Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shree Mad Davchand Bhag-2

Budi Sagar Suri · 2011/08

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धीमद् बुद्धिसागररिजी ग्रन्थमाळा-प्रन्यांक ५३.
ॐ अहँ महावीरदेवायनमः
श्रीमद् देवचन्द्र भाग २ वीजो.
संशोधक,
योगनिष्ट शास्त्रविशारद जैनाचार्य श्रीमद् युद्धिसागरसूरि.
એક
प्रगकर्ता,
श्रीअध्यात्मज्ञानमसारकमंडळ.
हा. वकील मोहनलाल मिचन्द, पादरा.
प्रति-५००
वीर संवत् २४५५.
विक्रम संपन् १९७५.
किम्मत :-८-०.

आ ग्रंथ मळयानुं ठेका':-
नहील मोहनलाल हिमचंद-पादरा (गुजरात.)
वडोदरा-शिमा, सुमागामियटीन प्रेसमां, विटमाइ आशाराम टारे
दा.-१०-१०.१९. नागेन प्राटानां मारे छापी प्रसिद्ध कयु.,

निवेदन.
श्रीना बुद्धिका दिपवन ओगमवासना
के ओहदेवननगमाया पछी बोतः
जीन्द्र देवन्न्नोभावहा डेके.श्रीन्द्रजी
नहरकत मनोकरीमानी फेवनानाचार्य
श्रीन्द्र बुद्धिमानः रेनो जने उनी पर
ने के ई.मा कांगकेवी राजेनमा
हेल्ने हांकत औन्द्र सचन्द्र प्रम भगनी प्रतवनानां
विस्तार कई की है ये जे सावट नपी.
मन झाली. २०० नाने हाबी हवी की इन
मंडने वा हार काना वरने ने मला १५०
करनेई हो उसनेमा मनानांकडे हे.
श्रीमद् देवल बीमा भरना एकतर ट १२०० ना
जाने देने १० नस्लो मादी डे
द भरे वर्ग को ना देकर जाती
मेंडक्क अ. नं. २०० नासो आती
मन्द मन्द : -

तेनी वीगतवार यादी अनुक्रमणिका उपरयी वांचको जोई
शकशे. श्रीमद् देवचन्द्र प्रथम भागनी पेठे आ बीजो भाग
पण जैनो तेमज जैनेतरोने अत्यंत उपयोगी थई पडे तेम
छे. युरोपीय विग्रहना समयमा आ ग्रंथ छपायामां आवेलो
होबायी सस्त मोववारीना लीघे कागळो-उपाभगी-बंधाई
वगेरेनो एटलो बधो खर्च थयो छे के एक नकलनी पडतर की.
रु. ६-०-० ना आशरे थाय छे तेमज कद वधी जवायी
ये कडके बावेल छे छतां तेनी कीमत मात्र रु.३-८-०
रासी छे. वे कडका सायेज आपवामां आवशे.
"
श्रीमद् देवचन्द्र प्रथम भाग तथा चीजा भागमां मदद
करनार जैन ग्रहस्योनां नाम नीचे प्रमाणे :-
रु.५०१ शा. म्होलाल नाथाभाई-पादरा.
२०० शा. म्होलाल नरोतमदासगणु ( पादरा)
२०० शा. झवेरभाई भगवानदास-कावीठा (बोरसद)
१०१ श्रीयुत श्रेष्ठी अमरचंदजी बोथरा बालचर (मुर्शिदाबाद)
३१ श्रीयुत श्रेष्टी बुधसिंहजी बोयरा
जगतपतिसिंहजी दुगड"
हरखचंदजी नाहटा
२५ , गुलाबचंदजी मूरा
१८६ शा. हीरालाल छोटालाल-पादरा
२५० बाइ स्तन शा. चुनीलाल कहानदासनी विधवा इटोला
( वडोदरा)
१०१ वकील. मोहनटाल हीमचंद-पादग
२५ सा. आइ जमना. वकील मोहनलाल हीमचंदना पत्नी
"
"
"
"
।

(५)
१०० शा. लक्ष्मीचंद लालचंद-चढ़ (पादरा)
१०० बाइ चंचल शा. दामोदर कल्याणदासनी विधवा ,
८९ बेन मी शा. प्रेमचंद दलसुखभाइनी भाणेज. पादरा
८० शा. केशवलाल लारचंद बडोदरा-मामानी पोळ
७५ शा. केशवलाल नरोतमास बद्ध (पादरा)
७९ बाइ आचार शा. गोरधनभाइ हीराचंदनी विधवा अंगु-
टण (डभोइ)
५० शा. रतनचंद लापाजी. काबीटा ( बोरसद )
४१ शा. भाइलाल चुनीलाल. पादरा
२५ वकील नंदलाल लहुभाइ, पादरा
२५ बाइ सांकन वे शा. मगीलाल चुनीलालनी विवा. पादरा
२० एक गृहस्थ तरफी पादरा
१० शा. त्रीकमलाल ब्रजलाल राजली ( भोइ )
३५ शा. मुटी पीतांबरदास मुजपुर (पादरा)
५ बाइ लमगी शा. दलसुखभाइ प्राणजीवनदासनी दीकरी
पादरा
५ बाइ डाही ते शा. छोटाटाल उगनलाटनी विधवा. पादरा
२०० बाद आदीत शा. मथुरभइ ईश्वरदासनी विवा. मुजपुर
१६ शा. भागेकलाल वरजीवनदास. पादरा
१५० गाम वेजलपुरना जनशाळाना ज्ञान खातेवी हा. शा.
छगनलाल लमीदास
७५ दाहोदना झा हेमचा हाजीवनदाय,
१२५ गाम गायन ::

"
"
"
(६)
५१ शा. हीराचंद केशाजी गंमीरा
२५ मा. अंबालाल आशाराम
२५ शा. माणेकलाल केशवनी
१० शा. जेचंद केशाजी
११ मा. प्रेमचंद दलमुग्यभाइ पादरा
१० शा. नगीनटाल मोतीलाल
१. मा. दीगटाल ललुभाइ
१० बाद परगन ते यशील दलपतभाइ ललुभाइनी विधवा पन्नी,
१. बाइ समस्त ते शा. कस्तुर दीपचंदनां सौ. पत्नी
३३२०
"
"
"
-
१.१ ऊ. श्री गुमति मागरजी महागजना उपदेशयी हा.
पीयाटाल मघट्ट.
१. श्रीप्त मालमवंद गुलेला बीकानेरवाठा, बंगलोर.
.
श्रीमद अनाचार्य युद्धिमागर मग्जिीप श्रीमद्नां पुस्तको
गुयायामा प्रस्तावना सम्दयामां-चेमज बने भागनु नाम पुरु
पनां मुवी दरेक प्रमो सयोगी मूचनाओ आपरामां से
आत्मभोग आटोके ते सानो पदलो कोई गते यी
दाने देन नदी पखंत नही पग आ कार्य तेओश्रीना
मन उपदेग ने वीज यित थयु दीवायी आ
वाला डन ने नया ने पावन नाम क्यो। ने
ना निदिन र दया तोश्रीनो जेटलो

श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराजनां पुस्तको मेळवी आपवामां
जे जे मुनि महाराजाओए तथा अन्य ग्रहस्थोए मदद करेली
छे तेमज जे जे ग्रहस्योए द्रव्य स्हाय करी छे तेमनो अने
मारा सहाव्यापी बंधु माणेकलाल वरजीवनदास, मंगलभाइ
लक्ष्मीचंद (वह) प्रेमचंद दलसुखभाइ तथा भाइलाल चुनीलाल
बगेरे जेमणे आ कार्यमां धणी मदद करी छे ते सर्वनो
प्रथम भागमां उपकार मानवामां आवेलो छे तेमज आ वीजो
भाग छपावी पूर्ण करती वखते पण फरीयी उपकार मानवामां
आवे छे.
श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराजना ग्रंथो बहार पाडनार
अमो तेमज आ कार्यना मुख्य उत्पादक श्रीमद् बुद्धिसागर
सरिजी महाराज ए सर्वे मोटा भागे तपगच्छना छैए उतां
श्रीमद्ना गुणानुरागयी तेमना गंयो उपाववामां अहोभाग्य
मानीए छीए वेज प्रमाणे खरतर गन्ना मुनिराजो तथा
भावको श्री तपागच्छना मुनिओ उपर गुणानुरागी बनी
तेमना बनावेला उत्तम ग्रंथो बहार पाडी बन्ने गच्छवाळा
परस्पर सहकार्यथी प्रयत्न करशे तो जैन कोमने घणो लाभ
थशे.
सं १९७५ ना वैशाख मुदि ६ ना दीवसे पादरामां श्री
शांतिनाथजी महाराजना देराशरना बजा दंडारोपण महो-
त्सबना वरवोडामां जैनाचार्य श्रीमद् बुद्धिसागरमरिजी महा-
राजना उपदेशथी श्री कल्पमत्र. महोपाध्याय श्रीयनोविजयजी
महागजना यथो तथा श्रीमद् देवचन्द्र भाग पहेलो नपा श्री
आनंदवनपद भावार्थ मग्रह ए प्रयोन टेट् बहुमान पूर्वक वाम

एक हायी उपर वेसवानो चढावो बोलतां वडुना शा. मणी-
लाल लक्ष्मीचंदे मारे रकमनो चढावो बोली श्रीमद् देवन्चद्र
पहेलो भाग लेइ हायीपर बेठेला. आ उपरयी श्रीमद्ना ग्रंथो
मत्येनो अपूर्व भक्तिभाव जणाइ आवे छे. जैन कोममा पूर्वा
चार्यांना ग्रंयो खरेखर आगमोनी पेठे मनाय छे. श्रीमद्ना
बन्ने भागो छपावीने घहार पडवायी अमोने घणोज आनंद
थयो छे. आ ग्रंथोमां शुद्धि कर्या छतां जे मुलो रही गएली
जगाशे ते पीजी आरतिमा सुधारी लेवामां आवशे.
श्रीअव्यात्म ज्ञान प्रसारक मंडळ तरफयी घणां पुस्तको
पडतर किंमते अने केटलांक पडतरयी पण ओछी किंमते
बहार पाडवामां आरे छे. माटे आ संस्थानी कदर करनार ससी
ग्रहस्थो मंडळ तरफयी पुस्तको छपाववामां सहाप करशे
तो मंडळ वयारे उत्साहयी एया पण वधारे उपपोगी कार्य
यजावशे.
वीजी आवृत्ति छपावता पहेलां आ ग्रंथो संबंधी ले ले
महादयो योग्य सूचनाओ करशे तो वीजा प्रसंगे वे उपर
पूग्नु ध्यान आपवामां आवशे.
इत्येवं ॐ अहं शान्तिः३
१० पादग-आश्विन
शुक्ल २ सं. १९७५ } वकील मोहनलाल हीमचंद

(१७) श्रीमद् देवचंद्र भाग २. विभाग यीजो. अनुक्रमणिका. विषय पृष्ट १ अध्यात्म गीता. ४३९-४७७ २ द्रव्य प्रकाश. ४८१-५४५ १ प्रथम चार अजीवदार. ४८१ २ वीचं पुदलद्वार. ४९७ ३ जी जीवद्वार. ५०४ ३ वर्तमान चोवीशी वाळावबोध. १ श्री रूपभजिन स्तवन मां प्रीतिनी रीत बतावी छे. ५४७ २ श्री अजितनाथ स्तवन मां कारण कार्य भावनी साधनता बतावी छे. ३.श्री संभवजिन स्तवन मां मोक्ष कारण क्यारे ने केवी रीते नीपजे ते दर्शान्युं छे. ४ श्री अभिनंदनजिन स्तवन मां है व्य निश्चयनययी कोइ कोइयी मळतां नयी ते बतावेल है. ५ श्री सुमतिजिन स्लवनमा सामान्य वि. शेष धर्मन तथा मप्रभगान स्वरूप वर्णन्यु छे. ५८३ ।

(१८) ६ श्री पद्ममभजिन स्तवनमां नयना भेद- वडे प्रभुदर्शन जणायुं छे. ५९९ ७ श्री सुपार्श्वजिन स्तवनमां ज्ञानदर्शन चारित्रादि जुदा जुदा गुण- लक्षणादि वर्णन छे. ८ श्री चंद्रप्रभुना स्तवन मव्ये चार नि- क्षेपा तथा सात नयवडे उत्सर्ग अप- वाद सेवनाना मेद वर्णन्या छे ९ श्री सुविधिनाथ जिन स्तवनमा आत्म- समाधि आदि गुण तथा ते प्रगट करवानी रीति बतावी छे. १० श्री शीतलनाथ जिन स्तरन मध्ये सिद्धना गुणोनी अनंतता तथा द्रव्यर्नु अल्प बहुत्व तथा द्रव्यपूजा भावपूजानी अगत्य वर्णवी छे. ६४३ ११ श्री श्रेयांसजिन स्तवनमा करण कि- याने कार्यरुप विभंगीए ज्ञानादि गुणो परिणमे छे वेनुं वर्णन छे. १२ श्री वासुपूज्य जिन स्तवनमा द्रव्यपूजा भावपूजार्नु चारे निक्षेपें वर्णन करी प्रशस्त भावपूजा तथा प्रशस्त रागनां टक्षण बताव्यां छे. १३ श्री विमळनायजीना स्तवनमां अ- स्तिता नास्तितानी अनंतताना लक्षण बतावेट हे.

(१९) १४ श्री अनंतनाथजीना स्तवनमां प्रभु दर्शनयी साधक जीवना आत्मगुणनी पुष्टि थाय छे विगेरे कथन छे. ६८२ १५ श्री धर्मनाथजी स्तवनमा सामान्य स्व- भाव तथा विशेष स्वभावना भेद विस्ता- रथी वर्णव्या छे. ६८७ १६ श्री शांतिनाथजीना स्तवनमां सातनये प्रभु स्थापनानुं वर्णन तथा स्थापना ते मोक्षतुं निमित्त कारण सातनये छे ते समजाव्युं छे. ६९९ १७ श्री कुंथुनाथजीना स्तवनमा प्रभु देश- नाना वर्णन प्रसंगे अर्पितानर्पित नयतुं तया सप्तभंगीनु सकलादेशि विकला देशि भांगा सहित वर्णन छे. ७०९ १८ श्री अरनाथ जिन स्तवनमां उपा- दान, असाधारण, निमित तथा अपेक्षा कारणतुं स्वरूप तथा ते कारणता प्रगट करवी ए कर्ताने वश छे विगेरे वर्णन छे. ७२० १९ श्री मल्लिजिन स्तवनमा छ कारकनी साधकता बाधकता तथा शुद्धतातुं वि- स्तारथी वर्णन के. ७३२ २० श्री मुनिसुव्रत जिनस्तवनमा पुष्ट नया अपुष्ट निमित्त स्वरूप तेमज पुष्ट निमित्तवडे सिद्धनारुप कार्य निपजा- (२०) ववा प्रसंगे छ कारक केवी रीते होय तेनुं वर्णन छे. ७४४ २१ श्री नमिनाथ जिन स्तवनमा प्रभु से- वाने मेवनी उपमा घटावी छे. ७५३ २२ श्री नेमिनाथ जिन स्तवनमा राजिम- तीए प्रभु प्रत्येनो कामरुप अशुद्ध राग टाली प्रशस्त राग कयों वेनुं वर्णन छे. ७५९ २३ पार्श्वजिन स्तवनमा परिणति तथा प्रवृ- तिनी एकता दर्शावी पछी शुद्धता, एकता, तीक्ष्णताना अर्थ कहा छे. ७६५ २४ श्री महावीर जिन स्तवनमा संसार पार पामवा विनती करी छे. २५ कलशरुप स्तवनमां जिन स्तुतिनुं फळ तथा कर्तानी गुरुपरंपरा वर्णवी छे. ४ वीस विहरमान जिन स्तवन. ५ अतीत जिन चोवीशी. ८०९-८४९ ६ स्नात्रपूजा. ८५१-८६८ ७ नवपदपूजा. ८६८-८७२ ८ एकवीश प्रकारी प्रजा ८७३-८८३ ९ अष्ट प्रकारी प्रजा. ८८४-८९१ १० वीर जिन निर्माण को. ८९३-९०९ ११ श्री पद्मनाभ जिन स्नान ९१० १२ श्री सीमवर पामि विनती स्तवन .

१४ श्री सिद्धाचटजीनां स्तनो. ९१३ १७ दीवाळीनं स्तवन. १८ नवानगर आदि जिन स्व० १९ पृवपद स्तवन. २० समवसरण स्त० २१ कुंभस्थापना स्त० २२ सहरूकूट स्त २३ अजितनाय जिन होरी. २४ ज्ञान बहुमान नमस्कार. २५ सिद्धाचल स्तुति. २६ विसस्थानक २७ गिरनार २८ वडी साधु वंदना. २९ साधुनी पंचभावना (टवार्थ) (१) भूतभावना. (२) तप (३) सत्व ९१९ ९२१ ९२२ ९२१ ९२३ ९२४ ९२५ ९२६ ९२७ ९२९-९५० ९५१-९९२ ९५३ . ९५९ (४) एकत्व " ९७४ " ३० अप्रवचन मातानी सझायो ३१ प्रभजनानी सझाय. ३२ मण मुनिनी ३३ समकिननी ९९३-१०२१ १०२२ १०२८ " vita

१०३१
(60"
३४ गजसुकुमालनी
३५ पंचेंद्रिय विषय त्याग-पद
३६ आत्म पद.
३७ मुनि गुणस्वाध्याय.
३८, साधु पद स्वाध्याय.
३९ साधु पद स्वाध्याय टबो.
४० श्री बाइजिन स्त० टबो.
१०३७
१०३७
१०३९
कागळो ३.
१०७३- ८०
'४४
४५ श्रीमद् बुद्धिसागरसूरिकृत श्री महावीर
मभु जन्मगीत, पारणं.
१०८१

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अथ श्रीमद पाटर देवचंद्रकृत । अध्यात्मगीता प्रारंभः ।। गग॥शाल भमागीतानि॥ प्रणनिए विश्व हित जैन वाणि। महानंद तन सिंचवाअमृत पाणी । महा मोहपुर भेदवा जपाणी। गहन भवपं.द छेदन कृ.पाणी ॥१॥ -दिस करत ने जगद ने हित के० कानी नारी महकी रे देवीदीनानं वानीने नेमानी ३. ना. दई जिनकी रहेदी महा नंदरता. हने निक नई पोज होइन हो. बर्ट: दिन होने हो मेहगल टेहर के नगर का भागाने र संगो पाई. इस है ई हे गहन दे. अति- . 11 भावन नव विधायक गांधक, माजिदर । - अध्यात्मगीता. नय निक्षेप प्रमाणे जाणे वस्तु समस्त । त्रिकरण जोगे प्रणमुं जैनागम सुप्रशस्त ॥२॥ अर्थ:--वली जिनवाणी कहेवी छे १ घणा पुद्गलादिक संबंधी जे द्रव्य तेने प्रगट करी देखाइयावाली एहवी, वली तत्व से आत्मतत्व जे आत्मानुं स्वरूप तेने बोध के० समजाववावाली, वली चिद्रूप के० चेतनरूप एहयु जे आत्मस्वरूप तेने शोधक के० प्रगट करी देखाडे एहवी, वली जिनवाणी कहेवी छ ? नय के नेगमादिक सात नय तथा नामादि च्यार निक्षेपा तथा प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाणे करी समस्त वस्तु पदार्पनी जाण- पणानी करणहारी छे, अन्यमतिनां शास्त्र छे ते अपशस्त छे, अने जिनमतना आगम छे ते प्रशंसनीय छे, एहवो जिनागम हने विकरण योगे करी मनोवाकाययोगे करी प्रणभु १ नम• स्कार करुं ; इति भावः ॥२॥ जिणे आतमा शुद्धताये पिछाण्यो । तिणे लोक अलोकनो भाव जाण्यो । आत्म रमणि मुनि जग विदीता। उपदिसी तिणे अध्यात्म गीता ॥ ३ ॥ अर्थ:-हवे सर्व द्रव्यनो जायक जे जीव द्रव्य सर्वद्रव्य मन्ये ते आन्मयनो लक्षण हीये मार प्रथम आत्मद्रव्यना जाणने माधक कहिये । है 7 जण आतमा के० जे जिव गमकित प्रमुब आलम के ते द्धता छ. मूल मत्तास्वरूप पिठाप्यो के ओलम्यो नेग कोक नया अलोकनो भाव सर्व अध्यात्मगीना. ४५१ , जाग्यो ने आचारांग मूने काय के "जे पगंजाणइसे सबंजाणइ" ते आम के आत्मस्वरूपीज रमे एहवा मुनि जगतमांहि प्रसिद्ध छे, तेणे अध्यात्मगीतामो उपदेन की छे पण करता कहे के हुँ नदी करतो इतिभावः ॥ ३ ॥ द्रव्य सर्वना भावना जाणग पालग एह । ज्ञाता कर्ता भोक्ता रमता परिणति गह ।। ग्राहक रक्षक व्यापक धारक धर्म समृह । दान लाभ वल भोग उपभोगनणां जे गृह ॥2॥ अर्थ:-जय मर्चना के वाग्निकायाटिक पट म्यना गुणपयोय तथा अंदवि देव भावना मित्र की प्राण्या हे, तथा दोहा हे पहनो कमा छ जना के स्वानों सम्प जाने इन ने कनी के मुभारम विभाग दगानो कनीनभवनासन अंतरा भी व्हनो का मानदेय पाप हनो मेन है. कविता हने हो कर मना कण सता इन्देक परिणतिन , महक, क. ज्ञानादि गुणधर्म सा तेहने हमें हर अपनी रासमहार नपा स्मधर्मने बिह बरे ते पारक ए ग्राहक, कर. सन सहनो हो. एहि आम उन का . : - लाधना समूह प्रगट्या ३. बनी : .. ब - ४४२ अध्यात्मगीता. गये दान पोताना ज्ञानादि अनंतगुणने विपे दीये छे ते दान- लन्धि, १ लाभांतरापक्षयगये पोताना स्वरूपनो लाभ थयो ते लाभलब्धि २ भोगांतराय कर्म क्षय थाय त्यारे पोताना ज्ञा- नादि अनंतगुणना पर्याय तेहने समये समये उपभोग करे छे ते उपभोगल्लन्धि ४ वीर्यातराय कर्म क्षय गये पोताना अनं- तज्ञानादिकने विपे अनंतो वीर्य फोखे छे ते वीर्यातरापलब्धि ५ तथा जिहां आत्मा ज्ञान दर्शन रूपगुण बेमयिज कहे छे, तिहांतो वीर्यादिक गुण सिद्धमां नमी कहेता अने जिहां अ- नंतगुणी व्याख्या करे तिहां कहे छे एटठे असंख्यात प्रदेशी, अरूपी, अखंड ज्ञानदर्शन गुणमयी उपयोग लक्षण कर्ता, भोक्ता सहज परिणामे जीवदन्य जाणवो. जीवभाव द्रव्य प्राणे करीने सदा जीवे ते जीव, चेते-जाणे तेमाटे चेतन कहिये, तथा नवा नवा पर्यायने पमाडे मारे आत्मा कहे छे इत्यादिक अनेक नाम छे. ॥४॥ संग्रहे एक आया वखाण्यो। नेगमे अंशथी जे प्रमाण्यो । दुविध व्यवहार नय वस्तु बीहचे। अशुद्ध बलि शुद्ध भासन प्रपंचे ॥५॥ अर्थ:-साते नये करी जीवनो स्वरूप ओलखावे छे. संग्रहे एक आत्मा वग्वाण्यो, संग्रहनयना मनवालो सत्तानो ग्रहण रेछे एश्ले ए म। जीव चेतना समताय जोतेथके एक स- रीवा छे, ए मग्रहनयनोमन नगमनयना मतवाला एक अंश महीने मव बस्तुनो प्रमाण कर पुरले जावना आट रुचक अध्यात्मगीता. ४४३ " प्रदेश को लेपाता नयी सदा उदाडा छे, तेणे करी आत्मा सिद्ध समान जाणो. व्यवहारनय मते वे प्रकारे जीव कहे छे, अगर ते अष्ट कर्माश्रित संसारी जीव, अने राहते अष्टकर्म रहित सिद्ध, एवं वे प्रकारे व्हेंचे, एक सकळ कर्म क्षय करी लोकाये विराजमान ते सिद्ध, वीजा संसारी तेहना थे भेद- एक सयोगी वीजा अयोगी इत्यादिक ले भेद ते व्यवहारनयना मतवालो ते वस्सना गुण पर्यायी प्रवर्तिन ग्रहे थे, ते प्रवत्ति ये प्रकारनी-जे द्रव्यना गुणनी शुद्धता जेयी निपजे ते प्रवृत्ति ते साधन गृद्ध व्यवहार १ अने जे प्रवृत्ति करतां द्रव्यधमनी अशुद्धता नीपने ते प्रवृत्तिने अशुद्ध व्यवहार कहीये १५ अशुद्धपणे पणसय तेसठी भेद प्रमाण । उदय विभेदे द्रव्यना भेद अनंत कहाण ॥ शुद्धपणे चेतनता प्रगटे जीवविभिन्न । क्षयोपशमिक असंख्य क्षायिक एक अनुन्न ॥६॥ अर्थ:-अशुद्ध व्यवहानपने मजे जीवना पांघने वेदाट भेदनो माग जाणतो. अट औदपिक भावने योगे वर्ग जोनां तो जीवापना भेद अनंता करा हे, अने गुरुयन- हारनप मजे जीवनी पेतनता नीपले अने विभिन्न अभे- दामने जारी. पुइटीवर सो जाने नेहने परोक्षजे पाम तेने इहिं न पोपोमानहने मोटो परि ' ' विकलां गा. ३ मा ११.३. भाबको ६ :: ar - ४४४ अध्यात्मगीता. नामथी जीव चेतन प्रबुद्ध । क्षेत्रथी असंख्य प्रदेशी विशुद्ध ॥ द्रव्ये स्वगुण पर्याय पिंड । नित्य एकत्व सहजे अखंड ॥७॥ अर्थ:--नामयी जीवने चेतन कहिये. चेतनालक्षणो जीवः चेतना ते ज्ञानदर्शन चारित्र तप उपयोग वीर्य लक्षण इत्यादि तथा बीजो अर्थ, नाम निक्षेपे जीव अथवा चेतन अथवा प्रबुद्ध कहिये, ए जीवनां प्रण नाम कहीये, क्षेत्री जीवनी स्वक्षेत्ररूप असंख्य प्रदेशात्मक अने विशुद्ध ते अत्यंत निर्मल छे, व्ययी निज द्रव्य पोताना गुण ज्ञानादि स्वपर्याय तेहनाज पिंड समुदायस्प छे ते द्रव्य कहीये, अने नित्य ते सदर शाश्वतो छे, केणे कयों नथी अने एकत्व ते निश्चय नयमते जीव सदाकाळ पोताना स्वरूपमा एकत्यपणे छे, सहज अखंड ते खंडाय नहि, अछेदी अभेदी छे. ॥७॥ ऋजुसुये विकल्प परिणामे जीव स्वभाव । वर्तमान परिणितमय व्यक्त ग्राहक भाव ॥ शब्दनये निज सत्ता जोतो इहतो धर्म । शुद्ध अरूपो चेतन अणमहतो नव कर्म ॥ ९ ॥ अर्थ--ऋगमननयने मते जीव विकल्परूप पारिणामिक भाव ग्रहे छे. एटले वर्तमान समये जीवने जेबो उपयोग होय तेवो प्रगट कही बोलावे, अजय नयमतवालो यथाकथित अध्यानगोता. ४४९ आदः सामायिक स्थितोऽस्मिनोभावान्गृहेगतलाकेनाऽपिपृष्टं- श्राद्धः कुत्रगतः एवं पृष्टे सत्पपिनघुना भनितं ममस्थानी गृहेगतः एन क्युं जनेशदनपनवे पोतानी आत्मसत्ताने जोतो ज्ञानदर्शन चरित्रादिक अनंतो धर्म पोतानी आत्म- मत्ताने विरेनबो हे. वेहने प्रगट का इहतो-वांडतो थो शुद्ध निर्मल अल्पी पुलादि विभावदशा रहित चेतना लागो पोताना पोपशम गुल्ने साधकाने प्रवर्ततो ते सन्द- नपजीव कहीए. इहां जेल आनप्रति नशामन ने ग्रहे अंचक याद तेस्तो जीवरको गदखे एके एहा जीवने जे समये उपोग होदते समये नवा कम्तो ग्रहयो न करे ॥८॥ इणिपरे शुद्ध सिद्धात्म रूपी । मुक्तः परशक्ति व्यक्त अरूपी ॥ सनकिति देश यति सर्वविरति । धरे साध्यरूप सदा तत्त्व प्रीति ॥ ९ ॥ अर्थ:-एनिरिटे छद्र खिमली दुद लिद भग- वाद् ते सात निज आत्मा यातो जमानाने विचातो जमवली हे. रस्त्त के पदक बिनादर्ण सवालो डे पर के शक्ति के आन सामना व्यक्त के अगसो तेने अनानावना मापक मलित. देवनिति तथा मई निर्णन है अंजने मस नत्वन प्रन बाहामा डे. पहरा नेहा मजन 7 रन अन्न निगा रा र सारे. पाकि?

४४६
अध्यात्मगीता.
समभिरुढ नये निरावरणि ज्ञानादिक गुण मुख्य।
क्षायिक अनंत चतुष्टयी भोगी मुग्ध अलक्ष्य ॥
एवंभूतं निरमल सकल स्वधर्म प्रकाश ।
पूरण पर्याय प्रगटे
पूरण
शक्ति विलास ॥१०॥
अर्यः-सममिदनपमते शुकल्यानरूप अभियेकरी घाती
कर्मने श्रये निगवर्णपणे जानादि अनंतगुण रूप लक्ष्मी प्रगटे
एटो मुख्य लक्ष्मी प्रगटे अने क्षायिकभावे अनंत चतुष्टप
प्रगट्या अनंतज्ञान १ अनंतदर्शन २ अनंतचारित्र ३ अनंत
वीर्य ४ नेहना भोगी तेग्मे चौदमे गुणटागे केवली भगवान्
जाणता. तेहनो जाणपणो भोला अजाण जीव न जाणे, एवं
मूतनयमने कम मळ रहिन निर्मल सकलसंपूर्ण पोतानो ज्ञाना-
दिक म्वधर्म मान्ममनाने विष प्रकाश को प्रगट करे छे एको
धर्मनो काम प्रगट्यो पटले एक एक प्रदेशे अनंता जे प.
पांय ते मपूर्ण प्रगट्या छे मकल गुणना पर्याप पोताने कार्य
को प्रवने हे देवार पूर्ण पर्याय प्रगटे थे ते संपूर्ण शक्तिनो
विटाम भोगायो प्रगटे. इत्ययं. सादि अनंत भांगे करी एवं.
मतनो मिदन म्वर वम्पायु. ॥१०॥
एम नय भंग मंगे मनृगे।
माधना मिदनारूप पुगे ।।
माधम नार न्या नगी प्रग।
मा यमद ना तु दागे ॥१॥

अध्यात्मगीता. ४४७ अर्थः-इम नैगमादि सप्तनयर्नु रूप भंगने संगे करी दीपतो छे. साधकता ने चोथा गुणटाणायी मांडी अयोगी लगे चडी सिद्ध भाव करे छे परो छे. शुद्ध व्यवहारनयने मते चोथा गुणटाणायी मांडी यावत् तेरमा गुणटाणालगे साधक- भाव छे. निश्चयनयमते कार्य सिद्ध निपजे तिवारे जीवने पूरो कहिये. ज्यां त्यां साधकभाव छे तिहां लगण अधूरो छे. सा- धकभाव शन्दनय सममिरुद नयमते देशविरति सर्वविरतिरूप सायभावे त्यांलगे जीवने अपूरो कहीये अने जेवारे साध्य जे कार्य सिद्ध नीपन्यो तेबारे पछी हेतु के० कारण साधक- पणानो प्रवर्तन ते गरो के बलवंत नहिं एटले कार्य सिद्ध कारणनो बल नहि ॥ ११ ॥ काळ अनादि अतीत अनंते जे पररक्त । संगांगि परिणामे वर्ते मोहासक्त ॥ • पुद्गल भोगे रिज्यो धारे पुद्गल खंध । परकत्ती परिणामे वांधे कर्मना वंध ॥ १२ ॥ अर्थ:-जेवारे एवो आत्मा छे तेवारे संसार किम थाय ? ते कहे छे. जे आत्मा अनादिकाल अतीत के० गयो छे अतीतकाळ अनंतां पुद्गल परावर्त थयां परभाव जे पौद्गलिक सुखने तेहना खंधना गुण वर्णादिक तेहने विषे रक्त के. रागीपणो शायी थयो ? ते कहे छे. संगांगी के पुद्गले दीधा अंग तेनो जीवे कयों सग एटले अगा के० पुगल ले परभाव तेनो संग मीलचो अने आन्मा तेहने अगा करी तेहनो संग करे एटले तेहना सगने परिणामे कर बनना मोहमा आमक्त अध्यात्मगीता. थयो तेबारे जीवने इयो विगाड थयो ? ते कहे छे. जीव पुगलने भोगे रीइयो थको पुद्गलना संघने घरवानी इच्छा उपजे एटले पुद्गलने भोगे राज्यो इश्ता पाम्यो थको पुद्गलना खंघने धारे- राखे, पुद्गल ग्रहण करे छे अने परनो का पोते थाय छे त्यारे कर्मना बंध पोते बांधे छे ॥१२॥ वंधक वीर्यकरणे उदेरे । विपाकि प्रकृति भोगवे दल विखेरे ॥ कर्म उदयागता स्वगुण रोके । गुण विना जीव भवोभव ढोके ॥ १३ ॥ अर्थ:-जे कर्म अंधपणे प्रवर्ततो जे वीर्यने बंधक वीर्य कहीए. ते बंधक वीर्यकरणे सत्तागतकर्मने उदये जीव नवीन कर्मबंध बांधे, शेणे करीने ? करण जे इंद्रिय वेहनो वीर्य जे पराक्रम वेहनी प्रेरणाए करी शुभाशुभ प्रकृतिरूप विपाकनों दलियां सत्ताये रयां ते उदय आध्ये भोगवीने विखरे वे खेरखे अने तेहने विपे रागद्वेप परिणामरूप मननी विकणताइं नवां कर्म बांधे छे, ते कर्म ज्यारे उदय आवे त्यारे आत्माना स्वगुण रोके आवरे गुण ढंकाणा एटले जीव गुण विना थयो त्यारे जीव, भव च्यारगतिमाहे रझलतो फिरे छे एटले रागद्रे प्र. णम्यो जीव निर्गुण थको च्यारगति मध्ये अनादिकालनो आत्मा भव प्रमण करे छे.॥ १३ ॥ आतम गुण आवरणे न ग्रहे आतम धर्म । ग्राहक शक्तिप्रयोग जोडे पुद्गल शर्म। 1 अध्यात्मगीता. परलाभे परभोगने योगे पर कर्त्तार।. एह अनादि प्रवत्तें वाधे पर विस्तार ॥१॥ अर्थः-आत्मगुण ते ज्ञानादिगुण ते कर्मरूप आवरणे अवराणा तेबारे आत्मानो धर्म ज्ञानादि कीहांयी ग्रही शके ? ज्ञानादिगुण न आदरे अने ग्राहक शक्ति छे तेबारे शं ग्रहे ? पुट संधना सर्व शेष पुगल जोड्या मांड्या प्रयोगे करी एटले पुदलनो भोगी थयो त्यारे ते शुभाशुभ पुलना संघ मेळा का ते पर पुदलने लाभे लाभपणो मान्यो १ अने शुभाशुभ- पर पहलनो दान देइने दान मान्यो २ गुभाशुभ पहलनो भोग मिले भोग मान्यो ३ अने शुभाशुभ परपुदलनो उपभोग मिले उपभोग मान्यो ४ एम दानादिक न्यार लब्धिने वली वीर्य शक्ति फोरवी तेहने पोगे करी परनो कर्ता थयो. कोइ पूछे के ए जीवपर कर्नापगो क्रिस्ये काले पाम्यो ? तिहां कहे छे ए अनादिनी प्रति हे, एहवी रीते अनादिकाळनी जीवने अबी प्रति घट्तेपी परभावनो विस्तार एम कर्मनो बिम्नार पान्यो हे तेने करी संसार सुटतो नवी. ॥१४॥ एम उपयोग वीर्यादि लब्धि। परभाव रंगी करे कर्म वृद्धि ।। परदयादिक यदा नुह विकल्पे । नदा पुण्य कर्मतणो बंध कल्पे ॥१५॥ अर्थ-एहवी ने वीदि पांच सम्धिन दिन बीवनो अको उपयोग जन्मों, पार पोताना स्वभावन वा

४५०
अध्यात्मगीता.
त्यारे जीव परभावनो रंगी भयो सारे ते जीव नवनवा कर्मनी
पदि करे, कर्मनी वृद्धि करवा मांडी जिवारे एहवी जे परदया-
दिक करे अनुकंपा करे एहयो जे शुभ विकल्प उपजे शुभ
परिणाम तेहयी इयु पाय ? तेवारे पुण्य कर्म बंधाय तेहयी
पण आत्मानो गुण न प्रगटे. ॥१५॥
तेहीज हिंसादिक द्रव्याश्रय करतो चंचलचित्त।
कटुक विपाकि चेतन मेले कर्म विचित्त ।।
आतम गुणने हणतो हिंसक भावे थाय।
आलम धर्मनो रक्षक भाव अहिंस कहाय ॥१६॥
अपं. ते जीच हिंमादिक यात्रा करतो वित्त के
मनी पथर परिणामि जीयने पहयो जे हिंसादिकनो विकल्प
उन्यो, कोयने टगवानो परिणाम उठ्यो, तेथी इयुं थाय ?
पापना कडवा विधाकनो बंध थाय, एम कटुआ कर्मनी विधि-
पता बंधाय पटले अशुभ परिणामे अशुभ कर्म जीव मेलये
नंगो करे, ए दृश्य दया दम्य हिंसा तेहनो फल देखाच्यो छे,
जे विभाव परिणाम प्रणीने आग्माना गुणने हवा ते भाव
हिमा अमगम ने हगाय ते भाव हिंसा है, पर जीव है.
सानां नो आमगुम हाता नयी ते निश्चपी हिंमा नयी.
जो अन्मगुण हमाप से पानी हिंमा की नयी तोहि पण
देने मात्र दिमक कहीये आत्म हिंसा पाप परतु नयी
पटने आम ने गये भार अहिंसा के गुणी नया
अनादिक मग्ने अनुमकी दी उस्मोग करता आमाण
दुसरन ने मार अहम कदये ॥ १६ ॥

अध्यात्मगीता.
आत्मगुण रक्षणा तेह धर्म-
स्वगुण विध्वंसणा ते अधर्म ॥
भाव अध्यात्म अनुगत प्रवृत्ति ।
तेहथी होय संसार छित्ति ॥ १७ ॥
अर्थ:--आत्मगुण के० पोताना आत्माना गुण जे ज्ञा
नादिक वेहने शुद्ध उपयोगने विषे प्रवर्तिने राखवा तेहिज
आत्मिक धर्म छे, स्वगुण विन्वंस के० पोताना आत्माना गुप
ने ज्ञानादिक हणाय अवराय अशुञ्ज उपयोगे परभाव अनु.
यायी प्रवर्ततां तेहिज अधर्म कहीए. हवे अन्यात्मना च्या
भकार कहे छे, नाम अध्यात्म १ स्थापना अध्यात्म २ र
अव्यात्म तेने कहीये हयी भाव अव्यात्म उपजे, सद्गुर
जे अव्यात्मना जाण तेहनी सेवा भक्ति विनयादिक करीने
अत्यात्मना स्वरूपनी गुरुगमयी ओलखाण करे, अयवा अ
ध्यात्म शास्त्रनो अभ्यास करे, तथा ध्यानतुं स्वरूप गुरुगमर्य
धारीने प्रथम अभ्यास व्यवहारयी करवा मांडे इत्यादिक दर
अध्यात्म वे भाव अध्यात्म प्रगट करवानुं कारण छे. ए दर
अध्यात्म जाणवू ३ हवे भावअध्यात्म कहे छे एहवो आत्म
कुण ओलखे छे आध्यात्म ज्ञान घयुं होय ते ओलखे जे
भाव अध्यात्म ते मोक्ष कारण छे, भाव अध्यात्म तेहने
कहीये ज्ञानादिक शुद्ध उपयोगने अनुयायी सन्मुख प्रवर्ति ते
भाव अध्यात्म कहिये. एहवो आत्मानो गुण थयो तिवारे
जीवने इयो गुण निपजे ? ने संसार समुद्रनो उछेद करे एरले
संसार घटाडे तेयो थोडा काळमाहे सिद्रियरे ॥ १७ ॥

अध्यात्मगीता. एह प्रबोधना कारण तारण सद्गुरु संग। श्रुत उपयोगी चरण नंदि करि गुरुरंग ॥ आतम तत्त्वालंबि रमता आतम राम । शुद्ध स्वरूपने भोगे योगे जसु विश्राम ॥१८॥ अर्थ:--पहजे आत्मज्ञान पूर्वे का तेहना बोधना शाम के संसार समुदयी आत्मस्वरूपनो प्रतियोष देइ ओ- टदाण कगीने कोण तारे भला जे सद्गुरु तेहनो संग भक्ति कानां मोचीज जे समकीत भव्य जीपने करावीने संसार समुद्री तारे ते गुम्नो वर्णव करीए छीए: गुरु केया होय? है कहीरे कीये. मार श्रुतज्ञानना उपयोगने विगे सदा रमे है. मामाद के.. चारित्रने विष रमे छे. सदा आनंदपणे वर्ते 2. एका गुरु मेयाये रंग कालो ते गुरुनी सेवा कसी जेयी अमात्मज्ञान पामीए, वठी गुरु केया छ ? जेम आत्मा प्रगट थाप देद्दनो उक्षम छे, रमणीय ठे आत्मामां रमी रया छ, मात्मानपने आलंयी रमण करे छे. सदा पहना आत्माराम आमावानं शिरमे ते अमागम वहीये, वर्ग गुरु केया है। जेहन स्वरना भोग्नी इष्टा तेहनो भार पंग उन दसन पारिय पा३ योग सारे छ, जरा है। पग्ने विविध प छ । गुरु मी नो राम वन उनी ।। १८ ॥ महाल योगयी बाल जीय । को पलो महजयी परमजीय ॥

अध्यात्मगीता. ४५३ आत्म शक्ति करी गंठी भेदी। भेद ज्ञानी धयो आत्मवेदी ॥ १९ ॥ अर्थ:-वगा जीव एवा गुगुल्या बोध पाने, एवी रीवे सद्गुनी संग-सेवा की वणा जीपने समकितनी प्राप्ति होप, दोई बली गुल्नी पोगवाह विना भवस्थिति पाकी हु तो कोइक जीव सहजी बोय पाने एल्ले कोइक जीव सहजयी बोध पाने एट कोहक जीव सहजयी पार पत्येक चुदादिनी परे समशित पाने गुरुना उपदेश दिनाज इत्पर्यः जीव पोताना आत्मानी रागडेप परिणाम भावकनी गांठ आत्माने पुदल हो ममत्वता एकीभूत ते गांड अनादिनी छे. ते पोतानी श- तिए करीने भेदे, सां पीनेद करतो त्यांतो पोतानी आत्म- शक्तिए आर्य करण के. पहेला इदि न आया. एका परि- पाम ते मार्च कमरूप पोताना वोर्षोल्लासे करिने रादेपनी गांट दे तो समकितनी मानि पाने, गुल्ना पोग दिनापे देवरे सो गुण निपजे ? ते बहे है, भवज्ञान ले शरीर आन्नानो भेद विवश निन्दता काल्पज्ञान घ. दारीर जह है अपेतन हे, आना पेन है. एहतो भावी न्यारो ओ. तपणे ते दहन .त्परे मनो दिहती जानी तेवर आमदनी देह-जाः पो. ॥ १९ ॥ द्रव्य गुण पाद अनंगनी पड़ परतीत । जाण्यो आतन का भोक्ता गह परनीत ॥ अक्षा पाने उपन्या भातन मुनयं सत्य । साध्यालंबी चनना लगि आनन नत्व ॥२०॥ ..

४५४ अध्यात्मगीता. अर्थ:--आत्मस्वरूपने उपयोगे पते वारे एक: विषे अनंतागुण छे ते मध्ये एकेका गुणमे अनंता.पाय छे. जे जीम हता तेम परतित थइ वेवारे शुं थयु ? आत्मा पो- ताना स्वभावनो कर्ता भोक्ता थयो. परमावना कतादिनी मूल मटी गइ, एटले निर्भय थयो एवी श्रद्धाने योगे प्रवीत प्रगटी त्यारे जाणपणुं पोतातुं छतु थयु, जेवारे ओठल्यो ते. वारे वेहवें आलंबन करवा मांडयुं त्यारे चेतना वलगी आत्म- तत्व जे ज्ञानादिकने विषे ॥ २०॥ इंद्र चंद्रादि पद रोग जाण्यो। शुद्ध निज शुद्धता धन पिछाण्यो । आरम धन अन्य आपेन चोरे। कोण जग दीन वळी कोण जोरे ॥२१॥ अर्थः-एवं ज्यारे खरुं भासन पयुं त्यारे इंद्रनी पदवी चक्रवत्तिप) वासुदेवपy ए औदयिक सिद्धि इंदिपजनित पोद्ग- लिक मुख ए सर्व रोग जाण्या, शुफनिज के. शुद्ध निर्मल पोताना आत्मानो शुद्धतापणो जे ज्ञानादिक धन जे पोतानी भावऋद्धि हती ते जाणी ओळखी पोताना आरमानी ऋद्धि जे अरूपी धन ज्ञानादिक भाव लक्ष्मी स्वगुण पर्यायरूप तो स्वाधीन छे. कोइयी आपी अपाती नयी एटले अरूपी वस्तु कोइयी आपी जाय नहि, कोइनी लेवाय नही, त्यारे माग- घानु दीनपशु टयु अने जगतने विपे कोइ एवो दीन नयी जेहने आपे अने कोदयी आत्मानी ऋजि लेवाय नही एवो सभामगीता. .. - कोई जोरावर नवी ने सेंची है. एको जोस्पो वारे पोतानी दिनो भपन भज गपो. ॥ २१ ॥ आतम सर्व समान निधान नहा मुख कंद। सिध्धतणा साधी सत्ताये गुणबंद।। जेह स्वजाति तेहथी कोण करे वध बंध। प्रगट्यो भाव अहिंसक जाणे शुध्ध प्रवंध।।२२।। अः-आम के आत्मा सर्व तरीखा है, कोइनो स्पून्याधिक हे नहीं, निधान के निचे महासुखरूप हे, ले सुखनी विहांई उपना नयी ते मुख सिद्ध भगवान्ने प्रगट भयुं हे अने संसारी जीवने ए सुख सत्तामा रहुं हे, पीजी पर असर्व जीद सत्तादे एक सरिखा सामान्पपने जाणवा. निष्प नपने मजे सर्व जीव ज्ञानदर्शन चारित्ररूप निधाने करी मुक्त हे. निश्ची सब जीव सत्ताए महासनां कंदमूळ हे, सिद के सिद्धना जीव नया सारी जीव सरिता साधर्मीपने गने हे, पण सत्ताये देना गुण बरावर हे, तेबारे पोतानी बराबरीना सरल जीव थपा, तथा चीनी रोवे निवपनपी सर्व जीवनो धर्म सत्ता सिद्ध समान एक सरीखो हे, जेनो सरलो धर्म होय तेने सायनी चहिये. सर्व जीव सत्तापे ज्ञा- नादि गुपना इंद-समूह हे, तेगा मई जी एक जातिना घया, बुख ८ तेबारे तेनं हिमा किन पाय ! चार तेहने दुःख किन देवाय । तेहता ३६ ; है: र एवी रोते ज्यारे दया प्रपने तेवर - अहमक प्रगद बाप नेवार पिनसाशन शुद्ध मापनो पर जाग्यो. ते जाना कहेले - अध्यात्मगीता. ॥ यतः । यथाममप्रियाःप्राणास्तथा तस्यापि देहिनः इतिमत्वान कतम्यो घोर प्राणियो बुधैः ॥ २२ ॥ ज्ञाननी तिक्षणता चरण तेह । ज्ञान एकत्यता ध्यान गेह ॥ आत्म तादात्म्यता पूर्णभावे । तदा निर्मलानंद संपूर्ण भावे ॥२३॥ अर्थ:--पटले ज्ञान दर्शन चारिकरूप निश्चयनय ज्ञाननी निसपना के पहई जे तिक्ष्णतापणे निर्मल आत्मज्ञानना उसपोग तेदिन चारित रहीये. जे पोताना आत्मस्वरूपना जानमें एकत्वा के ने व्यानरूपी घर वहीये, एहवो जे आत्मा आत्मानी आन्मताने जानादिक पुणं भारने पामे, तदा कहतां तिवार नामर आनंद साणं पामे. ॥ २३ ॥ चेतन अस्तिभाव जंह न भाते भाव । नयी भिन्न अरोचक रोचक आरम स्वभाव ।। ममकित भाव भाव आतम शक्ति अनंत । कर्म नादानी चिंतन नाणे ते मतिमंत ॥२६॥ अ.नन के. अत्मानो अनि मात्र आपणी ऋदि महिछे ममाना साम पर किसर टो नहि ने अन बात की. निधारली नानी अन्म मनाने दिन अन्त मननिमंट म यमो बारे हो ? न , म परमार आ- अमात्मगीता. ४५७ लापी जे अद्धि ही ते पोतापले जाने नहि तेहदी अलगो रहे तेहनी तचि पन राखे नहि. अविभावे पौगालिक वस्तु- नी जापियी अंग न्यागे प्रबहे. त्पर पि विहां । ते कहे हे, रोचक के पोताना आम स्वभावनी ऋदि ज्ञाना- विकनी रुचि राखे ने पोतानी प्रज्ञा प्रगती हे ते सक्ति भारे अनंति शक्ति पोतानी जानी हे हनी रुचि क्रेतेहने रूपादे हेनेता स्पानमा तपटीन चपो थशे प्रवत हे, की मतवानो विकल्प नदी आये नहीं एहवी श्रद्धा प्रगटी , पोता स्वल्प ओलन्यु हे, हवी का दे एनी डेढ़ जाप कर्म बलवानी बुद्धि गले नह नेहने मोटी बुद्धिना वर्ग कहने को न लारे ने माहग का शिकार से इन कार न घाय. ॥२४ ।। स्वगुण चिंतनरले बुद्धि घाले । आत्मसत्ता भणी जे निहाले।। शुद्ध स्याद्वाद पद संभाले परघरे तेह नति केन वाले ॥ २५ ॥ ई-विर ई चिनो है . मन के. ताना जन्मने जिन अनंता रहे है गुमनी । पार वह पति का के. वी. का पर:

४५८ अध्यात्मगीता. रुचिवंत थयो तेहने जोवे-संभाले, अंतरंग द्रष्टिये करीने परघर के ते परभावमा पोताना आत्मानी चित्त निमित्त जे बुद्धि तेहमां घाले नहि एटले परपरिणतिमा पेसे नहि, ते जीव पो- ताना स्वभावरूप घरमां बुद्धि प्रवत्ताये इति रहस्य. ॥२५॥ पुण्य पाप वे पुद्गल दल भासे परभाव। परभावे परसंगत पामे दुष्ट विभाव ॥ ते माटे निज भोगी योगीसर सुप्रसन्न । देव नरक तृण मणि सम भासे जेहने मन्न ॥२६॥ अर्थः-पुण्य पाप कहेतां जे पुण्य पाप छे ते थे पुद्ग- लनां दलीयां छे, पाप छे ते कडवा विपाकछे अने पुण्य छे ते मीटा विपाक छे. ए ये जेने मन सरखा जाण्या छे. पुण्प पाप एबे मुनिने मन परभाव भासे छे, आत्मिक धर्म नहीं, पुद्गलनां दलियां छे ते माटे परभाव भासे छे, वली एह विचारे जे परभाव जे विभावदशा, एना संगयी च्पार गतिमा रजलयुं थाय छ, तिणे करी पुण्प पाप बेहु दुष्ट विभाव छ, आत्मधर्म नहि, तथा पीजो अर्थ कहे छे, परभाव रूप विभावदशा ने परसंग तिणेकरीने दुष्ट विभाव जे मोहा- दिक पामे आत्मस्वरुप न पामे, तिणेकरी संसारमा फरतां अनेक प्रकारे कर्म विटंबना रूप दु.खविपाक भोगवे, पर संग भकी, ते माडे के० ते कारण निज भोगी के० पोताना आ- त्मस्वभावना भोगमा बर्न के तहने यो समानगज कहिए, योग ने आत्मम्ममारना जानदान चापि ३ भावयोग नेमादि नेन मन म्ममा के कदापनदिने गकल्प विकल्प अध्यात्मगीता. ४५९ हर्ष विषवाद रहित समभावे निर्विकल्पपणे चित्त प्रसन्नपणे रहे छे तेहने मुनिराज कहिये. ते मुनिराज केवा छे १ देवताना सुखने विपे तथा नरकना दुखने विपे सम भावे छे, तृण के. वणखल, तथा मगिरत्न ए के सरिखा जाणे छे; ए सर्व पौडलिक विभाविक सुख दुःख जागी समभाव वित्तेने मुनि वत् छे. ए सर्व शुभाशुभ पुल छेते विनाशिक भाव छ, माहरा गुणनो अंश नयी एहवं मुनिराज जाणे. ॥ २६॥ तेह समता रसी तत्त्व साधे। निश्चलानंद अनुभव आराधे ॥ तीन घनघाति निज कर्म तोडे । संधि पडिलहिने ते विछोडे ॥ २७ ॥ अर्थः-ते मुनिराज एवी रीते शुद्ध जाणपणे करी स्वा- भाविक समभाव जे अचल समताना रसीया थाये ते पोतान तत्व के० ज्ञानादिक आत्मतत्त्व साधे के संपूर्ण भाव निप- जावे, निश्चल जे अचल आनंदने उपार्जे, कोइ दहाडे ए आनंद मटे नहीं एहयो जे आनंदमयी अनुभव अमृतल्प सदाकाल जे आत्मधर्मनो भोग आस्वादन करे, आराधे तेबारे आकर घनवाती कर्म छेते आत्मगुणना घातकारी छे, ते आत्मप्रदेशयी जूदा करे कोनीपरे ? कठीआरानी परे ते कठी- आराना हाथमा कुहाडो तिखो ठे, ने लाकडं सामु छे तेनी संधि जाणे हे. ते लाकडाने वीरतां वार लागे नहि, तिम मुनिराज ए ड वियपहाडो ले जाणपणा माहित जियः कर अध्यात्मगीता. muvemarwar सम्यक् रत्न यो रस राच्यो चेतन राय। सान क्रिया चके चकधूरे सर्व अपाय ॥ चक्र स्वभावथी साधे पूरण साध्य । करता कारण कारज एक थया निरावाध ॥२८॥ जयं.- .राम्या के सम्पाज्ञान १ सम्पर दर्शन २ राम्पर भाग्यि ३ ए जे प्रण रत्नत्रयी रस राच्या के० सा- क्याने गझ अपनी चनन राजानी तेबारे ज्ञान के० स्वपरनु जा से आत्मिक ज्ञान, जानना ये मेद बाघज्ञान शास्त्र पटनाते ट्यज्ञान १ भारज्ञान आत्मिज्ञान क्रिया के. क्रिपये मदे, योगक्रिया शुभाशुम पंधरूप आश्रयरूप. उप- पोनरिया ते २ बम्पने रिप ग्मणरूप चारिपगुणने विपे यग्नान दाना बन-आमवीर्य एकत्यपणे परिणमे वे क्रिया मोशनी आना पती ज्ञान क्रियाकप चोकरी भाव गगु धान पार करे, गर्व कट या कारक के. ए पद- कामं का पोताना संपूर्ण कार्य प्रते साये करे, कर्ता दई ? काम ने मम्यान २ कार्य ते कग्यो फेवरज्ञान- का अगदान ने कर्मक्षयम् ४ संप्रदान ते गुणनि वृदि- कर अपना ते आधारमा बलशान १६ कार्यमा ए झं मनः नि ! कता ? म २ पसंमदान ४ नंदान, अगदान' विकमियादिकाका पट, कना टका ! मग : कार्यकारझानदि अनेक अनाया पाप गर मार्ग टन : यारा थाप पर अराधा अध्यात्मगीता. ४६१ स्वगुण आयुधथकी कर्म चूरे। असंख्यात गुणी निर्जरा तेह पूरे ॥ टळे आवरणधी गुण विकासे । साधनाशक्ति तिम तिम प्रकाशे ॥२९॥ अर्थः-स्वगुण के० पोताना ज्ञानादि गुण ते रूप जे हपीआर हायमा आन्यु ते हथियार कर्म पूरे ते धगी समये २ असंख्यातगुणा कर्मनां दलिपाने आत्मप्रदेशी खेरवी नाखे, वेबारे शुद्ध उपयोगी वगुणे करी आत्माने पूरे, भाव निर्ज- राए करीने एवी निर्जरा पुष्ट करे, ते धनी जिम २ असं. स्पातगुणा कर्मदल खेरवे तिम २ आवरण टले तेवी गुण विकसेज प्रगट करे ते गुण प्रगटे तिम साधननी शक्ति ववती जाय, पोतानं आत्मगुण रूप कार्य सावं तेने विषे निश्चलता रूप परिणामनी शक्ति. वीर्ष उल्लास वचतो जाय २ प्रकाश वचतो जाप. अमरवि किंवत् ॥ २९ ॥ प्रगव्या आतम धर्म धया सवि साधन रीत । वाधक भाव ग्रहणता भागी जागी नित ॥ उदय उदीरणा ते पण पूरब निर्जरा काज । अनभिसंधि बंधकतानिरस आतमराज ॥ ३० ॥ भई-गरमा जान वर निजागी ते. चार प्रगटलों के प्रो. भानगडे

अध्यात्मगीता.
मणमी इती ते तिहां थकी निवारीने पोताना स्वरूप अनुया
साधनपणे परिणमावी ते कहे छे. आत्मानी कर्तृत्व शक्तिरूं
है अनादिकाळनी परकर्तापणे अबळी प्रणमी हती तिहापर्व
निवारीने पोताना स्वरूप कर्तारूप साधनपणे प्रणमावी, अं
आरमानी भोक्तृत्यरूप शक्ति अनादिकाळनी पर पुद्गलादि हि
भाव दशाना भोगने विपे प्रणमी हती त्यां की निवारी
पोतामा स्वभाव भोगीपणे प्रणमाघी २ अने आत्मानी रख
कवरूप जे शक्ति ते अनादिकाळनी परपुद्गलादि विमाः
दवाना रक्षकपण प्रणमी हती तिहां थकी निवारीने पोतान
स्वमाव रखकरणे प्रणमावी ३ अने आत्मानी ध्यापकतारू
ने शक्ति ते अनादिकाळनी पर स्वभावरूप विभावदशाने नि
ध्यापी रही हनी ते विहांयी निकाठीने पोताना स्वभाव क्ष्य
पकपणे प्रामावी ४ अने आरमानी ग्राहकावरूप जे शनि
ते अनादिकालनी परमादकपणे परिणामी हनी ते रयां पर
निवारीन पोनाना स्वभाव ग्राहकपणे परिणमावी ५ एवी री
पांच शाक्ति अनादिकालानी प अनुयायिपणे अपटी प्रणम
हनी ते निदा यी निवारीने पोनाना पप अनुजाइक
सानारने प्रणामी त्यार वायकमाव के. अनादिकानोप
स्HAT यादमा जीदने मायकमावरुप ग्रहणता के
मोतिक विभाष पेसीन दहण करतो हनोले ये विमायन
मामां बनना पेमती नदी ते विभाषनो पहाणपणो हतं
मारो पररविकर अनित्य पण पावटयो, भाग
के. जमत पणे मार निलामो गयो जान
पोर m -7
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अध्यात्मगीता. कर्मनां पुल लाग्पां छेते सेंची उदेरी उदयानी पूर्व कर्मने भोगाने निर्जरे एड उदय उदीरणा पण पूर्व कर्म निर्जराने काजे हेतु हे, अननिसंधि के० अणउपयोग वीर्य अनमिसंधि ने अनुपयोगी अनेक कर्मग्रहण कालो हतो ते निरस के कर्मना कसायना सी आत्मा लखो थयो, अनुपयोगे कर्म- ग्रहण करतो हतो तेयी लखाशपणे अंतरंगयी न्यारो थयो ते- वारे आत्मस्वरूपनो आत्मा गजा जाणवो. ॥३०॥ देशपति जब धयोनीति रंगो। तदा कुण थाय कुनय बाल संगी। यदा आत्मा आत्मभावे रमाव्यो। तदा बाधक भाव दृरे गमाव्यो ॥ ३१ ॥ जधः- के. असंन्यात प्रदेशरूप देश तेने विध रंगागो एक रंग लाग्यो, नवाग के० तिवारे सल्याए, बुनप के. नियन्त्र ने मानद अनीति मागतो चालनागे न धार वहनो भंग न करे. सुन्य ने सनकितनो मार्ग स्वभावधर्म तेमांम करेले मार्ग पोते चारे तेडिज उपदेश देतेनीगकर अने परिणतिन्य मार्ग का तेवानो संगन कर पा के जिवारं पोनानो आना आमभाव के. ज्ञानादिक अनंन गु, रूप आत्मभान मञ्चों-मा गयो. नद. अनदिक. से बनायो एटले बेगने का है। si htram --- अध्यात्मगीता. सहेज क्षमा गुण शक्तिथी छेद्यो क्रोध सुभह । माईव भाव प्रभावथी भेद्यो मान मरट । माया आर्जव योगे लोभ ते निस्पृह भाव । मोह महा भट से ध्वस्यो सर्व विभाव ॥३२॥ अपं:-महज के० म्यामाविक क्षमागुण अकृत्रिम शक्ति के. आत्मायी होदायो के० दण्यो, मोह राजाना क्रोध गुमटने हण्यो निर्मुल कयों माई के मानरहितपणू गुरुमाल परिणामि ते नर्माश आरमयभने विये नमतो भार ते मादर गुणने प्रमाणे की मान जे अहंकार सुभटनो मर जे मो- हा पीनाम्य. माया के कपट तेने आयप के. मत परिणामी दृश्यमा गाणा रहित ने आगंगणे की की माया मटन हायो निलीमना गांदानी अमिलापा दिन पक, अराम दागपाही मोक्षामिटाती पण गंगागामिलापी मदीपदी निलीम भार ने करी मोहगजाना लोभ गुभटने हामी मोह के.. मोहाय महागभट ने मां आगुणनेही मा पदेन के हटगदी नागी कारेमां शिवरार मान अनमिसाटना जीवने गमत पट र अन पाम्याज प गर्माशी दिने हो भने हायो एम को हम समाविक था मामोर। मग म मेर अमात्मगीता. जेह उदयागता प्रकृति बळगी। अव्यापक थको खेरवे तेह अळगी ॥३३॥ अर्थ:-इन स्व के एवी रो आत्मानो वीर्य पराकने करी सवार दो अनंत बनो बनी कर्म शत्रुने जीतीने पर परिणतियी निको. अन स्वभाव मम कीने जखीर थयो भोगते के आत्मानी ज्ञानदिक संता सुधीर के. निर्भय घट्ट भोगले उप आबी प्रति आत्माने लगी हे, अध्यापक के निर नो थको उदए जादी का प्र. कृति वनगी हे ने भोली के अलगी रे.समभावपने. ॥३३॥ धर्मध्यान इक नानमें ध्याचे अरिहा सिद्ध। ते परिणतिथी प्रगटी तात्त्विक सहज समृद्ध । स्वस्वरूप एकले तन्मय गुण पर्याय । ध्याने ध्यातां निर्मोहीने विकल्प जाय ॥३१॥ जापान के पोतानो आमा सजागने- विरे अन डोहे. ते वर्मने ओलसी परिद कहना स्थानने में प्रवते ने धर्मपानना द अन्यान करत परिपामार एक्व रहन सिदना गुने पोतना काम कुन्ध गाने ने य. ओमन वेड पर प्रान्त दर हां नई - म : द ४६६ अध्यात्मगीता. की पात्व के० एकत्यपणे सन्मय उपयोगे लपलीन थाय, पोताना आत्मगुण अने आत्मपर्यापना ध्यानने विषे तेहवा पानने लगे पुत्वाणे प्रयत नेवारे ते जीव निर्मोही मोह रदिन थपो तेरे सर विकल्प दुर जाय, निकला महे तिवारे मोगुण पाप ने को हो ॥ ३४ ।। पदा निर्विकल्पी थयो शुद्ध ब्रह्म । नदा अनुभवे शुद्ध आनंद शर्म । भेद रत्न प्रयो तिक्ष्णताये। अभेद रत्न प्रयीमें समाये ॥ ३५ ॥ :-~यहा के पर गंवळा विकल्प हित निर्वि- कधि आत्मा भयो, नेवार गुद्र पर केगुद्र जानमपी पपो ईन पटा पोताना आत्मम्मम्पना शुद्र ज्ञानमा थयो, तदा के देवर अनमो के. भोगा, शुद्ध निमंट आनंदमयी मुन्द्रम्प अमयानीपो भोगवे, आन्मिा. गुग्याने मेद रनायी के मान , दर्शन २ चारित्र ३ ने मंटपोते ज्ञान ज्ञान- को मोनने दानाप मात्र, अदा महणार २ पोग, वेदी कनीय ग्नी नीतानी गतिए वर्ग अनंद नदी. मान्य मदाय गिना ने अमे ने मानन ?? मानन र जानना दिना अध्यात्मगीता. दर्शन ज्ञान चरण गुण सम्यग् एक एकना हेतु। स्वस्त्र हेतु थया समकाळे तेह अभेदता खेतु ॥ पूर्ण स्वजाति समाधि धनधाति दल छि.। क्षायिकभावे प्राटे आतम धर्म विभिन्न ॥३६॥ , अर्थ:--दर्शन के० सम्पगदर्शन १ सम्पगज्ञान २ स. म्पग्चारित्ररूप ले गुण एरले दर्शन हे ते जीवने सामान्य उपयोग गुण ज्ञान हे, एकले दर्शन नया ज्ञान ए वेने विष पिरताप एकामता पने उपयोगे व ते चारित्र जाणवो, माटे ए ऋण परस्पर एक के एक एकना हेतु कारमरुद जाणवा. स्वस्त्र के० पोतपोताना एक समये हेतु थया ज्ञान १ दर्शन २ पारिवरुप ३ रत्नत्रयी ते एकतापने प्रणमि तेमज स्वक्षेत्र के० आमाना अस्पाता प्रदेशाम्प क्षेत्रने विभेद भाव रहित अभेदपने प्रणम्या एकरूप थया तेबारे केवो थयो, धन- घातिया कर्मना साहनां दर्गयां आत्मप्रदेदानेविगे सापां हतां ते हित के हेदी नारूपांतेचारे पूर्ण के.संपूर्णपोतानी जाति ने ज्ञानादि गुपनी समापि स्थान तेने वरी पनवाती म हेदां, शाकिनाव के शालिकमारे प्रगटे थके एक समागतने दि अननो अलिक धर्म भक्तिने रहो हनोवे पत्त के मन यो देकर चिनिन के. अभेद कर.' 75 का विनर ॥३६॥ पर्ने योग र धया अपांगी भाव हॉनसता अनन्त भगी।

४६८ अध्यात्मगीता. पंच लघु अक्षरे कार्य कारी। भवोपग्रहीकर्म संतति विडारी ॥३७॥ अर्थ:--तेरमा गुणठाणाने विष छेले समये योगतिक मन- वचन काया ए त्रण योग रुंघीने सूक्ष्म क्रियामतिपाती शुक ध्याननो त्रीजो पायो ध्याता चउदमे गुणस्थानके चढे, विहां प्रथम बादर मनोवाकाय रुंघे, पछे मूक्ष्मयोग रुषि अयोगी थयो. भाव के० स्वभावे शैलेसना के० मेरु पर्वतनी परे अकंप अडग अचळ थिरताभावे अडग थयो एवो स्वभाव अचळ थयो, पंचलघु के० चउदमे गुणस्थानके जीव, अ, इ, उ,ऋ ल, ए पांच लघु अक्षररूप उच्चार करे एटलामा स्वसिद्ध कार्य निपजावे, भवोपग्रहिक-भवने आश्रयी जे अवातीकर्म पुद्गलनी श्रेणिअवशेष के० थाकतां रयां हनां ते विडारी, ध्यानामि शुक्लध्यानना चोया पायाने ध्याने करी कर्मक्षय करे तेवार पछी ॥३७॥ समश्रेणे एक समये पहोता जे लोकांत। अफुसमाण गति निर्मळ चेतन भाव महांति॥ चरम विभाग विहीन प्रमाणे जसु अवगाह। आत्मप्रदेश अरूप अखंडानंद अवाह ॥३८॥ अर्थ:--समश्रेणे करी एक समयने विषे चौदराज लोकने अते लोकाग्रभागे अजगमर स्थानके जे अरे अनता सिज परमात्मा विराजमान वर्ने छे, ने सिद्धक्षेत्र पोहता सिजपणे अफुममाण के० आकाशप अवना प्रदेश प्रथम फरस्या छे अध्यात्मगीता. 1 तेहज आकाश प्रदेशनी समगीए वर्तता सिद्धि पाम्या, सिद्धि वर्या, कर्मरूप मल थकी रहित निर्मळ धया, तेबारे शुभ ज्ञानादिआत्मस्वभाव क्षायिकभावे सदाकाळ शाश्वता रहे. सिद्ध क्षेत्रमें चरम के छल्ला भरीरनो बीजो भाग घटाडीने अब- शेपे के० धाकता ये भागना शरीर प्रमाणे आत्मप्रदेशमो घन करी ते प्रमाणे अवगाहना करी सिम क्षेत्रने विषे विरा- जमान थयां.आत्मप्रदेश के आत्मप्रदेश अस्पी छे. अखंड - नंदमयी अवाह के अबाधा के० पीडा रहित स्वक्षेत्र व्याप्या हे, आत्मस्वभावमें रह्या छे ।।३८ ।। जिहां एक सिद्धात्म तिहां छे अनंता । अवन्ना अगंधा नहि फासमंता॥ आत्मगुण पूर्णतावंत संता। निरावाध अत्यंतसुन्नास्वादवंता ॥३९॥ अर्थः-जिहां एक सिकात्म के० जिहां एक सिज पर- मात्मा छे, ते क्षेत्रने विषे अनंता सिद्ध मेळा मीने रद्या हे, ते सिम कहेवा हे ? अवना के० पांच वर्ण रहित, अगंधा के गंध रहित. नहीं फासमंता के० आठ फरसरूप धकी पण रहित हे. वी मिद्ध कहेवा छे ? आत्मगुण के. पोताना आत्माना गुण जानादि अननगणनी पूर्णता उना भाव प्रगल्या हे. वली निगाव २० मा प्रकार अबाधा पीडा धका गहन सिद्ध है अद- मुवावादकता के. व्यारनी कायना देवनाना दर जान ला - मुम्व काळनो मन्त्री का कर र करदे पण मिद में बगे अध्यात्मगीता. परमात्मा आत्मिक सुख अनुभवे छे, ते सुखने तुल्य एक समय मात्र पण न आवे, एहवा स्वभाविक सुखनो आस्वादन करे छे. ॥ ३९ ॥ का कारण निज परिणामिक भाव। ज्ञाता ज्ञायक भोग्यभोग्यता शुद्ध स्वभाव ॥ ग्राहक रक्षक व्यापक तन्मयताए लोन। प्ररण आत्मधर्म प्रकासरसे लयलोन ॥१०॥ अर्थः- कर्ता कहेतां सिनो जीव १ कार्य के पो. ताना ज्ञानादि अनंतगुण संपूर्ण २ अने कारण ते स्वगुण रम- णता रूप ३ सिद्ध स्वभावे परिणम्या छे, ज्ञाता के. ज्ञाने करी ज्ञेय पदार्थ जाणे छे, भोग जे भोगवा योग्य शुरु स्वज्ञानादि तेहनो भोक्ता छे. ग्राहक के० परस्वरूप विभाव- दशानो अनादिकालनो ग्रहणपणो कपों छे अने स्वस्वरुपयी मिन्न पुद्गलादि वस्तु अनादिकालनी तेहना रक्षकपणानी मति निवारीने स्वस्वभाव रक्षकपणे परिणम्या अने परपरिणतिने विपे अनादिकालनो व्यापकपमो हतो ने निवारीने स्वभाव व्यापकपणे परिणम्यो तेहने विषे लीनथका वत्तें छे, तन्मयपणे पूरण के. संपूर्ण आत्मधर्मनो प्रकाश भयो ने रमेकरी लप- लीन छे, साक्षात्कार मनपणे ॥ ५० ॥ द्रव्यथी एक चेतन अलेशी । क्षेत्रथी जे असम्य प्रदेशी॥

अध्यात्मगीता. ४७१ उत्पाद वळी नाश ध्रुव काळ धर्म । शुद्ध उपयोग गुणभाव शर्म ॥४१॥ अर्थ:-द्रव्पी के द्रव्ययी ज्ञानादि चेतनारूप गुण सहित छे, तेमाटे सिप ते द्रव्ययी के० चेतन कहीए अने कृष्णादि पट लेश्या रहित सिम अलेशी छे, क्षेत्र की सिम ते स्वक्षेत्ररूप असंस्थानप्रदेशी छे. उत्पाद के० कालयी सि- अने जाणवा देखरूप पर्यायनो समये समये उपजवो थाय हे. जाणवा देखवारूप पूर्वपर्यायनो नाश थाय छे २ अने सिजने ज्ञानादि अनंतगुण प्रगट्या छे ते सदाकाल वपणे शाश्वता हे ३ अने सिने ज्ञानादि अनंतगुणरूप धर्म है, बुदपणे प्रगट्यो हे तेहने विषे उत्पाद १ व्यय २ थइ रह्यो हे. शुक उपयोग के भावयकी सिने पोताना ज्ञानादि अनंत गुणरूप भाव प्रगट्यो हे, तद्रूप घरनेविपे सदाकाल शुक उपयोगवंत या पत्ते हे, भाव मुख प्रगट्यो हे. ॥४॥ सादि अनंत अविनाशी अप्रवासी परिणाम । उपादान गुण तेहज कारण कारज धाम। शुद्ध निक्षेप चतुष्टय जुनो रत्नो पूर्णानंद । केवल नाणो जाण नेहना गृणना छंद ॥१२॥ एक मित गति साश्री हे नही पा ::- अत्यात्मगीता. त्मिक सुख अनुभवे छे, पोतामा परिणामिक भावे वा छे. अप्रयासी परिणामे रया छे, उपादान के स्वज्ञानादि अनं. तगुण कारणरूप प्रगट्या छे अने अनेकज्ञेय पदार्थ जाणवा देखवारूप पर्यायनो उत्पाद व्यय समये थइ रह्यो छे, ते कार्य पोताना आरमस्वरूपने विपे निवास कयों छे एटले ए त्रणे एकतापो परिणमे छे. शुज के० निर्मळ च्यार निक्षेपे करी युक्त छे सिर पहवो नाम त्रणेकाले एकरूप शाश्वतो वर्ते छ १ अने थापना सिम ते विभागे शरीर प्रमाणे क्षेत्र अब- गाही रया छ २ दट्य सिद्ध ते सिन्तादि गुणरूप उतां प. पाय वस्तुरूप प्रगट्या छे ने द्रश्य सिझ ३ सामर्थ्य पर्याय प्रवर्तनासप अनंतो धर्म प्रगट्यो नेणे करी नर नवा शेपनी वर्तनारूप पर्यापनो उत्पाद म्पय समये २ अनंतो थइ रद्यो छे, मेणे सिझ अनंतो मुग्व भोग छ, ने भार सिम ४ ए रयार निक्षेपे करी सदा रक्त प्रवत्तें छे. आत्मिक आनंदमुख भोगवे छे, केवटनाणी के० पहवा सिझनो स्वरूप प्रत्यक्षपणे विज्ञानी जाणे देखें अने सिम परमात्माने अनंतगणना समद भगट्या छे तेहने विषे अनंतो सुख भोगवे छे, ते केवाज्ञानी गम्प छे, पण धनग्य मुनिना जाणवामां न आये. पहवि शुद्ध सिद्धता करण इहा। इंद्विय मुख धकी जे निगेहा पुदली भावना ज असंगी। र्गत वाद भगायो॥

अध्यात्मगीना. अर्थ-एहवी के०ले पूर्व वखानी शुद्ध निर्मल सिद्धता के. सिद्ध परमात्मानी संपदा हे, तेहवी सिम संपदा प्रगट करवानी ने मुनिने इहा के० वांडा ठे, ते मुनि कहेवा छे? इंद्रिय के० पांच इंदियना बीस विषय सुख पौगलिक तेहनी वांडा रहित वत्तं हे, वी भुनि केवा छे पीद्गलिक के० स्व स्वरूपदी भिन्न के० जुदा एहवा शुभाऽशुभविभाव दशारूप जे पौटिकभाव तेहना संगयी रहित न्यारा ने मुनि प्रवत्तें छे, ते असंगी ते मुनिराज निर्मळ बुधिना धगी अने ले सात्य एक अने साधन अनेक एवी रीते सत्ता गंतना धर्मने साधे ते मुनि, परमार्थ साधवाना रंगी हे. ॥ ४३ ॥ स्याद्वाद आतम सत्ता रुचि समकित तेह। आतम धर्मनो भासन निर्मळ ज्ञानी जेह ।। आतंम रमणी चरणी ध्यानी आतम लीन। आतम धर्म रम्यो तेणे भव्य सदा सुख पीन॥४४ अर्थ: स्याद्वाद के नित्य अनित्यादि आठ पक्षे करी अनेकांतनयरूप मार्ग ते स्याद्वादे करी आत्मसत्ता रुचिने ओल- सीने प्रकट करवानी रुवि प्रवृत्ति ते मुनि, शुद्ध भासनरूप समशित भाव सहित जाणवा. आतमधर्मे के० आत्मा शुभ निश्चय नोकरी जोतां तो पोतानी आत्मसत्ताने विषे ज्ञानादि अनंत गुण रूप धर्म रह्यो छे, नेहनो भासन प्रतीत प्रगटी तिधारे निर्मल ज्ञानी धयो निर्मल जाणपणं थयुं त्यां आत्म के० ते मुनि सदाकाल स्वआत्म स्वरुप रमण करे तेहने शुद्ध चरित्रनो उपयोग वयों, तिवारे आत्मस्वल्पना ध्यानने लीन- 60

४७२
अध्यात्मगीता.
त्मिक सुख अनुभवे छे, पोताना परिणामिक भावे वा छे.
अप्रयासी परिणामे रडा छे, उपादान के० स्वज्ञानादि अनं-
तगुण कारणरूप प्रगट्या छे अने अनेक्ज्ञेय पदार्थ जाणवा
देखयारूप पर्यायनो उत्पाद व्यय समये थइ रह्यो छे, ते कार्य
पोताना आत्मस्वरूपने विपे निवास कयों छे एटले ए प्रणे
एकतापणे परिणमे छे. गुन के० निर्मळ च्यार निक्षेपे करी
युक्त छे सिम एहवो नाम प्रणेकाले एकरूप शाश्वतो वर्ते
छ १ अने थापना सिम ले त्रिभागे शरीर प्रमाणे क्षेत्र अव-
गाही रडा छे २ द्रव्य सिद्ध ते सिझतादि गुणरूप छतां प.
र्याय वस्तुरूप प्रगट्या छे ते द्रव्य सिझ ३ सामर्थ्य पर्याय
प्रवर्तनारूप अनंतो धर्म प्रगट्यो तेणे करी ना नवा शेपनी
वर्तनारूप पर्यायनो उत्पाद व्यय समये २ अनंनो थइ रह्यो
छे, सेणे सिद्ध अनंतो सुख भोगवे छे, ते भाव सिम ४ ए
च्यार निक्षेपे करी सदा रक्त प्रवर्ते छे. आत्मिक आनंदसुख
भोगवे छ, केवलनाणी के० एहवा सिझनो स्वरूप प्रत्यक्षपणे
केवळज्ञानी जाणे देखे अने सिक परमात्माने अनंतगणना
समूह प्रगट्या छ तेहने विषे अनंतो सुख भोगवे छे, ते
केवळज्ञानी गम्य छे, पण छद्मस्थ मुनिना जाणवामां न आवे.
॥४२ ।।
एहवि शुद्ध सिद्धता करण इहा ।
इंद्रिय सुख थकी जे निरीहा ॥
पुद्गली भावना जे असंगी ।
ने मनि शद्ध परमार्थ रगी ॥३॥

अध्यात्मगीता. ४७३ अर्थ-एहवी के० ले पूर्व वखानी शुद्ध निर्मल सिद्धता के० सिद्ध परमात्मानी संपदा छे, तेहवी सिम संपदा प्रगट करवानी ने मुनिने इहा के० वांडा छे, ते मुनि कहेवा छे? इंद्रिय के० पांच इंदियना वीस विषय सुख पोन्नलिक तेहनी वांडा रहित वत्त छ, वली मुनि केवा छे पौगलिक के० स्व स्वरूपयी मिन्न के० जुदा एहवा शुभाऽभविभाव दशारूप जे पौगटिकभाव तेहना संगयी रहित न्यारा ने मुनि मवर्ते छे, ते असंगी ते मुनिराज निर्मळ युधिना धी अने जे साव्य एक अने साधन अनेक एवी रीते सत्ता गनना धर्मने साधे ते मुनि, परमार्य साववाना रंगी छे. ।। ४३ ॥ स्याद्वाद आतम सत्ता रुचि समकित तेह। आतम धर्मनो भासन निर्मळ ज्ञानी जेह ।। आतम रमणी चरणी ध्यानी आतम लीन । आतम धर्म रम्यो तेणे भव्य सदा सुख पीनाथ अर्थः पादाद के नित्य अनित्यादि आठ पक्षे करी अनेकांतनपरूप मार्ग स्पाद्वादे करी आत्मसत्ता रुचिने ओट- सीने प्रकट करवानी रुचि प्रवृत्ति ते मुनि, हाद भासनल्प মসলিন মাৰ চিন সাৰা, আনমন ক লালা ২৪ निधय नयेकरी जोतां तो पोतानी आत्मसत्ताने विष ज्ञानादि अनंत गुण रूप धर्म रजो छे, नेहनो भासन प्रतीत प्रगती तिवारे निर्मल ज्ञानी घयो निर्मट जाणयां थयु न्यां आन्म के० ने मुनि महाकाल वजाम स्वरूप मग कर लेने सुद्ध परिजनो उपयोग इत्यों, तिवरे आमादान याने त.

४७२
अध्यात्मगीता.
मिक मुख अनुभो छ, पोसामा परिणामिक भावे वा छे.
अप्रपासी परिणामे रया छे, उपादान के० स्वज्ञानादि अनं.
नगुण कारणरूप मगट्या छ भने अनेकज्ञेय पदार्थ जाणवा
देखयाम्प पपायनो उपाद व्यय समये थइ रह्यो छे, ते कार्य
पोताना आत्मस्वरूपने विष निवास कयों छे एटले ए पणे
एकतापो परिणमे है. शुद्ध के निर्मळ च्यार निक्षेपे करी
मुक्त के सि पहयो नाम प्रणेकाले एकम्प शाश्वतो वत
१ अने पापना सिंह ने विभागे शरीर प्रमाणे क्षेत्र अब-
माही रखा २ दम्य सिझ ते सितादि गुणरूप छतां प.
पोप नानुरूप प्रगट्या छे ने द्रव्य सिम ३ सामथ्र्य पर्याय
प्रवन्नार अनंनो धर्म प्रगट्यो नेगे करी ना नवा शेपनी
वर्तनाम्प पर्यापनो उपाद श्यय समये २ अनंतो थइ रयो
छे, नो मिझ अनंतो गाव भोग छ, ने भार AिRY
रपार निरपे करी सदा रक्त प्रयत्ते हे. आमिक आनंदमुख
भोगते थे, केवटनागी के० पहवा मिनो स्वरूप प्रत्यक्षपणे
केवरमानी जागे देखे अने सिम परमात्माने अनंतगुणना
मन्द प्रगटया छे तेवने विषे अनंतो गग्य भोगवे छे, ते
बरसानी गम्य थे, पण मन्य मुनिना जाणवामान आये.
॥ ४२ ॥
पहवि शुद्ध सिद्धता करण इहा।
इंद्रिय मुख थकी जे निरीहा।
पहली भावना जे अमंगी ।
ने मुनि शुद्ध परमार्थ ग्गी ॥ १३ ॥

मननपनानादि कार निझरे अरमन रोक, जनीवादि नवल्व पर बानो जो मन के.वर्म चेतनशानादिक मुरम इन पर. दिना एवी से मानदेनमा सो सान हुने, निशा के निधर नई बपने दिन की राती जलने सह हद वि. हल निप. करमाइंस है मुनाः मुना निकर नहा नपनो अदेश ३. निशान हेतु हे. वाद व्यवहार पंधनो न . हक उजे इन मा जम्मी तामने ३. निपरी भागहत जिन बिहान कुन. मिशन निदान जानी इन्तु नवे रन्या ने निग्रंथ । नव अन्यात विहां साधु पंथ ।। निजे गीतार्थ चरणे रहिजे। शुद्ध सिद्धांत रस तो लहिजे॥ १७ ॥ -वन्दवः . ने दि बरे निच नेहने में दिह ने मर्ग हीर । हर र करेन ते हिला- देहः हर हर ई. निदान ४७६ अध्यात्मगीता. --- - भणे वांचे संभळावे एवाये पण आत्म स्वरूप ओळस्यो नयी. शुद्ध उपयोगे न वर्तेते द्रव्य चारित्रिया कहिए. १ भाव चारित्र ते आत्म स्वरूपमा एकत्व था, वे आत्मस्वरूपनी थिरता, आत्मस्वरूपर्नु रमण, आत्मस्वरूप निश्चस्ता आत्मस्वरूप भोगी, परभाव अभोगी वे भाव चारित्र २ तेणे गीतार्य के० आत्म- स्वरूपना जाण एवा गीतार्थ मुनिना चरण कमळ सेवीए, मोक्षामिलापी मुनिने सेव्यायी शुं नीपजे ! शुद्ध के० शुक्र निर्मल यथार्थ निःसंदेहपणे सिद्धांत जे आगम संबंधी या जिन वाणीना ज्ञानरस मते चाखी जे गुरु कृपापकी तथा आगमनो रहस्य ते इयाने कहीए १ यतः आत्माराम अनुभव मजो, तजो परतणिमाया, एह छे सार जिनवचननं, वली एह शिवछाया ? श्री परमात्माए बिगडे बेसी एहवी प्ररूपणा करी अहो भव्य जीवो । आत्माने आराम के० रमावे एवो अनुभव भजो सेवो, एटले आत्मानो अनुभव करजो, पर के० पुनल परभावनो त्याग करवो एह जिनवचननुं सार छे, वळी शिव तस्नी छाया छे. संसारतापनी टाळणहारि छे. इत्पर्य ।। ४७॥ श्रुत अभ्यासी चौमासि वासी लिंवडी ठाम । शासन रागी सोभागी श्रावकनां बहु धाम ॥ खरतरगच्छ पाठक श्री दीपचंद्र सुपसाय । देवचंद्र निज हरखे गायो आतमराय ४८॥ अर्थ:-सिद्धांत शावना अभ्यासी लिंबडी गामनेविषे चोमा रहिने ए ग्रंप रच्यो, जैन शासनना रागी सौमाग्यवंत श्रावकनां घणां घर छे, खरतरगच्छने विषे दीपचंद्र नामा अध्यात्माता. अपात्यायजीने प्रसादे देवचंद्र नामा उपास्याये पोताने हर्षे करी आत्म राजाने गायो, आनसल्प यथार्थ वर्णवायो.॥४८॥ आत्मगुण रमण करवा अभ्याले। शुद्ध सत्ता रसोने उलाले ॥ देवचंद्रे रची अध्यात्मगीता । आत्म रमणि मुनि सुप्रतिता ॥ १९ ॥ अर्थ:-भव्य जीवने आत्मगुण रमण करवा अम्यासे ज्ञानादि गुणवडे रमण करवा स्वरूप जाणवा. अभ्यासने अर्षे शुरु आत्म सत्ता ज्ञानादि चेतननी वेहना रसिया ने अर्थिने उल्टास करवाने अथें देवचंद्र उपाध्याये अध्यात्मगीता रची, पोताना आत्म रमण करवाने अर्ये अने अत्यात्म ज्ञानवंत मुनिने प्रतीतकारी छे, ए ग्रंथ रचना कीधी स्वरूपने अर्थे ॥४०॥ इति पाठक देवकृत अध्यात्मगीता संपूर्णा ॥ ।।शुभं भवतु ।। ॥ इति श्री अध्यात्मगीता देवचंद्रकृता ॥संपूणी शुभं भवतु॥

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॥ॐ नमः सिदं श्रीगुरुभ्योनमः॥
॥अथद्रव्यप्रकाशभाषालिख्यते ॥
॥ दोहा।।
अज अनादि अक्षयगुणी, नित्य चेतनावान् ।
प्रणमु परमानंदमप, शिवसरूप भगवान् ॥ १ ॥
॥ अवस्याहादभावको नमस्कार ।।
। सबैया इकतीसा ॥
जाकै निरसन ने पिरतासु भाव धेरै, वरे निज मोक्षपद
हरे भवताको, करमको बंध वारे मोहको विडारडारे सारे निज-
सकति वचारे ज्ञानदायको एकानेकल्प जान नित्यानित्यभाव
हानै आपा पर भेदकरी ग्रहे स्व सुभावको, अक्षर विगुण इंद
कर्मजालसो अफंद नमतहे देवचंद स्यादवादभावका.॥२॥
॥ अथअध्यात्ममाहात्म्यकथनम् ।।
॥ सर्वया उकतीमा ॥
अन्यात्मभावको प्रभाव कहो कहा ताहि जाको महिमान
ज्ञान जगतमे गायोहे, पाहिको सभाव लहि आपा पर भेद गहि
सम्पासुभाषमहि बोधिनीज वायोहे वानकी अबाती भेद कर्मको
मूल डेदि वेद निजभावको परमभाव आयोहे, रिषभदेवाधिदेव
अत्यात्मभाव मंत्र अमर अवर निज केवलशे पायोहे. ॥३॥

दत्यप्रकाश ॥ अथमोहविलासक्थन ॥ ॥ सवैया इकतीसा॥ लहोते आरिजकुल गुरुको संजोग वलि पूरबके पुण्यबल एसो जोगलमोदे, अन्यातमग्रंथसार सुणो कान धरी प्यार पीयो ताको रस निज तत्वशुद्र प्रयोहे; तौमी यह तेरो जीव चाहत विशेष दोर भोगी ममत्यतासी माचिराचि रह्योहे, जगको जीवन- हार एतो सर मोहमार मोहकी मरोरमें जगत लहलयोहै. ॥४॥ ॥ अथप्रथमदार ।। ॥ संघया इकनीसा॥ प्रथम धरमदग्य, दूसरो अधर्मद्रव्य, तीसरो आकाशद्रव्य, टोकाटोकमानहे, चोयो कालव्य एक पुगलद्गव्यरूपी निजनिज- सत्तावंत अनंत अमानहे; पांचोह अचेतन चेतनासरूप लीये यो ज्ञानवान दृष्य घेतन मुजानहे, स्यादवादभाव लीये ती अधिकार पाके प्रयको आग्म कीनो ग्रंथज्ञान मानहे. ॥५॥ ।। कपिलघुताई ॥ । सबैया एकतीसा ॥ कोउ याट मंदमति चित्तसो करे उति नमके प्रदेश सर गनि देवो करमे, कोउ जन ठीन नन पुरातन वपातीत ययन मो कई एमो जुद को हरिमे; मुघर वामन सो मकति दिनु कहे प्रमो लंगीकरि मना मनो मेकलाग्मी, नमे में अलपनुदि महाद ग्रंप मल्यो पंडित हमेगे निज मानके गहामी. ॥३॥ ॥ ग्रंथभधिकारीगन ॥ ॥ मया सतोमा। पर दम दानि कम्म माम मानि नाम मभार रहि धाम मा द्रव्यप्रकाश ४८३ उदासी है, आतमके विसरामी ज्ञानके अंतरजामी बाधासौ विरभिनित राधावामवाती है; जालसौ जगतजाके माल सब मैल जैसो अमल असंड निज ब्रह्मके विलाती है, एसे समकीत धारी शुद्ध नरके विचारी कंतहे देवचंद ज्ञानके मकाशी है. ॥४॥ ॥ अथ देशविरति वरणन ॥ ॥सर्वया इकतीसा॥ अभक्ष्यके त्यागी हे परम रस यागी एसे परसी निरागी जिनधर्मके विनीत हे, आत्मिक सुख लहि समतासु धीर गहि विषय कपाय मोह रससी वितीत है; परम धीरज धरि आत्मीक बट करि समकित कर करि मिथ्यासी अजीत हे, निष्ट मित घोर भापी सिद्धसख अमितापी इकवीस गुण धारी धारक पुनीत है ॥८॥ ॥ दोरा॥ सायक शिवको सायमुनि, 'ताके मेद विचार, जिनवर आचारिजमवर, उपाध्याय जनगार ॥९॥ । अर्हतकीद्रव्यस्तवना ।। ॥ सर्वया इकतीसा॥ जाही देहति अति सोमित अनंतरेह जाकी नन चतुराई नाही छान जोर है, नाही जिनगजके बनो बिलममानो, झिसग हद अभय को है. जाले ति अर. देवदेवी ३१ की शाम्न सम्म मुन्दर हरदान सरश परमादत एमो जिन विsan : ..

४८४ द्रव्यप्रकाश ॥ दोहा॥ दर्वितस्तवनाना यकी, करतां पुन्यप्रकाश, आतमके गुन गावता, केवलज्ञान विलास. ॥११॥ ॥ अथ भावस्तवनं ॥ ॥ सर्वया इकतीसा॥ टोकालोक भासक अनंत ज्ञानहष्टि जाकी वीरज अनंतसुख उमेरै कर्मकंदजू, चरण अनंतबर लोकालोक भावधर पुन्य पापसी व्यतीत सुध सुख वृंदजू; वेद कौन भेद तीनी जोग कौन खेद तहां चेतन प्रकाश भयो कर्मसी अपंदजू; ऐसे जिनराज निज ज्ञानमे विराजमान अमल अखंड नित ध्यावे देवचंदज. ॥ १२॥ ॥ आनार्यस्तवनं ॥ ॥ सर्वया यनीसा ।। पंचाचार पाले निज ब्रह्मको संभाले भाले-टाले परभाव सत्र शुद्धभाव भावे हे, परमधरम गहे समता सभाव बहे रहे न सराग वित्त नित्त लिव लाये है दुविध दयाके धार कीनो नारि परिहार परिग्रह दूर डारि नीरलोमी दावे है; परन्याधि दूर टारे रागद्वेप मोह बारे ऐसे आचारज जिको देवचंद घ्यावे हे ॥ १३ ॥ ॥अथ उपाध्याय चरणन ॥ ॥ मवैया इफलीमा ॥ निय मो अनित्यम्य एकानेक कोशरुप सदसद्माव ट इन्यप्रकाश. स्पाद्वादको सहाप है अन्य अनेद नय परजाय भेदनय सग- नगमादिनै अस मेद पाप है। द्वादशांगी सूत्रसार पठाचे सपरिवार साये सुद्ध कारज ने मोक्षके उपाय है, पंच महात्रत पाले दोष सहिको टाले पूजनीक भन्पनीको ऐसे उपाध्याय ॥ अथ साधु स्तुति ।। ॥ सर्वया इकतीसा ॥ आत्मारामके जारानी निज मुखवीतरामी पुन्यके अकामी पापवष्टिलौ न काज हे, इंद्री सुखकी न आस रहे जगसी उदास परिग्रह हीन मी अजापि महाराज है, मिथ्यास्या विमुख निज ज्ञान भावही के स मोक्ष सनमुख सिद्धसुखके समाज है, करम उदिकसेवी करत हे क्रियाकर्म सत्तावीस गुणवारी ऐसे मुनिराज है ॥ १५॥ ।।दोहा।। अविरत आदि अजोग, लगी यहे सिदको हेत, जो गुन जहां पुरन हुवे, सोइ सिको खेत. ॥१६॥ ॥ अथ मिथ्यादृष्टिहेय कथन ॥ सर्वया इकतीसा॥ आपको न जाने परभावहिको आपा माने गहिके एकांत पक्ष मान्योहे गहलो मने बायो रहे पुन्यकर्महिको चहे वहे अहबुद्रिभाव ५. हर गतिमा इरे सद्गतिहिकी इहा करे का बहे मोर दोलने. स्यावाद भावचित एमे कि परून कझो ज्ञानभावके अदलमे ।। १७ 44----- ॥ध ग्रंथारंभको नमस्कार ।। ॥ दारा॥ उदोभाव स्पायदा, जामे अस्य विलास, गमकिन कारण मंथ यह नामे दम्पप्रकाश. ॥ १८ ॥ ॥ शिष्य प्रश्न ॥ ॥दोहा॥ शान आदेजो, गाना चेतन सोय, जे जीव पनि ईप है, उन जाने क्या होय. ॥१९॥ ॥ अथ गुमनरकपनं ।। गगानीमा॥ घेतन ल्य अनत गुनामिन ध्येय आदेय स्वमार घर है, आप निमानि धमे मामीचमे आप लये शिरमार परे है, से यद जान पाद मगति पंथलमार लिये वियर है, हिर संदेह निदान काग्न त्याग स्वरूप वग्यान करे हा२०॥ ॥दोहा॥ स्पारे पाको शादिरे, गर, आरनो जान, पातेन भादको निमन. ॥ २१ ॥ रामर . ---- ।।२।।

। भेदज्ञान उभयनल नयचरणन ॥ सोया पतीसा॥ सुव नप निहले जवारय माप मन्यवहार क्रिपा नय ता विपरीत है. मेरज्ञान शान न होप विवहारनय ज्ञानके निहास्ये पाको त्याग वहीं नित है; वस्तुको पीडाने निज शुद्धिको विरुद्ध गने शुद्ध नसल्प एसो सम्परको नीत है, तन तिपको सानी देवो अंतरजामी एसो शुदनपसो हमारी नर प्रीत है ॥२३॥ ।। पुनःचंद्रायणः । बाज लिंग पह नद विहाग. नत्वहीन किरिया आधारा गहन जोग नप शुद्ध कहता विनोत्पागयोग विवहार ज्ञानकी डेक्मे. ॥२४॥ ॥शुजनय महिमा ।। ।।दोहा। पाविनुन पहा. दिनमा समान, आदि मय नहि अंत तनु, दोलक निहदे जान. ॥२५॥ ॥ शिप्य प्रश्न ॥ ।' दोहा । ८ नह .

८८ द्रव्यप्रकाश ॥भेदज्ञान माहातमकथन । ॥ सबैया इकतीसा॥ जे ते केई भन्य जीव लीन ज्ञानमे सदैव करमके बंधको उखारे एक पलमे, ताको मूल हेत एक भेदज्ञानहीकी ढेक उकते विवेकको विचार जोयुं दीलमे; बंधको बिलासमे मगन नेऊ आई जाम परे कर्मबंधमाहे रूले जगजालमे, वेतो भेद- ज्ञान वितुं निहचे पिछान्यो देव करमको गाढवाढे अज्ञानकी चालमे ॥ २८ ॥ ॥ अथ ज्ञानविलास कथन ।। ॥ संबया इकनीमा। आपा पर भेद लीन आतमा स्वज्ञान पीन करमके पुंजको न आने निज देसमे, वसि निज गुनदास भासे आप रूप रास विराजे अखंडरूप आतम प्रदेशमे जनादि अज्ञानके वदावसि पक्ष्योहे ज्ञानभान जैसे दवि रयो वढाके प्रवेशमें, तेसे प पुराणदेव तवको पीठाने नाही करमको करतार भयो परदे. शमे ॥ २९॥ ॥ आतमामाकथन ॥ ॥ सोया फितीमा । सहज स्वभाव अप गुम्के वचन सेती जान्यो निज तत्व तर जाग्यो जीवगप ६, मतो पाइन्य नाहि पादस्य मेरो नाही पमी युद्ध भासि नर व मे थाय है देवी जानी गहो तुम पाम अनंत पद जाके पट आगे और पट न मुहाय है, प्रमाण कन्याकान. ४८९ निक्षेप नप जान तेज लागे जस्त ऐतो निज समृद्ध मोक्ष ज्वार है॥३०॥ ।। अय आत्मा मुक्ताल्पवरणन।। ॥दोहा॥ पंचदप औरण अनुस, ए सब पुल मुक्तः इन पर निज देजमद, हु की विनत॥ ॥ ॥ आन्मारिरभावनाकथन । । सर्वया इकतीना। पदनो भलो नभात गर रहे जल को ज्ञाता जीत्र होइ कान दियगतो, जे ते ज्ञान नायके गेहे प्रभाव साथ देते परजानि इन करे ज्ञानयोग, वन वेतनल्प अनज अनंत स तात्रे दिन पान को त्यागना तो लोगो, मात्र दिनास होते बरतल्प भयो तारे व राखे बैन करन जनोग सी ॥३२॥ ।दोहा। परमादिक परभाव ए. है सब तनके जंगः नवना रंग गहे पकिरपड्युं साधिके संग. ॥ ३३ ॥ ॥ आत्मारिकदृष्टांतकथन ।। । सबैया कनीना। ने किरातिकमभाव निम्मलत्य दिर चेननमहाद निरमल है. नौ नग दोष मेह भाग्नी उमानिनी बन्यो है संसान अजनबिल है. नई नई अरनो :

द्रव्यप्रकाश स्वभाव द्रव्य, भूप न कहावे बहु कंचन सकल है, तम पक्ष राहू संग चंद्र राहु योग भयो चंद्र कहा तम होइ नित्य जो विमल है ॥ ३४ ॥ ॥ संसारीआमाकथन ।। । कवित ।। पर परनति निज मानी शुद्ध पानति पर जाने रागादिक संजोग आत्मपर भावहि टाने, गगी गेपी अहं एह विकलप मल मिठीपो करे कम्मको यय फोरे जमोहल फलीयो जिम मृत ठाय जुन पुरुप निज मूतभाषको इक कहे त्यो जीव एह अनानाय विविध कर्म बंधन लहे॥ ३५ ॥ ॥दोहा॥ चेतन पके जोगमा, परको करना होय, या ते पायो पर लम्बे, नो अकर्ता सोय. ॥३६॥ ॥निजउपादेय पहियकथन । ॥दोहा॥ घेतन विन जे ते दरव, ते अशुद्र पग्डेय, मुद्र नना मनुगत, निन्य जीव आदेय. ।। ३७ ॥ पर व्य ? हेय है, नामी कदीये जेपः नांन यवानो प्रगट. यादवाट नय लेय. ॥ ३८ ॥ ॥ अथदम्यारा॥ 11 . न P .. " व्यप्रकाश. ४९१ ॥ द्रव्यचतुष्टयसरूप ॥ ॥सर्वया इकतीसा॥ धरम भवरन दम्प नभ काल न्यारो द्रव्य अल्पी असंड जड भाव दीये बरते, ताने तिन अस्तित्ताप काल वितु जिन कहे गहे गनधार तीन पद अनुतरतैः च्यारो निज गुणवान ल्हन निधान नित निज निज काज साजे निळे कौन परते, पारो तौ विमुक्त नित अधिपितन भवत जीव तत्त सिद्ध होय समुद्र तरते ॥ ४० ॥ ॥ कालव्य विन नीन हव्यभाव ।। !! नया इकतीसा ॥ परम अधरम नभ तीनोशे इकेक संच अकिरीय निरंतर जैनमें वसाने है, परम अवर्ग दोनं असंख्य प्रदेशांत लोक असमान मान अचल कहाने हे. नभ अंस है अनंत लोकालोक मानवंत गुण परजायत अकृत पिहाने हैं, एते उनसम तोमी ज्ञान विहं देय नाहि अय एक जीव जो तो लोकाटोक जानेहे ॥ ४ ॥ ॥ अथ द्रव्यलक्षण। 1 दोहा।। जोतो पुगत जीवको, चल्न सहाई होपः आप अबल अक्रि.नित्त, धर्म व्य है सोय. ॥४२॥ ।। अथ शिप्य प्रश्न शिष्य का सद्गुल मुना २. ना न जगमे पुल पर में : ५।

द्रव्यप्रकाश. ॥ गुरु उचर कथन । ॥ दोहा।। जैसे जलचर जीवकुं, चलनसहाई नीर; तैसे पुद्गल जीवको, चलन सहाए वीर ॥ ४४ ॥ ॥ अधर्म द्रव्य लग्वन ।। ॥दोहा॥ अधर्म द्रव्य जो थिर करे, जीव पुद्गलको साहि, मध्य दीह ग्रीषम समे, ज्युं पेयी तरुछांही. ॥ ४५ ॥ ॥ आकाश द्रव्य लक्षण । ॥दोहा॥ जो देवें अवगाहना, सो आकाश कहेवाय, गुणपरजयजुत जा समें, पांचौ द्रव्य समाय. ॥ ४६॥ ॥ अथ सामान्य अष्ट गुण कथन" ॥ कवित॥ पहिलो अस्ति सभाव वस्तु सभावता यीय गिनतीजो दव्य सरूप गुन चतुर्थ परमेय परमान पंचम अगुरू लघुत्व छटो सप्रदेश कहीजे, सत्तम चेतनहीन आठमो अरूप लहीजे, ए आठ द्रव्यके जाति गुन कदाकाल नाविभचर, धर्मादि द्रव्य- प्रय नीत्य ए आटी गुन नित्यप्रत्ये धर ॥ ४७ ॥ गति हेतु को धर्मथित हेतु है अधर्म अवगाह दन ती अकाशहीकी गुन है तिनी ए विशेष गुन कह तिनी द्रव्यहीके अब गुन जीव हिवेकी मन है, यकी विशेष गुनयह असाधारन .

द्रव्यप्रकाश. , साधारन गुन सतपदको कहन है, अचेतन रूप विनु तदुभय गुन कह्यो गुनपर्याय द्रव्य ज्ञानयोग नहै ॥ ४८ ॥ ॥ द्रव्यपर्याय कथन ।। ॥ सर्वया इकतीसा ॥ गुनके विकारपर जाय कहे जिनराज स्वभाव विभावरूप ताके दोय भेद है, सुधपरजायतो अगुरु लघुके विकार हानि वृद्धप जाके बारह विभेद है; अनंत असंख्य संख्य भाग हानि गुणहानि एतौ छही हानी छही वृद्धियु अखेद है, एतौ परयाय छही द्रव्यको समान भाखे उरि परयाय गुन सुनन उमेद है ४९॥ ॥विभावपर्याय कथन । ॥ दोहा ।। खंध थान गत भेद ले, कहनो वचन विलास, परपर्याय धर्मादिके, ज्युं घटमठ आकाश. ॥ ५० ॥ ॥ आकाशदुविध कथन ॥ ॥ दोहा ॥ सो आकाश द्वैविध भयो, यद्यपि है एक खंघ, लोक अलोकनीके सबे, कहो लक्षन संबंध. ॥ ५१ ॥ ध्रुव उत्पादन अंतजत, जहां एक आकाश, सादि अनंत अपार जड, सो अलोक परकास. ॥५२॥ जामें गुणपर्याय जत, छही द्रव्यको वास, आप असंख प्रदेशधर, सोहे लोकाकाश. ।। ५३ ॥ - . ,

द्रव्यप्रकाश
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॥ अथ शिष्य प्रश्न ॥
।। सवैया इकतीसा॥
धर्मलोकाकाश मान अधरमताकेमान असंख्य प्रदेशी एक
जीव यु अनंत है, लोकालोक नभसम पुद्गलअणु द्रव्य कालके
सुछमसमें वरतना अनंत है। आधार लोकाकाससो प्रदेश ते
असंखराशि वास थान तुछ अरु आवेय महंत है, तावे कैसे
समाप कहो सामी को उपाय क्य रिती थिति कीतौ हम मन
प्रांति है ॥ ५४॥
॥ अथ गुरु उत्तर ॥
॥ सवैया इकतीसा ॥
जैसे एक जलधाउं तदमित जलमृत तामे तदुवित्त सरकरा
गलि जाय है, तामे लुणका करको गारिडारे यारडारे तामे
मइको समूह पोमे टहराप है। जैसे एक गउँमांहि पांची वस्तु
टहराहि जलादिक तहकीक प्रगट दीसाय है, तैसे लोकाकाश-
माहि पाची द्रव्यमाय जाहि अवगाह गुनको समकि कहयाय
है ॥५५॥
॥ अन्यमति प्रश्नोत्तर कथन ॥
।। सवैया इकतीसा ॥
अन्यमति पक्ष गहे कहै यही बात सब धरम अधर्म द्रव्य
जगमाही नाही है, परतक्ष दीसे नाही अनुमान ज्ञान नाही
उपमान शब्दमाही एती न कहाही है; नाते जैन कहे व न
अनुमान लेके यथा इंद्री अग्रहीन भाव जगमाहि होही है,
गतिहेत सो उहत दधिवत पनवत नसे अरूपी निन्य दप
जगमांहि है ॥५६॥

वन्यप्रकाशा. ४९५ । अन्यमति प्रश्नोत्तर ।। ॥ सवैया इकतीसा ॥ कालबादीकी उकतीगत थिती रीत इत कालके अधीन दीन हीन मत पीन है, बुध कहे कालगुन नव पुरातनपन दोय क्रिया एक द्रव्य कवह न कौन है: पंचभूत बादी कहे गति बाउ भूत छति घितिरीत समसत्त प्रथवी अधीन हे. बुध कहे वायुम मि जीव पुदलदल वाको बल और याको बल नौन यीन है ॥५॥ ॥ दोहा॥ या ते पुल जीवको, गति थिति हौत सदीवः धर्म अधर्म हो द्रव्यजड, इनको ज्ञाना जीव. ॥५०॥ ॥ कालद्रव्य लक्षण । ।।दोहा।। वरतन परणति जाग नित, क्रियापरा परवान; नव जीरनको हेतु जो, कालद्रव्य सो जान.॥५६॥ ॥ कालद्रव्य गुणपर्याय कथन ॥ ॥ सवैया इकतीसा॥ अस्ति आदि अध्गुन युत अमदेशी नित समेकी मीलन वित नाहि अस्तिकाप है, बरतना हेतुए विशेष गुन कहे जिन अगुन लचुत्व मेद पाके परयाय हे आपली प्रमुखपर परजाय हे अनंत उनपाइ व्यय मंन कही वाय हे. सो तो दन्य एक कहे समय अननवत नखे नमित बग्ननाको उपाय है ।।६०॥ .

६
दध्याकाश.
।
॥ शिष्य प्रश्न ।
। चोपाई॥
शिष्य कहे तुम काल प्रयाना, मनुज खेतमित करो सुजाना,
उत्पादादिक सब जगमाही, समसममें क्युं कहवाही॥६॥
॥ अथ गुरु उत्तर ॥
॥ मया इकनीसा॥
तर आयारिज एक गहि जिनमत टेक कई एसि वात
परवान पक्ष गदिक, नरखेत समे मितकालमांही तीनो हीहि
रहो द्रव्यमांदी नीत देरो ज्ञान लहीको तावे उपदेशमाहि
कदे जिन वन एमे गहे गनधार सरचान सुध यहिके, देख्यो
युं अनंत जीन देगेगे अनंतानि देखत हमी अनंतज्ञान
सरददिके ।। ६२ ।।
।। अन्य भाषाग्जि यचन ।।
॥ संईया शतीसा॥
कई और गुरु काल दृष्य हे असंख्य पिर रेणुकए टोक.
पादेव परमान , एकएक रेणुकमे अनंत प्रगट होत सम्प
साब ममें का पालान निज निज काज करे अनमिटपने
गदाय ते अग्निकामी कहागिन वहान दे, अनंत अतीत
काट देतो अनागनाल अमोनी परिणामी कालदम्य मान
.
॥ निधयाना कपन ।
।दोहा।।
अनुमित होने को पाटाकाट,
निदायी साना पार ॥२४॥

द्रव्यमकाश. काटन्य उपचारहे, पंच अस्तिको चाली ओर कयन सब शाखके, सो उपचारि भालि. ॥६५॥ ॥ हेयउपादेय विवेचन ॥ ॥ सवैया इकतीसा ॥ उतपाद व्यय वृधपने जीवसम एमी अगुल्टय वै पर- जापी समान हे, जरूपी अखंड अज अनादि अनंतसंत अनमिल औरसे तीलोकके प्रवानहे; इत्यादिक गुनसोस मान तौमी ए अजान ताते ध्यानध्येयमां य ज्ञानवान् है, अनंत विगुणसाथ देवचंद गुणनाथ येय उपादेय ब्रह्म ज्ञानको नि- धान हे ॥६६॥ ॥ इनि द्रव्यप्रकाशको प्रथम अधिकार ॥ ॥ दोहा ॥ वरने च्यारो न्यपर, लेह अल्प अजान अब वरनी संक्षेपसी, रूपी जड परमान. ।। १ ।। ॥ अथ आतमाकरमयोगको दृष्टांत ।। ॥ सवैया इकतीसा ॥ जैसे नीरनिधि नीर समीरको मार भेती उहरे उतंग अति चंचलता विससे, डौलतनदीकोनाथ चपलकलोलसाथ रंचनसु थिर होइ आकुलता मिलसे तैसे ए चेतनप अमल अजेल- रूप असंड अनंत ज्ञान सुधर सनेमे, सोइ जीव कर्म यों मोहके पवन क्ष्यों फेयों फारे ममतासो क्षोभ भाव कोर सौ ॥२॥ 69 २७

४९८
द्रव्यपका.
॥ पुनः दृष्टांत ॥
जैसे माटी जलसंग-घट दीपकादि चंग-नवनव भाव
धरे मृदरूप वोइ है, तेसे कर्मजल जोग-जीव च्यारगति रोग-
लहे अखंड ध्रुव चेतनत्व सोई है। ऐसो निज गुणवंत-अमल
अखंड संत-ताहिको सरूप गहि सिद्धरुप जोइ है, कहे
देवचंद बंदि ऐसे चिदानंद विनु मोक्षको साधक भया और
नही कोई है ॥ ३ ॥
॥ पुद्गल द्रव्य लक्षण ।।
॥ दोहा॥
पूरण गलणन सभावधर, अस्तिकायमूर्तिक,
फरसं वरण रसगंवमय, पुद्गलद्रव्य मुठीक ॥ ४ ॥
॥ अथ पुद्गलगुणपपीय कथन ॥
॥ सवैया इतीमा ।
जाके मूल गुनगनि रूपी अचेतन भनि अस्तिपन आदि
खट आठे ओघ गुन है, पुरनगलनरूपी अनुको विसेस गुन
य? असावारनके उरमांही जैन हे । हानिदिपविध मूल
परपाप याके द्वणुक प्रमुखखंय परजायआने है, एकवर्ण एक
गंव एक रस = फरस पांचो गुन पाके मूल परीपैयनाने है
॥५॥
॥ पुडलदव्य मरूप॥
!! दोहा ।।
1 यामे मति मदाय,
अग्निकाय कहेवाय. ॥ ६ ॥

पप्रकाश. ४९९ पुद्द द्रव्य अनंत हे. सब नभ अंस समान, ताके संच अनंत हे. नरदपास संठान. ॥७॥ सो पुल है दोप विध, इक अणु दूजो संघ, संघ दुविध एक जीव, वितु पीय कर्मको बंध. ॥८॥ ॥ पुद्गलखंध स्वरूप ॥ ॥ सबैया इकतीसा ॥ छुटे अन्हे अनंत मी संधमे मिलत आपके सकंध होप संब अनु होय हे, जे ते अनुहे अनंत ते ते संच होय नाहि ऐसी बात कहे सोतो मुरख अबोह है; तास कहे व्य पुद्गल परावर्तकाल मिले कैसी भांति जाकी पुल सोहहे, अनुगति जीवसम यातिहे अमीतनित कही अनुवात अब खं. धको प्रबोहहे ॥९॥ ॥ पुद्गलपर्याय कथन ॥ ॥दोहा॥ डाया भातप तेजतम, सववंच लघुल, विछरन मिटन प्रवाहगति, इनकौं पुगलमूट. ॥ १० ॥ केइ इंद्री गन्य हे, के अगम्य निरवार, संस्जस अनंतमन, त्रिधा संघ विस्तार. ।। ११ ॥ ज्ञानहीन जडहेय सब, उपादेय जीउ सार, अब वरनी निज ज्ञानहित, कर्मवंच विस्तार.।। १२ ।। ॥ अथ कर्महतु कथन ॥ ॥ सर्वया इकतीसा ॥ पंचनियाको अविरत बानसंच पंचविम संचराय योग पं ५००। द्रव्यप्रकाश.' दस हे, एतै सगवन हेतु कर्मबंधहीकै खेत ताके मेद ची प्रकृति थितिरस देस है। प्रकृति समावथिति कालटहरा वरस चिकणाई दल समुदाय परदेस है, करे निजनिज काज भाव- कर्मके समाज मोदकको दृष्टांत च्यारोमे अवस हे ॥१.३ ।। ॥ कर्म अष्टप्रकार कथन || ॥ सबैया इकतीसा ॥ प्रथम ज्ञानावरणीय ज्ञानको अछादलेय आंखपर पट जैसे याको सब दाव हे, भेदमति आदि पंच पांच्यो निज गुण वंचे क्षायक्क्षयोपशम यामे दोय भाव है; दरसन उछेदक दरसना वरनीय प्रतिहारसम ध्रुवबंधी टहराव है, दंसनावरन च्यार निंद पांच परकार यामे दोय भाव मोहद्रष्टिको उपाव हे ॥१४॥ वेदनीकरमभर अन्यावाय रसहर ताके दोय भेद एक सातामी असाता हे, असाताको पाप हेतु साता हेतु पुण्य होत मधु- लेपयुत असिधारासी चटान हे; मोहनीके भेद दोय दंसनके तीन मेद जगमे कहात हे, मिथ्यामोह मिअमोह समकित खामोह तिनीइ प्रकृति निज गुनकेरे घात हे ॥ १५ ॥ ॥मिथ्यामनयरणन॥ ॥ सवैया तेवीसा ॥ देहसी प्रीत प्रतीत अनीत सो पूपकी रीत सौ जाकी मिताई, जीव अजीव विरेककी ढेक न जानन नां कछु आप पराई; कर बढिांग दपादि क्रियापनि अंतर ज्ञान भगति न पाई, चंद कहे जिनबट पासि ऐमी मिथ्यामति जाई पुलाई ट्रम्पमकामा. । मिश्रष्टियरपान ।। ॥दोहा वानगगये. वचनले, नाहि राग नहि देप; पदमशीनर आए. मित्रमोहसे लेस. ॥ १७ ॥ ॥ मन्यादष्टिवक्षन ।। ।। सर्वया पानीसा ।। ज्याको तन भौति नाहि सातापर निकी नोहे ज्ञानरीति पोनिज नीत माही ब. निकादि अट मिट इष्ट नित गुननिट अंतरंग पहिरंग संवन्स लोहे की सुखनु दिनुख निक गुन्द मनमुख निज ज्ञान रूपी का भाव नसे है, परते धरमराग देवादिको माग पाने समर्शत मेह रग संग से॥१८॥ दोरा मिसमोह मार दल, समोसना रविवो सी सी र पाना॥१९॥ ।।माप्रिमोशनीदेमंद ॥ :: मारे पाहि पावर दिल भोपा.मा. मट S ना.

