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Hindi Gatha Saptashati

Chaturvedi,narmdeshwar · 2012/08

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विष्णुप्रिया के वरद पुत्र
तथा
वीणापाणि के श्रद्धालु सेवक
श्री पुरुषोत्तमदास टंडन 'राजामुनुआ'
को
4
सविनय

विषय-सूची
पृष्टसख्या
भूमिका उपश्म, प्रथ परिचय, गाथा कोश, उलयन, रचयिता,
रचनाकाल, पाठभेद क्रमभेद, टीकाएँ, गाथा सप्तशती के
कवि, निष्कर्ष, प्रथम प्रकाशन, भारतीय संस्करण, भाषा,
छद, उपसहार
प्रथम शतक
१
द्वितीय शतक .
तृतीय शतक
चतुर्थ शतक
७३
पञ्चम शतक
शतक
१२१
समम शतक.
१४५
परिशिष्ट ( क ) गायानुक्रमणिकादि
(ख ) कवि एव कवयित्री
(ग) प्रमुख प्राकृत शब्द-सूची
१७६
१८६

आभार-प्रदर्शन "हिन्दी गाथा सप्तशती' का प्रकाशन मेरे लिए एक साहसपूर्ण कार्य है, इसे मैं भलीभांति जानता हूँ। परनु यदि उद्देश्य महान है तो साहस से काम लेना ही चाहिए। लक्ष्य-मार्ग की बाधा अथवा कठिनाई को सोच कर कदम न उठा बैठ रह्ना न तो उपयोगी है, न वाछनीय । इसे इसी प्रेरणा का परिणाम समझना पाहिए। फिर मेरी अकेली शक्ति एव सामथ्र्य की यह देन नहीं है । पूर्ववर्ती लेखको को प्राय समस्त कृतियों ने किसी न किसी रूप में मुझे यथेष्ट सहायता पहुँचायी है । अतएव मैं उन सभी ससको अथवा टीकाकारो से उपकृत हूँ। पाठाश की पाण्डुलिपि तैयार करने में चि० विनोद तथा चि० नित्यानन्द तिवारी ने अपना यत्किचित् सहयोग दिया है जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। डॉ. देवीप्रसन मैत्र तथा उनके परिवार ने समय-समय पर जिस आत्मीयता के साथ मुझे निरापद स्थान में काम करने की सुविधा प्रदान की है उसके लिए मैं उनका ऋणी हूँ। परनु स्नेहमयी 'ज्वालामुखी' का सक्रिय सहयोग यदि न मिला करे तो मेरे सभी ऐने सकल्प मन के मन में ही रह जाया करे । अतएव जो सुख-दुख वा साक्षी एव भागीदार है उसे कैसे भुलाया जा सकता है। अन्त में मैं चि० मोहनदास एव चि० विट्ठलदास के प्रति अपना साभार मानता हूँ जिन्होंने धैर्य तथा उत्माह के माथ इमे प्रकाशित किया है । मुद्रण सम्बधो भूलो के लिए मैं क्षमाप्रार्थी है। ९८/४ए पुरुषोतमनगर, इलाहाबाद १ जनवरी १९६१ -नर्मदेश्वर चतुर्वेदी भूमिका उपक्रम प्राचीन भारतीय पामय अपने कलेवर में जितना ही विशाल एव विविध है, अंतरग दृष्टि से यह उतना ही गहन तथा गभीर है। मनद्रण अथरा फ्रान्तदर्शी ऋपियों की अंतर दृष्टि तथ्य विश्लेपण से अधिक तत्व चिन्तन पर ही केन्द्रित रही है। उनके चिन्तन का विपय चारो पुरपायों में से अधिकतर 'धर्म एव मोक्ष' ही रहा है। यद्यपि लौकिक जीवन का सम्बध-सूर प्राय 'अर्थ तथा काम' द्वारा ही सचालित होता है। फिर भी वहाँ पर धार्मिक अथवा आध्यात्मिक स्वर नितना मुखर है, उतना अन्यान्य नहीं। सामाजिक स्तर पर उसका अधिकाश एकागी तथा एकदेशीय है। यदि कहीं पर दृष्टि- प्रसार लक्षित होता भी है तो यह कीर्तिधयल उत्तुग शैल शिसरो पर ही अधिक टिका है, उन सकुल तमसावृत्त उपत्यकाओं में कम ही रम सका है जिस कारण, उनके आधार पर सम्पूर्ण सामानिक जीवन का विशद चित्र नहीं उभड पाता है। लौकिक जीवन का स्पष्ट परिचय हमे यहाँ पर नहीं मिल पाता, केवल इतस्तत उसका आभास मात्र मिलता है। उसमें से ऋपि तथा देव वर्ग के अतिरिक्त मनुष्य का जो रूप झलकता है वह अधिक्तर व्यक्ति का न होकर विभूति का है जन साधारण से भिन्न 'कुलीन एव सभ्रान्त' वर्गका प्रतिनिधित्व करता है । शेप दस्यु, देत्य तया म्लेच्छादि कोटि के कहला कर हेय अथरा तिरस्कृत ठहराये जाते है। यही नहीं, सभी युगों में दास प्रथा' भी किसी न किसी रूप में प्रचलित रही है।' ऐसे प्रथ जो लौकिक जीवन के अधिक निकट हैं बहुत थोडी सरया में सुलभ हैं। उनमें 'गाथा सप्तशती' का स्थान महत्त्वपूर्ण है, जहाँ मूलत लोक जीवन का सहन हास विनास, आहाद विपाद तथा 1 Dey Raj Chapada Slavery to Ancient Iodia, Peopels Pablo shing House Perrate Limited, New Delhi 1960 (२) रीति-नीति एवं आचार-विचार भी प्रचुर मात्रा में अभिव्यक्ति पा सका है। इसकी शेप बातें आनुषंगिक मात्र हैं जिनका पृथक् महत्त्व है। ग्रंथपरिचय 'गाथा सप्तशती' एक संग्रह ग्रंथ है, यह उसके प्रथम शतक की तृतीय गाथा' से स्पष्ट होते देर नहीं लगती। इसे कवियत्सल हाल ने कोटि गाथाओं से चयन करके प्रस्तुत किया था। उक्त तनीय गाथा में प्रयुक्त हालेण' शब्द का प्रयोग कतिपय दीकाकारों ने 'शालेण', 'शालयाहनेन' अथवा 'शालिवाहनेन' के रूप में किया है। हाल के रूप में 'शालवाहनेन अथवा शालराहन' शब्द के प्रयोग संभवतः प्राकृत रूपान्तर के कारण है । यह भी संभव है 'शालवाहन' शब्द 'सालाहण' अथवा 'हालाहण' से 'हाल' में परिवर्तित हो गया हो।' यद्यपि स्वर्गीय नाथूराम प्रेमी संदर्भगत 'सलाहणिजे' का अर्थ 'शालयाहन' न करके श्लाघनीय' करते हैं। ऐसा लगता है कि कतिपय टीकाकार इन तीनों ही नामों से परिचित रहे हैं, क्योंकि सन् १८७३ ईसवी में रावसाह्य विश्वनाथ मण्डलीक द्वारा 'गाथासप्तशती' की जो प्रति सुलभ हुई उसका नाम 'शालिवाहन सप्तशती' ही पाया गया जिसका समथन कतिपय अन्य उपलब्ध प्रतियों की अन्तिम गाथा से भी हुआ और जिसमें किसी कोश' का उल्लेस पाया जाता है।" ..सत्त सताई कहवच्छलेण कोडी मतभारम्भि । हालेण विरहाई सालाराग गाहाणं ॥३॥ २. हारोवेणीदपठो खटटुग्गलियाई तहय तालुति । सालाहणेग गहिया दहकोडीहिं च चठगाहा ॥ (प्रबन्धचिन्तामणि) ३. केशव स्मृति अंक, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, वर्ष ५६ अंक ३-४ संवत् २००८, पृ० २५३ । १. जर्नल अय रायलं एशियाटिक सोसायटी, यम्बई शाखा, खण्ड १०, संख्या २९, पृ० १२७-१३८ । ५. ऐसो कहणामकिय गाहा पडियद पहिआ मोओ। सच सभाओ समत्तो सालाहण विरइओ कोसो । तथा- Rar: Das Baptaçatstam; Verse 409.

गाथा कोश दण्डी ने सर्गबद्ध अथवा महाकाव्य के अंगीभूत जिन पद्य प्रथों का उल्लेख किया है उनमें कोश-ग्रंथ अद्वितीय है। उनके परवर्ती विश्वनाथ ने 'साहित्यदर्पण' के छठे अध्याय में कोशमंथ का लक्षण इस प्रकार दिया है "कोशःश्लोक समूहस्तु स्यादन्योन्यानपेमकः" अर्थात् कोश-काव्य के श्लोक परस्पर निरपेक्ष होते हैं। उपर्युक्त 'कोश' के सन्दर्भ में हमारा ध्यान सर्वप्रथम कोटि गाथाओं वाले 'गाथाकोश' की ओर आकर्षित हो जाता है जिसका उल्लेख संस्कृत साहित्य तथा प्राकृत सुभाषितों मे यत्र-तत्र पाया जाता है। वहाँ पर कवि एवं कोशकार के रूप मे 'हाल' की स्पष्ट चर्चा है । बाणभट्ट', उद्योतन सूरि', अभिनन्द, राजशेसर, हेमचन्द्र', जिनप्रभ सूरि , मेरुतुंग सोडूढल और राजशेसर सूरि' ने अपनी-अपनी रचनाओं में विशालकाय ग्रंथ 'गाथाकोश' की ओर इंगित किया है। इनकी रचनाएँ ईसा की सातवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दो के बीच की है। इस प्रसंग में यह सोचने का अवसर मिल जाता है कि 'गाथाकोश' अथवा 'गाथा सप्तशती' एक की न होकर दो विभिन्न रचनाओं की संज्ञाएँ है। कारण, 'गाथा सतशती' की गाथाओं की संख्या सात सौ निर्धारित है, जबकि विशालकाय 'गाथाकोश' की गाथाएँ करोड़ की संख्या में हैं । उद्योतन सूरि द्वारा उल्लिखित 'गाथा कोश' और राजशेखर द्वारा यर्णित 'गाथा संग्रह' अभिन्न प्रतीत होते है । मेरुतुंग ने 'प्रबन्ध चिन्तामणि' में जिस 'गाथा कोश' की चर्चा की है यह विचारणीय १. अविनाशिनमग्राम्यमकरोत् सातवाहनः । विशुद्धजातिभिः कोपरस्नैरिव मुभाषिते । (हर्षचरित) २. दलाल. काव्य मीमांसा, सम्पादकीय टिप्पणी, पृ. १२। ३. वहीं। ५. रामचरित ६९३ एवं २२११००। ५. कपूर मंजरी एवं सूमि मुस्तावली । ६. मभिधान रममाला; देसीनाम माला, वाद, गाया । ७. कल्प प्रदीप, ८. उदय सुन्दरी। ९. प्रवन्ध चिन्तामणि, अथ सातवाहन प्रयन्ध, पृ. 11-1 I .

है।' सातवाहन ने चार लास स्वर्ण मुद्राओं द्वारा 'गाथा चतुष्टय' को लेकर जिस 'सप्तशती गाथा प्रमाण' का 'संप्रद गाथा कोश' काशास्त्र तैयार कराया यह निश्चित रूप से 'चार गाथाओं का संग्रह मान न होकर चार भागों वाला 'गाथा कोश' हो सकता है जिसका समर्थन जिन- प्रभ सूरि की इस उक्ति द्वारा हो जाता है कि 'गाथा कोश' चार भागों में बॅटा था। परन्तु अभी तक किसी ऐसे संग्रह की प्रामि नहीं हो सकी है जिसके अभाव में भ्रमरश 'गाथा सप्तशती' को ही 'गाथा कोश' मान लेने की परम्परा चल पड़ी है। कृति एवं कृतिकार में नाम- साम्य होने के कारण यह भ्रान्त धारणा तथ्य रूप में स्योकार कर ली गई है जिसकी चपेट मे बड़े-बड़े टीकाकार तथा इतिहासन तक आ गए हैं और इसी को परवर्ती लेसकों तक ने दुहरा दिया है। उलझन फलस्वरूप 'गाथा सप्तशती' सातवाहन (प्रथम शताब्दी) की रचना मान ली गई है और उसके संदर्भगत उल्लेखों को तत्कालीन बतलाया जाने लगा है। कतिपय विद्वानों ने अन्तर्साक्ष्य के आधार पर शंका प्रकट करते हुए काल-निर्धारण सम्बंधी भिन्न भिन्न मत व्यक्त किया है। कीथ ने यदि उसे दूसरी से पाँचवीं शताब्दी के बीच का बतलाया है तो वेबर ने तीसरी तथा सातवीं शताब्दी के मध्य का । इसी प्रकार भाण्डारकर ने यदि उसे छठी शताब्दी का पाया है तो मिराशी' ने पहली से आठवीं शताब्दी तक का होने का अनुमान किया है और नीलकण्ठ शास्त्री ने दूसरी-तीसरी शताब्दी के पक्ष में अपना .. चतुरविंशति प्रबन्ध, ज. रा. ए. सो. बम्बई शाखा, खंड १. पृ० १३५ २. कीथ : संस्कृत साहित्य का इतिहास, पृ. २२४। ३ वेबर : Das Saptacatalau Des Hala (1801) Introduction, P.xxll ४. भाण्डारकर डी. भार०: विक्रम संवत् , भाण्डारकर स्मारक ग्रंथ, पृ०१८९॥ ५. इण्डियन हिस्टॉरिकल कार्टरली, दिसंबर १९४७, खंड २३, पृ. ३००.१० ६. नीलकण्ठशास्त्री के. ए. ए हिस्ट्री अव साउथ इण्डिया, ऑस्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पृ. ९० एवं ३३०। (

मत व्यक्त किया है। परन्तु किमी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के
पूर्व और अधिक उहापोह कर लेना अभीष्ट है।
4
रचयिता
'गाथा सप्तशती' के रचयिता पर विचार करते समय जब हम
कोशकार सातवाहन की विशेषताओं पर ध्यान देते हैं तो कुछ स्पष्ट
भेद लक्षित होने लगते है। कोशकार हाल का जैनमतावलम्बी होना
प्रसिद्ध है, यद्यपि इसका कोई पुष्ट प्रमाण नहीं है, केवल जैन ग्रथों में
उनका उल्लेस मार है, जबकि 'गाथा सप्तशती' का रचयिता शैर है और
यह बात मगलाचरण वाली गाथा से ही स्पष्ट होते देर नहीं लगती।'
कोशकार हाल का उल्लेख जैन प्रबन्धों मे तो पाया ही जाता है इसके
अतिरिक्त यह कई जैन तीर्थों का उद्धारक तथा प्रनिपालक कहा गया
है। सस्कृत एवं प्राकृत साहित्य मे ऐसे सन्दर्भ आते हैं जिनसे
कोशकार सातवाहन दानी, धर्मात्मा, पराक्रमी, लोकहितैपी एव विद्या-
नुरागी जान पड़ता है । उसकी तुलना भोन और मुज आदि से की गई
है। चाणभट्ट ने नो उसे 'विसमुद्राधिपति' की सज्ञा से विभूपित
किया है। हेमचन्द्र और मेरुतुग ने उसे नागार्जुन का शिग्य बतलाया
है जो उसका समकालीन था। इसके विपरीत 'गाथा सप्तशती' का
रचयिता हाल विलासी रुचियाला और प्राकृत प्रेमी शृगारी करियों का
आश्रयदाता है। इसके अतिरिक्त 'गाथा सप्तशती' मे जो रचनाएँ
सकलित है उनका रचना काल भी विचारणीय है।
रचना काल
प्रथरचना फाल निर्धारित करते समय जब-हमारा ध्यान तत्का-
लीन धानिक परिस्थिति की ओर जाता है तो हमें यह देख कर
आश्चर्य होता है कि प्रथ मै पैद्धधर्म को यथेष्ट महत्व नहीं दिया
गया है। इसके विपरीत यदि उसका कहीं उल्लेस हुआ भी है तो
१ पसुवइणो रोसारणपडिमासात गोरिमुहाद।
गहि अघ पक्ष्व विअ सासलिलेजलि णमह ॥1॥

यह सम्मान सूचक कदापि नहीं है। जबकि बौद्धधर्म के लिए प्रथम शताब्दी उत्कर्ष काल ठहराया जा सकता है। अशोक का शासन काल घौद्धधर्म के प्रचार एवं प्रसार का युग रहा है ऐसे समय की रचना में उक्त धर्म का इस प्रकार का उल्लेख होना स्वाभाविक नहीं प्रतीत होता है। इसके विपरीत यहाँ पर राधा, कृष्ण, हर, गौरी, गणेश, वामन, फालिका, सरस्वती और लक्ष्मीनारायण आदि की अधिक चर्चा है। यहाँ पर पौराणिक देवी-देवताओं का ही प्राधान्य है जो उस युग की प्रवृत्ति के अनुरूप नहीं है। ऐसी दशा में अनुमान करने का आधार मिल जाता है कि 'गाथा सप्तशती' गुप्तकाल अथवा उसके बाद का संग्रह है जैसा कि श्री मथुरानाथ शास्त्री ने भी अपनी भूमिका में संकेत किया है। पहिसाक्ष्य के आधार पर यह विचारणीय है कि प्राचीन लेसको द्वारा जहाँ-कहीं 'गाथाकोश' का उल्लेख हुआ है, वहाँ पर 'गाथा- सप्तशती' का नाम नहीं आया है। इसी प्रकार संकलित गाथाओं की सात सौ संख्या का उनमें कहीं उल्लेस नहीं मिलता है। दसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक यही स्थिति है। हेमचन्द्र, जिनप्रभ सूरि और राजशेखर सूरि आदि ने भी 'गाथाकोश' का ही नाम लिया है। चौदहवीं शताब्दी के मेरुतुंग ही सर्वप्रथम लेखक हैं जिन्होंने 'गाथा सप्तशती' का नामोल्लेख किया है। ऐसा लगता है कि 'गाथा सप्तशती' को यहीं से सातवाहन संकलित 'गाथाकोश' बतलाने की भूल आरंभ हुई है। मेस्तुंग ने जिस 'गाया चतुष्टय' का उल्लेख किया है उससे 'गाथा सप्तशती' की संगति नहीं धैठती है। 'गाथा सप्तशती' को प्रथम शताब्दी का संग्रह मानने में एक अन्य बाधा भी है वह यह कि उसके बाद गोवर्धन की 'आर्या सप्तशती' के रचनाकाल बारहवीं शताब्दी तक किसी अन्य सप्तशती का पता नहीं चलता है। श्री मथुरानाथ शास्त्री ने अपनी भूमिका में यह दिखलाने का यन किया है कि 'आर्या सप्तशती' की कई गाथाओं पर 'गाथा समशती' का स्पष्ट प्रभाष है। इससे यह भनुमान करने का और अधिक अवसर मिल जाता है कि 'गाथासप्तशती' दसवीं-बारहवीं शताब्दी के बीच का संकलन है। १. कीरमुहसच्छहेहि रेहइ पमुहा पलासकुसुमेहि । बुद्धस्य बलगवन्द पदिएहिं व भिश्तुसंवहिं Men पाठमेद उत्तर तथा दक्षिण भारत में 'गाथा सप्तशती' की कई प्रतियाँ उपलब्ध बतलायी जाती हैं। वेबर ने प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर पाठों को शोधने के लिए नियम (Vorrort, p.XXVII) बनाया जिसके अनुसार चार सौ तीस गाथाओं के पाठ परस्पर मिलान के बाद निर्धारित हुए, किन्तु मूल 'गाथा सप्तशती' की संख्या इससे कहीं अधिक है। कवियत्सल हाल ने कोटि गाथाओं में से सात सौ गाथाओं को चुन कर संकलित किया अथवा फरवाया था । अतएव मूलतः सात सौ से कम गाथाएँ नहीं होनी चाहिए। क्रमभेद 'गाथा सप्तशती' की उपलब्ध प्रतियों की गाथाओं के क्रम में एकरूपता नहीं है। प्रतिलिपि करने अथवा कराने वालों ने मनमानी रीति से उन्हें क्रमबद्ध कर दिया है। कहीं-कहीं अन्यान्य प्रचलित गाथाओं तक का उनमे समावेश किया गया मिलता है। वेयर वाले संस्करण की उत्तरार्द्ध याली गाथाओं में से कई परवर्तीकालीन हैं। लोकप्रिय गाथाओं के मूल रूप मे हस्नलिसित न होने के कारण पाठभेद के साथ-साथ क्रमभेद के भी अधिक अवसर उपस्थित हुए हैं। टीकाएँ आफ्रेट के अनुसार 'गाथा सप्तशती' की लोकप्रियता का पता उसकी टीकाओं की संख्या से चल जाता है। कुलनाथ, गंगाधर, पीतांबर, प्रेमराज, भुवनपालन और साधारण देव ऐसे ही टीकाकार हैं। इनके अतिरिक्त पीतांबर की टीका में भट्ट, चैतन्य, फुलपति, भट्टराघव और भोजराज के नामोल्लेख हैं। डॉ० भाण्डारकार ने किसी आजड का टीकाकार रूप में नाम गिनाया है। पंजाब विश्वविद्यालय 4. Report on the Search for Sanskrit Manuscripts daring the Years 1887-91, P.26.

(८) के पुस्तकालय में माधवरान मिश्र लिसित 'तात्पर्य दीपिका' नामक हस्तलिसित टीया सगृहीत है ।' पडित मथुरानाथ शास्त्री की टीम आधुनिक है । गगाधर तथा पीतायर की टीकाएँ पूर्ववर्ती हैं जिनका उल्लेस शास्त्री जी ने किया है। इनमे से भुवनपाल जैन और प्रेमरान सहगल (सहगिल) सत्री हैं, क्षत्रिय नहीं जैसा कि अन्यत्र कहा गया है। वेबर के अनुसार 'गाथा सप्तशती' की सात प्रतियाँ और तेरह टीकाएँ उपलब्ध हैं। 'व्यगच सर्वकपा' एक मिन टीका है। गाथा सप्तशती के काय 'गाथा सप्तशती' की सभी प्रतियों में संकलित गाथाओं में एक रूपता नहीं है । चार सौ तीस गाथाओं में ही समानता है, शेप में विविधता है। इनके रचयिताओं के भी उल्लेख प्राय मिल जाते हैं। फिर भी कई प्रतियों में फवियों के नाम परस्पर नहीं मिलते । भुवनपाल की टीका में इन रचयिताओं की सरया ३८४ तक पहुँच जाती है। बगाल से ताडपन पर लिसित एक खण्डित प्रति प्राप्त हुई है निसमें चार सौ तीस गाथाएँ सफलित है और जो सभी उपलब्ध प्रतियों में एक सी है । इस प्रकार लगभग दो सौ सत्तर अथया इनसे अधिक गाथाओं मे ही हेर फेर है। कवियों की नामावली पर विचार करते समय यह स्पष्ट होते देर नहीं लगती कि इनमें से अधिकाश का समय प्रथम शताब्दी के बाद का है और यह उन चार सौ तीस मूल गाथाओं के कवियों पर भी लागू होता है। इसलिए यह मानने का सबल कारण है कि मूल में ही इन कवियों की रचनाओं को सकलित कर लिया गया है। इससे काल निर्णय घरने में भी सहायता मिलती है। मूल 'गाथा सप्तशती जगदीश लाल Gstha Supfa Sati, Introduction, ps २ वेघर Das Saptacatakam Des Hala, XXTHI Indis he Studen II p" ३ वेबर Das Saptacatakam Des Hala (1681) P YY III मिराशी The Date of Gatha Saptarati Iod an Historical Quarterly, Dec 1947 के कतिपय रचयिताओं के कालकमादि पर यहाँ विचार पर लेना उपयोगी है जो इस प्रकार है- (१) प्रवरसेन : भुवनपाल की टीका में इन्हें प्रपर, प्रवररात अथवा प्रवरसेन कहा गया है। पीतांबर की टीका में भी इनका उल्लेस है। यही यात निर्णयसागर प्रेस वालं संस्करण में पायी जाती है। इन्हे प्राकृत काव्य 'सेतुबन्ध' और 'रापण यहो' का रचयिता बतलाया जाता है। माण, दण्डी तथा आनन्दमर्द्धन के उल्लेसों के आधार पर इनका समय सातवीं शताब्दी से पूर्व होना चाहिए। यदि इन्हें हम वाराटक वंशीय द्वितीय प्रवरसेन मान ले तो यह समय पाँचवीं शताब्दी का हो सकता है जो कश्मीर नरेश प्रवरसेन का समसामयिक भी कहला सकता है। (२) सर्वसेन : भुवनपाल और पीताबर की टीकाओ मे इनका नाम मिलता है। दण्डी ने 'अन्ति सुन्दरी' मे प्राकृत काव्य 'हरि विजय' के रचयिता को राजा बतलाया है। यह वाकाटक वशीय वत्सगुल्म शारसा का सस्थापक हो सकता है जो प्रथम प्रवरसेन के पुनो मे से एक था। इसका उल्लेस इसके पुन द्वितीय विन्ध्यशक्ति के वसीम ताम्रपत्र तथा अजन्ता की १६ सरयक गुफा में पाया जाता है। सरसेन का समय चौथी शताब्दी का द्वितीय चरण है। (३) मान . मिराशी इन्हें राष्ट्रस्ट यश का संस्थापक मानाङ्क मानते है जिनका समय चौथी शता दी के उत्तरार्द्ध का मध्य है। सतारा जिला का मान अथवा मानपुर इस घराने का मुरय स्थान है। कर्नल टॉड को मोरी राजा मान का एक शिलालेस मानसरोवल मील (चित्तौड ) से भी प्राप्त हुआ था। (४) देव अथया देवराज • इसे मिराशी राष्ट्रकूट वंशीय मानाङ्क का पुत्र बतलाते है जिसके दरबार मै कालिदास को चन्द्रगुप्त द्वितीय ने दौत्य कार्य करने के लिए भेजा था। इस राजा का उन्लेस राष्ट्रकूट घश की दो ताम्रलिपियों मे हुआ है। ये दोनो पिता पुन मुक्तक-याव्य के रचयिता तथा प्राकृत कविता के प्रेमी थे। 'देसीनाममाला' में देसी नामो के किसी कोश की चर्चा है जो देवराज कृत बतलाया जाता है। नी-दसवीं शताब्दी के शिलालेखों में भी इस नाम के अन्यान्य राजाओं रे उल्लेख पाये जाते हैं। 1 (१७) (५) याक्पतिराज : यह महाराष्ट्रीय प्राकृत काव्य 'गउडवहो' तथा 'मधुमयन विजय' का रचयिता समझा जाता है । इसकी चर्चा आनन्द. यर्द्धन, अभिनयगुण और हेमचन्द्र ने भी की है। कन्नौज के प्रतिहार राजा यशोवर्मन का यह राजकरि था और 'याक्पतिराज' परमार राजा मुंज का एक विरुद भी था। भरभूति का यह समसामयिक है। यह आठी शताब्दी के उत्तरार्द्ध का ठहरता है। (६) कर्ण अथवा कर्णराज : अकोला जिले के तरहला प्राम से इस नाम के कई सिफे मिले हैं। मिराशी के अनुसार यह सातवाहन यशीय एक राजा है जिसका समय तीसरी शताब्दी का द्वितीय चरण है। (७) अयन्तिवर्मन : यह नवीं शताब्दी का प्रसिद्ध कश्मीर नरेश है जिसके दरबार में धन्यालोक' के प्रणेता आनन्दवर्द्धन रहते थे। (८) ईशान : यह बाणभट्ट का मित्र तथा समसामयिक प्राकृत का प्रसिद्ध कवि था जिसका नामोल्लेस 'कादम्बरी' में पाया जाता है। इसका समय सातवीं शताब्दी या पूर्वार्द्ध है। (६) दामोदर : यह आठवीं शताब्दी के कश्मीर नरेश जयपीड का प्रधान मंत्री हो सस्ता है जो 'कुट्टनीमतम्' का रचयिता यतलाया जाता है। उसमे 'रनावली' की कथा और एक पद्य पाया जाता है। (१०) मयूर : बाणभट्ट ने इसे प्रारत भाषा का कवि और अपना श्वसुर बतलाया है । इसलिए इसका समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध होना चाहिए। (११) बप्प स्वामी : यह प्रसिद्ध कवि तथा जैन आचार्य समझा जाता है जो प्रतिहार राजा नाग वा लोक अथया द्वितीय नागभट्ट का मिन एवं समसामयिक था। चन्द्रप्रभ सूरि की रचना 'बप्पट्टि चरित' (प्रभावक चरित ) मे इसका उल्लेख मिलता है। इसका समय नवी शताब्दी का पूर्वार्द्ध होना चाहिए | (१२) बल्लभ अथवा भट्ट वल्लभ · आनन्दवर्द्धन कृत 'देवीशतक' की टीका मे कैय्यट ने अपने को वल्लभदेव का पौन कहा है जिसका समय दसवीं शताब्दी का चतुर्थ चरण है। अपनी रचना 'भिक्षाटन' काव्य में कवि ने पूर्ववर्ती करि कालिदास तथा बाणभट्ट की चर्चा की है । इस प्रकार इसका समय आठवी-नवीं शताब्दी हो सकता है।

(१३) नरसिंह : शाईघर पद्धति एवं 'धन्यालोक' की टीका में इस करि के कई श्लोकों का पता चलता है। यह सोलंकी राजा भी हो सकता है जो धारवार जिले का निवासी था। दसौं शताब्दी के ऋषि पंप रचित 'विक्रमार्जुन विजय' में इस वंश के दस राजाओं का उल्लेस मिलता है। इस नामावलि मे नरसिंह नामक दो राजा है। कषि पंप द्वितीय नरसिंह का समसामयिक था। कन्नौज नरेश यशो- वर्मन का उपनाम 'नरसिंह' कहा गया है। (१४) अरिकेसरी : यह नरसिंह का पुत्र समझा जाता है । द्वितीय अरियेसरी कवि पंप का समसामयिक है। (१५) वत्स, वत्सराज अथवा पत्स भट्टी: नीं शताब्दी में कनौज के गुर्जरप्रतिहार वशीय वत्सराज नामक राजा रहा है। पाँचयों शताब्दी का 'मदसोर प्रशस्ति' का रचयिता वरसभट्टी इन गाथाओ का रचयिता हो सकता है। इस अवधि के भीतर इस नाम के कई व्यक्ति अथरा राजा हुए है जो हर हालत मे परवर्ती कालीन है। (१६) आदि वराह · नवीं शताब्दी की ग्वालियर प्रशस्ति में प्रतिहार राजा भोजदेव का उपनाम 'आदि वराह' दिया गया है। बहुत संभव है कि यही यह कवि है। (१७ ) माउरदेव · स्वयंभू प्राकृत साहित्य का प्रख्यात जैन लेखक है जो अपने को भापा-कवि माउरदेय का पुन बतलाता है । 'पउम चरिउ', 'पंचमी चरिउ' तथा 'रिट्टनेमि चरिउ' इसकी प्रसिद्ध रचनाएँ है। इसके एक व्याकरण की चर्चा मिलती है जो न तो प्रसिद्ध है, न उपलब्ध । प्राकृत भाषा के छद पर इसकी किमी रचना का पता नहीं चलता है । इसका समय सातवीं-आठवीं शताब्दी संमर जान पड़ता है। (१८) पिअट्ठ (विअडइन्द्र) स्वयभू के प्रथों मे प्राकृत तथा अपभ्रंश के कवि रूप में इनका उल्लेख मिलता है। इनका समय छठी- सातवीं शताब्दी हो सकता है। (१६) धनञ्जय : इस नाम के दो करि रिख्यात है। एक मालगा नरेश मुंज परमार का दरवारी कवि था जो भोज तथा सिन्धुल का समसामायिक था। एक अन्य धनञ्जय नामक लेसक का सस्कृत श्लोक 'धवला' टीका मै उद्धृन है जो धनञ्जय 'नाममाला' का ही है। यह मस्कृत का महानि है जिसका 'द्विसधान' महाराव्य 'काव्यमाला' में (१२) प्रकाशित है। 'नाममाला' कोश प्राकृत का नहीं, संस्कृत का कोश है।' धवला टीका आठवीं शताब्दी की है। इस प्रकार ये दोनों कवि छठी से दसवीं शताब्दी के बीच के हैं। (२०) कविराज : कन्नौज के विख्यात कवि राजरोसर का विरुद है। राजशेखर प्राकृत का कवि तथा विद्वान था। 'कर्पूर मञ्जरी', 'काव्य मीमांसा' तथा 'सूक्तिमुक्तावली' आदि इसकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। इसका समय नवीं-दसवीं शताब्दी है। (२१) सिंह : नवीं शताब्दी के प्रथम चरण में गुहिलोत वंशीय इस नाम का राजा था। दसवीं शताब्दी के शक्ति कुमार के आहाड़ से उपलब्ध एक शिलालेख मे इसकी प्रथम भर्तृपद के पुत्र रूप में चर्चा है । 'पाटसू प्रशस्ति" में इसे ईशान का अग्रज कहा गया है । (२२) अमित (गति): यह संस्कृत भाषा का कवि और माथुर संघ का जैन मुनि है । इसके संस्कृत ग्रंथ प्राकृत के संस्कृत रूपान्तर मान हैं। मालवा के मुंज परमार के दरबार में इसे सम्मान प्राप्त था । इसका समय दसवीं शताब्दी है। (२३) माधयसेन : यह अमित गति का गुरु है । परन्तु इसका कोई ग्रंथ नहीं मिलता। संभव है स्फुट रचनाएँ करता रहा हो । (२४) शशि प्रभा : परमार राजा मुंज तथा उसके उत्तराधिकारियों के दरबारी पद्मगुप्त ने अपनी रचना 'नवसाहसांक चरित' में राजा सिन्धुल की रानी शशिप्रभा का उल्लेख किया है। संभव है यही वह कवयित्री हो। (२५) नरवाहन : मेवाड़ के गुहिलोत वंशीय राजा सिंह के उत्तरा- धिकारियों में यह नाम पाया जाता है। इसका दसवीं शताब्दी का एक १. स्वर्गीय नाथूराम प्रेमी द्वारा डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल को लिखा गया पत्रांश जो नागरी प्रचारिणी पत्रिका वर्ष ५७, अंक २-३, संवत् २००९ में पृ० २७३-७४ छपा है। २. दलाल : काव्यमीमांसा की भूमिका, पृ० ३२ । ३. इण्डियन ऐण्टिकेरी, खण्ड ३९, पृ० १९१ । ४. एपिग्राफिया इण्डिका, खण्ड १२, पृ० १३-१७ । ५. नाथूराम प्रेमी : जैन साहित्य और इतिहास, पृ० ८३, २५७ शिलालेख उदयपुर के पास एकलिंग स्थान से मिला है।' आहाड़ फे शिलालेख मे इसे शालिवाहन का पिता सूचित किया गया है। उपर्युक्त विवरण द्वारा 'गाथा सप्तशती' का रचनाकाल निर्धारित करने में यथेष्ट सहायता मिलती है और यह स्पष्ट होते देर नहीं लगती कि वर्तमान रूप मे 'गाथा सप्तशती' घस्तुत' 'गाथा कोश' से भिन्न पनि है । इस प्रकार इसका परवर्ती कालीन होना भी निश्चित हो जाता है। फिर भी यह जानना शेप रह जाता है कि यह सातवाहन वंशीय कोश. कार हाल से भिन्न हाल कौन और कहाँ का है जो शेष राजा भी है। निष्कर्ष 'गाथा सप्तशती' का सकलनकर्ता निश्चय ही कुशल करि अथवा काव्य मर्मज्ञ रहा होगा। ध्वन्यालोक, तल्लोचन, काव्य प्रकाश तथा सरस्वती कण्ठाभरण आदि ग्रंथों में गाया कोश' की कई गाथाओ को उद्धृत किया गया मिलता है। इससे पता चलता है कि यह काव्य. प्रेमियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय रहा है। ऐसा लगता है कि उसके अधिक्तर शृगारी गाथाओं का चयन करके यह समह ग्रंथ तैयार किया गया है जिसकी पुष्टि तीसरी गाथा द्वारा हो जाती है। परवर्ती टीकाकारों ने गाथा कोशकार 'हाल' (सातवाहन, शालवाहन) और 'गाथा सप्तशती' के संकलनकर्ता को अभिन्न मानकर दोनों की ही गाथाओं को हाल नाम से सम्बद्ध कर दिया है । यद्यपि अपवाद स्वरूप 'शाल' अथवा 'शालिवाहन' पाठ भी मिल जाते हैं। पीताबर की टीका में कई स्थलों पर हाल के स्थान पर शाल- चाहन कर दिया गया है जो गाथाएँ गाथा कोशकार हाल सातवाहन १ जर्नल रॉयल एशियाटिक सोसायटी, बम्बई शाखा, खंड २२, पृ०१६६-६७) २ सत्त सताइ कइबाहरण कोडीम मारस्मि । हारेण विरहाइ साराराण गाहाण ॥ ३ ॥ साकृत रूपान्तर- समशतानि कविवन्सलेन कोटेमध्ये। हालेन विरचितानि सालङ्काराणा गाथानाम ॥

(१४) की न होकर 'गाथा सप्तशती' के संकलनकर्ता शालिवाहन की हो सकती हैं। इस टीका में जिन कई गाथाओ का रचयिता 'शालवाहन' है यह निर्णय सागर प्रेस वाले संस्करण मे हाल' द्वारा रचित नहीं बतलाया गया है। इससे यह अनुमान करने का आधार मिल जाता है कि गाथाओं के रचयिताओं का नाम देने मे टीकाकारो से भूलें हुई हैं । कवियों की नामावली मे भी पाठभेद है और उनकी गाथाओ में भी क्रमभेद हुआ है तथा कई गाथाओं मे कवियों के नाम तक नहीं हैं। फिर भी 'गाथा कोश' की कई गाथाएँ 'गाथा सप्तशती में समाविष्ट हैं। प्रथम शतक की प्रारंभिक तीन गाथाएँ और अन्य तकों के आदि एवं अन्त की अथया कुछ अन्य गाथाएँ 'गाथा सप्त- शती' के 'शालिवाहन' की है जिनका शालवाहन' पाठान्तर उपलब्ध है। शेष गाथाएँ जो हाल नाम के साथ अकित है वे दाक्षिणात्य सातवाहन 'हाल' की रचनाएँ है जो 'गाथा कोश' से ले ली गई जान पडती हैं। 'गाथा सप्तशती' मे सातवाहन 'हाल' के राजकवि 'पालित' तथा 'गुणाढ्य' की भी कुछ गाथाएँ शामिल है। यह उल्लेखनीय है कि 'गाथा सप्तशती' में कहीं भी 'हाल' का 'सातवाहन रूप मे उल्लेस नहीं मिलता। गाथाओं में उल्लिखित विषय एवं शन्दादि से उनके रचयिता का दाक्षिणात्य अथवा महाराष्ट्री होने का अनुमान होता है। परन्तु इसके विपरीत अन्य गाथाओं में यमुना तथा मानसरोवर का भी नामोल्लेख हुआ है। यही नहीं अन्य कई ऐसे वर्णन मिलते है जिनका उत्तरी भारत की रीति-नीति से भी साम्य है । इसलिए यह भी ध्यान देने योग्य है । परन्तु दसवीं शताब्दी का शैवमतावलम्बी शालिवाहन नामक राजा जिसके सरक्षण मे 'गाथा सप्तशती' का संकलन हुआ है वह मेवाड़ का गुहिलोत वशीय राजा नरवाहन का पुन शालिवाहन हो सकता है। उसका शासन काल १७२-७७ ईसवी के आस-पास है जिसका पुत्र एवं उत्तराधिकारी शक्तिकुमार था! मेवाड़ का राजवंश १.मिराशी : The Date of Gathsaptasti, Indian Historical Quarterly, 1947. २. गौरीशंकर हीराचन्द भोझा : राजपूताने का इतिहास, खण्ड १, पृ०५३०-३३ ।

परम्परा से ही पाशुपत शैवमत का अनुयायी है। राजा शालिवाहन विलासी प्रकृति का था और उसका अत भी दुश्चरित्रता के ही कारण हुआ। इस प्रकार राजकुल मे इसका स्थान गौण बन गया और उसका उल्लेख केवल १७७ ईसवी की आहाड अथवा ऐतपुर प्रशस्ति मे ही हो सका । आवू, चित्तौड़ तथा रणपुर की प्रशस्तियो की वंशावली मे उसका नाम तक नहीं मिलता गाथा कोशकार सातवाहन हाल के नौ शताब्दियों बाद मेवाड़ नरेश शालिवाहन का ही नाम आता है जिसकी राजधानी आहाड अथवा आड (प्राकृत मे आल्य) रही है। इसका घशावशेष अय भी उदयपुर के पास देखा जा सकता है। इसी समय के आस-पास मालवा नरेश परमार राजा मुंज ने आक्रमण द्वारा आहाड़ को ध्वस्त कर चित्तोड को हस्तगत कर लिया था। इसी आहाड के आधार पर इन नरेशों को आहाडिया कहने की परम्परा थी। यह स्थान तीर्थ- स्थान भी रहा है। बहुत दिनों तक दोनों शालिवाहन (गुहिल तथा सातवाहन) भ्रमश एक ही समझे जाते रहे जिसका निराकरण स्वर्गीय ओमा जी ने किया था। इस भ्रान्ति को पुष्ट करने मे जिनप्रम सूरि तथा राजशेखर सूरि ने भी योगदान दिया था । परन्तु जिनप्रभ सूरि यह लिखना भी नहीं भूले कि यदि कहीं कोई असंभाव्य बात आ गई हो तो उसका दायित्य उन पर नहीं, 'पर-समय पर है क्योंकि जैन कभी असगत बात नहीं कहते । फिर भी शका हो सकती है कि मेवाड मे प्राकृत भाषा का प्रचलन था भी अथवा नहीं । तथ्य यह है कि गुप्त साम्राज्य के अवसान के घाट सातवीं से दसवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत में प्राकृत का प्रचार अपने उत्कर्ष पर था। ग्यारहवी शताब्दी के राजा भोज ने अपनी रचना 'सरस्वती कण्ठाभरण' में लिखा है कि "आध्यरान के राज्य १. एपिमाफिला इण्डिका, खण्ड १० श्लोक १०, पृ. २० । २.भत्र च यदसम्भाव्यं तत्र परसमय एव । मन्तव्यो हेतुर्यखासगतवारजनो जैन ।

में कौन प्राकृतभापी तथा साहसाक के समय मे कौन संस्कृनभापी नहीं हुआ ?" आध्यराज को लेकर विद्वानों में काफी मतभेद रहा है और घाण फा एक शोक टीकाकार शकर के कारण विवादास्पद बना रहा । किन्तु डा. हाजरा ने अपने एक लेस द्वारा इसका निरापरण कर दिया। उनके अनुसार पाण ने सम्राट हर्प लिए आढ्य- राज का प्रयोग किया है। अतएर प्राकृत-प्रेमी आढ्यराज शालि- वाहन ही हो सकता है जिसका उल्लेख 'सरस्वती कण्ठाभरण' में हुआ है। इस प्रकार यह आन्धराज मेवाड़ नरेश गुहिल शालिवाह्न का ही रितद होना चाहिए । सातवाहन हाल के लिए आध्यराज कहा गया कहीं नहीं मिलता। भापा-विज्ञान की दृष्टि से प्राकृत एवं अपभ्रश के प्रभाव तथा प्रचलन के कारण 'श' का 'ह' उच्चारण हो जाना सम्भव है। अतएव शाल का हाल हो जाना असभाव्य नहीं है। श्री मिट्ठन लाल माथुर ने अपने एक निबन्ध में इन प्रश्नों पर विस्तार पूर्वक विचार किया है। उनका निष्कर्ष है कि "दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध मे किसी प्राकृत प्रेमी शैव राजा ने छह अन्य दरबारी कवियों की सहायता से अपनी शृगारी मनोवृत्तियों के अनुकूल प्राचीन एवं समकालिक प्राकृत कवियों की रचनाओं में से ७०० मुक्तक गाथाएँ चुनकर 'गाथा सप्तशती' या 'शालिवाहन सप्तशती' नाम से पहली पार सगृहीत की 113 प्रथम प्रकाशन 'गाथा सप्तशती' को सर्वप्रथम प्रकाश में लाने का श्रेय वेबर को talam Des Hala नामक मथ प्रकाशित कराया था जिसमें तीन १ केऽभूवनायरानस्य राज्ये माकृत भाषिण । काले श्री साहसाकस्य के न सस्कृतवादिन । २ डॉ. भार०सी० हाजा इण्डियन हिस्टॉरिक्त कार्टरहरी, जून १९४९ पृ. १२६-२८॥ ३ नागरी प्रचारिणी पत्रिका पर्प५६ अङ्क ३-४ सवत् २००८, पृ. २७४ ।

( १७ ) सो सत्तर गाथाएँ संगृहीच थीं। सन् १८७२-७४ ईसी में और अधिक गाथाएँ उपलब्ध हुई जिन्हें उन्होंने Zeitschrifter Deutschen Morgen Landischen Gasellschaft (26 : pp 735 foll ) में प्रकाशित कराया। परन्तु 'गाथा सप्तशती' की सम्पूर्ण प्रति सन् १८८१ ईसयी में लिाप्जग से ही प्रकाशित हुई जिसका नाम Das Saptaca. takam Des Hala था। उन्होंने पुस्तफ को शुद्ध पनाने के लिए अनेक हस्तलिखित प्रतियों का उपयोग किया था और साधारणदेव की 'मुक्तारली' नामक टीका फी 'मज्या पद्धति' से काम लिया था तथा कुलनाथ, गंगाधर एवं पीतांबर की टीमाओं से भी सहायता ली थी। 'ज्या पद्धति' उत्तरकालीन है । 'बजालग्ग' में कहा गया है कि- एकत्थे पत्थावे जत्थ पढिजन्ति पउर गाहाओ। तं सलु पजालग्गं यज्ञ ति य पद्धई भणिया ।। 'प्रज्या' अर्थात् विपय फ्रम से संग्रह करने की पद्धति । डॉ थामस ने 'कवीन्द्र वचन समुच्चय' की प्रस्तावना मे चना, प्रज्या और वर्ग को समानार्थी शब्द माना है।' भारतीय संस्करण परन्तु भारतवर्ष मे 'गाथा सप्तशती' को सर्वप्रथम सन् १८५ ईसपी में निर्णय सागर प्रेस, बम्बई से प्रकाशित कराने का श्रेय 'काव्यमाला' सम्पादक पण्डित दुर्गा प्रसाद शर्मा तथा पणशीकर शास्त्री को है । यह सस्करण निर्णय सागर प्रेस, बम्बई द्वारा प्रकाशित 'काव्यमाला' (प्रमांक २१) में मुद्रित हुआ था जिसमें गंगाधर भट्ट की 'भारलेश प्रमाशिका' टीका भी सम्मिलित है । इसे तैयार करने में चार हस्तलिसित प्रतियों की सहायता ली गई थी जिनके आधार पर पाठभेद भी दे दिया गया है। सम्पादक द्वारा संस्कृत प्रस्तावना के अतिरिक्त अकारादि प्रम से गाथाओं की अनुक्रमणिका भी दी गई है। सन् १९११ ईसवी में इसकी द्वितीयावृत्ति हुई थी। पंडित मथुरानाय शास्त्री ने इसका प्रकाशन संस्कृत छाया, विस्तृत प्रस्तावना तथा टीका सहित निर्णय सागर प्रेस, बम्बई से कराया था जिसकी तृतीयावृत्ति %. Ed. P. 11. Thomas : Bibliotheca Indics, Vo 1309.

सन् १९३३ ईसवी में हुई थी। इस सस्करण के बाद पञ्जाय विश्वषि- द्यालय के पुस्तकालय में सगृहीत हस्तलिखित प्रति की सहायता लेकर जगदीशलाल जी ने पहले ओरियटल कालेज मेगजीन में और तदनन्तर सन् १९५० ईसयी में लाहोर से हारिताम्र पीताबर की टीका सहित पुस्तक रूप में प्रकाशित कराया था जिसके आरभ में विवेचनात्मक प्रस्तावना तथा अन्त में अकारादि क्रम से गाथासूची सम्मिलित है । यह सयोग की बात है कि सन् १९५६ ईसवी मे लगभग एक साथ ही कलकत्ता से श्री राधागोविन्द बसाक द्वारा बगला सस्करण और पुणे से श्री सदाशिव आत्माराम जोगलेकर द्वारा मराठी संस्करण सुसपादिन होकर प्रकाशित हुए है । निस्सन्देह आज तक हिन्ही पाठको के लिए ऐसे महत्त्वपूर्ण अथ का कोई हिन्दी सस्करण सुलभ न होना चिन्त्य रहा है। भाषा महाराष्ट्रीय प्राकृत मे 'गाथा सप्तशती' की रचना हुई है। प्राकृत भाषा के कई रूप है जो देशकालादि के अनुसार परिवर्तित होते रहे हैं। 'काव्यालकार' के टीकाकार नमि साधु ( १०६८ ईसवी) ने "प्रकृतेति । सकलजगज्जन्तूना व्याकरणादिभिरनाहित सस्कार सहजो पचन व्यापार प्रकृति । तत्रभव सैव वा प्राकृतम् ।" द्वारा प्राकृत का परिचय दिया है। इस प्रकार प्राकृत सस्कृत के सस्कार से शून्य तथा व्याकरण के नियन्त्रण से मुक्त सामान्य जनता की स्वभान सिद्ध बोलचाल की भाषा है। परन्तु सस्कृत तथा प्राकृत का परस्पर अप्रभा- यित रहना स्वाभाविक नहीं है। 'प्राकृत सनीवनी' में कहा गया है कि "प्राकृतस्य तु सर्वमेव सस्कृत योनि ।" फिर भी डॉ गुणे इससे सहमत नहीं जान पडते, वे दोनों को पृथक पृथक् मानते हैं।' पररुचि प्राकृत भाषा का आदि व्याकरणकार है जो पाणिनि का परवर्ती अथवा समसामयिक है। उसने महाराष्ट्री, पैशाची शौरसेनी एर मागधी इन चार भाषाओं पर विचार किया । महाराष्ट्री प्राकृन के 161 An Introduct on to Comparat se Ph lo ogs, P २ डॉ. केतकर प्राचीन महाराष्ट्र, पृ० ३.४।

(१६) मूल स्थान को लेकर विद्वानो मे मतैक्य नहीं है । दण्डी के अनुसार "महाराष्ट्राश्रया भाषा प्रकृष्ट प्राकृत विदु ।" इस दिशा में महत्त्वपूर्ण सक्त है ।' प्राकृत भाषा में भी तत्सम, तद्भव एव देशी शब्दों का मिश्रण मिलता है। प्राकृत भापा के माधुर्य की बडी प्रशसा की गई मिलती है। 'चनालग्ग' में जयवल्लभ ने निम्नलिखित गाथा उद्धृत की है-- देसियसद्दपलोड महुरक्परछन्दसठिय ललिय। फुडवियइपायडत्थ पाइअकम पढेयम्य ॥२८॥ इसी प्रकार राजशेखर ने सस्कृत एव प्राकृत भाषा की तुलना करते हुए 'कर्पूरमजरी' (निर्णयसागर प्रेस सस्करण १८) मे लिखा है कि- परसा सक्कअबधा पाउअबधो वि होइ सउमारो। पुरिसमहिलाण जेत्तिआमहतर तेत्तिअमिमाण ॥ वाक्पति राना के निम्नलिखित उद्गार भी ध्यान देने योग्य है- णवमत्थ दसण सनिवेश सिसिराओ धन्ध रिद्धीओ। अविरलमिणमो आ भुवन बन्धमिह पर पययम्मी ॥ सयनाआ इम वाया विसन्ति एत्तो य णेन्ति वायाओ। णेन्ति समुद्दचिय णेन्ति सायराओचिय जलाइ। हरिस विसेसो वियसायओ य मउलायओ य अच्छीण । इह घहि हुनो अन्तो मुहो य हिययस्स विष्फुरइ॥ इतने पर भी प्राकृत भाषा की श्रेष्ठता मे भला किसे सन्देह रह सकता है ? किसी अनात कवि की उक्ति है कि-- 99 Mal srastrı Language and Literateve Journal of the University of Bombay Tol IV Part VI p 31 २ सस्कृत रूपा तर- देशीशब्दपर्यस्त मधुराक्षरच्छद सस्थित लरित । स्पुरविक्टप्रकटाथं प्राकृतकाव्य पटनीय ३ सस्कृत रूपातर- पुरा सस्कृतगुम्फा प्राकृतगुम्फोऽपि भवति सुकुमार । पुरुषमहिलाना यावदिहान्तर तेषु तावत् ।। 4 ॥ 1 अमित्र पाउस कम्यं पदिउंसोउं अ ण आणन्ति । पामस्सा सन्ति पुणन्ति ते फलजन्ति। अर्थात् 'जिसने अमृत सहश प्राकृत काव्य मा पठन अथया श्रमण परना नहीं जाना पद पामशास्त्र की सत्यापिन्ता में प्रवृत्त होते लजा पर अनुभव क्यों नहीं करता?" फिर भी यह लक्ष्य करने की बात है कि नानाघाट एवं नासिक के शिलालेखों में व्यवहत प्राकृत, 'गाथा सप्तशती' के प्राकृत जैसी नहीं है। कदाचित् यह भेद शैलीभेद के कारण है। इसका एक अन्य पारण कालभेद और स्थानभेद भी हो सकता है । सोलहयीं शताब्दी के संत कवि रजब जी ने प्राकृत और संस्कृत के विषय में कहा है- बीज रूप कडु और था, वृक्ष रूप भया और । त्यों प्राकृते संस्कृत, रजब समझा व्यौर ॥ ७४॥' 'गाथा शप्तशती' का 'गाथा' शब्द छन्द के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। यो 'गाथा' शब्द का प्रयोग वैदिक साहित्य से लेकर बौद्धादि साहित्य तक में विभिन्न अर्थों में किया गया मिलता है। पिंगलाचार्य ने 'अत्रा- नुक्तं गाथा' कहा है। हलायुध "अत्रशाने नामोदेशेन यन्नोक्तं छन्दः प्रयोगे च दृश्यते, तद्गायेति मंतव्यम्" कहते हैं। रनशेखर सूरि ने गाथा का लक्षण इस प्रकार बतलाया है। सामनेणं चारस अट्ठारस घार पनरमत्तायो । कमसो पायचउक्के गाहाए हुंति नियमेणं ॥ गाहाइ दले चउचउमत्तंसा सत्त; अट्ठोमदुकलो। एयं धोयदले विदु नवरं छठोइ एकगलो।। कोलत्रुक गाथा को प्राकृत मे संस्कृत से आया बतलाते हैं। डॉ. गोरे ने 'वजालग' की प्रस्तावना के सातवें पृष्ठ पर गाथा का विवरण दिया है। अन्यत्र प्राकृत गाथा का लक्षण इस प्रकार दिया गया है- 1. परशुराम चतुर्वेदी : संतकाव्य, प्रथम संस्करण, किताप महल, इलाहाबाद, पृ० ३८॥ 3. Sapskrit and Prakrit Poetry, Asiatic Researches x P 400.

पठम बारह मत्ता, वीए अद्यारएहि सजुत्ता। जह पठम तह तीअ, दह पञ्चविहसिआ गाहा।।' सस्कृत छन्दशास्त्र में आर्या के लिए जो नियम निर्धारित है यह भी इसी प्रकार का है- यस्या पादे प्रथमे द्वादशमानास्तथा तृतीयेहपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थ के पञ्चदशसार्या । अर्थात् जिस छन्द का प्रथम चरण बारह माना का (स्वर की लघुता एव गुरता के परिमाण से) द्वितीय अठारह का, तृतीय बारह और चतुर्थ पन्द्रह का होता है उसका नाम आर्या है। इस प्रकार सस्कृत की आर्या ही प्राकृत का गाथा छन्द है। 'वजालग्ग' मे जयवल्लभ ने 'गाथा' की सराहना करते हुए कहा है- अद्धक्सरभणियाण नूण सविलासमुद्धसियाइ । अद्धच्छिपेच्छियाइ गाहाहि विणा ण णाजति ।।६।। यही नहीं, आगे कहा है- गाथा रुपइ पराई सिक्खिजन्ती गवारलोएहि । कीरइ लुचपलुचा जह गाई मन्ददोहेहिं ॥१५॥ कवि उमग मे यहाँ तक कह गया है कि- ललित महुरक्सरए जुपईजणवल्लहे ससिंगारे । सते पाइअकये को सक्कइ सक्य पदिऊ।। अर्थात् ललित एव मधुर, शृगारिक तथा युवती जन प्रिय गाथा सस्कृत काव्य मे कहाँ मिलेगा? उपसंहार इस प्रकार यह स्पष्ट है कि 'गाथा सप्तशती' वही रचना नहीं है जिसे 'गाथा कोश' नाम द्वारा अभिहित किया जाता है। 'शालिवाहन १ सस्कृत रूपान्तर- प्रथम द्वादा मात्रा द्वितीये अष्टादशभि सयुत्ता । यथा प्रथम तथा तृतीध दशपञ्चविभूपिता गाथा ॥

(२२) सप्तशती' नामक प्रति से उन छह सहयोगी करियों के नाम' तक का पता चल जाता है जो शालिवाहन के सहायक रहे हैं। अधिकांश प्रतियों की प्रारंभिक सात गाथाएँ इन्हीं द्वारा रचित बतलायी जाती हैं। आंध्रमृत्य अथवा सातवाहन हाल प्रथम शताब्दी का दाक्षिणात्य राजा था जिसने 'गाथा कोश' का संकलन कराया था। यह स्वयं प्राकृत का कवि भी था । राजशेखर ने 'कर्पूर मंजरी' के विदूपक द्वारा इसकी तुलना कोटीश, हरिचन्द्र और नन्दिचन्द्र आदि प्राकृत कवियों से करायी है। घाणभट्ट ने 'हर्पचरित' में सातवाहन राजा द्वारा विशुद्ध जाति के रनों के सहस्र सुभापितों से समन्वित अमाम्य एवं अनिनाशी कोश बनाये जाने की चर्चा की है। राजशेखर ने 'काव्य मीमांसा' में लिखा है कि चन्द्रगुप्त विक्रमा- दित्य के अन्तःपुर में संस्कृत का और कुंतल सातवाहन के अन्तःपुर में प्राकृत भापा का प्रचलन था। कुंतल शब्द का इसी अर्थ में प्रयोग यात्स्यायन ने 'कामसूत्र' में भी किया है । डॉ० पीटर्सन के अनुसार सातवाहन कुंतल जनपद का अधिपति था जिसकी राजधानी पैठण (प्रतिष्ठानपुर) थी। उसका उपनाम 'हाल' अथवा शतकर्ण था । मलयवती उसकी रानी थी और द्वीपकर्ण उसका पिता था। वह शिववर्मा का मित्र तथा गुणाढ्य का आश्रयदाता था। 'गाथाकोश' नामक एक अभिधान भाण्डारकर इंस्टिटयूट पूना के संग्रह मे क्रमांक (३८६) सन् १८५८-८८ और ३८५ सन् १मना-६१ ईसवी का सुरक्षित है। विपय वस्तु की दृष्टि से 'गाथा सप्तशती' अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कृति है। इस ग्रंथ में कृपिजीवी भारतीय जीवन का चित्र अंकित है। इसमें मानवी प्रवृत्तियों एवं चरित्रों का निदर्शन है। यह एक प्रकार से तत्कालीन रीति-नीति तथा आचार-विचार का कोश-ग्रंथ है, जहाँ अधिकतर जन-साधारण का ही जीवन मुसर है। पामर-पामरी, १. चोदित (वोदिस), चुल्लुहः, अमरराज, कुमारिल, मकरन्दसेन और श्रीराज। २. अविनाशिनमग्राम्यमकरोत् सातवाहनः । विशुद्धजातिभिः कोपरररिव सुभापितैः॥

(२३) हालिक-हालिक पनी, नन्दन दुहिता, गृहिणी-गृहपति और प्रेमी-प्रेमिका के बीच की मामीण उत्तियाँ चित्ताकर्षक होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज की कसौटी भी है। इसमें प्राचीन भारतीय ग्रामी उनके निवासियों, उनके पारिवारिक जीवन की विशेषताओं-यथा, सभ्यता एवं संस्कृति का चित्रमय परिचय मिलता है। ऐसा लगता है कि इन्हीं को लक्ष्य कर इन गाथाओं की रचना हुई थी। कदाचित इसी कारण, इसमे स्नभानोक्ति का स्पष्ट प्रमाण मिलता है जो 'शिष्ट समाज द्वारा लांछित होकर 'अश्लील उक्ति' तक क्लाफर प्रसिद्ध है। यह ग्रंथ शृंगार-रस प्रधान है। इसमे विभाव,अनुमान तथा व्यभिचारी के अनेक उदाहरण मिल सकते हैं। इसी प्रकार संयोग वियोग के मनोहारी उद्गार भी प्रचुर माना मे मुलभ हैं। ये प्रामीण मनोभाव परिमार्जित न होकर अपने प्रकृत रूप मे है। इनका भीतर-बाहर एक समान है। इसी कारण यह ग्रंथ 'लोक-साहित्य' की तालिका में महत्त्वपूर्ण स्थान पाने का अधिकारी है। परवर्ती काल के कई कपि और लेखक इस पथ के भाव तथा शैली के ऋणी हैं । 'गाथा सप्रशती' के सांस्कृतिक अध्ययन के लिए एक स्वतंत्र मथ अपेक्षित है। इस सन्दर्भ मे प्रथम शतक की ४८ची गाथा- अण्णमहिलापसङ्ग दे देव करेसु अम्ह दइअस्स | पुरिसा एकन्तरसा ण हु दोप गुणे विआणन्ति ॥ अर्थात् हे देव, हमारे प्रियतम के निमित्त दूसरी महिला की आसक्ति का निधान करो, नहीं तो पुरुष एकरस स्वादी हो जायेंगे एर किसी के गुण-दोष को विशेष भार से नहीं समझ पायेंगे। इसकी सामाजिक व्याख्या करना नृतत्व विशारदों अथवा समाज- शास्त्रियों का विपय है। जहाँ तक अपना सम्बध है इस सन्दर्भ में पाठकों का ध्यान मैं राजगृह के युद्ध भक्त पूर्ण नेष्टि की कन्या उत्तरा- वाली बौद्ध कथा' की ओर आकृर्षित करना चाहता हूँ जिसका विवाह अत्रौद्ध परिवार में हुआ था। फलस्वरूप चातुर्मास में वह न तो धर्म अपण कर सकती थी और न भिक्षु-भोजन करा पाती थी। एक १.धम्मपद, कोधवग्गो-३ तथा बसालिनी नाम घग्मसगणिपकरणह फया-11 दिन उसने अपने पिता के निकट अपनी मनोव्यथा व्यक्त की जिसके उत्तर में उसके पिता ने पन्द्रह हजार कार्यापण उसे इस हेतु दिया कि वह इसे देकर अपने स्वामी की देखभाल के लिए सिरिमा अथवा श्रीमती गणिका को नियुक्त कर दे । इस प्रकार उत्तरा ने पन्द्रह दिन के लिए श्रीमती को स्थानापन्न कर दिया । यह राजवैद्य तथा प्रधान अमात्य जीरक कौमारभृत्य की कनिष्टा भगिनी एवं वैशाली की नगर-वधू अम्बपाली की कन्या थी। यदि उपर्युक्त घटना सच है तो पिता द्वारा अपनी कन्या को उक्त मुझाव देकर उसकी सहायता करना और पत्नी का अपने पति के लिए गणिका नियुक्त करना गाथा को समझने में सहायक हो सकता है। यद्यपि मनोवैज्ञानिक अथवा प्रचलित सामाजिक प्रथा से उक्त आचरण खियोचित नहीं जान पड़ता, फिर भी यह कथा एक परोक्ष समाधान प्रस्तुत करती है। abetpe-

हिन्दी-गाथासप्तशती
प्रथम शतक
पसुवरणो रोसारणपडिमासंकंतगोरिमुद्दमन्दं ।
गहिग्यपंक विभ संझासलिलअलि गमद ॥१॥
[पशुपते रोपारगप्रतिमासंक्रान्तगीरीमुश्चन्द्रम् ।
गृहीतापजमिर सध्यासलिलाअलिं नमत ]
पशुपतिकी संध्या-सलिलामहिको नमस्कार करें-जिसमें गौरीका
(किसके पानमें मन हो अलि प्रदाना रहे हैं-इससे उत्पन्न) रोपारण
मुखपन्द्र संक्रान्त हुआ है, एवं इस कारण ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो
भपन ही ले लिया गया है ॥७॥
अमिभं पाउअकम्यं पढि सोउं भजे आणन्ति ।
फामस्स तत्तन्ति कुणन्ति ते फहण लजन्ति ॥२॥
[अमृतं प्राकृतकाम्यं परितुं श्रोतुं ये न जानन्ति ।
कामस्य संवधिन्नां कुर्वन्तस्ते कथं न जन्ते ॥]
जो भगृत सरीखे माकृतहाग्यका पाद एवं भवण करना नहीं जानते के
कामकी सम्पचिन्तामें प्रवृत्त हो सजिन को नहीं होते ? ॥२॥
सत्त सताई कइवच्छलेण कोडोम मझारम्मि ।
हालेण विरहाई सालङ्काराण गाहाणम् ॥ ३॥
[ सप्तशतानि कविधासन
कोटेमध्ये।
हालेन विरचितानि सालारागों गायानाम ]
अरविभूपित गायाओंको कोटिमें से केवल सात सौ गायाएं जिन्हें
कविवरसल हाल से प्रगीत किया था संग्रहीन की गई हैं ॥३॥

गाथासप्तशती उस निचलणिप्पन्दा मिसिणीपत्तम्मि रेहद वलाआ। जिम्मलमरगअभारणपरिट्टिआ संपत्ति व्य ॥४॥ [पश्य निक्षलनि स्पन्दा विसिनीपत्रे राजते पलाका । निर्मटमरकतमानपरिस्थिता शशुचिरिव ॥ देखो, पद्मपत्रके ऊपर पलाका निश्चल एवं निःस्पन्द भावस भवस्थित हो वैसे ही शोमा पा रही है, जैसे कि निर्मल (शुभ्र) मरकतभाजनके ऊपर पद्ध-राति भवस्थित हो ॥ ४ ॥ तावचिम रइसमए महिलाणं विभमा विराअन्ति । जाव ण कुवलअदलसेच्छआई मउलेन्ति णअणाई॥५॥ [सावदेव रसिसमये महिलानां विभ्रमा विराजन्ते । यावा कुवलयदलसच्छायानि मुकुतीभवन्ति नयनानि ॥ ) रतिवेला ललनामा विघ्नम तभी तक शोमा पाते हैं जब तक कि उनके कुवलय-दलकी सी सुन्दर कान्तिवाले नयन मुकुरित नहीं हो जाते ॥५॥ जोहलिअमप्पणो कि ण मग्गसे मग्गसे कुरवास्स । एभं तुद सुहग हसइ चलिआणणपंकों जाआ॥६॥ [दोहदमारमनः किं न मृगयते मृगयसे कुश्यकस्य । एवं तव सुमा हसति यलिताननपङ्कजं जाया ॥ ] हे सुभग, तुम अपने कुरयकवृक्ष के निमित्त तदीय आलिंगनरूप दोहदकी प्रार्थना कर रहे हो-अपने निजके लिए नहीं। इसी कारण तुम्हारी जाया अपना मुखपम तिरछा करके हँस रही है ॥ ६ ॥ तावनन्ति असोरहि लडाणाओं दइअविरहम्मि । किं सहइ कोवि कस्स चि पाभपहारं पहुप्पन्तो॥७॥ [बाप्यन्ते अशोकैर्विदग्धवनिता दयितविरहे। सिहते कोऽपि स्यापि पादप्रहारं प्रभवन् ।] प्राणप्रियके विरहमें विदग्ध वनिताएँ भशोरवृत द्वारा भी तारित होती है-प्रभावशाली होनेपर क्या कोई किसीका पादप्रहार सहन करता है ? ॥७॥ अत्ता तह रमणिज्ज अझं गामस्स मण्डणीहों। लुअतिलवाडिसरिच्छं सिसिरेण कसं मिसिणिसण्डं ॥८॥ [भु तथा रमणीयमस्माकं प्रामस्य मण्डनीभूतम् । सूनतिलवाटीसहसं शिशिरेण कृतं विसिमीपण्डम् ॥]

प्रथम शतक
हे वचन
शिशिर ऋतुने हमलोगों के प्रामके शोभास्वरूप उस पद्मखण्डको
विमतिलक्षेत्र के समान बना दिया है। कहीं ऐसा न हो कि सकेतस्थान
तिलक्षेत्रपर जार उपस्थति हो] ॥ ८ ॥
किं रुअसि ओणअमुही धवलाअन्तेसु सालिछित्तेसु ।
हरिआलमण्डिअमुही गडि व्य सणवाडिआ जाआ ॥९॥
। किं रोदिप्यवनतमुसी धवलायमानेषु शालिक्षेत्रेषु ।
हरितालमण्डितमुखी नदीव शणवाटिका जाता ।
पके हुए शालिसेक सफेद दिखायी पड़नेपर तुम मुखड़ेको नीचे कर रो
क्यों रही हो १ पीतपुष्पमहित शणवाटिका (तो) हरिताल द्वारा मण्डित-
वदना नटीकी नाई दिखायी ही पड़ रही है ॥९॥
सहि ईरिसिध्विय गई मा रुव्वसु तंसवलिअमुहमन्दं ।
पआण वालवालुङ्कितन्तुकुडिलाण पेम्माणं ॥ १०॥
[ सखि इदृश्यव गतिर्मा रोदीस्तिर्यग्वलितमुखचन्द्रम् ।
एनेपा पालकीनन्तुकुटिलानां प्रेग्णाम् ॥]
हे सनि, शिशुक्रटिका-तन्तुकी ही भाँति प्रणयकी गति कुटिल होती है
(अतः) अपने मुखचन्द्रको तिरछा कर रोदन मत करो ॥ १० ॥
पाअपडिअस्स पइणो पुट्टि पुत्ते समारुहत्तम्मि ।
ढमण्णुदुण्णिाएँ यि हासो घरिणी' णेकन्तो॥
[पादपतितम्य परयुः पृष्ठ पुने समारुहति ।
इदमन्युदूनाया अपि हासो गृहिण्या निष्क्रान्तः॥]
पेपर गिरे हुए पतिकी पीठपर पुत्रको चढ़ते हुए देखकर, कोपके कारण
अस्य दुखित गृहिणी (के मुंह) से भी हँसी फूट पड़ी ॥१॥
सञ्चं जाणइ टुं सरिसम्मि जणम्मि जुजए राभो।
मरउण तुमं भणिस्सं मरणं वि सलाहणिजं से।
[ सायं जानाति द्रष्टु सारी जने युज्यते राग ।
नियता नवा भगियामि मरणमपि श्लाघनीयं तस्या ॥]
हमारी सपी सत्य ही देखना जानती है कि साश जनों में ही अनुराग
उपयुक्त होना है। उसे मरने दो, मैं तुमसे उस (के जावन ) के विषयमें कुछ
नहीं कहूँगी, उसकी मृत्यु भी छाछनीय है ॥ १२ ॥

।
४
गाथासप्तशती
घरिणी महाणसकम्मलग्गमसिमलिइएण इत्येण ।
रित्तं मुहं हसिजह चन्दावत्थं गौ पदणा ।।
[गृहिण्या महानसकर्मलममपीमसिनितेन इस्तेन ।
स्पृष्टं मुखं हस्यते चन्दावस्थां गतं पाया ॥
रन्धनकर्ममें रत, कालिमा द्वारा मलिन हायसे स्पृष्ट, गृहिणीके मुखड़ेको
चन्द्रमाको दशाको प्राप्त होते देखकर पति हँसता है ॥ ३ ॥
रन्धणकम्मणिउणिए मा जूरसु, रत्तपाइलसुअन्ध ।
मुहमामं पिअन्तो धूमाइ सिही ण पजलइ ॥ १४ ॥
[धर्मनिपुणिके मा ध्यस्य रक्तपाटलमुगन्धम् ।
मुखमारुतं पियधूमायते शिखी न प्रश्वलति ॥]
हे रन्धनकर्मनिपुणिके, खिश मत हो । रह पाटलपुष्पके-से सुगंधित तुम्हारे
मुख-माहत पान के उद्देश्यसे ही अप्ति केवल धूमायमान अवस्थामें रह रहा है,
प्रज्वलित नहीं हो रहा है। १४ ॥
किं किं दे पडिहासइ सहीहिँ इअ पुच्छिाएँ मुद्धाए ।
पढमुग्गअदोहणीऍ णवरं दइझं गा दिट्ठी ॥ १५ ॥
[किं किं ते प्रतिमासते सखीभिरिति पृष्टाया मुग्धायाः ।
मथमोद्गतदोदिन्याः केवलं दयितं गता दृष्टिः ॥
'कौन-कौन सी वरत तुम्हें रुचिकर रूपमें प्रतिभासित होती है'-सखियों
द्वारा ऐसा पूछा जाने पर प्रथम पार उद्गत गर्भाभिलापधारिणी मुग्धा रमणी
की दृष्टि केवल प्रीतमकी ओर ही गई ५१५॥
अममम गअणसेहर रमणीमुहतिलअचन्द दे छिवसु ।
छित्तो जेहि पिअअमो मम पि तेहिं विअ करहिं ॥१६॥
[अमृतमय गगनशेखर रजनीमुखतिलक चन्द्र हे स्पृश ।
स्पृष्टो यः प्रियतमो मामपि तैरेव करी॥
हे चन्द्र, तुम अमृतमय हो, गगन के शेखर हो एवं रजनी (रूपी नायिका)
के मुखतिलक हो-जिन किरणों द्वारा तुमने मेरे भीतमका स्पर्श किया है,
उन्हीं के द्वारा मेरा भी स्पर्श करो। १६॥
पहिइ सो वि पउत्थो अहं अ कुप्पेज सो वि अणुणेज।
इअ कस्स वि फलइ मणोरहाण माला पिअसमम्मि ॥१७॥

