Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shree Mad Rajya Chand Prnit Mokasmala
Front matter
नयंदपक गधीन
भदावाद
युनाइटेड मोलींगम, फपनी टीम
सांकलियु. पाठ. पृष्ठ - - . -- २०-११ १२. विपय. मस्नायना. यांचनारने भोपामण. सर्वमान्यधर्म (पघ) वामनाचमनार मानद अनायीमुनि भाग ३ मंचाच सद्धमनच सद्गस्ताव भाग २ उत्तमगृहस्थ जिनेश्वरनी भक्ति भक्तिनो उपदेश (पद्य) खरीमहत्ता वाहुरळ चारगति संसारने चार उपमा भाग: चार भावना कामदेव श्रावक १ १६ सत्य पगिहन मकानना २६ मोसमाळा-पुस्तक वीर्जु. तत्व ममायूं यत्ना २८ रात्रिभोजन २९-३० सर्व जीवनी रक्षा भाग २ ४७-५२. मत्यारुपान ५१-५३ ३२ विनयवडे तत्त्वनी सिद्धि छ मुदर्शन शेठ ग्रामचर्य विपे मुभापित (पद्य) नमस्कार अनानुपूर्वी सामायिक विचार भाग ३ प्रतिक्रमण विचार ४१.४२ भिसारीनो पेद भाग २ १९-७२ अनुपम क्षमा ४४ राग सामान्य मनोर्य (पद्य) ४६-४८ कपिलमुनि भाग ३ ७५-८१ तृष्णानी विचित्रना पथ) ८१-८३ ८३-८४ प्रमाद विवेक एटल गुं? नानिभाए गग्य सा माटे ध्या! ८..८८ महागीर शामन अनुचि कान रहवी
५६.१०१
मोक्षमाया-पुग्नक धीजु.
सामान्य नित्य नियम
समापना
गम्य प धर्म साप
धर्मना मतमंद भाग
नमशिरचा भाग
समलाप विचार (3)
जामयिना
सापनी नर पार
मननामा मगर
योग
मनमः
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१४:-
Hisar
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शुद्धिपत्रक. पार्नु ५ मोरी. अशुद्ध न निमनहाय मभागी उपनलिका समगनिनु हेनुया २ " . त निममहोप, गमभागी, उपजीविकामां उगमगनिनुं गनिशा डो भान्मतिपिए निय गलागे. पती १ भारमहिनापर निगम गलांग पा नाम्या ধানমন্স। मानवांधली प्राण १० मानकमण भगनिया प्राण ६० .. স্বাস্থল मानापान य कान .. न पान . . ८. ३ मान.
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मोसमा
प्रस्तावना.
शिक्षणपतनि बने
मुबमुत्रा.
१. एक म्यादाः वायर
समानामा परी सर.
एमपीबायोग
भनी हामी 27-कमर दर भने
मन मा
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६.
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८ , मोशमाळा-पुस्तक पीजु. पिवयन भने प्रभावोध भाग भिन्न छे. आ पुस्तक एमांनो एक संछे तो सामान्य तरारूप छे. गरानी भाषानुं जेने सारं ज्ञान छ, अमे नपतरवादि मामान्य प्रकरणो ने समनी सकेछे, एमोने आ ग्रंय विशेष बोपदायक पो. भा ग्रंपनी योजनानो एक हेतु उपरता युरानोने मान्म-हिन भणी लक्ष करावानी छे. सेमन आत्मा- था गुम्पो भारी वोमी म्-पर हितकारी माळा गुंथी भाग- दिमा माये एगे पण एकदेतु छ. भा मोक्षमालाना पार पुग्नको पानी योजना हती; एमनि मा यी पुग्नक . भगाउ का नेम मा पुप्ता यालाययोप में विवेचन भने समावबोध श्रीना भने चाया पुप्तामा भारपानी योजना हनी. पहला पुम्नानो उदेश पांचमा पारीग्राफी मुचित पाप . आयना कनी मप ए याकीना पातको गोप प्रथम ने भी श्रीनो देवोन्मग यया छ जना करना पार्नु कंद मनामनर रोड के ना. श्रीना भने चांपा पालकनी संकलना- दरेक माठाना १०८ शिक्षापटप मार-पर वपतमा पर मानी. को विकी, मध्यम्यमानी जीय शानियमानुं पारंगन या मालना प्रमागे माग गंपरा असायं को नो मापागने माहित गुरमा नयाग्नु ! २. बायनी मा बीनी डानगर प. " भागवाना या अगर 43 वनगा कपिर पागने मार थापा 'यु, नद inमनी, कियानी भासा ना ५ नमा मोक्षमाय-पुस्तक वी. के:-"बहु उंटा उतरतां आ मोक्षमाळा मोसनां कारणरुप यह पडलो. (कारण) मध्यस्थतायी एमां तत्वज्ञान अने शिल वोधानो उद्देश डे." आ मोक्षमाय मोक्षवधूमाटेनी वरमाला याप ए सहज सिद्ध यार छे. तत्वज्ञान अने सत्शील, अथवा जान अने क्रिया, अयबा श्रुत अने चारित्र धर्मनी आराधना, अथवा सम्यग्नान, सम्यग्दर्शन अनेसम्यश्चारित्र,सरळ भापा- मांसल जाणपणुं अने ते प्रमाणे सत्य वर्जन आ मोक्ष माप्तिनां साधन, अने ए सापनोनो आ ग्रंयमां वोपडे. तो ते पयार्य वांची-विचारी ते प्रमाणे प्रवर्तनारने मोक्ष केम मुलभ न होय? अर्याद तत्व समजवानो प्रयास करी, ते सपनी मुघी शवे वर्चे वो तेने मोक्ष दूर नयी. आम तत्वज्ञान पामबानो, सत्तील सेववानो, अने परिणामे मोक्ष मेव्वयानो आसा ग्रंयमां वोघेछे. वनजिज्ञासा जागृत करे, अने सवनमां मेरे एवो स्थळे स्थळे उपदेशडे. अज्ञान अने मतमतांवर टाब्बानो, मध्यस्यता- यी तत्व उपर आववानो, एती चि उपजावतानो प्रयास स्य- के स्थळे जे मोहनां कारणरुप छे. शिक्षापाठमात्र मनन फरपा योग्य उ. एटले प्रत्येक प्रयम् अवलोकन न करता ए वांचनारने शीर राख, योग्य हे. वांचनारने भलामणना पाठमां दर्शाच्या प्रमाणे विवेकपूर्वक, मननपूर्वक. आ माळा कंठे घर- वाथी प्रांते बहुद्दिन यो. माटे समृद्ध भारओ, व्हेना विवेक पूर्वक. मध्पन्यनाथी. ममत दन की. बहुगन अने विनय पू. वक आ ग्रंयनु पठन-मनन कर. जेया मोक्षनां वारण रूप यह पडवानो आ मालानो हे सहज मिद्ध याय नथाम्न :
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ॐ मोक्षमाळा. पुस्तक वीजुं. शिक्षापाठ १ वांचनारने भलामण. बांचनार आ पुस्तक आजे तमारा हस्तकममां आवे डे, देने का पूर्वक वाचनो, देवां कहेला विषपोने विवेकयी वि- चारजी, अने परमार्थने हृदयनां धारण करजी. एम करतो वो मे नीति, विवक, पान. ज्ञान, मद्गुन अने आत्लयांति पानी मतमो. न ज्ञानना हमो के केटलांक अजान मनुप्यो नहीं जांच- वा पोय पुलको वांचीने यन्य वचन वृया बोड देने, जेपी नेभो अब रस्ते वही जाय छ, आलोजमां बजीति पाने जे. अने परलोकमां नीच गनिए जाप हे. भानाहाननां पुलकोनी पेठे या पुस्ता पटन वार्नु नयी. पर मनन करवातुं छे. देयी का मा अने परमा बनेगा नमारुहित यगे.भगवाननांकलांवचनोनो एमांदमयों छे. नमे आ पुस्तकको बिनय अने विवेकयी उपयोग करनी. विनय अने विवेक अपना हेतुत्रो के. नमन बीनो एक आ ग भलाई के भोने वचनों
मोक्षमाला-पुस्तक पीजं.
आवडतुं न होय अने आनी इच्छा होय तो मा पुस्तक अनुक्रमे
तेमने वांची संभळावq.
तमने आ पुस्तकमांयी जे कंइ न समजाय ते मुविचक्षण
पुरुष पासेयी समजी लेवं योग्य छे.
तमारा आत्मानं आयौ हित याय, तमने ज्ञान, शांति य.
ने आनंद मळे तमे परोपकारी, दयाळ, क्षमावान, विवेकी
अने बुद्धिशाळी याओ एवी मुभ याचना अईत भगवान पासे
करी आ पाठ पूर्ण करु छ.
-::-
शिक्षापाठ २ सर्वमान्यधर्म.
चोपाइ.
धर्मतत्व जे पूछयुं मने,
ते संभळाई स्नेहे तने
जे सिद्धांत सकळनो सार,
सर्व मान्य सहुने हितकार.
भास्युं भाषणमा भगवान,
धर्म न पीनो दया समान;
अभयदान साये संतोप,
घो प्राणीने, दळवा दोप.
सत्य शीळने मघळा दान,
दया होइन रणा प्रमाण
२.
मर्वमान्यधर्म.
६.
दया नहीं तो ए नहि एक,
विना सूर्य कीरण नहि देख.
पुष्पपांखडी ज्यां दूभाय,
जिनवरनी त्यां नहि आज्ञाय:
सर्व जीवन ईच्छो मूख,
महावीरनी शिक्षा मुख्य.
सर्व दर्शने ए उपदेशः
ए एकांते-नहीं विशेष
सर्व प्रकारे जिननो वोध,
दया दया निर्मळ अविरोध !
ए भवतारक सुंदर राह,
धरिये तरिये करि उत्साह
धर्म सकळन ए शुभ मूळ,
एवण धई सदा प्रतिकूळ.
तत्वरुपधी ए ओळखे,
ते जन होचे शाश्वत सुखें
शांतिनाय भगवान प्रसिद्ध,
राज्यचंद्र करुणाए मिद्ध.
६
.
शिक्षापाठ ३ कर्मना चमत्कार.
हुँ तमने कंटलीक सामान्य विचित्रनाभी कही जाउं छ;
ए उपर विचार करतो तो तमने परभवनी श्रदा द्रह थशे.
एक जीव सुंदर पलंगे पुष्पसारयामां शयन करे छे, एकने
४ मोक्षमाला-पुस्तक पी. फाटल गोदही पण मळती नयी; एक भात भातनां भोगनायी राप्त रहे छे, एकने काळी जारनां पण सांशा पडे छ; एक अगणित लक्ष्मीनो उपभोग ले छे, एक फुटी वदाम माटे थइने घेर घेर भाटके छे एक मधुरा वचनयी मनुष्यनां मन हरे छे, एक अवाचक जेवो थइने रहे छ, एक सुंदर वस्त्रालंकारयी विभूषित थइ फरे छे, एकने खरा शियानामा फाटेखें कपहुं पण ओढवाने मळतुं नथी. एक रोगी छे, एक प्रवळ छे. एक बुद्धिशाळी छे, एक जडभरत छे. एक मनोहर नयनवालो छ, एक अंघ 2. एक लूलो के पांगळो छ, एकना पग ने हाथ रम- णीय छे. एक कीर्तिमानछे, एक अपयश भोगवे छे. एक लासो अनुचरो पर हुकम चलावे छे, अने तेटलानान टुंबा सहन अंक करे छ. एकने जोइने आनंद उपजे छ, एकने जोनां यमन थाय छे. एक संपूर्ण इंद्रियो वाळो छ, अने एक अपूर्ण इंद्रियो- वाळो छे. एकने दीन दुनियानुं लेश भान नयी, एकनां दुःखनो किनारो पण नथी. एक गर्भाधानमा आवता जमरण पामे छे, एक जन्म्यो के तरत मरण पामे छ, एक मुवेलो अवतरे छ अने एक सो वर्षनो वृद्ध यईने मरे छ. कोइना मुम्ब, भाषा अने स्थिति सरसां नयी. मुर्ख राज्य- गादी पर खमा खमाथी वधावाय छ, समर्थ विद्वानों का खाय छ! आम आम्बा जगन्नी विचित्रता भिन्न भिन्न प्रकारे तमे भो छो; ए उपाधी नमने कंइ विचार आवे छे ? में कयुं छे मानवदेह. ते उपरथी तमने विचार आवतो होय तो कहो के ते शा पड़े याय छे? पोतानां बांधलां शुभाशुभ कर्मचडे. कर्म वडे आखो संसार भमवो पडे हे. परभव नहीं माननार पोते ए विचारो शा- वडे करे छे ?-ते उपर यथार्थ विचार करे तो ते पण आ सिद्धांत मान्य राखे. शिक्षापाठ ४ मानवदेह. आगळ कमु छे ते प्रमाणे विद्वानो मानवदेहने वीजा सपना देह करतां उत्तम कहे जे ते उत्तम कद्देवानां केटलांक कारणो अत्रे कहीरों. आ संसार बहु दुःखथी भरेलो जे. एमांधी ज्ञानीयो तरी- ने पार पामवा प्रयोजन करे छे. मोक्षने साधी तेओ अनंत मुखमां विराजमान थाप छे. ए मोक्ष वीना कोई देहयी मळतो नयी. देव, तिर्यंच के नर्क ए एक गतिथी मोक्ष नयी, मात्र मानदेयी मोक्षछे. त्यारे नमे कहेशो के सबळां मानवियानो मोक्ष केम धतो नधी! तेनो उत्तर जेओ मानवपणुं समजे डे, नेओ मंसार शोकने नर्ग जाय डे. जेनामां विवेकवद्धि उदय पामी होय, अने ते वडे सत्यामत्यनो निर्णय मपनीने परम नन्वज्ञान नया उत्तम चार्ग- त्ररूप सद्धमन मेवन फागने जेओ अनुपप मोकने पाम छ. नां देहधारीपणाने विद्वानो मानवपणं कई छे.मनुष्यना शरीरना दबाव उपरथी विद्वानो नेने मनुष्य कहेना नी; पग्न नेना विवेकने लड़ने मोक्षमाला-पुस्तक पोर्नु. कहे .हाग, ये पग, ये आंत, कान, एक मुग, मेट भने एक ना ए मेने होप तेने मनुष्य कडेवो एम आपणे स- पर नहीं भी एम रामजीए तो पछी यांदराने पण मनुष्य गगको नाप एणे पण ए प्रमाणे सगळु प्राप्त कर्प . विरो. मी पापंछई पण छ; मार पने महा मनुष्य कोनो ना, नी-पानापणं मपने तेज मानय केहेवाय, शानी भी करेछे के प मा या दुस्सम थे अति पुग्पना म- भावी पदे मागडे छ माटे एपी उतारळे आत्मसार्थक करी मो. अयमनमार, गनकुमार जी नाना पालको पण पानपणांने ममनवायी मोक्षने पाभ्या. मनुष्यमा ने शक्तिय- पारे ६, ने निरकगने पदोन्मत्त हाथी गा माणीने पण वा करी ले पन चक्तिवर्ड जो नेभो पाताना मनरूपी पीने वश कराटे तो कट कल्याण याप! को पण अन्य देशमा पूर्ण सदाना उदय पनी नयी এন বায়না নামঃ মঃ খ গবী স. বুখী গণ- पने मोटो पाया इसम पानादेमळ करी को मापनी ६ केटार मों दुगनामा, अमानमा, विषया, भने अ. रकपना पद भागे पानावर कृपा गुपो . मा कास्तर हाग पं. ५ नगरना माना गाय, सी पोसना त्रिभर मारनामी साता नधी, माट पनेर मनगया मामान या.
अनायी मुनि भाग १. शिक्षापाठ ५ अनाथी मुनि भाग १. अनेक प्रकारनी रीदिवाळो मगधदेवानो श्रेणिक नामे राजा अवनिदाने माटे मंटिकृत नामनां वनमां नीरळी पथ्यो, पननी विचित्रता मनोहारिणी हती. नाना प्रकारनां तो त्यां भावी रयां हता; नाना प्रकारनी कोमळ वेलीमो पाटोप या रही हती; नाना पकारनां पंजीओ आनंदयी तेनु सेवन करतां इता; नाना प्रकारनां पक्षियोनां मधुरां गायन त्वां संभदाता हनां; नाना प्रकारनां लयी ते वन उवाइ हनुनाना प्रकारनां जनां मरण लावतां हता; डंकामां ए वन नंदन- पन जेवू लागतुं हवं. ते वनमा एक झाड नटे महा समाधित पण मुगुमार अने सुखोधित इनिने ते मापक फेलो दीटो. एनु रुप जोपने ते राजा अलंत आनंद पाम्पो. उपमारोहन रुपयी विस्ति पाने मनमानी परंमा करवा लाम्पो. आ पनिनो फेवो अस्त वडे ! एन के मनोहर सोनी केची अदभुत सौन्दवा ! भावी पिसका समानो परनार से: थाना अंगपी वैराग्यनो चोम : भानी की निगमता जनाय 6: मा मदि का निर्णय नमा काल : (भंगी व दान : दिने चितवनो-तप पनी -22:47.. स्तो बानमो. सांभपा दो-दन सतीरनी अनि न. ९८ में : उ: तपनी जानकीने नियोकामना । ..
८ मोक्षमाळा-पुस्तक वीजं. आर्य ! तमे प्रशंसा करवा योग्य एवा तरुण छो; भोगविला. सने माटे तमारी वय अनुकूळ छे; संसारमा नाना प्रकारनां मुख रह्याछे, ऋतु ऋतुना कामभोग, जळ संबंधीना विलास, तेमज मनोहारिणी खिओनां मुखवचननं मधुरं श्रवण उतां ए सघळानो त्याग करीने मुनित्वमा तमे महा उद्यप करोछो एनुं शं कारण? ते मने अनुग्रहथी कहो. राजानां आवां वचन सा- भळीने मुनिए का, हे राजा हुँ अनाय हतो. मने अपूर्व वस्तुनो प्राप्त करावनार, तथा योगक्षेमनो करनार, मारापर अनुकंपा आणनार, करुणाथी करीने परम मुखनो देनार एवो मारो कोड मित्र थयो नहीं. ए कारण मारा अनायीपणा, इतुं. -:०- शिक्षापाठ ६ अनाथी मुनि भाग २. श्रेणिक, मुनिना भाषणयी स्मित हमीने बोल्यो, तमारे म- हा रीद्धिवंतने नाय केम न होय ? जो कोइ नाथ नयी तो हूं यां छ. हे भयंत्राण! तमे भोग भोगवो. हे संयति ! मित्र, शातिए करीने दुल्लभ एवो आ नमारो मनुष्यभव मुलभ करो! अनाथीए कम्यु, अरे श्रेणिक राजा! पण तुं पोते अनाथको तो मारो नाय धइश ? निर्धन ते धनाध्य क्याथी बनाये? अबुध ते बुद्धिदान क्याथी आपे ? अज्ञ ते विद्वता क्यांधी दे ? बंध्या ते संतान क्याथी आपे ! ज्यारे तु पोते अनाथ छे त्यारे मारो नाथ क्यांधी यइश ? मुनिना वचनधी राजा अनि आकुळ अने अनि विस्मित थयो. कोइ काळे जे वचननु श्रवण ययं नी ते वचन- पति मुखथी श्रवण थयु गथी ते शंकित अनायी मुनि भाग २. ययो भने पोल्यो हुँ अनेक प्रकारना अश्वनो भोगी छ, अ. नेकपकारना मदोन्मच हापीओनो धणी छ; अनेक प्रकारनी सैन्या मने आधीन के नगर, ग्राम, अंतःपुर अने चतुष्पादनी मारे कर न्यूनता नयी; मनुष्य संबंधी सघळा प्रकारना भोग हुँ पाम्पो छ, अनुचरो मारी आशाने रुडी रीते आराधे छ एम राजाने छाजती सर्व प्रकारनी संपत्ति मारे घेरछे अनेक मनवांछित वस्तुओ मारी समीपे रहेछे. आवो हुं महान् छतां अनाय केम होउं ? रखे हे भगवन् , तमे मृषा वोलता हो! मुनिए कपु, रा. जा! मार कहे तु न्यायपूर्वक समज्यो नपी. हवे हुँ जेम अनाथ ययो; अने जेम में संसार त्याग्यो तेम तने कहुं छ; ते एकान अने सावधान चित्तथी समिळ सांभळीने पछी तारी शंकानो सत्यासत्य निर्णय करजे. कौशांधी नामे अति जीर्ण अने विविध प्रकारनी भव्यताधी भरेली एक सुंदर नगरी छे; त्यां रीद्धिपी परिपूर्ण धनसंचय नामनो मारो पिता रहेतो हतो. हे महाराजा! योवन वयना प्रथम भागां मारी आंग्यो अति वेदनायी घेराइ, आखे शरीरे यग्नि पळवा मंडपो. शखपी पण अतिशय तीक्ष्ण ते रोग वैरी- नी पेठे मारापर कोपायमान भयो. मारु मस्तक ते आंखनी असामवेदनापी दुःखवा लाग्यु. वजना महार जेवी, वीजा ने पण रौद्रभय उपजाबनारी एवी ने दारुण वेदनायी ९ अ. त्वत मोकमांहतो. मंग्याबंध वैद्यकमावनिपण वैद्यगजा मारी ते वेदनानो नाश करवाने माटे आन्या अने नेमणे अनेक औषध उपचार कया पण ते स्था गया. ए महा निपूण गणाना वैद्यगनी - मोक्षमाळा-पुस्तक पीज. मेने ते दरदधी मुक्त करी तक्या नहीं, एज हे रामा ! मार भनाथपणुं हतुं. मारी बाखनी घेदना टाळयाने माटे मारा पिताए सर्व धन आपया मांडणु; पण वेथी करीने मारी से घेदना दळी नहीं, हे राजा! एन मा अनापपणे तु. पारी माता पुप्रने शोके करीने अति दुःखार्च या; परंतु से पण मने दरदयी मुकावी की नहीं, पन हे गा! मारं अनायपणुं हतुं. एक पेट्थी जन्पेला मारा ज्येष्ट बने कनिष्ट भाइभो पोताथी बनतो परिश्रम करी चूक्या पण मारी से वेदना टळी नहीं, हे राजा ! एज मारुं अनाथ पर्ण सुं. एक पेटथी जन्मेली मारी ज्येष्ठा अने कनिष्पा भगनी- मोथी माकं ते दुःख टळयुं नहीं, हे महाराजा ! एज मा अ- नापपणु इतुं, मारी स्त्री जे पतिवृत्ता, मारापर अनुरक्त भने मेमयंती इती, ते भासु भरी मारु हेयु पलाळती हती तेणे अष पाणी आप्या छता भने नानाभकारनी अंघोलण, घुवादिक मुगंधि पदार्थ, तेमज अनेक मझारना फुल चंदनादिका ना- गिता अजाणिता विलेपन कर्या छता, हुं ते विलेपनधी मारो रोग सामावी न पाक्यो. सण पण अळगी रहेती नहाती, एवी से स्त्री पण मारा रोगने टाळी न शकी, एन हे महारामा ! मारुं अनायपणुं हसू. एम कोइना प्रेमथी, कोइना औषधी, कोइना विलापयी के कोइना परिश्रमयी ए रोग उपशम्यो न- ही. ए वेळा पुनः पुन: में अमन वेदना भोगवी; पछी ई प्रपंची- संसारथी मेद पाम्यो. एकबार जो आ महा विडवनामय वेदना. यी मुक्त य तो खंती, देती अने निरारंभी प्रवश्याने धारण अनाथी मुनि माग २. क़र, एम. चितवीने शयन करी गयो. ज्यारे रात्रि अतिक्रमी गइ त्यारे हे. महाराजा! मारी ते वेदना क्षय थइ गइ अने टुं निरोगी थयो. मात, सात वजन बंधवादिकने पूछीने प्रभाते में महा क्षमावंत, इंद्रियने निग्रह करवावाळु, अने आरंभोपाधिथी रहित एवं अणगारत्व धारण कयु. शिक्षापाठ ७ अनाथी मुनि भाग ३. हे श्रेणिक राजा.! सार पछी हुँ आत्मा परआत्मानो नाथ. थयो. हवे हु सर्व प्रकारना जीवनो नाथ छउं. तुं जे शंका पा- म्यो हतो ते इवे टळी गइ हशे. एम आ जगत्-चक्रवत्ति. पर्यंत अशरण अने अनाथ छे. ज्या उपाधि छे त्यो अनाथता -छे माटे हुं कहुंछउं ते कथन तुं मनन करी जजे. निश्चय मानजे. के. आपणो आत्माज दुःखनी भरेली वैतरणीनो करनार छ। आपणो आत्माज क्रूर साल्मलि वृक्षनां दुःखनो उपजावनार छेआपणो आत्माज वंछित वस्तुरूपी दुधनी देवावानी कामधेनु मु- खनोउपजावनार छेआपणोआत्माजनंदनवननी पेठे आनंदकारी आपणो आत्माज कर्मनो करनार छे आपणो आत्माज ते कर्मनी टाळनार छ आपणो आत्माज दुःखोपार्जन करनार छ,भने आप- णोआत्माज मुखोपार्जन करनारछे आपणो आत्माज मित्र ने आ. पणी आत्मान री छे; आपणी आत्मा कनिष्ठ भाचार स्थित अने आपणो आमाज निर्मळ आचार स्थित रह उ. एम आत्मम- काशकवाध श्रेणिकने त अनाथी मनिए आप्या. श्रेणिकराना बहू संतोष पाम्यो. वे हाधनी अंजलि करीन ने पम वान्यो ** मोशमाळा-पुस्तक बीजं. अनंत संसार मेनो गयो , तेने, नियना आगमा सरदेव कमा . ए दोपरहित शुद्ध भात्मस्वरूपने पामेला होताथी पूमीप पामेपर कदेवा योग्य से. उपर कमाते महार दोप- मोनो एक पग दोष होय त्या सदेव सा परतुं नपी. मा परम तल महरपुरुषोधी विशेष जाण अवश्यतुं . शिक्षापाठ ९ सद्धर्मतत्व. मनादि काळयी कर्मनाना बंधनयी आ आत्मा संसार- परिसम्या करे. ममय मात्र पण नेने पर मुग नपी. पी. गनिने प मेच्या करे मने अधोगतिमा पहना आरमाने परी रापनार-मरगति मापनार वस्तु नेनं नाम पर्म करवाय से, भने एन सत्स सुगनों उपाय .ने धर्मतत्वना सर्व मा. पान भिन्न भिन भेद कवाडे. तेमांना पुरुपये है। उपवार. धर्म २ निधयधर्म. व्याहारथममा दया मुख्य से. सत्यादि पासीनो शार मानो ने दगानी सा पाने . दयाना आठ मदरे. १व्यदया २ मार दया रसदपा ४ पादपा ५सादया ६ अनुग्दया . पहाग्दया, ८ निवपदया. नयम दयदा-कोर पर काम करतू ने पत्रक प्रारसा ना ने पाया. बी मापदया-बाना नानि दुर्गति तो दंपीने अनुसारका १५२ ने मादया. नापा-या पाना भनादिकायोपियार सद्धर्मतत्त. पी पहायोडे, तत्व पामतो नथी, जिनामा पाळी चकतो नयी. एम चितवी धर्ममा प्रवेश करतो ते स्वदया. चौधी परदया-उकाप जीवनी रक्षा करवी ते परदया. पांचमी स्वरूपदया-सूक्ष्म विवेकयीस्वरूप-विचारणात स्वरूप दया. उही अनुबंघदया-सदगुरु के मुशिक्षक शिप्पने करवाक- यनयी उपदेश आपे ए देखवामां तो अयोग्य लागेछे; परंतु परिणाम करुगानु कारणडे-एन नाम अनुसंघदया. सातमी व्यवहारदया-उपयोगपूर्वक वया विधिपूर्वक ने दया पाळवी तेनुं नाम व्यवहारदया. आठमी निश्चयदया-शृद्ध साध्य पयोगमा एकता भाव, अने अभेद उपयोग ते निधयदया. ए आठ प्रकारनी दयावढे करीने व्यवहारधर्म भगवाने क- घो के. एमां सर्व जीवनुं मुख, संतोप अभयदान ए सगळं विचारपूर्वक जोता आवी जायछे. पीजो निश्वयधर्म-पोताना स्वरुपनी भ्रमणा टाची, आ. स्माने आत्मभावे ओळखो, आ संसार ते मारो नयी, हुं एयी भिन्न परमअसंग सिदसद्रश्य शृद्ध आत्मा हूं, एवी आत्म- स्वभाववर्तना ते निश्यधर्म डे. जेमो कोड माणीनुं दु:स्व. अदिन के अमंनोप नहोछे त्यां दया नीः अने दया नयी त्यां धर्म नधी. अन भगवाननां कहला धर्मतत्वयो म प्राणी अभय चायडे. --
मोक्षपाग-पुस्ता पी.
शिक्षापाठ १० सद्गुरुतत्व भाग १.
पिता-पुष, तुं ने शाळामा अभ्यास करता नापते
साबानो सिर कोण?
पुत्र-शिलानी, सद्विान भने समान प्रामण.
शिवानी वाणी, पापळगत बगेरे केवाणी
पुष-पना वपन पर पाछे. ए कोने विकी पो.
लाता नधी भने पर गंभीर , बोलेछ यारे नाणे मुसमाधी
पण पो. को प्रापान काता नी, अने अमने गाय
नीति ममनायी शिक्षा भापे छे.
तिा यावा कारण नागने मने को जोएि.
पर-पार पम के.म करोग पितानी गंगारमा शिक्षण
पाने पाटे पतियो मम, व्यवहारनी नीति शी पटला पाटे
पाने सामने सामरी.
1ि -नागरावाणी के सा दोनती।
पुर-नीना वर पा पाग यमने अनि भने कुरपन
बोलता भारत पार नीति नो वागी पण को।
रिया-नो, मानने म fast
र मंमारमा पररावा नीति सामान पी.
बरसे कपल भने यस्तानिया र सानं परमाने
यान, महा मी
मन बी सीन म.
IT ITE र नीरिया
सद्गरतल. शिक्षकमां यह भेद छे. एक वीलोरीना करका जेम व्यवहार शिक्षक बने अमूल्य कौस्तुभ जेम आत्मधर्मशिक्षक रे. पुत्र-शीरडत्र ! आपनं को व्याजवी हे. धर्मना शिक्षक- नी संपूर्ण अवश्य छे. आपे वारंवार संसारनां अनंत दुरा सं- पंधी मने कप छ एपी पार पामवा धर्मज सहायभून छे सारे धर्म वेवा गुरुथी पामिये तो थेयस्कर नीवटे से मने कृपा क- रीने दो. शिक्षापाठ ११ सद्गुरुतत्व भाग २. पिता.....पुत्र! गुर व मकारना कदेवाय . १ काटस्व- रूर. २ कागदावरुप... पपरस्वरूप. काटम्वरुप गरु सर्वोत्त. म; कारण संसाररपी ममुटने काएवरुपी गुरुज तरेडे--अने वारी सकणे. २ पागलस्वरूप गुरू ए मध्यम से संसारसमुद्र ने पाने तरी सके नहीं; परंतु या एन्य उपार्जन करी के. ए पीनाने तारीमा नहीं. ६ पयरस्सर ते पोते व भने परने पप युबारे. साहवरुप गुरु मात्र मिनेमा भगनना दामना ३. पाशी ये माना जे गुरु राता ने समावरणने रद कर- नार it. आपले वया उधम पानुन पारिए जीए; अने उत्तमपी स्एप पीर. ए जो उनम रोपनी ने भरममा ना. विकलर पा मारनामां मारी पार मारे. दरमानना भट, सम्पद लारामवचार, ममासाप ९ मपर हैं- धम गुरु ना जीनामांकन वानी : पो. एका गुना नाका बना.
१८
मोक्षमाळा-पुस्तक चीजें.
गवाननी माखली आता तेने यथातथ्य पाळे, जाणे, अने श्रीमाने
पोधे, कंचन कामिनीथी सर्व भावी त्यागी होय, विशुद
अहारजळ लेता होय, याविश प्रकारना परिसह सहन करता
होय, क्षांत, दांत, निरारंभि अने जितेंद्रिय होय, सिद्धानिक
मानमा निमम होय धर्म माटे थइने पात्र शरीरनो निर्वाद
करता होय, निर्गध-पंथ पाळनां कायर न होय, सळी मात्र
पण अदन लेना न होय, सर्व प्रकारना अहार रात्रिये त्याग्या
होय, ममापि होय, अने निरागतापी सत्योपदेशक होय.
टुकामां ते प्रानि काष्ट स्वरुप सद्गुरु जाणवा. पुत्र! गुरुना
याचार, ज्ञान ए सम्बंधी भागमा बहु विवेक पूर्वक वर्णन
कर्य छे. जेम तु आगळ विचार करता विनो जाश, सेम
पछी हुँ तने ए विशेष नन्वो वोधतो जाय.
पुत्र-पिनानी, आप मने दंकामा पण या उपयोगी अने
कल्याणमय का निरंतर ने मनन करतो रहीय.
शिक्षापाठ १२ उत्तम गृहस्थ.
मंमामा रया छनां पण उनम पारको गृहाश्रमयी भा.
रममापनने मापं नीनो गृहाश्रम पण वगणायछे.
ने उत्तम पुरुष, मापायिक, क्षमापना चौविहार प्र.
स्वाटयान . यम नियमन मेवेले.
पर पान मी मान बननी द्रष्टि गये छ.
मगर ययानि दान देगे.
शांत, परी अंने कोमट पापा पोले.
उत्तम गृहस्थ.
सत्यानुं मनन करे हे.
बने लां मुधी उपजीविकामा पण माया, कपट, इ.
करतो नयी.
वी, पुत्र, मात, तातं, मुनि अने गुरुए सघळांने
पयायोग्य सन्मान आपे छे.
माचापने धर्मनो योष आपे हे.
यनायी घरनी स्वच्छता, रांधवं, सीधयु शयन इ०
रखावे.
पोते विचक्षणतायी वत्ति खी, पुत्रने बिनपि अने
घान करे.
सघळां कुटुंबमां संपनी दृदि करे छे.
आवेला अतियितुं यथायोग्य सन्मान करे छे.
याचकने क्षुधांतुर राखतो नयी.
सत्पुरुषोनो समागम अने तेभोनो बोध धारण
करें डे.
समर्याद अने संतोप युक्त निरंतर वर्ने छे.
यथाशक्ति भावनंचय जेनां घरमां रघो छः
अल्प आरंभयी जे व्यवहार चलावे छे.
आवो गृहस्सावास उत्तम गतिनु कारण याप, एम
झानीओ कई छ.
शिक्षापाठ १३ जिनेश्वरनी भक्ति भाग १.
निहार-विचक्षण सत्ल : कोई कन्नी, कोई ब्रह्मानी .
