Adarsh Library, Jaipur
Samprada
Front matter
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Zh
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मनुवादक
नेमिचन्द जैन
साप्तायादी
ताराशंकर वन्धोपाध्याय
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प्रियवर श्री विमलचन्द्रसिंह को सप्रेम
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राल में एक छ. फुट लम्बा व्यक्ति; शायद इंच-दो इंच अधिक ही होगा। दीपंता के अनुपात में कुछ कृश है, पर दल या जीर्णदेह नहीं। काला रंग- बंगाल का काला रंग, चमकीला काला । बडी-बडी दौविषण्ण-दृष्टि प्रा । विपण्णता के अतिरिक्त भी कुछ और है, जिसे देखकर लगता है, इस व्यक्ति का मन बाहर होने पर बहुत दूर है, भीतर होने पर गम्भीर मन्त- डूबा हुआ है। पगला पादरी । इस नाम से ही यह व्यक्ति इस इलाके मे परिचित है । इसमे यहां के लोगो का दोप नहीं, इसमे बेहतर उसके व्यक्तित्व को शायद प्रबाट नहीं किया जा सकता। पादरी की पोशाक पहनते हैं, पर यह गेरए रंग में रंगी है। इस इलाके के किसी गिरजाघर के साथ भी उनका कोई सम्बन्ध नहीं। किसी धर्म का भी प्रचार नहीं करते। वस रोगियो का इलाज करते फिरते हैं । पगले पादरी बढे अच्छे डॉक्टर हैं मौर साइकिल पर प्रास-पास के गांवों के चक्कर लगाते रहते हैं । सडक के दोनों मोर लोगो ने पूछते हैं, "क्यो, कैसे हो सब लोग ? अच्छे तो हो ?" साय-साय मोठी हमी सारे मुख मे भर पड़ती है। ठीक है।" "अच्छा, अच्छा, बहुत अच्छा । ठीक में रहो !" किमी के घर में कोई बीमारी होते ही वह पगले पादरी की प्रतीक्षा मे खड़ा हो जाता है। कुछ ही देर मे साइकिल को घण्टी मुनायी पड़ेगी, "हाँ वावा, सप्तपदी/७ और साइकिल के ऊपर गेरुए वस्त्र पहने पादरी दीख पड़ेंगे। देखते ही वह हाथ उठाकर पहले से ही कह उठता है-"बाबा साहब !" छ: फुट लम्बे पादरी साहब साइकिल से धरती पर पैर रख देते हैं, उतना नहीं पड़ता । "क्या हाल-चाल है ? क्यों, क्या हुआ ?" "बुखार।" "किसे?" "मेरे बेटे को।" "चलो, देखू !" जाकर देखते हैं, देखकर साइकिल के पीछे बंधे हुए दवाइयों के बक्स में ने दवा देते हैं। ज़रूरत होने पर कहते हैं, "मेरे घर आकर दवा ले जाना।" कागज पर लिख देते हैं। वांकुड़ा जिले के बीचोबीच से जो सडक----यह पुरी की सड़क के नाम से प्रसिद्ध है--विष्णुपुर को छूती हुई मेदिनीपुर होकर समुद्र के किनारे तक चली गयी है, जिसमें इधर-उधर से कई-एक और सड़क भी आ मिली हैं, उसके किनारे ही उनका मिशन अथवा पाश्रम है। यह गाल के जंगलों और गेरुया मिट्टी का प्रदेश है। बीच-बीच में पहाड़ी नदियाँ-बीरावती-गिलावती-दारकेश्वर, वीराई शिलाई-दारका। बीच-बीच में लाल पत्थर, कंकरीला वंजर प्रदेश। इसी तरह की ऊँची- नीची धरती एक विशेष पठार के ढंग से टेढ़ी-मेढ़ी चली गयी है । पर इसी के दोनों तरफ फिर बंगाल की नरम धरती का प्रसार है। वहाँ खुशहाल भरे-पूरे गांव है, अनाज के खेत हैं। उत्तर और मध्य भारत के पहाड़ों और जंगलों की यह पंक्ति उड़ीसा और बिहार के पास से अजीब ढंग से टेढ़ी-मेढ़ी फली की भांति इधर-उधर फैलकर धीरे-धीरे समाप्त हुई है। मेदिनीपुर से लगाकर बांकुड़ा जिले के जंगली क्षेत्र इनिहास-प्रसिद्ध हैं। इन पयरीले-करीले, टेढ़े-मेढ़े गाल के जंगलों से घिरे हुए प्रदेशों में जो गाँव हैं, उनमें आदिवासियों के वंशबर रहते हैं-बाउड़ी, बागदी, मेटे, माल, खैरा, नयाल । सामन्त-युग में इनके वीच उत्तर भारत के क्षमिय. -सिंह, राय इत्यादि-मुखिया बन बैठे थे। ऐगे ही एक-एक परिवार ने अाज घोड़ी-थोड़ी दूर पर एक-एक जाति का - | सप्त पदी रूप ले लिया है। उनकी जिन्दगी में मामला-मुकदमा, दीवानी-फौजदारी लगी ही रहती है। पो काले रंग के पीली प्रोखोंवाले गरीवी मे जर्जर अधनंगे मूक इमानो के बीच गोरे रंग के दीर्घ प्राकृति और उग्र प्रकृति के मनुष्य विचित्र रूप में मिल गये हैं । एक-एक क्षत्रिय के घर का नाम राजमहल है । इन राजमहलों में टूटी हुई दीवारें हैं, मिट्टी के कच्चे प्रोगन पोर पुराने फूम के छप्पर है; उनमे मैली पुरानी धोती पहने, नगे वदन राजा बैठे-बैठे वीही पीते हैं प्रयवा हुक्का गुडगुहाते हैं घोर एक-दूमरे के गाय वर्कग कण्ठ ने बटु नापा में झगड़ा करते हैं । रानियों और राजकुमारियों अपने ही हायो से चूल्हा-चौका करती हैं, कन्धो पर रखकर पानी ले पाती हैं, धान नी कूट लेती है। प्रोगन युहारना, वरतन मलना प्रादि काम प्रमी भी उन्ही काले रंग के लोगों के परीवी स्त्रियां करती हैं । पुरुष जमीन जोतते हैं, पशु चराते हैं, जंगल में लकडी काटते हैं । कहीं-कही एक-माघ 'घर दलपत या नायक-वागदी का भी अभी तक मिल जाता है। दलपति नायक इनकी उपाधि है । ये लोग गायद किमी जमाने में क्षत्रिय सामन्तो के प्रधीन योद्धा मरदार थे। ये लोग जगली इलाकों में वनों में घिरे नामन्नों के दिये हुए गांवों के बीच अपनी जाति और परिवार एव नोकर- चाकरी को लेकर मद्य-माम और मोटे लाल चावल का भात खाकर, दुर्दान्त साहस के माय शिकार में और मन्ध्या को मादल फे माथ नाच- गाने में जीवन बिताते थे। पठान-मुगल-युद्ध के जमाने में इनकी कहानी जनश्रुति नहीं, इतिहाम हो गयी है । मुगल साम्राज्य के अन्तिम दिनो में मराठा-युद्ध के समय इन्होंने बाकायदा लडाई की है । जगलो में छिपार, पंडों के ऊपर छिपकर नीर चलाये है। रात के अंधेरे में पीछे मे माकर छापे मारे हैं: खदेडे जाने पर घर-बार छोड़कर घने जगलो में जा छिपे हैं। ईस्ट इंडिया कम्पनी के काल में कम्पनी की फौज के माय भी इनकी लड़ाई हुई है । सामन्त राजाम्रो दाग अधीनता स्वीकार कर लेने पर भी वे लोग, ये मरदार, युद्ध करने रहे थे। बागदी मरदार गोवर्धन दलपति की लड़ाइयो का हाल तो कम्पनी के कागज-पत्रों में लिखा हुआ है । गोवर्धन दलपति अपने इलाके की सीमा बचा कर ही सन्तुष्ट नहीं था, उमने कम्पनी की मीमा में से भी कुछ इलाके - । दनल कर लिये थे; दिन-दिहाड़े एक के बाद एक गाँव लूटकर, जलाकर, गांव की सड़कों पर आदमियों के सिर काटकर लटका जाया करता था। इन्हीं का एक-ग्राथ घर अाज भी दिखायी दे जाता है। मैदानी इलाकों में ब्राह्मण, कायस्थ, वैद्य, नवशाक आदि जातियों के गांव इनसे कुछ दूर हैं। उन सब गांवों में वागदी, मेटे, माल प्रादि जातियों के लोग हैं, पर उनका रूप इनसे कुछ अलग है । खून की गरमी और गाढ़ेपन में गायद कुछ अन्तर आ गया है । शाल-वनों में फूल खिलने के साथ-साथ अरण्य इन लोगों को प्राज भी हाथ के इशारे से बुलाने लगता है । शाल के साथ-साथ ही ई पलाश और महुअा। पलाश के फूल के रंग से आज भी ये लोग अपने कपड़े रंगते हैं; महुए की शराब बनाते हैं। बीच-बीच में प्रावकारी विभाग की पुलिस छापा मारती है, पर ज्यादातर पकड़ नहीं पाती। दूर-दूर हुए गाल के जंगलों के बीच इनका अड्डा कहाँ है, यह ढूंढ निकालना प्रायः असम्भव है। कभी-कभी पकड़े भी जाते हैं, और फिर जेल भी काटनी पड़ती है, पर वह इन लोगों के लिए बड़ी बात नहीं । बीच-बीच में शिकार के लिए निकलते हैं। इस मामले में संथाल इनसे आगे हैं, पर ये भी कभी-कभी निकल पड़ते हैं। मोर, जंगली मुर्गा, तीतर, सरगोश, हिरन, सुगर, भालू आदि को मारकर बहुत उत्साहित होते हैं। खास तौर पर सुग्रर-भालू का उत्पात होने पर तो ये लोग वेचैन हो उठते हैं कभी-कभी शेर भी पा जाता है। उसके साथ लड़ने-योग्य दुर्दान्त साहस आज गायद नहीं रहा, पर शेर पाने पर स्थानीय बन्दुकवाले शिकारी बाबुओं को खबर देते हैं। थाने की मारफत विष्णुपुर शहर के अधिकारियों के पास भी खवर भिजवाते हैं । लगभग दो सौ वर्ष की लगातार गुलामी और चतुरतापूर्ण शोषण के कारण इनकी जिन्दगी से सब तरह का अभि- मान लगभग चला गया है, किन्तु साहस और उल्लास बहुत अधिक नहीं मिटा है । वस आज शेर अपने पर भाला, बल्लम, धनुप लेकर उन्मत्त प्रानन्द के साथ उससे लड़ने के लिए निकल पड़ना अब नहीं चाहते। जीवन का मूल्य जव बड़ा नहीं है तब इतने भय में क्या सन्देह है ! इन्हीं सब लोगों के बीच रहते हैं वे पगले पादरी।
शाल-बन के किनारे लाल मिट्टी पर एक छोटा-सा गांव है। पास में ही चली गयी है पुरी की पक्को मड़क । उत्तर-पश्चिम को पोर मोरार गांव में वैमनियन चर्च का दो मंजिला भवन है । एकदम छोटा नगण्य- सा गांव है । चाल-यन यहाँ प्राकर कुछ विरल और हल्का-मा हो गया है। गांव के भी बाहर, जहाँ से शाल-वन धना होने लगता है, वही छोटा-सा एक बंगलेनुमा मकान है, जिसमे तीन-एक कमरे हैं। यही है पगने पादरी का मेरा । संगी-साथियों में एक पक्षी, दो गाय और एक दम्पति है-जोमफ और सिन्धु । जोमेफ का परिवार कई पीढियों में ईगाई है । जोसेफ लाल सिंह । मिन्धु माझियों की बेटी है। वह ईमाई नहीं । व्याह भी इन लोगों का नहीं हुआ। दोनों एक-दूसरे के प्रेम में पटकर घर-बार, नाते-रिश्तेदार, समाग सबको छोड़कर चले प्रापे हैं । प्राफर पगले पादरी के पास प्राधय लिया। जोमेफ थोड़ी-सी अग्रेजी जानता है। पगले पादरी ने उने कुछ कम्पाउण्डरी भी मिपा दी है। वह कम्पाउण्डरी करना है और लड़की की पाठशाला में पण्डिताई भी। सिन्धु पक्षियों की देख-भाल करती है । इन बंगले की गृहिणी भी वही है। गृहस्थी रसोई सब उसी के हाथ में है । और एक संथाल लडकी भी यहाँ रहती है । नाम है झुमकी । २५-२६ वर्ष की अपूर्व स्वस्थ लडकी है। ऐसे डील-डौलवाली सरल लडकी हमेगा नजर नहीं पाती। पगले पादरी ने उसे बड़ी मुश्किल मे मौत के मुंह में बचाया है । अमत्रो या तीन बार च्याह हुअा है, पर तीनों ही स्वामी थोडे-थोडे दिन बाद मर गये । उससे सबको सन्देह होने लगा कि झुमकी डाइन है। संथाल-समाज के मुसियो ने इमे मृत्यु-दण्ड दिया । पगले पादरी को पता चलते ही वह साइकिल पर चढकर तूफान की तेजी से वहां पहुंचे भोर बड़ी मुश्किल मे उमे छुडाकर ले आये । इस गांव के संथाल मुखिया को उन्होंने इलाज करके बचाया था। यह और भी बहुतों का इलाज कर चुके हैं। पगले पादरी को वे लोग ठुकरा नहीं सकते। पगले पादरी ने उन्हें यह वचन दिया कि अब मुमकी कभी किमी ममय गांव में नहीं जायेगी, वह उन्हीं के मकान में रहेगी, गायों की सेवा करेगी पोर फूल-पौधे लगायेगी।
. "उने क्रिस्तान तो नहीं कहेंगे, वावा साहब ?" "नहीं।" उसके बाद हंसकर कहा था, "मैं क्या क्रिस्तान हूं मानी ?" बूढ़े संघाल सरदार ने कहा था, "कौन जाने ! लोग कहते हैं तुम ज़रूर किस्तान हो; पर क्रिस्तान कहते हैं नहीं हो। तुम्हारी कोई जात नहीं । तुम्हीं जानो कि तुम क्या हो!" पगले पादरी जोरों से हँस पड़े थे। फिर बोले थे, "लोग कहते हैं, मांझी, मेरी कोई जात नहीं । पर इन्सान तो हूँ। तुम भी इन्सान हो, मैं भी इन्सान; और वह लड़की भी इन्सान।' "तुम इन्सान जरूर हो, वह नहीं। वह जरूर डाइन है।" "मैंने तो इलाज करके तुम्हारा इतना बड़ा भूत का रोग ठीक कर दिया-तुम्हीं बतायो ! मैं उसका भी डाइन रोग ठीक कर दूंगा।" "कर दोगे । कहते हो इसे ले जायोगे, तो ले जायो !" तभी से झमकी भी यहीं रहती है, गायों की सेवा करती है, वेगले में फूल-पौधे लगाती है । कभी-कभी बंगले को सीमा के बाहर सड़क पर भी निकल आती है, पर किसी संथाल स्त्री-पुरुप को देखते ही डरकार छिप जाती है, चाहे जहाँ हो । कहीं वे लोग फिर कहने लगे कि वह उन्हें खा गयी! वह कभी-कभी पगले पादरी के कमरे में भी घुस आती है। पगले पादरी शायद आंखें बन्द किये कपड़े की पाराम-कुरसी पर बैठे हैं । किसी के जल्दी-जल्दी आने की आहट सुनते ही पूछते हैं, "यीन ?" फुसफुसाकर भयभीत मुद्रा में वह किसी अंधेरे कोने अथवा अलमारी के पास से उत्तर देती है, “मैं बाबा साहब, झुमकी !" बाबा साहब मुख उठाकर उसकी ओर ताकते हैं। श्रीकृष्ण अरण्य- वाला की सफ़ेद चमकती हुई आँखों की ओर देखते ही, स्वच्छ जल की सतह पर कांपती हुई जल-पास की भांति उस दृष्टि में उसका भयप्रथाम्पित अन्तर दीख जाता है, पूछते हैं, "डर गयी ! बाहर कोई मांझीया गया है शायद ?" वह अपने बड़े सवल हाथों को एक अन्य दिशा में बढ़ाकर दिखाती हुई कहती है, "अं-हं, मान-परम ।" अर्थात् नहीं-नहीं, उस तरफ, उस तरफ । १२ / सप्तपदी - .
वाहर नहीं पाये हैं, उस तरफ जा रहे हैं । वाया साहय उसे प्रमय देकर बाहर पाते हैं। जानेवालों को युला- कर उनकी ही भाषा में बातचीत करने लगते हैं; वेधडक. बोलते चले जाते है। साधारणत. यह इस जिले में चालू बंगला भाषा में ही बातचीत पारने है । कोई समझ नहीं सकता कि ये यहां के प्रादमी नहीं । उनमें में कोई-कोई पूछता है, "हाँ बाबा साहब, हम लोगो की बोली इस तरह कैसे मीख ली मापने" माहब प्रसन्न होकर उन्मुक्त हसी में ऐने हिलने लगते है जैसे तेज हवा में गाल के वृक्ष । कहते है, "तुम लोगों से मुहम्मत है इसलिए ! उसी मनर में सीस ली! हे!" उसके बाद फिर कहते हैं, "तुम्ही कहो, जिसमे नुम्हें मुहय्यत हो, उसका मुंह देपर तुम उसके जी का मुस-दुख नही समझ लेते ? समझ लेते हो न ? जी की बात मुंह देखकर समझी जा सकती है, तो मुंह को बात कान ने गुनकर सीख ली तो दममें ऐसी कौन-मी बड़ी बात हुई ! ऐं ?" स्वर-उच्चारण मब मानो एकदम एका तार में बंधा हो । प्रश्न करनेवाले के मन में रत्ती-भर भी सन्देह नहीं रहता । उसका मारा हृदय उपलब्धि से प्राप्लावित हो जाता है, अपने-माप ही यह गरदन हिलाकर हामी भरता है-ठीक बात है, ठीक बात है । पर उनकी अग्रेजी मुनकर सभ्य समाज के बहुत लोग धर करते है, प्रादमी मद्रासी या दक्खिन भारत का ही होगा। नाम भी है-रेवरेण्ड कृष्णस्वामी । मुग पर भी सोजने से चिह्न मिल जाते है । छ फुट लम्बा, मोटे हाटवाता, चरयो-रहित व्यक्ति, चमकता हुमा काला रंग, घने काले मोटे-मे बाल; दम्पिन के लोगो-जमी ही बडी-बडी पाखें । दृष्टि प्रयप ही कुछ विचित्र है । वह शायद व्यक्तिगत है । विपन होकर भी प्रसन्न । वर्षा के बाद हले-हल्के बादलो में ढंके हुए शान्त स्निग्ध प्राकाश की भांति बादलों के भौने भावरण को भेद पाली नीलाभा की भांति ही विषण्ण दृष्टि में प्रसन्नता का प्राभास खिल उता । यो अच्छा लगता है इस प्रादमी का हराना । चकाट दादी और गूछों के बीच में जब गुन्दर, दांतों की पंगित प्रसन्न हेंसी से नमक उठनी है, तब पास-पास लोगों के मन के भीतर भी मानो उसी प्रगन्न तागी छटा वितर जाती। दो उन्नीग सोगवालिस का माल । महागुर की विभीपिका : अंधड़ की भांति सारे देश के जार में चली जा रही है । देश, समाज, घर-गृहस्थी राब टूट-फूटकर रहे जा रहे है । असाल और महामारी में लोग ऐसे परे है जैसे तूफान के प्राघात से पशु-पक्षी । भागे पोर हाहाकार मचा हुया है । देशव्यापी स्वतन्नाता- भान्दोलन गुट रागग गो लिए क्षीण हो उठा है । अंग्रेजों और अमरीतियों की फोजी तैयारियों का जाल बंगाल गेम सिरे से लगातार दूसरे गिरे ताजा गया है। पटगोच, फोगो, गोहाटी, जिगवाई, दीमापुर, गोहिमा गे लगातर उरारा, पानागा, प्याराडोचा, वासुदेवपुर, गड़गपुर, मेदिनीपुर तमा फौजी की पिजिन-सी शृंखला बन गयी। एक के साथ गरे का पासी नागों द्वारा सम्बन्ध एक विस्तीर्ण विराट पृथ्वी-व्यापी मनापी जाने जगा लगता है। हर गांव में प्रमाण की मामी ने हाहागार मना है। हर गहर में भूग ने दुगीहियों ने ढांच-जैसे भिगारियों की कारण नासर प्रार्थना मुनायी पती : "गोड़ा माद ! गुट्ठी-भान जटन ! मां जी ! मां जी !" मून पर नापल ने बदले चुरा मिलता है, और उसग मिली नाल, पुल, गंग। ही सबो योग चला है फ़ौजी गाफिले । जीप, टंग, वेपन- गारिकर-पार भी तरह-तरह की अगव-प्रणय सालों की मांदर-गालियां। १४ / सप्तपदी । मिर के ऊपर मंडराते हैं अंग्रेज और अमरीकियों के लडाकू हवाई जहाज । गाडियों में चलती हैं अग्रेजी और अमरीको पलटनें । उन्ही के साथ-साय नीग्रो प्रफीकी । चलते-चलते रास्ते में सेना के बीच इम देश के प्रकाल- पीड़ित भूखे लोगों के ऊपर पाकर गिरते है नारंगी के छिलके, चबाये हुए कोये। चौवकर पुकारते भी जाते हैं, ए:-- हाय के इशारे में भी चुलाते है। ही-ही करके हमते हैं। कोई-कोई रुपया-धेली भी फेंकते हैं । लोगों की भीड उसके ऊपर टूट पड़ती है । मूखी मिट्टी की धूल उड़ने लगती है और उनके सारे शरीर पर छा जाती है। विदेशी मनिकों के कमरे क्लिक-क्लिक शब्द मे मुबर हो उटते हैं। वीच-बीच में अमरीकी सिपाहियों के दल जीपगाडियों में चहे चले जाते दिखायी पड़ते हैं । कोई एक स्वर से गा रहा है, अथवा नो में चूर गोर-गुल कर रहा है । ठीक गैचोवीच शहर से जुटाई हुई एक-दो निम्न- कोटि की यारागनाएं होती हैं-~विलायती गराव के नशे मे विमरते हुए वस्त्र लडसडाती हुई देह । ये भी प्रमत्त उल्लाम से सैनिकों के अट्टहाम के माय हेमकर स्वर मिलाने की चेप्टा करती हैं । राह-बाट में युवती स्त्रियों को देखते ही मैनिक चिन्ताते है-हलो हनी | माई हनी प्याराडोबा में एक हवाई अड्डा बना है । कुछेक मील दूर वासुदेवपुर में भी एक छोटा-सा पड़ा है। मोरार मे वेसलियन चर्च के बंगले के सामने पुरी की सडक और एक स्थानीय सड़क के चौराहे के पास, शाल-वन गे लगे हुए स्थान मे खोदकर पेट्रोल की बडी-बडी टंकियां लगायी गयी हैं । यहाँ मे पाइप-लाइन चली गयी है वासुदेवपुर और प्याराडोबा तक । बुल- डोजरो के द्वारा मिट्टी खोदकर पेड़ काटकर जगत के बीच कुछ ही दिनो के भीतर एक विचित्र फौजी अड्डा बन उठा है, मय-दानव के हाथों को माया- पुरी की भांति । प्याराडोबा स्टेशन मे रेल लाइन प्रायी है । यहाँ बड़ी- बड़ी गाडियां प्राकर ठहरती है । गाडियो में उतरने है मदहोग विदेशी मैनिको के दल । अमरीकी मिपाहियों को जैयो में नोटों की गड्डियां होती हैं । साय मे बहुत-मा डिम्मो मे बन्द खाने का सामान, विस्कुट, रोटी। ॥