५०२ द्रव्यपकांश. ॥ नामकर्मभेद ॥ ॥दोहा॥ नामकर्मके भेद बहु, वरणत बडे गरंथ; तावे यरनी नाम कबु, जासे कछु अस्थ. ।। २२ ।। ॥ सवैया इकतीसा ॥ पैसठि प्रकृति पीड अटावीसहे अपीड सब मिल्यां नाममेद तिरानु कहानहे, तनपंचदशमाहि पांचको गहन कीजे वरनादी वीसमांही च्यारोइ गहनह। तब सडसठी मेद भये बंधमांही गहे उदय उदीरनामे इनहुको मानहे, सत्ताके सरूपमांही पान- कोहे उछाही देवचंद कर्ममुक्त सदा सुखयान हे. ॥२३॥ ॥ अधगोत्रकर्मभेद॥ ॥दोहा॥ उंच नीच दो मेदको, गोतकरम जड जान; मुंदे निजगुन अगुरुलघु, कुंभकारसम जान. ।। २४ ॥ ॥ अंतराय पांच भेद ॥ ॥दोहा॥ दान लाभ बल भोगको, वली उपभोग प्रकार इन पायोको मुडे, अंतराय सो धार. ॥ २५ ॥ ॥ अष्टकर्म उत्कष्टधीनि कथन ॥ ॥दोहा॥ ज्ञानदर्शनावरण अ6, वेदनीय अनराय. इनकि कोहाडी योनि. मागा नीम कहाय ॥२६।। .

वन्यप्रकारा. सित्तरी कोहाडी यीति, मोहनीयके वीस सागर कोडाकोडी यति, नामगोतके वीस. ॥२७॥ ॥ अष्टकम जयन्ययाति ॥ ॥दोहा॥ पंचकर्मको जवन्य पोति, एक महुरत होय: परमदेव अरु नरक्की, सागर तेतीस जोय. ॥ २८ ॥ ॥ अय रसवंध कथन ।। ॥दोहा॥ सर्ववाति उष्टरस, देस घातको मध्य गुन अवतीको होनस, आगममांहि प्रसिद्ध. ॥ २९ ॥ बाणगंद अह परस ते रस अनंतगुण होपः कर्ममाही रस अनंत दिनु, कर्म न वचे कोप. ॥३०॥ ॥ अब प्रदेयंघ अप्ठ वरगना सरूप कथन । नया इकतीसा॥ उदारिक निद आहारक तेजससौ भासा सासोवास मन कारमण अंतहे, एकारक आदि है जमन्य जीवतो अनंत ज्दारिक अगहन गहन अनंतहे; वैकरीको अगहन ताही सो अनंत तातो बनिय गहन बरगना अनंत है. आठोइ अनंत पुलइट वृद्धमंत इनसो निमुक्त देवबंद नहातहे ॥३॥ || अप कर्मदल विभंजन कथन ।। ॥ मया इकतीसा॥ पायो मोहकम्पास चे आट कर्मझाम नब सब घोरे जर आउने बन्दानांये. नाते नानगोन अरहे अविर नाने द्रव्यमांश. -- ॥ नामकर्मभेद ॥ ॥दोहा॥ नामकर्म के मेन अतु, वरणत पडे गरंथा नाते पानी नाम कर, जागे कछु अस्य. ।। २२ ।। । सबैयाइकनीमा ॥ पटि प्रति पीड अटावीसदे अपीड सय मिल्यां नामभेद तिगानु पहान, तनपंचदशमाहि पांयको गहन कीजे यानादी दगमांही स्पागेइ गहनदे; तय सदसठी मेद भये पंचमाही गरेअप उदीरनामे इनको मानहे, सत्ताके रारूपमाही पान- को उग्राही देवबंद कर्ममुक्त सदा गुग्वयान है. ॥२३॥ ॥ अयगांवकर्मभेद ॥ ॥दोहा॥ उनी दो मेदको, गोताम जर जान; मुंदै निजगुन अगालय, भकारगम जान.॥ २४ ॥ ।। नगरपांग भेद। द्वारा दान लार र भोगतो, की सभोग प्रकार; इन पदेवो मुद), अनाय मो यार ॥ २५ ॥ मटा मापारियन ॥

स्तिा कडाडीत मेहनीपत वाल पर दाझेडी ति, नानक दी. ॥२७॥ ॥ अष्टकर्म जयन्यथोनि ॥ 1 दोहा चाकी जपन्दति. एक म्हात होपः परम अन नाक, कान और.11२८॥ की महा. देर म बाप अन्यहोर: जन नि. के. ३01! भाभदागना माल कपन ।। بن غبغي दिन! شده نفت جن فننت تن تن تن : ----:-:-

दृश्यप्रकाश
॥ शिप्यप्रश्न॥
॥ सवैया इकतीसा ॥
निहचे असुद्धनग घ्यायरागादिक चय ताहीको व्यापक
होय कर्मसौ करतुहे, सोई व्यवहार लई वेदक समाव गहि
गतसमय कृत किया फलको गहतु हे कृतकर्म भोगता है
नुतनको करता है एक समे एक जीव क्रिया दो घरतु हे,
हमकुं संदेह एह कहो गुरु गुनगेह तुंहारे सिमांत वीचीके
सो अमिमतुहे. ॥ ६ ॥
॥ अथ गुरुउत्तर कथन ।।
॥ सवैया इकतीसा ॥
सुद्धपने अपने गुनको करता यह जीव जपारथ एही,
ज्ञान सरूप अनुप सधे गुण रासि वधे गतरोष अनेही; भावत
कर्म करे पर योग विभाव संजोग अज्ञानको गेही, ताही ते
द्रव्यत कर्म उपाधि लगे जीउको किरिया द्वयकेही ॥१॥
॥दोहा॥
विदुष रागादि पर, कीने ताके रोध,
व्यकर्मको रोध है, ताते निर्मल बोध.॥८॥
॥ सरैया इकतीसा ॥
ज्ञानरूप ज्ञानमांहि क्रोध भाव क्रोधमाहि ज्ञान कोष
एकतान होय कई वातमे, ज्ञानरूप आतमामे रागदोष मोह
नाही वस्तुको स्वभाव मेद सुदनाके ध्यानमे; एसो ज्ञान धरे
सोतो कर्म कोन बंध करे बरे न अशुद्ध मोह जग्यो भेद
ज्ञानमे, चेतनाहे जीव वन्नु कर्म पुल वस्तु वस्तु गुण कृति
भेद जिनके खानमे. ॥ ९ ॥

द्रव्यप्रकाशः ५०७ ॥ संवरहतुकथन ॥ ॥ दोहा ।। जान्यो आतम ज्ञानसो, आतम आस्रवं भेद तब आस्रव संवर भयो, गयो कर्मको खेद. ॥१०॥ ।। अध ज्ञानाजीववरणन ।। ॥ सर्वया इकतीसा ॥ काहूं एक संत जीव निज गुन गहि लीने पर गुन त्याग जोग पर जानी त्यागे है, विरम्यो विरुद्ध सेती रम्यो निज गुन रेती मोहके सुभट जेते ते ते दूर भागे हैं। राती निज आतमासो दूर टरपो हेतमांसो विमुख होय ज्ञान ध्यान लागे है, ऐसे मुझ जीव देव करे नही कर्म टेव सुजता सुचाह पाये संतरस पागे है ।। ११ ॥ ॥ उपदेवाकथन ॥ ॥सवैया तेवीसा॥ मरख जीव घरे पित्तने कहा जल्प विकल्प सदा दुखदाई, पावट्ट बन सदा अति उजल दूर तजो सब तोज पराई दर्शन लाभ पहे जग वर जीवको काल अनंत सदाई, दे देवचंद रहो हम सो ३ अक्षर पर गुण प्रीति सदाई॥१२॥ !! रागादिकसौशिप्पम नगरउत्तरकथन । । संपा। को कई रागादिर. वनो नित नाहि आदि दिन सदा काट एकही सभार है, में अहगी नाही नगी कहो व्यप्रकाश जीवहीको या ते जीव रागादिक तादातम्यता दाव हे संत कहे बंध्ये वितुं छुये कहनो असत्य रागादिक एक माने मुक्तिको अभाव हे, या ते यह तहकीक कहीं देवचंद्रवात रागादिक पर द्रव्य कर्मको विभाव है. ॥१३॥ ॥ आतमशिक्षा कथन ॥ ॥ चौपाई॥ सदा अनंत विकलपजल्पको धारते कहा बंधतहो; कर्म नौकशी निज कार तेजो विकल्प विनु एक नित्य निज अनुभवो, तो. न करो पर बंध धरो न भव नवो. ॥ १४ ॥ ॥ अथ ज्ञान महिमा ॥ ॥दोहा॥ यह परमातम ज्ञान गुन, भवतरु छेदनहार ध्येयरूप आदेय फुनि, मुनिजन मन आधार. ॥१५॥ ॥ शिवभवहेतु कथन ॥ ॥दोहा॥ जिनयर जन सुखकर कह्यो, यह उपदेश उदार शिव थानक निज मुन गहन, निज गुन त्याग संसार.॥१६ ॥ जीयमहिमा ॥ ॥ मवैया इकतीसा ।। जामे दी पंचनाही को प्रपत्र नाहि मनको न रंच जामे तनको न अगटे, नाहि म देन खेद मार्गनाको भयो छेद ध्यानव्याना भेट नत ३५० नग्ग है, शान व निरूपाधि

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१० दम्यप्रकाश ॥ गुरु उत्तर ॥ ॥ दोहा।। वि पुगट मी करे, मदिरासे प्रमभाव चममे आक गुण, नयना पुद्गल दार. ॥ २१ ॥ रयु शानापरणादि तन, सक्ति जीउकी तोर कई विकल अज्ञानमो, फेरे भवकी दोर. ॥ २२॥ ।। शिप्य प्रश्न पुनः ॥ - हे स्वामी अशुद्रप, एति शक्ति न होय जीव ज्ञानता दले, चेतनको गुन खोप. ॥ २३ ॥ ॥ गुरु उत्तर कथन। ॥ माया नेवासा ओउ पुमान पीये मदानन होय विशुद्ध करे विकलाई, बादकी पद्रि को वृतानीको मुठिन जीप दुरे पितपाई, दर्शन दे दनादको जीपको जानपनो राय जाई, रयु पह पुट कर्मक संघ मी जी अनिलो लेगु दाई. ॥२४॥ दो मोहान जनावरे विकार अती दन न हो। गुम ग्यु थार. ॥२५॥ ८ . 1.नियम दम्पमकामा ताहीको विनाश दो पुद्गलमे लोहे अनादिता कहे याको प्रसंग अनंत होत जेसे ज्ञान नको योग सदा दसेहे, एते दोपवंत वानि तुम कहि कहा जानि गुरजी हमारो वित्त संसपमाही धसेहे ॥ २६ ॥ ॥ गुरुजतर वायन ।। ॥ दोहा।। नि हेतु दिनसे नये, वरतु अनादि ज्यं सांत, कर्मभपके पुनसे, कनक मैल लांत. ॥ २७ ॥ आनन करे निजभावको. न को परपरनाम, स्वस्वभाव किरीया दर, सो पावे शिव टाम. ।। २८ ।। असत नाहवे करे. भावान ए जीव ब्रम्पकर्मको पुनिप्रदेनपापवहार सदीव. ।।२९ ।। ॥ शिप्य प्रश्न ॥ । मईया इतीमा ।। पाद अ. पायो भार हा कहो हिट करता कमी पानिकी स्तिहे, नाहीके अभाव कैसे इन्य कर्म- पुट क्रेगो चेतनगम नाम जो सीन हैपार जन पास्ता तनाप गुणका भाग नाशे वही अनीत है, तदने अभाव होत कमी काला नदि अनंत जीव कही- ने नीति हे ॥३०॥ निनित है. :: ::.हेतु तुन्न भार ५१२ द्रव्यप्रकाश लगी रह्यो परभाव मेरो एतो भर्म है जेसे लोह प्रमको निमित्त कह्यो चमकको चमकदो शक्तिको निमित्त लोहकर्म है, ऐसे जीव कर्मको संयोग लगी रो तोमी निहचे विचारे मिझ कर्म जीव धर्म हे ॥३१॥ ॥अथ मीमांसकमल कथन जैन उत्तर सहित॥ ॥ सर्वना इकतीसा ॥ मंद कहे सुखदुःखे भाव सिव आदिककी करता प्रकृति एक जीव ब्रह्म न्यारो है, करता न काहुको हे भोगता न होय काको करता दिवाको सम प्रकृतिको प्यारो है। तासो कहे बुद्ध भैया शिव भेद दातुं क्रिया एक करे ऐसो बोध कहा विच्यारयो हे, सुखदुसको निमित्त प्रकृति कहीसो सत्त ताको काके कारिजको कर्नाभोक्ता धारयो हे ।। ३२ ।। ।। जिनवचन ॥ ॥दोहा॥ करता भोक्ता ज्ञानको, निहचे ब्रह्म सदैव करे भोगवे कर्मको, विवहारेय जीव. ॥३३॥ ॥ ब्रमयादीमर कथन ॥ ॥ सरैया इकतीसा ॥ अमवादी कडे मद्म एकहे अखंड सो तो ध्रुवज्ञान मुद्रा धरि वैकुंठमे रहे है, ताके नब अम ए ने दीसे जगमाहि जे ते जज्ञाता नवनव सब वाम लहेहे; पूर्ण नित्य ब्रह्म ज्योति नाकी इछा जब दोन 7 नाही अमको मी वैकुंठमे गहे है, एमे मुझ बम बिर, निजावान शताको कर्मवसि सुखी दुमी कोन करे !" ३२ पप्रकाश. ताको जनउत्तर कथन ॥ ॥ सवैया इकतीसा ॥ जैन कई मन रीत इवाभावसौ अतीत गतोष मोसमय इहा शेष गोपे, आपप्रदेशी मी असंड हि काल सदा ताके संड करि वेको हेतुं कौन जानी: ताने जीव हे अनंत निज ज्ञान गुणवंत नित्यानिन्य भावेमंत शुद्धनै बसानीये. ता से भिाव वत्ती ते ते मचाती कहे जे ते कर्ममुक्त तेते लिख बुम मानीये ।। ३५ ॥ ॥ अथ बोडमनकथन॥ सर्वया उकनीसा॥ बुद्ध कहे प्रथम सरे में जो जीव हुनो दुतीय समेने लो जीव वन्न नाहीहै, कता हे कर्म, जो मोनो भोगता न होय करे और तो और मेरे मत नाही हे जैने जीत्र तैसे और वन्तु सब उही माने जाने न सरूप सुदबुद रीति सोही है. पर सभावको नया म्य कहे रहे मद मत निज घोष चारा नाहीं है. ॥ २६ ॥ ।। सर्दया इस्तोमा जैन हे वन्तुगन्य नांदन ३ नद निन्द निराधाय पर ज्ञापन अनिन्द है. मैं : नई हद तक न एती बात जाने रहने को यह को काय हे धानपने कीनो काम उसने पाद आएशन अनन्द एक गहरे अपत्य हे नाते द्रव्यप्रकाश re उतपात व्यप ध्रुव धारा तीनो सदा एक समे एक वस्तु वीवि कही सत्य हे. ॥ ३७॥ ॥ न्यायमति॥ ॥ संवैया इकतीसा ॥ ऐसे वानी सुनी मनमांही न सुहानी तय न्यायमति बोल्यो निज पक्षको परीके, नारी वितुं होय कैसे संतानके उपज न भोजनको करे कौउ पाक विनुं करेके उधमके कीये विवं केमे कापसिदी होत उद्यम प्रधान याते कहो और हरिके, पाते करतार जीव कहो विश्वनाथ ऐसे पीरजको फोरि निज उद्यमको धरिके ॥ ३८ ॥ ॥नाको जैन उत्तर कथन ।। ॥ गाया कीमा ॥ जैन कहे एतो बात कही हे पुरंतनप म्यादयाद वादी एमी वात नाही कई है, घेतन दीरज जागे भागे परभार सब पाते पह उद्यम व्याहारमाही गहे; कम दे चम सो गुन १५ वदेदे, मंको स्वामित्वानो भेदज्ञान भार पिर्नु अहं वृद्धि मात्र वमि पेतनही रहे ॥ ३९ ॥ ॥शियमति ऋथन ॥ ॥ मांगतातीमा। दिश कर रहे है मर गान कारनपन, पारामि दाकारद होय कमार दम् : ari " मर . .

व्यप्रकाश. ५१५ . काटपाय फल खिरे जनममरण वात कालहीने टीन है, याते मुखदुख रासी शिश्वास भववास रवि शशि दे जस्त कालके आधीन है॥४०॥ ॥जनउत्तर कथन । ॥ मवैया इकतीसा॥ जैन कहे मुनो भईया लेती कही तुम यात तेती सब सावी ये एकांत नाहि गहना, स्वभाव निपत पूर्व कृत फुनी उद्यम सो पंचमो तो समवाय कालबसि कहनी पांच समवाप मिले फले तव शिवकाज समवाय मिल्यो बिनु काज नाहि सरो, मतपक्षपात हरी स्यादवाद भाव वरी नय भंग भेद हत एसो ज्ञान धरनो ।। ४१ ।। ॥सर्वमत एकन्वीकरन जैनमत स्थापन ।। ॥ सर्वया इकतीसा॥ भीमांतक कर्ममांनि विवहार पक्ष गहे वेदपाली ना मानी दई नर गहतरे, दोष हित भगा कहे परजाप नए जाप मति रहे करतार उद्यम महतुः शिवमति कामवादी सर्व सातादीन बानी पां समवार ननि टेकने रहतुहे, एल सब संतवादी संगत रीति गहे. सादादि नए अनेकता वहरे ॥ ४२ ॥ ॥ अप पदर्शन जन माम्म कपन । । मया रकमा बिहार नर गंह नहि भूमर र निदे विमान द्रव्यप्रकाश ब्रह्म नित्य ज्ञान धाम हे, परजायने अब्रुव सुक्षम सभाष घर उदिम सभाव लीये करतार राम है; कालचाल हे प्रवाह पर नाम चक्रगति युं अनेक अंगपान जीव पर नाम है, एक अंग तजि सरवंग गहे सो सुबुद्धी एक अंगरंग रागि सो कुबुद्धि खाम हे ॥ ४३ ॥ ॥ अथ स्यादवादसरूप कथन । । सवैया इकतीसा॥ आपने चतुष्कगुन हेसो नाही परगुन या ते दोनुं वात सम कथन रहतुहे, है मी नाही ह्यो जाय नाहि नाहि क्ह्यो जाय, कयो जाप हैहत न यो सर्व नयमै कहतु है। नित्य हे अनित्य हेकी सत्य हे असत्य हेकि अवक्तव्य वक तव्य सत्र अमिमत है, एसो प्रभु विदानंद ज्ञानादि निगुन योग देवचंद पद पाय आनंद लहतुहे ॥ ४४ ॥ ॥ मविकल्पनिर्विकल्पज्ञान कथन । ॥दोहा॥ नव नव गुनमय जीव कहो, यह सविकल्प ज्ञान; नास कर्म कर एकमय, निर्विकल्पको ध्यान. ॥४५॥ ॥ निर्विकल्पमहिमाध्यान कथन ॥ ॥ सवैया फनीसा ।। अनादि अजान लीये गगहोप मद पीये मोह महातम मो महातम वधाग्यो हे. जीव लोक जीत लीयो जानगन मृद्र दीयो कापो निज गज परभावको पक्षमाम्यो । नाको पर.

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५१०
द्रम्पप्रकाश.
मांस अस्थि रुधिरादिको, करे दुगंडा पेखी;
तन्मय तनको निज गने, यह अज्ञानता देखी. ॥५४॥
॥ सवैया तेवीसा॥
देहको नेह तजो तुम चातुर आतुर भाव सदाईन पाही,
व्यंतरके पुरसी छिनभंगुर रूपकी सोभ सो बादर छांही;
घणा (1) दिनके सबसि दुरगंधके दुपन गेह वदी इनमाही,
या तनकी ममता न तजो तो (लौ,) आतमज्ञान जगे
तुम नाही. ॥५५॥
॥दोहा॥
देहादिकको मिन्न गणी, गहि आतम शीवकुल;
परमें निज अभिमानता, यह भव प्रमणा मूल. ॥५६॥
॥ निस्पृहताभाव कथन ।
॥सया इकतीसा ॥
अधरम घाती शिव मारगको संघाती एसो रंच नाही पक्ष-
पाती अध्यातम राव हे, परम नरमवर मेदज्ञान भाषधर हरि
परदोप कर्म नासको उपाव हे; तन मन त्रिया धन योवनादि
पर गिने मोहद्रोहमै नस न जीतको दार हे, नरककी भीत
नाहि मुरपद मीति नाहि मवरीति रित्यौ ऐसा निस्पृह भाव
है ॥१७॥
॥दोहा॥
स्व स्वरूपगत दृष्टिको, नाहि शक्रपद चाहि
स्व स्वरूपगत दृष्टिको, लघुपद लदे उठादि. ॥५॥
परम ज्योति मुम्बम्बाइग्न, योर्ग' जोग करता
कुथित अन्न ग्यू गग विन, जा नहि विषय अनिन ॥५९॥

द्रव्यप्रकारा. ५१६ आतम अभव सुखसो, भ्रष्ट भये दूखुद्धि विषयन रति चितमें करे, सुकर कादम लुइ.॥६०॥ ॥ आतम स्वरूप वरणन।। ॥ सवैया तेवीसा॥ सुद्ध सुरंद अफंद अमंद आनंदको कंद सदा मुख धारी, ऐसो अनोपम आतमज्ञान सुधाघर कुंडमै जीले अपारी; अनादि अज्ञानके भर्म लग्यो यह कर्म कलंको मैल पखारी, संत टहे निखानको घानक दर्शनज्ञान चरित्रसे भारी ॥ ६१ ।। ॥दोहा॥ स्व स्वरूप आलंब विनं. शिवपथ और नहीज; मुक्ति स्त्री वश करनको, सोहं ध्यान सुगीज. ॥ ६२ ॥ से पंकजदल अमल, रहे कर्मसौ मिन्न, त्या आतम स्व सभावमय, कर्मखेदनिर्विन ॥६६॥ ॥ इंडिसुखहेय कथन ॥ ॥ सवैया इकतीसा॥ जग इंटी सुख नेते ते ते सत्र दुखरूप कबहुं न समता हे ममता अनंत हे, जेसे पंथी मल्देन ग्रीषम सने प्रवेश मध्य दीन नीर विन भोजन करंत हे कामभोग रतिमति उचित न तोपे राम पामकाज जेसे दुख राजीमे महंन हे, पनग ज्यु दुख देय निहवे सरूप हेय गेय योग उपादेय मागमे अकंत हे ॥ ६४ ।। ।।दोहा। उत्तम पद ते तुं पर्यो, सो विभाव अनभावः तोमी वाहि मेग्में, कहाको गुना३ ।। ॥

द्रव्यप्रकाश. ॥ सर्वया तेवीसा ॥ यह शरीर हे पीरको पीहरई पर आतमकी हरहेरी, वेरी करेरी परी यह ज्ञायक काई अनेरी रही नही सेरी; ज्ञान सरूपमयी भजि चेतन ए तनये मन मोति उबेरी, ज्ञानको मोगर लेकर आतम तोरि तुं मोह जंजीरकी जेरी ॥६६॥ ।।शरीर कथन ॥ ॥ सर्वया इकतीसा॥ मेतो तनधारी नांहि एतो तन मेरो नांही मेतो ज्ञान गुणधारी करमस्यो न्यारो हे, मेंतो चेतना सरूप एतो जड भावरूप मेरो याको कोन नेह एह न विचारयो है; मेंतो नित्य ए अनित्य प्रगट असुविखानि हानिधान एसो देह मोको कैसे प्यारो हे, मोहके विटंब घेरयो भवकाल वित प्रेरयो ऐसो भेदज्ञान में तो वित्तमें न धारयो है ॥६॥ ॥परहेयआतमाउपादेय कथन ॥ ॥ संवया इकतीसा ॥ सुन दृष्टि समकिती प्रकृते वित्तवित्त करमको करतन कहो कयो जात हे, मिथ्यादृष्टि रमति पररंग राच्यो संतो पर कृत फटहीरो भोगता कहान हे, निज पाको विवेक करे भेद- ज्ञान टेक टक डारिके अनेक यह जन वान हे पग्मुक्त गुणयुक्ति मुक्ति दिन मनियन पमा निज चतनको देवचट ग्यान है।। ६८ ॥

द्रव्यप्रकाश ॥ मनसंकल्प कथन ।। ॥दोहा॥ विकल्प जाल कल्टोल करि, चपट मनोजलरंदा वितन्ह चेतनता दुरि, ज्यु बादरमें चंद. ॥ ६९ ॥ || आनमामोक्षहेतु॥ मईया मेवीमा ॥ आम आतमभाव धरसो सुपेतनता गुनजानो साई, यापकप्पेय अभेद चिदाकर मार त्याग कसो अपराइ पंचट भाव तनो भजि एकता चित नरंग अनंग हराई, सादिअनंत महंत जीत नो पावर मोक्ष प्रधान नवाई.७०॥ पदो पर मुल नानमो. न पाया होरः निजगुण समुदता लहे. हे मातम मोप. ॥१॥ ।।जानीराप टा पित जयं देह देवली होतः मी हार भी न तो नर ॥ ७२ !! !! आत्मा अध श.पन । समान ई., केदार द्रध्यमाश. F घेतनाको जानादि अभंगरंग जाके संग पाही है। अंतरंग यहि- रंग अग पगंग भंगि इंटीकी उमंग तजी जामे परछादि है, होय जो मेन एगो जैमो नो भार तेसो तोए कर्मबंध पत्र नोरन कदाही है. ॥ ७३ ।। ॥ आत्रमागमिग यापन ॥ ॥दोहा॥ निसिप लोहरिया रहे, अपानांत मणि योग; निक्रिय गाकर हाजीर कमके गेग ॥७॥ । परमात्माममा कथन ।। 1 मापानीगा॥ पदाट निदानः नि मी मा आद अमोकन अनादि अनन. निम्मद पर पान पाम ज्योति परम आम तय मान; मीनागी मज पामामा गुमान जिन निराधन मटन सिट मापन, पगो जी। कर्म मंग मग मी अन मग 'मानमें रहता है. ॥७॥ ।। माम्मान दामन कान। + भाषा: Raran m. har .

द्रव्यप्रकाश.
॥ शिप्य प्रश्न॥
॥दोहा॥
एक द्रव्यमे तीन गुण, कैसे रहे एकत्र
यह इम मन संदेह है, कहो गुरु परमपवित्र. ॥८॥
॥ अथ गुरु उत्तर कथन ।।
॥ सवैया इकतीसा ॥
जैसे पीत स्निग्वगुरु तीन गुन भेद वितुं निरंतर आदि
लेके कंचनमे रहो है, दहन पचन फुनि तपन ए तिन
गुण अगनिमे एकसमें जिनवर कहे हे; शीतल प्रतल वलि
निरमल जटविधि तीनो गुण एकसमे स्वभावसे वहे है, तैसे
जीव द्रव्यमांहि ज्ञानादि त्रिगुन रहे निहसु भावसे अभेद
रूप गहेहे ॥ ७९ ॥
॥ ज्ञानगुन भेदाभेद कथन ।
॥ चोपाई॥
जो विचारीये नय विवहारा, तो ज्ञानादि जीवसु न्यारा
राहूसीस जैसे यह लीजे, हेअ भेदपे भेद कहीजे. ॥८॥
॥भेदज्ञान महिमा कथन ।।
॥ सवैया इकतीसा ।।
कामभोग लालवी दे सब जीव वशी कीने मीने मोहरसमे
निरंतर विकल है, ताकी डाक दृरहरि आप पर भेद करि
ऐसो भेद ज्ञानगुन अदोष अमल है: धारावाही रीत लीये
ताको घरेसो सुबद्धि करमके मोरनको कारन सबल्है, अकल
सकल वितुं सकल जगत परि रहे सिद्ध जैसे तोपमे
कमलहे ॥१॥

५२४ द्रव्यप्रकाश. ॥ आत्मबुद्धि उपादेय कथन ॥ ॥दोहा॥ आरमबुद्धि शिवको करे, देहबुद्धि संसार ता ते तनधी त्याग, कर निजगुनसो प्यार. ॥८॥ पुण्य पाप दोन मकृति, हे पुद्गलको खंघ; इनपर आतमबुद्धि जी, इह करमको बंध. ।। ८३ ॥ ।। शिष्य प्रश्न ॥ ॥ सवैया इकतीसा॥ दृष्टभाव पापहेतु सृष्ठभाव पुण्यहेतु याते दोउ कर्ममाहि हेतुमेद मानीये, पाप उदै हे असाना पुण्य उदे होय साता यावे क्षार मिष्टरूप स्वादभेद टानीये पापतो कुगति देय पुण्य सदगति देय गतिमेद परत फलमेद जानिये, पापनो लगे अनिष्ट पुण्य सपहीको इष्ट संकिलेस सोधिन सुभानुमेद आनीये ॥४॥ ॥ अथ गुरु उत्तर कथन ॥ ॥ मया एकतीसा॥ गुरु कहे पाप पुण्य दोन कर्म जालम्प हेतु रस गतिफल भेद नादि सेसीये कंपगेग पापभोग पुण्यहे अकररोग दोवं एम्दस्तानि विनासिकरूप देखीये; पापमो अरुचिमाव पुण्य- सेती प्रतिमा मिपाट नव ५ कुमति विशेषाये, दो बहमारम्प दो समानरूप नहींसो पागे सोइ समलिती देखीये ॥८॥ कमिश्यामनि परगन॥ मर्षया नीमा । पासमु विमा अझ सम्पदिने, मनमम मृगनिम मदिरा द्रव्यप्रकाश. ५२५ कुगतिसं डोहै, करताने कारलको कीनोमें कारज एसो अहंबुद्धि मातो विपरीति धरेहै: आपको न पहिचाने टाने भमभाव भन तन धन निजगुन कर्मको करेह, कपटको आसन अज्ञानको विकासन हे ऐसो निध्यामति भवसागरमे परे ॥८६॥ ॥ पुनः मिथ्यामति कथन ।। ॥ सर्वया इकनीसा॥ आपको न जाने चित परहिको माने वित टाने प्रम- भाव रत करम कहरने, वित्तमाही घरे बांक सुखहीकी कक्ष राखे डोलतनिसांकरां कूमत्तज्यूं सहरने; हानि धान मल- खानि जान न गिलानि आनि राचे तामे अतिविष वेदज्यु जहरमे, उलट अस्त नित लोटन कबूतरल्यु सुलस्त नाहिकर मिथ्याकी सहरमे ॥ ७॥ ॥ पुनः मिथ्यादृष्टि कथन ।। ॥ सर्वया इकतीसा ।। करगत जीवनज्यो जीवन पस्त नीत विन छीन छीन तन मन भी बदतु हे, कालकी न वात जाने करे बहुकाट तात तात मात भात संग सातई व हे धरम भरम दिनु भरमके घर परयो ज्ञान लिन निवारत पुन्यको रस्तुहे, इतनेमी मुख पुरुष निज रूस नाहि सुख मुखभयो नित दुःखने अन्तुहे ॥८॥ ॥ पुनः मियामनि कपन । ॥ सईया तेवीसा॥ ग्रंथ पडे न बड़े कछ ज्ञान, अज्ञानमे लानन्यु पाथरसे, ५२६ द्रव्यप्रकाश. मौन रहे ग्रहे जोग जुगतिसहि बंधनहे सरसे; आसन मंडि आशा सब छडि पवनके साधकहे हरसे, इति करतुति करे वितु ज्ञान जे मूदमिथ्यातमति नरसे. ॥ ८९॥ ॥मिथ्यामति कथन ॥ ॥ दोहा॥ मिय्या मति अपराधीनी, परगुन चाहे आप; ज्यु ज्युं परसंपति बढे, त्युं त्यु होय संताप. ॥ ९ ॥ ॥ परयस्तु हेय आत्मा उपादेय ॥ । मवैया इकतीसा ॥ वचन जुगति चित्त तनति मनथिति हित अनहित रति अरतिकी रति है, अंबेउर पुरचर असन यसन बनरस्त गन अनजहा नयनकी गतिदे, पुण्य पाप आदि देय गेय घेय हेप सब संयोग वियोग थिति जामे नित्य प्रतिह, अक्षर त्रिगुन साथ देवचंद गुननाय उपादेयरूप एक आतमा अमितहै।।९१ ॥ पुण्य पाप हेय कयन ॥ ।। मया मतीमा ।। पुण्य पार पट मन्टहे अगिट दल खलगुलवल मान पनि भेद घरेहे, पाते पुन्य पाप गेव कीने निज घोष सोधि याकी समाधि ग गेप (दो) जरदः इंधन अभाव जैसे अगनि उदोत नांदि मानके अभाव मे नादि टोहे, तेसे भार कम नाम माननना प्राम परम अनंत देवपंद

द्रव्यप्रकाश
५२७
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।। आतमशिक्षा कथन ।।
। सर्वया नेवीण।
करम उपाधि अनादिके बंधन भीति लगी तुंम्ह वापरसी,
रागरूं रोसको रंग लग्यो जीउ नीलो रंगन्यं कापरसो; पारकी
संपत्ति आपनी थापि के थापन दाबनको तरसौ, भयो तुम
ब्रह्मकरमके कारक मूरख रास लगे परसौ. ॥ ९३ ।।
। पंधविधि कधन ।।
॥ दोहा॥
बंधे अपनी लालसा, कुलीया वरतीरपंच
त्युं असुद्ध निज भावसो, बंधे आतम खंत्र. ।। ९४ ॥
॥मिथ्यामनि गुरु-उत्तर कथन ।।
॥ सबैया इकतीसा ॥
ईश्वरकी रत इन आतमा कहत नित ज्ञान रित मत रत
मदमत वारेहे, ईश्वरकी इछा करि नर फिरे बहुपरि नरग सरग
तिरजग योनि धारे है। एते परि जैन कहे आतमा अक्रिय
संत अरूपी दिगादिवत् अलिपत सारे है, कुगति मुगति याते
आनि कोउ नाहि देत निजकृत कर्मफल भोगत विचारेहै ॥९५॥
॥ अज्ञानमहिमा कथन ॥
॥ दोहा॥
मैं अज्ञान वीरजसो. त्रिविध कर्मको आधः
करता भोगमा ताहिको. मात्र धानु मन माथ. ॥९६॥

५२८
द्रव्यप्रकाश
॥ आत्माएक निया कथन ।।
॥ सवैया इकतीसा॥
एक एक कारजके करतार हे अनेक एक एक करताके
कारीज अनेक है, ऐसे कहे जीव करतार होप परहीको पर
करतार चिदानंदकोमी एकहे, एक करतार एक कारजको तह-
कोक स्यादवाद मतमांहि इहै थिर टेकहे ॥ ९७ ॥
॥दोहा॥
चेतन दुरगतिमे परे, पुरवकृत संबंध
ज्युं विटामृत कूपमें, परे मत्त जन अंधः ॥ ९८ ॥
॥ पूर्वज्ञानयल वर्णन ॥
॥ सवैया इकतीसा ॥
आतमाको ज्ञान ध्यान मुक्तिको है निदान आत्मज्ञान
विनुं शिव कबहु न जानीये, दान दया तप जप उपसम यम
दम ज्ञान वितुं एति क्रिया तुछ फल मानिये; याते दोनुं व्याप्ति
जानि आतमा एकंत आनि मन तन वा निरोधी सिद्धसोपी
आनिये, यह निरवान थान यह हे केवलज्ञान आनकर कुति-
वानि दोपमे वखानीये. ॥ ९९ ॥
॥ अथ आत्ममहिमा ।
॥ मया इकतीमा ।
धरम अवरम द्रव्य एक असंख्यातदेश उपचार काल नम
अनंत प्रदेश है, जीवहे अनंत नाते पुद्गरहे अनंत व्य
यो अनंत गुणको प्रवेशहः गुण गृणमे अनन परजाय
परिणति ज्ञाता मय भावशे परम गेय देश है. अनादि अनंत निर
दद महानदकट महोदयी प्रमो मेगे 'नमा इमेम है ॥१०॥

॥ परमात्मनदिना स्थन । सपा इस्तीमा नाननेके निरल नहपोगने संकल्प तने हे नित्य निसर्गा नाररहे. ज्ञानावर दिवस काही लो तीन देतना र निज रुपमै निर्हः सुमन यह साड़ी दुमादक नई निज निल पसी न ट प है. परन असंह मोति निन्दन हे अमित देश तत्व हिनी है ॥ १०१॥ ॥ आत्मा अनेकाप कथन ॥ माया रस्तीमा" निद हर निर हरिए अनेक है मनमन- भवन के न उसने है, नाम है पल विकृत जम्मी अगद दिन धन है. होकने कीन कर ऐ पर बना हान भन्दा देवनंद प.हे ॥१०२ ॥ न निज र भोईर सिदर हर नीमनाली मनान :

द्रव्यपकाना. जेति तेति फल वीवें वीनू काजकी कहांनि है; दान दया तप जपदम उपसम भाव तजैगे कठीन वात जेते जग मानी हे, रहेगे प्रमादरत निरपंच अंघ से ज्ञान मन बंधके अबंध मति ठानी हे ।। १०४ ।। ॥ अथ गुरुउत्तर वचन ॥ । सर्वया इकतीसा ।। जैसे विषवेद नर विपको विकार जाने कारे तारे. उप- चार विष अपहर है, सोइ आप विष भखे तोमि कछु नाहि टखे मूछा न पावे सो नौ लोक विष हरे है। जैसे नाग भंवधर नागसे गहावे अंग आपनिःसंग रहे नागहीसो लरेहैं, तेसे ज्ञानपूर्व कर्म जोग भोग भोगवे पै रहे अलिपत ताते पंच नाही घरे है॥१०५॥ । पुनःगुम्वचन ॥ ॥ सर्वया इकतीसा॥ जैसे कही दावानल जले अनिही चपल झाले पुर वन जामे गिरिकूट जरे है, तब कोउ मंत्रवादी मंत्रकी सकतीसेती, अमिशक्ति बंब राखे तब ताप टल है। सोतो मंत्रयर वर तामे कुंदकंदपरे फीरेधीरे इतन तोभी नाही बल है, तेसे ज्ञाता थोषशक्ति बंधशक्ति रोकिनी भोगवेपे भोग तोभी कर्ममे न लिडे है.॥१०६ ॥ शिष्य प्रश्न । माया इफनीमा शिप हे यानी नुम कही पनि बान माचि तोमि हम...

२ मनमाह संदेहतो खो है, जैसे भोगरीत समातिनी मोगले हे तोनी तुंन बनने संबंध रीत है है जैसे कोउ नत्तनर नहो आति नाहि ति साही बाही है गंध नाही गहे है, रे ज्ञाता र भोग्ने राग विभिनव कशे तो नाहि रहे है.॥ १०॥ | जिनमत कयन ॥ ॥दोहा॥ सर्व भाव निज स्पन्न, यह लिनार पानि तो कता करे, या किस खनि. ॥१०॥ ।। मृहमति कयन ।। {? बोजाई॥ स्वभाव निजना निहारे, परकरजको कोय न पारे रेमा अहंजी राम्यो सता रहे पगुन्द मान्यो. ॥१०॥ ।। हेयांराय कथन ॥ सया नदीमा बरमके नाम परचो ह वेतन एतन मन नीति बनार, ज्ञानरी र तुनि को देहकी पतिजनीतिउतारे तर निकाले हरेक निर्मः भार स्वार धार, ज्ञान निकन सस्को जनजमाति मुनि जननिहाटे ११० । आन्नकर्मक्षय कथन ।। नईचा किनांना द्रव्यप्रकाश. तापे प्रोति टारीके, अखंड अनंत ज्ञानवंत निज आतमा चित्त थीर आंनी जीव औरकुं विसारिक ज्ञान जोर कर्मशोरी, भोरी माया डोरी तोरी मोरीके मनोरी निज ज्ञानकु पसारिके, भानिको विकार आनी पायो निरवान थान जाको महिमान असमान सम धारिके. ॥ १११ ॥ ॥ आतमासिद्धसम कथन । ॥दोहा॥ अष्ट कर्म वन दाहिके, भये सिद्ध जिनचंद, ता सम जो आपा लखे, ताको वंदे चंद. ॥ ११२॥ ॥ मोक्षपरंपरा कथन ॥ ॥ सर्वया इकर्तासा॥ प्रथम ग्रंथि मेदीकरी उपसम भाव धरि क्षायक अंकुर भयो मिथ्या डर गयो हैं, उनेकी ने है कपाय ज्ञान गुन दोनु पाय बन्यो गुनयान ध्यान श्रेणियान आयो है। सूक्ष्मसंपराय- चीन छीन मोह लयीन छीन कीन कर्मतीन केवलको पायो है, ज्ञानादि त्रिगुन राय देवचंद पद पाय ध्यान ध्याता ध्येय- भेद मूरते गवायो हैं. ॥ ११३ ।। ॥ पुनामोक्षपरंपरा कपन ॥ ॥ मया इकत्तीसा॥ मुमक्रिय छिन्नरिय व्यानक्रिय ज्ञान पीय लिय निखान पद आपनीजो आधि है, अष्ट कट नष्टभये इष्ट अष्ट गुन गई बई महानंदको अनादिको जे माय है। जामे लोकरीति नाहि हार जाति मीति नाहि मीत प्रांत नीन नांहि जानको समाय द्रव्यप्रकाश.. ५३३ है, अजोगी अभोगी योगी अवेदि अछेदवेदी अलेसी अभेदी यसो देवचंदनाथ हे. ॥ ११४ ।। ॥ आत्मशुन्हना कथन ॥ ॥ संवैया इकतीसा ॥ पीछे कर्मके प्रपंच रंच न अरुचि संच वंचक सभाव पंच सुद्धरूप भयो हैं, परभाव सागरमें प्रमजके वेगवेग बुडो चिर- कालको सभाव सोउ तरयोहे; दीप्त करके प्रकरता करी दलित तम अष्ट करम मल दलि अठ गुन वरयो हैं, ऐसो जो परम जोति सदा काल जयवंत तमतम खंडवैकुं रविसम धरयो हैं. ॥ ११५॥ ॥ आत्मगुण वरणन ॥ ॥ सर्वया इकतीसा ॥ करतार भोगतार एसे जे विकार भार अपहार करि वर थिरभाव लयो हे, गुन घन घाती च्यार ताको बंध तोरिडारि अमंद आनंद कंद मोदबुंद वरयो है; शुद्ध सांत है अनंत अहत्तविचित्त वृत्ति परज्योति सत्य नित्य सत्यरूप रह्यो हैं, सब ज्ञेयमे ज्ञेय करि हेय हरि शुद्ध बुझ ब्रह्म मेरो सदाकाल कहो हैं. ।। ११६॥ ॥ आतमरूप ॥ ॥ सर्वया तेवीसा ॥ मुक्तिको माग मुवाग विरागको दर्शन ज्ञान चरित्र यी है, तन्मय आतम आतमवेदिके मोह उछेदन रीति लयी है। आतमज्ञान कलाकलिंबै जसृनिर्मल संबर बुद्धि भयी है, सोनरको कछ कर्म करे सोतो पर्वकर्म उद्धीकमयी हैं.॥११७|| .

द्रव्यप्रकाश ------- -- ॥ अशुद्धजीव कथन पहिरात्मीकि निंदा ॥ ।। सवैया देवीमा ॥ ग्रंय भने सब सासनके अमिमान धरै विचरे जगजेते, आपकी पंडित मुख्य कहापकर नित्य वाद विवाद अचेते; आतम बुद्धि तजे न शरीरसौं क्या पटिके गुनके समजेते, पाउ पन्यो गुन कारननां कछु रामहिराम जपत ज्यु तोते. १२५॥ ॥ जिनधर्मप्राप्ति कथन ॥ ॥ सर्वया तेवीमा । में बहुकाल अज्ञानकी चालमे आपके रूपको भाव मुलानो, सो निजरूप लह्यो सुलहो अप में सबमै भवसौसु लजानो चेतनवंत सदा अतिउज्जल संत अनंतसुज्ञानी मिलानो, ज्ञानको बीज अखीज निरंजन मज्जन श्रीजिनधर्म पीछानो.१२६ ॥ आत्मपाठ स्तुति कथन ।। ।। सबैया तेवीसा॥ आतममुं मथि आतमज्ञानको भानु उद्योत ज्यु जोति बठे हैं, पासको काठघटात ज्यु आपमे आपसु ज्युं दबदाबकठे हैं। याहिते आतम मग्नमती विरति सुत्रति शिवमाग चढेहैं, आत्मज्ञान विना सग्नान न साधकआनमपाठ पढे है. ॥१२७ ॥ चोपाई॥ जेसे रजु सरप प्रम माने, त्यु अजान मिय्यामति ठाने देहबुद्धिको आत्म विचारे. याते भव भ्रमहेतु पसारे. ॥१२॥ .

न्यप्रकाश.
॥ अज्ञानविलास कथन ।।
॥ सवैया तेवीसा॥
मे बह देर अज्ञानके फेरमें औरकीओरति हेरनवायो,
वच्यो भवलोह विमोहकी निदमे ज्ञायक दृष्टिको तेज दवायो
आतम दुमि भइ परपै डरपै अस्पै निज नित कहायो,
चंद कहे गुणवंद देह विनूं काट अनंत मर्मत गमायो.॥१२९।।
॥ज्ञानजागृतदगा।
॥ सर्वया इकनीसा ।।
पाहीके पीछान्यो अतिअतिसे चेतनसत्ति जागे जाने तिन-
टोक अलोक समाने है, याहिके सरूप जान्यो जाने खट भाव
सब एवं खट भाषके पिठानकु कहाने है। अतिहानि सतिमति
शासके विवित्तताइ जाके जानपने दिदं श्रमरूप टानेहे, जैसे
कन वितुं तुस खंडनहे निकारन तसे ज्ञान विनुं सब काज
निफटाने है. ॥ १३० ॥
॥ पुनः ॥
जाके अनुभवसेती भागे भवर्भात निज परतीत सो अनित
तित २ जागी है, जैसे भानके ज्योत सब जग ज्योति होत
भासे पट पट भाव अंधकार भागे है। तैसे जाके वेज जागे
राग द्वेष यी भागे लागे न करम नव शिव जाके आगे है,
परम आनंदकंद देवचंद सुखकर घरमी व्रती मुनीस जाके
पान सागे है.
॥दोहा॥
आतम आतमध्यान गत, न भने और उपाय,
जैसे पाक काट दिन, सहजे उपनाम पाय ॥१३१॥

द्रव्यप्रकाश ॥ पुनः आत्मान कथन ॥ ॥छप्पय ॥ परम सुखी श्रीयान नाहि को दुजो याते, निरमय पद ए मुख्य और सब जनकी बाते, यहे संतरस जान मोष मारगमी एही, कमवृक्षके छेदय है फरसीज अवेही, इह ज्ञान- यान भगवान वर ज्ञानादिक गुन प्रय है, यह भजो रमो जानो इहे समां इह दुरगम इहे. ॥ १३२ ।। ॥ अथ चेतनान कयन ।। । सबैया तेवीसा ॥ ज्ञान अज्ञानके देतु भए तुम आपतही भमते भवमाही, कारक बुद्धि भई परसो नासो चित्तमें सुख संपती पाही; आप जानीके ध्यानमे आनिके सुद्र मुनि निवानको जाही, आपको यापक आपदी चेतन घेतनता गुनज्ञानको चाही॥१३३ भोग संजोग भोगके गेह ते नेह तेपाभव ते विरचे जे, भावही आतम आतमने वर आनमज्ञान कला अरचे जे मोदी जेटशे टेटके ते ना या भपके सुग्व नां परपेठे, सम्यक व्यानहियो निज आनिके कर्मो भमं सही खग्चेते.१३४ रोग दिना जन तिक्त, क्रमाय ज्यु ओषधम्य चित प्रीति उतारे, आतुरता बिन पातु ने ना देदकी मार कर दिनमारे, दान मोह विना दिन मात्र गतन पतनगृख ममारे, मोग भयोगको जोगका नटी मा महाधिन मानोधारे.१३५ ॥ पुनः नंगनगुन कान ॥ "मांपासीमा अंता का टोनी की म मा प्रकारे, गम मात्र rrrrr माम "

द्रव्यप्रकाश
मोहकी निंदमें धूमित चेतन देखत स्वमा भवादि उलास,
आपने आप समाय रहे व शुद्ध निरंजन भाव अभ्यास. ॥१३६॥
॥ ज्ञानविलास कथन ॥
॥ सर्वया तेवीसा॥
ज्ञान विलास अभ्यास कीया वितुं कर्मको भर्म सदीड वधार,
इंद्रीय पंच प्रपंच करै चित या रस प्यार अपार संभारे,
फीरें भवमैं नव वेस करै नित भावीत कर्म उपाधि ले लौरे,
सोनिज थान बसे जब देव ए हर्ष प्रकर्षकि नैन बचारे. ॥१३॥
॥ पुनः परमात्म वरणन ॥
॥ सवैया इकतीसा ॥
ज्यासी ज्ञानज्योतिहीं, फुरत परम रस सरस यरस विनु
जामे रस एनहे, टोकालोक लोकनकुं अमल विमल तेज
योगादिक क्रिया विनं ज्याकी आराधन है। मूलसे दलित
अतिमोह गलके पटल अखिल विज्ञानवंत संत गुन घन है,
एसौ देवचंद इदं निगुण आनंदकंद ताहीसौ प्रतिति प्रीति वीर
मेरे मन है ॥१३८ ॥
॥ सम्यक्आत्मवर्णनं ॥
॥ सर्वया इकतीसा॥
जाके उर अंतरमें राग दोष मोह नांहि आपमे समाय
हैं आपही अनंत है, और व्यसु न प्यार समें सार ध्यान
धार घरीके संभार सार संत रस संत है। टंक सौ उकेरथो जैसो
रतन अभंग जोति तेसो परब्रह्म निज ज्ञानसो महंत है,
निखंद है अवंय चेतनाको संघ संत अमलान ज्ञानगुन सन-
मंधर्वत हैं ॥ १९॥

५४० द्रव्यप्रकाश. ॥ आत्माअयंध कथन ॥ ॥ दोहा॥ जे थीर आतम ध्यानमे, आतम ज्ञानविलीन; जे निजगुन थिरता लहै, गहे न कर्म नवीन.॥१४०॥ नव नव भव तरु छेदको, यह शीत शास्त्र उदास ध्यान पवित्र मुनिसको, रहै ध्येय गुन धार. ॥१४॥ दुरगम पद पथ अगम ए, लहि ऐसो निज योग, पृथा बाह्य करनी करे, दंडे तीनो योग. ॥१४॥ ॥ करनी सरूप कथन ॥ ॥ दोहा ॥ करनी निज गुनक तरनी, घरनी दोष अथांहिः दुखम या भवसमुदकी, तरनी वरनी नाही. ॥१४॥ ॥ सवैया तेवीसा॥ या करनी वरनी परनितमे मोह महीपतिकी तरनी है, या करना पनी तलको फारनी करनी परनी सरना है। या करनी हरनी गुनकी अरनीटर संवरकी टरनी है।' या करनी करे निच सभावको कोह महादवकी अरनी है.॥१४४ ॥दोहा॥ करनी करता करमकी, इनमे घेतन दीन; जय घेतन समता मिले, तो लहे मुखपीन. ॥१४५।। ॥ परमात्मास्तुनि ॥ ॥ सवैया रफनामा ! परम निधान हैकि निग्वान थान हकि असमान ज्ञानवान द्रव्यप्रकाश ५४३ - सदा अमलान है, संघ निरय निबंध कर्म हीन पीन छीन- मसकीनभाव भावतो जीन है। चितने चेतन खान दरसन भातमान अनुभव ज्ञान जान जनगुन हीन है, अक्षर त्रिगुण इंद देववंद नहानंद परम अमृत संतपद ल्प लीनहे.॥१४६॥ ॥ कुंडलीयो॥ ऐसो चेतन नमबर, समता नारि वियोग, चित्त पिरता न रहे की, पावहि बहुविधि सोग, पावहि बहुविधि सोग जन्म मरमनिरुद, अति भव भवामण भमंत, जह रज विरह चित, क्षणभंगुर गुन हीन हो आम काण तन, निज प्रिय दिनु ह भ मार एसो चेतन ॥ १४७ ॥ ॥ आत्म समता वियोग ।। ।। सर्वया तासा॥ मित्त विनिमें दीन भणे अति मोचीन साधितान रहे है, यह जगने दीन राति निता अंताडे दिग्ता न गहे है। जातम भीतर नख दिपोगन दुख पायो मुरद जचहे हैं, सोहलतोनिज मानके आगो बन्द पा. नवहे है.१४- ॥ पुनः आन्मा. विशुदगन फपन ॥ अदिता पिता सम्नी से कोई ले, दिन मातिर मी किन ननदीक हो को ऐना नोकिन नहो, देश नि.१४॥

द्रव्यप्रकाश ॥ प्रेगनमा समताप्रीति कथन ॥ ॥दोहा॥ घेतन घेतुनता सहित, परम धरम गुनथान; पाचे घर निरसान पर, समता प्रीति निधान. ॥१५॥ ॥ अथ कयि निज मुनाइ कपन ॥ ॥ सबैया तेवीमा ॥ मे जिन भागमते जो उलंपिके जो कछु यात विरुद्ध वखानी, सो तुम सोधिक मानह पंडित पंडित जाहीकी मोह नीसांनी गहो गुनमा गनिके तुम राजन शास्त्रको अर्थगु तत्व पीयानी, घोधिए बोषक ग्रंथ गदो युघटारिके संपति पद विरानी. १५१ ॥अथ पूर्य कविगरके गुन । । सांया इफलीमा पाटक गुपाटदीके नियाग्न आटहीके हंसराज राजपति नामे हमगनहे, ताके कीनेदेगलम शत अडवीस न्युत शान- होके जान अन्दमनके गम है तापके पीठान जान ताहिको निवान मान दिपर अमल सव ग्रंथ लिए नाम, आप पर बेद का पामार मा मुर पग्धान घर नाताके कान है. ॥ १५२ ॥ दा दित धमनपा, संगम पोमाग, निशानिने शो दय अायाग. ॥१५३।। । प्राकामा पुरा नाम कयन । Aartim . महान द्रव्यप्रसादा. ज्ञान वान सब कहै हैं, जिनवर धर्मपरि जाकी परतीति थिर और मत वात चितमाहि नाहि गहे है। जिनदत्तसुरीवर कडी जो क्रियाप्रवर खरतर खरतर सुद्ध रीति वहै है। पुण्यके प्रधान ध्यान सागर सुमतिहीके साधुरंग साधुरंग राजसारलहे है॥१५४॥ ।।दोहा ।। सब पाठक सिरसेहरो, राजसार गुनवान; विचरे आरीजदेशमै, भवि जन छत्र समान. ॥१५५।। ॥ सर्वया इकतीसा ॥ ताके शीश है विनीत परमीतसौ बितीत साधरीत नीत धारी गुन अमिराम है, आत्मज्ञान धर्मवर वाचक सिंतबर अतिउपसंत चित्त ज्ञान धर्मनाम है: ताके सिम्य राजहंस राजहंस मानसर सुप्रवान उद्यमादि गुन गन धाम हे, अंतेवासी देवचंद कीनो ए गरंथ वर अपनो चेतन राम खेलिबैकुं टाम है ॥ १५६॥ ॥दोहा॥ कीनो यहां सहाय अति, दुर्गवास शुभचित्त; समजावन निज मित्तका, कीनों ग्रंथ पवित्त. ॥१५॥ ॥ अथ शास्त्रक श्रोता तिनके नाम ।। ॥ सबैया इकतीसा ।। आतम सभाव मिड मल्लको पहारी दिटो भेरुदास भेउझास मुलबंद जान हैं, ज्ञानडेख राजवर पाग्म स्वभाव घर सोमजीव तवपरि जाकी सरधान है: जानादि त्रिगुनमंत अपातम ध्यानमंत मुदतांन घांन वास आवक सुजान है, ताकी धर्म - ५४४ ट्रन्यप्रकाश emen- मीति मन आनिकै गरंथ कीनो गुनपरजाय घर जामे द्रव्य- ज्ञान है ॥ १५८ ॥ ॥दोहा॥ अध्यातमसेली सरस, जे मानत सौ जैन, ते वाचेंगें ग्रंथ यह, ज्ञानामृत रस लेन. ॥ १५९ ।। गुन लच्छन पहिचानिके, हेयवस्तु करि हेय; चिदानंद वितमय अगम, शुद्ध बम आदेय. ॥१६०॥ परमात्म नप गुद्ध धरि, शिवमारग एहीज; यह मोहमें नव भमें, यह ग्रंथकी वीज. ॥१६॥ ॥ मंवत् कथन ॥ ॥दोहा॥ विक्रम संवतमान पह, भप लेश्याफे भेद मुद्र संयम अनुमोदिक, करि आश्रयको छेद(१७६१)॥१२॥ ता दिन या पोयी रवी, वन्पों अधिक संतोष मुम वासर परन थई, प्रथम जिनेसर मोप. ॥१६॥ ॥ अथ ग्रंथ महिमा ॥ ॥ मांया इफतीमा ॥ गुनकी नियान हेकि मानो निग्यान है कि साची जिन. पान यामे अधिक उदार है, मानी मद भंजन है मिप्या मति. मिंजन है ज्ञानहाट अंजन लिटाका गुस्सारहे; रामको रमन कि दमन हेफि पाकोवमन है अपार पारावार है, संतको सा कि दि म्याटपाट यामे औरको विपादनादि शानि न्यप्रकाः , ॥ दोहा ।। स्पाइवाइयत द्रव्य पर, जहां खाने ठीक नाने वन्य प्रकासपी, ज्ञानय तहकीक. ।। १६५ ।। ॥ पुनः ग्रंथमदिमा ॥ ॥सवैया इस्तीसा ।। पास प्रतीत नाहि पुण्य पाप मीति नाहि रागदोष रिति नाहि आतम विलास है, सायकको सिद्धि है कि जो कु बुद्धि है की राजबंकी रिद्धिज्ञान भानको विकास है: सजन महाप दुज चंद ज्युं चदार है कि उपसमभाव पाम अधिक व्यास है, अन्पमतसौं अवंद वंदनहें देवचंद ऐसे जैन आग- ममें इम्पको अकादा है ॥ १६६ ।। ॥दोहा।। ज्ञान स्पान मुस्थान पह, यह मुगतिरो पंथः जीवद्वार नभव है (नव यह है) पुग्न भने गाय ॥१६॥ ॥ इति श्री देवचंद्रमुनि दिन्ति द्रव्यमकामा(प्रज)भापाग्रंधे तृतीयं जीवहारं नमातम ।।

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५४८ दे० घो० वा. -- -- त्यागेन च तत्काले पद्य कति तदेकमायनिस्तया तत्प्रीत्यनु- शानं ज्ञेयमिति." जिहां आचरण करावालानु अति आदर सहित उद्यमर्नु अतिशयपणे होय, ते प्रीति जाणवी, वे प्रीतिना विलास विना चाले नहीं, माटे तेहना रुचि अमिटापी जीवें वीजां सर्व कार्य तीने हज कर. तया तिहांज एक निष्टा प्रतीति करवी, तेने मोनिअनुष्ठान जाणयु ॥ इति भावार्यः ।। ते प्रीति संसारी भावयी सर्व जीशेने छे, पण ते पल्टावीने गुणीयी करवी, ते कहे छे. ॥अथ प्रथम श्रीऋपभजिन स्तवन । । निद्रडी वेरण हुइ रही ॥ ए देशी ।। ऋषभ जिणंद' प्रीतडी, किम कीजें हो कहो चतुर विचार ॥ प्रभुजी जइ अलगा वश्या, तिहां किणे नवि हो कोई बचन उच्चार ॥१०॥९॥ अर्यः-श्रीनामिकुलघरनी भार्या, श्रीमरुदेवी स्वामिनीनी कुक्षिनेविषे उत्पन थईने जेणे अटार कोडा कोडी सागरोपम सुधी, निर्वाण मार्गन चिन्न हन ते निवार्य, एवा श्रीऋषभदेव प्रथम तीर्थकर, रागरंप गहततायी जिन कहिंय, तथा उप- कारमपदा, अने जानःगय यपदायकरि विगजमानतायी जिणद कहिय गायी प्रतिविनाम कवानो अयो भन्य जीव, मोक्षा- मिलपी विचार छ ने, नागगी ऋषभ पुरुषोत्तम साथ शीरी ने प्रीति की ? ए वीनगगया प्रीति, माहाग आत्माये पहेला

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५५० दे० चो० बा०३ पोंचे नहीं. तथा कागल नहीं पहोंचे तो कोई माणस मुकीय पण तिहां सिद्धावस्थाने विषे कोई प्रधान पण पहोंचे नहाँ के जेनी साथै विनति कहावियें. इहां कोई जीवने संशय उपजे - के रत्नत्रयी आराधीने अनेक जीव मोक्षं जाय छे, तो कोई न पहोंचे एम केम कहो छो? ते उपर कहे छे, जे तिहां: सिद्धावस्थाने विपे.जे पहोंचे ते तुम समो, तुम जेवो प्रभुता-::- मय, वीतराग, अयोगी, असंगी, सकलज्ञायक, पण वचनरहित एटले अर्थात् ते पण परमपूज्य ते कोइवें व्यवधान कहेतार आंतरो मेद कहे नहीं, माटे प्रीतिना त्रण उपाय मांहेलो कोई। उपाय दीसतो नयी, तेमाटे श्रीयुगादिदेव साईं प्रीति केमर करिय१॥ इति ॥२॥ प्रीति करे ते रागीया, जिनवरजी हो तुमें तो वीतराग ॥ प्रोतडी जेह अरागीथी, भेलवी ते हो लोकोत्तर माग ॥ १० ॥ अर्थ:-हवे वळी कहे छ के संसारी जीव मुझ सरीखा तया सम्यग्दृष्टि प्रमुख-पण जे श्रीसर्वज्ञ त्रैलोकीतिलकपी प्रीति करवा चाहे तो रागी राग सहित छे, अने हे जिनपरजी! हमें तो वीतराग छो, रागरहिन छो, गाने अनेक रीने रीझ. वी, पण जे पोनें रागी नहीं, ते केम रीझ पामे ? इहां कोई जीव कहे जे तेवांग वीनगगी प्रीति न करवी ? तिहां कले. जे अगी गग हित नहया ने पनि मलावी, तेनो लोकोत्तर मार्ग के. पटले राम जान गायी गी । 14 -

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'दे चो० 'बा० अरिहंत उपर राग करखो, ते निर्विष करतो, मां विषयामि-, लाषपणुं नहीं, वर्णादिकनी रीझ नहीं, तथा इहलोक, परलोक इंद्रियमुखामिलाप नहीं, प्रभुना ज्ञानादिक गुण छ ति मने आपे, एवी अमिलाषा नहीं. एक अरूपी, अज, अविनाशी, अकृत्रिम, शुद्धज्ञानादिक गुण सकल व्यक्त थया, स्वरूपभोगी स्वरूपरमणी, स्वरूपाश्रित, एवा गुणनो राग, एकलो गुण प्रकट करवा वास्ते करतो ते राग, निर्विप जाणवो, वे निर्विष प्रीति करवानी मुझमां तो शक्ति नयी, ते माटे हवे ए बनाव केम बने । हे उपकारी पुरुषो ! ते तमे कहो ॥ इति चतुर्थगायार्थः।।४।। प्रीति अनंती परथकी, जे तोडे हो ते जोडे एह ॥ परम पुरुपथी रागता, एकत्वता हो दाखी गुण गेह ॥२०॥५॥ अर्थ:-हवे चतुर पुरुष, उपाय कहे छे, प्रीति कहेतां राग अनंतो परथकी एटले पुद्गलभावयी अथवा शरीरी जीषयी छे, ते सर्व जे जीव तोडे कहेतां टाले, ते जीव ए गुणी अरिहंतादिकयी प्रीति जोडे, एटले सर्व परभावयी राग तजे, ते गुणीराग करी शके. विहां कोई पूछशे जे गुणी अरि- हतादिकयी गुणे मले, पण राग नो पापस्थानक छे, शामाटे करिये १ विहां कहे छे , परम पुरुष, वीतरागयी रागता कहेता रागीपयं ते पण गुणर्नु घर कथु छे, अने श्रीअरिहंता- दिकी पूणे एकवल्याने मल, ते पण गुण, गेह कई छे, तेमाटे प्रथम श्रीअरिहंत उपर गग कम्बो, तेहीज पीनगगन ताकारणछे ॥ इति पंचमगाचार्य , ५ ॥ .

प्रथम श्रीऋषभजिन स्तन. प्रभुजीने अवलंवतां, निज प्रभुता हो प्रगटे गुणरास ॥ देवचंद्रनो सेवना, आपे मुज हो अविचल सुखवास ॥रु०॥६॥ अर्थ:--ए रीतें प्रभुजीने अवलंबतां कहेतां आत्रपतां पोनानी प्रभुता अनंतगुणपर्यायरूप प्रगटे, निराकरण घाए, गुणनो राशि समृह, सर्व व्यक्त घाय, तेमाडे देव जे चार निकायना देवना अपना नरदेवादिकमांहे चंद्रमा समान श्रीअरिहंत देव, हनी सेवना भक्ति, इम्पयी तथा भावी कावी, ते आपे कहेतां दे, मुने अविचल मुख, अन्याय मुस, व्हनो वास कहेतां रहे, एटले भावार्य ए जे, श्रीपर- मामा, परमपुरुषोत्तम अरिहंतनी सेवना असंयम आस्रवत्याग, संपम संवरूपपरिणमन, ते सेवना कहिये । उक्तं च ॥ आ- पाकारी भत्तो, आगा डेईओ सो अभत्तोत्ति ॥ इति । तथा अरिहंत प्रभु पोतो पोतानी मेवनाना अर्ण नदी, पर्व जीबोने स्वहित बरखा वास्ते एहीज का हे, अने अरिहंत आज्ञा ते कोईनो टुकन मनाको नयी, पर श्रीमरिहत देखें केवट जाने दोहं. सई जीवोने पोतानां जान, दान, कारित, ते सामानंदतु हे. तेमाडे ले गर्ने जान. नर्गन, मा निधय जद. मन F5 पाने. का न म ... नि.

५५४ दे. चो० था का . पईने, एक परमोपकारी, तस्योपदेशी, धर्मनापक, श्रीअरिहंत देवनी सेवना करवी ॥६॥ इति श्रीरुपमजिनस्तवन समाप्तम् ।। ॥अथ द्वितीय श्रीअजितजिनस्तवनं । ॥दयो गति दयनी रे॥प देशी ।। ज्ञानादिक गुणसंपदा रे, अनंत अपार॥ ने सांभलता ऊपनी रे, रुचि तेणे पार उतार ।। अजित जिन नारजो रे, तारजो दीन दयाल ।। अजित जिन तारजो रे ॥ १ ॥ भयं-ने श्रीअजितनाथ मामीनी स्तवना करे छे., काम कामावनी माचनता देखाहे छ, जे कारण माझे, ते कापं नीपजे, ने कागणना ये मेद छे. एक निमित कारण पीठ सादान ऋाणा, पण अगदान कारनी कारणता निमित्त मन्या प्रगट ने निमिन कारगनी पुटलाय पाप, अने मोगर्नु निमित्त काणा, श्रीदतत्व, ने का कार्य निपमे से परिपाटी बात. मका याजिसाय गुणोपादि बिगेर वर्ग, यज्ञ माम्न, शिकाय, ते कलमान सपा कर मारपाक कल अने बल एणसे सन र अमर प्रत्यावर मल गुगनी सा, है प्रतीक बना AT प्रल, म, शेयी म., सवस्यता ग अन गुम हो पर माना ना. मी Te in fuTEM . . . - द्वितीय श्रीजजितजिन स्तरनं. ९५५ हे. तथा नास्तिपर्याय ते पग वस्तुनो स्वधर्म छे, श्री विशे- पावश्पकमांहे भूतज्ञानाधिकारें कयु हे. ।। एवं जते सति परः प्राह ।। जइ ते परपजापा. न तस अह तस न परपजाया ॥ जंतं मिय संकका, तो परपजाप ववएतो ॥१॥ इह स्वपर्यावाणानेव तत्वायता युक्ता दे बानी परपर्यापास्ते पदि पवादीन तर्हि नाक्षरस्य तधाक्षरस्य ते तर्हि न पहादीनां ताश्च पदि परस्प पर्या- पान्तर्हि तस्य कथं ? तस्य चेत्पन्त्य कथनिति विरोव स्नद- युक्तानिप्रापापरिज्ञानाद्यन्मान् कारणात् नम्मिनकारे काराद्यक्षरे वटादिपापाजस्तिवनासंबद्धास्ततन्तेषां परपर्यायव्यपदेशोज- न्यया च्यात्तेन रूपेण तेऽपि संवद्वाएवेत्यतस्वेषामपि व्याहत्त- रूपतया पारमार्थिकवपर्यायत्वं न वित्यो अलिवेन तु बटा- दिपाया पवादिष्वेव प्रतिवमा इत्यारपते पत्रमा व्यय- देश्यते इति भावः ॥ निवि हि वस्तुनः म्वरूपं, अस्तित्वं नास्तित्वं च ततो ये पत्रास्तित्वेन प्रतिवमा नम्प स्वाया उन्ने, पेतु पत्र नास्तिवन नबनाते तस्य पापयांचाः पति- पाचं ॥ इति निमित्तनेदस्पारन वपशन्दौ, नवेकेषां तत्र सर्वया संबंधनिराकरणपर. ।। बन्युनहाइनपि नया रझाय- मेरो निन्नं ॥ तं जेग जीवभावो, मिना इन उपद पापा ॥१॥ वस्तुस्वभा पति पथावयित वस्तुघल्पमाभियत- दपि देवलज्ञान अकागदावन बननो भिन्नत्र ।। ननु व्योत्तनान्यः ३.६ 5 ।। कृतः । इत्याह ।। रेन को न: F .. निनोनीव- पपायो न वादिन्नन्य, नारे लन-'३ः स्तुि नतो दे० चो० बा. मिन्ना इति ते ज्ञायमाना अपि वे कथं तस्य स्वपर्यायाभवेयुः ? सर्वसकरैकत्वादिमसंगातस्मादमूर्तत्वचेतनत्वसर्ववेतृत्वाप्रतिपावीच निरावरणत्वादयःकेवलज्ञानस्यस्वपर्यायाघटादिपर्यायास्तु व्यावृत्ति- माश्रित्य परपर्यायाः ॥ अन्ये तु व्याचक्षते ॥ सर्वव्यगतान सर्वानपि पर्यायान् केवलं ज्ञानं जानाति येन च स्वभावेनैकं पर्यायं जानाति न तेनैवापरमपि किंतु स्वभावमेदेनान्यथा सर्व द्रव्यपर्यायकत्वासंगस्तस्मात् सर्व झपपर्यायराशितुल्याःस्वभाव- भेदलक्षणकेवलज्ञानस्य स्वपर्यायाः सर्व द्रव्यपर्यायास्तु पर- पर्यायाः इत्येवं स्वपर्यायाः परपर्यायाश्चोभयेऽपि परस्पर तुल्याः केवलस्येति ॥ इत्यादि अधिकार सर्व माहाभा- ध्ययी जाणजो. ते अस्ति पर्याय वे जीवद्रव्पना सर्वथी अनंतगुणा छे, ते सर्व प्रभुजी तुमारा निरावरण थया, ते अनंतगुणमयी परमानंदसंपदा तमारी आगममांयी सांभलतां मु- झने पण ए रुवि उपनी, जे एहवी सिद्धता माहरे प्रगटे, एहयो अमिलाप उपनो तेथी कई छ के हे परमपुरुष ! मुझ अनाय दीन कर्मवशें भवभमताने भवसमुदयी पार उतार, सं. सारया पार उतारवानी विनति तुम विना यीजा कोण आगल कहुं ? जे भवपार पाम्पा ते आगल भवपार पामवानी विनति करूं ? ते भणी स्वामी! मुझने संसार निस्तार करो. ए वि- नति जे जीर, भवथी उद्विग्न मोक्षामिलापी थयो, ते आतुर थइने कहे छे के हे अजित जिन ! मुने तारजो, संसारयी पार उतारजो. तारजो हे प्रमुजी तुमे दीनदयाल छो. हे स्वामी। परमभावकरुणाना करणहार छो ॥ इति प्रथमगाथार्थ. ॥१॥ जे जे कारण जेहनुं रे, सामग्रीसंयोग ।। मलनां कारज नीपजे रे, करतातणे प्रयोग ॥१०॥२॥ ..

दिचीप भीजवितजिन स्तवनम्.
:
-हरे ने कपन जे कारन हे, ते कान तथा
कात्रीनो पेग मनन कार्य नीपजे.जेन पटरुप कार्य,
तेदन वंद, ऋ. वीवर, निनित करना है, तथा नतिजा
मटन नहे. अने बुनकर ना हे, जे कार अनेद
हनो देहो. वर्ग : अनेस कर्नापी नित, तेनो
दर्भ प. नितः एक घर है परन्तु हे. व्हनो का
भनित हे. अने स्विताल का मार्ग अ.
ति हे. के हने वा आम प. अन्त्रि हे.
हो म कमाने सहसत रूप सिद्धन,
है. हने दे रहंत देवाधिदेव नया मुन्न
दिर निनि कम अने मान्त्री निमा-
पइदिक मनमोहन कर नीरजे, महे महत
कान देना निन्तिक दीनान तु देगी
निने नहीं दे रहनदेवना निन
ने पर निरनि हई -
क...
नई दिन
पार लिनि कर्ना बसलहि कारण संयोग !!
निजामनुमल्याहार निमिनह भीग ।।

५५ अर्थ:--माटे कार्यसिद्धतानी निष्पत्ति ते कर्त्ताने हाय छ, जेम दंडरूप कारण तेने जो कर्चा घटरूप कार्य करवाने पर त्वे तो घटरूप कार्य करे, अने तेज दंड जो घटत्वंसने प्रवर्ताव तो घटवंस करे, ते माटे निमित्तनी प्रवृत्ति ते कर्ता, ने कार्य करवाने प्रवतवे ते कार्य करे, माटे कार्यनी सिद्धि ते कर्त्ताने हाथ छे, पण कारणनिमित्तादिक तेनो संयोग मल्यों कार्य निपजे, ए पद्धति छे. माटे कोई संसारी आत्मा निज कहेता पोतानुं आत्मिक पद परमानंद महोदयरूप वेहनो कारक कहेतां करवावंत तेने मोक्षना पुष्टकारण प्रमुजी श्री अरिहंत भल्यां थकां अवश्य निमत्तनो भोग चाय, एटले जे जीव से- सारथी उभग्यो मोक्षामिलापी थयो, ते मोशना निमित्त श्री तीर्थकर देव पामीने, हर्षनो भोग आस्वादन पामे घणो वि- लास उपजे कार्योयी कारणनी पुष्टता वांछे, ए नीति छे इति ॥३॥ अजकुलगत केसरी लहे रे, निजपद सिंह निहाल॥ तिम प्रभुभक्त भवि लहे रे, आतमशक्ति संभाल॥ अ०॥४॥ अर्थः- उपर दृष्टांन कहे छे. जेम कोई केसरी सिंह जन्मकालथी बकराना टोलामां वध्यो छे तो वे एम जाणे जे बकरानो टोटो तेज माहेरुं कुटुंब छे, स्यां किवारें बीजो सिंह आवे, वेवारें बकरा सर्व नासे, अने पोते पण नासे, एम करतां किवारे सिंहनो आकार देखीने पोता सामु जुए, त्यारे ते पोतानो समान आकार जोईने चियार जे पहनने मारुंनो सुल्पप दीसे छे, ने हूं पण मिह छ, पछी निर्भय थाय, 2 . .

द्विवीप श्रीअजितजिन स्तरनं. ५५९ ए रीते अज केतां बकरानां कुल केतां बोलामांहें गत केतां रह्यो जे सिंह, ते सिंहपर्ण मूली गयो, ते वीजा सिंहने दे- सीने पोतानू सिंहपणं संभारे, तिम केहतां ते रीतें प्रभुनी भक्ति करतां भन्यजीव लहे, कहेतां पाने. पोतानी आत्मश- तिनी संभाल कहेतां बोलताण पामे, ले वीतराग देव देखीने तेनी भक्ति करता तथा सेवतां धकां उपजे जे वस्तुस्वरूप- सत्तावमै हुँ पण वीतराग निःकर्मा शुद्धस्वरूपी ई, ए पण पहेलां संसारी जीवद्रव्य हता, पठी सिद्ध धया, तेम हुँ पण प्रघमयी संसारी इं, पण जो सायं, तो सिद्धरूप थाउं. ए सर्व ओलखाण, प्रभुसेवना करतां निपजे ॥ ४ ॥ इति चतुर्थ गाचार्यः॥ कारण पद कपिणे रे, करी आरोप अभेद ॥ निज पदअर्थी प्रभुथकी र, करे अनेक उमेद ।।अ०५॥ अर्थः-लेवा योई रहेश ले अरिहंत देव तो अन्य जीवना मोजकी नयी ने रिहतदेव पामे मोल मागो छो? तेने उत्तर कहे के. के कारणपद ने अरिहतादिक ते अति- पुष्टाटंबन हे, माटे जे कारण तेनेज अनेकत्तीपणे आरोप करीने निज कहेतां पोतार्नु पद ने शुभ सिता. हनो अर्थी जे भन्य जीव से प्रभु श्रीतीर्थकर देवयी अनेक म- म्यक्त्वादिक गुणनी उमेद कहेना आमा करे. जे हे प्रभुजी! मुख्ने मोक्षनां कारण नया मोक्ष में आयो. एक निमित्त कारणने कीपने आगेप करी स्तुति कर ॥ अहवा परमातम प्रभु रे, परमानद स्वरूप ॥ स्याद्वादतत्ता रती रे. अमल अग्बंड अनृप ॥१०॥ . २ दे० घो. या ---- अर्थ:--हवे जे निमित्त पामीने उपादान समरे, पलटण पामे, ते रीत कहे छे, अथवा प्रभु परमात्मा तेहा स्वरूप कहे छे. आत्मा प्रण मकारना छ, एक बहिरात्मा, यीजो. अंतरात्मा, पीजो परमात्मा. तिहां जे शरीरादिक औदायिकमाय- कमजनितने आत्मपणे गणे, ते बहिरात्मा कहिये, अने जे शरीरादिक औदायिकमावयी आत्मा असंख्यात प्रदेशी, चेतनाल.. क्षगज्ञानादि अनंतगुण पर्याय सहित अरुपी मिन्न एटले आत्मा अम्मी, शरीर रूपी, आरमा सहज अकृषिम, शरीर संयोगी कृषिम, तेमाटे कर्मयोगें शरीरादिमध्ये रह्यो, पण मिन छ, एडवो मेदज्ञानयंत, समकित गुणठाणायी मांडी क्षीणमोह गणटागाना भग्म समय पर्यंत अंतगरमा जाणवो, नया ज्ञा- नावणी, दर्शनावणी, मोहनी, अतगय, पचार कर्म क्षय गयां, फेवलज्ञानी ने मयोगी अने अपोगी केवली नया अP- कर्ममुक्त सिखामा, हे परमारमा जागयो, एटले श्रीअजितनाव अरिहंन एवंम्तन परमात्मा छे, प्रम छ, म सिर पस्नु- गते पोताना गुणपर्यायाप सपदाना प्रमु छे, कोई दम्प, अन्यदप्यतुं स्वामी होपज नही, ज्यां गुपी जे म्यना कि तनमांहे पण पादश्यनु स्वामिण छ, रयां शुषी ते द्रष्य पद नहा, टमाट श्रीअनिल अरिहन पोनाना सभाम्ना मम, भने उनम जीव पोताने कर्मवश पक्ष्या मोहें मुंग्या जागी, पोलान । समान गो, अने अमोदी पापीन पया सेने मन कर, अने अमोहनि अवरायां पाने यमाहाता धनी माप माटे अहना समायी पोनातुं प्रभा पामी, देने पर ही काय, मन्त्रमा स्ना योग मृग काय, तो मार , पो मन pm 12

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दे. चो. बा. - थर्नु स्वरूप छे, जीवादि पर द्रव्य छे, तेमध्ये पंचास्तिकाय ते परमा इन्य छे, तथा छटो काल ते उपचारद्रव्य छे. ए चर्चा, तत्वार्थ, विशेषावश्यक तथा धर्मसंयही मन्त्रेयी जोवी. वेमव्ये एक एक द्रव्यने विषे अनंता गुण, अनंता पर्याय छे, ते अनेकता जाणवी, अने एक द्रव्यने विषे एक समय स्था- नित्य स्यादनित्यं, स्यात् एकं, स्यात् अनेके, स्यान् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् मित्रं, स्पान् अभिनं, स्यात् वक्तव्यं, स्यात् अवक्तव्यं. ए सर्व स्वभाव, समकालें वर्तता पामी लीयें, एटला धर्म समकालें मांहें वरते, ते धर्मनी अनंत प्रवृत्तिने स्थाहाबाद कहिये ।। स्यात् इति पदं अनेकांतोयोतकं एहवी स्याद्वादमयी जे आत्मानी गुणपर्यायरूप सत्ता छे, वेना रसी कद्देनां रसीया छो, एटले स्पावादमयी आन्मसत्ता, देहना भोगी हो, तथा अमल कहेतां कर्ममल रहित डो, अखंड कहेतां किवारें खंड न पामो, अनुप कहेतां हनी उरमा नयी, ए- हवा प्रभु देखीने माहारे लाभ थयो ॥६॥ आरोपित सुख भ्रम टल्यो रे, भास्यो अव्यावाध ।। समस्योअभिलापीपणोरे, क साधन साध्य ।।अ०७ अर्थ:-एहवा ममुजी आत्मानंद भोगी, आत्मस्वरूप र- भी, नत्वविलासी, तुमनें जोइने माहरे अनादि कालतुं ई- द्विपमुखने विषे जे मुखनु भासन ते आरोपिनमुखमम हतो, ते टल्यो, अने अन्याय, आमिकआनंद सुख ते भाग्यं. जिहां मुषि विषय मुख उमर सुग्वद्धि हती, तिहां सृधि वि. पप मुग्दनो अमिलाप हतो. ते हो तो सर्व विषय रहित, अध्यायाध गुसी श्री प्रभुजी दीटा, नेयी ते भव्य जीवने पण

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५६४ दे० चो. बा० सारमा आठ कर्मरूप उपाधि उपादान कारण हतो, हवे पद स्वरूपी, निःकर्मा, तस्वदेव देखाने पोताना शुद्ध स्वरूप उपादान कारण थयो, एटला काल सुधि ए आत्मा आठ कर्म रूप कार्यनो कर्ता हतो, हवे परमदेवनी श्रझा पामीने संवर निर्जरा रूप कार्यनो कर्ता थयो; माटे हे परमेश्वर ! हे जग- दाधार ! हे दीनयो । तुमारे अनुयायी मारी चेतना प्रवृती तेयी कारण नया कार्य इत्यादि यीजी पण अनंती आत्मशक्ति, ते सर्व समरवा लागी, एरले सर्व आत्मानी शक्ते आत्मभाव मयो, अने परभाव तजया मांड्यो ८॥ इति अष्टम गायायः ।। श्रद्धा भासन रमणता रे, दानादिक परिणाम ॥ सकल थया सत्ता रसी रे, जिनवर दरिसण पाम ॥ अ० ॥९॥ अध:पटला काल गधि उदक पुण्य महति तेनो वि. पाक ने मानावेदनी ममुग्न गुणगेधक नवविमुख वेना स्वाद, डीदने मीटा लागता हता, तेयी ते पुण्यना उदपने गुग मानतो हनो, ते हरे एवी अदा पर ले भव्यागार निःम पर, हे. हीन मास मान्य हे, नया जे वातुनी पार्थनानुं ज्ञान प. में भाम्न बना आगरा ने ममय, अने मा जे पुढ. नामसमें पन मा गय, नपा १ माग. + नीयं ए पायेनो परटा कार मी न हरनो हनी, साम 737. नाही का माग दानी, रोग

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५६६ दे० चोर बा. पकपणे रह्यो जे सम्परु ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक् चार- अरूप भावधर्म वेना दातार छो. एटले हे प्रभु ! तुम दीड भावधर्म सांभरे, तमे भावधर्मना उपदेशक छो, सर्व जीवने भावधर्मना दातार छो ॥१०॥ इतिश्री अजितजिनस्तवनम् ।। ॥अथ तृतीय श्रीसंभवजिन स्तवन प्रारंभः। ॥घणरा ढोला ॥ ए देशी॥ श्रीसंभव जिनराजजी रे, ताहरु अकल स्वरूप ॥ जिनवर पूजो ।। स्वपरप्रकाशक दिनमणिरे, समतारसनो भूप ॥ जि०॥ १॥ पूजो पूजो रे भविकजिन पूजो, हारे प्रभु पूज्यां परमानंद ॥ जि० ॥ अर्यः-हवे श्रीसंभवनाथ जिन कहेतां श्रुतकेवली, अव- धिज्ञानी, मनःपर्पवज्ञानी प्रमुखमांहे राजा समान, एवा हे संभव प्रभु ! ताहरु कहेतां तमारुं अकल कहेता कोइयी. कलाप नहीं एह स्वरूप छे, एहवा जिनबरने पूजो. अहो भव्यों? तुमे एहवा परम पूज्य परमेश्वरने पूजोः वी मम केहवा छे ? जे स्व केतां पोतानो धर्म अने पर केतां धर्मास्तिकायादिकनो धर्म, वेने प्रकाशवाने दिनमणि केहेतां मूर्य जेवा छे, तथा समता जे सबने विपे राग देष रहीनपशु, तेहना मुप केतां २.

तृतीय श्रीसंभवजिन-स्तवनं. ५६७ १ राजा छे, एहवा तत्वप्रकाशक अरिहंतने पूजो, वारंवार पूजो, भविक केतां मोक्ष पोग्य मोक्षरुचि जीव तने पूजो, ए स्वल्प- भोगी, निर्मलानंदमयी, अज, अविनाशी, अक्षय, अणाहारी, अशरीरी, अनंतज्ञानमयी, अनंतदर्शनी, शुद्धस्वरूपी, देव- तत्वने पूल्यां परमानंद घाय. जे पुलयोगदी सुख उपजे, ते उपचारमुख मारे ते परमानंद नहीं, अने से आत्मानं सहज अविनाशी, अमयासी, स्वरूप सुख अन्यावावरूप तेने पर- मानंद कहीये, ते सुख, अरिहंत देवने पूज्यां पामीजें. यद्यपि अरिहंत देव, कोट् अन्य जीवना अन्यावाधादि गुणना कर्ता नयी, पण ले भन्यजीव, पोतान शुद्धपारिणासिक परमसिद्धता स्वरूप साध्य करीने वीतराग परमात्माने सेवे, अवलंबे, ते नि- यमा पोतार्नु तत्व प्रगट करे, नियामिक कारण माटे, एहयी स्वरूप प्रगट थाय एमज घारखं ॥१॥इति प्रथम गाथार्यः॥ अविसंवाद निमित्त छो जगत जंतु सुखकाज ॥ जि० ॥ हेतु सत्य बहुमानधी रे, जिन सेव्यां शिवराज ॥ जि० ॥२॥ अर्थः-वली हे प्रभुली ! तमें अविबादि केतां विसंवाद ले निर्धार नहीं ते, अने तमें निश्चय निर्धार कार्पने करो, माहे अविसंवादनिमित्त हो ॥ निमित्त लक्षणं ॥ कार्य- मिनत्वे सति कर्तृवन्याः वत्त्वे सति हेतुनिमित्तमिति ।। मारे हे मभु ! तुमें जगनना जीव तेना आत्मिक मृत्वरूप कार्य नि- पजावाने प्रधान निमित्त डोजी. माटे हेतु केहेतां कारण ते ५८ दे...त्रो०. बा०. सत्य केहेतां साचं तेने बहुमान केहेता माहामोटमपणे सेवतां जे मुज सरिखो मोहवश पझ्यो, तृष्णायें यस्यो, पुद्गटनो रागी, असंयममयी, मिथ्यात्वे मूल्यो भाव, ते निराधार, अशरण एहयो हूं, तेने श्रीतीर्थकर देव, परमतत्वमय, त्रैलोक्योपकारी, जेना नामयी परम कल्याण थाय, एहवा परमेश्वरनो योग मल्यो, माटे मारे ए वेला, ए घडी, धन्य. एम असंख्यात प्रदेश निःकर्मा, निःसंगी, स्वरूपभोगी देवतत्व- बहुमान करतो थको ने जिन केतां वीतरागने सेवे, ते जीव, परम कल्याणमपी पोतें थाय. इहां सत्यपद वेने जोड्युं, हेतु सत्य ते अरिहंत देव आपणा मोक्षरूप कार्यना हेतु छे, तेनं सत्य केहेता सावं बहुमान करवू, एटले इहलोक, परलोक, इंद्रियसुखनी आशंसा टालीने अद्भुत वर्ण, गंध, संस्थानानिशय, वचनातिशय, माति. हार्य प्रमुख सर्व शुद्ध बहुमान कारण माटे बहुमान काना योग्य छे, ते द्रव्यमान पण जे अरिहंतना शुभ ज्ञानादि गुण अनंतानुं सकल पुगटातीतपणातुं परम अरूपी अनीट्रिय- पणा, बहुमान ते सत्यबहुमान कहिए. एटठे जिनशासनमव्ये १ नाम, २ थापना, ३ द्रव्य, ए वण निक्षेपा ते कारा छे. अने घोषो भावनिक्षेपो, ते कार्यवस्तु छे, माटे निहां सुत्री ममुना अतिशयादिकना योग विकल्प तिहां रावी म्पपद्यमान छ, अने जे दर्शनगुणे प्रभुनानु भामन थपार्थी तत्वमाभा- धनुं जे यमान, ते भावरहमान कहिए. अने नामादिक प्रण निदोषा वे भावना कना छ, अपमा मायामिटाती है, तो से पण सत्यवमान जाग. ते सत्पन्मानयी जे जिनगेना वेज ममनी आज्ञायें परमात्र त्याग म्यभार पहण कालां सिक. निरुपदव ने सिद्धपा, ते गन पामी. पटो सामारिक मित्र

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पो. पा.
कार गोपाबाले के गरे
को भी पाप, ते पर ना जाओ, पर भाय तथा
अभपांस मिलाना गादान, पण सो
FAam AATH मी या
माशारणपणं गयी, जो
भाग प्रगट होना ET, मा. सर्व आमा पोन
पोलान! MRI मला कायना सन आश्य है,
पमा करना निगमाये,
मा? 2 निमा माया गरिन र
देगा? रीना आमा पनि तराने
माझfia, मार II nin मानो
शिक, देशी समादाने आदरगां
समाजमार्ग ... 11, गोगा जी-
पनामा श्रीनला पण मनाया
अरमान में? भारमग जीने
पोटात... मृग ना
श्रीमान
मिनिस्टर नान !
उपनामाश्य
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५७२
दे. घो० चार
जना निमजे, मारे तमारी गिद्धता ते माहारे साधनरुप है,
रोयी हुं तो माहरु स्वरूप प्रगट करूं, ते उपकार तमारो छे,
तेयी माहारे तो आधार, माण, शरण, सर्ग हे देव ! तमेज
यो ।। ४ ।। ति चतुर्व गायार्थः ॥
एकवार प्रभुयंदना रं, आगम रीनं थाय ॥
कारणसरी कार्यनी रे,सिद्धि प्रतीत कराय॥जि०५॥
ग.--माद श्रीअरिहंत अनंतज्ञानी, अनानी, गु!.
चारित्री, अविकारी, आपापी, गपभोगी, सम्परमणी, ग.
रूपविटानी, पलोम्याग, लोपकारी, पाटना भाग,
कमंगेगना महर, परमेधर, पमोपा, सेने एकगार पण
गने आगम कहनां गिद्वानमां का, तेरी जोयंदन
धार, पटटे अनशन पनीने गुणानुमान अनुभूतना, आशा,
नदरिदालना। जो काग, मो माहा मोशमा यानि
पंड, पटनी नील कगय, ना माट' में काम कलां
इंटे का नया का पानी मिति im.
निनी मान जाय. अने का निजे, पटो श्रीम
परम विवि वदना काम न आमा, Tm.
andi, ननद Anान मे
P3 Torror, fime
निन म म म पर.
है: Ariate
Katuware

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५७४ दे० ,चो० प्रा० आधारभूत एहवा श्रीजिन कहेतां वीतरागना चरणने ने उल्लास कहेता हर्ष धरीने बंदे, कहेतां वांदे, तेनो जन्म कृतार्थ ॥ निज सत्ता निज भाषथो रे, गुण अनंतनुं ठाण ॥ देवचंद्र जिनराजजी रे, शुद्ध सिद्ध सुखखाण जि०० अर्थः-ते प्रमु निज कहेता पोतानी सत्ता अनंतगुण पर्याय रूप ते निज भावी कहेतां पोताने भार स्वभावेयी थया छे. एहवा जे गुणज्ञानादिक अनंत ते ठाग कहेतां ठेकाणं छे. सर्व देवमां चंद्रमा समान जिनराज, ते कहेवा छे? शुद्ध सिद्ध कहेतां निष्पन्न गुणनी खाण छे ॥८॥ इति संभवजिनस्तवनं ॥३॥ ॥अथ चतुर्थ श्रीअभिनंदनजिनस्तवनम् ।। ॥ व्रत्मचर्यपद पूजीयें ॥प देशी। क्युं जाणं क्युं वनी आवशे, अभिनंदन रस रीति हो मित्त ॥ पुद्गल अनुभरत्यागी, करवी जसु परलोत हो मित्त ॥ क्युं०॥१॥ अर्थ:--हो श्रीअमि संदन प्रभुनी स्तुति कहे छे. कोई भन्य जारने श्रीपातगादेवी पायपणे मलवान मन धयु, पण प्रभुज ने मारी जन पोसामा अगदावनो विचारे छे, जे वह परमा देवनाम मिटाव तेनो विर-

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५७६ दे० चो० बा. - सर्व प्रकारे स्वाधीन, निदोंपी तेथी परमेश्वर वली केहवा छे? जे वस्तुगतें कहेतां मूलवस्तुवमें अलिप्त छे, एटले सर्व जीव द्रव्य शुद्धसंग्रहन अलिप्त छे, पण कोई अन्यद्रव्य तथा रा- गादि अशुभ परिणतियी लेपाय नहीं, अने अभिनंदन प्रभु तो सर्वन विशुफ थया छे, टंकोत्कर्णन्याय माग्भाश्चमी थया छे, ते सर्व रीते परथी अलिप्त छे, एटले जे लेपाय, वे मले, पण जे लेपाय नहीं, ते केम मले १ हवे छ द्रव्य छे, तेनां नाम कहे छे. १ असंख्यात प्रदेशी, लोकममाण, अरूपी अक्रिय, अचल, अचेतन चेतन तथा जीव अने पुद्गल ए ये द्रव्य, गतिपरिणामी छे तेने गतिनो सहायी थाय, ते धर्मास्तिकाय द्रव्य जाणवू. २ असंख्यातप्रदेशी, लोकपमाण, अरूपी, अ. चेतन, अक्रिय, स्थितिपरिणामी, एटले जे जीवपुगलने स्थिर रहेदानुं सहाय आपे, ते अधर्मास्तिराप, ३ अनंतमदेशी, लोकालोकप्रमाण, अरूपी, अचेतन, अक्रिय, अने सर्व द्रव्यना पोते अवगाहक परिणामी, तेने अवगाहनानुं हेतु, ते आका- स्तिकाय द्रव्य, ४ पुद्गलपरमाणु, अनंतारूपी, अचेतन, सक्रिय, पूर्णगलनधर्ममयी, १ वर्ण, २ गंध, ३ रस, ४ स्पर्शयुक्त; एक एक परमाणु, एहवा अनंत परमाशु ते सर्वलोकमांहे जाणवा,* पण लोकयी बाहेर नहीं, ते पुद्गलास्तिकायद्रव्य, ५ चेतनालक्षण, १ज्ञान, २ दर्शन, ३ चारित्र, ४ तप, ५ वीर्य, ६.उपयोग, लक्षण तया अरूपी, स्वभावनु कर्ता, असंख्यात प्रदेशी, एहवू एक जीवटप, तेहवा अनंता जीव, वे जीवास्तिकायद्रव्य कहिये, ए पांच दयने प्रदेशनो संबंध ठे, माटे अग्निकाय कहिये. ६ नया छठं अप्रदेशी, अम्पी बननालाण, निश्चयनययी पास्तिकापनी बनना न्यवहां उपचायी ज्योनिश्र- ८८ चतुर्थ श्रीजनिनंदनजिन स्तरनं. ऋने चारें जोरसाय, ते कालद्रम्प, एह पनां नाम कयां. तेमां धर्मास्तिकाय.२ अधर्मास्तिकाय, ३ आशशास्तिकाय, ४ काल, ए चार दम्प, अपरिणामी कोड्दी मिले नहीं, जने १जीव, २ पुट, ए दे नप परिणानी, एटाले अन्यम्पपी मिटे, मांहे पुटप नांहोनांहे संघपा पाने, अने परानु- पापी रेतपणे परिणम्पो जे जीव, तेने प्रदेश कर्नपने वलगे, पण एक लीवधी वीजो जीव मने नहीं अने पुल तो संसारी जीपी मरे, पण माहारा अभिनंदन परमेश्वर तो सिर धया d, निप्पाबादिक हेतुर्ण मुक्त थपा , तेने पुल लागी सझे नहीं, ए स्वरुप हे, माटे यदी व्य मटे नहीं. एले एक जीव ते अगद जीव मड़े नहीं. बीहं पर मृदन कोई बप कोई हसन मंडे नहीं. ते न तो मलाई नी तथापि कादित् भाई महे तोपग भाद कहेनां वस्तुनी मूल- परिणति परतिरपरी अन्यनीय तथा अन्य पुइटन अ- पहे, एडरे स्पारे नही, जे पदारमता दे उपाधियी हो. अने प्रभु श्रीअभिनंदन देवने भारया दम निन्द हो. मई मायने अनुपा धपोह. एटा कमा, भोना, पार... गावाला जपानन: सपा दिवई पर विमलो. जन्माने को! मामिल व दे० थो. या पोताना गुणपर्यायनी प्रवति ते भाव, एम द्रव्यादि घारनी परिणति से घरनुधर्म छे, मादे ते प्रभु केम मले १ ॥२॥ इति द्वितीय गाथार्थः ॥ शुद्ध सरूप सनातनो, निर्मल जे निःसंग हो मित्त ॥ आत्म विभूतें परिणम्यो, न करे ते परसंग हो मित्त । ॥ क्युं०॥३॥ अर्य:-चढी श्रीपीनगगदेव कहेवा छे १ शुद्ध कदेतां सर्य- दोगदिन, पहा स्वरूप हनुं सनातनो कदेतां नित्य छ, पनि पर्याय अनित्य छे, पण इहां कूटस्य नित्यता नित्य है, निमंट ज्ञानावगणादि मल रहित, यली निस्गंग केहेतां सर्व मंग दिन, जेहनो अगम्यानप्रदेशमन्ये दम्पयी कोई परमाणु मान रहो नदी, अने माश्यी जेहनी परिणतिमाहे रागी वेपी- को कई अन्य भाव नयी, पहतो निग्गंग छे ते परमेमर, वही आत्मविभूति कहेता पोतानी गुम्यादादरूप, अनंत, अज, अविनाशी, अग्वंद, म्बर परिणायो, पहयो जे परमेश्वर ते पर देतां वीना ट्यनो गग पटले संयंत्र को नही, ए. टरे मनाये जीवद्रय पामंगी नदी, विमा पामी पपोहे, काले सम्पा, विपी का मानो परिणामीने गरे पाते कोई पानो मग का नहीनो पहा प्रमुदी देन मटा मार हे प्रभु । नमन माया ना मुझने मुम ॥३॥ न य य , गजान आगम वर, मिलन नमन माया मिन|| प्रन ना मानमयो गुटमा पना नायनामिन।।

चतुर्थ श्रीजनिनंदनजिन स्तरनं. ५७९ अर्य:-एम विचारतां उपयोग बाम्पोते कहे हे, पण- जा आगमनले केहतां ले आगममां हें कपुं गुस्मुलें सां- भल्यु, तेना बंख्यकी जायं ई, ले हे भन्यजीव ! प्रमुत्री वीतराग सायें आपणे मला हे, हने गरज होय, ते मडे, ए पोतानी पक्ष प्रगट करसानो वित मटे, प्रभु तो स्त्र कहेता पोतानी संपत्ति ले स्वक्षेत्र असंस्पात स्व प्रदेश- विधे व्यापकपने रक्षा ले अनंतज्ञानादिक गुण. ते संपदानसी हे शुद्ध खल्पनो नय कहेतां धी है, माटे निम्मनपरमा- नंदभोगी शुद्ध स्वरूपी ते कोयी मळे नहीं ॥४॥ इति चतुर्य गाचार्यः ॥ परपरिणामिकता अछे, जे तुझ पुद्गलयोग हो मित्त ॥ जड चल जगनी एंठनो, न घटे तुझने भोग हो मित्त॥ क्युं० ॥५॥ अर्यः-हवे कोई पुडशे जे द्रव्यमांहे परया मवानी शक्ति नयी, तो साधक जीवद्रव्य पग, वस्तुवमें शुद्ध हे, वेने प्रमयी मल, ते पग तेनी सत्तामां तो नयी, तो हो देवी रीतें मिले । लां कहे हे. ले अनादि अतीतकाल ए संसारी जीवन आत्मिक मुल सर्व अबरारं अने भोगवर्म, क्षयोपशमी डे, ते काईक भोगन्यो जोइये, ते स्वरूपने अण पामवे, पुदलना वर्ग, गंध, स्म, फम्म, जे अभोग्य हे, तेने भोगवतो धको परभोगी थयो, परपरिगामी थयो, ए परपरि- पामिक्तानी चाल ते अनादिनी व हे, एटले का परनो, भोक्ता परनो, रमण परने विध, ग्राहक परनो, एम सर्व, पर- - .

पंट देचोकाया भावमयी थयो छे. इहां कोई पूछशे जे शुद्ध दयवी, ते परपरिणामी केम थाय १ तेने कहे छे. जे पुद्गलनायोगें : पुद्गलावलंबी चेतना पइ, एटले कहे छे जे हे जीव ! पुर्व रने योगें ने तारी परपरिणामिकता अनादिनी अशुद्धता विजातीयपणे छे, दोपरूप छ, अने आत्माने सर्व अपटित छे, केम जे पुदल ते जड छ, तथा चल कहेतां विनाशी छे जगत्नी एठ छे, ते पुद्गल द्रव्य द्रव्ये घुब छे, अने पर्याय अनुष छे, वर्णादिक, खंधादिक पर्याय सर्व पलटे छ, अने। सर्व संसारी एकेका जी ये एकेको पुद्गलपरमाण, तेने शरीर- पणे, भाषापणे, मनपणे, आहारपणे, अनंती यार लइ राइने मापो छे, ते माटे ए पुगल ते सर्व, जीवोनी एंठ छ भने जीवदम्य ते स्वरूपभोगी छे, माटे हे घेतन ! सुने ए पुन- टनो भोग घटतो नयी, केम जे हंस केवारे कचरामां बांध घारे नहीं ॥ ५॥ इति पचम गायायः ॥ शुद्धनिमित्ती प्रभु ग्रहो, करीअशुद्ध पर हेय होमिच।। आरमालंबी गुण लयी, सह साधकनो ध्येय हो मिचा। फ्यु०॥६॥ अर्य:- F-माट परभोगीका अगुद निमित्त ने पुदनादिका तेने नजीने मृद्ध, निःकर्मा, पदमपमने अपदो, एक पआरमान कि पगनुयायिनाथे, ने टाटाने माटे प्रथम अदालन मन अमिहनालयनी १८१, मेयी गुरुनिमिती से नितिन नियम . 4 भन मनो, मेवो,m या परीन पटने

चतुर्थ श्रीजनिंदनजिन स्तवनं.
-
सर्व पाना त्याग करने ममुने भजो. ते अमु वेडेवाडे?
से आरमाची देशां सर्वरने पोतानी लालाने अबस्या
हे, एसडे पोताना आत्माने विषेज तन्मय थपा हे, तथा
गुपनी पहली गुल्ने वि स्प कहेतां विनाम लेहनो के
व अंदाजरागत केहेई ! समोसने निरजावनारा
सावक एहना ने न्याय देशाविति, निरति, गिता
वारी, नारद जी ने देय हे, एटले सर्व आत्माने
श्री लिक परमात्मा क्षेप हे. ध्यान दे प्रकार के, एक
साडंबन, पीई निरालंबन. मां ने अरिहंतसिन तत्व
स्वरूप अपत्याने छान वई, ते तालंदन भान हे तेने
श्रीजनिंदन प्रनु सबने यात्रा योग्य हे ॥६॥ इति
एक कपाः॥
जिम जिनपरआलंबनें, वधे सधे एकतान होमित्त।
तेमतेम आत्मालंबनी, ग्रहत्त्वरूप निदान हो मित्ता
क्युं० ॥७॥
इम का लेन कार ने जरो जीव,
है इंजिनदेखनी नमनाने अने , देहेतां सर्व-
पानी देना
दहननी सुजनानां पर-
पर, एकान पेनं एक दिने, एडे
म ने नि मानने वाले ना
या त पेनने जानाकार।
..
साई ।। इति ॥ ७ ॥

..दे०योमा
स्वस्वरूप एफरवता, साधे पूर्णानंद हो मित्त ।
रमे भोगवे आतमा, रखत्रयी गुणधुंद हो मित्त ॥
क्यु०॥८॥
अर्यः-से जेवारे स्वस्वरूपएकाग्रता ज्ञान, दर्शन, चारि..
पम्प रहे, तेवारे परिणामिक परमतवने विषे एकत्यता शुद्ध
स्वरूपरमण, रामस्वरूपमोगी पाय, वेयी सधे कहेतां निपजे,
पूर्णानंद कहेतां संपूर्ण, आत्यंतिक, एकांतिक, अनंताविशप,
अवाधक, केवलनिरावाय, स्वाधीन आरममुख निपजे, पछी ए
आरपा पोतानी रखपी आदिक गुणवंदने विचे रमे, वेहनेज
भोगवे, तगमय, तबिलामी, स्वमावानंदी को रहे, मादि
अनंतोशाल, स्वपरिणामिक प्रगटपणे ॥॥इति अपम
गापायः ॥
अभिनंदन अवलंबनें, परमानंद विलास हो मिला
देवचंद्र प्रमुसेवना, करी अनुमत्र अभ्यास हो मिस:
क्युं०॥९॥
अ-रीतें भीअमिनंदन प्रमुने अपने परमानंदनो.
विडास याप, सर्वदेवमाह चंद्रमा समान जे माईन देव
वेहनी सेवना, अदा एतिकाई नाम पर देवा माटे
पोराने संबोदने है देवर नमारी सेना करे,
अदमना अायामको पले अनुमवयुक करे. तीन अरमा
निशान भय शा.पाट ने मो, भादो ॥९॥

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५८५ दे घो० वा. विना भोगो छ, माटे अकामी छे, एटले स्वक्षेपयी. वेगलो जे पुगतना वर्ण, गंप, रस, फरसनों भोग, वे वांछों पड़ें, ने कामना कहिये, पण तेनो भोगी आरमा नयी, मारमा तो ज्ञानादिक गुण जे स्वक्षेत्रध्यापकपणे प्रगटमोग वेहनो भोगी , ते भोगयतां कामना न जोइये, माटे कामना विना भोगी छे, ए अधरज जाणवू ॥१॥ इति प्रथम गाचार्यः॥ ऊपजे व्यय लहे तहवि तेहयो रहे, गुण प्रमुख बहुलता तहवि पिंडों। आत्मभावें रहे अपरता नवि ग्रहे, लोक प्रदेश मित पण अग्वंडी ।। अ० ॥२॥ अर्थ:-हो नित्यतादिक धर्म कहि समजारे छे. सर्वद्रव्य छ, तेमध्ये काल ते उपचार द्रव्य छ, तपा धर्मास्तिकापादि पांच द्रव्य अग्निशप छे, तेमां १ धर्मास्तिराम, २ अपमा. स्तिकाप, ३ आकाशास्तिकाय. ए या एकेक पछे, जीय अनंता क्ष्य छ, पुदल अनंता दृदय छ, द्रव्यर्नु अगुस्सपुर पॉप परगुण हानि वृद्धिम्प पफ पाई जलावर्तनी परें बनें, ते एकद्रव्य, जेनुं पत्र मिन पटयं से मिमदाप, ये रा हत्य, उत्पाद, प्यप, अवमुक्त.हे, तेमादे नियानियले । उक्तं व विषादवपकमाये । न जाइ जीको नामो, न नामो होड सामो नन्। मोपापार, दुर सम्म पलामो ॥१॥ न ॥ मावि य परममप, पानामपय निगं ॥ य गुहद कमल मोराट को |॥२॥ mपनिनो , यता पम जीवनो पंचम श्रीसुमतिजिन स्तवनं. ५.५ - नित्यानित्य स्वभाव हे, ते हे हे. अभिनवपर्याय उपजे हे, पपर्याप पर पाप हे, या एक प्रदेशे जगल्यपर्याय अनंत गुमो हे, पीजे प्रदेशे तेली अनंतभागहीन है, बीजे प्रदेशों संपात गुन वदतो हे, चोये नही संल्पान गुण इदि है, एम अस्पात विभाग हे. ते प्रतिसमय परावर्तरूप के ते निहां जनंजय विहां रूपात गुण थाप,.देवी ने प्रदेश अनंत गुप्ता द. ते मंच पयो, जने अस्पात- पर उपजई प. ते उपदयो नया अगला सोरहो, जानको तयानजाई. ए.ज्ञाननो धर्म हे, ते शेपने पर शान नित्य हो, जाप नहीं. जेना विवक्षित समापने सि केवलज्ञान अनंता जीत धपातेने मो. परमानें जनता धर्म हे देने वाले तथा अनाग्नजनता पाने हे जाने पनि थप हे घटे ए धर्म अपना हे, प.ते कईने सामानो धर्म, जानमाहे हे. अने पाईपने जागो सान पराहपानी पर्नु न “विपरदात विपदिमोऽपि भेदः क्षेपात जाननेदः, पुन. जान पर पम्प पपापा- सतदेवनारदेनरपानेमपात भा" पाने सन वर्तमानाने जाते. तेहने नका, नाले, नेने जनागत व्हने मन को नाप भासन- देतशि हे जमले ना दे सपनो कप उनसपनो उद.Fr::. : 'न, रिक, घर हेरनी : नसे. एरने उनले . - - - मा माने,

૧૮૬
दे० चो० बा.
ते नित्यता. ए वे स्वभाव कया. तया एक आत्माने विषे
ज्ञानगुण, दर्शनगुण, चारित्रगुण, वीर्यगुण, दानगुण, लामगुण,
भोगगुण, अरूपीगुण, अगुरुलघुगुण, अन्यावावगुण. इत्यादिक
अनंता गुण छे, ते सर्व गुण मिन्न भिन्न छे, तेयी अनेकता
छ, तथा ते सर्वगुण समुदायरूप छे, पण केवारें भिनत्री
न थाप, ते अनंत गुणपर्यापनो एकपिंड एहयो आत्मा छ,
माटे एकरूपनो, वली प्रभुजी तमे केहया छो जे स्वदम्प,
स्वक्षेत्र, स्वकाल, स्वभावपणे अस्ति छो, ते अस्तिभाव कोई
पार टलनो नयी, वेणे हे प्रभु । तमें आत्मभावें रहो ओ
पण कोइ वार अपर केतां वीजा ददयनो भाव केतां धर्म
लेना नयी, माटे स्यात् अस्तिपणे छो, पोताना धर्मे रहो छो,
पर द्रव्यनो धर्म स्यान्नास्तिपणे छे,ते कोइबारे में (तेमां)
पो परिणमता नयी, माटे स्पाअम्निनास्तिरूप छो. हये इहां
समभंगी उपने, ते कहे थे. १ बट्य ते पोताना गुण अने
पर्यायनो समुदाय तथा म्वक्षेत्र, ते पोतानो अगस्ट स्वभाव,
विभागीकन असंख्यातप्रदेश, म्नकाल ते उत्पाद प्यपरूप म.
वर्तना स्वभाव ते अनंता जानना पर्याय, अनंता दर्शनना
पर्याय, अनंता धारिपना पर्याय, अनंता अगरलयु पर्याय,
देगे म्यानुअम्ति ए पहेलो भांगो थयो. २ परद्रव्य, परक्षेत्र,
परकान्ट, पग्मावो स्पातनाग्नि प योजो भांगो. ३ नया
अस्ति, नाम्नि, ए ये बात मे शाले, माटे स्यात् अग्नि,
म.
४ पदो धर्म एक य.
T, गया
गोचर नही पहना
मार्ग
.. नया पाठ कयचितो
आनन्य पदोयो मा यो ', अदना अस्तित

" पंचम श्रीसुमतिजिन स्तवनं. धर्मने पण हे, माझे स्यानुअस्ति अवक्तव्यं ए पांचमो भांगो घयो.६ ते अवतव्यपरं नास्तिवर्मन पण छे, ते मारे स्यात- नास्ति अवक्तव्यं ए डटो भांगो.७ एहयो वस्तुधर्म समुदाय पर्यायपणे स्थानस्ति नास्ति युगपत् अवतन्यं ए पदार्य धर्म छे, ए सातनो भांगो थयो. ए सामान्य सप्तभंगी कही, तेमज नित्य तथा अनित्पनी सतभंगी, एक अनेकनी सप्तभंगी, 4- तय तथा अवतापनी समभंगी तथा गुणपर्यायनी सप्तभंगी, त्या न्यास्तिक पर्यापास्तिकनी संसभंगी, एम अनंयी सप्तभंगी वस्तव, हे, ते समभंगी सर्व पदार्थ पोताना स्वभावनें पल- स्ता नयी, ते कारणे हे प्रभुजी ! तुमें अस्तिनास्तिपणे छो, स्वधर्मपणे रहो हो, परधर्म ग्रहण करता नयी. वली हे प्रभु ! तमें केहेवा हो? तोके चउद राजटोकना जेटला आकाशप्र- देश हे, वेटटा तमारा आत्मप्रदेश हे, पण ते असंख्यात- प्रदेशनुं स्वल्प, पटगुण हानिवृधिरूप, अगुरुलघुपर्यायनो तरतमयोग, विभागपने रहेई. इंखलाअवयवनी परे ज्ञानादि गुणोर्ने अवस्थान क्षेत्र, क्षयोपशम काले कार्याम्यासे तरतमता, तेहत स्वरूप कम्मपपडी विष योगस्थान अधिकार तथा पृहत्कल्पभाष्पमध्ये संपर्मनिअधिकारयी जागजो, तथा शायि- कभावें सर्वगुणनी सामान्यता, परंतु अगुत्टवपर्यायन तारतम्य सदा हे, तेपी प्रदेगरम हे, जयवा सर्वगुण पर्याय तुल्प- विभागे अस्पातप्रदेशपने वेहेंचाप पग कोई वारें जूदा ख- डाता नी, मारे असंडप . ए.ले असंख्याता प्रदेशल्प अवपाता हे, पण भिन या नहीं. ते आच जागढ॥२॥ ॥ इति द्वितीय गाचार्य । . - A ५८४ दे० चो० बा० कार्यकारणपणे प्रणमे तहवो ध्रुव, कार्यभेदें करे पण अभेदी। कर्तृता परिणमे नव्यता नवि रमे, सकल वेत्ता थको पण अवेदी ॥३॥ अर्थः- वली उत्पादव्यरूप धर्म कहे छे. जीवद्रव्यने विषे जेटला गुण छे, ते सर्व पोतार्ने कार्य करे छे, अने उपा- दानरूप कारण तेहीज कार्य थाप छे. इहां कोई कहेशे जे पूर्वकाले कारण, पश्चाक्काले कार्य, एतो जमालीनो मतं छ, जो कारणकाल, कार्यकाल मिन्न होय, तो कारणकाल वि- नाशें तदनंतर कार्यकाले कारण विना कार्योत्पत्ति थाप, अने कारण विना कार्म मानतां अनेक दोष थाय, वेवारें धः पट कार्य थाय, पटें कार्य थाय, माटे कारण विना कार्य नथी, एटले कारणभाव, तथा कार्यभाव, ए वे एक सममें छे, ए जैननी श्रद्धा छे, श्रीविशेषावश्यकमध्ये घj वखाण्यु छ, जो याा उत्पन्न कारण कार्यविपे एक कालता छे, तो सहज अ. कृत्रिम कारण कार्यता एकसमयेंज होय, तेमाटे जीवनो केव- लज्ञानगुण, ते विशेषभाव सर्व जाणे छ, तिहां सर्वतुं जाण, ते कार्य छ, अने ज्ञानगुण, जाणवा रीतें प्रवर्ते, ते कारण छ, तेहज समय कारण कार्यपणे परिणमे छे. अने ज्ञानगुण पणे सदा, प्रब छे, तेम केवल दर्शनादि गुण अनंता छे, ते सर्व परीत परिणमे है, फागना पप, तिहांज कार्यता उत्पाद कार्यतान्यप, निहाज कारणता उपाद, इस सर्व व्यने विपे, उत्पादम्पय धर्म छे, इहा कोइ कहे छे जे उत्पादश्यय स्वतः ५२ पंचम मोहमतिजिन लनं. ५८९ नणे, परमत्पती हे, एन रहे हे नी मूट हे, जे पाम- पिपी धर्म, ज्ञान थाप, रक्षन ते सहज घाय, विहां श्रोतांवर गी तत्वार्थीकाकारती तास से छे ।। जय ६ वामपडे उपपोत्पादन को योगः किंतु परम- पवाजातेऽवगाहकातिवानापत्ता पारम्पपाविति तेषां कपम- काबरोऽमहाभाव वग व ततोला रक्षास्प सामारित पेपरे पिलायापनिति. बोपो प एवं मानानलपति रविन पनावरूपं तेन हि- जमदपोत्तमाः कपोता तु सिसापरिणानेन सर्व रुला पदादिनपमिनार मोगारिया डीवजानानिय तकदमदर्शनमविस्करिमांकालाई अमदुतागुपदेव घ भाकपडे ॥ वन जोई मा पार्थ करदी, मोनी! . वाले परिपने हे, तेली हेपारो.सने गुस्तो अभाव तो नर्ग, हद दहे, हे निर, निय, ए दरूप हे, ते २. दामले यो बरे वेहने रहा ... पवन कलन दे० चोबा ए कार्यमेर्दै प्रण धर्म पामी छैयें, परंतु केवारे 'मिन्न पाता नयी, तिम जीवना अनंतगुण मिन मिन कार्य करे छे, परंतु यस्तुय मिन नथी. कार्य तो सर्व भेदें कहेतां मिनपणे करे छे, पण अमेदी कहेतां भेदरहित छे. वली प्रतिसमय कर्तृता पणे छे, पटले पंचास्तिकायमध्ये धार अस्तिकाय ते अकर्ता, छे, अने एक जीवास्तिकाय स्वतंत्रकर्ता छे, वे स्वाधीनपणे कारणावर्टयी थइ कार्यने निपजावे, ते का, तथा जेम पर कार्य घर, तेनो कर्ता कुंभकार तेम ज्ञानादि कार्यनो कर्ता जीव छ, माटे कततापणे परिणमे छे. पण काइ नभ्यपणे नपी, रमतो, पटाले जे प्रतिसमये पर्यायने करे, पण काइ नवो नपी करतो, अस्नियम छ, मज रहे छ, वली सकल कहेता - सर्व द्रव्य छ तेहना गुणपर्याय स्वभाव, तेना उत्पादरूप, पपलपा ध्रुवरूप, अनीत अनागत वर्तमानकाल सर्व प्रणे काटना येता कोनां जाण ठो, ए सर्वने जाणो छो, पण अवेदी करता पुरुष, स्त्री, नपुंसकम्प वेद रहित ठो, माहे पेत्ता थकान, धवनय अवेदी छो, ए अचरिज जाण॥ ३ ॥ इति तृवीय गायार्यः॥ शुडना युद्धता देवपरमात्मता, सहज निज भावमोगी अयोगी॥ स्वपर उपयोगी तादात्म्यमत्ता रमी, मानि युजनो न प्रयोगी ॥ ॥४॥ यादरकर -

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दे० चो या अनंती शक्ति छे, ते सकर्मा जीवनी सर्व शक्ति दवाणी छ, अने तमें साध्य साधक भाव करीने सर्व कर्मपडलने दल्वे करीने सर्व शक्ति प्रगट करी छे अने ते सर्व शक्तिनी मिन्न: भिन्न प्रवृत्ति छे, सर्व शक्तिने प्रयुंजता छो एके सर्व कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञापकत्व, पारिणामिकत्व, माहकत्व, ओघr रत्वादि शक्ति प्रवत्तें छे, पण कोई शक्ति अण प्रवर्ती रहेती नयी, तथापि न प्रयोगी कहेतां शक्ति प्रवर्तायता कोई जातिनो प्रयोग कहेतां प्रयास उद्यम विकल्प करयों पडतो नयी, एटले सर्व शक्ति सहेजें प्रवर्ग छे ॥४॥ इति चतुर्ष- गाचार्यः॥ वस्तु निज परिणते सर्व परिणामिको, एटले कोई प्रभुता न पामे ।। करे जाणे रमे अनुभवे ते प्रभु, तत्त्वसामित्व शुचि तत्त्व धामें ॥ अ०॥५॥ अर्थ:-हवे १ नित्य, २ अनित्य, ३ एक, ४ अनेक ५ अस्ति, ६ नास्ति, ७ भेद, ८ अमेद. इत्यादिक, अनंत' धर्म प्रमुमा छे वे माटे परमेश्वरपणं छे तेनी ऊलखाण कर; वाने कहे छे. जे नित्यानित्यादिक धर्म तो सर्व द्रव्यमां छे. एटळे घस्तु केतां जीवादि पदार्थ ते निज परिणति में केतां पोतानी स्यावाद परिणति में सर्व केतां समस्त द्रव्य परिणा- मिकी केतां परिणामी छे. एटले नित्यानित्यादिक धर्मपणे सर्व व्य परिणामी छे, पण तेयी कोइ परमेश्वरपणं न पामे, सर्व ट्रम्प साधारणधी माटे एमां शी अधिकाइ एट केतां

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५९४ दे. चो० घा० , कहे छे. तत्व केतां वस्तुनो मूलधर्म, स्वामित्व केहेता वेर्नु स्वामिपा ते परमेश्वर प शुपि कहेतां पवित्र कर्म रहित निर्मल तत्व सिद्धतातुं धाम कहेतां घर ते निष्पन्न सिद्धाय स्था वेज परमेश्वर पणु छ, बाकी सबसंसारी जीप, सत्तायें परम- गुणी छे, पण जेना गुण प्रगट थया, ते पूज्य जाणवा. माटे श्रीयशोविजयजी उपाध्यायें का छे ॥ गाया ॥ जे जे अंश रे निरुपाधिकपणुं, ते ते कहीर्य रे धर्म ॥ सम्यग्दृष्टि र गुण- टाणा थकी, जाव लहे शिवशर्म ॥१॥ माटे जे परम पज्य ते मिद छे॥५॥ इति पंचम गापार्थः ।। जीव नवि पुग्गली नेवपुग्गल कदा, पुग्गलाधार नाहीं तास रंगी॥ परतणो ईश नहिं अपर ऐश्वर्यता, वस्तुधमें कदा न परसंगी ॥ अ० ॥६॥ अर्य: हा जीवनो जे मूल धर्म छे, ते श्रीगुमतिनाय अरिहंतने निपन्यो छे, ते कई छे. जे जीव नवि पुग्गली कहेनां जीव ते कोई वो पहली नयी अनंतो काल संसारा- वस्यायें पुदलयी एकटो रयो, पण केवा पुद्रलरुप थपो नहीं, तपा जीव ते पुदटनो आधार नदी, कारण जे पादप तो आश, धर्म, अधर्म, जीव, पट, पस आकाशदाय मोदी के, माजीदना घटी हरन देयं, ते जीवनी भारमगुन्जायी थयो, म जे मगरी जीवोन भोग नपा उपभोग मनो महाकाट अयोराम मी पास. मोगली गदना नई नया Himan, दीपांजगपनो पंचम श्रीसुमतिजिन स्तवनं. ५९५ - .. क्षयोपशम पानी से वीर्य पण परानुपापी घयु, तथा कर्ता, ग्राहकता, व्यापकता, भोत्ताप सदा निराधरण छे, अने कार्य, माद, व्याप्य, भोग, आवरणां , तेवी पुलपाय, पुलानुपापी प्रवृत्ति के कार्य, पुढलभोगपणे वेहना वर्गादिकमां व्यापक थयो, पुल्ने रहे है, पडी जेने भोगन्यो, नीज होश उपजे, एटले पुइल्नो रुचि के फरी पुलने आहे, तया भोगवे,यी आत्मप्रदेशे पुल रहा हे, आत्मप्रदेश ते स्वगुणपर्यायतुं क्षेत्र हे, पण परपुदलपतुं क्षेत्र नयी, तया मुलबस्तुधर्म पुगलनो रंगी नयी, स्वधर्मना आस्वादन विना ए पुदलनो रंगी घयो हे, पण वस्तुरीत विचारतां एने पुढल्या दयो संबंधछे ? वर्ग आत्मा परभावनो स्वानी नयी, परभाषे एनी ऐश्वर्यता कहेतां ठकुराई नया; ए वस्त्वमे कदा कहेतां कोइ वेला परसस्तनो संगी नयी, जीवद्रव्यनो सत्ताधर्म एहवो हे, माटे माहारो मुमतिनाय परमेश्वर गुदेव, ते पुदलनो आधार तथा रागी केम होय ? सर्व पुलातीत छे ॥ ६ ॥ संग्रह नहीं आपे नहीं परभणी, नवि करे आदरे न पर राखे । शुद्धस्याद्वाद निजभाव भोगी जिके, तेह परभावने केम चाखे ॥ अ०॥७॥ अर्यः-वटी सुमतिनाये परमात्मा केहेवा के ? ने पर- भनी कहेतां पावन्तु भनो माहागपने सरहे नहीं, ते परवस्तु कोई बीजाने आपे नहीं. परन्तुने कर नहा, परवस्तुने आ- दरे नहीं, परवस्तुने परिग्रह पनपने गले नहीं, ए शुदय- .. - दे० चो० बा० नो धर्म छे, तथा शुद्ध कहेतां निर्दोष स्यावाद कहेतां अनंत- धर्मात्मक निज कहेता पोतानो, भाव कहेतां धर्म, अनंत ज्ञान दर्शनाधिक, तेहना जे भोगी आस्वादी एटले स्वभोग्य- ना जे भोगी थया, वे परभाव ने रागद्वेपादिक अयवा युद्गल- वर्णादिक, वेहने निष्पन्नपरमात्मा केम चाखे कहेतां आस्वादे ? माटे परमात्मा ते परभावने चाखे नहीं, स्वरूपभोगीज होय ॥७॥ इति ताहरी शुद्धता भास आश्चर्यथी, उपजे रुचि तेणें तत्त्व ईहे ॥ रंगी थयो दोपथी उभग्यो, दोपत्यागे ढलें तत्त्व लोहे ॥ अ०॥८॥ अर्यः- हवे साधन धर्म कहे छे. तिहां श्रीसुमतिनाय पोतें मुक्त थइ कृत कृत्य थया, ते परजीवनी मुक्तिना कर्ता नहीं, तो शा वारते स्तवो छो १ नमो छो ? त्यां कहे छे, जे ताहेरी कहेतां हे प्रभु ! तुमारी शुद्धता, निःकर्मता, अनंत- गुण मगटता, तेहतुं जेवारें भासन कहेतां जाणपणुं थाय, वे जेम जेम गुणनी घोषणा करे, तेम तेम गुणतुं भासन थाय, तेयी आश्चर्यता उपने, जे अहो प्रभुनु जान । बण लोकगत पदन्य प्रण काल परागृति सहित एक ममय जाणे, तेमज अहो प्रभुनुं दर्शन अहो प्रभुनं चारित्र । सकल पल अ- भोगी। अहो परमानः । इत्याटिक अयथा आश्चर्य उपजे, तेयी पोताने तेहपा में मानी मचि उपजे, ईहा उपजे. पछी ने मौसमनि जीव विचार न केवार माहागे -

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-
दे० चो० ०
के कारणपणे परिणमे, जेम कार्य निपजे, तेम तेनी कारणता;
बंस पामे, एम आरमसि साधना नवि टके, जैवारें परंतु
कहेता जीवपदार्य, उत्सगरीने संपूर्ण आरमा पोतानी समाधि ३.
परमानंद पामे, तेयारे कारणता रहे नहीं, सिद्धपणे परतुनो
मूलधर्म प्रगडे, सेवारे साधनपणुं रहे नहीं ॥ ९॥ इति नत्रम'
गापायः॥
माहरी शुद्ध सत्तातणी पूर्णता,
तेहनो हेतु प्रभु तुही साचो॥
देवचंद स्तव्यो मुनि गणें अनुभव्यो,
तत्वमत मविक सकल रायो । अ० १०॥
अपं:-माट हे प्रभुजी ! मादरी शुद्ध निर्मल आरमसता,
वेदनी पूर्णता कदेता मपर्णता मेहनो हेतु कोनां निमित
कारण हे प्रमु मुंहीन मायो छो, नमाग जे पददेय नि-
मित्त पाम्या विना माहागे निर्मल मोझ कम निपने ! रा.
बीवनी पड़ीज परिणति छे, जे निमित्तावलंपी पद, EN
नावटंवी याय, देव ने पार निकायना, तेहमां पंदमाममान
बडे वेणे स्नथ्यो, नया मनि जे निग्रंय मोक्षामिलापी में
अनुमायो, देहना गगन आम्पादन पर्यपदयो से आरन
देव, तेनी नम्बरमानपटने यमगत गल्ती नामा
कना, देना म मामयी दीवो नर्म गयो, मन पायो
?.नाम Moviनि गृमनजिन का

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६०० दे० चो०बाज स्वरूप निर्धार, स्वरूप रुचिरूप प्रगट्यो, तो आत्मा मोहम- ल्लथी रहित चाय, माटे परम पवित्र छ । उक्तं च । सम्म, तेणं सुदो, सच्चसु किञ्चो हवइ सिबहेऊ ॥ संवखुड़ी तह निज्जरा य, धम्ममूलं च सम्मत्तं ॥१॥ मूलं दारं पंइटाणं,' आहारो भायणं निहि ॥ दुमुक्कं साविधम्मस्स, सम्मतं परिकि- त्तियं ॥२॥ बली दर्शन कहेना हे प्रभुजी! ताहरु देखई, अपवा शुद्धश्रद्धा ते जे जीय, शब्दन करे, ते जीवनो जे, सर्वजीवसंग्रहनये सिद्ध समान छे, ते जेवारें पोताना सर्व आवरणक्षय करी सपूर्णसिम थाय, नेवारें एवंभूतनय सिक कहिये. ते माटे संग्रह ते एवंभूत थाय, इहां नपर्नु स्वरूप संक्षेप कढ़िये ये. " सत्ताग्राही संग्रहः " वस्तुनी सत्ताने रहे, ते संग्रहनय कहिये, अने यस्तुना नामपदनो जे अर्थ, तेपणे: परिणम्पो, वेध स्वेद्यपद भावनिक्ष ते शब्दनय कहिये. वली सकटपयायपरिणामिकतारूप प्रगटपणे संपणं यस्त, ते एवंमूत' नप कहिये. एटले नाहरू दर्शन जे देख, ते अंतरंग अरि- हंतना स्वरुपमासन आम्बादन सहित प्रभुतान अवलोकन ते शब्दनये प्रमु→ देग्वत्र थयु. १ योगनी चपरता, तथा उप- पोग अन्यकापनो, माय एकलं माइंद्रिय करी प्रमुमदान भोई, वे नैगमन प्रभु दीटा. ३ चंदन, नमन, आशानना वर्जनपगे ले प्रमुमुद्रा नया प्रमना शगग्नं देख, हे स्पर- हारनये प्रमु दीटा. ४ गेग का विकल्प अपोग ममुना गुणनो, अने मवईयन र नये, प्रकाय फरे, पर स्ता माने, तपा हप मदन ना मायनाये जो स्तो, हे सनमय गमि पर ये ग पर श्री पद्मप्रभजिन स्तरनं. सर्व प्रमुख तथा प्रभुतुं शरीर तिहां वलगा अंतरंग आ- त्मसत्ता प्रगट करवातप साध्यत्तचि थयों थको प्रभुतान तत्व- संपदारूप अवलोकन ते शन्दन प्रभुजी दीवा. ए रीतें श्री प्रभुजीने देखे. हे निपमा स्वसत्ता प्रगट करे, मारे ए निमित्त कारणरूप प्रदर्शन जाई. एम सम्पनत्वना पण नय करीने बन्दिन ने शुद्ध श्रद्धारूप समलित ते संसारो जीवनी सत्ता प्राग्भावनुं कारण हे ॥ १ ॥२॥ वीजें वृक्ष अनंतता रे लाल, पसरे जल योग रे ॥ वा० ॥ तिम मृळ आतम संपदा रे लाल. प्रगटे प्रभु संयोग रे॥ वा० ॥ तु० ॥ ३ ॥ अर्थः-हो कारणकार्य भाव कहे . जेम वीज होय तेनां अनंता वृक्ष उपजवानी ठवी हे, पण मू कहेतां माटीमा नाखे, तथा जल रहेतां पानी सोचे, एशे संपोग मले. वारें जगे, एटले मानी तथा पानीना संयोगे वधे. ए रीत हे, लेम उपादानधर्म ते निमित्तकारण दिना प्रग नहीं. ए रीतें माहारी आत्मसंरक्षा पद्यति सत्तारू उती हे पण वारें प्रमु श्रीवीतराग देव मुदस्वरूपीनो योग मजे, तेबारे प्रगडे ते आलंबी तल्लने आलंबने वर्ते, तो ते निपने, एम महारे आत्माविषे सत्ता सर्व के पग श्री अरिहंतरूप निमित्त मडे, वारें सिदि नापजे ॥३॥ इति तृतीय गाथाः।। जगतजंतु कारज तचि रे लाल. साधे उदयें भाण रे ॥ वा०॥ - दे० चौ. वा. चिदानंद सुविलासता रे लाल, वाधे जिनवर जाण रे॥वा०॥ तु० ॥४॥ अर्थ:-सर्व जगत्वासी जीव आहार, विषय, परिग्रह मेलववारुप कार्यना रुचि कहेता अमिलापी छे, एटले पोत पोताना कार्य करवा रूप परिणाम सर्व जीवोने छे, पण सूर्य उद्योनरूप निमित पाम्या विना कार्य करी शके नहीं. सूर्य उयोनरूप निमित्त कारण पामे, तेवारे सर्वलोक कार्य करवा लागे, ए रीत प्रगट देखाय छे, तेम माहारी आत्मा चिद् कहेतां ज्ञान, आनंद कहेतां अव्यायाधमुख अथवा सकलज्ञेय ज्ञायकता रूप जे ज्ञान तेहनो जे आनंद, तेने विदानंद कहिये, तेनी सुविलासता कहतां शुद्धपणे विलास एटले भोग- वq, ते आत्मानंद भोगीपणुं ते यद्यपि सतानेविपे छतुं छे, तो पण जेवारे श्रीजिनराजनो वर कहेता प्रधान अनुष्ठानदोष, तथा एकांत दोष, तथा अर्थापत्तिदोष रहित ध्यान करिये, तेवा आत्मानंद प्रगटे, उपादान छे पण हे प्रभु ! तमारा जेवु निमित्त मले प्रगट थाय. माटे माहारे प्रभुममान उप- कारी कोई नहीं, ते कारणे हे परमेश्वर । ताहरू दर्शन मने व्हालु छ, जे अनंता भव भमता न पाम्यो ते जो मले, तो माहरू अनग्गी जनत नन उनना कालन परिः जाय । उक्तं च ॥ ननन मोहतिमिनटोपनन, पूर्व विभो सकतपि प्रविगेकिलोऽसि ॥ ममावियो विधयति हि मामनर्था प्रोद्य- नप्रयागतय ग्रन्ययते ॥ १ ॥ एटले प्रभून दर्शन दुर्लभ पष्ट श्री पद्ममभजिन स्तवनं. ६०३ - लब्धि सिद्ध मंत्राक्षरें रे लाल, उपजे साधक संग रे ॥ वा०॥ सहज अध्यातम तत्वता रे लाल, प्रगटे तत्त्वीरंग रे ॥ वा० ॥तु०॥५॥ अर्थ:--वली वृहांत कहे छे. जेम आकाशगमन प्रमुख सब्धियो तेनी जे सिद्धि ते विद्याशक्ति मंत्राक्षरमां छे, पण ते तेहवो उत्तर साधक मले. तेबारें नीपजे, तेम सहज स्व. भावरूप ने अव्यात्म कहेतां आन्मावी तन्मयपणे रही, जे स्पादादरूप ज्ञानदर्शनादिक आत्मिकपरिणतिरूप तत्वता, ते यद्यपि वस्तुधमे आत्माने विपे उनी छे, पण जेवारें निष्प- तत्त्वी शुद्ध निर्मल, निरावरण, आत्मस्वरूपभोगी, आत्मरमगी, आत्माश्रयी, असंख्यात प्रदेश पुलसंश्लेषरहित, एका शुद्धदेवने आनंबर्ने एक रंग करे, तेबारे ज्ञानावरणादि कर्मयी रहित निरावरणरूप प्रगट भाव उताप नीपने ॥५॥ लोह धातु कांचन हुवे रे लाल, पारस फरसन पामि रे ॥वा० ।। प्रगटे अध्यातमदशा व्यक्तगुणी गुणग्राम रे ॥वा० ॥तु०॥६॥ अर्थः- बीजो दृष्टांत कहे छे. लोहयातुमन्यं कांचन क "हेता सुवर्ण थवानी सत्ता है, तोपण पारम पार :मुख जान निमित्त पामीने पोतानुं सोनाप लहे छ . . जीवनी पण शुद्ध आत्मिकदशा यद्यपि सत्तारूप है, पण व्यक्त रे लाल, १ .

