Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
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प्रकाश पागमप्रकाशन ममिति द्वारा त्रिम इन गति से भागमो का प्रसाशन हो रहा है, भाशा है बमसे मी महानुभावों तथा हमारे पयंसहायर मन्जनो को अवश्य सन्तोष होमा । पाचाराग (प्रथम तथा द्वितीय पासरदशाग पीर माताधर्मक्यांग के पश्चात् 'मन्तगहदमाग' पाठको के कर-वमलों में पहुचाया जा रहा है काल बाद हो 'मनुत्तरोववाइय' भी पहुंचने वाला है। इसका मुद्रण लगभग समाप्त हो गया है पौरभ ह तैयार हो जाएगा । भूत्रताय भोर स्थानांगमूत्र मुद्रा के लिए प्रम में दिये जा रहे हैं। समवायाग का चका है, मोर संशोधन हो रहा है। भगवती और प्रज्ञापनामूत्र का अनुवाद हो रहा है। प्रश्नध्याकर पातिक मूत्र का सम्पादन लगभग पूर्ण होने में है। उल्लेख करते हुए प्रतीव प्रसन्नता होती है कि जिनवाणी प्रचार-प्रसार के इस पावन मनुष्ट माज के ज्ञानप्रेमी सम्जनो ने भच्या मनुमोदन किया है और विद्वगं ने भी इसकी मुस्तरठ से प्रशगा। र तक प्राप्त सम्मतियों से---जिनमे से कुछ मुक्ति हो चुकी हैं. यह स्पष्ट है । मन्तगहमूत्र का अनुवाद सुविष्यात विदुषी उगवलकोति स्व. महामती धोउगवलमारी पिप्या तथा भाचार्यसम्राट् राष्ट्रसन्त पदेय श्री मानन्दकृषिजी म. को मानानुत्तिनी विदुषो । मोदिव्यप्रमाजी ने किया है । महामतीजी एम. ए. घोर पी-एच डी. पदवियों से विभूषित हैं। भारी मा जराती है, फिर भी हिन्दी भाषा में यह अनुवाद प्रस्तुत करने मापने हमे जो मून्य महयोग दिया है, उपर पामार प्रकट करने के लिए शरद पर्याप्त नहीं हैं। अन्यमाला के सम्पादक प. श्री गोमाचन्द्र जो भारिल्ल ने को परिभाजित किया है, फिर भी यदि गुजराती भाषा की प्रस्पष्ट मतर नहीं दिखाई दे तो भी मूग म आशय को स्पष्ट करने में बही दुख भी न्यूनता नहीं माने पाई है। पर्याप्त परिश्रम के महामती की किरण को सजनभोग्य और मुन्दर बनाने का सफल प्रयास किया है। परिशिष्ट देने से शोध पर विद्यापियों के लिए भी यह विशेष उपयोगी सिर होगा। हम भागा करते हैं कि अन्य विदुषी महासनि ध्वी श्रीशिव्यप्रभाजी रा अनुसरण करके धागे पाएंगी और इस पवित्र पायोजन में हमे सहयोग प्रदान करें हमारे समाज के विख्यात विमान् तथा मनीषी साहित्यकार श्रीदेवेन्द मुनित्री शास्त्री नै म पा प्रस्तावना लिया है। प्रस्तावना में प्रागमा सागोरांग निदर्शन करा दिया गया है। प्रारम्भ से ही मारा। सहयोग हमें प्राप्त रहा है और पूर्ण विकास है कि वह भविष्य में भी प्राप्त रहेगा। अममम के युवाचार्य सोमः पतिर श्री मधुकर मुनिजी म. रे प्रति हम पाती तनाव करना अपना पतंय समझते है जिनो दिशानिर्देशन मे यह प्रसाशनरायं हो रहा है. ओप्रस्तुत धाम प्रधान सम्पादक है मौर जिनको दूरदगिता और जिनवाणीम के कारण हो मै भी इस मंत्रामा हो सका है। भगवदापी के प्रचार-प्रभार के इस सालिन अनुप्टान में पने महमोगियों में भी हम है। पा. जन बाफरेंग के तपा इस समिति के अध्यक्ष दिवामूत्ति थावरम सेठ मोहनमनगरी मा. पौर श्रीक्वरलाल जो पैताला, यो मूलचन्द जी मुराणा, थी दौरतराज जी पारय, श्री गुमानपत हो यी- स्थानीय को धो सनपद जी मोदी तया स्थानीय मत्री श्रीमान् परिमन जी विनापिया, पं. मोमा भारिल्ल तया थीमुजानमत जो सेटिया मादि का सहयोग विभिन्न सो में हमें प्राण हो रहा है। लम- मामारी है। पुखराज शीगोदिमा जनराज जापाहामा की मापन समिति, मवर (TRITE जैनधर्म, दर्शन व संस्कृति का मूल माघार मर्वन की वाणी है । सर्वज्ञ अर्थात् मात्मद्रष्टा । सम् पारमदर्शन करने वाले हो विश्व रा समग्र दर्शन कर सकते हैं। जो समप्र को जानते हैं, वे ही तत्त्व निरूपण कर सकते हैं । परमहितवर नि यस का यथार्थ उपदेश कर सकते हैं । मझो द्वारा कथित तत्त्वज्ञान, पात्मज्ञान तथा प्राचार-व्यवहार का सम्यक् परिवोध 'मागम' मूत्र के नाम से प्रसिद्ध है। तीर्थकरो की वाणी मुक्त मुमनो को वृष्टि के समान होती है, महान् प्रज्ञावान् गणघर उसे अपित करके व्यवस्थित 'पागम' का रूप दे देते हैं। माज जिमे हम 'मागम' नाम से अभिहित धरते हैं, प्राचीन समय में वे 'गणिपिटक' का 'गणिपिटक' में समग्र द्वादशागी का समावेश हो जाता है। पश्चादवर्ती काल में इसके अग, उपांग, अनेक भेद रिये गये। जब लिखने की परम्परा नहीं थी, तब मागमो को स्मृति के माधार पर या गुरु परम्परा से सुर जाता था। भगवान महावीर के बाद लगभग एक हजार वर्ष तक 'मागम' स्मृतिपरम्परा पर ही चले स्मृति-दुर्बलता, गुरु-परम्परा का विच्छेद तथा मन्य भनेक कारणो से घोरे-धीरे मागम शान लुप्त हो महासरोवर का जल मूपता-मूखता गोस्पद मात्र ही रह गया । तव देवद्धिरण क्षमायमण ने श्रमणों क बुलाकर स्मृतिदीप से लुप्त होते पागम ज्ञान को-जिनवाणी को सुरक्षित रखने के पवित्र उद्देश्य से लिनि मा ऐतिहासिक प्रयास किया और जिनवाणी यो पुस्तकारद करके माने वाली पीढ़ी पर प्रवर्णनीय उपना यह जैन धर्म, दर्शन एवं संस्कृति की धारा को प्रवहमान रखने का अद्भुत उपक्रम था। मागमा का सम्पादन वीर निर्वाण के ९८० या १९३ वर्ष पश्चात् सम्पन हुपा। पुस्तकास्ट होने के बाद जैन मागर्मों का स्वरूप मूल रूप में तो सुरक्षित हो गया, किन्तु कालदो पात्रमण, पान्तरित मतभेद, विग्रह स्मृति-दुर्बलता एवं प्रमाद प्रादि कारणो से प्रागमज्ञान की शुद्ध धा बोध की मम्या गुरुपरम्परा धीरे-धीरे क्षीण होने से नहीं रखो। पागमो के भने महत्वपूर्ण मन्दर्भ, गूढ प्रथं दिन-विच्छिन्न होते चले गए। जो मागम लिखे जाते थे, वे भी पूर्ण शुद्ध नहीं होते थे। उना मर्थ-ज्ञान देने वाले भी विरले हो रहे । अन्य भी अनेक कारणों से प्रागमज्ञान को धारा मनुचित होती गयी विक्रम की होलहवीं शताब्दी में लोकाशाह ने एक आतिकारी प्रपल दिया। प्रागमों के मो प्रथ-शान को निभपित करने का एक साहमिक उपत्रम पुन. चालू हुपा। किन्तु कुछ साल बाद पुन: ध्यवधान पा गए। माम्प्रदायिक देप, संदालिक विग्रह तथा लिपिकारों को भाषाविषयक मरता मा उपलब्धि तथा उनके मम्यक् अर्थबोध में बहुत बड़ा विघ्न बन गए। उनीमवी शताब्दी के प्रथम चरण में जब भायम मुद्रण की परपरा चली तो पाठको को बु हुई । प्रागमो वो प्राचीन टोकाएँ, घणि व नियुक्ति जब प्रमाणित हुई तथा उनके भाधार पर प्रागमों का Listress.sottator Hit Thailankanantic Trart:rmarir | Rammanाम arraimit : Ritu TIMriti aurt. "...::mirmwater! rrivartin Arr. Preet frees Perraran mrit karneri it ani mi nा भA : retrit L 11- ARRitime मुझं माना IrMITTri. irrrrrr REET Earram म मुर्भ Radio farain Rufommarati ment- -भूमि मिधोमरमर
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ममवापाग में इस मागम रे दम प्रध्ययन मोर सात वर्ग बहे हैं।' मन्दोमूत्र मे माठ वर्गों का उल्लेय स्तु दश अध्ययनी का उत्लेख नहीं है। प्राचार्य प्रभयदेव ने रामवायाग वृत्ति मे दोनो भागमो के कपन मंजस्य बिठाने का प्रयास करते हुए लिया है कि प्रथम वर्ग में दश मध्ययन हैं । इस दृष्टि से समयायांग । दश अध्यपन पौर अन्य दो की दृष्टि मे सात वर्ग पहे हैं । नन्दोमूत्र में अध्ययनो का उल्लेख नहीं है. रेवत पाठ वर्ग बनलाये है। परन्तु इस सामंजस्य वा पन्त तक निर्वाह रिस प्रकार हो सकता है ? रामबापांग में अन्ताद्दशा के शिक्षापाल (उद्देशनाल) दश बहे गये हैं जबकि नन्दीमूत्र में उनकी सत्या बताई गई है । समवापाग को वृत्ति में प्राचार्य प्रभयदेव ने लिया है कि उद्देशनवालो के अन्तर का अभिप्राय त नहीं है। पाचार्य जिनदासगणी महत्तर ने मदीणि मे ' और पाचार्य हरिमा ने नदिति में लिया है कि पर्ग के दश मध्ययन होने से प्रस्तुत मागम का नाम अतगडदसामो है। पूणि मे दशा का अर्थ प्रयस्था स्या है। गमवायाग मे दश मध्ययनो का निर्देश है रिन्तु उनके नाम का निर्देश नही है । जरो नमि, मातग, 7, रामगुप्त, गुदर्शन, जमालि, भगाली, विप, चिया और फाल अबापुन । तत्वार्थमूत्र के राजवानिक में एक अनपण्णतो मे दुध पाठभेद के साथ दश नाम प्राप्त होते हैं। जैसे मातग, गोमिल, रामगुप्त, गुदर्शन, यमलोक, वलीक, यवल, पाल पौर अयप्ठपुत्र ।' उममे लिया है कि पापम मे प्रापेक तीर्थंकरो के समय में होने वाले दश-दश भन्तकृत् केवलियो का वर्णन है।" जयपवला में भी इस बात का समर्थन पिया है।"नदीगूत्र मे न तो दश प्रध्ययनों का उल्लेप है मौर के नामों का ही निर्देश है । रामदायाग भौर तत्वार्ययातिक मे जिन नामो का निर्देश हुमा है वह वर्तमान दस अग्झयणा सत्त बग्गा। -ममवायांग प्रशीर्णक, समवाय मूत्र ९६ अठ्ठ वग्गा नदीसूत्र ८८. दम अग्भयण ति प्रयमवर्गापवैयद घटन्ते, नन्द्या तथंव घ्याव्यातत्वात् बच्चे पढपने 'सत्त याग' राि सत् प्रथमवर्गादग्यवर्गापेक्षया यतोऽप्यष्ट वर्गा, नन्यामपि तथा पटितरवात् -समवापांगवृत्ति पत्र ११२. ततो भणित-भट्ठ उद्दे गणवाला इत्यादि, इह प दश उद्देशनवाला प्रधीयन्ते इति नास्याभिप्राय- मवगच्छाम । -गमवायांगवृत्ति, पत्र ११२ पढमवागे दश अग्भपण ति तस्मायनो अतगादा त्ति-नदिगूत्र चूरिणसहित पृ. ६८ प्रयमवर्गे दशाध्ययनाति इति तस्मस्यया पन्तद्दशा इति-नदिमूत्रवृत्तिराहित, पृ. ८३ दगति-प्रवत्था-नदीमूत्र, चूरिणहित पु. ६६. टाण, १०/११३. तरवार्यवार्तिक १/२०.५७३ । ...""इत्येते दश वर्धमानतीर्थकरतीर्थ, एवमपभादीनां त्रयोविंशलेस्तीय वन्येऽन्ये च दश दशानपारा दश दग दापणानुपसर्गानिजित्य कमनत्र मंक्षयादन्तकृत दश मस्या वय॑न्ते इति मन्तबादशा । –तस्वार्यवानिक १२०,पृ.७३. (ए) अंगपणती, ५१. अंनयहदसा गाम अग पग्निहोयमागे दाणे गहिऊण पाहिहेर सरण णिवाण गदै गुदगणादि दग-दग माह निरव परिवदि। .... --पसायपाहा, भा.प.११..
पाली प्रातुन मागम हो रपना बधारमा गली में की गई है. इस गैली को प्राचीन पारिभाषिक शब्दावली मे 'पपानुरोग' कहा जाता है । इगमी में "तेग कालेज तेण ममरण" इम मन्दायली से पया का मारम्भ किया जाता है। मागमो में तापमा, उपासमागि, पनुतरोषपातिा, विशारगूत्र प्रौर पन्तद्दशांग मूत्र का इसी मनी में निर्मायरिया गया है। मधमागधी भाग में गादोरे दो उपाय होते है-परिवगति, परिवमइ, रायवम्णतो, रायवण्ण मो, एमपीमा, एगीगाए । इस पागम में प्रायः स्वरान्तस्प पहर करने को मनी को मानाया गया है। पागमो में प्राप. सक्षिप्तीका रीमंती को पानाते हुए मदान्त में बिन्दुयोजना द्वारा प्रथया अक- पोजना द्वारा पतिट पाठ होगा लेपी प्राचीन ती प्रतित है । मागमोदय ममिति द्वारा प्रकाशित 'पलाइनांग मूत्र' में रमी मंगो मो पातारा गया था, रिन्तु धी प्रमौलप ऋषिजी महाराज स्मारक प्रन्थमाला द्वारा प्राणित पनाहगार मूत्र' में पूर्णपाठ देने से गली को स्वीकार रिया गया है । इस ली मी वाचना में पायल मुविधा रहती है । इमो मुविधा को साय में रखते हुए मूल पाठ को पूर्णरूपेण परत करने की शैली हमें भी प्रानानी पड़ी। हम गूत्र में यथारपान भनेक तो मा वर्णन प्राप्त होता है, मष्टम वर्ग में विशेष रूप से सपो के स्वरूप एर पनि विस्तृत विवेचन किया गया है । इन तमों के अनेकविध स्थापनायाय प्राप्त होते हैं । हमने उन ममत पालना-यत्रीरबलारमक रूप देवर मारक बनाने का प्रयाम पिया है। प्रस्तुत प्राय पोवनशैली परयंत प्यवस्थित है। इसमें प्रत्येर माधक के नगर, उद्यान, चस्म-स्यतरायतन, गा, माता-fran, धर्मावाय, धर्माया, हमोक एवं परमीक पी ऋद्धि, पाणिग्रहण पौर प्रीतिदान, भोगो का परियाग, प्राग्या, दीक्षाराष, अतरहण, सपोपयान, गसपना और पन्त त्रिया या उल्लेग किया गया है। 'पानगरमा गित गाथा पात्रो परिचय मे प्राट होता है हि थमण भगवान महावीर के भासन में विभिन्न जाति एप थेगी के व्यक्तियो को साधना में गमान अधिकार प्राप्त था । एक मोर जहाँ चीमिमो गजात्र-राजगनी भोर गायापनि साधनापथ में पण गे पर मिला पर चल रहे थे, दूमरी पोर वहीं फतिपय उपेक्षित वर्गवारी शुर जातीय भी समम्मान इस माधनाक्षेत्र में पाकर समान रूप से भागे बढ़ रहे थे। वयं को रष्टि से मतिमुन जरो वान मुनि और गजगुकुमार जैसे गज-प्रागाद के दुलारे गिने जाने वाले भी इस क्षेत्र में उतर बा मिति प्राप्त कर गये मन्तगादमा मूत्र के मनन मे जात होता है कि गौतम मादि, १८ मुनियों के समान १२ भिक्षु प्रतिमा एक गुणग्न-गागर ता की गायना से भी गायर वर्म-दाय कर मुक्ति सना है। प्राप्त कर पनी कमेगादि मुनि १४ पूर्व के मान में रमण करते हुए गामान्य से २ यो तपस्या से रमं क्षय कर मुक्ति के अधिकारी बन गए। अर्जुनमाली ने उपशम भाव-दामा की प्रधानता रो केवल छह माम वेले २ को तपस्या कर मिटि प्राप्त कर ली। दूगरी ओर अतिमुम कुमार ने भान-पूर्वक गुण रहन तप को साधना से गिदि मिलाई मोर गजगुकुमाल ने विना शाम पड़े और लम्बे समय तक साधना एव तपस्या लिए बिना ही केवल एक शुद्ध घ्यान के बल से ही मिद्धि प्राप्त परली । इसी प्राट होता है कि ध्यान भी एक बड़ा तप है । काली मादि रानियो ने सयम लेकर कठोर गाधना की और मम् गमय मे मिद्धि मिलाई । म प्रसार कोई गामान्य तप मे, कोई कठोर तप मे, कोई क्षमा की प्रधानना गे तो पोई अन्य देवल प्रारमध्यान की अग्नि में वर्मों को भोक कर सिद्धि के अधिकारी बन गए।
भगवान् अरिष्टनेमि के शासन में यक्षिणी नाम की सानी प्रविनी हुई और भगवान महावीर के शासन मार्या चन्दनवाला प्रतिनी साध्वी थी। शक्षाएं :- इम मूत्र के अध्ययन से मुमुक्षुजनो को ऐमी अनेक अमूल्य शिक्षामो का लाम हो सकता है जिनके द्वारा उनका जीवन प्रादर्श रूप हो जाता है । जैसे- १. धैर्य और रढ़ विश्वास गजमुकुमार की तरह होना चाहिए। २. सहनशक्ति अर्जुन-माली के समान होनी चाहिए। श्रावक लोगो को सुदर्शन श्रमणोपासक का अनुकरण करना चाहिए जिमका प्रात्मतेज देव मी सहन नहीं कर सका। ४. धर्मविश्वास कृष्ण वासुदेव को भाति होना चाहिए । प्रश्नोत्तर को शैली प्रतिमुक्त कुमार के समान होनी चाहिए। ६. त्यागवृत्ति कृष्ण वासुदेव की आठ अग्रमहिपियों की भाति होनी चाहिए। तपश्चर्या महाराजा योपिक की दस देवियों की भाति होनी चाहिए जो पाठवें वर्ग में विस्तार परिणत है । इस प्रकार यह शास्त्र अनेक शिक्षाग्रो से प्रलकृत हो रहा है। जो भव्य प्राणी उक्त शिक्षाम्रो को धारण कर लेता है उसका मनुष्य-जीवन सार्थक और जनता में भादर्श रूप बन जाता है । उपकार:- यद्यपि इस शास्त्र के समुचित सम्पादन में मैं अममर्थ थी तथापि पूज्य गुरुदेव अनुयोगप्रवर्तक श्री कन्हैया. लालजी (कमलमुनिजी) म. सा. की पावन का से, शास्त्र विशारद माणेक कु वरजी म. सा. के शुभाशीप से, प. शोमाचन्द्रजी भारिल्ल को प्राप्रपूरित प्रेरणा से, परम पूज्य ग्रामम-प्रभाकर प्रात्मारामजी म. सा. की तसहायता में और भगिनी साध्वी वा. ब. मुक्तिप्रभाजी म. मा, वा दर्शनप्रभाजी म. सा. और बा. ब. अनुपमाजी के परम सहयोग से श्रमणसघ के युवाचार्य विद्वान मुनि श्री मधुकरजी म मा द्वारा प्रायोजित इस पवित्र अनुष्टान में विचित् योगदान करने में समर्थ हो गई। यतः इन सर्व महाविभूतियो और महानुभावो की महती कृपा, भावना प्रेरणा से पावन बनी हुई मैं मेरे पौर प्रिय पाठकों के संसार का अत करनेवाली पावनी दशा को प्रम्यर्थना के साथ विराम लेती हूँ और प्रमाददश बुद्धियोप या भज्ञानवश हुई त्रुटियों हेतु एतदेवतानो की और मुर्व अतघरो की क्षमा चाहती है। ७. महंडत्मला साध्वी दिन्यप्रभा १९८० जैन उपाश्रय जमनाक्षस मेहता मार्ग, तीनबत्ती वालकेश्वर-६ प्रस्तावना अन्तकृदया : एक अध्ययन - - अतीत के सुनहरे इतिहास के पृष्ठो का जब हम गहराई से मनुशीलन-परिशीलन करते हैं तो यह स्पष्ट परिज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक काल से ही भारतीय तत्त्वचिन्तन दो धारानी में प्रवाहित है, जिसे हम ब्राह्मण सस्कृति भौर श्रमण सस्कृति के नाम से जानने-पहचानते हैं । दोनो ही सस्कृतियों का उद्गमस्थल भारत हो रहा है । यहा को पावन-पुण्य धरा पर दोनो ही सस्कृतिया फलती और फूलती रही हैं। दोनो ही सस्कृतियाँ साथ में रही इमलिये एक सस्कृति की विचारधारा का दूमरी संस्कृति पर प्रभाव पहना स्वाभाविक है, सहज है। दोनों ही सस्कृतियो की मौलिक विचारधारामो में अनेक समानताए होने पर भी दोनो में भिन्नताए भी हैं। ब्राहाण सस्कृति के मूलभूत चिन्तन का स्रोत 'वेद' है । जैन परम्परा के चिन्तन का माद्य सोत "मागम" है। वेद 'नि' के नाम से विश्रत है तो भागम "त" के नाम से । ति मौर श्रत शब्द मे प्रथं की दृष्टि से प्रत्यधिक साम्य है। दोनो का सम्बन्ध "श्रवण" से है । जो सुनने में भाया वह धत हैं।' और वही भावचाचक श्रवण श्रुति है । केवल शब्द श्रवण करना ही धनि भौर शुत का अभीष्ट प्रर्थ नहीं है । उसका तात्पर्यार्थ है-- जो वास्तविक हो, प्रमाणभूत हो, जन-जन के मगल को उदात्त विचारधारा को लिये हुए हो, जो माप्त पुस्यो व सर्वज्ञ-सर्वदर्शी वीतराग महापुरुषो के द्वारा कथित हो वह मागम है, श्रत है, श्रुति है। साधारण व्यक्ति जो राग-द्वेष से सत्रस्त है, उसके वचन थत मोर ध्रुति की कोटि में नहीं पाते हैं । प्राचार्य वादिदेव ने प्रागम की परिभाषा करते हुए लिखा है-माप्त वचनों से मावित होने वाला मयं-सवेदन हो “मागम" है।' क. श्रूपने स्मेति थ नम्। तचायंराजवानिक । प. प्रयते प्रात्मना तदिनि त शब्द' । --विशेषावश्यकभाष्य मलपारीयावृत्ति । २. प्राप्तवचनादाविर्भूतमर्थसवेदनमागम -प्रमाणनयतत्त्वालोक ४१-२ ।
पावात् कुछ अपवादो को छोड़कर श्रत साहित्य में परिवर्तन नही हुमा । वर्तमान में जो भागममाहित्य उप है, उसके मरक्षण का श्रेय देवदिणि धमाधमण को है । यह माधिकार कहा जा सकता है कि वर्तमा उपलब्ध प्रागम-साहित्य को मौलिकता प्रसदिग्ध है। कुछ स्थलो पर भले ही पाठ प्रक्षिण व परिवदित हुए किन्तु उससे पागमो को प्रामाणिकता में कोई अन्तर नहीं पाता । अन्तरद्दशा यह पाठवा अग मूत्र है । प्रस्तुत अग में जन्म मरण पी परम्परा पा मात करने विशिष्ट पवित्र चरित्रात्मानो या वर्णन है और उनके दश मध्ययन होने से इस का नाम पन्तकशा है । समका मूत्र में प्रस्तुत प्रागम के दश अध्ययन मौर सात वर्ग बताये हैं। प्राचार्य देववाचक ने नन्दीमूत्र में पाठ पा उल्लेख किया है पर दश मध्ययनो का नहीं । माचार्य प्रभयदेव ने ममवायांग वृत्ति में दोनो ही उप पागमों के कथन में सामजस्य विटाने का प्रयाम करते हुए लिखा है कि प्रथम वर्ग में दश अध्ययन हैं, इस र गमवायोग गूत्र में दश अध्ययन पोर अन्य वर्गों की अपेक्षा में सात वर्ग रहे हैं। नन्दीमूत्रकार ने मध्यपनी कोई उल्लेघन कर केवल माठ वर्ग बनाये है। पर प्रश्न यह है कि प्रस्तुन मामजम्य मा निर्वाह पन्त तक प्रकार हो सकता है ? क्योकि ममवायाग में ही मन्तरद्दशा के शिकाल (उद्देशनकाल) दा रहे हैं जबकि मूत्र में उनकी मच्या पाठ बनाई है। प्राचार्य मभयदेव ने स्वय यह स्वीकार किया है कि हमे उगनमा भन्तर का मभिप्राय ज्ञात नही है।" प्राचार्य जिनदासगणी महतर ने चणि मे मोर प्राचार्य हरिभा ने नन्दीति" में है कि प्रथम वर्ग के दश मध्ययन होने से इस पागम मा नाम 'मग्नगदशामो है। चूषितार ने दशा का प्रवस्था किया है। यह स्मरण रखना होगा कि समवायाग मे दश प्रध्ययनों का निदंग तो है पर उन प्रध्य के नामो का मकेत नहीं है । स्थानाङ्ग मे दश अध्ययनो के नाम इस प्रकार बताये है-नमि, मानग, गो! रामगुप्त, गुदर्शन, जमालि, भगाली, रिप, चिन्दार, मोर पाल अवरपुत्र।" पाचार्य प्रालंक ने राजवातिक और प्राचार्य शुभचन्द्र ने अगएणति" अन्य में दृध पा के माथ दश नाम दिये हैं। ये इस प्रकार है- नमि, मातग, मोमिप, रामगुप्त, मुदर्शन, यमनौर, पनीर, र पाल पौर अरष्टपुत्र । इममे यह भी लिखा है कि प्रस्तुत भागम में एक ही समय में होने वाले पग- मन्तरत वलियो मा वर्णन है । इस स्थन मा ममर्थन वयवातावार वीरगन और उपमैन ने भी किया है ८. समवायाग प्रकीर्णक समवाय ९६. ९. नन्दी गूत्र ८८. १०. समवायोगवृत्ति पत्र ११२. ११. समवापागवत्ति पत्र ११२. १२. नन्दोमूत्र पूरिणहित पत्र ६८. १२. नन्दी मूत्र यत्ति सहित पत्र १४. नन्दी मूत्र पूणिमाहित ३.६८. १५ स्पाना १०। ११३. १६. तत्वापरावातिर १।२.१.१. १७ अगायलो ५१. १८ एमागरमाग .. १३..
शारर राधारण ने आट गाना में लिया है कि यजुर्वेद में ऋषभदेव, प्रतिनाथ मोर मरिष्टनम इन तीन सीतारोगा उम्मेय पाया जाता है।" सन्दपुराण के प्रभाम यर में एक वर्णन है-पाने जन्म के पिहने भाग में वामन ने सा पिया । उम तारे प्रभाव में गिरने वामन शेदन दिये । वे शिव, पामरणं, अचेल तथा पपामन से मियत में । वामन ने नसरा नाम नेमिनाप रणा। यह नेमिनाथ इम घोर निराल में सब पापो वा नाश करने वाले हैं। उनके दर्शन और सगेसरोही या फल प्राप्त होता है। प्रभामपुराण में भी अरिष्टनेगि यी स्तुति की गई है। महाभारत के अनुशासन पर्व में 'गरः पौरिखनेश्वर' पद पाया है। विनो ने 'शूर: गोरिजिनेश्वर.' मानकर उमरामपं परिष्टनेमि पिया है। लावतार तनीय परिवर्तन में तपागत युद्ध के नामी को मूची दी गई है। उनमें एक नाम "परिष्टनेमि" | गाभव है पहिमा के दिव्य पालोर को जगभगाने के कारण मरिष्टनेमि प्रत्यधिर लोरप्रिय हो गये निमा पारण उनारा नाम इसी नाम-गूची में भी पाया है। प्रशिर इतिहासकार . राय चौधरी ने मरने वैष्णव परगरा के प्राचीन इतिहास में श्रीराको परिष्टनेमि का चचेरा भाई लिया है। कर्नल टॉड ने परिप्टनेमि के सम्बन्ध में लिया है कि मुझे ऐमा ज्ञात होता है कि प्राचीनकाल में पार युद्ध मेधावी महापुपए है. उनमें एक मादिनाय है. दूसरे नेमिनाथ है, नेमिनाथ ही सेन्डोनेषिया निवासियो के प्रथम प्रोडिन तथा पीनिया के प्रथम "फो" देवता था। प्रसिद कोषपार गे. नगेन्द्रनाथ वसु, पुरातत्ववेत्ता राक्टर पुटर, प्रोफेगर बारनेट, मिटर करवा, सटर हरिदत्त, द्वार प्राणनाथ विद्यालाार, प्रभूति भनेर-प्रनेक विद्वानो का स्पष्ट मन्तम है कि भगवान् परिष्टनेमि एक प्रभावशाली पुरुष थे। उन्हें ऐतिहासिक पुरुष मानने में कोई बाधा नहीं है। धान्दोग्योपनिषद् में भगवान् परिष्टनेमि का नाम "घोर मागिरम पि" पाया है, जिन्होंने पीरण को पारमय भी शिक्षा प्रदान की पी। धर्मानन्द गौशाम्बी रा मानना है कि भागिरस भगवान् मरिष्टनेमि माही माम था। प्रागिरग ऋषि ने श्रीकृष्ण से कहा-श्रीरपण जब मानव का अन्त समय सग्निकट पाये, उस समय उगको तीन सातामा स्मरण करना चाहिये- १. व मातमगि-प्रविनश्वर है। २. व प्रग्युतमगि-तएर रम मे रहने वाला है। ३. व प्राणमशिताग-1 प्राणियों का जीवनदाता है। ४०. Indian Philosophy, Vol. I. P. 287. १. सम्पराए प्रभाग याड, ४२. प्रभाग पुगण ४९।५. 1 ४१. महाभारत अनुशासन पर्व म. १४९, तो ५०, ५२ ४४. मामागं प्रयाग, पणित टोडरमल। ४५. बौर धर्म दर्शन, प्राचार्य मरेन्द्रदेव, पृ. १६२. ४६. अन्नग पाफ दी महारपर रिसर्च इन्स्टीट्यूट पत्रिका, जिल्द २३, पृ. १२२ । ४७. भारतीय संसति और महिंगा-पृ. ५७ । ४८. तसंतत् पोर प्रालिमा, कृष्णाय देवकीपुत्रायो वयोवाचाऽपिपासा एव स बभूव, सोऽन्त धेलायामतपय प्रतिपर्धेतासत मस्यच्युतममि प्राणसीति । -छान्दोग्योपनिषद् प्र. ३, पड १८. [२७] - पन्नौ धौ । मुगपाणि पक्ष को यह उपामना करना या । गगृह नगर की सलिना गोष्ठी के छह मस्यों के दा बन्युमनी के परितको प्रष्ट जाने से अर्जुन माती के मन में अन्यन्त रोष पैदा हपा मोर मुद्गरपाणि पक्ष महयोग से उसने उनमा पर दिया । वह हिंगा पा नग्नताशय करने सगा ! प्रतिदिन सात व्यक्तियो को मारता भगवान महावीर रे मागमन पो धरण पर मुदर्शन श्रेप्टो दर्शनापं जाता है। प्रत्रुन को यदा-पाश से मुः परता है और भगवान् के चरणों में पहुचाता है। राह के बाहर यमाविष्ट पर्बुन माली का पावर पा । क्या मजाल कि कोई नगर से बाहर निकल सी हिम्मत गरे ! मगर म. महावीर का पदार्पण होने पर गुदर्शन, माता-पिता के मना करने पर भी रुका नहीं । वह भगवान् रे दर्शनार्थ रवाना होता है। मार्ग में अर्जुन मा सादावार होता है । हिंसा पर हिंसा : विजय होती है। ग वर्णन में यह भी प्रतिपादित पिया गया है कि नामधारी अनेक भवत हो सकते हैं किन्तु सच्चे भव बहुत ही दुर्लभ है। विग रामय पाकाम में उमा-पुमा पर घटाए पायें, उन घटाम्रो को देख कर कोई मोर पहेत हा मय, रव गत पर! भोर पहेगा, यह कभी मभव नही है । जो सच्चा भक्त है, वह समय मा पर प्राणी की बाजी भी लगा देवा है मितु पीछे नही हटता । वह जानता है, विना पग्नि-स्नान किये सुवर्ण निधार नही पाना! बिना घिरी होरे में चमक नहीं पाती । मेरो हो दिना षष्ट पाये भक्ति के रग में भी चमक दमक नहीं पाती। मर्नुन माली श्रमण बनार उग्र माधना परते हैं । जिस के नाम से एक दिन बरे-बड़े वीरो के ५ पनि , हृदय घाते थे, जिसने पांच माह तेरह दिन में ११४१ मानवी की हत्या की थी, वही व्यक्ति न निन्य साधना को स्वीकार करता है, तो उसका जीवन मामूल-चूल परिवर्तित हो जाता है। लोग उन श्रमण प पवन बहार निसार पर है। लाटी, परथर, ईट प्रौर थप्पड़ो से उन्हें प्रताडित परते हैं तथापि उन के म में पात्रोमा नहीं होना ! वह मही चिन्तन करते हैं- समण सजयं दत हणेज कोइ पत्थई। नरिष जीवरम मागुत्ति एव पेहेग्ज सजए । धमा सयन मोर दान्त होता है, वह इन्द्रियोमा दमन करता है । यदि कोई उसे मारता और पीटता तो भी वह जितन करता है कि यह पारमा कभी भी नष्ट होने वाला नहीं है, यह मजर अमर है, शरीर क्षणभग है । उगमा नाश होता है, तो उसमें मेरा क्या जाना है। इस प्रकार ममत्वपूर्षर चिन्तन करते हुए ये भयक उपसों को भी शान्त भाव से राहन करते हैं । अर्जुन अपनी दामामयी उग्र साधना के द्वारा छह माह में ही भो प्राप्त कर लेते है। वर्ग में उग बालमुनि का भी वर्णन है, जिसने छह वर्ष को लघुवप में प्रामा प्रहण भी धी।" ऐतिहागिर प्टि से महायोर के शासन मे राय से लथवय में प्रत्रग्या ग्रहण करने वाला वही एक मुनि है । अन्य ५.. उत्तराध्ययन मूत्र२।२७ ५१. 'युमारगमणे' ति पवर्षजातस्य तस्य प्रवजिनस्वान्, माह घ 'छम्बरिसो पम्वइनो निग्गंध होइऊरण पावयण' ति, एकदेव पाश्चर्यमिह मन्मथा वपर्याप्टकादारान प्रत्रग्या स्यादिति । -भगवती सटीक भा. १.श.५.उ.४, १८६. पत्र २१९-२ [२९] यो हो जाते है । गुग मुविधामो में पलने वाली गुरुमार रानिया राना उप तपाचरण करके पारमा को कुन को तरह पमरा मातो है, यह इन दो वर्षों के मारपन मे स्पष्ट होता है। इन महारानियो रे छुट-पुट जीय प्रगंग पागमा व भागो रे पाख्या-गाहित्य में यत्र-तत्र वियरे पर हैं। विस्तारभय मे हम उन सभी प्रसगो। यहां नहीं दे रहे है। इन महाशनियों ने विभिन्न प्रकार भी कठोर तपश्चर्या को जिमरा उन्लेग इन यो लिया गया है। वन में--मझो गगना-महित प्राय पूर्ण कर निर्वाण को प्राप्त करती है। इम प्रभार लादमाग मूत्र में अनेक प्रकार के माधो पौर माधिकामो की साधना का सत्रीय म है । एक घोर गामार जंगै तरणतायी है, तो दूसरी मोर पनिमुक्त कुमार जैसे अपवयक तेजस्वी श्रमर नमात्र है। सागरी पोर वासुदेव धोरण र मसाट श्रेणिक को महारानियों की औवन-गायाए तर को उगाव पिर विणा रही है । यही पाए है कि पर्युपए के पावन पुग्ध पलो मे स्थानरवासी परम्परा के वा इम पागम मायापन पर है। भगो में यह पाठयां अग है, पाठ वर्षों में विभक्त है । और पपग पर्व मार दिन होने है। माटामोको पारपनिर रूप मे नष्ट करने वाले ९० गानो का पवित्र धरित्र है। पटगोन मिद्धिको प्रदान करने में समर्थ है। समागम गो, पर्युषण के गुनहरे परगर पर पब से वाचने सो परम्परा प्रारम्भ हुई, यह अन्वेषण है। मभव है पोर पोरागाह या उनके पाचात् प्रारम्भ हुई हो । जिम मिमी ने भी यह परम्परा प्रारम्भ कर पासाहम लिया होगा, वह मन ही नेजस्वी व्यक्ति रहा होगा ! पलाशा ग पर मरत में दो पतिया प्राप्त होती है। एक भाचार्य अभयदेव की और एक पाच पामीनार जी महाग की। तीन-चार गुमराती अनुवाद प्रमाणित हुर है और पाच हिन्दी अनुवाद प्राट हुए है इस तरह म पागम के यारह सरसरण प्रभाग में पाये हैं. जो मनुवाद भी मुद्रित हुमा है। परत साग पूर्व गरकरणों की अपेक्षा अपनी कुछ अलग विशेषनाए लिये हुए है। गुरु मूल पाठ प्रपं. पोर पर ना विवेचन है, जो कभा में भाये हुए गम्भीर भावों को व्यक्त मरता है। परिशिष्ट में भार रहस्य पोयत करने के लिये टिषण प्रादि प्रत्यन उपयोगी मामग्री भी दी गई है। इस धागम के सम्पादन का श्रेय है-यहिन साध्वी दिव्यप्रभा जी को जो परमविद्रुपी साध्वीर गावमारी जी की मुशिष्या है। विदुरी महामती श्री उग्ग्वल कुमारी जी एक प्रप्टप्रतिभासम्पन्न सा पी। उनो नाम गे गम्पूर्ण जन गमात्र मनी भाति परिचित हैं। महासती जी की प्रबल प्रतिभा के सदर्शन उन गुनिध्यामी में गहन पगे पिया मरते हैं। प्रस्तुत भागम में महासती श्रोदिय्यप्रभा जी की प्रतिभा को दि विरल विकीन हो हैं । उगा यह प्रयाग प्रशसनीय है । माशा है वे लेपन के क्षेत्र में भागे बदका सरस्वती भागार में दाम पनि गषित करेंगी। जन प्रागम भारतीय गाहिर की अनमोल गपक्ष है, जिस पर जन शामन का भव्य प्रामाद मनात है। उगो प्रकाशन गपादन र सम्बन्ध में विभिन्न स्थानो से प्रयत्न हुए हैं। पर ऐमे सहरणो की प्रपै? चिरकालगे थी जो प्रागम मून हा को इपष्ट र सकें। भागम के व्याम्या-साहित्य मालीक में मार ग्रन्थियो यो पोन गरें। गोष्टि से श्रमणमप ये युवाचार्य श्री मधुरर मुनि जी ने इस महान व को मापन्न करने का एक पगाल पिया, जिरा यो सभी ने मुक्तराष्ट से प्रशमा की। मेरे परम श्रद्धेय रस ५७ देखिएन पागम गाहित्य : मनन और मोगासा-ते. देवेन्द्रमुनि पृ.७१३ [३] विषयानुजग प्रथम यगं विषय पृष्ठ संख्या मायन:रय .... १ गामी पापा .... .... . १८ দিদিমা पर २.1.न:सपुरा मारिमारोंसे सिद्धि .... द्वितीय वर्ग उस २२ गनीमाया গগাস না; এ অব २२ २२ .... तृतीय वर्ग .... २३ .... उन पणोदय: बरनामा पोनिसान २३ ... ... २८ २.१पयन चौरह पूर्व गतम मध्यपन:सारण ... अष्टम भावपन : गगुमार .... .... ३३ ३४ .... .... 164. सपनागपासपण सनगाणादेवीपर में प्रवेश देसी पुन: भागमनी और समाधान गुषों की पहनान देवी की पुराभिलाषा Tण द्वारा बिनानिवारणा उपाय देवी देवीगोपापान ..4 ... ... ४८ THETIFrt... Featute १.inrir Prittarrer Frotein १२२ १२ १५. .... 4. ummitra Reirtnterestaterge Arrangers Sher detert Artemina "Emire यम 2.11 minde १m मारमा .... १४४ #sthn.fi Frtewa THE YHUNT PawaRRRRIrritatnaffarmiream Tantra Hiranfielgifram ... ययनका ... ... Arrafsafm.urmus मनमाना HAIR T Ainmar सन :ोरणा AAPPEARE . AN +10. मन का प्रतिशोध रामह नगर में मानक थायर गुदर्शन थप्टी भ. महावीर का पदार्पण मुदर्शन पा बन्दनार्य गमन गुदगंन रो पर्जुन द्वारा उपमर्म मुदगंन पौर मर्जुन की भगवत्पर्युपामना पर्जुन की प्रग्या परिपह-गहन पौर मिद्धि ४.१४ अप्पपन :सम्पपारिगापापति १५मध्ययन अतिमुत गौतमस्वामी की भिक्षाचर्या और प्रतिमुक्त गौतम और अतिमुक्त का ममागम मनिमुक्ता गौतम ने गाय वन्दनायं गमन अधिमुन मी प्रत्रमा • मिति १५ अध्ययन :मना १२० १२२ १२४ १२५ १३० १३३ .... .... .... सप्तम वर्ग १.१३ अध्ययन :मंदा प्राधि .... १४ अष्टम वर्ग प्रथम अध्ययनासो ... १४६ १४६ .... ... १५४ उमेर पाली भार्या या रत्नावली तर वाली प्रारी प्रतिम गाधना-सिद्धि द्वितीय अध्ययन : गुवासी गुगली का बनरावली तप तृतीय मध्ययन : महापालीका सतिहानियोहित सप धनुर्प मध्ययन प्रणा कृष्णा देवी का महामिहनिष्कौडित तप १५४ .... १५६ .... १५९ .... पंचम अध्ययन : पुषणा गुराणा का भिक्षुपतिमा-पाराधन १६० वष्ठ अध्ययन :महाराणा १६५ १६५ .... सनम अध्ययन महावृषणा या मघुमवतोभद्र ता घोरपणा थोरणाषा महत्गवंतोभद्र तप १६७