रेल लाइन के पास साइंडिंग में दो-चार नहीं, अनगिनत डिब्बों का ढेर लग गया है। भूखे अकाल-पीड़ित अधनंगे इन्सान डिव्ये उठा ले जाते हैं, चाट-चाट- कर खाते हैं । दिन-रात प्रासमान को गुंजाते हुए वममार और लड़ाकू हवाई जहाज सिर के ऊपर चक्कर काटते रहते हैं। कोई उतरता है, कोई ऊपर उडना है। सन्ध्या होते ही बिजली की बत्तियाँ जल उठती हैं । खोल से ढंकी हुई हैं, फिर भी उनकी रोशनी इधर-उधर फैल जाती है। संनिक नाच- घर से बाजे बजते हैं, नात्र होता है । अट्टहास गूंजता रहता है । झींगुर की झंकार में मुखरित शाल-वन के बीच निविड़ अन्धकार जैसे चौंक उठता है। शायद कोई दो सौ वर्ष पहले सामन्त राजाओं के राज में पाइकों की मदालों की रोशनी, मादल की आवाज, तथा हा-रा-रा ध्वनि-ताण्डव के बाद इस बनभूमि का अन्धकार इस प्रकार कभी नहीं चौंका होगा । मराठों के राज के बाद से इधर के जंगली गांव भय से रोशनी बुझाकर अंधेरे कं पन्दे में छिपकर इस प्रकार कभी नहीं सोये । ये सब गाँव पक्की सड़क ने दूर-दूर हैं, जंगल के भीतर की तरफ। वहां के लोग अंधेरे में सुनते रहते हैं-पक्की सड़क पर घर-घर करती हुई मोटरें चल ही रही हैं, चल ही रही हैं। पगले पादरी ने कुछ हटकर अपना बसेरा बना लिया है-पक्की सड़क में और भी दूर जंगल के बीच । वह जहाँ थे उस गांव को ही फौजी अधिकारियों के हुक्म से हटा दिया गया है । रेवरेण्ड कृष्णस्वामी जंगल के भीतर पगडण्डियों पर होकर साइकिल में पके वास्ते पर आ जाते हैं। बुधवार'और शनिवार को वह मोरार के मोड़ ने बहुत दूर, विष्णुपुर की ओर बढ़कर प्रोन्दा चले जाते हैं; वहाँ लपर असाइलम में कुष्ठ रोगियों का इलाज करते हैं । पुरी से लगा- कर इस इलाके में कुष्ठ रोग का बहुत जोर है । कुष्ठजन्य अन्धापन इस क्षेत्र में अभिमाप की भांति है । सप्ताह में दो दिन कृष्णस्वामी बहुत १६ / सप्तपदी सवेरे ही उठकर चले जाते हैं और शाम को लौटते हैं। प्रसाद का प्रारम्भ था। कृष्णस्वामी शाम को लौट रहे थे। उनको विचित्र पोगाक के साय सिर पर एक देसी ताल की पत्तियों का टोप है, मांसी पर धूप का चश्मा। प्रभी वर्षा शुरू नहीं हुई है। प्रसाद के लन्वे दिन में पृथ्वी के अधिक-से-अधिक समीप मूर्य की गरमी मे धरती मानो मुलसी जा रही है । जुते हुए खेतो के ऊपर गरम हवा में धूल उड़ रही है । वावा साहब अपनी मन्यस्त गति से साइकिल चलाये जा रहे हैं। पक्की सड़क छोड़कर किनारे-किनारे ही चल रहे हैं । फौजी मोटरें भयंकर गति से प्राती हैं, पल-भर की अन्यमनस्कता अयवा हिसाव में भूल होते ही सड़क के किनारे ढूंठों में जोर से टकरा जाती हैं। टूटकर गाड़ी उलट जाती है, चलानेवालों और दूसरी सवारियों का प्रात्तनाद सुनायी देता है। कभी-कभी रास्ता छोड़कर सेतों में जा गिरती हैं। दो-चार उलट भी जाती हैं और सवारियां चिटककर गिर पडती हैं। चोट हल्की होने पर उठकर धूल माइते हैं और हा-हा करके हँसते हैं । दो-चार चलाने- वाले भाश्चर्यजनक दृढता के साथ स्टीयरिंग को पकड़े जुते हुए खेतों में कुछ दूर चलाकर धीरे-धीरे चाल कम करके ब्रेक लगा लेते हैं। फिर गाड़ी से उतरकर अपनी भाषा में प्रश्लील गालियां बकने लगते हैं, अकारण हो । पाश्चर्य की बात है, भगवान का नाम नहीं लेते। रेवरेण्ड कृष्णस्वामी सोचते-सोचते चले जा रहे थे। मराठों के आतंक के समय, छिहत्तर के काल में, सामन्त राजाओं के साथ युद्ध के जमाने में, पाइक-विद्रोह के दिनो मे भी क्या देश की ऐसी ही हालत हुई थी? इन्सान क्या ऐमा हो सोखला हो गया था? उसके अन्दर का संचय क्या इतना ही क्षीण और सणजोधी है ? हाय युद्ध ! हाय काइस्ट ! हाय ईश्वर के पुत्र ! फिर भी इस देश के इन अकाल-पीड़ित सर्वस्वहीन शिक्षा वंचित निवासियों का कोई सहारा तो है । भावी युग-मनुष्य के सामने कुछ बचाव प्रवरम है। पर ये विदेशी सैनिक, ये तो उनसे भी अधिक प्रभागे हैं-- मौत के घर से अपीर, असहाय ! ती आतंक इन्हें दिन-रात खदेड़े फिरता है। ये लोग गजे तक शराब पिये सांस रोककर जान हथेली पर - से दौड़े चले जाते हैं और पेड़ से टक्कर खाकर मरते हैं। गाड़ी उलटने ने नीचे दबकर कुचल जाते हैं। दौड़ते-दौड़ते रास्ते में जो कुछ भी भोग के लिए मिलता है उसे ही भोग करते जाते हैं। कहाँ है शिक्षा, कहाँ है सन्यता, कहाँ है जीवन का गौरव ? हाय काइस्ट! मूली पर बिद्ध होकर तुम्हारी मृत्यु हो सत्य है, पुनर्जीवन केवल कल्पना है । मनुष्य का रचा झूठा आश्वासन ! हाय बुद्ध ! हाय चैतन्य ! चैतन्यदेव इसी पय द्वारा पुरी से गया गये थे। खोल-करताल के साथ इन सब प्रदेशों में धरती-पासमान हरि नाम से मुखरित हो उठे थे। विष्णुपुर के वैष्णव देवता भी झूठे हैं । वे भी तो मनुष्यों की रक्षा न मार सके । राजा गोपाल देव की पुकार भी झूटी है, उनके हरि-कीर्तन का भी कोई फल नहीं हुया । अपनी रक्षा की शक्ति न सही, उनकी ही भांति प्रचण्ड वर्वर शक्ति को रोकने की क्षमता मनुष्य की न सही, अपनी पात्मा की रक्षा करने की शक्ति भी उन्हें न मिल सकी। मुमिरिनी की झोली एकदम फटे चिथड़े की झोली है। सामने ही रेल का फाटक है। कृष्णस्वामी ने साइकिल से अपने दोनों पैर धरती पर टिका दिये : छ: फुट लम्बे प्रादमी के लिए इतना ही काफी था। फाटक के पास ही चौकीदार का घर है। कृष्णस्वामी की विचार-शृंखला टूट गयी। वह यथार्थ की दुनिया में लौट आये। यही जीवन है । यह जीवन जब तक है, तब तक अपना काम करते रहना होगा। "वंशी ! वंशी है !" चौकीदार के घर का दरवाजा खुल गया। चौकीदार रामचरन बाहर निकाल पाया । "वावा साहब !" "है ! वंगी कहाँ है ?" वंशी रामचरन का लड़का है। उसे कोढ़ है- पहली ही अवस्था में। कृष्णस्वामी ने ही इधर से आते-जाते एक दिन रास्ते में बालक के चेहरे को देखकर पहचाना था । बहुत समझा-बुझाकर इलाज के लिए राजी १८ / सप्तपदी पिया था। इन गेग के इंजन में बड़ा दर्द होता है। बंगी ज्यादातर भाग निकलता है। कृष्णस्दामी वंगी यो बहलाने के लिए बुध-न-युछ नेकर ही पाते हैं । मिनी दिन पोई गुड़िया, किमी दिन कोई तस्वीर, किसी दिन कोई माने की चीज, किमी दिन और कुछ। पाज भी चंगी भाग गया है । रामचरन ने चारो ओर देवा, पर बेटे का यही पता नहीं। बह ऊँचे स्वर में पुतारने लगा-~-"मो -चन--सीहो। बन-- शी-हो!" कृष्णस्वामी माइकिल चौकीदार के घर की दीवाल ने टिकाकर चबूतरे पर पाकर बड़े हो गये । रामचरन को स्त्री ने कमरे में निकल कर एक नूडा विद्या दिया । कृष्णस्वामी ने मूठे के पर बैठकर अपने चोगे की जेय में एक चौमुरी निकाली। बोले, "इमे बजाकर युलानो ! हं ! वांनुर्ग को प्रावाज सुनते ही पास नहीं होने पर अभी पा जायगा।" परन्तु उससे पहले ही सामने महक के किनारे एक ग्राम के पेड़ के कार मे यंशी धम्म ने कूद पड़ा। "ग्रा रही है ! भा रही है ! वही है वावा, एकदम यही है !" कोतूहल यी तीव्रता में उसका योडा-मा मूजा प्रा मुम मागो तमतमा इटर है। दोनों प्रासं जल-मी रही है। "कौन ? कौन भा रही है जी वंशीवदन ?" हंसकर कृपगम्बानी ने पूछा । "मैं तुम्हारे लिए कमी वांमुग लाया हूँ देगी तो । संगीवदन के लिए बगी!" पर वमी का मन बोमुगे में नहीं पापित दृना। उनकी स्थिर जलनी दुई दृष्टि सामने सक को मोर हो उगी हुई थीद पर मनो मोड़ लेती थी, उसी के मिरे पर । उसने गायद पिता से ही पहा, "वही लडकी ! वही जिसने सिर पर चमकदार रगीन फेटा बांध रखा था। पेट के कार में मैंने देखा है। गाडी प्रांधी की तरह मा रही है, मौर रंगीन फैटा यौधे वह उसमें बैठी है। धूप के मारे मानसमककर कर ही है । है । वोह-बोह-वोह !" दूर मोड के सिर पर जीत की गरज अब सुनारी देने लगी थी। गचमुच कोई जीप मा रही है। सचमुच पीछे से पटती धूप में किनी के सिर पर गहरी लाल टोपी साफ दिखायी देती है। रामचरन वोला, "बहुत देखा बाबा साहब ! पर ऐसी औरत हमने वाप-दादा के जमाने में भी नहीं देखी थी। एकदम मेम साहब है !" कृष्णस्वामी हँसने लगे। धोती, चादर और चट्टी के देश में केवल योती पर जीनेवाले गरीव रामचरन और इस बालक वंशीवदन का मन किसी विचित्र वेदावाली विदेशिनी को देखकर विस्मय से अभिभूत हो गया है। जीप सचमुच ही तूफान की तेजी से आ रही है । औरत हाँ, इन लोगों ने कहा है कि औरत है-लाल टोपी पहने हुए वह स्त्री जैसे कांप रही है, गिरी पड़ रही है, इधर से उधर । जीप में सामने चालक के पास ही बैठी लड़खड़ा रही है। लगता है श्वेतांगिनी है। पास बैठा हुआ बालक वलिप्ठ देह का एक गोरा है । वदन पर सिर्फ बनियाइन है, सिर पर टोपी है, अफ़सर की टोपी। चाल धीमी करके मोड़ लेकर गाड़ी फाटक पार कर गयी। पर कुछ ही दूर जाकर बैक लगने से खड़ी हो गयी। धक्के से स्त्री बाहर गिरते-गिरते बची; सामने डैश-बोर्ड पर गिरते ही किसी तरह एक छड़ को जोर से पकड़ लिया। गाड़ी फिर पीछे हटने लगी। प्राफर रामचरन ने घर के सामने खड़ी हो गयी। गोरा सैनिक - उसकी पतलून के कपड़े का चिकनापन देखते ही कृष्णस्वामी समझ गये कि अमरीकी अफ़सर है। "हे-मन ! वाटर ! वाटर! पानी !" रुंधे हुए कण्ठ से आदेश के स्वर में स्त्री बोली, "पानी लायो ! यू, सुनता नहीं !" कृष्णस्वामी उठकर खड़े हो गये। आँखों से धूप का चश्मा उतार चबूतरे से उतरकर जीप के पास आ खड़े हुए। स्थिर दृष्टि से युवती की भोर ताकते रहे । सचमुच उसका वेशा विचित्र था । पश्चिम के आधुनिक- तम फैशन का लाल रंग का लम्बा पतलून अथवा स्लैक्स, प्राधी बांहों का टेनिस-कालरवाला रेशमी व्लाउज, सिर पर रंगीन चमकदार रेशमी कपड़े के लम्बे टुकड़े का शिरोभूपण पारचर्य रूप से लालसा जागत फरनेवाला मोहक वेश । और वैसा ही निर्लज्ज ! २० / सप्तपदी अमरीकी अफसर ने उनके सामने माकर पतलून की जेय से एक नोट निकालकर सामने रखते हुए कहा, "डोण्ट यू अण्डरस्टैण्ड, मैन ? वाटर, पानी-पानी-" युवती भी करीब-करीय साय-ही-साथ कह उठी, "यू स्वाइन !" अमरीकी अफसर ने इस बार डाँटते हुए कहा, "यू विच, स्टाप, माई मे यू स्टाप !" कृष्णस्वामी ने हंसकर शुद्ध अंग्रेजी में कहा, "प्लीज ! प्लीज डोण्ट एव्यूज हर लाइक दैट, भी इज इल।" "नथिंग । यू डोण्ट नो मैन ! एक बोतल वह कुनिया गट-गर निगल गयो है। नशे में है। पानी दो ! मोच रहा था, रास्ते में कोई तालाव मिलने पर उसे गोता देकर सय नशा छुड़ा दूंगा। तुम लोगो का घर देखकर यही रुक गया। लगता था वेहोश हो जायेगी। नगा, सिर्फ नगा।" कृष्णस्वामी ने कहा, "मैं डाक्टर हूँ। मुझे साफ दीख रहा है कि वह बीमार है । मेरी बात सुनो, तुम उसे उतार लो ! उरी पोरन देस-भाल को जरूरत है। मेरे इस बैग में दवाइयों हैं । एक खुराक दवा दूंगा। मेरा विश्वास करो, मैं मेडिकल कालेज का पासशुदा डाक्टर हूँ ।" इसी बीच युवती गद्दी के ऊपर लुढक गयी। कृष्णस्वामी ने अपनी दोनो लम्बी वाह फैलाकर उसे उठा लिया । बोले, "रामचरन, अपनी पटिया विद्या दो।" कुछ पल स्थिर दृष्टि से मुख की ओर देखते रहे। फिर दृष्टि हटाये बिना ही बोले, "माफिमर, प्लीज़ उसके सिर से वह कपड़े का टुवान्डा मोल दो।" अफसर ने हाथ बढ़ाया और थोडा-सा झटका देकर शिर का कपड़ा खीचकर खोल दिया। प्राश्चर्यजनक घने काले केश विसर गये। कृष्णस्वामी ने बड़े थल से उसे साट पर मुला दिया । बहुत सुथूपा के बाद युवती को होश आया। एक खुराक दवा भी उमे कृष्णम्वागी ने पिलायी थी । होश माने के पहले उसने भडभडाकर बहुत-सा वमन किया, जिससे उसके शरीर का वस्त्र सन गया । घोडा-सा कृष्णस्वामी के हाथ और कपड़ों में भी लगा। दुर्गन्ध से उस जगह को हवा मानो इपित हो ।
उठी। कृष्णस्वामी ने पत्नपूर्वका सब-गुछ धोकर फेंक दिया। अफसर निलिप्त भाव मे बैठा-बैठा देखता रहा और लगातार सिगरेट पीता रहा। बीच-बीच में दो-चार बात भी कही थीं। सभी प्रश्न-सचक थीं। मानो रह-रहार हात् मन में उठ रही हो..--असम्बद्ध । एक बात का दूसरे के नाथ कोई सम्बन्ध नहीं। बेहोश युवती भनेत-सी पड़ी थी। उसके मुख की भोर ताककार अमरीकी अफसर ने कहा, "इजण्ट शी व्यूटिफुल ? फ़ाइन प्राइज एण्ड प्रारलिदा -एजण्ट इट ? हे, व्हट डू यू से !" कृष्णस्वामी ने देख-भाल करते-करते ही कहा, "यरा, शी हेज़ गाट ए बीट फ़स" सनमुन युवती रूपवती है, और रूप में पाश्चर्यजनक मोहिनी है। नागकर सिर के पने काले फेश, अपूर्व सुन्दर प्रांखें और पलकें । पलकों के रोएँ लम्बे हैं जो सुन्दर प्राकृति की आँखों को और भी सुन्दर बना - . थोड़ी देर बाद अफ़सर ने फिर पूछा, "इज इट एनीथिंग वेरी नीरियरा?" पाष्णस्वागी ने कहा, "हो रापाता था। नशे के ऊपर इस गरमी में हीट स्ट्रोक हो सकता था । अभी भी डर है !" फिर कुछ-एक मिनट बाद रावाल हुआ, "तुमने कहा था कि तुम डॉगटर हो ! गवालिफाइड मेडिकल मैन । लगता भी यही है । पर ऐसी पोशाक पयों है तुम्हारी ?" * संन्यासी हूँ। भारतवर्ष के संन्यासियों की तरह-तरह की पोशाक होती हैं। पर यह रंग सबा है।" "पीन यू टैल फॉरचून ?" "सिर्फ डॉक्टर हो ?" "हो, और संन्यासी।" पिर देर बाद अफसर बोला, "यता सकते हो, इस तरह की स्नियां तुम्हारे देश में कितनी होंगी? स्टेंज गलं !" फिर से अपने- - २२/ सप्तपदी । " आप ही कहने लगा, "उससे मरीमेंट पुरी में हुई थी। मान दि मी बीच । स्रेज गर्न ! घण्टे भर में ही हम लोग घनिष्ट हो गये। मत. धन्य है ! कितना हम सकती है ! कमा प्रचण्ड पोप है ! क्या गरार ती है !" निगरेट का एक का मीचवर धुपा छोड़ते हुए यह फिर बोला, "तभी मेरे साय मटक रही है।" फिर वोला,"मीच एम्पोर्ट- पर बहुत ही याइल्ड है।" कृष्णस्वामी ने कहा, "होश में प्रा रही है । तुम्हारे पाम और पोड़ी- सी गराब है। मी नीड्स-" युवती शराब पीने के बाद मुग पोड़ा विकृत कर बोली, "काटर- प्लीज ! वाटर-ठण्डा पानी।" कृष्णस्वामी ने मुंह में पानी डाला । युवती ने फिर मुंह गोला। कृष्णस्वामी ने फिर पानी दिया। उसके बाद प्रांवों के नीचे उंगली रस. कर हंसते हुए बोले, "लट मी लुक ऐट योर पाइज । लुक ऐट माई फ्रेम ।" युवती की भौंह चढ गयी, दृष्टि तीक्ष्णतर हो गयी। अमरीकी प्रफमर ने कहा, "हे-डोण्ट-; यह सब मत करो! हू यू हियर ?" उसके बाद कहने लगा, "मचानक ही चीप पडनी है, मार बंटती है-हिस्टीरिया की तरह ।" किन्तु इसी बीच युवती हडवहाकर उठ बंटी। ती दृष्टि मौर तीदग वण्ठ मे चोपकर बोली, “यू फको-लीव मी-; छोड दो मुझे- पाला पादमी ही का।" अमर चिल्लाकर उठा, "शट अप यू बिच ! गट अप माई मे।" वृष्णस्वामी ने हमकर युवती के माथे पर हाय फैले हुए प्रसन्न स्वर में कहा, "तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं। मैं हॉस्टर हूँ। तुम्हें मेरी बात माननी चाहिए। मौर थोड़ी देर लेटी रहो, टीक हो जामोगी। तुम्हारे सिर में पीडा हो रही है, मैं जानता है । यह लो, गोली मा लो! प्लीज ! प्लीज एण्ड बी स्टिल 1"वंग सोलन-सोलते कविता-पाठ के स्वर में कहते गये, "पेशेन्स यू यंग रोज-लिप्ड मेड-पंगेन्स प्वीज-" प्रफमर हंस पड़ा, "हे डॉक-यू मार ए पोएट-प्रा-दट्न पाइन ।" युवती मसि बन्द किये लेटी हुई थी। उसरे चिवने मस्तक पर कुबेर - ।
रेखाएं जाग उठी। "लो! खा लो !" गोली खाकर युवती उठ बैठी । “ए स्मोक प्लीज़!" हाथ बढ़ा दिया नेल-पालिश लगी हुई उंगलियों के पोरों पर निकोटीन के दाग थे । अफ़सन उत्साहपूर्वक कहने लगा, "नाउ शी इज प्रो के । यह लो ! गैट अप माइ हनी।" उसके बाद कृष्णस्वामी की ओर देखकर वोला, "वह ठीक हो गयी है, डॉक, प्रोके । अब हम लोग चलेंगे। वहुत-बहुत धन्यवाद । यह लो!" और उसने दो दस-दस रुपये के नोट निकालकर रखे । कृष्णस्वामी ने कहा, "बहुत धन्यवाद । पर मुझे माफ करो ! यही तो मेरा धर्म है । क्राइस्ट के नाम पर तुमसे अनुरोध करता हूँ।" । तीन झुमकी ने आकर विस्मय-विस्फारित आँखों से लालसिंह और सिन्धु की और देखते हुए फुसफुसाकर कहा, "सिंह, बाबा साहब को क्या हुआ है ?" लालसिंह प्रातमान की पोर ताकता हुआ किसी दूर गरजते हवाई जहाज को खोज रहा था। झुमको की वात पर उसने मुड़कर देखा, "क्या .." हुमा है ?" "जाने क्या बड़बड़ा रहे हैं, कोई जन्तर-मन्तर पढ़ रहे हैं, मने सुना। डर के मारे भाग पायी। चाय नहीं दे सकी। जानो, तुम दे पायो ! वावा रे !" जन्तर-मन्तर की कोई बात सुनते ही झुमकी भयभीत हो उठती है। गता है शायद उसे ही डाइन समझकर कोई मन्त्र चला रहा है । दिन नेि पर वह जंगल में भाग जाती है । चुपचाप झाड़ियों के भीतर बैठी हती हैं, खरगोश की ही भांति । बहुत-ता समय बीत चुकने पर भय धीरे- रे कम हो जाता है; तव गुनगुनाकर कुछ गाती है, उसके बाद उठ ती है। | सप्तपदी चाय का प्याला हाय में लेकर नालसिंह कृष्णस्वामी के कमरे के दरवाजे पर जा खड़ा हुमा । वह जानता है कि बीच-बीच में बाबा साह्न बाइबिल के सरमन अपने पार ही पढ़ने लगते हैं । वह अपने माय भोर बदन पर कायदे के अनुमार हाय लगाकर 'मामीन' कहता है । सचमुच ही बाबा साहब कमरे में इधर-उधर चकार काट रहे हैं मौर वाइबिल पढ़े जा रहे हैं । वाइबिल नहीं, कृष्णस्वामी कविता-पाट • कर रहे थे। "It is the cause--It is the cause my soul Let me not name it to you, you chaste stars- I'll is the cause. Yet, I'll not shed her blood Nor scar that whiter skin of her's than snow. शेक्सपियर के 'मॉयसो' में पाठ कर रहे हैं कृष्णस्वामी । माज 'रामचरन के मकान ने ही 'प्रॉयनो' याद मा रहा है। उस युवती के साथ • बातचीत में 'प्रॉथलों की कितनी पंक्तियों का प्रयोग किया था! "लेट मौ लुक ऐट योर माइज । लुक ऐट माइ फेस । पीस एण्ड यी 'स्टिल !" ये सभी 'प्रॉयलो' नाटक के मंवाद हैं। "पदोन्स यू यंग रोज़-लिप्ड मेड-~" इमफा भी बहुत-सा हिम्सा वही मे है। ये मब बातें अमरीकी अफसर के समझने की नहीं। भोजन-गराव-नारी-नाचरंग-हथियार-अस्त्र- पत्र- इन्हें छोड़ ऐसी बातें समझते से युद्ध नहीं चलता। ठीक है, कुछ-कुछ 'ऊंचे स्तर के लोग भी हैं। शायद बहुन ने कवि भी कलम छोडकर कमर मे रिवाल्पर तटकाये राइफल कन्धे पर रखे आ गये हैं, पर वने कितने हैं ? कम-से-कम वे लोग इस प्रकार एक स्त्री को सिर पर उठाये नहीं 'घूमते । पर रीना ग्राउन भी न पहचान मको । गन्द कानो मे पहुंचे, पर स्मृत का द्वार नहीं खुला। प्राश्चयं । नही । पाश्चर्य किस बात का? शराब ने उसकी स्मृति को, बुद्धि को, मायद सारे मस्तित्व को, माच्छन्न कर रखा था।
चाय का प्याला रखकर लालसिंह चुपचाप बाहर चला गया । फ़ादर ईश्वर की याद कर रहे हैं। रीना ब्राउन के लिए एक दिन ईश्वर भी तुच्छ हो गया था। यह ठीक है कि तब कालाचांद ईश्वर को नहीं मानता था। कालाचाँद नहीं, कृष्णेन्दु, कृष्ण इन्दु । देहाती लड़का। काला,. छरहरा, लम्बा, बड़ी-बड़ी आँखें, माथे तक भरपूर घने बाल, मुख पर आँखों में ग्राम-सुलभ सरलता । देहात की कर्कशता की थोड़ी-सी मलिनता भी है, किन्तु अाश्चर्यजनक सप्राणता, और बुद्धि भी वैसी ही तीक्ष्ण । देहात के प्रसिद्ध लुहार की बनायी हुई असली इस्पात की दाय के समान है; तेज धार, अनमनीय दृढ़ता, किन्तु शान-पालिश ने घिसी-मजी हुई। नहीं, थोड़ी मैली। कालाचाँद का जन्म पश्चिमी बंगाल के एक विख्यात वैद्य वंश में हुआ था। पर वह ख्याति उस समय अस्तोन्मुखी हो चुकी थी। प्रपिता- मह और उनके भी पूर्व-पुरुप प्रसिद्ध भिषगाचार्य थे। आयुर्वेद का प्रचार कम होने के साथ-साथ पिता का उत्साह भी कम हो गया था। वे आयुर्वेद के बजाय खेती-बाड़ी में और धर्म-कर्म में मन लगाते थे । अपने इकलौते वेटे को डॉक्टरी पढ़ाने की उन्हें बड़ी लालसा थी। गांव के स्कूल में मैट्रिक पास करके कालाचांद इण्टरमीडियेट साइंस पढ़ने के लिए कलकत्ता के सेण्ट जेवियर्स कालेज में पाया, इण्टर पास करके मेडिकल कालेज में प्रवेश करने के लिए। ज़रा-सी बात पर हा-हा करके हंसता है, धम्म-धम्म करके सीढ़ी से उतरता है; लम्बे कालाचांद का सिर कक्षा के अस्सी फ़ीसदी लड़कों से प्राय: : इंच ऊपर दीखता रहता है । शुद्ध देहाती उच्चारण में निस्संकोच वात कहे जाता है । कौतूहल की तो कोई सीमा ही नहीं । दिन-रात ही प्रश्न करता है-क्या ? क्या ? क्यों ? क्यों ? उसके साथ देहाती लहजे का लटका । शहरी लड़के हँसते हैं। पर काला- चांद इस नवकी परवाह नहीं करता। वह भी हँसता है। कभी-कभी गांव में सीखी पुरानी व्यंग्य-कथाएँ सुनाकर बदला लेने की कोशिश करता है ।। २६ / सप्तपदी । पत्ता है, "तुम लोग मुझे माम कहते हो! तो फिर मामा को क्या कहते हो?" अचानक कालाचांद प्रसिद्ध हो गया। उस समय भी मेण्ट जेवियर्स की पुरानी ही इमारत थी। कालेज के दक्खिन की ओर बड़ा भारी खेलने का मैदान था । उस मैदान में टिफिन के समय लडके फुटवाल खेलते ये सभी कलकत्ता के स्कूलों के लड़के होते थे। मुफस्निल के लड़के सडे दसते रहते थे। कम-ने-कम देहात से हाल ही में प्राये हुए पहले वर्ष के सदनां को तो उतरने का साहस ही न होता था । खिलाड़ियों की संख्या बाईस तक सीमित न रहती थी, उसने घढ ही जाती थी। कुछ दिन देखते रहने के बाद गायद डेढ़ महीने पीछे, अगल में, कालाचांद बरामदे से उतरकर मैदान के पाम जाकर खड़ा हो गया-गोल लाइन के पास । बूंदा-चांदी से मैदान में फिसलन हो गयी थी। खिलाड़ी गेंद में ठोर मारने के प्रपल में फिमलकर कीचड़ की महलियों की भांनि गिरते चले जाने थे। देखनेवाले लडके हो-हो करके हंसते थे। एक सिक्सयार्ड मॉट । गोल- कोपर गेंद को ठीक जगह रखकर हट गया। फुलबैक गेंद मे ठोकर मारने के लिए पर उठाते ही फिसलकर दूर जा गिरा। पल-भर में कालाचांद ने जूते उतारे और दौड़कर गेंद में ठोकर लगा दी। पक्के खिलाड़ी का जोरदार शॉट, गेंद ऊंची उटकर मेण्टर लाइन के पार दूसरी तरफ की हाफक लाइन के सामने जाकर गिरी । "कौन है यह लडका? कौन है जी" ढूंढ मच गयी । कालेज-टीम का कप्तान तीसरे वर्ष का माशु दास प्रागे वह प्राया । "क्या नाम है ? कहाँ मेले हो? किम स्थान पर सेलते हो? मैच खेले हो?" "हां, बहुत मैच खेले हैं । 