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Hansh Rajnidhanam
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भूमिका इन सब गुणोंके होते हुये इस ग्रन्थमें हंसराजार्थवोधिनी टीका भाषामें ऐसी हुई है कि मानो अमृतकुंड जो अति कठिन स्थल है उसके लानेके लिये रेलगाडी वनगई ।। प्रथम तो यह ग्रन्थ केवल संस्कृत जाननेवालोंहीके लिये फल- दायक था अब भाषा जाननेवाले वैद्यलोगभी उसी प्रकार अपना अर्थ प्राप्त करसक्तेहैं। प्रथम इस अपूर्व अत्युत्तम ग्रन्थको हमने छपायाथा पश्चात् हमारी इच्छानुसार लखनऊमें मुंशीनवलकिशोरजीने छापा था अब इस ग्रंथ ( हंसराजनिदान) के सर्व प्रकारके छापनेका हक व रजि- स्टरीका हक खेमराज श्रीकृष्णदास श्रीवेंकटेश्वर छापाखाना वम्बई को दे दिया है इसलिये सूचित करताहूं कि अवसे कोई महाशय व उक्त महाशय इस ग्रंथके छापनेकी आशा न करें लाभकी कांक्षामें व्यर्थ व्यय न कर बैठे। पण्डित दत्तराम चौवे मथुरा . पुस्तक मिलनेका ठिकाना-- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर छापाखाना-बम्बई.
हंसराजनिदानकी अनुक्रमणिका विषय. विषय. " .... " " " 1 . १ पित्तकफचरके रक्षण २ / अन्य ग्रन्थान्तरसे तेरह सन्नि- पाताके नाम | तेरह सन्निपातोंकी मर्यादा तेरहसीलपातोंमें साध्यासाध्यल० ३] सन्धिकसन्निपात अन्तक सन्निपात चित्तविनम रुग्दाह | सीतांग तन्द्रिक " ... " " " .... ... .... .... .... " .... ... .... .... " " ... .... .... 'मंगलाचरण पूर्वाचार्योको प्रणाम अनेक आचार्योके वाक्यसे ग्रन्थका कथन 'त्रिविधिरोगपरीक्षा... देश बल कालआदिकी परीक्षानन्तर औपध नाडीपरीक्षा बातनाडीलक्षण पित्तनाडीलक्षण कफनाडीलक्षण 'द्विदोपकोप नाटीके लक्षण सन्निपातकी नाडीके लक्षण तत्काल मृत्युवालेकी नाडीकाज्ञान ज्वरवान् पुरुपकी नाडीका लक्षण रक्ताधिक्य नाडीकाज्ञान क्षुधित सुखिततृप्सकीनाटीकाल. काम क्रोध लोभ मोह भय चिन्ता श्रम मन्दाग्निमें नाडीके लक्षण वातकोपकारक वस्तु पित्तकोपकारक वस्तु कफकोपकारक वस्तु ज्वरकी उत्पत्ति स्वरकी संप्राप्ति ज्वरके पूर्वरूप ४ कठकुरज ... ... १० ... " " " .... " १२ " " .... १२ .... .... " - ... कर्णक भुग्ननेत्र रक्तष्टीवी प्रलापक जिह्वक आभिन्यास "त्रिदोप ज्वरको साधारण मर्यादा ५ | हारिद्रक सन्निपातके लक्षण "अजीर्णज्वर लक्षण.... आमज्वरलक्षण रक्तन्धरलक्षण दृष्टिचर लक्षण ६ भूतञ्चर लक्षण मलचर लक्षण ६ खेदज्वर लक्षण शापञ्चर लक्षण १२ .... .... वातज्वरके लक्षण.... पित्तवरके लक्षण... ... ... " ... ... कफन्चरके लक्षण. वातपित्तज्वरके लक्षण चातकफञ्चरके लक्षण । .... .... ७ ... ...
.... .... .... " . " २१ २२ २३ ... .... .... " २६ .... २५ .... हंसराजानिदानम् । विषय. पृष्ट. विषय. औपधजनितम्वर लक्षण शुक्रगतचरके लक्षण भयचर लक्षण धातुपाकीचरके लक्षण क्रोधवरलक्षण तथाच शवयातश्वरके लक्षण १४ ज्वरके दशोपद्रव अभिचारचरक लक्षण "अन्तर्वेगवहिबंगके लक्षण असाध्य लक्षण कामवर लक्षण स्त्रीसंगज्वरके लक्षण "चरमुक्तके टक्षण .... चरका तरणता कथन क्षीणधातुजनित तथा मन्दाग्निचर "आठञ्चरोंके नाम लक्षण सन्ततचरक लक्षण १५ वरकाबीभन्स स्वरूप विषमज्वरके लक्षण " त्रिशिरावरका लक्षण महेन्द्रवरके लक्षण "कपिलब्बरका लक्षण वेलावरके लक्षण "भस्मविक्षेपकका लक्षण एकान्तरज्वरक लक्षण १६ त्रिपादज्वरका लक्षण त्र्याहिकज्वरके लक्षण "महोदरज्वरका लक्षण चातुर्थिकपाक्षिक मासिक वार्षिक बरके (पिंगाक्षज्वरका लक्षण लक्षण "चलद्विग्रहबरका लक्षण देवकोपजनितचरके लक्षण.. इति ज्वररोगनिदानम् एकांगज्वरके लक्षण अतीसारः गन्ध तथा स्पर्शचरके लक्षण चातातीसारके लक्षण अंतकञ्चरके लक्षण १७ | पित्तातीसारके लक्षण शोकञ्चरके लक्षण कफातीसारके लक्षण रसगतचरके लक्षण सन्निपातके अतीसारकेल. त्यागतवातवरके टक्षण रक्तातीसारके लक्षण स्वागतपित्तन्वरके लक्षण १८ आमातीसारके रक्षण स्वग्गतकावरके लक्षण अतीसारकं असाव्य लक्षण रक्तगतञ्चरके लक्षण अतीसार रोगको उत्पत्ति मांसगतज्वरके लक्षण अतीसाम पथ्य मेदगतज्वरके लक्षण संग्रहणी अस्थिगतज्वरके लक्षण १९ वातसंग्रहणी निदान मजागतभरके लक्षण ..... पित्तसंग्रहणी लक्षण " " .... 1 .... .... १ " .... " " २७ " .... " " .... " .... .... .... .
अनुक्रमणिका। विषय.. विषय. पृष्ठ. " .... .... .... .... " " .... कफसंग्रहणीके लक्षण त्रिदीपसंग्रहणीके रक्षण सन्निपातकी संग्रहणीके लक्षण संग्रहणी रोगकी संप्राप्ति ग्रहणी रोगमें पध्य.... अर्शनिदान बवासीरके लक्षण वातकी बवासीरके लक्षण पित्तकी वासीरके रक्षण कफकी बवासीरके लक्षण सन्निपातकी बवासीरके लक्षण बातकी बवासीरमें पथ्य पित्तकी बवासीरमें पथ्य कफकी बवासीरमे पथ्य भगन्दर भगन्दर रोगके लक्षण वातके भगन्दरके लक्षण पित्तजीनत भगन्दरके लक्षण सन्निपातजनित भगन्दरके लक्षण अजीर्णरोगकी उत्पत्ति सम विपम तीक्ष्ण मन्दाग्निका वर्णन . वाताजीर्णके लक्षण पित्ताजीर्णके रक्षण कफाजीर्णके लक्षण अलस विलंविकाके लक्षण.... विचिकाके लक्षण कृमिरोग कृमिरोग निदान कृमिरोगको उत्पत्ति कृमिरोमें पथ्य पाण्डुरोग पांडुरोग उत्पत्ति ३०. चातक पीलियाके लक्षण "पित्तके पीलियाके लक्षण करके पीलियाके लक्षण सन्निपातके पाण्डुरोगके लक्षण पांडुरोगके असाध्य लक्षण पांडुरोमें पथ्य ३१ हलीमककामला कुंभकामला पानकी रोग ३२ लक्षण "कामलाके लक्षण कुंभकामलाके लक्षण हलीमक रोगके लक्षण ३३ |पानकी रोगके लक्षण रक्तापित्त रक्तपित्त रोगको उत्पत्ति रक्तपित्तके लक्षण वातपित्त कफके रक्तपित्तके ३४ लक्षण | साध्यासाच्य विचार रक्तपित्तरामें पथ्य राजयक्ष्मा ३५ क्षयरोगकी उत्पत्ति क्षयीरोगनिदान वातकी क्षयीके लक्षण ३६ पित्तकी क्षयीके लक्षण " कफकी क्षयीक लक्षण असाध्य क्षयीके लक्षण ३७ कासरोग " खांसी रोगको उत्पत्ति "खांसीके लक्षण ४ " ४२ .... .... " " 0 .14 " 4... . .... ... .... ....
विपय. पृष्ठ. | .... " हंसराजनिदानम् । विषय. छर्दि ४६ छर्दिरोगको संख्या और उत्पत्ति , वातको हार्दिक लक्षण ., पित्तकी छर्दिक लक्षण, ,कफको अर्दके लक्षण सन्निपातको छर्दिके लक्षण.... ४७ छर्दि रोगके उपद्रव.... , छर्दि रोगमें साध्य असाध्य लक्षण " ": .... .... ... .... - " .... " " वातकी खांसीके लक्षण पित्तकी खांसीके लक्षण फफकी खांसीके लक्षण त्रिदोपकी खांसीके लक्षण असाध्य खांसीके लक्षण .... हिका हिचकी रोगकी उत्पत्ति .... चालकको हिचकीके गुण तरुण पुरुषकी हिचकीके लक्षण वृद्धपुरुपकी हिचकीके लक्षण पांचहिचानकेनाम और लक्षण श्वास श्वासरोगके लक्षण.... त्रिविधश्वासके लक्षण स्वाभाविक श्वासके लक्षण अतिश्वासके लक्षण महाश्वासके लक्षण.... स्वरभेद स्वरभेदकी उत्पत्ति.... वातके स्वरभेदके लक्षण पित्तके स्वरभेदके लक्षण कफके स्वरभेदक लक्षण , असाप्प स्वरभेदके लक्षण अरुचि अरुचि रोगकी उत्पत्ति वातकी अरुचिके लक्षण पित्तकी अगचिके लक्षण कफको अरचिके लक्षण यातकी असचिमें पध्य . and पित्तको अरुचि पध्य फफकी अरुचिमें पध्य .... । .... " तृष्णा तृष्णा रोगको संख्या और उत्पत्ति . | वातकी तृष्णाके लक्षण पित्तकी तृष्णाके लक्षण कफकी तृष्णाके लक्षण त्रिदोपजनित तृष्णाके लक्षण तृपारोगमें साध्य असाध्य विचार तृषारोगमें पथ्य मूर्छा २० मूर्छरोगकी उत्पत्ति .... मू रोगकी संख्या और लक्षण वातकी मू के लक्षण पित्तको मू के लक्षण ५१ काकी मू के लक्षण ..... ' सन्निपातको मू के लक्षण रुधिरकी मू के लक्षण मयको मू के लक्षण विषकी मू के लक्षण प्लमरोगके लक्षण दाह दाह रोगके लक्षण.... "धातुक्षीण दाहके लक्षण " .... .... " .... .... .... " " ... . :- " .... .... .... .... " अनुक्रमणिका । विषय, विषम. पृष्ट. +... " " " ६९ .... .... " .... " ७१ " .... " .... .... .... " " ७२ मदात्यय मदात्यय गेगके लक्षण अयुक्ति मद्यपानके दूपण युक्तिसे मद्यपानके गुण प्रथम मद्यपानके गुण द्वितीय मद्यपानके अवगुण.... तृतीय मद्यपानके अवगुण चतुर्थ मद्यपानके अवगुण पित्त मदात्ययके लक्षण कंफ मदात्ययके लक्षण वातमदात्ययके लक्षण त्रिदोष मदात्ययके लक्षण मद्यपानोत्थ अजीर्णके लक्षण मद्यपानोत्थ भ्रमके लक्षण उन्माद उन्माद रोगके लक्षण उन्माद रोगका हेतु चात उन्मादके लक्षण पित्तउन्मादक लक्षण फफ उन्मादके लक्षण सन्निपातउन्मादक लक्षण औरभी कारणउन्मादक लक्षण भूतोन्मादकेलक्षण दैत्यसे पैदा उन्मादकैलक्षण गन्धर्व लगाहो उसके लक्षण यक्षमस्तके लक्षण महासर्पमस्तके लक्षण पित्रीश्वरप्रस्तनरके लक्षण राक्षसप्रस्तनरके लक्षण प्रेतग्रस्तके लक्षण देव आदिकोंके प्रवेशका लक्षण अपस्मार ६० | वातको मृगीरोगके लक्षण | पित्तको मृगीरोगके लक्षण कफकी मृगीक लक्षण ६१ | सन्निपातकी मृगीकै लक्षण .... वातव्याधि वातव्याधि रोगके लक्षण साग यातक लक्षण ६२ त्वचामें प्राप्त वातके लक्षण रुधिरमें प्राप्त यातके लक्षण.... मांस मेदागत धातके लक्षण मन्नास्थिगत वातके लक्षण.... ६३ शुक्रगत वातके लक्षण नाडीगतवातकं लक्षण कोष्टगत वातके लक्षण सांगगत वातके लक्षण सन्धिमें स्थित वातके लक्षण ६४ ! पांच वातके जुदे २ लक्षण पित्तावित प्राणवातके लक्षण ६४ | कफान्वित प्राणवातके लक्षण कफ पित्तयुक्त उदान वातके ल. ६५ | पित्तकफयुक्त समान वातके ल. पित्तयुक्त अपान वातके लक्षण कफयुक्त अपान यातके लक्षण पित्त कफयुक्तव्यान वातके लक्षण ऊर्यगत वातके लक्षण अधोगत वातके लक्षण पित्तयुक्तवातके लक्षण ६७ कपयुक्त यातके रक्षण कफपित्तयुक्त यातके लक्षण अधोभागमें प्राप्त वातक रक्षण " " ७५ " " .... .... " - " " " .... 11 १ " " ... " ... .... ....
.... .... ८ .... ... - वातरक्तके उपद्रव " ... " " . " गुल्म रोगकी संख्या " हंसराजनिदानम् । विषय. पृष्ठ. विषय. वातरक्त जाई रोकनके उपद्रव वातरक्तकी उत्पत्ति आंसू रोकनेके उपद्रव वातरक्तके लक्षण ७६ छींक रोकनेके रपद्रव पित्तावित वातरक्त के लक्षण डकार रोकनके उपद्रव कफयुक्त वातरक्तक लक्षण , रद्द रोकनेके उपद्रय श्लोक ११ "मूख मारनेके उपद्रव प्यासरोकनेके उपद्रव उरुस्तम्भ रोगकी संप्राप्ति ७७ श्वास रोकनेके उपद्रव उरुस्तम्भके लक्षण निद्रा रोकनके उपद्रव आमवात रोगकी उत्पत्ति ७८ उदावत रोग होने के कारण आमवात रोगके लक्षण , वातके उदावर्तके लक्षण श्लो०१७.... वातजन्य आमरोगके लक्षण गुल्मरोग पित्तसे कुपित आनवाने के लक्षण कफसे कुपित आमवात के लक्षण गुल्मरोगका स्वरूप साध्यासाध्यकष्टसाध्यआमवातल. यात गुल्मके लक्षण निदोपज आमवातके रक्षण पित्तगुल्मके लक्षण.... परिणाममूल कफ गुल्मके लक्षण शूलरोगको उत्पत्ति .... 'बादीके शूलका लक्षण ८० रक्तगुल्मके लक्षण.... असाध्य गुल्मके लक्षण पित्तके शूलका लक्षण सन्निपातज गुल्मके लक्षण.... कफ शूलका लक्षग साध्ययाप्य असाध्यके लक्षण वातकफ शूलके लक्षण श्लो०१० 'वातपित्तजनित शूलके लक्षण श्लोक ११ गुल्मरोगके दश उपद्रव ... हृद्रोग असाध्य शून्टके लक्षण ८२ हृद्रोग निदान शूलके दश उपदव वादीक द्रोगके लक्षण पित्तके द्रोगके लक्षण आनाह रोगकी उत्पत्ति करके हृद्रोगके रक्षण ..... अधावातरोकनेसेउदावर्तके लक्षण १३ सन्निपातके रोगके लक्षण n, विष्टायग रोकनेके उपदर कृमिरोगके दोगके लक्षण मूत्र रोकनके उपद्रव ,, हृदय रोगके उपय .... " " " " ." .... . " १५ शूलकी उत्पत्ति " १८ आनाह उदावत " " ... A .... .... . .... " .... " . " .. .. ... अनुक्रमणिका। (१२ विपय. पृष्ठ. । विषय. पृष्ठ. मूत्रकृच्छ्र कफ यातके विस्फोटकके लक्षण मूत्रकृच्छ्रको उत्पत्ति ८९ कफ पित्तके विस्फोटकके लक्षण वानके मूत्रकृच्छके लक्षण सनिपातकी पीडिकाके लक्षण पित्तक मूत्रकृच्ट्र के लक्षण त्वचागत पीडिकाके लक्षण कफके मूत्रकृन्ट्रके टक्षण रक्तमें गत पीडिकाके टक्षण ... मूत्रकृच्छ्रमें साध्यासाध्यपरिज्ञान | मांसमें प्राप्त पीडिकाके लक्षण मूत्राघातकी उत्पत्ति ... | मेदामें प्राप्त पीडिकाके लक्षण यातके मूत्राघातक लक्षण ९१ मजामें प्राप्त पीडिकाके लक्षण पित्तके मूत्राघातके लक्षण ..... हाडमें प्राप्त पीडिकाके लक्षण ... ९९. कफके मूत्राघातके लक्षण | शुक्रमें प्राप्त पीडिकाके लक्षण अश्मरी असाध्य शीतलाके लक्षण ... पथरी रोगकी उत्पत्ति पिटिका वातकी पथरीके रक्षण ... "पिटिकाके दशभेद १०० पित्तकी पथरीके लक्षण ९२ | प्रमेहसे उत्पन्न पिडिकाके लक्षण कफी पथरीके लक्षण ९३ | वर्णसे पिडिकाके लक्षण वीर्य्यरोधकी पथरीके लक्षण सराविकाके लक्षण प्रमेह कच्छपिका जालनी सर्पपिकापुत्रि- प्रमहरोगकी उत्पत्ति ९४ १०१ वातके प्रमेहका लक्षण " विद्रधिका विदारिका विततांजली पित्तके प्रमेहका लक्षग के लक्षण कफके प्रमेहका क्षण "पिडिका विनाशार्थ पूजा प्रमहरहितके लक्षम मेदवृद्धि साध्यासाध्यकष्टसाध्य प्रमेहके ल. | मेदरोगकी उत्पत्ति पीडिका मदरोग लक्षण पीडिका रोगकी उत्पत्ति गण्डमाला पीडिका रोगके लक्षण " यातकी गण्डमालाके लक्षण पीटिका रोगका पूर्वरुप ९६ | पित्तकी गण्डमालाके लक्षण १०३ यातकी पीडिकाक लक्षण कफकी गण्डमालाके लक्षण पित्तकी पीडिकाके लक्षण ... श्लीपद कफकी पीडिकाके लक्षण लीपदके लक्षण बातपित्तको पीडिकाके लक्षण ९७ | वातके श्लीपदका लक्षण'.... 7 " " पीके लक्षण .... " " " ... ... " "- ... .... " ... ... ... -11- ".
... ..." .... 12 .... " ... " .... १३६ .... १ " . . .... " .... .... (१४). हंसराजनिदानम् । विषय. विषय. कन्छपरोगके लक्षण नासारांग ताल्पाकके लक्षण पानसरोगके लक्षण, गलरोग क्षवधुरोगके लक्षण गलरोगका निदान '..... १२९ पूतिनश्यक लक्षण... यातरोहिणकि लक्षण नासापाकके लक्षण पित्तरोहिणी लक्षण पूयरक्तके लशण कंफरोहिणी के लक्षण प्रदीप्तरोगके लक्षण रुधिरकी रोहिणीके लक्षण प्रतीनाहके लक्षण.... कंटशान्करोगके लक्षण १३० नासाशोपके लक्षण अधिजिहाका लक्षण पकपीनसकेन्टक्षण.... बलासाक्षरोगके लक्षण पीनसरोगको उत्पत्ति नासाशतनीक लक्षण वातक पीनसरोगके लक्षण... गलायुरोगके लक्षण पित्तके पीनसके लक्षण यलविद्रधिके लक्षण १३१ कफके पीनसके लक्षण गलीघरोगके लक्षण रुधिरके पीनसके लक्षण बातपित्तकफकी मुग्यपिडिकाके ल०.... सन्निपातके पीनसके लक्षण कर्णरोग नेत्ररोग कर्णरोगनिदान वातके नेत्ररोके लक्षण कर्णनादके लक्षण पित्तके नेत्ररोगके लक्षण यधिरके लक्षण कफके नेत्ररोगके लक्षण शब्दडके लक्षण नेत्रमन्यके लक्षण श्रावगदरोगके लक्षण वातभ्रमण रोगके लक्षण कर्णगृथके लक्षण प्रतीनाहके लक्षण.... १३३ कसे नेत्रपाकके लक्षण कृमिकर्णके लक्षण नेत्रपाकके लक्षण ... कर्णपाकक लक्षण मोतियाविन्दके लक्षण पित्तकर्णपाकके लक्षण असाध्यमोतियाविन्दके लक्षण कफवर्णपाकके लक्षण १३४ | नेत्रके प्रथमपटलके रोग वातक पूतिकर्णरोगके लक्षण नेत्रके द्वितीयपटलके रोग पित्तो पूतिकर्णरोगके लक्षण नेत्रके तृतीयपटलके रोग फरक पूतिकर्णरोगके लक्षण नेत्रके चतुर्थपटलके रोग .... " " १ " १३२ / नेत्ररोगोत्पत्ति " .... १३८ .... " ... 1 .... १ .... " " .... .... .... .... .... .... .... .... " 11 1. " १४१ .... .... ... " .... 11 1" 11 ... .... " ... " .... ... " ... .... " " " अनुक्रमणिका। (१५) विषय. पृष्ट. विषय. यातकै नेत्ररोगके लक्षण १४१ कफको योनिके लक्षण १४७ पित्तक नेत्ररोगके लक्षण | वातसेपित्तसेकफसे जिसका पुष्प नष्ट हुआ हो कफके नेत्ररोगके लक्षण उसके लक्षण ऊर्चअधोगतदृष्टिरोगके लक्षण | विटुताके लक्षण धूम्रदर्शी अर्थात् रतौंधी के लक्षण पूतिगन्धके लक्षण गंभीररोगके लक्षण पंच्यायोनिके लक्षण १४८ पूयलाठ्यरोग के लक्षण १४२ | खंडितायोनिके लक्षण उपनाहके लक्षण... प्रसूति परिवालरोगके लक्षण प्रसूतिरोगकी उत्पति ब्राह्मणीरोगके लक्षण स्त्राय और पातकालक्षण वातपित्तकपको पिडिकाके लक्षण प्रसूतिरोग के लक्षण १४९ मस्तक प्रसूतिरोगके उपद्रव बालरोग मस्तकरोगकी उत्पत्ति ... वातदुग्धके गुण यातपित्तकफके मस्तकरोग पित्तपित दुग्धके लक्षण राधिरके मस्तकरोग कफपिनदुग्धके लक्षण १५० सन्निपातक मस्तकरोग दोपराहेत दुग्धकी परीक्षा... कृमिके मस्तकरोगके लक्षण दोपहानदुग्धक गुण आधाशीशीक लक्षण वाटकोको अन्तर्गतपीडा जाननेका स्त्रीरोग प्रदरोगकी उत्पत्ति धुकुनपारिगर्भिकके लक्षण यातपित्तके प्रदरके लक्षण १४५ तालकंठकतालुपाकके लक्षण कफसे प्रदरके लक्षण | सामान्यग्रहयुक्तके लक्षण सन्निपातके प्रदरक लक्षण .... | स्कन्दग्रहशकुन ग्रहग्रस्तकं लक्षण रवतामहप्रस्तके लक्षण योनिकन्दकी उत्पत्ति पूतनाग्रह अस्त के लक्षण पित्तक योनिकन्दके लक्षण मद्वितामहनैगमेयग्रहप्रस्तके लक्षण कफके योनिकन्दके लक्षण विपरोग सन्निपातकेयोनिकन्दके लक्षण स्थावर जंगमविष. पंडाख्य और सूचीमुखयोनिकेल. स्थावर विपके लक्षण वातकी योनिके लक्षण १४७ | जंगमविपके लक्षण पित्तकी योनिक लक्षण विपदेनवाटेको परीक्षा " " .... " " १४४ " ... उपाय .... ... . ... " . ... " ... .... .... " ... ...
पृष्ट. । .... .... " .... सर्पकाटेके लक्षण... " (१६) हंसराजनिदानम्। विषय. पिपय, पृष्ठ मूलपत्रफलविपके लक्षण १५३ मक्खी और नग्यके विपके दक्षण फूल गोद लचाके विषके लक्षण :... सादिक काटका असाध्य लक्षण दुग्धधातुके विपके लक्षण १६४ योविपके लक्षण मूत्रपरीक्षा देशविशेषकाल और नक्षत्र विशेष सर्प साध्यासाध्यमनुष्यकी मनपरीक्षा काटे उसके लक्षण वातपित्तकफसे मूत्ररक्षण मूपको रियके लक्षण | द्विदीप और त्रिदोपके मूत्रको परीक्षा.... कोटआदि विपके लक्षण १५५ नपुंसकभेद और लक्षण कालेबल्केि विषके लक्षण आसेक्य नपुंसकके लक्षण ..... बहींसर्पकाटेके लक्षण सौगन्धिक नपुंसकके लक्षण मेंडक मछली जोक छिपकली शतपदीके कुंभिकपंढके लक्षण विपके रक्षण.... | ईय॑क पंढके लक्षण मग्छरके विषके लक्षण १२६ महापंढके लक्षण लताविपके लक्षण ,, नापिंढके लक्षण " " १६९ .... " " .... .... इति हंसराजस्य विषयानुक्रमणिका समाप्ता ॥
श्रीगणेशाय नमः। हंसराजनिदानम् । भाषाटीकासहितम् । हंसराजकवि हंसराज ग्रन्यके कर्ता प्रन्थके आदिम शिष्टाचार परिपालनके नित्तिम और अन्यकी निर्विघ्नसमाप्तिके निमित्त मले प्रकार उचित अपने इष्टदेव श्रीबालाजीको ध्यानपूर्वक स्रग्धरा छंद करके मंगलाचरण करते है ।। ध्यायेदिति । ध्यायेद्दालाम्प्रभाते विकसितबदनाम्फुल्लराजीवनेत्रां मुक्तावै- दूर्यगर्भरुचिरकनकजैर्भूपणैर्भूपितांगीम् ॥ विद्युत्कोटिच्छटाभा परिमलबहुलां दियसिंहासनस्थां गीदेवी तस्य दासी भवति सुर- वनं नन्दनं केलिगेहम् ॥१॥ धत्ते ते चरणांबुजं स्वहृदये मातर्नरो योनिशं तस्याऽस्ये परिनर्त्तते प्रतिदिनं वाग्गद्यपद्यात्मिका ।। लक्ष्मीस्तस्य गृहे स्थिता करतले मुक्तिः स्थिताः सिद्धयो द्वारे तस्य विभूपिताश्च निधयस्तिष्ठन्ति नित्यं मुदा ॥२॥ अर्थ-ग्रा -प्रातःसमय श्रीबालाका ध्यान करना. कैसी है बाला कि प्रफुल्लित मुख,फूले कमलके समान नेवाली, मोती और वैदूर्यमणि करके जटित मुन्दर सुवर्णके भूपणो करके भूपित देह, जिसकी कोटि बिजलीके समान प्रकाशवाली अतिशय सुगन्धयुक्त देह श्रेष्ठसिहासनपर स्थित, ऐसी बालाका जो मनुष्य इस प्रकार ध्यान करता है उसकी सरस्वती दासी होती है. और देवतोंका नन्दनवन क्रीडाका स्थान होता है ।। १ ॥ हे माता जो मनुष्य तेरे चरणकमलोका अपने हृदयमें निरन्तर ध्यान करता है तिसके मुखम गद्यपद्य रचनारूपी सरस्वती निन्य नाचती है । घरमें लक्ष्मी स्थिर है मोक्ष उसके हाथमे है, अप्रसिद्धि उसके द्वारपर खडी रहे और नवनित्रि नित्य आनंदपूर्वक स्थित रहती है । इस श्लोकका छन्द शार्दूलविक्रीडित है ॥ २ ॥ जगन्मातर्नमस्तेऽस्तु वरदे मंगले शिवेणग्रन्थकर्तुं प्रवृत्तस्य साहा- य्यं कुरु मेऽनिशम् ॥३॥ अहमपि जगदंवे दृश्यतां दिव्यदृष्ट्या न भवति तब हानिः क्वापि दृष्टेः कदाचित् ॥ स्वजनहितपरायाः 4 हमराजनिदानम् । शंकरस्य प्रियाया अमृतरसहदिन्याऽहं सनाथो भवामि ॥१॥ भिपक्चक्रचित्तोत्सवं जाड्यनाशं करिष्याम्यहं वालबोधाय शा- ब्रम्।।नमस्कृत्य धन्वंतरि वैद्यराजं जगद्रोगविध्वंसनं स्वेन नामा ५ अर्थ-हे जगन्मातः ! हे वरदे ! हे मंगले । हे शिव! तुम्हारे अर्थ नमस्कार है ग्रन्थकरनेको प्रवृत्त मेरी निरन्तर सहाय करी ।। ३॥ हे जगदम्ये! मुझे दिव्य दृष्टिस देख, तेरो दृष्टिको कभी यहीं हानि नहीं हो. येसी तुमहो कि अपने भक्तजनके हितमें तत्पर और श्रीशंकरको प्यारो पत्नी हो. अमृतर- सको सरोवरी मैं तुह्मारी दृष्टीसे सनाध होऊंगा इस शोकका मालिनी नाम छन्दहै ॥ ४ ॥ मैं वैद्योंक राजा धन्वन्तरिको नमस्कार कर बालकांके बोधके अर्थ जगत्के रोगोंका नाशक वैद्य समुदायक चित्तको उत्सव कारक मूर्खतानाशक ऐसा अपने नाम करके अर्थात् हंसराज नाम करके अन्यको करताहूं. इस शोकको छन्दकानाम भुजंगप्रयात है ॥ ५ ॥ ब्रह्मेशो गरुडध्वजो भृगुसुतो भारद्वजो गौतमो हारीतश्चरको- त्रिकः सुरगुरुर्धन्वतरिधिवः ॥ नासत्यो नकुलः पराशरमुनिर्दा- मोदरो वाग्भटो येऽन्ये वैद्यविशारदा मुनिवरास्तेभ्यो परेभ्यो न- मः ॥६॥ आत्रेयधन्वंतरिसुश्रुतानां नासत्यहारीतकमाधवानाम् ।। सुपेणदामोदरवाग्भटानां दखस्वयंभूश्चरकादिकानाम् ॥ ७॥ एषां समालोक्य मतं मुहुर्मुहुर्यथो मनोज्ञः क्रियते मयाऽधुना॥ परदोपै रचितोऽल्पमेधसां ज्ञानाय नूनं भिपजात्ममानिनाम् ॥८॥ अर्थ--ब्रह्मा, शिव, विष्णु, शुक, भरद्वाज, गौतम, हारीत, चरक, अत्रि, बृहस्पति, धन्वतरि, माधव, अग्विनीकुमार, नकुल, पराशरमुनि, दामोदर, वाग्भट और जे वैद्यामं चनुर मुनियोंमें श्रेष्ट उन सबनके अर्थ नम्मकार है ॥ ६ ॥ आत्रेय, धन्वंतार, सुश्रुत, अश्विनीकुमार, हारीत, माधव, मुपेण, दामोदर, वाग्भट, सनत्कुमार और चरकादिक ॥ ७ ॥ इनके गत वारवार देखकर वैद्य ऐसे अपने आपको माने अल्पबुद्धि वारेनको निश्चयज्ञानके अर्ध दोपकरके रहित जे पद तिन करके गचित मनको प्रसन्न करनेवाला अब मैं ग्रंथरचना ।। ८॥ दर्शनस्पर्शनप्रश्नै रोगिणो रोगनिश्चयम् ॥ आदौ ज्ञात्वा ततः कुचिकित्सां भिपजांबरः ॥ ९॥ देशं बलं क्यः कालं गुर्विणी- गदमोपधम् ॥ वृद्धवैद्यमतं ज्ञात्वा चिकित्सामारभेत्ततः ॥ १० ॥ अर्थ-देखना स्पर्शकरना पंछना इन तीन प्रकारसं पहिले रोगीके रोगको निश्चय करके वैद्यों में श्रेष्ठ फिर गेगांका चिकित्सा करे।॥ ९॥ देश वल अवस्था काल गर्भिणीका रोग औषध और वृद्धवैद्यके मतको जान फिर चिकित्सा करे ॥ १०॥ ,
भाषाटीकासहितम् ।
अथनाडीलक्षणानि।
करांगुष्टमूलोद्भवा प्राणभूता नृणां रोगिणां साक्षिणी सौख्यभा-
जाम्॥जलोकोरगाणा गतिं नाडिका या विधत्ते निरुक्ता च वाता-
त्मिकासा ॥११॥ विधत्ते गति काकमंडूकयोर्या मुनीन्द्रनिरुक्ता च
पित्तात्मिकासा ॥ शिरा हंसपारावतानां गतिं या दधाति स्थिरा
लेप्मकोपान्वितासा ॥ १२ ॥ नाडी चंचलतां कचिच्छिथिलतां
शेत्यं क्वचिचोप्णतां धत्ते मंदगति द्विदोषकुपिता स्थानच्युति
क्षीणताम्।।वक्राकारगति क्वचिद्वितनुते प्राप्नोति कंपं क्वचिंद्वैकल्यं
विदधाति याति कुपिता मासान्तरे सानिशम् ॥ १३॥
अर्थ-
-प्रथम नाडी परीक्षा निग्ये है. हाथके अँगुठोके निकट रोगी मनुष्यके सुखदुःखकी साक्षी
देनेवाली नाटी यदि जोंक या सर्व कामी चाल चले तो बातकी नाडी कहिये ॥ ११ ॥ और जो
नाडी कामडकीसी चाल चले तो मुनियोने पित्तको नाटो कहींहै, और जो हंस कबूतर कोसी
चाल चले तो कफकोपकी नाडी कहिये ॥ १२॥ हिदोष कोपको नाड़ी चञ्चल कभी शिथिल
कामी शीतल कभी गरम और मद विकटताको प्राप्तहुई गमन करेहैं और स्थानको छोटदेय और
बहुत धीरे २ चले, कभी टेढी चले, कभी कभी कांपे, विकटताको प्राप्त हुई ऐसी नाडी कए मही.
