Sanmati Library, Jaipur
Shanti - Sopan
Front matter
श्री ७० ज्ञानानंद जी न्यायतीर्थ द्वारा अहिंसा प्रचा.
रणी सभा काशीके लिये अहिंसा प्रेस भदैनी घाट-काशी
से मुद्रित।
पुस्तक मिलने का पता:-
-
मेनेजर अहिंसा प्रचारिणी सभा,
करती।
* अहिंसा ग्रन्थमाला, प्रथम पुष्प 12
शान्ति-सोपान
परमानन्द स्तोत्र, खरूप-संधोधन, सामायिक पार
मृत्यु-महोत्सव और समाधि--शतक का
भावानुवाद।
श्री ब्रह्मचारी ज्ञानानन्द जी कृत ।
--
प्रकाशिका-
श्री अहिंसा प्रचारिणी सभा, काशी।
श्रावण
श्री वीर नि०सं०२४४
.
अन्य सूची-
१-परमानन्द-स्तोत्र
२-खरूप-संवोधन
३-सामायिक-पाठ
४-मृत्यु-महोत्सव
पू-समाधि-शतक
१से इतका
१०-२३ ॥
२४-२८७
1
"
.
४४-१२६ ॥
ज्ञानं न किं किं कुरुते नराणाम् ।
समर्पण।
श्रीमान् माननीय महानुभात्र न्यायाचार्य
पंडित गणेश प्रसाद जी वर्णी
संस्थापक स्यावाद महाविद्यालय काशी
घ सतर्क-सुधा-तरंगिणी पाठशाला
सागर के कर कमलों में लघु
लेखक द्वारा सादर
समर्पिता
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अयंति जगति जिन शालनम् । भूमिका। साहित्य-सेवी, शिक्षित समुदाय इस यातको भली-भांति जानता है कि संसार के समस्त रसों में शांति रस सब से ऊंचे दर्जे का है। क्रोधादि कपायों के प्रचण्ड संताप से जब किसी की आत्मा तप्त हो जाया करती है तब बड़ी २ नदियों की निर्मल धाराये, शीतल चंदन, चन्द्रमा, खस, फेवड़े और मलयगिरि की प्रातःकालीन 'शिशिर सुगंधित निर्मल अनिल आदिक सब मिल कर भी उस संताप को दूर करने में समर्थ नहीं हुआ करते। उस संताप के नष्ट करने की शक्ति यदि किसी में होती है, तो वह केवल संसार के स्वभावको जान- ने वाले सरल चित्त सज्जनों के सुधा-सावी उपदेश में होती. है। इसी एक रामबाण औषधि के सेवन से यह क्रोधादि कपाय को भयंकर हार्दिक रोग शांत हो सकता है । प्रवत से प्रवल प्रतापी योद्धा बड़ी २ तोपं, तलवार और मशीनगनों का भय दिखा कर भी जिस मस्तक को रंचमात्र नीचा नहीं कर 'सकते; उसी उन्नत मस्तक को महर्षि पुरुष, प्रशम-पीयूष- पोपक एक-दो वाक्य सुना कर 'चरणों में झुका लिया करते हैं। इस प्रकार संसार भर को वंश करने में समर्थ और विना प्रयत्ल हमेशा पास रहने वाले शांतिमय शस्त्र की महिमा में और अधिक कुछ न लिख कर प्रकृत पुस्तक शांति-सोपान के विपरने हम यह सूचित कर देना आवश्यक समझते हैं कि इस - (२) पुस्तक में जिन परमानंद स्तोत्र, श्रीफलंक देव विरचित खरूप-संवोधन मृत्यु महोत्सव घ श्रीपूज्यपाद स्वामी रचित समाधि-शतक, नामक ग्रन्थों का सरल अनुवाद प्रकाशित किया गया है, वे चारों ही ग्रन्थ शांति रस की पुष्टि करने में एक से एक उत्तम है। प्रथम ग्रन्थ परमानंद स्तोत्रमें वापि केवल २४ ही श्लोक । किन्तु ये थोड़े से ही पध, जब सब तरफ से वित्त-वृत्ति को हटा कर मनन किये जाते हैं तब आत्मा में विचिन श्रानंद उत्पन्न कर देते हैं । इस स्तोत्र के.रचयिता का नाम यद्यपि हमें मालूम नहीं हो सका किन्तु इस बात को प्रकाशित किये विना हमसे नहीं रहा जाता कि जिन महानुभाव के द्वारा इस स्तोत्र की रचना हुई है उन्होंने केवल अपनी इस कृति से ही परमात्मपद की झलक दिखाने का कार्य कर दिया है। दूसरा स्वरूप-संबोधन ग्रंथ दि० जैन न्याय शास्त्रों के प्रसिद्ध कर्ता श्री अकलंक भट्टाचार्य का बनाया हुआ है। जिस प्रखर प्राचार्य ने न्याय विनिश्चयालंकार सरीखा अद्भुत ग्रंथ ३०,००० हजार श्लोकों में लिखकर समाप्त किया है और अष्टशती व राज़वार्तिक सरीखे अनेक महत्व पूर्ण विशाल ग्रंथ रचकर अपनी अलौकिक विद्वत्ताका परिचय दिया है उन्हीं प्राचार्य महाराज ने इस छोटे से युक्ति पूर्ण ग्रंथ को केवल २५ श्लोकों में रचकर यथेट भोजन कराने के बाद उत्तम पान का बीड़ा खिलाने सरीखा काम कर दिया है। अंथ का महानुभाव ने इस छोटे से अध्यात्म ग्रंथ में भी ।
(३)
न्याय विषयक लेखनशैली की अद्भुत छटा दिखाये विना
नहीं छोड़ी।
तीसरा सामायिक पाठ केवला १२ श्लोकों में किसी
महात्मा ने ऐसासुन्दर बनाया है कि ध्यान पूर्वक पढ़ने से
राग-द्वेप की कालिमा का बोध करा देता है।
चौथे; मृत्यु-महोत्सव ग्रंथ में हमने १८ मूल श्लोकों के
अतिरिक्त पूर्व में ७ श्लोक श्री रत्न करंड श्रावकाचार में से
भी सम्मलित कर दिये हैं। दिन-रात मौत से डरते रहने
पाले संसारी जीवों के लिये मृत्यु महोत्सव के २५ श्लोक
बड़े काम की चीज हैं। इन श्लोकों को ध्यान पूर्वक पढ़ कर
मनन करने से विवेकी पुरुषों का मृत्यु का भय वास्तव में
दूर हो सकता है।
पांचवा-समाधि-शतक ग्रंथ सर्वार्थ सिद्धि च जैनेन्द्र
व्याकरण के सूत्र का श्री पूज्य पाद आचार्य के द्वारा १०५
श्लोकों में रखा गया है इस अपूर्व ग्रन्थ के एक अनुभव पूर्ण
श्लोक द्वारा ग्रंथ कर्त्ता महाराज ने जिस प्रशम-पीयूष का
पान कराया है उसका पता पाठकों को इस ग्रंथ का मनन
करने से ही लग सकता है । भयंकर सांसारिक दुःखों के रूप
में पड़े हुए जिस पुरुष को अपनी आत्मा के उद्धार की उत्कट
इच्छा हो उसको दुःख कूप से बाहर निकलने के वास्ते रज्जु
(रस्सी) का काम देने के लिये यह अंध निःसन्देह समर्थ
समझना चाहिये।
तथा संसार के समस्त दुखों की
(४) असली जड़ का पता लगाना हो और उस जड़ को काट डालने की जिसकी इच्छा हो उसका कार्य इस ग्रंथ के "मूलं संसार दुःखस्या देह एवात्मधोस्ततः । त्यक्त्वना प्रविशेदन्तर्वहिरव्यापतेन्द्रियः ॥१५॥ केवल इस श्लोक के अर्थ को मनन करके तदनुकूल किया करने ले चल जावेगा। ' इस प्रकार इन पांच छोटी २ पुस्तकों को शांतरस की पोषक समझ कर भावानुवाद करके शांति सोपान के नाम से प्रकाशित कर दिया है। यदि पाठक महाशयों को हमारा.यह प्रयास पसंद आवेगा तो श्रागामी और भी कोई पुस्तक अध्यात्म रलिक पाठकों की सेवा में समर्पित करने की चेष्टा को जायगी। प्रशानवश यदि किसी श्लोक भाव व्यक्त फरने में त्रुटि रह गई हो तो पाठक महोदय उसे सूचित करें। मिती श्रावण शुक्ला १५ वी०सं० २४४८, प्रशम-पीयूय पिपासु- ब्रह्मचारी-ज्ञानानंद। खजांची की नंशियां जयंपुर। WeCere श्री परमानन्दाय नमः।" शान्ति-सोपान * परमानन्दस्तोत्र * H परमानंदसंयुक्तं, निर्विकारं निरामयं । ध्यानहीनान पश्यन्ति, निजदेहे व्यवस्थितं ॥१॥ अर्थ-परमानन्द युक्त रागादिक विकारों से रहित, स्व- रादिक रोगों से मुक्त और निश्चय नय से अपने शरीर में ही विराजमान परमात्मा को ध्यानहीन पुरुष नहिं देख सकते। अनंतसुखसंपन्न, ज्ञानामृतपयोधरं । अनंतवीर्यसंपन्न, दर्शनं परमात्मनः ॥२॥ अर्थ-अनन्त सुखविशिष्ट, ज्ञानरूपी अमृत से भरे हुए समुद्रके समान और अनन्त वल युक्तपरमात्मा का स्वरूप सम- झना चाहिये। निर्विकारं निरावाधं, सर्वसंगबिबर्जितम् ।
२
शान्तिसोपान ।
परमानंदसम्पन्नं, शुद्धचैतन्यलक्षणम् ॥३॥
अर्थ-रागादिक विकारों से रहित, अनेक प्रकारकी सांसा-
रिक वाधानों से मुक, सम्पूर्ण परिग्रहो.से शून्य, परमानन्द
विशिष्ट, शुद्ध केवल ज्ञान रूप चैतन्य ही परमात्मा का लक्षण
मानना चाहिये ॥३॥
।
6
उत्तमा स्वात्मचिंतास्यान्मोहचिंता च मध्यमा ।
अधमा कामचिंता स्यात्, परचिंताऽधमाधमा ४
अर्थ-अपनी आत्मा के उद्धार को चिंता करना उत्तम
चिंता है, प्रकृष्टमोह अर्थात् शुभराग वश दूसरे जीवों के भले
करने की चिंता करना मध्यम चिंता है, काम भोग की चिंता
करना अधम चिंता है और दूसरों के अहित करने का विचार
करना अधम से भी अधम चिंता है॥४॥
निर्विकल्पसमुत्पन्नं ज्ञानमेव सुधारसं ।
बिबेकमलिं कृत्वा तत्पिति तपस्विनः ॥५॥
....
अर्थ-आत्मा के असली स्वरूप को विगाड़ने वाले अनेक
प्रकार के संकल्पविकल्पों को नाश करने से जो ज्ञानरूपी अ-
मृत उत्पन्न होता है उसको तपस्वी महात्मा ही विवेक रूपी
अंजुलि से पीते हैं ॥५॥
३ परमानन्दस्त्रोत्र 1 सदानन्दमयं जीवं यो जानाति, स पण्डितः। स सेवते निजात्मान, परमानन्दकारणम् ॥६॥ अर्थ-जो पुरुष निश्चय नय से सदा ही आत्मा में रहने वाली परमानन्द दशा को जानता है वही वास्तव में पंडित है और वही पुरुष अपनी आत्मा को परमानन्द का कारण समझ कर वास्तव में उसकी सेवा करनी.जानता है। नलिन्यां च यथा नीरं, मिन्नं तिष्ठति सर्वदा। अयमात्मा स्वभावेन, देहे तिष्ठति निर्मला अर्थ---जैसे कमल पत्र के ऊपर पानी की बूंद्र कमल से हमेशा भिन्न रहती है, उसी प्रकार यह निर्मल आत्मा शरीर के भीतर रह कर भी खभाव की अपेक्षा शरीर से सदा भिन्न ही रहता है अथवा कार्माण शरीर के भीतर रह कर भी कार्माण शरीरजन्य .रागादि मलों से सदा अलिप्त रहता है ॥ ७॥ द्रव्यकर्ममलैर्मुक्तं मावकर्म विवर्जितम् । नोकमरहितं विद्धि, निश्चयेन चिदात्मनः ॥८॥ अर्थ-इस चैतन्य आत्मा का स्वरूप निश्चय करके शाना. वरणादि रूप द्रव्यकों से शून्य, रागादिरूप भाव कर्मों से रहित व औदारिक वैक्रियिक श्रादि शरीररूप नोकर्मों से रहित जानना चाहिये। .
४ शान्तिसोपान । आनन्दं ब्रह्मणारूपं, निजदेहे व्यवस्थितम् । ध्यानहीनान पश्यन्ति, जात्यन्धा इव भास्करम् ९ अर्थ-इस परम ब्रह्म रूप परमात्मा के श्रानन्दमय ख. रूप को शरीर के भीतर ही मौजूद होते हुए भी ध्यान हीन पुरुष नही जानते हैं, जैसे जन्मांध पुरुष सूर्यको नहीं जानना है। तद्धयानं क्रियते भव्यैर्मनायेन बिलीयते । तत्क्षणं दृश्यते शुद्धं चिच्चमत्कारलक्षणम् १० माक्षके इच्छुक भव्य जीवों को वही ध्यान करना चाहिये जिसके द्वारा यह चंचल मन स्थिर होकर परमात्मस्वरूप में विशेष रूपसे लीन हो जावे, फ्यो कि जिस समय इस प्रकार का ध्यान होता है उसी समय चैतन्यचमत्कारस्वरूप परमात्मा का साक्षात् दर्शन होता है। ये ध्यानाला मुनयः प्रधाना स्तदुखहीना नियमाद्भवन्ति । सम्प्राप्य शीघ्रं परमात्मतत्वं ब्रजन्ति मोक्षं क्षणमेकमेव ॥११॥ जिन मुनियों का उत्तम ध्यान करना ही स्वभाव पड़ गया है वे मुनिपुंगव कुछकाल में ही नियम से सर्वदुःस्रो ५ परमानन्दस्त्रोत्र। से छूट कर अहंत स्वरूप परमात्मपदको प्राप्त हो जाते है और बाद में प्रयोगकेवली होकर क्षणमात्र में- अष्टकर्म रहित अविनश्वर मोक्षधाम में सदा के लिये जाविराजमान होते हैं ॥ ११ ॥ आनन्दरूपं परमात्मतत्वं, समस्तसंकल्पविकल्प मुक्त स्वभावलीना निवसन्ति नित्यं । जानाति योगी स्वयंमव तचं ॥१२॥ 'निज स्वाभाव में लीन हुए मुनि ही परमात्माके समस्त संकल्पों से रहित परमानंदमय स्वरूप में निरंतर तन्मय रहते है। और इस प्रकार के योगी महात्मा ही आगे कहे जानेवाले परमात्म-स्वरूप को स्वयं जानते हैं ।। १२ ॥ चिदानन्दमयं शुद्ध निराकारं निरामयं । अनन्तमुखसम्पन्नं सर्वसगविवर्जितम् ॥१३॥ लोकमात्रप्रमाणोऽयं निश्चये न हि संशयः । व्यवहारे तनूमात्रः कथितः परमश्वेरैः ॥१४॥ श्री सर्व देव ने परमात्माका स्वरूप चिदानंदमय शुद्ध रूप-रस,गंध स्पर्शमय श्राफार से रहित, अनेक प्रकार के रोगों से सर्वथा शून्य, अनंतसुत्र विशिष्ट य सर्व ,परिगृह ६ शान्तिसोपान । रहित बताया है। और निश्चय नयसे। श्रात्मा या परमात्मा का प्राकार लोकाकाश के समान असंख्यात प्रदेशी तथा व्यवहार नय!कर्मोदय से प्राप्त छोटे व बड़े शरीर के समान बताया है ॥ १३ ॥ १४ ॥ . यत्क्षणं दृश्यत शुद्धं तत्क्षणं गतविभ्रमः । स्वस्थचितः स्थिरीभूत्वा, निर्विकल्पसमाधिना१५ इस प्रकार ऊपर कहे हुए परमात्माके खरुप को योगी पुरुष जिस समय निर्विकल्पसमाधिके द्वारा (ध्याता-ध्येय-ध्यान, की अभिन्न रूप एक अवस्था हो जाने से) जान लेता है उस समय उस योगी का चित्त रागादि जन्य आकुलता से रहित स्थिर होता है और उसकी आत्मा को अनादि काल से भ्रम में डालने वाले श्रज्ञानरूपी पिशाच का नाश हो जाता है। उस समय वह निश्चल योगी ही धागे कहे जाने वाले विशेषणों से विशिष्ट हो जाता है। स एव परमं ब्रह्म, स एव जिनपुंगवः । स एव परमं तत्वं, स एव परमो गुरुः॥१६॥ स एव परमं ज्योतिः, स एव परम तपः । स एव परमं ध्यानं, स एव परमात्मनः ॥१८॥ स एव सर्वकल्याणं, स एव सुखमाजनम् ।
परमानन्दसांत्र।
स एव शुद्धचिद्रूपं, स एव परमः शिवः ॥१८॥
स एव परमानन्दः, स एव सुखदायकः ।
स एव परचैतन्यं, स एव गुणसागरः ।१९।।
अर्थ-अर्थात् वह परमध्यानी योगी मुनि ही परमब्रह्म तथा
घातिया कमों को जीतने से जिन, शुद्धरूप हो जाने से परम
आत्मतत्त्व, जगतमात्र के हितका उपदेशक हो जाने से
परमगुरु, समस्त पदार्थों के प्रकाश करने वाले शान से युक्त
हो जाने से परमज्योति, ध्यान ध्याता के अभेदरूप हो आने
से शुक्ल ध्यान रूप परमध्योन, व परम तपरूप परमात्मा के
पास्तविक स्वरूपमय हो जाता है तथा वही परमध्यानी मुनि
ही सर्व प्रकार के कल्याणों से युक्त, परमसुख की पात्र, शुद्ध
चिद्रूप, परमशिव कहलाता है और यही परमानंदमय, सर्व
सुखदायक, परमचैतन्य आदि अनंतगुणों का समुद्र हो
जाता है। १६ ॥ १७॥ १८ ॥ १६॥
परमाल्हादसम्पन्नं, रागद्वेषविवर्जितम् ।
अर्हन्तं देहमध्ये तु, यो जानाति स पण्डितः॥२०॥
अर्थ-इस प्रकार ऊपर कहे हुए परम आल्हादयुक्त, राग-द्वेष
शून्य, अर्हन्त देव को जो ज्ञानी पुरुष अपने देहरूपी मंदिर में
विराजमान देखता व जानता है, वही पुरुप वास्तव में पंडित
कहा जा सकता है ॥२०॥
और
शान्तिसोपान
आकाररहितं शुद्ध, स्वस्वरूपव्यवस्थितम् ।
सिद्धमष्टगुणोपेतं, निर्विकार निरंजनम् ॥२१॥
अर्थ-इसी प्रकार अरहंत भगवानके स्वरूप की तरह सिब
परमेष्ठी के स्वरूप को सपरसादिमय आकार से रहित,
शुद्ध, निज स्वरूप में विराजमान, रागादि विकारों से शून्य.
कर्म-सल से रहित, क्षायिक सम्यग्दर्शन, केवल शान, केवल
दर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व, अव्यावाध, अगुरुलघुत्व
अवगाहना रूप अष्ट गुणों से सहित चितवन करे।
तत्साशं निजात्मानं, प्रकाशाय महीयसे ।
सहजानंदचैतन्यं, यो जानाति स पंडितः।।२२॥
सिद्ध परमेष्ठी के समान तीनलोक घ तीनो कालवी
समस्त अनंत पदार्थों का एक साथ प्रकाश करने वाले केवल
ज्ञान आदि गुणों की प्राप्ति के लिये जो पुरुष अपनी आत्मा
को भी परमानंदमय, चैतन्यचमत्कारयुक्त ज्ञानता है, वही
वास्तव में पण्डित है।
पाषाणषु यथा हेम. दुग्धमध्ये यथा धुन ।
तिलमध्ये यथा तैलं, देहमध्ये तथा शिवः ।
काष्टमध्ये यथा वन्हिा, शक्तिरूपण तिष्ठति ।
अयमात्मा शरीरेषु, यो जानाति स पण्डितः॥२४॥
परमानन्दस्त्रोत्र । अर्थ-जिस प्रकार सुवर्ण-पापाणमें सोनागुप्त रीतिसे छिपा रहना है, तथा दुग्ध में जैसे घृत व्याप्त रहता है, तिल में जैसे तैल व्याप्त रहता है उसी प्रकार शरीर में परमात्मा को विराज- मान समझना चाहिये। अथवा जैसे काष्ठ के भीतर अग्नि शक्तिरूप से रहती है उसी प्रकार शरीर के भीतर शुद्ध आत्मा को जो पुरुष शक्ति रूप से विराजमान देखता है वही वास्तव में पण्डित है ॥ २३ ॥ २४ ॥ शुभं भूयात् ॥
॥श्रीः॥ . श्री भट्टाकलंकमणीत-स्वरूपसम्बोधन मुक्ता मुक्तकरूपोयः, कर्मभिः संविदादिना। अक्षयं परमात्मानं, ज्ञानमूर्ति नमामि तम् ॥१॥ अर्थ-मंगलाचरण करते हुए श्री अकलंकभट्टाचार्य कहते हैं कि जो अविनश्वर ज्ञानमूर्ति परमात्मा ज्ञानावरणादि . द्रव्यकों से, रागादिक भावकों से व शरीररूपनोकर्म से मुक्त (रहित ) है और सम्यग्ज्ञान आदि अपने स्वाभाविक गुणों से अमुक्त (युक्त) है उस परमानंदमय परमात्मा को नमस्कार करता हूं। अर्थात् उपर्युक्त तीन प्रकार के कर्मों को नष्ट कर देने के कारण जो मुकरूप है और अनंतदर्शन, अनंतसुख, अनंत- वीर्य, श्रादि गुणों से युक्त होने के कारण जो अमुक्त रूप है और शान ही जिसकी मूर्ति है उस अविनश्वर परमात्मा को इसमें नमस्कार किया गया है। मीमांसक परमात्मा को कर्म रहित नहीं मानते इस लिये उनके मतको निराकरण करनेके लिये कर्म-मुक्त विशेषण दिया गया है, नैयायिक व वैशेषिक, मुक्तजीव में शानादि विशेष गुणों का भी प्रभाव मानते हैं इसलिये शानादि से अमुक्तविशेषण दिया है,कोई रमतावलम्बीमुक्तिसे फिर वापिस स्वरूप-सम्बोधन। पाना मानते हैं इस लिये अक्षय विशेषण दिया गया है, सांख्य मतावलम्बी परमात्मा को श्रान रहित मानते हैं इसलिय शान- मूर्ति विशेषण दिया गया है। और मुक्तामुक्तकहने से त्याद्वाद की सिद्धि भी की गई है तथा आगे भी प्रायः प्रत्येक श्लोक में स्यावाद की सिद्धि की जायगी ॥१॥ सोऽस्त्यात्मा सोपयोगोऽर्थ क्रमाद्धेतुफलावहः । योग्राह्यो ग्राह्यनाद्यन्तःस्थित्युत्पत्तिव्ययात्मकार अर्थ-वह परमात्मा आत्मरूप होने से कारण स्वरूप है, और शान-दर्शन-रूप होने से कार्य स्वरूप भी है। इसी तरह केवल ज्ञानके द्वारा जानने योग्य होने से ग्राह्य स्वरूप है, और इन्द्रियों के द्वारा न जानने योग्य होने से अग्राह्य स्वरूप भी है। द्रव्यार्थिक नयको अपेक्षा नित्यरूप है, और परिणमन शील होने से पर्यायार्थिक नयको अपेक्षा उत्पाद-विनाश स्व- भाव भी है। इस प्रकार परमात्मा में अनेक तरह से अनेकांत मना.सिद्ध होता है ।। २.॥ प्रमेयत्वादिमिर्धमैरचिदात्मा चिदात्मकः । 'ज्ञानदर्शनतस्तस्माचेतनाचेतनात्मकः ॥ ३ ॥ अर्थ-प्रमेयत्वादिक धर्मों की अपेक्षा से वह परमात्मा अचेतन रूप है और शान दर्शनकी अपेक्षा से चेतनरूप भी .