दे० ०"बा कहेतां प्रगट कर्मावरण रहित जे गुणी अरिहंत तेहना गुण- ग्राम करतां, स्मरण करतां, आपणो आत्मा गुणानुयायी पइ संपूर्ण गुणीपणुं पामे, वेवारे सत्ता प्रगटे. इहां कोई पूछशे जे. निमित्त विनाज सिद्धपशुं केम म पामे ! तेने उत्तर कहे छे.. ने आत्मा अनादिनो पुद्गलरूप परनिमित्त पामीने बंधपद्धति को छ, ते जो पुद्गलरूप परनिमित्त मुके, तो मुक्त थाय, ते पुगलरूप परनिमित्त तो अरिहंतरूप शुद्ध निमित्तने अक्लंन्या , विना टले नहीं. माटे श्री वीतरागदेवरूप शुद्ध निमित्त पामेयी, आप तव प्रगटे ॥६॥ आत्मसिद्धि कारज भणी रे लाल, सहज नियामक हेतु रे ॥ वा०॥ नामादिक जिनराजना रे लाल, भवसागरमहासेतु रे ॥ या० तु० ॥७॥ अर्थ:-तेमाटे आत्मसिद्विरूप जे कार्य, ते करवाने सहज अकृत्रिम नियामक केनां निधार, हेतु केतां कारण ने श्रीवी- तराग देव वेने पामीने निश्चे भव्य जीवने मोक्ष नीपने, ए निर थपो. नामादि केनां नामनिक्षेपादि ते अरिहंत एहयु नाम देने अवणे, उचारणे, स्मरण री पण अनेक जीव गुणावलंया पद ममकित प्रमुख गुण पामीने सिद्ध पया. नया श्रीअविहननी स्थापना जे मृदा ममतानी ममुह, वियपत्रिका दिन. अतिशयमान, की जिनाम्ना मा योग श्रमं ग. * अनय गुणावगर्व' या न जा मांद माया, उपचाग . . ना मोवाय प्रबनीय 1-1-1 पष्ट श्री पद्मप्रभजिन स्तवनं. जिनराज, वेहना विवहार उपदेश समवसरण देखी अदभुतताने अलंबी, गुणावलंयी घट् अनेक जीव स्वधर्मसंपदा वरी सिद्धि पाया तथा अरिहंतनो भावनिक्षेपो ते अरिहंत न्यना गुण जे केवलज्ञानादि तथा पर्याय ते अगुरुलयतादि व्हनी अनंत परिणति ने भासन, श्रद्धान तथा रमण केतां पोताई तन्न तेने अवलंता अनेक जीव मोक्षरूप लक्ष्मी पाम्पा; माटे ए श्री अरिहंतना जे नामादि बार निक्षेपा हे, ते भवरूप महा समुद्रमध्ये सेतु केतां मोहोटी पाज समान हे. माटे प्रभुना नामादि चार निक्षेपाने अवलीने आत्मसिद्धि कावी ॥७॥ इति नाम गायार्थः ।। स्थंभन इंद्रिय योगना रे लाल, रक्तवर्ण गुण राय रे । वा० ॥ देवचंद्र बृदें स्तव्यो रे लाल, आप अवर्ण अकाय रे ॥ वा० ॥तुगादा अर्थः-वडी श्रीपद्मप्रश्न स्वामीनु रक्तवर्ण शरीर ते सामा जीवना इंदिप तया पोगर्नु स्यंभन डे, एटले इंद्रियो कर्णा- दिकने अवलंबान हे माः प्रभुजी गते वर्णे हे, गुणगांमी- दिक तेहना जा के. देव, धर्म देव ते साध. नग्देव ते चवत्ती. भावंच के नवनि प्रनुक. नेहमा चद्रमा स- मान, बली हा गणवादिर हन' का समूह. तेथे स्तन्या, पण प्रभु केहा , के. अगय. अफरस, एहवा अकाप हे. जर 'हत है. एके भारकर्म.म्यकर्म, नोकर्मरहित हे. सकल पहलाकात हे. एहवा श्रीपद्मप्रभ देव ६०६ दे० चो० बा० ते मने आधारभूत छ, परमशरण छे, एना निमित्तें परमपद नीपजे ॥८॥ इति अष्टम गाथार्थः ॥ इति पष्ठ पद्मप्रभजिन स्तवनं संपूर्ण । ॥अथ सप्तम श्री सुपार्श्वजिन स्तवनं ॥ हवे श्रीसुपार्श्व प्रभुने सहजधर्मरूप तत्त्व संपदापणे स्तबे २. जगतना जीव पुगलानंदी छे, ते नवा पुदलने लेवे करी आनंद पामे छ, पण ते पुलसंयोगजन्यसुख, तया दुःख, ते आत्महित नहीं विभाव छ माटे, अने जे आत्मानु सहज सुख ते आत्मधर्म छे, ए रीतें आगममध्ये उपदेश छे, ते कहे छ जे आत्माना अनंता गुण छ, ते गुणगुणतुं सुख जुदं जुई है, अने एक अन्यायाध सुखरूप आत्मधर्म जूदो छे, एक इहवी व्याख्या छ तथा आत्माना ज्ञान दर्शनरूप गुण, ते फूलगुण छे, अने वीर्यादिक सर्व ते गुणनी प्रवृत्तिरूप धर्म छे. एक एवी पण व्याख्या छे. अने १ ज्ञान, २ दर्शन, ३ चारित्र, ४ दान, ५ लाभ, ६ भोग, ७ उपभोग. इत्यादिक भनंतगुण आत्माने विषे छे, तया विशेषावश्यकमांहे कयुं छे. क्षायिक सम्यक्त्व केवलजान केवलदर्शन सिद्धत्वानि पुनः सेझावस्थायामपि भवति । अन्ये त दानादिलब्धिपञ्चक चारि- सिम्स्यापीन्छति तदावरणम्य वायभावात आवग्णाऽभावेपि व नदसत्त्वे सीणमोहादिवपि नामवप्रमगात ततस्तन्मते पारिवाना मिद्रावग्यापामपि सद्भाव पुनग्नस्वाय गुनगयादि. हण कुर्वन जो यति ॥ अवाऽनन्तवमान्मकतया शक्या. प्र. नायिन सर्व मा प्रतिपटम्प्रवचनन त पमा यथा सम- सप्तम श्री सुपार्शजिन स्तवनं. ६०७ कमायोजनीयाः क्रियावत्वं पर्यायोपयोगिता प्रदेशाष्टकनिश्चलता एवं प्रकाराः सन्ति भुयांसः । अपि समुन्वये । एवं प्रकारा अनादिपारिणामिका भवन्ति जीवस्य भासः । इहां जीवने विपे अनंता धर्म जुदा जुदा क्रा, तया रत्नाकरास्तारिकामध्ये सम- भयधिकारे । नन्वेस्मिन् जीवादी प्रतिवस्तुन्यनंतधर्मात्मकत्वे- नानंतधर्मवत्वमेव । स्यावाइल्नाकर । एकत्र वस्तुन्येककधर्म- पर्यायानुयोगवशादविरोधेन व्यस्तयोः समस्नयोधविधिनिषेधयोः स्पात्कारांकितः समधा वारमयोगः समभंगीति । नन्वेकस्मिन् जीशदिवस्तुन्यनंताविधीपमाननिपिवमानानानाधर्माः स्पाहादीनां भवेयुः । बाध्यता पत्तत्वा द्वारपतापाः नतोविन्दैव सम- भंगीति युवा निरस्पति । एका वस्तुनि वित्रीयमाननिषिव्य- मानानंतयाऽन्युपगमेनानंतभंगी प्रशांत समभगीति न थे- तति नियनिति अत्र तिमाह ॥ विधिनिषेधासागरेक्षया मतिपयांपकानन्यसतानामति नमभंगीनामेव मंभवादिति तथाप्ये- कैकरायमाभिन्य विधिनिषेधविकन्याभ्यां न्दन्नम्मन्नाभ्यां मर्मव भन्यः भवति न पुनग्नतान्नवथमनतम मगादिनातवं समभपाः नमुनापने तन ल्पगढ़ः । प्रतिपाय प्रतिपक्ष तु पर्यनुपोगाना मात्र गमवादिति अन्नधासा भगीनामावनिमनन्छ । एक यदि अनना हा ? ने धर्म नया मकान . संभार ६०८ दे० चौ० वाज गुण अने धर्म ए बेतु एकज छे, श्रीविशेषावश्यके " जह सो विसेस धम्मो, चेपण तह मा किरिया " इहां घेतना- गुणने धर्म कही बोलाग्यो छे. वली भाष्यने तिपे। आह ननु गुणस्वभावयोभैदएव तन्दनिबनधर्म मेदाभावात् ।। इत्यादि । हो मेद गुणना भांगीजें, तिहां अम्तिकता लहिये जी ॥ ए पाठ द्रव्यगुण- पर्यायना रासमां यशोविजयजी उपाध्यायें पग अस्निाता धर्मने गुण कही बोलायो छे. बली सिद्धांतमा पण उपयोगादिक अव्यापात्र नया अवनेआदिक अनेक गुण क्या छे, तथा नत्वार्थमा मुक्त आत्मा निक्रिपः नया क्षायिकमम्यात्ववीर्य- सिद्धन्वयनज्ञानेगत्यंति के. संयुक्तोनिदेनापि मुग्न तयाऽ- ग्निकापवाणवत्यानादित्यामंग्व्येयप्रदेशवत्वनिग्यत्यादयः सत्येय जीवग्य. परि भगवती मां सिदने अनीपा नया अयारिधीया कहा है. नतो करणम्प चवीपनी ओक्षा करा, पण तेहीज श्रीअन्योग द्वारमा शायिकधि अधिकार तथा पत्र दमाम्नमां वीर्य ने जीवलक्षण . पम का . नया पारिष प्रतिरूपनी ना है, पण ग्यिानाकपचारित्र ने नो जाग्नु म्दरमा, ने दनापयनना अटकावदामा अध्ययनदी जोया नया वाहितमले वा श्रीमचरित मानुनि अध. २. द्वात्रिम गृणा । यसमें " PE0 समन श्री सुपार्वजिन लवनं. एम पान तथा आननीनांसादिक जनेश योनां कयु हे, ना जालानी जेबारे नेम्पास्या कर तेनारे गुण - नंताएक एक गुणने दिले अविभाग जनता, एक एक अविभागले दिन जनता पाप, एकापडाने दिले पाल्या देखाप , ने तेज अविनान नया पायन एका पा श्रीभगवानी वीसन देखाय हे अने संत व्याख्या गुण- पपोप बेहुने एक पापास्तिक वही बोलल्या जे. एम नवि- विन्न वडीने श्रद्धा सरुवी. इहां श्रीअरिहंत पने विश ओलावा निनि गुनगुपनी हुनी जुनी पाया जगाया माटे तथा पोतनी तत्तानी विद का ना गुणगानो हो जो धर्म कही लवना करर्षे उ. प्रशस्ति पद. ॥ हो सुंदर तर सरिखं जग कोई नहीं ॥ देशी ॥ श्री सुपास आनंदमें. गुण अनंतनो कंद हो ॥ जिन जी ।। ज्ञानानंदें पूणो. पवित्र चारित्रानंद हो । जि० ॥ श्रीगा। अर्थ:-श्री मुरार्थम आनंही है. हुन आनंद ते एने कि, जेनांहे परनो नेल नयी. वर मुख हे. वी सुमार्यप्रनु केहता हे ? के गुले महनावी अथवा 'व्या- त्रिता गुणाः एम्प ने मनाय नेहने अत्रि रहाते गुण, प. तेनां अन्य गुना नहीं, गुमले तो पाप . मुझे समजावा गुमा इति कन्चभावचनाननया अरमाने .

दे० चो. बा. जाणणा नत्यि इति आवश्यकनियुक्तिवचनात्। माटे गुणने विषे पर्याय छे, पण गुणने विपे अन्य गुण नयी, श्रीनपचक्रमां कहे छे, जे गुणने विषे अन्यगुण पy होय तो गुण ते द्रव्यपणुं पामे, तेमाटे गुण ते निर्गुण छे, एटले सुपास प्रभुरूप द्रव्य छ, ते ज्ञानादिक अनंत गुणनो कंद छे एटले मूल छे. तिहां ज्ञान जे आत्मानो विशेषावबोधल्प सकल विशेप धर्म गुण- पर्याय, तेहनी अनंती परिणति तेहनो ज्ञायक नित्यानित्यादिक अनंत धर्गनुं ज्ञायकत्व, वेत्तृत्व, अगुरुलधुत्व, अनंतपर्यापनो पिंड, ते ज्ञानगुण ते लोकालोक सकल प्रत्यक्षरूप सर्वप्रदेश- निरावरणारूप तेहने आनंदें करी पावनो कहेतां पवित्र छ, पूर्ण छे. वली कपाय तथा पुगल फल आशारूप दोपरहित एवं स्वरूप स्थिरतारूप जे चारित्र, अनंतपर्यायात्मक, अक- पायता, अवेदता, असंगता, परमझमा, परममार्दव, परमनिलों- भतारूप, स्वरूप एकत्वरूप पास प्रभु ! ताहारे विपे छे, एटले चारिघानंदमयी छो, ते माटे पवित्र निर्मल हो ॥ १ ।। इति प्रथम गाथार्थः॥ संरक्षण विण नाथ छो, द्रव्य विना धनवंत हो ॥ जि०॥ का पद किरिया विना, संत अजेय अनंत हो ॥ जि० ॥ श्री० ॥२॥ अर्थ-वली हे प्रभ । नम सरक्षण बिना नाय कहतां यी छो, एटो कोई अन्य नीचना तथा अन्यदत्यना रख- वाडी करना नयी, केम ने मरक्षण पा करव. । ए नमागे

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दे० चो० पा० --- जना रयापत पोताना ज्ञापकादिक गुण, तेनी प्रति सहित जे ज्ञान, दर्शन, चारिय, वीर्यादिक गुण, अन्वयी गुण यहिये, वेदीन ऋद्धि पदेनां संपदा तेहना रामह छो, अने कपायादि दोपने ये करी जे अकसायादिक गुण उपना, वे पतिरेक गुण कहिये, नयी सति सद्भायो एटले जे छते पामिये, हे अन्वयी गुण कहिये, तेहना समह छो. यली वर्ण, गंध, रस, फरस, ते पुद्गलम , नयी त रहित छो, अने निज कहेतां पोतानो जे स्वरूपधर्म, नेहना भोत्ता छो, गुणना यह कहतां रामद छो॥३॥ इति ।। अक्षय दान अचिंतना, लाभ अयलें भोग हो ॥ जिन० ॥ वीर्य दाक्ति अप्रयासना, शुद्ध म्यगुण उपभोग हो ।जि०॥श्रीला॥ अर्थ:-चटी है. प्रमुनी। नमाग अनंता गुणनी पनि देवी र ? ने की. दीयंगुण ते सवंगुणने पदकार दिर है, नेम नान गुणना उपयोग बिना वीर्य करी दारे. नहीं, नवी वीने मदाय आनगुणन है, नया मानमा रमण ते परनु रहर, अनं पगमा नको, ते पारिसने मनन महार. प्रम एक गाने अना गुण गदाय छे. होने दिने नो मामलामा हान- . . " 14

सनम थी मुपाजिन लनं.
६१३
तमें सादि अनंत दा. साधीन पने स्वगुणस्प पारने
अनंत दान अपरने हो हो. पर फेवारें शीण न थानो
माटे जप का ज्ञान आगो झो. एहलो दानगुण तमारे लिये
है, अने ने गुपनी महापत्र शक्तिनी प्राति. ते टान
रे, पीजाने से चितो. ने साम धापने पर निर्धार नहीं,
जने है मनुजी : मार दिरे विना विकल्परूप ले साना-
घर ते नी. तेष लाभ अनंतो है, मारे अनचिया
सामना धनी हो. पहबो लाभा है. इसी हे अनुजी तमें
पोताना पापने प्रतिसमये भोगतो हो. पन प्रयास दिना
भोगने हो, माई न पनना प्रश्नविना भोगनती हो,
बना सर्व सनी मति नहाप ने वीर्य दे जन
अन्पहार दिन पुर्व ई है. प. ते वादनी पृ दिना
परमें एक उदा हिना वा पुरे हे. वर्डी हुद्ध स्वरान
केन. जे सगुः नेहनो उभोग हे. ए पांच
संपनी विनः भर दी मंच मन प्रगट्या हे,
रे पनुनी । न कपन का सपनो लान,
सापने भग. मानो - बारित नहकार
न. है .
:::५८ ॥४॥इति।।
एतिर आत्यंतिका
सहज अहन न्वाधीन हो । जिल।
निम्नन्ति निद मुन
अन्य मानक - - : श्री॥५॥

प
६१४
दे० चो० बा०
पाछो दुःख पामे नहीं, वली आत्यंतिको केतां जेथी पीज
वघारे सुख कोइ नयी, एटले सर्वयी अधिक ते पण सहज
केनां स्वभावन अकृत केतां अणकीg पण कोइनु करेलं नहीं,
वली ते पोताने स्वाधीन पोताने वश पण पराधीन नहीं.
वली निरुपचरित केतां जे उपचाररूप नहीं, अछता आरोपने
उपचार कहिये, ते ए सुखमा काइ उपचारपणु नयी, संसारमा
शातावेदनी सुख, ते उपचरित सुख छ, केमके शातामध्ये
सुखधर्म नयी, पण अज्ञान मूलें, संसारी आत्मा, सुख मानें
छे, पण वडेरा एने सुख कहेता नयी, जे संसारामिनंदी मोहें.
मुद्र परमार्थने अजाणता विषयगृद्ध पका इंद्रिपदेहजनित .
विषयसुखने सुख माने छे, ने जाने मुख नहीं ॥ यतः।।
विसपमुहं दुखं चिय, दुःख पडियारओ तिगग्छंय ॥तं.
महमुवयाराओ, न वयारो विणा तथं ॥१॥ इति विशेषा-
वरपके ॥ तथा शातानो उदय, ते पण स्वधर्मरोवक छे, अने
पुदल कर्मनो विपाक छे माटे ते सुख नहीं । सापासापं दुःख,
तस्विरहंमि य गृहं जउत्तेणं ॥ देहिदियेसु दुख, सुख देहि
दिया मावो ॥ इति ॥१॥ एम औदायिक मुख, वे मुख,
नहीं, अने जे सिद्धनिरुपम अनंन आत्मस्वमात्र मागमात्र
मोक्ताप नेज मुख जाण. पली निद कहतां जेमा अग्य
नीव तथा अजीव इयनो संयोग नहीं, पटले परयसनो भेट
नयी. कदापि पावरमुन कारण पामीने अर्नु हो । विहां
कहे रे. जे ने सिद्धमुग्य को के अन्य केतां पीजां
दथ्य हेनुपा जेमा नदी की पान केला पाने, प्रयन
B. पाट श्रीमगजिनन प्रारक मुग्म में महानंद .
-

सप्तम श्री सुपार्श्वजिन स्तवनं. ६१५ एक प्रदेशे ताहरे, अव्यावाध समाय हो॥जि०॥ तसु पर्याय अविभागता, सर्वाकाश न माय हो । जि० ॥श्री०॥६॥ अर्थ:--चली हे प्रभु ! तमारा आत्माना एक प्रदेशने विषे अनंत गुण, अनंत पर्याय छे. तेमांहे हे प्रभुजी ! ता- हारे एक प्रदेशे जे अन्यावाध गुण समाद् रह्यो छे, ते अनंतो छे, ते अन्याशय मुखना पर्याय तेना अविभाग ते केवलीनी प्रज्ञापे जेहना एक खंडना वे खंड न थाय, तेने अविभाग कहिये, ते अविभाग लोक तथा अलोकाकाशना एकेका प्रदेशे एकेको मुखनो अविभाग राखियें, तोपण सर्वाकाश कहेता टोक अलोक रूप सर्व आकाशमां समाय नहीं, एटले आका- शना प्रदेशयी पण नमारे एक प्रदेशे रघु जे अन्याराव मुख, तेना अविभाग :नंत गुणा छे ।। यतः ।। खिनाओ भाव- धम्मा अर्णतगुणा ।। इति ।। सदा भंवधर्मयी भावधर्म अनंत गुणा हे ।। ६ ।। इति ॥ एम अनंत गुणनो धणी, गुण गुणनो आनंद हो । जि० ।। भोग रमण आम्यादयुन. प्रभु तं पन्माद हो । जि० ॥श्री॥७॥ अर्थ:-एर कता है भनी । नमे अनंत गु- णना धनी हो. जान. न. चारित्र, वायं. लम्यावाघ, अम-

दे० ० बा०
तता, अगुरुलघु, दान, लाभ, भोग, उपभोग, कर्ता, भोक्ता
पारिणामिकता, अचल, अविनाशी, अनंत, अज, अनाश्रयी
अशरीरी, अणाहारी, अयोगी, अलेशी, अवेदी, अपायी
असंख्यप्रदेशी, अचल, अक्रिय, शुद्धसत्ताप्राग्भावरूप, नित्य,
अनित्य. एक, अनेक, सत्, असत्, मेद, अभेद, भव्यत्व,
अभव्यत्व, सामान्य, विशेप, इत्यादि अनंत गुण पर्यापरूप
धर्मना धणी छो. ते गुणनो जुदो जुदो आनंद छे, तिहां दृशंत
कहे छे. जेम संसारी जीवने धननु मुख भिन्न छे, रूप सुख
मिन्न, भोजननुं सुख भिन्न, देखवानु मुख मिन्न, स्थानक
मुख मिन छ, तेम सिद्ध आत्माने पण गुण गुणन सुख
मिन्न भिन्न छे, तेथी अनंतो अनंत रीने आनंद छे, एटला
सर्व गुणनो आनंद ले, ते सर्वनो भोग पण छे, केम के
भोगव्या विना आनंद थतो नी, एटले अनंता गुणना आ.
नंदनो भोग अनंतो छ, तेमज ते सर्व गुणने विषे अनंतुं
रमण पण छे, तेम अनंतो आस्वाद पण छे, केम के अनंता
गुणने आस्वादीने भोगी थयो थको आनंदने विलसे छे, माटे
अनंतो आस्वाद पण छे, तेथी हे प्रभु । तमें परमानंद छो.
इहां गुणगुणीनो अमेद उपचार बोलायो, जे परमानंदमयी
तेहीज परमानंद, एहया परम देव छो ॥ ७ ॥ इति सनम
गाचार्यः ॥
अव्यावाध मचि थई.
साधे अव्याचा हा ॥ जि० ॥
देवचंद्र पट लह.
परमानंद ममा हाजि ॥श्री०

समम श्रीसपार्शजिन स्तवनं. - अर्थ:--एहई परमानंदरूप अम्पावाय मुख श्रीपरमात्म- प्रभुने विषे ठे, ते में निर्धार करयो, तेबारे जाण्यु के जेवू अन्याबाय सुख श्री सुपार्श्व प्रभुने विश छे, एहज सुख माहारे विखे पण छे, एहा जाणपy प्रगट्यु. तेथी भन्य जीवने उपयोग आम्यो, ले ९ पण ज्ञानादि अनंत गुणी छ, हवे माहारो शुद्धानंद भोग केवारें प्रगटे ? एहवा उपयोगें ले जीव ज्येष्ट महिनामां जेन वपैयो तृषातुर थइने बरसादने अमिलार्षे वरते, तेनी परें ले जीव, अन्याबाय सुखनो रुचि अमिलापी घड्ने पुलसंयोगजन्य जे सुख तेनो विषभक्षण समान आत्मस्वरूपनां चातक जानीने तेथी उभग्यो थको एक आत्मानंद केबारे प्रगटे ? एवो धको वर्ते, पछी तेहना सायक जे मुनिराज तेनां चरण सेवतां उदासीन थइने सावे, केतां निपजावे, आत्मिक अन्यावार सुख प्रत्ये. एटले उत्तम जीव स्पाद्वाद आगम प्रवण करी, पांच आश्रयी चिरमी शुद्धसंयमी घर, देहनिस्पृही धको मोसने साचे ।। उक्तं च ॥ यतः ।। पंचासव विरता, विसप वित्ता समाहि संपत्ता ।। राग दोस विमुत्ता, मुनिणो साहंति परमन्यं ॥ १ ।। आउस्स खीणमाग, मुप्पाणवियोगेवि ले समाहिपया ॥ तावय दइडबपावि हु, मु- निणो साहंति परमन्यं ।। २ ।। एहवा मुनिराज विशाल विष- पना अवांडक, तत्त्वगवेपी, तत्त्वरसिया, नत्वानंदरुवि, पोतार्नु तत्व, अनादिन कर्ममंगे दवा में प्रगट कम्बा मार सकल पुद्गलभाषयी विक्त. यहने में अम नरज' हे ते जीव, निमित्तावलंबनी थइ स्वल्पावटकन तां परमचे एकत्र पामीने क्षपकगि आगेहण कर वनवाति कर्म खपावीने सयोगी केवी थद्, पड़ी शैलेशीकरण करी निःकमा घड्ने , 78 दे० चो० प्रा० i-MA- देव जे धर्मदेव मुनिराज, तेमाहे चंद्रमा समान एहयु अरिहंत पद तेने ते जीव पामे, जेमां परमानंदनी समाधि छे, अने सकर्मारूप अवस्था ते महान्याधि छे, माटे निरावरण निर्मा- वस्था ते परम समाधिरूप छे, ते अवस्था श्रीसुपार्श्व परमा- त्माने अवलंबतां जीव पामे, माटे श्रीमुपाई मभुनी सदा सेवना कवी. एहीज आधार, बाण, भरण छे॥८॥ ॥अथ अष्टम श्री चंद्रप्रभजिनस्तवनं । ॥ श्री श्रेयांम जिन अंतरजामी । एदेशी। श्रीचंद्रप्रभ जिनपद सेवा, हेवायें जे हलिया जी ।। आतमगुण अनुभवथी मलिया, ते भवभयथी दलिया जी ॥श्री०॥१॥ अर्थ:-हवे श्रीचंद्रप्रभ भगवान्नी स्तवना कहे छे, अने सेवना पण ओलखावे हे, ते श्रीचंद्रनभनामा आटमा प्रभुनी पद केतां चग्णनी सेवा अथवा अरिहंत पदनी सेवना, तेहनी छे हेवा केतां चाल रीन, तेहमांजे हलिया केतां तेवी टे। पड्या छे, तेहने प्रभुमेवन विना काल जाय नहीं, जेहने असंख्यात प्रदेशे श्रीप्रभु परमात्मा परमपूज्यनु आराध्यप छे, ते जीव आत्मा चेतनाला नव्यान प्रदेश म्वधर्मना कर्ता, स्वधर्मना भोका पोताना गणा ज्ञानदानादिक. नेहनो अनु- भव केला भोगवय. नेत्या मध्या के ये आमगृणभोगी अश्म श्रीचंद्रप्रभजिन स्तरनं. .. .. थमा हे, तेज जोन का केतां चार गतिल्प संसार हनो ने भय, जन्न नरल वल्परोया कर्माधीनतारूप, तेहथी उल्या हे. एटले पयार्यरत ने परमात्माने सेवे, ते अवश्य जसंसारी शाप. तेना वा चोग्य वयात आल्या. ए न्यायें, हपन वचन हे, जो कारण महे. तो कार्य नीपजे. तेन उत्तम जीब अरिहंत सेवन परिणम्या प्रभु मल्याना हा संतार समु- ने गोपालमान माने हे ।। ।। इति प्रथमः ।। द्रव्यलेव वंदन नमनादिक. अर्चन बली गुणग्रामो जी ।। भाव अभेद थावानो ईहा, परभा निःकामो जी ॥ो॥२॥ अवना चार प्रकारनी हे. १ नामसेवना, २ स्थापनालेवना, नवना, ४ भावनेवना. तेमां नाम तथा स्थापना. एदना को सुगम हे. भने द निपाना दे भेद है. एक. आगमन दम्पनिया. अने बीजो नोजा- गायी निमोदिहा ले आगमी दयनिक्षेपो, तेतो जे सेवनानो अर्थ विधि जा. प. ते कारें है अर्थतो उर- पोग न ते आगमन निको हदें। अनरोगोदई । इति अनुपोगनावचन" हरेजो नोअगमवी पनि तेहना वर्ग : द ए नागर, ह भाग, मौत तदापतिरिक्त दर बिना भाव पनि हला. . न. पा. वेहन . ते जर - निझरे हे. ए पाले मंह. नया हम वना- :

दे० घो० वा ArA देव जे धर्मदेव मुनिराश, तेमाहे चंदमा समान एह अरिहंत पा रोने ते जोर पामे, जेमा परमानंदनी समाधि छे, अने सफारूप अपस्या ते महान्याधि छे, माटे निराबरण निःकर्मा- यस्था ते परम समाभिरूप ले, ते अपग्था श्रीसुपार्थ परमा- माने जायतां जर पामे. माटे श्रीग्रपात्री प्रमुनी सहा मेगना की. हीज आधार, नाण, दागा रे ॥८॥ ॥अथ अष्टम श्री चंद्रप्रभजिनस्तवनं । ॥ श्री श्रेयांग जिन अंतरजामी दी। श्रीचंद्रप्रभ जिनपद संया, हेवायें जे हलिया जी॥ आनमगुण अनुभवथी मलिया, ने भवभययी टलिया जी ॥श्री०॥१॥ अंधः-हवे श्रीचंद्रप्रभ भगानी नाना यहे, अने मेदना पण ओलदायी ने श्रीपप्रमनामा आठमा प्रमनी पद केतः सानी मेगा मया भहित पदनी मेगना, हनी दे देता येतां बाल गन, देशमा ने दिया बताती हैं। पहा है, देहने प्रवन मिना मार मार नही, जेने अपन देग श्रीव पाया पानातं, अगमा, देशी ना कना, Tara नया भर अश्म श्रीचंद्रप्रभजिन स्तवनं. - - - - थया छे, तेज जीव भव केतां चार गतिरूप संसार तेहनो जे भय, जन्म मरण स्वरूपरोधक कर्माधीनतारूप, तेहथी टल्या छे, एटले यथार्थ रीते ले परमात्माने सेवे, ते अवश्य असंसारी थाय. तेमाटे टलवा योग्य थया ते टल्या. ए न्यायें, हर्पनुं वचन छे, जो कारण मले, तो कार्य नापजे. तेम उत्तम जीव अरिहंत सेवन परिणम्या प्रभु मल्याना ह संसार समु- द्रने गोपदसमान भाने छे ।। १ ।। इति प्रथम० ।। द्रव्यसेव वंदन नमनादिक, अर्चन वली गुणग्रामो जी ।। भाव अभेद थावानी ईहा, परभा निःकामो जी ॥श्री०॥२॥ अर्थः-ते सेवना चार प्रकारनी छे. १ नामसेवना, २ स्थापनासेवना, ३ द्रव्यसेवना, ४ भावसेवना. तेमां नाम तथा स्थापना, ए वे सेवना तो सुगम छे, अने द्रव्यं निक्षेपाना वे भेद छे. एक आगमथी द्रव्यनिक्षेपो, अने पीजो नोआ- गमयी व्यनिक्षेपो, तिहां जे आगमयी व्यनिक्षेपो, तेतो जे सेवनापदनो अर्थ विधि जाणे, पण ते काले ते अर्थनो उप- योग नथी, ते आगमयी द्रव्यनिक्षेपो कहियें। अणुवओगो दछ । इति अनुयोगद्वारवचनात् " हवे बीजो नोआगमयी द्रव्यनिक्षेपो, तेहना वली. पण भेद छे. एक ज्ञशरीर, वीजें भव्यशरीर, चीजें तव्यतिरिक्त शरीर. तिहां जे जे सेवना भावरूप परिणम्या हता, पण प्राणमुक्त थया, तेहनां शरीर, ते ज्ञशरीर द्रव्य- निक्षपे छे, ए पहेलो भेद. तथा जे जीव हमणां तो सेवना- दे० चो० चा० Mod देव जे धर्मदेव मुनिराज, तेमाहे चंद्रमा समान एहबुं अरिहंत पर तेने ते जीव पामे, जेमां परमानंदनी समाधि छ, अन् सरुमारूप अवस्था ते महान्याधि छे, माटे निरावरण निःकर्मा- वस्था ते परम समाधिप छे, ते अवस्था श्रीसुपार्श्व परमा- रमागे अस्टयतां जीव पामे, माटे श्रीगुपार्थ प्रमुनी सदा मेवना कमी. एडीज आधार, वाण, शरण के ॥८॥ ॥अथ अष्टम श्री चंद्रप्रभजिनस्तवनं ।। ॥ श्री श्रेयांम जिन अंतरजामी । एदेशी ॥ श्रीचंद्रप्रभ जिनपद सेया, हेवायें जे हलिया जी ॥ आनमगुण अनुभवथी मलिया, ने भवभयथी टलिया जी ॥श्री०॥१॥ अयं-हो श्रीचंद्रप्रभ भगवान्नी नयना कद्दे छे, अने मेवना पा ओटयावे, ते श्रीचंद्रप्रभनामा आटमा प्रभनी पर वेतां पानी मेवा अा अपिहंत पदनी मेरना, रोहनी हे देवा घेता चाल गन, नेहमा जे हलिया मेनां तेवी टेरें पहा हे, देवने प्रमुवन विना कार आप नही, जेद्दने अमापन पदों श्री मदन meani दे दाम मा .ir मना कनो, * मी अष्टम श्रीचंद्रप्रभजिन स्तवनं. ६२१ ५ सुझं न याति ॥१॥ नाणाहिओवरतरं, हीणोवि हु परयणं पभावंतो ॥ नयदुक्करं करतो, मुहवि अप्पागमो पुरिसो ॥२॥ इत्यादिक वचनें भावधर्म ते मुख्य छे. द्रव्य विना भाव ते गुणकारि छे, पण भाव साध्यरुवि विना एकलं द्रव्य ते का- मर्नु नयी, ए परंपरा छे, वली परभाव जे आत्मधर्मयी अन्य पुण्यबंध शुभकर्मनो विपाक तेहनी कामना अमिलाषा विना जे व्यसेवना, ते कामनी जाणवी. ॥२॥ इति द्वितीय गाथाघः॥ भावसेव अपवादें नैगम, प्रभुगुणने संकल्पें जी ।। संग्रह सत्ता तुल्यारोपें, भेदाभेद विकल्पं जी ॥ श्री० ॥३॥ - अर्थ:--हवे भावनिक्षेपाना बे भेद छे, ते कहे छे. एक आगम भावनिक्षेपो, चीजो नोआगम भावनिक्षेपो. तिहां भाव- सेवनाना पदना अर्थने जाणतो थको तेवा उपयोगें प्रवृत्ते, ते पुरुषने आगमयी भावसेवना कहिएं, ए आधाराधेयनो अभेद ग्रही, निक्षेपो कयो, तथा जे जीव भावसेवनायें परिणम्या, हनी भक्ति, साधना, परिणति, ते नोआगमयी भावसेवना कहिये. इहां मूल वस्तुध विचारतां आत्मन्यने विपे सेव्य- सेवक भाव नयी, सत्ता सर्व द्रव्य समान छे, जने कोइ द्रव्य कोईनो धर्म लेतां देतां नयी, पण ले संसारी जीव ते ते जनादिनो अदार पापस्थानके परिणम्यो, विभावभावित थको कर्ममयी घर्डने संसारी पुटनो मिखारी, तत्वनो क्यो, मो. हने बंदीखाने दुःखमयी घयो हे. ते नेवारे स्वम्पने पामे, तेवारें सिद्ध परमेश्वर धाय. तेनो श्री अरिहंत निःकर्मा तत्त्व. - , ६२० दे० चो० बा० पणे परिणम्या नयी, पण अनागतकालें भावसेवनापणे परिण- मशे, ते भव्यशरीर द्रम्पनिक्षेपो कहिये, ए सर्व द्रव्यनिक्षेपो ते नैगमनयने मतें छे, ते बीजो मेद. तया जे सेवनानी प्रवृत्ति अंतरंग भावसेवनाने कारणपणे वरते, ते तद्व्यतिरिक्त द्रव्य- निक्षेपे सेवना कहिये. ए पीजो भेद करो. तेमाहे जे योगनी वंदन नमनादिक प्रवृत्ति, वे व्यवहार- न द्रव्यसेवना. अने जे अंतरंग विकल्में बहुमानादिक, ते ऋजुमूत्रनये व्यसेवना. ए रीतें द्रव्यसेवनानुं स्वरूप क्यु, एटले जे अरिहंतना चार निक्षेपरूप कारण दृष्टिगोचर, श्रवण- गोचर, स्मरणगोचरपणुं पामीने जे जीव, वंदन, करजोडन, नमन, मस्तक नमाव, इत्यादिक अम्युत्थान अंजलि, आधि- नतादिकरण, चंदन पुष्पादिकें करीने अर्चन, वली गुणग्राम जे मुखयी मधुर ध्वनिये गुण कहेवा, ते द्रव्यसेवा जाणवी, अने जे आत्मा संसार पराइमुख अरिहंतना गुणतुं अत्यंत बहुमान, असंख्यात प्रदेशे अरिहंतनी अरिहंततानी आश्चर्यता, अद्भु- तता, तथा अरिहंतनिमित्तना विरहें अक्षमता, अने अरिहंत ईहारूप परिणाम तेयी अमेदपणे थवानी भावपणे निपजाव- वानी ईहा, ते द्रव्यसेवा लेखे छे, परंतु भावरुविपणा विना द्रम्पप्रवृत्ति ते बाललीला समान छ, नेमाटे इहां कह्यो जे भाव तेयी अभेद थवानी ईहा सहित जे सेवा ते द्रव्यसेवा जाणवी, द्रव्यमत्ति विना एकला भावधर्मने पण तचार्थटीकामां आ- चाय साधन कयुं छे. तथा सम्मतिग्रंथे । चरण करण प्पहाणा, ससमय परसमय मुक्कवाबारा ॥ चरणाकरणस्स सार, नित्थय य

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६२२ दे० चो. बा० भोगीने पूज्यपणे अविलंयता नीपजे, माटे स्वकार्य करवाने से परमात्मा निष्पन्न सिद्ध तेहने निमित्त कारणपणे अवलंबीने अंतरंगपरिणतियी सेवे, ते जिहां सुघी एनी शुद्धसत्ता संपूर्ण पहें न थाय, तिहां सुधी ए सेवक अने संपूर्ण शुमानंदमयी थया, ते सेव्य जाणवा, ए निमित्ताचलंयी सेवा, ते अपवाद सेवा, अने ते सेवा करतां पोतानु साध्य निपजावई, ते उत्सर्ग सेवा कहिये । उक्तं च ॥ उक्कोसो उस्सग्गो, जास संपुषण मम्- लसम्भावो ॥ अवधाओ तरसाहण, सम्बृढिकरो अणेगविहो । इति ॥१॥ जे जेहनो उत्कृष्टो संपूर्ण निर्मल निर्दोष स्वभाव थयो, जेयी आगल बीजी अवस्था काहिं नहीं, ते उत्सर्ग कहिये, अने ए उत्सर्गने निपजावा माटे कारणरूप जे मार्ग अंगीकार करतो, ते अपवाद कहिये. इहां सेश मध्ये जे आत्मसायन पयु, ते उत्कृष्ट अने ते आत्मसाधन निपजायचाने जे कारण अविलंपा जोइए, ते सर्व अपवादे जाण. तेमां अरिहंतनी सेना ते आत्मसावन- कारण छे, तेयी ए अपवाद सेवना छे, ते सात नयें करी सान मे छे, ते सात नपर्नु संक्षे स्वरूप बताये छे. १ अनेके गमा. सकल्पारोपागाश्रयाद्या या रा नगमः । जिहां अनेक नामादिक गमा ग्रहवारे नया संकल्पे, आरोपे, भने अंशेपण वस्तुने माने, गमनय कहिये. २ भगृहाति वनमानामा सामान्य में मग्रहः । जे न्यपन ग्रहे, अम श्रीचंद्रप्रभजिन स्तवनं. ६ संम्हमृहीतं अर्थविषेण विभजतीति व्यवहारः। संग्रह- न म से सामान्य. व्हने संशा अंगभेदें , अदं वेहेंये, ते व्यवहानप कहिये. ४ ऋगीतानागशवपरिहारेण ऋज सरलं वर्तमान सूत्रपतीनि सहन्नः । जे ना सरल वर्तमान अवस्थाने आहे, अतीत अनागनी कायनाने से नहि, ते हात मानद . दादाव परिणनिः इति मनः। प्रकृति प्रत्यपादिक. व्याक पनि लिद येतो मन, व्हमां ने पपाई बोटे. परिपने वस्तुने वन्तु माने. नवा- इत्ती प्रतितिरिति मनपा मन्दान्य अर्थ- ६ सम्पर प्राप्तः नारमित्र ३- चन मिनि नावाने हा इति समनिस्ट- नमः । के पालना दाद का नामना पाहत अपनाई माई मिहे. या ६ भारत. नेपादे तिनो नाइपको मित हे. भई दनु बानुर रहे. सहना पहिले ७- निच कर -- ३२४ दे० चो० बा. व्यवहार, ४ अनुसूत्र. ए चार नपने द्रन्यायिकपणे द्रव्यनिक्षेपे मान्या छे, अने शब्दादिक प्रण नयने पर्यायार्थिकपणे भाव- निक्षेपें मान्या छ, तथा ऋजुमूवादिक चार नयने भावपणे कह्या छ, तेनो आशय कहे छे जे वस्तुनी अवस्था त्रण छे, १ मवृत्ति, २ संकल्प, ३ परिणति, ए त्रण भेद छे. मांजे योगव्यापार संकल्प, ते चेतनाना योग सहित मनना विकल्प, तेने श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमण प्रवृत्तिधर्म कहे छे. तथा संक- ल्पधर्मने उदेक मिश्रपणा माटे द्रव्य निक्षे कहे छे, मात्र एक परिणति धर्मने भावनिक्षेपो कयो छे. अने सिद्धसेनदिवाकरें विकल्प ते चेतना माटे भावनय गवेष्यो छे, अने प्रवृत्तिनी सीम, व्यवहारनय छे, अने संकल्प वे ऋजुमुत्रनय छ, तथा एक वचनपर्यायरूप परिणति ते शब्दनय छे, अने सकल वचन पर्यापरूप परिणति से सम- मिस्टनय छ, तथा वचन पर्याय अर्थ पीय रूप संपूर्ण एवंभूत नप छे, माटे ए शब्दादिक प्रण ते विगुभनय हे, भावधर्ममध्ये मुख्यभावने उत्तर उत्तर मूक्ष्मताना ग्राहक छ, ए रीत नपनो अधिकार संक्षे कह्यो. हो ए साते न की अपवाद मावसेवनाना सात भेद कहे थे. १ श्रीअरिहंतरूप स्वजाति अन्यगम्य तेहना स्वरूपने चिंतकवे जे चेतनानो अम प्रभुना गुणने अनुयायी मंकल्प पडेटा केबारे न थयो हतो, ते कल्पविश्यादिका निवागने प्रमुगुने जोड्यो, निमिनावरीपणा माद अपवाद अनाग परिणाम ने भाववना HTTETTE Tम माट'नगमनंय अ- बात मावस वना जागा 7 दिनापगवान को.

आम श्रीचंद्रप्रभजिन स्तवनं. २ थी अरिहंतदेवनी निष्पत असंस्पात प्रदेश निरावरण सर्व स्वशक्तिने चितवने पोतानी सत्ता पण वेहवी विचारे, उभपनो तुल्यारोप करे: अने अगनिपनानो पश्चात्ताप करे, निपनानुं परमात्मधर्म, वह मान करे, तया भेद कहेतां व्यवी क्षेवर्क, काला, भाववी, श्रीमभुनी तथा माहरु द्रव्य मिन्न हे, अने सत्तासाय अनेद हे, एहवा सापेक्षपगेले बहुमान युक्त सत्ता प्रगट करवानी सपित एवो विकल्प ते संग्रहनये अपवाद भावसेवना कहियें ॥ ३ ॥ इति गायार्यः व्यवहारें बहुमान ज्ञान निज, वरणे जिनगुण रमणा जी । प्रभुगुण आलंवी परिणामें, ऋजुपद ध्यान स्मरणा जी ॥ श्री० ॥४॥ ३ अर्यः-पोताना क्षयोपशमभावि ने ज्ञान, दर्शन, वी, तेमध्ये प्रतिसमये भातन श्रीअरिहंतनी शुद्ध स्वरूप संपदा, केवल ज्ञानादिक. अने उपकारसंपदा जे देशना धर्मक- थन, ते शुधउपकारीपर ठे. नया चोत्रीश अतिशय, पांत्रीश वचनातिशय आठ.प्रातिहारूप संपदा, तिहांज उपयोग राखे, अने केवारें श्रीमभुजीनी प्रभुता विसारे नहीं. बहुमानमध्ये श्रीवीतराग ते सर्वयी अधिक मोनापने सइहे, वीर्य ते जिन- भक्तिने विधे पोरवे, नया चा कहेतां चारित्रने श्रीअरिहं- नता गुणने विधे रमण एकव तन्मयनापा पामीने रहे, इहां के शापोपशनी आन्मागुणना प्रहा- भासनादिक. ते श्रीअरिहंत अनुपापी थह, हे मारे ए स्पहारनये अपवाद भाषसेवना कहिये. ..

दे. चो. या --- ४ प्रभु श्रीपरमात्मा अयोगी अलेशी, तेना गुणने अव- लंबीने आदरीने परिणाग जे अंतरंग आत्मद्रव्यनी क्षयोपशमी परिणति सामान्यचक्रभावरूप, तेमध्यं तन्मयपणे जे नहीं वीसरे एवा स्मरणपणे तदुपयोगें रहे, ते जिहां सुधी धर्मव्यानरूपं आलंबी साधे, तिहां सुधी, रुजुमुत्रनये अपवादभावसेवना कहिये. ए पण आत्मसाधनरुप उत्सर्गभावसेवा तेनु कारणपणू छे, तेथी ए अपवादसेवा कही ॥४॥ इति चतुर्य गाथार्थः।। शब्दं शुक्ल ध्यानारोहण, समभिरूढ गुणदशमे जी॥ वीय शुक्ल अविकल्प एकत्यें, एवंभूत ते अममे जी ॥ श्री० ॥ ५॥ ५ अर्थ:-हवे श्रीप्रभुझप शुद्रव्यने आलंधीने जे जीव भावमुनिताचाचि थइ दर्शन, ज्ञान, चारित्र, ए रत्नत्र- यीमयी परिणमीने जे प्रथस्त्ववितर्क सप्रविचाररूप शुक्ल ध्या- नपणे परिणम्यो, तेवारें ए जीव शब्दनयें भावसेवनावंत थयो, एटले रुजुमूत्रनयमां नो प्रशस्तउदैक सहित अरिहंत गुणनी इष्टतादिक परिणामने सहकारें हतो, अने जिहां शब्द- नप थयो, तिहां प्रशस्तालंबननु कार्य पड़े नहीं. साधक ने भन्यजीव, तेहना गुण ते सर्वप्रमुगुणयी एकत्व थइ स्वरूप एकत्वता पाम्या शुहाव्याननी शुभताने परिणाम्या, तेवारें शब्द- नय, अपवादभार सेवना कहिये. इहां पा निमित्तपूर्वक मंडाग छे, तेमारे अपवाद भावमेवना कही, अश्या मायनपणा मारे अपवाद कहि बोलायो.

अष्टम श्रीचंद्रप्रभजिन स्तवनं. ६२७ ६ नेवारें सायक जीव दशमे सम्मसंपगय गुणटाणे चड्यो शुहाव्यानना प्रथम पायाने अंने आग्यो, परमनिर्मल- भाव बर्यो, ते वेलाए जेटली आत्मगुणनी साधना करता योगवीर्यनी सहायें सावकता थाय, ते सर्व अपवा छे, अने उन्सनमार्गे तो योगधर्म पण आन्माने तजा योग्य हे, ते पण तेकालें सायनाम्प छेतेमाटे इहां कारणिक ग्रयो, पण स्वरूपमन्वें नहीं. अने जेलं पारणम्य लहि, ते सर्व अप- वाद ठे, माटे दाने गुणवान समभिननये अपवाद भावसे- वना हे, ए पण साधनां आसन हे. .. ७ जेबारे हापानने बीजे पापे एकत्वदित अप्रवि- चाररूपें नहटो भावमुनि निर्विकल्प समाधि परयो, स्वरूपए- का परिणम्पो, तेबारें सायना पूर्णपर थयु. ते माहे एवंभू- तनप सेवना थइ. तो कोइ पढे जे अयोगी गुणटा मुखी साधना हे. नो इहां झीगमोहगुमागे सेवनानो एवंभूत केम कहो हो? तेने उतर कहे हे जे अपोगी मुवी तो उस- नसांधना हे, अने इहां तो आवादमादनानो अधिकार है, दी अपवादमावना इहां पूरी पह. वरी कोई पूछे जे अमन निर्मोह अवस्थामां | अपशनः हे व्हने उना. जे एक पाननो बीजे पायो र हनी नदेवनानं रू आन्म- धन गई. ते प्रयोग है. हमी नशानुगत सहाय है. नया नमान्न .. . पोरानी मन नेहनं अलंगन के. विहान .:: ग: निही को गन्यानो एवम . ... ... ..

१२८ दे० चो० बा. अपवाद भाव सेवनाना सात न करी सात भेद कह्या ॥५॥ इति पंचम ॥ उत्सर्ग समकितगुण प्रगव्यो, नेगमप्रभुता अंशे जी॥ संग्रह आतम सत्तालंवो, मुनिपद भाव प्रशंसें जी ॥ श्री० ॥६॥ अर्थ:-हये उत्सर्गमागें भावसेवनाना सातनये करी सान भेद कई छे. इहां जेटलं आत्मधर्मरुप स्वकार्य नीपजे छ, ते उन्सर्गमेया कहिये, एटले करया योग्य जे कार्य ते उकृष्ट कर, पण तेमां जेटली ऊगता होय, तेमाटे नपालायका जोइये, ते फटावी देवा छे. १ चार आत्मानो शंादिपांच अतियार रहित क्षायिक आन्मिक नभ्य निर्धाररूप गुदममकिनरूप गुण प्रगट्यो, तेगा ए मायरआत्मानो एक अगे प्रभुतानो गुण प्रगटयो, नेयी आन्मानं एक अंश कार्य यय, नमाट गमनप उसर्ग भावमेका यी दहा को7 निपन्यो तेने मेगा बेम कहीं डा. कमया हर पल " , अयना को -मान' जनता मानो 1. Tar:- . 1 ...

जाम श्रीचंद्रप्रभजिन स्तवनं. ६२९ त्तमश्वाय गुददेवोचि ॥ ए बीकामव्ये हे, तेयी उपादाननि- प्पत्ति ते उत्सर्गसेवा जाणवी. इहां आत्माना अनंत गुण है, मांनी एक समक्ति गुण प्रगट्यो, ते आत्मानो एक अंश प्रगट्यो, तेज ए नगमन उत्सर्गभावसेवा थइ, अने एहीज उत्सर्ग आत्मगुणनभुता पण प्रगटी. २ वारे वे भावमुनि पद्यपि पोतानी आत्मसत्ता आवरी हे, तो पग जे डी हती तेने निर्धार करीने भासनगत करी, ते हवे स्वसत्तालंबी शुद्ध धर्ममयी थयो, तेहीज आत्मसत्ता- भासन रमण, एकत्वसत्तासन्मुख थको रहे, एटले ए जीव आज नुषी स्वतत्ताटंत्री थपो हतो नहीं, ते थयो. एटलं आदान समय, माटे संरहनय उत्सर्गभाव सेवा कहिये. ३ जेबारे ते साधक जोर, अप्रमत्तमुनिराज अवस्था पानीने उपाशन कारणता सर्वस्वल्पालंबी करी, ते अवस्था आत्मानी परिणामप्रति ग्राहकता, व्यापकता, भोक्तृता, कर्तृता आदिक सर्व स्वरूपें बलगी, तेबारे अंतरंग वस्तुगत ले व्यव- हार, ते वस्तुवल् ययो, ते व्यवहारनप ऊसर्ग भावसेवना कहिये. ए मुनिपदनो जे भाव, वेहने प्रशंसे कहेतां खाने सूत्रं जे श्रेणिपदस्थे, आत्मशक्ति प्रकासेजी॥ यथाख्यात पद शब्दस्वरूपें, शुद्धधर्म उल्लासें जी॥ . श्री०॥७॥ ५ अर्व:-जे अन्मा अपकनिषदे रहो धको पोता ६३० दे. चो. था. m-a- आत्मिक शक्ति प्रकासे केतां प्रगट करे, तेने ऋजुमुत्रनय उत्सर्ग भावसेवना कहिये. ५ जेवारें आत्माने ययाख्यात क्षायिकचारित्र प्रगट थयुं, तेवारें जे चारित्र सहकारी आत्मशक्ति प्रगटे, गुद्ध अकयायी, असंगी, निस्पृहरूप शुद्ध धर्म उल्लास पामे, चारित्र सहकारी जे वीर्यादिक तेपण जे कपायानुयायी फरता हता, ते सर्व आत्मरमणी थया, ए धर्म जेटलो उल्लास पामे, ते सर्वशब्दन उत्सर्गे भावसेवना जाणवी. इहां स्वरूपरमणी असहायी थयो, ते जेटलं अन्य असहापीप' नीपन्यु, तेग्लं उत्सर्गसेवन जा. ण ॥७॥ इति भाव सयोगी अयोगीशलेंसे, अंतिम दुग नय जाणो जी॥ साधनताए निजगुण व्यक्ति, तेह सेवना वखाणो जी ॥ श्री० ॥ ८॥ ६ अर्थः-जेवारें ए आत्मायें सर्व घनघातिकर्म क्षय करीने अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र, अनंत वीर्य, ए चार मोट अनंतक प्रगट का, ए चार गुणने संकर तथा सहकारें जे बीजा वक्तव्य तथा अवक्तव्य अनंता स्वधर्मीगुण प्रगट थया, आत्मिा आनंदी थया, तेवार सममिरूतमये उत्सर्ग भावसेवा थई. ७ जे काले शैलेभी जाग रे, आत्मप्रदेशनो घन करे, अयोगीकवलापा याय. तेवार एवभूतनये उन्मर्ग भावसेवना

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६३२ दे० चो० घा० आताभाव ते भावद्रव्य पद, वाह्यप्रवृत्ति निःसंग जी ॥ श्री० ॥९॥ अर्थः-इहां जेटलो कारणभाव, ते सर्व अपवादे जाणवो, अने जेटलं कार्य जे स्वगुणनिप्पत्ति, तेटलो उत्सर्ग जाणो. प उत्सर्ग तथा अपवादनां लक्षण तथा फलावणी सर्व यह- कल्पभाष्यमांयी तथा तेनी टीकायी विस्तारपणे जोइ लेजो, अने जेटलं बायप्रवर्तन ते व्यनिक्षेपो जाणवो. एहवी श्री चंद्रमभस्वामीनी सेवायें ले हलिया, ते आत्मधर्म संपूर्ण वरे ॥ ९॥ इति नवम गाथार्थः ॥ कारणभाव परंपर सेवन, प्रगटे कारजभावो जी ॥ कारज सिद्धे कारणता व्यय, शुचि परिणामिक भावो जी ॥ श्री० ॥१०॥ अर्थः-हवे कारणभाव जे श्री अरिहंतदेव तेहनी परं- पराये द्रव्यभावना करतां थकां भावसेवा प्रगटे, अने भाव- सेवायी उत्सर्ग धर्म प्रगटे, अने उत्सर्ग धर्म प्रगट्यो, तेवारें पोतार्ने कार्य शुद्धस्वरूप अनुभवरूप प्रगटे, अने कार्य जे शुफ सिद्धतारूप ते सधे केतां नीपजे, ते कार्य नीपने कार. णता जे हती तेहनो व्यय केतां नाश थाय, केमके कार्यनी ऊंणतायें कारणता छे, परंतु कार्य नीपने कारणधर्म रहे नहीं, तेवा, शुं रहे ? ते कहे केले गुचि केता पवित्र भावकर्म, दत्यकर्म, नोकर्म रूप हेतुमद्भावरूप मल रहित जे आत्मानो अष्टम श्री चंद्रप्रभजिन स्तवनं. पारिणामिक भाव छे, लेपणे एर्नु मूल लक्षण है, खट्प, स्वक्षेत्र, स्वकाल, स्वभावरूप तेपणं रहे, परमानंद अविनाशी अवस्था वरे ॥ १० ॥ इति । परमगुणी सेवन तन्मयता, निश्चय ध्याने ध्यावे जी ॥ शुद्धातम अनुभव आस्वादि, देवचंद्र पद पावे जी ॥ श्री० ॥ ११ ॥ अर्थः-ए रीने परम केतां उत्कृष्ट गुणी जे श्री अरिहंत शुद्धदेव तेहनी सेवा अति दुर्लभ छे, ते पामीने तेहमांहे तन्मय धईने जे जीव निश्चय केतां निर्धारे, अथवा निश्चय केतां पोताने ५ स्वरूपच्याने एकत्वता रूपें जे घ्यावे, ते जीव, शुद्ध निष्कलंक जे आत्मा चिदानंद घन, तेहनो जे अनुभव केतां यथार्थ ज्ञान वेद्य संवेद्य पद सहित तेहने आस्वादिने देव जे निग्रंथ अथवा भुवनपति प्रमुख चार निकायना, तेहमां चंद्रमा समान भाव उद्योत समता शीतलतानां कारण जे अरिहंत ते रूप पद- स्थानक ते प्रत्यें पामे, एटले अहो भव्य जीवो ! जो तमें पोताना आत्मसुखना इच्छक थया छो, अने शुझानंदने वि- लसो, एवी अमिलापा तमने छे, तो श्रीचंद्रप्रभस्वामी शुध- देव, अशरणना शरण, जगदाधार, जगतजीवना परोपकारी, मोह तिमिरनो वंस करवाने भावमूर्य जेहवा, कमरोगना परम वैद्य, महा माहण, महा गोप. महानियामक, महासार्थवाह, सम्यकदृष्टि जीवना जीवनप्राग. देशावर तिने नो महामंकनी परें जपचा योग्य, साय निग्रथ जहना आज्ञाय चाले छ, आल्या. " - ६३२ दे० चो० या - आरभाव ते भावद्रव्य पद, वामप्रवृत्ति निःसर्ग जी ॥ श्री०॥९॥ अर्थ:-इहां जेटलो कारणभाव, ते सर्व अपवादे जाणवो, अने जेटलं कार्य जे स्वगुणनिप्पत्ति, तेटलो उत्सर्ग जागवो. ए उत्सर्ग तथा अपवादनां लक्षण तथा फलावणी सर्व वृह- कल्पभाष्यमांयी तथा तेनी टीका विस्तारपणे जोइ लेजो,' अने जेलं बाद्यपवर्तन ते द्रव्यनिक्षेपो जाणवो. एहवी श्री चंद्रमभस्वामीनी सेवायें जे हलिया, वे आत्मधर्म संपूर्ण वरे ॥ ९॥ इति नवम गाथार्थः ॥ कारणभाव परंपर सेवन, प्रगटे कारजभावो जी। कारज सिद्धे कारणता व्यय, शुचि परिणामिक भावो जी ॥ श्री० ॥१०॥ अर्थ:-हवे कारणभाव जे श्री अरिहंतदेव वेहनी पर: परये द्रव्यभावना करतां पका भावसेवा प्रगटे, अने भाव: सेवायी उत्सर्ग धर्म प्रगटे, अने उत्सर्ग धर्म प्रगट्यो, सेवारें पोता कार्य शुद्धस्वरूप अनुभवरूप प्रगटे, अने कार्य जे शुश सिद्धतारूप ते सधे केतां नीपजे, ते कार्य नीपने कार पता जे हती वेहनो व्यय केतां नाश चाय, केमके कार्यनी' ऊणतायें कारणता छ, परंतु कार्य नीपने कारणधर्म रहे नहीं, वेवारें मुं रहे? ते कहे छे. जे शुचि केनां पवित्र भावकर्म, द्रथ्यकर्म, नोकर्म रूप हेतु सद्भावरूप मल रहित जे आत्मानो ८६ परिजनिक मन हे से मना कर है. इस स्वक्षेत्र, ककनसमान है. दमानंद अनी अवस्था करे ॥१०॥इट। परमगुणी लेवन नन्नयता. निश्चय ध्यान ध्यान जी शुजानन अनुन्न आस्वादि. देवचंद्र पद पासी श्री श्रीमत निकारक मक जे पाये, ते जी. भासिन दन, तेहनो जे अनुभव विंद मोद पद सहेत तेहने आस्वादिने देवर कर मुहारे मनुख चार निकायना, वेहन न मन उत समता शीतलतानां कारगजे नकल- मानक ते प्रत्यें पामे, एने हो ... पोताना आन्नमुन्दना इहर. के.: -- से पी अभिनपा बनने हे. नद्र- देव. जालना या मोह लिनिनो मन कम दे० चो० या. यना हृदयरूप सरोवरना हंस, आचार्यजीना नाथ, गणधरना साक्षात् मोक्षहेतु अने स्यादादधर्मना उपदेशक, एहवा श्री अरिहंतदेव तेनी सेवा करो, एहज आधार छे, ए श्रीचंद्रम भनी सेवा जिहां सुधि तमारी संपूर्ण सिद्धता न थाप, तिहां मुधि अखंड रहेजो, एहीज सार छे ॥ ११ ॥ ॥अथ नवम श्री सुविधिनाथजिन स्तवन। थारा महेला उपर जम्से बीजली हो लाल जम्से॥ देशी दीठो सुविधि जिणंद,समाधिरसें भयो होलालस०॥ भास्यो आत्मस्वरूप, अनादिनोवोसयोहोलाल॥अ० सकल विभाव उपाधि, थकी मन ओसयो होलालाथ० सत्तासाधन मार्ग, भणी ए संचयों होलालाभ०॥१॥ अर्थ:--हवे श्री सविधिनापपरमात्मानी सुति करे छे. कोइक भव्य जीव अनादिकालनो मिथ्यात्व, असंपम, कपाय- योग रूप द्रव्यभाव हेतुपणे परिणम्पो, एकेंदिप साम, यादर, तथा चंद्री, नेटी, धारिद्री, पर्षदीपगे अनंता भव सुधी भय- भरमा फरतो अनेक देवनी वामनायें यामित थको फुदेवने देवद्धिए माननो अपग गुदेव जे श्रीनगग तेहने कप्त्य प्रमुख टोपे मानतो पो कोई कालें श्रीनिराग प्रमुनी प्रमुता दीटी नहीं, ते केवाक भवस्थितिनो परिपाक, वर्ग, कोइक पुल्पना उदय श्रीविधिनाय पग्मे मग्नी मुट्टा टीटी, ते पण मम्मी जनता भनाग वान भामन गोया पई. ने क ८८ नवम श्री चंद्रप्रभजिन स्तवनं. ६३५ - श्री अरिहंतनी प्रभुता देखीने उल्लसितविते ते भव्य जीव, श्री वीतरागनी उपकारता पाम्यो, तेवारे ते प्रीतें हर्षयी बोले छे, जे दीटो केतां भासनपणे प्रतीत सहित सुविधिनाय प्रभुजी दीठो, पण ते केहबो दीटो ? ले समाधि केतां आत्मगुणनुं विपरी- तपवर्तन ते उपाधि, अथवा विषय कषायने अनुयायि ने प्रवर्तन, ते पण उपाधि, तथा ने तप्त उद्धत वक्रता परिणा- मादिक, सर्वविभाव ते पण उपाधि तेने निवृत्ते सकलगुण स्वरूप परिणामी थये ने आत्मगुणनी वस्तुगतें स्थिरता ते समाधि वेहनो रस, तेणें करी भरयो केतां संपूर्ण एटले परम- समाधिमयी श्रीसुविधिनाय दीटो, ते दीटायी एक मोटो लाभ घयो, ते शुं लाभ थयो ? तोके भास्यो केतां जाणपणामां आन्यो, पोताना जात्मान स्वरूप ते शुद्धविदानंदलक्षण जाण्यु, ने जनादि अतीत कालनो विसरयो मूली गयो हतो, ते श्रीप्रभु दीवां भास्यु यी सकल केतां सर्व ले विभाव दोष आत्मिक अगदतारूप जे उपाधि वेहपकी मन केतां चित्त ओसरचो केतां पाठो हट्यो, जे ए विभाव परिणति हूं नहीं तथा विभाव परिणतिनो हूं कर्ता पण नहां, ए मुने करवं भोगवई परिणम घटे पण नहीं, ते जेटली क्षयोपशमी आत्मपरिणति ते सर्व राग द्वेष असंयमयी निवृत्तवा लागी, अने सत्ता केतां जे अनंतगुणरूप आत्मानी सत्ता हना साधननी रीत केतां चाल ( मार्ग) सम्यरज्ञान, सम्पन्- दर्शन, सम्यगचारिकरूप ने आत्मिक कार्य, ते मार्ग भनी ए भन्यजीव परिणम्यो, एटले यी आत्मसत्ता प्रगट थाय, ते मार्ग भगी ए आत्मा संचरयो केतां प्रवयों ॥ १ ॥ इति प्रथम गाथार्यः ॥

दे० चो० - बा० तुम प्रभु जाणगरीति,सर्वजग देखता होलालस०॥ निजसत्तायें शुद्ध, सहुने लेखता हो लाल स०॥ परपरिणति अद्वेप, पणे उबेखता हो लाल ॥०॥ भोग्यपणे निजशक्ति, अनंत गवेखता हो लाल ॥अ०॥२॥ अर्थ:-वली हे प्रभुजी ! तुमें जगत्पडात्मक वेने केव. लज्ञान, तथा केवलदर्शने करी देखो छो, पण जाणंग रीतें एटले राग द्वेष रहित जे एक आत्मानो जाणंग गुण छे, तेयी सर्वभाव जाणो छो, परंतु तेमां शुभपरिणामी वस्तुना ग्राहक नयी, अने अशुभपरिणामी वस्तुना द्वेपी नयी, यथार्य , रीते जगतना जाण छो, कापणं, भोक्तापणं, ग्राहकपणं स्वा- मिपणुं एटलां वानां दालीने अहंबुद्धि रहित सर्वभावना जाणंग छो, वली हे प्रभुजी ! तुमें केहवा छोरी जे सर्वद्रव्यने पोताना सत्ताध शुद्ध, निर्दोष, निःसंग लेखो छो, एटले पंचास्तिकायमां प्रण अस्तिकाय तो परसंग विना छ, अने पुद्गलनु संयोगीपणं ते भेदसंवातधर्म छे, पण कापणे नयी, जाते स्वसत्ताने लोपतो नयी, जने जीवने यद्यपि अनादि विभाव छ, परंतु सत्तारूपं मूलधर्मेन छे, ते प्रभुजी ! तुमे जीवपणं मूलसत्तायेंज लेखयो छो, तेमां परपरिणति भावअशुद्धता, जानाधरणादि कर्म, मनोधादिक सबने भदेपपणे आत्मधर्मयी मिन्न मादे व्यायामतेनो ..1: करना या जे नजे, तेने त्याग है, केम के समता न न्या-न नवम श्री चंद्रप्रभजिन स्तवनं. ६३७ - तुमें भोगपणे पोतानो भोग भोगो छो, निजशक्ति ने अनं- तगुणपर्याय रूप, परमचतन्यरूप, परमानंदरूप, सहजसुखरूप, एवी ले अनंती तत्त्वविलासता तेने भोग्यपणे गणो हो, स्व- धर्मनेज भोग्य जाणो छो, माटे हे सुविधि परमेश्वर : तमें परमात्मतारूप परम धर्मना भोगी छो जी ॥२॥ इति द्वितीय गाथार्थः ॥ दानादिक निजभाव, हताजे परवशा होलालह०॥ ते निजलन्मुख भाव, ग्रहो लही तुज दशा होलालाग्र० प्रभुनो अद्भुत योग, सरूपतणो रसा हो लालस०॥ भाले वासे तास, जास गुण तुज जिता हो लाल ॥ जा० ॥३॥ अर्थ:-दानादिक. जामधन ले क्षयोपशानी हे, ते सर्व परानुपापी हो, पुलापानी छे, ते अनादिना परकम भई रता हो, ते मई, रे मभु ! ताहरी शुर वीतराग दशा रही देवा पानी योनीमार सई आत्म सतानो सम्मुख पोहो. मनातक पास. एक्टे अरिहं लावटंबनी पा पली मते समापानी धार, सुशाश्टंपनी पार भने। नार्ग गांग्लपीना सा. नरेशन हे सहमत . निति निःसहार .... नगर नस्वस्त ५. म त वनार ० चौ. बा. अनंत पर्याय उत्पाद, व्यय, ध्रुव, मेदाभेद, अस्ति नास्तिरूप स्वरूपने लीये यतें छे, पड़वी रत्नश्यी, हे परमेश्वर । ताहारे विगे परिणमी छे, तेहनी प्रतीत ते वासना तथा ओलखाणं से भासन से तेहने पाय, जेदने तुज केतां तुमारा जेया गुण प्रगट्या होय, एटले हे नाथ ! हे सर्वज्ञ ! हे पेलोरप- दीपक ! नाहरी एनपी से तुझ समान गुणी होप, वेहनाज भासनमां आने ॥ ३ ॥ मोहादिकनी घृमि, अनादिनी उतरे हो लाल ॥०॥ अमल अखंड अलिप्त,स्वभावजसांभरेहो लालास्य. तस्वरमणधुचि ध्यान, भणी जे आदरे होलाल म०॥ तेसमतारसधाम स्यामिमुद्रा यरे होलालस्याount अर्थ:-हे प्रमु । नाहरी मुद्रा ने पाम समतार्नु धाम हे, एवी पीजी कोहनी न होय, केम के एड़वी सरल परमात्र हित परिणनि, नो जगे एम कर दोप, तेनेज निरजे, ते कई हे, माह ने मुजना परिणाम, नेहनी मिले वडा अग्राहकता, परमावग्राहस्ता, पग्मावामानाम्य विमारता ते अनादि काटनी भारमान बिछे, इहा पर. जे दिवाना अनादिनी छ, अरमानो समान किंवा पापमाप छ । सो सानिमाम छ, दो विमानमा पाने कहो हो ! अने जो पापराम के तो अनादि कम कहि : नेहन उतरले आदि केतां पोटो बाकी दिनोटा मिद पट्टी कटामे, स्पा हटाने का है, न अडियोका , नवम श्री चंद्रप्रभजिन स्तवनं. विना कर्न केम संभवे ? ए पक्ष उपजे. ते माटे अनादि सहजातसंपोग हे. तिहां कोई पूछे जे उभप संयोग एकटो कहो, तो कारण कार्यनो संबंध केम रहे ! तेहने उत्तर जे, उपादान धर्मे एक समयमा एकठीज कार्यकारणता हे, जेम सम्पग्दर्शन, सम्यग्ज्ञानने हे, तेनी पेरें यहां पण श्री विशे- पावश्यकवी जाणवू, यदक्तं ॥ गाथा ॥ नन कम्मरस य पुन्छ, कत्तुरभावे समुभको जुत्तो ॥ निझारणो सोविय, तह जगत्युपत्ति भावे य ॥ १ ॥ इत्यादि गायाची जाणवो. कोइ पूडशे जे अनादिनो मटेलो तेनो वियोग केम थाय ? तेहर्ने कहिर्ये ।। गाथा ॥ जह चेह कंचगोबत, संयोगो णाइ संतर गोवि ॥ बुडझई लोवाय, तह जोगो जीव कम्माणं ॥१॥ इति पूज्य- वास्यात्. एटले ए विभावपरिणाम यद्यपि अनादिनो ठे, पण प्रकृतिक छे, स्वरूप नयी, मारे एनो वियोग ते कीचो धाय. वेवारें कोई कहेदो ने विभावन कापणं केम छे ? तेने कहे हे. जे आमा स्वरूपकर्ता तेहने स्वरूपावणे परभाव- संयोगें पकतीपर थ\ हे, ते विभावमोहनी भूमि उतरे, निध्यात्वनी भुल रले, तेवारें अमल केतां रागद्वेष रहित जसंड केतां देवोरें खंडाय नहीं, अलिम केतां पासंगना टेपरहित एहवो पोतानो सहजस्वभाव सांभरे, भासन गोवरमां आने, पद्यपि कम पागो हे, तो पा स्वभावें ललित डे, निरामय है, कय हे पण कर्मवी न्यारो छे, निसंग हे, एहयो आत्मा जेबारें मोलतानां आये, पछी हज सावर जात्मा पोतातुं तव गुलनिरूपनपयी बलुखनाद हमा रमे, अनादि पौगालिक आदिमा नर्जिन. पोताना . .. .. .

६४० दे०. घो० पाली - ज्ञानादि अनंतगुणमा रमे, एहज तर पारिक्ता प्रगटे, पी शुधि केतां पवित्र निर्मल ध्यानवे प्रथम अरिहंतादि गुणीना गुण स्वरूपमां नन्मयता रूपवर्मपान ध्यायीने पोताना अनंता पपांपनी परिणति प्रागमाय अनुभवका रातागत विरोमाषी भासन एक्स्य शमध्यान मणी जे पुरुष आदरे; केता अंगीकार करे, पुरुष स विमाय क्षप करीने परम समतारसना धाम पहया स्वामी श्री जिनेंद्र देव, देहनी मुना। पामे, पटले वीतगगावस्था पामे, निर्मल पूर्णानंदी पाय ॥४॥ प्रमुछो निमुवननाय, दास हुं ताहरोलालादास०॥ करुणानिधि अमिलाप,अछे मुशए खरोहो लाल 01 आतमवस्तुस्वभाव, सदामुहासांमरोहीलालसा मासन वासन पह,चरण ध्याने घरोहो लालाय०॥५॥ अर्थ:- प्रभुयी विनति करी पोनानो मनोरप को छे, हे प्रमु । नमें त्रिभुवनना नाय छो, सम्यगदर्शनादि गुण पमालाना नपा हदवालवाना पाम का छो, अने तमागे दाम हा श्री वीनगगन दाग नो ममकिती, देशरिति, तास्वविदिने बिहे, का इहा नो भकपणा चार वन छे, माटे हे कमणानिधि माना समा: मुझने ए स्तो अमिटर, कह से माह भरमानो वानुम्ममार " मेश ददन हम्मे मनमे समेत पटेमंदोग बिदेस डेग टोपिमहलिग मरिगुदि दिशा दिदेर म माम अविका गा मा सर पर बन रमत का काम नवम थी सुविधिनाथजिन स्तवनं. ६४५ पुरिसेण अभहापरिणेसणे उवमाणविज्झति अरूवी सत्ता अपयस्स पयं नत्यी सेंणं सद्देणं स्वेणं गंधेणं फासेणं इति आचारां- गोक्तं " तथा शुभस्वसत्ता स्वरूपी, अनंत ज्ञान, दर्शन, चा. रित्र, वीर, अनंत स्वरूपकर्ता, स्वरूपभोक्ता, स्वरूपपरिणामी, असंख्यप्रदेशी, प्रतिप्रदेशे अनंतपर्यायी नित्यानित्यादि अनंत- स्वभावी, स्वकीयकारकचक्रपरिणामीरूप माहारो स्वभाव, ते सदा निरंतर भने सांभरो, भासनमा रहो, वासना, प्रतीत, भासन, ज्ञान, चरण, माहे रमणच्यान तेहज स्वभावमां तन्मयता धरो. ए मनोरथ सदा माहरो छे, साधकभावें साधक रीत सिद्धाव- स्थायें सिद्धरीतें सदा रहेजो ए अमिलाप छे॥५॥ इति ॥ प्रभुमुद्रानो योग, प्रमु प्रभुता लखे हो लाल ॥3॥ द्रव्यतणेसाधर्म्य स्वसंपत्ति ओलखे होलाल॥स्व०॥ ओलखतां बहुमान, सहित रुचि पण यधे हो लालास. रुचि अनुयायी वीर्य, चरणधारा सधे हो लाल ॥च० ॥६॥ अर्पःदा कोट् पढे ले तुं नाहरा आत्मधर्मनो रुचि- त घयो, केबारें मभुजीनं काम हे ! तेने उत्तर ले, आत्मस्वभाव निसरी, परभानगी घद, ए माहागे आमा दारी- संगी, मानेगी, अनंगी, बुटिगी, नण टिगीपणे ममतालिंगी पा रहोते. समता धर्म विमरी गणे हे. ते दो अनंत- शानी, पर अमोही. अमनी मना, पापनानिपम्प हनो पेग मटे, दोरे जानना २. REP Bइ. पद्वानहर एपी बीमनी मनाने का नोटा 1 ६४२ दे चो० मा पछी जीवद्रव्यपणाना साध, केतां सरखापणे जे सिद्ध पयार ते पण जीव अने हुँ पण जीव मा सत्तासारखा.. गुणपर्याय स्वभावें तुल्य छैयें. तो जेवी संपदा श्रीसुविधिनाय परमेश्वरने प्रगट थई छे, तेरलीज संपदा माहरी सत्तामा पा छे, तेथी हुँ पण ते परमेश्वर जेटली संपदानो धणी छ, एम ओलख्या पछी ते संपदा उपर बहुमान आये, तेथी से संपदानी रुचि प्रगटे, जे एहवी संपदा माहारे केवारें नीपजसे अने: जेनी रुचि होय, तेहनो उद्यम थाय, तेयारे वीर्यगुण- स्फुरण : ते पण रुचिने अनुयायी छे, अने जे दिर्श वीर्य स्फुरे वेह- मांज रमण थाय. पटले वेहनुज नीपजवावं माधरण पाप, एट प्रम दीठे प्रभुनी प्रमुता मासे, वे भमुना पोतामां जाणे. पठी हे प्रगट करवानी मचि उपजे, तेथी रुविन वी तपा धारित जे रमण, ने पण ते दिशे सधे, तेयारे ते सिद्धता- प्रगटे, तेयी जिनमुद्रानो योग ते पर्वा साधन छे, प..मागं:- कयो ॥६॥ इति पत्र गाथार्यः ॥ क्षायोपशामिक गुणसर्व,ययातुज गुणरसी होलालाथ० सतासाधनशक्ति,व्यक्तता उष्टसी होलालगाय०॥ हवेसंपूरण सिद्धि, नणी शीवार छे हो लाल तिon: देवचंद्र जिनराज, जगत आधार छे हो लाल, ॥ ज ०७॥ अ-पाठी प्रायोपामिगुण घेतना वीर्य, दानादि सर, मेगा मुझ केत्रा नाग गुना ग्मी पमा, नेग ते निमत्र- गुन मा Qा पवाटी अननगण मना र मापन दशन श्री शीतलनायजिन स्तवनं. निपजावानी लात्मशक्ति देनी हनी, ते व्यक्त केतां प्रग. उपजे उल्लसी केतां उल्लास पामी. हवे निमित्त कारण म पादान कारण प्रगटे, आत्मा तत्ववि, ताधिक, तत्त्वालंत्री घाय, तो संपूर्ण अविनाशी सिद्धता निपजतां शी चार ? एजे पुष्टकारणे निपमा कार्य निपजे, तेमाडे देवचंद्र स्तुति कर्ता, अथवा सर्वदेवमाहे चंद्रमा समान ते जिनराज, श्री- तराग, ते जीवना आधार छे, एडे जिनमुबाने आलंबनें अनंत जीव सिदि वरचा, तेयो अरिहंतालंबने सिद्धता निपने, ए नियामक हे, वास्ते अरिहंतस्मरण, बंदन, नमन, स्तवन, ध्यान करो. हे भन्य जीवो। तमने एहीज आधार छे॥७॥ इति श्रीसृविधिजिनस्त०॥ ॥अथ दशम श्रीशीतलनाथजिनस्तवनं ।। " ॥ आदर जीव क्षमागुण आदर ।। ए देशी ।। शीतल जिनपति प्रभुता प्रभुनी, मुझथी कहोय न जाय जी ।। अनंतता निर्मलता पूर्णता, ज्ञान विना न जणाय जी ॥शी०॥१॥ अर्थ:- हो दशना परमेश्वर श्रीशितलनाथजीनी लाना करे हे. श्रीशीतलनायनी अनंत विनयर आत्मिक प्रभुता हे प्रत्यक्ष तो देवीन गम्य हे,अने सम्पति ने तो प्रक्षामा हे, ते कहे हैं. है शीतल जिनपति ! तुमने ६४४ दे० चो० वा० कपाय, तृष्णा, नोकपाय, तापरहित परम वीतरागता, निस्पृ- हता, परम परभाव अभोग्यता रूप, शीतलता प्रगटी छे अने पति केतां क्षीणमोही प्रमुखना पति तेनी प्रमुता ठकुराइ अनंत सहज संपदातेमुज अल्पज्ञानीयी तो कही न जाय, केम जे सिद्धना अमिलाप्य, अनमिलाप्य, सर्वपर्याय निरावरण प्रगट थया छे, तेमां अनमिलाप्प पर्याय श्रीकेवली जाणे, पण वचनें अगोचर छे, माटे कहि शके नहीं, अने अमि- लाप्य पर्याय अनंता छे, ते पण वचननो क्रम प्रवर्तन छे माटे. मित आउखें कहेवाय नहीं. तिहां अनंता जीवश्य, ते एकेका द्रव्यना प्रदेश असंख्याता छे, ते वली एकेका प्रदेशे ज्ञानादि गुण अनंता छे, ते वली एकेका गुणना पर्याय अनंता छे तेमध्ये स्वभाव अनंता छ। उक्तं च ॥ जीवा. पुग्गल समया, दव्यपएसा य पज्जवा व ॥ थोवाणंताणंता विसेसमहिया दुवेणंता ॥ १ इति तथा निर्मलता ते ए सर्व पर्याय निरावरण, निःसंग निःस्सहाय छे. अने पूर्णता केतां सर्व शक्ति मग भावे पूर्ण छ, ते सर्व केवल ज्ञान विना जणाय नहीं ॥१॥ इति प्रथम गाथार्थः । चरम जलधि जल मिणे अंजलि, गति झींपे अतिवाय जी ॥ सर्व आकाश ओलंघे चरणे, पण प्रभुता न गणाय जी ॥ शी० ॥२॥ अर्थः-त्यां हांत, जेम चरम केतां छेल्लो जेनी साधिक तीन रज्ज, बाय परिधि छे, एहयो जलधि केतां स्वयंमूरमण समुद्र तेहत मपल अल, तेने कोइ अंजलिये भाषी १०२ दशम थी शीतलनायजिन स्तरनं. ६४५ सके अथवा कोई एहलो पग होप ने अत्यंत प्रटर काल ना मोहोत वापरानी गर्ने चाडे, तया कोई अनंता टोकालोक मटी सर्व आकाश ने चरने केतां पगे करी जोवे एहतो तो कोई होप नहीं, परंतु टांत मात्र दीयो हे, ले एहवा शक्तिमंत पग निष्पन श्रीसिद्धपरमेश्वरनी ले प्रभुता ते क्षापोपसम शाक्तिवालायी गनी जाप नहीं, बने श्रीवीतराग सर्वज्ञनी प्रमता संत ज्ञानी जाते. परंतु ते पग वचनपोर्गे कहि शके नहीं, तेमाडे अनंत हे ॥ २ ॥ इति द्वितीय गावाः ॥ सर्वद्रव्य प्रदेश अनंता, तेहधी गुणपर्याय जी ॥ तात वर्गधी अनंत गुणुं प्रनु. केवल ज्ञान कहाय जी ॥शी० ॥३॥ अर्थ:-हवे ते अनंतता कहे हे. सई जीवद्रव्य दर जजीवश्य अनंता हे, हेयी सर्वदम्पना प्रदेश अनंत मां सारा प्रदेमनी अनंतना अति मोटी हे, देह ई एपनी अनंतता पनीज मोटी हे, व्हन ई- हमा हे, ९ कर अप दरका रे? पर हो. हे मतदमें मुपा निक पिचाई है. ३ - कर ६४६ चिोवा'', 1. I गु छ । उक्तं च ॥ दयागय गुणाणय, पञ्जावाण नागेण ।। नागे नागेहिं दंसिर्य ॥ इति युनः गुणाणामासओ दन्न, एग दवस्सिया गुणा ॥ लरकणं पज्जवाणंतु, उभओ निस्सिया भवे ॥१॥ इत्यादिकयी मिन्न व्याख्या छ, तिहां पावणा- स्त्र कामु छे. ए सेणं भंते जीवाणं पुग्गलागं सञ्चदशाणं सम्बपएसाणं सबपञ्जवाणय कपरे कयरेहिंतो अप्पा या बहुपा पा सल्लावा विसे साहिया वा सब थोगा जीया पुग्गला अगंतगुणा भद्वा समया अणंतगुणा सम्बदम्या विरोसादिया सय्यपएसा अगंत- गुणा सय्यपनया अणंतगुणा ॥ इति गणधरवाश्यात् एटले श्रीप्रमुजीनो केवटज्ञानगुण तेनी अनंतता ते आवी रीते छ के छ दम्पना गुण पर्याय सर्व अस्तिपणे रया छे, ते सर्वने जागे, तया वेनी परम्परनी अपेक्षायें नास्निपा अनंतुं रघु छे, सबने पण श्रीप्रमुनो केवरज्ञानगुण जागे, तपा ए सर्वयी अनंत गुणा बढी यीजा भात्र होय, तो वेने पण लागे, एम अनंती शक्ति है, तेम दर्शननी पण वेटली शाक्ति छे, तेमाटे ट्यना प्रदेश पर्याय तेना यग करिये, वेहने दली अनंतगुणो गुणाकार करिये पलं हे प्रम: है परमेअरी ! नमाम केवलमान कहेवायचे. ते श्री भगती मृ ।। अभियं ना केवटिम्म ॥ एम को दो ॥३॥ इति तृतीय गायाय ॥ कवल दर्शन एम अनतुं, ग्रह मामान्य म्बनाव जी । म्वर प्रा. वाण अनत ममरता मरना दो ॥

दशम श्री शीतलनाथजिन स्तवनं. ६४. अर्थः-एटला सर्व भाव ते सर्व सामान्य युक्त छे, ते सर्व केवलज्ञानगम्य छे, अथवा सामान्याश्रयी छे, जे विशेष. ते सामान्य विना नहीं, अने सामान्य ते विशेष विना नहीं: सर्व पदार्थ सामान्यविशेष रूप छे ॥ न सामन्न तओ नत्यि, विसेसो खपुप्फ वा ॥ तथाच ॥ संमती ॥ दई पन्जव विउअं, दव विउत्ता पज्जवा नत्यि ।। उप्पायठिइ भंगा, हवइ दविय. लख्खणं एवं ॥१॥ इति ॥ तेमाटे सर्व द्रव्यनेविपे सामान्य धर्म अनंता छे, ते सर्व केवल दर्शनगुणें देखे छे. तेथी पण अनंत गुणा सामान्य धर्मने देखी शके एवी शक्ति छे, तेथी . एटला पर्यायमय केवल दर्शन गुण छे. . उक्तं च विशेषावश्यके ।। यावंतोहि ज्ञेयस्य पर्याया स्ता- वंतस्तदवभासकत्वेन ज्ञानस्याप्येष्टव्याः ॥ तथा भगवत्यंगे ॥ अणंता दसणपज्जवा इति ।। वास्ते केवल दर्शन पण अनंतुं छे, ए दर्शन, सर्व पदना अस्तित्व सत्व वस्तुत्व प्रमेय त्वादि सामान्य न्याम्किने देखे छे. एम चारित्र गुण ते पण अनंतपर्यायी छे, पोताना आत्माना सर्व पर्याय ते सर्वस्व धर्म: छे तथा पोतायी मिन्न अनंता जीव द्रव्य तथा सर्व अजीव द्रव्य तेहना धर्म ते परधर्म छे, एटले सर्वम्वधर्ममा रमण, पर- धर्ममां अरमण. ए सर्व पर्याय चारित्रना छे, एटले स्वरूपरमण, परभावनिवृत्ति, ए चारित्रना परिणति छे. अने अनादिन जे पररमणीयपणं भूलथी चय हन. ने निवागने वक्ति चेतना- वीर्यादिकी परिणति. ते परमार या गेकान ६.५ विषे राखवी ए सवरभाव ते चारित्रना अनतर. सयमश्री श्री व्य- वहारभाष्ये कहा है. न सब जीवया अननगृणा चारित्रना .

६४० दे० चो० बा० . उवाडा विभागनी एकवर्गणा करिये, तेवी असंख्याती वर्गणा एक स्पर्द्धक थाय. तेवा असंख्यात स्पर्दके एक संयमस्थानक थाय. ते सर्व जवन्य संयमस्थान ते वली असंख्य पदगुणरीतें असंख्यपद्गुण करतां सर्वोत्कृष्ट असंख्यातमु संयमस्थान थाय. ए चारिवनी अविभागनी अनंतता देखाडी, ते सर्व चारित्रगुण हे प्रभु ! तमारो निरावरण छे, तेमाटे चारित्र अनंतुं छे ।। इति।। द्रव्य क्षेत्र ने काल भाव गुण,राजनीति ए चार जी। घास विना जड चेतन प्रभुनी, कोइन लोपे कारजी। शी०॥५॥ अर्थः–एम वीर्यादिक गुणनी स्वयमें अनंतता जाणवी, एवी अनंत स्वगुण संपदामयी छो, वली हे नाथ ! हे परमे. श्वर ! तमें जगत्मां जीव तथा अजीव तेहना जे गुण, स्व. भाव, पर्याय, ते सर्व १ द्रव्य, २ क्षेत्र, ३ काल, ४ भाव, ए रीतें घार परिणमनपणे छे, अने तमारा ज्ञानादिक गुण, ते पर द्रव्यादिक चार परिणमने परिणमे छे, अने सर्व स्वपररूप- धर्मन जाणपशुं करे छे, ते पण चार प्रकारे परिच्छेदन करे छे. ते चार प्रकार कहे छे. १ समुदाय, ते द्रव्यधर्म जाणवो. २ आधारता ते क्षेत्रधर्म जागयो. ३ वर्तना उत्पादम्पयरूपमार, ते काटयम जाणवो, निचे विचारता तो काल द्रव्य मिन्न नदी, केमके पंचाम्निकापनी वर्तना ने कालचर्म हे, ए तत्वार्य तथा धर्मसंग्रहणी अने विश्वावश्यकमध्ये की चर्चा छे. अनपेक्षित दरपाम्निस्नये पहने टग्य काणे, पग्नु जाने पानिपा पमा नदी, नया अपना बनना में कार, ४ नया डायनो दशन श्री शोमलनाधलिन नवनं. तपन के मान. ९ रोने ३. कला निपतली मननी गडे. अनुनी है. ले द राजनो ने. कोई न माने. तमा ज्ञान परिनेके.:: सम्पष्टि, देविति. डेरडे. - निन जसंह काला है।न।।२।। शुद्धाय पिर प्रभु उपयोंगे. जे समरे तुझ नान जी अव्यावाध अनंत पार परम अनृतमुव धामो हो ॥६॥ निजहर सं .-: -- एंड टेक॥ ने नाम ६५० दे. चो. बा. अनुदान ते साध्य शून्यसापेक्षता विना ले कावं, इत्यादि दोष टाली जिन आज्ञा प्रमाणे, विधि सहित, प्रीति, भक्ति, वचन अमंगरीते. तद्हेतु नया अमृत अनुष्टानें. तिळां तहेतु ये, ने एक तेहीज साधन सार्नु करवाने अब मोक्ष निपगावा माटे. अने अमृत ते विकरण योगनी एफना हांसदित तन्म- पपणे निरामय साधन. एरीने घिर थईने शंहादि चालता रदिन श्रीप्रमजीना म्यजाति म्पभावि रुगुणों करी उपयोग ममु गुणे जोडीने जे भन्यजीव आत्मार्थी यइने श्रीशीतनाप परमसमतामयी प्रमुनु ध्यान कायाने तेहनं नाम रामरे येतां समारे, ते जीव अन्नको गृणीनं आध्यने आरमोगदानी पाईने निष्कर्मा याय, नया । अननु अयाया। गुम्ब, पागंग रदिन आयामिक गम्न म 31+मो के परम उत् अमृत अविनाशा पद: नानामहादिक अनंत गुपर्नु घाम थे। उन ॥ मित्र मयर समय मगात मग्मय माया- बाह, मणगविनि मिग नामधेय या गाण ॥ नपा समतिग्रंथ ॥ अन मुदप रापट जगमिहा मका नियम महान मिमिगृह ।। अनिहा मध्यावह निारयणमारं अपर- वति॥ । दवा मुख पाम ॥६॥इति पर गायायः ।। आणा नाता निर्भयना. निमकनारप जो ॥ भारम्मान प्राय गेले

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. पम अनतरण भए नामा ॥७॥ दे० चौ. या अनुष्ठान ते साध्य शून्यसापेक्षता विना जे का, इयदि दोष टाली जिन आज्ञा प्रमाणे, विधि सहित, प्रीति, भक्ति, वचन असंगरीते. तद्हेतु तया अमृत अनुष्टाने. तिहां तइहेतु से, जे एक तेहीज साचन सार्नु करवाने अ मोझ निजाता मारे. अने अमृत ते विकरण योगनी एकता हर्षसदित तन्म- यपणे निरामय साधन. ए रीतें थिर थईने शादि पाउता रहित श्रीममुजीना स्वजाति स्वभाविकगुणे करी उपयोग पर गुणे जोडीने जे भन्यजीव आत्मायी पदनै श्रशीतना परमसमतामयी ममुर्नु ध्यान करवाने वैदन नाम रामरे नेता संभारे, ते जीव अनुक्रमें गुणीने आलंबने आत्मोपदानी दईने निष्कर्मा थाय, तेबारे ते अनंत अम्पापाय सुम, पामंग दिन आध्यात्मिक सुख पामे. ते मुख केह छ ? तो के पर उत्कृष्ट अमत अविनाशी सहज ज्ञानानंदादिक अनंत सुगई धाम छ । उक्तं च ॥सिव मयल माप मन माम मचा- मप्पुणरावित्ति सिगइ नामवेयं टri गाणे तया संमतिग्रंथे । अब मुइय सपल जगमिहा सा निरुपम सहार मिनिमहं ॥ अनिहण मनायाहं निरिमाणमा अर वति ॥ १ ॥ एडवा मुम्न पामे ॥६॥ इतिघा गावाः ।। आणा ईथरता निर्भयता, निवडकतारूप जो ॥ माराधीन ने अव्यय गैनं. बाह, - दशम श्री शीतलनायजिन स्तवनं. ६५१ - वीजानी आज्ञा तो स्वायें तथा भपयी कोई माने, अने प्रभु श्रीअरिहंतनी आज्ञा तो सहेजें कोइ द्रव्य टोपतुं नयी, तया ने लौकिक प्रभुताना धगी, तेतो पौद्भलिक मानोपेत संपाना धनी ठे, अने श्रीतीर्थकर तो जगदुपकारी अनंत सहज संप- दाना ईश्वर छे, तेयी ईश्वरता अद्भुत छे. वीजा राजादिक तो मात्र पोताना सेवकोवीज भय पामे नहीं, परंतु परचक्र तथा मरणादि भय सहित हे. अने महारो परमेश्वर निर्मलानंद कारण शुद्ध देव तो सर्वकाल सर्वभय रहित छे, स्व अखंड अविनाशी संपदा परमनिर्भयतावंत छ, तया जगदमां इंद्र, चंद, चावर्ति, ते तृष्णाने उदय इच्छादोषमपी हे, इच्छायी संपदा अपूर्ण छे, अने श्रीवीतराग तो स्वसंपदापूर्ण प्रागभा- वना भोगी ठे, तेवी समस्त परसंपदाने अबांडे, माटे निर्व- च्छकतामयी छे. वी श्रीप्रभु परमात्मा तेहना ने भाव केतां भावधर्म शुद्धचिदानंदादिक ते सर्वस्वाधीन छे. पराधीन नवी. वली ते अञ्चय केतां अविनाशीपणे बंसरहित हे. ए रीने अनंतगुण ने पूर्व कह्या तेना राजा हे ॥इति सप्तम गाथार्यः।। अव्यावाध सुख निर्मल ते तो, करणज्ञाने न जणाय जी। तेहज एहनो जाणंग भोक्ता, जे तुन समगुण रायजो ॥ शी० ॥८॥ अर्थः हे प्रभु : अपर डिप सुरु ते अनंत स्वभोगीप में की ... अम्पावाय सुस ज्ञान केतां जापा का तो दायाने आधीन ने २.९ ६५२ दे० चो० घा. मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञान छे, तेयों करी जणाय नही, तया अवधि मनःपर्यवज्ञान ते यद्यपि इंद्रियोने आधीन नयी, तो पण ते रूपीभावना जाणंग छे, पण जीवस्वरूपने जाणी शके नहीं, जे माटें क्षयोपशमज्ञाने अव्यायाधन स्वरूप जाण्यं न जाय, पण जे जीव तुझ समान गुणना राय केतां स्वामी थया, तेहज परमात्मा, ए अन्यावाघ गुण, स्वरूप जाणे, तथा भोगवे, बीजाने मगर नथी, केम के आत्मधर्म अतींद्रिय छे माटे तेहना मोगी सिद्ध भगवंत छे, वीजायी ए भोगवाय नहीं ॥८॥ इति ॥ एम अनंत दानादिक निजगुण, वचनातीत पंडूर जी ॥ वासन भासन भावें दुर्लभ, प्रापति तो अति दुर जी ॥ शी० ॥ ९ ॥ अर्यः--एम अनंतादानादिक केतां दान, साम, भोग, उप- भोग, वीर्य, सिमत्व प्रमुखगुण, हे प्रमुजी ! ताहरे प्रगट छे, वे वचनने गम्य नयी, पंदूर केतां मोहोटा छे, एहया आत्मगुणनी वासन केतां श्रद्धा, भासन केला जाणपणं, वे पामधुं दुर्लभ छे, तो प्रगटपो पहवी सिद्धता पामवी सिद- तानी प्राप्ति धवी ततो ज वगली हे ॥ इति नवम गापायः ॥ सफल प्रत्यक्षपणे त्रिनुवनगुरु, जाणुं तुझ गुण प्राम जो।।

दशम थी शीतलनापजिन स्तवनं. ६५३ ३ - वीजु कांहिं न मारे स्वामी, एहि करो मुज काम जी ॥ शी० ॥१०॥ अर्थः-हे त्रिभुवनगुरो ! ताहरी गुणसंपदा अनंती ते सर्व ९ प्रत्यक्षपणे जाणं एहीज मागुं ;, एहीज इच्छा छे, माहरे एहीज काम ठे, जे ताहरी संपदा ते केवलीने प्रत्यक्ष छे, माटे केवल ज्ञान मागु ई. परंतु हे प्रभुजी ! ९ वीडं काहिं पण मागतो नयी ॥ १० ॥ इति दशम गागार्थः ॥ एम अनंत प्रभुता सईहता, अचे जे प्रभु रूप जी ॥ देवचंद्र प्रभुता ते पामे, परमानंद स्वरूप जी ॥ शी० ॥ ११ ॥ अर्थ:--एम अनंती प्रभुनी प्रभुता, परमात्मता, सर्वप्रदेश निरावणता अनंत पर्याय, निरावरणता सकलज्ञानादि गुण निरा- वरणता, तेने सईहतां सममित गुण प्रगत, ते प्रभुना गुणनी बटु मान सहित प्रतीत कन्ना जे जीव धीशीतटनाय प्रभुना योगे प्रभने अचें, प्रभने अचंबानो अधिकार भीरापप्पसेगी सूत्रमय कऍ हे. ॥ अत्यंगहा पाए पनिपार महारबत्ति- पाए सम्माननिवार - ...' : पुच्चिस्मामो अप्ले गालि .? जीप मेति ॥ ए लाटावानी व है. नया अनुजीनो रोग न म तो मनुना साना पज पर ममान हे. , दे० घो. या श्रीअरिहंतने यांचा फल मों कयु के॥ हिपाए गुहाए निम्मे साए अागामियता ॥ अने जिनप्रतिमाने यांदयान फल पण एडीज आला का नया साधुने अधिकार महानत पाटयान पाउ पण हीज का, एम भनेक अभि- कार का वेमारे प्रमुना मान गजरानो मोटो लाभ थे, पोइ दक्षिणा देगीने भय पामे, तेणे उपयोग देगे जे गर्ने पानीवनी दपान फल झालादनी वही, अने आगो आमा ज्ञानादिकम जोई, नो भागा थाय ते मोगहेतु है, अने भाषहिमा ते हिंगा, नया दपहिगा से मार. दिमार्ट कण , मनु हिंगा नाही. दहां श्रीभा या वपन टरो ॥ परमहंगा मावो, जीव बानि नानजिओमिद्रियं ।। सायो- बदप मार, नपinादिना दिया ।। १ ।। नये सात टोकमान दिल्या जीवनात गाभाषः संगनागि अ.हमारनिति निमामिनि, मार पांरपार माय. ती दललाय मायने र आहार, विहार, पान, निगा ददिक कानां, मंदिगत कम पाई. जी. दिलो न नि ? म न पायानि हिंगो, पापोत मिनियम नाय. रीमो दिम? दाम में दम- ६ . द .