प्रथम शतक [एप्यति सोऽपि प्रोपितोऽहं च कुपियामि सोऽध्यनुनेष्यति । इति करया अपि फलति मनोरथाना माला प्रियतमे ॥ ] मोपित घे भी लौट आयेंगे, मैं भी कोप-प्रदर्शन करूँगी एवं वे भी अनुनय करेंगे। प्रियतमके संबंधमें इस प्रकारके मनोरथ समूहों की माला किसी भाग्यवतीको ही फलवती होती है ॥ १७ ॥ दुग्गअकुडुम्बअट्ठी कह णु मए धोइएण सोढव्या । सिओसरन्तललिलेण उअह रुग्णं च पडएण ॥ १८॥ [ दुर्गतकुटुम्बा कृष्टिः कथं नु मया धौतेन सोढण्या। दशापमरसलिलेन पश्यत रुदितमिव पटकेन । "धोए जाने पर मैं दुर्गनकुटुम्बगण द्वारा किये हुए आकर्षगको किस प्रकार सहूँगी-मानो ऐसा ही कहकर वखावण्ड प्रान्तभाग से विगलित जलके कसे रोदनकर रही है ॥ १८॥ कोलॅम्बकिसलवण्णअ तण्ण उण्णामिएहि कण्णेहि। हिअहिलं घरं वञ्चमाण धवलत्तणं पाव।। १९॥ [कोशाकिमलपवर्णक तर्णक उनामिनाम्यो कर्णाभ्याम् । हृदयस्थित गृह घजन्धवटरव प्रामुहि ॥ ] है उसमित कर्ण रस, कोप-विनिर्गत-भान किसलयका वर्ण मुम धारणकर रहे हो-तुम अपने हृदयामिलपिन गृहमें प्रविष्ट हो धवलता प्राप्त करो ॥१८॥ अलिअपसुत्ता विनिमीलिअच्छ दे सुहा मज्झ ओआसं । गण्डपरिजम्वणापुलइअङ्ग ण पुणो चिराइस्सं ॥२०॥ { अलीकप्रनुप्तक विनिर्मालिताइ हे सुभग समावकाशम् । गण्डपरिचुम्धनापुलकिता न पुनधियिष्यामि ॥ हे सुमग, अली कनिद्रामे नयनोंको निमीलित करनेपर भी तुम अपने गण्डचुम्वनपर पुलकित्तांग होते हो, शरयापर मुझे स्थान दो, मैं अब ऐसी देर नहीं करूंगी ॥२०॥ असमत्तमण्डमा वित्र वञ्च घरं से सकोउहल्लस्स। चोलाविप्रहलहलअस्स पुत्ति चित्ते ण लग्गिहिसि ॥ २१ ॥ { असमासमण्डनैव ग्रम गृहं तस्य सकौतूहलस्य । व्यतिमान्तोसुक्यस्य पुचि चित्ते न लगिष्यसि ॥]

. गाथासप्तशती उस कौतूहलाकान्त के घर, सजावटके पूरे हुए बिना ही प्रवेश करो- हे पुत्रि, यदि उसकी उत्सुकता दूर हो जाय तो हो सकता है कि अम्हें उसके वित्तमें स्थान न मिले ॥ २ ॥ आमरपणामिमोठं अघडिअणासं असंहअणिडालं। घण्णधिभतुप्पमुहिए तीए परिउम्यणं भरिमो ॥ २२ ॥ [ धादरमणामितीष्टमघटितनासमसंहनरसाटम् । यसटिप्तमुष्यास्तस्या. परिचुम्मन स्मरामः ॥] वर्णमिश्रित घृतद्वारा लिप्तमुखी उस रजस्वला रमणीके परिचुम्बनका स्मरण करता हूँ जिसके लिए उसने भादरपूर्वक भोट झुका लिया था। परन्तु वर्णवित के भयसे नासिकाको संयोजित नहीं किया एवं ललाटका स्पर्श भी नहीं किया ॥ २२॥ अण्णासआई देन्ती तह सुरए हरिसविअसिमकवोला। गोसे वि ओणअमुही अह सेत्ति पिआंण सद्दहिमो ॥ २३ ॥ [भाज्ञाशतानि ददती तथा सुरते हपविकसितकपोला । प्रातरप्यवनतमुखी इयं सेति प्रियां न अहम ॥] सुरतके समय हर्पसे पुलकितकपोला होकर विलासके संबंधमें सैकड़ों भाज्ञाएँ देनेवाली नायिका ही प्रातः होनेपर अवनतमुखी हो गयी है-यह विश्वास नहीं कर पा रहा हूँ ॥ २३ ॥ पिअविरहो अप्पिअदंसणं अ गराई दो वि दुक्खाई। जीएँ तुमं कारिजसि ती णमो आहि जाईएँ ॥२४॥ [प्रियविरहोऽप्रियदर्शनं च गुरुके द्वे अपि दुखे । यया एवं कार्यसे तस्यै नम भाभिजात्य ॥] प्रियजनका विरह एवं अप्रियजनका दर्शन-ये दोनों ही महान् दुखके कारण हैं-तब भी तुम जिस भाव की प्रेरणा से कार्य करते हो उसी भाभि- जास्यको नमस्कार करती हूँ ॥ २४ ॥ पको वि कलसारो ण देइ गन्तुं पआहिणवलन्तो। कि उण वाहाउलिअं लोअणजुअलं पिअमाए ॥ २५॥ [एकोऽपि कृष्णसारो न ददाति गन्तुं प्रदक्षिणं बलम् । किं पुनर्वापाकुलितं होषनयुगलं प्रियतमायाः ॥]

प्रथम शतक
७
एक कृष्णसार मृगही प्रदक्षिणभावसे चलने पर लोगों को जाने नहीं देता-
प्रियतमाके यापालित दो लोचन क्सि प्रकार जाने देंगे ? ॥ २५॥
पण कुणन्तो विम माणं णिसासु सुहसुत्तदरविपुत्राणं ।
सुण्णइअपासपरिमूसणअण जइ सि जामन्ती २६ ॥
[ नारीप्य एव मा निनाए गुस्स मुप्तदाविदानाम् ।
शून्यीकृतपार्थरिमोपगवेदना यद्यायः॥]
रानिमें सुखसे सोग वाले व्यक्तियों में से कुछ कुछ जागे हुए की शूल्योहन
पानित पेदना यदि गुम जानते तो अपने अपराधको छिपाने के लिए
मान न परते ॥ २६॥
पणकुविाण दोह वि अलिअपसुत्ताण माणइलाणं ।
णिचलणिरुद्धणीसासदिण्णकण्णाण को मल्लो ।। २७ ।।
[प्रणयकुफ्तियोद्धयोरप्यलीकप्रसुप्तयोर्मानवतो. ।
निचलनिरनि भासदाकर्णयोः को मल..]
प्रणयकुपित, मिथ्यानिदिन, मानयुक दम्पति जय निवासका निरोधकर
निश्चलभावसे एक दूसरेके निवास पादपर कान लगाये रहते हैं, तब इन दो
के पीच कौन अधिक समय होता है ? ॥ २७॥
णवलअपहरं अहे जेहि जेहिं मदद देवरो दाउं।
रोमञ्चदण्डराई तहि तहिं दीसइ बहर ॥२८॥
[ नवलताप्रहारमश पत्र यच्छति देवो दावम् ।
रोमानदण्डाजिरतन तत्र रयते बघाः ॥]
नापिकाके म जिन जिन स्थानोपर देवर सता द्वारा प्रहार करने का
इच्छुक है, वधूके उन उन स्थानोंपर रोमाशकण्टकरानि दिखायी पड़ती है ॥२८॥
अजमए तेण विणा अणुहमसुहाई संमरन्तीए ।
अहिणपमेहाण रचो णिसामिओ व झपडही घ॥२२॥
[अधमपा तेन विना अनुभूतसुखानि संस्मरन्या।
अभिनय मेघानां वो निशामितो वध्यपह इन।]
उसके विशहमें पान में पूर्वानुभून सुस्ताशिकी बातें यादकर नव मेघवृन्द
की ध्वनिको यध्यपटह-शब्दके रूप में सुनती हूँ ॥ २९॥

गाथासप्तशती
णिकिय जाआमीरा दुइंसण णिम्यईडसारिच्छ ।
गामो गाम णिणन्दण तुज्झ कए तह वितगुआइ ॥३०॥
[निष्कर जायामीरा दुर्दांन निम्पकीटसाप ।
मामो प्रामगीनन्दन सब कृते तथापि सनुकायते ॥
है मामनायकपुन, तुम निर्दप एवं जायाभीरु हो, तुम्हारा दर्शन पाना
दुष्कर है। तुम निायकीट-सदृश दुरूपा रमणीपर आसक्त हो; सुम्हारे लिए सारा
गरि दुर्यल होता पला जा रहा है ॥ ३०॥
पहरवणमागविसमे जाआ किच्डेण लहइ से णिई।
गामणिउत्तस्स उरे पल्ली उण सा सुहं सुबई ॥ ३१ ॥
[महारमणमार्गविषमे जाया कृच्छेश लमते सस्य निनाम् ।
ग्रामणीपुत्रस्योरसि पल्ली पुनः सा सुसं स्वपिति]
সাময়িক शाखमहारजन्य पणचिह्नविषम-वास्थलके उपर उसकी
जाया भरयन्त कष्टसे निदालाम करती है, किन्तु, प्रहाद्वारा गन्य धनमार्ग
विषम पुरमें वही पली मुससे सोती है ॥ ३ ॥
अह संभाविअमग्गो सुहअ तुप जेव्ध णवर णिन्बूढो ।
पहिं हिअए अण्णं अण्णं याआइ लोअस्स ॥ ३२ ॥
[ अयं संभावितमार्ग सुभा स्वयैव केवलं नियूदः ।
इदानी हृदयेऽन्यदन्यद्वाचि लोकस्य ॥]
हे सुभग, केवल तुमने सम्भावित श्रेष्ठ जनोंके पथ का अवलंबन क्यिा है-
भाकल लोगों के हृदयमें एक भाव दिसायी पड़ता है और पाश्य में अन्य भाव
उहाँइ पीससन्तो किति मह परम्मुहीऍ सअणद्धे ।
हिमों पलीविभ वि अणुसपण पुट्टि पलीयेसि ।। ३३ ॥
[ उष्णानि निःश्वसकिमिति मम परायुस्याः शयनार्धे
हृदयं प्रदीप्याप्यनुशन पृष्ठं प्रदीपयसि ॥]
हाय्याने भाधेमागमें मैं पराशुष हो खोया हूँ, तप भी तुम उचनिःश्वास
त्यागकर अनुशयसे मेरे हृदयको प्रदीपित करती हुई होकर भी मेरे प्रदेशको
प्रदीरित करती हो?॥३३॥
तुह विरहे चिरआर. तिस्सा णिवडन्तवाहमइलेण ।
रहरहसिहरघपण व मुद्देण छाहि विस ग पत्ता ॥ ३४॥

मिमपन्ययाण सूरा परिसी विहरण पत्ता ३८॥ प्रयमात [तविरद विकारक सपा निपवादापमशिगेन । रविधशिवाय जेनेव मुन रहाय ने माता ] देविकाराम, राम्हारे विहमें निति यापद्वारा मरिन उसका मुख मायाका भयरया नहीं करता, उसी प्रकार जिप प्रकार सूर्य र निरपर स्पिन पावापाको नहीं मास होसी ॥ ३४॥ दिभरम्स असुरमणस्स पुलगा णिप्रप्रालिदिभाई। दिशदं कहो रामाणुलग्गसौमित्तिचरिआई ॥ ३५ ॥ [देषारयामास पूलपनिजाति वितानि । दिवस कपपनि रामानुरूममौमित्रिपरितानि n] दूपित गिरा देवर के निकट पुण्य भनी मिशि पर चित्रित या सिमित रामानुरत मिशानन्दन सरितको दिनभर वर्णन करती है ॥५॥ चत्तरपरिणी पिमदंसणा य तरुणी पायपहा । असई सजिमा दुग्गभा य ण हु सण्डिअं सीलं ॥ ३६॥ [पपरगृहिणी प्रियदर्शना घ राक्षणी मोरितपनिका । मसीप्रतिशिनी दुर्गमा धम रातु पनि तीलम् ] पौराहपा मिमा पर हो, पिर भी जो घी मिलाना हो, तो जी स्वय सरली हो, फिर भी जिमा पी प्रगामी हो, एक भी कामिनी की पर- पानिमी होकर भी जो दरिदा हो-ग प्रकारको नारियों का धरनमी धित मही होता (अर्थात् परप होता है)। हादरभमाउलपुडिभफेसरो गिरिणाएँ प्रेण । एरवडउनुहणिगुइमाबरो द्वीए पतम्या ॥३॥ [महावतभमाकुल्यन्दितमरो गिनिद्या पोग। मनिममयो दिने निरि नदी का प्रसाद में कदम पर इस रहा है, उमामा-मा जलायत्त के भ्रम से माकुल हो सन्दित हो रहा है सपने को rम, कभी उम्मान पक्ष की निमा हो रहे हैं। अहिभागमाणिणो दुग्गामस्स आदि पिप्रस्स रफ्ननी। कदाप .]

१० गाथासप्तशती [भाभिमायमानिनो दुगंतस्य छायां पायू रपन्ती। निज यान्धयेभ्यः ष्यति गृहिणी विभयेनागच्छदया।] अपने कुलाभिमानी दरिद्र पतिकी छाया रक्षा करने के लिए गृहिणी धन. समृद्धि कर भागन यान्धवजों के प्रति विरक्ति प्रकाशित करती है ॥ ३८॥ साहीणे वि पिअअमे पत्ते वि सणे, मण्डिओ अप्पा। दुग्गअपउत्थवाझं सझियं सण्ठन्यतीए ॥ ३९ ॥ [स्वाधीनेपि प्रियतमे प्राप्तेपि धणे न मण्डित भारमा । दुर्गतप्रोपितपतिको प्रतिवेशिनी संस्थापयरया ॥] पति के दुर्गत एवं प्रवासी होने पर भी अपनेको रद रखने वाली यह महिला अपने प्रियतमके स्वाधीन होने पर भी एवं उत्सबमें उपस्थित होने पर भी अपने शरीरको मन्डित नहीं कर रही है ॥ ३९॥ तुज्य वसइ त्ति हिअभं इमेहि दिवो तुमं ति अच्छीहिं। तुह विरहे किसिआईं ति तीऍ अड़ाई वि पिभाई ॥१०॥ [तव वसतिरिति हृदयमाभ्यां दृष्टस्वमित्यापिणी । तव विरहे कृशितानीति तस्या भङ्गान्यपि प्रियाणि ॥] उसका हृदय तुम्हारा वास स्थान है, उसके नेत्रदय द्वारा तुम देने जाते हो, एवं उसके अंग तुम्हारे विरह में कृश हैं। इस कारण ये सभी उसे प्रिय प्रतीत होते हैं ॥ ४०॥ सम्भावणेहभरिप रते रबिनइ ति जुत्तमिणं । अणहिअ उण हिअजं दिज्जइ तंजणो हसह ॥११॥ [सद्धावस्नेहमरिते रक्त रश्यते इति युक्तमिदम् । अन्यहृदये पुनर्हदयं यदीयते तजनो हसति ॥] संसार सद्भाव एवं स्नेह से पूर्ण जनों पर अनुरक्त होता है यह सो ठीक है किन्तु म जो हृदयहीन व्यक्ति को अपना हृदय दे रही हो, इसपर वो लोग हँसेंगे ॥ ४॥ आरम्भन्तस्स धुआं लच्छी मरणं चि होइ पुरिसस्स । तं मरणमणारम्भे वि होइ लच्छी उण ण होई ॥ ४२ ॥ [भारममाणस्य ध्रुवं लक्ष्मीमरणं वा भवति पुरुषस्य । तन्मरणमनारम्भेऽपि भवति लघमीः पुर्नन भवति ।

प्रथम शतक
यह तो निधय है कि कामकाको मोलम हो सकता है, मुत्यु
भी हो सकती है, किन्तु वह मृत्यु तो कार्यारम्भ हुए बिना भी हो जाती है
तथापि हमी यिना भारम्भ हुए उपस्थित नहीं होती ॥ ४२ ॥
विरहाणलो सहिज्जइ आसारण वल्लहजणास ।
एकग्गामपवासो मार मरणं विसेसेइ ॥ ४३ ॥
[विरहानरः सद्यत आशावाधेन घलभगमस्य ।
एकनामप्रवासो मानमरणं विशेषयति ॥1
प्रियजनों का विरहानल आशा कारण सहन किया जाता है, किन्तु, हे
मारः, एक ही प्राममें धाम करने के कारण यदि प्रवास हो जाय तो यह
मृत्युसे भी बढ़कर है ॥ ४३॥
अयपडइ पिआ हिथए अण्णं महिलाअणं रमन्तस्स ।
दिठे सरिसम्मि गुणे असरिसम्मि गुणे अईसन्ते ॥४४॥
[आस्खलति प्रिया हृदये अन्य महिलाजन रममाणस्य ।
हटे सहशे गुणे असाशे गुगे आश्यमाने ॥]
भन्य महिलाओं के साथ रमण करने वाले हृदयके HAN गुण दिसायी
पड़ने पर भी असहश गुण दिग्वने पर प्रिया जाग उठनी है ॥ ४४ ॥
णइरसच्छहे जोधम्मि अइपवसिपमु दिअसेसु ।
अणिअत्तासु अ राईसु पुत्ति किं दहमाणेण ॥४५॥
[नदीप्रसदृशे यौवने भनियोपिनेषु दिवसेषु ।
अनिवृत्तासु च गरिपु पुत्रि किं दग्धमानेन ।]
नदीकी यादकी भाँति यौवन अल्पायायी है, दिन बीतते जाते हैं एवं रात
भी भय लौटकर नहीं आयेंगी। हे पुत्रि, दग्धमान द्वारा क्या मिले ४५॥
फल फिल खरहिमओ पवसिइहि पिओत्ति सुण्णइ जणम्मि ।
तद यह मअवह जिसे जह से कहं विभ ण होइ ।। ४६ ।।
{कश्यं दिल खरहृदयः प्रवरस्यति प्रिय इति भूयते जने ।
तथा घर्धस्व भावति निक्षे यथा तस्य ल्यमेव न भवति ॥]
ऐसा मुना जाता है कि मेरा रदय प्रियतम प्रातः ही प्रवासा जायेगा,
हे निशादेवि, तुम इस प्रकार यह जाओ कि प्रात: हो में हो ॥१६॥

१२
गाथासप्तशती
होन्तपहिअस्स जाआ आउच्छणजीभधारणरहस्सं।
पुच्छन्ती भमह घरं घरेण पिअचिरहसहिरीयो ॥१७॥
[भविष्यस्पथिकस्य जाया आपृच्छनजीवधारणरहस्यम् ।
पृष्ठन्ती भ्रमति गृहं गृहेण मियविरहसहनशीला ]
भविष्यमें प्रवासगमनेच्छु व्यक्तिको जाया, घर-घर घूमकर विदाई के समय
प्राण-धारण करने का रहस्य उनसे पूछ रही है जिन्होंने प्रियका विरह सहन
किया है ॥ ७ ॥
अण्णमहिलापसझं दे देव करेसु अह्म दइअस्स ।
पुरिसा एकन्तरसा ण हु दोपगुणे विआणन्ति ॥ १८ ॥
[अन्यमहिलाप्रसङ्गं हे देव कुस्माकं दयितस्य ।
पुरुष एकान्तरसा न खलु दोषगुणौ विज्ञानन्ति ॥]
हे देव, हमारे प्रियतम के निमित्त दूसरी महिलाको प्रसक्तिका विधान करो,
नहीं तो पुरुष एकरसास्वादी हो जायेंगे एवं किसी दोप तथा गुणको विशेष
भावसे नहीं समझ पायेंगे ॥ १८ ॥
थो पि ण णीसरई मज्झण्णे उह सरीरतललुका ।
आअवभपण छाई वि पहिअ ता किंण वीसमसि ॥४९॥
[ स्तोकमपि न निःसरति मध्याह् पश्य शरतललीमा ।
भातपमयेन छायापि पथिक तरिकं न विश्राम्यसि । ]
हे पथिक, मध्याह्नमें धूपके भय से छाया भी शरीरमें छिप जाती है,
धाहर नहीं निकलती, अतः हमारे यहाँ तुम भी विनाम क्यों नहीं करते?॥३९॥
सुहउच्छअंजणं दुल्लह पि दूगहि अम्ह आणन्त ।
उअभार जर जी पिणेन्त ण कावराहोसि ॥५०॥
(सुखपृच्छक जनं दुर्लभमपि दूरादस्माकमानयन् ।
उपकारक पर जीवमपि नयन कृतापराधोऽसि ॥ ]
हे ज्वर, तुमने मेरे ऊपर बड़ा उपकार किया। दूरसे हमारे सुखलिप्सु
दुर्लभ जनको हमारे निकट लाकर तुम यदि हमारे प्राणको भी ले जा सको
तो भी मुम्हे अपराधी नहीं कहूँगी । ५०॥
आमजरो मे मन्दो ण मन्दो जणस्स का तन्ती।
सुहउच्छअसुहम सुअन्ध अन्य मा अन्धिों छियसु॥५१॥

प्रथम शतक १३ [भामोग्घरो मे मन्दोऽथवा न मन्दो जनस्य का चिन्ता । सुखपच्छक सुमग सुगन्धगन्ध मा गन्धित स्पृश" हे सुएजिज्ञामाकारिन् , हे सुमग, हे सुगन्ध-गन्ध युक्त, मेरा भाम घर मन्द है अथवा ममन्द इस विषय में संसारको चिन्ता क्यों है? तुम ज्वर की गन्धसे युकाको मत छूना ॥ ५ ॥ सिहिपिच्छलुलिअकेसे बेवन्तोरु विणिमीलिअद्धच्छि। दरपुरिसाइरि घिसुमरि जाणसु पुरिसाण दुःखं ॥ ५२ ॥ [शिखिपिछलुलितकेशे येपमानोरु विनिमीलितार्धाषि। ईपरपुरुषायिते विश्रामशीले जानीहि पुरुषागा यदु खम् ॥ ) हे ईपतपुरुषायित कार्यमें विराम करनेवाली, तुम्हारे केश मयूरपुच्छ के समान लुलित हैं, तुम्हारे अरुदय कपमान हैं एवं तुम्हारी भाधी भाख विशेष भावप्ते मुँदी हुई दिखती है। समझ लो पुरुषों को कितनी पीड़ा है ॥ ५२ ॥ पेम्मस्स विरोहिअसंधिस्स पञ्चक्खदिविलिअस्स। उअस्स व ताविअसीअलस्स विरसो रसो होइ ।। ५३ ।। [प्रेम्णो विरोधितसंधिनस्य प्रत्यक्षाप्टपलीकरय । उदकस्यैव तापितशीतलस्य विरसो रसो भवति ॥] जो प्रेम पहले विछिन्न होकर बाद में सन्धानयुक्त होता है, एवं जिस प्रेम में अपराध प्रत्यक्षतः दिखायी पड़ रहा है, उस प्रेमका रस पहले गरम किये और पाद में रण्डे किये हुए जलकी भांति विरस हो जाता है । ५३ ॥ वजवडणाइरिक पइणो सोऊण सिजिणीघोस । पुसिआई करिमरिऍ सरिसवन्दीणं पि अणाई ॥ ५४॥ [वत्रपतनातिरिक्त परयुः ध्रुरवा शिझिनीघोपम् । प्रोन्डिलानि पन्या सामन्दीनामपि नयनानि "] धनपातके शन्द की अपेक्षा अधिक गम्भीर स्वामीके धनुष टंकार भन्द को सुनकर बन्दी अपने जैसे अन्य बन्दियोंके नपनोंको पोद दे रही है ॥५४॥ सहइ सहइत्ति तह तेण रामिभा सुरअदुन्धिअद्धण । पम्माअसिरीसाइँ व जह से जाआई अंगाई॥५५॥ सिहते सहत इति तथा तेन रमिता सुरतदुर्विदग्धेन । प्रालानशिरीपाणीव जातान्यनानि । यथास्या गाथासप्तशती सहन कर रही है, सहन कर रही है इस प्रकार सुरतकार्यमें दुर्विदग्ध यह वश्यानायिका पुरयों द्वारा इस प्रकार रमित होती है कि उसके मन मम्लान शिरीपपुष्पकी भांति हो गये हैं ॥ ५५ ॥ अगणिअसेसजुआणा वालअ वोलीणलोअमजाआ। अह सा भमइ दिसामुहपसारिअच्छी तुद करण ।। ५६ ॥ [भगणिताशेषयुवा चालक ध्यनिफ्रान्तलोकमर्यादा । अथ सा भ्रमति दिशागुम्बप्रसारिताशी तव कृतेन ।।] हे पालक, घय अन्यान्य युवकों की गणना नहीं करती, केवल तुम्हारे अन्येपणमें लोकमर्यादा को त्यागार दिल्यावकी भोर नेत्र प्रसारित कर घूम रही है ॥ ५६ ॥ फरिमरि अालगजिरजलआसणिपडनपडिरवो एसो। पइणो धणुरवकसिरि रोमञ्चं किं मुहा यहसि ॥ ५७॥ [ यन्दि अकालगर्जनशीलजलदाशनिपतनप्रतिरप एपः । परयुधनूरवाकासगशीले रोमाञ्चं किं मुधा वहसि ॥] हे बन्दि, जो सुन रही हो यह तो अकाल गर्जनशील मेघके अशनिपतन की प्रतिध्वनिमान है। हे पति के धनुष-बाणके रखको सुननेकी अभिलापिणि, व्यर्थ ही रोमाञको क्यों वहन करती हो ॥ ५७ ॥ अज्ज व्ये पउत्थो उज्जाभरओ जणस्स अजेय। अजे अ हलिहापिजराइँ गोलाणातडाई ॥ ५८॥ [ अधैव प्रोपित उजागरको जनस्याधैव । अधैव हरिद्रापिझरागि गोदानदीतटानि ॥ ] आज ही (मेरा पति)प्रवाममें गया है, आज ही सपत्नियोंका जागना भारंभ हुआ है एवं आज ही गोदावरीका सट प्रदेश हरिद्रा से पिसावर्ण हुआ है॥५॥ असरिसचित्ते दिभरे सुद्धमणा पिसभमे विसमसीले । ण कहइ कुडुम्बयिहडणभएण तणुआअए सोहा ॥ ५९ ॥ [असहशचित्ते देवरे शुक्ष्मनाः प्रियतमे विषमशीले । न कथयति कुटुम्वविघटनमयेन तनुकायते ग्रुपा ॥ ] देवरके दूपित चित्त होनेपर भी याद में कुटुम्ब-विघटन होने के भयसे शुभ-

प्रथमशतक
चित्ता वधूने भाग्यन्त विषम स्वभाव याले पतिसे कुछ कहा नहीं, फिर भी वह
हश होती जा रही है ॥ ५९॥
चित्ताणिअदइअसमागमम्मि फअमपणुआईं भरिऊण ।
सुण्णं कलहामन्ती सहीदि हण्णा ण मोहसिआ॥६० ॥
[चित्तानीतयितसमागमे कृतमन्युकानि स्मृत्वा ।
शून्यं कलहापमाना सखीभी रुदिता नोपहसिता ॥]
चित्तमें आनीत मियतमझा समागम होने पर उसके अपने क्रोधके कारणों को
थादकर पृथा कलहकारिणी होनेपर अन्य सखियाँ उसके लिए रोती ही है,
उसका उपहास नहीं करतीं ॥१०॥
हिअअण्णएहि सम असमत्ताई पिजह सुहावन्ति ।
फजाई मणे ण तहा इअरेहिं समापिआई पि॥ ६१ ॥
[हृदयः सममसमातान्यपि यथा सुग्पयन्ति ।
कार्याणि मन्ये न सथा इतरैः समापितान्यपि ॥]
मुझे प्रतीत होता है कि हृदयज्ञ पुरुषों के साथ चरितार्थ कार्यकलाप
जितना सुपदायक होता है, भहृदयज्ञ पुरुषों के साथ चरितार्थ कार्यकलाप भी
उतना सुखदायक नहीं होता ॥६॥
दरफुडिसिप्पिसंपुडणिलुकहालाहलग्गछेप्पणिहं ।
पकम्यट्टिविणिग्गअकोमलमम्मुहुरं
उअह " ६२॥
[ईसम्फुटितशुक्तिसम्पुटनिलीनहालाहलाप्रपुच्छनिभम् ।
पकानास्थिविनिर्गतकोमलमाम्राकुर पश्यत "]
पके आमसे निकले हुए इस अंकुरको देखो। यह जैसे ईषत् स्फुटित
शक्सिंपुट में निलीन हलाहल के अग्रपुछ सी दिसायी पदप्ती है। १२ ॥
उअह पडलन्तरोइण्णणिअअतन्तुद्धपाअपडिलगं।
दुल्लपखसुत्तगुत्थेक्कयउलकुसुमं व
मकड।। ६३ ।।
[ पश्यत पटलान्तरावतीर्णनिजकतन्तूपादप्रतिलमम् ।
दुर्लक्षसूत्रनधित्तकाकुल कुसुममिव
मकंटकम् ॥]
पटलके अन्तरमे विलंवित भपने तन्तुके ऊर्ध्वपादमें प्रतिलग्न मर्कटकको
देखो। यह दुर्लक्ष्य सूत्र में प्रथित एक छकुलकुतुम सा लक्षित हो रहा है।
उअरि दरदिट्टयण्णुअणिलुकपारावआण धिरुपहि।
जित्थणह जामरेवेअणं सूलाहिणं व देअरलं ॥ ६॥

गाथासप्तशती विरुतः। [ उपरीपाष्टशंकुनिलीनपारावताना निस्तनति जातवेदनं शूलामिक्षमिव देवकुलम् ॥ ] मन्दिरके ऊपरकी भोर कुछ-कुछ दिखायी पड़नेवाली कीलकमें निलीन पारावत गण फूजन द्वारा जैसे देवकुल शूलद्वारा मिन हो घेदनासे रव कर रहा है ॥६॥ जर होसि ण तस्स पिमा अणुदिअहं पोसहहिं अङ्केहि। णपसूअपीअपेऊसमत्तपाडि व्य किं सुपसि ॥६५॥ [ यदि भयति न सस्य प्रियानुदिवस निःसहैरः। नवसूतपोतपीयूपमत्तमहिषीवरसेव किं स्सपिपि n] यदि तुम उसकी प्रिय नहीं हो तो प्रतिदिन निःसह अंग लेकर नवप्रसूत पीयूष पाने में मत्त महिपीवरसा की भाँति क्यों सोती हो ? ॥ ५ ॥ हेमन्तिआसु अइदीहरासु राईसु तं सि अविणिहा । चिरअरपउत्थयइए ण सुन्दरंजं दिआ सुपसि ॥ ६६ ॥ { हैमन्तिकारवतिदीर्घासु रात्रिषु स्वमस्यविनिद्रा। चिरतरप्रोपितपतिके न सुन्दरं यदिवा स्वपिपि ॥] हे रमणी, तुम्हारा प्रिय बहुत समयके लिए प्रवासमें गया है, तुम हेमन्त ऋतुकी इस अतिदीर्घ रानिमें निद्राविच्छेदका अनुभव न करके भी दिनके समप सोई रहती हो, यह सुन्दर कार्य नहीं है ॥ ६६ ॥ जाइ चिक्खल्लभउप्पअपअमिणमलसाइ तुह पए दिण्णं । ता सुद्दअ कण्टइजन्तमंगमेझिं किणो वहसि ॥ ६७॥ [यदि कर्दमभयोरप्लुतपदमिदमलसया तव पदे दत्तम् । तरसुभगकण्टकितमङ्गमिदानी किमिति वहसि ॥] यदि वह भलसायमान पके भयसे छलाङ्ग मारकर तुम्हारे पैरपर यह पैर निक्षेप कर रही है, ऐसा होने पर, हे सुभग, अब तुम अपने रोमाञ्चित भङ्ग क्यों पहन कर रहे हो?॥६॥ पत्तो छणोण सोहइ अइप्पडा एव्य पुण्णिमाभन्दो। अन्तविरसोव्य कामो असंपणो य परिओसो ॥ ६८॥ [भाता हगो न शोमते अतिप्रभात इव पूर्णिमापन्द्रः । अन्तविरस इव कामोऽसम्प्रदानश्च परितोपः॥]

प्रथम शतक भरयन्त सयेरे पूर्णिमाका चन्द्र, अवसानपर रसशून्य कामना एवं संप्रदान. रहित परिसोप, जिस प्रकार शोमा नहीं पाते, उसी प्रकार उरसव उपस्थित हो जानेपर हो शोभा नहीं पद जाती ॥ १८॥ पाणिग्गवणे व्विा पचईएँ णाभं सहीहिं सोहां। पमुयइणा पासुइकङ्कणम्मि ओसारिए दूरं ।। ६९ ॥ [ पाणिग्रहण एवं पारया ज्ञात सखीभिः मौभाग्यम् । पशुपसिना पासुकिकोऽपसारिते दूरम् ॥] पाणिमहाके ही समय पशुपतिको बामुकिरूप करण दूर करते देख सखियों ने पार्वतीका सौभाग्य जान लिया ॥ १९ ॥ गिही दयग्गिमसिमइलिआई दीसन्ति विज्झसिहराई । आससु पउत्थवइए होन्ति णवपाउसम्भाई ॥ ७० ॥ [प्रीमे दयानिमीमलिनितानि रश्यन्तै विनयशिखराणि । भाश्वसिहि मोषितपति के न भवन्ति नवप्रायूस्वाणि ॥ हे भोषितपतिके, माश्वस्त हो जाभो, प्रीष्मकाल में दावानलकी मसिद्वारा मलिनित घे वियशिखर समूह दिखायी पड़ते हैं, ये नववर्षाकी मेधमाला नहीं हैं। जेत्तिसमेत्तं तीरइ णिव्योढं देसु तेत्तिसं पणों। ण अणो विणिभत्तपसाअदुक्ससहमस्खमो सन्यो ।॥ ७१ ॥ [यावरमा शम्यते निचोडं देहि तावन्तं प्रणयम् । न जनो विनिषत्तप्रसाददुःखसहनतमः सर्व..] जितना प्रणय नि.शेष भावमे घहन किया जा सकता है, उतना ही प्रणय हो । कारण, प्रसादविनिवृत्त होनेपर तमनित दुःख सहने में सभी समर्थ नहीं होते ॥1॥ चहुवल्लहस्स जा होइ बलहा कह वि पञ्च दिअहाई। सा कि छठं मग्गइ फत्तो मिटुं च यहुअं म॥७२॥ [पहुवतमस्य या भवति वक्षमा कथमपि पच दिवसानि । सा कि पई मृगयते कुनो मृष्टं च पहुई घn] जो नायक अनेक प्रियाओंको अनुगृहीत करता है, उसकी जो कोई प्रिया हो यह पाँच दिन सक ही उसकी परीक्षा करती है। वह क्या वे दिन तक २ गा०२०

गाथासप्तशती
प्रतीक्षा करती है, कारण जो अनुकूल वा मधुर होता है उसे अधिक पाना
मुकृतसापेक्ष है ॥ ७२ ॥
जंजसो णिज्झाअह अह्नोआसं महं अणिमिसच्छो ।
पच्छाएमि अं तं तं इच्छामि अ तेण दीसन्तं ॥७३॥
[यरस निर्णायस्यगावकाशं ममानिमिपातः ।
मच्छादयामि ध सं तामिछामि च तेन दृश्यमानम् ॥ ]
मेरे मिन जिन सजायका की ओर वह एकटक देखता है, उन भगावकाशों
को मैं प्रच्छादित भी करती हूँ, और फिर यह भी इच्छा करती हूँ कि वह
उन्हें देखे । ७३ ॥
दिढमण्णुदूणिआएँ वि गहिओ दइअम्मि पेच्छद इमाए ।
ओसरइ पालुआमुट्टि उव्व माणो सुरसुरन्तो ॥४॥
[दृढमन्युट्नयापि गृहीतो दयिते पश्यतानया ।
भपसरति थालुकामुष्टिरिय मानः सुरसुरायमाणः ॥
देखो, कोपवश भस्यन्त व्यथित हो उसने प्रियतम से मान किया है,
किन्तु यह मान यातुकामुष्टि की भाँति सुर्-सुर् कर अपसृत हो जाता है ॥७॥
उअ पोम्मराअमरगअसंवलिआ णहअलाओं ओअरइ ।
णह सिरिकण्ठभट्ट व्य कण्ठिआ कीररिन्छोली ।। ७५ ॥
[पश्य पद्मरागमरकतसंवलिता नमस्तलावतरति ।
नभ:श्रीकण्टभ्रष्टेव कण्ठिका कीरपंक्तिः ॥]
देखो, नभलपमीके कण्ठदेशसे भवतरित, पराग एवं मरकतद्वारा संकलित
कष्ठिकानामक हारपष्ठीके समान भाकाशतलसे शुकपंक्ति उतर रही है ॥ ५ ॥
ण वि तह विपसवासो दोग्गचं मह जणे संता।
आसंसिथविमणी जह पणइजणी णिअत्तन्तो ॥ ७६ ॥
[ नापि तथा विदेशवासो दोगस्य मम जनयति सन्तापम् ।
भाशंसितार्थविमना पथा प्रणयिजनो निवर्तमानः ॥ ]
मेरा विदेशमें वास एवं अपनी दुर्गति उतना सन्ताप नहीं उत्पन्न करती
जितना प्रणयी जन भाशंसित विषयसे विमुख वा विमना होने के उपरान्त
प्रत्यावर्तन कर संताप उत्पन्न करते हैं ॥१॥
खन्धम्गिणा वणेसुंतणेहि गामम्मि रक्खिओ पहिओ।
णअरवसिओ णडिजइ सासुसरण व सीपण ॥७॥

प्रधम शतक [ स्कन्धामिना पनेषु तृगामे रहितः पथिकः । नगरोपिः खेधते सानुशयेनेय शीतेन ॥ ] जो पधिक वनों में स्थूल काठामि द्वारा एवं ग्रामों में मृण द्वारा शोवमे अपनी रक्षा करता है वह नगरमें वास करने जाकर अनुशययुक्त शीत द्वारा जैसे खित हो रहा है॥ ७७ ॥ भरिमो से गहिआहरधुलसीसपहोलिरालाउलि। चअणं परिमलतरलिअभमरालिपदण्णकमलं य ॥७८॥ [स्मरामस्तस्पा गृहीताधाधुत शोर्पमघूर्णनशीलाल काकुरितम् । यदनं परिमलतरलितभ्रमरारिप्रकीर्णकमलमिव .] चुग्धनार्थ अधर गृहीन हो जानेपर, शीपंकम्पन के साथ एवं कुण्डलघूर्णनसे माकुलित उसका मुख स्मरण करता हूँ, मानो वह परिमल के लोमसे तरलित भ्रमरकुलद्वारा प्रकीर्ण एक कमलके समान दिखायी पड़ा था ॥ ७८ ॥ हलफलण्वाणपसाहिआण छणवासरे सबत्तीणं । अजाएँ मजणाणारेण कहिलं च सोहग्गं ॥७२॥ [ उस्माहतरलरवसानप्रसाधिताना वासो मपनीनाम् । भार्यया मननानादरेण कथितमिव सौभाग्यम् ॥] उरसरके दिन उत्साहचायल्यमें नानद्वारा प्रसाधिन सामियों के निकट केवल उस भार्याने ही मजनमें अनादर दिखाकर अपना सोमाय सूचित किया है ॥ ७९ ॥ हाणहल्लिद्दामरिअन्तराई जालाई जालवलअस्स । सोहन्ति किलिश्चिअफपटपण कंकाहिसी कमत्यं ।। ८०॥ [सानहरिदाभरितान्तराणि जालानि जालवलयस्य । शोधयन्ती पुदण्टन के करिष्यामि कृतार्थम् ॥ ] खान-हरिद्रासे भरितान्तर तुम्हास केशसामानोके जालोको पुद पंशकण्टक द्वारा शोधित कर तुम किस सौभाग्यवान्को कृतार्थ करोगी ॥ ८॥ असणेण पेम्मं अयेइ अइदसणेण वि अवेइ । पिसुणजणजम्पिएपा वि यवेइ एमेम विभवेइ।। ८१ ॥ [ अदर्शनेन प्रेमापैत्यतिदर्शनेनाप्यपैति । पिशुनजनजहितेनाप्यत्येवमेशप्यपैति ] २० गाथासप्तशती प्रेम विना देखे दूर हो जाता है, अत्यन्त देखनेपर भी दूर हो जाता है, खालों की कुवागीसे भी दूर हो जाता है और अनायास भी दूर हो जाता है ॥४॥ असणेण महिलाअणस्स अइदंसगेण णीअस्स । मुक्खस्स पिसुणअणजम्पिएण एमे वि खलस्स ॥ ८२ ।। [अदर्शनेन महिलाजनस्यातिदर्शनेन नीवस्य । मूर्सस्य पिशुनजनजपितेनैवमेवावि खलस्य ॥] महिलाओं का प्रेम बिना देखे, नौधोका प्रेम अधिक देखे जानेपर, मूखौंका प्रेम दुष्टोंके वाक्य से पूर्व सलका प्रेम अकारण ही दूर हो जाता है ॥ ८॥ पोट्टपडिएहि दुख अच्छिजर उण्णएहिं होऊण । इस चिन्तआण मण्णे थणाणं कसणं मुहं जा ॥ ८३॥ [उदरपति ताम्या दुख स्यीयत उन्नताम्या भूत्वा । इति चिन्तयतोमन्ये स्तनयोः कृष्ण मुखं जातम् ॥] पहले उन्नत रहनेपर भी प्रसवके अन्त में उदरपर्यन्त गिर जानेपर भी कष्टमें रहना होगा। ऐसा लगता है कि यही सोचकर दोनों स्तनोंका अगला भाग काला हो गया है। ८३ ॥ सो तुज्झ कप सुन्दरि तह छीणो सुमहिला हलिउत्तो। जह से मच्छरिणी' वि दोश्चं जाआएँ पडिवणं ॥ ८४ ॥ [ स तव कृते सुन्दरि तथा क्षीणः सुमहिलो हालिकपुनः । यथा सस्य मरसरिण्यापि दौरय जायया प्रतिपरम् ॥] हे सुन्दरि, तुम्हारे लिए वह रूपवार्य हालिकपुत्र इतना क्षीण हो गया है कि उसकी जायाने मसरिणी होनेपर भी उसके लिए स्वयं दूतीका कार्य करना स्वीकार किया है । ८४॥ दक्खिण्णेण वि एन्तो सुहअ सुहावास अह्म हिअआई। णिकइअवेण जाणं गओसि का णिमुदी ताणं ॥ ८५॥ [ दाक्षिण्येनाप्यागच्छन्सुभग सुखयस्यस्माकं हृदयानि । निष्कतवेन यासां गतोऽसि का निवृतिस्तासाम् ॥ ] हे सुभग, दाक्षिण्यवश हमलोगों के निकर उपस्थित होकर भी हमलोगों को इतना सुखी करते हो और जिनके निकट भकपट ही चले जाते हो उनको न जाने कितना आनन्द होता होगा । ८५॥

प्रथम शतक २१ एक्कं पहरुविण हत्थं मुहमारुपण बीमन्तो। सो वि हसन्तीऍमए गहिमोवीएण कण्ठम्मि ॥८६॥ [एकं प्रहारोद्विग्नं हस्तं मुखमारतेन वीजयन् । सोऽपि समस्या मया गृहीतो द्वितीयेन कण्टे ॥] महारकार्यमें उद्विग्न मेरे एक हाथको मुखमारुनद्वारा वीज़न किये जानेपर मैंने हँसते-हँसते दूसरे हाथ द्वारा उसका कण्ठमाण कर लिया ॥८६॥ अवलम्पिअमाणपरम्मुहीऍ एन्तस्तमाणिणि पिस्स। पुटपुलउग्गमो तुद कहेह संमुहट्टि हिअभं ॥ ८७ ॥ [भवलम्बितमानपराइ मुण्या भागाछनो मानिनि प्रियस्य । पृष्ठपुलकोद्गमस्तव कथयति सम्मुखस्थितं हृदयम् ॥] हे मानिनि, मान अवलंबन कर पराङ्मुखी होनेपर भी तुम अपने पोटपर रोमांचके उद्गमदारा भागमनकारी प्रियतमके निकट अपना हृदय सम्मुखस्थित रूपसे ही सूचित करती हो ॥ ८७ ॥ जाणइ जागायेउं अणुणअविविप्रमाणपरिसेसं। आरिकम्मि वि विणावलम्वर्ण सच्चिभ कुणन्ती ॥ ८८॥ [ जानाति झापयितुमनुनयविद्रावितमानपरिशेषम् । बिजनेऽपि विनपायलम्बन सैव कुर्वती.] पकान्वमें सुस्तके समप विनयका भवलंधनका प्रियतम के भनुनय से दूरीहन मानके परिशिष्टको स्थापित करना केवल यही जानती है ॥ ८८॥ मुहमारुपण तं कद गोरअंरहिआएँ अयणेन्तो। पताण वल्लवीणं अण्णाण वि गोरकं हरसि ॥ ८९॥ ( मुखमारुतेन त्वं कृष्ण गोरजो राधिकाया अपनयन् । एतासां बहबीनामन्यासामपि गौरवं हरसि ॥] है कृष्ण, सुम अपने मुखमारुनद्वारा राधिका अनुसे धूलि भयवा गोधूलि हटाकर, पुरोवत्तिनी भन्यान्य गोपीगोंका गौवधागौरता हरणकरते हो ॥९॥ किंदाय फआ अहया करेसि कारिस्सि सुहा पत्ता हे। अवगहाण अलजिर साहसु काए खमिजन्तु ॥९॥ [किं तावरकृता अथवा करोषि करिष्यति सुभगेदानीम् । अपराधानामलजाशील कपय कतरे सम्यन्ताम् ] २२ गाथासप्तशती है सुभग, जिन अपराधोंको तुमने किया है, अभी कर रहे हो एव भागे करोगे, हे निहन, उनमेंसे किन अपराधोंको में समा कर सकती हूँ, यह बताओ तो॥ णूमेन्ति जे पहुत्तं कुपिनं दासा व्य जे पसाअन्ति । तेवि महिलाण पिआ सेसा सामि दिवस घराआ॥९१ ॥ [गोपायन्ति ये प्रभुत्व कुपिता दासा इव ये प्रसादयन्ति । त एव महिलानो प्रिया शेषा स्वामिन एव वराका ॥] जो पुरुष कान्ता विषयमें अपना प्रमुख गोपन कर रखते हैं एव जो दासकी भाँति कुपिता कान्ताको अनुनय द्वारा प्रसन्न रखते हैं, वे ही महिलाओं के निय होते है, और इतर पुरष दिल्य स्वामी शब्द द्वारा पुकारे जाते हैं ॥ ९॥ तइआ फमग्घ महुअर ण रमसि अण्णासु पुप्फजाईसु । पद्धफलभारिगुरुई मालई पति परिच्चअसि ।। ९२॥ [ तदा कृतार्घ मधुकर न रमसेऽन्यासु पुष्पजातिपु । यरफलभारगुर्वी मालतीमिदानी परित्यजसि ॥ ] हे मधुकर, उस समय कृनन्न होकर अथवा मालतीके प्रति भादरवश म भयान्य पुष्पोंमें अनुरत नहीं हुए। अब बरफलभारसे विनत मारतीका परित्याग कर रहे हो ॥ १२ ॥ अविअङ्गपेक्वणिज्जेण तक्खणं मामि तेग दिटेण । सिविणअपीएण व पाणिपण तण्ह व्विाण फिट्टा ।। ९३॥ [अवितृष्णप्रेक्षणीयेन तरक्षण मातुलानि तेन इष्टेन । रवानपीतेनेव पानीयेन तृष्णव ने भ्रष्टा ] है मामी, स्वप्न में पीये हुए जल द्वारा प्यासके मिन्नेकी भाँति, अतृप्तनयनसे इसे देखने की मेरी प्यास दूर नहीं हुई है ।। ९३ ॥ सुअणो देसमलंकरेइ तं विभ करेइ पयसन्तो। गामासण्णुम्मूलिअमहावडट्ठाणसारिच्छं ॥९४ ॥ ( सुजनो य देशमलकरोति तमेव परोति प्रक्सन् । मामास नोन्मूलितमहावटस्थानसाशम् ॥ ] भाछे ग्यक्ति जिस देशको अपने निवास द्वारा भर कृत करते हैं उसी देशसे प्रथम शतक २३ प्रवाया जाकर घे ही मामासन्न उम्मूलित महापटयरस्थानकी भांति उसे दुखदायक कर डालते हैं ॥ ९ ॥ सो णाम संभरिलह पञ्भसिओ जो मणं पि हिहि । संभरिअव्यं च क गयं च पेम्म गिरालम्ब १९५॥ {स नाम संस्मर्यते प्रभ्रष्टो यः क्षणमपि हृदयात् । स्मर्तव्यं च कृतं गत घ प्रेम निरालम्यम् ॥ रमरण रखने की बात उसके ही विषयमें ऊँचती है, धणमरके लिए भी हृदयमे जिमझे निकल जानेकी संभावना है। जिस जग प्रेम मरणयोग्य हो जाता है, उसी सण वह बालग्यनशून्य हो जाता है ॥ ९५ ॥ जासं च सा कयोले अज वि तुह दन्तमपडलं याला । उभिण्णपुलअवढिपरिगअं रक्खा बराई ॥९६ ॥ [ न्यासमिन सा कपोठेऽद्यापि तव दन्तमण्डल वाला। उद्धिमपुल क्वृतियेष्टपरिगत रति वरामी] वह दीना पाला भाजतक अपने कपोलपर तुम्हारे द्वारा दिये हुए मण्ड- लाति दक्षतको न्यानो रूपमें महालकर रखे हुए है. जैसेकि वह पतस्थान चतुर्दिग में विकसित रोमांचवृत्ति बेदा द्वारा पेष्टिन है ॥ १६ ॥ टिट्ठा चूा अग्याइआ सुरा दरिसणाणिलो सहिओ। कजाई चिअ गरुआई मामि को बलहो फस्स ॥ ९७ ।। { धाता भामाता सुरा दक्षिणानिल' सोदः। कार्याप्येव गुरुकाणि मातुलानि को वनमः यस्य ॥ ] भानोकुर देखा गया है, सुरा पोपी गयी है एवं दक्षिणपवनको भी महन किया गया है। उसका अर्थान् नायकका कार्यसमूह हो गुरुतर प्रतीत होता है, अत. हे मामी, कौन सिमा प्रिय है । ९७ ॥ रमिऊण पपि गो जाहे उयहि पडिणिउत्तो। यहरं पउत्थपइआ व्य तम्सणं सो पवासि व्य॥९॥ { रमवा पदमपि गतो यदोपाहि प्रनिनिवृत्त । अहं मोषितपतिदेव तरक्षणं स प्रघातीव ॥] रमणके उपरान्त वह एक पग भी चलकर अब भालिंगन के लिए प्रविनिवृत्त होता है, तब मैं अपनेको प्रोषितपतिका एवं उसको प्रवासी समझती हूँ ॥१८॥ 7

२४
गाथासप्तशती
अविइण्इपेच्छमिजं समसुहदुःखं विहण्णसम्भावं।
अण्णोण्णहिअअलग्गं पुण्णेहि जणो जण लहइ ।। ९९ ।।
[भवितृष्णप्रेषणीय समसुखदुःसं वितीसगावम् ।
भन्योन्यहृदयला पुण्यजनो जनं लभते ॥]
जो पुरुष प्यासे नयनोंसे दर्शनीय, सुखदुःखके समय सद्भाववितरणमें
समर्थ एवं परस्परके हृदयों में न होने योग्य है, ऐसे पुरुषको कोई सी बड़े
भाग्यसे ही पाती है। ९९ ॥
दुःखं देन्तो वि सुह जणेइ जो जस्स घल्लहो होइ ।
दश्मणहदूणिआणं वि वहद थणाणं रोमञ्चो॥ १०० ।।
[दुःखं दददपि मुखं जनयति यो यस्य वल्लभो भवति ।
दयितनखदूनयोरपि वर्धते स्तनयो रोमाञ्च]
जो जिसका प्रिय है, वह दुःस दिये जाने पर भी सुख उत्पन्न करता है।
प्रियके नखद्वारा खिल स्तनद्वय भी रोमांचमें फूल जाते हैं ॥ १० ॥
रसिमजणहिअअइए कवइच्छलपमुहसुकइणिम्मविए ।
सत्तसअम्मि समत्तं पढम गाहास ए॥११॥
[ रसिकजनहृदयदयिते कविवरसलप्रमुखसुकविनिर्मिते ।
सप्तशतके समाप्त प्रथम गाथाशतकमेतत् ॥]
कवियरसलप्रमुखसुकविरचित, रसिकोंके हृदयहार सप्तशतीमें यह प्रथम
गाथाशतक समाप्त हुभा ॥१०॥

द्वितीय शतक तस्या धरियो धरिओ विअलइ उमएसो पिड्सहीहि दिनम्तो। मभरद्धमयापापहारजजरे तीऍ हिअअम्मि ॥१॥ [तो तो विगलग्युपदेशः प्रियसखीभिर्दायमानः । मकरध्वजयाणप्रहारजजरे हृदये ॥ कामदेवके वाण-प्रहारसे जर्जरित उसके हृदयमें प्रियसखियोद्वारा दीयमान मान करने का उपदेश पारयार ग्रहण करने पर भी विगलित हो जाता है ॥१॥ तडसंठिअणोदेमन्तपीलुभआरएखणेकदिपणमणा । अगणिअदिणियाअभआ पूरेण समं चइ काई ॥२॥ [तटसंस्थितनीकान्तशावकरपणकदत्तमनाः । अगणित विनिपातमया पूरेण समं वहति काकी ॥] तटसंस्थित नीदमें वर्तमान शावककुलके रक्षणमें एकान्त मनौनिवेशकारिणी काकी सट सरुके मजनान्तर अपने गिरनेके भयको न गिनकर जलप्रवाहकके साप हुपती जा रही है ॥२॥ बहुपुप्फभरोणामिअभूमीगअसाह सुणसु विपत्ति । गोलातडविअडकुडग महुअ सणिभं गलिजासु ॥३॥ [बहुपुष्पमरावनामितभूमीगनशाख शृणु विज्ञप्तिम् । गोदासटविकरनिकुशमधूरु शनगंलिप्यसि ॥] हे गोदावरीके तटस्थ विकटनिकुञ्जस्थित मधूत, तुम्हारी शाखाएँ अनेक पुष्पोंके भारसे पृथ्वीपर्यन्त इक गयी हैं, तुम मेरी विज्ञप्ति सुन लो- सुमको धीरे-धीरे विगलितपुष्प होना पड़ेगा ॥३॥ णिप्पच्छिमाई असई दुःखालोआई महुअपुष्काई । चीए यन्धुस्स य अटिआई रुअई समुश्चिणा ॥ ४॥ [निष्पनिमान्यसती दुखालोकानि मधूकपुष्पाणि । पिसार्या धन्धोरिवार नि रोदनशीला समुधिनोति ॥]

गाथासप्तशती असती रितामें भवस्थित घंधुओंके सर्वपरिशिष्ट अस्थिसमूहकी नाई दुःखावलोक्ति सर्वपरिशिष्ट मधूरु पुप्पसमूह रोदन करते-करते चयन कर रही है ॥४॥ यो हिअभ मडहसरिआजलरअहीरन्तदीहदार व्य । ठाणे ठाणे चित्र लग्गमाण केणापि डल्झिहसि ॥५॥ [ हे हृदय स्वल्पसरिजलस्यहियमाणदीर्घदारुवत् । स्थाने स्थाने एव लगरकेनापि धच्यसे ॥] हे हृदय, स्वरुपसोया नदीके जलके वेगमें छिपते हुए दीर्घ काठकी भाँति जगह-जगह ठोकर खानेपर भी किसीके द्वारा तुम दग्ध दोनोगे ॥५॥ जो तीऍ अहरराओ रति उव्यासिओ पिअअमेण । सो विवादीसह गोसे सवत्तिणअणेसु संफन्तो ॥६॥ पिस्तस्या अधररागो राजावुद्वासित प्रियतमेन । स एव दृश्यते प्रात: सपनीनयनेषु संकान्तः ॥] उसका जो सधाराग रातमें प्रियतमद्वारा निरन्तर अधरपानवश पोंछ दाता गया है, वही रक्तिमा प्रात काल होनेपर सपत्नियों के नेत्राम संक्रान्त देखी जाती है॥३॥ गोलाअडटिअं पेठिऊण गहवइसुअं हलिअसोण्हा। आढत्ता उत्तरिडं दुम्खुत्ताराएँ पअधीए ॥७॥ ( गोदावरीतटस्थित प्रेक्ष्य गृहपतिसुतं हलिकस्नुषा । भारधा उत्तरीतुं दु.पोतारया पदण्या ॥] हालिककी पुत्रवधूने गृहपतिपुत्र अर्थात् अपने कान्तको गोदावरीतटपर खड़ा हुआ देखकर मस्यन्त कष्टसे उत्तरीमार्गसे अवतरण करना प्रारम्भ किया। चलणोआसणिसण्णस्स तस्स भरिमो अणालवन्तस्स। पाअड्डट्ठावेटिअकेसदिढामहणसुल्लिं ॥८॥ [चरणावकाशनिपणस्य तस्य स्मामोऽनालपतः । पादाङ्गुष्ठावेष्टितरेशपुढाकर्षणगुग्गम् ॥] मेरे चरणों में चुपचाप बैठे हुए एवं भयसे निर्वाक उसके मनमें मेरे पादांगुष्टद्वारा भावेष्टित उसके वेशगुटके १६ भाकर्षणसे जो सुख नापन हुभा था, वही मुझे याद भा रहा है।८॥

२७
द्वितीय शतक
फालेर अच्छभलं च उअह कुग्गामदेउलदारे।
हेमन्तप्रालपदिओ विज्झामन्तं पलालगि।।९।।
[पाट्यायामशमिय पश्यत कुमामदेवारद्वारे ।
हेमन्तकालपाधिको विमायमानं परालानिम् ॥]
म लोग देखो, युरे प्रामक मन्दिर द्वारपर देमन्तकालीन एधिक निर्वाण-
माय पहारालिको भालकी भाँति पाट रहा है ॥ ९॥
कमलाभरा मलिआ हंसा उहाविमा ग अपिउच्छा।
केणॉवि गामतडाए अभं उत्ताणभं ब्यूढं ॥१०॥
[ कमलाकरा न मृदिता मा उड्डायिता न च पितृवसः।
केनापि प्राममहागे अभ्रमुत्तानितं लिप्तम् ॥
हे पुआ, नहीं जानता गावकी तलैयामें भागशको तानकर किसने गिरा
दिया है, तथापि वापर कमलल उपमर्दित नहीं हुआ है, हंस भी यहाँसे
उद नहीं गये है। १०n
केण मणे भग्गमणोरहेण संलायि पवासोत्ति ।
सविसाई व अलसान्ति जेण बहुआएँ अगाई ॥ १३ ॥
[ केन मन्ये मनमनोरधेन संहापितं भवाम इति ।
सविपाशीवालसायन्ते येन नवा भङ्गानि ॥
ऐसा प्रतीत होता है, जैसे किसीने भग्नमनोरथ होकर भवासगमन के
सायंध धात किया है । इसी कारण, वधूके भंग-प्रायंगोंने जैसे विपदग्य होने से
कार्यपटुनाको छोड़ दिया है ॥११॥
अअवि वालो दामोअरोति इअ जम्पिए जसीआए।
फहमुहपेसिअच्छं मिहुअं इसिरं वभयहहिं ॥१२॥
(अद्यापि पालो दामोदर इति इति जल्पिने यशोदया।
कृष्णमुवपितातं निमृतं हसित प्रजवधूमिः ।)
भाजता दामोदरका मेरे निकट अचपन हो रह गया है, यशोदाके ऐसा
महनेपर प्रजवष्टियाँ कृष्ण मुखको धोरमास फिराकर गोपनभावसे हसीं ॥१२॥
ते विरला सप्युरिसा जाण सिणेहो अहिरणमुहराओ ।
अणुदिअह वहमाणो रिणं व पुत्तेसु संकमइ ॥१३॥

गाथासप्तशती [ ते विरसा सापुरुषा येषां स्नेहोऽभिन्न मुखरागः । अनुदिवसवर्धमान ऋणमिव पुत्रेषु संकामति n] थे सापुरुष विरले ही हैं जिनका भमन्दीभून मुखरागयुक्त स्नेह प्रतिदिन सर्दित होकर पितृ ऋणकी मांति पुत्रों में भी सक्रान्त होता है ॥ १३ ॥ पश्चणसलादणाणहेण पासपरिसंठिआ णिउणगोवी । सरिसॉविआणं चुम्बई कयोलपडिमागों कण्हं ॥ १४ ॥ [नर्सनलाघननिभेन पाचपरिसस्थिना निपुणगोपी। साशगोपीनां धुम्पति कपोलप्रनिमागत कृष्णम् ॥] पासमें खड़ी हुई निपुण गोपी नृत्यश्लाघाके बहाने भनुराग सम्पन्न अपनी जैसी गोपियों के कपोलपर प्रतिविम्बित कृष्णको प्रतिमाको अललितभावसे चूम रही है ॥ सम्वत्थ दिसामुहपसॉरिपहि अण्णोपणकडअलग्गेहिं । छलिं व्ध मुभा विझो मेहेहि विसंघडन्तेहिं ॥१५॥ [ सर्व दिशामुखप्रतिरन्योम्पकटकलग्ने । छलीमिव मुश्चति विन्यो मेविसंघटमाने ।] पर्वतके प्रतिनितम्बमें हम, पादमें विघटमान होकर सारी दिशा में फैले हुए मेघसमूहको देखनेपर ऐसा प्रतीत होता है मानो वियपर्वत अपने शरीरसे मिली छोड़ रहा है ॥ १५ ॥ आलोअन्ति पुलिन्दा पन्यअसिहरट्ठिमा धणुणिसष्णा । हत्थिउलेहि घ विझं पूरिजन्तं भवहिं ॥१६॥ [भालोकयन्ति पुलिन्दा पर्वतशिखरस्थिता धनुनिपग्णा । हस्तिकुलरिव किन्य पूर्यमाण मवाने । पर्वतके शिखर पर धनुष लेकर बैठे हुए पुलिन्दाण विषय पर्वतको हरितकुल सास कृष्णकाय नव मेघमाला द्वारा परिपूर्वमाण देखते हैं ॥१६॥ वणवमसिमइलको रेहइ विझो गणेहि धरलेटिं। खीरोअमन्थणुध्छलिअदुद्धसित्तो व्य महुमहणो ॥१७॥ [घनदवमपीमरिनाङ्गो राजते विनयो नैवल । तीरोदमयनोलितदुग्धसिप इव मधुमधन' । दावानिकी मसि द्वारा मलिनित दे बाला विनयाच धवल मेघसमूह

द्वितीय शतक
द्वारा भान होकर, क्षीरसागाके मथनमें उछाले हुए दुग्ध द्वारा सित मधु
मपनविष्णुकी भांति शोभा पा रहा है ॥ १७ ॥
वन्दीअणिहाबन्धविमणाइ चि पकलो त्ति चोरजुभा।
अणुराण पलोइओं, गुणेसु को मच्छरं वहह ॥ १८ ॥
{ वन्द्या निहितवान्धवविमनस्कयापि प्रवीर इति चोरयुवा ।
Ce
अनुरागेण प्रलोकिती गुणेषु को मत्सरं वहति ॥
॥]
घान्धों के मारे जाने पर विमनस्का बन्दिनी युवती चोर युधकको शौर्यादि-
गुण सम्पन्न प्रदीर समसकर अनुगगी देख रही थी-गुणवैभव देसने पर
मारसय प्रदर्शन कौन करता है ।।
अज कइमो चि दिअद्दो वाहवह रुवजोव्वणुम्मचा।
सोग्ग धणुसम्पच्छलेण रच्छासु विहिरर ॥ ११ ॥
(अध कतमोऽपि दिवसो व्याधवधू रूपयौवनोन्मत्ता ।
सौभाग्यं धनुस्तष्टत्वपछलेन प्यासु विकिरति ॥]
आज कितने दिन हो गए, रूप एवं यौवन में उन्मत्त व्याधवधू धनुके सूपम.
स्त्रक्के निक्षेपके बहाने अपने सौभाग्यको रथ्यापर निक्षेप कर रही है ॥ १९ ॥
उक्खियह मण्डलिमारुपण गेहङ्गणाहि वाहीप।
सोहागवडाअव्य उअह धणुरुम्परिन्छोली ॥२०॥
[उरिवायते मण्डलीमारुतेन गेहानणादयास्त्रियाः ।
मौभाग्यध्वजपताव पश्यत धनुः सूचमावश्पतिः।]
घ्यायवधूके गृहाङ्गणसे अपने सौभाग्यके वजपताकारूपिणी धनुको सूचम-
स्वपंक्ति मण्डलवायुद्वारा उदायी जा रही है- देखो ॥ २० ॥
गअगण्डस्थलमिणहसणमअमइलोक्रअकरञ्जसाहाहि ।
पत्तीम कुलहरायो णाणं वाहीम पइमरणं ॥ २१ ॥
{সলসিমলমতিনীৰহ্মানি।
आगच्छन्त्या कुल गृहाजातं प्यास्त्रियापतिमरणम् ॥
पिताके घरसे लौटकर व्याघवधूने हाथोके गण्डस्थलघर्पणसे उत्पस
मदद्वारा मलिनीकृत कर शाखासमूहको देखकर अपने पति के मृत्युको समझाया।
गववहुपेम्मतणुइओ पण पदमघरणीम रफ्पन्तो।
आलिहिअदुप्परिलं पि गेइ रपणं धणं पाहो ॥२२॥

३० गाथासप्तशती [नववधूप्रेमानतः प्रायं प्रथमगृहिण्या रक्षन् । तनुस्तदुराकमपि नयापरण्यं धनुधिः ॥] नववधूई प्रेममें अध्यन्त कृशतनु होनेपर भी ध्याध प्रथमगृहिणीके प्रणयकी रसाकरने के निमित्त तनुकृत एवं दुराक धनुषको अरण्य में वहन कर लेता है ॥ २२ ॥ हासाविओ जणो सामलीम पढमं पसूममाणाए । बल्लहवारण अलं मम त्ति यहुसो भणन्तीए ॥ २३ ॥ [ हासितो जनः श्यामा प्रथम प्रसूयमानया। वहमवादेनालं ममेति बहुशो मगरया ॥] प्रियतमकी बातोंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं, भनेकशार ऐसा कहकर प्रथमप्रसपकारिणो श्यामलाने सबको हँसाया है ॥ २३ ॥ फइवरहि पेम्मं जस्थि विभ मामि माणुसे लोय । अइ होइ कम्स विरहो चिरहे होतमि को जिअइ ॥२४॥ [वैतवरदितं प्रेम नारस्येव मातुलानि मानुपे लोके । भय भयति कस्य विरहो विरहे भवति को जीवति ॥ ] हे मामी, मानवजगतमें कपटताशून्य प्रेम जैसे एकदम नहीं है-यदि ऐसा होता तो क्या किसीको विरह होता? विरह होने पर भी क्या कोई जीवित रहता ॥२४॥ अच्छेरं व णिहि विअसग्गे रम्य अमअपाणं व । आसि म्ह तं महत्तं विणिसणसणं तीए ॥२५॥ [भाश्चर्यमिव निधिमिव स्वर्गे राज्यमिवामृतपानमिव । भासीदस्माकं तन्मुहूर्त विनिवसनदर्शने ताया ] विवस्त्रावस्थामें उपयश दर्शन मुझे उसी क्षण अद्भुतरूप, निधिप्राप्तिरूप, स्वराज्यलाभरूप, यहाँतक कि अमृतपानरूप प्रतीयमान हुआ था ॥ २५ ॥ सा तुज्झ बल्लहा तं सि मज्झ वेसो सि ती तुज्झ अई। पालम फुड भणामो पेम्मं किर बहुविआरं चि ॥२६॥ [ सा तव बबभा स्वमसि मम द्वेप्योऽसि तस्यास्तपाहम् । पालक स्फुट मगामः प्रेम किल बहुविकारमिति ] पह अन्य रमणी तुम्हारी प्रिया है, तुम हमारे प्रिय हो, तुम उसके द्वेष्य हो द्वितीय शतक प्रय में तुम्हारा प्य ई-हे साटा, स्पष्टता कहती है कि प्रेम भनेक प्राम विकार युक्त होता है ॥ ३॥ अदभ लजालुइणी तस्स अ उम्मच्छराई पम्माई। सदिआरणीति णिउणो मलाहि कि पारायण ॥२७॥ {रास्तस्य योन्मराशि प्रेमागि। मशीनोऽपि निपुणोऽपए कि पादरागेश ] मैं स्वयंERTer हूँ, उसका प्रेम भी भयंत उगकर है एमविषा भी माविकारम भरपरत निपुण है। अतः निषेध करती हूँ, पारागप्रयोगकी भापरता नही है ॥२०॥ महुमासमायभाइसमामरावारणिमरे रपणे। गाम विरहायरॉपद्धपदिभमणमोहणं गोची ॥ २८ ॥ [मधुमाममामातमका शंकानिभाये। गायति विरहापराएपथिकमनोमोहन गोपी यसन्त-वायुमे भाइस ही भरे भाग्य को संकारसे परिस। यहाँ उनके साथ साथ गोपी भी शिक्षारयुमा आष्ट पपिकों के मन मुग्पका गान गा रही है ॥२८॥ तह माणी माणधणा' तील पमे दूरमणुपदो। जह से अणुपीश पिओ पगाम विम पडत्यो । २९ ॥ [ता मानो मानधनपा सपा प्यमेव दामनुष्य पथा सस्या भनुनीय प्रिय एषाम एप मोरिमः.] मानधना उस प्रिपाका मान इतनी दूरत अनुप हुमा है कि उसका मिप उस पनुनय काने उपात एकही गार में प्रवासीकी मानि होगया है ॥ १९॥ सालोएँ विस सूरे परिणी घरसाभिमन्स घेत्तूप । उन्तस्स वि पाप धुमा वसन्ती ६सन्तरस ॥३०॥ [ सालोक एवं सू गृहिरी गृहस्वामिनों गृहोरया । अनिमोऽपिपादी भावति सन्ती इसan) सूर्यका भारु रहते ही गृहिगी हंसमुख होकर ईसटे हंसते पनि गृहस्वामी के दोनों पाको घोराठीtat..