१२ 4 शान्ति-सोपान है अर्थात् दोनो अपेक्षाओं से चेतन अचेतन स्वरूप है। भावार्थ-आत्मा में एक चेतना नामका गुण है जिस गुणकी शान व दर्शन ये दो प्रर्याय होती हैं । और इस चेतना गुण अथवा इसको शान-दर्शन पर्यायोंकी अपेक्षा से ही श्रात्मा चेतन कहलाता है, इस चेतना गुण के अतिरिक्त आत्मा में और जो प्रमेयत्व (जिसके होने से वस्तु ज्ञान का विषय होती है) श्रादि अनंत गुण ऐसे हैं जो कि पुद्गलादि अचेतन पंदार्थों में भी पाये जाते हैं उन गुणों की अपेक्षा आत्मा एवं परमात्मा को अचेतन भी कह सकते हैं और इसी लिये आत्मा में चेतनपना व अचेतनपना सिद्ध होता है ॥३॥ ज्ञानाद्भिन्नो न चामिन्नो,भिन्नाभिन्नः कथंचन । ज्ञानं पूर्वापरीभूतं, सोऽयमात्मेति कीर्तितः ॥ ४ ॥ अर्थ: वह परमात्मा शान से भिन्न है और शान से भिन्न 'नहीं भी है अर्थात् शान से कथंचित् (किसी अपेक्षासे) भिन्न 'है. सर्वथा (सव अपेक्षाओं से ) भिन्न नहीं है। इसी प्रकार वह परमात्मा शान से अभिन्न है और शान से अभिन्न नहीं भी है अर्थात् शान से. कथंचित् अभिन्न है सर्वथा अभिन्न नहीं है, क्योंकि पहले पिछले सर्व शानों का.समुदाय ही मिल कर आत्मा कहलाता है। भावार्थ-श्रआत्मा' नित्य परिणमनशील पदार्थ है और इसमें अनंत गुण हैं जिनमें ज्ञान गुण एक ऐसा है कि जो हमारे खड़प-सम्वोधन। १३ अनुभव में आता है और जिसके द्वारा हम अपने व दूसरे के आत्मा को जान सकते है इस कारण शान गुण को ही यहां आत्मा कहा गया है, दूसरी बात यह है कि यह ज्ञान या चेतना गुण आत्मा में हमेशा रहते हुए भी परिणमता (बदलता) रहता है इस कारण किसी एक समय के मानमात्रही आत्मा न होने से ज्ञान से प्रात्मा भिन्न है और सर्व समयों के शानों का समुदाय रुप होने से मान से आत्मा अभिन्न है इसी का. रण शान से प्रात्मा को सर्वथा भिन्न वा अभिन्न न मानकर कथंचित् मिन्न अथवा अभिन्न माना गया है ॥ ४ ॥ स्वदेहप्रमितश्चार्य, ज्ञानमात्रोऽपि नैव सः । ततःसर्वगतश्चायं, विश्वव्यापी न मर्वथा ॥ ५॥ अर्थ-वह अगहन परमात्मा अपने परम औदारिक शरीर के चगवर है और वरावर नहीं भी है अर्थात् समुद्घात (मूल शरीर में रहने हुए भी श्रात्मा को प्रदेशों का कारण विशेप से कार्मण श्रादि शरीरों के साथ बाहर निकलना) अव- स्था में जिस समय केवली भगवान की आत्मा के प्रदेश संपूर्ण लोकाकाश में फैल जाते हैं उस समय आत्मा औदारिक शुगर के वरावर नही है। इसी तरह वह परमात्मा ज्ञानमात्र है और शान मात्र नही भी है अर्थात् ज्ञान गुण को मुख्य करके व अन्य समस्त गुणों को गौण करके यदि विचारा जाय तो आत्मा या परमात्मा मान मात्र दृष्टि में आता है और यदि अन्य गुणों २४ शान्ति-सोपान। को मुख्य किया जाय तो शानमात्र दृष्टि में नहीं भी आता है। इसी तरह जब केवलशान के द्वारा सम्पूर्ण लोक र अलोक को जानने की अपेक्षा लेते हैं तव परमात्मा को सर्व गत भी कह सकते हैं क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ परमात्मा से गत अर्थात् शात हैं और सम्पूर्ण पदार्थों को जानते हुए भी अरहंत परमात्मा अपने दिव्य श्रौदारिफ शरीर में ही स्ति रहता है इस लिये वह विश्वव्यापी नहीं भी है। भावार्य-परमात्मा उपर्युक धर्म कथंचित् सिद्ध होते है, सर्वथा सिद्ध नहीं होते ॥५॥ नानाज्ञानस्वभावत्वादेकोऽनेकोऽपि नैव सः ! चतनकस्वभावत्वादेकानेकात्मको भवेत् ॥६॥ - अर्य-उस आत्मा में मतिज्ञान, (इन्द्रिय व मन से वस्तु को जानना ) श्रुतधान (मति भान से जाने हुए पदार्थ के सम्बन्धीको जानना ) श्रादि अनेक मान होते हैं तथा और भी सम्यत्व (सचा विश्वास ) चारित्र (सबापाचरण) आदि अनेक गुण होते हैं जिनके कारण यह मामा यद्यपि अनेक रूप हो रहा है तथापि अपने चेतन स्वरूप की अपेक्षा एकपने को नहीं छोड़ता। इसलिये इस आत्मा को कथंचित् एक कप भो. जानना चाहिये और कथंचित अनेक रूप भी जानना चाहिये । भावार्थ-जैसे एक पुरुष एक खरुप होकर भी पिता पुत्र चचा, मतोजा श्रादि रूप कहलाता है क्यों कि पिता की प्रा. - खरूप-सम्बोधन मा उसको पुत्र, और पुत्र की अपेक्षा उसी को पिता, भतीजे की अपेक्षा चचा और चचा की अपेक्षा भतीजा कहते हैं । उसी तरह एक आत्मा प्रात्मपने की अपेक्षा एक स्वरूप होकर भी अपने धर्मों की अपेक्षा अनेक रूप कहा जाता है ॥ ६ ॥ नाऽवक्तव्यास्वरूपाचे निर्वाच्यापरभावतः। तस्मान्नेकान्ततोवाच्या नापि वाचामगोचरम्॥ अर्थ-वह प्रात्मा अपने खरूप की अपेक्षा वकब (कहे जाने योग्य ) होने से सर्वथा प्रवक्तव्य (न कहे जाने योग्य ) भी नहीं है। और पर पदार्थों के स्वरूप को अपेक्षा प्रवक्तव्य होने से सर्वथा वक्तव्य भी नहीं है। भावार्थ-प्रत्येक पदार्थ अपने धर्मों की अपेक्षा से कहा जाता है या पुकारा जाता है परके धर्मोकी अपेक्षा से नहीं व्यवहार किया जातां जैसे कि आम का फल, आम के नाम से कहा जाता है केला अमरुद आदि के नाम से नहीं कहा जाता। इस लिये प्रत्येक वस्तु में अपने खभाव से कहे जाने की योग्य- ता व अन्य पदार्थों के स्वभाव से न कहे जाने की योग्यता समझते हुए आत्मा में भी ऐसाही समझना चाहिये । स स्याद्विधिनिषेधात्मा खधर्मपरधर्मयोः । समूर्तिबोधमूर्तित्वादमूर्तिश्च विपर्ययात् ॥८॥ अर्थ-वह आत्मा अपने धर्मों का विधान करनेवाला १६ . शान्ति-सोपान । व अन्य पदार्थों के धर्मों का अपने में निषेध करनेवाला है और शान के श्राकार होने से वह आत्मा मूर्तिक तथा पुद्गलमय शरीर से भिन्न होने के कारण अमूर्तिक है। भावार्थ-आत्मा में जैसे स्वरूप की अपेक्षा विधिरूप धर्म है वैले पर के स्वरूप की अपेक्षा निषेधरूप धर्म भी है। क्योंकि जैसे ज्ञानादिक आत्मिक धर्मों की अपेक्षा आत्माकी सत्ता सिद्ध होती है वैसे रूपरसादिक पुद्गल के. धर्मों को अपेक्षा श्रात्मा की सत्ता नहीं सिद्ध होती । इसके अतिरिक्त, शान को पुंज होने के कारण जैसे प्रात्मा मूर्तिक कहा जा सकता है उसी तरह पुद्गल परमाणुओं का बना हुआ न होने से अमू- तिक भी कहलाता है ॥ ॥ इत्याद्यनेकधर्मत बंधमोक्षौ तयोः फलम् । आत्मा स्वीकृस्ते तत्तत्कारणैः स्वयमेव तु ॥९॥ अर्थ-इस प्रकार पहले कहे हुए क्रमके अनुसार यह आत्मा अनेक धर्मों को स्वयं धारण करता है और उनके धर्मों के फल स्वरूप बंध व मोक्ष रूप भी कारणधीन खयं परिण- मता है। भावार्थ यह आत्मा राग-द्वपादि कारणों से कर्म का बंध करके पराधीन व दुःसी भी अपने आप ही होता है, और शान, ध्यान, जप, तप, आदि कारणों से बंध अवस्या को नष्ट करके मुक्ति को प्राप्त करखाधीन भी.वयं हीहो जाता है। - । .
स्वर-सम्बोधन। कर्ता यः कर्मणां भोक्ता, तत्फलानां स एव तु । बहिरन्तरूपायाभ्यां तेषां मुक्तत्वमेवहि ॥१०॥ अर्थ-जो आत्मर बाह्य 'शत्रु मित्र आदि ध अंतरंग रांग उप श्रादि कारणों से शानावरणादिक कर्मों का कर्ता व उनके मुख दुःखादि फलों का भोक्ता है, वही प्रात्मा वाह्य स्त्री, पुत्र, धन, धान्यादि का त्याग करने से कर्मों के कर्ता भोक्तापने के व्यवहार से मुक्त भी है। अर्थात् जो संसार दशा में कर्मों का कर्ता व भोता है वही मुक्तदशा में कर्मों का कर्ता भोक्ता नहीं भी है ॥ १० ॥ सदृष्टिज्ञानचारित्रमुपायः स्वात्मलब्धये । तखेयाथात्म्यसस्थित्यमात्मनो दर्शनं मतम् ॥११॥ यथावस्तुनिीतिः सम्यग्ज्ञानं प्रदीपयत् । तत्स्वार्थव्यवसायात्मकथञ्चित्समितेः पृथका१२॥ दर्शनज्ञानपर्यायेपत्तरोतरमाविषु। स्थिरमालम्बनं यद्धा माध्यस्थ्यं सुखदुःखयोः ।१३।। ज्ञाता दृष्टा हमेकाऽहं, सुख दुःखे न चापरः । इतीदं भावनादाय, चारित्रमथवापरम् ॥१४॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों अपने शुद्ध आत्मखरूप की प्राप्ति अर्थात् संसारसे मुक्त १८ शान्ति-सोपान । होने के कारण है, जिनमें से आत्मा के वास्तविक खरूप या सांत तत्वों के सच्चे श्रद्धान को तो सम्यग्दर्शन कहते हैं। पदार्थों के वास्तविकपने से निर्णय करने को सम्यग्ज्ञान कहते हैन.यह सम्यग्ज्ञान दीपक की तरह अपना तथा अन्य पदार्थों का प्रकाशक. होता है, और अशान निवृत्ति अप जो फल है उससे कथञ्चित भिन्न भी है। स्त्री, पुत्रादिक बाहा पदार्थों की-मोह-ममता को त्याग कर जो अपनी ही क्रम २ से होने पाली शान दर्शनादिक पर्यायों में आत्मा के उपयोग का स्थिर होना है उसे सम्यक् चारित्र कहते हैं । अथवा सांसारिक सुख दुःखोंमें मध्यस्थभाव रखने को सम्यक् चरित्र कहते हैं, या, मैं शाता दृष्टा हूं अपने कर्तव्य के फल स्वरूप सुख दुःखों का भोगने वाला स्वयं अकेलाही हूँ वाहा स्त्री पुत्रादि पदार्थों का मेरे से कोई संबंध नहीं है इत्यादि अनेक प्रकारको शुद्ध प्रात्म स्वरूप में तल्लीन कराने वाली भावनाओं की दृढ़ता को भी सम्यक् चारित्र कहते हैं ॥ ११ ॥ १२॥ १३॥ १४ ॥ तदेतन्मूलहेतोः स्यात्कारण सहकारकं । तबाह्य देशकालादि तपश्च बहिरंगकम् ॥१५॥ अर्थ-सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान व सम्यक्चारित्र को जो ऊपर के श्लोकों में मोक्ष प्राप्ति का मूल कारण बताया है उनके सहकारीकारण बाह्यदेश कालादिक व अनशन, अवमोदर्य आदि वाह्य तप समझने, चाहिये। . L .
खरूप-सम्बोधन। २६ भावार्थ मोक्ष प्राप्ति में जैसे रत्नत्रय अंतरंग कारण है पैसे ही उत्तम क्षेत्र दुःखमसुखमा काल व वजूर्पभनाराचसं- हनन उपवास प्रादि तप वाह्य कारण है ॥ १५ ॥ इतीदं सर्वमालोच्य, सौस्थ्ये दोन्स्थ्ये चशक्तितः। आत्मानं भावयेन्नित्यं रागद्वेषविवर्जितम् ॥१६॥ अर्थ-इस प्रकार तर्क वितर्क के साथ श्रात्म स्वरूप को अच्छी तरह जान कर सुख में व दुःख में यथाशक्ति श्रात्मा को नित्य ही राग-द्वेप रहित चितवन करना चाहिये अर्थात् सुख सामिग्री के मिलने पर राग नहीं करना चाहिये और अनिष्ट समागम में छप नहीं करना चाहिये, क्योंकि ये सब इष्ट अनिष्ट पदार्थ श्रात्मा की कुछ भी हानि नहीं कर सकते। इनका सम्बन्ध केवल शरीर से रहता है ऐसा विचार रखना चाहिये ॥१६॥ कषायै रञ्जितंचतस्तवं नैवावगाहते । नीलीरक्तेऽम्बरे रागा, दुराधेयो हि कौकुमः ॥१७॥ अर्थ-क्रोधादि 'पायों से रंजयामान हुए मनुष्य का चित्त वस्तुके असली स्वरूपको नहीं पहिचान सकता, जैसे कि नीले कपड़े पर केसर का रंग नहीं चढ़ सकता। भावार्थ-यस्तुके यथार्थखरूपको जानने का यत्न करने से भी पहले हृदय से क्रोधादि कपायों को दूर करना २० शान्तिसोपान, चाहिये तभी वस्तु का वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकेगा। जैसे अग्नि से जली हुई भूमि में अंकुर नहीं,उराता, वैसे ही कपाय से दग्ध हृदय में धर्माकुर नहीं उगता इस. शान्त को भी हृदयंगम करके .प्रत्येक पुरुष को निरन्तर. कपायों को दूर करने के लिये पूर्ण प्रयत्न करते रहना चाहिये । जिससे कि वे संसार; सागर में डूबो हुई अपनी आत्मा , का उद्धार कर सके ॥ १७॥ ततस्त्वं दोषनिर्मुक्त्यै, निर्मोहो भव सर्वतः। उदासीनत्वमाश्रित्य तत्वचिंतायो भव ॥१८॥ अर्थ-श्राचार्य व्यवहारी .जीव से कहते हैं कि हे.माई अब राग-द्वप के विना दूर किये आत्महित नहीं हो सकता तब तुमकोरांग कंपनष्ट करने के लिये शरीरादिक पर पदार्थों का मोह त्याग कर और संसार शरीर व भोगों से उदासीन भाव धारण करके तत्त्व विचार में तन्मय रहना चाहिये ॥२८॥ हेयोपादेयतत्त्वस्य, स्थिति विज्ञाय हेयतः। निरालम्बों भवान्यस्मादुपये सावलम्वनः॥१९॥ अर्थ-हेय (त्यागने, योग्य) व उपादेव (ग्रहण करने योग्य ) पदार्थों का स्वरूप जानकर,हेय वस्तु को त्यागना चाहिये व उपादेय वस्तु का ग्रहण करना चाहिये। भावार्थ+जो.स्त्री, पुत्र, धनधान्य, शत्रु मित्रादि पदार्थ । म खरूप-सम्योधन। २१ श्रात्महित के वाधक व रागद्धेप के बढ़ाने वाले हैं उनसे सम्बन्ध छोड़ना चाहिये और संसारी जीवों को एक मात्र पंच परमेष्ठी का शरण ग्रहण कर ज्ञान ध्यानादि में तन्मय रहना चाहिये ॥ १६॥ खं परं चति वस्तुलं, वस्तुरूपेण भावय । उपेक्षाभावनोत्कर्षपर्यन्ते शिवमाप्नुहि ॥ २० ॥ अर्थ-अपनी श्रात्मा के व पर पदार्थों के असली स्वरूप का यार २ चितवन करना चाहिये, और, समस्त संसारी पदार्थों की इच्छा का त्याग करके उपेक्षा भावना (रागद्वप के त्याग की भावना ) को बढ़ाने २ मोक्ष पद प्राप्त करना चाहिये ॥२७॥ माक्षेपि यस्यनाकांक्षा सं मोक्षमधिगच्छति । इत्युक्तवाहितान्वेषी,कांक्षान क्वापि योजयेत्२१ अर्थ-जब किसी साधु महात्मा पुरुष के हृदय से मोक्ष की भी इच्छा निकल जाती है तभी उसको मुक्ति प्राप्त हो सकती है इस सिद्धान्त वाक्य के ऊपर ध्यान देते हुए आत्म- हित के इच्छुक जीवों को सभी पदार्थों की इच्छा का त्याग करना चाहिये। भावार्थ:-किसी भी पदार्थ की प्राप्ति प्रयत्न करने से होती है इच्छामांत्र से नहीं होती, यहां तक कि मोक्ष की इच्छा ૨૨ • शान्ति-सोपान । करने से मोक्ष मी प्राप्त नहीं होता, किन्तु इच्छा करने से मोक्ष प्राप्ति में उलटी वाधा उपस्थित होती है, इसलिये प्रात्मा का हित चाहने वाले पुरुषों को इच्छा सर्वथा त्याज्य सम- झना चाहिये ॥ २१॥ साऽपि च स्वात्मनिष्ठत्वात्सुलमा यदि चिंन्त्यते। आत्माधीन सुख तात, यत्नं किं न करिष्यसिार अर्थ-यदि कोई यह कहे कि इच्छा करना तो अपने श्राधीन होने से सुलभ है किन्तु फल प्राप्ति अपने श्राधीन न होने से कठिन है इसलिये इच्छा किसीभोवस्तु की जा सकती है, ऐसा कहने वाले को श्राचार्य करुणा पूर्वक कहते हैं कि हे भाई, जैसे इच्छा करना आत्माधीन होने से सुलभ है पैसे ही परमानन्द मय सुख का पाना भी तो श्रात्मा के ही श्राधीन है इसलिये तुम उस सुख की प्राप्ति का प्रयत्न ही क्यों नहीं करते, जिससे कि संसार के झगड़ों से छूट फर हमेशा के के लिये निराकुलित हो जाओ ॥ २२ ॥ खं परं विद्धि तत्रापि, व्यामोह छिन्धि किन्त्विमम्। अनाकुलस्वसंवेद्य, स्वरूपे तिष्ठ केवले ॥२३॥ अर्थ-श्राचार्य कहते हैं कि मुक्ति प्राप्त करना भी अपने ही श्राधीन समझ कर स्त्र और पर को जानना चाहिये तथा वाह्य पदार्थों के मोह को नष्ट करना चाहिये, और प्राकुलता -
स्वरूप-सम्बोधन।
२३
रहित स्वानुभवगम्य केवल अपने निज स्वरूप में ही स्थिर
होना चाहिये ॥ २३ ॥
स्वासं स्वन स्थित स्वस्मै स्वस्मात्स्वस्याविनश्वरी
स्वस्मिन्ध्यात्वालभेत्स्वस्थमानंदममृतं पदम् २४
अर्थ-इस श्लोक में आचार्य श्रान्मा में ही सातों कारक
सिद्ध करते हुए कहते हैं कि व्यवहारी जीवों को अपने ही
आत्मा में अपने ही आत्महित के लिये अपने ही द्वारा अपने
आप ही अपना ध्यान करना चाहिये, और अपने ही ध्यान
से उत्पन्न हुए परमानन्द मय अविनश्वर पद को प्राम करना
चाहिये ॥ २४॥
इति स्वतचं परिभाव्यवाङ्मयं,
य एतदाख्याति शृणोति चादरात् ।
कयति तस्मै परमार्थ सम्पदं,
स्वरूपसबोधनपंचविशतिः ॥२५॥
अर्थ-श्री अकलंक भट्टाचार्य उपसंहार करते हुप ग्रन्थ
का महात्म्य वर्णन करते हैं कि जो पुरुप पच्चीस श्लोकों में
कहे हुए इस खरूप सम्वोधन ग्रन्थ को पढ़ेंगे सुनेंगे और
इसके वाक्यों द्वारा कहे हुए आत्म तत्व का वारंवार मनन
करेंगे उनको यह अन्य परमार्थ की सम्पत्ति अर्थात् मोक्षपद
माप्त करावेगा ॥ २५॥
॥ श्रीः॥ सामायिक-पाठं। सिवातुवची भक्त्या, सिद्धान् प्रणमतः सदा। सिद्धकार्याः शिवं प्राप्ताः,सिद्धि ददनु नो व्ययाम्? अर्थ-श्री सिद्ध परमेष्ठी व जगत सिद्ध सभी पदाथों के कहने वाले जैन आगम को अथवा श्रागम के मूलकर्ता श्री अरहंत भगवान् को भक्ति पूर्वक नमस्कार करके घ उनके बताये हुए मार्ग पर चल करके जिन पुरुषों ने संसार-दुःख के नष्ट करने रूप कार्य सिद्ध कर लिया है, ऐसे जीवन्मुक्त अरहंत देव व मोक्ष प्राप्त सिद्ध परमेष्ठी, हमको भी अविनश्वर पद प्राप्त करावे भावार्थ-जिन पुरुषों ने श्री अरहंत देव व सिद्ध. परमेष्ठी के अपना आदर्श मान कर व उनके बताये हुये मार्ग का अव- लम्बन लेकर परहंत व सिद्धं पद प्राप्त किया है वे हमको भी उसी अविनश्वर पद के मार्ग पर लगायें। इस श्लोक में यह बात भी बता दी गई है कि मोक्ष प्राप्ति का एक मान उपाय श्री अरहंत व सिद्ध परमेष्ठी को आदर्श मान कर उनके बताये हुए मार्ग का अवलम्बन करना ही है॥१॥ नमोऽस्तु धौतपापेभ्यः सिद्धेभ्य ऋषिसंसदि ।
सामायिक-पाठ। २५ सामायिकं प्रपद्येऽहं, भवभ्रमणसूदनम् ॥ २॥ अर्थ-समस्त कर्म-कलंक को नष्ट कर देने वाले श्री सिद्ध परमेष्ठी को अत्यन्त भक्ति सहित अपने मनो मंदिर में विराज मान करके महर्षि पुरुषों के गहने योग्य कोलाहलादि से रहित पवित्र स्थान में स्थित होकर संसार दुःख को नाश करने वाली तथा परमानन्द पद को प्राप्त कराने वाली सामायिक को मैं प्रारम्भ करता हूं ॥२॥ साम्यं में सर्वभूतेषु, वैरं मम न केनचित् । आशां सवीं परित्यज्य, समाधिमहमाश्रये ॥३॥ अर्थ-सामायिक करते समय ऐसी भावना करनी चाहिये कि सम्पूर्ण जीव मात्र में मेरी समता रहे, वैर भाव किसी के साथ भी न हो, और समस्त सांसारिक इच्छाओं को त्याग कर मैं निरन्तर प्रात्मध्यान में तल्लीन रहूं ॥ ३ ॥ रागद्वेषान्ममत्वादा, हा मया ये विराधिताः । क्षमंतु जंतवस्ते मे, तभ्यः क्षमाम्यहं पुनः ॥ ४॥ अर्थ-अनादि काल से अब तक संसार चक्र में भ्रमण करते हुए मैंने राग-द्वषवमोह वश जिन जीवों का घात किया है उन से मेरी अति विनय पूर्वक परोक्ष प्रार्थना है कि वे मुझे क्षमा करें मुझे स्वयं भी अपनी अनादि काल से अब तक २६ . । . शान्ति-सोपान। निरंतर बनी रही हुई अपनी इस दुर्बुद्धि का अत्यंत खेद है। इसके अतिरिक्त जिन जीवों से मेरे प्रति कुछ अपराध बन गया होगा उनको भी मैं सरल हृदय से क्षमा करता हूँ ॥४॥ मनसा वपुषां वाचा, कृतकारितंसम्मतैः। . रत्नत्रयमवंदोष, गहें निंदामि वर्जये ॥ ५॥ -सामायिक में यह भी विचारना चाहिये कि मन बचन काय से की हुई कृत कारित व अनुमोदनां के द्वारा जो मैंने अपने रत्नत्रय अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्नाम व सम्य- चारित्र में दोप लगाया है उसको मैं गर्हा व निंदा करता हूं और उस दोषका परित्याग करता है॥५॥ तैरश्चं मानव दैवमुपसर्ग सहऽधुना। कायाहार कायांदीन, सत्यजामिविशुद्धितः॥६॥ अर्थ:-तिर्यञ्च मनुष्य व देवों से.किये हुए उपसर्ग को भी शांति पूर्वक सहन करने के लिये मैं इस समय तैयार हूं और शुद्ध मन वचन काया पूर्वक शरीर से ममत्व त्यागता हूं। सामायिक के काल तक श्राहार व अन्य परिग्रहों को छोड़ता हूं, तथा क्रोधादिक कपायों को अपना शत्रु समझ कर यथा शक्ति त्यागना चाहता हू॥६॥ राग द्वेष मयं शोक,महोत्संक्यदीनताः। व्युत्वजामि त्रिधा.सर्वमरति रतिमेव च ॥ ७ ॥ PM सामायिक-पाठ। अर्थ-राग, द्वेष, भय, शोक, हर्ष, उत्सुकता, दीनता रति आदि सभी दोषों को मैं आत्मघातक समझ कर मन वचन काय से सामायिक के काल तक त्यागता हूच हमेशा के लिये इनको त्यागने योग्य शक्ति प्राप्त करना चाहता ॥७॥ जीवते मरणे लाभेलामे योगे विपर्यये । वंधावरौ सुख दुःखे, सर्वदा.समता मम ॥ ८॥ 'अर्थ-जीवन मरण में लाभ अलाम में, संयोग वियोग में, शत्रु मित्र में, व सुख दुःख में, मेरे सदा समता भाव रहे ऐसा विचार करना चाहिये व सामयिक में इसी प्रकार का समता भाव रखना चाहिये। आत्मैव मे सदा ज्ञाने, दशने चरणे तथा । प्रत्याख्याने ममात्मैव, तथा संवरयोगयो । अर्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र व सम्यक त्याग में और कर्मों के रोकने व ध्यानादि करने में मेरे एक आत्माही शरण है। भावार्थ-आत्मा की शुद्ध दशा हो जाने पर ये सब गुण प्राप्त हो जाते हैं अथवा ये सब गुण आत्मा की शुद्ध दशा से मिन्न नहीं है इस लिये आत्मा शुद्ध होने पर इनकी मासिके लिये पृथक् प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥ एको में शाश्वतश्चात्मा, ज्ञानदर्शनलक्षण । - .
. शान्तिसोपान। शेषा बहिर्मवा मावाः सर्वे संयोगलक्षणाः॥१०॥ अर्थ-शानदर्शनवरूप एक नित्य आत्माही वास्तव में मेरी निधि है, बाकी फमों के संयोग से होने वाले जो क्रोध मान माया लोभ राग द्वीप श्रादि परिणाम है या स्त्री, पुत्र धन; धान्यादिक बाह्य पदार्थ हैं वे सय मुझसे भिन्न हैं उनसे मेरा धास्तव में कोई सम्बन्ध नहीं है ॥ १० ॥ संयोगमूला जीवेन, प्राप्ता दुःखपरम्परा । तस्मात्संयोगसंबंध,त्रिधासर्वत्यजाम्यहम् ॥११॥ अर्थ-इस मेरी आत्मा ने अनादि काल से अब तक शानावरणादि कर्मों के संयोग से ही संसार में रुलते २ बहुत दुःख पाये हैं इसलिये अब मैं मन बचन फाय से कर्म संबंध कोही त्यांगता । इत्यादिक भावनाओं व विचारों द्वारा सामाथिक करते समय अपने मन को हित अहितका विवेचक बनाना चाहिये ॥११॥ एवं सामायिकात्सम्यक् सामायिकमखंडितम् । वर्तते मुक्तिमानिन्या वशीभूतायते नमः ॥१२॥ अर्थ-इस प्रकार सामायिक पाठमे.ही हुई रीतिके अनु. सार परम.अखंडित सामायिक को करने से जो महात्मा पुरुष मुक्ति रूपी स्त्री के वशीभूत हो गये हैं अर्थात् जिनको मुक्ति । प्राप्त हो गई है उनको मैं वारंवार नमस्कार करता ह॥ १२॥ . .
श्री मृत्यु-महोत्सव। सल्लेखना किसे कहते हैं और वह काव की जाती है। उपसर्गे दुर्भिक्ष, जगस रुजायां च निःप्रतीकारे। धर्माय तनुविमोचनमाहुः सल्लखनामाः ॥१॥ अर्थ-जिसका कुछ प्रतीकार या इलाज न किया जासके ऐसे किसी भयंकरसिंह आदिद्वारा खाये जाने आदि केउपसर्ग श्राजाने पर, जिसमें शुद्ध भोजन सामिग्री न मिल सके, ऐसे दुष्काल के पड़ जाने पर, जिसमें धार्मिक व शारीरिक क्रियाये यथोचित गति से न पल सके ऐसे बुढ़ापे के श्राजाने पर, तथा किसी असाध्य रोग के हो जाने पर, धर्म की रक्षा के. लिए शरीर के त्याग करने को व यथायक्ति कपायोंके मन्द करने को महात्मा पुरुष सल्लेखना या समाधि मरण कहते हैं। आगेके श्लोकों में बताये हुए कारणों से इस मृत्यु अवस्था को दुःखदायक न समझ कर एक प्रकार का उत्सव या महो- त्सव समझना चाहिये, क्योंकि यह समय आयु पर्यन्त अभ्यास किये हुए शान, ध्यान, जप, तप, आदि शुभ कार्यों की परीक्षा का है और किये हुए शुभ कार्यों के फल की प्राप्ति का है, जैसे वीर पुरुष बहुत काल तकशस्त्र विद्या का अभ्यास कर युद्ध में जाते समय हर्ष मानता है और मरने का भय , ३० शान्ति-सोपान। को भी मृत्यु समय में नहीं करता, उसी तरह इस झांनी पुरुष कुटुंबियों आदिक से व शरीर से मोह त्यागने में यहादुरी दिखानी चाहिये ॥१॥ तप के फल स्वरूप समाधि मरण के लिये प्रयत्न । अंतक्रियाधिकरणं,तपः फलं सकलदार्शनास्तुवते । तस्माद्यावधिभत्र, समाधि मरण प्रयसितव्यम् ॥२॥ अर्थ-प्रायु पर्यन्त किये हुए तप का फल श्री अरहंत देव ने अन्त समय में होने वाला समाधि मरण कहा है इसलिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति को लगा कर समाधि मरण करने में परम प्रयत्ल करना चाहिये। भावार्थ-जैसे बहुत काल तक शास्त्राभ्यास करके भी परीक्षा के समय अनुत्तीर्ण (फेल) हो जाने वाला छात्र प्रशंसा का पात्र नहीं होता, अथवा युद्ध में हार जाने वाले सिपाही की जैसे कोई बड़ाई नहीं करता उसी तरह प्रायुपर्यन्त तप आदि करके भी जो पुरुष मरण समय में शरीर के या संबंधियों के मोह में विह्वल हो जाते हैं, उनका तप या झाना- दिक पाना प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। इसलिए अन्त समय में शरीर को कारागृह ( कैदखाने ) और संबंधियों को पहरेदार के समान समझ कर दोनों से प्रेम त्यागना चाहिये क्योकि तप, शान, ध्यान आदि उत्तम कार्यों के करने से परलोक में मिलने वाली . जो उत्तम विभूति है उसके शो
३
-
मृत्यु-महात्सर।
३१
प्राप्त होने में शरीर व सम्बन्धी बाधक होते है ॥२॥
समाधि.मरण के समय का कर्तव्य ।
स्नेहं बैंर संगं, परिग्रहं चापहाय शुद्धमनाः।
वजनं परिजनमपि च, क्षात्वा क्षमयेत् प्रियेबचनैः
अर्थ--समाधि'मरण के समय शुद्ध मन पूर्वकं मित्रों से
प्रेम, शत्रुओं से रैर व स्त्री-पुत्रादिक से पति-पिता आदि का
संबंध त्यांग कर और सर्व प्रकार की चेतन-अचेतन परिग्रह
से अर्थात् गाय, भैंस, दासी, दास, रुपये, पैसे, घर, वार
आदि से खामीपने की बुद्धि का त्याग करके सम्पूर्ण कुटुम्बियों,
व अन्य मेल मिलापी जनों से मिष्ट वचनों द्वारा क्षमा करानी
चाहिए, और स्वयं भी सव से क्षमा-भाव धारण करना
चाहिए।
भावार्थ:--गृहवास को सराय में किये हुए · पड़ाव के
समान या एक वृक्ष पर किये हुए अनेक पक्षियों के वसेरे के
समान समझ कर अपने को अकेला ही समझना चाहिये,
मुसाफिर खाने की भीड़ को भाई, बंधु, ताऊ, चचा, पुत्र,
मित्र श्रादि समझ कर आकुलित होने से इस जीव का कोई
भी लाभ नहीं होता है । इसलिये उक्त विचारों के द्वारा सब से
मोह त्याग कर आनन्द पूर्वक इस जीर्ण, शोर्ण, दुर्गन्धमय व
रोग प्रसित शरीर से कूच करने के लिये तैयारी करनी
4.