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दे. यो. चा० - ॥अथ एकादश श्री श्रेयांसजिनस्तवनं ।। प्राणी पाणी गिनतणी, तुमै धारी चित्त महार रेपदेशी। श्री श्रेयांस प्रभुतणो, अति अद्भुत सहजानंद रे ।। गुण एक विध त्रिक परिणम्या, गम गुण अनंतनोद रे॥ मुनि चंदजिर्णद अमंद दिणंद परें, नित्य दीपती मुग्यकंदरे ॥१॥ अय:-श्रीश्रेयांग मम पामेवा निगा निगाण स्थ सम्पमोगीनो अनि केतां अत्यंत सार अदभुत केला आ- अर्वर्ग सहजानंद केनां अग्रिम महज गमावनो आनं: हे. आश्रयासमुनी ते जीवदाम्य हे, गायनापनपी परिणीने सिद्ध भया है, ते मिदाने अपम्मान प्रदेशी, अर्गतगणी छ, अनंतापापीहे, ते अमनो एक एक गुण ने प्रण परिगतिकप, मद्रातं अयं रिपारा ते गुण परेप, देव अपनी मण्यता अनेकमा गुमनी पायनिय कमांडाय वने हाय, कर रेनो प्रा.नानी नजाने र आगो इद मन म्हानेए, अने और पना बाकी ने माना :- एकादश श्रीश्रेयांसजिन स्तवनं. ६५७ - - दिक ले गुण छे, ते विवि परिणमे छे. एरीत विविधता के करण, कार्य, अने क्रिया, ते गुणनी तेहीज गुणमा छे, ए प्रण परिणामनो कर्ता ते आत्मा छ, तिहां उपादानपणे प्रकृष्ट कारण ते करण अने ते करणनुं फंल साध्य ते कार्य तथा ते करवारूप प्रवृत्ति के क्रिया, कर्त्तानो व्यापार ते सि. अवस्थायें अमेदरूप हे, जेम ज्ञानगुण ते करण जाणई, जने ते ज्ञानगुणवी जे ज्ञेय पदार्यो ज्ञान धाय के एनुं साप फल छे मारे ए कार्य जाणवं, तथा ते कार्य जाणवाने ले ज्ञाननी स्फुरणा एटले प्रवृत्ति ते क्रिया जाणवी, एत्रणे अभेद छे, ए विविधपरिणामें परिणम्या, एवा अनंतगणना इंद छे, ए श्रीपांस प्रभुना सर्वगुण पक्तपने स्वकार्यताने को छ । उक्तं च विशेषावदपके । जंकज कारणाई, पजाया वत्पुणो जओ तेण ॥ अनेणोण मया, तो कारण कज भप- पेज ॥१॥ इति वचनात् ।। एम कारण कार्य क्रियानी अभेदता पण छे, नथा मेदता पण हे, काटें अभेदता हे, सन्द, प्रमेय अभेदता हे, अने संज्ञा संख्या रक्षणे भेदना है, मार एवी यास्पा हे ।। मुनिचंद केतां मुनि ने विकास अविषयी तत्त्वानी मां चंदमासमान अथवा मुनिचंद जिनंद ते जिन नामान्यकेवरीमा पंदना समान, वी अमंद फेता देदीप्यमान दिगंद केला तेनी परें दीप्तुं हे, तेजन नदा मदद केता गुन्दनो समूह हे जेने एहका पहना गुणस्त- पले स्वशाने रहे । । हो आमाना जनता ले माहे मगर ते 83 दे० चो० वा. उपयोग छ । सन्याओ. लदिओसागारोवउत्तस्स उववज्जइ तो अणगारो वउत्तस्स इति ॥ ते उपयोगमा प्रथम ज्ञानगुण छे. माटे प्रथम ज्ञानगुणनी विविधता कहे छे ।। इति । निजज्ञानें करी ज्ञेयनो, ज्ञायकज्ञातापद ईश रे॥ देखे निजदर्शन करी, निज दृश्यसामान्य जगीश रे॥ मु.॥२॥ अय:--लोकालोकमां जे वर्तमान छे, तथा अतीतकालें हतुं, अने आगमीककालें थाशे, ते सर्व पोताना भावप्रमेय त्वपणा माटे ते ज्ञेय छे, एटले जाणवा योग्य छ, तेहर्नु जाणवू ते आत्माना असंख्यातप्रदेश निष्टित ज्ञानगुण छे, वे शानः आत्मानो स्वधर्म छे, सर्वविशेषनो जागंग छे, तेयी निज केतां पोताना ज्ञानगुणें करीने जाणे पुटले ज्ञान ते जाणा- रूप कार्यतुं कारण थ, उपादानकारण कार्यता एक समप छे, अने ते जाणवारूप कार्यनी प्रवृत्ति, ते वीर्षने सहकारे क्रिया थाय छे, जो गुणनी प्रवृत्ति विना जाणवा रूप कार्य मानी, तो दर्शनोपयोग कालें ज्ञानगुण निरापरणपशु छर्नु छे, पण क्रिया विना उपयोग नयी, वेमाडे कारणमून जाने करी सर्व शेयने जाणो छो, पोताना ज्ञानगुणे करी सर्वक्षेपना ज्ञायक केतां जाना हो, तेयी पम् । नमें जागपगा माटे ज्ञातापदना ईश छो, स्वामी ओ. ज्ञानमयी छो, म जाण छो, तेया जाता को हवे दर्शनगगनी विविधता कहे हे. हे प्रमुजी ! तमें एकादश श्रीश्रेयांसजिन स्तवनं. ६५९ पोताना दर्शनगुर्गे करीने निज केतां पोताना आप केतां देखना योग्य जे सर्व अस्तिकापनी सामान्यता, अस्तित्वं,वस्तुत्वं, द्रव्यत्वं, प्रनेत्यादि. नित्यत्वाऽनित्यत्वादि, सामान्यपणे जगीश केतां संपदा एटले जात्माने विषे अनंती सत्व इयत्वादि सामान्यसंपदा हे, तेने दर्शनगुणें देखे, ते “ दर्शनेन पभावानां दर्शनं करोति आमा" इहां आत्मा ते देख- हारो दर्शनगुणे करणमा देख्वा योन्य जे पदार्थ, ते सर्वने देखे हे, एडे देसं ते कार्य, दर्शनगुण के कारण, दर्शन- गुपनी प्रवृत्ति ते क्रिपा, देखगहारो आत्मा ते कर्ता, ए दर्शनगुणा विविध परिणमन जागवू ।। २ ।। इति द्विीय गाचार्यः।। निजरम्ये रमण करो, प्रभु चारित्रे रमता राम रे ॥ भोग्य अनंतने भोगवो, भोगे तेणें भोक्ता स्वाम रे ॥ मु० ॥ ३ ॥ अर्थः वे चारित्रगुणनी त्रिविध परिणति कहे हे. हे प्रभुजी ! हे पानेवर ! हे परमानंद पूर्णानी ! ताहो अनंत आलधर्म ते तन्ने न्य हे, रमवा योन्य हे, ते गुहात्मप- रिणतिरूप निजान्पवित्र नमें रमन को हो. चारित्रगुणे करीने एर चारित गुण करौ स्वम्पने विजेजे रमग ते रूप जने नरगगः प्रवृत्तिरूप क्रिपा तेने करो हो, वनडे है - भुजी ! तमें रमता गम हो. पोताना स्वल्पनां सता हो, देवी स्वरूपरमनी स्वल्पानुभव स्वल्पवित्रनी होगी। ..

दे चो, बा० --" : हवे भोगगुणनी विविधता कहे छे. भोग्य कहेता भोग- ववा योग्य जे प्रगट आत्मस्वरूप अनंतज्ञानादि गुण, वेहने तमें भोगगुणें करी भोगवो छो, के केम ? जे भोगांतराय' कर्मनो क्षय तमने प्रगट थयो, ते भोगगुण तेणे करीने तमें पोतानी भोग्ययोग्य जे अनंतात्म संपदा वेहने भोगवो छो, माडे हे स्वामिन् ! तमें भोक्ता छो,जे बीजाजीव क्षयोपशम भोगी पुद्गलादि अशुद्ध परिणतिने भोगवे छे, वेतो अशुद्धभोक्ताछे, अने तमे शुफ भोक्ता छो, एटले भोगगुणकरणे करीने निजभोक्तापणा- रूप कार्यने करो छो. भोगगुणनी प्रवृत्ति, वे क्रियाने करवे करीने छे. अत्ता सहानभोई, ते असहावाओ अत्तपरिणामा ॥ इति. वाक्यात ॥ माटे भोक्तागुणना स्वामी छो ॥३॥ इति. तृती!). देय दान नीत दीजते, अतिदाता प्रभु स्वयमेव रे॥ पात्र तुमें निज शक्तिना, ग्राहक व्यापकमय देव रे॥ मु०॥४॥.. अर्थ:-हवे दानगुण, जे दानांतराय कर्मना क्षयी प्रगट्यो छे, माटे दान गुण तथा लाभगुणनी विविधपरिणति को छे. इहां दान ते सिद्धतामां स्वगुणना प्रवर्तनने स्वकीय क्षायिक वीर्यनी सहकारतावं देवु वे दान अने सहकारतानी प्रामि जे गुणने, थई ते लाभ, ए रीतें दान तथा लाम प्रवर्ते छे, देय. कहेता. देवा योग्य जे गुण वेहने सहकार वे दान, ते दान नित्य केतां सदा दीजते थके हे परमेश्वर ! तुमें अति दाता छो, अनंतगुणनें सहकाररूप अनतुं दान दीयो छो, स्वयमेव कहेता पोतायीज .

एसद श्रीपासाभिन स्तरनं. -- - पोताने आपो हो, एले सनम ते काम. जने दानापनी महति तेरिया तथा न्हाप दान दीव ते कार्य. ए सर्वनो स्वामी आत्मा ते दाता हे, आमने एहद दान है, तथा एकटान हे, अने पानाव दे गया हैतो विमान हे, ते जालाने तो नवी, हे स्वामी! तुमें निज कहेता पोतनी शक्ति नंमदर तेहना पात्र केतां आधार हो: तथा सानातिना ग्राहक तुमें हो, अने ए आमातिना पापरनन्नयनाम्य अवस्थान पर तंज हो ॥४॥ इति चतुर्य गावाः ।। परिणामी कारज नणो. कर्ता गुण करणे नाथ रे ।। अक्रिय अक्षय स्थितिमयी. निकलंक अनंती आथरे ।। १० ॥ ५॥ ज--वर्ट रे देव । हेपा । नमाग अनेक अनि टस तथा जननिहाल मई मानव ५८, व्हनी का परिते करे हे. पानि के जवादिक अनंतु कई, देहना वर्ना गुपो मने एडे गुर करन ने कल के पल है व नग मुन्नी नाति . हिला ८ क.. कार जिनकन हे नाथ ! में हो, से तुमारं कई पकिः- - मंड इनहेमजा अपना दर ८ दे० चो० बा. जे आउखानी स्थिति तेतो सयोगीभावनी छे, अने श्रीसिद्र- भगवंत तेतो सहजगुणी छे, तेयी अविनाशी स्थिति तुमारी छे. वली निकलंक केतां सर्व कर्मकलंक रहित छो, तया निरा- वरणी एवी जे अनंती आय केतां संपदा वेना तमें घशी छो ॥ ५॥ इति पंचम गायार्थः ।। परिणामिक सत्तातणो, आविर्भाव विलास निवास रे ॥ सहज अकृत्रिम अपराश्रयी, निर्विकल्पने निःप्रयास रे ॥ मु० ॥६॥ अर्थ:-हवे कदाचित् कोई कहेशे जे कोई गुण अधुरो हशे १ माटे तेने पूर्णता कही देखाडे छे. परिणामिकपर्यवे सत्ता कदेतां सती तेहनो आविर्भाव कहेतां प्रगटप एटले प्रागभाव ते अनंतगुणपर्याय निराकरण सकल प्रसंग रक्षित थवे संपूर्णसचा तिरोभावी हती, ते मगर थइ छे, ते मारभावी सचाना विटासना अनुभवनो हे प्रमुजी ! निरास तां घर खो. स्वगुणभोगी छो, सस्वमायना अनुमदी छो, यही है ममु ! हमें सहन केला नभावनो जे मुलधर्म तेना आत्रिम से पर आगयी वेता पायातुना आधार बिना, हे बटी निषिल्प येतां मनोचितना दिना, ते बटी निःपास देतां प्रपास व्यय विना जे आत्मधर्म, देहनो अनुभव ते नमें भोगयो हो ।।।। प्रमु प्रमुना संमारनां, गानां करना गुणग्राम

एकादश श्रीपांतजिन नं.
सेवक साधनता वरे,
निजतंवर परिणति पाम रे ॥ मु०॥७॥
अर्थः- एहना प्रमुनी तेवना ले फल थाप, ते कई
हे. मम ने श्री श्रेयांसनायनिम्मतवी, निरामयी, निराव-
रनी हनी प्रस्ता अनंतज्ञानपी, सर्वतंबरी अनंतानंदरूप
परनेशाता, असहायता, सर्वशक्ति निराकरणता, अनंतपाप
स्वीकार्द कारगारूप निकर्मता, निःसंगता, ममत्व,
विनत्व, माहरुत्व, व्याक्त्व, आधारक, कारकत, कारणत्व
कार्यव, इत्यादि प्रभुता एक एक. प्रदेशे अनंतगुण पाप भाग-
भाव परिजनन रूप स्वपनदाने संभारतां, वित्तनां सरम
करता तथा गातां केतां स्वरयोगें गातां गुणनो ग्रान
सम्ह करतां की सेवा तनतचि मानसिकतानो क्यों ते
निपत ६२ रन मानयी जीव अनादिनो वादक, स्वर-
परराड् द ह : है. = जोर मारनना ते आत्मस्वरूप
निराकरण करवा पावन अवन्या. सर्ग अपवाद तनलि-
तपी मांडी अयोगी चर्म मनपरूप गुणत्यनारोहप, दोषत्पाग,
गुमागभाव अधिक गुमनी रूप. पूर्ण तपनी ईहाल्प साद
नाप पाने के निज ईनां पोतानी संघरपरिणतिने पानी
करीने एके प्रमुगुजपोनें वो परे चेतना गुर्माना
गुपने अहपापी धार. तेवहरूपवनगुण परिने,
द तमताने साडे,
बने तान्दारीनी से क : मानद सारन॥७॥

दे. गो का प्रगटगरामा ध्याता, निना याना धाय रे ।। तारमण कामना, गणतने गह गमाय रे ॥ १० ॥ ८ ॥ अ. भा11. भारगाने गोनानी HTRों में भारत मागमा आपसी मो. ने farm Trwी नगरो भोगणो भरम पार श्रीमान , निगा या नर ना गया, भीग गोशाना Farm यानि l सानो गाना am, दमन म. मा? | A ने पालो म. पर्याय मा माता का TATA अंगांग अननो परख, III | Me विगतमा मापन 111 TH Tiamarth 11 नाग * . * . . A गायोग र Famamalini 74 " पर 1. 711nary ८ एकादश भी ग्रंपांसजिन रतश्न. ६६५ . प्रभु दीठे मुझ सांभरे, परमातम पूर्णानंद रे ॥ देवचंद्र जिनराजना, नित्य वंदो पय अरविंद रे । मु० ॥ ९ ॥ अर्थ:-ते मारे प्रभु दीठे एरले प्रभुनो स्थापनानिक्षेपो दीठे मुने सांभरे केतां स्मरणमा आवे, रमरणमां आवे ? तो के परमात्मा, सिद्ध, भगवान् , अचल, असंगी, अभोगी, अयोगी, तेहनो पूर्ण अनंतपर्यापी त्रिकाल अविनाशी आनंद केतां गुणानंदादिक ते सांभरे, अने ने प्रभु स्वरुपाश्रित चेतना करवी, तेहज पोतानो आत्मा साधवानो परम उपाप छे, ते मारे देव ने निर्मचादिक तेमां चंद्रमासमान ने जिन- राज वीतराग श्री श्रेयांस परमेश्वर, तेना पदरूप अरविंद केतां कमल तेने नित्य वंदो, सदा प्रणमो, तथा स्तुतिकर्ता नाम पण देवचंद्र छे. ते पोताने पण कहे . ले श्री अरिहंतना चरण नित्य सेवो, अरिहंतसेवन तेहज संसार महासमुद्र मोहावर्त अज्ञानांवकार मिथ्यात्वकदममग्न जीवने निस्तार पार करानो पुष्ट उपाय हे, अरिहंत प्रतिमाने आलंबने अनंत जीव पूर्णानंदी धया, वली ने यथार्थ जोलखाणे पुइलाशंसा रहितपणे श्री अरिहंत सेवन करशे, ते परमसुख पामशे. एहज शरण वाण आधार छे ॥ ९ ॥ इति एकादश श्री श्रेयांसजिन स्तवनं संपूर्ण ॥ ११ ॥ - . १२३ ६६६ दे० चो० मा Adi ॥अथ द्वादश श्रीवासुपूज्यजिन स्तवन। हवे प्रभुसेवन जे पूजना नेहना द्रव्यभाव ओठरवावया- रूप धारमा प्रभु श्री वासुपूज्यजी तेनि स्तुति करीयें छैये, तिहां निक्षेपा पार लखीयें छैयें. १ नाम, २ स्थापना, ३ दव्य, ४ माव. तिहां नामनिक्षेपा, लक्षण गायायी कहे छे. पजापाणमिवेयं, ठियमणत्थे पपत्य नियिरकं । जा इच्छिप १ नाम, जाव दयं च पाणं ॥१॥ तथा थापनालक्षणं || गाथा | जं पुण तयत्प सुन्न, तपमिप्पारण तारिसा गारं ॥ कीर इस निरागार, इत्तर मियां साठवण||li टप लक्षण । गापा ॥ दवए दुपएदो स्वययो, विगारों गुणाण संदावो ॥ दश्य भवं भावस, भूपभावं १ ज जोग ॥ ३ ॥ अयया यच कारणं नत् द्रव्यं ।। मूतस्य भाविनो वा, मावस्य हि कारणं तु यहोके नत् दप्प, इत्यादि ।। भावल- क्षण हरिमापयैः ॥ भाशे विवक्षितक्रियानुमतियुत्तो हिं विधिः समाख्यातः सर्वरिंद्रादिवद्वंदनादिक्रियानुभवात् ॥इति।। ९ गते पार निक्षेपा हे, नशा कोइक नामादि निक्षेपा उपचारें माने थे, वेहने कहियें ले मिन्न वस्तुने नामादिक करिप, हे मिन्न हे, परंतु पोन पोलानी पस्तूनां नामादि पार हे बांज, तेमाटे का थे, बीजिनमदरत्यः ।। ६ मादोधिय बापु, नर मुन्नहि किंथ सेसेहि ॥ नामा. दो निमावा, नियुपजाया ॥ इपि ॥ पयस्माद देवि नामादयो यम्मुन. पाया धर्मा नपा प्रविष्टादशा. पुनीत नामदपोरि भnि || पर at का है.

द्वादश श्रीवासुपूज्यजिन स्तनं. भावनिक्षेपाने ले त सिनतुषु विशेषतर्वियमानानां नामादीनां प्रधानतानाजोदर्शितः तामान्यतः पुनहित्यमानानां सर्ववस्तुषु प्रत्येक चतुर्मानप्पनीषांसमावः प्राप्पतएवेति दर्श पनाह ॥ अहा क्युनिहालां, नाम क्याप जो तयागारो॥ कारणपादन, जप वनं तं भा ॥१॥ ए गाया चार निशेपा एक वस्तु कहा, तथा वली नामादि नपर्ने परस्पर विवाद निपालाप पूज् का हे॥ एवं विवति नपा, निहाभिनितको परोपरजो ॥ इतिवचनात् ॥ वर्ग पूज्पदंज वचन हे ले, नानाइमेपतइत्य, बुद्धिपरिणामभावको निप॥ न्युअत्यनोए, च उपजापं भयं सत्वं ॥ १ ॥ इति ए. रोते नानादिक चारे निक्षेप ते पस्तुना वपर्याय है, एन श्रजा कात्री, ए निक्षेपानं वरुप हिलारें प्रीविशेषावस्य कमां कई हे. तिहांगी ए गाया टली हे. ॥ इति प्रशस्तिः।। ॥पंपडो निहालु रे यीजा जिन तपोरं ॥ ए पी ।। पूजना तो कीजें रे वारमा जिनतणी रे, जसु प्रगट्यो पूज्य स्वभाव ।। परकृतपूजा रेजे इच्छे नहीं रे, साधक कारज दाद॥ पू० ॥१॥ जहरे कारमा श्री बाप सनीनी स्तवन रे हे. हे भव्य जीये! तनारे को बनाने मुन्नी कर मन हे, तो वारना जिन दीनराग श्रीवासाम्प पुत्मोन प्रजना ई, एमनिरादर- पाचरित्री ज्ञान, 3 ६६८ दे० चौ० चा० अयोगी, अभोगी, अलैशी, अभेदी, असहायी, अपायी, अरूपी, शुद्धस्वरूपी जे सिद्ध, सकलपरभाव अभोगी, युगलो- पचाररहित एहवो पुज्यस्वभाव जेहनो प्रगट्यो छे, वेहनी पूजा कीजें, जे भक्तिना रागी नहां, अने अभक्तिना द्वेषी नहीं, एहश सर्वज्ञ तेहीज पूजवा योग्य छे ।। उक्तं च आप्तमीमांसायां ।। देवागमनमोयान, चामरादिविभूतयः ।। मायाविष्वपि दृश्यते, अन स्वमसि नो महान् ॥१॥ सूक्ष्मांतरितार्थाः प्रत्यक्षाः कस्यचितु यथा ॥ अनु में तत्यतोज्ञान, मिति सर्वज्ञशंसितम् ॥ १॥ अइसय पाडिहेरा, सम्म कम्म उदयसंमुआ | लेणं न बिम्हओ मे, विम्ही वीयरागते ॥१॥ वली प्रभु प्रज्यपर्ण कहे छे. जे परकृत देवता मनुष्य गुणरागी थका अनेक प्रकारनी भक्ति, पूजा करे छे, परंतु परमेश्वर, कोइनी पूजा इच्छता वांडता नयी, इच्छादोष रहित छे, माटे परभावना संग, तथा परकृताजाने वांछता नयी, वे पूज्य जाणश. अने साधक से मोक्षना अपीं, मार्गानुसारी, समकिती, देशविरति, संवेगपझी मुनिराज, तेहतं कार्य, जे संपूर्णसिद्धता, वेहना दाव केतां उपाय छे, तेहीज निमित्त योगें अनंत सिद्ध नित्यना, माटे पोते पृजाना अवांछक, अने पूजे तेहने परमानंद पूर्णता निपजे ॥१॥ इति रे कारण भावनुं रे, भाव प्रशस्तने शुद्ध ॥ परम इष्ट वल्लभ त्रिभुवन धणी रे, वासुपूज्य स्वयं बुद्ध ।। पू० ॥२॥ द्रव्यथी पूजा द्वादश श्रीवासुपूज्पजिन स्तवनं. ६६९ ' n . , अर्थः- पूजाना ये भेद हे. एक व्यपूजा, पीजी भावपूजा, तिहां न्हवण विलेपनादिक जे बाब उपचार, योग समारखाने करियें, ते द्रव्य पूजा जाणवी. तिहां अदार पाप- स्थानक छे, ते सर्व आत्माने दुःखहेतु छे, ते सर्व पलटाववाने पूजामा प्रशस्त राग करिये, ते आत्माने तज्जातीय तजवा योग्य जे कर्म ते कर्म निर्जरवानी नीति के, माटे जिनपूजा ते संवर छे, तेथी अवश्य करवा योग्य हे, तेमां बाद्ययी जे फूल, केसर प्रमुखनी पूजा ते न्याम्प छे, ते भावपूजा ने गुणगुणी एकत्वता रूप हनुं कारण छे, माटे व्यनिक्षेपो ते तेहनेज कहिये, के ले भावन कारण होय. हवे भावनिक्षेप पूजा ते वे प्रकारनी छे. प्रथम मास्तभावनिक्षे पूजन, वीजें शुद्धभावनिक्षेपे पूजन तेहमां भाव ते आत्मानी परिणति, अने प्रशस्त ते गुणी ऊपर राग जाणवो ॥ उक्तं च ॥ गाथा ॥ अरिहंते सुयरागो, रागो सुमुगीसु पश्यणेसु च ॥ ए सुपसत्यो रागो, इति वचनात् ॥ तथा चउसरणपयन्नामा कर छे ॥ नुकयाण राय समुप्पन, पुन पुलयं कुरु कगलो ॥ इति वचनात् ॥ हवे प्रशस्तन स्वरूप लिखे छे. तेमा जे विषः परिग्रह उपर राग छ, यी तो कर्मबंध उपजे, अने अनुकंपा ने शातावेदनीनी हेतु हे, तेतो सर्वनिर्गणी जीव उपर पण छे, नया गुणी उपर अनुकंपा करवी, ते निदवा गरहवा योग्य छे । उक्तं च आ- वश्यके । सुहिएस अ दहिएस अ, जा ने असंजएस अथकंपा ।। रागेण व दोसेण व, तं निदे नं २ गरिहानि ॥१॥ इति वाक्यात् ॥ तथा जे अरिहंतादि १३ पग्नेश अने आगम, साधर्मिक उपर पक्षपात विना गुगापणा माटे ने राग, ते प्रशस्त राग जाणवो. ते यद्यपि पुण्यबंधनो हेतु हे, तथापि -

दे० यो बाd
उता आरमगुणने स्थिर पानो तथा नया प्रग करवानी हेतु
छे. पुण्यानुबंधी पुण्यनो हेतु छे, ए श्री हरिभद्र"पूरें पंच
परतुग्रंयमां कधं छे ॥ गाया || नाणाइ गुणरुइ खट, तारतीय
गुणसंपर्य संपत्तो ॥ चनो गुणसंपत्तो, पसत्यरागं निहिं कुणई
॥१॥ गुणरुइ मूलं एवं, तेणं गुणवृदिउ मणिपं ।।
जह इलाइपुत्तो, पसत्परागेण गुणपत्तो ॥२॥ इति वचनात ॥
इहां कोई पूछे जे, श्री गौतमस्वामीने त्रिभुवन दयाल, विश
लानंदन, श्रीवीर परमात्मा उपर राग हतो, ते केवलमानने
रोयक केम थपो ! तेहने उतर कहे छे.जे भीगीतभनो प्रशस्त
राग, क्षयोपशम रत्नत्रयीनो तो दीपक हनो, पण श्रीवीर विष.
मान छतां, रागनी मंदता थइ नहीं, केमके छते कारणे राग टटयो
इकर छे, पण जेवारें कारण मट' तेथी रागनी अवस्था अटकी,
तेवारें श्रेणी थई, म प्रशस्त राग सर्व जीवोने क्षयोपशमी व
यीनो विरोधी नयी, क्षापक्तानी हायुक्त, क्षायामाने मनीक
करे, पंतु आयकरबत्रपी यश दीये नहीं ॥ उक्त च भासवि.
शमुस्यः प्रीजिनपर मुरिपूज्यः संवेगरंगशाला सिद्ध रसो'
नन्गुण, ईहाए समए गुणे मध्ये ॥ देणं अरिहंताई, सुगम
मुगग समाहिमो॥१॥ ते माटे प्रसन्न भाषामा पत्र
सायनामां . हवे शुद्ध मावाजाते, जे आरमाई सामान्य
पक, विशेषचक्र, श्योपशमी पेननावीर्य, हे सर्व श्रीमरहम
परमारमाना झापासिद्धत्वादिगुणानुपापी पाते से शुत्रमार
TA मावी, पटले गुणगी पईने गुगाहमानी प. परी
स्वप्रम नभयपने पके स्तम्माता निरमे, ए मोक्षमो.
माग . मगत माजानं मल कई है. भी भारत
शवामी माप क्षेत्राच्या वृद्ध या प्रा विभु-

द्वादश श्रीवासुपूज्पजिन स्तवनं. ६०१ बननाय ते परम केतां अत्यंत इष्ट केतां रलिलामणा बड्भ केतां वाल्हा लागे, ते प्रशस्तरागरूप भाव पूजा जाणवी ॥२॥ इति द्वितीय गाधार्यः॥ अतिशय महिमा रे अति उपगारता रे, निर्मल प्रभु गुणराग ॥ सुरमणि सुरघट सुरतरु तुच्छ ते रे, जिनरागी महाभाग ॥ पू० ॥३॥ अर्थ:-वनी प्रशालरापा बोलवावे हे. ने श्रीअरि- हंत अतिशपना महिमा उपर अद्भुतता आश्चर्यता तया आठ प्रातिहार्पनी विस्मयता इत्यादि देखीने अयश सांभलिने ने राग उसजे, ते सर्व प्रशस्तराग जागो, तथा जगन्ना जीवोने महामोहरचार निवारूप धर्मदेशना देईने विसरी गएलो जे आत्मवर्ग, तेने देसाडे सर्व संदेह टाले ए उसगार, भाव- आजीविकाना नाका, नवी भूलें पड्या जोबोने तचना देखाइनार, एहव उपकारीपर श्रीअरिहंत हे, ते उपकारीपणा उपर ले इष्टता, तथा निर्मल कर्म आवरणे रहित केवल ज्ञान, केवल दर्शन, वीतरागता, असंगता, स्वरूप भोगी प्रमुख गुणा उपर राग ते पण प्रशस्त राग कहि . बली सुरमणि कलां कामकुंभ तथा सुरतरु केतां कल्पात ते सर्व तुच्छ भासे, केमके एतो इहलोक्नुसना हेतु, नया भावअद्धताना वा- रखा वाला हे. तेहने असार जानीने तुल गणे, अने श्रीजरि- हंतनो राग ते परंपरा आत्ममुखनो हेतु हे, आत्माना गुगनी वृद्धि करसा पुष्ट निमित्त हे, माडे श्री जिनराज, परमदयाल, - - MA ६७२ दे० चौ. बा. स्वगुणभोगी, माहागोप, परमोपकारी, माहारी तत्व संपादना उपदे-. शक, वे उपर जे जीवने साची ओलखाणे राग प्रगटे, ते जीव महाभाग्यवान्, तया पवित्र जाणवा, जे जीव कामराग, दृष्टि- राग, स्नेहरागनी मीड टालीने, श्रीपुरुषोत्तम, परमानंदी श्रीवा- सुपूज्य प्रभु उपर रागी थयो, तेने धन्य छे. ते महंत जीव मोहोटा भाग्यनो धणी जाणवो, ए सर्व प्रशस्त रागभाव पूजा कही ॥ इति तृतीयगाथार्थः ॥३॥ दर्शन ज्ञानादिकगुण आत्मना रे, प्रभु प्रभुता लयलीन ॥ शुद्ध स्वरूपी रूपें तन्मयोरे, तसु आस्वादन पौन ॥ पू० ॥ ४ ॥ अर्थः-हवे शुद्धभावपूजा कहे छ, तिहां जे आत्माना क्षयोपशमभावी दर्शनगण, तया ज्ञानादिगुण, ते सर्व प्रमुनी प्रमुतायी लयलीन यया छे, बहुमान श्रीअरिहंतनुं छे, मासन पण अरिहंत गुणनी अनंनतानु छे, रमण श्री अरिहंत गुणना स्वरूप भासननुं छे. अनुभव पण अरिहंत गुणना भासननो छे, एम जेटली आत्मशक्ति प्रगटी छे, ते सर्वअरिहंत गुणने अनुयायी करीने, तन्मयतारुप करे, ते शुद्धभाव पजा जाणवी ते आवी रीतेः-प्रभु नो निरवारभासनतुं आस्वादन, वे आनंदतायें मग्न रहे, शुद्धस्वरूपी परमात्मा तेहनस्वरूप जे जे वस्तुधर्म, तेमव्ये नन्मयी थईने, तेना आस्वादने अनुमवें, पीन केतां पुष्ट रहे, ते भावयी भक्ति जाणवी, तथा वंदन नमनादिक्ते योग भक्ति जाणवी नथा प्रभु उपर इएता ते द्वादश श्री वासुपूज्पजिन स्तवनं. राग भक्ति जामवी. तया हुं सही मोटो माहरे अरिहंत परमेघर वो धणी हे, हुं मोक्षना मार्गने पाम्यो, अने पोताना आत्मगुणने प्रभुनी प्रभुताने अनुपापीपणे वावे, एहवो टीन धको रहे, व्हने तवभक्तिवंत कहिए. एहवा सममिति, देशविति, सर्वविरति, में पोतानी मूलपरिणति प्रभुतायी नेटवी हे. आत्मपरिणतिरूपन्मंगें प्रमुनी प्रभुताने सावी रखा हे, महानुभाव हे, ते शुद्धभावपूजा जाणवी ॥४॥ इति चतुर्य गाथार्य ॥ शुद्धतत्व रस रंगी चेतना रे, पामे आत्मस्वभाव ॥ आत्मालंबी निजगुण साधतोरे, प्रगटे पूज्यस्वभाव ।। पृ० ॥ ५ ॥ अर्थः-एम रनिर्मट तची श्रीजरिहंनदेव सिद भगवान् व्हनारसे रंगानी पड़ी तेहना गुगनी भोगी नेवारे चेतना थपी, अन्य विकल्प बी अनुभवभावना सहित मभवले रतीटी द् तेबारे ते चेतना पोताना आमसभा- बने पामे, आमवभावधि, जामस्वभावोपयोगी, आत्मस्वभा- वरमनी, आमानुभवी भयो, पट उगदानाबटनी अवस्था पामे आने वारे ए भापजीव अन्मानना धाय, देबारें ताना मुगने नारनो नियनो. मायर दानादिक गुपने प्रगट करतो. मन्यान को दोपन हानी गानागनाव स्वरूपद स्वरूपानुनी पनो १३. नननने निजा- ६७४ देपो वा करे, एटले पहेलो हुं परमपूज्य अनंतगुणी छं, ए निररूप सम्यक् दर्शन प्रगटे, स्पाद्वादसत्तार्नु भासन थाये, पछी ने सत्ता प्रगटी, वेहनो रमण अनुभवरूप चारित्रगुण प्रगटे, पछी, निरावरण केवलज्ञान नीपजे, ए परमपूज्य श्रीअरिहंतने पूज- वायी पोतानो पूज्यस्वभाव प्रगटे ॥५॥ आप अकर्ता सेवाथी हवे रे, सेवक पूरणसिद्धि ॥ निजधन न दिए पण आश्रित लहे रे, अक्षय अक्षर ऋद्धि ॥ पू०॥६॥ अर्थः-श्री वीतराग पोते परजीवना मोक्षना अकर्ता छ, केम जे परकर्तापणुं जीवद्रव्यनो धर्म नयी, तेमाटे पोते पर- जीवनी सिजिना अकर्ता छे, पण श्रीप्रभुजीनी सेवायी सेवक जे भक्त, तेहने हुवे केतां थाय शुं थाय तो के संपूर्ण 'सिझता निपजे, निज केतां पोतानो धन जे अनंत ज्ञानाः दिकगुण ते प्रमु कोइ यीजाने आपता नयीं, एटले कोइ 'पोतानो गुण वीजाने आपे नहीं, अने ते गुण पण पोताना द्रव्यने मुकी यीजामा वर्ते नहीं, अने कोइ द्रव्य कोई ई. ध्यनो गुण ग्रहे पण नहीं, सर्व द्रव्य पोतें पोतानी सत्ताला स्वामी छे, तेमाडे अरिहंत पोठे कांइ आफ्ताज नयी परंत जे अरिहंतने आश्रित सेवे, ते निथे अक्षय केतां जेहनो क्षय न थाय तया जे विनाश न पामे, तथा अक्षर केतां खऱ्या जखं जेहमां नयी एवी अविनाशी अक्षर अनंत मात्मसंपदा पूर्णानंदादिक शुद्धि रहे केतां पामे, माटे जिन- इशा श्री बसालि तपनं. मत तेई स्वित नामक जर हे ॥६॥ जिनवर पूजां रे ते निजपूजना रे. प्रगटे अन्वयशक्ति। परमानंद दिलाती अनुभवे रे. देववंद्र पद व्यक्ति ।। पू० ॥ ७ ॥ - जिनरानी हा मति दी पोताना मलनी रुनकन्वी हे. अन्न वदारका हे, जलार दन की है, मने जिनसेवनानी पोतना सवली ननंदक नंतरत्ति. हे परे, प्राले, के नंदने विकत घई. अनुक्तां निवरत, निमपत. नस्वभेजाबरू नंदनका. नेहनी जोहानी न है दिने सहित निरनिको नयाना को पहल उत्तम मार है। इस साजिनः ।।

दे० चौ० बा० ! ॥अथ त्रयोदश श्री विमलजिन स्तवनं ॥ ॥ दासअरदास सीपरे करे जी ए देशी। विमल जिन विमलता ताहरी जी, अवर वीजे न कहाय ॥ लघु नदी जिम तिम लंघीय जी, स्वयंभुरमण न तराय ॥ वि० ॥१॥ अर्थः-हवे श्री विमलनाथ प्रभुजीनी स्तुति कहे छे हे विमलजिन ! हे परमेश्वर ! ताहरी विमलता केतां तमारी निर्म- लता केहेवी छे १ जे समस्तद्रव्यकर्म भावकर्मपरानुजापीतादि दोष रहित पणे छे एहवी निर्मलता ते अवर केतां वीजा कोई छद्मस्थ जीवे न कहाय केतां कहि शकाय नहीं, सिद्धस्व. रूपस्य अनंतत्वात् वाचःक्रमपरिणतत्वात् आयुष्याल्पत्वात् , वेन- वक्तुंनशक्यते केन इतिभाष्यवचनात, तेमाटे कहेवाय नहीं देना उपर दृष्टांत कहे छे. जेम लघु नदी केतां नान्ही नदी तेने जेम तेम लंधी ये, केतां उतरि , पण असंख्याता कोडी जो. जननो स्वयंभुरमण नामा समुद्र, ते कोइ पामर जनयी तयाँ जाय नहीं, अने प्रभुना गुण तो स्वयंभू रमण समुदयी पण अनंतगुणा छे, ते सर्व वचने हो जाय नहीं ॥१॥ सयल पु वी गिरि जल रु जी, कोइ ताल एक हथ्थ ॥

त्रयोदश श्री विमलजिन स्तवनं. ६७७ तेह पण तुझ गुणगण भणी जी, भाखवा नहीं समरथ ॥ वि०॥२॥ अर्थः-तथा सयल केतां सर्व पृथ्वी, गिरि वे पर्वत, जल ते पाणी, तर ते वनस्पति, ए सर्वने कोइ एक हाथै तोळे केतां उपाडे एहवो बलवंत पण ते बाल वीर्यवंत होय तेथी वेपण प्रभुजी ! ताहरा गुणना गण केतां समूह तेने भाखवा केतां केहवाने समर्थ नहीं, कारण तेहमां बालवीर्यनी शक्ति छे, अने तमारु निर्मल स्वरूप ते केवलज्ञानी क्षायक- वीर्यवंतने गम्य छे, तेने पण सर्ववचनें गोचर थायज नहीं, तो बालवीर्यवंतयी केम केहेवाय ! इति द्वितीय गाथार्थः ॥२॥ सर्व पुद्गल नभ धर्मना जी, तेम अधर्म प्रदेश ॥ तास गुण धर्म पझव सहुजी, तुझ गुण एकतणो लेश ॥ वि०॥३॥ अर्थः-सर्व पुद्गल द्रव्य तथा नभ केतां आकाश द्रव्य, धर्म केतां धर्मास्तिकाय द्रव्य, तेमज अवर्मास्तिकायना प्रदेश, एटले ए पंचास्तिकायना प्रदेश अनंता तेहना गुण अनंता वे गुणधर्म नित्यत्वादि ते पण अनंता वेहना पर्याय वली वेहवी अनंतगुणा छे, ते सर्व मली पण हे प्रभुजी । नाहरो एक गुण जे केवलज्ञानरूप वेहनो लेशमात्र छे, केम जे ए सर्व पंचा. स्तिकायना भाव वर्तमान काले छे, अने केवली तो ए सर्वना अतीत, अनागत, अने वर्तमान, ए त्रणे कालना पर्याय उत्पाद, १३५ दे० चो० मा० एयय, ध्रुवरूप तेहने एक समपमा जाणे, ता एयी अनंत- गुणा बीजा धर्मने पण एक समपमा जाणे, ते माटे केवल ज्ञाननी शक्ति अनंतगुणी छे । उक्तं च ॥ विशेषारश्यके । देहि केवलम्प निःशेषज्ञेयगता विश्यमूता पर्यापास्ते ज्ञाना- देवादिनयमलेन ज्ञानरूपत्वादपियेर स्वपर्यायाः मोक्ता नतु पायापेक्षया इत्यविशेषकेवलयविरोधी नाशंकनीय इति ।। इति ॥ ३॥ एम निजभार अनंतनी जी, अस्तिता केटली थाय ॥ नास्तिता स्वपरपद अस्तिताजी, तुझ सम काल समाय॥ वि०॥४॥ अर्थ:-परीते जेम केवलज्ञानगुण अनंतापी, तम जे येवर दानादिक विज्ञ केनां पोताना भार गुग पर्याय अनंता है, नंदनी अनंगता केही पाप ने नप रोत्र र भार प अग्निपा ने अननु नेम पपपोप जे पीमा जीवनय सादि अनीराय नेटना प्रदेश तेदना स्वभाष देशम पनी जे अननताले गर्नु मानि. की नमागना , दे पण अनंत ते नमसरसा, मेम सापट गये ॥ इतिश्री ना हेम मी: देय माता में नप पपईया मोदी, भकिन मलादेश भाटिना are reो श्याम दाई नादान 13

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दे० चो० वा ते माटे नास्तिपणानो वस्तुयी संबंधज छे, ते स्वपद केतां स्वदन्यना गुणांतरनी विवक्षितगुणमां नास्तिता तथा परपद केतां परद्रव्यना गुणनी नास्तिता ए नास्तिता सर्व वस्तुधर्मे पारिणामिक भावे रही छे, ते सर्व निरावर्णपणे हे श्रीविमल प्रभु ! तमारी परिणामिकतामये तथा कर्तृतामध्ये भोर्तृतामध्ये समकाले केतां प्रतिसमये समाये छे, एटकी अनंतता तमारे विपे छे, हे प्रमुजी तमारी निर्मलता ते सम. केति जीवने अभागोचर छे, तथा पूर्वधरने परोक्षमासन गोचर छे, अने केवलीने प्रत्यक्ष छे, ए रीतें अमिलाप्य तथा अनमिलाप्यनी अनंतता छे, ते बीजा कोइयी कहाय नहीं, माटे हे नाथ ताहरू ज्ञान, दर्शन, सुखवर्मनी अनंतता जे भन्यजीवने स्याद्वादोपेत मासन प्रतीत गोचर थइ, वे जीवने धन्य छे, तो हे प्रभुजी ! तमारी शी बात कहूं! तमे तो महापूज्य छो, महोटा छो॥ ताहरा शुद्धस्वभावने जी, आदरे धरी वहुमान ॥ तेहने तेहिज नीपजे जी, ए कोई अद्भुत तान ॥ वि० ॥५॥ अर्थ:-हे प्रभुजी नाहरो जे शुद्ध निदोप समात्र, अ- नंतानंदादि रूप अक्रिया, अक्षय, वेदने जे आदरे केतां अंगीकार करे, वंदन, सेवन, स्मरण, ध्यानादिकपणे आदरे, घड़ी बहुमान केतां अन्यादरपणे जे आहे, ते साव्यापी सेवानो तेहवोज पोलानो स्वभाव शुद्ध थाय, निःकर्मता नीपजे, प्र- - प्रयोदश श्री विमलजिन स्तवनं. ६८१ भुना दीहवो स्वभाव निर्मल थाय, माटे रे प्रभो! ए कोई अद्भुततान केतां तत छे ले अरिहंत प्रभुनु शुदयस्प चिंतवतां ध्यान करतां, पोतानुं स्वरुप नीपने, एहिज आश्चर्य छे॥५॥ इति पंचम गाथार्थः ।। - तुम प्रभु तुम तारक विभृजी, तुम समो अवर न कोय ॥ तुम दरिसणधको हुँ तयोंजी, शुद्ध आलंवन होय ॥ वि ॥ ६ ॥ अर्थ:-माटेरे धीविमलनाथ । माहरा प्रभु अभिपति तुमेज लो, वही मुजने संसारमांची नारवा वाला परमनिमक परमत्तामवंत तुमे टो, रे देव ! हे कृपासिर ! हे नानभानु तुम समान मादरे बीजो को नयी विभवन माहे मेज दबाळ हो, हे जगतबन्सल । । नाहगे नहान फेला दन्दड या दर्शन से समकिन तेने पाने धरे तो मार नमन को- लंगी शार भयो, हां कर पा घरे नाना हा असार चन्दन व एम7 निमंत बापना को को माय! नाहन ने अपने में मारमा ले ओली पिटप - दिपविली པ་ “ བྦེ་ དུསཾ ག..} ཡ - प्रनुमणी चिमलता यादी जी. से पर पिल्मन र ॥

दे० चो. पा. देवचंद्र पद ते लहे मी, विमल आनंद स्वयमेव ॥ वि० ॥७॥ अर्थः-ए रीते प्रभुजीनी विमलता केतां निमस्ता ने ओलखीने जे मागी थिरमन केतां दृढमने सेवा भक्ति करे, वे समकिति, देशविरति सर्वविरति जीव, सर्वदेवमां चंद्रमा समान पद परमात्मपद लहे केतां पामे, अनादि संततिसंयोगी भावकर्म उपाधिनो क्षय करीने, निर्मल सिद्ध बुद्ध आत्मतत्वनी पूर्णता ते पामे, इहां स्तुतिकतान नाम पण देवचंद्र छे, वे सूक्यु ए पद कहे छे जे मन्ये विमल केतां निर्मल आनंद ते स्वयमेव केतां पोतेज छे, ते पोतानो आनंद पोते भोगने एहवा अनंत धर्म प्राग्भाव रूप श्रीविमलनाथनी सेवना करो, मोक्षार्थी जीवने श्रीअरिहंत सेवना वेहिज मोडं कारण छ, अनादिनी मांति टालबानु पुष्टनिमित्त छ, ॥ ७॥ इति त्रयो- दशम श्री विमल जिन स्तवनं संपूर्ण ॥ ॥अथ चतुर्दश श्री अनंत जिन स्तवनं ॥ ॥ दीठी हो प्रभु दीठी जग गुरु तुज ॥ देशी ॥ मूरति हो प्रभु मूरति अनंत जिणंद, ताहरी हो प्रभु ताहरी मुझ नयणे वसी जी॥ समता हो प्रभु समता रसनो कंद, सहेजें हो प्रभु सहेजें अनुभव रस लसी जी ॥१॥ . .

ईश श्री अनंतजिन स्तवनं.
६८३
जर्यः हवे चौदमा प्रभु श्री अनंतनायजीनी स्तवना
को डे, हे अनंतनायजिद नाहरी केतां तुमारी मुरति देता
नुन एडे आकार के माहारा नपने केतां नेत्रने दो वती
है! कहेली हे तो केसमता ने राग द्वेष रहितपर
के रूप ले स नो कंद हे. पी सहने प्रयास बिना
अनुभव स्वभोगीपर ज्ञान व्हना रयी टीन हे तन्नय छे
भवदव हो प्रभु भवदव तापित जीव,
तेहने हो प्रभु तेहने अमृतघन समी जी।
मिथ्याविष हो प्रभु मिथ्या विपनोखीव,
हरवा हो प्रभु हरवा जांगुली मनरमी जी ॥२॥
अर्थः-वर्ग भवने चारगतिस्प संसार, ते रूप दव
देतां नाबानलना तारे करीने बी रहेता आइलित जीवोने
पास शीतलता कसाने नाही मति ने अमनना मेह
समान डे, एडे संतानो तार नमाल। नयाँ म हे, माटे.
वर्ग निष्पावरूपवित्र व्हनी बांध केतां यूनि- वेहने
हसाने गुर्ज देतां गाडीना मंत्र समान ताहरी मूर्ति हे
॥२॥ इति ॥
भाव हो प्रभु भावचिंतामणि एह,
आतम हो प्रभु आतम संपत्ति आपत्रा जी ॥
एहिज हो प्रभु एहिज शिवसुख गेह,
तत्व हो प्रभु तत्त्वालंबन थापवा जी ॥३॥

दे० चो० प्रा० अर्थः- वली हे प्रभु ! तुमारी मुद्रा भावचिंतामणि रत्न समान छे, एटले चिंतामणि रत्न ते इंद्रियसुखनो हेतु छे, ते तो द्रव्य चिंतामणि छे, अने श्रीवीतरागनी मृद्वा ते मोसम सनी हेतु छे, माटे भात्र चिंतामणि समान छ, आत्मानी पोतानी अनंतज्ञानादिक संपत्ति आपराने भाव चिंतामणि रत्न समान छे, माटे एहिज शिव सुखनुं घर छे, तत्वले यस्तु. नो मूलधर्म छे, ते स्वरूप आलंचवाने तुमारी मूर्ति श्रेष्ठ कारण छे, ॥ २ इति० ॥ जाण हो प्रभु जाए आश्रय चाल, दोटे हो प्रभु दीठे संवर वधे जी ॥ रल हो प्रभु रखत्रयी गुणमाल, अव्यातम हो प्रभु अध्यातम साधन सधे जी॥४ अर्थ:-चली जाय केतां नाश पामे आश्रय केतां नयां कर्म देवानी चाल नाश पाने, नया प्रभुजीनी मूर्ति दीठे, संस. नी कि चाय, आत्मधर्मरमणरूपता यवे, यती एनपी केतां सम्पदर्शन, ज्ञान, चारित्रम्प जे गुणनामाला येतां निमंत्र श्री ते दमा , पदयो अध्यात्मभामम्वरूप, तेह सावन केला नापनायानो माय ने मवे केतां नापजे ॥ ५ ॥ मोठी हो प्रभु मीठो दोटो हा प्रभु दोठी गवि बहुमानयी जी। मुझ पर प्रा तमगुण भामन युन ramm 1 भय नयी जी ।। ।। मूरत तुझ, पंचदश श्री धर्मनायजिन स्तवनं. ६८५ अर्थ:-हे प्रभुजी ताहरी सुरत केतां धापना ले आ- वाररुप सुंदर मुना दीडी ते घनीज भीती केतां मिष्ट लागी पन केवी दीनी ले रवि मोज्ञाभिलापयुक्त नया बहमान संयुक्त अन्न हसे वीडी, जे आज हूं धन्य कृतज्य जेम वसुदेव हिंडमले का हे. कोविह पुलविनो, बविलो पुवं व भव सहलेहि ॥ ते जिणवतंसमा लंभोमपंच ले टो॥॥ तेदी अहो वीतरागता : अहोज्ञानता ! अहो सकारता ! अद्भुतता ! आता जे हुं रंक दीन मोहेमन्न असंपनीने ए मन मुत्रानो पोग पन्दो. ते नीज मोटी बात पई एहवा बहुमाने दीदी. एहवी अरिहंता ने अरिहंतना केवल जानादिक गुण ने अनंत चतुप नेहना भान उर- योग युक्त ने जोर से, पर्युपासना ब्रम्प तथा भारती करे तेहने भव देनां मंहारनो भर नी ले अरिहंतनी भक्ति करे से कर प्रमः करे नहीं ।। उन च ।। हो विनमुकारो, जिपवर वाहस बदमाम || सामागगो. नारद नरं व नार का ॥१॥ इति करना ॥ इति पवन नापार्थः।। नाने व्यणा हो प्रमुखमा दी उहले जी ।। गुण आस्वाद हो प्रनु गुण आस्वाद अभंग, नन्मय हो प्रभु तन्मयता जे धने जी ॥६॥ नाम हो प्रनु अद्भुत ग. नतिजे. ३ । नहर्ग पोर- पारन वीर न...: सपना ... दे० चौ० बा पकारी छे, जे दीठे पोतातुं स्वरूपपणुं सांमरे वली यापनाने 'निमितें गुण जे अनंत चतुष्टयादिक, परम निर्मल यथार्थोप- देशादिक वचनातिशय अशोक वृक्ष, इंद्रध्वजादिक देखीने अभंग गुणवें आस्वादन थाय ते गुण आस्वादन केवो में तो के अभंग छे ते कोने नीपजे के जे जीव, तन्मयतापणे श्रीमभुना गुणयी धसे, तेहने नीपजे तेनेज इत्यादिक वातो. नो आनंद थाय ।। इति षष्ठ गाथार्थः ।। ६ ।। गुण अनंत हो प्रभु गुण अनंतनो वृंद, नाथ हो प्रभु नाथ अनंतने आदरे जी॥ देवचंद्र हो प्रभुदेवचंद्रने आणंद, परम हो प्रभु परम महोदय ते वरे जी ॥७॥ अर्थ:-एम ज्ञानादिक अनंत गुणना बूंद केतां समूह एहवा नाथ केतां श्री अनंतनाथ स्वामी तेने जे आदरे, उपादेय करे, ते पाणी देवचंद्र जे स्तुति कर्ता अथवा देव चंद्र ते चोसठ इंद्र तेहने आनंद केतां परमानंदमयी एवो जे परममहोदयवंत मोक्षरूप स्थानक ते भक्तिवंत जीव वरे केतां पामे ए नियामक छे. ए प्रमुनीने सेवतां कर्म क्लेशयी रहित थाय ॥७॥ इति चतुर्दश श्री अनंत जिन स्तवनं संपूरणम् पंचदश श्री धर्मनाथ जिन स्तवनं. ॥ अथ पंचदश श्री धर्मनाथजिन स्तवनं। ॥ सफल संसार अवतार पहुं गणुं ए देशी ॥ धर्म जगनाथनो धर्म शुचि गाईऐं, आपणो आतमा तेहवो भावियें॥ जाति जसु एकता तेह पलटे नहीं, सुद्ध गुणपज्जवा वस्तु सत्तामयी॥१॥ , " अर्थ:-हवे श्रीधर्मनाथ भगवाननी स्तुति करे छे अने आत्मद्रव्यने साधकता बाधकतानो उपयोग आगे ठे. तिहां धर्म एहवे नामें पतरमा तीर्थकर जगदुपकारी परमतत्त्वी जग- तुना नाथ, तेहने परमहिनकारी धर्म प्रगट्यो छे, ते भात्म स्वभावी धर्म छे. ॥ उक्तं च ॥ संग्रहण्यां ॥ जो पुण आप सहावो, धम्मोपगिरस इत्यादि अथवा उभयरकपहेऊ इत्यादि पुनः भावधर्माधिकारे जीवाणं भावधम्मो, कम्माभावेण जोखलु सहाशे इत्यादि।। कम्मविम्मुदामरुबो, माणिदियत्ता अत्यिलमेजाओ ॥ स्वादि बिरहतो का, अगाद परिणाम भावाभो ॥१॥ सादिधर्मस्प वरूपं उक्तं ।। एहबो श्रीधर्मनाथ स्वामीनो धर्म शुचि केतां पवित्र निरा- वरण परानपापीपणारहिन तेने गाइये, वाचार संभारी, तत्त्व- प्रगरुप हे नवि. अने पोतानो आमापण नेहबोज भादी, केतां विचारी, एने नेहवो धर्म नाथस्वामीनो धर्म डे, तेहबोज जमाले सामानो धर्म के पाच हिमा १४. - दे० चो० पा० मुतटीकायां ॥ जारिससिद्धसहायो, तारिसभाको हु सब जीवाणं ।। तेणं सिद्धतरुइ, कायदा भवजीवहिं ॥ १ ॥ तथा च तत्वा- र्थदीकायां ॥ जीयोजीवत्वावस्थःसिद्धः इति माटे सिद्रा ते जीवनी पोतानी अवस्था छ, ईहां कोई पूछे जे सिद्ध तथा संसारी सकर्मा, समोही, मिथ्यात्वी, असंयमीने तुल्य केम कहो छो. तेहने कहे छे. जे वस्तुनी जाती एकता पणे छे, ते कि. यारें पलटे नहीं. माटे जीव द्रव्य, पदिज धर्म छे जे अना- दिनो, कर्मायत्तं थयो तो पण पलटे नहीं, स्वजाति मुके नई तो मारी नपा श्रीधर्मनाय ग्यामीनी जापनीजाति एक है। श्रीटाणांगमा कयु छे, एगेआया इत्यादि ते माटे ययापि अत्यंत मोहतीन अयोधमा पक्ष्यो, तो पण जीप संग्रह नं तेवोज छ जे शुद्ध निर्मल गुणपर्यायमयी यानुनी राना छे, केमके सर्व पदार्य गुणपर्याय सयुक्त छ, उक्तंय नत्याय " गुणपर्यायवद् द्रव्यं ॥ इति ॥" दनं पारिकों, दाल उत्ता प पजया नस्थि ॥ उपाय ठिइभंगाई, दीय स. एपं ॥१॥ इति रामनित. गाथा || उम्पति पति, परि• जमति गुणाण दवाए ॥ दवणगय गुणा, न गुणपना पदमाए॥१॥ अपजो जाणा नदी, तथा आयपानि युनो । गुणाणामामओटा ॥ पगामिया गुणा | ari पनवागंतु, उमो निगिया मो॥१॥ी गाय- पने ॥ ते मार डा. यानुनी मना, मामाची है, पनि जीव मी, अने मान Mi, ये अवनंनो मनायनि. म. आपले प्राण ने श्रीवनमानी मानी पर नन्नानी पानी ॥ REM पंचदश श्री धर्मनाथजिन स्तवनं. नित्य निरवयव वली एक अक्रियपणे, सर्वगत तेह सामान्यभावे भणे ॥ तेहधी इतर सावयवविशेषता, व्यक्तिभेदे पडे जेहनी भेदता ॥२॥ - - अर्थः-हवे सामान्य विना वस्तुनी उती आधारता नहीं, अने विशेषविना कार्य नहीं, पर्यायप्रवृत्ति नहीं, ते माटे पंचा- स्तिकाय ते सामान्यस्वभाव अने विशेषस्वभावमपी छे, तिहां सामान्य स्वभाव लक्षण कई ले. जे नित्य अविनाशी तथा निस होय, पण आकाशनी परें निरवयव होय, ते मारे क्यो जे निरवयव जेहने विभाग अंग नदी, ते पण एकज पण मां घेपणो नहीं स्वजातिमां विधाभाव नहीं ते एक, पण जाणवारूप अपना परस्पररूप क्रिया करे नहीं, तेयी अक्रिय, ते पण कोइपर्यायमां व्यापे, कोई पर्यायमां न व्यापे, तेहवा नहीं पण सर्व पर्यायमा ब्यापेज ए लक्षण जेहमां छे, तेहने सर्वज्ञ देवें सामान्यस्वभाव क्यो छे. ए सामान्यलक्षण श्रीवि- शेषावश्यकें कंधु छे. एग निचं निरवयव, मक्कियं सजग्गं च सामनं ॥ ए गायाना व्याख्यानयी जाणवो. तिहां भावना जे नित्यपणे सामान्य धर्म हे ते पदार्थमां नित्यपणं सदा है, ते निसपणाने पर्यायप्रदेशरूप अवयव नयी, ते नित्यपगं सर्व एकज डे, अने जाणवादिक कोई क्रिया करतो नयी, तेयी अक्रिय ठे, ते नियपर्ण प्रदेशमा. गुणमां. पर्यापमां, सर्वमा व्यापक डे, तेयी सर्वगत हे. एटला लक्षणने पहोंचे, ते मारे नित्यपरं ते सामान्य है. एम अनित्यवादिक पण सर्व सा- दे. चो० ० मान्य स्वभावमा जाण. हवे विशेष स्वभावन लक्षण कहे छे. ते सामान्ययी इतर केतां वीजा जे सावपत्र केतां सप्रदेशी अविमागपर्याय संयुक्त अनेक अनिय सावयव, सक्रिय, ते विशेष स्वभाव जाणवो, पण व्यक्ति जे पदार्थ तया गुणांतर तेहना भेदे जेहनी भेदता केनां जुदापणु पई, एडले सर्वय. क्तिने विपे विशेषपणे जुई जुई छे. मारे विशेषनी सर्वन जुदायी छे, ते विशेष स्वभावमा ज्ञानादिकगणना भेद जाणवा. ए सामान्यविशेषतुं लमण कायं. ए सामान्यविशेषसत्तामयी एकता पिंडने नित्य अविनाशता, अस्ति निज रुद्धिथी कार्यगत भेदता, भावश्रुत गम्य अभिलाप्य अनंतता, भव्यपर्यायनी जे परावर्तिता ॥ ३ ॥ अर्थ:-ए सर्व धर्मनाप प्रमुनो धर्म छे. हवे सामान्य- भावनां लक्षण कहे . १ प्रथम एकता कतां एक समार जे पिंड केतां पिंडपणं ते ट्रम्पना मर्यप्रदेश, गुण, पर्याप, हनो समुदाय ते एक पिंडम्प छे, पण, मिरूप वर्ततो पी, सेने एकस्वभाव कहिये. २ श्रीजो निन्य अविनायता केतां अभंगाना र दाबायप नित्य इतितत्वावरनान, नदयमा बीजो नित्य- भाव कहिये. यांसो मांयगतान नभावरना पण कोई कारे

पल सेवन करने क... ट रूम में
. र डे मनाले गणि
मी मना
यानं सततं पता
S: भात
नकाः नेम नलिन।
उन्नु भयन । : ।
कमाई

दे० चो० बा० छ, तथा गुणाविभाग ने एकएकगुणना अनंता अविभाग में जेम पारिवना अविभाग संयमश्रेणीमां कहा, वीर्यना अविभाग योगस्थान अधिकारें कम्मपयडीमां कह्या छे, तेमाटे गुणावि- भागपणे पण अनेक स्वभाव छे. एक एक द्रव्यमां अनंतागुण छे, ते वली एकेका गुणमां अनंता गुणाविभाग छे, ते अनेक स्वभावता छ, तथा भावाविभागे जे पर्याय धर्म ते ज्ञानादिक गुणना अनंता पर्यायनी मुश्मता गहन छे, ते पण अनेक स्वभाव छ, एटले क्षेत्रे तथा गुणें अने पर्यायें सर्व रीतें दध्यमां अनेकता छे. २ पीजो नाश केतां व्यय तथा उत्पाद केतां उत्पाद ए परिणति ते सर्व द्रव्यमा अनित्य केतां अनित्यस्वभाव छे. ३ पीजो पर केतां आपणयी वीजा जे द्रव्य तेहना धर्म ते अन्यद्रव्यमां नयी एटले एक द्रश्यना जे धर्म ते मीजा द्रव्यमान पामीये, ते द्रव्यमा नास्तिता केतां नास्तिस्वभाव छे. ४ चोयो आत्माना सर्व गुणपर्याय ते मिन्नमिनकार्य को के, परंतु क्षेत्र केतां भाजन ते सर्वनो आत्मा छे, माटे गुण- पर्यापनी अनंतता छे, पण कोई मूलदम्पने तजी शक्तो नयी, एकक्षेत्रे एकाधारपणे घ्याप्यत्व केतां अवगाही रवा छे ते इ. प्यमा अमेदता रेतां अमेदस्वभाव छे. ५ पांचमो बली वस्तुने स्वर केवल ज्ञानगम्यपणे यरने अनेनयात्मक पो द्वन्यनुं अनमिलाप्यपाते अब. 1114 छ, उक्तं च ॥ श्रीविगेयावदपके ॥ अमिलाप्प अनमिनाया अननगणा इति ।। 71-1-

पंचदश श्री धर्मनायजिन स्तवनं.
६ छहो अनेक पर्यायनोपरावर्त छ, पण वस्तुना मूल-
रूपी पल्टे नहीं, ते रूज रहे डे, ए नियतपणा माटे व.
स्तुमां अभ-पस्वभाव छे.
ए सर्व स्वभाव सम्मतितर्क तथा धर्मसंग्रहणीना व्याख्या-
नयी जोवा, ए सामान्यस्वभाव छे ते पदार्थनो द्रव्यास्तिकमूल-
धर्म छे, एहवा परिणमनपणाथकी सर्व पदार्थ स्पाइादि कहेवाय
ठे, ले समय एक ते समये अनेक ले समये नित्य ते समय
अनित्य, जे समये अस्ति, ते समय नास्ति, ले समय मिन्न
ते समय जमिन ले समय वक्तव्य, ते समर्षे अवक्तव्य, ले
सम भन्य ते समये अभव्य इत्यादिक एम वली एक अनेक
नित्यानित्यादिक एक एक स्वभावनी सप्तभंगी थार्य. तेवा ज.
नंता स्वभावें अनंवीसप्तभंगीयो कम्पनेविषे घाय, ते स्पावाद-
रहाकावतारिकामां क' . ले " नियानित्याधनंतस्वभावभेदतः
मतिवमें निगाभिन्ना समभंगी एक्मनंताः समभंग्यो भवति इति॥
तथा च श्रीजिनवल्लभमृरिवाक्यं ।। बहुविह नपभंग, वत्पुनिचं
अनिछ । सदसदनमिलाप्पा, लाप्पमेगं अगं ॥१॥ इति । ए
स्वभाव महोपाध्याय श्रीपशोविजयी वतन्पगुणपर्यापना
रासम समर्पा हे, तिहां जोई टेवा ॥ ४ ॥ इति चतुर्प
गाचार्यः॥
धर्म प्रागभावता सकल गुण शुद्धता,
भोन्यता पत्ता रमण परिणामता ।।
शुद्ध स्वप्रदेशता तत्वतन्यता.
व्याप्प व्यापक तथा मासमाहरता ॥५॥

दे० चो० बा. अर्थ:-हवे विशेष स्वभाव कहे,छे.. द्रव्यनो धर्म जे ज्ञानादिक तेहनी प्राग्भावता केतां प्रगटपणुं ते आविर्भाव- धर्म, वीजो ज्ञान, दर्शन, चारित्रादि, सर्व गुणनी शुद्रताये सर्व स्वगुण- भोगीपणं ते भोग्यता धर्म तथा कर्तृता केतां कर्ता- पणं सर्व प्रदेशकार्यानुगत समुदायप्रवृत्ति कार्योत्पादकं कर्तृत्वं ते धर्मास्तिकायादि द्रव्यने प्रदेशे प्रदेशे चलनादिसहायरूप कार्यनो थावो, ते मिन्नभिन्न प्रदेशने आश्रये छे. अने जीव- द्रव्य जाणवा देखवारूप कार्य, ते सर्व, असंख्यप्रदेशना मलवायी छ, ते माटे जीव द्रव्यने विपे कपिणुं विशेष स्वभाव छे. वली रमण जे कोईकने विषे रमवु तया परिणामिकता जे परिणामिकपणं ते शुद्ध स्वमदेशीपणुं ते पण विशेष स्वभाव छे; तथा तत्त्व केतां वस्तुमां मुलधर्मे जे चैतन्यता ते पण विशेष स्वभाव छ, व्याप्य व्यापकपणु तथा ग्राह्य ग्राहकप तथा आधाराधेयपणू संरक्षणपY स्वस्वामिभावादिक ए सर्व वि- शेष स्वभाव जाणवा. ए रीतें सामान्य स्वभाव तथा विशेष स्वभाव, ते सर्व श्रीधर्मनाय परमेश्वरना निर्दोष थपा, तेहमां पण सामान्यस्वभाव तो निर्दोष सदा हता, परंतु पर संयोगे विशेष स्वभावनों विधाभाव पो हतो, ते हेश्री धर्मनाथ मभुजी तुमे स्वरूपालंबनी थई करणगुणे जे ज्ञान, दर्शन, चारित्र, अने वीर्य, तहने स्वरूपयी एकत्व करी, स्वरूप माग्भाव करी, स्वरूप कर्या छे, माटे निरामय थया छो॥५॥ ॥ इति पंचम गाथार्थः ॥ संग परिहारथी स्वामि निजपद लघु, शुद्धआत्मिक आनंदपद संग्रर्वा ॥

पंचदश श्री धर्मनाथ जिन स्तवनं.
६९५
जहवि पर भावथी हुँ भवोदधि वस्यो,
परतणो संग संसारताये ग्रस्यो ॥६॥
अर्थः-हवे एहवी अनंत गुण निर्मलता प्रभुजीने जे
रीते नीपनी, ते रीत कहे छे, हे देव, हे परमेश्वर ! तुमे
पुद्गलादिकनो संग सर्वथा परिहार केतां त्याग कयों, तेहयी
निज केतां पोता, परमपद अन्यावाधानंदरूप चिद्रूपावस्थान-
रूप लां. केतां पाम्यो माटे तमे शुद्ध केतां निर्मल आत्मिक
केतां जे आत्म द्रव्यनो आनंद अन्यानाधादिकते संग्रह्य केतां लायो
अने हे प्रभुजी! जहवि केतां जो पण हुं परभावी केतां परमात्र
निमित्त पामीने परभावरूप परणमीने, वर्तमान परानुयायी भवो-
दधि केतां भवसमुद्रने विपे वस्यो छ, भवनिवासी थयो छु, तेयी
पुद्गलादिकने संगे संसारता भावयी नवु नवु अव्यवसायीपणुं
पामीने द्रव्ययी चारगतिरूप संसारमा संसरवापणे करीने ए
माहारो आमा ग्रस्यो छ. एटले ए संसारे मुझने ग्रास करी
लीधो छे, माटे हे देव ! तुमे असंगी, हुं संगी, तुमे मुक्त,
हुँ बद्ध, तुमे अकर्मा, हं कर्माश्रित तुमे स्वरूपभोगी, हूं पुद्गल-
भोगी, तुमे स्वगुणपरिणामि, हुं पुद्गलाश्रित रागद्वेष परिणामि,
तेयी हे प्रभु! माहारे तो माहरी भूलयी कोइक नर्बु जे
सत्तामा कर्त्तापणामां, परिणामिकतामां न हतो ते नीपनो, ए
अशुद्धकर्तापणं में कयु, तेहयी स्वगुण आवरी ने पुनलनो
ग्राहक थयो, ने पहलने लेबायी माहरो आत्मा पुदलभोगी
थयो, एटले ताहरे माहरे अंतर पडी गयो, तेयी है संसारी
छ अने नमे सिद्ध व्येय हो, इति पट गाथार्यः॥६॥

दे० चो. या ---- तहवी सत्तागुणे जीव ए निर्मलो, अन्यसंश्लेप जिम फिटक नवि सामलो ।। जे परोपाधियी दुष्टपरिणति ग्रही, भाव तादात्म्यमां माहरूं ते नहीं ॥७॥ अप:-तोपण सत्तागुणे द्रव्यास्तिक संग्रह न ए माहगे जीव निर्मल , निष्कलंक है, असंगी , अपी है, कोण दर्शने १ जेम श्यामादिक पुटसंयोगे फटिक सनो दल दयाम दीटामां आवे छ पंतु फटिक कांइ इपाम थयो नयी, पर अपरीक्षक लोक तेने श्याम आणे हे, पण जाते जेहको हतो तेहबोज , नेम कमगंगे आमा अशुद्धरूप देखाप , पात्र तत्वज्ञानी एने जाते निमंटन जाणे छे, म अद्रात पण निर्मल जाने छे अने जे पाउपाधियी पुष्टपरिणति करता पाप नहीने तादात्यभावमा नाम्पमंचे की छ, नेगी टाधिकमात्र मागे नयी, संयोगे संबंध मन्यो , परंतु सम- पापमंत्रवे नयी जे विमाव ते तापनिमय ये पातु नादाम्प- संदेवे नदी, एम भाग ॥ इति गम गायायः ॥ ७॥ निगे परमारमप्रभु भनि गी थह, शुद्धकारण रमे नत्व परिणति मयो।। आरमप्राहकययं नजे पर ग्रहणता, मत्वमांगी भयंटले, पामायता ॥ ८॥ kar मानी पंचदश श्री धर्मनायजिन स्तवनं. तेयी एने निशरी , तो जाये तेवारे ए माहरो आत्मा स्व. रूपावस्थित धाप, एम विचारी तेहनो उमय चितवे हे. ले ए संसारी जात्मा परागत थइ रखो ठे, तेहने जो हमणां स्वरूपदी जोडीए, तो की शके नही, अने परविजातियी जोड्यो को बंधने वधारे , माहे परस्वजाति जीव लेज- मोही, गज्ञानी नेवी जोडीये, तो सजाति स्वरूप रंगी याय. पछी अरिहंत स्वरूप तथा आपणा आत्मानु स्वरूप तुल्प हे, तेयी तेहना स्वरूपं रसिक थाप, तो पड़ी कर्मे आवर्यो पग, जात्मस्वरूपनी तचि उपजे, ते रचियी पोताना स्वरू- पने सहे, जाने, रने, उद्यम करे, परभाव तजे ए अनकमयी संपूर्ण वरूप पाने, तेमाडे परमात्मा प्रभु श्रीधर्मनायजीना भक्तिनो रंगी घइने शुद्ध कारणने से आत्मा तल्वपरिणतिमां मन्त थाप, पोता जात्मस्वरूप जोवे, ध्यावे, संभारे तथा तेहनेज प्रगट करवाना पर करे, एवी रोते जेवार आत्मानो माहक थाप, तेवरे अनादिनी परसाहकता तने, केम ले आत्म- स्वरूपनो ग्राहक थयो, ते परभावने ग्रहे नहीं, लेटली आत्म- परिणति आत्मय माहक यह ते कर्मादिक न तेने संघरपरि- पति रहिये, वर्मतत्तभोगी थपे, परभोगीपर ले, तेबारें बालाने भोगवे ॥८॥ शुद्ध निःप्रयास निजभाव भोगी यदा, आत्मक्षेत्रे नही अन्य रक्षण तदा । एक असहाय निस्संग निद्वता. शक्ति उत्सर्गनी होय सह व्यक्तता ॥ ९ ॥ :

दे० चो० वा अर्थ:-जेबारे शुद्ध पुद्गल संगरहित निःप्रयास निजभा केतां आत्ममावनो भोगी थयो, तेवोरे आत्ममदेशे अन्य केता पुद्गलकर्म तथा रागादिकनुं रक्षण केतां राखको नथी, एटले स्वरूप ग्राहक चेतनानुं वीर्य थाये, तेबारे पुद्गल कर्म आत्म- मदेशे संबंधीपणे रहे नहीं, सर्व पुगलखरीने आत्मा निःकर्मा थाय, तेवारे एक सर्वसंग रहित. असहायी, निद्र उत्सर्गनी शक्ति सहित व्यक्तता केतां प्रगटता निरावरणपणुं पामे ।। ॥ इति नवम गाथार्थः ॥ ९ ॥ तेणें मुझ आतमा तुझथकी नीपजे, माहरी संपदा सकल मुझ संपजे ॥ तेणें मन मंदिरे धर्म प्रभु ध्याइये, परमदेवचंद्र निज सिद्धि सुख पाइयें ॥ १० ॥ अर्थ:-तेयी हे देव हे श्रीनिराग ! तुमारे निमित्ते माहारो तत्त्व नापजे, वीजो कोई उपाग देखातो नया, माहरा आत्मा सिद्धप' ने ताहारा स्वरूपने अवलंबे नीपजे, माहरो अनंतगुणपर्यायरूप स्वकर्तापणं सभोक्ताप' स्वरूप ऐश्वर्य सर्व जे मोहावीन कर्मावृत्त छ, ते मुने संपने, एटले हुँ मा. हारी अरूपी सत्तागत तत्वसंपदानो धगी तथा भोगी, अवि- नाशीपणे थाऊं, ए प्रभुजानो परम उपकार जाग, ते कारगे मनमंदिरने विपे श्रीधर्मनाथ प्रमुने घ्याइए, क्षण एक पीजी उपाधिचितविएं नहीं, ए प्रभुना गुण नया उपगारनं बहुमाने ध्यान करिये, नवा मायक्ने एहिज आधार के, तेबारे पग्म उत्कृष्ट देव , व म+ मुनि नेदमा चदमा ममान ले पोनश श्री शांतिजिन स्तपनं. परमालपदरूप निज केतां पोता सिदि केतां निष्पन्नमुख, अम्पानाधादिक तेने पाइयें केतां पानि, एडीज मोशनो 3- पाप हे, तेमाटे श्रीजरिहंत सेवन निरवानपने का ॥१०॥ ॥ इति श्री धर्मजिन स्तनं संपूर्णम् ॥ ॥अथ पोडश श्री शांतिजिन स्तवनं ॥ । आंखटीये में आज सेवजी दीठो रे ॥ए देशी।। जगतदिवाकर जगतकृपानिधि, वाहाला मारा समवसरणमा वेटारे ॥ चउमुख चउबिह धर्म प्रकाशे, ते में नयणे दीठा रे ॥ भविक जन हरखो रे ॥ निरखी शांति जिणंद ॥भ० ॥ उपनाम रतनो कंद ॥ नहीं इण सरखो रे ॥ ए आंकणी ॥१॥ अर्व:- सोलमा डिन श्रीशांतिवाय मनी लाना करे हे. नेमा केहः जगाने कि दिवस देतां मुग्नी जनेश उदोजना बन्ना ना करना निधि ७०० दे० चो० या० नयणे केतां आगम श्रवण रूप घक्षुए दीठा, माटे हे भविक जीवो ! तुमें जिणंद केतां सामान्यकेवलीमां इंद्रसमान एहवा श्रीशांतिप्रभुने निरखीने हरखवंत थाओ. उपशम जे परमझमा तद्रूप जे रस तेनु ए कंद छे, एना तुल्य बीजो कोई नयी, ए प्रभु परम शांतरसमयी छे. ॥ इति प्रथम गायार्थः ॥१॥ प्रातिहार्य अतिशय शोभा ॥ वा० ॥ ते तो कहिय न जावे रे ॥ चूकवालकथी रविकरभरतुं, वर्णन केणी परे थावे रे ॥ भ० ॥२॥ अर्थः-वली प्रभुनी जे आठ मातिहार्यनी तया चोत्रीश अतिशयनी शोभा ते मुज सरिखा ट्यामोहि जीवयी कही जाय नहीं. दृष्टांत-जेम घुकचालकयी केतां धूबडना बालवयी रविकर केतां सूर्यना किरणोनो भर केतां समूह तेह वर्णन केवी रीतें थाय ? अर्थात् नहींज थाप, तेम मुज सरखायी पण मातिहार्यादिकनी शोभा कही जाये नहीं. इति ॥२॥ वाणी गुण पांत्रीश अनोप ॥ वा०॥ अविसंवाद सरूपे रे॥ भवदुःखवारण शिवसुखकारण, सुधो धर्म प्ररूपे रे ॥ भ० ॥ ३॥ अर्य-वली प्रभुनी जे वाशी ठेहने विधे उपमा रहिन पानाम गुण रहा है. ते वागी विमवादपणार्या रहिन अविसंवाद

७.१.
कार से निकल
नई डे॥ इति वद ॥३॥
दक्षिण पश्चिन उचर नितिमुख ॥ वा० ॥
ठबन जिन उपगारी॥
तर आलंबन लहिय अनेके.
विहां यया सनक्ति वारी रेभ.
बसन
रूपमा लिन केन बिन उपरे हे देह
।। इत नुकः । ।.
पद नपकारजस्वला ! बा ।
सा नपारन वानी॥
नितिन तनान याना जिननी.
६ आमननी बानी रे । भर॥ ५॥

७.२ दे० चो० या० अर्थः-हो यदीविशेष थापनानुं उपगारीप तया सन्य- पणं कहे थे, ते मध्ये श्रीअरिहंत तथा सिद्धजी पण आपणा आत्मना निमित्त कारण हो, अने श्रीजिनप्रतिमा से पण आपणा नाचसाधननु निमित्त कारण छे, वेहमां पापना गिनने विगे अरिहंतसिद्धपणे छ नये , इहां कोई छेजे मरिहन धया अपया सिद्ध थया तेहनी धागना छे, तो सान तय माने, छ नय केम कहो छो? तेहने उार कहे ते ने मुल नो थापनानिमेषामन्य थापना ते प्रण न “माम 'पापनादयनिक्षेपयनगमादिनयाति इति ॥ " अत उध्यो । हां हां नामादि एकेक निक्षेपाना चार थार भेद पाप ॥ उन प भाष्ये ।। नामादि प्रागेकंया इति ॥१॥ की प्रथम म्यान पहा नाम स्थापनामा स्थापनानो म निरपो, पीजो ए ग्यापना ग्रहण हेसु थापले, पागनो याना नियमो जाणतो. शंगो मारना नियोता दे पापनानो दाप निशेषो जागो. गोपो निपाओ पवने काणिक यारे ने पापनानो भाग शिरो. एम धारना भा निरी, अमा नविन am मुतांश्योपजिम? मिनि ॥ मामो मंगा, निरमाओ ना ॥१॥नि नेवी श्रीभरि नया ना ना, मट देना नय. ते 4

पोडमा श्री शांतिनिन स्तवनं.
."
ते
धापना करी है, देमाडे ए संमहनप अरिहंत मिर
स्थापना हे.
६ मरिनना आकारने यंदन नमनादि नई स्याहार
श्री अरिहंतनो धार हे, तेहा का ए पापना,
सहारनद थापना कहि.
४ ए प्रतिमाए पापना देग, हभपने इझिनो वि.
कल एहको मजे हे. के ए श्रीजरिहंतजी हे ते विश्लेंड
स्थापना करो हे. ते नवनय स्थापना के.
५ अरिहंतरित एहको मन इदंपति
यहां भरने हो, दे मदनर स्थापना की.
६ अविना पद
दीन टीवर ताजिन
पारंगत जिन पगत रूपादिक नई पनी प्रति पर
माना. हे समनिस्टन स्थापना घट् परंतु देवन
". मरता है ध. भारतान
नरक
सारे भाका र देत निमाल. महंत.
न हो, इस न
.
..
हाई टेन' नर बनेर

७०४ दे० चो० बा. विरति, सर्वविरतिने मोझसाधन- निमित्त कारण छे, ते निमित्त कारण सात नये छे, ते कारणनो धर्म कर्ताने वश छे. ते नि- मित्तकारणपणं सात न छे, ते कई छे. १ पहेलो संसारानुयायी जीवने ए जिनमतिमा दीठे अ रिहतनं स्मरण थाय छ, अथवा जिनकंदने जीवनी सन्मुखता थाप छे. तेवारें सन्मुखनानो जे निमित्त ते नैगमनय निमित कारणपणुं छे. २ जिन प्रतिमा दीठे सर्व गुणनो संग्रह पाप छ, सा. घकतानि चेतनादि सर्वनो संग्रह ते तत्त्वनी अमुतताने स- न्मुख थाय छे, ते संग्रहनय निमित्त. ३ चंदन नमनादिक साधकम्यवहाग् निमित्त ते परहार- नय निमित्त. ४ तत्वईहारुप उपयोग समरवानो निमित वे अम्त्र- नय निमित्त. ५ संपूर्ण अरिहंतगाना उपयोगें जे आदान ए निमित तस्वसाधने परिणम्यो, ते शब्दनय, पापनानो निमित्त है, समकिती प्रमुखन एहवो छे. ६ अनेक रीने चेतनाना वीर्यनी परिणति, सर्वसायनाने सन्मुख पहले मममिन्टनम म्यापनानं निमित काम जाई. ए मारनानं का पानी नस्वचि नन्दमनी पहने ने गत मनमा परि मपुर्ण निमन करता पा- माने ? - कागाना न जमननय निमिन १० पोडश श्री शांतिजिन स्तवनं. कारणपणं छे, एटले निमित्त कारणनो ए धर्म छे, जे उपा- दानने कारणपणे पमाडे, अने उपादान कारण ते कार्यपणे नीपजे. एरीत छे. तेथी जिनप्रतिमा ते मोक्षतुं निमित्त कारण छे, ते नि- मित्त सात नये छे. तेहमां शय्यंभवादिकने शब्दनय सीम, कारण थयु, अने पुण्यसचिन व्यवहारनय सीम, निमित्त कारणपणं थाय. तथा मार्गानुसारी समकेतिनी आठ दृष्टि जे योगदृष्टि समन्वयमां कही छे, तेमांनी आदिनी चार दृष्टि वालाने जमवनय सीम, निमित्त कारणपणुं थाय छे अने पुण्याच्यादिकने ए जिनप्रतिमा संपूर्ण एवंमृतनये कारण- रूप थइ देखाय छे. तेबारें इहां भावनायें ए युं ने था- पनाने विपे संपूर्ण सात नयम्प निमित्त कारणता छे. पछी कार्यनो कर्ता जिहां मुधी एडने नीपजावे, तेटलो नीपजे, तेथी ए स्थापना ते सगनय केतां साते नये करी कारणठाणी केतां निमित्त कारणपणान स्थानक छ, ते थापना श्रीअरिहंत पदना मूल तो द्रव्य अने भाव ए वे निक्षेपावंत छे, परंतु निमित्त कारणना चार निक्षेपा सातनय संयुक्त छे. उक्तं च ॥ निमित्तरयापि सप्तप्रकारत्वनय प्रकारेण निमित्तरय द्वविध्यं द्रव्यभावात् ॥ तयोपादानरयापि सप्तप्रकारत्वं नयोपदेशात. " नो अमिहाणमणय " इति वचनात् ॥ नस्थिनएहिं विद्वणं, मुत्तं अत्योय जिणमए किंचि ॥ आसजउ सोयारं, नये नय- विसारओ आ ॥ १ ॥ इति ॥ माटे निमिनपण स्थापना केतां जिनप्रतिमा अने जिननी केतां श्रीअरिहंत बद समान केतां तुल्यत्व छे. एटले विचाना अरिहत नया नेमनी स्थापना जे मति, ते बेह समान केना बगर छ, नयी विचरता अरिहंत ७०६ : दे०.चो. बा० तया तेहनी स्थापना ए वे साधक जीवने निमित्त कारण छे, पण उपादान नी सर्वमा निमित्तता छे, ए आगम केतां सिद्धांतनी वाणी छे, जे अरिहंतने वाद्यानुं तया अरिहंतनी प्रतिमाने वांदवानुं फल सिद्धांतमा सरखं का छे, भाटे समान छे ॥ इति पंचम गाथार्थः ॥५॥ साधक तीन निक्षेपा मुख्य ॥ वा० ॥ जेविण भाव न लहिये रे ॥ उपगारी दुग भाप्ये भांख्या, भावचंदकनो ग्रहिये रे ॥ भ० ॥६॥ अर्थः-अने, १ नाम, २ स्थापना, ३ द्रव्य ए प्रण नि- क्षेपा ते भावना कारण छ. उक्तं च भाष्ये ।। अहवा नाम- दवणा, दवाई भावमंगलं गाए ॥ पारण भावमंगल, परिणाम- निमित्त भावाओ ॥१॥ माटे ए प्रण निक्षेपा साधक केतां कारण छे, ए प्रण निक्षेपा विना भावनिक्षेपो थापज नहीं, अने नाम तया स्थापना ए ये निक्षपा भाष्यने विरे उप- गारी कया हे, ते कडे छे, जे म्यानपो छे, वे पिंडरूप हे, मारे ग्रहाय नहीं, अने भागनिमेपो नो अरुपी, वे आधना नाम नया म्यापना पये निक्षपा विना ग्रहवाय मेवारे, नहीं. तेमार आदिना वे निपा ने उपकारी छे, उक्त च ॥ इत्यमम्व नाम. नपाय ओ मरम्मत्र ॥ नामा विहाणा, होजा भावोरिवलामो ॥ १ ॥ क्याम संकाय, यो विगतमाओ । अमिहागादिणाओ. दिमो :: ।' मा नाम्न प्रधानत्व

कालजजिननि:
से जानकारी
जालना त्वत्वनाव
F

देव चो० या णनी थापना करी, तिहां जिनमुना देखीने, जिनराजना गुणावलंबी चेतना करी पठी ते सेवना करतां प्रभुजी सि- द्रावस्थारूप परम अनंतगणीना स्वरूपयी जे माहरी चेतनानी अभेदता एकत्वपरिणामता ते वाधि केतां वघी, वेवारें ए आ- माने एहको अनुमान सध्यो, जे तत्वीदेवयी अभेदपयं बहु- मानपणे भल्युं तो एम जागु छ जे ए माहारो आत्म स्वस्व- भाव अनंत ज्ञानादिपूर्णानंद गुणनी व्यक्त केतां प्रगटतान थर्बु तेहनी योग्यता साधि, एम अनुमाने निरधारी, एटले ए जीव सदा सर्वदा विषयरंगी हतो, ते तत्त्वी प्रभु निर्विषयीने रंगे रम्यो, तो कोइक अवसरे स्वरूपरभणी धाशे एहई अनु मान थयुं जो कारणयी अभेद थयो, तो कारज नीपज्ञापशे ए पलटवाप' अनंते काले न थयुं हतुं ते थयु, तो ए द्रव्यमा पलटवानी योग्यता छ, अनादिनी बालयों पर ए भन्यतापणाना लिंगनू अनुमान तो थाय छे, एटठे भव्यपणं जणाप छे, ए भक्तिनी बहुलतायें हर्पन वचन छे ॥७॥ भलुं थयु में प्रभुगुण गाया ॥ वा० ॥ रसनानो फल लोधो रे॥ देवचंद्र कहे माहारा मननो, सकल मनोरथ सोधो रे ॥भ० ॥ ८॥ अर्थ:--माटे हे प्रभु !!! आज मुजने भलु केतां अत्यंत रूह भयं, जे में प्रभु श्रीसोलमा शांतिनाय परमात्मा परम शांतरसमयी तेना गुणनी स्तवना करी, तेयो में माहरी रसना केतां रसेंदि जे जिव्हा तेनु मटुफल ली एटले रसनाने

मने हो.
॥ अय मतदज्ञ श्री कुंजिन स्तवनं ॥
।"चरनजिक देवी
सनवलर सीकरी.
बारह परपर नांह ॥
कलाकर जगनाही रे. इंजिनेस
निर्मल दुज मुख वानी
श्रवन सुने. हिल उन्नमिवाली रे.
! ॥२९ की।
--
-
5

दे० घोबा करतो. तेहनी रुचिएं रेहेयुं एहज साधन छे, एहयो उपदेश- करता तथा करुणाकर केतां कृपाना करणहार जगायना नाथ, एहवा श्रीकुंयुनाय स्वामी, तेहना मुखनी निर्मल वाणी, उम देशम्वनि, ते जे पाणी श्रवणे सुणे, तेद्दिज पाणी, गुणरूप- मणि रवनी खाण छे, एहया कुंयुनाथस्वामीने नमो॥इति॥२॥ गुणपर्याय अनंतता रे, पलिय स्वभाव अगाह ।। नयगम भंग निक्षेपना रे, हेयादेय प्रवाहां रे ॥ कुं० ॥ ३॥ अर्थ:--गुण ते जे यातुना सहभावि धर्म " दण्यार्यतपा- निगुणागुणा इतितया उत्तत्वात् " तथा कममापि उभपा- शित ते पर्याय, अने दम्य, गुण, पपाय, ए सर्यमा पर्ने, सेने स्तभाव कही पटले गुणनी अनंतता, नया पर्यापी अनंतता, अने स्वभावना अनंतता, सई अगाह केतां अगाव हे, जे अवगाहबाने दोहेटी . वही नप केतां अने, धांग्मा वानुन विरे एकापावटान ते नप कहिये | उन. ननस्यायें । अनेकदन्ताय वग्नुन परेन पर्मिग अपन अप- चामान्मक निपानिया पत्रिवनपयोगमा पदवाट ना, अन ना नमन मय पछी तिर बहन ने नया मा गयो हनं ममा मानदेन अन्य अनंदन वन'Entr"परे नमः .

सप्तदश श्री कुंजिन स्तवनं. ७११ - अनेक भातिना वस्तबम, उपचारयम कारणवम स्वरूपें उपदेशे ते वली हेर धर्मना, नय निक्षेपा भांगा ते हेयरूप कहेता अने उपादेय धर्मना नय निक्षेपा, ते उपादेयरूप प्ररूपता, एहवी श्रीकुंघुनायजीनी देशना डे, वली एक द्रव्यमा गुण अनंता, पर्याय अनंता, स्वभाव अनंता, उपदेशे, इहां भावना ने गुणपर्यायने आवरण छे, स्वभावने आवरण नयी, अस्तित्व नित्यत्वादिक ने छे ते मन्ये विशेषस्वभाव बिगडे पण सामा- न्यस्वभाव बिगडे नहीं, तया सर्वधर्म नय तथा भंगा अने निक्षेप सहित उपदेशे छे, एहवी श्रीकुंजिननी देशना ॥ ॥३॥ इति तृतीय गाथार्यः ॥ कुंथुनाथ प्रभुदेशना रे. साधन साधक सिद्ध । गौण मुख्यता वचनमा रे, ज्ञान ते सकल समृद्धो रे ॥ कुं० ॥ ४ ॥ अर्थः--वली श्रीकुंघुनाथ प्रभुनी देशना केहेवी के. जे मध्ये साधन केतां रनवमी पूर्ण अभेदतारूप निपजाववाना उपाय ते जिनमुत्रासेवन मुनिवंदन अनुकंपादिका टही राहत ध्यान पर्यंत करा हे, त्या मार्गानुसारीयर्या लही झीणमोही पर्यंत अपवादे अने उत्सर्गे अयोगी टगें साधक जीव जाणत्रा, तेहा तारतम्य योग कहे है, पहेलो मार्गानुसारी ते समक्लने साधे, अने समक्षेति ते विरतिने सावे. विरति ते शुकल्यानने साचे, नपा गुल्लमानी शाचिकगुणने साचे, सायकगुणी सिइने साचे, ए साधकनो क्रम हे. ते सर्व प्रभु देशनामां कहे, तथा 14 १६.९

७१२
दे० चो० बा०
VAALAN
सिद्धपणुं संपूर्ण निष्पन्ननिरावरणताप'. कहे. बली कुंथुनाथजीनी
देशनामां वचन जे बोलाय ते, अनंता गौणवर्म राखीने जे
वचनमां ग्राद्य ते धर्मने मुख्य करी कहे, एटले एक वस्तुमा
अनंता धर्म एकसमयमां परिणमे छे, ते सर्व एकसमयमा जागे,
परंतु वचनेकरी जे धर्म मुख्य करी कहेवाय ने मुख्य करी
कहे, बीजा सर्व ज्ञानमा गोणपणे जाणे, एम वचनमा गाय
तथा मुख्यपणे छे, पण श्रीकुंथुनाथ स्वामीनं केवल ज्ञान वे
सकल ज्ञेयने जाणवे करी समृद्धिमान् छे, एटले ज्ञानमा एक
हमणा जाणे वीजा पछी जाणगे एम नयी, सर्व भावने ते
समज जाणे छे, तेथी ज्ञानमां गौणता मुख्यता नयी, अने
वचन धर्मक्रम प्रवर्तन छे, ते एक कटा पछी पीजो कहेवाप,
माटे वचनमां गौणता अने मुख्यता छ।इति चतुर्य गायार्थः ४॥
वस्तु अनंत स्वभाव छे रे,
अनंत कथक तसु नाम ।।
माहक अवसर बोधयों रे,
कहेवे अर्पित कामो रे ॥ कुं० ।। ५ ।।
अर्थः-वस्तु जे जीवादिद्य ते अनंतस्वभावमयी छे,
सर्व वस्तु अनंतता युक्त छ, तथा वन्तुनो जीव अपया पुगल
एह जे नाम छे, ते पण अनंतनाने कदेतो छे, एटले जीव
एवो शब्द उच्चार करता जीवना अनंता धर्म छे, ते सर्व बोलणा
एम सर्व म्यानके समजयो माटे जे वस्तुनुं नाम ते ते वस्तुना
सर्व धर्मनो ग्राहकतेयीज नामनिपामा सयह नया व्यवहार
पवेद नय मम्य अन नैगम कारण छ, ए रीत छ, पातु ग्राहक

सपदश श्रीयुजिन स्तवनं. ले श्रोता तेहनो जेहवो अबसर होपे, तथा श्रोतानो हो बोध केतां जाणपत्रं होये. तेहवो वचनमां अपित करीने उप- देशे, एके ज्ञान तो सर्वने एक समयमां जाणे हे, परंतु उपदेशकालें केवली भगवान् जेहता श्रोता होय. तेलो कहे, वेदी केवानां अपित नय आगल करवानो काम पडे हे, से अर्पित तथा अनर्पित स्वरूप तत्वार्थमां कहे, "अनेक धर्माच धर्माताप्रपोजनवशात्काचित् कश्चिद वचनेनापिंडे विद- शिव तजापित संसपि वचनविवक्षिरे प्रयोजनाभावात् तत् अन- पितं इति:ले वर्गीपार्थ, तेहना अनेक धर्म, तेहने विष अवसरे जे धर्म, कहेवानं प्रपोजन उपनेते अबसरे धर्मने वचनने विष अर्पित कराएं. विवज्ञा करीने महि, ते अर्पित जाणको, अने ने धर्म न देतां नो हे तो पण प्रयोजन दिना ने गोपे नहीं, श्रवामां अपेक्षामां हे ते अनर्पित कहिले, उदास्पद् ज्ञान, तथा बोललो. ते अर्पित अनपित दे मापात शुद्ध थापे, अने केवट जान नो सर्व एक सम हे, परंतु वचन हे अति अनम्ति मस्सा पद हे ।। इति पंसा गापः ॥५॥ शेप अनर्पित धर्मन रे. सापेक्ष श्रद्धा दोध ॥ उभय रहित भासन होवे रे, प्रगटे केवल गांधी ॥ कुं० ॥ ६ ॥ रहने का. म. पी. नेमान 7 रासई मी. बागल. मागति ७१४ दे० चो० बा० एम जाणयुं अने उभय केतां ए अर्पित अनपिंत बेदुयी रहित जे भासन होवे ते चोध केतां केवलीनुं ज्ञान ते सर्वनो ज्ञायक समकाले छे, तेयी तेहमां अर्पित अनपिंतपणुं नयी, वचनमां अर्पितानपित छे, परंतु जाणवामां नयी ॥इति॥६॥ छति परिणनि गुणवर्तना रे, भासन भोग आणंद ॥ समकाले प्रभु नाहरे रे. रम्यरमण गुणदो रे ॥ कुं० ॥७॥ अर्थः-वटी हे प्रभुजी नमागमां जाननी, दर्शननी, पारियनी, वीर्यनी, मुग्वनी अस्पतानी, इत्यादिक अनंता नमाग गुणरूप धर्म, नेहनी उती हे, नेमज अनंत पर्यापनी पण छनी छे, ते स्वयादिकपणे गदा सदा नी , सेम म्वमाव गुणपर्यायनी परिणति परिणामिक्ता दयने परि- पाम, ते उपाद, व्यय, अपर नया पटगुण दानि दिपणे परिणने हे, नया नहिन जानादि गुणार्यायनी यनंना, ते जे स्ववानो कपापा ने जान जान, दर्शने देश, पारि रमे, नापणार्य का भोनाममायो भोगो, एम सांगण पोतपोतानी वर्ननाए वनंता पोनपोताना कापने को लेक नना जी, हे प्रमा नमागमा भने नगर पर्यापन मामन ना ग १ नमागमा ने मांगने भोगनीको नमनमा मनामनामी नमागम मन बनना नया PARLET aar .

सप्तदश श्रीकुंयुजिन स्तवनं. ७१५ सुखी छो.वली हे प्रभु हे सर्वज्ञ ! हे सर्वानंदमयी ! हे नाय ! हे सुघोपगारी ! तुमे केहेवा छो ? जे रम्य केतां रमवा योग्य जे अनंतात्मस्वरूप तेहमां रमण केतां रमg ते गुणना तुमे वृंद केतां समूह छो ॥७॥ इति सप्तम गायार्थः ॥ निजभावें सीय अस्तिता रे, पर नास्तित्व स्वभाव ।। अस्तिपणे ते नास्तिता रे, सीय ते उभय स्वभावो रे ॥ कुं० ॥८॥ अर्थः--हवे सप्तभंगीरूपें प्रभुना कहे छे. तिहां कोइक तो सप्तभंगी एकला पर्यायास्तिक नयनीज कहे छे; तेतो घटे नहीं, द्रव्यास्तिक पर्यायास्तिक नय द्वयमात्र वस्तु छ, तिहां स्यात् अस्ति, स्यात्नास्ति, स्यात् अवक्तव्यं, ए वण भांगा सकलादेशी छे, ते न्यास्तिकनयी छे, " एवं एते त्रयः सक- लादेशा भाष्यानुसारिणः एवं संग्रहन्यवहारानुसारिणः आत्मद्रव्ये विकलादेशा श्चत्वारः पर्यायनयाश्रया इति तत्त्वाय " शेष चार ते विकलादेशी छे, तेहनो परमार्थ एम छे जे स्यात्अस्ति ए भांगामां अस्तिपणं वयं अर्पित छे, पीजो नास्तिधर्म, अबक्तव्यधर्म, ते स्थापणामां आव्यो, एटले स्यात्अस्ति कद्यायी वयं द्रव्य ग्रहवाय छे, तेमज स्यान्नास्ति तया स्यात्- अवक्तव्यं ए भांगामां पण वयं न्य ग्रहवाय छे, अने ? स्यातअस्ति नास्ति, २ स्यानुअस्ति अवक्तव्यं, ३ स्यात्नास्ति अवक्तव्यं, ४ स्यात्अस्ति नास्ति युगपत अवतन्यं, ए चार भंगा ते वस्तुना अंशने एटले पयायने ग्रहण करे छे.तेहनो . - दे० चौ. बा. भावार्य ए छे जे प्रथम स्यात् अस्ति स्यात् नास्ति ए चोयो भंग छे, तेमां अवक्तव्यं ए धर्म नान्यो, तो कोई कहेशे जे स्यात्पदे अवक्तव्यं धर्म लही तेने उत्तर जे स्यात्पद ते अस्ति तथा नास्ति ए धर्मनी अनेकांततानो ग्रा- हक छे, परंतु अवक्तव्यनो ग्राहक नयी अने स्यात् अस्ति अवक्तव्यं ए पांचमो भंगो छे, तेहमां वस्तुनो अस्तिधर्म एक- समयी छे, ते वचनमां कद्या थका उपयोगमा लावतां असं- ख्याता समय लागे छे, तेमाटे ए अस्तिपयं अनेकांतो छ, परंतु वचने गोचर नयी. एमज स्यात् नास्ति अवक्तव्य, ए छटो भंगो पण भाववो, तथा स्यात् अस्ति नास्ति युगपत अवक्तव्य, ए भंगामां स्यात् केनां अनेकांते अस्ति केहेतां असंख्याता समय लागे, नास्ति केहेतां पण असंख्याता समय लागे, तेमारे अवक्तव्यं छे, भेला छे, पण जे रीतें वस्तुमा परिणमे छे, ते रीत केहवाना नर्या, तेयी ए चार भंगामा सर्व धर्म, यहण न थयुं तेमादे ए चार भंगा विकलादेशी छे, पण सकलादेशी नयी. हवे ए साते भंगार्नु स्वरूप कहे छे. १ ए आत्मा वर्तमान समय ज्ञान दर्शनादि स्वपर्यापनी परिणतिपणे अस्ति छे, एटले अतीतपर्याय तो विनष्ट है, अनागतपर्याय अनुत्पन्न छे, मारे वर्तमानपर्याय ग्रहण कयों, इहां स्यात् ते नास्ति अबक्तव्यं धर्मनो अनर्पिततानो द्योतक छे, ए रीते स्यात अस्ति ए पहेलो भंगो थयो. २ नया स्यात् ते कपंचित्पने गतिस्थितिअवगाहोपकारी वर्गादि अवेतनादि पाद्रव्यधर्म तथा पोताना अतीन अनागत पयांप ने, मापतिक वनवापये नयी, ए नाग्नि भंगो दट्यने १ सप्तदश श्रीकुंघुजिन स्तवनं. - -- द्रव्यपगे राखबारूप छे, नहीं तो कोई कालें जीव ते अजीव- ताने पामे, ए स्यात् नास्ति चीजो भंगो थयो. ३ तथा अस्तिधर्म पण वपर्ने अगोचर छे, अने नास्ति- धर्म पण वचने अगोचर हे, ते वचनगोचर धर्मदी वचन अगोचरधर्म अनंतगृणा छे, ते मारे रयान्कथंचित्पगे द्रव्यमां अवक्तव्यपरं हे, एटले उभय नय युगपत् अर्पण करतां सर्व- पदार्थ अबक्तव्यपणे छे, माटे ए ण भंगा सकलादेशी ते दप्पास्तिक नयपणे जाणवा, ए रणे भंगामां संग्रह तथा व्यव- हारनपनी प्रवृत्ति छे, ए स्थान अवक्तव्यनामा पीजो भांगो थयो. ४ तया चोथो भंग स्यात् अस्तिनास्ति छे. ते समुन्न- यापी रवद्रप्पार्थ पर्यायाचना अस्तितापणे तथा हिज मिनो- पयोगपणे ते अतीत अनागत परिणानिकपणे नास्तिता छे, ए ये धर्म पोतानाज गोप्या हे. ५ तथा ले विवक्षित वचनगोचर पार्थ मुख्य आत्म- धर्मने अपेक्षा अस्ति ठे, तेहिज आत्मदम्पनो सामान्यवि- क्षेपहपनी निजमहति धर्म समझाले अंगीकार करना स्या- अस्ति अध्यक्तव्यं ए पांचमो भंगो थयो. ६ रहो स्यात्नालिझम्पत्त ए एनज पांचनांनी परे भाववो, ए पर्यापनी ममता अन्ततामहीने का ए हो भंग धपो. ७ सालमो पावनम्ति सनाग्नि सुगरत अवताम्य नामे भगो है, में कोहनम्याप अभी अग्निार्षद सिपाही नाम्नि ने दिया मिनी अदनान ए सर्वपद नप ए मनोभा. .

दे० चो० ग्रा
+maya
ए सप्तभंगी ते नित्य अनित्य भेद अभेदादिक धर्मनी तथा
ज्ञान दर्शनादिक गुणनी सप्तभंगी थाय ते भावे छे. ज्ञान ने
छे ते ज्ञापक परिच्छेदकादि स्वपर्याय अस्ति छ, दर्शनपारि-
मादि स्वयपा तथा जडतादि परपर्याय नास्ति छ, एम
अनंती समभंगी संभवे, ते बुद्धिवंते भाववी, नया तस्या
तिने विष बली सम्मतित्तिने विप विस्तारयी कही छे, अने
स्याद्वादरनाकर पहन स्वरूप नया उपपत्ति, प्रकृति, परिगति,
नप सर्व यखाण्या छे. तिहांयी जोइ लेजो. हये गायानो अर्ग
लये छे.
निज केतां पोताने भारे, स्यदस्य, स्वय, स्वशाल,
भावपणे सीय केनां स्यात् कवितपणे अग्नि, अने तेहीन
दम्प, पग्दम्य, परक्षेत्र, पाकाट, परभाषणे नास्ति
नाग्निपा दयमा अम्नि केना , पी सीप
देनां ग्यात् कथधित उभय बना भानाय स्वभा। पले
आदि भांगो नया अतनो भागो ममाना साने भगा करेगा,
पदवी म्यादादपरिणति ने पामेया मुमे मापा मार्ने सा
दयनी पनि उपदेश क्यो, पहती नाही गाणीप
रतं गुट अनरना, अनेकता. पता, गापामायुग, श्री
अरिहंतनो अन॥॥
अग्निम्बमात्र जे मारणार
मनि गायममंत॥
करी,
मा

सप्तदश श्रीकुंथुजिन स्तवनं. ७१९ अर्थः-हवे पोतानो मनोरथ कहे छे. एहबो जे अस्ति- स्वभाव अनंत ज्ञान, दर्शन, चारित्र, अन्यावाघ, पूर्णानंदतारूप,जे माहरो सत्तागत स्यावाद उपयोर्गे ग्रयो तेहनी रुचि पीपासा करीने, वैराग्य जे संसारयी उदासीपणे ए संसारीभाव विभावो- पाधि माहरे अवटती छे, तेहने केबारे सर्वयी तड, एम विष- भक्षण तथा तप्तलोह पदधृति समान जाणीने उदासीन थयो, मोक्षामिलापी केवलज्ञानानंदने अमिला हे प्रभुजी !!! ताहरा सन्मुख उभो रहीने वंदना करीने मागं ई, जे हे तारक ! मुजने तार ! तार ! भवामणायी उगार, ए संसारजनित दुःख मुझयी हवे समातो नयी, जे माहरो अनंतो स्वाधीन आनंद पराधीन धयो, अने हुँ पुगलग्राही थयो तेयी तत्वभोगी एं, पण तत्त्वने जागी शस्तो नयी, औदायिकभावरूप अशुद्ध- पर्यायनी श्रेनिमां पड़ी रह्यो ई, अने हवे हे नाथ !!! ताहरे भरगे आग्यो . माटे मुजने माहरो अस्तिस्वभाव प्रगटे एहवो आत्मानो हित समकेत दर्शनयुक्त, चारित्रनो प्रसाद करो, एहवो हूँ जेश मागीश तेहीज दिन धन्य मानीश एहको मनोरथ करतो ॥ ९॥ इति नवम गाथार्थः ।। अस्ति स्वभावरचि धयी रे, ध्यातो अस्तिस्वभाव ।। देवचंद्र पद ते लह रे, परमानंद जमावा रे ॥ कुं० ॥ १० ॥ अर्थ-माद अहो भन्यजीवो तुम जो मर्व जीव स- ७२० दे० चो० मा० खना अर्थी छो तो जे सत्तागत अस्तिधर्म, तेहना रुचि अमि- लापी थयीने जे अस्तिस्वभावनी अनंतना तेहनेज ध्याता ध्यान करतां थकां सर्व देवमां चश्मासमान जे सिद्धपरमात्म- पद ते रहे केतां पामे, अशरीरता, निर्मलानंदता, निःसंगता- रूप परमानंद स्वाधीन आत्यंतिक अन्याबाय सुख तेहनोज जेहमां जमाव छ, सवन केतां एकीपणं छे, एहपुं पद श्री प्रभुनी सेवायी पामे, तेमाटे तत्त्वस्वरूपी, अरूपी, ज्ञानस्वरूपी, एहवा श्रीकुंथुनायना चरण- सेवन करो, हे भव्यजीवो! एहीच परम सुखनो हेतु छे. ।। १० ॥ इति कुंथुनाथ० ।। ॥अथ अष्टादश श्रीअरनाथजिनस्तवनं । ॥रामचंदके पाग चांपा मोरी रह्यो री॥ए देशी ॥ प्रणमो श्रीअरनाथ, शिवपुर साथ खरोरी ॥ त्रिभुवन जन आधार, भवनिस्तार करोरी ॥१॥ अर्थ:-हवे अढारमा श्रीअरनाय जिननी स्तवना कारणता पणे करे छे. प्रणमो केनां वारंवार नमस्कार करो, श्रीअरनाप स्वामीने, एहीज अमोही परमेश्वर वांदवा योग्य छे, शिव केतां निरुपद्रव जे सिद्धता, तेहीज उपमार्ये पुर केतां नगर तिहां पोहोचावाने खरो साथ छे, तेयी सार्यवाहनी उपमा श्रीअरि- हंतनेज छे, जे निःस्वार्थे भवअटवीमायी पार करीने मोक्ष- नगरने विषे परमानदपर्दे पहोचाडे एहवा कारणपणे श्रीअरिहंतजी छे, बली वण भवनना जनने आधार छे, मिथ्यान्व, असंयम यथार्य पीडितने आधार ओठमाम्य छे. वली चारगतिरूप भव अष्टादश श्री अरनाथ जिन स्तवनं. ७२१ , . केतां संसार तेहमांयी द्रव्ये तथा भावे निस्तारना करणहार छे।। इति प्रथम गाथार्यः॥ कर्ता कारण योग, कारज सिद्धिलहे री ॥ कारण चार अनूप, कार्यार्थी तेह ग्रहे री ॥२॥ अर्थ-हवे मोक्षकार्य निपजावा माटे कारण कार्यनी नीति कहे छे. सर्व कार्य छे, ते काना कीधा थाय छे, तेमां मिन्नकार्यनो कर्ता पण मिन्न, जेम घटनो कर्ता कुंभकार मिन्न छे, अने अमिन्नकार्यनो कर्ता पण अमिन्न छ, जेम ज्ञाननो कर्ता आत्मा छे, तेम संपूर्ण सिद्धत्वनो कर्त्ता पण आत्माज छे, ते कर्ता जेवारे कारणनी योगवायी पामे, तेवारें कार्यनी सिद्धि नीपजाववापण लहे, एटले एकलो कर्ता ते कारण सा- मग्री विना कार्य करी शके नहीं, कारण सामग्री मलेज, कार्य नीपजावे ते कारणना चार मेद छे, जे कार्य नीपजाववानो अर्थी थाय, ते चार कारणने ग्रहे. इहां घणा शास्त्रोमां तो कारणना वे भेद ह्या छे, एक उपादान कारण, बीजो निमित्त कारण, अने विशेषावदयकने विपे समवायिकारण, असमवायिकारण ए नाम क्या है, तथा आप्तमीमांसामां कारण त्रण कया छ, "समवाय्यसमवायि निमित्तभेदात् । तेमां समवायि कारण ते उपादान कारण अने असमवायि कारण ते नामांतर असाधारण कारण कहेवाय छ, तथा निमित्त कारणाना चे भेद करीये तेमां एक तो निमित्त कारण बीज अपेक्षा कारण ते तत्त्वार्थ दी- कामां वखाण्यु छ. नया अपेक्षाकारण पूर्वमिन्यनेन उच्यते यथा घटस्योत्पत्तावपेक्षाकरण व्योमादि उपनने दनि उपेक्षा "तेमाः .

७२२ दे० चो० बा० पद्यपि कारण, बेमां चारे अंतर्भूत छे, तोपण विस्ताररुविने मिनोपयोगी करवाने चार कारण कयां छे. एक उपादान पीचं असाधारण, श्रीजुं निमित्त, चोथो अपेक्षा ए चारे कारण जेवारे कार्परुचि कर्ता रहे, अने जेबारें ए चार कारणने कार्यरुपि कर्ता प्रयाये, तेयारे ते कारण समजवां, पण कर्ताना प्रयो. जन विना कारणता नहीं. एम भावना कखी ।। इति ।।२।। जे कारण ते कार्य, थाये पूर्ण पदे री ॥ उपादान ते हेतु, माटी घट ते वदे री ॥३॥ अर्थ:-हो प्रथम उपादान कारण स्वरूप कहे थे.जे कांना कार्यने सन्मुख थाप तथा जे कारण वेहीज पर्णपदे केनां पूर्णता ना अपने कार्यरूप थाय तेने उपादान देतुकेतां कारण कहीये. ॥ उक्तंच महाभाष्ये ।। तस्वकारणं तं, तशे- पहम्मेहजेण तम्मइया । विवरीप भन्नकारण, मियोमाभो तम्म ॥१॥ ए गायाने व्याख्याने पदाम कार्य यो तदिह नद्रव्यकारणं आदानकाणं पया नंतरः पटाप हति पटले लेम नंनु हता ते कर्ताने प्रयोगें पट थया, से उपादान कागा जेम घटकप कार्य तेहने माटी ते उपदान करग है, पछी माटी तेहज घटप पानी, एटो कारण वेडीज का पाम्पो, इहां का वान एक समपापले प्यास्यान छे, ते का दान कान से. पर महाभागे मतिनानाविको जमालि निन्दवना अधिक से हां कोई पूछे से कल रे गयं दारे एम को दोनो का कारन पEmurag ना मिलन, पर, मा, जपाश श्री अरनायजिन स्तवनं. ७२३ 40 माटी एहई नार हतं पछी पन्नाम य, मानी ते मूदता, पतात हत्ती, घटते जलाहल धनवंत हे, मारे निता है, ए प्रथम राशन कारण बताएं. इति तृतीपगापार्यः॥३॥ उपादानथी भिन्न, जे विणु कार्य न थाये ।। न हुवे कारजरूप, कर्त्ताने व्यवसायें ॥ कारण तेह निमित्त, चक्रादिक घटभावें ॥ कार्य तथा समवाय, कारण नियतने दावें ॥५॥ अर्थ:-हरे निमित्त कार का कहे हे. जे कारण उपदान कारन नित केतां हुई है, अने तेना मल्या दिना वा पाप नहीं, पर्ट व्हने दिये जे करत ते कनि पचमा देतां वनि उदने हे. ते निमित कर कहिये, देर घटना बाई हे त्हने चक्र, वीर, दंडादिक ते निमित्त कार हे.अने भात्री सादान करा हे. जादान हामी निमित्त करने पर वदंडादिक हे ते सर्व भिन्न हे, सने एनिमित्त मन्या दिना माहीनो घट पाप नहीं, देना पदक कहानि का वानपने नहीं, जो एकादिक्ने ने वर्ग ले कुंभर २२ करवाकर सोसानो देवो एने कहिले नहीं नो सन्ता- ..

७२४ दे० चो० बा० स्वरूप एहयुज छे. जे कार्यने करे, ते कार्यानंतर अथवा प्र. थम अप्रयुक्तकाले जे दंडादिकने कारण कहे छे, ते आरोप मार नेगमनयमते जाणवो, परंतु स्वरूपें नयी., तेमादे कार्यनो जे कर्ता, ते उपादान कारणने कार्यरूप करतां तेहमां जे जे उपगरण प्रवर्तीवे, ते ते निमित्तकारण जागयु एटले जे जे कार्यनी नियत ने नियामिकी छे ते ते कार्यनां निमित्त जा. णयां, जेम घटकापने चक्रादिक अने पटकार्यने तुरीग्योमादिक एम सर्वय जाणएनिमित्तकारण कयु॥इतिचतुर्थपंचम।।४।५।। वस्तु अभेद स्वरूप, कार्यपणुं न ग्रहेरो॥ ते असाधारण हेतु, कुंभे थास लहेरी ॥६॥ अर्थ:-हवे असाधारण कारण स्वरूप कहे छे. ते वस्तु जे उपादान कारण तेढयी अभेदस्वरूपें छे, अने काप पामतो नयी, पले कार्य नीपने ते रदेतो नयी, सेम घटकार्य नीपज्युं नोपण तेमाहे माटीपारा छे, तेनी परे ते रहेको नयी, ते अमाधारण हेतु केतां कारण वही, जेम घटरूप कार्य करना म्यास कोश कसलाकार थाये छे, ते मृर्षिहरूप कागी अभेद छे, परंतु घटकपकार्य नीपने ते रहेतां नयी, तेमाट ए मयं अमाधारण कारण जाणा, उक्तं य"प्रमाण- निमोन उपादानग्य वापवासामम्य आनगरस्या असाधार इति " ॥ इति पटगाया. ॥६॥ जेहनी नवि व्यापार, भिन्न नियन बहुभावी ॥ ममी काल आकाया. घट कारण महायो । + नो यार जमाश की अनाजिन स्तवनं. .. : .. अमर्तन नदी तपा सत्तान पते वयानो प्रयास करतो पहतो नदी बनेकाली ति देता हुदो है, तथा निप्त देतां निपला नि है जोइ, अने हुनादी केतां जोक बीजाई शार्पन भावी हे एरो कारनाक हे, हे अपेक्षा- कर रहा, जैन नी तथा काल तथा आकाश ए बिना कोई वनादि कार्य तुं नदी, जने मनी प्रमुरू जेन पन्नं काहे. तेन जन्य बीमा कार्यों पदारन, पपन्न बसाई प. तुं हे. ई. का मेन उपादान तथा नि- मित करनो व्यापार करे हे, तेम एतुं प्रवर्तन करतो न॥७॥ एह अपेक्षा हेतु. आगम माहे को रो॥ कारणपद उत्पन्न, कार्य थये न लदो री || रेदी हमेशा हेतु देतां कर. जगममा तण तत्वाबोदिकोना के. "या वस्पोत्पत्तों ओला. कारः सोमादि बोझ नविना तावामागत् ।। निर्णा- पानशाकर नितितत्वात या विषावपळेगाव- दपलवरितनविकरे "इहां द्वारभूत शिवाजमादि पाह- TERराति भतिजनहायाग देव इति । एकर का स्वर कहदे करद देतां हमांह कारनई हतो जमो धर्म नी, पर ज्या हे, महाड ३ कर दे ई व्हई करत कह ए - Fईक ने इयंना नार ७२६ दे० चो० बा कोइ पुतली कारण उत्पन्न करे, तेमज दंडादिकने कोइ घ2- धंसपणे प्रवृतवे, तो घटध्वंस करे तथा कर्ता जो दंडादिकने घट करवापणे प्रवर्तीवे तो तेहतुं कारण थाय, माटे जे कारणपाई छे ते कर्नान कर्य थाय छे. श्रीविशेषावश्यकें कपुं छे, "ये कारकाः कषुराधीना इति कारणं कार्योत्पादकं तेन कार्योत्पती कारणत्वं नवकार्याकरणे " ते मारे कारणपणू ते उत्पन्न छे. हवे कोई केहेशे जे वस्तुमां कोई कार्यना कारण तो छता छे, तो उत्पन्न छे, एम शावास्ते कहो छो १ वेहने उत्तर ने विवक्षित कार्यनी कारणता उत्पन्न छ, अथवा जे कार्यता जे काले ते कार्यता कर्ताना प्रयोगनी छे, वेमाटे उत्पनन छ, पण कार्य निपज्या पछी तेमध्ये कारण न पामी , जेम अनादि मिप्यावी जीव पद्यपि सत्तावत छे, तेमज अमन्य जीव पण सत्तावन्त छे परंतु तेहर्नु उपादान सिद्धताना कार्य करणहार नयी, वेयी कार्य नीपजतुं नयी. जेबारे कोइक जीवनु आदान अरिहनादिक निमित्त पामीने,कारणतापगे परिणमे, वे कार्य करे, माटे से उत्पन्न छे, अने ते कार्य सिद्ध थया पठी वे कारण रहे नहीं, जो सिद्धतामां सावकतानी छनी मानी में तो, सिद्धावस्था पर सायकल स्य मानय पढे ते सिदायायामां सायकप तो नयी माटे कार्य नापने, कारणता रहे नहीं, नपा निमित जे दंश- दिक ते पण कर्ना मिन कार्यना ध्यामा काग्णता करे, तो वे मित्र कायं पाये, परतु नेज कार्यनी ने काणता रहे नहीं, एम धारत ॥८॥ कार्यामहिपणां री॥ निजमनागत चम । पाटान गणा गे॥२॥ का आनमहव्य.