-पुस्तक पी. मोसमाळा- कोई रिभुनी, कोई अमिनी, कोई भवानीनी, कोई पैगम्म- रनी भने को काइम्दनी भक्ति करेगे, एमो भक्ति करीने मुंभाचारापना महा-विय निमागु, ने भाविक मोक्ष मनबरामी परम आगामी पदेवाने भने. नियामु-कही सारे, पथी नेत्री जाम गनि पामे एम नपारमान छ। मरा-भीनी भीनयर ने भी मोश पामे एमाई कही शकतो नधी. धान ने परमेश्वर को नेत्री को मारने पा. च्या नवी नो पठी सामान ए मोक्ष क्याथी भाप शेर वगरे कक्षा करी ग्रापा नी अने दूपणमहीन से. एपी ने पूनमा योग्य नपा. जिवामु-पपणी का कयां ने को। मन्य-प्रमान, निद्रा, मियाब, गग, देश, अविन, भय, मोर, नगमा दानानगर, सामानगय, योपानराप अ. ने सांगांतगय, काम, प्य, नि, अने भनिए भहार र. गमानं पराग होप नापण त अग. पाम परित पण कप केक पेशा पर पिच्या गत पनानारा पान नाना कान पामा गीताची था imया 1 माग या पीसी मो. बामाटा पाय " 41 4 गों ९.दादाम , गायन . किमानी बरसा 41. नाना 3 जिनेश्वरनी भक्ति भाग. सवारी परे!ळी नाक अवतार लेवार परमेश्वर सोराव तो त्वां देओने जा न भोगच वानी , एम मिद पाय . विवाह-माई, सारे पुश्य कोप! अने मक्षि सोनी करती के बहे आता समात्तिनो नजारा करे. सल-द मस्चिदानंदसल बोरन निद भगवान्नी पक्षियी मास इनहित, कपन, मुन्न कोवान परमपरहिन, मद, मदनों जिनेश्वर भगवाननी पति- पी आल्रतिसाद पा. निशान-ओनी भषि रसायी भन्ने देमोस आप ऐ समान बरं! मल-भाइ निशान, ने नानी भगतनको निरागी अने निर्विकार . प्ने ति निदान आपने चंद पटका- पार्नु भयोमन नपी. आपले माला अटानी ने दर पाने रदयी गपो से दे कर्मदड बना अनुमन पसानी अपार रे. मई कदापी जनसान, बनेर दान, मनमात्र, अनंदी, अने वानरपरा रा बिन सल-मालानी निस्पद गदि होनापी दे पापानमा किरन, पान ने मदर रमाका भो त सिकाई कि मेरे द ने निगरान सीमा::म:: नर- नंदन मर रन मोक्षपाला-पुस्तक पी. भान पाय ? नेम मिद के गिनेश्वरस्थापना चितवनरुप दपर्णधी आत्मस्वमानं मान याय छे. शिक्षापाठ १४ जिनेश्वरनी भक्तिभाग २. निमा--मा सत्य ! सिदम्वरूप पामेला त जिनेवरी मो मया पुग छ; त्यारे नामयी भक्ति करवानी और जरूर छ। मत्य --हा, अवश्य. अनंत मिदसरुपने ध्याता जे गुण सापना विचार याय ने भी कार्य परतुं ए जे जे ने सथाने पाम्पा मे कारण को! ए विचाम्नां उग्रता, महानवैराग्य, अ. नंनदया, मदानध्यान एमपठान स्मरण यो; पीना अनि नोकर पदमां ने नाममा ती विहार करताना नाम: नेभोना पवित्र आचार भने पवित्र चरित्रों अंतरणमा - दय नामदो. ने उदय परिणाम महा लाभदायक छ. म महा- वीग्नु पवित्र नाप म्मरण करवायी नेत्री को पारेका प्रकारे मिदिपाम्या! ए आदि पारपानी स्मृति यो. अने. एयी थापण वैगम्प, मिक स्यादिकनो उदय पाय.प. पगलांगम्ममा नापोवीन निशाना नाम. प्रधान कार्यात पनी हेतु में मने ममनाग. आकाठमां पा संयमाने घातीम निरीया पानां नान अने गांधीन माग ग्वामी दतमनी मा. पाप.iगनु भाग्य गम्प बोर है. मनर पावताना बनत भार मि RAIL म मावी ना. वर्षमानराम- मन्य २६ जिनेश्वरनी भक्ति भाग २. ना चोवीश तीर्थकरनां नाम आ काळे लेवाची काळनी स्थिति- नुं बहु सूक्ष्मज्ञान पण सांभरी आवेछे. जेम एओनां नाम आ' काळमां लेवायछे. तेम चोवीशी चोवीशीनां नाम काळ अने चौवीशी फरतां लेवातां जायछे. एटले अमुक नाम लेवा ऐम कंइ हेतु नथी. परंतु तेओना गुण अने पुरुषार्थ स्मृति माटे वर्तती चोवीशीनी स्मृति करवी एम तत्व रयुं छे. तेओना ज- न्म, विहार उपदेश ए सघळं नाम निक्षेपे जाणी शकायछे. ए वडे आपणो आत्मा प्रकाश पामेछे. सर्प जेम मोरलीना नादयी जागृत यायछे; तेम आत्मा पोतानी सत्य रीद्धि सांभळतां ते मोहनिद्राथी जागृत थाय छे. जिज्ञासु-मने तमे जिनेश्वरनी भक्ति संबंधी बहु उत्तम कारण कयु. आधुनिक केळवणीथी जिनेश्वरनी भक्ति कंइ फ- ळदायक नयी एम मने आस्था थइ हती. ते नाश पामी छे. जिनेश्वर भगवाननी अवस्य भक्ति करवी जोइए ए हुं मान्य रातुं छ. सस-जिनेश्वर भगवाननी भक्तिथी अनुपम लाभ छे, एना कारणो महान छे तेमना परम उपकारनेलीधे पण तेभो- नी भक्ति अवश्य करवी जोईए. वळी तेओना पुरुषार्थनुं स्म- रण थतां पण शुभ वृत्तियोनो उदय थायछे. जेम जेम श्री जिननां स्वरूपमा वृत्ति लय पामेछे तेम तेम परम शांति अवहेछे. एम जिनभक्तिनां कारणो अत्रे मंक्षेपमां कह्या ते आत्मार्थियोए विशेपपणे मनन करवां योग्य छ.
मोक्षमाळा-पुस्तक बी.
शिक्षापाठ १५ भक्तिनो उपदेश.
लोटकछंद.
शुम शीतळतामय जय रही,
मनवांछित ज्यां फळपंक्ति कही;
निन भक्ति गृहो तरु-करप अहो,
भनिने भगवंत मवंत लहो.
निज भात्मस्वरूप मुदा मगटे,
मन ताप उताप तमाम मरे
अति निर्जरता वण दाम गृहो,
भनिने भगवंत भवंत लहो.
सममावि सदा परिणाम यो,
जरमंद अधोगति जन्म नशे;
सुभ मंगल आ परिपूर्ण चहा,
भनिने भगवंत पवंत लही.
गुम मारे मन गुद कगे,
नवकार महा पदने समर्ग
नदिएर समान मुत्र कहो,
भनिने भगवंत मन नही.
करसो क्षय केवळ राग कया,
घरको गुम तलस्वरूप यया
ऋपचंदन अनंत दगे
मनिने भगांत मात्र सहो.
परी महता. शिक्षापाठ १६ खरी महत्ता. केटलाफ लक्ष्मीयी करीने महत्ता मळे डे एन माने रेट- लाक महान वयी महचा मछे से एक माने के फेटनाक पुत्र बडे करीने पहचा मळे जे एम माने हे केटलाक आधकारयी महवा म छे एम माने रे. पण ए एमर्नु मानतुं विवेकयी जो- तां मिथ्या छे. एओ जेमां महत्ता उरावे हे देमा मद्दचा नयी, पण लयुता के लक्ष्मीयी मंसारमा खानपान मान, अनुरोपर आदा भन ए सपर्नु मळ छे अने र महत्ता छे, एम वमे मा- नवा शो, पण एटलेयी एने महत्ता मानवी जोती नयी. लल्ली अनेक पाप बढे करीने पेदा याय है. आव्या पछी अभिमान, बेभानता, अने मुंहता आपे है. कुबममुद्दापनी महत्ता मेवा माटे तेनु पालन पोषण कर पडे छे. ते वडे पाप अने दुःख सहन करवां पहे छे. आपने उपाधियी पाप करी एवं उदर भरj पडे ई. पुत्री कंह धावत नाम रहे नयी; एने माटे पण अनेक प्रकारनां पाप अने उपाधि पेटवी पडे के छना एयी आप मंगल , थाय छे! अधिकारयी परतंत्रता के अमलमद आवे छे बने एयी जुलम, अनीति, लांच मज अन्याय करना पडे छे; के थाय छ. कहो त्यारे एमांयी महत्ता झानी याच ई. मात्र पापजन्य कर्मनी पारी कमंडे की आम्मानी नीव गनि थाय छ; नाच गाने के त्यां महना नी पण ल्यता आन्मानी माना हो मचत्रवन दया. वा. पोरकार अने ममनानां ही डे मन :: ए नो माना . एम , ८ मोक्षमाळा-पुस्तक वीजं. छतां लक्ष्मीथी शाणा पुरुपो दान देछे, उत्तम विद्याशाळा. ओ स्थापी परदुःखभंजन थाप छे. एक परणेली स्रीमान मात्र दृत्ति रोकी परस्त्री तरफ पुत्रिभावथी जुएछे. कुटुं- यवहे करीने अमुक समुदायतुं हित काम करछे. पुत्रवदे ने सं. सारभार आपी पोते धर्ममार्गमा प्रवेश करे छे. अधिकारथी दहा- पण व आचरण करी राना एमा वनेनं हित करी-धर्म- नीतिनो प्रकाश करछे, एम करवायी केटलीक पहचा पमाप खरी छता ए महत्ता चौकस नथी. मरणभय माथे रयो छे. धारणा घरी रहेछ. योजेली योजना के विवेक पराते हृदय- मांधी जता रहे एवी संमारमोहिनीय छे. एथी आपणे एम निम्संशय समनवं के सत्यवचन, दया, क्षमा, ब्रह्मचर्य अने समता जेवी भात्ममहचा कोई स्थळे नयी. शुद्ध पंचमहारत- धारी भिक्षुके जे रीदि अने महत्चा मेळवी ते अमदन जेवा चक्रवत्तिए लक्ष्मी, फुटुंब, पुत्र के अधिकारथी मेळवी नयी एम मारुं मानवु छ ! शिक्षापाठ १७ वाहुवळ. यापळ एटले पानानी भूनानं बळ एम अहीं अर्थ कर- वानो नथी, कारण के बावळ नामना पहापुरुपर्नु भा एक नानं पण अदभुन चरित्र . मन मग परित्याग करी, पवनी भगवान मरत अने वाहमळ नामना पोताना व मान गय मोपी विहार करता ना. न्यो पनिभा चक्रवनि थयो पापुरमाळापा 'चकनी उत्पनि धया पी प्रत्येक राज्य र नेणे पोनानी भन्नाय मारी, अने छमंडनी प्रभूता मंधी पात्र याव- ,
चाहुबळ.
लेज ए प्रभूता अंगीकार न करी. एयी परिणाममा भरते-
पर अने बाहुवचने पद मंडा. घगा वमत सुधी भरते पर
के वाबळ ए पन्नेमांधी एफे या नहीं, सारे शोधावेशमा
आवी नइ भरतेश्वरे बाहुबळपर चक्र मूब, पण एक वीर्ययी
उत्सम यपेला भाइपर पण ते चक्र प्रभाव न करी पाके, ए
नियमयी फरीने पाई भरतेश्वरना दायमा आयु. भरते चक्र
पूकवायी पाहुवळने बहु क्रोध आयो. तेणे महा वळवतर
मुधि उपाटी. तत्काळ लां वनी भावनान स्वरूप फर्य. ते वि.
पारी गयो के हुँ आ यह निंदनिय कर आने परि-
पाम फेवं दुःपदायक छ! भले भरतेश्वर राज्य भोगवी.
निध्या परस्सरनो नाश शा माटे करो ! था मुष्टि
मारवी योग्य नथी; ते इगामी ने हदे पाछी वारची
पण पोप नी. एम विचारी नेणे पंच मुष्टि केग लंचन कार्य
भने त्वांधी निभाने वाली नीरच्या. भगवान आदीवर
ज्या अटाए दिक्षित पुपोषी देमग आप-- भार्याधी विहार
करता हना नां जया इच्छा करी; पण मनमा मान भाएं
के. त्यांनासतो माराधी नाना भटाणु भारने वंदन कर
पर. पाटे त्यांनी जनुं योग्य नथी. एक माननियी बनमा
ते एकान पाने मा. रवंबर पाम पर गया. दा.
नापी काया राना मार्ग पर रहार जेना
देवानामा: प.
नयी पी नाम:
मंगर अ.न.EE:
परमी . न.प. .* : वरनी
.
२८ मोक्षमाळा-पुस्तक बी. यी वाडवळ विचारमा पड्या. विचारतां विचारता नेने भान थयुं के सत्यछ–९ मानरुपी मदोन्मत्त हाथीपरथी हज क्या उतयों छउँ ! हवे एथी उतरवू एज मंगळकारकछे एम विचारी तेणे वंदन करवाने माटे पगल भयु के ते अनुपम दिव्य कैवल्य कमळाने पाम्या. वांचनार, जुओ मान ए केवी दुरित वस्तु छ !! शिक्षापाठ १८ चारगति. संसारवना शुभाशुभ जीव सातावेदनीय, अमानावेदनी- य वेदतो कर्मनां फळ भोगववा आ चारगतिमा भम्या करे के तो ए चारगति खचीत जाणवी जोइए. १ नर्कगति-महारंभ, मदीरापान, मांस भक्षण, इत्यादिक तीन हिंसाना करनार जीवो अघोर नर्कमा पड़े छे. त्यां लेश पण शाता, विश्राम के मुख नयी. महा अंधकार व्याप्त छे. अंगछेदन सहन करवू पडेछे. आग्रमा वळवू पहेछे अने छरप- लानी धार जेई जळ पीयुं पढेछे. अनंत दुःखथी करीने ज्यां माणीभूते सांकड, अशाता अने विलविलाट सहन करवा पडे छे. आवा जे दुःपने केवलज्ञानीओ पण कही शकता नथी. अहोहो !! ते दुःख अनंनिवार आ आत्माए भोगव्यांछ. २ तिर्यचगनि छल, जूट प्रपच इत्यादिक करीने जीय सिं. ६, वाघ, हाथी, मृग, गार, म, पळद इत्यादिक तिर्यंचना शारीर धारण करेछ. ने निर्यचगनिया भुष, नग्म, नाप, वध पंधन, ताडन, भारवहन इत्यादिना दुःखन महन करे छे, चारगति. ३ मनुप्पगति-वाय, असाय, विपे विवेकरहितछे ल- माहीन, माता पुत्री साये काम गमन करवामां जेने पापापा- पर्नु भान नयी; निरंतर मांसभक्षण, चोरी, परस्त्रीगमन वगैरे पहा पातक कर्या करेछे. एतो जाणे अनार्यदेशनां अनार्य मनु- प्प के. आयदेवामां पण क्षत्रि, ग्राह्मण, वैश्य प्रमुख मतिहीन, दारेद्रि, अडान अने रोगधी पीडित मनुप्योछे. मान, अपमान इसादि अनेक मकारनां दुःख तेओ भोगवी रह्यां छे. ४ देवगति--परस्पर वेर, झेर, क्लेश, शोक, मत्सर, काम, मद, सुधा आदिवी देवताओ पण आयुष्य व्यतित करी राछे ए देवगति. एम चारगति सामान्यरुपे कही. आ चारे गतिमां मनुप्यगति सीथी श्रेष्ट अने डुलभ छे, आत्मानुं परम- हित मोक्ष ए देनुथी पमाय है ए मनुष्यगतियां पण केटलाक दुःख अने आत्मसाधनमां अंतरायो छे. एक तरुण सुकुमारने रोने रोमे लालचोळ सुया घोचवायी जे असह्य वेदना उपजे ते करतां आठगुणी वंदना गर्भस्था- नमां जीव ज्यारे रहेछे त्यारे पामेछे. लगभग नवमहीना मळ, सूत्र, लोही, परु आदिमां अहोरात्र मुर्छगन स्थिनिमां वेदना भोगी भोग ने जन्म पामे ७. गर्भम्याननी वंदनायी अनंत गी वेदना जन्मसमये गन्न थाय छे. त्यार पड़ी वालावस्या माय डे. ममत्र धर अने नमाम्यामा भनममजी रानी रहान ने बारावस्या पग य य अने यधावन्या आवडे. धन उपार्जन कम्बा मटे नाना पकाना प.पमा पर पडे. ज्यां- थी उत्पन्न भयो त्या एट विषय विकारमा नि जापडे.
मोक्षमाळा-पुस्तक बीजं. उन्माद, आळस, अभिमान, निंद्यष्टि संयोग वियोग एम घटमालमा युवावय चाली जायछे सां वृद्धावस्या आवे छे. शारीर कंपेछे, मुखे लाळ झरे छे. त्वचापर करोचली पी जा. यछे. मुंघसांभरचं अने देख ए शक्तियो केवळ मंद पर जायजे. केश धवळ यह खरवा मंडेछ चालवानी आप रहती नथी. हायमा लाकडी लइ लहथडीयां सात चालवू पढे छे. कांतो जीवन पर्यंत खाटले पडयां रहेQ पडे छे. श्वास, खांसी इत्यादिक रोग आवीने वळगे छे. अने योटा काळमा काळ आवीने कोळीभो करी जाय छे. आ देहमांथी जीव चाली नीकळेछ. काया हत्ती नहती या जायछे. मरण समये पण के- दली कधी वेदनाछे ? चर्तुगतिनां दुःखमा जे मनुष्यदेह श्रेष्ठ तेमा पण केटलों वा दुःख रह्यो छे! तेम छना उपर जगाच्या प्र. माणे अनुक्रमे काळ आवेडे एम पण नयी गमे ते वखने ते आवीने लइ जायचे. माटेन विचक्षण पुरुषो प्रमाद् विना आ- स्मकल्याणने भाराधे छे. शिक्षापाठ१९संसारने चार उपमाभाग१, संमारने महा नत्तानीभो एक समुदनी उपमा पण आपे छ. संसाररुपी सपद अनंन अने अपार. अहो लोको ! एनो पार पामा पुरुषायना उपयोग कगे: उपयोग करो !! आम एमनां स्थळे स्थळे वचनो छे. मंमाग्ने ममुदनी उपमा छाजती पण छे. ममुद्रमा जंप मामांनी डोळो उउया करडे तम सं. सारमा विषयरूपी भनेर मानां भी उसळेछ. जळनो उपरथी प्रेम संसारने चार उपमा भाग १. सपाट देखाव के तेम संसारपण सरळ देखाव देछे. समुद्र जेम क्यांक बहु उंटो छे, अने क्यांक भमरीओ खबरावेछे तेम सं- सार काम विषय प्रपंचादिकमां बहु रंडोछे. ते मोहरुपी भम- रीओ सवरावे छे. थोडे जळ उतां समुद्रमा जेम उभा रहेवायी कादवां गुची जइए छीए तेम संसारना लेश प्रमंगमा ते तृ- पणापी कादवां पुंचवी देछे. समुद्र जेम नाना प्रकारना ख- रावा अने तोफानी नाव के वहाणने जोखम पहोचाडेछ, तेम स्वीयोरुपी खरावा अने कामरुपी तोफानधी संसार आ- माने जोखम पहोंचाडे . समुद्र जेम अगाध जळपी शीतळ देखातो उतां बडवानळ नामना अग्निनो तेमां वास छे तेम संसारमा मायारुपी अग्नि बळ्याज करेछे. समुद्र जेम चोमा- सामां वधारे जळ पामीने उंदो उतरेछे तेम पापरूपी जळ पामीने संसार उडो उतरे छे, एटले मजबुन पाया करतो जाय छे. २ संसारने बीजी उपमा अमिनी छाने छे. अग्नियी क- रीने जेम महातापनी उत्पत्ति छे. एम संसारथी पण त्रिविध तापनी उत्पत्ति छे. अग्निधी वळेलो जीव जेम महा विलवि- लाट करेछे. तेम संसारथी वळेलो जीव अनंत दुःखरुप नयी अ- सह बिलबिलाट करेडे. अग्नि जेम सर्व वस्तुनो भक्ष करी जापछे, तेम संमारना मुग्नमां पडेलांनो ते भक्ष करी जायचे. अभिमां जेम जेम घी अने इंधन होमाय छे नेम नेम ने वृद्धि पामे छे, तेवीनगीने समाररुप अनिशं नाव मोहिनीरुप घी अने विषयरुप इंधन होमानां ने वृद्धि पाम छ. ३ मंसारने त्रीजीपमा अंधकारनी छाजे छे अंधका- .
मोक्षमाळा-पुस्तक बीमुं.
रमां जेम सौंदरी, सर्पनुं भान करावे छे तेम संमार सत्सने
असत्यरुप वतावे छ; अंधकारमा जेम प्राणीओ आम तेम
भटकी विपत्ति भोगवे छे तेम संसारमा बेभान पाने अनंत
आत्माओ चतुर्गतिमां आम तेम मटके छे. अंधकारमा जेम काच
अने हीरानु ज्ञान यतुं नयी तेम संमाररुपी अंधकारमा विवेक
अविवेकनुं ज्ञान यतुं नथी. जेम अंधकारमा प्राणीओ छती
आंखे अंघ धनी जाय छे तेम छती शक्तिए संसारमा तेश्रो
मोहांध वनी जाय छे अंधकारमा जेम घुबड इत्यादिकनो
उपद्रव वधे छे तेप संसारमा लोभ, मायादिकनों उपदव वधे
छे. एम अनेक भेदे जोतां संसार ते अंधकाररुपन जणाय छे.
शिक्षापाठ २० संसारने चार उपमा
भाग २.
४ संसारने चोथी उपमा शकटचक्रनी एटले गाडांना
पैडांनी छाजे छे चालता, शकटचक्र म फरर्नु रहे छे तेम
संसारमा प्रवेश करना ते फरनां रुपे रहे छे शकटचक्र जेम
धरी विना चाली शकतुं नयी तेम संसार मिथ्यावरुपी धरी
विना चाली शकतो नथी. शकटचक्र म आरावढे करीने
रघु छे नम मंसार शंका प्रमादादिक आरायी टक्यो छे. एम
अनेक प्रकारची शकटचकनी उपमा पण समारने लागी शके छे.
एवी रीने मंसारने जटली अरोपमा आपो एटली योडी
छे. मुस्टयपणे ए चार उपमा पापणे जाणी हवे एमांयी तत्त
लंबु योग्य छे.
वार भावना.
३३
३
१ सागर जेम मजवुत नाव अने माहितगार नाविकथी
तरीने पार पपाय छे तेम सद्धर्मरुपी नाव अने सद्गुरुरुपी
नाविकयी संमारसागर पार पामी काय छे. सागरमा जेम
डाह्या पुरुपाए निर्विघ्न रस्तो शोधी काढयो होय छे तेम जि-
नेश्वर भगवाने तत्वज्ञानरुप निर्विघ्न उत्तम राह वताव्यो छे.
२ अमि जेम सर्वने भत करी जाय डे, परंतु पाणीयी बु-
झाइ जाय रे तेम चैराग्यजळयी संसारअनि बुझवी शकाय छ.
३ अंधकारमा जेम दीवो लइ जवायी प्रकाश थतां, जोर
शकाय रे तेम तत्वज्ञान रूपी निर्बुज दीवो संसाररुपी अंधका-
रमा प्रकाश करी सत्य वस्तु वताव छे.
४ शकटचक्र जेम वळविना चाली शकतुं नयी तेम सं-
सारचक्र राग, द्वेषविना चाली शकतुं नथी.
एम ए संसारदरद निवारण उपमावडे अनुपानादि पति-
कार साधे कह्यं. ते आत्महितीपए निरंतर मनन करयुं अने
वीजाने योधq.
शिक्षापाठ २१ वार भावना.
वैराग्यनी, अने नेवा आत्महिनैपि विषयोनी मुद्रहता यषा
माटे वार भावना चितववानुं नन्वज्ञानीओ कहेडे.
र शरीर, वैभव, लक्ष्मी कुटुंब परिवागादिक मर्व विनाशी
छ; जीवनी मूळ धर्म अविनाशी छ एम चितवg ते पहली
अनित्यभावना.
२ संसारमा मरण समये जीवने शरण राखनार कोई
भावना. मोक्षमाना-पुस्तक वीजें. नधी, मात्र एक शुभ धर्मनुन शरण सत्यछे एम चितवई ते पीनी प्रसरण भावना. २ मा भारपाए संमारसमुद्रमा पर्यटन करता करता सर्व भव कीधाछे, ए संसारनंजीरयी ९ क्यारे छुटीश ! ए संसार मारो नथी, हुं मोक्षमपि छु; एम चितवई ते श्रीनी संसार ४ आ मारो आत्मा एकलोछे ते एकलो आव्योछे, एक- लो जशे; पोतानों करेला कर्म एकलो भोगवशे एप चितवई ते चोयी एकत्वभावना. ५ आ संसारमा कोई कोर्नु नपी एम चितव, से पांचमी अन्यस्वभावना. ६ आ पारीर अपवित्र छ, मळमुत्रनी साण छ, रोग ज. राने रहेवार्नु घाम छे, ए शरीरथी हुँ न्यारो छ एम चितवई ते उही अशुचिभावना. ७ राग, देप, अज्ञान, मिथ्यात्व ईत्यादिक सर्व भाभवछ एम चितवं ते सातमी आश्वभावना. ८ ज्ञान, ध्यानमा जीव वर्तमान पईने ना कर्म पांधे नहीं एवी चितवना करवी ते भाठमी सम्बरभावना. ९ ज्ञानमदिन किया करवी ते निरानं कारण छ एम चितव, ते नवमी निर्मराभावना. १० लोकस्वरूपनं उन्पत्ति, स्थिति, विनाशस्वरुप विचा- रखं ते दगमी लोकम्वरूपभावना. ११ मंमाग्मा भमता भान्माने सम्यकज्ञाननी प्रासादी प्राप्त थी दुल्लभ ; वा मम्यजान पाम्यो तो व
वापर असर
विगत परिनाम से हम . एवी विश्वना ने
अन्यानी रोपापभावना.
१२ घना उपदेशन तपा र कामना दोघा एका गुरु
भनेवं श्रवासन ती विग्ना ने बानी पर्न
आवार मानाभो पनन निरंतर विचारवादी म.
मुरलो चर पदने पापा से पाने-अने परे.
शिक्षापाठ २२ कामदेव श्रावक.
पी: भगवानना नया द्वादमानने किमह भायी
धारण करना. विकी निपचनावरक कापदेर ना.
मना एक. श्रावक नेभोना शिष्य ना. सुवर्मा सभा दिएक
देता कामदेवनी पस्तानी मा करी. पवामां त्वां एक
तुभ दिवान देव बो हनी ने एती नद्रदानो ओभास
बतायो अनेक चांदी परिसह पता न होप त्यां.
सुधी काप मानीत अन दा जमाद. आ मारी बात
९ पने बच आगीने सलग देनाई. पद कामदेव ने
चा सापालामा लीन इना. देववार श्यर सानु ल
दैनिय कः भने की कामदेवने अब था वोपन अब
रा. एटले गुमा में अंग कर्माने काबानो को पाने
कर चार पी. नोय कामदेव कार्यान्मयो ने म्य
नहीं: पी प्रदाय का गहननो देर शाम कंगने
बने नाना प. पी. कारन का कामयो
उच्या . निको अनं भयंका र पो कोन
सादीन्ममा ३३ प्र.न. नई.. एक महिना
पोलमाला-पुस्तक यौन.
पारे पहोर देवनाए कर्या कर्य; पण ने पोतानी धारणामा फा.
न्यो नहीं. पछी ते देव अवधिमानना उपयोगवढे जीयु नो का.
मदेयने मेहना शिपरनी पेरे अहोळ रमा दीदा. कामदेवनी
भरमून निघालता नाणी नेने विनयभावयी प्रणाम करी पो.
तानो दोप समावीने ने देवता स्वस्थानी गयो,
कायदेव श्रावकनी धर्मददना एवो पोध करेछे के मत्सर्भ
भने मयननिनामा परम दर रहे भने कायोत्मर्ग मादि प्रेम
पने नेम एकाग्र चिसी अने सुदनापी निदीप करता. पळ.
बिगळ मायया कापोन्मादि बाद दोपयुक्त यापछे. पाई मेवा
दष्पलाम माद धर्मशाप काटनारथी धर्ममा दाना स्थायी सी
सके ! भने गाकतो केवी रे ! ए विचारता रोद थाप.
शिक्षापाठ २३ सत्य.
मामान्य करानमा पण कंगापछे के मय ए आ जगत्
पारण ८. अथवा मन्या पागा मा नगत धुणे. ५ कपन.
पायी की शिक्षा पर क. धर्म, नीति, गन, अने प्यार
र मन्या सामर कर्ग म्यो प्रने पचा नहोय तो न.
गननं १ . पयका राय' पाटे मन्य प नगर्ने
पारण न कर प्रतियोनि. नव कमी माना
मंतु नया
मृगनयन प्राय र दायर
पएसमा ? il.
मृगजा, मा.
नगर मेशी.
सत्य. पा भण्या इता. पर्वत अध्यापकनो पुत्र हतो; अध्यापके काळ करें. एयी पर्वत तेनी मा महीत बमुराजाना दरवारमा आवी रहो नो. एक रात्रे तेनी मा पामे घेठी ; अने पर्वत तथा नारद शाखाभ्याम करेछे. एमां एक वचन पर्वत एवं योल्यो के 'अजादोतव्यं. त्यारे नारदे पूउयुं अज ते अ॒ पर्वत ? पर्वते नए, 'अन' ते 'वोकाडो.' नारद वोल्यो, आपणे त्रणे जण तारा पिता कने भणना हता त्यारे तारा पिताए तो 'अन' ने प्रण पनी 'ग्रीहि' कहीछे भने तुं अवळं पा माद कहे? एम पर- पर वचनविवाद वध्यो. चार पर्वते कन्यं, आपणने वसुराजा को ने परं. ए वाननी नारदे हा कही; अने जीते तेने माटे अमुक मरन करी. पननी मा ने पामे घेटी हती तेणे भा मांभळ्यं. 'अन' एटले. 'मीदि' एम तेने पण याद हतुं मरन- मा पोतानो पुत्र पारगे एवा भयथी पतनी मा गरे राजा पासे गह अने पू:यं, गजा, 'अन एटले ? यमुग़जाए मंत्र- धपूर्वक कर. 'अन एटले 'नीदि.' त्वारे पवननी माए ग- जाने का माग पत्रधी 'योकहाँ' कवयो के माटे, नेनो पक्ष करना पटो: नयने रवा मार ने भी भाव. यमृगजा वाल्योः ९ असर के.सी पनं २ . पवनी पाए क. पण जो न मानो २.. नई नो मन र. या अपी राकार-गयो मद र संगने मजमय मिहामन : सा. बदामन पार आए १३. २ प २ को .:: मरने सिहामनर अनाम मे १२५. ना पवनना पस - .. .
मोक्षमाजा-पुस्तक बी.
न कर तो ग्रामणी मरेछेए बळी मारा गुरुनी स्त्री. न
पालना वटे रानाए प्रामाणीने कईं समे भले जाभोई
पंतनो पक्ष फरीश. भायो निधय करावीने पतनी मा मेर
भाषी. प्रमाने नारद, पर्वत अने सनी मा विवाद करता रामा
पामे भाव्या. राना अजाण पी पूड्या लाग्यो, पर्वत ।
पने काग, राजाधिराज! अन ते मे कहो. रानाए नार•
दने पुण्यं, नमे से कहोछो । नारदे क', 'अन' ते प्रण यानी
'मोदी' नमनं क्या नथी मांभरतुं यमुरामा पोल्यो, 'मन'
पटने 'योरो' पण 'नाही' नहीं. नेन वेळा देवताए मिटाम
नधी उछाटीटी नात्यो; पण कामपरिणाम पामी नरके गयो.
भा उपाधी मामान्य मनुष्योए मत्स, मेमम रानाए गा-
पर्मा अाशन भने सम्य पमे गृहण करवायोग्य छ ए माय
बोध मो.
पनि माग भगवाने प्रणीन का छे माना अपम
महामनी रक्षाने पाट पाहीना गार सृत पारल अने
नेगा पापली वाहने मत्य महानुन छ.९ मत्सना अनेक
भंद मिनयी शुत करवा पापना ऐ.
शिक्षापाठ २१ सत्संग.
मन्मंग मामुपान म. से मम्मंगनी माम मच्या
जनावार वाशित मिटि पान परी गमे मेरा परिवार
मरे मम्मट पान; मम्मंगनी पर परमार
देने समाना रवि वर्ग म माम ना.
सत्संग. फतां अधोगतिमय महा पापो करावे, तेमज आत्माने म. लिन करे छे. सत्संगनो सामान्य अर्थ एटलोछे के रत्तमनो सहवाम. ज्यां सारी हवा नयी आववी त्सां रोगनी वृद्धि याय छे तेम यां सत्संग नयी त्यां आत्मरोग वघे छे. दुर्ग- घी कंटाळीने जेम नाके वस्त्र आहुं दइए डीए तेम कुसंगधी सहवास बंध करवानुं अवश्यतुं जे संसार ए पण एक प्र- कारनो संग छ; अने ते अनंत कुसंगरुप तेमन दुःखदायक होवायी त्यागवा योग्य छे. गमे ते जातनो सहवास होय परंतु जेहे आत्मसिदि नयी ते सत्संग नयी. आत्माने सत्य रंग चढावे ते सत्संग. मोसनो मार्ग वतावे ते मंत्रि. उ. त्तम शास्त्रमा निरंतर एकान रहे, ते पण सत्संग के सत्पुरु. पोनो समागम ए पण सत्संग है. मलिन वस्त्रने जेम साबु तथा जळ स्वच्छ करेछे तेम दाखवाय अने सत्पुरुषोनो समागम, आत्मानी मलिनता टाळीने शृद्धता आपछे.जेनाथी हमेशनो प. रिचय नही राग,रंग,गान.नान.अने स्वादिष्ट भोजन मेवानां होय ते तमने गमे नवा मिय होय नोपण निश्चय मानजी के ते स. मंग नथी, पण कमंग डे सन्मंगयी प्र'म ययेन एक वचन अमुल्य लाभ आप ७. नवजाना बोए मुख्य दोष एबो कयों उ के मत्र मंग परित्याग करी. अंतरमा रहेला म विनायी पण विरक्त रही एकांतनं मेवन कगे. नेमां ममंगनी नुन आवी जाय इं. केवल एकान ननो ध्यानमा रहेके यांगा. ध्याममां नवं प छ, परंतु ममबभाविनी ममागन जपाय एक प्रकारनी बत्तननानो प्रसाद नीक ने, भार एकज
४०
मोक्षमाळा-पुस्तक बीजे.
कप होवायी प्रणा माणमो छना भने परस्परनो सहास नां
में एकानरुपम छ भने तेवी एकांत मात्र संनसमागममा रही
कदापि कोइ एम विचारशे के विषयीमंडळ मळे छे त्या समभाव
सरमा वृत्ति होगाची एकांत को न कहेवी? तेनुं समाधान तत्काळ
के ने भी एक भावि होना नधी.नेमा परस्पर स्वार्थ युधि अने मा.
यानुं अनुसंधान होय छ भने यो ए ये कारणथी ममागमछे ने एक
मावि के निर्दोष होता नधी. निदोष भने ममावभावि स.
मागम नो परम्परथी गात मनीश्वगनाई तेमन मध्यानमः
मान अल्पाभी पुरुपनी पण कंटलेक अंश छे. ज्या स्वार्थ भने
माया कपटन त्या ममम्बनायता नथी; भने ने परमंग पण
नवी मन्मंगयी में गुप अने आनंद मकर ने भनि स्तुनिपात्र
हे श्यां गायांना मुदर प्रशी याय, ज्या उत्तम मान ध्याननी
गुरुपा याय, ज्यां मयुगीनां गम्बिार पिचार घाय, ज्यो
नवमानना नांगनी लारिया , ज्या माठ समाधी मि.