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चाहिये ॥३॥
३२
शान्ति-सोपान ।
मृत्यु-महोत्सव की तैयारी।
आलोच्य सर्वमनः कृतकारितमनुमतं च नियाजी
आगपयन्महाबनमामरणस्थायि निःशेषम् ॥४॥
अर्थ--श्रायु पर्यन्त मन-वचन-काय से व कृत, कारित,
अनुमोदना (करना कराना, खुशी-मनाना,) से संचय किये
हुए समस्त पाप कार्यों की आलोचना (निंदा) फर के मरण
पर्यन्त के लिये समस्त महाव्रता (अहिंसा, सत्य, अचौर्य,
ब्रह्मचर्य व परिग्रह त्याग) को धारण करना चाहिये ॥ ४ ॥
के
शाकं ययमवमादं क्लेदं कालुष्यमरतिमपि हित्वा ।
सत्त्रोत्साहमुर्दीय च, मनः प्रसाध्यं श्रुतेरसृतः॥५॥
अर्थ-समाधि गरण के समय कायरपने के व दुःख
कारण भूत शोक,भय, खेद, ग्लानि, कलुपता व अरति (बेचैनी),
आदि को त्याग कर अपने पराक्रम और उत्साह को पूर्ण रूप
से प्रकट करना चाहिये, और अमृतोपम शास्त्र-वचनों का
रसास्वाद करते रहना चाहिये ॥ ५ ॥ "
-
समाधि
मरण
की विधि।
आहारं परिहाप्यच क्रमशःस्निग्धं विवर्द्धयेत् पानं ।
स्निग्धं च दायित्वा, खरपान पुग्येर क्रमशः ॥६॥
1 मृत्यु-महोत्सव। खरपानहापनामपि, कृत्वा कृलोपवांसमपिशवत्या। पञ्चनमस्कारमनास्तनुं त्यजेत् सर्वयत्नेन ॥७॥ अर्थ-समानि मरण करते समय शरीर से ममत्व घटाने के लिये क्रम से पहले श्राहार का त्याग करके दुग्ध पान का अभ्यास करना चाहिये, पश्चात् दुग्ध का भी त्याग करके छाई या गर्म जल.के पोने का अभ्यास करना चाहिये, यादमें शक्ति पूर्वक जलादिक सभी वस्तुओं का त्याग करके उपास करते हुए तथा सर्व यत्न से पंच परमेष्ठी के गुणों का ध्यान करते हुये शरीर को छोड़ना चाहिये ॥ ६॥ ७it. मोक्ष नगर के लिये कलेवा। मृत्युमार्गे प्रवृत्तस्य, वीतगंगों ददातु में | समाधियोधपाथेयं, यावन्मुक्तिपुंगे पुरः ॥८॥ अर्थ- श्री वीतराग सर्व देव से प्रार्थना है किंमृत्यु महो. त्सवंरूपी कार्य में लगे हुए मुझको स्वरूपं की सावधानी व रत्नत्रय को प्राप्तिकपी, पाथेय (कलेवा) देखें, जिससे कि मैं मोक्ष नगर में ना पहुँचूं। ... . ३ * नोट उपयोगी व प्रकरण योग्य समझ कर श्री रत्नकरड. श्रावका चार के ये। उपर्युक्त ७ श्लोक भी मृत्यु महोत्सव के साथ में लगा दिये हैं। ३ ८ शान्ति-सोपान । भावार्थ-अरहंत देव श्रादि की प्रार्थना या भक्ति करने से यद्यपि साक्षात् मोक्ष प्राप्ति नहीं होती, . तथापि पुण्य वन्ध पूर्वक परंपरा हो सकती है ॥ मरने में भय क्यों किया जाय। कृमिजालशताकोणे, जर्जरे दहपजरे । भज्यमाने न भतव्य, यतस्त्वं ज्ञानविग्रहः ॥९॥ अर्थ-मरण के भय को दूर करने के लिए मरते समय श्रात्मा को ऐसे समझना चाहिये कि हे आत्मन् ! तू तो शान रूपी दिव्य शरीर का धारी है इसलिये सैकड़ों कीड़ों के समूह से भरे हुए इस जीर्ण, शीर्ण, शरीर रूपी पीजरे के नाश होते समय तुझे कदापि भय करना उचित नहीं है। भावार्थ -यह विचारना चाहिये कि अनादि काल से संसार चक्र में भ्रमण करते २ ये हाड़ मांस के शरीर तो ते ते इतने पा लिये हैं, यदि वे सब इकट्ठे हो सकते तो उनसे यह सम्पूर्ण तीन लोक भर जाता, अथ एक शरीर के नष्ट होने में भी दुःख मानना या भय फरना योग्य नहीं है ॥॥ नये नगर को गमन। ज्ञानिन भयं भवेत्कस्मात्प्राप्त मत्यमहात्सवे । स्वरूपस्थः पुरं याति देहों देहान्तरस्थितिः॥१०॥ अर्थ-हे ज्ञानी प्रात्मन् ! इस मृत्यु रूप महोत्सव के प्राप्त . .
मृत्यु-महोत्सव। ३५ होने से तू क्यों भय करता है क्योंकि इस मृत्यु के द्वारा तो तूअपने ज्ञानादिक खरूप में स्थित रहता हुआ शरीरान्तर रूप नये नगर को ममन करता है। भावार्थ-मृत्यु जय आत्मा की शान दर्शन आदि पंजी को नहीं छीनती किन्तु उसको इस जीर्ण शरीर रूपी टूटी फूटी झोपड़ी से निकाल कर नवीन शरीर रूपी मनोहर महल में पहुंचाती है तब उसको भयकारी या दुःखदाई न समझ कर हितकारी ही समझना चाहिये ॥ १० ॥ भरण से स्वर्ग के सुख। सदत्तं प्राप्यते यस्मात् ,दृश्यते पूर्वसत्तमैः । भुज्यते स्वर्भवं सौख्यं, मृत्युभीतिःकुतःसताम् ११ अर्थ- महात्मा पुरुप.कहते हैं कि जब मृत्यु के द्वारा जन्म भर दिये हुए दानों के फल स्वर्गादिक के सुख प्राप्त होते हैं तव मृत्यु जैसे उपकारी. मित्र से भय करना फैसे उचित हो सकता है ॥११॥ मृत्यु भूपतिका स्वागत। आगर्भावसंतप्तः प्रक्षिप्तो देहपजरे । नात्मा विमुच्यतेऽन्येन, मृत्युभूमिपति बिना ।।१२।। अर्थ-समाधि मरण करते समय विचारना चाहिये कि - शान्ति-सोपान। कर्म रूपी शत्रु ने मुझे इस देह रूपी पीजरे में लाकर बंद कर रक्खा है जिसके कारण मैं गर्भ में से लेकर अब तक अनेक प्रकार के दुःख भोग रहाई इस शरीर को मैंने जन्म भर उत्तमर भोजन कराये अच्छेरवस्त्र पहिनाये और अनेकप्रकार की सुख.सामग्री प्राप्त कराई स्वयं अनेक प्रकार की लोभादि कषायों से संतप्त रहकर धन कमा २ कर इसको अनेक प्रकार के आराम दिये किन्तु इस कृतघ्न ने मुझे कभी सुन न दिया अच्छे भोजनों का मल मूत्र रुधिर श्रादि बना कर उनमें मुझको सड़ाया, दिव्य से दिव्य वस्त्रों को इसने बदबू दार बनाया संसार के अनेक जीवों से मुझे नाते जुड़वाये इत्यादि अनेक दुःखों के कारण मैं इससे तंग आ गया ई भौर मृत्यु रूपी बलवान राजा के विना और कोई इस दूध शरीर रूपी पिशोच से मुझे बचाने के लिये समर्थ नहीं है इस लिये स्वयं ही मेरे पास आये हुए मृत्यु महाराज का मुझे बड़ा उपकार मनाना चाहिये ॥ १२॥ : मृत्यु-मित्र। सबंदुःखप्रदं पिंडं, दूरीकृत्यात्सदार्शमिः। मृत्युमित्रप्रसादन, प्राप्यते सुखसम्पदः ॥ १३ ॥ अर्थ -आत्म दर्थी शानी पुरुष रूपी मित्र के प्रसाद से सब दुःखों को देने वाले इस देह रूपी पिंड को त्याग कर सुख सम्पत्तिको प्राप्त होते है अर्थात्, गर्भ से लेकर मरण पर्यन्त . '; - ..
मृत्यु-महोत्सवन ३७ इस अपवित्र शरीर में निवास कर के जीवों को जो अनेक दुःख भोगने पड़ते हैं उन सबसे छुड़ा कर स्वर्ग आदिक,सुख को प्राप्त कराने के लिये मृत्यु ही समर्थ है इसीलिये ज्ञानी पुरुष मृत्यु को मित्र के समान जानते हैं ॥,१३ ॥ *... मृत्यु कल्पवृक्ष मृत्युकल्पदुमे प्राप्त यनात्मार्थो न सापितम्। . निमग्नो जन्मजबाले, म पश्चात् किं करिष्यति.१४॥ अर्थ-जिस पुरुप ने मृत्यु रूपी कल्प वृक्ष को प्राप्त करके भी अपनी प्रात्मा का हित साधन नहीं किया वह फिर संसार रूपी कीचड़ में फंस कर अर्थात् दुर्गति में जाकर पाये हुये नीच शरीर में कैद हो जाने के बाद अपना क्या कल्याणं कर सकेगा। भावार्थ-मरते समय जो जीव अपने परिमाणों को विशुद्ध रखता है वह उत्तम गति को प्राप्त होता है और जो मोह माया,में फंसा, कर मरता है वह दुर्गति में जाता है । इसलिये मरते समय जैसे बने वैसे प्रयल -पूर्वक विशुद्ध परिमाणं रहने चहिये ॥ १४ ॥ विना प्रयत्न सुन्दर शरीर व उत्तम इन्द्रियों की प्राप्ति । जीर्ण देहादिकं सर्व, नूतनं जायते यतः। स मृत्युः किं न मादाय,सतां सातोत्थितियथा१५ - 1 स शान्ति-सोपान । अर्थ-जिस मृत्यु के द्वारा जीर्ण-शीर्ण शरीर व शिथिल इन्द्रियां छूट जाती हैं और नवीन शरीर व उत्तम इन्द्रियों प्राप्त हो जाती हैं। साना वेदनीयाकर्म के उदय को भाँति उस मृत्यु के आने पर जीवों को क्या हर्ष नहीं मानना चाहिये! किन्तु अवश्य मानना चाहिये। भावार्थ-जैसे साता वेदनीय कर्मके उदय (फलदेन से जीवों को अनेक प्रकार की सांसारिक सुख सामिग्री प्राप्त होती है। उसी तरह मृत्यु होने पर भी परलोक में व इस भव' में किये हुए पुण्य कर्मों का उत्तम फल मिलता है। इसलिये जैसे साता 'कर्म के उदय को संसारी जीव चाहते हैं वैसे ही मृत्यु आने पर उसका भी हर्ष मानना चाहिये ॥ १५ ॥ सुख दुःख आत्मा को होता है न कि शरीर को मुख दुःखं सदा वत्ति देहस्थश्च स्वयं व्रजेत् । मृत्युमीतिस्तदा काय जायते परमार्थतः ॥१६॥ अर्थ-सुख दुःख का अनुभव शरीर में स्थित जो आत्मा है उसको होता है, शरीर को नहीं होता, और मृत्यु समय खयं शरीर से निकल कर परलोक में जाता ही है, यही रह कर शरीर की तरह नष्ट होता नहीं, फिर मृत्यु का भय वास्तव में किसको माना चाहिये ? अर्थात् किसी को भी मानना नहीं चाहिये, क्योंकि जिस आत्मा को सुख दुःख होता है उसका तो मरने से कुछ बिगड़ता नहीं, और जो शरीर नष्ट होता है M . / -- मृत्यु-महोत्सव। उसको मुख दुःखका ज्ञान नहीं, इस लिये विना शानके शरीर को भय भी नहीं लग सकता, आत्मा शरीर के मोह से भय करता है सो उसको नवीन शरीर मिल जाने के कारण भय उचित नहीं.॥ १६ ॥ मृत्यु, शानो को प्रमोद और प्रशानी को शोकका कारण है।' समागसक्तचित्तानां मृत्युर्मीत्यै भवेन्नृणाम् । मोदायते पुनःसापि ज्ञानवैगग्यवासिनाम् १७॥ अर्थ-जिन पुरुषों का चित्त संसार में आसक्त हो रहा है उनके लिये मृत्यु भय का कारण है और जो महात्मा पुरुष आत्मशान में तल्लीन हैं तथा संसारसे उदास हैं उनको मृत्यु के पानेका भी हर्ष होता है, शोक नहीं होता ॥ १७ ॥ 'देहाधिपति को रोक यात्रा। पुराधीशा यदां याति सुकृतस्य बमत्सया । तदासो वार्यत कन प्रपञ्चः पाञ्चभौतिकै॥१८॥ अर्थ-इस शरीर रूरी नगर का मालिक यह प्रात्मा किये ईए पुएब के फलको प्राप्त करने की इच्छा से जव परलोक यात्रा करता है तब यह. पंच भूतमय शरीर उसको कदापि नहीं रोक सकता। भावार्थ-जब तक इस जीव के इस जोक सम्ब-धो पायु शान्ति-सोपान। का उदय रहता है तभी तक शरीर आत्मा को कैद कर सकता है, और जिस समय यह आयु समाप्त हो जातो है व दूसरी श्रायुका उदय प्राजाता है उस समय प्रात्माको परलोक जाने । से शरीर तो क्या बड़े २इन्द्रादिक भी नहीं रोक सकते? ॥११॥ मृत्यु समय को पीड़ा ज्ञानी को वैराग्य का कारण है। मृत्युकाले सतां दुःखं, यद्भवेद व्याधिसभवम् । देहमोहविनाशाय, मन्ये शिवसुखाय च ।। १९ ॥ अर्थ-मृत्यु समय में जो प्रायः रोग संबंधी पीड़ा होती है उसको भी ज्ञानी पुरुप शरीर से मोह त्यागने में कारण मानते हैं और परलोक के उत्तम सुखों का निमित्त जानते हैं, क्योंकि अनेक प्रकार के रोगों से.जीण शीर्ण दुर्गन्धित शरीर में निवास करने से उनका इस तरह की अरुचि हो जाती है जैसी कि एक उच्चकुलीन पवित्र पुरुष को चाण्डाल आदि के दुर्गन्ध मधिनावने घर से होती है ॥ १६ ॥ मृत्यु, को ज्ञानी सुख और अज्ञानी दुःख का कारण मानते हैं। • ज्ञानिनाऽमृत संगाय मृत्युम्तापकरोऽपि सन् । आमकुम्भस्य लोकेऽस्मिन् भवेत्याकविधियथार. . अर्थ-अज्ञानी जीवों के 'मृत्यु दुःखदाई मालूम देने पर भी.ज्ञानी पुरुषों को सुधामय सुसका कारण मालूम होती है।
मृत्यु-महोत्सव । ४१ क्योंकि वे जानते हैं कि जब तक कच्चा घड़ा 'अग्नि में नहीं पकाया जाता तब तक उसमें जैसे अमृत स्वरूप जल नहीं भरा जाता, उसी प्रकार मरण समय में होने वाले रोगादिको को पीड़ा को शांति पूर्वक सहे बिना वर्ग मोक्ष के सुख नहीं मिल सकते, ऐसे विचारों के कारण ही ज्ञानी पुरुषों को मरण का दुःख नहीं होता ॥ २० ॥ कठिन तप व समाधि मरण के फल की समानता। यत्फलं प्राप्यते सद्भितायासबिडंबनात् । तत्कालं मुख साध्यं स्यान्मृत्युकाले समाधिना॥२१॥ अर्थ--जो फल बड़े बड़े प्रती पुरुषों को कायलेश आदि तप, व्रत आदि के धारण करने से प्राप्त होता है वह फल अंत समय में सावधानी पूर्वक किये हुए समाधि भरण से जीवों को सहज में ही प्रात हो जाता है।' भावार्थ-जो आत्म विशुद्धि अनेक प्रकार के कठिन व्रता- चरण व तप करने से होती है वह भरण-समय में कुछ काल. तक ही शांति धारण करने में संसार का मोह त्यागने से प्राप्त हो जाती है ॥ २१ ॥ शांति पूर्वक मृत्यु का फल । अनातःमान्मयों शांति, न तिर्यग्नापि नारकः! धर्मध्यानी पुरो मर्योऽनशनी त्वमरेश्वरः ॥२२॥ 7 शान्ति-सोपान। अर्थ-जो पुरुष अंत समय में धार्तराद्र परिणाम न कर के शांति पूर्वक मरण करता है वह तिर्यञ्चगति व नरफगति में नहीं जाता, और जो ज्ञानी जन धर्म ध्यान पूर्वक उपवास कर के परलोक यात्रा करते हैं वे स्वर्ग के इन्द्रनादि उत्तम पदी को प्राप्त करते हैं ॥ २२॥ समाधि मरण से ही प्रत, तप व शास्त्रज्ञान सफल होते हैं। तप्तस्य तपसश्चापि, पालितस्य बनस्य च । पठितस्य श्रुतस्यापि, फलं मृत्युः समाधिना ।।२३॥ । अर्थ-बहुत काल तक किये हुए उन तपों का, पाले हुये व्रतो का और निरंतर अभ्यास किये हुए शास्त्र ज्ञान का एक मात्र फल शांति पूर्वक प्रात्मानुभव करते हुए समाधि. मरण करना है। भावार्थ-यदि कोई पुरुष आयु पर्यन्त तप करके, प्रत. पाल के व शास्त्राभ्यास करके भी मरण समय में मोह को घटा कर शांत परिणाम न कर सका तो उसका' वतादिक पालने का सव परिश्रम एक तरह से व्यर्थ ही समझना चाहिये ।। २३ ॥ नवीन से प्रेम और पुराने से अरुचि । अतिपरिचितेष्वज्ञानं भवेत्प्रीतिरिति हि जनवादः चिरतरशरीरनाशे, नवतरलाभ च किं भीरुः ॥२४॥ 'अर्थ-संसारी जीवों का प्रायः ऐसा नियम है कि चे मृत्यु-महोत्सव। ४३ अच्छी से अच्छी वस्तु का भी अत्यंत परिचय होने पर एक प्रकार से तिरस्कार करने लगते हैं, और नवीन वस्तु चाहे अच्छी भी न हो तो भी उसमें प्रीति किया करते हैं, इस नियम को लेकर शास्त्रकार संसारी जीवों से कहते हैं कि भाई मरने से तो तुम्हें पुराना शरीर छूट कर नवीन,शरीर , मिलता है फिर तुम मरने से क्यों डरते हो ॥ २४ ॥ स्वर्गादत्य पवित्रनिर्मलकुले संस्मयमाणा जनैः। दला भक्तिविधायिनां बहुविधं बाच्छानुरूपं धनम् भुक्ता भोगमहर्निशं परकृतं स्थित्वाक्षणं मण्डले। पात्रावेशविसर्जनामिव मृति सन्तो लमते स्वतः२५ अर्थ-पहले श्लोकों में यताया है कि जो शानी महात्मा पुरुप मरण समय में धर्म ध्यान पूर्वक शान्तचित्त से व्रत उपवासादि करते हुये शरीर छोड़ते हैं। वे वर्गों में जाकर इन्द्रादिक की सम्पत्ति को प्राप्त करते हैं, अब इस श्लोक में बताते हैं कि वे ही पुण्यात्मा पुरुष स्वर्ग को आयु समाप्त कर पड़े २ पवित्र जगत पूज्य उत्तम कुलों में अवतार लेकर अनेक उन्तम पुरुषों से पूजे जाते हैं अर्थात् तीर्थंकरादि पद प्राप्त करते हैं, और कुछ काल पृथिवी मंडल में विराजमान रहकर पुण्योदय से उपार्जित अनेक उत्तमोत्तम भोगों को निरंतर भोगते हुये तथा भक्त पुरुषों को मनोवांछित फल देते हुए, अंत में तप करके जगत को एक प्रकार का नाटक सा दिखा कर व अनादि कालीन कार्माण शरीर के संबंध को भी छोड़ कर परमानन्द मय परमपद को प्राप्त हो जाते हैं ॥२५॥ इति शुभम् ।। - ५ ॥ श्रीः॥ समाधि-शतक श्री पूज्यपाद स्वामी विरचित। मोक्षार्थी पुरुषों को मोक्ष का स्वरूप बताने की इच्छा रखने वाले श्री पूज्यपाद स्वासोप्रारम्भ में मंगला ". धरण कप श्री सिद्ध परमेष्ठी.फो नमस्कार करते है। - . । येनात्मा बुध्यतात्मैव, परत्वेनैव चापरम् । अक्षयानन्तबोधाय, तस्मै सिद्धात्मने नमः॥१॥ अन्वयार्थ (येन आत्मा आत्मा एवं अबुध्यत ) जिसने . ओत्मा को आत्मा ही जाना है (च अपरं परत्वेन एव) और पर को पर रूप से. ही जाना है तस्मै अक्षयानस्तबोधाय सिद्धांत्मने नमः ) उस अविनश्वर व अनन्त शान वाले सिद्धं परमेष्ठी के लिये नमस्कार हो ॥१॥ श्री भरहंत परमेष्ठी को नमस्कार। जयन्ति यस्या ऽवदतोपि मारती, विभूतयस्तीर्थकृतो ऽप्यनीहितुः। - समाधि-शतक। ५५ शिवाय धात्रे मुमताय विष्णव, जिनाय तस्मै सकलात्मने नमः ।।२।। अन्वयार्थ (अवदतः अपि अनीहितुः अपि यस्य तीर्थ- कृतः) तालु, श्रोष्ठ आदि के द्वारा बचन को उच्चारण नहीं फरते हुए भी और जगत के हित की इच्छा न रखते हुये भी जिस तीर्थंकर भगवान की (भारती विभूतयः जयन्ति ) वाणी की-सब जीवों का हित प्रतिपादन रूपी-विभूति अथवा घाणी और समवशरणादि विभूति जय को प्राप्त होती हैं। (तस्मै शिवाय धाने सुगताय विष्णवे जिनाय , सकलात्मने नमः अस्तु) उस.कल्याणरूप, असि, मसि, कपि. आदि के उपदेश द्वारा जगत का उदार करने वाले, भनन्त चतुष्य को प्राप्त करने वाले, केवल ज्ञान के द्वारा समस्त पदार्थों में व्या- पने वाले, और घातिया कर्मों को जीतने वाले, दिव्य शरीर धारी परमात्मा के लिये नमस्कार हो ॥२॥ प्रन्थ बनाने की प्रतिज्ञा । श्रुतेन लिंगेन यथात्मशक्ति समाहितान्तः करणेन सम्यक् । समीक्ष्य कैवल्यसुखस्पृहाणां, विविक्तमात्मानमथाभिधास्ये ॥३॥ अन्वयार्थ अब इष्टदेव को नमस्कार करने के अनन्तर ४६ शान्तिसोपान। - (विविक्तं प्रात्मानं) कर्ममल रहित आत्मा के स्वरूप को (श्रुतेन लिंगेन समाहितान्तः करणेन सम्यक समीन्य ) शास्त्र! के द्वारा, हेतु के द्वारा, और एकाग्र मन से प्राप्त किये अनुभव के द्वारा सम्यक् प्रकार जानकर (कैवल्य मुग्मस्पृहासां) सकल कर्म के प्रभाव रूप कैवल्य पद और अनंत सुम्न की इच्छा रखने वालों के लिये (यथात्मशक्ति अभिधास्य) अपनी शानशक्ति को न छिपाकर कहूंगा ॥३॥ श्रात्मा के भेद । वहिरन्तः परश्चति, त्रिधात्मा सर्व देहिषु । उपयात्तत्र परम, मध्योपायावहिस्त्यजेत् ॥ ४॥ अन्वयार्थ (सर्व देहिषु बहिन्नन्तः च परः इनि त्रिधा श्रात्मा) सर्व जीवों में वहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्मा इस प्रकार आत्मा को तीन अवस्था होती हैं। (तत्र मध्योपा- यात् वहिः त्यजेत् परमं उपेयात् ) उनमें अन्तरात्माको साध- नरूप मानकर बहिरात्मा श्रवस्था को छोड़ना चाहिये और परमात्म अवस्था को प्राप्तकरना चाहिये। भावार्थ-प्रत्येक संसारी जीप मिथ्यात्व अवस्था में बहि- रात्मा, सम्यक्त्व प्राप्त होनेपर अंतरात्मा, केवल ज्ञान प्राप्त हो जाने पर परमात्मा हो सकता है। अभव्य जीवों में भी अन्वरा. मावस्था और परमात्मावस्था शक्ति रूप से है परन्तु भन्यों में इन दोनों अवस्थाओं के व्यक्त होने की योग्यता नहीं है।
समाधि-शतका यदि ऐसा न माना जायगा तो फिर अभव्योमें केवल ज्ञाना- वरणीय कर्म का बन्ध व्यर्थ हो जायगा। सर्वश में भी भूत- प्रज्ञापननय की अपेक्षा बहिरात्मावस्था व अंतरात्मावस्था सिद्ध होती है। इन तीनों अवस्थाओं में से जिन संसारी जीवों के वहिरात्मावस्था व्यक्त हो रही है उनको प्रथम सम्य- ग्दर्शन प्राप्त कर वहिरावस्था को त्याग अपनी अन्तरात्माव- स्था व्यक्त करनी चाहिये ॥४॥ प्रत्येक अवस्था का लक्षण । बहिरात्मा शरीगदौ, जातात्मभ्रान्तिरान्तरः। चित्तदोषात्मविश्रान्तिः, परमात्माऽतिनिर्मलः ॥५॥ अन्वयार्थ-( शरीरादौ जातात्मम्रान्तिः यहिरात्मा) शरीर और आदि शब्द से लिये हुए बचन व मन में उत्पन्न हो रहा है आत्मा का भ्रम जिसको वह वहिरात्मा है (चित्त- दोपात्मविभ्रान्तिः श्रान्तरः) और जिसको चित्त के विकल्प रागादिक दोष व आत्मा के खरूप के विषय में कुछ भी भ्रान्ति अर्थात् अज्ञान नहीं है वह अंतरात्मा है (अतिनिर्मलः परमा- त्मा) और जिसको आत्मा अत्यन्त निर्मल हो गई है वह पर- मात्मा, है ॥ ५ ॥ . परमात्मा वाचक नाम। निर्मला केवलः शुद्धो, विविक्तः प्रभुरव्ययः।
शान्ति-सोपान परमेष्ठी परात्मति, परमात्मेश्वरो जिनः ॥६॥ अन्वयार्थ (निर्मलः) कर्मरहित (केवलः) शरीरादि संबंध रहित (शुद्धः) द्रव्यकर्म व भाव कर्म के नाश हो जाने से परम विशुद्धता युक्त (विविक्तः) शरीर और कर्म दोनों से रहित (प्रमुः) इन्द्रादिक का खामी (अव्ययः) प्रान हुए अनंत चतुष्टय से च्युत नहीं होने वालो (परमेष्ठी) इन्द्रादि- क से भी बन्दनीक परमपद में स्थित रहने वाला ( परमात्मा) संसारो जीवों से उत्सष्ट जिसका आत्मा है । ( ईश्वरः) अंतरंग अनंत चतुष्टय और वाह्य समवशरणादि ऐश्वर्य से जो युल है (जिनः ) कर्मों को जीतने वाला (इति परमात्मा) इस प्रकार बहुत से परमात्मा के वाचक शब्द होते हैं ॥ ६॥ घहिरात्मा की शरीरोदिक 'मैं आत्म बुद्धि होने का हेतु । वहिंगत्मेन्द्रियद्धारै रात्मज्ञानपराङ्मुखः । स्फुरितश्चात्मनो देहमात्मत्वेनाऽध्यवस्यति ॥७॥ अन्वयार्थ-(इन्द्रियद्वारैः " वहिथग्रहणे " स्फुरितः वहि-- रात्मा आत्म ज्ञानपराङ मुखो. "भवति") इंद्रियों के द्वारा वाह्य पदार्थों को ग्रहण करने में ही लगे रहने के कारण यह बहिरात्मा आत्म ज्ञान से पराङ्मुख रहता है ("ततएव च श्रात्मनः देहं शात्मत्वे न अध्यवस्यति ") और इसी लिये अपने शरीर को आत्मा समझता है-॥ ७ ॥ .