गाथासप्तशती
वाहरउ मं सहीओ तिस्सा गोत्तेण किं स्थ मणिपण ।
थिरपेम्मा दोउ जहिं तहिं पि मा किंपिणं मणह ॥ ३१ ॥
[ज्याहरतु मो समयस्तस्या गोण किमग्न भणितेन ।
स्थिरप्रेमा भवतु यत्र तत्रापि मा किमध्येनं भणत u]
असी सखियो, उस ( सपत्नी) के नामद्वारा मुझे पुकारता है तो पुकारने
दो, उससे इसरूप पुकारेजानेपर मेरी क्या पति ? जिसतिसके प्रति वह
स्थिरप्रेमा हो-तमलोग उससे कुछ कहना मत ॥३१॥
रूअं अच्छीसु ठिअं फरिसो अङ्गेसु जम्पिों कण्णे ।
हिअ हिअए णिहि विओइरं किं त्थ देव्वेण ॥ ३२ ॥
[ रूपमघगोः स्थित स्पर्शोऽङ्गेषु अपितं कर्णे।
हृदयं हृदये निहितं वियोजितं किमत्र देवेन ॥]
देव क्या हमारे नयनद्वय में स्थित पियका रूप, अंगों में स्थित इसका
संस्पर्श, कानों में निहित उसकी पाते एवं हृदय में निहित उसके हृदय इन सबको
मेरी भावनासे वियोजित करने में समर्थ होगा? ॥
सअणे चिन्तामइ काऊण पिमं णिमीलिअच्छीए ।
अप्पाणो उपऊढो पसिटिलवलाहि वादाहिं ॥ ३३ ॥
[शयने चिन्तामयं कृत्वा प्रियं निमीलितापया।
भारमा उपगूढः प्रशिथिलवलयाम्यो बाहुभ्याम् ॥]
नेत्र निमीलितकर शय्याकेऊपर वह कामिनी अपने प्रियको चिन्तामनकर
विरह प्रशिथिल बलययुक्त बाहुपद्वारा अपना ही आलिंगन कर रही है ॥३३॥
परिहूपण वि दिअहं घरघरभमिरेण अण्णकजम्मि ।
चिरजीविपण इमिणा खविमझो दड्डकारण ॥३४॥
[परिभूतेनापि दिवसंगृहगृहनमणशीलेनान्यकायें।
चिरजीवितेमानेन पिताः स्मो दग्धकायेन ॥]
दूसरेका कार्य-साधनेकेलिए सारेदिन एकघरसे दूसरे घर आ जाकर
भन्मान्वेपी दाधकाककी भाँति पराभून अपनी इस वृद्ध दग्धदेहद्वारा मैं उद्वेजित
हो गयी हूँ ॥ ३४॥
घसइ जहि चेम खलो पोसिज्जन्तो सिणेहदाणेहिं।
तंचेग आलभं दीअम व्य भइरेण माले ॥३५॥

३३ द्वितीय शतक पिसति यत्रैव खलः पोप्यमाणः स्नेहदानः । तमेवालयं दीपक इवाचिरेण मलिनयति ॥ जिस घरमें स्नेहदानद्वारा खलजन संवदित होते हैं, स्नेहदानद्वारा पोषित दीपककी माँति वे उसी घरको शीघ्र ही मलिम बनादेते हैं ॥ ३५॥ होन्ती विणिप्फलचिअधणरिद्धी होइ किविणपुरिसस्ल । गिमाअवसंतत्तस्स णिअअद्याहि व्य पहिअस्स ॥३६॥ [ भवनश्यपि निष्फलैव धनद्धिर्भवति कृपणपुरुषस्य । ग्रीमातपसंतप्तस्य निजकाछायेव पथिकस्य ॥] कृपणको प्रभूत धनवृद्धि होने पर भी यह प्रोमके भातप से संतत पथिकके लिए अपनी छायापमान निष्फल सिद्ध होती है ॥३६॥ फुरिए वामच्छि तुए जइ एहिइ सो पिओ जता सुइरं । संमोलिय दाहिणसं तुइ अवि पहं पलोइस्सं॥३७।। [स्फुरित वामाति स्वयि यद्येप्यति स प्रियोऽद्य तरसुचिरम् । संमील्य दक्षिणं स्वयैवैतं प्रेक्षिप्ये ॥] हे पायें नेत्र, तुम्हारे स्फुरित होनेसे यदि वह मिय भाजही आजाय तो में अपनी दायें नेत्रको मदेरहकर केवल तुमसे बहुतदेरतक उसे देखूगी ॥३७॥ सुणअपउरम्मि गामे हिण्डन्ती तुह करण सा वाला। पासअसारिव्य घरं घरेण कइआ चि खजिहि ॥ ३८॥ [शुनकमधुरे प्रामे हिपहमाना तव कृतेन सा घाला। पाशशारीव गृहं गृहेण कदापि खादिष्यते ॥] कुरकुरयहुलप्राममें वह याला तुम्हारेलिए इस घरसे उस घर जाते-आते कभी न कभी पासाकी गोटी अथवा पाशर्मभावद सारिकापधीकीमाँति खा डाली जायगी।॥ ३८॥ अण्णणं फुसुमरसं जं किर सो महह महुअरो पाउं । तं णिरसाण दोसो कुसुमाणं णेश भमरस्स ॥३९॥ [अन्यमन्यं कुसुमरसं परिकल स इच्छति मधुकरः पातुम् । तभीरताना दोषः कुसुमानां नैव अमरस्य ॥] यह मधुकर जो अन्यान्य पुष्पोंसे रस चूसनेकी इच्छा करता है, इसमें रमशून्य युप्पोका ही दोष है, मधुकरका किसीप्रकार दोप नहीं है ॥ ३९ ॥ ३गा०रा०

३४
गाथासप्तशतो
रस्थापइण्णणअणुप्पला तुमं सा पडिच्छए एतं ।
दारणिहिपहि दोहि वि मङ्गलकलसेहि व थणेहिं ।। ४० ।।
[रयाप्रकीर्णनयनोपला वो सा प्रतीयते मायान्तम् ।
द्वारनिहिताम्यो द्वाम्यामपि मङ्गलकलशायामिव स्वनाम्याम]
राजपथकीओर नयनपनको विस्तारित रखकरमी वह रमणी अपने
सुधद्वयको मालकलशद्वयकी भाँहि द्वारपर निहितकर तुम्हारे आगमनकी
प्रतीक्षा कर रही है॥४०॥
तारुण्णं जा रुव्वा ता छोणं जाव छिजए अझं।
ताणीससिभ पपइभ जाव अ सासा पहुप्पन्ति ॥४१॥
( सावदुदितं यावदुयते तावत्तीणं यायाधीयतेजाम् ।
तावलि असितं पराक्पा यावर [७] वासा प्रभवन्ति ॥ )
जितनी देर रोया जासकता है उतनीदेर अमागिन रोपी है, जितना पीण
हुभा जा सकता है उसके मग उतने चोग हुए हैं एवं जितनीदेर साँस तेजीसे
चल सकती है उतनीदेर उसने उहास लिया है ॥३॥
समसोक्खदुक्खपरिवहिआणे कालेण इंढपेम्माण ।
मिहुणाणं मरद जं तं खु जिअइ इअरं मुझं होइ ।। ४२ ।।
[समसौख्यदुःखपरिवस्तियोः कालेन स्वप्रेग्णोः ।
मिथुनयोम्रियते यत्तस्खलु जीवति इतरन्मृतं भवति ॥]
सुख एवं दुःखमें समानभावसे परिवदितहोकर कालान्तरमें हदमेममें
मापद दम्पतिमेंसे नो एक मर जाता है, वस्तुतः वही जी जाता है एवं दूसरे
व्यक्तियोंद्वारा मृत गिना जाता है ॥ ४२ ॥
हरिहिइ पिअस्त णवचूअपल्लयो पदममअरिसणाहो ।
मा रुवसु पुत्ति पत्थाणकलसमुहसंठिओ गमणं ।। ४३ ।।
[हरिष्यति प्रिषस्य नवचूतपलया प्रथममक्षसनाय ।
मा रोदीः पुनि प्रस्थानकलशमुखसंस्थिती गमनम् ॥]
है पुत्रि, प्रस्थानमा कलश के ऊपर संस्थित प्रथम मारीयुक्त नवज्ञान-
पल्लव ही प्रियजनके गमनका हरण अथवा निवारण करेगा, अतः मुम रोना
मत॥१३॥
जो कह वि मह सहीदि छिदं लहिऊण पेसिमोहिमय ।
सो माणो चोरिअकामुन ब्व दिट्टे पिए णट्ठो ॥४॥

द्वितीय शतक [यः कथमपि मम सातीमिशिछ या प्रवेशितो हृदये। समानधोरकामुक इव स्टे प्रिये नष्टः ॥] प्रणयकलहरूप छिद्र देखका सखियोंने मेरे हृदयमें जो मान प्रविष्ट करा दिया है, यह मान प्रियवरको देखते ही बोर कामुककी भौति भाग गया है ॥४४॥ सहिमाहि भण्णमाणा थणए लग्नं कुसुम्भपुष्पं ति । मुद्धबहुआ हसिजइ पप्फोडन्ती गहवाई ॥४५॥ [सखीभिर्मण्यमाना स्तने लग्नं कुसुम्भपुष्पमिति । मुग्धयधूहस्यते स्फोटयन्सी नखपदानि ॥] स्तनमें क्या कुसुम्म कुसुम लगा हुआ है !-सखियों द्वारा ऐसा पूछा जाने पर मुग्धवधूने स्तनपरसे नखचिवको हटानेकी चेटकी जिससे सखियाँ हँस पड़ी ॥ १५॥ उम्मूलेन्ति व हिम इमाई रे तुह विरजमाणस्त। अवहीरणवसविसंतुलवलन्तणअणद्धदिट्ठाई 11४६॥ [ उन्मूलयन्तीव दयं इमानि रे तव रिज्यमानस्य । भवधीरणवश विसंधुलवलनयनाधानि ॥] अरे तुम्हारे मेरेमति विमुखहोनेपर तुम्हारी उपेक्षावश लक्ष्यविहीन हो परावर्तनशील नयनाटि मेरे हृदयको उन्मूलित कर रही है ।। ४६ ॥ ण मुअन्ति दीहसासं ण अन्ति चिरंण होन्ति किसिआओ। धण्णाओं ताओं जाणं बहुबल्ल घल्लहोण तुमं ॥४७॥ [न मुञ्चन्ति दीर्घश्वासाम्ररुदन्ति चिरं न भवन्ति कृशाः । यासा बहुवराम चनमो न पम् ॥] पहुवलम, सुम जिसके प्रिय नहीं हो-ऐसा कहकर जो तुम्हारे विरहमें दीनि श्वास नहीं छोड़ती, बहुतदेरतक रोदन भी नहीं करती एवं कृा भी नहीं होती-वे ही रमणी धन्य है ।। ४७ ।। गिहालसपरिघुम्मिरतंसवलन्तद्धतारआलोभा । कामस्स वि दुन्यिसहा दिहिणिआया ससिमुद्दीए ॥४८॥ [निदाटसपरिपूर्णतशीलतियाचलर्धतारकालोकाः । कामस्यापि दुर्विपहा दृष्टिनिपाताः शशिमुख्या] धन्यास्ता गाथासप्तशती चन्द्रवदनाकी पड़ी हुई दृष्टि मदनदेवके धैर्यकोमी तोड़ देती है क्योंकि यह रष्टि भर्दतारकाके आलोकनिदाम भट्स, परिपूर्णमान एवं मानवेतरभावसे प्रेरित ही दिखायी पड़ती है ।। ४८॥ जीविअसेसाइ मए गमिआ कह कह वि पेग्मदुहोली। पहि विरमसु रे डहहिअअ मा रजसु कहिं पि ।। ४९।। [जीवितदोपया मया गमिता कथं कथमपि प्रेमदुदौली । इदानी विरम रे दुग्धहृदय मा रज्यस्व कुत्रापि ॥) दग्धहृदय, मैंने किसीप्रकार जीवनमानावशेष होकर प्रेमको दूहोली अर्थात् निष्फल प्रेम प्रन्थि निवाहित की है, तुम अय विरत हो जाओ एवं अन्य किसीसे अनुराग मत करो ॥ १९ ॥ अजाएँ णवणहक्यअणिरीक्सणे गरुअजोव्वणुत्तुङ्गं । पडिमागअणिभणअणुप्पलचिशं होद थणघ8 ।। ५०॥ [भार्याया नवनसातनिरीक्षणे गुरुपौवनोत्तुङ्गम् । प्रतिमागत निजनयनोत्पलातिं भवति स्तनपक्षम् ॥] वररमणीके अरमन्त गुरु एवं यौवनोतुहस्तनपृष्ठ, उसके नूतन नखरात दर्शन के समय, उसके प्रतिविम्बित नयनपम द्वारा अर्धित हो रक्षा है ॥ ५० ॥ तंणमह जस्स यच्छे लच्छिमुहं कोत्थहम्मि संकन्तं । दीसह मअपरिहीणं सतिविम्ब सूरविम्ब व्य ॥५१॥ [तं नमत यस्य वक्षसि लघमीमुख कौस्तुभे संक्रान्तम् । एश्यते मुगपरिहीम शिविम्वं सूर्य धिम्य इ८ ॥ उस नारायणको ही प्रणाम करो, जिसके दस स्थितकौस्तुभमणिमें संक्रान्त लक्ष्मीदेवीका मुखका, सूर्यविन्धमें प्रतिफलित मृगगून्य अर्थात् निकला चन्द्रयिम्बकी नाई शोभायमान ष्टिगत होता है ॥ ५ ॥ मा कुण पडियफ्यसुहं अणुणेहि पि पसाअलोहिल्लं । अइगहिअगरुअमाणेण पुत्ति रासि व्व छिजिहिसि ।। ५२ ।। [ मा कुरु प्रतिपरसुखमनुनय प्रियं प्रसादलोभयुतम् । भनिगृहीतगुरकमानेन पुनि राशिरिष शीणा भविष्यति ॥ ) दे पुन्नि, शत्रुओंका सुख बहाना मत, अपने प्रसादलोलुपप्रियको अनुनय- साध्य करो, नहीं तो अतिगुरुमानका महणकर इम (सोलने के लिए माता भादि ) शशिकी नाई ीण एवं न्यून हो जाभोगी । ५१ ॥ -

द्वितीय शतक
चिरहफरवत्तदूसहफालिज्जन्तम्मि तीन हिसअम्मि ।
अंसू फजलमहलं पमाणसुत्तं च पडिहाइ ।। ५३ ।।
[विरहकरपत्रदु सहपाध्यमाने तश्या हृदये।
अश्रु फजलमलिनं प्रमाणसूयमिव प्रतिभाति ॥ ]
दुसह विरहरूप करपत्रद्वारा वापाट्यमान उसके हृदय के ऊपर उसका
कजलमलिन अनुममाणसूत्रकी नाई मतिमात हो रहा है ।। ५३ ।।
दुणियअमेभं पुत्तम मा साहसं फरिजातु ।
पत्थ णिदिताई मपणे हिअाई पुग्णे ण लम्भन्ति ॥ ५४ ।।
(दुर्मिक्षेपकमेतस्पुत्रक मा साहसं फरिष्यसि ।
सन निहितानि मन्ये हृदयानि पुनने म्यन्ते । ]
हे पुत्रक, पह हृदय रूप निक्षेप वा अर्पण दुर्मिक्षेप कहा जा सकता है,
अर्थात तुम्हारे हृदय के फिर लौट पानेकी संभावना नहीं है, सुतरी तुम
साहसपूर्ण कार्य करना मत । भान पड़ता है कि इस नायिका निहित मन
फिर पायामही जाता॥५४॥
णिव्युत्तरमा वि यह सुरअविरामटिई अआपन्ती।'
अविरअहिना धणं विकिपि अस्थि ति चिन्तेइ ॥५५॥
[निवृत्तरतापि षधू: सुरतविरामस्थितिमनानंती।
अविरतवदयान्यदपि किमप्यस्तीति चिन्तयति ॥ )
अनुभूतामणा होनेपा भी धूटी सुरहावसामपर क्या करना चाहिए, यह
न जानकर भविरत हृदय लेकर, इसके बाद और कुछ है, ऐसा विचार
करती है ।। ५५ ॥
जन्दन्तु सुरअसुहरसतदायहराई समललोअम्स ।
बहुकेअवमग्गविणिम्मिआई येसाणं पेम्माई ।। ५६ ।।
( नन्दन्त सुरतसुखरसतृष्णपदराशि सकललोकस्य ।
बहुतवमार्गनिनिमितानि पेश्याना प्रेमाणि ॥]
सभी के सुरससुखरसकी तृष्णाका अपहरगकरनेवाला एवं अनेक प्रकार के
कपटमार्गद्वारा रचित घेश्याओं का प्रेम कोकेलिए अभिनन्दनीय हो ॥ ५६ ॥
अप्पत्तमण्णुदुक्खो किंमं किसिमत्ति पुच्छसि हसन्तो।
पावसि जइ चलचित्तं पिमं जणं ता तुह फहिस्सं ॥ ५७ ॥

३८ गाथासप्तशती [भप्राप्तमन्युदुःख किं मा कृति पृच्छसि इसन् । प्राप्स्यसि पनि चलचित्तं प्रियं जनं तदा सब कययिष्यामि ॥] चित्तधोमजन्य दुःस कभी तुम्हें नहीं मिला है, इसीसे हंसका पूछती हो, 'मैं कृश क्यों हो गयी हूँ।' चंचल चित्त प्रिय जब उन्हें मिल जायणा तभी तुम्हारे प्रश्नका उत्तर दूंगी। ५७ ॥ अवहत्थिऊण सहिजम्पिआईं जाणं करण रमिओसि। एआई ताई सोक्खाई संसओ जोहि जीअस्स ! ५८॥ [अपहस्तपिरवा सखोजदिपतानि येषां कृते न रमितोऽसि । एतानि तानि सैख्यानि संशोय यैर्भावस्य ॥] जिन सुखोंकेलिए तुमने सखियोंकी बात न माणकर मेरे साम रमण कररही है, वे ही ये सारे सुख है। किन्तु इन सबके द्वारा मेरा जीवन संशयापन हो जाता है । ५८ ईसालुओ पई से रत्तिं महुयं ण देइ उच्चे। उच्चे अप्पण स्विस माए अहउज्जुअसुहाओ ।। ५९ ।। ईमोशीछः पतिस्तस्या रात्रौ मधूकं न ददास्युच्चेतुम् । उचिनोरयारमनैव मातरतिऋजुकरवमावः ॥] ईप्यापरायणपति उसे रात्रि मधूकपुष्प नहीं सुनने देवा । हे माँ, अत्यन्त मरहस्वभाववाला वह पति अपने आपही मधूकचयन कर रहा है। ५९ ॥ अच्छोडिअवस्थदन्तपत्थिर मन्थरं तुमं घच्च । चिन्तेसि थणहपासिमस्त मस्झरस विप भई ।। ६०॥ [छादाष्टक्वार्धान्तपस्थिते मन्थरं वं मज । चिन्तयसि स्तनमरायासितस्य मध्यस्यापि न भन्नम् ॥] भरी, बनान्त आकर्षणपूर्वक प्रस्थानशीले, मन्यागतिसे जा । स्तनमासे मायासित मध्यका मन हो सकता है, यह नहीं सोच रही हो क्या ॥१०॥ उद्धच्छो पिअ जलं जद्द जद विरलड्गुली चिरं पहियो । पावालिआ वि तह तह पारं तणुई पि तणुएइ ॥ १ ॥ [क्षिा पिवति अलं यया यथा दिरलाहुलिचि पथिकः । अपापालिकापि तथा तथा धार तनुकामपि तन्करोति ।] उपरकी पोर नयन सटाकर हाथकी हुटियोंको विरलकर पथिक जैसे- T

द्वितीय शतक
३२
जैसे काल-विकाशके साथ जलपान कर रहा है, प्याउपालिका पैसे-वैसे
सीणजलधाराको सीणता कर जल डाल रही है ॥ ११॥
मिच्छामरों पेच्छद जादिमण्डलं सावि तस्स मुदमन्दं ।
तं चटुमं च करई दो वि कामा घिलुम्पन्ति ।। ६२ ।।
{ भिषाघरा मेपले माभिमण्डलं सापि सरप मुखपदम् ।
सच्चदुकं च करई द्वयोरपि का दिलुम्पति]
मिधाजीवी नायिकाके भाभिमपदलकी ओर रष्टिपात कर रहा है, यह
नायिका भी उसके मुखचन्द्रकीओर देखाही है। इस अवसरपर कोर पोनोंक
घटुक एवं काक अर्थात् भिक्षादान पान एवं भिवाग्रहण पानसे भत्रको ले
भागते है ॥१२॥
जेण विणा जिविज्जा अणुगिज्जइ सो कआरपदो वि।
पत्ते वि गभरदाहे भण कस्स ग बल्लदो अग्गो।। ६३ ।।
[पेन विना न जीभ्यतेऽनुनीपते सतापरायोऽपि ।
प्राप्तेऽपि नगरदाहे मण करय न पाठमोऽग्निः)
जिसे बोदनेपर जीवनयापन संभव नहीं है, कृतापराध होनेपर मी उसे
सनुनीत करना उचित है। बसाको सो, सारनगरके शटनेपर भी अग्नि किसे
प्रिय नहीं है ॥ १३॥
वक्कं को पुलइज्जउ कस्स कहिज्जउ मुहं घ दुक्ख या।
केण समं च इसिजउ पामरपउरे हाग्गामे ॥६५॥
[पकं कः मलोक्यता कस्य कृप्यता सुख वा दुःसं था।
केन समं था हस्यता पामरप्रचुरे हसमामे ॥]
किसकी ओर मैं पम्भावसे देखें, किससे सुखदुलकी घात कहूँ एवं
इस पामरबहुल दुष्ट ग्राम में किसके साथ परिहास करूं। ६.p
फलदीवाहणपुण्णाहमहलं लहले फुणन्तीए ।
असहमणोरगम्भिणी इत्या परहरन्ति ॥६५॥
[ कापासीदेप्रकर्पणपुण्याहमगलं लागले कुर्वाया।
असत्या मनोरथगर्मिण्या हस्तौ परपरायेते ॥]
कपासका खेत धुनने के रामाम्मदिवसही मजशिया सम्पादन करने समय
मनोरपधारिणी असतोके हस्तस्य यरपरा रहे हैं ॥ ५५ ॥

४०
गाथासप्तशती
पहिउल्लूरणसङ्काउलाहि असईदि बहलतिमिरस्स।
आइप्पणेण णिहुअं बडस्स सित्ताई पत्ताई ॥६६॥
[पथिकच्छेदनशाकुलाभिरसतीभिवहलतिमिरस्य ।
भालेपनेन निभृत वटस्य सितानि पत्राणि ॥]
अन्धकार बहुलषरक्षके पत्तोंको अन्धकार दूरकरनेकेलिए पधिकगण कहीं
हे न दें, इस भाशासे भाकुल असती खियोंने मालेपनद्वारा उन्हें लिपाकर
सिक कर रखा है अर्थात् काकविष्टाकी आशवासे पपिकगण मानो पत्तोका
छेदन नहीं करते ॥६६॥
भअन्तस्स वि तुद्द सग्गगामिणो णइकरअसाहाओ।
पामा अज्ञ विधम्मि तुच कह धरणि विद छिचन्ति ॥ १७ ॥
[ भजतोऽपि तव स्वर्गगामिनो नवीकरणशाखा ।
पापद्यापि धार्मिक तप कर धरणामेव स्पृशत ॥1
हे धार्मिक, स्वर्गगमनके अभिलाषी होकर तुम मदीसटस्थित परमवृक्षकी
शाखा दन्तधावनार्य भनकररहे हो, किन्तु अभीतक सम्दारे दोनों पैर पृथ्वीपर
ही कैसे रखे हैं ॥ ६॥
अच्छउ दाव मणहरं पिआइ मुहदसणं अइमदग्छ ।
तगामछेत्तसीमा वि झत्ति दिट्ठा सुद्दाघेइ ॥ ६८॥
[भरतु तावन्मोहर मियाया मुखदर्शनमतिमझाम् ।
तग्रामक्षेत्रसीमापि शरिति रा
सुखयति ॥]
प्रेषसी के भति मूल्यवान मनोहर मुख दर्शनको वा सो दूर रहे, उसके
ग्रामकी सीमा भी यदि कहीं अचानक दिख आय सो यह भी मममें सुष
उत्पन्न करती है॥१८॥
णिसम्माहि वि छेत्ताहिँ पामरोणेअ ययए यसई।
मुअपिअजामासुण्णइअगेहदु क्खं परिहरन्तो ॥१९॥
[निकर्मणोऽपि क्षेत्रापामरो नैव प्रजति वसतिम् ।
मृमप्रियजायाशून्यीकृतगेहदु स्त्र परिहान् ॥]
प्यारी नायाके मर जानेपर शूय गृहके दुखको दूरकरनेकेलिए पामर
कार्यशून्यक्षेत्र से भी अपने घर नहीं जा रहा है ॥ १९॥
झञ्झापाउत्तिण्णिअघरवियरपलोटसलिलधाराहि ।
कुइलिहिमोहिदिभई रक्खा अजा करमलेहिं ॥ ७० ॥

द्वितीय शतक [सम्झावातो तृणीकृतगृहविषरप्रपतरसलिलधाराभिः । कुण्यलिखितावधिदियसं पापा कारा; ॥] सम्झायाप्तमें तमके उदमावेपर गृहविरारपर्यन्त जल पह रहा है, साधवी भार्या मित्तिलिखित स्वामी के प्रयासकाल भवधिसूचक दिन संवपाको दोनों हाथोबारा र कर रही है ॥ ७० ॥ गोलाणाए कच्छे चश्यन्तो राहाइ पत्ताई। उफ्फडर मकडो सोफ्सपा पोर्ट अ पिढेरे ॥ ७ ॥ [गोदावशी नपा कर पर्वयमाजिकायाः पनानि । उत्पतनि मर्कट: सोरखशम्दं रोत्युदरं च ताटपति ॥ ] गोदावरी के किनारे रामिकामा पन पर्वणकर बन्दर उछल रहे हैं, खोक शम्द कर रहे है एवं अपने पेट पीट रहे हैं [संकेत स्थानमें भयकी भाशा है॥1॥ गहयाणा मुअसैरिहडुण्डुअदामं चिरं यदेऊण । घग्गसआई उण णयरिम अजाघरे यद्धं ॥७२॥ [गृहपतिना मृतसमिद्धपटादाम गिमूठ्या । वर्गशतानि मीरवानन्तरमार्यागृहे घरम् ॥ गृहपतिने मृत महिपके वृहत् घण्टाकी माताको भनेकदिन तक सुरक्षित रखकर पातशतपशु को खरीदकर भी, पूर्व सरश महिप न पाकर उस मालाको भार्या भायतनमें बांध रसा। [सुभगा पूर्वपदी के भाभूपणादिको अन्य प्रेयसीको देना उचित नहीं] ॥७२॥ सिहिपेदुणावभंसा यहुआ याहस्स गठियरी ममह । गअमोत्तिभरअपसाहणाण मन्झे सवत्तीणं ॥७३॥ [शिसिपिच्छावतंसा पधूधिरप गर्विता भ्रमति। नामोतिकरवितप्रसाधनाना मम्ये सपनीनाम् ॥] मयूरपुष्पदा विभूषित होकर भी ध्याधपपू गर्यके साय गतमुहासे निर्मित भाभूपीको धारणकर सपनियों के बीच भ्रमग कर रही है." बङ्कछिपेच्छिरोणं उदल्लपिरीण घर्ममिरीणं । उकुदसिरीण पुत्तम पुण्णेहिं जपो पिओ होइ ॥ ४ ॥ [पक्रापिप्रेषणशीलाना मनोपनीयानां चक्रममगशीटानाम् । पाहामशीठान! पुरा पुष्पैशनः रिपो मावि ।

५२ गाथासप्तशती पुत्रक, को रमशी तिरहेकटापसे देखनेवाली, पक्रवचन से उद्दीपनशीला, पत्रपतिसे भ्रमणशीला एवं वक्रसो से हँसनशीलाका प्रिय होने के लिए लोगों के पुपयका बल होना आवश्यक है ॥ ४ ॥ भम धम्मिा पोसत्थो सो सुणओ मज मारिओ तेया। गोलाअडविअडकुडनचासिणा दरियसोहेण भ्रम धार्मिक विनम्घः स शनकोऽद्य मारितस्तेन । गोदातटविकटकुलवासिना बप्तसिंहन हे धार्मिक, सुम प्रशान्तभावसे अन्यत्र भ्रमण करो, गोदावरीके तीरपर्ती विकटकुअमें पास करनेवाले उस एस सिंहद्वारा १६ कुत्ता आम ही मारा गया है।॥४५॥ वापरिपण भरिसं अच्छिं कणऊरउप्पलरपण । फुकन्तो अविह्न चुम्यन्तो को लि देवाणं ॥ ७६ ॥ [ बातेरितेन भृतमति कर्णपूरोस्पकरमसा । फूरकुर्वनवितृष्णं चुम्वन्कोऽसि देवानाम् ॥j वायुद्वारा उप्तिकर्णपुररूपमें व्यवहृतपनरागसे पूर्णनयनमें फूरकार करने जाकर अतृप्तश्रमिलापसे चुम्बन करनेवाले तुम देवों में से कोई देव हो ॥ ६ ॥ सहि दुम्मेन्ति कलम्बाई जह मं तह ण सेसकुसुमाई। पूर्ण इमेसु दिअहेतु वहा गुडिआधणं कामो ॥७॥ [खि यथयन्ति कदम्मानि यथा मां तथा न शेषकुसुमानि । नूनमेषु दिषसेषु पहति गुटिकाधमुः भी सखी, कदाचके फूल हमें जितना मन कर देते हैं, अन्य फूल उतना नहीं देते। वर्षाके दिनों में कामदेव निश्चय ही कदम्पकुसुमरूप गुटिका या निशेपकारीधनुष ध्यपहारमें ला रहे हैं ।।७७ ॥ पाहंदूई अतुमंपिओ सिको प्रम्ह एत्य समारो। सा मरइ तुज्ज्ञ असो तेणअ धम्मपसरं मणिमो॥८॥ [ नाहं दूतीन स्वं प्रिय इति कोऽस्मामय व्यापार। सा निमते हवारशस्तेन च धर्माचरं भणामः॥ में स्वयं दूती नहीं हूँ, तुम मी उसके प्रिय नहीं हो, मुसा इसविषय में हमलोगोंको कुछ नहीं करना है । तब यह मारी जायगी और तुम्हारे अपयशी काम -- । .

द्वितीय शतक ४३ चर्चा भी चलेगी, इसीसे मैने स्त्रीवनिवारणके निमित्त यह धर्मवार्ता चलायी।। ७८॥ ती मुद्दादि तुह मुहँ तुज्दा मुहायो अ मज्म चलणम्मि। हत्थाइत्थीम गो अइदुरआरओ तिलमो 11७२।। [सस्या मुखात्तव मुखं तव मुखाच मम घरगे। हस्ताइस्तिकया गतोऽतिदुष्करकारफस्तिलक ॥] भायन्त दुष्कर कार्यकरनेवाली उस नायिकाका तिलक मालिङ्गन करते समय उसके मुखसे तुम्हारे मुखमें एव प्रतिके समय सारे मुखसे मेरे चरणों में प्रतियोगिताभावसे इस्तान्तरित हो सलन हुभा है ॥ ७९ ॥ सामाइ सामलिजर अद्धच्छिपलोइरीम मुहसोहा । जम्बूदलकअकण्णावसभरिए हलिअयुत्ते ॥८॥ [ श्यामाया श्यामलायतेऽर्धाधिप्रलोकनशीलाथा मुखशोभा । जग्यूदष्टकृतकर्णावतसभ्रमणशीले हलिकपत्रे ॥] जम्यूकिसलयको कर्णावतंसरूपमें व्यवहतकरनेवाले हालिकपुनको देखकर मतुले नय से देखनेपाली श्यामाकी मुखशोभा साँवली हो गई ॥ ८० ॥ दूइ तुमं विअ फुसला कक्खउमउआई जाणसे चोल्डं। कण्डूइअपण्डुर जहण होई तह तं करेजासु ॥ ८१॥ [ दूति स्वमेव कुशला ककंशमृदुकानि जानासि वक्तुम् । कपितपाण्डुरं यथा न भवति तथा त करिष्यति ॥] हे दूती, सुग्दी यही कुशला हो, एव सुम्ही जानती हो कि किसपकार कर्कश पर्ष मृदुवचन बोलाजाता है, किन्तु देखो, उसे दात तो लगे पर पह पीला म पद जाय ॥ महिलासहस्सभरिप तुह हिअए सुहा सा अमाअन्ती। दिअहं अणण्यकम्मा अ तणुअं पि तणुएइ ॥ ८२॥ [ महिसासहप्रभृते तय हृदये मुभा मा अमान्ती। दिवसमनभ्यको भर तनुकमपि तनूकमोति ॥] सुमरा, सहस्त्रो महिलाप्रोद्वारा भरे हुए तुम्हारे हृदय में स्थान न पाकर वह अन्य दैनिक कृत्यों को छोड़कर अपने कृश अगोको कृशसर कर रही है।।१२॥ पणमेत्तं पिण फिट्टह अणुदिभइविइण्णगरुअसंताया। पच्छण्णपायसङ्के व्य सामली मज्झ हिअामो || ८३ ॥

गाथासप्तशती [ममानमपि नापयारयनुदिवसवितीगगुरुकसंतापा। प्रच्छापापश च श्यामला मम हृदयात् ॥ प्रया पाएकी भाशवाकी भाँति प्रतिदिन गुरु सन्ताप उत्पादन करके भी वह श्यामा मेरे हृदयसे पृथक् वा अपस्त नहीं होती ॥ ८३ ॥ अजमणाई फुपिआ अवऊहसु कि मुहा पसाएसि । तुह मण्णुसमुप्पाअऍण मज्झ माणेण वि ण कर्ज ।। ८४ ॥ [भज्ञ नाहं कुपिता उपगृह किं मुधा प्रसादयसि । सव मन्युसमुरपादकेन मम मानेनापि न कार्यम् ॥] भरे भज्ञ, मैं तुमपर कुपित नहीं हुई हूँ, मेरा आलिङ्गन करो, मुझे वृधा ही क्यों प्रसा फरना चाहते हो। मेरी भोरसे तुम्हारे ऊपर करेप करने वाले मनका भवरान करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ।। ८४ ॥ दीहपउरणीसासपमाविमो वाहसलिलपरिसित्तो। सार सामसवलं व ती अहरो तुह विओए । ८५॥ [ दीर्घोष्णप्रचुरनिःश्वासप्रततो पाप्पसलिलपरिसित । साधयति श्यामशवलमिव तस्या भधास्तव विपोगे । ] तुम्हारे विरह में उसका अधर दीर्घ, उष्ण तथा प्रधुरनि भाससे तप्त एवं चापजलसे परिसित होकर मानो 'श्यामशयल' नामक चतविशेषका आचरण कर रहा है [ इस प्रतमें पहले अग्नि और पादमें जल के भीतर प्रवेश करने की विधि है ] ॥ ८५॥ सरप महद्धदाणं अन्ते सिसिराइ बाहिरुलाई। जाआई कुविअसजणहिअअसरिच्छाई सलिलाई ॥८६॥ [शरदि महादानामन्तः शितिराणि यहिष्णानि । मासानि कुपितसजनहृदयसाहाणि सलिलानि ॥] पारदकालमें महादसमूहकी अलराशि कुपित सजनहृदयके समान भीतर जसल, किन्तु थाहर गर्म रहती है ॥ ८॥ आमरस किंणुफरिहिम्मि कि बोलिस्सं कह णु होइहि मिति । पठमुगमसाहसआरिमा हिम थाहरेह ।। ८७ ॥ [भागतस्य किं नु करिपामि किं धदशमि कयं नुम विष्यति रिम्] इति। प्रथमोतसाहसकारिकाया इयं थायरायते ॥]

द्वितीय शतक नायकके भा जानेपर मैं क्या करूँगी, उसे क्या कहूँगी एवं कसे मिसार होगा ! ऐसा सोचकर प्रथमोतसाहस अवएम्पनरनेवालीका हृदय थरथर कोपता है॥ ८७॥ णेउरकोडिविलग्गं चिउरं दइअस्स पाअपडिअस्स। हिअ पउत्थमाणं उम्मोअन्ती घिभ फहेइ ।। ८८ ॥ { नूपुरकोटिविलग्नं चिरं दयितस्य पादपतितस्य । हृदयं प्रोपितमानमुन्मोचयन्स्येव कथयति ॥ ] नपुरके अप्रभागमें संलग्न पादपतित प्रियजनके केशका उन्मोचनकरके ही, वह नायिका अपने हृदयके मानयुक्त होनेकी सूचना दे रही है ।। ८८ ॥ तुज्झहराअसेसेण सामली तह सरेण सोमारा । सा किर गोलाऊले हाआ जम्बूफसापण ॥ ८९ ।। [सबाराशेपेण श्यामला तथा सरेण सुकुमारा। सा किस गोदाकूले स्नाता जम्बूकथायेण ॥] सुकुमाराङ्गी यह स्यामा तुम्हारे भङ्गरागशेप तीच जग्नुकपायद्वारा गोदा- वरीनदीके किनारे महटा दी गयी है ।। ८९ ।। मज वेग पउत्थो अज विम सुण्ण माई जाभाई। रत्यामुघदेउलचत्तराई अह्म च हिअआई ।। ९० ॥ [ मद्यैव प्रोपितोऽध शून्यकानि आतानि । रथ्यामुखदेवकुलघरवरपयरमा च हृदयानि ॥] आज ही यह नायक प्रवासार्थ चला गया है और आज ही गाँवका मार्गमुख, देवकुल सथा प्राङ्गणसमूद एवं साध-साय हमलोगोंका हदपसमूह शून्य हो गया है ॥१०॥ चिरडि पि अआणन्तो लोआ लोएहि गोरबन्महिआ। सोणारतुले व्य गिरफ्षरा वि पन्धेहि उम्भन्ति ॥ ११ ॥ [घर्गावलीमप्यजानन्तो लोका लोकगारवाम्यधिकाः । सुवर्णकारतुला इव निरहरा भपि स्कन्धैरमन्ते ॥] अनेक ग्यक्फि वर्णमालाके ज्ञानरहित अनेक ग्यक्तियोंको गौरपमें अधिक समझकर, स्वर्णकारको निरक्षरतुलाकी माति, कम्घेपर झुलाकर होने हैं ।।९।। आसमस्तकवोलं नलिअक्सरजम्पिरि फुरन्तोटिं। मा छियसु ति सरोसं समोसरन्ति पिकं मरिमो ।। ९२ ।।

गाथासप्तशती सा [भाताम्रान्तः कपोला खलिताधरमदानशीलो स्फुरदोहोम् । मा तेति सरोपं समपसर्पन्ती प्रिया स्मामः ॥] ईपन ताम्रापमान कपोलविशिष्टा, स्खरितामा जल्पनकारिणी, स्फुरिता. घा एवं 'मुझे टूना मत' कहकर रोपहित अलग हटनेवाली अपनीमियाका मैं स्मरण करता हूँ ॥९॥ गोलायिसमोआरच्छलेण अप्पा उरम्मि से मुक्को । अणुअम्पाणिहोसं तेण वि सा यादमुवऊदा ॥ १३ ॥ (गोदावरी विषमावतारच्छनारमा उरसि तस्स मुक्त। अनुकम्मानिषि तेनापि गादमुपगा गोदावरीका अवतरणस्यान विषम है, इसी बहाने नायिकाने अपने शरीरको नायक्के वारपलपर छोड़ दिया एवं उसने भी अनुकम्पासे निषि- समझकर उसे मेमसे लिहित किया ॥ १३॥ सा तुइ सहयदिणं अज चिरे सुहम गन्धरहिअंपि। उदयसिअणअरघरदेवदे व्व ओमालि वहा॥२४॥ [सा स्वया स्वहस्नदत्तामणापि रे सुभग गन्धरहितामपि । उदासितनगरपादेववेद भवमालिका वहति ॥] है सुमग, सम्प्रति गम्घाहित होनेपरभी, तुम्हारे हायद्वारा पायी हुई मालाको वह परित्यक्ता नगरगृहदेवताकी नाई, भाज भी हो रही है । ९४ ॥ केलीम वि रूसेउं तीरप तम्मि चुकविणअम्मि। जाइअपहि व माप इमेहि अवलहि अहि ।। ९५ ॥ [ वेश्यारि रयितुं न पाश्यते सरिमध्युतविनये । याचितकीव मातरेभिरवशरथे, . ] अरी माता, उसके विनय युवहोनेपरभी, दूसरेद्वारा नीलाममें लायी हुई वस्तुकी भाँति मेरे अवश भनेको केलिरहानेभी मुर नहीं किया जा सकेगा॥१५॥ उप्फुल्लिआर खेलउ मा णं घारेदि होउ परिऊठा। मा जहणभारगराई पुरिसामन्ती झिलिम्मिहि ॥ ९६ ॥ { বহিবা মা বাবা মা অতিমা। मा अपनभारी पुरुषायित कुषसीमिप्यति ] द्वितीय शतक ४७ यह पालिका उपुतिका नामक क्रीकर सेले, इसे रोकना मत, इसे कुछ पीण होने दो, जिससे जघनमारकीगुरुसा लेकर विपरीतविहार करते समय शान्ति भनुभव न करे ॥ १६ ॥ पउरजुषाणो गामो महुमासो जोअणं पई ठेरो। जुण्णसुरा साहीणा असई मा होउ किं मरउ ।। ९७॥ {प्रधुरयुया प्रामो मधुमासो यौवनं पतिः स्थविरः। जोर्णसुरा स्वाधीना मसती मां भवतु किं नियताम् ॥] गाँव में अनेक युवक रहते हैं, मास भी मधुमास है, मायिकाका यौवन पूर्ण है, किन्तु उसका पति स्थविर है, सुरामी पुरानी है, जिसको इतनी स्वाधीनता है, यह युवती असती नहीं होगी तो क्या मरेगी १ ॥ १७ ॥ पहुसो वि फहिज्जन्तं तुह यमणं मज्झ इथसंदिटुं। पण सुझं त्ति जम्पमाणा पुणरत्तसरं कुणह अजा ॥ ९८ ॥ [बहुमोऽपि कथ्यमानं तब यधनं मम हरतसंविधम् । म भुतमिति जयन्ती पुनरुक्तशतं फरोरपार्या ॥] मेरेद्वारा प्रेरिस म्हारी यात अनेक पार भनेक प्रकारसे उससे कहे जानेपर भी, 'यह नहीं सुना गया' ऐसा कहकर यह माय ही सैकड़ोंयार पुनरुषि कररही है ॥ १८॥ पाअडिअणेहसम्भावणिम्भरं ती जह तुमं दिट्ठो। संवरणचावडाए अण्णो विजणो तह व्ये ॥९९।। [प्रकटितस्नेहसावनिर्भरं तया ययावं टः। संवरणायामृतपा भन्योऽपि जनस्तयैव ॥] स्नेहप्रक्टन एवं पूर्णसद्भावसे नायिका जिसप्रकार तुम्हें भी देखरही है, मेमको छिपाने के लिए हाय.हो,बारमन्याटोगको भी रसीप्रसर देखती है ४९९५ गेबह पलोअह इमं पदसिमयअणा परस्स अप्पेइ । जामा सुअपदमुन्मिण्णदन्तजुमलड्डिअं घोरं ॥ १० ॥ [गृहीत प्रलोकयतेदं मइसितवदना पायुरपति । जाया सुनप्रयमोनिदन्तयुगलारितं यदरम् ॥]

गाथासप्तशती
'इसे ग्रहण करो एवं देखो'-ऐसा कहकर जायाने पुनके प्रथमोद्गत
युगदन्तद्वाराचिह्नित बेरफलको हंसते हुए पतिको समर्पित किया || ...॥
रसिअजणहिअअदइए कइवच्छलपमुहसुकइणिम्मदए ।
सत्तसमम्मि समत्तं यी गाहास एवं ॥ १०१ ॥
[रसिकजनहृदयदयिते कविवरसलप्रमुखसुकविनिर्मिते ।
सप्तशतके समाप्तं द्वितीय गाथाशतकमेतत् ॥]
कविवरसल प्रमुख सुकविरचित रसिकजनोंके हृदयहार सप्तशतीमें यह
द्वितीय गाथाशतक समाप्त हुभा ॥ १०१॥

तृतीय शतक अच्छउ ता जणवाओ हिअ विअ अत्तणो तुह पमाणं । नह तं सि मन्दणेदो जहण उचालम्भजोग्गो सि ॥१॥ [ अस्तु तावजनवादो हृदयमेवारमनस्तव प्रमाणम् । तथा स्वमसि मन्दस्नेहो यथा नोपाटम्मयोग्योऽसि ॥ 1] लोग अल्पस्नेह कहकर पहारी निन्दा करते हैं, वह पान तो जाने दो, उस विषयमें तो तुम्हारा हृदय ही प्रमाण है। तुम इसने मम्बस्नेह हो गए हो कि सुम तिरस्कार के पात्र मी नहीं रह गए हो॥।॥ अपच्छन्दपहाविर दुलहलम्भं जणं वि मग्गन्त । आआसपदेहि भमन्त द्विअअ फइआ वि भजिहिसि ॥२॥ [भारमग्छन्दप्रधावनशील दुर्लभलम्भं जनमपि मृगयमाण । भाकाशपयनंमद्दय कदापि भक्षयसे ॥] रेदप, अम स्वेच्छासे प्रियजनकी प्राप्तिकी भाशामें दौड़ रहे हो, जिसकी प्राप्ति दुर्लभ है, उसके भग्वेपणमें तत्पर हुए हो, तुम भाकाशमार्गमें विचरणशील हो गए हो। संभवतः ऐसा करनेसे धमकिपी समय टूटकर गिर पड़ोगे ॥२॥ अद्दय गुणविध लहुआ अद्दधा गुणअणुओंण सौ लोओ। अद्दय लिणिग्गुणा घा बहुगुणवन्तो जणो तस्स ॥३॥ [अथवा गुणा एव धयोऽथवा गुणज्ञो न स लोकः । भयवास्मि निर्गुणा या बहुगुणवाानस्तस्य ॥] मंभवतः मेरे गुण ही लघु वा अनादरणीय है, या वह व्यक्ति ही गुण नहीं है, अथवा में ही गुणशून्य हूँ, अथवा उसका प्रिय व्यकि ही अनेक गुणों से सम्पन होगा ॥३॥ फुट्टन्तेण घि हिअपण मामि कह णिवरिजए तम्मि । आदंसे पडिपिम्पं चि जम्मि दुःखं ण संकमा ॥४॥ हरितापि हृदयेन माहानि क्यं निवेद्यने तस्मिन् । आदर्श प्रतिविम्वमिव पस्मिन्दुः खं न संकामति ॥] गा०० ५० गाथासप्तशती हे मामी, दुःखसे विदीयमान हृदय लेकर भी किस प्रकार उससे मनोग्यथा व्यक्त करूँगी! दर्पण में प्रतिविम्धकी नाई उसी व्यक्मेिं मेरा अनुभूत दुःख संकान्त हो जायगा न " ॥ पासासको फाओ णेच्छदि दिण्णं पि पहिअधरणीए । ओअन्तकरअलोगलिअयलअमज्झटिअं पिण्डं ॥५॥ [पाशाशकी काको नेच्छति दत्तमपि पयिकगृहिण्या। भवनतकरतलावगलितवलयम्स्यस्थित विण्डम् ॥ ] विरह क्लिष्टा पथिकवनिताद्वारा प्रदत्त पिण्डको अपने लटके हुए करतलसे विगलित वलयके मध्यस्थित देखकर, पाशशबासे उद्विग्न काक उसे प्रहा करने की इच्छा नहीं करता ॥५॥ ओहिदिअहागमासंकिरीहिं सहिआहिं कुडलिहिआओ। दोतिष्णि तहिं विष चोरिआएँ रेहा पुसिजन्ति ॥ ६॥ [भवधिदिवसागमाशतिनीभिः सखीभि. कुड्यलिखिताः । द्विवारतत्रैव चोरिकयारेसाः प्रोन्यन्ते ॥] प्रियतमके प्रत्यागमनकी अवधिदिवसको निकवी समझकर सविषोंने दिवप्तगणनाकी भक्ति रेखाओं से होतीनको अलरित भावही पोंछ रखा है॥६॥ तुह मुहसारिन्छ ण लहइत्ति संपुण्णमण्डलो विहिण।। अण्णम व्य घडइउ पुणो वि खण्डिज्जइ मिअड्डो ।।७।। [तवमुखसादृश्य न लभत इति संपूर्ण मण्डलो विधिना । अन्यमयमिम घटयितु पुनरपि खण्ड्यते मृगाय ॥ 'भाजतक चन्द्रमा तुम्हारे मुखड़े का साइश्य प्राप्त न का सफा', इमी कारण विधाता सम्पूर्ण मण्डल चन्द्रकोभी अन्य प्रकारसे निर्मित करने के लिए उसे सहित कर डालता है।। ७ ॥ अर्जगोत्ति अर्जगोत्ति अर्जगोत्ति गणरीए । पढम विक्ष दिनहढे कुडो रेहाहि चित्तलिओ॥८॥ [ अध गत इत्यच गत इत्यध गत इति गणनशीलया। एवं दिवसाधे कुदय रेसाभिरिनितम् ॥] 'प्रियतम भास हो गया है. आज हो गया है, भास हो गया है, इस मधम

तृतीय शतक
38010
मकार गणनाकर प्रथम दिनादमें ही मेरी ससीने गृहमितिको रेसामनारा
चित्रित किया है ॥ ८॥
ण वि तह पढमसमागमसुरअसुहेपाविएवि परिमोसो।
जह वीअदिअहसविलक्खलक्विए वअणकमलम्मि ॥९॥
[नापि तथा प्रथमममागमसुरतसुखे मासेऽपि परितोषः ।
यथा द्वितीय दिवससविलक्षलक्षिते वदनकाले.]
प्रथम समागममें सुरतसुखसे भी उस प्रकारका सुख नहीं मिला, जिप्स
प्रकारका सन्तोष दूसरे दिन उसके सलन अवलोकनसे भूपित पदनकमलको
देखकर मिला था ॥९॥
जे समुहागभयोलन्तवलिअपिअपेसिअच्छिविच्छोहा ।
अम्हं ते मअणसरा जणस्स जे होन्ति ते होन्तु ॥१०॥
[ये समुखागतव्यतिक्रांतवलितप्रियप्रेषितापिवितोमा ।
अस्माक ते मदनशरा जनस्य ये भवन्ति ते भवन्तु]
अन्य लोगों के निकट जैसा हो होये, हमारे निकट किन्तु प्रथमतः अनुमयार्थ
सम्मुखागत होकर तत्पश्चात् व्यत्तिकान्त होने के समय विचलित होकर मियतम
जब विशोभित रष्टि दालने हैं, तब वे मदनशर जैसे प्रतीत होते हैं ॥१०॥
इअरो जणो ण पावह तुद्द जहणारहणसंगमसुहेल्लिं ।
अणुदवइ कणअडोरो हुअवहवरुणाणं मादप्पं ॥११॥
[ इतरो जनो न प्रासोति तव जघनारोहणसंगमसुखकेलिम् ।
अनुभवति कनकदोरो हुतवहवरुणयोर्माहात्म्यम् ॥]
तुम्हारे जधनपर आरोहणरूप सङ्गमसुम्वकेलि अन्य कोई भनुभय नहीं
कर पाता। केवल कनकसूनही अप्ति एव वरुणके माहात्म्यका अनुभव कर
सकते हैं॥११॥
जो जस्स वियसापे तं सो देइत्ति किं स्थ अच्छे ।
अगहोन्तं पि खु दिण्णं दोहग्गं तइ सवतरणं ।। १२ ॥
[ यो यस्य विभवसारस्तं स ददातीति किमनाश्चर्यम् ।
अभवदपि खलु दत्त दौर्भाग्यं या सपानीनाम् ॥]
जिसका जो वैभव है वह उसे ही देसकता है, इसमें क्या भाश्चर्य !
किन्तु तुम्हारे पास जो नहीं है, ऐसा प्रियप्रायमें वशितता नम सपत्नियों को दे
सके हो, यही भाश्चर्यका विषय है ॥ १२॥

गाथासप्तशती
चन्दसरिसं मुहं से सरिसो अमअस्स मुहरसो तिस्सा।
सकअग्गहरहसुजलचुम्बण कस्स सरिसं से ॥१३॥
चन्द्रसदृशं मुखं तस्याः सरशोऽमृतस्य मुखरसस्तस्याः।
सधप्रहरभसोज्वर चुम्बनकं कर५ साश
तस्याः ॥]
उसका मुग्व चन्द्रसाश है, उसका अधररत अमृत के समान है, किन्तु
उसके केशग्रहण के साथ पेगोज्वल चुम्बन किस वस्तु के मुग है ? यह कहते
नहीं बनता ॥३॥
उप्पण्णत्थे कज्जे अइचिन्तन्तो गुणागुणे तम्मि।
चिरआलमन्दपेच्छित्तणेण पुरिसो हणइ कज्जं ॥ १४ ॥
[ उत्पन्नाथै कार्येऽतिचिन्तयन्गुणागुणो तस्मिन् ।
चिरकालमन्दप्रेक्षिस्वेन पुरुषो इन्ति कार्यम् ॥]
उस फलाभिमुख कार्यसे गुणदोषका अत्यधिक विचार करने जाकर,
बहुसदेरतक केवल मन्द दिशाके प्रेरणद्वारा पुरुष कार्यको नष्ट
देता है॥1॥
वाल तुमाहि अहिमणिअविअ बल्लहं महं जीअं ।
तं तइ विणा ण होइ ति तेण कुवि पसापमि ॥१५॥
[बालक स्वत्तोऽधिकं निजकमेव वल्लभ मम जीवितम् ।
तवया विना न भवतीति तेन कुपितं प्रसादयामि ॥ ]
अरे पालक, मेरेलिए मेरा अपना जीवन सुम्हारे जीवन से भी मिय है,
वह जीवन तुम्हारे पिना नहीं रहना चाहता; इस कारणसे कुपित तुम्हें प्रसन
करने के लिए उग्रत हुई हूँ ॥५॥
पत्ति ण पत्तिअन्ती जइ तुज्झ इमे कमज्दा रुमईए ।
पुट्ठी वाहविन्दू पुल उम्भेषणा भिजन्ता ॥१६॥
[प्रतीहि न प्रतीयन्ती यदि सवेमे न मम रोदनशीलायाः ।
पृष्ठस्य पापविन्दव' पुलको देन मिद्यमानाः]
सलका बचन छोड़कर मेरा विश्वास करो, यदि पीटके पल गिरे हुए
रोदनशील तुम्हारे भभुपिन्दु मेरे पुलकोद्गम द्वारा भिन्न म हो जाय तो तुम मेरे
अनुरागमें विश्वास मत करना ॥ १६ ॥
तं मितं कालव्यंज फिर वसम्मि देसमालम्मि।
आलिहिअभित्तिपाउल्ला घण परम्मुहं डाइ ॥ १७ ॥

तृतीय शतक [तन्मित्रं कर्तव्यं यरिकल व्यसने देशकालेषु । आलिखितमिलिपुत्तलकमिव न पराइमुरां तिष्ठति ॥] जो मित्र उपयुक्त देश एवं कालमें व्यसन उपस्थित होनेपर भित्तिपर भालिखित पुत्तलिकाके समान पराङ्मुख हो खड़ा नहीं होता, ऐसा ही मिन धनाने योग्य है ।।१०॥ बहुआइ पाइणिउजे पढमुग्गसीलपण्डणविलस्य। उडेइ विहंगउलं दादा पक्खेहि व भणन्तं ॥ १८ ॥ [वधा नदीनिकुझे प्रथमोद्गतशीलखण्डनविलपम् । उड्डोयते विहंगकुलं हा हा पक्षरिव भणत् ॥] निभृत नदीतटस्थित निकुञ्ज में पके प्रथम संघटित शीलभनसे जित हो । पंखा संचालनद्वारा ही जैसे 'हाहा' करते-करते पक्षी उड़ गए ॥ १८॥ सञ्चं भणामि यालभ णत्यि असरकं वसन्तमासस्स। गन्धेण कुरवाणं मणं पि असइत्तणं ण गआ॥ १९ ॥ [सत्यं मणामि बालक नारयशक्यं वसन्तमासस्य । गन्धेनकुरकरणोमनागम्यसतवं गता ॥ अरे पालक, सच ही कह रहा हूँ कि बसन्त मासकेलिए अकरणीय कार्य कोई भी नहीं है, तथापि कुरवककुसुमके गन्धसे यह रमणो ईपत् असतीत्वको भी प्राप्त नहीं हुई ॥ १९॥ एक्कयामयइवेठणविवरन्तरदिण्णतरलणअणाए । तइ योलन्ते बाल पारसउणाइतीप ॥२०॥ [एकैतिचएनवियरान्तरदत्ततरलनयनया। स्वपि यतिकान्ते बालक पक्षरशपुनायितं तपा] हे यालक, तुम घले गए, एक-एक कमसे वृतिवेष्टन के समस्त विवरान्तरमें लस नेश पारकर तुम्हे देशले लिए यह रसणी शिमें रिशत मनि जैसा आचरण कर रही थी ॥२०॥ ता किं करेउ जइ तं सि तीस वइवेटपेलिअथणीए । पाअट्टद्धक्खित्तणीसहङ्गीभ वि ण दिवो ॥२१॥ [ सरिक करोतु यदि विमसि सया वृत्तिवेष्टनप्रेरिसस्वनया। पादानुशास्तिनि.सहानयापि न T न

५४
गाथासप्तशती
इतिहनके ऊपर दोनों स्तनोंको स्थापितकर, परके भाधे अंगूठेसे निस
भारतापूर्वक खड़ी होनेपर भी, पदि वह रमणी तुम्हें न देखे तो, वह और क्या
कर सकती है? ॥२॥
पिअसंभरणपलोहन्तवाइधाराणिवाअमीआए।
दिजा चटगीवाएँ दीयओ पहिअजाआए ॥ २२ ॥
[प्रियसंस्मरणप्रलुठद्वाप्पधारानिपातमीप्तया।
दीयते पक्रनीवया दीपक: पधिक झायथा ।
प्रियजनका स्मरण मानेपर नयनमें दुलके वारपधारा दीपकपर गिरनेके
अमङ्गल भयसे भीत हो, पथिकमाया प्रीयाको टेढ़ाकर सभ्यदीप जला रही है ।
तह वोलते यालअ तिस्साअगाइ तह णु चलिआई।
जह पुट्टिमज्झणिवतन्तवाहधाराओं दीसन्ति ॥ २३ ॥
[स्वयि व्यतिकामति बालक तरया अनानि तथा नु पलितानि ।
ययापृष्ठमध्यनिपतद्वाप्यधारा श्यन्ते ।
हे पालक, मुम्हारे चले जाने के समय, मुम्हें देखने के लिए उसने अपने भोंको
इस प्रकार विचलित एवं परिवृस किया था कि ऐसा लगा उसकी वापधारा
उसकी पीठके अपर ही गिरी ॥ २३ ॥
ता मज्झिमो विअ वरं दुजणसुअणेहि दोहि विण कनं ।
जह दिछो तवइ सलो तहेअ सुअणो अईसन्तो॥२४॥
[तन्मयम एवं वरं दुर्जनसुजनाम्यां द्वाम्यामपि न कार्यम् ।
यथा दृष्टस्तापयतिखलस्तथैव सुजनोऽाश्यमानः ॥]
दुर्जन एवं सज्जन इन दोनोंसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं, मध्यम धा साधारण
व्यक्ति ही हमारे लिए श्रेष्ठ हैं कारण, खल वा दुर्जन दिखायी पड़ते ही जैसा
संताप उत्पन्न करते है, वैसा ही सजन भी भारश्य होते ही करते हैं ॥ २४ ॥
अद्धच्छिपेच्छिमा करेहि साहाविरं पलोएहि।
सो वि सुदिट्ठो होहिह तुमंपि मुद्धा कलिजिहिसि ॥२५॥
[भर्वाधिक्षितं मा कुरु स्वाभाविक प्रलोकय ।
सोऽपि सुरष्टो भविष्यति खमपि मुग्धा कलिष्यसे ।
कटाचद्वारा मस देखना, स्वाभाविक दृष्टिसे साकना, इससे यह भी माली
प्रकार दिखायी पड़ेगा एवं लोग तुम्हें भी क्यामें असमर्थ 'मुग्धा गिनेंगे ॥२५॥

५५
तृतीय शतक
दिअदं खुढपिकाए तीए काऊण गेहयावा।
गरूप घि मण्णुदुभो भरिमो पाअन्तसुत्तम्म ॥ २६ ॥
[दिवसं रोपमुकायास्तस्याः पा रोडम्यापारम् ।
गुरोऽपि मन्युःरो स्मारामः पादान्तमुताय . ]
मारे दिन घर के काम-काज में लगे रहकर रोषमेमोरया मेरी प्रिय कामिनीका
वित्तश्लेश भयन्त मारी होनेपर मी, अपने पादान्तमें उसके शयनकी बात
स्मरण करता हूँ ॥२६॥
पाणउडी वि जलिऊण हुभवही जला अण्णधाडम्मि ।
पहु ते परिदरिअव्या विसमदसासंठिा पुरिसा ॥२७॥
[ যানমথি ভিয়াৱহ ববি হাইবি।
न खलु ते परिहतम्या विषमदशासंस्थिताः पुरुः ॥]
मद्यपानकुटीमें प्रज्वलित होकर मी पनि यश मिमी प्रावलिस होती है।
विषम अवस्था संस्थित पेसे पुरुषोंका भी कमी त्याग नहीं करना चाहिए ॥२॥
जंतुझ सई ज्ञाआ असईओ जंच मुहअ आहो वि।
ताकिं फुट्टउ वी तुज्य समाणो जुआ जस्यि ॥२८॥
[यत्तय सती माया सम्यो यच सुमग वयमपि ।
सरिक हफुटतु बीजं तव समानो युवा नास्ति ।]
हे सुमग, तुम्हारी जाया तो सती है और मेरी असती, इसका मूल कारण
या प्रकट होता हैतुम्हारे समान युवक कोई नहीं है, क्या यही कारण
नहीं है। ॥२८॥
सव्यस्सम्मि वि द्धे तहवि हु दिअमस्स णिचुदि च्चे।
सं तेण गामडाहे इत्याहत्यि कुडो गहिओ ॥ २९ ॥
[ सर्वस्वेऽपि दग्धे तथापि खलु हरपस्य निनिरेव ।
यत्तेन नामदाहे इरताहरितकया कुटो गृहीतः॥]
गावके जलने में सकुछ अल जानेपर भी मेरे हृदय में परयन्त सुस
अनुभूत हो रहा था, कारण, उसने मेरे हाथसे अपने हाय में पड़ा महण
किया था॥ २९॥
जापन घणुदेसे कुजो विहु णीसाहो झडिअपत्तो।
मा माणुसम्मि लोए ताई रसिमो दरिदो अ॥३०॥

गाथासप्तशती [जायतां वनोद्देशे कुजोऽपि खलु निःशाखा शिथिलपत्रः। मा मानुषे लोक स्यागी रसिको दरिख ।।] वनभूमिमें शाखाशून्य एवं गलितपत्र कुञ्जवृक्ष यदि उत्पन होता है तो हो, किन्तु मानवलोगों में रयागशील एवं रसिकजन कहीं दरिद न हों ।। ३० ।। तस्स असोहागगुणं अमहिलसरिसंच साहसं मझ। जाण गोलाउरो चासारत्तोद्धरत्तो [तस्प व सौभाग्यगुणममहिलासाशं च साहसं मम । जानाति गोदापूरो वर्षायाधरावध ॥] गोदावरीका प्रसण्ट जलप्रवाह एवं वर्षाकालको समग्र रानि भी माधी रातमें उसके सौभाग्यकी बात एवं मेरे अमहिला सरश साहसकी बात जानते हैं ।। ३१॥ ते वोलिआ वस्सा ताण कुडमाण थाणुआ सेसा । अझे वि गअवाओ मूलुच्छेअं ग पेम्मं ॥ ३२ ॥ [ते ग्यतिक्रान्ता वयस्यास्तेषां कुझानां स्थाणवः शेषाः । वयमपि गतवयस्का मूलोच्छेध गतं प्रेम] के सारे पयरक चले गए हैं, उन कुओंमें ढूंवृक्षसमूह ही शेष रह गया है । मुप्त विगत वयस्काके भी प्रेमका मूलोऐद हो गया है ॥ ३२ ॥ थणजहणणिअम्योवीर णहरवा गअवआण वणिआणं । उपसिआणणियासमूलवन्ध च दीसन्ति ।। ३३॥ [स्तनजघननितम्घोपरि नखराष्ट्वा गतवया वनितानाम् । बदसिताननिवासमूलधन्धा श्यन्ते ॥] गतचयका यनितानों स्तन, जघन एवं नितम्यप्रदेशके ऊपर नायकका नधिद्वपमूह मानो शून्यीकृत मदननिवासके मूह बन्धनके चिह्रस्वरूप वराजते हैं ॥३३॥ जस्त जहं विम पदमं तिस्ता अङ्गम्मि णिवडिआ दिट्ठी। तस्स ताहि चे ठिआ सम्बई केण वि ण दिटुं ॥ ३४॥ [यश्य यौव प्रथम तस्या बड़े निपतिता ति। तस्य तत्रैव स्थिता साई पेनापि म एम . ] उस नायिका जिस पर जिसकी प्रियम पड़गयी है, उसी भामें ।

५७ मृतीय शतक बसको टिगदापी हैइसी कारण, कोई पसारे भाको महादेव सका॥३४॥ धिरहे यिसंघ पिसमा अमअमआर संगमे यदि । कि विक्षिणा सम विमोदि विपिमा चिणिम्मिमा ॥३५॥ [वि विपमिय विषमागतमा मति संगमेऽधिकम् । विभिना सममेष पामपि प्रिनिनिर्मिन] मिया सियापा विष समान विषया एवं सहममें भापभिक अमृतमपी सा पडती है, तया विसताने लोगो पर समाह भायसे ही उसका निर्माण किया है।॥ १५ ॥ असणेण पुत्तभ मुटु यि दाणुपन्धपरिभाई। दत्यउद्धपाणिभाई घ फालेण गलन्ति पेम्मा ॥ ३६॥ [भदानेन पुत्रक मनपि नेहानुबाबपरितानि । हारापुटानीपानीव कालेम गम्ति प्रमाणि ॥] पुत्रक, दरतालालिस्थित जल जिसका समप पार गरित हो जाता है, उसीप्रकार स्नेहानुरपन अष्ट धरित प्रेम भी यस दिन न दिग्गयी राने फसवर शिस हो गया है। पापुरओ न्यिम गिजा विष्टुअदत्ति जारपेत्रदरं । णिउणसदीयरधारिम भुभजुअलन्दोलिणी पाला 1 ३७ ॥ [पतिशत एव नापते शिकति कायद्यान । निपुगसमीकरएना भुप्रयुगान्दोए नशीला यादा।] पशि दंशन का होने बहाने पद पाशा पनि पम पमे दी पर सखियों द्वारा एन स्पा दो मुमयुगरको आन्दोलित करते-करते भारत पर ले जायी जाही॥३०॥ पिक्षिणा मामासम्मि पामरी पाइहिं यहल्लेण। मिसममुम्मुर स्यिय सामलीमयपो पढिन्छन्ती ॥ ३८ ॥ [विक्रीजात भाषमासे पामर प्रादा घटी। निभूमापुनिभी रसामरसः रतनौ पश्यन् ।। माधक महीने में पामरखन, एमाहित पानो भूमीकी अनिके समान गाथासप्तशती उष्णतादायक श्यामाके स्तनद्वयकी प्रतीक्षाका, बैल खरीदने की भाशामें अपनी शीतनिवारणको सामग्रीमी बचदालता है ।। ३८ ॥ सच्चं भणामि मरणे हिअसि पुण्णे तडम्मि तारीए । अज वि तत्थ फुडने णिवडइ दिट्ठी तह च्चे ॥ ३९ ॥ [पत्यं भणामि मरणे स्थितास्मि पुण्ये सटे ताप्याः । अद्यापि तत्र निकुळे निपतित दृष्टिस्तथैव ॥] सचही कहरहा हूँ कि मरणपथपर समिहित अवश्यहो गयी हूँ, किन्तु आज भी तापीनदीके पुण्यतटपर स्थित उस निकुञ्जकीओर मेरी दृष्टि उसी भावसे पड़रही है ॥ ३९ ॥ अन्धअरवोपत्तं व माउआ मह पई विलुम्पन्ति ईसाअन्ति महं विश छेप्पाहिन्तो फणो जाओ ॥ ४०॥ [अन्धकरषदरपात्रमित्र मातरो मम पति विलुम्पन्ति । ईयन्ति महमेव लागूलेम्प: फणो जातः ॥]] हे मातामो, अन्धेके हाथमें स्थित बेरपात्रकी भांति मेरे पति के प्रेमको ये भसती लूटले जारही हैं एवं मेरे प्रति ईपिरायण बनरही हैं, मानो पुच्छसे ही फणकी पत्ति होती है (अर्थात् दशन योग्य पुच्छही फणरूप से दंशक हुई)॥४०॥ अप्पत्तपत्तअंपाविऊण णवरङ्ग हलिअसोण्हा । उअह तणुई ण माह रुन्दासु विगामरच्छासु ॥५१॥ [अप्राप्त प्रासं प्राप्य नवरङ्गकं हलिकस्नुपा। पश्यत तन्वी न माति विस्तीर्णास्वपि प्रामापासु ॥] सुमलोग देखो, अलम्पलामकुसुम्मवख पाकर ही हालिक पुत्रवधू स्वतः तन्वाकृतिहोकर भी विस्तीर्ण ग्राम मागोपर अपनेको संतुलित नहीं रख पा आक्खेवआई पिअजम्पिआई परहिमअणिम्वुदिअपई। विरलो खु जाणइ जणो उप्पण्णे जम्पिअन्याई ॥४२॥ {वाक्क्षेपकाणि प्रियजपितानि परहृदयनितिकराणि । विरलः खलु जानाति जन पन्ने अपितम्यानि 1] प्रयोजन उपस्थित होनेपर वक्षम्य, प्रतिवादीदिए निन्दासूचक, फिर तृतीय शतक मी मरेके हदयको सन्तोष देनेवाले प्रिययाश्य इनेगिने म्पतिही जानते हैं ॥ ४२ ॥ छज्जद पहुस्स ललिपिमाइ माणो समा समस्यरस । जाणन्तस्स भ मणि मोणं च आणमाणस ।। ४३॥ (गोमते प्रभोलिस प्रियाया मानः पमा समस्य । जानसरच माणितं मौनं वामानातः ॥] ममुकी रयेण्डाकीदारिद, प्रिया मान, समयों की शमा, शानियों का कथन एवं भज्ञानीका मौन शोभा पाते हैं॥३॥ घेविरसिण्णकर लिपरिगदपपसिअलेहणीमगे। सोत्थि चित्रण समप्पर पिअसदिलेहम्मि किलिदिमी ॥४॥ [घेपनशीटस्थितगालि परिमहापरिसरोमनीमार्गे । स्पस्स्येष म समापसे नियसति लेग किं लिखामः ॥] भरी प्रियसखि, लेपमें में और क्यालिगी। कम्पनशीट एवं स्सेदपुट मालीके परिप्रदसे रखलिस ऐपनी मार्ग स्वरित लिखना ही समाप्त नहीं होता ॥४४॥ देव्यम्मि पराहुत्ते पत्तिम घडि पि विहहह गराणं । फजं चालुअपरणं ध्य कह पन्धं विभ ण पद ॥ ४५ ॥ [ये पराजमुखे प्रतीहि घटिनमपि विघटने मराणाम् । कार्य बालकावरण इव कथमपि पन्धमेव न ददाति ] देव पदि पराहमुख हो तो मानवकृत कार्य भी मर हो जाता है, इसपर विधास करना, इस पयस्यामें यानुकानिर्मित दीशासकी माई कोई कार्य रोक महीं मानसा ॥ १५॥ मामि हिम पीतेण जुआणण मन्त्रमाणाए। हामलिदाड अणुसोत्तजसं शिमतेम ४१६॥ [मातुलानि हृदयमित पीसं तेन यूना मजस्याः । स्नानहरिदाकटुकमनुखोतो जलखिता है मामी, माननीला मो इनान-हरिद्वारा एक अटके प्रवाहगत होनेवर उसे पीकर उस पुरकने जैसे मेरेही हरयको पी डाला है

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तृतीय शतक
[ सोऽर्थो यो हस्ते तन्मित्र यन्निरन्तर व्यसने ।
तप यत्र गुणास्तद्विज्ञान यन्त्र धर्म ॥]
वही वास्तविक अर्थ है जो हस्तगत हो गया है, वही मित्र है जो ग्यसनमें
निरन्तर समीप रहे, वही रूप है जिसमें गुणोंका सयोगमी हो, एव वही
विज्ञान है जिसमें धर्मभी रहे ॥५॥
चन्दमुहि चन्दधरला दीहा दोहच्छि तुह विओअम्मि ।
चउजामा सअजाम व्य जामिणी कह वि चोलीणा ॥५२॥
[पनमुखि चन्द्रधवला दीर्घा दीर्घाति तव वियोगे ।
चतुर्यामा शतपामेव यामिनी कथमध्यतिक्रान्ता ॥ ]
हे शशिवदने, दोघलोधने, तुम्हारे विरह में चन्द्रधवल दीर्घ एव चातुर्याम
विशिष्ट होनेपर भी शतयामपरिमित रूपमें प्रतिभासित यामिनीको मैंने किस
प्रकार बिताया है ? ॥ ५२ ॥
अउलीणो दोमुहमओ ता महुरो भोअणं मुहे जाव ।
मुरओ ब्व खलो जिण्णम्मि भोअणे विरसमारसह ॥ ५३॥
[अकुलीनो द्विमुखस्तावन्मधुरो भोजन मुखे यायत् ।
मुरज इव खलो जीणे भोजने विरसमारसति ॥]
जब तक मुखमें भोजन द्ष्य रहता है, तभी तक अकुलीन द्विमुस पछगण
मृदाकी नाई मपुर थातें करते हैं, किन्तु मोज्य वस्तुके जीणं होजानेपर विस
यातों में निन्दा भादि करते हैं ॥ ५५ ॥
तह सोण्हाइ पुलइओ दरवलि अन्तद्धतार पदिओ।
जह वारिओ वि घरसामिए मोलिन्दप घसिओ ॥ ५४॥
[तथा स्नुपया प्रलोकिसो पलिसातारक पथिक ।
यथा पारितोऽपि गृहस्वामि।। अलिन्दके सुप्त ॥]
आँखके आधे तारेको घोड़ा यल देकर गृहस्थकी पुत्रवधूने पपिहर
प्रकार देखा है कि गृहस्वामीद्वारा घजितहोकरभी वह गृहके अदिन्दही
वास करने लगा ॥५॥
लहुअन्ति लहु पुरिसं पध्यअमेपि दो विकनाई।
णिव्यरणमणिव्यूढे णिमूढे जं अ णिवरं ॥ ५५ ॥

દર गाथासप्तशती [लघयतो लघु पुरुष पर्वतमात्रमपिटे अपि कायें । निवरणमनियूदे नियूंढे यह निर्वरणम् ॥] पर्वतके समाम उन्नत प्यक्तिको भी दो कार्य शीघ्र ही लघु कर डालते है.-(प्रथम) कार्यके अनिष्पन्न होनेपरभी आरमगुणोंका निवेदन एवं (द्वितीय) कार्यके निप्पल होने परमी आत्मश्लाघाका निवेदन ॥ ५५ ॥ के तुगथणुरिखतेण पुत्ति दारद्विआ पलोएसि । उण्णामिअकलसणिवेसि अन्धकमलेण च मुहेण ॥५६॥ [कं सुझस्तनोरिक्षसेन पुनि द्वारस्थिता प्रलोकयसि । उन्नामितकलशनिवेशितार्घकमरेनेव मुखेन ॥] हे पुनि, उधत कलशद्वयके ऊपर निवेशित पूजापद्मकी माँति अपने तुम स्तनद्वय के ऊपर उरिक्षप्तवदनको रख दरवाजेपर खड़ी होकर तुम किसको हर रही हो॥५॥ वइविवरणिग्गअदलो एरण्डो साहइ व्व तरुणाणं । पत्थ घरे हलिअवहू एहमेत्तत्थणी वसइ ।। ५७ ॥ [धृतिविवरनिर्गतदल एरण्डः साधयतीव तरुणेभ्यः । अत्रगृहे इलिकवधूरेतावन्मात्रस्तनी वसति ॥ ] वेधनके छिद्रसे पन निकालकर एरण्डवृप तक तरुणजनों के निकट यह सूचितकर रहा है कि इस घरमें वृहद स्तनान्वित हलिकवधू पासकर रही है।। ५७॥ गअफलह कुम्भसंणिहयणपीणणिरन्तरेहि तुझेहि । उस्ससि पिण तीरइ कि उण गन्तुं हअथणेहि ॥५८ ॥ [गजकलभकुम्मसंनिभयनपीननिरन्तराम्यो सुहाग्याम्। उच्छ्चसितमपि न तीरयति किं पुनर्गन्तुं हतस्तनाभ्याम् ॥ ] हस्तिशावक के कुम्भसाश, घनसनिविष्ट, पीन, निरन्तर एवं तुझ स्तनहतक- द्वपके भारसे वह रमणी श्वास-प्रश्वासका कार्य हो सम्पादित नहीं कर पारही है, जानेकी यात तो दूर रही । ५८ ॥ मासपसूर्य छम्मासगन्भिणि एकदिअहजरिच। रङ्गुत्तिणं च पि पुत्तम कामन्तओ होहि ॥ ५९॥ [मासप्रसूता पण्मासगर्मिगीमेकदिवसम्वरितां च। रहोसीणां च प्रियां पुत्रक कामयमानो भय]