'इत्तं मारे' मंडल मिल चुके हैं । सिउड़ी, वर्धनान, कांचनतला, शान्तिनिकेतन में मैच खेल चुका है। पांच वैस्ट प्लेयसं-मैडल है मेरे पास । लंपट भाज्ट खेलता हूँ। कार्नर विक गे गेंद गोल में पहुंचा दूंगा । पुलवंक भी तेल सकता हूं, लंपट बैंक, सेण्टर भी खेल चुका हूं। गोल कर सकता हूँ। दीजिए न एक कानर किक, दिरा दूं । देते हैं ?" "लाना तो जी गेंद । लाना ज़रा " कार्नर किक से गेंद सचमुच गोल में चली गयी। विचित्र ढंग से गेंद गोल के सामने छः गज सीमा के भीतर पहुँचकर और फिर टेढ़ी होकर एकदम कोने के पास से गोल में घुस जाती थी। यह कालाचांद का पर पहचान चुका था। कालाचांद को लैपट पाउट में खेलने को कहा गया । ऊँचा-लम्बा कालाचांद अपने लम्बे-लम्बे पैरों से गेंद लेकर दौड़ा। वह दौड़ता तीर की भांति था। एकदम उस किनारे की लाइन के पास से गेंद मारी। ठीक गोल के सामने जाकर गिरी। अपना फैर फिसलने से गिरे भी कई एक वार। लोग हँस उठे। पर कालाचांद ने वह सुना ही नहीं, देखा तक नहीं । अचानक एक बार नाराज होकर सेण्टर फार्वर्ड से कह उठा, "एक भी गोल में नहीं घुसा सके ? मुझे खेलने देंगे सेण्टर में ?" कालाचांद ने सेण्टर फार्वर्ड में आते ही गेंद को पकड़कर थोड़ा ऊपर उठाया और फिर एकदम गोल-कीपर के हाथों में ही फेंका । गोल-कीपर ने गेंद को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, कालाचाँद उछलकर गेंद को सिर से मारकर गोलकीपर के ऊपर गिर पड़ा। गिरे दोनों ही, पर गेंद गोल में चली गयी। दूसरी बार गोल-कीपर ने उसे मार दिया । नाक से खून गिरने लगा तर कमीज़ सन गयी। कुछेक मिनट वह थोड़ा अचेत-सा रहा । फिर तुरन्त ही उठ खड़ा हुआ और सिर के बालों को खून तथा कीचड़ से सने हुए हाथों से हटाता हुया मैदान में भीतर पहुंच गया। पर कप्तान दास ने उसका हाथ पकड़कर कहा, "नहीं, श्राप और नहीं । आपस में ही मार-पीट नहीं करते।" कालाचांद अद्भुत लड़का है । वह हंस पड़ा । बोला, "कैसे जाना में मार- 'पीट काँगा ?" हंसफर कप्तान ने कहा, "हम भी तो खेलते हैं।" कालाचांद ने कहा, "यह ठीक है।" कालाचांद उसी दिन कालेज में मशहूर हो गया। पर उसकी प्रसिद्धि का अन्त वहीं तक न था। कुछ दिन, शायद महीने-भर के बाद ही, चंगला भाषा मे अध्यापक कक्षा में घुसते-घुसते अचानक चकित होकर . . २८ / सप्तपदी थम गये । वंगाली अध्यापक साहित्य-रसिक, साहित्यिक थे। कक्षा में कोई ऊँचे स्वर में कविता-पाठ कर रहा है। सद्य ख्याति प्राप्त कालाचांद ने प्रादृत और दुर्दान्त छात्र की भांति दो कक्षाओं के बीच अध्यापक के तख्त पर चढकर कविता-पाठ शुरू कर दिया है। इसके पीछे थोड़ा-सा इतिहास पा । कक्षा में पहला स्थान मौलाना के किसी मुसलमान नेता के लडके हलीम का था । वह कक्षा में बड़ी शतानी करता था। दो घण्टो के बीच तख्त के कार जाकर सडा हो जाता था, अध्यापको की नकल उतारता, मनमाना बकता,खडिया लेकर वोडं पर कार्टून बनाने की कोशिश करता-- एक क्लाउन की भांति । लडके हँसते। अचानक उस दिन बंगला भापा की कक्षा में कालाचाद आकर खड़ा हो गया । बंगला की कक्षा में हलीम नहीं है । वह बंगला नही पढ़ता । कालाचांद ने वंगला कविता-पाठ शुरू कर दिया: प्राज इस प्रभात में, प्रभातविहग, फौन गीत गाया दूर, बहुत दूर, मासमान से, स्वर जो बह पाया। उसके बाद कहने लगा, "सुनो भाइयो, पॉपेज-बॉयज-माई फॅड्स-कामरेड्स-!" कामरेड शब्द तव तक पा चुका था । सन् उन्नीस सौ पडतीस- उनतालीस की बात है। "मैं कविता-पाठ कर रहा हूँ, मुनो! रवीन्द्रनाथ की कविता 'निझर का स्वप्न-मंग'।" उसका गला अच्छा नहीं था। उसके ऊपर उम्र का भारीपन गले मे हाल ही में पैदा होना शुरू हुआ था। उसकी अावाज उस समय फटी- फटी-सी, कुछ भारी-भारी-सी थी। किन्तु इस सबका उमे कुछ खयाल ही न था, वह इसकी परवाह ही नहीं करता था। हर काम मे वह एक विदोप शक्ति द्वारा अपने-अापको उँडेल सकता है-संचित जलराशि के निमग्न गतिवेग की भांति, प्रत्येक जल-विन्दु के शक्ति प्रयोग की भांति, उसके तन-मन दोनों के ही समस्त अणु-परमाणु, जो काम भी वह करता, उसी में तन्मय हो जाते थे। उसके गले का स्वर यर-थर कांपने लगा, विजली शक्ति की भांति सभी श्रोतानों के मन में वह मावेग संचरित हो "पाज इस प्रभात में रवि के ये किरण-कर कसे प्रा छाये हैं प्राणों पर।" उसके गले का स्वर ऊंचा होने लगा । प्रावेग मानो पुंजीभूत बादलों की भांति प्रावर्तित हो चला । शुरू से आखिर तक सारी कविता का पाठ करके अन्तिम छन्द पर या पहुँचा : "जाने क्या हुआ आज जाग उठे प्राण सुनता हूँ दूर महासागर का गान और मेरे चारों ओर कैसा कारागार घोर- तोड़-तोड़-तोड़ कारा प्रवल, आघात कर।" और पंक्तियाँ समाप्त करते ही वह तख्त से नीचे उछलकर कक्षा के बन्द दरवाजे के पास जा पहुंचा और किवाड़ों में धम्म-धम्म मुक्के मारने लगा। लड़कों ने भी अपनी बैंचों को पीटना शुरू कर दिया। ठीक उसी समय अध्यापक ने कमरे में प्रवेश किया। हंसकर बोले, "दैट्स नॉट दि वे, दैट्स नॉट दि वे, माइ फेण्ड्स । झरने के जल का कारा- गार को तोड़ने का ढंग और मानव-हृदय का रुद्ध पथ की बाधाओं को तोड़ने का डंग एक-सा नहीं होता। पर तुम तो अच्छा कविता-पाठ करते कालाचाँद!" फिर एक बार कालाचाँद की ख्याति चारों ओर फैल गयी। उस वार इण्टर कालेज-कविता--पाठ-प्रतियोगिता में उसे भेजा भी गया। उसने बँगला और संस्कृत-प्रतियोगिता में कविता-पाठ किया। पुरस्कार तो उसे नहीं मिला, पर संस्कृत-कविता-पाठ में प्रशंसा मिली। सबसे बड़ी बाधा हुई थी उसके गले के कारण, नहीं तो शायद पुरस्कार भी पा जाता। उच्चारण के लिए भी उसके अंक कम हो गये थे । खेल के मैदान से कालेज तक, इधर नामी रेस्टोरेण्ट से लगाकर होस्टल तक कालाचांद के कण्ठ-स्बर से, उसके गतिवेग से, वातावरण चंचल हो उठा । किन्तु वार्षिक परीक्षा में वह फेल हो गया। कहने लगा, किसी दूसरे कालेज में चला जाऊँगा। कालेज-टीम के कप्तान ने कार में ३० / सप्तपदी - यहफर ने प्रमोशन दिना दिया। रेक्टर ने उसे बुलाकर कहा, "तुम्हें ‘सावधान होना पड़ेगा कालाचांद ! तुम तो 'हल' लडके नहीं हो।" उम दिन कालाचांद को अपने पिता और मां की याद प्रायी थी। उसके पिता अल्पभाषी मोर गम्भीर प्रकृति के व्यक्ति थे, पूजा-उपा- सना में लगे रहते थे। उनके मुव पर, यांवों में, प्राचार-व्यवहार में ऐसी कुछ बात थी जिमने उनके पास पहुंचते ही मन उदास हो जाता था। शायद एक प्रकार का प्रच्छन्न लज्जा का पश्चानाप । वह लम्बी सांस लेते रहते हैं, मुंह में कुछ पहले नहीं। केवल गृह-देवता के द्वार पर प्रणाम करते समय आस-पास कोई न होने पर कहते हैं, "मेरी अक्षमता के लिए क्षमा करो प्रम् ! तुम्हारे भोग में कमी करनी पड़ती है--यह दुप में तुम्हारे मियाय और किससे वह ?" उमवी मां प्रसन्नता की मूर्ति थी, कल्पवृक्ष थी। उसने जब भी जो बुछ चाहा है वही उन्होने उसके लिए जुटा दिया है। जिसकी चाह है यह प्रयम्य मिलेगा, यह विश्वास उमे मां ने ही दिया है। उनके मांचल में अनन्त दूघ धा, हृदय में अनन्त स्नेह था और मन में अनन्त प्राशा थी। उनका प्रश्रय प्राय और अगाध था। उनकी मां ने उने तैरना सिखाया था। वह स्वयं तैरना जानती यी। जिस नालाब में वह स्नान करती थी उसमे कमल खिलते थे। कालाचोद रोज़ फूलों के लिए हछ करना, मां तोटकर ला देनी थी । कुछ दिन बाद उन्होंने कहा था, "तू ही तैना सीख, सीवकर तोइ ला, मुभमें नहीं लाया जाता !" नैरना सीखने के डर से कई दिन तो उसने फिर कमल की बात ही नही उठायी थी। कुछ दिन दाद मां स्वय ही एक दिन पट्ट में कमर बांधकर पडा तराती हुई बोली थी, "पा, कमल तौड़ेंगे।" वह मां के नाथ-माय गया था। प्राते समय कई बार पड़ा आगे वहाते हुए उन्होंने कहा था, "इमें पकर उसके बाद गेज वही उनको गृह-देवता की पूजा के लिए कमल ला दिया करता था। मां उसके पास लेटकर भविष्य के बारे में बातें रिया करती थी "बड़ा भारी डॉक्टर बनना, विलायत जाना, जर्मनी जाना । बड़ा भारी मकान बनवाना, गाड़ी खरीदना, नौकर-चाकर रखना !" वह ऐश्वर्य की ही बातें करती रहती थीं। बहुत ही सरल मन की थीं। उनके लिए दान-ध्यान-दया-स्वार्थ-त्याग आदि सब अपने उपभोग के बाद थे । अपने हाथों कमाकर पहले खूब खायेंगे, उसके बाद दूसरों की सोचेंगे। वह कहता, "विलायत जाने से जाति नहीं चली जायेगी?" "प्राजकल वह जमाना नहीं रहा । और फिर जायगी तो चली जाय । जाति को लेकर क्या अपने पिताजी को भांति घो-धोकर पियेगा ?" "पिताजी प्राज्ञा नहीं देंगे।" "तुम चले जाना ! नहीं होगा तो हम अलग रहेंगे, वृन्दावन चले जायेंगे । तू तो बड़ा हो सकेगा !" परीक्षा में फेल होने के बाद उसे उस दिन उन्हीं लोगों की बात याद . प्रायी। और इस स्मृति को वह फिर नहीं भूला, कम-से-कम इण्टर की परीक्षा देने तक तो नहीं भूला । उसने पहली श्रेणी में इण्टर परीक्षा पास की। मेडिकल कालेज में भरती हुया । यहाँ वह कालाचांद गुप्त नहीं, कृष्णेन्दु गुप्त था । इण्टर परीक्षा के पहले ही विश्वविद्यालय में अरजी और अदालत में हलफनामा देकर उसने अपना नाम बदलवा लिया था। सेण्ट जेवियर्म के फ़ादर रैक्टर उसकी पढ़ने-लिखने में उन्नति देख- कर उसने खुग ही थे। उन्होंने हनकर कहा था, "हाट्स इन ए नेम-कालाचांद ?" कालाचांद ने हंसकर उत्तर दिया, "कालाचांद कृष्णेन्दु मीन्स दिनेम-~~दि लैक मून ! आई व चेज्ड दि वर्ड ओनली, नॉट दि मीनिंग । पाई एम दि सेम प्रोल्ड ब्लैक मून, फादर !" पिता को, मां को भी पन में यही लिखा था। पिताजी ने कोई उत्तर न दिया था, मां ने लिखा था, "ठीक किया ! इसमें हमें कोई एतराज नहीं।" इज़ ब्लैक मून, एण्ड - ३२ / सप्तपदी पर तब तक उममा कालाचांद नाम भी कालेज-कालेज में स्वयं उमकी ही भांति प्रसिद्ध हो चुका था। उसने इसने हिम्मत न हारी। किसी के कालाचांद रहकर पुकारते ही वह कहता, 'नॉट कानाचाँद-- माई एम कृष्णेन्दु-काल मी कृष्णेन्दु प्लीज !" रीना ब्राउन के माय परिचय यही हुना-वह भी उसी कालाचांद नाम को लेकर । रीना ब्राउन कालेज की चीफ़ नर्म मेट्रन पाली ब्राउन की सौतेली लड़की यो-पॉली के पति जिमी ग्राउन की पहली पत्नी की लड़की। कालेज के स्टाफ क्वार्टर में मिसेज द्राउन रहनी थी। रीना की उम्र उम समय १५-१६ की होगी। दीपांगी लडकी उन समम किशोरी ही थी. पर तभी में अपूर्व मोहिनी । शरीर का रंग गोरा होने पर भी बंगाल की श्यामलिमा का एक हल्का-सा आभास उम पर स्पष्ट था । सबसे अधिक मापक ये लड़की के केश । छोटे-मे कपाल को टंकती हुई ऐमी भरपूर पनी काली केश-राशि कम ही दिखायी देनी है । तेलहीन स्सेपन में भी उसकी श्यामल गोमा फीकी न पडती थी, घुघलेपन का समास नही होता या । मानो माये के ऊपर घने काले केदा-सम्भार के साथ इस लाल मिट्टी के प्रदेश के सघन दाल-वनी की गोमा का कोई सम्बन्ध हो । कृष्ण-कुन्तला के बजाय अरण्यकुन्तता ही मानो उसकी अधिक उपयुक्त और गोमन उपमा हो। वैसी ही काली काली दो भौहें-माथे के बीच से लगाकर मानो कान तक खिंची हुई, कच्चे वास के मोटे धनुष की भांति उसी के अनुरूप दो मुन्दर प्रांखें-उसकी पलको के घने काले रोगो ने उन्हे मौर भी मुन्दर बना दिया है। फूल की केसर की भांति दोघं । लगता है मानो पलकों में काजल-रेखा और स्वप्निलता लेकर ही लवी ने जन्म लिया हो। रीना एक निर्दिष्ट समय पर अपने पलट के बरामदे में दिखायी पड़ती है। तभी उस जमाने के सैनिक मेडिकल विद्यार्थियों में से द्वितीय वर्ष के छात्र कक्षा से निकलते थे-उमके ठीक वुछ ही देर बाद, शायद दम मिनट बाद । मंनिक छात्र प्रायः सभी बाहर चले जाते थे, वह जाता सिर्फ जॉन क्लेटन, सैनिक छात्रों का सेण्टर-हाफ । जॉनी मार-पीट में मिदहस्त गुण्डा था।
- जॉन क्लेटन युद्ध-विभाग के विख्यात प्राई० एम० एस० अफसर का बेटा था। वह जिद्दी अफसर वेढव शरावी, विन्यात शिकारी, नाचने में प्रवीण और मार-पीट में निपुण व्यक्ति था। लोग कहते हैं जहाँ चास क्लेटन होता उस छावनी के अफ़सर सन्यस्त रहते थे। भयंकर तूफान की भांति दूसरों की घर-गृहस्थी उजाड़ने में ही उसे प्रानन्द आता था । उसकी यह हिाई स्त्रियों के लिए बड़ी आकर्षण की वस्तु थी। इसी आकर्षण ने एक दिन पॉली ब्राउन उस समय मिस पॉली मॉरीमन-को भी घेर लिया था। पर उस समय क्लेटन का विवाह हो चुका था। पत्नी इंग्लैण्ड में थी, जॉन अभी बालक ही था। पॉली मॉरीसन ने टूटे हुए दिल से मैनिक विभाग का काम छोड़कर कलकत्ता प्राकर मेडिकल कालेज में नौकरी कर ली थी। क्लेटन साहब ढीठ होकर भी ढोंगी न था। कलकत्ता में नौकरी दिलाने में उसने सहायता की थी। कई-एक बड़े-बड़े अस्पताल केवल योरपवासियों के लिए निर्दिष्ट थे-~-उनका चक्कर काटने के बाद पॉली ने मेडिकल कालेज में नौकरी ले ली थी। वह उस समय भी मिस पॉली थी । यहीं रहकर वह मिसेज ब्राउन हुई है । रीना उस समय १० वर्ष की वालिका थी। जेम्स और रीना के साथ घर-गृहस्थी में डूबकर पॉली ब्राउन क्लेटन को करीब-करीव बिलकुल भूल चुकी थी। अचानक पिछले वर्ष जॉन क्लेटन पाकर मेडिकल कालेज में भरती हुआ । मिसेज़ पॉली ब्राउन को एक चिट्ठी देते हुए उसने कहा था, "मेजर चार्ल्स ब्राउन ग्राफ़ दि किंग्स प्रोन रेजिमेंट, प्रापको उनकी याद -- है?" "मेजर चार्ल्स क्लेटन, डियर चाली ?" जॉन ने हंसकर कहा था, "मैं उनका लड़का हूं।" "तुम उनके लड़के हो ?" "हां, यहां मेडिकल कालेज में पढ़ने आया हूं।" विस्मित हो गयी थी पॉली ब्राउन । मेजर चार्ल्स क्लेटन का लड़का इंग्लण्ड के बजाय यहां डॉक्टरी पढ़ेगा ? आई० एम० डी० होगा? चार चप में चिकित्साशास्त्र समाप्त ! उस्तरा चलाकर इस देश के नीम हकोम फोड़ा काटते हैं । ये लोग मोथरी छुरी से भी उससे बेहतर नहीं ३४/ सप्तपदी 1 काट सकते । प्राई० एम० डी० के उपयोग के लिए पनी छुरी के बजाय मोयरी छुरी की व्यवस्था है। उन्हें कभी भी ब्रिटिग-प्राइरिसा रेजिमेंट ने नौकरी न मिलेगी। काले सिपाहियों के रेजीमेण्ट में मेडिकल अफसर होगा। पॉली ग्राउन के माश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं, पर चिट्टी पडकर पॉली पाउन ने अपने-आप ही कहा था, "स्टेज 1 स्टेंज लक ! लक के मिया और क्या कहूं ! मेजर क्लेटन के जीवन में उत्तट-पलट हो गयी है । विचित्र अदृष्ट के मिवाय और क्या ! पांच वर्ष पहले की बात है । क्लेटन सी० पी० में बड़ी छावनी में या । तब तक उसके बाल-बच्चे यहाँ पा चुके थे। क्लेटन भी कंप्टेन में मेजर हो चुका था। पत्नी के प्राने से अफसरों की मण्डली में उमे लाचार होकर फूंक-फूंककर कदम रखना पड़ता था। कोटन की पत्नी मार्गरेट दृढ स्वभाव को म्यी थी-माहम और शारीरिक गति दोनों मे ही क्लेटन के उपयुक्त । क्लेटन ने समाज छोटकर मध्य भारत के जंगलों में घूमना शुरू कर दिया, शिकार की खोज मे । शिशर के लिए जंगलों में भटकते-भटरते ग्रादिवामी स्त्रियों के उपभोग का रास्ता निकाल लिया था उसने । कुछ ही दिन में मार्गरेट को भी इसका प्राभास हुमा । वह भी एक राइफल लेकर शिकार में उसकी मगिनी बन गयीं। अन्तिम वार एक विचित्र घटना घटी। क्लेटन-जैसे व्यक्ति किसी बात को घुमा-फिराकर नही कहत- सत्य के प्रति श्रद्धा के कारण नहीं, जिन्दगी की कोई घटना ही उसके लिए लज्जा का विपय नहीं होती इमलिए । उसने पॉली ब्राउन को लिखा था, "पॉली, विचित्र घटना हुई। मेरे मन ने मुझे धोसा दिया या दह कोई नियति का सेल था, या मेरे कम-फल की परिणति थी, यह प्रान भी नही समझ पाया। उस बार एक घने जंगल के बीच एक गांव में प्रडा बनाया या। मारेट साथ थी। एक बाघ के जोडे का अड्डा भी पास ही था। गांव में प्राकर एक प्राश्चर्यजनक जंगली युवती को देखा । मेरा मन बाघ की बजाय उसकी ओर ही अधिक सिंच गया, पर मार्गरेट माय थी। जो हो, मचान बांधकर दूसरे दिन रात को एक बाघ को मारा, पर एक भाग ।
- गया। जो मरा वह वाघ था, भागनेवाली थी वाघिनी । तीन दिन फिर उसको न पा सका, पर उसके पैरों के निशान विचित्र रूप में चारों तरफ दीसते रहे, मानो सामने न पाकर पीछे की ओर से चक्कर काट रही हो । गांव के सरदार ने कहा था, "लौट जाइए साह्व, यह बाधिनी भयंकर है। आपके पीछे पड़ गयी है।" वात दिन के समय हो रही थी। गांव के और लोग भी इकट्ठे थे। उन्हीं के बीच वह विचित्र मादकतामयी जंगली युवती भी थी। सबकी नज़र बचाकर वह मन्द-मन्द मुसकरा रही थी। तुम उस ज़माने के चार्ली को भूली न होगी । इस मामले में वह पक्का उस्ताद था। कोई बाघिनी पीछे पड़ी है, केवल इस कारण चाल्र्स क्लेटन उस जंगली मदिरा का पान किये बिना लौट सकता था । मार्गरेट ठीक समझ न पायी थी, फिर भी उसने कहा था, 'लोट चलो।' मैंने कहा, 'अाज का दिन और देस लें।' टीक उसी समय वाधिनी गांव के बाहर प्रकट होकर एक गर्जन द्वारा मुझे नियति का निमन्त्रण देकर जंगल में अदृश्य हो गयी। माम को अचानक उस स्त्री से भेंट हो गयी । उसने भी हँसकर निमन्त्रण दिया । मैंने उससे कहा, 'आज शिकार के लिए नहीं जाऊंगा, आधी रात को मिलूंगा।' मार्गरेट से कहा, 'तबीयत ठीक नहीं है, मचान पर जाना प्राग ठीक नहीं होगा।' डेरे पर ही रह गये । डेरा मुखिया के.घर के ही एक कमरे में था। मैंने शराब पी और मार्गरेट को भी पिलायी। उसे मुलाना ज़रूरी था और वह सो भी गयी थी। अचानक खट-खट आवाज हुई। कान लगाकर सुनने लगा। मैं शिकारी हूं, जानवरों के परों की आहट पहचानता हूँ। मैं चार्ली फ्लेटन हूँ, अभिसारिका के पैरों की नाप भी पहचानता हूं। वह पंरों की प्राहट उसी जंगली युवती की थी। मन्तोप के साथ दरवाजा खोला, थोड़ा-सा किवाड़ हटाकर बाहर नांका। प्रासमान में चांद था। जंगल में चाँदनी फैली हुई थी। कंसी अपूर्व थी वह चांदनी ! गहरे हरे रंग गे घेरे के बीच उस शुभ्रता की कोई उपमा नहीं मिलती। उसी के बीच दीख पड़ी वह युवती । देखने में मुमने कोई भूल नहीं हुई थी । हृदय के भीतर रक्त उवल उठा । मैं बाहर निकल पाया। सीटी बजायी । वह स्थिर खड़ी थी। पर मैं आगे बढ़ गया। पर योन पाहाँ ? ठीक उसी क्षण वाघ की दहाड़ से जंगल थर्रा उठा। ३६ / सप्तपदी ।
पौधे से बाधिनी मेरे ऊपर उछल प्रायो । में थोडा-सा विसक सका था, तो भी वह मेरे दायें कन्धे के ऊपर प्राकर गिरी। उसी क्षण मैन मुनी मार्गरेट की चीख । उसी के दूसरे ही क्षण बन्दूक को प्रावाज सुनायो दो-- एक-एक कर दो गोलियां । फिर वाघ को दहाड़। उसके बाद कुछ याद नहीं, होगा प्राया बहुत दिन बाद अस्पताल में । दायां हाय बाट डालना पड़ा है। दायां कान भी नहीं है। दायें पैर मे फैक्चर हुआ था उसमें भी जान नहीं है । वापिनी मार्गरेट के टुकड़े-टुकड़े करके ही मरी थी। दोनों ही गोलियां उसके सीने मे और पेट में लगी थी । मरते समय लुढ़कते. लुढयाते पाकर मेरे ऊपर ही गिरी थी। आलिंगन कर लिया था । और भी मजेदार बात क्या हुई, जाननी हो ? उम जंगली गांव में उम लडकी का पता कोई मुझे न दे सका था। मैंने तलाश की थी। उन लोगों का कहना था, 'नहीं तो, ऐमी तो कोई स्त्री इस गांव में नहीं है !' आज भी में क्या सोचता हूँ, जानती हो ? वह युवती क्या शुरू से ही मेरे मद्य- विह्वल मस्तिष्क और नारी-लोलुप चित्त की भ्रान्ति थी ? नितान्त कल्पना थी ? जो हो, प्राज मैं विकलांग असहाय हूँ, मामूली पेंशन ये ऊपर निर्भर मामूली पादमी। जॉनी को इंग्लण्ड भेजकर पढ़ाने की सामर्थ्य नही । वह कलकत्ता पदने जा रहा है। मैं जानता हूं, तुम वहाँ की मेदन हो । जॉनी की देखभाल करना।" ईश्वर का नाम लेकर पॉली ब्राउन ने गरीर पर क्रॉस का चिह्न बनाया था । 