समाधि-शतक। १६ आत्मा में मनुष्यादिक की कल्पमा! नरदेहस्थमात्ममानः मविद्वान् मन्यते नरम् । तिर्यश्च तिर्यगङ्गास्थ, सुगमस्थं सुरं तथा-॥८॥ 'नारकं नारकांगस्थं,नं स्वयं तत्वंतस्तथा । अनन्तानन्तधीशक्तिः, स्वसंवेद्योऽचलस्थितिः॥९॥ अन्वयार्थ (अविद्वान् नरदेहवं आत्मानं नरें) वहिरा- स्मा मनुष्य के शरीर में स्थित आत्मा को मनुष्य और (तियं- झंगस्थं तियञ्च तथा सुंरास्थं 'सुरमन्यते) तिर्यच के शरीर में स्थित आत्मा को तिर्यञ्च तथा देव के शरीर में स्थित आत्मा - . . देव मानता है। (एवमेव नारकाङ्गस्थ प्रात्मन"नारकं मन्यते ) इसी प्रकार. नारको - के शरीर में स्थित आत्मा- को. नारकी मानता है (तत्त्वतः स्वयं तथा नं) परन्तु यह श्रात्मा परमार्थ से स्वयं ऐसा नहीं है। भावार्थमनुष्य गति मनुष्य आयु आदिक कर्मों के उदय के निमित्त से ही जीवों में मनुष्य तियश आदि का व्यवहार होता है वास्तव में यह जीव फर्म निमित्त बिना स्वयं मनु- प्यादि रूप नहीं है किंतु यह वास्तव में (अनन्तानंतधीशक्तिः स्वसंवेद्यः अचलस्थितिः) अनन्तानंत ज्ञानवाला अनन्तान्त बल वाला तथा अपने द्वारा ही जानने योग्य और अपने स्वः પૂo शान्ति-सोपान । रूप में ही निश्चल स्थित रहने वाला है || ME पर के शरीर में परात्म बुद्धिः। स्वदेहसदृशं दृष्ट्वा, परदेहमचेतनम् । परात्माधिष्ठित मूढः, परवेनाऽध्यवस्यति ॥१०॥ अन्वयार्थ (मूदास्वदेहसदृशं. परात्माधिष्ठितं अचेतनं परदेहं दृष्ट्वा परतत्वेन अध्यवस्यति )बहिरात्मा अपने शरीर के समान दूसरों की आत्मा से युक्त दूसरों के अचेतन शरीर को भी दूसरों का आत्मा समझा है अर्थात् . बहिरात्मा जैसे अपने शरीर को अपना, श्रात्मा मानता है उसी प्रकार स्त्री पुत्रादिक के शरीरको स्त्री पुत्रादिक का आत्मा मानता है ॥१०॥ ऐसा मानने से क्या होता है। 'स्वपग,ध्यवमायन, देहेष्वविदितात्मनाम् । वर्तते विभ्रमः पुंसां, पुत्रभायर्यादिगाचः ॥११॥ , अन्ववार्थ-(अविदितात्मनां पुंसां देहेषु खपराध्यवसायेन पुत्रभार्यादि गोचरा वर्त्तते ) आत्मस्वरूप को नहीं जाननेवाले पुरुषों को अपने और.परके शरीर में ही अपनी और परकी अात्मा के निश्चय होने से पुत्र स्त्री. आदि के विषय में विभ्रम होता है । अर्थात् मूद जीव अपने शरीर के साथ स्त्री पुत्रादि के शरीर के सम्बन्ध को ही अपनी आत्मा. का सम्बन्ध सम- समाधि-शतक। ५२ भना है और इसी लिये उनको अपना उपकारक समझता है तथा उनके संयोग में सुखी व वियोग में दुःखी होता है ॥१२॥ ऐसे विनम से और क्या होता है। अविद्यामंज्ञितस्तस्मात्संस्कारों जायते दृढ़ः । यन लोकोऽङ्गमेव स्वं पुनरप्याभिमन्यते ॥ १२ ॥ अन्वयार्थ-(तस्मात् अविद्यासंहिता हैदः संकारःजायते) उस विनम से अज्ञानात्मक दृढ़ संस्कार उत्पन्न हो जाता है (येन लोक अंग एव 'पुनः अपि स्वं अभिमन्यते) जिसके कारण यह संसारी जीव अपने शरीर को ही फिर परलोक में भी अपना आत्मा मानता है । अर्थात् शरीरंकोमात्मामाननेका यह मिथ्या संस्कार परलोक में भी आत्माके साथ जाता है १२० देह में प्रात्म बुद्धि होने से और क्या असर होता है। देहेस्वबुद्धिरात्मनं युनक्त्येतेन निश्चयात् । स्वात्मन्येवाऽऽत्मधीस्तस्मादियोजयतिदेहिनम्१३ अन्वयार्थ-( देहे स्वबुदिः निश्चयात् आत्मानं एतेन युनक्कि) शरीर में आत्मबुद्धि रखनेवाला पहिरात्मा, निश्चय से अपनी प्रात्मा को शरीर से सम्बन्ध करता है (स्वात्मनि एव आत्मघीः तस्मात् देहिनं वियोजयति) और अपनी आत्मा में ही भात्मवृद्धि रखने वाला सम्यग्दृष्टि अन्तरारमा, अपनी પુર । शान्ति-सोपान आत्मा को शरीर से पृथक करता है । अर्थात् शरीरको आत्मा मानने से आत्मा के साथ नवीव शरीरों का सम्बन्धा होता. रहता है जिसके कारण यह मूढजीद निरंतर संसारमें रुलता है और जब शरीरादि से ममत्व छूट कर आत्मा में ही प्रात्म बुद्धिं उत्पन्न हो जाती है तबै यह जी, सम्यग्दष्टिं अंतरात्मा हो जाता है और ध्यानादिक का सतत अभ्यास करके शरी- रादिकसे सम्बन्धछुड़ाकर अपने आत्माको मुक्त कर लेता है १३॥ शरीर को प्रात्मा मानने वालों पर करुणाभाव। देहेष्वात्मधिया जाता.. पुत्रंभादिकल्पना। सम्पत्तिमात्मनस्ताभिर्मन्यत हा इंत. जगत्॥१४॥ अन्वयार्थ- (देहेषु आत्मधिया पुत्रभार्यादिकल्पना जाता) शरीर मे प्रात्म बुद्धिं होने से पुत्र स्त्री श्रादिकं की कल्पना होती है (हा हतं जगत् ताभिः आत्मनः सम्पति मन्यते.) खेद है कि इस प्रकार मोह से अपने असली पानंद को भूल कर यह मूढजीव स्त्री पुत्रादिक के द्वारा ही अपने को समृद्धिशाली मानता है। अर्थात् जब तक इस संसारी, जीवको मिथ्यात्व के उदय से अपनी अनंत चतुष्टयरूपी सम्पत्ति को ज्ञान नहीं होता तब तक यह स्त्री, 'पुत्र, धन, धान्यादिक चायपदार्थों को ही अपने मान कर उनमें रमा रहता है और मिथ्या आई- कार घशं सुख दुःख मौनता रहता है ॥ १४॥ : पहिरोमा को अन्तरमा होने की शिक्षा मूलं संसारदुःखस्य, देह एवात्मधीस्ततः ... .
समाधि-शतकंग ५३ स्यक्तैनां प्रविशेदन्तवहिरव्यापतेन्द्रियः ॥ १५ ॥ अन्वयार्थ-(देहे,प्रात्मधीः एव संसारः दुःखस्य मूलं ) शरीर में आत्मबुद्धि का होना ही संसार के दुःखों का मूल कारण है (ततः एनां त्यक्त्वा :बहिः अव्यापतेन्द्रियः , अन्तः प्रविशेत्) इसलिये शरीर में आत्म बुद्धि को छोड़ कर और इन्द्रियों को बाह्य विषयों से रोक कर अंतरंग में प्रवेश करना चाहिये! : ini Tri. : भावार्थ जितने भी संसार के प्रपंच हैं "वे सब इस . शरीर के साथ है, जब तक जीव 'इस शरीरमको अपनों मानता रहेगा तंव तक यह संसार के दुःखदाई जंजाल से कभी नहीं छूट सकता । इसी कारण इस अपूर्व गून्थ में ग्रन्थ- कार ने समस्त दुःखों की जड़े जो शरीर में आत्मबुद्धि को होना है उसके छुड़ाने के लिये ही अधिक जोर दिया है ॥१५॥ मत्तश्च्युत्तेन्द्रियदाः, पतितो विषयवहम् । तान् प्रपद्यामिति मां, पुरा वेदन तत्वतः ॥१६॥ 'अन्वयार्थ अहं पुरा मत्ता च्युत्वा इन्द्रियद्वारी विपर्येषु पतितः अन्तरात्मा अपनी पहली अवस्था को विचारता है कि मैं अनादिकाल से अब तकं व्यर्थ ही अपने स्वरूप से च्युत होकर इन्द्रियों के द्वारा विषय रूप में पड़ा रहा ( तान् अहं इति प्रपंच तत्त्वतः मां न वेद ) और उन विषयों को ही शान्ति-सोपान। अपना स्वरूप समझ कर वास्तव में अपनी आत्मा को आज तक मैंने नहीं पहिचाना। भावार्थ-जब तक जीव को अपनी असली रलत्रय रूप वा अनंत चतुष्टय रूप सम्पत्ति का परिझान नहीं होता तब तक ही वह वाह्य विषयों को सुखदायक समझता है और जव इसे अपने असली सुधारसका कुछ भी खाद आ जाता है तव बाह्य विषय उसे विप सरीखे मालूम पड़ने लगते । इसी कारण जो जीव प्रथम विषय भोगों को सुख रूप मान कर सेवन करता था वही अब पहले भोगे हुए विषयों पर भी पश्चात्ताप करने लगता है ॥ १६ ॥' श्रात्मशान का उपाय। . एवं त्यक्त्वा बहिर्वाचं, त्यजेदन्तरशेषतः । एष योगः समासेन, प्रदीपः परमात्मनः ॥१७॥ अन्यवयार्थ एवं पहिर्वाचं त्यक्त्वा अन्तः अशेषतः त्यजेत् ).आगे के श्लोकों में कही जाने वाली रीति के अनु- सार बाह्य बचन को छोड़कर अर्थात् स्त्री, पुत्र, धन धान्यादिक मेरे हैं इस प्रकार के मिथ्या प्रलाप को त्याग कर, अन्तरंग बचन को भी समस्त रूप से छोड़ना चाहिये, अर्थात् मैं सुखी हूं, दुखी हू', दूसरों का गुरुहू', व शिष्य हू', इस प्रकार के आत्मविषयक मिथ्या बिकल्प रूप अंतरंग वचन को भी छोड़ना चाहिये (एष समासेन योगः परमात्मनः प्रदीपः) यह संक्षेप - समाधि-शतक। ५५ से कही हुई वाह्य व अभ्यन्तर के बचन के त्याग रूप, वित्त को विषयो.से रोकने पाली समाधिही वास्तव में परमात्म- स्वरूप को प्रकाशने के लिये दोपक के समान है ॥ १७ ॥ वाह्य वचन को छोड़ने का उपाय । यन्मया दृश्यते रूप, तन्न जानाति संवर्था जानन दृश्यते रूपं, ततः कन वीम्यहम् ॥१८॥ अन्वयार्थ (मया यत् दृश्यते, तत् सर्वथा न जानाति) इन्द्रियों के द्वारा मुझे जो शरीरादिक रूपी पदार्थ दिखाई देते हैं, वे किसी भी पदार्थ को बिल्कुल नहीं जानते (जानत रूपं दृश्यते न ) और जो पदार्थों को जानने वाला चेतनद्रव्य आमा है; वह मुझे इन्द्रियों से दिखाई नहीं देता (ततः अहं केन प्रवीमि.) इस लिये मैं बात चीत करूं तो किससे कर। भावार्थ-जो अपने अभिप्राय को समझे उसी के साथ बात चीत की जा सकती है, लकड़ी पत्थर आदि जड़ पदार्थों से कोई धचंन व्यवहार नहीं करता, इस बात को लेकर अंतरात्मा अपने मन को समझता है कि दूसरों का श्रात्मा तो मुझे दिखाई देता ही नहीं और शरीर दिखाई देता है। वह कुछ जानता नहीं, फिर मैं शरीरादिक जड़ पदार्थोसे क्या यात करूं? अर्थात् मुझको चुप चाप रहना ही मुनासिब है। अन्यकार ने इस श्लोक में यचन गुप्ति पालने का और यिय को झंझटों से छूटने का एक उत्तम उपाय यताया है | -- 1 पृ. शान्ति-सोपान। 1. अंतरंग बचन को छोड़ने का उपाय यत्परः प्रतिपाद्या ह, यत्परान् प्रतिपदिये। उन्मत्तचष्ट्रितं तन्मे, यदहं निर्विकल्पकः ॥१९॥ अन्वयार्थ (अहं परैः यत् प्रतिपादये ) मैं अध्यापकों से पढ़ने योग्य हूँ; अथवा मैं शिष्यों को पढ़ाता. इसी प्रकार और भी मैं सुखी , दुःखी हूँ राजा रंक हा इत्यादि अनेक प्रकार के आत्म विषयक संकल्प विकल्पों का जो करना ( तन मे उन्मत्तचेष्टित, यत् अहं निर्विकल्पकः). वह सब मेरी पागलो सरीखी चेष्टा है क्योंकि मैं तो वास्तव में निर्वि- कल्पक ह.in: . : भावार्थका जीव का असली खरूप इन अनेक प्रकार के बचन विकल्पों के गोचर वास्तव में न होने पर भी जो यह मूढ़ जीव भ्रम वश सुखी-दुःखी, राजा-रंक गुरु-शिष्य, आदि की अनेक मिथ्या कल्पनायें आत्मा में करता रहता है, यही अंतरंग वचन-विकल्प हैं.जो कि श्रात्मा के.:लिये अत्यन्त दुखदाई हैं, इसलिये अपनी आत्मा को वास्तव में इन विकल्पों से रहित समझ कर इन विकल्पों को छोड़ना चाहिये ।।,१६ ॥ ..:: विकल्प रहित श्रात्मा का असली स्वरूप यदग्राह्यं न गृहाति गृहीतं. नापि मुंञ्चति । जानाति सर्वथा सर्व, तत्स्वसंवेद्यमम्म्यहं ॥२०॥ -- : . 7 समाधि-शतक। ५७ -- . अन्वयार्थ-(यत् अंग्राह्यं न गृएहाति) जो शुद्ध यात्मा, अग्राह्य रागद्वेपादिक को तो ग्रहण नहीं करता और ( गृहीतं नं अपिमुञ्चति) ग्रहण किये हुए केवल ज्ञानादिक फा त्याग नहीं करता किन्तु (सर्च सर्वथा आनाति सम्पूर्ण पदार्थों को सर्व प्रकार से जानता है (अहं तत् स्वसंवेद्यं अस्मि ) मैं वही अपने द्वारा ही अनुभव में आने योग्य चेतन द्रव्य है । भावार्थ-जंव तक यह आत्मा केवल शान, केवल दर्शन, अनंत सुख, अनंत वीर्य, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिकधारित्र आदि अपने असली गुणों को विकसित न करके रागी वेपी बना रहता है तब तक यह अंशुद्ध कहलाता है और जब राग द्वपादि विभावों को छोड़ कर अपने असली गुणों को प्राप्त कर लेता है तब सम्पूर्ण पदार्थों का फेवल शातामात्र रह जाता है वाह्य पदार्थों या अपने रांगार्दिक विकारों का कर्तामोका नहीं रहता, और यही जीव कर असली.खरूप है ।।२०। आत्मज्ञान होने से पूर्व की चेष्टा । उत्पन्नपुरुषम्रान्तः, स्थाणो यद्धद्विचष्टितम् । तद्वन्म चेष्टितं पूर्व, देहादिष्वात्मविममात् ॥२१॥ अन्वयार्थ-(स्थाणौ उत्पन्नपुरुषभ्रान्तेः यद्वत् विचेष्टितम्) स्थाणु में पुरुष की भ्रान्ति हो जाने वाले मनुष्य को जैली चेष्टा होती है (देहादिषु आत्मविभ्रमात् मे पूर्व तद्वत् चेष्टितम्) शरीरादिक में आत्मा का भ्रम रहने से, मेरी:भी. पहले शरी- रादिक के विषय में वैसी ही चेष्टा धी।
शान्ति-सोपान ।. भावार्थ-जैसे कोई पुरुष भ्रम से वृक्ष के ढूंठ को मनुष्य मान कर उसके उपकारादि करने का विचार करने लगता है उसी प्रकार में भी भ्रम से, पहले शरीरादिक को प्रात्म मानकर उनके उपकारादिक में लगा हुआ था ॥ २१ ॥ आत्मशान होने के बाद की चेष्टा । यथाऽसौ चेष्टते स्थाणी, निवृत्त पुरुषाग्रहे। तथाचेष्टाऽस्मि देहादौ, विनिवृत्तात्मविभ्रमः ॥२२ अन्वयार्थ-(असौ स्थाणौ पुरुषानहे निवृत्ते यथा चेपते) यह मनुष्य स्थाणु में पुरुष का भ्रम दूर होने पर जिस प्रकार उपकारादि के त्याग की चेष्टा करता है (देहादौ विनिवृत्ता त्मविभ्रमः तथा चेष्टः अस्मि) शरीरादि में प्रात्म-भ्रम दूर होने पर मैं भी उसी प्रकार चेष्टा करने लगा हूं। -जव स्थाणु को स्थाणु पहिचान कर उसमें से पुरुष विषयक अज्ञान दूर हो जाता है तब यह शानी मनुष्य उसके विषय में उपकारादिक की , कल्पना भी छोड़ देता है क्योंकि उपकार करने का विचार स्थाणु को पुरुष मान कर हुआ था बाद में निश्चय होने पर वह पुरुप निकला नहीं. तव उपकार किसका किया जाता, इसी तरह इस जीव को जब सम्यक्त्व हो जाने से शरीरादि में आत्म-भ्रम नहीं रहता तय वह हृदय से शरीर के संस्कारादि करने में भी उपेक्षा करने लगता है ॥ २२॥ .
समाधि-शतक।
पक्ष
शुद्ध आत्मामलादि लिंग और एकत्व आदि संस्थानहीं है।
येनात्मनाऽनुभूये हमात्मनैवात्मनात्मनि ।
सोऽहं न तन्न सा नासो, नको न दौ न वा बहः२३
अन्यवार्थ-(येन श्रात्मना आत्मना आत्मनि एव प्रात्मना
अहं अनुभूये ) जोमैं चैतन्य स्वरूप आत्मा अपनी आत्मा ही
अपने खसंवेदन न करके अपनी आत्मा को अनुभव करता
(सोऽहं, न तत्, न सा, न असो, न एका, नोवा न
बहुः) वह शुद्धखरूप मैं प्रात्मा, न तो नपुंसक हूं, न स्त्री
है, न पुरुष हून एक रूप हूं, न दो रूप हूँ, न बहु रूप हूँ।
भावार्थ-जीव में स्त्री पुरुष आदिक को व्यवहार
केवल शरीर के सम्बन्ध को लेकर होता है और एक पने
दो पने बहु पने का न्यवहार गुण-गुणी की भेदाभेद विवक्षा
को ले कर होता है। शुद्ध प्रात्म के अनुभव को दशा में न
शरीर की कल्पना है और न भेदाभेद की विवक्षा है वहां तो
केवल यह आत्मा अपने प्रानानंद रस का परम तृप्ति के साथ
पान करता रहता है, इसलिये वहां ये बाह्य कल्पना नहीं
उठती ।। २३ ॥
शुद्ध आत्मा का स्वरुप
.
यदभावे सुषुप्तोऽहं, यद्भावे व्युत्थितः पुनः।
अतीन्द्रियमनिर्देश्य, तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ॥२४॥
शान्ति-खोपान । अन्वयार्थ (ययभावे अहं सुषुप्ता, पुनः यद्भावे व्युत्थितः) जिस शुद्ध आत्म स्वरूप के प्राप्त न होने से मैं अव तक सोता रहा, और अब जिसके प्राप्त होने से जाग गया है, (अहंतत् अस्मि;) मैं उसी शुद्ध खरूप वाला है ( "तच्च" अतीन्द्रिय, अनिर्देश्य, वसंवेद्यं) और वह शुद्ध स्वरूप न इन्द्रियों से जानने योग्य है, और न वचन से कहने योग्य है किन्तु अपने श्राप ही अनुभव में आने योग्य है। भावार्थ-जब तक इस जीव को अपने शुद्ध-स्वरूप की प्राप्ति नहीं होती तब तक यह एक प्रकार की प्रज्ञान निद्रा में पड़ा रहता है, और जब अज्ञान का.'नाश होकर शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है तभी यह वास्तव में जोगतो हुआ कह- लाता है ॥ २४ ॥ "शुखासखरूप का संवेदन करनेवाले की आत्मा में रागा- दिक का अभाव हो जाने से शत्रु-मित्र की कल्पना नहीं रहती, अव इसी बात को दिखाते हैं। क्षीयन्तेऽत्रैव रागाद्यास्तत्त्वतो मां प्रपश्यतः । बोधात्मानं ततः कश्चिन्न मे शत्रुन चाप्रियः ॥२५॥ अन्वयार्थ-(तत्वतः वोधात्मानं मां प्रपश्यतः " मम" अत्र एवं रागावाः क्षीयन्ते ) वास्तव में शुद्ध शोन खरूप अपनी आत्मा का अनुभव करने लगने-से इसी जन्म में रागळेप समाधि-शतका ६१ प आदि नष्ट हो जाते हैं। ततः न मे कश्चित् शत्रुः न च प्रियः) इस लिये न कोई मित्र मालूम पड़ता है और न कोई शत्रु दिखाई देता है। भवार्थ-जव तक इस जीवको अपने चिदानंदमय सुधा- रस का स्वाद नहीं आता तब तक यह वाह्य पदार्थों को अपनी रागपादि रूपी अग्नि के शमन करने का उपाय समझ, उनकी प्राप्ति के लिये भटकता फिरता रहता है, और अनुकूल सामग्री के वाधक-साधक जीवों को शत्रु-मित्र मानता रहता है, और जब इसको अपने स्वाभाविक सुधारस का खाद् आने लगता है तब बाह्य पदाथों में व उनके साधक-बाधक जीवों में इसकी उपेक्षा वुद्धि हो जाती है। इस कारण उस समय यह न तो किसी को मिन समझता है और न शत्रु मानता है, क्योंकि मित्र की पल्पना राग-रूप के कारण होती है और उपेक्षा होजाने से राग-छप पाह्य पदार्थों में उसके रहते नहीं ॥२५॥ यद्यपि ऐसी दशा में अब किसी ने यह प्रश्न किया कि तुम्हारा कोई शत्रु-मित्र नहीं रहता, किन्तु तुमको दूसरे पुरुष तो शत्रु-मित्र मान सकते हैं ? इसी का उत्तरः- स्वात्म संवेदन वाला इस प्रकार देता है। मामपश्यन्नयं लोको.-न-मे शत्र न च प्रियः। मां प्रपश्यन्नयं लोको, न मे शत्रु न च प्रिया२६॥ 1 ६२ शान्ति-सोपान। अन्वयार्थ-(मा अपश्यन् अयं लोक न मे शत्रुः न च मियः) मेरे स्वरूप को बिना जाने यह जगत् मुझे शत्रु अथवा मित्र नहीं मान सकता (मां प्रपश्यन् अयं लोकान मे शत्रुः नच प्रियः ) और मेरे स्वरूप को जान कर भी यह जगत मुझे शत्रु वा मित्र नहीं मान सकता। भावार्थ-स्वात्म संवेदी का यह कहना है कि परिचित व्यक्ति में ही शत्रु वा मित्र की कल्पना हुआ करती है अपरि- चित में नहीं होती, इसलिये प्रथम तो ये संसारी जीव मेरे, खरूप को जानते ही नहीं तव फिर मेरे में ये शत्रु मित्र की कल्पना ही क्याकंर सकते हैं, और कदाचित् यह माना जाय कि जानते हैं तो भी इनको शुद्धाम स्वरूप का अनुभव हो जाने से मेरे में उपेक्षा बुद्धि उत्पन्न हो जायगी, तब भी ये मुझ में शत्रु-मित्र को कल्पना नहीं कर सकेंगे। वहिरमावस्था का त्याग और परमात्मपद को भावना का उपदेश। त्यक्वैवं बहिरात्मानमन्तरात्मव्यवस्थितः । भावयेत्परमात्मानं सर्वसंकल्पवर्जितम् ॥ २७॥ अन्वयार्थ (एवं वहिरात्मानं त्यक्त्वा अन्तरात्मव्यवस्थि- तः सर्वसंकल्पवर्जितं परमात्मानं भावयेत् ) इस प्रकार पूर्व लिखे क्रमानुसार वहिरात्मपने का त्याग करके अन्तरात्मा बनना चाहिये और सब प्रकार के संकल्प विकल्पों से रहित समाधि-शतका ६३ परमात्मपद की प्राप्ति के लिये भावना करनी चाहिये ।। २७॥ परमात्मपद की भावना का फल । सोऽहमित्यात्तसंस्कारस्तम्मिन् आवनया पुनः। तत्रैव दृढसंस्काराल्लमते द्यात्मनि स्थितिम् ।२८ अन्वयार्थ-(पुनः तस्मिन् भावनया सः अहं इति श्रात्त- संस्कारः) चार २ परमात्मपद की भावना करते रहने से "वह परमात्मा मैं ही हूं। इस प्रकार का दृढ़ संस्कार प्रात्मा में उत्पन्न हो जाता है (तत्र एवं दृढ़संस्कारात् हि आत्मनि स्थितिं लभते) और परमात्म स्वरूप का दृढ़ संस्कार उत्पन्न होने से यह जीव निश्चय से अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर हो जाता है। से जव भावार्थ-उक्त प्रकार की दृढ़ भावना के प्रवास जीव की परमात्मपद के साथ एकत्व बुद्धि हो जाती है तय यह जीव अपने को केवल भानमयो घ अनंतसुख सम्प- न्न समझने लगता है, और जब यह अपने को सर्वक्ष व अनंत सुखी मानने लगता है, तव छोटे-मोटे काल्पनिक सुख के कारण भूत वाह्य पदार्थों से इसका ममत्व स्वयं ही छूट जाता है जिसके कारण इसके राग-द्धप मंद होते २ नष्ट हो जाते हैं और इसको परमात्म पद की प्राप्ति हो जाती है ॥२८॥ यहां किसी का प्रश्न है कि परमात्मा की भावना करना तो शान्ति-सोपान। बड़ा कठिन है तब फिर जीवों की परमात्म-भावना में प्रवृत्ति क्यों होती है ? इसका उत्तर रूप श्लोक कहते हैं। मूडात्मा यत्र विश्वस्तस्तता नान्यदः भयास्पदम् । यतो मोतस्ततो नान्यदभयस्थानमात्मनः ॥२९॥ अन्वयार्थ (मूढ़ात्मा यत्र विश्वस्तः ततः अन्यद् भया- रूपन) यह मूढ़ जीव जिन, शरीरस्त्री पुत्रादिकपाह्य पदाथा का विश्वास करता है, घे ही सबसे अधिक इसके लिये दुःख के कारण हैं इनके समान और कोई इसके लिये दुःखदाई नहीं है ( यतः भीतः ततः श्रन्यद् अभयस्थान प्रात्मनःन) और जिस परमात्म स्वरूप के संवेदन करने में यह जीव भय करता है दुःख मानता है। उसके समान और कोई पदार्थ आत्मा के लिये मुखदाई नहीं है। भावार्थ-जिस प्रकार सर्प से काटे हुए पुरुष को कडु वा नीम भी खादिष्ट मालूम देता है उसी तरह विषय कपायों में फंसे हुये पुरुष को शरीरादिक बाह्य पदार्थ भनोहर दिखाई देते हैं और जैसे ज्वर को वीमारी में उत्तम मिठाई भी अरुचि- कर मालूम होती है उसी तरह मूढ़ जीव को परमात्मा का अनुभव करने में भी, कष्ट मालूम देता है, किन्तु, वास्तव में देखा जाय तो परमात्मानुभव के समान सुखदाई और शरी- रादिक के समान दुःखदाई और कोई नहीं है। क्योंकि यह जीद अनादिकाल से अब तफ शरीरादिक हो. आत्मा मान समाधि-शतक। कर तथा परमात्मा का.खरूप न पहिचान फर ही दुःख मांग रहा है ॥२॥ परमात्मपद की प्राप्ति का उपाय । - सर्वेन्द्रियाणि संयम्य, स्तिमितेनान्तरात्मना । यत्क्षण पश्यतो भाति तत्त्वं परमात्मनः ॥३०॥ अन्वयार्थ-(सन्द्रियाणि संयम्य 'स्तिमितेन अन्तरा- त्मना क्षणं पश्यतो यत् भाति तत् परमात्मनः तत्वम् ) सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने र विषयों से रोक कर स्थिर भन के द्वारा अनुभव करने से जो चिदानन्दमय आत्मस्वरूप प्रतिभास में श्राता है, वही परमात्मा का असली स्वरूप है। भावार्थ-परमात्मपदकी प्राप्ति के लिये इन्द्रियों, को पाह्य 'पियों से रोकना चाहिये और मन को परमात्म स्वरूप की भावना में तन्मय करना चाहिये ॥३०॥ परमात्मपद की प्राशि के लिये किसकी उपासना करना चाहिये? यः परात्मा स एवाई, योऽहं स परमस्ततः। अहमेव मयोपास्यो, नान्यः कश्चिदिति स्थिति:३१ अन्वयार्थ-यः परात्मा; स एव अहं यः महंस परमः) जो परमात्मा है वही मैं हूँ अथवा जो मैं हूं, वही परमात्र - ६६ शान्ति-सोपान। है (ततः अहं एव मया उपास्यः; अन्यः कश्चित् न इति स्थितिः) इस लिये मैं ही अपने बारा उपासना करने योग्य अन्य कोई मेरे द्वारा उपास्य नहीं है. भावार्थ-सिद्ध परमेष्ठी के समान अपनी आत्मा को भी शुद्ध बुद्ध मानकर जययह अन्तरात्मा काभेद,भावना करते २ अपने शुद्ध स्वरूप में लीन हो जाता है तभी परमात्म-पद को प्राप्त कर सकता है. इस लिये मुक्त-प्रद प्राप्त करने के लिये निश्चय नय से ध्यानाकरने योग्य या उपासना करने योग्य अपना शुद्धात्मा ही समझना चोहिये ॥३॥ इसी बात को दिखाते है। प्रच्याव्य विषयेभ्योऽहं, मां मयैव मयि स्थितम् । बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि, परमानंदनिर्वृतम् ॥३२॥ अन्वयार्थ (अहं मयि स्थितं बोधात्मनं परमानंदनित मां विषयेभ्यः प्रच्याव्य मया एवं प्रपन्नोऽस्मि ) मैंने अपने में हो बिराजमान शान स्वरूप व परमानंदसम्पन्न अपने भात्मा को विषयों से बुड़ाकर अपने आपही प्राप्त किया है । भावार्थ, जिस परमात्म पद या मुक पद को यह जीव प्राप्त करना चाहता है वह परमात्मपद शक्ति रूप से इस आत्मा में ही है । और उसके उद्योग से ही इसको प्राप्त हो सकता है। किसी ईश्वर आदि के पास यह संग्रह रूप से ."