नेके भीतर रोगीको मार डाले ॥ १३॥
त्रिदोयान्विता नाडिका चंचलाप्णस्फुरद्दित्रिरूपा स्वरायुग्विभि-
ना ॥ गात तेत्तरीयां विधत्तेतिकंपंक्षणं क्षीणतां याति मुच्छा
क्वचित्सा ॥ १४॥ शिरा यस्य वातादिता पित्तदग्धा कफेनातिको-
पेन नाडी कृता सा॥गदी सोल्पकालेन मृत्योर्विदीर्णे मुखे यास्य-
ते दतदंष्ट्राभिकीर्णे ॥ १५ ॥
अर्थ-संनिपातको नाडी चाल और गरम और दो तीन प्रकारकी चाल चलै, वह नाडी जल्दी
आयुकी काटनेवाली जानी, और तीतरकीसी चाल चले और बहुत कां तथा मंदचले और कभी
चलनेस रहि जाय वह भी अन्नाध्य ॥१४॥ जिस रोगीकी नाडी घातकरके दूषित, पित्त करके दग्ध,
और करके कोपफरक बुदित हो वह रोगी थोडे कालमें मौतके खुले हुयेदंतदाढा करके युक्त मुख-
में जायगा अर्थात् मरेगा ॥ १५ ॥
(४) हंसराजनिदानम् । शिरा यस्य सूक्ष्मातिशीतान्विता वास रोगी न जीवेत्प्रयल:- कदाचित॥चलद्वित्रिरूपा त्रिदोपान्विता वा स रोगी यमस्यालये शीघ्रगता ॥ १६॥ नाडीशीघ्रगति धत्ते ज्वरकोपेन सोपणताम ॥ रक्ताधिक्येन सा कोप्णा गुवीं वेगवती भवेत् ॥ १७ ॥ सुखिनो मनुजस्थ शिरापरितः स्थिरतां समुपैति दधाति बलम्।।क्षुधितत्य भवेञ्चपला सततं तृपितस्य शिरा ब्रजति स्थिरताम् ॥१८॥ अर्थ-जिस रोगीकी नाही आतिमंद चले, और शीत करके युक्त हो यह रोगी अनेक यन्नोंके करनेसेभी नही जीवे, और जिस रोगीको नाडी त्रिदोपयुक्त दो तीन प्रकारकी चले, वह रोगी जल्दी यमराजके घर पहुंचेगा ॥१६॥ चरके कोपसे नाटी गरम और जलदी चटनीहै, और धिरक वि- गटनको नाडी गरम और भारी तथा जल्दी चलतीहै ।। १५ ॥ सुखो मनुष्यको नाडी बलयुक्तं और स्थिर चलती है, और क्षुधित मनुष्यकी नाडी चपल और भोजन करेकी नाड़ी स्थिर चटतीहै इस श्लोक छन्दका नाम तोटकहत्तहै ॥ १८॥ मोहेन कामेन भयेन चिंतया क्रोधेन लोभेन बहुश्रमेण वा ॥ मंदाग्निनोद्वेगतरेण पीडया स्यान्नाडिका मन्दतरा नृणांभृशम् १९ इति हंसराजकृते हंसराजनिदाने नाडीलक्षणवर्णनम् अर्थ-मोस कामसे भयस चिन्तासे क्रोधसे बहुत परिश्नमसे मदाग्निसे रोगसे पीडासे मनुष्योंकी नाडी निरंतर मंद चलती है ॥ १९ ॥ इति श्रीमाथुरदत्तराभपाठकनर्मिनहंसराजार्थबोधिन्य भाषाटीकायां नाडीलक्षण समाप्तम् ॥ दोपैविनानरोगाः स्युनंदोपा हेतुभिविना ॥ हेतवः कर्मसम्भूता- स्तान्हेतून्कथयाम्यहम् ॥१॥ (अथवातकोषकारकवस्तु ) प्राणा- पानगतेविघातकरणः क्षुन्मूत्रतृोधनेायामत्रतशोकशीतस- लिलसानैः स्त्रियाः सेवनः।। रक्षाम्लामिपमिष्टपिष्टकटुकैरत्यंबुपा- नाशनवर्षाशीतशरत्सुचैत्रसमयेवातस्यकोपोभवेत्२ (अथपित्तको- पकारकवस्तु) तीक्ष्णोष्णाम्लविदाहिशाककटुकेः क्षारान्नपित्ताश- नैायामाध्वपरिश्रमेदिनपतेरातापसंसेवनेः ॥ क्रोधोप्णोल्लवनः कपायमदिरापाननिशाजागरेवाग्रीष्मशरत्नमध्यदिवसे पित्तस्य कोपोभवेत् ॥३॥ 1
भापाटीकासहितम् ।
अर्थ-विना दोपोंके रोग नहीं होते और बिना हेतुओके दोष नहीं होते और हेतु कर्मसे पैदा होत,
सो उन्ही हेतुओंको में कहताह।।१।प्राण और अपान पवनको गति बिगड़नसे भूख प्यास मूत्र इन-
के रोकनेसे दण्ट कसरतके करने से व्रतके करने शोचस शीतल जटकं नहानेसे बहुत स्त्रीके संगसे
रुखा खट्टा मीग पिसा कडुआ ऐसे पदार्थके भोजनसे बहुत जल और भोजनके करनेसे वर्षा
ऋतु शरदऋतु शीतकाल और चैत्रके महीने में बात कुपित होताहे ॥२॥ तीक्ष्णमिरच आदि गरम
खट्टा दाहका करनेवाल पदार्थ शाक कडुआ खार मिला अन्न और पित्तकारक ऐसे भोजनके कर-
नसे दण्टकसरतके करनेते रानाले चटनसे पारश्रमके करनेस वाममें रहनेसे क्रोधसे गरमीसे ग्वल-
ने कूदनेसे कसैली बस्तु मयंकपानेले गनिमे जागनेसे वर्णऋतु शरदऋतु मध्याहमें पित्तकोप
करताहै ॥ ३॥
कफकोपकारकवस्तु ॥
क्षारक्षीरविकारशोकमधुरैः पानाशनातिकमर्मूलस्निग्धगरिष्ठक-
दपिशितःशीताम्लमापाशनैः॥ नासानेत्रमुखेषुधूमरजसोपात्तैर्म-
हाघोपणेः श्लेप्माकोपनरंदधातिशिशिरे हेमंतकेमाधवे ॥
अर्थ-बार दूधकापदार्थ शाक मिट भून्य प्यानके समयको उलयन करनेसे कंद चिकना
गरिष्ट मूल पदार्थ पिसा अन्न शीतकमा उर्द इनके ग्यानेसे नाक, नेत्र मुख इनमे धुंयेंके और रजके
भारनेसे पुक्तरनेस शिशिरऋतुमे हेमन्तटमे वैशाग्यमे कफ कोप करताहै ॥ ४ ॥
ज्वराणांघोररूपाणां यातिचिह्लानितान्यहम् ॥ वक्ष्येज्ञानेननेने-
वरोगः संज्ञायते बुधैः॥५॥ (तस्य प्रागुत्पत्तिमाह) दक्षापमानसंकु-
रुद्रनिश्वाससम्भवःज्वरोऽष्टधापृथगद्वंद्वसंघातागन्तुजः स्मृतः
॥१॥ (ज्वरस्य संप्रातिमाह ) मिथ्याहारविहारस्य दोपाह्यामाश-
याश्रयाः ॥ बहिनिरस्यकोष्टानि ज्वरदाः स्यूरसानुगाः॥२॥ज्वरके
पूर्वरूपको कहेहैं ) तापः शरीरे गुरुताऽलसत्वं सागपीडा विरस-
त्वमास्ये ॥शीतःश्रमो वीर्यवलंस्य हानिः ज्वरामचिह्नानि वदंति
संतः॥६॥ (वातज्वरकेलक्षण ) जृम्भोद्गारतृपाः कपायवदनं नि-
द्राविनाशोऽरुचिः श्वासोरूक्षवपुर्धभोविकलताशोपो मुखेक्षि-
स्रबः॥ हिकाध्मानविवर्णतांगचलनं रोमोहमोगव्यथा हल्लासीत्र-
विगुंजनं भवति तदातज्वरे लक्षणम् ॥७॥
, श्रम J हंसराजानदानम् । अर्थ-धोररूपञ्चरोंके चिह में कहताहूं जिनचिन्ह अर्थात् लक्षणों करके पंडितोंकरके रोग सवजा ने जायें ॥५॥ दक्षके करेहुये तिरस्कारसे क्रोधित शिवकी श्वाससे उत्पन्न हुआ ज्वर आठ प्रकारका १ वातसे, २ पित्तसे, ३ कफसे, ४ वात पित्तसे, ५ वातकफसे, ६ पित्त कफसे, ७ वानपित्तर- फसे, ८ आगंतुजसे ॥१॥ मनुष्यों के मिथ्या आहार और मिथ्या विहारसे आमाशयमें रहते जो बात। पित्त कफ सो आमाशयको बिगाड़ करके फिर रसको विगाडै और कोटेकी अग्निकी गरमाको बाहर निकाल दहको तप्ता करदेवै उसीको व्वर कहते हैं ।।२।। इतिमाधवकारः । शरीरमें तप, तथा शरी- रका भारीपना, आलस्य और सब शरीरमें हड़कल, मुखमें स्वाद न रहे, शीतका लगना, अनायास श्रममालूम हो, वीर्य बलका नाश होना, ये चिन्ह ज्वरके पूर्व होते हैं ॥ ६ ॥ जंभाई, डकार, तथा प्यासका लगना, मुखका कडुआहोना, नदिका न आना अरुचि श्वास, शरीरका सखापन, तथा शरीरमें वेकली. मुख सूखे, आंखसे आसूका पड़ना, हिचकी आना, पेट शरीरका औरही वर्ण हो जाना, अंगका फडकना, रोमांचका होना, शरीरमें व्यथा सूी उलटीका आना, आंतोंका बोलना, ये लक्षण वातज्वरमें होतेहै ।। ७ ।। (पित्तंवरकेलक्षण ) हृत्कंठोष्ठकरांघिदाहमरति स्फोटं तृपा सं- भ्रममूष्माणं श्वसनं मुखे कटुकतां मूर्छामतीसारकम् ॥ हृत्कंपं नयनेरुणे विकलतां शीते रुचिंशोपणं स्वेदं देहगतःकरोति कुपितः पित्तज्वरोन्तर्व्यथाम्॥८॥(श्लेप्मज्वरलक्षणं)स्तैमित्यं वमनंजडत्व- मलसं निष्ठीवनं गौरवं माधुर्यं वदने तनौ मलिनतां स्वेदं चरोमो- दमम्॥कठेघुरघुरतां च पीतनयनं निद्रांत्वचि स्निग्धतां कासंशीर्प रुजंकरोति विकलं श्लेष्मज्वरोङ्गव्यथाम्॥९॥(वातपित्तज्वरः) भ्रमो रोमहपौरुचिः श्वासकासौ तृपांगेपुदाहः शिरोतिर्वमित्वम्॥ विनि- द्रांगपीडातिशोपोल्पमूर्छा ज्वरे वातपित्तोद्भवे चिह्नमेतत् ॥१०॥ अर्थ-हृदय कंठ और हाथ पांव इनमे दाह होना, इन्डाका नाश, हड कलका होना, प्यास, भ्रम, गरमी. श्वास, कडुआ मुख, मूर्छा, दस्त, हृदयमें कंप, नेत्र लाल, देहमें वेकली शीतलताका प्पारालगना. मुखसूग्वे खंदका होना, अन्तःकर्णमें दुःख, ये लक्षण कुपितपिचचर दहमें करताहे ॥ ८ ॥ शरीर गोटकपटेसे पोंछ सरीखा मालमही उलटीका होना. शरीरका जकडजाना, आलस्य काका थूकना, देहका भारी होना, मुख मीठा हो, देह मेला, पसीनका आना, रोओं खडा' होना कंटमें वरवर शब्द होना कुछ पीलाई लिये नत्रही निद्राका आना, त्वचा, चिकनाई लिये होय, सांसो, शिरमें दर्द, ये लक्षण कायरक है ॥ ९॥ भ्रम रोमका खटाहोना, अनि, वास . ~ .
- भापाटीकासहितम् । खांसी, प्यास, देह, दाह, शिरमें दर्द वमन, निद्राका न आना, देहमें पांडा, अत्यंत मुखका सूखना, मूर्छाका आना, ये बात पित्तचरके लक्षणहैं ॥ १० ॥ (वातकफज्वर) स्तैमित्यंगुरुतारुचिर्विकलता तंद्रा पिपासालसं कासोङ्गस्फुटतांवमिः श्वसनता शोथोमुखे लिप्तता॥स्वेदःपर्वभि- दारतिश्च जडता रोमोद्गमः शीतता वातश्लेष्मसमुद्भवस्य कथितं चिहं ज्वरस्यपिभिः ॥११॥ अर्थ-शरीर गीले कपडेसे पोछे समान मालूम पडे तथा शरीरका भारीपन अमांच, वैकल्टी, तंद्रा, प्यास, आटकस, खांसी, अंगोंका फडकना, श्वास, सूजन, कफसे ल्हिसामुन्ख, पसीना, गांटोमें दर्द, चैन पडे जडपना, रोमांच शीत लगना, पुराने ऋषियोंने यात कफ, चरके लक्षण कहे हैं ॥ ११ ॥ (पित्तकफज्वर) तिक्तास्यौ रुचिता कफस्य वदने लेपो मुहुः शीतता तंद्रासंथिषु वेदना च हृदये दाहः पिपासा भ्रमः॥ कास श्वासतरस्तनौ मलिनता स्वेदो वमिर्मोहता चिह्न पित्तकफज्वरे मुनिवरैः संकीर्तितंपूर्वजैः॥१२॥(तेरहसन्निपातोंकेनाम)संधिकश्चां- तकश्चैव रुग्दाहश्चित्तविभ्रमःशीताङ्गस्तंद्रिकाप्रोक्तः कंठकुब्जश्च कर्णकः ॥ विख्यातो भुग्ननेत्रश्च रक्तष्ठीवीप्रलापकः ॥ जिह्वकश्चेत्य- भिन्यासस्सन्निपातास्त्रयोदश ॥इतिसंगृहीतपाठः। तेषां मर्यादा। संधिके वासराः सप्त चांतके दशवासराः॥रुग्दाहे विंशतिज्ञेया वह्नय- प्टो चित्तविभ्रमे ॥ पक्षमेकं तु शीतांगस्तंद्रिके पंचविंशतिः। विशे- यावासराश्चैव कंठकुब्जे त्रयोदश । कर्णके च त्रयों मासा भग्नने दिनाष्टकम् । रक्तष्ठीबी दशाहानि चतुर्दशप्रलापके ॥ जितके पो- डशाहानि कलाभिन्याससंज्ञके। परमायुरिदं प्रोक्तं नियते तत्क्षणादपि। अर्थ-कडुआ मुख, अरुचि, मुख कफस व्हिसा रहना, बार जाडा गरमीका लगना, तन्द्रा, सांधिमे पीडा, हृदयमें दाह, प्यास, भ्रम, खांसी, श्वासका जोर, देहमें मन्दिनना, स्वेट, बमन, मोह, ये लक्षण. पहिले मुनीश्वरोंने पित्त कफ नरके कहहै ॥ १२ ॥ १ मधिक, २ अनक, ३ रन्दाह,
.
*
(८)
हंसराजनिदानम् ।
४ चित्तविभ्रम, ५ शीतांग; ६ तन्द्रिक, ७ कंठकुल्ज, ८ कर्णक, ९. भुग्ननेत्र, १० रकटीवी
११प्रलापक, १२ जिक,१३अभिन्यास, ये तेरहसन्निपात तेरहोसन्निपातोफा अवधि-संविकी
७ दिनको, अन्तकको, १० दिन, रुग्दाहको २० दिन, चित्त विधमकी २४ दिन, शीतांगको
१५ दिन, तंद्रिकको २६ दिन, कंटकुल्जकी १३ दिन, कर्णककी ९० दिन, भुग्ननेत्रको ८ दिन,
रक्तष्टीबीको १० दिन, प्रलापकके १४ दिन, जिहकके १६ दिन, अभिन्यासके १६ दिन पहे.
हैं यह सन्निपातोंकी परमावधि कहीं है परन्तु तत्काल भी रोगी मरजाता है ये श्लोक संगृहीत है ।।
(तेरहसन्निपातमें साध्यासाध्यविचार) संधिकस्तन्द्रिकश्चैव कर्ण-
कः कंठकुब्जकः। जिह्वकश्चित्तविभ्रंशः पटसाध्याः सप्तमारकाः॥
(संगृहीतपाठः)
अर्थ-संधिक, तंद्रिक, कर्णक, कंटकुल्ल, जिह्वक, चित्तविभ्रंश ये ६ माध्य हैं बाकी सात
असाध्य हैं ।
संधिकसंनिपातकेलक्षण।
त्रिदोपोत्थिते संधिके सन्निपाते भवेत्संधिपीडाऽस्यशोपोथशूलम्।।
भ्रमोवीर्यनिद्राविनाशोतितंद्रा पिपासोष्ठपाको रुचिर्दाहकालौ॥१३॥
अंतकसन्निपात केलक्षण।
करोत्यंगभंग भ्रमं वेपथु यः शिरः कंपनं कंडुरं रोदनं च ॥
प्रलापं सतापंच हिकामसाध्यं बुध त्वं विजानीहि तंचांतकाख्यम्१४
चित्तविभ्रमसंनिपातकेलक्षण ।
चोमोहाद्रुदति क्वचिद्विकलतां प्राप्नोति शोकं क्वचित् फूत्कारं कुरुते
दधातिमदतां गीतं क्वचिद्गायते॥संतापं सहते मुदं वितनुते वाचं
"भ्रमाद्भापते तंचित्तभ्रमसन्निपातमनिशंजानीहि दुस्साधनम्॥१५॥
अर्थ-तीनों दोपोंसे उत्पन्न हुआ जो संधिक सन्निपात तिसके ये लक्षण हैं सन्धीनमें दर्द,मुखकासू-
बना, शून्द, भ्रमवीर्य और निद्राका नाश, तंद्रा, प्यास, ओठोंका पकना, अरुचि, दाह और खांसी
॥ १३॥ अंगोंका टूटना, भ्रम, कम्प और शिरका हिलना ग्वाज तथा रोना, याहियातयकना,
मंताप, हिचकोका आना जिसमें ये लक्षण हों उसको हे वैद्य ! तू असाध्य अंतक सन्निपात जान
॥ १४ ॥ जो मोहसे रोध, कभी विकलताको प्राप्त हो कभी शोचकर कभी फूल्फार करे, की
मस्तपनको प्राप्त हो, गीतगावे, कभी संताप हो, की प्रसन्न होवे, • कभी भ्रम बकने लगे, ये
रक्षण जिसमेंहों उसे नहीं उपाय जिसका ऐसा चितभम सन्निपात जानो ॥ १५॥
...
भापाटीकासहितम् ।
रुग्दाहसन्निपातकेलक्षण ।
यः शूलं वितनोति दारुणभयं हस्तांदिशेत्यं तथा जिह्वां कंट-
कितां भ्रमं विकलतां मोहं च कंठव्यथाम् ॥ श्वासं कासतरं नि-
रंतरतृपां हृत्कंठयोः शोपणं संतापं श्रमरोदनं प्रलपनं जानीहि
रुग्दाहकम् ॥ १६ ॥
शीतांगसन्निपातकेलक्षणम् ।
शीतत्वं विदधाति योखिलतनो रोमोद्गमं वेपथु श्वासं कास-
तमं क्वचिच्छिथिलता मूर्छामतीसारकम् ॥ चेष्टां क्षीणतरां क्लम
वमथुतां हिकां शिरश्चालनं तं शीतांगमयहि वैद्य हरि मृत्योः
सखायं ध्रुवम् ॥ १७॥
मंद्रिकसन्निपातकलक्षण।
कंठे कंडुतृपाऽसचिल्लमथुताः पीडा हि कर्णद्वयोर्जिह्वाश्याम-
तराच कंटकयुता तंद्रातिरासो रतिः॥संतापःकफवेदनाबहुतराश्वा-.
सोधिकः कासता मृत्युःस्यात्खलुतंद्रिको निगदितश्चिहेरमीभिःपरैः १८
अर्थ-पेटमें शूट हाथ पैर टंढे जाममें कांटे श्रम वेकन्टी बेहोसी कटम पीडा, वाम, खांसी,
प्यास बहुत लगे, हृदय कटका सूखना संताप, श्रम, रुदन करना, प्रलाप, ये लक्षण रुग्दाह
सन्निपातके जानना ॥ १६ ॥ जिसमें ये रक्षण मिलते हो उसको वैष्णवञ्चर मीतका मित्र शांतां
ग सन्निपात जानना चाहिये जो सब देहको शीतल करदे रोमखटे होजाय कंप, बास, खांसी.
अंधेरा मुस्तो कभी मुर्छा और दस्तकाहोना जिसकी चेष्टा मंद पडिजाय बिना श्रमको श्रमहो,
रहहिचकी, शिरका कांपना ॥ १७ ॥ कंटमें खुजलीचले, प्यास, अरुचि, ग्लानि, दोनों कानों में
पीडा काली और काटयुक्त जीभ तंद्रा अतिसार अरति सताप कफसे पीडा, बहुत श्वासचले,
और खांसी इन लक्षणोंसे रोगीका मारनेवाला तद्रिक सन्निपात जानना ॥ १८ ॥
कंठकुब्जसन्निपातकेलक्षण।
कंठग्रहं यः कुरुते हनुग्रहं मूप्रिलापं ज्वरकंपवेदनाः ॥ मोह :
च दाहं हृदये शिरोरुजं तं कंठकुन्ज प्रवदंति साधवः ॥ १९ ॥
-
-F
(१०)
हंसराजनिदानम् ।
कर्णाकसन्निपातकलक्षण ।
ग्रंथिः कर्णातदेशे भवति बहुतरां कंठदेशेतिपीडा ग्लानिः श्वासः
प्रसेको वचनशिथिलताश्लेप्मणारुद्धकंठः सूकिंपः प्रलापो
वपुपिकृशतमा वेदनोप्मा च कासः । स्वस्वं रूपं च रोगावि.
द्धति सततं कर्णके सन्निपाते ॥२०॥
अर्थ-जो कंठमें पीडा कर, टोडी जकड नाय, मृा तथा वकना, ज्वर कंप, देहमें पांडा
बेहोसी, हृदय दाह, शिरमें दर्द, येटक्षण कंठकुल्ज सन्निपातके महात्मा कहते हैं ॥१६॥ कर्ण-
क सन्निपातके ये लक्षण है कानके पास गांठ बहुतसी होय कंटमे दर्द ग्लानि श्वास लारका गिरना,
मंद २ बोलना, कफसे कटका रुकना मुळा, कंप और वकना शरीर कृश तथा पीडा और गरमी
और खांसी तथा अनेक रोग प्रगट हो ॥ २० ॥ इति कर्गक सनियातके लक्षण समाप्त हुये ।
भुग्ननंत्रसन्निपातकंलक्षण ।
स्मृतिभ्रंशनं भुनक्सन्निपातःकरोत्यंगपीडांभ्रमंभुग्ननेत्रम्॥ज्वर
वेपनं शून्यतां श्वासकासौ प्रलापं प्रसेकं पिपासामसाध्यः ॥२१॥
रक्तपीवीसन्निपातकेलक्षण।
छदिरक्तष्ठीवनं कृष्णजिह्वां कोसंश्वालं मंडलं दाहमुग्रम् ।। संज्ञा-
नाशं तापमाध्मानतृष्णां रक्तष्ठीवी प्राणनाशं च कुर्यात् ॥ २२ ॥
प्रलापीसन्निपातकंलक्षण।
प्रलापीरवेः पुत्रगेहं प्रयाति ज्वरस्तापपीडांगकंपप्रयासाः॥ तृपा-
शोकसंज्ञाबिनाशप्रवादाः शिरःकंपमोहांगदाहो विनिद्रा ॥२३॥
अर्थ-बेहोसी हो अंगोमे दर्द भौर का आना नेत्रोंका बुरा होना ज्वर तथा काँपना देहमें शून्यता
श्वास खांसी बकना लारका बहना प्यास ये लक्षण असाध्य भुग्ननेत्र सन्निपातके है ॥ २१ ॥
मविरकी उलटी करना जीभ काली हो खांसी श्वास चकत्ता पडजावे घोर दाह हो संझा जाती-
रहे तार चर तथा पेटका फूटना तृष्णा प्यास ये लक्षण हो तोप्राणका नाश की रक्तटांची सन्नि-
पात जानना ॥ २२ ॥ प्रलापी सन्निपातवाला रोगी यमलोकको जाता है और उसके ये लक्षण
होत ज्वर ताप पीटा कापना विना कारण श्रमहो प्यास शोच संज्ञा नाश बकना शिरका,
हिलाना बहोसी अंगाम दाह नदिका न आना ॥ २३ ॥
भापाटीकासाहतम् । (११) जिहकसन्निपातकेलक्षण। जिह्वा कंटकवेष्टितां शिथिलतां श्वासाधिकं मूकता रात्री जाग- रणं तृपां वधिरतां वीर्यक्षयंक्षीणताम् ॥ हृत्पाश्र्वोदरनासिकाध- रगले शोथंविसंज्ञंज्वरं काये यः कुरुते रुजं बहुतरां जानीहि तं जिह्वकम् ॥२४॥ अभिन्याससन्निपातकेलक्षण । अभिन्यासको यस्य देहे स्थितः स्याद्भवेत्तस्य मृत्युर्विनिद्रातित- प्णा ॥ ज्वरः पाददाहोगकंपोतिजाड्यं भ्रमः श्वासता कासता क्षीणचेष्टा ॥ २५॥ अजीर्णज्वरलक्षण । अजीर्णज्वरो लक्षणेरष्टभिर्वा भिपक्सत्तमै यतेसप्तभिर्वा अती. सारउद्वारऊप्मातिनिद्रा शिरोतिः प्रलापोहि जृम्भोदरे रुक् ॥२६॥ अथ-जीभ काटन करके युक्त, नथा शिथिल, श्वासका ज्यादा चलना, गृगापाना, रातमें जागना प्यास तथा बहरापना वीर्यका नाश होना दुर्घटना हृदय पसबाटे पेट नाक ओट गला इनमें सूजन हो बहोसी, ज्वर, ये लक्षण जिसकी देहमे हो उसको जिकसन्निपात जाना ॥२४॥ जिसकी देहमें अभिन्यास सन्निपात हो उसके ये लक्षण हैं नींद आवै नहीं, अति प्यास हो, ज्वर, पैरामें दाह, अंगोका कांपना, बेहोसी, भौर, स्वास, खांसी, चेप्टामंद, ये लक्षणवालेकी मौत होय ॥ २५ ॥ इति त्रयोदश मन्निपाताः ॥ * अजीर्णचर आटटक्षणोंसे अथवा सात लक्षणास जाने सा ये है अतीसार १, डकार २, गरमी अतिनिद्रा ४, शिरमे दर्द ५, खोटा बोलना भाई ७, पेटका दूग्वना ८ ॥ २६ ॥ , * सद्यस्त्रिपंचसप्ताहान् दशाहान् द्वादशादपि ॥ एप्रविशदिनः शुद्रः स.नेपाती मुभीवति॥१॥ (त्रिदोषज्वर स्यमादा ) सप्तमाद्विगुणायावन्नयम्येकादशी तथा एपा निदोषमादा मोक्षाय च वधाय चाापित्तकफा- निस्पृश्या दशदिवसदादशाहसप्ताहात् ॥ हन्ति विमुंवति पुरुष त्रिदोपजो धानुमलपाकात् ॥ ३ ॥ इति । *(समात् दारिदकसानपातस्य लक्षणं ग्रन्थान्तरात्) हारिद्रदहनसनेप्रकरांवितोपे निष्टोवनादिकपन रुपलक्षितोयः ॥ हरिदकासकभितः किल सनिपातःसाध्योनचैवाभेषजा ज्वरकाररूपः ।।
हंसराजनिदानम् । आमज्वरलक्षण । हल्लासलालाश्रुतियांत्यरोचकैः शुन्नाशनिद्राबहुमूत्रतालसैः ॥ वत्काल्पवेरस्यवलक्षुतक्षयेरामज्वरो वेद्यवरेविलक्ष्यते ।। २७ ।। रक्तवरफेलक्षण । प्रलापोझदाहो मुखाद्रक्तपातस्तृपास्फोटना मोहतांगप्रपीडा ॥ भ्रमोरक्तनेत्रेऽथ निद्रा विमूर्छा भवंतीह रक्तज्वरेलक्षणानि॥२८॥ दृष्टिज्वरलक्षण । मुहुर्मुहुर्जुम्भणमंगदाहं विस्फोटनं संधिपु शूलमुत्रम् ॥ स्तब्धेक्षिणी छदिमनाहतां यो दृष्टिज्वरः संकुरुतेविवर्णम् ॥ २९ ॥ अर्थ-खाली ओकी आवै, लार बहे, रद्दहो, अरुचि, भूख न लगे, नींद, मूतका जादा उतरना, आलस, मुख बेरसहो, बल और भूखका घटना, तथा क्षई हो इन लक्षणोंम वैचोने चतुर सो आमयर जाने ॥ २७ ॥ वकना और अंगोंमें दाह, मुग्यसे रुविरका गिरना, प्यान, हटकर, बेहोसी, अंगोंमें पीश, भौर, लाल नेत्र, नीदका आना, मूा ये रक्तचरके लक्षण हैं ॥ २८ ॥ वारंवार जंभाईका आना, शरीरमें दाह, शरीरका टूटना, सन्धि २ में दर्द, भयानकनेत्र हो वमन, अनाह, शरीरका वर्ण और तरहका हो जाय, ये दृष्टिबरके लक्षण हैं ।। २९ ॥ . भूतज्वरकेलक्षण। भूतप्रेतपिशाचदेत्यदनुजेर्जातो ज्वरो राक्षसेर्यस्तापंढदिवेपथुवि- तनुते मूर्छा प्रलापंमदम् ।। जुम्भामंगविमर्दनं विकलतां हास्य कचिद्रोदनं गीत रक्तविलोचनं मनुज तं जानीहि भूतज्वरम्॥३०॥ अर्थ-भूत, प्रेत, पिशाच, दैत्य, दानव, राक्षस इनसे जो चर हो उनके ये लक्षणहै शरीरतत्ता, हृदयमें कोर, मूली, व्यर्थवकना, मस्तहोना, जंभाईका आना, शरीरको तोटना, वकली हसना, कीरोना, कभीगीतगाना, लाल २ नेत्र ये लक्षण भूतचरके हैं ॥ ३० ॥ मराज्यलक्षण। प्रलापोंगतापो भ्रमो हृद्विदाहस्तृपोद्गारनिष्टीवनं पूर्णष्टिः ॥ सन्मेहनं कंटजिह्वोप्टशोपः शिरोगौरवं विज्वरे लक्षणानि॥३१॥ .