'हे भगवान, 'पुनर चाती शैतान के चंगुल में फंस गया था। पर तुम बैठो, जॉनी ! तुम मेजर चार्स क्लेटन के लडके हो । मेजर क्लेटन किमी समय मेरे वॉम थे, मित्र थे। मेरे घर का दरवाजा तुम्हारे लिए सदा सुला रहेगा, जब चाहो आ सकते हो।" उसने अपने पनि जेम्म ब्राउन के साथ भी जॉन का परिचय करा दिया था । जेम्म पाउन किमी जमाने में मेदिनीपुर इलाके में रहता था। उसके पिता मेदनीपुर में विटिम जमीदारी कम्पनी में थे। वही पहाड, जंगल खरीदकर व्यापार करते थे। वही व्यापार जेम्म ब्राउन भी करता था । व्यापार मे नुकसान होने के बाद वह इन्सॉलसी लेकर अपनी पुत्री रीना के माय कलकत्ता पा गया था। उसी के बाद पॉली मॉरीमन से नुलाकात हुई। इस बात को आज कोई चार वर्ष हो गये। "रीना बड़ी अच्छी लड़की है।" दो वेणियाँ हिलाती हुई रीना बैठी-बंठी मधुर हँसी हंस दी थी। "इसके पिता ने तय किया था कि इसे कन्वेंट में रखकर अन्त में 'नन' बनायेंगे । जिमी को भी धर्म-कर्म का बड़ा खन्त है। इसे कन्वेंट में रखा भी था। मैं ही वहां से जबरदस्ती ले आयी हूं। देखो न, कैसा सलोना स्वभाव है, कैसा सलोना चेहरा है !" उसी सलोने स्वभाववाली रीना ने चिढ़कर कृष्णेन्दु से कहा था, "यू ब्लंकी कालाचांड यू हीदेन !" कृष्णेन्दु सिर पर पट्टी बांधे विजयी वीर की भांति कालेज के खेल के मंदान में अभी-अभी पाया था और लड़के उल्लास तथा उत्साह से शोर मचाते हुए उसका स्वागत कर रहे थे । रीना ब्राउन क्रोध में उबलती हुई अपने फ्लैट से उतरकर ग्राउण्ड के भीतर थोड़ा-सा प्रवेश करके चीखकर बोली थी, "यू ब्लैकी कालाचाँड ! यू हीदेन !" उसके पीछे-पीछे पायी थी उसकी प्राया। इसी देश की गोरे रंग की एक स्त्री। सिर के बाल पक गये थे; मोटी-मोटी भौहें थीं; देखने में वह बहुत अजीव लगती थी। उसकी आँखों की दृष्टि तो अद्भुत थी-सदा ही मानो अातंक से खुली रहती थीं, पलक नहीं गिरती थीं। वह पीछे से चिल्ला रही थी-"रीना, रीना, रीना, रीना ! नहीं ! नहीं !" रीना चुप नहीं हुई थी। उसने पैर पटककर कहा था, "यू, सुनायी नहीं पड़ रहा है तुम्हें ?' कालाचांद ने उसके पास प्राकर कहा था, "बरसात के इस कीचड़ के ऊपर इस तरह पैर न पटको। तुम्हारा ऐसा अच्छा स्कर्ट कीचड़ की छींटों से भर गया।" सचमुच यही हुया था। लड़के हंस पड़े थे । उस हंसी के प्रच्छन्न व्यंग्य से रीना का मुख लाल हो गया था। इस बात का कोई जवाब.. भी उसे न सूझा था । खुल्लम-खुल्ला इलजाम लगाते हुए उसने कहा था, "जॉनी को तुमने इस तरह क्यों मारा ? हाई ? यू ब्रूट !" उसके उत्तर देने के पहले ही कालेज-टीम का फुलवैक वसन्त बोल ३८ सप्तपदी उठा था, "इसके सिर की पट्टी नहीं दीखती? जॉनी ने ही मारा था पहले।" कृष्णेन्दु ने कहा था, "मेरी कोई वाग्दसा नहीं है मिस ब्राउन, होती भी तो वह पाकर जॉनी से ऐसा प्रश्न नहीं करती। वह समझ लेती कि लड़ाई शुरू होने पर जोरदार व्यक्ति की मार भी जोरदार ही होगी। कोचक हमेशा ही भीम के हायो मरता है।" लड़के 'हो-हो' करके हंस पड़े थे। प्रवानक उस आया ने हाथ जोड़कर कृष्णेन्दु से शुद्ध बंगला भाषा में कहा था, "हे यावा! दुहाई तुम्हारे पुरखो की, तुम तो भले मादमी के लड़के हो, मैं हाय जोडती हूँ, हार मानती हूँ । उससे कुछ न कहो। एबाबा!" स्त्री वंगालिन है ! इसी प्रारचर्य से सब लडके स्तब्ध हो गये थे। इसी बीच रीना जल्दी मे चली गयी थी। जाते-जाते चीखकर उसने कहा था, "यू विल वि पनिरह, गॉड विल पनिमयू !" कालेज के भीतरवाले मैदान में स्लैलने के अधिकार को लेकर साधा- रण मोर एंग्लो-इण्डियन मंनिक छात्रों के बीच भगडा, मार-पीट, कालेज के इतिहास में लिखा है । उसका कांटा तब तक निकला न था। उसकी पटक खेल के मैदान में भी चलती है। कल दो दलों के मंच में जॉनी ने ही मार-पीट शुरू की थी। उन्हें हमेशा मे ही वूट पहने रहने की सुविधा रहती है ; फिर जॉनी मार-पीट में सिद्धहस्त । बेचारा जॉनी, कृष्णेन्दु को जानता न था ; पर कृष्णेन्दु का छ. फुट लम्बा आकार देखकर उसे योड़ा होगियार हो जाना चाहिए था। इसके अतिरिक्त पिछले दो वर्षों मेकालाचांद का खेल में जैसा नाम या उसका ध्यान करके मारने के पहले भली-भांति सोच-विचार कर लेना उचित था। शुरू मे ही सेण्टर- हाफ़ । जॉनी ने बूट की ठोकर से इन लोगो के मेण्टर-फारवर्ड को घायल कर दिया था । वैचारे के दाहिने घुटने के नीचे जस्म हो गया था। उठ खड़ा होने पर भी उसकी दौडने की शक्ति जाती रही थी। उसके बाद ही जॉनी ने इन लोगों के मेण्टर हाफ के पैर का अंगूठा कुचल दिया। रंफरी ने उसे चेतावनी भी दी; पर जॉनी ने दूर हटकर रैफरी को 'सन ऑफ़ एबिच' गाली दी थी। बात कृष्णेन्दु के कानों में पड़ी । सेण्टर-फारवर्ड को अपनी जगह देकर यह यहां आ गया। आगार जॉनी के ठीक सामने यदा हमा। जॉनी ने हराकर कहा, "कालाचांड, दंट्स प्रालराइट।" बात पूरी होते-न-होते गेंद दोनों के बीच आ पड़ी । जॉनी ने उसके पुटने को निगाना बनाकर वूट चलाया । पालाचाँद ने चतुराई से अपने पुटने बचाकर जॉनी के उठे हुए पैर के नीचे की ओर किक जमाया। छ: फट लम्बे इन्सान के मजबूत बांस-जैसे पैर के किक मे जॉनी चित जा पड़ा। घोड़ी ही देर बाद जॉनी ने उसको सिर का निशाना लगाया। सिर फट गया । खून-सने बड़े-बड़े बालों को पीछे की ओर भाटककर कृष्णेन्दु कोई दो मिनट के भीतर ही गेंद लेने के लिए झपटा। जॉनी तेजी से लपककर उसे रोकने पहुंचा, कृष्णेन्दु तव तक गेंद इन्समैन को देकर आगे बढ़ गया था । ऊंत्री गेंद पाकर गिरी । जॉनी और कृष्णेन्दु आमने-सामने थे, दोनों ही हैड देने के लिए उछले । कृष्णेन्दु ने हैड दिया, जॉनी तिरछा होकर चीखता हुआ धरती पर गिर पड़ा, पेट को दवाये हुए। उसके बाद बेहोश । उसे उठाकर ले जाना पड़ा था । आज भी अस्पताल में है । पेट की अन्तड़ियों में चोट लगी है। उसके बाद कृष्णेन्दु ने हैटट्रिक की थी। रीना ब्राउन इसी कारण उससे कह गयी, "गॉड बिल पनिश यू।" कृष्णेन्दु ने भी उत्तर दिया था। यद्यपि उत्तर देने में उस पाया के मुख से अनुनयपूर्ण वंगला भापा सुनने के कारण कुछ देरी हो गयी थी। विस्मय से प्राधा मिनट चुप रह गया था। फिर चीखकर कहा था, "हलो मिम, हलो ! देन प्रास्त योर गॉड- अपने भगवान् से कहो, मेरे सामने प्रकट हो, या मुझे अपने सामने हाज़िर करायें। जानती हो, मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता । मेरा एक बड़ा लाभ होगा, उन्हें, देख सकूँगा। इसके लिए अगर जरूरत हो तो वताना, तुम्हारे जॉनी को फिर पीट दूंगा!" । 1 - "रीना माउन! तुम्हारे ईश्वर को में देख चुका हूं, रीना पाउन! पर आश्चर्य ४० / सप्तपटी है, हाइन होने की अपराधिनी इस मादिम स्प नारी झुमकी में भी उन्हें देखा है ! सिन्धु, लालमिंग ग्रादि के भीतर भी उन्हें पाया है । तुम्हारे सायी, मृत्यु-मय-वस्त, मय-यान-विमोर, उस अमरीकी अफसर के भीतर भी देखा, दह मौजूद हैं । युद्ध में भाग लेनेवाले के भीतर नही, जो युद्ध मे जान देने के लिए इतनी दूर छाया है, उनके भीतर उन्हें देखा तुम्हारे भीतर नहीं देखा, रीना ब्राउन !' "वाचा साब!" कमरे में सिन्धु ने प्रवेश किया। "कौन ? सिन्धु ?" "हां, बाबा साहब ! चाय दे गयी थो, पी नहीं । रात कितनी हो गयी है ! भूख क्या प्रापको नहीं लगती, बाबा साहब ?" "मेरी रोटी ढककर रख देना, सिन्धु ! जब जो करेगा, सा लूंगा!" 'ॐई ! ग्राप खा लीजिए, तब मैं जाऊंगी।" "नही मिन्धु ! प्राज मुझे छोड़ दे, बेटी !" "तदीपन टीक नहीं है, वावा?" "तबीयत तो टीक है बेटी, मन टोक नहीं।" कहकर कृष्णस्वामी उठ पड़े। मरे से निकलकर बरामरे मे पा सड़े हुए । वरामदे मे सुले मैदान में उतर पाये। चारों ओर वर्षा ऋतु के घने काले शाल-वन में चांदनी की भामा फूट उठी है । दूर क्षितिज तक जगल में कार-ही-ऊपर चली गयी है । नियाद नहीं, नि स्नन्य भी नहीं, पर मानो केवल अवसन्न हो । पेड़-पेड़ पर कलियां परिपुष्ट हो रही है। कल मवेरे बिल जायगी । परसों जो सिमेंगी वे प्राज बढ रही है। दो प्राज सवेरे सिली थी, उनकी गन्ध अभी तक हवा में बिखरी हुई है। धरती के मधन अन्धकार में जड़े की हो की भांति लागों सूक्ष्म मुख फैलाये जीवन-रम पो रही है । विचित्र जीवन- तपस्या अविराम चल रही है । कीचड का रम फूल के रूप में खिलता है । रीना ग्राउन मायद सराद पिवे नाचती होगी, या चीखती होगी, या भासद अमरीकी मरमर के माय विकृत लालमा से उन्मत्त व्यभिचार में अपने प्रारको नष्ट करती होगी। भौतिक जगत में एक विस्फोट हुमा, जिसे जानिकों ने माकस्मिक घटना बताया। उमी ने ही जीव उत्पन्न हुया था। उस जीवोत्पत्ति में ही ईश्वर की तपस्या का होम-कुण्ड जलता है। उसमें अनन्त प्राणों की समिधानों की आहुति पड़ रही है। प्राण अग्नि बना । तुम उसमें अंगार बनकर झर पड़ी, रीना ब्राउन ! यह कसे हुया? . आगे बढ़ चले कृष्णस्वामी । अपने प्राथम की सीमा पार करके जंगल की ओर चल पड़े। जंगल में वृक्ष मानो बात कर रहे थे। हवा से पत्ते-पत्ते में कुछ जाग उठा है, कोई राग बज उठा है। सारा दिन' उन्होंने मनुष्य का, जीव-जन्तुग्रों का जीवन-खाद्य प्रॉक्सीजन प्राप्त किया है। अब ऑक्सीजन दे रहे हैं। तुम दिन-रात कार्बन डायोक्साइड ग्रहण करते हो, दिन-रात कार्बन डायोक्साइड ही देते हो। उनके विलय में भी एक विचित्र सूक्ष्म स्थिति विद्यमान है, पर तुम्हारे भीतर केवल क्षय है, केवल क्षय, केवल क्षय ! "बाबा साहब ! फादर !" बंगले की तरफ से किसी का कण्ठ-स्वर वह पाया । जोसेफ लालसिंग' पुकार रहा है। वह जंगल की ओर चले जा रहे हैं इसी से शंकित हो उठा है । जंगल में भालू हैं, जंगली सुअर हैं, बीच-बीच में चीते भी आ जाते. हैं । इसी डर से उन्हें लौट आने को कह रहा है । घूमकर खड़े होकर भारी गले मे कृष्णस्वामी ने कहा, "बहुत भीतर में नहीं जाऊँगा, जोसेफ !" "नहीं, बाबा साहब, गांव से कुछ लोग पाये हैं, फ़ादर !" लोग ! इसका मतलब है किसी के घर कोई बीमारी या मुसीवत प्राः पड़ी है । लौट आय कृष्णस्वामी ! लोग वरामदे में बैठे हैं, एक कोस दूर के एक छोटे से गांव से पाये हैं। कृष्णस्वामी सभी से परिचित हैं-वह है बूढ़ा शरण नायक ! "क्या हुमा नायक ? इतनी रात को ?" "होगा क्या? मुसीवत ! नहीं तो तुम्हारे पास पाता ही क्यों इतनी रात गये?" "कौन वीमार है ? मुझे तो कुछ पता नहीं ।" "जानोगे कसे ? मेरे लड़के की बड़ी विटिया ! पहला जापा है। दोपहर से ही दर्द उठ रहे है। दाई ने इतनी रात गये कहा, 'मेरे बस. ४२ / सप्तपदी का काम नहीं नायक । हालत सचमुच खराब लग रही है। तुम वावा साहब को सवर दो। लड़की दर्द से तड़प रही है । सुना नही जाता । एक वार चतना ही पड़ेगा वादा को।" "जरूर चलना पड़ेगा।" कृष्णस्वामी जल्दी मे उठकर कमरे के भीतर गये । पुकारा, "जोसफ ! तुम भी चलो। सब औजार लेकर बंग में ठीक से लगा लो। तुम लोग कोई लालटेन नहीं लाये, नायक ?" तेल कहाँ है ! एक टूटी-फूटी हरीकेन है-वह घर में रखी है । पर चांदनी खिली है, चलेंगे।" "अपनी एक हरीकेन ले लो लालसिंग । प्लमेड इज ही दैट कमेय इन दि नेम ऑफ दि लॉर्ड । चलो नायक !" छोड़ो रीना की बात । रीना मर चुकी । उनके लिए तो वह मर ही चुकी । "नही बाबा, 1 चार "वो प्रनटु यू,” रीना ने उन्हें एक दिन लिखा था। वही उसकी अन्तिम चिट्ठी थी । "कृष्णेन्दु, तुम मेरे लिए मर चुके । हेड टु मी।" अगले दिन सवेरे कृष्णस्वामी शरण नायक के घर मे लौटे । प्रायः सारी रात परिश्रम करके शरण की नातिन का प्रसव कराकर घर लौट रहे थे। माल-वन में अभी भी रात को विचरनेवाली का प्राना-जाना बन्द नही हुप्रा या । पक्षियो ने अभी वीरा नही छोहा या, अभी चहचहाना शुरू किया था। फूल भी बम खिल ही रहे थे। मिर के ऊपर प्रासमान में बगुलों की पक्तियां उडी चली जा रही थी। विष्णुपुर के बांध पर जा रहे हैं, और एक माय बहुत-मे हम चक्कर काट रहे हैं। सुबह की हवा थके हुए शरीर में बहुत अच्छी लग रही है। साइकल होती तो वहा अच्छा होता ! लौटते-लौटते यही वात याद आयो । कल रात को ही याद प्रायी थी । पर अब तक दबी रही, किसी अन्य विचार के लिए अवकाग ही न था। अन्तत. कृष्णेन्दु रीना को प्यार करने लगा था। रोना भी उसे करने लगी थी। विचित्र ढंग से दोनों के विरोध के बीच सेतु तैयार हो गया था। सोचने पर माज भी कितना आश्चर्य होता है। रोना उसे देखते ही बरामदे से चिल्लाकर कहती, "यू हीदेन !" कृष्णेन्दु तव धर्म-ईश्वर कुछ भी नहीं मानता था, यही हीदेनिज्म था। मंदर पार माइण्ड की मंशा को मानकर उसने नयी यात्रा शुरू की थी। पर हीदेन महलाना उने अखरता था । उस लड़की से बदला लेने की तीन इच्छा उसके मन में विक्षुब्ध आवेग से चक्कर काटती रहती थी और मामूली- ने अवसर पर विचित्र रूप में प्रकट हो जाती थी। कोई महीने भर बाद की बात होगी। सितम्बर के अन्त में, मेडिकल कालेज में इनकी दीम एका कालेज कम्पिटीशन का सबसे बड़ा शील्ड जीतकर लायी थी। उस बार के खेल में कृष्णेन्दु ही सबसे अच्छा खिलाड़ी माना गया था। मेट्रन पॉली वाइन को खेल देखने का बहुत शौक था। कॉलिज की टीम का खेल होने पर वह जरूर जाती और अपना प्रिय पंखा हाथ में लेकर ठीक सामने की फुन्सी पर ही बैठती। पास होती रीना। कृष्णेन्दु मानो रीना से बदला लेने के लिए ही पागलों की भांति अदम्य उत्साह के साथ खेलता । रीना को सचमुच ही कोष होने लगता । कृष्णेन्दु को हीदेन कहने का हठ उसका बढ़ता ही गया । जीता हुया शील्ड जिस दिन कालेज में आया उस दिन लड़यो कृष्णेन्दु को कन्धे पर उठाये नाच रहे थे। रीना बरामदे में निकल- कर पायी । अचानक कृष्णेन्दु को क्या सूझा कि रीना के हीदेन पाहने के पहले ही यह चिल्ला उठा, "जे काली!" तभी विचित्र घटना हो गयी। रीना झपटकर कमरे में चली गयी। उसके बाद रीना को देखते ही कृष्णेन्दु चिल्लाकर पाहता, "ज काली!" रीना भी पाहती, "होदेन !" पहले दिन अप्रतिभ होकर कमरे में चले जाने के बाद अब और अप्रतिम नहीं होती रीना। कुछ महीने बाद बड़े दिन पर सैनिक छात्रों का सोशल फंक्शन हुआ । उसमें कुछ चुने हुए दृश्य भी दिखाये गये थे। एक दृश्य था 'प्रांधिलो' से। प्रॉथिलो और डेसटिमोना। "इट इज दि कॉज, इट इज दि गॉज माई सोल" से लगाकर डेसडिमोना की हत्या तय का दृश्य ! जॉन पोटन ने अपिलो का पार्ट किया था और अधिकारियों की अनुमति । ४४/mar लकर रीना ने डेसहिमोना का। क्लेटन द्वारा प्रॉयलो का अभिनय अच्छा नहीं हुआ, पर अपने चेहरे और मीठे गले के कारण, साग तौर पर सहन अभिनय के लिए, रीना की प्रशंसा हुई थी। कृष्णेन्दु ने देखा था वह अभिनय । उसके बाद उसे क्या सूझा कि प्रायेलो नाटक के उस दृश्य को उसने कण्ठस्य कर लिया और चाहे जब "इट इज दि कॉज, इट इज दि कॉज" कहकर वह स्वगत-भापण बोलना प्रारम्भ कर देता । रीना ने चिडकर तय में कृष्णेन्दु के सामने निकलना छोड़ दिया। तो भी कृष्णेन्दु साली बरामद की पोर देखकर ऊंचे गले से कहता, "इट इज दि कॉग, इट इज दि कॉज।" इसके बाद सब उलट-पुलट हो गया—नाटकीय रूप में नहीं, प्रत्यन्त सहज ढंग से, स्वच्छन्द गति से । पहले उस परिवर्तन के समय कृष्णेन्दु को अवश्य ही कुछ विस्मय हुआ था। पर माज...? जंगली रास्ते पर चलते-चलते कृष्णेन्दु के मुख पर प्रसन्न-म्लान हमी खिल उठी। किस बात का विस्मय ? क्या कारण था विस्मय का? मनुष्य के भीतर प्राण- तत्व का यही तो स्वभाव है । यही तो मानव-देह की वेदी पर ईश्वर की तपस्या है । गुण के क्षेत्र में एक को दूसरे के साथ होड जिस भांति मनुष्य का स्वभाव है, होड़ के बाद गुणग्राह्यता भी उसी प्रकार प्रकृति-धर्म है । अगले वर्प फुटबाल का सीजन आया । इण्टर-यूनिवर्सिटी गोल्ड कम्पिटीशन में मेडिकल कालेज की टीम के जाने की बात ठीक हुई- आई० एम० डी० और एम० बी० क्लास के लडकों की एक मिली-जुली टीम । क्लेटन और कृष्णेन्दु दोनों ही चुने गये । चुने जाने के बाद ही दोनों का मीठी के ऊपर प्रामना-सामना हुया ! दोनों ही एकमाय बोल उठे, "हेलो !" दोनों ने ही साय-साथ हाथ वढाय मीर एक-दूसरे के हाय दवा लिये । दोनों ने ही कहा, "तुम्हारे रहते मुझे कोई चिन्ता नहीं।" टूनमिट में ये लोग फाइनल तक पहुंचे थे। फाइनल में हार गये । सेल बम्बई में हुआ था। लौटकर आये तब तक दोनों एक-दूसरे के अन्तरंग बन्धु हो चुके थे। क्लेटन ही उस पॉली ब्राउन के घर ले गया था। पॉली ब्राउन बहुत खुश हुई थी। इस दुर्दान्त लड़के की कालेज में ऐमी लोकप्रियता देखकर सदा - " पादचयं होता था। और कालेज के सव लोगों से वह भी अलग न थी । उसने कृष्णेन्दु का स्वागत करते हुए कहा था, "प्रॉयेलो, दि टवुलेण्ट मूर!" उसके बाद ही हंसकर बोली थी, "इट इज दि कॉज़, इट इज दि कॉज ।" तुम यह खूब कहते हो। मुझे बड़ा अच्छा लगता है । पर रीना को चिढ़ाने के लिए क्यों कहते हो ? "यू नॉटी वॉय ! रीना उस समय कमरे के दरवाजे पर खड़ी हुई मन्द-मन्द हंस रही यो । क्लेटन ने कहा था, "लंट बाइगॉन्स वी बाइगॉन्स । शेक हैण्ड्स यूटू, एण्ड बी फ्रेण्ड्स ।" कृष्णेन्दु ने उठकर हाथ बढ़ाते हुए कहा था, "मैं माफ़ी मांगता हूं।" रीना ने हाथ बढ़ाकर कृष्णेन्दु का हाथ दवाते हुए कहा था, "वी पार फेण्ड्न !" वातचीत के बीच अचानक पॉली ब्राउन ने प्राकर कहा था, "वह तुम एक बार सुनायो न ! 'इट इज दि कॉज, इट इज दि कॉज ।' वही ! सचमुच तुम वह बहुत अच्छा सुनाते हो । तुम्हारी भारी आवाज़ में एण्ड एण्ड." यू कैन पुट लाइवली इमोशन इन इट।" रीना बोली, "एण्ड..." पर इतना कहकर ही चुप हो गयी। क्लेटन ने पूछा, "क्या ?" रीना ने हंसकर कहा था, "तुम्हारी अपेक्षा कहीं अधिक प्रॉथेलो की भांति । टॉल, मोर मूर-लाइक, इजण्ट इट ?" कृष्णेन्दु ने कहा, "पर तुमसे अधिक अच्छी डेसडिमोना की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता । मुझे लगता है परफ़ेक्ट।" क्लेटन ने कहा, "तो फिर तुम दोनों सारा सीन करो! लेट अस एन्जॉय एण्ड मेक दि मेमोरी ऑफ दि फर्स्ट मीटिंग अनफॉरगेटेवल । ग्राज के इस परिचय की स्मृति चिरस्मरणीय हो जाये।" जेम्स ब्राउन एक बार पाकर तुरन्त ही लौट गया था। अजीब आदमी है। ठीक अजीव नहीं, वह उन सब अंग्रेजों में से है जो इस देश में एक छोटे- मोटे लाट साहब हैं। काले प्रादमी के साथ बात करने में भी नफ़रत होती है; और पक्के मिश्चियन की भांति हीदेन को छूने पर हाथ धोता है। गावितहीन है, इसीलिए चुपचाप रहता है। १६ / सप्तपदी रीना ने ब्राउन साहब के कमरे को और नजर डालते हुए कुछ आपत्ति ची थी। क्लेटन वाउन के पास जाकर अनुमति ले आया था। ब्राउन साहब ने पूछा था, "क्या सिर्फ कालेज में पहनेवाला भला लड़का है या भले घर का लड़का है ?" क्लेटन ने कहा था, "बोथ।" "तो जरूर अनुमति दे सकता हूँ। ऊंची जाति का अपने यहाँ ?" "हो । ही इज ए गुष्टा। वो हंव मो मैनी गुप्टाज अमंग्स्ट अवर प्रोफेमर्म।" "येस, येस, प्राई नो । गुप्ताज पाई नो । येस ।" पाउन माहब ने अनुमति दे दी थी। उन लोगों ने सारे ही दृश्य का पाठ किया था । अन्त में एक घटना भी हो गयो । डेनडिमोना की हत्या करने के समय जब उसने, 'इट इज टू लेट' कहकर उसका गला घोटने का अभिनय किया और रीना जब 'प्रोह लॉर्ड, लॉर्ड, लॉर्ड' कहकर कातर चीत्कार कर उठी, तव उस क्षण वही आया 'रीना रोना' चिल्लाती हुई कमरे में घुम पायी थी। चौककर कृष्णेन्दु उठकर अलग खड़ा हो गया था। रीना ने जल्दी में उठकर बैठते हुए उसे सान्त्वना दी थी। चकित हो गया था कृष्णेन्दु ! रोना ने मेदिनीपुर-मानभूम-बांकुडा इलाके की सास शुद्ध वेंगला भापा में सान्त्वना दी थी। "झूट, झूठ, यह सब झूठ-मूठ है; यह सब थिएटर की बातचीत है।" जेम्स ब्राउन भी अपने कमरे से निकलकर दरवाजे पर पाकर सडा हो गया था । डरे हुए पशु की भांति स्थिर दृष्टि से ताकती हुई वह स्त्री स्तब्ध मूक हो गयी थी। "निकलो, इस घर से निकलो यू विच, गेट आउट !" ब्राउन ने क्रोध में गरजते हुए कहा था। कृष्णेन्दु को थोड़ी बैचनी-सी अनुभव हुई थी। रोना उस स्त्री का हाय पकडकर उमे वहां से बाहर उसके कमरे में पहुंचा पायी थी। पाली ब्राउन ने जेम्म बाटन को सम्हाला था। क्लेटन ने हंसकर कृष्णेन्दु से कहा था, "दैट नेटिव वोमन- उसने रीना को एक महीने की उम्र से पाल-पोसकर बड़ा किया है । बहुत प्यार सप्तपदी/४७ - करती है। रीना भी नापसन्द नहीं करती। वट यू सी, ही इज नॉट लाइक इट। मिस्टर ब्राउन अकृतज नहीं हैं, वह उसे निकालना नहीं चाहते, निकालना भी नहीं है । पर वह उसे मां की भांति प्यार करना चाहती है, अपनी बेटी की भांति देखना चाहती है । यह वह बरदाश्त नहीं कर पाते। गू नो, मिस्टर ब्राउन इज ए पका साहेब । सिर्फ यही नहीं, ग्राउन बड़े कट्टर क्रिश्चियन भी हैं।" रीना का वह रूप अभी तक याद है। एक बार देखती थी उस ओर जिधर ममता में प्रावद्ध मूफ पशु की भांति उसकी धाय चली गयी थी और फिर देखती थी बाप के कमरे को पोर । अचानक वह उस कमरे से निकलकर अपने कमरे की तरफ चली गयी थी। पॉली ब्राउन ने लौटकर कृष्णेन्दु से कहा था, "मुझे बहुत दुख है गुप्टा ! तुम कुछ खयाल मत करना! तुम जानते नहीं, यह स्त्री बड़ी अनक्लीन इन माइण्ड है। और कुछ अाउट ऑफ माइण्ड है-थोड़ी-सी पागल । रीना सोती है कि वह इधर-उधर जादू-टोना करती रहती है । बड़ी खुशी हुई आज । और तुमने कितना सुन्दर काव्य-पाठ किया। फिर भी कभी माना! प्लीज़ ! प्लीज़, डु कम !" . क्लेटन के साथ उसका यह स्नेह-सम्बन्ध शारीरिक बल को लेकर ही था। उनके होस्टल में पहुंचते ही पंजा लड़ाने से शुरुग्रात होती। कमरे में घुसते ही हाथ बढ़ाकर कहता, "कम प्रॉन !" उसके वाद तरह-तरह की होड़ चलती। जो कुछ भी क्लेटन को पारनयंजनक लगता, उसे जब वह पॉली ब्राउन के मकान पर कृष्णेन्दु को खींच ले जाकर दिखला लेता, तब पीछा छोड़ता। मूने नारियल को सिर्फ हाय की ताकत ने छीलकर सिर के ऊपर तोड़कर गाते हुए देखकर उसने पूछा था, "पत्थर हो ?" "नहीं । काटने से खून निकलता है," कृष्णेन्दु ने हंसकर कहा था । एक दिन पचास उबले हुए अण्डे खाने का प्रमाण भी उसे ब्राउन- रिवार के घर जाकर दे पाना पड़ा था। '८/सप्तपदी इसी बीच रीना और वह कब परस्पर वन्यु हो उठे यह ठीक-ठीक वताना कठिन है, पर यह बन्धुत्व तिल-तिल करके बना था। अचानक किसी एक दिन की किसी प्रकस्मिक घटना के फलस्वरूप या एक दिन के किसी प्राकस्मिक पावेग का उच्छ्वास-मान नहीं या । अत्यन्त सहज स्वच्छन्द नाव और गति में बढ़ा था-ठीक फूल खिलने की भांति । हो, फूल खिलने की भांति । फूल जिस दिन खिलता है उस दिन सूरज निकलने के पहले तक भी उमके वर्ण और गन्ध को घोषणा किसी को नहीं बुलाती। पर जद खिलता है तो उसके रग की शोभा, गन्ध का निमन्त्रण चारों ओर बिखर जाता है । इसी भांति उन लोगों ने एक दिन एक-दूसरे को जाना या । क्लेटन दो वर्ष फेल होने के बाद जव पास होकर निकला तब कृष्णेन्दु छठे वर्ष में था। और उस समय वह सिर्फ खेल के मैदान में ही प्रसिद्ध न था, केवल दुर्दान्तता के लिए ही सर्वजन-परिचित न या, विद्या के क्षेत्र में भी उसकी प्रतिभा उजागर होने लगी थी। चिकित्मा की कई पद्धतियों में तभी ही वह पक्के डॉक्टर की भांति निपुण हो गया था । हैजे में मेला- इन इन्जेक्सन और इन्ट्रोवीनस इन्जेक्शन देने के काम में वह बहुत दक्ष था। उसकी यह दक्षता ऐसी थी कि हैजे के केस में नामी डॉक्टर तक उने मदद के लिए बुलाते हैं। इन्जेक्शन वहीं देता था, डॉक्टर बम उपस्थित रहते। इससे उसे पंसा भी मिल जाता था। लवर्सन इन्जेक्सन देने के लिए तो तब उसने एक हाल ही में पास होनेवाले डॉक्टर मित्र के नाम में एक चेम्बर ही खोल लिया था। इसमे क्लेटन ने उसकी दडी सहायता की थी । एंग्लो-इण्डियन समाज में उसे परिचित करा दिया था। क्लेटन ने तब तक उसे मूट सहनना भी सिखा दिया या। घोती-कमीज पहननेवाले डॉक्टर के पाम ये लोग नही पाना चाहते । उस पैसे की कमी न होती थी। खुद ही कमा लेता था। क्लेटन पास हुा । उन लोगों को पास होते ही नौकरी मिल जाती है। नयी नौकरी पर जाना होगा। सैनिक छात्रों ने जानेवालों का अभिनन्दन किया । क्लेटन के प्रयल में 'प्रॉयलो' का वही दृश्य फिर अभि- नीत हुप्रा । उसी के कहने से अपिलो कृष्णेन्दु बना और हेसडिमोना रीना।