६७ समाधि-शनक। मौजूद नहीं है जिसको कि यह प्रसन्न होकर अपने सेवकों को दे सके । दूसरे परमात्माओं से हम केवल इस विषय में यही लाभ उठा सकते हैं कि अरहंत (जीवनमुक्त ) अवस्था में 1 दिये हुए परमात्म पद के साधनभूत उनके उपदेश का मनन कर और जिस ध्यान मुद्रा से उन्हों ने परमात्म पद प्राप्त किया है उस दिन्य देह का या उसकी प्रतिबिंब काचित्र अपने उदय पर अंकित करें और बाद में अपनी भी उसी प्रकार की ध्यान मुद्रा बनाकर तथा उनके बताये हुए साधनों का उपयोग में लाकर खयं परमात्म पद प्राय करें ॥३२॥ प्रात्मा को शरीर से मिन्त न जानने से हानि । यो न वेत्ति परं देहा, देवमात्मानमव्ययम् । लमते स न निर्वाणं, तप्त्वाऽपि परमं तपः॥३३ अन्वयार्थ -(एवं यः अव्ययं आत्मानं देहात् परं न वेत्ति, सः परमं तपः तप्त्वाअपि निर्वाणं न लभते) इस पूर्वोक कथनानुसार जो पुरुष अपने अधिनश्वर आत्मा को शरीर से भिन्न नहीं मानता है वह उग्र तप को करके भी मुक्ति को महीं प्राप्त कर सकता। भावार्थ-जो पुरुष श्रात्मा के असली स्वरूप को न जान- कर इस नश्वर शरीर को ही आत्मा मान रहा है पर मुक्ति को भी अन्य वाह्य पदार्थों की तरह विपय-सुख का साधन समझ कर यदि उसकी प्राप्ति के लिये कठिन से कठिन नप भी । शान्ति-सोन। करे तो क्या उसको मुक्ति मिल सकती है ? ॥३३॥ यहां किसीकी शंका है कि मुक्तिके लिये तो गड़े काठिन् . तप करने वताये हैं और कठिन, तप करनेसे चित्तम खेद होता है तब.फिर तपकरनेसे मुक्ति कैसे प्राप्तहो सकती है? उत्तर- , आत्म देहान्तर ज्ञानजनिताल्हाद निवृतः। तपसा दुष्कृतं घोरं भुजानोऽपि न विद्यते ॥३४॥ अन्वयार्थ-(आत्म देहान्तर शानजनिताऽल्हादनिवृत्त तपसा धोरं दुष्कृतं शान अपि न विद्यते ) जो पुरुष आत्मा और शरीर केोभेद शान से उत्पन्न हुए आनंद में मग्न हो रहा है वह तप के द्वारा उदयं में लाये हुए दुःदाईसे दुःख- दाई के फल को भोगते हुए भी दुःखी नहीं होता है। भावार्थ-जिंस समय इंस. जीव के अनुभव में आत्मा और शरीर मिन्न २. दिखाई देने लगते हैं उस समय इसकी समस्त चिंताएं दूर हो जाती हैं क्यों कि जितने भर भी संसार के दुःख हैं वे संबाशरीर को अपना जानने से ही होते हैं। भूख, प्यास, रोग, शोक व जीने मरने के दुःख शत्रु, सर्प नादि का भय,गर्मी-सर्दी को बाधा, इन्द्रियों के विपन की चाह श्रादि की अनेक भयंकर से भयंकर आपत्तियां इस जीव को शरीर के संबंध ही उठानी पड़ती है, इसलिये जिस समय संरीर को भी यह आत्मा मिन्न समझ लेता है उस समय समाधि-शतक। " . इन सब आपत्तियों से छूट जाने के कारण इस जीव को एक अलेकिक प्रानंद प्राप्त हो जाता है, और अपनी इल परम- सुस्त-दायिनी भेद भावना की दृढ़ताके लिये उस दशा में यह जीव कायमादि तप करके शरीर कोनीन २ कर कश करता है और सफलता पाने पर श्रानंद मानता है, इसी कारण उसे तप करते हुए खेद नहीं होता ॥२॥ -इसी कधन की पुष्टि। राग द्वेषादि कल्लोले, रलोलें यन्मनोजलम् । स पश्यत्यात्मनस्तचं तत्तचं नेतरो जनः॥३५॥ अन्वयार्थ-- राग पादिकल्लोलैः यन्मनोजलं अलोल सात्मनः तत्त्वंपश्यति, तत् तत्त्वं इतरः जनः न) राग हेप आदिक कल्लोलो करके जिसका मन रूपी जल चंचल नहीं हुआ है वही पुरुप प्रात्मा के स्वरूप को जान सकता है, इस मात्म-खरुप को रागीदेषी पुरुष नहीं पहिचान सकता। भावार्थ-अनादि साल से यह जीव शरीरादि बाह्य पदार्थों में आत्म बुद्धि किये हुए है और ये वाह्य पदार्थ श्रात्म- स्वरूप न होने के कारण कर्मानुसार बाह्य निमित्त को लेकर मिलते विधुड़ते रहते हैं, इस लिये जिस वाह्य निमित से अनुकूल विषयों की प्राप्ति होती है उसमें राग और जिसके निमित्त से इष्ट वस्तु का विच्छन व प्रतिकूल वस्तु का संबंध होता है इससे यह जीव हेप करता रहता है और इस राग 4 .
७० शान्ति-सोपान! दप रूपी अग्नि से निरंतर दग्ध रह कर अपने वास्तविक श्रांत्म खरूप को नहीं पहिचानता । इस लिये आत्मस्वरूपकी प्राप्ति के लिये राग द्वेष का नाश करना सबसे आवश्यक है जो पुरुष इनका नाश कर देता है यह परमात्म पदपा सकता है जो नहीं करता वह नहीं पा सकता। घह आत्मा का स्वरूप क्या है? अविक्षिप्तमनस्तत्र. विक्षिप्तं म्रान्ति गत्मनः । धारयत्तदविक्षिप्तं, विक्षिप्त नाश्रयेत्ततः ॥३६॥ अन्वयार्थ:-(अविक्षिप्तमनःप्रात्मनातत्त्वं, विक्षिप्त भ्रान्तिः) अविक्षिप्त अर्थात् रागादिरहित तथा देह व प्रात्मा के अभेद शान से शून्य अपने शुद्ध स्वरूप में निश्चल जो मन है वही प्रात्मा का स्वरूप है इसके विरुद्ध जो विक्षिप्त अर्थात् रामादि परिणत व देह मात्मा को एक जानने वाला प्रांत मन है वह आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं है। (ततः प्रविधिमं तत् धारयेत् विक्षिप्त न श्राश्रयेत् ) इस लिये अविक्षिप्त मन को धारण करना चाहिये, और विक्षिप्त मन का प्राश्रय नहीं करना चाहिये। भावार्थ:-यह है कि उपयोग सपो भाव मन है वह शानात्मक होने से.आत्मा का ही स्वरूप है। जिस समय वह शान स्वरूप भाव-मन रागादि रहित होकर शरीरादि बाह्य पदाथों को प्रात्मा से भिन्न अनुभव करने लगता है तथा
समाधि-शनका
प्रात्म-ध्यान में तन्मय हो जाता है उस समय उस मन को
आत्मा का निज स्वप समझना चाहिये । और रागादि युक्त
भाव मन को शान स्वरूप होते हुए भी विकारी होने के कारण
प्रात्मा का निज स्वरूप नहीं मानना चाहिये।' इस लिये
श्लोक के उत्तरार्द्ध में कहा है कि मनमसे रागादि विक्ष पोको
दूर करके उसको शुद्ध करना चाहिये ॥३६॥
मन में विरोप क्यों होता है ?
अविद्याऽभ्यासमस्कारे खशं क्षिप्यन मनः ।
तदेव ज्ञानसंस्कारैः, स्वतस्तत्त्वेऽनतिष्ठने ॥३७॥
अन्वयार्थ-(अविद्याभ्याससंस्कारैः मनः अवशं क्षिप्यते)
शरीपदिक को आत्मरूप जानने वाले अमान के अभ्यास से
उत्पन्न हुये मलिन संस्कारों के द्वारा मन, आत्मा के वश में न
रह कर विक्षप को प्राप्त हो जाता है ( तदेव बान संस्कारैः
खतः तत्वे प्रवतिष्ठते) और वही मन भेद-बान से उत्पन्न
दुये उत्तम संस्कारों के द्वारा स्वयं ही आत्मस्वरूप में स्थिर
हो जाता है ।। ३७ ॥
विज्ञप व अविक्षप से क्या फल होता है।
अपमानादयस्तस्य, विक्षेपो यस्य चेतसः।
नापमानादयस्तस्य, न क्षेपो यस्य चतसः ॥३८॥
७२ । . शान्ति-सोपान । अन्वयार्थ-(यस्य चेतसः-विक्षपः तस्य अपमानादयः.) जिसके मन में विक्ष प.होता है उसी के चित्त में मान-अपमान आदि को कल्पना होती है । यस्य चेतलः क्ष-पः न, तस्य अप- मानादयः न ). और जिसके मन में विक्ष-प नहीं होता उसका अपमानादि को तरफ ध्यान भी नहीं जाता। भावार्थ-जब तक हमारे मन में मान-अपमान से हर्ष- विषाद होता है तब तक समझना चाहिये कि राग-पादि कषायों ने हमारे मन को विक्षिप्त कर रक्खा है, और जय मान-अपमान आदि को कल्पना हृदय से निकल जाती है उस समय इन विक्षोपो से मनको रहितमानना चाहिये ३८॥ अपमानादिक के दूर करने का उपाय ! यदा-मोहात्मजायेते, राग-द्वेषो तपस्विनः । तदेव मावयेत्स्वस्थमात्मानं शाम्यतः क्षणात्:३९ अन्वयार्थ (यदा तपस्विनः मोहात् राग वषौ प्रजायेते, तदा एव स्वस्थं आत्मानं भावयेत्, क्षणात् शाम्यतः) जिस समय किसी तपस्वी मुनि के हृदय में मोह के उदय से राग- द्वप उत्पन्न हो जावें उस समय उसको अपने शुद्ध प्रात्म- स्वरूप की भावना करनी चाहिये, इस प्रकार वारं२ आत्मख- रूप की भावना करने से ही रागद्ध पक्षण भर में शांत हो जाची भावार्थ-ये राग, प, क्रोध, मान, माया, लोभ,श्रादिक .
समाधि-शतक। एक प्रकार के मानसिक रोग हैं जो कि अज्ञानके द्वारा शरीर, स्त्री, पुत्रादिकों को आत्मरूप मानने से तथा पंचेन्द्रियों के विषयों को प्राप्ति-अप्राप्ति से उत्पन्न होते हैं, शुद्ध आत्म- स्वरूप का चितवन करना ही इनको निर्मूल करने के लिये एक मात्र रामवाण औषधि है। इन रोगों का निदान (मूलकारण) आत्मस्वरूप का अमान है। इसलिये इस अज्ञान का नाश किये विना इन रोगों की जड़ नहीं जा सकती ॥ ३४ ॥ राग-रूप का विषय व उनका विपन दिखाते हैं:-.. यत्र काये मुनेः प्रेम, ततः प्रच्याव्य देहिनम् । बुद्ध्या तदुत्तमे काये, योजयेत्प्रेम नश्यति ॥४०॥ अन्वयार्थ-(यत्र काये मुनेः प्रेम, बुद्धया ततः देहिनं प्रच्याव्य तत् उत्तमे कार्य योजयेत्, म नश्यति) जिस शरीर में तथा इन्द्रियों के विषयों में मुनिका प्रेम है, अर्थात् आत्म- बुद्धि हो रही है, विवेक शान के द्वारा उन शरीरादिकों से पृथक करके उस प्रेम को चिदानन्दमय उत्तम आत्मरूपी काय में लगाने से बाह विषयों का प्रेम नष्ट हो आत्मा को जाता है। भावार्थ-जब तक इस जीव को अपने झानानंदमय परम मनोहर उपवन में कीड़ा करने का अवसर प्राप्त नहीं होता, तब तक यह अत्यन्त घृणित स्त्री श्रादि के शरीर व अन्य पंचेन्द्रियों शान्ति-सोपान । के विषयों में ही लुभाया रहता है तथा अपने मल-मूत्र व अस्थि पंजर के पिंड रूप शरीरको ही बार २ देख कर प्रसन्न होता रहता है। यदि यह जीव किसीप्रकार अपने दर्शन मोहा- दिक का उपशम करके अपने शांत सुधारस का एक धार भी खाद ले ले तो इसकी इन बाह्य विषयों में कदापि रुचि न रहे और बहुत काल तक इसे जगत--जाल में फंसना न पड़े।४०॥ इस भ्रमात्मक प्रेम के नाश होने से क्या होता है ? आत्मविभ्रमजं दुःख, मात्मज्ञानात्पशाम्यति । नायतास्तत्र निर्वान्ति, कृत्वापि परमं तपः॥४१॥ अन्वयार्थ-(मात्मविभ्रमजं दुःखं आत्मज्ञानात् प्रशाम्यति) शरीरादिक में आत्मा का भ्रम होने से जो दुःख होता है यह आत्मशान होने से नए हो जाता है । (तंत्र अयंताः परमं तपः अपि कृत्वा न निर्वान्ति ) इसलिये जो पुरुष आत्म स्वरूप के ज्ञान प्राप्त करने में प्रयल नहीं करते थे दुर्धर तप को करके भी निर्वाण को प्राप्त नहीं कर सकते। भावार्थ-मुक्ति प्राप्ति के लिये आत्म-शान की प्राप्ति पूर्वक किया हुआ तप ही कार्यकारी है, इसके विरुद्ध आत्मा व उसमें उत्पन्न हुए रागादिक विकारों के वास्तविक खरूप 'को विना जाने जो पुरुष ऊटपटांग पंचाग्नि आदिक तप किया करते हैं ये उसी प्रकार नासमझ सनझे जाया करते हैं जिस प्रकार कि धुखार की चीमारी में यवासीर की दवाखाने वाले
समाधि-शतक।
७५.
-
बेवकूफ माने जाया करते हैं ।। ४१ ॥
शरीरादिक को मात्मा मानने
फलं चाहता है।
वाला तप
करके
क्या.
1
शुभं शरीरं दिव्याँश्च, विषयानमिवाच्छति ।
उत्पन्नात्ममति देहे, तत्वज्ञानी ततश्च्युतिम्।।४२॥
अन्वयार्थ (देहे उत्पन्नात्ममतिः शुभं शरीरच दिव्यान्
विषयान् अभिवाञ्छति) शरीर में जिसको आत्म-द्धि हो
रही है वह पुरुष तप. करके देवों के सुंदर शरीर को घ खगों
के दिव्य विपयों को ही चाहता है, (तत्त्वज्ञानी ततः च्युतिम् ।
और जो तत्वज्ञानी है वह ऐसे शरीर व विपयों से भी छूटना
चाहता है।
भावार्थ-हिरामा खर्गादिक के मिलने को ही परम-पद
की प्राप्ति ससझता है इसलिये केवल स्वर्गादिक की लालसा
से ही पंचाग्नि प्रादि तप के द्वारा कायक्लेश करता है और
जो आत्मां के वास्तविक स्वरूप को जान जाता है उसको
स्वर्गों के विषय भोग भी अन्य विषयों की तरह दुःखदाई
मालूम पड़ते हैं इसलिये वह सम्यग्दृष्टि पुरुष उन स्वर्गादिक
के विषयों की इच्छा न करके परमानंदमय मोक्षपद की इच्छा
रखता है॥ ४॥
शान्ति-सोपान । किसको कम-बंध होता है और किसको नहीं होता ? परत्राहम्मतिः स्वस्मा,च्च्युतो बध्नात्यसंशयम् । सास्मिन्नहम्मतिश्च्युत्ता, परस्मान्मुच्यते बुध॥४३॥ 1 अन्वयार्थ-(परत्र अहम्मतिः स्वस्मात् च्युतः असंशयं वध्नाति ) जिसको. शरीरादिक पर पदार्थों में श्रात्म-बुद्धि हो रही है वह अपने स्वरूप से व्युत रह कर निःसंदेह शाना- घरणादिक कर्मों का बन्ध करता है ( स्वस्मिन् अहम्मतिः बुधः परस्मात् च्युत्वा मुच्यते) और जिसको आत्मा में ही आत्म बुद्धि उत्पन्न हो गई है वह ज्ञानी अंतरात्मा शरीरादि के संबंध से छूट कर मुक्त हो जाता है .॥४३॥ : .. बहिरात्मा किसको आत्मा मानता है व अंतरात्मा किसको? दृश्यमानमिदं मूनिलिंगमवबुध्यते । इदमित्यवबुद्धस्तु, निष्पन्नं शब्दवर्जितम् ॥४४॥ अन्वयार्थ ('मूढः दृश्यमानं त्रिलिंग इदं अवबुध्यते') मूढ़ घहिरात्मा इस विलिंगात्मक शरीर को ही आत्मां मानता है (अयबुद्धः शब्दवर्जितं तुनिष्पन्न पदं इति अवबुध्यते) और शांनी अंतरात्मा नामादि विकल्पों से रहित श्रनादि सिद्ध श्रात्मा.को ही आत्मा मानता है॥४४॥ यदि अंतगत्मा आत्माकोही प्रात्मा मानता है तो फिर वह अपने,को बाह्य पदार्थों का कर्ता-भोक्ता को मानता है ?
. समाधि-शतक । . . जानन्नप्यात्मनस्तच, विविक्तं भावयन्नपि । पूर्वविभ्रमसंस्कारीद्, प्रान्ति भूयोऽपिगच्छति।४५॥ अन्वयार्थ-(आन्मनः तत्त्वं जानन् अपि, विविक्त भाव- यन् अपि) अविरत सम्यष्टि अंतरात्मा, आत्मा के स्वरूप को जानते हुए भी तथा अन्य पदाथों से भिन्न आत्मा की भावना करते हुए भी: (पूर्व विभ्रम संस्कारात् भूयः अपि भ्रान्तिं गच्छति ) पूर्व बहिरामावस्था के भ्रामक संस्कारों के कारण फिर भी भ्रान्ति को प्राप्त हो जाता है। भावार्थ-अविरत सम्पद्दष्टि अंतरात्मा को यद्यपि विचार काल में बाह्य पदार्थों के कर्ता-भोक्ता पने का भ्रम नहीं होता 'तथापि अंनादि काल से संतत अभ्यास में आये हुए मिथ्या- स्वजन्य संस्कारों के असर से साधारण अविचारित कार्यों में उसको कदाचित् कर्ता-भोक्ता पने का व्यामोह भी हो जाता है इसी कारण उसके शानचेतना (शुद्धात्मा का अनुभव) के सिवाय कर्म-चेतना ( कर्त्तापने का. अनुभव ) व कर्मफल- चेतना (भोकापने का अनुभव ) भोमानी गई है ॥४५॥ इन भ्रामकासंस्कारों के दूर करने का क्या उणय है? अचेतनमिदंदृश्य, मदृश्यं चेतनं ततः। स्वरुष्यामि व तुष्यामि, मध्यस्थों हं भवाम्यत:४६ । अन्वनार्थ-(इदं दृश्यं अचेतनं, चेतनं अदृश्यं ततः क.
शान्ति-सोपान । रुष्यामि व तुष्यामि ) अन्तरात्मा को निरंतर यह विचारते रहना चाहिये कि यह जितना भी दृष्टिगोचर जगत् है, यह सब अचेतन है और ओ चेतन है वह टिगोचर नहीं है। इस 'लिये मैं फिस पर तो रोप (शोध) करू और किस पर संतोष करु १ अर्थात् किसी से भी राग-द्धप न करके ( अतः अहं मध्यस्थः भवामि ) मुझे मध्यस्थ रहना हो.उचित है। : भावार्थ-सस्यग्दृष्टि-अन्तरात्मा को पूर्वमें कहे हुए कर्ता- भोक्तापने आदि के अनेक मिथ्याभ्रामक संस्कारों को दूर करने के लिये निरन्तर यह विचार करते रहना चाहिये कि जिन वाद्य पदार्थों का मैं अपने को कर्त्ता व भोक्ता मानता हूँ, अथवा जिनको देख कर क्रोधादि करता हूं, वे सब पदार्थ जरूप हैं मेरे स्वरूप से उनका- कोई सम्बन्ध नहीं है, ऐसे जड़ पदार्थों पर रोप करना व संतोष करना मुझे. कदापि उचित नहीं है, इसलिये इन सब बाह्य पदार्थों पर माध्यस्थ्य भाव रखना ही योग्य है ॥ ४६॥ वहिरात्मा च अंतरात्मा किस २ वस्तु का त्याग व ग्रहण करते हैं ? त्यागादाने बहिर्मूदः, करोत्यध्यात्ममात्मवित् ! नान्तविरुपादान, न त्यागो निष्ठितात्मनः ४७ अन्वयार्थ-(मूढः वहि त्यागादाने करोति, आत्मवित् अध्यात्म ) मढ पहिरात्मा पके उदयसे बाह्यअनिष्ट पदार्थों समाधि-शतक । ७६ का त्याग करता है और रोग के उदय से वाह्य इष्ट पदार्थाका ग्रहण करता है तथा आत्म स्वरूप को जानने वाला अंन- रामा अन्तरंग रागद्ध पधादिक का त्याग करता है और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक् चारित्र प्रादि निज भावों का ग्रहण करता है । (निष्ठतात्मनः श्रन्तः बहिः न त्यागः न उपा- दानं ) और अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित नो कृतकृत्य सर्व परमात्मा है वहन वाह्याभ्यन्तर किसी पदार्थ का त्याग करता है और न किसी का ग्रहण करता है। भावार्थ-परमान्मा बाह्य पदार्थों का त्याग-ग्रहण तो पहले अंतरात्म अवस्था ही छोड़ देता है और रागादिक अंत- रंग कपायों का त्यांग घ केवल शानादिक निज गुणों के ग्रहण करनेसेही वह परमात्म-पद प्राप्त करता है इसलिये उसे पर कुछ त्यागना व ग्रहण करना बाकी नहीं रहता ॥ १७ ॥ अंतरात्मा को अंतरंग रागादिक का त्याग व सम्ब- रज्ञानादिक का ग्रहण किस प्रकार करना चाहिये? युजीत मनसाऽत्मानं,बाक्कायाम्यां वियोजयेत्। मनसा व्यवहारं तु, त्यजेदाक्काययोजितम् ।४८ अन्वयार्थ-(आत्मानंमनसायुजीत,वाक्कायाभ्यां वियो- जयेत् ) श्रात्मा को मानसशान के साथ तो तन्मय करना चाहिये और वचन व काय की क्रियाओं से रोकना चाहिये।
.