सात पिनार नाय, या माअनन्य कथनराळशिचन
याय पलो मन्मंग न पाइभ रहे होड पम करके मन्मंग
मंडन्टा कोर पापावि नार हाय ! नी नेनुं गमागन प्रा :
पाया अंने मायन्या मम्मंगन होता नयी ग.
जामना मनाना बाग मात्र ही न सायना प्राय
गत 2, मान पा :871
कामा नागना मन दायपदाम-मया पत्राने
को 'य' पर मामा
नरनिया 341 142 रनको
11 नाय'
परिग्रहने संकोचतो.
वोजीशार वे आगमन होय नहीं: जेम पृथ्विपर तराय नहीं,
तैम मत्संगयी हाय नहीं; आची मत्संगमां चमत्कृनि . नि-
रंतर एका निर्दोष समागममा मापा लइने आवे पण कोण ?
कोइन दुर्भागी; अने ते पण अर्मभक्ति .
सत्संग ए आलान परम हिवकारि औषध छे.
शिक्षापाठ २५ परिग्रहने संकोचवो.
जे पाणीने परिवहनी मर्यादा नयी, ने प्राणी मुबी नयी
तेने जे पच्यु व ओच्छे. कारण जेटनु जाप केलांची विशे-
पमाप्त करवा देनी इच्छा पापडे. परिबानी वनामा ने
इम होप वेनु मुख तो भोगगर्नु नयी परंतु दोय ते पण
चखते जापरे. परिप्रायी निरंतर परिवर परिणाम अने
पापभावना रहेछ; अकस्मात् पोग्धी एका पापभावनामा मा-
पुष्प पूर्ण पाप नो बहुधा अयोगविन कारण या पटे. केरळ
परिखा वो मुनिपरो लागी शो पन मृदस्यो एनी भयुक
पादा करी सके. मादा यवाची उपरांत परिवानी सति
नयी अने एमी करीने विशेष भावना पनामा पती नयी
अने पी के नेकां संको गमवानी या पटेछे पनी
सपना का जाय. रोग मारे नसीआदिमा गए
विविदि.मा हा
पनीर दी जार
::::
....... :::
पटो.इन PF
४० मोक्षपाळा-पुस्तक पीन. का गुमाया के भारहितपि था नयी. जेणे एनी टुकी मादा की नहीं; ने पहोला दुःपना भोगी यया ... छह साधी आता मनावनार राजाधिरान, पानी कर गय . ए गमर्थ पानीमा शुभुम ना एक चकानी पड़ गयो . गणे छ संह साधी लीधा एटले पक्रयाग-पर- थी ते मनाया; पण एटदेगी एनी पनोपांच्छा इस न पहा. ज ने नापी यो. एरले पानकी संहना पंड माला पणे नियम कपों. दया पवनी छह साधेछ, भने हुं पण पर- थान मानेमा महता नानी या माशायी निकाल हुं नामांति पा. ममर्थ यात्रा भीवनपर्यंत ए पंडोर मना. मी मा विचारथी समुद्री नमरत्र मार्ग ने उपर ग मेन्यादिनो माधार रनो हता; पमैरवना पर नार देवता मेरस कवाय नमा प्रथम एरिनार्य के कोग ना. णे कटलाग व प्रामाथी गुटको यो! माटे वागनाने की पटा पार पाने चाल्यो गयो पर्णी यांनी गयो पछी श्रीजा गा. मन म हता कानी हमारे पापा गया सारे नात्र वृप अन, गत अनं मागमति गमय नामनी ने बानी पोमनापा ने मानामा पानी पोथी गाती नतमसमान या', परन पापियां मोगा 2. ५ पर 14 मानाची : -041147, 4.
तत्व समजवु. ने महा दोप दे एवो एनो स्वभाव ले.. ए माटे थइने आत्महि- तपिए जेम. बने तेमतेनो त्याग करी मर्यादापूर्वक वर्तन करवं. शिक्षापाठ २६ तत्व समजबु. शास्त्रोनां शास्त्रो मुख पाठे होय एवा पुरुपो घणा मळी शके; परंतु जेणे थोडां वचनोपर प्रौढ अने विवेकपूर्वक विचार करी शास्त्र जेटलुं ज्ञान हृदयगत कर्यु होय तेवा मळवा दुल्लभ छे. तत्वने पहोंची जq ए कंइ नानी वात नथी. कूदीने दरि- यो ओळंगी जवोछे. अर्थ एटले लक्ष्मी, अर्थ एटले तत्व अने अर्थ एटले शदनुं वीजें नाम. आवा अर्थशदना घणा अर्थ थायछे. पण अर्थ एटले तख ए विपयपर अहीं आगळ कहेवार्नुछे. जेओ निग्रंथ- प्रवचनमां आवेलां पवित्र वचनो मुखपाठे करेछे; ते तेओनां उत्साहवळे सत्फळ उपार्जन करेछे; परंतु जो तेनो मर्म पाम्यो होय तो एपी ए सुख, आनंद, विवेक अने परिणामे महद्भूत- फळ पामेछे. अभणपुरुप मुंदर अक्षर अने ताणेला मिथ्या ली- टा ए वेना भेदने जेटलं जाणेछे नेलंन मुम्बपाठी अन्य ग्रंथ विचार अने निग्रंथमवचनने भेद रूप मान; कारण अर्थ पूर्वक निग्रंथ वचनामृनो धाय नधी: नेम ने पाया तवावे. चार का नधी. जोक नवविचार करवामांव जाइराई नोपण विचार करी शकः रानी नोपण पाणीवी पर तमज जे वचनामना गरे ।
मोक्षमाला-पुस्तक पी. ते अर्थ महिन होय तो यह उपयोगी थई पडे, नहींतो पोपटवा. राम नाम. पोपटने कोई परिनये रामनाम कहेता शीसदारे परंन पोपटनी पाला जाणे के राम ते दाडम के द्राक्ष. सामा. न्या गममा यगर गएं पाय. कच्छी पोर्नु अनि एक कंदापछे ने केक हाम्ययुक्तछे गम्; परंतु एमाथी उत्तम शिक्षा मठी नेम छ; एटले भी कही न छ. करछना कोई गाममा श्रावधर्म पालना रायशी, देवशी अने तशी एम प्रम नाम घाग ओशवाळ रोना हना. नियमित रीते तो. ध्याकाठ, भने पटिये प्रतिक्रमणि करना हता. परोहिये राय जी भने मंध्याकाळ देशी मनिकमण कगवना हना. राधि- यी मनिकरण रायनी कगरना; अने मंबंधे 'रायशी पडिम- मणुटायमि' एम नेने योलार पडन नेमान 'देवशीने देवशी परिपणुंगममि पम मंबंध होनाथी याला पर्नु गोगानु. योगे घगाना बानायी एक दिनम मंगाका तीने पोला. ववारेमा यो पेनसीप म्या 'देवगी परिमाणं अपमि' एम आग्य त्या घेतली पर टायपि ए वारयो लगा दी. घा! प मामठी या शाम्यग्रम्न गया अनेछयं प्रामका । गनमी वान्या वटी माम ने कम! साटमा पच्या 'it. दीपा टायपि म न म कालोमोमगार का मार्गदर पार नाय भागां पानगर अनाना काम दाता 144 1.24.4 समीप 14" H मना टाटा,मगरका पना. पहिसाणं टापनि एम कां न कहुँ ! एनी भद्रिकवार तो बचाने विनोद उपजाव्यो; पड़ी अर्थनी कारपसहित समजण पाडी एटले सुननी पोतानां मुखपानी प्रविक्रमणयी शरमायो. आ वो एक सामान्य वाव छे; परंतु अर्यनी सुवी न्यारी डे. तत्व पर विचार करी शाके. वासीको गोळगब्योन लागे नेम नियवचनान्तो पण सलग्न आपे. महो! पण मर्म पामबानी वावनी तो क्लीहारीज ! शिक्षापाठ २७ यत्ना. जेम विवेक ए धर्म, मूवत छे; म पना र धर्मर्नु उपत- त छे. विवेकची धर्म वत्र प्रहण कराय है तथा पनायी ने वत्व शृद्ध राखी शजायले अन ते प्रमाणे प्रार्चन करी भकाय हे. पांच ममिविरून पनो तो बहु धेट के; परंतु हाथनीय नर्व भात्र पाबी मुकान, न:: छना जेटला भावांगे पानी काय वेटला भाभे पण अमावानी यो पाई गरा, जि. मा भगवंत वांवली न्यू अंने नाम या प्रन्य ज्यां वरमार्ग छ, त्यां बहु दोपयों पानी काय ए यन्न पकाने धे ई. सतारी भने वेगमर्ग कान, नो नो बाटो सम्बनी अपूर्ण विधि, पदे. इचननं बार ये है उपयोग अनाजमा रहला मामी- अगर पता मामाच्या वरचा दाधना अममा मला. आंगामा पापानं .: धव चमनी या नीचे भी एकीनन अ... .
४३ मासमाळा-पुस्तक चीजें.
गा, अगा, अनारोग्यता इसादिक फट कप थाप है;
भने पालोमा दागदापि महापापना कारण पण यह पडे ।
ए पादे थइने कानी घोष पाण्यामा, यमयामा, उठया.
पो, गमरामा भने पीना होक प्रकारमा यत्रानो उपयोग के.
सो. पी भने भाये य प्रकारे लाम छ. चाल पापी
अंगाभा गी पर स्वच्छ पाया, पाणी विधि सहित ग.
या काष्टादिक उंचन मंपरीने नांपर्यापक आपणने
प्रगार पर काम नबी नेम नमामिप यपत जनो नपी.एस
निरमा दागत करीदीमा पठी पाळा मुशल नथी. एथी
गि अमंग्यान पिगपी नुमा यो से
प्रो काम यन्नापूरकन कर ए विकी पार्नु
क.
शिक्षापाठ २८ गत्रिभोजन.
अस्मिानपान ने भाराने विभाजन त्याग
इन ब. गामा पार मसाना पारा ने अमा.
करने जानना आसानो रंग होम जानिना म.
नाना मोर ने प्राय पराय. गरिमार
नाय प्राण र मनान
मनट 3 4 24 पर 3, न मानता
गोटा मू. 42
प्रभा
मा
4 मारना
मन मा
सर्व जीवनी रक्षा भाग १. ४७ . अने मच्छरादिक सूक्ष्म जंतुनो पण भय रहेछे वसते ए, बुटुंबादिकने भयंकर रोगर्नु कारण पण यइ पडे छे. रात्रिभोजननो पुराणादिक मतमां पण सामान्य आचारने खातर त्याग क्यों छे छतां तेओमां परंपरानी रुबीए करीने रात्रिभोजन पेसी ग रे. पण ए निषेधकतोडेज. शरीरनी अंदर वे प्रकारनां कमळ छे. ते म्पना अस्तयो संकोच पामी जायछे एयी करीने रात्रिभोजनमा सूक्ष्म जीव भक्षगरुष अहित यायछे जे महा रोगर्नु कारणछे. एवो केट- लेक स्थळे आयुर्वेदनो पण मतछे. सत्पुरुपो तो दिवस वे घही रहे त्यारे वाल करे बने वे यडी दीवस चन्यां पहेलां गमे ते जावनो थाहार करे नहीं. रात्रिभोजनने माटे विशेष विचार मुनिसमागमयी के शास्त्री जाणवो. ए संबंधी बहु मूल्म भेदो जाणवा अवश्यनाछे. चारे नकारना अहार रात्रिने विपे त्यागवायी महफळ छे. आ जिन वचन छे. शिक्षापाठ २९ सर्व जीवनी रक्षा भाग १ दया जेवो एके धर्म नयी. दया एज धर्मर्नु स्वरुपडे. ज्यां दया नथी लां धर्म नयी. जगतितकमां एवा अनर्थकारक धर्म मतो पत्यारे के जेओ एम कहेछे के जीवन हणतां लेश पाप यतुं नयी; बहु तो मनुष्य देहनी रक्षा करो. तेम ए धर्ममतवा- का झनुनी. मदांध छ भने दयानुं लेश खरुप पण जाणता नथी. एओ जो पोवानुं हदयपर प्रकाशमां मूतीने विचारे तो ४८ मोक्षमाला पुस्तक वाजु. अवश्य तेमने जणाशे के एक मूल्ममा मूक्ष्म जंतुने हणवामां पण महा पापछे. जेवो मने मारो आत्मा भियछे तेवो तेने पण तनो आत्मा प्रियछे. हुं मारा लेश व्यसन खातर के लाभ खातर एवा असंख्याता जीवोने वेधडक इणुं छउं. ए मने केठल वधु अनंत दुख कारण यह पडशे ? तेओर्मा युद्धिील पण न. ही होवाथी तेओ आवो सात्विक विचार करी शकता नयी. पापमा ने पापमा निशदिन मन छे. वेद, अने वैष्णवादि पं. थोमां पण सूक्ष्म दया संबंधी कंद विचार जोवामा आवतो नथी. तोपण एभो केवळ दयाने नहीं समजनार करतां घणा उत्तमछे. स्थूळ जीवोनी रक्षामा ए ठीक समज्याछे; परंतु ए सपळा करता आपणे केवा भाग्यशाळी के उपा एक पूपा• खडी भाय त्यां पापछे ए खरंतत्व समग्या अने यज्ञयागा. दिक हिंसाथी तो केवळ विरक्त रया छीए ! यनता प्रयनधी जीव पचावीए छीए, वळी चाहिने जीव हणवानी आपणी लेश इच्छा नथी. अनंतकाय अभक्षयी बहु करी आपणे विर- क्तन छीए. आ काळे ए सपळो पून्यप्रताप सिद्धार्थ भूपाळना पुत्र महावीरनां कलां परमतत्ववोधना योगयळयी वध्यो छे. मनुष्यो रीदि पामंछे, सुंदर स्त्री पामेछे, आनांकित पुत्र पामे छ, पहोलो कुटुंबपरिवार पामेछे मानप्रतिष्टा तेमन अधिकार पामेछे. अने ते पामवा कंइ दुल्लभ नथी; परंतु खरं धर्मतत्व के तेनी श्रद्धा के तेनो योडो अंश पण पामत्रो महा दुलम छ. ए रीदित्यादिक अविवेकी पापर्नु कारण थई अनंत दुःख- मां लई जायछे; परंतु आ योडी श्रद्धाभावना पण उत्तम सर्व जीवनी सा भाम २. पहिर पहाबाडेछे. आम दपार्नु सत्तरिणाम छे, आपणे धर्मत- सयुक्त मां जन्म पान्या छीर तो हवे जेम बने ते मित्र दयामय वर्चनमा आपबु. वारंवार लामां राख के सर्व जी- वनी रक्षा करवी. दीनाने पण एवोज युक्तियुक्तियी वोप आपत्रो. नई जीवनी सा करता माटे एक बोपदापक उचम युक्ति पादशाही अभयकुमारे करी हवी ते आश्वा पाटमा हुँ पहुं उ एमज वववोपने पाटे चौक्तिकन्याययी अनार्य जेवा धर्मननवादीओने मिक्षा आपत्रानो बखत मळे तो आपणे केला भाग्यशाली! शिक्षापाठ ३० सर्व जीवनी रक्षा भाग २. मगध देशनी रामही नगरीनो अधिराजा श्रेणिक एक वसते सभा भरीने वेटो हतो. प्रसंगोपात वातचिदना प्रसंगां मांसलुम सातो हता ते वोल्पा के हमणां मांगनी विदोष सस्ताई ई. आ वाव अभपहमारे सांगली. ए उपत्यी ए हि- सर सामनोने वोष देवानो ने निक्षय कों. सांजे ममा विसर्जन यई अने राजा:पुरपां गया.पार पठी काव्य माटे जे जेणे मांसनी वाचारी हवी तेन तेने पर अभयकुमार गया. जेने घेर जाय त्यां सत्कार कर्षा पछी तेओ पूछना ला. न्या के आप, पन्धिन लाई अगर ये फेस पचा परे: अभयहारे कायं. महागना जिने अगेन उत्पन्न बाजे बंद भंडाकादयी ने कई नु. यना काका मा यामानान होर वो भी.
मोसमाळा- पुस्तक पीजु. तपे राजाना प्रियमान्य छोमाटे तमारे त्यांए मांस लेवा आयो छ. प्रत्येक सामते विचायु के कामना मांस ई मुराविना, शीरीते आपी शके ? एयी अभयकुमारने पूथ्यं महाराज, ए तो केम यई शके १ एम कही पछी अभयकुमारने केटलुक द्रव्य । पोतानी वात राजा आगळ नहीं मसिद करवा ते प्रत्येक सामंत आ पता गया अने ते अभयकुमार लेता गया.एम सपना सामंतोने घेर अभयकुमार फरी आव्या.सपळा यांस न आपीशक्या,अने आम तेपणे पोतानी वात छुपाक्वा द्रव्याप्यु. पछी वीने दिवसे ज्यारे सभा भेली थइ त्यारे सघळा सामंतो पोताने आसने आवीने घेठा. राजा पण सिंहासनपर विराज्या हता. सामंतो आवी आवीने गइ काल कुशल पूछवा लाग्पा. रामा ए वातथी विस्मित थया. अभयकुमार भणी जोयं एटले अभयकुमार पोल्या. महा- राज काले आपना सामंतो सभामा पोल्या हवा के इपणों मांस सस्तु मळे. जेथी हुँ तेभोने त्यां लेबा गयो हतो, त्यारे सपळाए मने यहु द्रव्य आप्यु; परंतु काळजार्नु सबा पैसाभार मांस न आप्यु. त्यारे ए मांस सस्तु के माधु घघा मामतो सांभळी दारमयी नीचुं जोइ रह्या. कोइची का योली शका' नहीं. पछी अभयकुमारे कायु, आ कर में तमने दु.ख आपया कर्य नधी; परंतु पोध आपका कर्यु छे. आपणने आपणाश- रीरनुं मांस आपy पढेतो अनंतमय थाय छे, कारण आपणा देहनी आपणने मियताछे, तेम जे जीवन ते मांस हशे सेनो पण नीव तने वाली हशे. जेम आपणे अमूल्य वस्तुओ आपीने पण पांतानो देह वचावीए छीए तम ने विचारा पामर A
प्रत्यास्पान.
पाणीओने पण होई जोइए. आपणे समजणानां, बोलना
चालनांमागी हाए. ते विचार अवाचन अने निराधार
भाणी हे तेमने मोतरुप दुःप आपीए ए . पापमरळ
कारण रो. आपणे भा चचन निरंतर लामा राग के
माणीने पोतानो जीव वालो के भने सर्व जीवनी रक्षा
करवी ए वो एफे धर्म नपी. अभपदमारना भाषणपी पति-
प. महाराजा मंतोपापा. सपन्य सामंतो पण दोष पाम्दा.
मोए से दिसमपी मांस गावानी प्रतिक्षा बरी, पाप एक
मोते अभा हे भने यो जीप पापा पिना ने भार्नु
नधी र पोटो अधर्ममाटे अभय प्रधान, कथन समितीने
ते भीए अपदान रक्ष भाj.
अनपदान आन्माना परम मुखर्नु बारम.
शिक्षापाठ ३१ प्रत्याख्यान.
पाप नापना रद पारंवार मागमांना.
सं. (
नोद महारथान है; अने दे र बन्द
नीति न कर पा र ममी वा नियम
काल पदो पर ऐ. मानससानो महा
མཱ ཙྪའི . ་རཀ ནོ༑ ་ ཁོ
माधान भीनमो नमन ही पी करके
मरमरी को मन
:
पोक्षमाळा-पुस्तक कार्जु जेम घरनुं वारउघाई होय अने भानादिक जनावर के मनुष्य चाल्युं आवे तेम इच्छानां द्वार सुल्ला होय तो तेमां कर्म भवेश करे छे. एटले के ए भणी आपणा विचार छूटयी जाय छ; ते कर्म बंधन- कारण छ, अने जो प्रसाख्यान होय तो पछी ए भणी द्रष्टि करवानी इच्छा यती नयी. जेम आपणे जाणीए छीए के वांसानो मध्य भाग आपणाची जोइ शकातो नधी, माटे ए भणी आपणे द्रष्टि पण करता नथी; तेम प्र- साख्यान करवायी आपणे अमुक वस्तु खवाय के भोग्वाप तेम नथी एटले ए भणी आपणुं लक्ष स्वाभाविक जनुं नयी, ए कर्म आववाने भाडो कोट यह पड़े छे. प्रसारुयान कर्या पछी विस्मृनि वगेरे कारणयी कोई दोष आवी जाय तो सेना प्रायश्चित निवारण पण महात्माभोए का छे. प्रत्याख्यानथी एक पीजो पण मोटो लामछे से एके अ- मुक वस्तुओमान आपणो लक्ष रहे छे, वाकी वधी वस्तुओनो त्याग यह जायछे जे जे वास्तु साग करी छे ने ते सबंधी पछी विशेष विचार, ग्रहयुं, मूक, के एवी कद उपाधि रहेती नथी. एवढे मन बहु वहोलनाने पामी नियमरुपी सडकमां चास्युं जा. यछे अप जो लगापमा आवी जायछे, तो पछी गमे तेवो प्रबळ छतां तेने धारेले रस्ते जेम ला जवाप छे तेम मन ए नियमरुपी लगाममां भाववाची पछी गमे ते शुभ राहमा लइ जवाप छ अने ना वारंवार पर्यटन कराववाथी ने एकाग्र, विचारशील अने विवकी थायछे, मननो आनंद नगग्ने पण निरोगी करे छे. वळी अभक्ष्य, अनंतकाय, पानिपादिक नियम कर्यायी .
विनपवढे वत्वनी भिदि . पजभरीर निरोगी रही पके रे. मादक पदार्यों मनने अपने पने दोरे, पण मलास्यानयी मन लां जवां अकेले एथी ते विमा पाप हे. प्रत्याख्यान ए फेवी उचम नियम पायानी प्रतिज्ञा से ते आ पर्या तमे समस्या हो. विशेष सद्गुरु मुन्नयी अने शामावलोकनयी समजवा हुँ चोध कर उ. शिक्षापाठ३२विनयवडेतत्वनी सिविछे. राजराही नगर्रानां राज्यासनपर ज्यारे श्रेणिक राजा वि- राजमान इना, सारे ने नगरीमा एक डाट रहेको हतो. एक वसवे ए टास्नी सीने गर्भ रहो, त्याने तेने केरी सावानी इच्छा उत्पन्न या. तेणे ते लादी आपवा डाने काएं. चंदा वई, आ कानो पसत नयी, पटले सारो पाप नयी. नहीं ताई गमे देटलेचे होय लायी मारी विधानां बच्चडे करीने लावी वारी इच्छा सिद्ध कर. डाळपीर राई, राजानी . हारानीना वागम एक अनाटिक कैरी देनार आंबोडे. तेपर असारे रीमो लची रही हझे, माटे त्यां जाने एकेरी लावो. पोतानी खानी इच्छा पूरी पाडवा चंदा दे वानमा गयो. गुप्त ते आंबा समीप जई मंत्र भनीने तेने नमामो बने करी लीपी. वीजा मंत्री करीने ने हदो एम करीदीयो. पण ते पर मान्चो भने नीतनी इच्छा मानितर हा विचारले लांची रीताका लाग्यो. एक दिवसे फरतां फरनामाळीनी द्र का भी गई. फेरीओनी चोरी यली जोइने वणे ज- मोक्षमाळा-पुस्तक वीर्जु. इने श्रेणिकराजा आगळ नम्रतापूर्वक कन्यु. श्रेणिकनी आज्ञायी अभयकुमार नामना बुदिशाळी मधाने युक्तिवडे ते चंडाळने शोधी काट्यो. तेने पोता आगळ तेढावी पूडयुं, एटलां बयां माणसो पागमा रहेछे छतां तु केवी रीते चढीने एकेरी लई गयो के ए वात कळवायां पण न आवी । चंडाळे कपुं, आप मारो अपराध क्षमा करजो. हुं साचु बोली ज छ के मारी पामे एक विधा छे; तेना योगयी ९ ए कैरीमो लइ सक्यो. अभप. कुमारे कयु, माराधी क्षमा न थइ शके; परंतु महाराजा गि- कने ए विधा तुं आप तो तेओने एवी विद्या लेबानो अभि. लाप होवायी तारा उपकारना बदलामा हुं अपराध क्षमा क- रावी शकुं. चंडाळे एम करवानी हा कही. पछी अभयकुमारे चंडाळने श्रेणिकराजा ज्यां सिंहासनपर बैठा इता सां लावीने सामो उभो राख्यो; अने सपळी वात रागाने कही यतावी. ए पातनी राजाए हा कही. चंडाळे पछी सामा उभा रही थर. थरते पगे श्रेणिकने ते विचानो योघ आपया मांडघो; पण ते वोध लाग्यो नहीं. झडपथी उमा थइ अभयकुमार घोल्या महाराजा! आपने जो ए विधा अवश्य बीसवी होय सो सामा आवी उभा रहो; अने पने सिंहासन आपो. राजाऐ विद्या लेवा सातर एम कयु तो तत्काळ विद्या साध्य यइ. आ वान मात्र वोध लेवाने माटे हैं. एक चंदालनो पण विनय कर्या बगर श्रेणिक जेवा राजाने विद्या सिद न था, तो तेमाथी तत्व ए ग्रहण करवानुं छे के मद्विधाने साध्य करवा विनय करवो अवश्यनो छे. आत्मविद्या पामवा नियगुरुनो जो विनय करीए तो केई मंगळदायक थाय!
मुदर्शन शेठ. विनय ए.उत्तम वशीकरणले. स्वराज्यपनमा भगवाने वि- नयने धर्मर्नु मूल काही वर्षाच्या छे. गुरुनो, मुनिनो, विद्वाननो, मातापिनानो अने पोवाथी वढानो बिनय करतो ए आपणी उत्तमतानुं कारण रे. शिक्षापाठ ३३ सुदर्शन शेठ. माचीन काळमां शृद एक पवित्राने पाळनारा असंख्य पुरपो पर गया है; एमाथी संकट सही नामांकित यथेलो गुर्शन नामनो एक सन्पुरुष पण ऐ. ए धनाड्य मुंदर मुर- द्वानो कांतिमान अने मध्य पदमा हतो. जे नगरमां ने रहेको हलो ते नगरना राज्यदरबार भागधी का काम प्रम- नने ली सेने नीर. पट. ते बेटा राजानी अभपा ना- मनी राणी पोताना आसामना गोमनां देवी ती. लांयी सुदर्शन भनी नीदहना. उचम रुप बने कापा जो. इनेनुं मन सला. एर. अनुचरी मोपलीने क.पट भाषी निर्मक कारण बजावीने सुदर्शनने पर नाची. लार सारनी दानारत की अभपार मदर्शन भोग भोग- कसान भवन वर्ष. नदर्शने केला आलो नमनट पपु नी. दटे गटीने मुराद क.पा.मा पी: मेन ' ' . : . D मोसमाना-पुस्तक पी. गरजनो आनंदयी आम तेम ममता हता. धामधुम मची रही हती. मुदर्शन घेउना छ देर कुमार नेवा पुत्रो पण त्या आ. च्या हता. अमया राणी कपिला नामनी दासी साधे ठाठ- माठयी त्यो आवी इती. मुदर्शनना देवपून वा छ पुत्रो तेना नोवामां आध्या, कपिलाने सेणे पूछयु माग रम्य पुको फोना छे! कपिलाए मुदर्शन शेउनु नाम आयुं. नाम सांभ- लीने राणीनी छातीमा कटार भोकाइतेने कारी घा वाग्यो. सपळी धामधुम बीती गपा पछी माया कपन गोठवीने अम. याए अने तेनी दासीए मळी रानाने कयुः तमे मानता इशो के मारा राज्यमा न्याय अने नीति वर्ते छे दुर्जनोपी मारी भना दुःखी नधी; परंतु ते सपळ मिथ्या छे. अंतःपुग्मां पग दुर्ननो प्रवेश करे त्या मुधी हजु अंधेर छ ! तो पछी वीना स्थळ माटे पूछचं पण ? तमारा नगरना मुदर्शन नामना शोठे मारी कने भोगर्नु आमंत्रण कयु. नहीं कहेवा योग्य क- थनो मारे सांभळयां पडयां; पण में तेनो तिरस्कार कर्यो. आयी विशेपअंधार कयुं कहेवाय ! पणा राजा मूळ कानना काचा होयछे ए वात जाणे बहु मान्य छे, तेमां वळी खीनां मायाधि मधुरा वचन ऐ असर न करे तातातेलमा टाढा जळ जे. घा वचनथी राना क्रोधायमान थया सुदर्शनने शूळीए चढावी देवानी नत्काळ तेणे आता करी दोधी, अने ते प्रमाणे स. घलं यई पण ग\ मात्र शूलीए मुदर्शन से एटली वार हनी. गमे तेम हो, पण साटिना दिव्य भंडारमा अजराळ छे, ससनो प्रभाव ढाक्यो रहेतो नथी. मुदर्शनने शूळीए मार्यो,
ब्रह्मपर्यापैमुभाषित.
के शूली फीटीने तेनुं झळझळतुं सोनार्नु सिंहासन ययुः अने
देव दुंदुभीना नाद यया; सर्वत्र आनंद व्यापी गयो. नुदर्शननु
ससशीळ विश्वमंडळमां झळकी उठयु. सत्य शीळनो सदा जय छे.
शीयळ अने मुदर्शननी उत्तम ड्रढता ए वन्ने मात्माने
पवित्र श्रेणिए चढावे छे!
१
शिक्षापाठ ३४ ब्रह्मचर्यविपेसुभाषित.
दोहरा.
निरखीने नवयौवना, लेदा न विषयनिदान;
गणे काटनी पूतळी, ते भगवानसमान.
आ सपळा संसारनी, रेमणी नायकरुप;
ए त्यागी, त्यान्यु वधु, केवळ शोकस्वरुप.
एक विपयने जीतता, जीत्यो सौ संसार;
नृपति जीततां जीतिये, दळ, पुरने अधिकार. ३
विषयरुप अंकूरथी, टळे जानने ध्यान;
लेश मदीरापानथी, छाके ज्यम अज्ञान.
जे नववाह विशुदयी, घरे शियळ मुखदाइ
भव तेनो लव पछि रहे, क्त्ववचन ए भाइ.
मुंदर शीयळनुरतरु, मन वाणीने देह
ज नरनारी सेवश, अनुपम फळ ले तेह.
पात्र विना वस्तु न रहे, पात्र आत्मिक ज्ञान
पात्र थवा सेवा मदा. ब्रह्मचर्य मंतिमान.
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८
मोशमाग-पाक पीले शिक्षापाठ ३५ नमस्कारमंत्र. नमो प्राण, नमो मिला नमो भापरिमाण नमो गनापाण; नमो मोभे समपा. मा परिर यायोने नियमारना नाकार ( नमस्कार) मंच के पंचपरमेष्पिंत्र कोणे. अनि भगांना पार गुण, मिद भगांना पार गम, आचार्यना पीश गुण, उपाध्यायना पंजीत गुण, अनेमा धुना गया गुण मलीने एकमो भाउ गुग यया. अंग पिना पाकीमा पार भांगळीभीनी पारदरा पाय ; भने एपी ए गोर्नु चिनान करानी योजना होगयी धाग्ने मरे गुगता १०८ याय . पटले नरसार एम कदेशमा साये एवं गूययन रथु जणाप के है भव्य ! तारा ए भागबीना टेरवांधी ( नवकार ) मंत्र नवधार गण.-कार एटले करनार एम पण थाय . पारने नवे गुणना भेटला पाय एटाला गुग- नो भरेलो मंत्र एम नवकार मंत्र तरीके एनो भर्य पंच परमेष्टि एटले पा सकळ नगमा पनि यस्नु भो परमोत्तर ते ते काय काय ? तो कही नानी के भरिहंत, गिद्ध, आ. पार्य, उपाध्याप अने माधु, एने नमस्कार करवानो ने मंत्र नेम परमेष्टि मंत्र; भने पांच परमेष्टिने माय नकार होपापी पंचए. रमेष्टिमत्र एयो शब्द थया. भा मा भनादिमिदनापणे, धर शकरो.
नमस्कारमंत्र. कारण पंचपरम अनादिमिद से. एट ए पांच पानो आ- पम्प नयी मबाहयी अनादि, भने तेना जरनार पण अनादि. मिद . एपी ए जाप पण अनादिमिद रहे. ...--.८ पंचपरमेष्टिमंत्र परिपूर्ण जाणवापी मनुष्य उनम गदिने पाए एम मत्पुरुषो वह ई ए माटे नमारंपत ? ... का मुं न्यायपूर्वक से. एम. मानुर. ६.--एने बयां कारगयी न्यायपूर्वक बाहरी काय ? 3--1.५ तमने हुँ ममना मननी निप्रदता भर्षे एका सो गर्वोचम नगाभागना मत्ल गुगर्नु ए निरन रे. दादी जोना बी आनन्दरूप, मिदम्बरप. पारावा साध्याय स्यत्व भने साथस्वर र एनी विकली विचार करया जए भूबान . कारण.. ओ पूष्मदा पोराची ! पन विकारता एनां स्वप, गुणदपार विचार करमानी मा. सपने नारा अपम. को पत्र वेटलो मा-गरमो नमानेको सापको. राजाकानी पर पर. मन मारन, निर भगत, आर. पाने मोनो रोनरी “निभाना नाम नीर. ९ मग ६० मोक्षमाळा-पुस्तक बी. शिक्षापाठ ३६ अनानुपूर्वि. १ २ ३ ४ २ १ ४ ३ २ ३ १ २ ४ ५ २ ३ ४ ३ ५ पिता...आती जातनां कोष्टकथी भरेलं एक नानुं पुस्तक छे से ते जोयुं छे। पुत्र-~-हा पिताजी. पिता--एमा आडा अपना अक मुक्या छ, तेनु कांड पण कारण तारा समनवामा छ। पुत्र--नहीं पिताजी.-मारा समजवामा नयी माटे आप ते कारण कहो. पिता....पुत्र प्रत्यक्ष छे के मन ए एक पर चंचळ चीज छे; जेने एकाग्र करघु बहु बहु विकट छ। ते ज्या सुधी एकान यतुं नयी त्या मुधी आत्ममलिनता जती नयी. पापना विचारो घटना नथी. ए पकायता माटे चार प्रतिज्ञादिक अनेक महान माधनो भगवाने कद्या छे. पननी एकाग्रतायी महा यो. गनी अणिये चढवा मारे अने तेने कंटलाक प्रकारची निर्मल
सामापिकविचार भाग १.
करवा माटे सत्पुरुपोए आ एक साधनल्म कोष्टकावलि करी.पंच
परमेष्टि मंत्रनापांच अंक एमां पहेला मूक्याछे भने पछी लोमविलो.
मस्वरुपमां लक्षवंघ एना ए पांच अंक मूकीने भिन्न भिन्न प्रकारे
कोटको की छे. एम करवानुं कारण पण मननी एकाग्रता
थईने निर्जरा करी शकाय, ए जे.
पुत्र-पिताजी ! अनुक्रमे लेवायी एम मा माटे न यइ सके?