तृतीय शतक
है पुक, मासमा प्रमूता, यह मास गभिंगी, एक दिन परसे भाग
एवं रमभूमिसे प्रत्यागता, इस प्रकाा प्रियानों के प्रति कामयमान होना ॥ ५९॥
पडिवफ्समण्णुपुझे लावण्णउडे अणनगअयुम्मे ।
पुरिससअहिअधरिए फीस थणन्ती थणे यहसि ॥ ६०॥
[प्रतिपपमन्युपुली लावण्यकुशवनाराजकुम्मी ।
पुरुषशसहदयस्तो किमिति स्तानन्ती सनी यामि ॥]
सपत्नीरूप प्रसिपके मनस्तापविधायक, लावण्यकला साश, मदन
हस्तीके कुम्भ तुल्य एवं शतशत पुरुओंके हृदय में भमिलपित अपने स्तनप
किस कारण कॉखने जैसे शन्नों के साथ वहन कर रही हो॥६॥
घरिणिधणत्यणपेलणमुदल्लिपडियस्त होन्तपहिस्स।
अवसउणझारअवारविहिदिनहा सुहाचेन्ति ॥ ६१ ॥
[गृहिणी धनस्तनप्रेरणसुख केलिपतितस्य भविष्यापधिवस्य ।
अपशकुनाहारकवारविरिदिवसा सुषयन्ति ॥]
गृहिणीके स्यूलरतनपीवनजनित सुसलिमें निमग्न अधिर भविश्यमें
भवासगामी नायक पल शकुनशास्त्र विरोधी मगलवार एवं महादोष भगुम
दिवस यानाविरोधी होने के कारण सुखदायक प्रतीत होते हैं ।। ६ ।।
सा तुह कपण बालम अणिसं घरदारतोरणणिसण्णा।
ओससई चन्दणमालिम व दिअहं विस घराई ।। ६२॥
[ सातव कृतेन यालकानिशं गृहद्वारतोरणनिपग्णा।
भवशुष्यति बन्दनमालिकेव दिवसमेव बराको ॥]
हे पालक, तुम्हारे भागमनको प्रतीचामें यह दीना नायिका सर्वदा
चन्दनमालिकाको नाई' गृहद्वारके तोरणपर बैठी रहकर एक दिनमें ही शुष्क
होती जा रही है। १२॥
हसि सहत्यतालं सुस्वयई उवगपहिं पहिएहि ।
पत्तअफलाण सरिसे उड़ीणे सूअचिन्दम्मि ॥ ६३ ।।
[हसितं सहस्ततालं शुष्कपटमुपगत परिकै ।
पत्रफलानो साउदीने शुम्वृन्दे ।
शुष्क वटवृषक तले उपस्थित पथिक, पत्र एवं फाटके समान शुओंडे उद
सानेपा, हाय से ताली बजाकर इसे थे ॥ १३ ॥

६४ गाथासप्तशती अन्ज म्हि हासिआ मामि तेण पारसु तहपडन्तेण । तीप वि जलन्ति दीववत्तिमम्भुण्णमन्तीए ॥ ६४ ॥ [षमास्मि हासिता मातुलानि तेन पादयोस्तथा पतता। सयापि ज्वलन्ती दीपवर्तिमग्युत्तेजयरया ॥] है मामी, भाज सस्तीके चरणोपर उसी प्रकार गिर कर उस नायकने एवं जलती हुई दीपवर्तिकाको समधिकउत्तेजितकर सखीने मुझे खूब हंसाया है ॥६॥ अणुक्त्तणं कुणन्तो वेमे विजणे अहिष्णमुहराओ। अपवसो विहु सुअणो परव्वसो आहिआईप ।। ६५ ॥ [ अनुवर्तनं कुर्वन्द्वयेऽपि जनेऽभिन्ममुखरागः । मामयशोऽपि खलु सुजनः परयशः कुलीनवापा] मुखराग अपरिवर्तित रखकर सुजन अप्रियजनके अनुवर्तन करनेपर यही समक्षा आयगा कि यह बारमवश होनेपर मी कधी कुलीनताका मी चावी हो सकता है ॥ ३५॥ अणुदिअहवाहिआअरविण्णाणगुणेहि अणिभमाहप्पो । पुत्ता अहिआअजणो विरज्जमाणो वि दुल्लक्खो। ६६ ।। [अनुदिवसवर्षितादरविज्ञान गुणैर्जनित माहारग्यः । पुत्रकामिजातजनो विषयमानोऽपि दुर्लक्ष्यः ॥], हे पुत्रक, प्रतिदिन संवदित भादरसमन्वित विज्ञानगुणद्वारा अपने माहा. rयको प्रकाशितकर सरकुल लात महिलाएं पर्मित होनेपरभी तद्प हो अतिकष्टमें दिखती हैं । ६६ ॥ विण्णाणगुणमहग्घे पुरिसे घेसत्तणं पि रमणिज । जणणिन्दिए उण जणे पिअत्तणेणावि लजामो ॥६॥ [विज्ञानगुणमहाधे पुरुष द्वेष्यावमपि रमणीयम् । जननिन्दिते पुनर्जने प्रियरवेनापि जामहे ॥] विज्ञानगुणमें भरयन्त आदरणीय व्यक्ति मेरे प्रति द्वेष्यभाव रखने पर भी यह रमणीय है, किन्तु संसार जिसकी निन्दा करता है, ऐसे व्यक्तिका प्रियव पानेपर भी मैं भनित होती हूँ ॥१७॥ कई णाम तीमतह सो सहायगुरुमो वि थणहरो पडिओ। अहया महिसाणं चिरं को विण हिअम्मि संडार १६८॥

तृतीय शतक [कथं नाम तस्यास्तपास स्वभावगुरुकोऽपि स्तनमा पतितः। अथवा महिलाना चिरं कोऽपि न हृदये संतिष्ठते उम नायिकाके उत्तने स्वमावगुरु सनमार किस प्रकार भवनत हुए! अयश महिलाओं के हृदय में कोई चिरकालतक टिका नहीं रह सकता ॥ १८ ॥ सुअणु अर्ण छियन्तं सूरं मा साउली वारेहि। पभस्स पङ्कअस्स अजाणउ फअरं सुहप्फंसं ॥ ६२ ।। [सुतनु यदनं स्पृशन्तं सूर्य मा चनाचलेन वारय । एतस्य पङ्कजस्य ध जानातु कतरसुवापशम् ॥] हे सुमनु, अपने बदनको स्पर्शकरनेवाले सूर्यको नुम वसाप्रल द्वारा रोकना मत, तुम्हारे बदन और कमलमें किसका पर्ग अधिक सुखद है, यह सूर्पको जानलेने हो।। ६९ ॥ माणोसह व पिजद पिआइ माणसिणीम इअस्स। करसंपुडबलिउद्धाणणाइ महराइ गण्डूसो ॥ ७० ॥ [मानौषमिव पीयते प्रियया मनस्विन्या दयितस्य । करसंपुटवलितोवाननया मदिराया गया।] निपल्यकि करसम्पुट द्वारा उपर उठाये गए मुखडेवाली मनस्विनी मिया प्रियतममदत्त मदिरागण्डूपको मान दूर करने की औपधिरूप में पी रही है ॥५०॥ कह साणिव्वणिज जीअ जहा लोइमम्मि अङ्गम्मि। दिट्टी दुव्यलगाई व पङ्कपडिया ण उत्तरई॥७२॥ [कथ सा निर्मप्यता यस्या यघाटोफिते थे। रधिदुर्थला गौरिव पङ्कपतिता नोत्तरति ॥] जिस रमणीके जिस अपर जिस किसीकी दृष्टि पड़ जाती है, वहाँसे पपतिता दुर्बल गायकी भाँति यह फिा अपर नहीं उठती, उसके समप्र सौन्दर्यका वर्णन किस प्रकार हो सकता है ? ॥७॥ कौरन्ती विमणासह अए रेहब्ध खलपणे मेत्ती। सावण सुअणम्मि कमा अणहा पाहाणरेह व्य ॥ ७२ ।। [क्रियमाणैव नश्पायुदके देखेव सलजने मैत्री । सा पुनः सुनने कृता पनघा पाषाणोवेव ॥ ] ५गाश गाथासप्तशती खलों में स्थापित की जानेवाली मैत्री जलमें खींची गयी रेखाकी भांति लम हो जाती है, किन्तु यही मैत्री सुजनमें स्थापित होने पर पापाशमैं खींची गयी क्षतिविहीन रेखाकी भाँति स्थायी होती है ।। ७२ ॥ अन्यो दुकारनार पुणो नि तन्ति करेसि गमणस्स । अज मिण होन्ति सरला वेणीअ तरङ्गिणा विउरा ।।७३ ॥ [भयो दुष्करकारक पुनरपि चिन्ता करोपि गमनस्य । अद्यापि न भवन्ति सरला वेण्यारतरङ्गिणा चिकुरा ॥] हे दुष्करकर्मकारक, यह अत्यन्त कष्टका विषय है कि तुम पुन प्रवासमें जानेकी सोचरहे हो, भाज तक हमारी वेणीके तरनायित केशसमूह सीधे नहीं हुए ।। ७३ ।। ण वि तह छेअरआईं वि हरन्ति पुणरुत्तराभरसिआई। जह जत्थ व तत्थ वजह य तह व सम्भावणेहरमिआई ॥७॥ [ नापि तथा छेकरतान्यपि हरन्ति पुनरुतरागरसिकानि । यथा यत्र या तत्र वा यथा वा तथा वासद्धावस्नेहामितानि ।।] विदग्धजनोंके धारवार भाचरित अनुरागरसमें पूर्णरमणभी मनका उतना हरण नहीं करता, जितना जहाँ वहाँ, जिस तिस भावसे भाचरित सद्भाव एव स्नेहविशिष्ट रमण करता है ।। ७४ ॥ उज्झसि पिआइ समझ तह वि हु रेभणसि कोस किसिति। उचरिभरेण अ अण्णुअ मुबइ बइल्लो वि अगाई ।।५।। [ उसे प्रियया सम तथापि खलु रे भणसि किमिति कृशेति । उपरि भरेण च हे अज्ञ मुश्चति बढीवोऽप्यनानि ॥ ] तुम्हारी अपनी नूतन प्रिया के साथ तुम्हें अपने चित्तर हो रही हूँ । भरे, फिर भी तुम पूछ रहे हो कि 'मैं कृशा क्यों होती जा रही हूँ। हे अश, ऊपर मार लाददेनेपर वैरभी शारीरस्याग करडालता है ॥ ५ ॥ दिढमूलबन्धगण्ठि व्य मोइसा कह वि तेण मे याह । अझेहि वि तस्स उरे सुत्त व्व समुक्खा थणा ॥ ७६ ॥ [दमूलबन्धप्रथी इव मोचितो कथमपि तेन मे चाह । अस्माभिरपि तस्योरसि निखाताविव समुरखानौ रतनौ ॥]

तृतीय शतक उस नायकने अत्यन्त कष्टसे मेरे दृदभावसे मूलबन्धयन्यिमें अपित दोनों याहुओंको छोड़ा था, एवं मैंने भी किसी प्रकार उसके घनास्थलके आर उभड़े हुए सनद्वय को छोड़ दिया है ।। ७६ ॥ अणुणपसाइआप तुज्य घराहे चिरं गणन्तीए । अपहुचोहअहत्थड्रीय तीए चिरं रणं ।। ७७ ॥ [अनुनयप्रसादितया तवापराधांविरं गणयमया। अप्रभूतोभयहस्नामुल्या तया चिरं रदितम् ॥] मेरे अनुनय प्रसस होकर भी वह बहुत देरतक तुम्हारे अपराधों की गणना करते-करते, दोनों हाथोंकी अगुलियोको असमर्थ जान बहुत देर शेयी थी ॥७७ सेअच्छलेण पेच्छह तणुप अगम्मिसे अमाअन्तं । लायपणं ओसरइ व्य तिवलिसीयाणवत्तीय ॥ ७८॥ [ स्वेदच्छलेन पश्यत तनुकेऽझे तस्या अमात् । लावण्यमपसरतीय निवलीसोपानपंक्तिभिः॥] देखो, उस नायिकाका लावण्य, उमके कृश अङ्ग में समा न सकनेपर जैसे स्वेदके बहाने निबली (उदरभागकी लम्बी रोमरेखा) रूप सोपानपंक्ति द्वारा उतर रहा है॥७॥ देव्याअत्तम्मि फले कि कोरड एत्तिमं पुणो मणिमो। कङ्कल्लिपल्लवाणं ण पल्लवा होन्ति सारिच्छा ॥७२॥ (वायत्ते फले हिं क्रियतामिपरपुनभंगामः । कलिपलयानां न पल्ला भवन्ति सशः.] कारण, फल देवाधीन है, अत' उस विषयमें और क्या किया जाय, किन्तु इतना कह सकती हूँ कि अशोक पत्नवके मरीखे पल्लव नहीं होते ॥ ७९ ॥ धुअइ व्य मभकलई कशेलपडिअस्स माणिणो उमह । अणवरअवाहजलभरिअणमणकलसेहि चन्दस्स।। ८०" [ धावतीच मृगकल के कोलपतितस्य मानिनी पश्यत । अनवरतबाप्पजरभृननयनकलशाभ्यां चन्द्रस्य ।।] देखो, मानिनी कपोलपर प्रतिविम्वित चन्द्र के मृगरूप कलको भनवात प्रवाही बापजलसे पूर्ण नयनकटशद्वय द्वारा जैसे धो रही है ।। ८ ।। - ६८ गाथासप्तशती • गन्धेण अपणो मालिआणं णोमालिआ ण फुट्टिहइ । अण्णो को वि आसइ मंसलो परिमलुग्गारो ॥ १॥ [गन्धेनात्मनो मालिकाना नवमालिका त च्युता भविष्यति । अस्याकोऽपि हतशाया मांसलः परिमलोगास ॥] अन्यान्य पुरुषों के साथ मालिकामे स्थित नयमालिका पुष्प कभी भी अपने गन्धसे च्युत वा भ्रष्ट नहीं होता। इस हताशा पुष्पवधूपे किसी अन्य प्रकारका घना परिमल निकलता है ।। ८५॥ फलसंपत्तीअ समोणआई तुझाई फलविपत्तीए । हिमआइ सुपुरिसाणं महानरूणं व सिहराई ॥ ८२ ॥ [फलसंपल्या समवनतानि तुहानि फलविपत्या। हृदयानि मुपुरुषाणां महातरूणामिव शिखराणि ॥] महावृक्षके शिखरकी माँति सरपुरुषों का हृदय फल-सम्पत्तिसे भत्यन्त भवनन एवं फलविपत्तिसे उन्लत रहता है ।। ८२ ।। आसालेइ परिअणं परिवत्तन्तीम पहिअजाआए। णित्थाणुवत्तणे बलिअहत्यमुहलो बलभसहो ॥ ८३॥ [भाधासयति परिजन परिवर्तमानायाः पथिकजायापाः । नियामवर्तने वलितहस्तमुखरो वलयशब्दः ॥] पथिककी जाया जय शय्याके ऊपर दुःसह भावसे कावट बदलती है, संघ उसके संचलित हायसे मुखर वलयका शब्द ही उसके जीवन के सम्बंध, परिजनों को आश्वासित करता है ।। ८३ ।। तुझो चिभ होइ मणी मणसिणो अन्तिमामु वि दसासु । अत्यमणम्मि वि रइणो किरणा उद्धं चित्र पुरन्ति ॥ ८४ ॥ [ तुमेव भवति मनो मनस्विनोऽन्तिमास्यपि दशामु । मस्तमनेऽपि रखे किरणाऊर्वमेव स्फुरन्ति ।।] अन्तिम दशामें भी मनस्वीका मन उसत ही रहता है, सस्त-गमन के समय भी सूर्य की किरणें ऊपर ही स्फुरित होती है ॥ ८ ॥ पोर्ट' भरन्ति सउणा वि मारआ अपणो अणुधिग्गा । विहलुद्धरणसहावा हुवन्ति जइ के वि सप्पुरिसा ।। ८५ ॥

तृतीय पातक
[उदरं विशति कुना भपि हे मातर भाग्मनोऽनुद्विमाः ।
विलोदाणस्वभाव। मयन्ति यदि केऽपि सरपुरुषाः ]
हे माताओ, भन्यकी उदापूर्तिफी चिन्ता किये बिना खग बिना किसी
उद्वेग अपना पेट भर लेने है, किन्तु कोई यदि तत्पुरुष हो तो उसका स्वभाव ।
दुगंगजनों के रक्षा संलम होता है ॥ ४५ ॥
ण विणा सन्माषण ग्धेपर परमाथजाणुओ लोओ।
को जुण्णमजरं फक्षिपण आरिउं तरइ ॥ ८६ ।।
[न दिना सदायेन गृपते परमानो होकः।
को जीणमा कालिया प्रतायितुं शमोति]
समायके अतिकमे किमीको पामाश नहीं माना जाता। कौन पक्ष बिदाल
को केवल काक्षिक ( भिगोये मातके पानी) द्वारा टग सकता है १॥ ८६ ॥
रपणाउ तणं रणाउ पाणि सव समंगाई।
तह यि माण महण अ आमरणन्ताई पेम्माई 11 ८७ ।।
[परण्यातृणमरण्यारपानीयं सयंसः स्वयंमाहम् ।
सपापि मृाण मगीना चामरणान्तानि प्रेमाणि]
मृग-मृगीको अनटस स्वतः प्राप्त ग एवं जल ही महण करना परता है।
फिर भी मूग-गीका प्रेम भानीयम स्थायी होता ॥ ८ ॥
तायमपणे ण तहा चन्दणपको वि कामिमिट्ठणाणं ।
जद दूसरे वि गिम्हे मण्णोणालिगणमुद्देली ॥ ८ ॥
[तापमानयति न सपा पन्दनपशेऽपि कामिमिथुनानाम् ।
यथा महऽपि प्रामे अन्योन्यारिन मुखकेलि..]
घिसा चन्दन भी कामियोका साप उसमा दूर नहीं कर पाता, जितना
ग्राम में भी पररालि नम्प मुस्केहि दूर कर देता है ॥ ८॥
तुप्पाणणा किया चिट्टसि त्ति पडिपुच्छिा पाए ।
विणायनिजदणत्यलाइ लबोण हसिम ।। ८९॥
[लिसानमा रिमिति सिसीति परिपृष्टया वाया।
दिगुगाष्टिाना हमापन इतितम् ।]
पा मुहम पोतकर क्यों बेटी हो, इस प्रकार पूड़ी कामेपर यधू पहलेकी
अपेश अपने जघाँको रोहर मानत गुणसे हमने लगी ॥ ९ ॥

७० गाथासप्तशती हिअ च्चे पिलीणो ण साहिओ जाणिऊण घरसारं। चान्यदुव्वअणं विक्ष दोहलंओ दुग्गअवहए ।। ९० ॥ [हृदय एवं विलीनो न कथितो ज्ञात्वा गृहसारम् । बान्धवदुर्वचनमिव दोहदो दुर्गतवध्वा ॥] दुर्गत वधू अपने धाकी सामर्ष जानती है, इसीलिये गर्भवती अपनी इच्छा को धात, घरधनों के कुटिल वक्षनको भाँति अपने हृदयमें ही रखती है, पिसीको बनाती नहीं ॥ १० ॥ धावइ दियलिअधम्मिल्लसिचभसंजमणवायडकरग्गा । चन्दिलभअविवलाअन्तडिम्भपरिमग्गिणी धरिणी ।।९१ ॥ [ धावति विगलितम्मितसिचयसयमनव्याप्तकरामा । चन्दिलमयविपलायमान हिम्मपरिमार्गिगी गृहिणी] नाई के भय से भागने वाले शिशुको खोजनेवारी गृहिणी अपने सुले हुए बालरों एव भाँचलको सयमित करने में निरतहस्ता होकर दौड रही है ॥ ११ ॥ जह जह उव्यहइ वह णवजोयणमणहाई अगाई। तह तह से तणुआअइ मज्झो दइओ अ पडियाखो ॥ २२ ॥ [ यथा यथोद्हते वधूनवयौवनमनोहराण्यङ्गानि । त्या तथा तस्यास्तनूयते मध्यो दयितश प्रतिपक्ष ) वधू जैसे जैसे अपने नवयौवनसे मनोहर भोंका वहन करती है, वैसे ही वैसे उसकी कमर, प्रियजन एष सभी शत्रु कृश होने लगने हैं ॥ १२ ॥ जह जह जरापरिणओ होइ पई दुग्गओ विरुओ वि। कुलवालिमाण तह तइ अहिअमरं बल्लहो होइ॥ ९३ ॥ । यथा यथा जरापरिणतो भवति पतिदुर्गसो विरूपोऽपि । कुलपालिकानां तथा तथाधिकतर वल्लभो भवति ॥] पति नितना अधिक जराजीर्ण, दुर्गत एव विरूप होता जाता है, कुलपालिका नारियों के लिए उतना ही प्रिय होता चला जाता है ॥ ९३ ॥ एसो मामि जुवाणो वारंवारेण यडअणाओ। गिम्हे गामेकरडोअरघ फिच्रेण पायन्ति ॥९॥ [एप मातुलानि युवा धारवारेण यमाय । प्रामे मामैकवटोदकमिव परदेश प्राप्नुवन्ति ।]

तृतीय शतक
हे मामी, यही वद युवा पुरुष है जिसे गाँवकी असली स्त्रियों, प्रोममें
प्रामके सनिकटस्थ कूके शीतल जलकीभाँति अत्यन्त कष्टसे पाती है ॥ ९ ॥
गामडस्स पिउच्छा आवडुमुहीण पण्डुरच्छा।
हिमण समं असईण पडद याआहवं पत्तं ॥२५॥
(ग्रामवरस्य पितृध्वस आपाण्डमुबीना पाहुरच्छायम् ।
हृदयेन सममसतीनां पतति वाताहत पन्नम् ॥]
हे बुभा, पीतमुखी असतियोंके मन के साथ ही साथ गाँव के वटवृक्षक
पीतवर्ण पत्रसमूह वासे भाहत हो गिरे जा रहे है ।। ९५ ॥
पेच्छइ अलद्धलक्खं दीहं णीससइ सुष्णसं हसइ ।
जह जम्पइ अफुडत्थं तह से हिमटिअंकि पि ॥९६॥
[पश्यायरब्धलचा दी निश्वसिति शून्य हसति ।
यथा जवपश्यरफुार्थ तथा तस्या हृदयस्थित किमपि . ]
जब युवती विना लक्ष्य के हो दृष्टिपात कर रही है, दीनि वास फेंक रही
है, सूनी हँसी हंस रही है, एव अपार्थ मावसे न जाने क्या भालाप कर रही
है, तब ऐसा लगता है कि शायद उसके मन में कुछ न कुछ है ही ॥ १६ ॥
गयह गओम्ह सरणं रक्खसु एअंत्ति अडअणा मणिरी।
सहसागरस तुरिमं पाणी निभ जारमप्पेइ ॥ ९७ ॥
[गृहपते गतोमाफ शरण रक्षेनमित्यसती मणिया ।
सहसातस्य वरित परयुरेव जामति ॥ ]
हे गृहस्वामी, यह पुरुष हमारा शरणागत हुशा है, इसकी रक्षा करो-
कहकर भमतीने सहसा भाये हुए पति के हाथों जारको सौंप दिया ॥ ९७ ॥
हिमट्रिअस्ल दिजउ तणुआअन्ति ण पेच्छह पिउच्छा।
हिअद्विआम्ह कंतो भणिउं मोहं गआ कुमरी ।। ९८ ॥
दिप्सितस्य दीयता तनूभवन्ती न पश्यय पितृप्वस ।
हृदयेप्सितोऽrमाझ कुतो भणिवा मोह गता कुमारी ॥]
अरी घुभा, इस कुमारीको इसके मनोवामिछुन व्यतिको ही समर्पित कर,
यह दुर्य होता जा रहा है, क्या यह उन्हें दीस नहीं रहा है ! 'मेरा हृदयहार
पुरुष कहाँ है, यह कहकर कुमारी मोहपरत हो गयी है ॥ १० ॥

७२ गाथासप्तशती खिणस्सउरे पइणो ठवेइ गिम्हावरण्हरमिअस्स। ओलं गलन्तकुसुमं पहाणसुअन्य चिउरभारं ॥ ९९ ॥ [खिनस्योरसि पयु स्थापयति ग्रीष्मापराहरमितस्य । आई गरकुमुम स्नानसुगन्ध चिकुरभारम् ॥] ग्रीष्मकाल के अपराह्न समय रमणकरनेवाले खिन पतिक वन स्थल के ऊपर यह अपना भाई, गलितपुष्प एवं स्नानसुगन्धियुक्त केशमार स्थापित कर रही है । ९९ ॥ अह सरदन्तमण्डलकवोलपडिमागो मअच्छीए। अन्तो सिन्दुरिअसलवत्तकरणि पहा चन्दो ॥ १० ॥ [ असौ सरसदन्तमण्डलकपोलप्रतिमागतो मृगाया । अन्त सिन्दूरित शतपावसाहश्य वहति पन्द्र ॥] मृगनयनीके सरस दन्तकृतमण्दर युक्त कपोलपर प्रतिविम्धित हो चन्द्र, बीचमें सिन्दूरवर्णयुक्त शखपात्र की समानता पा जाता है ॥ १० ॥ रसिमजणहिमनदइए कइवच्छलपमुहसुकइणिम्मअप । सत्वसम्मि समत्तं तीअं गाहासभं ए॥ १०१॥ [रसिकजन हृदयदयिते कविवरसलप्रमुखसुकविनिर्मिते । सप्तसतक समाप्त तृतीय गाथाशतकमेत ] कविवरसय प्रमुख सुरवियों द्वारा रचित, रसिकों के हृदयहार सप्तशती में यह तृतीय शतक समाप्त हुआ ॥ १॥ 4otopor चतुर्थ शतक अह अम्ह थाअदो अज फुलहराओत्ति छेन्छई जाएं। सहसागमस्स तुरिअं पदणो फण्टं मिलाये ॥१॥ (असावस्माकमागतोऽद्य कुलगृहादिस्यसती जारन । सहसागतस्य वरिन पत्युः षष्ठ लगयति ॥ ] 'यह व्यक्ति भाज ही मेरे नहरसे आया है'-ऐसा कहकर असती स्त्री अपने उपपतिको सहसागत पतिके गले लगा देती है ॥१॥ पुसिआ अषणाहरणेन्दगीलकिरणाहा ससिमऊहा। माणिणियअणम्मि सकजलंसुसङ्काइ दहएण ॥२॥ [मोन्छिताः कामरगेन्द्रनीलकिरणाहताः शशिमयूखाः । मानिनीवदने सकजलाशया दयितेन ॥ ] मिय पति मानिनी बदनपर कर्णाभरणस्थित इन्द्रनीलमणिके प्रमामिश्रित चन्द्रकिरणसमूहको भास्की बूंद समझकर पौछ दे रहा है ॥ २ ॥ पदहमेतम्मि जए सुन्दरमहिला सहस्समरिए वि। अणुहरइ गवर तिम्सा वामद्धं दाहिणद्धस्स ॥३॥ [पापनमान्ने जगति सुन्दर महिलासहस्रनृतेऽपि । अनुहाति केवल तस्या घामा दक्षिणाय ॥] रहस्रों सुन्दरियों से परिपूर्ण इतने बड़े ससारमें सौन्दर्यके विषयमें केवल इसका ही वामा दक्षिणाङ्गका अनुकरण कररहा है ॥ ३ ॥ जह जह पाएइ पिओ नह तह णचामि चञ्चले पेम्मे। बल्ली चलेइ अझं सहारथद्धे वि रक्खम्मि ॥ ४॥ [यथा यथा वादयति प्रियस्तथा मया नृत्यामि वाले प्रेग्गि । वली वलयरयझं स्वमावस्तम्धेऽपि पृ॥ प्रेम मेरे पासयका विधायक है, पान् मेरा प्रिय जैसे जैसे बजायेगा, में से पैसे नाचूगी भात उसकी इच्छाका पालन करूंगी। स्वभावस्तब्ध यूपमें भी अचल सा लिपटी रहती है ।

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गाथासप्तशती
.
दुक्रोहि लम्भइ पिनो लद्धो दुक्येहि होह साहीणो ।
लद्धो वि अलद्धो घिस जइ जद हिमतत ण होई ॥५॥
[दुसलभ्यते प्रियो लन्धो दुखैभवति स्वाधीन ।
लिधोऽप्यलब्ध एव यदि यथा हृदय तथा न भवति ॥ ]
बड़े पटसे प्रियजनों को प्राप्त किया जाता है, प्राप्त करने पर भी बड़े कष्टसे
उन्हें स्वाधीन किया जाता है और यदि घे हृदय के अनुरूप न हो तो सध
होनेपर भी उन्हें अलब्ध ही समझा जाता है ॥ ५॥
अन्यो अशुणअसुहकहिरीअ अफस कअनुणन्तीए ।
सरलसहायो वि पिओ अविणअमग्गं वलण्णीओ ॥६॥
(कमनुनपसुखकासगशीलयात कृतं कुर्वरया ।
सरलस्वभावोऽपि प्रियोऽविनयमार्ग बलायीत ॥]
हाय रे, अनुनयन सुखको भाकाहाकर मैंने उसके द्वारा किये गए
अपराधको भी किया गया कहकर सरल स्वभाव प्रियको मी बलपूर्वक भविनय
के मार्ग में खींच रही हूँ॥६॥
हत्येसु अ पाएसु अ अङ्गुलिगणणा अइगा दियहा ।
पहि उण केण गणिजउ ति भणेउ रुमा मुद्धा ॥७॥
[इस्तयोश्च पायोखाद्गुलिापानयातिगता दिवसा ।
इदानी पुन केन गण्यतामिति भणिवा रोदिसि मुग्धा ॥ ]
हाय एप पैरों में स्थित बहुरियों द्वारा गणनाकर दिनोंको काटा है। भव
किसके सहारे यह दिन गणना करूँगीऐसा कहकर मुग्धा रो रही है ॥ ७ ॥
कोरमुहसच्छहोहिं रेहा वसुहा पलासकुसुमहि ।
बुद्धस्स चलणन्दणपडिएहिं व भिसुसंधेहिं ॥ ८॥
[कीरमुखसह राजते वसुधा पलाशकुसुम ।
धुमस्य चाणचन्दनपवितरिव भिसधै ।)
बुद्धदेव धरणवन्दनार्थ धराशायी भि की भाँति शुभमुखसश रक्तवर्ण
पलाश पुर्पोसे वसुधा शोगाधित हो रही है।
जंज पिहलं अहं तं तंजाअ सिोअरि सि ते ।
जंज तणुमतं तं पि ट्टि किंत्य माणेण ॥९॥

বনু বন্ধ
[पचभुलम तत्तजात कृमोदरि शं ते।
यद्यत्तनुकं सनदपि निठिनं किमत्र मानेन । ]
हे कृशोदरी, तुम्हारे जो-जो अन स्थूल होते हैं, थे।
हम हो गए हैं और
जो-जो भा स्वभावतः कृश होते हैं, ये-वे मन सनावी चरमपीमा पर पहुँच
गए है, इसलिये मान द्वारा क्या मिलेगा? ॥९॥
ण गुणेण हीरइ जणो हीरइ जो जेण भाविभो तेण ।
मोचूण पुलिन्दा मोत्तिाइँ गुलाभों गहन्ति ॥१०॥
[न गुणेन हियते जनो हियते यो येन भावितस्तेन ।
मुकवा पुलिन्दा मौक्तिकानि गुना गृहन्ति ॥ )
कोई व्यक्ति कवल गुण द्वारा किसी के भाषणका विषय नहीं होता।
जो ग्यकि जिम यस्तु द्वारा प्रेम रूप लाता है, वह ग्यरित मी यस्तु द्वारा
माकृष्ट होता है । उरकल के पर्वतवासी पुलिन्दगम मुमाको स्यागकर गुजाको
ही ग्रहण करते हैं। 10॥
लङ्कालआणं पुता बसन्तमासेफलद्धपसराण ।
भापीअलोहिणं वीइ जण पलासाणं ॥११॥
[शयान पुत्रक वसन्तमासकलब्य प्रसराणाम् ।
भापीतलोहिताना बिभेति मनः पलाशानाम् ॥ ]
हे पत्रक, निवासी पर्यो, अख एवं मांस में अधिकतर महन एवं
अत्यधिक रुधिरपापी सक्षमोकी भाति शावास्थायी, वसन्त मासमें ही
अधिकतर प्रस्त एवं ईपत् पीत एवं लोहित वर्ण पलाशपुष्पों से सुन्दर नारियाँ
दरती है॥1॥
घेत्तूण धुण्णमुष्टिं हरिसूससिआप चेपमापाए ।
भिसिणेभित्ति पिअअमं हत्थे गन्धोदरं जा ॥ १२॥
[ गृहीत्वा पूर्णमुष्टिं हो।मुक्तिाया घेपमानायाः ।
अविरामीति प्रियतम हस्ते गन्धोदकं जातम् ॥]
हर्षसे उपसित हो, साविक भावपे कॉपती हुई नायिका गन्धद्रव्यको
चूर्ममुष्टि ग्रहणकर प्रियतमके ऊपर विकीर्ण करेगी, ऐसा सोचते ही धर्ममावये
उसके हाथमें गन्धमल उत्पन्न हो गया ॥२॥

गाथासप्तशती
पुद्धिं पुससु किसोअरि पडोहरकोलपत्तचित्तलिभा
छेहि दिअरजाआहि उज्जुए मा फलिजिहिसि ॥१३॥
[पृष्टं मोन्छ कृशोदरि पश्चादगृहाछोटपचित्रितम ।
विदग्धाभिदेवरजायामि ऋजुके मा कलिष्यसे ।]
हे कृशोदरी, मकान के बादवाले घरमें सनिहित भोट वृक्षके पत्ते द्वारा
चित्रित अपनी पीठको पोंछ सालो। नहीं तो, भरी सरले, तेरी चतुर देवरानियाँ
तुझे समझ जायगी 11
अच्छीई ता थइस्सं दोहि वि हत्येहि वि तस्सि दिट्टे ।
अङ्गं कलम्पकुसुमं व पुलइ कहँ णु ढकिस्सं ॥ १४ ॥
अक्षिणी सावरस्थगयिष्यामि दाभ्यामपि हस्ताभ्यां तस्मिन।
भझंकदरपकुसुममि पुलकितं कथं नु च्छादयिष्यामि ॥]
उसके दिखायी पहनेपर, मैंने हान्ना दो हार्थों द्वारा दोनों नेत्रोंको
ढक लिया, किन्तु कदग्यके पुष्पकी नाई पुलकित सारे शरीरको कैसे
ढक लें.॥४॥
झञ्झाबाउत्तणिए घरम्मि रोऊण णीसहणिसणं।
दावेह व गवइ विज्जुब्रोओ जलहराणं ॥ १५ ॥
[सम्मावातोतृगिते गृहे रुदिरवा निःसहनिषण्णाम् ।
दर्शयतीव गतपतिका विद्युयोतो जलधराणाम् ॥]
सम्झावात में तृणशून्यीकृत गृहमें दुसहरलेशव रोदन करने बैटी हुई
प्रोषितपतिका रमणीको विद्युत् की ज्योति माकाशवर्ती मेघके निकट दिखायी
दे रही है ॥ १५॥
भुजम् जं साहीणं कुत्तो लोणं कुगामरिद्धम्मि ।
सुहम सलोणेण वि किं तेण सिणेहो जहिं ण स्थि ॥ १६ ॥
[ भुट्दव यास्वाधीनं कुतो लावणं कुमामरिझे।
सुभग सलवणेनापि किं तेन स्नेहो यन नास्ति ॥]
अपने उद्योग द्वारा जो जुट रहा है, उसीका भोजन करो। इस गॅपई में
रधनकार्यकेलिए छवण कहाँ मिलेगा? है सुभग, जिम वरतु, स्नेह
(स्निग्धता) नहीं है, उसके केवल लवण (लावण्य ) युक्त होमेसे श्या
लाम॥१६॥

चतुर्थ शतक
मुद्दपुच्छिाइ हलिओ मुहपकममुरहिपवणणिव्ययि।
तद पिअह पमइकडु पि ओसई जण ण णिहाइ ॥ १७ ॥
[सुसरियकाया हरिको मुखपरमसुरभिपयननिर्वापितम् ।
तथा पियति प्रकृतिकटुकमप्यौषधं यथा न तिष्ठति ॥ ]
हलिकने भो भनुरक्त शरीर मुखनिज्ञापाकारिणी के मुपकमल के समीर
द्वारा शीतल किये हुए स्वभाव कटुऔषधिको इस प्रकार की दाला कि उसका
किंचिन्मा भी शेप नहीं रहा। १७ ॥
अह सा तहि तहिं बिभ पाणीरचणम्मि चुकसंकेया।
तुद दंसणं विमग्गह पभट्टणिदाणठाणं व॥१८॥
अथ सा सत्र तत्रैर पानीरवने विस्मृतसदेता।
सन दर्शन विमार्गति प्रभ्रष्टनिधानस्थानमिव ॥]
याद में यह नायिका मनस्थल की बात भूलाकर विस्मृत भाधारस्थानकी
भाति, उसी उसी याणीकुलमें तुम्हें खोज रही है ॥८॥
दढरोसकलुसिअस्स वि मुअणस्स मुहाहि विप्पिरं कन्तो।
राहुमुदम्मि वि ससिणो किरणा अमरं विअ मुमन्ति ॥ १९ ॥
(रोपकलुपितस्यापि सुननस्य मुखादप्रियं कुतः।
सहुमुसेऽपि शशिनः किरणा अमृतमेव मुश्चन्ति ॥ )
मयुरकट-रोयवश कलुषित होनेपर भी मले आदमी के मुंदसे मप्रिय पात
कहाँ निकलती है ? राहुके मुख, परे हुए चन्द्र किरण अमृत ही देते हैं ॥१९॥
अचमाणिओ वि ण तहा दुमिजइ सजणो विद्दयहीणो।
पडिकाऊ असमत्थो माणिजन्तो जह परेण ॥ २०॥
[भवमानितोऽपि न तथा दूयते ससनो विमवहीनः ।
प्रतिस्ममों मान्यमानो यथा परेण ।
वैभवहीन सजन अपमानित होनेपर भी उतने सुब्ध नहीं होते, जितना
कि दूमरी द्वारा माने जाने पर भी वैभवक अभाव, प्रत्युपकारसे असमर्थ होने
पर यथित्त होते है ॥ २॥
कलदन्तरे वि अयिणिग्गाई हिअअम्मि जरमुवगाई।
सुअणकाइ रहम्साई उहह थाउस्यए अग्गी ॥ २१ ॥

७८ गाथासप्तशती [कर हान्तरेऽप्यविनिर्गतानि हृदये जरामुपगतानि । सुजनश्रुतानि रहस्यानि हत्यायु सनिः] सुजनों द्वारा सुनी हुई भेदकी भाभी कलह में उसके मुंहसे नहीं निकलती, उसके हृदय में हो वे नष्ट हो जाती हैं और उसके लायुषयके साथ साथ भनि उन्हें दग्ध करती हैं । २।। लुम्योओ अगणमाहवीण दार गलाउ जाआउ। आसासी पान्थपलोअणे वि गिट्ठो गवईणं ॥ २२ ।। [स्तबका अङ्गणमाधवीना द्वारागला जाताः। भावासः पायमलोकनेऽपि नष्टो गतपतिकानाम् ॥] आँगनमें आरुद्र माधवीलताके गुच्छे घरके दरवाजे भगलास्वरूप हो गए है, परन् प्रोषितपतिकाओं के कष्टों के लिए मधिकों के प्रति दृष्टिक्षेपका भावास भी हमेशाकेलिए पूर्णत: नष्ट हो गया है। २२ ॥ पिअसणमुहरसमउलिआई जइ से ण होन्ति णअणाई। ‘ता फेण कण्णरइ लक्खिजई कुपलभं तिस्सा ॥२३॥ [प्रियदर्शनमुखरमानुकुलिने यदि तस्या न भवतो नयने । तदा केन कर्णरचित लक्ष्यते कुवलयं तस्याः ॥] उस नापिकाके नेन यदि प्रियदर्शन सुखसे मुकुलित न होते तो क्या उसके कानों में रचित नीलकमलको कोई देख सकता? ॥ २३ ॥ चिस्पिलखुत्तहलमुहकढणसिठिले पदम्मि पासुत्ते। अप्पत्तमोदणमुहा घणसमभं पामरी सवइ ॥ २४॥ [ कदमममहलमुषकर्षणशिथिले पायो प्रसुते । अप्राप्तमोहनसुखा धनसमयं पामरी शपति ।] कीचड़ में फंसे हुए हलकी नोकको खींचकर धकेहुए पति सोगानेपा अप्राप्त सुरतसुखापामरवधू वर्षाकाठको अभिशाप दे रही है ॥२५॥ दुम्मेन्ति देन्ति सोक्खं कुणन्ति अणुराअभं रमायन्ति । अरइरइयन्धयाणं णमो णमो मप्रणयाणाणं ॥२५॥ [न्ति वदति सौख्यं कुर्वन्त्यनुराग मयन्ति । भरविरयाचवेभ्यो नमो नमो मदनयागेम्यः ॥] .

चतुर्थ शतक ध्याशा एवं चिन्तानुरक्षन के सहायक मदनक यागोको नमस्कार करती हूँ, कारण ये सय मिश्रको अनुपस्थिनिमें मनोप्पा भी उत्पन्न करते है और सुस भी प्रदान करते हैं, या कभी प्रेमानुराग बढ़ा देते है एव कमी सौमनस्य उत्पन्न कर देते हैं ॥ २५॥ पुसुममा वि अइपरा अलफंसा यि दूसपनाया। भिन्दन्ता वि रइभरा कामस्स सरा यहुचिअप्पा ॥ २६ ॥ [कुसुममया अप्यत्तिवरा अस्पर्शा अपि दु महप्रतापाः । भिन्दन्तोऽपि रतिकराः कामस्य शरा बहुविपाः ॥ कामदेव के वाण नाना प्रकार विशिष्ट अर्थात् परस्पर विरधर्मा हैं। कारण, कुसुममय होने पर भी ये अत्यन्त तिवग है, लक्ष्यवस्तुको स्पर्श किये शिना ही ये उससे दुसद ताप प्रकट करते है एवं हृदय-भेदन करने भी रतिसम्पादन को होते हैं ॥ २६ ॥ ईसंजणेन्ति दान्ति मम्मदं चिप्पियं सदावन्ति । चिरहे ण देन्ति मरिउं यहो गुणा तस्स यहुभग्गा ।। २७ ।। ईयोजनयन्ति दीपयन्ति मन्मथं विप्रिय साहयन्ति । विरदे न ददति मर्तुमदो गुणास्तस्य यदुमाई..] भहो, प्रिय अथवा कामयाण को गुणावली यहुविध है- ईया उत्पन्न करते हैं, कभी मदनभाव उद्दीपित करते हैं, कभी अप्रियाधरण सहन कराने हैं एवं विरहमें भी मरने का अवकाश नहीं देते ॥ २७॥ णीआई अज णिकिव पिणक्षणवरह ऑस् चराईए । घरपरिवाडीभ पहेणाई तुह दसणासाए ॥ २८॥ निीतान्यद्य निष्प पिनदानवाकया घराक्या । गृहपरिपाट्या प्रहेणकामि तव दर्शनाशया ॥ ] हे निर्दय, तुम्हारे दर्शनको आशमें वह दीनानायिका नूनन रक्तवस्त्र पहनका माज यह श घर बायन बॉट रही थी, किन्तु तुम्हारी अनुकम्पा उसे नहीं मिली ॥ २८॥ सूरजइ हेमन्तम्मि दुग्गओ पुस्फुभासुअन्येण । धूमकपिलेण परिविरलतन्तुणा जुग्णपडएण ।। २९ ।।

८० गाथासप्तशती { सूप्यते हेमन्ते दुर्गतः करीपानिसुगन्धेन । धूमकपिलेन परिविरलतन्तुना जीर्णपटकेन ॥] हेमन्तकालमें नायकको गोइंटे की अग्नि सुगन्धिविशिष्ट, यूएँ के कारण शिल वर्ण एवं सभी प्रकार से विरलसूत्रमय जीर्णवसद्वारा उसे अत्यन्त दरिद्र सूचित किया जाता है ॥ २९ ॥ खरसिपिरउल्लिदिभाइँ कुणइ पहिओ हिमागमपहाए । आममणजलोल्लिअहत्थफंसमसिणाई अहाई ॥ ३०॥ [ सीधगपलालोल्लिखितानि करोति पथिको हिमागमप्रभाते । आचमनजलादितहस्तस्पर्शमणान्यङ्गानि ॥] शिशिरके समागममें प्रभात समय पथिक तीश पुमालद्वारा त भोंको साचमन मलसे गीले हायके स्पर्शद्वारा महाण अश्या चिकना कर पक्वफ्खुडीअंसारमरिं पामरस्य सीसम्मि। पन्दिम्मिव होल्ती भमरजुआणा अणुसरन्ति ॥ ३१ ॥ [ नखोस्खण्डितो सहकारमारौं पामरस्य हो । बन्दीमिव नियमाणो भ्रमरयुवानोऽनुप्तरन्ति ] नखद्वारा उन्मूलित एवं पामरों द्वारा सिरपर ले जाती हुई भाम्रमारियोको बलद्वारा भपढ़त बन्दिनी समसकर भ्रमरयुवा उनका अनुसरण कर रहे हैं ॥ ३॥ सूरच्छलेण पुत्तम कस्स तुमं अञ्जलिं पणामेसि । हासकडक्खुम्मिस्सा ण होन्ति देवाण जेधारा ।। ३२ ।। [ सूर्यपछलेन पुनक करमै स्वमलिं प्रणामयसि । हास्यकरासोन्मिधान भवन्ति देवानी अपकाराः। हे पुनक, तुम सूर्यके यहाने किसे बलिदेते हुए प्रणामकर रहे हो? देवताओंकी स्तुति हास्य एवं कटासदार मिश्रित होने योग्य नहीं है ॥ ३२ ॥ मुहयिन्झयिमपईवं मियदसासं ससद्धिभोल्लाये। सहस भरिसोर्ट चोरिअरमिमं सुहाये ॥३३॥ [मुखविभापितमदीपं निरुदश्वास सशक्षितोला । राषितो चोरिकारमितं सुरापति ॥

चतुर्थ शतक मिपसे गुस्खमा द्वारा दोपा युझाया जाप, मास अपरुन हो आप, समापसे मारन, एवं शत शपथद्वारा अघरदशन वर्जित हो, यह चौरमा मुल उपस करना है ॥ ३३ ॥ गेअच्छलेण भरि कम्स तुम रुमसि जिम्मरक्षण्ठं । मण्णुपडिराद्धकण्ठद्धणिन्तसलिमक्सरल्ला ॥३४॥ [गेयरलेन मृावा कम्प व रोदिपि निर्भरोस्करम् । मन्युप्रतिरुदण्टाधनियंपारितारोपापम् ॥] गाने के पहाने विसे स्मरणका तुम रोती हो, इस रोदनसे मुम्हारी उत्कण्ठा की अतिशयता प्रकट होती है एय इससे तुम्हारे शोकनिरुः कण्ठसे भधान सत एच सलिसापर प्रलाप सुनामी पड़ता है ॥ ३५ ॥ पहलतमा हराई अज्ज पडत्यो पई घरं सुण्णं । तह जगोसु समजिस जहा अम्हे मुसिज्जामो ॥ ३५ ॥ [बलहनमा हतराविरय प्रोषित पनिह शून्यम् । तथा जागृति प्रतिवेशित यथा घय मुप्यामहे ॥] दुर्भाग्यपूर्ण रात्रि गादान्धकारमय है, पति भी पाज ही प्रवासार्थ गया है, मेरा धा सूना है। हे पड़ोसी ( उपपति), इस प्रकार जागृत रहना जिससे हमारे यहाँ चोरी न हो॥३५॥ संजीवणोसहिम्मिय सुअस्स रक्खइ अणण्णयावारा । सासू णयम्भदसणकण्ठागजीविभं सोई॥ ३६॥ [समीयनीवधमिव सुनस्य रसत्यानन्यग्यापारा। श्वधनवानदर्शनकण्ठागतमीविता स्नुपाम् ॥] सास नवजलधर दर्शन के कारण, कण्ठागत प्राण पुमरको पुरकेलिए सीवन भौषधिके समान समझकर, अनन्यकर्मा होकर ना करती है ॥ ३९ ॥ पूर्ण हिमणिहित्तार घससि ज्ञाआर अम्ह हिमम्मि । अण्णह मणोरहा मे मुहब कहं ती विण्णामा ॥३७॥ [भून हरपनिहितया यससि जाययास्माक हृदये। अन्यथा मनोरथा मे सुभग च्य तया विधाता ] [हे सुभग, तुम निश्चय ही अपने हृदय में निहित अपनी मार्याको साथ रेकर मेरे हृदय में पास कर रहे हो, नहीं तो मेरे मनोगतमाषको उसने कैसे जान लिया॥३७॥ ६गा००

गाथासप्तशती
तह सुहम अईसन्ततिस्साअच्छीहि कपणलगोहि ।
दिण्णं घोलियाहि पाणिभं दसणसुहाणं ।। ३८॥
[स्वयि सुभा अदृश्यमाने तस्या अहिल्या कलमाम्यां ।
दत्त घूर्णनशीलपापाय पानीयं दर्शनसुखेभ्यः ॥]
हे सुमा, तुम उसके नयनपथ ते भारय होने पर, उसके कर्णपर्यन्त
विस्तृत बाप्पसे घूर्णनशील नयनद्वय तुम्हारे दर्शन सुखकेप्रति जलाञ्जलि
देरहे थे॥३८॥
उप्पेरमागम तुह मुहदसण पडिरुद्धजीविआसार ।
दुहिआइ मए कालो कित्तिसमेतो व अवो ॥ ३९ ॥
[ उत्प्रेक्षागत स्वन्मुखदर्शनप्रतिरुद्धजीविताशया।
दुःखितपा मया कालाकियन्मानो या नेतन्यः ।]
ज्यान वा कल्पनामें प्राप्त तुम्हारे मुखदर्शनद्वारा मेरे जीवनकी भाशा
स्थापित रही है। किन्तु इस प्रकार दुखी होकर मैं कितना समय
बिताऊँगी॥३९॥
वोलीगालक्खिअरूअजोव्वणा पुत्ति कंण दुम्मेसि ।
दिट्ठा पणट्टपोराणजणवा जम्मभूमि व्य ॥ ४०॥
[व्यनिकान्तालतिरूपयौवना पुत्रि कं न दुनोपि ।
पृष्ठा प्रणटपौराण जनपदा जन्मभूमिरिव ॥ ]
हे पुत्री, मुम्हारा पूर्वकालीन रूप यौवन विगलित होने से अब वैसा दिखायी
नहीं पड़ता एवं तुम विनय पूर्वजोंके निवास (जन्मभूमि ) को मोति दिखायी
पदकर रिसे दुख नहीं देती ? ॥४०॥
परिओसविअसिपाहिं भणि अच्छीहि तेण जणमझे ।
पडिवणं ती वि उच्चमन्तसेएहि अझेहिं ॥४१॥
(परितोषविक्रिसिताश्या भणितमतियां न जनमध्ये ।
मतिपनं तया युदमरस्वेदैरनै । ]
अनेक लोगों के बीच उस नायकने अपने परितोषविकसित नयनद्वय द्वारा
अपना अभिमत प्रकाशित किया । उसे नायिकाने मी बस बहे हुए श्वेदाल-
विशिष्ट बहों द्वारा उस अभिमतको बङ्गीकार कर लिया था।
एककमसंदेसाणुराअवड्दन्त कोउहल्लाई ।
दुःसं असमत्तणोरदार बच्छन्ति मिगुणाई ॥ ४२ ॥

মুখ বন্ধ
८३
[भन्योम्यानुरागरमानकोलानि ।
दुःखमसमासमनास्पानि निन्ति मिथुनानि ॥]
दोनों मेमो परस्पर प्रेरित प्राय याद्वारा उसपर अनुरागमें कोहलके
बदजाने पर मिलन मनोरथ पूा न कामकने के कारण दुवमे रहरहे ॥ १२॥
जह सो म पलही व्यिा गोत्तग्गाहणेण तम्स मदि फीम।
छोह मुदं ते रविरांसचिसइंय तामरसं ॥४३॥
[यदि सन चलम एच गोग्राहगेन हय समि किमिति।
माति मुम्ब सब रविकरसारिकसितमिय सामरमम् ॥ ]
है सखि, यह यदि तुम्हें प्रिय न होगा तो उसका नाम लेनेपर तुम्हारा
मुख सूर्यकिरणके संररामे विकसित पपकी भाति प्रतीयमाम क्यों होगा।
माणदुमपरसपपणस्स मामि सव्यगणिज्युइभरस्स ।
अबऊहणस्स भदं राणाडअपुयरहस्स ।। ४४ ॥
[ मानदुमयपपनस्प मानुलानि पहिनितिकरस्य ।
भवगृहना भई रनिनाटकपूर्वहस्य.]
मभी भगौ सुषविधायक, रतिनाटकके पूर्वरनरूपी आलिजनकी शुम.
कामना करमी हूँ॥१४॥
णिअणुमाणणीस हिअन्न दे पसिअ विरम पत्ताहे।
अमुनिअपरमस्थ जणाणुलग्ग कीस म्ह लहुएसि ॥ ४५ ॥
[ निकानुमाननिता दर हे प्रसीद विरमदानीम् ।
अशातपरमार्थजनानुलान किमिश्यामांवघमि uj
हे हृदय, गुम अपने अनुमानद्वारा ही शाशून्य हुए हो, मम्प्रति नायकको
खोजसे विरत होभो, ऐसे अहात ममं व्यक्तिमें भासत होना, हम मी
ललनाओंको इतना छोरा पो पना देता है ? ॥ ५५॥
ओसहिअजणो पक्षणा सलाहमाणेण भचिरं हलिओ।
चन्दो त्ति तुज्दा यमणे विइण्णकुसुमाञ्जलिविलक्पो॥ ४६॥
{ भावसधिकजना पाया श्लाघमाने नातिविरं हसिनः ।
चन्द्र इति तय वदने वितीर्णउसुमाञ्जलिदिटशः]
तुम्हारा मुत्र ही चन्द्र है, ऐसा योदकर उसके प्रति कुसुमाञ्जलि देनेसे
लनित अदानादिमें नियमित गृहस्थको प्रदांमार सुम्हारा पति बहुत देर
साहमा है ॥ ४६॥

गाथासप्तशती छिजन्तेहि अणुदिणं पञ्चवम्मि वि तुमम्मि अङ्गेहिं । बालअ पुच्छिज्जन्ती ण अणिमो कस्स कि मणिमो॥४७॥ [जीयमाणोरनुदिनं प्रत्यक्षेऽपि स्वरम। बालक पृछपमाना न जानीमः कस्य किंमणामः ॥] हे बालक, उन्हारे स्थापित होने पर भी प्रतिदिन भोंको सीण होते देख इसका कारण पूछे जाने पर मैं किसे क्या उत्तर दूं? यह नहीं जाननी ॥ १७ ॥ अगाणं तणुसारस सिक्खावा दीहरोभिवाणं। विणआइकमआरअ मा मा णं पम्हसिजासु ॥४८॥ [ भङ्गानां तनुकारक शिक्षक दोधी दिसध्यानाम् । विनपातिकमकारक मा मा एना प्रस्मरिष्यति ॥] है नायक, तुम सखीके भोंकी कृशताके विधायक हो, उसके दोघरोदनके मूल शिक्षक एवं शीलमा करने के कारण हो । तुम अब कभी उसे स्मरण न करना॥४८॥ अपणह ण तीरइ चित्र परिवहन्तगरु पिभभमस्स। मरणविणोपण विणा विरमाऊँ विरहदुक्खं ॥ ४ ॥ [अन्यथा न शक्यत एवं परिवर्धमानगुरुकं प्रियतमस्य । मरणविनोदेन विना विरमयितुं विरहदु खम् ॥ ) मरणरूप मष्टि माधनके अतिरिक्त किसी दूसरे प्रकारसे प्रियतमके विहमें बदने वाला भारी दुःस शान्त न होगा ॥४९॥ वण्णन्तीहि तुह गुणे बहुसो अम्हि छिम्छईपुरओ। बालअ सअमेज फओसि दुल्लहो कस्स कुप्पामो ॥ ५० ॥ [वर्णयन्तीभिस्तव गुणा बहुशोऽम्माभिरसतीपुरतः । पालक स्वयमेव कृतोऽसि दुर्लभः कस्मै कुष्यामः ॥] असतियों के सामने मैंने ही मुम्हारी गुणावली का बहुत वर्णन किया है। इसके फलस्वरूप, हे पालक, स्वयं मैने तुम्हें दुलंम बनारिया है। किसे कोप दिसायें ॥५० जामो सो वि विलस्खो मए वि हसिऊण गाढमुरगूढो। पढमोसरिभस्स णिसणस्स गडि विमग्गन्तो।। ५१॥ [ जानः तोऽपि विलयो मपापि हसिवा गादमुपगूढः । प्रथमापर सस्य निवसनस्प अंधि विमाग्यमाणः 1] गाथासप्तशती [पचने वथने घलच्छीर्यशून्यावधान हुद्वारम् । परिव ददनी निवासान्तरेषु किरियरमान्दुनोवि] हे सरिष, प्रत्येक बातमें निवास के समय सिरसञ्चालनकर शून्यावधान के "हूँ-हूँ' शब्द उदारितकर हमलोगोंको संतप्त क्यों करती हो ? ॥ ५६ ॥ सम्भावं पुच्छन्ती बालअ रोआविआ तुभ पिआय । णस्थि विभ कासव वासुम्मिस्सं भणन्तीय ॥ ५७ ॥ [सद्धावं परन्ती बालक रोदिता तय प्रियया । नाररयेव कृतशपथं हासोनिम, मणारया ॥] हे पालक, उसके प्रति तुम्हा सदाद के सम्बन्धमें जिज्ञासा रनेपर मुझे तुम्हारी प्रियाने रुलाया है। शपथ दिलानेपर उसने हमकर गुझे कारण यतलाया कि तुम्हारा सद्भाव एकदम नहीं है ॥५७ ॥ पत्थ मप रमिअव्वं तीम समं चिन्तिऊण हिअरण। परमरकरसेप्रोल्ला णिवाइ तुघरी पविजन्ती ॥ ५८ ॥ [क्ष मया नव्यं तया समं चिन्तयिावा हृदयेन । पामरकावेदार्दा निपतति सुबरी उप्यमाना ॥ ) इसी माहरके खेत में में उसके साथ रमण करूँगा; यह सोसते हो पामरके स्वेदोद्रमसे भाई हो उप्यमान (पक्षमान) मारकर पी सिहा ॥ ५८॥ गहवासुओच्चिएसु वि फलहीवेण्टेसु उअह बहुभाए । मोह भमा पुलइओ विलग्गसे अहली हत्थो ॥ ५९॥ [गृहपतिसुतावचितेवरिकर्शमन्लेषु पश्यन RER! गोधं भमति पुलकितो विलग्नस्येवातिहरतः॥] हुमलोग देखो, गृहयतिके पुत्र अात् मेरे पतिद्वारा सपनदियहुए फुलरातियुक्त वृनसमूहमें धधूके विलामवेदान्वित भरि विशिष्ट हाय पुल. कित होकर पृथाही आगे बडाहा है ।। ५९ ॥ अजं मोहणसुहिकं मुअति मोत्तू पलाइए हलिए । दरफुडिअवेण्टभारोणआइ इसिमं च फतहीय ॥ ६॥ [क्षा मोहनमुखिता तेनि मुबारा पलायिते ६लिके। दारफुटिनन्समारावननया इमितमिय कापस्या । ] सुरतसिता भार्याको मराहुभा समझकर भय के सारे उसे दश इलिक

चतुर्थ शतक
माग गया, किंचित तिला हुआ फूल वृनसमूह भारसे अवगत होकर कार्याप्ती
भी मानो हँसने लगा।
गोसासुकम्पिअपुलाएदि जागन्ति पश्चिडे धण्या।
अम्हारिसीहि दिट्टे पिअम्मि अप्पा वि वीसरिओ ॥ ६॥
[निवासोकस्मितपुलकितआनन्ति नतितुं धन्याः ।
भस्माइशोभिईटे प्रिये क्षाएमापि विस्मृतः
नृत्य के समय मेमीके भगस्पर्शसे जो निवास II एवं पुलक साथ
नृत्य करना जानती हैं, वे धन्य है, किन्तु मेवी जैसी रमणीक मियको देख पाते
ही भारमविस्तृत हो जाती हैं ।।६।।
तणुपण वि तणुइलाइ पीपण विक्खिजप बरला इमिण ।
मात्येण यि मन्क्षणे पुत्ति कद तुज्य पडियफ्लो ।। ६२ ।।
सिनुकेनापि सन्यते सीणेनापि चीयो पलादनेन ।
मन्मस्थेनापि मध्येन पुग्नि कथं तब प्रतिपः॥]
हे पुनि, सहारी कमर दुग्ली एवं पतरी है, इस कमावद्वारा तुम अपने
प्रतिद्वन्दियोंको दुबली-पतली बनाने में किस प्रकार समर्थ हो रही हो १ ॥ १२॥
याहित्य घेजरहिओ धणरहिओ सुभणमझपासो व्य ।
रिउरिद्धिदसणम्मिय दूसहपीओ तुह विमोओ ॥ ६३॥
{पाधिरिध वैधाहितो धनरहितः स्वजनमायदास इव ।
रिपुपादिदर्शन मिव दुःसहनीयसप वियोगः ॥]
पुम्हारा विरह मेरेलिए पैचरहिन पाधिको भाति, स्वजनीक धीच निधन
हो वासकरनेकी भाति तथा अपने नेम्रद्वारा मनुभाको समृद्धि देखने के समान
प्रतीत होता है ॥ ६२॥
को त्य जम्मि समायो थइ विस्थिपणणिम्मलुत्तुझं।
विक्षनं तुझ पराधिय ग घ पोहरं मोत्तं ॥ ६४ ॥
(कोऽन्न जगतिसमः स्थगयितुं विस्तीर्ण निर्मलोत्तुङ्गम् ।
हृदयं तव नराधिप गगर्न च पयोधरान्मुक्त्वा ]
हे राजन्, पयोधर (स्तन वा मेघ) के अतिरिक्त कौनसी वस्तु इस जगत्में
विस्तीर्ण, निर्मल एवं उत्तुन तुम्हारे हृदय एवं गगनपा अधिशा करनेमें
समय है।॥ ६॥

गाथासप्तशती
आअपणेइ अडअणा कुउगहोम्मि दिण्णसङ्केआ।
अम्गपअपेल्लिाणं मम्मरकं जुण्णपत्ताणं ॥६५॥
[भाकर्णयत्यसती कुआधो दत्तसकता ।
अप्रपदप्रेरिताना मर्मरक जाणपत्राणाम् ॥]
निकुञ्जतले दत्तपत्रेता भमती तुम्हारे पादार द्वारा भारत जीर्णपत्रों का मर-
मर शब्द सुन रही है ।। ६५ ।
अहिलेनिन सुरहिणीससिअपरिमलावद्धमण्डलं भमरा ।
अमुणिचन्दपरिहयं अपुवकमलं मुहं तिस्सा ।। ६६ ॥
[भभिलीयन्ते सुरभिनि श्वसितपरिमलायमण्ड भ्रम ।
अज्ञातचन्दपरिभवमपूर्वकमल मुख तस्या ॥]
अपूर्व कमलके समान नायिका जो मुख कभी भी चन्द्रसे पराजित नहीं
हुआ, उस मुखसे पहिर्गन सुरभियुक्त नि वामका परिमल पाने के लोभमें भरि
(कामुकगण) दल यनाकर मुखकोभोर यदरहे हैं ।। ६६ ॥
धीरावलम्विरीय वि गुरुअणपुरओ तुमम्मि योलीणे ।
पडिओ से अच्छिणिमीलणेण पम्हडिओ पाहो ॥ ६७ ॥
धैर्यावलभ्यनशीलाया अपि गुरुजन पुरतस्त्वयि यतिमान्ते ।
पतितस्तस्था अधिनिमीलनेन पचमस्थितो बाप ॥]
मुम्हारे पले जानेपर, गुरुजनों के सम्मुख धैर्यावलम्सनार सिधा रहनेपर भी,
नायिकाकी आँख मुंद जानेपर पलक स्थित पाप गिर पड़ा ।। १७ ॥
भरिमो से सभणपरम्मुहीम चिअलन्तमाणपसराए ।
काअरसुत्तव्यत्तणयणक्ल सप्पेल्लणसुल्लिं ॥ ६८ ॥
[स्मरामस्तस्या शयनपराइ मुख्श विगलन्मानप्रमाया ।
कैतव सुप्तोद्वर्तनस्तनकट शरणमुम्बके लिम् ॥]
पहले शयन पराइमुवी हो पर भी, यादमें मानमार विगलित होनेर
उस नायिकाने परनिद्रामा भवरग्यनका पावर पदलकर कुचारको
प्रेरणासे जिस सुखकेलिको उप किया था, उसे ग्माण कारहा हूँ ॥१८॥
फग्गुच्छणणिहोस केण वि पदमपसाइणं दिणं।
थणअलसमूहपलोहन्तसेमधोमं किणो धुअसि ॥ ६९ ॥

ce चतुर्थ शतक [फागुनोसनिपि केनापि कष्टमप्रसाधनं दतम् । स्तनामुम्बप्रलुटरस्वेदधीतं किमिति धावपति ] नजाने किसने फागुनोरमा में हें निर्दोष विधारे पिता कीपर टा दिया है। अपने स्मारके मुझसे विगलिव स्पेदवारा धोये हुए उस हीदको पुन क्या धो रही हो ॥ १९ ॥ किंण मणिओ सि यालम गामणिधूथाइ गुरथणसमस्य। गणिमिसमीसीसिवलन्तवअणणणइदिहि ॥ ७० ॥ {किंग भणितोऽसि पासक मामगोपुण्यागुरुमनसमपम् । अनमिपमीपदीपदानपनाtun] हे पाणा, गुराके सम्मुष अनिमियनयनमे मुरको तिरछाकर कटाक्ष- द्वारा तुम्हें ऐसार प्रामिणीही कन्याने हमसे क्या नहीं कहा १०॥ अणमन्तरघोलन्तयाहभरमन्थराइ दिट्ठीए । पुणरसपेखिरीप थालय किंजंण मणिभो सि ॥ ७९ ॥ { নানাঘুমাসয়ামাহা তো। पुनरुक्तप्रेषणशीलया पालक कि यन्नमणितोऽसि ।।] नयनाभ्यन्तरमें धूर्णमानयाभरित मन्या रहिये मुगद यारयार देखकर, दे धारक, उस नायिका में ऐसा क्या है जिसे तुमसे यह न दिया हो१॥1॥ जो सीसम्मि विइण्णो मज्झ आणेहि गणवई आसी। तं दिवस यहि पणमाणि हमारे दोहि संतुट्ठा ॥ ३२॥ [4. शी वित्ती! मम युवभिगणपनिरासीत् । समेवेदानी प्रणमामि हाजरे भव सा ] युवकोने मेरे रिपर जित गणपतिको दान किया था, भय यौवन विगत होनेपर उन्होंको प्रणाम कर रही हूँ । हे हतभागे, तम सन्तुष्ट होओ ।। ७२ ॥ अन्ताहुत्तं उजइ ज्ञाआसुण्णे घरे हलिमरची। उपयाणिहाणाई व रमिस्ट्रागाई पेच्छन्तो ॥७३॥ [ अन्तरभिमुख दाते जायाशून्ये गृहे हालिपुत्र । उरखातनिधानानीव रमितस्थानानि पापन् ॥] जापाशून्य घरमें रमणके स्थानोंको, उखाद सहित निधिक उत्पारित

।
गाथासप्तशती
स्थानकी भाँति समझने के कारण उसे देखकर हलिकपुत्रके हदयमें दाहका
अनुभव हो रहा है॥७३॥
णिहामङ्गो आवण्डुरत्तणं दोहरा अ णीसासा।
जाअन्ति जस्स विरहे तेण समं कीरिसो माणी ॥४॥
[निद्रामा आपाण्डवं दीर्घात निश्वापा।
जायन्ते यस्य विरहे तेन तमं कीदृशो मानः।]
जिसके विरहमें निद्राभन, पाण्डरता एवं दीर्घनिवास उत्पन्न होता है
उसके साथ किस प्रकार मानका अवलम्बन करूं? ॥ ७ ॥
तेण ण मरामि भण्णूहि पूरिया अज जेणरे सुहम।
तोग्गअमणा मरन्तीमा तुज्झ पुणो वि लग्गिस्सं ॥७५ ।।
[ तेन न म्रिये मन्युगिः परिताच येत रे सुभय।
स्वगतमना नियमाणा मा तत पुनरपि लगिष्यामि ॥ ]
हे मुभग, मुम्हारी हृदपेश्वगी होकर मानेपर भी, कहीं फिर तुम्हें पतिरूपमें
न पाऊँ यही सोचकर क्रोधपूर्ण होकर भी माना नहीं चाहती ॥ ५ ॥
अवरज्झसु बीसद्ध सव्वं ते सुहम विसहिमो अम्हे ।
गुणणिभरम्मि हिअए पत्तिम दोसा | माअन्ति ।। ७६ ॥
[अपराध्यस्व वित्र सर्व ते मुभग विषहामहे वयम् ।
गुणनिर्भर हृदये प्रतीहि दोषा न मास्ति ॥]
हे सुभग, विनब्ध होकर यथाशक्ति भराध करो, मैं तुम्हारा सय पुष
सहन करूंगी तुम विश्वास करना कि तुम्हारे गुणोद्वारा पूर्ण मेरा लक्ष्य तुम्हारे
दोषों को स्थान न दे सकंगा ॥७६ ॥
भरियरन्तपसरिअपिमसंभरणापिसुणी पराईए।
परिवाहो विअ दुक्खस्स चदइ णअणट्टिओ पाहो ॥ ७ ॥
(भूतोवरप्रसृत प्रियसंस्मरणपिशुनो धराया ।
परीवाद व दुवस्य धक्षति नयन स्थिनो शरः।
दीनारगीकी भासाम स्थित धाप, परिपूर्ण होकर निकलने के साथ ही
माय पक्षावस्थामें प्रिय ही स्मृति का चिन्तन करते-मदुम प्रथा प्रवाह
की नाई प्रवाहित हो रहा है ॥ ४ ॥

चतुर्थ शतक जंज फरेसि जज जसि जह तुम मिच्छसि । तं तमणुसिक्सिरीए दीदो दिनहीण संपडइ ॥७॥ [करोषि यनजामि यथा निरीक्ष। सत्तदनशिवणशीला दोघी दिययो म संपते ॥] कुम जो-जो करते हो, जो-जो पोलते हो एवं जिस प्रकार देको हो उसका अनुसरण करने जानेपा देखती है कि मेरे दिन दूर नहीं पीत होते ॥ ७॥ भण्डन्तीम तणाई सोत्तुं दिपणा जाई पदिअस्स । ताई च्चे पहाप अक्षा आअट्ट रुमन्ती ॥ ७ ॥ [ भासंपन्या तृणागि स्मर्तु दत्तानि यानि पधिरय । सान्येव प्रमाने भार्या भापति रुदती ॥ भार्मनाकर रात्रि में पथिको सौने लिए रमणी ने पुभाल दिया था, समेत होने पर उसे ही रोने रोते स्टोररही है ।। ९ ।। यसम्मि अणुविधग्गा विद्दवम्मि अग्गविमा भए धीरा। होन्ति अहिण्णसदाया समेसु विसमेमु सम्पुरिसा ।। ८० ॥ [सनेऽनुद्विमा विमवेडगामा भये धीरा। भयरपभिन्नस्वभावाः समेविषमेषु सत्पुरुषाः ।। सजन व्यक्ति पिपदामें अनुशि, पदमें भगर्वित एवं भयमें धीर रहकर अनुक्छ एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में उमस्वभावशील (स्थितप्रज्ञ)रहते हैं।८०॥ अन सहि केण गोसे फं पिमणे बलहं भरन्तेण । अम्दं माणसरा हिमायणफोडनं गीअं॥ ८१॥ [भरा समिकेन प्रात: कामपि मन्ये बसमा स्माता। भस्माकं मदन शाइतहृदयमगरफोरनं गीतम् ॥ ) अरी सस्त्री, प्रतीत होता है कि भाज प्रातःकालही जैसे कोई प्रियतमाको स्मरणकर इस प्रकार मानकर रहा है जिममे मनपाणद्वारा भाइन मेरे हश्य का घाव विदीर्ण हो रहा है। उट्ठन्तमहारम्भे थणप दट्टण मुद्धय आए । ओसण्णकयोलाए णीससिमं पदमपरिणी ॥८॥ [उत्तिष्ठन्महामौ स्तनौ दृष्ट्वा मुग्धवत्राः। भवमसकलया निवतितं प्रथमगृहिण्या ] ९२ गाथासप्तशती यक कपोल विभिटा प्रथगृहिणी मुरश्य भारम्भ महाविस्तार उठ हुए स्तनों को देखकर मिश्वास रही है । ८२ ॥ गरमछुआउलिअस्स वि यलहकरिणीमुहं भरन्तरस। सरसो मुणालकवलो गभस्स हत्थे विश मिलाणो ॥ ३॥ [ गुरुधाकुलितस्थापि सभीणीमुख स्मरत। सरमो मृगालकवलो गजाय हस्त एवं ग्लानः ॥] भयन्त उधार होने पर भी प्रियतमा धिनीका मुंह स्मरणकर हाधीके शुण्डपर स्थित सरस मृगायकवलभी मान होता जा रहा है, मक्षित नहीं हो रहा है। ८३ ॥ पसिअ पिए का कुविआ सुअणु तुम परअपम्मिको फोयो। को हु परो नाथ तुमं कीस अपुण्णाण में सत्ती ।। ८४ ।। [प्रसीद प्रिये का कुपिता सतनु वं परजने का कोप.1 का राल परो नाथ स्वं किमित्यपुण्यानां मे शति] हे प्रिये, प्रसन्न होओ। कौन कुपित हुआ है ? सुतनु, मुमने कोप किया है। परमों के प्रति कोप कैपा? भरे पराया कौन है ? हे नाथ, तुम्ही पराया हो। कैसे ? मेरे अपुण्य की शक्ति के सदृश ।। ८४ ॥ पहिसि तुमति णिमिसं व जन्गि जामिणीभ पढमद्ध। सेसं संतायपरत्वसाह घरिसं घ पोलीणं ।। ८५ ॥ {एव्यसि त्वमिति निमिषमिव जागरितं यामिन्याः प्रथमार्धम् । को सम्तापपरवशाया पर्पमिय व्यक्तिकान्तम् ॥] 'तुम भाओगे यह सोचकर रमशी ने प्राय एक निमिपके समान प्रारम्भिक रानिका पूर्वाद्ध जागर बिताया है, फिर उत्तराद्धको विरह-सन्तत होकर घर्षके समान फारदिया है ॥ ५॥ अवलम्यह मा सङ्कह ण इमा गहलविआ परिम्भमद। अत्यागजिउम्भन्तहित्यहिया पहिअजाआ॥८६॥ { मा सावं नेयं महलहिता परिभ्रमति । आकस्मिगणितोद्भातग्रस्तहृदया पधिजाया ॥ इस रमणीको पकड़ो, कोई पाराश मत करो, यह प्रदादिद्वाकान्त होकर परिभ्रमण नहीं कर रही है, इस परिमाया हदप आकस्मिक मेघ. गर्जन द्वारा उमान्त होकर प्रस्त हो गया है. ८६॥