शान्ति-सोपान ।
(.वाक्काययोजितं व्यवहारं तु मन जा त्यजेत् ) और वचन व
काय से किये हुए कार्य को भी मन से चितवन न करे।
भावार्थ-रागादिक के त्यागने व सम्यग्ज्ञादिक के प्राप्त
करने के लिये अन्तरात्मा को वचन व काय की क्रियायें छोड़ते
जाना चाहिये, और मन के द्वारा निरन्तर आत्म-चितवन
करते रहना चाहिये । तथा वचन व काय की कोई आवश्यक
क्रिया यदि करनीभी पड़े तो उसमें मन नहीं लगानाचाहिये।
यहां कोई प्रश्न करता है कि स्त्री-पुत्रादिक के.साथ
तो कायकी चेष्टाव वचनालाप करते समय सुख
होता है तब फिर बचन-काय के व्यापार
त्यागने से क्या लाभ है?
जगदेहात्मदृष्टीनां, विश्वास्य रम्यमेव वा।
स्वात्मन्येवाऽऽत्मदृष्टीनांक्व.विश्वासक्ववा रतिः४९
अन्वयार्थ (देहात्मदृष्टोनांजगत् विश्वास्यं रम्यं एवं वा)
शरीर में आत्मदृष्टि रखने वाले वहिरात्मा जीवों को यह स्त्री-
'पुत्र, धन्य-धान्यादिक का समूहरूप संसार, विश्वास-पात्र व
मनोहर मालूम देता है, (स्वात्मनि एव आत्मदृष्टीनां क
विश्वासः क्व वारति) किन्तु आत्मा में ही आत्मदृष्टि रखने
वाले 'शानी पुरुषों को इस प्रपंचरूप संसार में न विश्वास
होता है और न रति ही होती है।
भावार्थ-जव तक इस जीव को अपने वास्तविक स्वरूप
-
.
'ममाधि-शनका . का भान न होकर देइ आदिक परं पदाथों में श्रान्मबुद्धि बनी रहती है नभी तक उसे वाह्य पदार्य मनोहर मालूम देते हैं, श्रथवा उस को उन में विश्वास रहना है और जब उस पुरुष का स्वपर का वास्तविक ज्ञान हो जाता है तब उसे निजानंद को छोड़कर बाह्य पदाधी में रमन की कदापि इच्छा नहीं होती. या विषयं उसे एक नीरसे य ढुम्बद मालूम देन लगते हैं। अंतरात्मा को मन-वचन-काय की प्रवृत्ति कैसी रखनी चाहिये? . आत्मज्ञानात्परं कार्य न बुद्धो वाग्यच्चिरम् । कुर्यादर्थवशाकिञ्चिद्याक्कायाभ्यामतत्परः ॥५०॥ श्रन्ययार्थ-(श्रान्मशानान् परं कार्य बुद्धी चिरनधारयन) आत्ममान के सिवाय अन्य कार्यों को बहुत काल तक बुद्धि में धारण नहीं करना चाहिये। (अर्थवशाकिनिद बाझाया- भ्यां अनत्परः कुर्यात् ) प्रयोजन वश 'यदि वाह्य कार्य कुछ करने हो नां उन्हें केवल वचन व काप से करने चाहिये, उनमें मन से श्रासक्त नहीं होना चाहिये। ': भावार्थ-मान के इच्छुक मानी पुरुषों को अपना मुख्य लव्य तो आत्मोद्धार ही रखना चाहिये, मानसिक उपयोग को बाह्य कार्यों में न लगाकर निरंतर श्राम हित के कायों में ही लगाना चाहिये और अपने व परके उपकार वश यदि कुछ ६
शान्ति-सोपान ।
बाह्य कार्य करने भी पढ़ें तो उनमें विशेष उपयोग न लगा-
कर श्रावश्यक समझ,वचनव काय से कर देना चाहिये ॥५०॥
अंतरात्मा वाह्य विषयों में श्रास न होकर आत्म स्वरूप के
विषय में क्या विचारता है?
.
यत्पश्यामीन्द्रियैस्तन्मे, नारित यन्नियतेन्द्रियः ।
अन्तःपश्यामि सानन्द, तदस्तुज्योतिरुत्तमम् ५१
अन्वयार्थ-(यत् इन्द्रियः पश्यामि तत् मे नास्ति ) जिस
शरीरादिक को मैं इन्द्रियों के द्वारा देखता हूं वह मेरा स्वरूप
नहीं है। (नियतेन्द्रियः यत् उत्तमं ज्योतिः सानंदं अंतः
पश्यामि तत् अस्तु) इन्द्रियों को बाह्य विषयों से रोक कर
स्वसंवेदन शान के द्वारा जिस परमानन्दमय अतीन्द्रिय मान
स्वरूप उत्तम ज्योति को मैं अंतरंग में देखता हूँ, यही वास्तव
में मेरा स्वरूप है।
भाषार्थ 'जब बाह्य विषयोंसे उपेक्षा कर अंतरात्मा आत्म-
स्वरूप के चितवन में तन्मय हो जाता है। उस समय उसको
परमानन्दमयी भात्मज्योति साक्षात् सरीखी प्रतिभासित होने
लगती है। और वह अपने उसी चिदानंदाजुभव में मग्न रहने
लगता है। वाह्य विषयों की निकरता होने पर भी उनकी
; तरफ उसका ध्यान नहीं आता.॥५१॥
समाधि-गतक।
यदि.परमानन्दमयी ज्योति प्रात्मा का निज स्वरूप है तो उसका
अनुभव करते समय कर क्यों होता है ?
सुखमारब्धयोगस्य, बहिःखमथात्मनि ।
बहिरेवासुखं सौख्य, मध्यात्मभावितात्मनः ॥५२||
अन्वयार्थ (भारण्धयोगस्य 'बहिः सुखं अथ आत्मनि
दुःखं ) जो पुरुष आत्म स्वरूप की भावना फरना प्रथम ही
प्रारम्भ करता है। उसे प्राचीन संस्कारों के कारण वाय
विषयों में सुख और आत्म विचार में दुख मालूम
होता है। (भावितात्मनः बहिः एव असुखं अध्यात्म सौख्यं)
और जिसको निरंतर भावना करते रहने से आत्म स्वरूप का
प्रतिभास हो जाता है। उसे बाह्य विपयों. में दुःख और
प्रात्म चितवन में सुख होने लगता है।
भावार्थ-मात्म चितवन करना प्रारम्भ कर देने पर भी
अब तक भावना करने वाले को आत्म स्वरूप की पहिचान
नहीं होती, तब तक उसे आत्मिक आनन्द न आने से बाह्य
विषय मनोहर जान पड़ते हैं। तथा आत्म विचार करना एक
प्रकार की झंझट दिखाई देती है। और जब उसे अभूतपूर्व
परमानन्दमय आत्म स्वरूप का अनुभव होने लगता है। तर
यह उसमें ऐसा मग्न होता है कि उसे बाह्य विषय, विष
सरीने मालूम देने लगते हैं । जैसे कोई पुरुष जन्म से ही
अपने पास के सारे कुएं का पानी पीता रहा हो और उसफो
,
।
. शान्ति-सोपान । कुछ दूर से निर्मल शीतल मिष्ट जल के कुंचे या पानी लाकर पीने को कहा जाय तो जाते समय उसे ग्वेद होने के कारण अपना खारी कुवां ही अच्छा मालम देगा। क्यों कि पास के खारी कुवे पर जाते समय मार्ग को धूप सहनी नहीं पड़ेगी। किन्तु जब वह दूर वाले कुवे के निर्मल शीतल-स्वादिष्ट जल का पीवेगा, तब उसे अपने पास का वारी कुवां बद्भुत बुरा मालूम देने लगेगा और मार्ग की थकावट को यह भूल जायगा ॥३॥ आत्मस्वरूप की भावना किस प्रकार करनी चाहिये ? - । तन्वयात्तत्परान्पृच्छेत्तदिच्छेत्तत्पगमवेत् । येनाविद्यामयंरूपं,त्यक्त्वा विद्यामयं ब्रजेत्।५३। अन्वयार्थ-(तव्यात्, तत् परान् पृच्छन्, तत् इच्छेत् तस्परो भवेत्) अात्मस्वरूप की ही. वात दूसरोंसे कहनी चाहिये, अात्मस्वरूपको ही दूसरों से पूछना चाहिये, उसो श्रात्मस्वरूप की,प्राप्तिकी निरंतर इच्छारखनी चाहिये, और श्रात्म-खरूपके चितवन में ही प्रतिसमय तन्मयं रहना चाहिये। (येन अविद्या- मयं रूपं त्यक्त्वाविद्यामयं व्रजेत् )जिससेकि अज्ञानमय अवस्था छूट कर शानमय-आत्मखरूपकी प्राप्ति होथे। भावार्थ-जैसे किसी धनिक वृद्धपुरुपका अत्यन्त प्रेमपात्र एकमात्र विवाहित पुत्र विनाकहे परदेश चलाजावे तो वह वृद्ध.
.
समाधि-शतकी.
पुरुष जिससे बात करने का अवसर मिलता है तो अपने पुत्र
की ही यातकरताहै, किलोसे कुछ पूछता है तो अपनेधुभके पान
फी हो यात पूछता है। यदि किसा वस्तु
की
इच्छा करता है
तो एक मात्र अपने प्रिय पुत्रके आने की ही इच्छा करता।
यदि किसी का चितवन भी करता है तो उसी अपने प्रेम पात्र
पुत्र का करता है । मारांश यह है कि जैसे उस युद्धपुरुष के
चित्त से उसका पुत्र किसी क्षण भो पृथक् नहीं होता, इसी
प्रकार प्रात्म-खरूप की प्राप्ति के लिये निरन्तर चेष्टा करनी
चाहिये।
अशानी और ज्ञानी अामा किसको मानते हैं?
शरीरे वाचि चात्मानं,मंधत्ते वाक्शरीरयो। .
भान्तोऽमान्तःपुनस्तत्त्वं, पृथगेषां विबुध्यते।५४॥
अन्वयार्थ-(वाक्शरीरयोःभ्रान्तःशरीरे चाचि च श्रात्मानं
संघचे ) घचन और शरीर के वास्तविक स्वरूप को न जानने-
पाला प्रान्त बहिरात्मा शरीर और वचन को. ही आत्मा
जानता है । (अभ्रान्तःपुनःएषां तत्वं पृथक् विबुध्यते) और शानी
पुरुष शरीर,वचन व आत्माके स्वरूपको पृथक् २ जानता है।
शरीरादिक को आत्मा मानने वाला बहिरात्मा जिन वाह्य
विषयों में आसक्त हो रहा है,वे इसके हिनकारक नहीं हैं।
न तदस्तीन्द्रियार्थपु, यत् क्षेमं करमात्मनः ।
तथापि गते बालस्तत्रेवाज्ञानभावनात् ॥५५॥
-
शान्ति-सोपान ।
अन्वयार्थ (इन्द्रियार्थेषु तत्न अस्ति यत्श्रात्मनामकर)
पंच इन्द्रियों के विषयों में ऐसी कोई भी विशेषता नहीं है
जिससे कि आत्मा का कुछ भला होसके । (तथापि पालम्का-
नभावनात् तन एव रमते)खेद । कि यह संसारी जीव तोमा
भधानवश उन विषयों में हो रमता है।
भावार्थ-सब तरह से हानिकारक, अनित्य, पानीपुरुपोंके
बारा निषिद्ध, इन्द्रियोफे विषयों में भी जो इस जीवको आनंद
भाने लगता है यह सब प्रधानकी ही महिमा है।
.
अनादिकालीन मिथ्यात्पयश जीय क्या करते हैं।
चिरंसुषुप्तास्तमसि, मूदात्मानाकुयोनिषु ।
अनात्मीयात्मभूतेषु, ममाहमितिजागति ५६॥
अन्वयार्थ-(पूढात्मानःतमसि कुयोनिषुचिरं सुपुप्ताः) येमूद
संसारी जीव मिथ्यात्वके उदयवश अनादि कालसे तो निगोदा-
दिक कुयोनियों में निवास कररहेहैं, अर्थात् अचेत पड़े सोरहेहैं।
(धनात्मीयात्मभूतेषुमम अहं इति जागृति)यदि कदाचित् कर्मोदय
से ये जीव.मन सहित संशीभी होजातेहैं तो मानसिक संकल्प-,
विकल्पों के द्वारा प्रत्यक्षभिन्न स्त्रीपुत्रादिक संबंधियोको भी
अपने मानकर अनेक प्रकारके प्रपंच में पड़े रहते हैं।
भावार्थ--निगोदादिक पर्यायों में तो बानको अत्यन्त
म्यूनतासे यह जीव अनेकदुःख भोगताहीहै किन्तु पहली पायों
.
समाधि-शवक! से विशेषज्ञानवान मनसहित पंचेन्द्रिय होने परभी रागद्वेषमोह- घश दूसरोको अपने मान , दुःखी हो रहता है। बहिणास्मात्रथा को त्याग कर अपने च पर के शरीर को इस प्रकार मानना चाहिये। पश्यन्निरंतरं देहमात्मनोऽनात्मचनमा । अपगत्मधिया न्येषामात्मतत्व व्यवस्थितः॥५७॥ अन्वयार्थ (आत्मतत्ते व्यवस्थितः आत्मनः देहं निर्ग- तरं अनात्मचेतसा पश्येत् ) आत्म स्वरूप में स्थित होकर अपने शरीर को निरंतर अपने से भिन्न समझना चाहिये । (अन्येषां अपरात्मधिया) और स्त्री-पुत्रादिक दूसरे जोधोंके शरीर को उनको आत्मासे भिन्न मानना चाहिये। भावार्थ-देह के साथ प्रात्मा की अभेद बुद्धि अनादि- फाल से हो रही है। निरंतर उत्तम २ उपदेशों के मिलने पर भी, इस व्यामोह का मिटना कष्ट साध्य समझ कर, ग्रंथ- कार बार २ अनेक प्रकार से इसो घात को दिखाते है । यहां कोई प्रश्न करता है कि जैसे अपने वास्तविक स्वरुप को स्वयं जानना चाहिये, वैसे हो दूसरों को भी यताना चाहिये, या नहीं ? उत्तर- अज्ञापितं न जानन्ति,यथा मां ज्ञापितं तथा। मृहात्मानस्ततस्तेषां, वृथा में ज्ञापनश्रमः॥५८ .
मम
.
शान्ति-सोपान
अन्वयार्थ-(मूढ़ात्मानः यथा मां शापितं ने जानन्ति
तथा शापितं ) तत्यशानो अंतरात्मा कहता है-अपने मन
को समझाता है कि जैसे ये मूढ़ प्रशानी जीव मेरे स्वरूप
को बिना बताये नहीं जानते, पैसे हो यताने से भी नहीं जान
सफेंगे। (ततः नेपांजपनश्रमःमे वृथा ) इसलिये उनके योध
कराने के लिये जो मेरा बंद करना है, वह वृथा है।
भावार्थ-बहुत से पानो
पुग्य दूसरों को उपदेश करने
में इतने व्यग्र हो जाते हैं कि उपदेश न मानने पर अधीर हो
उठते हैं । और वस्तुस्वरूप को भूलकर सुनने वालों से कपास
करने लगते हैं। जिसके कारण वे दूसरों के हित करने के भ्रम
में पड़ कर अपना अहित कर लेते हैं। ऐसे पुरुषों के प्रतिगोध
के लिये हो यह उपयुक्त श्लोक ग्रंथकार ने लिखा है। जिसके
लिखने का यह प्राशय है कि परोपदेश की प्रवृत्ति का होना
शानी जोषों को शुभ कपाय रूप समझना चाहिये और अपनी
..शुद्ध परिणति को प्राप्त करने को योग्यता होते समय इसको
भो वाधक हो समझना चाहिये । इस शुभ प्रवृित्ति के व्यामोह
में पड़ कर प्रात्महित को कदापि भूलना नहीं चाहिये ।
इसी वातको दूसरी तरहले कहते हैं।
यबोधयिनुमिच्छामि, तन्नाहं यदहं पुनः
ग्राह्यं तदपि नान्यस्य, तकिमन्यस्य वोधये। ५ ।
* अन्धयार्थ(यद्वोधयितुं इच्छामि तन नअहं, पुनःयन् अहं
-
.
समाधि-शनका
E
-
सन अपि अन्यस्य ग्राहां तत् अन्यस्य किं वाधये) जिस देहादिक
के स्वरूपको मैं संसारी जीवीको मुनाना चाहताहै प्रथया वेमु-
नना चाहते हैं वे देहादिक तो मेरे स्वरूप नहीं है । और जो मेरा.
} ग्रास्तविक परमानंदमय स्वरूप है उसको ये मूहजीन जान
नहीं सकते, इसलिये अब मैं इनको क्या समझाऊं ।
भावार्थ-मानी अंतरात्मा परोपदंश करने की अनुचित
लालसायन्यनताले छूटने के लिये फिरअपनी प्रान्माकोसममाना
है कि हे श्रात्मन , यदि नूहन सारी जीवोंकोउपदेशमा दंगा
नो शरीरादिक जड़पदार्थों के विषय अथवा संसार दशा
विषयमें देसकता है।क्योंकि आत्माका शुद्धस्वरूप तो एक प्रकार
से बचनद्वारा कहाभी नहीं जासकता और. इन्द्रियों से सुनकर
ग्रहण भी नहीं लिया जासकता, और संसारके दुःखों का
व शरीरादिक का अनुभव इंनजीवों को स्वयंही होरहा है. फिर
तू इनको उपदेश देनेके झंझटम पड़कर व उपदेश न मानने से
खिन्न होकर, व्यर्थ ही श्राकुलिन क्यों होता है ! ..
-
बहिरान्मा व अंतसन्मा किसमें संतुर होते हैं?
बहिस्तुष्यति मंदात्मा,पिहित ज्योतिरन्तर ।
नुष्यत्यन्तः प्रबुद्धात्मा बहिावृत्तकोतुकः ६०
अन्वयार्थ (सूहात्मा अन्तरं पिहित ज्योतिः येहिः तुष्य.
नि ) मोह कर हिसको अंगरंग शान ज्योनि-प्राचानिन को
--
है।
शान्ति-सोपान ।
रही है वह मूढ़ बहिगत्मा शरीरादिकवाह्य विषयों में ही संतुष्ट
रहता है। ( वहियोवृत्तकौतुकः प्रवुद्धात्मा अन्तः तुष्पति) और
जिसका वाह्य विषयों में अनुराग नहीं रहा, वह मानी अंतरा.
स्मा अपने अंतरंग प्रात्म-स्वरूप में ही संतुष्ट होता है।
तत्त्वज्ञानी बहिरास्माको दशा पर विचार करता है।
न जानन्ति शरीराणि, सुखदुःखान्य बुद्धयः।
निग्रहानुग्रहधियं तथाप्यत्रैव कुर्वते ॥ ६१॥
अन्वयार्थ (शरीराणि सुखदुःखानि न जानन्ति ) यद्यपि
औदारिकादिक शरीर जड़रूप होने से सुख-दुःख को नहीं जा-
नते (तथापि श्रवुद्धयः अत्रैव निग्रहानुग्रहधियं कुर्वते ) तो
भी मूढ़ बहिरात्मा इन शरीरों से राग-द्वेष करता है और द्वेष-
चश भूखामरके शरीर को दुःख देना चाहता है तथा राग वश
अनेक प्रकार के भूषण वस्त्र पहिन कर शरीर को सुखी
फरना चाहता है।
भावार्थ-अंतरात्मा विचारता है कि देखो,ये संसारी प्राणी
कितने मूढ़ है; कि जो शरीर जड़रूप है उसको भी राग-द्वेष.
घश सुत्री-दुःखी करने, की चेष्टा करते हैं।
संसार व मोक्ष कव होता है ?
स्वबुद्धया यावद्गृहीयात्कायवाचतसांत्रयम् ।
संसारस्तावदेतेषां भेदाभ्यासे तुनिवतिः ॥६॥
-
समाधि-शुनक ।
अन्ययार्थ (कायवाक, चेतसां अयं यावत् स्वक्षया
गृण्हीयात् तावत्संसारः) जब तक मन-वचन-कायका प्रात्म-
बुद्धिसे ग्रहण किया जायगा, तब तक ही संसार समझना
चाहिये । (एतेषां भेदाभ्यासे तुनिवृतिः) और इन तीनों मन-
वचन-कायों का आत्मा से पूर्ण रूप से भेद भान होने पर
जीव की मुक्ति समझनी चाहिये ।
अर्थात् अब तक यह जीव मन-वचन काय य इनके निमित्त
से होने वाले रागादिफ विकारों घ अन्य याह्य कार्यों को अपने
समझता रहता है तब तक वह जीव संसारी है और जब मन,
पचन, काय"इन तीनों को तथा इनके निमित्त से उत्पन्न हुए
राग, द्वेप, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि विकारोंको व स्त्री-
पुवादिक बाह्य पदार्थों को यह जीव पूर्णरूप से भिन्न समझ
लेता है तय मुक्ति का पात्र बन जाता है।
शरीर और आत्माका भेदज्ञान होने से यह जीव शरीर,की
रढ़ता आदिसे आत्मा की दृढ़ता प्रादिक नहीं मानता।
धनेवस्त्रे यथाऽऽस्मानं, न धनंमन्यते तथा ।
घनेस्वदेह प्यात्मानं, न घनं मन्यते बुधंगा६३॥
जीणे वस्त्रे यथाऽऽत्मानं, न जीणंमन्यते तथा ।
जाणे खदेहेप्यात्मानं नजीर्ण मन्यते बुधा६॥
रक्ते वस्त्रे यथाऽत्मानं न.रतं मन्यते तथा।
रक्त स्वदेहेऽप्यात्मानं, न रक्तं मन्यते बुधः॥६५॥
१३ शान्ति-सोपान । नष्ट वस्त्रे यथाऽऽत्मानं, न नष्टं मन्यते तथा । नष्टेस्वदेहेऽप्यात्मानं, न नष्टं मन्यते बुधः।६६। . अन्वयार्थ त्रुद्धिमान पुरुप जैसे दृढ़ या मजवून कपड़े को पहिनकर आत्मा को बलिष्ठ नहीं मानता. वैसे ही शरीर के पुष्ट होने से श्रात्माको पुष्ट नहीं मानता ॥ ३ ॥ बनके पुराने होजानेपर जैसे श्रात्माको जीर्ण'नहीं मानता वैसेही शरीरके अंश या वृद्धहोजाने पर आत्माको शया वृद्ध नहीं मानताटा रंगे हुएं वस्त्र पहिनकर जैसे आत्माको रंगी हुई नहीं मानता, उसी तरह केशर चन्दनादि से शरीरको रंगकर भी श्रात्माको रंगी हुई नहीं मानता ॥६५॥ इसीप्रकार जैसे वस्त्र नष्ट होजाने पर भी प्रासाको मष्ट नहीं मानता, असेही शरीरके नष्ट होने पर भी आत्माको नष्ट नहीं मानता ॥६६॥ भावार्थ-ज्ञानी पुरुष इस शरीरको नष्ट वस्त्र के समान सम- झतेहैं, जैसे वस्त्रों के ग्रहण व त्यागमें अन्यजीवों को प्रात्मा के जीवन-मरणका भ्रम नहीं होता,वैसे हीशानीपुरुपों को शरीर के ग्रहण व त्यागमें भी आत्माके जीवन-मरण का भ्रम नहीं- होता ॥ ६६ . परमवीतरागता रूप शांतदशाको कौन माप्त कर सकता है। यस्य सस्पन्दमाभाति, निस्पन्देन समं जगत् ।। अप्रज्ञमक्रियामागं, स शसं याति नेत ६७ समाधि-शतक। अन्धयार्थ (यस्थ श्रमशंप्रक्रियामोगं सस्पं जगत् निम्पं देन समं प्रामाति) जिस ज्ञानी पुरुषको ज्ञानरहित, आचरण भादि क्रियारहित, तथा सुम्न आदि के अनुभवरूप भोगरहिन. पद शरीरादि कप जीयके निमित्त से अनेक पेश करने वाला जगत् निस्पंद-निश्चेष्ट लकड़ी पत्थर सरीखा मालूम पड़ने लगताहै वही पुरुष परम वीतराग शान्त अवस्थाको प्राप्त कर. सकता है। इस परमयीतराग अवस्था को अनेक प्रकार के मपंच में फंसे हुए मूढ़ बहिरात्मा जीव नहीं प्राप्त कर सकते ॥ ६७॥ अहिरामा अपने स्वरूप को क्यों नहीं पहिचानता? 'शगरिकंचुकेनात्मा, संवृतो ज्ञानविग्रहः । नात्मानबुध्यते तस्माद्ः प्रमत्यतिचिरंभवे ॥६८ अन्वयार्थ (शरीरकंचुकेन संवृतः भानविग्रहः श्रात्मा 'प्रात्मानं न बुध्यते तस्मात् भवे अतिचिरं भ्रमति ) हान हो है. शरीर अथवा स्वरूप जिसका ऐसायहात्मा फार्माणशरीर 'रूपी कांचली से ढका हुआ है। इस लिये अपने वास्तविक स्वरूप को न जानकर अनादि काल से संसार चक्र में भ्रमग करता फिर रहा है। यहां पर क्रांचली को फेवल दृष्टान्त मात्र समझना चाहिये। जिस प्रकार सपके कंवल ऊपरी भाग में ६४ शान्ति-सोपान। वृक्ष की छाल की तरह कांचली रहती है, शरीर के अंदर नहीं रहती; उस प्रकार श्रात्मा के साथ,कार्माणशरीर (सुक्ष्म शरीर) का सम्बन्ध नहीं समझना चाहिये । किन्तु संसारी नात्मा और फर्म को इस प्रकार मिला हुआ मानना चाहिये जिस प्रकार दूध में मोठा वा पानी में नमक मिल जाता है । अथवा जैसे दाद की दचा धनाते समय पारे और गंधक को पीसकर एकमेक करने पर दोनों की अवस्था बिल्कुल फजल सरीखी हो जाती है। पारे की संफेदी व चमक और गंधक का पीला पन न जाने कहां चला जाता है। इसी प्रकारात्मा के साथ कर्मों का सर्वांश सम्बन्ध रहने पर दोनों के गुण विकृत रहते हैं। आत्मा का अनंत दुख-सुख रूप परिणत रहता है और भी सम्यक्त्वादि गुणों की यही हालत रहती है ॥३॥ पहिरात्मा शरीर को आत्मा,पयों समझता है ? प्रविशद्गलतां ब्यूहे,देहे ऽणूनां समाकृतौ । स्थितिभ्रान्त्या प्रपद्यन्ते, तमात्मानमबुद्धयः ।६९। अन्धयार्थ-(श्रबुद्धयः प्रविशद्गलतां अणूनां व्यूहे देहे समाकृती स्थितिभ्रान्त्यातं प्रात्मनं प्रपद्यन्ते) मूढ़ बुद्धि वाले 'बहिरात्मा जीव निरंतर प्रवेश करने वाले व जीर्ण होने वाले पुद्गल परमाणुओं के समूह रूपशरीरको प्रात्माके समान' -'आकार वाला देख कर तथा शरीर व आत्मा की एक क्षेत्र मै स्थिति होने के कारण उत्पन्न हुए भ्रम से शरीर को ही मात्मा जानते हैं। - ::
समाधि-शनका ६५ भावार्थ-यदि इस शरीर का असली स्वरुप विचार कर देखा जाय तो यह घृणित पुद्गल परमाणुओं के पुंजके सिवाय और कुछ नहीं मालूम देता और जिन परमाणुगों से यह बना है वे भी इसमें शुरूसे अंत तक हमेशा नहीं रहते, किन्तु प्रनि- क्षण शरीर में नवीन-नवीन परमाणु-भाकर मिलते रहते हैं, और पुराने परमाणु निकलते रहते हैं। शरीर की यह दशा होते हुए भी आत्मा के समान आकार घाला होने से तथा यात काल से शरीर व आत्मा को एक क्षेत्र में स्थिति • रहने से मूढ़ बहिरात्मा इस शरीर को ही श्रात्मा मानता है ।। शरीर के धर्मासे आत्माको पृथक् माननेका उपदेश । गौरःस्थूल कृशोवाहमित्यङ्गेन विशेषयन् । आत्मानं धारयन्नित्यं, केवलज्ञाप्तीवग्रहम् ॥७॥ अन्वयार्थ (अहं गौरःस्थूल वारशःइति अंगेन विशेषयन् केवलक्षप्तिविग्रहंश्रात्मानं नित्यं धारयेत् ) मैं गोराई, स्थूल , अथवा कृश है, इस प्रकार शरीर के धर्मोसे पृथक् समझकर श्रात्माको नित्य ही केवलमान स्वरुप प्रथया रागादिक से भिन्न एकमात्र ज्ञानस्वरुप वा केवलझान रूपी शरीर विशिष्ट मानना चाहिये ॥ ७० ॥ मुक्ति प्राप्त करने की योग्यता कर आती है? मुक्तिरेकान्तिकी तस्य, चित्ते यस्याञ्चलाधतिः। तस्य नै कान्तिकी मुक्ति,यस्य नास्त्यचलाधतिः७१ . शान्ति-सोपाल। अन्वयार्थ (यत्य चित्ते अयला धृतिः, तस्य एकान्ति. को मुकिः ) जिस पुरुष के चित्त में आत्मस्वरूप, की निश्चल खिति है । उसको नियम से मुक्ति प्राम होती है। ( पत्य अय. ला तिः नास्ति, तस्य एकान्तिको मुक्ति नास्ति ) और जिस पुरुष को प्रात्म, स्वरूप में निश्चल स्थिति, नहीं है. उसको मुक्ति कदापि नहीं हो सकती।" भावार्थ-यह जीव आत्म स्वरूप में निश्चल होकर तन्मय होने से हो मुक्ति का पात्र होता है। विना आत्मस्थिरता के मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। - : N मोज्ञ के इच्छुक पुरुषों को क्या करना चाहिये ? जनेभ्यो वाक्ततः स्पन्दो,मनसश्चित्त विभ्रमा। मान्ति तस्मात्संसर्ग, जनेयोगी ततस्त्यजेत् ७२ अन्वयार्थ (जनेभ्यः वाक, ततः मनसः स्पन्दः तस्मात् चितविभ्रमाः भवन्ति, ततः योगो जनैः संसर्ग त्यजेत ) जगत के जीवों से मिलने पर घचन को प्रवृत्ति होती है, वचन को प्रवृत्ति होने से मनमें व्यग्रता होती है और व्यग्रता होने से मन विक्षिप्त सरोखा होजाता है, इसलिए आत्महित या मोक्षपद के इच्छुक योगी पुरुषों को व्यवहारो जनों का संसर्ग सर्व- "था छोड़ना उचित है।
समाधि-शतक। ९७ नगर व पनकी कल्पना किसके हृदय में होती है ? ग्रामोऽरण्यांमति देधा, निवासोऽनात्मदर्शिनाम् । दृष्टात्मनां निवासस्तु, विविक्तात्मैव निश्चिला७३ अन्वयार्थ-(प्रामः अरण्यं इसिधा निवासः अनात्मद- शिनाम् ) यह ग्राम है अथवा यह वन है, इस प्रकार दो तरह के स्थान को कल्पना अनात्मदर्शी पहिरात्मा जीवों को ही होती है । (रमात्मनां निवासातु विविक्तः निश्चनःआत्मा एय) और प्रात्मखरूप को जानने वाले शानी .पुरुषों का निवास- स्थान, वास्तव में उनका रागादि रहित निश्चल आत्मा ही होता है। क्योंकि आत्मशानी पुरुष निरंतर अपने प्रात्म गुणों के अनुभव में ही रमे रहते हैं इस लिये उनका ध्यान बाह्य ग्राम एन आदि स्थानों की तरफ नहीं जाता, परमानन्द मय निज आत्मा का ही एक प्रकारका मनोहर उपरन समझते हैं। ७३ शरीर को आत्मावात्मा को श्रात्मा मानने से क्या होता है? देहान्तरगतेवाज,देहेऽस्मिन्नात्मभावना। बीज विदेहनिष्पत्तरात्मन्येवात्मभावना ७४| अन्वयार्थ-(अस्मिन् देहे प्रात्मभावना देहान्तरमतेः थीजं) इस शरीर में श्रात्मा की भावना करना परलोक गमन का कारण है। (आत्मनि एव प्रात्मभावना विदेह निष्पत्तेः बीजं) और इस आत्मा में ही आत्मा की भावना करना मोक्ष प्रानि का कारण है। ७ . शान्ति-सोचान। भावार्थ-जो पुरुष शरीर को ही निश्चय से आत्मा समझता है वह निरन्तर नवीन २ शरीर धारण करता रहता है और जो पुरुष श्रात्मा को ही निरन्तर प्रात्मरूप से चितवन करता है; वह मुक्तरूप शुद्ध आत्मा हो जाता है। आत्मा का गुरु कौन है? नयत्यात्मानमात्मैव, जन्मनिर्वाणमेवच । गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्तिपरमार्थतः।७५ - अन्वयार्थ (आत्मा एव श्रात्मानं जन्म निर्वाणंच नयति) आत्मा ही आत्मा को जन्मरूपी संसार में रुलाता है और स्वयं ही संसार से पार करके मोक्ष पद प्राप्त कराता है। (तस्मात् आत्मनः गुरुः आत्मा, परमार्थतः श्रन्यः न अस्ति) इस लिये श्रात्मा का गुरु आत्मा ही है, अन्य, कोई वास्तव में गुरु नहीं है। भावार्थ-आत्म-हित के उपदेशक प्राचार्यादिक गुरुओं का सच्चा उपदेश. सुनकर भी जब तक यह जीव विषय-- कषायादिक का त्याग नहीं करता है तब तक बराबर संसार- सागर में रुलता रहता है और कभी-कभी प्राचार्योंके उपदेश मुने विना भी विषय-कषायादिक त्याग करके मोक्ष पद प्राप्त कर लेता है। इसलिये वास्तव में आत्मा को स्वयं अपना गुरु अपने को ही मानना चाहिये । .