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७२८ दे० घो० बा० गुणटाणयी मांडीने सिद्धपर्यंत जे गुणनी वृद्धि करवी, एटले अभिनव गुणतुं कारणपणु ते सर्व ज्ञान, दर्शन, चारित्र, श्रेगि- गत ध्यान परिणाम, क्षयोपशमीभाव, विधिसहित आचरणा, तथा भक्ति, अने गुणीनुं बहुमान, जेयी पोताना कार्यनी सिद्धि निपजे. वे ज्ञानक्रियारूप साधक अवस्थानी तरतमता ए सर्व असाधारण कारण कहे. ए असाधारण कारण ते आत्मगुणरूप उपादाननी भिन्न भिन्न ऊगताथकानी अवस्था छे, सदा पूर्व पर्याय उत्तरपर्याय, कारण छै, ते समज क्रियाकाल निशा काटनो अभेद छे. ए असाधारण कारण कह्यो. ॥१॥इति। नरगति पढम संघयण, तेह अपेक्षा जाणो ॥ निमित्ताश्रित उपादान, तेहने लेखे आणी ॥११॥ अर्थ:--हवे सिद्धतारूप कार्य, अपेक्षा तथा निमित्त ए ये कारण कहे छे. नर केतां मनुष्यनी गति, पदम केतां पहेलं संघपण वज्ररुषभनाराच, पंचेद्रिपणुं इत्यादि सिद्धतारूप कार्य- अपेक्षा कारण जाणो. इहां कर्त्तानो व्यापार नथी, पण ए नि जोइयें. ए पाम्या विना मोक्षरूप कार्यनी साधना थाय नहीं, तेमाटे अपेक्षा कारण कहीयें, पण ए मनुष्य गत्यादिक सर्व जे जीवन उपादान परिणमन, धर्मार्थी थइने निमित्त जे देव गुरु सिद्धांत नेहने जेणे आश्रयो, तो तेहनी मनुष्य गत्पादिक लेखे केतां कारणपणे आणजो, अने जेणे निमि. तने आश्रयो नयी. नेहनी मनुष्यगत्यादिक कारणपणामां गणशो नहीं, ने ही अनादिनी घालमा , पलटण करतो नी, तेमाटे ए अपेक्षा नया निमित्त ए ये कारण कयां ॥११॥इति।।

अष्टादश श्री अरनाथजिन स्तवनं. , निमित्त हेतु जिनराज, समता अमृत खाणी ॥ प्रभुअवलंबन सिद्धि, नियमा एह वखाणी ॥१२॥ अर्थ:-हवे आत्माने सिद्धतारूप कार्य करतां निमित्त कारण श्रीजिनराज वीतराग छे, ते वीतराग सर्वज्ञ केहवा छे, समतारूप अमृतनी खाण छे, इष्ट अनिष्टता रहित समताना धणी छे, शुद्ध चरित्र परिणाम तेहीज अमृत छे, तेहनी खाण छे, एहवा प्रभु परमेश्वर परम दयाल, परमात्मा, शुद्धतत्वरूप भोगी, पूर्णानंदी, चिदानंद जे श्रीअरनाय प्रभु तेहने अवलंबवे पो- तानो भासन प्रभुना ते गुण जाणवाने जोडी एम अनंता गुण ते सर्वगुणना भासननी रीझ तथा वे उपर बहुमान एहवे आलंबने रहेQ, तेयी नियमा सिद्ध निवारण थाय एम आगममा वखाण्यो छे, एहीज मोक्षनो उपाय छे. ए निमि- त्तकारण कयु ॥ १२ ॥ इति । पुष्ट हेतु अरनाथ, तेहने गुणधी हलीयें ॥ रीझ भक्ति वहुमान, भोगव्यानथो मलीयें ॥१३॥ अर्थः-माटे पुष्टकेतां नियामक हेतुकेतां कारण ते जि- नराज श्री अरनाथ प्रभ तेहना गुण जे केवल ज्ञान, अनं- तानंदरूप तेही हलायें केनां आपणो आत्मा वेदिसें जोडीयें, प्रगटगुगीना गुणी आपा चेतना जोडवी, रीझ केता गगनीमन्नता. भनिना नवना. बहुमान, आदर, मो- बाद, भोगकेता आन्दन दाना चिननी एकाग्रता, ए श्री अग्नाय प्रमता " करन श्रीमी एकत्यपणे ' Arue , देर यो पार मठिय, सामने गन्दा तलने जपलंग से मधान छ । पति प्रोगामायः ॥ १३ ॥ मोटाने उत्संग, घेटाने सी चिंता ॥ तिम प्रभु चरण पसाय, सेवक थया निचिंता॥१४॥ अर्प:-नया साफिक दृष्टांत कहे छे.जे मोहोटाने उसंगे फेतां गोटामा पेटो तेहने कोई गिनां नहीं, ते निचित पपो, तेम सेवक पण प्रभुजी निरामय देव तेहना चामने सेवो, चिनारहित थयो, जे परमोत्तम, सर्वगुणभोगी, निरा- टेगी, विन्मपी, अनंत दान, लाभ, भोग, उपमोग' वीर्यमपी, भीजिनेभर निःकर्म देवतस्व, परभाश्ना अर्ता, परभाव अभोगी, परानुयापीना रदिन, एहयो देय जो आदयों छे, तो मोहर्नु शु जोर छ । संसार कोने छ १ कर्मनी पीक कोने छे १ जो परमोत्तम धणी में माहरे माये कयों छे जेहना ध्यानयी माहारो मोक्ष नीपजे, ते देवनो योग मिल्यो छे. ते माटे चिंता नयो । उक्तं च श्रीजिनवल्लभपूज्यः ।। पसरेइ तीयलोए, तापमोहधयारंभमइ जई ॥ सिमताव मिच्छत्तं सितं फुरइ फुडफुरंताणं ॥ १ ॥ तंनाणंस पूरो, पपडपजीयस- तीज्झाणसुरो ॥ १४ ॥ इति चतुर्दश गाथार्थः ॥ अर प्रभु प्रभुता रंग, अंतर शक्ति विकासी॥ देवचंद्रने आणंद, अक्षय भोग विलासी॥१५॥इति।। अर्थ.-माटे श्री अरनाथ प्रभु अटारमा परमेश्वर जेणे तत्त्वरुचि थइने नच्यामिपि तत्त्वसाधक तत्वध्यानी थइने १८८ अष्टादश श्रीअरनाथजिन स्तवनं. ७३१ , तत्त्वप्रगट कर्य, ते प्रभुनी प्रभुता, सुदज्ञायकता, शुद्धरमणता, शुद्धानुभवता, अपौटिकता, असंगता, अयोगिता, सकल प्रदेश निरावरणता, मागभावी शुमसत्ताभोग्यता, तेहने रंगें ने रंगाणा छे, ते साधक सम्पग्रहष्टि, देशविरति, सर्वविरतिनी अंतरंग शक्ति तत्वप्राग्भाव करवानी साधक कारकता, साधक कर्ता- पणं, परमसंबर पूर्वक परम सझामनिर्जरा रूप शक्ति, विकस्वर थवे, प्रगट घवे, ते शक्तियी सर्वकर्म विगम थवे, सर्व आ- त्मिक धर्मने प्रगटवे करी, परमात्मा देवमांहे चंद्रमा समान श्रीनिष्पन्न परमेश्वर तेहनो ने आनंद, अध्यावाय, शिव, अचल, अरुज, अविनाशी, तेहनुं जे अक्षय स्वरुप, तेहनो भोग केतां अनुभव तेनो बिलाती आत्मा थाय, एटले स्वसंपदा तत्वता आत्मशुद्धपरिणति, वेहने सादि अनंतो काल भोगवे, अथवा देवचंद्र ले स्तुति कर्ता ते अक्षय आनंदना भोगनो विलाती याय, माटे स्वरूपसिद्ध, अरूपी, चिठ्ठप, श्रीपरमेश्वर, तेहने सेवो, त्याो, नमो, गावो, तेहना गुण संभारो, एहीज मोक्ष साधन- पुष्ट निमित्त छे, ए निमित्त उपादानकारणरूप घइने असाधारण कारणाएं बडतो मनुष्यगत्यादि अपेक्षा कारणपणे करी तत्वानंद रूप कार्यने करशे, ते मारे उपादा- नादिक त्रणे कारणनी कारणता निमित्तने अबलंवें प्रगटे, वेयी निर्दोषपणे आशंसादि दोष वर्जिने शुद्धनिमित्त ने सेवे, ते सेवनयी कीपर समरे अने क पा समरेवी स्वकार्य करे, मारे धीजरनापीनी भक्ति ते परमावार छे ।। १५ ।। इति श्री अरजिनस्तवनं ॥१६॥ " , ९८९ ०२२ द० चौ० बा० HAAR ॥अथ एकोनविंशति श्रीमल्लिनाथ जिन स्तवनं॥ देखी कामिनी दोह के, कामें व्यापियोरे केका०॥ए देशी॥ मल्लिनाथ जगनाथ, चरणयुग ध्याईयें रे॥च०॥ शुद्धातम प्राग्भाव, परम पद पाईये रे ॥१०॥ साधक कारक पटक, करे गुण साधना रे ॥०॥ तेहीज शुद्धसरूप, थाय निरावाधना रे ॥था॥१॥ अर्थः-हवे ओगणीशमा श्री मल्लिनाथ परमेश्वरनी स्त- वना करे छे. तिहां कारकशक्ति पलटवायी सिद्धता निपजे छ, ते पलटवानो उपाय श्री अरिहंतनी सेवना छे, ते रुप स्तुति करे छे. श्री मल्लिनाय, परमेश्वर, परमज्ञानी, ते जग केतां लोकना नाथ मोहनो भय एटले अंतरंग भावरिपुथी छोडाव- वाना परम कारण छे, वेहनां चरणयुग केतां पदकमलनुं जोड़ें तेहने ध्यायीये, वारंवार सभारियें, एहवा प्रभुने घ्यायवाथी ध्याताने झुं नीपजे ? ते कहे छे. शुद्ध जे आत्मानो परमा- त्मभाव अनंतगुण निर्मलनारूप तेहनो जे मागूभाव केतां. मगटपणुं निर्मल शुद्धतारूप परमपद निर्मल पद ते पामीयें, एटले पोतानी आत्मता निर्मलपणुं भजे, ते आत्मसिद्धिरूप कार्य करवाने छ कारक छे. तिहां सर्व कार्यमां कारक प्र. त्तिनी कारणता छे, कारकका विना कार्यनी निष्पत्ति नथी. जेम १ कुभकार ने ना, २ . नकार्य, ३ मृत्पिड चक्रा.

एकोनविंशति श्री महिनापजिन स्तवन. दिक कारण, ४ माना पिंडने, नवा पर्यायनी प्राप्ति ते सं- प्रदान, ५ पिंड स्थासादि पर्यायनो व्यय ते अपादान, ६ घटादि पर्यायन आधारपणे ते आधार, एम घटरूप कार्यमां षट् कारक हे,तेमज आत्माने अनादि कालना ए छ कारक बाधक रूपे परिपाम्यां ठे, ते देखाडे हे. १ आत्मा परविभाव रागादि ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्मनो कर्ता धयो हे. २ भापकर्म सम्पर्कमने ले आत्मा करे, के कार्य नामा पीचं कारक. ३ अविभाव परिणतिरूप भावाभव अने प्राणाति- पातादि व्याघर, ए वे कारणधी कर्म चापे, माटे ए करण नामा नाज कारक. ४ अशुदतानो तथा स्पर्मनो लाभ ते संप्रदान नामा वो' कारक- ५ स्वरूपरोध, क्षयोपशमनी हानि, तथा परानुयपापिता तेजपाशन. ६ अनंती अशुद्ध विभावता, तया ज्ञानावर्णादि कर्मने मालवा रूप ले शक्ति ते लाचार नामा कारक जागg ते. ए रीतें ए , कारक्त का अनादितं अशुरूपये वायक- तापने आत्माने परिणनी ररं हे, ते वारे साधक आत्मा, पोतानो स्वधर्म नीपजावका पो परिणमा, वैवारें ए हए कारक सावक पने प्रत्या गुपनी आम धनी साधना करे. ए रीते ए ३ कारक लायर पने परिणम्या कार्य नोपजे शुद्ध स्वरूप थाय. ए बत्रपरिमार्मिकता पवका कारण - ७३४ दे० चो० बी० पणं कोने परिणमे ? ते कहे छे. जे निराधाचा श्रीसिद्धभगवंत- वेहना छ कारक, ते रामपणे प्रवृत्ते छे, अने धावक जी- वोना बावकपणे परिणमे छे, तथा समकेत गुणटाणायी मांडीने अयोगी गुणटाणा पर्यंत, साधकपणे परिणमे छे, तथा सिद्ध भगवंतना शुजस्वरूपरू परिणमे छ, कारक ते आत्मा- नामा जे कर्तारूप, द्रव्य तेहनी ए परिणति छ, उक्त च श्री विशेषावश्यके. कारण व्याख्यानावसरे ॥ गाथा || छविह कत्ता इ, कारण कम्मं च तत्तो य ॥ संपयाणा वायाण, तह नासंमिहाणाय इति ॥१॥ गाथार्यः। तथा २ कारणं पोदा ॥ यथा ॥ कारण महवा छद्रा, तत्य संनंतोत्ति कारणं कत्ता ॥ वझ पसाहगतमं कारणम्मिओ पिंडदंडाइ ॥ १॥ कम्म किरिया कारण, इत्यादि गापायी जाण, ॥ होइ पसत्यं मोरकस्स कारणं. इह यन्मोक्षस्य कारणहेतु तत् मशस्तभावकारणं उच्यते॥ इति बचनात. मादे साधकपणे कारक परिणम्या तो सिक्ता कार्यने' करे, ते माटे निरागाव जे सिद्ध निरावरण अध्यागाध सुख वेमा तेहनो कर्तादिक शुद्ध पारिणामिक भाव शुद्ध पो थाप, स्वस्वरूप कर्तृत्वपणे परिणमे ॥१॥ इति ॥ कर्ता आतम द्रव्य, कार्य निज सिद्धता रोका॥ उपादान परिणाम, प्रयुक्त ने करणता रे॥०॥ आतम संपट दान, नेह संप्रदानना रे ॥ ते॥ दाता पाचन दय, त्रिभाव अभदना ॥त्रि०॥

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७३६ दे० चो० बा० वहीं जे जे आत्मधर्म निपजता जाय, ते संप्रदान कहिये। उक्तं च ॥ गाथा ॥ देओ स. जस्स तं सं पयाणमिह तंपि कारणं तस्स ॥ हो इतदत्थित्ताओ, न कीड तं विणा जंसो॥ इति माटे जे आत्माना अस्तिवर्मनुं थर्बु ते संप्रदानकारक जाणवू, इहां दाता आत्मा तथा पात्र पण आत्मा अने आ. स्माने देय केतां देवा योग्य ते पण आत्मवर्म, ए प्रणे भावनी अमेदता छ, एटले गुणतुं प्रगट करघु वे देय अने आत्मा दाता तथा आत्मगुणने प्रगट करे ते दाताप' अने गुणतुं पात्र पण आत्मा एटले दान, दाता अने ग्राहक, अने घणे अमेद छे ॥२॥ स्वपर विवेचन करण, तेह अपादाना रे ॥०॥ सकल पर्याय आधार, संबंध आस्थानथी रे ॥सं०॥ वाधक कारक भाव, अनादि निवारवो रे॥अ०॥ साधकता अवलंची, तेह समारवो रे ॥ ते ॥३॥ अर्थ:-५ जे आत्मायी समवायें रह्या तेहने स्वधर्म आ- स्मधर्म कहिये. अने तेही विपरीत जे मोहादिक कर्म अशुद्ध मशत्ति वे परभाव कहि ये, तेहनुं विवेचन कर, भिता का, अशुद्धतानो उच्छेद करखो, दोपनो त्याग करयो, पटले जे दोपविश्लेष करवो, अर्थात् अनादिसंसार कपि तथा भोक्ता उतनीने जे आत्मस्वरूप कापj भोक्ताप तेहीज प्रगट करवं, ते पांच, अपादानकारक कहिये. ६ साल केतां समम्न सर्वायर्याय नेहनो आधार ते आमा छे, आत्माने आत्मपयायची म्वम्वामित्वमय छ, ट्याध्य पापक एकोनविंशति श्री मल्लिनाधजिन स्तवनं. संबंध छे. ग्राह्यग्राहक संबंध छे. आधाराधेय संबंध छे, ए सर्वनं आस्थान केतां ते कारणरूप क्षेत्र ते आत्मा छे, ते आस्थनता माटे आत्मा आधार छे, ए आधारनामा छटुं कारक जाणवं. ए छ कारक साधकपणाना कमां. हवे ए साधकपणं केम पामे ? ते कहे छे. बाधक जे परभाव तेहने अनुयायी अशुद्ध कर्तादि कारकपणे मिथ्याव, असंयम, कपाय रूप भाव अशुद्धतारूप सामान्य चन, अगुद्धसाध्यानुगत अगद- कापणू तेहने निवारवं. ते चक्र रोकीने स्वरूपानुगत करो, तेमाटे ए अनादिनी भूल टालवी. जिहां सुपी कर्ता परभाव- कारक छे, तिहां सुधी कांइ साधक्ता नयी, जिहां सुधी कर्ता अशुद्धकार्यानुयायी सामान्य चक्र है, तिहां सुधी शुभसाधक्तानो अंदा पण उपन्यो नयी, श्रीपूज्य कर के, जे आत्मा तत्त्वकर्ता पणे थया विना सर्वशुभ प्रवर्तन ते चालचापल्य छे, तेमाडे कारकचन बाधकतायी वारीने, साधकताने अवलंबीने ते कारक- चक्रने समारबुं स्वरूपानुपायी कार्बु अने पोताना आत्माने एम कहेवू जे हे चेतन ! तुं परभावनो कर्ता तया भोक्ता अने ग्राहक नहीं, तुंतो संपूर्णानंदनो शुद्धविलासी छो, अने तुं ने परभावमा रमी रह्यो हो, तथा परभावनो भोगी थइ रह्यो छो ? ए तुजने घटे नहीं, ताहरु कार्य, तो अनंत गुण पारिणामिकरूप स्वरूपकर्ता स्वरूपभोक्तापणं छे, तेमाटे हे चैतन्यहंस ! हवे तु यथार्थ जिनवाणीरूप अमृत पान करीने, अनादिविभाव विष वारीने पोतानुं तत्त्व संभारी रखपर विवे- चनकारी थड्ने पोतानो ने सहजानंद व्हने कर. एहीज ताहरु कार्य छे, तुं तेहर्नु उपादान कारण शक्तिमंत छो, तेहनो लेवावालो छो, तुं नाहरी गुणसंपना नाहर प्रदेश प्रगट करवा- - - दे० चो० वा. रूप दाननो संप्रदानी छे, माटे हे चेतन ! ए अनादि अंगु- परिणामने तुंहीज त्याग करीश, अने ताहरी सत्तानो आश- पण तुहीज छो, माडे तुंहीज ताहरा तत्वने का, नाहरु तन्त्र तुं नीपजाविश. एम पो पोताना आत्माने कहिने, सावका आदरयुं ते आदरतां कारक समरे, कारकने समरवेयी अनुक्रमें आत्मानुं स्वकार्य नीपजे, पछी एहीज आत्मा सिद्ध थाय- माटे एहीज साधननो मार्ग छे, साधन की कार्यनी सिद्धि थाय, ए क्रम छे ॥ ३ ॥ इति तृतीय गाथार्थः ॥ शुद्धपणे पर्याय, प्रवर्तन कार्यमें रे॥०॥ कादिक परिणाम, ने आतम धर्ममें रे ॥ ते । चेतन चेतन भाव, करे समवेतमें रे ॥ क० ॥ सादि अनंतो काल, रहे निजखेतमें रे ॥२०॥४॥ अर्थः-पहेलो शुद्धपणे निष्पन्न आत्माना ज्ञानादिक पर्या- यतुं जाणवा देखवा रूप कार्यतुं प्रवर्तन, उत्पाद व्ययरूप परिणमन, ते कार्यनो कर्ता आत्मा छे, पी आत्मगुणर्नु परिणमन ते कार्य, पोर्नु आत्मगुणज्ञानादिक ते करण, चोथु आरमगु गनो लाभ ते संप्रदान, पांचमं परभार त्यागपरिणति ते अपादान, छछु अननगुणनं गखयं, ते आधार, प छ कार- कनु चक्र ने मिद्रायम्याने विष सदा स्वाधीनपणे पार छ, तेही शुद्रनिम्पनपण जे ग्यपर्यायनं प्रपतन, तेहगे कनादिक छ कारक तेहन जे परिणामन ते आ-मयमंमांदल , पुटले मितपणे ने कनांक छ काक ने बापमन्येतो. चेतन केना आमा र पाता।। ननभाव बना आत्मभावकर, गम- एकोनविंशति श्री मल्लिनाधविन स्तवनं. वेतमें केतां समवाय संबंधमां है, पुले आत्मा आत्मभावनो कती हे, ए समवापसंवा मूलपने सादि अनंता कालपर्यंत निजखेतमें केतां पोताना अस्पाता प्रदेशल्प क्षेत्रमध्ये आत्मधर्मनां निप्पन सिद्धतापणे रहे, भिदिनी आदि छे, परंतु अंत नी, मारे नादि अनंतो वाल स्वमेव स्वस्वरूपमा आत्मा रहे ॥ ४ ॥ इति चतुर्थ गाधार्यः परकर्तृत्व स्वभाव, करे तां लगे करे रे ॥ क० ॥ शुद्ध कार्य रुचि भास, धये नवि आदरे रे ॥१०॥ शुद्धात्म निज कार्य, रुचे कारक फिरे रे ॥२०॥ तेहिज मृल स्वभाव, हे निज पदावरे रे ॥२०॥५॥ अर्थ:-पर देतां ने भाव, अपकर्म अने नोर्म, हने कत्तपनाने स्वभावें करें, तिहां सीन हनेज करे, एकले ए पकापां अनादिकालयी रे हे, जिहां मुधी परनो गनी, परनो भोगी, तिहां मुधि परक पर ए आत्मा क्ने, पबारें , नित, निगवा, वाम मगर रखा रूप. कार्पनी मवि थार, वारें पदनार आदरे नहीं. हम आमवरूप पाबाद रोने परमानंद भान तथा कवि देशव कारक पटवानां पीज हे, हे मारे जे मापर दान. मापन मान, ते मोशन मत है, हवामानंतनान, नगन. मगर मुदिनी. अकर, नाजनकार आनयम मनामन. नापतिरक... अंजी, ३. . बिहा दे. चो. या सीम परपोडलिक गुरखनी रुगि छ, तिहां सीम परनो का हो, तेहथी सकारानं चक्र से संग परिणमे छ, अमेजे जागर भेजान धारायी, आत्मा परविभंगन करीने पोरा आत्मा एक उठरंग में जाएं, रोहनेज हित मार्ग से गाते आत्मिा धर्मनीग मषि उपजे, पी जेहनी हो हागि उगने, ते तेही कार्य करे, नेगोरे कांधर्म साप? करे, मां काफया लााश्रित पाप, तेयारे दीन पोनाको अपर, भाट, नानी, निःप्रपागी रामपारिणमन गे मागमा पर्म तेसने ग्रहण करे, केम मे पकार मुलधर्मी महे, तेहगी निज येनां गोताना परमारम, पूर्ण अप्र, नं: पदनेवर, पागे, ताप, भरिया in अनन, निनि., अम्पी, अपापाचगुणी, पहीन आमा भाग नि॥५॥ कारण कारतरूप, अंडे कारक दयारे॥१०॥ यस्तु प्रगट पाय, पर मनमें गाया ॥ ॥ पण गुडम्बरप ध्यान, चेतनता ग्रह ॥ ॥ दर निजमायभार,गकन्ट कारक लंm : 4mmar निदा , मा? कारना नही, है? टायर मा? forget tan are Pariram Ati RT

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दे० चो. बा. आवारीपर्ण ते आधार. एम पदकारक सावकप पामीने सि. पता परमोत्तमतानो उच्छरग समाधि सकल निमलता निपगाो. ॥इहां पधर्भ अवलंयमानी भावना लसे छे ॥गाया||अहम्मिको खलु गुनो, निम्ममओ नाण दंगण समग्गो ॥ तम्मिटिओ तधितो, सोपए सपनेमि ॥१॥ अहं आत्मा ज्ञानादि अनंत गुणपर्याय रूप, अनंतम्बधर्ममयी तथा द्रव्यपणे, अगंडपणे, समु. दायपणे एक ए. वली नियनपयी शुद्ध छ, यद्यपि अनादि पर- भावमां दुध, स्वभाव मट थको अशुद्ध थयो, तो पण जानियी मुटया मुख्य अनतज्ञानादि गुणमय, शुद्ध, निष्कलंक, निरामप, नि.गग, निदापी छ. सर्व ममकार परभार माहरापणायी रहित ई, जान गालमागन, परिच्छेदनाप, दर्शन सामान्योपयोग तेदिन मनी ४, पढ़या मामन रमण, परिणमनाप, रोपाको सर्व परोपाधिन क्षप करू एं, इम स्वशुदमरूपने मसी, सर्व परमा भेट कग, निमल्टागद निपजामो ॥६॥ इति । माह पूर्णानंद, प्रगट करया भणी रे ॥३०॥ पुष्टालंबन रूप, सब प्रभुजी नणी रे ॥०॥ देवचंद्र जिनचद्र, भनि मनमें धरी रे ॥ अव्यावाध अनंत, अक्षय प प्रादगं051 महार 47/+II , एकोनविंशति श्री मल्लिनाधजिन स्तवनं. रूप नीपले, तेबारे भञ्च जीवने पोतानी तव नीपजाववारूप शक्ति, ते श्रीअरिहंतजीनी सेवनावी घाय, तेमाटेज निर्धार कयों छे, जे हे प्रभुजी ! माहारो जे पूर्णानंद, पूर्ण अन्या- बाध मुख ते प्रगट करवाने पुष्पालंबन केतां पुष्ट नियामकी आलंबन केतां आधार ते श्रीप्रभुजी भव्य जीवना आधार, मुनिजनना प्राणाधार, आचार्य उपाध्यायजीना परम दयाल, भावचिंतामणि समान, समकिती जीवना ध्येय. ध्याताने प्रति- च्छंदरूप, अनंत गुणाकर निर्मल ज्ञानानंदना पात्र, एहवा श्रीजिनराज, महाराज, मुखसमाज, तेहनी सेवना तेहीज पुष्टा- लंबन छे. तेमाटे सर्व देवेंद्रादिक नेमध्ये चंद्रमा समान, एहवा ने जिनचंद्र श्रीवीतराग अरिहा, नेहनी भत्ति सेवना आज्ञा मानवा रूप, तदनुयायीपणं तेहीज बाग शरण छे, एहवी भक्ति मनमा धरो. स्थिर राखो, अथ स्तुतिकर्तान संबोधन, हे देवचंद्र ! श्रीजिनचंद्रनी भक्ति केतां चरणसेवना ते मनमां धरो, तो अन्यावाव. जिनां परभावनी पीडा नहीं, परमानंद- रूप, जेहना अनंत गुण ते गण्या जाय नहीं, अक्षय केतां जेहनो छेद नहीं, विनाश नहीं, एह जे परमात्मरुप. पद, ते आदरो, एटले पामो, माटे ए आत्मवाधकता तनी साध- कतामां रमे, सिद्ध थाये, एहीज प्रभुसेवनानुं फल है, माटे हे सिद्धरुचि जीवो। नमे श्रीमल्लिनाथ परमपुरुषोत्तम परमेश्वर, निःकारणा, जगदन्मल, नेहने गाओ. म्नवो, भारी ध्याची, प्रयमयी साधन बन ईज आदा. जीवन छे ॥ ७ ॥ इति मदिन पनि लिवन ।। . १

दे. थो, या
॥अथ विंशतितम श्रीमुनिसुव्रतजिनस्तवनी
भोलंगही ओलंगडीसुहेली हो, श्री श्रेपासनी रेप देशी
ओलंगडी ओलंगडी तो कीजें,
श्री मुनिसुव्रत स्वामीनी रे॥
जेहथी निज पद सिद्धि ॥
फेवल ज्ञानादिक गुण उल्लसे रे,
लहिएं सहेज समृद्धि ॥ ओ० ॥ १ ॥
अप:-हये श्रीनिवत पामेधर अहन स्वरूप परमारमा,
अहिंसकनी नयना कर थे, मुनि जे निग्रंय तेदना गुप्त
केतां मला वन पट्या श्रीमुनिगुगत प्रभु सहनी ओलंग
केना सेवा पटले गुणयाम करिये जेहयी निमान का पो
तार्नु पद ने परमानंद पर तेहनी सिद्धि केनां निति पाये।
पदी केवल ज्ञानादिक गुण उल्लमे येतां मगटे, शानार
रमनो भोगी थाप, तथा सदन अत्रिम स्वरूपस्मृति पार,
पपन मेव फल छे ॥१॥ति।
उपादान उपादान निम परिगनियातुनो रे,
पण कारण निमिन आयोन ।।
पुर मार दुविध ने उपदिश्यां ।
पार माधीन, प्रा॥ ॥

विंशतितन श्री मुनिनुवाजिन लवनं ७४५ .. अर्थ:-हवे इहां आत्मसायना करवामध्ये उपादान ते निज केतां पोतानी परिणति ते वस्तुनो मूलधर्म डे, एले जे आत्मसत्ता हवी हे, ते उपानन कारण हे, पण ते निमित्त कारणने आधीन, निमित सेवन कर्ता उपादान कारण समरे, ते निमित्त कारगना के नेद हे. एक पुष्ट निमित्त पीज अयुष्ट निमित्त, तेने माहरू जे कार्यनो कर्ता, ते जे विं कार्य घाय. ते विवें कार्य ग्रही प्रवर्ताये, तो ते निमित्त कारण- कार्यनो हेतु थापः पग अविचे ग्रहण करे, तो निमित्त कारण कार्य करे नहीं, जेम कुंभकार चने फेरखे, तो मा- बीना पिंडने वटपने पमाडे, अने नहीं फेरवे तो न पमाडे. एडे श्रीअरिहंतजी मोशना निमित्त कारण तो छे, परंतु ले रीते आगममध्ये कयु हे. नेवित्रं आशातना बाली, पुलाशंसा रहित केवलज्ञानादि गुणनी ओलखाण सहित जो सेवे, तो मोशनो निमित्त कारण याय, पण अविधै सेवना, ते कामनी नहीं, मारे ग्राहकने विधि सहिन कारण मधु, तो ते कार्यने करे ॥ २॥ इति द्वितीय गाथार्यः ।। साध्य साध्य धर्म माहे होवे रे, ते निमित्त अतिपुष्ट ॥ पुष्पमाहे तिलवासक वासना रे, ते नवि प्रध्वंसक दुष्ट ॥ ओ० ॥३॥ अर्थ:-हो पृष्टनिमिन्नं वन्य कई छे. साध्य केतां करवा पोय. जे वय ३ ३ काम होय. ते तेनुं पुष्ट शरण कई. ने राष्ट्र :- ये का वान अयें हो यो ग्रा यो कार्यने करे, पण ते कानो घंसान थाप, रोहनो रांत कहे जे. जेग वेलने रागामाराना करमण कार्य, वेहने पारण पुग छे, परंतु यामना करती ते साध्य छ, याराना कलमय छे, अने से पल ते तेल तसा तेलगी यारानाना धंगानगी, ते मारे ते निमित छ । उत्तं चशेपारश्य । वाय आगaनिमितं इति तो पुणे, मुग्गरं कारणमिति ना अपूर्ण तिनमा श्रीमिद्धमेनायिः ॥ हेतुनिदोग, मोक्षमागावने ॥ इति ॥ तहमा श्रीअरिहंतो ने मोक्ष जागना पर निमिनले मारे सायो निगा, मामा से श्री अतिने तिरे, माजश्री गरिने पुरनिमिन है, जो विधिय गेवन पाय, नोएपी मोक्षमा निष॥fil दंड द निमिन अपुष्ट घडातणारे, नयि घटता नगु मोह ।। साधक साधक अध्यकता अहेरे, निग नहीं नियत प्रबाट ॥०॥४॥ भयं-हो आनिमिन देशमा आप निमित है, m TRAgrrentin. देन करता येता या 7. farmms are mart R 1 mint. Amt::m, Rator : . arma विंशतितम श्री मुनिमुवतजिन स्तरनं ७४७ नी, अने श्री अरिहंत परमात्मान नेवन ते नि सिद्धतार्नु कारण हे, एहने सिद्धिकार्यनी रुवे ने सेवे, वेहने नियमा सिद्धि निपने ॥ ४॥ इति ।। पट् कारक पट कारक ते कारण कार्य- रे, जे कारण स्वाधीन ॥ ते का ते कर्ता सहुकारक ते वसु रे, कर्म ते कारण पीन ॥ ओ०॥५॥ अर्थ:-हवे कारणनी पुरता कहेवा निमित्ते कारक कहे हे. १ का, २ कर्म, (कार्य) ६ करण, ४ संमदान, ५ अपादान, ६ अधिक. ए. कारक हे, ते हरेक कार्य, निपजावानां करा हे. जिहां का किया करे, विहां अनु- सपने (सहजरने) एउ कारक. जागा, वहां आमा पोता तिरूप कार्य ने करवा र क्रिया वर, तेबारे एक कारक. सर्व हो. तिहां ने आमा देहां सिद्धि- सर कई अभेद हे, वे माटे तेनां काद. प. अनेद हे, भने निरनो दा नि होप, करें इन पर निन हो, एमोतिहे, परंतु विमिन करके कमिशन हो, सियार र निमिन का, भीमति हो, हेहने इ. सनई पहोते, नाति हे. हर बार न मरे हक है. देह दे० चो० बा० कत्ता ॥ श्रीभाष्यसुधांबुषिवाक्यं ॥ सर्वकारक ते कर्त्ताने बों छे, आधीन छे. हवे बीमुं कर्मनामा कारक, ते जे काला पुर थाये अने कयु थाय, ते कर्मकारक कहीयें । उक्तं च ॥ कम्म किरियाकरणं इति ॥ कार्य कार्य संकल्पे कारकदशा रे, छत्ती सत्ता सद्भाव ॥ अथवा तुल्य धर्मने जोय रे, साध्यारोपण दाय ॥ ओ० ॥६॥ अर्थ:-इहां कोई पठशे जे कर्म तो कार्प छे, पण काण नयी, तेहने उत्तर कहे छे. जे कोने पटेलां तो कार्यनी संकल्प पाय ठे, ते वर्णनं ते कर्ता पदेला साप कापने विचारे, ते वार पठी कार्य करे, ते मादे कारण कहिये । उत्त प विशेगावश्यक ॥ सवाऽपि बुद्रा सरल्प कार्य कति इति ॥ व्यवहाम्नतो युद्धापयमितस्य भम्प विकगितो मृण्मयः- स्लरवालंबनतया काणं भवति ॥ अपरा स्यादि काळ ते घर कार्यनं कागा थे, अने कर्नाने नो म्यागादिका),अपाजे कार्य निपजापान मुनिकादिक मूल उपादान, रोदा ये कानी छनि सनाय योग्यता हो, ते का रानाग्न से मागमाची शान काणा ॥ उन्न । पोषः पगभग समानान गरायला अथा मापो ॥ 7 विशतितम श्री मुनिसुनतजिन स्तवनं ७४९ , उतांपणं ते कार्य बुहिये मेल्वे, ते मारे कार्यनें कारण कहे अथवा तुल्य धर्म जो, ने मुजने एहवं कार्य निपजावू छे, जेन कोइ आत्मा मोक्ष पूर्णानंद करवाने उद्यमी धयो, ते सिद्धरूपनिष्पन्न तत्वने जोवे, अने विचारे जे भने मा- हलं एहवं तत्व निपजाब के, एम संकल्प करवों, वे तुल्य धर्म जोइ कार्यनो उद्यम पणो थाय, ते मारे कार्यने पण कारण कहे ॥ उक्तं च श्री पूज्यैः किं बहुना ॥ यथा पचायुक्तितो घटते तथा सुधायाः कर्मणः कारणत्वं वाच्यम- न्यया कर्मणो कारणले करोति इति कारणमिति पण्णां कारक- वादपपत्तिरेव स्यादिति ॥ ए रीतें कर्मने विषे कारणपयं मानवं, एमज कारकता है, सायन आरोपण कर एहज कर्मने कारकपर जाई ॥ ६ ॥ इति षष्ट गाचार्यः ।। अतिशय अतिशय कारण कारक करणते रे, निमित्त अने उपादान ॥ संप्रदान संप्रदान कारण पद भव नथी रे, कारण व्यय अपादान ॥ ओ० ॥७॥ अर्थः-अतिशय उत्कृष्ठपने के कारण ते कारणनामा बीइं कारक पहिय, तेहना ये भेद के. एक निमित्त कारण वी उपादान कारण, तिहां उपादान ते सान्नानो सत्ता धर्म निमित्त कारण श्रीजरिहंतादिक अने कारण पद भवन घयु एले उपादन अधिक अधिक कारणता पाने. ते कारणपर्या. पनो लाम. हे माना. उसनन कारणमां नको नयो का पद नाम कहिये, जयना दे० चो० प्रा० कार्यना नया नया पर्याय मगद भयं, ते संप्रदान कदिएँ, एटले कार्यपदर्नु भान ते संप्रदान कहिये, अने पाउला वापस पर्यायनो पप केतां विनाश ते अपादान पांयमुं यारत कहिये, जीणं कारणपर्यापनो नाश नम्य कारणता निपगा, ये कापनी निष्पत्ति छ ।॥ ७॥ इति सप्तम गाथार्यः ।। भवन भवन व्यय विणु कारज नयि होये रे, जिम दृपदे न घटत्य ।। शुद्धाधारशुद्धाधार स्वगुणनो द्रव्य हेरे, सत्ताधार मुतत्व ॥ ओ० ॥८॥ अर्यः-कोइ कहे जे संप्रदान तथा अपादान तेहषां भी कारणता हे ? तेहने उता कहे .जे भान फेनां ना पर्यापन पधु, व्यय केतां पर पनो नादा, ए पपा दिना कार्य निपने नहीं, जेम माटीनो पिंड, ते पिंडापनो पा स्यामा पर्नु भान नया स्यामपर्यापनो ध्यप, कोशापापर्नु मान, योगापांफ्नो व्यय, भूगल पयांपर्ने भान, म पर्यापनों व्यय, काट पायर्नु भान, कपाल ओपनोपा घटायनं मान, पने कार्यनी शनि, हेम मित्राने पदाने निध्यायापांपनी प्यप, RE :- पर्ने मदन, देदना म्यायनी मनी पर, मानो मत परे कानी पनि, तु मान नया पर दिना कार पापा, मादी मन पर, - r: () विशतिनम श्री मुनिसुनतजिन खान ७५६ विरेस्मातादि वपर्याप्तुं भवन पर नयी. ते मारे निपने नहीं हो रुई आधारकारक कहे हे. स्वगुण जे ज्ञानादिकतेनो मुद अधार पहार्य हे एके जीद पा ज्ञान, चारित: वी, दान, दान, भोग, उपभोग, अन्याय, अमर्तता, अगु- रुटता. असंडता निर्मलता कता: परिणानिस्तादि मूल- गुणसर्वनो आप बीजम्प हे. एम मालिशपादि सर्व प पोतोनाना गुगना आकार , देवी धर्मास्तिकापने जावार ना कारक हो। एम कोई पहे. तेहने उत्तर. जे धर्मालिसपने मन्तवारी हे, पतु र्तृक नदी ते मारे काका न गवेयं. सदानने लत्तानो भाचार हे, सत्ता है आत्मानो मृत्य जे निरानप व्हनो आधार सुत- वडे ॥८॥ इति नाम गाथार्थः॥ आतम आतम का कार्य सिद्धता रे, ततु साधन जिनराज ॥ प्रनु दीठे प्रभु दीठे कारज चि उपजे रे, प्रगटे आत्मसमाज ॥ ओ०॥९॥ ज: हो उन कहे . जना स्वरूपातच, भवो- द्विस, मोज्ञान्तिपी, सन्पन गुल मगरे, जे स्वरूप कलाप विरतिर नव पान. नवलपतादिक्ने करने का हे. एरटे तत्वार्थी अमानो सदना सकलगुणगढ- ताप, निःकमान्य केहद मदन निर्जन सय जिनगड मज्ञ हे. प्रन पम्मामा ? पथार्य भारत ..

७५२ दे० चो० या० थाय, कार्यनी स्वसत्ता मागभावभोगीपगानी रुवि उपजे, ते रुचि संपूर्णसिद्धतान मुख्य कारण छे, ते रुचि वयती साय. नभाव, ध्यानावस्यावलंबीने पूर्णानंदता निपजाये, आत्मानो समाज केतां साम्राज्य प्रगडे, तेहयी मोसनो कर्ता आत्मा खरो पण मोक्षनी रुचि बिनान कर्तापणुं प्रगटे नहीं, अने वे रुचि श्रीअरिहंतदेवने दीठे निपजे, माटे श्रीअरिहन दर्शन, ते रुचिर्ने कारण छे, अने रुचि ते मोशन कारण छे, एवी रीतें मोक्षरूप कार्य- मूलकारण श्रीअरिहंतज छे, ते भाटे माहारे मोक्ष निपजे, एउपकार तत्वहितना करनार, श्रीअरिहंतनो जाणं ॥ ९॥ इति ।। वंदन वंदन नमन सेवन वली पूजना रे, स्मरण स्तवन वली ध्यान ॥ देवचंद्र देवचंद्र कीजें जगदीशनुं रे, प्रगटे पूर्ण निधान ।। ओ० ।। १० ।। अर्थ:-तेमाटे चंदन केतां कर जोडन, नमन केतां शीश नमाववारूप, सेवना ते आज्ञा मानवाम्प, बली पूजना ते पुष्पादिकनी, तथा स्मरण ने वारंवार गुणन संभार, स्तवन वचनें की गुणर्नु कथन, हर्पयी काय, तया ध्यान ते प्रमु. गणे वित्तनी एकाग्रतान करयं, एटला सर्व उपाय छे, ते सर्व देवचंद स्तुति कर्ना ने पोतने कले, ने वंदनादिक क. तथ्य की, श्री जगादानी मानी ने कम्ता सेय- कने प्रगट केना पा: ITT. ननगग, आत्म- शक्ति, पम्मानतात. ... श्रीजनगज परमामानी एकविंशति श्री नमिनाथजिन स्तवनं. सेवा करतां पोतानी पूर्णपरमात्मता निपजे, अविनाशी धन प्रकाश पामे, ए श्री मुनिसुव्रत देवाधि देवनो परम उपकार छे. ॥ १० ॥ इतिश्री मुनिसुवजिनस्तवनं संपूर्ण ॥ २० ॥ ॥अथ एकविंशति श्रीनमिनाथ जिनस्तवन। ॥पीछोलारीपाल, उमादाय राजवीरे। उ०॥प देशी॥ श्रीनमि जिनवर सेव. धनाधन उनम्यो रे॥१०॥ दिटां मिथ्या रोरव. भविकचित्तथी गम्यो रे।भ०॥ शुचि आवरणारीति ने, अभ्र वधे वडां रे ॥अ०॥ आतमपरिणति शुद्ध, नेवीज झवूकड़ा रे॥ते० १॥ अर्थ:-हवे एरवीगमा जिनराज परमोपकारी वेहना गुण स्तवे हे. उपगारमंपदाएं करीने श्री एकवीसमा नमि- जिनवर ते ननिनाम धापना ते दामादे जे नमणाईनो उत्कृष्ट भाव हे, तेमाटे ते श्रीनमिनाय जिन ले अपाती, मांदे पर केतां प्रधान वीरा. पनजानी. परमात्मा, वरूपभोगी, विदानंदधन, निर्विकारी देवने सोललई तथा तेनो योग मलबो, परहेज दुर्लभ हे । उन.२ ॥ इंदनं सहितं, समान कर- दुमरस कोटीणं ॥ तभो मलदो दुरहो, दो दित्यनाहम्म ॥१॥ माटे निहनि दमाद हे, ते मंगार- रक्रमा भनिन .. ननदमन जित- ...ना टी. श्री D .७५४ दे० चो० बा० जेम मेह चारे दिसायी चढी आवे, वेम मर्ने, वचनें, कायायें, अध्यात्मपरिणतिय श्रीनमिप्रभुनो बहुमान नमन गुणनी अद्भुतता एटले प्रभुयोग मल्यानी आश्चर्यता प्रगटी, ते मेह रूप जाणवी. वली मेह जेवार चारे तरफयी घटा करी उंचो आवे, तेबारे लोकना मनमा दुःकालनो भय होय ते जाय, तेम इहां श्री अरिहंत सेवनारूप मेघ जेबारे प्रगटे, तेबारे अनादि कालनो मिथ्यात्व रूप जे रोख केतां दुःकाल हतो, ते भविक जीवोना चितयी गम्पो केतां टली गयो, ए लाभ थयो. मेघने विपे जेम मोटा बादलां वषे, तेम ए प्रमुभक्तिरूप मेवने विपे शुचि केतां पवित्र, अविधिरहित, आशातनारहित, पुद्गल आशंसारहित, एवी भली आचरणा जीवने थाप, वेहीज अभपटल केतां यादलांना समूह वधे, केतां महोटा थाप, एटके रूपी वस्तुनें रूपी उपमा घटे. मेहमां बिजलीना झबकारा घणा होय, तेम इहां प्रभुसेवना करतां आपणा आत्मानी परिणति शुद्ध थाय, गुणी शुद्धतत्त्वीना सेवनने अनुयायी चाय, तेहीज विजलीना अबुका जाणा॥१॥ ॥ इति प्रथम गाथार्यः ॥ बाजे वायु सुवायु, ते पावन भावना रे ॥ते॥ इंद्रधनुष्य त्रिकयांग, ते भक्ति एकमना रे॥१०॥ निर्मल प्रभुम्नवघाप युध्वि?)नि घन गर्जना ज्यु॥ तृष्णा ग्रीष्मकाल, तापनी नजना ॥ना. २॥

एकविंशति श्री नमिनायजिन स्तवनं. ७५९ अर्थ:--मेहमां जेम वायु अनुकूल होय, तेम ए जिन- क्तिरुप मेहने विपे जिनगुणनी बहुमान सहित जे भावना नववी तेहीज मुवायु वाप छे. वदिमांत्रण रेखा युक्त इंद्रधनुष्य शोभाकारी होय, तेम हां मन, वचन, कायरूप ण योग ते भक्तिने विपे एक ना घया, ते इंद्रधनुष्य हे. जेम मेहमां गर्जना होय, तेम इहां निर्मल उज्ज्वल प्र- गुना गुण तेमनी ने स्तवना पनि शब्द तेहीज घन केतां हनी गर्जना जाणवी. मेहमी ग्रीम उष्णकाटना ताप टले, तेम इहां प्रभुसे- उनी तृष्णा पुल मुखनी पीपासानो जे अंतरंग ताप होय, ले एक आत्माने आत्ममुखनी ईहा पर जे तृप्यारूप नीम कालनो महाताप, ते मटे ।। २ ।। शुभ लेश्यानि आलि, ते वग पंक्ति वनी रे॥ते॥ श्रेणीतरोवर हंत, वसे शुचि गुण मुनि रे ॥३०॥ चौगति मारगबंध, भविक निज घर रखा रे॥म०॥ चेतन समता संग, रंगमें ऊमया रे ॥२०॥ अर्थ:-जेन मेहमां कारक्ति होप तेन इहां प्रगस्त एभरेदपा जे पारदपाना परिधान पहनी हेपानी मन सी . - जिननिता पने THE हर : धानास्ट थर जमा नया दे० चा बा० - जेम वर्षादयी चार दिशिना मार्ग बंध थाप, तेम इहां जिनभक्तिना योगें चार गतिनो मार्ग गंध थाप एटले साया मनयी जे प्रभुसेवन करे, वे चार गतिना ममणने टाले. यांकालें सर्वलोक पोताने घरै रहे. तेम इहां पण अना. दिनो उदत परभागामिलापी आत्मा ते अनेक विषय विकाररूप भावमा देतो हतो, तेने श्रीनिःकमदेवने निमिते रारूपनी प्राति थइ, घेतनरामताने संगे रंगे केनां रीझ करीने ऊमझो थको समतामां रमी रहे, स्यात्म सभावमां अनुमा रंगे रमी रहे ॥ ३ ॥ इति तृतीय गायार्थः ।। सम्यग्दृष्टि मोर, तिहां हरखे घणु रे ॥ति०॥ देसी अद्भुत रूप, परम जिनयर तणुं रे ॥१०॥ प्रमुगुणनो उपदेश, ते जलधारा यही रे ॥२॥ धर्मरचि चित्त भूमि, माह निश्चल रही रे ! अर्थ:--जिनतिरूप मेट देसीने गम्यम्साटि तथापि रूप मोर देहने अत्यंत हा आनंद अने, धातीयर देवन कर केह ? जो अन्यत पसलमा म देला मीने दिने, दोषय श्रीअरिहतना पगना अगुटा समान रंग की माके नहीं, पद पातर निकिग पामेमानस देगीत मन्यात जीव यांना मानी पहा आनंद पाने. पर श्रीनीयादा नन्नन र.

एकविंशति श्री ननिनापजिन स्तरनं. عا जलधारा धर्मतचि जीवना चित्तरूप भूमिकामा निश्चल रहे- एले तलवंत जीवना चित्तमां प्रभुना गुण समाइ रहे॥४॥ चातक श्रमण समूह, करे तव पारणो रे ॥०॥ अनुभव रत आस्वाद, सकल दुःख वारणो रे ॥त अशुभाचार निवारण, तुण अंकूरता रे ॥४०॥ विरति तणा परिणाम, ते वीजनी पूरता रे॥ते०५ अर्थ:-अभनेवनल्प जलधारा बरसतां श्रमण निर्म तस्वरमनी महामुनि तप जे चातक ते पार करे छे, एट सम्पगन कालें तत्वस्वल्पं पोताना अनुभवनी पीपाला य. हती, ते पीपाला श्रीजिनभक्तिरूप कारण पामीने आत्मस्त रूपन चार्य ज्ञान ते रूप अनुभव वेहना रसवें आस्वाद देतां भोगावा ते रूप पार करे, पण ए पार कहे: । सकल सांसारिक विभाव ले कभार उमता गुणा बरमतादिक तेनो वारणो केतां वारणहार हे, एले तत्पर सर्ग निवारा करे हे. हले कोका नीलां तृण जगे. म जिनभक्तिरूप मेह मांहे पग अनुभाचार निवारण थयु, ए तृमना नौला अंक का ६ नोक काका कावे. तेन इह अन रे जोजन पृता ।। - ॥

-७५६ दे० चो० बा० पंच महानत धान्य, तणां कर्पण वध्यां रेता साध्यभाव निजथापी, साधनतायेंसध्या रेसा॥ क्षायिक दरिसण ज्ञान, चरणगुण उपना रे ॥च आदिक बहुगुणसस्य,आतम घरनीपना रे॥आ॥ अर्थः-वर्षाकालमां ने वीज वाव्यां होय, ते उगीने वघे, हां द्रव्य तथा भावी पांच महावत "सबाओ पाणाइवापाओ रमणं " इत्यादिक धान्य ऊगीने उत्सर्गावलंबी महावत ते नरतिचार 'थया, तेहीज ध्याननां कर्षण वृद्धि पाम्यां, पण व्यभाव केतां साव्यप निज केतां पोतानो आत्मभाव ते व्यपणे थापीने साधन कार्य निपजावधानी शक्ति, वेपणे व्या, एटले साधनरूप थया, भावार्य जे आत्मानी सत्ता पूर्ण प्रागभाव करवी एहवो साध्य धारीने, महावत परिण- रूप साधनायें परिणम्या, क्षायिकनिरावरण, संपूर्ण केवल ज्ञान, वलं दर्शन, यथाख्यात चारित्र प्रमुख गुण अपना प्रगट पा. इत्यादिक स्वगुणनी अनंतता व्हीज सस्य केतां धान्य जे आत्मा जिनसेवनमयी ययो हतो, वेहना घरे नीपना, मिप्रदेशसर्व ज्ञान, दर्शन, चारित्रनी पूर्णता पाम्या ॥६॥ भुदरिसण महा मेह, तणे प्रवेशमें रे॥०॥ रमानंद सुभक्ष थयो, मुझ देशमें रे ॥२०॥ बचंद्र जिनचंद्र, तणो अनुभव करो रे ॥त०॥ दि अनंता काल आतममुख अनुसरो रे॥आon७॥

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३. यो पार
अहोगा भीगनी गति पर है.
गांगमान, मारी, पानि मिला।
सिविल गोनपा , ni गा.
गावोनी हामो नाममा
निमाया पानी rimint
HIT नी, PHTft कि गंगा गाय
माt, ३.६ जनाम, जागा,
अगर, नान, नाम, माना गोग,
T, HAM, 1 जग | Sim.
vie71111FिTIMIT
Fort, fa.nitin1, नाtita:T, En
4.1, rator , it 1 !!
मिटन, 11 1201
भनि प्राट the
अपन दि
गडटनागोगा, जो
अवठा ना।

द्वाविंश श्री नेमिनाथजिन स्तवनं. ७६१ . लंन्या एटले भरिपणानो अशुद्ध राग टाली देवतस्वने रागें आदर्या, एम विचार्य ने उत्तमने संगें उत्तमता वधे, एटले चारित्रवंत सर्वज्ञ श्रीनमीश्वर भगवान् ते सर्वोत्तम छे तो एना संगयी महारी पण उत्तमता एटले सिद्धता पूर्णात्मता बवे, वली सचे तां नीपजे. आनंद केतां आत्यंतिक, ऐका- तिक, निद्र, निरामय सुख थाय, तेमाटे तेहीज करवू घटे, एम सर्व भन्य जीवोयें विचार ॥ २ ॥ इति द्वितीयगाथार्थः ।। धर्म अधर्म आकाश अचेतना, ते विजाति अग्राह्यो जी ॥ पुद्गल ग्रहवे रे कर्मकलंकता, वाधे वाधक वाह्यो जी । ने० ॥३॥ अर्थः-हवे राजीमतीय जे विचार्य, ते कहे छे. सर्व- लोकमां पंचास्तिकाय छे, अने काल ते ठती रूपें द्रव्य नयी, श्रीभाष्यकार तथा अनुयोगद्वारसूत्र जोतां उपचारद्रव्य छे वली पंचास्तिकायमा धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय अने आकाशास्ति- काय, ए प्रण द्रव्य अचेतन छे, नया विजाति छे. वली जीवद्रव्यनी ए जाति नहीं, अयादा हे, ते अपरिणामीपणा तथा अचलपणा माटे जोब ग्रहबाप नहीं. तेमाटे एहयी पण माहरे काम : 17 : माय चिरकालनो परिचय के. जयने ग्रहवे आत्म ने नश अने, वन नादि गुणनी विपयामता व :: पहलने लेना - , : करहिन थाय, । - दे० यो पा० अनंनो काल चपो, पण आत्मदिन पर्थ नहीं, मारे ५ पहलमा संगची पागामीडयो, मारे उत्तम जी, गहने दो मही, एम रागीवाणु, जे पुणे पण ग्रह नरी पना पास नो अगता जी निगोमा पा ॥३॥ इति शीपणावायः॥ रागीरांग रे रागदशा यो, था निण गंगागजी ॥ नीगगीथी रे गगनं जोर, लाहि भाना पारी जी ॥ ॥ ४ ॥ भोपा जी ने मामा, rh जाति , माद तेहने पी गmafim Arm प्र पढमा पण दीटो, ने का, तो ग गान, है, मा! नहनी गो Amit पण राग दाना, अने नो अभिनत अताना आगम होना मनमा दरता दोग, सीमा मनिका " मन मनन ?mt, !, AT पmean.. Mri, .: 22 .

द्वाविंश श्री नेमिनायजिन स्तवनं. अप्रशस्तता रे टाली प्रशस्तता, करतां आप्रव नाते जी ॥ संबर बाधे रे साधे निर्जरा, आतमभाव प्रकासे जी । ने०॥५॥ सर्द:-ते नाले कामरूप ले अमशस्त राग हतो, ते बर्ग परिहंतकतारूप प्रशस्त राग कालो, गुनी उपर राग ते प्रशस्त हे, ते सावनत काननो हे ते प्रशस्त राग करतां अदक आभा नाश पाने, नवा कर्म चाप अब परि- पति से बनी प्रशस्तरागी जीव, गुनाने अवलंम्पो रहे, देहवी खननी एकत्वता वथे, ते स्वगुण एकत्वता परिया- मयी संबपरिणति बने, अने पूर्वकृत कर्मनी निर्जरा परीता- कल्पते पर सजे देतां नोपजे, हे संवरनिर्जराने प्रगचे जानानो भावयन, अनीशक्ति प्रकाश पाने, निराकरण थाप ॥५॥ इति पंचम गाथार्थः । नेमिप्रभुभ्याने रे एकत्वता, निजतत्त्रे एक तानो जी ॥ शुक्लध्याने रे साधि सुसिद्धता, लहिये मुक्ति निदानो जी ॥ ने० ॥६॥ - अर्थ-राजीमीजी एम विचाराने श्रीनेमिपरमेश्वरनेज अबलया केमके ननिप्रभुने त्याने एकवता नन्मय करके का निज वा पोताना नवं आमन्वय एक्तान केनां " -- दे० चो० वा. एकत्वपणं नीपजे, ते जेवारे स्वरूपें एकत्यप पामे, तेवरे शुक्लच्यान प्रगटे जे स्वरूप एकत्यपणुं तेहीज शुरुध्यान छे, ते शुक्लथ्याने करी पोतानी साव्यता साधी केतां नीपजावाने तेहयी मुक्ति जे सकलकर्मरहीतपयुं तेह निदान केतां मूर कारण लहीये, केतां पामीर्य ॥ ६॥ अगम अरूपी रे अलख अगोचरु, परमातम परमीशो जी॥ देवचंद्र जिनवरनी सेवना, करतां वाधे जगीशो जी ॥ ने०॥७॥ अ:-तेमाटे सर्व भव्य आत्मायौं अध्यात्म सुखरुचि एहयु तत्व सेवे, ते कदे छे. अगम केनां जेहन गम्य नहीं, अथवा जेमांदे अजाण जीवयी प्रवेश थाय नहीं, यही जेहा रूप, गंध, वर्ण, रस, संस्थान नहीं, तेमाटे अरूपी, तया अटर केतां पुद्गलामिलापी, एकांतवादी, एका नव्यापिक, वैदानिक गांस्य ममासिक, वशेषिक, यो नास्तिक, तथा ने एकांत द्रपदयादिक पक्षग्राही एवा जैनलिंगी इत्यादिकयी सरवाय नहीं, एटले ओलखाय नहीं, यही अगोयर येतां इंद्रियगोपर नहीं, अाद्रिय पदार्य ते अतीदिपस्याद्वादज्ञाने सापेक्ष उप- योगें व्याननी धाग्यायज गोचर है, यही परमोत्कृष्ट सा विभाग रदित अनंत गुणप्रागभावरूप आमा छ, यही पानीश देता स्कृष्ट अविनाशी महज अनंतगुण पाय धर्मनार थे, पर्ड नरदेव ने चावत', भावदेव ने भानपनि, स्पनर, ज्यो. निणी, बमानिक, ? निशाना दाता. नया देर वे अयोविंश श्री पार्थनापजिन स्तवनं. मुनिराज जिनकली स्थविरकलीपरिहारविसुद्धि, पडिमापडिकन, . मतपतपी. उनांतमोही झीगमोही आत्यापः श्रतवर, पूर्वधर, आचार्य, गलयर प्रमुख के धर्मदेव. ते सर्व मन्ये चंदना समान नापर, शासनना पति, मार्गदेशक, एहवा ने जिनवर वेहनी सेवना आज्ञा मानवाल्प करतां यां वाचे केतां वृद्धि पामे, सायसंपदा, तथा सितारूप संपदा, तेही श्रीतीर्थकर तीर्थ- पनिनी वना के पाम मचान हे. पण वंदन नमनादिक ने भावी गुणन बहुमान. आज्ञाप्रमाणता रूप सेवा करता अनंता सिद्ध धया. वर्ग अनंता सिद्ध पदो, एडीज मोक्ष- मुखनो आप हे॥७॥ इनिनेनिनायजिनस्तान ॥२२॥ ॥अथ त्रयोविंश श्रीपार्श्वनाथजिनस्तवन।। 1! कदम्बानी देगी। सहजगुण आगरी स्वामी सुखसागरी, ज्ञानवपरागर प्रनु सबायो । शुद्धता एकता तीक्ष्णतानावधी, मोहरिपु जिति जय पाहायो॥१॥ -बार अपनी पानेशानी कन्कार न रहे, ७६६ दे० चो० बा. - स्वाधीन, निरामय, निःप्रयास, अविनाशी सुख तेना समुद्र छे, निःसंग सुखना पात्र छे, केवलज्ञानरूप वयर केतां वन वे हीरो वेहना आगर छे, सदा सर्वदा प्रभु तमें साया छो, ए श्रीपार्श्वनाथ स्वामीनी शुद्धता, ज्ञाननी यथार्यता, निर्मलता, एकता, ते चारित्रनी स्वरूप तन्मयता. तीक्ष्णता, ते वीर्यनी तीव्रता, वीर्यनी तीक्ष्णता ते धारा छे, अने चारित्रनी एकता ते पुंठलयी प्रेरणा छे, तथा ज्ञान ते प्रकाश देखाडण हार छे, ते माटे ए मलेज मोक्ष छे. कोइ कहेशे जे सम्यग्दर्शन का न कयुं ? तेहने उत्तर. जे ज्ञान ते दर्शन युक्तनेज कहे छे. एटले ज्ञानमध्ये दर्शननु एकप छे, तथा तप ते वीर्यनी तीक्ष्णता कही छे, उक्तं च आवश्यकनियुक्ती ॥ नाणं पयासगं सोहगो उ तवो संयमो उ गुतिकरो ॥ तिण्हवि समाओगो, मोरको जिणसासणे भणिजो ॥१॥ एटले शुद्धता, एकता, तीक्ष्णतायी मोहरिपुने जीतीने अर्थात् ज्ञान, चारित्र, तथा तपना बलें मोहादिक कर्मने हणीने, जयनो पडहो बजान्यो ॥१॥ इति प्रथम गाथार्यः । वस्तु निजभाव अविभास निकलंकता, परिणति वृत्तिता करी अभेदें । भाव तादात्म्यता शक्तिउल्लासथी, संतति योगनें तुं उच्छेदे ।। स० ॥२॥ अथ ये अदनादिकनु स्वरूप कहे छे. वस्तु जे जीवादिक 3 अन्य, तहना जे निज केतां पोताना भाव ते गणपयायस्य उत्पाद, यय परिणतिनो अविभास केतां जा. .

बोरिंग श्री पार्थनायजिन लवन. ७६७ प. ते पर निकलंक एटले एकांतता अपयार्यता तता अधिकता रहित सम्परज्ञान ने उड़ा कई, तपा परि- पति ने जीवनो राक्ष मुल परिणाम ते सम्पने विषे एक- सप पाभावमां ने नहीं, ए आमानी परिणति हे. अने संसारी जीवन विभाग रंगीने हे मुह परिणति तो पारिन मोहनी आत्त हे, हे करीने ति सति ते रागी देपी पुलभोगीप प्रति रही हे, ते प्रहनि तीने इंद स्वरुपपर भनी करि, प्रति नथ परिणत हुन एकज प्रवर्तन भई ने परिणति हांज प्राति नहीं, पर औपा- विक प्रतिनो संग पग दो नयी. हे मारे परिणति त्या प्रति देहु एकपने अभ करी देने एकता वही. वडी भारताशान्यता भक्ति केनां ने निभान जपता केतां तत्पतिसंवचे हे, ज्ञानावरणादि पुल कर्म के संयोग संचे हे, जने शुक्मादिक वीपांदिक सगुण तादात्म्यसब हे, ते ताहान्य मंचती के आत्मिक शक्ति ज्ञाविवपिना उत्साली ते आत्मा संततियोगमां संतति केतां परंपरानो ले संपोगक संबंव देहने उन्ठेने, एक ज्ञानावरगादे क- भनी प्रकृति, स्थिति, रस. प्रदेशको वंश, देहा स्थिति प्रमाने रहेछ हे, एके ले कर्नने आननदेश सय वर ते आ- स्पातो काल वृशे सिर शेजोडी मागगेनो के. परंतु एवंद भोगनां मंशा स्थितिय सिमवाय हे, व ते भोगना प्रनिम्मद अके. एक ." हे. पन्नु अग्निदारे अन.. की पुर, पुत्र , पो रेनो उ र नो पोताना

दे० चो० घा०
-1-
आयुष्य प्रमाणे परते, परंतु संताननी परंपरा अनंनी च.
तेम तेनां तेहीज कर्म तो स्थिति प्रमाणे रहे, परंतु पूर्व
मैने भोगावे, मानो थाय, तेहने भोगावे, यही पी
नवानो चंच, एम संताननी परंपरा ए अनादिनो छे.
संततियोग आगीपम्प वीणता चले हे परमेयर !
उच्छेदे केतां सर्वया उच्छेद करे, एले जान, दर्शन, चालि
वीर्यना, बलें अनादि कर्मसंबंधने तुगे विनाश कपों एशा
ममुजी सुमागमांज छे, यीजामां नहीं, प कार्य तम यां
निरावरण थया ॥ १ ॥ इति द्वितीय गाथार्यः ।।
दोप गुण वस्तुनी लखीय यथार्थता,
लही उदासीनता अपरभावें ॥
ध्वंसि तजन्यता भायकापणं,
परम प्रमु तुं रम्यो निज स्वभा mir
अर्थ:-हो वही पर गदना, पाता, ना
कोनो अांतर केले. यानु ले ग, न, गनिना, नि,
आतर, विपादि, नेना टोप ने अगम यांना या
ते गुवांशिक, नहने ना के पी पी
अगुभदोष दिन वस्तुने अगभग गुम.
मन वानुन शुभ , जट या mmतर
दातुने तनाm, पया पर cim
स्टता कई माने र नि
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अयोविंश श्री पार्थनाथ जिन स्तवनं. ७६९ पोतानो आत्मा अस्पातमदेशीहने विपे व्याप्यन्यापक- भावें रखा ले गुणपर्याय, तेही अपर भाव केतां अन्यभा- बने एटले वीजा अन्य केतां जुना जे अनंता जीव तया अनंता पुद्गतादिक अजीव पदार्थ, ते सर्वथी उदासपणे स- वना अनाहक, अभोगी, असंगी धया, ए सर्व चारित्र परि- णतिने एकता कहिये अने वंसी केतां उच्छेदीने तजन्यता- भाचे जे विभावक पशु नेहने छेदीने छेदकता शक्ति ते तीक्ष्णता जाणवी. ए कार्य करते हे प्रभुजी ! तुं निज केतां पोताने स्वभावें म्यो, आत्मस्वभावरमगी थयो ॥३॥ इति तृतीय गाथार्थः ॥ शुभ अशुभ भाव अविभास तहकीकता, शुभ अशुभ भाव तिहां प्रभु न कीर्छ । गुद्धपरिणामता वीर्यकर्ता थइ, परम अक्रियता अमृत पीधुं स०॥४॥ अर्थः--वली एहीज निभंगीनो अर्थातर कहे छे. शुभ केतां प्रशस्त अशुभ केनां अप्रशस्त जे भाव. तेहनी जे अविभाग केतां ओलखाण, तहकिकता केतां तेहने निर्धारे ते शुद्धतापगे ए सर्व तमे जाण्युं परंतु हे परमेश्वरं ! तुमें तिहां गगीद्वेपीपणे शुभअशुभ भाव पग कयों नहीं, पहीज एकता. चारित्र धमनी अगा. अपी. परिणति ते एकता गुद्ध निगवण परिगामन' ते पारिणामिकभावे जे वीर्यगण, हना कला पाने पडे गगपने अनुयायीपणे वानी वि है. है मगध हिनपरे यदे, वीर्य शुद्ध

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अयोनि श्री पानाधजिन स्तन. ७७१. . नजतो, पोताना आनाने तत्वारिणतिमन्ने तन्मयता पमाडतो पछी ज्ञानदंज रमा, ज्ञाननोज नियार, एके पर्यापमेदै ते मूलगर्ने एकच पने, ए अनेकानपीनं स्वरूप, स्पानिगम्प हे. परंतु मूलन आत्मा ज्ञान, दर्शन, एके गुणे सहित हे, पहली अन्ना है. और निवारयिताएं सर्व चेतना गुणनी प्रति छे. तेनारे ए ज्ञानमाहेज स्थिरवारिणति ते अनेदता की. प्रथम सपोरमानी चल्वीनाएं चेतनापिनी प्रति अपनी हती. में भागनाति पछी में करण कार्यमा विकारिणतिर हती. सी.मोहका रोचकने सरे समकाल अमनपसनी मति . ते केवजान थपे निराकरणता एक्सननी यह, एर्ने अनेद की दाप . ए श्री भा- पपनी समजवी ॥५॥ ." उपनाम रस भरी सर्व जन शंकरी, मृति जिनराजनी आज भेटी ॥ कारण कार्दनिप्पत्ति श्रद्धान छे, तेणे भवनमनी भीड नेटो ॥१०॥ अ:- म सानो अभाव. तेहनं भरी भने मन बने इस क्षेत्र कच-नी बगदारी पहाडी .

दे यो प्रार
कारणने माटो, जाई, जे कारणना से कार्यनो ऐन,
मादे कारण पले कार्यनी निष्पति थो, पागे मागम
भग्यतागोत उपयोग भयो. तेहगी जापजे परमपुरुषोत्तम
देर श्री यीनरागनी इप-11 जो उगी, तो कोई दिए
आमा गुणी पनार हो, ए अनमान जाग्यो जे काम
at का विपनदो जो भाममाण पण शहराया
है, भरमगनी मी मटी, g कारण कार्योपगारी मन
एम भावना मी. जो ममता ममता लगे,
'मा मिना वा ॥ ६॥ इति परमागायः ।।
नपर भायने पानीप्रनु दर्शनें,
रिकगत हर्ष उगाह वाया ।।
हेतु पकायता म परिणामयी,
मिटि गाधकरणामा मायांगा
हा माय श्रीलनामा
धिरन बन पाताप्रभुनी म त
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याविश श्री पार्श्वनायजिन स्तवनं. जे आज केतां ले दिवसे प्रभुने भेट्यो, ते दिवसें माहरु सिदिसाधकपणे सध्यं ॥ ७ ॥ इति सप्तम गाथार्थः ।। आज कृतपुण्य धन्य दीह साहरो थयो, आज नर जन्म में सफल भाव्यो॥ देवचंद्र स्वामी ग्रेवीशमो वंदीयो, भक्तिभर चित्त तुझा गुण रमाव्यो।स०॥८॥ अर्थ:-आज जे वेलायें अनुष्टानादिक दोष रहित आत्मा प्रभुभक्तं परिणम्यो, ते दिवस कृतपुण्य केतां पुण्योदय थयो, ए दिन धन्य थयो, ए दिने जिनभक्ति रत्त अध्यवसाय थवे ए नर जन्म सफलपणे विचायो जे माहरो ए जन्म सफल हे, जे में नीरागी, निस्पृही, परमगुणी, सर्वज्ञ, सर्वदशी देव, श्रीपार्श्वनाथस्वामी ग्रेवीशमा तीर्थकर तेने भेट्यो, बांद्यो, स्तन्यो, • अने तेहनी भक्तिभरने विपे चित्त केतां मन रमायुं एटले पुगलरमणता तजी, श्रीअरिहंतगुणनी रमणताएं मन रमायुं तेहीज दिन कृतार्य कृतपुण्य सफल मानवो, ए दिन लेखानो जा- णवो, सर्व देवमांहे चंद्रमा समान अथवा स्तुतिकर्ता जे देव- चंद्र ते एहबो टाभ पाम्यो ॥८॥ इति श्रीपार्श्वनाथजिन स्तवनं ॥

॥अथ चतुर्विश श्रीमहावीरजिन स्तवने। ॥ बाल कहानी देशी गाले।। नार हो सार प्रभु मुझ संयक भणी, जगतमा पटलं गुजश लीगे। दाम अपगुण भस्या जाणी पोतातणी, दयानिधि दीनपर दया कीजें ॥ता॥१॥ अगं - कांदा आगी श्री जिनागमना अपांग Pण नानागादि आग आत पोनानी अनं। अाम- शनि, जानने अनादि पाभागानुर्गगता दोन न. fa सामान बोनानी साधाना शक्ति को पानिपोमा गमान मादाममा श्रीनाथना गण मन भी नसनी आमट माना गरिन, नितिनजनाल ना अगिहना गम देने माल मामी नाम ना.. 7gn forem!!! रापरेmagमम mmat या?", FREETari krism, HER. Trammar, Famire . , + Irrent 144 चतुर्वेिश श्री माहावीरजिन स्तवनं. ७७५ - " दरिद्री, मार्गनो विराधक, असंपमसंचारी, महाविकारी, तमारी आज्ञाची विमुख, अनादिनो उद्धत, एहवा मुज ऊपर दया करीजें ताहरी कृपा तेहीज वाण (शरण) घशे. यद्यपि अरि- हंत तो कृपावंतज है, तो कृपा शी करवी छे ? तो पण भी विचार नहीं माटे अर्थीनु ए वचन छे, जे दयावंतनेज एम कहेवाय छे, जे हे देव ! तमें दयाना भंडार छो, तमनेंज अवलंबे तरीश, एज सत्प छे॥१॥ इति प्रथम० ॥ रागहेपें भस्यो मोह वैरी नडयो, लोकनी रीतमां घणुए रातो ॥ क्रोधवश धमधम्यो शुद्धगुण नवि रम्यो, भन्यो भवमाहे हुं विषय मातो ॥ ता०॥२॥ अर्थः-दास कद्देवो छे, राग भयो, जगन्मां पञ्यो, गुणीयी ईध्या करे छे, मोह ने मुंजितपणं ते तत्त्वनी अजा. पता विपर्यासना, हेतुयें मोहवेरी नड्यो तेयी दवाणो छ, तथा लोकनी ले रीत केतां चाल तेमांहे घणोज मातो के. लोकनी चाल मांहे मग्न हे, लोकरंजननो अर्यो हो, कोध ने ताता चंडपरिणाम तेहने विषे धमधमी रयो छे, जेम धमण धमतां अनि तपे, तेम तपी रह्यो छे, शुद्ध गुण जे सम्यग्दर्शन, सम्पज्ञान, शुद्धचारित्र, क्षमा. माईव. आजवादि आत्मगुग, तेने विषे म्यो नहीं. तन्मयो न थयो. ते रूप न ग्रहो. वली भम्पो चतुर्गतिरूप भवचनमाहे व्य, भव. काल, भावरूप समार तेने विष हुँ विषय से पचेद्रियना स्वाद. तेमांद्दे मातो केला मग्न थयो. विषयग्रस्त धयो धको एम मगाग्वत्र अनु. २३३ - - .

चौर मा. भागते हो मुगने नार मा गाय ! दीन! नि:- गा दयाल । मज ना मादागी उगार ॥२॥ आदएं आगरण लोक उपनारथी, शापाभ्यारा पण काद कीधी । शुल श्रमान यली आरमअवलंनपिनु. नहत कार्य गणे कोन सीधी । सा॥३॥ अ.कदाचिन मोड पदे जे आया आT आदर्ग भी हार गर्ग, पानसे मां लोनी पटो नया गाना अपोगानुमानगी माना frना in amar Pा पोइन गोर पर १. कमानी Teti mi imminाय मागा, माना Tri ना ना मान! miगाना . माग , पान 7 मा भy " मदानी प्रदान it KATA TEET, writ 7 matrut, it प्र. :: UThm R... imagrat . १ चतुविश श्री महावीरजिन स्तवनं. ७७७ स्वामिदर्शन समो निमित्त लही निर्मलो, जो उपादान ए शुचि न थाशे ॥ दोप को यस्तुनो अहवा उद्यम तणो. स्वामिसेवासही निकट लाशे ॥ता० ॥१॥ अर्थ:-स्वामी श्रीवीतराग जे परकार्पना अकर्ता, पर- भावादिना अभोक्ता इन्छा, लीला, चपलता रहित एटले ले हा तो जगतावंतने हे, अनेले परमेश्वर तेनो पूर्णसुखी हे: तेमाडे इच्छारहिन, बी टीला पण सुखनी तालवालाने होय, अने टाल्वीपर नी, एहवा स्थानीना दर्शन समान निर्मल निमित्त सही केला पामीने जो ए आत्मानं उपादान मूतपरिणति ते मुवि केतां पवित्र नहीं चाहो तो जाती उइ ले वन्तु जे जीव, हनोज दोष फेतां अवगुण हे, एडे रखे ए जीवनो दल अपोन्प होप ! ए जीवनी सना देवी रीतनी है ? अथवा पोताना उद्यमनी खामी हे देनके आकरे प्रदरे उदम वरी आमान समारो जोह, ते ए जीव पोतानी जमादा आन्माने समारतो नदी, तेमाडे हवे का? ने दीजो उजाप को नर्ग, तो श्रीअरिहंतनी सेवा हीज नि निकट केलांनीश्वासाने केला पमा एट ए साना हा है, परंतु बौजिनगजनी सेवनार्ग हप्ता नडले ॥४॥ स्वामिगुण ओलखी वामाने जे भजे. दन शुल्गना नेह पाने ।।

७७८ .दे० चौ. मा० ज्ञान चारित्र तप वीर्य उहासंधी, कर्म झीपी वसे मुक्तिधामें ॥ ता०॥५॥ अर्थ:-स्वामी जे श्रीअरिहंत, तेहना गुणने ओलसीने जे प्राणी श्रीअरिहनने भजे, केता सेये, ते दर्शन केतां सम कितरूप गुण पामे, ज्ञान दर्शननी निर्मलता पामे, ज्ञान ते ययायभासन, चारित्र ते स्वरुप रमण, तप ते तत्यएकाग्रता वीर्य ते आत्मसामयं, तेहना उल्लासी केतां उन्लसोयी ज्ञानावरणादिकर्मने झीपीने यसे केतां रहे, मुक्ति केता मोह निरावरण संपूर्ण सिद्धताप धागे केतां थानक यगे ॥५॥ इति पंचम गाथार्थः ॥ जगत वत्सल महावीर जिनवर सुणी, चित्त प्रभु चरणने शरण वास्यो ।। तारजो वापजी विम्द निज रावया, दासनी सेवना रखे जोशो ॥ना०॥ ६ ॥ अर्थः-जगत्रपाल केनां जगत्रपना धर्मदिन हवा महावीर श्रीयोवीशमा जिनार, तेहने गुणी येतां गांभ: लिने वित केनां मन ने प्रभने पणने आगो वाम्पो येती बमात्यो, ते मार हे प्रम पामेर। मागे जामा नो पर. टीने मसाधन कर, पटी शनि देगाती नी माटे भद्रा मत्तिएं कद है नाताई दीनओ। मज दामने तुमें नारनो, तमा न विन्द गगरा माट नाम से "Riमरे .r चतुर्विदा श्री महावीरजिन स्तवनं. ७९ - " .. विनति मानजो शक्ति ए आपजी, भावस्याद्वादता शुद्ध भासे ॥ साधी साधक दशा सिद्धता अनुभवो, देवचंद्र विमल प्रभुता प्रकाशे ता०॥ ७ ॥ अर्थ:-माहर्ग एटली तिनति मानजो, ए पण भद्रकप- णार्या भक्तिवें वचन छ, जे शक्ति सामर्थ्य एवी आपजो, ते कहे हे, जे भाव वनां यग्नुधर्म से स्याद्वादरीतें नित्य, अनित्य, अनेक, अस्ति, नास्ति, भेद, अभेदपणे छ द्रव्यना अनंता धर्म शुद्ध, शंकादिक दषण रहिन भासे, केतां जाणप- णामध्ये आवे. साधि केतां नीपजावीने साधकदशा ते भेदर- तवयी, सिद्धता, निष्पन्नता, अनुभवे, केतां भोगवे, सर्वदेवमांहे चंद्रमा समान सिद्ध भगवान् तेहनी विमल केना निर्मल ने प्रभुता, ते प्रकासे केतां प्रगट करे, ए-ले स्यादाद ज्ञाने साधकता प्रगटे. सायकनाथी सिद्धना प्रगटे, एहीज सारपद्धति छे ॥७॥ एटले ए चोवी मान धया. पोताना जाणपणाप्रमाणे परमेश्वग्ना गुण प्रामे नाना 4. तेमाहे जे पधार्य ते प्रमाग. जो अत्यानि मिमि . "नाय गुण लेवो, दोष नजको. ... कन् का है. महोटा पु क्षमा राम्वं गुण । ?'नालिन स्तवनम् ।।२४।। 1 - दे० चौ. मा ॥ अथ सामान्यकालरूप पंचविंशतितम स्तवनं ॥ ॥ काल बोलयानी देशीमा । चोवीशे जिनगुण गाईये, ध्याईयें तत्वस्वरूपो जी॥ परमानंद पद पाईये, अक्षय ज्ञान अनूपो जी ॥ चो० ॥१॥ अर्थ:-श्रीऋषभदेवया मांडीने महावीर पर्यंत आम- रिपणी कालें शासनना नायक गुणरनाकर, महामाहण, महा गोप, महविद्य, एहया चोवीश नीकर पया, तेहने गाइ केतां गुणग्राम करीये, अने पोताना नत्यवसाने पापीयें तेदने व्यारे, तत्पनी एकाग्रता पामीये, तेहयी परमानं* विनाशीफ्ट पार्माज. यी अक्षय, अविनाशी, एह भाविक शान वे अप आमुन पामीजें ॥१॥ इति प्रथम गाया। चौहदसें वारन मला, गणधर गुणभंडागे जी ॥ समतामयी साधु साधुणी, सावय श्राविका सारा जी ॥ चो० ॥२॥ को मनाना (१४५२ ) भला गाना - manan ring सामान्यकलशप स्तन. ७८१ सानी, अने धारक, प्राविका सार केतां प्रधान धर्मना घोरी, सम्पगदर्शन, ज्ञान, शारिननां पात्र, ए प्रकारनो संव ते सहित गायत्रो ॥२॥ इति द्वितीय गाथार्यः ।। वईमान जिनवरतणो, शासन अति सुखकारो जो ॥ वाविह संघ विराजता. दुःपमकाल आधारो जी ॥ चो० ॥३॥ अर्थः था हनयां श्रीवर्धनान महावीर स्वामी शा- सन अत्यंत सुरखनु कारक हे. ए सासनमांहे ले पेटा, ते जीव संसारनो पार पाने, नया दुनम काल पांचमा आरामने भन्यजीवने आधारमत अनुचि व विराजे हे, वर्तमानकालें नयतत्व पम्पनी सोलखा थाप, निष्पाय अपमनो जेया जात आहे, ते उजगार श्रीरसभुना मासननो हे, ते श्रीधारनांत आगम हे ।।३।। जिनसंवनधी ज्ञानता. लहे हिताहित वोधो जी॥ अहित त्याग हित आदरे. संयम तपनी शोधा जी॥ चो०॥४॥ अमः- निदनान काम करने अनुमान AAR- - ७८२ दे० चौ० या० अहितनो त्याग करे, तया हितने आदरे तेहयी संपम तंपनी शोध केतां गुजता थाय ॥४॥ अभिनव कर्म अग्रहणता जीर्णकर्म अभायो जी॥ निःकर्मीने अवाधता, अवेदन अनाकुल भावो जी ॥चो०॥ ५॥ अर्थः---संयम तपनी शुद्धता थवायी नयां कर्मनी अग्र: हणता थाय. एटले नवां कर्म न बांबे, अने जीर्ण केतां जूनां कर्मनो अभाव थाय, एटले पूर्वपंच सत्तागत कर्म निर्जरे अने नवानो बंध नहीं थाप, तया मलगां सत्तागत क्षय जाय तेवारें आत्मा निःकमी केतां सर्वकर्मरहित थाय, अपायता केतां आधा रहित थाय, ने बाधा ते आत्मप्रदेशे पुगलना संगनी छे, पुद्गलसंग टले, बाधा मटी गइ, तेबारें आत्मा अ. वेदन अनाकुलपशु पाम्यो ने आकुलता परोपाधिनी हती ते गइ ते सर्वप्रभुभक्तिनो उपगार जाणयो माटे चोवीशे जिनने रतवीएं एहीज सार छे॥५॥ इनि पत्रम गापार्थः । भावरोगना विमगथी, अचल अक्षय निरायाधी जी ॥ पूर्णानंददशा लही, विलसे सिद्ध ममाधी जी ॥ चो० ॥६॥ नय... भाग 1 पगन्यायापण तेहनो विगम ७.३ केतां सर्वी रत्वे करीने अनट केतां रस्ता रहित अक्षय केतां अविनाशीप निरानाथ केतां अपराध पद मगरे, ते सर्व मूल का जिनाज भी वीतराग देवया सेवना भार स्वे, अन्य तथा भावी प्रगडे, माडे तेवना की एहाज हित हे, पूर्णानंद परमानंद अनंत गुणना भोगल्प स्वसि- दता दशा ही केतां पानीने बिटले केनां अनुमरे, सिद्ध- निष्पन्न पनिधिताई आनिक समाधि, ज्ञानदान समाधि, जयावावानंदसमावि भोगने, पाने, ए श्री जिनेयाना सेवनन फर एहोज परम निर्वापसदनी मानि हे, ते सर्व विकल्प कल्पना निवारीने, सर्वज्ञ सर्वदी जलवी परनेघर निर्वि- शरी देव देवन ने एहीज परमसुखनु पृष्ट कारण हे॥६॥ श्रीजिनचंद्रनी लेवना, प्रगटे पुण्य प्रधानो जी॥ सुमति सागर अति उल्लसे, साधु रंग प्रभु ध्यानो जी ॥ चो० ॥७॥ अर्थ:-श्री दिन अरिहंत देव हनी सेवना करता पुप प्रधान प्रग भने श्रे ननति ने परमानंद सावकाति उन्लो देतां उसात पाने अने मभुने स्पाने साथ केतां भलो रंग पाप. बीन अर्थ अजिनदार भट्टारक श्री सतर गटायर्यावर टेहना शीद श्रीवानोपान्याप, तेहना शिव श्रीनुमति सागवान्याय. हना रिच श्रीमा- बुंगवाचक, ए म्नति स्नान पवमा ३६.१ या नेहनां नाम रझा ॥ ॥ उनि मनाई दे० चो० था. सुविहित खरतर गच्छवरू, राजसार उवझायो जी ॥ ज्ञानधर्म पाठक तणो, शिप्य सुजस सुखदायो जी॥ चो० ॥८॥ अर्थ-सुविहित कहेता पंचांगी प्रमाण स्वमींनी हेतु केतां कारण एहवी जेहनी समाचारी, एहवो जे खरतरगन्छ ते मन्ये वर केतां मधान सर्व माल निपुण मरुस्थल विसे अनेक जिनचेत्यप्रतिष्ठा कारक आवश्यकोदार प्रमुख ग्रंथोना कर्ता एवा महोपाध्याय, श्रीराजसारजी थया, वेहना शिष्य श्रीज्ञानधर्म उपाध्याय, न्यायादिक ग्रंथाच्यापक, जेणे साठ वर्ष पर्यंत जिव्हाना रस तजी शाक जाति तजी, ने संवेग- धृत्ति धरी, तेमना शिव्य रुडा यशना धणी, सुखना देवा- घाला एहवा ॥ ८ ॥ इति अष्टम गाथार्थः । दीपचंद्र पाठक तणो, शिप्य स्तये जिनराजो जी॥ देवचंद्र पद सेवतां, पूर्णानंद समाजो जी ॥ चो० ॥ ९ ॥ अर्थः-तथा जेणे श्री शजय तीर्थ उपर शिवासोमजी' कृत चोमुखनी अनेक विष प्रतिष्ठा करी तथा पांच पांडवना यिनी प्रतिष्टा करी, नया समोसग्ण चैत्य तथा श्रीकुंथुनाथ चैत्य प्रतिश करी, आगजनगरे सहलफणापार्श्व प्रभुनी प्रतिश

श्रीदेवचंद्रजीकृत विशति विहरमानजिन स्तवनं. ७८५
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करी, एहवा उपाध्याय श्रादीपचंदजी, वेहना शिष्य पंडित
देवचंद्रगगि, तेणे ए चोवीश मननी स्तवना भक्तिवशें करी,
पोतानी भक्ति परिणति महानंद हेतु हे, एहवा गुणना
नाय, देवचंद्र पद पूर्णानंद ने सिद्ध अम्पावाय आनंदनो
समाज केतां समुदाय ते पाने, ए जिनभक्ति ते मोशनो
परमोपाय छे ॥ ९॥ इतिश्री चोवीश निनस्तुतिनो पाला-
वबोध संपूर्ण ॥
॥ इति श्री देवचंद्रजी माहाराज कृत यालावयोष सहित
चतुर्विशति जिनलवनानि संपूर्णानि ।।

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अथ श्रीदेवचंद्रजीकृत विंशति विहर- मानजिन स्तवनानि ।। ॥ तत्र प्रथम श्रोसीनंधरजिन स्तवनं ॥ ॥ सिद्धचक्रपद वदी ॥ ए देशी ॥ ॥ श्री तीमघर जिनवर स्वामी, बिनती अवधारो ॥ शवधर्म प्रगट्यो जे तुमचो, मग तेह अम्हागे रे स्वामी, विनवी मनरंगे ॥ १ ॥ जे परिणानिक धर्म तुमारो, वहतो अमचो धर्म ॥ अक्षाभानन सा वियोगें, बलापो विभाव अधर्म रे, स्वामी ॥ वि० ॥ २ ॥ वस्तु स्वभाव स्वजाति वेहनो, मूल अनाव न पाप ॥ पाविभाव अनुगत परिणतिया, कने ते अकरायरे, स्वामी ॥ वि॥३॥ने विभाव ते पर नैमित्तिक, संतति भार अनादि ॥ पानिमित्त ते विषय सं- गादिक,ते संयोगें तादि है, खानी ॥ वि० ॥ ४ ॥ अयुद्ध निमित्त ए सरना. अना कता पन्नो || निमित से जर पिद्दन, इन भोत्ता दानो सानी ॥ वि॥५॥ जेहना धर्म अनंता प्रगटमा ने निजराति बाँचे ।। परमातम जिनदेव अमे, नानादिर गुर्ग. यानी ॥ वि० ॥ ६ ॥ SHEET ने. श्रीनवर देव।। भनिन... नर व मानी ॥ कि. | ७ | :::: दि.

७०८ श्रीदेतचंद्रजीकृत विंशति विहरमानजिन स्तवनं. स्वभावें ॥ पूर्णानंद सिम्ता साधी. देवचंद्र पद पावे रे स्वामी ॥ वि० ॥ ९॥ इति सीमंघरजिन स्तवनं ॥ ॥ अथ द्वितीय श्रीयुगमंधरजिन स्तवनं ॥ ॥ देशी नारायणानी ॥ श्री युगमंचर वीन, रे, 'विनती अवधार रे । दयालराय ॥ ए परपरिणति रंगयी रे, मुझने नाथ उगार रे ।। द० ॥१॥ श्री० ॥ कारक ग्राहक भोग्यता रे, में कीघी महाराप रे ॥ द० ॥ पण तुझ सरिखो प्रमु लहि रे, सावी वात कहाय रे ।। द० ॥२॥ श्री० ॥ यद्यपि 'मूल स्वभावमें रे, परकर्तृत्व विभाव 'रे॥द० ॥ अस्तिघरम जे माहरो रे, एहनो तथ्य अभाव रे ॥ द०॥३॥श्री०॥ परपरिणामिकता दशा रे, लहि परकारण योगरे।। द० ॥ चेतनता परगत थइ रे, राची पुद्गल भोग रे॥ द० ॥४॥ श्री० ॥ अशुद्ध निमित्त तो जड अछे रे, वीर्यशक्ति वि. "हीन रे ॥ द० ॥ तूंतो वीरज ज्ञानयी रे, सुख अनंते लीन रे॥ द० ॥५॥ श्री० ॥ तिण कारण निचे कयों रे, मुझ निज परिणति भोग रे ॥ द० ॥ तुझ सेवायो ‘नीपजे रे, 'भाजे भिवभय सोग रे ॥द० ॥ ६॥ श्री० ॥ शुद्ध रमण आनंदता रे, ध्रुव निस्संग स्वभाव रे, ॥ द० ॥ 'सकल प्रदेश 'अमूर्तता रे, ध्यानां सिद्ध आप रे ॥ द० ॥ ७ ॥श्री० ॥ "सम्पम् तत्व जे उपदिश्यो रे, सुणतां तत्व जमापरे गाद०॥ प्रद्धाज्ञाने जे ग्रयो रे, तेहित कार्य कराप रे ॥ द० ॥८॥ श्री० ॥ कार्परुचि का ये रे, कारक सवि पल्टाय रे ॥ ३०॥ आनमगर्ने आनन रने रे, निज घर मगल थाय रे ॥ १० ॥ ९ ॥ श्री. ॥ त्रागा शरण आधार हो रे, मजी

सधत विशद व्हाल्नजन नं. ८६
हर 1.सीहत भी पुगवजिन
स्तनं ।।
॥ अय तृतीय श्रीवाजिन स्तवनं ॥
जिन
बदेशी बिन्दि
नननन।।।।नहहें विकाता केस
न हो जेद मारकर परिजननो, रहीस
कत जतिन के काटने. न को
विद विमल !!: हरजिना जनो
विजय !! माना जमिन मार
'विहन ॥ नाम अपनी अहिरीन

७९० श्रीदेवचंद्रजीकृत विंशति विहरमानजिन स्तवनं. ॥१०॥ बा० ॥ परमातम परमसेरू,भावदया दातार ।। प्र०॥ सेवो घ्यावो एहने, देवचंद्र सुखकार ॥ ० ॥११ या॥ इति ॥३॥ ॥ अथ चतुर्थ श्रीसुबाहु जिन स्तवन ।। ढाल || माहरो वालो ब्रह्मचारी ॥ ए देशी ॥ श्रीसुबाहु जिन अंतरजामी, मुझ मननो विशरामी रे ॥ ममु अंतरजामी ।। आतमधर्मतणो आरामी, परपरिणति निःकामी रे ॥ प्र० ॥१॥ केवल ज्ञान अनंत प्रकाशी, भविजन कमल विकासी रे ॥प्र॥ चिदानंद धन तत्पविलासी, शुद्धस्वरूप निवासी रे ॥ म० ।। २ ॥ यद्यपि हुं मोहादिक छलीयो, परपरिणतिरों भलीयो रे ॥प्र० ॥ हवे तुज सम मुज साहित्र मलीयो, तिणे सवि भवभय टलीयो रे ॥ ॥३॥ ध्येप स्वभावें ममु अवधारी, दुर्याता परिणति वारी रे ॥ प्र० ॥ भासन वीर्य एकताकारी, ध्यान सहज संभारी रे ॥०॥४॥ पाता ध्येय समाधि अभेद, परपरिगति विच्छे रे ।। प्र० ॥ पाता साधक भाव उच्छेद, ध्येय सिद्धता वेदे रे ॥ प्र० ॥६॥ व्यक्रिया सायन विधि याची, जे जिन आगम वाची रे ॥०॥ परिणति वृति विभावें राची, तिगे नवि थाये सात्री रे ॥ म० ॥ ६ ॥ पग नवि भय जिनराज पसायें, तत्त्वरसा- यण पाये रे ॥ प्र. ॥ प्रभुभग निज विन वमाये, भावरोग मिट जाये रे ॥ प्रा॥७॥ जिनपर वचन अमृत अनुसरीये, नच ग्माण आदरियर ।। ॥ व्यभाव आम्रव परिहरीये, देवचट पद का॥प ॥ ८ ॥ इति चतुर्थ श्री मुबाइजिन स्तवन ।। ४ ॥

श्रीदेवचंद्रजीकृत विशति विहरमानजिन स्तवनं. ७९१ ॥ अथ पंचम श्रीसुजातजिन स्तवनं ॥ ।। देदं देवें नणद हठीली ।। ए देशी ।। स्वामी सुजात महाया, दीटा आणंद उपाया रे ॥ मनमोहना जिनराया ॥ जिणे पूरण तत्व निपाया, द्रव्यास्तिक नय ठहराया रे॥ म० ॥१॥ पर्यापास्तिक नपराया, ते मूलस्वभाव समापारे ॥०॥ ज्ञानादिक स्व परजाया, निजकार्य करण वरताया रे ।। म० ॥ ॥२ ॥ अंशनय मार्ग कहाया. ते विकल्पभाव सुणाया रे ॥ म० ॥ नय चार ते द्रव्य थपाया, शब्दादिक भाव कहाया रे॥म० ॥ ३ ॥ दुर्नय ते सुनय चलाया, एकत्व अभेदें ध्याया रे ॥म० ॥ ते सविपरमार्थ समाया, तमु वर्तन भेद गमाया रे॥ म०॥ ४॥ स्याद्वादीवरतु कहिजे, तसु धर्म अनंत लहीजे रे ।। म० ॥ सामान्य विशेषतुं धाम, ते द्रव्या- स्तिक परि गाम र ।। म० ॥५॥ जिनरूप अनंत गणीजें, ते दिव्यज्ञान जाणीजर ।। ० ॥ श्रुतज्ञानें नयपथ लीजें अनु- भर आस्वादन कीन रे || म० ॥६॥ प्रभुशक्ति व्यक्ति एकमा, गुणु सर्व रह्या समभावे रे ॥म० ॥ माहरे सत्ता मभु सरखी, जिनवचन पसायें परखी रे ।। म० ॥ ७ ॥ तुतो निज संपत्ति भोगी, इंतो परपरिणतिनो योगी रे ॥ म० ॥ तिणे तुम्ह प्रभु माहरा स्वामी, हुं सेवक तुझ गुणग्रामी रे ॥०॥८॥ए संबंधे चित्त समवाय, मुझ सिद्धिनुं कारण थाय रे ॥ म०॥ जिनराजनी सेवना करवी, ध्येय ध्यान धारणा धरवी रे ।। म०॥९॥ तुं पूरण ब्रह्म अरूपी, तुं ज्ञानानंद स्वरूपी रे।। म ॥ इम तत्त्वालंबन करीयें, तो देवचंद्र पदवरीय रे ।। म०॥ १०॥ इति सुजातजिनस्तवन।। " 2.0 ७९२ मीदेवयंदजीकृत शिति विहरंमानजिन स्तन: ।। अथ पष्ट श्री स्वयंप्रभगिन स्तवनं ।। ॥ भोगनाहेडाउहभिारिलाहुरो गद्ददरोए देशी ॥ गामी स्वयंप्रभने हो ज.उ.भामणे हर बार हमार ॥ वातु- धर्म परण जगु नीनो, भार हाकिरतार ॥१॥णा ॥ द्रम्पधर्म ने दो जोग रामारया, विषय विक परिद्वार ।। आनन- शक्ति स्वमार गुधर्मनी, साधनहेतु उतार ॥ २ ॥ सा ।। उपशम मात्र हो मित्र.यिका, जे निज गुण मागभा। ॥ विप्याने नीपनालो, साधन धर्म सभा ॥३॥ स्वा ॥ सकिन.गणी हो ोटेशी लगे, आतम, अवगत मार मार लिग हो उपादान बता, साब्याटन दार ॥४॥दा० ॥ गायदेश हो ही भारता, निर खम्य ॥ आतम गुमानी हो ना, सिद्ध रामा अनुरा ॥ ५॥ वा० ।। अपर अपित होने निरमा, पामा ना विद्वप ।। आतमभोगी हो रमत्रा नित, मिरमाण पा॥ ६ ॥ १० ॥ यो धर्म हो प्रभुत नीपो, भाग्यो देवता धर्म ने अपना ही भो पिकिर दिदारी का नाम मोटा दाप दिम काय॥ मारना मला, मार दिला स्मर||cum13 मान होना करता कम दो दिर पर, बन्द दस्ताद ।। २.१ श्री दिन दिनमा

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७९४ श्रीदेवचंद्रजीकृत विशति विहरमानजिन स्तवनं.
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॥ अथ अष्टम श्री अनंतवीर्यजिन स्तवनं ।।
॥ चरणाली चामुंडा रण बडे ॥ए देशी ॥ अनंतवीरज
जिनराजनो, शुचि वीरज परम अनंत रे ॥ निज आतम भावे
परिणम्यो, गुणवृत्ति दर्तनावंत रे ॥१॥ मन मोयु अम्हारुं
प्रभुगुणें ॥ ए आंकणि ॥ यद्यपि जीव सद् सदा, वीर्यगुण
सत्तावंत रे ।। पण कमें आवतचल तथा, बाल बाधक लहंत
रे ॥ २ ॥ म० ॥ अल्पवीर्य क्षयोपशम अछे, अविभाग वर्गणा
रूप रे ॥ पड्गुण एम असंख्पयी, धाये योग स्थान स्वरूप
रे ॥३॥ म० ॥ सुहम निगोदी जीवथी, जायसनीवर पजत
२॥ योगनां आग असंख्य छे , तरतम मोहें परापत रे ॥ ४
।। म || संयमने योगें वीर्य ते, तुम्हें कीघों पंडित दक्षरे
॥ साध्य रसी साधक पणे. अगिसंधि रम्यो निज लक्ष रे॥५
॥ म० ॥ अमिसंधि अपंधक नीपने, अनमिसंधि अपंधय पाय
रे ॥ स्थिर एक तत्त्वता यानतो, ते भायिक शक्ति समाप
रे॥ ६ ॥ म० ॥ चक्रममणन्याय सयोगता जी की अयोगी
धाम रे ॥ अकरण वीर्य अनंनता, निजसहकार अकाम रे ॥
७ ॥ २० ॥ शुद्ध अचल निजवीर्यनी, निरुपाधिक शक्ति अनंत
रे ॥ ते प्रगटी में जाणी गही. तिण तमहीन देव महंत रे
॥८॥ म. नक्ष ज्ञान चेतना अनुगमी, मुझ वीर्य स्वरूप
समाय र ॥ पडित अायिकता पामो. ए. पणसिद्रि उपाय रे
॥ ॥ म || नायक नाद 17. मेवनयी आनम सिद्धि
॥ दवनः : 1.47
ग म मगांडर ॥१॥०॥

श्रीदेवचंद्रजांकन किंगति विहारमानजिन सक्नं. ७९५
॥ अथ नवम श्रीसूरप्रभजिन स्तवनम् ॥
॥ देशी कहानी ॥ जगदीशनी तीच्या अति शूरता
ते चिरकालनो मोह जीन्यो ॥ भाव स्याहाहना गृद्ध परकाश
कारे, नीपनो परम पद जग दीतो ॥१॥ मु० ॥ प्रथम-
निध्यान हणि गुना दंगा निका, प्रगट करि लेणे अविरति
पगासो ॥ राह चारित्र रात कार्य एस्वी, परिणति क्लु-
पता नवि विणाशी ॥३॥।॥ वारे परभावनी कर्तृता
मुली, आमपरिणाम वर्तत्व धारी ! अनि आरोहतां वेद
हास्यादिनी, संगमी चेतना प्रभु निशारी ॥३॥०॥ भेद-
जाने क्या वस्तुता ओलसा, द्रय पपायों थइ अभेदी ।।
भाव सविकल्पता हेदि केवट सकल, ज्ञान अनंतता स्वामि
बेदी ॥४॥ ॥ वीर्यशाविक ले चालता योगनी,
सेषि चेतन कयों शुवि अशी ॥ भाव देशमें परम
अक्रिय थह, क्षय वर्ग चार न कर्नया ॥ ५॥ मू० ॥
वर्ण रस गंध दिनु फन्न संन्धान दिद, योगत संग दिन
जिन असा पान आनंद अन्यंत सुख अनुभवा, तत्तत-
न्मय सदा विवरूपा ॥६॥ मु०॥ ताहरी वास्ता धीरता
तीष्णता, देखि वक्तगो वित्त गन्यो । राग नुप्रास्ता
गुणी आश्चर्पता, गुपी अट्ठनपने जीव मान्यो। ७॥ मृ०॥
आत्मगुण रूचि धये नन्द साधन रसो. नव नियत्ति निर्वाण
धावे ॥ देवकाइ परमात्मा सेवनयक'. पग्म आत्मिक आनंद
पाचे ॥ ॥ ॥ इनि म नग्मभजिन लवनम् ॥ ९॥

०१६ श्रीदेवचंद्रजीकृत विंशवि विहरमानजिन सपनं. ॥ अथ दशम श्रीविशालजिन स्तवनं ॥ ॥ प्राणी याणी गिनती ॥ एदेशी ॥ देव विशाल जणंदनी, तो यावो तय गमाशि रे ॥ विज्ञानंद रस अनु. नी, सहज अल निरुपाधि रे ॥१॥ रा०॥ अरिहन द यंदीय गुणयंत रे ॥ गुणांत अनंत महंन तो भग्ना गो भगांत रे॥ ए आंकणी | भर उपाधि गर टालरा मनी लोय अमोच रख पाय आपत्र कर्ग, तम तापों नविजन ओगरे ॥२॥ ॥ भासमा जल ताया नामक सम जिनगज रे॥ पण हालांग पामी ये, अक्षय दावनगरनुं गज ॥३॥ ग० ॥ अ० ।। भा अटी आगे बहनयी, पारग प्रभुनी गया रे ।। शुद्रमार्ग दर्शकपणे, ग अमंका नाहर ॥५। पो. ॥ अ० [ Afसन पली माहनिवारा यामी ॥ श्रम ग रक्षा हा, देणे गोगईश मिगम ॥५॥॥॥ भार नामक पता, माता ॥ धर्म अहिंगा भीगनगे। हा अन्डीया विना ॥६॥ मा || .॥ मा अहितमा. नाक आया मनिणः ॥ मोसमा नभावती र मह अग्दि । ॥ ७ ॥iti TRA मुगम वार ॥ र गुग- 7. मह, माद नाय ||Choti बिहान सानन ॥

श्रीदेवचंद्रन इन शिति विहानानजिन स्नानं. ७९७ ॥ अथ एकादश श्री बगंधरजिन स्तवनं ॥ । नदी यमनाके नी । एदेशी ॥ विहामान भगवान, गुणो मृज विननि । आनाकानाय असो त्रिभवन पति॥ भासक लोकालोक. तिनो पवितकवान, कहूं हूं तुज प्रति पनि जोडि. सम्यो पर पुरलें । हाल्यो :: ...--. काजल ॥ आश्रय अंधविभाव. का. नाच ! न यो विवादान. दोष द्यु परभनी ॥२॥ अंगृा टार कास. का जिनमन किया। न त भगृण चान, अनादिनी में पिया ।। वृधिगगनो पोप, तेह नमकिन पादादनः . न देख निजा॥२॥ रक्षमा चना | वस्तु अनंत विभाव, न भाभ3170 गोमा देव. नम लशि- की ।। इति मा. प्रभो नहाका || ४ ॥ महाविदेह सारे ३ जिन ।। श्रीरत्रया अरिहना अनेन गुणा ना मटा मज नारो ।। महविध गुपयोग. in. Eve || ५।। प्रमुख भव्य स्वभाव, न को मारने । प्रमोड. एह चेतन सो।। पाये टिका: ..'' मग सहज वनंत्र 7 ते ७९८ श्रीदेवचंद्रजित विंशति विहरमानजिन स्तवनं. ॥ अथ द्वादश श्री चंद्राननजिन स्तवनम् ॥ ॥ वीरा चंदला ॥ ए देशी ॥ चंद्राननजिन, सांभलीएं अरदास रे ॥ मुस सेवक भणी, छे प्रभुनो विश्वासो रे ।। ॥ १ ॥ चं०॥ भरतक्षेत्र मानवपणो रे, लायो दुःपम काल ॥ जिनपरवघर विरही रे, दुलहो सावन चालो रे ॥२॥ ५० ॥ द्रव्य क्रिया रुवि जीवा रे, भाव धर्मरुविहीन ॥ उपदेशक पण तेहया रे, शरे जीव नवीन रे ॥३॥ ० ॥ तत्त्वागम जाणंग तजौ रे, बहुजन संमत जेह ॥ मृड हली जन आदर्या रे, गुगुरु पहाये तेह रे ॥ ४ ॥ ५० ॥ आणा साध्य विना त्रिया रे, लोके मान्यो रे धर्म ॥ दसण नाण चरित्तनो रे, मृल न जाग्यो मर्म रे ॥५॥० ।। गठ कदा ग्रह सारे रे, माने धर्म प्रसिद्ध ॥ आतम गुण अफया- यता रे, धर्म न जाणे शुद्ध रे ॥६॥०॥ तत्वरसिक जन थोडला रे, बहुलो जन संवाद ।। जाणो छो जिनराजजी रं, सबलो एह विवाद रे॥७॥ ॥ नाय चाग बंदन तणो रे, मनमा घणो उमग ॥ पुग्य बिना किम पामीये रे, मभुसेवननो रंगरे ॥८॥ ॥ जगतारक प्रभु यांदीए रे, महाविदेह मझार धर्म स्याद्राता रे, मुगि करिये निर्धार रे ॥ ९ ॥ ५० ॥ तुझ करुणा सदु उपरे रे, सरस्सी. छे महाराप || प अविराधक जाने रे, कारण सरलं थाय रे॥ १० ॥ ३० ॥ पहया पण भवि जीवने रे, देव भक्ति आधार ।। प्रमममी पार्मायें रे, देवचंद्र पद सार रे ॥११॥ ६० ।। इति ।।

आदेवचंद्रजीत मिति चिन्हमानजिन स्तनं. ७९९ ॥ अथ त्रयोदन श्री चंद्रबाहुजिन लवनम् ॥ ॥ भी आनाय उपासना ॥ए देगी। वाजिन सेवना भवनाशिनी तेह ।। पल्परिणतिना पाल्ने, निष्कासन रेह ।। १ ।। ।। पुल भाव आगन्ना, उद्वाहन केत ॥ सम्पदर्शन बासना. भान्नयनमे ।। २ ॥ ॥ विक- र. पोग प्रशतना, गुगलपना ग ।।दन पूजन भावना निजपावना संग ॥॥॥ पानातन पर कामना कान- नाशन एह ॥ सताव प्रशासना. नरबा गुणगेह ॥४॥ ६. ॥ परमेवर जालंदना, रापा नेह जीव ॥ निर्मल सापनी सायना, व्ह स्टीव ॥५॥२०॥ परमानंद आपवा. मभु पुE जर तुम सम तारक सेवा परमेव न पाप ॥ ६ ॥ ५० ॥ नान संपानि त तुम्हें कारण ॥ देव, अवनी. सेवा शुलकाः ॥७॥ ॥ इति मानिन्दनं ।। ॥ अथ चतुर्दश श्रीभुजंगस्वानि स्तवनम् ॥ ॥ देशी नमानी ।। पुपलाद विज हो, के विचरे तीर्थपति ॥ प्रभचने मेरे हो. के सुर नर अनुस्पति ॥ प्रदेशमा । तर गुणनी न्द वभावती हो. के परिगति :

८०० श्रीदेमंद्रजीत विशति विरहमानजिन लपनं. - wal Mawan हो, के कग्नाभार नहीं ।। सत प्रदेश हो, के पति किमत कही ।। चेतन द्रायने हो, के सात प्रदेश मिले || गुणा तंना या हो, के वरतुने सहग बलें ॥ ३ ॥ शंकर सहकारी हो, के राह जे गुण यने ।। द्रव्यादित परिणति हो, के भये अनुराग्ने । दानादिक लधि हो, केन इवे सहाय जीना। सहकार अही हो, के गुणना पति धना ॥४॥ पर्याय अनंगा हो, के ने एक कार्यपणे ॥ नाते तेहने हो, के जिना गुण पभो। मानादिक गुणनी हो, के यांना जीर मंत। धर्मादिक दृश्यने हो, के गहरे कामे ॥५॥ गाहक व्यापाता हो, के ममतुम धर्म ग्मी ।। आग अनभावी हो, के परिणी अन्य यनी ।। तदा शनि अनंती हो, के गाताने मुड टाक्ति विकागन हो, के थाने गुण रमतां ॥ ५॥ निज गुणभोगी हो, के पामि मजंग मृदा ॥ से निप हो, के ने ना धन्य । दोषद प्रभुनी हो. के. गों भनि मधे ।। आतम अनुमानी हो, के निरनि हानि वो ॥ ॥ इति ॥१४॥ ॥ अथ पंचना श्री यादवजिन म्यानमः॥ ॥ का निकनन ॥ ॥ के साय हो नि ...!! frrr.k- 4. ..