भाषाटीकासहित । ८ + - खेदज्वरलक्षण। विष्टंभनं स्फोटनमंगदेशेश्वासः पिपासालसताप्रसेकः ॥ स्वेदोऽ तिनिद्रामवीर्यनाशो भवतिखेदज्वरलक्षणानि ॥३२॥ शापज्वरकंलक्षण। श्यावास्यतोद्वगवमीपिपासा विनष्टचेष्टाभ्रमतापम ः ॥ दुर्गधि- तांगे हदिवेपथुत्वं भवंति शापज्वरलक्षणानि ॥ ३३ ॥ अर्थ-खाटा वालना, शरीरतत्ता, हृदयमे दाह, प्यासलग, डकार आवे,बार २ थूकं, टेढा देखें थोडा थोडा दस्त उतरै, कंट जीभ ओठ इनका सूग्वना, शिरभारी ये मलञ्चरके लक्षणहे ॥ ३१ ॥ पेटका फूलना, शरीर में हटकल, श्वास, प्यास, आलस, लारका गिरना, पसीना, अतिनिद्रा, मस्त पना, वीर्यकानाश, ये खेदं ज्वरक लक्षणहैं ॥ ३२ ॥ मुंह,काटा, उद्वेग, रह, प्यास, शरीरकीचे- टाका नाशहोजाना, भोर, शरीर तत्ता, मूर्छा, देहमें बासका आना, हृदयका कापना, ये राब शाप- ज्वरके लक्षगहें ।। ३३ ॥. औषधजनितम्वरक लक्षण । भवेदौषधीगंधजे चिह्नमेतज्ज्वरे चित्तविभ्रंशता रक्तनेने ॥ शिरो रुग्वमिमूर्च्छतागात्रशोपः पिपासालमत्वं च निद्राविनाशः॥३४॥ भयज्वरकालक्षण । भयात्कस्यचिदुद्भवेदोररूपे ज्वर चिह्नमेतद्भवेदंगकंपः ॥ मुखे शुष्कताभ्यंतरेत्यंतपीडा प्रलापोथचित्तभ्रमः शोकम. ॥३५॥ अर्थ-विपले औपथके सूघनैंसे जो वर पैदा होताहै उसके ये लक्षण होते है चित्तका डामाडो- लहोना, लाल २ नेत्र, मथवाय उलटीका होना, मूर्छ, शरीरका सूखना, प्यास, ग्लानि, नींदका न आना, ये लक्षण औपचननित ज्वरके हैं ॥ ३४ ॥ जिस किसीको भयसे वर पैदा हुआ हो उसके ये लक्षण, अंगोंका कापना, मुखका सूचना, शरीरमें बहुत पीडा, व्यर्थ बकना, चित्त, चला यमान, शौच, और मूर्छा ॥ ३५ ॥ कोपज्वरकेलक्षण। भवंतीहकोपज्वरे लक्षणानि स्फुरद्गात्रभंगं चलद्रक्तनेत्रम्॥प्रला पोथ हल्लासकंपातिमूळ विवर्णःप्रसेको मुखस्तालुशायः ॥३६॥ - , .
- (१४) हंसराजनिदानम् । शखघातज्वरलक्षण । शस्त्रास्त्रदंडाश्मकशादिघाततो जाते ज्वरे घोरतरे हि लक्षणम् ॥ तापःपिपासाकफकंठरुन्द्वताशोथःप्रलापोऽरुचिरातिता भवेत् ३७॥ अभिचारज्वरकेलक्षण । ज्वरेऽभिचारसंज्ञके भवंति लक्षणानिपट् ॥ प्रलापालमोहता- स्तृपागकंपतारुचिः ॥३८॥ अर्थ-ये कोपबरके लक्षण हैं अंगोंका फड़कना, शरीरका टूटना, चन्यायमान लाल नेत्र, वाहियात वकना, खाली रद्दका आना, कांपना, दुःखकाहोना, मूळ, शरीरका वर्ण औरही तरहका होजाना, लारका टपकना; मुख और तालुका शोष ॥ २६ ॥ शम्न कहिये नन्यार और छुरी आदि, और अस्त्र कहिये ब्रह्मास्त्रादि, दंड कहिये लकडी आदि, अदम कहिये फ्थर, कशादि कहिये कोरडा आदि, इनके लगने से जो वर पेदाहो उसके ये लक्षण हो अरहो, प्यासहो, कफसे कंटकारकना, सूजन, बडबडाना, अग्चि दुःख ये लक्षण है ॥३७॥ अभिचारसे तथा मंत्रको उलटा जपनेसे जो अरहो तथा किसीने जादृ कियाहा इस वरमें मुन्य ६ लक्षण होनहै. बटवडाना, पेटमें शूल, बेहोशी, प्यास, कांपना, शरीरका अरुचि ये ॥१८॥ कामज्वरके लक्षण । रोमोनमः साहसहर्पजृम्भा भीतिर्विपादो मदशोकरोपाः ॥ ए- तानि चिहानि भवंति यस्य कामज्वरं तं कथयति वैद्याः ॥ ३९ ॥ अथस्त्रीप्रसंगाजनित। स्त्रियोत्यंतसंगाद्भवेचिहमेतज्ज्वरोग्लानिनिष्टीवनं श्वासकासम्॥ भवेद्वेपथुर्गात्रदेशेम्वुपूरस्तृपानिर्वलत्वं च पीडा च शोथः ॥ ४०॥ अर्थ-रोमांच, साहस, अँभाई, डरकान्दगना, दुःग्यकाहोना, मोहहो, और शोक. क्रोध, ये लक्षण जिसमें हों उसको वैद्य काम ज्वर कहते है ॥ ३९॥ जो मनुष्य बहुत स्वांसे मैथुन कर उससे पैदा ज्वरक ये टनगई अरका होना, ग्यानि, वेरवेरमें थूकना.श्वास, खांसी,कंप, शरीमें, पीनाआना, प्यास. नानाफती, पीडा मूजन, ये॥ ४० ॥ क्षीणधातुमंदाग्निजज्वरलक्षण धातोः क्षीणतयाथवाग्निशमनाज्जातो ज्वरश्चिंतया शैथिल्यं कुरुते रचं वितनुते धत्ते तनो पांडुताम् ॥ सर्वांगं तुदते ददाति कृशता हर्प परं नाशते वीर्यत्वं जयते रुतं न सहते श्वासं भ्रमं विभ्रतेप्टे?
भापाटीकामहिनम् । . - संततज्वरके लक्षण। वसति रुधिरधातो. यो ज्वरो द्वादशाहं कचिदपि च दशाहं सं- ततं संततोयम् ॥ प्रभवति खलुनाम्ना श्वासकासं विधत्तेवरयति नरदेहं याति नाशंस पश्चात् ॥ १२ ॥ विषमज्वरकेलक्षण। निरंतरं तिष्ठति सर्वदेहे सूक्ष्मो ज्वरो यो विदधातिशेत्यम् ॥ अत्युप्णतां यातिकदाचिदेवतंकप्टसाध्यं विपमं वदन्ति ॥४॥ अर्थ-धातुके क्षीग होनेसे तथा मंदाग्निके होनम तथा चितास ओ वर पैदाहो उसके ये लक्षण है. शिथिलता, अचि, शरीरपीलाहो, सागमें पीडाहो, नथा शरीरका कृश होना हर्षजातारहै, वीर्य- कानाश, श्वास भौरकाहोना ।। ४१ ॥ जो उवर रुधिर धातुमें पहुंच जाय वह वर १२ तथा दिन बराबर बनारहे उसको संततज्वर कहते है उसमें श्वास, खांसी, नथा सब देहका जरना बाद थोडेदिन यह वर मारडालेहे ॥ ४२ ॥ जा ज्वरमंद होके सब देहमें बराबर रहे और कभी शीत- लंग कभी जादा शरीर गरमहो जाय उसको कष्टसाध्य विषमञ्चर कह है ॥ ४६॥ महन्द्रवरकेलक्षण । अहोरात्रयोर्वाद्विकाले त्रिकाले चतुष्कालके वा प्रवृत्ति निवृत्तिम् ॥ करोति ज्वरो यः स्वतंत्रोतिरौद्रो महेंद्रोहि नाम्ना निरुक्तो मुनीन्द्रेः॥ वेलाज्वरकेलक्षण। अहोरात्रयोरेकदेशे ज्वरो यः समागत्य देहे स्वरूपं विधाय । नरं पीडयेन्नित्यशो निर्दयं तं विजानीहि वेलाज्वरं वेद्यराज ॥१५॥ अर्थ-जो दिनरातमें दो दफे या तीन या चाग्दफे आये और उतर जावे उस स्वतंत्र घोर बर का महेन्द्रनाम मुनियों ने कहाहै ॥४४ा जो वर दिन रातमें एकदफे एकअंगमें आपके फेर सब शरीरमें फैलकर गरीरको निन्य बहुतदुःखद उसको वैद्य वेलाचर जाने ॥ ४५ ॥ एकांतरज्वरकालक्षण। दिनकांतरे यो विधायोग्ररूप नराणां शरीरे प्रपीडेन्नितातम् ॥ दिनेकं विमुच्याथ धातूंश्च शेते तमेकांतरं त्वं विजानीहि वैद्य ॥ ४६॥ --- 1 (१६) हंसराजानदानम् । एकान्तरज्वरलक्षण। एकांतरो ज्वरो घोरो द्विविधः परिकीर्तितः ॥ शीतेनेकः समा- याति ताप नायाति यो परः ॥१७॥ ज्याहिकज्यरकेलक्षण। दिनद्वयं तु विश्राम्य मेदोमज्जास्थिधातुपु ॥ यः कुप्यति तृतीयेऽह्नि ज्याहिकं तं विदुर्बुधाः ॥ ४८॥ अर्थ-उसको हे वैद्य तू एकान्तरज्वर जान जो एकदिनमें घोररूप होके मनुष्योंके शरीरको दुःखदे और एक दिन छोडकर आये और धातूनको सुखायडाले ॥ ४६ ॥ इकतरा घोरयर दो प्रकारकाहै एक शीत लगकर आये और एक गरमीसे आये ॥ ४७ ॥ जो वर मेदा मन्ना हहीम पहुंच जाताहे और दोदिन बीचमें देकर तीसरे दिन आने उसको व्याहिक अर्थात् तिजारी पण्डितलोग कहते है ॥४८॥ चातुर्थिकादिज्वरंकलक्षण । एवं चातुर्थिको ज्ञेयः पाक्षिको मासिकस्तथा ॥ वार्पिको मनिभिः प्रोक्तो वर्षमायाति नान्यथा ॥४९॥ देवकोपजनितज्वरलक्षण। वापीकूपतडांगगोपुरमठप्राकारदिप्रपादेवांगोपवनानिदेवसदनं छिन्दन्ति ये मंडपम् ॥ साधुब्राह्मणयोगिनां पितृगवां पीडां प्रकु-. वन्तिये तेषा देववरप्रकोपजनितो घोरज्वरो जायते ॥ ५० ॥ एकांगज्वरलक्षण । प्राणिनामेकमंगं यो ज्वरो रुजयति ध्रुवम् ॥ तस्यांगस्य च यन्ना- म तन्नाम्ना ज्वर उच्यते ॥५१॥ अर्थ-ऐसे ही चातुर्धिकचर जाने तथा पाक्षिक अर्थात् जो पंद्रहवें दिन आये,तथा मासिक जो महीनामें आये, तथा वार्षिक जो वर्षदिनमें आवे, वीच नहीं आवे ये मुनिने कयाहै ।। ४९ ॥ जो मनुष्य बावडी, कुआ, तालाब, गोपुर, मढी, प्राकार, यज्ञकोवेदी, प्याऊ, देवप्रतिमा; याग, मंदिर मंडप, इनको नोडडाले तथा साधु,ब्राह्मण,योगी, माता, पिता,गंड,इनको दुःखदेते, तिनको ईश्व- रके कोपसे घोर ज्वर पैदा होताहै ॥ ५० ॥ मनुष्योंके कोईसे एकअंगमें वरचढे और उस अंगका जो नामहो वह जर उसी नामकरके कहाजाता है ॥ ११ ॥ .. . -- + भापाटीकासहितम् । (१७) ज्वरस्तु यस्य संस्पर्शाबंधाद्वा दर्शनादपि ॥ ज्वरो भवति तन्नाम्ना इति रोगविदो विदुः॥५२॥ अंतकज्वरलक्षण । श्वासोी वहते गलं कफचयैः संरुध्यते यो मुखात्फेनं संवमते शिरां विधमते कासं विधत्ते रतिम्॥आध्मानं कुरुते चमोहमरुचि हिक्कामतीसारकं तं विद्याज्ज्वरमंतकं प्रियसखं मृत्योरसाध्यं- भृशम् ॥ ५३॥ शोकज्वरकेलक्षण। अर्थाऽपत्यकलत्रभ्रातृसुहृदां शोकोद्भवो यो ज्वरः शैथिल्यं कु- रुते नरं विमनसंश्वासं मुहुर्वेदनाम् ॥स्तैमित्यं विकलंभ्रमं वधिः रतामूच्र्छा बलौजःक्षयं प्रस्वेदं वहुमोहतामरुचिता निद्रां तनौ पांडुताम् ॥ ५४॥ त्वचाप्राप्तहुएवातज्वरलक्षण । कुर्यात्त्वचिस्थः पवनज्वरोनिशं रोमोद्गमं रौक्ष्यत्वगक्षिमीलनम्। जृम्भांगमर्दश्रवणाक्षिवेदनां विण्मूत्रवर्धे मुखमिष्टतारतीय ५५॥ अर्थ-और जो वर किसीवस्तुके छूनेसे अथवा सूंघनेसे वा देखनेसे होय वह उसी नामसे विख्यात होताहै ऐसे रोगके जाननेवाले कहते हैं ॥ ५२ ॥ श्वासका ज्यादा चलना, गला कफके समूहसे रुकाहो, और जो मुखसे झाग गेरे, नाडीका जोरसे चलना, खांसी, इच्छाका नाश, पेटका फूलना, बेहोसी, और अरुचि, हिचकी, दस्तका होना ये लक्षण, मृत्युका प्यारा (मित्र) कालज्वरका जानना ये असाध्यहै ॥५शा'द्रव्य पुत्रादि:स्त्री भैया सुहृद इनके नष्टहोनेके शोकसे जो ज्वर होताहै उसके ये लक्षण है शरीरमें शिथिलता, मनका बिगडजाना, श्वास, वेर २ मे दुःखका होना, शरीर गीलेकपडेसे पोंछासाहो, बेकली, बहिरापना, मूर्छा, तथा बल तेज इनका नाश होना, पसीना बहुतहो, बेहोसी, अरुचि, नीद, शरीरपीला ॥ १४ ॥ यातज्वर त्वचामें होतो ये लक्षण हों, रोमाच तथा त्वचाका रूखापन, आंखोंका मीचना, जंभाई अंगोंका टूटना, कान आंखमें दर्द दस्त पेसाबका वंदहोना, मुख, मीठा, तथा अरति ॥ ५५॥ - इसराजनिदानम् । चर्मगतपित्तज्वरलक्षण! रक्तत्वचंदाहमतीवतृष्णामास्येकटुत्वं परिदेहशोपम् ॥ ऊप्माणमा तिंबहुशीतलेच्छां पित्तज्वरश्चर्मगतः करोति ॥५६॥ चर्मगतकफज्वरलक्षण। लालामुखे गौरवमालसत्वं निष्ठीवनं शीतवपुः शिरोर्तिम् ॥ निद्रा च मूत्राधिकतां प्रलापं श्लेष्मज्वरश्चर्मगतः करोति ॥ ५७ ॥ रसगतज्वरलक्षण । पिपासाशिरोतिर्वमिः शूलमुग्रं प्रलापोंगकंपो सचिवैमनस्यम् ॥ वपुःस्वेदरोमांचितं कंठदाहो रसस्थो ज्वरो लक्षणेआयतेजेः॥५८॥ रुधिरगतज्वरलक्षण। ज्वरःशोणितस्थो भ्रमं देहदाहं सरक्तं च निष्ठीवनं ताम्रनेत्रम् ॥ शिरःपीडनं शोपमूष्माणमाति पिपासामरोचं करोतीति मूर्छाम्५९ अर्थ टाढत्वचा, दाह, अत्यन्त प्यास, मुखकडुवा, शरीरका सूखना, गरमी मालूम हो घबगह द, शीतलवस्तुर्काइच्छा ये लक्षण पित्तम्बर खचामें होय तो होते हैं ॥५६॥ नुखसे लारका बहना शरीर भारी, आलस, कफका थूकना, देह शीतल, मथवाय, निद्रा, पेशाबकाम्यादा गिरना, बद्ध वडाना, ये लक्षण कफञ्चर चर्ममें पहुंचता है तब होते हैं ॥ ५७ ॥ प्यान, नथवाय, बमन, दर्द, बडबडाना, अंगामें कंपकंपी, अरुचि, मनका बिगडना, शरीमें रोमांच, तथा पतीना, कंटमें दाह, ये लक्षणोंसे जानों कि इसके रसमें ज्वर पहुंच गया है ||१८|| जो जर रुधिरने पहुंच जाये उसके ये लक्षण हैं भौर, देहमें दाह, रुधिरमिलाथूकना, तांबेमोग्वेनेगदाल, शिरले दर्द, शेप, गरमी घबराहट, प्यास, अरुचि, और मूर्छा ॥ ५९॥ मांसगतज्वरलक्षण । भवति ज्वरे मांसगे लक्षणानि तमोष्मांगमद्दोंभ्रमो मूत्रकृच्छ्रः । वपुः स्वेदमभ्यंतरे तीनदाहस्तृपावेदना छर्दिरातिः प्रलापः ॥६०॥ मेदगतज्वरलक्षण। भवंति ज्वरे मेदगे लक्षणानि शरीतिदुर्गधिता दंतपीडा । मुहुर्मू- व्रता वह्निनाशः कृशत्वं विपादोल्पसारो रुचिः श्वासकासी ॥६॥ - .
भापाटीकासाहितम्। (१९) अस्थिगतज्यरलक्षण । ज्वरेऽस्थिप्रदेशे गते लक्षणानि भवंत्यस्थिविस्फोटेनं पर्बभेदः॥ शरीरस्य विक्षेपणं देहदाहस्तुपोप्माविलापाभ्रमः स्वेदतापौ ॥६॥ अर्थ-मांसमें जब अरपहुंच जाता है उसके ये लक्षण होते हैं अंधेरा आना, गरमीका लगना, शरीरका टुटना, भौर, पेशावका रुक २ के गिरना शरीरमें पसीना, हृदयमें ज्यादादाह, प्यास, येफली, रद्द, दुःख, बडबडाना ॥ ६० ॥ मेदामें ज्वर पहुंच जाता है उसके ये लक्षण है शरीरमें बासआना, दांतोंमें दर्द, वेर २ मूतना, जठराग्निका नाश, देहकृश, दुःख, बलका घटना, अरुचि, श्वास, और खांसी ॥ ६१ ॥ जिसका वर हड्डीमें पहुंच जाता है उसके ये लक्षण हैं हडफूटनहो, संधि २ में पीडा, देहको इधर उवर पटकना, तथा देहाँ दाह, प्यास, गरमी, विलाप, भ्रम, पसी- मा, तथा ज्वर ॥ ६२॥ मजागतज्वरलक्षण। वहिः शीतताभ्यंतरेऽत्यंतदाहः तमः कंपनं मर्मभेदः प्रलापः॥ तृषा श्वासहिवार्तयो मूत्ररोधो भवंति ज्वरे मजगे लक्षणानि ॥६॥ शुक्रगतज्वरलक्षण। ज्वरः शुक्रदेशे स्थितो मृत्युदूतस्तदाज्ञायते सप्तचिहभिंपग्भिः॥ भ्रमो वीर्यनाशस्त्वचाहीनशोफो बलोजः क्षयः श्वासकासो क्ल- मत्वम् ॥६४॥ धातुपाकीज्वरलक्षण। निद्रावलोजोसचिवीर्यनाशो हृद्वेदनागौरवताल्पचेष्टा ॥ विष्टंभ- ता यस्य किलारतिः स्यात्सधातुपाकी मुनिभिः प्रदिष्टः ॥६५॥ अर्थ बाहरसे जाडा लंगे, भीतर अत्यंत दाहहो, अंधेरा आना, कांपना, मर्म स्थानोमें दर्द, वडबडाना, प्यास, श्वास, हिचकी, बेकली, मृतकारुकना, ये लक्षण मेदामें ज्वर पहुंच जाता है तब होतेहैं ॥ ६३ । जब मौतकादुत ज्वर शुक्रयाने वीर्यमें पहुचजाय उसको वैद्य सात लक्षणांसे जान भौर, वार्यका नाश, त्वचाका हीनहोना, वल, तेज, इनका नाश, श्वास, खासी, ग्लानि ॥ ६४ ॥ नीद बल, तेज, इच्छा, वीर्य, इनका. नाश, हृदयमें दुःख, शरीरका भारीपना . N
(२०)
हंसराजनिदानम् ।
अल्पचेष्टा, दस्तकारुकना, मनका न लगना ये लक्षण जिसमें हों उसको धातुपाक मुनियोंने
.
कहाहै ॥६५॥
तथा च।
काये धातुविपाकिनां परकरस्पोंपि वजायते रात्रिः कल्पश-
तायतेल्पतरभो दीपोऽपि दावायते ॥शब्दो वाणसमायते मृदुग-
तिवातस्त्रिशूलायते यूकासूचिकुलायते तनुतमं वासोऽपि भा.