समाधि-शुनका ES यहिरात्मा को मरने में भय क्यों लगता है ? हदात्मबुद्धिदहादावुत्पश्यन्नाशमात्मनः । मित्रादिभिर्वियागंच, विभेति मरणादृशम् ।७६। अन्वयार्थ-('देहादी हदात्मबुद्धिः प्रात्मनः नाशं मित्रा- दिभिः वियोगं च उत्पशान मरणात् भृशं विभेति )शरोरादिक मे जिसकी द आत्मबुद्धि हो रही है वह पुरुष शरीर छूटते समय प्रात्मा का नाश मानफर तथा मित्रादिकों से वियोग हुआ जानकर, मरणसे अत्यन्त भय खाता है। भावार्थ-यद्यपि इस वर्तमान शरीर को छोड़कर दूसरा शरीर प्राप्त करमा पुराने कपड़े को उतारकर नघोन कपड़े बदलने के समान है, इसमें भय करने की पा दुःख मामने की कोई भी बात नहीं है । तथापि जो अज्ञानी जीव इस शरीर को आत्मा समझे हुए हैं और मित्र वर्ग में अत्यंत मोहित हो रहे हैं, उनको मरने से अन्यंत भय लगता है। और इस भय लगने का मूल कारण वास्तव में उनका ही उपयुक्त अज्ञान है ॥७॥ शानी पुरुष को मरने का भय क्यों नहीं होना ? आत्मन्येवात्मधारन्या, शरीरगति मात्मनः । मन्यते निर्मयं त्यक्त्वा,वस्त्रं वस्त्रान्तरग्रहम् ।७७॥
२०० शान्ति-सोपान । - - अन्वयार्थ-(श्रात्सानि एवं भात्मधीः शरीरगति शात्म. नः अन्या वर त्यक्त्या वस्त्रान्तर अहं "इव" निर्भयं मन्यते) जिसको आत्मा में ही आत्मबुद्धि हो गई है यह ज्ञानी पुरुष शरीर के विनाश को श्रात्मा से भिन्न मानता है और मरने- जीने को पुराने वाले को उतार कर नवीन वन बदलने की तरह समझ कर निर्भय रहता है ॥७॥ एकसाथ व्यावहारिक व पारमार्थिक कार्यक्यों नहीं सिद्ध होते? व्यवहारे सुषुप्तो यः स जागत्यात्मगोचरे। जागर्ति व्यवहारेऽस्मिन्,सुषुप्तश्चात्मगोचरे ७८ अन्वयार्थ-(या व्यवहार सुषुप्तः सः आत्ममोचरे जागर्ति) जो व्यवहार के कार्यों में सोता है अर्थात् उनसे उदासीन रह- ता है वह श्रात्म अनुभषके विषयों में जागता है। अर्थात् उसमें तन्मय रहता है।( अस्मिन् व्यवहारे या जागति सामात्मगोचरै सुषुप्तः) और जो पुरुष व्यावहारिक कार्यों में तन्मय रहता है घह श्रात्मानुभव से कोसों दूर रहता है। भावार्थ-जीवों के चित्त की वृत्ति एक समय में विरुद्ध दो कार्यों में नहीं लग सकती, जिस समय में मन , विषयों में •फंसा रहेगा उस समय प्रारम-हित के कार्य उसे अच्छे नहीं सांगेंगे और जिस समय श्रात्म हित की तरफ मनका झुकाव होगा,उस समय उसे विषय-कषाय विष,सरीखे लगने लगेंगे।
.
समाधि-शतका
१८
जीवको मुक्ति का प्राप्त होती है ?
आत्मानमन्तरेदृष्ट्वा,दृष्ट्वा देहादिक वहिः ।
तयोरन्तरविज्ञानादभ्यासादच्युताभवत् ।।७९॥
अन्वयार्थ-(आत्मानं अन्तरे दृष्ट्वा, देहादिक बहिः दृष्ट्या-
तयोः अन्तरविशनात् अभ्यासात् अच्युनः भवेत् ) आत्मा को
अंतरंग में देखकर और शरीरादिक को बाघ जानकर, शरीर
और आत्मा की भिन्नता का दृढ़ शानाभ्यास करते २ जीव
मुक्त हो जाता है।
भावार्थ-जंच, इस जीव को श्रात्मा और शरीर का भेद
स्पष्ट मालूम देने लगता है तब यह शारीरिक क्रियाओं से
उपेक्षा करने लगता है और सम्यक् शानादिक आत्मिक गुणों
की प्राप्ति व वृद्धि के लिये प्रयत्न करने लगता है। इसी तरह,
फरते २ अघ सम्पूर्ण देहादि संबंधी क्रियाओं को छोड़कर
अपने सर यात्मिक गुणों का पूर्ण विकाश कर लेता है तब यह
जीव मुक्त हो जाता है।
पानी पुरुष जगत् को कैसा जानते हैं ?
पूर्व दृष्टात्मतत्त्वस्य, विमात्युन्मत्तवज्जगत् ।
स्वभ्यस्तात्मधियः पश्चात, काष्ठ पाषाणरूपवत् ८०
अन्वयार्थ- (प्रात्मतत्त्वरय जगत् पूर्व उन्मत्रवत् वि..
भानि, स्वभ्यस्तामधियः पश्चान्याष्टगापाए सावन ) जिसने
शान्ति-सोपान ।
ये
अपने आत्म स्वरूप को जान लिया है उस ज्ञानी पुरुष को .
पहले यह जगत् उन्मत्त सरीखा मालूम देने लगता है, और
जय श्रात्मानुभवका और भी अधिक दृढ़ अभ्यास हो जाता है
तब उस महापुरुष को यह जगत्काष्ठ-पापाण सरीग्ना बिल्कुल
निश्चेष्ट दिखाई देने लगता है।
भावार्थ-जब इस जीव को देह घ आत्मा का भेदज्ञान
होने से अपने परमानंदमय चैतन्य चमत्कार स्वरूप आत्मदेव.
का दर्शन होने लगता है उस समय वह ज्ञानी पुरुष इस
अपूर्व प्रानन्द से जगत के जीवों को घंचित देखकर उनको
दशा पर करुणा करता हुआ विचार करता है कि देखो,
संसारी प्राणी कितने मूर्ख हैं ! कि इस अपूर्व आनन्द को प्राप्त
करने की योग्यता रखते हुए भी इस सुधारस के स्वाद से
बंचित रहते हैं और अत्यंत घृणित व नीरस विषय-भोगों को
भोगकर.अस्थि (हाड़) चावने वाले श्वान की तरह आनन्द
मानते हैं। पीछे वही ज्ञानी पुरुप आत्म स्वरूप के अनुभव में
अत्यन्त तन्मय हो जाता है तब उसका ध्यान जगत के जीवों
की तरफ विल्कुल भी नहीं रहता, इस लिये वह जगत को
काष्ठ- पत्थर आदि की तरह निश्चेष्ट-क्रियाशून्य ही समझता
है। अर्थात् श्रात्म स्वरूपमें तन्मय हो जाने पर जगत विषयक
करुणा भाव भी उसके हृदय से निकल जाता है। उस समय
वह यानी महात्मा राग-द्वेष रहित बीतराग
-द्वेष रहित बीतराग दशाको प्राप्त
हो जाता है।
।
समाधि-शतक । १०३ शरीर व प्रात्मा की भेद-भावना के बिना मुक्ति नहीं होती। शृण्वन्नप्यन्यतःकाम,बदन्नपि कलेवरात् । नात्मानं भावयद्भिन्न,यावत्तावन्न मोक्षमा ८१ अन्वयार्थ-( कलेवराट् भिन्नं आत्मानं, अन्यतः शृश्यम् अपि,बदन अपि,यावत् भिन्नं न भावयेत् तावत् मोक्षमा न) "शरीर से आत्मा भिन्न है, इस बातको उपाध्याय श्रादिक गुरुत्रों से सुनकर भी तथा इली वातको दूसरों से बार-बार कहते रहने पर भी जब तक भेद शानकी हद-भावना नहीं की जातो तब तक मुक्ति नहीं हो सकती। भावार्थ-श्रात्मा और शरीर के भेद की कथा को तोते की तरह कहने सुनने मात्र से विशेष फल की प्राप्ति नहीं हो सकती, किन्तु मुझौशलमुनि की तरह इस प्रकार की भेद- भावना होनी चाहियें जिससे कि व्याघ्रादि फर जीवों के द्वारा शरीर के.भक्षण किये जानेपर भी आत्मा में श्राकुलतान होवे । अथवा पांडवों को तरह शरीर के जलते रहने पर भी राग उत्पन्न न होवे । इस प्रकार की दृढ़ भेद-भावना से ही वास्तव में मोक्ष की प्राप्ति होती है। आत्मा को शरीर से भिन्न मानना कब सार्थक होता है ? तथैव भावय देहाड्यावृत्यात्मानमात्मनि । यथानपुनगत्मानं,देहे स्वप्नेऽपि योजयेत् ।।८२॥
१०४ शान्ति-सोपान । . अन्वयार्थ-(देहात व्यावृत्य नात्मानं श्रात्मनि तथैव भावयेत् यथा पुनः स्वप्नेऽपि देहे प्रात्मानं न योजयेन् ) शरीर से भिन्न मानकर श्रात्मा की आत्मा में इस प्रकार रढ़ भावना करनी चाहिये जिससे कि स्वप्न में भी शरीर में, श्रात्मा का प्रतिमास न होने पाये। भावार्थ-किसी वस्तु का संस्कार हदय से पूर्ण निकला. हुना तंभी समझना चाहिये जब कि स्वप्न में भी उस संस्कार फा असर हृदय पर न होने पावे। इसी बातको लेकर इस श्लोक में बनाया गया है कि वारतव में प्रात्मा को शरीर से भिन्न मानना तभी सार्थक हो सकता है जब कि स्वप्न में भी शरीर और नात्मा के एकपनेका शान न होने पाये। मोक्ष प्राप्तिमें पाप और पुण्य दोनों प्रतिबंधक जानने चाहिये । अपुण्यमवतः पुण्ये,बतमक्षस्तयो व्ययः। अबतानीव मोक्षार्थी, बतान्यपि ततस्त्यजेत्।८३। अन्श्यार्थ (अग्रतैः अपुण्यं,प्रतैः पुण्यं, तयोः व्ययः मोक्षः, ततः मोक्षार्थी अव्रतानि व प्रतानि अपि त्यजेत् ) हिंसादिक श्राव्रतों से पाप होता है,अहिंसा आदिक ब्रतो से पुरय होता है और पुण्य व पाप दोनों के नाश से मोक्ष होता है। इस लिये मोधा के इच्छुक.पुरुष को आमतौ, की तरह व्रतों को भी छोड़ना चाहिये।
समाधि-गका
१०५
भावार्थ-मोडमाप्ति के लिये जैसे ईसादिक पर कार्य
प्रतिबंधक है उसी तरह हिंसादिक प्रतवा.दया मार प्रादिक
पुरय कार्य भी प्रतिबंधक है। इस लिये मोह के इन्दुक पुरुषों
को लोहे सोने की वेडी के समान पाप पुण्य दोनों की
छोड़ कर केवल अपने शुद्धान्मा के
अनुभय में तन्मय होना
चाहिये। यहां इतनी बात और जानने की है कि जब तक
शुद्धात्मा में तन्मय होने की योग्यता न होवे तय तक पुण्य
कार्यों को कदापि नहीं छोड़ना चाहिये। क्योंकि यदि एयो-
प्रयोग में स्थिरए विनाही मोपयोग को छोड़ दोगे तोहन
दोनों उपयोगों केन रहने से चित्तवृछिपापकार्यों की तरफ
झुक जायगी, जिससे प्रात्माको और भी अधिक दुःख सहने
पड़ेंगे। इसलिये दोपयोग के अभाव में महिंसादिक की
भावना का शुभोपयोग को ही परंपरा मुक्तिका कारल समम.
कर इस्तावलम्बन समझना चाहिये।
पाप-पुण्य के त्याग करने का क्रम ।
अवतानि परित्यज्यबतेषु परिनिष्ठितः।
स्वजेतान्यपि संभाष्य,परमं पदमागनः ८४]
अन्वयार्थ-( अग्रतानि परित्यज्य, प्रतेषु परिनिष्ठितः
प्रारमनः परमं पदं सम्प्राप्य तानि अपि त्यजेत् ) हिंसादिक
मतों को छोड़कर अहिंसादिक तो में स्थिर होना चाहिये
शान्ति-सोपान। अर्थात् उनको पालन करना चाहिये । पश्चात् राग-द्वेष रहित लाक्षात् वीतराग पद की प्राप्ति हो जाने पर प्रतों को भी छोड़ना चाहिये । अर्थात् वीतराग दशा प्राप्त होने से पहले अहिंसादिक घेतों को नहीं छोड़ना चाहिये | En दुःख का मूल कारण व मोक्ष का वाधक कौन है? यदन्त ल्पसमपृक्तमुत्प्रेक्षालालमात्मनः। मूलं दुःखस्य तन्नाशे, शिष्टमिष्टं परंपदम् ॥८॥ अन्वयार्थ-( यत् अन्तर्जल्पसम्पर्क उत्प्रेक्षाजालं प्रा. स्मनः दुःखस्य मूलं,तमाशे इष्ट परं पदं शिष्ट') अंतरंग वचन व्यापार करके सहित जो अनेक प्रकार का कल्पना जालो वही वास्तव में श्रात्मा के लिये दुःख का मूल है इस संकल्प विकल्प कप कल्पना जाल के नाश होने पर ही वास्तव में परम पद की प्राप्ति हो सकती है। भावार्थ:-परमानन्द मय चैतन्य चमत्कार स्वरूप निज श्राम द्रव्य को न पहिचान कर जो यह जीव व्यर्थ हो अपने श्रात्मा को सुखी व दुखी, राजा-रंक, सबल-निर्बल मानता रहता है तथा इन्हीं बातो को लेकर जो और भी अनेक प्रकार के संकल्प-विकल्प करता है यह सब प्रपंच ही इस जीव के संसारमें भटकनेका मूल कारण है । और इस प्रपंचको छोड़ने से ही इसको मुक्ति प्राप्त हो सकता है।
समाधिगातक. १०. । कल्पना जाल के नाश करने का क्रम । अवती बतमादाय, ती ज्ञान परायणः । पगरमज्ञानसम्पन्नः, स्वयमेव परों मवेत ॥८॥ . अन्वयार्थ-(अवती, प्रतं प्रादाय, 'प्रती धानपरायणः, परात्मभानसम्पन्नः स्वयं एव परः भवेत् ) अन्नती अवस्था में उत्पन्न होने वाली कल्पनाओं को तो व्रत प्रहण करके नाश कर और व्रती अवस्था में होने वाली कल्पनाओं को जान भावना में तन्मय होकर नाश करे, पश्चात् अहंत अवस्था में सर्वक पद प्राप्त करके क्रम से मुक्ति मंदिर में अनन्त काल तक जा निवास करे। भावार्थ-गृहस्थ अवस्था में स्त्री-पुत्र, धन-धान्याधिक के प्रपंच में पड़े रहने से जो अनेक प्रकारके इशानिष्ट संकरा- विकल्प उठते रहते हैं । साधु पद ग्रहण करके पहले तीन गृहस्थ सम्बन्धी विकल्पों का त्याग करना चाहिये, पश्चात् साधु अवस्था में भी पोछी-कमण्डलु, शिष्य-प्रशिष्य आदि के निमित्त से जो विकल्प उठते हैं उनको निरन्तर धानाभ्यास घा श्रात्मभावना में लीन होकर छोड़ना चाहिये। इसी प्रकार कम से शुक्ल ध्यान द्वारा अहंन पद प्राप्त कर, सिद्ध पद प्राप्त का दादिये HAI शान्ति-सोपाना साधुपेश पार करने मात्रसे मुक्ति नहीं हो सकती। लिंग देहाश्रितं दृष्टं,देह एवात्मनो भवः । न मुच्यन्ते मवात्तस्मात्ते ये लिंगकृताग्रहाः।८७) अन्वयार्थ (लिंगं देवाश्रिता,देह पर भारमनः मश, तस्मात् ये लिंग कृतामहाः तेभवात् न मुध्यन्ते ) जरा पारख करना अथवा नग्न रहना आदिक जो भेष हैं वे सब शरीर के प्राधित हैं और शरीर के निमित्त से ही प्रारमा संसार कहलाता है। इसलिये केवल भेष मात्र से ही मुक्ति प्राप्त करले का आग्रह करने वाले पुरुष संसार से मुक नहीं हो सकते। भावार्थबहुत से अज्ञानी साधु दुराग्रह पर सम्मान, ध्यान प्रादि के विना केवल वेश मात्र को ही मुक्ति का कारण मान बैठते हैं, ऐसे पुरुषों को समझाने के लिये भाचार्य महा- राज कहते हैं, कि केवल वेश मात्र से मोक्ष प्राप्ति का पात्रा करना मूर्खता है, साधु वेश धारण करके उस पद के योग्य झान-ध्यान आदि के करने से ही चारतव में मातम हित हो सकता है। यहां पर एक बात यह और जानने की है कि जिस प्रकार बहुत से अहानी साधुओं को घेश मात्र का पद होता ऐसे ही बहुत से दुर्विदग्ध पुरुषों को शान मात्र का पक्ष भी होता है। अर्थात् असे कोई २ पुरुष शान के पिमा साधु. धेश मात्र से मुक्ति मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास करते है बैंसे ही बहुत से पुरुष साधु वेश के विना हान मात्र से ही ।
समाधि-धमका
"
मोक्ष प्राप्ति का स्वप्न देशा करते हैं, यह भी ऐसे पुरुषों का
केवल भ्रम मात्र है, जिस प्रकार सम्मान, मोक्ष प्राति में
साधक है उसी प्रकार घ्य चारित्र भी साधक है, केवल
एकान्त मानने का ग्रन्थ कार ने निषेध किया है। इसी माय
का एक यह काव्य श्री अमृत चन्द्र लामा ने समयसार के
कलशों में लिखा है-
मानाः कर्म नयासम्बन परा,ज्ञानं न जानन्ति य-1
मग्ना माननयैषिणोऽपि अदति, सच्छन्दमन्दोघमाः ॥
विश्वस्योपरि ते तरन्ति सततं, ज्ञानं भरन्तः स्वयं ।
ये फुयन्ति न कर्म जातु न वर्श यान्ति प्रमावस्य च ॥
भर्यात्--जो पुरुष छान. सराप पारमा को न जानकर
केवल याह्य क्रियाकांड को ही मुकि का कारण जान उसमें
हो तन्मय रहते हैं वे भी संसार में इधते हैं और जो शुद्ध
आत्म सरूप को प्राप्ति हुए बिना ही मिथ्या हान के कुतको
में पड़कर व्यवहार चारित को सर्वथा छोड़ देते हैं ये भी
संसार में ही दयते हैं। किन्तु जो पुरुष व मारम सम्प
को प्राप्ति हो जाने पर उसमें तन्मय होते हैं अर्थात् जिनकी
निधय सम्यग्दर्शन, सम्यगशान और सम्यक चारित्रमय एक
अमेदरूप परिणति हो जाती है वे संसारसे पार होते हैं। ऐसी
अवस्था होने पर व्यवहार चारित्र का छूटनो कार्यकारी
है और जब तक यह परम शांत दशा प्राप्त न हो तब तक
प्रमाद रहित. होकर परहार रत्नमय का धारण करमा प्रत्यक्ष
।
।
आवश्यक है ||
१५०
शान्ति-सोपान
उत्तम जाति में उत्पन्न होने मात्र से मुक्ति नहीं हो सकती।
जाति देहाश्रिता दृष्टा, देह एवाऽऽत्मना मवः।.
न मुच्यन्तं भवात्तस्मात्ते ये जातिकताग्रहा।८८
अन्वयार्थ (जाति-देहाश्रता इष्टा, देह एव मात्मनः
भवः, तस्मात्ये जाति कृता प्रहाः, ते भवान् न मुच्यन्ते)
प्राह्मण आदि जातियां शरीर के आश्रित है और शरीर हो
आत्मा के लिये संसार है इसलिये जिनको जातीय पक्ष का
अनुचित दुराग्रह होता है वे संसार से मुक्त नहीं हो सकते।
यहां पर भी यह वात विशेष जानने की है कि यद्यपि नाममा
क्षत्रिय, वैश्य इन उत्तम जातियों में उत्पन्न हुए पुरुषों को ही
मुक्ति प्राप्त हो सकती है अन्य को नहीं हो सकती, तथापि
मुक्ति प्राप्ति के शान-ध्यानादि साधन किये बिना ही केवल
उत्तम जाति में उत्पन्न होने भाव से मुक्ति मानना भ्रम
यहां भी आचार्य महाराज ने "वर्णनां ब्राह्मणो गुरुः" "काशी
मरणान्मुक्तिः" इस प्रकार मिथ्या एकान्त छुड़ाने के लिये यह
श्लोक लिखा है ||
--
मिथ्याशास्त्रोंका दुराग्रह करनेसे भी परमपदकी प्राप्ति नहीं होती।
जातिलिंगबिकल्पेन, येषां च समयाग्रहः ।
तेऽपि न प्राप्नुवन्त्येव, परमं पदमात्मनः ॥८॥
समाधि-शृंतक । अन्धयार्थ-(येषां जाति लिंग विकल्पेन समयाग्रहः ने ऽपि श्रात्मनः परमं पदं न प्राप्नुवन्त्येव ) जिन पुरुषों को पूर्व मैं कहे हुए जाति और लिंग के विषय में शास्त्र प्रतिपादित होने का श्रांग्रह है अर्थात् घामणत्वं श्रादि जाति में उत्पन्न होने मात्र से अथवा किसी एक वेश मांत्र के धारण करने से ही मुक्ति हो जाती है इस प्रकार के कथन वाले शास्त्रों को प्रमाय मानकर जो पुरुष अनेक प्रकार के दुराग्रह करते रहते है वे भी श्रात्मा को शुद्ध अवस्था को नहीं प्राप्त हो सकते। विना मोह मंद हुए बाह्य चारित्र कार्यकारी नहीं। यत्यागीय निवर्तन्ते, मागेभ्यो यदवाप्तय । प्रीनि तत्रैव कुर्वन्ति, द्वेषमन्यत्र मोहिनः।९।। अन्वयार्थ-यत्यागाय यदवाप्तये भोगेभ्यः निवर्तन्ते, मोहिनः तत्रैव प्रीति अन्यत्र पं कुर्वन्ति), शरीरादिक पर- पदार्थों से ममत्व दूर करने के लिये तथा योतराग अरस्या की प्राप्ति के लिये बहुत से पुरुष विषय-भोगों को छोड़ कर साधु हो जाने पर भी पश्चात् मोह के उदय से शरीरादिक में प्रीति व वीतरागता के साधनों से द्वप करने लगते हैं। भावार्थ-अंतरंग राग-द्धप-मोह के शांत हुए विना यदि कोई पुरुप किसी उत्तेजना आदि के कारण विषयमांगों को छोड़ कर मुनि यूत भी धारण कर लेता है तो शोध दी फिर १११ शान्ति-सोपान। पतित हो जाता है। ऊपर से मुनि सरीया बेश रखकर भी यह शरीर में अथवा भोजनादिक में प्रोति रखने लगता है और जिस चौतसंग दशा को प्राप्ति के उद्देश से उसने मुनि प्रत लिये थे उसमे या उसके साधन भूत लान, ध्यान पादि से पराङ्मुख रहने लगता है इस प्रकार मोह के उदय से फोधादि अंतरंग परिग्रहों को न छोड़ सकने के कारण वह 'दुवी ही रहता है, इस लिये प्रारम हित के इच्छुक पुरुषों को पहले मोहमंद करने के लिये प्रयत्न करना चाहिये और जितना २ मोह मंद होता जाय, उतना ३ व्यवहार बारित पढ़ाते जाना चाहिये। शरीर में मात्मा के नम होने का संत। अनन्तरज्ञः सम्यते, हट पंगायथाऽन्ध के। संयोगाद् दुष्टमंगेऽपि, संधतेतहदात्मनः ॥९॥ अन्वयार्थ-(प्रान्तमः संयोगात् यया पंगोष्टि भाषा के संधत्ते, तद्वत् प्रात्मनः दृष्टिं अंगे अपि संधत्ते ) लंगड़े और अंधे के भेद को न जानने वाला पुरुप जैसे तंगड़े की पशि को अंधे में आरोपित करता है पैसे ही आत्मा और शरीर के भेद को न जानने वाला पुरुष प्रात्मा की रष्टि को शरीर में आरोपित करता है। । भावार्थ-जैरे अंये के कंचे पर लंगड़ा चढ़ा हुआ जा रहा हो अर्थात् मन्त्रे को गंमड़ा रास्ता बताता जा रहा हो
समाधि-शतक।
और आधा अपने पैरों से चलता जा रहा हो, ऐसी दशा में
कोई पुरुप अपने नेत्रों की मंद ज्योति से यदि लंगड़े को न
देखकर यह समझे कि यह चलने वाला पुरुपही अपनी आँस्यों
से देखकर जा रहा है तो यह उस मंद ज्योतिवाले का जानना
जिस प्रकार ठीक नहीं है उसी प्रकार आत्मा व शरीर का
संयोग होने से जो पुरुष शरीर को ही श्रात्मा समझता है
उनका भी यह शान ठीक नहीं है।
अंतरात्मा को शरीर में श्रारमा का भ्रम नहीं होता।
दृष्टभेदो यथा दृष्टि, पङ्गोरन्धेन योजयेत् !