९३ चतुर्थ शतक केसररअविच्छड़े मारन्दो होइ जेत्तिमओ कमले। जइ भमर तेन्तिओ अण्णहिं पितासोहसि भमन्तो ॥ ८७॥ [ केसारजःसमूहे मरन्दो मति यावान्कमले। यदि भ्रमर तावानन्यत्रापि तदा शोभसे अमन् ॥ ] रे भोरे, कमलके केपरपराग समूहमें जितना मधु होता है, यदि अन्य पुष्पों में भी उतना ही मधु हो तो तुम्हारा यहाँ जाना अच्छा लगता है ॥८॥ पेच्छन्ति अणिमिसच्छा पहिआ हलिअस्स पिट्ठपण्डरिगं । धूअं दुद्धसमुहुत्तरन्तलच्छि विअ सअह्ना ॥ ८८॥ [प्रेपन्तेऽनिमिपाक्षाः पथिका हलिकस्य पिष्टाण्डरिताम् । दुहितरं दुग्धसमुद्रोत्तरलदीमिव सतृष्णाः ॥] अनिमिपलोचन देवताओंने धीरसागरसे उर्ध्वगत पीतवर्ण लघमीकीओर जिसप्रकार सतृष्णभावसे देखा था, तण्डुलादि चूर्णलेपनद्वारा पीतवर्णप्राप्त हलिक पुयोके प्रति राहगीर भी उसी प्रकार निनिमिप एवं सतृष्ण होकर रष्टिपात कररहे हैं ।। ८॥ फस्स भरिसित्ति भणिए को मे अस्थि त्ति जम्पमाणाए। उविग्गरोइरीए अम्हे विरुआविआ तीए ।। ८९ ॥ [ कस्य स्मरतीति भणिते को मेऽस्तोति जल्पमानया। अद्विग्नरोदनशीलया धयमपि रोदितास्तया ॥] "किसे स्मरणकर रही हो? ऐमा पूछे जानेपर, 'मेरा कौन है' ऐसा उत्तर दे, उद्वेगसे रोनेवाली उस रमगीने हमलोगोंको भी रुलाया है ।। ८९ ॥ पासपडिअं अहव्ये किं दाणि ण अट्ठवेसि भत्तारं । एविभ अवसाणं दूरं पि गअस्स पेम्मस्स ॥ ९० ॥ [पादपतितममध्ये किमिदानी नोरयापयसि भर्तारम् । एतदेवावसानं दूरमपि गतस्य प्रेम्णः ॥] हे अनुचित व्यवहार करनेवाली, अभीतक तुम पैरोंपर गिरे हुए भारको उठा नहीं रही हो ? मत्यन्त पृद्धि प्राप्त प्रेमकी भी यही चरमसीमा है ॥ ९० ॥ तडपिणिहिअग्गहत्था वारितर हि घोलिरणिअम्या । सालूरी पडिविम्ये पुरिसाअन्तिव्य पडिहाइ ॥ ९१ ।। [सटविनिहितामहरता वारितरगगेर्णनशीलनितम्या । शाली प्रतिबिम्बे पुरुषायमागेव प्रतिभाति ॥]

गाथासप्तशती जलतटपर अगला हाथ रखकर एवं जलतरण द्वारा नितम्बप्रदेशको हिला- कर मेढकी अपने प्रतिविम्यमें मानों पुरुषोचित अभ्यासर रही है, ऐसा प्रतीत होता है॥ ९॥ सिकरिअमणिअनुहविभाइँ धुमहत्थसिञ्जिअन्वाई । सिक्यन्तु वोडहीओ कुसुम्भ तुम्ह प्यसाएण ॥९२ ॥ [सीकृतमणितमुखये पितानि धुतहस्तशिक्षितव्यानि । शिवन्तु कुमायः कुसुम्भ युप्मप्रसादेन ॥] हे कुसुम्म, तुम्हारी कृपासेही कुमारियाँ सरकार, मणितनामक जन- विशेष, मुखपरिचालन एवं हस्तकम्पजनित भूषण झनकार करने की शिक्षा पावें ॥ १२ ॥ जेत्तिअमेत्ता रच्छा णिअभ्य कह तेत्तिओ ण जाओ सि। जंछिप्पइ गुरुअणलजिओ सरन्तो वि सो सुहओ ॥ ५३॥ [ याचप्रमाणा रथ्या नितम्व कथं तावन्न जातोऽसि । येन स्पृश्यते गुरुजनल जापसृतोऽपि स सुभगः ॥] हे नितम्ब, रच्या अर्थात् रास्तेका जितना परिमाण है, उतना परिमाण लेकर तुमने जन्म क्यों नहीं लिया ? कारण, गुरुओं के सामने जित होकर हिटगाने पर भी वह सुभग तुम्हारेद्वारा छू ही लिया जाता है ॥ १३ ॥ मरगअसूई विद्धं च मोत्तिअंपिअइ आअअग्गीओ। मोरो पाउसाले तणग्गलग्गं उभयविन्दं ॥ ९४ ॥ [ मरकतसूचीविद्धमिव मौक्तिकं पियरयायतग्रीवः । मयूरः प्रावृटकाले तृगामलममुदधिन्दुम् ॥ वर्षामें मोर विशाल प्रीव होकर मरक्तमगि सूईद्वारा विद्ध मुक्ताक समान दिपायी देनेवाला तिनका भन भागों लो हुए जलबिन्दुका पान कर रहा है [ नृणलता गृह ही सकेस स्थान है। ] ॥ ९ ॥ अजाद णीलकञ्चभमरिउपरि विहाइ थणवह । जलभरिअजलहरन्तरदग्गरं चन्दविम्य व्य ।। ९५॥ [ भार्याया नीटकनुभूतो रितं विमाति स्तनपृष्ठम् । जलभृतजलधरानसरदरोद्गत चन्द्रबिम्पमिव ॥] भार्याका स्तनपृष्ठ नीलकनुक द्वारा आवृत होने पर भी (सर्वरित का चतुर्थ शता क्षितत) वंगत होकर अलगन मुमोल माघरके बोधले ईचत् उगम बन्द महायोगाई शोभा पा रहा ॥ ९५ ॥ रामविरच कादं यदिओ पदियम्स साहा ससक्छ। जत्तो सम्माण दलं तत्तो दरणिग्गन किवि ॥२६॥ [विदामपि फर्श पथिक पपिय पनि म । पर प्राणा दल सम ईलिग किमपि ॥] 'आम्रपुर के मिस स्थानसे पत्तेका उद्गम होता है, उस स्थानमे पोड़ा थोड़ा निकला हुआ (बहुर ) म जाने क्या दिखायी दे रहा है। रामविरम पकी भाति म पातको मी एक पथिक दूसोसे या शाहित होकर कहना है ॥९॥ धण्णा ता महिलाओ जा दामं सिविणए वि पेच्छन्ति । णिद्द चिन तेण चिणा ण एइफा पेच्छए सिविण ॥ ९७ ।। [धन्यासा महिला या दपितं सनेऽपि प्रेशते। निद्वेष सेन बिना मैति का प्रेते स्वप्नम् ॥ ] को त्रिपको स्यनमें भी देगलेनी है,पेदी नारो धन्य है। उपके रिहमें मुझं निद्रा ही नहीं भाती, स्थान कोग देसे॥ १७ ॥ परिरक्षकगभण्डस्थलमणरेसु सवोतु । अपणसमयसेण य पहिरबा तालयेण्ट ॥२८॥ [परिपकनफाण्टलगदरपटमनोहरयोः गयो। भन्यसमयवशेन च परिप्रियते सायएन्तयुगम् ॥] कनक कुशल युरित गण्डरपट में शोभित बर्णयमें कालारतरवश तालपत्रनिर्मित पर्णागूपगयुगल भी धारण होता है ।। १८ ॥ मझावपत्यिस वि गिम्दे पहिअस्स हर संता। हिममटिअजामामुदयजीबाजलप्पयो ॥ ९९ ॥ [मन्यामस्थितस्यापि मोरे पथिकरय इति संतापम् । द्वदपस्थितमायामुखगगाइयोस्रनाजलवादः ।। अपने हदयस्थित माया मुरश्चन्द्रकी पोरना जगवाह, मोममें मामा के समय पप र हुए पपिरका सन्ताप दूरकर देता है ॥ १९ ॥ भण को परस्सा जपो पत्थिनन्तो असमालमि। रतियामहा रुमन्तं पिमं वि पुत्त सवा मामा ।।१०।।

गाथासप्तशती
[मण को न रुप्यति जन प्रार्यमानोऽदेशकाले।
रतिव्यापृता दन्तं प्रियमपि पुन शरते माता।
अनुपयुक्त स्थान एवं भसमय में भनुनीत होनेपर कौन हष्ट नहीं
होता, बताओ तो रतिनिरत माताभी प्रियपुनके रोनेपर भभिशाप
देती है।॥१०॥
एत्थ बउत्थं विरमइ गाहाणं स सहावरमणिनं ।
सोऊण जंण लग्गइ हिअए महुरत्तणेण अमिमं पि॥ १०१ ।।
[अन चतुर्थ 'वामति गायानो शतं स्वभावरमणीयम् ।
श्रुत्वा पन्न छगति हृदये मधुरवेनारतमपि ॥]
स्वभावरमणीय गाया समूहका चतुर्थ शतक यहीं समाप्त हो गया जिसे
सुननेपर हृदयको अमृत भी उतना मधुर नहीं लगता ॥१०॥

पञ्चम शतक उहासि उज्मसु कसि कसु अह फुडसि हिअअ ता फुडम। तह वि परिससिओ च्चिा सोहु मए गलिअसम्भावो ॥१॥ [पासे दहस्व पप्यसे छयास अथ फुटसि पय तस्फुट । तथापि परिशेषित एव सः खलु मया गलितमझायः॥] श्रे हृदय, दम होना हो तो हो जाओ, कथित वा पक्ष होना हो तो हो जाओ, किन्तु तय भी उसे मैंने स्नेह वा सार विगलित ही निर्धारित किया है। दण रन्दतुण्डमणिग्गणिअसुअस्स दाढणं । मोण्डी पिणावि कज्जेण गामणिअडे जये घरह ॥२॥ [सा विशाटण्याप्रनिगंतं निजसुतस्य दंष्ट्राप्रम् । स्की विनापि कार्येण प्रागनिकटे यवशाति ॥] अपने पुनके विशाल मुसामसे निम्ले हुए दादों को देखकर की बिना दिमी काम गांव के निकटस्थ भयके सेतों में विवरणकररही है॥२॥ हेलाकरगट्टिअजलरिक्कं सारं पसन्तो। जअह अणिग्गअयडयरिंग भरिअपगणो गणादिवई ॥३॥ दिलाफरामाकृष्टजलरिक्त सागर प्रकाशयन् । जयायनिप्रवदयानितगानो गणाधिपतिः॥] शुण्डद्वारा भवज्ञापूर्वक सलपान किये जाने पर रिक्त या शून्य सागरको प्रकाशित पर निग्रहसमर्थ गणाधिपति भनिगृहीत यहवान द्वारा गगनमण्डल को परिपूर्ण करते-करते अपयुक्त हो रहे है ।। ३ ।। एएण च्चिा कंकेलि तुज्दा त पथि पजत्त। उपमिन तुछ पल्लवेण वरकामिणी हत्यो॥४॥ [पतेनैप करेश्ले तय सारित यस पर्याप्तम् । उपमीयते यत्तय पक्षवेन घरकामिनीहस्तः ॥] है अबोक्रा, तुम्हारे पखवकेसाथ सुन्दरी कामिनीका हाय उपमिन होता है, इमले प्रतीत होता है कि मुम्हारे पास यह है ही नहीं जो पूर्ण न हो।

गाथासप्तशती रलिअयिभट्ट पिलासिम समअण्ण सञ्चथं असोमो सि। घरजुबइचलणकमलाहशे विज विससि सपहं ॥५॥ [ रसिक चिदम्प विटामिन्समय सत्यमशोकोऽसि । वरयुवतिचरणकमलादतोऽपि यद्विकसमि सतृष्णम् ॥] हे रसिक, हे विदाय, हे विरासी, हे अनुकूलसमयज्ञ पक्ष, वास्तवमें तुम अशोक अथवा शोकरहित हो, कारण, श्रेष्ठ युवतीके चरणकमल द्वारा आहत होनेपर भी तुम सतृष्ण भावसे विकसित होते ही अर्शत् देखते रहते हो ॥५॥ वलिणी याआवन्धे चोज्जणिउअत्तणं च पअडन्तो। सुरसस्थकआणन्दो वामणरूयो हरी जअइ ॥६॥ [बलेर्वाचायन्धे पाश्चयं निपुणवं च प्रकटयन् । सुरसार्थकृतानन्दो वामनरूपो हरिर्जयति ॥] ঘাতী ক্লাব ফযমঘ অথাব নিকার্ক বিষম आश्चर्य, गुण एवं निपुणता है-इसे समझकर प्रकट करते-करते सुरससंपा पचनप्रयोगद्वारा सयको भानन्दित का विनीत अथवा पराभूत परदारापहानी विजयी हो। बलिराजा के वाक्प्रयोग के नियमनके पक्ष-अपनी अद्भुत किया एवं नैपुण्यका भाव प्रकाशित करते करते देवसध को मानन्दित करनेवाले वामनरूपी विष्णु विजयी हो ॥६॥ विजाविजड जलणो गहवइधूआइ चित्यअसिहो वि। अणुमरणधणालिगणपिअअमसुहसिञ्जिरङ्गीए ।। ७}} [निर्वाप्यते ज्वलनो गृहपतिदुहिया विस्तृतशितोऽपि । अनुमरणघनालिङ्गनप्रियतममुघश्वेदशीतागया ॥] सती होने के लिए चितापर धैठी गृहपतिको दुहिता भनुमरणके समय प्रियतमके गादालिङ्गनजनित सुखसे उत्पन्न स्वेदबिन्दुओं के कारण शीतहिनी हो विस्तृत विखाग्निको भी बुहा रही है ।।। जारमसाणसमुभवभूइमुद्दष्फससिरिडीए । ण समप्पड णवकावासिआइ उद्धलणारम्भो ॥ ८॥ [ जाररमशानसमुद्भवभूतिबरपर्शस्वेदशीटाया। न समाप्यते नयापारिक्या उद्धा नाम्म ) जारके श्मशानसमुभूत मरमद्वारा अनुलित होने के सुस द्वारा उत्पा पत्रमशः स्प्रेदम मुनगसे निी गालिरमारिणी मिगी स्पेनिया लिए भामानुलेपन मार्गको ममाल नही र पारदी । एको पणनुमाइ यणो धीओ पुलएर णमुदालिदियो । पुत्तम्स पिप्रअमम्स अ ममाणिसपणा धरणीय ॥९॥ [ प्रस्नोति रतनो दिनीयः पुलकिलो भवति नरमुग्यानिमितः ।। पुण्य प्रियतमाय च गप्पनिया गृहिण्याः ।। य एवं विपतमके बोध पेदने के कारण गृहिणीबा एतन दुग्ध कर रहा है और दूसरा हम पतिप्रेममें मघाप्रमे सिदिम हो हो पत्ताचा मोई जणे थालत्तणे यि पानी। मामणिमा यिसकन्दलिय यदीओ पादिर अणत्यं ॥१०॥ पायरय मोई जनपनि पार येऽपि यतमाना। प्रामणीदुदिमा विपासीय यधिना कीयापनम् ॥] पालिकासी अमरया में इस प्रशर परमान रहकर भी प्रामातियो दुहिता मोह कर रही है, विषकन्दली अर्थात् विपाकी भाति पनि होकर ही करवायेगी 1100 अपहुपरन्तं महिमण्डलम्मि पदसंठिभं निरिणी। तारापुष्पप्पभरश्चिनं प तइयं पनं गमद ॥ ५ ॥ [प्रभामहीमण्ड नभ पंस्थितः धिरं दो। साराशिमिर तमीयं पदं नमन।] महिमादल, भारमिन होने के कारण यहुत देयक न मोमण्डल में रिया কারণে ব্রণ দগুলি মিষিঃ বিঃ সহ গান্ধী সময় करो। गुप्तधानमें अंगभुमा घयाया प्रनो में नायिका गनिमें उपयुका यिकमयनयार रमणकराके विपरमें दूसरे के बहाने मे वतासी है। सुप्पर तहमा वि गओ जामोत्ति सहीमा कीस में मण सेहालिाण गन्धो पा देह सोत्तुं सुबह तुन्दे ।। १२॥ [मुपता तृतीयोऽपि गतो याम इति सपः किमिनि मा मम । शेफालिन मन्यो न ददानि र स्वपित यूयम् ।] सविषो, तुम मुसमे यह पो रह रही होकि "सीमरा याममी त गया, तुम मोओ"काटि I मुझे सोने नहीं देना है, म सपोजन १०० गाथासप्तशती फैह सो ण संभरिजइ जो में तह संठिआई अङ्गाई। णिचत्तिए वि सुरप णिज्झाइ सुरसरसिओन्च ॥१३॥ [कथं स न सस्मयंते यो मम तथासस्थितान्यङ्गानि । निवर्तितेऽपि सरते निध्यायति सुरतरमिक इ.] जो व्यक्ति सुरतासिकके समान, सुरतक्रिया समाप्त होनेपर भी मेरे मङ्गीको तथासंस्थित समझकर उनके प्रति भास गडाये रखता है, उसे कैसे स्मरण न करूं?॥ १३॥ सुक्खन्तवहलकद्दम्मघम्म चिसूरन्तकमठपाठीणं। दिट्ठ अविठ्ठउन्वं कालेण तलं तडाअस्स ॥१४॥ [शुष्यवहलकदमधर्मविद्यमानकमठपाठीनम् । मष्टपूर्व कालेन तल तडागस्य । ग्रीष्मकाल तड़ागके उस अदृष्टपूर्व तलदेशको देख पाता है जिससे गहरा कीचड़ सूखता जा रहा है एव जिसमें तापके कारण सभी कछुए एव पाठीनमास्य सभी कष्ट पा रहे हैं ॥ १४ ॥ चोरिअरअसद्धालुइ मा पुत्ति न्भमसु अन्धआरम्मि। अहिअअरं लक्खिजसि तमभरिए दीवसीहत्व ॥ १५ ॥ [चौर्यरतश्रदाशीले मा पुन्नि भ्रमाधिकारे । अधिकतरं लक्ष्यसे तमोमृते दीपशिखेव ॥] हे चौर्यरतिमें आस्थावान् पुनि, अन्धकारमें मत घूमना, समसारमा प्रदेशमें दीपशिवाकी नाई शरीरलावण्यवश अधिकतर दिखायी दे जाभोगी। घाहित्ता पडिवणं ण देह रूसेइ एकमेकस्स। असई कजण विणा पइप्पमाणे पईकच्छे ।। १६ ॥ [व्याहृता प्रतिवचनं न ददाति रुष्यस्यकैकस्य । असती कार्येण विना प्रदीप्यमाने नदोकन् । नदीकच्छ के जए जाने से जिज्ञासा करने पर भी असती कोई उत्तर नहीं दे रही है एवं कार्यम्यतिरेसे मी अकारण किती किसीके ऊपर रुष्ट हो रही है। आम असइ म भोसर पइपए ण तुह मलिभगोसं। कि उण जणस्स जाअव्य चन्दिलं ताण कामेमो॥ १७॥ [साम असायो वयम्पसर पतियते न ह मलिना गोत्रम् । किं पुनर्जनस्य जायेव मापित ता कामयामहे . ] पञ्चम शतक 38010 ठीक है, हमलोग क्या हुभा असती ही हैं। हे पतियते, हम हट जाओ। मुम्हारा गोत्र अर्थात् नाम वा बुल मलिन नहीं हुआ है, तब भी किसी व्यक्ति जापाकी भाँति हमरोगोंने कभी नाईकी कामना नहीं की है। 10॥ কি অৱনি রুমি গলির লিখা সানির। जाहि प दिट्टो सि तुमंताभो चिस सुहा सुहिआओ ॥ १८ ॥ [निद्रा लगन्ते कधितं भृण्वन्ति स्वलितावरं न जरान्ति । यामिन दृष्टोऽसि त्वं ता एव सुभग सुखिता] हे सुभग, जिन रमणियोंने तुम्हें देखा नहीं है, ये ही सुपी है। कारण ये सो सकती हैं, दूमोकी बातें सुन सकती हैं, एवं उन्हें प्रशास्वलन के साम षातचीत नहीं करनी पड़ती ॥ १८॥ चाल तुमाइ दिण्णं कण्णे फाऊण योरसवाहिं। लजालुणी वि बहू घरं गा गामरच्छाप, ॥ १९ ॥ [चालक स्वया दत्ता करें कृत्वा बदरमहादीम। लजालुरपि वधूगृहं गता प्रामाध्यया.] हे बालक, लजाशील होनेपर भी धध तुम्हारे दिये हुए बेरगुडको कानमें धारण कर गाँव के पथमे घर चली गई ॥१९॥ अह सो विलक्खहियओमए अहवाएँ अगहिआणुपाओ। परपजणचरीहि तुह्मोहि उक्खिो पेन्तो ॥ २० ॥ [अप स विर सहदयो मया अभव्यया भगृहीतानुनयः । परवानर्तनशीलामियुष्माभिरक्षितो नियन् ॥ ] और, मैंने अशिष्टा होकर उस अनुनय स्वीकार नहीं किया, इसमे विधुर- हप हो वह या घरसे निकलने ममय तुमलोगों द्वारा उपेशिन हुआ है ? कारण, तुम्हारा काम ही है याजा बजाकर दूसरोंको नया डालना ॥ २० ॥ दीसन्तो णमणसुहो गिन्धुइजणभो करेहि विछियन्तो। अभत्थिो लमइ चन्दो व्य पिभो कलापिलमो॥२१॥ [श्यमानो नयनसुको नितिजननः कराम्मा [ भरि ] स्पृशन् । अभ्यर्थितो न पते पद इद प्रिय. पलानिलयः।] इटिप मानेपर पर मुखका तस्यायक, का क्षमता विसन द्वारा मंग, १०० गाथासप्तशती फंह सोण संभरिजइ जो मे तह संठिआई अङ्गाई। णिव्यत्तिए वि सुरप णिज्झाइ सुरअरसिओन्ध ।। १३॥ [कथं स न संस्मर्यते यो मम तधासंस्थितान्यगानि । निवर्तितेऽपि सुरते निध्यायत्ति सुरतरसिक इव ॥] जो व्यक्ति सुरतरसिकके समान, सुरतक्रिया समाप्त होनेपर भी मेरे मोको तथासंस्थित समझकर उनके प्रति आँख गदाये रखता है, उसे कैसे स्मरण न करूँ॥१३॥ सुक्खन्तवहलकद्दम्मघम्म विसूरन्तकमउपाठीणं । दिटुं अदिट्ठउव्वं कालेण तलं तडाअस्स ॥ १४ ॥ [शुष्पहलकदमधर्मखिद्यमानकमठपाठीनम् । टमष्टपूर्व कालेन सलं तडागस्य ॥ ग्रीष्मकाल तड़ागके उस भादृष्टपूर्व तलदेशको देख पाता है जिससे गहरा कीचड़ सूखता जा रहा है एवं जिममें तापके कारण सभी छुए एवं पाठीनमरस्य सभी क्ट पा रहे हैं । १४ ॥ चोरिअरअसद्धालुइ मा पुत्ति ब्भमसु अन्धभारम्मि। अहिअरं लक्खिजसि तमभरिए दीघसीहव्य ।। १५ ।। चिौर्यरतश्रद्धाशोले मा पुनि भ्रमान्धकारे । अधिकतरं लक्ष्यसे तमोमृते दीपशिखेव ॥] हे चौर्यरतिमें भास्थावान् पुत्रि, अन्धकारमें मत घूमना, तमसात प्रदेश में दीपशिबाकी नाई शारीरलावण्यवश अधिकतर दिखायी दे जाओगी ॥ घाहित्ता पडियअणं ण देह रूसेइ एकमेकस्स। असई कजण विणा इप्पमाणे णईकच्छे ॥ १६ ॥ [ग्याहता प्रतिवचनं न ददाति रुप्याककरण । असती कार्येण विना प्रदीप्यमाने नदीपच्छे । नदीकच्छ के जलजाने से जिज्ञासा करने पर भी असती कोई उत्तर नहीं रही है एवं कार्यध्यतिरेक्से भी अकारण किसी-किसीके ऊपर रुष्ट हो रही है आम असइ हम ओसर पइन्धए ण तुह मइलिनोस। किं उण जणस्स जाअव्य चन्दिलं ताण कामेमो॥१ [Bाम असायो वयमपसा पतिव्रतेमकिन गोत्रम। किं पुनर्जनस्य जायेष ना १०३ पञ्चम शतक [मालतीकुसुमानि दम्बा मा जानीहि निभृतः शिशिरः । कर्तव्याचापि निर्गुणानां कुन्दानामपि समृदिः।] ऐसा मत समझना कि केवल सगुग मालनीकुसुमके समूहको जलाकर शिशिर सन्तुष्ट हो गया है, अभी भी निर्गुण कुन्दपुष्पसमूहकी समृद्धिको घटाना उसके लिए शेष है ॥ २६ ॥ तुङ्गाणे विसेसनिरन्तयण सिरस] वणलद्धसोहाणं । कअकजाण भडाण व थणाण पडणं विरमणिनं ॥ २७॥ [ तुझ्योर्षिशेषनिरन्तरयोः [ सरस ] प्रणालधशोभयो । कृतकार्ययोर्भटयोरिव स्तनयोः पतनमपि रमणीयम् ॥ ] मानादि द्वारा उन्नत, विशेष निरन्तर अथवा समकतमाय एवं युद्धादिम प्राप्त सरसनविशिष्ट होने के कारण अत्यन्त शोभित, विजयी योद्धाद्वय के समान ति, अन्योन्यसलग्न एव सरसवणविशिष्ट अर्थात् रतिसमरमें नखादि विह्वयुक्त होने के कारण अत्यन्त शोभित कृतकृय स्तनद्वयका लटक जाना भी रमणीय है ॥२७॥ परिमलणसुद्दा गुरुआ अलद्धविवरा सलखणाहरणा। थणा कव्वालाय व्य कस्स हिअए ण लगन्ति ॥२८॥ [परिमलनसुखा गुरुका अलव्धविवरा' सलक्षणाभरणाः । स्तनका काव्यालापा इव कस्य हृदये न लगन्ति ॥] मर्दन में मुखका, स्थूल, रन्ध्रशून्य एवं सुलहगाकान्त भामरणमे दोमित स्तन--विचारसुखकर, अर्थगुरु, दोपरहित एवं पुरसविशिष्ट बलशारसे मुशोभित काग्यालापके समान-किसके हृदय में नहीं भाते ॥ २८॥ खिप्पइ हारोथणमण्डलाहि तरणीय रमणपरिरम्मे। अधिअगुणा वि गुणिनी लहन्ति लट्ठयत्तणं काले ॥२२॥ [लिप्यते हारः स्तनमण्डलाचगीमी रमापरिरम्मै । अर्षितगुणा अपि पुगिनो समन् स्यवं काटन] रमणकाल मालिअनमें तनी ग्लनमाहटम हारको हारा अवसर उपस्थित होनेपर चिंतागवार गुगीपग मी एष प्रन करते हैं। अर्थात् छोटे समाने जाते हैं ॥ २९ ॥ अण्णा को निमुहायो मम्ममिदिगो हलाहमासम्म । मिन्दार जीवाणं हिनप, मरमान प्रत्ति पनला। 2011

१०२
गाथासप्तशती
करनेपर संतापहर, क्लागृहतल्य अर्थात् पोडशकलात्मक मेरा प्रिय गगनोगत
चन्द्रकी भाँति मार्थित होकर भी दुष्प्राप्य है ॥ २ ॥
जे पीलममरभरग्गगोछा आसि जइअडुच्छरे ।
कालेण वचुला पिअअवस्स ते थण्णुआ जाभा ॥२२॥
[ये भीलभ्रमरभरमग्मगुच्छका आसनदीतटोरसगे।
कालेन वक्षुला. प्रियवयस्य ते स्थाणवो जाता ॥
।]
हे प्रियवयस्य, नदी के किनारे शो बञ्जल अर्थात् वेत लतासमूह
नीलभ्रमरके
भारसे टूटे पड़ते थे, वे काल के प्रभावसे शाखाहीन वृक्ष के समान प्रतीत हो
रहे हैं ॥ २२ ॥
खणभङ्गुरेण पेम्मेण माउआ दुम्मिअम्ह एत्ताहे ।
सिविणअणिदिलम्भेण व दिट्ठपण?ण लोअस्मि ॥ २३ ॥
[क्षणमगुरेण प्रेरणा मातृवस दूना. स्म इदानीम् ।
स्वामनिधिलम्भेनेव हरमनप्टेन लोके ॥]
अरी मौसी, स्वशमें प्राप्त इनष्ट निधिकी भांति पगभगुरप्रेममे मैं भय
संसारमें भरयन्त दुस भोग रही हूँ ॥ २३ ॥
चावो सहावसरलं विच्छिवइ सरंगुणम्मि वि पडन्तं ।
वङ्कस्स उजुअस्स अ संवन्धो किं चिरं होई ॥ २४ ॥
[चाप. स्वभावसरल वितिपति शरं गुणेऽपि पतन्तम् ।
वस्य ऋजुस्य प संबन्धः किं चिर भवति ।
धमुपकी दोरीके उपर संस्थापित स्वमा सरल चाणको दूर फेंको, यस
एवं पवक्र इन दोनों का सम्बन्ध क्या कभी चिरस्थायी हो सकता है।। २४ ॥
पढम वामणविहिणा पच्छा हु फओ विअम्भमाणेण ।
थणजुअलेण इमीए महुमहणेण व्य बलियन्यो ।॥२५॥
[प्रथमं वामन विधिना पवारवलु कृतो विजृम्भमागेन ।
स्तन युगटेनेतस्या मधुमपनेनेच बलिइन्धः ]
रमणीके ये दोनों स्तन मधुसूदन विष्णुकी भांति पहले वामनरूप थे,
वादमें सपूर्ण विकसित होकर दलिबन्ध (यधर्मयन्धन एवं विष्णुलिए
सहिदैस्यका बन्धन ) करने में समर्थ हुए हैं ॥ २५ ॥
मालइकुसुमाई फुलुञ्चिकण मा जाणि णिमुओ सिसिरो।
फाअव्या अनवि णिग्गुणाण दुन्दाणं वि समिझी ॥ २६ ॥

पञ्चमतक [पांगले मतपयोधरे यौवन इय पतिकान्ते । प्रधर्मकाजकुसुमं एयते पलितमिव धापया n] उन्नतपयोधर (सन) युक्त यौवनकी नाई उधमपयोधर (मेघ) विशिष्ट वर्षाकी रातके घीत जानेपर, धरणीके पके हुए पालकी भाँति एक काश- कुसुम पहले दिखायी पड़ा ॥ ३ ॥ फरथं गर्भ रविम्यं कत्थ पणवाओं चन्दताराओ। गयो घलाअपति फालो होरं घ फोर ।। ३५ ॥ [पुत्र गत रविविन्यं कुत्र प्रणाश्चन्दतारका । गनने घसाकापक्ति कालो होरामिवाति ॥] दिनमें सूर्ययिम्य कहाँ सो गया? रानि चन्द्र और तारे कहा माग गए, क्योतिर्विदोको महगणना रेखाधिद की भाँति वर्षाकालीन भाकाशको मलकापंक्ति मङ्कित कर रही है ॥ ३५॥ अविरलपडन्तणयजलधारारज्जुघहिपअत्तेण । अपहुत्तो उक्सेत्तुं रसद १ मेदो महि उमद ।। ३६ ॥ [ भविरलपतलवमलाजुटिया प्रयत्नेन । समभयानुरसेप्तुं रसतीय मेघो महीं पश्यत ॥] देखो, अविरल रखलित नवजधारारूप मे भायम महीको ऊपर न खींच सकनेके कारण, मेय मानो शान कर रहा है ।। ३६ ॥ ओ हि मोहिदिअहं नहा पडियजिजण दहमस्स। अत्येस्काउल वीसम्भधाइ कि तह समारद्धं ॥ ३७॥ [हे हरप भाधिदिवस सदा प्रतिपय दपितस्य । समादाकुल विसामघातिन किंवा समारम्धम् ॥] भरे हृदय, उस समय प्रियके प्रवास-अवधिको स्वीकार कर भस्माद आरल हो विधासपातीकी भाँति तुमने क्या करना प्रारम्भ किया है 1.३॥ जो विण आणई तस्स वि कहे भग्गाई तेण बलआहे। अइउन्हुआ पराई अह य विओसे हसाए ॥ ३८॥ [ योऽपि न जानाति तस्यापि कथयति भमान न बछयानि । भतिऋजुका पराश भयका प्रियस्तस्या हमामा ] जो नहीं जानते, उनसे कहती है. "मेरा वलय इसके द्वारा सोपा गया

१०४
गाथासप्तशती
।
[अन्यः कोऽपि स्त्रभानो मन्मथशिखिनो हटा हताशस्य ।
निर्वाति नीरमानां हृदये सरसाना हरिति प्रज्वलति ॥ ]
क्षरे, हताश (ध) मदनाग्निका स्वभाव साधारण भनिसे विलक्षण
है । निरस हृदयमें यह युझजाती है, किन्तु सास हृदयमें सुरत धधक
उठती है ॥३०॥
तह तस्स माणपरिवहिनस्स चिरपरणअवद्धमूलस्स।
मामि पडन्तम्स सुओ सद्दो विण पेम्मरुपखस्स ॥३१॥
[लया सस्प मामपरिवर्धियतस्य चिरमण्यमूलस्य ।
मातुलानि पततः धुतः शब्दोऽपि न प्रेमवृक्षस्य ।
है मामी, नो प्रेमतरु इसने मान-सम्मानसे बड़ा हुआ था एवं जिसकी
जद घिरभणयमें भाषद थी, उसके पतनके समय कोई आवाज ही नहीं
सुनायी पड़ी ॥३॥
पाअपडियो ण गणिओ पिशंभणन्तो वि अप्पियं मणिओ।
चच्चन्ती विण रद्धो भण फस्स कए को माणो ॥३२॥
[पादपतितो न गणितः प्रियं मणश्नप्यप्रिय मणितः।
वजनपि न रद्धो भण पस्य कृते कृनो मानः ॥]
नायकके पैरपर गिरने पर भी तुमने उसे समझा नहीं, उR द्वारा मीटी
घासे हो जानेपर भी तुमने तीखी बातें सुनायीं, उसके चले जाने पर भी
सुमने रोका नहीं । यतामो तो, किसके लिए मानकराही हो ? ॥३२॥
पुसइ खणं धुयह खणं पप्फोड तक्खणं अआणन्ती ।
मुद्धवहथणवढे दिण्यां दहपण गहरय॥३३॥
[मोञ्छति पणं चालयति वर्ण परफोटयति सममानती।
मुग्धवधः स्तनपदे दा दयितेम नसरपरम ॥]
समझ न पकने के कारण, स्तनपृष्टपा भियतमप्रदत्त नराधिरको मुग्ध-
वधू एक पण पोइ रही है, एकक्षण धोरही है एवं उसी रुण यनादि सारा सारे
दाल रही है ॥ ३ ॥
चासरत्ते उण्णअपमोहरे जोरणे व पोलीणे ।
पढमेक्ककासकुसुमं दीसा पलिमंच धरणीए॥३४॥

पञ्चमशतक १०७ [कुरुनाथ इव पथिको दूयते माधवस्य मिलिन । भीमेन यथेच्या दक्षिणवातेन स्पृश्यमान. ॥ ] माधव से मिलकर यहच्याकमसे भीमसेनने दक्षिण चरणद्वारा स्पशंकर दुर्योधनको जिस प्रकार दुखित किया था, माधव (वसन्त) से मिलकर भयानक दक्षिणयुवा भी यहच्छाकमसे स्पर्शकर पथिकको इसी प्रकार दुपित कर रही है ॥४३॥ जायण कोसविकासं पायद ईसीस मालईफलिआ। मनरन्दपाणलोहिल भमर तावच्चिभ मलेसि ॥४॥ [यावर कोपविकासं प्राप्नोतीयम्मालतीकलिया। मकरन्दपानसोमयुक्त अमर तावदेव मईयसि ॥] जयतक मालतीकलिका कोप कुन पद नहीं जाता, तबतक हे रसपानलोलुप भारे, तुम मदनमारसे ही संतोप प्राप्तकर रहे हो ॥ १४ ॥ अकअण्णुभ तुज्झ कर पाउसराईसुअंमए सुण्णं। उपेक्खामि अलजिर अज चि तं गामचिक्खिल्लं ।। ४५ ॥ [भकृतज्ञ तव कृते प्रावृद्धादिषु यो मया सुण्णः । उत्पश्याग्यलमाशील अद्यापि तं प्रामपकम् ॥] ओ अकृतज्ञ, यासातकी रातमें भी तेरे लिए मैंने जिस मामपाको सर्व किया है, भरे निलंज, उसी पङ्कको मैं बाज भी देख रही हूँ॥ ४५ ॥ रेहइगलन्नकेसम्पलन्तकुण्डलललन्तहारलआ । अद्धप्पइआ विज्ञाहरि व्य पुरुसाइरी वाला ॥ ४६॥ [रामते गलरशस्खलरकुण्डललधारलता। अर्धापतिता विद्याभरोव पुरुषायिता बाला।] भदंपतिता विद्याधरीकी भाँति इस घालाके पुरुषोचित रमणमें निरत हानेले धुलते हुए को, पिरभ हुए कुण्डल एव झुलते हुए हारलला शोभत हो जइ भमसि भमसु एमे कण्ह सोहागगन्निरी गोडे । महिलाणं दासगुणे विआरक्खमो अजविण होसि ॥४७॥ [ यदि अमसि भ्रम एवमेव कृष्ण मौमाग्यगवितो गोहै। महिलाना दोषगुणौ विचारतमोग्रापि न मसि ।]

गाथासप्तशती है।" हो सकता है कि वह शोचनीया रमणी ही परयन्त सालस्वभावशाली हो, अथवा उस हमाश रमणीका प्रिय ही साल स्वभाववाला है। ३८॥ सामाइ गरुनजोधणपिसेलभरिए कबोलमूलम्मि। पिजइ अहोमुहेण व कण्णवसेण लावणं ॥ ३९ ॥ [श्यामाया गुरुकयौवनविशेष कपोलमूले । पोयतेऽधोमुखेनेव कवितसेन लावण्यम् ॥] श्यामा नायिकाके विशाल एवं विशेष यौवनसे मामलित कपोलके मूलपर अधोमुख होकर कर्णाभरण मानो लावण्यपान कर रहा है ॥ ३९ ॥ सेउल्लिअसम्बद्गी गोत्तग्गहणेण तस्स सुहास । दूई पट्टाएन्सी तस्सेअ घरगणं पत्ता ॥ ४० ॥ [स्वेदा कृतसाली गोत्रमाणेन तस्य सुभगाय । दूती प्रस्थापयन्ती (सदिशन्ती वा) तस्यैव गृहा मासा ] सस सुभगका नाम ही ऐनेपर अपने सारे भोंको स्वेदाई कर दूसोको नायकके पास भेजनेका प्रबन्ध करते करते वह स्वय ही उसके गृहमालपारी उपस्थित हुई ॥ ४॥ जम्मन्तरे विचलणं जीएण सुमअण तुज्झ अच्चिरस । जातं पि तेण वाणेण विज्झसे जेण हविज्झा ॥ ४१ ।। [जन्मातरेऽपि घरणी जीवेन बल नदन सार्धयिष्यामि । यदि तमपि न वाणेन विष्यसि येनाद विधा] अरे कामदेव, जिप्त याद्वारा हम मुझे विद्र कर रहे हो, उसी के द्वारा यदि उसे भी विद करो तो अन्मान्तरमे भी में सुम्हारे चरणीको पूजा करूंगा। णिअवस्यारोपिअदेदभारणिउणं रसंलिहलेण । विभसाविऊण पिजड मालइकलिआ महुअरेण ॥४२॥ [निजपचारोपिरादेहभानिपुण रस लामानेन । विकास्य पीयते मारती कलिका मधुकरेग ॥] अपने दोनों पद्धोंपर देहका भार टाल भरपन्त निपुणमायसे रमारदादन पूर्णकार मालतीकी कलिकाको विकसित कर पाया है ॥ ४२ ॥ कुरणादा धिटा पहिओ मिजद माहयम्स मिलिपण । भीमेण हिडिआप दाहिणयापण छिप्पन्तो ।।४३॥

पञ्चमशतक
हृदयले जो बचन मिलते हैं, घे अन्य पके होते हैं। पासमे हर
। जाभो। इन सप कपर वचनों में क्या प्रपोशम 1241।
कह सा सोहग्गगुणं मए समं यह णिरियण तुमम्मि ।
जीम रिजाइ गोतं हरिऊण अ दिजए मन्डर ॥ ५२ ।।
[ म सा मौभाग्यगुण मपा मम यहति मिग यि ।
यस्या हियते नाम हावा १ दीयते मनम् ॥
अरे निर्दय, मेरी सुलनामें यह रमणी तुम्हारे मधमें अधिक मीमाय
गुण पहन करती है। कारण, समका नाम (गोत्र) हारे द्वारा भुराया
जाकर मेरे पति प्रयुफ किया जा रहा है । ५२ ॥
सहि साहसु सम्भावेण पुच्छिमो कि असेसमहिलाणं ।
यहन्ति करठिा दिवस पला दइए पउम्मि ॥ ५३॥
सिसि कथम सद्भावेन पृछाम किमशेषमहिलानाम् ।
घर्धन्ते कास्थिता एव पलया पिते प्रोपिते ॥]
सती, पोलो तो-सद्भावना सहित पूछती हूँ--क्या प्रियके प्रवास जानेपर
सभी महिलाओं के दाम पलय धद जाते है अर्थात् दीले पद जाते हैं ॥५॥
ममइ पलिता जूर उपियविउं से कर पसारे ।
फरिणो पर्पसुत्तस्स हणिलाइआ करिणी॥५४॥
[भ्रमति परितः खिद्यते उत्तु सस्य का प्रसारयति ।
कारण पनिमनस्य स्नेहनिगडिता करिणी ]
परमें गिरी हुई हाथोकी स्नेहहलासे जड़ी हुई, हयिनी, हाथी के चारों
और घूम रही है, से अनुभव कर रही है पर उसे उटाने के लिए अपना
सूद फैला रही है ॥ ५४॥
रहकेलिहिअणिसणकरकिसलअमरुद्धणअणखुअलस्स ।
रुदस्स नइअणअणं पचापरिउम्यि अह
[रतिलिहतनियसनककिसलयरुदनयनयुगलस्य ।
रुदस्य सृतीयनयनं पार्वतीपरिघुम्मितं जपति]
जिप्स रुदने रतिरलिक समय पानीका बखापहर कर लिया या एवं
जिसके
नयनयुगल करक्रिसस्य द्वारा मुंद दिये गए थे उसी रुका पार्वती
सुम्पित तृतीपने विजपी हो ॥ ५५ ॥

गाथासप्तशती है कृष्ण, तौमायगर्वसे गर्वित होकर यदि गोष्ट में भ्रमण करना हो तो अमण करो, (किन्तु इतना करनेपर भी) म यदि महिलाओं के दोष-गुण देखने में समर्थ हो सको भर्याद नहीं हो सकोगे ॥ १७ ॥ संहासमए जलपूरिमजलि विहडिएक्कयाम। गोरीम कोलपाणुजों व पमहादियणमह ॥ १८॥ [सध्यासमये जलपरिताञ्जलिं विघटित कामकरम् । गौ कोपपानोपातमिव प्रमथाधिपं नमत ॥] सनपाके समय गौरीमो मसादित करने के लिए जलपूरित अलि पाँधकर बाय करको अलगकर शपथ के लिए कोपपानमें उधत प्रयमधिपति (शिव) को नमस्कार करणे॥१० गामणिणी सव्वासु वि पिआसु अणुमरणगहिअवेलासु । मम्मच्छेपसु वि वल्लद्दाइ उवरी वलइ दिही ॥ ४२ ॥ [प्रामण्या सास्वपि प्रियास्वनुमरण गृहीतषेपासु । मर्मच्छेदेवपि वहभाया उपरि बलते दिः॥] मृत्यु के समय मामनायककी सारी मियाएँ अनुमाणवेषधारी होकर भी, उस ममच्छेदविधायक दशामें भी उसकी दृष्टि भरयन्त बसमा प्रिपाके ऊपर जाती है। १९॥ मामिसरसक्खयण वि अस्थि विसेसो पम्पिअव्याणं । हमइआण अण्णो अपणो अवरोहमइआणं ॥५०॥ [मातुलानि सासाराणामपस्ति विशेषः मनस्पितम्यानाम् । स्नेहमयानाम योन्य सपोधमयानाम् ॥] हे मामी, यास्यावलीमें ममान भयका प्रयोग होनेपर भी वैशिष्टय जित होता है. भरणे, स्नेहमय बचना वैशिष्टय एक प्रकारका होता है और अनुरोधा वदत वधनका शिष्टय सो प्रकारका होना है ॥५०॥ বিছিন্নী বলি লা মা বাসায়। ओसरसु किं इमेहिं अदरुत्तरमेत भणियहि ॥ ५ ॥ [हृदयेन्यः प्रसारित यान्यन्यानि सानि पचनादि। अपसर मिभिरघोसामाग्रमणितः । ]

पञ्चम शतक
भजट का र
देखो, गोष्ठमें दुए वृषभ के सौगमें अपने पलकको रगड़कर गाय मौमाग्य
कर रही है॥१०॥
उअ संभमविक्सित्तं रमिअन्चलेहलाएँ असईए।
पवन कुडड़े धर्म व दिण्णं अविणास्स ॥ ६ ॥
[पश्य सनमविक्षिप्त पन्तस्यापापस्या अमस्या ।
नरक कुम्ने ध्वजामिय दत्तमविनयस्य ॥]
रमणलम्पटा असतीद्वारा कुझमें, भविनय के वनपट रूपमें प्रदत्त संभ्रम-
विदित कौस्तुभवस्त्रको देखो ॥ ६ ॥
हत्थफसेण जरगवी वि पण्डहर दोह अगुणेण ।
अचलोअणपण्हुइरि पुच पुण्णेहि पाविहिसि ॥ ६ ॥
[हस्तस्पर्शन जरद्स्यपि प्रनीति दोहदगुणेन ।
भवलोकनप्रस्नवनशीला पुयक पुण्य प्राप्स्यसि ॥]
भरे पेटे, दोहदके (दूध देनेवालेके ) गुणवश हमस्पर्शमानसे अकर्मण्य
मा भी दुग्धपात फाती है, किन्तु देखने मानसे प्रस्वगशीला (अनुक्ता
रमणी) को तुम अपने मुकृतॊके बलसे ही पा सकोगे ।। ६२॥
मसिणं चङ्कम्मन्ती पर पए कुणइ कीस मुहमस् ।
पूर्ण से मेहलिमा जहणगम छियइ णहन्ति ।। ६३ ।।
[ मतणं चकम्यमाणा पदे पदे करोति किमिति मुखभाम् ।
नून तस्या मेपलिका जघनमतां स्पृशति नखपतिम् ॥]
समसल स्थानपर चलने चलने यह रमणी मुँह क्यों बना रही है ?
निश्चय ही उसकी मेखला (कधनो) जघनगत नसरतपछिको छू (गर)
रही है (उसी की व्यथा मे मुंह बना रही है)।। ६३ ।।
संवाहणखुद्दरसतोसिएण देन्तेण तुहमरे लक्वं
चलोण विस्कमाइत्तचरिअणुसिक्सि तिस्सा ॥ ४॥
[सवाहनसुम्वरसनापितेन ददता तय करे लाहाम् ।
धरणेन विक्रमादित्यधरितममुशिक्षित सस्या ॥]
उस युवी के घरणको तुम्हारे सवाहनकायद्वारा सुम्पस पानेसे सुप
होकर तुम्हारे हाथमें 'टा विद प्रदान करनेसे माटम पड़ता है कि इसने
विक्रमादित्यके चरितका अनुसरण करना सीखा है ॥ ६४ ॥

गाथासप्तशती धायद पुरयो पासेसु ममइ दिट्टीपहम्मि संग्रह। णवलइरस्स तुह हलियाउत्तदे पहरतु धराई। ५६ ॥ [धावति पुरत पारवंयोनमति दृष्टिपथप्ततिष्ठते । नवलतिकाकरस्य तव हलिपुत्र हे महात्व वाकीम् ॥J हे हरिपुत्र, तुम्हारे हाथ में नवलतिका ले लेने के कारण यह रमणी तुम्हारे निकर दौड़ रही है, तुम्हारे पास घूम रही है एव तुम्हारे दृष्टिपथमें ही सस्थित रहनही है । तुम उस शोचनीयापर लनिका द्वारा प्रहार करो ॥ ५ ॥ कारिममाणन्दवडं भामिन रहन सहिआहि । पेच्छा कुमरिजारो हासुम्मिस्सेहिं अच्छीहिं ।। ५७ ॥ [कृत्रिममानन्दपट भाग्यमाण या सखीभि । प्रेशते कुमारीजारो हासोन्मिश्राम्यामपिम्याम " ! कुमारीका जार सलियों द्वारा घुमाये जाते हुए वधूके कृत्रिम भानन्दपर (मपुष्पवतीका वख) को हँसीयुफ ने ना देख रहा है ॥ ५ ॥ सणि सणि ललिअगुलीश मअपावडलामणमिसेण । यह घबलवा व यणिमहरे तरुणी ॥५८॥ [शनकै शनकैर्मलिताङ्गुल्या मदनपटलापनमियेग। याति धक्लबगपट्टमिव प्रणिताधरे सती ॥] प्रणयुक्त अधरपर अंगुलीद्वारा शनै शने मन्दिर (मोम) हेपन करने के बहाने तरणी मानो उमपर श्वेत पट्टी बाँधे दे रही है ॥ ५८ ॥ रइविरमलजियो थप्पत्तणि सणाओं सहस व्य । दन्ति पियमालिङ्गणेण जहणं पुलवहओ ॥ ५९॥ [रतिविरामलजिता अप्राप्तनिवपना सहयैव । आप्पादयन्ति प्रियतमालिङ्कनेन सधन कुवा] रमणके विरामके समय जिला कुलपधुएँ महसा पान पाकर प्रियतम को मालिक्षित हो कर अपने अाँको ढकता है ॥ ५९ ॥ पाअडिश सोग्ग तम्याए उमद गोट्टमम्मि । दुहवसहस्स सिट्टे अक्खिउ पण्डभन्तीय ॥ ६ ॥ [टिस सौभाग्य गवा पश्यत गोठमाणे । दुष्रमय के अधिपुट करदारया]

पञ्चम शतक
देखो, गोटमें दुष्ट वृषभ सींगमें अपने पलकको रगड़कर गाय सौभाग्य
प्रकट कर रही है ॥ ६॥
उअ संभमविक्सितं रमिभयअलेहलाएँ असईए ।
णवग्न फुडत धन ब दिणं अविणअस्त ॥ १ ॥
[ पश्य मभ्रमविक्षिप्तं तस्यकलापटया अमस्या ।
नवम कुम्जे स्वामिय इत्तमरिनयस्य ॥]
रमणलम्पटा असतीद्वारा कुझमें, भविनयके वनपट रूपमै प्रदत्त संभ्रम-
विक्षिप्त कौस्तुमवस्त्र को देखो।। १ ।।
इत्यफसेण जरगवी वि पण्हहइ दोह अगुणेण ।
अवलोअणपण्हुइरि पुत्तम पुण्णेहि पाविहिलि ॥ ६ ॥
[इस्तस्पर्शन जरद्स्यपि प्रस्नोति दोहदगुणेन ।
अवलोकममस्नवनशीला पुत्रक पुण्य प्राप्स्यसि ॥]
अरे बेटे, दोहदके (ध देनेवालेके) गुणवश हस्तस्पर्शमानसे अकर्मण्य
पदा मी दुग्धपात करती है, किन्तु देवने मानसे मरणशीला (अनुरका
रमणी) को तुम अपने मुखौके थलसे ही पा सकोगे ॥१२॥
मसिणं चसम्मन्ती पए पर पुणइ कीस मुहमहू ।
पूर्ण मेहलिया जणग छियद णहचन्ति ।। ६३ ॥
मएणं घड्कम्यमाणा पदे पर करोति किमिति मुखमङ्गम् ।
नून तस्या मेबलिका जघनगत स्पृशति नत्रपतिम् ।।]
समतल स्थानपर चलते-घरने यह रमणी मुंह क्यों बना रही है?
निश्चय ही उपकी मेखला (कर्धमी) अघनात नसतपतिको (रगद
रही है (उपी की व्यथा से मुंह बना रही है) ॥ १३ ॥
संवादणसहरसतोसिपण देन्तेण तुहकरे लक्खं ।
चलणेण यिस्कमाइसचरिश भणुसिस्पितिस्सा ।। ६४ ॥
[संवाहनसुपरसती पितेन दता तव को लाचाम् ।
घरगेज विक्रमादित्यचरितमनुशिक्षित तस्या ॥]
उम पुषसी के चरणको पम्हारे साहनकायद्वारा सुग्घरस पानेसे पुरा
होकर सुम्हारे हाथ में लाक्षा' सिद्ध प्रदान करनेसे मालूम पड़ता है कि इसने
विक्रमादित्य के परितका अनुपाण करना सीमा है ॥ ६ ॥

११२ गाथासप्तशती पापडणाण मुद्धे रहसपलामोडिचुम्धिभव्याण । दसणमेत्तपसपणे चुकासि सहाण बहुआणं ॥ ३५ ॥ [पादपतनाना मुग्धे रममबलात्कारधुम्दितण्यानाम् । दर्शनमात्रप्रसने भ्रासि सुखाना बहुकानाम् ॥ हे मुग्थे, तुम प्रियके दर्शन मासे प्रसन्न हो जाती हो, किन्त, पादपतन, वेग एवं बलात्कारके साथ चुम्बनादि जनित बहु प्रकार के सुखसे प्रष्ट पा उससे घक्षित हो जाती हो ॥६५॥ दे सुअणु पसिभ एहि पुणो वि सुलहाई सिध्याई । एसा ममच्छि मअलन्छणुजला गलइ छणराई॥६६॥ [हे सुतनु प्रसीदेदानीं पुनरपि सुलभानि रोपिनम्यानि । एपा मृगाति मृगला छनोजवला गलति भणरात्रि ॥] है सुतन, अब प्रसन्न होओ, किसी दूपरे समय रोप भाव फिर सुलभ होगा। हे मुगलोचने, चन्द्रोवला उत्सव रजनी चीतप्ती जा रही है ॥ ६॥ आवण्णाई कुलाई दो घिन जाणन्ति उपणाई णेउं । गोरी हिममदइभी अहया सालाहणणरिन्दो ॥ ६७ ।। [आपलानि कुलानि दावेव जानीत उमति नेतुम । गौहिदपदयितोऽथवा शालिवाहननरेन्दः ।।] आपधुक्त कुलकी (पक्षान्तामें भापर्ण अर्थात् अपर्णा पर्वतीय कुलकी) स्त्रति दो ही व्यक्ति कर सकते हैं, गौरीके हृदयवक्षम या मालिवाहन शके नरपति॥६॥ णिकण्ड दुरारोह पुत्तामा पालि समारहस्सु। आरुणिवडिमा के इमीण फआ हआसाए ॥ ६८॥ 1 मिष्काण्डदुरारोह पुत्रक मा पालि समारोह । भारुदनिपतिता के भमया न कृता इताशया ॥] है पुत्रक, शाखाविहीन आरोहण में कएसाथ इस पालि (पाठ) पुष्पवृष१ मत पदमा। इस हताशा पालिने किसे पदाकर गिरा नहीं दिपा है।॥८॥ गामणिघरम्मि अत्ता एक्या विम पाडता रहगामे। घदुपाडलं च सीसं दिसरस्स ण सुन्दर पक्ष । १९॥

पञ्चमशतक [प्रामणिगृहे वधु एकैव पाटल। इह ग्राम । बहुपाटल च शीर्ष देवरस्य न सुन्दरमेतत् ॥ ] हे श्वश्व, इस ग्राममें केवल ग्राममोके यहाँ एक पाटलावृक्ष है। देशका मस्तक तो अनेक पाटोद्वारा युक्त दिसायी देता है, यह तो भन्दा काम नहीं है । ६९॥ अण्णाण वि होन्ति मुहे पम्हलधरलाई दोहफसगाई। पभणाई सुन्द्रीणं तह वि हु दटुंण जापान्ति ॥ ७० ॥ [अभ्यासानि भवन्ति मुरो परमलपवलागि दीर्घकृष्णानि । भयनानि सुन्दरीण तथापि सलु द्रष्टुं न जानन्ति ॥ ] अन्यान्य भनेक सुन्दरियों के मुसमें पदमल (पंख जैसे) धवल एवं दीर्घकृष्ण नपनयुगल वर्तमान रहते है, तथापि वे सप (भूविलामादि के साथ) देखना नहीं जानते ३७.॥ हंसेहि च तुह रणजलअसमअमअचलिअविहलवखेहि। परिसेसिअपोम्मासेहि माणसं गम्मद रिऊहिं ॥ ७१॥ { ছবিৰ বৰ গলমহালৰিৱই। परिशेषितपमाहानसं गम्यते रिघुमिः ॥] है राजन्, हमोंकी मोति नम्हारे शनु ( सेवाद्वारा) तुम्हारे मनका अनु- गमन अर्थात् छन्दानुवर्तन करते हैं। कारण, उनके स्वपक्षीयगण तुम्हारे रणरूप जलद समयको उपस्थित देखकर विह्वलचित्तसे भाग रहे हैं एवं उनकी श्रीप्राप्ति की भाशा शेष हो रही है, हंसगण भी जलद-समय उपस्थित होनेपर विह्वल होकर भागना आरम्भ करते हैं एवं पाप्राप्तिको भाशा शेष है सोचकर मान- सरोवरकी ओर दौड़ पड़ते हैं ॥1॥ दुग्गभघरम्मि धरिणी रखिन्ती आउलत्तणं पइणो। पुच्छिदोहलसद्धा पुणो वि उअ चित्र कहे ॥ ७२ ॥ [ दुर्गतगृहे गृहिणी रक्षन्ती भाटावं पत्युः । पृष्टदोनदा पुनरप्युदकमेव कथयति ॥ ] किम दोहद (गर्भवतीकी नाना प्रकारको साध) की उन्हें इच्छा है, पतिमे ऐमा पूछी जानेपर भी दुर्गत घरकी पत्नी पतिकी ब्याकुलता दूर करने के लिए पारबार पानी ही मांग रही है ।। २१ ८गाश

गाथासप्तशती
आअम्बलोअणाणं भोलंसुअपाअडोरुजहणाणं ।
अवरहमजिरीणं कर ण कामो वहा वावं ॥७३॥
[आवानलोपनानामा शुकप्रकटोरुजनानाम् ।
अपराहमजनशीलानां कृते न कामो वहति पापम् ॥]
गोले कपड़े पहनने के कारण जिनके उह एवं अपनस्थल मकट है, जिनके
मेन ताम्रवर्ण विशिष्ट भारत है अपराह्न समय जलमें मजन (स्नान )
करनेवाली उन सब रमगियों के लिए कामदेव धनुष नहीं होते ॥ ७३ ।।
के उव्वरिआ के इह ण खण्डिा के ण लुत्तगुरुविह्या ।
जहाई वेसिणिओ गणणारहा उव वहन्ति ॥ ७४॥
[ के उर्वरिताः के इन खण्डिता के न लुप्तगुरुविभवाः ।
नखराणि वेश्या गणनारेमा इव वहन्ति ।
कितने पुरष भायन्त भाकृष्ट नहीं हुए हैं, कितने पुरुष खण्डित (मनभम)
नहीं हुए हैं और कितने पुरुष विपुलवैभव नहीं खो चुके हैं, वेश्याएँ इस विषय
की गणना रेखाके रूपमें कामुकप्रदत्त नखचित धारण करती हैं ॥७१ ॥
विरहेण मन्दरेण व हिमभं दुद्धोमहिं व महिऊग ।
उन्मूलिआईं अन्यो अम्हं रअपाई व सुदाई । ७५ ॥
[विहेण मन्दरेणेव हृदयं दुग्धोदधिमिय मपित्वा ।
उम्मूलिप्सानि कष्टमस्माकं एनानाय सुखानि ॥]
मन्दार पर्वत जियप्रकार तीरसागरको मथकर रत्नों को निकालवा है, अहो,
तुम्हारा विरह भी उसी प्रकार हृदयको मपकर इसके सारे सुखोंको समूल नष्ट
कर देता है॥५॥
उज्जुअरए प तूसह यमम्मिधि आर्म विभप्पे ।
पत्य अहवाएँ मए पिए पिमं कह पु कामव्यं ॥७६ ॥
[ऋकरते न सुध्यति पयागमं विकरणपति ।
भग्रामस्यया मया प्रिये मियं कय कयम ॥]
पति हावभावशून्य रतिसे पष्ट नहीं होता, पारतिसे मी (कहाँ सौगा)
सोधविधारकर सन्देह करता है। मैं जब अशिधा , ता प्रिय प्रति प्रिय.
धारण विस प्रकार कहेंगी?om
यविविलाससरसिए सुरए महिला को उयमानी।
सिकपर असिपियमा वि सम्यो क्षणुयन्येण ॥१७॥

११५ [बहुविधविलाससायिक सुर महिलानां क उपाध्याय । शिक्ष्यते अशिषिताम्मपि सर्व स्नेहानुषन्धेन । ] बहुविध विरासासयुक्त सुस्तके सम्म धमें महिलाओंका (अन्य ) शिक्षक कौन है। नेहानुषन्धन ही सबको अशिक्षित परतुको शिक्षा दे देना है l घण्णावसिप रिअत्यसि सच्चं विभ सो तुप ण संभविभो । ण हु होन्ति तम्मि दिटे सुत्थावत्याई अझाई ॥ ७८ ॥ [वर्णवशित विकरमसे पत्यमेव स स्वया म सम्मारित । न खलु भवन्ति सस्मिनष्ट स्वस्थावस्थान्यानि ॥] बरी नायक गुग वर्णनद्वारा पीकृत हृदये, तुम मर्थ की भारमरलाया प्रकट करती हो। किन्तु यस्तुनः तुमने दृष्टिद्वारा सम्मावित चा अनुगृहीत नहीं दिया है। कारण, उसके एक बार दिवायी पद जाने पर मग स्वरय नहीं रह सकते।।७८॥ आसपणचिाहदिणे अहिणत्वहुसङ्गमरसुगमणरस । पढमपरिणीय सुरों परस्स हिअए ण संडाइ ॥ ७९ ॥ [ भासविवाहदिने अभिनववधूमनमोरमुकमनस । प्रयमविण्या सुरत परस्य हदपेन सनिष्ठते ॥] भामा विवाह के दिन नववधूके सङ्गम मासिकरिए उसुमित्त घरके हृदय में प्रथम गृहिणीकी सुस्तकथा स्थान प्राप्त नहीं करती ॥ ७९ ॥ जह लोकणिन्दिनं जइ अमङ्गलं जइ विमुझमजा। पुप्फवदसणं तह वि देइ हिअअस्स णियाणं ॥ ८॥ [यदि लोनिदित यद्यमद्गल यदि विमुत्तमर्यादम् । पुष्पवतीदर्शन तयापि ददाति हृदयस्य निर्वाणम् ॥] पुष्श्वती रमीका दर्शन यदि लोकनिन्दित भी हो, यदि अमालजनक भी हो एव यदि भादालानदोषसे दूषित भी हो, तब भी वह हृदयमें मुस सत्पन्न घरता है।।2।। जइ ण छिरसि पुप्फवई पुरओता कीस वारिओ वासि । छित्तोसि चुतचुलन्तेहि धाविउण अॅद हत्येहि ॥ ८ ॥ [ यदि न रशसि पुष्पवर्ती पुरतरतरिकमिति वारितस्तियसि । स्पृणेऽसि चुग्नुमापमानाविश्वात्मा हस् ॥]

गाथासप्तशती
यदि पुष्पवतीको छूभोगे नहीं सो, घर्जित होने पर भी सामने क्यों खड़े
हो ? मेरे चुलचुलायमान (चनल) हाधने मागकर तुम्हे छू लिया ॥ ८॥
उजागरअकसाइअगुरुअच्छी मोहमण्डणविलक्सा।
लजइ लजालुइणी सा सुहा सहीहि विवराई ॥ ८२॥
[ उजागरककथायितगुरुकापी मोघमण्डनविला ।
हजते बजाशीला सा सुभग सस्त्रीभ्योऽपि वाकी 1]
है सुभग, मेरी इस हतभागिनी एवं लजाशीलाका नयनयुगल
अमिजागरण के कारण भारत एवं माराकारत हुआ है । निरर्थक अलगसे
यह विमूदा होकर सखियोंसे भी लजित हो रही है ।। ८२ ॥
पवि तह अइ गरुपण वि तम्मा हिअए भरेण गम्भस्स।
अह विपरीअणिहुअपां पिअम्मि सोहा अपावन्ती ॥ ८३ ॥
[ नापि तथातिगुरुरेणापि ताम्यति हृदये भरेण गर्भस्य ।
यथा विपरीतनिधुवनं प्रिये स्नुषा अमाप्नुवती ।)
गर्भिणी
पुत्रवधू
प्रियतमके साथ विपरीत विहारभोग नहीं कर सकेगी।
मह सोचकर मन ही मन जितनी दुखी हो रही है, उतनी दुखी तो गर्भ
गम्भीर भारसे भी नहीं हो रही है ।। ८३ ।।
अगणिअजणायचाअं अवहत्थिमगुरुमणं पराईप ।
तुद गलिअदसणाए तीए बलिउण चिरं रुपणं । ८४ ॥
[भाणितजनापवादमपहस्तितगुरुजनं वराश्या ।
तवगलितदर्शनया सया वलिरवा दिरं रुदितम् ॥ ]
मुम्हे देश न पाने के कारण वह धेचारी लोकापवादको चिन्ता एवं
गुरुगोंको भसामानित कर मुँह फिराकर बहुत देरसे रोदन कर रही है ॥८॥
हिम हिभए णिहिवित्तालिदिअ य तुह मुद्दे दिट्ठी।
आलिङ्गणरहिआई णवर सिजन्ति
अहाई ॥५॥
[पं हृदये निहित चिनारिसितैव तव मुखे रष्टि ।
भारिगरहितानि देवल
धीचन्नेलानि ।
सखी सहारे हृदय में अपना दम संस्थापित सती है। म्हारे गुर
उसकी शिक्षिताकी भोलि संह-शस भाटिनहित होने के कारण
उमक भासीम हो जारी है ॥ ८५ ॥

पञ्चमशतक
अह विमोअतणुई दुसहो विरहाणलो चलं जी।
अप्पाहिजउ किं सहि जाणसि तं चेच जं जुत्तं ॥ ८६ ॥
[बई वियोगतन्वी दुःसहो विहानलश्नलं जीयम् ।
अभिधीयत सखि जानासि स्वमेव यद्युतम् ॥ ]
मैं प्रियके विरहमें कृम हुई है, विरहाग्नि दुःसह प्रतीत हो रही है, जीवन
भी धवल अर्थात् गमनोन्मुख हो गया है। परी सखी, इस समय जो
उपयुक
हो, उसीका उपदेश दे ॥८६॥
तुह विरहुजागरओ सिविणे विण देह दसणसुहाई।
वादेपा जहालोअणविषोअणं से हरं तं पि॥८७॥
[तव विरहोजागरका स्वप्नेऽपि न दाति दर्शनसुखानि ।
पारपेण यदालोकन विनोदनं तस्या इतं तदपि ॥]
तुम्हारा विरह मनित जागरण स्वप्नमें भी तुम्हारे दर्शनसे वस्पन सुख
नहीं दे रहा है । जो देखने में थोड़ा-बहुत अच्छा भी लगता है वह भी तुम्हारे
भानुभोंमे भास होने के कारण मष्ट प्रतीत होता है ॥ ८॥
अण्णाराहाधियो जहतह कालेण गम्मइ पसा।
वेसतणाघराद्दे कुविधं कह तं पसाइरस ॥ ८८ ॥
[भन्मापराधकुपितो यथातया कालेन गच्छति प्रसादम् ।
द्वेप्यावापराधे कुपितं कथं नं प्रमादपियामि . )
मेरा पदि अन्य किसी प्रकार के अपराधसे वह कुपित होते तो जिम किसी
प्रकार समय पाकर उसे प्रसन्न कर लिया जाता। किन्तु मेरे पति द्वेप्य भावरूप
अपराध होने के कारण उसे किस प्रकार प्रमात काँगी ॥८॥
दीससि पिआणि जम्पसि सन्मायो सुहम पत्तिम व्वेन ।
कालेऊण हिमश्र साहसु को दावा करत ।। ८ ।।
[दृश्य प्रियाणि जल्पसि सद्भाव. सुभग एतावानेव ।
पायित्वा हृदयं कथय को दर्शयति कस्य ।।]
है मुभग, तुम्हारा इतना सद्भान है कि तुम मुझे दर्शन देते हो एवं
मुझसे प्रिय पाने काते हो, किन्तु यताभो तो, कौन किसे हृदय चीरकर दिखाये ?
उअलहिउण उत्ताणिआणणा होन्ति के पि सविसेस ।
रित्ता पामन्ति सुइरं रहघडिअव्व फापुरिसा ॥९० ॥