पिता-लोमविलोम होयतो ते गोठवतां जर्बु पडे अने नाम
संभारतां जवू पडे. पांचनो अंक मुक्या पछी वेनो यांकडो
आवे के 'नमो लोए सबसाहुणं' पछी-'नमोअरिहताणं'
ए वाक्य मूकीने 'नमो सिदाणं' ए वाक्य संभार, पडे. एम
पुनःपुनः लक्षनी द्रढता राखतां मन एकाग्रताए पहोंचे हैं. अनु-
कमबंध होयतो तेम यह शक्तुं नथी; कारणके विचार करतो
पडतो नयीः ए सूक्ष्म वसवमा मन परमेट्रिमंत्रमांधी नीकळीने
संसारतंत्रनी खटपटमां जड़ पडे के अने वखते धर्म करतां घाड
पण करी नाखे छे, जेथी सत्पुरुपोए अनानुर्विनी योजना करी
छे. ते वहु मुंदर डे अने आत्मशांतिने यापनारी छे.
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शिक्षापाठ ३७ सामायिकविचारभाग १.
आत्मशक्तिनो प्रकाश करनार, मम्यग्ज्ञानदर्शननो उदय
करनार, शृद्ध समाधिभावमा प्रया करावनार, निरानो अ.
मृल्य लाभ आपनार,
रागद्वेषयी मध्यन्य वृद्धि करनार एबुं मा.
मायिक नापर्ने शिक्षाकृत छे. मामायिक मुदनी व्युत्पत्ति मम
आय-इक ए गुब्दार्थी यायडे. मम एटले रागद्देपरहिन मध्यन्य
। मोसमाळा-पुस्तक पीजु. परिणाम, आप एटले ते समभावनायी उत्पन्न यतो ज्ञानदर्शन चारित्ररुप मोक्षमार्गनो लाभ; अने इक कहेता भाव एप अर्थ थायछे. एटले जेवढे करीने मोसना मार्गनो लाभदायक भाव । उपजे के सामायिक. आर्च, अने रौद्र ए वे प्रकारनां ध्यानको त्याग करीन, मन, वचन कायाना पापभावने रोकीने विकी मनुप्पी सामायिक करेछे. मनना पुद्गळ तरंगी छे. सामायिकमा ज्यारे विशुद्ध परि. णामयी रहेQ योग्यछे त्यारे पण ए मन आकाश पानालना घाट घड्या करेछ. तेमज भूल, विस्मृति, उन्माद ईत्यादियी वचन- कायामां पण दूषण आक्वायी सामायिकमां दोप लागेछ. मन, पचन अने कायाना थईने वत्रीय दोष उत्पम थापछ. दश म. नना, दश वचनना अने यार कायाना, पम यत्रीश दीप जाणया अवश्यना छे. जे जाणवायी मन सावधान राती काप. मनना दश दोप कई छउं. १ अविवेकदोप-सामायिकन स्वरुप नहीं जाणवायी य. नमा एवो विचार कर के आधी मुं फळ थवा इत? आधीने कोण तयु हो ? एवा रिकल्पनुं नाम अविवेकदोप. र यशोवांछादोप-पोते सामायिक करे ऐ एम पीना मनुष्यो नाणे तो प्रर्शमा करे एवी इच्छाए मामायिक करवं ने यशोवांछा दोप. ३ धनवांछादोष-धननी इच्मए मामायिक कर ते ध. नगंडा दोप, ४ गदोप-मने गोको धीम कई अने हुँ सामायिक पण तेयुन कछ! एको अध्यवमाय ने गर्षदोप.
सामानिविचार भाग २, ५ भदोष हुँ धावा दुनमा मागे मने लोको मोटा नरीमान देश बने जो मामापिर नहीं नोक- रंग. आटली किया ण नयी करतो; एम निंदाना भपक्षी सामाधिक परे ते भपदोप. ६ निदानदीप-- मामायिक करीने नेनो फन्थी पन नी, मादिक वार्नु ने निदानदोष. पशेर-मानपिन क हो के नहीं हो तो किनारे ने महाप. ८ व.पापदापामायिक मोपादिकपी बरदानी गा. दश जी मोर, मान, मापा, लोभमां चि घरे ने पाटोप. दिनपद परमामामादिदेवानरोप. १० सामनदोषमधिभार अने मार मामा- वि.न बारे में समानदार. शिक्षापाठ३८सामायिकविचारभाग २. मननादरानन दर र दार मन करत ३ .
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"
मोक्षमाळा-पुस्तक चीजें.
५ निरपेक्षदोप. सामायिकमां शासनी दरकार विनों वा.
क्य बोले ते निरपेक्षदोप.
५ संक्षेपदोप. सूत्रनापाठ इत्यादिक र्दुकामा गोली नाखे
यथार्थ उपार करे नहीं ते संक्षेपदोप.
६ क्लेशदोप. कोइची कंकाश करे ते क्लेशदोप.
७ विकयादोप. स्त्रियादि चार के सात प्रकारनी विकया
मांडी घेसे ते विकयादोप.
८ हास्यदोप. सामापिका कोइनी हाँसी माकरी करते
हास्यदोप.
९ अशुद्धदोप. सामायिका सूत्रपाउ न्यूनाधिक अने अ.
शुद्ध वोले ते अशुददोप.
१० मुणमुणदोप. गडबडगाटायी सामायिकमां मूत्रपाठ
पोले जे पोते पण पूर मांड समजी शके ते मुगमुणदोप.
ए वचनना दश दोष कया हवे कायाना यार दोष कहुं उ.
१ मामायिकमां पगपर पग चहावी बसे, ते श्री गुरु आदि
प्रत्ये अविनयरूपमासन ते पहेलो अयोग्प आसनदीप..
२ चलासन दोप. हगडगते आमने प्रेमी सामापिक
करे, कशि वारंवार ज्यांची उठयुं पडे तो आसने वेसे ते
चलामनदोप.
१ पलटिदोप. कार्योत्सर्गमा आलो चंचळ राणे एक.
लदिर.
४ सायक्रिया दोष. मामायिकमां कर पार क्रिया के
सनी संझा कर ते मावास्यादाप.
सामायिकविचार भाग ३. ५ आलंदनदोप. भीतादिके ओगण दह वेसे एयी त्यां बेठेला जंतुनो नाश याय के तेने पीडा याय वेपन पोचाने प्र- मादनी महचि याय, ते आलंदन दोप. ६ आकुंचनमसारणदोप. हाय पग संकोचे, लांबा करे ए आदि ते आकुंचनमसारपदोप. ७ आलमदोष अंग मरडे, टचाका वगाहे ए आदि वे भालस दोप. ८ मोटनदोप. आंगळी वगरे वांकी करे टचाका वगाडे ते मोटनदोप. ९ मलदोप. घरटा घरड करी सामायिकमां चल करी मेळ खरे ते मलदोप. २० विमासणदीपं. गळामां हाय नाखी वेमे १० वे वि- मासण दोप. ११ निद्रादोप. सामायिकमां च आवे ते निद्रादीप. १२ वनसंकोचन. सामाधिकमां टाट प्रमुखनी भीवियी व. सूयी शरीर संकोचे ते. ए पत्रिन दूपणरहित सामायिक कर. पांच अविचार टाळा. शिक्षापाठ ३९सामायिकविचार भाग ३. एकाग्रता अने सारधानी बिना ए वत्री दोपतांना अमुक दोप पण आची जाप रे. विज्ञानवेत्तानोर मामापिनु जयन्य भमाग चे घडीनुं वांध्यु ई. ए इत्त सावधानी पूर्वक करवायी मोक्षमाला-पुस्तक पी. परमशांति आपे छे. केटलाकनो ए पे घडीनो काम, ज्यारेज- तो नी त्यार तेश्रो यह कंटाळे छ. सामायिकमां नवराश सहने घेमराधी काळ माय पण पोथी! आधुनिक काळमां मावधा. नीधी सामायिक करनारा पहुन थोडा छे. मतिक्रमण सामा- पिकनी माये करवान होय छे त्यारे तो वखत जयो मुगम पड़े छे. जो के एवा पायरो प्रतिक्रमण लक्ष पूर्वक करी शकना नपी सोपण केवळ नवराश करना एमां जार कंइक फेर पर छे. मामायिक पण पुर जाने आवरतुं नथी तेसो विचार मामा. पिकमां पछी यह मुंशाय छे. केटलाक भारे कम्पिो ए भर- मरमा व्यवहाना प्रपची पण घडी राखे छे. आधी सामापिस पर दोपित थाप छे. विधिपूर्वक प्रामायिक न पाय ए पदकारक अने क. मनी वाहुल्यता छे. साठ पडीना ओराय पाल्पा मापसे अमन्याता दिवमी मरेला अनंना सालचा व्यतित करता पण ने मायक न पर्यु ने बयरीना विशुद्ध सामापिकपी याग ७. मसाक मामापिक या माटे नेमा प्रवेश कर्पा पछी पार टेगमपी पारे लोगम्मनी कायोत्मर्ग करी पित्तनी कडक ममता पाणवी पी मनपाट के उमम ग्रंपर्नु मनन काy,.. गग्पना मम काय्यों वारा, पाचगर्नु भयपन का मरण की जनतन अभ्याम पाय तो काया कोने मानापारथी बोध पारा; म मामायिकी कार पनि करवा. मुनिग. जनी नी ममागम होय ना याममामी मामी भने ने मनन करनी; तर न हाय प्रने गाय मनोय मोगिन मनिक्रमपरिवार. अभ्याली पासपी वैरान्पोधक कयन श्रवण करा किंवा कंद अभ्यास करचो. एसपची पोगबाइन होप तो केरलोक भाग लापूर्वक कायोत्सर्गी रोक्नो; अने केटलोक भाग महापुरु पोनां चरित्रस्यामां उपयोगपूर्वक रोकतो; पर जेम बने तेम विवेकयी अने उत्सायी सामापिकीमा व्यक्ति करतो. कंड़ साहिल न होप नो पंच परमेष्टिमंत्रनो जारज उत्साहपूर्वक क- खो. पण व्यर्थ काळ काही नाखवो नीं. धीरजयी, मांविषी बने पवायी सामायिक का. जेम वने नेम सामायिकमां शा- सपरिचय वधारतो. साव्यडीना अहोरात्रिमांयी पडी अवश्य वचावी सामा. पिको सद्भावयी कई शिक्षापाठ ४० प्रतिक्रमणविचार. प्रविकरण एरले पाहुं फरवु-फरीयी जोई नई एम एनो अर्थ यई सके.भावनी अपार जे दिवसे जे वसते प्रविक्रमण करवानू याय; ते बजतनी अगार अयचा ते दिवसेजे जे दोष यया होय ते एक पछी एक अंसात्म्मयी जोई जवा अने नेनो पश्चाताप करी दे दोपयी पाहुं र तेर्नु नाम भतिकमण हवाय. उत्तम मुनियो अने भाविक धारको ध्यानाने अने रा- विना पाउना भागमां दिवसे अने रात्र एन अनुकने ययेला दोपना पक्षावार करे ठे के नेनी समापनाइम एनं नाम अझै आन विक्रम छे. ए मदिमन आपणे पन अन्य करवं. कारण के आ आला मन, बचन अने जापाना पोनपी मोसमाला-पुस्तक बीमुं. अनेक प्रकारना कर्म पांधे . प्रतिक्रमण मुरमा पर्ने दोन क- रेगे मेयी दिवस रात्रमा थला पापना पचातापते परे पादक. शुद्धभाव पडे करी पचाताप करवायी संश पाप पता परलोकमय अने अनुकंपा ष्टे प्रारमा कोमळ पापले. स्वागना योग्य धम्मुनो विवेक आवतो जायचं. मगपत्माशीप अडान भादि मे दोष विस्मरण थपा होय सेना पचाताप पग पई शकेले. भाम र निर्जरा करतार्नु उत्तम साधन छे. पर्नु आवश्यक परे पण नाम . भावश्यक एटमे पास करीने करवा योग्य; ए सत्य छे. ते बहे भारमानी मलिनता अमे, माटे प्रकाय करवा योग्यत्रणे. मायकाल में निकपण करवामा आवछे तेनु नाम 'देव. सोपरिपण पटले दिनममधी पापनो पातार; भने राविना पाचशा मागमा मनिझमण करवामां आवछेने 'रा. परिमग ' कवाय हे. देवमीप अने गाए प्रार मासाना पी. पपारीए करवाने प्रतिमा पारिक भने मरन्मो कावाने ने मंकमरिक कवाय . सगुलाए पोरनापी पिटी पर नियम हे. रेटगार मामान्य वृदिपानी पम को दिवम भने राग मारे वायथितप नियमग क य तो कमाई नी, पपको माग नसी गरिये भाामा अपुर कसान पानी पर नारायनोमिकी पानी प्राय पतिशमनी पोरनाराम पर भीखारीनो खेद भाग १. उत्तम छे. जेम बने तेम भतिक्रमण धीरजयी, समजाय एवी भाषायी, शांतिथी, मननी एकाग्रतायी अने यत्नापूर्वक कर. शिक्षापाठ४१भीखारीनोखेद भाग १. एक पामर भीखारी जंगलमां भटकतो हतो. त्यां तेने भूख लागी. एटले ते विचारो लडथडीआं खातो खातो एक नग- रमा एक सामान्य मनुप्यने घेर पहोंच्यो; त्यां जइने तणे अनेक प्रकारनी आजोजी करी; तेना कालावालायी करुणा पामीने ते गृहस्थनी स्त्रीए तेने घरमांयी जमतां वघेलं मिष्टान् आणी आप्यु. भोजन मळवायी भीखारी बहु आनंद पामतो पामतो नगरनी वहार आव्यो, आवीने एक झाड तळे वेठा त्वां जरा स्वच्छ करीने एक वाजुए अति जूनो ययेलो पोतानो जळनो घडो मूल्यो. एक वाजुए पोतानी फाटीतु- टी मलिन गोदडी मूकी अने एक वाजुए पोते ते भोजन लइने वेठो. रानी राजी यतां एणे ते भोजन खाइने पुरु कयु. पछी ओशिके एक पथ्यर मूकीने ते मुनो. भोजनना म- दयी जरावारमा तेनी आंखो मिचाइ गा. निंद्रावश ययो एटले तेने एक स्वमु आव्यु. पोते जाणे महा राजरोद्धिने पाम्पोछे। सुंदर वस्त्राभूपण धारण कर्याई देश आसामा पोतानो विजय- नो डंको वागी गयोडे समीपमां तेनी आज्ञा अवलंबन करवा अनुचरो उभा यइ रहा छै; आजुबाजु छडीदारो खमा खमा पोकारेछे एक रमणिय महेलमां मुंदर पलंगपर तेणे शयन करें छ देवांगना नेवी खीओ तेना पग चारेछे पंखायी एकबाजु- ७० मोक्षमाळा-पुस्तक पी. एयी पंवानो मंद मंद पवन डोळाय छे एवा स्वमामां तेनो आत्मा चढी गयो. ते सपना भोग लेतां तेना रोम उल्लसी गया. एवामां मेघ महाराना चढी आयो वीमळीना शत्रकारा यया लाग्या. मूर्य ,वादळाची ढकाइ गयो। सर्वत्र अंधकार पथराइ गयो मुशलधार वर्षाद यशे ए जणाएं अने एटलार्मा गामी नयी पक प्रबळ कडाको थयो. कडाकाना अबानी भय पामीने ते पामर भीसारी विचारो जागी गयो. शिक्षापाठ ४२ भीखारीनो खेद भाग २. जुए छे नो जे स्थळे पाणीनो खोखरो पहो पच्यो हतो ते म्पळे ने घडो पड्यो छे ज्यो फार्टी दुटी गोदडी परी हनी त्यांन ते पडी छ. पोते वा मलिन भने फाटेला क- पहां धारण कयौं हतां तेव ने तेवते वनो शरीर उपर छ. नयी नलभार वध्यं के नयी जवभार घटपुं. नथी से देश के नयी ते नगरी, नी ते महेल के नयी ते पलंग; नयी ते काम रछत्र धरनारा के नयी ते घरीदारो; नपी ते नियों के नयी ते वनालंकारो; नधी ते पंखा के नी ते पवन नयी ते अनु. घरो के नयी ते मामा नी ते मुख दिलाम के नयी ते म. दोन्मनना; भाइ तो पोते नेवा हता नेवाने तेगा देसाया. एपी ने दगाव भोइन ने खेद पाम्यो. मामा में पिध्या भारंबर दोगे नथी आनंद मान्यो पार्नु नो भहीं करों ए नयी समा. नागोग भोगना न. भने नन परिणाम जे पेद ने भोग ए. एन ए पामर नीव पथानापमा पडी गया.
भीखारीनो सेद भाग २ ७१ अहो भन्यो ! भोखारीनां सप्नां नेश संसारनां मृत अनि- ल छे. समामां जेम ते भीसारीए मृत समुदाय दीडो बने आ- नंद मान्यो नेम पामर प्राणीओ संसार समाना मुससमुदायमा आनंद माने जे. जेमते मृत नमुहार जातिमां निध्या जगापा मज्ञान प्राप्त यतां संसारनां मुख वां जगाय छे. स्वमाना भोगन भोगव्या उदां जेम भीशारीने खेदनी प्राप्ति यइ, तेन मोहांध प्राणीओ संसारनां मुन्न मानी वैसे अने भोगव्या सम गणे ई. परंतु परिणामे मेद, दुर्गति अने पसाताप ले छे ते चपन अने विनानी उतां समाना खेद न तेनुं परिणाम ९ ई.ए उपरया बुदिमान पुरुषो आत्महितने गोरे हे.संसा- रनी अनिलवार एक कान्य छेते- उपजाति. वियुतलानी मनुवा पतंग यायुप्य तो जन्ना रंग पुरंदरी बार अनंगरंग शृं रात्रि त्यां अपनी प्रसंग! विषार्थ:-लक्ष्मी वीजबी जेनी है. बीनबीनो बजार जेम यइने ओलया जाय छ. नेम लली आने वाली जाय उ. अधिकार पतंगना ने छे. गनीम चाहि. वमनी का छ: नेम पात्र येडो का ही हाय. मांयी जनो हे उ. आयब पानीना का ई पानी हिलोही आव्यो के गयो म जन्म पान्या अं एक मां
1-पुस्तक पी .
मोक्षमाला-
रमा के न रपा सां बीना देहमा पडद्यं परे छे. कामभोग प्रा.
फाशमा उत्सम या इंदना पनुप्प वर्षाकाळमा पाने क्षणार.
मालय यई जाय छ तेम यौवना कामना विकार फलीभूत
पीभरा यपमा भतारो छ दुकामारे जीव ! एसपळी.
स्तुभोनो संवैध क्षणभर छ एमा प्रेमबंधननी सांकळे बधाईने
शुराप ! तात्पर्य ए सपळा चपळ मने विनाशी , तुं असर
भने अविनाशी छे पाटे तारा जेवी नित्य वस्तुने मात करे !
प पोप यया.
शिक्षापाठ ४३ अनुपम क्षमा.
मा अंतर्श भीनमामा पगछे, पवित्र आधारनी हा
करवामां बननर ऐ. सदमारे अमद्य दामा, समपरिणामयी
समा रामनार मनुष्य मरमागर तरी नाय छे.
कृष्ण व मुदेवना गनगृ.पार नामना नाना मा महामुक
पान, मुमार मात्र वारनी वयं भगवान् नैमिनायनी पासे
थी मंमारन्यागी या मनानपा उन ध्यानमा ग्पा ना. सारे
नमी एक अद्भुत क्षमापय चारित्रधी महासिदिने पायी गपा
ते महीं कई
मोमम नामना प्रामगनी मुम्पामपन पूधी नोट गरमु.
हम मगाग न पान र यया पाला गरगृहमारतो
मंमार लागी गया. प्रार्थ, पंवानी पूरी मुग जानाची
ने सामरामनने पोध व्याप्यो गामाग्नी बाप
कानी परती सधारमा सामूनि गनमृगार परात्र
विशुद भावी कायोत्सर्गमां है, त्यां आवी पहोंच्चो. कोमल
गजनुजमारना मायापर बीकणी माटीनी वाड करी; अने अंदर
घन्वयखना अंगारा भी, इंधन पृथु एटले महा नाप ययो. एयी
गजमुहमारनो सोमदेव बब्बा मंड्यो एटले ते मोमल जतो
रग्यो. ते वखनना गजमुडमारना असघ दुःखनु वर्णन केम ईश?
सारे पण तेत्रो समभावपरिणाममा रसा. किंचित् कोष के द्वेष
एना हृदयमा जन्म पान्यो नीं. पोताना आत्माने सितित्या-
पक करीने बोध दीयो के जो ! नुं एनी पुत्रीने परप्यो होत तो
ए कन्यादानमा तने पायडी आपत. ए पायही योडा वखतमां
फारी जाय नेवी अने परिणाने दुखदायक यात. आ एनो बहु
उपकार ययो के ए पापडी बदल एणे मोक्षनी पायडी बंधावी.
एवा विशृद्ध परिणामयी अडग रही समभावी असा वेदना
सहीने तेओ सह सदी यई अनंतन मृखने पान्या. केवी
अनुपम मा अने के ननं मुंदर परिणाम तत्वज्ञानीयोनां वचन
छे के आत्मा मात्र सद्भावनां आश्वो जोड़ए; अने ते आव्यो
तो मोक्ष दृयेनीमांज छे. गजकुमारनी नामांकित क्षमा केवो
शृद्ध बोध करे!
शिक्षापाठ ४१ राग.
श्रमण भगवान महावीरना अग्रेसर गणवर गोनमर्नु नाम
नमे बहबार जाप्युंडे. गौरमस्वामीना बोपन्ना वेदनाकभिप्यो,
केवड़ान पाम्या सतां गौतम पाने कबहान पाम्या नहोना,
कारण के भगवान महावीरनां अंगोपांग, वर्ग, वाणीप इत्यादिपर
मोक्षमाळा-पुस्तक घीउँ.
हनु गौतमने मोह हतो. निग्रंथप्रवचननो निष्पक्षपाती न्याय
एको छ के गमे ते वस्तुपरनो राग दुःसदायफ छे. राग ए मो.
ह अने मोह ए संसारन छ. गौतमना हृदयपी ए राग
ज्या शुधी सस्यो नहीं त्या मुधी तेभो केवळज्ञान पाम्पा नहीं.
श्रमण भगवान ज्ञानपुत्र उपारे अनुपमयसिदिने पाम्या,
सारे गौतम नगरमाथी आवमा हता. भगवानना निर्माण समा.
चार समिळी तेभी गंद पम्या. विरहथी तभी अनुराग पचनधी
पोल्या. हे महावीर! तमे मने माथे सो नराख्यो परंतु संभार्योए
नहीं. मार्गमीति मामी नम द्रष्टि पण करी नहीं! आम तमने
णजन नदोन. पवा विकलो था थना देनी ला फों ने से.
निगगीगिए चट्या; ई बहु मूर्पना कर छउं. ९ वीतराग-नि.
विकाग अने निगगी ने मारामा कम मोद राये ? पनीर
अने मित्रार केवट ममान दृष्टिहती! ए निरागीनो मिथ्या
मांद राछ ! मोर मंमान प्रबळ कारण छ एमबिचारमा
विशाग्ना नानक तीन निगगी पया. एटले अनमान
महागिन था; अंने मात निर्माण पयार्या.
गौनपनिनो गग प्रापणन या माम योध आहे. म.
गवानपनी पार गौतम नंग गण याने दापदापाययो तोप
मंमारना, ने वीर मामा पानी पोर अनंत दास
पारनामा, .!. न ग अनशनसीबस्द
5. न. या गगनी सांग
नी, श्री ५ यमन
ननुं कारण;
ना अपना '
७५
कपिलमुनि भाग १.
शिक्षापाठ ४५ सामान्य मनोर्थ.
सवैया.
मोहिनिभावविचार आधीन यइ,
ना निरखं नयने परनारी;
पत्यरतृल्य गपुं पवैभव,
निर्मळ तातिक लोभ समारी!
द्वादश वृत्तं अने दिनता परि,
सात्विक या स्वरुप विचारी;
ए मुजनेम सदा शुभ क्षेमक,
नित्व अखंड रदो भवद्दारी.
ते विशलाननये मन चिंतवि,
ज्ञान विवेक विचार वधारूं;
निल विशोध करी नव तत्वनो,
उत्तम बोध अनेक मचाएं
संशय वीज गे नर्दि अंदर,
ने जिननां कथनो अवधार.
राज्य, मदा मुन एज मनोरय,
धार, यो अपवर्ग, उतार.
२
शिक्षापाठ ४६ कपिलमुनि भाग १.
कौमांवी नामनी एक नगरी हती; सांना राजदरवारमा
राज्पना आभूपणत्प काश्यप नामनो एक शाती रहती हवी.
मोक्षमाळी-पुस्तकया .
एनी गिनुं नाम श्रीदेवी हतु तेना उपरथी कपिल नामनो एक
पुत्र नम्म्यो इनो; ते पंदर वर्षनो ययो त्यारे तेना पिता परधाम
गया. कपिल लाहपाडमा उछालो होबाथी का विशेष विदना
पायो नहातो; तेथी एना पितानी जगो कोद बीना विज्ञानने
म काश्यपगासी जे पुंजी कमाइ गया हता ते कमावामा अ
भक्त एवा कपिले पाइने पुरी करी. श्रीदेवी एक दिया धरना
पारणाम उभी ही त्यां ये चार नोकगे सहित पोनाना पति-
नी नागीयपदी पामेली विद्वान जतो तेना जागामा आगो.
घा मानयी जना आ शाम्रीने जोइने श्रीदेवी ने पोतानी पूर्ण
चितिनं मरण थइ भाच्यु. ज्यान मारा पनि भा पीपर हता
सारे के.वं मृग भोगवनी हती! ए मा मुप तो गर्ष परंतु
मागे पुत्र पण पुः भन्यो नगे. एम विचारमा टोटना डोलना
लेनी पांधी दह दह आंमु परया मध्या. एवामा फरतो
फनो कपिल त्या पानी पीच्या श्रीदेवीने रहनी नौद तेर्नु
कारण पूलय कपिलना बहु आग्रदयी श्रीदेवीए ने पते कही
बनान्यं, पनी कपिल बोल्यो जी मा! हुं युदिनाळि, प.
रंतु मार्ग युदिनी उपयोग नको जोरप नयों या शक्यो नी.
पटले विद्यानगर पदि पाम्यो नहीं. में कई त्या माने
९ मागी बननी कि माय कर; श्रीदेवीप मंद माये कर,
प नागी बनी नहीं नहीं नो पामिनीपादार भा.
चेटी थानन नगगन नामनो नागविनानो पिर
टे, न अनेर पियान रियाटान देशो मागली त्यांना
वाय नो पामिदिमाय मर्ग. पाये दीवम राकार मन
या अनु की रिटनी मा.
कपिलमुनि भाग २. ७७ अवध बीततां कपिल श्रावस्तिए माखीजीने और आवी प- हाच्या. प्रणाम करीने पोतानो इतिहास कही बताव्यो. शास्त्री- जीए मित्रपुत्रने विद्यादान देवाने माटे बहु आनंद देसाड्यो; पण कपिल आगळ कंह पुंजी नहोती के ते तेमांची साय अने अभ्यास करी शक एथी करीने तेने नगरमा याचवा जg पडतुं तुं. याचता याचतां वपोर यह जता इता, पछी रसोई करे अने जमे सां मांजनो योडो भाग रहवो हतो. एटले का अभ्यास करी शफनो नहोतो. पंडिते तेनुं कारण पृड्युं लार कापिले ते कही बनाव्युं पंडित तेने एक गृहस्य पासे नेटी गया. ते गृहस्थे कपिलनी अनुकंपा खातर एने हमेशां भोजन मळे एवी गोटवण एक विधवा ब्राह्मणीने त्यां करीदीधी. जेयी कपिलने र एक चिंता ओठी यह शिक्षापाठ ४७ कपिलमुनि भाग २. ए नानी चिंता ओडी यह सवीनी मोटी जंजाल भी यइ. भद्रिक कपिल हवे युवान् ययो हतो; अने जेने त्यां वे ज- मवा जतो ते विधवा वाइ पग युवान् हती. तेनी साये देना घ- रमांची कोइ मापस नहो. हमेशनो परस्परनो वातचितनो संबंध वध्यो. वयीने हास्यविनोदले ययो; एम करता करतां वनेने प्रीति बंधाइ. कपिल तेनाथी लुम्यायो ! एकांत बहु अ- निष्ट चीन है! विधा प्राप्त करवान ने भूली गयो रहस्य वाफपी मयां सीयांयी बन्नमांट पुरं यह हः पण लूगडालचांना वांचा मोक्षमाला-पुस्तक पी. थपा. कपिले गृहस्थाश्रम मांडी येठ जेथु करी मयु. गौ तेत्रों उता-की जीय होवाथी संसारनी विशेष लोताळनी लेने माहिती पण नहोती. या पंगा कैम पेदा करवा ते विचारा ते जाणतो पण नहोतो. गळ बीए तेने रस्तो यताप्पा के मुंझा- पामा कर गच्या नथी; परंतु उपायथी मिदि छ, आगामना गनानी एवो नियम छे के सबारमा पहेलो जा जे पाह्मण मा. विवाद आपे तेने ने ये मामा मोर्नु आपेछे. सां जो नामाको भने प्रथम आशिवांद आपी को तो ते ये मासा सोनुं मळे. कपिले ए वाननी हा कही. भाट दिवस मुधी आंटा पापा पण थपन वीत्या पछी जाय पदले कंडवले नहीं. एथी तेणे एकदि- वम एवो निधय कयों के नोटु चोकमा मुरतो चीवट राशीने टा. पछी ने चोकमां मृता; अवगत भागतां चंद्रनो उदय थयो. कपिले प्रमान ममीप जाणीने मुरीमो बाटीने मागिर्वाद देवा माटे दोरनां जया मार. रक्षपाळे पार जाणीने सेने प. करी राया. एस करना वीनुं पर पट्यु. प्रभान भयो एटले सगने का जाने गनानी समक्ष भी राख्यो.कपिल रे. मान को उभी रो रामाने नेनां गारना मण माश्यां नमी. एपी नेने मरद हनान पूलयं. चंदना प्रकाराने मूर्यममान गग- नाग्नी मस्तिार गनाने दया पापी. नेनी दरिद्रता साना गजानी रजा या एयी पिने कप पाशिर्वादने माटे पर दार जो पानी तामर या ना होना ग्ई मागी र.नने वा tirz पोरीसारी. दी गवार कई मामता नसी पियर .
कपिलमुनि भाग.
आप्पो मारं मन हजुस्थिर भयं नयी; एटले शृं मागवू ते मू-
झर्नु नथी.राजार मामेना वागमां जड़ सा मीने स्वस्थता पूर्वक
विचार करी कपिलने मागवान कही. एटले कपिल ते वागां
जड़ने विचार करवा बेटो.
शिक्षापाठ १८ कपिलमुनि भाग ३.
मामा मोनू लेवानी जैनी इच्छा ती ते कपिल हवे
दणारंगमा घमडापो. पांच महौर मागानी इच्छा करी तो
त्या विचार आयो के पांची के पुरु यनार नयी. मारे
पंचवीस महोर मानवी. ए विचार पण फों. पंचवीग महो-
रथी का आ वर्ष इतराय नहीं मारे मो महोर मागवी; त्यां
पळी विचार फा. सो महोरे वे वर्ष इतरी, वैभव भोगीप;
पाड दुःसनां दुन. माटे एक हजार महोरनी पाचना करती
टीक थे, पण एक हजार महोर छोकगं छैयांना चार सर्व
आने के एई थाप वो पूरं पण, चाय! माटे दा हजार
महोर मागी केपी हीदगी पर्यंत पण चिता नही. त्यां
बच्ची इच्छा फरीदा हजार महोर मई जाय एस्ले पनी
मुडी वगरना यई र पहे. माटे एक लान मोरनी मागणी
करके जेना ध्यानयां यथा वैभव योग: पणजी ! लक्षा-
धिपति तो गाय हे. आर नामांकित पायी पाना?
मारेकर महार मागनीकी महान् श्रीनता कवाय.
वली पाग. दहान धनी पन अपल
क.देवाय नहे, मारे गजा, अगम्य : पप जो अधु
८०
मोक्षमाला-पुस्तक वा.
राग्य मागीश तोग राना माग तुल्य गणाशे. अने वीर
पनो पागा पण गणाइश. माटे माग तो भाणु राज्य मा..
गई एम ए तणामा डुब्यो; परंतु तर मंमारी एटले पाछो
परयो; मा नीर! भाषणे एवी कनवता शा माटे करवी
पर भाषणने या प्रमाणे आपरा तत्पर थयो तेश
गार मं; भने नेनेन भ्रष्ट करतो! पर जोता तो एपी
भारणीम भ्रष्टता छ. माटे भई राज्य माग; परंतु ए गा.
शिए मानी मानी त्यारे नाणांनी उपाधि पण वर्मा
भोली ! मारे कर लाप मुलीने मो यो महोरन मागी
मा. नार, गोवा पहोर हमणो भानो पछी विपोय.
समान गत पानगो नः प्रने प्रियायाम पण घों में
माट पाच पण नोलजी पठीनीयात पछी ओ!
पनि माग्नीप, मग करना नथी; मात्र ये मामा गोर्नु
या पायाला न पागले. पानाजीर या या..
गापमपा ने कहz.iant. भागय मांगता पण
दृष्गा माता न. 14 मेनार भने सीनेपाली
दो घटी. गगना मा नानि तो pritin
में मांगी गस्त! मी तीन मत माँग
मा मन न प नीं; गा मानसी
हम सभी मनन inaam मा
नीना मामा इन mini! पना आया
मार याच्या अंत: १५मागाहूँग
मार
4 . ... गुimit
- नृन्नानी विनिमा. मुख नो मनापमानस. नृपमा ए मार वृक्ष बनले. एनो है जीव, नारे में ग्या! विधा का विषयमा पटी गयो विषयमा पटवायी आ उपाधिमा परवी उपाय को मारिन भनन तृष्णा मदना नांगमा में पध्या. एर उपाश्मिापीमा मंगारमा एम अनंत उपाधि वी पटो. एपी एनो लाग र.. रखो दिनले. मलमनोपजे निरुपाधि मुख एवे. नथी. पस विचारनों विचारता-नागा समारवाथी ते कपिरनो अनेक भावरण धय या. नेनुं भंतःकरण पुहिन भने र विवेक- तर म. विचमा ने किया TER जानवटे ने मान्मको विचार करी वयो. अर्वणिए चदी ने कहानने पाम्यो. हापापी कनिष्ट पान ! जानीमा एक काई के - मा आरामनामी मनात निरंतर नवीन र. कास पारना - एटर पाना हे. दोर एज रस भने एज मात्र मनोजितना करे. शिक्षापाट १९ तृष्णानी विचित्रता. ।२२.१.६:१६
८२
मोक्षमाळा-पुस्तक पी.
मळी नृपताइ सारे ताकी देवताइअने,
दीठी देवताइ त्यारे ताकी शंकराइने
अहो राज्यद्रमानो मानो शंकराइ मळी (!).
वधे तृशनाइ तोय जाय न मराइने.
करोचली पडी डाही डाचांतणो दाट वाळ्यो,
काळी केशपटी विपे, चेतना छवाइ गा;
मूंघg सांभळयुने देस ते मांडी वव्यु,
तेम दान आवली ते, खरी, के खवाइ गह
वळी केड यांकी हाड गयां अंगरंग गयो,
उठवानी आय जता लाकडी लेबाइ गर;
अरे! राज्यचंद्र एम, युवानी हराइ पण,
मनधी न तोय रांड, ममता मराइ गा.
२
करोडोना करजना, नीरपर डंका वागे,
रोगयी धाइ मयुं, गरीर मूकाइने,
पुरपनि पण माथे, पीडवाने ताकी रह्यो,
पेट तण वेट पण, शके न पुराइने
पिन अने परणी ने, मचावे अनेक घंध,
पुत्र, पुत्री भामे गाई पाउं दुःपदाउने,
अरे गज्यचंद्र नाय जीव झायरा दारा करे,
मंना रडाय नही न नी नृशनाइने.