तथा न योजयेद्देहे,दृष्टात्मा दृष्टिमात्मनः९२
अन्वयार्थ-(एभेदः यथा पंगो दृष्टिं अन्धे न योजयेत्
तथा दृष्टात्मा आत्मनः दृष्टि देहे न योजयेत् ) लगड़े व अन्धे
के भेद को जानने वाला जैसे लंगड़े को अन्धा नहीं समझता
है उसी प्रकार आत्मा व शरीर का भेद जानने वाला पुरप
आत्मा को शरीर नहीं समझता है । अर्थात् जिस पुरुष को
अन्धे व लंगड़े के भेद की तरह शरीर व आत्मा का भेद
मालूम पड़ जाता है वह शरीर को आत्मा न समझ कर
शान, दर्शन, सुख, वीर्य श्रादि गुणों के पुंज को आत्मा
समझता है।
-- शान्ति-सोपान। कौन पुरुप किस अवस्था को भ्रम रूप सममता है मुप्तोन्मत्ताद्यवस्थैव, विभूमोडनात्मदर्शिनाम् । बिममोऽक्षीणदोषस्य सर्वावस्थात्मदार्शनः।९३॥ अन्वयार्थ-(अनात्मदर्शिनांमुप्तोन्मत्ताधवस्थाएव विभ्रमः आत्मदर्शिनः अक्षीणदोषस्य सर्वावस्था विभ्रमः । अथवा-आत्म- दर्शिनां सुप्तोन्मत्ताद्यवस्था एव-"अपिः,विनमः न,सर्वावस्था- मदर्शिनः क्षीण दोषस्य विभ्रमः आत्मस्वरूप को न जानने वाले वहिरात्मा पुरुषों को केवल सुप्त व उन्मत्त अवस्था ही भ्रमरूप मालूम देती है किन्तु आत्मदी पुरुष को रागी पुरयों की सर्व ही अवस्थायें भ्रम रूप मालूम देती हैं। अथवा इस श्लोक का दूसरा अर्थ यह है कि आत्मदर्शी पुरुषों को सुप्त (निद्रावस्था) व उन्मत्त अवस्था भी भ्रम रूप नहीं होती, और देहादिक की सम्पूर्ण अवस्थाओं को आत्मा की अव. स्थायें जानने वाले रागी पुरुष की मुप्त ध उन्मत्त सर्व ही अवस्था भ्रम रुप होती हैं। भावार्थ-व्यवहारी जन तो स्वप्नके झान को या उन्मत्त. पागल पुरुष के ज्ञान को या उसको क्रियाओं को ही मिथ्या समझते हैं किन्तु आत्म दर्शी पुरुष प्रपंच में फंसे हुए बहिरा- स्मा पुरुषों की समस्त क्रियाओं को ही भ्रम रूप समझते हैं क्यों कि व्यवहारी जन चाहे शुभ कार्य करें चाहे अशुभ कार्य करें कोई भी कार्य उनका राग-द्वेष के बिना नहीं होता, समाधि-शतक। और जिन कार्यों में राग-द्वप लगा हुआ है वे संय कार्य परमार्थदृष्टि से भ्रम रूप है श्रारम स्वभाव नहीं है, इसी से प्रात्मदर्शी पुरुप व्यवहारी जीवों के समस्त कार्यों को भ्रम रूप समझते हैं। दूसरा अर्थ संस्कृत टीका में इस श्लोक का यह भी दिया है कि आत्मदर्शी पुरुषों की सुप्त व उन्मत्ता- दि अवस्था भ्रम रूप नहीं होती।क्योंकि जो पुरुप आत्मरसमें भीगे हुए है अथवा यो कहिये कि जिनको परमानन्द मय पात्मिक सुधारस के पान करने का अभ्यास पड़गया है। उनको जब इन्द्रियों की शिथिलता से निद्रा आ जाती है अथवा खान-पान की प्रतिकूलता व रोग आदि से कदाचित् मुर्छा भी श्राजाती है तो भी उनकी श्रात्मानुभव की वासना नहीं छूटती । इसलिये ऐसे आत्मदर्शी पुरुषों की सुप्त व उन्मत्त अवस्थाभी नमरूप नहीं होती,यदि वे मुप्त व उन्मत्त अवस्थायें भ्रम रूप होती हैं तो शरीरादिक वाद्य पदार्थों की समस्त अवस्थाओंको श्रात्मरूप समझने वाले बहिरान्मा पुरुषों की ही होती हैं। कर्म-बन्ध किससे छूटता है और किससे नहीं छूटता ? विदिताऽशेष शास्त्रोपि, न जायदपि मुच्यते । देहात्मदृष्टि, ज्ञातात्मा सुप्तोन्मत्तोऽपिमुच्यते ।९४॥ अम्बयार्थ-(देहान्मदृणिः विदिताशेषशास्त्रः अपि, जाग्रह , शान्ति-सोपान । अपि न मुच्यते, शातात्मा सुतोन्मत्तः अपि मुच्यते) जिस पुरुष की शरीरादिक बाहा पदार्थों में आत्मदृष्टि है वह संपूर्ण शास्त्रों को जानता हुआ तथा जागता हुश्रा भी कर्म-बन्ध से नहीं छूटता और जो पुरुष आत्मज्ञानी है उसके सोते हुए भी तथा मूञ्छित अवस्था में भी कर्म निर्जरा होती रहती है। भावार्थ-शरीर व आत्मा के भेद ज्ञान बिना कोरा तोते को तरह रट कर प्राप्त किया शास्त्र ज्ञान श्रात्म हित का साधक नहीं है और आत्मज्ञान होने पर सुप्त व मूञ्छित अव- स्था भी आत्मा की हानि करने में समर्थ नहीं है। मन किस वस्तु में लीन होता है ? यत्रैऽऽवाहितधीः पुंसः, श्रद्धा तत्रैव जायते । यत्रैव जायते श्रद्धा, चित्तं तत्रैव लीयते ।९५॥ अन्वयार्थ-(पुंसः यत्र एव ाहितधीः तत्र एव श्रद्धा जोयते, यत्र एव श्रद्धा जायते, तत्र एव चित्त लीयते) पुरुष की जिस पदार्थ में बुद्धि लग जाती है उसी में उसको श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है और जिस पदार्थ में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है उसी में उसका मन रम जाता है। भावार्थ-जिस पुरुषकोजोबस्तु प्रिय मालूम देतीहै उसी वस्तु को ग्रहण करने की उस पुरुष की इच्छा होती है और जिसके ग्रहए करने की इच्छा होती है उसी घस्तु उसका मन हर समय लीन होता है । इस नियम के अनुसार जिस में
समाधि-शनक।
पुरुष को यात्म अनुभव करना अच्छा लगता है उसको श्रान्मा-
नुभव करते रहने की ही निरंतर इच्छा रहती है और इसी
कारण उसका मन अात्मानुभव में ऐसा तन्मय रहता है कि
स्वप्न में भी श्रात्मानुभव से अलग होना नहीं चाहता। इसके
विरुद्ध जिस पुरुष का विषयों से प्रीति है उसका मन निरंतर
विषयों में ही फंसा रहता है और इसी कारण यदि उसको
शास्त्र ज्ञान भी हो जाता है तो वह कार्यकारी नहीं होता है।
मन किस वस्तु से उदास नहीं होता ?
यत्रैवाऽहितधीः पुंमः, श्रद्धा तस्मान्निवत्तते ।
यस्मान्निवर्तते श्रद्धा, कुतश्चित्तस्य तल्लयः १९६॥
अन्वयार्थ-(पुंसः यत्र एव अहितधीः तस्मात्, श्रद्धा
निवर्तते, यस्मात् श्रद्धा निवर्तते चित्तस्य तल्लयः कुतः )
पुरुप की जिस वस्तु में अनुपकारफ वुद्धि होती है अर्थात्
जिस वस्तु को वह हितकारी नहीं समझता उस यन्तु
उसको रुचि नहीं होती, और जिस वस्तु में रुचि ही नहीं
है उस वस्तु में मन कैसे लग सकता है ? अर्थात्-जैसे किसी
पुरुप को यदि विषय-कपायों से बचना हो, तो पहले उसे
विषय-फपायों को दुःखदाई समझना चाहिये, क्योंकि जय
उसकी बुद्धि में विषय-कपाय दुःखदाई मालूम देने लगेगे तय
स्वयं ही उसकी रुचि उनसे हट जायगी, और रवि हटने से
मन विषय कपायों के सेवन करने से उदास हो जायगा।
। ११८ शान्ति-सोपान । ध्येय को ध्यानासे भिन्न मानकर भी ध्यान करना उत्तम ही है। भिन्नात्मानमुपास्यात्मा, परोभवति तादृशः । वत्तिदीपं यथोपास्य, भिन्ना मवाते तादृशी।९७ । अन्वयार्थ-(आत्मा भिन्नात्मानं उपास्य तादृशःपरम्भवति, यथा मिन्ना वर्तिः दीपं उपास्य ताशी भवति ) यह जीव अपने से-भिन्न श्रहंत-सिद्ध स्वरूप परमात्मा की उपासना करके उनही सरीखा अहत सिद्ध रूप परमात्मा हो जाता है जैसे कि बत्ती,दीपक से भिन्न होकर भी दीपक की उपासना से दीपक स्वरूप हो जाती है। भावार्थ-परमात्मा को भिन्न मानकर भी उसका ध्यान- मनन आदि करो तो भी आत्मशुद्धि होती है। यहां ग्रंथकार का आशय यह है कि जबतक "जो परमात्मा है वही में और "जो मैं ,वही परमात्मा है। इस प्रकार ३१ वे श्लोकमें कहे अनुसार ध्याता-ध्यान-ध्येय को एक रूप मानकर ध्यान करने की योग्यतान होवे तवतक ध्याता-ध्येयको भेद-भावनाले ध्यान करनेको भी हेय नही समझना चाहिये,किन्तु भेद भावना से किये हुए ध्यान के द्वारा भी श्रात्मा का बहुत हित होता है, यही समझना चाहिये। ध्याय को ध्याता से अभिन्न मानकर ध्यान करने का, दृष्टान्त पूर्वक समर्थन। उपास्यात्मानमेवात्मा, जायते परमोऽथवा । माथित्वात्मानमात्मैव,जायतेऽग्नि यथा नरू९८ समाधि-शतक। अन्वयार्थ-(अथवा अात्मा श्रात्मानं पर उपास्य परमः जायते,यथा तमः श्रात्मा यात्मानं एव मथिवा अग्निः जायते) अथवा श्रात्मा अपनी ही उपासना करके परमात्मा हो जाना है । जैसे बांसका वृक्ष बांसके साथ ही रगड़ खाने से अग्नि- रूप हो जाता है। भावार्थ-यदि श्रात्मा अपने शुद्ध स्वरूप को ही ध्येय समझ कर उसमें ही तन्मय होकर अमेठरूप से ध्यान करता है। तो परमात्मपद प्राप्त कर लेता है। जैसे कि वांस, वांस के साथ ही रगड़ खाने से अग्निरूप हो जाता है || 6 || भेदाभेद का उपसंहार। इतीदं भावयन्नित्यमवाचां गोचरं पदम् । स्वतएव तदाप्नोति,यतानाऽऽवततेपुनः ॥९९॥ अन्वयार्थ-(इति इदं नित्यं भावयेत्, स्वतःएव नत्प्रयात्रा गोचरं पदं प्राप्नोति यतः पुनः न श्रावते) अध प्राचार्य महाराज भेदाभेद का उपसंहार करते हुए लिखते हैं। कि आत्म स्वरूप को भिन्न रूप अथवा अभिन्नरूप मानकर निरन्तर भावना करनी चाहिये। जिससे कि वचन अगोचर उस परमात्म पदको, प्राप्ति होवे जिससे कि फिर छूटना नहीं होता और संसार के दुःख भोगने नहीं पड़ते।
१२० शान्ति-सोपाना आत्मा भूत वतुष्टय से उत्पन्न नहीं है और संसार अवस्था में सर्वथा शुद्ध नहीं है। अयलसाध्यं निर्वाणं, चित्तत्वं भूतनं यदि । अन्यथा योगतस्तस्मान्न,दुःखं योगिनां क्वचित। अन्वयार्थ (यदि चित्तत्वं भूतज "तर्हि, निर्वाणं प्रयत्न साध्यं, अन्यथा योगतः तस्मात् योगिनां क्वचित् दुःखं न) यदि कदाचित् चैतन्यस्वरूप प्रात्म तत्त्वकी उत्पत्ति चाक के मतानुसार पृथिवी,जल,अग्नि और वायु इन चार भूतों से ही मानली जाय तो फिर मोक्ष प्राप्ति के लिये प्रयत्न करने की कुछ आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि जव भूत चतुष्टयसे उत्पन्न हुश्रा शरीर ही आत्मा मान लिया गया तो शरीर के नाश को ही मोक्ष मानना पड़ेगा और जब कि शरीर का नाश, आयु समाप्त होने पर स्वयं ही हो जाता है तब फिर उसके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ सिद्ध होता है। इसलिये मोक्ष पुरुषार्थ को ध्यान में रखते हुए चार्वाक की इस मन-ग- दन्त कल्पना को ठीक नहीं समझना चाहिये। दूसरे यदि चैतन्य स्वरूप आत्मा को सांख्यमत के अनुसार सर्वथा स्वभावसिद्ध शुद्ध स्वरूप ही मान लिया जाय तो भी मोक्ष प्राप्ति के लिये पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि श्रान्मा, की अशुद्ध रूप संसार अवस्था से शुद्ध रूप - समाधि-शनक। २० मोक्ष अवस्था के प्राप्त करने के लिये ही शान-ध्यान, जप-तप श्रादि पुरुषार्थ या उद्योग की आवश्यकता होती है और यदि आत्मा को अनादि से ही सर्वथा शुद्ध स्वरूप मान लिया जाय तो फिर मोक्ष प्राप्ति के लिये किया हुआ लब परिवार व्यर्थ पड़ जाता है,इसलिये यह साख्यमतका कथन भी युक्ति संगत नहीं जानना चाहिये । हां,यदि जीवन्मुक्त रूप श्ररहंत अवस्था की अपेक्षा आत्मतत्त्व को शुद्धखरूप माना जाय तो यह चान बन सकती है और इस दशा में मोक्ष भी अप्रयत्न लिए वन सकता है। पयोकि सर्वश-रूप अरहन्त केवली का प्रात्मा भी शुद्ध हो जाता है और मोक्ष प्राप्ति के लिये नव वे कोई बुद्धि- पूर्वक प्रयास भी नहीं करते, इसलिये उनकी मुक्ति भी घरहन अवस्था की अपेक्षा विना प्रयत्न के कही जा सकती है, इसके अतिरिक्त अरहंत अवस्था से नीचे के गुणस्थान पाले जो मुनि है उनको ध्यानादिक के करने से ही अरहंत , अवस्या पूर्वक मुक्ति प्राप्त होनी है इसलिये मुक्ति के लिये प्रयत्न करना भी आवश्यक सिद्ध होता है। यहां कदाचित् यह शंका हो सकती है कि प्रयत्नसिद्ध मुक्ति मानने में तो प्रयत्न करते समय कष्ट भोगना पड़ेगा और जिस कार्य के फरने में प्रथम ही कष्ट भोगना पड़े, उसमें पीछे से मुन्ध क्या मिल सकता है ? इस प्रश्न का खुलासा उसर यही है कि मुक्ति प्राप्ति के लिये कठिन से फठिन रुप व धान आदि करते हुए भी मर्पितन सेद नहीं मानते किन्तु अपने लन्चय की सिद्धि होते देग तप-ध्यान ६ - । । १०६ शान्ति-सोपान। आदि करने में.आनंद मानते हैं, क्योंकि वे शरीर को आत्मा से भिन्न समझते हैं इस लिये शरीर के कशा होने से उन फो खेद नहीं होता। शरीर के नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता। स्वप्ने दृष्टेबिनष्टेजपि,न नाशास्ति'यथाऽऽत्मनः तथा जागरहप्टेपि,विपर्यासाविशषतः ॥१०॥ अन्वयार्थ-स्वप्ने पृष्टे विनप्टे अपि यथा आत्मनः नाशः न अस्ति, तथा जागररो अपि, विपर्यासाऽविशेषतः) स्वप्न में शरीर के नाश होने पर भी जैसे आत्मा का नाश नहीं होता, उसी प्रकार जागृत अवस्था में भी शरीर के नाश होने पर आत्माका नाश नहीं होता। यहां यह शंका हो सकती है।कि स्वप्न में तो भ्रम से शरीर के नाश के साथ प्रात्मा का नाश मालूम पड़ता है। इस के उत्सर में जागृत अवस्था में भी शरीर के नाश के साथ आत्मा के नाश को भ्रमरूप ही समझना चाहिये, क्योंकि जैसे झोपड़ी के जल जाने पर भी आकाश नहीं जसता पैसेही शरीर के नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता। हां! स्वप्न अवस्था में शरीर का भी नाश भ्रम रूप है। जागृत अवस्था में मरते समय शरीर के परमाणु विखर कर अवश्य अलग-अलग हो जातेहैं अर्थात् उनको शरीररूपस्कन्ध पर्याय वास्तव में नष्ट हो जाती है। किन्तु आत्मा का अभाव दोनों
समाधि-शतका
प्रयस्थानों में नहीं होता। प्रात्मा की सिद्धि प्रष्ट सहनी,
प्रमेय कमल माण्ड श्रादि ग्रन्थों में विस्तार पूर्वक की है
यहां खंडन-मंडन के विषय पर दृष्टि नहीं दी गई है।
कायक्लेशादि करके श्रात्मा को शरीर से मिन्न जानने का
अभ्यास करना चाहिये।
अदुःखभावितं ज्ञानं, क्षीयते दुःखसन्निधौ ।
तस्माद् यथावलं दुःखैरात्मानं भावयेन्मानिः१०२
अन्वयार्थ-(अदुःखभावितं शानं दुःखसन्निधौ क्षीयते,
तस्मात् यथायलं आत्मानं दुःखै भावयेत् ) सुकुमारता पूर्वक,
दिना फाय-क्लेश आदि तप किये, जो शरीर व भात्मा का
भेदज्ञान होजाताहै वह उपसर्ग,परिपह आदि कष्टोके मानेपर
नष्ट भी हो जाता है। इस लिये मुनि-जनों को यथा शक्ति
कायक्लेश आदि तय करके ही शरीर से भिन्नामात्मखरूप की
भावना.करनी चाहिये।
भावार्थ-जिसको अनेक प्रकारकोभयंकर कष्टों के आने
पर भी शरीर का मोह उत्पन्न न होवे, वही सभा मेवयानी
समझा जा सकता है और यह बात तभी हो सकती है जब
शरीर को खयं अनेक प्रकार के कष्ट देकर निराहल रहने का
अभ्यास किया जाये।
5
१०८,
शान्ति-सोपान ।
आत्मा के चलने पर शरीरसक्यों चलता है ?
प्रयत्नादात्मनो वायुरिच्छाद्वेष प्रवर्तितात् ।
वायो शरीरयन्त्राणि, वर्तन्ते स्वेषु कर्मसु।।१०३॥
अन्वयार्थ-('इच्छाद्वेपप्रतियात् आत्मनः प्रयत्नात्
वायुः"चलति,धायो शरीरयन्त्राणि स्वेषुकर्मसु वर्तन्ते) राग
द्वेष से उत्पन्न हुए आत्मा के प्रयत्न से शरीर के भीतर
वायु चलती है और वायु के चलने से शरीर व इन्द्रियरूपी
यन्त्र अपना २ कार्य करने लगते हैं।
भावार्थ-यहां पर किसी की यह शंका थी कि जव शरीर
व श्रात्मा विल्कुल भिन्न २ पदार्थहैं तव आत्मा की इच्छा के
प्राधीन शरीर का गमन क्यों होता है ? अथवा जिधर को
आत्मा जाता है, जीवित अवस्था में उधर को ही शरीर क्यों
जाताहै ? इसी शंका के उत्तर में यह श्लोक लिखा गया है कि
पहले आत्मा से राग द्वेष के वश प्रयत्न पैदा होता है, वह
प्रयत्न
शरीराके भीतर की वायु को इच्छित स्थान की तरफ
को चलाता है और वायु रेलगाड़ी की तरह शरीर को उधर
हो खैच करले जाती है।
शारीरिक क्रियानो बहिरात्मा ही मुख मानता है।
तान्यात्मनि समारोप्य, साक्षाण्यास्ते सुखं जडः।
त्यक्त्वारोप पुनादान प्राप्नोति परमं पदम्१०४
समावि-शतक। १०६ अन्वयार्थ (जंडा साक्षारिए तानि अात्मनि समारोप्य सुन्वं प्रास्ते,विद्वान् पुनः प्रारोपं त्यक्त्वा परमं पदम् प्राप्नोनि) मूल पुरुष इन्द्रियों सहित उन नौदारिकादि शरीरों को श्रात्मा मानकर सुख मानता है और हानी पुरुष शरीर व इन्दियों में आत्मा का संकल्प त्यागकर परमपद को पाता । अर्थात् मूद बहिरात्मा, शरीर व इंद्रियों की अनेक किया- ओं को आत्मा की ही क्रिया जानकर, सुन मानता है, किन्तु शानी पुरुष ऐसा नहीं मानते। ग्रंथ का उपसंहार। मुक्ता परत्र पखुद्धिमहंधियं च. संसारदुःखजननी जननादिमुक्तः। ज्योतिर्मयं सुखमुपैति परात्मनिष्टस्- तन्मार्गमतदाधिगम्य समाधितन्त्रम् ॥१०॥ अन्वयार्थ (तनमार्ग एतत् समाधितन्नं अभिगम्य परात्मनिष्ठः संसारदुःनजननों परत्र परघुद्धिं अहंधियं च मुक्त्वा जननाद् विमुक्त ज्योतिर्मयं सुखं उपैति ) भावार्थ-प्रन्यकर्ता श्रीपूज्यपाद स्वामी ग्रंथ का उपदान करते हुए कहते हैं कि परमानन्द मय शुद्ध श्रात्मा की हानि के उपायभूत इस शांतिमय प्रात्मस्वरूपके प्रतिपादक समाधि तन्त्र शास्त्रको आनफर परमात्मा की भावना में स्पिन पुरष शान्ति-सोपान संसार के दुःखों को उत्पन्न करने वाली पर पदार्थों में परमात्मबुद्धि व प्रात्मबुद्धि को त्यागकर संसारसे मुक्त होता है और पानानन्दमय सुखनिधि स्वरूप परमात्मपद को प्राप्त होता है ॥ इतिशुभम् ॥
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आहंसा भूतानां, जगति विदितं ब्रह्म परमम् ।
इस पुण्य पृथिवी पर कमो सय में अहिंसा भाव था ।
राजा प्रजा पशु पक्षि तक पर पड़ा प्रेम प्रभाव था |
हिंसक विरोधी जीव भी थे शांत,तज वीभत्सको।
थी गौ पिलाती सिंह को पय, सिंहनी गोवत्स को।
नियमावली
श्री आहिंसाप्रचारिणी सभा, काशी!
दया, क्षमा, परोपकारता आदि
पनुप्योचित गुणों के स्थान में हिंसकता, क्रूरता, नृशंसना
आदि दुर्गुणों की बेहद बाढ़ को देखकर दुर्गुणों को दूर
कर उक्त गुणों के पुनरुत्थान के लिये इस समा फा जन्म
वर्तमान जनता
में
श्रा है।
११) मुख्योद्देश्य-अहिंसा ( दयाधर्म) का सर्वत्र प्रचार
करना तथा हिंसा व उसके कारणों को रोकने का
• उद्योग करना।
२) साधन-(१) आनरेरी प्रचारक मण्डल, (२) साता.
हिक अहिंसा पत्र, (३) उपदेशक विभाग, (४)
हक्ट विभाग, (1) शाखासमायें।
३) नियम सभासदी-प्रत्येक देशवासी और प्रत्यक धमा.
नुयायी महाशय (१)मांस भक्षण, मद्य (शराय ) पान
.
:
व शिकार खेलने का त्याग करने पर: (२) चरबी,
चमड़ा व . हड्डी का व्यापार न करने पर और
( ३.) अहिंसा के पूर्ण अर्थ से सहमत होने पर इस
सभा के सभासद हो सकते हैं।
फीस सभासदी।
( १ )जो महाशय १०००) या अधिक एकमुश्त प्रदान
करेंगे,वे परम सहायक होगे।
(२)जो महाशय १००) एकमुश्त प्रदान करेंगे वे स्थायो
सभासद होंगे। ...
( ३ ) जो महाशयं ५) वार्षिक प्रदान करेंगे । साधारण
सभासद होंगे। उक्त महाशयों के स इस सभा के
समस्त ट्रेक्ट व साप्ताहिक अहिंसा पत्र विना मूल्य
भेजे जायने । प्रत्येक महाशय केवल २) वार्षिक
! देकर भी साधारण सभासद हो सकते हैं, किन्तु उन
को इस सभा के समस्त ट्रेक्ट ही विना मूल्य भेजे
"जांयगे।
१.) विशेष रूप से अहिंसा प्रचार करने वाले महाशय
आनरेरी सभासद वनाए जासकेंगे।
( ५ ) साप्ताहिक अहिंसा पत्र का मूल्य ३॥) रुपया
वार्षिक है।
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१३
मैनेजर,
श्री अहिंसा प्रचारणी संभा.
काशी।
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