रायते ॥६६॥
ज्वरस्यदशोपद्रवाः।
ज्वरस्य प्रसिद्धादशोपद्रवाः स्युस्तृपा विग्रहश्छद्यतीसारहि-
काः॥ शरीरस्य भेदोऽरुचिःश्वासकासौ समूर्छा हि भागद्वयं ते
प्रदद्युः॥ ६७॥
अर्थ-चातुपाकी मनुष्य देहमें अन्य मनुष्यके हाथका स्पर्श वज्रके समान मान्दमपडे,अल्परोश-
नीवालाभी जो दपिक सोभी ज्वालाके समान मान्दमहो, वोलना वाणके समानलगे, मन्दगति चलने-
वाला पवन त्रिशूलके समान लगे, जुआं खटमल आदिका काटना सूई के समान लगे, छोटाभी-
वस्त्र शरीरपर भारी लगे ॥ ६६ ॥ ज्वरके उप दश प्रसिद्ध है प्यास, दस्तका बंद होना, रद्द,
असार, हिचकी, शरीरका टूटना, अरुचि, श्वास, खाँसी और मूर्छ ।। ६७ ॥
शरीरस्य वाह्ये यदाश्लेष्मवातौ भवेतां तदाशीतलं वाह्यदेशम् ॥
यदाभ्यंतरेऽभ्यंतरे शीतलत्वं भवेद्यत्र पित्तं विदाहोपि तत्र ॥६॥
यस्मिन्नंगे वायुयति तस्मिन्नंगे पीडां कुर्यात् ॥ पित्तं दाहं श्लेप्मा-
शीतं सर्वान् दोपान् सर्वे कुर्युः ॥ ६९ ॥ अंतर्दाहः प्रलापः श्वस-
नमतितृपानिग्रहो दोपवर्चः स्वेदः संध्यस्थिशूलं भ्रमविकलतनुः
. संधिदेशेषु पीडाम् ॥ अंतर्वेगस्य चिहं निगदितमपरैवेद्य-
राजैर्ध्वरस्य दाहादीनां लघुत्वं यदि भवति वहिबेंगरोगस्य
चिह्नम् ॥ ७॥
भापाटीकासहितम् ।
अर्थ-यदि यात कफ शरीरके बाहर हो तो वाहरका सत्र भाग सीतरहे, और जो यातका
शरीरके भीतरहो तो भीतरही शीतटता रहै, और पित्त जिस जगह होय तो दाहभी उसी जगह
जाने ।। ६८ ॥ जिस अंगमें वायु याने वादी हो उसी अंगमें दर्दहो और जिसे अंगमें पित्त होय उसी
अंगमें दाह होय और जिस अंगमें कम होय उसी अंगमें शीतलता होय और .जिस जगहपर जि-
तने दोपहों उतनेही रागोंको पैदा कर है दो होय तो दो, और तीन होंय तो तीन, और एक
होयतो एक ।। ६९ ॥ शरीरके भीतर दाह हो, वाहियात वकना, श्वास, अत्यन्तप्यासका रुकना,
दोपोंका बढाना, पसीना, संधियोंमें तथा हड्डियोंमें शूलका चलना, भौर ॥ ७० ॥
असाध्यलक्षण।
भवेद्यस्य दुर्गधताश्वासवाहे तथांगप्रदेशेतिकंपोविवर्णः ॥ वहिः
शीतताभ्यंतरेत्यंतदाहः सरोगी रवेः पुत्रगेहं प्रयाति ॥ ७१ ॥
कृशः पिच्छलांगो महाश्वासवाहो भ्रमो हृप्टरोमारुणाक्षोंगकंपः॥
तमो रात्रिदाहो दिवाशीततार्तिः स रोगी न जीवेत्कदाचित्सुधा-
भिः॥७२ ॥ जिह्वा श्यामतराथ कंटकयुता रात्रौ दिने जागरं
श्वासो निर्गतलोचने शिथिलता नासामुखे शुष्कता ॥ यस्यांगे
परिमंडलानि वहुशो मूर्छा प्रलापस्तमः कासो रुद्धगलो गदी स
गदितोऽसाध्यो भिपग्भिः परैः ॥ ७३ ॥
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अर्थ-एसा रोगी रविका पुत्र जो यमराज ताके घर जाताह कैसा कि, जिसके श्वास निकसनेमें
घास आवे, तथा शरीरमें अत्यन्त कँपकँपी, शरीरका विवर्ण, बाहरसे शीतलता, और भीतर
अत्यन्त दाह ।। ७१ ॥ कृश, पिच्छलदेह, बडी २ श्वासकाचलना, भ्रम, हृष्टरोम, लालनेत्र, अंगसे
कंप, अँधेरेका आना, रातमें दाह होना, दिनमें जाडा लगना, तथा दुःख, ऐसा रोगी अमृत करके
भी नहीं जीवे ।। ७२ ॥ जीभ जिसकी काली और काँटेसे व्याप्त, दिनरात जागना, श्वासका चलना,
नेत्रों में सुस्ती, नाक मुख सूखना, जाके देहमें रुधिरके चकता पडगये होय, मूर्छा, बडबडाना,
अंधेरा आना, ग्वांसीसे गलेका रुकना, ऐसा रोगी वैद्योंने असाध्य कहाहै ।। ७३ ॥
भवेद्यस्य नेत्राश्रुपातोगहीनो मुखान्नासिकायाः पतेद्रक्तधारा॥मु-
खं कुंकुमाभंगले कर्णमूलं सरोगी न जीवेत्कदाचित्प्रयत्नैः॥७॥
(२२) हंसराजनिदानम् । कृशस्थूलता स्थूलतायाः कृशत्वं स्फुटन्नेत्रगोलं स्वभावोऽन्यथा स्यात् ॥ शरीरार्द्धशूलं खचाहीनशोफो गमिप्यन्सरोगी यमस्या लयं वै॥७५॥गदी जिह्वया यो रसं वेति नैव श्रुत्तिभ्यां न शब्द न नेत्रेण रूपम् ।। त्वचास्पर्शमुग्रं नसा नैव गंधं सरोगी न जीवेत्स हरे रुपायैः॥७६ ॥ अर्थ-नेत्रोंसे आंशू गिरे, शून्य देह, मुख नाकसे लोहका गिरना, मुंह जिसका लाल, गटेमें कर्ण- मूल रोग हो, वह रोगी कदाचित् यतनोंसे न जोये।७४॥श तो मोटा और मोटा कृश और नेत्रों के गोल फटेसे मालूम हो स्वभाव पलट जावे, आधे शरीरमें शूल चले, त्वचाहीन लिङ्गेन्द्री हो, वह रोगी यमराजके घर जायगा ॥७९॥ जिस रोगीको जीभसे स्वाद न मालूम हो, और कानोंसे शब्द न सुने, और नेत्रोसे जिसे दीखे नहीं, त्वचा स्पर्श न मादम हो, नाकसे गंध न मालूम हो, ऐसा रोगी हजार उपाय करने परभी नहीं बचेगा ॥ ७६ ॥ भवेद्यस्य बाह्यांतरे शीतगात्रं न जीवेद्गदी चंडरश्मेः सुताभ्याम्॥ प्रलापें शिरश्चालनं यः करोति सुपेणादिवैद्यैरसाध्योनिरुक्तः॥७॥ गतायुर्मनुष्यो न पश्येत्स्वजिह्वां ध्रुवं नासिकायं वशिष्ठस्य भा. र्याम् ॥ स्वकीयां च छायां विशीर्षांसरंध्रां भृशं याति नाशं नरो- योनुपश्येत् ॥ ७८॥ स्वरो यस्य हीनो गुदा यस्य भृष्टा शरीर कृशत्वं वलौजोविहीनः॥ निमग्नेक्षिणी संभ्रमः श्वासकासौ स रोगीयमस्यालये याति शीघ्रम् ॥७९॥ अर्थ-जिसका वाहर भीतर शीतल शरीर हो, यह रोगी चंडरश्मिजो सूर्य तिसके पुत्र जे अश्विनी कुमार तिन करके न जीवे तथा बडबडाना शिरका इधर उधर पटकना, जो रोगी करे वह मुपेणनादि वैद्यों करके असाध्य कहा है ॥ ७७ ॥ मरनेवाला मनुष्य अपनी जीभ ध्रुवका तारा नासिकाका अप्रभाग अरुंधती इनको नहीं देखे, तथा अपनी छायाके मस्तक नहीं देखे, तथा अपनी छायामें छेद दीखे, वह रोगी निधा मरे ।। ७८ ॥ स्वर जिस रोगीका मंदहो गुदा जिसकी भ्रष्ट, शरीर कृश, तथा निर्बल और तेजरहित नेत्र, जिसके भीतर घुसजाय, संभ्रम, श्वास, खाँसी ऐसा रोगी यमपुरको जस्दी जाये ॥ ७९ ॥ - - भाषाटीकासहितम् । (२३) रुदतिहसतिगीतंगीयतेक्वापिकालेश्वसितिमुदातिचित्तेभापतेदुर्व- चांसि॥प्रलपतिपरिदेवंवादते नृत्यतेयोवहतिवहुलतापंयास्यतेम- त्युववे ॥ ८॥ अथ रोगमुक्तस्यलक्षणम् । विमुक्तरोगस्य नरस्य लक्षणं विड्वंधमोक्षौ मनसि प्रसन्नता॥ देहे लघुत्वं रसनातिकोमला स्वल्पा तृपेच्छा रसभोजने भवेत्॥८॥ उरसि शिरसि कंडूरात्रिनिद्रांवगुंजा भवति विशदचेतः स्वल्पतृ- ष्णांगरौक्ष्यम् ॥ मुखकरणविपाकः खेदयुक्तं शरीरं कृमिमलपरि- पूर्ण रोगमुक्तस्य चिह्नम् ॥ ८२॥ अर्थ-रो, हँसे, कभी गीतगावे, श्वास ले, कभी चित्तमें प्रसन्न हो, कभी खोटा वोल, बट- वडावे, कभी वेदनाहो कभी ताली बजावे, कभी उठकर नाचने लगे, और जर बडे जोरसे हो वह रोगी निश्चय मोतका ग्रास होवे ।। ८० ॥ नीरोगी रोगहीन मनुष्यके ये लक्षण हैं दस्त खुलकर हो मन प्रसन्न, हलका शरीर, जीभकोमल, प्यास कम, रसभोजनमें, इच्छाहो ॥ ८१ ॥ हृदयमें और माथेमें खुजालचले, रातमे अच्छी तरह नींद आवे, आंतोका बोलना चित्त प्रसन्न अल्पप्यास शरी- ररूखा, मुख और कानका पकना, पसीनेका आना, मलकीडोंसे परिपूर्ण, ये रोग दूर हुयेके लक्षण हैं। ८२॥ शीतंगुदयस्यशुभाचदृष्टिश्चैतन्यकायःकफहीनकंठम् ॥ स्वल्पांग- तापो रसनातिशुद्धा शीर्षे लघुत्वं स रुजा विमुक्तः॥८३॥ तारुण्यं विदधातिपट्सु दिवसेष्वायेपुघोरज्वरस्तस्मिन्नोपधमुत्कटं गदह- रोदद्यान्नकाले क्वचित् ॥ दोपोपद्रवसंयुतेतितरुणे देयं झटित्यो- पधं वार्धक्यं दिनपंचकेपु पुरुतो जीर्णज्वरोऽतः परम् ॥ ८४ ॥ ज्वराणांस्वरूपाणि। वीभत्सस्त्रिशिराबरोथ कपिलो भस्मप्रहारस्त्रिपात् पिंगाक्षाथ महोदरोऽथ परतो रौद्रोज्वलद्विग्रहः॥ शंभोःश्वाससमद्भवाभयक- (२४) हंसराजनिदानम् । रा दक्षकतोव॑सकाः घोराघरनादिनो मुनिवरेः प्रोक्ता ज्वरा- स्तेऽष्टधा॥ ८५॥ अर्थ-दीतल तो गुदाहो,शुभजिसकीदृष्टि, शरीरमें चैतन्यता,ककरहितकंठ, दहमें मदगरमी, जाम शुद्ध शिरहलकाय ये लक्षण गतरोगके है|८||आदिके छः दिनमें तो घोर ज्वर तरुण होताहै,तिसमें करडी रोगहती, दवाई कभी न दे, और कदाचित् तरुण ज्यरमें दोषोंका उपद्रवहो तो जल्दी दवाई देवे तोछः दिनसे परे पांचदिनतक ज्वरको बूढा कहतेहैं इस उपरांत अर्थात् ग्यारहदिन उप- रांत जीर्णज्वर कहाताह||८||द्रके श्वाससे पैदा हुऐ भयके देनेहारे दक्षप्रजापतिके यज्ञक विगाडने- वाले घोर घर घर नादके कर्ताधर मुनीश्वरोंने आठतरहके कहे, सो लिखतह १ वीभत्स, २ त्रि- शिरा, ३ कपिल, ४ भस्मप्रहारी, ५ त्रिपात, ६ पिंगाक्ष, ७ महोदर, ८ जलविग्रह ये ।। ८५|| वीभत्सज्वरस्वरूपमाह । वीभत्सोरुधिरारुणांवरवृतो मुण्डास्थिमालाधरो रक्ताक्षः कृ- मिसंकुलस्त्रिनयनो दुर्गधिपूर्णोनिशम्॥नग्नो रुद्रसमुद्भवोतिबल- वान्कोपो जगद्घातकः कृष्णांगो मलिनो मदान्धदमनः पूष्णो- द्विजध्वंसकः॥८६॥ अथत्रिशिराज्वरस्यलक्षणम् । अभूदक्षविध्वंसरुद्रप्रकोपात् त्रिशीर्षस्त्रिपानंदनेत्रोतिकायः॥च- लजिह्वया सृक्किणीलेलिहानो वृहत्तालुजंघोरुणाक्षोतिक्रोधी॥८७॥ अभूगुन्द्रकोपाज्ज्वरः कापिलाख्यो मुखांगारपुंजोद्गिरन्दीर्घकायः ॥ मदापूर्णिताक्षः स्फुरत्ताम्रकेशो महामेघगजों मनोहर्पहर्ता ॥८॥ -- अर्थ-रुधिरसे रंगे हुये वस्त्रोंको पहिरै, मुण्ड और हड़ियोंको मालाका धारणकरने वाला,लाल२ नेत्र, कृमिस जिसकी देह व्याप्त, तीन नेत्र बासजिसकी देहमें सदाआतीहै, नंगा, रुद्रसे पैदा हुआ अतिबली कोपवान् जगत्का घातक, कालेरंगका, मलिन, मस्तोंको सीधा करनेवाला, पूपादेवताके दांतोंका तोडनेयाले ऐसा बीभत्स ध्वर है॥८६॥श्रीमहादेवके कोपसे तीनमाथेका त्रिशिरा नाम चर दक्षका मारनेवाला, हुआ, तीन जिसके पाप, नयनेत्र, अत्यन्तलंबी : चलायमान छुरासी जामसे ओटोंको चाटता, बडे ताल वृक्षके समान जंघा, लाललालनेत्र, अत्यन्तकोधी ॥ ८७ ॥ रुद्रभग-
भापाटीकासहितम् ।
वान्के कोपमें एक कपिलनामक विख्यात ज्वर पैदा हुआ, मुखमेंसे अंगारोंकी उलटी करता,
अतिलंबा, मदमें चलायमान नेत्रहैं जिसके, प्रकाशमानतांबेके समान वाल हैं, जिसके, घोर मेघको-
सीगर्जना करनेवाला मनके हर्पका दूर करने हारा ॥ ८८ ॥
भस्मविक्षेपकज्वरलक्षणम् ।
अभूद्भस्मविक्षेपको रुद्रकोपात् महाहाहासो मुहूर्तृम्भमाणः ॥
चलत्सप्तजिह्वःकरालोग्रदंष्ट्रःस्फुरत्तप्तताम्रारुणः श्मश्रुकेशः॥८९॥
त्रिपाद्भुद्रकोपाहभूवारुणाक्षोभृगोः श्मश्रुविध्वंसकः स्तब्धकर्णः॥
ज्वरो दीर्घकायो मुहुः श्वासकर्ता रणे नृत्यमानोंगदाही
तृषार्तः॥९०॥
त्रिपादज्वरस्यस्वरूपम् ।
अभूद्वीरभद्रेश्वरादुत्कटास्यो ज्वरः पिंगनेत्रोल्पजंघोग्निवर्णः॥तृपा-
द्विजिह्वो नृसिंहोद्वितीयश्चलत्तीबकेशः कृशःशुप्कमांसः॥९॥
अर्थ-श्रीरुद्रके कोपसे एक भस्मविक्षेपक ज्वर पैदाटुआ महान् अट्टहासकाकरने वाला,बेर २में जंभा
ई लेता, चलायमान, सातछुरो सी जभिहै,भयानक कोलासी टाढ, प्रकाशमान तपाये तांबेके समा
नहै डाढी और बाल जिसके ॥ ८९ ॥ श्रीरुद्रके कोपसे एक त्रिपादनामक स्वर पैदा हुआ तीनपैर
लालनेत्रवाला, और भृगुको डाढीका उखाडनेवाला, खडे कान जिसके वडी देह जिसकी वारवार
बासका कर्ता, संग्राममें नाचनेवाला, शरीरमें दाहका तथा प्यासका कर्ता ॥९०॥ वीरभद्र गणसे
एक पिंगाक्षनामक ध्वर पैदाभया बडेमुख, छोटी जांघ, अग्निसरीखा वर्ण, प्याससे दुःखी, दोजीभका
मानो दूसरा नृसिंहहीहै चलायमान तोखेबाल कृश सुखाहुआ शरीरका मांस जिसका ॥११॥
महोदरज्वरस्पस्वरूपम् ।
बभूवातिदीर्घोदरोलंबकर्णो ज्वलदग्निरूपश्चलद्रक्तनेत्रः॥ तृपा-
श्वासजृम्भान्वितांगप्रमर्दो भटेशोज्वरोरक्तवर्णः प्रमत्तः ॥ ९२ ॥
पिंगाक्षकास्वरूप।
ज्वलद्विग्रहोमुक्तकेशश्चलद्भूस्त्रिशूलासिहस्तोभुजंगेशपाशा ज्व-
रेशोतिवीर्योहरश्वासजातः कृशः शुष्कमांसोवलीभैरवेशः ॥९॥
भापाटीकासहितम् ।
(२७)
कफातिसारकेलक्षण ।
सकष्टगुदातःपुरीपप्रवाहश्चलस्फेनिलोमेदुरोदुष्टगंधिः ॥ हरि-
च्छेतकृष्णाकृतिःकष्टसाध्योभवञ्चिह्नमेतत्कफस्यातिसारे ॥३॥
अर्थ-तृपा, ग्लानि, अत्यन्त हृदयमें, पेटमें, गुदामें, घोरदर्द, तथा दाह, थोडा २ मलनिकसे.
सब न निकसे, भीतरदाहहो, श्वास, अरुचि, देहमें बेकली, मुख, नाक इनका अत्यन्त सूखना, ये
लक्षण वातातिसारके पहले ऋपि तथा वैद्योंने कहेहैं ॥ १ ॥ दस्तजिस रोगीका चित्र विचित्ररंगका.
निकसे तथा सहतके रंगका वा वसाके रंगका निकसे और दुर्गंधयुक्तहो बारवारमें तत्ता जावे कंप तथा
संतापके साथ और शूल दाह ये गुदाके द्वार पर हों तथा हृदय नाक मुग्ध इनमें शोपहो प्यास और
अनायासश्रमहो ये लक्षण ऋपिनमें श्रेष्ठ अत्रि और भरद्वाजादिकाने पित्तातिसारके कहेहैं ||२जिसके
दस्तकाप्रवाह गुदासे वडेदुःखसे जावे जिसमे झागहो चिकनाहो दुष्टगंधहो हरा श्वेत काला वर्णही यह
कष्ट साध्य कफातिसारके लक्षणहैं ॥ ३ ॥
सन्निपातातिसारलक्षण।
अतीसारेसारे कफपवनपित्तप्रजनिते गुदे पाश्व कुक्षौ जठरहृदये
शूलमरुचिः॥ मुखे कंठे शोपो भवति सततं छर्दिररतिस्तृपा-
कासः श्वासो वपुपि परिशोफोङ्गदहनम् ॥2॥
रक्तातिसारकेलक्षण ।
वारंवारं पुरीपं भवति सरुधिरं कंठताल्बोष्ठशोपो बस्ती पादे
प्रपीडा हृदि जठरगुदे पार्श्वदेशेषुशूलम् ॥ ग्लानिः काये कृशत्वं
परिगलिततंनुनिलवं शरीरे रक्तातीसारचिहं प्रवरमुनिजनैः
प्रोक्तमेतन्नितांतम् ॥५॥
आमातिसारकेलक्षण।
आमं स्वल्पं पुरीषं सितरुधिरनिभं पीतवर्णं सकष्टं वारंवार
प्रतप्तं प्रचलति गुदतः पूयदुधियुक्तम् ॥ स्निग्धं शूलं गुदाने
प्रभवति परितः फेनिलं पिच्छिलं वा आमातीसारचिह
मुनिवरवचनात्कीर्तितं हंसराजेः॥६॥
. (२८) हंसराजनिदानम् । अर्थ-बात पित्त कफसे पैदा हुआ घोर अतिसार उसमें ये लक्षण होते हैं-कि गुदा, पीट, फूख, 'पेट, हृदय इनमें शूलका चलना, अरचि मुख कंटका सूखना, रद्द, तथा मनका न लगना, प्यास खांसी, इवास, शरीरमें सूजन, शरीरका दहन ॥ ४ ॥ वारंवार दस्त रुधिर मिलाहुआही कंठ तालू ओठ इनका सूखना मूत्रस्थान तथा पैरोंमें पीडा हृदयमें पेटमें गुदामें पीटमें शूल तथा ग्लानि शरीरका यश तथा गलना तथा निर्वलहोना ये लक्षण रक्तातिसारके मुनीश्वरोंन निश्चय करके कहे हैं ॥ ५ ॥ आममिला थोडा २ दस्तहो श्वेत तथा रुधिरके समान तथा पीला वर्ण साथ कटके दस्तहो बारंबार तत्ता गुदासे रांध दुर्गध युक्त चिकना, गुदाग्रमें पीडा, तथा झाग युक्त और गाढ, । लक्षण आमातिसारके मुनीश्वरोंके वचनसे हंसराजने कहे हैं ।। ६ ॥ अतिसारकाअसाध्यलक्षण । अतीसारिणं तं त्यजेच्छीतगात्रं तृषाशोथशूलान्वितं श्वासयुक्तम् ।। ज्वराधमानहिकान्वितं दाहमू गुदापृष्ठशोषार्तिकासादिजुष्टम् ७॥ अतिसारकीउत्पत्ति। विरुद्धाशनैः स्निग्धदुग्धान्नदोवस्नेहदुष्टांम्बुमद्यादिपानैः॥ गरिष्टाम्लपिष्टैः कृमीणां विकारैरतीसाररोगो भवेन्मानवानाम् ॥८॥ अतिसारेपथ्यम् । अतीसारे त्यजेत्स्नानं संतापं वह्निसूर्ययोः ॥ तैलाभ्यंगं च व्यायाम गुरुस्निग्धादिभोजनम् ॥९॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रेअतीसारलक्षणं द्वितीयम् ॥ अर्थ-ऐसे अतिसार मनुष्यको वैद्य इलाज न करे कैसेको कि जिसका शीतल शरीरहो प्यास शूल युक्तहो श्वास ज्वर आफरा हिचकी सूजन इन करके युक्तहो दाह मूर्छा तथा कांचका निक- टपडना शोक दुःख खांसी युक्तको ॥ ७ ॥ विरुद्ध भोजन करनेसे चिकनी तथा दूध तथा अन्न इनके दोषसे पतली तथा तेलकी तथा दुष्टजलके पीनेसे मदिरादिके पीनेसे भारी खट्टा तथा पीसा अन्नक खानेसे और मीनके विकारसे मनुष्यको अतिसार रोग पैदा होय है ।। ८॥ अतिसारवा- लामनुप्प ये काम न करे नहाना अग्नि और सूर्य इनके तेजका सहना तेलका लगाना तथा कसरत कुस्तीका करना भारी चिकना आदि भोजनका करना ॥९॥ इतिहंसराजार्थबोधिनीभापाटीकामें अतिसारनिदानपूर्णहुआ ॥ ...
भाषाटीकासहितम् । (२९) अथसंग्रहणीनिदानम् ॥ वातसंग्रहणीलक्षणम् । वातोत्थोग्रहणीगदःप्रकुरुते .विड्वंधनं मूर्छनं कासं श्वासतरं मुखं च विरसं कंपं शरीरे भृशम् ॥ कुक्षौ तालुनि मस्तके हृदि गले शोयो गुदे वेदना कप्टं प्रच्यवते पुरीपमशकृत्सामंसशब्दं घनम् ॥१॥ पित्तसंग्रहणीकेलक्षण । चिहं पित्तग्रहण्यांभवति हृदये कंठदेशेतिदाहः शूलं.मेट्रे गुदाने रुधिररतिरतः शुष्कफेनं पुरीषम् ॥ तुच्छं तुच्छं सकष्टं क्वचिदपि- बहुशो दुष्टगंधिप्रयुक्तं पीतं वा कृष्णरूपं वससदृशनिभरोमहर्पो- तितृष्णा ॥२॥ कफसंग्रहणीकेलक्षण। कफसंग्रहणीकुरुते हृदये जडतामुदरे गुरुतामरुचिम् ॥ मनसि भ्रमतांगरुजं शिथिलं सितफेनयुतं च पुरीपमरम् ॥३॥ अर्थ-बादासे प्रगट संग्रहणी दस्तको बंद कर है मूळ, खांसी, श्वास, मुखबेरस, शरीरमें कंप, कोख तालुआ माया छाती गला इनका सूखना, कष्टसे थोडा २ विष्टाका त्यागहोना आम मिला दुभा सदके M4 ओर पला ।. १॥ पिनको, संग्रहणक ये लक्षण है. हृदय, मोर कायमें, दाह, लिंगौमूल, गुदाके अप्रभागसे रुधिरका गिरना, सूखा तथा झागमिला तथा कष्टसे थोडा २ कभी ज्यादा बासको लिये पीला वा काला वा बसाके समान दस्त हो, रोमांच .तथा प्यास हो ॥२॥ काकी संग्रहणीमें हृदयका जकटना, पेटका भारोहोना, मनमें अचि, भौर, देहमें दुःरा तथा शिथिलता, सपेदागोंका मिटा दस्त, ये रक्षण कफसंग्रहणीके होते हैं ॥३॥ त्रिदोपसंग्रहणीकेलक्षण। ग्रहण्यां त्रिदोपोद्भवायां संकष्टं पुरीपद्रवं शब्दयुक्तं वसाभम् ।। भवेदल्पमल्पं क्वचिद्रक्तवर्ण गरिष्टोदरं दुष्टदुगंधिमिश्रम् ॥ ४ ॥ , . हंसराजनिदानम् । सन्निपातकीसंग्रहणी। 'विष्टंभं ग्रहणीगदः प्रकुरते दोपैस्त्रिभिः संभवो घेरस्य शिरसि व्यथा गुरुतमां शूलं गुंदापीडनम् ॥ आलस्यं हृदये गुरुत्वमरुचि कासं तृषासंभ्रमं श्वासाध्मानविवर्णतोदरकृमीन् दाहं करांध्यो- मिम् ॥ ५॥ अतीसारे. गते मंदं वह्नींच्छाद्यातिभोजनः । वर्तते यो भवेत्तस्य ग्रहणी दारुणाभृशम् ॥ ६॥ अर्थ-सन्निपातसे पैदाहुई जो संग्रहणी उसमें ये लक्षण होते हैं साथ कटके और शब्दके दस्त- का होना, तथा वसाके समान और थोडा२ कभी लालरंगका, पेटभारी रहे, और वासमिला दस्त हो ॥४॥ पेटमें आफरा करती है तथा मुखमें विरमता, शिरमें दर्द, और शूल तथा गुदा पीडा, आलकस, हृदयका, भारीहोना अरुचि, खांसी, प्यास, भौर स्वास, पेटका फूलना, शरीर बुरेरंगका होजाय पेटमें कृमी, हाथ पावोंमें दाह, और यमन ॥५॥ जब अतिसार चलाजाय और जठराग्निका इच्छा अति भोजनसे बंदकरदे उसके घोरसग्रहणी होती है ॥ ६॥ संग्रहण्यांपथ्यम् । व्यायाम मेथुनं रूक्षं भोजनं वह्नितापनम् ॥ तैलाभ्यंगदिवा- स्वाप ग्रहणीरोगवांस्त्यजेत् ॥७॥ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृतेवैद्यशा- स्त्रेग्रहणीलक्षणं तृतीयम् ॥ अर्थ-स्त्रीसंग, रूखाभोजन, आंचसेतापना, तेल लगाना, दिनमें सोना, ये संग्रहणी रोगवाला न्यागः ॥ ७॥ इति माथुर दत्तरामकृत हंसराजार्थबोधिनी टोकामें संग्रहणारोगलक्षम समाप्त हुआ। अथर्शनिदान। गुदाग्रेषु जातानि मासांकुराणि चतुस्त्रीणि संख्यानि संगानि यानि ॥ भवन्तीति दुर्नामसंज्ञानि नूनं मरुच्छेष्मपित्तोद्भ- बानीहतानि-॥१॥ वातकीयवासीरकेलक्षण । शुष्कावातसमुद्भवाश्चिमिचिमास्तब्धागुदस्याकुरा मलानाः श्यामतराः सराश्च विकटा नीलाः सिताभाः क्वचित् ॥ स्वर्जू- मापाटीकासहितम्। (३१) राकृतयोंधिहस्तसहिताः शीर्पाननाःसंयुता भिन्ना विस्फुटिता- नना ज्वरकराः पायूस्थिता दुःखदाः॥२॥ वाताशासि कृशत्व- मेव बहुलं कुर्वन्ति विड्वंधनं क्षुन्नाशं बलवीर्यकांतिहरणं शूलं- गुदापीडनम् ॥शोपं कंडुरुजं विकारमधिकं शब्दं गुदातोनिशमा- ध्मानं जठरव्यथां गुरुतमांप्लीहं तनौ पांडुताम् ॥३॥. अर्थ-गुदाके अप्रभागमें हुये तीन या चार मांसके अंकुर अंग करके सहित खोटा नाम(संज्ञा) जिनकी ऐसे यातपित्त कफसे पैदा होते हैं ॥ १ ॥ बादीसे पैदाहुए ये जो गुदाके मस्से उखडेहों सवहीं चिमचिमीलिये हों टेढेहों कुहिलाये हुयेहो कालेही खरदरे बाँक लीले सुपेदहों खजूर फलक सदृशहाँ हाथ पैर शिर मुँहके चिह्न संयुक्तहों अलग २ फटे मुखके बर करनेवाले गुदामें प्रकट दुःखके देनेवाले हैं ।। २॥ बादीकी बवासीर मनुष्यको कृश कर है, तथा दस्तको बंदकरै, भूखको बंदकर, बलबीर्य तेजको दूरकरैहै, शूल,पेटमे गुदामें दर्द, शरीरको सुग्खावे, खुजली चलै, दुःखकर, अधिक विकार तथा गुदासे शब्दके साथ अधोवायु चले, आफरा, पेटमें भारी, व्यथा, नीह, शरीरपीलाकरे है ॥ ३॥ पित्तकीबवासीरकालक्षण। गुदांकुरास्तु पित्तजा भवंति पक्वविवभाः स्रवति रक्तमुल्वणं च मासिमासि मेदुराः ॥ अजाविशूकरीशुनीगवांस्तनोपमा हि ते स्वरा जलौकिकामना महत्सुदोपसंभवाः॥४॥ स्वल्पास्व- ल्पतरं पुरीपमरति विड्बंधनं कूजनं कष्टं वातसमन्वितं सरु- विरं शूलं गुदागर्जनम् ॥प्लीहं वीर्यवलक्षयं शिथिलतां गुल्मांत्र- हिं भ्रमं पित्ताास्यरुचिं तृपा बहुतरां कुर्वत्यनाहं श्रमम्॥५॥ कफयवासीरकेलक्षण। कंबाढयागुदसंभवाःखरतरामांसांकुराःपिच्छिलाः स्तन्याः श्वेत- निभा मृगौस्तनसमाःस्निग्धाश्च स्पर्शप्रियाः ॥ स्थला मूलढा भवंति मिलिताः कार्पासयीजोपमा वंध्यावद्धमाखा व्यथादि- जनकाः पापोद्भवा दारुणाः ॥६॥ अर्थ-पित्त यवासोरके मस्से पके कंदूरी फलके समान हो, मिनाक, महाना नहर छिपाहुआ, बकरी, शूकरी, कुतिया, गो, इनको थनोंक ममा, दो जोड (३२) हंसराजनिदानम् । . - . , . , आकारहों ये बहुत दोपसे होते हैं ॥ ४ ॥ पित्तको बवासीर दस्तको बहुत कम निकारे, मन कहीं न लगे, दस्तका बंद होना, गूंजना, कष्ट पूर्वक अधोवायु रुधिरके साथ निकसना, शूलके साथ गुदाका गर्जना, प्लीह वीर्य बलका नाश, शिथिलता, गोला, अंत्रवृद्धि, भ्रम, अरुचि, प्यास ज्यादा, अनाह, श्रम, ये लक्षण पित्तको बवासीरके हैं ॥ ५ ॥ गुदाके मस्सोंमें खुजली चलं खरदरहों और गाढे टेढेहों, सपेदहों, मृगीके स्तनोंके समानहों, चिकनें और सिराना प्रियलगे, स्थूल, दृढ जडवाले, कपास बीजके: समानहों, रुधिर न निकले, वमुखयाले, दुःखके देनेवाले, पापसे उठे दारण ॥६॥ कफकीबवासीरकेलक्षण । संकोचं गुदवंधनं च जठरे कुर्वत्यनाहं दृढं तुच्छं कष्टतरं पुरीप- मसकृन्निद्रां तनौ पांडुताम्।।आध्मानं गुरुतां भृशं शिथिलताहर्पक्ष यंक्षीणतां श्लेप्माऑसि शिरोरुजं बहुतरं जाड्यम्बलौजःक्षयम् ७॥ सन्निपातबवासीरकालक्षण। अर्शास्यसाध्यानि गुदोद्भवानि त्रिदोपजातानि समस्तरोगान् ॥ तन्वंति कार्य रुधिरं स्रवंति दहति वीयं ददतीह दुःखम् ॥८॥ वातकीयवासीरकापथ्य। त्यजेदर्शसा संयुतो वातजेन नरः सर्वदा मैथुनं रूक्षभोज्यम् ॥ कपायं श्रमं मद्यपानं विदाहि जलस्यावगाहं वहिःस्वापमेतत्॥९॥ अर्थ-गुदाका बंधन, तथा संकोच, उदरमें आनाह, थोडा कटके साथ मलका त्याग, नींद- तथा पीलिया, आफरा, भारीपना, शिथिलता, हर्षक्षय, क्षीणपना, मथवाय, बलतेजका क्षय, ये कफकी बवासीरके लक्षणहैं ।। ७ ॥ त्रिदोपसे पैदा हुई बवासीर सब असाध्यहैं, और सबरोगोंको पैदा करहै, कृशताको पैदाकरे. रुधिरको ज्यादा निकारे, वीर्यको दहन करे, दुःखको देय ॥ ८॥ वातकी बवासीरवाला मैथुन, रूसा भोजन. कसेली वस्तु, श्रम, मद्यपान, दाहक वस्तु, जलमें घुसिके न्नान, बाहरका सोना ये त्यागदेव ॥९॥ पित्तकीयवासीरकापथ्य। पित्तजेनार्शसा युक्तस्त्यजेरक्षारोष्णभोजनम् ॥व्यायामं सूर्यसंतापं कट्वम्ललवणानि च ॥ १० ॥ .
भापाटीकासहितम् । , - कफीबवासीरकापथ्य । कफार्शसायुक्तनरः प्रयातं जलावगाह मथुराग्लशीतम् ॥ त्यजेद- तिस्निग्धगरिष्ठभोज्यं स्वापं दिने जागरणं रजन्याम् ॥ ११॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृत वैद्यकशास्त्रे अर्शसालक्षणं चतुर्थम् ॥ अर्थ-पित्तको बबासीरवाला मनुष्य इतनी वस्तु त्यागदेव, क्षार मिला अन्न तथा गरमभोजन दंडकसरत, सूर्यके घाममें डोलना, कवी खट्टी चरपरी मोनकोवस्तु ॥ १० ॥ कफी बवासीरवा- ला नर, हवा, जलमे घुसकर नहाना, मीठीवस्तु, शारी, तथा खट्टी, अति चिकनी, भारीवस्तुका भोजन, दिनमें सोना, रातमें जागना, त्यागदे ॥ ११ ॥ इतिहसराजार्थबोधिनी टीकामें बवासीर रोग लक्षण समाप्त हुआ । भगंदरलक्षणम् । गुदतः परितो द्वितयेंगुलके पिडिकार्तिकरोरतिकृज्ज्वरदः ॥भग- दारणको रुधिरेण युतो मुनिभिर्गदितस्तु भगंदररुक् ॥१॥ वातकभगंदरकालक्षण । भगंदरो मरुद्भवो रुजां करोति दारुणो ह्यपानवातसंभवो गुदंप्रपी- डयेन्निशम् ॥ करोति पेडिकाशतं विपाकदाहसंयुतं बणैश्च रोधि- री नदी पुरीषमूत्रवंधनम् ॥२॥ पित्तजनितभगंदरकेलक्षण । भगंदरोतिदारुणः करोति पित्तजोऽहितं गुदे च पेडिकारुणाविपा- कदुःखभूमिका ॥ अनेकधामुखाखरास्तुपूयशोणितावहाः कटो व्यथामनेकधामपानकोफ्तो भवाम् ॥३॥ अर्थ-गुदाके चारो तरफ दूसरे अंगुलमें मरोरी दुःखकी देनेवाली आर्तिकी करनेवाली ज्वरको करनेवाली भग और गुदाके बीचमें भगकोसी तरह भगदारणक रधिर युक्त होताहै इसीसे मुनियोंने इसका नाम भगंदर कहा है ॥ १ ॥ वादीसे और अपान वायुसे उत्पन्न जो चोर भगंदर यो दारण पीडा कर है, और गुदामें अत्यन्त दुःखहो, 'और सैकडों मरोरी गुदाके . .