प्रमाद. पामारी अवापर वो तो पसी, जीवन दो पायो बनाया, GE पायो भाली भादा लापम भार विवादी माटी पायनोनी वीरमारने: राने लाकी मां नो नामी हे ना, पोन्पा पिना पाळमार्ग मगाने! और राय देना देनी आमापादेवी! जना मानरी मराराने: शिक्षापाठ ५. प्रमाद. पक्षी पारिता, समाद पादर भाने गमले इन- E. नानु महान रामद ने निवार की सेवा न ८४ मोसमाळा-पुस्तक बीजें. लीयो के लेशे एम जंजाळ यह रही छे त्यां प्रमादयी धर्म क व्य काई रही जशे. अति विचिक्षण पुरुषो संसारनी सर्वोपाधि त्यागीने असे रात्र पर्ममा सावधान थायछे फळनो पण प्रमाद करता नपी. विचक्षण पुम्पो अहो रावना थोडा भागने पण निरंतर धर्म- कर्चव्यमा गाळेछ; अने अवमरे अवसरे धर्मकर्चव्य करता रहे छे. पण मुंढ पुरुषो निद्रा, आहार, मोनशोख अने विकया तेपन रंगरागा आयु व्यतित करी नाखेछे. एर्नु परिणाम ते. भो अधोगति रुप पामेछे. म यने तेम पत्र अने उपयोगयी धर्मने साध्य करवो योग्य छे. साठयडीना अहोरात्रमा वीशघढी तो निद्रामा गा. लीए छीए. बाकीनी चाळीश घडी उपाधि, टेलटप्पा अने रमळवामा गाळीए छीए. ए करता ए साठयडीना वखतमायी पचारपही विशुद्ध धर्मकर्तव्य माटे उपयोगमा लइए तो पनी दाकै एयुं छे एनु परिणाम पण के सुंदर याय! पळ ए अमूल्य पीज छ; चक्रवर्ती पण एकपळ पामना भासी रिदि आप तो पण ते पामनार नयी. एक पळ व्यर्थ सांबायी एक भय हारी जानेछ. एम तत्वनी दृष्टि ए सिर! शिक्षापाठ ५१ विवेक एटले शु लघु शिष्योः-भगवन् ! आप अपने स्थळे स्थळ कोता आरो छो के विरेस र महान् श्रेयस्कर . कि ए अंया- रामा पहेंला भारमाने ओटम्बानी दी . विवेक बडे विवेक एटले शृं? ८५ करीने धर्म टकेडे. विवेक नयी त्यां धर्म नयी तो विवेक एटले y?ते अमने कहो. गुरु-आयुष्यमन्नो ! सत्यासत्यने तेने स्वरुपे करीने सम- जवां तेनुं नाम विवेक. लघु शिप्योः सत्वने सत्य अने असत्यने असत्य कद्देवा. नूतो बघाय समजे छे. सारे महाराज ! एओ धर्मनुं मूळ पाम्या कडेवाय! गुरु:-नमे जे चात कहोठो तेनुं एक दृष्टांत आपो जाइए. लघुशिप्यो:--अमे पोते कडवाने कडवून कहीए डीए मधुरांने मधुरु कहीए छीए. झरने झेर ने अमृतने अमृत कहीए डीए. गुरुः-आयुष्यमनो! ए वां द्रव्य पदार्थ छे; परंतु आ- स्माने कयि कडवाग, कयि मधुराश कयुं झेर अने कयुं अमृत छे? ए भावपदार्थोनी एयी कई परीक्षा यह गुके ? लघुशिष्यः-भगवन् ! ए संबंधो तो अमारुं पण नयी. गुरु-त्यारे एज समजवान छे के ज्ञान-दानल्प आ- स्माना सत्व भाव पदार्यन अज्ञान बने अर्चन रूप असव वस्तुर येरी लीया छे, एमां एटली वधी मिश्रवा यइ गई छे के परीक्षा करवी अति अति दुल्लम के संसारनां मुखो अनंति- वार आत्माए मोगव्यां उतां, तेमांयी इजु पण मोद्द टच्यो नहीं, अने तेने अमन जेबो गप्यो ए अधिक छे कारण सं- सार कडवो छे. कडवा पिवाने आपेडे. तेमन बैरान्य जे ए फडवा पिवाक्नु औषध है, तेने कडयो गयो आ पण भवि
मोक्षमाला-पुस्तक वीजु.
वेक छे. ज्ञान दर्शनादिगुणो अज्ञानदर्शने घेरी ला जे मिश्रता
करी नांखी छे ते ओळवी भावअमृतमा आवद्यु; एर्नु नाम वि.
वेक छे. कदो सारे हवे विवेक ए केवी वस्तु वरी!
लघु शिष्यो:- अहो ! विवेक एज धर्मर्नु मुळ अने धर्म रक्षक
कहेवाय छे ते सत्यजे. आत्म स्वरूपने विवेक विना गोळखी
शकाय नहीं ए पण मसछे. नान, शील, धर्म तल अने तप ए
सपळा विवेक विना उदय पामे नहीं ए आपनु कडेवू यथार्य
छ. में विकी नयी ते अज्ञानी अन मंद छे. तेन पुरुष मनभेद
अने मिथ्या दर्शनमां लपटाइ रहे छे. आपनी विवेक संबंधीनी
शिक्षा अमे निरंतर मनन करी .
शिक्षापाठ ५२ ज्ञानीओए वैराग्य
शा माटे वोध्यो?
संमाग्ना साप मंथी आगळ केटलुक कहेवामां आव्यूं
छ. तं तमने लक्षमा दशे.
मानीओए एने अनंन मेदमय, अनेन दुःसमय, अन्य
पस्थित, चळविचळ, अने अनित्य को आरिशेपणो लगा-
स्वा पहला एमणे मंमारसंयमी मंपूर्ण विचार करलो जणायछे.
अनंत भवन पर्यटन, अनंत कानुं भवान, अननगीवननी
व्याधान, अनंत मरण, अनंतशोक व करीने समारचक्रमा
आत्मा भम्पा कां. मंमारनी दंगाती मारणा नेवी मुंदर
मोहिनीए भामाने नस्य चीन की नांग्थ्यो छे. ए जे मुघ
यात्माने काय भामत नयी माहिनायी मत्लग अन पर्नु
मानीऔर वैराग्य मा माटे योध्यो ?
स्वरुप जोवानी एणे भाकांक्षा पण करी नयी. पतंगनी नेम
दीपक मले मोहिनी नेम आत्मानी संसारसंबंध मोहिनी
उ.मानी भी ए मनानं क्षणभर पण मुबाप कहता नयी.
ए संमारनी नल जेटली जम्यो पण र विना रही नयी. एक
भुदयी करीने एक चर्ति मुधी भावे करीने सरसापशु रघु
से. एटलं चक्रवर्तीनी मंमार संबंधमां जेटली मोहिनी
तीन पटक तथा विशेष भूइने है. सरकारी जेम नमन मजा-
पर अधिकार भोगवे रे नेम नेनी उपाधि पण भोगवे.
भंडने एमांनुं क ए भोगवयुं पहनुं नयी. अधिकार करना
उनी उपाधि विपहे. सदाननो पोवानी पनि मलेनो
जेटले मरे नेटलान अपना नयी विष मुंडनी पोतानी
अजीमले मेयरले. पनि भोगयी जेलो मने.
देज ग्न म मानीत. परनिनी जेली.
पनी दाना नली आपि. ने एना भवना
माना रे.दने जन्म से अने पपरवानां जे. भाम नाय
किनारेन अनिवाधीगनपी. जग बन्दी बने माहित
है. मामि.मामा.मानेशातारे-
दनीयभागले. अनेकविसम्माननीयोगदिन.
बनेने मागावर पंतु कर
पापा मा.
जगेन ने नपा शानदारी
रोरपीसीएनपना मन नपरे
म. भोग भोगका बंई नर नाम
८८ माक्षमाळा- पुस्तक बी . मांसादिकनां छे. असातापियी पराधिन छ संसारनी आ उत्तमोत्तम पदी भावी रही तेमां आवं दुःख, आषी क्षणिकता, आवी तुच्छता, भायुं अंधपणु प रयुं छे तो पड़ी चीजे मुख सा माटे गण, नोइए ? ए सुख नथी उतां सुघ गणो तो जे सुरव भयवाना अने सणिक छे ते दुःखन छे. अनंत ताप, अनंत शोक, अनंत दुःख नोइने ज्ञानीभोए मसारने पुर दीधीछे ते सत्य छ. ए भणी पाई वाली जोवा जेयू नथी. सां दुःख दुःखने दुःखन छ, दुःखनो ए समुद्र के. वैराग्य एन अनंतमुखमा लइ जनार उत्कृष्ट भोपियोंछि. शिक्षापाठ ५३ महावीरशासन. हमणां जे जिन शासन मार्तमान छे ते भगवान महावीगर्नु प्रणीत कोलु छे. भगवान महावीरने निर्वाण पधार्या २४०० वर्ष या गया; मगध देशना अत्रियकुड नगरमा सिद्धार्थ राजानी राणी त्रिशलादेवी क्षत्रिपाणीनी कुवे भगवान महावीर मनभ्या. महावीर भगवानना मोटा भानु नाम नंदीवर्द्धमान इ. तेम- नी नानु नाम यशोदा हत्तुं. त्रीश वर्ष तेभो गृहस्थाश्रममा रबा. एकांतिक विहारे साहाचार वर्ष एक पक्ष तपादिक सम्पकाया. रे, एमणे अशेष घनघाती कर्पने पाठीने भस्मिभून कपा अनुपमेय केवळज्ञान अने केवदर्शन ऋजुतालिका नदीने किनारे पाम्या एकंदर बहानेर वर्षनी लगभग आय भोगी सर्व कर्म मस्मिभून करी सिद्धम्बरुपने पाम्या. धर्चमान घोवाशीना ए ऐसा निश्वर दता.
८९ महावीरमासन. एओनुं आ धर्मतीर्थ प्रवर्चे छ ते २१००० हजार वर्ष एटले पंचमकानी पूर्णता सुधी प्रवशे; एम भगवतीन्त्र- मां कयुं छे. आ काळ दश आश्चर्ययी युक्त होवायी ए श्री धर्मतीर्थ प्रत्ये अनेक चिपचिओ आवी गई रे. आवे छे अने आवशे. जैनसमुदायमा परस्पर मतभेद बहु पड़ी गया छे. पर- सर निंदाग्रंथोयी जंजाळ मांडी वेठा छे. मध्यम्य पुरुषो मत- मतांतरमा नहीं पडनां विवेक विचारे जिनवितानां मूल तत्वपर आवे छे उत्तम दीलवान मुनियोपर भाविक रहे हैं. अने सत्य एकाग्रतायी पोताना आत्माने दमेडे. कामभावने लीये चलते वखते शासन केंद्र न्यूनाधिक :- कायामां आवे छे. 'चंक जटाय पछिमा' एवं उत्तराध्ययन मूत्रमा वचन उ, एनी भावार्थ ए ई के ऐसा तीर्थकर (महावीरस्वामी) ना शिप्यो वांका अने जड धो. अने तनी सत्यता विपे कोडने बोलg रहे नेम नथी. आपणे त्यां नत्वनो विचार करी डीए? क्या उत्तम शीलनो विचार कगए डीए! नियमित वसत धर्ममां क्यां व्यनिन करीए छाए ! धर्मार्थना उदयने माटे क्यां लक्ष राखीए डीए! क्या दाझवडे धमनवने शोची- ए छीए ? श्रावर कुम्मा जन्म्या थी कगने धावक, ए वात आपगे भाचे करीने मान्य करवी जोइनी नथी: एने माटे जो- इता आचार-द्वान-बोध के. एमाना का विशेष लक्षणो होय ९० मोसमामा-पुस्तक थी . तेने यावक मानिये तो ते यथायोग्य छे. द्रव्यादिक केरलाक प्रकारनी सामान्य दया पावकने घर जन्मे से अने से पाळे, ए बात बवाणवा लायक छ; पण तत्वनै कोइकन जाणेछ मा ण्या करता माझी शंका करनारा अर्धदग्धो पण छ नाणीने भ- पद करनार पण छे. परंतु जाणीने तत्वना कोटामा तोकनारा कोक पिरलाम छे. परंपर आम्नायमी केवळ, मनापर्यव अने परम अवधिज्ञान विच्छेद गया. दष्टिवाद विच्छेद गर्यु, सिदा- तनो घणो भाग पण विच्छेद गयो; मात्र थोडा रहेला भागपर सामान्य समजणथी शंका करची योग्य नथी. जे शंका याय ते विशेष जागनारने पूजवी, त्यांची मनमानको उत्तर न मले तो-. पण जिनवचननी अदा चळविचळ करवी योग्य नयी, केमके अनेकांत शैलीना सरुपने विरला जाणे छे. उत्तम अने शांत मुनिभोनो समागम, विमलभाचार, विवेक, तेमन दया, क्षमा आदि सेवन कर. तुच्छ पुद्धियर्थी शंकित यधुं नहीं, एषां आपणु परम मंगळ छे ए पीसन करवू नहीं. शिक्षापाठ ५४ अशुचि कोने कहेवी ? निजामु:-पने जैन मुनियांना आचारनी वात बहु रुची छ. एआना जेवो कोइ दर्शनमा संतोमा आचार नथी. गमे तेवाशीपाळानी टाढा अमुक वसाडे तेभोने रेडवई पड़े थे जनाळामा गमे तेया ताप तपता उता पगमा तेओने पगरखो के मायापर छत्री लेवाती नथी. उनी रेतीमा भातापना लेखी -::- वे. पाव जान पानी पर छे, यास्सने र नेत्री माता नी. द प्रसव साडेसे. ये बदाम पर रान्वी मरना नथी. अपोल वचन नेपोरोली मलाई नये. नमो लइ जना नपी. आता पवित्र आतारो, मरे! दापक . परंतु नववारमा भगवाने रूपन करवानी ना हैरान नोमने पपासवी नयी. मल-माटेरेमी नदी जिहान-मारपी अपि रे. मल-नर अचि ! दिसमु-रीर परिन ९. मल-मा. मगरनी मरिनटाने या सोनी ९ वात सिरक नी. तर पोटे दाने र एतो विचार प. ना. लि., पनीर मार देर पर चार दिन पानी नादुर पई को सारी मनोरमाने स्नान करानी म:- हो मोर नसे. नामाकन- मेरो .. लाइन ममता पारन पर पार. ijट गन्ना मरे र
मोक्षमाळा-पुस्तक वीजें.
समजवान छे नहावाथी वृत्तभंग यइ आत्मा मलीन याय छे
अने आत्मानी मलीनता एज अशुचि .
जिज्ञानु:-मने तमे बहु सुंदर कारण पताच्यु. भूक्ष्म वि.
चार करतां जिनेश्वरनां कथनी बोध अने अत्यानंद प्राप्त
थाय छे. वारु, गृहस्थाश्रपीओए सांसारिक प्रवर्तनधी थपेली
अनीच्छितजीवहिंसादियुक्त एवी शरीर संबंधी अशुचि टाळवी
जोहए के नहीं ?
सत्यः--ममजणपूर्वक अशुचि टाळवीन जोडए. जैन वु
एक पवित्र दर्शन नी; यथार्थ पवित्रतानो योधक ने छे. परंतु
शौचाचिनु स्वरुप समजयुं जाए.
-:.'-
शिक्षापाठ ५५ सामान्य नित्यनियम.
प्रभात पहेलो जागृत यह नमस्कारमंत्र स्मरण करी पन.
विशुद्ध करवं. पापव्यापारनानि गंको राविसंबंधी ययेला
दोपर्नु उपयोगपूर्वक प्रनिरुपण कम्युं.
प्रतिक्रमण कर्या पछी यथारमर भगवाननी उपासना-स्तुति
तथा स्वाध्यायी वर्ग मननं उज्वळ कष.
मान पिनानो विनय करी मंमागकाममा आत्महितनी
क्ष भूप नही नेप व्यहारिक कार्यमा यन कर.
पति भोजन करना पाला मन्याचे दान देवानी परम भा.
ग मटना योचित प्रकृति करवी.
महारविहारादियां नियम मदित वर्ष.
तुरना रासी
क्षमापना. सत्शास्त्रना अभ्यासनो नियमित वखत राखवो. सायंकाळे उपयोगपूर्वक संध्यावश्यक करवू. निद्रा नियमितपणे लेवी. मुता पेहेला अढार पापस्थानक, द्वादशतदोप, अने सर्व जीव मत्ये क्षमावी पंच परमेष्टि मंत्रनुं स्मरण करी समाधि पूर्वक शयन करवू. आ सामान्य नियमो बहु मंगळकारी . जे अहीं संक्षे. पमा कह्या छे. विशेप विचारवाथी अने तेम प्रवर्त्तवाथी ते विशेष मंगलदायक अने आनंदकारक थशे. शिक्षापाठ ५६ क्षमापना. हे भगवान ! हुं वह भूली गयो, में तमारां अमूल्य वच- नने लक्षमां लीधा नहीं. में तमारा केहेलां अनुपम तत्वनी वि. चार को नहीं. तमारां प्रणीत करेला उत्तम शीलने सेव्यु नहीं. तमारां कहेलां दया, शांति, क्षमा अने पवित्रता में ओळख्यां नहीं. हे भगवान! हुं भूल्यो, आयड्यो-रझव्यो- अने अनंत संसारनी विटम्बनामां पडयो छर. हुं पापी छडं. हुं बहु मदोन्मत्त अने कर्म रनधी करीने मलिन छई. हे पर- मात्मा! तमारा कहेलां तन्वविना मारो मोक्ष नथी. हुँ निरं- तर अपंचमां पडयो छ; अज्ञानधी अंध थयो छ, मारामां विकशक्ति नथी अने हुँ मुंह उई, हु निराश्रित छ, अनाथ छ. निरागी परमात्मा ! हवे हुँ तमाळं, तमारा धर्मर्नु अने त- मारा मुनिनुं शरण गृहुं छई. मारा अपराध क्षय थइ हूं ते ,
पोशमाळा-पुस्तक पी.
गरं पायी मुकामारी अभिमारा. भाग करेला
पापोनी से पचाताप कर्म ७. नेम मई मूक्ष्म विचा
मानो उसेप तमतमारा तरखना चपरकारो मारा
पापी प्रकाश करे छ. तपे निरागी, निरंकारी, मनिदा.
मेरवार, महमानंदी, अनंतमानी, अनंनदी, अने
काागक छो. , मात्र पारा हितने अर्धे तमारी मार
पापा पाई. एक पळ पण नमाग कोला तसनी कान
पाय, नपारा कहेला ना भरा रहेएन मारी मा.
कांक्षा भने नि पाओस भगवान ! नमन hि
ia? नपायी अनाणु ना मात्र पक्षाना
कनन्य पानीमा इन्द्र-गति नि:
शिक्षापाठ ५७ वैराग्य ए धर्मनुं खरूपये.
पक बन मोनी पनिनवासी रंगायनने नामांसपी पाइए
मो ने नहीं मांगा. जो पानी
एक्यो घादर माने पलिता जानी भा. भारत
पापी मान्पा शिनारस, अनादिया मापा गंगा-
तीमारिन लिनतासी
पसिना भाषण वयापीर मोदी
घर न in 44 | at सी; म मामी
Taara प्रा-रा.
4m 44 41
, वैराग्य ए धर्मर्नु स्वरुप छे. हे के ज्यां खिो भोगववानो उपदेश को होय, लक्ष्मीली. लानी शिक्षा आपी होय, रंग, राग, गुलतान अने एशाराम करवानुं तत्व बतान्युं होय सां आपणा आत्मानी सत् शांति नधी, कारण ए धर्ममत गणीए तो आखो संसार धर्म- मतयुक्तन छे. प्रत्येक गृहस्यनु घर एन योजनाथी भरपूर होय छे. छोकरांछैयां, खी, रंग राग तान त्यां जाम्बुं पडयु होय छे अने ते घर धर्ममंदिर कहे, तो पछी अधर्मस्थानक कयुं ? अने जेम यत्तिए छीए तेम वर्चायी खोडं पण शृं? कोइ एम कहे के पेलां धर्ममंदिरमां तो प्रभूनी भक्ति यह शके छे तो तेओने माटे खेदपूर्वक आटलोज उत्तर देवानो छे के ते परमा- त्मतत्व अने तेनी वैराग्यमय भक्तिने जाणता नयी. गमे तम हो पण आपणे आपणा मूळ विचारपर आवq जोइए. तत्व- शानीनी द्रष्टिए आत्मा संसारमा विपयादिक मलिनताथी पर्यटन करे छे. ते मलिनतानो क्षय विशुद्ध भाव जळधी होवो जोइए. अहंतनां तत्वरुप साघु अने वैराग्यरुपी जळ वडे, उत्तम आचा- ररुप पथ्यरपर, आत्मवखने धोनार निर्गध गुरु छे. आमां जो वैराग्यजळ न होयतो वीजा वां साहि- त्यो कह करी शकता नथी; माटे वैराग्यने धर्म, स्वरुप कही शकीये. अर्हतमणीत तत्व वैराग्यज वोध छ, तो तेज धर्मन स्वरुप एम गणवं.
९३ मोक्षमाळा-पुस्ता यजु. शिक्षापाठ ५८धर्मना मतभेद भाग१. आ जगतमा अनेक प्रकारची धर्मना मन पडेला .तेगा पतभेद अनादिकाळची छे, ए न्यायमिद छे. पण प मा भेदो कालादि योगे को कई रुपांतर पामे सरा.ए संबंधी केटोक विचार करीए. कंटला परम्पर मळता भने केटलाक परसर विन्द छ, कटलाक केरळ नास्तिकना पायरेला पण ऐ. कंदलाक मामान्य नीनिने धर्म कई छ. केदलाफ जाननेज धर्म को . कंटलाफ नान पज धर्मपन कई छ केटला मसिने कहे; केटला क्रियाने कद कंटलाफ विनयने को छ अने ... सामागग्ने मानव एनेन धर्ममन को . ए मेमन यापकोए एम धारकों जगाप छ के भी ने काप छीपन नमागीर के मस छे. वाहीना. पढा मनो अमन्य भने कुन चादी / नया परमार वादार योग्य : अपाय गठन . पहातना उप- नापज बोध माग्टयना पण पन वीर योपनो पण पन कोष छ. व्यायमनमानी पग पन पोर . कनी पन बार जनि.मीन पनवार दिनो पत्र बोरयामानान 15 अननगर वार नोपपपरामा पर सपने मानिदि प्रा. त्या पार होनाril वाती सादी का पाना नानी, नमना गी. वरना बादी कर मामी; मातादी
धर्मना मनभेद भाग २
कार भोटो मोटोहोच. अशा प्रतिवादी फईक वधारे माचो,
अने वाली काईकोलो मोटो होय.केवळ पनेनीवान मोटी होती
न जाए. आम विचारकरतां तो एक धर्ममन माचो टरे अने
चाकीना वाटा टरे.
निशान-ए एक आश्चर्यकारर दान हे. सर्वने अमल
३. मने मत्ल रेप की वाय ! जो मने अमल एम
बीए नो मापणे नास्तिर रीए; अने धर्मनी मच्चाइ जाय.
भानो निश्चय के धर्मनी मचा नेम जगनर नेनी अवश्य
.एस. धर्ममन मल अनेकानाम अमल एस कहीर नो ने दात
मिद करी बनावची जोए. सर्व सत्ल कहीए नो नो एनीनी
नेवी शान भीन कारण मी आटया धामतभेद कस पट!
जोकर पण नभेद न रोपनोपजी जादा पांदनानासनो
सामाटेपन बरं! एर भन्योन्दना विधी पाहीवार
भर परेरे.
मोदन नेमका नमागन रग मागन मल
भने मला नानी दानी र कवि वानिक
हिनी मन . ' :'. .
पाका नाम
एवर काम
शिक्षापाठ ५१.धमना मनभेद भाग २.
हारनपटा गां. सदान पर
मोशमाळा-पुस्तक पी.
पाकीना धर्ममतने केवळ अमत्स कहला पड़े; पण ९एम की
न बाई. शुद्ध आत्मज्ञानदाना निययनपपडे सास असमरूप
ठरे; पांनु व्यवहारनये ते असत्य कही शकाय नहीं. एक
मत्य भने पाकीना अपूर्ग अने गदाग छ एम कई जे.
तैमन केटलांक कुतर्कवादी भने नास्तिकछे ने केवळ रा
पातु जेभी परलोक संबंधी के पाप संबंधी कापण योर के
भग बनावे ने जानना धर्ममनने अपूर्ण अने गदोष की
शाय छ. एक दर्शन ने निदान भने पूर्ण कोवानुछे ते रिपे.
भी बात हयगा एक वाजु गनीए.
हो नपने का घशे के मदोग अने अपूर्ण ए कपन
पना पान के भामाटे पोल्य र ? तेर्नु समाधान पयं नोए.पर्नु
समाधान पप छ के ने धर्मपतराळा भोनी यांमुवा युदिनी गति
पाची त्या मुल नेपर्ण विनागं कपी. अनुपान, भने उपमा-
दिक आधागडे ने धोने जे कथन मिद जगा ने प्रत्यारे नागे
मिद छ पानपग दगी ने पा लीया ना मुगग एका.
नरवादबीयांमनिलाम नीतिमान, क्रियाभादि एक
पाने पिवी, पी बीना पाना पांग्ग पो
तपणे हात सो नीpिi ण वर्गया।
मा मात्र या ना, पण पोतनी
वृदि पटमार कर
मा चाहिसंगी
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बगान बाराती प्रा.
का दाना पार ग - मनरा प्रपना गादी
धर्मना मतभेद भाग ३ ९९ अत्यप्रव्यमादियी तेओ जप पाम्या. केरलाके शृंगार अने लोके छित साधनोपी मनुष्यनां मन हरण को. दुनियां मोहमा तो मुझे दुबी पड़ी छे एटले ए इचिव दर्शनयी गाडरले य- इने तेसोए राजी थइ तेनु कहे मान्य राज्यु. केटलाके नीति, क्या इ वैरान्यादि गुग देखी इसादिकमी ते कथन मान्य राज्यु. प्रवर्तकनी बुद्धि तेओ करवां विशेप होचायी तेने पछी भगवानपज मानी लीघा. केटला वैराग्ययी धर्ममत फेल्लावी पाउयी कलांक मुखमालियां सायननो बोध खोसी पो. ताना मतनी हद करी पोतानो मत स्थापन करवानी महान भ्रमनाए अने पोतानी अपूर्गता इत्यादिक गमे ते कारणयी वीजान कहेट पोवाने न रुन्यु एटले लेणे होज राह काट्यो. आम अनेक ममतांवरनी जाल यती गइ. चार पांच पेढी एफनो एक धर्म मत रहो एटले पछी वे इधर्म यइ पढ्यो. एम स्पळे स्थळे यतुं गचुं. शिक्षापाठ ६० धर्मना मतभेद भाग ३. जो एक दर्शन पूर्ग अने मत न होय नो वीजा धर्म- वने अपूर्ण अने अमत्य कोर प्रमाणया कही गुजाय नहीं; ए मारे थइने से एक दर्भन पून अने मच ई नां तन्वयमा- परी वीजा मनोनी अपूर्णता भने एकांनिकता नाइए. ९ वीजा पमतोमा तत्वज्ञान संबंधी ययाय नम वि. चारो नयी. केला जगवर्चानो बोर काछे; पम जगद- कर्चा मागाटे सिद् यइ सातो नयी. पेटलाक दानयी
मोक्षमाला-पुस्तक वीज.
मोशछे पम कहेछ ते एकातिक छे तेमग क्रियायी मोक्ष
एम कनारा पण एकातिर छ. ज्ञान, क्रिया ए यमेथी मो
कोनारा तना यथार्थ स्वरूपने जाणता नयी; भने ए बने
भेद श्रेणियं नयी कही शापा एन एमनी शितानी सा
जणाइ भावले. ए धर्ममतस्थापको सतदेयतत्समा कडेला अष्टाद
दूषणोधी रहित नहोता एम एओए उपदेशेला शाम्रो ।
थवा नेमना चरित्रोपरगी पण तत्पनी दृष्टिए जोता देसायां
केटलाक मनीमा तिमा, प्रग्रह्मचर्य ई. अपवित्र आपण
योप छे ने नो सहनमा अपूर्ण अने मरागीना या जोर
मां भावले. कोइए एमां मर्यव्यापक पोश, कोपए करना
पर मोश, कोण सामाग्मोक्ष अने कोरए अमूक कार
मुवी रही पतित य ए रुप माल पान्योछे पण एमांधी को
पान नोनी सप्रमाण यह शकली नी. एभोना विमार्ग:
अपूर्णपणु निस्पृह नवोनाभीप दशायु ते यथापित भाग
योग्य छ
बंद पारायना वीना मतांना पासको परितो अनेर
भाग त्यादिक नांगमाया ने मना अर्ग एम सगाई भी
६. वनमानमा ने बीते घगा प्राचीन काल मेथी
पर पानीमापम् ने पण हिंमार सैन नि शेयी
भमसे. नेम मगाना वामपम पटगायी.
मनवा रवानेव पर निगान
म्यानर रानामगरदशी
हतार नाम मिति माय. या,
अपवर्ग, बार, Air, भानपादानं
रे
मुखविपविचार भाग १. १०१ एकैए वर्णव्यां नथी. तेनी साये शुद्ध आत्मज्ञान, तेनी कोटियो, जीवनां च्यवन, जन्म, गति, विगति, योनिद्वार, प्रदेश, काळ, तेनां स्वरुप ए विपे एवो मुहम वोपछे के जबडे तेनी सर्वच- तानी निसंकता याय. काळभेदे परंपराम्नाययी केवरज्ञानादि झाना जोवामां नयी आवतो, उनां जेजे जिनेवरना रहेला सिद्धांतिक वचनोई ते अखंडछे. तेओना केटलाक सिद्धांतो एवा सूक्ष्म छे के जे अकेक विचारतां आखी जींदगी वही जाय. जिनेश्वरना कहेला धर्मतत्तथी कोइ पण प्राणीने लेश खेद एलन्न यतो नथी. सर्व आत्मानी रक्षा अने सर्वात्मशक्तिनो प्रकाश एमां रहयो छे. ए भेदो वांचवायी, समजवायी, अने ते पर अति अति सूक्ष्म विचार करवायी आत्मशक्ति प्रकाश पामी जैनदर्शननी सर्वोत्कृष्टपणानी हा कद्देवरावे छे. बहु मन- नथी सर्व धर्ममत जाणी पछी तुलना करनारने आ कयन अवश्य सिद्ध यो. निर्दोषदर्शननां मूवतो अने सदोष दीननां मूतत्वाविप वीजे प्रसंग विस्तारथी कही. शिक्षापाठ६१ मुखविपेविचार भाग १. एक ब्राह्मण दरिद्रावस्थायी बहु पीडातो हतो. तेणे कंटा- बीने ठेक्टे देवर्नु उपासन करी लक्ष्मी मंचबानो निश्य कों. पोते विज्ञान होवार्य उपासन करवां पहेलां विचार कयों के कदापि देव तो कोइ हर यसो; पण पछी वे आग मुम्न
मोक्षमाला-पुस्तकधी .
म माग ता करी पछी मागवान का गूगे नहीं, अगा
गनाधिक मूने सो करेल मा पण निरर्थक जाप, माटे एक
सम्पत भाग्या देवमा प्रथाम करयो. संसारना महरपुरुषोना
पाप, र अन पुष जोग. एम निमय करी ते प्रयासमा
नीकटी पक्ष्या. भारतना जे जे रमणिप भनेरीद्धिमान शहरो
एलान जोगा. गनिमयक्तिर राजाधिराजनां अंनापूर, पुण
भने पर नीया. श्रीमंतीना भाराग, यदिार, पागगीया
अनाव पवार नाया; पण एपी ने कार ने मन मान्
नही. कोइने ग्रीन दम्प, कोने पनि दुःप, कोइने प्रशा.
नाद.य, कोने यालना वियोगदाग, कोइने निर्णन
मार्नु प, कोने यामीनी उपगिर्नु दुग, कोईन भर
मम, कोने गर्नु दुस, कोने शरदय, कोने
जडनानप,
कोग्ने पायापर्नु म, कोरने गया,
कोइने कुक्नु दुग, कोने पोताना नीच कुल दुम, कोने
चीनिय, कान पान दुप, कोईन नि दुआ, एम
पर
मिना ont
माता. यी गने पर्नु मन कोई न मान र
मा दुःमनी पर कप गर्म गुम ना जाम
भानी. सामा! m fraat
पर माननी मा मामबन irant भातो.
ri पारमान, वायु, बागवार कर
मुल प्रवास पर ! मुरघरे
महाआआधी तो 10 THATRA
- मुख विष विचार भाग २. घेर गयो. श्रीमंत मुखग्रहमा वेठा हता. तेणे अतियि जाणीने ब्राह्मणने सन्मान आप्युः कुशलता पूली. अने तेओने माटे भो- जननी योजना करावी.जरा वार जवादई धीरजयी शेठे ब्राह्म- णने पूछयुः आप आगमनकारण जो मने कहेवा जेई होय तो कहो. ब्राह्मणे का, हमणा आप क्षमा राखो आपनो सघ. ली जातनो वैभव, धाम, वागवगीचा इत्यादि मने देखाडवू पडशे; ए जोया पछी आगमनकारण कही. शेठे एन कई मर्म- रुप कारण जाणीने कोः भले, आनंदपूर्वक आपनी इच्छा प्रमाणे करो. नम्या पछी ब्राह्मणे शेठे पोते साये आवीने धा- मादिक वताववा विनंति करी. धनाध्य ते मान्य राखी; अने पोते साये जई वागवगीचा, धाम, वैभव ए सपळु देखाडयु. दोउनी खि अने पुत्रो पण त्यां ब्राह्मणना जोवामां आव्या. तेओए योग्यतापूर्वक ते ब्राह्मणनो सत्कार कर्यो. एओनां रुप, विनय अने स्वच्छता जाइने तेमन तेओनी मधुरवाणी सांभळीने ब्राह्मण राजी थयो; पछी तेनी दुकाननो वहिवर जोपो. तेमां सोएक वहिवटिया त्वां वेठेला जोया. तेओ पण मायाल, विनयि अने नम्र ते ब्राह्मणना जोवामां आन्या. ए. थी ते बहु संतुष्ट थयो. एनुं मन अहीं कंइक संतोपायु. मुखी तो जगमा आज जणायछे एम तेने लाग्यु, शिक्षापाठ ६२ मुखविपेविचार भाग २. केवां एनां मुंदर घर ! केवी मुंदर तेनी स्वच्छता अने जाळवणी छे ! केवी शाणी अने मनोजा देनी नुमाळ खो!