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पढमो वग्गो पढमं प्रज्झयणं रोप १-तेणं कालेणं तेणं समएणं चपानामं नयरी। पुण्णभद्दे चेइए-वण्णनो। तेणं कालेणं तेणं उमएणं प्रज्जसुहम्मे समोसरिए । परिसा निग्गया जाव [धम्मो कहियो। परिसा जामेय दिसि उन्मूमा तामेव दिस] पडिगया। तेणं कालेणं तेणं समएणं प्रज्जसुहम्मस्स अंतेवासी प्रज्जजंवू जाव [नामं अणगारे कासवगोत्तेणं सत्तुस्सेहे समचउरंससंठाणसठिए वज्जरिसहणारायसंघयणे कणयपुलयनिह- सपम्हगोरे उग्गतवे दित्तत तत्ततवे महातवे अोराले घोरे घोरगुणे घोरतवस्सी घोरवंमचेरवासी उच्दसरीरे सखित्तविउलतेयलेस्मे प्रज्जसुहम्मस्स परस्स प्रदूरसामंते उड्ढंजाणू अहोसिरे झाणकोट्ठो- बगए सजमेणं तवसा अप्पाणं मावेमाणे विहरइ । तए णं से प्रज्जजंयू नामं प्रणगारे जायसड्ढे जायसंसए जायकोउहल्ले, संजायसड्ढे संजाय- संसए संजायकोउहल्ले, उत्पन्नसड्ढे, उप्पन्नसंसए, उप्पन्नकोउहल्ले, समुत्पत्तसड्ढे, समुप्पानसंसए, समुप्पान- कोउहल्ले उट्ठाए उट्ठति । ट्ठाए उद्वित्ता जेणामेव प्रज्मसुहम्मे परे तेणामेय उवागच्छति । उवागयित्ता प्रज्जसुहम्मे येरे तिवखुत्तो प्रायाहिणपयाहिणं करेइ । करेता वंदति नमसति, वंदित्ता नमंसित्ता प्रज्जसुहम्मस्स परस्स पच्चासन्ने नातिदूरे सुस्सूसमाणे णमंसमाणे अमिमुहं पंजलिउडे विणएणं] पज्जुषासमाणे एवं वयासी- उस काल और उस समय मे चपा नाम की नगरी थी। उसके बाहर पूर्णभद्र नामक यक्ष- मन्दिर था। उस काल और उम समय में आर्य सुधर्मा स्वामी चपा नगरी मे पधारे। नगर-निवामी जन धर्म-देशना श्रवणार्थ नगर में निकले । यावत् प्रायं मुधर्मा स्वामी ने धर्म-देशना दी । (धर्म- कथन मुनकर) जनता जिम दिशा से आई यो उम दिशा मे] वापस लौटी । उस काल और उम समय में प्रार्य मुधर्मा स्वामी के प्रार्य जवू [नाम के अनगार (शिप्य) थे। उनका काम्यप गोत्र था । उनका भरीर मात हाय ऊँचा था। उनका संस्थान समचतुरस्र-ममचौरम था। उनका सहनन वन-ऋषभ- नाराच था। कमोटी पर खीची हुई सोने को रेखा के ममान तथा कमल को केमर के समान वे गौरवणं थे । वे उन नपस्वी, दीप्त तपस्वी, तप्त तपस्वी, महातपस्वी, उदार, कर्मगथुनी के लिए घोर, घोर गुणवाले, घोर तपस्वी, धोर ब्रह्मचर्य का पालन करनेवाले, प्रतएव मरोर-सस्कार के स्यागी थे। दूर-दूर तक फैलने वाली विपुल तेजोलेश्या को उन्होंने अपने शरीर में मक्षिप्त कर रखी थी। वे जम्बू स्वामी, आर्य मुधर्मा स्वामी के न बहुत दूर और न बहुत नजदीक, ऊबंजानु और अघ.शिर होकर अर्थात् दोनो घुटनों को खड़े करके एवं गिर को नीचे की तरफ झुकावर ध्यानरूपी कोष्ठक मे प्रविष्ट होकर सयम और तप मे अपनी आत्मा को भावित करते विचरते थे। तत्पश्चात् पार्म जवूनामक अनगार को तत्त्व के विषय में श्रद्धा (निझामा) हुई, माय हुमा, कुतूहल हुमा, विशेष रूप से श्रद्धा हुई, विशेष रूप मे मशय हुमा और दिगm m . - प्रथम वर्ग] [: योधन है । यहाँ पर उग "काल" का यह भयं हुआ कि इस अवपिणीके चतुयं पारे में इस पागा से वाचना दी गई थी। परन्तु दगगे यह स्पष्ट नहीं कि चतुर्थ पारे में किम ममय वाचना दी गई थी? क्योंकि चतुर्य प्राग ४२ हजार वर्ष कम कोटा-कोटी गागरोपम का है । अत इस बात को "तेप ममाण" ये पद देकर स्पष्ट किया है । उग ममय का यह अर्थ है कि जिम गमय प्रायं मुधर्मा स्वाम विसरण करते हुए पपा नगरी में पधारे, उम ममय उन्होंने जम्बू म्वामी को प्रस्तुत पागम की वाचन दी। इगगे यह ध्वनित होता है कि प्रस्तुत ग्रागम को वाचना भगवान् महावीर के निर्वाण के बाद दो गई थी । वृत्ति में प्रमयदेव मूरिजी ने काल में प्रवपिणी का चतुषं विभाग प्रर्थान् चौथा प्रार पौर 'गमान' या विशेष बाल अर्थ किया है। गो. परनान् यह बनाया गया है कि उम कान और उम ममय में प्रार्य मुधर्मा म्वामी चपा नगरी में पधारे पौर नगरी के बाहर पूर्णभद्र चरस में टहरे । उनको शरीर-मपदा, उनके कुल एवं उनके गुणों का वर्णन प्रस्तुत प्रागम में नहीं दिया गया है, क्योंकि नायाधम्माहामो में इसका विम्नार में वर्णन लिया गया है । पन. यहाँ केवल मकेत कर दिया है । इसमें यह स्पष्ट होता है कि प्रस्तुत पागम के प्रतिपादक भगवान् महावीर के पचम गणधर एव प्रथम पट्टधर पायं गुधर्मा स्वामी थे और उनके शिष्य पार्य जम्बू स्वामी प्रश्न-कर्ता थे। प्रस्तुत विवरण मे ऐगा प्रश्न होता है कि प्रायं मुधर्मा स्वामी का विवरण प्रस्तुत करनेवाले उन्दोष-उपाधान के कर्ता कोन हैं ? गका समाधान यह है कि जंगे मुधर्मा स्वामी ने गौनमादि गगाधरी का उलय दिया है, उगी तरह पायं जवू स्वामी के बाद होनेवाले प्रभवादि प्राचार्यों ने इम उत्ोष में प्राय मुधर्मा ग्यामी का वर्णन किया है । प्रत ऐमा ही परिलक्षित होता है कि हम उपोद्घात के कर्ता प्राचार्य प्रभवादि ही हो । इंग प्रार "तेण गमएण" शब्द का उपलक्षण-अर्थ यह होता है कि-चतुर्थ प्रारक के अनलर पायं मुधर्मा म्वामी चपा नगरी में पधारे और चपा नगरी के बाहर पूर्णभद्रनामक चंत्य में टहरे । उनी प्रागमन का गुभ-गदेश मुनकर नागरिक उनके दर्शनार्थ पाए और धर्मोपदेश सुनकर यापम मोट गये। उस समय उनके शिष्य प्राय जयू स्वामी विनय-भक्ति एव श्रद्धापूर्वक उनके चरणों मे उपस्थित होकर विनन गन्दी में बोले । क्या वोले, यह आगे कहा जाएगा। प्रस्तुत गूत्र में मूत्रर्ता में वर्णन-क्षेत्र एव वर्णन-कर्ता आदि के नाम का उल्लेख मात्र किया है । वर्णन-स्थान एवं वर्णन गनों के सम्पूर्ण स्वम्प को जानने के लिये अन्य प्रागमो को देखने का गर्कन पर दिया है । मन नपा नगगे एव उममे रहे हुए पूर्णभद्र चैत्य का वर्णन एव उसमे पधारे हुए प्रायं गुधर्मा स्यामी के जीवन परिचय से लेकर परिषद् के पावागमन तक का वर्णन मोपपातिक पादि पागमो मे जानना चाहिए। उम मे चपा नगगे एव पूर्णभद्र चत्य का विस्तार में वर्णन किया गया है ।ग स्थानो पर इन वणित विषयों का समूचक शब्द है-"वण्णयो।" 'यण मो' यह पद वर्णक का बोधक है। वर्णन करनेवाला प्रकरण वर्णक शब्द से व्यवहत रिया जाता है। आगे जहाँ-जहाँ जिग पद के प्रागे वर्णक पद का उल्लेख मिले, वहां-वहाँ पर उस पद से गगूचित पदार्थ का वर्णन करनेवाले पाठ की पोर मंकेत रहेगा। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि प्रागमो में अंग मूत्रो का ही स्थान प्रमुख होने पर भी यहाँ अंग मूत्रों में गिन पाठों के लिए पाटको को अगवाह्य आगमो पर क्यो अवलवित किया जाता है ? 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[ प्रथम वर्ग] पार्य मुधर्मा स्वामी बोले-"जम्बू ! श्रमण भगवान् ने अष्टम अन्नद्दशाग के पाठ प्रतिपादन किए हैं।" विवेषन-प्रागम-गरिपाटी के पर्यवलोपन से यह स्पष्ट होता है कि मर्व प्रागम प्रार्य के स्वामी और मार्य मुधर्मा म्वामी के प्रश्नोत्तर रूप है । प्राय जवू स्वामी प्रश्न करते हैं और न गुधर्मा म्यामी उगका उत्तर देते हैं । यही प्रश्नोतर माज हमारे सामने प्रागमो के रूप में दिखाई है । दमयी स्पष्टता प्रस्तुत मूत्र में भलाती है । अन्नानाग मूत्र का शुभारभ इस प्रकार के प्रश्नो में ही होना है। इन मूत्र में प्रश्नोतर द्वारा पार्य जवू स्वामी ने प्रप्टम अन्नद्दगाग पागम के श्रवर वर्णन वो जिनामा प्रस्तुत की है। वस्नुन. भागमा के तीन प्रकार है-(१) पारमागम, (२) अनन्तरागम में (३) परंपरागम'। गुरजनों के उपदेश दिना म्वयमेव पागमो का ज्ञान होना प्रात्मागम कहलाता है। तीर्थव परमारमा के लिये अर्थागम प्रारमागम स्प हैं पौर गणधरो के लिये मूभागम पारमागमरूप है (मूलरूप पागम वो मूत्रागम, मूत्र के मयं म्प मागम को अर्थागम मौर मूत्र और भयं उभयस्प पार को तदुभयागम कहते हैं)। स्वयं प्रात्मागमधारी पुरा से प्राप्त होने याला मागममान अनन्तरागम कहा गया है गणधर भगवान् के लिये प्रर्थागम अनन्नरागम रूप है । तथा जवू स्वामी प्रादि गणधर-गियो लिये गूत्रागम अनन्तरागमारूप है। प्रात्मागमधारी महापुरुष से प्राप्त न होकर जो प्रागम-ज्ञान उनके गिप्य-प्रशिप्य आदि । परम्परा मे प्राप्त होता है, वह परम्परागम कहा जाता है। जमे जवू स्वामी प्रादि गगधरशिष के लिये अर्थागम परम्परा रूप है । तथा इन के बाद के गमी गाधको के लिये मूत्र एव प्रथं दो प्रकार के पागम परम्परागम हैं। प्रतः यह स्पष्ट ही है कि प्रस्तुत अन्तमाग गूत्र अयं को दृष्टि से तीर्थकर परमात्मा के लि पान्मागम है, गणधरी के लिये अनन्नरागम है और गणधर-शिष्यो के लिये परम्परागम है । इन प्रकार यह पागम मूत्र की दृष्टि मे गणधरो के लिये प्रात्मागम, गणधर-गिप्यो के लिये अनन्तराग और गगाधर-प्रमियों के लिये परम्पगगम है। अर्थप गे पागमो का प्रतिपादन तीर्थकर परमात्मा करते हैं, गणधर उन्हे सूत्र रूप गूयते हैं । वस्तुतः गणधर भगवान् तीर्थकर परमात्मा से प्राप्त किए हुए पदार्य के प्रचारक म्वयं उमके द्रष्टा या सप्टा नहीं है । प्रस्तुत मूत्र में बनाया गया है कि प्रायं मुधर्मा ने जवू अनगार से कहा है जवू ! भगवा महावीर ने अन्तगढ मूत्र के पाट वगं प्रतिपादन किये हैं । इम मूत्र में प्रयुक्त “यग्गा" गन्द वर्ग का वोधक है । वर्ग का अर्थ होता है शास्त्र का ए विभाग, प्रकरण या अध्ययनों का गमूह । आर्य मुधर्मा म्वामी के प्रस्तुत विचारों को जानकर आर्य जबू स्वामी ने जो निवेदन प्रस्तु किया वह अब तृतीय गूत्र में दर्शाया जाता है- पोरदार प्रसार विजयस प्रथम वगं] [६ गौतम ५-"एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवई नाम नपरो होत्या । दुवालसजोयणा- यामा, नव-जोयण-वित्यिण्णा, घणवइ-मइ-निम्माया, चामीकर-पागारा, नानामणि-पंचवण्ण-कविसीसग- महिया, सुरम्मा, मलकापुरी-संकासा, पदिय-पक्कोलिया पच्चक्खं देवलोगभूया पासादीया दरिसणिज्जा अभिस्वा पडिहवा। तोसे गं बारधईए पपरोए बहिया उतरपुरस्थिमे दिसीभाए एस्य गं रेवयए नाम पवए होत्था । तत्य णं रेवयए पव्वए नंदणवणे नामं उज्जाणे होत्या। पण्णो । सुरप्पिए नाम जवखायतणे होत्या, पोराणे, से णं एगेणं यणसंडणं सवप्रो समंता संपरिरिखत, प्रसोगवरपायवे।" (मार्य मुधर्मा म्वामी जवू अनगार के प्रश्न का उत्तर देते हुए बोले-) "जबू! उम काल और उस समय मे द्वारका नाम की एक नगरी थी। वह वारह योजन लम्बी, नौ योजन चौडी, वंचमण देव कुबेर के कोगल से निर्मित, स्वर्ण-प्राकारी (कोटो) से युक्त, पचवर्ण के मणियो से जटिन कगूरों से सुशोभित थी और कुबेर की नगरी अलकापुरी मदृश प्रतीत होती थी। प्रमोद और कोटा का स्थान थी, माक्षात् देवलोक के ममान देखने योग्य, चित्त को प्रसन्न करने वाली, दर्शनीय थी, अभिरूप थी, प्रतिरूप थी। उस द्वारका नगरी के बाहिर ईशान कोण में रैवतक नाम का पवंत था । उस रैवतक पर्यन पर नन्दनवन नाम का एक उद्यान था। उस उद्यान का वर्णन प्रोपपातिकसूत्र के वन-वर्णन के समान जान लेना चाहिए। वहाँ सुरप्रियनामक यक्ष का एक मदिर था, वह बहुत प्राचीन था और चारों ओर से अनेकविध वृक्षममुदाय मे युक्त वनखड से घिरा हुआ था। उस वनवड के मध्य में एक मुन्दर अशोक वृक्ष था।" विवेचन-"वारवई"-इम पद का सस्कृतरूप द्वारवती होता है। यह कृष्ण महाराज की नगरी का नाम है । वैदिक परपरा मैं इसी को द्वारका कहते है। इस प्रकार द्वारवती तथा द्वारका ये दोनों शब्द एक ही नगरी के बोधक हैं। इस मूत्र के अनुसार द्वारका नगरी "दुवालमजोयणायामा (द्वादशयोजनायामा) अर्थात् वारह योजन लम्बी थी। प्रस्तुन में योजन का माप "प्रात्मांगुल" में करना है। जिस काल में जो मनुष्य होते हैं उनके अपने अंगुल को प्रात्मागुल कहते हैं । ६६ अगुल का एक धनुष होता है और दो हजार धनुषो का एक कोम, तथा चार कोस का एक योजन होता है। इस तरह द्वारका नगरी की लम्बाई ४८ कोस को थी। ४८ कोम जितने लम्बे विशाल क्षेत्र में द्वारका नगरी को बसाया गया था। 'धरणवइ-मइ-निम्माया' अर्थात्-जिस नगरी का निर्माण कुवेर की बुद्धि द्वारा हुमा, उमे धनपतिमति-निर्माता कहते हैं । प्रश्न होता है कि क्या मत्यलोक में कोई देव कुवेरादि नगरी का निर्माण करने पाते है ? इसका समाधान एक रहस्य में है-"जब यादव जरासंध प्रतिवामुदेव के पातक से पातंक्ति हो गए और शोयंपुर को छोड़कर समुद्र के समीप सौराष्ट्र में पहुँचे, तब नगरी के योग्य तथा मुरक्षित स्थान देखकर कृष्ण महाराज ने वहां अट्ठम तप किया, धनपति बंधमरण का पाराधन किया।
प्रथम वर्ग] [. गौतम ५--"एवं खतु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं बारवई नाम नमरी होत्या। दुवातसजोयणा. यामा, नव-जोयण-विरियाणा, धणवइ-मइ-निम्माया, चामीकर-पागारा, नानामणि-पंचवण्ण-कवितीसग- मंडिया, सुरम्मा, मलकापुरी-संकासा, पदिय-पक्कोलिया पच्चरखं देवलोगभूया पासादीया दरिसणिज्जा अभिरूवा पडिरूवा। तोसे णं बारधईए गयरीए बहिया उत्तरपुरत्यिमे दिसोभाए एत्य पं रेवयए नामं पटवए होत्या । तत्य णं रेवपए पध्वए नंदणधणे नामं उज्जाणे होत्या । षण्णभो । सुरप्पिए नामं जक्खायतणे होत्या, पोराणे, से णं एगेण वर्णसंडेणं सवप्रो समंता संपरिविक्षत, प्रसोगवरपायवे ।" (प्रार्य सुधर्मा स्वामी जवू अनगार के प्रश्न का उत्तर देते हुए बोले-) "जवू ! उम काल और उस समय में द्वारका नाम की एक नगरी थी। वह धारह योजन लम्बी, नौ योजन पौडी, वैश्रमण देव कुबेर के कौगल मे निर्मित, स्वर्ण-प्राकारो (कोटो) मे युक्त, पचवर्ण के भरिणयों में जटिन पगूरों से सुशोभित थी और कुवेर को नगरी अलकापुरी मदृश प्रतीत होती थी। प्रमोद और गोडा का स्थान थी, माक्षात् देवलोक के समान देखने योग्य, चित्त को प्रसन्न करने वाली, दर्शनीय थी, अभिरूप थी, प्रतिरूप थी। उम द्वारका नगरी के बाहिर ईशान कोण मे रैवतक नाम का पर्वत था । उरा रेवतक पर्वत पर नन्दनवन नाम का एक उद्यान था। उस उद्यान का वर्णन प्रोपपातिकसूत्र के वन-वर्णन के ममान जान लेना चाहिए। वहां सुरप्रियनामक यक्ष का एक मदिर था, वह बहुत प्राचीन था और चारो ओर से अनेकविध वृक्षसमुदाय मे युक्त वनखड से घिरा हुआ था। उम बनयंड के मध्य में एक सुन्दर अशोक वृक्ष था।" विवेचन-"वारवई"-इम पद का सस्कृतरूप द्वारवती होता है । यह वृष्ण महाराज की नगरी का नाम है । वैदिक परंपरा में इमी को द्वारका कहते हैं । इस प्रकार द्वारवती तया द्वारवा ये दोनो शब्द एक ही नगरी के बोधक हैं। इस मूत्र के अनुमार द्वारका नगरी "दुवालमजोयणायामा (दादायोजनायामा) पर्यान् वारह योजन लम्बी थी। प्रस्तुत में योजन का माप "प्रारमागुल" मे करना है। जिम काल में जो मनुष्य होते हैं उनके अपने अंगुल को प्रात्मागुल कहते हैं। ६६ अगुल का एक धनुष होता है और दो हजार धनुषो का एक कोस, तथा चार कोस का एक योजन होता है। इस तरह द्वारा नगरी को लम्बाई ४८ कोस को यो । ४० कोम जितने लम्बे विशाल क्षेत्र में द्वारका नगरी को बसाया गया था। 'धरणवइ-मइ-निम्माया' प्रर्यात्-जिम नगरी का निर्माण कुबेर को बुद्धि द्वारा हमा, उमे धनपतिमति निर्माता कहते हैं। प्रश्न होता है कि क्या मत्यंलोक में कोई देव कुबेरादि नगरी का निर्माण करने पाते हैं ? इमका समाधान एक रहस्य में है--"जब यादव जरामन प्रतिवामुइव के मानक मे प्रातरित हो गए और शौर्यपुर को छोड़कर ममुद्र के समीप सौराष्ट्र मे पहुँचे, तब नगरी के योग्य तथा सुरक्षित स्थान देखकर कृष्ण महाराज ने वहाँ मट्टम तप किया, धनपति वंश्रमण का पाराधन दिया।
प्रथम वर्ग] [११ कौटुम्बिक, इभ्य, श्रेप्टी, मेनापति], सार्थवाह-इन मव पर तथा द्वारका एव प्राधे भारतवर्ष पर आधिपत्य यावन् [पुरोवनित्व (प्रागेवानी), भर्तृत्त्व (पोपकना), स्वामित्व, महत्तरत्व (बडप्पन) और अाज्ञाकारक सेनापतित्त्व करते हुए-पालन करते हुए, कया-नृत्य, गीतिनाट्य, वाद्य, वीणा, करताल, नूर्य, मृदंग को कुशल पुरुषो के द्वारा बनाये जाने में उठनेवाली महाध्वनि के साथ विपुल भोगों को भोगते हुए] विचरते थे। विवेचन-प्रस्तुत मूत्र में द्वारकाधीश कृष्ण महाराज के राज्य-वैभव का वर्णन किया गया है। इम वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि महाराज कृष्ण को राजधानी में राजयोग्य सभी वस्तुएं उपलब्ध थी और इनका राज्य आर्थिक, सामाजिक, मैनिक मभी दृष्टियों से सम्पन्न था। 'दमहं दमाराणं' इन पदों की व्याख्या करते हुए वृत्तिकार अभयदेवमूरि कहते हैं- 'ममुद्रविनयोक्षोभ्यस्तिमित. मागरस्तया। हिमवानचलरचव, धरण पूरणस्तथा ॥ १॥ अभिचन्द्रश्च नवमो, वसुदेवश्च वीर्यवान् । वसुदेवानुजे कन्ये, कुन्ती मद्री च विथ ते ॥२॥ दश च तेहश्चि-पूज्याः इति दशाहो.।' अर्थात्-कृष्ण महाराज के पिता वमुदेव दम भाई थे। (१) समुद्रविजय, (२) अक्षोभ्य, (३) स्तिमित, (४) सागर, (५) हिमवान्, (६) अचल, (७) धरण, (८) पूरण, (६) अभिचन्द्र, (१०) वसुदेव । ये दसों वडे वली थे। समुद्रविजय इनमें सबसे बड़े थे और वसुदेव सबसे छोटे । इन के कुन्ती और माद्री ये दोनों बहिनें थी। 'पजुण्णपामोक्साणं अघुट्ठाण कुमारकोडीण' अर्थात् माडे तीन करोड कुमार थे और इन मे प्रद्य म्न प्रमुख थे। यहाँ एक प्रश्न हो सकता है कि कुमारो की इतनी बड़ी मस्या क्या द्वारका नगरी में ही विद्यमान थी ? या कुछ राजकुमार द्वारका में और कुछ द्वारका से बाहर रहते थे। इसका ममाधान यह है कि सूत्रकार ने कुमारों को जो संख्या बतलाई है, वह केवल द्वारकानिवासी राजकुमारी की नहीं, प्रत्युत यह सभी राजकुमारों की है। महाराज कृष्ण के समस्त राज्य में इनका निवास था। उम ममय कृप्य महाराज का राज्य वैताड्य पर्वत तक फैला हुआ पा, अन. कुमारी को उक्त सख्या भारत वर्ष के तीनों मडो में निवास करती थी। मूत्रकार ने प्रागे चलकर 'उग्गसैणपामोक्खाणं सोलमण्हं रायमाहस्मीण' ये पद दिये हैं । इनका अर्थ है-मोलह हजार राजा थे, इनके प्रमुख महाराज उग्रसेन थे। इन के राज्य भी तीनों संडी में ये और तीनो सडो में इनका निवास था। सूत्रकार ने कुमारों को, राजाओं की तथा अन्य लोगों को संख्या का जो निर्देग किया है इसके पोछे यही भावना है कि कृष्ण महाराज के राज्य में ये सब लोग रहते थे और इन सब पर कृष्ण महाराज राज्य करते थे। जिस प्रकार आजकल जनगणना द्वारा जनता को मस्या का पता लगाया जाता है और देश के निवासियों को जाति, धर्म और भापा आदि का वोध प्राप्त किया जाता है, ठीक इसी प्रकार उस समय वासुदेव कृष्ण के राज्य में कितने कुमार ये ? कितने राजा थे? कितना सैनिक - प्रथम वर्ग] [१३ सुमिणदंसण-कहणा, जम्मं बालत्तणं कलामो य । जोवण-पाणिग्गहणं, कपणा वासा य मोगा य॥' नवरं गोयमो अट्टहं रायवरकण्णाणं एगदिवसेणं पाणि गेल्हार्वेति, मट्ठओ दामो। उम द्वारका नगरी में अन्धकवृष्णि नाम का राजा निवास करता था। वह हिमवान् - हिमालय पर्वत को तरह महान् था। (उमकी ऋद्धि-समृद्धि का वर्णन औपपातिक मूत्र में किया गया है।) अन्धकवृष्णि राजा को धारिणी नाम की रानी थी। कभी किमी समय वह धारिणी रानी अन्यत्र वरिणत (पुण्यवान् जन के योग्य) उत्तम शय्या पर शयन कर रही थी, जिमका वर्णन महावल (के प्रकरण में वरिणत भय्या के) समान समझ लेना चाहिये । तत्पश्चात्- स्वप्न-दर्शन, पुत्रजन्म, उसकी बाल-लोला, कलाज्ञान, यौवन, पाणिग्रहण, रम्य प्रासाद एव भोगादि-(यह मय वर्णन भी महावल जमा ही समझना)। विशेष यह कि उम बालक का नाम गौतम रखा गया, उसका एक ही दिन मे पाठ थेठ राजकुमारियो के साथ पाणिग्रहण करवाया गया तथा दहेज में पाठ-पाठ प्रकार की वस्तुएं दी गई। विवेचन--प्रस्तुत सूत्र में गौतम कुमार के गर्भ में आने से लेकर विवाह तया विषयभोगो के उपभोग तक का वर्णन किया गया है, अब मूत्रकार अग्रिम सूत्र मे परमाराध्य भगवान् अरिष्टनेमि के चरणो में पहुँच कर गौतम कुमार के दीक्षित होने का वर्णन करते हैं- -तेणं कालेणं तेणं समएणं अरहा अरिद्वनेमी माइगरे जाव [संजमेण तवसा मापाणं भावमाणे] विहरह, घरविहा देवा आगया। कण्हे वि णिग्गए । पम्म सोच्चा "जं नवरं देवाणुप्पिया! मम्मापियरो आपुच्यामि । देवाणुप्पियाण [तिए मुंडे भवित्ता प्रागाराम्रो प्रणगारियं पव्ययामि] एवं जहा मेहे जाव (तहा गोयमे वि) [सयमेव पंचमट्टियं लोयं करेइ । करिता जेणामेव समणे भायं अरिटुनेमो तेगामेव उयागच्छइ । उवान्छिता समणं भगवं भरिट्टनेमि तिक्खुत्तो प्रायाहिणं पयाहिण करेह । करिता बंदइ, नमसइ, वंदित्ता नमसित्ता एवं वपासी- मालित्ते णं भंते ! सोए, पलिते णं भंते ! लोए, प्रालित्तपलित गं भंते ! लोए जराए भरणेण य। से जहा नामए ई गाहावई प्रागारंसि भियायमासि जे तस्य भंडे भवदापमारे मोस्लगुरए तंगहाय प्रायाए एगंतं प्रवक्कमइ, एस मे णित्यारिए समाणे पच्छा पुरा हियाए सुहाए समाए मिस्साए आणुगामियताए भविस्सइ । एवामेव मम वि एणे प्रामा भंडे इष्? कते पिए मणन्ने मगामे, एस मे पित्यारिए समाणे संसारयोट्रेपकरे भविस्सइ । तं इच्छामि गं देवाणप्पियाहि सयमेय पवायियं, सयमेव मुंडावियं, सेहादियं, सिक्लावियं, सयमेव प्रापार गोयर-विणय-वेणइय-चरण- करण-जाया-मापावत्तिय धम्ममाइक्खियं । सए पं समणे मग अरिटुनेमो सयमेव पवावेइ, सयमेव प्रापार जाव पाममाइपमा-एवं देवाणपिया! गंतवं चिट्ठिपम्वं गिसोयव्यं तुट्टिपव्वं भजियवं भासियवं, एवं उट्ठाए उट्ठाय पाहि भूएहि जोवेहि सत्तेहि संजमेणं संजमियन्वं, प्रस्सि व पं भट्ट भो पमाएयत्वं । १. यह गापा अंगमुत्ताएि में नहीं है। २. M.C. Modi द्वारा सम्पादित अतगह में 'गोयमो नार्मण' पाठ है। ३. मूत्र नं. २ में प्रस्तुत पाठ पूर्ण दिया गया है। यहां दिहाइ हेतु अपूर्ण पाठ बारेट में पूर्ण किया गया है। - - प्रथम वर्ग] [१३ मुमिणदंसण-फहणा, जम्मं बालत्तणं कलामोय। जोवण-पाणिग्रहणं, कण्णा पासा य भोगाय॥' नयरं गोयमो अट्टाहं रायवरफण्णाणं एगदिवसेणं पाणिगेहाति, मट्ठमो सामो। उग द्वारका नगरी में अन्धकवृष्णि नाम का राजा निवाम करता था। वह हिमवान्- हिमालय पर्वत को तरह महान् था। (उमकी ऋद्धि-ममृद्धि का वर्णन प्रोपपानिक गूत्र में किया गया है।) अन्धकवृष्णि राजा की धारिणो नाम की रानी थी। कभी विगी गमय यह धारिणी रानी अन्यत्र वणित (पुण्यवान् जन के योग्य) उत्तम शय्या पर गयन कर रही थी, जिसका वर्णन महायल (के प्रकरण मे वरिणत भय्या के) गमान समझ लेना चाहिये । तत्पश्चात्- स्वप्न-दर्शन, पुत्रजन्म, उमको बाल-लोना, कलानान, यौवन, पाणिग्रहण, रम्य प्रामाद एय भोगादि-यह सब वर्णन भी महावल जमा ही मममना)। विशेष यह कि उग यालक का नाम गौतम रखा गया, उसका एक ही दिन मे पाठ श्रेष्ठ राजकुमारियों के साथ पाणिग्रहण करवाया गया तथा दहेज में पाठ-पाठ प्रकार की वस्तुए दी गई। वियेचन-प्रस्तुत सूत्र में गौतम कुमार के गर्भ में माने गे लेकर वियाह तया विषयभोगों के उपभोग तक का वर्णन किया गया है, अब मूत्रकार अग्रिम मूत्र में परमाराध्य भगवान परिष्टनेमि के परणों में पहुँच कर गौतम कुमार के दीक्षित होने का वर्णन करते हैं - ८-तणं कालेणं तेणं समएणं परहा अरिहनेमी प्राइगरे' जाव (संगमेण तवमा पापा भावेमाणे] बिहरह, चविहा देवा आगया। कहे वि जिगए। पम्मं सोया "गं मपर देवाणुपिया ! मम्मापियरो आपुच्छामि । देवाणप्पियाणं [अतिए मरे नविना मागास प्रणमारिपं परवयामि एवं जहा मेहे आव (सहा गोयमे वि) [सयमेव पंचहियं सोपं करे।परिता गामेय समणे भगवं अरिष्टनेमी सेणामेव उवागच्या । उदायित्ता समण भगवं भरिटनेमि निरातो मायाहिणं पयाहिणं करेइ । करिता चंदा, नमसह वंदित्ता ममंसिप्ता एवं पयासी- मालित गं भंते ! लोए, पतित भंते ! सोए, मालितपमित भंते ! मोए जराए मरण या से जहा नामए कई गाहावई मागारंसि भिमायमामि जे ताप भं भवामपभार मोल्लगुरए से गहाय प्रयाए एगेतं प्रवपरमा, एम मे पियारिए समाणे पाया पुरा हिसाए मुहार समाए हिस्सेसाए आणुगामियताए भविस्सऽ । एषामेव मम विएगे पापा मोईने लिए मनाने मगामे, एस मे रियारिए समाणे संसारयोग्यास भविस्सः। संधामि गंगाप्पियाहि मयमेव पवावियं, सयमेव मुंगवियं, सेहादियं, सिरताविर्य, सयमेव मापार-गोवर-निगम-मेगाव-धाग- करण-जाया-मायावतिय धम्ममाइति । तए गं समणे मगव भरिनेमो सरमेव पावावे, सयमेव प्रापार. नाव पम्ममामा-एवं देवाणुपिया! गंतमं चिट्ठियावं गिसोयग्वं तुपहिया नजियवं भामियाय, एवं ढाए रहार पाहिं भूहि जोवेहि सहि संनमेणं संजमिपावं, मस्मि टुंगो पमाएपा। १. मह पापा मममुताएि में नहीं है। २. M.C.Modi द्वारा मापात गदा में 'रोन्को मार्मर' पार है। १. मूत्र नं. २ में प्रा पाठ पूर्ण सिका। यहां हर पल festi - पाला, मामयमण, अधमामयमरण आदि विविध प्रकार के तप से आत्मा को भावित करते नग्ने लगे। परिहत भगवान् अरिष्टनेमि ने अब द्वारका नगरी के नन्दनवन से विहार कर मोर व अन्य जनपदी में विनग्गग करने लगे। नाम्या पोर शाम्प्र-स्वाध्याय में तत्पर अनगार गौतम अवसर पाकर भगवान् अरिष्टनेमि या में उपस्थित हए । विधिपूर्वक वदना, नमस्कार करने के अनन्तर उन्होंने भगवान् से निवेदन - "भगवन् । मंगे इच्छा है यदि आप प्राज्ञा दे नो में मामिको भिक्षु-प्रतिमा (प्रतिज्ञा विशेष, गधना कर। नगगन में माना पाकर वे साधना में लीन हो गए । जैसे स्कन्धक मुनि ने नागी चाहो नि मोनमामार ने भी यारह भिक्षुप्रतिमानो का पाराधन करके गुणरत्न ATTI भी गती पागान किया। पूर्ण रूप मे म्बन्धक की तरह ही नितन किया, भगवान मामा पशि मुनिया माय बंगे हो ग जय पर्वत पर चढे । १२ वर्ष की दीक्षा पर्याय पूर्ण का माग गी मरगना माग गायत् [मात्मा को प्रागधित किया। अनशन द्वारा माठ भोजनों का भाग पर गि पध-प्रयोजन के लिये नग्नभाव-गाधुनि, मुण्डभाव-द्रव्य से सिर को मुडित 1. भार गे परिपायाग करना, पंग नोन प्रात् बालों को हाथों से उपाड़ना, ब्रह्मचर्यवाम, 11 --नान न करना. पया-पत्र का प्रयोग न करना, उपानह-जूते का उपयोग न करना, मा-भूमि पर मना, पारामान पर गयन करना, परपरप्रवेश-दूमरों के भागवाना, नाभालाभ-किमी गमय वस्तु का प्राप्त होना, किसी ममय न होना, रमान-ही मान वही प्रपमान होना, दूगरों द्वारा की गई होलना-मवहेलना, निदा, नाम माम शातिपादिता गुप्त रहस्य प्रकट करना, ताडना-मारना, गा, निदा, ना नाना प्रभार परोह इन्द्रियों के दु गदायक उपमगं महन करना [मादि किया जाता • र म उम गबन को मिस कर गिरा पोर अन्तिम श्यामो द्वारा मिड, बुद्ध, मुक्त, मकन एवम प्रकार के दुमा में विमुक्त हो गए। श्रमण भगवान् महावीर ने नयम पनका यह पं कहा है। पिन-मनुत मूर में दोशाक प्रनलर गोतम प्रनमार को अध्ययनशीलता, तपोभावना, ...तर पतिविधि कर मिटरको उपलका वर्णन प्रस्तुत हिया rai पर। सम्प का अर्थ है-शास्त्र में वर्णन किये अर्थ है पर माघ । स्थानाग मूत्र में इसके नोन 1. (२) मूत्र स्थविर स्थानाग-गमवावाग दोसामर्शप वाले मात्र। भारित-मां गाय योगों में रिपनि, (२) पि, (३) मामारियल, प्राचाराग पारि (4) सवागने दान पाता परिणाम-मममार। मा पर माल भीष्ट है। मुनि सममा पागल होता है-मारह पाप मा हो सकता है कि गणधर महाराज अतिशय (ज्ञान विशेष) के धार लिये उन्होंने भविष्य में होने वाले चरितो का भी सकलन कर दिया। इसके अतिरिक्त रम्परा की अपेक्षा से अतीत काल का निर्देश भी दोपयुक्त नहीं कहा जा सकता। 'चउत्थ जाव भावेमाणे' मे उपयुक्त चतुर्थ शब्द व्रत-एक उपवास का वोधक है, तथा यावत् और भावेमाणे का अर्थ है--भावयन्-वासयन्-अर्थात् अपने जीवन में उसका हप्रा। - 'मासिय भिवसुपडिम' का अर्थ है मासिकी भिक्षुप्रतिमा। प्रतिमा का अर्थ है प्रतिज्ञा । ना को भिक्षु-प्रतिमा कहते है । ये प्रतिमाए वारह होती है । उनका विस्तृत विवेचन दशा न किया गया है। इस प्रतिमा का धारक साधु एक अन्न की और एक पानी की दत्ति (दाता द्वारा दिए न और पानी की अयण्डधारा दत्ति कहलाती है।) लेता है । जहा एक व्यक्ति के लिये भं । दुग्धपान छुडवाकर भिक्षा देने वाली स्त्री तथा अपने ग्रासन से उठकर भोजन देने व गया स्त्रों में भोजन नहीं लेता। जिसके दोनों पर देहली के भीतर हों या बाहर हो । • यह (१) याचनी-पाहार की याचना करना, (२) पृच्छनी-मार्ग पूछना, (३) अनुसार । वहा मे भोजन लेता है , गर्भवती या छोटे बच्चे की मां के लिये बनाया गया भोजन वह नहीं लेना । दिन के ग्रादि , मध्य और चरम इन तीन भागों में से एक भाग मे वह भिक्षा । परिचित स्थान पर वह एक रात रहता है , अपरिचित स्थान पर एक या दो रातेद मादिनिय प्राज्ञा लेना , ( 6 ) प्रश्नों का उत्तर देना , ये चार भाषाए बोलता है । - पागम गृह - जिमके चारो योर वागहो , ( २ ) अधोविकट गह - चारो ओर से सला नाही , ( ३ ) अधोवृक्ष मूनगृह - वृक्ष का मूल या वहाँ पर बना स्थान , इन स्थानो पर स्वा निसर रहर माना है । इन स्थानों में कोई प्राग लगा दे तो , यह मुनि जीवन को मुरः स्वर स्थान में बाहर नहीं निकलता । विहार में यदि पाव मे काटा लग जाए ना । जानना , धामो मे धन पर जाए तो उमको भी दूर नहीं करता । जहाँ मूर्य ग्रस्त होना हिमर बीद पाए नारकर पीछे नहीं हटता । यदि कोई जीव उसे देखकर डरता होना पार हो जाता है।गोन - निवागा के लिये गरम स्थानी या वस्त्रो किवा तथारूप वस्तुमान , नागरमा रापरिहार करने के लिये दीत स्थान में नहीं जाता । इस किसिमे नमा रानहाता है । दमका ममय एक माम का है । इस प्रकार माध के प्रति उको पानी पानमामिरी घटी पाण्मामिकी और मातवी साप्नमामिको बहताता है । नाम निका - तिना है । पहली मामिको , दुमरी वैमामिकी , तीसरी मामिमी , कोको -11 मा.मारी माननियानी जाती हैं । पाठवी प्रतिमा का ममयमात दिन - गर मान्न - पानी की एक दनि , दुमरी में दो , नीमरी में तीन , चौथी में चार , पावर मरीमारदिन - रात पाठीमचोविहार उपवास करना होता है । नरम 1.नागना होगा । ममरमात दिवम का है।दमवी काममा भीमासनि .