हंसराजनिदानम् । ऊपर करें, और वै पकजाये तथा दाहहो और घावहोजाय, रधिर यहै, दस्तपेशाबका बन्द होना, ये लक्षण होते हैं ॥ २ ॥ पित्तसे पैदा जो मतिदारण.मगंदर उसके ये लक्षणहै दुःवहीं, गुदाक ऊपर लाल २ मरोरीहों, और ये पफिजाये, खेदको पैदार अनेफमुखहीं, करडी हो, राबधिर जिनसे सवे कमरमें दर्द हो, यह भी अपान वायुको कोपसे पैदाहोताहै ॥ ३ ॥ गुदाते पिडिकां कुर्याद्भगंदरगदोनिशम् ॥ केंडशोपं व्यथां पाके रक्तपूयहवाः कृमीन् ॥ ४॥ सन्निपातजनितभगंदरलक्षणम् । आहुस्तंच भगंदरं कफमरुत्पित्तोद्भवं पण्डिता विस्फोटैर्दहते गु- दंकृमिकुलैरत्यामिपं योनिशम्।। पक्वैश्छिद्रसमन्वितैःसरुधिर पूयं स्रवत्यामिपं शोथं कंडुरुजादिकं वितनुतेऽपानेन विड्वंधनम् ॥५॥ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यकशास्त्रे भगंदरलक्षणम् ॥ अर्थ-भगदरका रोग-गुदामें मरोडी पैदाकरे, और उनमें खुजलीचले, तथा शोपहो, पफनमें दर्दहो, रुधिर तथा राधबहै, और कृमि पडजाय ॥ ४ ॥ जिसभगंदरमें ये लक्षणहों उसको पंडित सन्निपातका कहतेहैं जिसमें बड़े २ फोडे करके गुदामें दुःखहो और कमीनके समूहसे निरं- तर व्याकुलहो, और पकजाय तथा गुदाके वारपार छेद होजाय उनछेदोंमें राधरुधिर मल मांस नि- कसे मूजन खुजलीहो अपान पवनसे मुदाद्वारा मलका नहीं उतरना ॥५॥ इति श्रोहंसराजार्थ बोधिनी टीका भगंदररोग लक्षण समाप्तहुआ ।। अजीर्णरोगकेलक्षण। भुक्तान्नपाचितं नैव वह्निनोदरजेन तत् ॥ तस्योपरि पुनर्भु- तमजीर्ण तद्विदुर्बुधाः ॥ १ ॥ भुक्तान्नं न विपाकमेति जठरे विण्मूत्रयोस्तंभनादात्री जागरणाद् दिवातिशयनादत्यंबुपानान्न गाम्॥दुर्भक्ष्याद्विपमाशनादतिभयात्क्रोधाद्विरुद्वाशनात् मंदाग्नौ बहुभोजनाद्गुरुतराप्रवेपतश्चिंतया ॥ २॥ वाताधिके विषमतां समुपैति वह्निः पित्ताधिके भवति वह्निरतीवतीक्ष्णम् ॥ श्लेष्माधिके जठरजो हुतभुक् समंदो वाताधिकेषु समकेपु समाग्निरत्ये ॥३॥ अर्थ ई-खाया हुआ तो भन्न जटराग्नि करके पचा नहीं और तिसके ऊपर फिर, खावे उसको पंडित अजीर्ण कहते हैं ॥ १ ॥ मलमूत्रके रोफनेसे, रातमें जागना दिनमें सोना बहुत पानी पीना.
। भापाटीकासहितम् । गार्दिष्ट भोजन करना, विषम भौजनसे, अतिभयस, क्रोधक करनेसे, बिन भांजनसे, मंदास ज्यादा भोजनसे, देपसे चिन्ता करनेसे, खायाहुआ अन्न पेमें पत्रता नहीं है ॥ २॥ वाताविका विषमाग्नि पित्ताधिकसे तांदणाग्नि कमाधिकसे मन्दाग्नि और वात पित्तकफके समान होनेसे समाग्नि होती है ये चार प्रकारकी अग्नि मनुष्योंके होतीहै ॥ ३ ॥ विष्टब्धं विषमोऽनलः प्रकुरुते रोगांश्च वातोद्भवांस्तीक्ष्णाग्नि- विदधाति पित्तजनितान् रोगान् विदग्धाशनम् ॥ आमश्लेप्मस- मुद्भवान् बितनुते रोगांश्च मन्दानलो नैरोग्य हुतभुक् समोहि सततं धत्ते रुचिं मानसीम् ॥४॥ पावाजीर्णलक्षण। वातार्जीणे चिह्नमेतत्प्रसिद्ध जृम्भाशूलं क्षुत्पिपासांगमर्द॥ सा- म्लोद्गारो धूमयुक्तोतिकप्टःश्वासः शोषो मूत्रघातोष हिक्का ॥५॥ पित्ताजीर्णकेलक्षण । मृादाहः संभ्रमः शूलमुग्रं तृष्णोद्गारो धूमयुक्तोतिसाम्लः ॥ मोहः स्वेदश्छर्दनं गन्धिसांद्र पित्ताजीणे लक्षणं सद्भिरुक्तम् ॥६॥ अर्थ-विषमाग्नि आफरा और बानके रोगोको पैदाफरहै तीक्ष्णाग्नि पित्तके रोगोंको और अन्नको दग्ध करदे मन्दाग्नि कारके रोगोंको और आमको पेटा करैहे, समाग्नि नैरोग्य और चिका पैदा करैहे इमामे यह समाग्नि अग्नि श्रेष्ट है ॥ ४ ॥ वातके अजीर्णमें ये लक्षण होते हैं, जमाई, शूल, प्यास, धूमयुक्तखटीडकार, भूख अगोंका टूटना, अतिकष्ट, श्वास, शेप, मूत्रयात, हिचका ॥4॥ एवं मूळ, दाद, श्रम घोर मूल, प्यास, धूमयुक्त पट्टी टकार, बेहोसी, पसीना, पासक साथ और गातर ये पित्ताजीर्णक रक्षण हैं ॥ ६ ॥ कफाजीणलक्षण। कफस्याजीर्ण भवति गुरुता छर्दिरधिका अतीसारःशोथो रुचि रपि तृपाक्षद्विकलता ॥ बमिालाववादरतिरुदरे भारमधिकं शिरः कंठे नाभी गुदपवनसंचारमधिकम् ॥ ७॥ इतिश्रीभिपक्चक्रवित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यकशास्त्रे अजीर्णनिदानं समाप्तम्।।
.
नापाटीकासहितम् ।
(३७)
अर्थ-अपवित्रता, मन, न्यात, का, कंट,मुख, ओट इनका मूखना,बेहोसी, मनका टामा-
टोल, शरीरने बाह, नद. २ बालना, स्वचाका नुकडना, भून्यकता नाश, चेष्टा रहित येमी विचि-
माके लक्षण होते है ।। ५॥ इति श्रीहनराजार्थबोधिनी टीकामे विचिका रोग तथा विलंबिकारीग
उभग समान हुआ।
अथ क्रिमिनिदानम् ।
जायन्तेकिमयोनरत्यजठरे वाटे च यूकादयो वाह्याभ्यन्तरभेद-
तो बहुविधाः सूक्ष्मातिसूक्ष्मास्तथा ॥ दीर्घादीर्घतरा भवन्ति
मिलिताभिन्नाःपराजन्तवो नानावर्णसमान्विता बहुपदःपादैविही-
नाः पराः॥ १॥ मूर्तिकंडुपिटिकाश्च कोटरान कुर्वन्त्यतीसार-
मनाहसंभ्रमम्।।दाहं विवर्ण वमथु विगन्धितां कार्य शरीरे कृम-
यो मुहुर्मुहुः॥२॥ उदगतकृमीणां चिह्नमेतन्नराणां भवति हृद-
यदाहः संभ्रमोऽङ्गे विकारः ॥ अरतिरुधिरकासं छर्यतीसारशूलं
सकलविकलकायः ष्टीवनं निर्वलत्वम् ॥३॥
अर्थ-कृमिरांग दो नरहकाहै एक बाहर्ग, दूसरा भीतरी, पेटमे, गिडोह आदि हो सो भीतरी
और बाहर जय लोग्य आदि होनहै. एमे बाहर और भीतरको भेदमे तथा अटेसे छोटे और बडेसे बटेके
भेद करके बहुतभेदह नाना वर्णके बहुन पाद तथा पादरहित होते है ॥१॥ मूर्छा, आर्त, खुजली,
पिटिका इनका ग्बुजाना अतीसार, अनाह, भोर, दाह, शरीरका वर्ण औरही तरहका, यमन,दुर्गंध,
शरीर कृश, कृमि ये लक्षण कृमिगेगम होते हैं ॥ २॥ उदरमे कृमि पटगये हों उसके ये चिहहै
हृदयमें दाह, भोर, शरीग्में विकार, मन न लगे, दस्नमें मधिरका गिरना, ग्वांसी, वमन,टम्त,
सब शरीरमै बेकन्नी, भारयार थूकना, निर्वसना ॥३॥
कृमिरोगकीउत्पत्ति ।
भुक्तस्योपरिभोजनेन मधुराम्लाभ्यां मृदाभक्षणाद्दध्ना मापपयो-
भिरामिपयुतेः श्लेप्मोद्भवाजन्तवः ॥ सन्तापक्षतशोफ.शाकमधु-
भिर्मयेन रक्तोद्भवा अन्ये; कृमयो भवन्ति जठरं नृणां सदा
दुःखदाः॥४॥
(३८)
हंसराजनिदानम् ।
कृमिरोगपथ्यम् ।
कृमिवान् संत्यजेन्मिष्टं पिष्टं शाकं पयो गुडम् ॥अव्यायाम मृदु-
चाम्लं मापं मांसद्रवं दधि ॥ ५॥
इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते
वैद्यकशास्त्रकृमिलक्षणं संपूर्णम् ।
अर्थ-भोजनके ऊपर भोजन करनेसे, मीठा खट्टा मट्टी, दही, दूध, उर्द, मांत इनसे काफी
काने पैदा होतीहै सन्ताप, घाव, सूजन, शागके खानेसे, महत, मद्य इनसे रुधिरको कृमि पैदा
होतीहै और भी प्रकारसे कृमी मनुष्यके पेटमें दुःखको देनेवाली होतीहै ॥ ४ ॥ कृमि रोगवाला
मीठा, पासाअन्न, शाक, दही, दूध, गुड, दंडकसरतका न करना, माटोखाना, खट्टीवस्तु, उर्द,
मांस, पतलीवस्तु, इनको त्यागदे ॥ ५ ॥ इतिहंसराजार्यबोधिनी टोकामें कृमिरोगलक्षणसमाप्तहुआ।
पाण्डुरोगनिदानम् ।
दोपाः संकुपितास्त्रयोपि दधते पाण्डं शरीरेरुजं नृणांतीक्ष्णतम
द्रवञ्च लवणं रूक्षामिपं सेविनम्।।मृत्पूगीफलभोजिनां हि सतत
रात्री दिवाशायिनां स्त्रीवत्यंतविलासिनां प्रतिदिन शाकाम्लसं-
भक्षिणाम् ॥१॥
वातकपीलियाकंलक्षण ।
ण्डुर्वातसमुद्भवो नयनयो रूक्षं वचः स्फोटनं तोदाना
हकृमीन् करोति कृशतां गुह्यस्थले शोफताम् ॥ हृत्कंपं श्वलनं
तनी मलिनतां पीतयुर्ति क्षीणतां मन्दाग्निं वलवीर्यकान्तिहरणं
छर्दि तृपा दारुणाम् ॥२॥
पित्तकपीलियाकंलक्षण ।
अक्षणोर्मूत्रपुरीपयोस्त्वाचे नखेप्वन्तेषु पीतप्रभा श्वासं कासस
मन्वितं कृशतर्नु मूर्छामतीसारकम्॥हृल्लासं हृदि संभ्रम विक-
लता दाहं तृपासंयुतं पाण्डुः पित्तसमुद्भवः प्रकुरुते शोषं मुखे
शोफताम्॥३॥
. भापाटीकासहितम् । अर्थ--जोमनुष्य तीखी पतली ज्यादा नोन रूखामांस मट्टी सुपारी इनको खावे तथारातदिन सोवे बहुत मैथुनके करनेसे नित्य शाग और खट्टाखानेसे तीनों दोप कुपितहो पीलियाके रोगको पैदा करते हैं ॥ १ ॥ बातसे पैदाहुये पीलियाकं ये लक्षण, नेत्रों में रूखापन, त्वचाका फटना, मुईकी- तरहचुमनेका दर्द, आनाह, तथा शरीर कृश भ्रम, गुह्य इन्द्रीपर सूजन, हृदयमें कंप, श्वास, शरीरमलिन, तथा शरीर पीला, मन्दाग्नि, बलवीर्य कांतिकानाश, वमन, प्यास, मुखका सूखना ॥ २ ॥ नेत्र, पेसाब, दस्त, शरीरको त्वचा, नख, इनका पीला होना श्वास, खांसी, शरीर कृश, मूर्छा, दस्तोंका होना, सूखी उलटी, हृदयमें भ्रम, बेकली, दाह, प्यास, मुखका सूखना तथा 'सूजन ये पित्तसे पैदाहुये पांडुरोगके लक्षणहैं ॥ ३ ॥ कफकेपीलियाकालक्षण । शुक्लाननं शुक्लपुरीपमूत्रं तंद्रालसं स्त्रीष्वरुचिं कृशत्वम् ॥ लाला- वमित्वं श्वयधु गुरुत्वं पांड्वामयश्श्लेष्मभवः करोति ॥ ४॥ सन्निपातकपाण्डुरोगलक्षण। त्रिदोषोद्भवे पाण्डुरोगे कृशत्वं भवेच्छ्वासकासं तृषा वेप- थुत्वम् ॥ शिरोर्तिः प्रसेको रुचिः संभ्रमत्वं वलौजो बिनाशः क्लमो छर्दिशूलम् ॥ ५॥ त्रिदोषान्वितः पाण्डुरोगी भिषाम्भरसा- ध्यो निरुक्तो हृताक्षो विचेष्टः॥ ज्वरः श्वासहृल्लासकासातिसार- स्तृषासंभ्रमोंगेषु कंपः प्रलापी॥ ६॥ अर्थ--सपेदमुख, सपेद पेसाब, और मल, तन्द्रा, आलकस, स्त्रीसगकोइन्छाका नाश, लारका पडना, बमन, शरीरका भारीहोना, ये लक्षण कफस पैदा हुआ पांडुरोग करता है ॥ ४ ॥ सन्निपातसे उत्पन्न हुआ पांडुरोग उसमें ये लक्षण होते है शरीर कृश, श्वास, खासी, प्यास, का, मथवाय, पसीनेका आना,अरुचि,भ्रम,बल, कांतिका नाश, ग्लानि, वमन, शूल||५|त्रिदोष, युक्त पांडुरेगिी ऐसा वैद्योंने असाध्य कहा है नेत्रसे रहित, चेष्टाकरके हीन, वर, श्वास, सुखी उदी खांसी, अतीसार, प्यास, भौर, अंगोंमें कंप, वाहियात बकना ॥ ६ ॥ यः स्रोतांसि रुणद्धि सो मुनिवरेस्त्याज्यो भृशं दृरतस्तेजो- वीर्यवलौजसां प्रतिदिनं हानि करोति ध्रुवम् ॥ पाण्डुत्वं त्वत्रि नेत्रयोः कररहे यंत्रेषु विण्मूत्रयोर्धत्ते वह्निविनाशकोऽतिबलवान् पाण्डुमनुष्यादनः ॥७॥ कृशता (४०) 'हंसराजनिदान-1 पाण्डुगेगेपथ्यम्। पाण्डुरोगीत्यज्येदम्लं दिवास्वापञ्च मेथुनम् ॥ शाकं मासाशनं रुक्षं मृद्रक्षमतितीक्षणकम् ॥ ८॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते. वैद्यशास्त्रे पाण्डुरोगलक्षणम्॥ अर्थ--ऐना पांडुरोगी येयों करके त्यान्य है जो कानोंसे बहरा करदे, तंज वीर्यवल कांति इन- की प्रतिदिन हानिकर, त्वचा नेत्र नस्य आंत मल्टमूत्र ये पीलहों, जठराग्निसे रहित ऐसा पांडुरोग बली मनुष्यका मारनेवाला जानना ॥ ७ ॥ पलिया रोगवाला मनुष्य खटाईका खाना, दिनमें सोना, नथा बीसंग करना शाका, मांस, मन्यो वस्तु, मट्टी खाना, अतितीवी मिरच आदि वस्तु फा ग्याना त्यागकरे ॥ ८॥ इति हसराजार्थबोधिनी टोकामे पांडुरोगका निदान समाध हुआ ना हलीमक कामला कुंभकामला पानकीरोग निदान । हृत्पनेमलमूत्रयोनयनयोर्धत्तेतिपीतद्युतिं दोबल्यं बलवीर्ययो- रनुदिनं नाशं भ्रमं कामलाम् ॥ अस्थिस्फोटबती करोति विकलं मांसाशनाद्रक्तपा संतापं करयोर्मुखे वृषणयोः शोफ च पादयोः१ हलीमकरोगनिदानम् । करोति कुम्भकामलानखेपु नेत्रयोर्मुखे पुरीपमूत्रयोर्भृशं सकृष्ण- तां तृपातिकृत्वलाग्निवीर्यतेजसां विनाशिनीप्रकंपिनी ज्वरांग- दाहबर्द्धिनी विमोहशूलदायिनी ॥२॥ पट्चक्रेषु नखेषु मूत्रयुगुले विण्मृत्रयोर्नीलतांसंधत्ते च हलीमकं कृशतनुःस्त्रीपु प्रहर्पक्षयम् ॥ संतापं कुरुते रुजं वितनुते पित्तानिलोत्थं गदं तन्द्रा अंगविमर्दनं शिथिलतां श्वासं भ्रमं वेपथुम्॥३॥नखेप्वंगदेशेषु मूत्रे पुरीपे द्वयो- नेत्रयोः पाण्डुता तृदप्रसेकः॥ वहिःशीतताभ्यन्तरेत्यंतदाहो वदे- सानकी लक्षणैर्लक्षणज्ञः॥४॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सत्रे हंसराजकृते वैद्यकशास्त्रे कामलाकुम्भकामलालीमकपानकीलक्षणम् ।
- . . भाषाटीकासहितम् । (४१) अर्थ-जो मनुष्य मांस खायै तथा रुधिर पीयाकर उसके कामलारोग प्रगट होय और ये लक्षणको करै है, छाती मल मूत्र नेत्र ये पीलेहों, दुर्बलता, बलवीर्यका नाश, भ्रम, हफ़्टन, वेकल्टी, संताप, हाथ मुख अंडकोश इनमें सूजन, तथा पैरोंमे सूजनहो ॥ १ ॥ कुम्भकानन्टा देहम ये लक्षण करे है; नख, नेत्र, मुख पीला तथा दस्त पेसात्र काला, प्यास, पीडा और बन्न अग्नि वीर्य तेजना- शक, कम्प, चर, देहमें दाह, मोह, शूल करे है ॥ २ ॥ छ:चत्रोंमें नखामे नेत्रों में मलमूत्रमें जो नालापना करदे और शरीर पतला स्त्रीसंगकी इच्छाको दूर करदे, वेकली, तंद्रा, अंगोंका टूटना, शिथटता, श्वास, भ्रम, पीडा, इन लक्षणोंको वातापित्तसे पैदा हुआ हदीमक गर्ग करता है ॥ ३ ॥ नखोंमें शरीरमें मल मूत्रमें नेत्रोंमें पीलाई हो प्यास, पसीना, बाहरीनाडा, भीतरी दाह, इन लक्षणोंसे लक्षणका जाननेवाला पानकी रोगजाने ।। ४।। इति हसराजार्धवाविन्या कामलाकुम्भ- कामलाहलीमकपानकारोगनिदानम् ।। अथ रक्तपित्तनिदानम् । रक्तपित्तकीउत्पत्तिलक्षण। व्यायामेरविवह्नितापसहनैस्तीक्ष्णोष्णकट्वामिपेरत्यंनं सुरतेदिया तिशयनैः स्निग्धान्नसंभोजनैः।एतैःसंकुपितं नु पित्तमधिकनिर्गत्य- पाह्यांतराच्छदिलोहितिमां च नेत्रयुगुले रक्ते तनौ मण्डलम् ॥ ॥१॥ निःश्वाले लोहगंधिःप्रभवति शिरसो रक्तधारा च कोपणा सन्तापः कोष्टपीडा नयनविकलताऽरोचकः ष्टीवनस्वस् ॥ तृष्णा मूर्छाप्रसेको मनसि शिथिलता संभ्रमो देहदाहः कासः श्वासो- ल्पचेष्टा कृशतरहुतभुक् रक्तपितस्य कोपात् ॥२॥ अधोर्ध्व भवे- उक्तपित्तप्रवृत्तिः श्रुतिघाणवत्क्राक्षिभिश्चोर्ध्वदेशे ॥ गुदायोनिमेढ़े रधोयाति रक्तं समस्तैश्च रोमैःशरीरस्थ वाह्ये॥३॥ अर्थ-दड कसरतकैकरनेमे, घाममें डोलनेसे, अग्निके तापनेस, नीग्वी गग्नी कईई मांस इनके ग्वानेस, अति स्त्रीसगसे, दिनमें सोनेसे, स्निग्ध अन्नके भोजनसे,बुपित हुआ जो पित्त सो मविरको बिगाटकर रधिरकी उलटी कराव तथा नेत्रोंसे रुधिर गिरे और शरीर में खून बिगडनेसे चकत्ता होजाय ॥ १ ॥ रक्त पित्तके कोपसे ये लक्षण हो श्वास लेनमें लोहकासी गधिही, शिग्स रविरको गरमधारा पडे, प्यास व्याकुलताही उदरमें पीटा नेत्रामे बैकली, अरचि, रविरका थूकना, मूळ, तथा पसीनेका आना, मनमें शिथिटता, भ्रम, देहमें दाद, खांसी, श्वान, हान्चेष्टा, अग्निमंद ॥२॥ .
(४२) हंसराजानंदानम् । रक्त पित्तको प्रवृत्ति ऊपर तथा नांचेके रास्तासे निकसे सो लिखते है, जो कानोंस नाकसे मुखसे नेत्रसे रुधिर गिरे उसे ऊर्बप्रवृत्ति जाने और गुदाके द्वारा तथा योनिद्वारा लिंगसे रुविर गिरे उसे अधोप्रवृत्ति जाने और सब रोमोंसे शरीरक बाहर निकलता है ॥३॥ वात पित्त कफ और सन्निपातजन्यरक्तपित्तके लक्षण । रुक्षारुणं श्यामतरं च रक्तं वातात्मकं तं प्रवदन्ति वेद्यामा पित्तो. त्थितं रक्ततमं कपायं स्निग्धञ्च सांद्रङ्कफजं सफेनम् ॥४॥ ऊर्ध्वगं कफजं रक्तमधोगमारुतोद्भवम्॥रोमकूपैर्वहिर्यातं तं विद्यात् पित्त- संभवम् ॥५॥अधोर्ध्वगंवातकफप्रकोपात् द्विदोषजं तं जपदान- साध्यम् ॥ अधोर्ध्वरोमैजनितं त्रिदोषकोपादसाध्यं मुनिभिः प्रदिष्टम् ॥६॥ अर्थ-रुखा लाल काला जो रुधिर निकले उसे यातका रक्तपित्त वैद्य कहते हैं और टाल कसेला पित्तका तथा चिकना, गाढा, झागयुक्त, कफका कहते है ॥ ४ ॥ जो ऊपरी मार्गस रुधिर गिरे उसे कफका जानो, और नीचे मागोंसे गिरे उसे वातका जानो और जो रोमोंसे गिरे उरी पित्तका जानो ॥५॥ वातकफके कोपसे ऊपर तथा नाचे मागासें रुधिर गिरता है, उसे द्विदोषका जानो, वह जप दानके करनेसे अच्छा हो और नीचे तथा उपरका तथा रोममागात जे रुधिर गिरे उसे सन्निपातका जाने वह मुनियों ने असाध्य कहाहै ॥६॥ साध्यरक्तपित्त । रक्तपित्तं सुखं साध्यं निरुपद्रवमेव तत् ॥ सोपद्रवं तु दुःसाध्य जपहामौषधादिभिः ॥७॥ उद्वारे लोहितं यस्य क्षुते निष्ठीवने तथा ।। भवेन्मूत्रे पुरीपे वा रक्तपित्ती म्रियेन्नरः ॥ ८॥ रक्तपित्तरोगे पथ्यम् । व्यायाम धर्मसंतापं तीक्ष्णोष्णकटुकानि च ॥ दिवास्वापमति स्निग्धं रक्तपित्ती नरस्त्यजेत् ॥९॥ इति श्रीभिषेकचक्रचितोत्सवे हंसराज- कृते वैद्यशास्त्रे रक्तपित्तलक्षणम् ।।
भाषाटीकासहितम् ।
अर्थ-जो उपद्रवरहित रक्तपित्तहा वह सुखसाध्य है और जो उपदबके साथ हो वह असाध्यहे सो
जपके करानेसे होम और औषधि करनेसे भी नहीं अच्छाहो ॥ ७ ॥ जिस मनुष्यके डकार लेनमें
लोहेको बास मारे तथा छोकनेमें थूकनमें मूत्रमें मलमें रुधिर गिरे, वो रक्तपित्ती मनुष्य मरे।।८॥ दंड
कसरत करना, धूपमें डोलना, खेद, तीखी गरम कटु वस्तुका भोजन, दिनमे सोना, अत्यंत चि.
कनी वस्तु रक्तपित्तवाला त्याग करदेवे ॥ ९ ॥ इति हंसराजार्थबाधिनी टीकाम रक्तपित्तरोगनिदान
समाप्त हुआ।
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यक्ष्मण उत्पत्तिः।
यो भार वहते नरो गुरुतरं संपीड्यते यक्ष्मणा शस्त्रास्त्रैः परिघा
तितो दृढधनुःप्राकर्षतः पीडितः॥ उच्चैपतितो महाश्मतरुभिः
संदीपितो मर्दितो दंडेर्मुष्टिकसदिभिःपरिहतःसंधर्पितःशापितः।।१।।
अथ निदानम् ।
देहस्थो राजयक्ष्मा हृदि कफनिचयं वर्द्धते शोपतेंगें नाडीमार्ग
रुणद्धि ज्वरयति मनुजं क्षीयते धातुसंघान्॥वीर्योजःकांतितेजोऽन
लवलपिशितं हंति पांडु विधत्ते उर्व श्वासं तनोति प्रसरति
हृदये क्षीणशब्दं करोति ॥ २॥ यक्ष्मारुक् कुरुतेरुचिं कृशतनुं
सूक्ष्म ज्वरं गौरवं देहं जर्जरितं क्षतं च गलके कासाधिकं शोप-
णम् ॥ संतापं हृदि वेपथु सरुधिरं निष्ठीवनं पूयभं मोहं छद्यरति-
भ्रमं शिथिलता शूलं क्वचिद्दारुणम् ॥३॥
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अर्थ-जो मनुष्य भारी वारको उठाये, तथा शन्नु अस्वस घायलहो, हृदयनुपके खीचनेस. कोई
कारण कर पीडित होनेसे, उबपर्वत वा वृक्षके गिरनेस, जलनेस, और मीडनसे तथा दड कोरटा
से आदिके पिटनेसे डरपनेसे महात्माओंके शापसे क्षयोरोग पैदा होताहै |॥ १ ॥ देहमें क्षयरोग
स्थित ये लक्षणों को करे हे हृदयमें कफको बढावे, शरीरको मुखादये, नाडीके मागोंको रोकदे
अरवान् करदे, धातुके समूहको सुखायदे, चौर्य वट तेज ताकत कांति जठराग्निक बटको तथा मांस-
को क्षीणकरदे, पीलियाको करे, दर्घ श्वासको करे, तथा क्षीण शब्दको करे है ॥ २ ॥ अरुचि
तथा कृशंदह, मंदजर, शरीरभारी,जर्जर शरीर गलेने धार, खांसी, शोप, ग्वेद, हृदयमें का, रुधिर
राधमिलाय थूकना, बेहोश, रहकरना, मनका टामाडोल होना, अन, शिथिटता, की महागल.
होजाय अथवा गल जारने चलना ये लक्षण क्षयरोग करें है ॥ ३॥
(२८)
हंसराजनिदानम्।
विवर्ण शरीरं शकृद्रक्तसूत्रं करोत्यंगपीडां महाराजयक्ष्मा ॥ तनो .
ऋन्यतां बुद्धिनाशं प्रलापं गले घर्घरत्वं युवत्या प्रर्हपम् ॥ ४ ॥
वातकीमईकालक्षण।
मन्दाग्निबलवीर्ययोरनुदिनं हानिः कृशत्वं वपुः कालः शुष्कतरो
रुतं कृशतरं श्वासो रुचिः शोपता ॥ रूक्षो मंदतमो ज्वरः क्लम
क्षुता निष्ठीवनं पूयनं छर्दिा यदि वेपथुर्भवति तत् वातक्षये
लक्षणम् ॥५॥
पित्तकीक्षयीकेलक्षण।
पीडाकुक्षिशिरोगलेषु हृदये रक्तं च निष्टीवनं शीतम्लेऽधिकता
रुचिर्बलनता कंठे विगन्धिर्मुखे॥कासश्वाससमन्विताः कृशतनु-
भिन्नस्वरोल्पज्वरस्तत्पित्तक्षयलक्षणंनिगदितं वैद्यैःसुपेणादिभिः६
अर्थ--शरीरका वर्ण औरही प्रकारका होजाय, वारवार लाल पेशाब उतरे, शरीरमें
पीडाहो, मुन्न शरीर पडजाय, तथा बुद्धिका नाश, बर्राना गलेमें, घरघर शब्दहो स्त्रीके
साथ रमणी इन्छाहो, ये लक्षण महाराजयक्ष्मा करता है ।। ४ ।। वातकी क्षकि ये लक्षण हैं,
मंदाग्नि, वट वीर्यको हानि. शरीर कृश, श्वास, मंदशब्द और अनचि, शोप, शरीर
मदचर, ग्लानि, राधका थूकना तथा उलटी करना, हृदयमें कंप ॥ ५॥ कांख मस्तक गला
हृदय इनमें दर्दहो, रुधिर मिन्टा थूकना, शीतकी तथा खटाईको इन्टाहो अरुचि तथा कंठमें जलन
मुखमै बास आये, ग्वांसी श्वासहो, कृशंदहहो, बुरी आवाज हो मंदचर, ये लक्षण सुषेणादि वैद्योंने
पित्तको क्षयीक कहे है ॥ ६ ॥
कफकीशचीकेलक्षण ।
.