मोक्षमाळा-पुस्तक वा. केवा तेना कांतिमान अने कद्यागरा पुत्रोछे ! के संपील नेर्नु कुटुंब ! लक्ष्मीनी महेरपण एने त्यां केवीछे! आखा मार- तमा एना जेवो चीजो कोइ मुखी नथी. हवे तप करीने जो हु मागुं तो आ महाधनाक्ष्य जैन सघडं मागं, पानी चाहना करु नहीं. दीवम पीती गयो भने रात्रि या. मुबानो वखत ययो. धनाढ्य अने ब्राह्मण एकांतमा वेठा हता; पछी धनाढ्ये वि. प्रने आगमन कारण कहेवा विनंति करी. विमा-९ घरधी एवो विचार करी नोकळ्यो इतो के यथायी वधारे सुखी कोण छ ने जो अने तप करीने पछी एना जेयूं मुग्प संपादन कार्यु आखा भारत ने ननो सघना रमणीय स्थळी जोयां; परंतु कोइ राजाधिराजने सां पण मने संपूर्ण मुख नोवामां आयुं नहीं. ज्यां नोयु त्यां आधि, व्या- घि अने उपाधि नोवामां आवी. आप भणी भावना आपनी प्रथमा मापळी एटले हु अहीं आव्यो; अने संतोप पण पा. म्यो. आपना जेवी रीदि, मत्पुन, कमाउ, ग्री, मुटुंब, घर वगेरे मारा जोवायां क्याय प्राप्यु नथी. आप पोते पण धर्म- शील, मदगुणी अने जिनेश्वग्ना उत्तम उपास्यकलो. एयी ९ एम मानें के पापना गप पीने नथी. मारता आर विशेष मुनीगे आमना करीने कदापि देवरुन पार्नु तो पापना नवी मुर्मापति याचं पनाप-पंडितनी, भार एक या मपंपाला विचारथी नारच्या डा; एटले भाश्य आपने नंप नेम सानुमत्री रामविपमिनार भाग पान कई र पी जेप नमारी इडा पार मेप करजी. पारे ला पापे में मुख जोया ते ने मुम्ब भारत पोप नयी एस आपे वा नो सेमागे; पण परं ए मने में- भानु नमागे सिलन एनोरे जगत्मा कोइ स्पले वास्त- विक पर नपी. नगर दुःखपी बरीने दार ऐ. इसे पने एमी जुओ को परंतु व सविक रीते मही नपी. मि-आपर्नु भा को वोइ अनुभवमिद बने मार्मिक स. में अनेक जातजाप के मां पर विचारो पारा वा परिश्रम सीयो नपी. ने मने तो अनुभव ने माटे पाने पनी नपी. व आपने दुम ऐ ! मो. भनाय ...तिमी भानो मोराने PER. मन परराजेईए; अने र पापी बंद रम्यो पपरा है. शिक्षापाठ ६६ सुखविपेविचार भाग ३. हसी र सम.जे बरदाशन र र नर ने FFrtm पो पर पारा गरी टनर पान मा ....
१०६ मोक्षमाळा-पुस्तक दी. श्री पण गुजरी गइ. ते बखतमा मने कंइ संतान नहोतुं. गवरी पोटोने लीधे मार अहींची नीकली नई पडयु. मारा कुटुंगो. ओए यती रक्षा करी; परंतु ते माम फाट्यार्नु धीगई. अन्नने अन दांतने येर थपानी स्थितिए, हुँ यहु आगळ नीक- ली पडयो. स्पारे ई साथी नीकम्यो त्यारे मारा भी मने रोकी राबवा त्या के में गामनो दरवाजो पण दीडो नयी पाटे तने नवा दशकाय नहीं. ता कोमळ शरीर का पण की नाके न भने तुं या ना अने मुवी था तो पी आर पण नहीं; माटे एरिचार तारे माडी चाळवी. यणा मारपी नेभान समनाती, मारी स्थितिमा भावी सारे आश्य भी भावीग. एम यचन दा नावादर पपंटने नीळी गयो. पार पाडौ वटवानी नगारी या. देवयोगे पारीग्न एक दमरी पण ही नोनी. एक के ये महीना उदरपोषण पाये ने माग्न रहा नहो. छतां मागमा गया त्या मारी यु. टिए पारय पारव्या ने वाणमासी हनी ने यहागना नाविक माना अनमना प्राइने गाताना गं भाग भाग दमनी बात की.ने मन चोलाको प्रमुा. याममा गोटव्यः माई माग पोषणी मागणुपदा करती ती. ए वाग्मा पाचिन ग्यारे निारयु न्यारे भारतमा पार पायात्रा की नमाजाच्या माT टीकमार यापी र पानी मामी भानामा परमार मा... 411 माम. का प्रया ME-पान पासाने मुखविपेविचार भाग ४. सामा आन्या इता. हुं मारी कुटुंबीओने आनंदभावधी जर मज्यो. तो मारा भाग्यनी प्रशंसा करवा लाग्यां. जावेथी लीधेला माले मने एकना पांच कराया. पंडितनी ! सां केट- लाक प्रकारची मारे पाप करवां पड्या हतां पुरुं सारा पण हुँ पाम्यो नहोनो; परंतु एकबार लक्ष्मी साध्य करवानो जे प्रति- ज्ञाभाव को हतो ते प्रारब्ध योगयो पल्यो. जे दुःखदायक स्थिनिमां हु हतो ते दुःखमां खामी हती ! स्त्री, पुत्र एतो जागे नहोनांज, मावाप आगळ्थी परलोक पाम्यां हां.कुटुंबी- ओना वियोगवडे अने विना दमडीए जावे जे वसते हुँ गयो ते पखननी स्थिति अनानदृष्टिथी आंखमां आंसु आणी दे तेवी के आ वसने पण धर्ममां लक्ष राख्यं इतुं. दीवमनो अमुक भाग नेमां रोकतो हनो: ते लक्ष्मी के एवी लाल नहीं; परंतु संसारदुःखयो ए तारनार साधन छे एम गणीने. मोतनो भप क्षण पण दूर नथी, माटे र कर्तव्य जैम वने तेम खराधी की ले. ए मारी मुख्य नीति हती. दुराचारथी कंड नुव नधी; मननी हप्ति नयी; अने आत्मानी मलिनता है. ए वत्त भणी में मारूं लक्ष दोरेल ह. शिक्षापाठ ६४ मुखविपेविचार भाग ४. अहीं आच्या पछी हूं मारां देकाणांनी पन्या पाम्पो. ते पण लक्षणी अने मर्यादाग्रीन्ट नीवडी; एवढे करीने मारे
मोक्षपाला-पुस्ता पीर्नु.
प्रगपुर पया. बहिरट प्राळ वाथी भने नाथु नाणारेय.
पारनु होगाणी दश वर्षपा है पहाकोव्यावति पा पापी,
पुना नीति, विचार, भने पुदि उसम रहेगा में बहुमुंदर सा.
धनी गाया. घी, ते भी आरिपनि पाम्या २. मा.
श्रीमान योग्य योग्य एप गोठी तानी रियनिने पुरमा
करी. मानना में अमूक नियमो यो पा. उत्तम पायनो मा.
म पण करी लीयो. मा फरस एक ममल पातर कपं. गम्हं
पाई मेट भने तुरंपरानुं नामकितपशु न सका,
एम करवगवा माटे में भा सगळू कएन ई गुहा मानतो
नयी परिसीना करना पी0 नोषण प शामली
ऐ. मश्गुन नपी. जगत्मा बहुमा करीने अशातानी .
में धपा मागे काल गाळयानो नियम रालयो, शासना
मनन, मापुताना ममागम, पपनियम, एक महीनामा बार
दीयम प्रपनप, मन गादान, ग र धानी नपा-
विमांची देरलोक माग र भो में साम्यांश, पाने
हारमा लायोग्य कर्ग निर्गम गानोग
सणां निगल या नेम नगी एम गारमीना
साब नी; पण पर्मती कारण छ. पाना
मानाम परमिशन ने शनिवारी.
रानी हमरा Ritinापरणनी
बमा परम परमानं
परे
बारा tot.ertist.
प सोपा मारणारा मना मगर, पार
१०९ समविपविचार भाग ५. दोवसनो नबो अनुभव अने वाकीनो आगनो पर्मानुभव ए- मने वे जग मुहुर्च बांधु छ. मारी श्री धर्मशालनो केटल्लोक घोष पामेली होचायी ते पन सौपने उत्तम यमनियमनो दोष करो सप्ताहिक सभा भरे. पुत्रो पग शावनो बनतो पार- चप राखेडे. विद्वानोनुं सन्मान, अविपिनो विनय, बने सामान्य सत्यता -एकज भाव-एवा नियमो बहुधा मारा अनुचरो पण सेवेडे. एओ या एयी यावा भोगवी मोडे. लक्ष्मीनी साये मारा नीतिधर्म, सद्गुण, विनय एणे जनसमु- दापने बहु मारी अमर करी छे. राजासहित पण पारी नी- विवाद अंगीकार कर तेवू ययुडे. आ मपटुं आत्ममंसा माटे एं कहे तो नयी, ए आप स्मृतिमा राखg मात्र आपना पूछेला सुलासा दासल आ सपर्छ मझेपसा कहेनो नई छ. शिक्षापाठ ६५ सुखविपेविचार भाग ५. या सपळ स्परयी हुँ मृत्ती छई एस बापने लागी - को, अने सामान्यविचारे मने पहमुखी मानो वो पानी शकाय तेम 2. धर्म, चील अने नीतिथी नेमन शाखापानयी भने जे आनंद उपजेचे ते माननिय जे. पन नत रायी ई मुखी न मनात. यांनी सर्व प्रकारे वाह बने अन्यवर - रिग्रह में त्याग्यो नयी, त्यांची. राग दोपनो भावले. जो के वे बहु अंश छे. नथी पग छ तो ला उपाधि पपछे. सर्व संग परिलाग करवानी मारी संपूर्ण भारता; पण ज्यां- २१० मोक्षमाळा-पुस्तक जु. सुधी तेम थयु नथी त्या मुशी गणानां हजु कोर प्रियजननी वियोग, व्यवहारमा हानि, कुटुंबीर्नु दुःख ए यो अंग्रे पण उपाधि आपी शके. पोताना देहपर मोत शिवाय पण नाना प्रकारना रोगनो संभवछे. पाटे केवळ निर्गय, वाघांभ्यनर प- रिग्रहनो त्याग, अल्पारंभनो त्याग ए मघळ नथी युं त्यो मुधी, हुँ मने केवळ सुखी मानतो नयी. व आपने तसनी - हिए विचारनां मालम पडश के लक्ष्मी, स्त्री, पुत्र के कुटुंब एवढे मुख नथी. अने पने मुख गणुं तो ज्यारे मारी स्थिति पतित थइ हनी त्यारे ए मुव क्यां गयुं तुं ? नो वियोगछे, जे क्षणभंगुर छ अने ज्या अव्या पाय पणुं नपी ते संपूर्ण के वास्तविक मुख नथी. एटल्य माटे थइने हुँ मने मुरी कही शकतो नथी. हु बहु विचारी विचारी व्यापार वहिवर करतो हतो तोपण मारे आरंभोपाधि, अनीति अने लेश पण कपट सेव_ पडयुं नथी, एप तो नयीम. अनेक प्रकारना आरंभ, अने कपट मारे सेवा पक्ष्यां इता. आप जो धारता होके देवोपासनयी लक्ष्मी प्राप्त करवी, तोते जो पूष्प नहोय तो कोई काळे मळनार नयी. पूण्यपी पामेली लक्ष्मी महारंभ कपट अने मानममुव वधारत से महापापना कारण पाप नगरुमां नाग्वेछ, पापी, आत्मा महान् मनुष्यदेह ए गुमावी दे छे. एकनो नाणे पूण्यने साद मत्रां; वाकी वही पाप ग्न कम्युः लक्ष्मीनी अन ने वर मासा समारनी उपाधि मांगी धार छ के विकी आत्मा- ने मान्य न होय. में कारणयी लक्ष्मी उपार्जन करी हनी,
.
गृवविविनार भाग ५.
ते कारण ये आगल आपने मनायूं . प मापनी हा
होम ने करी. आप किटान हो. विद्वानने चाई. भा.
पनी अभिरापा रोयना धर्मध्यानयां प्रसन्न प. मारर
बी भरा. आपनी उपजीविकानी माळ पोजनाम
को मेमो, गारपूर्वक करावी आ. ही शामध्ययन अने
मनवम्ननो उपदेश को मियारंभीपधिनी रेगुनासो
पार न पटो, की आपनी जेवी मा.
परित-भाप आपना अनुभवनी ए मनन सबा नेवी
भाग्मारिका सी. र भाप को मायरो पाई।
जापान जीव विज्ञवी को मापनी विवानि.
राशदिवासी सनीने जे र गरी हनी ने
नी. भास करना विकी शिकार की
नाना, शो नुनमा विवाद को वि.
नri माग नक्षी. मला बा.
स. मरोजमाने मानो एस.
གཙང་བྷེ བ འི ༢༢:.ག :
दिनोदी न..
११२ मोक्षमाळा-पुस्तक चीजें. शिक्षापाठ ६६ सुखविपेविचार भाग६. धनादयः-आपने मारी बात रुची एपी हुँ निराभिमान- पूर्वक आनंद पामु छरं. आपने माटे हुँ योग्य योजना करी- प. मारा सामान्य विचारो कथानुरुप अहीं कहेबानी ई भाज्ञा लई छ। जेभो मात्र लक्ष्मीने उपार्जन करवामां कपट, लोभ अने मायामां मुशाया पडद्या छे ते बहु दुःखीछे. तेनो ते पुरो उपयोग के अधुरो उपयोग करी शकना नयी. मात्र उपाधि ज भोगवे छे. ते भसंख्यान पाप करेछे. काळ अचानक लइने उपाही जाय छे. अयोगनि पामी से जीव अनंतसंसार वधारे छे. मळेलो मनुष्य देह निर्मात्य करी नाले के थी ते निरंतर दुःखीम छे. जेभोर पोताना उपजीविका जेटली मापनमात्र असारमयी राख्या छ, शुद्ध पक पमिन, मनोप, परान्मानी रक्षा, यम, नियम, परोपकार, अल्पराग, अभद्रव्यमाया भने मत्स तेमन शासाम्पयन राखेल छे, मरपुरुषोने मेवेछ, नियतानो पनार्य राख्यो छे, बड़े प्रकार करीने मंसारथी जे त्यागी नेवा छ, जेनां पैराग्य अने विवेक उत्तर ये तेवा पुरूषो पवित्रता मुमपूर्वक कार निर्गपन करे छ. मामकारना प्रारंभ अने परिवायी श्री गलि यया. द्रव्ययी, संत्री, काळयी भने नगरी नभी अनिवघरगविरं ,, मित्र प्रत्ये समान धारा भने गुद प्रात्मःयानमा मुखविपविचार भाग ६. मनो काळ निर्गमन पाय है, अयवा स्वाध्याय ध्यानमा लीन छ. जितद्रिय अने जिव रूपाय एका वे निर्पयो परम मुखी. मई यनयानी कर्मनी तप जेणे कोंगे चार कर्म पात जेना पक्ष्यां छ; जे मुक्त के जे अनंतदानी अने अनंवदा ऐ ते तो संपूर्ण मुखीज छे. मोसमां तेओ अनंत जीवननां अनंतमुखमा सर्च कर्पविरक्तवायी विराजे छे. आप सत्पुरुषोए कहेलो मन मनं मान्य छे. पहेलो तो मने सार छे. पीजो हमणां मान्य छ; अने यणे भागे ए ग्रहण फरखानो पारो चोय छे. बीजो बहु मान्य छे. अने चोयो तो सर्वमान्य अने सचिदानंद सरूप से. एम पंडिदजी आपनी अने मारी मुखसंबंधी वातचित या. मसंगोरात ते वाव चर्चवा जा. तेपर विचार करी. आ विचारो मापने कमायी मने वह आनंद ययो . आप तेवा विचारने अनुच्छ यया एपी वी आनंदमां दृदि यह . एम परसर वातदित परवां करवां हर्षभर पछी भोसमा- धिमारी शपन करी गया. जे विकीमो आ मुखमंबंधी विचार करने तेभी पर चत अने आत्मगिनी उत्कृष्टवाने पामशे. एमां कईदा अत्यारंभी, निरारंभी अने सर्वमुक्त लक्षणो सार्वक मनन करखां जवां उ. जेम बने तेस अत्तारंभी यह मम्भावयी जनस- सदापना हित मणी वन्, परोपकार, दया, ति क्षमा अने पवित्रता सेवन कर ए वह सुबहायक है. नियताविप तो विशेष कहवान नदी. पुन्हा त्या अनंत मुबयान उ. .
[-पुस्तक पौर्नु. मोक्षमाळा- शिक्षापाठ ६७ अमूल्य तत्वविचार हरिगीत छंद. यह पूण्यकेरा पुजयी शुम देह मानवनो मयो सोये अरे ! भवचक्रनो आंटो नहिं एके रब्यो मुख प्राप्त करता मुख टळेछे लेश ए लक्षे लहो क्षण क्षण भयंकर भावपरणे का अहो राची रहो ? -::- लक्ष्मी अने अधिकार घयतां, वश्यं ते तो कहो, शुं कुटुंब के परिवारथी वधवापणं, ए नय ग्रहो; चपचापणुं संसारनं नर देहने हारी जवो, एनो विचार नहीं अहोहो ! एक पळ तमने हवो !!!२ मुख नहीं. ३ निदॉप मुग्प निर्दोष आनंद, स्पो गमे त्यांची मले; ए दिव्यशक्तिमान थी जंजिरेधी नीकळे !! परवस्तुपां महिं मुझको, एनी दया मुनने रही ए त्यागवा भिदात के पश्चातदुख ते ९ कोण टुं । क्यांपी, पयो ?f स्वरुप मार्क सर्क। कोना संबंध वळगणा छ ? राम के ए परहरु ! एना विचार विक पूर्वक शान मावे जो कर्या; तो मर्व आरिपकमानना मिदाननत्व अनुभव्या. . . 4 . --- ४ * ने-माप्त करवा अमन बानु मत्य कंवळ मानj ? नि:प नरनं कथन पानी "से" नेणे अनमव्यः जिनद्रियता. ₹! आत्म तारो! आत्म तारो! शीघ्र एने ओळखो, सर्वात्ममां समष्टि यो आ वचनने हृदये लखो. शिक्षापाठ ६८ जितेंद्रियता. ज्यांनुषी जीभ स्वादिष्ट भोजन चाहेछे, ज्यांची ना- सिका सुगंधी चाहे ज्यांनधी कान वारांगनाआदिनां गायन अने वाणित्र चाइछे, ज्यांनी आंख वनोपवन जोवान लक्ष राखेडे, ज्यांमुवी त्वचा नुगंधीलेपन चाहेछे, त्यांमृधी, नेम- सुप्य निरागी निय, निःपरिग्रही, निरारंभी अने ब्रह्मवारी यह शकतो नयी. मनने वश करए सर्वोचम से. एना चढे सपळी इंद्रियो वा करी शकाय . मन जीतबुं बहु दुर्घट छ. एक समयमां असंख्याता पोजन चालनार अन ते मन छे. एने यजावईं वह दुल्लम के. एनी गति चाळ अने न झाली शराय देवी छे.महाज्ञानीओए जानरूपी लगामवडे करीने एने संभित राखी सर्व जय कोंडे. उत्तराध्ययन मूत्रमा नर्मिराज महर्षिए भद्रमले एम क- झुं के दश लास भटने जीतनार. कड़क पख्या में परंतु सा- लाने जीतनारा बहु दुल्लम के अने ते दम टाख मुभटने जीतनार करतां अत्युचय छे. मनन सर्वोपाधिनी जन्मदाता भूमिका छे. मनज बंध अने मोक्षद् कारण डे. मनज सर्व मंमाग्नी मोहिनी रुपछे. ए व यवां आत्मसरपने पाम टेश मात्र दुलम नपी.
पोक्षमाळा-पुस्तक चीजें. मनवहे इंदियोनी लोलुपता है. योमन, यानित्र, मुर्ग- धी, खिनुं निरीक्षण, सुंदर पिलेपन ए सघळु मनन मागे . ए मोहिनी आहे ते धर्मने संभारवा पण देतुं नयी. संभा पछी सावधान यदा देवं नथी. सावधान पया पछी पति- तता करवामा प्रवृत थाय छे. एमां नयी फावन सारे सा- पधानीमा केइ न्यूनता पहोवाडे छे भो ए न्यूनता पण न पामता अडग रहीन ते मनने जीते छे तेभो सर्बया सि दिने पामे छे. पन कोइयीन अकस्मात जीती शकायछे, नहीं तो पह- स्वाश्रमे अभ्यास करीने जीतायछे ५ अभ्यास नियता. मां बहु पर पाकरले छता सामान्य परिचय मांगी तो मेनो मुख्य मार्ग आ छे के ते जे दुरेच्छा करे तेने मूली नवी से म करई नहीं. ते ज्यारे शब्दस्पर्शादि विलास इरले सारे आपा नहीं. दुकामा आपणे एथी दोरायुं नहीं पण मापणे पने दौर मोक्षमार्ग चितव्यामां रोक. नितदि- पता विना सर्व प्रकारनी उपाधि उभीम रही है. सागे न त्याग्या जेवो पाप से, लोक लजाए देने सेवा पट से. माटे अभ्यासे करीने पण मनने साधीनतामा लई अनाप आरपीत करई. शिक्षापाठ ६९ ब्रह्मचर्यनी नववाड. जातीभोर पोरा समामा केवा भेद भने के स्वस अयनी नववाड. रहावेन रे ! ए बडे फेटली पत्री आलोमति याप! ब्रह्मचर्य जेवा गंभिर विषपसरूप मंझपना अति चालारिक वे आयु है. ब्रह्मचर्परुपी एक सुंदर झाड अने ने सा कर- नारी जे नव विधियो ने वारर्नु र आरी आचार पाशमां विशेष स्मृति रही सके एवी सरब्बा करी रे. ए नव पाड मर अहाँही. १ इसवि. ब्रह्मचारी साधुर झी, पके पडंग एयी में- गुरु वसविना रहे नहीं. नी वेगवारनी -मनुप्यिनी अने देशंगना. ए प्रत्येकना पाहावे वे भेद हे. एस्तो मुड अने धीजी सीनी माँ के चित्र. एमांयी गमे ते मारनी खी ज्या होप लां ब्रह्मचारी माधुर न रहे. उनके ए विकारत . पर परले विवणी. गाय मंस इलादिक जे स्थळे होप ने सन रहे: अने पडंग एण्डे नपुंसक एनो वास होप सां नरोई. पता नारनो वान ब्रह्मचर्पनी हानि करे. हेभोना कामचेष्टा हार मात्र इलादिक विकारो पनने भ्र- करे हे. २च्या. मात्र पर.टी विदोनेके एकजीने चना- देश ब्रह्मचारीर नकरचो. क्या ए पोहनी उत्तचि रूप हे. ब्रह्मचारीरीना लकापवित्रास संबंधी यो वांदवा नही, देवन जेसी पिच बडे चा नकारनी गरे देशृंगार संबंधो क्या ब्रह्मचारीर की नहीं. ३ शमन-गिनी साये पर भासने नसबं. देवन ११० मोक्षपाला-पुस्तक वार्जु. ज्यांनी पेठी दोय त्यांचे घडी मधीमां ब्रह्मचारीए नये- सर्यु. ए लियोनी स्मृतिनुं कारण छ, यो विकारनी उत्सत्ति थाय छे. एप भगवाने कयुं छे. ४ इंद्रियनिरीक्षण-स्त्रीओनां अंगोपांग ब्रह्मचारी साधुए न जोवां न निरखपां. एना अमुक अंगपर द्रष्टि एकाग्र यवापी विकारनी उत्पत्ति यायछे. ५ कुड्यांतर--भीत, कनात के बादानो अंतरपद राखी स्त्री-पुरुष ज्या मैथुन सेवे त्या ब्रह्मचारीए रहेचु नहीं. कारण शमचेष्टादिक विकारनां कारणछे, ६ पूर्वक्रिडा-पोते गृहस्थावासमां गमे नैवी जातना शृंगा- स्थी विषयक्रिडा करी होय तेनी स्मृति करवी नहीं; सेम करवायी ब्रह्मचर्य भंग थायछे. ७ मणीत-ध, दही, घृतादिपधुरा अने चीकाशवाळा पदार्थोनो बहुधा अहार न करयो. एथी विर्यनी रदि अने उन्माद यायर्छ अने तेथी कामनी उत्पत्ति यापछे. माटे ग्रह- पारीए तेम करवू नहीं. ८ अतिपावादार-पेट भरीने अतिमात्रआहार करवों नहीं तेम अति मानानी उत्पत्ति पाय तेम करवू नहीं एपी पण विकार वर्षछे. ९ विभूषण-स्नान, विलेपन करवा नहीं, लेमन पुष्पा- दिक ब्रह्मचारीए ग्रहण करवू नहीं. एथी ब्रह्मचर्पने हानि . उत्पन यापछे. । कहीछे. पर- सनामार भाग.. था ए नमारा सांभक्चामां आनी हो, परंतु गृहस्सावासमां अ. मुक अमुक दिवस ब्रह्मचर्य धारण करवामां अभ्यासीओने लक्षमा रहेवा अाँ भागळ कंइक सपनणपूर्वक कही है. शिक्षापाठ ७० सनत्कुमार भाग १. चरवीना वैभवमांशी सामी दोप! सनकुमार एच. मावर्ची नो. तेनां वर्ण अने रुप अत्युचम हता. एक वेळा मुर्ममभामां ते रुपनी स्कृति यह; कोइ ये देवाने ते वात रची नीं; पछी वेओ ते का टाळबाने विसरुप सनमार• नां मनःपुरमां गपा. मनकुमारनो देह वेळा रोच्या भों हतो. सेने अंग मर्दनादिक पदार्थोन पात्र विदेशन र. देणे एक नार्नु पंची परे . अने से स्नान मजन करवा पाटे पेटा हवा. किरणे आवेला देवता नेनुं मनोहर सुप, कंचनद- पिकापा, अने इंद्रजेवी कांति जोइन कटु आनंद पाम्बा, अने साधु धुगायु. भा जाने चमवार छ: तमे मा का मारे घुमा देदोर पाई, मे सारं स भने वर्ग निरम- चा पाटे पर अभिलाषी हवा. परे म साग वर्ग सनी स्कृति मांगी हनी; काले भने का जोर, जेपी अपने ने भानंद गावो. साधू मान्य न राम धुंनो बोमांसपा नवले यी विप न माई . मनावर कम्पनी नियों का सावन- माग का मजाई में न र गममा मा सार पारन न. TEREL ने पार निरामनार मोक्षमाळा-पुस्तकं घीजें. छर त्यारे, माई रुप अने मारो वर्ण जोवा योग्य छे. असारे तो हुँ खेळमरी कायाए वेठो छ. जो ते वेळा तमे मारा प. वर्ण जुभो तो अद्भुत चमत्कारने पामो अने चकित यह मा. ओ. देवीए कयुं, सारे पछी अमे राजसभामा आवी एम कहीने त्यांची चाल्या गया. सनत्कुमारे त्यार पछो उत्तम व सालंकारो धारण कर्या. अनेक उपचारथी जेम पोतानी कापा विशेप आश्चर्यता उपनावे तेम करीने ते राजसमामा आवी सिंहासनपर बेठो. आजुबाजु समर्थ मंत्रियो, सुमटो, विद्वानो- ने अन्य सभासदों योग्य आसने 'बैंमी गया हता. राजेपर चामर छत्रयी विशाता अने खपा समाथी वधावावां विशेष शोभी रया छे, त्या पेला देवताओ पाछा विमरुपे याव्या. अ- दभूत रुपवर्णयी मानंद पामवाने बदले जाणे खेद पाम्यां एवा स्वरूपमा तेओए मायुं धुगाव्युं चक्रवर्तीए पूज्यं, महो ब्राह्मणो ! गइ घेळा करता आ वेळा तमे जूदा रुपमा माएं धुणाव्यं पर्नु y कारणछे ? ने मने कहो अवधशानानुसारे विम कार्य के है, महाराजा ! ते रुपमा अने आ रुपमा भूमी आका शनी फेर पडी गयौ छे. चक्रवर्तीए ते स्पष्ट सपनाववाने वधुं. मामणोए कयुं, अधिराज! तमारी काया मयम अमृततुल्य ती. आ वेळा और नुन्य छे. ज्यारे अमृततुल्य अंग र त्यारे मोद पाम्या, भने आ वेळा अन्तुन्य छ सारे खेद पा- म्पा. मे कहीए जीए ने वाननी निदना करवी होप तो तमे तांपुल पूको, तत्काळ ते पर मानी बसशे अने ते परलो. क पहोंची नो.
सनतकुमार भाग २. १२१ शिक्षापाठ ७१ सनतकुमार भाग २. सनत्कुमारे ए परीक्षा करी तो सत्य ठरी. पूर्वित कर्मना पापनो ने भाग तेमां आ कायाना मद संबंधीजें भेवण य. वापी ए चक्रवचिकाया झेरमय यह गई हवी. विनाभी अने अचिमय कापानो आवो प्रपंच जोइने सनत्कुमारने अंतःकरणमा राज्य उत्पन्न ययो. आ संसार केवळ तजवा योग्य रे. आवीने आवी अचि स्त्री, पुत्र, मित्रादिका पारी- रमा रही है. ए सपहं मोहमान करवा योग्य नथी, एम विचा. रीने ते छ संडनी प्रभुना त्यागी चाली नोकल्या. माधुरुपे स्पारे विचरताहतात्यारे तेओने पहारोग उत्पमययो.नां सल- त्वनी परीक्षा लेवाने कोइ देव ला पैदरुपे आपो. साधुने कएं, एबहु कुमक राजद . तमारी काया रोगनो भोग ययेली ऐ. जोछा होय तो तत्काल ९ ते रोगने टाळी आपुं. सा- धु पोल्या, हे वैद ! कर्मरुपी रोग महोन्मस है; ए रोग टाढ. पानी नमारी जो समर्थता होप तो भले पारो ए रोग टाळो, ए समर्थता नरोपो आ रोग भले मो. देवता बोल्यो, ए रोग टाब्वानी समर्थता नपी, माधुर पोतानी लन्धिना परिपूर्ण बटवडे पुंकवाची भंगुनि की तेरोगने सरडी के वकास ते रोग नाश यो; अने काया पाठीती तेती बनी गा. पछी ते ना देवे पोतानु चार काम्पु पन्यवादगार वंदन करी पोनाने स्थानक गा. रनपीत जेवा मदेव लोपथी गदगदना महागंगनी
-मोक्षमाला-पुस्तक वीजु.
उत्पत्ति जे कायामा छे पळमां वणसी जवानो जेनो सभाव
छ जे प्रत्येक रोमे पोणा वरचे रोगवाली होइ रोगनो भंडार
छ, अन्न वगैरेनी न्यूनाधिकनाथी जे मत्येक कायामा देखाव
देछे, मळमुत्र, नर्क, हाड, माम, पर अने श्लप्मपी जेर्नु
धारण टक्युं छे, बचायी मात्र जेनी मनोहरता छ ते
कायानो मोह सरे विभ्रमन छे. सन सुमारे जेनुं लेशमात्र मान
कंयु ते पण जेयी मखायु नहीं ते कायामा महो पामर ! से
"मोहे छे? ए मोह मंगलदायक नयी.
,
शिक्षापाठ ७२ वत्रिस योग.
सत्पुरुषो नीचेना रनिश यांगनो संग्रह करी आत्माने उ.
ज्वळ करवानें कहेछे.
१. मोक्षसाधकांग माटे शिष्ये आचार्य प्रत्ये मालो-
चना करवी.
२. आलोचना पीना पामे प्रकारावी नहीं.
३. आपत्तिकाळे पण धनं दपणु साग नहीं.
४.सोक, परलोकना मुगनां फलनी यांनाविनातप करयु.
५. शिक्षा पळी ने प्रपाणे यमायो वर्त, अने नवी शिक्षा
विवजयी गृहण करवी.
६. ममत्वनो त्याग कर.
७. गुण र कम्य
८. निलोभना गरी
१.परित समगन नाना.
पत्रिम योग..
१०. सरळ चित्त राखg.
११. आत्मसंचम शृद्ध पाळचो.
१२. समकित शृद्ध राखg.
१३. चिचनी एकाग्र समाधि राबवी.
१५. कपटरहित आचार पायो.
१५. विनय करवा योग्य पुरुषोनो पयायोग्य विन
य करवो.
१६. संतोपयी करीन तृपानी मर्यादा टुंकी करी नांखवी..
१७. वैराग्यभावनामां निमम रहे.
२८. मायारहित वq.
१९. शृद्ध करणीमा सावधान यवं.
२०. सम्बरने आदरखो अने पापने रोक्वां.
२१. पोवाना दोप सम्भावपूर्वक टाळवा.
२२. सर्व प्रकारना विषययी विरक्त रहेवं.
२३. पू गुणे पंचमहात्त विशृद पाटचां.
२४. उत्तर गणे पंचमदासपने विशुद्ध पायां.
२५. उत्साहपूर्वक कापोन्मर्ग करतो.
२६. प्रसादहित दान ध्यानमा प्रयत्न कर.
२७. हमेशां आन्नचास्त्रिमा मृल्ल उपयोगयी वत्तई.
२८. पान, निद्रिस्ना भय एकाप्रतापूर्वक करवं.
२९. मरणांत दासयी पग भय पानको नहीं.
३.सिपादिकना संगने त्लागतो.
२१.मापरिन विदि कारची.
१२५ पोतमाला-पुस्तक पीज.
१२. मरणकाले भारापना करवी.
ए अकेका योग अमूल्य है. सपना संग्रह करनार परिणा-
मे अनंत मुखने पामे छे.
शिक्षापाठ ७३ मोक्ष सुख.
था जगत् मंडळपर पण केटलीक एवी बस्नुभो भने
मनेष्णसी के जे केटलाक अंशे जाणता छतां कही श.
काती नयी. छता ए वस्तुभो कंह संपूर्ण शाषन के अनंत
भेदवाळी नयी. एवी पस्तुर्नु उपारे वर्णन न था के सारे
अनंत मुखमय मोक्ष सबंधीवो उपमा क्यापीन मळे । भगवा-
नने गौतमस्वामीए मोसना अनंत मुखपि मभ कयु सारे
भगवाने उत्तरमा क', गौतम! ए अनंतमुख हुंजा 0
पण से कदी शकाप एयी ही मागळ को उपमा नपी. जग.
स्मा प सम्बना दुल्प कोरपण घस्नु के सुप नपी, एम पदी
एक भील- प्रशांत नीना मावर्मा पाप्यं दद्ध.
पर जंगलमा एक भद्रिकमील तेना पारा सही
रोता तो. चार यारेनी समृदिनी उपाधि देने सेश मान
पण नहोई. एक दिवम कोइ राना अधीा माटे फरनी
फरतो सां नीकली भाग्यो; नेने बहु नृपा सागीली; पी
करीने मानरे पीस भाग पाणी माग्. भासे पाणी आ.
बीपज अळयी रामा मनोपायी. पोगाने भीम सरफी पडेमी
मनप अदाननी मन्परकार करपा मार मीलने सम्मान
मोस मुख.
१२५
साथे लीषो. नगरमा आन्या पछी तेणे भीलने तेनी जॉदगीमा
नहीं जोयेली वस्तुमा राख्यो. मुंदर महेलमा, कने अनेक
अनुचरो पनोहर उतरलंग, अने स्वादिष्ट भोजनधी मंदमंद
पवनमां, सुगंधी विलेपनमां ने आनंद आनंद करी आप्यो.
विविध जातिना हीरामाणेक, मौक्तिक, मणिरन अने रंग ये-
रंगी अमूल्य चीजो निरंतर वे भीलने जोवा माटे मोकल्पा
करे वागगीचामा फरवा हरवा मोकले. एम राजा तेने मुरत
आप्यां करतो हतो. कोइ रात्रे व मूह रहां हता, सारे ते
भीलने वाळवच्चा सांभरी आव्यां एटले ते त्यांयी केइ लामा
कर्षावगर एकारक नीकली पदो. जइने पोदानां कुटुंगने
पक्ष्यो. ते पांये माने पूछt के तुं क्या हतो! भीले कयं,
पा एखमा लां में बहु वसाणका लायक वस्तृभो जोइ.