७. 1 - ९ . २॥ 5 द ७ २० ६ r २५० ५ ५ २ " २४॥ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ३ २० २ २ २ | २ | २२ २ २ २ ܘ: 3 ० १ १ १ १ न १ १ १ ~ १ १ १ सलेहणाए-शब्द का अर्थ होता है-अन्तिम ममय में किया जाने वाला शरीर और क आदि को कृश करने वाला तप-विशेष बीओ वग्गो तक्षेप १-"जडू णं भंते ! समणेणं भगवया महायोरेणं अट्ठमस्स अंगस्त अंतगडवसाणं पढ़ जग्गस अयम? पण्णत्ते, दोच्चस्स णं भते ! वगरस अंतगउसाणं समणेणं भगवया महायोरेणं प्रज्झयणा पण्णता? एवं खलु जेबू ! समणेणं भगवया महावोरणे भटुमस्स अंगस्स अंतगरवसाणं वोच्चस्स या प्रट्ठ प्रग्झयणा पणता। सगहणी-गाहा प्रक्षोभसागर खलु समुहिमयंतपवल नामे य। धरणे य पूरणे वि य अभिचंदे चेव अटुमए । अक्षोभावि-पद जहा पढमो वागो तहा सव्वे प्रट्ट अज्झयणा गुणरयणतवोकम्म । सोलसवासाई परिमा' सेतुने मासियाए संलेहणाए सिद्धो। आर्य ने प्रार्य सुधर्मा स्वामी से पूछा-हे भगवन् ! श्रमण भगवान् महावीर ने अत दशा के प्रथम वर्ग का यह अर्थ प्रतिपादन किया है तो द्वितीय वर्ग के कितने अध्ययन फरमाये हैं ? मुधर्मा स्वामी इसका समाधान करते हुए बोले-हे जवू ! श्रमण भगवान् महावीर ने म अग अतगडदशा के द्वितीय वर्ग के पाठ अध्ययन फरमाये है । उस काल और उस समय मैदा नाम को नगरी थी। महाराज वृष्णि राज्य करते थे। रानी का नाम धारिणी था। पाठ पुत्र थे- (१) प्रक्षोभकुमार, (२) सागरकुमार, (३) ममुद्रकुमार, (४) हैमवन्तकुमार, (५) अ कुमार, (६) धरणकुमार, (७) पूर्णकुमार, (८) अभिचन्द्रकुमार । जैसे प्रथम वर्ग मे गौतम का वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इनके पाठ अध्ययनो का वर्णन भी समझ लेना चाहिए। भी गुणरत्न तप का पाराधन किया और १६ वर्ष का सयम पालन करके अन्त मे शत्रुजय पर्व एक मास को सलेसना द्वारा सिद्धिपद प्राप्त किया।
तत्पश्चात् अनोयस कुमार को आठ वर्ष से कुछ अधिक उम्र वाला प्रा जानार ने उसे कलाचार्य के पास भेजा । तत्पश्चात् कलाचार्य ने मनीयस कुमार को गणिन नि है ऐसी लेस आदि शकुनिरुत (पक्षियों के शब्द) तक को यहत्तर कलाएँ मूप से, प्रथं से प्रो- सिद्ध करवाई तथा सिसलाई। वे कलाएं इस प्रकार है-(१) लेसन, (२) गणित, (३) रूप बदलना, (- (५) गायन, (६) वाद्य वजाना, (७) स्वर जानना, (८) वाद्य मुधारना, (६) ममान ता (१०) जुआ खेलना (११) लोगो के साथ वादविवाद करना (१२) पासो री सेलना (१३ खेलना (१४) नगर की रक्षा करना (१५) जल और मिट्टी के मयोग मे वस्तु का निम (१६) धान्य निपजाना (१७) नया पानी उत्पन्न करना, पानी को सस्कार करके शुद्ध उप्ण करना (१८) नवीन वस्त्र बनाना, रगना, सीना और पहनना (१६) विलेपन की पहचानना, तैयार करना, लेपन करना ग्रादि (२०) शय्या बनाना, शयन करने की विधि आदि (२१) आर्या छद को पहचानना और बनाना (२२) पहेलियां बनाना प्रो (२३) मागधिका अर्थात् मगध देश की भाषा मे गाया आदि बनाना (२४) प्राकृत भाषा प्रादि बनाना (२५) गीति छद वनाना (२६) श्लोक (अनुष्टुप छद) बनाना (२७) सुवर्ण उमके प्राभूपण वनाना, पहनना अादि (२८) नई चादी बनाना, उसके आभूषण बनाना प्रादि (२६) चूर्ण-गुलाव अवीर आदि बनाना और उसका उपयोग करना (३६) गह- पहनना आदि (३१) तरुणी की सेवा करना-प्रसाधन करना (३२) स्त्री के लक्षण (३३) पुरप के लक्षण जानना (३४) अश्व के लक्षण जानना (३५) हाथी के लक्षण (३६) गाय बैल के लक्षण जानना (३७) मुर्गा के लक्षण जानना (३८) छत्र लक्षण जाना ( लक्षण जाना (४०) सड्ग-लक्षण जानना (४१) मणि के लक्षण जानना (४२) काकर्ण लक्षण जानना (४३) वास्तुविद्या-मकान दूकान आदि इमारतो को विद्या (४४) सेना के प्रमाण प्रादि जानना (४५) नया नगर बसाने प्रादि की कला (४६) व्यूह-मोर्चा १८७) विरोधी के व्यूह के मामने अपनी सेना का मोर्चा रचना (6) सेनामचालन (४६) प्रतिचार-पत्रुमना के समक्ष अपनी सेना को चलाना (५०) चक्रव्यूह-चाक के प्राकार बनाना (५१) गरुड़ के आकार का व्यूह बनाना (५२) शकटव्यूह रचना (५३) सामान्य यु- (५४) विशेष युद्ध करना (५५) अत्यन्त विशेष युद्ध करना (५६) अट्ठि (यप्टि या अस्थि करना (५७) मुष्टियुद्ध करना (५८) याहुयुद्ध करना (५६) लतायुद्ध करना (६०) बहुत , पौर घोडे को बढ़त दिलाना (६१) गड्ग को मूठ आदि बनाना (६२) धनुष-बाण सवध होना (६३) चादी का पाक बनाना (६४) सोने का पाक बनाना (६५) मूत्र का छेदन (६६) मन जीतना (६७) कमल के नाल का देदन करना (६८) पत्र-छेदन करना (६६} कड़ मादि का घेदन करना (७०) मृत (मूछिन) को जीवित करना (७१) जीवित को मृत (E करना मौर (७२) पार धूक प्रादि पक्षियों की बोली पहनानना । तत्पश्चात् वह कलाचार्य अनीयस कुमार को गणिन प्रधान, लेपन से लेकर शकुनिरुत बहत्तर कलाएँ मूब (मूल पाठ) में, अथं गे और प्रयोग मे मिद्ध कराता है तथा सिसलाता है करवा कर मोर मिगता कर माता-पिता के पाम ले जाता है। तब पनीराम बाराका - कौटु बिक (माथ रहने वाली), वनीम ग्मोई बनाने वाली, बत्तीम भण्डार को रक्षा करने वाली, बत्तीग तरुणिया, बत्तीम पुप धारण करने वाली, बत्तीम बलिकम करने वाली, बत्तीग गय्या विधाने वाली, बत्तीस प्राभ्यन्तर और बनीम वाध प्रनिहारियां, बनीम माना बनाने वाली और बत्तोम पेषण करने वाली बामियां दी । इसके अतिरिक्त बहुनमा हिरण्य, मुवणं, काम्प, चम्प तथा विपुल धन, कनक यावत् मारभूत धन दिया, जो मान पीढी तक इच्छापूर्वक देने पोर भोगने के लिये पर्याप्त था। इस प्रकार अनोयस कुमार ने भी प्रत्येक स्त्री को एक-एक हिरण्य कोटि, एक-एक स्वर्ण कोटि, इत्यादि पूर्वोक्त मभी वस्तुएँ दी, यावत् एक-एक पेपणकारी दामी नथा बढ़त-मा हिरण्य-गुवर्ण आदि विभक्त कर दिया । ऊंचे प्रासादो मे अनोयम कुमार वजते हुए मृदंगों के द्वारा पर्याप्त भोगो का उपभोग करता हुअा रहने लगा। उम काल नया उस समय श्रीवन नामक उद्यान में भगवान् अरिष्टनेमि म्यामो पधारे । यथा- विधि अवग्रह की याचना करके मयम एव तप मे ग्रात्मा को भावित करते हुए विचरने लगे । जनता उनका धर्मोपदेश सुनने के लिये उद्यान पहुंची और धर्मोपदेग मुन कर अपने-अपने घर वापस चली गई। जनसमूह का कोलाहल मुनकर अनीयम कुमार ने भी भगवान् के निकट जाने का मकला किया। वे भगवान् को मेवा में पहुंचे। उन्होंने भी भगवान् का प्रवचन मुना । प्रवचन के प्रभाव से उनके हृदय में वैराग्य उत्पन्न हो गया । अन्त में गौतम कुमार की तरह वै भगवान् के चरणों में दीक्षित हो गये । दीक्षा लेने के अनन्तर उन्होंने मामायिक से लेकर चौदह पूर्वो का अध्ययन किया। वीम वर्ष दीक्षा का पालन किया । अन्त समय में एक मास की सलेसना करके शत्रुजय पर्वत पर मिद्ध गति को प्राप्त किया । मुधर्मा स्वामी कहने लगे हे जम्बू ! इस प्रकार श्रमण भगवान महावीर स्वामी ने अष्टम अग अन्तगड के तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का अर्थ प्रतिपादन किया था। २.६ अध्ययन इसी प्रकार अनन्तमन में लेकर दात्रुसेन पर्यन्त अध्ययनों का वर्णन भी जान लेना चाहिए । मव का बत्तीम-वत्तीम श्रेष्ठ कन्यानों के माथ विवाह हुआ था और मय को वतीस-बत्तोम पूर्वोक्त यस्तुए दी गई। बीस वर्ष तक मयम का पालन एव १४ पूर्वी का अध्ययन किया । अन्त में एक माम की मलसना द्वारा गर्बुजय पर्वत पर पांची ही मिद्ध गति को प्राप्त हुए। दियेचन प्रस्नुन मूत्र में अनोयम कुमार के गेप जीवन का नया अनन्नमेन प्रादि पांच धष्ठि पुत्री का वर्णन किया गया है । 'पोइदाप' का अर्थ है-प्रौनिदान, जो हर्ष होने के कारण दिया जाता है। यहाँ दान का पर्य पारितोपिक-मोपहार । बम प्रीनिदान का प्रयोग दहेज प्रथं में विशेष प्रसिद्ध है । वर्तमान में विवाह के मामर पर कन्यापक्ष की पोर में घर-पक्ष को दिया जाने वाला धन और सम्मान दहेज कहा जाता है, किन्तु प्रस्तुत मूत्र में पता चलता है यह दहेज वियाह के अवसर पर वर के पिता को पोर में वर को दिया जाता था। जो वर द्वारा विवाहित कन्याग्रो मे बाट दिया जाता था। 'नवर मामाक्ष्यमाश्याई पउद्दस पुस्माई-दम वाक्य मे पटिन 'नवर' यह मव्यय पद गौतम कुमार पोर पनोपन कुमार को प्रध्ययनगत भिन्नता को प्रकट कर रहा है । 'नवर' शब्द का अर्थ है - सप्तम अध्ययन सारणे ४-तेणं कालेणं तेणं समएणं वारयईए नयरोए, जहा परमे, नवरं-वसुदेवे राया। धारिणी देवी । सोहो सुमिणे । सारणे कुमारे । पण्णासम्रो दाओ। चउद्दम पु-या। वीस यासा परियामो । सेस जहा गोयमस्स जाव' सेत्तुजे सिद्ध । उस काल तथा उस समय मे द्वारका नगरी थी। उसमे यमुदेव राजा थे। उमको रानी धारिणी थी। उमने गर्भाधान के पश्चात् स्वप्न में मिह देसा। ममय पाने पर बालक को जन्म दिया और उसका नाम सारण कुमार रखा गया। उसे विवाह में पचास-पचास वस्तुओं का दहेज मिला । सारण कुमार ने सामायिक से लेकर १४ पूर्वो का अध्ययन किया। बीस वर्ष तक दीक्षा पर्याय का पालन किया। शेष सब वृत्तान्त गौतम की तरह है। जय पर्वत पर एक मास को सलेसना करके यावत् सिद्ध हुए। १. प्रस्तुर वार का पूर पाउपम वर्ग के ९वें मूत्र में प्रा यया है।
३४] [अन्तद्दन तव (दीक्षित होने के पश्चात्) वे छहो मुनि जिस दिन मुडित होकर प्रागार से अनगा धर्म मे प्रव्रजित हुए, उसी दिन अरिहत अरिष्टनेमि को वदना नमस्कार कर इस प्रकार बोले- "हे भगवन् हम चाहते है कि आपको प्राज्ञा पाकर हम जीवन पर्यन्त निरन्तर वेले-वे तप द्वारा प्रात्मा को भावित (शुद्ध) करते हुए विचरण कर।" अरिहंत अरिष्टनेमि ने कहा-देवानुप्रियो ! जैसे तुम्हे मुग हो, करो, गुभ कर्म करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए। तव भगवान् के ऐसा कहने पर वे छहो मुनि भगवान् अरिष्टनेमि की प्राज्ञा पाकर जीवन भर के लिये बेले-वेले की तपस्या करते हुए यावत् विचरण करने लगे। पहों अनगारों का देवको के घर मे प्रवेश ७-तए णं ते छ प्रणगारा मण्णया कयाई छट्ठक्खमणपारणयंसि पढमाए पोरिसीए सरझायं फरेंति, जहा गोयमो जाव [बीयाए पोरिसीए झाणं झियायंति, तइयाए पोरिसोए अतुरियम चवलमसंभंता मुहपोत्तियं पडिलेहंति, पडिलेहिता भायण-वस्थाई पडिलेहंति, पडितेहिता भायणाई पमन्जंति, पमज्जित्ता भायणाई उग्गाहेति, उग्गाहिता जेणेय अरहा परिछनेमी तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता अरहं प्ररिट्टनेमि वंदति नमसंति, वंवित्ता नमंसित्ता एवं वयासो-] इच्छामो णं भंते ! घट्टक्खमणम्स पारणए तुम्भेहि सम्भणुण्णाया समाणा तिहि संघाउएहि पारवईए नयरीए जाव [उच्च-नीय-मज्झिमाई कुलाई घरसमुदाणस्स भिषणायरियाए] पउित्तए । तए णं ते छ प्रणगारा अरहया परिढणेमिणा मन्भणण्णाया समाणा प्ररहं रिट्टनेमि वंदति नमसंति, पंदित्ता नमसित्ता अरहमो प्ररिट्टनेमिस्स प्रतियामो सहसंबवणाम्रो पडिनिवखमति पडिनिक्समित्ता तिहि संघाडएहि प्रतुरियम जाय [चवलमसंभंता जुगतरपलोयणाए दिट्ठीए पुरमोरिय सोहेमाणा-सोहेमाणा जेणेव वारवई नयरी तेणेव उवागच्छति, उवागच्छिता बारवईए नयरीए उच्च- नीय-मज्झिमाई कुलाइ घरसमुदाणस्स भिक्खायरियं] मर्डति । तदनन्तर उन छहो मुनियों ने अन्यदा किसी समय, वेलें की तपस्या के पारणे के दिन प्रथम प्रहर में स्वाध्याय किया और गौतम स्वामी के समान (दूसरे प्रहर में ध्यानारूढ हुए, तीसरे पहर में कायिक और मानसिक चपलता से रहित हो कर मुगवस्त्रिका, भाजन तथा वस्त्रों को प्रतिलेपना को । तत्पश्चात् वे पात्रों को भोली में रख कर और झोली को ग्रहण कर भगवान् परिप्टनेमि स्वामी को गंवा में उपस्थित होते हैं, वन्दना-नमस्कार करते है, तदनन्तर निवेदन करते है)- भगवन् ! हम येले को तपस्या के पारणे में पापको मात्रा लेकर दो-दो के तीन सघाडी से द्वारका नगरी में यावत् [माधुवृत्ति के अनुसार धनी-निधन प्रादि सभी धरी मे] भिक्षा हेतु भ्रमण करना चाहते हैं। नर उन दही मुनियों ने प्ररित परिष्टनेमि को माज्ञा पाकर प्रभु को वदन नमस्कार पिता । वदन नमगार कर वे भगवान् अरिष्टनेमि के पाम में महाप्रवन उद्यान से प्रस्थान करते फिर वे दो दो के तीन मपाटको में महज़ गति मे यावत् [चपलता तथा सभ्रान्ति से रहित, चार - ।
सोनोपुन भागमा मात्र ८ तपामार आप ni antarwa atfat परिसानेता एवं परामो- किन देगापिngrग गरेगामगे शेपणा जाम पचाप देवतांगमूगए गममा निगं पोर ना [alixit Trump HI- रिपाए] प्रामा भापान मा mir. amar FIR माना गोमाको मणीयसनी तए पते पपगाराएर पागो-form ! E पागुरागामा चारयईए नयरोए जारभूपाए मना AmI Rो नामाना मागणीसात, गो घेव गं ताई ताइ पुमा रोपपता भरापामा पनि । एष पनु देवाणप्पिए! माह महिमपुर नपरं नाम गाहामा गुस्साए भारियाण प्रत्तया छ भायरो सहोदरा सरिममा नारनमसरसमाना परमो परिदमास तिर धाम सोच्चा ससारभस्मिानीया सम्ममरणाणं मार पाया। तर महज दि पध्यमातं घेय दियसं परहं परिट्टनेमि वामो नमसामो, म एपाय मिन प्रोगिहामी. इच्छामो णं भंते ! तुम्नेहि मानण्णाया समागा नाय' प्रहामुह देगणपिया। तए णं अम्हे परहमा परिट्टमिपा प्रानणण्णापा समाणा गायानोवाए पछठेण जाव विहरामो। त पम्हे मग्न पट्टयखमणपारणपंसि परमाए पौरिगोग जाय [सम्भाय करता, बीयाए पोरिसीए झाणं भियाइत्ता तापाए पोरिसीए परहया प्ररिट्टनेमिणा प्रानणग्णामा समाणा तिहि संघाइएहि वारवईए नपरोए उच्चनीयमग्भिमाई कुसाई परसमुदाणस्म मिसायरियाए] प्रडमाणा तव गेहं प्रणप्पविट्ठा। तं गो सतु देवाणप्पिए ! ते चैव गं प्राहे, अहे णं मण्णे । देवां देवि एवं वदंति, यदित्ता जामेव विसं पाउग्नूया तामेव विसं परिगया। इसके बाद मुनियों का तीसरा मपाडा पाया यावत् उमे भी देवकी देवी प्रनिलाभ देती है। उनको प्रतिलाभ देकर वह इस प्रकार बोली-"देयानुप्रियो । क्या कृष्ण यामुदेव की दम बारह योजन लम्बी, नव योजन चौड़ी प्रत्यक्ष स्वर्गपुरी के ममान द्वारका नगरी में श्रमण निन यो को उच्च-नीच एव मध्यम कुली के गृह-गमुदायो मे, भिक्षा भ्रमण करते हुए पाहार-पानी प्राप्त नहीं होता? जिसमे उन्हें प्राहार-पानी के लिये जिन कुला में पहले प्रा चुके हैं, उन्ही कुली में पुनः पाना पड़ता है ?" देवको द्वारा इस प्रकार कहने पर वे मुनि देवकी देवी में इस प्रकार बोले-"देवानुप्रिये ! ऐसी बात तो नहीं है कि कृष्ण वासुदेव को यावत् प्रत्यक्ष स्वर्ग के समान, दम द्वारका नगरी में १. वर्ग-३ वा मूत्र-७. २. वर्ग-१ का गूप-६. ३. वर्ग-३ का मूत्र-७. ४. वर्ग-३ का मूत्र-६. ५. वर्ग-३ का मूत्र-६. ६. वर्ग-३ का मूत्र-६. ७. वर्ग-३ का मूत्र-६.
३० [4.18.10 सरकरणपर जानुरागर-गम-पर-fam माffaimiz JANJultit. मिहि, रामपा-गुणानुमायोनिहि. गोjanam गोग. जुयाणहि पानामनिरनिगर. गुनाaamarpatialaiमय, पयरलासपोय म नागर नुसार सामाnिt team तए पते निर-मा एकामानाlan. RATOR" 'सहारा प्रागार पिणएणं ययम नाय परिfri सरगना नार 4 जागा) उपयति । जहा देवापरा चार [Patni auft sam, aantiमा, फरकोउय-मासपाram for frm afrimur.Trum. एगायनो-कंटगुत्त-उमज-गोनिगुराग यामार्मागरम भूगो, पोगगुपmanti हिया, युगुल्लगुरुमालगाnिा. गाग्रगुमिगुरिया, Amateur, रामरण. भूसियंगो, कालागरपरिपा, मिरिगमागा, नार पमहापानाfundn, यहिना चिलाइयाहि, गाणारेस-मिरेसपरिमारमार, महिपगाह गिय-पतिय परियाण पाहि, कुसनाहि, यिणोपाहि, परियापारिप-रम-महतसा प्रतेराम्रो णिगच्या, णिपिता अमेय बाहिरिया पट्टागमामा, नगर पम्मिए नागपरे रोग उयागच्छा, उमार्गादत्ता जाप पम्मियं जाणापयर दुस। तए गं सा देवई देवो पम्मियापी जाणापयरानो पायोहर, पामोहितावह गुमाहिबार महत्तरगवंदपरिसिता भायं अस्टिनेमि परिहण परिगण मागदा, नहा-सचिसाण दवाणं विसरणयाए, प्रचित्ताणं दम्याणं प्रयिमोयणपाए, विणयोगपाए गायसीए. पायाफास अंजलिपागहेणं, मणस्स एगत्तोभायकरणेणं; जेव मगय प्ररिटनेमी तणेय उवागच्या उवान्छिता भगवं प्ररिट्टनेमि तिसत्तो मापाहिण-पयाहिण करे, करिता र जमराह बंदिता णमंसित्ता ... 'सुस्मसमाणो, पमंसमाणी, प्रनिमुहा विणएणं पत्रसिउसजाव] परवासा। तए णं परहा मरिट्ठनेमो देय देवि एवं क्यासो- से नूर्ण तय देवई ! इमेप प्रणगारे पासित्ता अपमेयाहये प्रझिथिए चितिए पस्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पण्णे-एवं अनु पहं पोसासपुरे नयरे प्रामुत्तेणं जाव' तं णिग्गच्यसि, जिग्गच्छित्ता जेणेव मम अंतियं तेणेव हत्यमागया, से नूर्ण देवई ! प्रठे समठे ?' 'हता प्रस्था' इस प्रकार की बात कहकर उन श्रमणों के लौट जाने के पश्चात् देवकी देवी को इस प्रकार का प्राध्यात्मिक, चिन्तित, प्राथित, मनोगत और सकषित विचार उत्पन्न हुमा कि "पोलामपुर नगर में प्रतिमुक्त कुमार नामक श्रमण ने मुझे बचपन में इस प्रकार कहा भा है देषानुप्रिये देवकी ! तुम पाठ पुत्री को जन्म दोगी, जो परस्पर एक दूसरे से पूर्णत. गमान (ग्राकार, त्वचा और अवस्था वाले, नील कमल, महिप के शृग के अन्तर्वर्ती भाग, गुलिका-रग विशेष पोर अलमी के समान वर्ण वाले, श्रीवत्स से अकित वक्षवाले, कुसुम के समान कोमल और कु इल के समान घु घराले वाला वाल] नलकूबर के समान प्रतीत होगे। भरतक्षेत्र में दूसरी कोई माता वैसे पुत्रों को जन्म नही दंगो। पर वह कथन मिथ्या निकला, क्योंकि प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है कि अन्य मातानी १. प्रस्तुत सूत्र में अपर देखिए ।
[ मन्ताशा का निन्दु होना, उसका हरिणंगमेपो देव को पाराधना करना. देवका प्रसन्न होकर देवको देवी के पुत्री को सुलसा के पाम पहुंचाना तथा सुलसा के मृतपुत्रों को देवकी देवी के पास पहुंगाना प्रादि जो कथन किया उसी का प्रस्तुत मूत्र में वर्णन दिया गया है। 'नेमित्तिएण' शब्द का अर्थ होता है नैमित्तिक । भविष्य की बात बनाने वाले ज्योतिषी को नैमित्तिक कहा जाता है। "णिदू शब्द का अर्थ है-मृत प्रसविनो। जिगके बने मृत पंदा हो, उसे निन्दू कहते हैं । मृत वालक दो तरह के होते है-एक तो गर्भ में ही मरे हुए पैदा होने वाले, दूसरे पैदा होने के वाद मर जाने वाले । प्रस्तुत प्रकरण में निन्दू से प्रथम अयं का ग्रहण हो प्रभोप्ट प्रतीत होता है। हरिणगमेपी -शब्द का अर्थ करते हुए कल्पमूत्र (प्रदीपिका टीका के गर्भ परिवर्तन-प्रकरण) मे लिखा है-'हरे इन्द्रस्य नगमम् प्रादेगमिच्छनीति हरिनंगमेपी, केचित् हरेरिन्द्रस्य संवधी नंगमेपी, नाम देव इति'-- अर्थात् हरिनंगमेपो शब्द के दो अर्थ है-~१. हरि इन्द्र के नंगम-पादेश को इच्छा करने वाला देव तथा २. हरि-इन्द्र का नंगमेपी अर्थात् संबंधी एक देव । हरिनगमेपी सौधर्म देवलोक के स्वामी महाराज शकेन्द्र का सेनापति देव है। इन्द्र को प्राशा मिलने पर भगवान् महावीर के गर्भ का परिवर्तन इसी देव ने किया था। 'उल्ल-पड-साडया' का अर्थ है--जिसने प्राई (भीगा हुआ) पट और शाटिका धारण कर रखी है । पट ऊपर प्रोढने के वस्त्र का नाम है। शाटिका शब्द से नीचे पहनने को धोती या साडो का बोध होता है। 'पाहारेइ वा, नौहारेइ वा, वरइ वा' का अर्थ है-पाहार करती थी-भोजन साती थी। निहारेइ अर्थात् शौचादि पियानों से निवृत्त होती थी। वरइ-दाब्द व धातु से बनता है जिसका अर्थ है-विचार करना, चुनना, सगाई करना, याचना करना, आच्छादन करना, सेवा करना। प्रस्तुत में यू धातु विचार करने के अर्थ में प्रयुक्त हुई प्रतीत होती है। तब 'वरइ' का अर्थ होगा विचार करती थी, अन्य कार्यों के सम्बन्ध में चिन्तन करती थी। "भत्ति-बहुमाण-मुस्मूसाए" का अर्थ है-भक्ति-बहुमान तथा शुथ पा के द्वारा। भक्ति शब्द अनुराग, बहुमान शब्द अत्यधिक सत्कार तथा शुध पा शब्द सेवा का परिचायक है। इन पदों द्वारा मूत्रकार ने हरिणगमेपी देव को पाराधित-सिद्ध या प्रसन्न करने के तीन साधनों का निर्देश किया है । देव को सिद्ध करने के लिये उक्त तीन बातो को अपेक्षा हुआ करती है। देव को मिद्ध करने के लिये सर्वप्रथम साधक के हृदय मे देव के प्रति अनुराग होना चाहिए, तदनन्तर साधक के हृदय में देव के लिये प्रत्याधिक मत्तार-सम्मान की भावना होनी चाहिये । देव को सिद्ध करने के लिये तीसरा साधन देव की सेवा है। मुलगा ने हरिणगमेषी देव को पाराधना की, उसकी पूजा की, परिणाम स्वरूप उसने अपना मभोप्ट कार्य सिद्ध कर लिया। इममे भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि देवता के प्रति की जाने वाली माराधना माधक को कामना पूर्ण करने मे महायक वन मकती है। देव अपने भक्त की रक्षा करने तथा उम पर अनुग्रह करने में मगन होता है। लोग पुत्रादि को उपलब्ध करने के लिये देव-पूजन करते है और पूर्वोपार्जित किसी पुण्य [अन्तकृद्दगा विवेचन-भगवान् अरिष्टनेमि से यहां मुनियो का वृत्तान्त मुनने पर "ये छहो मेरे ही पुत्र है" इस प्रकार की प्रतीति हो जाने पर वह देवकी देवी छहों मुनियो के दर्शन करती है और पुनः पुन उन्हें देखकर हर्षित होती है, ऐसी स्थिति में उसका छिपा हुया वात्मल्य उजागर हुअा, और स्तन- दुग्ध द्वारा प्रकट हो गया । तदनन्तर अपनी स्थिति में समाहित वह अपने भवन में वापस लौटी और विशेष विचारधारा मे डूब गई। अग्रिम सूत्र मे सूत्रकार उसकी विचारधारा और परिणामधाराम्रो का दिग्दर्शन कराते है। देवको को पुपामिलापा १३–तए णं तीसे देवईए देवीए अयं अज्झथिए चितिए पत्यिए मणोगए संकापे समुप्पणे- एवं खलु अह सरिसए जाव नलकुब्बर-समाणे सत्त पुत्ते पयाया, नो चेव णं मए एगस्स वि बालत्तणए समानुए। एस वि य णे फाहे वासुदेवे छह-छहं मासाणं ममं अंतियं पायदए हव्वमागच्छद । त पण्णाओ णं ताओ प्रम्मयानो, पुण्णाम्रो ण तायो अमयाओ, कयपुग्णामो पं ताम्रो अम्मयामो, कपलपणाप्रो णं तामो सम्मयानो, जासि मण्णे णियग-कुच्छि-समूयाई थणदुद-लुद्धपाई महर समुल्लाथापाई मम्मण-पजंपियाई थण-मूला कयसवेशभागं भिसरमाणाई मुद्धपाई पुणो य कोमल: कमलोयमेहि मिहिऊण उच्छो गियेसियाई दति समुल्लावए सुमहरे पुगो-पुणो मंजुलप्पमणिए । महं गं प्रधण्णा अपुष्णा प्रकयपुष्णा अकयलक्सणा एत्तो एक्कतरमविण पत्ता, मोहय जाव [मणसकप्पा करयसपल्हरपम्ही मट्टग्माणोवगया] झियायइ। उग समय देवकी देवी को इस प्रकार का विचार, चिन्तन और अभिलापापूर्ण मानसिक सकरप उत्पन्न हुमा मि महो! मैने पूर्णत. समान प्रकृति वाले यावत् नलकूबर के समान सात पुत्री को चन्म दिया पर मैंने एक को भी वाल्यग्रीडा का मानन्दानुभव नहीं किया। यह कृष्ण वासुदेव भी पह-यह माम के पनन्नर चरण-वन्दन के लिये मेरे पाम आता है, अतः मैं मानती हूँ कि ये माताए धन्य है, जिनकी अपनी कुक्षि में उत्पन्न हुए, स्तन-पान के लोभी बालक, मधुर पालाप करते हुए, नुनलानी योनी में मन्मन बोलते हुए जिनो स्तनमूल कक्षा-भाग में अभिसरण करते है, एव फिर उन मुंग्यालको यो जो माताए कमन के ममान अपने कोमल हाथों द्वारा पकड़ कर गोद में बिठाती हैं पौर प्रपने बालगोगे मधुर माल गन्दी में बार बार बात करती है। मैं निश्चितरूपेण अधन्य मोर पुष्पहीन हूँ क्योकि मैंने इनमे में एक पुत्र को भी बालपीडा नहीं देगी। इस प्रकार देवको गिन मन में होगी पर मुग रमार (मोक-मुद्रा में) प्राध्यान करने लगी। शिवन-प्रस्तुत मूत्र में मात-मात पुत्र को माता बनने पर भी उनकी वाल्यत्रोदा पारि माताकीदेशी वा मिन प्रस्था-विशेष उठने वाले माल्प-विकल्पो का हृदय-दापक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। unnबिनासिर ११-मं पन वामुरे हाए गाय [स्पतिकम्मे कपकोउप-मंगस-पायम्यिते मानेर रिमिर रंगाए गए पाए हावमागमा। तए से कप्ठे वामुरेवे देवादि पामा पामिता शेए पाराममहरंग, सरिता शरवि एव क्यासो- सम्परा प्रायो! तुम मम पामिता रदस्तुट्टा बार [पित्तमानरिया पोरममा परमसोम- [अन्त जहणाए पाए दिवाए देवगतीए जेणामेव बारवईए नयरे पोसहसालाए कण्हे वासुदेवे ते उवागच्छइ, उवागच्छिता अंतरिक्खपडिबग्ने दसवन्नाई सखिखिणियाई पवरवत्याई परिहिए- वासुदेवं एवं ययासी- "अहं गं देवाणप्पिया! हरिणेगमेसो देवे महिडिए, जं तुमं पोसहसालाए अट्टम पगिहित्ता न ममं मणसि करेमाणे चिटुसि, तं एस णं देवाणप्पिया! अहं इहं हवमागए । संदिस् पं देवाणप्पिया! कि फरेमि? कि दलामि ? कि पयच्छामि ? किंवा ते हिय-इच्छितं ।" तए णं से कण्हे वासुदेवे तं हरिणेगमेसि देवं प्रतिलिक्खपडियन्नं पासइ, पासित्ता हा पोसहं पारेड, पारिता करयसपरिग्गहिय] मजलि कटु एवं धयासो- इच्छामि गं देवाणप्पिया | सहोदरं फणीयसं भाउयं विदिणं । उगी समय यहा श्रीकृष्ण वासुदेव स्नान कर, वलिकर्म कर, कौतुक-मगल और प्रायश्कि कर, यस्त्रालाारी मे विभूषित होकर देवकी माता के चरण-वदन के लिये शीघ्रतापूर्वक आ पण पामुदेव देवको माता के दर्शन करते हैं, दर्शन कर देवकी के चरणों में वदन करते है परणपन्दन कर देवकी देवो में इस प्रकार पूछने लगे- "हे माता ! पहले तो मै जब-जय आपके चरण-वन्दन के लिये पाता था, तब-तब म- मुभं दान हो हष्ट तुष्ट पावत् प्रानदिन जाती थी, पर मां ! आज आप उदास, चिन्तित याव पानपान में निमग्न-सी क्यों दिख रही हो?" गृष्ण द्वारा इस प्रकार का प्रश्न किये जाने पर देवको देवो कृष्ण वासुदेव से इस प्रका बहने लगी-हे पुत्र! वस्तुत. दात यह है कि मैने ममान प्राकृति यावत् समान रूप वाले सात पुत्र पो जन्म दिया। पर मैने उनमें से किसी एक के भी बाल्यकाल अथवा बाल-लीला का मुम नह भोगा । पुत्र! तुम भी छह छह महीनों के यन्नर में मेरे पाम चरण-वदन के लिये आते हो । प्रत मेरोमा गाच रही है कि माताए धन्य है, पुण्यगालिनी हैं जो अपनी मन्तान को स्तनपान करात है. याब उनके माप मधुर पालाप-मलाप करती हैं, मोर उनकी यालग्रीडा के प्रानन्द का अनुभव करता है। पर है पात-पुष्प हूँ। यही मब मोचती हुई में उदामीन होकर इस प्रकार का पानपान र माता की यह यात मुनकर श्रीकृष्ण गामुदेव देवकी महारानी में इस प्रकार बोरे-- "मायो! पाराम पवा चिन्तित होकर प्रातघ्यान मत करो। में ऐमा प्रयत्न करूगा बिना मगर महोदर घटा बाई -पन्न हो।" इस प्रकार कह कर श्रीकृष्ण ने देवकी माता कोट. ११.१, रि, मनोई वचनो दागधं बधाया, पास्वान किया। इस प्रकार प्रानो माता कार खान पानी माता पानाद में निकले, निकलकर वहा पोषधशाला थी वह ... परनार परमार ने पदमभन तप (ना) म्वीकार करके माने मित्र देव को भार: सी. मोकार कोण गनुदा ने भी की। पिता यह कि दन्होंने हरिगंगा 1m ! पागला न पटम काया, महा करो पौरमाता में a. E ANNकाम ग-मुग प्रादिप्रकार का त्याग कर, माया. मारियां मनान प्रारभ-ममारभ को पाकर १०] तुमं देवाणुप्पिए ! णवण्हं मासाणं बहुपडिपुण्णाणं प्रउट्ठमाणराईपियाणं यिहरकताणं प्रम्ह कुलकेउ, कुलदोध, कुलपब्वयं, कुलवडेंसय, कुलतिलगं, कुलकित्तिकर, कुलविकर, कुलजसकर, कुलाधारं, कुलापायवं, कुलविवद्धणकर, स कुमालपाणि-पायं, महोणपरिपुण्णविधियारीरं, जाय ससिसोमाकार, कंत, पियदसणं, सरूवं, देवकुमारसमप्पभं वारगं पयाहिसि । से विपणं दारए उम्मुक्कबालभाचे विण्णायपरिणयमित जोग्यणगमणुपते सूरे गोरे विकते वित्थिण्ण-विउल-बल-वाहणे रज्जवई राया भविस्सइ । तं उराले गं तुमे जाय समिणे विदछ, पारोग- तुठि, जाव मंगलकारए णं तुमे देयो ! सविणे दिठे ति फट्ट भुमो भग्नो प्रणय हेइ । देवई देवी वस देवस्स रपणो अंतियं एयमझें सोच्चा णिसम्म हट्टतुट्ठ० करयल० जाव एवं ययासी-"एवमेयं देवाणप्पिया ! तहमेयं देवाणपिया। प्रवितहमेयं देवाणपिया! यस विद्धमेयं देवाणुप्पिया! इच्छियमेयं देवाणुप्पिया! परिच्छियमेयं वयाणुपिया! इन्द्रियपडिच्छियमेये देवाणुप्पिया ! से जहेयं तुझे वयह" ति कटु तं स विणं सम्मं परिया, पडिच्छित्ता वस वेवण रण्णा प्रभण्णाया समाणी गाणामणि-रयणमत्तिचित्तानो भद्दासणाप्रो प्रभळे, प्रभठित्ता पतुरियम- चवल जाव गईए जेणेव सए सपणिज्जे तेणेव उवागच्छद, तेणेव उवागछित्ता सणिज्जसि णिसीयद, णिसोइता एवं वयासो-'मा मे से उत्तमे पहाणे मंगल्ले सविणे प्रणेहि पावस मिणेहि पडिम्मिास' त्ति कट्ट देव-गुरुजणसंवद्धाहि पसत्याहि मगल्लाहि धम्मियाहिं कहाहि सविणजागरयं पडिजागरमाणी पडिजागरमाणी विहरह। तए णं वसुदेवे राया पच्चूसकालसमयसि कोड बियपुरिसे सद्दावेइ, सद्दावेत्ता एव वपासी-- "खिप्पामेव सद्दावेह ।' पडिणियख तेणेव उवागच्छित्ता ते सुविणलक्खणपादए सदाति । तए णं ते सुविणलक्खणपाठगा वसुदेवस्स रण्णो कोडविपपुरिसेहि सद्दाविया समाणा हटतुट्ठ• हाया कय० जाव सरोरा सिद्धत्यम-हरियालिया कयमंगलमुद्धाणा सहि सएहि गेहेहितो णिगच्छंति, निपच्छित्ता जेणेव कण्हस रण्णो भयणवरवडेंसए तेणेव उवागच्छति, उवागच्छित्ता फरयल यसुदेवं जएणं विजएणं वद्धाति । तए ण ते सुविणलक्खणपा. वगा वसुदेवेणं रण्णा दिय-पूइअ-सक्कारिम-सम्माणिमा समाणा पत्तेयं पत्तेयं पुषण्णत्थेस भद्दासणेसु जिसीति । तए णं से वसुदेवे राया देवई देवि जवणियंतरिय ठावेद, वेता पुष्फ-फल पडिपुण्णहत्ये परेणं विणएणं ते सविणलक्खणपाठए एवं वयासो-"एवं खलुदेवाणप्पिया! देवई यो अज्ज तति तारिससि वासघरंसि जाय सोहं सविणे पासित्ता णं पडिबुद्धा, तपर्ण देवाणुप्पिया! जाय के मणे कल्लाणे फलवित्तिविसेसे भविस्सइ? तए णं सुविणलखणपाठगा वसुदेवास रणो अंतियं एयम8 सोच्चा णिसम्म रहतुह.. मुविर्ण ओगिहंति, मोगिहिता ईहे अणापविसति, प्रणपविसित्ता तस्स सुविणास प्रयोगहण करति, तस० भणभणेणं सद्धि संचालति, संचालिता तस्स सुविणास लद्वा गहियट्टा पुच्छियट्ठा विणिधिया मभिगयट्ठा वसुदेवरस रष्णो पुरमो सविणसस्थाई उच्चारेमाणा उच्चारमाणा एवं ययासि-"एवं खतु देवाणप्पिया! भम्हं सुविणसस्थति बायासीस सुविणा, तीसं महायिणा, वायत्तरि सव्यसुविणा विद्या । तस्य ण देवाणुपिया! तित्यपरमायरो वा चावट्टिमायरो वा तित्यपरसि वा चक्कट्टिति एयरस मोरालस्स तं ५२] [अन्तः तए ण से वस देवे राया मट्ठारससेणोप्पसेणोमो सद्दावेद, सदायित्ता एवं ययासो-"गर गं तुन्भे देवाणुप्पिया! वारवईए नयरोए प्रम्भितरवाहिरिए उस्सवक उपकरं प्रभउप्पस अंवाद कुर्डडिम अपरिम अधारणिज्ज अद्धयमुइंग प्रमिलायमल्लवाम गणियावरणाइइज्जकलिय प्रण तालायराणुचरितं पमुख्यपरकोलियाभिरामं जहारिहं ठिरियं दसदियसियं फरेह, करि- एयमाणत्तिय पच्चप्पिणह । ते वि करेन्ति, करिता तहेव पच्चप्पिति । तए णं से वस देवे राया वाहिरियाए उयट्ठाणसालाए सोहासणवरगए पुरस्याभिमुहे सग्निस सइएहि य साहस्सिएहि य सयसाहस्सिएहि य जाएहि वाहि भोगेहि दलयमाणे वलयमाणे परिच्छेमा पडिच्छमाणे एवं च णं विहरइ । तए णं तस्स अम्मापियरो पढमे दिवसे जातकामं करेन्ति, फरिता वितिय दिवसे जागरि फरेन्ति, करिता ततिय दिवसे चंदसूरवंसणियं करेन्ति, करिता एवामेव निम्यते प्रसूइजातकम्मकर सपत्ते वारसाहदिवसे विपुलं असणं पाणं खाइमं साइमं उवखडान्ति, उवयखडा वित्ता मित्त-णा णियग-सयण-संबंधि-परिजणं बलं च बहवे गणणायग-दडनायग जाय मामतेइ । तओ पच्छा व्हाया कयवलिकम्मा कयकोउप-मंगल-पायच्छिता सवालंकारविभूसिया मह महालयंसि भोयणमंडवंसि तं विपुलं असणं पाणं साइमं साइमं मित्तणाइ० गणणायग जाव सहि आसाएमाणा विसाएमाणा परिभाएमाणा परिभुजेमाणा एवं च णं विहरइ । जिमियभुत्तत्तरागया वि य णं समाणा प्रायंता चोक्खा परमसइभूया तं मित्तनाइनियगसयण- संबंधिपरिजण गणणायग० विपुलेणं पुफ्फगंधमल्लालंकारेण सकारति, समाणेति, सकारिता सम्माणित्ता एव वयासो-] "जम्हा णं अम्हं इमे दारगे गयतालुसमाणे तं होउ णं प्रम्ह एयरस दारगस्स नामधेज्जे गयस कुमाले २ । तए णं तस्स दारगस्स मम्मापियरे नाम करति गयस कुमातोत्ति सेस जहा मेहे जाव' प्रलं भोगसमत्थे जाए यावि होस्था। तदनन्तर वह देवकी देवी अपने आवासगृह मे शय्या पर सोई हुई थी। वह वासगृह (शयनकक्ष) [भीतर से चित्रित था, वाहर से श्वेत और घिसकर चिकना बनाया हुआ था । उसका उपरिभाग विविध चित्रो से युक्त था और नीचे का भाग सुशोभित था। मणियो और रत्नो के प्रकाश में उमका अंधकार नष्ट हो गया था। वह एकदम समतल सुविभक्त भाग वाला, पचवर्ण के सरस और सुवासित पुष्प-पु जो के उपचार से युक्त था । उत्तम-कालागुरु, कुन्दरुक और तुरुष्क (शिलारस) को धूप से चारो अोर सुगन्धित, सुगन्धी पदार्थों से सुवासित एव सुगन्धित द्रव्य की गुटिका के समान था। उसमे जो शय्या थी वह तकिया सहित, सिरहाने और पायते दोनो ओर तकियायुक्त थी। दोनों ओर मे उन्नत और मध्य मे कुछ नमी (झुकी हुई) थी । विशाल गगा के किनारे को रेती के अवदाल (पर रसने से फिगल जाने) के समान कोमल, क्षोमिक-रेगमी दुकूलपट से आच्छादित, रजस्त्राण (उड़ती हुई धूल को रोकने वाले वस्त्र) से ढंकी हुई, रक्ताशुक (मच्छरदानी) सहित, सुरम्य प्राजिनक (एक प्रकार का चमड़े का कोमल वस्त्र) रुई, वूर, नवनीत, अर्कतूल (आक की रुई) के समान कोमल स्पगं वाली, मुगन्धित उत्तम पुष्प, चूर्ण और अन्य रायनोपचार से युक्त थी। ऐसी शय्या पर सोई हुई देवकी देवी ने ग्रद्धं निद्रित अवस्था मे पद्धं रात्रि के समय उदार, कल्याण, शिव, धन्य, मगलकारक पोर मोभन महास्वप्न देसा पोर जागृत हुई । १. वर्ग, मूत्र २.