शोफ कासरुजाग्निमंदजड़ता. श्वासो सचिर्वेपथुः शैथिल्यं स्वर-
भंगतांगकृशता वत्क्रविगन्धान्वितम् ।। तंद्रा कुक्षिरुजः कर्फबहु-
तरं निष्टीवनं पूयनं स्यात् श्लेष्मक्षयलक्षणं च हृदये कंठं दृढं
इलेप्मणः ॥७॥
भाषार्टीकासहितम् । असाध्यक्षीके लक्षणं। सहसदिनपर्यंतं न जीवेदिति मानवः ॥ ग्रहेण यक्ष्मणामस्तो साध्येनातिवलीयसा ॥८॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे वैद्यशास्त्रे हंसरा- जकृते यक्ष्मणोलक्षणं समाप्तम् ॥ प अर्थ-सूजन, खासी, अग्निमंद, जडता, श्वास, अरुचि, कप, शिथिलता, गलेका वैट जाना, शरीर पतला, मुम्बमे बासका आना, तद्रा, काखमे दर्द, कफका तथा पीयका, थूकना, कंठकर कफसे रुकना, ये कफकी क्षयीके लक्षण हैं ॥ ७ ॥ जिस मनुष्यको क्षयीरूप वलवान असाध्यग्रहने असलिया हो वह मनुष्य हजार दिनतक बड़ी कठिनतासे जीसके ।। ८॥ इति हंसराजार्थवाधिन्या राजयक्ष्मरोगनिदानम् समाप्तम् ।। अथकासरोगलक्षणम् । वनाक्षिनासासुरजोभिपाताबूमोपरुद्धात् गुरुभारवाहात् ॥ रू. क्षादनादंडकशादिघातात् कासोतिघोपादुपजायते वै ॥ १॥ खांसीके लक्षण । प्राणः कंटगतोत्युदानपवनो हृत्स्थोतिपीडाकरः शब्दः कांस्यनि- भिन्नघोपसदृशो निष्ठीवनं पूयभम् ॥ कंठे घुरधुरशब्दता कृशतनु स्वपीतवर्णारुचिर्विद्वद्भिः परिकीर्तितं हि सकलं कासस्य चिह महत् ।। २॥ वातकीखांसी लक्षण। उरसि शिरसि कुक्षो वेदना कंठदेशे भवति वलविनाशः ष्टीवनं तुच्छतुच्छम् ॥ गलमुखपरिशोपः शुष्ककासोंगमर्दःक्षवथुररतिरु- ग्रा वातकासस्य चिह्नम् ॥३॥ अर्थ-मुखम नत्रमें नाझमें धूलिके पडनेस, तथा धुआंके जानसे, भारी बोझ टटानस, कसा खानसे, दंडकोरडा आदिके पिटनेसे,अत्यन्त पुकारनेसे, खांसी पैदा होती है ॥ १ ॥ हृदय- की रहनेवाली जो प्रागवायु तो कंटमें प्रातही और कण्टकी रहनेवाली जो उदानवायु सो हदपमें , हंसराजनिदानम् । आती है तब इस रोगीको बहुत दुःख देती है और इस मनुष्यका शब्द जैसा कांसका पूना बस्तन बोलता है इस तरहको आवाज हो, और कामिन्टा थूके, कंटमें घरघर शब्दही, शरीर बनाये त्वचा पीलो होजाय, अरुचि, ये लक्षण पंटिनोंने खांसीके कह है ॥ २ ॥ इदद्यमे मस्तकमें कन्दम कंटमें दर्द, हो बल्लका नाश, थोडा थोडा थूकना, गलेका तथा मुखका सम्बना, सीखांसोका उटना शरीरका टूटना, छींकका आना, मनका न लगना, ये वादीको ग्यांसीके लक्षण है।। ३॥ पित्तकीखांसीके लक्षण । भवेद्वीर्यहानिर्बरो वक्तशोपः सरक्तं च निष्टीवनं शूलमुग्रम् ॥ तृ- पासंभ्रमस्तिक्तमास्यं विदाहो निरुक्तं परैः पित्तकासस्य चिह्नम् कफकीरखांसीके लक्षण। निष्टीवनं सांद्रकफेन युक्तं कासेन छर्दिलवीर्यनाशः ॥ शीर्ष प्रपीडा जडतांगगौरवं प्रोक्तं भिपग्भिः कफकासचिह्नम् ॥५॥ त्रिदीपकीरखांसीकेलक्षण । भवेद्यस्य निष्टीवनं पूयवर्ण मुखान्नासिकाया विगंधिर्विवर्णम् ।। महाश्वासवाहोंगतेजोल्पवीर्यःस कासीन जीवेत्कदाचित्सुधाभिः ६ अर्थ-वीर्यका नादा, घर, मुग्यका सम्बना, राधिरमिला थूकना, उनमूद, प्यास, भौर. कड्डया मुम्ब, दाह, ये लक्षण पित्तकी खांसीके पूर्वाचायोंने कहे हैं ॥ ४ ॥ गाढा ककका थूकना, रदहो चल वार्यका नाश, शिरमें दर्द, जडता, देहका भारी होना ,ये लक्षण वैद्याने कफी खांसीके कहे है ॥ ५ ॥राधके वर्णके समान थूकना, मुख नाकमें वासआये, तथा विवर्ण, महाश्वासका चन्दना, देह, तेज-धीर्य-इनका घटना, ऐसा खांसीपाला अमृतसेभी नहीं जोये ॥ ६ ॥ असाध्यखांसीके लक्षण। मुखे यस्य शोथो रुचिर्वेपथुत्वं सरक्तं च निष्टीवनं फेनिलं वा ॥ तृषा शूलमुग्रं भवेदुष्टगंधिः स कासी न जीवेत्सहलेभिपग्भिः वृद्धक्षीणतमः कासी साध्यो दानजपादिभिः ॥ तरुणो बलवा- साध्यः पथ्येरोपधिभिर्बुधैः ॥८॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसरा- जछतेवेद्यशास्त्रेकासलक्षणम्॥ - , - . भाषाटीकासहितम् ।। (४७) अर्थ-मुखपर जिसके सूजनहो, अरुचि,कंप, लविर मिला तथा झाग मिरा थूकना, प्यास, शूल दुर्गधिका मुग्वमें आना, एने लक्षणवाला रांगी हजार वैद्योसेभी नहीं जा १७ | बूढा तथा जी क्षीण पड़गयाहो, वह रोगी दान जगदिकोसे साध्यहै और जो रागी तरुणही तथा बलवान्हो वो पथ्य और औषधियोंसे पंडितोंने ग्वांसीवाला साध्य कहाहै ।। ८ ।। इतिहंगजाधवोविन्यांकासरोगल क्षणं समानम् शुभम् ॥ अथ हिकालक्षणम्। हिवारोगकी उत्पत्ति । रजोधूम्रपापात् मुखे नासिकायां गरिष्टान्नपानाजलस्यावगा- हात् ॥ श्रमादध्ववेगात्तृपातेररुच्या भवेयुतॄणां पंचधा रौद्रहिकाः ॥१॥प्राणोदानसमानकोपजनिता हिक्कांबवृद्धिप्रदा कष्टं हति करोति जन्मसमयेवालस्य वृद्धिंसुखम् ॥तेजोजोवलवीर्यवृद्धिम- धिकां हर्ष रुचिं वर्द्धयेद्रक्तास्यं तनुकंपनं नयनयोविस्फारमा गलम् ॥२॥ तारुण्ये वयास स्थिते कफमरुज्जाता न हिक्का हिता वैरस्य वदने गले सरसतां कुक्षौ प्रपीडारुजम् ॥ आटोपं हृदये ' रुणन्द्रि पवने मर्माणि संतोदते छर्दैि सा कुरुते रतिं वितनुते हृष्टासमुल्लासते ॥३॥ अर्थ-धूलि धुआ इनका मुग्व और नाकमे जानेस, गरिष्ट अन्नके भोजनसे, जलमें बहुत देरके रहनेसे, श्रमसे, रस्तेके चलनस, चौदह वेगोंके रोकनेस, प्याससे, अरुचिसे, मनुष्यों के पांच प्रकार का घोर हिचकीका रोग पैदा होताहै ॥ १ ॥ प्राण उदान समान पवनोंके कोप करनेसे हिचकी आंतोंको रडावे, सट करे, नशा रोगको मारती है और बारटकके जन्मसमय पाटकको बढाने तथा मुखते, और तेज बायको बढ़वारको करै तथा हर्ष रुचिको बढाथै मुखको लाल करदे शरीरको पावै नत्राको फटेसे करदे कंटको गालाकरदे ॥ २॥ तरुण अवस्थामें जो यातकफसे पैदा हुई हिचकी मा अहितहे मुग्वको विरस करदे, गलेमें सरसता करदे, कांवमें पोटाकरे, अतीको घेरले श्वासको रोकहें मममममें पीटाकर बमन तथा मनका न लगना, स्वांसी, मूम्बी रद्द, ये लक्षण करेगा। वार्द्धक्ये वयसि स्थिते सति महाहिका यदा जायते पित्तम्लेम मरुद्भवा प्रकुरुते पीडां गले मस्तके ॥ शूलाध्मानतृपारुचिं वित- नुते हटासहृत्पीडनं पंचत्वं वितनोति रोगमखिलं प्राणां- (४८) हंसराजनिदानम् । न्निहति द्रुतम् ॥ ४ ॥ उदानवायुकोपेन पंचहिका भवंतिताः ॥ कुर्वन्ति विविधान् रोगान् तासां नामानिसंत्रुवे ॥ ५॥ गम्भीरा महती तथा च यमला क्षुद्रान्नजा पंचधा गम्भीरोदरगर्जनी ज्वर- करी मर्माणि संतोदत। सर्वोपद्रवकारिणी वलहरी नाभेः प्रवृत्ता हिसा अन्याया महती करोति च तनो कंपं शिरःपीडनम् ॥६॥ अर्थ-वृद्ध अवस्था में जो हिचकी हो वो वात पित्त कफ तीनों दोपोंसे पैदा होतोहे वो धोर हिचकी कंठमें तथा शिरमे दर्दको करै है, शूल, अफरा, प्यासं, अरुचि, खाली रह, हृदयमें दर्द, और सवरोग पे लक्षण हो तो मनुष्य जल्दो मरजावे ॥ ४॥ उदान पवनके कोपसे पांच तरहको हिचकी पैदा होतीहै और अनेक तरहके रोगोंको पैदा करतीहै उन पाचौके नाम कहते है ॥ ५॥ १ गंभौरा, २ महती, ३ यमला, ४ क्षुद्रा, ५ अनजा; प्रथम गंभीराके लक्षण कहते है गंभीरा पेटमें गुडगुडाहट करे, चरको करे, मर्ममर्ममें पीडाकरे और सब उपद्रवोंको करे, बलका नाशकरे, यह हिचकी नाभिसे उठती है. अब दूसरी महतीका लक्षण कहतेहै शरीर कांये, शिरमें दर्दहो ॥ ६ ॥ बातश्लेप्मभवाकरोति यमला हिक्कांबपीडारुजौ ग्रीवातालुविभे- दिनी बलहरी ग्रीवाशिरःकंपनम् ॥ क्षुद्रानाभितलोद्भवारसचयं चोर्ध्वनयेत्कष्टदा वरस्यं वदनेन्नजा वितनुते गात्रे गुरुत्वं तथा॥७॥ इति भिपक्चक्रचित्तात्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे हिकालक्षणं समाप्तम् ।। अर्थ-तीसरी यात कससे पैदा ई जो यमला नाम हिचकी सो आंतोको पीडा दे, कंटतालुमे दर्दकर, बलका नाशकरे, नाडीशिर इनको कैंपाय, चौथी जो क्षुद्रानामकर प्रसिद्ध हिचकी है सो नाभीके नीचे उठती है, वो रसको ऊपर लेजातोहे अर्थात् उलटी करावे और कष्टको पैदाकरे, मुखको विरस करती है, पांचवी जो अन्नसे :पैदाहुई हिचकी सो शरीरको भारी करती है ॥ ७ ॥ इति हंसराजबोधिनीमें हिकालक्षणसमातहुआ । श्वासरोगनिदानम् । प्राणोदानसमानकोपजनितः श्वासो रुपावईते क्रुद्धोवं बजते मुहुर्मुहुरथो दोधूयमानं नरमानिद्रा हंति महातृपांवितनुते शीत- भाषाटीकासहितम् । (४९) ज्वरं कंपनं प्रस्वेदं कुरुते तनौ विकलता दाहं भ्रमं विभ्रते ॥१॥ शुकास्यं कुरुते रुणद्धि परतः स्रोतांसि रक्ताननं हृत्कंठोष्ठमुखेषु शोषमरति श्वासो रुचिं नाशते ॥आध्मानं तनुते शिरां विधमते नृणां तनुं कंपते शूलं वेदनया युतं विकलतांशब्दं परं रुंधते ॥२॥ स्वासःस्वाभाविको मंदोह्यतिश्वासोरुजाकरः॥मृतिप्रदो महाश्वा- सस्त्रिविधं श्वासलक्षणम् ॥३॥ अर्थ-प्राण, उदान, समान इन तीनों पवनोंके कोप करनेसे क्रोधकर बढती और ऊपरनीचे विचरती है कभी ऊपर चढे कभी नीचे उतरे नांदकानाश, तथा घोर प्यासको पैदाकरे, शीतज्वर, कंप, पसीना, इनको पैदाकर शरीरमें बेकली, दाह, भौर, ये लक्षण श्वासरोग करताहै ॥ १ ॥ श्वास मुखको सुखावै, नाडियोंके मार्गको रोकदे, चहरेको लाल करताहै, हृदय, कंठ, ओट, मुख इनमें शोपहो, मनका न लगना, अराचे, अफरा, नाडीनको धमावे, शरीर कैंपाये, वेदनायुक्त शुल, तथा चेकली और आवाजको निहायत कम करती है ॥ २॥ श्वास जो है सो स्वभावसेही मदहोताहै परंतु अतिश्वास रोग करता है और महाश्वास मौतका देनेवाला है ये तीनप्रकारके . , लक्षणह।। ३ ॥ स्वाभाविकश्वासकेलक्षण । श्वासःसंकुरुते वलं मृदुतर्नु स्वाभाविकः सौख्यदो धैर्य शौर्य- 'मदोत्सवं सुभगतांशक्ति पवित्रंनरमऊर्ध्वाधोगतिरुत्तमा पवनयो- दुर्गधिनिर्णाशकः सौगंधि सुकुमारतां बितनुते हर्ष परं वर्द्धते॥॥ अतिश्वासकेलक्षण । अतिश्वासः कासं वितरति भृशं शूलमरति वलं वार्य तेजो हरति कुरुते छर्दिमरुचिम् ॥ मुखं घाणं कण्ठं तुदति वहते श्लेप्ममधिकं तृपाध्मानं हिक्कां तनुषु गुरुतां स्वेदमधिकम् ॥ ५॥ महाश्वासकेलक्षण । संज्ञां नाशयते रुणद्धि सततं स्त्रोतांसि विष्टम्भनं वाग्बंधं कुरुते गलेकफचर्य मर्माणि संतोदते॥औद्धत्यं नयनं तृषां च हृदये दाह मुखे शोषणं नाडीस्त्रोटयते भ्रमं वितनुते श्वासो महान् प्राणहाद। इति श्रीभिपकचक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यकशास्त्रे श्वासलक्षणं समाप्तम्॥
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(५०)
हंसराजनिदानम् ।
अर्थ-स्वाभाविक श्वास बलको करें तथा देहको कोमल रक्खे, सुखको दे, धैर्य तथा पराक्रम,
मद, मंगल, सुंदरता, शक्ति पवित्रताको दे और पवनका ऊपर नाचेका आना जाना थ्रेटहे और
दुर्गन्धको नाश करती है, और सुगंधको दे, तया सुकुमारपना और हर्ष इनको वढाये ॥४॥
अतिश्वाससे खांसी, शूल, मनका, न लगना हो, बलवीर्य तेजको घटावे, वमन, अरुचिं मुख नाक
कंठमें पीडाहो, कफ अधिक गिरे, प्यास अफरा, हिचको, शरीरभारी, पसीना इनको अधिक कर
॥५॥ प्राणोंको नाशक, महाश्वास ये रक्षण करती है संज्ञाका नाश, और नसोंके मार्गको रोकदे ।
मलका न उतरना, जवानका बन्दहोना, कंटमें कफका जोर, मर्ममर्ममें पीडा, फटे फटेसे नेत्र, प्यास,
हृदयमें दाह हो, मुखका सूखना, नसोंका टूकना, मौरका आना ॥६॥ इति हंसराजबोधिन्या श्वास
लक्षणं समाप्तम् ॥
स्वरभेदलक्षणम् ।
अत्युच्चभाषाध्ययनाभिघातेस्तैलादिभ:रतिदुष्टपानेः ॥ संको-
पितः पित्तकफानिलास्ते कुर्वन्ति भिन्नस्वरमेवनृणाम् ॥ १॥
संभिन्नकांस्यस्यरतुल्यशब्दाः केचित्तथा गर्दभतुल्यघोपाः॥ अजा-
विछुच्छंदरिकाकशब्दं मुखे नेत्रयोःश्यामता मूत्रवर्चाः ॥२॥क-
चिदीर्घशब्दं खरोष्ट्राश्वतुल्यं वचःप्रस्थलं वातलं कंठपीडाम्॥३॥
अर्थ-उच्चस्वरके पढनेसे, चोटके लगनेसे, तेल खटाई आदिके खानेस, दुष्ट जलके पानसे,
कोपको प्राप्तभये जो वात पित्त कफ सो मनुष्योंके स्वरभंग रोग पैदा करतेहैं ।। १ ।। जैसे फूटे
हुये कांसकीसी आवाजहो, तथा गधेकीसी आवाजहो, अथवा वकरीके शब्दोसी आवाजहो,
छ दरकोसी आवाजहो, तथा कौवेकीसी आवाजहो, मुख नेत्र कालेहों, पेशाब ज्यादाटतरे ॥२॥
कभी बडा शब्द करे, गधेकी ऊटकी, घोडेकी, आवाजके समान कंठमें दर्द ये वातके स्वरभंगरोगके
लक्षण हैं ॥३॥
पित्तकेस्वरभंगलक्षण ।
स्वरः पित्तभिद्भिन्नकांस्यप्रघोपः करोत्यंगदाहं मुखेत्यंतशोपम् ॥
तनौ नेत्रयोः पीततां मूत्रकृच्छ्रन्तृपां कंठपीडां रुजंक्षीणगात्रम्॥४॥
कफकेस्वरभंगकालक्षण।
प्रभिन्नः स्वरः श्लेष्मणा क्षीणघोपो गलं इलेप्मरुद्धं गुरुत्वं श-
रीरे ॥ गलेघर्घरत्वं रुतं शुभ्रनेत्रं मुहुः ष्ठीवनं कासमुग्रं करोति ॥५॥
भाषाटीकासहितम् । असाध्यस्वरभंगकालक्षण। अंतर्गतः स्वरो यस्य बहि याति. कर्हिचित् ॥ वातपित्तकः- भिन्नःस रोगी नैव जीवति॥६॥ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैकद्यशास्त्रे स्वरभेदलक्षणम्। अर्थ-पित्तका स्वरभंग फूटे कांसेकीसी आवाज करै, देहमें दाह, मुखका सूखना शरीर तथा नत्रपीले, मूत्रकृळू, प्यास, कंटमें दर्द, शरीरका लटना, ये लक्षण करताहै ॥ ४ ॥ कफका स्वरभंग आवाजको मंद करें, कंटको कफसे रोकदे, शरीर भारी, गलेमें घरघर शब्दहो, पीडाहो, सफेद नेत्र हो, बार बार थूकना, घोरखांसीको करे ॥५॥ जिस स्वरभंगवाले, रोगीका स्वर भीतरीही रहे और बाहर न निकले और त्रिदोपसे हुआ हो वह रोगी नहीं जीये ॥ ६ ॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यां -स्वरभेदलक्षणं संपूर्णम् ॥ अरोचकरोगकोउत्पत्तिलक्षण । अरोचकः पित्तमरुत्कफैर्भवेद्भयेन शोकेन रूपांगपीडया ॥ रु- जातिवीभत्सविलोकनेन वा अहृद्यदुष्टाशनपानपूर्तिभिः ॥ १ ॥ वातअरोचकरोगकालक्षण। अरोचके वातसमुद्भवे हिते भवंति चिह्नानि मुखे कपायता ।। चपुस्तु रूक्ष कृशतांगगोरवं ज्वरोम्लताशूलमथांगपीडनम् ॥२॥ पित्तकेअरोचककालक्षण । असेचकः पित्तभवः करोति दाह प्रसेकं कटुकत्वमास्ये ॥श- रीरवाशांतरयोश्च शोथं पानेषु भक्ष्येष्वरुचिं कृशतम् ॥३॥ कफकेअरुचिरोगकालक्षण । अरोचकः श्लेष्मभवो विधत्ते गुरुत्वमंगेषु जडत्वमातिम् ।। क्षार- त्वमास्ये रुचिमोहशैत्यं गले कर्फ पांडुरुजं शरीरे ॥४॥ - (५२) हंसराजनिदानम् । : वातकोअगचिमपथ्य । . अरोचकी मरुद्भवस्त्यजेत् प्रवातसेवनम् ॥ अमंजलावगाहनं क- पायमम्लमामियम् ॥ ५॥ पित्तकीअरुचिपथ्य। पित्तात्मके त्यजेत्तीक्ष्णं विदाहि लवणाधिकम् ॥ व्यायामं वहिसं-- तापं विरसं कटुकं रसम् ॥६॥ अर्थ-मयसे, शोकसे,क्रोधसे, शरीरकी पोडासे बुरीवस्तु के देखने से मनको बुराटगे ऐसे भोज- नसे तथा दुष्टवस्तुके पानसे अरोचक रोग वात, पित्त, कफके कोपसे पैदा होता है ।।१॥ वादास पैदा हुआ अरोचक रोग उसके ये लक्षण है, मुख कड्डया, शरीररूखा, तथा कृश, तथा भारी, और ज्वर, तथा खट्टा मुख, शूल, शरीरमें पीडा ॥ २ ॥ पित्तसे पैदा हुआ अरुचि रोग उसके ये लक्षण है, दाह हो, लारका बहना, कडुवा मुख, शरीरका बाहर भीतरसे सूजना, खाने तथा पानेमें अरुचि, शरीर कृश ॥३॥ कफसे पैदा हुये अरुचि रोगके ये लक्षण हैं, शरीर भारी, तथा जड और दुःखहो, मुख खाराहो, तथा श्वास, अराचि, बेहोसी, शीतका लगना, कंठमें कफ तथा शरीरमें पीलिया ॥ ४ ॥ वादीकी अरुचियाला हवाका खाना, श्रमका करना, जलसे स्नान आदि. और कसली तथा खट्टी वस्तु और मांसका खाना त्यागदे ॥ ५ ॥ पित्तको अरुचियाला मनुष्य 'चरपरी, दाहकरनेवाली, ज्यादा नोनका खाना, दंडकसरतका करना, अमिका तापना, विरस, कडुई वस्तुका खाना, त्यागदे ॥ ६ ॥ कफकीअरुचिमपथ्य। त्यजेदरोचकीपिष्टंतैल्यशैत्यंकफात्मकः॥ गुरुत्वंदधिमिष्टान्नंवृन्ता- कंस्निग्धभोजनम्॥७॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे अरोचकलक्षणं सम्पूर्णम् ॥ अर्थ-कफको अरुचिकाला पिसा अन्न, तेलका पदार्थ, तथा शीतल वस्तु, कफके करनेवाली वस्तु, भारोवस्तु, दही, मीठाअन्न, बैंगन, चिकनाभोजन, ये त्यागदे ॥ ७ ॥ इति हंसराजार्थबो- न्यामरोचकरोगलक्षणं समाप्तम् ।। . तथा - .