उस नाटक में ही कृष्णेन्दु ने आवेग-प्रखर दबे हुए गले से डेसडिमोना ये मुख के ऊपर झुककर कहा था, "पाइ विल स्मल दी ऑन दि ट्री..।" तभी मानो वह अपना होश खो बैठा था । वह हिन्दू है, वह काला आदमी है । क्लेटन के प्राग्रह से अभिनय के लिए ऑथेलो का पार्ट मिलने पर भी डेसडिमोना रीना ब्राउन को चूमने का अधिकार उसका न था। तीन आवेग के बावजूद वहाँ उसने अपने-अापको संवरण किया। किन्तु- "So sweet was ne'er so fatal. I must weep. But they are cruel tears. This sorrow's heavenly." कहते-कहते उसकी बड़ी-बड़ी आँखों से आंसुओं की धारा बह निकली थी । गला रुंधा जा रहा था, किसी तरह उसने समाप्त किया, "It strikes where it doth love. She wakes." रीना ब्राउन अाँख मूंदे हुए भी उस आवेग के स्पर्श का अनुभव कर रही थी। अखि खोलकर देखा कि कृष्णेन्दु की आँखों से अाँसुओं की चारा बह रही है। पल-भर के लिए वह अभिभूत हो गयी थी। अगले ही क्षण उसने और कुछ अनुभव किया-शायद एकदम स्पष्ट नहीं, पर अन्धकार की भांति वर्णहीन भी नहीं; कुहासे के बीच रंगों की झलक की भांति । बाद में रीना ने कृष्णेन्दु ने यह बात कही थी। रीना को कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे, कृष्णेन्दु ने ही सुझाया था । "तुम कहना चाहती हो कि अन्धकार दूर होने के बाद कुहासे के वीच इन्द्रधनुप के रंगों की झलक की भांति ? जानती हो, काला कोई रंग नहीं । कालापन रंग का अभाव है, वर्णशून्यता।" रीना ने कहा था, "दैट्स इट।" फिर बोली, "उसके बाद जब तुमने कहा, 'थिन्क प्रॉफ दाइ सिन्स', मैंने कहा, 'दे पार लन्स प्राइ वेयर टु यू', उन क्षण मेरी भी अांखों से आंसू फूट निकले थे।" नाटक के बाद दोनों एक-दूसरे से कोई बात कहे बिना ही चले गये थे; मिले तक न थे । सात दिन तक । सिर्फ यही नहीं, कृष्णेन्दु जाने पाना हो गया था। कुछ ही दिन पहले लिखी हुई पिताजी की चिट्ठी बार-बार पढ़ता ५०/ सप्तपदी - और सोच में डूब जाता । पिताजी अचानक कलकत्ता पाये थे। महीन- भर से उसने कोई चिट्टी नही लिखी थी, इसी से चिन्तित होकर आ पहुंचे थे। और भी एक कारण था। उनके गांव के हरिविलास वसु कलकत्ता मे रहते थे। उन्होंने गांव जाकर कहा था, "लड़का तो साहब हो गया, श्यामसुन्दर काका ! कोट-पेंट पहनकर साहब-मेम के मंग घूमता-फिरता है। रेस्टोरेंट में एक मेज के पर बैठकर खाता-पीता है । मैंने अपनी आँसों से देखा है।" पिताजी अगले दिन ही कलकत्ता पाकर धर्मतल्ला के उस चेम्बर में पहुंचे थे। कृष्णेन्दु अाजकल मेत के बजाय इसी पते का व्यवहार किया करता था। कोई गोल-माल नहीं होता था। कृष्णेन्दु उस समय चेम्बर में एक फिरंगी लड़की को इन्ट्रावीनस इन्जेक्शन दे रहा था। उसके साथ की एक और लडकी वाहर बैठी थी। और दो मरीज़ इलजार कर रहे थे। सभी सलवसन के केस में। इस मामले मे इनकी मनोवृत्ति वैज्ञानिक है। ये लोग लज्जा नहीं करते । प्राकर साफ-साफ कह देते हैं, 'वैल डॉक, मुझे शक है, और शक का कारण भी है, कि मुझे दुरा रोग लग गया है। मेहरबानी करके देख "लोजिए !" और इलाज भली-भांति सत्म करके धन्यवाद देकर चले जाते हैं। चेम्बर में लड़की को इन्जेकदान देकर बाहर निकलते ही उसने पिता को देखा। "पिताजी !" "हाँ । महीने से भी अधिक अडतीस दिन मे तुमने चिट्ठी नही दी। चिन्तित होकर आया हूं।" "मैंने तो दो थी चिट्ठी !" "हमें नहीं मिली।" अचानक याद पाया कि एक पत्र लिखा था डाक मे डालने के लिए। चेम्बर में घुसकर ब्लॉटिंग पंड उठाकर चिट्ठी निकाली। अपगधी की भौति उगे हाथ में लिये पिताजी के पास लौटकर उसने कहा था, "काम मे भूल ही गया 1 डाली नही गयी।"
। पिता हंस दिये थे। इस बारे में कोई बात न कहकर उन्होंने पूछा था, "ये सब?" "रोगी।" "रोगी? तुम' ?" "एक डॉक्टर मित्र यहीं इलाज करते हैं, उन्हीं की मदद करता हूँ। आपके पाशीर्वाद से मैं डिग्रीशुदा डाक्टरों से भी अच्छा इन्जेक्शन देता बन्धु।" तभी क्लेटन और रीना आ गये थे। "हलो मन..." कृष्णेन्दु ने जल्दी से अपने पिता का परिचय देते हुए कहा था, "क्लेटन, ये मेरे पिताजी हैं। पिताजी, ये मेरे मित्र । हमारे कालेज में ही पढ़ते हैं, जॉन क्लेटन, और ये हैं रीना ग्राउन, मेरी "ण्ड ओल्ड मैन," क्लेटन ने सचमुच खुश होकर बहुत सम्मानपूर्वक ही यह बात कही थी। रीना स्थिर दृष्टि से उनकी ओर ताक रही थी। पिताजी और नहीं रुके, चले गये थे । दूर सम्पर्क के किसी रिश्तेदार के यहां जाकर म्हरे थे। उनके बालीघाट चले जाने के बाद रीना ने कहा था, "ही इज ए हिन्दू, ए टिपिकल वाहिन । मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा । कैसी मीठी बात करते हैं ! एण्ड यू, टर्बुलेंट मूर, ए रॉटर, हिज सन !" कृष्णेन्दु हंस पड़ा था। अगले दिन वह पिता को हावड़ा स्टेशन पर ट्रेन में बैठा पाया था। पिता यात कम ही करते थे, गाड़ी में बैठने के बाद एक भी बात नहीं कही थी। गाड़ी छूटने के समय सिर्फ इतना कहा था, "होशियारी से चलना!" कृष्णेन्दु को हंसी आ गयी थी। होशियारी से चलना होगा ? कैसे ? घर पहुंचकर पिताजी ने पत्र लिसा । लिखा था, "इच्छा थी कि पाते सनय तुम्हारे सामने ही सब बात समझाकर कह जाऊं, पर 'होशियारी से चलना' के सिवा और कुछ न कह सका । पत्र में सव-कुछ खुलासा लिखने बंा हूं फिर भी जाने कैसी वाधा अनुभव कर रहा हूँ। तुम्हारी माँ से ५२ / सप्तपदी भी ये मर वातें नहीं कह सका हूँ। इसी से मेरे मन की हालत समक सकोगे । मुझे लग रहा है जिवित न होगा। तुम योग्य पुत्र हो । विक्षा और बुद्धि में जद तुम्हारी मुत्यानि हो रही है जब किस तरह ने बुरा बहूं। पर तो भी करता हूँ कि मुझे अच्छा नहीं लगा। लगता है, टोक नहीं होगा । मानो बहुत दूर वहे जा रहे हो । हमारे शास्त्रों में महा है, उपनयन के समय तीन कदम ने अधिक नहीं बटना चाहिए। नहीं तो फिर लौटने का रास्ता नहीं बचता। मुझे लगता है कि तुम तीन कदम से अधिक ही बढ़ गये हो। दूसरी और वहा है, एक नाम सात कदम चलने ने अविच्छेद बन्धुत्व होता है। देखा कि कलकत्ता मे सुन यहतों के साथ बहुत-मे कदम चल चुके हो । सान कदम चने हो या नही, नहीं जानता। सप्तपद पूरे न हुए हो तो और मागे न बढ़ना। गोविन्द तुम्हारी रक्षा करें।" पर पाने के बाद भी कृष्णेन्दु हंसा या । पिताजी की निर्मूल शंका पर हम नहीं तो क्या करे ? पर इस घटना के बाद, अर्थात् क्लेटन आदि के विदा-उत्सव के उपलक्ष्य में, ऑयेलो के अभिनय के बीच अचानक ही अपना जो आत्म प्राटीकरण उसके मागे हुआ, उसके बाद पिताजी की चिट्ठी को खोलकर बार-बार पढ़े बिना उममे नहीं रहा गया। स्वय ही हिमाव लगा रहा था, कितने दम पीछे छोड़ आया है, कितने कदम चला माया है रीना के साथ। स्कूल एक कदम, मेण्ट जेवियर्स एक कदम, मेडिकल कालेज एक कदम । तीन कदम हो गये हैं। वह जानता है कि उपनयन के समय दो के बाद तीसरा पर रखते समय पिता अथवा उपनयनदाता ही पढकर पीछे हटा देते हैं। घर-गृहस्थी मे मीमित होकर बंधकर ही जीवन कट जाता है । मनुष्य के प्राण बन्द जल की भांति भाप वनकर पुनर्जन्म की जल-धारा के समान भरते हैं, प्रवाह की कामना करते हैं। उने यदि नदी के स्रोत की गति मिल जाये तो कोई सेद नही। सचमुच ही यह बहुत दूर चला प्राया है। उसकी रक्षा के गोविन्द की कोई जरूरत नहीं। गोविन्द के क्षेत्र से बाहर है वह । वह तो गोविन्द को मानता नही, विज्ञान के नथ्यों ने उसके आगे नया रास्ता बोल दिया है। और रीना के साथ ? कितने सादम ? कितने कदम हो गये ? नहीं, और उस रास्ते पर नहीं चलना होगा! रीना क्लेटन की मंगे- नमा पलेटन उगका मित्र है। उसने सेना के घर जाना छोड़ दिया। मैना ने ही चिट्ठी लिखी। उसने उत्तर दिया, "जॉनी था, जॉनी के माय जाया करता था। जॉनी चला गया है। सिर पर इम्तहान भी है। जॉनी लोटने पर ग्राऊँगा। मेरी गलती पर ध्यान न देना।" "वाया माहब !" "कौन ?" चौंककर कृष्णस्वामी बड़े हो गये। "तने सवेरे पैदल कहाँ जा रहे हैं ? साइकिल कहाँ गयी ?" किसी गाँव मे सिर पर पड़ा रसे और पाट के पाय का वोझा लिये पछिका नायक विष्णुपुर की ओर जा रहे थे । कृष्णस्वामी रास्ता भूल गये हैं। जंगल में रास्ता भूलना मामूली बात है अपने घर का रास्ता छोटगार बहुत दूर चले आये हैं । जंगल समाप्त होने को है। जंगल खत्म होते ही एकदम विष्णुपुर के किनारे पहुंच जायेंगे-बिलाल यमुना के बांध के पारा । चमगार गई हो गये कृष्णस्वामी। यहां गे लोटेंगे? नहीं। एक बार चलेंगे लाल बांध के पास । लाल बांध के किनारे ऊपर उग पत्थर को छू पायेंगे, जहाँ रामकृष्ण परमहंस ने बैठकर विधाम किया था। गन के भीतर, प्रवाध्य स्मृतियों का पीड़न उनसे और नहीं राहा मिट जाये, अनीत मी सारी स्मृति मिट जाये । पारस पत्थर के छूते लोहा गोना हो जाता है। उस परम चंगगी के पासन ने स्पर्श से उनका मन भी बैंगग्य मे भर उठे । गेमा के दाग से इन्द्रधनुप के सातों रंग पूरी तरहने रहें।
पाँच महापुरुष का स्पर्श महापुरुष के साथ ही चला जाता है । कम-से-कम भौतिक जगत् में तो नही रहता । भौतिक जगत् में पकडकर रोक रखने की शक्ति नहीं होती, होती तो मिस्र के फरामों की ममियों की कृपा मे ही पुराना मिस्र वचा रहता; बुद्ध की अस्थियों के ऊपर स्तूप के प्रताप से ही भारतवर्ष के सारे दुख मिट जाते; ईश्वर के पुत्र के प्राविर्भाव के बाद पड़ोसी-पड़ोसी के मेल से सारे यूरोप में एक अपूर्व प्रेम का राज्य खडा हो जाता। । रह जाती है महापुरुषों की वाणी । मनुष्य के भीतर-ही-भीतर बहती रहती है नदी की भांति । पर मन में जव तृप्या जागती है, जब मन मर- भूमि हो उठता है, तब उस नदी का स्रोत भी सूख जाता है। मूखकर तप्त बालू के टीले की भांति हाहाकार करने लगता है । मन ठीक उसी प्रकार प्रसर तृष्णा से हाहाकार कर रहा है । किसी प्रकार भी कृष्णस्वामी रीना द्राउन की बात भूल नहीं पाते । कैसे भूलें ? इस रीना को देखकर उस रीना की याद कैसे भूलें ? विष्णुपुर के लाल बांध के किनारे पत्थर से टिके हुए सोच में डूबे हैं कृष्णस्वामी। याद आती है रीना की वही मूर्तिमती सान्त्वना-जैसी छवि । दीर्घ कृष्ण पक्ष के घेरे के बीच जल से भरी हुई बडी-वडी दोनों प्रोसें। सजल नयनो से कृष्णेन्दु को और देखकर उसने कहा था, "यू पार हार्ट- लैस, यू मार हाटलंस, कृष्णेन्दु ! प्राई डिड नॉट नो ! नेवर यॉट इट ईवन !" अचानक हार्ट फेल होने में कृष्णेन्दु की माँ मर गयी थी। कृष्णेन्दु तार पाकर गया था और श्राद्ध प्रादि निवटाकर घुटा हुआ सिर लिये कलकत्ता लौटा था। मित्र लोग यह बात जानते थे, पर रीना को रहकर जाने की बात उमे न सूझी थी। कई महीनों में वह कुछ दूर ही हो गया था। वह डॉक्टर है। आजकल डॉक्टरी में मनोविज्ञान भी पडना पड़ता है। एक साथ नब्बे दिन तक मन को बांधे रखने से, दूर हटाकर रखने से मने ।
प्राकपंण का सूत्र जीर्ण-शीर्ण हो सकता है। उस दिन के बाद उसने संकल्पपूर्वक यही किया था। रीना क्लेटन की मनोनीता है । उसके माता- पिता जीवित हैं। पॉली ब्राउन के साथ भेंट होती थी, रोज़ ही उससे बातचीत करता; पर कम । लौटने के बाद उसके घुटे हुए सिर को देखकर पॉली ब्राउन ने आश्चर्य से पूछा था, "क्या हुया कृष्णेन्दु । ऐनी मितप ?" "मेरी माँ..." "मर गयीं? माता-पिता के मरने पर तुम लोग सिर घुटा देते हो?" "हाँ मिसेज़ नाइन, मेरी मां अचानक हार्ट फेल होने से मर गयीं। मैं उन्हें देख भी न पाया।" पॉली ब्राउन ने परमात्मीय की भांति ही सान्त्वना देने की कोशिश की थी। हृदय से धन्यवाद दिया था कृष्णेन्दु ने । सन्च्या को वह धर्मतल्ला के चेम्बर में मित्र के साथ बैठा था कि रीना पायी । आँखों में आँसू भरकर उसने तिरस्कार के स्वर में कृष्णेन्दु ने शिकायत की थी, "तुम हृदयहीन हो कृष्णेन्दु ! मैं नहीं जानती थी। सोचा भी नहीं था ।" "वठो रीना !" "नहीं । यही बात कहने के लिए भायी थी।" हाथ पकड़कर उसे रोकते हुए कृष्णेन्दु ने कहा था, "अपना अपराध स्वीकार करता हूं।" रीना वैठ गयी थी। उस दिन केवल उसकी मां की बात ही पूछती रही थी और सचमुच ही रो पड़ी पी। "आज की बातचीत मेरे मन में अक्षय रहेगी रीना ! तुम्हारा पवित्र हृदय स्वर्ग की भांति है । उसके स्पर्श से मेरा मन शीतल हो गया।" थोड़ी-सी हंसी खिल पड़ीथी रीना के मुख पर--वेदनासे म्लान किन्तु शान्त । कहा था, "सचमुच मां का प्रेम मुझे कभी नहीं मिला कृष्णेन्दु ! पॉली माती मुझे प्यार करती हैं, पर उनसे भी गहरे प्रेम का स्वाद मुझे मुन्ती के पास मिलता है। सोचती हूं, उसने तो सिर्फ पाला है। मेरी माया है। तो फिर गर्भ में रखनेवाली मां मे स्नेह का स्वाद कैसा होता होगा ?" कृष्णेन्दु रीना के जाने के बाद कुछ देर तक अभिभूत बैठा रहा था। । ५६ / सप्तपदी रीना के साथ सम्पर्क फिर से नया हो उठा । मूत्र सूत का न था, काल के साथ कुछेक महीनों में जोग हो जानेवाले उपादानों से बना न या । वह था सोने-जैसी धातु ने निर्मित-हजार वर्ष बाद भी मिट्टी के नीचे से निकलनेवाले सोने के प्राभूषण की भांति हजार वर्ष पहले के दो हृदयों के मिलन की साक्षी समान । असली सोना%; कोई मिलावट न थी। फिर अचानक एक दिन, वह अस्पताल के कम्पाउण्ड में घुस रहा था कि रीना की प्राया दौड़ती हुई आयो और उससे चोली, "डॉस्टर साहब !" उसकी आँखों की दृष्टि अद्भुत थी। वह दृष्टि ऐसी थी मानो बोल ‘रही हो । हृदय के भीतर क्रोध हो, प्रतिहिंमा हो, भय हो, प्रातंक हो, वह 'मानो अपना रंग लेकर उनमे स्पष्ट बाहर आ जाता था । कुन्ती की प्रांखों मे उन दिन प्रातंक और पाकुल प्रार्थना थी। कृष्णेन्दु ने तब हाल ही में परीक्षा पास की थी और हाउस-सर्जन 'या । उसकी इच्छा थी कि विलायत जाये । दो-एक वर्ष में ही इतने रपये इकट्ठे हो जायेंगे । हैजे के इलाज मे सलाइन इन्जेक्शन के लिए अभी से “उसकी बड़ी ख्याति थी और उसमें माहम भी बहुत था। इधर उसका उपार्जन का रास्ता खुला था। जब तक पास नहीं किया था तब तक किसी पौर डॉक्टर के पीछे-पीछे जाना पड़ता था। अब उमे अकेले जाने का अधिकार प्राप्त हो चुका था। इम देग के अमीरों के घर में बुरा खान- 'पान भी है, और चाहे जो कुछ खाने-पीने की प्रवृत्ति भी उनमे बडी प्रबल है। कलकत्ता शहर में मक्खियों की कमी नही । वैक्सीन भी लोग नही लेते। उन लोगों के घरो से रुपया पैदा करने के रास्ते में उसके लिए कोई वाघा नही । धर्मतल्ला के चेम्बर के सिवा चितपुर के इलाके में भी एक चैम्बर खोल लेगा। सलवसन इन्जेक्दान में भी उसका नाम है । एग्लो-इण्डियन बिना लज्जा के इलाज कराते हैं । इस इलाके में लज्जा के कारण जो बहुत छिप-छिपाकर इलाज कराना चाहते हैं, उनके लिए चेम्बर होगा। वहां वह चार के बजाय पाठ रपये फीस रखेगा। कुन्ती के मुख और प्रांखों की हालत देखकर वह डर गया था।
"क्या है कुन्ती ?" कुन्ती ने भय से आँखें फैलाते हुए कहा था, "रीना रो रही है, डाक्टर साहब !" "क्यों ? क्या हुआ "रो रही है ?" "फफक-फफककर रो रही है-सवेरे से।" ?" "पता नहीं, साहब के पिता के पास से कोई चिट्ठी आयी है साहब. के पास ।" "चलो, मैं चलता हूँ !" एक चिट्ठी उसकी ओर फेंककर रीना ने कहा था, "मैं क्या करूं कृष्णेन्दु ?" और वह फिर फूट-फूटकर रो पड़ी थी। जॉनी के पिता चार्ल्स क्लेटन ने ब्राउन साहब को पत्र लिखा था । "आपका पत्र जॉन को मिल गया । अापको बहुत-बहुत धन्यवाद । आप एक सच्चे अंग्रेज और क्रिश्चियन हैं। मैं भी हूं। जॉनी को भी वही शिक्षा मिली है। इस मामले में वह अब आपको पत्र लिखने ही वाला था कि आपका पत्र मिला। जॉनी जो बात आप लोगों को सूचित करना चाहता था वह मैं ही लिखे दे रहा हूं। परीक्षा के बिना प्रेम का ठीक मूल्य नहीं समझा जा सकता। आपकी लड़की रीना के साथ वन्धुत्व को उसने भूल से प्रेम समझ लिया था। शायद आप लोगों ने भी ऐसा समझा था। जॉन ने यहां प्राकर नौकरी कर लेने के बाद बड़े समाज में प्रवेश करके अपने लिए प्रेमपात्री खोज ली है। कर्नल रेमण्ड मेरे पुराने मित्र हैं । पॉली उन्हें जानती है । उन्हीं की लड़की है एमिली। एमिली रेमण्ड बहुत ही ग्य और सुन्दर लड़की है । ये दोनों ही एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, और घ्र ही वे पति-पत्नी हो जायेंगे । ए गर्ल इन डिस्ट्रेस इज ए सेक्रेड थिंग । पिकी लड़की रीना को दुख होगा, उसके लिए मेरी हादिक सहानुभूति कार कीजिए । समय से सब ठीक हो जायेगा।" कृष्णेन्दु स्तम्भित हो गया था। क्लेटन के बारे में मन में एक प्राघात- सा लगा था। उसके मन के भीतर एक तीखा क्षोभ जाग उठा था। ज वह यहां होता तो वह खुली हुई खिड़की में से कलकत्ता की । '/ सप्तपदी . इमारतों के ऊपर प्राकार की ओर ताक रहा था। क्लेटन ऐसा दांगी निकला! "प्राई.गेव हिम माई ऐनी धिंग, कृष्णेन्दु,” रीना तकिये में मुख टिपाकर रो उठी। "रीना, रोप्रो मत रोना ! लुक ऐट भी इन माई फेस रीना !" रीना ने पुमकर उसकी भोर ताका था। मृदु उदास हंसी के साय कहा था, "तुम मगर आज मुझे अॉयलो की भांति गला घोंटकर मार डालते, कृष्णेन्दु !" एक क्षण में क्या हो गया था। एक बड़े भारी ऊचे बांध को कांपते. कांपते हठात् टूटकर भूमिसात् होते देखा है ? ठीक उसी भांति सब बाया-बन्धन टूटकर गिर गये और उन्मुक्त जल-त्रोत की भांति जीवन का सारा आवेग मानो पल-भर में उन्मुक्त हो उठा । "रीना-रोना- मैं तुमने प्रेम करता हूँ।" ये कुछेक शब्द उसके मुख मे निकल पड़े थे। उसने पागल की भांति रीना के वक्ष पर गिरकर उसे बाहों में भर लिया था। "रीना, आई लव यू, मैं तुमसे प्रेम करता हूं, रोना! रीना! माई लव । मेरी सर्वस्व रीना! मैं तुमसे प्रेम करता हूँ !" कोमल प्रस्फुट स्वर में रीना ने केवल इतना कहा था, "कृष्णेन्दु ! माइ कृष्णेन्दु !" "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ रीना!" "मैं भी तुममे प्रेम करती हूँ उसके बाद वे एक-दूसरे के मुख ऊपर मुख रखकर बहुत देर तक स्तब्ध बैठे रहे थे। कुछ देर बाद कृष्णेन्दु ने कहा था, "मैं देर नहीं करना चाहता। जितनी जल्दी हो सके विवाह करना चाहता हूँ। कल प्राकर मैं तुम्हारे माता-पिता ने दान करूंगा।" अगले दिन कृष्णेन्दु ने ब्राउन साहब में जाकर बातचीत की यो। ब्राउन ने उसके मुंह की और देखकर वहा, "यू मी मिस्टर गुप्टा, में एक अग्रेज है। उससे भी अधिक, एक ईसाई हूँ। मेरी लडकी रोना अवश्य एंग्लो-इण्डियन है, उसके भीतर कुछ रक्त इस देश का भी है, पर वह भी ईसाई है। आजकल की भांति कानूनी रजिस्ट्री द्वारा विवाह मुझे मंजूर नहीं। वह भी राजी नहीं होगी। वह मुझसे भी अधिक ईसाई है। तुम्हें मैं जानता हूं। तुम कर्मठ व्यक्ति हो, साहसी और सज्जन हो । विवाह से मुझे इन्कार नहीं, पर तुम्हें ईसाई होना होगा।" "ईसाई होना होगा !" कृष्णेन्दु स्तम्भित रह गया ! यह सब उसने नहीं सोचा था। "सोच देखो, यंग मैन ! कल पाकर उत्तर दे जाना । कल न हो सके तो और कुछेक दिन वाद सही।" कृष्णेन्दु सिर झुकाकर सोचता-सोचता लौटा। रीना के कमरे के दरवाजे पर ठिठककर खड़ा हुा । दरवाजा वन्द था। उसने पुकारा, "श्रीना !" क्रन्दन-रुद्ध कण्ठ से उत्तर मिला था, "तुम जाओ, तुम जानो । मैंने नहीं सोचा था। मैंने यह बात नहीं सोची थी।" "रीना!" "नहीं ! नहीं ! नहीं !" वह चला पाया था। सीढ़ी के मोड़ पर कुन्ती खड़ी थी, वह भी रो रही थी। कृष्णेन्दु को देखकर बोली थी, "रीना मर जायेगी, डाक्टर साहब, रीना मर जायेगी।" पृथ्वी घूम रही थी, धरती-ग्राफाश, घर-द्वार, मनृप्य-सव मानो चक्कर खाकर एक हुए जा रहे थे। एक असीम शून्यता से उसका मन भरा जा रहा था । सब गून्य है, सब शून्य है। रीना के विना आज वह जीवित रहने की कल्पना भी नहीं कर सकता। धर्म? धर्म को तो वह नहीं मानता। सचमुच ही नहीं मानता। ईश्वर को भी नहीं मानता । वह नये युग के नये सत्य को मानता है। ईश्वर नहीं, यह सत्य ही आज उसके लिए एक मात्र सत्य है । टूथ इज़ गॉड-सचमुच ही अगर भगवान् है, तो सब धर्म ही बाज उसके निकट एक- मिथ्या हैं। तो भी एक का सहारा लेकर उने रहना पड़ा है । वह नहीं मानता, पर लोग उसे कहते हैं हिन्दू, वैद्य । यह उने कागज में भी लिखना पड़ता है, इसी रूप में फार्म भरने पड़ते हैं । आज रीना उसके जीवन का सत्य है । उसके लिए वह ईसाई होगा, ६०/ सप्तपदी । ईसाई ही होगा । उसके पिता... उसका हृदय भीतर से हाहाकार कर उठा। पिता ! उसके पिता ! का इसे खुशी-सुशी स्वीकार नहीं कर सकेंगे? ईसाई होकर भी क्या वह उनको सन्तान न रह सकेगा ? अपना धर्म लेकर वह रहेंगे । उनके प्राचार-पाचरण सबको जिस श्रद्धा से वह अाज देखता है वैसे ही सदा देयेगा । वह तो किसी धर्म के प्राचरण में अपने जीवन-सत्य को नही खोजेगा । वह अपना धर्म खोजेगा इस चिकित्सा- विज्ञान में में, चिकित्सक जीवन के प्राचार-मावरण में में। तो फिर विम बात का विरोध, किस बात का संघर्ष होगा, नाममात्र को उसके ईसाई धर्म ग्रहण कर लेने में ? वह तो दूर ही रहता है, पिताजी गांव में रहते हैं। वे वृद्ध हो गये हैं। उन्हें मेरी आवश्यकता हो कितनी होती है ? सेवा के लिए ? मेवा वह करेगा ही। वे छुयेंगे नहीं, उसे नहीं छुयेंगे, रीना को नहीं छुयेंगे ? क्यों नही छुयेंगे ? क्यों ? प्राधै पागल की भांति वह वाहर चला आया। उसके अन्तर में लगाकर देह का अणु-परमाणु तक पुकार रहा था 'रोना-रोना- रीना !' रीना से अलग होकर वह जीवित नहीं रह सकता । यह उसकी देह-लालसा नहीं है । उसने बार-बार परीक्षा कर ली है। यह उससे अधिक कुछ है, बहुत अधिक कुछ । अस्पताल से वह 'तबीयत खराव है' कहकर चला पाया। छोटे बैग में कुछ मामूली चीजें रखकर गाडी मे जा बैठा; घर पर पिता के सामने आकर खड़ा हुया। "अचानक तुम ?" पिता चौंक उठे। "माप ही के पास पाया हूं, आना लेने के लिए । मैं एक ईसाई एग्लो-इण्डियन लड़की में विवाह करना चाहता हूँ।" पिता इस बात से चौक नहीं, चीखे-चिल्लाये भी नहीं। उसके मुख की और देखकर अपने सदा के अभ्यास के अनुमार शान्त भाव मे ही बोले, "यह में जानता था ।" पिता के दोनो पर पकडकर कृष्णेन्दु पागल की भांति कह उठा था, "माप कह दीजिए।"