। अर्थात् हिगुल धातु, तरुण सूर्य, तोते की चोच और दीपशिखा के समान तेजोलेश्या का वर्ण होता है । प्रस्नुन मूत्र में नम्ण शब्द रक्त अर्थ मे प्रयुक्त हुआ है, अन्यथा तेजोलेश्या के वर्ण सम्बन्धी अर्थ की सगति नही हो सकती। जपासुमन, रक्तवत्धु-जीवक, लाक्षारस, सरस पारिजातक और तरुण दिवाकर समान जिसकी प्रभा हो, कान्ति हो, चमक हो, वर्ण हो, उसको 'जपासुमन-रक्तवन्धुजीवक-लाक्षारस-सरस पारिजातक-तरुण दिवाकर-समप्रभ' कहते है । गय-तानुय-समाण-अर्थात्-गज हाथी को कहते है । तालु अर्थात् ऊपर के दातों और कौवे के बीच का गड्ढा । गज के तालु को गजतालु कहते है। गज के तालु के समान जिसका तातु हो वह 'गज-तालु-ममान' कहलाता है। वैसे सभी प्राणियो का तालु रक्त और कोमल होता है पर हाथी का सानु विशेष रूप से रक्त और कोमल माना गया है। राजकुमार गजमुकुमार के युवक हो जाने पर उसके विवाह आदि के सम्बन्ध में क्या हुआ ? इस जिनामा के सम्बन्ध मे मूत्रकार कहते है- सोमिसबाह्मण १६-ताय गं बारवईए नपरोए सोमिले नाम माहणे परिवसइ-अडढे। रिउध्वेप जान [जजुयेद-सामवेद-प्रहध्वणवेद-इतिहासपंचमाणं, निघंटुछट्ठाणं चउण्हं वेदाणं संगोवंगाणं-सरहस्साणं सारए, पारए, धारए, पारए, सडंगवी, सद्वितंतविसारए, संसाणे, सिमाकप्पे, वागरणे, छंद, निरुत्ते, जोसामयणे, प्रमेमु य बहसु बम्हण्णएमु परिवायएसु नयेमु] सुपरिणिहिए यावि होत्मा। तरस मोमिल-मारणम्स मोमसिरो नाम माहणी होत्था । सूमाल । तस णं सोमिलस्स धूया सोमसिरोए माहणीए प्रत्तया सोमा नाम दरिया होत्या। सोमाला जाव' सुरुवा। स्वेण जावं (जोवणेणं) मावणेणं उपिस्टा उत्रिकटुसरोरा यावि होत्या। तए णं सा सोमा दारिया अण्णया कयाइ हामा जाय विभूमिया, यहि खम्नाहिं जाव' परिक्खिता सयाप्रो गिहाम्रो पडिमिक्खमइ, पडिमिक्खमित्ता जंग रायमागे तेणेव उवागया, उवान्छिता रायमार्गसि कणतिदूराएणं कोलमाणी चिट्ठा । उग द्वारा नगगे में मामिल नामा एक ब्राह्मण रहता था, जो समृद्ध था और ऋग्द, यजुर, गामवेद, अथर्ववेद इन चारो वेदो, पाचवे इतिहाम, तथा छठे निघण्टु, दन सबके अगो- पाग गति रहरम या माता था। वह इनमा 'मारक' (स्मारक) अर्थात् इनको पढानेवाला था, पताना कथा पया जी कोई वेदादि को भूल जाता था उसको पुनः याद कराता था मन. वर म्मारक था । वह वारक या अर्थात् जो कोई दूसरे लोग वेदादि का प्रमुख उच्चारण कप, उनको रोता था, इसलिये वह 'वार' था। वह 'धारक' या अर्थात् पढे को नहीं भुननेवाला या पितु उनको अच्छी तरह धारण करनेवाला था। वह वेदादि का पE-पारगत बा। छह नगा रा माता था। परितन्त्र (कापिलीय शास्त्र) में विशारद (पडित) था। १६ गनिमा, गिान, प्राचारदाम्प, व्याकरणशास्त्र, पदमास्त्र, म्युतिगात्र, मोगा :नमा मात्रा में नया दूसरे यक्ष ने शासन मोर पारिगर सम्बन्धो शास्त्री १. 171400 २ थिए, नार दानश्मा । वेदादि १ ६०] [अन्तान भगवान् अरिष्टनेमि की उपासना १८-तए णं से कण्हे वासुदेवे धारवईए नयरोए मग्झमग्झणं निगच्छा, निग्गन्यित्ता जेणे सहसंबवणे उज्जाणे जाव [जेणेव प्ररहा अरिट्ठनेमी तेणेव उवागच्छा, उवाच्छिता अरह परिटणेमिस्स छत्तातिछत्तं पडागातिपडाग विज्जाहरचारणे जंमए य देवे प्रोक्यमाणे उप्पयमा पासइ, पासित्ता प्ररहं अरिटुनेमि पंचविहेणं अभिगमेणं अभिगच्छछ । तंजहा-(१) सचित्ता दव्याणं विसरणयाए (२) अचित्ताणं दव्याणं प्रविसरणयाए (३) एगसाडियं उत्तरासंगकरणे (४) चक्लुप्फासे अंजलिपग्गहेणं (५) मणसो एगत्तीकरणेणं । जेणामेव परहा परिछनेमी तेगा मेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता प्ररहं अरिटुनेमि तिक्खुत्तो प्रायाहिणं पयाहिणं करेड, करित वंदइ, णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता अरहो अरिट्ठणेमिस्स पच्चासन णाइवूरे मुस्मूसमाणे नमसमान पंजलिउडे अभिमुहे विणएणं] पज्जुवासइ । तत्पश्चात् कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य भाग से होते हुए निकले, [निकलकर जहा सहस्रामवन उद्यान था और भगवान् अरिष्टनेमि थे, वहाँ पाये । प्राकर अरिहत अरिष्टनेमि स्वामी के छत्र पर छत्र और पताकानों पर पताका ग्रादि अतिगयों को देखा तथा विद्याधरी, चारण मुनियो और जू भक देवी को नीचे उतरते हुए एव ऊपर उठते हुए देसा। देखकर पाच प्रकार अभिगम करके अरिहत अरिष्टनेमि स्वामी के मन्मुख चले। वे पाच अभिगम इस प्रकार है -(१) पुष्प-पान आदि सचित्त द्रव्यों का त्याग, (२) वस्त्र-ग्राभूषण आदि अचित्त द्रव्यों का अन्याग, (३) एक शाटिका (दुपट्ट) का उत्तरासग, (४) भगवान् पर दृष्टि पड़ते ही दोनो हाथ जोडना और (५) मन को एकाग्र करना। ये अभिग्रह करके जहा ग्रहत् भगवान् अरिष्टनेमि धे वहा पाये । पाकर अरिहत अरिष्टनेमि को दक्षिण दिगा से प्रारम्भ करके (तीन वार) प्रदक्षिणा की । प्रदक्षिणा करके भगवान् को स्तुतिरूप वन्दन किया और नमस्कार किया। वन्दन-नमस्कार करके भगवान् के अत्यन्त ममोप नहीं और अत्यन्त दूर भी नहीं, ऐसे ममुचित स्थान पर बैठकर, धर्मोपदेश मुनने की इच्छा करते हुए, नमस्कार करते हुए, दोनों हाथ जोडे, सन्मुस रहकर] उपासना करने लगे। - धर्मदेशना और विरक्ति १९-तए णं प्ररहा परिट्ठणेमो कण्हस्स वासुदेवस्स गयसुकुमालस्स कुमारस्स तोसे य धम्म कहेइ, कण्हे पडिगए । तए णं से गयसुकुमाले अरहो अरिद्वनेमिस्स प्रतियं धम्म सोच्चा, [जं नवरं, मम्मापियरं पापुच्छामि जहा मेहो महेलियावन्नं जाय बद्रियकुले] [निसम्म हतुवै प्ररहं अरिट्टनेमि तिक्स्तो मायाहिणं पयाहिणं करेइ, करित्ता बंदइ नमसई, दित्ता नमसित्ता एवं वयासी-सद्दहामि पं भत्ते ! निर्णय पावयणं, पत्तियामि णं भंते ! निर्णय पावयण, रोएमिण भते ! निग्गंथं पावयणं, १. यहाँ मूत्रवार ने गजमुकुमाल के जीवन को "जहा महो" यह कहकर मेघकुमार के समान बताकर मा "महलियावग्न" पाठ दिया है. जिमका पर्व होता है महिलारहित या विवाहित । ज्ञाता० में मेपकुमार को विवाहित म्या किया है । पर यहाँ प्रस्तुत मद से दोनों की स्थिति को विभिन्नता दर्शायी है। यहाँ 'वाद' पार को पूर्ति हेतु हम विभिन्नता को रप्टि में रण कर उपयुक्त पूर्ति-माटो को नये परेग्राफ से पपा है। शुरू किया ६२] [अन्तकदमा तए णं से गयसुकुमाले अम्मापिाहं एवं युत्त समाणे प्रम्मापियरो एवं वयासो-तहेव पंत अम्मो ! जहेब णं तुम्भे ममं एवं वयह-"तुमं सि पंजाया! मम्हं एगे पुतं ? कते पिए मगुरणे मणामे थेग्जे वेसासिए सम्मए बहुमए प्रणमए भंडकरंडगममाणे रयणे रयणमए जीविय-उम्सासिए हियय-दि करे उंबरपुप्फ व दुल्लहे सवर्णमाए, किमंग पुण पासणयाए ? नो खलु जाया! पम्हे इच्छायो खणमवि विष्पोगं सहितए । तं भुजाहि ताय जाया! यिपुले माणुरसए कामभोगे जाव ताच वयं जीवामो । तो पच्छा प्रम्हहि कालगहि परिणययए यढिय-कुलयंसतंतुकमि निराय- यक्खे अरहो अरिदुनेमिस्स अंतिए मुंडे भविता पगाराप्रो अणगारिय पम्पइससि।" एवं खलु अम्मयानो ! माणुस्सए भवे अधुवे प्रणितिए प्रसासए वसणसमोबद्दयाभिभूते विज्जुलमाचले प्रणिच्चे जलयुब्बयसमाणे कुसग्गजलबिदुसन्निभे संझम्भरागसरिसे मुविणसणोवमे सण-पडण- विसण-धम्मे पच्छा पुरं च णे अवस्सविष्पजहणिज्जे । से के णं जाणइ अम्मयामो। के पुटिव गमणाए के पन्छा गमगाए ? त इच्छामि णं अम्मयानो! तुम्भेहि अन्भणुण्णाए समाणे परहओ अरिटुनेमिस्स अंतिए मडे भविता णं अगाराप्रो प्रणमारियं पवइत्तए । तए णं तं गयसुकुमालं कुमारं अम्मापियरो एवं वयासो-इमे य ते जाया! मज्जय-पज्जय- पिउपज्जयागए सुबहु हिरणे य सुवणे य कसे य दूसे य मणिमोतिय-संख-सिल-प्पवात-रतरपणः संतसार-सावएज्जे में अलाहि जाव प्रासत्तमानो कुलवंसानो पगाम वा पगाम भोत्तू पगाम परिभाएउ । तं अणुहोहो ताव जाया! विपुलं माणुस्सगं इड्डिसक्कारसमुदयं । तओ पच्छा प्रणय कल्लाणे प्ररमो परिट्टनेमिस्स अंतिए मुंडे भवित्ता मगाराओ अणगारियं पवइस्ससि । तए णं से गयसुकुमाले अम्मापिपरं एवं वयासी-तहेव णं त अम्मयानो ! जणं तुम्भ मर्म एव वयह-"इमे ते जाया ! प्रज्जग-पज्जग-पिउपज्जयागए जाव पच्वइस्ससि ।' एवं खलु अम्मयामो ! हिरणे य नाव सावएज्जे य अग्गिसाहिए चोरसाहिए रापसाहिए वाइयसाहिए मच्च: साहिए, अग्गिसामण्णे चोरसामण्णे रायसामण्णे दायसामणे मच्चसामणे सडण-पडण-विद्ध सणधम्मे पच्छा पुरं च णं प्रवस्स विप्पजहणिज्जे । से के णं जाणइ अम्मयामो ! कि पुग्वि गमणाए ? के पच्छा गमणाए ? तं इच्छामि प्रम्मयानो ! तुम्मेहि प्रभYण्णाए समाणे अरहओ अरिटुनेमिस्स अंतिए मडे वित्ता प्रगाराम्रो अणगारिय पम्वइत्तए । तए णं तस्स गयमुकुमालस्स कुमारस प्रमापियरो जाहे नो संचाएति गयमुकुमाल कुमार महहि विसमाणुलोमाहि माधवणाहि य पण्णवणाहि य सण्णवणाहि य विण्णवणाहि य प्रायवित्तए वा पणवित्तए वा सवित्तए वा विष्णवित्तए या ताहे विसयपडिफूलाहि संजमभउव्वेयकारिपाहि पण्णवणाहि पण्णवेमाणा एवं वयासो- एस पंजाया ! निगथे पावयणे सच्चे अणुत्तरे केलिए पडिपुग्णे नेयाउए संसुद्ध सल्लगत्तणे सिदिमागे मतिमग्गे निजाणमग्गे निव्वाणमगे सव्वदुक्खपहीणमग्गे, महीव एगंतदिहोए. खुरो इव एगंतधाराए, लोहमया इय जवा चावेयवा, वालुयाकवले इव निरस्साए, गंगा इव महानई पडिसोय- गमगाए, महासमुद्दो इव भुपाहि दुत्तर, तिक्खं कमियन्वं, गरुअं लंबेयध्वं, प्रसिधारव्वयं चरियर्व । नो खलु कप्पा जापा! समणाणं निगंयाणं आहाकम्मिए वा उद्देसिए वा कोयगडे वा विए पाए वा दुग्भिवसभत्ते वा कतारमते वा बलियाभते वा गिलाणभत्ते वा मूलभोयणे या कंवभोयणे या फलनोयणे वा बीयभोयणे या हरियभोयणे वा मोतए या पायए वा।
[अन्तान है कि-हे पुत्र ! यह दादा, पडदादा और पिता के पडदादा रो माया हुप्रा यायन् उत्तम द्रव्य है इसे भोगो और फिर अनुभूतकल्याण होकर दीक्षा ले लेना। परन्तु हे माता-पिता ! यह हिरण- सुवर्ण यावत् स्वापतेय (द्रव्य) सब अग्निसाध्य है-इमे अग्नि भस्म कर सकती है, जोर चुरा मात है, गजा अपहरण कर सकता है, हिस्सेदार बंटवारा करा सकते हैं मोर मृत्यु पाने पर यह अपना नह रहता है । इसी प्रकार यह द्रव्य अग्नि के लिये समान है, प्रर्थात् द्रव्य उग के स्वामी का है, उसी प्रकार अग्नि का भी है और इसी तरह चोर, राजा, भागीदार और मृत्यु के लिये भी सामान्य है । यह सड़ने पड़ने और विध्वस्त होने के स्वभाव वाला है । (मरण) के पश्चात् या पहले अवश्य त्याग करने योग्य है । हे माता-पिता ! किसे ज्ञात है कि पहले कौन जायगा और पीछे कौन जायगा ? अतएव में यावत् दीक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ। तत्पश्चात् गजसुकुमाल के माता-पिता जब गजमुकुमाल को विषयों के अनुकूल पास्यापना (सामान्य रूप से प्रतिपादन करने वाली वाणी) से, प्रज्ञापना (विशेष रूप से प्रतिपादन करने वाली वाणी) से, सज्ञापना (सवोधन करने वाली वाणी) से, विज्ञापना (अनुनय-विनय करने वाली वाणी) मे समझाने वुझाने, सवोधन करने और अनुनय करने में समर्थ न हुए तव प्रतिकूल तथा सयम के प्रति भय और उद्वेग उत्पन्न करने वाली प्रज्ञापना से इस प्रकार कहने लगे- 'हे पुत्र ! यह निर्ग्रन्थ प्रवचन सत्य (सत्पुरुषो के लिये हितकारी) है, अनुत्तर (मर्वोत्तम है, कैवलिक-सर्वज्ञ कथित अथवा अद्वितीय है, प्रतिपूर्ण अर्थात् मोक्ष प्राप्त कराने वाले गुणों से परिपूर्ण है, नैयायिक अर्थात् न्याययुक्त या मोक्ष की ओर ले जाने वाला है, सगुद्ध अर्थात् सर्वथा निर्दोष है, शल्यकर्तन अर्थात् माया प्रादि शल्यों का नाश करने वाला है, मिद्धि का मार्ग है, मुक्ति का मार्ग (पापो के नाश का उपाय) है, निर्याण का (मिद्धि क्षेत्र का) मार्ग है, निर्वाण का मार्ग है और समस्त दुखों को पूर्णरूपेण नष्ट करने का मार्ग है । जैसे सर्प अपने भक्ष्य को ग्रहण करने में निश्चल दृष्टि रखता है, उमी प्रकार इम प्रवचन मे दृष्टि निश्चल रखनी पड़ती है। यह छुरे के ममान एक धार वाला है, अर्थात् इम मे दूसरी धार के समान अपवाद रूप क्रियायों का प्रभाव है । इस प्रवचन के अनुमार चलना लोहे के जो चवाना है । यह रेत के कवल के समान स्वादहीन है-विषयमुख मे रहित है । इमका पालन करना गगा नामक महानदी के पूर में सामने तिरने के समान कठिन है, भुजाओं से महासमुद्र को पार करना है, तीखी तलवार पर ग्राममण करने के समान है। महाशिला जैमी भारी वस्तुमो को गले में बांधने के समान है । तलवार की धार पर चलने के समान है । हे पुत्र ! निग्रंथ श्रमणों को प्राधाकर्मी, प्रौद्दे शिक क्रीतकृत (खरीद कर बनाया हुआ), स्थापित (साधु के लिए रख छोड़ा हुआ), रचित (मोदक प्रादि के चूर्ण को पुनः साधु के लिए मोदक रूप में तैयार किया हुना, दुर्भिक्ष भक्त (माधु के लिये दुर्भिक्ष के समय वनाया हुअा भोजन) कान्तार भक्त (साधु के निमित्त अरण्य में बनाया हुअा अाहार), वर्दलिका भक्त (वर्षा के समय उपाश्रय में पाकर बनाया भोजन) म्लानभक्त (रुग्ण गृहस्थ नीरोग होने की कामना से दे वह भोजन), आदि दूषित माहार ग्रहण करना नहीं कल्पता है। इसी प्रकार मूल का भोजन, कद का भोजन, फल का भोजन, वीजो का भोजन अथवा हरित का भोजन करना भी नही कल्पना है। इसके अतिरिक्त हे पुत्र! तू मुम भोगने योग्य है, दु स सहने योग्य नहीं है । नू मीन महर्ने में ममर्थ नहीं है, उप्ण सहने में ममर्थ नहीं है । भूख नही सह सकता, गए गगामा पार समोर प्रमाणे Ment जाब-सा परगुरुमनामकरण तापामो - TIN भो यापिया' गरमाग Taimunu, Har. walk in Entrit me तए ते को निम्मिा fanfrint pust arमा-पियो सोहागपग पुगाभिमाई गमोरा गाने, ना RET मोyिanm परमाणं गांपए गरमाया रग REEHan mulainfult महया महेश मिग alafaat कर जार गए , जएपवित्र मा यो- भगा AT IF TREAT,# गते प्रयो? तए नगरुमा मा एमागो - train मामो at. यगापो रपहरण पहिं ५ पाnिt afमदासस तए न गमुहमालम मास प्रामापिरो करती हाति, पिता एक ययासो-सिपाय भी याnि founो fafe पहागाई l यसमाह रयहरणं पडिगह घ उयह सपगहारोग कासगं सहायह । तर गतेको पिपरिया गयाकुमासरत कुमारस्स पिउणा एय यता गमापा एटतुट करयम मा पता गिरिपरामा हिणि सयसहसाई, तहेय नाव कासगं सहायति । तय ग से IAL गय कुमारस famणा को यिय- परिसहि सद्दाविए समाणे हटतुळे हाए कपासिकामे नाव माग, यास्मिता करयल गयसकुमालस्स कुमारस्स पियर जएणं विजएण वावर, पजाविता एवं पासी- सविस'तुम वेवाणपिया ! जमए करणिचं? तए 4 से गम-समासस पिया तं कारावगं एप ययासो- तुम वेवाणपिया ! गयसुकमालस्स कुमारस्स परेणं जतण घउरंगुसयाने णिमणपामोग्गे मागको फप्पेहि । तए णं से कासवे एवं युत्ते समाणे हटतुद करपल जाय एवं सामा। तहमि माणाए पिणएणं धयणं पडिसणेइ, पडिणित्ता सरभिणा गंधोदएणं हत्यपाए पातालेश, पालित्ता सजाए अट्टू पडलाए पोत्तोए मुहं बंधद, मुह ययिता गवस कमालरस कुमारस परेण जतणं चतरंगुलबग्ने णिवखमणपाओगे मागकेसे कप्पेइ । तए णं सा गयस कुमालास कुमारस्स माया देवई देवो हंसलपनणेणं पडसाइएक भागकेसे पडिम्छा, प्रागकेसे परिच्छित्ता सुरभिणा गंधोदएणं पसालेद, सरभिणा गंधोवएणं पयसालित्ता अग्गेहि बरेहिं गंधेहि, मल्लेहि मच्चई, प्रग्गेहि बरेहि गंधेहि, मल्लेहि चित्ता मुडे वत्थे बंधई, मरे वत्थे बंधिता रयणकर गंसि पविखवइ, पक्सिवित्ता हार-वारिपारसियार-ण्णिमुत्तालिपगासाई सुवियोग-दूसहाई अंसूई विणिम्मुयमाणो विणिम्मयमाणो एवं ययासी-एस पं अम्हं गयस कुमालस कुमारस्स बहुस् तिहीसु य पधणीस य उस्सवेस य जगणेस य छणेस य अपच्छिमें वरिसणे भविस्तार इत्ति कट्ट सोसगमूले ठवेइ । तए णं तस्स गय-सुकुमालस्स अम्मापियरो दोच्चं पि उत्तराययकमणं सोहासणं रयाति, दोच्च पि उत्तरायक्कमणं मोहासणं रयाविता गयसुकुमालस्स कुमारस सेमापोयहि कलसेहि व्हायति १. महाबल के वर्णन मे इस पाठ हेनु-कि पयच्छामो, सेस जहा जमालिस्म तहेब जाव तएण"-दिया है। मतः ... प्रस्तुन जाव का पूरक पाठ महाबल, जमालि आदि के वर्णनो के प्राधार पर यथावश्यक रूप से मुक्ति ७० j अन्तद्दगा तए णं गयसुकुमालस्स कुमारस्त पुरिससहस्सवाहिणि सोपं दुरुढस्स समाणस्स तप्पढमयाए इमे अट्ठमंगलगा पुरओ अहाणपुवीए संपट्ठिया; तं जहा-सोस्थिय-सिरिवच्छ जाव दप्पणा; तयाणंतरं च णे पुग्णकलसभिगारं जहा उववाइए, जाव गगणतलमलिहतो पुरो प्रहापुम्वोए संपट्ठिया; एवं जहा उववाइए तहेव भाणियव्वं जाव पालोयं च करेमाणा जयजयसदं च पउंजमाणा पुरओ महाण पुबीए संपट्ठिया । तयाणंतरं च णं बहवे उग्गा मोगा जहा उववाइए जाव महापुरिसवागुरापरिक्खित्ता, गयसुकुमालस्स कुमारस्स पुरओ य मग्गयो य पासओ य प्रहाणपुटवीए संपट्ठिया । तए णं से गयसुकमाल-कुमारस्स पिया हाए कयवलिकम्मे जाव हस्थिबंधवरगए सकोरंटमल्ल- दामेणं छत्तेणं धरिजमाणेणं सेयवरचामराहि उद्धव्वमाणीहि हय-गय-रह-पवरजोह-कलियाए चाउरंगिणीए सेणाए सद्धि सपरिवुड़े, महयामडचडगर जाव परिक्खित्ते गयसकुमालम्स कुमारस्स पिट्ठनो प्रणगच्छद। तए णं तस्स गयसुकुमालस्स-कमारस्स पुरनो महं आसा पासवरा, उभो पासि जागा, गागवरा, पिट्ठो रहा, रहसंगेल्ली। तए णं से गयसकुमाल-कुमारे अन्भग्गभिंगारे, परिगहियतालि- यंटे, जसवियसेपछत्त, पवीइय सेयचामरबालवीयणाए, सविडोए जाव पाइयरवेणं, तयाणतरं च बहवे लदिग्गाहा कुतागाहा जाव पुत्थयग्गाहा, जाय वोणग्गाहा तयाणंतरं च णं अदुसयं गयाणं, अट्ठसय तुरयाणं अट्ठसयं रहाणं; तयाणतरं च णं लउड-प्रसि-कोतहत्थाणं बहूणं पायताणोणं पुरनो संपट्टियः तयाणंतरं च णं वहवे राईसर-तलवर जाव सत्थवाहप्पभिइओ पुरनो संपट्ठिया बारवईए नयरोए मज्झमग्झेणं जेणेव परहनो अरिहनेमी तेणेव पहारेत्थ गमणाए। तए णं तस्स गयसुकुमाल-कुमारस्स बारवईए नयरीए मझमझेणं णिग्गच्छमाणस्स सिंघाडग: तिय चउक्क जाव पहेस यहये प्रत्यत्थिया जहा उववाइए, जाव अभियंता म अमित्यणता य एवं ययासी-जय जय गंदा! धम्मेणं, जप जय गंदा! तवेणं, जय जय गंदा! भई ते प्रभग्गेहि पाण: दसण-चरितमत्तमेहि, प्रजियाई जिणाहि इंदियाई, जियं च पालेहि समणधम्म; जिविग्यो विय वसाह तं देव ! सिद्धिमग्भ, णिहणाहि य राग-दोसमल्ले, तवेणं धिइधणियबद्धकच्छे, महाहि य मह कम्मसत्तू झाणेणं उत्तमेणं सुक्केणं, अप्पमत्तो हराहि माराहणपडागं च धीर ! तेलोकरंगमगझे, पावय वितिमिरमणुत्तरं केवलं च गाणं, गच्छ व मोक्खं परं पदं जिणवरोवविद्वणं सिद्धिमग्गेणं प्रडिलेणं, हंता परोसहय, अभिभविय गामकंटकोवसग्गाणं, पम्मे ते अविग्धमत्थ, त्ति कट्ट अभि गंदंति, य अभियणति य। तए णं से गयसकुमाले कुमारे यारवईए नयरीए मग्झमझणं णिग्गच्छर, जिग्गच्छित्ता जेणेक सहसंबवणे उजाणे तेणेव उवागच्छद, उवाच्चित्ता छत्ताईए तित्याराइसेए पासद, पासित्ता पुरिससहस्सवाहिणि सोयं ठवेद, पुरिससहस्सवाहिणीनो सोयानो पच्चोहह । तए णं तं गयसकुमातं कुमार मम्मापियरो पुरमो का जेणेव मरहा परिद्वनेमी तेणेव उवागच्छन्ति, उवागच्चित्ता परहं परिटुमि तिषस्तो जाय गमंसित्ता एवं वयासो-एवं सलु मते ! गयसुकुमाले कुमारे पम्हं एगे पुत्ते इ? कते जाव फिमंग! पुण पासणयाए, से जहाणामए उप्पले इ वा, पउमे इ वा जाव सहस्सपत्ते इ वा पके जाए जले संबई गोवलिप्पद पंकरएणं, गोवलिप्पह जलरएणं, एपामेव गयस्: दुमाल कुमार काहि जाए, भोहि संबई गोवतिप्पद कामरएणं णोलिप्पइ भोगरएणं णो- पतिप्पा मित-गाइ-मियग-सण-संपिपरिजणेणं । एस जं देवाणुप्पिया! संसारभयुटिवणे भीए .
७२] बोले-“हे पुत्र [ al:मा' rari .intोमा) रंगना नार)। म म TRUTH को | नव गजरमार मार कारमा :"up । गोपाः परमानन RTANT TRITER THE पारा । गानुप्रिया पगामा तमगे + am - HIT Iो tir । भार-तार कर जमीन गार. It पोTER TT पगार का पुणा ने पासा याम मो) TE TEETHERat fun! गोध गजमुरुमार कुमार महाय. मा मग (मा. पु . 1) पोर गि गग्याभिषेक सोनवार्ग 1 HRTI - Hitrina पाना its गो। इसके पम्नान् गजमुरुमान के मा Infati I. ITE माग गरको पार न कर बंटाया। पोर एक गो माट गुनT TT भगा गो पारमि के कलगों में गॉड ग पाय! मग गाभिप किया। अभिपया करके हाथ गोरकर पार प- सिगा। माग प्रहार हम तुझे, यया देर नर सिकागमा प्रपोजन?" तर गजगुरुमाल ने इस प्ररार यहा - "हे माता-पिता' में किसान (प्रथा ! मो. सि पर्वा तीन, प्रापण अर्थात् दूगान । स्वर्ग, मत्यं पोर पाल तीन महीना मिलन का देवाधिप्टिन स्थान,) मे रजोहरण पोर पात्र मगवाना नया नापित को घुमाता पाहता तर गजमुकुमाल के पिता ने कौटुम्बिा पुरषों को युनाया पोर महा-मनुप्रियो ! मीनही भार मे मे तीन लाय मोनये निकाली। उनमे में दो नाग माया देकर विभाषण गे रचाहरण पोर पात्र मंगानों और एक लाख मोर्नया देकर नाई को युनायो। उपमुल मामा मुनकर हर्षित और तुष्ट हुए सेवको ने हाथ जोड़कर स्वामी के बननी को स्वीकार किया पोर भतार में में तीन लाख मुवर्ण-मुद्रा निकालकर कुत्रिकापण मे रोहरण पोर पात्र नाए नया नाई को बुनाया। गजमुकुमाल के पिता के सेवक पुरुषो द्वारा बुलाये जाने पर नाई वडा प्रमन मा । उसने स्नानादि किया और अपने शरीर को अलकृत किया। फिर गजमुकुमान के पिता के पास प्राया, पाकर उन्हे जय-विजय शब्दो से वाया और इस प्रकार कहाँ-"दगानुप्रिय! मेरे करने योग्य कार्य कहिये ।" गजमुकुमाल के पिता ने नापित में इस प्रकार कहा- देवानुप्रिय! गजमुकुमाल कुमार के अग्रकेश अत्यन्त यत्नपूर्वक चार अगुल छोडकर निष्फमण के योग्य काटी।" तब गजमुरुमाल कुमार के पिता को पाना सुनकर नापित अत्यत प्रमान हुमा मोर दोनो हाथ जोडकर बोला- 'स्वामिन् ! जमी पापको प्राज्ञा' इस प्रकार कहकर विनयपूर्वक उनके वचनों को स्वीकार किया। फिर मुगन्धित गन्धोदक से हाथ-पैर धोये और शुद्ध पाठ पट वाले वस्त्र से मुंह वाधा, फिर अत्यन्त यत्नपूर्वक गजमुकुमाल कुमार के, निष्क्रमण योग्य चार अगुल अग्रग छोड़कर गेप केसी को काटा। तदनन्तर गजसुकुमाल की माता ने हस के समान श्वेत वस्त्र में उन अयोगो को ग्रहण किया। सुगन्धिन गन्धोदक में धोया। उत्तम और प्रधान गन्ध तथा माला द्वारा उनका पर्चन किया और शुद्ध वस्त्र में बांधकर उन्हें रत्नकरटिय में रमा । इसके बाद गजमुकुमाल कुमार की माता, पुत्र-वियोग से रोती हुई हार, जल-धारा, सिन्दुवार वृक्ष के पुष्प मोर टूटी हुई मोतियों - [अन्तकृद्दर प्रियो । समान त्वचावाले, समान उम्रवाले, समान रूप-लावण्य और योवन गुणो मे युक्त तथा एक समान प्राभूषण और वस्त्र पहने हुए एक हजार उत्तम युवक पुरुषों को बुलायो।" मेवळ पुरुषों ने स्वामी के वचन स्वीकार कर शीघ्र ही हजार पुरुषों को बुलाया। वे हजार पुरुष हर्षित और तुष्ट हुए। वे स्नानादि करके एक समान प्राभूपण और वस्त्र पहनकर गजमुकुमाल के पित के पास आये और हाथ जोडकर, वधाकर, इस प्रकार वोले-'हे देवानुप्रिय ! हमारे योग्य जो कार्य हो वह कहिये ।' तव गजसुकुमाल के पिता ने उनसे कहा-"देवानुप्रियो ! तुम मन गजमुकुमाल कुमार की शिविका को वहन करो। उन्होंने शिविका वहन की। जब गजसुकुमार शिविका पर आरूढ हो गए तो सव से आगे आठ मगल अनुक्रम से चले । यथा :-(१) स्वस्तिक, (२) श्रीवत्स, (३) नन्दावतं, (४) वर्धमानक, (५) भद्रासन, (६) कलश, (७) मत्स्य और (८) दर्पण । इन पाठ मगलो के पीछे पूर्ण कलश चला, इत्यादि प्रोपपातिक सूत्र मे कहे अनुसार यावत् गगननल को स्पर्श करती हुई वैजयन्ती (ध्वजा) चली। लोग जय-जयकार करते हुए अनुक्रम मे प्रागे चले। इसके बाद उग्रकुल, भोगकुल मे उत्पन्न पुरुप यावत् वहुसंख्यक पुरुषों के समूह गजमुकुमाल के प्रागे पीछे और आसपास चलने लगे। स्नात एव विभूपित गजमुकुमाल के पिता हाथी के उत्तम कधे पर चढ़े। कोरण्टक पुप्प की माला में युक्त छत्र धारण किये हुए, दो श्वेत चामरों से विजाते हुए, अश्व, हायो, रथ और मुभटो मे युक्त, चनुरगिनी सेना सहित और महामुभटो के वृन्द से परिवृत गजमुकुमाल के पिता उसके पीछे चलने लगे। गजमुकुमाल के आगे महान् और उत्तम घोड़े, दोनो ओर उत्तम हाथी, पीछे रथ और रथ का ममूह चला। इस प्रकार ऋद्धि महित यावत् वाद्यों के शब्दों से युक्त गजमुकुमाल चलने लगे। उनके आगे कना पोर तालवृन्न लिये हुए पुरुप चले। उनके सिर पर श्वेत छत्र धारण किया हुआ था। दोनो पोर श्वेत चामर और पसे विजाये जा रहे थे । इनके पीछे बहुत-से लाठी वाले, भाला वाले, पुस्तकवाले यावत् वीणावाले पुरुप ननं । उनके पीछे एक मो पाठ हाथी, एक सौ पाठ घोडे पौर एक मो पाठ रथ चले। उसके बाद लकड़ी, तलवार, भाला लिये हुए पदाति पोधे बहन-म युवराज, धनिक, नलवर, यावत् मार्थवाह प्रादि चले। इस प्रकार द्वारका नगरी के बीच में चलने हुए नगर के बाहर महलाप्रवन उद्यान में अग्हित अरिष्टनेमि के पास जाने लगे। द्वारका नगरी के बीच मे निकलते हुए गजमुकुमाल कुमार को शृगाटक, विक, चतुष्पा पावत् राजमागों में बहुत में धनार्थी, भोगार्थी और कामार्थी पुरुष, अभिनन्दन करते हुए एव स्तुति करते हा दम प्रकार कहने लगे-“हे नन्द (यानन्द दायक)! तुम्हारा भद्र (कल्याण) हो । हे नन्द ! ममण्डित उत्तम ज्ञान, दगंन पोर चारित्र द्वारा अविजित इन्द्रियों को जीतो और श्रमण धर्म का पालन कगे। धर्य रूपी कच्छ को मजबूत बांधकर मवं विप्नों को जीता। इन्द्रियों को वग करके परिपहना मना पर विजय प्राप्त करी। नप द्वारा रागद्वेष रूपी मला पर विजय प्राप्त कर भोर उनम गुल ध्यान द्वारा प्रष्ट कर्म रूपी गो का मर्दन करो। धीर ! तीन लोक पी मिडा में ग्रा पाराधना पो पताका वैकर प्रप्रमनतापूर्वक विचरण करें और निर्मल, विगुद, मनुनर कंवल ज्ञान प्राप्त करें नया बिनवरोपदिष्ट मरल मिद्धि-मागं द्वारा परम पद मोर को प्राण करे । प्रारक धम-मार्ग मरिमी प्रभार ना विघ्न नहीं हो।" दम प्रकार नाग अभिनन्दन पोर स्तुति करने नगे। पुरुप चले । उनके ७८] [अन्तमा सोमिल द्वारा उपसर्ग २२-इमं च णं सोमिले माहणे सामिधेयस्स अट्ठाए बारवईओ नयरीप्रो वहिया पुन्वनिग्गए। समिहामो य दम्भे य कसे य पत्तामोडं य गेहइ, गंहिता तो पडिणिपत्तइ, परिणियत्तिता महा- कालस्स सुसाणस प्रदूरसामंतेणं वीईवयमाणे-वोईवयमाणे संझाकालसमयसि पविरलमणरप्ति गपसुकुमाले अणगारं पासइ, पासित्ता तं वेर सरह, सरित्ता भासुरत्ते रु? कविए चंडियिकए मिसिमि- सेमाणे एवं वयासी- "एस णं भो ! से गयसुकुमाले कुमारे अपस्थिय-जाय [पत्थिए, दुरंत-पंत-लवखणे, होग पुण्णचाउसिए, सिरि-हिरि-घिइ-कित्ति] परिवज्जिए, जेणं मम धूपं सोमसिरोए भारियाए अत्तयं सोम दारियं प्रदि@दोसपत्तियं कालवत्तिणि यिप्पजहिता मुंडे जाव पवईए । तं सेयं खलु मम गयसुरुमालात फुमारस्स येरनिज्जायणं फरेत्तए; एवं संपेहेइ, संपेहेत्ता दिसापडिलेहण करेइ, फरेता सरसं मट्टियं गेह, गेण्हित्ता जेणेव गयमुफमाले अणगारे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता गयसुकमालस्स प्रणगारस्स मत्थए मट्टियाए पालि वधइ, बंपित्ता जलंतोओ चिययानो फुल्लियकिसुयसमाणे खरिगाले कहल्लेणं' गेहह, गेहिता गयसुफमालस्स प्रणगारस्त मत्यए पविखवइ, पविखवित्ता भीए तत्थे तसिए उविग्गे संजायमए तमो सिप्पामेय प्रवक्कम, प्रवक्कमित्ता जामेव दिसंपाउन्मूए तामेव दिसं पडिगए। इधर मोमिल ब्राह्मण समिधा (यज्ञ की लकडी) लाने के लिये द्वारका नगरी के बाहर मुकुमाल अणगार के श्मशानभूमि में जाने से पूर्व ही निकला था। वह समिधा, दर्भ, कुश, डाभ एव मे पत्रामोडों को लेना है। उन्हें लेकर वहाँ से अपने घर की तरफ लौटता है। लोटते गमय महाकाल मगान के निकट (न प्रति दूर न प्रति सन्निकट) से जाते हुए सध्या काल को चला भे, जबकि मनुष्यों का गमनागमन नहीं के समान हो गया था, उसने गजमुकुमाल मुनि को यहाँ ध्यानस्थ पडे देखा। उन्हें देखते ही सोमिल के हृदय में वर भाव जागृत हुा । वह श्रोध से तमतमा उठना है पोर मन ही मन दम प्रकार बोलता है- परे । यह नो वही अप्रार्थनीय का प्रार्थी (मृत्यु की इच्छा करने वाला), [दुरन्त-प्रान्त-लक्षण पाला, पुष्पहीन चतुर्दशी में उत्पन्न हुमा हो और श्री (लज्जा तथा लक्ष्मी) से] परिवजित, गजमुकुमात कुमार है, जो भरो मोमयी भायां को कुक्षि से उत्पन्न, यौवनावस्था को प्राप्त निदोष पुत्री गामा कन्या को प्रसारण ही त्याग कर मुडिन हो यावत् श्रमण बन गया है ! इसलिये मुझे निश्चय ही मानामा को मार देगता है कि यहां से कोई देश तो नही रहा है। इस विचार से चारों भोर गजगुरुमाल में इस वर का बदला लेना चाहिये । इस प्रकार यह सोमित सोचता है मोर सोचकर दमता मा पाग के ही नानाव मे यह गीली मिट्टी लेता है, लेकर गजसुकुमाल मुनि के मस्तक पर पाल बांधता है। पान बांधकर जलती हुई चिना में में फूले हुए किंशुक (पलाश) के फूल से समान गाल-नान गेर के गारो को फिमा मपर (टोफर) में लेकर उन दहकते हुए अगारो को गजम्मान मुनिक गिर पर म देता है । गगने के बाद दम भय में शिकही उमें कोई देस न ले, भयभीत होकर पारा पर, न होकर एर उद्विग्न होकर वह वहां से शोघ्रतापूर्वक पोछे को मोर हटता हुमा भागता है। पहा में भागवाटपा यह गोमिन बिग और गे माया पाउमी मोर चला जाता है। १.T.:.11-न।
८० ] [ मन्ता गजसुकुमाल मुनि ने श्रमणधर्म की प्रत्यन्त उत्कृष्ट माराधना की है" यह जान कर अपनी वैश्रि शक्ति के द्वारा दिव्य सुगन्धित अचित्त जल की तथा पान वर्गों के दिव्य प्रचित्त फूली एव वस्त्रों के वर्षा की और दिव्य मधुर गीती तथा गन्धर्ववाद्ययन्त्रों की ध्वनि में प्राहाग को गुजा दिया। विवेचन-परम आत्मस्थ, प्रात्म-समाधि में लोन मुनि गजसुरुमाल ने मोमिल-ग्राह्मण द्वार- की गई यह भीपणातिभीषण हृदयविदारक महावेदना पूर्ण ममभावपूर्वक निप भाव से सहन की। परिणामत. केवलज्ञान और केवलदर्शन को प्राप्त कर वे मोक्ष मे पधार गये। मोक्ष-प्राप्ति मे परममहयोगी रूप (१) शुभ परिणाम पोर (२) प्रशस्त अध्ययमाय इन दो पदो का "सुभेण परिणामेण पसत्थन्झवसाणेण" शब्दो मे मूत्र में उल्लेरा किया है। दोनो का अर्थ- विभेद इस प्रकार-१ सामान्य रूप से शुभ निप्पाप विचारों को शुभ परिणाम कहते हैं । २. विशेष रूप से आत्म-समाधि मे लग जाने या गभीर प्रात्मचिन्तन मे सलग्न होने की दशा को प्रशस्त अध्यवसाय कहा गया है। "तदावरणिज्जाण कम्माण"-इम पद मे कम विगेप्य है और 'तदावरणीय' यह उसका विशेषण है। कर्म शब्द अात्मप्रदेशो से मिले कर्माणुगो का बोधक है और ज्ञान-दर्शन प्रादि पात्मिक गुणो को ढंकनेवाले, इम अर्थ का सूचक तदावरणीय शब्द है । "कम्मरयविकिरणकर'-कर्म-रजोविकिरण-कर अर्थात् ज्ञानावरणीय आदि कर्म रूप रज-मल का विकिरण-नाग करनेवाले को कमजोविकिरण-कर कहते है । "अपुव्वकरण-अपूर्वकरणम्, प्रात्मनोऽभूतपूर्व शुभपरिणामम्-अर्थात्-अपूर्णकरण शब्द जिसको पहले प्राप्ति नही हुई-इस अर्थ का बोधक है। यह पाठवे "निवृत्तिबादर गुणस्थान” का भी परिचायक माना गया है । इस गुणस्थान से दो श्रेणिया प्रारंभ होती है। उपशम श्रेणी और क्षपक श्रेणी-उपशम श्रेणीवाला जीव मोहनीय कर्म की प्रकृतियों का उपशम करता हुआ ग्यारहवे गुणस्थान तक जाकर रुक जाता है और नीचे गिर जाता है । क्षपक श्रेणी वाला जीव दशवं गुणस्थान से मीधा बारहवे गुणस्थान पर जाकर अप्रतिपाती हो जाता है । पाठवं गुणस्थान में प्रारूढ हुआ जीव क्षपक श्रेणी से उत्तरोत्तर वढता हुआ जब बारहवे गुणस्थान में पहुच जाता है तव समस्त धाती को का क्षय करता हुआ कंवल्य प्राप्त कर लेता है। तत्पश्चात् तेरहवे गुणस्थान मे स्थिर होता है। आयु पूर्ण होने पर चौदहवा गुणस्थान प्राप्त करके परम कल्याण रूप मोक्षपद को प्राप्त कर लेता है। प्रस्तुत मे सूत्रकार ने "अपुवकरण" पद देकर गजसुकुमाल के साथ अपूर्वकरण अवस्था का सम्बन्ध मूचित किया है । भाव यह है कि गजसुकुमाल मुनि ने पाठवे गुणस्थान में प्रविष्ट होकर क्षपक श्रेणी को अपना लिया था। अणते “दमणे आदि पदो की व्याख्या इस प्रकार है-१. अनंत-अंत रहित, जिसका कभी अन्त न हो, जो सदा काल बना रहे । २. अनुत्तर-प्रधान-जिससे बढकर अन्य कोई ज्ञान नहीं है, मबमे ऊंचा। ३. निर्व्याघात-व्याघात-रुकावट रहित ! ४. निरावरण-जिस पर कोई प्रावरणः पर्दा नहीं है, चारो पोर मे ज्ञान-प्रकाश की वर्षा करने वाला। ५. कृत्स्न-सपूर्ण, जो अपूर्ण नहीं है। ६. प्रतिपूर्ण-ससार के सब ज्ञेय पदार्थों को अपना विषय बनानेवाला, जिससे ससार का कोई पदार्थ मोझल नहीं है।
५२] [अन्तक तव कृष्ण वासुदेव ने द्वारका नगरी के मध्य भाग से जाते समय एक पुरुष को देखा, अति वृद्ध, जरा से जर्जरित [अति क्लान्त, कुम्हलाया हुअा दुर्वल] एव थका हुआ था। वह . दुखी था। उसके घर के बाहर राजमार्ग पर ईटो का एक विशाल ढेर पड़ा था जिसे वह एक-एक ईट करके अपने घर में स्थानान्तरित कर रहा था। तव उन कृष्ण वासुदेव ने उस पुरुष अनुकपा के लिये हाथी पर बैठे हुए ही एक ईट उठाई, उठाकर वाहर रास्ते से घर के भी पहुंचा दी। तव कृष्ण वासुदेव के द्वारा एक ईट उठाने पर (उनके अनुयायी) अनेक सैकड़ों पुरुषो टा वह बहुत बड़ा ईटो का ढेर वाहर गली मे से घर के भीतर पहुचा दिया गया । गयमुकुमाल को सिटि को सूचना २५-तए ण से कण्हे वासुदेवे वारवईए नयरीए मज्झमझणं निग्गच्छइ, निग्गच्चित्ता जे परहा परिटुनमी तेणेव उवागए, उवागच्छिता जाव [प्ररहं अरिटुनेमि तिक्खुत्तो प्रायाहिणं पाहि फरह, फरेत्ता] वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी- "कहि णे भंते ! से ममं सहोदर कणीयसे भाया गयसुकुमाले प्रणगार ज णं अहं वंवा नमसामि? तए णं प्ररहा रिटुनेमी कण्हं वासुदेवं एवं वयासो- "साहिए गं कण्हा ! गयसकुमालेणं प्रणगारणं प्रप्पणो पढे।" तए णं से कण्हे वासुदेवे र अस्टुिनेमि एवं वयासो-"कहाणं भते ! गयसुकुमालेणं प्रणगारणं साहिए प्रप्पणो अटै ?" तए " परहा परिद्वनेमो कण्हं वासुदेयं एवं वयासो-एवं खलु कण्हा गयसुकमाले णं भणगार मम कस्त पुण्यावरहकाससमयंति वंदा नमसद, वित्ता नमसित्ता एवं यासो-'च्यामि णं जाव' उपसंपग्जिता गं विहरई'।" तए णं तं गयसकमाल मणगार एगे पुरिसे पासइ, पासित्ता प्रासुरुत्ते जाव सिद्ध । तं एवं सतु वहा ! गयसकमालेणं मणगारणं साहिए अपणो अछे। वृद्ध पुरष यो महायता करने के अनन्तर कृष्ण वासुदेव द्वारका नगरी के मध्य में से होते हुए उहाँ भगवन्त अरिष्टनेमि विराजमान ये वहा मा गए । कृष्ण ने दाहिनी ओर से प्रारभ करके तीन पार भगवान् को प्रदक्षिणा परिश्मा की, वदन-नमस्कार किया। इसके पश्चात् गजसुकुमाल मुनि को वहानदेसकर उन्होंने परिहत प्ररिष्टनेमि में वन-नमस्कार करने के बाद पूछा- भगवन् ! मेरे गहोदर माता मुनि गजमुकुमाल कहा है ? मैं उनको वन्दना-नमस्कार करना चाहता है।" महाराज कृष्ण के इस प्रश्न का ममाधान करते हुए अरिहत परिप्टनेमि ने कहा- कृष्ण! मुनि गामाल ने मोक्ष प्राप्त करने का अपना प्रयोजन मिद कर लिया है। परिष्टनेमि भगवान् में पपने प्रश्न का उत्तर सुन कर कृष्ण वासुदेव परिष्टनेमि भगवान् के परनो में पुनः निवेदन करने नग- आधारित है। आयु वाधते समय अगर परिणाम मद हो तो प्राणु का वध विधिल पड़ेगा, अगर परिणाम तीव्र हो तो वध तीव्र होगा। शिथिल बधवाली प्रायु निमित्त मिलने पर घट जाती है-- नियत काल में पहले ही भोग ली जाती है और तीन बधवाली (निकाचित) मायु निमित्त मिलने पर भी नहीं घटती है । स्थानाग सूत्र मे मायुभेद के मात निर्मित यताये है जो इस प्रकार हैं- १. प्रज्भवसाण-प्रध्यवसान-स्नेह या भय रूप प्रबल मानसिक माघात होने पर मार्ग समय से पहले ही समाप्त होती है। २ निमित्त-शस्त्र, दण्ड, अग्नि प्रादि का निमित्त पाकर मागु शीघ्र समाप्त हो जाती है । ३. पाहार-अधिक भोजन करने से आयु पट जाती है। ४ वेदना--किसी भी अग मे असह्य वेदना होने पर प्रायु के दलिक समय से पूर्व ही उदय मे आकर प्रात्मा से झड़ जाते है। ५. पराघात-गड्ढे में गिरना, छत का ऊपर गिर जाना मादि बाह्य प्रापात पाकर आयु की उदीरणा हो जाती है। ६. स्पर्श-सर्प आदि जहरीले जीवो के काटने पर अथवा ऐसी वस्तु का स्पर्श होने पर जिससे शरीर मे विप फैल जाए, आयु असमय मे ही समाप्त हो जाती है । ७. प्राण-पाण-श्वास की गति बन्द हो जाने पर प्रायु-भेद हो जाता है। निमित्तो को पाकर जो प्रायु नियत काल समाप्त होने से पहले ही अन्तर्मुहूतमात्र मे भोग ली जाती है, उस प्रायु का नाम अपवर्तनीय प्रायु है । इसे सोपक्रम आयु भी कहते है। जो उपक्रम सहित हो वह सोपक्रम है । तीव्र शस्त्र, तीव्र विप,तीव्र अग्नि प्रादि निमित्तो का प्राप्त होना उपक्रम है । अनपवर्तनीय प्रायु सोपत्रम और निरुपम दोनों प्रकार की होती है। दूसरे शब्दों में इस अनपवर्तनीय प्रायु की अकालमृत्यु लानेवाले अध्यवसान आदि उक्त निमित्तों का सनिधान होता भी है और नही भी होता है। उक्त निमित्तो का सनिधान होने पर भी अनपवर्तनीय प्रायु नियतकाल से पहले पूर्ण नहीं होती। उन सब का भोग तो जीव को करना ही पड़ता है, केवल वह भोग जब स्वल्प काल मे हो जाता है यहाँ इतना ध्यान रखना आवश्यक है कि वन्धकाल में प्रायुकर्म के जितने दलिक बधते हैं, तब वह कालिक स्थिति की अपेक्षा अकालमरण कहा जाता है। २७-कहणं भंते ! तेण पुरिसेणं गयसुकुमालस्स प्रणगारस्स साहिज्जे विणे ? तए गं परहा अरिष्टुनेमी कण्हं वासुदेवं एवं ययासो- से नूर्ण कण्हा ! तुम ममं पाययंदए हव्यमागच्छमाणे चारवईए नयरीए एग पुरिसं--जाव' [जुणं जराजजरियवेहं मार सिपं पियासियं दम्पतं किलंत महइमहालयामो इट्टगरासीमो एगभग इट्टगं गहाय यहिया रत्यापहाम्रो अतोगिह मणप्पससि । तए गं तुम एमाए इट्टगाए गहियाए समाणोए मणेहि परिससएहि से महालए इट्टगस्स रासो बहिया रत्यापहामी अंतोघरसि] प्रणपवेसिए । जहा णं कहा ! तुम तस्स पुरिसस्स साहिज्जे दिग्णे, एवामेव कहा! ते पुरिसेणं गयसुकुमातस्स अणगारस्स प्रणेगभव-सयसहस्स-सचियं कामं उदोरेमाणेणं बहुकम्मणिज्जरस्थं साहिज्जे दिण्णे । -- १. देखिए मूत्र २४.