श्रीदेवचंद्रजीकृत विंशति विरहमानजिन लवनं. ८०१ तुमचा हो पूर्ण पवित्रता ॥३॥ पूर्णानंद स्वरुप, भोगी अयोगी हो उपयोगी सदा ॥ शक्ति सकल स्वाधीन, वरते प्रभुनी होने न चले कदा ॥ ४ ॥ दास विभाव अनंत नासे प्रभुजी हो तुझ अवलंबनें ।। ज्ञानानंद महंत: तुझ सेवादी हो सेवकने बने ॥५॥ धन्य धन्य ते जीव. प्रभु- पद बंदी हो ले देशन सुपे॥ ज्ञानक्रिया को शुद्ध, अनु- भव पोगें हो निज साधकपणे ।।६॥ वारंवार जिनराज, तुझ पद सेवा हो होजो निर्मली ॥ तुझ शासन अनजाइ, वासन भासन हो तस्वरमण वरी ॥ ७ ॥ हातमनिज धर्म, रुचि अनुभवयी हो माधन सन्दता । देवचंद्र लिनवंद्र भक्ति पसा हो होटो पतना ॥ ८॥ इति पंचना भी ईश्वरनामाजिन स्तरनं ॥ १५ ॥ ॥ अथ पोडा श्री नमिप्रभजिन लवनम् ॥ ॥ अरज अाज मुगोने रुडा राजीया होजी ।। ए देशी ।। ननिमम ननिभमभनी वीन हो जी, पामीवर अन्नाव ॥ जाणो को जागो टो विष दिन हो जी, नोपण दामाद- भाव ॥ १।। न ।। है दन्ता र कता पर भानो हो जी, भोत्ता पुरतरुप | बाहक माइक पर पहनो हो जी, राच्यो उ झन भर ।। || आरन आनन धर्म विमानयो हो . नि...|| आजभर ८०२ श्रीदेवचंद्रजीकृत विंशति विग्हमानजिन स्तवनं. बुझ । वीरज वीरज अनंत स्वभावनो हो जी, चारित्र क्षायिक शुद्ध ॥५॥ न० ॥ विश्रामि विश्रामि निजभावना हो जी, स्पादादी अप्रमाद ॥ परमातम परमातम. प्रमु देखता हो जी, भागि प्रांति अनाद ॥६॥ न० ॥ जिनसम जिनसम सत्ता ओलसी हो जी, तमु प्रागभावनी इह ।। अंतर अंतर आतमता सही हो जी, परपरिणति निरीह ॥७॥ न० ।। प्रतिछंदें प्रतिछंद जिनराजनें हो जी, करतां साधक भाव ॥ देवचंद्र देवचंद्र पद अनुभवे हो जी, शुद्धातम माग्भाव ॥८॥न० ॥ इति पोडश नमिप्रभजिन स्तवनं.॥ ॥ अथ सप्तदश श्री वीरसेनजिन स्तवनम् ॥ ॥ लाछलदे मात मल्हार ॥ ए देशी ॥ वीरसेन जगदीश ताहरी परम जगीश, आज हो दीसे रे वीरजता विभुवनयी घणी जी ॥१॥अणहारी अशरीर, अक्षय अजय अतिधीर, आज हो अविनाशी अलेशी व प्रमुता अगी जी ॥२॥ अतींद्रिय गत कोह, विगतमाय मप लोह, रे मोहे जगजनता भणी जी ॥३ अमर ॥ अखंड अप पूर्णानंद स्वरूप. आज हो चि दीपे थिर समना धगी जी ॥४॥ वेदरहित अपाय, शुद्ध सि अगहाय, आज हो ध्यापकं नायकने ध्येयपदें ग्रयो जी ॥५॥ दानलाम निज भोग, शुद्धम्वगुण उपभोग, आज हो अजोगी करता भोक्ता ममु लद्यो जी ॥ ६॥ दरिमाण जान चारित्र, सकल प्रदेश पवित्र, आज हो निमल निम्मी अरिहा वदीयं जी || देवचः जिन पणानदानी १६. आत दो जिनवग्मेवायी, विर न' ।। दृत्र । आज हो सोई

श्रीदेवचंद्रजीकृत विशति विरहमानजिन रतनं. ८०३
.
॥ अथ अष्टादश श्री महाभद्रजिन स्तवनम् ।।
। तर यमुनानू रे, अति रलीयामा रे ॥ ए देशी ।।
महाभद्र जिनराज, राज राजविराजे हो आज तुमारडो जी ॥
मायिकीय अनंत, धर्म अभंगें हो तुं साहिब बडो जी ॥१॥
है बलिहारी रे श्री जिनवरतगी रे ।। कर्ता भोक्ता भाव,
कारक कारण हो तुं स्वामी उतो जी ॥ ज्ञानानंद प्रधान
सर्व वस्तुनो हो धर्म प्रकाशतो जी ॥ २ ॥ १० ॥ सम्यग्-
दर्शन मित्त, स्थिरनिर्धारे रे अविसंवादता जी ॥ अन्यायाधि
समाधि, कोश अनश्वरें रे. निज आनंदता जी ॥३॥ ९ ॥ देश
असंख्य प्रदेश, निजनिज रीतें रे गुण संपत्ति भर्या जी ।। चारित्र
दुर्ग अभंग, आतम शक्ते हो परजय संचर्या जी ॥४॥ हुं० ।।
धर्मनमादिक सन्य, परिणति प्रभुता हो तुझ बल आकरो
जी ।। तत्व सकल प्राग्भाव, सादि अनंती रे रीतें प्रभु धर्यो
जी ॥ ५ ॥ ९० ॥ इन्य भाव अरिलेश, सकल निवारी रे
साहिन अवतयों जी ॥ सहज स्वभाव विलास, भोगी उपयोगी
रे ज्ञान गुणें भर्यो जी ॥ ६ ॥ हुं० ॥ आचारिज उबदाय,
साधक मुनिवर हो देश विरत धरु जी॥ आतम सिद्ध अनंत
कारणरूपेरे योगक्षेमंकर जी ॥ ७ ॥ हुं० ।। सम्यगृहष्टि जीव
आणारागी हो सहु जिनराजना जी ॥ आतम साधन काज,
सेवे पदकज हो श्री महागजनां जी ।। ८॥ हुँ । देवचंद्र
जिनचंद्र. भगते राचो हो भवि आतम रुचि जी ॥ अन्यय
अक्षय गुन्न. संपान प्रगट हो मनागत शुचि जी ॥९॥ १०॥

८७४ श्रीचंदजीकृत शिति विहरमानजिन स्तनं. ---- --------- ॥अथ एकोनविंश श्री देवजसाजिग स्तवनम् ।। ॥ महाविदेह क्षेत्र सोहामा ॥ ए देशी ॥ देवामा दरि- मा करो, free मोह निभार लाल रे ॥ प्रगो शुद्ध सामा पना गाना दही दार लाल रे ॥१॥ दे० ॥ सामी यगो या वो, गभरत दाग लाल रे ॥ क्षेत्र विभेद धणो पश्या- झिम पोहाग आग लाट रे ॥ २॥ दे॥ोन जो त नामदी, आपत नाय हर लाल ॥ जो होगी विराज- खटी, दंगण निय प्रभुना लाल रे ॥ ३ ॥ ३० ॥ धागन- मन में गुरपग, पिन शी नमाय लाल रे || या यो मुहागरे, ती निनादन थापाल रे ॥४॥३०॥ ग विगवना, शी कापी जी मारे । रति मोह से नहीं, दीटे आगमदी दादर ॥५॥ ३० ॥ आराम बाद ग्यमानने, वाचन शोना दाल माविमा तो कही महागाजार॥६॥ay. निम्मी मादिव मिल्यो, भाले मात्रम दाबारे ॥ शमन माद, नोग वापरावर ॥ ॥३॥ की, नायक meminarहित मान', पामत गुपका बाल ॥८॥er at दादरम्नान॥

श्रीदेवचंद्रजीहत विशति विहरमानजिन स्लरनं. ८०५ ॥ अथ विंशति श्री अजितवीर्य जिन स्तवनम् ॥ ॥ अजितपिजिन विचरतारे॥ नमोहना रे लाल।। पुका अविदेह रे ॥ भवियोहना रे लाल ॥ जंगम मुरतर सारिसोरे॥ मन । सेवे धन्य धन्य वेह रे ॥ भवि० १॥ जिनगुण अमृत पानवी रे ॥म० ॥ अमृतानिया सुपसाय रे ॥ भ. ॥ अमृतक्रिया अनुशानी रे ।। म ॥ आतम अमृत घाय रे ॥ भ० ॥२॥ प्रीति भक्ति अनुशानवी ॥म.॥ वचनजसंगी सेवरे ॥ भ० ॥ कतिन्मयता लहे रे ॥म.॥ प्रभुभक्ति निन्पनेवरे ॥ भ॥३॥ परमेश्वर अवलंबने रे ॥ ॥ माता ध्येय अभेद रे ॥ ॥ ध्येय समाप्ति हुने २॥ ॥ साध्यसिद्धि अविच्छेद रे ॥ भ. ॥४॥ जिन- गुण राग परागा रे ॥मः॥ वासिन मुझ परिणाम रे ॥भा॥ तजशे दुष्पविभावतारे ।।म। सरशे आतम काम रे ॥भ०।। ।। ५॥ जिनभक्तिरत चित्तने रे । म० ॥ वेधकरस गुण प्रेम रे॥भ. ।। सेवक जिनपद पानशे रे ॥म ॥ रसवेषित अय जेम रे भ०॥६॥ नाथ भक्तिरस भाषयी रेम०॥ तृग जाएं परदेव ॥ ॥ परमानम चिन्तामगि सुरतर यकी रे॥ म०॥ अधिकी अरिहन मेव रे ।।भ०॥ ७॥ गुण स्मृतियकी रे । म || परदयो आतमगम रे ।। भ. ॥ निपमारंचनता टहे है ॥ ॥ होह ज्यु परम पाम रे ॥ भ. ॥८॥ निर्मन नयाचे धंद्र 1. ।। कालो जिनपति भक्ति । नमः . ० ।। रग्म महोदय ।। ६ इन ॥२. ।।

८०६ श्रीदेवचंद्रजीकृत विंशति विहरमानजिन स्तवनं.
॥ कलश ॥ राग धन्याश्री॥
॥ यंदो वंदो रे जिनवर विचरंता बंदो॥ कीर्तन स्तान
नमन अनुसरतां, पूर्वपाप निदो रे ॥ जिनवर विचरंता बंदो
॥१॥ जंबू द्वीपें चार जिनेश्वर रे, धातकी आठ आणंदो ॥
पुष्कर अयें आठ महामुनि, सेवे घोशल इंदो रे ॥ जि.
॥२॥ केवली गणधर साधु साधवी, श्रावक श्राविका दो ॥
जिनमुख धर्मअमृत अनुभवतां, पामे मन आणंदोरे ॥ जि.
॥३॥ सिद्धाचल चौमास रहीने, गापो जिनगुण छंदो ।
जिनपनि भक्ति मुगतिनो मारग, अनुपम दिशगुसांदोरे
॥जि० ॥ ४॥ खग्नर गच्छ जिनचंद सूरियर, पुष्पप्रधान
मुर्णिदो रे । सुमति सागर सा रंग सुवाचक, पीयो भूतमः
करंदो रे ॥ जि० ॥५॥ राजसार पाक उपगारी, शानधर्म
दिगंदो । दीपचंद सद्गुरु गुणांता, पाठक धीर गपंदो।
॥ जि.॥६॥ देवचंद्र गणि आतम देने, गापा वास
जिगंदो।। ऋद्धि वृद्धि मुखमंपत्ति प्रगटे, मुजग महोप
हो रे ॥ नि० ॥ ७ ॥ इति पंडितश्री दादनीन विंशति
विहरमान जिनम्नवनानि संरगानि ।।

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॥अथ श्री महोपाध्याय देवचंद्रजीकृत अतित जिन चोविशी॥ ॥अथ प्रथम तीर्थंकर श्रीकेवलज्ञानी जिनस्तवन॥ नामे गाजे परम आल्हाद, प्रगटे अनुभव रत आस्वाद ।। तेथी धाये मति सुप्रसाद, सुणतां भाजेरे कांई विषय विपादरे, जिणंदा ताहरा नामधी मन भीनो ॥१॥ क्षेत्र असंख्य प्रदेश, अनंत पर्याय निवेश ॥ जाणग शक्ति अशेप, तेहथी जाणेरे काई सकल विशेपरजि०२॥ सर्व प्रमेय प्रमाण. जल केवल नाण पहाण ।। तिणे केवलनाणी अभिहाण, जन ध्यावेरे कोई मुनिवर झापरे जि०३॥ ध्रुव परिणति इति जान. परिणनि पग्नि निक. गा ।। 1 -

८१० श्री महो० देव कृत गतिन जिन चोविशी.
करता पद प्रवृत्ति प्रकाश,
अस्ति नास्तिरे कांई सर्वनो भासरे ॥जि०॥
सामान्य स्वभावनो वोध,
केवल दर्शन शोध ॥
सहकार अभावे रोध,
समयंतररे कांई बोध प्रबोधरे जि० ५॥
कारक चक्र समग्ग,
ने ज्ञायक भाव विलग्ग ।।
परमभाव संमग्ग,
एक गैरे काई थयो गुण यग्गरे ।जि०६॥
इम सारंचन जिन ध्यान,
भवि सायं नत्व विधान ।।
लह पूर्णानंद अमान,
तेहथी थायरे कांटशीव सानानि०७॥
दास विभाव अपाय,
नाम अनु मामाय ॥
नमय
मही

द्वितीय श्री निर्वाणी प्रभुनु स्तवन. नंदन वनना. ॥ अथ द्वितीय श्रीनिर्वाणी प्रभुनुं स्तवन ।। । वीरजी प्याराही वीरजी प्यारा ।। ए राग ॥ प्रणमुं चरण परमगुरु जिनना, हंस ते मुनि जन मनना ।। वाली अनुभव भोगी आनंद घनना ॥ १ ॥ मोरा खामो हो तोरो ध्यान धरीज, ध्यान धरीजे हो सिद्धि वरोजे, अनुभव अमृत पीजे. मोरा स्वामी हो तोरो० ॥ ए आंकणी ॥ सकल प्रदेश समा गुण धारी, निज निज कारज कारी॥ निराकार अवगाह उदारी. शक्ति सर्व विस्तारी ॥ मोरा० २॥ गुण गुण प्रति पर्याय अनंता, ते अभिलाप्य स्वतंता ।। अनंत गुणानभिलापी संता, कार्य व्यापार करंता ॥ मोरा० ३ ॥ छति अविभागी पर्यय व्यक्त, कारज शक्ति प्रवनं ॥ ३

८१२ श्री महो० देव० कृत अतित जिन चोविशी.
ते विशेप सामर्थ्य प्रशक्ते,
गुण परिणाम अभिव्यक्ते॥ मोरा०४॥
निरवाणी प्रभु शुद्ध स्वभावी,
अभय निरायु अपावी ॥
स्याद्वादी यम नोगत रावी,
पूरण शक्ति प्रभावी ॥मोरा० ५॥
अचल अखंड स्वगुण आरामी,
अनंतानंद विसरामी।
सकल जीव खेदज्ञ सुस्वामी, ·
निरामगंधी अकामी ॥मोरा०६॥
निःसंगी सेवनथी प्रगटे,
पूर्णानंदो ईहा ॥
साधन शक्ते गुण एकत्त्वे,
सीधे साध्य समीहा ॥मोरा० ७॥
पुष्ट निमित्तालंबन ध्याने,
सालंबन लय ठाने ।
देवचंद्र गुणने एक ताने,
पहोचे
प्रण
थाने ॥मोरा० ८॥

श्री तृतीय सागर प्रमु जिन लश्न. . ॥ अथ श्री तृतीय सागर प्रभु जिनस्तवन । ॥ उमानी पारणु आये ||ए राग ।। गुण आगर सागर स्वामी, मुनि भाव जीवन निकामी।। गुण करणे कर्तृ प्रयोगी. प्राभावी सत्ता भोगी ॥ १ ॥ सुहंकर भव्य ए जिन गायो, जिम पूरण पदवी पावानुहंकर०ाए आंकमी। सामान्य स्वभाव सपरना. द्रव्यादि चतुष्टय घरना ॥ देव दरान रचनाये. निज वा अनंन सहाये ॥१०॥ तहने में जाना ए धर्म विशेष पहा॥ मार वीकारताने... अरिभानी पर जो ॥

१५ श्री महो० देव० कृत अतित जिन चोविशी.
प्रति समये व्यय उत्पादि,
क्षेयादिक अनुगत सादि ॥सु०४॥
अविभागी पर्यय जेह,
समवायी कार्यना गेह ॥
जनित्य त्रिकाली अनंत,
तमु ज्ञायक ज्ञान महंत ॥सु० ५॥
जनित्य अनित्य स्वभाव,
ते देवे दर्शन भाव ॥
सामान्य विशेपनो पिंड,
द्रव्यार्थिक वस्तु प्रचंड ।मु०६॥
ईम कंवल दरशन नाण,
सामान्य विटोपना भाण॥
हिगुण आतम श्रद्धाप,
चरणादिक नमु व्ययमाए ।मु०७॥
द्रव्य जेह विशेष परिणामी,
ने कही पनव नामी।
एनी मामध्यं दुभं.
पर्याय विप निबंद "मु०॥
नमामा भागना पर
त

चतुर्थ श्री महाजस जिन स्तवन. ८१५ प्रगटी जस शक्ति अनंती, निज कारज वृत्ति स्वतंती ॥ सु० ॥९॥ गुण द्रव्य सामान्य स्वभावो, तोरथपती त्यक्त विभावी । प्रभु आणा भक्ते लीन, तिणे देवचंद्र पद कीन । सु० ॥१०॥ ॥ अथ चतुर्थ श्री महाजस जिन स्तवन ॥ आत्म प्रदेश रंगथल अनुपम, सम्यकदर्शन रंगरे, निज सुखके सधैया ॥ तुं तो निज गुण खेल वसंतरे ॥ निज०॥ पर परिणति चिंता तजी निजमें, ज्ञान सखाके संगरे ॥ नि० ॥ १ ॥ वास वरास सुरुचि केशर घन, छांटो परम प्रमोदरे । नि० ॥ आतम रमण गुलालकी लाली, साधक शक्ति विनोदरे ॥ निज० ॥२॥ ध्यान सुधारस पान मगनता, भोजन सहज स्वभांगरे ॥ निजः ॥

८१६ श्री महो देव कृत अनित जिन चोविशी. Math --------- Hin - रिझ एकत्वता तानमें वाजे, वाजिब सनमुख योगरे ॥ निज० ॥३॥ शुक्म्यान होरीको ज्याला, जाले कर्म कठोररे । निज०॥ शेष प्रकृति दल खिरण निर्झरा, भग्म बल अति जोररे ॥ निज || देव महाजस गुण अवलंबन, निर्भय परिणति व्यक्तिरे ॥ निज०॥ ज्ञान ध्याने अति बहुमाने, माध मुनि निज शकिरे ॥ निज० ॥ ५॥ मकल अनांग अलंगा असंगत, नाहि होरे मि ॥ निज.॥ देवचंद्र आगामें बने, उनम युहिं प्रसिद्ध रे ॥ निज० ॥६॥ ॥ अथ पंचम श्री विमलजिन स्नान । नरन्ग ' 'निनगन र्नु, जन, मि. गनगे। .

पंचम श्री विमल जिन स्तवनः .८१७ कार्य कारण दशा सहज उफ्गारता, :- शुद्ध कर्तृत्व परिणाम पूरी ॥ धन्य० ॥१॥ आत्म प्रभाव प्रतिभास कारज दशा, ज्ञान अविभागि परजय प्रवृत्ते ॥ एम गुण सर्व निज कार्य साधे.प्रगट, ज्ञेय दृश्यादि कारण निमित्ते ॥ धन्य० ॥२॥ दास वहु मान भासन रमण एकता, प्रभु गुणालंबनी शुद्ध थाये ॥ वंधना हेतु रागादि तुज गुण रसी, तेह साधक अवस्था उपाये ॥धन्य तुं०॥३॥ कर्म जंजाल युंजनकरण योग जे, स्वामी भक्ति रम्या धिर समाधि ॥ दान तप शील व्रत नाथ आणा विना, थईय वाधक करे भव उपाधि ।। धन्य०॥४॥ सकल परदेश समकाल सवि कार्यता, करण सहकार कर्तृत्व भावो। द्रव्य परदेश पर्याय आगमपणे. अचल असहाय अक्रिय दावो ॥धन्य०॥५॥ उत्पनि नाश भ्रव नर्वदा सर्वनी. पटगुणी हानिवृद्धि अन्यूनो ॥ .

१८ श्री महो देव कृत अनित जिन घोतिशी. अस्ति नास्तित्व सत्ता अनादि थको, परिणमन भावथी नहीं अजूनो ॥धन्ग०॥६॥ ईणी परे विमल जिनगजनी विमलता, ध्यान मन मंदिरे जेह ध्याये ।। ध्यान पृथक्त्व सविकल्पता रंगथी, ध्यान एकत्र अविकल्प आये ॥७॥ वीतरागी असंगी अनंगी प्रभु, नाण अप्रयास अविनाश पारी ।। देवचंद्र शुद्ध सता रसी संबता, मंपदा आत्म गांभा वधारी॥धन्य०॥८॥ ॥ अथ पष्टम श्री मानुभूति जिन स्नान ।। ॥ गनीयन जगालदेशी। जग नारक प्रभु यीन, विनतही अवधारे॥ तुज दरान विण{ भन्यो, काल, अनंत अगा। जग॥१॥ मुहम निगांद मरं यम्यो, पुद्गल परिद अनत भारदार माया, दरममाटर २॥

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२०. श्री महो० देव कृत अतित जिन चाविशी.
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अनल विगल पजतमें,
तल भव आयु प्रमाणरे ॥
शुद्ध तत्व प्राप्ति विना,
भटक्यो नव नव ठाणरे ॥ जग ॥८॥
साधिक सागर सहस दो,
भोगवोयो तस भावेरे ॥
एक सहस साधिक दधी,
पंचेंद्रि पद दायरे ॥ जग० ॥९॥
पर परिणति रागीपणे,
पर रस रंगे रक्तरे॥
पर ग्राहक रक्षकपणे,
पर भोगे आशक्तरे ॥ जग० ॥१०॥
शुद्ध खजाति तत्वने,
वहुमाने तडीनरे॥
ते विजातो रसता तजी,
स्वस्वरूप रस पोनरे ॥ जग॥११॥
श्री सर्वानुभूति जिनेश्वरूप
तारक लायक देवरे ॥
तुज चरणे शरणे ग्यो,
टले अनादि कुंटेवरे ॥ जग० ॥१२॥

श्री सप्तम श्रीवा जिन स्तवन. ८२१ सबला साहिब ओलगे. आतम सवलो धायरे॥ वाधक परिणति सवि टले, साधक सिद्धि कहायरे ॥जग० ॥१३॥ कारणधी कारज हुवे. ए परतित अनादिरे॥ माहरा आतम सिद्धिना, निमित हेतु प्रभु-सादिरे ॥ जग० ॥ १४ ॥ अविसंवादन हेतुनी, द्रढ सेवा अभ्यासरे।। देवचंद्र पद निपजे,. पूर्णानंद विलासरे ।। जग० ॥ १५ ॥ ॥ अथ श्री सप्तम श्रीधरजिन स्तवन। ।। रसीयानी देशी ॥ से मुख मुख प्रभुने न मली शक्यो, तो सी बात कहाय. जिणंदजी ॥ निज पर वोनक वात लहो सहु. पण मन किम पतित आय ।। जिणंदजी ।। से मुख० ॥१॥ १३ M ८२२ श्री महो० देव० कृत अतित जिन चोविशी. भव्य अभव्य परित्त अनंत तो, कृष्ण शुकलपक्ष धारः ॥ जि०।। आराधक विराधक रोतनो, पूछि करत निरधार ॥ जि० ॥ से मुख० ॥२॥ किण काले कारण केहवे मले, थाशे मुजने हो सिद्धि ॥ जि०॥ आतम तत्व रुचि निज रिद्धिनी, लहिशुं सर्व समृद्धि ॥ जि०॥ से मुख०॥३॥ एक वचन जिन आगमनोलही, निपाव्यां निज काम॥जि०॥ एटले आगम कारण संपजे, ढील थई किम आम॥जि०॥ सेoirn श्रीधर जिन नामे बहु निस्तस्या, अल्प प्रयासे हो जह॥जि०॥ मुज सरिखो एटले कारण लहे, न तरे कहो किम तेह ॥ जि०॥५॥ कारण जोगे साधे नत्वने, नवि समस्या उपादान ॥जि० श्री जिनगज प्रकाशो मुज प्रते, नहनी कोण निदान॥ जि०म०॥६॥ - ॥

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८२४ श्री महोदेव कृत अतित जिन चोविशी. -- गुण वहुमान गुलालसो हो. लाल भए भवि जीव ॥ ल. राग प्रशस्तकी धूममें हो, विभाव विडारे अतीय ।। ल॥जिन ॥४॥ जिन गुण खेलमें खेलते हो, प्रगट्यो जिन गुण खेल ।। ल० ॥ आतम घर आतम रमे हो, समता सुमति के मेल ॥ ल०॥ जि० ॥५॥ तत्त्व प्रतित प्याले भरे हो, जिन वाणी रसपान ॥ ल०॥ निर्मल भक्ति लाली जगी हो, रिझे एकत्त्यता तान ॥ ल०॥ जिन० ॥६॥ भव वैराग अविरशुं हो, चरण रमण सुमहंत ॥ ल०॥ समिति गुपति वनिता रमे हो, खेले हो शुद्ध वसंत ॥ ल०॥ जि० ॥७॥ चाचर गुण रसीया लिये हो, निज साधक परिणाम ॥ल॥ कर्म प्रकृति अरति गई हो. उलसीत अम्रित उद्दाम ल०॥जि०॥८॥ .

अष्टम श्री दत्तप्रभु स्तवन.
थिर उपयोग साधन मुखे हो,
पिचकारीकी धार ॥ल०॥
उपशम रस भरी छांटतां हो,
गई तताई अपार ॥ ल०॥जि० ॥९॥
गुण पर्याय विचारतां हो,
शक्ति व्यक्ति अनुभूति ॥ल०॥
द्रव्यास्तिक अवलंबतां हो,
ध्यान एकत्त्व प्रसूति।ललना०॥जि॥१०॥
राग प्रशस्त प्रभावनाहो,
निमित्त करण उपभेद ॥ ल०॥
निरविकल्प सुसमाधिमें हो,
भये हे त्रिगुण अभेद ॥ ल०॥जि०॥ ११॥
ईम श्रीदत्त प्रभु गुणे हो,
फाग रमे मतिमंत ॥ ल०॥
पर परिणति रज धोयके हो,
निरमल सिद्धि वसंत ॥ ल०॥ जि० ॥१२॥
कारणथें कारज न हो,
एह अनादिको बाल ॥ ल०॥
देवचंद्र पढ़ पाईन.
करत निज भात्र संभाल लाजि० ॥१३॥

८२६. श्री महो० देव कृत अतित जिन चोविशी. ॥ अथ नवम श्री दामोदर जिन स्तवन ॥ ॥ मोरा साहेब हो श्री शीलाधरे ॥ ए देशी॥ सुप्रतीते हो करि थिर उपयोग के, दामोदर जिन वंदीये ।। अनादिनी हो जे मिथ्या भ्रांतिके, तेह सर्वथा छंडीये॥ अविरति हो जे परिणति दुष्ट के, टाली थिरता साधीए। कपायनी हो कसमलता कापी के, वर समता आराधीए ॥१॥ जंबूने हो भरते जिनराज के, नवमा अतित चोवीशीये ॥ जस नामे हो प्रगटे गुण राशि के, ध्याने शिव सुख विलसीये ॥ अपराधी हो जे तुजथी दूर के, भूरि भ्रमण दुःखना धणी ॥ ते माटे हो तुज सेवा रंग के, होजो ए इच्छा घणी ॥ २ ॥ मरुधरमें हो जिम मुरता लंबके, सागरमें प्रवहण समो॥ ।

नवम श्री दानोदर जिन स्तवन. ८२७ भवभमत हो भविजन आधार के, प्रभु दरशन सुख अनुपमो॥ आतमनी हो जे शक्ति अनंतके, तेह स्वरूप पदे धस्या ।। पारिणामिक हो ज्ञानादिक धर्म के, ख स्वकार्यपणे वत्वा ॥३॥ अविनाशी हो जे आत्मानंद के, पूर्ण अखंड स्वभावनो॥ निज गुणनो हो जे वर्तन धर्म के, सहज विलासी दावनो॥ तस भोगी हो तुं जिनवर देव के, त्यागी सर्व विभावनो॥ श्रुतज्ञानी हो न कही शके सर्व के, महिमा तुज प्रभावनो ॥४॥ निकामी हो निकपाई नाथ के, साथ होजो नित तुम तणो ॥ तुम आणा हो आराधना शुद्धके, साधुं हुं साधकपणो ॥ वीतरागधी हा जे राग विशुद्धके, तहीज भवभय वारणा ॥

८२८ श्री महो देव० कृत अतित जिन चौविशी. जिनचंद्रनी हो जे भक्ति एकवके, देवचंद्र पद कारणो ॥ ५॥ ॥ अथ दशम श्री सुतेज जिन स्तवन ॥ अति रुडीरे अति रुडी जिनराजीनी थिरत अति रुडी ॥ ए आंकणी ॥ सकल प्रदेश अनंती, गुण पर्याय शक्ति महंती लाल ॥ अ०॥ तसु रमणे अनुभववंती, पर रमणे जे न रमंती लाल || अति० ॥१॥ उत्पाद व्यये पलटती, ध्रुव शक्ति त्रिपदी संतो लाल ॥अ०॥ उतपादे उतपतमंती, पूरब परिणति व्ययपती लाल [अ०॥२॥ नव नव उपयोगे नवली, गुण उतिथी ते नित अचली लाल ॥oll परद्रव्ये जे नवि गमणी, क्षेत्रांतरमांहि न रमणी लाल [अ०॥३॥ अतिशय योगे नवि दीपे, परभात्र भणी नवि छीपे लाल . अ०॥

दशम श्री मुज जिन स्तान. .८२९ निज तत्व रले जेलीनी, वीजे किणही नवि कीनी लाल ॥०॥२॥ संग्रह नपपी जे अनादि, पण एवंभूते सादि लाल ॥१०॥ जेहने वहुमाने प्राणी, पामे निज गुण तहनाणी लाल॥अ०॥५॥ धिरताधी धोरता वाधे. साधक निज प्रभुता साधे ।लाल ॥०॥ प्रभु गुणने रंगे रमता, ते पाने अविचल समता ॥ लाल ॥०॥३॥ निज तेजे जेह सुतेजा. जे सेवे धरि बहु हेजा लाल । अ० ॥ शुखालंबन ले प्रनु ध्यावे. ते देवचंद्र पद पाय लाल ॥ ॥ ७ ॥ ॥ अथ एकादशमी तानीनजिन लान । होती रही हो पालना ननि ननि ननि ननितीन नया बानी लिन श्री मही० दव० कृत आतत जन चाविशा. ज्ञेय सकल जाणग तुमे, प्रभुजी ज्ञान दिणंद नाथरे ॥ नमि० ॥१॥ वर्तमान ए जीवनी, परिणति केम नाथरे॥ जाणुं हेय विभावने, पिण नवि छूटे प्रेम नाथरे ॥ नमि०॥ २॥ पर परिणति रस रंगता, पर ग्राहकता भाव नाथरे । पर करता परभोगता, श्यो थयो एह स्वभाव नाथरे नमि०॥३॥ विपय कपाय अशुद्धता, न घटे ए निरधार नाथरे ॥ तो पण बंटुं तेहने, किम, तरिये संसार नाथरे नमि०॥४॥ मिथ्या अविरति प्रमुखने, नियमा जाणुं दोप नाथरे।। नंदू गरह वली यली पण ते पामे संतोप नायरे निमि०॥५॥ अंतरंग पर रमणता, टलक्ष्य किट्य उपाय माथरे ॥ ..

एकादशम श्री स्वामीप्रभो जिन स्तवन. ८३१. आणा आराधन विना, किम गुण सिद्धि थाय नाथरे ॥नमि॥६॥ हवे जिन वचन प्रसंगथी, जाणी साधक नीति नाथरे ॥ शुद्ध साध्य रुचिपणे, करिए साधन रीति नाथरे ॥ न०॥ ७ ॥ भावन रमण प्रभु गुणे, योग गुणी आधीन नाथरे । राग ते जिम गुण रंगमें, সম্ভ दीठां रति पीन नाथरे नमिला। हेतु पलटावी सवे, जोडया गुणि गुण भक्ति नाधरे ।। तेह प्रशस्तपणे रम्या, साधे आतम शक्ति नाधरे निमि०॥९॥ धन तनु मन पचना सो. जोडया स्वामी पाप नाथरे ।। वाधक कारण पारनां. साधन कारण थाय नायर ।। न० ॥ १० ॥ आनमना पलवारां. प्रगटे संबर नप नायर ॥

२३२ श्री महो० देव० वृत अतित जिन चौविशी. स्वस्वरूप रसी करे, पुरणानंद अनूप नाथरे ॥नमि॥११॥ विपय कपाय जहर टले, अमृत थाये नाथरे ॥ जे परसिद्ध रुचि हुयें, तो प्रभु सेवा धरी प्रेम नायरेनमि॥१२॥ कारण रंगी कार्यने, साधे अवसर पामि नाथरे ॥ देवचंद्र जिनराजनी, सेवा शिवसुख धाम नाथरे ॥नमि०॥१३॥ ॥ अथ द्वादशम श्री मुनिसुनत जिन स्तपन । ॥नमणी ग्यमणो ने मन गमणी ॥ देशी। दिठो दरिशण श्री प्रभुजीनो, . साचे रागे मनमुं भीनो ॥ जमु रागे निरागी थाये, तेहनी भक्ति कोने न मुहाये ॥ १॥ पुदगल आमा गगो अनेरा, नमु पामे कृग मारे पंग ॥

द्वादगम श्री मुनिनुबन जिन लवन. जसु भगते निर्भय पद लहिए, तेहनी सेवामां थिर रहियो ॥ २ ॥ रागी तेवकथी जे राचे, वाह्य भक्ति देखीने माचे ॥ जसु गुण दाझे तृष्णा आंचे, तेहनो सुजस चतुर किम वाचे ॥३॥ पूरण ब्रह्मने पूर्णानंदी, दर्शन ज्ञान चरण रस कंदी। सकल विभाव प्रसंग अफंदी, तेह देव समरस मकरंदी ॥४॥ तेहनी भक्ति भवभय भाजे, निगुण पिण गुण शक्ति गाजे दास भाव प्रभुताने आपे, अंतरंग कलिमल सवि का ॥५॥ अध्यातम सुख कारण पूरो. स्वस्वभाव अनुभूति सनूरो। तसु गुण वलगी चेतना कोजे. परम महोदय शुद्ध लहीजे ॥६॥ मुनिसुव्रत प्रभु प्रभुता लीना. आतम संपत्ति भासन पोना ॥

८३४
श्री महो देव का अतित जिन चोविशी.
--------
आणा रंगे चित्त धरी,
देवचंद्र पद शीघ्र वरीजे॥७॥
॥ अथ त्रयोदशम श्री सुमतिजिन स्तवन ।।
॥ कान्हैयालाल ए देशी॥
प्रभुस्यूं इस्यूं विनवुरे लाल,
मुज विभाव दुःख रीतरे साहविया लाल ।
तिन कालना ज्ञेयनीरे लाल,
जाणो छो सहु नोतिरे साहविया लाल ॥प्रभु०॥'
ज्ञेय ज्ञानस्यु नवि मिलेरे लाल,
ज्ञान न जाये तथ्यरे ॥ सा०॥
प्राप्त अप्राप्तमेयनेरे लाल,
जाणो जे जिम जयरे । सा०॥ प्रभु० ॥२॥
छति परजाय जे ज्ञाननारे लाल,
ते तो नवि पलटायरे ।। सा० ॥
ज्ञेयनो नवनवि वर्तनारे लाल,
सधि जाणे असहायरे ॥ सा०॥०॥३॥
धर्मादिक सहु द्रव्यनारे लाल,
प्राप्त भणी सहकाररे ॥साहि० ॥
रसनादिक गुण वर्ततारे लाल,
निज क्षेत्र नं धा॥मा०॥प्र०॥४॥

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८३६, श्री महो० देव० कृत अतित जिन चोविशी.
॥ अथ चउदशम श्री शिवगति जिन स्तवनम् ॥
धारा मेहेला उपर मेह झयुके चीमली तो लाल | देशो!
शिवगति जिनवर देव सेव आ
दोहिली हो लाल ॥ से०॥
पर परिणति परित्याग करे तसु
सोहिली हो लाल ॥ करे० ॥
आश्रव सर्व निवारि जेह
संवर धरे हो लाल ॥ जेह० ॥
जे जिन आणा लीन पीन
सेवन करे हो लाल ॥ पोन० ॥१॥
वीतराग गुण राग भक्ति रुचि
नेगमे हो लाल ॥ भ०॥
यथाप्रयत्ति भव्य जीव
नय संग्रह रमे हो लाल० ॥ नय० ।।
अमृत क्रिया विधि युक्त वचन
आचारथी हो लाल ॥ वचन० ॥
मोक्षार्थी जिन भनि करे
व्यवहारथी हो लाल॥ कर० ॥२॥

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८३८ श्री महो०.देव० कृत अतित जिन बोरिशी. सहज अनंत अत्यंत महंत सुखे भस्या हो लाल ॥ म०॥ अविनाशी अविकार अपार गुणे वस्या हो लाल ॥ अ०॥५॥ जे प्रवृत्ति मूल छेद उपाय जे हो लाल ॥०॥ प्रभु गुण रागे रक्त थाय शिवदाय ते हो लाल ॥ था०॥ अंश थकि सरवंश विशुद्धपणु ठवे हो लाल ॥ वि०॥ शुकल योज शशि रेह तेह पूरण हुने हो लाल ॥ तह०॥६॥ तिम प्रभुथी शुचि राग करे वीतरागता हो लाल ॥ करे०॥ गुण एकत्वे थाय स्वगुण प्राग्भावना हो लाल ॥ स्वगुण ॥ देवचंद्र जिनचंद्र संवामांहि रही हो लाल ॥ सेवा०॥ अव्यावाध अगाध आलम सुग्य मनहा हो लाल ॥ आ०॥७॥ .

पंचदशम भी आस्ताग जिन स्तवन. ॥अथ पंचदशम श्री आस्तागजिन स्तवन ॥ अन्यरे।। । मन मोघं अमापन गुणे ॥ए देशी ॥ करो साचो रंग जिनेश्वर, संसार विरंग सह सुरपति नरपति संपदा, ते तो दुरगंधी कदन्नरे । करो० ॥ १ ॥ जिन आस्ताग गुण रस रमी, चल विपय विकार विरुप रे ।। विण समकिन भने अभिलवे, जिणे चाल्यो शुद्ध स्वरूपरे ।। २.० ॥ २ ॥ निज गुण चिंतन जल रम्या, बांध अनलनो नाप रे ।। नवि व्यापे काप भवस्थिति, जिम शोतने अर्क. प्रतापरे ॥ क० ॥ ३ ॥ जिन गुण रंगी नंगना. नवि पांध अभिनय कर्मर ।। गुण मिनिज गा. आबाट निज पर । क..॥ ८ ॥ तलु

८४. श्री महो० देव० कृत अतित जिन चोविशी.
पर त्यागी गुण एकतत्त्वता,
रमता ज्ञानादिक भावर ॥
स्वस्वरूप ध्याता थई,
पामे शुचि क्षायिक भावरे ॥ करो० ॥ ५ ॥
गुण करणे नव गुण प्रगटता,
सत्तागत रस थीती छेद रे॥
संक्रमण उदय प्रदेशथी,
करे निर्झरा टाले खेद रे ॥ करो० ॥६॥
सहज स्वरूप प्रकाशथी,
थाए पूर्णानंद विलासरे।
देवचंद्र जिनराजनी,
करज्यो सेवा सुख वासरे ॥ करो० ॥ ७ ॥
॥अथ पोडपम श्री नमिश्वर स्वामी जिन स्तवन ।।
॥ हो पोर पंवीडा । एदेशी ।।
जगत दिवाकर श्री नमिश्वर स्वामजो,
तुज मुख दोटे नाठी भूल अनादिनोरेलो।
जाग्यो सम्यग ज्ञान सुधारम धामजो,
छांडी दुर्जय मिथ्यानींद प्रमादनारे लो॥ज०॥१॥

पोडशमा श्रीनमिवर स्वामी जिन सक्न. तहज प्रगट्या निज पर भाव विवेक जो, अंतर आतिन व्हतो साधन साधवरे लोल। साध्यालंबी थई क्षायकता छेक जो, निजपरिणतिधिर निजधर्मरलेठवरेलोज०॥२॥ त्यागीने लवि पर परिणति रस रीझ जो, जागी छे निजात्म अनुभव इष्टतारे लोल ॥ सहजे हुटी आव भावनी वालजो, जालम ए प्रगटी तंवर शिष्टतारे लोलाज०॥३॥ बंधुना हेतु जे के पाप स्थानजो, तुज भगते पाम्या पुष्ट प्रशस्ततारे लोल ॥ ध्येय गुणे वलन्यो पूरण उपयोग जो, तेहथी पामे ध्याताध्येय समस्ततारेलोलाज०॥४॥ जे अति दुस्तर जलधि समो संसारजो, ते गोपद सम कीथो प्रभु अवलंबनरे लोल॥ जाण्यो पूर्णानंद ते आतम पात जो, अवलंब्यो निर्विकल्प परमातमतलनेरेलोलाज०५ स्याहादी निज प्रभुताने एकत्वजो, क्षायिक भावे धाए निज रत्नत्रयीरे लोल।। प्रत्याहार कशेने धार धारण शुद्ध जो, त्यानी पूर्ण नमाधि लय महरे लोलाज॥६॥ ते ८४२ श्री महो देव० कृत अतीत जिन घोविशी. अव्यावाध स्वगुणनी पूरण रीत जो, कर्ता भोक्ता भावे रमणपणे धरेरे लोल॥ सहज अकृत्रिम निर्मल ज्ञानानंदजो, देवचंद्र एकत्त्वे सेवनथी वरेरे लोल || ०७॥ ।। अथ सप्तदशमा श्री अनीलजिन स्तवन । ।। देखो गति देवनी रे ।। प देशी ॥ स्वारर्थ विणु उपगारता रे, अद्भुत अतिशय रिद्धि आत्म स्वरूप प्रकाशता रे, पूरण सहज समृद्धि ॥ अनील जिन सेवीएरे। नाथ तुमारी जोडि न को निहुं लोकरे, प्रभुजी परम आधार अछो भवि थोकने।।१॥ परकारज करता नहिरे, सेव्या पार न हत॥ जे सेये तनमय धईरे, ने लहे शिव संकन करना निज गुण वृमिनार, गुण परिणनि उपभांग ॥ अ०॥२॥ 16

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८५४ श्री महो० देव० कृत अतित जिन चोविशी.
मोही जीव लोहको कंचन,
करवे पारस भारि हो॥
समकित मुरतरु उपवन सिंचन,
घर पुष्कर जलधारि हो ॥ अहो.॥०॥२॥
सर्व प्रदेश प्रगट सम गुणधी,
प्रति अनंत अपहारी हो ।
परम गुणी सेवन सेवक,
अप्रसस्तता वारी हो ।। अहो० ॥ ३० ॥ ३ ॥
पर परिणति मचि रमण महणता,
दीप अनादि निवारी हो।
देवचंद्र प्रभु सेवन ध्यान,
आनम शनि समारी हो ॥ अहो ॥ २० ॥४॥
॥ अथ एकोनविंशतितम कृतार्थ जिन नवन ।।
॥अधिनागमारा
•
যা যা লিনী মন মা,
पग मत मागी भाई।
मननन : मन.
आम ना al. ॥10॥१॥

एकोनधिमानितन श्री वृतार्य जिन स्तवा. ८४९
भक्ति नहि ते तो भाडायत,
जे सेवा फल जाचे ॥
दास तिले जे घन भरि निरखी,
केकीनी पर माचे ॥ तेवा०॥२॥
सारी विधि सेवा सारंतां,
आण न कांड भाजे॥
हकम हाजर लिजमति करतां,
सहजे नाथ निबाजे ॥ तेत्रा० ॥३॥
साहिब जाणो छो तहु वाते,
शुं कहीए तुम आगे ॥
साहिब जनमुख अमे मागणनि,
वात कारमी लागे । ले०॥४॥
स्वामि कृतारथ तो पण तुमथी,
आश सहुको राखे ॥
नाथ बिना लेबकनी चिंता,
कोण कर विज नावे ॥ लेवा० ॥ ५॥
तुज सेवा फल मान्या तां.
4 काचा ।।
विण माय वहिन पल आप.
निण देवच पद साची ।। ले० ॥ ६ ॥

८४६ श्री महोदेव० कृत अतीत जिन चोविशी.
॥ अथ विंशतितम श्री धर्मावर जिन स्तवन ।
अखीयां हरखन लागी हमारी अग्नीयां ॥ ए देशी ॥
॥राग प्रभाती॥
हुं तो प्रभु वारि छु तुम मुखनी,
हुँ तो जिन वलिहारी तुम मुखनी ॥
समता अमृतमय सुप्रसननी,
त्रेय नही राग रूखनी ॥ हुं० ॥१॥
भ्रमर अधर सिस धनु हर कमल दल,
कीर हीर पुन्यम शशीनी ॥
शोभा तुछ प्रभु देखत याकी,
कायर हाथे जिम असिमी ॥ १० ॥२॥
मन मोहन तुम सनमुख निरखत,
आंख न तृपति अम्हची॥
मोह तिमिर रवि हरख चंद्र छत्री,
मुरत ए उपशमची ॥ हुं० ॥३॥
मननी चिंता मटी प्रभु ध्यावत,
मुख देखतां तुम जिनजी॥
इंद्रि तृपा गई जिनेश्वर सवतां,
गुण गानां यचननी ॥ १० ॥४॥

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८४८ श्री महो देव कृत अतीत जिन घोषिशी. परमानंदि हो तुं परमातमा, अनिनाशी तुज रीत॥ प. गुण जाणी हो तुम वाणी थकी, ठहराणी मुज प्रीत ॥ श्री० ॥ ३॥ शुद्ध स्वरूपी हो ज्ञानानंदनी, भव्यावाध स्वरूप। भवजल निधि हो तारक जिनेवर, पग्म महोदय भूप ॥श्री०॥४॥ निग्मम निमंगी हो निग्भय अधिकारना, निरमल, महज गमुद्धि ॥ अष्ट करम हो वन दाहथी, प्रगटी अन्यय रिद ॥श्री॥५॥ आज अनादिनी हो अनंत अक्षता, . अक्षा अनआ कप। अयल भाल हो अगल भगमन, चिदानंद विदा ।। श्री०॥६॥ अनंत मानी हो अनंत दांनी, अनाकागरिकता दोकाला हायकमाकर,

एकविंशतितम श्री शुद्धमति जिन स्तवन.
८४९
ने निज पासे हो ते शुं मागीए,
देवचंद्र जिनराय ॥
तो पण मुजने हो शिवपुर साधतां,
होजो सदा सुसहाय ॥ श्री० ॥८॥

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॥ अथ श्रीदेवचंद्रजीकृत स्नात्रपूजाविधि प्रारंभः॥ ॥ प्रथम निरसहीतक भीदेगमाम आगे अंग प्रद करी, नान बस पांग. सभालदिलर. नी. दाजोटनी था- पना करी. ते उपर बाजोट माढा. कान पीट उपर पालनी स्थापना करखी. ते उपर नलनी गर्हः कानी ॥ तेनी जर रूपाना तथा नाली पर धरी ने पी कार्वा पोताने हा काली सांवनया बाजा कलमा प्रमुख स्थान नदी दन दरी, कमाने र दद, दुध, दक्षि. इत, जन तथा रंग, ए पंचानन कला भरी सका. पी नरोदा जी मूल नापती आगल जानी नम्बरवरी, अप- हामा लार संन्यो ।। है ममने मुख मा. भी गापा वी ते आसमान ॥ अगामिदिन का ग कसा लिहा- विधा. cिt नासिक स्नान पूजा विधि. ।। ए गाथाओ कह्या पछी प्रथम अक्षतर्ने धोइ तेओ ने केशर तथा चंदन लगाइबुं, तथा पुष्पोने पण जलयी शुद्ध करी राखवां, तदनंतर ते अक्षत तथा फुलनी कुसुमां- जालि हायमां लइ, उमा थइने " नमो अरिहंताणं, नमोऽहं- सिद्धा० " ॥ एम पाठ कहेलो. अने पछी ये श्लोक पटम करवा, ते आ प्रमाणे:- ॥ श्रीमत्पुण्यं पवित्रं कृतविपुलफलं मंगलं लक्ष्म लभ्याः, क्षुण्णारिष्टोपसर्गग्रहगतिविकृतिस्वप्नमुत्पातवाति ॥ संकेत कौतु- कानां सकलमुखमुख पर्व सर्वोत्सवाना, मात्र पावं गुणानां गुरुगरिमगुरो वैचिता यै न दृष्टम् ॥१॥ अशेषभवनांतराभि- तसमाजखेदामो, नचापि रमणीयतामतिशयीत तस्यापरः ।। प्रदेश इह मानतो निखिललोकसाधारणः, मुमेरुरिति तापिनः सपनपीठमावं गतः ॥ २ ॥ ॥ एम कडा पछी लाच पीठ सन्मुख कुसुमांजलि अर्पण करवी, तदनंतर लापनपीठ पखाली लछीने कुंकुमनो स्वस्तिक करवो, धूप उखेकयो, अने सर्व स्नाधीयाओना हापने धूपावली आपवी, पछी कर लगाडबो, अने एक नवकार कहीने नापीठ उपर प्रतिमाजींनी स्थापना करवी, ते प्रतिमा प्रायः पंचतौर्थिक, अर्थपरकरसंयुक्त स्थापी, तेना मुख आगल अक्षतोनी ढगठी करवी, अने तेनी उपर पंचामृतनो एक कलश मुकवो, पछी हायमां कुसुमांजलि लड्ने "मुक्तालंकार विकार०॥ ए आर्या भगी कुसुमांजलि अर्पण करीने, प्रति. माजीनां निर्माल्य उतारी प्रशासन करवू, अंगलहणायी प्रमा जिंने धूप उखेववो, अने केशर, चदन, कर तथा कस्तुरी स्नान पूजा विधि. " घसी ते पवित्रभाजनमा भरीने ते भाजन प्रतिमाजी आगल धरखं बड़ी कुसुमांजलि हाधमां लइ उभा घई इच्छ णमो अरिहंताण ॥ नमोऽहत्सिद्धः ॥" कहीने बान पूजानी पहेली पांखडी कवी, एन अनुक्रमें पांच पांखडी कही कुस- मांजलि पूर्ण करीने हायमां चामर लइने तेने भगतनी उपर ढोलतो ।। वस्तु॥ सपल जिनवरयी मांडीने यावत् बधाई बचाई थइ अतीव " सुधीनो पाठ कहे, ते पूर्ण थया पछी चैत्यवंदन करो. पठी शकस्ता कही जयवीयराय सुधी भणबु. पछी हाय घोई धूप कर्पूरादिक हाथने लगाया, त्यार के ने पूर्व कलशोने घोइ धूप आपी कै मोलीसूत्र बांधी उपर स्वस्तिक करी ओमां पंचामृत भरी, अक्षतोना दग- लाओ उपर धारण करी तेनी उपर अंगलहणां बांकी धूप उखेवी, वेजोमांना मात्र बेज कलशोने आसपास जलधारा देइने रास्या होय पछी मात्रीयाना हाथमा स्वस्तिको करी से जणो श्रेणीवर उभा रहेg, अने प्रत्येक सानीआयें समासमण देइ, पंचांग नमस्कार करतो, पछी प्रत्येक स्नात्री- यायें पोताना दे हाधमां कलशो टेवा, ते कलशधारक स्त्रावी- पायें पोताना बने हाथने विष रहेला कलमने उत्तरासंग वन- वडे बंकी राखबा, अने पोनें उभा उतां मुखर्या "श्री तीर्थपतिनो कलश मजन इहांची मांडीने संपूर्ण पूजा भणावी. त्यार पड़ी प्रतिमासा उपर कलशो ओडी. पखाल करी अंगल हणायी मजन . केशर वहनयाँ अर्चन करीने फूल चटाका २, पानमा बालन का विवना स्थापना वा ।। जने घर को सद आ पाट भगादी:- "

८५४.
स्नात्र पूजा विधि.
॥ अथ कलश ढालवा समयनुं स्तवन ॥
॥ इंद्र कलशभर ढाले श्रीजिन पर ॥ इंद्र कलशा ||
हाथो हाय अमरगण आनत, सीर विमल जलधारे । श्री
जिनपर० ॥१॥ सुरवनिता मलि मंगल गावे, भारत भार
महारे ॥ श्री जिनपर० ॥२॥ फिनर अरु गंधर्व महोरंग
निरत नीर नित्य सारे ।। श्री जिनपर० ॥ ३॥ देव इंदु.
मिनि गर्जत अति, शिर पर गुजरा वियारे ॥ श्रीजिनपर
॥४॥ परमानंद जिनराज जगतपद, जगजीवन दिताारे ।।
श्रीजिनपर० ॥ ५॥ इति कलश ढालया समय स्तान ।।
। पी केनीमां सृगपाणी लइने आरतिनी कार
अने ते वरतं मुखयकी गाथाओ कद्देवी, ते आधी रीत.-
॥ अथ लूण उतारण गाथा ।।
॥ उवहि पडिभग्ग पसरे, पयादिणं मुगिरह करेऊयं ॥
पइ सत्रण तणनियं रणं दृ अवहमी ॥१॥दोहा॥
सिरके विग मुह निगाह, दीहर नया II हाइ गुरु
मा मरिय, जलगी पम्मद दा ॥ २ ॥ एतारिद निय
वाह, तिनि पयादिय देउ ॥ नट्या मर गति पर रिजा
विजा टेग ॥३॥ गाथा । जेविज दिनःग
1 तह निहल्यह मम्मः ॥ जिम मधोका टायर
नासम्म ॥ ४ ॥ ॥ गया वीर मान महिमा
mm पन मग
1112

स्नान पूजा . ॥ दोहा ॥ सई मुनिस्ट् जटविजड, तं तह भमलइ पास ॥ अहव कपंतसनिम्मल, निन्गुण बुद्धि पपास ॥१॥ जल आगेविण जलनिह पानह, भर विकपंजलि भाविहि पासह ॥ तिति पयाहिण दितिय पासह, जिम जिउ घट्टई भत्र दुह पासह ॥ २ ॥ जल निम्मट कर कमलहि लेविय, सुरवर भावहि मुनिवर सेवितु ॥ पन जिणवर तह पद तरण, भय तुट्टई सामद सिद्धि गमगं ॥३॥ गाथाओ कडी लग पानी उतारीने जल मारण काडे, त्यार पी माला टइ उमा रहिने आ प्रमाणे गायाजो कहेवी:- अथ पुप्पमाला पूजा गाथा ॥ । आय पजय भत्ताम निपटाने मंदिरं ताल । जिपपाले भनिय जिजाम निपटाने सटि तम (पाटां. तरे) विपनर पर ॥१॥ म्हो जिनपभो. ཎY ཝཱགྷ བག ::1 '' ཡསམྨེ, ཨུ ཨུ་ महत दुइ दिद. मह निवटे बोट दान समय नम ॥६॥ एपाट मानिने महाप - ॥ अथवा फुलपूजा गाया ॥ पिन स्नात्र पूजा. " बुट्टी ॥ २ ॥ ए पाठ कहीने प्रमुनी आगल फूलो उछा- लवां, हवे आभरण तथा वस्त्रो लइने उभा छतां गाथाओ कहेवी, ते आ प्रमाणे:- ॥ अथ वस्त्राभरण पूजा। ॥ श्लोकः ॥ शकोयया जिनपतेः मुरशैलचूला, सिंहा- सनोपरि मितस्नपनाऽवसाने ॥ दध्यक्षतैः कुसुम चंदनगंध- धूपैः, कृत्वार्चनं तु विदधाति सुवस्त्रपूजा, ॥ १ ॥ तद्वत् श्रावकवर्गएप विधिनालंकारवस्त्रादिकां, पूजां तीर्यकृतां करोति सततं शत्यातिभत्तयाहतः ॥ नीरागस्य निरंजनस्य विजिता- रातेत्रिलोकीपतेः, स्वस्यान्यस्य जनस्य नितिकृते क्लेशक्षया- कांक्षया ॥२॥ एम कही आभरण तथा वस्त्र पूजा करवी ।। ॥ पछी ज्ञान पूजा करे, तेनी गाथाओ ॥ ॥ नमंति सामिति महीवनाहं, देवाय पूयं सुजहेव पुर्व ॥ भत्तीय चित्तं मण दामएहि, मंदार पुप्फेह सवेह नाहं ॥ १ ॥ तहेव सहा मण मुत्त एही, सुगंध पुप्फेह वरंसएहिं ॥ पूर्यत वंदंत नमंत नाणं, नाणस्स लाभाय भवरकयाय ।। २ ॥ए गाथाओ कहीने पुष्पोनी माला चहाववी, तया रौप्पमुद्रा, सुवर्णमुद्रा, मणि रत्न, अने वस्त्र एओयें करी स्वशक्ति अनु- सार ज्ञाननी प्रजा करवी. ॥ पछी धूप करती वरखतें आ गाथा कहेवी ॥ ॥ मीनकुग्गमुद्रारममार, सारसुगवनिशाकरतारं ॥ नार- मिलन्मलयोन्यविकार, लोकगरोह पमदार ।। २ ॥ एम

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स्नान पूजा. " युट्टी ॥ २ ॥ ए पाठ कदीने प्रमुनी आगल फलो उद्या लवां, हवे आभरण तथा वस्त्रो लइने उभा छतां गापा कद्देवी, ते आ प्रमाणे:- ॥ अथ वस्त्राभरण पूजा ॥ ॥शोकः ॥ शकोयया जिनपतेः सुरशैलचूला, सिंहा सनोपरि मितस्नपनाऽवसाने ॥ दव्यशतैः कुसुम पंदनगंध धूपः, कृत्वार्यनं तु विदधाति सुवराजां, ॥ १ ॥ तदन श्रावकवर्गएप विधिनालंकारवस्त्रादिकां, पूजां तीर्यकृतां करोति सततं शनयातिमत्तयाहतः ।। नीरागस्य निरंजनस्य विजिता- रावेनिलोफीपतेः, स्वस्यान्यस्य जनस्य नितिकृते केशाया- कांक्षया ॥२॥ एम कही आभरण तथा वन पूजा करी ॥ ॥ पछी ज्ञान पूजा करे, तेनी गाथाओ। । नर्मति सामिति महीपनाह, देवाय प्रपं गुजहे। पुरं ॥ भतीय चित्तं मण दामपहि, मंदार पुरफेह सोह नाहं ॥१॥ तहेव सट्टा मण मुत्त पटी, सुगंव पुष्फेह यरंगएहि ॥ दन बदंत नमंत नाणं, नाणम्म लामाय भवरकयाय ।। गायाभो कदीने पुष्पोनी माला पहावी, तथा रोपा गुवर्णमुद्रा, मी रत्र, अने यन्त्र एओ करी सशक्ति अनुः मार माननी पहा काही. ॥ पछी धूप करतो ययतें आ गाथा कहेगी। 1 मीनगटाममार, गरमगनिमारना || I दिमटकार लोगो नाम ।। २ ॥ पर

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स्नात्र पूजा. - बुट्टी ॥ २ ॥ ए पाठ कहीने प्रमुनी आगल फूलो उहा- लवां, हवे आमरण तथा वस्त्रो लइने उभा छतां गाथाओ कहेवी, ते आ प्रमाणे:- ॥ अथ वस्त्राभरण पूजा ॥ ॥ श्लोकः ॥ शकोयया जिनपतेः सुरशैलचूला, सिंहा- सनोपरि मितस्नपनाऽवसाने ॥ दध्यक्षतैः कुसुम चंदनगंध- धूपैः, कृत्वार्चनं तु विदधाति सुवस्त्रपूजां ॥ १ ॥ तत् श्रावकवर्गएप विधिनालंकारवस्त्रादिकां, पूजां तीर्यकृतां करोति सततं शक्तयातिभन्याहतः ।। नीरागस्य निरंजनस्प विजिता. रातेत्रिलोकीपतेः, स्वस्यान्यस्य जनस्य नितिकृवे क्लेशझया- कांक्षया ॥२॥ एम कही आभरण तथा वस्त्र पूजा करवी ॥ ॥ पछी ज्ञान पूजा करे, तेनी गाथाओ ।। । नर्मति सामिति महीवनाह, देवाय पुयं सुजहेव पुर्व ॥ मतीय वित्तं मण दामएहिं, मंदार पुप्फेह सवेह नाहं ॥१॥ तहेव सट्टा मण मुत्त पही, सुगंध पुप्फेद वरंसएहि ॥ पूर्यत वंदंत नमंत नाणं, नाणस्स लाभाय भवरकयाय ॥२॥ गायाओ कहीने पुप्पोनी माला चढावबी, तथा रौप्यमुद्रा, सुवर्णमुद्रा, मणि रन, अने वस्र एओ करी स्वशक्ति अनु. सार ज्ञाननी पूजा करवी. ॥ पछी भूप करतो वखतें आ गाथा कहेवो ॥ ॥ मीनरागमहाग्ममार, माग्मगधनियाकग्ना ॥ ना' मिटन्मलयोन्यविकार लोगो याम ।। २ ॥

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पती ॥ २॥ पार नहीने प्रमनी भागल हो उहा- टयां को आमतमा गमोलने उभाना गायानो फदेशी आ प्रमाण:- ॥ अथ यात्राभरण पूजा ॥ ॥ोरः || शोपपा जिनतः मुरशैलगा, सिंहा- सनोपरि मितानानासाने ॥ दयानः कुसुम चंदनगर- धूपः, कृपानं तु दिधाति सुखाजां, ॥ १ ॥ तदा आफरगंगा विभिनाकारसत्रादिकां, पूजां तीयेस्तां करोति सततं शनपातिभतपालः ॥ नीरागस्य निरंजनस्य विजिता- रावेसिलोझीपोः, सस्यान्यस्य जनस्य निरंतिकते क्लेशया- कांक्षपा ॥२॥ एम कही आभरण तथा यस पूजा करवी ।। ॥ पछी ज्ञान पूजा करे, तेनी गाथाओ । ॥ नमंति सामिति महीनाहं, देवाय पुर्य सुजहेब पुर्व ॥ भत्तीय पितं मण दामपहि, मंदार पुप्फेह सवेह नाहं ॥१॥ तहेव सहा मण मुत्त एही, सुगंध पुप्फेह वरंसएहि ॥ पूर्णत वंदंत नमंत नाणं, नाणस्त लाभाय भवरकयाय ॥ २ ॥ ए गाथाओ कहीने पुष्पोनी माला चढावती, तथा रौप्यमुद्रा, सुवर्णमुद्रा, मणि रत, अने वख एओये करी स्वशक्ति अनु. सार ज्ञाननी पूजा करवी. ॥ पछी धूप करतो वखतें आ गाथा कहेवी ॥ ॥ मीनकरगमदारममार, माग्मगवनिशाकरतार ॥ तार- मिलन्मलयोल्यविकार, रोकगरो अपमदार ।। २ ।। राम । अब मंगलदीपक पूजा :- TA- --- Ph खात्र पूजा- बुट्टी ॥ २ ॥ ए पाठ कहीने प्रभुनी आगल फलो उछा- लवां, हवे आमरण तथा वस्त्रो लइने उभा छतां गाथाओ कहेवी, ते आ प्रमाणे:- ॥ अथ वस्त्राभरण पूजा ॥ ॥ श्लोकः ॥ शकोयया जिनपतेः सुरशैलचूला, सिंहा- सनोपरि मितस्नपनाऽवसाने ॥ दव्यशतः कुसुम चंदनगंव- धूपैः, कृत्वार्चनं तु विदधाति सुवस्त्रपूजा, ॥ १ ॥ तदन श्रावकवर्गएप विधिनालंकारवस्त्रादिकां, पूजां तीर्थकृतां करोति सततं शन्यातिभन्याहतः ।। नीरागस्य निरंजनस्प विजिता रावेस्त्रिलोकीपतेः, स्वस्यान्यस्य जनस्य नितिकृते क्लेशक्षमा कांक्षया ॥२॥ एम कही आभरण तथा वस्त्र पूजा करती ॥ ॥ पछी ज्ञान पूजा करे, तेनी गाथाओ। ॥ नमति सामिति महीवनाहं, देवाय पूपं सुजहेब पुर्व ॥ भत्तीय वितं मण दामएहि, मंदार पुप्फेह सवेह नाहं ॥ १ ॥ तदेव सट्टा मण मुत्त एही, सुगंध पुप्फेद वरंसएहि ॥ पून वंदंत नमंत नाणं, नाणस्स लाभाप भवरकयाप ।। २ ॥ 'गायाओ कहीने पुप्पोनी माला चढावी, नया रोप्यमुद्रा, सुवर्णमुद्रा, मणि रत्न, अने वन एओयें करी स्वशक्ति अनु- सार ज्ञाननी पूजा करवी. ॥ पछी धूप करती वखतें आ गाथा कहेवी ॥ ॥ मीनकुरंगमदारमसारं, सारसुगंधानिशाकरतारं ॥ नार मिलन्मलयोल्यविकार, लोकगरोह धूपमुदारं ॥ २ ॥ एम नात्र पूजा विधि. ८५७ वडीने खूप खेयो. पछी मंगल दीपक करीने आ गाथाओ कवी- ॥ अथ मंगलदीपक पूजा ॥ ॥ कोसंबी संहपस्तवि, पयाहिणं कुणइ मउलियप- ईबो ॥ जिणलोम दसणोदिण, यररुव तुह नाह मंगल पईवो ॥ १॥ मानीजतो सुर सुंदरीहि, तुहनाह मंगल पईयो । कणपापलरस निझिय, भागुच पयाहिणं दितो ॥२॥ मर- गप सामल घालबरे विश, कोमल सरलिहि करिहिं करेविण, ने उजाट मंगल पईयो, तो नर होइ तिलोय पईवो ॥३॥ ए गाया कदीने मंगलप्रदीप करवो, पछी रकेवीमां कपूर धरी, आरतिमां बत्ती सलगावीने मुखधकी आ गापाजो कहेवीः- ॥ अथ आरति गाथा ।। - ॥ मरगप माग गडिय, विसाल थाट माणिक मंडिय पयो । प्हाण परकुरु खित्तं, भमउ जिण आरतियं तुम्हं ॥ १॥ आरति निपत्यह, निणरस धून किसणागरुच्चार्य ।। पासेसु भमा निजिप, संगमय विमिनादिठित् ॥ २ ॥ पस- पेपो भवंतर, समग्जिकम्मरे संवायं ।। आरतिय मंग- गा, उन्हरंति सलिलधारा ॥३॥ एवी रीते आरति काखी । रति संक्षेप आरतिविधिः ॥ ॥ पछी उत्तरासंग करी, वैल्पवंदन करई, अने बाद प्रकारे पूजा करावी. स्वाचित अध्यकारें पूजा नवराय तो शेष फल फूल्ने नैवेद्य जे होय, ते एमज वाली देह.

८५८
स्नान पूजा विधि.
गुणगीत करवां, जय जय शब्द उच्चारवा, साहामीवात्सल्य
करवू तथा यथाशक्ति दान देवु ॥ इति श्री लावपूजाविधिः
समाप्तः ॥
॥ आरति ॥ दीपक ॥ लूणजलविधिः प्रारभ्यते ॥
प्रभुयी अंतरपट करी, प्रमु सन्मुख देशी आरति कर
नारने नव अंगें कुंकुमनां तिलक करवां. पछी एक थालमा
स्वस्तिक करी, तेमां आरति, मंगल दीपक, जमणी बाजु
राखी, त्यां आरतिमा घृत थोडं भर. अने मंगलदीपकमां
घृत पूर्ण भर. पछी केशर, फूल, तंदुले करी, तेनी पूजा
करवी. उपर कुंकुमना छोटा नांखी मंगल दीपक प्रगटात्रो
अने कर सलगावयो तेनो मंत्र कहे छे. ॐ अहवे पंचज्ञा-
नमहाज्योतिर्मपाय, वांतवतिने द्योतनाय, प्रतिमाप दीपो
भूयात्सर्वदाहते ॥ १॥ एम भणी ॥ मंगलदीपक प्रगटावीने
पछी ते मंगलदीपायी आरति प्रगटावी, पछी दीवो नीचे
मूकीने आरति उतारवी, तेवार पछी दीपक उतारे, पड़ी
लूणनी काकरी लेइ “लण उतारो जिनवर अंगे"
पाठ कही लूणनी गाया भणवी, पछी बृहच्छांति कईवी, ते
न आवडे तो प्रण नवकार गणी, आ प्रमाणे श्लोक कहेवो
॥शोक ।। आजाहीनं क्रियाहीनं मंत्रहीनं च यत्कृतं ।।
तत्सर्व क्षमया देव, क्षम त्वं परमेश्वर ! ॥१॥ एम वहीं
चैत्यवंदन करचें ॥ इति आरति दीपक लण जल विधिः ।।
इत्यादिक
.
८

८५९ ॥ नानपूजा प्रारंभः॥ (पांवडी गाथा ) | दाल पहेली ।। ।। जलसे अतिलप कुमओ, वचनातितप उत्त, सो पानेला देखि नकि, विहान संपत ॥ १ ॥ ॥ नाल॥ ॥ विहान देवा जगभ... देखि भविक उन गुरु- मनि सन ॥ जे दी तुज निर्मल ना रहे परन महोदय ॥ कुमनांजलि मेहलो आदि जिश तोतं चरनमल सेवे दोसः इंज्ञा ॥ १० ॥ १ ॥ चोवीस वैरागी, घोश तोनानी, नवीन जिता ॥ ॥ एन यही प्र. मुना बने पूजा करी ॥ ॥गाथा ॥ ।। जे निपगुन पच्न स्लो तनु अन्नः एतु ।। तह पुगल अरोत जोन रंग नित ।। २ ।। ॥दार। दी ले पानेनिन पारन. पोलीभाव दर्शन ।। कुमति लेते नि ।। ॥३॥ एन रहो पनुन बहरे ॥ माया।

हात्र पूजा. ॥ ढाल॥ ॥ लोकालोक प्रकाशक नाणी, मविजन तारण जेहनी वाणी ॥ परमानंदतगी नीशानी, तसु भगत मुज मतिय ह. राणी ॥ कुसुमांजलि मेहेलो नेम जिगंदा, तो० ॥ कुछ ॥३॥ एम कही प्रभुना ये हायें पूजा करी ये ॥ ॥गाथा॥ ॥ जे सिज्झा सिझंति जे, सिज्झंसंति अणंत ।। जसु आलंबन टविय मण, सो सेवो अरिहंत ॥ ४ ॥ ॥ढाल॥ ॥ शिव सुख कारण जेह त्रिकालें, समपरिणामें जगत निहाले ॥ उत्तम सावन मार्ग देखाडे, इंद्रादिक जसु चरण पखाले ॥ कुसुमांजलि मेहेलो पास जिणंदा ॥ तो० ॥ कु० ॥४॥ एम कहीं प्रभुना खंभा पूजा करी में । ॥गाथा॥ ॥ समदिठी देस जप, साहु साहुणी सार ॥ आचारिज उवझाय मुणि, जो निम्मल आधार ॥ ५ ॥ ॥ढाल। ॥ चउविह संवें जे मन धायु, मोक्षत कारण निर- धार्य ॥ विविह कुसुम वर जाति गहेवी, तसु चरणे पण मंत टवेवी ।। कुसुमांजलि मेहेलो वीर जिणंदा ॥ तो० ॥ कु० ॥ ६ ॥ एम कही प्रभुने मस्तकें पूजा करी ॥ इति पांखही गाथा ॥ । यस्तुरचंद ॥ ॥ मयल जिनवर मयल जिनवर, नमिय मनरंग काला- हान पूजा. णकविहि संपविय, करिस धम्म सुपवित ॥ सुंदरसय इगस- तरि तित्यंकर, एक समय विहरति महीयल, चरण समय इगवीस जिण, जम्म समय इंगवीस ॥ भत्तिय भावें पूजीया, करो संच सुजगीस ॥ १ ॥ ॥ बाल वीजी॥ ॥ एक दिन अघिरा हुलरावती ।। ए देशी ।। ॥ भव त्रीले समकित गुण रम्या, जिन भक्ति प्रभु सगुण परिणम्या, तजि इंद्रिय सुख आशंसना, करी स्थानक वोशनी सेवना ॥ १ ॥ अति राग प्रशस्त प्रभावता, मन भावना एहबी भावता, सवि जीव करुं शासन रसी, इसी भाव दया मन उल्लसी ॥ २ ॥ रही परिणाम एहबुं भलं, निपजावी जिनपद निर्मलं ॥ आयुबंध व एक भव करी, अशा संवेग ते पिर धरी ॥ ३ ॥ त्यांयी चविय लहे नर- भव उदार, भरते तेम ऐवतेंज सार, महाविदेहे विजयें वर प्रधान, मत्य खंडे अवतरे जिन निधान ।। ४ ।। ।। अथ सुपनानी ॥ दाल त्रीजी ।। ॥ पुण्ये सुपनह देखे, मनमाहे हर्ष विशेषे, गजवर उज्वल सुंदर, निर्मल वृषभ मनोहर ॥ १ ॥ निर्भय केशरी सिंह, लक्ष्मी अतिही अवीह ।। अनुपम फूलनी माल, निर्मल शशी सुकुमार ॥२॥ तेजेंतरणी अति दीपे जीपे, पूरण कलश पडूर, पद्म सरोवर पूर ।। स्यणायर, देखे माताजी गुण सापर ॥ बारे तेरने अनुपम रस निधान ॥ ४ ॥ अग्निशित माताजी अनुपन ॥ हा रापने भासे, राजा सार पूजा. ॥५॥ जगपति जिनपर सुरखकर, होशे पुत्र मनोहर ।। इंदादिक जसु नमशे, सकल मनोरथ फलशे ॥६॥ ॥ यस्तुद॥ ॥ पुण्यउदय पुण्यउदय उपना जिननाह, माता रपणी समे, देखी सुपन हरसंती जागीय ॥ सुपन कही निन कंतने, सुपन अरय सांभलो सोभागीय ॥ विभुपन लिटर महागुणी, होशे पुत्र निधान ॥ इंद्रादिक जरा पाप नगी करशे सिद्धि विधान ॥ १ ॥ ॥ दाल ॥ चोथी । चंद्रावलानी देशीमा ।। ॥ सोहमपति आसन कंपियो ए, देइ अवधि मन आण- दियो ए॥ निज आतम निर्मल करण काज, भा जलनारण प्रगट्यो झहाज ॥१॥ भवानी पाग सन्यवाह, केरल नागाइप गुण अगाह ।। शिव साधन गुण अंगे जेह, कागण उटयो आमादि मेह ॥ २॥ हा विरामी ना रोमराय, मलयादिकमा निज ननु न माप || सिंज्ञामनयी उत्यो मुन्दि, प्रगमतो जिन आनंदकद ॥ ३॥ राग अशा सहा मो आवि सम्प, करि अभीप प्रणीय मय । मु भागे पशुण भाज मार, तिय लोप पट्ट दीटो मा ॥४॥ निमुमो मा टोय देव, पियानर नापित तुम सोनम गति का नया गमान. मिथ्या in Pा गमहान ॥ ५॥ ते दर माट नागा मम, मायो नानी हो मनाम ॥ पम मामी, ना देगी " irrन, पोष - स्नान पूजा. ८६३ " वघे सुर हर्ष धाम ॥७॥ पिता माता धेरै उत्सव अशेष, जिन शासन मंगल अति विशेष ॥ सुरपति देवादिक हर्ष संग, संयम अर्थिजनने उमंग ॥८॥ शुभवेला लगनें तीर्थ नाथ, जनम्या इंद्रादिक हर्ष साय ॥ सुख पाम्या त्रिभुवन सर्व जीव, वधाई वधाई घइ अतीव ॥ ९ ॥ ॥ ढाल ॥ पांचमी ॥ ॥ श्रीशांति जिननो कलश कहि प्रेम सागर पूर ॥ ए देशी ।। ॥ श्रीतीर्थपतिनं कलशमन्जन, गाइयें सुखकार ॥ नर- खित्त मंडण दुह विहंडण, भविक मन आधार ॥ तिहां राव राणा हर्ष उत्सब, थयो जग जयकार ।। दिशकुमरी अवधि विशेष जाणी, लयो हर्ष अपार ॥१॥ नियअमर अमरी संग कुमरी, गावती गुणछंद ॥ जिन जननी पासें आवि पोहोती, गह गहती आणंद ॥ हे माय ! तें जिनराज जायो, सुचि वधायो रम्न ॥ अम जम्म निम्मल करण कारण, क- रीश सूईकम्म ॥२॥ तिहां भूमि शोधन दीप दर्पण, वाय वीजण धार ॥ तिहां करीय कदली गेह जिनवर, जननि मज्जनकार ॥ वरराखडी जिनपागी बांधि, दीये एम आशीष ॥ जग कोडा कोडि विरंजीवो, धर्मदायक ईश ॥३॥ ॥ ढाल || छठी । एकवीशानी ॥ ॥ जग नायकी, विभुवन जन हितकार ए॥ ॥ परमातमजी, विदानंद घनसार ए॥ ए देशी ॥ ॥ जिन रयगीजी, दशदिशि उज्ज्वटता धरे ॥ शुभ- लगनेजी, ज्योतिष चक्र संचरे ।। जिन जनम्याजी, तेणें अवसर माता धरै ।। तेणे अवमाजी, इंद्रासन पण घरहरे ॥ -

८६४
स्नान पूजा.
॥ त्रुटक ॥
॥ थरहरे आसन इंद्र चिंते, कोण अवसर ए बन्यो ।
जिन जन्म उत्सव काल जाणी, अतिही आनंद उपन्यो ।
निज सिद्धि संपत्ति हेतु जिनवर, जाणी भक्तं ऊमह्यो ।
विकसित वदन प्रमोद वधते, देव नायक गहगयो ॥१॥
॥ढाल॥
॥ तव सुरपतिजी, घंटानाद कराव ए ॥ मुरलोकेंजी,
घोषणा एह देवराव ए ॥ नरक्षेत्रे जी, जिनवर जन्म हुओ
अछे । तसु भगते जी, सुरपति मंदर गिरि गछे ।।
॥टक ॥
॥ गच्छेति मंदर शिखर उपर, भवन जीवन जिन तणो॥
जिन जन्म उत्सव करण कारण, आवजो सवि सुरगणो ।
तुम गुद्ध समकित थाशे निर्मल, देवाधिदेव निहालतां ।।
आपणां पातक सर्व जाशे, नाय चरण पखालतां ॥२॥
॥ एम सांभली जी, मग्बर कोडी बहु मली ॥ जिन-
दनजी, मंदरगिरि सामा चली ॥ मोहमपतिजी, जिन जननी
घर आविया । जिन मानाजी, बदी स्वामी बधाविया ।।
॥ रक॥
॥ वधाविया जिन हा रे धन्य ह कृतपुण्य ए॥
लोक्य नायक देश मागी मन ममो को अन्य ए॥
है जगत जनन
मन्जन व करी॥
नमा गय भरी ॥३॥

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८६६
मात्र पूजा.
करि सहस अट्टोतरा, छत्र चामर सिंहासण शुभतरा ॥ उप-
गरण पुप्फ चंगेरी पमुहा सवे, आगमें भासिया वेम आणी
टवे ॥२॥ वीर्थजल भरिय करकलश करि देवता, गाना
भावता धर्म उन्नतिरता ॥ तिरिय नर अमरने- हर्ष उपजावता,
धन्य अम्ह शक्ति शुचि भक्ति एम भावता ॥ ३ ॥ सम-
कित वीज निज आत्म आरोपता, कलश पाणीमर्श भक्ति
जल सींचता ॥ मेरु सिहरोवरे सर्व आया वही,. शक उत्संग
जिन देखी मन गह गही ॥४॥
॥ वस्तुच्छंद-॥
॥ हो देवा हो देवा अणाइ कालो, अदिट्ठ पुढो
तिलोपतारणो तिलोय बंधु, मिच्छत्त मोहविद्धंसणो अगाइ
तिण्हा विणासणो, देवाहिदेवो दिढ बोहिय कामेहिं ॥५॥
॥ दाल तेहीज॥
॥ एम पभणंत वण भवणं जोईसरा, देव वेमानिया भति
धम्मायरा ॥ केवि कप्पट्टिया केवि मित्ताणु गा, केवि वर रमणि
वयणेण अइ उत्युगा ।। ६॥
॥ यस्तुच्छंद ॥
॥ तत्य अचुप तत्य, अदचुय इंद आदेस ॥ कर जोडि
सवि देवगण, लेप कलस आदेस पामिय ॥ अद्भुतरूप सरूप
जुअ, कवण एह उन्संगें मामिय ॥ इंद्र कहे जग तारणो,
पारग अम परमेम ॥ नायक दायक यम्म निहि, करिये तम्
अमिमेम ॥ ७॥

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नवपद पूजा. मझार ॥६॥ खरतरगच्छ जिन आणारंगी, राजसागर उन झाय ।। ज्ञान धर्म दीपचंद सुपाठक, , सुगुरुतणे सुपसाय ।। देवचंद्र जिनभक्तें गायो, जन्म महोत्सत्र छंद ।। बोय मीज अंकूरो उल्नुस्यो, संघ सकल आनंद ॥७॥ ॥ फलश ॥ राग वेलावल। ॥ एम पूजा भक्तं करो,आतमहितकाज ॥ तनीय विमान निज भावमें, रमता शिवराज ॥ एम० ॥ १ ॥ काल अनेने से हुआ, होशे जेह जिणंद ॥ संपय सीमंवर प्रमु, केवलनाग दिणंद ॥ एम० ॥ २॥ जन्ममहोत्सव एणी परें, श्रावक रुचिन ॥ विरचे जिन प्रतिमातणो, अनुमोदन खेत ॥ एम. ॥३॥ देवचंद्र जिन पूजना, करतां भवपार ॥ जिनपडिमा जिनसारसी, कही सूत्र मझार ॥ एम० ॥४॥ ॥ अथ श्रीनवपदपूजा ॥ अरिहंतपदपूजा। ॥डाल ॥ उलालानी देगी। ॥तीपंपति अरिहा नमुं, धर्म और धीरोजी ॥ दे. शना अमन यग्मता, निजात यह थीगे जी ॥१॥ उलाला।। परअसप निर्मल ज्ञानभामन, सां भार प्रकारातानि. एद अदा आत्मभा, सादिना वागता॥ जिननाम कर्म

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नरपा पूजा. शासन, यहा धोरी गनिारा || सिद्धांत यापण दान सरफ नमो पाटा पावरा ॥८॥ मुनिपदपूगा ॥ ।। सा गारी, नि:कामी निरोगी जी ।। भादाला पाता, आगगासन रंगोजी ॥९॥ उमाणे जम्मा गर्ग, देश निमंग निर्मदा । काउगा मुद्रा पर आगन, ध्यान अम्पागी सदा ।। सागर दी कर्म की नाही पाणी ।। गुनिराज करुणागि १ थन, प्रणा दिल भणी ।।१०॥ दर्शनपदना ॥ । सम्पादन गुण नमो, नातागोजी ॥ सुनिरालमा तना जेम्पोनी॥११॥ पाये॥ भन्दा अदा में प्रगा, मासे निदाना प्रगट भामा, कविता उar पनि वाम, महा न कान मान, दाग १२॥ मानाना॥ * ri, Txi. me rint.:: nitarium HTRA

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पान, साल मिति अनुरे ॥ आप गर्न मन मिल पग्म मानता परे ॥ २० ॥ ॥ इ रामा गुगार गणपुरंदर, मिदनापसी पिसागिदिगंदर, भतिजो मन हटी ।। पार श्रीगजगागा, शान गुगाना || गुरुती राम मदद सुशोभना ।।२१।। ॥ कायम ॥ मनिषितगा ।। रमानमा जगति गंभुगहोदय काम जिन गानोनम, शुभिगना रनपानि निगदो! पति कायम ॥ ौ का नादी करे। मार काला जगायक शर्मा, मार मन || आशा कमर कीया, में, अभिडा॥२॥ी मग आt, ना मोगुनी नक्षी, मग मालदाय॥

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एलीगमणारी मा. गिरिजेसीयो, गम नगा नाय जीयो । भीगो ॥३॥ पनि प्रम सारा ॥१॥ २ पिलेपनगा ॥ ॥दोहा॥ ।। पापना गदन म, गगगदो पन तार | जिन जन लेगे तग ,, गोर नागर ॥॥॥ RTE मन नि, टाण समिति || म अनी हा अरिहा, नन गरी भानिजोगी, धरी जिनगण गेल ।। भार न हमाली, दाने नि ? ॥९॥ कायम ॥ जिनान गानाको १६ Twin a पारी मानिपता आज मारी, मा दम Thuीपिन ||२|| ३ भूषणना ॥ ।। दि22 ad, आद माणित शि, TH A !!! रातार " ५५ ॥ runt . । .."

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एकवीशप्रकारी पूगा. . गुगर धनसार घण, करो जिनने धूप धाण ॥ २० ॥ दाल । धूप घटी जेम महमहे, तेम ददे पातकांद । अरति अना• दिनी जाये, पाने मन आणंद ॥ जे जिन पजे धू, मा. फरी सेह।। नावे पारे घ घर, आपे सुख अयोह ॥२१॥ काट्यम ॥ जिन घायानां धूप , मित्पत दुर्ग- धता जाय नरं ॥ धूप जिम सहज अवंग सभायें, कारता उभगति भ पारे ॥ ३२ ॥ इति पथपाना ॥६॥ ७ दीपपूजा ।। ॥दोहा॥ । मणिमय रजत तापममुग्ण, पार भरी एतर ॥ पनि गृप कागंभनी, कगे प्रदीप सनर ॥ २३ ॥ बाल ।। मंगलदीप बगायो, गायो जिनगुण गीत ॥ दीपनगी सेम आलिका, मालिका मंगल नीत ॥ दीपणी गुम ज्योति घोदित जिनमुख चंद ॥ निामी हादी भतिजना, ओम महो प्रणानंद ॥ २४ ॥ काश्यं ॥ जिन दीपमा माशे, देहदी निनिर अमान नामानित घटेमान ज्योतिरामे, जेदी ममता भाष भामं ॥२५॥ इति मनमदीनामा फलपूना ।। 7 दिन 7 norm 17 1.ACIM Ph न

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८८० ------ एकवीशप्रकारी पूजा. नवि लहे दुःख संसारमीमें ॥ ४६ ॥ इति चतुर्दश वन- पूजा ॥१४॥ १५ चामरपूजा ॥ ॥ दोहा॥ ॥ अति उज्ज्वल अंगुल तणं, एकशत आठ प्रमाण ॥ घामररने पूजतां, नासे दुरितविहाण ॥४७॥ दाल ॥ कना रपणने दंडे, मंडित धामरजोडि । हरखतां जिनमुख निर खतां, पीने होदा होडि ॥ विकसित कज जेम जिनमुख, सन्मुख आवी हंस ।। सेवे एम उपमति करे, भवि जन धरी आशंक ॥४८॥ कायम ॥ ज्ञान मय किरिय उज्ज्वर स्वभावें, नति उनति गौण मुख्यादि भावे ।। मानगुगमग जिनराज आणे, भावयी बुद्ध पामर वखाणे ॥४९॥ इति पंचदहावामाना ।। १५ ।। १६ छत्रयपूजा ॥ ।।दोहा।। ॥ उन्नत शाद चंद जिम, परप बह मूल ।। टारि जिन उपरें, नस दुगसिरि अनाल ।। ५० ॥ दाल ।। उप जेम करके, परके पानकार ॥ मोहादिक अरे पाटा, नाय वर आक्द।। जे निग्य न करें, गुभगो रहे जाम ।। नरागमय पर हर मामा कम्म ॥ ५१ ॥का- "पर ।। हका रस नि', 1 टीनता या योग me नाम गिरे •r:

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८९२ एकवीशमकारी पूजा. १९ नृत्यपूजा ॥ ॥ दोहा॥ ॥ मूकी शंक संसारनी, जिनपति आगे जति ॥ करी नृत्य सूर्याभ परें, तस नहीं भवभय नृत्य ॥ ५९ ।। दान ।। मूचर खेवर अमरवर, किनरी नरी शुभवित ।। नाये माघे जिनगुणे, सांचे मुकृतवित्त ॥ योग अपंचक एहयी, तेहपी जिनपद हेतु ॥ घउगइ गमणनिवारण, तारण भाजउमेनु ॥ ६० ॥ काव्यम् ॥ जेह निजपोगगति सहजरंगे, पोरी अमृतानुष्ठान संगें ॥ अतुलगुणतान न के असंगें, भारत- त्यानना पह दंगें ॥ ६१ ॥ इति एकोनविंशतिनृत्याजा ॥ २० स्तुतिपूजा ॥ ॥दोहा॥ ॥ प्यारण काय अकृति, न छंद आश । दोष न दो स्तुति करे, स्तुतिमा गुणामय ॥ १२ ॥ ॥क्षाला स्वापदविगजनि, माजति इति अना।। अनिशय पर उपगारी, अह ना T RET in शि. एम स्तनो, टतो जिन चिन ॥ मना कर दो ना, पहा ने निन ।।३॥ य जिन आन ममे सपना : । इमि तिमि सातादन,

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८८४ आपकारी पूजा. ------4 ॥अथ पंडितश्रीदेवचंद्रजीकृत अष्टप्रकारी पूजा लिख्यते॥ ॥प्रथम जलपूजा ॥ ॥ दोहा॥ ॥ गंगामागध क्षीरनिधि, ओषधर्मथितसार | मुमें यासित शुविजलें ॥ करो जिन सार उदार ॥ १ ॥ मात । मणिकनकादिक अविध करी, भरी कलश सहार ॥ गुम ही जे जिनवर नमे, तमु नही दुरित प्रचार ॥ मेरुशिता लिन मुरवर जिनवर न्हवण अमान, करना याता निज गुण, सर किन कि निधान ॥ २॥ छंद ॥ हर्षभरी असगांद आणे, स्नात्र करी एम आशीष मावे ॥ जिहांलगे रागिरि जंतुदीयो, अमनणा नाथ जियो हुँ जियो ॥३॥ ॥ विमलकेवलभामनभाया, जगति जंगमहोदपण जिनारं बहमानजटांयतः, शुविमनाः सपयामिद्रिये ॥१॥ * पम पामात्मने अनजानतमानशक्तो जन्मजाम निवारणाय श्रीमभिनंदाय र पजाम स्याहा ॥ १ ॥ अटाया। ॥ अथ द्वितीय रदन पूना प्रारंभः ॥ मामा मनमा 57. Er70ezi अध्यकारी पूजा. ८८५ - सकलसंताप निवारण, टारण सहु भविचित्त ॥ परम अनीहा अरिहा, तनु चरचो भविनित्त ॥ निजरूपें उपयोगी, धारी जिनगुण गेह ॥ भाषचंदन सुह भावयी, टाले दुरित अछेह ॥२॥ चाल॥ जिन तनु चरचतां सकल नाकी, कहे कुग्रह उष्णता आज धाकी ॥ सकल अनिमेषता आज म्हांकी, भन्यता अझ तगी आज पाकी ॥३॥ ॥ सकलमोहतमिस्रविनाशनं, परमशीतलभावयुतंजिनम् ।। विनयकुंकुमदर्शनचंदनैः, सहजतत्वविकाश कृतेऽचये ॥२॥ ॐही परमपरमात्मने अनंतानंतज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनि- वारणाय श्रीमग्जिनेंत्रय वंदनं यजामहे स्वाहा ॥२॥ इति चंदनपूजा ॥ ॥ अथ तृतीय पुष्पपूजा प्रारंभः ॥ ॥ दोहा ॥ शतपत्री वरमोगरा, चंपक जाइ गुलाब | केतकि दमणो वोलसिरी, पूजो जिन भरिडार ॥ १ ।। दाल-॥ अमल अखंडित विकसित, शुभसुमनी घगी जाति ।। टासीणो टोडर टबो, अंगी रवी बहु मांति ॥ गुणकुसमें निज आतमा, मंडित करवा भन्य ॥ गुणरागी जडत्यागी, पुष्प चतानो नव्य ॥२॥ चाल ॥ जगवी पूजता विविधालें, सुखरा ते गणे क्षण अमूलें ॥ सांति धरि मानवा जिनप पूजे, तस तणां पाप संताप जे ॥३॥ ॥ विकवनिर्मलाद्धमनोम. विशनचेतनभावसमुद्भवः॥ सु. परिणामप्रसूनवनेनः परमतत्समय हियजाम्यहम् ॥३॥ ही परमपरमात्मने अनतान्तज्ञानशतले जन्मजरामृत्युनि- - अष्टप्रकारी पूजा N वारणाय श्रीमजिनेंद्राय*पुष्पं यजामहे स्वाहा ॥३॥इन पुष्पपूजा। ॥ अथ चतुर्थ धूपपूजा प्रारंभः ॥ ॥ दोहा | कृष्णागरमृगमद तगर, अंबर तुरुक लोयान ।। मेलि सुगंध घनसार घण, करो जिननें पधाण || ।। दाल ।। धूपवटी जिम महमद, तिम दहे पातमाद । अति अनादिनी जाये, पारे मन आणंद ॥ जे जिन पने घरी भव व फिरि तेह ॥ नावे पाये ध्रुपवर, आवे सुरक अड ॥२॥ चाल || जिन घर यासतां धूपारे, मिच्छनदुर्गमा जाई दूरे ॥ धूप जिम सहज ऊदंग स्वभावे, कारक उalit माव पावे ॥३॥ । सकलकर्ममधनदाहनं, पिमलगामारगुजाना । अशुभमुदटसंगविवभिनं, जिनपतेः पुरतोऽतु गुहांतः ॥४॥ ॐ परमपरमात्मने अनंतानंतझानशक्तो जन्मगगमृत्युनिए- रणाय श्रीमभिनंद्राय धूपं पनामदे स्वाहा ॥२॥ इति पाय ॥ अथ पंचम दोषपूजा प्रारभ्यते ॥ ॥दोहा ।। मनिमय मन नामुम, पात्र की पर दनों मूष कामुमती, कगे प्रदीप गदा ॥१॥ मंगटार या दो, जिन नदीear . दिका मदिका मन "मोर for gir Tr, म मा अष्टप्रकारी पूजा. अज्ञान नासे ॥ निजवटे ज्ञानज्योति विकासे, तेहथी जगतना भाव भासे ॥३॥ ॥ भविकनिर्मलबोधविकाशकं, जिनगृहे शुभदीपक दीपनम्॥ सुगुणरागविगुद्धिसमन्वितं, दयतु भावविकाशकृते जनाः ॥५॥ ही परमपरमात्मने अनंतानंतज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवा- रणाय श्रीमजिनेंद्राय दीपं पजामहे स्वाहा ॥५॥ इति दीपपूजा ॥ ॥ अथ षष्टाक्षत पूजा प्रारंभः॥ ॥दोहा ।। अक्षत अक्षत पूरणं, जे जिन आगे सार ॥ स्वस्तिक रचतां विस्तरे, निजगुण भर विस्तार ॥१॥ ढाल | उज्जल अमल अखंडित, मंडित अक्षतचंग ॥ पुंजत्रय करो स्वस्तिक, आस्तिक भावे रंग ॥ निज सत्ताने सन्मुख, उन्मुख भावे जेह ।। ज्ञानादिक गुण टावे, भावे स्वस्तिक एह ॥२॥ चाल । स्वस्तिक पूलो जिनप आगे, स्वस्ति श्रीभद्र कल्याण जागे ॥ जन्मजरामरणादि अशुभ भागे, नियत शिवशर्म रहे तासु आगें ॥३॥ । सकटमंगटलिनिकेतनं, परममंगलभावमयं जिनम् ।। श्रयत भव्यजना इति दर्शयत्, दधतु नाय पुरोऽशतस्वस्ति- कम् ॥ ६ ॥ ॐही परमपरमात्मने अनंतानंतज्ञानशक्तये ज. न्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमजिनेंद्राय अक्षतान् यजामहे स्वाहा ।। ६ ।। इति अक्षतजा ॥ ॥ अथ सतम नैवेद्यपूजा प्रारंभः । ॥ दोहा ॥ सरत शुचि पक्वान भर, शालदार tee अएप्रकारी पूगा. घरे नवेद्य जिन आगले, धुवादोष तसु दूर ॥ १ ॥ दान ।। लपनश्री यरवेवर, मृदुतर मोतीचूर | सिंहकेसरिया से बैंक दलिया मोदकपूर । साकर द्वारय सिंगोडा, भक्तपजन का सद्य ।। करो नैवेद्य जिन आगले, जिम मिले गुरु अनाथ ॥२॥ थाले । बोरतां भोज्यपर भाव त्यागे, भविजना नित्र गुण भोज्य मागे ॥ अम्ह भणी अम्हनणो समय भोग्य, आपनो तातजी जगतपस्य ॥ ३ ॥ । सकलपुदलसंगविपर्जन, सहवेतनभागविलासरुम् ।। सरसभोजननत्यनिवेदनात, परमनितिभावमहं स्पृहे ॥ ७॥ *ही परमपरमात्मने अनंतानंनज्ञानशक्तये जन्मजामृत्युनिस- रणाय श्रीमजिनेंद्राप नैवेयं यजामहे ॥ ७॥ इति नैयाजा ॥ ॥ अथाष्टम फलपूजा प्रारंभः ।। ॥ दोहा । पक्र विजोर जिन करे, टाता शिस दे। सरम मर गुम फल वां, इह जिन मे करे ॥१॥ दाल ।। श्रीफल कदली मुग्गा, नागी आंपा सार । जंग अंजीर दाडिम, काणा परवीन मार || मला मुसादिक उनम, टोके आनंदिन जेह ॥ वा गंगादिक मनीष पाल । देव ।। २॥ पाल ॥ फटभर मा मामी, महमद देटि होप मस्ट पमी ॥ मस्ट मनि देपात मेर रंगे। प्पादनांलामानि प्रमं॥ ॥ दासी HTRA frET: रस म्हारन . . . . दिर " अष्टप्रकारी पूजा. ८८९ रणाय श्रीमजिनेंद्राय फलं यजामहे स्वाहा ॥८॥ इति फलपूजा ॥ ॥ दोहा ॥ इम अवविध जिनपूजना, विरचे जे थिरचित्त ॥ मानवभव सफलो करे, वाघे समकित वित्त ॥१॥ दाल । अगणित गुणमणि आगर, नागर वंदित पाय ॥ झुतधारी उपगारी, ज्ञानसागर उवझाय ॥ तासु चरणकज सेवक मधुकर परें लयलीन ।। श्रीजिनपूजा गाइ, जिनवाणी रसपीन ॥२॥ चाल ॥ संवत् गुण युग अचल इंदु, हर्षभरि गाइयो श्रोजिनेंदु।। तासु फल सुकृतयी सकल प्राणी, लहे ज्ञान उद्योत बन शिवनिशानी ॥३॥ ॥ इति जिनवरदं भक्तितः पूजयंति, परमसुखनिधानं देवचंद्रं स्तुति ।। प्रतिदिवसमनंतं तत्वमुद्भासयंति, परमसहज- रूपं मोक्षसौख्यं अयंति ॥ ९॥ ॐ ही परमपरमात्मने अनं- तानंतज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमजिनेंद्राय अर्य यजामहे स्वाहा ॥८॥ . ॥ अथ वस्त्र पूजा ॥ ॥ शको यथा जिनपतेः सुरशैलचूला, सिंहासनोपरिगतः स्नपनाबसाने ॥ दव्यातः कुसुमचंदनगंधवूपैः, कृत्वान्ननं त विदधाति सुवस्त्रपूजाम् ॥ १॥ इति ।। ॥ तद्वत् श्रावकवर्ग एष विधिनालंकारवस्त्रादिकां, पूजां तीर्थकृतां करोति सततं शनयातिभनयातः ॥ नीरागस्य नि- रंजनस्य विजितारातेत्रिलोकीपतेः, स्वस्यान्यस्य जनस्य निर्व- ८९० अपप्रकारी पजा. - --------- तिकवे होशक्षयाकांक्षया ॥१॥ ॐ ही परमपरमात्मने अनंता- नंतज्ञानशक्तये जन्मजरामृत्युनिवारणाय श्रीमजिनेंद्राय वर्ष यजामहे स्वाहा ।। इति यसपना ॥ ॥अथ लूण उतारण । ॥ण उतारो जिनवर अंगें, निर्मल जलधारा मनांगें ।। ल० ॥१॥ जिम जिन तदतह लूणज पटे, विम तिर अशुभ कग्ग बंध यूटे ॥ ० ॥२॥ नपन सत्रणां भी जिनजीनां, अनुपम रूप दयारमीनां ॥ ल. ॥३॥ सन्ह[ जिनजिनुं दीगे, लाज्यु लण ते जलमां मे ॥ ॥४॥ पण प्रदक्षिण देइ जलधाग, जला रोपषिो का उदारा ।। लू० ॥ ५ ॥ जे जिन ऊपर दुमगो माणी, ते पन पाजो स्मृण ज्युं पाणी ॥ ल० ॥ ६ ॥ अगर कृष्णागुर दरु गुगये, भूप करीने विविध प्रबंधे ॥१०॥७॥ उतार ॥ ॥ अथ आरति॥ ॥ विविध स्त्र मनि जदित ग्यायो, बाल विवाट अनाव दावो । आति मागे प्रभुनीने आगे, माना भारत मुख मागे ॥ आ. ॥ ॥ गत मंद ने in Er. पा का दामामि ॥frम मित्र अटका है. faran TO मा '. - - कोई ॥

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गीजिनारनिर्माण Map Antra.. -TA गुंग पर मेन अगिभाई, गुलगा रेवइबाई, अभुसम पी गुण निगाई सापि भगति सहाई दो ममजी ॥५॥॥ ॥ दाल॥ श्री गुणाग जिनराज || ए देशी ॥ नगर इचार, पउदगदग अणगार; भागारि हो राहग कतिम राहामणीनी, अमरमर गरम अधिक हजार गुमठी ही मोमता देगनी पीजी ॥१॥ विदरसारिका चार उपरि महग गर, सम्पा दृष्टि हो दर्शनात शीरमारगगिनी; मंदगी माग्दा मात्र, अजिता जिग जागा ही निगगप हमीजी ॥ २॥ वादीमा पार पामत भनक नीर, पसमयावास मानानिमगनी, दिन हित मुनिराज समता पान समाज, मनमा ददन मिद्रिाणी ॥३॥ देविका मालपान निमाल, अनमः नमः श्रपटा, 17 ताल राम गोडिशन पन रनर पतितनी॥प देगी। वीर विहारे बिहार विधान करता जगई नाजी, पर वन कामना ॥॥ शाना अनादि बिना दुसरे नपा परी निनाद आगन हात पन्त भर हिनदरी पन्य इहदि वन्द बनतो कन्द जनताहे. इंदिक भाग चले भाले उपजर की हर निहासन का एंद्रका लई वहदेसी: ॥ टक॥ वहदिन अपडे देवोही वन्देलसी. नतिरे तर जमा किता अन गुन गतिः स्य रवी दुनः उन परे ना नानी ॥२॥ गगन पन्ही उडमा कम नक्षी इले पक्न जनस्त. हाती इंडिया महले मुक्ति निः इसे भी वह दो, ज योमुरू कहे दिन भनिने पर नाईन - वीरजिनवरनिर्वाण. ॥ चुटक॥ तारता जनकुं भवोदधियी परम पूरण गुणनिहि, गजराज गति जिनराज पाया परिसरे आया वहीं, थई वधाई नगर सरले सज्जन बहु साहमे बहे, वर पुष्प मुक्ताफल वधावी सकल मंगल सुख लहे ॥४॥ ॥ढाल। आपाजी मुनिपति नरपति हरितपाल घर आया, पायाजी सुमणि सुरतरु अधिक महोदय पापा। वंझाजी अति प्रमुदित मूपती त्रिभुवन तारकज राया, टायानि तर दर्शित छिन दाण सभा सुखदाया । । युद्धक॥ धन धन ले थाना जरा मिनर वीर परम गुरु टापा, छत्रप चामर जिनजि सोमित सिंहासन गुभ पाया ।। मंदार कुसुमे प्रभु क्वाया मनग्माया सविगगे, चिरकाल जीयो जगत दीयो नगणतारण ईम पुगे ॥१॥ चौमासीनी वर्द्धमान जिन तिहां रह्या विधिसतिजी नव नव आभिगृह मुनिग्रहा, परदेसीजी श्रोताजन आन्या यदि प्रवचनेजी मत्वरहे ते गह गहि ॥ ॥टक ॥ गह गहि अनाग अपन मिना आम ममना भावना, परभाव पगणानि मनमानि पी ग्मारना दाय नम" जानटन पापना. 421? पह दहा लापता ॥ २ ॥ सम-4 मनन

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८९८ परिजिनपरनिर्वाण. ------ जय जय हे जय जय जगजीवन जग, सिद्धाय हे सिद्धारय नृप फूलतिलो, ३० ॥ मटा हे सुटा आज समें कन्यां पुन्य, भेट्यो हे भेट्यो जिनपर गुणनीलो ।। उ० ॥ ४ ॥ बलिहारि हे बलिहारि यार हगार, संज्ञानि है तुं शानि गुण रोहरो ॥३०॥ जंगम है जंगम तीरथ शिशुलांद, निथप है निश्रय दिग्गुण देहरो ॥ ३० ॥५॥ इंद्रादिक हे इंद्रादिना प्राण आधार, जी जीगो को गो लगे || 30 ।। अग दिठे है जग दिटे नागे दुःन अंधार, भामंदल दे भामंहार दिनकर झगमगे ॥ ७॥६॥ रिमुवन पनि विमान पनि हुन यान साद, मोधा मोहा गुपति नातिनी ॥ ३० ॥ दुदि हे दि भवमानाय दपाल, करियर की गधि विनती मी ॥२०॥७॥ हरी कर्म महा श्री || कीयं मन. : 13.1|| रनी Horm: :"urs arrazze, mathun

वीरजिनवरनिर्वाण.
-
प्रभु देशना अतिसुखकार भास्या निश्चय विवहार,
कारण कारज विधि भाखी शिव साधन शिक्षा दाखी ॥२॥
सर्व जीव अछे सम एप, संग्रह सत्ताने लेश;
जे पर परणति त्यागी, तसु कर्मनी भावठ भागी ॥३॥
जसु तत्वरुवि धयो ज्ञान ते साये साध्य अमान,
निज व्यक्ति शक्ति निज रंगी साधे गुण शक्ति अनंगी ॥४॥
झुचि श्रद्धाभासन रमणे कारक निज कार्यने गमणे,
भागे परपरणति रित एकत्वे तत्व प्रतित ॥५॥
परभाव अरोचक दृष्टि निज ज्ञानसुधानि वृष्टि,
परभोगी भाव अभावे करतादि थया निज भावे ॥६॥
जाणि निज परणति स्वामी, कुंण थाई परपरणामी
ए भावे निज गुण पोपे, ते शुद्ध समाधि संतोपे ॥णा
दुःख पोषक पर परसंग, न भजेहेत धरि रंग;
निज तत्व रमो भविमागी, देवचंद वदे इंम वाणि ॥८॥
॥ ढाल ॥ बहिनी रही न सकि तिसेंजी ॥ ए देशी ॥
सुरनरतिरिय समूहमेंजी वेटा श्रीवईमान;
जगत दया उपदिसेजी, शुद्ध धर्म सुख ध्यान ॥१॥
जिणेशर तुम मुज प्राणाधार ॥ टेक ।।
भवभय पीडित जीवनेजी, वाणशरण सुखकारः
सोल पहोरनी देशनाजी, वीर कही तिणवार
क्षीराभववचने कहाजी, प्रश्न उत्रीस उदार जिने ॥२॥
पंचावन अत्ययनमांजी, मुखविपाक स्वरूप:
वली तेता अध्ययनमांजी, दुःखविपाक विरूप जिने ॥३॥

९०० पीरजिनारनिर्वाण. -v-mini सात निशी पारटीजी गारिया गुजी थी, योगगे। पादर परिजी; रोच्यो सुक्ष्म वीर्य, गिने सार मदेश धन कारिजी परमविभागावगाड, मास महोतर रोजी, म तेर प्रतिनो दाद लिने ५॥ पमान शिप जी राति नक्षो साम, नागा द” करनी पूर्णानंदि धाम. मि. ॥ ६॥ गमागनियी योनी हगने लोगत, पूर्व प्रयोग अश्वनी गति नन.जिरे॥७॥ आगाहना । गाग्नीजी गाला अंगुलगा सर्य पदम गुणाजानी मुग प्रमाण गमाय. लि. पनि नित कापनती काला वर निपपाग, मादि अनना जी, भालमति नियम.जिन ॥९॥ म दाम महागमा यार का मुनिमार, विनया गानदार.मि. 1 विला पामरा, निगम firm, र पाय दगार्ड', नयनिणं.नि.10 अपना अव्याय: aft बाट प्रभामा म पीरजिनवरनिर्वाण. ९०१ अपने अगंधे असासे अरूपी, प्रभु तुं थयो अरस संटाण हीनो, अमोहि अवर्ता अभोगी अयोगी, अवेदी अखेदी गुणानंद पीनो. ॥२॥ प्रभु० ॥ मनुजाणतो ज्ञानपीत सर्व कति, वरतुने देखतो सर्व सामान्य भावो आतना गुगलग, अभव रसे यूनतो ते रो पूर्ण घद्धान भावो. ।।३॥ ममु० ॥ आत्मगुन बान लाने अनी बग्यो, भोग उपभोग निज धन टीनो; सकल गुणकाई सहकार सिरय वस्या, चपट वीरप गये घिर जहीनो. ॥ ४ ॥ मनु० ॥ तं क्षमी तं दनी हि मार्दवानी, आर्य विनुत्ति तमता अनंति तुं असंगी अभंगी अनंगी नम्, सर्व प्रदेदा गणशक्तिति ॥५॥ प्रमु० ॥ मनानी प्रमेह अमेह अग्रेडि, अरंपान्म देशी अशी अशोक स्वयं पानमुत्तो सदा पेपर पो सनिमानसे जेहनो काम देको. ॥ ६ ॥ मनु० ॥ ॥ दोहा॥ लि. जिन अभिने, इंदिश नहः कारवर मरह. ॥१॥ है. जिन दिन ननदोगरे हा॥२॥ .: मी र १ ।

वीरजिनवरनिर्वाण. ।। ढाल. मेरे नंदना ॥ एदेशी॥ ..एतला दिन लगे जांगतारेहां, प्रभु सनमुख बहुवार मेरे साहिबा वंदन विधि नाटक करिरेहां, लहेस्युं लाभ अपार. मेरा०॥ बोलो नाय दयाल किपानिधि करुणाल तुंज वयणां गुणमाल, थईसर्व निहाल तत्वरमण संभाल थाय ज्ञान विशाल. मे० ॥२॥ एक वचन श्रीवीरनोरे कापे भवनी कोडी; अविनाशी सुख आपवारे कोण करे तुंज होडि. मे ॥३॥ तुज सरीखे साहेब तेरे करता मोटी हुंस; मोह महारिपु जोपिनेरेहां करस्यां कर्मनो वंश. मे ॥४॥ मोहाधीन जे जीवडारेहां तृष्णा तामें तप्त; पुद्गल आशापंधि विषयारस संलिप्त. मे० ॥५॥ तनु विभावरंगी दुखीरेहां आरत आतमशक्ति वेहवाने कुंण तारसेरेहां देखाडि गुणव्यक्ति. मे० ॥६॥ बहु परिचित परभावनारेहां घपल एकत्व अपाय: मे० करतां कहे कुंग वारसेरेहां ते देखाडो ताप. मे० ॥ ७॥ विषयादिक आसेवतारेहां थातो अम संकोच; मे० तुज उपगारे वेहवेरेहां थास्ये किमते सोय. मे० ॥८॥ वीर चरण जायोअछरेहां सुणवा अमृत वाणि; मे० ते माटे सुर भोगनारेहां करता नवि मंडाण. मे० ॥९॥ कृपा करो एक वचननीरेहां अद्य पिछो वीतगग; मे० महा मोहना कश्योरेहां छोडावो महाभाग. मेरा० ॥१०॥ भरतसेवना जीवनेरेहां तुंबविण कुण रखवाल; दुसम काल कुतानमारहा ग्रहयो कवण हवाल, मेरा ॥११॥ मेवमनिने गयी यारहा राख्या मोमट, मेरा म्वधा यिवपमा नयारही ना यमा मुग्दि. मेग ॥१२॥ -

वीरजिनवरनिर्वाण.
हुं सोहन पति बिनबरेहां दया करो मुज देव; मेरा०
सदा हरि दासनारेहां मानो दिनति सेव. मेरा० ॥१३॥
नित्य मनोय नव नवारेहां करता भु अवलंब मेरा
ते दिशी दाख्यो सर्वने रेहां प्रभुजी ज्ञान कदंब नेरा०॥१४॥
एह श्रमण अमनी भगीरहां निज आराषक भाव मेरा०
कहने पूही आलोपरपेरेहां अंतर गत परभाव मेरा० ॥१५॥
भन्य अभय निरवारतारेहां पूही कुण पास मेरा
आव पीडित जीनारेहां कुष्ण सुणले अरदास मेरा० ॥१६॥
ते सवि मनमा रहिरेहां चाल्पो तारक सिदि मेरा०
आणा आलंबन करिरेहां की कार्य समृद्धि मेरा० ॥१७॥
तोपण एहना नामवीरेहां राखो मोटी आश मेरा.
देवचंदनी सेवनारेहां शिव मुख कारण सास मेरा० ॥१८॥
॥ दोहा ।।
इंन दुःख भरि स्वादिके दिमन चित्त मुखदिन
कलश वि नवर विदा चित्त भक्ति स्पटीन ॥ १ ॥
की विटेपन अति सुरनि सहविध फूल्नी माल
आभरणादिक अलंकापा श्री जिन जगत दपाट ॥२॥
सहरू यंभ शिविश रवि कप अमिरान
सिंहासनपाद पी लिपि काना मज अमिरान ॥३॥
प्रम देताया पासली उपाडे तुहंद
वैमानिक भुवनाविपति पर नजद ।। ४॥
चार विजे भक्ति मार शिान
होने आपने धन्नो कुन दिशा दान ॥५॥

९०४ वरिजिनवरनिर्वाण. ॥ गाथा॥ दुलहो जिणंदजोगो इव्हत धम्म सपण निधार दुलहा मुख पवित्ति, सामग्गी संगमो दुलहो ॥१॥ हाहाइय किं जायं, अरहो सिदो महोद पत्तो अम्हाण पुट्ट साहण, हेउ विजोग भवं दुरकं ॥२॥ वीर विहम्मि धम्मा, धारेण असरण पारहिया वेसिंदुसमकाले, कोदायी एरिसंचम्मं ।।३।। ॥ ढाल ॥ मेघमुनिसर काई उमडोलई रे ॥पदेशी ।। गीत गान नाटिक करीजी, फरुणा रसमय सर्व हा नायक हा तारकुंजी, कहता बदन सुपर्व नायजी मोटो तुंज आधार तुं विभुवन निसतारः तुं प्रमु ज्ञान आधार, तुंज सरिखो दातार दुलहो एपिवार नाप० २ ॥ चंदनकाष्टे जिनतनुंजी दाहे अग्निकुमार, दुसभरि सजल नयणे करीजी वायु ते पवन कुमार नाय. ३॥ उदधि कुमार जले करीजी शीतल कीधि टाम, जिनदादा ले भक्तियाजी सुरपति दक्षिग दाम नाय० ४ ॥ अस्छि भस्म माटि ग्रहेजी सुग्नर अपर अनेक, वंदे पूजे भक्तियीजी धाना विन विक नाप०५॥ देवमग्मा प्रतियोविजोजी या गौतम स्पानि, सांजे वनमा मुनि वदपाजी पायी विशान ना ६॥ पावा परिमर गाथरूजी गीता रिटाय, वीर विग्ह गौतम मुण्या* 3 दान मा गा|| हे प्रभु मुज पालक भगिता नजमा आम, पूमाप मुने बाटोडा एनिवाची समन.८॥

वीरजिनवरनिर्वाण.
९०५
हवे कुंण संशय मेसेजी केसे वाम भाव,
कैने वांदिश भगतित्युंजी करस्यं विनय स्वभाव नाय० ९॥
वीर विना केन यापस्पेजी मुने आतमसिद्धि,
वीर आधारे एतल.जी पाम्या पूरण समृद्धि, नाय० १०॥
इंम चितवतां उपन्योजी वस्तु धन उपयोग,
क्रता सह निज कार्यनाजी प्रभुनमित्तिक योग, नाय०११॥
ध्यानालंदन नाधनोजी, ते तो सदा अभंग,
तिण प्रमु गुणने जोडवेजी, जोइतुं आतम संग, नाथ०१२॥
आतन भासन रमणीजी मेदे ज्ञान पृथक्त्व,
तेह अनेदे प्रणम्योजी पाम्यो तत्व एकव नाय० १३ ॥
पान टीन गौतम प्रभुजी शाक श्रेनि आरोहि,
घन घाति सवितरियांजी, कीयो आत्म अमोह नाथ०१४॥
टोकालोकनी अस्तितानि, सर्वस्व पर परजाय,
तिन पालना जांनिपाजी, केवल ज्ञान पसाप नाथ०१५॥
प्रभु प्रभु करतां प्रभु यदाजी श्री गौतम गणराय
ततक्षिणइंद्रादिक भनाजी. एह बयाई चाय नाथ० १६॥
व सकल हरखित घयोजी जागि गौतम ज्ञान,
कारण दट पडि नहीजी, एह पुष्प अमान नाय०१७॥
सुरपति नरपति जन लहूजी चीवित संव महंत,
आया गैतम पारलेजी जय जप मन्द महंत नाय०१८॥
करि उन पद पापिपानी जगगुरु पाल्पा,
इंद्रादिक वंदन करीनी, बेटा सभा नझार नायः १९ ॥
तिन भवन हरसीत थपाजी. वीर पोवर देखी,
हरखें गुण गावे वनानी, चौविह संघ विशेष नायक २०॥
11

वीरजिनवरनिर्वाण.
वीर प्रभु पाटे ययाजी, गौतम ज्ञान निधान,
देवचंद्र वंदे सदाजी, समता अमृत खान नाय० २१ "
॥दोहा॥
श्री गौतम गुरु देशना, सांभली उच्या सर्व
सुरवर सह नंदीश्वरे पोहत्या भगति जखर्व ॥१॥
बार वरस केवटिपणे, विचा गौतम स्वामी,
आठ वरस केवलिनिधि, श्री सुधर्म अमिग़मी ।। २ ॥
वरस चीमालीस केवली, श्री जंबुमुखकार,
त्यार पछी अन ज्ञान बल, चाले सासन सार ।। ३ ॥
एकवीस सहस वरस लगे, रहस्से वीरवचन
तमु आलंबन ले रमे, तेहीज जीव मुघन ॥ ४ ॥
॥ढाल॥
धन्य धन्य सासन श्री जिनवरनो, जिहां वर यायक वंस रे,
दूसम काठे जास प्रसादे रदिई धर्म परंसंस रे धन्य० ॥ १ ॥
आर्य प्रभ सीजभवमूरि, सूरि यशोभद्र स्वामी रे,-
श्री समूति विजप मुतसागर, भद्रयाहु वर नामरे धन्य० ॥२॥
दश नियुक्ति छेद वर आगम, उपयर्या वरतु स्वरूप रे,
संपुरण हादस आगम धर, ज्ञानक्रिया विधि रूप रे धन्य० ॥३॥
पूलभद्र कोदया प्रतियोची, महागीरि मरिमहन्ति रे,
वपरम्वामी ने पाय दायर युग प्रधान मु प्रशस्त रे धन्य० ॥४
भाग्योद्धार कारक उपगारी श्री जिनभद्र मुनिंदरे,
नगणी करना श्रुत उग्ना श्री देवटि मुर्णिदरे धन ॥५॥
पुम्नामद क्या जिन आगम. गम्यो मामन मुद्रे,
नीका श्री मिला कि श्री अभयदेव प्रपदाचन ॥६॥

वीरजिनवरनिर्वाग. ९०७ श्री हरिभद्र मलयगिरि पंडित हेमनी मल्हार रे, दमहत्तरसूरि जिनेघर जिन क्लभ मुखकार रे धन० ॥७॥ श्री देविंद हेम आचारिज कुमारपालन सुभक्ति रे, श्री खेमेंद्र प्रमुख श्रुतरसिया दूसम काले चक्त रे धन ॥८॥ दुपसहसूरि छेल्ला गणधर आराधक जिन आण रे, चोविस संब गुधश्रद्वावर, पंचांगी परमाण रे धन० ॥९॥ प्रयटक नव तचनी श्रद्धा, ज्ञानक्रिया शिवसार रे, उत्सर्गने अपवाद साधना, निश्चयनयन्यवहार रे. धन० ॥१०॥ निमित्त वली उपादान ने कारण, योग साधन तीन प्रकार रे, प्रवत्ति विकल्प तथा परणति, शुचिकरता भव निस्तार रे.धन०११॥ पुष्ट निमित्त सेवनयी आतम, परणति घाई शुधरे, तत्त्वालंबि तत्व प्रगटता, साचे पूर्ण समृद्ध रे. धन० ॥१२॥ देवचंद्र श्रीवीर चरणयुग, सेवो भक्ति अखंड रे, सासन संगी आणा रंगी, ते थाइ गतदंड रे. धन० ॥१३॥ ॥ दाल ॥ कुमत इंम सकल दुरे करि ॥ ए देशी ॥ भगति इंम पित्त सावी धरी धरइ सासन रीत रे, वारीई दुष्ट दुरवासना सीइं भवतगी मिती रे. भग०१॥ वीर जिनराज सम प्रभु लहि गहगहि बुद्धि गुणग्रामरे, कोण पर देवने आदरे, कल्पतरू सम प्रमु पानि रे. भग० २॥ एक आधार के ताहरो माहरे दिनदयालरे, .सार कीजे हवे दासनि नाथ जगजीव प्रतिपालरे. भगा विनती दासनी धारीई तारिई कर उपगार रे, शेष अनादि निवारिई आपि इम अनुभव सार रे. भग०॥४॥ ,

९०८
वीरजिनवरनिर्वाण.
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मोह जंजाल क्शे जीवडा रडबडे पुद्गल राग रे,
हने शुद्ध रतनत्रयि दाखवि ते महाभाग रे. भग० ॥५॥
एक आलंबन स्वामीनो दासना चित्तने नाह रे,
असरण सरण भवअडविनो हि परम सत्यवाह रे. भग०॥६॥
तुज गुण रागभर हृदयमें किम वसे दुष्ट कपाय रे,
निरमल तत्वना ध्यानयी ध्याय निरमल थाय रे. भगाणा
ध्येयनी शुद्धता रसथकि विजय कंचन थाप रे,
तिम अमोहिरसि चेतना पूर्ण आनंद उपाय रे. भग 10
माहरी परणति दोपनी तीव्रता वारणहार रे,
ताहरा सासन श्रुततणो राग छे एक आधार रे. भग० ॥१॥
खिण खिण नाम तुमची, जपुं तुंज गुण स्तवन उल्लास रे,
चीतवि रूप प्रमूजी तणो, किजीये आत्म प्रकाश रे. भग०॥१०॥
वलि वलि विनg सामीजि नित्यप्रत्ये तुंदिज देव रे,
शुद्ध आशयपणे मुज होज्यो भवभय ताहारी सेव रे. भग०११॥
वीर आणा अविहइपणे आदरु सावन एह रे,
ताहारि साखयी सत्य छे, सीझस्ये माहरे वेह रे. भग०१२॥
भद्रकभावरागीपणे, विनती एम कराय रे,
देवचंद्र पद निपजे नाथजी भगति गुपसाय रे. भग १३॥
दाल॥ राग धन्याश्री ।।
गावो गावो रे जिनगनणा गुण गावो,
सम्पग्रदर्शन ज्ञान चरणनी निर्मन दिग्ता पायो रेजि. टेक॥
पंचकल्याणक स्तवना मनाता जातम नत्व नावो,
मोह महारिप दोष नादि में नेह, गमावो रेजि०॥१॥

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पद्मनाभ स्वामीन स्तवन. आवती चोवीशीना प्रथम जिनेश्वर- पद्मनाभ , स्वामीनुं स्तवन ॥ ॥ पंथही नीहाउ रे ॥ ए देशी ॥ वाडी वीलोकुरे भावी जिन तगी रे, पद्मनाभ जसु नाम: दुसम दोपीरे भरत कृपाकरे, उपशम अमृत धाम ॥ वाडी० १॥ वीर निमिते श्रेणीकने भवेरे, तुमे बांव्यु जिन नाम : कल्याणक अतिशय उपगारतारे, वीर समान सभाव। वाटही २॥ सुदि असाढे छठीने दिनेरे, उपजशो जगनाप; धेर धवल तेरस प्रमु जनमोरे, थाशे मेरु सनाय वाटही ३॥ मागसीर वदी दसमी दीक्षा ग्रहीरे, वरशो चरण उदार मुदी वैशाखे दसमे केवळी रे, चौविह संघ आधार यादडी० ४।। समवसरण सीहासन येसिनेरे, प्रभु करशो व्याख्यान आतम धर्म मुशी ते अवसरेरे, धरतो प्रभु गुण ध्यान वाटडी०॥५॥ संमुख विपदी पामी गणधरारे स्वशे द्वादश अंग; वे वेला हूं प्रमु घग्गे रट्टेर, जिनघरमे वरंग ॥ पाटडी०६॥ दीवाटी दिन शिवपद पामशोरे, मुद्रातम मारंदा देवचंद देवनी मेवनारे, साता परमानंद ॥ यादही ७॥

सीमंधरस्वामी विनीरूप स्तवन. ॥श्री सीमंधरस्वामी विनतिरुप स्तवन ॥ प्रभुनाथ तुं लिपलोकनो, प्रत्यक्ष त्रिभुवन भाषा: सर्वज्ञ सर्वदशी तुंमे शुद्ध मुरखनी खाण ॥ १ ॥ जिजजी वीनती छे एह (ए टेक) प्रभु जीव जीरन भन्पना, अनु मुज जीवन माण ताहरे दर्शनें सुख टुं, तुंहीज गति स्थिति जांग जि. ॥२॥ तुज बिना हुँ पिएं गति भम्पो, धर्मा मेख अनेक निजभावने परभावनो, जाप्यो नहीं सविवेक जि० ॥३॥ धन्य तेह जे नितु महसमें देसे पीजिनमुख वंदः तुज वागी अमनग्न तही. पामे ते परमानंद निः॥४॥ एक वचन श्री जिनगजनो, नपगम भंग प्रमाण लेने मदिरीते . निज लव निदि अमान. जि० ॥२॥ ले क्षेत्र वियोनापने ईप अति गुपनमः जमिरहने क्षजार के नीचे अपय.लि. ॥३॥ भी वीनगगन विमा यो कार अनीता ते जर निहाई, विहिनी रन. नि..!! मन काजमानी दिनोपोर मे ८॥ ति ।।३० ॥ Anuswimdana vt.