गाथासप्तशती [ उदकं लावा उत्तानितानना भवन्ति केऽपि सविशेषम् । रित्ता नमन्ति सुमिरहट्ट (अरघट्ट) घटिका इव कापुरुषाः ॥] कोई-कोई शुद्र पुरुष घटी यन्त्रमें स्थित घटिकाकी भाति जल पानेपर (अल्प सम्पत्ति पाकर) विशेष प्रकारसे मस्तक ऊँचा कर लेते हैं एवं रिकावस्थामें बहुत देर तक नम्र रहते हैं ॥१०॥ भागपिअसहम कत्तिव जोहाजलं हसरम्मि। चॅन्दारपणालणिज्झरणिवहपडन्न ण णिवाइ ॥ २१॥ [ भन्नप्रियसनम कियदिव ज्योत्स्नाजलं नम साति। चन्द्रकरप्रणालमिॉनिवहपतन निस्तिष्ठति ॥] . आकाशरूपी सरोवरमें प्रियसमभङ्गकारी ज्योत्स्नाजल और कितना है। चन्द्रकिरणरूप प्रणालनिरसमूह (परनाले ) से गिरकर यह तो समाप्त हो नहीं हो रहा है ।। ९॥ सुन्दरजुआणजणसङ्कले वि तुह दंसणं चिमगन्ती । रपण व भमइ दिट्ठी घराइआए समुग्विग्गा ।। ९२ ।। [सुन्दरयुवजनसलेऽपि तव दर्शनं विमागंयन्ती । अरण्य इव भ्रमति इटियराफिकायाः समुद्विग्ना ! बहुन सुन्दर युवोंसे भरे हुए स्थान में भी तुम्हारे दर्शनकी खोज करके ही इस चेपारीकी दृष्टि समुद्विग्न हो मानो भाग्य अथवा शून्यमें घूम रही है। अश्कोवणा वि सासू रामाविभागअबई सोहाए । पाअपडणोण्णमाप दोसु पि गलिपसु घलएमु ॥९३॥ [अतिकोपनापि वधू रोदिता गतपतिकया स्नुपया । पादपतनावनतया द्वयोरपि गलितपोवलययोः ॥] प्रणामार्थ पाद-पवनमें अवनसा भोषितमका पुत्रवधू, उसके हाथ में स्थित दोनी घटय ही होले हो रहे हैं। ऐसा देग्यकर भरपन्त क्रोधी स्वभावशाली सासको भी दुःखिता हटा रही है ॥ ९३ ॥ रोयन्ति व्य अरपणे दूसहरइकिरणफंस संतत्ता। अइनारहिल्लिचिरपहिं पाया गिम्हमग्याहे ॥ ९४॥ [सन्तावारण्ये दुसहरविकिरणपसंतसाः । अतिसारविहीविरसः पादपा श्रीममायावे ] पश्रमशतम् प्रीमी दुपहरी मा nिahate मा साया सोय कर कर रहे हैं। दुमदा मूर्यकिरणों के पर्शसे सम्रास हो समूह रहे हैं ॥ ९१. पढमणिलीणमधुरमाधुलोदवालि उलपकार। अहिमारफिरणणिउरभ्याम्पियं दला कमलयण ॥१५॥ [प्रधानिलीगमरमसुम्याटिकुलकारम् । সঠিমালনিছুর দুধ কম n} पहले भाये हुए मधुरमधुरोप मधुबाम गुन गुपतिनमा धन सनविरणमुकी रिमद्विारा गुम्धिन पा र दोपर पाटिलो गोत्तपरालणं सोऊण पिसभमे भजनीश गणादिगदे । पदामदिमम्स माल प्य मण्डणं उअह पडिदाइ ॥ १६ ॥ [गोपाल भुरा वियनमे भय तस्याः पादितमे। पपमहिपरप भालेष मण्डनं पश्यत प्रनिमानि । ] देखो, NTR उसपके दिल पियतम के गुर गोवारएन मुनने कारण, इस महिलाको शोभा मानो पादिप गलेम हाली हुई मालाकी मानि प्रतिभा होती है मदमदा मलयाओ भत्ता पारेद में परान्ती। अकोलपरिमलेण पि जो फतु मओ सो माध्येम ।। ९७ ।। [ मदमहापते मष्टपथातः अभयारयति मा गृहामियान्तीम् । भोटपरिमलेमापि यः स मृतः स मृन एवं . ] मलयपरम उरट सौरम घाम कर रहा है, इसी कारण साम मुझे पामे निल्नेको मना कर रही है। किन्तु गृयाटिकास्थित मोटापडे परिमलमे मिमे मारा जाना है, यह गारी आयेगी।५.॥ मुहपेच्छो पई से सा यि हु सपिसेसदसणुमाया। दोषि कात्या पुरंथमहिलपुरिनं य मण्णन्ति ॥१८॥ ( मुखक पतिस्तस्याः सापि रानु मविपनोपता। दारि कृताधी पूपियाममहिलापुरारि मन्यते । उसका पति सदैव ही उसके मुम्बईका दर्शनाधी है। यह मो निशा मुम देवहिप विशेषतः उन्मात रहती है। इस प्रकार दोनों ही परस्पर गाथासतशती कृतार्थ होने के कारण सोचते हैं कि पृथिवीपर कोई दूसरा पुरुष वा कोई दूसरी श्री नहीं है ॥ १८॥ खेमं कन्तो खेमें जो सो खुजम्बओ घरबारे । तस्ल फिल मत्थाओ को वि अणत्यो समुप्पण्णी ।। ९९ ॥ । क्षेमं कुतः शेमं योऽसौ जानको गृहद्वारे । तस्य विलमत्तकारकोऽप्यनर्थः समुपसः ॥] मेरा कुशल कैसे सम्मव है । घरके दरवाजेपर जो छोटा भामका पेड़ है, वही हमारे कुशल क्षेमकी सूचना देता है। इसके मस्तकसे क्या एक अनर्थभूत (मुकुल ) उत्पन्न हो रहा है? ॥ ९९ ॥ आउच्छणविन्छाभं जाआइ मुहं णिअच्छमाणेण । पहिपण सोअणिअलाविएण गन्तुं विअण हूँ॥ १०० ।। [भारछनपिच्छायं जापायाः मुरां निरीक्षमाणेन । पयिकेन शोकनिगदितेन गन्तुमेव नेटम् ॥ ] विदाईके समय आयाका मुखड़ा शुष्क एवं मलिन देखकर पथिकने शोक निमग्न होकर जानेकी इच्छा ही नहीं की ॥ १० ॥ रसिअजणहिअअदइए कइवच्छल पमुद्दसुकरणिम्मइए । सत्तसम्म समतं पञ्चमं गाहासभं एमं ॥ ११ ॥ [ रसिकतनहृदयदयिते कविवरसलममुखसुकविनिर्मिते । सप्तशतके समा गाथाशतकमेतत् ] रसिकोंके हृदय के भयंत प्रिय एवं कविवरमल प्रमुख सुकविगणाचित सप्तशती में यह पञ्चम गाथाशतक समाप्त हुआ 12000 पष्टशतक सूईयेहे मुसलं पिच्छदमाणेण दहलोपण। एपग्गामे यि पिनी समभं अच्छीहि विण दिट्टी ॥१॥ [ सूचीयेधे मुसलं निश्यिसा दमलोकेन । पप्रामेऽपि प्रिपा समाम्यामविम्यामपि न Cen] दग्ध पति सूतीयेप के मूचमस्थानपर मूमलनिक्षेप करते हैं। इस कारण, एक ही गाय पर्तमान मियको मैं समान भावसे भावभर देख भी नहीं पाती।।.. अज्ज पिसाय एक्कं मा मंधारेदि पिअसहि रअन्ति । फलि उण तम्मि गए जर ण मुभा ताण रोदिस्सं ॥२॥ [भयापि सायदक मा मा पारप पियसालि रुपनीम् । करूपे पुनस्तास्मिनाते यदि न मृना तदान रोरिष्यामि .] प्रिय मषि, केवल प्रान एक दिन के लिए हम हमें रोने से मना मत भरमा जित, कल प्रियतमके चले जाने पर यदि प्रागान्त न हो जाए तो पिर नहीं रोऊँगी ॥२॥ एदित्ति याहरन्तम्मि पिसभमे उअद भोणमुदीप । पिणाचेट्टिअजदणस्थलाइ लजाणभं इसिमं ॥३॥ (पहीति व्याहरति मिपतमे पश्यतायनसमुरा। दिगुगाष्टिजनधनस्थल्या सजायनसं इमिनम् । मुमलोग रेवो, 'भाभो हर मिपगम द्वारा बुगीजानेपर भवननमुम्बी महिला होकर बहको दोहरे बाल द्वारा कर लनापनत हमी ॥३॥ मारेसि कंप मुझे इमेण पेरन्तरत्तपिसमेण । भुलभावावविषिगप्रतिस्मभरद्धच्छिभल्लेग ॥४॥ [ मारपलिन मुग्धे भनेन पयंन्तरमाविषमेग । भूलताधापरिनिगंततोगतरार्धाषिभएलेन n] है मुग्धे, अपने हिम, तीर एवं शिशम भूलसाधारसे विनिर्गत तथा १२२ गाथासप्तशती सीक्षणतर अईनिमीलित इन नमनरूप बाग द्वारा तुम किसे नहीं मार सकती ॥४॥ तुद दंसणे सअह्ना सई सोऊण णिग्गदाजाई। तह पोलीणे ताई पभाई वोढधिमा जाआ ॥ ५ ॥ [तव दर्शने सतृष्णा शब्दं श्रुत्वा निर्गता यानि । स्वयि व्यतिक्रान्ते तानि पदानि वोढल्या जाता॥] तुम्हारे दर्शनकी अभिलापिणी होकर वह कण्ठम्वनि सुनकर घरसे जितने पग निकली थी, तुम्हारे चले जानेपर उसे उतनेही पग तक ढोकर ले भाना पड़ा था॥५॥ ईसामच्छररहिएहि णिव्यिारेहि मामि अच्छीहि । पखि जणो जणम्मिय निरिच्छए कहण छिन्नामो ॥६॥ [ईयोमरसाररहिताभ्यो निर्विकारान्या मातुलान्यतिभ्याम् । इदानी जनो जनमिव निरीक्षते कथं न हीयामहे ॥] . मामी, सम्बन्धहीन महिलाओंके प्रति साधारण पुरुषोंकी नाई वह मेरे प्रति ईर्या एवं मत्सर मावसे शून्य तथा निर्विकार नयनोंसे देख रहा है। मैं सीण क्यों नहीं होगी ॥६॥ पाउद्धअसिचमविहाविओरुदिट्टेण दन्तमग्गेण । बहुँमामा तोसिजा णिहाणकलसस्स व मुहेण ॥ ७ ॥ [पातोमतसिचयविमावितोमाटेन दन्तमार्गेश । वधूमाता सोप्यते निधानसशस्व मुखेन ।] भूमि बोदते समय स्थापन कसका मुंह दिखायी पड़नेपर जैसी समता होती है, वैसी ही इस नये माताको, पनामलके हवाले बड़ जाने पर कन्या उरु प्रदेशपर दन्तपत देखकर हुई ॥७॥ दिअमम्मि घसमि ण फरेसि मण्णुतह यि हमरिपदि । सडिजति जुमसुदावलिमधीरेदि अहिं ॥ ८॥ [हरये घससि न करोपिमन्यु तथापि नेहमुताभिः । शपमे युवतिस्वभावगलितामिरस्माभिः ॥] तुम मेरे हृदय में यास कर रहे हो एवं मेरे प्रति कोष मही पार करने अर्थान मेरा दुख नही दाते । फिर मी स्नेहपूर्णा एव पुरमीयमावा यं विगलित होने के कारण मुसे माशा हो रही है।

पष्ठ शतक
अण्णं पि कि पि पाविविसि मूढ मा तम्म दुपरामेत्तेण ।
हिम परादीपजणं मग्न्त तुद कति एवं ॥९॥
[अन्यदपि किमपि प्रापयसि मूढ मा साम्य दुखमात्रेण ।
हृदय पराधीनजनं मृगयमाण सय कियन्मानमिरम् ॥]
भो मूढ हृदय, केवल विरह सके कारण कष्टका अनुभव मत करना,
अन्य कुछ भी अर्थात् मृत्यु भी पाभोगे । पराधीन पतिकी प्रार्थना समान
अम्हारा यह विरहदुःख कितना है अर्थात् अस्यहर है ॥ ९॥
येसोसि जीभ पंसुल अहिअअरंसा हु वल्लभा तुज्छ ।
इस जाणिऊण पि मए ण ईसि दहपेन्मम्स ॥ १०॥
[प्योऽसि यस्या पासुल अधिकतरं सा खलु वलमा तय।
इति शास्दापि मया न ईषितं दग्धप्रेगः ॥ ]
अरे पापिष्ट, तुम जिस कामिनी द्वारा उपेक्षित या विरागभाजन हो, उसी
को अधिक प्रेम करते हो, यह जानकर मी में दग्धप्रेमके प्रति वा दग्धप्रेमके पश
हाल नहीं हुई।
सा आम सुहम गुणरूअसोहिरी आम णिग्गुणा अ अहं ।
भण तीभ जीण सरिसो किं सो सन्यो अणो मरत ॥ ११ ॥
[सा सत्यं सुमा गुणरूपदोमनशीला सत्यं निर्गुणा पाहम् ।
मण तस्या यो म सशः किं स सर्वो नो नियताम्]
हे सुभग, वास्तवमें तुम्हारी वह प्रेयसी रूपगुणशालिनी है, एवं में गुग.
विहीना हूँ। यताना तो, जिहने व्यक्ति उसके साश नहीं है, ये क्या
मर जायें।
सन्तमसन्तं दुक्खं सुहं च जाओ घरस्स जाणन्ति ।
ता पुत्त महिलाओ सेताओं जरा मनुम्साणं ॥ १२॥
[सदसदुखं सुख या गृहस्य जानन्ति ।
साः पुरक महिलाः शेषा जरा मनुष्याणाम् ॥]
हे पुत्रक, जो यधुएं घरके मभोके सदसत् सुख दु.ख सभीको विचारकर
चलना जानती हैं, केवल ये ही महिला पद वाग्य है; अन्यान्य रमणियों केवल
मानवीय राके समान है अर्थात् कुलबलधिनी हैं ॥१२॥
इसिएहि उवालम्भा अचुरबारहि कसिध्याई।
अंसूहि मण्डणाई एसी मग्गो सुमहिलाणं ॥ १३॥

गाथासशतप्ती [हसितैरुपालम्मा भायुपचारेः खेदितव्यानि । अभिः कलहा एप मार्गः सुमहिलानाम् ॥ ] हास्य द्वारा तिरस्कार, भस्यादर द्वारा खेद प्रकाश एवं अधुरा अलपरण वा तुष्ट करना, अच्छी महिलाओंकी यही मान प्रकट करनेको सीति है ॥१३॥ उल्लावो मा दिज्जउ लोअविरुद्ध त्ति णाम काऊण। समुदापडिए को उण वेसे वि दिलुि ण पाडेइ ॥ १४ ॥ [उहापो मा दीयता लोकविरुद्ध इति नाम करवा । संमुखापतिते कः पुनर्देष्येऽपि हिं न पातयति ॥] लोकविरून कार्य समझकर शोकप्रकाश (शोकम्पनि) नहीं किया गया है। किन्तु किसी व्यक्ति के अप्रिय अथवा उपेक्षित होनेपर भी क्या उसके सामने भाजानेपर उसपर दृष्टि न डाली जाय ! ४॥ साहीणपिअअमो दुग्गओ वि मपणइ कमरथमप्पाणं । पिअरहिमओ उण पुदवि वि पाविउण दुग्गओ च्चे ॥ १५ ॥ [ स्वाधीन प्रियतमो दुर्गमोऽपि मन्यते कृतार्थमारमानम् । प्रियरहितः पुनः पृथिवीमपि प्राप्य दुर्गत एव । ] स्वयं दुर्गत होने पर भी जिनकी प्रियतमा स्वाधीना हैं, वे अपने को कृतार्थ समझते हैं। किन्तु जो व्यक्ति प्रियारहित हैं, वे पृथिवी प्राप्त होनेपर भी दुगंत ही रह जाते हैं. ५ कि रुयसि कि असोसि कि कुप्पसि मुअणु एकमेकस्स। पेम्म विसंघ विसमं साहसु को रुन्धि तरद ॥१६॥ [किरोदिपि च शोधमि कुष्पमि सुसनु एकैकामै । प्रेम विषमिव विषम कथय को रोर्बु पानोति ॥] भरी सुतनु, रोती क्यों हो, शोकचिन्ता भी क्यों करती हो, मायेक व्यक्ति पर क्रोध क्यों प्रकट करती हो ? बताभो तो विष समान विषम मेमको कौन अवरक्ष कर सकता है। ते म जुआणा ता गामसंपमा तं च मम्द तारुणं । अक्खाणच लोभो कधि अम्दे वितं सुणिमो ॥ १७॥ [सेच युवानरमा प्रामपदरतामा सारग्यम् । भाभयानकमिद लोकः पयति ययमपि ताणुमः . ]

पाठशतक
वे ही, वे युवक नए थे, वह ही, वह तय ग्राम-सम्पत्ति थी और तब हम
लोगोंका बही-वह यौवन मी था। लोग आपमानकी भांति उन सयका वर्णन
करेंगे और हम सब सुनेंगे ॥ १७ ॥
चाहोहभरिअगपडाहरा' भणि विलक्खहसिरीए ।
अन्न वि किं रूसिजद सहायत्यं ग पेम्म ॥ १८ ॥
( थापौधभूतगण्डाधरया मणितं विलवहसनशीलया।
अद्यापि कि रुप्यते शपथावस्थां गतं प्रेम ॥]
पाप्पप्रवाहसे गण्डस्थल एवं अधरको भरकर लजाभीतासे हँसकर वह
नायिका बोली, अप और रोप क्यों प्रकट कर रही हो? प्रेम शपथकी भवस्था
पा चुका है अर्थात् शपथ द्वारा प्रेमको प्रतीति घटती है॥1॥
वण्णअघअलिप्पमुहिं जो मं अइआअरेण चुम्चन्तो।
एहि सो भूसणभूसिभ पि अलसाअइ छिवन्तो ॥ १९ ॥
। वर्ण घृतलिप्तमुखी यो मामन्यादरेण सुम्पन् ।
इदानी स भूषणभूपिनामध्यरसायते शन् ॥ ]
पुष्पावतीकी दशामें वर्णवृतद्वारालिप्तमुखी जिसने मुझे अत्यन्त भादरके
साथ चूमा था, वही अब मेरे भूपणद्वारा भलत होनेपर भी मुझे छूने में संकोच
का बोध कर रही है॥१९॥
णीलपडपाउअङ्गी ति मा हु णं परिहरिजासु ।
पहसु पिणद्धं रअम्मि अवणिजद अ ॥२०॥
[ नीलपटप्राध्ताङ्गीति मा खल्वेना परिहर ।
पट्टांशुकमपि नद्रं रतेऽपन यत एव ॥]
नीले वनद्वारा आवृत्त भगवाली समझकर उसे कभी पाग न देना।
पहने ४९ पवन भी रमणके समय छीन लिये जाते हैं ॥ २० ॥
सच्चं कलहे कलहे सुरआरम्भा पुणो णवा होन्ति ।
माणो उण माणसिणि गरुओ पेम्मं विणासेइ ॥ २१ ॥
[मस्यं कलहे-कलहे सुरतारम्भाः पुनर्नवा भवन्ति ।
मानः पुनर्मनस्विनि गुरुका प्रेम विनाशयति ॥1
प्रत्येक कलहके उपरान्त प्रारम्भ किया हुआ रमण पुनः नवीन होता है,
देता है ॥ २॥

१२६
गाथासप्तशती
माणुम्मत्ताइ मर अकारणं कारणं कुणन्तीए ।
असणेण पेम विणासि पोढवाएण ॥ २२ ॥
[मानोन्मतया मया अकारणं कारणं कुर्वस्या ।
भदर्शनेन प्रेम विनाशितं प्रौढवाइन ]
माम उन्मत्त हो, मान करनेका जो कारण नहीं है उसे कारण समझकर
दर्शन तक दिये पिना मने प्रतिज्ञापूर्वक भस्वीकृति द्वारा प्रेमको विनष्टकर
हाला है।॥२२॥
अणुऊलं विअ योत्तुं बहुवल्लह वलहे वि वेसे वि।
फुविभब पसाएर सिक्खइ लोओ तुमाहिती ॥२३ ।।
[अनुकूलमेव वक्तुं बहुवल्लमवल्लभेऽपि Qध्येऽपि ।
कुपितं व प्रसादयितुं शिस्त लोको युष्मत्तः ॥]
घहुवल्लभ, प्रिय रहो या अप्रिय, लोग तुमसे यह सीख सकते हैं कि
किससे किस प्रकार अनुकूल बचना प्रयोग करना चाहिए एवं कुपित व्यक्तिको
किस प्रकार प्रमान करना चाहिए ॥ २३ ॥
लजा चत्ता सोलं अखण्डिअं अजसघोसणा दिण्णा ।
जस्स करणं पिमलहि सो च्चेअ जणो जणो जाओ ॥२४॥
[लज्जा स्यक्ता शीलं ध खण्डितमयशोधोषणा दत्ता।
यस्य कृतेन (कृतेमन) मिप सखि स एव जनो जनो जातः ।।]
है प्रिय सखि, जिसके लिए मैंने वस्तुतः ना छोड़ दी है, परित्रको भार
कर दिया है एष अपयश मोल ले रखा है वह (प्रिय ) व्यक्ति ही भव
(उदासीन) ग्यक्ति यन गया है ॥२५॥
हसिभ अदिदन्तं भमिअमणिकान्तदेहलीदेस।
दिट्ठमणुक्खित्तमुदं एसो मग्गो पुलवहणं ॥२५॥
[इसितमाटदन्तं भ्रमितमनिकान्तदेहलोदेशम् ।
एमनुधिसमुसमेप मार्गः कुलपषमाम् ॥]
फुलचोकी यही रीति है, बिना दाँत दिग्याये हँसना चाहिए, देहतरीके
भागे दे यिना धूमना चाहिए एवं मुंह ऊपर सटाये बिना देषना चाहिए।
धूलिमइलो यि पतिमा वि तणाभदेहभरणो थि।
तह वि गइन्दो गरमत्तणेण ढपकं समुव्यदः ॥ २६ ॥

घष्ा शतक
१२७
[धूमिलिनोऽपि पातितोऽपि मृगचितदेहभाणोऽपि ।
तथापि गजेन्द्रो गुरुकत्वेन दो समुहति ॥] -
धूलिमलिन होनेपर भी, पट्टालित होने पर भी, तृण द्वारा देहपोषणकारी
'होनेपर भी गजेन्द्र अपने गुरुत्ववश (भारीपनके कारण) ढोल पहन करता है।
फरमरि कीस ण गम्मद को गयो सेण मसिणगमणासि ।
अद्विदन्तहसिरीअ अम्पिों चोर जाणिहिसि ॥२७॥
[यदि किमिति न गम्यते को गर्यो येन मपृणगमनासि ।
अष्टदन्तहमनशीलया जल्पितं घोर ज्ञास्यसि ॥1
हे बन्दी, मेरे साथ चलती क्यों नहीं ? तुम्हें क्या यह गर्व है कि इतनी
मन्नगमना हो गयी हूँ ? दाँत विना दिखाये हंसकर रमणी बोल उठी, "ह
चोर, (क्यों ऐमा करती हूँ ) जान जाभोगे" ॥ २७ ॥
थोरंसुपहिरु सवत्तियग्गेण पुष्फवइआए ।
भुअसिहरं पणो पेरिऊण सिरलग्गतुप्पलिमें ॥ २८ ॥
[स्थूलाधुभी रुदित सपत्नीवरोण पुष्पवाया।
भुजशिवरं परयुः प्रेय शिरोलग्नवर्णपूतलिप्तम् ॥ ]
पुष्पवतीके शिरोलग्नविलेपन पृतद्वारा पतिके भुजशिखरको लिख देखकर
सपरिनयाँ अविरल अश्रुधार यहाकर रोने लगीं ॥२८॥
लोओ जूरह जूरउ पणिसं होउ होउ तंणाम ।
एहि गिमज्जसु पासे पुष्पवरण पइ मेणिद्दा ।। २९ ॥
[लोक विद्यते सिंथतु वचनीयं भवति भवतु तमाम ।
एहि निमज पार्षे पुष्पवति नैति मे निद्रा ॥ ]
लोग दुखी होते हैं तो हो, निन्दा होती है तो वह भी हो। हे पुष्पवती,
आनो, मेरे पास भाजाओ, मुझे निद्रा नहीं भा रही है ॥ २९ ॥
जंज पुलपमि दिसं पुरओ लिहिअ व्य दीससे तत्तो।
तुद्द पडिमापडियाडि वहह व्य समलं दिसाअक्कं ॥ ३० ॥
[पो यो प्रलोकयामि दिर्श पुरसो लिखित एव दृश्य से समा
तव प्रतिमापरिपाटी यहतीव सकलं दिशावक्रम ]
#जिधर-शिधर देखती हूँ, मानो उधा ही उपर तुम्हें चित्रित देखती हूँ।
सारे दिवचन ही जैसे तुम्हासी प्रतिमाको परस्पर वहन कर रहे हैं ॥ ३० ॥

१२८
गाथासप्तशती
ओसरइ धुणइ साहं खोक्खामुहलो पुणो समुलिहइ ।
जम्बूफलं पा गेहइ भमरो त्ति कई पढमडको ॥ ३१॥
[अपसरति धुनोति शाखा खोक्खामुखाः पुनः समुश्लिखति ।
जम्बूफल न गृह्णाति भ्रमर इति कपिः प्रथमदष्टः ॥]
भरि द्वारा पहले कालिये जानेपर वानर बड़ी जोरसे खो खोकर
(जम्बुवृक्षसे ) हट रहा है, हालको हिला रहा है एवं पुनः नषद्वारा
इमपर खुरच रहा है। किन्तु इसमें मारा है, यह समझकर जामुनके फल को
नहीं ले रहा है ॥ ३॥
ण छिवा इत्येण कई कण्डूइभएण पत्तलणिउज्ने ।
दरलॅम्पिअगोच्छकइकच्छुसच्छहं वाणरीहत्थं ॥ ३२ ॥
[न स्पृशति हस्तेन कपिः कतिमयेन पत्रलनिकले।
ईपल्लम्धितगुच्छकपिकच्छुसहर्श वानरीहस्तम् ॥ ]
पत्रबहुल निकुञ्जमें मानर स्म्यमान करिकछु नामक गुच्छे की भाति
दिखायी पड़ता है। इस कारण खुजलीके समय इष्टतम होने पर भी बारीक
दायको अपने हायसे छूता नहीं ॥ ३२ ॥
सरसा वि सूसइ चिअ जाणइ दुफ्पाइँ मुद्धहिमा वि।
रत्ता वि पण्डुर चिअ जाभा परई तुह वि पिओए ॥ ३३ ।।
[ सासापि शप्पत्येव जानाति दुःसानि मुग्धहृदयापि ।
रस्तापि पाण्डुरैध जाता घराको सव वियोगे॥]
सुम्हारे वियोगमें यह पाराकी रसयुमा होकर भी सूखती जा रही है, मोहा-
छन्नहृदया होकर भी दुखका अनुभव कर रही, एवं रता (अनुरता) होकर
भी पादुवर्णा होती जा रही है ॥ ३३ ॥
आया अण्णसुजय विज उअह पल्लरी तउसी।
णीलुप्पलपरिमलयासिअस्स सरभरस सो दोसो ॥ ३४ ॥
[भारोहरि जी मजकमपि वापरयत घेतनशीला प्रासी ।
नीलोत्परपरिमलयासिताया: शरद सदोषः
देव, यसरी भो जीन है एपं कुज या पवृषपर जो भारोहण करती है.
यह नीलकमल के परिमलसे यासित शाल (इम) का दोष है ॥३५॥

पष्ट शतक उप्यहपहाविहजणो पविजिमिदमकलअलो पहअतूरो। अच्चो सोच्थ छणो तेण चिणा गामडाहो व ॥ ३५॥ [ उपप्रधाविततमः प्रविम्भितकलकला महततूर्यः । दुखं स एवं इणस्तेन विना प्रामदाह इव ॥] हाय, जिस उत्सव में लोग उपाको ओर भागते है, जीताविका कलकल रव उठना है एवं तूपनिदान उठाया जाता है-यही मधूसर रस प्रियतमले विरहमें मामदाहको भौति प्रतीत हो रहा है ॥ ३५॥ उल्लावन्तण ण होह कस्ल पासहिपण ठट्टेण । सदा मसाणपाअवलम्बिअचारेण य सलेण ॥ ३६ ॥ [ उल्लापयमानेन न भवति कस्य पावस्थित तम् ।। शङ्का श्मशानपादपलचितचोरेणेव सलेम ॥] श्मशानयूर पर गले फाँसी दालकर लटकती हुई, घरमाल, स्तम एव पराभवकारी धोरकी भाँति ( प्रवचता) योलो हुए पारित तथा गईसे स्तब्ध खल व्यक्ति किसमें बाधा नहीं उत्पन्न करते ॥३॥ असमत्तगुरुमाझे पहिं पदिए धर शितन्ते । णयपाउसो पिउच्छा हसद व फुडअध्यादि । ३७ ।। [ असमातगुरुककार्य इदानी पथिक गृह मतिमिर्तमाने । नवप्राट पियस इसतीच कुटाहास ॥ अरी बुआ, सम्मति भयावश्यक कार्यको समाप्त हो । पधिक पर लौट आने पर, नयी वर्षाले गिरिमक्षिका तिलने के समान हास-सोही हंस रही है ॥२७॥ दहण उण्यामन्ते मेहे आमुगजीविभासाप । पहिमपरिणीभ डिम्मी औरण्णमुदीन सयविभो ॥३५ [रक्षा उसमतो मेपानामुमाविताराया। पधिगृहिण्या डिभोग्यवदितमुगया इष्टः ॥] आकाशमें यादको उठसे हुए देवर, जीवन - त्यागकर, पथिकपनी ने रसि मुंइसे अपने शिश रीतिसे स्थिर किया ॥ २८॥ अपिहाराणायसनं ठाणे पेन्तो पुमो पुस । सदिसत्यो विश्व माणसिणीम TASTI ९मा०० गाथासप्तशती [ अविधवालक्षणवलयं स्थानं नयन्पुनः पुनर्गलितम् । सखीलार्य एव मनस्विन्या चलयकारको जातः ॥] मनस्विनीके अवैधव्यके लक्षणरूप वलयके गिर लाने पर, सखियाँ हो इसे धार-यार पहनाती हैं। अतः वे ही उसके वलय पहिनानेवाली (चूमिहारिन) हो गई हैं ॥ ३९॥ पहिअवहू विवरन्तरगलिअजलोले घरे अणोल्लं पि। उद्देसं अविरअवाहसलिलणिवहेण उल्लेह ॥४०॥ [ पथिकवधूर्विवरान्तरगलितजलार्दै गृदेऽनार्दमपि । उद्देशमविरतवाप्पसलिलनिवहे नादयति ॥] विवरों द्वारा गिरते हुए वर्षा जलकी धारासे आई गृहके जो-जो कोने भनाई रह गए हैं, उन-उन स्थानों को भी पथिककी वधू अविरल गिरनेवाली नेन जलकी धारासे आई कर रही है ॥ १० ॥ जीहाइ कुणन्ति पिकं भवन्ति हिअस्मि पिदुई काउं। पीडिजन्ता वि रसं जणन्ति उच्छू कुलीणा ॥४॥ [जिह्वायां (प-जिह्वया) कुर्वन्ति प्रियं भवन्ति हृदये निवृति पर्तुम् । पीडयमाना भपि रसं जनयन्तीक्षवः कुन्टीनाश्च ॥] गमा जिस प्रकार जिताका स्वाद उपस करता है, हृदयमें ताप निकृत कर शान्तिका विधान करता है एवं निष्पोटित होनेपर भी रस उप करता है, उसी प्रकार कुलीन व्यक्ति भी जिह्वा अर्थात् अनुकूल पचन द्वारा प्रियता उत्पन्न करते हैं। हृदयमें शान्ति प्रदान करते हैं एवं प्रपीटित होकर भी प्रोति उत्पन्न करते हैं ॥४॥ दीसइ ण चूममलं अत्ता प अ बाइ मलमगन्धयहो। पत्तं वसन्तमासं साहह उफण्ठिअं अं ॥४२॥ [श्पते न चूनमुलं धुन व धाति मलयगन्धवहः । प्राप्तं वसन्तमासं कथयायुरपण्ठितं चेसः ॥] हे साम, मानमरी नही दिसायी पाती। मलयपवन भी नहीं वह रहा है, उत्कंटित घिस ही पसन्तागमनकी सूचना दे रहा है । ४२॥ अम्बवणे भमरउलंण पिणा फळेण असुशंभमः । कत्ती जलणेण विणा धूमस्स सिदाउ दीसन्ति ।।३।।

पष्ट शतक [ मानवने भ्रमरकुलं न विना कार्येणोरसुकं भ्रमति । कुतो ऽवलनेन विना धूमस्य शिखा दृश्यन्ते ॥] अमराईमें अनायास ही उत्सुक हो भौरे घूम नहीं रहे हैं अर्थात् मबुपान के लोभमें घूम रहे हैं। अग्निके अतिरिक्त धूएँकी शिखा कहाँ दिखायी पड़ती है ! ॥३॥ दइअकरगहलुलिओ धम्मिल्लो सीहुगन्धिरं घअणं । मअणम्मि एत्तिसं चित्र पसाहणं हर तरुणीणं ॥४४॥ दयितकरमहलुलितो धम्मिला सीधुगन्धितं वदनम् । मदने एतावदेव प्रसाधनं हरति तरुणीनाम् ॥] प्रियतमके करग्रहणके कारण शिथिलषद केशबन्ध (जूड़ा) एवं मदिरा गंधसे आमोदित पदन-इतना श्रृंगार ही तरुणियोंके मदनोत्सवमें चित्तहारी होता है ॥ ५४॥ गामतरणीओ हिअ हरन्ति छेाण थणहरिलीओ। मअणे कुसुम्भरजिअझञ्चाहरणमेत्ताओ ॥ ४५ ॥ [प्रामतरण्यो हृदयं हरन्ति विदग्धानां स्तनभारवस्यः । मदने कुसुम्भरागयुक्ताबुकाभरणमात्राः ॥ ] मदनोत्सवमें कुसुम्मानित कचुकि मात्र भामरणरूपमें पहनकर, स्तन- भारवती मामतरुणियाँ विदग्ध जनोंके हृदयको हर रही हैं ॥ ४५ ॥ भालोअन्त दिसामओ ससन्त जम्मन्त गन्त रोअन्त । मुच्छन्त पडन्त पलन्त पहिअ किं ते पउत्थेण ।। ४६।। [भालोकयन्दिशः श्वसम्ममाणो गायनरुदन् । मूच्छन्पतरखलम्पयिक किं ते प्रवसितेन ॥] अरे पथिक, दिशाओंकी ओर देखकर ही सुम्हारे पास, जमाई, पान वा गमन, रोदन, मूरी, पतन एवं स्खलन हो रहे हैं-तुम्हारे प्रयासगमन से क्या प्रयोजन ॥१६॥ दळूण तरुणसुरअं विविहबिलासेहि करणसोहिल्लं । दीओ वि तग्गअमणो गर्भ पि तेल्लं ण लक्रोइ ॥४७॥ हप्ता सरुणसुरतं विविधविलासैः करणशोभितम् । दीपोऽपि तद्गतमना गतमपि सैलं न लक्ष्यति ॥ f १३२ गाथासप्तशती विविधविलासपूर्ण एवं कामशासोक्त यन्धनकरयादिद्वारा शोभित तरुण- तरुणीका सुरत देखकर उसमें लिस चित्तने भी नहीं देखा कि तेल निःशेष हो गया है। १७॥ पुणहत्तकरप्फालणउहअतडुल्लिहरणबढणसआई। जूहाहिवस्स मार पुणो वि जइ जम्मश्रा सहइ ॥४८॥ [पुनरुतरास्फालनोमयतटोल्लिखनपोनशतानि । यूाधिपत्य मातः पुनरपि यदि नर्मदा सहते ॥]. हे माता, न जाने, नर्मदा (नदी, नर्मदा सुखदात्री) नायिका यूथपति (गजपति, गोष्ठीनायक) के बारबार करके (शुण्ड, हरत) शत-शत ताइन (कटाव), उभय तट (फूष, किनारे) शत-शत उत्खनन एवं शत-शत पीड़न सहन कर सकेगी या नहीं ॥१८॥ वोडसुणो विअण्णो, अत्ता मत्ता, पई वि अपणत्यो। फलिहं व मोडिअं महिसपण, को तस्स साहेउ ॥४९॥ [ दुशुनको विपनः श्वधर्मत्ता पतिरप्यन्यस्यः । कारियपि मग्ना महिपकेग कस्ताय कायतु । गृहरक्षक दुष्ट कुत्ता मर गया है, मास उन्मादरोगसे प्रस्त है, पति परदेश गया हुआ है-येलने गो कापासका खेत नष्ट कर दिया है, कोई नहीं है जो उसे बता दे॥१९॥ सकअग्गदरहसुत्ताणिआणणा पिअइ पिअमुविइ । थोमंथोरोसोसबंध उअ माणिणी मदरं ।। ५०।। [सचनहरमसोत्तानितानना पिबति प्रियमुखवितीम् । स्नोक स्तोक रोपौधमिय पश्य मानिनी मदिराम ॥] देखो, प्रियतम द्वारा बाल पास कर यलपूर्वक अगर उठापे गए मुँहयाली मानिनी प्रियतमके मुख द्वारा दी हुई मदिराको बोपनिवारक औपधिक स्पमें धीरेधीरे पी रही है : ५०॥ गिरसोत्तोचि भुअंग महिसो जोहा लिहइ संतत्तो। महिसरस कइयत्थरझरो ति सप्पो पिमा लालं ।। ५१ ॥ [गिरिस्रोत इति भुजां महिपो मिया ऐति संतप्तः । महिरप कृष्णER इति मयः पिति etern n]

घट शतक
ग्रीम तापसे सन्तप्त बैल गिरिका घोत समर सपंको जिज्ञास घाट
रहा है, एवं सर्प भी काले परपरका हाना समक्षका उसका लार पी रहा है।
परसारि अत्ता ण णेसि कि पत्य रइहराहिन्तो।
चीसम्मजम्पिाई पसा लोआण पडेइ ।। ५२ ।।
[परशारी मातुलानि न नयसि किमत्र रतिरक्षात् ।
विवाभाषितान्येपा लोकानां प्रकटयति ॥]
भरी सास, इस पक्षायद सारिकाको रविगृहस अन्यत्र हटा क्यों नहीं
देता यह भारों के सम्मुख गोपनीय वचनों को प्रकट कर देती है ।। ५२ ।।
पहमेत्ते गामेण पडद भिख त्ति कीस म भणसि।
धम्मिम करजम जीमसि तं पिदे बटुकं ॥ ५३॥
[एतावन्मात्रे मामे न पतति मिति न किमिति मो मसि ।
धार्मिक भनक यजीवसि तदपि ते पहुकम् ॥)
हे काम भावाभकारी धर्मारमा, इतने बड़े प्राममें मुधसे ही क्यों कह
रहे हो कि 'भिसा नहीं मिलती' ! करमशाखा भट्ट होने के बाद जो जीवित
है-यही तुम्हारे लिए बहुत है ॥ ५३॥
जन्तिम गुलं विमसि या अ मे इच्छाह वाहसे जन्तं ।
अणरसिभ कि आणसि ण रसेण विणा गुलो होइ ।। ५४ ॥
[ यांत्रिक गुडं विगियसे न च ममेच्छया बाहयसि यन्त्रम् ।
भरसिक न जानासि न रसेन शिना गुडो भवति ॥]
भरे यन्त्रचालक, (चेतनके बदले) गुद्द पाहवे हो ? ऊपरसे हमारे इच्छा-
नुसार यन्त्र नहीं चरा सकते । भरे भरसिक, क्यो, नहीं जानते कि रसके
बिना गुण पैदा नहीं होता ॥ ५४ ॥
पत्तणिअम्बफंसा पहात्तिपणाएँ सामलङ्गीए ।
जलविन्दुपदि चिहुरा रुअन्ति यन्वरस च भपण ॥ ५५ ॥
[प्राप्तनितम्बरपाः स्नानोत्तीर्णायाः श्यामलायाः ।
जलबिन्दु कैश्चिकुरा रुदन्ति पन्धस्येव भयेन ॥
स्नानोत्तीर्णा श्यामलाको कुन्तल केदासमूह नितम्बके स्पर्शसुखको पाकर
जैसे पन्धनके भयसे स्नान जलविन्दुओंके बहाने रो रहे हैं ॥ ५५ ॥
गामङ्गणणिअडियकवान बड तुज्य दूरमणुलग्गो।
तित्तिल्लपडिक्खकमोइओ वि गामो ण उम्विग्गो॥५६॥

गाथासप्तशती [प्रामाङ्गगनिगडितकृष्णपक्ष वट तव दूरमनुलानः । दोः सन्धिकप्रतीचकभोगिकोऽपि प्रामो नोदिनः ।] है वटवृक्ष, तुमने गाँवक भागनमें कृष्णपक्षका अन्धकार बाँध रखा है। शुमने दूर रहका गाँवका रहनेवाला उद्विम नहीं होता, यधपि भोगासक कामियोंकी द्वारपाल प्रतीक्षा कर रहे है।। ५६ ॥ सुप्प डड्ढं चणआ ण भजिमा सो जुआ अइसन्तो। भत्ता वि घरे कुविआ भूआण व वाइओवंसो॥ ५७॥ {शूपं दग्धं घणका न भृष्टा. स युवातिकान्तः । श्वश्रूरपि गृहे कुपिता भूतानामिव वादितो वशः॥ ] सूप भी जल गया, धना भी भुना नहीं, वह युवक भी चला गया, साप्त भी घरमें कुपित हो गई । किन्तु श्रुतिविक्ल भूतके सामने जैसे घाँसुरी बजाई गई अर्थात् उसकी सारी चेष्टाएँ व्यर्थ हुई। ५७ ॥ पिमुणन्ति कामिणीणं जललुफपिआवऊहणसुद्धेलि । कण्डमकवोलुप्फुल्लणिश्चलच्छी घमणाई ॥५८॥ [पिशुनयन्ति कामिनीना जलनिलीनप्रियायगृहनसुखकेलिम् । फटकिवकलोपुष्पनिश्चलातीगि वदनानि ॥] कामिनियोंका कष्टकित कोलविशिष्ट एवं उपुल निशा समन्वित पदनसमूह, जलमें निलीन प्रियतों के मालिङ्गनसे उत्पल सुखकी कीड़ा सूषित कर रहे हैं ॥ ५८॥ अहिणवपाउसरसिपसु सोहर साआइपसु दिअहेसु ! रहसपसारिअगीवाणं गघि मोरवुन्दाणं ।। ५९ ।। [अभिनवप्राधृद्रपितेपु शोभते स्पामायितेपु दिवसेषु । रममप्रसारिसप्रीया मृत्यं मयायदानाम् i) वर्षाक नये बादलोंके गर्जनसे समन्वित २पामायमान दिवसों में लानन्दया उससितम्रीय मयूरोका नृत्य शोभा पा रहा है। (दिममें ही सस्तस्याग अभिसारयोग्य हो गया है।)॥५९॥ महिसयसन्धविलगं घोलह सिहाद सिमिसिमन्त। आदमवीणाझंकारसहमुद्दलं मसययुन्द ।। ६० ॥

मानिनीने बात न कर मुझे जितना कष्ट नहीं दिया हे उसमे कहीं अधिक घष्ठ शतक [महिपरकंधविष्टानं घूर्णते शशाहतं सिमसिमायमानम् । भाहतचीणाझंकारशब्दमुख मशक्वृन्दम् ॥] भैमौके कन्धेपर लगे मशकन्द माँगों द्वारा भाहन होनेपर सिम् सिम शम्द करते-करते पाहत वीणाके मशरकी ध्वनिको भाति गुखर हो घूम रहे हैं। रेदन्ति कुमुअदलणिचलट्ठिआ मत्तममरणिहामा । ससिअरणीसेसपणासिअस्स गण्ठि व्य तिमिरस्स ॥११॥ [राजन्ते कुमुददलनिश्चलस्थिता मत्तमधुकरनिकायाः | शशिकरनि.पोषप्रणाशितस्य प्रन्यय इय तिमिरस्य ।। ] उदय के अनन्तर चन्द्रकिरणों द्वारा अशेष भावसे नाशित अन्धकारी प्रथिसमूहकी भाँति प्रतीयमान मत्तमधुकानिकर कुमुद दलके उपर निश्चल भावसे बैठकर शोभा पा रहा है ॥ ६ ॥ उअह तरुकोडराओ णिक्वन्तं पुंसुवाणं रिम्छोलि । सरिप जरिओ व्य दुमो पित्तं च सलोहि चमइ ॥ १२ ॥ [पश्यत तहकोटरानिष्क्रान्तां पुंशुकानों पतिम् । शरदि ज्वरित इव दुमः पित्तमिव सलोहितं वमति ॥] देसी, वृक्षकोटरसे पुंशुकोंकी पंक्ति निकल रही है। जान पड़ता है कि भारत में प्रवराकान्त युस रक्तमिश्रित पित्तकी उलटी कर रहा है ॥ १२ ॥ धाराधुबन्तमुहा लम्बिअवस्सा णिउचिअग्गीया। घइवेढनेसु काआ सूलाहिण्णा व्य दीसन्ति ॥ ६३।। [धाराधाग्यमानमुना लरिवतरक्षा निकुचितम्रीवाः । धृतिवेष्टनेषु काकाः शूलाभिन्ना इच दृश्यन्ते ॥] खेतकी धृतिवेष्टन (मेह) के ऊपर बैठकर वृष्टि शारा द्वारा धोया। लम्बे पङ्घ एवं फैले हुए प्रौववाले कौए शूल द्वारा सम्यक् विद जैसे प्रतीत होते हैं ।। ६३ ॥ ण वि तह अणालवन्ती हिअभं दूमेइ माणिणी अहि । जह दूरविअम्भिअगरुअरोसमज्झत्यमणिएहि ॥ ६॥ [नापि तथा नाटपन्ती हृदयं दुनोति मानिन्यधिकम् । यथा दूरविजृम्भितगुरुरोपमध्यस्थमगितः ।] हुआ गाथासप्तशती कष्ट दिया है-बहुत दूरपर्यन्त गुरुकोपविशिष्ट उदासीन वचन द्वारा ।। ६४ ॥ गन्ध अग्धाअन्त पककलम्बाण वाभरिमच्छ। आससु पहिमजुआण घरिणिमुहं मा ण ऐच्छिहिसि ॥६५॥ (गन्धमाजिघ्नन्यवादस्वाना यामभृतात । भाश्वसिहि पधिकयुवन् गृहिणीमुखं मा न प्रेक्षिप्यसे ॥ ] हे युवा-पथिक, पके हुए कदरको सुगन्ध सूंघकर तुम्हारे नेत्र बाप्पपूर्ण हो गए हैं। तुम आश्वस्त होओ, गृहिणीका मुंह शीघ्र नहीं दिखेगा, ऐमा नहीं है ॥६५॥ गज महं चित्र उवार सम्वत्थामेण लोहहिमभस्स। जलहर लम्बालइ मा रे मारेहिसि घराई॥६६॥ [ग ममैवोपरि सर्वस्याग्ना लोहहृदयस्य । जलधर धम्मालकिका मा रे मारयिष्यसि यराकीम् ॥] हे जलपर, अपनी सारी शक्ति बटोरकर तुम मेरे लोहे जैसे कठोर हृश्य पर गरजो। किन्तु भरे मेघ, लम्बकेश-शोमिनी उस घेचारी कामिनीको मत मारना॥६६॥ पङ्कमइलेण छीरेक्कपाइणा दिण्णजाणुबडयोण । आनन्दिजा हलिओ पुत्तेण व सालिछेत्तेण ॥ ६ ॥ [ पलमलिनेन होकपायिना दाजानुपतनेन । भानन्यतेदालिका पुग्नेगेव शालिग्रेग ॥ ] पलिन, केवल दुग्धपानकारी एवं घुटनों द्वारा चलने वाले पुत्रकी भौति पक्षमलिन, केवल जलपायी एवं जानुस्थानीय (धाम्प) मृणालमन्यि धारण- शील सालि (धाम) द्वारा दालिक भानन्दोपभोग कर रहा है ॥ ६ ॥ फह मे परिणइभाले सलसलो होहिइत्ति चिन्तन्तो। भोणअमुहो ससूओ राया 4 साली तुसारेण ॥ ६७॥ [फ में गीतिकाले सरसो भविष्यमा ति चिन्तयन् । अपनतमुखः सप्को रोदितीय शालिस्तुपारेण] मेरे परिणनि-काल में अर्थात् पावस्था सलिदान एवं दुष्ट जन सेटका संग से होगा-यह चिन्ताहर मुग्न मोचेकर गुरु सहित (धान्य कटक यं शोक)मालिपान्य दुपारके बहाने शैसे रो रहा है ।। ६८ ॥

पष्ठशतक संझारामोत्थइओ दीसह गमणम्मि पडियआचन्दो। रचदुऊलन्तरिओ थणणइलेहो व्य णववहुए ॥ ६९ ।। [संभ्यारागावस्थगितो दृश्यते गगने प्रतिपचन्द्रः । रत्तदुक्लान्तरितः स्तननसलेख इव नववध्वाः ॥] रवर्ण व आत मववधूके स्तनके ऊपरके नखचिलकी नाई प्रतिपदाका चन्द्र भाकाशमें संध्यारागमें भरतहित दिखायी पड़ रहा है।॥ १९॥ अइ दिअर किंग पेच्छसि आसं कि मुहा पलोएसि । जााद बाहुमूलम्मि अद्धअन्दाण परिवाडि ॥ ७० ॥ [ अपि देवर किं न प्रेम शाकाशं कि मुधा प्रलोकय सि । जायाया पाहुमूर्धचन्द्राणां परिपाटीम् ॥] हे देवर, मामाको भोर व्यर्थ ही दृष्टिपात क्यों कर रहे हो ? माया बाहुमूल प्रदेशमें (नक्षतोत्पादित) भर्दधन्दाको क्यों नहीं देखते १७०॥ बाआइ किमणिजउ फेत्तिअमेत्तं व लिखिए लेहे। तुह विरहे जं दुक्खं तस्स तुमं चेअ गहिअस्थो ।। ७१ ।। [वाचया कि मण्यता कियन्मानं वा लिप्यते लेखे। नव विरहे यदुःखं तस्य स्वमेव गृहीतार्थः ॥] वाक्य द्वारा और क्या कहा जाय ? पत्रमें भी कितमा लिखा जाय ! तुम्हारे विरहमें कितना दुख है, यह तुम भली प्रकार समक्ष पा रहे हो ! मअणग्गिणो व्य धूमं मोहणपिच्छि व लोअदिट्टीए । जोधणधर्म व मुद्धा पहइ सुअन्यं चिउरभारं ॥ २ ॥ [ मदनारिच धूमं मोहनपिच्छिकामिन लोक्रष्टेः। यौवनवममिव मुग्धा वहति सुगन्ध चिकुरमारम् ॥] मुग्धा रमगी मदनामिक धुएं की भाँति, लोगों के नयनोंको मुग्ध करने की ऐन्द्रजालिक विद्यारी माँति यौवनकी वजरी भौति, सुगन्धित देशका भार वहन कर रही है ॥७२॥ रुसिटुंचि से असेसपुरिसे णित्तिभन्छेण । चाहोल्लेण इमीप अजम्पमाणेण वि मुहेण ।। ७३ ॥ [रूपं शिष्टमेव तस्याशेपपुष्पे निति ताण ! साप्पाणास्या अजातापि मुखेन । ] गाथासप्तशती कष्ट दिया है-बहुत दूरपर्यन्त गुरुकोपविशिष्ट उदासीन पचन द्वारा ॥ ६४ ॥ गन्धं अग्याअन्नअ पालम्याण वाहभरिमच्छ । आससु पहिअजुआण घरिणिमुहं मा ण पेच्छिहिसि ॥६५॥ [गन्धमाजिघन्यककदम्याना याप्पभूताः । भावसिहि पधिकयुवन् गृहिणीमुख मा न प्रेक्षिष्यसे । ] हे युवा-पथिक, पके हुए कदम्बकी सुगन्ध सूंघकर तुम्हारे नेत्र वाप्पपूर्ण हो गए हैं। तुम भाश्वस्त होमो, गृहिणीका मुंह शीघ्र नहीं दिखेगा, ऐमा नहीं है। ६५॥ गज महं चित्र उवरि सव्वस्थामण लोहहिअअस्स । जलहर लम्बालइ मा रे मारेहिसि पराई ॥६६॥ [गर्ज ममैवोपरि सर्वस्याग्ना लोहहृदयस्थ । अलधर टग्यालकिक मारे मारयिष्यसि बराकीम् ॥] हे जलधर, अपनी सारी शक्ति बटोरकर तुम मेरे लोहे जैसे कटोर हृदय पर गरजो । किन्तु अरे मेष, लम्बकेश-शोभिनी उस बेचारी कामिनीको मत मारना ।। ६६॥ पङ्कमहलेण छोरेक्झपाइणा दिण्णजाणुवडण । आनन्दिजा हलिओ पुत्तेण च सालिछेत्तेण ॥ ६७ ।। [ मलिनेन शाक्पायिना दत्तमानुपसनेन । भानन्चनेहालिकः पुत्रेणेव शालिग्रेग ॥] पचमलिन, केवल दुग्धपानकारी एवं घुटनों द्वारा चरनेवाले पुत्रकी भौति पकमलिन, केवल जलपायी एवं जानुस्थानीय (पाप) मृगालप्रधि धारण. पीट शालि (धान्य) ऐनद्वारा हालिक भानन्दोपभोग कर रहा है ॥ ६॥ फद्द मे परिणइभाले पलसहो होहिरति चिन्तन्तो। योणममुद्दो सासूसी रया व साली तुसारेण ॥ ६७ ॥ [ में परिणनिशाने पर सदो भविष्यसीनि चिन्नपन् । अयनतमुम्बः मशूको रोदिनीव शालिनुगारेण] मो परिणति-काटमें अर्थात् पापस्थामें खलिहान एवं दुर जम रोएका संग से होगा-पद चिन्तार मुख माघेकर शूक सहित (धाग्य कटफ एर्ष शोर) शासिधान्य पार पहाने मे रो रहा है ।।१८ घष्ठ शतक संझारामोत्थइओ दीसह गमणम्मि पडिपाचन्दो। रत्तदुऊलन्तरिओ थणणहलेहो प्य पवबहुए ॥ ६९ ।। [संध्यारागावस्थगितो दृश्यते गगने प्रतिपञ्चन्द्रः । रत्तदुकूलान्तरित स्तमनखलेख इब नववध्याः ॥] रक्तदर्श वसद्वारा आवृत नववधूके स्तनके उपरके मखचिकी नाई प्रतिपदाका चन्द्र धाकाशमें संभ्यारागों अस्तहित दिसायी पड़ रहा है ॥ १९॥ अइ दिअर कि ण पेच्छसि आआसं कि मुहा पलोपसि । जाआइ बाहुमूलम्मि अद्धअन्दाणे परिचार्डि॥७॥ [भयि देवर किं न प्रेक्षसे आकाशं कि मुधा मलोकयसि । जायाया पाहुमूडेऽर्धचन्द्राणां परिपाटीम् ॥] हे देवर, भाकाशकी ओर व्यर्थ ही दृष्टिपात क्यों कर रहे ! जाया बाहुमूल प्रदेशमें ( नखक्षतोत्पादित ) भचन्द्रों को क्यों नहीं देखते ? ७० ॥ वाभाइ कि भणिजउ केत्तिसमेतं व लिक्खए लेहे। तुह विरहे जं दुक्खं तस्स तुम चेभ गहित्थो ।। ७१ ॥ [वाच्या किं भव्यतो कियन्मानं वा लिख्यते लेखे। सब विरहे यदुःख तस्य त्वमेव गृहीताः ॥] वाक्य द्वारा और क्या कहा जाय ? पश्नमें भी कितना लिया जाय ? तुम्हारे विरहमें कितना दुःख है, यह तुम भली प्रकार समक्ष पा रहे हो ॥ ७॥ ममणम्गिणो व्य धूम मोहणपिच्छि व लोअदिट्ठीए । जोध्यणधर्म व मुद्धा यहइ सुअन्ध चिउरमारं ॥७२॥ [मदनामेरिव धूमं मोहनपिच्छिकामिव लोकदष्टेः । यौवनवामिव मुग्धा वहति सुगन्धं चिकुरभारम् ] मुग्धा रमगी मदनामिक धूर की भाँति, लोगों के नयनोको मुग्ध पानेकी ऐन्द्रजालिक विधिकाकी भाँति यौवनकी बजाकी भाँति, मुगन्धित कोंका भार वहन कर रही है॥७२॥ कसिटुंचि से असेसपुरिसे णित्तिअच्छेण । वाहोल्लेण इमीए अजम्पमाणेण वि मुद्देण ॥ ७३ ।। [रूपं शिष्टमेव सस्याशेपपुरुऐ नियतिवाण। सापासणारया भजपतापि मुखेन ] गाथासप्तशती भन्य सभी पुरुषोंसे लौटा हुभा नेत्र, उसके रूपस्मृति वाप्पा एवं कुछ भी न वर्णन करनेवाला उस नायिकाका मुखड़ा ही उस (नायक) के रूपको यता देता है ॥ ७६ ॥ रुन्दारविन्दमन्दिरमअरन्दाणन्दिालिरिञ्छोली। झणझणइ कसणमणिमेहल व्व महुमासलच्छीए ॥ ७४॥ [वृहदरविन्दमन्दिरमकरन्दानन्दितालिपतिः । झणक्षणायते कृष्णमणिमेखलेव मधुमासल पम्या ॥] घड़े-बड़े पमरूपमन्दिरमें मधुपानसे मानन्दित भ्रमरकुल, मधुमासलचमीकी कृष्णमणिरचित मेखला (कधनी) की नाई नझना रहे हैं ॥ ७४ ।। फस्स करो वहुपुण्णप्फलेकतरुणो तुहं विसम्मिहह । थणपरिणाहे मम्महणिहाणकलसे व्य पारोहो ।। ७५ ।। [ कस्य करो बहुपुण्यफलैकतरोस्तव विभमिप्यति । स्तनपरिणाहे मन्मयनिधानकलश इव प्ररोह ॥ ] बहुतसे पुण्यफलोंके एकमात्र पृषकी भाँति किस सुकृती पुरुषका हाय, कामदेवके स्थापन कर शासरीखे तुम्हारे विशालस्तनदयके उपर नवपप्लवकी भौति स्थान प्राप्त करेगा ? ॥ ७५ ॥ चोरा सभअसतहं पुणो पुणो पेसन्ति दिट्ठीओ । अद्विरपिपअणिहिकलसे व्य पोढवाआथणुच्छड़े ॥७६ ॥ [ चोराः समयसतृष्णं पुनः पुनः प्रेषयन्ति र भहिरषितनिधिक्टश इव प्रौढपसिकारतनोरस] सर्परचित स्थापन कलशको गाँति, प्रौढपसिका कामिनीके स्तनोत्सा में (धनापहरण करनेवारे चोरकी भौति) धोरगण दर-दरकर लारसासहित पार• चार टिपात कर रहे हैं ॥१॥ उव्या जयमणडररोमञ्चपसादियाई अंगाई। पाउसलन्छीम पभोरोहि परिपेलिमा विश्शा ।। ७७ ॥ [ उदाति मवगाहुरोमामाधितापदानि । मापापण्या पपोधाः परिप्रेरितो विनय ॥] पर चमोके पयोधर, मेघानसे उरोजिन हो विग्भपती नवगादुर रूपमें रोमारा प्रमाप्ति भदौको धारण करते है। ..॥

पष्ट शतक १३९ आम बहला वणाली मुहला जलरङ्कुणो जलं सिसिरं । अण्णणईण वि रेवाइ तह वि अण्णे गुणा के वि॥७८ ॥ { सायं पहला बनाली मुखरा अलरहयो जलं शिशिरम् । भन्यनदीनामपि वायास्तथाप्यन्ये गुणाः केऽपि ॥] यह सच है कि और नदियों के पास भी सविस्तृत पनोंकी पंक्ति है, श. मुखर जलरंकु पसीगण एवं पुनीतल जल विद्यमान है, तथापि रेषा (नर्मदा) नदीका और भी कोई कोई सा अतिरिक गुण भी है ।। ७८ ॥ पर इमीअ णिच्छद परिणअमालूरसच्छहे थणए । तुझे सप्पुरितमणोरहे व्य हिमए अमाअन्ते ॥ ७९ ॥ [भागच्छनास्पा निरीक्षा परिणतमालूरसदृशौ स्तनौ । सौ सरपुरुषमनोरयाविव हृदये अमान्ती ॥] आओ एवं सरपुरुषों के मनोरथकी माँ ति इस रमणीके हृदयदेश (पदस्थल) में अमान्त (विपुल अथवा मानके अनुपयोगी) तुङ्ग एवं पके हुए विग्यफल 'जैसे रतनद्वयको निाखो ॥ ७९ ॥ हत्थाहत्थिं अहमहमिआइ पासागमम्मि मेहहिं । अव्यो किंपि रहस्सं छपणं पिणहगणं गलइ ॥ ८ ॥ [ हस्ताहस्ति अहमहमिया वर्षागमे मेधैः । बायं किमपि रहस्य छनमपि नभोगणं गलति ॥] अहो आश्चर्यका विषय यही है कि वर्षागममें अहंकारवश हायोदाय मिले हुए मेघ पटाद्वारा भान होनेपर भी भाकाशरूपी आँगन गिरा पड़ रहा है। केत्तिसमेत होविद सोहगं पिनअमस्स भमिरस्स। महिलामअणछुहाउलकडक्वविम्रोवघेप्पन्तं ।। ८ ।। [कियन्मानं भविष्यति सौभाग्य नियतमस्य भ्रमणशीलस्य । সংকুনুতাটিয়াহ ৫} अन्यान्य नारी के लिए भ्रमणशील प्रियतमका सुभगव कितनी देर टिकेगी? कारण, महिलाएँ केवछ मदनहुधाले माल कटाक्षपातद्वारा ही इसे वशमें लाना चाहती हैं। णिअघणि उपऊहसु फुफ्फुडसहन झत्ति पडिबुद्ध । परवसइवाससदिर णिभए वि घरम्मि, मा मासु ।। ८२ ॥

२४० गाथासप्तशती [निजगृहिणीमुपगृहस्व कुक्कुटशब्देन सरिति प्रतिबुद्ध । परवसतिवासशङ्किलिजकेऽपि गृहे मा भैषीः ॥] कुक्कुटरव (मुर्गेकी बोली ) से झट ही उठ पड़ो एवं अपनी गृहिणीका मालिङ्गन करो। अरे ओ दूसरेके घर रहने में सदोषी, अपने घरमें देखो भय न करना॥८२॥ खरपवणरअगलत्थिगिरिऊडापडणभिण्णदेहस्स। धुमाधुकइ जीव विज्जुआ फालमेहस्स ॥ ८ ॥ [खरपवनरयगलहस्तितगिरिफ्टापतनभिन्न देहस्य । धुकधुकायते जीव इव विद्युत्कालमेघस्य ॥] प्रचण्ड पयनद्वारा गलासे हाथद्वारा खिसकाये जाकर, गिरिफूट (पिरि- शिखर) से गिरकर अत्यन्त तीण देह कालमेघजीव वा माणकी भाँति विजली धुक् धुक्कर कॉप रही है ॥ ८३ ॥ मेहमबिसस्स णजह उभरे सुरचावकोडिभिण्णस्स । फन्दन्तस्स सविभणं अन्तं व पलम्बए विज्जू ॥ ८४॥ [ मेघमहिपस्य ज्ञायते उदरे सुरचापकोटिमित्रस्य । मन्दतः सधेदनमन्त्रमिव प्रलम्वते विद्युत् ॥ ] प्रतीत होसा है कि इन्द्रधनुषकी फोटिद्वारा उत्पाटित होकर घेदनावश अन्दनशब्दकारी मेपल्प महिपके उदरस्थित अस्यकी भाँति पिडुली लग्यमान हो रही है ॥ ८४ ॥ णयपालवं विसण्णा पहिमा पेच्छन्ति चूअरुपयस्स। फामस्स लोदिउम्पनराइ य।। ८५॥ [ नयपलय विषण्णा पथिकाः पश्यन्ति घूमतरय । कामस्य लोदितसमूहराजित हस्तमा र मिव ॥] मिाह विपादयुफ पपित भाम्रवृक्ष मूतमपएएचसी भोर रसोबावारा शोभित कामदेवका हस्तस्थित माला समझकर टिपात कराहा है ।। ८५ ।। महिलाणं चित्र दोसो जेण पचासम्मि गयिमा पुरिसा। दोतिपिया जायण मरन्ति ता ण विरदा समप्पन्ति ॥८६॥ [मदिसानामे दोपो येन प्रवासे गर्विताः पुरुषाः । देवियो पावन प्रियम्त सावन विरहा समायो] हत्थमल्ल पठशतक पुरुष भी प्रवास मग्याप इतने गयंका भनुमय करते यह महिनाका दोष है। जप तक महिटामिमे दो-तीन मर नही जायेंगी सयमक विदको ममातिनही होगी ।। ८१ याला दे यथ लहुँ मरद पराई अलं विलम्येण । सा तुजस देसणेण वि जीजा गरिय संदेहो ॥ ८॥ (पालक हे मन र नियसे राकी अहं विटम्येन । सा राय दर्शनेगापि जीवियनि नास्ति संदेशः।] हे प्रमाणभिश पाठक, शीघ्र चलो, पाकी (दयनीया) रमगी मारी जा रही है, विलय करने का प्रयोजन नहीं है। सुरक्षा दर्शन पाकर यह यच जायगी, इसमें सन्देह नहीं है ।। ८७ ॥ तम्मिरपसरिअनुअबदजालालिपलीविए वादोए । किंसुअवणन्ति फलिऊण मुद्धहरिणो ण णिकमइ ।। ८८ ॥ [साम्रवर्णप्रसृतहतवदन्यालासिप्रदीपिते पनामोगे। शिकयनमिति कर दिया मुग्धहरिणो न निष्कामति ] ताप्रपर्ण होकर विस्तृत अग्निशिवासमूहद्वारा प्रमाणित धनप्रान्ताको अमवा किरास्कानन समसार मुग्ध परिण निकल मही रहा। विनाशके कारणको हो सुखका हेतु समझकर मुग्धजन प्रेयसीको पोद नहीं सकते ८॥ णिमुअणसिप्पं तह सारिआइ उल्लापिमं म्ह गुरुपुरी। जह तं वेलं माए ग आणिमो कत्थ यशामो ॥ ८ ॥ [निरनशिल्पं तथा शारिकयोपितमस्माकं गुरुपुरतः । यथा सो बेला मातनं मानीम: कुन मजामः॥] हे माता, शारिकाने गुरुजनों के सम्मुम हम लोगों के सुरतशिवपकी कहानी इस प्रकार कह दी थी कि उस समय में लज्ञासे कहाँ दिप जाऊँ यह समझमें मही भाया ॥८९॥ पथगप्फुल्लदलुल्लसन्तमअरन्दपाणलेहलओ। तंत्यि कुन्दकलिभाइ जण भमरो महद फाउं ॥२०॥ [प्रस्योरपुलदलोलसम्मकरन्दपानलुब्धः । सन्नास्ति कुन्दकलिकाया यन्न भ्रमरो पाति कतम् । नवप्रसुटिनदर विशिष्ट कुन्दकुसुम उलमित मधुपानमें लोलुप हो मारा सन्दरसिकामे सम्पन्य नहीं जद सवा ऐसा काम नहीं है । ९० ॥

है। कारण, કર गाथासप्तशती सो को वि गुणाइसओ ण आणिमो मामि कुन्दलइआए। अच्छीहिं चित्र पाउं अहिलस्सइ जेग भमरेहिं ॥९१ ॥ [स कोऽपि गुणातिशयो न जानीमो मातुलानि कुन्दलतिकायाः । अधिम्यामेव पातुमभिलप्यते येन भ्रमरैः ॥] हे मामी, मैं नहीं जानती कि कुन्दलतिकाका यह गुणोत्कर्ष कितना भौरीने मुख द्वारा नहीं केवल नयनसे ही इसे पीने की अमि. लापाकी है ॥९॥ एक चिअ रूअगुणं गामणिधूआ समुन्यहइ । अणिमिसणअणो सअलो जीए देवीकओ गामो ॥ ९२॥ [ एकैव रूपगुणं ग्रामणीदुहिता समुदहति । भनिमिपनयनः सकलो यया देवीकृतो ग्रामः ॥] ग्रामनायककी पुत्री भले ही इतना रूप एवं गुण धारण कर रही है कि सारे ग्रामवासी अपलक नयन विशिष्ट हो देवता पनकर खड़े हो गए हैं ॥१२॥ मण्णे आसाओ चिअ ण पाविओ पिअअमाहररसस्स । तिअसेहि जेण रअणारादि अम समुद्धरि ॥ ९३ ॥ [ मन्ये आस्वाद एक न प्राप्तः प्रियतमाधररसस्य । त्रिदशैर्येन रसाकरादमृतं समुत्तम् ॥] मुझे प्रतीत होता है कि देवताओंने प्रियतमाके अधररसका स्वाद नहीं पाया है, इसीसे उन्होंने समुद्रसे अमृत निकाला है ॥ १३ ॥ अण्णाअविअणिसिमभल्लमम्माहआइ हरिणीप । असणो पिओ होहिइ त्ति बलिउं चिरं दिहो ॥२४॥ [भाकांकृष्ट निशितमझमर्माहतया हरिण्या। भदर्शनः प्रियो भविष्यतीति यलिरवा चिरं रएः॥] पापके कान सक भाट सीप भाले दूणा साहस ऐकर भी परिणी (प्रेमया) 'मेरा प्रिय दर्शनके भगोषर होगा' ऐसा सोचकर कम्धेको टेवार बहुत देरता निहारने लगी। ९५ ॥ विसमट्टिमपिस्कोपाम्पदसणे तुज्य सत्तुपरिणीए । को कोण पत्थिनी पदिमाम हिम्मे रमन्तरिम ॥१५॥ .