[पनामा गई है--वध, उदय, उदीरणा प्रोर मना। मिपामा निमिन में नानासमोर प्रापि में परिणत होकर कर्म-पुद्गलों ना पामा के मा गानो को नह मिन नाना बर। अवाधाकाल समाप्त होने पर प्रोर उस्य-कान-पान का गमर पाने पर कमा का शुभाशुभ फल देना उदय है। प्रवाधाकान (वणं हा का ना जाना प्रारमा को फल नही मिमा काल) व्यतीत हो चुकने पर भी जो कर्म-दनिक में उमा में पानगाले है, उनको प्रयरन विशेष से मीच कर उदय प्राप्त दनियों के माप भोग लेना औरणा है। बोहा कमा का प्राने स्वमा को न छोड कर प्रात्मा के माय नगे रहना मना है। उस पोर औरणा में यह मन्नर है कि उदय में किसी भी प्रकार के प्रयत्न के बिना म्वाभाषिक नाम में कमाल का भोग होता है और उदोरणा में प्रयन्न करने पर ही कर्मफल का भोग हो। प्रग्नुन में मुनि गजमुरुमाल ने जो कम-फल का उपभोग किया है, यह म्याभाविक क्रम में नहीं किया, किन्तु गोमिल ब्राह्मण के प्रयत्न विशेप में कर्मो का उपभोग कगया गया है, प्रत यहा रुमी को उमेरणा प्रथं प्रपेक्षित है । सोमिल ब्राह्मण का मरण २८-तए णं से कण्हे वासुदेवे परहं परिद्वनेमि एवं ययासो-से णं भंते ! पुरिसे मए कहं जाणिपब्वे ? तए पं परहा परिणेमो कण्हं वासुदेवं एवं पयासो-जे गं कहा ! तुम पारवईए नयरोए अणुप्पयिसमाणं पासेता ठियए चेव ठिहमेएणं कालं करिस्सा, तण्णं तुमं जाणिग्जासि "एस णं से पुरिसे।" तए णं से कण्हे वासुदेवे परहं परिद्वमि यंदा नमसइ, दित्ता नमसिता जेणेव पाभि- सेयं हत्यिरयणं तेणेव उवागच्छद, उवागच्छिता हात्य दुहह, दुहिता जेणेव पारयई नयरी जेणेव सए गिहे तेणेव पहारेत्य गमणाए । तए णं तस्स सोमिलमाहणस्स कल्लं जाव' जलते अपमेयास्ये प्रम्झत्यिए चितिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पणे एवं तु कण्हे वासुदेये परहं परिणाम पायदए निग्गए । तं नायमे भरहया, विण्णापमेयं अरहया, सुयमेयं प्ररहया, सिट्ठमेयं प्ररहया भयिस्सह काहस्स वासुदेवस्स । त न नग्जइ णं कण्हे वासुदेये मम केणइ क-मारेणं मारिसइति कंट भीए तत् तसिए उदिग्गे संजाय- भए सपानो गिहामो पडिणिवखमइ । कण्हस वासुदेवास धारय नार प्रणुप्पविसमाणस्स पुरनो सखि सपडिदिसि हब्वमागए। भगवान् अरिष्टनेमि द्वारा अपने प्रश्न का ममाधान प्राप्त करके कृष्ण वासुदेव फिर भगवान् के चरणों में निवेदन करने लगे-"भगवन् ! म म पुरुष को किस तरह पहचान सकता है।' श्रीकृष्ण के इस प्रश्न का ममाधान करते हुए भगवान् अरिष्टनेमि कहने लगे-'कृष्ण ! यहाँ से लौटने पर जब तुम द्वारका नगरी में प्रवेश करोगे तो उम ममय एक पुरुष तुम्हें देखकर भयभीत होगा, यह वहाँ पर पडा-पडा ही गिर जाएगा। प्रायु को ममाप्ति हो जाने से मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। उम ममय तुम ममझ लेना कि यह वही पुरुप है।' अरिष्टनेमि भगवान द्वारा अपने प्रश्न फा उत्तर मुनकर भगवान् अरिष्टनेमि को वदन एवं नमस्कार करके श्रीकृष्ण ने वहां से प्रस्थान किया और अपने प्रधान हस्तिरन पर बैठकर अपने घर की ओर रवाना हुए। उधर उस मोमिल ब्राह्मण के मन मे दूसरे दिन सूर्योदय होते ही इस प्रकार विचार उत्पन्न १. पिए-ननीय वगं, मूत्र २०.
]] [अन्तकृद्दशा ममं सहोयरे कणीयसे भायरे गयस कमाले अणगारे अकाले चेव जीवियाओ ववरोविए ति कट्ट सोमिलं माहणं पाहि कड्डावेइ, कडावेत्ता तं भूमि पाणिएणं अन्मोक्खावेइ, मभोक्खावेता जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए । सयं गिहं प्रणुप्पविट्ठ। उम ममय मोमिल ब्राह्मण कृष्ण वासुदेव को सहसा सम्मुस देख कर भयभीत हुआ और जहाँ का नहाँ स्तम्भित सडा रह गया । वही खड़े-खड़े ही स्थितिभेद से अपना आयुष्य पूर्ण हो जाने में मांग-शिथिल हो धडाम मे भूमितल पर गिर पड़ा। उस समय कृष्ण वासुदेव सोमिल ब्राह्मण को गिरता हुग्रा देखते है और देवकर इस प्रकार बोलते है- "अरे देवानुप्रियो । यही वह मृत्यु की इच्छा करने वाला तथा लज्जा एवं शोभा से रहित सोमिन ब्राह्मण है, जिसने मेरे महोदर छोटे भाई गजसुकुमाल मुनि को असमय में ही काल का ग्रास बना डाला।" ऐमा कहकर कृष्ण वासुदेव ने सोमिल ब्राह्मण के उस शव को चाडालों के द्वारा पगोटया फर नगर के बाहर फिकवा दिया और उस शव के स्पर्श वाली भूमि को पानी से धुलवाया। उग भूमि को पानी में धुलवाकर कृष्ण वासुदेव अपने राजप्रासाद में पहुंचे और अपने प्रागार में प्रविष्ट हुए। नि ३०-एय सलु जंयू ! समणेणं भगवया महावीरणं जाव' संपत्तेणं अट्ठमस्स अगस्त अतगादमाणं तच्चस्स वग्गस अट्ठमग्झयणस्स प्रयमठे पण्णते। श्री मुधर्मा स्वामी प्रपने शिष्य जवू को सम्बोधित करते हुए कहते है है जबू! यावत् मोक्ष-गाप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने अन्तगाग मूत्र के तृतीय वर्ग के अष्टम अध्ययन का यह पर्ष प्रतिपादित किया है।
१०-१३ अज्झयणारिण
तृतीय वर्ग की समाप्ति
तृतीय वर्ग की समाप्ति
३२-एवं दुम्मुहे वि । कूवए वि । तिणि वि बलदेव-धारिणी-स.या।
दारुए वि एवं चेव, नवर- वस देव-धारिणी-सए।
एवं-प्रणाहिट्ठी वि वस देव-धारिणी-सए।
एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव' सपत्तणं पट्ठमस्स अंगस्स अंतगडद
तच्चस्स वग्गस्स तेरसमस्स प्रज्झयणस्स प्रयमठे पण्णत्ते ।
इसी प्रकार दुर्मुस और कूपदारक कुमार का वर्णन जानना चाहिये। दोनो के पिता व
पौर माता धारिणी थी।
दारुक और अनाधृष्टि भी इसी प्रकार है। विशेष यह है कि वसुदेव पिता और धादि
माता थी।
श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-"हे जवू ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने आठवे अग अतग
दशा मूत्र के तीसरे वर्ग के एक से लेकर तेरह अध्ययनों का यह भाव फरमाया है ।"
इसी प्रकार मनिरत कुमार का भी वर्णन है। विशेष यह है कि प्रद्युम्न पिता और बंदी [अन्तकृद्दर श्रीजवू स्वामी ने सुधर्मा स्वामी से निवेदन किया-"भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्र ने आठवे अग अतकृत्दशा के तीसरे वर्ग का जो वर्णन किया वह सुना। अतगडदशा के चौथे वर्ग के हे पूज्य ! श्रमण भगवान् ने क्या भाव दर्शाये है, यह भी मुझे बताने की कृपा करें।" सुधर्मा स्वामी ने जवू स्वामी से कहा-'हे जवू ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने अंतगड- दशा के चौथे वर्ग मे दश अध्ययन कहे है, जो इस प्रकार है- (१) जालि कुमार, (२) मयालि कुमार, (३) उदयालि कुमार, (४) पुरुपसेन कुमार (५) वारिषेण कुमार, (६) प्रद्युम्न कुमार, (७) शाम्ब कुमार (८) अनिरुद्ध कुमार, (६) सत्यनेमिः कुमार और (१०) दृढनेमि कुमार । जवू स्वामी ने कहा-भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने चौथे वर्ग के दश अध्ययन कहे है, तो प्रथम अध्ययन का श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु ने क्या अर्थ बताया है। मुधर्मा स्वामी ने कहा-हे जवू ! उस काल और उस समय में द्वारका नामकी नगरी थी, जिसका वर्णन प्रथम वर्ग के प्रथम अध्ययन में किया जा चुका है। श्रीकृष्ण वासुदेव वहाँ राज्य कर रहे थे। उस द्वारका नगरी मे महाराज 'वसुदेव' और रानी 'धारिणी' निवास करते थे। यहाँ राजा और रानी का वर्णन प्रोपपातिक सूत्र के अनुसार जान लेना चाहिए। जालिकुमार का वर्णन गौतम कुमार के समान जानना । विशेष यह कि जालिकुमार ने युवावस्था प्राप्तकर पचास कन्याओं से विवाह किया तथा पचास-पचास वस्तुओं का दहेज मिला । दीक्षित होकर जालि मुनि ने वारह अगो का ज्ञान प्राप्त किया, मोलह वर्ष दीक्षापर्याय का पालन किया, शेप सब गौतम कुमार की तरह यावत् गजब पर्वत पर जाकर सिद्ध हुए। इसी प्रकार मयालिकुमार, उवयालि कुमार, पुरुषसेन और वारिपेण का वर्णन जानना चाहिये। इसी प्रकार प्रद्युम्न कुमार का वर्णन भी जानना चाहिये । विशेष-कृष्ण उनके पिता और हनिमणी देवी माता थी। इसी प्रकार साम्य कुमार भी; विशेष-उनकी माता का नाम जाम्बवती था । ये दोनो श्री- वृष्ण के पुत्र थे। जाति प्रमृति माता की। उसकी माता पो। इसी प्रकार मत्यनेमि कुमार का वर्णन है। विशेप, समुद्रविजय पिता पौर शिवा देवी इमो प्रकार दृढनेमि कुमार का भी वर्णन समझना । ये सभी अध्ययन एक समान हैं। सुनां स्वामी ने कहा- हम प्रकार है जब । दाममानो जाले र चौथे वर्ग का धमन . पंचमो वग्गो पढमं अज्झयणं-पउमायई म. अरिष्टनेमिका पहाण. धर्मदेशना १--जब गं भते । समणेणं भगवया महावीरेणं जाव' संपत्तणं चउत्यस यग्गस्स अयम? पण्णते, पंचमस्स वग्गरस अंतगडवसाणं समणेणं भगवया महायोरेणं नाव संपत्तेणं के पट्टे पण्णत्त । एवं खलु जवू ! समणेण भगवया महावीरेणं जाव' संपतेणं पंचमस्स वग्गस्स दस अझयणा पण्णता, त जहा- संग्रहणो-गाथा (१) पउमावई य (२) गोरी (३) गंधारी (४) लवक्षणा (५) सुसीमा य । (६) जंबई (७) सच्चभामा (E) रुप्पिणी (8) मूलसिरि (१०) मूलदत्ता यि ॥ जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं जाव' संपत्तणं पंचमस्स वग्गस्स दस प्रज्झयणा पण्णता, पढमस्स गं भंते ! प्रज्झयणस्स के प्र? पण्णत ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं वारवई नपरी । जहा पदमे जाव' कण्हे वासुदेवे माहेवच्चं जाव' विहरइ । तस्स णं कण्हस्स वासुदेवास पउमावई नाम देवो होत्या, वण्णम्रो । तेणं कालेणं तेणं समएणं परहा रिटुनेमी समोसढे जाव [अहापडिहयं उग्गहं उगिहिता संजमेणं तवसा मप्पाणं भावमाणे] विहरइ । कण्हे वास देवे निग्गए जाय" पज्जुवास । तए णं मा पउमावई देवी इमोसे कहाए लबट्ठा समाणी हहतुट्ठा जहा देवई देवो जाव' पन्जुवासइ । तए गं मरहा मरिद्वनेमो फोहस्स वास देवस्स पउमावईए य, जाय धम्मकहा। परिसा पडिगया। प्रार्य जवू स्वामी ने प्रार्य मुधर्मा स्वामी से निवेदन किया-"भगवन् ! यावत् मोक्षप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने यदि अन्तगडमूत्र के चतुर्थ वर्ग का यह अर्थ वर्णन किया है, तो भगवन् ! यायत् मोक्ष प्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने अन्तगडमूत्र के पचम वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है? उत्तर में पायं मुधर्मा स्वामी बोले-“हे जवू ! यावत् मोक्ष-प्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने मन्तगडमूत्र के पचम वर्ग के दस अध्ययन बताए है । उनके नाम इस प्रकार हैं- (१) पावती देवी (२) गौरी देवी (३) गान्धारी देवी (४) लक्ष्मणा देवी (५) मुमीमा देवी (६) गाम्ययतो देवी (७) सत्यभामा देवी (८) रुक्मिणी देवी (1) मूलश्री देवी पौर(१०)मूलदत्ता देवी । जम्यू स्वामी ने पुनः पूधा-'भने ! श्रमण भगवान् महावीर ने पचम वर्ग के दस मध्ययन कहे है तो प्रथम अध्ययन का क्या अर्थ कहा है ?' मुधमा स्वामी ने कहा- है जब ! उग काल उग ममय में द्वारका नाम को एक नगरी थी, जिसका वर्णन प्रथम १-..पर वर्ग र २. प्रथम वर्ष मूत्र .. ६. प्रथम वर्ग, मूत्र ६. .. और यम, मूत्र २. तौर वर्य, मूत्र ९. - -- ६६] [अन्ताद य माणुस्सएसु य कामभोगेसु मुच्छिए गढिए गिडे प्रभोयरपणे नो संचाएमि अरहो परिट्ठनेमिट जाव [अंतिए मुडे भयित्ता प्रगारापो अणगारियं] पय्यदत्तए।' 'कण्हाइ ।' प्ररहा परि?णेमी कण्हं वासुदेवं एवं ययासो- "से नणं कण्हा | तव अयं प्रज्झस्थिए चितिए पस्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पग्जिस्यान्धपण गं ते जालिप्पभिइकुमारा जाव' पव्वइया । से नणं कहा ! प्रस्थे समरये? हंता अस्थि । तं नो खलु कण्हा ! एयं भूयं वा भव्यं वा भविम्सइ या जगणं यासुदेवा चइत्ता हिरणं जाव' पव्वइस्संति। से केण?णं भंते ! एवं बच्चइ 'न एवं भूयं या जाय' पध्वइस्संति ? 'कण्हाड !' अरहा अरि?णेमो कण्हं वास देवं एवं वयासी- "एवं खलु कण्हा ! सव्वे वि य णं वासुदेवा पुय्यमये निवाणकडा से एतेण?णं कण्हा ! एवं बच्चइ न एवं भूयं जाव पवइस्संति । अरिहन्त अरिष्टनेमि से द्वारका नगरी के विनाश का कारण सुन-ममझकर श्रीकृष्ण वासुदेव के मन मे ऐसा विचार चिन्तन, प्रार्थित एव मनोगत सकल्प उत्पन्न हुआ कि ये जालि, मयालि, उवयालि, पुरिससेन, वीरसेन, प्रद्युम्न, गाम्ब, अनिरुद्ध, दृढनेमि और सत्यनेमि प्रभृति कुमार धन्य हैं जो हिरण्यादि [मपदा और धन, सैन्य, वाहन, कोप, कोष्ठागार, पुर, अन्त.पुर आदि परिजन घोड़कर तथा वहुत-सा हिरण्य, सुवर्ण, कासा, दूष्य-वस्त्र, मणि, मोती, संख, सिला, मूगा, लालरत्न प्रादि मारभूत द्रव्य आदि] देयभाग देकर, नेमिनाथ प्रभु के पास मुडित होकर अगार को त्यागकर अनगार रूप में प्रबजित हो गये है। मैं अधन्य हू, प्रकृत-पुण्य हूं कि राज्य, कोष, कोष्ठागार, सैन्य, वाहन, नगर] अन्त.पुर और मनुष्य सबधी कामभोगो मे मूछित हूं, इन्हें त्यागकर भगवान् नेमिनाथ के पास मुडित होकर अनगार रूप में प्रवजित होने में असमर्थ है। भगवान् नेमिनाथ प्रभु ने अपने ज्ञान-बल से कृष्ण वासुदेव के मनमे पाये इन विचारों को जानकर प्रात्त ध्यान मे डूबे हुए कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार कहा-"निश्चय ही हे कृष्ण ! तुम्हारे मन में ऐसा विचार उत्पन्न हुग्रा-वे जालि, मयालि प्रादि कुमार धन्य है जिन्होने धन वैभव एक स्वजनों को त्यागकर मुनिव्रत ग्रहण किया और मैं अधन्य हूँ, प्रकृतपुण्य हू जो राज्य अन्त.पुर और मनुष्य सबधी काम-भोगो मे मृद्ध है । मैं प्रभु के पास प्रवज्या नहीं ले सकता। हे कृष्ण ! क्या यह वात सही है ?" श्रीकृष्ण ने कहा-"हाँ भगवन् ! आपने जो कहा वह मभी यथार्थ है।" प्रभु ने फिर कहा-"तो हे कृष्ण ! ऐसा कभी हुआ नही, होता नही और होगा भी नहीं कि यामुदेव अपने भव में धन-धान्य-स्वर्ण प्रादि सपत्ति छोड़कर मुनिव्रत ले लें। वासुदेव दीक्षा लेते नहीं, लो नही एव भविष्य में कभी लेगे भी नहीं।" ३.४.५.६-इमी मुत्र में पर पास मारा।
६८] [अन्तर श्रीकृष्ण के तीर्थंकर होने को भविष्यवाणी ४-तए णं से कण्हे वासुदेवे परहं अरिहर्गमि एवं वयासो- "प्रहं गं भंते ! इओ कालमासे कालं किच्चा कहि गमिस्सामि ? कहि उवय जिस्सामि । तए णं अरहा प्रस्टुिणेमो कण्हं वास देयं एवं ययासी- "एवं खलु कण्हा! तुम बारवईए नयरोए सुरग्गि-दीवायण-कोय-निवडाए मम्मापिर-नि विप्पहूणे रामेण बलदेवेण सद्धि वाहिणवेयाति अभिमुहे जुहिद्विल्सपामोखाणं पंचण्हं पंडवाणं पंडुर पुत्ताणे पास पंडमहुरं संपत्थिए कोसरवणकाणणे नग्गोहबरपाययस्स महे पुठयि सितापट्टए पोयवः पच्छाइय-सरीरे जराकुमारेणं तियखेणं कोदंड-विष्पमुक्केणं उस गा यामे पावे विद्ध समाणे कालम कालं किच्चा तच्चाए वालुयप्पभाए पुढवीए उज्जलिए नरए नेरइयत्ताए उययज्जिहिसि ।" तए णं से कण्हे वास देवे प्ररहमो अरिद्वणेमिस्स अंतिए एयम8 सोच्चा निसम्म मोहय जा झियाइ। कण्हाइ ! परहा परि?णेमी कण्हं वास देवं एवं क्यासी-"मा णं तुम देवाणप्पिा ! ओहयमः सकप्पे जाव' झियाह । एवं खलु तुम देवाणुप्पिया! तच्चामो पुढयोमो उज्जलियानो नरया मणतरं उध्वट्टित्ता इहेव जंबुद्दीवे दौवे भारहे वासे आगमेसाए उस्सप्पिणीए पुडेस जवणएस. सयदुवा नयरे बारसमे अममे नाम परहा भविस्ससि । तत्थ तुम यहूई वासाई केवलिपरियागं पाउणेत्त सिझिहिसि बुझिहिसि मुच्चिहिसि परिनिवाहिसि सव्वदुषखाणं अंतं काहिसि । तए णं से कण्हे वास देवे परहनो अरिटुणेमिस्स अंतिए एयमटुं सोचा निसम्म हट्ट माफोडेइ, अप्फोडेत्ता बगइ, वगिता तिवई छिदई, सिदिता सोहणाप करें, करता मरहं अरिमि वंदाइ नमसइ, वंवित्ता नमंसित्ता तमेव आभिसेषक हतिय दुरूहद, दुहिता जेणेव बारवई नयरी, जेणेव सए गिहे तेणेव उवागए। प्राभिसेयहत्थिरयणा पच्चाई, पचोहिता जेणेव बाहिरिया उवट्ठाणसाला जेणेव सए सीहासणे तेणेव उवागच्छइ, स्वाच्छित्ता सोहासणवरंसि पुरत्याभिमुहे निसीयइ, निसीइत्ता कोडुबियपुरिसे सद्दावेइ सहावित्ता एवं वयासी- तब कृष्ण वासुदेव अरिहत अरिष्टनेमि को इस प्रकार बोले- "हे भगवन् ! यहाँ से काल के समय काल कर मै कहाँ जाऊंगा, कहा उत्पन्न होऊगा ?" इसके उत्तर में अरिष्टनेमि भगवान् ने कहा- हे कृष्ण ! तुम सुरा, अग्नि और द्वैपायन के कोप के कारण इस द्वारका नगरी के जल कर नष्ट हो जाने पर और अपने माता-पिता एव स्वजनो का वियोग हो जाने पर राम बलदेव के साथ दक्षिणी समुद्र के तट की ओर पाण्डुराजा के पुत्र युधिष्ठिर आदि पाचो पाडवो के समीप पाण्डु मथुरा को मोर जानोगे । रास्ते में विश्राम लेने के लिये कौशाम्य वन-उद्यान में प्रत्यन्त विशाल एक वटवृक्ष के नीचे, पृथ्वीशिलापट्ट पर पीताम्बर मोडकर तुम सो जानोगे। उस समय मृग के भ्रम में जराकुमार द्वारा चलाया हुमा तीक्ष्ण तीर तुम्हारे बाएं पैर में लगेगा। इस तीक्ष्ण तीर से विद्ध होकर तुम काल के समय काल करके यालुकाप्रभा नामक तीसरी पृथ्वी में जन्म लोगे। प्रभु के श्रीमुख से १.२० देधिये वसंमत १०० ] [अन्तकृष्ट को दोहरा कर पुन मुझे मूचित करो।" कृष्ण का यह प्रादेग पाकर उन पानाकारी राजपुरुषों वमी ही घोषणा दो-तीन वार करके लौटकर इसकी सूचना श्रीकृष्ण को दी। विवेचन - पिछले मूत्रों में श्रीकृष्ण वासुदेव भगवान् अरिष्टनेमि में अपने मृत्यु-वृत्तान्त पौर नूतन जन्म कहाँ किस स्थिति में होगा, इस सम्बन्ध को जिज्ञासा का समाधान प्राप्त करते हैं। तत्पश्चात् धार्मिक घोषणा करवाते है। उनकी इस जिज्ञासा के समाधान में भगवान् अरिष्टनेमि उनके तृतीय पृथ्वी मे उत्पन्न होने और फिर भावी तीर्थकर चौवीसी मे १२ वे अमम नामक तीर्थ होने का भविष्य प्रकट किया है । कृष्ण को कृष्ण वासुदेव कहा जाता है । वासुदेव शब्द का व्याकरण के अाधार पर अर्थ होत है-“वसुदेवस्य अपत्य पुमान् वासुदेव ।" वसुदेव के पुत्र को वासुदेव कहते हैं । कृष्ण के पिता क नाम वमुदेव था, अत. इनको वासुदेव कहते है। वासुदेव शब्द सामान्य रूप से कृष्ण का वाचक है- कृष्ण का दूसरा नाम है, परन्तु वासुदेव का उक्त अर्थ मान्य होने पर भी यह गब्द जेन-दर्शन क- पारिभाषिक शब्द बन गया है । अतएव सभी अर्धचक्रवर्ती वासुदेव शब्द से कहे जाते है । जन-परम्परा मे वासुदेव नौ कहे गए है-१ त्रिपृष्ठ, २ द्विपृष्ठ, ३ स्वयभू, ४ पुरुषोत्तम, ५. पुरुषसिंह, ६ पुरुष- पुण्डरीक, ७ दत्त, ८ नारायण (लक्ष्मण), कृष्ण । इनमें कृष्ण का अतिम स्थान है । वासुदेव का पारिभाषिक पर्थ है-जो सान रत्नो, छह 'सडों में से तीन खडो का अधिपति हो तथा जो अनेकविध ऋद्धियों में सम्पन्न हो । जन-दृष्टि से वासुदेव प्रतिवासुदेव को जीतकर एव मारकर तीन खड पर राज्य किया करते है । इसके अतिरिक्त जैन परम्परा ने २८ लब्धियों में में वासुदेव भी एक लब्धि मानी है। तीन मह तथा मात रत्नों के स्वामी वासुदेव कहलाते है, इस पद का प्राप्त होना वासुदेव लब्धि है। वामदेव में महान् वल होता है। इस बल का उपमा द्वारा वर्णन करते हुए जैनाचार्य कहते हैं--का के किनारे बैठे हुए और भोजन करते हुए वासुदेव को जजीरों से वाध कर यदि चतुरगिणो मेना महित मोनह हजार राजा मिलकर गांचने लगे तो भी वे उन्हें खीच नहीं सकते, किन्तु उमी जोर को पाए हाथ में पकड कर वासुदेव पानी और उन्हें ग्रामानी से खीच सकता है । जन प्रागमों में जिन कृष्ण का उल्लेख है वे ऐसे ही वासुदेव है, वासुदेव-लब्धि में मम्पन्न है। पन्नग इमूप में एक वासुदेव कृष्ण का वर्णन किया है। सनातन धमियों के माहित्य मे वासुदेव गम मीन-गास्त्र मम्मत व्याम्या देखने में नहीं पाती। वैदिक माहित्य में वासुदेव पदविशेष या लधि- विप है ऐमा रोई उल्लेग नहीं मिलता। पन्नगड मूत्र तथा अन्य ग्रागमो मे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वासुदेव कृष्ण भगवान् मरिष्ट नमि के अनन्य अडानु भक्त थे, उपासक थे। यही कारण है कि भगवान के द्वारका में पधारने पर बीमार के माध दर्शनार्थ उनको मेवा में उपस्थित होते हैं, अपने परिवार को माथ ले जाते हैं, नामदेशना मुनते है । भगवान् में द्वारकादाह की बात सुनकर स्वय भगवान् के चरणों में दीक्षित न हो मरने के बारण पाल होते है। बालिकुमार प्रादि राजकुमारी के दीक्षित होकर पाम-नामुग होने में उनको अंगमा करते है। इन मवाना में प्रमाणित होता है कि वाम हम भगान् पाएनमि के पनुरारी थे। उनके मार्ग पर चलनेवालों को महयोग देते थे, क्षमता होने पर भीम पर सपने को पभिनागरम कहा जाय तो कृष्ण महाराज मंत्र मांशसम्म । - स्वजनेभ्यश्च । १०२] [अन्नदन लिया । वासुदेव कृष्ण ने ग्राग मान्न करने के अनेको पत्न किए, पर कर्मा का ऐमा प्रकोप चल रह था कि ग्राग पर डाला जानेवाला पानी तेल का काम कर रहा था। पानी डालने गे प्राग मान्न होती है, पर उम ममय ज्यो-ज्यो पानी डाला जाता था त्यों-त्यो अग्नि मोर अधिक भडाती थी अग्नि की भीषण ज्वालागं मानो गगन को भी भस्म करने का यत्न कर रही थी। कृष्ण वामदेव बलराम, सब निराग थे, इनके देखते देखते द्वारका जल गई, वे उसे बना नहीं सके । द्वारका के दग्ध हो जाने पर कृष्ण वासुदेव और बलराम यहा मे जाने की तैयारी करने लगे। इसी बात को सूत्रकार ने "मुरदीवायणकोवनिदवाए" इस पर मे अभिव्यक्त किया है । "अम्मा-पिइ-नियग-विप्पहूणे"-अम्बापितृ-निजाविग्रहोण:-मातृपितृभ्या विहीन --अर्थात् माता-पिता और अपने सम्बन्धियो मे रहिन । कथाकारी का कहना है कि जब द्वारका नगरी जल रही थी तब कृष्ण वासुदेव और उनके बड़े भाई बलराम दोनो प्राग बुझाने की चेष्टा कर रहे थे, पर जब ये सफल नही हुए तब अपने महलो में पहुंचे और अपने माता-पिता को बचाने का प्रयत्न करने लगे। वडी कठिनाई से माता-पिता को महल में से निकालने में सफल हुए। इनका विचार था कि माता-पिता को रथ पर बैठाकर किसी सुरक्षित जगह पर पहुचा दिया जाए। अपने विचार की पूर्ति के लिये वासुदेव श्रीकृष्ण जय अश्वगाला में पहुंचे तो देखते है, प्रवासाला जलार नष्ट हो चुकी है। वहा मे चने, रथशाला मे पाए । रथशाला को आग लगी हुई थी, किन्तु एक रथ उन्हें सुरक्षित दिखाई दिया। वे तत्काल उसी को वाहर ले आये, उस पर माता-पिता को बैठाया । घोड़ो के स्थान पर दोनो भाई जुत गए पर जैसे ही मिहद्वार पार करने लगे और रथ का जूना और दोनो भाई द्वार में बाहर निकले ही थे कि तत्काल द्वार का ऊपरी भाग टूट पड़ा और माता-पिता उसी के नीचे दब गए। उनका देहान्त हो गया । वासुदेव कृष्ण तथा वलराम से यह मार्मिक भयकर दृश्य देखा नही गया। वे माता-पिता के वियोग मे अधीर हो उठे । जैसे-तैसे उन्होंने अपने मन को सभाला, माता पिता तथा अन्य सम्बन्धियों के वियोग से उत्पन्न महान सताप को धर्यपूर्वक सहन किया । माता-पिता तथा अन्य सम्बन्धियों को दमी विहीनता को मूत्रकार ने "अम्मापिई-नियग-विप्पहूणे" इस पद में नमूचित किया है। "रामण वलदेवेण मदि" '-का अर्थ है-राम वलदेव के माथ । महाराज वसुदेव की एक गनी का नाम रोहिणी था। रोहिणो ने एक पुण्यवान् तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह परम अभिराम मुन्दर था, दगलिए उसका नाम 'राम" रपा गया। आगे चलकर अत्यन्त वलवान् पगरमी होने के कारण राम के माथ 'बल' विशेषण और जुड़ गया और वे राम, बलराम, बलभः पोर यल यादि अनेक नामों में प्रसिद्ध हो गये । जनशास्त्रों के अनुसार बलदेव एक पद विशेष भी है । प्रत्येक पामुदेव के बड़े भाई बलदेव कहलाते हैं, ये स्वर्ग या मोक्षगामी होते है । वलराम नौवे बलदेव थे । धनदेय और वासुदेव का प्रेम अनुपम और द्वितीय होता है। महाराजकृष्ण के बड़े भाई बलदेव गम को हो मूत्रमार ने "रामेण बलदेवण" इन पदो से व्यक्त किया है । "दाहिणयनाए अभिमुहे जुहिटिन्लामायाण", "पचण्ह पाडवाण पडुरायपुत्ताणं पास पमहुर माथिएका पर्व है-दक्षिणममुद्र के किनारे पाडुराजा के पुत्र युधिष्ठिर आदि पाचों पाइयो के पान पाण्डु मथुरा की ग्रोर चल दिये। द्वारका नगगे के दाय हो जाने पर पृष्ण यई चिन्तित थे। उन्होने वलराम से कहा--मौरों । .
१०४] [ पन्तादर -- - । चाहिए था । रौद्रध्यान अपने योयन पर पा गया पोर उगो गाणानपूर्ण मिति में श्रीकृष्ण के देहान्त हो गया। "नच्चाए वालुयप्पभाए पुढखोए उग्जानिए नए"-तोगम्मा गनुकाप्रभाया पुथिव्या- मुज्ज्वलिते नग्के- अर्थान बानुगाप्रभानामा नोमगे गृपो के उगालिन नगमे । जन-दृष्टि में यह जगन् ऊम्चलोस, मध्यलोक मोर मधोलोक इन तीन लोगों में विभक्त है अधोलोक मे मान नरक है। अधोलोक के जिन स्थानों में पंदा होकर जीव पाने पापो का फल भोगते है, वे स्थान नरक कहलाते है। ये मान पृयियों में विभक्त हैं जिनके नाम हैं-धम्मा, वमा, गंला, अजना, रिट्ठा, मघा तथा माघवई । इनो-रत्नप्रभा, गाराप्रभा, बालुकाप्रभा, पप्रभा, धूमप्रभा, तम प्रभा और महातम प्रभा मात गोत्र है। शब्दार्थ मे मम्बन्ध न रखने वालो मना को 'नाम' कहते है पोर शब्दार्थ का ध्यान रख कर किमी वस्तु को जो नाम दिया जाता है वह 'गोत्र' कहलाता है। वालुकाप्रभा तोगरी भूमि है। बानु रेत अधिक होने से इसका नाम वालुकाप्रभा है । क्षेत्रस्वभाव में इसमे उष्ण वेदना होती है। यहा को भूमि जलते हुए अगारो से भी अधिक तप्त है। कृप्ण वासुदेव वालुकाप्रभानामक नीसरो पृथ्वी में गंदा हुए । उज्ज्वलित शब्द के दो मर्य होते है- पहला तीसरी भूमि का माता नरकेन्द्रक-नरकस्थान विशेष मोर दूमरा भीषण भयकर । उज्ज्वलित गब्द नरक का विशेपण है । "उस्मप्पिणीए"-उत्मपिण्याम्-अर्थात् उत्सपिणीकाल मे। जन शास्त्रकारों ने काल को दो विभागो में विभक्त किया है, एक का नाम अवपिणी और दूसरे का उत्मपिणी है। जिस काल में जीवों के महनन (अस्थियों की रचनाविशेष), मस्थान, क्रमशः हीन होते चले जाए, भायु मोर अवगहना घटती चली जाए, वह काल अवसर्पिणी काल कहलाता है। इस काल में पुद्गलों के वर्ण, गध, रम और स्पर्श हीन होते चले जाते है । गुभ भाव घटते है, अगुभ भाव बढते है। यह काल दग कोड़ा-कोडी सागगेपम का है। इसके विपरीत जिम काल में जीवों के महनन आदि क्रमशः अधिकाधिक शुभ होते चले जाते है, प्रायु और अवगाहना वढती जाती है, वह उत्मपिणी काल है। पुद्गलो के वर्ण, गध, रत पौर स्पर्श भी इस काल में मगः शुभ होते जाते हैं। यह काल भी दम कोडा-फोड़ी सागरोपम का है। भगवान् अरिष्टनेमि ने कृष्ण यामुदेव ने कहा-कृष्ण ! ग्राने वाले उत्मपिणोकाल मे पुण्ड दा के गतद्वार नगर में अमम नाम के बारहवे तीर्थकर होमोगे। प्रतापनामूत्र के प्रथम पद में भारतवर्ष में माहे २५ देशो को प्रार्य माना गया है। मार्य देश में ही प्ररिहन्त, चक्रवर्ती, बलदेव और वासुदेव को उत्पत्ति बताई गई है। यहां प्रश्न उपस्थित होता है कि जिन गाठे २५ दंगों के नाम शास्त्रों में बनाए गए हैं उनमें पुण्ड देश का नाम देसने को नुगार यहाँ कृष्ण वासुदेव बारहवे तीर्थकर बनेगे, नहीं मिलना, ऐमी दगा में जमको प्रादेग कमे कह सकते हैं ? भगवान् रिप्टनेमि के कथना- - १०६ ] [अन्तकद्दशा इसके बाद वह पद्मावती महारानी भगवान् अरिष्टनेमि से धर्मोपदेश सुनकर एवं उसे हृदय मे धारण करके प्रसन्न और सन्तुष्ट हुई, उसका हृदय प्रफुल्लित हो उठा। यावत् वह अरिहत नेमिनाथ को वदना-नमस्कार करके इस प्रकार बोली- भते । निग्रंथप्रवचन पर मै श्रद्धा करती है। जैसा आप कहते हैं वह वैसा ही है। अापका धर्मोपदेश यथार्थ है । हे भगवन् । मैं कृष्ण वासुदेव को प्राज्ञा लेकर फिर देवानुप्रिय के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण करना चाहती हू । प्रभु ने कहा-'जैसे तुम्हे सुख हो वैसा करो। हे देवानुप्रिये ! धर्म-कार्य मे विलम्ब मत करो।' नेमिनाथ प्रभु के ऐसा कहने के बाद पद्मावती देवी धार्मिक श्रेष्ठ रथ पर आरूढ होकर द्वारका नगरी में अपने प्रासाद में प्राकर धार्मिक रथ से नीचे उतरी और जहा पर कृष्ण वासुदेव थे वहा पाकर अपने दोनो हाथ जोडकर सिर झुकाकर, मस्तक पर अजलि कर कृष्ण वासुदेव से इस प्रकार बोली- 'देवानुप्रिय ! आपको अाज्ञा हो तो मै अरिहत नेमिनाथ के पास मुण्डित होकर दीक्षा ग्रहण फरना चाहती हू।' कृष्ण ने कहा-'देवानुप्रिये । जैसे तुम्हे सुख हो वैसा करो।' तब कृष्ण वासुदेव ने अपने प्राज्ञाकारी पुरुषो को बुलाकर इस प्रकार प्रादेश दिया-- देवानुप्रियो ! शीघ्र ही महारानी पद्मावती के दीक्षामहोत्सव की विशाल तयारी करो, घोर तैयारी हो जाने की मुझे सूचना दो। तब आनाकारी पुरुषों ने वैसा ही किया और दीक्षा- महोत्सव की तैयारी की सूचना दी। ७-तए णं से कण्हे वासुदेये परमावई देवि पट्टयं दुरहेइ, अट्टसएणं सोवण्णकलसाणं जाय [एवं रुष्पकमसाणं, सुवष्णरप्पकलसाणे, मणिकलसाणं, सुवग्नमणिकलसाणं, रुप्पमणिकलसाणं, मुवन मणिकालमाण, भोमेजससाण सम्वोदएहि. सध्यमट्टियाहि सम्यपुष्फोह सव्वगहि सम्वमन्तेहि गप्योगहिहि म, सिद्धायएहि य, सविडोए सम्य जुए सम्ववलेणं जाय [सव्वसमुदएणं सम्वादरेणं गविभूए सविमूसाए सम्वसंभमेण सम्वपुप्फांधमल्लालंकारेणं सध्वडिय-सह-सणिणाएणं महमा दीए महया जुए महपा बलेणं महया समुदएणं महया यरतुडिय-जमगसमगप्पयाइएण संख-पणा पाहरिमन्नार-तरहि-हरक-मुरय-मुहंग-दुभिघोसरवेणं महया महा] महाणिकत्रमणाभिसेएणं पनिमिया, ममितिचित्ता सम्वासकारविमुसिय करे, करेत्ता पुरिससहसवाहिणि सिबियं दुरुहारी, एविता गराए नपरोए मम्भमभणे निय, निगमिता जैव रेवपए पयर, जेणे महतवपणे उगमापे तेणेव उवागन्या, उवान्छिता सोपं ठवेद "पमावदि" मीयामो पच्चोहण पज्योहिता जगत्र परहा परिनुमा तेणेव उammar, Gवागता रह परिष्टुमि तिश्नुत्तो माहिम-पयाहि करेजा करेसा नमार, वस्तिानमसित्ता एवं वातो- एम भने ! मम पाणहिलो पउमाई नाम देवो वा कता पिया माण्णा मणाभिरामा जागोपिरसामा हिपरामरणित, रितु पिय दुम्सहा सवणयाए] किमंग पुण पासणयाए यह देगलिय! मिसिर्गािमात दमयामि पर गं देवाणप्पिया ! सिस्सिमिभिक्त । ar . १०८] [पन्नादगा तए ण सा पउमावई प्रज्जा बहपरिपुग्णाई योसं यासाई सामण्णपरियागं पाउणा, पाणिता मासियाए सलेहणाए प्रपाणं भूसेइ, भूसेत्ता सटि भत्ताई प्रणसगाए थे, वित्ता जस्सद्वाए कोई नग्गभावे जाव [मडमा, केसलोए, यमचेरवासे, महाग, प्रच्छत प्रवाहणय भूमिसेजामो, फलगसेज्जामो, परघरप्पयेसे, लतावलाई माणायमाणाई, परेसि होलणाम्रो, निवणामो, खिसणाओ, तालणालो, गरहणाम्रो, उच्चायया विरुवल्या गायोस परीसहोयसगा-गामकटगा महियासिज्जति] तमझें पाराहेइ, चरिमुस्तासेहि सिद्धा। तब उस पद्मावती देवी ने ईशान-कोण में जाकर स्वयं अपने हाथों से अपने शरीर पर धारण किए हुए सभी आभूपण एव अलकार उतारे और स्वय ही अपने केसों का पनमुष्टिक लोच किया। फिर भगवान् नेमिनाथ के पाम पाकर वन्दना की। चन्दन नमस्कार करके इस प्रकार कहा-“भगवन् । यह समार जन्म, जरा, मरण प्रादि दुप रूपी आग में जन रहा है। यावत् मुझे दीक्षा दे।" इसके बाद भगवान् नेमिनाथ ने पद्मावती देवी को स्वयमेव प्रव्रज्या दी, और स्वय हो यक्षिणी श्रार्या को शिप्या रूप में प्रदान की। तब यक्षिणी प्रार्या ने पपावती को धर्मशिक्षा दी, यावत् इन प्रकार सयमपूर्वक प्रवृत्ति करनी चाहिए। तब वह पावती आर्या मिमिति, [भापासमिति, एपणासमिति, प्रादान-भाण्ड-मात्र-निक्षेपणा समिति, उच्चार-प्रसवण-सेल-जल्ल-सिघाण-परिष्ठापनिका समिति, मन समिति, वचनसमिति, काय-समिति इन आठ समितियों और मनोगुप्ति, वचनगुप्ति पौर कायागुप्ति में सम्पन्न, इन्द्रियों का गोपन करने वाली गुप्तेन्द्रिया-कछुए की भान्ति इन्द्रियो को वश मे करने वाली] ब्रह्मचारिणी प्रार्या हो गई। तदनन्तर उस पयावती ग्रार्या ने यक्षिणी प्रार्या से सामायिक मे लेकर ग्यारह अगों का प्रध्ययन किया, बहुत से उपवास-चेले-तेले-चोले-पचोले-मास और अर्धमाम-खमण आदि विविध तपस्या से आत्मा को भावित करती हुई विचरने लगी। इस तरह पद्मावती प्रार्या ने पूरे वीस वर्ष तक चारित्रधर्म का पालन किया और अन्त में एक माम को सलेपना में प्रात्मा को भावित कर, साठ भक्त अनशन पूर्ण कर, जिम अर्थ-प्रयोजन के लिये नग्नभाव, [मुण्डभाव, कंगलोच, ब्रह्मचर्यवास, अस्नानक, पछत्रक, अनुपाहनक, भूमिशय्या, फलकशय्या, परगृहप्रवेश, लाभालाभ, मानापमान, होलना, अवहेलना, निन्दा, सिसना, ताउना, गहीं, विविध प्रकार के ऊचे-नीचे २२ परिपह तथा उपमर्ग महन किये जाते है उम अर्थ का आराधन कर पन्तिम श्वास मे मिड-बुद्ध-मुक्त हो गई। २-८मध्ययन गौरी प्रादि १-तेणं कालेण तेणं ममएण पारवई नयरी | रेवयए पवए। उज्जाणे नंदणदणे । तस्य गं भारयईए नयरीए कम्हे वासुदेवे। तस्स गं काहस्स वासुदेवास गोरी देयो, यण्णमो। परहा समोसदे! कण्हे गिगए । गोरो जहा पउमावई तहा निगया। पम्मकहा। परिसा परिगया। कण्हे वि । तए में मा गोरो जहा पउमाई तहा निवखंता जाव' सिला। 1. ब. ब..