९१२ सामंधरस्वामी विनतीरुप रतान. जो क्षेत्र मेद टळे प्रभु तो सरे सबळां काजः सन्मुखें भावि अभेदता करी वरुआतमराज. जि० ॥११॥ परपंठे इहा जेहनी, एवडी जो छे स्वाम; हाजर हजुरी जो मिळे, तो मिळे आतम राम. जि. ॥१२॥ हूं इन्द्र चन्द्र नरेन्द्रनो, पद न मागुं तिलमात; मागुं प्रभु मुज मन थकी, न पीसरो क्षणमात्र. जि० ॥ १३ ॥ जहां पूर्ण शुद्ध स्वभावनी, नवि करी शकुं निज ऋद्धिः तहां घरण शरण तुमारडां, एहिज मुज नव निधि. जि० ॥१४॥ माहरी पूर्व विराधना, जोगे पड्यो ए मेदा पण वस्तुधर्म विचारता, तुज मुज नहीं छे भेद. जि० ॥१५॥ ममु ध्यानरंग अमेदयी, करी आत्मभाव अमेना ऐदी विभाव अनादिनो, अनुभवू स्वसंवेद्य. नि० ॥१५॥ वीनयु अनुभव मियने, तुं न करीश पररस पाहा शुद्धामरस रंगी थइ, कर पूर्ण शक्ति अगह. जि० ॥१७॥ जिनराज सीमंघर प्रमु ते, मिल्यो कारण गुदा हवें आत्म सिदि निपायवी, शी ढील करीये युद्ध. जि० ॥१॥ कारण कारय सिद्धिनो, वरसे घटेन विलंग सावदी पुग्णानंदना, निज कता अपरंर. जि. ॥१९॥ निज शक्ति प्रमु गुणमें रमे, ते करे पूर्णानन्दा गुग गुणी भेद अमेदयी, पीजीये दशम मान्द. जि० ॥२०॥ मम मिहमुद महोदयी, व्याने यई लपलीन; निज देवनंट पते , नियम म गुग पीन, नि. ॥२१॥ ॥ इति कीनी ममात्र ।

श्री सिद्धाचल चत्यपरिवाडी स्तवन. ॥ श्रीसिद्धाचल चैत्य परिवाडी स्तवन ॥ भरत नृप भायगुं॥प देशी ॥ शेत्रंज गिरि भेटीये ए मेटीये कर्म कटेश । सेवज० ।। मिथ्या दोष निवारवा ए धारवो समकित देश ॥ से० ॥१॥ काटअनादि भवोदधिए भमतां भव समुदाय ।। से। पान पार सम जाणजो ए एहिज तीरथराय ।। से० ॥२॥ मानव भव पामी करीए ए तीरय गुणगेह ।। से० ॥ जेणे नवि भेटयो जुगत ए ते दुःखीपा रेह ॥०॥ इहां सिद्धा पण कोडी ए गणघर भी पुंडरीक ।। से० ।। चैत्र शुकल पुनिम दिनेए निज सत्ता गुण वीक ।।से०॥४॥ पागुण सुदि सातम सह नेमि दिनमी शिवनाथ ।।से। पोसाठि नमी पुत्री वसुए आटमें फेवटज्ञान ।। से० ॥५॥ सागरमुनि तिग कोडीदीए कोडीपी मुनि श्रीसार से। वेर कोडिदी सिवरार सोनत्री अजगार || ॥६॥ असम वंदा आदितवताए, तमु गत आदित्य शांति ॥ एण्टाख परिवारघु ए, पापा पान प्रति ॥२०॥७॥ ऋपन दा मुनियर सहए, मला कोहि आह ॥२०॥ सिव परता नियालेर निम्मले निरंन । ने॥॥ क्षा दोन लिवरल प्राप? ने पाविद ।।। पदमान नियंपए दमिनारी निट मे॥६॥ . साजिनान सुनीभर एनम पर ९१४ श्री सिद्धाचल चैत्यपरिवाडी स्तवन. आणंद रक्षित भावनाए भावतां सिवपुर पत्त ।। से० ॥ कालासी इगसहसीए, मुनी सुभद्र सय सत्त ॥ से० ॥११॥ रामचंद्र पण कोडयीए, नारदमुनि पिसताल | से० ॥ पांडव कोडि पीसकए, सिव पोसा सगकाल ॥ से० ॥१२॥ संब प्रद्युम्न मुनिश्वरुए, मुनि साढविण कोड ।। से० ।। विमलाच निर्मल थया ए, ते प्रणमें वे करजोड ॥ से० ॥१३॥ थावचा सुत सूकमुनिए, सेलंग पंपक सिद्ध ।। से० ॥ वसुदेव धरणी सिव लधु रे, सहस पैत्रीस प्रबुद्ध ।। से० ॥१४॥ वेदरतिनिकरमताए सामी सल चोफाल ॥से ॥ श्री वससार आनंतताए, पामी गुण संभाल ॥से० ॥१५॥ सिध्या बहु मुनि इण गिरिवरेंए, यादव वंश अनेक ॥ से॥ श्रेणिक कुल साधु साधवीए, सिद्ध लया थिर टेक॥ से० ॥१६॥ विद्याधर भूचर घणाए, इहां पाम्या गुण कोडि ॥ से० ॥ आतम हेते एहनीए, को न करी शके होडि ॥ से० ॥१७॥ तिवारे तीरथपतीए, ए तीरथ बहुबार ॥ से० ॥ आग्या भविजन तारवाए, निरमम निरहंकार ॥ से० ॥१८॥ पुंडरगिरिनी सेवनाए, जेह करे भवी जीव ॥ से० ॥ ते आतम निरमल करीए, पामे सुख सदीय ।। से० ॥१९॥ ए गिरिराजने सेवताए, पामे देवचंद्र पदसार ॥ से ।। भव भव ए तीर्थ सेवनाए, होज्यो परम आधार. ॥ से• ॥२०॥ ॥ कलस ॥ ईम सकल तीरथ नाथ संगंज शिखर मंडण जिनवरो श्री नामिनटन जग आनदन विमल शिव सुख आगरो श्री सिज्ञापस स्तवन. सुचिपूर्ण विदयन ज्ञानदर्शन, सिद्ध उद्योत सुभ मर्ने निज आत्मतत्ता शुद्ध कसा वीरजिन केवल दिने श्री सुविहित खरतर गच्छ जिनचंद्र सुरि साखा गुणनीलो वझायवर श्री राजसारू, सीस पाठक सिर तीलो श्री ज्ञानधर्मवूम पाठक देवचंद्र वीन यो जगहितको इति चैत्रपरवाडी सिद्धखेवनी संपूर्ण ॥ ॥ श्री सिद्धाचल स्तवन । धन धन मुनिवर ने संजमवर्याजी परिहर्या पाप अहाररे समता आदरी मुनि ममता तजीजी सम्यक् क्षमा दया भंडाररे. धन धन० ॥१॥ पभ वंश बड नूप पुत्र वेजी द्रविड अने वीजो वारिखिल्लरे भूमि निमित्ते रणरतीया धकाजी तापस संयोगे काड्यो सल्ल रे. ॥ धन० ॥२॥ संजम लीयो भट दशकोडियाजी पुहृता सिद्धावल गिरिशंगरे अणसण करि निज तत्ले परिणम्याजी विविध विविध बोसिरावी संगरे ॥ धन० ॥३॥ रत्नत्रयी रमी आत्म संवरीजी ओलखी ठंड्यो सर्व विभावरे प्रत्याहार करि धरी धारणाजी बलगा निर्मल ध्यान स्वभावरे ॥धन ॥४॥ मैत्रिभाव भनी सवि जीपीजी, करुणाभाव दुःखी तेमरे पंच गुणीनी नित्य प्रमोदताजी, गुभ अशुभ विपाके मच्या प्रेमरे ॥ धन० ॥५॥ .3

श्री सिद्धाचल स्तवन
पिंडस्वे अरिहंतादिक तणीजी, मुद्रा आसन शुभगाकार रे
ध्याता अतिशय उपगारीपणुंजी ध्यानपदस्य थो सुविचार रे
॥ धन० ॥६॥
निर्मल सिद्ध स्वभावे तन्मयीजी, ज्ञानादिक गुणयी थिर भावरे -
सिद्ध शुद्ध गुणीगण गावताजी, अविलंम्यो रुपस्थ स्वभावरे
॥ धन०॥७॥
सत्तागत आतमगुण ऐकताजी, ध्याता निज गुण पर्यापरे
भेद स्वभावे थइ अभेदताजी, तन्मय तत्वे मोहविलायरे ।।
धन० ॥८॥
मोह क्षय थये घातिदलक्षय गयाजी, पाम्या निर्मल केवल ज्ञानरे।
सिद्ध थया दसकोडि मुनिसरुजी, कार्तिक शुदि पुनम दिन
मानरे । धन ॥९॥
कार्तिक शुदि पुनिम जे सिद्धाचलेजी, वंदे पुजे घन नर वेहरे
उत्तम गति पामी शिव मुख लहेजी, थाये ते अनुपम मुस
गेहरे । धन ॥१०॥
सिद्धायल सिध्या मुनिरायनेजी, गायो घ्यायो घरि आणंदरे
सदगुरु पाटक श्री दीपचंदनोजी, शिम्य गणि भारो देवचंदरे ॥
धन ॥११॥
श्री सिद्धाचल स्तवन
घालो ससि जिन पंदन जइए, श्री विमटायल अंगेरे,
अनंत सिदि ज्यान सिदाचल, फरसी जे मन रंगरे पाटो॥१॥
गुलआधारी मये मुविहित, पोठे पापविहारी;
परत आहारी मुनि मंगाग, साल सविन परिहारेपारो॥२॥
श्रावक श्राविका प्रमुगु गाति, प्रभु भक्ति अतिरातीरे
करने नमन उन' गजगी मनु महातारे पानी॥३॥

श्री सिविल स्तवन. ९१७ जिहां मुनि कोडि शिवगेह पहोता, निज अनुभव सलसवीरे वियप दोष उपसम ततति, रत्नत्रयीमें सजीरे ॥चालो ॥४॥ त्पभादिक जिन फरासित अंगे, फरस्पा पाप पुलाइरे सुद्ध गुण सरन गुण प्रग, ध्यान लहर टीलाइरे॥चालो॥५॥ अर्वात जनागतने वर्वमाने, ए वीर्य शिर टिकोरे श्री शेजा भक्ते पाने, देवचंद पदनिकोरे ।। चालो ।। ६ ।। 'श्री सिद्धाचल स्तवन. चालो पालोने राज श्री सिद्धाचल जइए भी निमताचल वीरथ फरसि, आतन पान करिए॥चालो॥१॥ हग लिरिवर मुनिर कोडि, आतम तव निपायो पूर्णानंद सहज अनुभव रस, महानंद पद पायो चार॥ पुंडरिकरमहा मुनिवर दोडि, तात विभाव गमापो; भेदाभेद तत्व परिणतिनी, पान अनेद आपो चलो॥३॥ जिनवर गधर मुनिकर कोडि, ए वीरथ रंगरातः हद शक्ति व्यक्त गुणनिधि विभुबन जिन्ना बाता कानो॥ ए वीरथ परने भय परीक्षा, दूरगति उछेदः सम्पर इरिस- निर्मट कार, निज आनंद अनेद कटो संत असार वीरेन्तः काले मित मामा टेसांचे भी मरती भक्ति रस संबहित स्मनी ॥ स्वराजिनः भत्ति पद (एन) इस श्री संयने अनुज नेटर जगई पर निद ॥७॥ सानानंदीत विभुमन दीन. पन्ने नाना; देवा र पा जानुन, प. पद पटना रोना

श्री वीरममुनु दीपालीवें स्तवन.
॥ श्री वीरप्रभुनुं दीवाली- स्तवन ।
मारग देशक मोनोरे, केवलज्ञान निधान ।
भावदया सागर प्रमुरे, पर उपगारी प्रधानोरे ॥१॥
वीर प्रभु सिद्ध थया, संघ सकल आधारो रे।
हवे इण भरतमां, कोग करो उपगारो रे । वीर० ॥२॥
नाय विहूणं सैन्यज्यू रे, वीर बिहूणोरे संघ ॥
साचे कोण आधारथीरे, परमानंद अभंगो रे ॥वी ॥३॥
मात विहूगो बाल ज्युरे, अरहो परहो अपडाय ॥
वीर विहूणा जीवडारे, आकुल व्याकुल थापरे । वी० ॥४॥
संशय छेदक वीरनोरे, विरह वे केम खमाय ।
जे दौठे सुख उपजेरे, ते विण केम रहेवाय रे ॥ वी० ॥५॥
निर्यामक भव समुदनोरे, भव अडवी सत्यवाह ॥
पे परमेश्वर विण मलेरे, केम वाघे उत्साह रे ॥ वी० ॥६॥
पीर थकां पण श्रुततणोरे, हतो परम आधार ।
हवे इहां श्रुत आधार छेरे,अहो जिन मुद्रा साररे । वी० ॥on
मण काले सवि जीवनेरे, आगमयी आणंद ॥
सेयोध्यावो भवि जनारे, जिन पडिमा सुख कंदरे ॥ वी० ॥८॥
गणघर आचारज मुनिरे, सहुने एनि परे सिद्धि ।
भव भव आगम संगयीरे, देवचंद्र पद लीधरे ॥ वी० ॥९॥

श्री नवानगर आदिजीन स्तरन. ॥ श्री नवानगर आदिजीन स्तवन । नवानगरमे भेटीए जिनवर जपकारी, परमानंद महारसी मूनि मनोहारी. ना० ॥१॥ घणा दीवसनी हंसडी दी मनमांदे, के सवि आज सफल घर मणने जगनाहे. ना० ॥२॥ दरिसण दीठे देवनां दःख जाए दूरे, चिदानंद रस उपजे समता रस परे, ना ॥३॥ जिन मुदा जिनवर सनी शिव तादन मांसी, श्री अरिहंत अवलंबने पूर्णता दासी. नवा ॥४॥ पग संवर जिन भनिनो पल सालो तोल्यो, दितमुख निश्पको आगममें य. नवा० ॥५॥ तुंगीचा नाना साबके जिन ईपी, भग दोगन विधही. ॥ ६ ॥ बिहानी लिन एम. एजना अधिक प्रसंगे. मला भगद संगे ममी दिन प्रतिमा दे, साजना रे. नमः ॥८॥ मानदिई रन ना ॥९॥ है ::. का ॥१०॥ 7 १२० श्री नवानगर आदिजीन स्तवन. आवश्यक पंचांगतुं पुस्तक थयु पहेलं, जे अधिकार तिहां लस्युं विधिपूर्वक वहेलं. नवा०॥१२ अन्य सूत्र लखतां थकां न खं ते विगते; ते माटे शंका कशी जिन पूजा भगते. नवा ॥१३॥ पुस्तकारुद जीणे कयु तसु वचन कल्लोला चूर्णिमे पूजा कहीं शी शंका भाली. नवा० ॥१४॥ आगम अरथ लया विना आगम उत्यापे वे तप खप करता थको नवी भव भय कापे. नवा ॥१९॥ विनय वेयावच दानमें हिंसा नवि लेखे, अति हिंसा दाखवी कां पूजा उवेखे. ना० ॥१६॥ नाम निक्षेपो उच्चरी नमतां आणंदे, नाम थापना दुग भणी शे मादे न वैदे. नवा० ॥१७॥ एम आलोची चित्तमां जिन प्रतिमा वंदो, जिन शासन उदिपणां करतां आणंदो. नवा० ॥१८॥ शेठ विहार सुहामणो आदिसर स्वामी, वंदो पूजा भविजनां पूरण सुख कामी. नवा० ॥११॥ फलस. एम मोक्ष कारण विवन धारण तरण तारण गुणकरी जिनराज पडिमा नमण पूजा सूत्र साखे आदरी सुषि ध्यान वाघे सिद्ध साधे कर्म कलेस सहु हरी श्री दीपचंद्र पसाय मांखो देवचन दिले धरी 2 समवसरण स्तवन. ९२१ आतमभावे नो हो चेतन आतमभावे रमो एकगी. परभावे रमतां ते चेतन, काल अनंत गमो. हो ॥१॥ रागादिकत नलीने चेतन, पुल संग भम्यो, बोगति माहे गमन करता, निज आतन न दमो. हो ॥२॥ ज्ञानादिक गुण रंग धरीने, कर्नको संग मो. आतम अनुभव मान घातां शीव मनी रमो. होगा। परमातम ध्यान करतां भवायवीमां न भमो, देवचंद्र परमातन ताहिक, स्वानी करीने नमो. हो ॥४॥ इति द्रुपद संपूर्ण. ॥ समवसरण, स्तवन ॥ आज गहती हूं सवारणमां जिन वचनामृत पीचारे, श्री परमेश्वर बदनकमल ठी निरख निरख हरखेवारे. आ०१॥ तिनभुवन नायक शुद्धातम तवामृरत दुहरे, सकल भषिक वसुधानी लानी, मातं मन पिण तुहरे. आ० २॥ मनमोहन जिनपरजी नुजने, अनुभव पिपालो दीयोरे, पूरणानंद अक्षय अविचलरस, भक्ति पवित्र घड् पीपोरे. आ० ॥ ज्ञानसुधा टाटीनी लहरे. अनादि विभाव निसार्पोरे. सम्परज्ञान सहज अनुभवरत: मुचि निजबोव समार्पोरे.सा. ४॥ भोली सखीयो एम गुं जोबो, मोह मान मत राचोरे, देवचंद्र प्रभुई एकताने, निलमो के मुख ताचोरे. आ० ५॥

९२२
कुंभ स्थापना स्तवन
॥ कुंभ स्थापना स्तयन ॥
धरम उत्समसमे जनपद कारणे उतम मंगल आपरे ए,
भावमंगल तिहां देव अरिहंत प्रभु एहयी परम मंगल मंगल यरे ए.
तेहना नामने जाउं हुं भामणे, सिगसिण हरख समरण करे ए,
पांच कल्याणके जीम सुरपति करे, तिम जिन भक्ति भवि आदरेप.
भावमंगलतणि पुरता कारण, दयमंगल भला क्रीजीए ए,
तिहां गुणे पूर्णता इच्छता भविकजन, कुंभ थिरगरण लीजीए ए,
पदमआसन टटयो परम छये टन्यो, मंत्र पतिथी जीए,
जिनवर जिनमणि दीशि हावभरी,हियरे पुरण कलशजयी पीये .२१
माहरा नापने पाम मंगल होजो, मंगल संश चापि भगे ए,
मंगल तीर्यने मंगल चन्यने, मंगटनेह करता भगीर,
जनशासनतणो हात मंगल का, तेन आनंद अनि उपने ए,
पवन अवसर गमे माताना गर्भमें, पोहणजे संपने ए. ३॥
तिम प्रामादनी थापना भामरे म थान में हनीप,
जेम संमाग्ना मगट काप
निन जिन धर्मनी दिने कागणे, पाय गुविवि मंगल परे ए,
परम आनहावर व्यता मानता गीत मंगट भी उनए
देवना देवने मंगटीजता देवगः पद अनमरे ए,

भी सहट जिनप्रतिमा स्तवन.
९२३
अथ श्री सहतकूट (१०२४)जिनप्रतिमा स्तवन.
देशी रनीयानी.
तहत जिन प्रतिमा पंद्रीय मानव अधिक जज विवश
सुंदर मूति अति लोहाननी. एकतहाने चोवीत. वि० सहा
(ए टेक)॥
जात अनागत ने वर्तमाननी, वप्प चोवीती हो तार विकी
बोकेर जिनवर एकएक क्षेत्र, मनीने कसार. वितह२॥
पांच भरत की एसत पांव सरती रीत समाज विकी
दश क्षेत्र घट् धाए सातवीत अधिक जिनराज. वि.सह.३॥
पंचविदेहे जिनवर डो (१६०) उत्कृष्ट एहाज देव विवेकी
जिन समान जिन प्रतिमा जोलती भक्तीकीजे हो सेव.नि०४॥
पंचकल्पाकलिनचोर्वासना वीसासो(१२०)हाजधाप विवेकी
ते कल्पा-कनिषि{सावी, लान अनंत महाप. वि. तह ५॥
पंच विदेहे हो हननां विहाताः 'वोतन अरिहंत विनी
शास्तजिनसभान्न आदिदेचार(४) अनादि अनंत.दि.६॥
एकाहा चोवी जिनवरतनी प्रविना एका आम विवश
पूजा या जनम सस्त होने, सीझे बंधीत काम. वि०७॥
तीनकाल जाइ दीपना, केवलना. पहात वित
कपाक करोमन इहां सानवां, साने गुमननी सांवि०॥
सहा- तिनावः उन तीनहेज दरी बिहार विकी
देवी जद्दत ए हे स्तन, पाटन नगर नझार. वि. ६॥
दादा ना करने
नम: देहरा
२

म
९२४ श्री सहस्रकूट जिनप्रतिमा स्तवन.
तीर्थ सकल वळी तीर्थकर सह, एणें पूजा पूजाप विवेकी;
एक जीह (जीव्हा यी महिमा पहनो, किणभातें कहेवाय.वि० १०॥
श्रीमाळी कुळदीपक जेतसी, शेठ मुगुणभंडार विवेकी;
तस सुत शेठ शिरोमणि तेजसी, पाटण नगरमें दातार. वि० ११॥
तेणे ए विंच भराव्या भाव, सहस अधिका चोवीस विवेकी;
कीधी प्रतीष्टा पुनमगच्छधा, भावाभम्रीस. वि० १२॥
सहस जिनेसर विधी पूजसे, द्रव्यभाव शुचि होय विवकी
ए भव परभव परम सुखी होवे, लहस्ये नवनिधि सोय. वि. १३॥
जिनवर भक्ति करें मनरंग, भविजननी ए छे रीन विवेकी
दीपचंद्र सम श्री जिनराजजी, देवचंदनी ए प्रीत वि० ॥१४॥
इति सहस्रकूट स्तवन समाप्त ।।
॥ पद ॥राग होरी॥
अजितनाथ चरण तोरे ॥ आयो अ० ॥
तुं मनमोहन नाप हमारो, त्रिभुवनजनकुं मुख प्यारो ॥
अरी अरी लाला दि०॥
तृष्णा ताप निवारणा बागे, भावना चंदनसे अति प्यारो ॥०॥१॥
माहा माहाग रक्तंग शरीरो, तग भेदनकुं वन अदारो ॥०॥
प्रांगधरा पुरमा मनोहागे, प्रामाद बन्यो अतिसारो ॥ ॥२॥
समता सम वर्गपत बन धागे, ममकित वीज ऊपावन क्यारो ॥
देवचंद्र गुणि गुण मभागे, पदी अगण झागता उदारो ॥०॥३॥

श्री ज्ञान बहुमान नमस्कार- ९२५ ॥ श्री ज्ञान बहुमान नमस्कार ।। सकल वस्तु प्रतिभाशमान निरमल सुख कारण, सम्पन् दर्शन पुष्ट हेतु भाजल निधि तारण: संयम तप आनंद कंद अन्नाग निवारण, मार विचार प्रचार ताप तालीत जिन टारग ॥ १ ॥ स्पावाद परिणाम धर्म परगति पडि बोहण, साहु साहुनी संघ सर्व आराधन सोहशः मोहतिमर विनंत सूर निध्यात्व पगासग, आतन शक्ति अनंद मुझ प्रभुता परगासग ॥ २ ॥ मति श्रुति अवधि विशुद्ध नाण मगपजन केवल, नेद पचास क्षापोपशामिक सेक क्षायिक निमल दोष परोन प्रथम तिहां दुग परतक्ष देशतः, सकल प्रतक्ष प्रकाशभात व केवल अपर मित ॥३॥ धर्म सकलनो मूल शुद्ध विपी जिन भाशे, बाहिर अंग मयान बंच गणवर नुमका : भी नियुक्तिभाप पडिशाखा दी, चरण टीका पत्र पुष्प संशप सब बी. ॥ ४॥ पंचगीसारं बोध को जिन पंचम अंगे, नही अनुयोग द्वार सास मानो मनरेने वीर परंपर जीत अन्न उपगारी, अन्यासो आगम अगर नित्पर गुरुवारी. ॥५॥ २३ --- - ९२६ श्री सिद्धाचल स्तुति.. मोह पंकहर नीर सिद्धांत अवधि, देवचंद्र आणा राहित नप भंग अगाये। ए श्रुतज्ञान सोहामणो सफल मोक्ष सुखांत, भगत सेवो भविफजन पामो परमानंद ॥ ६ ॥ ॥ श्री सिद्धाचल स्तुति ॥ विमन्दाचलमंडण जीनवर आदि जीणंद, निर्मय नीरमोही केवळ ज्ञान दिणदा जे पुग्य नपा धार धरी शेइंज गिरिशीग्यरे समवसर्ग सुखद ॥ इण पासमा रुखभादिक जिनराय, पली काल अतीते अनंत पसीमी थाप; ते सविणगिरिवर आरी परमी जाय, इम भावी का आयगे गवि मुनिगय. ॥ २ ॥ भी रूपम नागणधर पुरिक गुणयंत, हादश अगायना कीधीश महंत गति भागम मारेगा मदिम मंदन, भापिजिन गारो थिति॥३॥ पोमा गोनद पद गुमार, अगुवा कायापा, राय मानद frn.४॥ .

वीत स्थानक स्तुति. ९२७ ॥ वीस स्थानक स्तुति ॥ अरिहंत सिद्ध परयण आचारज धविराण, उपझाप साहु नाणसण विनयपहाण; चारिन ब्रह्म झिरिया तप गोयम जिनभाण, संजमनाणी श्रुत संब सेवो वीसे टाण ॥१॥ उत्कृष्टे जिनवर एकसो सित्तेर धीर, वली काळज धन्ये जिनवर वीस गंमीरः जिन घाय अनंत अतीत अनागत काल एबीसे घानिक आराधी गुण माल. ॥ २ ॥ आवश्यक देवेला जिन वंदन विनि काल, थानक पद गीणो तहत दोष सुकमाल: काउस गुण स्तवना पूजा मभावनासार, इन शासन वन्छ : करतां भवनो पार. ।।३।। समरीजे अहोनिसि गुणारागी सुरसाय: जस जसनी सुरपति पावन कर नाधः थानक तर विपि जे सेवेमन रंग, देवचंद्र आगाए शानिधिको तसु चंग. ।। ४।'

९२८
गिरनार स्तुति.
॥ गिरनार स्तुति ।।
यादय कुलमंडण नेमिनाप जगनाय,
त्रिभुवण जनमोहन शोमव शिवपुरसाय;
गिरनार शिखर शिर दीक्षानाण निघाण,
सोरिपुर नपरे चरण जनम सुरसा ॥ १ ॥
इम भरवे पंचे इखते वलीसार.
चोवीसी जिननी थाये जन आधार,
तर पंच कल्पाणक वंदे ने जेह,
निरुपम मुख संपति निशे पामे तेह. ॥ २॥
जीन मुख लही बीपदी गुप्पा जेह,
यर अंग अग्यारह दृश्विाद गुण गेहः
विगि काले जिना कल्याण विधिनेह,
समकित विकारगण मेयो धराये सनेहः ॥ ३ ॥
श्री नेमिजीमा शासन विनपरत,
जिनपर कल्याणक आगया भविपिता
देवचंद्रने दामन शानिधि का नित भैक,
समरीने अनिशि गा अंगद देव. ॥ ४॥

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वडी साधु वंदना
साधु सदा प्रण, केवली, काल अनादि अनंते वली;
जेहि वडा विचरे गुणवंत साधु साथी सहु भगवंत. ।।४।।
ते सहु प्रण, मन उल्लास, अरिहंत सिद्ध ने साव प्रकार
साधु वंदना करुं हितकार, ते सांभलजो सहु नरनार. ॥५॥
॥ दोहा॥
इणही जंबू द्वीपमे भरतज नामे क्षेत्र,
जिनवर वचन नही करी निर्मल कीया नेत्र ॥१॥
तिहां चोवीसे जिण ढुवां रीपभादीक महावीर
पूर्व भाव करी प्रणमीये पांमीजे भवतीर. ॥२॥
पूर्वभव चक्रवत्ति थया, रिषभदेव नाइंद,
अजितादिक तेवीस जिण, राजा सह मंडलीकः ॥ ३ ॥
वृत लेई पूर्व चवदे रीपभ भण्या मनरंग,
पूर्वभव तेवीस जिण भण्या अग्यारे अंग.
चीस स्थानक तिहीं सेवीया, योजे भव मुरराय,
तिहाथी चवी चोवीस जिण, ते दुवा मणमुं पाय. ॥५॥
॥ दाल २जी ॥ नमणी रमणी ॥ एहनी देशी॥
श्री चक्रवत्तिं पूर्वभव जाण, वैर नाम तिहां नाम वा
ऋषभदेव प्रणमं जग भाषण, गुण गावतां हुये जन्म प्रमाण. 18
वीमराई पूर्वनर नाम, अजित जिगेमर करुं प्रणाम:
विमलवाहन पर्वभर गय, श्री गंभा पण चीन साय. ॥२॥
पूर्वभा धर्मनी न, अमिननन प्रणम् शुम ध्यान;
पूर्वभव यया ममनि प्रमिद, गमति जिस प्रण सिद्ध. ॥३॥
पर्वभव गजा -RE HER पद नित्य,
पर्वमा 7 . . . . " गरम प्राम जगनाह. ॥४॥

वटी साय वंदना. her+.. पर्व भने हगाह मुनिल काम प्रगk निसदीय जगवाह पूर्वभव जीव, प्रग, मुदत जिद नदीव. ॥५॥ लाह पूर्वभव जाग. श्री मीनल मण, जमातः दीनाई कुटतिर समान, मण, भी शेषन यान. ॥६॥ इंवत्त मनित, कानास्पद नाना पूर्वमन र काभाग, वांद विका वर्ग मन गग. ॥७॥ पूर्वभव लेाप गहिर र अनंजिन मा पर; साय शीगेमन सिंहरदगा, धनार यांइ दिन लाप. ॥८॥ एभा मेदय गुपगार, तिनाय जिननि सार: पूर्वना ऋषीमुनि की नार प्रान् गुर सी. ॥९॥ रापन नुनि बिस्पात, बांद अर्जुन सिमुन्न नाता पभव नंदनमुनिट, ते मन की बहिडित ॥१०॥ मिहगिरी पभर मा. नि माननिय जगादान अदर्शन सह मुनिवर वि. सोही मन नमिना ॥११ नरेनर म मा रहने सवान लेनिन नव निम्नी १२॥ से भोकिने . देह: काय टा पोटे मनन, ही न .१६॥ पर डा . . ! . न : ...

९३२ पडी साधु धंदना. ॥ हाल ३ जी॥राग वेलावली॥एदेशी। चंद्रानंन मिण प्रथम जिणेसाँ, इजा श्री राधः भगांतो अगीयमेण नीजानीकर, चोथा श्री अश्री दिपेण अरिहनो विकरण गुद रादा जिगप्रणमुं. ॥ १ ॥ इंगसर तणारे चोवीग के, नसभादिक स्वामी अनुक्रम ( एकगमे जिन हा जगदीगो. पि० ॥२॥ पांचमा निर्मादिन गुणी, बलिहारी छटा निगायके गोमद सातमा जिन गमझ, यतिगण आदमा गुणगापो. ॥३॥ नवने अनीयमेण जिन प्रणमुं, दगमा श्री सीगण उपर देवगमा इम्याग्गा ध्याउं, यारमा निपत रादित गुग्यकारक. पि..? तेगमा अगजर जिणनाके, पीदमा श्री जिगनाय अनंनो, पंनग्मा उपगांत नमिले, गालगा श्री गुममेण महतtant सनामा अतिमाग गुगीन, प्रणम् अटाग्मा श्री गुगागरे। गममा मन्दर मनोदर, दीगमा श्रीधर प्रण लागfront इकर्षणमा गमकोट मुहर, बागमा मग अगर टेगमा अर्ग:एक अनोम, frगमा प्राण वागणी" ये अगरी माया, प्रहरीमगिर भामरे, हो अग का मुनि मुक्त गावि. Enाम, fate लिम प्रदान दयन, म वा अनंत और विद्वान व दिनानिmrita दमा दर. र. are a न. There... - .

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९३४ बड़ी साथ वंदना. पचास लाख कोड सार तिहां असंख्य केवली, जेह थया मुनियर तेह प्रणमें अशुभ दुरमति निरदली. ॥३॥ ढाल। अजित जिणेसर ने गणधर, धुर प्रग सहसेण सुहरु मणमु प्रहसम फगुसाहुणी, हरखस्युं वांदु सगर महामुनि. ऊलाली ॥ महामुनि सगर तीस लारो कोड अंतरे ले थपा, केवठी मुनिवर तेह प्राण दोय कर जोडी रापा श्री संभव घारु मुनियर चित समायिकगुण रमु, लाख दमेही कोडसागर अंतरे सिद्ध सढे नमु. ॥ ४ ॥ द्वाल॥ श्री अमिनंदन प्रणम् गुणपति, यानाम मुनि अजपासणी सागर लाखे ना कोई अंतरे, केवली थया वदीये शुभारे, ऊटाटी॥ मुभपरे मुमत निसर गणधर घमशाग विमगपा, नेऊ सहम कोड सागर विय नम जे मिद पपा, श्री पम्पम् गाम नांमी मुहीये मला यंदी, सादगी वाई नामे प्रणम्या दखवानि ॥५॥ घोड म्हम नपामगर विर वटी, मगन मनिसले पया श्रीमदान निधि निगम गुजनिक - वही साथ वंदना. श्री चंद्रप्रभुदीन गणवर ती सगा पाईये, ने सागर कोड अंतरे केली गुण गाईपे. दाल मोसफल संसार अबतारपनिjाप देशी।। विधि जिसर मुनीराए, साहनी वंदिये पित्त डाह ए: अंतरे दो नव सागर सह मिहां, वाटिकन नी बीह भाप्यो तिहां. ॥१॥ खानी शीतल जिप सार आनंद ए. सनी गुलसा नमु वित्त आदर: एकशेड सागर तनो संगे लो, एमो सरोका गटो. ॥२॥ सहन हामी साउन . भावी दिन माई ॥३॥ दीन नदी सी सुमन 5. ॥ ॥ पोरन सी वही साधु वंदना. D स्वामी वासुपूज्य जिण साधुश्री धर्मघर, साहुणी यली जिहां धी उपद्रवहर सुगुरु सुभद्र मुबंधव यखाणिये, मौजे मुनि घर निगृष्ट हरि जागीये. ॥ ६ ॥ तीस सागर वीच अंतरे जे थया, केवली वंदीये भाव भगतेराया; विमलजिन यंदीये साधु सीमंधर यली, समणी धरणी धरा आगम सांभली. ॥७॥ गुरु सुदरसण मुनि सागरदत्त ए, भवहर बंधव भद सिवपत ए; ना सागर पीच अंतरे केवली, जे पया ते सदु बंदीए यटीवन्टी. ॥८॥ स्वामी अनंतजिण प्रणमीये जमुगणी, गमणी (प्रेमे) नम गुग श्रेपंगमुनिः मीम अशोकण प्राण प्रभपती, प्रात पुरुषोतम केयर नृपति. ॥९॥ सागर भाग्नो अनगे भाभीये, केवली दहीने मीर गत मानी। जिगदा धर्म और मामा कर, गनी ममता या वाली मा गुग ॥1॥ मन मम सरगम, पन मग गुदा नदीम

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१९३८ वडी साध वंदना. कोड सहस वर्ष अंतरे ए सिदा मुनिद सातमी नरक रामुम चक्री पटुत्यो मतिमंद. ॥४॥ मलिजिनेसर दिए अमिनेय मुणिंद, गणति वंदु धरण कमल प्रणमु सुखदा सहस पंचावन साधवी साघुसहसचालीस, यतिससोमुनि केयठी प्रणमु निसदीस. ॥५॥ ममि जिनेसर पूर्वभा सदी वही अनगार, तात पलि तमु यंदीये पली मुनिगारमयार, अयल जीव धयो पडिबुध धर्ण चंद्र छापा, पूर्ण जीवते संखासु रूपी कहापा. ॥ ६ ॥ धेस मनने अदिन सनु अमिचंद्र जित सच, सहि केवल मुक्त गया पू भर मियुः मुनिवर नंदन नंद मित्र सुमित्र यवाग, बाल मित्र कटी नाण मित्र अमगपत आए. ॥७॥ अमरमेण महामे आटे नाप तुमार, मिटिमंगाते साय यया अंग छेदविचार अंतरे हां यही जाये लाग्न घोपलाग, केलि विहां यहांदी व उग. ॥८॥ इंदु निगा वीगमा मुनिगालाकामी, मगर दम तो कम गीग्नामी गुग्दा मानने र पो अनिस माटे, निमित पद १॥

م - ९४२ वढी साधु वंदना क्षेत्र विदेहमे केवल संयम, सिद्धही सोले ते मुनी ए, 'इण परि अनीवह दोए गतीस सह यति कह गुण थूगीर; दसरह द्रढ रहे महा धनुतेह, सतनु गुण मुज मन वस्पार, नवधनु दसधनु सहि धनुमुनि एह भारवीयो, सून कनही दशाए॥१ पूरव भव हरगुरु नाम दुसभसेण, ललत नाम ते पूरवम ए, राम बलदेव वली नवमो हलधार, ब्रह्म लोके सुर अनुभवे एक चविजिण तेरमो नाम निकसाय, थाय सीसही मुरतरु समोर, बंचव केशव एक अवतार, अमम होसी जिण बारमोए ॥६॥ सहसरले त्यांसियां सातसे भाषीयां, वरस पंचास इहां अंतरो तिहां वले चित्तमुनि सिद्ध संपत्तस, नाम लेईने कीरत करूं ए. पूर्वभव अंधव चक्री ब्रह्मदत्त, सातमी नरक गयो मरी एy ईण अंतरे वली नमुं, बहु केवली वेगेसिव सुंदरी ज्यां वरीए ॥ ॥हाल ९ मी ॥ रामचंद्रके यागमें चम्पो मोरी रहोरी ॥ए देशी॥ सेवीसमा जिन तारक, पुरसा दाणीय पास, मुनिवर सोले सहस, गणधर आठहुलासा आज दिने सुभ सुभ घीक, वांदु बासठ नाम, वली ब्रह्मचारी सोमल, श्रीधर करूं प्रणाम ॥१॥ वीरमइ जस आदि, सिद्धा सहस प्रमाण, तेह मुनिवर वंदता, होये परम कल्याण साथी संख्या मह अडतीस, सहस वखार्थ, पुष्प चुलादि सहम दो, सिद्धी ते मन आणु ॥ २ ॥ समी मपामी यासी भुमी, भामी धर्म चौजाम, ए अधिकार क्यो, श्री टाणाग मुटाम, (-

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९४४
वडी साधु वंदना.
राई उदाई सिंह दस विरनो, निर्मल संजम धारोजी
सेट सुदर्शन मुनि मुगते गयो,सुशी महाबल अधिकारोजी.नि०॥३
काल संवेगी गंगायो गणी, पिंगल ने शिवराजोजी
काम उदये अवतो मुनि, बंदता सीजे काजोजी. नि० ॥ ४ ॥
भकाई मुनिकिकम बंदीये, अरजुन माली हुलासोजी
काशव मव धर जाणीये, केवलरूप कैलासोजी. नि० ॥५॥
मुनि हरीचंद बारतिये वली, सुदर्शन पूरण भेदोनी:
साथ समण भद्र समता आदरे, सुपईठ समय मंदोजी-नि॥६॥
मेष मुनीश्वर औरतो मुनि, राप ऋपी अलोजी;
श्री जिण सीस ए सहु मुगते गया, सेवे सुरनर सक्कोजी नि०॥णा
सहस छत्तीसे समणी चंदणा, आदे चउसे सिधीजी
देवानंदा जननी वीरनी, केवल ज्ञाने समिंदीजी. नि०॥८॥
नितनित वंदु समणी ए सह, समणी जैवंती पदम सिइया तरी
सिद्धा केवल पामीजी, नंदानंदवती नदीता वलीनंदसेणीया
नामोजी. नि० ॥९॥
मरुतसमरुता महामरुता नमु, मरुदेवा वटी जाणीजी;
भद्रासमदा सुजया जिनतणी, पाली निर्मल आणाजी. नि०1१०
समणोसमणी भुइ दोनानमं, राणी श्रेणकराईजी
मास संक्षेपण वेरे सिद्ध थई, प्रणम्या पातीक जायजी. नि०॥११
कारी गुकाली महाकाली नमु, कन्या सुकन्या तीमोनी
महा कन्या वीर कन्या साहुणी, राम कन्या सुद्ध नेमोजी.नि० ॥१२
कन्या महासेण कन्या, ए दश श्रेणिक नारीनी;
निजनिजनदन काल मुणे करी, लायो गंयम भारीजी.नि०१३
एका ममी ने पेरणावी, आई दश प्रकागेजी;
र र मन गई, न बद बयागेजी. नि० ॥१४॥

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वडी साय वंदना. नृप श्रेणिक नंदन, इस दस तेरे कुमार आठ आठ रमणी तजी, अनुत्तर सुर अवतार ||१२|| तिण अवसर नपरी, काकंदी अमिराम; तिण पूरब देशे भद्रा, सारथवाही नाम. ॥ १३ ॥ तसु नंदन धनो, सुंदर रूप निधान; तिन परणी तरुणी, बत्तीस रंभ समान. ॥ १४ ।। जिन वयण सुणीने, लीधो संयम जोग; मुनि तरुणपणेमे, छंड्या रसना भोग. ॥ १५ ॥ नित छठ तप पारणो, आंधीले भुत्त भात; जस समणवणी मग, कोई न वंछे तिलमात. ॥ १६ ॥ अति दुक्कर तपस्या, आराधी नव मास: एक मास संथारे, सर्वार्थ सिद्ध वास. ॥ १७ ॥ काकंदी मुणि क्षत्त, राजगृही सरीदास: पेलक ए बेर्ड, एकण नगर हल्लास. ॥ १८ ॥ राम पुत्रने चंद्रमा, साकेतपूर वर ग्राम, पुटीमा पेठा ले, पुत्र वाणीयां ग्राम. ॥१९॥ हपणापुर पोटिल, सहुए धना समान; तरुणी तप जिणनी, संपम वर सीमान. ॥२०॥ हवे बहल कुमर कह, राजगृही आवास; सर्वार्थ सिद्ध पडतो, घर संयम छई मास. ॥ २१ ॥ एक भव शिवगामी, ए श्री जिनवर सीस, सहु नवमे अंगे, भाल्या मुनि तेतीस. ।। २२ ।। हवे पाम महा पोम, भई सुभद्र वरवाण; पामभद्र ने पामसेन, पोम गृप्त मन आण. ॥ २३ :

वडी साधु वंदना. ९४७ नलिगी गुल्म आगंद, नंदन एह मुनिजान; कालादिकना सुत, कप्पपईसीया टाण. ॥२४॥ मुनि उद्ग पूड़या, गौतमने पचखाण; ची जामयकी कीयो, पंचती परिमाण. ॥ २५ ।। जिणे जिन मत मांडी, छंडो कुमत अनेक ते आद्र कुमर मुनि, धन धन बुद्ध विवेकः ।। २६ ।। गर्व भाली बोच्यो, संजयी नृप अणगार मुनि क्षत्री भास्या, बहुविध अर्य प्रकार. ॥ २७ ॥ मही मंडल विचरे, विगत मोह अमाथ; गुण गाता अहोनिस, संपजे शिवपुर साथ. ॥ २८ ।। नृप श्रेनिक नंदन, मुनिवर मेव सुजाण; तज आठ अंबेजर, उपन्यो विजय विमाण. ।। २९ ॥ अपमानी रैणा, आदयों संपम जेहः जिन पालक मुनिवर, सोहम सुर थयो तेह. ॥ ३० ॥ हरि चोर चीलापतो, मुसमा तात ते धन्नो आराधी संपम सोहम, सुर उपनो. ।। १ ।। श्री वीर जिसर, तासग मुनिवर नाम: निज भक्ते गाउं, व्हनणा गुण प्राम. ॥ ३२ ॥ ।।दाट १२ मी ॥ विशालीया पिगल।ए देशी ।। धर्मघोष गुरु सोतवन, मामने पारने ह पत्त, मतिलाम्पो तुभ वित्त, मुनुस यो भव दिय सुबादः सर थो संजन मही साहू, गुण तनु गाई नितः ।।१।।

यही साधु वंदना
श्री जुगबाहु जिणवर आये, विजय कुमर मति लाम्यो भावे,
बीजे भव भद्र नंदी, भोगतजी थयो साधु मुणांदा
करी सलेपणा लयो सुख वृंद, गुण तम गात आणंद. ॥२॥
ऋषभदत पहिले भव संत, तिन प्रति लाम्यो मुनि पुष्पदंत,
तिहांयी थयो सुजात, तृण सम जाणी सह रिद्ध वात;
आदरी आठे प्रवचन मात, भवियणा नसु गुण गात. ॥३॥
पूर्वभव नृपति धनपाल, वीसमण भद्र ने दान रमाल,
देई शिवा सीव थाय, संयम लेई ते मुनिरायः
लहि केवल ने शिवपुर जाय, ते बंदु मन लाय. ॥ ४ ॥
पूर्वभव मेघरथ राजन, सुधर्म मुनिने देई दान,
चीजे भव जिनदास, संवर पाली जे थया सिद्धा
केवल दर्शन ज्ञान समिद्ध, वांदु तेह उल्लास. ॥५॥
मित्राई पूर्वभव जाण, संभूत विजयने दोन बखाण,
कुमर ते धनपत होई, वीर समीपे संयम लीधो;
ततक्षण कर्म हणीने सिधो, दिन प्रति वंदु सोई. ।।६।।
पूर्वभव नागदत्त धनेसर, प्रतिलाम्यो इंद्रपुर मुनिसर,
महीमल नाम कुमार, संयम लेई कारज सार्याः
भवसायरयी चेतन तार्या, ते बंदु बहु वार. ॥७॥
गृहपति हुतो धर्मवोष, तिन प्रतिलाम्यो अति संतोष,
नाम मुनि धर्मसिंह, बीजे भव थयो भद्रनंदी;
मुक्ति गयो भव बथन छदी, ते बंदु मुनि इह. ॥८॥
पूर्वभव जिनशत्र नरेसर, प्रतिलाम्यो धर्मवत सुलेसर,
महिचंद नाम कुमार, निण उडी बहराई कुमार;
पाचम्म नपा ने शाहार बद केवलधार. ॥ ९ ॥

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९५० घडी साघुवंदना. AMA गुरुणी सुभद्रा केरी समणी सुनारे पूर्णभद्र सुचंग, मांगभद्रने दत्तशीवबल मुनिरे, तिण तम्या लोभ संताप इंद्र परीक्षा अवसर उपशम आदरोरे, नमो नमावे आप. मु०६ सुरवर सेवत श्रीहरि केसो बलमुनिरे, संवर धार सुलेस सकने मे (हो?) डी प्रतिसंयम आदयोरे, दशार्णभद्र नरेस. मु०॥ मुनि करकंडराजा देश कलिंगगोरे, दुमुही पंचम्पाल: वली विदेही नृपति नमि नामे अतिरे, निग्याई गंधार रसाल. मु० ॥ सेतवीजे ने महिप्रल ए सह राजवीरे,बत लेई थया अणगार कामकपाय निवारी सीतल आतमारे, थिवरते ग्रक गणधार. मु०॥९ हवे श्रीवीर जिणेश्वर सीस सुहमगणीरे तास परंपर एहः जंचू प्रभव वलि सय्यंभव जाणीयेरे, मनगपीया मुनि तेह. मु० ॥१० श्रीजसोभद्र ने मुनि संमतबीजे बलीरे, भद्रबाहू थूलभद एमः अणेरा जिणवर आणमांही दुबारे, वे मुनि गाउं समुद्र मु० ॥११ काल अनंते मुनिवर मुक्ते गयारे, संप्रति विचरे तेहः नाणदर्शन ने चर्णकर्ण घरंधरारे, श्रीदेववंदे तेह. मु० ॥ १२ ॥ ॥कलश ॥ इम चोवीस जिणवर प्रथम गणधरचक्री हलवर जे हुवा, संसारतारक केवली वली समयसमणी संथुवा संवेग श्रुतधर साधु सुरखकर आगम वचने जे सुण्या, दीपचंद गुरु सुपसाये श्री देवचंदे संयूण्या. ॥१३॥ इतिश्री वडी साधु वंदना तेर दालकी चोपाई संपर्णम् ॥

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९५२
साधुनी पंच भावना,
सद्गुरू शासन देव नमी, बृहत्कल्प अनुसार।
शुद्ध भावना साधुनी, भाविश पंच प्रकार ॥३॥
अर्थ:-वली शुफ नये स्यावाद उपदेश देवावाला सद्गुरू
अने तीर्थकरोनी वाणी शासनदेवीने नमी बृहत्कल्प भाष्यने
अनुसारे शिव मार्ग साधता साधुओने भाववानी शुभ पंच
भावना भावीशुं ॥३॥
इंद्री योग कपायने, जीपे मुनि निशंक ।
इण जीते कुध्यान जय, जाए चित्त तरंग ॥ ४ ॥
अर्थः-मुनि पंच इंद्रियो, पण योग अने चार कापने
निर्भय निशंकपणे जीते तोज आत्तं रौद्र कुध्यान माठा अन्य
वसायने जीते अने तेथी वित्तना शुभाशुभ संकल्पो रूप
तांगो जाय एरले निर्विकल्पपणे शुद्धात्मगुणमा परम समाधि
पामे ॥४॥
प्रथम भावना श्रुततणो, वीजी तप तिय सत्व ।
तुरिय एकता भावना, पंचम भाव सुतत्त्व ॥ ५ ॥
अर्थ:--तेमांहे श्रत अभ्यासनी पहेली भावना (1)
विपप भोग इच्छा रहित शुझात्म गुणमा तृप्त रहेवू ठेतर
रूप मीजी भावना (२) बनाए धैर्य रासी परिसह अने
विषयादिकयी चलायमान थy नहि एम साहस राखवारूप
पीजी मन्यभावना (३) शुझान्य नत्वमा एकस्य अडोट-
पणे परिणाम घिर कम्पा कप चायर्याए कावभावना (४) अने
आम तत्त्व विकासपपाचमी मनत्वभावना जाणवी (4) ॥५॥

साधुनी पंच भावना. श्रुतभावना मन धिर करे, टाले भवनो खेद । तपभावना काया दमे, वामे वेद उमेद ॥६॥ अर्थः-श्रुतभावना मन यिर करे अने भवनमण भीतिनो खेद टाले. तपभावना कार्मण अने औदारिकादि कापाने दने अने वेद भोगवाना उमेदने फेंके एटळे तेनी ईच्छा आशा कामना मटी घिरता थाय ॥६॥ सत्त्वभाव निर्भय दशा, निज लघुता इक भाव । तत्वभावना आत्म गुण, सिद्ध साधना दाव ॥७॥ अर्यः-सत्वभावनायी निर्भयदशा पामीए. पोतानी स्वता भावीए तो स्वस्वरूपमा एकता थाय. तत्त्वभावना भाववादी आत्म शुद्धता सिद्ध करवानो दाव आवे ॥७॥ ॥ ढाल १ ली। लोक स्वरूप विचारो आतम हित भगीरे ॥ ए देशी ॥ श्रुत अभ्यास करो मुनिवर सदारे, अतिचार सहु टालि। हीण अधिक अक्षर मत उच्चरोरे, शब्द अरथ संभालि ॥ श्रुत० ॥१॥ अर्थ:-हे मुनि ! अकाल अबिनपादिक आठ अति- चार तजी सदा मृत अभ्यास क्रो, अझरनो हीग अधिक उचार न करो अर्थ संभाठी शन्द उच्चार करो ॥१॥ 120 ३

साधुनी पंव भावना
सूक्ष्म अर्थ अगोचर दृष्टियोरे,
रूपी रूप विहीण।
जेह अतीत अनागत वर्ततारे,
जाणे ज्ञानी लीन ॥ श्रुत० ॥२॥
अर्थः--जे सहजे दृष्टिगोचर न आवे एवा अर्थरूपी
के अरूपी अतीत अनागत के वर्तमान विषय जेम होर
तेम ज्ञाने लीन होय ते ज्ञानी जाणे छे तेम रूपी अरूपी
कालादिक तथा आत्मगुणने प्रशस्त अप्रशस्त विचारी सूक्ष्म
अर्थ दृष्टिगोचर करो ॥ २ ॥
नित्य अनित्य एक अनेकतारे,
सदसद भाव स्वरूप ।
छ ए भाव एक द्रव्य परिणम्यारे,
एक समयमा अनूप ॥ श्रुत० ॥ ३ ॥
अर्थ:-
1:-सकल द्रव्यमां समकाले नित्य, अनित्य, एक
अनेक, सत्य असत्य, एवा छए भाव परिणमे छे ए अनुपम
रूपेश्य विचागे ॥३॥
उत्सर्ग अपवादपटे करीरे,
जाणे सह श्रुन चाल ।
धचन विरोध निवारे युनिथोरे,
थापे इषण टाल ॥ श्रुन० ॥ ४ ॥

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हमान पामत्म समान पाते दे, नाता प्रकारचे साधुनी पंच भावना. श्रुतने गणधरोए याद्यो एम का छे एटले दम्पत ते पर भावभुतनुं कारण छे माठे भूत ते उपकारीज छे ॥६॥ श्रुत अभ्यासे जिनपद पामिएरे, छठे अंगे साख । श्रुतनाणी केवलनाणी समोरे, पनवगिने भाख ॥ श्रुत०॥७॥ अर्थ:-ज्ञाता अंगमां श्रुतअम्पासे जिनपद पामीए एम काछे बळी धृतज्ञानी केवलज्ञानी समों एती पण प्रकार सिद्धांतोमा धणे टेकाणे छे ॥७॥ श्रुतधारी आराधक सर्व ते रे, जाणे अर्थ स्वभाव । निज आतम परमातम सम प्रहेरे, ध्यावे ते नयदाय । शुत०॥ ८॥ पं.-श्रुतमानी पंचाग्नि दयना पूर्ण मार्ग अपने आम माटे गवं आगयर को अनजानीज पोताना आ- हाय हे पटो नए युक्तिवः अमाना पामभान यो यही मनमाने पाम ॥८॥ मंयम दाशन ने ज्ञान गंधर, यान तिर मापन। २ साधुनी पंच भावना. ९५७ भव स्वरूप चउ गतिनो लखेरे, तेणे संसार तजंत ।। श्रु० ॥९॥ अर्थ:-शुद्ध संपम अने शुद्ध सम्पदर्शन ते तज्ञानेज वघे अने धर्मत्यान लम्पान हे श्रुत अजाण साधी शके नहीं पण द्रव्य गुण पर्यायनो पूर्ण जाण श्तज्ञानी होय तेज धर्न शुक्लध्यान साधी शके वली श्रुतज्ञानीज शुद्ध ध्येय अने शुद्ध साधना प्रवृत्ति जागी साधी आत्म सिद्धि करे वली श्रुतज्ञानी चारे गतिर्नु भवस्वरूप जाणे तेथी ते भवभोगवी विरक्त थई उदासीनता रूप नावे ची क्षेम कुशलताए निर्भ- पपणे भव समुद्र तरे ॥ ९॥ इंद्रिय सुख चंचल जाणी तजेरे, नव नव अर्थ तरंग। जिम जिम पामे तिम मनं उल्लसेरे, वते न चित्त अनंग ॥ श्रु० ॥१०॥ अर्थः-श्रुतज्ञानी इंद्रियसुख चंचल अने उपचरित जागी तने अने शुतज्ञानीने वस्तुना नवा नवा अर्थ तरंगो अगडे ते सकल शंका खाजादियी निवर्ते म जेम अधिक भूत पामे तेम तेम आत्मवीयें करी मन उल्लास पाने अने तेना वित्तमां अनंग के काम विकार वसे नहि-हे नहि अने कोई ठेकाणे टस्युं छे के “नव नव अरपत रंग " एटले भून ते चित्तने शुद्धान्म भावमा नबो नवो रंग रांझ आपे ॥१०॥ G साधुनी पंच भावना. काल असंख्याताना भव लखेरे, उपदेशक पण तेह। परभव साथी आलंबन खरोरे, चरण विना शिव गेह ॥ श्रु० ॥ ११ ॥ अर्थ:--पूर्ण श्रुतज्ञानी असंख्याता काल गुधी पार भा जाणे अने श्रुतज्ञान विना जे उपदेश करे हे ते पोताने अने पर जीवने यूदायबापाला छे पण शुद्ध शुतज्ञानी तेज राममापी अने सत्य उपदेश करपायालो . परभवे जना जीवने श्रुतज्ञान तेज संगे रदेवाचालं सामु आउँपन छे अने याय चारित्र विना पण श्रुत एज मोझर्नु घरछे ॥११॥ पंचम काले श्रुन बल पण घगोरे, तो पण ए आधार । देवचंद्र जिन मतनो तत्व ए रे, श्रुतझ्यु धाग्यो प्यार ॥ ७० ॥ १२ ॥ अर्थ:-आ पायमा दुरामकाठमां ताट घरे तो पा श्रुतनोज भाया. देवयः मुनि को के दिन मनन् गार ने खानामा न अपाममा दत

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--mort ९६० साधुनी पंप भानना. उपहाणे योग दुहा करो, शिव साधेरे सुभा अणगार ।। भ० ॥३॥ अर्थ:-शुदात्म भावमां तृमिस्त जीर मन यघन शप- योगने तथा इंद्रिय विषयने पण जीते तेयी ता ते कर्मने छेदशावालो कापरावालो सार जाणो. ध्यानतुं कारण तेने उसल्यान कहीए पटले सारा पीनामा विषयादिक व्यापारमा पित गर्नु रोकीए ते ध्यान के० शुमाग भारमा यीलाने कारण 2 तेने उपचान यहीए. ते उपचाने करी मग पचन काप योग अगंयम पुदगल व्यापारसी वारी गपमपागर्मा थिर करी गुया अणगार मोक्ष साये ॥ ३ ॥ जिम जिम प्रतिज्ञा न थको, बैंगगीओ नपसी मुनिराय । निम तिम अशुभ दल लीजये, रवि नेजर जेमशीन मिलाय ॥ भ०॥८॥ अयं.-चगनी नपानी मनिगम मोवानी प्रति १. तेम देम अभामंदर दाजोम मनाई ईत मादा पामे देन अभार मा मे ॥४॥ ने मि पद्विमा आदर, आमन अप पुगोर। अनिचोन ममता मामां, मन म॥५॥ .

साधुनी पंच भावना. अर्थः-- मुनि साधुनी बार प्रतिमा मांहेयी कोइ पण प्रतिमा आदरे अने धैर्यपणे अडोल अकंप आसने रहे, समता: भावमा अतिशय लीन थइ उपयोगनी घिरता वधारे अने. शरीरने तृण परे जाणे ते मुनि सहज शिव संपदा वरे ॥५॥ जिण साधु तप तलवारथी, सूडयो छे हो अरि मोह गयंद । तिण साधुनो हुं दास छु, नित्य बंदुरे तस पय अरविंद ॥ भ० ६ ॥ अर्थः--जे साधए तपत्पी तलवार बडे मोह शत्रुरूप गजेंद्रने काप्यो ते सायनो हुँ वास छ अने तेना पदकमलने निय बंद ; ॥६॥ आचार सूयगडांगमां, तिम कह्यो हो भगवई अंग । उत्तराध्ययन गुणतीशमें. तप संगे हो सहु कर्मनो भंग ॥ भ०॥७॥ अर्थः-आचारांग, मूत्रकृतांग, भगवती अंगमा अने उत्तरा- ध्ययनना ओगणवीसमामां का छेके तपस्यावी सफल कर्मनो नाश धाय एम अनेक स्थानके कार्य हे॥७॥ ते दुविध दुकर तप तपे. भव पास आश विएन। धन्य ! साधु मुनि ढंडण समा, ऋपि खंधक हो तीलग फुल्दत्त ॥ भ० ॥८॥ 11 साधुनी पंच भावना. अर्थ:-जे मुनि भवपास आश विरक्त थया ते द्रव्यमाव दुविध दुकर तप आदरे. धन्य! ते टंडण मुनि, खंधक रुपि, तिसगमुनि अने कुरुदत्त ए आदि साधुओने के जे दुष्कर तप आदरी उत्तम गति वर्या छे॥८॥ निज आतम कंचन भणी, तप अग्नि करी शोधत। नव नवि लब्धि पल छते, उपसर्ग हो ते सहंत ॥ भ० ॥९॥ अर्थ:-निज आतम कंचन करवा एटले रागद्वेषादि म: ठीनता टाली शुद्ध सिद्धरुप करवा तप रूप अमिए करी कर्म मेल प्रजाली आत्मअंग शुद्ध कंचन करे. नव नवि लम्धिना वल छते पण सनत्कुमार चक्री पेठे महंत पुरुषो निराकुल पणे उपसर्ग परिसह सहे ॥ ९ ॥ धन्य ! तेह जे धन गृह तजी, तन स्नेहनो करी छेह । निःसंग वनवासे वसे, तपधारी हो ते अभिग्रह गेह ॥ भ० ॥१०॥ अर्थ:- :-धन्य! तेने के जे धन अने घर तजी तन स्नेहनो छेह करी निःसंग निर्भयपणे परसंग तजी वनवासे रहे. तपधारी मुनि ते अमिग्रहना घर छे. जगत्वासी जीव स्नेहपाने बघायला छे. स्नेह ममान अन्य पासज नयी, तेमां मुरूप ग्नेह देहनो , देह नेहवडेज घर धन स्त्री मित्र

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९६४ सावुनी पंच भावनाः वली निश्चयं जोतां आत्मा एक नित्य अजर अमर स्वतंत्र अरोगी, अनाकुल अक्षम अजन्म अयोनी अजय अमेद अछेद छे तो दुःख सुख आपदा संपदा ते कोने छ ? माटे धैर्य राखो ॥१॥ क्रोधादिक वसे रण सने, सह्या दुःख अनेक। ते जो समतामा सहे, तो खरो विवेक ॥रेजीब० ॥ २॥ अर्थः --क्रोधादिक वशे रणसंग्राममां मनुष्यो अनेक दुःस सहे छे अने विषय वशे पण अनेक दुःखो सहे छे. तेमन जीवो मान अने लोभवो जागी यूझीने अनेक दुःखो सहे छे पण जो समतावशे दुःखो सहे तोज साचो विवेक छे ॥२॥ सर्व अनित्य अश्वासतो, जे दीसे पह। धन नन सयण सगां सहु, तिणझ्यु इयो नेह ॥ रे जीव०॥३॥ अर्थ:-जे जे नजरे देगीए छाए, नारनवे मुंगामां आये है, जिन्यारती शाखामा आहे, त्वचाडे सांप छे ते ते यन नन मजन गगा सांची लोदी हाइमांग वार्य स्त्र मणि मानक मा आटारिक शनि वरिप शक्ति, मन चल चरनार मा ग्र पयायो अनिन्य अमर

साधुनी पंव भावना.
९६५
ता परतंत्र चल मल जइहे, तेथी [ स्नेह करयो ? के
जेना पडे युद्ध आत्मिक स्वतंत्र आनंदनी हानी ने अज्ञान
निध्यात्र कलाप जन्म जरा मरणादिनी इद्धि थाय छे तो
एवा दासदाई पुल पापो उपर शेग नर्स स्नेह करे ॥३॥
जिम वालक वेलू तणां,
घर करीय रमंत।
तेह छते अथवा व्हे,
निज निज गृह जंत ॥ रे जीव० ॥ ४ ॥
अर्थः-जेन बालक वेल्ल अने पूनां पर करी रने के
जने ते भागेयी जयचा तो तेने पञ्चां मुकीने पोत पोताने
धेर जाप हे. तेन पोइटिक वैभव पञ्चो मुकीने अथवा नाश
थवी संसारी जीव अन्य गत्यंतरे जाप हे. तो एहवा
परतंत्र पदार्थों उमर लेह सो अगर तेना नेहाशे बंधाई
रहे ते मोज्ञानिनादी जीवोने युक्त नयी ॥४॥
पंधी जेम सराहमां,
नदो नावनी रोति ।
तिम ए एरियण तो मिल्यो,
तिणधीशी प्रीति ॥ रे जीव०॥ ५॥
अर्थ:-या तो जेम धर्मशाना अयवा सराहनां मेगा
महे हे बी नासो वीगेरेना नामां पन अनेक तरेहना
तोको भगा नई ३ तेन ए कामो परिवार मल्यो हे त्यो
मोति करो जान्न सताने महं ए मुं हितरी हे ? ना
ए तो हितकारी नयी प. अहतकरी हे ॥५॥

साधुनी पंच भावना
ज्यां स्वारथ त्यां ए सहु सगां,
विण स्वारथ दूर।
पर काजे पापे भले.
तुं किम होये सूर ॥ रे जीव०॥६॥
अर्थः-ज्यां मुघी जेने स्वारथ छे त्यां सुधी ते सर्वे
सगपण राखे छे पण स्वारथ थया पछी वेगला रहे छे तो
ताहरे पोताना आत्म गुण शिवाय अन्य परिजनयी कांई
स्वारथ नयी तो परकाजे तुं शा वारते पापमां भयं अने
पाप कार्यमा केम शूरो थाउं छु ? ताहरूं शूरपणं ताहरा
रागादि शत्रुओने विदारवामां जो वापरूं तोज ताहरू पुरुष
पणानं साचुं पराक्रम कहेवाय पण कर्म शत्रुओने पोषवामां
अने आत्म गुणोनी हानि करवामां शरपणं करे वेना जेत्रो
मूर्ख कोण १ ॥ ६॥
तज वाहिर मेलावडो,
मिलियो बहु वार।
जे
पूरव मिलियो नहीं,
तिणस्युं धर प्यार ॥ रे जीव० ॥७॥
अर्थः--आत्म अंगयी बाहिरनो मेलापरूप मेलाबडो छोड
के ने अनंतिवार मल्यो नो पण निवृत्तिरूप सुख लेश
मात्र नाहग हाथमा आन्यु नहीं भाटे जे अनादियी नयी
मल्यो एहवो शुद्धाम धर्म अने शुद्धाम धर्मना दातारयी
प्या कर के वडे पग निवृनि शाभूत सुम्ब पामे. ॥७॥

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सावनी पंच भावना. साधवा रूप उत्तम नरभव हाय आन्यो छे अने तुं गरटन राखु के शी फीकर छे तो नरभवादि सर्वे धर्म सामग्रोनो जोग मलबो दुर्लभ छे एम जाणवू ॥ ९ ॥ रोगादिक दुःख ऊपने, मन अरति मघेव। पूरव निज कृत कर्मनो, ए अनुभव देव ॥रे जीव०॥१०॥ अर्थः-रोगादिक दुःख उपने तुं मनमा अरति न ग्रहीश केमके पूर्व निज कृत कर्मनो एहयो अनुभव छे. वी तुं निज रूपे आरोग्य ज्ञायक अखंड शुद्ध तत्त्व तो ए अधीर देह संभालंता छतां पण न रहे एवीने संभालवानी वेठ के प्रयास क्यां सुधी करीश १ माटे ताहरी आरोग्य ज्ञायकताने संभाल के जेयी निःप्रयासी शाश्वत स्वतंगसुम प्रगटे ॥१०॥ एह शरीर अशाश्वतो, खोणमें सीसंत। प्रीत किसि ते ऊपरे, जे स्वारथवंत ॥रे जीव०॥ ११ ॥ अर्थ ~~अनत पुदगल वर्गणायी उपजेलं प्रयु आ दर अनामत अणमा भय पामे एप में उपर प्रीति की ' या मनी आत्म गुरनामां प्रीत " नी मा गर्व नाzi प्रानि गण गांदराज टोरमा उपा नपा स्वारपांत साधुनी पंत्र भावना. रहेला पार्थोमां विखरी रह्यो छे पण तने हितकारी थतो नयी. माटे गुहात्मगुणमां अने शुद्धात्म तत्त्व दातारमों प्रीति कर के जेवी अनंति प्रीत ताहरी ताहरामा थशे ॥११॥ ज्यां लगे तुज ईण देहथी, छे पूरव संग। त्यां लगे कोटि उपायथी, नवि थाये भंग ॥ रे जीव०॥ १२ ॥ अर्थः--ज्यांसुधी आ देहयी ताहरो पूर्ण कर्म वशे संग छे त्यांसुधी क्रोडो उपाययी पण ए देहनो भंग थवानो नयी अने तुं तो क्षायिक अभंग अंगवालो छ ॥ १२ ॥ आगल पाछल चहुं दिने, जे विणसी जाय। रोगादिकथी नवि रहे. कोध कोटि उपाय ॥ रे जीव० ॥.१३ ॥ अर्थः-देह तो आगर पाडल चार दिने निश्चय विनाश पामवावाली छे अने रोगादि टालबा कोडो उपाय करवायी पण रहे एवी नयी ॥ १३ ॥ अंते पण एने तयां, थाये शिव सुख । ते जो छूटे आपथी, ता तुज श्यो दुःख ॥रे जोव० ॥१४॥ 100 'MAdminary -- सावनी पंच भावना. अर्थ:--आखर पण देह ममत्व छोडवायीज नियमा शिव- सुख थाप छे तो ते देह आपयी छठे तेमां तुजने गुं दुःख छ । देहना ममत्ववडेज अनेक जातना कर्म रोग अने दुःस खडा थयां छे तो ते ममत्व तजवायीज मुख थाय एमांशु शंका छ १॥ १४ ॥ ए तन विणसे ताहरे, नवि कोई हाण। जो ज्ञानादिक गुणतणो, तुज आवे झाण ॥ रे जीव०॥ १५॥ अर्थ:-जो तने निज ज्ञानादिक गुणर्नु ध्यान आवे अने थीर रहे तो ए देह विणसतां ताहरी कोइ प्रकारनी हानि नयी ॥ १५॥ तुं अजरामर आतमा, अविचल गुण राण। क्षण भंगुर जड देहथी, तुज किहां पिछाण ॥ रे जीव० ॥ १६ ॥ अर्थ:-तुं जग रहिन अमर आत्म तत्व छ तुं ताहरा शान पारिप का भोक्ता ग्राहकता व्यापकता आदि अनंत अविचल गुणोने गजा छ अंने न पोनानो मृलया ए गुणो मन कम्य नो कोग गर जगदी नाहग गुणो मलीन को गन • माट गणी मृद अन योर गदी अबल

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९७२ साधुनी-पंच भावनाः अर्थ:-ज्ञान ध्याननी वात करखी सुगम छे पर कोई शुभाशुभ उदय आन्ये, अंत समय आफत पझ्ये विस्तार ध्यान राखे छे माटे कोइ समय पण स्वसयम चूको नही ॥ १९॥ अरति करो दुःख भोगवे, परवश जिम कोर। तो तुज जाणपणातणो, गुण केवो धीर ॥ रेजीय० ॥ २० ॥ अर्थ:--अशुभ कर्म उदय आव्ये पर वशता मानी आदरी कीरनी पेठे अरति करी तुं दुःख भोग तो ताहरा जागर णानुं धैर्य गुं रघु १ माटे आत्म अंग असंड अभंग जाणी धैर्य आदरी दीन थयु नहीं ॥ २०॥ शुद्ध निरंजन निरमलो, निज आतम भाव । ते विणसे कहे दुःख किशो, जे मिलियो आर ॥रे जीर० ॥ २१ ॥ अर्थ-नाहरो शुद्ध निर्मल के यमरज मने नही पहनो मुद्राम भार हे ते जाग निश्य का ते माद का का, पा वर्म दशे आदी म्ले या पुदार पपीय विमानां ननदम। शेन वात निगम ने कोर तुःस का प्रभम 5.+2 मा आदी देने בים ..

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साधुनी पंच मावना. कष्ट पड्यां समता रमे, निज आतम ध्याय । देवचंद्र तिण मुनि तणा, नित बंदु पाय ॥ रे जीव० ॥ २४ ॥ अर्थः-देवचंद्र मुनि कहे छे के कट आग्या छतां पर पोताना द्रव्य क्षेत्र काल भावमां संतोय रासे समता घरे एटले आत्म शुद्धता ध्याय तेवा मुनिना चरणकमल यंदु एं ॥२४॥ ॥ दाल ४ थी। ॥ प्राणी धरीए संवेग विचार ॥ ए देशी ॥ ज्ञान ध्यान चारित्रने रे, जो द्रढ करवा चाह। तो एकाकी विहरतां रे, जिनकल्पादि साय रे प्राणी एकल भावना भाव, गिय मारग साधन दाव रे ॥ ॥ प्राणो० ए आंकणी ॥ १ ॥ अर्थ:-जे मनि मान -गान अने पारिपने दर का महायता मनि . ' मिनाहि मार

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十

सायनी पंच भावना. ९७७ आव्यो पण तुं एकलो रे, जाईश पण तुं एक। तो ए सर्व कुटुंवधी रे, प्रीत किति अविवेक रे ॥ प्राणी० ॥७॥ अर्थ:-तुं अहिंआं एकलोज आन्यो छु अने एकलोज जईश तो आ अधिर कुटुंब अने अन्य अनेक पदार्थोवी हे अविवेकी ! तुं शा माटे पोति राखं छं १ ॥७॥ वन मांहे गज सिंहादिधी रे विहरतां न टले जेह । जिण आसन रवि आधमे रे, तिण आसन निशि छेहरे ॥ प्राणी० ॥८॥ अर्थः-मुनि वनमा गज सिंहादि देखी भय पामी पाहो हठे नहीं पण विहार करतां जे आसने रवि अस्त धाय तेज आसने निर्भयपणे रहि रात्री पूरी करे ॥८॥ आहार ग्रहे तप पारणेजो, करमा लेप विहोण। एक बार पाणी पीवतां रे, वनचारी चित्त अदीनरे ॥ पाणी० ॥ ९ ॥ अर्थः-मुनि तपने पारणे स्वाद आदिकनी लोलुपता महादिक कर्म लेप रहिन संपम अ दिनमा एक बार आ- 1:23 हो it T17 repit's पर संगे गुण हाण। पर धन प्राही गोर ने रे. एकपणी मुमणरे ॥ प्राणी ॥ १० ॥ अप:- दोगो गन पाप महगा प्यारना, साता, माता, भोता दिपायी उपग्या छे पगार पोपनी पाहाता या माता आदि छोडी रादारम नप प महेनो अर्गत गुगनी खाण ने पण पा मगे नो गुणोनी हानि भाग माटे पामंग ना. एक गुदाम भावमा मATI हे तेज एकटया सता गुरु वाण छे. जे पर ग्राम पर धन हे ते योर जागो पण पोतानी यन्तु भोगो ने निर्णयाणे सहने सुरमा बनें म आत्मा पर परिणति ग्रहण। नत्री ज्ञानादित निन पर गतिमा ग्राहकता यापाता सता कर्ता भोक्ता आदिप आदरे तोज शाश्चन समाधिमा मग्न रहे ॥१०॥ पर संजोगधी बध छरे, पर वियोगधी मोक्ष। तेणे नजी पर मलाना. गकपणा निज पायो । प्राणी ॥ ११ ॥ अर्थ न ' डोड्यां मुक्ति साधनी पंचभाषना. ९७९ छे. ते माटे पर मेटाबडो तजी पोताना एकपणाने जाणी ज्ञानादिक गुणोने पुष्ट कर ॥ ११ ॥ जन्म न पाम्यो साथ कोरे, साथ न मरशे कोय। दुःख व्हेंचवा को नहींरे, क्षणभंगुर सहु लोयरे ॥ प्राणी ॥ १२ ॥ अर्थः-कोइ साथे सलाह करी जन्म पाम्यो नयी वेम मन्यो पण नयी तेम दुःख बहेंचवा पण कोइ समर्थ नयी पण जेने जेवां जन्म मरण दुःख आदिनो उदय होय तेवोज ते भोगवे से जीवनां शरीर क्षणभंगुर छे माटे अक्षय आत्म अंगमां पोतावणं जागी एकत्त्वपणे घिर रहो ॥१२॥ परिजन मरतो देखीनेरे, शोक करे.जन मूढ । अवसरे वारो आपणोरे, सहु जननी रूढरे ॥ प्राणी० ॥ १३ ॥ अर्थः-परिवारमायी कोइने मरतो देखी. मुह पुरुष शोक करे छे वली अवसरे सर्वनो तेम आपणो एज वारी छ एम जाणीने परिजन अने शरीर रुपपर द्रव्यमां ममता करता नयी ते अखंड शुद्ध निज आत्म स्वभाव जाणी निर्भय निराकुल रहे छे ॥ १३ ॥ सुरपति चक्री हरी वलोरे, एकला परभव जाय ।

२८२ साधुनी पंच भावना.. नयी कारछे परवस्तु छे. माटे हे भवि! तमे एनी ममता अने स्नेह संभाल छोडी शुद्ध निरंजन आत्मदेवने ध्यानो पोताना शुद्ध स्वरूपनो अनुपम अनुभव अभ्यास करो ॥१॥ नरभव श्रावक कुल लह्यो । तु०॥ लाधो समकित सार ॥ भविक० ॥ जिन आगम रुचिशं सुणो ॥ तु॥ आलस निंद निवार ।। भविक० ॥२॥ अर्थ:---उत्तम आर्य क्षेत्रमा नरभर आरकंकुल सदगुरु भने सत्शास्त्र योग पाम्या के जे दशे दांत पामो दुर्लभ के. एवी सामग्री पामी विषय प्रमाद यशे फोगट न गमागे अने सार समकित पण पाम्या छो माटे आलस अगे- निद्रा कोडी जोनेश्वरे प्ररुपेलं आगम के जेमां सम्यरुमाश्म फोरी हाल कर्मनो नाश करी परमनित्ति रुप मोक्षपदनी प्राप्ति याप ए आदि भाव अताच्या छे ते आगम परम मेम कपि आदर सहित सांभलो. वी आगममा पंपास्तिकायना अने नवे तत्वना भाव प्रत्यक्षपणे सिद्ध करी देखाध्या छे ते भिटो शकादि दोष टाली निःशंक निर्मयपने मोमगार्ग सावी ॥ २ ॥ समयांतर सहभावनो ॥ तु०॥. दर्शन ज्ञान अनंत ॥ भ० ॥ आनम भात्र थिर सदा ॥ तुं० ॥ प्रसय चरण महन। भ॥ ३॥ .

निन लोक निहंकालनी ॥ तु ॥
परिजन नीन प्रकार न
एक सने जानि॥तु !!
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माल दोपहारको दु:

साधुनी पंच भावना. पुद्गल संकल विवेकथी। तु०॥ शुद्ध अमूर्ति रूप ॥ भ०॥ ईद्रिय सुख निस्पृह थई ।। तु०॥ अकषाय अवाह खरूप॥.भ०॥६॥ अर्थः-पुद्गल ते पोताना वर्ण गंव रस स्पर्श सहा पडण विध्वंसन ग्रहण त्याग ए आदि अनेक रूपी सन सहित छे. एयी मिन्न आत्म ज्ञान दर्शन रमण मुख वीर दान टाम भोग उपभोग उपभोगादि अनेक अरूपी अनून लक्षण युक्त सदा छे. कोई काले पण ते पुदगदादि अन्य द्रव्यना विशेष लक्षणवालो हतो नहीं, छे नहीं, पशे नहीं माटे परलक्षणे पोतानो न जूओ. आत्मा स्वागे अग्नि परलमगे नास्ति रूप छ. एम परम विके स्वपर मिलता जागी पर ममता आदि त्यागी आपणा ट्रम्प क्षेत्र काल भारसा आपापणानी रुडी मति की पिर उपयोगे अखंड समर आत्मशुद्धता घ्यावो, आन्म शुद्धतामां उपयोग स्माशे, इंदिर सुरसयी निस्पृह थई कपापो अने कपायोनां कारग तत्री अबाधित शुद्धात्म स्वरुपमा क्ष यिर करो ॥६॥ द्रव्यतणा परिणामथी॥तु०॥ अगुरु लघुत्व अनित्य ।। भ०॥ सत्य स्वभावमयी सदा ॥तु०॥ असत्य तजी तुमे मित्त ॥०॥७॥ Arma सावनी पंच भारता. नो न समये नवा नवा पापे सगुण हानिवृद्धिपने बुन कृतां उसाद चपाने परिपने डे. एको अनित्य स्वभाव सतां पन नित्य स्वभाववालो अने स्पावाद परिणानी जान सनाव घ्यावी, पोताना म्प क्षेत्र रहने भावे सदा तत्प स्वभावत आत्मा हे जने पर द्रव्य क्षेत्र का बने भावे जल्द हे. नाडे हे नित्र ! बल्ल तजि सत्य सनावमयो पान स्वरूप ध्यान ॥७॥ निज गुण रमतो राम ए॥तु० ॥ सकल सकलगुण साण ॥भ०॥ परमातम पर ज्योति ए॥ तु०॥ अलख अलेप वखाण ॥ भ०॥८॥ कई:--जामा पोताना हद्ध गुणमा रमतो पोज राम हे, एके परम जारानी हे. वर्ड, दुदिदी बली साप नहीं एहतो जाड जने सस्त गुन्नी सा हे. वटी ए परमात्मा हे, परमभावनो भोगी हे. सूर्य चंद्र तारा नहा रत आप्न जादिनी व्यावहारिक ज्योतिषी पर एके ज्ञान दर्शन रूप आजक परम पोतिवंत हे, वर्ड. उनस्पने पूर्व कां को नहीं पहनो हे. वर्ड जेन सामने कनादि डेर नागे नहीं तेन अन्न संगे पुद्गल टेर को नहीं एहतो निरव दे और जाने को पहन लेने स्वपना कहे देने और लग्ने नली एहसोजमा खिलानेनं उतरे ॥८॥ 1::

साधुनी पंच भावना. पंच पूज्यथी पूज्य ए ॥ तु०॥ सर्व ध्येयथी ध्येय ॥भ०॥ ध्याता ध्यान रू ध्येय ए ॥तु०॥ निश्चे अभेद ए श्रेय ॥ भ०॥९॥ अर्थ:--अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय अने साप पंच परमेष्टी पूज्य छे वेमने पूजवाथी जीव देवादिक शुभ गति पामे केमके प्रशस्त राग ते पण पुण्याश्रव रूप छे अने पोताना परमदेवने पूजयु ते तो राग रहित शुद्धात्म भाव हे. तो शुद्वात्म भाव सेवतो पुरुष निर्वाण पद पामे. अरिहंत अने आचार्यादि तत्त्व उपदेशना दातार छे पण ते उपदेशने ग्रहण करवावालो अने सेववावालो आत्मा पोतेज पूज्य छ, वलि आत्मशुद्धता शिवाय जे अन्य ध्येयतुं ध्याई ते शुभा शुभ बंध प्रकृतिने वधारवावालुं छे अने सहज शुद्धात्म स्व. रूपनुं ध्यायु ते शुभाशुभ बंध विना निर्वाण पद आफ्ना छे. माटे साल ध्येयमां शुद्धात्म भाव ते परम ध्येय हे. शुद्ध ध्यानने ध्यावाचालो पोते आत्माज छे अने उपयोग शुद ध्येयमा यिर करयो ते उपयोग पोतानोज छे अने गुन्द्र ध्येय ते पोनाज शुद स्वरूप छ, एम ध्याता ध्यान अने ध्येय व्यवहारे मेद कहीये अने निश्चपनये ए प्रो भाव आत्मायी अभेद पो छे पटले आत्मानाज छे तेज श्रेप के. कल्याणकारी छे ॥ ९ ॥ अनुभव करनां पहनी ॥ तु.॥ थाए परम प्रमोद ॥ भ० ॥

साधुनी पंत्र भावना. शिव सुख एक रूप अभ्यासशु॥ तु० ॥ छे तसु गोद ॥ भ०॥१०॥ अर्थः-आत्म शुद्धतानो अनुभव करतां परम प्रमोद उपने अने पुनल विषय अनुभव रूप अशुद्धता टले. जे मुनि अनंत लक्षणमयी पोताना ज्ञायक एक रूपनो अभ्यास करे- ध्याय तेने मोक्ष सुख पोतानी गोदमां एटले पोताना खोला- मांज छे॥१०॥ बंध अवंध ए आतमा ॥ तु०॥ करता अकरता एह ॥ भ० ॥ एह भोगता अभोगता ॥ तु०॥ स्याद्वाद गुण गेह ॥ भ० ॥ ११ ॥ अर्थः-परश्यना ममत्वयी बंधायलो आत्मा व्यकर्म तथा भावकर्म बांधे छे पण शुद्ध आत्मस्वरूप जागी पर पारिणानिकता त्याग्या पछी स्वस्वरूपमा रमे त्यारयी अयंत्र के. वली व्यवहारनपयी द्रव्यकर्म अगर पुद्गल वर्गणा, जीव वर्गगी जीव बांधे छे अने निश्चय नपदी पोताना निग्य रुक्षगणे करी पुद्गल परमाणुआ अगर पुद्गल वर्गणा आ- पसमां पुद्गलो साये बंधाय छे पण नीच, पुद्गलो साये बंधातो नयी. व्यवहार नपयी जीव, द्रय कर्मनो अने गाम नगर घट पटादिनो कर्ता कहेवाय पण निश्चयनपयी गाम नगर के घर पर तथा न्यकर्म पुद्गल वर्गणा आदिनो कर्ता जीव नयी. पण स्वस्वभावनो कर्ता हे. रागादि वो पर गुण पर्यापनो भोगी जीन कवाय पण निश्चय नपी

साधुनी पंच मावना.
पर गुण पर्यायनो भोगी जीव नयी. अगद निश्श्ये रागादि
अशुद्धतानो भोगी छे पण शुद्ध निश्चयनये पोता- शुद्र
स्वरूप जाण्या पछी पोताना ज्ञानानंद आदि अनंत एद्र
स्वभावनो भोगी छ एम स्याद्वाद एज गुण घर छे ।।
एक अनेक स्वरूप ए तु०॥
नित्य अनित्य अनादि ॥ भ०॥
सदसद्भावे परिणम्या | तु०॥
मुक सकल उन्माद ॥ भ०॥ १२ ॥
अर्य:-आत्मा पोताना परम चेतनत्व स्वभावे निधय
अनंत पर्पायनो एक पिंड एक रूप छे अने ज्ञान दर्शन
घरण सुख वीर्यादि के व्यवहारे अनेक रूप छे. द्रव्यार्षिक
नये नित्य छे. नवा नवा पर्याय परिणमवे पर्यापापिकनये
अनित्य छे. स्वयादिके सत्य अने पदयादिके असत्य
छे. एम वें यो सकल समय सदसदभावे परिणापा
अनादि सिद्ध छे. माटे मोह मदिरानो उन्माद छोडी पपा-
वत् वस्तु स्वरूप जागी पदम्पनी ममता छोडी शुदारम
तत्वमा लीन थर्बु जोइप ॥ १२॥
जप तप करिया खपथकी ॥ तु.॥
अष्ट करम न विलाय ॥ भ०॥
ते सहु आतम ध्यानयी ॥ तु० ॥
क्षणमें खेरू थाय ॥ भ० ॥ १३ ॥

साधुनी पच भावनाः ९८९० अर्थः--तप जप किरियानो खप. करवायी जे आठ कर्मनो नाश थाय नहीं ते आठे कर्मनो शुद्धात्म ध्यानवडे क्षणमां क्षय थाय छे ॥ १३ ॥ शुद्धातम अनुभव विना ॥ तु०॥ बंध हेतु शुभ चाल ॥ भ० ॥ आतम परिणामे रम्या ॥ तु०॥ एहज आलव पाल ॥ भ० ॥१४॥ अर्थः-शुद्धात्म अनुभव बिना शुभाशुभ सर्वे आचरण ते कर्मबंधनां हेतु छे. जे जीव शुद्धात्म परिणामे रम्या तेने आस्रवरूप पाणी आवतुं अटकाववाने पाल बांधी एटले शुभाशुभ पुद्गल दल अने शुभाशुभ पुद्गल परिणाम रस आवता रोकवाने संवर रूप आडी पाल बांधी एम जाणवू ॥१४॥ ईम जाणी निज आतमा ॥ तु० ॥ वरजी सकल उपाध ॥ भ०॥ उपादेय अवलंवने ॥ तु०॥ परम सहोदर साध ॥ भ० ॥१५॥ अर्थः-एम जागी सकल शुभाशुभ विभाव उपाधि डाली एकलो सहज निज शुद्धात्म भाव रूप शुद्ध तत्व ध्याओ. शुद्ध आत्मभाव रूप उपादेय अवलंबने वत्ती परम महोदय सिद्धि पद साध्य साधो-सिद्ध करो ॥ १५ ॥ भरत ईलासुत तेतली ॥ तु० ॥ ईत्यादिक मुनि धुंद ।। भ० ॥

९९० सांधुनी पंच भावना. . आतम ध्यांनथी ए तर्या ॥ तु.॥ प्रणमे ते देवचंद्र ॥ भ० ॥ १६ ॥ अर्थः-भरत चक्री, इलायचि कुंवर, तेतली मुनि, ए आदि मुनिओना वृंद शुद्धात्म ध्यानधी तरया छे तेने देव. चंद्र मुनि वंदे छे. परमार्थ ए के घणो काल अगर थोडे काल वाह्य चारित्र प्रवृत्ति करो पण ज्यारे. पूर्ण समभाव आदरी समयानंतर शुद्धात्म उपयोगमा मग्न लीन थशो तोज केवलज्ञानादि शुद्ध गुणो पामी सिद्धि परशो ॥ १६ ॥ ॥ ढाल ६ छठी॥ शैलग शेवंजे सिया ॥ ए देशी ॥ भावना मुक्ति निशाणी जाणी, भावो आसक्ति आणीजी। योग कपाय कपटनी हाणी, थाये निर्मल जाणीजी ॥ भावना ॥१॥ अर्थः-ए पंथ भावना मुक्तिनी निशानी अर्यात निम- रगी छे. एम जाणी ए भावनाओमां विशेष रक्त थई तन्म- यताए भावो. तेवी अप्रशम्न योग कपायो अने कपट आदि दुर्गणोनी हामी थाय, अने ए भाषना निर्मल जागी जे सेवे दे उतावलो आन्म शुटना पामे ॥ १ ॥ पंच भानना प मुनि मनने, संवर वाणी चबाणीजी।

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९९२
सावनी पंच मावना.
धारी शुद्ध तत्त्व विचारवावाला राजसागर नामा पाटक वे
शिन्य निर्मल ज्ञान अने निर्मल धर्मना भंडार सहु से
हितकारी ज्ञानधरम नामना पाठक वली ॥४॥
राजहंस सहगुरु सुपसाये,
देवचंद्र गुण गायजी।
भविक जीव जे भावना भावे,
तेह अमित सुख पायजी ॥ भ०॥५॥
जेसलमेरी शाह सुत्यागी,
वर्द्धमान वड भागीजी।
पुत्र कलन सकल सोभागी,
साधु गुणना रागीजी ॥ भ०॥६॥
तस आग्रहथी भावना भाई,
ढालवंधमां गाईजी।
भणशे गुणशे जे ए ज्ञाता,
लहेशे ते सुख शाताजी ॥ भा०॥७॥
मन शुद्ध पंचे भावना भावो,
पावन जिन गुण पावोजी।
मन मुनिवर गुण संग बसायो,
मुख संपनि गृह थावोजी ॥ भा०॥८॥

अष्ट प्रवचन मातानी सझ्झायो.
॥दोहरा ॥
सुकृत कल्पतरु श्रेणिनो,
वर उत्तरकुरु भोमि ।
अध्यात्म रस शशि कला,
श्री जिन वाणी भौमि (नौमि?)॥ १ ॥
दीपचंद पाठक सुगुरु,
पय वंदी अवदात।
सार श्रमण गुण भावना,
गाइशुं प्रवचन मात ॥२॥
जननी पुत्र हित शुभकरी,
तिम ए पवयण माय।
चारित्र गुण गणवर्द्धनी,
निरमल शिव सुखदाय ॥३॥
भाव अयोगी करण रुचि,
मुनिवर गुप्ति थरंत ।
जो गुप्ति ना रहि शके,
तो सुमते विचरंत ॥ ४॥

अष्ट प्रवचन भातानी सइझायो. -- गुप्ति. एक संवरमयी, उछरंगीक परिणाम। संवर निर्झर समितिथी, अपवादे गुणधाम ॥ ५॥ द्रव्ये द्रव्यत चरणता, भावे भाव चरित्त । भाव द्रष्टि द्रव्यत क्रिया, सेवि लहो शिव मित्त ॥ ६ ॥ आतम गुण प्रागभावथी, जे साधक परिणाम । समिति गुप्ति ते जिन कहे, साध्य सिद्धि शिव ठाम ॥७॥ निश्चय करण रुचि थई समिति यतिधर साधि । परम अहिंसक भावथी, आराधे निरुपाधि ॥८॥ परम महोदय साधवा, जेह थया उजमाल । श्रमण भिक्षु माहण यति, गावू तस गुणमाल ॥ ९ ॥ २ अट प्रवचन मातानी सम्झापो. ९९५ ॥ वाट पहेली। प्रथम गोवालगतने भवेनी ॥ए देशी।। प्रथम अहिंसक मततणीजी. उत्तम भावना एह ।। संवर कारण उपदिशीजी, समता रस गुण नेह ॥ मुनोतर इरिया समिति संभार, आप्रव कर तनु योगधीजी, दुष्ट चपलता पार ।। मुनोतर० ॥१॥ काय गुप्ति उत्तर्गनोजी, प्रथम समिति अपवाद । इरिया ते जे चालवोजी. धरि आगम विधिवाद. मुनी० ॥ २ ॥ ज्ञान प्रान तिझापनांजी, पिर पेटा मुनिराज ॥ इयाने चपलपणी करजी, अनुभव ग्न मुनगज ॥ मुनी ॥ ३ ॥ मुनि 5 वनहीं पसीजी, पानी कारन यार।

अष्ट प्रवचन मातानी सइझाया. जिन वंदन ग्रामांतरेजी, के आहार निहार ॥ मुनी० ॥ ४ ॥ परम चरण संवर धरुजी, सर्व जाण जिन दीठ ॥ शुचि समता रुचि ऊपजेजी, तिणे मुनिने ए ईदृ ॥ मुनी० ॥ ५॥ राग वधे थिर भावथीजी, ज्ञानविना परमाद ॥ वीतरागता ईहताजी, विचरे मुनि साल्हाद ॥ मुनी० ॥६॥ ए शरीर भव मूल छ जी, तसु पोपक आहार । जाव अयोगी नवि हुवेजो, त्यां अनादि आचार ॥ मुनी० ॥७॥ कवलाहारे निहार छे जी, एह अंग व्यवहार। धन्य अतनु परमातमाजी, जिहां निश्चलता सार. मुनी० ॥ ८॥ पर परिणति कृत चपलताजी, कीम मूकस्येरे एह ।

मा प्रवचन मातानी सहझापो. निस्पृहो तनु एम विचारी कारणेजी, करे गोचरी तेह ॥ मुनी० ॥ ९ ॥ क्षमावंत दयालुआजो, नीराग। निर्विषयी गजगतिपरेजी, विचरे मुनि महा भाग । मुनी० ॥ १० ॥ परमानंद रस अनुभव्याजी, निज गुण रमता धोर। देवचंद मुनि वंदतांजी, लहिये भवजल तीर ।। मुनी० ॥ ११ ॥ ॥ दाल दोजी॥ ॥ भावना मालती वृत्तीए ॥ ए देशी ।। साधुजी समिति बीजी आदरो, वचन निदाप परकासरे। गुप्ति उत्सर्गनी समिति ते, मार्ग अपवाद सुविलासरे ॥ साधु० ॥१॥ भावना बोजा नहाबननणी, जिन भणी सत्यना मुलर ।

अष्ट प्रवचन मातानी सडझायो. भाव अहिंसकता वधे, सर्व संवर अनुकुल रे ॥ साधु० ॥ २: मौनधारी मुनि नवि वहे, वचन जे आश्रव गेहरे। आचरण ज्ञानने ध्याननो, साधक उपदिसे तेहरे ॥ साधु० ॥३॥ उदित पर्याप्ति जे वचननी, ते करी श्रुत अनुसाररे। वोध प्रागभावी सन्जायथी, पलि करे जगत उपगाररे ॥ साधु० ॥ ४॥ साधु निज वीर्यथी परतणो, नवि करे ग्रहणने त्यागरे। ते भणी वचन गुप्ति रहे, एह उत्सर्ग मुनि मार्गरे ॥ साधु० ॥५॥ योग जे आश्रवपद हतो, ते कों निर्झरा रूपरे। लोहथी कंचन मुनि करे, साधता साध्य चिद्रूपरे ॥ साधु० ॥ ६ ॥ आत्म हित पर हित कारणे, आदरे पांच सिझायरे । ६ अष्ट प्रवचन मातानी सइझायो. । ते भणी असन वसनादिका, आश्रय सर्व अववायरे ॥ साधु० ॥७॥ जिन गुण स्तवन निज तत्त्वने, जोइवा करे अविरोधरे। देशना भव्य प्रतिबोधवा, वायणा करण निज वोधरे ॥ साधु० ॥८॥ नय गम भंग निक्षेपथी, स्वहित त्याद्वादयुत वाणरे। सोल दश चार गुणतु मिलि, कहे अनुयोग सुपहाणरे ॥साधु० ॥९॥ सूत्रने अर्थ अनुयोग ए, वीय नियुक्ति संजुत्तरे, तीय भाष्ये नये भाषियो, मुनि वदे वचन एम तंतरे ॥ साधु० ॥१०॥ ज्ञान समुद्र समता भर्या, संवरी दया भंडाररे। तत्व आनंद आखादता, वंदिए चरण गुणधाररे । साधु० ॥ ११ ॥ मोह उदये अमोहो जिना, शुद्ध निज साध्य लयलीनरे ।

अह प्रवचन, मातानी सइझापा. WAAD देवचंद्र तेह मुनि बंदिये, ज्ञान अमृत रस पीनरे साधु० ॥ १२ ॥ ॥ ढाल ब्रीजी॥ " । झांझरिया मुनिवर ॥ ए देशी ॥ समिति तीसरी एपणाजी, पांच महानत मूल । अणहारी उत्सर्गनोजी, ए अपवाद अमूल; मनमोहन मुनिवर समिति सदाचित्तधार॥१॥ चेतनता चेतनतणीजी, नवि परसंगी तेह । तिण पर सन्मुख नवि करेजी, आतमरतो व्रती जेह ॥.मन० ॥२॥ काय योग पुद्गल ग्रहेजी, एह न आतम धर्म । जाणग करता भोगताजी, हुं माहरो ए मर्म ॥ मन० ॥३॥. अणभिसंधि चल वीर्यनीजी, रोधक शक्ति अभाव ।

अर प्रवचन मातानी सहसायो. पण अभिसंधिज वीर्ययोजी, कोम ग्रहे परभाव ॥ मन० ॥ ४ ॥. इम पर त्यागी संवरीजी, न ग्रहे पुद्गल खंध । साधक कारण राखवाजी, अशनादिक संबंध ।। मन० ॥५॥ आतम तत्त्व अनंतताजी, सान विना न जणाय । तेह प्रगट करवा भणीजी, घुत सहसाय उपाय ॥ मन०॥६॥ तेह जेहथी देह रहेजी. आहारे पलवान् । साप्प अरे हेतुनेजी. फेम तजे गुणवान् ॥ ७ ॥ तनु अनुपायो वीर्यनोजी. वर्तन अदान संजोग। हर पहि सम जाणोनी. सानादिव उपभोग । मनः ॥ ८॥ जो साधकाना नरी सहेली. . तोनमरे आहार । 153 १००२ अष्ट प्रवचन मातानी सइझायो. वाधक परिणति वारवाजी, अशनादिक उपचार ॥ मन० ॥९॥ सुडतालीसे द्रव्यनाजो, दोप तजी नीराग। असंभ्रांति मूछा विनाजी, भ्रमर पेरे वडभाग ॥ मनः ॥१०॥ तत्त्व रुचि तत्त्वाश्रयोजी, तत्त्व रसीक निग्रंथ। कर्म उदये आहारताजी, मुनि माने पलीपंथ ॥ मन० ॥ ११ ॥ लाभथकी पण घन लहेजी, अति निर्झरा करंत । पाम्ये अण व्यापकपणेजी, निरमल संत महंत ॥ मन० ॥ १२ ॥ अणाहारता साधताजी, समता अमृत फंद। भिक्षु श्रमण वाचंयमीजी, ते वंदे देवचंद ॥ मन० ॥ १३ ॥ १.

अष्टःप्रवचन मातानी सइझापो. ॥ दाल चोथी॥ ॥ भोगंडा हत्तारे विषय न राचीएं ॥ ए देशी ॥ समिति चौधोरे चउ गति वारंणी, भासी श्री जिनराज। राखी परम अहिंसक मुनिवरे, चाखी ज्ञान समाज ॥१॥ सहज संवेगोरे समिति परिणम साधन आतम काज। आराधन ए संवरं भावनो, भव जल तारण जहाज ॥ सहज० ॥२॥ अभिलापो निज आतम तत्वना, साखी करि सिद्धांत ॥ नाखी सर्व परिग्रह संगने, ध्यानाकाशीरे संत ॥ तहज० ॥३॥ संवर पंचतणी ए भावना, निरूपाधिक अप्रमाद । सर्व परिमह त्याग अतंगता, तेहनो ए अपवाद ॥ सहजः ॥१॥ श्याने मुनिवर उपकरण संग्रहें, जे परभाव विरत।

१००४ 'अष्ट प्रवचन मातानी सइझाया. देह अमोहीरे नवि लोही कदा, रत्नत्रयी संपत्त ।। सहज० ॥ ५॥ भाव अहिंसकता कारण भणी, द्रव्य अहिंसक साधि। रजोहरण मुख यत्रादिक धरे, वरवा योग समाधि ॥ सहज० ॥ ६ ॥ शिव साधननो मूल ते ज्ञान छे, तेहनो हेतु सझ्झाय ! ते आहारे ते बलि पायथी, जयणाए प्रयाय ॥ सहज० ॥ ७ ॥ पाल तरुण नर नारी जंतुने, नग्न दुर्गच्छानो हेतु। तिणे चोलपट ग्रही मुनि उपदिशे, शुद्ध धरम संकेत ॥ सहज०॥८॥ दस मसक सीतादि परिसहे, न रहे ध्यान समाधि। कल्पक आदिक निरमोहीपणे, धार मुनि निरवाध ॥ महन० ॥१॥ प अप नदीना मानना, कारण र मान।

अष्ट प्रवचन मातानी सइझाया. दश वैकालीक भगवई साखथी, तन विरताने रे तंत ॥ सहज० ॥ १०॥ लघु सजीव सचित्त रजादिनो, वारण दुःख संघट्ट । देखी पूंजेरे मुनिवर तेहथी, ए पूव मुनिवदृ ।। सहज० ।। ११ ।। पुद्गल खंध ग्रहण निखेवना, द्रव्ये जयणारे तास। भावे आतम परिणति नवनवी, ग्रहतां समिति प्रकाश ॥ सहज० ॥ १२ ॥ वाधक भाव अद्वेषपणे तजे, साधक ले गत राग। पूष गुण रक्षक पोपकपणे, 'नीपजते शिव माग ॥ सहज० ॥ १३ ॥ संजम श्रेणेरे संचरता मुनि, हरे कर्म फलंक। धरता समता रस एकत्त्वता, तत्त्व रमणी निशंक ॥ सहज० ॥१४॥ जग उपगारीरे तारक भव्यना. लायक पूर्णानंद।

१००६ अष्ट प्रवचन मातानी सइझापा. देवचंद एहवा मुनिराजना, चंदे पय अरविंद ॥ सहज०॥ १५॥ . ॥ दाल पांचमी॥ चेतन घेतजोरे । एदेशी । पंचमी समिति कहि अति सुंदररे, पारिठावणिया नाम । परम अहिंसक धर्म वधारणीरे, मृदु करुणा परिणाम ॥१॥ मुनिवर सेवज्योरे, समिति सदा सुखदाय । थिरता भावे संयम सोहायछेरे, निरमल संवर थाय ॥ मुनियर ॥३॥ देह नहयो चंचलता यधेरे; विकसे दुष्ट कपाय। निग ननु राग ध्यान रमेजी, ज्ञान चरण मुपसाय । मुनि ॥३॥ जिहां ागेर विहां मल उपजेरे, ना नगा परदार ।

१००७ फरे जंतु पर घिर अणदाच्या. सकल दुगंधा पार ॥ मुनिः ॥ १ ॥ संचन पापक आम गिना. आणा पातक सागि। ঘধি গুন বােভে ৰে, आपति लाम पिठाणि ॥ १० ॥ ५ ॥ पप्या आहारं कपीमा पाटी, निज फोटे अप्रमाद । देह अरागी भात समापनारे, पीरनी ए अपवाद ॥ ६ ॥ संलोदिय दृपा परिहगैरे. परोसने । सापरतु द्विप !! ! दलालीन पाहालरी समी. शिन बादि मुनी + . अष्ट प्रवचन मातानी सइझाया. थिविर कल्पनो प्रति अपवाद छेरे, ग्लानादिक नहि काम ॥ मु० ॥१॥ पह द्रव्यथी भावमारे, घाधक जे परिणाम। द्वेष निवारी मादकता विनारे, सर्व विभाव विराम ॥ मु०॥ १० ॥ आतम परिणति तत्त्वमयो करेरे, परिहरता परभाव ॥ द्रव्य समिति पिण भावभणी धरेरे, मुनिनो एह स्वभाव ।। मु० ॥ ११ ॥ पंच समिति समता परिणामधीरे, क्षमा कोप गत रोप। भावन पावन संयम साधतारे, करता गुण गण पोप । मु० ॥ १२ . साव्यरसी निज तत्वे नन्मयीरे, टहरंगी निगमाय। योग किया फल, भाव अपंचनार, शुचि अनुभव मुघ दाय ॥ मु०॥ १३ ॥ भागायुत नागो दांनीर, निश्चय निमा, वन ।

जर प्रवचन मातानी सहझायो. १००९: देवचंद्र एहवा निग्रंथ तेरे, मुज गुरु तत्व महंत ।मु०॥ ॥ दाल छट्टी।। ॥ वैरागी थपोरे । ए देशी ॥ मुनि मन वसि करो, मन ए आत्रव गेहोरे। मन ममता रसी, मनधीरे टालो यति वर तेहोरे ।मुनि ॥१॥ पुष्ट तुरंग चित्त ते कचुरे, सो मोह नृपत्ति प्रधान । आर्त रोदना खेन एरे, रोक!!! तुं ज्ञान निधानरे ॥ मुनि० ॥ २ ॥ गुप्ति प्रथम र साधुनेरे, धर्म शुरूलनार कंः ।। वस्तु धर्म निनन्यारे माध पूर्णानंद । मुनिः ॥३॥ योग ने पुद्गल जांग छ. वा अभिनव कन। 121 १०१० अट प्रवचन मातानी सरझायो. GJM RAM योग वर्तना कंपनारे, नवि ए आतम धर्मरे । मुनि० ॥ ४ ॥ वीर्य चपल परसंगमीरे, एहन साधक पक्ष । ज्ञान चरण सहकारनारे, वरतावे मुनि दक्षरे । मुनि० ॥ ५ ॥ सविकल्पक गुण साधनारे, ध्यानीने न मुहाय। निर्विकल्प अनुभव रसीरे ॥ आत्मानंदी थायरे ॥ मुनि० ॥६॥ रत्नत्रयोनी भेदतारे, पह समल व्यवहार। त्रिगुण वीर्य एकत्यतारे, निर्मल आत्माचाररे ।। मुनि० ॥७॥ शुक्रयान श्रुनलंबनी रे, एपण साधन दाव। धम्नु धर्म उडांगमांग, गुण गुणी एक मभारे ॥ मुनिः ॥ ८ ॥ पामहाय गृग बनना यम्नु धरम न कहाय ।

अष्ट प्रश्न मातानी सडझायो. १०११ साध्वरसी तो कीम ग्रहरे, साधु चित्त सहायरे ॥ मुनि० ॥९॥ आत्म रुचि आत्मालयोरे, ध्याता तत्व अनंत । स्यादवाद ज्ञानी मुनिरे, तत्त्व रमण उपसंतरे ।। मुनि० ॥१०॥ नवि अपवाद रुचि कदारे, शिव रसीया अनगार। शक्ति यथागम सेवतारे, निंदे कर्म प्रचाररे ॥ मुनि० ॥ ११ ॥ शुद्ध सिद्ध निज तत्वतारे, पूर्णानंद समाज। देवचंद्र पद साधतारे, नमीए ते मुनिराजरे ॥ मुनि० ॥ १२ ॥ । टाल सातमी ॥ सुमति सदाए दाम बगे । ए देशा॥ हमि ॥ वचन गुप्ति सुधो धरा, वचन ते कर्म सहाय, सलुणा ।

'भष्ट प्रवचन मातानी सरझाया. 1 उदयाश्रित जे चेतना, 'निश्चय तेह अपाय, सलुणा ॥ वचन० ॥१॥ वचन अगोचर आतमा, सिद्ध ते वचनातीत, सलुणा। सत्ता अस्ति स्वभावमां, भापक भाव अनीत, सलुणा ॥ पचन०॥२॥ अनुभव रस आस्वादता, फरता आतम ध्यान, सलुणा। वचन ते वाधक भाव छे, न वदे मुनि अदीन, सलुणा वचन०॥३॥ बचनास्लव पलटाक्या, मुनि साधे स्वाध्याय, सलुणा । तेह सर्वथा गोपनी परम महारस पाय, सलुगा रचन०nan भाषा पुल वर्गणा, ग्रहण निसर्ग उपाधि, सन्दुणा । करवा आतम योयने, दयाने पायो, मदुमा । पचन ॥५॥ पावन बोम्ज ना, मानम गुग मन, मटणा ।

जाप्रवन नासानो साझापो. तावत सनिहरा, . आत्तवपर आपत्त, सलुणावचन०॥६॥ ईम जागी थिर संजमो. न करे चपलीनंध, सलुगा। आत्तानंद आराधता, आज्ञेच्छो निय, सलुगा ॥ वचन ॥७॥ साध्य शुद्ध परमातमा, ततु साधन उत्तर्ग, तलुणा। वारे भेदे तर विविधे, सकल श्रेष्ठ व्युत्तर्ग, सलुणावचन०॥८॥ सनकित गुण गुणवाणे कयों, साध्य अयोगी भाव, सलुणा । उपादानता तेहनी. गुतिरूप दिमाक ना ना न०॥९॥ गुति रवि गुते स. कारण सनि::सगा। फरता फिरता प्रहे नयनमः :रचना१०॥ .. अरमा टिन: जह. मा मष्ट प्रवचन मातानी सडझाया. -- प्रणमे नित्यप्रत्ये भावशु, देवचंद्र मुनि तेह, सलुणा ॥ वचन ॥११॥ । ढाल आठमी॥ ।। फूलना चोरस प्रभुजीने शिर चढे ॥ए देशी ॥ गुप्ति संभारे ग्रीजी मुनिवरु, जेहथी परम आनंदोजी। मोह टले धनघाती परिगले, प्रगटे ज्ञान अमंदोजी ॥ गुप्ति० ॥१॥ करि शुभ अशुभे भव भ्रम जे छे, निण तजि ननु व्यापारोजी । चंचल भाव ते आलव मूल छे, जीव अचल अविकारांजी ॥ युतिः ॥२॥ इंदि विषय मफलनो द्वार , घंध हेतु द्रट पहाजो। अभिनय कर्म माँ ननु यांगथी, निग विर कलिहाजी । गुनि० ॥३॥ आतम बोय र पापंग जे, ने का ननु पागजा।

अध पश्चन मातानी सइझापो.
१०१५
चेतन सत्ता रे परम अयोगी छे,
निर्मल थिर उपयोगजो ॥ गुप्ति० ॥४॥
जावत कंपन तारत बंध छे,
भास्युं भगवइ अंगेजी।
ते माटे ध्रुव तत्त्व रले रमे,
माहण ध्यान प्रसंगेजी ॥ गुप्ति० ॥५॥
वीर्य सहायीरे आतम धर्मनो,
अचल सहज अप्रयालोजी।
ते परभाव सहायी किम करे,
मुनियर गुण आवासोजी ॥ गुति० ॥६॥
खंत्ती मुत्ती अकिंचनी,
शौच ब्रह्मधर धीरोजी।
विषय परिपह सैन्य विदारवा,
वीर परम सौंडीरोजी ।। गुप्ति० ॥ ७ ॥
कर्म पडल दल क्षय करवा रती,
आतम ऋद्धि समृद्धोजी।
देवचंद्र जिन आणा पालता,
बंदी गुरु गुण वृद्धोजी ॥ गुप्तिः ॥८॥

आए प्रवपना मातानी सरक्षाया. ॥दाल नवमी॥ ॥ रसीयानी देशी॥ धर्म धुरंधर मुनिवर साहही, नाण चरण संपन्न, सुगुण नर । इंदि भोग तनी निज सुख भजी, भवचारक ऊन्विझ, सुगुणनर ॥ धर्म० ॥१॥ द्रव्य भाव साची सरधा धरी, परिहरी शंकादि दोष । मुगुणनर । कारण कारज साधन आदरी, धरी सुध्यान संतोप ।। मुगु० ॥ २॥ गुण पर्याये वस्तु परखता, शीख उभय भंडार । मु० परिणति शक्ति स्वरूपानां परिणमि, करता नमुव्यवहार ।। मुगु०॥३॥ लोकसन्न धीतिपिच्छा यारना, करता मंयम पृदि। मुल उनर गृण सर्व सभारता, घरता आनम शुद्धि ॥ ॥2॥ नधारी श्रुतधनिश्राग्मो, कमि कयां निक नाग ।

साप्रवचन मालनी सासापो. अभ्यासी अभिनय श्रुततारना. अविनासी उपयोग !! गुल॥५॥ द्रव्य भाव सातव मल टालता, पालता संपन सार।०॥ साची जैन लिया संभालना, गालता फर्म विकार ।। मुगु० ॥ ६ ॥ सामायिक आदिक गुण धेणिमां. रमता बढनेरे भाव । मुगु० ॥ तीन लोक्थी भिर निलोकमां, पूजनिक ले जनु पार ॥ १० ॥ ७ ॥ अधिद गुणी निज तुल्य मुजीयको, मिलता ते मुनिराज !! परन समापि निधि नवजलाधिता, तारण करन जहाज ॥ ॥८॥ परवा अमन । !! संबर की भावना पता मो नम:! पदा मुनि र अष्ट प्रवचन मातानी सरझायो. अप्रमत्त मुनि श्रुत तत्व पूछवा, सेवे जासु अभंग ॥ सुगु० ॥ १० ॥ सदहणा आगम अनुमोदता, गुणकर संयम चालि । सुगु० ॥ च्यवहारे साची ते साये, आयति लाभ संभालि ॥ सुगु० ॥ ११ ॥ दुपारकारीथी अधिका कहे, पृहल्कल्प च्यवहार । सुगु०॥ उपदेश माला भगयई अंगने, गीताग्य अधिकार | सुगु०॥५॥ भाव घरण स्यानक फरस्या यिना, न हुये संयम धर्म । सुगु० ॥ तेश्याने जूठ ने ऊपरे, जे जाणे प्रवचन मर्म ॥ मुगु० ॥ १३ ॥ यदा लामे निज सम्मत यापया, परजनरंजन कान । मुगु०॥ शान क्रिया द्रव्यन रिषि सायरी, नेह नहि मुनिगन । मुगु० ॥ १४ ॥ याय दया एकांत उपदिन, धृत भानाय विहीण । मुगु ॥

लोकने,
प्रवचन मातानी सइझापा. १०१९
वग
पेरे ठगता
मूरख
वह
भमसे तेह दोन ॥सुगु० ॥१५॥
अध्यातम परिणति साधन ग्रही,
उचित वहे आचार । सुगु० ॥
जिन आणा अविराधक पुरुष जे,
धन्य तेहनो अवतार ।। सुगु० ॥ १६ ॥
द्रव्य क्रिया नैमित्तिक हेतु छे,
भावधर्म लयलीन । सुगु० ।।
निरुपाधिकता जे निज अंशनी,
माने लाभ नवीन ॥ सुगु० ॥ १७ ॥
परिणति दोष भणी जे निंदता,
कहेता परिणति धर्म । सुगु० ॥
योग मंधना भाव प्रकाशता,
तेह विदारे हो कर्म ॥ सुगु० ॥ १८ ॥
अल्प क्रिया पण उपकारोपणे,
ज्ञानि साधे हो सिद्ध । सुगु० ॥
देवचंद्र सुविहित मुनिइंदने,
प्रणम्यां लयल समृद्धि ॥ सुगु० ॥ १९ ॥

अष्टे प्रवचन- मातानी सरझापा •॥ कलश। -: राग धन्याश्रीं ॥ ते तरियारे भाई तेतरिया, जे जिनशाशन अनुसरियाजी । जेह करे सुविहित मुनि किरिया, ' ज्ञानामृत रस दरियाजो ॥ ते तरिया० ॥१॥ विपय कपाय सह परिहरिया, उत्तम समता वरियाजी। शील संनाहथकी पाखरिया, भवसमुद्र जल तरियाजो॥ तेतरियाणाशा समिति गुपतिशु जे परिवरिया, आत्मानंदे भरियाजी। आस्लव द्वार सकल आवरिया, घर-संवर संवरियाजी ॥ ते तरिया ॥३॥ खरतर मुनि आचरणा चरिया, राजसार गुण गिरियाजो। ज्ञान धरम तप ध्याने यसिया, श्रुत रहस्थनः रमियाजी॥ ते तरिया ॥ दीपचंद पाटक पद धरिया, विनय रयण सागरियाजो।

ना प्रवचन मातानी सरझापी.
१०२१
देवचंद मुनि गुण उचरिया,
कर्म अरि निझरियाजी ॥ ते तरिया० ॥५॥
सुरगिरि सुंदर जिनवर मंदिर,
शोभित नगर सवाईजी।
नवानगर चोमातु करिने,
मुनिवर गुण थुति गाईजी ॥ते तरिया०॥६॥
अरिहा अणविचार्यों
विस्तरि जल संपदा।
निग्रंथ वंदन स्तवन करतां
परम मंगल सुख सदा ॥१॥

॥अथ श्री प्रभंजनानी सझ्झाय लिख्यते॥ . ॥ ॥ दाल १ ली ॥ नाटकोपानी नंदनी । एदेशी ॥ गिरि येतात्यने ऊपरे, चकांका नपरी लो ॥ अहो यांका॥ पक्रायुध रामा विहां, जीत्या सवि पपरी लो॥ अहो जीरपा० ॥१॥ मदन सता तर सुंदरी, गुण शील अर्यमा टो॥ अहो गुण पृषी तास मभंजना, रूपे रति रंमा लो। अहो रूपे०॥२॥ विद्याधर मूगर गुता, बहु मिलि इक पंडे सो ॥ अहो पा. राधादेव मंडावियो, घर यरया खते ॥ अहो वा० ॥ ३ ॥ कपा एक हजागयी, प्रभजना घाटी सो ॥ अहो प्रभंजना ॥ आर्य मंहमा आवतां, वन संर पियाली से। भदौ बन ॥१॥ निरंथी गुमतिश्ता, अदु मुग्गी संगे टो ॥ महोगा। मात्र बिहार विमानां, यो मन रंगे हो। अहो वो॥५॥ आप एरी, उमादो कोसो।। अहो ।। दिन ar, पर यो॥ महोयर .10 श्री प्रभंजनानी सहशाप. १०२३ ए इयो हित जाणो तुमे, एपी नवि सिद्धि टोअहो एदी०॥ विषय हलाहल विष जिहां, शी अमृत बुजि टो । अहो शी० ॥७॥ भोग संग कारमा कहा, जिनराज सवाई लो॥ अहो जिन०॥ राग द्वेष संगे वषे, भव ममण सदाई लो ।। अहो भव० ॥८॥ राज सुता कहे साच ए, ले भालो बानी लोअहो लेगा पण ए मूल अनादिनी, किम जाए ठंडागी लो । अहो । किम ॥९॥ जेह तजे ते धन्य हे, सेवक जिनजीना टोअहो सेवक०॥ हने जड पुट रस स्पा, मोहे लपीना टो॥ अहो मोहे० ॥१०॥ अध्यातम रस पानपी, मीना मुनि पालो। अहो पीना०॥ हे परिगतिरति ती, निज तत्वे तमापा ॥ अहो निज० ॥११॥ अमने सिप करदो पहे. कारण संपोने से | अहो कारना॥ पण चेतनता परिपने, जड दुइटना भोगेको॥ अहो जर० ॥ १२॥ भर कन्या उरे, चिकित हरे भने । होदि॥ पसी पर पद कादया. उन भने । होपका श्री भगनानी साझाप. - ॥ बाल २गी ॥ टुं यारो पना तुम जाण म देश ॥ ME कई सादगी गुण कम्पकारे । घया। प संसार को । एहने जे हित कार गणे रे । धन्या । से मिथ्या आदेशरे । एशानी कम्पा सांभल दिन उपदेश । आदिवारी जिनेदारे। एजानी । कीने त आदेशरे । राजानी ||१|| आया। ग्वादीने मे घोपरे । कया । वेहन भेयापार ॥ गरनपी साधन कोरे । कापा । मोहाधीनता वारे ॥१२॥ जे पुरुप बना सणारे । काया । माछे से जी ।। से संगो भयो रे । कया । द्वारी काल सदी ॥३॥ तर प्रभंजना गितारे । अगा। अनादि अनंत ।। दे पण मन सना समोरे । अध्या। राहग अशा गुमहतो ।। भाभपता गति श्रीसदी रे । मणा । पाम्पा uft in भन्नता प्राना मृता, अप्पा | TT ति गु, ५॥ सो मका कई बार । दागामा मिर पण पाय ।। निय ता की छो। म म मरे । मटा मन सरिता ! छ माहगे पपअप भयो। लता मान Set ra Tren श्री प्रभंजनानी सडझाय. १०२५ सम्यध्याने बहेंचतारे । अप्पा । हुं अमूर्त चिद्रुप रे ॥ कर्ता भोक्ता तत्त्वनो रे। अप्पा । अक्षय अक्रिय अनुप रे ।। सर्व विभाव की जुदो रे । अप्पा । निश्चय निज अनुभूति ।। पूर्णानंदी परणम रे । अ० नहि पर परिणति रीति ॥ सिद्ध समो ए संग्रहे रे। अप्पा । पर रंगे पलटाय॥ संगांनी भावे करी रे । अप्पा० । अशुद्ध विभाव अपाय रे ।। सु० ॥ १२॥ शुद्ध निक्षय नपे करी रे । अप्पा । आतम भाव अनंत । तेह अद्धन करी रे । अ० । दुष्ट विभाव महंत रे।। . प करम कर्ता थपो रे । अप्पा । नय अगुद्ध व्यवहार ।। तेह निवारो स्वपदेरे । अप्पा । रमतां शुद्ध व्यवहार रे ॥ सु०॥ १४ ॥ व्यवहारे समरे थके रे । अप्पा० । समरे निश्चय तिवार । प्रत्ति समारे विकल्पने रे । बप्पा० । यी परिणति सार रे॥ सु० ॥१५॥ पुद्गलने पर जीवनी रे । अप्पा । कीयो मेद विज्ञान ।। बाधक्ता दूरे दहि रे । अप्पा । हवे कुण रोके ध्यान रे।। सु०॥१६॥ आलंबन भावन बनेर । अप्पा । घाम पान प्रगटाय॥ देवचा पर लाया । अ। एहिज युद्ध उमाप रे॥ सुज्ञानी० ॥१७॥ 1:५

१०२६
श्री प्रभंजनानी सइझाय.
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॥ढाल ३ जी॥तुठो तुठोरे मुजसाहेब जगनोतूठो।एदेशी।।
आयो आयोरे अनुभव आतमचो आयो ।
शुद्ध निमित्त आलंबन भजतां, आत्मालंबन पायो रे ॥
अनुभव०॥१॥
आतमक्षेत्री गुण परजाय विधि, तिहां उपयोग रमायो ।
पर परिणति पररी जाणी, तास विकल्प गमायो रे ॥
अनुभव०॥२॥
पृथक्त्व वितर्क शुकल आरोही, गुण गुणी एक समायो ।
परजय द्रव्य वितर्क एकता, दुर्द्धर मोह सपायो रे ॥
अनु० ॥३॥
अनंतानुबंधी सुभटने काढी, दर्शन मोह गमायो ।
तिरि गति हेतु प्रकृति क्षप करी, थयो आतमरस रापो रे ॥
अनु० ॥४॥
द्वितीय तृतीय चोकडी खपावी, वेद युगल क्षय पायो ।
हास्पादिक सत्तायी धंसी, उदय वेद मिटायो रे ॥अनु० ॥५॥
घइ अवेदी ने अविकारी, हण्यो संजटनो कपायो।
मायों मोहचरण खापक करी, पूरण समता समायोरे॥अनु०॥६
घनघावी विक योद्धा लडिआ, ध्यान एकत्वने पापो ।
ज्ञानावरणादिक भट पडिया, जीत निशान घुरापो रे ॥
अनु०
केवलज्ञान दरशनगुण प्रगट्या, महाराजपद पायो ।
शेष अवानी कर्म क्षिण दल, उदय अवर दिखायो रे ।।
अनु० ॥८॥

श्री प्रभंजनानी सइझाय.
१०२७
सयोगी केवळ घया प्रभंजना, लोकालोक जणायो।
तीन कालनी विविध वर्तना, एक सने ओलखायो रे।।
अनु० ॥९॥
सर्व साधाये वंदना कीपी, गुणी विनय उपजायो।
देव देवी तव स्तवे गुणस्तुति, जगजय पदह बजायो रे ।।
अनु० ॥ १०॥
सहस्र कन्यका दीक्षा लीपी, आश्रव सर्व तजायो।
जग उपगारी देश विहारे, शुद्ध धरम दीपायो रे ।।
अनु० ॥११॥
कारण जोगे कारज सावे, वेह चतुर गाइने ।
आतम सायन निर्मल साचे, परमानंद पाइने रे ।।
अनुभव०॥ १२॥
ए अधिकार कलो गुणरागे, वैरागे मन भावी ।
वसुदेव हाडतो अनुसार, मुनि गुण भावना भावी रे ॥
अनु० ॥१३॥
मुनि गुण धुणतां भावविशुद्ध, भव विडेदन थावे ।
पूर्णानंद पद एहवी उससे, साचन शक्ति जमावे रे ॥
अनु०॥१४॥
मुनि गुण गावो भावो भावना, पाको सहज समाधि ।
रत्नापी एकत्त्वे खेलो, मिटे अनादि उपाधिरे।।
अनु० ॥ १५ ॥
राजसागर पाठक उपगारी, ज्ञानवरम दानारी ।
दीपचंद पाठक खन्नर घर, देवन्द्र सुखकारी रे॥
अनु० ॥१६॥

-१०२८ बंदणमुनिजीनी सइझाय. नयर लींचडी मांहे रहीने, वाचंयम स्तुति गाई। आत्म रसिक श्रोता जन मनने, सायन रुचि उपजाई रे ॥ अनु० ॥१७॥ इम उत्तम गुण माला गायो, पावो हरप पवाइ । जैन धरम मारग रुचि करतां, मंगल लील सदाई रे ॥ अनु० ॥ १८ ॥ संपूर्ण ॥ श्रीरस्तु । ॥ अथ ढंढणमुनिजीनी सझ्झाय ॥ घन०२ ॥यनिता विहसीने विनवे ।। ए देशी ॥ धन धन ढंढण मुनिवरु, कृष्णनरेसर पुरा रे, गुणमणि लवणिम शोभतो, लखमी लीला जुत्तो रे. धन १ कोमल कमला कामिनी, मूकी एक हजारो रे नेमिवचने वैरागीयो, लीयो संजम मारो रे. ग्रहणा ने आसेवना, शीखी शिक्षा सारो रे विचाता आन्याजी द्वारिका, नेमि साथै सुखकारो रे. धन० ३ एकदिन गोचरी संचर्या, करता गदेखणा शुद्धि रे, आहार कांई मिच्यो नही, मुनि मन समता बुद्धि रे. धन० ४ मुनि चिंते पुदल बलें, इयो निजगुण अम्पासो रे, उत्सर्गे (उठरंगें) आतमय, कीजे शिवपद वासो रे. धन० मानि ययाम आदर, अपवाहें अनेको रे। महज दो मवर बर, नो नई पादेको रे. घन०६

हंगमुनिजींनी सरझापं.
नितमति गोचरी संबरे, न मिले जाने पानोरे
प्रभुचरणे आवी नमी, पृढे तनी अभिमांनो रे. धन०७
इयु कारण कहो नायजी, एक्जो ए अंतरापो रे
जिन भाखे कृत कर्मनो, एहयो छे व्यवसायो रे. धन०८
पूरबभत्र धन लोभी, की दूर अपायो रे
तीबरसे ले बांधीयां, व्हनो फल दुःखदायो रे. धन० ९
नृप आदेशे पांचसे, हल खेडका अधिकारों के
चास एक निज क्षेत्रनी, खेडावी धरी प्यारो रे. धन० १०
भात पारीनो सर्वने, तुन्हे कीचो अंतरायो रे
तीबरसे ले बांधीवो. तह विपाक ए आयो रे. धन० ११
मुनिवर अनिह आदमों, एह करप कीधे रे,
तेदयु हवे आहारने, धीरज कारज सीधे रे. इन० १२
मास गया पर इजीपेरे, पर मुनि समतारीनो रे
अपरामें अति निर्जरा. जाने तिणे नवि दीनो रे.धन० १३
वासुदेव जिन बंदीने, पूणे दरी आनंदोरे,
साधक साइमें निमो. काम हो जिनो है.न. १४
नेमि हे मुनि, स्वर निर्जरा धरे,
स्ट माइक अधिक है. बिहारी ई. पन० १५
दोन र कोदन० १६

धन०२१
१०३० ढंडणमुनिजीनी- सइझाप.
सांभळी मुनि अति हरखीया, धन धन ए गुरुराजो रे,
वीतराग उपगारीया, कृपा करी मुज आजो रे. घन० १९
साध्य अधुरे कुंण करे, ए आहार असारो रे,
पुद्गल जगनी एंठ ए, किम ल्ये मुनि सुविचारो रे. धन० २०
साधन वरते आदरे, ए साधक व्यवहारो रे
निःकारण परवस्तुने, छीपे नहीं अणगारो रे.
इम चिंतवी शुद्ध थंडिलें, परठवतो ते पिंडोरे
पुद्गल संगनी निंदना, निजगुण रमण प्रचंडो रे. धन० २२
पर परिणति विच्छेदतां, निज परिणति माग्मावो रे। '
क्षपक श्रेणि ध्याने रम्या, पाम्यो आत्म स्वमायो रे. धन० २३
आतमतच एकाग्रता, तन्मय वीरज घारे रे
धन घावी सवि खेल्या, रत्नत्रयी विस्तारे रे.
क्षीणमोह करी चरणनी, क्षायिकता करी पूरी रे,
केवलज्ञानदर्शन वर्या, अंतराय सवि चूरी रे. धन० २५
परम दान लाभ नीपनो, कीधो कारज सुधो रे,
समवसरणमें आवीया, साध्य संपूरण सीयो रे. धन० २६
एहवा मुनिने गाइये, ध्याइयें घरी आणंदो रे
देवचंद्र पद पाइये, लहीये परमानंदो रे.
इति श्री ढंढणमुनिवर स्वाध्याय समाप्त.
धन० २४
धन०२७

श्री समकितनी सइझाय.
॥ श्री समकितनी सइशाय ।।
समलित नवि लपुरे, ए तो रुल्यो चतुर्गति मांहे;
बस धावकी करुणा कीनी, जीव न एक विरान्यो
वीन काळ सामायिक करतां, शुद्ध उपयोग न साध्यो. स. १
जूठ बोटवाको व्रत लीनो, चोरीको पण त्यागी
स्परहारादिक महा निपुण भयो, पण अंतरष्टि न जागी. स०२
ऊल बाद करी धो लटके, भस्म लगा धूम घटक
जब द सिर मुंहे टो, विण प्रज्ञा भव भटके. स०३
निज परनारी त्यागज करके, ब्रह्मचारी व्रत टीनो;
स्वर्गादिक पाको फल पानी, निज कारज नवि सिध्यो. स०४
बाध किया सब त्याग परिग्रह, द्रव्य लिंग धर टीनो:
देवचंद्र कहे ग विध तो हम, बहुत बार कर लीनो. स०५
,
॥ गजसुकुमाल मुनीश्वर सझ्झाय ।।
साल टीआम फली मेरी आम फटीप देगी।
..
द्वारिकाना ड म नभर नबन प्रन्द्धिः
नर को (क)
वसुदेव देवकी म पन ०१

.
धन धन जे० २५
१०३४ गजसुकुमाल मुनीश्वर सइझाय.
। दाल ३ जी॥ धनधन साधु शिरोमणि दणोए देशी।।
घन धन जे मुनिवर घ्याने रम्या रे.
समतासागर उपशमवंत रे
विषय काय जे नडिया नहीं रे,
साधक परमारथ सुमहंत रे.
धन धन जे मुनिवर ध्याने रम्या रे.(ए आंकणी)२६
जादवपति परिवारें परिवयों रे,
नेमि चरणे पुहंता गजसुकुमाल रे,
मात पिता मातें वहिरावीया रे,
नंदन बाल मनोहर चाल रे.
ममुमुख सर्व विरति अंगीकरी रे,
मुकी सरख अनादि उपाधि रे,
पूछे स्वामी कहो केम नीपजे रे,
मुजने वहेली सिद्धि समाधि र. धन धन जे० २०
प्रभु भाखे निज तत्त्व एकाग्रता रे,
उदय अव्यापकता परिणाम रे;
संवरयाये साधे निर्जरा रे,
लघुकाले लदिये शिवधाम रे. धन धन ने० २९
एगराई पडिमा तुमे आदरो रे,
घरजो मातमभाव सुधीर रे
समतासिन्यु मुनिवरें तिम कर्यो रे,
शिवपद साधन बडवीर रे.
शिर उपर सिगडी सोमिलें करी रे,
समता शीतल गजमुमाल
धन धन जे०३०

पंचेंदि विषय त्याग.
इच्छा कीजे ए मुनिभावनी रे,
ज्युं रहीये अनुभव परमनिधान रे. धन धन जे. ३०
खरतर गच्छ पाटक दीपचंदनो रे,
देशचंद्र वंदे ए मुनिरापरे
सकल सिद्ध सुख कारण साधुजी रे,
भव भव होज्यो सुगुरु सहाय रे. धन धन जे. ३०
इति श्री गजसुकुमाल सम्झाय समाप्त.
पंचद्रिय विषयत्याग.
पद.
विषयनको पगंग चेतन छोड दे,
विरोई फौरत विद्यादन फरम श धोई फीरत माग...!
कंट छिदायो मिन आपणो रसनाके परसग;
नेश विपर कर दीर शिम्बा, जर जल मरत पतंग..२
खपद जटामाई फग मूग, म्योपो मानो अंग,
वित्र मन्द गुराग नगिन,मोदी मोरग..३
पाहो बस दुम पापी ग्नंग,
पांची इंद्रा दल नदा दुत, न नापना..?
नदी जिनाम्दी निरनिटर, करेन..
नुतनदन ?
देशदनमान 7.