भापाटीकासहितम् । छदिरोगलक्षणम् । दोपैय॑स्तैः समस्तैर्वा वातपित्तकफात्मकैः ॥ भवंति छर्दयः पंचवीभत्सानां विलोकनात् ॥१॥ स्निग्धैरहृद्यैर्लवणेरतिद्रवर्ल- तादिभक्ष्यैरतिभोजनै रुपाअत्यंवुपानर्भयनिंद्यदर्शनेछर्दिर्भवेद- ध्वपरिश्रमैः परैः॥२॥ वातकीछर्दिकलक्षण । छर्दिातभवाकरोति विविधान् रोगानलं भोजनी कृष्णाभा हरि- तासचिः शिथिलतां हृत्पावपीडां भ्रमम् ॥ उद्गारं स्वरभेदनं च महतीं जृम्भां गले पीडनं शूलं रूक्षवपुस्तृपां च शमनं वह्न- स्तनौ शोपणम् ॥३॥ अर्थ-यात, पित्त, कफसे तथा सन्निपातसे तथा, धुरीवस्तुके देखनेसे छर्दि उलटीका रोग पांच- 'प्रकारका होताहै ॥ १ ॥ चिकनी सूगली नोनकी पतली तथा लता आदिके ग्वानसे, बहुत भोजन- से, क्रोधसे, बहुत जलके पीनेसे, डरके लगनेसे, सूगली वस्तुके देखनेसे, बहुत रास्ताकं चटनेसे, अपर कहिये कृमि पडनेसे, स्त्रीके गर्भ रहनेसे, छर्दिनाम रद्दकारोग पैदा होताहै ॥ २ ॥ जा मनुष्य बहुत भोजनकर उसके वातकी छर्दी अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न करतीहै, तथा काले रंगकी तथा हरे रंगकी हो, और शिथिलताको करे, हृदयमें पसवाडोंमें पीडाकरे, भ्रमकोकरे, डकारखुरीके आना, स्वरभंग, घोर जंभाई, कठमें पीडा, शूल, शरीरमे रूखापन, प्यासका अवरोध, शरीरमें आगसी जले, और शोपको करे ॥ ३ ॥ पित्तकीछर्दिकलक्षण। 'छर्दिः पित्तसमुद्भवारुणनिभा पीतप्रभा सा कचित् कोप्णा- दाहयुतागपीडनपरा तृशूलमूर्छान्विता ॥ हृत्कंठोष्टमुखेषु ता- लुरसनाशीपु पीडाप्रदा संतापभ्रमकारिणी रुचिहरी श्लेष्मांश- का सा भवेत् ॥ ४॥ कफकीछार्दिकलक्षण। छदिः श्लेप्मसमुद्भवा शितनिभा फेनान्विता मेदुरा क्षारास्यं कु- रुते रुचिं वितनुते तंद्रां प्रसेकं वमिम् ॥ आलस्यं जडतां वपुर्ण- , । -- . (५४) हंसराजनिदानम् । रुतरं लालां च निष्ठीवनं रोमांचं हृदि वेपथु मुखमलं कासं तनौ शीतताम् ॥५॥ सन्निपातकीछदिकेलक्षण । छर्दिः पित्तमरुत्कफेः प्रजनिता नानानिभाकष्टदा श्वासं कास- युतं तनोति कृशतां दाहं तृपाकंपनम् ॥ हृल्लासं तमकं वपुः विकलता मूर्छामतीसारकं शूलं मूत्रविरोधनं ज्वरतमं हिक्कां विवर्ण वमिम् ॥ ६॥ अर्थ-पित्तकी छर्दिरोगके ये लक्षणहै, लालरंग तथा पीले रंगकी तथा गरमहो, दाहयुत, शरीरमें पांडा, प्यास, शूल, मूर्छा, हृदय, कंठ, ओठ, मुखताल, जबान, शिर इनमें पीडाहो, खेद, भ्रम, रुचिको नाशकरे कफको नाशक हो ॥ ४ ॥ पित्तकी छारोगके ये लक्षण हैं, सपेदरंगहो, झागसे आच्छादितहो, चिकनी, खारामुख, अरुचि, तन्द्रा पसीनेका आना, रद, सुस्ती, जडपना, देहभारी, लारका गिरना, बारबार थूकना, रोमांच, हृदयमें कंप, मुखमलीन, खांसी, शरीरको शीतलगें ॥ ५ ॥ त्रिदोपसे पैदाहुई जो छर्दि उसका चित्रविचित्र रंगहो, कष्टको पेदाकरे, श्वास, खांसी, तया शरीरमें कृशता, दाह, प्यास, कंप, खाली उलटो, तमक, देहमें बेकली, मूर्छा, अतीसार, शूल, मूत्रका रुकना, ज्यर, अंधेरैका आना, हिचकी, वर्ण औरही तरहका और यमन ये लक्षण हो ॥६॥ छदिरोगकेउपद्रव । कासो हिकातृषाश्वासोहृद्रोगस्तमकोज्वरः ॥ मू वैचित्यमि- त्यतेज्ञेयाश्छर्देरुपद्रवाः ॥७॥ छदिरोगकासाध्यासाध्यलक्षण । छर्दिः सोपद्रवासाध्या रक्तपूयवहा तथा ॥ नोपद्रवाभवेत्सा- ध्या ज्ञात्वा भैपज्यमाचरेत्॥८॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेद्यशास्त्रे छदिलक्षणं संपूर्णम् ॥ . - भाषाटीकासहितम् । अर्थ-खांसी, हिचकी, प्यास, श्वास, हृदयमें पीडा, तमक, ज्वर, मूर्छा, बेहोसी ये छर्दि रोगके उपद्रव हैं ॥७॥ उपदव सहित छर्दिरोग असाध्यहै और जिसमें रुधिर और राँध गिरती हो वोभी असाध्यहै, और जिसमें उपद्रव न हो वो साध्य है ऐसे साध्य असाध्य परीक्षा कर पीछे दवादे ॥ ८॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यां छर्दिरोगनिदान समाप्तम् ।। अथतृष्णालक्षण। कफोद्भवापित्तभवा मरुद्भवा त्रिदोपजा भुक्तभवा क्षतोद्भया ॥ । भयश्रमाभ्यां जनिता क्षयोद्भवा भवंति तृप्णाष्टविधाश्च दुःसहाः ॥१॥ तृष्णारोगकीउत्पत्ति। वाताशनाध्वश्रमतापरक्तैः स्रोतस्त्वपांवाहिषु शुष्कनेषु ॥ हृ- स्कंठतालूनि दहति दोषास्तृपा तदा संजनिता नराणाम् ॥२॥ चातकीकृष्णारोगकालक्षण । तृष्णा वातसमुत्थिता च कुरुते स्रोतो निरोधं श्रमं शोयं शंख शिरोगलेपु विरसं वक्त्रं निरुत्साहसम्॥संकोचं परितस्तनौ प्रलपनं चित्तभ्रम रूक्षतां शीतोदैः परिवद्धिता वितनुते हिकामजीर्ण ज्वरम् ॥३॥ अर्थ-तृष्णा अर्थात् प्यासका रोग आठतरहकाहै, ऐसे वैद्य कहते हैं १ कफसे २ पित्तसे, ३ . वादासे, ४ सन्निपातसे, ५ भोजनके करनेसे, ६ घावसे, ७ भय और श्रभसे, ८ क्षईरोगके होनेसे ॥ १ ॥ वातसे, भोजनके करनेसे, मार्गके चलनेसे, श्रमकै करनेसे, गरमीसे रुधिरके बिगडनेसे, कु. पितहुए जो वात, पित्त, कफ सो जलके बहनेवाली नाटीको सुखाकर हृदय, कंठ, तालूमें दाहको पैदाकरे, तब मनुष्योंके तृपारोग पैदा होताहे ॥ २॥ बातकी तृपा ये लक्षण पैदा करती है, बहिरा- पना परिश्रम कनपटी, मस्तक, गला इनमें शोष, मुखमें विरसता, तथा साहसहीन, देहमें संकोच वकना, चित्तमें भ्रम, तथा देहरूखा शीतलजलके पीनेसे जो तृपा पैदाहो यो हिचकी और अजीर्णज्वरको बढाये ॥ ३॥ पित्तकातृपारांगकालक्षण । आधिव्याधिसमन्विता भयकरी पित्तात्मिकाशोषणी तृष्णादा- हंसराजनिदानम। . हविवर्धिनी सुखहरी कार्यस्य विध्वंसनी॥ उष्णत्वे विदधाति दोष- मखिलं शीते सुखं विभ्रते रक्तास्यं कुरुते मुखे विरसतां मूच्छां प्रलापं भ्रमम् ॥४॥ कफकीकृष्णाकेलक्षण । मूत्रावरोधं जठराग्निनाशं निद्रां विधत्ते गुरुतां शरीरे॥ हृत्कं- ठपीडां वितनोति कासं श्लेष्मात्मिका छर्दिकरी च तृष्णा ॥ ५ ॥ त्रिदोपजनिततृपाकेलक्षण । निदोपजनिता तृष्णा तेजोवीर्यवलोजसाम् ॥ नाशिनी रुकरी घोरा मनोक्षप्राणहारिणी ॥६॥ अर्थ-आधि कहिये मानसिकरोग, व्याधि कहिये अरादिरोग तथा भय पैदा करे, शोप, दाहको बढावे, सुखको दूरकरे, देहको विध्वंस करे, गरमीसे सकल रोगपैदाकरे और शरदीके होनेसे मुग्य मालूमहो, लाल और रसरहित मुखहो, मूर्छा, प्रलाप धम, ये लक्षण पित्तकी तृष्णाके हैं ॥ ४ ॥ मूत्रका रुकना तथा मंदामि, नीदकाआना, शरीरभारी, हृदयमें, कंठमें पीडा, खांसी, रद्द, ये लक्षण कफकी प्यास रोगहें ॥५॥ सन्निपातकी तृषा तेज वीर्य वल ताकतका नाश करनेवाली है घोर रोग पैदाफर मन और इंद्रियोंकी हरनेवाली है ॥ ६॥ तृपारोगसाध्यासाध्यविचार । अल्पदोषकरीतृष्णा श्रमघाताध्वभोजनैः ॥ जाताशीतोदपानेन नाशमेति गरीयसी ॥७॥ अतृष्णारोगेपथ्यम् । गुवन्नभोजनं स्निग्धं तीक्ष्णोणं लवणामिषम् ॥व्यायामं सूर्यसं तापं तृष्णावान् परितस्त्यजेत् ॥ ८॥ -- इति श्रीभिपक्चक्रचित्तात्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे तृष्णालक्षणम् ॥
भाषाटीकासहितम् । (५७) अर्थ-जो श्रमसे चोटसे रास्ताके चलनसे भोजनसे तृषा अर्थात् प्यासलगै वो साध्यहे, और जो ठंढेपानी पीनेसे प्यासलगे, सो प्राणकी नाश करनेवाली जाननी चाहिये ॥ ७ ॥ भारी अन्नका भोजन, चिकनी वस्तु, तीखी, गरम, नोनकी, मांस, दंड कसरतका करना, सूर्यका तेज, ये तृपारोगवाला त्यागदे ॥ ८ ॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यां तृष्णारागनिदानं सम्पूर्णम् ॥ J मूरोिगकी उत्पत्ति । क्षीणस्य गतसत्त्वस्य विरुद्धाहारसेविनः ॥ धाविनः सक्षत- स्यापि वीभत्सस्य विलोकिनः ॥ १॥ तस्य नाडीपु सर्वासु दोपाः सर्वे प्रकोपिताः ॥ रुपा विशंति कुर्वति मूर्छा वैचित्त्यका- रिणीम् ॥ २॥ वातपित्तकफैर्मद्यैः शोणितेन विपेण च ॥ मृी • भवति सा कुर्यान्नरं काष्ठमिवानिशम् ॥ ३॥ अर्थ-जो मनुष्य क्षीणहो, ताकतरहितहो, विरुद्ध आहारका खाने वालाहो, दौडने वाला हो, और जिसके शरीरमें घावहो, धिनायदी वस्तुदेखीहो ॥ १ ॥ ऐसे पुरुषके कोपको प्राप्तहुये जो तीनों दोष सो सर्व नाडियोंमें कुपितहो धसकर बेहोसी करनेवाला मूर्छारोग पैदा करते है ॥ २ ॥ सो भू»रोग वात, पित्त, कफ और सन्निपातसे और मद्यके पीनेसे रुधिरसे बिपभक्षण करनेसे सात प्रकारका होताहै, यो मू» मनुष्यको काष्टकी तरह पृथ्वीपर गेर देती है ॥ ३ ॥ बातकीमूर्छाका लक्षण । दृष्ट्वाकाशं श्यामनीलावभासं पश्चादुां वातजामेति मूर्छाम्॥ यो मर्त्यस्तं पीडयंतीति रोगा जृम्भाकंपश्वासतृष्णाप्रसेकाः॥४॥ पित्तकीम का लक्षण। पीतारुणं नभः पश्यस्तमः पश्यस्ततः परम्॥नरोयः पतते भूम्यां तां मूछा पित्तजां वदेत् ॥५॥ जंतौ प्रबुद्धे तमसि प्रनप्टे मूर्छा तु पित्तप्रभवा करोति ॥ प्रस्वेदतृष्णापरिवेपथुत्वं दाहं च ताप मुखशोपमातिम् ॥६॥ अर्थ-जो मनुष्य आकाशको काला नीला देखे, फिर धरतीम गिरपडे और जिसको अँभाई, कंप, प्यास, पसीनेहीं, उसको वातकी मूर्छ कहते हैं ॥ ४॥ प्रथम पीला, लाल आकाशको
(५८)
हंसराजनिदानम् ।
देखे, फिर अंधकार मालूमहो और तिस पीछे धरतीमें गिर पडे उसको पित्तको मूर्छा कहते हैं
॥ ५॥ और जव मनुष्यको होस होजाय आंखोंके आगेसे अंधकार हट जावे, तबपसीना आवे
प्यास लगे, कंपहो, दाहहो, अरहो, मुख शोपहो, पीडाहो, उस मुठ्ठीको पित्तको कहतेहैं ॥ ६ ॥
कफकीमूच्छाका लक्षण ।
शु_ नमो नरः पश्यन्मूर्छयो| पतेद्यथा ॥ निश्चेप्टो दंडवन्नूनं
तो विद्याच्च कफात्मिकाम् ॥ ७॥ प्रबुद्धे मनुजे कुर्यान्मूर्छा
निद्रां कफात्मिका ॥ शैथिल्यं गौरवं तंद्रां हृल्लासं कासतृड्-
ज्वरम् ॥८॥
सन्निपातकीमू के लक्षण।
त्रिदोषजनिता मूर्छा सर्वरोगवहा नरम्॥पातयत्याशु मोहाब्धौ
विना वीभत्सदर्शनम् ॥९॥
अर्थ--जो मनुष्य आकाशको धौलादेखै फिर गिरपडे चेष्टाराहेत लकडीकीसीतरह उस मूर्छा-
को कफी कहते हैं ॥ ७ ॥ जब मनुष्य सावधान होजाय तब नींद आवे, तथा शिथिलता होय,
देह भारीहो, तंद्राहो, सूखी रद्द आवे, खांसीहो, तथा प्यासहो, ये कफकी मूर्छ के लक्षणहें ॥८
त्रिदोष अर्थात् संनिपातसे पैदा हुई मूर्छा सर्वरोग प्रकट करे, और मनुष्यको मोहरूपी समुद्रमें
गेरदेवे, विना सूगली वस्तुके देखे जो पैदाहो उसको सन्निपातकी मूर्छा कहते हैं ॥ ९॥
रुधिरकीमूर्छाका लक्षण।
भ्राणेन रक्तस्य च दर्शनेन मूर्च्छति ये स्त्रीजनभीरुवालाः ॥
बुद्धेषु चिह्नानि भवति तेषां मोहोंगकंपोतिभयं जडत्वम् ॥ १० ॥
मंद्यकीमूर्छाका लक्षण।
मद्येन मूर्छा जडतां करोति नेनेरुणत्वं शिथिलं शरीरम् ॥ हर्ष
प्रलापं परिवुद्धिनाशं निद्रां वमित्वं भ्रमतां प्रसेकम् ॥११॥
विपकीमूर्छाका लक्षण।
नासाकर्णमुखेषु शोपमधिकं मूर्छा विपासंभवा दाहं तीव्रतरं
दधाति हृदये कंठेतिपीडारतिः ॥ दृष्टिं नाशयते 'करोति
षिकलं देहस्य विक्षेपणं तेजो वीर्यवलौजसां प्रतिपलं विध्वंसिनी
शोपणी ॥१२॥
- - भाषाटीकासहितम् । (५९) अर्थ--नाकसे रुधिरके गिरनेसे स्त्रीजन तथा डरपोक तथा बालक ये देखकर मूर्छाको प्राप्तहोते हैं; होस होनेपर ये लक्षण होते हैं, मोह, शरीरका कांपना, डरका, लगना, तथा जडत्व ॥ १० ॥ बहुत व दुष्टमद्यके पानसे जो मूर्छा हुई उसके ये लक्षण है जडत्व, और नेत्रलाल, शरीर शिथिल, हर्ष, बकना, बुद्धिका नाश, निद्रा, बमन, भ्रम, मुखसे लारका गिरना, ये ॥ ११ ॥ विपके खानेसे व सूंघनेसे जो मूर्छाहो उसके ये लक्षणहें नाक, कान, मुख इनका सूखना, तीव्रदाह, हृदयमें, कंठमें दर्द, मनका न लगना, नेत्रोंसे कम देखना, बेकली, देहका पटकना, तेज, वीर्य, बलताकत इनका नित्यघटना और शोपहो ॥ १२ ॥ क्लमकेलक्षण। व्यायामेन विना काये श्रमः स्याच्छ्ासवर्जितः॥ इंद्रियाणांहि वृत्तिप्तः क्लमः सैवोच्यते बुधैः ॥ १३ ॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे मूर्छा लक्षणंसमाप्तम् ॥ अर्थ-जिस मनुष्यक दंडकसरतके विनाही श्वासरहित श्रमहो और इंद्रियोंका जो स्वभाव तिसको पलटदे उसको पंडित क्लमरोग कहते हैं ॥ १३ ॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यां मूछारोगनिदानं संपूर्णम् ॥ दाहरोगनिदानम् । देहे शोणितमुच्छ्रितं प्रकुरुते दाहं महादारुणं खंगं यं बजते त- मेव दहते वाह्यो स्वचं चांतरैः॥ मांसं शोणितनाडिकास्थिनिच- यालेष्मं वसां मजिका सर्वांगेषु गतं दहत्यवयवं सर्वं रुपाह- निशम् ॥ १॥ धातुक्षीणदाहकालक्षण। क्षीणे धातावुत्थितो घोरदाहो मूर्छा कुर्यान्मर्मघातं ज्वरा- तिम्॥तृष्णांशोपंक्षीणशब्दं कृशत्वं वैद्यैरुक्तोऽसौ नरः कष्टसाध्यः , ॥२॥ मर्यादादधिकं रक्तं देहसंस्थितमामयम् ॥ लोहगंधं दहत्यंगं पित्तवातस्य भेषजम् ॥ ३॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे दाहलक्षणं संपूर्णम् ॥ .
हंसराजनिदानम् । अर्थ-जिस मनुष्यके दहमें घिर बढताहै, उसके महादाहका संग पैदा करता है, निस अंगमें रुविर प्राप्तहो उस अंगको दहनकर, और भीतर दाहके होनेसे बाहरकी त्वचामें दाहहो,. और मांस रविर नाडी हड्डी इनके समूहको तथा कफ और बसाको: मन्नाको दहनकरे, सागमें प्राप्तदाह सब अंगके अवयवोंको क्रोध करके निरंतर दहनकरे ॥ १ ॥ जिस मनुष्यको धातु क्षीणहो उसके घोर दाह रोग पैदाहो उसके ये लक्षणहें, मूर्छाहो, मर्ममर्ममें पीडाहो, अरहो, प्यास, शोष मंदशब्दही और कृशदेहहो, यो रोगी वैद्योंने कष्टसाध्यकहाहै ॥ २ ॥ मर्यादासे अधिक रक्त देहमें बढताहे तव दाहरोग होताहे और जब रुधिर निकले तब लोहेकीसी वासआये, सवदेहमें दाहहो, उसमें बातपित्तकीदवाई करना चाहिये ॥ ३ ॥ इति हंसराजार्थवोधिन्या दाहरोगलक्षणं समाप्तम् ।। मदात्ययरोगकालक्षण। दोपा विपस्य ये सर्वे'सुधायाश्चापि ये गुणाः॥ते मद्ये परितिष्ठंति युक्त्या युक्त्या पिवेन्नरः ॥१॥ अयुक्त्या यो पिवेन्मयं तस्य रोगो भवेशम् ॥ तस्माद्युक्त्या पिवेन्मद्यं सौख्यायामृतवन्मुहुः ॥२॥ अयुक्तिमद्यपानेदूपणम् । सूर्याग्निततेन बुभुक्षितेन रोगान्वितेनापि पिपासितेन ॥ श्रमा- वितेनाध्वपरिश्रमेण वेगावरोधेन भयान्वितेन ॥३॥क्षीणेन शो- काभिभयेन चैव कोपाभिभूतेन च निर्वलेन ॥ अत्यम्लभक्ष्यण च सेवितं बहु करोति मद्यं विविधान् विकारान्॥ ४॥ अर्थ-विपके सर्व दोप और अमृतके सर्व गुण मद्यमें रहते हैं, युक्तिसे और अयुक्तिसे पीये तो गुण और अवगुण करता है ॥ १॥ उसीको दिखाते हैं जो मनुष्य वेतरकीबसे दारू पीता है उसके बराबर रोग पैदाहोता है इसीसे मद्यपान विधिपूर्वक करना चाहिये क्योंकि विधिपूर्वक पिया दुआ मद्य अमृतके गुणोंको करता है ॥ २ ॥ सूर्यके तेजमें धामसे, वा अग्निसे तपाहुआ भूखसे • व्याकुल रोगी, प्यास, श्रमसे थका, रास्तके चलनेसे, चौदह बेगोंके रोकनसे, व्याकुल भययुक्त॥३॥ क्षीण मनुष्य, शोकयुक्त, कोपयुक्त, निर्बलता, अत्यंतखटाई खाईहो, और बहुत मद्य पियाहो, ऐसे -मनुष्योंके मद्य अनेक विकार करताहे ॥ ४ ॥ लज्जावुद्धिविनाशनं विकलतां छर्दि गुरुत्वं तनौ पांडुवं कृशता मुखे विरसंतां निद्रां विमूर्छा तृपाम् ॥ हृल्लासं तमकं वर्मि शिथि- - भाषाटीकासहितम् । (६१) लतां गुह्यप्रकाशं तमः कार्याकार्यविमूढतां प्रकुरुते मद्यश्च दोषा . करम् ॥५॥ मद्ये संत्यमृतोपमा गुणगणा युक्ताः प्रपीतेनिश क्षुद्दोधः स्मृतिपुष्टितुष्टिरुचयो नीरोगता कांतयः ॥ आनंदांकुर- कोटयो मधुरता स्त्रीषु प्रहपोत्सवौ वीर्योंजोबलधैर्यशौर्यमतयः सौजन्यसौख्यादयः ॥६॥ अर्थ-लज्जा बुद्धिको दूर करताहै, बेकली, रद, देहभारी, पोलिया, शरीरकृश, मुखमें सवाद- न हो निद्रा, मूर्छा, प्यास, सूखी उल्टी, तमक, वमन, शिथिलता, छिपीबातको कहना, अंधेरा आना कार्य अकार्यको न जानना, दोपोंकी खानि, ऐसा अयुक्तिसे पियाटुआ मद्य करता है, ॥५॥ अथ मद्यपानगुणः ॥ युक्तिसे मद्यपानकरना अमृतके समान गुण करताहै, क्षुधाको • वढावे, स्मृति, पुष्टता, तुष्टता, रुचि, नीरोगता, कांति, आनंदके अनेक अंकुर पैदाकरे, मधुरता, स्त्रियोंमें रुचि, उत्सव, वीर्य, ओज, बल, धीरता, शूरता मति, सुजनता सुखादिकोंको , पैदा करताह ॥ ६॥ मद्येन वुद्धिः प्रथमेन मोदः स्त्रीपु प्रहो वहुभोजनेच्छा ॥ वा- दिवगीतेषु रुचिः सुखं च निद्रारतिः स्यान्मनसोत्सवश्च ॥७॥ मद्ये द्वितीये पुरुषः प्रमत्तः स्यान्नष्टवुद्धिर्विगतात्मचेष्टः ॥ पूर्णा- ननो हर्पयुतोतिनिद्रो दुर्वाक्यशीलो बहुलीलया युक् ॥८॥ तृतीये- मदे नष्टदृष्टिर्मनुप्यो वदेत्सर्वगुह्यानि गच्छेदगम्याम् ॥ गुरुं नैव पश्येदभक्षेत्समंताद्विलज्जो स्वतंत्रो भवेद्भग्नशीलः॥९॥ अर्थ-प्रथम पियाहुआ मद्य बुद्धिको और मोदको वढाये, स्त्रीगमनमें चि पैदाकरे, बहुत भोजनः की इन्छा, वाजे और गीत सुननमें इन्छा, सुखनींद, मनका एकापटगाना, मनमें टत्साह, ये गुण करता है ॥ ७ ॥ दूसरी दफे मद्य पियाहुआ आदीको मस्त करदताहै युद्धि नष्टकरदे चेष्टारहित करदे तिरछी दृष्टि हर्पयुक्त, अतिनिद्रा, खोटा बोले, अनेक टाटाकरे ॥ ८ ॥ तिसरीदफे पिया मय मदसे नष्टदृष्टि करदे, और सब लिपीवात को कहे, और मा, बहिन, बेटी, गुस्का स्त्रीम भी गांदा काम करनेको इन्छा हो, गुरकोभी न देखें, अभक्ष्य भोजनकर, लज्जात्यागदे अपना इग्याका कान करे, मारधाड करे ॥९॥ चतुर्थ मदे मृत्युतुल्यो मनुप्यो भवेद्ज्ञानहीनः स्वकायें वि- (६२) हंसराजनिदानम् । कार्ये ॥ कियाचारशोचादिहीनो विमूढः परं स्वं न जानाति मत्तो विलनः ॥१०॥ पित्तके मदात्ययके लक्षण। पार्श्वशूलशिरःकंपश्वासहिकाप्रजागरेः ॥ मुखशोपेण पित्तस्य तमवेहि मदात्ययम् ॥ ११ ॥ कफके मदात्ययके लक्षण । तंद्राहल्लासस्तैमित्यच्छरोचकगौरवेः । शीतलांगस्य तं विद्या कफप्रायं मदात्ययम् ॥ १२ ॥ अर्थ-चौथीवार पियाहुआ मद्य मुरदेके समान करदे, ज्ञानरहित करदे, अपने पराये कामको न समझे, क्रिया आचार शोच इनकरके रहित करदे, मूढ करदे अपना पराया न जाने, और मस्त लज्जाराहत होजावे ।। १० पसवाडोंमें शूलहो, शिरफांपे, श्वास हिचकी, जागना, मुखका ये पित्तके मदात्ययके लक्षण है ॥ ११ ॥ तंद्रा, सूखी रद्द, गोलकपडेसे पोंछासादेह, वमन, अरुचि देहमारी और शीतल अंगहो उसको काके मदात्ययकहते हैं ॥ १२ ॥ अंगमर्दतृपाशूलरूक्षगानविवर्णता ॥ हिका भ्रमैश्च तं विद्या द्धातप्रायं मदात्ययम् ॥ १३ ॥ त्रिदोपकैमदात्ययकालक्षण । सोपद्रवैः सर्वलिंगेत्रिदोपोत्थैर्मदात्ययः ॥ त्रिदोपजनितो ज्ञेयः साध्यायं च भिषग्वः॥ १४॥ चिहं च तत्परमदस्य वदंति वैद्याश्छिकातृपागगुरुतावहुपर्वभेदः॥ विण्मूत्रशक्तिररुचिर्विरसा- स्यता च श्लेष्मा ज्वरस्तु कृशता रुजता कपाले ॥१५॥ अर्थ-अंगोंका टूटना, प्यास, शूल, रूखाशरीर, तथा विवर्णदेहका, हिचकी य चातके मदात्ययकेहैं ॥ १३॥ जो उपद्रयके साथ हो और तीनों दोपोंका लक्षण मिलतेहों उसको सनिपातका मदात्यय जानना ॥ १४ ॥ औरभी सन्निपातमदात्ययके चिई कहते हैं जिसमें छीक, यास, शरीरभारी, संधि, पीडा, विष्टा, मूत्रका निकलजाना, अरुचि, मुखसे सवाद जातारहै, कफ और चर तथा मस्तकमें पीडा हो ॥ १५ ॥ लक्षण - F
भाषाटीकासाहितम्।
(६३)
मद्यपानोत्थअजीर्णकेलक्षण।
अजीणं मद्यपानोत्थं कुर्याद्दाहमचेतसम् ॥ तृष्णाध्मानमुद्गारं
संधिभेदः शिरोरुजम् ॥ १६॥
मद्यपानोत्थभ्रमकेलक्षण।
भ्रमो मद्यपानोत्थितः कंठधूमं कर्फ दाहमुग्रंज्वरंश्यामजिह्वम् ।।
प्रशोपं पिपासां वमि पार्श्वशूलं गरिष्टोदरं नीलमोष्ठं प्रकुर्यात्१७॥
इति श्रीभिषक्चक्रचित्तात्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे
मदात्ययपरमदाजीर्णविभ्रमाणां लक्षणानि॥
अर्थ-मद्यपीनेसे हुआ अजीर्ण वो ये लक्षण करताहै, होश न रहे ऐसा दाहको कर प्यास और
पेटकाफूलना, तथा डकारका आना, संघिसंधिमें पीडा, मस्तकमे दर्द ॥ १६ ॥ मद्यके पीनेसे हुआ
जो भ्रम घो ये लक्षणको करे, कंठसे धुंयेंका निकलना, कफनिकलना, दाहहो, ज्वर, जाभकाली-
पड़जाय, मुखशोष, प्यास, वमन, पसवाडोंमें दर्द या शूल, उदरमे भारीपना, ओठनीले ॥१७॥
इति हंसराजार्थबोधिन्यां मदात्ययरोगस्समाप्तः ॥
अथोन्मादलक्षणानि ।
विक्षिप्ततामनोवृत्तिदोपर्वातादिभिर्भवेत् ॥ समस्तैर्वासमस्तैर्वासो-
न्मादः कथितो बुधैः ॥ १॥ वार्ताया विस्मृतिर्येन गाने गीत-
स्य विस्मृतिः॥शौचाशौचन जानाति सोन्मादः कथितो बुधैः॥२॥
उन्मादरोगलक्षण।
उन्मादहेतुद्विजदेवतानां संन्यासिनां साधुपतिव्रतानाम् ॥ आध-
र्पणं कुत्सितमंत्रसाधनं दुष्टाशुचीनामशनं च पानम् ॥ ३॥
अर्थ-उसको पण्डितोंने उन्मादरोग कहाहै.जिसमें समस्त वा न्यून वातादि दोपों करके मनकी
वृत्तिमें विक्षिप्तता अर्थात् चावलापना पाया जाय ।।१।। वात करनेको विस्मृति, और गानमें गीतकी-
विस्मृति, जिस करकेहो और शौच भष्टताको जो न जाने उसको पंडितोंने उन्मादरोग कहा..
॥२॥ये उन्मादरोग होनेके कारणहै, ब्राह्मण, देवता, संन्यासी, साधु, पतिव्रतास्त्री इनको दुःख
दनेसे और खोटे मंत्रके साधनस, अपवित्र और दुष्ट पदार्यके भोजनसे या पीनेसे ॥ ३॥
(६४) हंसराजनिदानम् । वातोन्मादकेलक्षण। वातोन्मादद्गृहीतः क्वचिदपि हसते रोदति क्वापि काले रूक्षांगः शून्यचित्तः परिवदति वचो निष्ठुरं वर्थहीनम् ॥ शीघ्रोत्साह विधत्ते स्मितचलनयनो गीतनृत्यं करोति स्वांगानां क्षेपणं वा विकलकृशतनुः क्षीणधातुर्मनुष्यः॥४॥ पित्तउन्मादकेलक्षण। पित्तोन्मादनयुक्तः सततजलरुचिर्भोजने दत्तदृष्टिः॥ रक्ताक्ष- स्तब्धनेत्रो भ्रमविकलतनुः शुष्ककंठौष्टतालुः ॥ शीतेच्छामर्म दाहः परिवदति वचोरौत्यम विधत्ते भक्ष्याभक्ष्यं परेषां परिहरति हठाद्वाग्विवादं करोति ॥५॥ कफउन्मादकेलक्षण। कफोन्मोदे चिह्न भवति कृशता छZरुचयः कफोद्रेकः कंठे म- नसि जडतांगे विकलता ॥ गतोजो भूकत्वं श्रुतिवधिरता देह- गुरुतावमिर्निद्रालालोरसि कृमिशतं वाक्शिथिलता ॥६॥ अर्थ-यातउन्मादयुक्त मनुष्यके ये लक्षण होते है, कभी हंसे, कभी रोवे, रूखा शरीरहोजाय, शून्याचित, दुष्टवचन बोले, व्यर्थबोले, कभी उत्साहयुक्त हो, कभी स्मितयुक्त, चंचलनेत्र, कभी गीत गावे कभी नाचनलगे, कभी अंगोंको चलानेलगे, बिकलहो, शरीरकृश, क्षीणधातु॥४॥जलपीने और भोजन की इच्छाहो, लाल तिरछे नेत्रहों' भम और देहमें, वैकलीहो, कंठ, तालु, ओठ इनका सूखना, शीतल वस्तुको इच्छा, मर्ममर्ममें दाह, पुरावोले, रोवे, क्रोधयुक्तहो, पराया भोजन, भक्ष्य अभक्ष्यको हठसे लूटले, वादकरने लगे, ये लक्षण पित्तोन्माद युक्तके है ॥ ५ ॥ देहकृश; वमन, अरुचि, कफका बढना, कंठमें मनमें जडता, देह विकल, गति और ताकत इनका बंदहोना, गूंगा- पना, बहिरापना, देहभारी, रदहोना, निद्रा आवे और लारका गिरना, पेटमें कृमि पडजाय, वाणी शिथिल, ये कफके उन्मादके लक्षण हैं ॥ ६॥ सन्निपातकेउन्मादकेलक्षण। उन्मादेन निभिर्दोषैर्जातेन ग्रसितो नरः॥ सोपद्रवरसाध्योयं कथितो भिपजांवरैः ॥७॥ . . - - भाषाटीकासहितम् । औरभी कारण लिखतहें। चौरैर्नृपेन्द्रररिभिस्तथान्यैः संत्रासितः क्षीणधनोभिघाती॥शोका- भितप्तो मुनिभिः प्रशप्तः संजायते तस्य मनोविकारः॥८॥ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे उन्मादलक्षणम् ॥ अर्थ-त्रिदीप उन्माद करके प्रसागया जो मनुष्य और उपद्रवयुक्तहो यो रोगी असाध्य है, ऐसे श्रेष्ठ वैद्योंने कहाहे ।। ७ ।। चोरोंने राजाने वैरियोंने और किसीने इस मनुष्यको त्रास दिखायाहो, और जिसका धन नष्टहोगयाहो, चोटलगीहो, शोकयुक्तहो, ऋषि मुनि करके शापदियागयाहो, ऐसे मनुष्यके मनोविकार अर्थात् उन्माद रोग होताहै ॥८॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यां उन्मादरोगस्समा- प्तिमगमत् ।। अथभूतोन्मादलक्षणम् । ब्रह्मण्यो गुरुदेवपूजनरतो दाता च शुद्धाक्षरः संतुष्टो मित- भुक् सुगन्धिवनिताप्रीतिर्विनिद्रोऽनिशम् ॥ तेजस्वी बलवान् शुचिर्नयपरोभिज्ञोतिहान्वितो देवोन्मादयुतो नरः स भवति ब्रह्मात्मको ब्रह्मवित् ॥ १॥ दैत्यलगेहुये मनुष्यके लक्षण । देवब्राह्मणसाधुवैष्णवगवां स्त्रीणां च संन्यासनां विद्वेपी भय दोऽतिनिष्ठुरवचास्तुष्टोन्नपानादिषु ॥ दुष्टात्मा परमर्मभिद्गतभयः क्रोधी च मानी नरःस्तब्धो गर्वसमन्वितो दनुजयुक् क्रूरो सहि- प्णुर्वली ॥२॥ गंधर्वलगाहो उसके लक्षण। संचारी विपिने नदीपुलिनयो रम्यस्थले पर्वते हृष्टारमारुणकंजचा- रुनयनो वादिवगीतप्रियः॥ तुष्टो नीतिपरायणोतिचतुरो वाग्मी सुगंधान्वितो गंधर्वग्रहपीडितः सुवचनः स्वाचारभुङ्मानवः॥३॥ अर्थ-जा ब्राह्मण गुरु देव इनका पूजन कराकरे, दाताहो, शुद्भवाले, संतुष्टहो, थोडाग्दानेवाला, सुगन्धी और स्त्रीमें प्रीतिहो, रातदिन निद्रा न आवे, तेजस्वीहो, वटवानहो, पवित्ररहे, नातिक - . , - , हंसराजनिदानम् । जाननेवालाहो, सर्व बातोंको जाने, हर्षयुक्तहो, ब्रह्मका जाननेवाला, ब्रह्मात्मक ऐसा मनुष्य देवताका उन्मादवाला जानना ॥ १॥ जो मनुष्य देव ब्राह्मण साधु वैष्णव गो स्त्री संन्यासी इनसे बैरकरे, इनको भयदे, तथा खोटाबोले,अन्नजलसे जो तुष्ट नहो, दुष्टहो, पराये मर्मका छेदने- वालाहो, निडरहो, क्रोधीहो, मानीहो, स्तब्धहो, गर्वयुक्तहो,करहो, सहनशील, तथा बलोहो, ऐसे मनुष्यको दैत्यकी बाधाजाने ॥२॥जो मनुष्य वन नदी पुलिन रमणीकस्थल पर्वत इनमें विचरनेवाला हो, प्रसन्नचित्त, लालकमलकेसे नेत्रहों, वाजा और गीत जिसको प्यारालगे, तुष्टहो, नीतियुक्तहो, अति चतुरहो, शुभ बोलनेवालाहो, सुगंधयुक्तदेहहो, वाग्मी, अपने वित्तमाफिक भोजनकरे ऐसे मनुष्यको गंधर्वकी बाधा जाननी ॥३॥ यक्षग्रस्तके लक्षण गंभीरोल्पवचोऽरुणाम्बरधरो धीरोतिशूरो महान् भो माः प्रब- दंतु मे झटिति किं दास्यामि कस्मै वरम् ।। यो यक्षग्रहपीडितो वदति ना नान्योरुणाक्षोनिशं तेजस्वी बलवान् वरो द्रुतगति- ग्मिी सहिष्णुभृशम् ॥ ४॥ महासर्पादियुक्तउन्मादके लक्षण । क्रोधात्मा भुजगग्रहेण परितो यस्तो हि यो मानवो रक्ताक्षो रुधिरप्रियोतिवलवान् प्रेप्सुः पयःपायसे । शौचाचारवहिर्मुखो विलिहितोऽसृक्सृक्किणीजिह्वया शून्यागाररतः क्वचित्प्रसरतः सव हिंसाप्रियः ॥ ५॥ पित्रीश्वरोंकेदोपका लक्षण। दध्योदने पायसशर्करासु मध्वाज्यमासेषु च रक्तवस्त्रे ।। सुगंध- पुष्पेष्वतिशीतलोदे पितृग्रहग्रस्तनरोभिलापी ॥६॥ अर्थ-जो मनुष्य गंभीर और अल्पवाणीका बोलनेवालाहो लालकपडे पहिने धीर अतिपूरहो और जो कहे कि हे मनुष्यो! मुझसे वर मांगो,क्यावं. और लाल नेत्रहो,तेजस्वीही, वलयान्हो,जल्दी चलनेवालाहो, श्रेष्ठ बोलनेवाला, सहनशील, ऐसा मनुष्य यक्षको बाधायुक्त जानना ॥ ४ ॥ क्रोधीहो । और रुधिरप्यारा लगे, मलीहो, दूध और खोरके भोजनकी इच्छाहो, शीच और आचारहितहो,' विले सरीखा घर प्यारालगे, लालनेत्रहो, जीमसे ओठोंके रुधिर लगेको चाटे, शून्यघरमें रहाकरे, कमी पसरजाय, सांपकीसीतरह हिंसा करना प्यारालगे, ऐसे मनुष्यको भुजंग अर्थात् महासर्पकी बाधा - भापाटीकासहितम् । (६७) समझनी चाहिये ॥ ५॥ दही भात खीर बूरा शहद घी मांस लालवन सुगंध पुष्प शीतलजल ये 'पदार्थ जिसको प्यारे हों उस मनुष्यको पित्रीश्वरोंकी बाधा जाननी ॥ ६ ॥ राक्षसलगेहुयेमनुष्यके लक्षण। सुरामांसरक्तपु लिप्सुर्विलज्जो महाक्रोधयुक्तोतिशूरः सहिष्णुः ॥ बली निष्ठुरः क्रूरकर्मा विरूपो गृहीतो निशाचारिभिर्यो मनुष्यः॥७॥ प्रेतग्रस्तके लक्षण । भ्रमति रुदिति नित्यं गह्वरारण्यसेवी विलपति किलमूच्छामेति कंपं विधत्ते॥ हसति लिखति भूमि भक्ष्यपानैरतृप्तो वदति विकल : वाणी प्रेतग्रस्तोमनुष्यः ॥८॥ वालभीरुस्त्रिया देहे प्रविशंति सुरा- दयः॥ शीतादयो यथाकाये मन्यते प्रतिबिंववत् ॥ ९ ॥ अर्थ-मद्य मांस रुधिर इनकी इच्छाहो, लजारहित, महाक्रोधी, शूर, सहिष्णु, वली, निठुर, क्रूरकर्मका करनेवाला, विरूप, ऐसा मनुष्य राक्षसग्रस्त जानना ॥ ७ ॥ डोलाकरे, नित्यरोयाकरे, पर्वत वनमें रहाकरे, विलापकरे, कभी मूर्छासे गिरपडे, कॉपे, हँसे, धरतीको लिखे, भोजन और पीनेसे तृप्त न हो, विकलवाणी बोले ऐसा मनुष्य प्रेतग्रस्त जानना ॥ ८॥ बालक डरपोक स्त्री इनके देहमें देवता आदि प्रवेश करतेहैं जैसे शीतधाम देहमें लगे तिसीतरह प्रतिबिंब उनका मादम होताहै।॥९॥ विशंति देहे मनुजस्य सर्वतो ग्रहादयः कैरपि दृश्यते न ते ॥ कुर्वति पीडां महती सुदुस्सहां गच्छंति शात्या वलिमंत्रकादिभिः ॥१०॥ विशंति नरदेहेषु पूर्णमास्यां सुरग्रहाः॥ संध्ययोर्दानवादै- त्या गंधर्वाश्चाष्टमीद्वयोः॥११॥ पितरः कृष्णपक्षे च यक्षाये प्रति पत्तिथौ ॥ पंचम्यामुरगा रात्री गंधर्वाराक्षसादयः ॥ १२ ॥ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे भूतोन्मादलक्षणंसंपूर्णम् । अर्य-प्रहादि संपूर्ण मनुष्यके देहमें प्रवेशकरते किसीको नहीं दीखते और दुस्सह तथा भारी पीडाको करते हैं यो सर्व शांति और वलिदान तथा मंत्रजापसे शांत होते हैं ॥ १० देवताग्रह मनुष्यके देहमें पूर्णमासीको प्रवेश करते हैं, और असुर दानव पूर्णमासी• और अमावास्या इनकी .