जेहपुत्त कर्डवे ठवेत्ता पुरिससहस्सयाहिणोए सोयाए निक्खते जाय प्रणगारे जाए-इरियासमिए- माइपाई एक्कारस अंगाह अहिज्जा । सेसं जहा खदयास गुणरयणं तवोकम्मं सोलसवासाई परियामो। तए णं से मकाई मणगारे समणस्स भगवमो महावीरस्स तहारूवाणं येराणं प्रतिए सामाइय- छट्ठो वग्गो-षष्ठ वर्ग १-२ अध्ययन मकाई और किकम १-जइ ण भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमरस अंगस अंतगडदसाणं पंच वग्गस्स प्रयमढे पण्णत्ते, छट्ठम्स णं भंते ! वग्गस्स के प्रठे पण्णते? एवं खलु जबू! समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमः स अंगस्स पंतगडबसाणं घट्न वग्गस्स सोलस अज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा- सगहणी गाहा (१) मकाइ (२) किकमे चेव, (३) मोग्गरपाणी य (४) कासवे । (५) खेमए (६) घिइहरे, चेव (७) केलासे (८) हरिचंदणे ॥१॥ (९) वारत्त (१०) सुदंसण (११) पुण्णभद्द तह (१२) सुमणभद्द (१३) सुपइ8 । (१४) मेहे (१५) प्रइमुत्त (१६) अलाके, अझयणाणं तु सोलसयं ॥२॥ जइ सोलस मज्झयणा पण्णता, पदमस गं भंते ! अज्झयणस्स अंतगडदसाण के अ पण्णते? एवं पलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएण रायगिहे नपरे। गुणसिलए चेइए । सेणिए राया तत्य णं मकाई नाम गाहावई परिवसइ-पडे जाव' प्रपरिभूए । तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावारे गुणसिलए जाव [चेइए प्रहापडित्यं जाना निगया। तए से मकाई गाहावई इमोसे कहाए । सो जहा पाए गंगदत्त तहेय इमो । जाय गुप्तवंभयारी। तहेय विउले सिद्ध। किकमे वि एवं चेव जाव' विउले सिद्ध । १. वर्ग ३, मूत्र १. २... वर्ष १. मूत्र १८.
एपनी धारावाला, शापायों के प्रापम म मघन मिलने में गहरी छायावाला, रम्य तथा महामेरी ममुहारी नरह प्रदान हो रहा था। उममे पानी वर्गा के फल मिले हुए। वह बगीचाम नंगमान गुगना. भिम भार वाला था। उगमे 'मुगरपाणिनामा पर तिमी बिना मगार पल-परिमाग (वनंमान नोन के पनुमार नगभग सानेर जाव [किण्होभासे, पल्लाल्लि पच्चियपिडगाई मेण्हइ, गेण्हिता रायगिहामो नयराम्रो पडिणिक्खमइ, परिणिक्यमिता गहाय, जेणेय मोगरपाणिस्स जक्सस्स जक्खाययणे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छिता मोग्गरपापिस जसस महरिहं पुप्फच्चणं करेइ, फरेता जाणुपायपडिए पणामं करेड, तमो पच्छा रायमग्यसि वित्ति मुहमार थी। उम पर्जुनमाली का राजगृह नगर के बाहर एक बड़ा पुष्पाराम (फलो का बगीचा) मीन निराला, कहीं स्निग्ध एर स्निप कालिवाला, वांदि गुणों की अधिकता के कारण तोर तृतीय अध्ययन मुद्गरपाणि अर्जुन मासाकार २-तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे । गुणसोलए चेइए । सेणिए राया। चेतणारेवो! तस्य प रायगिहे नयरे प्रज्जुणए नाम मालागारे परिसइ-अड्डे जाया अपरिन्ए । तस्स में प्रज्जुणयस्स मालापारस्स बंधमई नाम भारिया होत्या-सूमालपाणिपाया । तस्स मजुणगान मालायारस्स रायगिहस्स नयरस्स बहिया, एत्यं णं मह एगे पुष्फारामे होस्था-किण्हे नोले नोलोभासे, हरिए हरिप्रोभासे, सोए सोमोभासे, गिडोभासे, तिव्वे तिम्वोभासे, किन्हे तिम्वधाए, घण-कडिय-काडछाए रम्म महामह निरंयभूए वसवण्णकुमुमकुसुमिए पासारि दरिसणिज्जे प्रभिरुवे पडिरूवे । तस्स ण पुप्फारसमस प्रदूरसामते, एत्य णं प्रज्जुणयस्स मातायारस प्रज्जय-पज्जय पिइपरन पागए प्रणेगकुलपुरिम-परंपरागए मोगरपाणिस जक्सस जलाययणे होत्या-पोराणे दिवे सन्चे जहा पुण्णमद्दे। तत्थ ण मोग्गरपाणिस्स पडिमा एगं महं पलसहस्सणिफणं मनोमयं मोग्गरं गहार चिट्ठा। तए णं से प्रज्जुणए मालागारे यालप्पभिई चेव मोग्गरपाणि-जक्खभत यावि होत्या। जेणेय पुष्फाराम तेणेय उवागन्दा, उयाच्छिता पुष्फुच्चय करेइ, करता प्रगाइं वराई पुका कपमाणे विहर। उस काल उम समय में राजगृह नाम का नगर था। यहां गुणशीलकनामक नगर में राजा घोपिक राज्य करते थे। उनको रानी का नाम चेलना था। उस राजगृह 'पर्जुन' नाम का एक माली रहता था। उमको पत्नी का नाम 'बन्धुमती' था, जो अत्यन्तं मुन्दर पर मान पालिवाना था, हा हरित एव हरित मानवालाको दष्टि में कही गीत मोर उद्यान था। उन नगर में भानि को समताव पाम्लित करने वाला प्रतिपय दर्शनीय था। उन पर नागपुरगापा-बाप-दादी में नया या दुगपग गन्धित था। यह पूरीमा पाएनार गमन sfrii) भारता मोहे का एक मुगर था। .......
पागए पणेगकलपुरिम-परंपरागए मोगगरपाणिस्स जक्खस्स जक्खायपणे होत्या-पोराणे दिए नहा पुण्णमद्दे। तस्य ण मोग्गरपाणिस्स पडिमा एगं महं पलसहस्सणिप्फण्णं प्रमोमयं मोग्गा रस्सास्सि पन्धिपपिउगाइ गेण्हइ, गेण्हित्ता रायगिहामो नयराम्रो पडिणिक्खमा, परिणिय महाप, जेणेव मोगरपाणिस्म जक्सास जवनाययणे तेणेव उवागच्छद, उवागच्छिता मोग्गरपा नार मगरा यमिक राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम चलना था। उम राजगह नम मुमार पी। उमपनमाली का राजगह नगर के बाहर एक बड़ा पुष्णाराम (फलो का गोन पा। वह पुपादान नही तृष्ण वर्ण का पा, [श्याम कान्तिवाला था, कही मार के गले को नह परनी शालिवाना था, महोदग्नि एव इग्नि कालिवाना था। स्पर्ग की दृष्टि में रही। निशाना, ही निप एक म्निम कान्निवाला, वांदि गुणों को अधिनामार नादातरा, सामायीक प्रापम में मषन मिलने में गहरी छायापाना, रम्य तथा महान ननमारनामा-चार-दादी में मनी प्राः कुलारपरा मे मम्बन्धित था। Ti 1. बिमदायमसार परिमाग (पतमान नोनप्रनुमार मगमन 11 जासाम महरिहं पुष्फचणं करेड, करेत्ता जाणुपायपडिए पणामं करेइ, तमो पच्छा रायमम्मसि । ममुहार का तासीन हो रहा था। उसमें पानी वो के फल मिल हुए। वह बनी तृतीय अध्ययन मुद्गरपाणि अर्जुन मालाकार २-तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे । गुणसोलए चेइए । सेणिए राया । चेत तस्य गं रायगिहे नयरे प्रज्जुणए नाम मालागारे परियसइ-अड्डे जाव' अपरिए । भग्नुपयस्स मातायारस्स बंधुमई नाम भारिया होत्या-समालपाणिपाया। तस्स पं मन मातापारस रायगिहरूस नयरस बहिया, एत्यं महं एगे पुष्फाराम होस्था-किण्हे जाव [कि- नोले नीलोभासे, हरिए हरिमोमासे, साए सोनोभासे, गिडगिदोभासे, तिव्वे तिब्बोमासे किप्हच्छाए, नोले नीलच्याए, हरिए हरियच्छाए, सीए सोयच्छाए, गिद्ध भिडन्याए तिथ्यच्चाए, पण-कडिय-कच्छिाए रम्मे महामह) निउरंगभूए वसद्धयण्णकुसुमकुसुमिए । वरिमणिग्ने प्रभिल्वे पडिरूये। तस्म णं पुप्फागमस्स प्रदूरसामते, एत्य णं प्रज्जुणयस्स मालायारस्स प्रज्जय-परजय-पि घिट्टर। तए ण से प्रज्जुणए मालागारे बालप्पभिई चेय मोगरपाणि-जववभक्त यावि हे जेणेव पुप्फाराम तेणेव उवागच्छर, उवागच्छता पुप्फुच्चय करेइ, करता प्रग्गाई वा ] पप्पमाणे विहरस। उम बाल उम ममय में राजगृह नाम का नगर था। वहां गुणशीलरुनामा उद्यान था। पान' नाम का एक मानी रहता था। उसकी पत्नी का नाम बन्धुमतो था, जो प्रन्यन्न मुन्ना द्वारा मप्र एवानित करने वाला प्रतिगप दसनीय था। म भागन पयां पतवारी के ममीप ही मुद्गरपाणि मा गना, ITIHITम मुद्गरसाद नामा यः का पक्षागार पार कर FIFI) भार वाला वो का एक मुद्गर या । नामा हा कर।" यह निश्चय करके वे छही उम यक्षायतन के किवाड़ों के पीछे छिप कर निरचन सा उधर पर्जुनमाली अपनी पत्नी वन्धुमती के साथ फूल-संग्रह करके उनमे से कुछ उत्तम पून ११४ ] [अन्तकृद्दशा उस राजगृह नगर मे 'ललिता' नाम की एक गोष्ठी (मित्रमडली) थी। वह (उसके मदम्य) धन-धान्यादि से सम्पन्न थी तथा वह बहुतो से भी पराभव को प्राप्त नहीं हो पाती थी। किसी समय राजा का कोई अभीप्ट-कार्य सपादन करने के कारण राजा ने उस मिय-मंडली पर प्रसन्न होकर अभयदान दे दिया था कि वह अपनी इच्छानुसार कोई भी कार्य करने में स्वतन्य है। राज्य की ओर से उसे पूरा सरक्षण था, इस कारण यह गोष्ठो बहुत उच्छृ सल और स्वच्छन्द बन गई। एक दिन राजगृह नगर में एक उत्सव मनाने की घोषणा हुई। इस पर अर्जुनमानी ने अनुमान किया कि कल इस उत्सव के अवसर पर बहुत अधिक फूलो की माग होगी। इसलिये उन दिन वह प्रात काल मे जल्दी ही उठा और वास की छबड़ी लेकर अपनी पत्नी वन्धुमती के साथ जन्दी घर से निकला। निकलकर नगर मे होता हुअा अपनी फुलवाड़ी में पहुंचा और अपनी पत्नी के माय फूलो को चुन-चुन कर एकत्रित करने लगा। उस समय पूर्वोक्त "ललिता" गोष्ठी के छह गोष्ठिक पुरुष मुद्गरपाणि यक्ष के यक्षायतन में पाकर ग्रामोद-प्रमोद करने लगे। ४–तए णं अज्जुणए मालागारे बंधुमईए भारियाए सद्धि पुप्फुच्चयं करेइ, (पस्थियं भरेह), भरेता अम्गाई पराई पुष्फाई गहाय जेणेव मोग्गरपाणिस्स जक्खस्स जबखाययणे तेणेव उवागच्छा तए णं ते छ गोठिल्ला पुरिसा प्रज्जुणयं मालागार यधमईए भारिवाए सद्धि एग्जमाणं पासंति, पासिता अण्णमण्णं एवं वयासो- "एस ण देवाणुप्पिया! प्रज्जुणए मालागारे बंधमईए भारियाए सढि इहं हम्वमागग्या ।। सेयं खलु देवाणुपिया। प्रम्ह मज्जुणयं मालागार प्रयमोडय-धरता बंधुमईए भारिपाए सरि विउलाई भोगभोगाई भजमाणाण विहरित्तए, त कट, एयम मण्णमण्णास परिसुति, परिमणेत्ता कथातरेसु निनुषति, निच्चसा, निफवा, तुसिणीया, पच्छण्णा चिति । तए णं से पग्णए मालागारे बंधुमईए भारियाए सदि जेणेव मोगगरपाणि जस जक्खाययणे ते व उवागच्या, मालोए पणामं करेइ, महरिहं पुप्फच्चणं करे, जण्णपायपडिए पणामं करेइ । तए. गोठिल्ला पुरिसा वयववस्स कथाउंतरहितो निगच्छति नियता प्रज्जुण मालागारं गेहति, रोहित्ता प्रयमोऽय-पणं करति । पमईए मालागारीए सदि बिउलाई भोगभोगाई भुजमाणा विहरति । पंच पला । उन छह गोष्टिरु पुरुषों ने प्रजनमाली को बन्धुमती भार्या के साथ यक्षायतन को मोर माते देमा । देगार परस्पर विचार करके निश्चय किया- अर्जुनमाली अपनी बन्धुमती भार्या के सात घर हो पा रहा है। हम लोगों के लिये यह उत्तम अवसर है कि मजुनमाली को तो मोधी मुश्कियो (दोनो हाया को पीट पीये) से बनपूर्वक वाधार एक मोर पटक द मौर बन्धुमती के साथ गुबकी पर मनमानी अपनी रन्धुमती भाषा के माय यशान में प्रविष्टा परि यक्ष पर पति पाल हो उसे माम किया। फिर चुने वा उनमोत्तम फन उम पर पढ़ार दोनो घुटने भूमि पर रेकर प्रणाम दिया। उसी समय शीघ्रता में उन छह गोष्टिक पुरुषों ने किवाड़ों के पौधे में निकल १२०] [ प्रनामा है-इम नगर में ग्राए हुए 'इह पर का अर्थ है इस उमान में पाए ना मारह ममोगा' का अथं है—याधुग्रो के योग्य स्थान पर ठहरे है। मुदर्शन को अर्जुन द्वारा उपसर्ग १०-तए ण से मोगरपाणी जबसे सुद सणं समगोयासपं प्रदूरसामतेणं योईययमा वोईवयमाणं पासद, पासित्ता प्रामुरुत्ते रुठे कुयिए किए मिसिमिसेमाणे तं पलसहसगिफरणं प्रमोमयं मोगर उल्लालेमाणे-उल्लालेमाणे जेणेव सुरसणे समणोवाराए तेगेय पहारेस्थ गमगाए । तर ण से सुदंसणे समणोवासए मोगरपाणि जपलं एजमाणं पास, पासिता प्रमोए प्रतस्ये प्रग्विणे प्रवभिए प्रचलिए अमभते यत्यतेणं भूमि मजद जिता फरयसपरिहियं वसणहं सिरसावत मत्थए अंजलि फट्ट एव वयासी- "नमोत्य णं प्ररहताण जाप' संपत्ताणं । नमोस्य णं रामणस भगयो महावीरस्स प्राइगरस्स तित्थयरस्स जाव संपाविउकामस। पुयि पिणं मए समणस भगयमो महावीरस्त अंतिए थूलए पाणाइवाए पच्चपलाए जावज्जीयाए, धूलाए मुसायाए, थलाए प्रविण्णााणे सवारसतोसे कए जावज्जीवाए, इच्छापरिमाणे कए जावज्जीवाए। तं दाणि पितरसेव अंतियं सव्यं पाणावास पच्चक्खामि जावज्जीवाए, मुसावा प्रदत्तादाण मेहणं परिण पचणाम जावग्जीयाए, सम्य कोई जाव [माणं मायं लोहं पेज दोसं कलह अन्भक्सा पेसण परपरिवायं प्रससं मायामोसं] मिच्छादसणसल्लं पच्चपखामि जावज्जीवाए। जदणं एत्तो उपसागाओ मुच्चिस्सामि तो मे कापड पारित्तए । प्रह णं एत्तो उवसम्गामो न मुच्चिस्सामि तो मे तहा' पच्चयखाए चेव त्ति कटु सागार परिमं पडिवज्जइ। तए णं से मोग्गरपाणी जपे त पलसहस्सणिफण्णं प्रमोमयं मोगर उल्लालेमाणे: उल्लालेमाणे जेणेय सदसणे समणोवासए तेणेव उवागए। नो घेवण संचाएइ सदसणं समणोवासयं तेयसा समभिपडित्तए। १०–तच उम मुद्गरपाणि यक्ष ने मुदर्शन श्रमणोपासक को ममीप में ही जाते. हुए देखा। देगकर वह ऋद्ध हुग्रा, रुष्ट हुअा, कुपित हुआ, कोपातिरेक मे भीषण बना हुआ, क्रोध को ज्वाला मे जलता हुया, दात पोसता हुआ वह हजार पल भारवाले लोहे के मुद्गर को घुमाते-घुमाते जहाँ मुदर्शन श्रमणोपामक था, उम और प्राने लगा। उस समय क्रुद्ध मुद्गरपाणि यक्ष को अपनो मोर पाता देवकर मुदर्शन श्रमणोपामक मृत्यु को सभावना को जानकर भी किचित् भी भय, त्रास उद्वेग अथवा क्षोभ को प्राप्त नहीं हुआ । उमका हृदय तनिक भी विचलित अथवा भयाक्रान्त नहीं नहीं हुमा । उसने निर्भय होकर अपने वस्त्र के अचल से भूमि का प्रमार्जन किया। फिर पूर्व दिगा को मोर मुह करके बैठ गया ! बैठकर वाए घुटने को ऊचा किया और दोनो हाथ जोडकर मस्तक पर जलिपुट रमा । इसके बाद इस प्रकार बोला- में उन मभी परिहत भगवतो को, जो अतोतकाल में मोक्ष पधार गये है, एवं धर्म के मादिः कर्ता तीर्थकर श्रमण भगवान् महावीर को जो भविष्य में मोक्ष पधारने वाले है, नमस्कार करता हूँ।" १. वर्ग १. मूत्र २.
१२२] उपसम-निवारण परिम "तेजसा ममभिपडित्तए" पद का प्रयोग किया है । मुगरपाणि यक्ष ने सुदर्शन पर प्राक्रमण रिया, [अन्तकृया ११-तए णं से मोग्गरपाणो जक्खे सुबसणं समणोयासयं सध्वमो समंता परिघोलेमागे परिपोलेमाणे जाहे नो चेव णं संचाएइ सदसणं समणोवासयं तेबसा समभिपरित्तए, ताहे सुदंसणस्त समणोवासयस पुरनो सक्ति सपडिविसि ठिच्चा सदसणं समणोवासयं प्रणिमिसाए विट्ठोए मुरि निरिषपद, निरिवियता प्रज्जुणमस्स मालागारस्स सरीर विष्पजहाद,विपहित्ता तं पतसहस्सणिफणं प्रमोमयं मोग्गरं गहाय जामेव दिसं पाउम्मूए तामेव विसं पडिगए। तए ण से अज्जुणए मालागारे मोगगरपाणिणा जपणं विप्पमुक्के समाणे 'घ'ति घरणियलंसि सवंगेहि निदिए । तए णं से सुदंसणे समणीवासए 'निरुवसग' मित्ति कटु पारे । मुद्गरपाणि यक्ष सुदर्शन श्रावक के चारों ओर घूमता रहा और जब उसको अपने तेत्र में पराजित नहीं कर सका तव मुदर्शन श्रमणोपासक के सामने आकर खड़ा हो गया और अनिमेष दृष्टि गे बहुत देर तक उसे देखता रहा। इसके बाद उस मुद्गरपाणि यक्ष ने अर्जुन माली के शरीर को त्याग दिया प्रोर उस हजार पल भार वाले लोहमय मुद्गर को लेकर जिस दिशा से आया था, उसी दिशा में चला गया। मुद्गरपाणि यक्ष से मुक्त होते ही अर्जुन मालाकार 'धस्' इस प्रकार के शब्द के साथ भूमि पर गिर पड़ा। तय सुदर्शन श्रमणोपासक ने अपने को उपसर्ग रहित हुआ जानकर अपनी प्रतिज्ञा का पारण किया मोर सपना ध्यान सोला। विवेचन--प्रस्तुत सूत्र में यह दर्शाया गया है कि सेठ सुदर्शन को देखकर मर्नु न मानी ने अपना मुद्गर उघाला तो मही पर वह प्राकास में अधर ही रह गया। सुदर्शन को मारम-पाक्ति की तजस्विता के कारण वह किसी भी प्रकार से प्रत्यापात नहीं कर पाया। मूत्रकार ने इस हेतु हो गया। मुदर्शन के प्रगाधारण तेत्र में पराभून मुद्गरपाणि यक्ष अर्जुन माली के दारीर में से भाग गया और मजुन मानी भूमि पर गिर पड़ा। तब सुदर्शन ने "सकट टल गया" यह समझ कर अपना वद ममाप्त कर दिया। सुरव और मधुन भरपर्युपासना १२-तए म से पग्नुगए मालागार ततो मुहुतंतरणं भासरथे समाणे उठे, उडेता मुरंसग समगोमासर एक वयासो- "तुम्ने वाप्पियाहि वा संपस्यिया ? तर में मुरसगे समभोवासए भानुभयं मासागारं एवं ययासो-- “एवं तनु देशपिया! हं मुमो नाम समगोवामए-अभिगमनीयानोवे गुणसिलए और गम मा महानगर पाए मस्यिए।"
१२४ ] [अन्तरदशा है भते ! यही मत्य है भते । नि सदेह ऐना ही है भते ! यही इप्ट है भते ! यही स्वीकृत है मते ! यही वाछित-गृहीत है भते । जमा कि आप यह कह रहे है'-यो अप्रतिकूल बनकर पर्युपासना करना । मानसिको उपासना अर्थात्-अति सवेग (उत्माह या मुमुक्षु भाव) अपने में उत्पन्न करके, धर्म के अनुराग मे तीव्रता से अनुरक्त होना ।] उस समय श्रमण भगवान महावीर ने सुदर्शन श्रमणोपासक, अर्जुनमाली और उम विमान सभा के सम्मुरा धर्मकथा कही । सुदर्शन धर्मकथा सुनकर अपने घर लौट गया । विवेचन-प्रस्तुत सूत्र में बताया गया है कि मुद्गरपाणि यक्ष द्वारा होने वाले उपद्रव समाप्त होने पर सुदर्शन ने अपने ग्रामरण अनशन को समाप्त कर दिया। अनशन समाप्त करने के अनन्तर सेठ मुदर्शन ने बडी गभीरता एव दूरदर्शिता से काम लिया। वे अर्जुनमाली को मूच्छित दा में देवकर भयभीत नही हुए और उन्होंने वहां से जाने का भी प्रयत्न नहीं किया, प्रत्युत वै वहाँ बड़ी दान्ति के साथ बैठे रहे । कारण स्पष्ट है। उनका हृदय दयालु था, सहानुभूतिपूर्ण था । मर्जुनमानों को अचेत दशा मे छोड़कर वे जाना नहीं चाहते थे। उनका विचार था कि अर्जुनमालो अब परवगता से उन्मुक्त हो गया है, अतः इसकी देखभाल करना तथा का मार्गदर्शन करना मेरा कर्तव्य है । दगो कर्तव्यपालन को बुद्धि से उन्होंने वहां से प्रस्थान नही किया। अर्जुनमाली अन्तर्मुहूर्त तक वेसुध पडा रहा, "महत्त'तरेणं-मुहूर्तान्तरेण-स्तोककालेन- मुहूतं गन्द का अर्थ है-४८ मिनिट । दो घड़ियो को मुहूतं कहते हैं और दो घडी से पन्नमुंहूर्त कहा जाता है। मूत्रकार के कहने का प्राशय यह है कि अर्जुनमाली के शरीर से जब यह निकल कर चला गया, उसकै अनन्तर अर्जुनमाली घडाम से भूमितल पर गिर पड़ा और कुछ नमन तक बेहोग पा रहा । उसके अनन्नर उसे होग पाया। -- न्यून काल पहुँच गया। धुनको प्रया निगंध पावयणं ।' 'महामुहं देशपिया ! मा परिबंध करेहि ।' तए ग पषमुपिं सोपं करेता नारा विहार। बरंच १६. वर्ग 1, मुर२. मचेत होने पर अर्जुनमाली ने मामने उपस्थित मुदर्शन को देय उनका परिचय जानने के गाथ मवाद किया और मठ मुदगंन के साथ गुणशिलक उद्यान में भगवान महावीर के चरणों में १३ - तएणं से अग्जणए मालागारे समणरस भगवप्रो महावीरस्स अंतिए धम्म सोचा निसम्म रहतुझे समणं भगवं महावीरं तिक्तो प्रायाहिण - पयाहिणं करेड , करेता वानमंहा . प्राणए मालागारे उत्तरपुर स्थिमं दिसौभागं प्रवकमा प्रवरमिता सरमेर तए नमेगए मणगारेजचेव शिवसंमं जाव ' पटवाएतं चेव दिवसं समसपर वरिप्ता नमसित्ता एवं वयासो - ' सहामि भंते ! निगंयं पावयणं जाव ' प्रमभुमिमनो ! महारं वास , नममा , परिता नमिता म एमालय प्रभागहं आगेहा - सपा में को १२६ ] [पनारमा मडह, मरिता रायगिहाम्रो नगर पििनमागिमिसा मेणे गुगगिता भए, नेगेर समणे भगव महायोरे जाव [तेनं उगगनगा, बागमता गमगाम भगवतो महायोरम पूर: सामते गमणागमणाए परिसर, परिकमेसा एसगमगेसण प्रालोएर, मासोएसा भरापान पडिदसेइ, परियसत्ता समण मायया महायोरेण भग्भग्णाए समाणे प्रमुमिदए मागिर पाए प्रणभोययणे बिलमिय पण्णगभूएम पापा मार माहा। ए गं समणे भगय महागरे मण्णया रायगिहाम्रो पानिपनमा, परिणिमिता रहिया नगरविहारं पिहरा। तए ण से प्रजणए प्रणगारे तेग पोरालेग मिलेग पयतेण पाहिएणं महाभागेणं तबोकम्मेणं प्रप्पाणं मायेमाणे बहुपरिपुणे मासे सामण्णारियाग पाणा, पाणिता अउमासिपाए संलेहणाए प्रपाण भूमेर, भूमेता तो मत प्रणमणाए रे सा जसद्वाए कोरा नग्गभावे जाव' सिद्ध। उस समय अर्जुन मुनि को राजगृह नगर में नीन-मध्यम पुलाम भिशार्य पूमते हुए देग्पकर नगर के अनेक नागरिक-स्त्री, पुरुष, यान, र म प्रकार मही- "इसने मेरे पिता को मारा है। इसने मेरी माता को मारा है। भाई को मारा है, बहन मारा है, भार्या को मारा है, पुत्र को मारा है, कन्या को मारा है, पुत्रवधू को मारा है, एवं इसने मेरे अमुक स्वजन सबधी या परिजन को मारा है। ऐगा कहकर कोई गाली देता, कोई होलना करता, अनादर करता, निदा करता, कोई जाति प्रादि का दोष बनाकर नहीं करता, कोई भय बताकर तर्जना करता और कोई थप्पड़, ईट, पत्थर, लाठी प्रादि मे ताडना करता। इस प्रकार उन बहुत से स्त्री-पुरुष, बच्ने, बुढे पोर जवानी में प्राफोग-गाली, [होलना, अनादर, निंदा, गाँ सहते हुए], ताडित-तजित होते हुए भी वे अर्जुन मुनि उन पर मन से भी उप नही करते हुए उनके द्वारा दिये गये सभी परोपही को ममभावपूर्वक गहन करते हुए उन कष्टो को समभाव से झेल लेते एव निर्जरा का लाभ समझते । सम्यानपूर्वक उन सभी सकटी को सहन करते, बड़े एव मध्यम कुलो में भिक्षा हेतु भ्रमण करते हुए जुन मुनि को कभी भोजन मिलता तो पानी नहीं मिलता और पानी मिलता तो भोजन नहीं मिलता। वैसी स्थिति में जो भी और जैसा भी पल्प स्वल्प मात्रा मे प्रामुक भोजन उन्हें मिलता उसे वे मर्वथा प्रदीन, प्रविमन, प्रकनुप, अमलिन, आकुल-व्याकुलता रहित मखेद-भाव से ग्रहण करते, थकान अनुभव नहीं करते । इस प्रकार वे भिक्षार्थ भ्रमण करते । भ्रमण करके वे राजगृह नगर से निकलते और गुणशील उद्यान मे, जहा श्रमण भगवान् महावीर विराजमान थे, वहाँ पाते और वहां आकर [भगवान् से न प्रति दूर न प्रति निकट से उपस्थित होकर गमनागमन सम्बन्धी प्रतिक्रमण करते, भिक्षा में लगे हुए, दोषों को पालोचना करते] और फिर भिक्षा मे मिले हुए ग्राहार-पानी को प्रभु महावीर को दिखाते। दिसाकर उनकी प्राज्ञा पाकर मूळ रहित, गृद्धि रहित, राग रहित और मासक्ति रहित; जिस प्रकार १. वगं ५. मूत्र ६.
१२८] [अन्तकृया 'प्रदीणे' त्यादि तत्रादीन. गोकाभावात् अविमना न शून्यचित्त: अकलुपो द्वे पवजितवान् अनाविल जनाकुलो वा नि क्षोभत्वात् अविषादी कि मे जीवितेनेत्यादि चिन्तारहितः, अतु- एवापरितान्न.-विधान्तो योग ममाधियस्य सः तथा स्वाचिकेनन्तत्वाच्चापरितान्तयोगी। इसका अर्थ इस प्रकार है- मन में किसी प्रकार का गोक न होने से अर्जुन मुनि प्रदीन-दीनता से रहित थे, समाहित चित्त होने में प्रविमन थे, उप-रहित होने से मन में किसी प्रकार की कलुपता-मलिनता और अाफुलना नहीं थी। क्षोभगून्य होने में मन में किमी प्रकार का विपाद-दुःख नहीं था। मेरा इस प्रकार के तिरस्कृत जीवन में क्या प्रयोजन है, ऐसी ग्लानि उनके मन में नहीं थी, अतएव वह निरन्तर समाधि मे लीन थे । समाधि मे मनत लगे रहने के कारण ही अर्जुन मुनि को अपरितान्तयोगो कहा गया है । अपरिताल योग गब्द मे स्वार्थ में 'इन' प्रत्यय लगा कर अपरितान्तयोगी शब्द बनता है। "विलमिव पण्णगभूएण अप्पाणेण तमाहार ग्राहारेइ" '-का अर्थ है-जिस प्रकार साप दिल में प्रवेश करता है, उसी प्रकार पाहार को ग्रहण किया गया। इन पदों का अयं वृत्तिकार के दादा में एग प्रकार है- "यिसमिर पन्नगभूनन प्रात्मना तमाहारमाहारयति-यथा भुजगो बिलस्य पार्श्वभागदप- मगरगन् मध्यमार्गत एवात्मान बिल प्रवेशयति तथा मुगस्य पार्षद्वयस्पर्गरहितमाहार काटनालाभिमुग प्रवेश्याम्हारयतीति भावः ।" प्रयात् ग मपं दिन के दोनो भागो का स्पर्श किए बिना केवल बिल के मध्यभाग में ही ग्नि में प्ररिष्ट होता है, उसी प्रकार अर्जुन मुनि मुप के दोनो भागो का स्पगं किए बिना केवल मुग में प्राहार ग्म कर गर्ने के नीचे उतार लेते हैं । नापर्य यह है कि जिम प्रकार दिन में प्रवेश परले गमय मां अपने प्रगा । उगम पा नहीं करता, बड़े मकान में उममें प्रवेश करता है, उसो पार रिमा भार के प्रारंवाद को प्रसंशा न करते हुए रागढ प म रहिन होकर मुग में में स्पर्श हो नहीं पा हो. इस प्रभार में वन भुया को निवृत्ति के उद्देश्य में प्रजन मुनि प्राहार मेवन करते हैं। मधन में इन गविषयक मन्दों के प्रात्यनि प्रभाव का मन किया गया है । मयमी व्यक्ति गेट गाना ग्मनेन्द्रिय पर पिप प्राप्त करना है। मन मुनि ने इस मापना के रहस्य को *नामानि मनननिया या मोर म जीवन में उतार भी लिया था। न पाराम मिग परतेप पहिएण महानुभागेण तवाफम्मेग'-नेन पूर्वनित उदारण-मानेन, विन-विगायन भगवता दनन, प्रगृहांतन टभावतः स्वीतेन, महान भान-महान् अनुभाग प्रभावो यम्य, नेन ता.मंगा। यहां पर मनमुनि ने गोता मारा उनका सामना का अभियान किया गया है। प्रस्तुत गाठ में ना.मं विशेष्य है पोर मार पारि गरि है। लो प्रविचारमा म प्रकार है- का- रिता को प्रोर मन करता है। मन मुनि के माता मारामानिनि का नरमाया लोगों को मारने परामरामा11 41. Tना प्रानान कितना पानी नया - पराधीन था । वह ता यत्र की भाति प्रवृत्ति कर रहा था । अतएव मनुप्यवध योग्य कपाय को तीव्रता १५-तेणं वालेणं तेणं समएणं रायगिहे नयरे, गुणसिलए चेइए। सेणिए राया, कासवे नाम १३०] [अन्तान होती है । तप रूप अग्नि के द्वारा कर्म-मन के भस्मसात् होने पर प्रारमा गुर स्फटिक की भाति कि हो जाती है। इसलिए अर्जुनमुनि ने मयम ग्रहण करने के पनन्तर अपने कर्ममल युक्त प्रात्मा निर्मल बनाने के लिये तपरूप अग्नि को प्रचलिन किया। परिणाम-स्वरूप व कंवल्य-प्राप्ति अनन्तर निर्वाण-पद को प्राप्त हुए। थेणिकचरित्र मे लिसा है कि अर्जुनमाली के शरीर में मुद्गरपाणि यक्ष का पाच माम दिनो तक प्रवेश रहा । उसमे उसने ११४१ व्यक्तियों का प्राणान्त किया। इसमे ६७८ पुष १६३ स्त्रियाँ (थी । इससे स्पष्ट प्रमाणित है कि यह प्रतिदिन सात व्यक्तियों की हत्या करता रह यहा एक प्राशका होती है कि जिस व्यक्ति ने इतना बड़ा प्राणि-वध किया और पाप कर्म से प्रार का महान् पतन किया, उस व्यक्ति को केवल छह मास को साधना में कैसे मुक्ति प्राप्त हो गई? उत्तर यह है कि तप मे अचिन्त्य, अतक्यं एवं अद्भुत शक्ति है । प्रागम कहता है-भवको सचिय कम्म तवसा निजरिज्जइ ।' अर्थात् करोडो भवों में मचित किए-बाधे कम भी तपश्चर्या द्वान नष्ट किए जा सकते है । यह भी कहा गया है- अण्णाणी ज कम्म खवेइ भवसयसहस्सकोडोहिं । त नाणी तिहि गुत्तो, सवेइ ऊसासमेत्तण-प्रवचनसार । अर्थात् अज्ञानी जीव जिन कर्मों को लासो-करोडो भवों में सपा पाता है, उन्हें त्रिगुप्त-मन- वचन, काय का गोपन करने वाला ज्ञानी अात्मा एक स्वास जितने स्वल्प काल में क्षय कर डालता है । जव तीव्रतर तप की अग्नि प्रज्वलित होती है तो कर्मों के दल के दल मूमे घास-फून की तरह भस्मसात् हो जाते है। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत प्रसग मे यह भी कहा जा सकता है कि अर्जुन मालाकार द्वारा व वध किया गया, वह प्रस्तुतः यक्ष द्वारा किया गया वध था। अजुन उस समय यक्षाविष्ट होने से उसमे सभव नहीं। ४-१४ अध्ययन काश्यप आरिमायापति गाहावई परिवसइ । जहा मकाई । सोलस वासा परियामो। विपुले सिद्ध । एवं-सेमए यि गाहायई, नवर-कायदानास परियामो पिपुले पथ्वए सिई । एवं-पिइहरे यि गाहावई कायंदोए नयरीए । मोलस वासा परियानो । विपुले सिरे। एवं-केलासे वि गाहावई, नवरं-साएए नगरे । पारस वासाई परियानो विपुले सिद। एवं-हरिचवणे विगाहावई साएए नयर । पारस यासा परियामो विपुले सिद्ध । एवं-यारत्तए विगाहावई, नवरं-रायगिहे नयर । पारस वासा परियायो । विपुले सिई। एवं-मुईसणे वि गाहायई, नवर-वाणियाणामे नयर। दूइपलासए चेहए। पर वासी परियामो । विपुले सि।