मुटुंबीओ-पण ते केवी ! ते तो अपने कहे.
भील-मुं कई: ही एची पक्षे वस्तृम नयी.
कुटुंतीमो-एम होप के आनंखला, डीप, कोडां केव
मजानां पक्ष्यांलां कोइ एपी जोवालायक वस्तु नी !
भील-नहीं,भाइ,एवी पीज तो अहाँ एहे नयी.एना मोगरा
भारनी के इनारमा भागनी पन मनोहर चीन महीनपी.
मुटुंदीमो-लारे दोन बोल्पाविना गे रहे. वने म.
मना पाणे पापी पीसारु बने।
है गांदनः जम ए भील रामानुस भोगरी आयो
पनो नेपम जानतो हदो उतां उपमा पोन्प बन्नु नी म
पापा ने काजी तो नहोतो. देव मानप पोपने-
मोक्षमाळा-पुस्तक पीजु.
चिदानंर स्वरुपमय निर्षिकारी मोक्षनां मुखना अमंख्यानमा
भागने पण योग्य उपमेय नहीं मळवाथी तने कही शकतो नयी.
मोक्षना स्वरुपापे शंका करनारा तो कुतर्कवादी एओने
सणिक मुखसंबंधी विचार आहे सब मुखनो विचार पायी
भावे? कोइ आत्मिकतानहीन एम पण कहेछे के आधी कोरपि
दोष मुखर्नु साधन त्यां रथु नहि एदले अनंत अव्याराध मुस
फही देखें, आ एजें कथन विवेकी नथी. निद्रा प्रत्येक मानवीने
पिय सेपण नेमां ने भी कह नाणी के देसी समता नधी, अने
माणवामां आये तो मात्र स्वमोपाधि- मिथ्यापर्ण आवेनेनी
अमरपण पाय ए म्यमा वगरनी निद्रा नेपां सूक्ष्मस्यूळ सर्व
जाणी अने देखी शकाय; अने निरूपाधियी शनि संघ लइशा
पतो नेनु ने वर्णन / कर्ग शाके ! एने उपमा पण भी आप
आ तो स्यूठ ति पण यालविवेकी ए परथी का विचार
करी के ए माटे कयु से.
भीलनं दृष्टांत, ममनायवा म्पे भाषाभेद फेरफारपी तमने
कही बताव्य.
शिक्षापाट ७२ धर्मध्यान भाग १.
भगवान ना • यान यांभास, रोड़, धर्म
अने शुरल पोला । पान त्यागवा पाग्य. पाछळनाये
ध्यान मारपसायापले अमानना घट जागा माटे, वारा
विचारमा मन परा पाटे नियमवयननु नाच पाना माटे,
मायुपीए संना योग्य विधाता योग्य अने ग्राण करवा
4 धर्मध्यान भाग २ योन्य धर्मध्यानना मुरूप सोळ भेद छे. पहेला चार भेद कई उ.१ आणाविजये (आज्ञाविचय).२ आवायविजय (अपा- परिचय ). ३ विवागविजये (विपाकविचर ). सटाणविजय (संस्थानविवयं). १ आवाविषय. आज्ञा एटले सर्वज्ञ भगवाने धर्मतत्त्व संबंधी जे जे कांछे से ते सत्ल छ एमां शंका करवा जई नयी; पानी हीनताथी, उत्तम मानना विच्छेद जवाथी; बुद्धिनी मंदतायी के एंवा अन्य कोई कारणयी मारा समज- वामां ते तत्व आप नयी. परंतु अहत भगवते अंदा मात्र पण माया मुक्त के असल कर्यु नयीन, कारण एओ निरागी, त्यागी, अने निस्पृही हता. मृपा कद्देवानुं के कारण एमने रत नहीं. तेम एओ सर्वदर्शी होवायी अज्ञानयी पण मृपा कहे नहीं, ज्या अज्ञानज नयी, त्यां ए संबंधी मृपा पायी होय? एवं जेचिंतन करचुं ते 'मानाविच नामनो प्रथम भेद छ.२ अपापरिचय. राग, द्वेष, काम, कोध ए वयीन मीरने से दुःख उत्पन्न याय छ नेयीज नेने भवमा भन पडे हे. तेनुं ने चिपन काचं ने 'अपायविजय' नामे जो भेट डे. अपाय एटले दु. ३ विपार विच है या इव सहन करुं छभागिन 33. नाटक पा, छ, न मघळ ना फ.ना दर ३निवा ते धर्म ध्याननो त्रीनी कमविपाकचन मे . ४ मन्या. नविषय. अपलोकनुं बरूप कितई . बम निष्टि पने आहार है. जीव भी करीने पूर्ण भरपुर छ. असं ख्यात योजननी मांगनुकाटीए निन्छो लोक हे. ज्यां भसं- ,
मोक्षमाला-पुस्तक पी.
Rurmir-समुद्र. असंख्याता ज्योतिरिय, पाणपतरा
दिना नियाग . 'उरणाद, व्यय भने भुगताना पिता
पमा मागी पडी ७. भटीरीपमा नयाप तीर २०, यश
परमातोय. नेपोतमा केगळी भगवान भने निष
अनिसान विमरे, नेभाने "शामि, नमामि,महारेराम, गपा
मि, नाग, मगढ़, देवर्ष, चेहर्ग परगागामि " एप तमान
स्या कमी प्रायर, प्राकानी गुणग्रामकरीए. ने विशाल
पी प्रपात गो प्रति उद मो. मा भाम.
कारना सामाना निमाम ए. पठी इत् भागमारा प
मनामा प्रोग. न "दापि, पान पानुपापि"
TERI IIT मा लोक, स्मो wit
ला नमनाम भन न पनि बानादिक. पण
श्रीनाम प्यानका पारमाण मानायी भने
निसार नमामि छ, म निका
नए का भर
'मन नायना
44104 AM पपणानना भार
मंद मायाम
11
.
शिक्षापाट ५ घमंध्यान माग २.
मात्र मसानो . . #ATTA
धर्मध्यान भाग २. १९९ दिक पाने फरी श्रुत सहित चारित्र धर्म परवानी रुचि पामे तेने निसर्ग रवि की .. नत्र सचि. श्रुतमान, पने अनंद तत्वना भेदने माटे भाखलां भगवानना परिष-वचनोनुं जमा मुंपन पयुं ऐ, वे मंत्र कण करवा, मनन करना, अने भावपी पहन करवानी रवि उपजे ते नुत्र रचि.४ उपदेशच. अशाने करीन पामेला कमाने करीने सपालाए, लेमन दान करीने नवां चर्म न बांधीए. मियाले करीने पापा कर्म दे मभ्यम्भावी सपावीए, मम्पाभावी नवां कर्म न पीए. राज्य करीने उपायो कर्म ने बरामदे करीने साए भने गायबरे करीन पानवां कर्म न दांधीए. क.पाये करी जपा- यौ कम ने कपाय टाळीने मारीए, एपी नवां कम न पांथी. ए. अगम पोगे की मापी कर्म में राम दांग करी बा- दर, म बोगकरी नां कर्म न बांधीए. पांच दिपना मादकप बाय दरी पायो तेसंबरे की पारीए. नरस मरे र नांगर्स न वांधीए. ने माटे अहानादिक भायमान ने दानादिर. मंरमार्ग पान करबा मारे होकर भगदेवनी देश मनिपानी गरिसडे देने बादेश गरेकार.(पर्मपाननां पारा बापां. जपानमा पार भागन. १ वांदना २६. बना पानापा. वरना एरे नियमति निशान पापराने पटे ननिदांटना पना बार- नारपुर के महाराजपचनमारकर पंचनामानन. मा. दान पाया, रि. पर पानी पदपारराने सागरत मिगारगरे
मोक्षमाळा-पुस्तक बी.
मा तेमज भन्पना तापनी मध्यस्थ परीक्षाने पाटे यथायोग्य
विनय सहित गुर्वादिकने प्रश्न पूगए तेने पृजना काए.'
पगाना. पूर्व मिनमापिन प्राय जे भण्या होइए ते स्मरण
मा रहेवा माटे, निर्मरा ने अर्ये शुद्ध उपपोग सहित शुद मूषा.
थेनी वारंपार सम्झाय करीए तेन नाम परावर्शना रन..
घालावीतराग भगाने ने भागमणीत कां से भार
तेरा इन, ग्रहीने विशेष कारीने, निधय करीने, का, कंगा
अने विनिगिछारिता, गोतानी निनंगन भी समामध्ये हे
भाव नेपा प्रणीत कीप के नया मांभळनार, महनार पमें भग
यंतनी भाताना भागया पाय. ५ पर्यषालगन सहिए. ए
धर्मव्यानमां चार भालगन कवाया. धर्मगाननी नार अनुसा
कर छउ. । बालानशा.. भनिन्यानशा.२ अशरणानु
सा. ४ मंगागनुवा । गानो योध वार मावनाना पारमा
गया. नमन म्ममा
म.न.T
धन
शिक्षापाट धर्मध्यान भाग ३.
4. मुनापार पण
नाTHE MEAA7 पानागने पापा मुनि
नमाना निसाना,
7 HRA , - • ग, प्रान मंत्र अनु.
कापना UP 4 प्रगमनाग
प्रशमिमा म! +102 सिमा
माती प्रारी मार
- - १ धर्मध्यान भाग २. पाम्या; अथवा कया भेदभणी भावना राखी छे! ए. सोळ भेदमांनो गमे ते भेद हितकारी अने उपयोगी परंतु जेवाअनु- क्रमथी लेबो जोइए ते. अनुक्रमपी लेवायतो ते विशेष आत्म- लाभर्नु कारण थइ पडे. सूत्रसिद्धांतनां अध्ययनो केटलाक मुखपाठे करें डे; तेना अर्थ, तेमां कहेला. मूळतत्वो भणी जो तेओ लक्ष पहोंचाडे तो कइक सूक्ष्मभेद पामी शके. केळनां पत्रमा पत्रमा पानी जेम चमत्कृति छे तेम सूत्रार्यने माटे छे. ए उपर विचार करतां नि- मळ अने केवळ दयामय मार्गनो जे वीतरागमणीत तत्वबोध तेनुं बीज अंत:करणमां उगी नोकळशे. ते अनेक प्रकारनां शा- खावलोकनयी, प्रश्नोत्तरी, विचारथी अने सत्पुरुपना समाग- मपी पोपण पामीने वृद्धि यई वृक्षरुपे थशे. जे पछी निर्जरा अने आत्मप्रकाशरुप फळ आपश. श्रवण, मनन अने निदिध्यामनना प्रकागे वेदांतवादियोए बताच्या छे; पण जेवा आ धमध्यानना पृथक् पृथक् माळ भेद कमा छे तेवा नत्यपूर्वक भेद कोई स्थळे नयी. ए अपूर्व है. एमांधी शास्त्रने श्रवण करवाना. मनन करवानी, विनारवाना, अन्यने वोध करवानी, गंका कंवा टावना. अकया करवानो- एकत्व विचारवानी, अनित्यना विचारवाना. अगरणा विचा- स्वानो, चैराग्य पामवानी संमाग्नां अनंत दुश्न मनन करवानो, अने वीतराग भगवंतनी आतावडे करीने आखा लोकालोकना विचार करवानो अपूर्व उत्माद मुळे छे. भेदे भेदे करीने एना पाछा अनेक भाव ममजाच्या छे. .
मोसमाला-गुम्सक पी.
पना केदलाक भाव समननाथी ता, शानि, क्षमा,
दपा वैराग्य भने जाननो पर पर उदय पशे.
तमे कदापि ए मोळ भानुं पान करी गया सो तो पग
फरी फरी तनुं पुनरावन करमो.
शिक्षापाठ ७७ ज्ञान संबंधी वे बोल
भाग १.
और सर्नु नका नाणीए ने मान. मान सनी ना
मयं . हो गयापनि विनावाने से के ए माननी कर आर.
यस्ताछे! मो मायकता सेना ने प्रातिना का गायन ।
नो मापन छेनी में अनुदेशकाल भारछ? जो देश
कामादिक अनुहट तो क्या एभी अनुाळ?
सिरानमा मेदरला! माणगापना
पहीलामागान माग्न का क्या कप
कविराट ने माना पायर' पानी
परिमाप : बान
..ारी श्री बाबा
पार
fir या दरा, RAT प्रालि
बीमार मा uTRA पाग
पो marar TI AURATikanx मा
बारा : ५५ ; प्रा.
पनि काम 8 1 44 गार..
.
जानसंबंधी वे बोल भाग २. रनाथी निरंतर तापतो आत्मा मात्र स्वकर्मविपाकया पर्यटन करे. पर्यटननु कारण अनंन दुःखद नानावरणादि का ऐ बेटे करीने पाला स्ववाने पामी शकतो नपी; अने वि- पपादिक मोहदरनने सवरूप मानी रसो रे. ए मयां- परिणाम मात्र पर कार्य तेज दरे. अनंत दुम अनंत भावे परीने मोः गमे नेग्नं अमिष, गमे नेटलु पदायक अने गमे वेदलं गेंद्र उवां में दुःख अब्धी अनंनिवार सहन परयं पदयु; ते दुप मात्र मां ने अनानादिक कर्मयी माटे ए अदानादिक. टाळ्या माटे छाननी परिपूर्ण आवस्यकता छे. शिक्षापाठ ७८ ज्ञान संबंधी वे बोल भाग २. २ वडानमामिना मायनो विप का विचार कर्गद. अ. पून पतीनियो रिपूर्ण अन्नदान माद र नयी ए पाटे पाने पाहिपुन जे देर ने भावहान माध्य करी रे. एसो देश ने रानटे. प्राम: सर . पाना दाना भनेर मामा कानमा अमन वां पामना नी ! जनता भार्ग नाम- पुन भावहाननेपामा ने भीना परिजनन सनी ने माने मुदिनीप. अतिरिना मना नवी. मार नभी दोजी अदा पर! अनेसाई नी मां मानातिनानी का माननादानी साप मटर
मोक्षमा-नानी
नामानी मानि भने नेनी अक्षा पण गायन.प.
माया र भूमे के कवर गमाय भूमिमा नामी शो
पारी मानगिनो! मा गर्न सर्म मार्गम
पण गाना. नवनी अदा ना भने धपा मारे
निमी भयो. गं करीने में मिमालिने
मायालो जम्मपण भामधान प्रामिनी हानि कान.
कारण यस्त भेदए भनि पहागले. मी Tig
गाण की मन नपान गयमाना धारक
पण प्रारमशान . पगारे मा. पण कर
७. पगया मान करपा माराने मागमाली या भग
मदाण पर पूणानुनी मादा उगम सानी
पतिय मापन य.
१ श्री मान मानने अनदेशक श्रीना
पंदनी माग. पातमा पार कर्म
नाम inा अनु. निकम
ने भरा प्रा . या14141; 4. मदन witx
5.41 1 17ITTी
भामा 17 mita
गर्म पानी
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पyria fastram mari, REATurt
rarREartmet witory
मानसंबंधी वे बोल भाग १.
गयां, वाकी साडा अटार हजार वर्ष रह्या एटले पंचमकाळनी
पूर्णता नुवी काळनी अनुकता छे. देशकाळ वे लेइने परिपूर्ण
अनुकूल छे.
शिक्षापाठ७९ज्ञान संबंधी वे बोल भाग३.
हवे विशेप विचार करीए.
१ आवश्यक्ता शी छे ? ए महद् विचारनु आवर्चन पुनः
विशेषतायी करीए. मुख्य अवश्य स्वस्वरुपस्थितिनी श्रेणिए
चढवु ए . अनंत दुःसनो नाश, दुःखना नारायी आत्मान
पिक मुख ए हेनु डे केमके नुख निरंतर आत्माने भियन
उ, पण जे स्वस्वरुपिक मुख हे ते. देशकाळ भावने लेइने
श्रद्धा, ज्ञान इ० उत्पन्न करवानी आवश्यकता अने सम्बम् भाव
सहित उच्चगति, सांयी महानिदेहमां मानवदेहे जन्म, त्यां सम्यम्
रावनी पुनः उन्नति; तत्वज्ञाननी विशुद्धता अने वृद्धिा ठेवटे
परिपूर्ण आत्मसाधन ज्ञान अने तेनुं सत्य परिणाम केवळ सर्व
दुःखनो अभाव एटले असंड, अनुपम अनंत शाश्वत पवित्र
मोक्षनी माप्ति ए सयां माटे जाननी आवश्यकताछे !
२. ज्ञानना भेद फेटला छे अनो विचार फहुँ छर. एजा-
नना भेद अनंत डे. पण सामान्य द्रष्टि समजी शके एटला
माटे सर्वज्ञ भगवाने मुख्य पांच भेद कया छे ते जेम छे
तेम कहुँ उ. प्रथम मति हिताय श्रुन, तृतीय अवय, चतुर्य
मनःपर्यच अने पांच, संपूर्ण स्वरूप केवळ. एना पाडा प्रतिभेद
के तेनी बची अनीद्रिय स्वरुपे अनंत भगवान के.
मोक्षमाळा-पुस्तक यीनु. ३. शं जाणवारुप छ । एनो इवे विचार करीए. वस्तुर्नु स्वरुप जाणवू सेनुं नाम ज्यारे जान; सारे वस्तुओं तो अनंत छे एने कयि पंक्तियी जाणवी ? सर्वज्ञ यया पठी सर्व- दाशतायी ते मत्पुरुष, ते अनंत वस्तुनुं स्वरुप सर्व भेद करीने माणे छे अने देखे छे; परंतु तेओ ए मर्वज्ञ श्रेणिने पाम्या ते काय काय वस्तुने जाणवाथी ? अनंत श्रेणियो ज्यामुधी जाणी नयी त्यांमुधी कयि वस्तुने जाणना जाणना ते अनंत वस्तु भोने अनंत रुपे जाणीए ? ए शंकाने समाधान इवे करोए ? जे अनं- तरस्तुओ मानी ने अनंत भंगे करीने छे. परंतु मुख्य वस्तुत्व स्वरुपे तेनी चे श्रेणिओ छे. जीव अने अनीव. विशेष वस्तुल स्वरुपे नवतत्व किंवा पदव्यनी गो बाणवा रुप यह पढे छे. जे पंक्तिए चढतां चढना सर्व भावे जगाइ लोकालोक स्वरुप इस्तामलकरत् जाणी देखी शकाय छे. एटला पाटे थइने जाण. वारुप पदार्य ने जीव अने अजीवछे ए जाणा रूप मुख्य घे विभो करलाइ. शिक्षापाठ ८० ज्ञान संबंधी वे वोल भाग ४. ४ पना उर मंद मंक्षेपमां कई छ. ए चैतन्य लसणे एक रुप छ. देहमा अने व्य या अनंतानु अनन.देहम्पको तेना इंद्रियादिक जाणवा पडे नेनी गति, विगनि इत्यादिक जानका रूप; ननी संमग ऋदि नागवा रूप तपन अगाव चान संबंधो देवोल भाग ४. जीव, तेना ही पली पुद्गल आकाशादिक विचित्र भाव काळचा इ. जागवा खछे. जीवाजीव जाणवानी प्रकारांवरे सर्वच दीए नव श्रेणि रुप नवतत्व कमांछे. अजीव, पाप, आश्रत, संबर, निरा, वंध, मोक्ष. एमांनां फेटलांक ग्राहम, पेटलांक जाणवारूप फेटनांक स्पागवा रूप. सपो ए वत्तो जाणता रुप तो छेज. ५ जाणवानांसाधन. सामान्य विचारमा ए साधनो जो के जाण्यां छे, तोपण विशेष कंइक जाणीए. भगवाननी आज्ञा अने तेनुं शृद्ध स्वरुप ययातय जागवं. स्वयं कोइकज जाणे छे. नहीं वो नियजानी गुरु जणाची श. निरागी झाता सर्वोत्तम छे. एटला मारे श्रद्धा वीज रोपनार के तेने पोपनार गुरु ए सा- घन रूप से ए सापनादिकने माटे संसारनी निवृत्ति एटले गम, दम ब्रह्मचर्यादिक अन्य सायनो डे. ए सापनो माप्त करवानी वाट कहीए वो पण चाले. ६ ए ज्ञाननो उपयोग के परिणामनां उत्तरनो आमय उपर आधी गपो छ पन काभेदे कंद फवान है. बने ते एटलंग के दिवसमां बडीनो सत पण नियमित राखीने जिधर भगवान्नां कहेला नववोधनी पर्यटना करो. बीव- रागना एक सिद्धांतिक शवपरथी ज्ञाना दरानो हु सचाप- शम यो एम ई विवकी हुं 5 मोपमाळा-पुस्तक पीडे. शिक्षापाठ ८१ पंचमकाळ. काळचक्रना विचारो अवश्य करीने जाणवा योग्य छ. जिनेश्वरे ए काळचक्रना वे मुख्य भेद कया छ उत्सापिणी २ अवसर्पिणी. अकेका भेदना छ छ आरा छे. आधुनिक वर्तन करी रहेलो आरो पंचमकाळ कहेवाय छे अने ते अवतपिणी फाळनो पांचमो आरो छे, अर्पिणी एटले उतरतो काळ उतरला काळना पांचमा आरामा केयु वर्तन आ भरतक्षेत्रे थर्बु जोइए तेने माटे मत्पुरुषोए केटलाफ विचारो जणाव्या है ते अवश्य जाणवा जेवा छे. एओ पंचमकार्नु सरुप मुख्य आ भावो कहे छे. नि- यमवचनपरयी मनुष्योनी श्रदा भीम थती जमो. धर्मना मूळच. लोमा मतमनार वधशे. पाखंडी अने प्रपंची मतोर्नु मंडन पशे. जनसमूहनी रुचि अधर्म भणी पळशे. सत्यदया हळवे हळवे पराभव पामशे. मोहादिक दोपोनी वृद्धि यती जश. दंभी अने पापिष्ट गुरुभो पूज्यरूप थशे. दुष्प्रवृत्तिनां मनुष्यो पोताना पं. दा फावी जशे. मीठा पण धर्तवक्ता पवित्र मनाशे शुद ब्रह्मचर्यादिक शीलयुक्त पुरुषो मलिन कदेवाशे. आत्मिकमानना भेदोहणाना नशे; हेतु वगरनी क्रिया वती नशे. अज्ञान- क्रिया यहुपा सेराशे व्यारळ करे एया विषयोनां मायनो वता मो. एकांतिक पक्षो सत्तावित यो श्रृंगारथी धर्म मनाशे. सरा क्षत्रियोरिना भूमि शोकग्रस्न थशे. निर्माल्य राजवंशी. यो वैश्याना दिलासा मोह पामगे, धर्म, कन, अन तरी राम- पंचमकाल. नीति भूली नसे; अन्यायने जन्म आप. जेम ल्याशे तेम म. जाने दो. पोते पापिष्ट आचरणो सेवी प्रजा आगळ ते पळावता जो. राजबीनने नामे शून्यता आवती जसे. नीच मंत्रियोनी महत्ता प्रती जो. एयो दीनमजाने चुतीने भंडार भरवानो राजाने उपदेश आपशे. शीय भंग करवानो धर्म रा- जाने अंगीकार करावशे. शौर्यादिक सद्गुगोनो नाश करावे. मृगयादिक पापमां अंध वनावशे. राज्याधिकारीओ पोवाना अधिकारी हजारगुनी अहंपदत्ता रासने. विमो लालचु अने लोभी यइ जो. सहिद्याने दाटी देवोः संसारी साघनोने धर्म ठराव. वैश्यो मायावि, केवळ स्वार्थि अने कठोर हृदयना य. वा जमे. समग्र मनुप्यानी सत्तियो घटती जो. अहव अने भयंकर हलो करतां वेओनी चचि अटको नहीं. विवेक, विनय, सरळवा इ० सद्गगो घटवा जो. अनुकंपाने नामे ही- नता यो. मावा करतां पनिमां प्रेम वघरे पिता करतां पुत्रमा प्रेम वर; पातिवृत्त्य नियम पूर्वक पाळनारी मुंदरीओ घटी लो. स्नानयी पवित्रता गणाश; धनयी उत्तमकुळ गणावे. गु- रुथी शिप्यो अवदा चालो. भूमिनो रस घरी जो. संक्षेपमा कहवानो भावार्थ के उत्तम वस्तुनी क्षीणता के अने कनिष्ट व- स्तुनो उदय छे. पंचमकानुं सल आमांनु प्रत्यक्ष वरन पर केटलं वधू करें! मनुप्य सद्धर्मतत्वमां परिपूर्ण श्रद्धावान नहीं यइ सके संपूर्ण तंचनान नहीं पामी शके जंबुखानीना निर्वाण पछी श निर्वाणी वस्तु भा भरतक्षेत्रयी व्यवछेद गर.
१९.
मोसमाळा-पुस्तक पी .
पंचमकार्नु आउँ स्वरुप गाणीने दिवशी पुरुषो तश्पने.
गं करशे; काळानुमार धनश्रद्धा पामीने उगगति सापी
परिणाम मोपा गायशे. निग्रंपायन, निग्रंथ गुरु १० धर्माप
पामामा सानो छे. एनी भाराधनायी कर्मगी विराथना .
शिक्षापाठ ८२ तत्त्वाववोध. भाग १.
दा वैकटिक मूत्रमा कथन छ के जेणे भीगगीना
मार नयी भागाने पर मंयमा गिर कम रही शाश!
ए वपनामा तापम छ के नम आत्मा, अनारमानt R.
कान नाग, पनागरानी परिपूर्ण अवश्य छे.
भान्मा अनान्मार्नु गल्प माप निगानगीगमाप्तया
रामेछ.भनेर अन्य मनापाए यताचा विश विषारी दर्गाच्या,
पग ने यमा नया. मा मात्र भागागी र करेला पिन
माहित ना करेला मुख्य नानपने विजयुधिया नेप
करे, नेपाल प्रात्मबाने आगी.
म्यादवादीमी प्रश्प, धनं अनंत मायला पाला
से परीने परिगं तो ग भने दाम मानी
नापमान वानापानमा भाग TTMI पापा
सपनं पा प्रापन . प न मिटा मार
प्रादानी पनि माग ने मार
पाय. ना मोहाणे
मग माती भार. मागीदनाम
.
वत्तापयोष माग २, नमाणे ओ तयमान संधी द्रष्टि पहोंचाहे छ; अने भावानु- सार तेयोना आत्मानी उसळता याय है. ते वडे तेयो यात्माननो निर्भक रस अनुभवे . जेर्नु नवान इचय अने मूक्ष्म छे, तेमन नुशीलयुक्त जे वतहानने से छे ते पुरुष सहभागी हे. ए नवसनां नाम आगना मिक्षापाउमा हुँ नही गयो उ एन विशेष सत्र प्रहात भाचार्यांना महान् धोयी अश्य मेळा: कारण सिद्धांतमा जेजे कडे, ते ते विशेष भेदयी सपजवा माटे महापभूत प्रज्ञावंर आनायविरचित ग्रंथो . ए गुल्गम्यत्र पण उ. नर, निर्भपा अने माणभेद नव- वत्वनां ज्ञानमा अवश्यनां ; अने देनी पयार्य समजण ए माताए यापीहे. शिक्षापाठ ८३ तत्त्वावबोध भाग २. सर्वच भगवाने लोकालोकना संपूर्ण भाव जाग्या अने जोया तेनो उपदेश भव्य लोकोने को. भगवाने अनंत ज्ञान- चंटे करीने लोकालोकना स्वल्पविना अनंन भेद जाण्या हता; परंतु मामान्य मानवियाने उपदेश्यी पिए चना मुख्य देखावा नव पदार्य योए दाव्या. एयी लोकालोकना सर्व भावनो एमा समावेश यड़ जाय डे. नियनपचननी जे ने मूल्म बोध , ते तलनी द्रष्टिर नशाकमा समाइ जाय मज सपना धर्ममनोना सूक्ष्म विचार ए नवतत्वविद्वानना एक देशमा आवी जाय छे. आत्मानी जे अनंत शक्तिपोकाइ
मोसमामा-पुस्तकत्री.
सो भने प्रकाशित करया अति भगवाननी पपिन पीपर
भनन शाक्तियो सार प्रफलित पर शके के उपारे नवरारि.
जानम पारागार ज्ञानी थाय.
यमद्वादशांगी जान पण ए नरस वा मानने सा.
पार. भिन्न भिन्न प्रकारे ए नरानससका माननो पोध करे
एपी भानिक मानमा योग के नवतरजेणे अमर
भाव मनाया गम भने गांदची यो
ए नामा विपद ने भागा योग्य रेय, देप भने 7.
पादय पटले त्याग करा योग्य, नागा योग्य भने प्राग
पता योग्य पम प्रगनात मायामामा.
पन्न - बागायनने जाणाने कर! नंगाम
नज ननो मामा ना!
उना:- नया Art गायान
यासी
- या प्राग na .
। यान माग पूरा
4. पण
मना नहाय. १६42 AM पारा
HTTrail
प्राय In Tamati
बामगार... प्रामा
प्रा. गरम प्रा. si
दवार नाम . १९३ शिक्षापाठ ८४ तत्ताव बोध भाग ३. नववतुं जाने नसलो मगन्तवाची भाग, स- नन अने निर्वासन जडान , दे सलो महा मान बन बन्दवाइन पार से पुलोने पारो दिन भारत पनप नामसनेसबुझानुवार प- पार्थ जात्रा महावीर मदन मासनमा बहुमानांवर पडी नपा ये हैं दुल्न कारण दत्तमान मनायी जात वर्ग कर . मात्र जिपानवार राता मा में परिनाम रहेगोवर.बोसोना दोन भावेली चिनी - स्ति समाज बने सामनेटकडनी मलाई मात्र नवनीने नवनापरवात से.मना अन- छे, एनपी ई बार नावने पटनले ३ हबार पुरुषों का मांड माला से पन्न बने विचारपूर्वक के अंगदान देवे गी मनीर देना पुलो पर नहीं व्यारे आतदिन यिति सहान मची पहन लन सदर की पहा . ६ चौरियन के "सोशले एकमा दे" हा पुरुषांना माना निका वा भारती नयी. एकमत विकास मंत्री नलेनिने मारी किमान के विवश बने कान्यतया बन विद्धिमान न म देशना विकासाच पोजिनमानां
मोगमामा-पुस्ता पी.
वपनामृगा भनुम भाननी पगादि मम्मो मुनिसमाचार
पारामा गरम पर पहशे. मान भने किवा गुदा
मगरानो ६५ गो परिणाो भागा या यो.
शिक्षापाठ ८५ तत्त्वावबोध भाग ४.
में अपना नानोपण गातानी
मेकर ने भाग ना. गागा पीयर मात करा.
Pा .. गामा प्रायम गुणगानी गाने
समस की भाममान 311211 पापी; भो गनिमा.
किन परामय
न. 12. मामाक Train
में न ना हानी पोरीन
, न न न 14t Frim
नायक नगरीमा RT.
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प्रमा
RAI 41 प्रास
गा: '. 30 11 पण
1441 4.7 प्रधान
THER 14141; MAIT,
तयाचवीष भाग ५. बानंद, समर्थ तत्वज्ञाननी स्फूरणा, उत्तम विनोद अने गंभिर 'चळकाट दिग् करी दइ शृद्ध सम्यक् शाननो ते विचारो बहु उदय करेले. स्वाद्वादवचनामृनना अनंत मुंदर आशय समजवानी श- कि ा काळमां आ क्षेत्रयी विच्छेद गपेली छत्तां ते परत्वे ने ने मुंदर आशयो ममजाय छे ते ते आशयो अति अति गंभिर तत्वथी भरेला छे. पुनःपुन: ते आशयो मनन करायतो चार्वाक- मनिना चंचळ मनुप्यने पण सध्धर्ममां स्थिर करी दे तेवा . संक्षेपमा सर्व प्रकारनी सिद्धि, पवित्रता, महाशील निर्मळ उटा अने गभिर विचार, स्वच्छ वैराग्यनी भेट ए तत्व: जानवी मळे छे. शिक्षापाठ ८६ तत्त्वाववोध. भाग ५. एकवार एक ममर्थ विद्वानमाये निग्रंथप्रवचननी चमत्कृनि संधी वानचित थ; नेना मधमा ने विद्वाने जणाय्यू के आ- दले हुँ मान्य राखे छः के पदाचीर ए एक समर्थ तत्वानी पुरुष हना; एमणे जे चोध कर्यों डे, ते शीली लइ मसात पु. रुपाए अंग उपांगनी योजना करीना ने विचारो ने घमनि भरेला पनि एउपरथी लोकालोक्ने ज्ञान एमां युके एम नदीन गई. एम उनां जो नम का ए मंबंधी प्रमाण आपना हो तो ई ए वाननी का अदा लावी ई. पना उपरां में एम का के. जैन वचनामृनने यथार्य नो - पग चिप भेटे वर्गन पण जाणनो नधी; पण ने मामान्य भारे माई एयी पण प्रमाण मापी गई मरी. पी नर.
मोशमाळा. पुस्तक यो .
सत्ताविमान संधी याचिन नीकली. में कई एका भागी ए.
दिनं मान भावी जाय छ; परंतु या समजवानी शकि
ओए. पछी नेभीए ए कगनने प्रमाण मांग, त्यारे आठ कर्म
में को बताया ननो साथै एम गूचयं के एशिवाय पनाती
मित्र मार दी ग ना कर्म गोषी भापी पानी भने
गुम्पनी मानियो कहीने कई भा शिवाय एक पण धार पर
इनगांधी भागो. एम कता अनुक्रमे घात लीधी. ममम जीवना
पेर कही पूड एमा र न्यूनाधिक कडेगा मांगोगी अनार
दयना मंद कहील. कारिगना करोछाएम नारा.
पंधी वातचित या त्यार ते भार थोडीयार किार करने कहा
भानो महावीरनी करानी असुन नमानि के भीरनी एक
ना भेद मटतो नपी ने पापपुण्यादिकनी एक निति
पानी नयी; अनं नवk कम पण पनपी. भाव स.
पानी मिदांतो ना छ मा मानो.पा भाषी
पश्नि नपान टटेक भी पानी भोई.
शिक्षापाठ ८५ तत्त्वावयोध. भाग ६.
पनामा श्रामगीनी मात्र मार
नया विभाग माना ८ माला
न; मनायी गय का
Sitatti प्रोग
राय 4 mins रामायमा प्रा
तत्त्वावरोध भाग ६. २९७ तमे कयु के केटलेक अंशे सृष्टिनुं तत्त्ववान एमां आवी सके खरं; परंतु ए मिश्रवचन 2. अमारी समजाववानी अल्पजतायी एम बने खरे; परंतु एयी ए तत्वोमा का अपूर्णता छे एमनो नयीज. आ कर पक्षपाती कथन नथी. विचार करी आखी सहिमांयी ए शिवायर्नुएक दशमुं तच शोधतांकोइ काळे ते मळनार नयी. ए संबंधी प्रसंगोपात आपणे ज्यारे वातचित अने मध्यस चर्चा थाय सारे निःशंकता थाप. उत्तरमा तेओए कहा के आ उपरंथी मने एम तो निकता हे के जैन अद्भुत दर्शन रे. श्रेणिपूर्वक तमे मने केटलाक नव- तचना भाग कही बताव्या एथी हुँ एम वेधडक कही दाईं छ के. महावीर गुप्तभेदने पामेला पुरुप हता. एम सहनमाज वान करीने "उपनेवा,""विघनेवा" "धवेवा,"ए लन्धिवाक्य मने तेथोए कर. ते कही बनाया पछी तेभोए एम जपाप्युं के आ शोना सामान्य अर्थमां तो कई चमत्कृति देवानी नपी उपज, नाश य अने अचळना, एमए प्रण दादोना अर्थ ऐ.. परंतु श्रीमन् गणरोए नो.एम दर्शित वयु के ए वचनो गुरमुग्धी श्रवण करनां भागबना भाविक निप्पोने द्वादनांगीनें भागमरिन डान रद! ए माटे में एक विचारो पहाना- रीजोपा एतां पने नो एम नान्कए वनवू असंभदिन में, कारण अति अनि मध्य मानेन्ट मिदांतिर धान एमां पयांपी समाप! ए संबंधी समे सब पहोंचा कसो! --
१४८ मोक्षमाळा-गुम्नक बी.