पिता ने कहा था, "तुम पागल हो । नहीं तो पिता के पैर पकड़कर निर्लज्ज की भांति यह वात नहीं कह पाते।" "उसके विना मैं नहीं जी सकता।" "तुम्हारे मर जाने पर मैं यात्म-हत्या कर लूंगा, यह बात मैं कहूं तो भूत होगा। मैं आत्म-हत्या नहीं करूंगा, कप्ट जरूर होगा, पर जीता रहूंगा । भगवान् का नाम लेकर जीता रहूंगा।" वह चीख उठा था, "पिताजी!" पिता ने शान्त स्वर में कहा था, "मैंने उत्तर दे दिया है कृष्णेन्दु ! उस लड़की से व्याह कर लेने पर भी मेरे लिए तुम मृत हो और लड़की को न पाने के कारण मर जाने से भी। मैंने तुमसे कहा था, 'और आगे न बढ़ना । तुमने नहीं सुना। उसके साथ जीवन-अग्नि को साक्षी करके सात कदम अगर चल चुके हो, तो फिर तुम्हारे लिए और क्या रास्ता --- लम्बी सांस लेकर हँसते हुए उन्होंने गोविन्द का स्मरण किया था । और कोई बात नहीं कही, उठकर चले गये। कुछ देर खड़े रहकर कृष्णेन्दु जैसे पागल की भांति गया था वैसे ही पागल की भांति लौट आया- सीधा स्टेशन । कलकत्ता के रास्ते में बीच ही में उतर पड़ा था। सारी रात प्लेटफार्म पर बैठा रहा था। बहुत सवेरे फिर गाड़ी पकड़कर पालकत्ता लोट पाया था। प्राफर रीना की चिट्ठी मिली थी, "नहीं-नहीं-नहीं। यह तुम मत करना कृष्णेन्दु, मैं पैरों पड़ती हूं। मैं प्रासनसोल जा रही हूँ। रेवरेण्ड अर्नेस्ट के पास । उसके पास शान्ति है । मैं शान्ति के लिए ही जा रही हूँ। रीना।" तब तक कृष्णेन्दु दृढ़प्रतिज्ञ हो चुका था । रीना को उसे पाना ही होगा। जीवन के किसी भी मूल्य पर रीना उने चाहिए ही। धर्म-जाति-कर्म-प्रतिष्ठा-सब-कुछ दे सकता है । बीना नहीं जानती, रेवरेण्ड अर्नेस्ट उसे शान्ति न दे सकेंगे; दे ही नहीं सकते। उनका धर्म भी नहीं दे सकता । शान्ति-सुख-यानन्द-तृप्ति-~-सब-कुट है उसके उमे पा लेने में। जीवन का सुख, जीवन की गान्ति जिस ६२ / सप्तपदी । प्रकार भोग मे, पदार्थों में नहीं है उमो प्रकार जीवन को छोड़कर, यादर्शवाद अथवा धर्म के प्राचार-पाचरण में, मन्त्र-जाप मे, त्याग-तपस्या में भी नहीं है। केवल काया में भी नहीं है । काया को छोड़कर माया में भी नहीं है । काया-माया मे मिला-जुला ही जीवन है। जीवन का काम्य यदि कही है तो वह जीवन में ही है। रीना, तुम जी चाहती हो वह मुझमें है, मैं जो चाहता हूं वह तुममे है । रूप, रम, स्वाद, मन-माधुर्य, स्नेह, प्रेम, सान्त्वना यही तो जीवन की कामना है। यह सब जीवन में ही है। और कही नहीं है, और कही भी नहीं है। वह फिर निकल पड़ा था। और अधिक देर नहीं । वह सीधा ब्राउन के पाम, पाली के पास गया था, "मैंने ईमाई होने का फैसला कर लिया है, मिस्टर ब्राउन ! ब्राउन कुछेक पल तक स्थिर भाव से मुंह की ओर ताकता रहा । फिर उठकर उसका हाथ पकटकर बोला था, "मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ, गुप्टा !" कृष्णेन्दु ने कहा था, "पाशा करता हूं रीना के साथ विवाह करने में आपको अब कोई प्रापत्ति न होगी।" "बिलकुल नही । बहुत ही सुगी-खुशी स्त्रीकृति दूंगा।" "ठीक है, ग्राज ही मैं चर्च जा रहा हूं।" "कहो तो मैं तुम्हारी सहायता कर सकता है।" चहुन प्राभारी होऊंगा, मिस्टर ब्राऊन !" ब्राउन की मदद में उसका धर्म-परिवर्तन बहुत ही प्रासानी मे हो गया था। धर्म-परिवर्तन के बाद ब्राउन ने कहा था, "यू रन अप टु रीना । त्रिंग हर वक।" पॉली ने कहा था, "वह रोती-रोती गयी है। अव हमी-खुशी लोट प्राये।" कृष्णेन्दु ने कहा था, "कल जाऊँगा।" वह अपने घर लौट आया। एक दिन पहले ही उसने धर्मतल्ला में नया घर ते लिया था-रीना के साथ गृहम्थी वसाने लायक घर । जहाँ पहले रहता था वहीं ईसाई होने के बाद वह नहीं रहना चाहता था । 1 पडोसी बड़ी निप्युरता से चोट पहुंचायेंगे। मन में एक प्रश्न उठा था । धर्म पदि ईश्वर देता है तो इतना अनुदार क्यों है ? प्रेमहीन क्यों कर देता हूँ मनुप्प को ? एक क्षण में ही इतने दिनों का प्रेम-स्नेह सब मिट गया? सब मिट गया ? ईश्वर क्या प्रेमहीत, प्रीतिहीन, लेहहीन है ? वह वया विद्वेपी है ? वह क्या चोट पहुंचाता है ? मन जाने कैसा हो गया धा? धर्म को वह नहीं मानता । ईश्वर नहीं है इस बात को वह अटल सत्य समझता है । तो भी हिन्दू धर्म छोड़ ईसाई धर्म ग्रहण करके मन जाने कसा हो गया ! सारी रात वह बरामदे में डेक चेयर पर बैठा रहा। न्यू टेस्टामेण्ट लेकर पढ़ने की कोशिश की, पर मन नहीं लगा । रीना की तस्वीर लेकर उसे निहारता बैठा रहा। मन तव फिर उत्साह से भर उठा । सारी रात रीना के साथ व्याह के स्वप्न देखता रहा । वह उठा । प्रासनसोल, उसे प्रासनसोल जाना है-रीना के पास । सुबह की धूप उसे सोने की मालक जैसी जान पड़ी। पृथ्वी मिट्टी है । पृथ्वी कठिन है । सूर्य का आलोक सोना नहीं है, बड़ा उत्तप्त है । मनुप्य का सबसे बड़ा सर्वनाश उसकी प्रात्म-प्रवंचना में है । उसने अपने साथ जितना छल किया है, उससे अधिक और किसी ने नही किया। मिथ्या को सत्य समझ उसके पीछे घूमते-घूमते थककर एक दिन वह मुंह के बल गिरता है और हाहाकार करता हुआ मरता है। उनी मिथ्या के मोह से वह सोने को मिट्टी कहता है । मुख का कोर फैक उपवास द्वारा निज को पीड़ित करता है। रीना की वह दृष्टि, वह स्तम्भित, विस्मय-भरा मुख अाज भी उसे याद आता है। पालनसोल पहुंचकर रीना उसे सामने ही मिली थी। रेवरेण्ड अर्नेस्ट के बंगले के बाहर बड़ी उदास दृष्टि में आकाश की और ताक रही थी। कृष्णेन्दु ने उल्लास से उच्वसित होकर उसे दूर ने पुकारा था, "रीना! ना !" रीना चौंक गयी थी । अस्फुट स्वर में कह उठी थी, ''कृष्णेन्दु !" ६४ / सप्तपदी । "हाँ रीना, मैं कल बंप्टाइज हो गया । तुम्हें लेने पाया हूँ . अब और कोई बाधा नहीं है । तुम मेरी हो! यू पार माइन !" रीना में विचित्र रूपान्तर होने लगा । कृष्णेन्दु उसका हाथ पकड़ते- पकड़ते ठिटककर रुक गया । रीना जाने कैसी हुई जा रही थी। अपलक दृष्टि स्थिर हो गयी- उसके मुख के कपर गड़ी हुई, तो भी मानो उसे देखती नहीं। उसके यौवन-माधुर्य से प्रदीप्त मुख पर कौन-मे शब्द लिखे दीख रहे हैं। मस्तक पर, मृकुटी पर, दोनो होटो पर हलकी रेखानों में मन के स्तम्भित विस्मय के साथ-साथ और भी दुर्योध्य कुछ प्रगट होता जा रहा है । उसमें विचित्र दृढ़ता है तया विचित्र कुछ और है । महिमा? हां वही। धीरे-धीरे रीना ने कहा था, "तुम ईसाई हो गये ? मेरे लिए ?" "हां, रीना!" "अपने धर्म को, अपने ईश्वर को तुमने त्याग दिया ? मेरे लिए ?" "रीना, क्या कह रही हो?" "तुम समझ नहीं पा रहे हो?" "समन रहा हूँ। मैं तुम्हारे लिए प्राग दे सकता हूँ रीना !" "लाइफ इज मॉर्टल । प्राण नश्वर हैं । एक दिन वह जायेंगे ही। असंख्य प्राण दिन-रात पा रहे हैं कृष्णेन्दु, जान-बूझकर प्रादमी मरता है, जहर खाता है, गले में फांसी लगाता है, प्रादमी पादमी को मारकर स्वय मरता है । कृष्णेन्दु, उस दिन यहाँ से थोड़ी ही दूर पर हजारी बाग में एक आदमी मेर को मारने के प्रयत्न मे स्वयं शेर के हायो मारा गया । जॉन क्लेटन प्रायद किसी युद्ध में गोली के सामने खड़ा होकर प्राण देगा। मजबूर होकर देगा । इस भांति प्राण देना नशा है कृष्णेन्दु ! मुझे प्रभु ने प्राण दिये हैं, ईश्वर के लिए, धर्म के लिए। मेरे लिए तुमने उसी धर्म को, अपने विश्वास के ईश्वर को छोड दिया कृष्णेन्दु ! फॉर ए गलं ? फॉर दीज़ प्राइज प्रॉफ माइन विच यू सो एडोर !" पहले तो कृष्णेन्दु रीना इस माकस्मिक माक्रमण से विचलित हो गया था। इस रीना को उसने प्रान पहली बार देखा। धर्मान्यता में उस, पागल ! उसने अपने को संदरण करते हुए मै रोककर या, .
"डोण्ट वी सिली, रीना !" "सिली?" प्रदीप्त हो उठी थी रीना। कृष्णेन्दु ने भी दृढ़ स्वर में कहा था, "येस ! सिली। क्योंकि रीना, मनुष्य किसी एक धर्म का अवलम्बन करता है, उसका अतिक्रमण करके मार्वजनीन मानव-धर्म में दीक्षित होने के लिए। इन एक धर्म की कट्टरता और बन्धन में बन्दी की भांति बंधे रहने के लिए नहीं।" "येस ! मानती हूं। सुना है, पर समझ नहीं पाती। नहीं समझ पाती । इतना कह सकती हूं कि जो लोग वहां पहुंचने की कोशिश करते हैं वे किसी एक व्यक्ति को पाने के लिए ऐसी तपस्या नहीं करते। वे तपस्या करते हैं सब मनुष्यों को प्रात्मीय रूप में प्राप्त करने के लिए । एक नारी के प्रागे अपने-अापको समर्पण नहीं करते कृष्णेन्दु, सब लोगों के बीच अपने-ग्रापको विलीन कर देते हैं, ढाल देते हैं । ईश्वर बड़ा पवित्र है, बड़ा मूल्यवान है । उसका तुमने परित्याग कर दिया कृष्णेन्दु ? मेरे लिए ? नहीं, नहीं ।" "यह तुम क्या कह रही हो, रीना?" रीना फिर स्थिर दृष्टि से उसकी अोर ताकती रही। "रीना !" रीना ने कहा, "नहीं, मेरे लिए नहीं। जिस सौन्दर्य से तुम प्रेम करते हो उसी सौन्दर्यमयी एक नारी के लिए।" उसका गला रुंघता जा रहा था। इस बार अांखों से जल बह निकला। कृष्णेन्दु ने व्याकुल होकर उसका हाथ पकड़ते हुए कहा, 'रीना" "छोड़ दो । लीव भी ! डोण्ट टच मी । प्लीज़. "प्लीज !" "रीना !" निरुच्छ्वास क्रन्दन के साथ रीना ने कहा था, "तुम भयंकर हो, कृष्णेन्दु, तुम भयंकर हो। एक नारी के लिए तुम अपने ईश्वर को छोड़ सकते हो । कृष्णेन्दु, मुझसे सुन्दर नारियां बहुत हैं । तो फिर उनमें से किसी को जब देखोगे, सम्पर्क में प्रायोगे, उस दिन तुम मुझे भी तुच्छ वस्तु की भांति छोड़कर चले पायोगे। ईश्वर, जिस ईश्वर को तुम इतने दिन अपना एकान्त प्रात्मीय मानते आये हो, जिसे प्यार करते रहे हो! ६६ / सप्तपदी - ग्रोह ! तुम जानो ! तुम जानो ! मैं तुम्हें प्यार करती है। पर नहीं, विवाह में नही कर सकेंगी। तुम भयंकर हो !' कृष्णेन्दु पत्थर हो गया ! स्थिर स्तब्ध भाव से खड़ा रहा । रीना ये शब्द कहकर ही बंगले के भीतर चली गयी थी। बरामदे मे वृद्ध पादरी खड़े हुए थे। मायद वे इन दोनों को दातचीत के बीच नही पाना चाहते थे। अब वे उतर आये । "यंग मैन ! "गुड मॉनिग, फादर !' "गुह मॉनिग । बैठोगे-आराम करोगे?" "यंक यू, फादर ! बहुत-बहुत धन्यवाद ! इसकी जरूरत नही । मैं नवस्ट ट्रेन पकडना चाहता हूं।" वह बाहर निकलकर चला पाया था। यही रीना ब्राउन ! जिसने इसके बाद वक्ष पर क्रॉस लटका लिया था और जो केवल होली वाइबिल हो पढ़ती थी, बही रीना ब्राउन ! जिस रीना ब्राउन ने जीवन-भर अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा की थी, वही रोना बाउन! उसने उन्मादिनी की भांति दाराव और व्यभिचार में अपने-आपको बहा दिया है । अमरीकी अफसर के जीवन के परमात पूरा कर लेने के उच्छृखल उल्लाम मे प्रात्म-समपंग करके भटक रही है, वह रही है । शायद स्मृति भी नष्ट हो गयी है। 'प्रॉथलो' की बात भी उसके मन से मिट गयी है । कहने से भी याद नहीं आती, भौहें चढ़ाकर देखती रहती है, अन्तस्तल से सहन न कर मकने के इंगित तीसी दृष्टि में झलक उठते हैं । और कृष्णेन्दु ? उसने कृष्णस्वामी होकर इस जंगली इलाके में रोगियों को चिकित्सा और कुष्ठ रोगियों की सेवा में अपने प्रापको विलीन कर दिया। रीना ने कहा था, "धर्म-विशेष को छोड़कर मनुष्य निर्विरोप मानव-धर्म में पहुंच गया है । मानव एक व्यक्ति के लिए नहीं, एक नारी अथवा एक पुष्प को पाने के लिए नहीं, सब मनुष्यों को प्रात्मीय रूप में 'पाने के लिए है।" अब वह केवल रेवरेंड कृष्णन्दु गुप्त नहीं है । वह ईसाई है, वह भारतीय संन्यासी है, वह रेवरड कृष्णस्वामी है। जिस ईश्वर की उपेक्षा करने के कारण रीना को उससे भय हुआ था, उस ईश्वर को पाना ही होगा । उत्ती को उसने खोजा है । उसका पता उसे मिल गया है। मनुष्य की भौतिक देह में उन्हें उसने तपस्यारत देखा है। चिद्विभ्रान्तिकारी महासत्ता । मनुप्य विराट् महासत्ता की दीक्षा लेगा। शुद्ध पवित्र ममता से कोमल, सत्य से निर्मल और प्रेम ने परिशुद्ध अहिंसक । इस युद्ध के समय भी वह तपस्या को डुबाकर समाप्त नहीं कर सका । तापसी की भांति वह उसे निगलने की कोशिश करके भी निगल नहीं सकी। विचित्र विस्मय यह है कि उसे उसी ईश्वर की खोज में लगा देखकर रीना को प्राज भय हुआ, वह संकुचित हो उठी, हिंस्र हो उठी-मनुप्य को देखकर सरीमृप की भांति । पाश्चर्य है, वह निर्मल ग्रालोक-सन्धानी रीना-याज इस युद्ध में जो उन्मादिनी तामसी प्रकट हो रही है, जो सारी तपस्या को भ्रष्ट करना चाहती है, ईश्वर की हत्या करना चाहती है-उसी तामसी की कोतदासी है रीना, क्रीड़ा-संगिनी है, प्रेतनी है । वल्कि शायद उसी की प्रतीक है। हे भगवान् ! ओह गॉड ! रीना-अचानक जीप की गड़गड़ाहट से उनका विचार-सून टूट गया। जीप ! वह अस्त हो उठे। जीप के साथ रीना का अस्तित्व मानो मन के भीतर जुड़ गया है--विजली की चमक के साथ मेघ-गर्जन की भांति । वह उठ खड़े हुए। अचानक नजर पड़ी कि बंगले के मन्दिर के छोर पर फोजी पोशाक पहने कोई धूम रहा है, बाइनॉकुलर से कुछ देख रहा है। प्रमोद-भ्रमण और उल्लास, उच्छृखलता और उन्मत्तता । तामसी रीना साथ है। निश्चय । भयात की भांति कृष्णस्वामी चल पड़े-पक्की सड़क पर नहीं, रोतों-तों पाकर जंगली रास्ते पकड़ते हुए। ६८ / सप्तपदी . छः कृष्णस्वामी जंगल मे होकर चले जा रहे थे। तेज चाल से ही चल रहे थे। बहुत देर हो गयी है । कोई सात बजे होंगे। मरीज प्राकर बैठे होंगे। बीमार इन्सान । उनका बस भगवान ही है । लमिद मार दि पुअर इन सिरिट : फॉर देयर इज दि किंगडम ऑफ हैवेन । वे ही भक्त हैं । "माहं वसामि वैकुण्ठ योगिनां हृदये न च ।" नक्तों के हृदय में वाम 'करता हूं । वे लोग अनिक्षित होकर भी भगवान् को भक्ति करते है । अंधेरे में रहकर भी वे आलोक को कामना करते हैं । वे जीवन का प्रकाश चुझाकर अंधेरा नहीं करते। प्रकार के प्रभाव में ही प्रकार प्रकार कहकर रोते हैं । उनके भीतर ईश्वर की तपस्या है । जंगल में कोई फूल खिला है । गन्ध उड़ रही है । पक्षी कलरव कर रहे हैं । मूरज माज बादलो के पीछे छिपा हुआ है । वनभूमि वां को अामा में उन्मुख है । कृष्णस्वामी प्रत्येक पत्ते के भीतर उद्भिद प्राणों की च्याउल प्रत्याभा का अनुभव करते हैं । "हेलो, डू यू हियर ? हैलो?" कृष्णस्वामी चौंक उठे । नारी का कण्ठ-स्वर, रीना ब्राउन की आवाज इम जंगल में ? इतनी सवेरे घर-उधर ताकने पर वृष्णस्वामी ने देखा कि रोना बाउन जंगल के भीतर एक खुली जगह में अकेले वडे गाल वृक्ष के तने का सहारा लेकर धंठी है। पास में एक फ्लास्क रखा है, हाथ में सिगरेट है । पोशाक वही है। कृष्णस्वामी ने सिर्फ कहा, "येस ?" "कम हियर, सिटाउन । हेव ए हिन्क, ए स्मोक ।" "प्राई डोण्ट ड्रिन्क, प्राई होष्ट स्मोक । येक यू।" अव रीना चीख उठी, "कृष्णेन्दु !" कृष्णस्वामी ने हंसकर कहा, "मेरे रोगी बैठे होगे रीना, मैं चलूँ । मुझे क्षमा करो।" उसके बाद फिर वोले, "तुमने पहचान लिया रीना? कल सोचा था कि तुम्हारी स्मृति भी क्षीण हो गयी है।" "हो गयी है । वहृत-कुछ हो गयी है । पर 'प्रॉयलो' नहीं भूल सकी।
को नुक ऐट युअर ग्राइज, लुक इन माई फेस' कहकर जैसे ही तुमने
गोर देखा, तभी मैं तुम्हारी दृष्टि को पहचान गयी थी, पर।"
रीना सिगरेट का कश खींचने लगी। बहुत शराब पीने के कारण
उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मैं चलूं रीना!"
"तुम यहाँ क्या कर रहे हो? यह कैसी पोशाक है ? यह क्या चेहरा
। रखा है ?"
"मैं क्रिश्चियन संन्यासी हूं रीना ! भारतवर्ष का संन्यासी ! संन्यासी
कर जो किया जाता है, वही कर रहा हूं। ईश्वर को खोज रहा हूँ।
चश्य ही, मनुष्य की सेवा में से । मैं डाक्टर हूँ, बीमार होने पर उनका
लाज करता हूँ। पर असली इलाज कुष्ठ-रोगियों की चिकित्सा का ही
रीना के हाथ से सिगरेट गिर पड़ी। एक लम्बी सांस छोड़ते हुए बोली,
"जीवन नष्ट कर रहे हो कृष्णेन्दु ! प्राइ ऐम दि कॉज़, पाइ ऐम दि
पॉज..."
।"
"नहीं, मेरा जीवन नष्ट नहीं हुआ
"पाइ ऐम ग्लंड।"
"मैं चलूं । गुड वाई।"
"एक मिनट ! मेरी कोई बात नहीं पूछोगे ?"
"नहीं, तुम्हारा हाल तो तुम्हारे रूप से ही प्रकट है रीना ! और
क्या पूर्वी ?"
"ईश्वर नहीं है कृष्णेन्दु ! मैंने तुमसे ग़लत कहा था। दुख पहुंचाया
था। ईश्वर नहीं है।"
रीना ब्राउन उठकर खड़ी हो गयी। "मैं कहती हूँ, ईश्वर नहीं है।
नथिंग इज सिन-पाप नहीं, ईश्वर नहीं।"
उसका कण्ठ-स्वर तीव्र हो उठा।
"तुम यह सब छोड़ दो कृष्णेन्दु ! जीवन को नष्ट मत करो । लौट
जानो, नया जीवन प्रारम्भ करो।"
"तुम्हारे साथ ?"
७०/ सप्तपदी
रीना द्राउन 'ही-ही' करके हंस उठी। तीन तोदण वीभत्स हेसी । हंसी रोककर बोली, "मेरा दाम बहुत है कृष्णेन्दु ! तुम्हारा दाम मेरे लिए उस दिन से भी कम । उस दिन भय हुधा या ।माज करुणा होती है। हामलेस, टोसाइल, वयंलेस, आस्तिक, ईश्वर-खोजो तुम, निर्दोष तुम, मूसं तुम, मेरी घृणा के भी पात्र नहीं हो, करणा के पार !" कृष्णस्वामी ने और कोई बात नहीं कही, प्रागे वह गये । पीये मे तीन चीत्कार करके रीना वोली, "मुनो मेरी बान । सुनो। यू मस्ट लीव दिस प्लेस । यहाँ तुम नहीं रह सकोगे । चले जाओ । बहुत कृष्णस्वामी घूमकर खड़े हो गये । रीना की ऐसी तीव्र उग्र मूर्ति उन्होंने कभी नहीं देखी यो । उसको धनी काली बड़ी-बड़ी वरौनियों को स्वप्निल वैप्टनी के भीतर नही हुई काली आंखें ऐमी ज्वलन्त हो सकती हैं, यह उनके लिए कल्पनातीत था। उसकी दोनों प्रौखें जल रही थी, भकभक कर रही थीं। रीना ने कहा, "तुम्हारा वह वंगला मुझे चाहिए । में वहां रहूंगी। बहुत दिन रहूंगी । तुम्हें मैं सहन नहीं कर सकती । तुम्हें यह इलाका छोड़कर चले जाना होगा। यू मस्ट । नहीं तो मैं उन्हें भड़का दूंगी । वे लोग तुम्हें, वे लोग क्यो, मैं ही तुम्हें गोली मार दूंगी।" कृष्णस्वामी कोई उत्तर न देकर चुपचाप फिर चल पड़ें। फिर नहीं लौटे । भय उन्हें हुप्रा-~अपने लिए नहीं, उस झुमकी के लिए और सिन्यु के लिए। रीना वाउन प्रेतिनी की भांति पेड़ के नीचे खड़ी शायद निष्फल माक्रोश में उबल रही है, मायद फ्लास्त खोलकर मराव पो रही है, यह मनुमान करने में उन्हें तनिक भी दिलम्ब नही हुमा । उन्होंने तय किया कि मुमकी और सिन्धु गांव के भीतर जाकर रहेंगी । लालसिंह उनकी रक्षा करेगा । वह भी चला जायेगा । वह अकेले रहेंगे। उन्हें कोई भय नहीं । भय कृष्णेन्दु को कभी भी नहीं रहा । कृष्ण- स्वामी होकर ईश्वर को सोजते फिरते हैं । उन्हें मृत्यु मे क्या भय होगा?