१३२] [अन्तकृया विवेचन-प्रस्तुन मूत्र में ग्यारह श्रावको का उल्लेग किया गया है। ये सब मोह-ममत्व के वन्धन तोडकर तथा वैराग्य में नाता जोडकर मगलमय सामागर भगवान् महावीर के चरणों में पहुचकर दीक्षित हो गये। इनके जीवन में जो-जो अन्नर है यह निम्नोक्त तालिका में दिया जा वीक्षा-पर्याय | निर्वाण-स्थान उद्यान गुणगीला १६ वर्ग १६ वर्ष विपुल पर्वत विपुल पर्वत विपुल বল नाम नगर १. श्री काश्यपजी राजगृह नगर १. श्री क्षेमकजी काकदी नगरी ३. श्री धृतिधरजी काकदी नगरी ४. श्री कैलाशजी साकेत नगर ५. श्री हरिचन्दनजी | साकेत नगर ६. श्री वारत्तकजी राजगृह नगर ७. श्री सुदर्शनजी वाणिज्यग्राम नगर ८. श्री पूर्णभद्रजी वाणिज्यग्राम नगर ६. श्री सुमनभद्रजी श्रावस्ती नगरी १०. श्री सुप्रतिप्ठितजी | थावस्ती नगरी ११. श्री मेघकुमारजी | राजगृह नगर धु तिपलाग १६ वर्ष १२ वर्ष १२ वर्ष १२ वर्ष ५ वर्ष ५ वर्ष अनेक वर्ष २७ वर्ष अनेक वर्ष विपुल पर्वन विपुल पर्वत विपुल पर्वत विपुल पर्वत विपुल पर्वत विपुल पर्वत विपुल पर्वत विपुल पर्वत । पनारमा या वर्णन मोपपानिरग में गम ना HTRATIMATERITrपो का मामा अतिमुक्त नाम या मार पा जो मुमार मा। उग कान मोर उम ममा मन भगमन मोर THErfume नाम गे गरे गाम को पायन करने या मोर नागरिक-THE-हाग रहित विहार करते हुए पोनागपुर नगर के मोन मा । उग कान, उग गमय यमग भगान मालिम रहे अनुमार निरन्तर वेने यो कान मोr Hinा मिनरत थे। पारणे के दिन पहली पोग्गिी में पाया और लोग गोरिगी में शारीरिक गीता में गहिन, मानगि IITE Hोर रस्ता रहित होकर मुपवस्थिका को परिलगना को किराना है। फिर पात्रों को प्रमार्जना करी पोर पानी को नाममा राजमान ये वही पाए, पाकर भगवान् को पदना-नमस्कार कर इस प्रकार निकिया- "हे भगवन् ! ग्राज पठभक्त के पारणे के दिन माप की माता होने पर गालागपुर नगर में ऊंच, [नीच, पोर मध्यम कुनों में मिशा को विधि के अनुगार निलिये जाना चाहता हूँ ।) श्रमण भगवान् महावीर ने कहा-देवानुप्रिय । जिस प्रकार तुम्हें मुग हो, करो, उनमें विलम्ब न करो। भगवान की प्राज्ञा होने पर गोतमस्थामो भगवान् के पाग गे, गुणशीला प्रत्य में निकले। निकल कर शारीरिक त्यरा और मानमिक चपलता में रहित एवं मानता व उत्सुकता मे रहित युग (धूमरा) प्रमाण भूमि को देखते हुए मिमिनिपूर्वक पोलागपुर नगर में पाये । यहाँ ऊन, नीच, और मध्यम कुलों मे भिक्षा को विधि अनुमार भिक्षा हेतु] भ्रमण करने लगे। इधर अतिमुक्त कुमार स्नान करके यावत् गरीर को विभूपा करके वहुत बालक-बालिकाओं और कुमार-कुमारियों के माथ अपने पर में निकले पोर निकल कर जहाँ इन्द्र- स्थान अर्थात् क्रीडास्थल था वहाँ पाये । वहां प्राकर उन वाला वालिकामों के साथ मेलने लगे। उस समय भगवान् गौतम पोलासपुर नगर में सम्पन्न असम्पन्न तथा मध्य कुलो में यावत् भ्रमण करते हुए उस भीडास्थल के पास से जा रहे थे। विवेचन--प्रस्तुत मूत्र पोलामपुर के राजकुमार अतिमुक्त कुमार तथा श्रमण भगवान महावीर के प्रथम गणधर गौतम के मधुर मिलन या प्रथम मुलाकात का वर्णन प्रस्तुत करता है इसमे प्रतिमुक्त जिनके साथ खेलते हैं, उनके लिये "दारहि य, डिभएहि य, कुमारएहि य" दशब्द का प्रयोग हुआ है । दारक, डिभक तथा कुमार ये तीनो सब्द ममानार्थी प्रतीत होते है परन्तु वृत्तिकार ने इनके विभिन्न अयं इस प्रकार बताये है-दारक-मामान्य बालक, अच्छी आयु वाला, दिभक-छोटी मायुवाला, कुमार-अविवाहित । पेलने वाले स्थान को "इदट्ठाणे" कहा है जिसका अर्थ होता है क्रोडास्थान, जहाँ पर इन्द्रस्तम्भनामक एक मोटा सभा गाड़कर बालक और बालिकाए सेलते है। मे लड़के-लड़कियों, इसके बाद भगवान् गौतम मे अतिमुक्त कुमार इस प्रकार बोले- 'हे देवानुप्रिय ! आप कहाँ रहते है ?' भगवान् गौतम ने अतिमुक्त कुमार को उत्तर दिया- देवानुप्रिय । मेरे धर्माचार्य और धर्मोपदेशक भगवान् महावीर धर्म को प्रादि करने वाले, मावत् शास्वत स्थान-मोक्ष के अभिलापी इसो पोलासपुर नगर के बाहर श्रीवन उद्यान में मर्यादानुसार स्थान ग्रहण करके सयम एव तप से आत्मा को भावित कर विचरते है । हम वही रहते हैं।' विवेचन-प्रस्तुत मूत्र के परिशीलन से यह स्पष्ट है कि वालक अतिमुक्त कुमार में भगवान गौतम में तीन प्रश्न किये थे। वे प्रश्न है आप कौन है ? आप किम उद्देश्य से भ्रमण कर रहे हैं ? आप कहाँ पर रहते है ? प्रस्तुत सूत्र में इन तीनों के उत्तर भी दिये गये है। प्रथम प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान् गौतम ने अपना परिचय देने के साथ-साथ साधु-जीवन को मर्यादा का वर्णन भी कर दिया है। प्रथम प्रश्न के उत्तर मे गोतम स्वामी ने कहा-'हम श्रमण है, निर्गन्थ, ईर्यासमित एव ब्रह्म चारी है। वस्तुत ये चारो गन्द साधु-मर्यादा के परिचायक है । उनको व्याख्या इस प्रकार है-तपस्वी प्रथया प्राणिमात्र के माध ममतामय समान व्यवहार करने वाले महापुरुष श्रमण कहलाते है । जो परिग्रह में रहित है अथवा जिनमे राग-द्वेष को ग्रन्थि न हो वे निग्रंन्य है ईर्या-गमन संबंधी समिति विवेक अर्थात् प्राग देखकर तथा मावधानी से चलना ईरियाममिति है। चतुर्थ महाव्रत ब्रह्मचर्य के परिपालक गाधक को ब्रह्मचारी कहते है। दूभरे प्रश्न का समाधान करते हुए भगवान् गौतम ने अतिमुक्त कुमार से कहा-"वत्स ! मे भिक्षा भ्रमण कर रहा हूँ।' तोमरे प्रश्न के उत्तर में मौतम स्वामी ने श्रीपन उद्यान में मेरा निवास है, ऐसा न कहकर थोवन उद्यान में परमात्मा महावीर के पाम हमारा नियाग है, ऐसा बताया। इसमें उनको भपूर्व गुरभक्ति मलकती है। रिउलग...... ......माइमेण-इम पद मे विपुल शब्द के कई अर्थ पाए जाते हैं-प्रभुत, प्रवर, विस्तांगो, विशाल, उत्तम, श्रेष्ठ मादि। प्रस्तुत में 'उत्तम' प्रभ ग्रहण करना चाहिए। भरिमुलका गौतम साप बनायं गमन 10-तएप से घामृत कुमार भगवं गोयम एप वयासो- "मामि गंमते ! वह तुममेहि मदिसमगं भगवं महायोरं पायदए।" "महामुह रेवापिया! मा धिं करहि।" तए में पामत कुमार भारमा गोयमेणं सांड नेगेव समणे भगवं महावीर तेणे उPur, Infeता मपर्ण भावं महामेरं तितो आयाहिण-पदाहिणं करेर, करेता या बारपावामा १४० - अतिमुक्त कुमार अतिमुक्त कुमार ने अपनी बात स्पष्ट करते हुमा कहा कि धर्म के संबंध में में मयंथा अनभिज्ञ हूँ ऐसी बात नहीं है । धर्म को पूर्ण परिभाषा मैं नहीं जानता तथापि कुछ न कुछ जानता अवश्य हूँ । मुझे नन्हा वालक समझकर ऐसा न मान ले कि धर्म-तत्व से भै सर्वथा पारिमित है। मुझे इस बात का बोध है कि जो पैदा हुआ है, उसे एक दिन मरना है, जन्म के साथ मृत्यु का अनादि कालीन मबध है । जन्म लेने वाले को एक दिन मृत्यु का ग्रास बनना ही पड़ता है। यह मैं जानता है, पर मुझे यह नहीं पता कि कब ? कहाँ और कमे? कितने समय के अनन्तर मृत्यु का प्रहार महन करना पड़ेगा ? मैं यह नहीं समझता कि जोय किन कर्मबन्ध के कारणों से चारो गतियों में जन्म लेते हैं परन्तु मै यह अवश्य जानता हूँ कि अपने किए हुए कर्मों के कारण हो जोव नरकादि गतियो में उत्पन्न होते है। प्रस्तुत कथानक मे अल्पज्ञ और सज्ञ का साष्ट अन्तर परिलक्षित होता है। प्रस्तुत मूत्र में प्रयुक्त "कम्माययणेहि" शब्द का अर्थ वृत्तिकार ने इस प्रकार किया है- "कम्माययणेहि त्ति, कर्मणा ज्ञानावरणीयादीनामायतनानि प्रादानानि वधहेतव इत्यर्थः । पाठान्तरेण "कम्मावयणेहि त्ति' तत्र कर्मापतनानि य कर्मापतति-मात्मनि सभवति, तानि तथा"-अर्थात् "कर्म" शब्द ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय प्रादि कर्मों का ससूचक है और "प्रायतन" शब्द वध के कारणों का परिचायक है । कहीं-कही "कम्माययाह" के स्थान पर "कम्मावयहि" ऐसा पाठान्तर भी उपलब्ध होता है । जिन कारणों से कम आत्म-सरोवर में गिरते हैं, मात्म-प्रदेशो से सबंधित होते है, उन्हें कर्मापतन कहते है । दोनों का पाराय एक ही है । अतिमुक्त कुमार के जीवन सबंधी अंतगडसूत्र के इस वर्णन अतिरिक्त भगवतीमूत्र के चतुर्थ उद्देशक में मुनि प्रतिमुक्त के जीवन को एक घटना का बड़ा सुन्दर विवेचन मिलता है । यहाँ अावश्यक होने से उसका उल्लेख किया जा रहा है- 'तणं कालेणं तेण समएण समणस्स भगवो महावीरस्स अतेवासी अइमुत्ते गिवयमाणसि कसपडिग्गह-रयहरणमायाए बहिया सपढ़िए विहाराए । तए णं प्रमुत्त कुमारममणे वाहय वहमाण पासइ, पासित्ता मट्टियाए पालि वधई, वत्तिा गाविया मेणाविया में णाविप्रो विव णावमय पडिग्गह उदास कटु पव्वाहमाणे पवाहमाणे अभिरमई, तच थेरा अदक्सु, जेणेव समणे भगव महावीरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छिता एव वयामी- एव पलु देवाणुप्पियाणं अतेवासी ग्रइमुत्ते णाम कुमारममणे भगव, से ण भते ! अइमुन कुमारसमणे कहि भवग्गणेहि सिम्मिहिइ, नाव अत करेहिइ? प्रज्जो ! त्ति समणे भगव महावीरे ते धेरे एव वयासी-एव खलु प्रज्जो ! ममं अतेवासी अइमुत्ते णामं कुमारसमणे पगइभद्दए, नाव-विणोए, से ण महमुत कुमारसमणे इमेण चैव भयग्रहणेण मिाहिह जाव अत करिहिइ त माग अन्जोतुम्भे प्रमुत्त कुमारसमण होलह, निदह, सिसह, गरहह, यवमणह, तुम्ने म देवाणुप्पिया ! प्रामुत्त कुमारसमण अगिलाए सगिण्हह, अगिलाए उगिहह, यगिलाए भत्ते ण पाणेण विणाण येयावडिय करेह । अदमुत्ते ण कुमारममणे अतकरे चेब, - णाम कुमारसमणे पगभद्दए , जाव - विणीए । तए ण से अइमुत्त कुमारसमणे अण्णया कयाइं महाबुटिकायसि - का परिचायक है। कहीं-कहीं "कम्माययहि" के स्थान पर "कम्मावयणेहि" ऐसा पाठान्तर भी जिपमामि कारपडिगह-रपहरणमायाए पहिया मपट्टिए विहाराए । तए ण प्रइमुत्ते कुमारनमगे १४०] [अन्तकृद्दा- प्रतिमुक्त कुमार ने अपनी बात स्पष्ट करते हुया कहा कि धर्म के सबंध में में सर्वथा अनभित्र हूँ ऐसी बात नहीं है । धर्म की पूर्ण परिभापा मैं नहीं जानता तथापि कुछ न कुछ जानता अवश्य हूँ । मुझे नन्हा बालक समझकर ऐसा न मान ले कि धर्म-तत्त्व से मैं सर्वथा अपरिचित हूँ। मुझे इस बार का बोध है कि जो पैदा हुआ है, उसे एक दिन मरना है, जन्म के साथ मृत्यु का अनादि कालीन मबंध है । जन्म लेने वाले को एक दिन मृत्यु का ग्रास बनना ही पड़ता है । यह मैं जानता हूँ, पर मुझे यह नहीं पता कि कव? कहां और कैसे? कितने समय के अनन्तर मृत्यु का प्रहार महन करना पड़ेगा? मैं यह नही समझता कि जोव किन कर्मवन्ध के कारणो से चारो गतियों में जन्न नेते हैं परन्तु मैं यह अवश्य जानता हूँ कि अपने किए हुए कर्मों के कारण ही जीव नरकादि गतियों में उत्पन्न होते है। प्रतिमुक्त कुमार के प्रस्तुत कथानक में अल्पज्ञ और सर्वज्ञ का स्पष्ट अन्तर परिलक्षित होता है। प्रस्तुत मूत्र में प्रयुक्त "कम्माययणेहि" शब्द का अर्थ वृत्तिकार ने इस प्रकार किया है- "कम्माययणेहि त्ति, कर्मणा ज्ञानावरणीयादीनामायतनानि आदानानि वधहेतव इत्यर्थः । पाठान्तरेण "कम्माययहि ति' तत्र कर्मापतनानि य कर्मापतति-ग्रामनि सभवति, तानि तथा" अर्थात् “कम राब्द मानापरणीय, दांनावरणीय ग्रादि कर्मों का संसूचक है और "प्रायतन" शब्द वध के कारणों उपलब्ध होता है। जिन कारणों से कम आत्म-सरोवर में गिरते हैं, आत्म-प्रदेशों से संबंधित होते है, उन्हें कर्मापतन कहते है । दोनो का प्राशय एक ही है। पतिमुक्त कुमार के जीवन संबंधी अंतगडमूत्र के इस वर्णन के अतिरिक्त भगवतीनूत्र के चतुवं उद्देशक मे मुनि प्रनिमुक्त के जीवन की एक घटना का बड़ा मुन्दर विवेचन मिलता है। पावश्यक होने में उसका उल्लेस किया जा रहा है- 'तेण कालेण तेणं गमएणं ममणस्म भगवग्रो महावीरस्म अतेवासी प्रमुत्त गाम कुमारममने पगभद्दा, नाव-विनोए। नए न में प्रदमुत्त कुमारगमण मण्णया कयाइ महापट्टिकार्यान याय वाप पागद, पामिना मट्टियाए पानि वध, वधिता माविया में पाविया में पाविमो दिन गावमय पटिगह उदगम टु पाहमाण पध्याह्माण अभिरमई, त च धरा प्रदायु, जेणेव समजे भगव महावीरे नव उशगन्धर, उवागन्धिना एव वयामी- एर गल देवाणियाण ओवामा पदमुक्त गाम कुमारगमणे भगव, रोज भते ! परमुन सुमारगमगेगाह भवग्गहनहि मिभिहिद, नाव अन करेहिद ? पन्चो ! नि मम भगव महा गोरे ने मेरे एव वयानी--एदं गनु प्रज्या ! मम अगामी पानुन पान गुमाग्मन पगइभदा, बार-विमाए, में मात कुमारममणे इमण व भरगहनत पए कामभरतुम्ने न देवारिया ! प्रामुन कुमाग्ममग प्रगिनाए मगिहह, प्रदिनार निगमणि गट हा प्रमुन मागम प्राकर । यहाँ सिद्ध हुए। १४२ ] उस काल और उस समय वाणारगी नगरी में काममहावन नामा उद्यान था। उन वाणारमी नगरी में अलक्ष नामक राजा था। उस काल और उम समय श्रमण भगवान् महाबोर यावत् महावन उद्यान में पधारे । जनः परिपद् प्रभु-वन्दन को निकली, राजा अलक्ष भो प्रनु महापोर के पधारने की बात सुनकर प्रमा हुआ और कोणिक राजा के समान वह भी यावत् प्रभु की मेया में उपासना करने लगा। प्रभु ने धर्मकथा कही। तव अलक्ष राजा ने श्रमण भगवान महावीर के पास 'उदायन' की तरह थमणदीक्षा ग्रहण को । विशेषता यह कि उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य सिंहासन पर बिठाया । ग्यारह अगो का अध्ययन किया । बहुत वर्षों तक श्रमणचारित्र का पालन किया यावत् विपुलगिरि पर्वत पर जाकर इस प्रकार "हे जवू ! श्रमण भगवान् महावीर ने अष्टम अंग अतगड दशा के छठे वर्ग का यह अर्थ कहा है।" विवेचन-प्रस्तुत सोलहवे अध्ययन में वाराणसी नगरी के अलक्ष नरेश के जीवन का उल्लेख किया गया है । अलक्ष नरेश भगवान् महावीर के चरणों में परम श्रद्धालु भक्त थे। इनको प्रभु चरणों मे निष्ठा एव आस्था का दिग्दर्शन कराने के लिये मूत्रकार ने चपा-नरेग कूणिक की ओर मकेत किया है, जिसका वर्णन प्रोपपातिक सूत्र में है। "जहा उदायणे तहा निक्खते" का अर्थ है-जिस प्रकार महाराजा उदायन ने दीक्षा ग्रहण की थी, उसी प्रकार अलक्ष नरेश भी दीक्षित हुए। उदायन राजा का वर्णन भगवतीमूत्र के शतक १३ उ. ६ में पाया है। उसके अनुसार उदायन मिन्धु-सोपोर प्रादि सोलह देशो का स्वामी था। एक दिन यह पोपधशाला में पौषध करके बैठा हुपा था। धर्म-जागरण करते हुए उसे भगवान् महावीर को स्मृति प्रा गई। यह सोचने लगा यह नगर, कानन धन्य हैं जहा भगवान् विहार करते हैं । वे राजा, प्रादि धन्य है जो भगवान की वाणी सुनते हैं, उनको उपासना करते हैं। अपने हाथ से उन्हें निर्दोष भोजन, वस्त्र, पात्र मादि देते है। मेरा ऐसा सौभाग्य कहाँ ? मुझे तो उन महाप्रभु के दर्शन करने का भी अवसर नहीं मिलता। चिन्तन को धारा ऊम्बंमुखी होने लगो। उसने गोचा-यदि भगवान् मेरी नगरी में पधार जाएँ तो में उनकी सेवा करू, और साथ ही इस भगार ससार को छोड़कर दोधित हो जाऊं। उम समय भगवान् चम्पा के पूर्णभद्र उद्यान में विराजमान थे। वीतभयपुर और चम्पा में सात सो कोम का पन्तर था, पर करुणासागर भक्तवत्सल भगवान् महावीर ने अपने भक्त की कामना पूर्ण करने के लिये चम्पा से प्रस्थान कर दिया मोर धीरे-धीरे यात्रा करते हुए वे उदायन को नगरी मै पधार गरे । भगवान् के पधारने के शुभ ममातार पाकर उदायन मानन्द-विभोर हो उठे। यर्ड समारोह के साथ राजा, रानी पोर कुमार सब भगवान् के चरणों में उपस्थित हुए। धर्म-कथा मुनी, भगवान् को कल्याण-कारिणी वाणी मुनकर उदायन को राज्य हो गया। अपना उत्तराधिकारी निश्चित करने के लिये वह वापम महलो में प्राया। गासन का सारा दायित्व प्रभीच कुमार . - को सत्तमो वग्गो १.१३ अध्ययन नंदा आदि १--जइ णं भंते ! समर्णणं भगवया महावीरेणं अमरस अंगस्स अंतगाउदसाणं घटस्स वाणास अयम? पण्णत्ते, सत्तमस्स वग्गस्स के प्र? पण्णते? एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं सत्तमरस वगस्त तेरस प्रज्झयणा पण्णत्ता, तं जहा- सगहणो-गाहा १. नंदा तह २. नंदवई, ३. नंदुत्तर ४. नंदिसेणिया चेव । ५. मरुता ६. सुमस्ता ७. महमस्ता ८. मरवेवा य प्रहमा ॥१॥ ६. भद्दा य १०. सुभद्दा य, ११. सुजाया १२. मुमणाइया। ११. भूयदिण्णा य बोधवा, सेणिय मजाण नामाई ॥२॥ जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं सत्तमस्स वग्गास्त तेरस अग्भपणा पण्णत्ता, पढमस्स णं भंते ! अझयणस अंतगडदसाणं के प्र? पण्णते ? एवं खलु जंबू ! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नपरे। गुणसिलए चेहए । सेणिए राम, वण्णप्रो । तस्स णं सेणियस रणो नंदा नाम देवो होत्या-वणयो । सामो समोसढे, परिसा निग्गया। शंसा नंदा देवी इमोसे कहाए सट्ठा हद्ववट्ठा कोड बियपुरिसे सदावेद, सहायेत्ता जाणे दुरुहई । जहा पउमावई जाय' एकारस अंगाइ अहिन्जिता वोस वासाई परियामो जाव' सिद्धा। एव तेरस वि देवोभो नंदा-गमेण नेयवानो। घटे वर्ग का अर्थ मुनने के अनन्तर प्रार्य जवू स्वामी प्रार्य सुधा स्वामी से निवेदन करने मंग-भगवन् ! यावत् मोक्षप्राप्त श्रमण भगवान् महावीर ने अष्टम अग अतगडदशा के छठे वर्ग का जो अथं बताया है, उसका मैंने श्रवण कर लिया है, अब श्रमण यावत् मोक्षप्राप्त भगवान् महावीर ने प्रष्टम अग अनगड दगा के सातवे वर्ग का जो अर्थ कहा है उसे सुनाने की कृपा करें। उमके उत्तर में मुधर्मा स्वामी ने कहा-सात वर्ग के तेरह अध्ययन कहे गये हैं, जो इस प्रकार है- गाया-(१)नन्दा, (२) नन्दवती, (३) नन्दोत्तरा, (४) नन्दणिका, (५) मरता, (६) गुमरता, (७) महामरता, (८) मरदेवा, () भद्रा, (१०) मुभद्रा, (१) मुजाता, (१२) मुमनायिका, (१३) भूनदत्ता। ये गाणिक राजा की रानियाँ यौ।"'ये सब धोगिक राजा की पलियों के नाम है। तए - स-मत्र . २, वर्ग-१ मा जहणं भंते ! समणेणं भगवया महावीरणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं सत्तमस्स वग्गरस घड़े वर्ग का अयं मुनने के प्रनन्तर प्राय जवू स्वामी प्रायं सुधर्मा स्वामी से निरदन करने राजा प्रवं बनाया है, उसका मैंने श्रवण कर लिया है, प्रव थमण यावत् मोक्षप्राप्त भगवान मो-गवन् ! यारत् मोक्षपाप्न थमण भगवान् महावीर ने अष्टम अग अतगडदशा के बदले वसं उम उनर में मामा म्वामी ने कहा-मानवे वर्ग के तेरह मध्ययन कहे गये हैं, तो पाया-(नन्दा, (३) नन्दाती, (३) नन्दोत्तरा, (८) नन्दपिका, (५) मरता, (१) गुमरा (5) मामाना, () मावा, (२) भद्रा, (१०) मुभद्रा, (११) मुजाता, (१२) सत्तमो वग्गो १-१३ अध्ययन नवा आदि १-जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं घट्टस्स वगस्त प्रयम? पण्णते, सत्तमस्स वग्गस्स के अट्ठ पण्णते? एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महावीरेणं अट्ठमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं सत्तमस्स वग्गस्त तेरस प्रग्झयणा पण्णता, तं जहा- सगहणी-गाहा १ नंदा तह २. नंदवई, ३. नंदुत्तर ४. नंदिसेणिया चेव । ५. मरुता ६. सुमरता ७. महमरुता ८. मरुदेवा य अट्ठमा ॥१॥ ६. भद्दा य १०. सुभद्दा य, ११. सुजाया १२. सुमणाइया। ११. नूयदिण्णा य बोधवा, सेणिय भज्जाण नामाई ॥२॥ तेरस अभयणा पणत्ता, पढमस्स गं भंते ! अभियणस अंतगडदसाणं के पट्टे पप्णते ? यण्णप्रो । तस्मण गियरस रणो नो सामी समोसढे, परिसा निग्गया। एवं पनु जंबू! तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नपरे। गुणसिलए चेहए। सेणिए राया, "....!: I...": ... परियानो जाय' सिद्धा। :::::'- रिसे सद्दावेइ, सद्दावेता जाणं दुराहा । एव तरम वि देवीयो नंदा-गमेण नेयम्वाम्रो। महावार ने अष्टम बम बनगड दशा के मातवे वर्ग का जो कहा है उमे मुनाने को कृपा करें। दमदार है- मुंबनारस, (१३) दाना रे मायनिक राग नार ..
अट्ठमो वग्गो प्रथम प्रध्ययन काली उतक्षेप १-जइ णं भंते ! समणेणं भगवया महायोरेणं प्रटुमस्स अंगरस अंतगडदसाणं सत्तमस्स वग्गस अयम? पण्णत्ते, अट्ठमस्स वग्गस्स के अ? पणते ? एवं खलु जंबू ! समणेणं भगवया महायोरेणं मट्ठमस्स भंगस्स अंतगडदसाणं पट्ठमस्स वग्गस्त दस प्रज्झयणा पण्णत्ता तं जहा- संगहणी गाहा (१) काली (२) सुकालो (३) महाकाली, (४) कण्हा (५) सुफाहा (६) महाकाहा । (७) वीरकण्हा य वोधवा, (८) रामकण्हा तहेव य । (8) पिउसेणकाहा नवमी, दसमी (१०) महासेणकण्हा य ॥१॥ जइ णं भंते । समणेणं भगवया महावीरेणं पटुमस्स अंगस्स अंतगडदसाणं दस अग्झयणा पण्णता, पढमस्स णं भंते ! अग्झयणस्त अंतगडवसाणं के प्र? पण्णते? एवं खलु जंवू ! तेणं फालेणं तेणं समएणं चंपा नाम नयरी होत्या। पुण्णमद्दे घेइए । तत्थ पं. चपाए नयरोए फोणिए राया, वणो। तत्थ पंचपाए नयरोए सेणियस रणो मज्जा, कोणियस्त राणो चल्लकमाउया, फालो नाम देवी होत्था, यण्णमो । जहा नंदा जाव' सामाइयमाइयाई एक्कारत अंगाई अहिज्जइ । बहिं चउत्य जाय प्रपाणं भावमाणे यिहरइ । श्रीजवू स्वामी ने प्रार्य मुधर्मा स्वामी से निवेदन किया-"भगवन् ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त भगवान् महावीर ने पाठवें अग अतगडदशा के पाठये वर्ग का क्या अर्थ प्रतिपादन किया है ?" श्री सुधर्मा स्वामी ने कहा-“हे जवू ! श्रमण यावत् मुक्तिप्राप्त प्रभु महावीर ने पाठवे अंग अनगढदशा के पाठये वर्ग के दश अध्ययन कहे है, जो इस प्रकार है- गाथार्थ-(१) काली, (२) मुकाली, (६) महाकाली, (४) कृष्णा, (५) सुकृष्णा, (६) महाकृष्णा, (७) योरकृष्णा, (८) रामकृष्णा, (इ) पितुर्मनकृष्णा और (१०) महासेनकृष्णा । श्री जबूस्यामो ने पुनः प्रश्न किया-"भगवन् ! यदि पाठये वर्ग के दश अध्ययन कहे है तो प्रथम अध्ययन का श्रमण यावत् मुक्ति प्राप्त महावीर ने क्या अर्थ कहा है ?" पायं मुधा स्वामी ने यहा-"हेज ! उग काल और उम ममय चम्पा नाम की नगरी १. वगं ५, मूत्र ४,६ २. वर्ग १, मूत्र १४०] [FRE करता मामगि पार । मामा कर करता सामगि पारा प्रदान कर फरता सम्यकामानि पार कर. कामगि पार। पार करो फरता सम्परामगुपियंपार। एव पनु एमा रमायलोए तबोकमाम पामा परितो ग संसारणं तिहि मासे बावीसाए य महोराहि महागुश नार [पहार महासम्म प्रहामणे महालाप सम्म काए फासिया पालिया सोहिया तोरियादिया] पारादिपा भगा। एक दिन यह पानी पानां, पान करता मोर मागे पोर पार हाय जोर र विनयपूर्वक इस प्रकार गाली-" पा । पाको माना जाताना in IT गोकार करके विचरना पाहती है।" मार्या चन्दना ने कहा-"देवानुप्रिय! श्री मुग हो वंगा करा, प्रमादमा करा।" तव पाली प्रार्या, मायर्या पदना की प्रामा पाकर रनाली ना को अंगीकार कर पिचरने लगी, जो इस प्रकार है- उपवास किया, कररो, रावकामगुणयुक्त पारणा रिया, पारणा करके, बला किया, कर, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, नेला स्यिा, करके, गवंकामगुणयुक्क पारणा किया, पारणा करके, पाठ वेले किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा लिया, पारणा करके, उपवाम किया, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, वेला किया, कर, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, तेला किया, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, दशमः चोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, द्वादशम-पचोला किया, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, यह उपवाम किये, करके, मयंकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, सात उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, पाठ उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, नव उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, दग उपवास किये, करके, मर्वगुणकामयुक्त पारणा किया, पारणा करके, ग्यारह उपवास किये, करके, मर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, बारह उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, तरह उपवाम किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, चौदह उपवाम किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, पन्द्रह उपवाम किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, सोलह उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, चीतीम वेले किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, सोलह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, पन्द्रह उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, चौदह उपवाम किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, तेरह उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, वारह उपवाम किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, ग्यारह उपवान किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, दस उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, नव उपवास किये, करके, सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, पारणा करके, पाठ उपवाम किये, करके सर्वकामगुणयुक्त द्वितीय अध्ययन सुकालो सुफाली का कनकावली तप ५-तेणे कालेणं तेणं समएर्ण छपा नाम नयरो। पुण्णभद्दे चेइए। कोणिए रामा । तस्य पं. सेणियस रण्णो भज्जा, कोणियस्स रष्णो चुल्लमाउया सुकाती नाम देवी होत्या । जहा कालो तहा सुकाली वि निक्खंता जाव' बहूहिं जाव तवोकम्मेहि पप्पाणं मावेमाणी विहरइ । तए णं सा सुकाली अज्जा भण्णया कयाह जेणेव प्रज्जचंदणा प्रज्जा जाय इच्छामि गं अन्जानो ! तुम्भेहि अन्भणण्णाया समाणो कणगावली-तयोम्म उपसंपन्जिता गं विहरितए । एवं जहा रयणावलो तहा कणगावलो वि, नवरं-तिसु ठाणेसु प्रदुमाई करेइ, जहिं रयणावलीए घट्ठाई। एमकाए परिवाडीए संवच्छरो, पंच मासा, बारस य महोरत्ता । उहं पंच वरिसा नव मासा अट्ठारस दिवसा । सेसं तहेव । नव वासा परियाओ जाव' सिद्धा। उस काल और उस समय मे चंपा नाम की नगरी थी। वहां पूर्णभद्र उद्यान था और कोणिक राजा वहा राज्य करता था। उस नगरी मेथोणिक राजा को रानी और कोणिक राजा को योटी माता मुकाली नाम की रानी थी । काली की तरह सुकाली भी प्रबजित हुई और बहुत से उपवास धादि तपो से प्रात्मा को भावित करती हुई विचरने लगी। फिर वह सुकाली प्रार्या अन्यदा किसी दिन प्रार्य-चन्दना प्रार्या के पास प्राकर इस प्रकार बोलो--"हे पायें ! आपकी आज्ञा हो तो मैं कनकावली तप अंगीकार करके विचरना चाहती हूँ भार्या चन्दना की भाज्ञा पाकर रत्नावली के समान सुकाली ने कनकावली तप का आराधन किया। विशेषता इसमे यह थी कि तीनों स्थानो पर अष्टम-तेले किये जव कि रत्नावली मे पप्ठ-बेले किये जाते हैं । एक परिपाटी में एक वर्ष, पांच मास और बारह अहोरात्रिया लगती हैं । इस एक परिपाटी मैं ८८ दिन का पारणा और १ वर्ष, २ मास १४ दिन का तप होता है। चारों परिपाटी का काल पाच वर्ष, नव मास मोर अठारह दिन होते हैं । शेष वर्णन काली प्रार्या के समान है । नव वर्ष तक चारित का पालन कर यावत् मिद्ध, युद्ध पौर मुक्त हो गई। विवेचन--कनकावली तप और रत्नावली तप मे इतना ही भेद है कि रत्नावली मे वहाँ पाठ बेले तमा ३४ येले किये जाते हैं, वहाँ कनकावली तप में माठ वेले पोर ३४ तेले किये जाते हैं। रोप तप के दिन बराबर हैं । पारणे में भी समानता है। कनकावली तप को एक परिपाटी में एक वर्ष पांच मारा पौर १२ दिन लगते है । इस प्रकार चारो परिपाटियो के ५ वर्ष ६ मास मोर १८ दिन होते हैं । कनकावली को प्रयम परिपाटी की रूपरेखा अगले पृष्ठ पर प्रदर्शित यय द्वारा स्पष्ट होती है। १. वर्ष ५, मूर . २. वयं ५. मूत्र ६ ३. वर्ग, ४ ४. वसं १, मूत्र ६ तृतीय अध्ययन महाकाली महाकाली का क्षुल्लकसिंहनिष्कोडित तप ६--एवं महाकाली वि । नवरं-पुड्डागसोहनिकोलियं तवाकम्मं उपसंपज्जित्ता णं विहरइ, तं जहा- चउत्यं करेइ, करेत्ता सव्वकामगुणिय पारेइ । घट्ट करेइ, फरत्ता सव्वकामगुणियं पारे । चउत्यं करेइ, करेत्ता सव्वकामगुणियं पार इ । प्रमं करइ, करेता सम्वकामगुणियं पारेइ । घट्ट करेइ, करेता सव्वकामगणियं पारइ। दसम फरई, करता सम्वकामगुणियं पारइ। मट्ठम कर, करत्ता सव्व कामगुणियं पारह। दुवालसमं कर, करता सध्यकामगुणियं पारई। वसमं कर ई, फरत्ता सव्यकामगुणियं पारइ। चोद्दसमं कर इ, फरत्ता सव्वकामणिय पार । दुवालसमं करते, करता सम्वकामणिय पारइ। सोलसमं कर ई, करता सम्वकामगणिय पारइ । चोद्दसमं कर इ, करता सम्वकामगुणियं पार इ। अट्ठारसमं कर इ, करता सम्वकामणि पार। सोलसमं कर करता सध्यकामगणियं पार इ । योसइमं कर इ, करता सम्वकामगुणियं पारइ । अद्वारसमं कर कर ता सम्वकामणियं पार इ। वीसइम फर इ, फरत्ता सव्वकामगुणियं पार । सोतसमं करते, करता सय्यकामगणियं पारइ। प्रद्वारसमं फरई, करता सम्वकामगणियं पार । चोट्समं कर फरता सम्वकामगुणियं पारइ । सोलसमं कर इ, फर ता सव्वकामगणियं पार । बारसमं करते। फर ता सम्वकामगुणियं पारई। चोदसमं करई, करता सत्यकामणियं पारइ । दसमं करते, फरता सय्यकामगणियं पारहे। पारसमं कर इ, करता सम्वकामणियं पारइ। अट्टमं कर करता सम्वकामगणिय पारे । दसम करह, करता कामणि पारद। छ8 कर इ, करता सय्यकामगणिय पारई । पटुमं कर इ, करता सम्यकामाणियं पारइ। चउत्य कर इ, करता सम्वकामगणियं पारई। पढ़ कर इ, फरेत्ता सम्वकामगणियं पार। चउत्यं फरइ, करता सप्यकामगणियं पारे। तहेय चत्तारि परियाडीमो । एकाए परिवाडीए छम्मासा सत्त य दिवसा। चउण्हं दो वरिसा प्रट्ठायोसा य दिवसा जाव' सिद्धा । काली की तरह महाकाली ने भी दीक्षा अगीकार को । विशेष यह कि उसने लघुसिहनिप्पीडित तप किया जो इस प्रकार है- उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके वेला किया, करके सर्वकामगुण युक्त पारणा किया, करके उपवास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया,करके तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करसे येला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके चौला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके तेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा १. वयंमत्र २.
[अन्तलगा
त्याग किया, तोगरी में सेपमात्र का भी त्याग किया, पोपो में उसासा का पारणा माश्लि ता
से किया।
सुडारा-सिंहानिकील
रा
पारपिटीपार
परिपाटीपार "
पारितासहयोरिन, मास, दिन
(एरितोलिमा. दिन
सरा २.२५रिक
CC000000000000
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पञ्चम अध्ययन
सुकृष्णा
বলে কা সিনিমা মানে
4-एवं मुकण्हा वि, नवरं-सत्तसतमियं भिक्पडिमं उपसंपज्जित्ता गं विहरइ
पढमे सत्तए एकोक भोपणस वति पडिगाहेइ, एक्केवकं पाणयस्स ।
दोन्चे सत्तए दो-दो भोयणस्स दो-दो पाणयास पडिगाहेइ ।
तन्चे सत्तए तिण्णि-तिप्णि स्तोमओ भोयणस्स, तिण्णि-तिणि वत्तीओ पाणयस्स ।
घाये सत्तए पतारि-चतारि दत्तोपो भोयणस्स, चत्तारि-चत्तारि दत्सीम्रो पाणयरस ।
पचमे सत्तए पंच-पंच दत्तोपो भोयणस, पंच-पंच दत्तोमो पाणयस्स ।
पः सत्तए प-य दत्तोपो भोयणम्स, एच दत्तीग्रो पाणपस ।
सप्तमे मत्तए सत्त-सात दत्तोपो भोयणम्स, सत-सत्त दत्तोमो पाणयस्स पडिगाहेइ ।
एवं पतु एवं सत्तारामियं सिरहाम एगणपण्णाए रातिदिएहि एगेण य छण्णउएण भिक्षा:
सएण महामुत जाव' पाराहेता जेणेष अंग्जचंदणा अजा तेणेव उयागया, उवान्छिता अजाणं
पानमसापरित्ता नमसित्ता एवं वयासो-
मामि गं पजाम्रो ! तुम्नेहि प्रामणग्णाया समाणो अनुमियं मिस्नुपरिमं उयसपग्जिताण
हिरेसए।
महामुह वापिए ! मा परि करहि ।
का पायर्या की तरह पार मुहमा ने भी दीक्षा ग्रहण की। विशेष यह कि वह सप्त-गप्लामिका
नितिमा परम करके विधाने लगी, वो इस प्रकार है-
पसमा भएर नि भोजन को प्रोर एक दत्ति पानी को ग्रहण को । द्वितीय गता में दो
नमोसोपोर दो पनि पानी की बहन की तीय मानक तीन दत्ति भोजन की पोर तीन
पनि पानी कम हो। न मारे चार दनि भावन की पोर धार दति पानी को ग्रहण की।
मन भावन पोर पान दनि पानी को ग्रहण की। मन में हर दर्शन
भोर पोर मान सनी का हो। माता मनाममान दान मांगन को प्रोर मा
नामी कामगा
नाना (st) - मो बिरानो (११६) भि को दनिया हो।
नाममार सो मानिमा ता की मम्मद
.
।
-
य भिक्खासएहि १६२] [अन्तकद्दमा पढमे अट्ठए एक्केवक भोयणस्स दत्ति पडिगाहेइ, एक्के पाणयास जाव [दत्ति पडिगाहेइ], अट्टमे अट्ठए अट्ठ भोयणस्स पडिगाहेइ, प्रट्ठ पाणयरस । एवं खलु एवं अट्ठमियं मिक्खुपडिमं चउसट्ठोए रातिदिएहि दोहि य अट्ठासीएहि मिक्सासएहि महासुतं जाव' आराहित्ता नवनवमियं भिक्खुपडिम उवसंपज्जिता गं विहरह- पढमे नवए एक्केषक भोयणस्स दत्ति पडिगाहेइ, एक्केक्कं पाणयस्स जाव [वत्ति पडिगाहेइ] नवमे नवए नव-नव दत्तोश्रो भोपणस्स पडिगाहेइ, नव-नव पाणयस्स । एवं खलु एवं नवनवमियं भिक्खुपडिम एक्कासीतिए राइदिएहि चहि य पंचत्तरेहि भिक्खा- सरहिं ग्रहासुत्त जाव' पाराहेत्ता दसदसमियं भिक्खुपडिम उवसंपन्जिता गं विहरइ- पढमे दसए एक्केक्कं भोयणस्स दत्ति पडिगाहेइ, एक्केवकं पाणयस्स जाव [वत्ति पडिगाहेर] । दसमे दसए दस-दस दत्तोपो भोषणास पडिगाहेइ, दस-दस पाणयरस । एवं सलु एवं दसवसमियं भिक्खुपडिम एक्केणं राइंदियसएणं प्रदहि प्रहामुत्त जाव' पाराहेइ, पाराहेत्ता यहि चउत्य-ट्ठम-दसम-दुवालसेहिं मासढमाससमर्हि वियिहेहि तवोफम्मेहि अप्पाणं भावमाणो विहरइ । तए णं सा सुकण्हा प्रज्जा तेणं पोरालेणं तवोकम्मेणं जाव' सिद्धा। निक्खवयो। प्रार्यचन्दना प्रार्या में यात्रा प्राप्त होने पर प्रार्या मुकृष्णा देवी अष्ट-सप्टमिका नामक भिक्षुप्रतिमा को धारण कर के विचरने लगी । अष्ट-ग्रप्टमिका भिक्षु-प्रतिमा का स्वरूप इस प्रकार है- पहले पाठ दिनो मे प्रार्या मुकृष्णा ने एक दत्ति भोजन को और एक दत्ति पानी को ग्रहण की। दूसरे सप्टक में अन-पानी को दो-दो दत्तिया ली। इसी प्रकार कम से तीसरे में तीन-तीन, चौथ में चार-चार, पाचवे में पाच-पाच, इ8 में छह-छह, सातवें में सात-सात और भाठवे में पाठ पाट पन-जन को दत्तिया ग्रहण की। इम पद-प्रप्टमिका भिक्षु-प्रतिमा को माराधना में ६४ दिन लगे और २८८ भिक्षाएं ग्रहण की गई। इस मिन-प्रतिमा को गूगोन पद्धति से प्राराधना करने के अनन्तर मार्या मुकृष्णा ने नर-नरमिरानामा निशु-प्रतिमा को पाराधना प्रारम्भ कर दी। नर-नवमिमा भिक्षु-प्रतिमा को माराधना करते समय प्रार्या मुकृष्णा ने प्रथम नवरु में प्रतिदिन एक एक दत्ति भोजन को पोर एक-एक दत्ति पानी को ग्रहण को । इमो प्रकार प्रागे प्रमशः एक-एक दति वहाते हए नौवं नरक में पान जन की नौ-नौ दत्तिया ग्रहण की। rror कीमा प्रतिम मारभकी। १.२-३ वर्ष ६.२ .