पष्ठ शतक मालिनी तुरत [विषमस्थितपकानदर्शने तब शत्रुगृहिण्या । कः को न प्रार्थितः एपिकानां हिम्मे रुवति ॥] विपन शाखा पर स्थित केवल एक भाग्नफलको देखकर शिशु पुत्रके रोने लगने पर, तुम्हारी शत्रु-गृहिणीने भाम गिराने के लिए किस किस पथिककी बिनती नहीं की ॥ १५ ॥ मालारी ललिउल्लुलियाहुमूलेहि तरुणहिअआई । उल्लूरइ सज्जुल्लूरिआई कुसुमाई दावन्ती ॥ २६॥ [मालाकारी ललितोललितबाहुमूलाम्या तरुणहृदयानि । उल्लुनाति सोऽवलूनानि कुसुमानि दर्शयन्ती ॥] तोडे गए कुसुमको दिखाने जाकर अपने सुन्दर एवं विशाल स्तनदारा युवकोंके हृदयको व्याकुल कर रही है ॥ ९६ ॥ मझो, पिओ, कुअण्डो, पल्लिजुआपा, सवत्तीओ। जह जह यहन्ति थणा तह तह छिन्जन्ति पञ्च पाहीए ॥९७॥ { मध्यः प्रिया सुहम्यं पल्लोयुवानः सपत्न्यः । यया यया वर्धते स्तनौ तथा तथा पीयन्ते पच न्याध्याः ॥] व्याधपनी के दोनों स्तन जैसे-जैसे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे पाँच पस्तुएँ जोग होती जा रही है-उसकी करि, उसका प्रियतम, उसका कुटुम्ब, गाँव के युवक एवं उसकी सपलियाँ । ९७ ॥ मालारीप चेल्लहलयाहुमूलावलोअणसभहो । अलिपि भमइ कुसुमग्धपुच्छिरो पंसुलजाणो ।। ९८ ॥ [ मालाकार्याः सुन्दरयाहुमूलावलोकनसतृष्णः । अलीकमपि भ्रमति कुसुमाघप्रश्नशीला पासुलयुया ] मालिनके सुन्दर स्तनयुगल देसनेको छालसामें परखोलारट युवक रमूट फूलोंका मूल्य पूछता हुआ धूम रहा है ॥ १८ ॥ अकअण्णुअ घणवणं घणपण्णन्तरिअतरणिभरणिभरं । अइ रे रे पाणीरं रेवाणीरं पि यो मरसि ।। ९९ ॥ [भकृतज्ञ घनवर्ण घनपान्तरिततरणिकर निकरम् । यदिरे रे बानीरं रेवानीरमपि न स्मरसि ॥] रेरे अकृसश, जो बेतकुन मेघ जैसे सांपले, रग एवं जहाँ सूर्यकिरण गाथासप्तशती घने पल्लवसमूहोंसे भाग्छादित हैं, उस वेसकुञ्जको यदि स्मरण न भी कर सको तो क्या तुम रेवा (नमंदा) नदीका जल भी स्मरण नहीं कर सकते १९९६ मन्दं पि ण आणइ हलिभणन्दणो इह हि उड्ढगामम्मि । गहवासुआ विवजइ अवेजए कस्स साहामो ॥ १०॥ [ मन्दमपि न जानाति हलिकनन्दन इह हि दग्धग्रामे । गृहपतिसुता विपद्यतेऽवैधके कस्य कथयाम..] इस वैद्य शून्य जले गाँवमें गृहपतिकी नन्दिनी चिकित्साके अभाव में विषाद- युक्त हो जायेगी-हलिकनन्दन (जामाता) यह तनिक सभी नहीं समझ रहा है-किससे यह बात कहूँ॥ १०॥ रसिजणहिमअदइए कइवच्छलपमुहसुकगिम्मिए । सत्तसअम्मि समत्तं सटुंगादास प॥ १०१॥ [ रसिकजनहृदयदयिते कविवरसलप्रमुखसुकविनिर्मिते । सप्तशतके समाप्त पष्ठ गायाशतकमेतत् ॥] रसिकजनों के हृदपकी भतिप्रिय एय कविवरसल प्रमुख सुकविगण द्वारा रचित मतशती में यह पष्ठ गाथाशतक समाप्त हुभा ॥ १०१।।

सप्तम शतक पशमपरिरमणपदारसमुह कुराहमिम्मि । यादण मण्णुपिअलन्तयाधिोभं अj मुां ॥१॥ [अन्योन्यपरिहारममु पुरनमिभुने । पान मन्युविगतद्वाप्पपीतं पनु[म.] गारगोशे पापर हा निमिरा महारके माघ दोरी देकर व्यापने परयाश गिदग या पदारा पीत (सिक्क.) पनुपको दिपा ॥1॥ ता मुद्दा विलम्ब गणं मणामि को यि फरण अलमद घा। अविभारिभलारमभारिणी मरउ ण मणिसं ॥२॥ [सागुमा शिष्टमय पर्ण मणामिया भपिशोनाममा पा। अरिपारियकामहरिणी नियतम ममियामि ॥] है मुभग, घोड़ी देर को, एक भी मामधर्म तुममे काम करना चाहती है, पादने क्या काम बिना रिचार कार्य को प्रारम कानेवाली हमारी माप तो मारी लाप, उसके लिए उन्हें में सुध नही कहूँगी २ ॥ भोऽणिदिपणपणमचक्तिमस्सिपियो दलिभउत्तो। पत्तादे अण्णपद्देण माण जीमोल्लम देई ॥३॥ [ भोगिनी दरामदेगका स्यायनापितो हलिक पुर। इदानीमन्य प्रदेगकाना ही इति पपनं ददाति] मामीण परपारीको परीवारा प्रेषित मोदकादि का पापनको पाने में हारची इलिन्य लोगोंके मोपयोकी 'दी दी' र निन्दा कर रहा है।३० पञ्चूसमझदारलिपरिमलणसमूससन्तयत्ता । कमला रमणिविरमे जिताअसिरी महम्म॥५॥ [प्रपामापरिगरिमनप्तमुपपासाम । कमलान रनिविराम बिनोकरीमहमायने. रजनी भवसानपर प्रातनिनाबलिक संग पार मानिने कमर-समूहही लोकविज्ञपिनी सोभा सौरभ का सबंध यात होती है। १०मा०

गाथासप्तशती
पाउव्वेल्लिअसाउलि थएसु फुडदन्तमण्डलं जहणं।
चडुआर पई मा हु पुत्ति जणहासि कुणसु॥५॥
[वातोद्वेलितवस्त्रे स्थगय स्फुटदन्तमण्डलं जपनम् ।
घटुकारकं पति मा,खतु पुत्रि जनहास्यं कुरु ॥ ]
भरी वायुके द्वारा उद्वेलित वस्रोंवाली, स्फुट भाषसे लक्षित पति के दन्त
चिह्नयुक्त जोंको हक लो। है पुनि, चाटुकार पतिको लोगोंके हास्यका विषय
मत बनाओ॥५॥
वीसत्थहसिमपरिसफिकआण पढमं जलअली दिण्णो। .
पच्छा पहूआ गहिओ कुडम्बमारो णिमजन्ती॥६॥
[विसम्घहसितपरिक्रमाणां प्रथमं जलालिदत्तः ।
पश्चाद्वधा गृहीतः कुटुम्बमारो निमजन् ।]
धधूने पहले तो मूक हास्यसे भऔर फिर गमनागमनसे जलालि दी है,
पादमें दुर्गतिप्राप्त कुटुम्चियोंका भार ग्रहण किया है ॥६॥
गम्मिदिसि तस्स पासं सुन्दरि मा तुरअ घड्ढउ मिअङ्को ।
दुद्धे दुद्धं मिअ चन्दिआइ को पेच्छद मुहं दे ॥ ७॥
[ गमिप्यसि तस्य पाव मुन्दरि मा श्वरम धर्धतो मृगांकः ।
दुग्धे दुग्धमिव चन्द्रिका का पते मुख ते॥]
दे मुन्दरि, उसके पास जा सकोगी, इतनी शीताका प्रयोजन नहीं है,
चन्द्रमाको और अधिक पढ़ने दो। दूध दूधकी तरह, चन्द्रिका उम्हारा
मुखड़ा देखने में क्या समर्थ होगा?॥॥
जइजूरर जूरउ णाम मामि परलोभवसणिमो लोभो।
तह यि यला गामणिणन्दणस्स यमणे यला दिट्ठी॥ ८॥
[ यदि सियते पियसा नाम मातुलानि परलोकव्यसनिको लोक।
मपारि पटाग्रामणीनन्दनस्य पदने पर टि.]
है गामी, परलोक भासनिवाले व्यक्ति कि सोदा, सपापि प्राम.
मापा पुमं मुगडी भी मेरी हि पलपूयंह पर रही ॥८॥
गेदं व वित्तरदिय पिज्जारपदरं प मलिलसुण्णसिभ ।
गोदणरवि गोपनीय पमणं तुद विभाए ॥९॥

सप्तम रातक [गृमिव वितरहितं निझरबहामिव सलिलशून्यम् । गोधनरहितं गोमिय तस्या पदनं तव वियोगे॥] मुम्हारे विरहमें उसका मुग्ध रित्तरहित (निधन) गृहकी भांति सलिए. शून्य निझरगदरकी भाँति अथवा गोपनरहित गोष्ठ की भाति प्रतीत हो रहा है ॥९॥ तुह दसणेण जणिभो इमीभ लजाउलाइ अणुराओ । दुम्गमणोरहो विभ हिअमच्चित्र जाइ परिणामं ॥१०॥ {सव दर्शनेन जनितोऽस्या लजालुकाया अनुरागः । दुर्गतमनोरम इव हृदय एष याति परिणासम् ॥ ] तुम्हारे दर्शनमें उत्पन्न अनुराग, दरिद्र के मनोरपकी भाति उस हजाशीलके हृदपमें ही समास हो जाता है। जं तगुआमद सा तुह करण कि जेण पुन्छसि इसन्तो। अह गिम्हे मह पई पट्यं मणिऊण भोरुण्णा ॥११॥ पा तनूयते सा तब कृतेन किं येन पृच्छसि हसन् । असी प्री-मे मम प्रकृतिरिति भणियावरुदिना ॥] जो रमणी ही कृश हो जाती है, वह क्या तुम्हारे लिए वैसी होती है। उसी कारण क्या तुम मेरी ममता के बारे में हँसकर पूछ रहे हो? 'मोमकाल में कृश होना मेरी प्रकृति है' कहकर वह रोने लगी। घण्णकमरहिमस्स वि एस गुणो णवरि चित्तकम्मरस । णिमिसं पिजण मुञ्चइ पिओ जणो गादमुपऊदो ॥ १२ ॥ [घर्णमाहितस्याप्येष गुणः फेवलं चित्रकर्मणः । निमिपमपि यन्न मुजति प्रियो जनो गाढमुपगूढः ॥] थर्ण (ख)विन्यापरहित केवल भारेख्य कर्मका यह गुण दिखायी पड़ता है कि गादमावसे भालिनिन प्रियजन प्रियाको पगभरके लिए भी छोदते नही ॥१२॥ अविहत्तसंधियन्धं पढमासुमेरपाणलोहिल्लो। उन्चेलिउंण आणह सण्ड फलिभामुदं भमरो॥१३॥ [अधिमा संघियन्धं प्रथमरतोद्भेदपानलुम्धः । उद्वेलितुं न जानाति घण्डयति करियामुखं अमरः ॥]

કેટ गाथासप्तशती पुष्पके प्रथमोनिन (प्रथम प्रकट) रस पीनेका लोलुप हो भ्रमर कलिका. का मुत्र प्रस्फुटित करना नहीं जानता, अपितु इसके सन्धियन्धनको विभक्त किये बिना ही खण्डित कर देता है ॥ १३॥ दरवेविरोरुजुअलासु मउलिअच्छीसु लुलिअचिरानु। पुरिसाइरीसु कामो पिासु सजाउहो चसइ ॥ १४ ॥ [ईपद्वेपनशीलोरुयुगलासु मुकुलितासीपु लुलिनचिकुरासु । पुरुषायितशीलासु कामः प्रियासु सजायुधो वसति ॥] पिपरीत विहारमें जिन प्रियतमाओंके उरुयुगल ईपत् कम्पमान, नेन युगल मुकुलित एवं केशपाश खुले हुए रहते हैं, पुरुषोचित शीला उन्हीं कामिनियों के लिए कामदेव अस्त्र सजित होकर घाम करते हैं ॥ १४॥ जंज ते ण सुदामइ तं तं ण फरेमिजं ममाअत्तं । अहअंचि जण सुहामि सुहम तं किं ममाअत्तं ॥ १५॥ [ययते न सुखायते सत्ता करोमि पन्ममायत्तम् । अहमेव यस सुखाये सुभग तरिक ममायसम्] जिन जिनसे तुम्हारा सुन उत्पन्न नहीं होता, यह वह मैं नहीं करती, कारण यह मेरे वशमें है। हे सुभग, मैं जो सुख अनुभव नहीं करती, यह भी क्या मेरे यसमें है ॥१५॥ वाधारविसंवारं सअलावअयाण कुणइ हअलजा । सवणाण उणो गुरुसंणिहे यि ण णियज्झाइ णिोश ॥१६॥ [व्यापारविसंवाद सफ्लावययानों करोनि हतारना । श्रवणयो पुनर्गुरुमंनिधायपि न निगम नियोगम् ॥ ] निलंज (दग्ध) का सभी भयपयोंके व्ययहारमें बाधा पहुँचाती है। किन्तु यह एना गुगणगोंके समीप भी दोनों कानों पयहारका निरोध नहीं कर पाती॥१६॥ कि भण६ मं सहीमो मा मर दीसिहा सो जिमन्तीए । फजालाओ एमी मिदमागी उण प दोर॥१७॥ [भिनयमा समपो मा निपस्य दयते स जीयरया। पापांशप प्रेहमागः पुननं मरति ॥ भी नियो, म मुझसे क्या कह रही हो। 'म मरा, जीवित रहनेपर पर सप्तमशतक १४२ उसे देख पाभोगी-कार्यपालोचनामें सो यह करने योग्य है, किन्तु यह प्रेम-पय नहीं है ॥ १७॥ पफल्लमओ दिट्टीम माम तह पुलहमो समहाए । पिभजायस जहधणुं पटियाहस्स हत्याओ॥ १८॥ [एकाकी गोटया मृन्या तथा प्रलोस्तिः सतृष्णया! प्रियजायस्य यया धनुः पतिसं व्याघस्य हरतात् ॥ ] याधका धाण अपने प्रति उचात देवकर मृगीने इस प्रकार सतृष्णा नेत्रसे एकाकी मृगकी ओर देखा कि अपनी पत्नी में अनुरक चित्रपाले प्याप हापसे धनुष टूट पड़ा 1100 गलिणीसु भमसि परिमलसि सतलं मालई पिणो मुमसि । तरलत्तणं तुइ अहो महुअर जडू पाडला हर ॥ १९॥ [नलिनी भ्रमसि परिमृद्राति सप्ला मालतीमपि नो मुखसि । तरहा सबाहो मधुकर पाटला हरवि हे प्रमर, सुम नलि नियों के निकट उदते-फिरते हो। नवमालिकाका मदन भी करते हो और मालतीको भी छोड़ते नहीं, अप पारळ पुष्प यदि बहारी यह चितवनलताहरणकर सकती ॥१९॥ दो अलमकवालमपिणसविसेसणीलकचहा। दावेह थणत्यलवणि य तरुणी झुअजणाणं ॥२०॥ द्वियनुलकरपाटरिनामविशेएनीटविका। दर्शयति रतनस्थलर्णिकामिव तरणी युवानेम्य ] दो संगुली परिमित अवकाशयुक, विशेषतः नीले रंगकी कबुकिका पहनकर तरुणी मानो युवकों को स्तनपलसबंधों भादर्श पदर्शित कर रही है। रफ्खेइ पुतरं मत्थपण मोच्छोम पडिच्छन्ती। अंसुहि पहिभरिणी पोलिजन्तं ण लस्वेद ॥२१॥ हरपति पुनकं मस्तरेन पटलप्रान्तोदकं प्रतीच्यन्ती। अक्षुभि पधिपृहिणी भाभवन्त न पति ] अपने छुतमे गिरनेवाले जल को अपने मस्तकपर सहनकर पपिकी गृहिणी पुत्रको रक्षा कर रही है, किन्तु वह जो अपने भभुषारसे उसे सीधे देरही है इस ओर उसने लय नहीं किया।

१५० गाथासप्तशती सरए सरम्मि पहिया जलाई फन्दीसुरहिगन्धाई। घरलच्छाई सभण्हा पिमन्ति दइआणं ५ मुहाई ॥ २२ ॥ [दरदि सरसि पयिका जलानि नोटोपटसुरमिाघीनि । घवाराष्ट्रानि सतृष्णा पियन्ति दयितानामिव मुरानि . ] परत्में पथिक सरोवरमें नीलकमलके सुरभिगन्धविशिष्ट घवल एवं स्वच्छ जलको प्रिपतमाओंके (घवटाप) मुखदे जैसा समझकर सतृष्ण होकर पान कर रहा है। सरोवरका तीर सभेतस्थान नहीं होसस्ती ॥ २२ ॥ अभन्तरसरसाओ उपरि पन्चामपद्धपढाओ। चतम्मन्तम्मि जपे समुत्ससन्ति च रच्छाओ ॥ २३ ॥ [अन्यन्तरसरसा उपरि प्रवातवरपश । घड्क्रममाणे जने समुष्ट्रमन्तीव रझ्या ॥] लोग भाते जाते रहते हैं। इस कारण भम्यन्तर में रस (जल) युक्त एव वाहर यायुके प्रभावसे घर परमार्ग से सांस ले रहे हैं (प्यत रुप होनेपर मी नायिका मीठासे अनुरागिणी है) ॥ २३ ॥ मुद्दपुण्डरीअडाआइ संठिया उअह रामसे या उणपिट्ठकुट्टणुच्छलिअधूलिधवले थणे यहइ ॥ २४ ॥ [मुखपुप्तरीकरदायाया सस्थितौ परयत राजहसाविव । पापिष्टकुटनोलितधूलिधवलो स्तनो पहति ॥] देखो, रमणी अपने मुखपद्मको छायाम सस्थित रामहसदयकी भाति, उत्सवदिनके पूएकी ढेरसे उद्दाले हुए धूलिद्वारा घवलित स्तनय वहन कर रही है ॥ २३ ॥ तह तेणवि सा दिट्ठा तीअवि तह तरस पेसिआ दिट्ठी। जह दोण्ह वि समम चिमणिमुत्तर आईं जाभाई ॥२५॥ [तया तेनापि सा दृष्टा तयापि सया तस्मै प्रेषिता दृष्टि । दावपि सममेव त्तिरतो वह रमगी उसके द्वारा उसी प्रकार देखी गई, एवं उस युवकके प्रति उस रमनीने भी उसी प्रकार रष्टिपात किया जिससे एक ही साय दोनोंका रतिसुख मिटा २५ वालिमापरिसोसण कुडगपत्तलणसुलहसंके। सोहग्गकणमकसवह गिम्ह मा कह वि झिन्निहिसि।॥ २६ ॥ यथा जाती ॥

'सप्तमातक . { অথবাধবিশ্বাস নিয়ে মিম। सौभाग्यनककप मी मा पमपि जो भविष्यति] हेप्रीम, मुम छोटी पापिकाको सुप्तानेयाले हो, निपन पत्तों वरपाफ दो, तुम्हारी उपस्थिति में पति स्थान मुछम होता है पदम सौमाग्यसुवर्णकी कसौटी मत हो, सम कमी लीग मा होना ॥ २९॥ दुस्सिविसरमणपरिमाएदि घिटोसि पयरे ताया। जा तिलमत्तं यसि मरगम फा तुम मुलफहा ।। २७॥ ছুরিথিনহয়মি এই স্ব। यातिहमा पतसे माकत का सव मूल्यकया।] हेमरक्त, मसाज रसपरीपक तुमको सवतक पाथरपर घिसंगे, नयतक तुम तिलभरमें पर्यवसित , होभोगे । - सपने मूपए निर्धारणकी बात तो दूर ही रही ॥२७॥ जह चिन्ते परिअणो आसदा जह स तस्स पडिवायो । पालेण वि गामणिणन्दणेण तह रमिता पल्ली ॥२८॥ [ यथा चिन्तयति परिजन माशते पपा घरप प्रतिपः। •यालेनापि मामणीनन्दनेन तथा रपिता पाती। उसके परिजन निसप्रकार, चिन्तावर हुए थे एवं उसके शत्रुभाने निप्त प्रकारको भागमा प्रस्ट की धी-प्रामनारकका पुन पास होने पर भी कारकी इसीप्रकार करने में समर्थ हुआ था । २८ ॥ अण्णेमु पहिलो पुच्छसु यादमपुत्तेमु पुसिमवम्मा। अम्दं पाइजुआणो हरिणेसुधjण पामेह ॥ २९॥ [अन्येषु पधिक पृच म्याधकपुनेषु नागि । अस्माकं साधयुवा हरिणेषु धनुर्न नामयति ] हे पधिक, मुन जाय भोंके यहाँ पृश्न न ग्रिगविशेष धर्मके सम्बन्ध रो। हमारे याधयुश हरिणों के उर धनुष नहीं बने । गअवहुवेहव्यमरो पुत्तो मे एण्यविगिनाई। तइ सोण्हाइ पुलको जद कपडकरण्डसं वइ । ३ ।। [गजबघूयः पुत्रो मे एकमाण्डषिनिपाली । तथा स्नुपया मलोहितो पथा काण्डसमूह वहति ]

८
गाथासप्तशती
मेरा पुत्र पहले केपण एक या चार गोको विधवाकर सरना
था, किन्तु पुत्रवधू (पतोह) द्वारा इसप्रकार देस माता है कि अब यह
पानीशे केवल होता है॥३०॥
विझायणाला पल्ली मा कुणउ गामणी ससा ।
पच्चजिविभो जाइ कह चि सुणा ता जीवियं मुभा ॥ ३१ ।।
[नियारोहगाला पती मा को प्रामजी असिति ।
मायुजीवितो पति कथमपि णोति तनीधि खति]
ग्रामवासी कहीं चोरमयसे मिध्यपर्वसपर पलापनके लिए पढ़ने का राग
म अटा, प्रामनायक अभी भी जीवित है, यदि प्राण लौट भानेपर वह किसी
मकार मुनले तो प्राणत्यागकर देगा ॥३॥
अप्पादेर मरन्तो पुत्तं पल्लीपई पत्तेण ।
मह पामेण जह तुम लजसे तह करेजासु ॥ ३२॥
[शिपयति नियमाणः पुत्रं पक्षोपतिः प्रयत्नेन ।.
मम नाला यथा स्वं न हो तथा करिष्यसि ॥]
मरता मृतमाय गाँवका मुखिया पत्नपूर्वक पुत्रको यह उपदेश दे रहा
-इस प्रकार काम करना कि मेरा नाम लेनेपर कोई तुम्हें लजित न करे।
अणुमरणपस्थिआप पञ्चागअजीविए पिअसमम्मि ।
वेदव्यमण्डणं कुलवहा सोहग्गरं जाकं ।। ३३ ॥
[अनुमरणप्रस्थिताया प्रत्यागतमीविते प्रियतमे ।
वैधव्यमण्डनं कृष्टवध्वाः सौभाग्यकं जातम् ॥]
प्रियतमके प्राण लौट भानेपर अनुमरणमें व्यस्त बुलवका वैधव्यशकार
सौभाग्यनारमें परिणत हो गया ॥ १३ ॥
महुमच्छिाइ दहें दळूण मुह पिअस्स सूणोड़ें।
ईसालुई पुलिन्दी रुपखच्छाभं गआ अण्मं ॥ ३४ ॥
[मधुमक्षिकया दृष्ट दृष्ट्वा मुखं प्रियस्योच्नोएम् ।
ईर्ष्यालुः पुलिन्दी पच्छायां गतान्याम् ].
मधुमक्षिका द्वारा दंशित प्रियतम के फूले हुए ओटसे युक्त मुखको देखकर
ईयापरायण उरकल निवामी पर्वतीय पुलिन्दपनी दूसरे पृषकी छाया
चली गयी।॥३४॥

सप्तम शतक
धण्णा वसन्ति णीसमोहणे यहलपत्तलवाम्म ।
घाभन्दोलणोणविभवेणुगहणे गिरिग्गामे ॥ ३५ ॥
[धन्या वातन्ति निक्षमोहने यहलपत्रवृती।
वातान्दोलनादमामिशवेणुगहने गिरिमामे ॥]
जिस प्राममें वृक्षको यहलपत्रराजिद्वारा भावेशित स्थान है, जो वायुके
शौक भवनमित वेणुवन द्वारा गहन है एवं जहाँ नि शरूपसे सुरतसुत्र
अनुभूत हो सकता है-ऐसे गिरिमाममें धन्यपुरुष ही निवास करते हैं ॥३५॥
पप्फुल्लघणकलम्या मिसोमसिलाअला मुइअमोरा।
पसरन्तोज्झरमुहला पोसाहन्ते गिरिग्गामा ॥ ३६॥
[प्रोत्पुल्लघनकदम्या निधीत शिलातला मुदितमयूराः ।
प्रसरम्निीमुखरा उमापति गिरिमामा )
जहाँपर पतसपिविष्ट कदम्बवृक्ष पुष्पविकाससे उत्फुल, शिलालसमूह
जलद्वारा धौत, मयूरकुलआनन्दित पर जो सरते हुए निरसमूहसे मुखरित
है- गिरिमाम ही मनुष्यको प्रोत्साहित करते हैं ॥ ३३॥
तह परिमलिमा गोवेण तेण हत्थं पि जाण ओल्लेह ।
सचिअ धेशू पति पेच्छसु फुडदोहिणी जामा ।। ३७ ।।
[तथा परिमलिता गोपेन तेन इस्तमपि पा नाईयति ।
सैव धेनुरिदानों मेध्य कुटदोहिणी जाता u)
देखो, जो धेनु पहले उस गोपद्वारा उस प्रकार दुहे जाकर भी उसके
हायको भी गोला नहीं कर पाती थी, यही पहा मरकर दूध दे रही है ॥ ३ ॥
धवलो जिअ तुह कर पलस्स कए जिअन्ति गिट्ठीभो।
जिभ तम्मे अम्ह वि जीविषण गोटुं तुमाअतं ॥ ३८॥
[धवलो जीवति तव कृते धवलस्य कृते जीवन्ति गृष्टय ।
जीव है गो. रस्माकमपि जीतिन से स्वदायतम
हे धेनु, मुम्हारे ही सुखके लिए गोरा घेल प्रागधारण करता है एवं
एकवार प्रसूता धेनुएँ भी उनके सुखके लिए जीवित हैं। तुम यधो रहो, अपने
जीवनद्वारा हमने हमलोगोंके गोष्ठको भएने भाधीन कर रखा है ॥ ३०॥
अग्धाइ छियह चुम्यह ठेवह हिअमम्मि जणिमरोमहो।
जाआकयोलसरिसं पेच्छह पहिओ महुअपुप्फ ॥ ३९॥

१५४ गाथासप्तशती १ [भाजिप्रति स्पृशति चुम्पति स्थापयति हृदये जनितरोमाः । जायाकपोलताश पश्यत पथिको मधूकपुष्पम् ॥] देखो, पथिक जायाके कपोलसहश मधूकपुष्पको पाकर कभी इसे सूंघ रहा है, हरहा है, कभी इसे चूम रहा है, एवं कभी रोमाखित शरीरमें इसे अपने वक्षस्थलपर धारण कर रहा है ॥ ३९ ॥ उअ ओल्लिजाइ मोहं भुअंगकित्ती कडअलग्गाह । ओज्झरधारासद्धालुगण सीसं घणगएण ॥ ४०॥ [ पश्याशियते मोघ भुजाकृती क्टकलमायाम् । निझरधाराश्रदालुकेन शीर्ष वनगजेन ॥] देखो, जंगली हाथी गिरिकटकमें हम सपस्वचाको निरिकी धारा समझकर उसमें अपने मस्तकको भाई करने की चेष्टा कर रहा है॥४०॥ कमलं मुअन्त महुअर पिककइत्याण गन्धलोहेण । “आलेखलड्डु पामरो व्य छिविऊण जाणिहिसि ॥४१॥ [ कमल मुञ्चन्मधुकर पककपित्याना गन्धलोभेन । भालेवण्यखड्क पामर हर स्पृष्ट्वा ज्ञास्यसि ॥ ] हे मधुकर, कमलको छोड़कर पके हुए कपिरथफल (कैंथ) की गन्धसे इसे छूकर ही पामर चित्राङ्कित हड्ड् स्पर्शकी भांति इसे तुम समझ सकोगे। गिजन्ते मगलगाइआहि वरगोत्तदिग्णअण्णाए। सोउं व णिग्गओ उअह होन्तवहुआई रोमचो ॥ ४२ ॥ [गीयमाने मङ्गलगायिकाभिवरगोनदत्तकर्णायाः । प्रोतमिव निर्गतः पश्यत भविष्यद्वयूकाया रोमाश्च ॥], देखो, मङ्गलगायिकाओंके गान गाते रहनेपर, वरके नामोल्लेखपर ध्यान देनेवाली मावी वधूका रोमाञ्च भी जैसे नामश्रवणके लिए निर्गन होरहा है ।। मपणे आअपणन्ता आसण्णविआहमङ्गलुग्गाइई । तेहिं जुआणेहि सम हसन्ति में वेअसकुडगा॥ ४३ ॥ [मन्ये पाणंयन्त भाससारिवाहमङ्गलोद्गीतम् । तैर्युचमि समं हसन्ति मो वेतसनिकुञा ॥] जान पड़ता है कि उन युधगण के साथ ही साप त निकुन समूह भी मेरे भासन विहारके मालगीतको सुनकर मेरा उपहास कर रहे हैं ॥ ४३ ।।

सप्तम शतक उभगमचउत्थिमङ्गलहोन्तविक्षोभसविसेसलग्गेहि। तीभ वरस्स असेसुपहि रुग्णं व हत्येहिं ।। ४ ।। [ उपगतचतुर्थीमालभविष्यद्वियोगसविशेपलमास्याम् । तस्या परस्य च स्वेदाश्रुमी रुदितमिव हरताम्याम् ॥] उपस्थित चतुर्थी मङ्गलके दिन मावीवियोगके भयसे विशेषरूपसे सश्लिष्ट वरवधूके दोनों हाथ जैसे पसीनेरूपी भासू बहाकर रोरहे है ।। ४ ।। ण अदि िणे मुहंण अ छिवि देइ गालवइ कि पि । तह थि हु कि पि रहस्सं णयवहुसङ्गो पिओ होइ ॥ ४५ ॥ [न च दृष्टिं नयति मुख न च स्पष्टु ददाति नालपति किमपि । तथापि वलु किमपि रहस्य नववधूसग मियो भवति ॥] नबोदा स्वामी मुखकी ओर पुष्टि नहीं डालती। अपने को छूने भी नहीं देती भोर कुछ बोलती भी नहीं उब भी नरोदा जो लोगों को प्यारी लगती है, इसका अपूर्व रहस्य है । ४५॥ अलिअपसुत्तवलन्तम्मि णचवरे परवहून वेयन्तो। संवेल्लिओरुसंजमिअवस्थगण्ठि गओ हत्थो ॥ ४६॥ [भलीकप्रसुतवल्माने नववरे नववध्या वेपमान । संवेष्टितोरुसयमितवसन्धि गतो हस्त ॥] नये वरके टमूठ सोकर करवट बदलने पर नवोदाका हाथ कॉफ्ते-कापते अन्योऽन्य सश्लेपित उरुयुगलद्वारा नियमित दम्रधिकी ओर बढ़ जाता है। पुच्छिजन्तीण भणइ गहिआ पप्फुरइ चुम्बिा रअइ। तुहिका गवव हुआ कावराहेण उपऊदा ॥ १७ ॥ [गृधमाना न भगति गृहीता प्रस्फुरति चुस्विता रोदिति । सूरणीका नववधू कृतापराधैनोपगूढा] कृमापराध नये परद्वारा भाचिशित हो कर निर्वाचनशेड़ा पूछी जानेपर जवाब नहीं देती, हाथद्वार पड़ी जानेपर रोती दा ऊपर नीचे करती रहती है एक चूमी जानेपर रोती है ।। ४७ ॥ तत्तो चित्र होन्ति कहा विभसन्ति तहिं नहिं समापन्ति । कि मण्णे माउच्छा एकजुआणो इमो गामो ॥४८॥ ३ 7 থাৰৰয়ৰী [तत एव भवन्ति कथा विसन्ति त सत्र समाप्यन्ते । किं मन्ये मातृपया एक युवकोऽयं मामः ॥] हे मौसी, उस विषयको लेकर ही यात भारम्भ होती है, बनी रहती है एवं उसी धान समाप्त हो जाती है, मुझे लगता है जैसे कि इस गांवमें एक ही युषक वर्तमान है ॥ १८ ॥ जाणि अणाणि आहे यि जम्पिो ताई जम्प जणो यि । ताई चिम तेण पम्पिआई हिमभं सुहायेन्ति ॥ ४२ ॥ [यानि वचनानि धयमपि जल्गमस्तानि जपति जनोऽपि । सान्येव तेन प्रजापितानि हृदयं सुसयन्ति ॥ ) जो पाते हम लोग बोलते हैं, अन्य लोग भी उसे ही बोलते हैं, किन्तु धे ही यातें मियतमद्वारा बोली जानेपर मेरे हृदय में सुस उत्पन्न करती हैं ॥ ४९ ॥ सवाअरेण मग्गब पिनं जणं जइ मुहेण यो कन्जं । जंजस्स द्विअभदइअंतंण सुहं ज तहिं पथि ॥ ५० ॥ [ सर्वादरेण मृगय, प्रियं जनं यदि सुखेन वः कार्यम् । ययस्य हृदयदयितं तन सुख पत्तत्र नास्ति ] तुम लोगों को यदि सुखसे प्रयोजन हो तो प्रियतमको खोज लो। कारण, ऐसा हो नहीं सकता कि कोई ऐसा सुख हो जो व्यक्तिक प्रिय व्यक्तिर्म न हो ॥ ५.॥ दीसन्तो दिविसुओ चिन्तिज्जन्तों मणवल्लदो भत्ता। उल्लावन्तो सुइसुहो पिओ जणो णिच्चरमणिजो ।। ५१॥ [श्यमानो टिसुखश्चिनयमानो मनोवल्लभः श्वभु। उहप्यमानः श्रुतिसुष. प्रिय जनो नित्यरमणीयः॥ भरी सास, देखनेपर दृष्टिसुखकर, चिन्तित होनेपर मनमोहक एवं कथाप्रसा में उल्लिखित होनेपर ध्रुतिमुख-इप्त प्रकार नियमन हमेगाही रमणीय रहते हैं ॥ ५॥ टाणभट्ठा परिगलिभपीणमा उपगईभ परिवत्ता । अम्हे उण ठेरपोहर व्व उअरे च्चिअणिसण्णा ॥ ५२॥ [ स्यानभ्रष्टाः परिगलितपीनरवा परित्यक्ताः। धयं पुनः स्थाविरापयोधरा हवोदर एव निषण्णा.] उसस्या

सप्तमशतक
हमलोग तो, ऐकिन, स्थानध्युत, पीनस्वविहीन एवं उलिसे यशित
वृक्षाक स्तनकी मांति केवल उदरपोपय के लिए पानशील है ॥ ५९॥
पच्चूसाग रजिअदेद विभासोम लोअणाणन्द ।
अण्णात सपिअसभ्यरि णहभूसण दिणवह मोदे ॥५३॥
[मायूपागत रक्तदेह प्रिपालोक लोधनानन्द ।
अन्यत्र पितवारीक नमोभूपर दिनपते नमरते ॥]
है सूर्य, तुम्हें नमस्कार करती हूँ-म मातशाल भाते हो, तुम्हारा
शारीर रस्किम है, मुम्हारा मका प्रिय लगता है, हम भानन्दविधायक हो,
तुमने दूसरे देश में रात बिताया है एवं तुम भाारा मण्डल के भूषण हो ॥ ५३॥
वियरीअसुरअलेहल पुन्छसि मद फीस गम्भसंभूई।
ओअसे कुम्भमुद्दे जललयकपिा वि मिठाइ ॥ ५४॥
[विपरीससुरतलम्पट रसि मम मिमिति गर्भसभूमिम् ।
अपवृत्ते कुभमुखे जललवकणिकापि तिनि ]
हे विपरीत-सुरत-लम्ध, मेो गर्भके विषय में क्यों पूछते हो? नीचे की
भोर, मुख अयनस होने पर भी क्या कुझमें गलयिन्दु-कण भी टिक
सकता है।॥ ५४॥
मच्चाप्तण्णविवाहे समंजसोआईतरुणगोषीदि।
यहन्ते महमदणे संबन्धा पिण्डविज्जन्ति ॥ ५५ ॥
[भरयाससदियाहे समं यशोदया तहणगोपीमिः ।
वर्धमाने मधुमथने संबन्धा नियन्ते ॥ ]
मधुसूदनकी यम द्धि पर, जब उनका विवाद समय एकदम निक्ट मा
गया, तब तरुण गोपियोंने यशोदास अपना-उनका सायम्य छिपा लिया ५५॥
अंजं आलिहद मणो आसावट्टीहि दिनभफलमम्मि ।
तं तं यालो व्यविही णिहुअं हसिऊण पम्हमह ॥५६॥
[ पपदालिपति मन भाशारतिकामिहदयफल के
तत्तद्वाल इव विधिनिभृतं सिरम प्रोम्छति ॥ ]
मन भाशारूप लिकासे हृदयरूप फटकपर जो-को चित पर
रहा है, पक्षों की मांति विधि-सोपनसे वे सारे चित्र पोदने भाई ॥५॥

गाथासप्तशती
अणुगुत्तो फरफंसो सबलअलापुण्ण पुण्णदिअहम्मि ।
धीमासङ्गकिसहम एहिं तुह पन्दिमो चलणे ॥ ५७ ॥
[ अनुभूनः करस्पर्शः सक्लक्लापूर्ण पूर्णदिवसे ।
द्वितीयासमा इदानी तय धन्दामहे चरणी ॥ ]
है सालकलापूर्ण, पूर्णिमाक दिन सम्हारे करका संस्पर्श अनुभूत हुभा
है। भरे चन्द्र, द्वितीया (तिथि एवं रमणी) के संयोगसे तुम अत्यन्त कृश
हो गए हो-मुम्हारे घरगों की वन्दना कर रही हूँ ॥ ५७ ॥
दूरन्तरिए वि पिए कह चिणिअत्ताई मज्झ णभणाई।
हिश उण तेण समं अज्ज वि अणियारिअंभमइ ।। ५८ ॥
[दूरान्तरितेऽपि प्रिये कथमपि निवर्तिते मम नयने ।
हृदयं पुनस्तेन सममद्याप्यनिवारितं भ्रमति ॥ ]
प्रियतमके दूरदेश चले जानेपर मैंने किसी प्रकार नयनोंको तो फेर लिया,
किन्नु मेरा हृदय भभी भी उसके साथ-साथ भवाध रूपमें घूम रहा है ॥ ५८ ॥
तस्स कहाकण्टइए सहाअण्णणसमोसरिअकोवे ।
समुहालोअणकम्पिरि उपऊढा किं पवजिहिसि ॥ ५९॥
[ तस्य कथाकण्ठकिते शन्दाकर्णनसमपसृतकोपे ।
संमुखालोकनकम्पनशीले उपगूढा किं प्रपरस्यसे ॥]
सुम उसकी पात चलते ही रोमाश्चित हो जाती हो, उसके शब्दोंको
सुनते ही कोप छोड़ देती हो एवं उसे सामने देखकर कॉप जाती हो-आलिङ्गित
होनेपर तुम क्या करोगी? ॥ ५९ ॥
भरणमिअणीलसाहग्गखलिअचलणद्धविहुअवस्खउडा।
तरुसिहरेनु विहंगा कह कह पि लहन्ति संठाणं ॥ ६ ॥
[ भरनमितनील शाखाग्रस्खलितचरणार्धविधुतपक्षपुटाः ।
तरशिखोपु विहंगाः कथं कथमपि लभन्ते संस्थानम् ॥ ]
अपने भारसे युके हुए नील शाखाप्रमागसे धरणाईके खलित हो
जानेपर, पद्मपुटको कम्पित कर, तरशिखरोंपर पक्षी किसीप्रकार स्थान प्राप्त
कर रहे हैं ॥ ६॥
अहरमदुपाणधारिल्लिआइ जं च मिओ सि सविसेसं।
असइ अलाजिरि बहुसिक्सिरि त्ति मा णाह मण्णुहिसि ॥ १ ॥

सप्तम शतक [भधरमपानलालसया यह रमितोऽसि सविशेषम् । असती अपनाशीला पाशिपितलि मा नाथ मंस्याः ॥] माध, भपने अधरमपानकी हालसा कुम जो निशियमावमे रमिस हुए दो-४स कारण गुशे असती, माविहीना एवं परिधतिपिता मन समक्षमा ।।। पाणेण य पाणेण अराह गदिशी मण्डलो अहमणार । जद्द जारं अधिणन्दइ भुगर घरसामिए पन्ते ॥१२॥ [पादनेन ध पानेन च सधा गृहीतो मण्डलोरया । पया गारमभिनन्दनि भुपति गृहस्वामित्यति ॥] पेशाधारिणीने आहार एवं पानद्वारा कुत्ते को इस प्रकार वशीभूम कर लिया है कि पद जारको पाते देख अभिनन्दन करता है और गृहरामीको भारो देख भूक उठता है ।। ६२ ॥ फण्डन्तेण अफण्ड पलीमन्झम्मि यिअडफोअण्डं। परमरणादि वि अहिरं चाहेण आवित्रा भत्ता ।। ६३ ॥ [फण्ड्यसा सकारे पप्लीमाये विकटकोपडम् । पतिमरणादप्यधिक पाधेन रोदिता वधः ॥] गावके पीचोचीच व्याध अनायाम ही अपने भारमे युक्त अनुपको तनुकरने. की पेशकर सासको पति के मानेवी अपेश अधिक रलाया है ।।३।। अम्दे उज्जअसीका पिओ यि पिनसहि विआरपरिमोसो। हु अण्णा का वि गई बाहोहा कह पुसिनन्तु ॥ ६४ ॥ (चर्य अस्ताला प्रियोऽपि प्रियमनि विकारपरितोपः। न सवन्या कापि गतिप्पिौधाः कयं मोम्मपन्ताम् ॥] अरी प्यारी सखी हम माणशील है, फिर भी मियतमके हावभागदि विकारोंसे सन्तुष्ट रहते हैं। कोई दूसरा उपाय नहीं है, किस प्रकार वाप. प्रवाहको पाँच दालें। ६४॥ धवलोसि जइ वि सुन्दर तद धि तुए मन्झ रञ्जिमं हिम। राअभरिए वि दिअए मुहम णिहित्तीण रत्तो सि॥६५॥ [धवलोऽसि यपि मुन्दा तपापि स्वया मम रञ्जितं हडपम् । रागभृतेऽपि हृदये सुभग निहितो न रोऽसि ॥ -

गाथासप्तशती
है सुन्दर, तुम गोरे हो, फिर भी तुमने मेरे हृदयको रागरक्षित कर
दिया है और हे सुभा, मेरे रागपूर्ण दयमें रहकर भी मुम रक्षित नहीं हो
रहे हो ॥६५॥
चञ्चपुडाहमविभलिभसदाररसेण सित्तदेहस्स।
कीरस्स मग्गलग्गं गन्धधं भमद भमरउलं ॥६६॥
[चनपुटाहतविगलिससहकाररसेन सितदेहस्य ।
कीरस्य मार्गरमंगधान्धं भ्रमति भ्रमरकुलम् ॥]
फटानोंके भाघातसे गिरे हुए भामके रसद्वारा सिक्तदेह तोतापक्षीके
मागमें लगकर गन्धाध भ्रमरकुल घूम रहा है ॥६६॥
पत्थ णिमजइ अत्ता एत्थ अहं एत्थ परिमणो सअलो।
पन्थि रत्तीअन्धा मा महँ सअणे णिमजिहिसि ॥६७ ॥
[भन्न निमज्जति श्वश्रूरत्राहमन परिजनः सकला।
'पथिक राश्यन्धक मा मम शयने निमसयसि ॥]
यहॉपर तास निस्पन्दमावसे सोने में मान रहती हैं, यहाँपर में और
यहाँपर सारे परिजन सोते हैं। भरे रतौंधी रोगके मारे हुए राहगीर, तुम कहीं
मेरी शय्या, निमा न हो जाना ॥ ६॥
परिओससुन्दराई सुरपसु लहन्ति जाई सोक्खाई।
ताई चिअ उण विरहे खाउग्गिण्णाइँ कीरन्ति ॥ ६८ ॥
[परितोषसुन्दराणि सुरतेपुलभन्ते यानि सौख्यानि ।
तान्येव पुनर्विरहे खादितोद्गीर्णानि कुर्वन्ति ॥]
महिलाएँ सुरतप्रसङ्ग में जिनसारे परितोपसुन्दरसुखद अनुभव करती हैं,
विरहप्रसङ्गमें उन्हें दुषरूपमें परिणत होनेके समान उसकी प्रतीति
होती है ॥१८॥
मग्गं रिचम अलहन्तो हारो पीणुण्णाण थणआणं ।
उव्यिग्गो मम उरे जमुणाणइफेणपुओ ध्व ॥ ६९ ॥
[मार्गमिवालममानो हारः पीतोनतयोः स्तनयोः ।
उद्विमो भ्रमायुरसि यमुनानदीफेनपुञ्ज इव ॥ ]
पीन एवं उन्नत स्तनद्वयके बीच मार्ग न पाने के कारण ही हार जैसे यमुना
नदी फेनपुञ्जकी भाँति इधर उधर डोल रहा है ॥ ६९ ॥

सनमशनक पक्केण वि वडवीरेण ममतयणराइमन्यम्मि । तद नेण कमी अप्पा जद्द सेसदुमा तले नन्स ॥ ७० ॥ [एरेनापियटयो जाडोण मल पनराजिमध्ये । राथा तेन कृत था'मा यथा दोषदुमास्नले तम्य ] मारे यनों में घटयुरके उस एक बोजाहाने अपने को ऐमा कर डाला है कि अवशिष्ट द्रुम उसके नीचे पड़े हुए हैं ।। ७ ।। जेजे गुणिणो जे जे म चाइणो जे विटहविण्णाणा। दारिद र विपण ताणं तुमं माणुरा सि ।। ७१ ॥ [ये पे गुणिनो ये ये च यस्यागिनो ये विदग्यविमानाः । दारिधरे विचचग तेपो वं मानुरागममि ॥] जो शो गुशी हैं, जो-जा दाता है एवं जो-जी विज्ञान में निपुग है, मरे विधारिद्रय, सुम उनके प्रति अनुरम हो जाने हो ?॥१॥ जह कोत्तिमो सि सुन्दर समलतिहीचंददसणमुद्दाणं । ला मसिणं मोइनन्तकच पेस्पसु मुई से ।। ७२ ।। [यदि कौकिकोऽमि मुन्दर मलनिथिचन्ददर्शनमुन्यानाम् । सन्ममृशं मोच्यमानकन्चुर्क ग्रेशम्ब मुमं तस्याः ॥] है सुन्दर, यदि मारी तिथियोंकि उन्द्रको देख भानन्दमम्बन्धी हल दूर करना चाहते हो तो धीरे धीरे कम्चुक गोष्टने के समय परिदृश्यमान हम नायिकाके मुम्यदेको देगो ॥ २॥ समविसमणिव्यिसेसा समन्तयो मन्दमन्दसंभारा। अइरा होदिन्ति पहा मणोरहाणं पि दुलहा ।। ७३ ॥ [समविषमनिविशेश, समन्तनो मन्द मन्दमदाराः । अधिराद्मविप्यन्ति पन्यानो मनोरथानामपि दुरूस्याः . ] धोदे हो दिनों में सर्वत्र मार्गों की यह अवस्था होगी कि ममविषमायोका पता नहीं चलेगा, एवं यहाँ पर आना-जाना मी धीरे-धीरे होगा, यनिक कि यह सत्र मनोरयके चलने के योग्य मी नहीं रह जायगा । ७३ : अइदीहराई यहुए सीसे दीसन्ति वंसात्ताई। मणिए भणामि अत्ता तुम्हाणधि पण्डुरा पुष्ठी ॥ ७ ॥ ११ गा०० १६२ गाथासप्तशती [अतिदीर्घागि यध्वाः शी श्यन्ते पंशपत्राणि । भणिते मणामि वधु युप्माश्मपि पाण्डुरं पृष्टम् ॥] भरी सास, अगर तू कहे कि यहूके मस्तकपर पढ़े-बड़े बॉस के पत्ते लगे दिख रहे हैं तो मैं भी कहूँगो कि आपकी पीठ (धूलिके कारण) पीतवर्णकी दिख रही है ॥४॥ अत्यस्करूसणं सणपसिजणं अलिअवअणिम्वन्धो । उम्मच्छरसंतायो पुत्त पअवी सिणेहस्स ॥ ५ ॥ [आकस्मिकरोपकरणं पणप्रसादनमलीकवचन निवन्धः । उन्मत्सरमंतापः पुत्रक पदवी स्नेहस्य ॥ ] हे पुत्रक, अचानक ही रुष्ट और दूसरे ही क्षण सुष्ट, झूठी यातें बनाना एवं देपसे उपस मनाताप ये स्नेहकी पदवियाँ हैं ॥ ७५ ॥ पिजइ फण्णअलिहिं जणरयमिलिअं वि तुझ संलावं । दुद्धं जणसंमिलिअंसा वाला राअहंसि व्य ।। ७६ ॥ [ पिवति कर्णाञ्जलिभिजनरमिलितमपि तव संलापम् । दुग्धं जलसंमिलितं सा वाला राजहंसीव ॥ ] राजहंसो जिसप्रकार दूधमिले जलमे केवल दूधको पी लेती है, उसी प्रकार वह बाला अन्यव्यक्तियों की धातमें मिले हुए केवल तुम्हारे संलापको कर्णाञ्जलिद्वारा पी ले रही है ॥ ७६ ॥ अइ उन्जुए ण लजसि पुच्छिज्जन्ती पिअस्स चरिआई। सव्वङ्गसुरहिणो मरुषअस्स किं कुसुमरिद्धीहि ॥ ७७ ।। [अयि ऋजुके न लजसे पृच्छन्ती प्रियस्य चरितानि । सर्वाङ्गसुरभेमरुषकस्य किं कुसुमर्दिभिः॥] भरी सरलस्वभाववाली, प्रियजनों के चरितके सम्बन्धमें पूछकर क्या लज्जित नहीं होती ? सर्वागसुगन्धित (पिण्डखजूरके) मस्तकको सुमनसमृद्धिसे क्या प्रयोजन ?॥७७ ॥ मुद्धे अपत्तिअन्ती पवालअङ्कुरअवण्णलोहिअए । गिद्धोधाउराए कीस सहत्थे पुणो धुअसि ॥ ७८॥ [मुग्धेऽनश्ययन्ती प्रवालाकुरवर्णलोहिती। निधीतधातुरागो किमिति स्वहस्तौ पुनर्धावयसि । ] सप्तम शतक भरी मुग्भे, र पर्गही मानि निम, मरने दापो भी भाग पुष्टापा, पद विधाम न कर गुम पुनः दोनों हापोडी या धो रही हो। ७८॥ उन सिन्धयपव्यासदार धुमसपुससरिमाई। मोदस्ति मुअणु मुफोयमाई सरप सिमामाई॥॥ [पय धरपकमलागि शुतमानि । शोभते सुमनु मुनोदकामानिलिमामागि.) है मुतनु, देयो, भरमें मैन्धययही मान प्रतीयमान एवं मित की भासिविशेषसे गुक्ताल श्येत मेप नोभित हो रहे आउच्छन्ति सिरे िविचलिपाहि उम महिपदिणिजन्ता। णिप्पच्छिमयलियपलाइपदि मदिसा कुमार ॥८॥ [भान्ति शिरोमविहितः परय परिकापमानाः । नि:पशिमयडिमप्रलोकितमहिमा कुलान् । माधारी मोनिकों (माविमाधी अयया कमाइयों) द्वारा ले जाने हुए पेश दिलमानक हो मपनों में अन्तिम चार मुहार देखते हुए मे विदाई ले रहे हैं (भव कुश निरापद हो गए हैं।).. पुसउ मुदं ता पुत्ति अ याहोमरणं विमेमरमणिनं । मा एभं चित्र मुहमण्डपं ति सो काहिर पुणो यि ८१ ॥ [प मुग सम्पुति च (वि) याप्पोकाय विशेषामगीपम् । मा हरमेय मुखमानमिति करिष्यति पुनरपित] भी घेरी, भार बहाने वाले विगेर रमणीय अपने मुवईको पोज दाटो देखो, पह फिर कही यह न समझ ले कि यह मुघका मार है। मन्टे पअणुअपहुं अपदोयासेम साणविश्विल्लं। गामरस सीससीमन्तभं घ रच्छामुहं जा ॥२॥ [मध्ये मतनुरूपामुभयोः पाययो. रपानकदमम । ग्रामरप जीपंप्सीमन्तमिव यामुपं जातम् ॥] गविका रास्ना, बीच में स्वर एवं दोनों ओर गुम्कपा धारणकर इसके शीगन सीमन्त जैसा प्रतीत हो रहा है। -

१६४
गाथासप्तशती
अवरक्षागजामाउअस्स विउणेइ मोहणुक्कण्ठ ।
पहुआइ घरपलोहरमज्जणपिसुणो चलअसहो।। ८३॥
[अपराहागतजामातुद्विगुणयति मोहनोरकण्टाम् ।
घावा गृहपश्चाद्भागमजनपिशुनो परयशब्द ]
घरके बादवाले भागमें वधूके मजन (शयन या स्नान) सूचक यलयशब्द
अपराहमें भागत जामाताकी सुरतोत्कण्टाको दुगुना किये डाल रहे हैं ॥ ८३ ॥
जुज्झचवेडामोडिअजज्जरकण्णस्स जुण्णमल्लस्स।
फच्छावन्धो च्चि भीरुमल्लहिअरं समुपसणइ ।। ८४॥
[युद्धचपेटामोटितर्जरकर्णस्य जोर्णमल्लस्य ।
कक्षाबन्ध एव भीरुमल्लहृदयं समुपनति ॥]
युद्ध में चपेटाघात पाने के कारण अमर्दित एव जर्जरर्णविशिष्ट वृद्धमलका
मलकरछवन्धन ही भीहमलोंके हृदयको विद्रावित करता है। वृद्धपतिसे
विरक्त रमणी युवा नागरको अधिक आदर देती है ॥ ८४ ॥
आणत्तं तेण तुमं पइणो पहएण पडहसद्देण ।
मल्लि ण लज्जसि णञ्चसि दोहग्गे पाअडिज्जन्ते ।। ८५॥
[ भाज्ञप्त तेन त्वा परया प्रहतेन पटहशब्देन ।
मल्लि न लजसे मृत्यसि दौर्भाग्य प्रक्टोक्रियमाणे ॥]
भरी मल्लपस्नी, पतिके पटह (कर्ण) वनिको सुननेपर भी तुम अपने
जिस दुर्भाग्यकी घोषणा समझती थी, उस दुर्भाग्यके प्रकट होने लगनेपर भी
तुम लजित नहीं हो रही हो, वरन् नृत्य कर रही हो ॥ ८५॥
मा वच्चह वीसम्भं इमाण पहुचाडुकम्मणिउणाणं ।
णिव्यत्तिअकजपरम्मुहाण सुणआण व खलाणं ।। ८६ ॥
[मा व्रजत विनम्भमेषा बहुचाटुकर्मनिपुणानाम् ।
निवर्तितकार्यपराङ्मुखाना शनकानामिव खलानाम् ]
कुत्तोंकी तरह घाटुकारितामें निपुण एव काम निकल जाते ही पराङ्मुख
इन दुष्टों का विश्वास मत करना ।। ८६ ॥
अण्णग्गामपउत्था कट्ठन्ती मण्डलाण रिज्छोलिं ।
अस्खण्डिअसोग्गा परिसस जिउ मे सुणिआ ॥ ८ ॥

सतम शतक . [अन्य ग्रामस्थिता कयन्ती मण्डलानां पंक्तिम् । असण्डित सौभाग्या वर्षशत जीवतु मे शुनी॥ कुत्तोंके दलको भाकृष्टकर दूसरे गाँव में जा यसनेवाली मेरी कुतिया अखण्डसौभाग्यवती हो, सौ वर्ष तक जीवित रहे ।। ८७ ॥ सच्चं साहसु देअर तह तह चहुआरएण सुणएण। णिन्वत्तिअकज्जपरम्मुहत्तणं सिक्खिों फत्तो ।। ८८ ॥ [ सत्यं कथय देवर तथा तथा चाटुकारकेण शुनकेन । निवर्तितकार्यपरायुवरवं शिक्षित कस्मात् ॥ ] है देवर, पच बताओ तो-समी प्रकार चापलूसीकर कुत्ता जो काम समाप्त होने पर राख हो जाता है, यह उसने किससे सीखा है अर्याद तुम्ही से सीखा है ।। ८८॥ निप्पण्णसस्सरिद्धी सच्छन्दं गाइ पामरो सरप। दलिअणवसालितण्डुलधवलमिअड्डासु राईसु ॥ ८९॥ [निप्पनसस्यदि स्वच्छन्दं गायति पामरः शरदि। दलितनवशालित्तण्डुलधवलमृगासासु रात्रिषु ।। ] शरत्कालमें दलित नये शालिधान्यके तन्दुलके समान धवलचन्द्र शोभित विभावरीमें, पामर हालिक प्रचुर शस्यसम्पद पाकर भानन्दमें गा रहा है ।।८।। अलिहिजइ पडूअले हलालिचलणेण फलमगोचोए । केआरसोभरुम्भणतं सहिअ कोमलो चलणो ।। ९० ॥ [थालिप्यते पतले हलालिचरलेन कलमगोप्याः। केदारस्रोतोवरोधतिर्थक स्थित. कोमलश्चरणः ॥] (पूर्ववस्तर) केदारस्रोनके अवरोधवश तिरछे खदी कलम गोपीके कोमल चरणचित इस वर्ष हलरेखा खींचे जाते समय कीचड़ में खींच डाले जा दिनहे दिअहे सूसइ सङ्केअअभङ्गचड्डिामड़ा। आवण्डुणअमुद्दी कलमेण समं कलममोवी ॥९॥ [दिवसे दिवसे शुप्यति सङ्केतकभगवर्धिताशा। आपाण्डुरावन नमुखी क्रमेन सम कलमगोपी ॥]

गाथासप्तशती
-
(कमल परिपाकमें) सतभनकी भाशा बदजानेपर कमलगोपी
कमलके साथ-साथ पाण्हुवर्ण एवं अवनतमुखी हो दिनों-दिन सूखती जा
रही है ।। ९१॥
णपकम्मिएण हभपामरेण दटूण पाउदारीओ।
मोत्तव्वे जोत्तअपग्गहम्मि अवहासिणी मुफ्का ॥२२॥
[नवकर्मिगा पश्य पामरेण दृष्ट्वा भक्तहारिकाम् ।
मोहम्ये योक्त्रप्रग्रहेऽवहासिनी मुक्ता॥]
भयहारिकाओंको ( भोजन लानेवालियों को देखकर नवीन कर्मी निलंग्ज
किसान, जोतरश्मि मोचन करनेको उद्यत हो भ्रमवश यैलके नाय खोल
रहे हैं ।। ९२ ।।
दद्दूण हरिअदीहं गोसे णइजूरए हलिओ।
असईरहस्समग्गं तुसारधवले तिलच्छेत्ते ।। ९३॥
[दृष्ट्वा हरितदीर्घ प्रातनोतिखिद्यते हलिकः ।
भसतीरहस्यमार्ग सुपारधवले तिलक्षेत्रे ॥]
सुपारधवल तिलके खेत में असतीके हरिनवर्ण एवं दीर्घ रहस्यमार्गको देख
प्रतिःकाल किसान खेदयुक्त नहीं होते ॥ ९३ ॥
सङ्कोलिओ व्व णिजइ खण्डं खण्डं फओ व्व पीओ व्य ।
बासागमम्मि मग्गो घरहुत्तसुहेण पहिएण ॥१४॥
[सोचित इव नीयते खण्ड खण्डं कृत इव पीत इव ।
वर्षागमे मार्गो गृहभविष्यासुखेन पथिकेन ।]
वर्षागमसे भावी गृहमुखकी बात स्मरणकर पथिक मानो पथको संलिप्त कर
अथवा मानो टुकड़े-टुकड़े कर, अथवा मानो चर्वण कर चल रहा है ॥ ९४ ।।
घण्णा यहिरा अन्धा ते चित्र जीअन्ति माणुसे लोए।
ण सुगंति पिसुणवअणं खलाण ऋद्धिं ण पेक्षन्ति ॥ २५॥
[धन्या बधिरा भन्धास्त एव जीवन्ति मानुषे लोके
न अण्वन्ति पिशनवधनं खलानामृदिं न प्रेशन्ते ॥
जो बहरे हैं एवं जो अन्धे हैं वे ही धन्य हो जीवित हैं, कारण, घे ही
खल मनुष्यों की सुनते नहीं एवं उनकी समृदि भी नहीं देखते ॥ १५ ॥

सप्तम शतक
:
पण्हि वारेइ जणो तहमा मूइल्लओ कहिं व्य गओ।
जादे विसं व्य जायसव्वद्गपहोलिरं पेम्म ॥ ९६ ॥
[इदानी चारयति जनस्तदा मूलाः कुनापि वा गतः ।
यदा विपमिव जात सर्वाङ्गपूर्गितं प्रेम ॥]
जय प्रेम विषकी भांति सभी अगों में व्याप्त हो गया था, तय सभी मूक हो
गए थे-भूय सभी मना कर रहे हैं ।। ९६ ॥
कह तंपि तुइ ण णानं जह सा यासन्दिआणं वहुआणं ।
फाऊण उच्चवचिअंतुह दंसणलेहला पडिआ ॥ २७॥
[ कथं तदपि स्वया न ज्ञातं यथा मा श्रासंदिकानां धहूनाम् ।
कृत्वा उच्चावचिका तव दर्शनलालसा पतिता ॥]
तुम क्या यह भी नहीं जानते कि तुम्हारे दर्शनलालसासे अमिमून हो
यह (नायिका) अनेक भासन्दिका (वेतके भासन वा छोरी खाट) द्वारा
बनायी हुई ऊँची सिदी से गिर पड़ी है ॥ ९ ॥
चोराण कामुआणं अ पामरपहिआण कुक्कुडो वाइ।
रेरमह पहह वाहयह पत्थ तणुआअप रमणी ॥२८॥
[चौराम्कामुकाश्च पामरपथिकांश्च कुक्कुटो वदति ।
रे रमत पहत वाहयत अत्र सन्दी भवति रजनी ॥]
'भय रात थोड़ी-सी ही यची है' यह सूचितकर मुर्गा चोरों, कामुकों एवं
पनिकों से क्रमानुसार 'लेते रहो' 'रमणमें मन होओ' युद्ध (गारी ) 'स्टले
रहो' कहे दे रहा है ।। ९८ ॥
अण्णोण्णकडक्सन्तरपेसिअमेलीणदिटिपमय ।
दो च्चिन मण्णे कभण्डणाई समदं पदमिया ॥ ९ ॥
[अन्योन्यकालान्तरप्रेपितमिछितरष्टिनमरी ।
द्वावपि मन्ये कृतकलहो समा प्रहमिती]
एक दूसरेके प्रति एक दूमरेके कटाये प्रति
ऐसा प्रतीत होता है कि कलह करनेवाले दोनों ए मय पर ये ॥१९॥
संझागहिअजलअलिपहिमामंकनगग्नुि।
अलिअंविअ फुरिया निमित्रमम॥१०॥