1 है मृत्यु । अन्याय का सामना करते हुए वे मरेंगे। प्रेतिनी रीना ब्राउन भय से वे भाग निकलेंगे? रात के नौ बजे होंगे। वह बैठे हुए थे। हर जीप अथवा मोटर की वाज ने योड़े सजग हो उठते थे। बीच-बीच में दीर्घ निस्तव्यता के चमेघाच्छन्न अाकाश की ओर देखकर सोचने लगते थे। प्राकाश वर्मा बादलों से भर उठा है। आज शायद वारिश होगी। क्षितिज पर हल्की-सी विजली चमक रही है। पर वह यह बात नहीं सोच रहे थे । सोच रहे थे निप्कलुप पवित्रता की प्रतिमूर्ति रीना की वात । प्रेतिनी रीना ब्राउन की बात। प्रेतिनी नहीं, साक्षात् तानती हो उठी है आज रीना द्वान! रात तामसी नहीं है। रात के अंधेरे में जीवन के भीतर से ही तामसी निकलकर आती है । भौतिक जगत् में विक्षोभ के कारण बिना, अनियम हुए बिना, वह नहीं जागती। विक्षोभ निटाते ही वह शान्त हो जाती है, स्थिर हो जाती है। जीवन के भीतर ही वह सदा जागृत है, चेतना के भीतर ही वह दिन-रात सक्रिय है । सुप्ति के बीच वह एक दुःस्वप्न अवकाग-विधाम के बीच वह कुटिल कल्पना है। वह मनुप्य को शान्ति के रास्ते पर, सुख के रास्ते पर, चैतन्य के रास्ते में नहीं बढ़ने देगी। निष्ठुर पाकोश ने अजगर की भांति पीछे से सींचती रहती है, निगलना चाहती है । एक बार पकड़ लेने पर निगले विना शान्त नहीं होगी। उस समय प्रायः साधी रात बीत चुकी होगी। कृष्णस्वामी को झपकी- सी आ गयी थी। टॉर्च की रोशनी में झपकी टूट गयी। वे उठकर चैट गये। "शीन ?" दूर क्षितिज पर बिजली चमक उठी। उस क्षणिक प्रकाश में उन्हों देवा, हां सचमुच वही है । दीर्घागी नारी-मूर्ति बढ़ी पा रही है । थोड़ थोड़ी लड़खड़ा रही है । नीना ग्राउन ने उत्तर दिया, "मैं ! देखती हूँ मेरी प्रतीक्षा कर रहे हो!" "कर रहा हूं। सिर्फ तुम्हारी ही नहीं, तुम्हारे साथ और भी ल की प्रतीक्षा कर रहा था, जो लोग मुझे डराते; यह घर छोड़कर - ७२ / सप्तपदी जाने के लिए कहते। मैं समझ गा हूं कि इस मकान को चाहे इतनी जरूरत तुम्हें न हो, पर उसमें भी अधिक तुम्हें मुझे यहां में भगाने की जरूरत है । तुम्हें चंन नहीं मिल रहा है। पर क्यों ?" एक कुरसी पर बंकर रीना बोली, "पू मन्ट गो प्रवे मॉम हियर । तुम्हें जाना ही पड़ेगा।" "नोपाई मस्ट नॉट गो। मैं ईश्वर की नाधना में शपथ लेकर यहां प्राया हूँ।" "स्टाप !" रीना चीख उठी। मासमान के वादलों कीमोर देखकर वह बोली, "सब भूठ है। ईश्वर नहीं है। कभी या या नहीं, में नहीं जानती। था भी तो वह मर चुका है। इन्मान ने उनै मार डाला है । मेरी मोर देखो । मैंने उसे मार डाला है । प्रादिम युग के मनुष्य की भांति उसके शव को ममी की भौति चिपकाकर मत बैठो। जो मर चुका है वह -बच नहीं सकता।" "तुम अाज चाहे जो हो गयी हो रोना, नुम ईनाई हो।" "नहीं, नहीं, नहीं । में ईसाई नहीं हूँ।" "रीना!" "कभी नहीं थी । अपना गाँउ, अपनी दाइबिल में फेंक चुकी हूँ। मैं कभी वैप्टाइज नहीं हुई। मेरे पिता ने मुझे भी दीक्षा नहीं लेने दी। मेरा कोई धर्म नहीं । पिता चाल्लं बाउन अग्रेज थे, धर्म में ईमाई। पर अत्याचारी जमीदार । मेरी मां होदेन, हिन्दुमी में भी जंगलो अछूत जाति की स्त्री। वासना पूरी करने के लिए पिता ने उमको उप-पत्नी के रूप में गया था, उसको खरीद लिया था। मैं उन्ही की जारज सन्तान हूँ। कृष्णेन्दु, वही ग्राया, यही कुन्ती मेरी मां थी।" बिजली की चमक के साथ मेघगर्जन ठीक उसी क्षण रीना की बात की प्रतिध्वनि की मांति गूंज उठा। कृष्णेन्दु वजाहत की मांति स्तम्भित हो गया। कोई यात, एक विस्मयमूचक मर्मान्तक ध्वनि तक उनके मुंह से नहीं निकली। रीना हेम उठो । अचानक हती रोककर कन्धे पर लटके हुए पलास्क में थोड़ी-सी भराव पीपर बोली, "और सुनोगे? और भी बहुत है। मेरी वह मां कुन्ती, वह उसी मेदिनीपुर मे, जहाँ बाटन को . - - - - जमींदारी थी, वहीं के जंगली इलाके के एक पुराने क्षत्रिय ठेकेदार की रखेल की, एक ऐसी ही जंगली स्त्री की, लड़की थी। ठेकेदार को रखल एक ब्राह्मण के व्यभिचार का फल थी । और भी सुनोगे ? काली औरतों के रक्त के माय बहुत-सा गोरे रंग के लोगों का रक्त भी मिल गया था। सबके अन्त में गोरे अंग्रेज का रंग ! यह सारा मेरे भीतर प्रकट हुआ। काले वाल, बड़ी-बड़ी आँखों की पलकें, काला रंग । रंग-रूप मेरा जो भी हो, मेरा क्या कोई धर्म है, मेरा क्या कोई ईश्वर है ? ईश्वर की, धर्म को मैं जीवन्त समाधि हूँ। मृत ईश्वर मेरे भीतर सड़ रहा है । बदबू उठ रही है।" अचानक रीना शान्त हो गयी। कुछ देर स्तब्ध भाव से ही बैठी नही। कृष्णस्वामी को लगा कि उसकी आंखें भर आयी हैं। उन्होंने कहा, "तुम रो रही हो?" "रो रही हूँ ? लुक," उसने टार्च जलाकर अपने मुख पर डाला। नहीं, रीना रोयी नहीं थी। उसकी दोनों आँखें नशे से लाल थीं। दृष्टि' असहनीय तीव्र थी। "मेरी आँखों का पानी बहुत दिन पहले सुख चुका है। मरुभूमि हो गयी हैं वे । बहुत रोने से पानी खत्म हो चुका है ।" धीरे-धीरे रीना ने कहा, "सब तुम्हारे कारण कृष्णेन्दु, यू पार दि कॉज, यू पार दि कॉज । प्राज खुल्लम-खुल्ला तुम्हारा नाम लेकर ही पाहती हूँ, यू पार दि कॉज।" रीना थोड़ा हंसी । सायद 'प्रॉयलो' के उस दृश्य के अभिनय की सुखद स्मृति ने क्षण-भर के लिए थोड़ी-सी मधुरता पा संचार कर दिया। "तुम्हारे जैसे प्रिय व्यक्ति को लौटा दिया था, केवल इसलिए कि तुम ईश्वर में, धर्म में हृदय से विश्वास नहीं करते थे। कल तुम्हारे साथ नेंट होने के बाद से ही सोच रही हूँ कि उस दिन स्वयं को छोड़कर अपने ईश्वर को, अपने सारे धर्म को तुम्हें दे दिया था। मेरे अनजान में ही तुम मेरा सब-गुर टीन लाये थे।" फिर कुछ देर शान्त रहकर बोली, "प्रासनसोल ने लौट आयी ।। । ७४ / सप्तपदी ईश्वर और धर्म से मुझे इतना प्रेम या कृष्णेन्दु, कि अन्तर मे हाहाकार उठने पर भी मैं रोयी नही । संकल्प किया था कि सारा जीवन 'मन' होकर काट दूंगी । ब्राउन साहब ने उसे पिता कहते मुझे घृणा होती है कृष्णेन्दु, तुम्हारे बारे में पूछा। 'वह कहाँ है ?' मैंने कहा, 'मैंने उसे अस्वीकार कर दिया। उसने पूछा, 'क्यों ? वह ईसाई हो गया है, तुम यह नहीं जानती ? उसने तुम्हें नहीं बताया ?' मैंने कहा, 'बताया है।' उसने पूछा, तो फिर?' मैंने तुमने जो-कुछ कहा था सब उसे बता दिया । कृष्णेन्दु, एक पल में उसका मुखौटा उतर गया। चीखकर बोला, 'वेस्टर्ड ... बिच !' उसके वाद अनर्गल, गन्दी भरलील गाली-गलौज । बोला, "क्रिश्चियन यू क्रिश्चियन ? डू यू नो, वह हीदेन कुन्ती, बल्कि होदेन लोगों में भी मधिक घृणित-लगातार तीन पीढ़ियों से बैस्टई-वहीं तेरी मां है ?' बोला, 'जिन्दगी में पल भर की दुर्बलता ने मुझमे इतनी बड़ी गलती करा दी । तेरा गोरा रंग देवकर मैं भूल गया । तुझे बचाकर रखा।' रीना ने एक सिगरेट मुलगा ली। उसके बाद फिर बात शुरू करते ही ठिठककर आकाश की और देखती हुई वोली, 'इट्स रेनिंग । पानी बरसने लगा।" हंसकर बोली, "मेरी कुन्ती मां कहा करती थी, अरे मेह मा गया !" कई-एक वडी-बड़ी बूंदै कृष्णस्वामी के माथे पर, हाथ पर भाकर गिरी । दूर मे सां-सां की आवाज उठ रही थी । बरसात का जलप्लावन । मृदु मन्द हवा वह रही है। कृष्णस्वामी ने कहा, "भीतर चलो रीना !" "कमरे के भीतर? चलो ! पर उसकी जरूरत ही क्या है ? मैं चलती हूँ। बस इतना कहे जाती हूँ, तुमसे कह चुकी हूँ भोर फिर कह रही हूँ. यहां से तुम्हें चले जाना होगा । मुझे चैन नही मिल रहा है। यू मस्ट।" "वह सब होगा रीना ! पर इस बारिश में, रात के अंधेरे मे, कहाँ जानोगी?" "भीगती-भीगती चली जाऊँगी। मुसीबत मुझे अच्छी लगती है, कृष्णेन्दु । पहले प्राधी-पानी से डर लगता था । अब प्रानन्द मिलता है।
आई फियर नो डार्कनेस, माई पिर नो स्टॉन, आई फियर नो पण्डर, लेनी गो । बट यूनस्ट लीव दिस प्लेस।" "नहीं, नहीं, कठो! कमरे के भीतर पाकर महिम लालटेन को कृष्णस्वामी ने ऊंचा किया। "नो," कहती हुई रीना ने प्राफर रोशनी को कम करके दुना दिया। बत्तो गिर गयी । “धेरा'अंधेरा अच्छा है। जानते हो, ब्राउन से सारी वात सुनने के बाद तीन दिन तक मैं अंधेरे में पड़ी-पड़ी रोती रही थी। दरवाजे, खिड़कियां बन्द कर ली थी। रोगनी नहीं जलायी थी। अपनी और ताकने में मुझे भय होता था। और मेरे साथ-साथ लगातार रोती पी मेरी मां कुन्ती । ब्राउन ने मैं घृणा करती हूँ । कुन्ती से घृणा नहीं कर सकती। हतभागिनी ! ब्राउन के डर से भयभीत भूम जन्तु की भांति आजीवन मेरी माया बनकर रही, किसी दिन मुझे बेटी मकर एका स्नेह-अद्धा मुन्से न मांग सको। अंधेरे में हम दोनों रोती थीं। अपने लंक के भय मेरी नाता के परिचय की बदनामी बाद में उसे लगे, मुझे लगे, इस लज्जा से-वाउन ने मुझे ईसाई धर्म में दीक्षित तक न किया था . मुझे नर्सरी में भेज दिया। किन्तु मेरी मां के पास तब भी प-चीवन था। उस रूप में एक वन्य प्रारूपण था। विचित्र वा वह माकपंण। मेरे बालों में, सांखों में, पलकों में उनकी छाप नौजूद है । उसे भी द्राउन ने निकाला नहीं। उसे तो उसने खरीद ही लिया था। उसका भोग करता था, वर्वर को भांति। निदिचयन ! कान्ट ! नन प्रॉफ गॉड वह थे, कॉस पर विवकर मारे गये थे। उन्हें रोमन साम्राज्यवादियों ने मार डाला था। लोगों का विश्वास है कि वह फिर ने जीवित हुए थे। हुए भी हों तो सान्त्राज्यवादी अभी मरे नहीं हैं। वे उन्हें नित्य क्रॉस पर लटकापार मार रहे हैं।" रोना हनी। हनकर बोली, "पर ये लोग एक जगह नहान् है । पलटन ने मुझ व्याह करना चाहा था, पर इन गुरु अंग्रेज जनींदार ने प्रसनी सन्धान्तता कायम रखते हुए मेरा सारा हाल उसे पता दिया था। पटन के पिता ने बाउन को धन्यवाद दिया था। तुम हीदेन होसलिए - ७६ सप्तपदी तुम्हें सब बात बताने की जरूरत भी उसने नहीं समझी । मैं ईसाई नही हूं, तो भी तुम्हें ईसाई बनाये बिना मेरे साथ विवाह करने की मनुमति नहीं दी। मैं हीदेन के गर्भ से उत्पन्न लडकी हूँ, मुझे खेलने के बहाने धाईबिल और कौंस दिया था। बाहर अब मूसलाधार वर्षा होने लगी थी। चारों ओर के विशाल मुदीर्घ मालवन के पत्तों पर पानी गिरने के शब्द में चारो और मप- मल्लार-जैसा मंगीत वज उदा या विचित्र भरता हुमा-सा संगीत । मंमार के और सब गद डूब गये थे, यहाँ तक कि जीप अथवा मोटर की नावाज भी अच्छी तरह नहीं सुनायी पड़ती थी। अचानक रीना उठ पड़ी। वह खिडकी के पाम जाकर खड़ी हो गयी। बिडकी में से बाहर की और तारती हुई रुक-रुताकर कहने लगी, "कितनी सुन्दर रात है ! लगता है इस संसार में तुम्हारे और मेरे सिवा और कोई नहीं है, कुछ नहीं है।" कृष्णस्वामी स्तब्ध रीना की कहानी सुनते-सुनते वैसे ही स्तब्ध बैठे थे । वेदना और करुणा से उनका अन्तर प्रसन्न हो गया था । बाहर की इस सजा हवा के प्रवाह की भौति हाय-हाय कर रहा था । वैसे ही रो भी रहा था। हे भगवान्, तुम उसके अन्तर में फिर से जाग उठो ! उसके हृदय की समाधि को तोड़कर जाग उठो ! अपने स्पा से, कुष्ठ रोगी के निरोग होने की भांति ही कठिन आघात से विकृत व्याधिनस्त अन्तर को स्वस्थ मुन्दर बना दो रीना सुन्दर है, अब भी सुन्दर है । अाज भी उसके सर्वाग में वही माधुरी है, माज भी उसको दीर्घ धनी काली पलको में जडी हुई दोनो काली प्रांखें मानसरोवर की भांति स्वच्छ और गम्भीर हैं। प्राज भी उसने अाकाश की नील मामा को प्रतिविम्बित करने की शक्ति नहीं लोगो है । तुम बादलो को काट दो, हटा दो । हे ईश्वर ! धीरे-धीरे मागे प्राकर उन्होंने कहा, "रीना, तुमने यरावर ईश्वर की समाधि रचने की चैप्टा की है, ईश्वर-विरोधी शक्ति की । पालोक और कालिमा। भला और बुरा। पर बार-बार बुगई हारी है और भलाई जीती है । ईश्वर. उस समाधि को तोडकर फिर से प्रावित हुए हैं । हाय रीना, तुमने बहत दुख पाया है, वहुत वेदना भंती है। मेरा दुर्भाग्य है कि ।
. मैं उस समय दूर था । मुझे पता चलता तो ये दुख तुम्हें न सहने देता। कहता-जीवन, वह तो ईश्वर का अंश है। सृष्टि के भीतर मनुप्य के जीवन द्वारा ही भगवान् बात करते हैं, हंसते हैं, रोते हैं, प्यार करते हैं, स्वयं अपनी बलि देते हैं। विश्व के पागे अपने-अापको समर्पित करते हैं, मनुप्य के भीतर ही वे प्रत्यक्ष हैं । मनुप्य के भीतर जीवन, वह चाहे जहाँ पैदा क्यों न हो, सब जगह पवित्र है। ब्राह्मण नहीं, चण्डाल नहीं, ईनाई नहीं, हीदेन नहीं, धनी नहीं, दरिद्र नहीं। गोत्र, पुल, इतिहास का परिचय हो या न हो, मनुप्य सदा एक-सा पवित्र है, उसके भीतर से ईश्वर सदा एक-सी महिमा में प्रात्माभिव्यक्ति के लिए व्याकुल रहते हैं। तुम्हारे साथ में परम आनन्द से यह तपस्या करता।" फिर पीठ पर हाथ फेरकर बोले, "जिस ईश्वर को तुम समाधिस्थ कर दिया बताती हो, वह फिर उठेंगे । तुम शान्त हो जायो !" "डोण्ट टच मी प्लीज़ ! डोण्ट । डोण्ट, कृष्णेन्दु ! मुझे मत छुओ !" रीना चीस उठी । वह जैसे कोई आर्तनाद था। "पीस एण्ड वी स्टिल, रीना !" ऑथेलो की याद दिलाकर कृष्ण- स्वामी ने उसके हृदय में स्वप्नावेश की स्निग्यता का संचार करने की चेप्टा की। पर रीना अधीर कण्ठ से बोली, "मेरे लिए शान्ति नहीं। मैं स्थिर नहीं हो सकूँगी कृष्णेन्दु ! तुम नहीं जानते । उन सबके ऊपर किसी तरह भी मेरा कोई अधिकार नहीं बचा है। मेरा अन्तर सड़ गया है। मेरे ऊपर शैतान ने फटजा कर लिया है। बहुत कोगिरा कर चुकी हूँ, पर कोई बस नहीं चलता। अराध क्रोध से मेरा हृदय पागल हो उठता है, पारीर में प्रचण्ड विक्षेप जाग उठता है। मुझने नया नहीं जाता। ब्राउन के ऊपर क्रोध और प्राक्रोश से मैं बाहर निकल पड़ी थी । वाइविल को फेंक दिया था । तुमसे मेंट हो जाने के भय से एक जघन्य मोहल्ले में जा छिपी थी। साथ में मेरी मां थी । वह भी ठीक इस रात जैसा ही था- अन्धकारपूर्ण, मूक ! पाप करो, पुण्य करो, किसी का कोई प्रतिवाद नहीं, नियन्त्रण नहीं, वरन् नीरव प्रश्रय है। काले कपड़े की कालिमा में सारे अंग टक जाते हैं, उजागर नहीं होने पाते। मैंने यह जीवन रिपन स्ट्रीट के ७% / सप्तपदी इलाके में गुरू किया, 'नाइट डन' का जीवन, फिटनों के कोचवान, डेन के चेयर जिसके परिचालक थे। वहां से एक होटल मे जा पड़ी। होटल से इस लड़ाई के जमाने में देह वैचती फिर रही हूँ। उन लोगों ने मुझे बांध रखा है।" "रीना !" कृष्णस्वामी सिहर उठे। "नही । किसी को दोप नहीं देती। सब मेरे कर्मों का फल है । मेरा अन्तर मर गया है कृष्णेन्दु वही कद्र के नीचे तुम भी दव गये हो, ईश्वर दब गया है, ईश्वर का पुत्र दब गया है। मैंने अपने हाथों दवा दिया है।" "रीना !" कृष्णस्वामी ने उसका हाथ अपनी ओर खीच लिया। "मुझे चाहते हो ? प्रेम नहीं, देह दे सकती हूँ मैं । प्राण नहीं, मन नही । मन चला गया। प्रेम भी नहीं है । चाहते हो तुम ?" कृष्णस्वामी ने हाथ छोड़ दिया । बोले, "भगवान् नुम पर दया करें..." "नो ! नो ! नो ! वह नाम मत लो?" "मरे हुए से तुम्हे क्या भय है ?" "भय नहीं, घृणा है। सुनो कृष्णेन्दु, तुम यहां रहोगे तो मुझे चन नहीं मिलेगा । तुम्हे यहां से जाना ही होगा। तुम जाम्रो कृष्णेन्दु ! नहीं तो शायद मैं तुम्हें गोली मार दूंगी। अयवा वे लोग मार देंगे। यदि उन्हें यह मालूम हो गया कि तुम्हारे कारण मैं चली जाऊंगी तो वे क्षमा नहीं करेंगे।" कृष्णस्वामी अंधेरे में ही दीवार पर जिधर श्रॉस-विद्ध यीशु की एक मूर्ति टेंगी हुई थी, उघर देख । है अविनश्वर ! अपने-अापको प्रकट करो! "कृष्णेन्दु, जानोगे या नही, बोलो ?" "नही।" "नही ?" "नहीं।" "क्यों ? किसतिए ? मेरे लिए ? मेरी देह चाहते हो?"
. वाहर निकाला। कानों में उंगली डालते हुए कुष्णस्वामी ने कहा, "नहीं । तुम्हारी देह लेकर क्या करूंगा? 'येनाहं नामृता स्याम् किमहं तेन कुर्याम् ।' साथ-साथ अंग्रेजी में अनुवाद करते हुए कहा, "उसका क्या होगा ?" "तो फिर क्यों ? किसलिए?" रीना चीख उठी। "टु वी क्रूनिफाइड अगेन ।" कहते-कहते ही उन्होंने रीना के हाथ से टार्च लेकर जलायी। कॉस- विद्ध यीशु की मूर्ति पालोक्ति हो उठी। अगले ही क्षण रीना ने बड़ी तेजी से कुछ खींचकर पिस्तौल ! पिस्तौल उठाकर गोली चला दी। मूर्ति टूटकर गिर गयी। अगले क्षण पथभ्रष्ट उल्का की भांति रीना बाहर निकल गयी थी। वाहर से सुनायी पड़ा, "कल तुम्हें जाना होगा, यू मस्ट, ऑर यू डाई।" आश्चर्य है, अगले दिन से रीना फिर दिखायी नहीं दी। कृष्णस्वामी कितने ही दिन प्यारा-डोवा गये, कितने ही दिन मोरार की सड़क के चौराहे पर खड़े रहे, कितने ही दिन तक रामचरन के फाटक पर बिना प्रयोजन ही जाकर बैठते रहे। कितनी जी पायीं, कितनी विलासिनी स्त्रियां गयीं। पर रीना उनमें नहीं थी। रामचरन और रामचरन के बेटे ने कहा, "वह मेम कहाँ चली गयी वाचा साहय ?" कृष्णस्वामी क्या वतायें ? कहते, "कौन जाने !" कौन जाने, यह कहां है ! शायद किसी दूर देश में, सुदूर विस्तृत युद्ध-क्षेत्र की सीमा पर रीना तामसी उल्का की भांति तड़पती भटक रही 1 कौन जाने। - पृथ्वी केवल जल और मिट्टी नहीं है । समुद्र, वन, पहाड़-~-इसी के बीच पृथ्वी की सीमा समाप्त नहीं हो जाती। उसका एक ऊर्ध्व लोक भी है। ८० / सप्तपदी - अाकाश में जितनी दूर तक मध्याकर्षण विस्तृत है, वहां तक उसकी सीमा है । फिर मिट्टी के वक्ष के भीतर, अंधेरे गह्वर में उसका एक अघोलोक भी है । पेड़ की जड़ रहती है मिट्टी के नीचे, फूल खिलते हैं प्राकाश में। पक्षी पंख फैलाकर आकाश में उड़ते हैं । अाकाश में पहुंचकर और भी, और भी पर उठना चाहते हैं । पर उनका नीड़ मिट्टी के वक्ष में अटके हुए वृक्ष की डाल पर है, वहां उसे उतरना ही होता है । सरीसृप मिट्टी के वक्ष के अंधेरे गह्वर में रहते हैं। उन्हें बाहर मिट्टी के ऊपर निकलकर भाना होता है-वायु के लिए, आहार के लिए, प्रकाश के लिए। कृष्णस्वामी का मन विहग की भांति अाकाश-विहारी है । आलोक, और भी अधिक पालोक के लिए उसने पंख फैला दिये हैं। रीना ग्राउन ने ही एक दिन यह पख फैलाने की आकाक्षा जगायी थी । मनुष्य के जीवन में घात-प्रतिघात को यह शक्ति कितनी विचित्र है ! पिता जेम्स पाउन के प्राघात से वही रीना ब्राउन मधेरे गह्वर में सरीमृप बन गयो। बचपन में किसी पुराण में पड़ा था कि कोई राजा किसी के अभिशाप से अजगर हो गया था। मां से काजलहारा की कहानी भी सुनी थी। काजलहारा ठीक रीना की भांति स्फटिक की बनी लइकी थी। उसकी सोत ने उसे जादू की लकड़ी से सोपिनी बना दिया था। द्राउन ने धृणा और अमर्यादा की लकडी के आघात से उसे ठीक सांपिनी ही बना दिया है। पर पक्षी को भी तो धरती के वक्ष पर उतरना पड़ता है। सरीसृप को भी धरती के ऊपर पाना होता है । अचानक दोनो को भेंट हो गयी। ठीक वैसा ही। कृष्णस्वामी का रोना ब्राउन के इस जीवन से सम्पर्क ठीक वैसा ही है । अंधेरी रात मे सरीसृप-रूपिणी रीना विहंग कृष्णस्वामी के नीड़ में आकर अपनी विपली सांसो के गर्जन से उन्हे घमाकर चली गयी। फिर भेंट नहीं हुई। कृष्णस्वामी कई दिन तक अंधेरी रात में सरीमृप को प्रतीक्षा करते रहे, पर वह फिर कभी नहीं पायी। कहाँ, किस मुदूर स्थान में नये घरे विहार की खोज मे वह चती गयी है ? कृष्णस्वामी ने आकाश मे अपने पंख फैला दिये । पर, और ऊपर उठेंगे। रीना अपने रास्ते चली । गयी है, वह अपने रास्ते पलेंगे। गोवल बीच-बीच में, आपासमारी विहंग की धरती पर पड़नेवाली दृष्टि की भाति, रीना की बात गाय पाने पर दिगन्त गी भोर तागागार भगवान से उरागे मंगल गी गामना गरो। गाल्याण करो भगवान् । रीना गे गित गो स्पस्थ गारो, शान्त करो ! गुण्ठ- रोगी तुम्हारे पारा आया, गुगने उसे घुमा, उसे नवजीयन प्राप्त हुआ, उसी प्रकार रीना गे गित गो रपरम पारो ! हो, "धी पाउ मलीन !" 