शिक्षापाठ ८८ तत्त्वावबोध भाग७.
उपरम में कहा के प्राकाळमा प्रण महाशन मारतगी
विसं नेम ना कह सर्वन के महामायत नया l
मा भेट गामान्य मा पहोंगे तेदार पहनारी का समान
करीसकीय पम मने मंभव छ. त्यार नेमणे कई गो सेम
मंपा पो शेय तो परिषदी मीपर "ना" में "" .
गारे उनसे. ते एम के भी उत्पनिम्प ! तो के ना.
भीर विनतामा नोनाभीर धरना से? नो
के ना. पाम . यपन उतारो मने बानी वागत नीfr.
निका! नो के रा. भीर विनाmo! त.
भीर घानाकर ! ना कहा. भाम उता. भारिपारी
थापा पदरी एकत्र करी यांच्या छे. ए ओ पपाय करान.
काय नी अनेक प्रशानी दाण पा) के. विनाको गए
वायुयादा लोग नरा, पपीका. मी निविता
अने ना ना ना it प्रमाणीमिद का
बानी २. विना मनातान परागभाग श्री
का. नीर बटनामा ए भमर
५ नागो मारो माग
का मन !! नागप
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virunimilar
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तत्त्वावबोध भाग. ना अनेमस्तानी ना कही पछी त्रणेनी हा कही एना वळी पाडा ए दोप. एटले सर्वाळे चौद दोप. केवळ ध्रुवता जतां तीर्धक- रनां वचन त्रुटी जाय ए पंदरमो दोप. उत्सचिभुवता लेतां क- निनिधि पाय जेपी सर्व वचन त्रुटी जाय ए सोमो दोप. उत्पतिविघ्नतातो पापपुण्यादिकनो अभाव एटले धर्माधर्म सपलं गयु ए सत्तरमो दोप. उत्पति विघ्नता अने सामान्य स्थितिथी (केवळ अचळ नही ) त्रिगुणात्मक माया सिद थायडे ए अ. दारमो दोप. शिक्षापाठ ८९ तत्वाववोध भाग ८. एटा दोष र कयनो सिद्ध न यतां आवे रे. एक जन- निए मने अने पारा मित्रदलने एम कार के अनममभंगी नप अपूर्व, भने एथी म पदार्थ सिद् याय ऐ. नानि, अस्तिना एमां भगम्यभेद रहा . आ कथन मांभही अमे क्या घेर आप्पा पछी योजना करना करना भानमिवारपनी जीवपर योजना बनी.९ पार उनी नास्ति अन्तिना समभाव जीवापर नही जरी रे.. लबिवावलोपन पनेर पार. मोपन एणीदारी विमारनीहिनदी. मानों इदरमा अने कई के आरे में नामि भने अम्मि मर जीवर बनावा पाों ने माननीय नयी पर अपने एसपी मोनिक सा नाय नेम पाया. दीनो पचा नागनार नदी,मंदादिमागमाई
मोक्षमाळा-पुस्तक वीर्जु.
छ. नास्ति अस्ति नय पण आप ययार्य शैली पूर्वक उतार्यों
नयी. एटले हुँ तर्कथी जे उत्तर दइ शकुंते आप सांभरे.
उत्पत्तिय "ना" पवी जे योजना करी छे ते एम यथार्थ
पर शके के “जीच अनादि अनंत रहे."
विघ्नतामा "ना" एवी जे योजना करी छे ते पार्ष
यह शके के "एनो कोइ काळे नाश नथी."
ध्रुवतामा "ना" एवी जे योजना करी छे ते एम यथार्य
पर शक के" एक देहमा ते सदैवने माटे रहेनार नथी."
शिक्षापाठ ९० तत्वावबोध भाग ९.
उत्पत्तिा "हा" एवी जे योजना करी छे ते एम पयार्य
पदमाके के "जीवनो मोक्ष यया सुधी एक देहमांधीच्यवन पामो
वीना देहमा उपने छे."
मित्रताप "" एवी जे योजना करी छे ते
एम
यथार्थ
यह शक के "ते जे देहमांधी आव्यो त्यांची विन पाम्पो वा क्षण
क्षण प्रति पनी आत्मिक झद्धि विषयादिक मरणवढे धार
रही छे, ए रुपे विनता योनी काय छे."
धुचनामा "हा" एवी जे योजना कही छे ते एम यथार्थ
पर सके के "द्रव्ये करी जौर कोई काळे नास रुप नयी, त्रिका-
सिद हैं."
हवे एयी कर्णने पटले प अपेक्षाओ लक्षमा राखतां
योनेला दोर पण पाछ के दली अशे.
तत्वावार भाग ९
१ जीव विनरुपे नयी माटे ध्रुवता सिद्ध यइ. ए पहेलो
दोप टब्यो.
२ उत्तत्ति, विनता अने श्वता ए भिन्न भिन्न न्याये सिद्ध
यह एटले जीरनु सत्यत्व सिद्ध ययुं ए वीजो दोपगयो.
३ नौवनां मत्यस्वरूपे ध्रुवता सिद्ध यह एटले विनता गइ.
एत्रीजो दोप गयो.
४ द्रव्य भावे जीवनी उत्पत्ति प्रसिद्ध यह ए चोयो दोप
नयो.
५ अनादि जीव सिद्ध ययो एटले उत्सत्ति संबंधीनो
पांचमो दोप गयो.
६ उत्तत्ति अमियइ एटले कर्चा संबंधीनो छडो दोप गयो.
७ भुक्ता साये विनता लेवां अवाय ययुं एटले चार्वाक
मिश्रवचननो सातमो दोप गयो.
८ उत्पत्ति अने विनवा प्रयक् प्रथक् देहे सिद्ध यइ पाटे
केवळ चाचिसिद्धांत ए नामनो आउनो दोष गयो.
१४ अंकानो परसरनो विरोधाभास जवां चौदधीना
दोप गया.
१५ अनादि अनंतता सिद् यतां स्थानादवचन मत्य ययु
एपंदरमो दोप गयो.
१६ का नयी ए सिद्ध थनां जिनवचननी सत्यता रही
ए मोमो दोप गयो.
१७ धर्माधर्म, देहादिक पुनरावर्चन सिद् यतां सचरमो
दोष गपो.
मोक्षमाला-पुस्तकबी.
१८ ए सर्व वान सिद्ध यतां त्रिगुणात्मक माया असिद्ध
यह ए अवारमो दोष गयो.
शिक्षापाठ ९१ तत्त्वावबोध भाग१०
आपनी योगेली योजना हुँ पाएं छउं के आपी समाधान
पामी हो. मा कर यथार्थ शैली उतारी नथी, सोषण एयाँ
का पण विनोद मळी शके तेम छे. ए उपर विशेष विवेचनने
माटे बोहोलो बखत माइए एटले वधारे कहेनो नयी; पण एक
पे की बात आपने कहेवानी 2 ते जो आ समाधान ये ग्य
थयु होय तो कई. पछी तेओ तरफथी मनमानतो उत्सर मल्यो,
भने एक चे वात ने कद्देवानी होय ते सहर्ष कहां एमओए क.
पछी में मारी बात समावन की लनिधी कधू. आप
ए लब्धि संबंधी शंका करो के एने केशरूप कहो तोप बनना
ने अन्याय मळे छ. एमां भनि अनि उस्मळ भात्मिक शक्ति
गुरुगम्यता भने राम्य नए छोए. ज्या मुली तेय नयी, या
मुधी लधि विष शंका रहे परी; पण घाछ के आवेळा
ए संबंधी कोलावे वाल निरर्थक नहीं नाय. ने ए के मेमा
पोजना नाप्ति अग्निपा यानी जोर, नेप एमां पण या मूक्ष्म
विचार करवाना ई. दर दही मथक प्रथम उम्पत्ति, य.
घन, विश्राम, गभागान, पर्याम, इटिय,पत्ता,मान, मंशा मा-
पुस्प विषय १० भनेक कमरान प्रत्येक भेदे लेनाने विचारो
एलरिया नीटन; 3 मुवी मक्ष पहाचे त्यां
दरवावदोष भाग ११.
भी मपळा विचार करे रे. परंतु द्रव्यायिक भावायिक नये भा-
खी सनिदान ए प्रण गहामा रघुडे, ननो विचार कोइज करे
ऐने सद्गुरु अपनी पवित्र धिरूपे ज्यारे आवे सारे दादांनी
मान शा माटे न पाप ! जगत् एम कदेतांन मनुप्प एक घ.
र, एक वाम, एक गाम, एक सहेर, एक देश, एक संड एक
धिन ए सपल की दइ अमंग्यान द्वीप ममुद्रादिधी
भरपूर वस्तु केम ममनी जाय रे ! ए→ कारण मात्र एटलंन
के ते एजभनी पहोचताने समग्घुकिंवा एनं लक्ष एवी अ.
हक परोळताए पहों से अपी नगद एस कवां एवडो
मोटो मर्म नमनी के. नेमन कनु अने माळ मात्र थियो
निय गुरपी ए प्रदानी गम्यता लइ दादांगी जान
पापना ना. भावीरीने ने सरि अन्नदाता विवरजाता
पोरनी.
शिक्षापाठ ९२ तन्वाबोध भाग ११.
एम नरामवीर मध्य रचना त्रिपाद
अनादि से. पाक सीने सायो रहो, नेते पम्प
मामानामभेद विना ने पनी निदोपदा
पिएरे आसारे निपरो किसी
मा. सनी नाको प्रमादि दो देर
स.मा पनि नेपाल
विद.
सकारागीर
नपी जाप ट .....ली
अस.
"
मोसमाळा-पुस्तक बी. आ पछी केटलीक वातचित्त यइ. प्रसंगोपात प तीव. पारवार्नु वचन लइने सहर्ष अमांरं त्याची उबुं थयु. तत्वाववोधना संबंधमो आ कथन कहेवायु. अनंतमेदयी भरेला ए तत्व विचारो काळभेदधी जेटला ज्ञेय याय तेटला जाणा; ग्राम थाय तेटला ग्रहवा; अने त्याग्य देखाय तेरला “त्सागवा. ए तत्वोने जे यथार्थ जाणे ते अनंत चतुष्टपियों विराज- मान थाय छे ए सत्य समन ए नवततना क्रमवार नाम मूकवामा पण अरघुसूचवन जीवने मोहनी निकटतार्नु जणायजे शिक्षापाठ ९३ तत्वावबोध भाग १२. एनो तमारा लामा छे के नीव अजीन ए अनुस्मयी छे. पटे मोस नाम आवे छे. हवे ते एक पछी एक मूकी जाए तो भीर अने मोसने अनुक्रमे आचंत रहे पडशे. जीव. अनीव. पुण्य. पाप. आश्रव. संबर. निरा. बंध. मोल.
नचा भाग. बाग कहवायु.के एनाम वामां जीव अने मोड़ने निक- रवा हे..उवा निकटता नों न यापन जीर भने अजीरने निकाला यह सन्नुतःएम नथी.अज्ञानवडे तोएबजनिकटता रती पण ज्ञानवडे जोर अने मोशने निकटता रहीछे जमको - पुग्य मनीव DI नाव नरवचनामचन. skills. गोश - . - हो जुनी ए पन्नेने रंड निकटता आली छे! हा कहेली निकता आवी गा छे. पन र निरुवा नौद्रम्परूप से. पारे भावनिकटता आने सारे सर्व तिदियाय.एद्रव्य निकटका सा- धन सत्तरमालात, सद्गुरुवात अने मर्मतत्व ओली सदै- हर छे. भावनिकटता एरले केवळ एकन रूप या मान, दर्शन, अने चारित्र साधना के. ए चरी एवी पण आशंका यापपारें चन्द्र निस्ट लारे, वाकीनां लागलं! इतरमां कईवन जो मई लागी राजा होतो त्यानी घो. पटले नायरो. नीतों हेपा हेप, आदेपनो दोष लो. एक बालनिदि पार यरे.
२५६
मोक्षमाळा-पुस्तक वी.
शिक्षापाठ ९४ तत्वावबोध भाग १३.
ने जे कद्देवायुंडे ने ते केइ केवळ नैनकुळयी जन्म पा.
पेला पुरुषने माटे नथी, परंतु सर्वने पाटेछे. तेम आ पण नि:-
शंक मानजो के जे कर कदेवाय छ ते अपक्षपाते भने परमार्थ
दियी कद्देवाय छे.
तमने जे धर्मनत्व कहेवार्नु छ, ने पक्षपान के साथ दिपी
कद्देवानुं अपने कंइ प्रयोजन नथी; पक्षपात के स्वार्थधी तमने
अधतिल बोधी अमे अयोगतिने शामाटे मारियेारंवार तमने
निग्रंथनां वचनामृनो माटे कवायछे, नेतुं कारण ने वचनामृतो
सतमा परिपूर्ण छ, त छ. मिनेश्वरीने प्य के उपण कारण न.
होतुं के ते निमिने नेो मृपा के पक्षपानी योध; नेप एमओ
अजानी नहना, के एपी मपा पोधाइ जवाय. आशंका करशो
के प अज्ञानी नहोना । गा उप.यी जणाय ! नो नेना उत्त
गमा एओना पवित्र मिद्धांताना दम्यन मनन करवाने का ये
छिए.भने एम जे करशे ते नी पुनःआशका लेश पण नहीकरे.
जैनमनपार्नकोमनि अपार का राग दि नथी, के पपाटे पक्षपाते
भमेकापण तमने कहिय, नेपन अन्यमत प्रबनकांवनि अपारेर
चम्युदिनोंक मिध्या पनु बटनकाय बन्नमा अमेना मदमतिम.
पस्यरुपए.बहुबहमनन अन प्रयास पनि भ्य महीनी
त्यांमुधीना विचारथी अंम विनयी कहाकिम 142रुपों!
मैन नेई एक पूर्ण अने पवित्र दशन न , मग जेवी पर
तरवावर भाग १४. देव नयी, तरीने अनंत दुःखयी पार पाम होय तो ए सर्वश दर्शनरुप कल्पक्षने सेवो. , शिक्षापाठ ९५ तत्वावबोध भाग १४. जैन ए एटली वधी सूक्ष्म विचारसंकळनायी भरेल दर्शन उ के एमा प्रवेश करतां पण बहु वसत जोइए. उपर उपरथी के कोइ पनिपक्षीना कद्देवायी अमुक वस्तु संवैधी अभिप्राय बांधवो के आपको ए विवेकीनुं कर्तव्य नयी. एक ननाव संपूर्ण भयु होय, तेनुं जल उपरथी ममान लागे , पण जेम जेम आगळ चालीर छीए नेमतेम वधारे वधारे संडापर्यु आवत जाय के उना उपरतो जल मपाटन रहे छै; तेम जगाना स- घना धर्ममतो एक तगार रूप में, वेने उपरथी सामान्य सपाटी जोड़ने सरखा कही देवा ए उचित नयी. एम कहेनारा तलने पामेला पण नथी. जैनना अफेका पवित्र मिदातपर विचार करतां आयुष्य पूर्ण याय, तो पण पार पमाय नहीं तम रहे. पाकीना सपना धमनोना विचार जिनमणीत वचनामृनसिंधु भागळ एक विदुरुप पण नयी.जैनमत जेणे जाग्यो, भने सेन्यो ते केवळ निरागी अने सर्व पइ जाय ऐ. एना प्रवर्तको केवा पवित्र पुरुषो हना : एना सिद्धांतो केवा अखंड संपूर्ण अने दयामय एमां दाग इन नाहिक व निदोंप तो मात्र जेन छ : एवं एक पापक विषय नबी के जैना नहीं हाय अने पत्रु एई र नयी के जनमा नथी; एक विषपने अननभेदे परिपूर्ण कदनार ने जनद सन . प्रयोजन
मोक्षमाळा-पुस्तक पी .
भूतनत एना जेवू क्याय नथी. एक देहमा वे आत्मा नी
तेम आखी सृष्टिमा चे जैन एटले जननी तूल्य चीजें दर्शन नयोः
आम कहेवा, कारण शृं? नो मात्र तेनी परिपूर्णता, निरागी:-
ता, ससता अने जगद् हितपिता.
शिक्षापाठ ९६ तत्वावबोध भाग १५...
पायपूर्वक आटलं अमारे पण मान्य राय जोइएके ज्यारे
एकदर्शनने परिपूर्ण कही चान मिद करवी होय सारे प्रविप.
सनी मध्यम्य पुद्धिथी अपूर्णता दर्शवत्री जोइए. पण एके
यातपर विरेचन करवा जेटली अही अग्यो नयी तो पण यो
थो कहता आव्या छिए. मुख्यत्वे कहेवानुं के ए बात,
जेने रुचिकर थती नहोय के असंभावित लागती होय
सेणे जैनबवितानी शायो अने अन्य तत्वविनानी शाम्रो
मध्यम्य बुदिधी मनन करी न्यायने काटे तोलन करई..ए उ.
परथी अवश्य पटलं महावाक्य नकळशे, के ने आगद नगारा:
पर डांडी ठोकीने कवायुं हनुं ने सरुं छे.
जगन् गाडरियो प्रवाह छे. धर्मना मतभेद संधीना शिक्षा
पाठमा दाव्या प्रमाणे अनेक धर्ममननी जाल लागी
छ. विशुद्ध प्रान्मा कोरकन थाप छ. विवेकया तलने को.
कन बारे में परलं जैन नबने अन्यदर्शनियो माटे.
जागता नयी ५ गंद के भाशंका करवा नेन नयी..
मनो एने । प्राय गंगे के केवळ पद परमारम:
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मोसमाला-पुस्तक वीर्जु.
विचार करवानी प्रेरणा नथी. पण जो ए उपरथी एम
विचारयामा भावे के त्यारे जैन जगन्ने अनादि अनंत कहे छ
से कया न्यायधी कहेछ ? जगकर्ता नथी एम कहेवामा मर्नु
निमित्त | छे? एम एक पछी एक भेदरूप विचारथी तेभो -
ननी पवित्रतापर भावी सके. जगत् रचानी परमेश्वरने अवश्य
भी हनी ? रच्युं तो मुख दुःख भूकवार्नु कारण शृं हतं रचीने
मोत का मादे मूत्यु ! ए लीला कोने यनावी हती! रच्यु तो
कयां कर्मथी रच्यु? ने पहेलो रनत्रानी इच्छा का नहोनी ! .
पर कोण ? जगन्ना पदार्थ कोण ! अने इच्छा कोण! रघु
तो जगन्मां एका धनुं प्रवर्मन रामधुर भाम भ्रमनाया
नाम्यवानी अवश्य थी हनी! कदापि पम पानी के ए रि.
चारानी भूल यइ ! गेक्षमा क.गए! पण एवं दोट दहापण
क्यांधी गम्युं के एनेन यी उपेइनार एका महावीर नेवापु.
रूपाने जन्म आप्यो? एवानां कईला दर्शनने जगतमा विद्यमानना
का आपी ! पोताना पगपर हाथे करीने कुहाडो माग्यानी एनेY
अवश्य हनी ! एक ना जाणे एका विशा, अने बाकी वी.
जा प्रकारे ए विचार के जननान प्रवर्तकाने पनाथा कर देर
हलो ! जगाना होन नो एप कानी पीना लामने
कंड हानि पहोंचती ती! जगनानी नथी, नगनु अनादि
अन; पम करवा पपन कर पाना पटी नती ती!
पारा अना विचागविना जगाउ पावशे के नगनु न
नेमन ने पांव पाए पपानमा कासार्नु
मा... - दम्माम: नाना या नगर
तत्वावोध भाग १७. पीत करीछे, एक रजकणयी करीने आखा जगन्ना विचारो जेणे सर्व भेदे कमाछे तेवा पुरुषोनां पवित्र दर्शनने नास्तिक क- इनारा कपि गतिने पामशे ए विचारतां दया आवे रे ! -- शिक्षापाठ ९८ तत्वाववोध भाग १७. ने न्यायधी जय मेळवी शकनो नयी; ते पठी गाळो भाटे छ तेप पवित्र जना अखंड तत्वमिद्धांतो शंकराचार्य, दयानंद मंन्यासी वगरे ज्यारे तोडी न क्या त्यारे पछी जैन नास्तिक है, सो चार्वाकमेंसे उत्पन्न हुआ है एम कडेवा मांदयु. पण ए स्थळे कोइ प्रश्न करे, के महाराज ! ए विवेचन नमे पछी करो. एवा शब्दो कटेवामा कंद ववत विवेक के जान जोर्नु नयी; पण आ- नो उत्तर आमो के जैनवेदयी कपि वस्तुमा उतरतो छ; एन सान, एनो वोय; एन रहस्य; अने एर्नु सत्सील के डे ते एकवार कहो! आपना वेद विचारो कपी वारतमा जैनथी चढे से! आम ज्यारे मर्मस्थानपर भावे त्यारे मौनता शीवाय तेश्रो पासे दाजु साधन रह नहीं. जेमत्पुरुषोनां वचनामृत अने पोगवन्धी आ सधिमां मयदया,नत्वमान अने महागील उदय पामेछे. ते पुरुषो करना में पृरुपी गंगाग्मां गच्या परदा रे, मामान्य नचदानने पण नथा जाप ना. जो प्राचार पण पूर्ण नी. नेने वदना हवा.-पा- ना न्यायका भने मन्य- स्वरुपनः प्राण नापा बोनस रकम पाना न ना- कि.वा. ए पपन्न 2 या पनी होमनानावन को पार : त्या से .
मोक्षमाला-पुस्ता पा. मरा है गग छे त्यो सत्य तरच नथी. ए यान भाषणेशा माटे न बिगारखी! एक मुष्प पात तपने कई के जे ममवाहिननी भने पायनी छ. ते ए ले के गर्भ से दर्शनने तमे मानो; गमे तोर. की तमारी टिमा भावे तेप जैन ने कहो, सर्प दर्शनना शाय- नपने भो नेप जैननाने पण जुभी. स्वतंत्र भास्मिानिए में पाप लागे ने अंगीकार करो. मा के पीना गमे तेनुं भले एकदम नमे पान्य न करी पण ताने विचाग! . शिक्षापाठ ९९ ममाजनी अगत्य. प्रोग्रामिणी मंमारमधी भनेर कला कौशल्यमा गा. पीरिय पाम्या ! प विचार करना आपणने नया जगार के ने घाना र उम्मा प्रने र उम्मामा अनेकन . नु, कल्पना माही कापपा ए अनेक गुणांनी 3थी याममा , मपाले परिणाम | पzf? नो मापी पय भावन के मामी, काम भने अधिकार ए पपन .. गग साथी पनातिना कामगो कोवानी प्रोग कानी नयी; पातु मानने कोई गममा प्रमा या पानी पर गाना hi पंचममा, रामना. PAR Air पदासानी अंक "147ET-CEER सपा RITER.
मनोनिग्रहनां विन्तः लापलं तत्व प्रसिद्धियां आगवा ज्यां मृधी प्रयोजन नयी, त्यां: सुधी शासननी उन्नति पण नयी. लक्ष्मी जी अने अधिकार संमारी कलाकौशल्पपी पके डे, परंतु आ घर्पकमाकोशल्पपी वो सर्व सिदि सांपडदो. महान समाजना अंर्गत समाज स्थापना..बादामा केसी रहेवा करतां मतमतांतर ती एम क- रई उचित . हुं इच्छंछ के ते हनी सिाद यइ जनांवर्ग- ज मतभेद टोः मत्स वस्तु उपर पनुमंडलनुं स ावो. बने ममत जाओ! शिक्षापाठ १०० मनोनिग्रहनां विघ्नः वारंवार जे बोध करवामां आव्यो छे तमांची मुख्य तात्पर्य नीकरे हे ते एके आत्माने तारो अने तारवा पाटे तत्व- द्वाननो मकाम करो तया सत्शीलने मेवो. ९ माप्त करवा ने से मार्ग दर्शव्या ते ते मार्ग मनोनिद्रहनाने आधीन झे. मनो- निप्रदता यश लानी बहोडवा की जरूरनी छे. ए दहो- बामां पिनप नीना दोपहे. १ माम. ११ यवन्तृयी आनंद. २ अनिपानिय. १२ रसनावलम्पदा. ३ विमेष आहार. २३ भविमोग. ४ उन्माद हदि. १४ पाई अनिश राई ५ मापामांव. १५ नापविनानु राम् ६ अनि पनि काम १६ साइनो नह. . अशापापविनाम. " चौपाधडे नई.
८ मान.
साध्य न करवो.
२६४ मोक्षमाळा-पुस्तक बीमुं.
१८ एके उसम नियर
९ मर्यादाउपरांतकाय.
१० आपवडाइ.
ज्या मुधी आ अष्टादश विनयी मननो संघाडे, यां सुची
अष्टादश पापस्थानक क्षय याना नी. आ अष्टादव दोष
भवाथी मनोनिग्रहना अने धारेली सिद्धि यह शके ऐ. ५ दोष
ज्यांमुधी मनधी निकटता धरावेछे त्यो सुधी कोरपण मनुष्य
आत्मसार्थक करवानो नथी. अति भोगने स्थळे सामान्य भोग
नहीं, पण केवळभोग सागवृत्त जेणे पर्युडे, तेमज ए एके दोपर्नु
मूळ जेनां हृदयमा नयी ते मापुरुष महभागी छे.
शिक्षापाठ १०१ स्मृतिमा राखवायोग्य
महावाक्यो.
१ एक पेदे नियम एज आ जगवनो प्रवर्तक छे.
२ जे मनुष्य सन्पुम्पोनो चरित्ररहस्यने पामेछे ते मनुष्य
परमेश्वर थाय छे.
१ चंचळ चित्त एज सर्व विषम दुःखनु मुळियुं छे.
४ साझानो मेळाप अने थोडा साये ति समागम ए
पमे समान दुःखदायक छे.
५ समस्वभारिनुं मळयूं एने ज्ञानीभो एकांत कहेछ.
६ इंद्रियो तमने जीते अने सुख मानो ते करतां तेने समे
जीतवामांन मुख, आनंद अने परपपद प्राप्त करशो.
७ रागविना संसार नयी अने संमारविना राग नपी.
स्मृतिमा राखवायोन्य महावाक्यो.
८ युवावयनो सर्व संग परित्याग परमपदने आपेडे.
९ ते वस्तुना विचारमा पहोंचो के जे वस्त्र अतींद्रिय
स्वरूप-से.
१० गुणीना गुणमां अनुरक्त याओ.
शिक्षापाठ १०२ विविध प्रश्नो भाग १.
आज तमने ई केटलांक प्रश्नो नियमवचनानुसार घर
आपवा माटे पूई छ. कहो धर्मनी अगल सी छे!
E-अनादि काची आत्लानी नाम टाब्वा माटे.
म-जीव पहेलो के कर्म!
3-वले अनादि छेन. जीव पेहेलो होय तो ए विम
बन्ने म दगवान इ निमित्त जाइए. कर्म पहेला कहो
वो जीव चिना कर्म का कोगे? ए न्याययी बन्ने अनादिरेज,
म-जीव रुपी के अस्ती?
3-रूपी पण बरो; अने असी पग सरो.
म-रूपी रूपा न्यापयी अने अरुपी कया न्यायची ते कहो!
ह-दो निमित्त रुपी अने स्वस्व अरुपी.
म-देह निमिच यापी डे!
-सर्मना विपासपी.
प्र-कर्मनी पुख्य प्रतियो केटल्ली में
८-आउ.
म-कपि पि!
E-दानावरणी, दर्शनावाजी, वेदनांप, मोहनीप, नाल,
मोक्षमाला-पुस्तक बीजु.. गोप, मायुष्य अने अंतराय. म-ए आठे कर्मनी सामान्य समन कहो?' उ-जानापरणी, एटले आत्मानी शान संधीनी में अनंतशनि छेतेने भाच्छादन था जयं ते. दर्शनावरणी एटले. आत्मानी में अनंत दर्शनातिले तेने आच्छादन या जई ने. घेदनीय एट देहनिपिने शाना अशाता मारना बदनीय कर्म एयी अव्यापाप मुग्पाप मान्मानी शक्ति रोजाइ रहेकी ते. मोहनीय कर्म एटले आत्मनारित्र कप शक्ति रोकार रांची ते. नामक एटले अनिरुप दिव्य शक्ति रोकाइ रवी ते.गायक- में पटले अटल अवगाहनारूप आमिकशक्ति रोकाइ रहेगी ते. मायुकर्म पटले अभय म्यिनि गुण रोकाइ रहगो ते. अंतराप कर्म एटले अनंत दान,लाभ,गीय,मागोपभोग शक्ति रोकारही ते. शिक्षापाठ १०३ विविध प्रश्नो भाग २ - माँ दरवायी मान्मा यां जाय ? द-मनन अने पावन मोसमां -मा प्रामानी मां कोयार पयो! २.मग 3- पला प्रामा मिति . पी पुनम पने पी. २-केटीमा पाग' १-बार पतराती मनासय करने पर विविध प्रश्नो. १६७ पाहो में पुष त्रयोदछ गुगल्यानका विहार करछे ते. म-गुणन्यानक केटलां? 3-बाद मनां नाम कहो। .-१ मिथ्यात्वगुगल्यानक. १ मास्वादनमृगस्यानक. मिश्गुनन्यानक. ५ प्रविनिमयावष्टि गुगम्यानक ५ देगविनिमशानरू. ६ अमनमंयत्तगृगस्थानक. बम- नंयनरागस्यानक. ८ अपूर्वकरणगुगल्यानक. ९ यनिति- वादग्गुनम्मानक. १० मूल्यमंरायगुगल्यानक. १. उप- यांनमोहगुनन्यानक. १२माणमोहगुगस्यानक. १३मपोगी. फे गुगम्यानक. १४ अयोगी कवी गल्यानक. शिक्षापाठ १०४ विविध प्रश्नो भाग ३. म-केवी अंने नर्थिकर बननां फरा! चन्द्री अंने नाकर कि ममान छे, परंतु पिकरे पूर्व नविकर नामक मान्यूछे; नयी विशेषमा चार गुण भने अनेक अनियमई. दन गन सा माटे संदा पाप रे! ए :- बाय न दवा पाटनभाने ཙམ ། – Yབ :༌ ༈ པོ न
मोक्षमाला-पुस्तक पोई.
प्र.-महावीर पोला जैनदर्शन ।
मते कोणे उत्सम कयु हतु ।
प-ते पहेलाना नार्थ करोर.
भ-भीना अने महावीरना उपदेशमा कर भिमनापरीके।
.-नाको एक छे. भिन्न भिन्न पात्रने माने उपदेश
होताधी भने कडक काळभेद होवाधी सामान्य मनुप्पने मित्रता
लागे पती, परंतु न्यायथी जोता ए मिमता नषी.
म-एप्रोनो मुख्य उपदेश ?
भान्याने नागेभान्मानी अननशक्तिपोनो प्रकाश
करी; एने कमलप बनन दायी मुन करो ए.
-- माटे ने भार कया माधनोदशीच्या छ।
7-महानया मय, मध्यम, भने सदान कर
जागा; मोरना गुणग्राम करया; विविध धर्म भाघखो भने
निग्रंथ गुनधी धर्मनी मध्यना पाम ते.
म-विविध धमका'
3-म्यगाना,
पनप अने सम्यकपरिमार
शिक्षापाट ०५विविध प्रश्नो भाग ४.
या गटान गार पाना . सारे मई मारमा
मा नापने का मानना नभी!
-कनी मान्यतापी, मध्यावत्रा नाम दरियागी,
मो मम्ममागपना प्रभारी.
विधि मसी भाग. म-जैनना मुनियोना मुर आचारर ! 7-पांच मार, दारिधि पतिधर्म. ममादमाधिमं. पर, दारिधि वचारल, नवनिषि प्रामवर्य दादा माना नप, जोशदिवा चार प्रकार कपापनो निद्रा. विपानी, दर्शन चारित्रनुं भाराधन लादिक अनेर भेद. म-जनमानचोना पांगमन्यामियोनांचयाम के बने संदिपनी पांच माशील. पटते. ए आधारमा नो बनायो अनेभन्यागियो नेवन चौरजनिती नरसा मग म.मनी: 1-अंना पाम अने पंचना. अपू. नाद पना मनिशा अनमा अनि नमले. परा देना ने. साने मारे दांत भार जोहए: T-नदेनीक, सानिया नादिर अमाप पारदशिरि गानां पानी प्रम- नो नेपाt.T. भरना.. नारीशमी ने पत्रका दिन गोरोपन. शिक्षापाट विविध प्रश्नो भाग
मोक्षमाळा-पुस्तक यी .
असल पतिपती गणायछे, सेम जैनदर्शनयी वेदनों संबंध के.
म.-ए मां सत्यरुप तमे कोने को?
उ.-पवित्र जैनदर्शनने.
वेददर्शनियो वेदने कहेछ तेनुं केम ?
उ.-एतो मतभेद अने जैनना निरस्कार माटेछेपरंतु न्या.
यपूर्वक यन्भेना मूळतत्वो आप जोइ नमो.
म-आटल नो मने लागेछे के महातीरादिकजिनेश्वरनु कथन
न्यायना कांटापर छे; परंतु जगत्कीनी तेओ ना कहछे, अने
जगत् अनादि अनंनछे एम कहेछ ते विष कंद कंड़ का पापले के
आ असंख्यात द्वीपसमुद्रयुक्त जगन् वगर यनाव्ये त्यांची हाया
उ-मापने ज्यांमुधी आत्मानी अनंत शक्तिनीलेश पण दि.
ध्य प्रसादी मळी नयी त्यांमुधी एम लागे छे; परंतु तत्ताने एम
नहीं लागे. "मम्मनित"आदिग्रंथनो आप अनुभव करो एटले
एका नीकली जरो.
-परंतु ममर्थ विद्वाना पोतानी मायानने पण दृष्टांतादि-
की सिद्धांतिक करीद एयी ए पीगर नहीं, पण सत्य
कम कवाय !
-पण पाने कइ मृपा कपार्नु प्रपोजन नहोर्नु, भने .
कमर एम मानाये, के एम मारणने शंका या के ए रुयन मृपा
हो? तो पनी जगकर्ताए एवा पुरुषने जन्मपण का आयो
नामोटर पुग्ने जन्म पापा , प्रयोजन हर्नु ! तेम वीए
पुपरमो वंदना; जगाता भिद होत तो एम कवायी
माननि नरोनी
जिनपरनी वानी. शिक्षापाठ १०७ जिनेश्वरनी वाणी. अनंत अनंत भाव भेदयी भरली भली, अनंत अनंत नय निसारवानी, माल जगत हितारिणी हारिलो मी, बागिनी ममापि मोडारिणी मसाजी जाना जापानी ने कहा सस्ती दे वर्ष, आपापानिजमीन सपनी. भो: दाल, नरी पानता ए. शिपानी समीजी ने जानी. शिक्षापाठ १०८ पूर्णमालिका मंगल- नेवाः मोतीने मनपा
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