गाथासप्तशती [संध्यागृहीतजलाअलिप्रतिमासंफ्रान्तगौरीमुखकमलम् । अलीक्मेव स्फुरितो; विगलिसमंत्र हरं नमन ।।] सध्याकालीन अलान्जलिमें प्रतिविम्बित गौरीका मुखकमल देखकर, मंत्रोच्चारणलिप्त होने पर भी मिथ्याभावसे भोटोको घलानेवाले (हिलानेवाले) घरको नमस्कार करें ॥ १०॥ इअ सिरि हालविरइए पाउअकबम्मि सत्तखए। सत्तमस समत्तं गाहाण सहावरमणिजं ॥१०१ ॥ [इति श्रीहालविरचिते प्राकृनकाम्ये ससशते । सप्तमशतं समाप्तं गाया स्वभावरमणीयम ॥] इसी स्थानपर श्रीहाल ( नरपाल) विरचित सप्तशती नामक प्राकृत. स्वरमावरमणीय सप्तशतक समाप्त हुआ ॥ १०॥ . समाप्तोऽयं ग्रन्थः परिशिष्ट (क) ও ৩৩ गाथानुक्रमणिकादि गाथा सन्दर्भ पाठ गाण पाठ अइ उज्जुए-साद सुगन्धित अज्जारणील-स्तन ४।५५ भा कोवणा-दुष्ट सास अजाएँ णवग-नरक्षन 1५० आदिभर- चन्द्र ६७० भणऊल चिअ-अनुकूल वचन ६॥२३ भर दीदरा-ध्यमिचारिणी अगुणअपमा आए-अगण्य अपराध १७७ अउलीणो दोमुहओ-दो मुहे ३१५३ | अणुदिअइबढि-आदर भकभण्णुभ धण-तकुक्ष ६९९ अणुमरणपत्थिआए-महाग ७१३३ अकण्णुअतुश-अलग ५४५ अणुक्त्तग-कुलीनता ३१६५ अक्वड पिया-देषानि १।४४ अणुहुत्तो-कृशाह ७-७ अगगिजणाव-लोकापवाद ५८४ अण्णग्गामपउत्था-कुतिया ७८७ अगणि अमेस-लोकमर्यादा अण्णण कुमुम-रसनोमी २०१९ अग्धार लिवह-मधूकपुष्प ७३९ अण्णमहिला-रूपगविता ११४८ अह्राण तणुभारअ-शीलमा ४४८ अण्ण पिकि पि-पराधीन अचासण्णविवाहे-तरुणगोपी ७५५ अण्णण तीरह-उपचार ४०४९ अच्छउ ता उणवाओ-मन्द स्नेह अण्णाण वि दोन्नि-भूविलाम अच्छदाव-उरमुकता २१६८ अण्णावराह-देषमाव ५८८ अच्छाई ताथइस्स-हाँमा ४१४ अण्णासाई-विरोधाभास ११२३ अहेर व णिहि-विवस्त्रा १२५ अपोमु पहिअ-शिकारी ७१२९ अच्छोडिअवस्थ-प्रस्थानशीला अण्णो को दि-निरस सरस ५३० अजअ णाह-अज १८४ अण्णोपणकडक्स-कटाच दृष्टि ७११९ अज कश्मी वि-याच वधू २११९ अता तह-आशङ्का १८ अज्ज गोत्ति-रेसाङ्कन ३८ अत्यकरूसण-स्नेह पदवी ७७२ अजमए गन्त-व-अमिमार ३४. सणेश पुत्त-स्नेहानुबन्ध भज मा नेण-प्रतिध्वनि १२. अद्दसणेग पेग्म-दुराव १८१ अपि ताव-सशय ६.२ असगे महिला-प्रेमलीला १८२ अजमोरण-गलिक ४१६० । अद्धच्छिषेच्छिअ-मुग्धा ३१२५ अज म्हि हासिआ-मनोरजन ३.६४ अनो हुत्त हजार-विधुर ४।७३ अज विवा-नहस्यमय २०१२ । अन्धअरवोरपत्त-ईयोपरायण ३१४० अज्ज वेअ पत्यो अज-मना २१९. अप्पम्पन्न-त्रिविक्रम अजवेअ पउत्यो उजा-चौर रति १५८ अपच्छन्दपदाविर-मृगतृष्या ३१२ सज सहि वेल-सवेदना ४१८१ अपचपत्तम-असनुटिन ३४१ [१७] पाठ ६।५९ ४॥६६ ६९४ ५।३७ ११२२ २.८७ ५११०० १२० ७८० ३।४२ ७८५ 1११ ६.७८ १४२ गाथा सन्दर्भ पाठ गाथा सन्दर्भ अप्पत्तमण्णु-द्वेष २१२७ । अहिणवपाउस-मयूरनृत्य अपाहेद मरन्नो-मृत्युशय्या ७३२ | अहिलेन्ति सुर-अपराजिता अग्मन्तरसरसाओ-कोद ७।२३ आअण्णा-भाला अमअमअ गण-स्पर्शसुर ११६ आअण्णे अहअणा-पदचाप अमिअ पाउअ-प्रयोजन १२ आअम्बन्तक्दोल छुईमुई अम्बवणे भमर-अमराई ६१४३ आअम्बरोभणाण-सद्य खाता अम्हे उज्जुअसीला-नसरा ६ ६४ आअरपणामिभोट-चुवन भलिअपमुत्तम-उत्पण्ठिता आभस्स कि गु-सोच विचार भरिअपसुचवरन्तम्मि-दावच ७.४६ आउच्छणविच्छाअ-विदा के क्षण अरि हिज्जर-केदार घोत ७९० आउच्छन्ति सिरेहि-साई अवमाणिो वि-प्रत्युपकार ४/२० आक्खेवआई-प्रियवाणी अवरज्झसु-सहिष्णुता ४१०६ आणत तेण तुम-मछपक्षी अवरण्डागजामाउ-जामाता ७१८३ भामभसा भवराहेहि-शिष्टाचार भामजरो मे मन्दो-उदासीन अवलम्ब-उद्घान्न ४।८६ श्राम बहला-नर्मदा अवलम्बिअमाण-रूझन १८७ | आरम्मन्तस्स-विजयलक्ष्मी अबस्थिऊण-सशयापन ३५८ आग्दा जुण्णअ-भुमय अविअण्हपेक्मणिज्जेण-अतृप्त १९३ | बालोअन्त दिशाओ-क्षितिज अविइण्डपेच्छणिज्ज-सचिन कर्म ११९९ | आलोअन्ति पुलिन्दा-पुलिन्द अविरल पदन्नणव-वर्षा ५३६ | भावण्णा कुलाइ-सालाहण अविहत्तसधिवन्ध-भ्रमर आसण्णविआइ-मुरत कथा अविहवस् क्सण-चूडिहारिन ६।३९ | आसासेर परिभण-आश्वासन अन्वो अणुभ-अनुनय ४६ | भरोजको-सगम मुस भन्यो दुकर-केशपाश ७३ | ईस जर्गेन्ति-बहुविध गुणावली असमत्तगुरुअकज्जे-अट्टहास ६:३७ ईमामच्छर-ध्या मस्मर असमत्तमण्डपाविभ-निर्णायक घडी ३२१ | ईमानुभो पई-ईष्यालु पति असरिसचित्ते-विकल्प उअ लदिउण-रहें। मह भम्ह आअदो-उपपति ४१ उअ ओलिइ-निझर महअ रज्जालुहणी-महार २।२७ | अगअचउत्थि-वियोगानु अहम विभोम-विरदाग्नि ५.८६ उअ णिचल-बध्यान अहरमपाग- नैक उअ पोम्मराअ-शुकपक्ति अहव गुणविव-गुणविता ३३ / उरि दरदि-बबूतर यह समाविअ-दोरगापन રૂ૨ अममम-वजा मह सरसदन्त-चाँदनी उअ सिन्धवपवध-सैन्धवपर्वन अहसा तहिं-वाशीकुञ्ज उग्रह तरकोडराओ-वृक्षकोग्र भह सो विलक्स-पश्चात्ताप ५.२० अपडलन्तरो-बकुल महिभाभमाणिणो-कुलाभिमानिनी ११३८ | उक्खिप्पा-चक्रवात ६१४६ २०१६ 41६७ ३८३ ३।११ જા૨૭. २१५९ ५.९० ७० ७१४४ १७. ५।६१ ७७९ श६३ १२० [ १७१] ४१." गापा म पाठ सजागरभगार-मजाशीमा ५८२ | भोहिमो-जगन उनुभएकसूमइ-मकाप्रति भोहि भोपा." समामि-गोत मार मोहिम मास-मानिस दुनमहाररम- निस ४.मा- रेप हाई नाममनो-परासी ३३ किग उसको पिभरे-प्यार घण्टrt- उपगधे मजे-चेतावनी रमा- उपापानिजो-मधूग्मत्र राय गर्भ रह-तुण्ड पासवाण-शेरबजारी . कनारगु-गजाम उपागम मुह-मुस्तान कमलमुक-तानन परहिआर-उपुहिका कीदा कमलामराममिप्रा-गाया सम्ममा भिमाई- ४४६ करमरिमन-मोर बतावतेपर-प्रबनना करिमरिमा-मिम्पामिना" रतबीमा दिउ-शेकिन ४०१ उम्वार पर कुर-रोमाम पण विभ-अशोभ काम करो-रणापना परमपरिण-मविनय अवजा कस्म मरिमिटि-महानुभूति ४८. परकमसदेसा-संदेश ४४३ मन्नारीहरय एकचि रूप-देवता करि गुदर्शन मामा ०१७ पनिण-प्रसार १५४९ मे परिण-पर समसमभोलिहिल-गगनयनी ०१८ साविगिता- दीश सकेकमयाबेठन-विसर पछी १२. कसा सोहागना रेशनिकर कई मोग-एसरमिक यो पशुभ-उपपति प्रेम कारिममारन्दर-पुम्पती पदो दिक-समंत्रम १॥२५ किकि-गाभि पहिवारे जो-यात प्रेम शिप मशिन-नयन की मारा 1. पचाधिश मोर-N किमा-निगम ".. पत्य गिमजर-निशा ..मगर सहोमो-स्नेहम पत्य मर रमिसम्बरहरका ४५८ ( हम औ-प्राचामन पामेत्तरिम जर-भक्तिीपदी किपिकि अ-विषम प्रम ६०१ परमेत गा-धमात्मा कोरगनि मेत्री सो मामि जो-दुर्लभ ३९. कीरमा मान-भिभुम्य पदमीमा-शस्पन दुधाो स्वि-मद पहा सोगि-मनोरम "ममममा-विरोधी ४३१ सिहरनाम अबनायो के उबस्मि-अनुजपा का रहिसि नलि-मामामना neu ११ भोमराग-सामुन १३. केमिनेस-मानधुपा ७७० 41.3 ४८ गमो भग्ग-विधवा [१७२) पाठ |७१ २१९३ ११३ 313 ३१३ २१८ ४॥२४ रा० २९ ७९८ ६७६ सन्दर्भ केलीभवि रूसेउ-अनुरक्ता कैमररअ-केसर पराग कोत्थ जम्मि-पयोधर योसॅम्बकिसलअ-प्रोत्साहन सणमहुरेण-क्षणमहुर सगमेत्त-प्रच्चन्न पाप खन्धगिणा-सिन्नमना सरपवगरअलग-बिजली सरसिप्पिर-पुआल साणेण अ पाणेग-प्रशिक्षण सिण्णस्त उरे-खित्रपति खिप्पर हारो-काल प्रभाव रोम कन्तो-अनमधरी गअकलह-गजगामिनी गगण्डस्थल-मद गबहुवेहल्वभरो-भारवाहक गञ्ज मह-कठोर हृदय गन्ध अग्घाअनअ-आश्वासन ग-धेण अपणो-परिमल गम्मिहिसि तस्त-मृगाक गमअछुभाउलि-उदिन गह वह गोम्ह-जारपति गहवरणा-आभूषणादि गह वासोचिएपु-पुलक गामङ्गणणि अडि-द्वारपाल गामणिधरम्मि-सदिग्ध गामणिणो सव्वासु-ग्राम नायक गामतरुणिो-ग्राम तरुणी गामवडरस-पूर्ण प्रेम गिजन्ते मङ्गल-मङ्गल गान गिम्हे दवग्गि-भ्रम निवारण गिरसोत्तो-गिरि स्रोत गैअच्चलेण-प्रलाप मेड पलोअह-प्रथमोदन दान गेह व वित्तरहिअ-वियोग गोतावला-वध्यमादिष गोलाअ-सत पार गाथा सन्दर्भ २२९५ ] गोलाणइए-संक्न-स्थान ४४.७ | गोलाविसमोआर-पवित्र पाप ४१६४ परिणिधणत्यग-शकुन १११९ घरिणी महा-परिहास ५।२३ घेत्तुंग चुण्ण-हर्षोच्छ्वास २१८३ / चक्षुपुडाहअवि-प्रमाधन चत्तरपरिणी-कुल शोल ६८३ चन्दमुहि-चन्द्रमुखी चन्दमरिस-अनुपम ७६२ | चलणोआसगि-वेशाकर्षग वावो सहावसरल-वकावक ५.२९ चिक्खिलखुत्त-अभिशाप चित्ताणिअदहअ-कलहिणी ५.९९ ३५८ चिरडि पि अआण-तो-वर्णमाला श, घोराण कामुआण-कुक्कुटध्वनि ७.३० चोरा सभअसतह-प्रौढपतिका ६६६ / चोरिअरअसद्धालुइ-चौर्यरति घजा पटुस्स-शोभनीय ३८. विजन्तेहि-असमजस नइ को तो-कबुकी ४१८३ जह चिखल-रोमान ३२९७ ना जूएइ-नियत्रण २०७२ जण छिवसि-चञ्चल हाथ ४.५९ जह भमसि-गोष्ट भ्रमण ६५६ जइ लोअभिन्दिन-मर्यादामह ५/६६ जा मोण वलहो-प्रफुलित अई होसिण-पाई ६४५ जज आलिहा-भन्नमनोरथ सज करेसि-अनुसरण ७४१ जज ते ण-उपदेश जज पिहुल-कृष्ण ६१ जज पुलएमि-मर्वव्यापक ४।३४ जज सो णिज्झाअह-प्रदर्शन २१.० व तणुआअह-सनाप ७.९ अन्तिम गुल-अरमिक ज तुझ सई-मम कारण २॥७ जम्मन्तरे विचरण-जन्मान्तर। ४।४७ ७. ७७२ श६७ ५.४७ ५.८० ४४३ ७/१६ ४७८ १७० ६।३० ॥७३ ६५४ [ १७३ ) गाथा सन्दर्भ जस्म जद्द-असीम मौन्दर्य जह चिन्नेह परि-ग्रामणी नन्दन जह जह उवहर-नवयौवना जह जाजरा चदाव उतार जह जद बाह-छानुमरण जाएज वणुद्देम-रसिक जन जाओ सोवि-गाढालिङ्गन जाणा जाणावेउ-शील जाणिवणाणि-प्रियवचन जारमसाण-कापालिका जाव | फोसपिकाम-रसलोलुप जिविअ असामअ-विडम्बना जीविभसाइ-निष्फल प्रेम जीहार कुणात-कुलीन जुज्झचवेशामोडि-वृद्धपति जे जे गुणिणो-गुणगाहक जेए विणा-जीवनाधार जे गीरम्ममर-शोकगीत जेतिअमेत्त तोरइ-सलिन तिमेतारच्छा-नितम्दिनी जे ममुहागअ-मदन शर जो वह वि-यामुक चोर जो जस्स विडव-विस्मय जोनीऍ भइरराओ-अधरराग जो दि ण आण:-भग्न बलय जो सीसम्मि-गणपति झम्झाबाउत्तिग्गिा-सावी झम्झावाउत्तिगिए-मोषिनपतिना टिहाचा-अपना पराया ठाणामहा-स्थानभ्रष्टा ह झसि ज्शसु-वह सद्भाव ण अदिद्वि-नववधू अगम्भन्तर-अश्रुपूरिन नेत्र माइकरमच्चाहे-अनित्य यौवन ण गन्तो-मान सुक्सुडिस-युवा अमर पप गुणेग-रुचि पाठ पाठ ३॥३४ | णचगसलाइग-मनिभ्रम ७२० जस्विरहण-दानर बानरी ३२९२ | गन्दन्तु सुरभमुह-वेश्या प्रेम 31९३ ण मुअग्नि-दहुवलम ४।४ | गलियोमु भमसि-मधुकर ३३. गवकम्मिएण-निलंज किसान ७९० णवपल्लव-नव पलव १८८ जवल भपहर-रोमाश्च ७।४९ । शववहुपेम्म-मारवहन २।२२ ५८ ण विणा समावेण-माइ ३२८६ ५॥४४ ण वि तह अइ-विपरीत रति ५.८३ ३.४७ वि तह अणालव-ती-उदासीन वचन६६४ २१४९ ण वितह छेअ-रमण सुव ण वितह पढम-लजीलापन ३.९ ण वि तह विश्स-सताप ७६ णास वा सा-दन्तक्षत श९६ शाह दुईप तुम-वर्मवार्ता ७८ ४४५ 8123 २१४४ 15९ २६३ ५।२२ णिअआणुमाग-शङ्कारहित १७५ अिधशिअ-कुटरव ४४९३ जिभवासारोवि-नैपुण्य गिकण्ड दुरारोह-अविवमनीय निकम्माहि-विधुर ३११२ किन जापा-जायामीर २. लहन्नि-विदग्धोद्वार ५।३८ निहायको-मसम्भव ४१७२ | रिहालम-अलसदृष्टि शिपतिमाह-नमक १५ निषण्णमस्सरि-मानन्द गान १६९७ वुदरमा-अनुमहीना ७ १२ | मिहुअ सिप-मुरलशिस आई अज-रिदय पहपाउअगा-नौलवस्त्रधारिणी ६.५० मागमुक मेश्र-आत्मविस्मृता २४१ पदिमश्र-अन्नामों १२६ मेनि जे पहुस-नारी प्रिय ४३. पेरकोहि-नूपर ८८ ४१० बोइटिन-मनोशमना ४.४४ 14 ४ ७८९ ६६८९ 19. ४७७ [ १७४ ] माथा पाठ ४७५ २०१३ ३३३ ११४९ ६२८ ६१४४ १८५ ६।३८ ६।४७ ५२ ७९३ ४।१९ गाथा सन्दम पाठ सन्दर्भ तरा कधग्ध-गर्मिणी १९२ तेण ण मरामि-पुनर्जन्म तह बोलन्ते-प्रेमातुर ३१२३ ते विरला-सत्पुरुष तह मुह अ-अश्रुपात ૪૨૮ ते वोलिभा-अतीत तडचिणिहि अम्ग-मेढकी थणजह्णणिभ-स्मारक तडसहिअ-बाढ २०२ थोअंपिण-आमत्रण तणुएण वि-मध्यस्थ ४६२ थोरंसुरहिं ऊण्ण-सपलियाँ तणहम-नारायण २५. दरअकरग्गह-मदनोत्सव नत्तो चिअ-लेह केन्द्र ७.४८ दक्खिण्णेण-दाक्षिण्य त मित्त काभव-मिन लक्षण ३२१७ | दळूण उण्णमन्ते-पथिक पलो नम्मिपरसरिअ-मुग्म हरिण ६८८ | दळूण तरुणमुर-सूरत नस्स अ सोहग्ग-साहसपूर्ण ३।३१ | दळूण रुन्दतुण्ड-शूकरी नस्त कहाकण्ठपर-उपगूढा ७.५९ दळूण हरिअदीइं-रहस्य मार्ग तह नस्स माण-प्रेमतरु ५३१ | दढरोस-मृदुभाषी तह तेणवि सा-तृप्ति ७१२५ | दरफुडि अ-अंकुर तह परिमलिआ-उपचार चातुरी ७।३७, दरवेविरोरु-युगसञ्जा तह माणो-प्रतिक्रिया २।२९ दिअरस्स-पतिव्रता तह सोण्डार-चितवन ३५४ दिअह खुक्किा-स्मृति ना करेउ जर-घेरा ३१२१ | दिअहे दिअहे सूसइ-आशका ता मज्झिमो-सामान्य पुरुष ३।२८ दिवा चूभा-नायक तारुण-अभागिन २०४१ | दिदमण्णु-मान तालूरभमाउल-मवर १६३७ | दिढमूलबन्ध-दृढमाव नाव च्चि-विनम २१. | दीसइ ण चूअ-वसन्तागम तावमवणेह-सुकेलि 31८८ | दोसन्तो अणमुहो-दुष्प्राप्य ताविजन्ति-असमर्थता दीसन्तो दिद्विसहो-लाडली ना मुहअ-भविचार ७२ दीससि पिआणि-समस्या तीअ मुहाहि-पहेली २५७९ दीहुण्इपउर-श्यामशबल व्रत तुगाणे विसेस-रति समर ५५२७ | दुक्स देन्तो-मुखद दुःख तुह्रो चिअ-मनस्वी ८४ | दुक्खेहि ल-मर-कष्टसाध्य तुज्झगराअ-उच्रिष्ट ग्रहण २६८९ | दुग्गअकुटुम्ब-देन्य नुज्झ बमात्ति-अनुराग १॥४० दुग्गअधरम्मि-दरिद्र पनी तुप्पाणणा-लजावनत ३८९ | दुण्णिक्खेवभ-अर्पण तुहदसणेण जणिभो-लज्जालु ७.१० | दुम्मेन्ति देन्ति-मदन शर नुहदसणे मभण्हा-दर्शनाभिलाषिणी ६ | दुस्सिक्खिभरअ-रक्ष परीक्षा नुह मुहसारिन्छ-विधि-विधान ३७ दूर तुम-नीतिचातुरी तु विरहुजागरमो-दुर्भाग्य ५८७ | दूरन्तरिए-भ्रमणशील तुह विर हे-विरह याकुल १६३४ | देव्यग्मि पराठते-बालू की मौत ने अजुभागा-भाख्यान ६.१७ | देवाअचम्मि-दैवाधीन ११६२ ७.१४ २१३५ ३१२६ ७.९१ १९७ १६७४ ३७६ ५।२१ ७१११ १७ ५।८९ २२८५ ११०० ५.७२ 11 ७.२७ २।८१ ७-८ ३७९ [१५] पाठ ६४० ७.. २६६ २।९९ ५६५ ५।३२ ३२७ ४।२३ १।२४ ३२२२ ७७६ गाथा सन्दर्भ दे सुअणु-उत्सव रजनी दो अहुल-वानगी धण्णा ता महिलाओ-धन्या घण्णा बहिरा-अन्धे बहरे धण्णा वमन्ति-पर्वतीय प्राम परिभो परिभो-कामवाण धवलो जिभइ-दीर्घजीवी श्वलो सिना-चिचरजन धाराघुम्वन-कौए भावर पुरवो-मायूस पावा विअलिअ-शिशु भय धीरावलम्विरीअ-अन्तर्व्यथा धुइव-कलङ्क धूलिमइलो नि-दोल परपुरओ विभ-जार वैद्य पऊर जुवाणो-विवशता पकमलेग-पइमलिन पश्चगापुर-कुन्दकुमुम पच्चूसमजदावलि-प्रमान पच्चूमाग रञ्जित-दिनकर परसारि-रतिगृह पहिवखमण्णु-स्तन पदम बामण-वामन पढमणिलीण-मधुलोमी पण भविभाणे-मानयुक्त दम्पति पणिअम्बपता-श्यामलागी पत्तिय ग पत्तिभन्नी-प्रमाण पत्तो छणो-हताश पप्पुषणकलम्बा-हनीह परिओसविभसिएहि-अङ्गीकार परिमोस सुन्दराइ-परितोष परिमलणसुहा-काव्यालाप परिरकणा-यामीण नायक परिदएच-कुणी पतिम पिए-प्रमोचर पमुवाणी-मंगलाचरण पहरणमग-नायिका पाठ गाथा ५६६ पहिअवहू-अश्रुधारा पदिउतरण-उक्ति ४४९७ पामहिम सोहग्य-गाय रेल ७१. पाअडिप्रणेद-दृष्टि चातुरी ७.३९ । पाअपडणाण-बलात्कार २१ पासपदिम-चरम सीमा ७।३८ पापडिअस्म-उपहास ७६५) पापडिओ-अनादर ६।६३ [ पाणउडीय-आत्मसपंग ७५.६ | पाणिग्गाहणे-पार्वती ३९१ । पासासको-सशक Vi६७ | पिअदसण-प्रियदर्शन ३८० पिअविरहो-शिष्टाचार ६१२६ पिअमपरण-विरह व्यथा ३२३७ पिजर वणज-सनहसो सप | पिसुगन्ति कामिणोण-जलक्रीडा ६।६७ पुद्धिज-ती-आलिङ्गन ६९. पुहि पुस-रहस्योराटन पुणरुत्तकरफालण-नर्मक्ष ७.३ पुमा खग-नखक्षत ६१५२] पुसउ मुह-अनुप्रसाधन ३६० पुमियो एण्णा-विभ्रम ५.२ पेच्छद भन्द-प्रेम-रक्षण ५९५ | पेच्छन्ति अणिमिस-रागीर ११२७ , पेम्मरस विरोहिम-नीरसना ६१५५ [ पोट्टपडिएहिं-कृष्ण वर्ष २०१६ | पोट भरन्नि-उधार २०६८ फग्गुच्छण-फाल्गुनोत्सव ७३६ | फलसपत्तीम-अनुकूल प्रतिकूल ४१४१ | फलहाँवाइण-असती ६६८ फाले। अमल-भालू ५२८ फुट्ट तेग वि-मनोव्यथा ४९८ फुरिए बामच्छि-शकुन २०३४ | बलिणी वाभावधे-परदारापहारी ४८४ बदलतमा-सूना घर २१बदुभाइ-शीलभग १९३१ , बहुपुप्फ-चेतावनी ७४ ६।४८ ५.३३ ४२ ३९६ ४.८८ श१३ ३२८२ २०६५ २१९ २३७ ५६ ४३५ ३१८ २१३ ६।२२ ३।४६ गाथा सन्दर्भ पाठ । गाथा सन्दर्भ पाठ बहुवलहस्य-मिठास १७२ मागमारुस-शुभकामना ४।४४ बहुविइविलामरमिर-सहानुबन्धन ५७७ मागुम्मत्ताइ-मानोन्मत्त वहुसो वि-पुनरुक्ति १९८ | माणोसह-औषध ३१७० बालभ तुमार दिण्ण-बेरगुच्छ ५।१९ ममि सरसावराण-वाणी वैशिष्य ५.५० बालअ नुमाहि अहिभ-उद्देश्य ३१५ मामि हिअअ-यहुआ घूट बालभ दे बच्च-दयनीया ६८७ मारेसि कण-नयनवाण ६४ भगापिअसगम-ज्योत्स्ना ५.९१ मालइकुसुमाई-सगुग निर्गुण ५।२६ मनस्तरम-प्रहरी २०६७ मालारीए वेलहल-मालिन ६१९८ भण कोण-असमय ४१०० मालारी ललिउल्लुलिभा-व्याकुल ६१९६ मगन्ती-पश्चात्ताप ४॥७९ मा वच्च पुष्प-शोलोन्मूलन ४१५५ भमा पलित्तइ-जीवनसाथी ५.५४ मा वच्च वीसम-सल ७८६ भम धम्मिअ-मुझाव २१७५ | मामपसूत्र-रति रहस्य भरणमिमणील-आधार ७६० मुद्धे अपत्तिअन्ती-मुग्धा ७७८ मरिउच्चरन्त-शोकादर ৮৩৩ मुइपुण्डरीअ-राज हस ७२४ मरिमो से गहि आइर-स्मृति १७८ मुह पेच्छओ पह-दर्शनाफांक्षी ५.९८ मरिमो से सण-कपटनिद्रा ४६८ मुहमारुरण-उपालम्भ ११८९ भिचारों-भिक्षाजावी २०६२ | मुहविज्झविअ-चौर रमण ४।३३ मुझसु स साहीण-लह गरिमा ४१६ | मेइमहिसस्स-इन्द्रधनुष भोणिदिण्णपण-भोगिनी ७।३ | रहकेलिहिअगि-रनिकेलि मअग्गिणो-देशभार रइविरमलजिआओ-रमणातर ५1५९ मग चिअ-फेन ७६९ रक्रोह पुत्तअ-पथिक गृहिणी ७२१ मज्झण्णपस्थिअस्स-मुखचन्द्र ४।९. रण्णाउतण-प्रम ३८७ मज्झ पअणुअ-माप ७८२ रत्यापदण्ण-प्रतीक्षा २०४० मज्झो पिओ-न्यायपत्ती ६।९७ रन्धणकम्भ-सान्त्वना १।१४ मण्णे आअण्णन्ता-बालभ्यभिचारिणी ७.४३ रमिऊण पअ-रमण १९८ मण्णे आसासो-अमृत ६।९३ रसिम विभट्ट-समय मद पिण-जामाता ६१०० | रामविरुद्ध-राजद्रोह ४।९६ मरग असूई-सकेत स्थल ४.९४ | रुन्दारविंद-बसनलक्ष्मी ६७४ मसिश चम्मन्ती-वर्धनी रूअ अच्छीमु-भावना ।३२ महमहइ-अकोट वृक्ष ५०७/ रूअ सिठ-रूप ६७३ महिलाण चिअ-प्रवास ६४८६ | रेहा गलन्त-विद्याधरी ५।४६ महिनामहस्स-सतप्ता ૨૮૨ ६।६१ महिसक्खन्ध-वीणाशङ्कार ६६. रोवन्ति ब्व अरण्ण-झिलोशीट ५.९४ महुमच्छिमआइ-मधुमक्षिा ७६३४ | लङ्कालाण-रानिवासी महुमाममारुश्रा-वसन स०८ राजा चत्ता-अपयश मा कुग पहिवरव-गुरुमान १५२ रहुअन्ति-रघुता मा जूर पिआ-रोद ४११४ । लुम्बीओ अङ्गण-दृष्टिक्षेप ४॥२२ रहति कुमुभ-कुमुद [१७] पाठ ६१० ४४. २३१ ७५९४ ६२१ १२ ।३९ ७१८८ ४॥३६ ७।१०० ५1५८ ६।१२ गाथा सन्दर्भ लोमो जूएर-प्रलोभन वणे मणम्मि-हूँ हूँ वाविवर-विज्ञापन वक को पुल-वक्रदृष्टि बनिनपेच्छि-घोदशी बजवडणा-यन्दिनी वगदवमसि-विन्ध्य शोमा व अधअलिप्प-सकोन वणकामरहिअस्म-रेखाचित्र वण्णन्दीहि-मारीभून वण्णवमिए-वशीकृत धन्दी णिह अ-गुणवैभव वसा जहि-सलप्रति वसम्मि-सत्पुरुष वाभादकिं-विरह दुख वाउसिचअ-दस्तक्षत वाउलिमापरिसोसण-ग्रीष्म वाउवेलिभ-पके पीछे वाएरिएण-अतृप्त चुरन पावारविसबाअ-गुरुजन घासारत्ते उपणअ-काशकुसुम वाहरउ म-प्रतिबन्ध वाहोदमरिअ-शरथ वाहित्ता पहिवण-नष्टस्थल वादिब्द वेज्ज-विरह विकिण्णा-पामर जन विज विजइ-अनुमरण विशाम्हणालाव-विन्ध्यारोहण विण्णापगुण-लज नुमद विरहकरवत्त-अक्षु विशवाणलो-विरह ज्वाश विरहेग मन्दरेण-मन्दार पर्व विरहे विस-विष एवं अमृत विवरिअमर-विपरीत रति विसमद्विप्रपिके-शगृहिणी वीसत्यसिम-दायित्व-मार वेविरसिषण-पत्रारम्म १२ गा०शक पाठ गाथा ६।२९ | वेसोसि जीन-उपेक्षित १६ / बोटमुगओ-सकटापन वोगालक्सिम-वोरान २१२४ मणे विना-आलिङ्गन २०७४ माभग्यदर-मदिरा ११५४ मवेलिभो-वर्षागम 21१७ मच्च कन्हे-कलह सच जागा-अनुराग ७११२ मञ्चमगामि बालभ- माद ४५० पञ्च मगामि मरणे-तृष्णा ५७८ सच मादसु-चापसी 14 सनीवणीमह-रक्षा 134 सझागहिजल-मिथ्याभार महापात्राओ-जसविक ६1. सदाममए-शिव-गौरी ६७ मगिमणि-मोम ७.२६ मत्त सतर-यय परिचय मन्नमम त-कुलकलदिनी २०७३ मम्भाव पुन्ना-सद्भाव ७११६ / सम्भावणेहमारिए-आसक्ति ५.३४ समविसमणिधिमा-मनोरथ २३. | ममसोक्सदुक्स-जावन मरण ६१८ सरए मददाग-कुपित हदय ५।१६ मरए सरम्मि-तुलनीय ४६३ सरसा वि समह-पीतवर्गा ३३८ मवाहणसुइरस-विक्रमादित्य ५७ | मनत्यदिना-मेघमण्डल ७३१ सम्वरमम्मि-मझान ३६७ | मव्वाअरेण-प्रियजन २५३ सहइ सह चि-दुर्विदग्र १४३ महिआहि-मखचिड़ ५७. सहि ईरसिन्विभ-प्रणय गति ३३३५ | सहि दुम्मेन्ति-कामदेव ७५४ सहि माइम-प्रश्न मा आम-हीन माना કા सा तुर सहत्य-निर्माल्य ३।४४ । सा तुझ वडा-विकारयुक्त प्रेम ४।२७ २०४१ ७७३ २०४२ २२८६ ७२२ ५/६४ २१५ ३१२९ ७/१० १२५६ २०४५ ११० २७७ ૨૨૪ ૨૨૬ [१८] गाथा सन्दर्भ मातुइकएण-प्रत्याशा सामाइ गरुम-कर्णाभरण सामाइ सामलिजा-एक्षण सालोऍग्विअ-पाद प्रक्षालन साहीणपिअअमो-स्वाधीना साहोणे वि पिअअमे-कत्तंन्य सिकरिअमणिभ-काम शिक्षण सिदिपिच्छललिअ-प्रोत्साहन सिहिपेहुणाव असा-मयूरपाया भणु वण-जिनामा मुअणोज देम-अल्करण सुअणो ण कुप्पा-सञ्जन सुक्खन्त बहलाम-जलप्रदेश मुणअपउरम्मि-पासा सुन्दर जुआग-उदिम सुप्पट तहओ-शेषालिका सप्प डड्द-व्यर्थ मुदउच्यूअ-कृतज्ञताशापन सुइपच्छिार-कटु औषधि सूजर हेम-दरिद्रता मूविहे मुसल-तिल का ताड सूरच्चलेण-गक्ष सेअच्छलेण-त्रिवली से उल्लिअसब्वगो-दूती पाठ गाथा सन्दर्भ पाठ ३१६२ सो अत्यो जो-यथार्थ ५।३९ सो को वि गुणाह-नेत्रपान ६।९१ ૨૮૦ सो णाम समरिजा-स्मृति ११९५ २१३० सो तुज्य कर-दूतो १1८४ ६।१५ हसेहि वि तुह-मानसरोवर ५७१ इत्यपसेण-अनुरक्ता ५६२ हत्याहत्यि-वर्षागम ६८० ४९२ हत्येसु अ पारसु-मुग्धा ४७ २५२ हरिहा पिअस्स-गमन निवारण २०४३ २०७३ फिलहाश-बडम्पन ३६६९ | हाणहलिदा-जिज्ञासा १८० ११९४ | हमिअदिवदन्त-कुलवधू ६.२५ हरिअ सहत्य-उपहास ३१६३ ५:१४ | हमिएहि उवालम्मा-मान की रीति ६।१३ २०३८ दामाविमो जणो-प्रतिवर्जन २।२३ ५.९२ दिअअ दिअए-प्रणय-पत्रिका ५॥१२ हिअ अ-दारिद्य दुख ६।५७ अअहिअस्स-मोहासक्त १५० हिअण्णएहि-प्रतीति ४१७ | हिअम्मि वमसि-प्रेम शङ्का ६८ ४॥२९ हिअअहिन्तो-कपट वचन ६५ हेमन्तिआसु-लोकापवाद ॥६६ ४१३२ । हेगकरण-गणाधिपति ५।३ ३७८ | होन्तपहिअस्स-विदा के क्षण ११४७ ५.४० होन्ती वि पिष्फल-निष्फल २३६ ३१०८ - परिशिष्ट (ख) गा. क पीतांबर १ १ शालिवाहन २ भुवनपाल वसरान वत्सरान कृताल ० " D कवि एवं कवयित्री भुवनपाल गा क्र पीतांबर १ २६ अर्धराज्य २७ कुमार पोट्टिस २८ प्रणाम २९ शल्याण मालाहग ३० हरिनन ३१ अगरान चलोग्य ३२ भोगिक मयरन्दसेर ३३ अनग ३४ अनग ३५ शालिवाहन कुमारिल ३६ मल्लोक महिभूपाल ३७ अवरक " " " ४ योदित, वोडिस कु ५निलोक, चुलोह बु ६मकरन्न ७प्रवरगन, अमररान कु ८ कुमारिल ९ १० अनाक सिरिराअ कु " . " हरिरान याक्पनिरान भोन अनादेव रविरान हाल माहिल अलवर चुलोटक विभ्य मुग्म . . ३९ कविगन दुर्गस्वामिन् दुर्गस्वामिन् . ४० . . " १२ दुर्गास्वामिन् १३ हाल कुन १४ भीमस्वामिन्, हार ४१ नाथा ४२ वल्लभ ५ " ४३ अमृत ४४ रतिरान " ४५ प्रवररान " १५ गजसिंह १६ शालिवाहन " " वलम वैरसिंह कविराज प्रवररान मेघर साहल अनिरुद्ध सुरभवक्ष गजवर्म " १७ रुद्रमुत श्रा शातवाहन श्रीवर्मग श्रीवर्मण गुण . " . " " वघर्ष " " ४७ सिंह ४८ अनिरुद्ध ४९ मुरभव सल ५० स्वर्गवर्म ५. काल ५२ वैशार ५३ममय ५४ वर्ण ५५ कुसुमायुध १९ गज २० च द्रस्वामिन् २१ चलिराज २२ ३ मकरन्द २४ ब्रह्मचारिन् २५ जालसार- " कलिंग बहुराग मेघापकार ब्रह्मचारिन् | कालसार . " परर पण्मुस कर्णराज कुसुमायुध " " [१०] " भुवनपाल बटुक फरकुन वाक्पनिराज स्थिरसाहस " . " " " " मान नन्नराज धर्मग नरनाथ मान ग्रामणीक महाश्य श्रीधमिल दामोदर " " " "" ३मान . O " " 0 " गा. क्र पीतांवर १ ५६ गजलज. ५७ मकरंद. ५८ असहा. ५९ मुग्धाधिप. ६० मुग्धाधिप. ६१ मुग्धाधिप. ६२ ब्रह्मराज. ६३ कारित. ६४ प्रवरसेन. ६५मुसराज. ६६ धीर. ६७ धीर. ६८ कालाधिपर. ६९ अनुराग. ७० अनुराग. ७१ ૭૨ ७३ वसलक. ७४ पौलिनय. ७१ ७६ भीमविक्रम. ७७ विनयायिन. ७८ मुक्ताधर. ७९ काटिह. ८० मकरन्द. ८१ स्वामिक. ८. स्वामिक. ८३ कृतशशील. ८४ शान. ८५ आहिवराह. ८६ प्रइना. ८७ रेवा. ८८ ग्रामकूर. ८९ पोट. ९.रेवा. २१ गजदेव ९२मानग " भुवनपाल | गा. क्र. पीतांवर गृहलषित | १ ९३ वज 'करमदशेल, १४ हारकुन. असद " ९५वप्रराज. हूणाधिप,- ९६ स्थिरमाहम. विग्जूहराब ९७वप्रराज. विचित्र ९८ मकरन्द. ईश्वरराज ९९ श्राशक्तिक. पालिक " १०० यीशक्तिक. सयरसेन ૨ आख्यराज २मान कृष्टसदिर कोढिलक ४मान. चित्तराज ५महादेव. धृवर'ज चद्रपुट्टिका " ७ अलीक. मुद्धसील ८ भ्रमर. अज्झ ९कालर्मिह पीतहhण १० मृगाक. पालित्तक ११ मृगाक. वासुदेव १२ निधिविग्रह. भीमविक्रम १३ मुद्द- विरयादित १४ वुर. मुक्ताफल १५ क्मल. कादिलक १६ हालिक. मधुकर १७ शालिवाहन. मधुकर १८ शालिवाहन. स्वामिन् | १९ शालिवाहन. कृतपुराशील २०शारिवाहन निघट्ट २१ गधराज आदिवराह २२ कर्णपुत्र. पृथिवी " २३ अविराग. रेवती २४ राम. ग्रामट्टिका राम. पुट्टिस २६ उजय २७ शालिवाहन. २८ शारिप. मातंग २९ शालिक. " " 0 7 महादेव चमर कालियसिंह रसिक ताराभद्र नारायण मृगेंद्र गुरप कमलाकर ललित काहिल कृष्णराज स्कददाम " " " " " " " . " " . " " कर्णपूर अनुराग " " " " प्रवरसेन " . " ग्रामकुटिया स्वामिन् N [११] भुवनपाल/गा. क्र. पीतांबर . माभिवृक्ष २ वोगराज भुवनपाल आध्यराज महिषासुर पुण्डरीक " " 0 ६८ D " o . " ७० . . " . नरवाहन मम्वामिन् " ० गा. क.पीतांवर २ ३० शालिवाहन. ३१ सोमराज. । ३३ ब्रह्मगनि ३४ विकमराज ३५ कीनिराज. २६ कुदपुत्र. ३७ शक्तिहस्त. ३८ ३९ अनुराग. ४० ४१ वरशक्ति. ४२ . " . . क म्याघ्रस्वामिन् आन्ध्रलक्ष्मी नागधर्म " . " . ० " " . " हात . 6 ૪૨ 2 . ० " " . ४४ वलयोपित. ४५ बल्योपित. अविरत मावशक्ति नागभट्ट अचल . " " . " . " . " ४७ . 9 ४८ . " साहस निकोप ." ४९ . . " . योतिरमिक ७२ क्दुक माधव ७४ देवराज अनुराग ७६ ७७ रवशक्ति ७८ बधुधर्मन् ८० मालबाधिप ८१ मालवाधिप " ८२ विजयशक्ति ८३ ८४ विरहाणेल ८५ अवक ८६ केशवराज ८७ निप्पल्क ८८ मानग ८९ मातुल ९. सवज्झ मगलल्याला " ९२ हाल १३ प्रवरराज " . ९५ हरिकेशव गुणाढ्य ९७ भ्रानुक " ९८ स्वधर्मग रेघा १०० हाल 3 १ कादिलकी स्वामिन् ! ३ ५१ कलय " " ० ० " . ५२ . " ० . " 9 ५४ . " . " . . " . " . " . o ५८ . . " . . अनगदेव धर्मिण हाल मदाह स्थिरवित्त काटिल्ल गागिल वत्सराज भार कशपुत्र हरिवृद्ध मणिनाग राघ्रदेव प्रवरसेन दुलहस्तिन् " ६० " . . . ." . . स o 0 "६४ . . . .

[१८२ गा. म. पीतांबर ३ ४ . " . “भुवनपाल ममथ वहभट्ट सुदर इलक रोल्देव ६ 0 ० " ७ . o " ८ भुवनपालगा क्र. पीतांबर बधुदत्त हाल ४२ . ४३ मागहस्तिन् प्रवरसेन ४५ भानुशक्ति ४६ माधवराज "-४७ अनग अमरि ४९ त्रिविक्रम ५० . . " १ ९ . o . " १० . . " . . " . " . १२ १३ हाहुल मुचरित मुश्क सज्जन हाल रिंद्र " " ० . . " s . " . " ५० . " ५३ o २७ . . " १८ . . हाल सर्वसेन पालित्तक आढ्यराज देवराज अरिकेसरिम् ब्रह्मचारिन् |" अनवरत . ११ . " २० . J " . २१ G ५८ . . " . २२ १२३ १२४ . . ६० ० ० . पालित्तक गोविंदस्वामिन् पालित्तक पालित्तक कविराज हाल ऊर्ध्ववश दुर्विदग्ध पालित्तक आन्ध्रलक्ष्मी मुईक हाल पराकम समुद्रशक्ति हाल मेघनील " २५ o . " . D २७ ० " मकरद ६२ विक्रम ६३ हाल आ घलक्ष्मी ६५ विल्लभे ६६ असमसाह " . " . २९ 0 " " . . . " o . " . . निरुपम सर्वमेन , दयराज ७० " . " . पर्वतकुमार 0 " . १ " " ० हाल देज्झर मल्लसेन " . " ७४ ० o " 0. " . " ३. अनुराग ७६ যান समरस निरवग्रह *४० क " ७७ [१३] गा- क्र.पीतांवर . ३ ७८ . O मुवनपालगा..पीतांबर १५ जीवदेव १६ विध्यरान ७ विशुद्धशील " " ७९ भुवनपाल नागहस्तिन् रिलोचन यस्वामिन् भीमाधव अवन्तिवन प्रवरराज . " ८० . ८१ . . . " ८२ . " क अरकार " ८३ . . " २१ ० " ८४ . " २२ . अभिनवगजेंद्र ८५ ० . . हम हम नुतोहक सुतारक . " o ० " ८७ ० " २१ २६ - ८८ O " ८९ . " . ०७ . " " २८ हरिमग एक्ष्मण कृष्णचित्त कृष्णरान राज्यधर्मन पाहिल मधुमूदन " . " . " ". ९२ o महासेन धनंजय कृपाचरित्र प्रमत्र महारान वजदेव विरहानल आर कैवत " " ९३ ९४ . . " मल" ३२ ३३ ३४ 0 " ९१ . . " " . " ३१ . . " ९७ " . . विषद माविषमाफ मर्वस्वामिन् कीर्तिवर्मन आउर शिराडिन् । बमचिह " " ९९ . ३८ . . ३९ ४ १ 0 ४० . ૨ . " " . . ३ ४२ o ४ . शशिप्रभा प्रामदुट्टिया , मुग्रोव a महादेव विश्वसेन हाल प्रवरराम जीवदेव "राज पाहिल चुहोर राम मदर मायरान शेषर नागदन्निन् " ५ ० "" ४४ ६ O " ४५ " ७ D " ८ ४६ . . ४७ . . ९ ४८ . १० मुदर्शन अनुग . " ४९ . . . 7 . 0 " १३ नरमिट चक कदटागृह . " [१८४] गा. + पीतावर . भुवनपाल तारामट्ट हाल " . . " . " ५६ . " पारित्तक बयस्य " . ५८ . " . " . " श्रादत्त मन यशेखर " ६० . . " 0 . . " " 0 ६२ ६३ मालवला महोदधि o " . " " . 9 o " . " " ६७ . " . " . ० " ६९ ० . " . " ७० . मुवनपाल गा. क्र. पीतांवर मिधराज ९० शारिवाहन ९१ नदन ९२ नन्दिपुत्र अशोक ९३ पालित १४ पालित गुणनदिन् ९५ मानस्वामिन् जयकुमार ९६ वल्लण ९७ मलयशेखर रोलदेव ९८ वजनक ९९ मगलकलश वासुदेव " १०० महोदधि विशाल १ शालवाहन विक्रमादित्य २ विग्रहराज ३ ४ कहिल राहद ५ ब्रह्मचारिन् ६ ७ वामगन ८शालवाहन हाल ९शालवाइन हाल १० नागहस्तिन् | " दुगलक १२थाशक्ति अनुराग १३शकर मानुराज १४ शाळवाहन विशेषरसिक १५ब्रह्मदत्त चल्याणमिह |" १६ रोलदेव सबमर १७ पालित मृणाल १८ देवदेव केशव शिलिंध २०शारवाहन मत्तगजेंद्र २१ राजरमिक कृविद २० दशरथ २३ सरण दुर्द्धर, २४ क्वगतुग २५ पालिन २६ मृगावलक्ष्मी विरहानल २७रक्ष्मण " . " . ० " ७२ . पृथ्वानदन " ७३ . ७४ . " नील श्रीदत्त " ७५ ७६ . स्वमाव " ७७ . " ७८ . रोलदेव देवदेव " . ९तुहक भुजग " . " ७९ ८०प्रतान ८१ केशव ८२ नीलमानु ८३ मत्तगजेंद्र ८४ कुर्विद ८५ मत ८६ दुद्धर ८७ दुर ८८ सुरमिवरस ८९ मुरमिवत्स " o " प्रवरराज मुग्धहरिण परवल वाचनतुग स्फुटिक 0 " " ० " . " स्पुटिक गा. क्र.पीतापर ५ २८ पोटिस २९ मकरद भुवनपाल हाट पोट्टिम वृच्छिन दृच्छिन . " " ० मतुल " चुनोडर ३१ सालवाहन ३२ मान ३३ पालिन ३४ पारित ३५ . हार " " " . " " ० " . " " . " ३६ शालवाहन ३७ कहिल ३८ उहोल ३९ अट्टराज ४० माधव ४१सरमाह हाल . " अनदेव गुणमुग्धा आन्ध्ररक्ष्मी आभलक्ष्मी साहाल वराह कुभिभोगिन् निषद परमेश्वर दुर्लभराज " " " " ४२ मुग्ध [१५] मुवनपाल | गा. + पीतांबर विषयषि ५ ६५शारवाहन " ६६ पोलिस रामदेव ६७ पृथ्वीनाथ ६८ पृथ्वीनाथ पारित्तक ६९ कुमारदेव" ७. चुल्लेन ७१ चुलत ७२ मुकुद ७३ अनगर ७४ गुणाञ्च ७१ शारवाहन ७६ आ ध्ररश्मो ७७ रहिल मार्गशक्ति ७८ वराह सरग्रहण ७९ सेनेंद्र पर्वधर्मन् ८०नि मह उत्त दोसार ८१ प्रवरसेन पेष्टा ८२ दुलभराज ८३ नि मह क्ल कत ८४ हरिराज देव ८५ विदग्ध ८६ अजय विन्ध्यराज विध्यरान ८७ महादेव ८८बनगन विष्णुना ८९ राषव करान ९. राघव दुर्गरान ९२ विरह विराम वसन " ९३ दिग्ध वासुदेव ९४ दुर्लभरान चुल्होडक" ९५ परमेश्वर धवल ९६ दुवस्तु वहम ९७माधव रोहा ९८ शालवाहन रोहा ९९ सबररान - १००शाल्वाइन १विक्रममानु " " " " " हरिराज घृवमट्ट " " " " " विसाचार्य वनदेव रायव " " . ४३ गजेंद्र ४४ गजेन्द्र ४५ जोजदेव ५६ केशोराय ४७शाल्वाइन ४८शारवाहन ४९ कुमारिल ५० कुमारिल ५१चारदत्त ५२ विष्णुराज ५३वजलराय ५४ दुर्गरान ५५शालवाहन ५६ वसन ५७ ५८ चुलोत ५९ चुलोन, ६० चुलोत "शालवाहन ६२ रेखा . " " ९१ दूरमान दृरामध " वसत " हाल " . " " " दुर्गस्वामिन् विध्यराज रोहदेव " ० . " ६४ पादवशवनिन् " विक्रान्तमानु [१८६] भुवनपाल अनुभर स्पदन " . " भुवनपाल[गा पीतांबर शिवरान |६ ३९ सलवण ४० महिपामुर आन्ध्रलक्ष्मा ४२ वनकेसरिन् |" ४३ ४४ " . गा. क्र. पीतायर ६ २ सर्वसेन ३ सर्वमेन ४ महिपामुर, ५श्रामाधव ६ रेखा ७केशव ८ रोलदेव क " " . आदित्यसेन आदित्यसेन " " " . . ० " ४५ पालित्तक सिरिसत्ता " " . . " ४७ . . जयदास जयदेव जयसिंह साधुवलित " ११ यश सिंह " . . १२ बहुबल " ४९ . कालिंग मुमति . . १३ कुमारिल १४ ममथ " . . " ब्रह्मभट्ट गिरिसता अभिमान " ५२ . हाल " १६ ईश्वर " . वाणसूर " " ५३ ५४ ५५ . १७शालवाहन १८ . . " " . ० "२० 0 " ६५ प्रवरसेन ६६ कलश " . " २१ २२ रघुवाहन विपन्नाविहिक सरस्वता कालदेव अनुराग कलितसिंह तारागण आन्ध्रलक्ष्मा " 0 ६७ बहुगुण ६८ शालवाहन ६९ चामीकर विद्ध शातवाहन प्रवर कलशचित बहुगुण प्रमरान अर्जुन अर्जुन अजुन कव्वाहनर भोगिन् दुराज " २४ . M . o २५ ०६ " D . २७ . हर्ष " २८ ० . ५७१ चारुदत्त ७२ चारुदत्त ७३ देहल ७४ इद्ररान ७५ अनुराग २९ ३० " शिव गगह " . " ७६ समर्थ अमप " . " जयतकुमार बहुव " . " इद्रकर पालित पारित्तक ३३ ३४ ३५ " o . " " ० रुद्धरज " ७७६ दीवर ७८ पालिन ७९ अनुसाहक ८.शारवाहन ८१ नारायण ८२ चुलोह ८३ जावदेव ३६ . अजुन यादिलर आघलक्ष्मी जावरेव " . अनग ३७ ३८ 9 " अनुभा " [१] মুখ भुवनपाल ! गा.प्र.पोगांवर सोया १ज्ञानपाइन. २२ मारन. ७ . D गा. प्र. पीसीयर ६ ८४ बग्दा. ८५ ". ८६ शेपर. ८७ गुग्पहरिता. " . . २५मावत "" . १७ . ८८सार. ८९ सार. १०सार. ९९ कुमार. गुगानुगग माधवश्रिय माहम " १२ अनंग ग.२८ शानसाइन. २.शाग्वाइन. ३.वोडा. . "३२ " " . . " " ९३ अनग. ९४ पोरिम. २५ भीमभ्वामिन्. १६शालवाहन. . . " . "३४ . " . . . . " ९८शालवाहन. ९९ माग्दसेन. . . . me ३० ३८ " . . ७ . ४. " . . " " ૨ " "" " ४४ " " मोगामिद ० m ४७ . ४८ " " १ नुहोइ. २ गुहोह. ३ नुलोह. ४ दुर्लभराज. गोग्न ५शातवाहन. ६शामवाहन. विन्ध्यापि ७ महिपामुर जीवदेव ८पोरिम अरदेव ९पारित. अपराजित १.चन्द्रोह सोहक ११ मामवामिन्. गानि १२ भीमरवामिन्. त्रि १३ मुग्धगज. रदिगज १४ मेषचन्द्र. बोगदेव १५ मेघनन्द. मुभिवश १६ वापनिराज. १७ वामनिराज. कुम्जी, दुरग: १८ वास्ततिराज. दुम्जरगी, कुरमी! १९शान्वाइन. २० अनुराग. दोमन " . 3 " . . O " . " ५१शान वाहन. . . " . . " . . . ॥ n ५७ . . " [१८] भुवनपाल गा. ऋ.पीतांवर गा. क. पीतांबर भुवनपाल . . " ७९ . 0 " ० ० " . ८० ८१ . " o ० " ८२ ० " . " . . “ . . " . . ८४ ८५ 0 ० " ० . " . . ० . ८७ " . . . ० ८८ ८% " . ० ० . . क o ८. . . " ० . 061 " ९१ o ० " ७१ . ० . . . . " . ७२ ७३ ९२ ९३ ९४ ९५ " ८ . . ० o o . ७४ " . . . ० " . ९७ . " O . " . ९८ D ७७ . क " . ७८ depe- [१८८] गा. क.पीतांवर भुवनपाल |गा. भ.पीतांबर मुवनपाल . ० " ७९ . . . " “ 0 0 ८० ८१ " . " . . . “ ६२ 0 . 0 " ६३ o ० " ८४ . " . O " a . 11 ० . . ० " . . ८७ . . . S D 6 ८८ ८६ " . . 14 ० " ० क . " . ९० १ ७० . . ." " ७१ . . " . ९२ . " ० . ७२ ० " ० O " ७३ D ८ " . . ७४ " o . " " ० " . . ० " o 300 ९७ . . " . " ७७ . . D . " ७८ . " . ९९ परिशिष्ट (ग) प्रमुख प्राकृत शब्द-सूची अआणली १५५,५:३३ अपत्ति अन्नी ७१७८ अणमाण ३१४३ अवहरिय४१५३ अपरा ७/७३ अपहुत्त ३१७७, ५.३६ अररिकम्मि १४८८ अपप्पन्न ५११ असन्त १४ अप्पाहर ३२ अहमन्तो ३२४ अप्पे १०० अकअण्णुअ ५।४५ अग्मुण्णअन्तोए ३६४ अक्साशा७ अम्भत्यिो पा२१ अच्छर २१६८,३११ अमअ ११३ अन्ति ४४२ अम अमा ३३५ अच्छमल १९ अमित्र १२ अच्चिजद १५८३ अमुशिअ ४।४१, ६६ अच्छेर २२५, ३१२ अमाअन्न ३७८ अच्छोडिअ २०६० अमाअन्नी १८२ २१८४ अमाअन्ने ६१७९ अहिअ ५३ अम्बाण ४॥९६ अडमणाश९९७,०६५, ७६२ अलगिरी, अणहा ३१७२ अलजिर १९०,५१४५ अणि अत्तास १२४५ असराहि १२७ अणुमरण ५४९, ७.३३ अरिदिन्जर ७९० अणुमिक्खरी ४१७८ अवऊमु।८४ अगोड ६४० अवणिज ६२० अणहोन्त ३१२ अवहथिग २१५८ अण्४॥३७ अवहासिनी १९२ अण्णा १२३ अवहीरण २०४६ अण्णु ३७५ अवहो ७८० अत्ता ११८,६४२, ४९,७५१ अवेह स८१ अस्थक ४८६,७७५ अबो ३१७३, ४६,६८० अत्थेका पा३७ असहत्ता ३११९ अस्थमम्मि ३.८४ अमन्दिाग ९७ अन्तोद्दत्त ४७३ असामा ३४७ [१०] अहमहमिआइ ६८० उवऊहमु ६१८२ अन्वे ४१९० उस्स १२४ अहिं आम ११३८, ३६६ उज्जा ५.३८ अहिलेन्ति ४६६ उज्जुए ७७७ अस २०५३, ४२ उज्झसि २७१ आअह ४७९ उर्दुइ ३१८ आअढिअ ६।१४ उण्णामन्ते ६.३८ आइप्पणेग २०६६ उपहा ११३३ आउच्छण ५.१०० उपअ६७ आउटत्ता ५/७२ उप्पर ६८५ आक्सेव आई ३१४२ उपहा १७१ आणइ ५।३८ उप्पुलिआइ १९६ आणन्त १५० उबुद्द।३७ आणन्दवर५१७ उन्भन्ति २९१ आणन्दिजइ ६६७ उइल्लविरीण २०७४ आणिमो ६८९,९१ उहावो ६।१४ आदसे ३४ उरद ६११६ आम ५।१७, ६।११,७८ उहरण २१६६ आरसइ ३१५३ उहरिआ ६९६ आवण्डुरत्त ४७४ उजद६४० आवण्णा ५/६७ उवउहसू ६१८२ आसमु ११७०, ६६५ उबज्झाओ ५१७७ भासासे ३२८३ उवरिआ ५/७४ आहिजाईए १।२४, ३२६५ ब्वसिय २२९४ ण १६७ उससिआए ४११२ प्रस४।२७ ए६३४१,४॥९७,६७९ सामन्ति २४० एकमेकस्स ५/१६, ६६ साली १५९, ७१३४ एकल ७१८ असि ६० एण्ट् ि॥३२,६७,९२, २१४९, ४७,७२, ईसीस ५४४ ५६६,६६, १९, ३७, ७३७ इसीसि ४७० एत्ताण्ण १३८ उअ ११७५, ५४६१,७४०,७९,८० एताहे १९०, ४४५, ५२३, ७३ उअह ११८,६२, ६३, २१९, २०, ३१४१, एतिअ६१४४ ८०, ४१५९, ५।३६, ६०, ६६३, ३४, एत्तिम रास ६२,७१२४,४२ एन्नो १८५ उच्चवचिभ७९७ एह ४॥३, ६१५३ उच्चेर २१५९ एइहनेत ३१५७ उच्छू ६१ पन्तस्म १८७ [१६१] एन्ते ७६२ एमे १८१, ८२,२२२९ पहिब ११७, २१३७ पहिसि ४८५ ओभने ७५४ ओअन्त ३५ ओइण १६३ ओगलिअ ३५ ओच्छ ७१२१ ओझर ७३६ ओमाहिअ २१९४ औरण ६१३८,७११ ओल ३१९९ ओश ५७३ ओलिनात २१ ओलिजिद ७४० ओहो ६४० ओलेश ७१३७ ओसरइ ३१७८, ६३१ ओमरमु ५/५१ ओमहिअ ४।४६ ओसाहन्ने ७३६ ओमसर ३१६२ ओहि ५।३७ करमव १६८५, २१२४,५६ करआदि ३२ वश्वदलेग ११३ पह २१८१ कारिपरि ११५७, ४६ वरहि २७९, ५४ कच्या ७१८४ आ६४५, ७२० कमि ५१ कदर ५१३५ पदण ४।२४ पदन्ती ७८७ कण्हतेग ७६३ चण्डअन्तीए ०६० एण्ड १६८९; २११२,१४,५४४७ पत्तो १५७२, ६४३, ७1८८ वन्तो ४।१९ पन्दो? ७१२२ चम्मिरि ७५९ परमरि ६।२७ परिमारे ११.४,५७ करिजामु २१५४, ८१ परिहिन्मि २२८७ परेब्जाम २०८१, ७३३२ परम्म ११३७, ६६५,७१३६ कालिजिहिसि २२५,४०१३ यदि ६२ पवारराव ५१२८ राऊ १३३ पाम तओ ३.९ कारिम ५५७ दावालिया ५८ काहिर ५।१०,७८. पिणी ॥६७, ४६९ विलिनि ८० विलिम्मिहिइ २०१६ सिसि ४०, २०१७ वीर ३१७१, ७१६८ कीरन्ती ३७२ पीस ३६०,४।४३, ८४ कुअण्डो ६९७ कुडङ्ग २०७१, ३६३२, ३९, ४६.,५६,, ७४३ कुन्दो ३८ कुथ २०५२ कुगर १७२४९, ५/६३, ७१६ कुणन्नी १५८८, ४१६६६।२२ कुगान्तो श२६, ३६. कुशमु७१५ दुप्पा ३३५० कुरुणाहो [१२] कुल वालिआ ३२९३ कुलुबिऊण ५।२६ केन्तिअ६९ वोउद्दलाइ ४।४२ कोत्यहम्मि २५१ कोसपाण ५/४८ सजन्ति ३४८ सडिएहि ७८० खण्टिजइ ३७ गन्धेहि २१९१ खविअ २१३४,७५३ साणेण ७६२ सिज्जा ५.८५ खिप्पड ५।२९ सीरोथ २०१७ खुडकिआ ३१२६ सुडिअ ११३७, ४१३१ खुत्त ३७६,५:५४ पोक्सए २१७१ सोक्खा ६।३१ गरन्दो ६।२६ गजिर ११५७ गणरी २८ गणवई ४७२ गणाहिबई ५३ गण्ठि ६।६१,७४६ गम्मिहिसि ७७ गविरी २०७३, ५/४७ गलत्यिअ ६८३ गहवर २१७, ७२ गाअद २।२८ गामडाह २२९,६६३५ गामगि ११३०, ३१,४१७०,५४९,६९ गामणिधूआ ६१९२ गिट्टोभो ७१३८ गिम्ह ४४९९ गुगविस २३ गुल ६१५४ गेडन्ति ४।१० गोआअरी ४१५५ गोच्छ ६३२ गोआ पा२२ गोरअ १५८९ गोरि १११, ७११०० गोरी ५:४८ गोला ॥३ गोलाउर ३१३१ गोलाणा ११५८, २०७१ गोंविआ।१४ गोवी २११४, २८,७७ गोसे ११२३, २१६, ४।८१, ७१९३ घरणी ५९ घेत्तूण २१३०, ४।१२ घेप्पर ३३८६,६२८१ घोलप ४४७१,६६० घोलिर ४१३८, ९१ चत्थिमगल ७४४ चसिप ७३ चक्सन्तों १७१ चम्मन्तम्मि ७।२३ चम्मन्ती ५।६३ चटुअ २०६२ चत्ता ६२४ चन्दिल ३१११ चलण ५४१,७१५७ चारणो ७७१ चिउर ६७२ चिक्सल ६७ चिपिल ४१२४,५४४५, ७८२ चिन्तिऊण ४५८ चिरहिं १९१ चिराइरस १२४ चिहुरा ६५५ चुक २२९५,४११८ चुवासि ५.६५ चुलचुलन्त ५1८१ [१] चेअ६४२ जाएज्ज ३१३० छन्नर ३१४३ जागमु १५१ छग ७१२४, ११६८, ९, ६२४, ३५ जानिऊण ३९० छपराई ५/६६ जानिहिसि ६४२७ छलि ११५ जान्तिअ६।१४ द्याहि १३४, ३६,४९, २३६ जाहे ७९६ विजए. २१४१ जी ३१,४७,६८६ बिज्जन्त ४।४७ जावेजर ६८७ द्विजामी ६६ नाइद६३५१ विजिहिसि २५२ जुआ ३२८ छिन्नई ४१५० जुआण ३४६ छित्त ११३, १६ जुण्ण २।९७,४।२९,६५,६१३४ ट्रिप्पर ४४९३ जुगइ ३८, १४, ६२९,७. ट्रिप्पन्ती ५४३ जुरमु ।१४ शिवर १११६, ५१, २२६७, ९२, ५.१८, जुह ६१४८ ६।३२, १३ जेवार ४॥३२ विनी ३१६९, ५।२१,६१९ जेतिओ४८७ छिविऊ ७४ नोण्हा ४५९९,६९१ दिविऊग ७५१ नोत्तअ ७१९२ श्रीगो १४८४, २१४१ ड्वा २०७० धीर६७ झाडि ३१३० छूदा ४१८३,६८९ इनझनद६७४ छेा ४११३ झत्ति २०६८ छक ३७४ झिजन्ति ६३९७ हेदई ४१ झिन्जिहिसि ७।२६ छेत्त श६८,६९ ठवेइ ३.९९ छेपाहिन्तो ३४० ठड्ढेण ६६३४ छप्प २६२ ठरी १९७ ७.५२ जअश्मि ४१६४ ठेवर ७१३९ जए ४१३ हको ६३१ जगिम ४८५ डत रा४९ ६.५७,१०० जनेत ४२७ टनह४७३ जोगवाढ ३१२७ डनमि पर पिसि २५ जमुना ७६९ सद ४१२१ 'पप्प ३५०,९६,५११८ डिम्ब ३९१६९५ पिरि १९२ नलिका ३२७ डुण्डम २०७२ डोर ३१११ जसोमा २३१२,७५३ स्टक ६२६ जइश ५१५९ १३ गा०० [१४] ढकन्ति ५1५९ दकिस्स ४११४ पपअरदाहे २०६३ णचरिहिं ५।२० णजद६८४ पंडिश डिज्ज १७७ णम्मआ६४८ वर ४॥३ णवर १५,३२, ३४८,६१८५ णवरणअ३१४१,५६१ वरि ७९२ णाअश६९ णाण २।२१ ण्हाण ३२४६ णिअत्तन्ते ६।३७ णिअत्तन्ती ११७६ णिअत्ताइ ७५८ णिअलाइआ ५.५४ णिअलाविएण ५/१०० णिअसण ४१,५५५, ५९ शिअच्छमाणण ५1१०० णिअच्छद६७९ णिअच्छेसि ४१७८ मिकिश ११३०, ४१२८ णिज्जर ३१३७, ७९४ गिज्झार १७३,५।१३ गिदिम ४९ गिडाल २२२ पिण्हुविजन्ति ७.५५ णित ४१३४ णित्यण १६४ णिबुट्ट १॥३७ जिम्मअर ०१०१ जिमजम ६।२९ मिमन्जिहिसि ७६७ गिरीच्यए ६६ गिरण्झर ७१६ णितुफ ११६२,६४ शिवाणिजद३७१ शिचरण ३१५५ णिन्वजए ३४ णिब्वविअ ४१७ गिधाण ५.८० शिवुइ ३२२९, ४२, ६४१ गिन्वुद ३११५ णिहसण २।२१ णिहाआ६६१ णिहाणवलस ६७ गिहाणा ४७३ भिडिकलसे ६७६ णिहुअ २।१२, ६६, ७।५६ मिहुअण ६८९ णीससह ३२९६ णमेन्ति ११९१ ऊग २०७२ प्रेन्त ११५०, ५।२०,६१३९ पद १४१, ३१७४, ५.५०,५४, ६१८ इलिअ१६ तइआश९२, ५,३७, ७१९६ तउसी ६३४ तण ३१८७ तण्णअ १९ तगुआअइ ३२९२, ९८,७११ तणुआअए २५९, ७.९८ तणुभाइ ११३० तणुओ स२२ तणुरजह ४।१२ तणु २४ तगुएइ २०६१,८२ तन्ती १३५१, ३७३ तम्बाए ५।६० दम्वे ७.३० तम्म ६९ तम्मा ५८३ तम्मिर ६१८८ तरह ३८६ तरङ्गिगो ७३ [१५] दिभः ११३५, ३० दिजा ३३२२, ९८ दिन्न ११२ दिजन्ती सर दिर ७५३ दीओ ६१४७ जीव २६४ दीवन्ति ॥२७ दीमर १२८, २६, ५१, ३४३,५३४, तरणि ६१९९ ताई ॥३० तादीए ३३९ तालूर ११३७ निअसेहि ६१९३ तिवस ६४ निसिस ६.५६ तीर १७१,३१५८,४१४९ तीर २९५ বুটিক্ষ। ৩৬ दुप्प १२२, ६।२८ तुपाणणा ३२८९ तुमार५.१५ तुमाहिती ६:२३ तुरभ ७७ तुरिभ २९७ तुवरी ४/५८ सूसर ५७६ सोग्ग ४७ तोसिजद६७ थरउ ४६. थरस ४११४ धरण गुभा १७६ थगए ४८२ दीममे ६१३० दीमिर ७१७ दह ३११२ दोहर ११६६, ४७४, ७७४ दुणिमाए. ४११, दुहोली २०४९ दुम्मिन्ह ५।२३ दुम्मिन्नर ४२०,५४३ दुम्मैन्ति २१७७, ४।२५ दुम्मेमि ४।४०,५३, ५६ दुर ५४० दूतिभार १११०० दूर ६६४ दूमई १८८ दे ११६, २०, ४८,६८७ देमु १७१ देहती ६।२५ दो १२४, ३१३५, ५५ दोघur धणे श६० भान्ती ३६० थण्णुभा ५२२ परहरे रा८७ घरहरन्ति श६५ थागुभा ३१२ भोभ ४१,६५० धीर २८ दहण ४८२,७४ दो २७, २६२, २५ दोतिति ६८६ दोहा॥१२ दोहत ३९. धनिभ६८२ धम्मित शर भारतिभार ७६१ शुभई २१३०, ३१८०,४६९,५३३ दद।३४ दारेर ४१५, ११० दावेन्ती ६९६ दामोभरो श१२ दिगर ३१५,५९,५६,६७० भर [ १६६] धोइएण ११८ घो४९९ पई ७।११ पअत्तेण ५१६ धुकाधुकर ६८३ पाठी ५१४ धुन्वन्त ६६३ पाडला ५/६९ धूआ ४७०, ८८ पालि ५।६८ घूमाइ १११४ पाडि ११६५ पाणउडी ३२७ पारोहो ६७५ पावर ३२११,९४,५४४ पावालिआ २०६३ মুসসিলাহ্ ৭৭০ पाविअ श९, ६१९३ पअवीए २७ पाविऊण २४१६३१५ पआव ४॥२६ पाविहिसि ५६२६९ पआहिण १२५ पासअसार २३८ पईव ४१३ पामुत्त ४॥२४ पउम्मि ५५३ पिअर ४११७ पउत्यो १२१७, ३६,३९, ५८,६६,७०,९४७ पिअत्तणे ३२६७ २२९,८८,९०४१३५६४६ पिअन्त ३३४६ पंमुल ६।१० पिउच्छा श१०२९५, ९८०६।३७ पजम्पिआर ७४९ पिक ६१९५७४ पट्टान्ति ५।४० पिट्टे ७७६ पडिच्छए २४० पिट्ट ४१२२ पडिमा २१५० पिसुणन्ति ६१५८ पडिव ६६९ पिहुल ४९ पडिवक्खो २९२, २८ पील २ पहिहासद ११५ पुच्छिरो ६९८ पणवट्ट४१९५ पुच्छीजन्ती ४।४७,७४७ पणामेसि ४।३२ पु४१२८७ पण्हा ५/६२ पुद्धि ३३२३, ४१३, ७१७४ पण्हुअ५९ पुप्फवह ५।८०, ८१ पाहारि ५/६२ पुप्फुआ४।२९ पत्थिजन्तो४।१०० पुरिसामन्ति २९६, ४।११ पत्तल ७३५ पुरिसारी ११५२, ७।१४ पत्तिा ३१६,४५,४५१,७६ पुरुमारी ५।४६ पोर ५१३ पुलाओ ३१५४ पणोडन्ती १४५ पुलइजउ २०६४ पराहुत्त ३४५ पुलिन्द २०१६,७१३४ पामदिजन्तो७८५ पुबरम ४१४४ पाउअकञ्वं १०२ पुसिभ १३५४; १२७२९, पाउस १३५०,४३९४,४१४५६।३७,५९, ७४ | पुमा १३५१३३, ७८१ पाउहारीमो १२ पुसिजन्ति ३।६ ७६ पहिम २१३६, ६१, श६५४।३०, ७०%; ६८५ पहाविर श२ पेक्रामु ७७२ पेच्यूरी ४७१ पेदिहिसि६६५ पेम्म ३१३२ पेलण श६१, ४६८ पेलिभ २२१, ४१६५ पोर्ट १४८३, २१७१ ३८५ परिघुम्मिर २४८ परिचत्ता ७.५२ परिवतन्तीम श८३ परिमलसि ७११९ परिवाडि २४९ परिसकिण ७६ परिदरिअन्वा २२७ परिहरिजासु ६२० पहिरजा १९८ पमाणमुत्त २१५३ पमहादिव ५४८ पम्माअ१५५ पम्हल ५७० पग्इसिजाम ४४ पम्हसर ७४५६ परित्ता ५१५४ एटीविस २३,६८ पोरी २२० पलोइरस २३७ पलोरसि श१००, ३१५६, ६७० पलोहर ७८३ पविजिम्हिम ६५ पदजिदिति ७१५९ पदसिएमु १४५ पवसिहि १४६ पद ११६९,५५५ पसिम ४८४ पसिजन १७५ पसामन्ति ११९१ पसार २१८४ पमुबह ११,६९ पहप्पन्ति २४१ पहुप्पम्तो १७ पहेण ४१२८,७१३ पहोलिरं ७१९६ पगुच्छण ४६ परिसो १२ फलिह ६४९ परही ४१५९,६० फलहीवाहण २०६५ पसेड ५६२ पारिनन्तम्मि २०५३ फालेहि २९ पिदार श८३ पिटा १९५ पुन्नी २१७६ पुहऊ श२८ पुट्टिएर ३८ पुडसि पार इलामोदि ५११५ बहिरा ९५ बावद्धि।१० बुद्ध ११३७ J४८ बोर १००, १९ मअवर ४६ महाग ५:२७ मणिश४३ भगिनऊ ६७१ मगिरी १९७ মদ্ভগাই ও मण्डन्ती ४७९ ममिर ६८१ ममिरी रा७४,१५४ मरन्त ॥८१,३ मरिजा पसून १५ [१६] भरिकग श६० भरिमो १।२२, ७८२।८,९२,३।२६, ४.६८ भरिसि ४८९ भाअण ३१४८ मामिजन्तं ५।५७ भासु ६८२ मिक्सुसघ ४८ भिजन्ना ३१६ भिसगेमि॥१२ भिमिणी ११४,८ भिसेण ५:४३ भुका ७।६२ भुजमु ४३१६ भोइओ ६१५६ भोइणि ७३ भोण्डी ५२ मअण ५४१,६४४,४५ मअणवड ५1५८ मअच्छी ३११०० मअर अ२११ मसलो २८१ माअ ७११८ मदर ६.५० मराह ३७० मईण २८७ मडरेन्नि ११० मक्कडअ १२६३ मगर १७२,७५० मज्जिरी ५/७३ मज्झ ७१६५ मज्झारम्मि १३ मजर ३८६ महह २१५ मणसिगो २०११ मणे १२६१३१८४ मण्डो ७६२ मण्णन्ति ५१९८ मणिपाहिसि ७६१ मन्दरेण ५७५ मम्मह ६७१ मरउ ७२ मरगअ १४ मलिआ २०१० मल्लि ७१८५ मलेसि ५४ मसाणा३६ महं ६६६ महइ १।२८ २१३९.६९० महम्महइ ७४ मम्मह ५.३० महिऊण ५/७५ महुअ २।४ महुमहण २।१७,५१२५ माअइ ३४१ माअन्ति ४।७३. माउआ ३४०,८५ ५।२३ माउच्छा ७४८ माणसिणी २७०,६२१, ३९ माणसं ५७१ माणइल्लाणं श२७ माणिज्जन्त ४२० मामि १९३, ९७, २१२४, १४,४६, ६४ ४१४४, ५।३१,५०६६,९१,७८ मारेसि ६४ मारेहिसि ६६६ मालारी ६९६ मालर ६१७९ माहप्प ३२११,६६ माहवस्स ५४३ मिलाण ४८३ मिलादेइ ४१ मुम २१४२ मुअर २०१५,४७, ३१७५,४।१९७११९,३१ मुस ७३६ मुशलमो ७९६ मुम्पुर ३२३८ मुइओ २५३ मुद्दा ६७० [ १६६] मेसी ३१७२ रेहा १४, २०१७: ५।४६,६६१ मेलो ९९ रोजा४१५ मोजन्त ७७२ लगा६४ मोतिभं ४१९४ स्पिनर ४॥२३, ५.१५ मोसु ४१६४ एगा ४७१, २०१५२८ मोक्त ४।६० ए४|११ मोसूग ४११० लन्दी ४२, २०५९ मोग ३४३ टजाउगर७१० मोहामविधि ६७२ एमालरणी ५८२ राराहि ६९३ एणो ६७८ सहा ॥३१,९५,५।२१७६० रखा २११९, ३२४४९३,११९ सहिऊग २४४ रज १२५ अपग ५२९ रजिना १४१ हामन्ति ॥५५ सदुपमि ४।४५ राउ८७ रमगिज ॥१०१ शाल ६१.१ लाविर ४४१५ राभारश७१ रिहा ६५१ राम ॥३५ रिहन्ते 7५०४२ रामि २५२ दु राहिमा ११८९ शुक९६३५८ रिफ ५३ सुम्नीमो ४४१ रिस्टोरी १७५,२०,६१२,७४७८७ लेहल ६०,७५४ रिण २१२ रेगी। रि॥१६ लेइला ५६१, ७९७ रुमई २०१६ लोहत ५९५ रुमाविमा ८९ रोहित २०५२; 4m,१३ रुअर ०९:४७ वमा ७९८ रुग्ण १११७७ बमहि २।१२ या १९६३७ रुन्द ४१६५२,६७४ रम्प १९,२० बच १२१२:४५1८० हबर ४,१६७ वधरश९ रुवर १११०४१ बालो ५:१२ उस्मा४।१०० रूसेर ५१६ मासि २७ स्से १९५ रुसिमरा रेवा ७८,९९ बङ्क ५२४ बहा [2] चण्णघि २२२ वावसिर ५७८ यमिण ७२० वराई ४।२८, ५।३८,५६, ६।३३ चरिस ४१८५ चलिणो ५६ वलिवन्धी ५। २५ दलेइ ४।४ वल्लवीण १।८९ चविजन्ती ४५८ वसण ३१५१, ४.८० वसणिओ ७८ बसिओ ३५४ चमुहा ४८ वाहो ४७७ चाअउ ४११०० याइओ६५७ वाउलिआ ७।२६ बाउल्ल३१७ चाएइ ४।४ वावउ २१९९, ३२९१ यामण ५।६, २५ यावार २२६ वासा ५।३४,६८. वासारत्त ३।३१ बासुर श६९ वाह २११९,७३,८५,७१,१८, ६३ बाहरउ २।३१ बाहित्ता ५११६ वाहीए ।२०,६९७ बाहो २१२२ वाहोलेण ६७३ चाहोह ६१८ विझल ११ विभत्थसि ५।७८ विअदृ ५५ विअप्प ४१२६ विअप्पेश ५७६ विअसाविऊग ५४२ विदण्ण ४१७२ विउण ३८९, ६३,७८३ विच्छड्डे ४८७ विच्छिवह ५।२४ विच्छुअदह ३२३७ विच्छुहमाणेण ६१ विच्छोह ३१० विज्झवि ४१३३ विज्झसे ५.४१ विज्जाविजह ५१७ विजाहरि ५/४६ विज्झाअन्त २९ विज्झाइ ५३० विज्झ २०१५, १७, ६७७, ७.३१ विहि ३६१ विडट ७७१ विण्णाण ३५१ विणिअसण २१२५ विणिम्मिअआ ३३३५ वित्थअ५७ विराअन्ति ११५ विरमावेउ ४.४९ विलिअ १५३ विवज्जद६१०० विसम्मिहइ ६१७५ विसूरन्त ५४ विड्डइ ३४५ विहडण ११५९ विहडिए ५४८ विहल ५७१ विदाइ ४१९५ विही ७।५६ विहुअ ७६० सीमन्तो१८६ वीएण १८६ वौसमसि १२४९ चीसरिअ ४६१ विदेश ४१११ वेअग ११६ [११] वेआरिउ ३२८६ समोसरिअ ७१५९ वेज ३३७, ४१६३ सरए २८६, ७१२२, ७०, ८१ वेण्ट ४५९,६० सरअस्स६१३४ वेद ११९६ सरिए ६१६२ वेदणेसु ६६३ सरिच्छाई २१८६ वेलइल ६९८ सलाहणिज १११२ वेविर ३६४४, ७१४ सवा ४॥२४,१०० वेस ३१२६, ५६, ३६५, ६१०, १४, २३ सवन्ती १७१, श६,७३,३११२,६९७ वेसत्तण श६७,६४८८ सवह४१५७,६१८ वेसिणि ५७४ सविअण ६१८४ वेहब्ब ७१३०, १३ ससह ६४६,७१३२ बोड ६।४९ ससि १५१ बोडही ४१९२ सहाव ४१८०,५२४ व्वुद २०१० सहिजइ १४३ वोलाविस १२ सहिरीभो १४७ वोलिआ ३३२ वोल्गण ११५६, ३५२, ४१४०, ६७, ८५, सङ्किरी ३६ ५.३४,६५ सङ्कलिओ ७१९४ वोल्लु २८१ सठाह ३६८ सन्जिा २१३६, ३९,४१३५ सणिह ३१५८ सएण्ड ५५ समरण श२२, ४१७७ सई ३२२८ सभरन्तिए ११२९ सऊणाइम ३१२० समरिज्जइ १२९५, ५।१३ सद ४४८६ साउली ३२६९, ७५ सहिजसि ६८ सामाई २२८०,५।३९ सङ्किर ६८२ सामरि जा २१८० सच्चविओ ६६३८ सामलीए २२२३, ८३, ८९, श३८ सच्चाई ७७९ सारि ६५२ सच्चहिं ४८ सारिन्छ १९४, ३१७९ सणि २२३,५/१८ सण्ठन्वतीए १३९ सालिछित्त ११९ सद्दहिमो १॥२३ सादरी ४९१ सकमा २०१३ सालाहण ५।६७ सम३३५ सासू ४१३६ समअण्ण ५.५ समप्पड ३४,५८,६८६ समुक्खगर ७१८४ समुस्ससन्नि २३ समोगाई ३२८२ समोसरन्ति १९२ साइड (साहस) २७, ४९६, ५।५३, ६।१६,४२,१००,७४८८ साहाविध ३१२५ साहिओ ३९. साहीण २२९७, ४५ [ २०२] सू१३४ सादेइ २१८५ साहऊ ६१४९ सूर रा३०, ५१, ४३३२ सिकरिअ ४९२ सूसइ ६।३३, ७.११ सिक्सइ ५१७७ सेउल्लिअ५:४० मिक्सविआ ४.५२ सेओला ४५८ सिरसावअ४१४८ सेरिह २।७२ सिक्सिरि ७६१ सोणार २।९१ सिजिरगी ५।७,८ सोण्हा ११२९, ३१४१, ५४, ४।३६, ५1८३, सिह ६७३ ७।३० सिप्प ६८९ सोमारा २१८९ सिप्पि १६२ सोमिति ११३५ सिप्पिर ४.३० सोहिरी ६०११ सिमिसिमन्त ६६० सोहिल ६४७ सिविण १९३, ४४९७ हणइ ३३१४ सिही १।१४ हत्थाहत्यि २१७९, ६८० मुअ १९८,५१३१ हत्यउड ३१३६ हत्थाहत्यि श२९ मुअह ५१२ मुस्खन्त ५११४ हर ७१०० मुगअ २३८,७१,७८६ हरि ५६, ११ मुणिआ ७८७ हरिऊण ५.५२ हरिज्जइ ५/१२ सुगइ १४६ मुण्णविअ ९ हरिहिर २४३ सुणमु १३ हलहलआर हलफल १९७९ मुप्प ६१५७ हलिओ ६।६७, १०० सुप्पड ५११२ मुरमुरन्तो ११७४ हसिज २०४५ मुबई ११३१,६५,६६ हसिरी २१७४,६८, २७ मुहपुच्छिा ४११७ हालेग३ मुह १।१२,३१४९,५१८ हिण्डन्ती २।३८ मुहाओ रा५९ हीरह ११३७, ४६१० मुहाव ५.३०,६८ हीरन्न २१, ४॥३१ मुहावर ११६१, ८५, २०६८, ३०६१, ४१३३, होम्मि ४१६५ ७१५, ४९ होचमि २।१४ मुहेलि २६१,८८,४६८ होन्न ७४२,४ होर ५३५ सूरजर॥२९ होहिह ६६८,८१,७१७३ सूज ३॥

राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के परमोपकारक ग्रंथ- प्राकृत साहित्य का इतिहास मो० जगदीशचन्द्र जैन प्रस्तुत प्रन्य का प्रमुख विषय तो नाम से ही स्पष्ट है किन्तु ग मन्दर्भ रूप में विश्वमर की सम्पूर्ण मात्राओं की जानकारी संक्षिप्त रूप में प्राप्त हो जाती है। तदनन्तर वेद से लेकर शनीनतम शिलालेम, प्राचीन नारा, च्याम्प पादि तथा इस विषय पर सद्योत प्रकाश डालने वाले आधुनिक प्रन्यों के अध्ययन प्रादि के व्यापक समीक्षण और समालो बनपूर्वक अपने विषय का यह प्रथम अन्य हिन्दी साहित्य में भरतरित हुभा है। ऐमा विश्वास है कि प्रारत के उदगम, स्थिति और प्रचार आदि के विषय में जो भ्रामक और मन्दिग्प दुनिर्गत मत-मतान्तर प्रचलित है उन सबका एक साथ निर्णय हो जायगा और प्राय के पारतविक एवं प्रामाणिक इतिहास से लोग परिचित हो सकेंगे। दिन्दी साहित्य को लेखा की यह अनुपम देन है। प्रत्येक संस्कृत-मादित्य के अनुसन्धित्म छाय, अध्यापक एवं अनुरागी म्यकि इस प्रत्य का भवनोच्न एवं अध्ययन अवश्य करना चाहिए । मूल्य 20-00 हिन्दी-प्राकृत-व्याकरण आचार्य मधुसूदनप्रसाद मिश्र विश्वविद्यालयों में प्राकृत के अध्ययन की कुछ न कुछ स्वतन्त्र व्यवस्था की गई है । प्राकृत पढ़ने वाले छानों को या तो हेमचन्द्र, पररुचि आदि के संस्कृत सूत्रों को रटना आवश्यक होता था अथवा जर्मन विद्वान् पिराल आदि के अंग्रेजी अनुपादों मे किमी प्रकार काम चलाना पड़ता था। अभी तक हिन्दी में भारत के सभी अहों पर प्रकाश डालने वाला कोई पूर्ण म्यारण नहीं था। इसी क्मी की पूर्ति के लिए विद्वान् लेखक ने इस व्याकरण का प्रणयन राष्ट्रभाग हिन्दी में किया है। इसमें महाराष्ट्री, मागधी, शौरसेनी, पैशाची, अपनश श्रादि प्राकृत के जितने मा है, उन सब का व्याकरण हेमचन्द्र आदि की सहायता से बड़े सरल एवं सुबोध रूप में प्रतिपादित हुआ है । प्रत्येक नियम विश्य को अच्छी तरह समझाते हैं। नियमों के साथ स्थान-स्थान पर उनके सोदाहरण अपवाद स्पल भी बतलाये गये हैं। प्रत्येक नियम के साथ टदाहरणस्वरूप धाये हुए भारत शन्द के मंगत रूप भी सामने दे दिये गये हैं। पादटिपगी द्वारा उलझे हुए विस्य को समझाने की पूरी पेश कर साय हो तुलनामक अध्ययन की सामग्री भी प्रस्तुत की गई है और अन्त में प्रकारादि कम से प्रत्य में आये हुए ददाहरणों की सूची मी दी गई है। इस प्रन्य की आधुनिक विरोताओं को देखकर बिहार राष्ट्र भाषा परिषद् ने इसकी पारिपि पर ही ५.०) रुपयों का अनुदान प्रदान किया है।

संस्कृत साहित्य का इतिहास (बृहत् संस्करण) श्री वाचस्पति गैरोला इस अन्य को लिखते समय यह ध्यान रखा गया है कि पाठक परम्परा और पूर्वाग्रह के मोह में न पड़कर प्रत्येक विवादमस्त प्रश्न का समाधान स्वयं कर सकें। पाठक पर अपने विचार लादने की अपेक्षा उपयुक्त यह समझा गया है कि विभिन्न मतवादों की समीक्षा करके वह स्वयं ही विषय के सही ध्येय को ग्रहण कर सके । भारतीयता या विदेशीपन का पक्षपात त्याग कर किसी भी विद्वान् के स्वस्थ और सही विचारों को उधार लेने में सोच नहीं किया गया है। पुस्तक की विपय-सामग्री और उसकी रूप रेखा का गठन भी ऐसे ढङ्ग से किया गया है, जिससे संस्कृत भाषा की आधारभूत भावभूमि का परिचय प्राप्त होने के माथ-साथ सम-सामयिक परिस्थितियों का मी अध्ययन हो सके । आर्यों के आदि देश एव भार्य भाषाओं के उद्भव से कर उन्नीसवीं सदी तक की सहस्राब्दियों में संस्कृत साहित्य की जिन विभिन्न विचार-धीथिर्यों का निर्माण हुँआ और भारत के प्राचीन राजवंशों के प्रश्रय से संस्कृत भाषा को जो गति मिली, उसका भी समावेश पुस्तक में देखने को मिलेगा। मूल्य २०-०० संस्कृत साहित्य का संक्षिप्त इतिहास सस्कृत साहित्य के इतिहास का यह सक्षिप्त सस्करण इस उद्देश्य से लिखा गया है कि विभिन्न विश्वविद्यालयों की उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रम में निर्धारित इतिहासविषयक ज्ञान के सवर्धनार्थ विद्यार्थीवर्ग का इससे लाभ हो सके। पाठ्यक्रम की दृष्टि से संस्कृत साहित्य के इतिहास पर राष्ट्रभाषा हिन्दी में जो अनेक अन्य पुस्तकें लिखी गई है वे या तो सर्वागीण नहीं है अथवा उनमें छात्रों के उपयोगी इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन की क्रमबद्ध रूपरेखा का अभाव है। यह इतिहास पाठ्यक्रम की दृष्टि से तो लिखा ही गया है, किन्तु सस्कृत के वृहद् वाड्मय का आमूल ऐतिहासिक अध्ययन प्रस्तुत करने का भी इसमें उद्योग किया गया है। भाज आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत के छात्रों को वैज्ञानिक रष्टि से संस्कृत-साहित्य के इतिहास का अध्ययन कराया जाय, जिससे कि उनकी मेधाशक्ति का स्वतंत्र रूप से विकास हो सके और प्रस्तुत विषय पर उनके भाव विचारों को नई दिशा में भप्रसर होने का अवकाश मिल सके।

Hindi Gatha Saptashati

Author
Chaturvedi,narmdeshwar
Title
Hindi Gatha Saptashati
File name
Hindi Gatha Saptashati
Text
OCR done
Citation
1961
Published
2012/08
Publisher
Varanasi.,chowkhamba Vidyabhawan
Language
Sanskrit
Pages
234
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313301
Barcode
99999990322002.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
D8qZAksou7T
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