'फिर गुल क्षण बार रीना की चिन्ता छोड़कर अपने-आपको गाम में एबो देते हैं । परागण ही साइकिल लेकर निकल पड़ते हैं। गांव-गांव भटगते फिरते हैं।" "गोरो हो तुग लोग राब? ऐ? अजी महागो ! "अच्छे कहाँ बाबा साहब ? गूखा रहकर बचता है इनसाग ! पेट में राच्छग पुरा गया है। लड़ो, लड़की, जानवर-राब ।" "देखता हूँ, देखता, एस० डी० प्रो० से बात गारगे देखता "गिरोसिन तेल और कपड़े की बात गहना बाधा !" "गागा, पर अभी गिसी का हाथ तो नहीं देखना है ?" "यही छोटी-मोटी बीमारी है, यह पया देखेंगे ?" "उस बच्चे की पीठ पर यह दारा गोसाई जी ? पेरू, गं!" अचानमा एन लड़ो की पीठ पर गरदन के पास एगा फोगो सफेद 'पाग पर गार पड़ गयी थी। "यूँ रे लागो, पार पा, दार प्रा, सुन, . . सुन !" "जाता क्यों नहीं रे, हरामजादा बज्जात! दिखाता पयों नहीं ?" देगा-गालगर गाहते, "तभी तो महाशय जी, गौशा पारे-जैसा लग रहा है ! इरो तो दिखाना चाहिए। गयों नहीं ले पाते मेरे यहाँ । अच्छी तरह से जांचकर देसुंगा।" और फिर गल पड़ते हैं । गुण्ठ को पौलते देखकर मन-ही-मन गिन्तित होते है, वेदना अनुभव करते है। पौर राव-गुछ भूल जाते हैं। कृष्णस्वामी गो पास शुरू गेही अपना एक गाइयोस्कोप है। विद्यार्थी- जीवन में जब अपने गिनने साथ उगनीने रहार गिटस भारते थे, राव ही रो है। पलेटन गे गग पागों में जुटा दिया था। गोरी का गाल ८२/ सप्तपदी है यह जानते हुए ही कृष्णेन्दु ने खरीदा था । उम ममय वह विद्यार्थी- जीवन का कृष्णन्दु था। उसे कोई दुविधा नहीं हुई । पर माजकल जब कृष्णस्वामी उससे कोई काम करते हैं तो भगवान् से क्षमायाचना कर लेते हैं और साथ-ही-साय पिता-माता को प्रणाम कर लेते हैं। उनकी मां अपने सारे गहने कृष्णेन्दु को दे गयी थी । कृष्णेन्दु पास हुआ है । इन गहनो में से चूड़ियों का जोड़ा बहू को देगा और वाकी गहनो के रुपयों से डिस्पेन्सरी खोलेगा। याद के बाद उसके पिता ने वे सब उसके हाथो में रख दिये थे। कहा था, "लो रखो। तुम्हारी मां तुम्हें ही दे गयी है, अपने पास ही रखो ! तुम्हें पढ़ाने के बाद मेरा हाथ अव खाली है। गरीबी में क्या कर वढूं, कोई ठीक नहीं ।" वह कृष्णेन्दु माँ का लाडला था। गृहस्थी की सभी चीजों पर उनी का पहला अधिकार था। वह लेना ही जानता था, देना नहीं। मीखा ही न था। देना पहली बार उसने रीना को स्वय को देकर ही सीखा । छोड़ो रीना की बात! उसका कल्याण हो ! उसकी बात सोचते- सोचते बीच-बीच में लगता है, रीना ने निज को उसे नहीं सौंपा, उसके बजाय लौटाने के समय अपने ईश्वर को देवर स्वयं कंगाल हो गयी। ईश्वर, उसका मंगल करो! हे ईश्वर, उसको जीवन-समाधि को जीवन्त करके तुम फिर से जाग उठी । मनुष्य को पण-शक्ति की सद्बुद्धि, उसे हाय के इशारे से बुलाने के प्रकाश, ईश्वर, तुम जागो ! रीना को तुम्हारे हायों समर्पण करके कृष्णस्वामी निश्चिन्त है। रोना अंधेरे में विलीन हो जाती है । मन मे दूर हो जाती है । कृष्णस्वामी को पिता की याद आती है-अल्पभापी, निलिप्त व्यक्ति, वेहद कठोर । एक वाक्य में कृष्णेन्दु से कह दिया था, “जामो ! तुम्हारी जरूरत नही !" ठाकुरजी को लेकर वृन्दावन चले गये थे। सारी सम्पत्ति बेच दी थी। कुछ और रुपया ठाकुरजी के मठ में दे गये हैं। अपने जीवन मै उन्होंने थोडाही रुपया खर्च किया था। बाकी तेरह हजार कुछ-एक सौ रपया बैंक में रखा था। वकील से कह गये थे, कृष्णेन्दु की तलाश करके उसे दे देना । वह कृष्णस्वामी को मिला है । उसी में प्राधम चलता है। किन्तु इस प्रकार आश्रम को कुष्ठ अस्पताल बनाने से कितने दिन r! यहीं कृष्णस्वामी ने कुष्ठ रोगियों की एक डिस्पेन्सरी-सी बना लालसिंग और सिन्धु सन्त्रस्त हो उठे, "वावा साहब ! यह ठीक कृष्णस्वामी हँसते हैं। बीच-बीच में पूछते हैं, "तुम्हें डर लगता है लिसिंग ?" लालसिंग मौन द्वारा ही सूचित करता है, हां लगता है । सिन्धु साफ़ कहती है, "हां वावा साहब ! महामारी से किसे डर नहीं लगता ? हां, आपको सचमुच नहीं है । सो आपका पुन्न है, हमारे भाग में तो कोई पुन्न नहीं । क्या करें वताइए ?" वर्वर झमकी को भय नहीं होता, घृणा होती है । कहती है, “बहुत बुरी गन्ध आती है। कैसी वदवू ! ओफ़ ! और क्या हो जाता है... आक् थू !" वीच-बीच में वह अमरीकी फ़ौजी अफ़सर पाता है । अब वह "हे मैन" नहीं कहता। कहता है, "वैल रेवरेण्ड !" वीच-बीच में वह रीना की बात भी चलाता है । कहता है, "सुना है आसाम फण्ट पर घूम रही है । ठीक नहीं कहा जा सकता । पर वात उस डेयर-डेविल लड़की के साथ बहुत मेल खाती है।" "अासाम ?" "येस ! गौहाटी, शिलांग, चटगांव । जस्ट लाइक हर, लाइक ! शूटिंग स्टार ।" बीच-बीच में झुमकी को देखकर निर्लज्ज भाव से हँसत है, इशारे करता है। कृष्णस्वामी याद दिला देते हैं, "यह असल में एक चर्च है, मिस ऑफ़ीसर !" सामने युद्ध है । जिसके लिए मौत का परवाना कट चुका है । वे जितने उद्दाम होते हैं, उतने ही भीरु भी। ईश्वर के रोप से भय विना नहीं रह सकते । कम-से-कम ईश्वर को अप्रसन्न नहीं करना च अफ़सर क्रॉस का चिह्न बनाकर चला जाता है । सप्तपदी कोई एक वर्ष के बाद अचानक एक दिन कृष्णस्वामी ने लालसिंह से कहा, "लालसिंग, तबीयत बड़ी खराब-सी लगती है, मैं कुछ दिन के लिए बाहर "कहाँ जायेंगे बाबा साहब ? प्रापके न होने पर हम लोग यहां कैसे "रहेंगे ?" "पन्द्रह-बीस दिन ज्यादा नहीं । तुम लोग गांव के भीतर जमे रहते हो वैसे ही रहना !" पच्चीस दिन बाद कृष्णस्वामी लोट पाये। तबीयत ठीक नहीं हुई थी, बल्कि कुछ कमजोर हो गये थे। मिन्धु ने कहा, "तबीयत और भी - खराब कर लाये वावा माहब !" "बहुत भटकता रहा सिन्धु ! बहुत दिन यही रहते-रहते मन उकता गया था । छुट्टी पाकर खूब धूमा । ठीक लड़ाई के प्रासपास की जगहों में । शिलाग, गोहाटी, यहां-वहां । घूमने-भटकने में देह कमजोर होगी ही! पर हां, मन अच्छा हो गया है।" चटगांव से लगाकर गौहाटी तक युद्ध के सीमावर्ती स्यानों में उन्होंने पता लगाया था। हां, खबर मिली है । ठीक वैसी ही एक स्त्री थी। वह मर गयो। किसी ने उसकी हत्या करके गौहाटी से शिलाग के पहाड़ी रास्ते में एक खड्ड में फेंक दिया था । सम्भवतः कोई निष्ठुर सैनिक रहा होगा। रीना के उद्धत व्यवहार से ऋद्ध होकर उसे मार डाला होगा। पोस्टमॉर्टम में पता चला कि उसके पेट में पराब थी और यह भी पता चला कि प्रभागिनी जघन्य रोग में पीडित थी। कृष्णस्वामी निश्चिन्त हो गये । रीना अपने जीवन का पावना समझकर चली गयी प्रयवा निष्ठुर मूल्य द्वारा इस उल्का-जीवन का देना चुका गयी। पुलिस-विभाग को उसका कोई परिचय नहीं मिला। कृष्णस्वामी से ही उन्होंने प्रश्न किया था, "उसे जानते थे क्या ?" कृष्णस्वामी 'नहीं' कहकर ही चले आये थे। हे ईश्वर, भव मुझे अपनी सेवा में लीन कर लो ! यह संकल्प लेकर ही लौटे हैं । कलकत्ता 1 मानपदीly से बड़ी मुश्किल से दवाइयाँ भी खरीद लाये हैं। उन्हें उसी दिन सजा डाला। अगले दिन सवेरे झुमकी पाकर खड़ी हो गयी। "बाबा साहब "क्या ?" ।" । । टॅगा हुआ था, "लालसिंग कल रात चला गया है "चला गया है ? क्या मतलव ? कहाँ चला गया है ?" "क्या पता ? ये वे लोग जानें। कहता था कोढ़ का इलाज करते-- करते साहब को भी कोढ़ हो गया। कोई बच सकता है ? चल सिन्धु, भागकर जान बचा लें!' "क्या कहा ? किसे कोढ़ हुआ है ?" "क्यों, आपको हुअा है ?" कृष्णस्वामी विस्मय-विस्फारित दृष्टि से देखते रह गये। उन्हें कुष्ठ हुआ है ? कुछेक क्षण वाद उनकी बुद्धि सक्रिय हुई । “कहाँ ? किधर ?" अपनी उंगलियों को देखने लगे। एक छोटा-सा शीशा दीवार पर उसके सामने जाकर खड़े हुए। "किधर है ? कहाँ ?" झुमकी बोली, "ऊँ हूँ ! ॐ हूँ ! जैसे दाग देखकर आप बताते हैं—यह कोढ़ का लच्छन है, वैसा ही एक गोल-गोल दाग आपको हुआ है। पीछे की तरफ। आपको दीखेगा कैसे?" कृष्णस्वामी के कुरते को उठाकर पीठ पर एक जगह उंगली रखते हुए झुमकी ने कहा, "यह रहा । यही । कैसा दाग है यह ? एँ ?" कृष्णस्वामी निश्चल खड़े रह गये। सिर से पैर तक एक विचित्र सनसनी-सी दौड़ गयी । मानो वह थोड़े-से अवश हो गये हों। उन्हें चोट लगी। वह इसके लिए तैयार नहीं थे। यह नहीं कि इसकी सम्भावना नहीं रही, पर सत्य जव सचमुच या पहुंचा तव सहन करने में कष्ट हो रहा है । सचमुच वही है । झुमकी ने जहाँ उँगली रखी थी वहाँ खाल' नहीं है; झुमकी की उंगली का स्पर्श उन्हें अनुभव नहीं हुआ। रीना ! रीना के कारण ! कुछ भी जैसे मन के भीतर पकड़ाई नहीं आता। मन उस ओर से इतना व्यग्र था कि वाकी सब उनकी आंखों के प्रागे से अनजाने में ही निकलता चला गया था। । ८६ / सप्तपदी मस्तिष्क के भीतर कोग-कोग ने वेदना का प्रावेग घरती के गर्भ में छिपी हुई अग्नि की भांति फूटकर निकलना चाहता है। कृष्णस्वामी ने पहाड़ की भांति उसको अपने भीतर छिपा रखा है । कांपने नहीं देंगे। फूटने नहीं देंगे। अग्नि धरती के गर्भ में प्राणों के उत्ताप में परिणत हो जाये । प्राणों के कोश-कोश में वह अग्नि नहर प्रदीप-शिवानों की भांति भगवान की प्रारती के रूप में, यानन्द को दीपावलि के रूप में जल उठे! बहुत देर बाद ग्रामस्थ होकर उन्होंने कहा, "मैं वांकुड़ा जा रहा हूँ झमकी !" बांकुडा में नया क्या बतायेंगे ? कहेंगे, रोग छुत से हुआ है । अनि- वार्य है । इसके दाद ? कहां जायेंगे, क्या करेंगे? हां, आ पहुंचा है। वार्य-कारण का परिणाम ! कृष्णस्वामी को तिरस्कार-भरी बातें भी मुननी पड़ीं 1 सामूहिक वैज्ञानिक प्रयत्न के बाहर इस प्रकार अकेले एक व्यक्ति की कोशिश की यही अनिवार्य परिणति कृष्णस्वामी चुप ही रहे । केवल एक हंसी की रेखा धीरे-धीरे उनके मुख पर खिल उठी थी। लाई, पाइ काइ अनटु दी। मेक हेस्ट अनटु मी । "कोई बहुत चिन्ता का कारण नहीं है, पर इस प्रकार आपका लोगों का इलाज करते हुए घूमना ठीक नहीं होगा।" "अवश्य । ये उनका निर्देश है। आते-आते में सोच चुका हूं। मैं 'चला जाऊंगा । कुम्भकोणम के लेपर असाइलम मे । वही मेरी चिरित्सा भी होगी और में डाक्टर की हैसियत से कुछ काम भी कर सकूँगा।" "गॉड बी विद यू मद्रास समुद्र के किनारे कुम्भकोणम कुष्ठाश्रम है । वडा भारो प्राश्रम है । पीड़ाग्रस्त भगवान् की मेवा का मन्दिर । अाज रीना व्राउन को याद आयी । म्फटिक से बनी हुई मूनि की भांति पवित्र कुमारी रीना बाउन । प्रासनसोल के चर्च यार्ड में उन्हें लौटाते समय, उनके ईश्वर- तितासको उनके देवर को क्या इमी रास्ते जाने का निर्देश दिया ॥
- - था ? नहीं। यह रास्ता उन्होंने स्वयं ही चुना है । सैट ए वाच, पो लार्ड, विफोर माइ माऊथ । कोप दि डोर ऑफ: माइ लिप्स। एक भी क्षोभपूर्ण वाक्य कृष्णस्वामी के मुख से न निकला। चलो कुम्भकोणम { आखिरी सहारा वही है। सत्य से अधिक विस्मयकारी और कुछ नहीं। टूथ इज़ स्टेंजर देन फिक्शन । वास्तव जीवन में मृत व्यक्ति भी बच जाता है, कल्पना की कहानी में बचाने से अविश्वास होता है। वास्तव जगत् में प्राण कालिमा के साथ युद्ध करके उसकी सीमा को लांघ जाने के लिए युग-युग से भट- कते आये हैं, सामने क्षितिज पर आलोक के राज्य की उज्ज्वल महिमा आह्वान कर रही है, तो भी मनुष्य के काल में अविश्वासी बुद्धि कूट तर्क करके कहती है, यह आलोक नहीं, भ्रम है। आलोक मिथ्या है, कालिमा ही सत्य है । अमृत कल्पना है, मृत्यु ही सत्य है । और भी पाठ महीने बाद । कृष्णास्वामी कुम्भकोणम आश्रम में उस दिन थककर सोये उन्होंने यहीं अपना स्थान बना लिया है । सबसे कठिन रोगियों का वही इलाज करते हैं । उनका अपना इलाज भी होता है। रोग शुरू में बहुत वढ्ने के बाद अब कुछ थम गया है । नाक के किनारे कुछ सूज-से गये हैं। मुख पर, माथे पर, गालों पर अस्वस्थ रक्ताभ मसृणता दिखायी देने लगी है। दोनों कानों के किनारे भी फूल रहे हैं। हाथ की उँगलियाँ एकदम फूली नहीं हैं, पर तेल से सने हुए हाथों की उँगलियों की भांति दिखायी पड़ती हैं । शुरू में रोग बड़ी तेजी से ही बढ़ा था, अव रोग का वेग रुक गया है। इधर काल की पटभूमि पर बड़े-बड़े परिवर्तन हो चुके हैं। लड़ाई खत्म हो गयी। देश में विस्मयकारी राजनीतिक परिवर्तन हुए। भारतवर्ष स्वाधीन हो रहा है। भारतवर्ष विभक्त हो रहा है। कृष्णस्वामी देखते हैं और रोज़ ही कहते हैं यह जय तुम्हारी ही जय है ! । ८८ / सप्तपदी क्लान्त दृष्टि से अपने कमरे के खुले दरवाजे से वह सामने की ओर ताक रहे थे। एक डॉक्टर ने प्राकर कहा, "रेवरेण्ड, एक अंग्रेज सज्जन अपनी पत्नी सहित तुमसे मिलने पाये हैं। मैंने कहा कि तुम्हारी तबीयत ठीक नही, पर वे बोले कि बहुत दूर से आये हैं। यह भी कहा, कहिए मेरा नाम है जॉनी, जॉन क्लेटन !" "जॉन क्लेटन !"विस्मय मे कृष्णस्वामी चौंक उठे। "जॉन क्लेटन 'पत्नी सहित उनसे मिलने आया है, इस लेपर एसाइलम में ? कहाँ ? कहाँ है ?" अचानक कमरा कांपने लगा, पैर के नीचे की मिट्टी भी मानो काप "रही है । सामने के पेड़-पत्ते, धरती प्राकारा सब जाने कैसे हुए जा रहे हैं, क्या हुमा जा रहा है । ज्योतिर्लोक मानो फटा जा रहा है ! कृष्णस्वामी चीत्कार कर उठे, "रीना !" जॉन क्लेटन को बगल में रोना थी। रीता क्लेटन । क्लेटन की "पत्नी! "हां कृष्णेन्दु ! मैं । मुझे देखकर तुम्हें विस्मय होना स्वाभाविक ही है । पर तुम, तुम मुझे प्राश्चर्यजनक रूप से अशरीरी की भांति पीडा करते हुए मुझे दिन-रात वुलाते रहे हो । कम बैंक, कम बैंक, लौट प्रानो, लौट आनो ! यही पुकारते रहे हो । लौटना चाहा! तुम्हें अकेला छोड़कर चली भी गमी । पर कौन मेरी और हाय बढ़ाता ! किसका हाथ पकडकर में फिर से मनुष्य के हृदय राज्य में प्रवेश करतो । तुम्हारी बात सोची यो । पर वह नहीं हो सका। भय के कारण नहीं हो सका। मैं गोली रीना चुप हो गयी । दायद वह बात मुंह में नहीं कह सकी। कृष्णस्वामी का विस्मय दूर होता जा रहा है । रीना बोली, "तुमने कहा था, मनुष्य के हृदय में उसकी मन्द बुद्धि नित्य भगवान् के पुत्र को क्रॉसविद्ध करती है और वह नित्य नये जीवन मे जाग उठते हैं। वह सत्य मैंने भी अनुभव किया, पर तो भी तुम्हारे सामने नहीं जा सकी। तुम्हारी वह भयंकर बात मेरे कान में बजती रहती घो। तुमने कहा था, "मैं यहां रहूंगा टु वी सिफ़ाइड अगेन।"
सी हो, तुम सेण्ट हो, तुम्हारे पास खड़ी होकर मैं तुम्हें कलुपित तो हूँ, किन्तु .." ना की प्रांखों से अश्रु-धारा बह निकली। न क्लेटन मानो कृष्णेन्दु का वह पुराना बन्धु जॉनी नहीं । अथवा वामी ही वह कृष्णेन्दु नहीं। जॉन क्लेटन भी उनके साथ सभ्रम- वात कर रहा था। अवश्य ही क्लेटन भी अब वह क्लेटन नहीं । वह वदला हुअा वयस्क व्यक्ति है, जला हुआ व्यक्ति ! बहुत दुख । है । पहली स्त्री विवाह-विच्छेद करके चली गयी। युद्ध में बन्दी कर वहुत दिन पूर्वी प्रदेश के वन्दी शिविर में काट चुका है । आज भी सकी देह दुर्वल है । भीतर-बाहर आघातों के चिह्न स्पष्ट दिखायी देते है । क्लेटन के कान के पास गोली का दाग है । माथे पर बहुत-सी रेखाएँ उभर आयी हैं । उसका कण्ठ-स्वर शान्त हो गया है। क्लेटन बोला, "युद्ध में वन्दी हो गया था। छूटने पर कुछ दिनों वाद कश्मीर गया। सोचा था शरीर कुछ स्वस्थ होगा। मन के भीतर थकान की कोई सीमा नहीं। हठात् कश्मीर में रीना को देखा। तूफान में पंख टूट जाने पर लंडूरे हो जानेवाले पक्षी को देखा है कृष्णेन्दु ?" हँसकर क्लेटन ने कहा, "तुम्हें कृष्णेन्दु कहने में संकोच होता है, रेवरेण्ड, तुम सचमुच ही पवित्र हो।" कृष्णस्वामी ने कहा, "एकमात्र भगवान् ही पवित्र हैं, क्लेटन ! जो जीवन की वेदना को उनके चरणों में ढालने के लिए उनके मुख की ओर ताकते रहते हैं, उनके ऊपर भगवान् का आलोक पड़ने से ही वे पवित्र जान पड़ते हैं । नहीं तो वे भी मनुष्य हैं क्लेटन !" फिर वोले, "और बतायो ! मेरी धारणा हो गयी थी कि री जीवित नहीं है। ऐसी ही एक खबर पाकर मैं शिलांग गया था। वे जाकर सारा विवरण सुनकर लगा कि वह सचमुच रीना ही हो किसी ने एक लड़की की हत्या करके खड्ड में फेंक दिया था।" रीना ने दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा, "कितने खड्डों में, जंगलों में, ऐसी कितनी हतभागिनियों का जीवन समाप्त हुया है; गिद्धों और गीदड़ों ने खाया है, मिट्टी के साथ मिला दिया है, - तपदी । कोई हिसाब नही । मेरा भी यही होता कृष्णेन्दु ! अगर उस दिन तुमसे मुलाकात न होती, अगर तुम्हारी स्मृति मेरे पीछे देवदूत की भांति दिन- रात चक्कर न काटती रहती, तो मेरा भी यही हाल होता। मैंने वहां से भागकर छिपना चाहा था। उनकी हद के बाहर दूर-दूरान्तर मे भटकती-भागती फिर रही थी। प्रासाम, शिलाग, चटगांव में उस समय जो लोग थे वे पागल थे। सारे जीवन की क्षुधा पुंजीभूत करके उस समय वे लोग राक्षस की भांति हो उठे थे। उधर मैं न गयी। मैं चली गयी यी शिमला की और । वहाँ से फिर कितनी जगह ! वस शराब पीती थी। उस समय कभी मरकर पीछा छुडाना चाहती और कभी भीपण क्षोम से उल्का की भांति झपटना। कितनी ही वार, यू नो, तुम्ह आश्चर्य होगा, मैं वार जोन की ओर माघ रास्ते जाकर अचानक लौटकर भाग पायी। कश्मीर में जब अधमरी शराब में चूर एक निर्जन स्थान पर पड़ी थी, तो दो पशु मेरे पीछे पड गये.।" सन्च्या के बाद वे लौटने को बाध्य हुए । रीना तब लगभग अचेत थी और बम अपने-आप बड़बड़ा रही थी। उन्हें लाश से प्रानन्द नहीं मिला, उसे छोड़कर जाते समय लाउँ मार रहे थे। उसी रास्ते से क्लेटन श्रा निकला । उसने देखा तो दौड़कर पाया। अफसर का बैज देखकर वे लोग भाग खड़े हुए । क्लेटन देखकर सिहर उठा । रीना ! रीना ! हां, रीना ही तो है ! उसने पुकारा था, "रीना, रीना !" रीना वक्रती-बडबडाती ही रही। वे लोग जो बातें ममझ सके थे उसे समझने में क्लेटन को तनिक भी कठिनाई न हुई । रीना कह रही थी, "इट इज दि कॉज, भाई सोल !" और कोई मन्देह बाकी न रहा । रीना ब्राउन ही है ! वह रीना को पावे पर उठाकर ले आया था। बार-बार कान में कहता जाता था, "रीना माई डालिंग, रीना माई लव, रीना माई एंजिल ! आई लव यू, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, मैं तुम्हें प्यार करता पहले तो रीना को विश्वास नहीं हुमा । क्लेटन ने रीना को अपनी कहानी सुनायी थी। उसके बाद कहा था, "प्रथम यौवन का वह मैं दुख की आग मे जल चुका है। ग्लानि, आवर्जना ही जलती है, रास होती है : जो खरा है, वह राख नहीं होता, जलकर शुद्ध होता है । मैं तुममे इतना ही कहता हूँ रोना, ट्राई मी, मेरी परीक्षा करके देखो!"
. हो, तुम सेण्ट हो, तुम्हारे पास खड़ी होकर मैं तुम्हें कलुषित हूँ, किन्तु .." की आँखों से अश्रु-धारा बह निकली। क्लेटन मानो कृष्णेन्दु का वह पुराना बन्धु जॉनी नहीं । अथवा मी ही वह कृष्णेन्दु नहीं। जॉन क्लेटन भी उनके साथ सभ्रम- त कर रहा था। अवश्य ही क्लेटन भी अब वह क्लेटन नहीं वह वदला हुअा वयस्क व्यक्ति है, जला हुआ व्यक्ति : वहुत दुख है। पहली स्त्री विवाह-विच्छेद करके चली गयी। युद्ध में वन्दी र बहुत दिन पूर्वी प्रदेश के वन्दी शिविर में काट चुका है । आज भी की देह दुर्वल है । भीतर-वाहर आघातों के चिह्न स्पष्ट दिखायी देते । क्लेटन के कान के पास गोली का दाग है। माथे पर बहुत-सी रेखाएँ भर आयी हैं। उसका कण्ठ-स्वर शान्त हो गया है। क्लेटन बोला, "युद्ध में वन्दी हो गया था। छूटने पर कुछ दिनों बाद कश्मीर गया। सोचा था शरीर कुछ स्वस्थ होगा। मन के भीतर थकान की कोई सीमा नहीं। हठात् कश्मीर में रीना को देखा। तूफान में पंख टूट जाने पर लंडूरे हो जानेवाले पक्षी को देखा है कृष्णेन्दु ?" हँसकर क्लेटन ने कहा, "तुम्हें कृष्णेन्दु कहने में संकोच होता है, रेवरेण्ड, तुम सचमुच ही पवित्र हो।" कृष्णस्वामी ने कहा, "एकमात्र भगवान् ही पवित्र हैं, क्लेटन ! जो जीवन की वेदना को उनके चरणों में ढालने के लिए उनके मुख की ओर ताकते रहते हैं, उनके ऊपर भगवान् का आलोक पड़ने से ही वे पवित्र जान पड़ते हैं । नहीं तो वे भी मनुष्य हैं क्लेटन !" फिर वोले, "और बतायो ! मेरी धारणा हो गयी थी कि रीना जीवित नहीं है। ऐसी ही एक खवर पाकर मैं शिलांग गया था। वह जाकर सारा विवरण सुनकर लगा कि वह सचमुच रीना ही होगी किसी ने एक लड़की की हत्या करके खड्ड में फेंक दिया था।" रीना ने दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए कहा, "कितने खड्डों में, कि जंगलों में, ऐसी कितनी हतभागिनियों का जीवन समाप्त हुअा है; देह गिद्धों और गीदड़ों ने खाया है, मिट्टी के साथ मिला दिया है, .
कोई हिसाब नही । मेरा भी यही होता कृष्णेन्दु ! अगर उस दिन तुममें मुलाकात न होती, अगर तुम्हारी स्मृति मेरे पीछे देवदूत की भांति दिन- रात चक्कर न काटती रहती, तो मेरा भी यही हाल होता। मैंने वहीं से भागकर छिपना चाहा था। उनकी हद के बाहर दूर-दूरान्तर में भटकती-भागती फिर रही थी। प्रासाम, शिलाग, चटगांव में उस समय जो लोग थे वे पागल थे। सारे जीवन की क्षुधा जीभूत करके उस समय दे लोग राक्षस की भांति हो उठे थे। उघर में न गयी। मैं चली गयी थी शिमला की और 1 वहां से फिर कितनी जगह ! बस शराब पीती थी। उस समय कभी मरकर पीछा छुड़ाना चाहती और कभी भीपण क्षोभ से उल्का की भांति झपटना। कितनी ही बार, यू नो, तुम्हे आश्चर्य होगा, मैं वार जोन की ओर प्राय रास्ते जाकर अचानक लौटकर भाग पायी। कश्मीर में जय अधमरी भराव में चूर एक निर्जन स्थान पर पड़ी थी, तो दो पशु मेरे पीछे पड गये." सन्ध्या के बाद वे लौटने को बाध्य हुए । रीना तव लगभग अचेत यी और बस अपने-आप बडबड़ा रही थी। उन्हे लाश से प्रानन्द नही मिला, उसे छोड़कर जाते समय लातें मार रहे थे । उसी रास्ते से क्लेटन श्रा निकला । उसने देखा तो दौड़कर पाया। अफ़सर का बैज देखकर वे लोग भाग खड़े हुए । क्लेटन देखकर सिहर उठा। रोना! रोना ! हां, रीना ही तो है ! उसने पुकारा था, "रोना, रीना !' रीना वस्ती-बडबडाती ही रही। वे लोग जो बातें समझ सके थे उसे समझने मे क्लेटन को तनिक भी कठिनाई न हुई। रीना कह रही यो, "इट इज दि कॉज, माई सोल !" और कोई सन्देह बाकी न रहा । रीना ब्राउन ही है ! वह रोना को कन्धे पर उठाकर ले प्राया था। बार-बार कान में कहता जाता था, "रीना माई डालिंग, रोना माई लव, रीना माई एजिल ! आई लव यू, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, मैं तुम्हें प्यार करता हूं, मैं तुम्हे प्यार करना पहले तो रीना को विश्वास नहीं हुआ। क्लेटन ने रीना को अपनी कहानी सुनायी थी। उसके बाद कहा था, "प्रथम यौवन का वह मैं दुख की प्राग मे जल चुका है। ग्लानि, आवर्जना ही जलती है, राख होती है : जो खरा है, वह राख नहीं होता, जलकर शुद्ध होता है । मैं तुमसे इतना ही कहता हूँ रीना, ट्राई की मग परीक्षा करके देखो!"
। । रीना बोली, "क्या करती ? तुम्हारे पास खड़े होने योग्य शनि भीतर तब न थी। मैंने उस पर ही विश्वान कर लिया। और उन अपनी बात सच कर दिखायी। उसने अपने प्यार को प्रमाणित कर है । दोनों हाथों से मुझे जकड़ लिया। तुमने मुझे आशीर्वाद दिया कृष्णेन्दु, मुझे विश्वास था, वह उसके रूप में मुझे मिला । तुम नेष्ट कृष्णेन्दु ! तुम सेण्ट हो ! उसके बाद एक गहरी लम्बी सांस लेते हुए बोली, "मुझे बड़ा है, तुम्हारी इस अवस्था में कोई सेवा नहीं कर सकी।" कृष्णस्वामी सामने क्षितिज की और ताक रहे थे। उधर देखें देखते ही बोले, "शायद यही मेरा पुरस्कार है रीना! इससे ही उन्द मेरी सब अतृप्त कामनाएँ तृप्त कर दी।" फिर हमें, हंसकर बोले, "देखो, हमारे देश के शास्त्रों में लिखा एक साथ सात कदम चलने से मित्रता होती है। हम लोगों के विवाह स्वामी-स्त्री अग्नि को साक्षी करके सात कदम एक साथ चलते हैं। जब मनुष्य भगवान् की खोज करता है तब वह अकेला होता है, कि के साथ सात कदम नहीं चला जाता, बन्यु के साथ भी नहीं। बिल अकेले । उस रास्ते पर विचित्र रूप में प्रागीर्वाद भी मिलता है, प्रति भाप भी ! और सात कदम एक साय चले विना संसार के पान में नहीं लोटा जा सकता। तुम लोग साथ चले हो, द्वार खुल गये हैं तुम्हारी गृहस्थी सुख मे भरपूर हो । मेरी यात्रा अलोन ! में मुखी हूँ। मव स्तब्ध हो गये। क्लेटन ने वह स्तब्धता तोड़ी, "हम लोग फिर पायेंगे। में इंग्ल वापस नहीं जाऊँगा। रीना के साथ यहीं गृहस्थी वसाऊँगा। वार- पाऊंगा।" "यहीं रहोगे तुम लोग; तो फिर तो फिर में एक अनुरोध करूंगा। रीना, तुम मेरा पाश्रम जानती हो । वहाँ भनकी नाम की एक अनाथ नारी है-उसे अपनी गृहस्थी में ले लेना ! अच्छा ! अव अधिक नहीं। जॉन, यू बार ए मेडिकल मैन । अब जानो, और अधिक नहीं। गुड बाई ! गुड बाई! रोयो मत रीना; नो-नो-नो ! मैं देखना चाहता कि तुम हंस रही हो। लुक इन माई फेम । देखो ग्रानन्द के सिवाय भी क्या है ? कहाँ है ? गुड वाई ! गुड वाई !" अपना लम्बा हाथ उठाये वह दीर्घकाय पुरुप पत्थर की मूर्ति की - भांति खड़ा रहा...
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