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दिन पारणा के और ७५ दिन -उपवास के होते है । चारो परिपाटियो का सम्मिलित काल एक वर्ष, एक मास और दस दिन हुआ। विवेचन--"खुड्डिय सव्वग्रोभद्द पडिम" मे क्षुल्लक शब्द महद् को मपेक्षा से है। सर्वतोभद्र तप दो प्रकार का है, एक महद् एक लघु । यह लघु है इस बात को प्रकट करने के लिये क्षुल्लक शब्द का प्रयोग किया गया है। गणना करने पर जिसके अक सम अर्थात् परावर हों, विपम न हो, जिधर से गणना की जाए उधर से ही समान हो, उसे सर्वतोभद्र कहते हैं। इसमे एक से लेकर पाच अंक दिये जाते है, चारों ओर जिधर से चाहे गिन लें, सभी ओर १५ हो संख्या होती है। एक से पाच तक सभी ओर से गिनने पर एक जैसी सख्या होने से इसे सर्वतोभद्र कहा जाता है। यह प्रस्तुत यत्र से स्पष्ट होती है- सबनोद पसिना २ ३ १ ४ ५ ३ ५ २ १ ૨ ३ ४ १ २ ३ नरसियार १६८] [अन्तकृद्दशा प्रार्या काली की तरह ग्रार्या वीरकृष्णा ने भी दीक्षा अगीकार की। विशेप यह कि उसने महगवंतो भद्र तप कर्म अगीकार किया, जो इस प्रकार है- उपगम किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके वेला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करी नेला किया, करके मर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके चोला किया, करके गर्वकामगृपयुक्त पारणा किया, करके पचोला किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके छह जिये, करके मयंकामगुणयुक्त पारणा किया, करके सात किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया। यह प्रयम लता हुई। चोला किया, करके मयंकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पचौला किया, करके सर्वकामगुण- गुप्त पारणा रिया, कर छह उपवाग किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके सात उपवास किंग, करी गपंगामगुणयुक्त पारणा किया, करके उपयास किया, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा रिया, करफ येना किया, करके मय कामगुणयुक्त पारणा किया, करके तेला किया, करके सर्व काम गुणगुक्क पारणा पिया। यह दूसरी लता दुई। मान उपनाम रिये, कर मां कामगुणयुक्त पारणा किया, करके उपवास किया, करके गावामगृपयुक्त पारमारिया, करके वेला दिया, कर गर्व कामगुणयुक्त पारणा किया, करके तेला प्रिया, काक गामगुपयुक्त पारणा किया, करके चोला किया, करके सर्व कामगुणयुक्त पारणा रिया पर चौता दिया, करके म कामगुणयुक्त पारणा किया, करके छह उपवास किये, करके गगनगुमसुम पारणा मिश। पर नीमगे सना हुई। रापिग करके मकामगुणयुन पारणा किया, करके चोला किया, करके सर्व कामगुणयुक्त पारपास चोना निस, करके म कामगुणयुक्त पारणा फिया, कर यह उपनाग कि, काममा पारणा fri, करके मात उपग किये, करके मां कामगुणयुक्त पारणा किया, र मान रा. काके म कामगुण पुन्त पारणा किया। बेला किया, करके सर्व कामगुणयुक्त पारमाना। होगा। पारकिरे, का महामनुगपुन, पारणा किया, करके मान राम कि, कर पारमा किमान कि मां कामगुगयुक्त पारणा किया, कर सन PE मान पारमा लिा, सागि करो म कामगुगयुन पारमा tha aur m fra, RE ममगान पारणा किरा, कर पाता , कर समसारमा । मा. नानातिनातिगाममा पा: Mrit नाम माता सताना, सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पाठ उपवास किये, करके सर्वकाम- अष्टम अध्ययन মি रामरणा का भोरप्रतिमा तप १२-एवं रामकहा बि. नवर-भोसरपरिमं सरिता गं बिहार सहा- तुगालसमं कर करता सामाणियं पार। पोइसमकः करता सम्मकामणि पारे । गोसामं कर, करता समकामगा पा पारसमकर, करसा सम्यकामणिय पार । योसइमं कर इ. करता समकामगि पार । गोसराम कर करता सम्यकामणि पारे । पद्वारसमं कर, करता सम्मकामगिम पार। योगाम करी करता समसामणिय पारे । दुयालसमं कर, करता सम्मकामगि पार पोहराम कर करता सापकामणिय पारइ । वोसइमं करत करता सम्यकामगि पारे। पाससम का करे कामणिय पार । चोइसमें कर, करता सम्यकामणिय पारे, सोसस करे, करेसा सम्यकामगिर पारे । पहारसमं करेड, करेसा सम्बकामणिय पारे। घोहसम कर, करता सम्यकामणि पारे । सोलसमं करेइ, करता सम्यकामगणियं पार । अद्वारसम करे, कोत्ता सम्यकामगत्रिय पाई। वोसइमं कर दे, करता सध्यकामगणिय पारे। वुयालसमं कर, करता सम्यकामणि पारई। प्रद्वारसमं कर, करता सम्यकामगणिय पारे। योसा कर करता सम्बकामणि पार । दुवालसमं कर, करता सम्यकामणिय पार पोहसम कर, करता सम्वकामणि पारे । सोतसमं कर, करता सम्वकामणिय पारे। एक्काए कालो पम्मासा योस ५ दिवसा । चउण्हं कालो यो यरिसा दो मासा योस में दिवसा । सेसं तहेव जहा काली जाव' सिगा। मार्या काली की तरह मार्या रामकृष्णा का भी वृतान्त समझना चाहिए। विशेष मह कि रामकृष्णा आर्या भद्रोत्तर प्रतिमा अगीकार करके विचरण करने लगी, जो इस प्रकार है- पांच उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके यह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पाठ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके नव उपवास किये, करके सर्वकामगुण युक्त पारणा किया। यह प्रथम लता हुई। सात उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पाठ उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके नव उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पांच उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके छह उपयाँस किये, करके सर्वकामगुण युक्त पारणा किया। यह दूसरी लता हुई। नव उपवास किय, करके सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके पाच उपवास किये, करते सर्वकामगुणयुक्त पारणा किया, करके छह उपवास किये, करके सर्वकामगुणयुक्त गुणयुक्त पारणा किया। यह तीसरी लता पूर्ण हुई। १. वर्गमूत्र ३.४. पारणा किया करके नवम अध्ययन पितृसेनकृष्णा पितृसेनकृष्णा का मुक्तावलो तप १३-एवं-पिउसेणकण्हा वि, नवर-मुत्तालि तवोकम्म उवसंपज्जिता गं विहर तं जहा- चउत्यं कर इ, करत्ता सव्वकामगुणियं पार इ। टुं कर इ, करता सव्वकामगणियं पार घउत्यं कर , फरत्ता सव्वकामगुणियं पारइ। प्रमं कर इ, करता सव्वकामगुणियं पार चउत्यं करइ फरेत्ता सव्वकामगणियं पारह। यसमं कर इ, करता सव्यकामगणियं पार चउत्यं करइ, परता सम्यकामगुणियं पार ह । दुवालरामं कर इ, करता सन्यकामगणियं पार चउत्यं कर इ, करता सव्वकामगुणियं पार । चोदसमं करई, करता सम्बकामगणियं पार।। घउत्यं कर इ, करता सव्वकामगुणिय पारे । सोलसमं करई, करता सम्वकामगणियं पारा । घउत्य कर इ, फरता सबकामगणियं पार है । पद्वारसमं कर, करता सम्वकामगुणियं पाहे. घउत्य कर, फरेत्ता सव्वकामगुणियं पारइ । योसहम कर इ, करता सम्यकामगणियं पार घउत्य कर, करता सय्यकामगणियं पारइ । बायोसइमं कर, करता सय्यकामगुणियं पार घउथ कर इ, कर ता सम्वकामगुणिय पारे । चउयोसइम कर, करता सम्वकामगणिय पार। घउत्य कर, करता सम्बकामगुणिय पारे । योसइम कर दे, करता सय्यकामगणिय पारे। घउत्य कर, करता सम्बकामगणिय पारइ । महावीसइमं करइ करता सम्वकामगुणिय पारे। घउरथ कर, करता सयकामगणिय पारह। तीसइम कर करता सम्यकामगुणिय पार! घउत्य कर, करता सम्वकामगणिय पार। बत्तोसहम कर, करता सम्वकामगुणिय पार! घउस्य कर . करता सम्बकामणिय पारे । यत्तीसहम कर, करता सम्यकामगुणिय पाए घउरय कर, करता सम्वकामणिय पारह । यत्तीसहम करें, करता सम्वकामगणिय पाई। एवं तहेव प्रोसारेर जाव घउत्थंकर, करता सम्वकामगणिय पारे । एकाए कालो एक कारस मासा पगरस प दिवसा । चउण्हं तिणि परिसा बस य मासा । संस वाव सिजा स्नुिमनामा का चरित भी प्रायां पाली की तरह ममझना । विशेष यह कि पितृमनाना ने मुक्तारली तर गोकार किया, जो इस प्रकार है- उपरान रिया, कर मकामगुणयुक्त पारणा किया, करके वेला किया, कर सरकार गुगपुन्छ पारमारिया, करके उसमाम रिया, करके मकामगुणयुक्त पारणा किया, करके उना किया, करके सर्व कामगुपचुक पारणा मिया, करके उपनाम किया, करकं मकामगुपयुक्त पारमा किया, १. मा. +-
१७४]]
। मन्तामा
5000000
SOOOOG
(एक परिपाटी का काल ११ मास, १५ दिन
तपस्याकाल
पार परिपाटीका कात ३ वर्ष, १.मास
सुक्तावली तप
का
स्थापना-यन्त्र
तप के दिन एक परिपाटी के तमोरिन २८५ दिन
चार वरिपाटीकेतपोरिन ३ वर्ष, २मास
कारणे
पार परिपाटीके पारणे २४०
000
१७६] [अन्तरदशा एक पाय विल किया, करके उपवाग किया, करके दो प्रायविल किये, नरके उपवाम किया, करके तीन प्रायविल किये, करके उपयाग किया, करो चार मायविन किये, करो उपवास किया, करके पांच प्रायविल किये, करके उपवास किया, करके छह प्रायविन किये, करके उपवाग किया। ऐसे एक एक को वृद्धि से प्रायविल बढ़ाए । बीच-बीच में उपवास किया, इस प्रकार सो प्रायबिल तक करके उपवास किया। इस प्रकार महासेनकृष्णा आर्या ने इस 'पद्धं मान-प्रायविल' तप को पाराधना चौदह वर्ष, तीन माह और वीस अहोरात्र की अवधि में मूत्रानुमार विधिपूर्वक पूर्ण की। पाराधना पूर्ण करके पायर्या महासेनकृष्णा जहाँ अपनी गुरुणी प्रार्या चन्दनवाला थी, वहां पाई और चदनवाला को बदना नमस्कार करके, उनकी प्राज्ञा प्राप्त करके, बहुत से उपवास प्रादि से प्रात्मा को भावित करती हुई विचरने लगी। इस महान् तपतेज से महासेनकृष्णा पार्या शरीर से दुर्वल हो जाने पर भी प्रत्यन्त देदीप्यमान लगने लगी। एकदा महासेनकृष्णा आर्या को स्कदक के समान धर्म-चिन्तन उत्पन्न हुअा। पार्यचन्दना प्रार्या से पूछकर यावत् सलेमना की और जीवन-मरण को प्राकांक्षा से रहित होकर विचरने लगी। महासेनकृष्णा पायर्या ने प्रार्यचन्दना ग्रार्या के पास सामायिक से लेकर ग्यारह अगों का अध्ययन किया, पूरे सत्रह वर्ष तक सयमधर्म का पालन करके, एक मास की सलेखना से प्रात्मा को भावित करके माठ भक्त अनशन को पूर्णकर यावत् जिस कार्य के लिये संयम लिया था उसकी पूर्ण अाराधना करके अन्तिम श्वास-उच्छ्वाम से सिद्ध बुद्ध हुई। गायार्थ-एव श्रेणिक राजा की भार्यानो मे से पहलो कालो देवी का दीक्षाकाल आठ वर्ष का, तत्पश्चात् प्रमश: एक-एक वर्ष की वृद्धि करते-करते दसवी महासेनकृष्णा का दीक्षाकाल सत्तरह वर्ष का जानना चाहिए। विवेचन-"प्रायविलवड्माण"-प्रायविल-वर्धमान-वह तप है जिसमें प्रायवित क्रमशः बढ़ाया जाता है । इस तप की पाराधना में १४ वर्ष ३ मास पोर २० दिन लगते है। पिछले तपो का परिशीलन करने से पता चलता है कि मुत्रकार ने तपी की जो दिन-संख्या लिसी है, उसमें तपस्या के दिन और पारणे के दिन, इस प्रकार सभी दिन सकलित किए जाते हैं । यदि उसी पद्धति का अनुसरण किया जाए तो इसका काल-मान १४ वर्ष ३ माह और २० दिन कैसे हो सकता है ? गमाधान यही है कि इसमें पारणे का कोई दिन नहीं पाता। इसके दो कारण हैं- प्रथम तो मूत्रकार में पौधे पारणे का निर्देश करते चले आ रहे है, वैसे यहा पर मूत्रकार ने निर्देश नहीं किया, दूमरा यदि पारणे के मय दिन भी साथ में मम्मिलित कर दिए जाएं तो इस तप की दिनमस्या १० वर्ष ३ माग २० दिन न रहकर १४ वर्ष १० दिन हो जाती है। अत: यही समझना टोक है कि पार्या महामेनकृष्णा ने १८ वर्ष ३ माम घोर २० दिन तक तप किया, बीच में कोई पारणा नहीं किया। प्रायविन-वधमान-नप का स्थापनापत्र इस प्रकार है-
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परिशिष्ट-१ आगम में वरिणत विशेषनाम संकेत- वर्ग/ सूत्र १. तीर्थकरविशेष- १. अमम तीर्थकर २. अरिष्टनेमि भगवान्-वर्ग ३ से वर्ग ५ तक ३. महावीर स्वामी-वर्ग ६ मे वर्ग ८ तक २. प्रागम में वर्णित (जहा) शब्द से गृहीत व्यक्तिविशेप- १. अभयकुमार ३/१३ २. उदायन ६/१६ ३. गगदत्त ६/१ ४. गौतमस्वामी ३/६, ६/१२ ५. देवानन्दा ब्राह्मणी ६. महावल कुमार १/७, ३/१८ ७. मेघकुमार १/८, ३/१८ ८. स्कन्दकमुनि १/६,६/१, ८.१४ ३. आगम विशेप- १. उवामगदमा (उपासकदमाग) १/२ २. पणति (प्रज्ञप्ति-भगवतीमूत्र) ६/१५ ४. प्रयुक्त व्यक्तिविशेष-मनि आदि १. पतिमुक्तकुमार श्रमण ३/8 (जिसने देवकी को भविष्य कहा था) २. गौतम स्वामी ३. चन्दना साध्वी ८/१ ४. पशिणी माध्वी ५. देव-विशेष १. मुद्गरपाणि यक्ष ६/२ २. वं श्रमण कुबेर ३. हरिशंगमेषी ३/१० ६. क्षत्रियवर्ण के व्यक्तिविशेप- राजा १ अन्धकवृष्णि २ अलक्षराजा ३ श्रीकृष्ण वासुदेव ४. कोणिकराजा ५. जितशत्रु ६. प्रद्युम्न ७. विजयराजा ८. वमुदेवराजा ६. वलदेव १० समुद्रविजय ११. श्रेणिकराजा रानिया- १ अन्धकवृष्णि-पत्नी २. कालो ३. कृष्ण ४. गाधारी ५. गौरीदेवी ६. चेल्लणा ७. जाम्बवती ८. देवको ९. धारिणी १०. नन्दणिका ११. नन्दा १२. नन्दायती १३. नन्दोतरा १४. पपावती १५. पितृमनकृष्णा १६. वनदेवपत्नी ८/७ ६/२ ७/१ ३/२८ १८४] ३/१३ ५. कर्कतनरत्न ६. जातरूपरत्न ७. ज्योतिरसरत्न ८. पद्मराग ६ पुलकरल १०. मणि ११ मसारगल्लरत्न १२. रजतरत्न १३. रिप्टरत्न ३/१३ ३/१३ १/५ ३/१३ ३/१३ ३/१३ [अन्तामा १५. लोहिताशरल १५. पयरत्न १६. वैदूर्यरत्न १/१, ३/१ १३. स्पाटिकरन ३/१६ १८. सोगधिकरत्न १६. हमग रत्न ३/१३ ३०. क्षेत्रविरोप- १. भरतक्षेत्र (भारतवर्ष कहा है) १८६ ] [अन्तकृद्दशा स्पष्ट है कि गौतम गोत्र के महान गौरव के अनुरूप ही उनका व्यक्तित्व विराट् व प्रभावशाली था। एक बार इन्द्रभूति सोमिल प्रार्य के निमन्त्रण पर पावापुरी में होने वाले यज्ञोत्सव में गए धे । उगी प्रवरार पर भगवान् महावीर भी पावापुरी के बाहर महासेन उद्यान में पधारे हुए थे। भगवान् को महिमा को देखकर इन्द्रभूति उन्हें पराजित करने की भावना से भगवान् के समवसरण में पाये, किन्तु वह स्वय हो पराजित हो गये। अपने मन का सशय दूर हो जाने पर यह अपने पाच-गो शिष्यो महिन भगवान् के शिष्य हो गये। गौतम प्रथम गणधर हुए। प्रागमी में य प्रागमेत्तर माहित्य में गौतम के जीवन के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिसा मिलता है। इन्द्रभूनि गौतम दीक्षा के ममय ५० वर्ष के थे। ३० वर्ष साधु-पर्याय में और १२ वर्ष कवली पर्याय में रहे । पपने निर्वाण के समय अपना गण मुधर्मा को सौपकर गुण-शिला चत्य में मागिरु मनान करके भगवान् के निर्वाण मे १२ वर्ष वाद १२ वर्ष की अवस्था में निर्वाण को प्राप्त - शास्त्रों में गणधर गौतम का परिचय ग प्रकार का दिया गया है-ये भगवान के ज्येष्ठ सिप्प । मान हाप ऊंच धे। उनके सागर का मम्थान पोर सहनन उत्कृष्ट प्रकार का था । मुवर्ण गा के गमान गोर थे । उग्र ताम्दी, महा नपस्वी, पोर तपस्वी, धौर ब्रह्मचारी और मक्षिप्त विपुल. नयोगमा गम्पन्न थे। शरीर में प्रनामक्त थे। चौदह पूर्वधर थे । मति, धत, अवधि और मन. पाप-पार Hान के धारक थे। मभिरग्निपाती थे, वे भगवान् महावीर के समीप में कुर पागन में नीचा गिर कर के बंटते थे । ध्यान मुद्रा मे स्थिर रहते हए मयम और तप में प्रात्मा को भानिसले विचरते थे। (२) पण वामुर । माता का नाम देव को, पिता का नाम वासुदेव था। कृष्ण का जन्म अपने मामा पारा में मयुग मेटा था। राम उसको कारण योष्ण ने वर-भूमि को छोड़ कर मुद्र सौराष्ट्र में जाकर तारारपना की। योगवान नेमिनाय के परम भक्त वारिप में वर प्रमम नाम नीकर हारे। न माहिर मात भोर प्राप्त उमर भाषामो में योष्ण का जीवन विस्तृत रूप में मिलता है। द्वारा हाना हो जाने पर योग को मृत्यु रामार के हाथों में हुई। श्री माया। समान गती माररागनी नाना नगर्गमा पनि करानमन। नमानाकार र ।
.. "" १८८] । अन्तकद्दा जमालि के माता-पिता उमको उसके संकल्प से हटा नही सके । अपनी आठ पलियों का त्याग करके उसने पांच-सो क्षत्रिय कुमारो के साथ भगवान् के पास दीक्षा ली। जमालि ने भगवान् के सिद्धान्त-विरुद्ध प्ररूपणा की थी। (৩) রিনমালা शत्रुको जीतने वाला । जिस प्रकार बौद्ध जातकों मे प्राय. ब्रह्मदत्त राजा का नाम आता है, उसी प्रकार जैन-ग्रन्थों में प्राय जितशत्रु राजा का नाम आता है । जितशत्रु के साथ प्रायः धारिणी का भी नाम आता है। किसी भी कथा के प्रारम्भ मे किसी न किसी राजा का नाम बतलाना, कथाकारो की पुरातन पद्धति रही है। इस नाम का भले ही कोई राजा न भी हो, तथापि कथाकार अपनी कथा के प्रारम्भ में इस नाम का उपयोग करता है । वैसे जैन-साहित्य के कथा-ग्रन्थो ने जितात्रु राजा का उल्लेख बहुत माता है । निम्नलिखित नगरो के राजा का नाम जितरा बताया गया है- नगर राजा १. वाणिज्य ग्राम जितशत्रु २. चम्पा नगरी ३. उज्जयनी ४. सर्वतोभद्र नगर ५ मिथिला नगरी ६. पाचाल दंग ७. पामलकरपा नगरी ८ गावत्वी नगरी ९. वारगारमी नगरी १०. पालभिया नगरी ११. पोलामपुर (0) धारिणो देवो योपिक रारा की पटरानी थी। धारिणी का उल्लंग भागमा में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। मरात माहित्य के नाटको में प्राय. राजा की मरगे बड़ी रानी के नाम के मागे 'देवी' निशप लगाया जाता है, जिमरा प्रर्थ होता है रानियो में मय वही अभिषिक्त रानी, पान-पटरानो। रागाषिक के अनेक रानिया थी, उनमें धारिणी मुख्य यो । मौलिए धारिणी के मागे गसिप नगाया गरा है । दंग का प्रय है-युन्या । मेघरमार दमो धारिणी देयो का पुत्र था, जिसने भगवान् महावीर के पास दोशा " " " " ॥ " " " दहरोपी।
- भगवान् ने भी ना मन mm माम Ur मा FT. मग बघ मुनि मयम में स्थिर हो गया। एक मार को गांगना की । गायिमित किमान मे मे मा महानाग में मिस होगा। (११) स्कन्दक मुनि बन्दक मन्यागी थारम्नी नगगे के रहने वाले गरमा परिवार का शिष्य या और गोतम स्वामी का पूर्व मित्र पा भगवान महागेर निध्य frastri प्रनों का उत्तर नहीं दे सका, फलन पायरनी नागा ग र गुना कि भगवान् महागोर नगला नगर बाहर कष-पलाश उद्यान में पधारे है, नो मना भी भगवान् क नागना । माना समाधान मिलने पर वह वहीं पर भगवान् का शिष्य हो गया। स्कन्दक मुनि ने स्थविर के पाग रहार ११ नगी का अध्ययन किया । भिक्षु की १२ प्रतिमामी को कम से गायना की, भाराधना की। गुणरत्नसवत्मर तप किया। शरीर दुवंल, क्षीण पोर मरात हो गया । अन्त में राजगृह के समीप विपुल-गिरि पर जाकर एक मास को मलेसना की। काल करके १२ देवलोक में गया । वहाँ से महाविदेहवास से सिद्ध होगा। स्कन्दक मुनि की दीक्षा-पर्याय १२ वर्ष की थी। (१२) सुधर्मा स्वामी ये कोल्लाग सनिवेश के निवासी अग्निवेश्यायन गोत्रीय ब्राह्मण थे। इनके पिता धम्मिल ये और माता महिला थी। पाच सौ छात्र इनके पास अध्ययन करते थे। पचाम वर्ष की अवस्था मे शिष्यों के साथ प्रव्रज्या ली। बयालीस वर्ष पर्यन्त छयावस्था में रहे। महावीर के निर्वाण के बाद बारह वर्ष व्यतीत होने पर केवली हुए और पाठ वर्ष तक केवलो अवस्था में रहे । श्रमण भगवान के मर्व गणधरो मे सुधर्मा दीर्घजीवी थे, प्रत अन्यान्य गणधरो ने अपने-अपने निर्वाण के समय अपने-अपने गण सुधर्मा को समर्पित कर दिये थे ।' महावीर-निर्वाण के १२ वर्ष वाद सुधर्मा को केवलज्ञान प्राप्त हुप्रा और बीस वर्ष के पश्चात् सौ वर्ष की अवस्था मे मासिक अनशन-पूर्वक राजगृह के गुणशीलचत्य में निर्वाण प्राप्त किया।' (१३) श्रेणिक राजा मगध देश का सम्राट् था। अनाथी मुनि से प्रतियोधित होकर भगवान् महावीर का परम भक्त हो गया था। एसो एक जन-श्रुति है। १. (क) जीवते चैव भट्टारए रावहि जणेहिं मन्ज मुधम्मस्स गणो पिक्वित्तो दोहाउम्गत्ति णातु। ~कल्पमूत्र चणि २०१० (ग) परिनिलया गणहरा जीवते नायर नव जणा 3, इदभूई मुहम्मो अ, रायगिहे निम्बुए वीरे। -मावश्यक नियुक्ति गा. ६५८. २. मावश्यक नियुक्ति, ६५५. - १६२] [अन्तकृद्दशा (२) गुणशील राजगृह के वाहर गुणशील नामक एक प्रसिद्ध बगीचा था। भगवान महावीर के शताधिक बार यहाँ समवसरण लगे थे। शताधिक व्यक्तियों ने यहां पर श्रमणधर्म व चारित्रधर्म ग्रहण किया था। भगवान् महावीर के प्रमुख शिष्य गणधरी ने यही पर अनशन कर निर्वाण प्राप्त किया था। वर्तमान का गुणावा, जो नवादा स्टेशन से लगभग तीन मील पर है, वही महावीर के समय का गुणशील है। (३) चम्पा चम्पा अग देश की राजधानी थी। कनिघम ने लिखा है-भागलपुर से ठीक २४ मील पर पत्थरघाट है । यही इसके आस-पास चम्पा की उपस्थिति होनी चाहिए। इसके पास ही पश्चिम को और एक वडा गाव है, जिसे चम्पानगर कहते है और एक छोटा-सा गाव है, जिसे चम्पापुर कहते है । सभव है, ये दोनो प्राचीन राजधानी चम्पा की सही स्थिति के द्योतक हो ।' फाहियान ने चम्पा को पाटिलपुत्र से १८ योजन पूर्व दिशा मे गगा के दक्षिण तट पर स्थित माना है। महाभारत को दृष्टि से चम्पा का प्राचीन नाम 'मालिनी' था। महाराजा चम्प ने उसका नाम चम्पा रखा। स्थानाग मे जिन दस राजधानियो का उल्लेख हुआ है और दीघनिकाय मे जिन छह महानगरियों का वर्णन किया गया है, उनमें एक चम्पा भी है । प्रौपपातिक सूत्र में इसका विस्तार में निरूपण है। दशवकालिक मूत्र की रचना प्राचार्य शय्यभव ने यही पर की थी।' मम्राट् श्रेणिक के निधन के पश्चात् कूणिक (अजातशत्रु) को राजगृह मे रहना अच्छा न लगा और एक स्थान पर चम्पा के मुन्दर उद्यान को देखकर चम्पानगर वमाया । गणि कल्याण- विजयजी के अभिमतानुसार चम्पा पटना से पूर्व (कुछ दक्षिण मे) लगभग सौ कोस पर थी । अाजकल इमे चम्पानाला कहते हैं । यह स्थान भागलपुर से तीन मील दूर पश्चिम में है । चम्पा के उत्तर-पूर्व में पूर्णभद्र नाम का रमणीय चत्य था, जहाँ पर भगवान महावीर ठहरते थे। - १. दो एन्शियण्ट ज्योग्राफी माफ इण्डिया, पृ. ५४६.५४७ २. इंवेस पांफ फाहियान, पृ. ६५. ३. महाभारत १२/५/१३ ४. स्वारस १७१५ ५. भोपमानिस, चम्पा वर्णन ६ न पागम साक्षिा में भारतीय ममात्र, पृ. ६४ ७. शियितीपंप, ६५ ८, अमरा भगवान महावीर, पृ. ३६९ गौरत मारमा - Hit H गुर! Hir tit gram पशिलम में पागोवान प्रभा पारा में TT TE' और है।' बोर परम्परा के पनुमानराम मारहा। पारगोनाम भग होने के काम मात्रा मोर .. 4 माना है। न हजार गोगन में मोगमी हमारा नाnि) भाग पा ५७. मागे ऊँगा हिमगन पाहै।' निगा वर्णन मगर है frfan मे भाग में बाद हो सोकामना द्वीप के नाम में पियान है।' (५) हारमा (धारयतो):- भाग्न को मानीन गिर नईग्या र T Ut for II रहा है। मण और वैदिक दोनो ही गलियों में पारमय म कोम्तिार है। (१) माताधमकथा व अन्नगागापो के भनुमार तारका गोगदम ली। पूर्व-पश्चिम में बारह योजन लम्बी, पोर उतर-दक्षिण में न यार ोिणं मी भारा निर्मित मोने के प्राकार वाली धी, जिस पर पाच वणों के नाना मणिरोग मुग्जिागिमोपं स गरे थे । वह बडी मुरम्य, अलकापुरी-नुल्य और प्रत्यक्ष देवलोक-गग यो । वह बागाक, दर्शनीय अभिरूप नया प्रतिरूप थी। उसके उत्तर-पूर्व में बता नामक पन या । उग पाग ममस्त ऋतुमा में फल-फूलो गे लदा रहनेवाला नन्दनयन नामक मुराय उद्यान था। उग उद्यान में मुप्रिय यक्षायतन था। उम द्वारका में श्रीकृष्ण वासुदेव अपने मम्पूर्ण राजपरिवार के माथ रहते थे।' १. डिक्शनरी माव पाली प्रापर नेम्स, पण्ड २, ५ २३६ २ वही. खण्ड १, पृ. ११७ ३. वही, पण्ड १,१३५५ ४. वही खण्ड ११.९४१ ५. वही. खण्ड १, १९८१ ६ वही. यण्ड २, पृ. १३२५-१३२६ ७. (क) इण्डिया ऐज डेस्श्राइन्ड इन प्री टेक्सट्म प्राव बुद्धिज्म ऐड जेनिज्म १, विमलघरण ला लियित. (ब) जातक प्रथम यण्ड, पृ २८२, ईशानचन्द्र पौष (ग) भारतीय इतिहास को रूपरेखा भा १, पृ. ४, लेखक-जयचन्द्र विद्यालकार (घ) पाली इगलिश डिक्शनरी पृ. ११२, टो. डब्ल्यू गैस डेविम तथा विलियम स्टेड (3) मुत्तनिपात की भूमिका-धर्मरक्षित पृ. १ (च) जातक-मानचित्र---भदन्त मानन्द कौशल्यायन ८. (क) ज्ञाताधर्म कथा १।१६, मूष ११३ (ख) प्रातगडदशाम्रो ९. जाताधर्म कथा १०५, सूत्र ५८ १९६] [अन्तकृदन योजन धरती लेकर द्वारका का निर्माण किया बताया है। महाभारत मे श्रीकृष्ण ने द्वारकागमन के बारे में युधिष्ठिर से कहा-मथुरा को छोड़कर ह कुगस्थली नामक नगरी मे पाये जो रैवतक पर्वत से उपशोभित थी । वहा दुर्गम दुर्ग का निर्मा किया, अधिक द्वारो वाली होने के कारण द्वारवती अथवा द्वारका कहलाई।' महाभारत जन-पर्व मे नीलकठ ने कुशावर्त का अर्थ द्वारका किया है।' 'ब्रज का सास्कृतिक इतिहाम' में प्रभुदयाल मित्तल ने लिखा है। गुरमेन जनपद मे यादव के ना जाने के कारण द्वारका के उम छोटे से राज्य की वडी उन्नति हुई थी। यहा पर दुर्भद्य दुर्ग पौर विशाल नगर का निर्माण कराया गया और उसे अधक-वृष्णि सघ के एक शक्तिशाली यादव राज्य के रूप में मगठित किया गया। भारत के समुद्र-तट का वह सुदृढ राज्य विदेगी अनार्यों के पात्रमण के लिए देश का एक मजग प्रहरी भी बन गया था । गुजराती भाषा में 'द्वार' का अर्थ वदरगाह है । इस प्रकार द्वारका या द्वारवती का अर्थ हुअा 'वदरगाहो की नगरी।' उन बदरगाहो में यादवो ने मुदूर-समुद्र को यात्रा कर विपुल सम्पत्ति अजित को थी। द्वारका में निर्धन, भाग्यहीन, निर्वल तन और मलिन मन का कोई भी व्यक्ति नहीं था। (१) रायम देविड्म ने कम्बोज को द्वारका को राजधानी लिखा है।" (२) पेनवन्थु मे द्वारका को कम्बोज का एक नगर माना है । डाक्टर मलगेखर ने प्रस्तुत कथन का स्पष्टीकरण करते हुए लिसा है सभव है-यह कम्बोज ही 'कसभोज' हो, जो कि अधकव प्णि के दम पुत्रों का देश था।' (२) डा मोतीचन्द्र कम्बोज को पामीर प्रदेश मानते है और द्वारका को वदरवशा से उत्तर में प्रवस्थित 'दरवाज' नामक नगर कहते है। १. कुशस्थली पुगे रम्या वनोपशोभिताम् । ततो निवेश तथा च कृतवन्तो वय नप | ॥५०॥ नयंत दुर्गमस्रार देवरपि दुरामदम् । स्त्रिया:रि यस्या युध्रेयु किमु धित महारथा ॥५१॥ ""मरा मारियम गता द्वारवतोपुगेम् ।।६७ । -महाभारतममा, म १८ २. (1) महाभारत जन पर्व, प १६० मा ५. (ग) प्रनीत का पनावाग, १६३ हिनयनाड वजरा इनिहाम, . ४. हरिवगत १५८६५. ५. Buddhist India, P.28 Kunbaja was the adjoining country in the extreme North-West, with Dvaraka as SCapital. ६. परवार २, ११ ७. निरी पार पानी बामर नेम्म, भाग 1.7 ११२६ ८. मोरिन संबाविस्वस दो महाभारत, पृष्ठ ३२..
- - १६८1 [सदमा (8) भरतक्षेत्र - जम्बूद्वीप का दक्षिणी छोर का भूराण्ड भरतक्षेत्र के नाम से विथत है। यह अर्धचन्द्राकर है । जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति के अनुसार इसके पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण दिशा में लवण गमुद्र है। उत्तर दिशा में चूलहिमव त पर्वत है। उत्तर से दक्षिण ता भरतक्षय को लम्बाई ५२६ योजन ६ कला है और पूर्व से पश्चिम को लम्बाई १४०७१ योजन पोर कुछ कम ६ कला है। इसका क्षेत्रफल ५३,८०,६८१ योजन, १७ कला और १७ विकला है। भग्नक्षेत्र की सीमा में उत्तर मे चूनहिमवन नामक पर्वतगे पूर्व में गगा और पश्चिम में सिन्धु नामक नदिया बहती है । भरतक्षेत्र के मध्य भाग में ५० योजन विस्तारवाला ताठ्य पर्वत है।' जिसके पूर्व और पश्चिम मे लवणसमुद्र है । इस वैताड्य से भरत-क्षेत्र दो भागों में विभक्त हो गया है। जिन्हें उत्तर भरत और दक्षिण भरत कहते है । जो गगा और सिन्धु नदियां चूलहिमय त पर्वत से निकलती है वे वताढ्य पर्वत से होकर लवणसमुद्र में गिरती है । इस प्रकार इन नदियों कारण, उत्तर भरत खण्ड तीन भागो मे और दक्षिण भरत सण्ड भी तीन भागों में विभक्त होता है । इन छह खण्डो मे उत्तराद्ध के तीन खण्ड अनार्य कहे जाते हैं । दक्षिण के अगल-बगल के खण्डो मे भी अनार्य रहते है । मध्यखण्ड है उसमें २५।। देश प्रार्य माने गये है। उत्तराद्ध भरत उत्तर से दक्षिण तक २३८ योजन ३ कला है और दक्षिणा भरत भी २३० योजन ३ कला है । जिनसेन के अनुसार भरत क्षेत्र में मुकोशल, अवन्ती, पूण्ड, अश्मक, कुरु, काशी, कलिग, अग, बंग, मुल, समुद्रक, काश्मीर, उशीनर, मानर्त, वत्स, पचाल, मालव, दशार्ण, कच्छ, मगध, विदर्भ, कुरुजागल करहाट, महाराष्ट्र, सुराष्ट्र, भाभीर, कोकण, बनवास, पान्ध्र, कर्णाटक, कौशल, चोल, केरल दाम, अभिसार, सौवीर, शूरसेन, अपरान्तक, विदेह सिन्धु, गान्धार, यवन, चेदि, पल्लव, काम्बोज, पारट्ट, वाल्हीक, तुरुष्क, शक और केकय प्रादि देशो की रचना मानी गई है। बौद्ध माहित्य में अग, मगध, काशी, कौशल, यज्ज, मल्ल, चेति, वत्स, कुरु, पचाल मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ती, गधार और कम्बोज इन सोलह जनपदो के नाम मिलते है । १. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति, सटीक, यक्षस्कार १, सूत्र १०, ६५२ २. वहीं. १६१०६५-२ ३. लोकप्रकाश, सगं १६, श्लोक ३०-३१ ४. लोकप्रकाश, सगं १६, श्लोक ३३.३४ ५. वही. १६४८ ६. पही. १६३५ ७. वही. १६१३६ ९. (क) वहौ. १६, श्लोक (प) बृहत्तत्पभाष्य १, ३२६३ पत्ति, तथा १, ३२७५-३२८९. ८. मादिपुराए १६१५२-१५६ १०. अगुत्तरनिकाय; पालिटेबाट सोसायटी सस्करण : बिल्द १, पृ. २१३, जिद ४, २५२ - २०२] [अन्तकृद्दशा रेवतक पर्वत पर जा रही थी। बीच में वह वर्षा से भीग गई और कपड़े सुसाने के लिए वहीं एक गुफा में ठहरी,' जिसकी पहचान आज भी राजीमती गुफा से की जाती है। रंवतक पर्वत सौराष्ट्र में आज भी विद्यमान है । सभव है प्राचीन द्वारका इसी को तलहटी में वसी हो। रैवतक पर्वत का नाम ऊर्जयन्त भी है। रुद्रदाम और स्कधगुप्त के गिरनार शिला-लेखो में इसका उल्लेख है । यहा पर एक नन्दनवन था, जिसमे सुरप्रिय यक्ष का यक्षायतन था । यह पर्वत अनेक पक्षियों एवं लतानो से सुशोभित था। यहा पर पानी के झरने भी बहा करते थे और प्रतिवर्ष हजारों लोग संखडि (भोज, जीमनवार) करने के लिए एकत्रित होते थे। यहां भगवान् अरिष्टनेमि ने निर्वाण प्राप्त किया था ।" दिगम्बर परम्परा के अनुसार रैवतक पर्वत की चन्द्रगुफा में प्राचार्य धरसेन ने तप किया था, और यही पर भूतबलि और पुष्पदन्त प्राचार्यों ने अवशिष्ट श्र तज्ञान को लिपिबद्ध करने का यादेश दिया था। महाभारत मे पाण्डवों ओर यादवो का रंवतक पर युद्ध होने का वर्णन पाया है।" जन ग्रन्थों में रेवतक, उज्जयत, उज्ज्वल, गिरिणाल गोर गिरनार यादि नाम इस पर्वत के माये हैं । महाभारत में भी इस पर्वत का दूसरा नाम उज्जयत माया है । (१२) विपुल-गिरि पर्वत :- राजगृह नगर के समीप का एक पर्वत । आगमो में मनेक स्थलों पर इसका उल्लेख मिलता है । स्थपिरो की देस-रेस में घोर तपस्वी यहा पाकर सलेसना करते थे जन ग्रन्थों में इन पाच पर्वतों का उल्लेख मिलता है- १. भारनिरि २. विपुल गिरि १. गिरि वरय जन्ती, वासेपत्ता उ पन्तरा। काम नपारमिठो नयाणस्ग मा दिया। २ किशि तीरल, १९ १. न पागम साहित्य भारतीय समाज पृ ४७२ ४. हालाभापति, १३२९२२ १. (1) सामानिति, ३.. (4) पमूर, ११३०, पृ.१०२ (4) मा ११, ५, १० (1) तामा,... (1) उत्तरारन टोरा, २२.१ २. १. कायम मापा मार]. w. orfijuc i XII, 7. {•. ८. प. महारानी पाको, पृ. २१७, र.रसानी में ।' यह स्थान उत्तर-पूर्वीय रेलवे के बलगमपुर स्टेशन से जो राडा जाती है, उसमे ग मोल दूर है । बहराईच से वह २६ मील पर अवस्थित है। विद्वान वी० स्मिथ के अभिमनानुमार श्रावस्नी नेपाल देश के मजरा प्रान्त में है और वह वालपुर को उत्तर दिशा मे नथा नेपालगज के मनिकट उत्तर पूर्वीय दिगा में है। युमान नाग ने श्रावस्तो को जनपद माना है और उसका विस्तार छह हजार ली, उमको राजधानी को 'प्रामाद- नगर' कहा है, जिसका विस्तार वीस ली माना है।' जैन दृष्टि से यह नगरी अचिरावती (गप्ती) नदी के किनारे बसी थी। जिसमे बहुत कम पानी रहता था, जिसे पार कर जेन श्रमण भिक्षा के लिए जाते थे। कभी-कभी उसमे बहुत तेज बाद भी आ जाती थी। श्रावस्ती बौद्ध और जैन सस्कृति का केन्द्रस्थान रहा है। केशी और गौतम का ऐतिहासिक सबाद वही हुअा। अनेक ऐतिहासिक प्रमंग उम भूमि से जुड़े हुए है। भगवान् महावीर ने छमस्थावस्था में दसर्वां चातुर्मास वहा पर किया था। केवलज्ञान होने पर भी वे अनेक बार वहाँ पर पधारे थे और सैकडो व्यक्तियो को प्रसज्या प्रदान की थी और हजारों को उपासक बनाया था । श्रावरती के कोष्ठकोद्यान में गोरालक ने तेजोलेश्या से सुनक्षत्र और सर्वानुभूति मुनियों को मारा था और भगवान् महावीर पर भी तेजोलेश्या प्त की थी। शलक का परम उपासनः अयंपुल व हालाहला कु भारिन यही के रहने वाले थे। १. दी एशियण्ट ज्योग्राफी प्रॉफ इडिया, पृ. ४६९-४७४ २. जनल प्रॉफ रॉयल एशियाटिक सोसायटी, भाग १, जन. १९०० ३. पुपान चाड गम् ट्रेवेस इन इडिया, भाग १ पृ. ३७७ ४. (क) कल्पमूत्र (घ) वृहत्कल्प मूत्र, १३३. (ग) बहलल्प भाप्य, ४१५६३९, ५६५३. ५. (क) मावश्यक पूणि, पृ.१ (प) मावश्या हारिभद्रीया वृत्ति, पृ.४४५. (ग) मावश्यक मानगिरि वृत्ति, पृ. ५६५ (प) टोनी या कमानोश, पृ. ६. ६. उत्तराध्ययन ७. देखिए यस्तुत पन्य.
२२. श्री मोहनराजजी वालिया, अहमदाबाद ६. श्री रतनलालजी चतर, ब्यावर २३. श्री चेतनमलजी सुराणा, मद्रास ७. श्री जवरीलालजी अमरचंदजो कोठारी, ब्यावर २४. श्री गणेशमलजी धर्मीचदजी काकरिया, नागौर ८. श्री मोहनलालजी गुलावचंदजो चतर, व्यापर २५. श्री बादलचदजी मेहता, इन्दौर ६. श्री वादरमलजी पुखराजजी बंट, कानपुर २६ श्री हरकचदजी सागरचदजी वेताला, इन्दौर १०. श्री के. पुसराजजी बाफना, मद्रास २७. श्री सुगनचन्दजी वोकड़िया, इन्दौर ११. श्री पुखराजजी बुधराजजी वोहरा, पीपलिया २८ श्री इन्दरचदजी वैद, राजनादगाव १२. श्री चम्पालालजी बुधराजजी वाफणा, व्यावर २६ श्री मागीलालजी धर्मीचदजी चोरडिया, चांगा- १३. श्री नथमलजी मोहनलालजी लूणिया, चण्डावल टोला १४. श्री मागीलालजी प्रकाशचदजी रुणवाल, बर ३० श्री रघुनाथमलजी लिखमीचदजी लोढ़ा, चागा- १५. श्री मोहनलालजी मगलचदी पगारिया, रायपुर टोला १६. थी भवरलालजी गौतमचदजी पगारिया, ३१ श्री भवरलालजी मूलचदजी सुराणा मद्रास कुशालपुरा ३२ श्री सिद्धकरणजी बैद, चागाटोला १७. श्री दुलेराजजी भवरलालजी कोठारी, कुशाल- ३३. श्री जालमचदजी रिखबचदजी बाफना, आगरा पुरा ३४. श्री भवरीमलजी चोरडिया, मद्रास १६. श्री फूलचदजी गौतमचदजी काठेड, पाली ३५. श्री हीरालालजी पन्नालालजी चौपड़ा, अजमेर २६. श्री रूपचदजी जोधराजजी मूथा, पाली ३६. श्री घेवरचदजी पुखराज जी, गोहाटी २०. श्री पन्नालालजी मोतीलालजी सुराणा, पाली ३७. श्री भागीलालजी चोरडिया, प्रागरा २१. श्री देवकरणजी श्रीचदजी डोसी, मेडतासिटी ३८ श्री भवरलालजी गोठी, मद्रास २२, श्री माणकराजजी किशनराजजी, मेड़तासिटी ३६. श्री गुणचदजी दल्लीचदनी कटारिया, वेल्लारी २३. श्री अमृतराजजो जसवन्तराजजी मेहता, मेड़ता ४०. श्री अमरचदजी बोथरा, मद्रास सिटी ४१. श्री छोगमलजी हेमराजजी लोढ़ा, डोडीलोहारा २४. श्री वी गजराजजी वोकड़िया, सलेम ४२. श्री मोहनलालजी पारसमलजी पगारिया, २५. श्री भवरलालजी विजयराजजी काकरिया, बैंगलोर बिल्लीपुरम् ४३. श्री जड़ावमलजी सुगनचदजी, मद्रास २६. श्री कनकराज जी मदनराजजी गोलिया, ४४. श्री पुराराजजी विजयराज जी, मद्रास जोधपुर ४५. श्री जवरचंदजी गेलड़ा, मद्रास २७. श्री हरकराजजी मेहता, जोधपुर ४६. श्री सूरजमलजी सज्जनराजजी महेता, कुप्पल २८. श्री सुमेरमलजी मेड़तिया, जोधपुर सहयोगी सदस्य २६, श्री घेवरचदजी पारसमलजी टाटिया, जोधपुर ३०. श्री गणेशमलजी नेमीचदजी टाटिया, जोधपुर १. धी पूनमचदजी नाहटा, जोधपुर ३१. श्री चम्पालालजी होरालालजी वागरेचा, २. श्री अमरचदजी वालचदजी मोदी, व्यावर जोधपुर ३. श्री चम्पालालजी मीठालालजी सकलेचा, ३२. श्री मोहनलालजी चम्पालालजी गोठी, जोधपुर जालना ३३. श्री जमराजजी जवरीलालजी धारीवाल, जोधपुर ४. श्री छगनीवाई विनायकिया, ब्यावर ३४. श्री मूलचदजी पारस, जोधपुर ५. श्री भवरलालजी पोपड़ा, व्यावर ३५. श्री मासुमल एण्ड क., जोधपुर . २०८] २९. श्री वर्द्धमान स्थानकवामी जैन, श्रावकसघ, ११२. श्री कमलाकवर ललवाणी धर्मपत्नी : दिल्ली-राजहरा पारसमलजी ललवाणी, गोठन १०० श्री जवरीलाल जी शातिलालजी मुराणा, ११३. श्री लक्ष्मीचदनी अशोककुमारजी श्री- बुलारम कुचेरा १०१. श्री फतेराजजी नेमीचदजी कर्णावट, कलकत्ता ११४ श्री भवरलालजी मागीलालजी वेताल १०२. श्री रिद्धकरणजी रावतमलजी भुरट, गोहाटी ११५. श्री कंचनदेवी व निर्मलादेवी, मद्रास १०३. श्री जुगराजजी वरमेचा, मद्रास ११६. श्री पुखराजजी नाहरमलजी ललवाणी १०४ श्री कुगालचदजी रिखबचदजी मुराणा, ११७ श्री चादमलजी धनराजजी मोदी, अब बुलारम ११८. श्री मांगीलालजी उत्तमचदजी बाफना १०५. श्री माणकचदजी रतनलालजी मुणोत, नागौर ११६. श्री इन्दरचदजी जुगराजजी बाफना, १०६. श्री मम्पतराजजी चोरड़िया, मद्राम १२०. श्री चम्पालालजी माणकचदजी निधी, १०. श्री कुन्दनमलजी पाममलजी भण्डारी, १२१. श्री सचालालजी वाफना, औरगाबाद बैंगलोर १२२. श्री भूरमलजी दुल्लीचंदजी वोकडिया, १०८. श्री रामप्रमन्न ज्ञान प्रमार केन्द्र, चन्द्रपुर १०६. श्री नेजराज जी कोठारी, मागलियावास ११०. श्री अमरचदजी चम्पालालजी छाजेड, पादू सिकन्दरावाद बड़ी १११. यो मांगीलालजी गातिलालजी रुणवाल, लोढ़ा, वम्बई हरमोलान १२५. श्री भीकमचन्दजी माणकचन्दजी सात (कुडालोर), मद्रास ३ २४ 0 सिटी १२३. श्री पुखराजजी किशनराजजी तावेड, १२४. श्रीमती रामकुवर धर्मपत्नी श्रीचादम ..
मामिक धर्म का प्रस्वाध्याय तीन दिन तक। बालक एवं बालिका के जन्म का अस्वाध्याय यमरः गर्जन और विद्युत प्रायः ऋतु स्वभाव से ही होता है। अतः पादों में स्वाति नक्षत्र पर्यन्त अनध्याय नही माना जाता। ५. निर्यात-चिना बादल के आकाग में व्यन्तरादिकृत घोर गर्जन होने पर, या वादलों सहित आकाश में कडकने पर दो प्रहर तक अस्वाध्याय काल है। ६. यूपक-शुक्ल पक्ष मे प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, को सन्च्या चन्द्रप्रभा के मिलने को यूपक कहा जाता है । इन दिनों प्रहर रात्रि पर्यन्त स्वाध्याय नहीं करना चाहिए । ७. यक्षादीप्त-कभी किसी दिशा में विजली चमकने जैसा, थोड़े थोड़े समय पीछे जो प्रकार होता है वह यक्षादीप्त कहलाता है। अत प्रकाश में जब तक यक्षाकार दीयता रहे तब तक स्वाध्याय नहीं करना चाहिए । ८ धूमिका कृष्ण-कार्तिक से लेकर माघ तक का समय मेघो का गर्भमाम होता है। इसमें धूम्र वर्ण की मूक्ष्म जलरूप धुध पड़ती है । वह धूमिका-कृष्ण कहलाती है । जब तक यह धुध पड़ती रहे, तब तक स्वाध्याय नहीं करना चाहिए। ६ मिहिकाश्वेत-गीतकाल मे श्वेत वर्ण का मूक्ष्म जलरूप धुन्ध मिहिका कहलाती है। जब तक यह गिरती रहे, तब तक अस्वाध्याय काल है । १० रज उद्घात–वायु के कारण प्राकाश मे चारों ओर धूलि छा जाती है। जब तक यह धूलि फैली रहती है । स्वाध्याय नही करना चाहिए। उपरोक्त दस कारण ग्राकाश सम्बन्धी प्रस्वाध्याय के है । पौरारिक सम्बन्धी इस मनध्याय ११-१२-१३. हड्डी, मांस और रुधिर--पचेद्रिय तिर्यंच की हड्डी मास और रुधिर यदि मामने दिमाई दें, तो जब तक वहाँ से यह वस्तुएँ उठाई न जाएं तब तक अस्वाध्याय है । माम पाम के ६० हाथ तक इन वस्तुयो के होने पर अस्वघ्याय मानते हैं । विशेषना इनाना है कि इनका प्रस्याध्यायसो हाथ तक तथा एक दिन रात का होता है । स्त्रोत इसी प्रकार मनुष्य मम्बन्धी प्रस्थि मास प्रौर रुधिर का भी अनध्याय माना जाता है । मान एव पाठ दिन पर्यन्त का माना जाता है । १४, प्रचि-मल-मूत्र सामने दिसाई देने तक अस्वाध्याय है। १५. श्मशान-दमगानभूमि के चारो मोर सोमो हाथ पर्यन्त प्रस्याध्याय माना जाता है । १६ पाहण-चन्द्रग्रहण होने पर जपन्य पाठ, मध्यम बारह, मोर उत्कृष्ट सोलह प्रहर पपंल साप्यार नहीं करना चाहिए। १७. सूर्यग्रहण-मूर्यग्रहण होने पर भी क्रमशः पाठ, बारह और मोलह प्रहर पन्त प्रस्याप्पारसल माना गया है। वृत्तिकार
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