पंचेंद्रि विषय त्याग.
इच्छा कीजे ए मुनिभावनी रे,
प्युं रहीये अनुभव परमनिधान रे. धन धन जे. ३०
खरतर गच्छ पाटक दीपचंदनो रे,
देवचंद वंदे ए मुनिराप )
सरुल सिद्ध सुख कारण सावजी रे,
भर भर होज्यो सुगुरु सहाय रे. धन धन जे० ३०
इति श्री गजसुकुमाल सदझाय समाप्त.
पंचेद्रिय विषयत्याग.
.
विएपनको पगंग पेतन छोटदे,
निगेई फीग्न शिलालन फग्ग यश योई फीन मातंग...?
कंट छिनायो मिन आपणो सनारे परांग;
नेर विषय का दीप शिग्या, जद मात्र पतंग.१.२
ग्दाद बटनमाह फर मुगा, गोपो आनो अंग,
दिशामद गुण भाग नागिन, मोदी भयो रे नांग.. ३
की परत बाइप, पापोहेमभंग,
पांचो इंद्री पल महा दुग, ईम भापत देगा.. ४
नही जिवादी निकन रियाल
....47
apr..३

पंद्रि विषय त्याग.
इच्छा कीजे ए मुनिभावनी रे,
ज्युं रहीये अनुभव परमनिधान रे. धन धन जे.
खरतर गच्छ पाटस दीपचंदनो रे,
देवचंद व ए मुनिराय रे
सकल सिद्ध सुख कारण साधुनी रे,
भा भर होज्यो सुगुरु सहाय रे. धन धन जे.
इति श्री गजानमाल सरझाय समाप्त.
पंचेद्रिय विषयत्याग.
पियनको परमग गेनन छोड दे,
मिरोई फोन बिलान्टन फरस व बंधोई फीरन मानंग..थे।
कंट छिनायो निन आपणो रसनाके परांगा
नंग विषय कर दी शियां, जल मान पतंग..
दाद जठामाह कम माग, सोयो सानो अंग,
विशद गुमानगिन, मी मोरंग
..
पाही बन सु.५, पायावरनंग,
इंद्री मा महा दुनमाला
महोबEnagarmin 411
E
4
- '2.

पंचेंद्रि विषय त्याग.
इच्छा कीजे ए मुनिभावनी रे,
ज्युं लहीये अनुभव परमनिधान रे. धन धन जे० ३७
खरतर गच्छ पाठक दीपचंदनो रे,
देवचंद्र बंदे ए मुनिराय रे
सकल सिद्ध सुख कारण साधुजी रे,
भव भव होज्यो सुगुरु सहाय रे. धन धन जे० ३८
इति श्री गजसुकुमाल सइझाय समाप्त.
पंचेद्रिय विषयत्याग.
विपयनको परसंग चेतन छोड़ दे,
गिरोई फीरत विलालत फरस वश घोई फीस्त मातंग..ये. १
कंठ छिदायो मिन आपणो रसनाके परसंग;
नेत्र विषय कर दीप शिखापें, जल जल मरत पतंग. चे. २
खटपद जलजमांहि फस मूख, खोयो अपनो अंग,
विण शब्द सुण श्रवण ततखिन, मोही भयो रे कुरंग. चे० ३
एकएक इंद्री चरत यह दुःख, पायो हे सरभंग,
पांचो इंदी चटन महा दुःख, ईम मापन देवचंद. ० ४
आत्म पद.
अहो जिनवरजी निके नयण निहारे, याम केवल दर्शन झालात.
अतितिम्ये अनिहार
मुमता मोहन मिना वाचन भवि 71 प्यार
देवघद्र मप्र नम्वन, जिन नित नम मृ पार. ० ३
अहो० १

मृनिगुणस्वाट्याय. १०३७: मुनिगुणस्वाध्याय. राग प्रभाति. जगलमें तदा सुसी मुनिराज पर विभाव परिणतके त्यागी, जागे आत्म समाज निजगुण अनुभवके उपयोगी जोगी ध्यान जिहाज ॥ ज०॥१॥ हिंसा मोत अदत्त निवारी, नहि मैथुनको पास, पभाव परिमह त्यागी, टीने तत्व विलास ॥ ज० ॥२॥ निर्भय निर्मल वित्त निराकुल, चिलगे ध्यान अभ्यास देहादिक ममता सविवारी, विचरे सदा उदास ॥ ज० ॥३॥ परे आहारवृत्ति पात्रादिक, संयम साधनकाज देवचंद्र आणानजाई, निज संपति महाराज ॥ ज० ॥ ४॥ इति।। साधुपदस्वाध्याय. सापक सामन्यो रे निज सत्ताई पित्ता निजगुण मगमले परिपने रे, एहिज आतम चित्त ॥ पद अनंता निज दाज. बने ते गुजर पर्याचा परिणाम नि . रिद्ध । २॥ परनावात पोज देनमारते। तर, འཐེན༌= -1 -ཝཊྛ; འll १०३०० सावुपदस्वाध्यायः अपवादे पर वंचकतादिकारे, ए माया परिणाम उत्सँगै निजगुणनी वंचना रे, परमावे विश्राम ॥ सा ॥५॥ साते वरजी अपवादे आर्जवी रे, न करे कपट कपाय आतमगुण निज निजगति फोखे रे, ए उत्सर्ग अमाय ॥ सा०॥६॥ सत्तारोध ममणगति चारमें रे, पर आधीने वृत्ति वक्रचालयी आतम दुःख लहे रे, जिम नृपनीति विरत ।। सा० ॥७॥ ते माटें मुनि ऋजुतायें रमे रे, वमे अनादि उपाधि समता रंगीसंगी तत्त्वना रे, साधे आत्म समाधि ॥ सा०॥८॥ मापक्षयें आर्जवनी पूर्णता रे, सवि गुण ऋजुतावंत पूर्व प्रयोगें परसंगीपणो रे, नहीं तसु कति ॥ सा० ॥९॥ साधनभाव प्रथमयी नापजे रे, वेहिज थाये सिद्ध द्रव्यत साधन विवन निवारणा रे, नमित्तक सुप्रसिद्ध ॥ सा०॥१०॥ भावे साधन जे इक चित्तथी रे, भाव साधन निजमात्र भावसिद्ध सामयी हेतु रे, निस्संगो मुनि भाव ॥ सा० ॥११॥ हेये त्यागयी ग्रहण स्वधर्मनो रे, को भोगवे साध्य स्वस्वभाव रसिया वे अनुभवे रे, निज मुख अम्याराव ॥" सा० ॥१२॥ निःस्पृह निर्भय निर्मम निर्मला से करता निज समाज' देवचंद्र आगायें विचाता रे, नमिये ते मुनिराज ॥ सा० ॥ १३ ॥ ॥ इति श्री देवयजीवन म्बात्याय मंपूर्ण मगात् ॥

साधुपद सझ्झाय. ! साधक साधज्यो रे निज सत्ता इक चित्त ॥ निज गुण प्रगटपणे जे परिणमें रे एहीज आतम वित्त । सा० ॥ १ ॥ * यार्थ:-अहो आत्म स्वरूपानुभव सावक भन्यो ! सा- घन्यो-नाम साधन करल्यो, साधने सापनी सिद्धता एपाम- दुक्तिः ईहां साव्यस्वस्वरूपानुभवकारिका निज सत्ता ईक पित्त-एक चित्ते नाम तदाकार वृत्ति नहपी तन्मपी तापी उते आत्म सत्ता तिवी, किन ते लीखे. आमदम्पर्मे आत्म- त्वधर्म र हे, तेना आमता आत्मत्वपणे रही छे, आत्मता निज सता अभदापकार पो हे, एटले आत्मता निज सत्ता भेद नहीं एक हे एक्ले अनादिए सिद्धनी सत्ता असंस्पात प्रदेशात्मक तिनज संसारमें रहो केवटी अस्पात प्रदेशा- कीना सत्ता एक कम निगोदीपानी आठ वकवर प्रदेशा- मक सत्ता एक ॥ यदुक्तं नंदि मृ॥ सह जीवाणं पिणं अख्वरस्स अणंतमो भागोनिच्युन्याडियो नि नि নিন যখন মামাতান द भवामिन ईह सिद्धान र पारिमनिन बमनापा पामनि मननयमिन मिडान बननानान्त।

-Maas.w. -- -4 सायपर समझाय. देणहीज परत पक्षनें ग्रहण करी तिमहीग रामभंगी थही स्यामा भगो ग्रहण करीने अवपक्ष स्थापन कपोंछे से एक नाम पर भंगात्मा छे. मामा तुपुष्करपत्रपग्निलप: प्रतिः । की इलिमिन ए पो हीन सिद्ध समान कापर 'भेगे मंगे गयी, और एक आमाही गम है, ए नयन ले पर सदनो जनमतने आगे पानगपा भंगीन कपन के. राने नयागी नगी, मकर मग?अभयर जातिमा पनीन जीपनी जाति के गांपा भाप भी जानि भा. अपीए कपन है. इहां जैन न्यापगम्मतिनी ५१... प्रक, नेमा हजार ग्यारेक म्हागे यांचेलो ने दि. मत लिादो अर्थ का जाय इन्पटम. मापा गानगर निस मनागिन में निगेवाभागते fm टि , महा निधि या जनगेनितो छ.गाने मानो भनित, गिटाय कोनो मोटो मानो मिदान करायं गिधामा कपन RAITaty: माया पड़ी न लिग ने अगर जिन हिनपनन निमंट तो गाय, मटारो गरे थे रंदा थार, नातु मामाह rift निगा ममिनिट: Part fr: प्रो' रेत कई र नाशिम:: ari | मार- तुला27.1..:;:- भन्माल ! माम . 4.

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१.५२ साशुपत समझाय. अत्मासान. महामार गरे प चले ल्यापीन गोगा इदयामशेगा ध्यान निमाण चिंता करतो अंतर आरमात दिपाय, पण भानंदशनमुनिराजागिः पाप गापागात पहिल्या पदि स्ना नती कागा गन यगन पहा निश्चल का ते कोरो कापतो मी गयो तेनी परीक्षा का कारण दश वर दोगा दी। लोही दीई निचोरे जीरनो जापो से आ गामा ताननी यदिगतम तन अंतरालमा सपथ पिरभार, पामातम भातमभाग आतम अरपण वार ॥१॥ हलो ती विमा थाने परमातम, परमानमा अन मानादिगुणी मतो थअभय, ओग, अयादि । पोताना भा.मामा माrifier from a मना मान मिलाय तो निगमगाणा' दे दो भानादि गण आमामां मग ने start naram मा कराने पर An in the TATE Emir rR नि। दन.rar -7 . 2 Titantar •rmire पर 737.MAHARIT1 Ezrat Timraniree 2

सामुपद सझाप.
ए कविराजनी पोजनानो एज सुभाव हे तेज वातने गटरपटर
आर्गेनी पाहे, पानी आगे हांकतो चाल्यो जाप वे तने
पोने विचार टेणे. संबंध विन्न अंगोपंगभंग कविता वारसार
एकपद भागो दे पुनक्ति हाण कविता ते डोज सिझा-
पर्ने तनेही जोइ टेम्पो, एक निजाद कम जगा गुम्यो के
ते मिडेग्यो, इकलो मूजने पण ना देन्यो, योनु तुनो
घटक लिखत सनपानी सानपापी दुल्लहे, स्वरूपना
क्यानी योजना तेनां तो नरके.ए विना पीजी सहित
एक पोजना संक हे पोजना काकी एमिन विद्या पारी
हे, कौमुदी का विपन जाय शोक कायो आप न
पो. वह ए बात सुन न लितुं नो एडिसत .
कालो मूरदोखर झाले ए वारणे डिवं. गुजरातमा ए .हेबत
हे आनंदघन मालि, जिनराजनरियाया तो अपनी
७० यशोविजय रानरटुनरिया पोरे पो देज उपायो
उ० देवचंद्रxxजीन एकपूर्व ज्ञान हेतुं पी गरीष.
मोहनविजयपन्यास ले दमा, मुनने काट लिई
हे जर मनाने अर्थ सिसिरिहां सरीसो अर्थदीने
ते न्हाले . न कयो, म चिन्न बनेका
सही इहां सब गाया रितुं. हिंई ३जी गावागे जि.
पर्याय अनंता निज कारणपणेरे,
वरते ते गुणशुध्द
पर्यायगुण परिणामें कतारे.
निज धर्म प्रनिद ।। मा०२॥
.
६

१०४४ साधुपद सइझाप. प्रथम गाथारे अंते क्यो छे, एहिज आतमविर वित्त शब्दें आत्मद्रव्य नाम आत्मारो धन दैजी गाथारे आदें पर्याप ईसो पद धर्यों छे तेयी प्रथम द्रव्यरो रक्षण लिखे पछे पर्याय- लक्षण लिखसं. किम द्रव्य विना पर्यायरो असंभव, ते माटे द्रव्यलक्षणमाह गुणपाययत्वं द्रव्यत्वम् । इश कहिणे शु ज्ञानपदार्य द्रव्य छे. गुण कांइतर गुणलक्षणमाह ।महजा. तित्यं गुणन्यम् इतिगुणलक्षणम्॥ जिम स्वर्ण द्रव्यमें पीतना गुण सहजातिपणो तिमहीज ज्ञानव्य प्रगट हुवा उतां घरप- यादि पदार्थनो जाणपणो हुओ वे गुण कहीजे, वेषिण ज्ञानयकी मिल्या हुको छे तिमहीज दम्पने विपे पर्याय रया छे. पर्याय लक्षणमाह । पूर्वपूर्वाफार परित्यागोत्तरोत्तराकार परि. स्फूर्ति मंतोहि विशेषाः अपरमान पर्यायाः ए पर्याय या दोय नाम छे, जिम स्वर्ण द्रव्य तिणमें पीतता लक्षण, सर्व चातुयी भारी ए पिण स्वर्ण ट्रन्यनोहीज गुण लक्षण ति स्वर्णना अनेक आभूषण करणा से पर्याय तिमहीज जगतने विरे वार्यतः परिच्छेद्याः पर्यायास्तान: परिच्छिदिकास्तस्य केयलज्ञानस्य स्वभाषा घेदितव्याः स्वमायाश्च पर्याया इति । यावतो नाम जितरा, परिच्छेद्याः नाम परिछेदन नाम केक लक्षणे करीने मिन्न करिया योग्य नाम परिमाण करता पोग्य जे अनंता घटपदादि पदार्य एन ज्ञानकी जगत्में पदपटादि अनंता पदार्य तेऊ एक प्रश्न भिन्न भिन्न रहने केवटज्ञानयी ओटग्वा जे ते पदार्य परिध्द्य कहीने, नाम बदार्य निन्न सगे ओलखना योग्य छे. दिवे परिधानो १ मा-पानी २ 4.नी गाया- ३ एवं? जाने.

साघुपद सहझाय. १०४५ जय लितुं. तावंतः परिच्छेदका नाम जितराहीज परिठेद्य पदार्थ नित मित करी ओलखा जाणवा ते परिछेदक कही जे, तत्प केवलज्ञानत्य स्वभावावेदितव्याः नाम तिके परिठेद्य पर्यापर्ने बी परिछेवक पर्याप ते एर्व केवलज्ञान केवल दर्शन्रा सभाव हे, स्वभावाच पर्यायाः पर्याय अनंता शान ब्रम्परा पर्याय अनंता ते निज कारजपपेरे निज ख- रूपानुभव तदप जे वाई तिने स्वरुप रूप कार्य प्रातिपणे वरते ते गुण शुद्ध ते नान प्रवर्ते स्वरूप का चितवनमें के गुण पद तिको निर्मळ आत्मारो गुण हे. पर्याय गुण परिणाने पाप परिणाम जिनज गुण परिणाने ज्ञानादि गुण परिणाने कर्तृतारे आत्मारे स्वरूप कार्पनी प्राप्तिमा वीर्य पोखगोते वीरने विष आत्मानो कापणो हे, ते निज धर्म प्रतिद्ध हिज निज धर्म आत्मारो आत्नत्व धर्म ते धर्मने विषे स्वरूप कार्पनी तिवतारो वीर्ष परानीपणो आत्माने विधे रहो र कयन शालारे विज्ञ रहयो प्रति- होज हे. एहमेंहीज विशेषपने सुलीने लिखू. हिवे गायाना अक्षर उपर एहिज वात उतारिप हे, विहां ज्ञानावरगादि आठ कर्म ते तो आटेडी द्रव्य हे ते वय द्रव्य दीउ अनंती कर्म वर्गणा तेहोज प प अनंता जनता पाय के. यदुक्तं प्रज्ञापनायाः पंचम पद टीकायान् ॥ एकमपि द्रव्य मनंत पर्यायम् । निक काजरे जो बने आत्मा आत्मिक स्वरूपानुभव प्रत्यक्ष रूप कार्य में प्रवने के दाने पोतानो द् ज्ञानादे गुण जेहनः जे अनंता पाय ते कर्म साधुपंदं सइझाप. वर्गणाना एक एक पर्याय दीठ ज्ञान पर्याय पहिलावीनें पर्याय सहित कर्म द्रव्यनो नाश करे, पगैरे ते पणे आत्मा वर्ते प्रवर्ते ते गुण शुद्ध नाम आत्मा शुद्ध आत्मिक स्वरूपतापच्छेिदिकावच्छिा शुद्ध निर्मळ आत्मिक स्वरूपता आत्मारे विषे रह्यो ने आत्मत्वधर्म वेहने विपे रही आत्मता आत्मत्वपणोंतिणे करनें अबछेदिक रहित नहीं एतलें आस्मिक स्वरूतायें करने सहित तिणे करीने अवछिन्न व्याप्ततदाकारपोंछे तेमां प्रपतींज रयो छे. आत्मिकशुद्धगुण छे. पछे पर्यायगुण- नामें कर्तृतारे ते पर्यायना जे गुणज्ञान पर्यायना जे गुण ते एकेक गुण दीठ आत्मारे कर्तृतापणो छे कापणो छे. ने निजधर्म प्रसिद्ध नाम आत्मत्वधर्म ते आत्मारे विगे वेहने थये आत्माने विष पसिद्ध छे. जिम केवली केवल समुन्यात करते चोये समये अंतरालपूरते १४ राजलोकमें सातकर्म नी तिम एकेका कर्मनी अनंती अनंतीकर्मवर्गणा, यर्गणा लक्ष. णमाह॥ पंचमकर्म ग्रंपनी गाया। इगदुगुणू गाइजा अभय- गंम गुणअणूप्यंघाउरलोचियवग्गणार ॥ इत्यादि ट्याच्या अगू दादः प्रत्येक मंयमते अगू शब्द छ ति को इग करे एकेक दाद देइ मिलावणो ततः केवलोअपरेवाकः परमाणु रित्पर्यः विमति इंकलोने केवलपि एक्नो दुनो न हो वे अगु कहिये अ तेहिन अक कहिले ति अगु क्ने परमाणु दि जे. इस जगतने विप ममग्न जे लोकशाग प्रदेश तिगांमांद ने पकारी विद्यमान है, ना तिग मात्र यागे मनार ममान जाति पश्चगंगा कही जे, इश हीज प्रकारे व मी कर दिगार ममान जातिपणा हूंती साघुपद सइझाय. १०४७ दूजीवर्गणा कही जे इणेहि प्रकारे अनन्ता जे विप्रदेशी स्कंधति- णरि समान जातीय पणाहुति विजी वर्गणा. इणे हीजप्रकारे एकेक परमाणु वृद्धि करने वधावणे करनें अनंता संरूपातमदेशी स्कंध तिणारे समान जातीयपणा संख्यात वर्गगा कहिजे, इण ही प्रकारे असंख्यातवर्गणा जाणवी, अनंतपरमाणु वेकर निष्पन्न इस्या ने स्कंध तिके समान जातीयपणानं अनंतवर्गगा वही जे, इणही प्रकारे अनंतानंतर्गणा कहीजे, इणां सर्व वर्गणां प्रतें उदंचने अभव्य हुंती अनंतगुणा सिद्धरे अनंतमें भाग जे पर- मागु तिणें करी नीपच्या ने स्कंध ते उदारिक शरीर लेवा जोग्यवर्गणा हुवे ॥ १ ॥ उदारिक वैक्रिय भूक्ष्म २ वैकि- यतों आहारिक सूक्ष्म ३ अहारक तेजस साम ४ तेजस- सूं भाषा सूक्ष्म ५ भाषासों श्वासोश्वास ६ श्वासोश्वास मन ७ मनहूँ कर्म ८ ओ संबंध बीकामें वणोहे पण गारव भयात्त्याज्यम पिग पूरी १४ राजमें सुइना अगी टिके एतो मोट क्षेत्र पर हादी अनस्यातगृण क्षेत्रहीं नहीं बाकी खाली न रह्यो पछी जे जे कर्म दलीयां जीन प्रत्यद भोगव खपावणा तिण तिण क्षेत्र प्रत्यइ भोगवने कर्मलीयां अवशेष आयु स्थिति अवशेष रही ते प्रमागे ७ तेही कर्म प्रकृतिनां अवशेष दलियां राखे, तिम कोई नियाली जीव अंतगड केवली घड् मुक्तें जावावालो हे ते नि शुद्ध क्षायकीज हुवे तेने अवशेष एक अंतर्मुहुर्त आपस्थिति रही के ने एटला कालमा मान कर्म प्रकृति तेमा एकेकी कर्न दोट अनंती अनती कर्म वर्गणा बसची वा आन्ना आन्मत्र यम सहित उतो आन्मा अनत बर्ग छनो पोताना अनत वार्पना शक्ति पोताना अनत ज्ञानादि गुण तिनज १०१८ सायुपद सइझाय. पर्याय अनंतोमा आत्मवर्म संबंधित आत्मत्व शक्तिने फोर- वीने अनंती कर्म वर्गणाओमां एकेकी वर्गगा दीठ ज्ञानादि गुणना अनंत पर्याय वर्गणा दीठ फेलावीने खपावे, निस्सेस सर्वथा कर्म नाश करीने अंतर्मुहूर्तमां सिद्धे जाय विराजे ते आशये सिझाय कर्ताये पर्याय गुण परिणामें कर्तृतारे ते निज धर्म प्रसिद्ध-सिद्ध सूधी पोहचावी चुका. ए ये गाया- यांमे स्वरूप ग्राहक आत्मारी शुद्धता लिखी. हिवे परपरिणमन आत्मारी वात लिखे. परभावानुगत वीरज चेतनारे, तेह वक्रता चाल; करता भोक्तादिक सनि शक्तिमारे, व्याप्यो उलटो ख्याल ॥ सा०॥३॥ परभावागुगत वीरज चेतनारे, परभाव नाम क्रोध मान माया लोभ राग द्वेष मोह मिथ्यात्व इत्यादि स्वरूप प्रापक आत्मारे विपे नयी, परभावमे प्रवर्तते आत्मारे विषे तिणरे विषे अनुगत नाम प्राप्ति हुइ वीर्य चेतना एतळे परभावरे विपे आत्माये वीर्य पराक्रम फोख्यो. चेतनारे विषे वीरज फोरल्यो तिबारे आत्मा गहिलो हुवो भांग पीधी ठहिरि तिबारे जे आत्मा करे ते लिखे यथामदुक्तिः ॥ परपरणमन विभावे आतम अजा कृपाणी न्याये मिथ्यात्वादि हेतु आतम आपही बंध उदीरे आपही उदये सुख दुःख वेदे गयागति थिति मीरे ए जे चाला छे ते स्वरूप प्रापक आत्मारी नयी तेह पक्रना चार आत्मारी वस्ता चाल टहिरी, वाकी चाल टहिरी. कत्ता भोक्ता विचार आत्माने विचारी जोतां थकां साधुपद साझाच. १०४९ वीर्य आत्माए फोरवीने मिथ्यात्वादिक आत्मानुगत कीना आत्मारे विपे कीना आत्मारे विपे तो ए नदता अने आ- त्माए कीना सवि शक्तिमां रेते आत्मशक्तिए करने कीना भोगव्या पिण आत्माहीज तिवारे काही आत्मा भोक्ताही आत्मा दहियों यदुयत मागने यः कर्ता कर्म भेदानां, भोक्ता कर्म फलस्यच, संसा परिनिर्वाना. सापात्मा नाऽन्य लक्षणः १ व्याप्यो उल्टो ख्याल के तो स्वरुप कर्ता आत्माहीज छे के विरूप कर्ता पिण आत्माहीज टहियों आत्मा सागारो साहीज तिने आत्माहीज उलटो रूपाल खेल्यो, आत्मारे करवा योग्य नवी ते आत्माए कीनो तेथी उलटो स्पाल टहियों ॥ क्षयोपशमिकमा जुताने उपर्ने रे. तेहिज शक्ति अनेकः निज स्वभाव अनुगतता अनुसररे, आर्यव भाव विवेकः ॥ सा० ॥४॥ हिने तेज बीदनेविये अनंता भवन कता पर्श अनंतो काट दीन को ले हे जर जले भर हुनो देगी पोलमा मशवममि अमंद- पानोर ति दिन "पानीमा प्रथम विस्तार तार सम-जानि.

साधुपद सइझाय. दर्शन चारित्रादि तेहनो अनुगतता निजस्वभावमें आत्मा प्राप्ति हुवो निज स्वभावमें रमण हुबो एटले आत्मा पोताना स्व- भाव पाम्यायी अनुसरे, ग्रहण करे. आवभाव सरलतारो स्वभावीपणो ग्रहण करे, तिमहीज वली आत्म स्वभाव प्राप्ति रूप विवेक ग्रहण करे आर्यवपणेरो भाव प्रगटे ए तो आत्मानो क्षयोपशम सम्यकत्वयी उत्सर्ग कपन छे. अपवादें परवंचकतादिकारे, ए माया परिणाम; उत्सर्गे निज गुणनी वंचनारे, परभावे विश्राम ॥ सा०॥ ५ ॥ हिवे आत्मानो विशेष कथन लिखें अपवादे विशेष कथन करने ए आत्मा क्षयोपशम भावि छे. क्षायिकभावे नयी तेयी परवंचना अन्यने टगणो ए कपटनो परिणाम परिणमन छे, क्षयोपशमी छे तेयी जीवमें माया परिणमी छे, परं उत्सगें सामान्ये आत्मगुणनी ठगाइ थाय, सामान्ये आत्मगुण ठगी जे विशेषपणे न ठगी जे कीण विरियां तेहिज जीव स्त्र स्वभाव में प्रवर्ततो तिण विरियां तो नही ने स्वभावमें प्रव- ततो छतो एहिज जीव परभाव नाम आर्त रौद्रध्यान रूप विभावमें विश्राम ले विभावे जाय टहिरे तिवारे उ० निज- गुणनी सामान्ये वंचना टगाइ करे क्षयोपशमात् क्षयोपशम छे तेथी- सात घरजी अपवादें आर्जवीरे, न करे कपट कपाय:

साधुपद सइझाय. १०५१ आतमगुण निज निज गति फोरवेरे, ए उत्सर्ग अमाय ॥ सो०॥६॥ पांचमी गाथा क्षयोपशम भावयी विशेष कयो, हिवे उठी गायामें नायिकभावें विशेषपणो कहे छे. अपवादे नाम हिज जीव विशेषपणे साने वरजी सात कर्मप्रकृति अनंतानु- बंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व मोहनी, मित्रमो- हनी, सम्यकल मोहनी, ए साते परजी तिवारे अपवादे नाम विशेष आर्जवी थाय. विशेषपणे सरळ स्वभावीपणो ग्रहण करे. कपट तो अनंतानुबंधी चोकडी क्षपायां धनं शेष रह्या से अप्रत्याख्यानादिक तिण संबंधी माया परिणामीपणेमें म प्रवर्ते तिवारे आत्मा आत्मगुण अनंतज्ञान दर्शनादि ति- जाने निज निज गति फोखे शक्ति प्रवावे तेपिण एटला सुधी ही आत्मा उत्सर्ग सामान्ये अमायी अपवादे विशेषपणे हजी सुपी आत्मा अमापी नदी, मायानी दोड दशमें गुणटाणे रेअचरम समय सुघी छे. किम क्षपनि हजी सुघी नयी कीनी तेवी मायाने उपशामावी छे पिण संपूर्ण क्षपावी नयी. कर्ष केवलज्ञान केवलदर्शन नी पाम्यो ते पाम तिवारें शुद्ध शायिकी धास्ये केवलज्ञान केवलदर्शन उपन्यां सुं पहिला ले क्षाविकिपणो के तेहनें मिद्धांतमें अशुद्ध शायिकीपगो क्यो छे. यदक्तमागमे. ननुसप्तक्षये क्षायिक इन्युक्तन्यात् सनिक्षा- यिक मन्यस्वे श्रीकृष्णवासुदेवः कर्यनरकावनींजगाम श्रेणिव प्रथमामिनि इसा प्रत्यकीयो नत्रोत्तरमाह क्षा- यिकंदिया शुद्धमादति ॥ नत्र श्री कृष्ण श्रेणिकयोर- शुहं क्षायिकं । कस्माईनोः नडेनुआह । नत्यसपर्यवसि. IND १०५२ साधुपद सइझाय. तत्वादिति न विरोधः यदुक्तं श्री नवपद प्रकरण वृत्ती। तयाहि । क्षायिकस्यशुहागुडभेदेन द्विभेदत्वात् ॥ तत्रा- पायसद्व्ययिकला भवस्थ केवरिना मुक्तानांचया सम्यग्दृष्टिस्तच्छुन्हं क्षायिकम् । तस्यय साय पर्यवसा नन्यानास्त्येवभंगः तस्यनाम तिण क्षायकरे सादि अपर्व- वसितपणाहुँती भंग नही यदाहुः गंधस्तिभवस्थ केयसिन द्विविधस्यमयोगायोगभेदस्य मिहस्य दर्शन मोहनीय मतक्षयाविभूना मम्यगद्दष्टिः सादिर पर्ययमितति ॥ पाय पायमहचारिणी श्री श्रेणिकादेरिय मायष्टि स्तदशुद्धं क्षायिक तिण शुद्ध क्षायफरे सादि सांत मांगो हुचे अस्ति प्रतिपात: तिण जीवरे क्षायक पडणो छ किण हेते तिको हेतु श्री गंधहस्तीजी लिरो तोयाच अपाय. मप्रव्यवत्तिनी श्री श्रेणिकादीनांच मद्रव्यापीम भवन्यायमचारिणीमा मादिः मति शानांशहर सदिन मम्यम् दृष्टि हुये तिवारे मति नानांशकर सहित शायिक सम्पान्य प्रगट होवगेगु सादि कदीजे, केवल ज्ञानरी उत्पति हो ते मतिज्ञानांश क्षय हो निवार सांत कहीजे. अपाय सहपारिनी मम्या दशि अंघो तिवारे सादि सांत भांगी टदियों, केवल ज्ञान उपन्यां पछे मतिजानांश क्षप हरे ने शुद्ध क्षायिकरी आदि हुई तीन काटमें जग क्षाय. को नाम नही तिग अनंत अतएर दि अनंत भांगो दशाविरं पामें इति ॥६॥ मनागेध भ्रमण गति चारमें रे, पर आधोनं निः - .. सायपद सहदाय. वक्र चालथी आतम दुःख लहे रे, जिम नृप नीति विरत्त ॥ सा० ॥ ७ ॥ ओ जीव अपक्ष भाविकीपणामाटे सत्ता आम सत्ता ते आत्म सत्ताने रोष-रोकने भ्रमण गनि पारमेरे पार गति चोराती लाल जीयोनीगे प्रवर्तगो-मनमो पर नाम जडादिकी आधीनति हे एकले जीव जडावीन उत्तिए कानें चार गतिमा परि समस्तर समग करे. नन शेतमाह जिम हा वासुदेव अब भाविक सम्परत पानके शलां. तरे मरण पाप तीजी नको मात सागगेपरी स्थिति में उर- ज्यो उपन्यां परे तीजी नाकगे आउसो संभोगनें महप्पभव करने पांचो देवलोक दम सागरोपमरी स्थिति उरस्पां, निहांनी पवित्र कारने अमनजी इनाने आती बोरिसीम नीकर ली. यदुर्ग श्री मंचदानानि कृति पसुदेव दिरी नयादि । का ना आप पुटवीए उपहत्तादाद भारंवाने मप दुबारे नपरे जियनुत्त- स्मरी पुत्तत्तापदजिगत मंदिय भादो पर. परिवति, लिमपरणाम कन्ग नमुमपिता भनोट फरे दन मापमानदारमनाना भरा भपिनमः ॥ ने किया है मान लि. मीनेन .... स मनिहांत १०५४ साधुपद सझ्झाय. जिम नृप नीति विरत जिम राजा राजनीतिमा प्रवर्ततो थको सर्व वातें साता पामें तेहिज राजा नीतिने विस्व छोड्या थकां दुःख पामे इत्यर्यः ॥ ७ ॥ ते मा. मुनिजुतायें रमे रे, वमे अनादि उपाधि; समता रंगी संगी तत्त्वना रे, साधे आत्म समाधि ॥ सा०॥८॥ ते माटे तिण कारणे मुनिराज परभाव छोडनें रुजुता सरलता आत्मिक स्वभाव संबंधित जीणें करने आत्म स्वभा. वमें रमे-रमण करे दिनरात फिरी तेहिज मुनिराज. अनादि कालनो मिथ्यात्वादि उपाधिलक्षणमाह ॥ साध्य व्यापकत्वे सति साधना व्यापकत्यमुपाधिः ॥ साथवा योग्य वस्तु तिणरे विपे तो सर्वथा प्रकाररूप स्वरूपता व्यापी रही छे. व्याप रह्यां थकां तें साधन जे कारण तेने विषे अव्यापकत्वं व्यापन रही छे एटले स्वरूप कार्य साधवावालो ते साधन ठहियों तेहने विषे रुजुनापणो व्यापीने रयो तेहिज उपाधि, ईहां साधवा योग्य आत्मिक स्वरूप सरलता तेहने पिसे व्याप रही छे सावन मुनिराज तिणरे विषे अनादि कालीन मिथ्यात्वादिक उपाधि तिणसु रुजुता नावे तिण कारणे मुनि- राज रुजुताने ग्रहण कीयां स्वरूप प्राप्ति हुवे ते कारणे उपाधि वमें दूर करे निवारे साधुरे विषे स्वरूप ग्राहक शक्ति उपजे सुमता रंगी शुभमनि स्वरूप संबंधनी भली जे मति तिणगं मुनिगा रक्त दृवे. अहोनिशी सुमतिमयी प्रवते. संगी नत्त्वनार युद्धात्मतव नेहनो अहोनिशि चितवन १०५९ करेगी निगरे नाचे भान समाधि समाधि- चित्त तिरोधः मुनिश्मद बिन वित-मन देहनी को इति प्रति निनने का सपनो चितवन मायक्ष आर्जवनी पूर्णता रे. सवि गुण जुतावत: पूर्व प्रयोगे परतंगीपणो रे. नहीं तस् कावंत ॥ सा० ॥ ९ ॥ हि अनी अन म अनसनी तो निकाह कर्स ने एने पर नहीं को नमनी महल नायज्ञरे आर्जवनी पूर्णतारे सोही जता विना नि नही १. कर्नामे गे कान्तिं सपनो कप हवं. आबदी पूर्णकार समाज भावर त नहुँ, हिई में गुम हत सातनी नहु एक जना हतो म. जमा होत. झिकर बाद से है उनी असतो. F करने - पागले नदेव्हना साधुपद सइझाय. संगयी बंधाणो जे शरीर तेहनो खानपानादि बाह्य शुश्रूषा रही छे एतलें शरीर संबंधी परसंगीपणो रह्यो छे. नही तम् फर्तावंत तसु ते जे कर्मबंधणा शरीरनी शुश्रूपादिके करने तिणरो कर्त्तापणो तिणारे नहीं रह्यो छे, कमरो कर्तापणो बाकी न रह्यो ॥९॥ साधनभाव प्रथमथी नीपजे रे, तेहीज थाये सिद्ध द्रव्यत साधन विघन निवारणा रे, नैमित्तिक सुप्रसिद्ध ॥ सा०॥ १० ॥ कमरो कर्तावंतपणो नही तेयीज साधकभार आत्मिक गुण साधक स्वभाव आत्मारा आत्मिक गुणज्ञान दर्शनादि साधक साधन करणो सिद्ध करणो तिणरोभाव प्रथमयी- पहिला हुंती एटले ए हवे आत्मा थये छते नीपजे थाय हिज आत्मा थाप सिद्ध सिद्धपणे थाय पामे तो ते हये थये आत्मारे दव्यत साधन द्रव्यत्व साधनपणो माय सावन- पणो चारिबादि तेहना द्रव्पन्व साधनना जे कोई विधन ते विवनोनो निवारणारे निवारण करणो दूर करणो नैमित्तिक ए तो निमित्तकारण छे; साधारण असाधारगमांयी एकही नयी जीम कुंभकारे दंड चमचीवरादि निमित्त कारण घटरूप कार्य सिद्धि करता थकां छे तिम द्रव्यन साधन द्रव्य सावूपणागे पहो ययो आत्मा तेहनें पांचेई जे प्रागाति पाताअवगे निशरण द्रव्य सायुपगारे विष प्रागानिपानादिक नो विचन न पड़े प्राणातिपात मुघावादार्दिक लागे तद्रूप सायपद सम्पाय. १०५७ , ब्रम्प साधनपगारो विषन ते विवननो निवारयो पहवे ध्ये आत्मारे सहिज निवारणो हे, तेदी नैमित्तिक कारग कलो तिको नैनित्तक कार सुप्रसिद्ध-प्रसिद्धहिन हे, ए सर्व व्य साधन हे, त्य साधनयी तथा विध साधना नवी ॥१०॥ भावें साधन जे इक वित्तथी रे, भाव साधन निज भाव । भाव सिद्ध सामग्री हेतु तेरे, निस्संगी मुनिभाव ॥ ता० ॥ ११ ॥ व्य साधन को हो निज स्वभाव नापनकी सवाल सिद्ध धाप ते लिखे ते भावगायन हे, तेची नालापन स्वरूपानुपापी जो भावमापन आमिर ने मिड करे एहतो के भावमादन. दाहिनी प्रो र दिन- इति बग्ने नाभाय न है शानदार ए लिखत पालना न करे , निजन निर्मः काल बनेट एक ::..त गुणपतीपत्ता :- तेज किया साधुपद सझ्झाय. मुनिपणो निस्संगी मुनिभावपणो वे स्युं संग नामसंबंध नामशरीर पुद्गलादिक पण रह्या छे, परणम्या ते पुद्गल ते पुद्गलोयी नि- स्संगपणो छे. पोताना पुद्गल नपी जाणता, पुद्गलोनी परवर्या मात्र मूकी दीवी छे, मुनिभाव नामरवभावे मुनिराजपगो ते छ, एटले तदाकारहत्तिपणो तेहने कहिये तेरमें गुणटाणानो अंन्य अरु चौदमो गुणटाणो हिवे थास्ये ते पोतेज कर्ता आगळ गुंप्युं छे. वेहिज लिखे ॥ ११ ॥ हेयत्यागथी ग्रहण स्वधर्मनोरे, करे भोगवे साध्य । स्वस्वभाव रसिया ते अनुभवरे, निजसुख अव्यावाध ॥ सा०॥ १२ ॥ हेय त्यागयी भावसाचन जिवारे सिद्ध थयो तिवारे हेय- त्याग-छोड्या योग्य जीको वस्तु स्वस्वरूपरो वियनकारी जे पंच्यासी प्रकृति जुना कपडा प्राय तेहनो जे अंत करो खपाववो तदप हेय-त्यागयी, ग्रहण स्वधर्मनों स्टेयो स्वधर्मनो आत्मत्वधर्म अनंतज्ञानदर्शन चारिवादिकनो ग्रहण करे तप स्वरानो ग्रहण करे भोगवे साध्य साधा योग्य यन्तु स्वधर्म तेहनी सिद्धता ते जे भोगो, लयु पांच अक्षर नो उच्चारणरो काल तिग प्रमाणे चाटमा गुगागामें भोगने पछे म्बम्बमार मिपाने आगे म्यभार पूर्व कयो ते अनंत ज्ञानादि तेहनो मियो थयो सतो निज मुग्न अग्यापाय पीडा का दिन : ना7 1 7 च गुगटारे अनि में एक साल का समय दिया. पहन्यां -- -. सापद सझ्झाय. १०५९ पछे प्रथम समय सो तो आदि छे, सिमां पुहवणरी आदि छे. अनंतेकाले उठेहीज रहयो तिणसुं अनंत छे, तेवी सादि अनंत भांगो सिद्धमा छे इतिश्रेयः ॥ १२ ॥ निःस्पृह निर्भय निर्मम निर्मलारे, करता निज साम्राज। देवचंद आणायें विचरतारे, नमिये ते मुनिराज ॥ ता०॥ १३ ॥ इति आगली गाधारी संबंध जोरावरी मिलावणो पडे छे, सिझाय कर्ता महा मोटा यी विरुद्ध कहिवाय नही. प्रथम गाथानो ते संबंध अंतिम ए संबंध ते पोतेही विचारी टेग्यो, निस्पृह- वांडा रहित इसा ते मुनिराज के, निर्भय इहलोक परलोकादि भर तेणें कर रहित इता ते मुनिराज हे, निर्मल गयोछे कर्ममल ने हंती इसा थका करता निज सामाज स्वरूप संबंधी निज राज्य-आपणो राज्य कर रहा हे देवचंद्र आणाये विचतार ॥ देवेपुचद्रय चद्रोदेवचद्र संसार संबंधी देवता विष चंद्रमारी परे कर्मरहितपणामा उन्बल महास्या ते वीत. राग देव दाणारी आणा आज्ञा ते विरे विचरता-मवर्तता ननिये ते मुनिराज सा ते मुनिगजने ननि, ए दोर अंतिम पदारों प्रथम पक्ष नदिन अर्थ हे. हिवे द्वितीय पक्ष पित होप अतिम पहाणे अप टिन हे, देव विराज पद का-जिनेअग्नी आज सम्र प्रमाणे नंता पहवा में मानगड नेम दे सका इति नंकः ॥ इति जनमानस न करना।

श्री बाहुजिन स्तवन स्वोपज्ञटवासह.' पाहुजिणंद दयामयी, वर्तमान भगवान, प्रभुजो; महाविदेहे विचरता, केवल ज्ञान निधान, प्रभुजी. वाहु० ॥१॥ हवे श्रीजा तिहरमान पश्चिम जंबुद्धीपनेविगे बच्छ- विजय मसिमा नगरी, सुग्रीव राजा, विजयामाता पुत्र, मोहनी रागीना भरतार, हिरण लांच्छन, श्री बाटु स्वार्माने जे दया नीपनी छे ते दिखाडे छे, अने प्रभुने रतये छे. श्री बालु स्वामी दयामणी छे. यहां यथार्थ ज्ञान कराने दयान तथा अहिंमान स्वरूप कहीए बीए. जे कोइने हणयो नहिं वे अहिंसा कहीए. ते विभावपरिणतिए परिणमीने जे आम- गुणनो हणयो ते भावहिंगा. अने गुणी तया ज्ञानादिक गुणने अनपायी वीर्य उपयोग करना आत्मगुण हणायज नहिं. ते भार अहिंसा. नया जे आन्माना ज्ञानादिक गुण आन्नवी हणना जाणीने ते आसवयी राडीने आन्माने संवरने विष परिणम ते भावदया जाणवी. तथा कोइ पर. जीवना दश प्राण न हवा ते द्रव्य अहिंसा. अने कोइना द्रव्य माग हणाता उगाग्वा ते पदया, पर्नु स्वरूप विशेषा • ने अमर पवार र होई नोना ममदनी द्वरा भने । उपरनो अर्थ पर N श्री बाइजिन स्तवन. १०६१ वदयके वर्थ गणववादयी जोन्यो. तथा श्री हरिभत्रि- कृत अहिंसायी तथा ओपनियुक्तियी जोज्यो. इहां दया अहितानो एकपणो के कारने सायोपचार मा छे, दया वे अहिंसानो काम हे. अहिंसा के कार्य हे. स्वपरना ज्ञाना- दिक गुण न हणमा ६ भाव अहिंसा. ए धर्म पतः " एस धम्ने पुरे नीलिए " इत्यादिक आगम न छे. ते श्री बाह जिन रहेतां नागना इं पुष्टोपगारी माटे तीर्थकर ते परनदपानी हे. आनानी दया पूर्ण करी है, परनी संपूर्ण दया उपदि. नाना विचन्ता भन्य जीवोने देशनामते सिंचता महाविदेहलेने तेहि केवळ-जे सक्ल लोकालोकना भाव जेही प्रत्यक्ष परसहाय दिना एक तारे जाने से केवल ज्ञानना निधान हे. एका श्री बाइजिन हे ते परमदयाल छे द्रव्ययको छकायने, न हणे जेह लगार प्रभुजी, भावल्या परिणामनो, एहिज छे व्यवहार. प्रभुजी. वाहु० ॥२॥ दम्पदी : काय. १. पृथ्वीकाप. २. अप्पकाप. ३. तेड- काप. ४. वाजाप. ५. वनस्पतिसाद. ६. ताप. ने नहीं नेत्री अरिहंत टिगार अंगनापपिण. इहां वोह पूच्छये ले फेवसीना पगयी पारवाना वहां प्रमुख हणाये हे. तो न हणे किन कहो हो : तेनो उतर जे श्री भगवान् केव- टीना पगली पारेका प्रमुखना बवाहमाप दिन हने इरी- पाव्ही ६ . 'हेमा न हो ते माडे न हो इन कहो के उद्धे गुम हो मुनिने प्रातिपातिक क्रिया सरी हे श्री बाइजिन स्तवन. तो केवलीने किम होवे ? क्या माटे जे भावदया आत्मगुणनो रखवालबो तेना धणी जे उत्तम गुणी निग्रंपादिक तेहनो ए घ्यवहार कहेतां प्रवर्तन छे, जे जेमा जेहवा गुण हुवे तेहनो आचरण प्रवर्तन पिण तेहबोज हवे, जे पोते साहुकार हवे वेहनो देश चाली पिण समी हवे. जेहनो लांठीयो हो तेहनो देश चाली पिण वांकी हुवे, ए दृष्टांते जे परमेश्वर भावदया परिणामे परणम्या छे वेहनो विहार पण छकायने राखवानोज हवे इम जाणवो. ए द्रव्य दयारूप प्रथम भेद करो. रूपअनुत्तर देवथी, अनंत गुणो अभिराम प्रभुजी%B जोतां पिण जग जीवने, न वध विषय विराम, प्रभुजी. बाहु० ॥३॥ पीजा सरागी जीवनो रूप हुवे ते घणा जीवने विकारनो तथा संसारी रागादिकनो हेतु थाय तिवारे ते जीवना आत्म गुण हणाये, तिबारे ते रूप हिंसानो हेतु थयो, अने श्री प्रभुजीनो रूप से अनुत्तर विमानना देवतायी अनंतगुणो अमिराम कहेतां मनोहर छे. एहनो रूप छे. पिण जगायना जीवने जोतां धर्म राग उपजे पिण विषयनो विकार न उसने इतने जे रूपनी मनो- हरता ते पिण दयागो कारण जाणयो. ए. बीजो दयापणो छे.३. कर्म उदय जिनराजनो, भविजन धर्म सहाय, प्रभुजी; नामादिक मंभान्तां, मिथ्या दोप रिलाय, प्रभुजी. बाहु०॥४॥ ३ श्री पाइजिन स्तवन. वटी त्रीजी दया कहे हे. हे देवाधिदेव जिनराज तुम्हारो कर्मनो उदय, ने तधिकर नाम कर्ननो जप तथा भाषा वर्गगानो उदय प्रमुख ते जगपना नाप जीपने धर्मनो सहायनो कारण धाप है. उ. मायानगुनी. नंय फहं वेइजद अगिलाए धन्मदेमणबाट पविभागाने सांभ- लने घणा जीव धर्म पाने. अतिमय गीत देखीने वा जीपने वित्मय सर्वोत्तमपगो भाले. ते अतिमापनो स्वरूप प्रथमपार अतिशय सहजना जन्नना है. इपार पनवानी काय या पछी उदय पाप हे योगमीन अतिशय देवता गुपरागी धनी जग-जीवनी मात्र काम करे हे. ए चोत्रीत अतिशय. पांवीन वचनातिर नशि नाम- कन्नो औददिक विपक. हे. निद बने व पनाह वानो कारण पाप हे. हर्ग पानी गंगार गनुः मन्द पडतां उगरे हे. तिने एमीनो दरक्तरो. नया तुम्हारा नामाटिक रहे नाम नियमभाग्नं निमदोर बिलय जाये. धानापानादाला अग्निा भगवंताण नामगांजाम दिया किमंत अभिन. मण वंदा नमनपाप हाना र माटो. हम दो. पापनादी भनि हिआए नुहाएमा निन्न सामाजिना भरिमा नया "जी" :- पने Anand १०६४ श्री बाहुजिन स्तवन. चैत्यशब्दे जिन प्रतिमा छे. वली भगवती सूत्रे चमर अधिकारे सौधर्म इंद्रे अरिहंत तथा अरिहंत प्रतिमानी आशातना एक कहीं छे तथा करेमिभंवे सामाइयं ए शब्द उच्चरतां " भंते " थापनानो संबोधन छे. तया अंगचूलीया सूत्रे कयो छे जे गुणीनी थापना गुणी समान वडवी. तथा द्रव्यनिक्षेपो जंद्वीपपन्नत्ती भव्ये निर्वाण कल्याणके श्री रुपमदेवना शरीरने नवरावी चंदन विलेपन करी फूल चढावी ग्रहणा पहिरावीने शकस्तव कयों छे. तया उवाईमचे अप्पे गइया चंदणवत्तियाए अप्पेगइया पूअण वत्तियाए ए पाठे फूलनी पूजा ते गवेपी छे. तया नंदीम निल्लोफ महिय पूइपहिं अरिहंते पन्नवीए इत्यादी पाठ जोवो. तथा भाव निक्षपो. परम केवलादि गुणमयी श्री अरिहंतनी सेवना वंदण नमन ध्यान ते च्यार निक्षेपा जे नाम अरिहंत, थापना अरिहंत, द्रव्य अरिहंत, भाव अरिहंतने संभारतां मिथ्यात्व कुश्रद्धा- दिक दोप विलाय कहेतां जाय. हे प्रभुजी तारा नामादिक- पिण परजीवने आत्मगुणना कारण छे. इतरे वेपिण दयानाज हेतु छे ए चोयो दयापणो छे. आतम गुण अविराधना, भाव दया भंडार प्रभुजी। क्षायिक गुण पर्यायमे, नवि पर धर्म प्रचार, प्रभुजी ॥ वाहु०॥५॥ ए म अगार्गपणे पजीपना हिनम्प, द्रव्यभावपर दया. वंतपणो दाग्यो पिण ने पोताना आत्ममध्ये अहिंसकपणो निपनोई ने व्यापनमा मोटवार ले तिहाजे अनादि

भी वाहजिन स्तन.
..
तारी जीव पानपापी क्षपोपशनी उपयोग वीपने अक्तने
स्वगुणअनंतताने आवरण करतो हतो. ते लात्मगुण हिता
हवी. तथा पोतना गुण, पुबल टेने भोगरे प्रावतां
जानन विशवना थी हती, ते हे श्री बाहु स्वामी हिवे
तुने तुम्हारा कारन गुण, ज्ञान, दर्शन, चारित, वीर्प, दान,
सान, भोग, उपभोग, तोपगो, भोत्तापगो ज्ञापकपगो,
पाहतो व्यापकागो: रशको प्रमुख तवें वरूपानुपापी
सायकल स्वरूप, कर्ता स्वरूपः ज्ञाता स्वरूप, माहक स्वरूप,
भोत्ता स्वरूप, रक्षक स्वरूपात्री स्वरूप तन्मयतादिपगो धये,
जालगणना अविराधक यया ते मारे स्वरूपना सर्वथा
निराकरणपो रहिवो. जे आमाना गुपने चिराषवा नहि. ए
भाव दपा हे. तेना तुन्हे हे मनुजी ! हे परमेश्वर ! पानात्मा
तुन्हे भंडार हो. इकडे स्वखरूपने निळपने राखी रहा हो.
एहज भाव दपा छे. तेना भंडार डोजी. तेनो कारन कई
है. ले शायिक निराबरन ले गुण केवळ ज्ञानादित पर्याय
सकल वेत्तृत्वादिक हर्ने हि, पवन ने पुल रागादि जे
परधर्म रागादिक्ष वेहनो प्रकार कहतां. प्रवेश नह. महतो
नपी. ने पोपशनी गुज ते दलचित् सक्तिन्यूनता मारे
परानुपापी था. सावनचके सावपाज रहे, परं सादिक भावी
ले गुम हे जे स्वशक्तिनी सनापे, सकाई करे, पपानु-
पायो घरेज नहे. पहज पान बल्ल अनिशक्ता साद
अनन ने निक. हे जम अहेमा निरनों छे, ए चारित्र
गुना हे ३ वने प्रने हे. ते मारे-
.

श्री वाइजिन स्तवन. रीते थाय. ते दया कही छे. ते ए पांचमें बोले स्वरूप अवि- रावकरूप भावदयाना पात्र छोजी. सर्व जीवे, सर्व आगम मव्ये एहवा भाव दया अरूपी आत्मपरिणति ते धर्म सरदहीवो. अरूपी धर्मज अरूपी परमानंद नीपजे. ए धारवो. तथा श्री भगवती सुने आया सामाईयं ए पाठ तथा श्री विशेषावश्यक मचे जीवो गुण पडिवनो नयस्स दवशियस्स सामाईयं, भात्मगुणस्यधर्म प्रवृत्तिः तत्यायाधकतो अहिंसा, इति व्याख्यानात् तथा धर्म संग्रहण्यां नाम ठपणा दव्वर खित्ते काले तहेव भावेभ एसोखल धम्मनित्सेवो छविहो होई. ए गायानी प्रथम संक्षेप व्याख्या पहिलां करीने पछी विस्तर वाचनाए स्वगुण. पर्यायाधारत्वं द्रव्यत्यं तस्य परसंगित्वमेवाधर्मः पंक्ति स्थ न्यायात् अधर्म एव हिंसा ए आसमये वेहनो न करवो वे अहिंसा ए आशये गाथा सूत्र कहे छे. गुण गुण परिणति परिणमे, बाधक भाव विहीन, प्रभुजी। द्रव्य असंगी अन्यनो, शुद्ध अहिंसक पीन. प्रभुजी ॥ वाहु० ॥६॥ तथा गुण जे ज्ञानादिक ते गुगनी परिगति जाणवादिक स्वस्वका परिणमे गुण परिगतिनो बाधक भाव जे आवरण तेहयी विहीन कहेता रहित एरले निवारण गुण परिणाम तेहज स्वस्वकार्य करे, ते निरावरण गुण थयो ते शायी भयो ? जे कारणे द्रव्य आत्मा अन्यनो असंगी थयो तिवारे गुण निरावरण भयो एहज द्रव्यनो अहिंसकपणो नीपनो. तथा भी याजिन स्तवन १०३७ -- - प्रोपंचवस्तु टीकायाम, हेतुन्योऽभिनयकर्मग्रहणं हिंसा तमिवृत्तिः अहिंसा तथा श्री विशेषावरपके भगवती से एहना अधिकार अनेक हे. जे निष्पाद, अविरति, कार, पोग एहस पार भात्र संसार कसा हे, ते माडे सरल प्रदेश सरल भाव धर्म, अन्य ले पानाव व्हतो सभी सर्व संग रहितागो ते ब्रम्प अहिंसकरमोनिपने हे, ते मारे व्हवी रहित ते दम्य अतित कहीजी, परसंगी आमाने हिंसक वासे छे. ए शुद्ध जन अहिनामा पनि कडेला पुE ले पोग कटोहे, ते असपनो का दामने सामन रीते नदी. पर जला ले न पटे.साद दस शुतावनी - पोग ते इहां उभो हे. ते मारे आय वचनोग कलो हे. तथा श्री भगवी मराय गुपाने संसपी विष हे, माटे उत्सत्तरीपति ए पाहे ए िदनु पर्न जारपीछे. ते ना बना पर एइ. मेटो अल- धर्म प्रायो, म क्षेत्र से जाना दल का हपतो तो ते अपार धोएर मरमसले :- शेष समने किन मन: हिरोलियो अवगाहना है कि मनी, सिहोरिने मानी मोटी ना तीन महतो उत्पाद पपपुर. मोजे पनि पार, अनुजी। इंदन योजनानी. पलु वनार सनाप. प्रतुनी ॥ वाह-11८ श्री बाइजिन स्तवन. हिवे-भावनाये कालवर्मनी शुद्धता कहे छे. कालधर्म - क्षण, धर्मसंग्रहणीये कहीये छे. पवत्तण स्वो कालो दव- स्सचेव पचाओ सोवेव तउधम्मो कालस्स वजस्सजोए तथा तत्त्वाथै विशेषावश्यके पंचास्तिकायनी वर्तना तेहनेज कालपणो क्यो छे, तया अनुयोगद्वार सूत्रे पिण क्यो छे जे किं भंते अदा समएतिवुचति गोयमा जीवाचेव अजीवाचेव तिहां पिण जीव अजीवनी वर्तना ते काल तया स्वदव्य स्वक्षेत्र स्वकाल स्वभावत्वेन स्यात् अस्ति ए पद संमति तथा रत्नाकरावतारिका मन्ये छे, ए अस्तिपणो ते स्वधर्मेज हवे. परधर्मनो अस्तिपणो के द्रव्यनुं धर्म नहि. ते माटे काल उत्पाद व्ययरूप वर्तना ते स्वधर्म छे. आत्माना विशेष पर्या- यास्तिमयी परिणमन छे. ते उत्पाद तथा व्यय तया ध्रुसणे जे आत्मा परिणमे तेहने सहेजे परिणमे छे. इतले उत्पाद व्यय ते कोइने पर निमित्ते थतो नयी. ते माटे सहेजे ए परिणति थाय छे. संयोगीभावनो व्यय वे छेदन को थाय छे अने उत्पाद ते कोइ योजन कहेता कोइकने जोरे थाय छे, अने आत्मगुणनो उत्पाद ते परभावनी योजना विना थापछे. ए उत्पाद वस्तु स्वभावे समाप छे. वस्तु धमें समाय छे. ए काल परिणति सर्व द्रव्यनी किवारे हगाती नदी. ते वरतपणे तिमहिज परिणमे छे. वे वस्तुमै दिसाड्या मारे कानो छे. तया गुणनी वर्तना ते गुणावरक कर्म रोचे छे. ते तो रोधक- पणो हिंसा छे, ते निरावरण अस्थाये प्रारभावी वर्तना ते हि हणाती नयी. ते माटे एहने अहिंसक वर्नना कहीए. ते नीपनो छे. हे परमेश्वर पग्मदयातुम्हें स्वदया संपूर्ण नीपजावी छे श्री यशोविजयोपाध्याये निजदया परदयानो स्व. २ श्री वाजिन स्तवन १०६९ रूप उपदेश रहस्यमें वर्णयो के ते जोज्यो. निज या विणु कहो पर दया ये करण प्रकारे ए वचनने अधिकारनो आ- शप मिग एहज के. गुणपर्याय अनंतता, कारक परिणति तेम, प्रभुजी। निज निज परिणति परिणमें, भाव अहिंतक एन, प्रभुजी. ॥ वा० ॥९॥ हवे भावधर्मनी अहितकता कहे छे. तया श्री भगवती से भावआणं जीवे अगंता नाग पनवा । अणंना दंसण पजवा, अगंता चारित पळवा. अणंता अगुमलघु पनवा. इत्यादि धाधिशारे तया नावनीः उत्तराध्ययन नियुक्ती, जीवाजीव विभन्निने कि जोइ टेन्यो. नवरं तद्व्यति- रिक्तश्च जीवद्रव्य बन्यजीयः उच्यते इति महामस्तु विशे- पद्योनका पिरियं न कदाचित्तत्पर्याय दियुतं द्रव्यं तथापि च यदातहिताचा वियश्यते तदातदव्य प्रा. धान्यतो बन्य जीव भातु दशाविध एव परिणाम: कर्मक्षय क्षयोपशमोदयापेक्षः परिणनिरूपो भावजीवः इति ई ए शांतिवादि फास्टीस पाठ है. तग धर्म- हनीने विष मस्तेय धम्पल नियारवे हिं अभिनत्थित्ते मिल पतिनिमित्तं नहानअगंनो १ ए भावधर्म तथा श्री दशवशाहिर नियुति. अहिमाना निक्षेपा कर्या हे. देहनी ये जेवणायाधः अहिंसा 'वस्तु हत्या अगतिक याद दिला ' इत्यादि ते मारे नई ८ अब अगवे ' इत्पादि तथा कार

१०७० श्री बाहुजिन स्तवन.
कर्ता १ कर्म २ करण ३ संपदान ४ अपादान ५ आधार ए
छे ६ ते गुणपर्याय तो अनादिकालना अवराणा पड्या छे तथा
जे वीर्य चेतनना क्षयोपशमी थइ ते परानुयायीपणे परतता स्व.
गुणावरगरूप कार्य करवे स्वगुण प्रवृत्ति घातरूप स्वहिंसा करे के,
ते हे नाय तुम्हे स्वकीय सर्व गुण प्रगट करवे वली स्वरूप प्रवर्तन
करवे ते हिंसकाणो निधारीने स्वभाव धर्मना आहंसक थया छो.
तया कारकखटनी परणति अबराती नयी, पिण अनादिकाटनी
संगांगीपणे परकर्तापणे थयायी आत्माविभावकर्ता, कार्य, कारण
संप्रदान, अपादान, विभाव परिणमनरूप परानुपापी क्षपोपशम
वे अमिनवाश्रव परिगति वृद्धि लाभरूप स्वशक्ति रोकवा.
रूप ते हानि ते आत्मक्षेत्रे परभाव ग्राहकता परभाव भोग्यता
रक्षणनादिकपणे आधारकारक, इंम छ कारक हिंसक थया छे.
संसारी जीव ते तुम्हारा खटकारक साधनपणे करी पछी
केवल ज्ञानादिक गुण प्रवृत्तिपणे प्रवर्ताव्यो कर्तापगो,
कार्य, करग, संप्रदान, अपादान, आधार, सर्वज्ञतादिक गुण
प्रवृत्ति ते उपगरण वे भासनतादि लाम ते परभाव सन्मुख
न धसवो ते स्वरूप रक्षगता, ते ए छ कारक स्वगुण कार्य
करवारूप परिणः परणम्या एहज भाव अहिंसकता नीपनी.
ते भाव अहिंसा अव्यवसायपगो नी नो. एहज स्वधर्म नीपनो.
इतके आत्मगुण आत्मपर्याय तथा आत्मानाकारक ते सर्व
अनंता परिणामत्वादि शेर धर्म ते सर्व निज निज कहेतां
पोतापोतानी जाणग छे. तया देखयो तपा रमण आनंदादिक
परिणत परणमें छे. ते हिज भाउअहिंसकपगो छे. इतके जे
दव्यनो भाव अहिगक धयो तेहता द्रव्यक्षेत्रकाल नियमा
हिंसक थाप. ठे, हे श्री बाहुवामो तुम्हागे भावधर्म तुम्हे

श्री बाहुजिन स्तवन. १०७१ हणता नयी अने पर कोई हणी शके नहीं ए अहिंसकता जे साव्यमां ही ते तुम्हारे नीपनी छे. इतले तुम्हें परम अहिंसक हो अने अहिंसकताना कारण डोजी, ए रीते भाव अहिंसक्ता नीपनी हे. ते अस्तितपणो सर्वनें ध्येय छे. श्री जिनराज तुम्हारे अहिंसकपणो जे जीव अवलंबीने तन्मपी थाये-हनो पोतानो परम अहिंसकरगो नीपजे, ते माडे तुम्हे परम आधार हो. भव्यजीवना परम उपगारी छो, दयाट हो, शरणभूत होजी. ९ एम अहिंसकतामयी, दीठो तुं जिनराज, प्रभुजी; रक्षक निज पर जीवनो, तारण तरण जिहाज, प्रभुजी ॥ बा० ॥१०॥ एम कहतां ए रीते सर्व गुणे सर्व पर्याये उपादानपणे, निमित्ताणे, उपगारीपने, आधारपणे, उपदेशपणे, अतिशयादिक ब्दीकपगे हे वैताग तुम परम दयाल छो. हे प्रभुजी में मिथ्यात्व असंयमनी गताये अनादिकल स्वरूपावृत्तपणे भव भटकतां आत्मधर्म उच्छेदीपणे प्रवर्ततां तुम्ह समान तनी देव पर भावनो अकर्ता अभोक्ता ते किवारे दीटो नहतो. इतके उप- योग गोचर को नहतो. ति हरगां कोइक गिर सरितुपल घोलना न्यायें श्री वीतराग आगन अवग पथार्थ भातक गुरु उपगारे हे जिनराज ताहरो सरूपानंदीगो तदोपका- रीपणो ए अवसरे भासनगोचर थयो ते माहरे आज परम कल्याण धपो. ते मारे श्री जिनराज तुम्हे रक्षक हो. निज कहता स्वधर्मनो तथा कारणपणे परजीवना पिण रक्षक डो. - 4 १०७२ -श्री बाहुजिन स्तवन वे माटे निमित्त कारणने कर्तापणाने आरोपे तारण कहतां परजीवना तारखाना कारण छो. अने पोते तर्या छो. ते माटे जिहाजनी उपमा छे तुम्हने हे देव. १७. परमातम परमेसर, भाव दया दातार, प्रभुजी; सेवो ध्यावो एहने, देवचंद्र सुखकार. प्रभुजी. ॥ वा० ॥ ११ ॥ पूर्णानंदीपणा माटे स्वसत्ता प्रागभाव मा. सकल गुण अनवछिन्न स्वभाव भोगीपों हे प्रभुजी, तुम्हें परमात्मा छो. उत्कृष्ट आत्मा छो. वी समस्त स्वशक्ति गुणपर्याय रूप स्वाधी- नपणामाटे परमेश्वर छो. वळी शुदोपदेशक, तत्वधर्म देश- कपणायी, स्वधर्म राखवारूप भावदयाना दातार छो. एहवा परमात्मा परम पुरुष निरामय, निद्व, निस्संग, निस्सहाय, निर्मल, निःप्रयास, आत्मानंदभोगी श्रीवाहु विहरमान तीर्थंकर मवे सेयो. तेहनी आज्ञा प्रमाणे प्रत्तों, घ्यावो. ते बाद स्वामी स्वरूप संपदा उपकार संपदा अतिशय संपदा मध्ये तन्नय उपयोगी थायो. ए बाहु स्वामी केवा छे. देव ने ध्यार निकायना देवता तेहना चंद्र ने इंद्रादिक तेहने आत्मिक मुखना करणहार है, अयवा स्तुति वर्ता ये देवचंद्र नामे प्रमु गुण रसिक तेहने सुखना करगहार छे, इनले जे निर- मुष्टानपणे श्री वीतराग सेवना करे ते परम अन्याराध मुख घरे, महानंद पामे. निस्संगानंही याये. ए श्री निरसंग श्री पाहुम्वामीनी स्तवना भावदयारूप परम करुणाप कही छे. ११ श्रीमद् देवचंद्रजीना लखेला पत्र. अब बिहारी मुख हे तुम्हारा भाव सुखसाता समाचार हिसाप तो टिसजो, जीम संतोष उपजे. तया कोई कहेस्से ने व्यवहारयी तो सुख हे, निवारे निक्षपी दुःख व्यों पहलो शन्न टिस्पो व्हनो स्पो कारण : विहां उत्तर कहे डे के सातानी कर्मना उदयपी उपन्यो जे सुख ते पर धर्म मारे जावे ए नुसते दुःखरूप हे. उक्तंच साया साया हावं.नहिरहन्मियसुहंजओतणं. देहिदियतुःखं सुख्खं देहिदियाभावो ।। इति वचनात. ते कारने तातावदनीना द- परी अन्पो से तुस ते दुःखरूप हे. साता ते जानानो जे अम्पाबाय गुण हनो रोचक हे, त्या पोइक आचार्य बम्पायने पर्णय प कहे हे ते माटे गुजापनो रोचक के सातवेदनी कर्म देहना उदपपी उदपावलिकाए आन्या जे पुल ते जामानेभोपपने धाप के. मिग निश्पनये पुल्नो भोगनो के भम्पानाने मुक्त नपी. ते स्पाना ने निबर- नर्वे पुल्नो आत्मा अभोगी हे. विचारे कोई कहेले ले अन्ना तो पुनो अभोगी है, तो ए आना पुलभोगी किन थाप छे, अने पुइतनो भोगचो किन करे हे. विहां पहिले जे आमाने विष एक भोग गुरु हे. ते इहां भोग बापाप हेचो. ते भोग गुमः ॐनगर को आवों हे, तो नाम भेद क कहिले. ते भोगांनगर की मन मोहने नाम द य थप ३. विचार स्वगुण भ -- २०७४ श्रीमद् देवचंद्रजीना टखेला पत्र. पर्यायनो अनंतभोग प्रगटे, तिवार इहां कोइ कहेस्ये जे वेरमा गुणस्थानकवत्ती जीवने भोगांतरायने क्षय थावे करी अनंतो स्वगुणपर्यापनो भोग प्रगट्यो छे, अने आहारादि पुदगरनो भोग ते जीव किम करे छे, ते युक्ति खरी कही पिण इस छे जे तेरमा गुणस्थानकवत्तौ जीव पूर्व आहार पर्याप्ति बां- धतां जेतलां पुद्गलनो ग्रहणपणो चांन्यो छे, तेतला पुगल ग्रहे, तिधारे ते आहार पर्याप्ति पुद्गलरूप जे आत्मप्रदेशे संबद्ध छे, ते निजरे तेतलो निरावरण थाय, ते माटे केवली जे आहा. रादिक पुगटनो ग्रहण भोग करे छे तेम ते निर्जराः पिण वांछा भोगपणे नयी. तथा सम्यगहटिनो भोग ते प्रशस्त परि- णामनी प्रवर्तनाए करी निर्जरानो हेतु थाय छे, तो केवली शुं कहिवो. ते माटे स्वगुणपर्यायने भोगववारूप जे भोग गुण ते तो भोगांतरायना क्षययी प्रगटे, अने भोगांतरापनो क्षपा- पशम तो सर्व जीवने सदा पामीये, तिहां भोग गुणनो स्व. माव ए छे जे भोगवयो अने स्वगुण पर्यायनो भोग अनं- तकाल थयां मूली गयो छे, तिवारे पुद्गलानंदी थये छते आत्मा पुद्गलनो भोग भोगवे छे, ते इहां भव्य जीवे स्वआत्मिक अ- नंतोभोग गुरु मुखे सांभली, जाणी, श्रद्धा करी ते भोग अना- दिनो अवराणो जाणी, ते जीव निरावरग करवाने उद्यमी थाय ते इहां शुद्ध निमित्तनी अवलंच नाए शुद्ध उद्यमे आत्मा प्रवर्ती शके अने शुद्ध उद्यमे तथा शुद्र निमित्तनी अवलंबनाने विपे थिर परिणाम तो रहें, जो आत्मा पुद्गलभावयी विरमणपणे करे ते जे पुद्गलयी विरमबु ते संवर कहीये, एहवा भाव संवरने विषे रह्यो छतो स्वगुणपर्यायनो अनुभव प्रवनना करे ते शुद्ध ज्ञान कही ये. अने ते ज्ञान तो प्रवतें जो वीर्यनो सहकार होय वे २ श्रीमद् देवचंदजीना खेला प. ज्ञान प्रवर्तनावरे ने वार्यनो सहकार ते सकाम पंडित वीर्य कही अने ज्ञान स्वपर ज्ञायक होय पिण सदा आत्म प्रदे- शावगाही रहे. इणी रीते स्वगुणने विषे घिरता स्वगुणभोग आस्वादननी रमणता ते भाषचारित्र पहीये. ए रत्नवी जाणी स्वगुण उपादेय करे, परगुण हेयपणे पवते, संसारीभाव ज्ञेयपणे प्रवते. सर्व एकेद्रियादि जीव प्रथम गुणस्थानकवर्ती होप ते उपरे मध्यस्थ अने कारुण्य भावनाए वर्ते. स्वगुण निराबरण धाते हो प्रमोदभावनायें वर्ने, साधी उपरे सा मैत्रीभावना राखे स्वपर औदयिक सन्मुख नहि न दिये, तब श्रद्धा शुद्ध जीवने धर्म ध्यान कहताय तो कहेलोजी, जे जीव शुद्ध प्रवर्तनाए प्रया प्रपत्ते हे, प्रवर्तशे ते जीव धन्प , इम विचाख विण मादकभाव करतो नही. इगीरीते व्यावहारिक सुख छे. भाव सुख तो परिणामनी धारायें होय इति तत्वम् ।। (२) श्री. ॥ स्वस्ति श्री आदिजिनं प्रणम्य । अहम्मदाबादवी पं० ইৰ ডিলিন গীতি লিনাগৰিক মুমাৰিকা जानकीबाई हरपवाई प्रमुख धर्मवरूपत्तचि आत्मा योग्य धर्मलाभ वांजो जी। अब साता है। अहिंसाना स्वरूप तो पूर्व तुम्हने जगाच्या छई अने बी समजवां। मूल अहिना अनुबंध होइ. ते मध्ये उपपोर्गानई भाषयी अनें अन- उपयोगाने की ते को जिहा ने गुण स्थानक ते माफक जाणवी है मददना वितिय अं तेहता कारण आनो लिस्यु को आवान कम दाने अन्न परिणाम {o श्रीमद् देवचंद्रजीना लखेला पर. होई, असाधाण कारण तो अविरति कयाय रागादिक हुई अने निमित्त कारण तो काल स्वभाव निमित्तादिक योग वंचादि बधा हुई, तथा दव्ययी तथा भावी ए कारणनी मिना थाय तेंवारें अनवस्या दोप उपजें, ते मार्टि जीहां अनुपच- रितसइभूत व्यवहारलोप जिहां थाई ते सर्वभावयी उपादान जाणयुं. ए लक्षणमात्रई साधु अने मिहायी उपचरितसदमून व्यवहार ते निमित लक्षणसांघीई । अने जिहां उपचरित असतव्यवहार ते निमित्त लक्षण सावीई, तिहां शुद्ध गुन्द्र तो जोवा पडई, इस सवलें विचारी लिजीई, ए प्रश्ननो उना समुदायमात्र लिख्यो छे, ए गहनार्य छे, बहुश्रुताना अने तुम्हें वली लिस्यु जे ३ अहिंसा जे जे गुणस्थानक माफक जिहां होई तिहां हिंसा हुई किंवा न हुइ, ते तो हिंसा हुई पणि ते निरवद्यरूप छे. आयतिकाले निर्जरा निमित्तंज थाई अने दोपी(ने?) तुं शुभाघव रूप होई । ते सापय निराय कहीई छिं ते मार्टि हिंसा न कहइं सावधभाषाई कहींई अ.पितुं जे दीसई ते प्रसंगमान छे, ते मारि ट्याहारे इंस कहींई निश्चयी अहिंसा छे, ते जाण, तया पंडिनपी उपादान कारण तेहनो क्षयोपशम ते असाधारणकार अने हद प्पाहारनइं गुणोपेत पोग ते निमित्तकारण ए पगि रक्षा सामान्यमानई सबले ठेवां, नया अनुबंध आहिंसा आश्री टिस्यु ते जागय, तेनु नो दम्पयी अनुबंध अहिंसा, ग्रंथी मेहई उपयाम मसाक प्रिने भावयी शायिक ममक्तिीने ते संदर + वमा-प्रत्ययी हेतु अहिंसा श्री प्रसन्न हामं निगम ? वा निहा भावी हेतु, अहिंमा व शब्द त दश म बार श्रीन्द्र देवचंद्रजीना खेला पत्र. १०७७ " तग जय जहिता जानी तो सामान्य तो इंमज गुण- कई जिहां जिहां कल्प लगई रहे ते विण्ये अहिंता तिहां विहां साधीई अतिक्रमादिक ३ लगई भजना एकेकती कहिई जनाकार तो नई नहीं इत्यादि वणो विचार है, तो श्रीपनोविजपानी त नपरहस्य नव्य है, स्पष्टपणे सुदु- दिनई है तो वही कोहक समपे जगाई ते पीडई तथा अनंतनुर आश्री लिन्यु ते तो केवली भगाननें नित्पा- विक पर वर्ग घाइंका ज्ञान १ दर्शन २ समाहित ३ 4 ए स्वाभाविक मनुष्य थयां अनंतने शेष स्पार ना झपन अस्थिति- अपकनिर्वाय अबालिक नस-२ पुरवावगाहना अल्पी-३ अगुलनार ब्रम्प पन्न अविना-४ ९ चतुष्टय स्दिने घर. म सिद्धने नया देईने आपले शोर नहीं न्यूनाविक न्ह पानि तथा बिक्ने जगा आधी लिन हे जा सिने मतिने आपा जगत काता दोष नी. दांप مه श्रीमद् देवचंद्रजीना लखेला पत्र. तुम्ह जेसे ज्ञापक गुणी समझो श्रुतसंतोष । मिल्यां ज्ञान विमणौ वर्षे, लहें ज्ञान भरपोष ॥ ३ ॥ या चित्तसे नित वांचल्यो, श्रीजिनायनमः शुद्ध । स्वामि तुम्ह बलपुरी अह निशि जान विशुद्ध ॥ ४॥ इति लिः पादलीप्ततीये रत्नचंद्रेण । (३) ॥ स्वस्ति श्री आदिजिनं प्रणम्य अहम्मदावादयी पं० देवचंद लिखितं श्री मुरतजिंदरे सुश्राविका जिनागमरुचि बाई जानकीबाई हरपघाई ममुख स्वरूप धर्मरुवि जीव योग्य धर्म- लाभ वांचज्योजी. अब साता छे अपरंच तुम्हे यथार्थ ज्ञानी वीतराग सर्वज्ञ सर्वदशी अरिहंत परमात्मा यै प्रगट कयों सि. छात्माने जे संपूर्ण नीपनो छे, ते सर्व जीवने असंख्यात मदेशे घ्याप्य व्यापकपणे अनादि अनंत संबंध रहोछे, ते स्वभाव- धर्मनी रुचिपणे रह्यो जे धर्म ते आत्मानो अन्वय स्वभाव , सहज अकृत स्वरूप छे, ते उच्छरंग धर्म छे, जाणो देववो ते स्वकार्य छे. तेहनी प्रदति ते सगादिक छे, ते शुद्ध धर्म जेहनें समरणे प्रगट्यो ते देवतल ते संपूर्ण धर्मनी इहा ये संपूर्ण धी सिद्ध परमात्मानो बहुमान करखो ते साधन परि- णतिने संपूर्ण थवाना कारणपणा माटे तेहनें धर्म कही ये. मूल वस्तु धर्मे स्वस्वभाव तेहज धर्म ए श्रद्धा करवी. जे बाय प्रवृत्ति योगनी आचरणी तेहनें धर्म माने तेहना कह्याम सिद्ध ते धर्म रहित थायें, ते मारें कारण ते मूल धर्मयी मिन छ, यद्यपि उपादान कारण आत्मपरिणति छ पिण साधननी रीत श्रीमद् देवचंद्रजीना लखेला पत्र. १०७१ ते सिममानवी तेतलो मे [६] . दशमा गुणाणाना मुनिनें श्री भगवतीसूत्रं उत्सत्तं रियति इम क्यो ठे, तो जे स्वरूपरुचि विना सातादि गारव मारें संयम श्रृताभ्यासने संसार हेतु छे, ए आचारांगे घूताध्ययने चोथे उद्देशे कयो , ते माटें पूरण सिद्धावस्थायें ले तो पामीर्ये ते धर्म जाणो. तेहनी रुचि जे आगम प्रमाणे पोताना प्रागभावी गुण तथा उदीक गुणी अन्यापी करवो ए साधकता है, ते करतां संपूर्ण धर्म प्रगटें तेहनो उद्यम करवो ए सर्व जीवने हित ठे, ए आत्मसत्ता प्रगट करवा माटें परमेश्वर परमपुरुष परमानंदमयी संपूर्ण आ- त्मसत्ताऽभोगी सहज आत्यंतिक एकांतिक ज्ञानानंदभोगी पर- त्मानो बहुमान ध्यान करतो. आत्मिक शक्ति का भोक्ता- दिक कारक चक्र ते विभावरूप कार्य कर्तापणे अयुद्ध संसार कर्तापणे करतां अनंत पुल-परावर्त वही गयां, ते क्षयोप- शमी चेतनादिक दृद्ध निरंजन निरामय निव निष्पन्न पर- मात्मगुणानुयायक. ते स्वरूप प्रगट करवाना कार पछी स्वरूपावलंबी श्या एतलें परम सिद्धताना कारण थायें, ते माटे प्रथम प्रशातालंयी घई स्वरूपाटंबीपणे परगमी स्वरूप निष्पत्ति करवी ए हित जाणवोजी। तथा इन्प साधन ते भावसाधन नो कारण, भावसायन ते संपूर्ण सिद्धनो हेतु हैं, ते रीते प्रज्ञा राखवीजी. पौगालिक भावनो त्याग ते आत्माने स्वस्वरूप प्रगट करवाने परलो ए निमित्तकारण सायन हैं, अने आत्मचेतना आत्मस्वरूपालंयीपणे वरते ते उपादान साधन हैं, वे उपादान शक्ति प्रगट वा माटे सिद्ध बुद्ध अविराम निष्पन्न निर्मल अज सहज अविनाशी अप्रयासी ज्ञानानंद पूर्ण क्षाविक सहज पारिणामिक रनवपीनो पात्र ने थया, ते १०८० श्रीमद् देवचंद्रजीना लखेला पत्र. 'परमात्मा परमेश्वर्यमय तेहनी सेवना के प्रमु बहुमान भासन रमणपणे करवा वर्तमानकालें स्वरूप निर्धार भासनपिण दुर्लभ में, तो स्वरूपनो रमण ते तो श्रेणिप्रतिपन्न जीवनें हुवें संपूर्ण स्वरूपानंदी वीतरागनी भक्तिनें अवलंबने रहबोजी. श्रीआचा- रांगें लोकसाराव्यपर्ने आत्मस्वरूपावलंबी जीव ते साधक छे, वीजा साधक नयी, इम कह्यो छे. ते माटें शुद्ध साव्यरुचि अने यथापणे वस्तु परमार्यज्ञानी कर्मसय करवानो अथीं निस्संग आत्मानो परिणमन ते धर्म तेहना प्राग्भावना अर्थी ते साधक जीव परमसिद्धतानें वरें, एरी प्रतीत रासवीजी. आज्ञा श्री तीर्थकर देवनी ते प्रमाण, साधन रसी गुणी बहुमान स्वतत्व पूर्णताना रसिकपणे वरतज्यो ए तत्त्व छे जी। SEEre E+ समामा 25* -G-*-

श्री महावीर जन्म जयंती गीत पार
१०४६
श्री महावीर जन्म जयंती गीत पारj.
माता निगला अलावे पुत्र पारणे. ए राग.
जाजे महावीर जन्न्या जगमां आनंद आपका,
कोटि चंद्र वजनी झळकी जगमा न्योता
प्रगट्यो त्रप भुवनमां आनंदमय उद्योत,
विरम्या जहकाही पापी पंडित खद्योत.
जा० १
जगमा साविक आनंदना वाया शुभ वापरा,
पाम्पा नारकीओ पण मनमांहि आनंद
रुडा आनंदना बरस्या बहुला शुभ मेहुला,
भारत उदयं हरखे पाप पलायां मंद. जा० २
रुडी सर्व दिशाओ आनंद ओधे नीतरे,
टसोटस देव देवीची भरियु बहु आकाशा
इंझो गाये हरखे ने नाचे इंद्रागिनो,
चांदा जे भाले रूपातम लावात.
जा० ३
हो ने लोकपाल सह गारे वीरनां गीतडां,
विनोकारक प्रभुनो जानीने अहेवाल
प्रभुने मेरुपर न्हवगरे सुरपति भारी,
तडी भान्त बदर प्रगटी मंगलमाल.
जा०४
गहन जाति ही माइन यीज विजयपी,
हास्या व मन्त्री र अवता:
झोना वायां.
न्हाना ? दुई जनदनो नहि पार.
जा० ५
२

१०४२ श्री महावीर जन्म जयंती मीत पारणं.
आ०७
प्रेमे आनंदना श्वासो ले भारत गाजीने,
शांति आनंदना उश्वासो ले नरनार;
हरख्यां विशलामाताने सिद्धारय राजवी,
हरख्या जोपीओ जाणी भारत उद्धार.
आ०६
राजा वैशाली चेटक मनमा आनंदिया,
घरघर आनंद उत्सव वतें जयजयकार;
आखा भारत देशे घरवर पुत्र वधामणां,
प्रगट्यो जगद्गुरु प्रमु महावीरनो अवतार
वीश तीर्थकर भापित चोविशमा जिनपति,
आजे प्रकट्या जाणी सोने थयो निर्धार
माळे वेसी करतां कलोलो सह पंखीओ,
करतां आनंदना नादो तेम पशुओ सार. आ०८
सवळे प्रसिद्ध थइ तेरस महावीरना जन्मयी,
जगमां महावीर तेरस धेरेघेर गवाप;
सोनू रत्न अने रुपा हीराना पारणे,
वीरने झुलावे विशला माता सुखदाप.
आ० ९
विशला बोले मारी कुखे प्रगट्या वीरजिन,
तेथी सतीओमाही थइ प्रथम शिरताज;
म्हारी फूखे आन्पा धर्मोद्वारक राजवी,
रासी भारतजननी धर्मतगी शुभ लाज.
प्रमुनी जमभी जांचे लंगन सिंहनुं शोभर्नु,
प्रमुजी सिंहनी पेठे कगे पराक्रम वेग
दयाना उपदेश निर्दयता राठी विषयी,
टाटो नरनारी पशु पम्धीना सढ रश.
आ० ११
आ० १०

श्री महावीर जन्म जयंती गीत पारणं. १०८३
वीरजिन एक हजार ने लक्षण आठे शोमता,
वी जाण्या चोवीशमा मोटा जिनराज
केशीकुमर मुसयी त्रिशला जाणी गावती,
रुडां हाटरटानां गीतो गुण शिरताज. आ० १२
जगमा जोर प्रगतुं ज्यारे हिंसा पाप,
करतां नरनारीओ हि त्राहि पोकार
जगमां जुल्म घणा ने अंधकार अज्ञाननो,
त्यारे तीर्थकरनो जन्म थाय निर्धार. जा० १३
भारत आर्य देशमां सोनामूरज उगीयो,
आजे जाग्यु भारत सर्व देश गुरुराज
साये जन्म्या ड्क गणधर आदि ऋपियो,
जन्म्या देवी जीवो करवा संचे साज.
आ० १४
रुडं भारतनुं तप फल्युं जिनेश्वर जन्मली,
करवा सर्व वेदनो साचो अर्व प्रकाशा
जन्म्या जाण्या इंद्रादिकना वचने भारते,
पाम्या ऋषि तपस्वी योगीयो ब्लास. जा० १५
वंदीखानेपी छोट्या सवळा बंदिजनो,
भारत देश नगरनां उत्सव बटुटा थाप;
नगरमां नारंभो ठेर टेर दाता घगा,
अमरापुर समुं क्षत्रीकुंड मृत उभराय.
आ० १६
प्रभुने जोदा आवे देवदेवी नरनारीजो,
जोपी जोगीको सटु डोश आवे दोडि
परसे सिद्वारथ पर रंचननी सूत्र कोडी,
मभुनी जगमा जोतां कडे न पानी जोड,
दीरना तेजद के कई न लगना होट- बा. १७

श्री महावीर जन्म जयंती गीत पार[.
आ० २०
प्रभुजी तीर्थ स्थापशे समवसरणमा वेशीने,
करशे केवलज्ञाने सत्य धर्म उपदेश;
गणवर द्वादशांगी गुयाने धर्म वधारशे,
जेयी टळशे आधि व्याधिना सह क्लेश.
आ० १८
महावीर भारत घर घर ज्ञानाम्नि प्रगटावशे,
करशे दुर्गुणोनो बोधयकी संहार
सर्वे आर्यों एक स्वरूपी थइने चालशे,
राजा रंक सकलने सरखा हक निधार. आ०१९
सर्वे आर्यों दुःख बंधनने छेदी नाखशे,
ऊंचा नीचानो रहेशे नहीं मन अहंकार
सहुनो न्याय थशे समभावपणे जग सारीखो,
टळशे हिंसायज्ञो तथा मनुज संहार.
थाशे प्रजासंघनां राज्य अने सुनीतिओ,
रक्तयी खरडाशे नहीं सर्व प्रजानो संघ
राजा रैयत से आत्मरूपयी एक थइ,
करशे अरसपरस साहाय्य धरी मनरंग.
आ० २१
प्रभुजी आत्मज्ञानयी ब्राह्मण मुख्य कहावशे,
क्षत्री बनीने करशे सर्व कर्म संहार;
जगत्मा धर्मशुरानो क्षत्रपायी जणावशे,
अंतर वैश्य बनीने करशे गुण व्यापार.
केवलज्ञानी बनीने सेवा सहनी सारशे,
गामोगाम करीने पादयी विहार
सेवाधर्मतणो फेलाको काशे विश्वमां,
चतुर्विध संघ बनावी करशे जग उदार.
आ० २२
आ० २३

श्री महावीर जन्म जयंती गीत पारणं.
१००५
जा० २४
साची भक्ति साचां कमों ज्ञाने जगाशे,
विचारो आचारोमा घाशे बहु उदार
दयानो फेला करशे भारतमा भाची,
परोवर पंखीजो माला करशे निर्धार.
जीवी रागदेपने दुनिया करशे निर्मली,
आयों जैनो जिनने अनुसरशे दिनरात
ब्राझण आत्मज्ञानीओ बनीने विश्व जगाशे,
नवलं रडं प्रगट्युं भारतनु परभात. जा० २५
चारे वर्गों सविंधन खोनां त्यागशे,
घरोवर आत्मज्ञाननां प्रगटाशे बहुमूत्र
साचा व्याहारो वर्ताशे सावी नीतिदी,
ज्ञानीयो योगी यादो भारत माता पुत्र. जा० २६
परोवर मझभावना एज्ञो शुभ प्रगाशे,
जिनी चोवीशमो महावीरतणो अबतार
भाले भविष्य केशी इंशे ने बद ऋषियो,
एवं सुनाने हरस्पां भारतनां नरनार.
जवी वीर मभुनी अब सुर नर नारायो,
दापों पण भुवनमां जन मनमा आनंद
अगरयो साविक आनंद का न लेक्टोमां,
नाटा मोहरापना तया रक्षा पंद.
जा०२८
र रस महावीर जम बनी दी,
तापति हानीने नदीना :
पोहोर बना.
पारन व हाय. ० २६

०८६ श्री महावीर जन्म जयंती गीत पार[.
क्षत्रीकुंड नगरमा दश दिन उत्सब मांडियो,
प्रमुनां मंदिरोमां पूजाओ बहु थाय;
जमणो जमतां सर्वे जाति नर ने नारीओ,
देवां देशतणां नहिं रहेतां माहोमांझ. आ० ३०
आजे वीर प्रभुनी जन्म जयंती उझवी,
सफळो जन्म थयो ने फळी हृदयनी आश;
भारत ब्रह्मज्ञानयी गुरु बनी सह देशनो,
देशे स्वतंत्रता ने आत्मिक ज्ञान प्रकाश. आ० ३१
गायकवाडी राज्ये नगर पादरा शोभतुं,
जयंती वीर प्रमुनी कीधी हर्षोल्लास;
संवत् ओगणिश पंचोत्तरनी रुडी सालमां,
गावे बुद्धिसागरमूरि ज्ञान प्रकाश.
आ०३२
६

श्री महावीर मभुनुं पारणं.
श्री महावीर प्रभुतुं पारj.
त्रीशला मातानुं गान.
श्री महावीर प्रभुनु हालरहूं.
व्हालो व्हालो हदयनो प्राण. महावीर बालुडो
मारुं सर्व मनोरथ स्थान, महावीर बालुडो,
आंखडी अणीया अमूली, जोतां तृप्ति न थाती रे
नाच नचावे आंख इसारे, निर्मल नेहे सोहाती. म०
ब्रह्मतेज आंखे ऊभरातुं, प्रियजनो झट परखेरे,
आंख उलाळे विश्व उलाळे, सह हरखावी हरखे. म० १
कारमा नयणां लोकोत्तर इयां, कालजडांने कोरे रे,
नाजुक नानुं नाक मजान, उभरे आनन्द डोळे. म. २
दाडमरी सम दांतनी पंक्ति, हंस पंक्ति झट जीते रे
उपमालायक कोड न जगमां, अनुभव रीत प्रतीते. म० ३
हसतां पुष्प खरे ज्यम मोति, हास्य मधुरं सुहातुं रे
सर्व ब्रह्मांडोनी सह लीला, करतुं दील जणातुं. म० ४
कालजर्द्ध हरे कालं बोली, करे तन्मय मन टारी रे
अद्वैत ब्रह्मना मेळे झबोळे, प्रमोदधि अवतारी. म० ५
रक्त कमल अळनाना जेवां, पुनित पगलां भरतोरे;
डगमगु चाली विश्व खेलावे. छातीए बाझी पडतो. म०
उडी आनंदओब उडाडे, खोई पडी शुभ खेले रे
अंगुठो मुखमाही चावी, रमतो नव नव गेडे, म० ७
७
A

१०८०
भी महापौर प्रभु पारण.
.
बाठमभु पारणीए पोटे, हाटरटे दुलरा रे
प्रभुना लक्षण पारणीयामां, दीठां ते गुंजणा.म.
हालो हालो करना हलाये, पण मुगनने प्रेमे ।
अफल अटख लीलामां लगाय, रहेतो जीवन क्षेमे.म९
अनुमत्र रम्मत गम्मत करतो,विध जीवाडी एजीवे रे।
प्रण भुवन अंधार नाई, पुत्र पनोता दी. म. १०
दाल करीने छानी सम्मो, घांपी आनंद पारे
वादिर अंतर बाट प्रभुना, रूपे जग सह नासु मा ११
पग झांझगए जग समकारे, आंगही आगों रे
आनंद तेने देह भरेली, प्रेम तेजे गयी.
म. १२
ममि पटीने गाम जोतो, आंग मीची दहानोरे,
पामे आवी गोळामांयी, कळा करीने खातो. म. १३
मीले मौलाने ले मूलारे, हमे हमारे रमाते रे,
एमपनमयता माटे, राह करे ने दो. मा १४
समीमो आदो काल, अमने, देव नर्गने माटो
जगजीवन जगनाय जीवन मन, देखो ने दिलम्हारी.म. १५
ना ना मंतन ग्रामी, अनुभागने की
तीनमनि मगई, देज म. म. १९
अन्नने अन्दर

श्री महावीर प्रमुर्नु पार.
नाये गये शारे प्रेने, भीती जांख उवाडे र
जोड़ रहे मुजसान धानां. जैन व जगारे. २०१९
म्हाल करीने अंगे वळगे. जो नहीं बनवार
विधानीमा समायोः गुन माता धार. २०२०
कुती सोभा सोपी सारी. सिमी वारी जाउं
मालक गजा आनंद नाजा. गुण केदता हूँ गा.१०२१
आमप्रतियि नित न्हालं. मलके मदन महान
दिलण दिल पम्मानपने मौन ही मनं. २२
नमि न पाम साइ लडा. प्रभ से मुज को है
जन्मनरल भयो पदपन नोजलेले..२३
अकाल अंग जोपासना भाग
दिट गए बाडने तप . . ?
मनोरन र जीवन हाद.२
हारे भन.. :
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दिन:::::

भी महावीर प्रभन पारण.
एनसीने जननी शिरोमणि, विशला मान गणाणी रे।
पण भानमा थइ ई नागी, विशाल प्रमाणी.
अंगारी शक्ति पुराणी, नाम अनेके गाई रे।
सनिया शांति शास महतो, घरवर कानी याद म. ३१
थाल प्रभमां देश देतीमो, मियाण सहू जोगी रे।
बडिमागा वारि जा, अभने पार मोती.
.

पृ. पं. २३ ९ २१ '४० ९ अशुद्धि. शुद्धि शीष्य शिष्य वल्लभ सदनाः वाणि वाणी प्रणमी प्रणमीए रमतापरि रमतापरिणति त्यारे त्यारे पोताना ज्ञानादि अनंतगुण भोगवे छे, ते भोग- लब्धि. ३ उपभोगांतराय कर्म १२ ३ २० ६ क्षय गये घणो ११ ओहो कोइक जीव सह- जयी बोध पाने एटले गुणेकरी गुणे मेद रूपे जाणे जाणे धिराजमान विराजमान कर्ता कर्ता कार्य वि ४६८ ४७० ४७१ ४७२ ४८२ २० ६ ईहा विद मदीन 5 अननमुन्द .. अनतम G༣ག (३४) पृ. पं. 'शुद्धि. लिपत नभ ८ भौ समुद्रं अशुद्धि. अधिपतन भ समुद्र धाउं मृत ग ४९४ ११ टाउ भूत टाउ से ए . २३ ९ ४९५ ४९७ ४९८ हेत सेती विलसे फरस नामी मिथ्याको प्रपंच छाद M " ४९९ ५०० 2. मेती विसंसे फरसे नासी मिथ्याको अछाद दोय उनकट संत इकतीसा कर्म तादातम्यता उद्यम दोप दंसन चान जोय 1 १९ ५०२ ५०५ संत अक्षर विगुण इंद देवीसा २३ १ ५१४ तादात्म्यता उधम सौ करे कर्ममार- हीई आतमा को उद्यम कलो जाय हहत 1 गति परे है -- पं. ५२६ अशुद्धि. मिथ्या दो ५२८ ६ एति. मिच्या दोष टेक, ज्ञानिज की भेद होय नांहि पते पाने पह शत भैया अति कह ग १५ ५५४ उम्प भोज घरनी तापान्य . ५५५ तुज " १८ पारमार्दिक हाप सर्वपा वृतः पन्ने ५५६ देत दे ५६५ २ नि 11912 AM पं. अशुद्धि. शुद्धि. पृ. ५८३ १० ५८५ द्रव्या पद्य तदेव मेष्टन्या अनयी कार्म पज्ज तदव प्येष्टव्या अनंती कार्य " ११ ५८८ ५८९ १ " ये व्याचक्ष्यते पुत्पाद व्यापितं यौ व्याचक्ष्ये घुत्पाद व्यापित्वं ७ विरुद्ध " ५९० ५९१ ५९९ १३ १४ ९ तेथी कवेतां भाष जीना प्रमु शजु निष्प कहेतां भाषा जीनना प्रभु २१ २४ १० म 1 ६०४ करतां केमम २ ४ १५ २ निष्पन्न तेम कहेतां केमन प्रभ भयांसः ६०५ प्रश्न २६०७ मयामः (३७) पं. or wr पृ. ဝင်း ६०९ ६१२ ६१८ ६२६ ६४० ६४८ अशुद्धि. भावयोर्भेद सपज्जावा समह छे शुद्धि. भावयोरमेद सपनवा समूह २२ ३ १४ १३ मथक्त्व प्रभुयी छे, १४ ६६८ ६७१ ६७२ ६७५ १ १ पृथक्त्व प्रभुनी हो, रह्यो गुणस्थाना विम्हओ सुरवटकेतां महा नीपजाव पपत्र वस्तु अतः भोक्तृ अक्रिय द पूर्णम गाईएं गुणस्थना विम्हआ केतां माहा नीपजन पत्यव वस्तुः अती भोर्तृ अक्रिया ५ ६७९ " २३ LY २० ६८६ १८ गाई जिनपान्गत ७०३ १२ . जाती अग्नि पृ. ८ " " ७२५ ७३० २३ २ ६ २ ((३८) अशुद्धि. सन्नपि वचन समयक कार्ययी चिंतां प्रवृत्त ना मेवने मेवन पुरषा तुझा छो, शुद्धि. सन्नपि वचनेना सम्यक् कार्ययी चिंता प्रवर्ते नां मेवने सेवन पुरुषा तुझ छे, FEEEEEEEEEEEE: ७५४ ११ w १६ ६ ४ काइ १३ ७७९ ७८३ प्रकाशे परि प्रकासे पर श्रेष्ट शीघ्य उपझा गुणगुण २० ७८४ २ - शिष्य उवज्झा गुण नहीं प्रभु चं. विभिन्न " २० २२ ७९८ ७९ १६०० प्रमु चं विभन्न १ जा पं. AII.maa २ अगुद्धि. नी अतित मानता, स्वरूप रूचि ननि लो ८२७ ८३२ शुद्धि जी সীন मानता हो, स्वरूप रुचि नमी लोल ४ ५ १३ ८४२ स्वार्य ८४८ ८५१ ८५८ २ ९ स्वार्य सरय अनिनाशी कल्शा घतिने क्षमचं अविनाशी कलशो घातिने क्षनरव स ८६२ ८६९ मन्य ८७२ ८७४ मुहन सय उमझाय गर उन्हाच २ ८७ ८७९ ८८० २६ वरना 5 (.४०) पं. पृ. ८८२ १४ ८८८ २२ शुद्धि. देखें श्रीमजि जनाः ॥८॥ लूण उतारणम् हःपमे प्रमु पाइ ८९३ ८ १२ " २१ अशुद्धि. दो श्रीमजि जनाः उतारणं इसमे प्रमु पई दाइ पाशक तिह मारगमि इम चंझाजी ज गया ग्रहा गृहे ८९४ or पाराफ तिग मारगरसि " १० १५ ९ " " चंद्याजी जगरापा पक्षा मद्दे ॥ ८९७ २ ९ " मन गति प्टो नमन मुग्न टो १ दीन पं. पृ. १ अशुद्धि. शुद्धि. ११ १३ १ साशन निर्वाण तुं शासन निर्वाणं तु प्रभु प्रमु • ९१२ ११ १० २२ . ९९७ आनंत दीत अनंत दित ९२६ निशीये तत्वामृत ९२४ ९२४ नीशिये तत्वाम ए. तोरे॥ भाश तापीत নিময় अनंद २ तोरे मास तापित तिमिर अनंत पुष्प ९२७ १० १२ or-when काउस शानिधि नन अतुं हावीम कासन सानिधि नन अनु डवीन १२ . .. बुडून " पं. १२ ५५२). अशुद्धि. शीर शुद्धि शिश ९५२ १ . " ९५६ २० २ १५ . तणी शुद्वारम मारे। जाणे. नपदार तो केमके गुणोनो " ९ १९ " " तणो शुद्धाव माठे जाण नवदार तां केभके गुणोने पोतानो गुणी मू वाटे पाणी व वागं गे पनि हाभोग परभेटी पोतानो गुणो २१ गु माटे प्राणी पर्यु यारो अने ८ परमेयी गंगोनी (४३) अशुद्धि शुद्धि. ४ . ९ १० ११ सद्गुरु अनुकूल सन्झाय नृपति संती प्रतिष्ठता भीना c ९ १०३२ सहगुरु अनुकुल सज्जाय नृपत्ति संती प्रतिधता पीना पुत्रा बंदण धन भविक जिन ईहां ईक एषामपि ती हज वंदन घन ६ २२ निज इहां इक एषा १९ ९ .. १२ ਵੰਝ परिंदा परन्तक :०४६ अवन्द अवच्छेद परिणाने (४४) पृ. १०४६ ९ १२ २० १९ १०४७ १०४८ १०४९ १०५२ शुद्धि. गुण ज्ञान प्रसिद्ध कहिले एहयी परिणमन केतां गंवहस्ति हेतो वज्झिय विचरतारे अशुद्धि गुणज्ञान पसिद्ध कहिजे एहयी परणमन केतो गंधहस्ति। हेते वझिय विचतारे चंद संडक कारण अनवच्छिन्न w १२ " १०५३ १०५९ " २२ ८ संटईः करण अवच्छिन्न १०७२ or

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Shree Mad Davchand Bhag-2

Author
Budi Sagar Suri
Title
Shree Mad Davchand Bhag-2
File name
Shree Mad Davchand Bhag-2
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/08
Publisher
Badora,steem Press
Language
Sanskrit
Pages
692
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313863
Barcode
99999990311248.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
D9Bw7CToOL3
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