(६८) हंसराजनिदानम् । संधिमें प्रवेश करते है और गंधर्व दोनों शुल व कृष्ण पक्षको अष्टमीमें प्रवेश करते हैं ।। ११॥ पितर कृष्ण पक्षों और यक्ष पडवा, सर्प पंचमीमें, रात्रिमें राक्षसादिक, चतुर्दशीमें पिशाच ये प्रवेश करते है ।।१२।। इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यांभूतोन्मादटक्षणं सम्पूर्णम् ।। वातअपस्माररोगके लक्षण। मासे पक्षे दशाहे प्रकुपितमरुतां संभवो घोररूपो रोगोपस्मार- संज्ञः सपदि स कुरुते पातयित्वा नरांगम् ॥ श्वासं कासं च मूच्छा करचरणशिरःक्षेपणं शून्यदेहं दोपोद्रेकं विसंज्ञां कफच- यवमने स्वेदशोपांगपीडाः॥१॥ पित्तकीमृगीरोगके लक्षण । पित्तापस्माररोगी पतति भुवि नभः पीतरक्तं च दृष्ट्वा फेनं पीतं कफस्य प्रवमति मुखतः पीतनेत्रास्यकायः॥ उत्तप्ताक्षो विसंज्ञः क्षिपति करपदः: कंपते सप्रसेकःसंरंभश्वासमूछो भ्रमति बहु- तरं शुष्कहृत्कंठतालुः ॥२॥ कफकीमृगीरोगकेलक्षण। श्लेप्मापस्माररोगी वितरति बहुशो हस्तपादप्रकंपं संरंभादर्श- यित्वा सपदि शितनभः पातयित्वा मनुष्यम् ॥ शीतांगं शुक्लनत्रं शितकफनिचयं वऋदेशोद्गिरंत रोमांच श्वसशीतं जडतरहृदयं गौ- रवांगं स्फुरंतम् ॥३॥ अर्थ-मासमें पक्षमें दशदिनमें कुपित हुआ जो वात सो अपस्मारनाम मृगोरोगको पैदाकर' ये लक्षणोंको करताहै मनुष्यको पृथ्वीपर गैरदेता है, और श्वास, खांसी, मूळ,' तथा हाथपैरोंको इधर उधर पटकना, तथा शिरको पटकना, शून्य देह, दोपोंको बढ़ाये, बेहोशी, कफको उल्टी करे, पसीने, शोप, अगोंमें पीड़ा ॥ १ ॥ पित्तकी मृगीवाला रोगी धरतीमें गिरपडे और आकाशको लाल पोला देखे, और मुखसे पीले झाग कफको गेरे, पीलेनेत्र, पीलाही देह होजाय, नेत्र तप्त हो जायँ, बेहोशी हो, हाथ पैर पटके, कापे, पसीनेहो, श्वासका बढना, मुर्दा, बहुत डोले, ताल कण्ठ हृदय सूखे, ये पित्तको मृगी रोगवाला करे ॥२॥ कफको मृगी भापाटीकासहितम् । - , रोगवाला मनुष्य य लक्षणोंको करै हाथ पैरको कँपावै, जल्दीसे श्वेत आकाशको देख पृथ्वीपर गिरपडे, देह शीतल होजाय, नेत्रसपेद, श्वेतकफको मुखसे गेरे, रोमांचहो, श्वास हो, शरदी टने, हृदय जकड जावे, शरीरभारी, तथा देह फडके ॥३॥ सन्निपातकीमगीरोगके लक्षण । वातपित्तकफेर्युक्तश्चिह्नः सर्वैः समन्वितः ॥ अपस्मारः प्रकुरुते यंचतं रोगिणोनिशम् ॥४॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे अपस्मारलक्षणम् ॥ अर्थ-बादी कफ पित्त तीनो दोपोंके चिह्नों करके युक्त जो मृगीरोगवाला सो मर जाने ॥४॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यामपस्माररोगनिदान समाप्तम् ॥ वातव्याधिरोगलक्षण । व्यायामेन क्षुधातृपातिकटुकक्षाराम्लरूक्षाशनैः शोकव्याधिविक- र्पणातिगमनैरत्यम्बुपानादिकैः॥धातोःसंक्षयघातपातबनितात्यंत- प्रसंगादिभिर्वातः संकुपितः करोति विविधानोगान्महादारुणा- न् ॥१॥ स्रोतांसि सर्वाणि शरीरजानि रिक्तानि धातुप्रवहाणि तानि ॥ प्रपूरयित्वातिरुपा शरीरे मर्माणि संतोदति चंडवातः॥२॥ हृत्पा:दरवस्तिहस्तचरणग्रीवाशिरःकूजनं नाताकर्णमुखा- क्षिदंतरसनागुल्मांत्रसंपीडनम् ॥कुजवं बधिरंकृशत्वमरति खां- ज्यं शिरकंपन अर्धांगे जड़तां करोति कुपितो बातो महा- दारुणः॥३॥ अर्थ-दण्ड कसरतक करनेसे. क्षुधा तृपाके रोकनेसे, अति कडुआ खारा मामखा ऐसे पदार्थके खानसे, शोचसे, देहमें रोगके होनसे, बहुतचलनेसे, बहुत जल पीनेसे, धातुकं क्षय होनेसे वातसे, गिरपडनेसे, स्त्रीके बहुतसङ्ग करनेसे वात कुम्पेत हो मनुष्योंको महादारण अनेक यातके रोग पैदा करे ॥ १ ॥ जितनी शरीर धातुका बहनेवाली नाटो तिनको यात गुफा करदे और (७०) हंसराजनिदानम् । रोपको प्राप्त हुई जो वात सो सर्व नसोंमें प्रवेश कर प्रचण्ड यात मर्ममर्ममें पीडा करती है ॥ २॥ हृदय पसवाडा पेट वस्ती हाथ पैर नाड शिर इनका गूंजना, नाके कान मुख नेत्र दांत जीम टकना आंत इनमें पीडा हो, कुबडा होजाय. बहिरा तथा लटजावे, मनका न लगना, खंजापना, शिरका हिलना, अर्धागवायु होजाय तया वादीस जकड जाय, ये लक्षण कुपितमहाबात करती सर्वांगेपु गतो मरुद्गुरुतरं शूलं करोति द्भुतं भेदं संधिषु कंपनं करपदामस्थ्नां च संस्फोटनम्॥सर्वांगस्फुरणं विनिद्रमनिशं शोक शरीरे भ्रममाध्मानं कटिपीडनं हृदिरुजविण्मूत्रयोस्स्तंभनम्॥४॥ वातः कुर्यात्कोपितो दंतवंधं जिह्वास्तंभकर्णयोगुंजशब्दम।।नाडी स्तब्धं रक्तवीर्यादिशोपं अस्थिस्फोटं देहसंकोचवृद्धीः ॥ ५॥ जृम्भोद्गारं च हिकां वितरति पवनः पीतवर्ण शरीरं हल्लासं. श्वासकासं मनसि विकलतांछर्यतीसारगुल्मम्॥अंतर्दाहं विसंज्ञा कृशतनुमतिं कामलां पांडुरोगं उद्वेगं संधिभेदं व्यथयति सततं सर्वकाये मनुप्यम्॥६॥ अर्थ-सर्व अङ्गोंमें प्राप्त हुई जो बात सो ये लक्षणोंको प्रगट करै प्रबल शूल, संधीनमें पीडा, हाथ पैरोंका कांपना,हड्डी हड्डीका फूटना, सब शरीरका फड़कना,नींदका न आना, सूजन तथा भ्रम, पेटका फूलना, कमर पीडा, हृदयमें दुःख, विष्टा मूत्रका रुक जाना ॥ ४ ॥ कुपित बात दन्तबन्ध जीभका स्तम्भन, कानोंमें गुजारशब्द, नाडियोंका स्तम्भ,'रुधिर और वीर्यका सूखना हड्डी हड्डीमें पीडा देहका घटना बढना ये सर्व लक्षण करती है॥५॥ जम्भाई, डकार, हिलकी, पीलिया, सूखी रद्द, श्वास, खाँसी, मनमें बेकली, उलटी, अतीसार, गोला भीतरी दाह, बेहोशी, शरीर कश मनका न लगना, कामला, शरीरका रंग पीला, उद्वेग सन्धिनमें पीडा, सब शरीरमें व्यथा, ये लक्षण सागकी पवन करती है ॥६॥ करोति कुपितोनिलो हलीमकं च गृढ़सीमाविषूचिकां विलंविकां प्रलापमंगपीडनम् ॥७॥ त्वचामप्राप्तवातका लक्षण । वग्गतः पवनः कुर्याद्रूक्षत्वं त्वचि कृष्णताम् ॥ कार्कश्यं शून्य- तां कार्यं वैवयं स्फुटितारुजम् ॥ ८॥ ,
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भापाटीकासहितम् ।
रुधिरमेंमाप्तवातका लक्षण ।
बातो रक्तगतः कुर्यात् काश्यं रुधिरशोषणम् ॥ तीनतापं नणं
गुल्मं खजूं दर्दू विचर्चिकाम् ॥९॥
अर्थ-कुपितहुई जो बात सो मनुष्यकी देहमें हलीमक, गृध्रसी, विचिका,विलंबिका, प्रलाप,
अंगोंमें पीडा करतीहै ॥ ७ ॥ त्वचामें प्राप्त पवन शरीर सूखा तथा कालावर्णको करे,
कर्कशस्वभाव तथा देहमे शून्यता और कृशपना, विवर्ण तथा देहका फटना,
ये लक्षण कर-
तोहै ॥ ८ ॥ रुविरसे प्राप्तवादी शरीर कृशकरे, रुधिरमात्रको सुखाय देय, तीवनरकरे, फोटा
और गोलानको पैदाकरे, खुजली, दाद, खाजको करती है ॥९॥
मासमेदोगतवायुके लक्षण ।
मांसमेदोगतो वातो गुर्वंगं कुरुते श्रमम् ॥ स्तब्धांगमरुचिं ताप-
मरतिं रक्तशोपणम् ॥१०॥
मजास्थिगतवातके लक्षण ।
वातो मजास्थिगः कुर्याद्भेदं पर्वास्थिसंधिषु ॥ घलमांसक्षयं
शूलं विनिद्रां वीर्यनाशनम् ॥ ११ ॥
शुक्रगतवातके लक्षण ।
शुक्रस्थः पवनः कुर्यादरुचिं त्रिषु पीडनम् ॥ वीर्यशोपं मनस्तापं
बलकांतिमुखक्षयम् ॥ १२ ॥
अर्थ-मांस मेदामे प्राप्त वात देहको भारीकरे, अनायास श्रमको करे, शरीर जदजाय,
अरुचि, ताप, मनका न लगना, रुधिरका सूखना ॥ १०॥ मन्ना और हहोमें प्राप्तईई जो बात
सो गांटोंमें पीडा, हट्टी और संधिनमें पीडा मांस और बलका क्षय होना, शूल और नींदनाश
तथा वीर्यका नाश ये लक्षणोंको करे ॥ ११ ॥ शुक्रमें प्राप्तहुई वात सो अरुचि, मन, वाणी,
देह इनने पीडा, वीर्यका शोष, मनमें ताप, बल कान्ति सुखका नाश ये लक्षणोंको करे ॥ १२ ॥
नाडीगतवातके लक्षण ।
वातः शिरागतः कुर्यात्कुञ्ज खांज्यं महारुजम् ॥ शिरासंकोचं
स्तब्धत्वं वधिरं वमनं कृशम् ॥ १३ ॥
.
(७२)
हंसराजनिदानम् ।
कोष्ठगनवातके लक्षण।
कोष्ठस्थानगतो वातः कुरुते मूत्रबंधनम् ॥ शूलाध्मानमुदावर्त
गुल्माशासि भगंदरम् ॥ १४ ॥
सर्वांगगतवातके लक्षण ।
सर्वांगस्थोपि कुपितः पवनो विविधा रुजः ॥ कुरुते वर्द्धते
सर्वान् वाह्याभ्यंतरपीडकान् ॥ १५ ॥
अर्थ-नाडीगत वातरोग ये लक्षणोंको करै, कुबडापना, खंजापना, नाडौनका सुकडना, तथा
जडता, बहिरापना, बौनापना और कृश ॥ १३॥ कोष्टमें प्राप्तभई जो बात सो मूत्रबन्धको
करे, शूल और अफराको कर, उदावर्त, गोला, बवासीर, भगंदर इनको करती है ॥ १४ ॥
सर्वांगमें प्राप्तभई पवन सो तरहतरहळे रोगोंको पैदा करतीहै, और सर्वांगमें कुपित वात वाहरके
रोगोंको तथा भीतरके रोगोंक वडातीहै ॥ १५ ॥
सान्धनस्थितवातके लक्षण ।
संधिस्थः पवनः कुर्यात् शोर्फ शूलं च दारुणम् ॥ संधीविस्फो-
टयेत्सद्यःस च कर्पति वर्द्धते ॥१६॥ वायवः पंच देहस्था हेतवः
सुखदुःखयोः॥ स्वस्थाने सुखदाः सर्वे परस्थानेषु दुःखदाः॥१७॥
पंचवातके अलगअलग लक्षण ।
प्राणो वायुर्वसति हृदयेऽपानसंज्ञो गुदांते नाभेश्चक्रे भ्रमति परि-
तो जीवभूतः समानः ॥ कण्ठस्थाने चलति पवनो योहिरात्रा-
बुदानः सर्वांगेपु प्रसरति मरुद्व्यानसंज्ञो नितांतम् ॥ १८ ॥
अर्थ-संधियोंमें प्राप्त वात सूजन और दारुणशूल, संधिनमें पीडा और सुखाये तथा बढावै
॥ १६ ॥ पांच वात देहमें. सुखदुःखको देनेवाली रहती है । यदि वो अपने स्थानपर रहें तो,
सुखदायक और दूसरेके स्थानपर जानेसे दुःखदायक होती हैं ॥ १७ ॥ १ प्राणवात हृदयमें
रहतीहै, २ अपानवायुगुदामें रहतीहै, ३ जीवभूतसमानवायु नाभिचक्रमें रहती है और ४ रात
दिनकी बहनेवाली उदानवायु कंठमें रहती है और सब देहमें रहनेवाली व्यानवायुहै ।॥ १८ ॥
पित्तान्वितमाणवातके लक्षण ।
प्राणः पित्तान्वितः कुर्यादूप्माणं चित्तविभ्रमम् ॥ तृष्णां शूलं च
हिलासं हिकां छर्दि च दुस्सहाम् ॥ १९॥
. भाषाटीकासहितम् । (७३) कफान्वितमाणवातके लक्षण । प्राणः कफावृतः कुर्याद्दौल्यालस्यसादनम् ॥वेरस्यमरुचिंतंद्रामु- स्क्लेदं दोपसंचयम् ॥ २०॥ पित्तकफयुक्तउदानवातक लक्षण । उदानः पित्तयुक् कुर्य्यान्मूछा दाहं भ्रमं क्लमम् ॥ कफान्वितोति मंदाग्निं शीतं हर्षं च कंपनम् ॥२१॥ अर्थ-पित्तसंयुक्त प्राणपवन देहमें गरमीको करे तथा चित्तभ्रम, प्यास, शूल, सूखीरद, हिच- की, वमन लक्षणोंको करै ॥ १९ ॥ कफसंयुक्त प्राणवात ये लक्षण करतीहै दुर्बलता, आल- स्यका स्थान, विरसता, अरुचि, तंद्रा, उकलाहट दोषके समूहको बाढतीहै ॥ २०॥ पित्तके साथ मिली जो उदानवायु सो ये लक्षण कर मूर्छा, दाह, भ्रम, ग्लानि, और उदानवायु कफके साथ मिलीहो तो मदाग्नि, शीत, हर्ष, तथा कंपको करती है ॥ २१॥ पित्तकफयुक्तसमानवातके लक्षण । समानपित्तयुक्तृष्णां मूर्छामूष्माणमेव च ॥ कुर्यात्कफान्वितो हर्ष विषमूत्रं रोमहर्षणम् ॥ २२ ॥ पित्तयुक्तअपानवातके लक्षण । अपानः पित्तयुक्कुर्यात् रक्तातीसारमुल्वणम् ॥ ऊप्माणमरत दाहमशासि च भगंदरम् ॥ २३ ॥ कफयुक्तअपानवातके लक्षण। कफयुक्तो यदापानो गुदाते कृमिसंचयम् ॥ कुरुते गुरुता मूत्र मालस्यं वलनाशनम् ॥ २४॥ अर्य-समानवायु पित्तके साथ मिली हुई तृष्णा, मूर्छा, गरमीको करतीहै, इसीतरह कम्युक्त समानवायु हर्ष, विष्टा मूत्रका रुकना, रोमांचको करतीहे ॥ २२ ॥ अपानवायु पित्तके संयुक्त ये लक्षण करतीहै- रक्तातीसार, गरमी, मनका कहीं न लगना, दाह, बवासीर, भगंदर ॥ २३ ॥ कायुक्त अपानवायु गुदामें कृमिरोगकर, शरीरभारी, बहुत मूत्रका होना, आलस्य, बट कानाश ये लक्षणोंको करे ।। २४ ॥ पित्तकफयुक्तव्यानयातके लक्षण । व्यानः पित्तान्वितः कुदिंगविक्षेपणक्लमम् ॥ दंडकं स्तम्भनं (७४) हंसराजनिदानम् । दाहं शोफ शूलं कफान्वितः ॥ २५ ॥ नाडी यदा समभ्येत्य कुपितः पवनो बली ॥ देहविक्षेपणं कु-च्छिर कंपं करोति च ॥ २६ ॥ यदा संकुपितो वातो नानाहेतुभिरूलगः ॥ तदा संकु- रुते दोपं हृच्छिरःशंखपीडनम् ॥ २७ ॥ अर्थ-व्यानवायु पित्तके साथ मिलीहुई अंगोंको पटकतीहै,ग्लानिको करतीहे, उपताप, स्तंभ, दाह, सूजन, शूल ये व्यानवायु कफसंयुक्त करतीहै ॥ २५ ॥ वली पवन कुपितनाडीनमें प्राप्तहो शरीरका इधर उधर पटकना, करती है और शिर कंपको करतीहै ॥ २६ ॥ जब वादी नाना हेतूनसे कुपित उपजती है तब हृदयमें मस्तकमे कनपटीमें पीडा करती है और अनेकदोपोंको करती है ॥२७॥ : गत्वोचं स्वगृहात्करोति पचनो देहं च कोदंडवत् कंठः कूजति कोकिलेव सततं गात्रं मुहुःक्षेपणम् ॥ स्तब्धत्वं नयनद्वयोर्वित- नुते शोपं मुखे वक्रिमां श्वासं काससमन्वितं च जठरे शूलं तृषां संभ्रमम् ॥२८॥ पित्तयुक्तवातके लक्षण । दाहं पित्तान्वितः कुर्य्यात्तृष्णां छर्दैि शिरोव्यथाम् ॥ हृल्लास हृदयग्रथिं हिकां कंठहनुग्रहम् ॥ २९ ॥ कफयुक्तवातके लक्षण । कफान्वितो वर्मि कुर्यात्तंद्रां निद्रांगगौरवम् ॥ जाड्यं शैत्यं सरोमांचं क्षवं शोफं च वेपथुम् ॥ ३० ॥ अर्थ-अपने स्थानसे ऊपरको घढी हुई यात मनुष्यके देहको धनुपकी तरह बांका करदे, और कंठ कोकिलाको यतीर बोले, तथा शरीरको इधर उधर पटके, दोनों नेत्रोंका स्तन्धत्यहो, मुखका सूखना, तथा मुख टेढा होजाय, श्रास, खांसीके साथ पेटमें दर्दही, और प्यास तथा भ्रमही ॥ २८ ॥ पित्तयुक्त यात दाहकरे, प्यास, और वमनको करे, शिरमें दर्द, सूखीरद, उदयमें गांठ, हिचकी, कंठमें हनुग्रह, इन रोगोंको करे ॥ २९ ॥ कफयुक्त वात वमन, तन्द्र निद्रा, देहभारी, जटता, शीत लगना, रोमांच ठीक, मजन, कंप ये रोग करतीहै ॥३० भापाटीकासहितम् (७५). कफपित्तयुक्तवातके लक्षण। कफपित्तान्वितो वायुः पक्षाघातं कटिग्रहम् ॥ कुब्जं खंड शिर:- कंपमंगभंगं प्रपीडनम् ॥३१॥ अधोभागमाप्तवातके लक्षण। गत्वाऽधः कुपितः करोति मरुतोरुस्तंभनं कुंडलं शूलाध्मान विलंविकां गुदरवं गुल्मोपदंशं भृशम् ॥ शूकाासि भगंदरं कटिस्नं विण्मूत्रयोस्स्तम्भनं जंघोरूगुदशिश्नयोनिवृषणानां पीडनं दण्डकम् ॥ ३२॥ हेतुभिः कुपितो वातो ह्यतिकोपोन्यदो- पयुक् ॥ महाकोपस्त्रिदोषाभ्यां स वै भवति रोगदः॥ ३३ ॥ इतिश्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे वातव्याधिलक्षणम् ॥ अर्थ-कफ पित्त मिली हुई वात पक्षाघात, कमरमे दर्द, कुबडापना, खंज व शिरक हिलना, अंगभंग और पीडा करती है ॥ ३१ ॥ नीचेके भागमें प्राप्त हुई जो पवन सो ऊरुस्तंभ, कुडलैरोिग, शूल, अफरा, विलंविका, गुदामें शब्द, पेटभे गोला, उपदंश, शूकरोग, बवासीर, भगन्दर, कमरमें दर्द, दस्तपेशाबका एकजाना, जंघा, ऊरू, लिगेन्द्री, योनि,अंडकोश इनमें दर्द, तथा दडकरोग इनको करती है ॥ ३२ ॥ अपने हेतूनसे कुपित वात रोग करती है, और दोपके मिलनसे अति कोपको प्राप्त होती है, और त्रिदोपसे महाकोपको प्राप्त होती है तब बराबर रोग करती है ॥ ३३॥ इति श्रीहंसराजार्यवोधिन्यां वातव्याधिरोगनिदानं सम्पूर्णम् ।। अथवातरक्तरोगनिदानम् ॥ तत्रादीवातरक्तरोगोत्पत्तिः । रूक्षोप्णाम्लकपायतीक्ष्णकटुकस्निग्धाशनैर्भूयसः निष्पावांस- कुलत्थशाकमधुरक्षारान्नपित्ताशनेः ॥ तकाम्लासववारुणीदधि- पयःपानर्निशाजागरैः प्रायः कुप्यति वातरक्तमपरेर्व्यायामशो- जोमूत्रापातमें कहा है। . , .
- - .(७६) हंसराजनिदानम् । कादिभिः॥१॥ विरुद्धदुष्टाशुचिपानभोजनेर्जलावगाहेर्वनितातिसं गमेः॥ रात्रौ दिवा जागरणः प्रधार्पतो रक्तप्रकोपं कुरुते मरुत्तदा ॥२॥स्रोतांसि रक्तप्रवहाणि रुद्धा करोति वातो रुधिरं च कृष्णम्॥ रोपात्तथा शोणितमुच्छलंति समस्तरोगान्वितनोति नूनम् ॥ ३॥ अर्थ-रुखा, गरम, खट्टा, फसेला, तीखा, कडुआ, चिकना भोजन करनेसे, निष्याय तथा मांस कुलथी शाकमीठा खारमिला और पित्तकी करनेवाली वस्तु के ग्वानेसे छांछ, आम्र,आसव,मय, दही दूधके पानसे, रातमें जागनेसे, दंड कसरतके करनेसे शोचसे, वातरक्त कोपको प्राप्त होताहै ।। ॥ १ ॥ विरुद्ध दुष्ट अपवित्र वस्तुके पीनेसे, तथा खानेसे, स्नानसे, बहुत स्त्रीसंगसे, रातदिनके जागनेसे और डरनेसे यात रक्त रोग पैदा होता है ॥ २ ॥ सुधिरको बहनेवाली नादानके मार्गको रोककर वात रुधिरको कालारंगका करदेवे, फिर क्रोधको प्राप्त हुआ जो रुधिर सो देहके बाहर तथा भीतर अनेक रोगोंको पैदा करे ॥३॥ करोत्यालसं मंडलं वातरक्तं शरीरं विवर्ण रुजं रूक्षगात्रम् ॥ भ्रमं मूत्रकृच्छ्रे कमं मर्मतोदं ज्वरं वेपथुत्वं शिरःपीडनं तत् ॥ ४ ॥ पित्तान्वितवारक्तकेलक्षण । करोत्येवपित्तान्वितं वातरक्तं मुदं दाहसम्मोहतृष्णांगशोपम् ॥ भ्रमोष्मारति इछर्दिस्वेदांगतोदं कटुत्वं मुखे शोफमूर्छा विनिद्रम् ५ कफयुक्तवातरक्तलक्षण । कफेनान्वितं वातरक्तं गुरुत्वं करोत्यालसं मंडलं रक्तपीतम् ॥ वमिं मंदचेप्टेंद्रियपु प्रलापं शरीरेति पामां कृशत्वं क्षवत्वम् ॥६॥ अर्थ--यातयुक्त वातरक्त आलकम, कालेकाले देहमें चकत्ता, तथा शरीरका विवर्ण, रूखा देहकरदे, पीडा हो, भ्रम, मूत्रकृच्छ्, ग्लानि, मर्ममर्ममें पीडा, ज्वर, कंप, शिरमें पीडा ॥ ४ ॥ पित्तान्वित जो वातरक्त सो मस्तपना, दाह, मोह, प्यास, अंगशोप, भ्रम, गरमी, मनका डमा- दोलपना, वमन, पसीनेका आना, अंगोंमें पीडा, मुख कटुआ, सूजन, मूर्छा, निद्राका नाश ये लक्षणों को करता है ॥ ५॥ कफयुक्त वातरक्त देहभारी करे, आलकस, देहमें लालपाले चकत्ते करे, वमन, इंद्रियोंकी मंदचेष्टा होना, वकना, देहमें खाज, तथा देहकृश और छींकका आना ये को करे ॥ ६ ॥ पांगुल्यं च विसार्पकारुचिमदा मूर्छागुलीवक्रता हिक्कादाह- भापाटीकासहितम् । (७७). प्रवेपिका भ्रमतृपाश्वासक्लमः स्फोटताकासो मोहशरीरशोपम- धिकं मर्मग्रहश्चार्बुदः संप्रोक्तास्समुपद्रवामुनिवरैस्ते वातरक्तेऽहिताः. ॥७॥ सोपद्रवं त्याज्यतमंभिपरिभाईदोपजं कष्टतरेणसाध्यम् ॥ जपेन दानेन शिवार्चनेन यत्नौषधीभिर्ननु वातरक्तम् ॥ ८॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे वातरक्तलक्षणम् ।। अर्थ-पांगुरा, विसर्परोग, अरुचि, मद, मूर्छा, उंगलीटेंढी हो जाय, हिचकी, दाह, कंप भम, प्यास, श्वास, ग्लानि, शरीरका फटना, खांसी, मोह, देहमे शोप, मर्मस्थानोंमें पीडा,. अर्बुदरोग ये वातरक्त रोगके उपद्रव मुनीश्वराने असाध्य कहे हैं ॥ ७ ॥ वैद्यों करके उपद्रवके साथ जो यातरक्त सो त्याज्य है, और दो दोपसे पैदा हुआ जो वातरक्त सो कष्टसाध्य है वो जप दान शिवपूजन और इलाज औषधी करके अच्छा हो॥८॥ इति श्रीहसराजार्थबोधिन्यां वातरक्तनिदानं सम्पूर्णम् ॥ अथऊरुस्तम्भानिदानम् । नीत्वाधः कुपितो वातः सञ्चयं श्लेप्ममेदयोः ॥ जंघोरुसक्थिगु- ल्फेषु पूरित्वास्तम्भयेद्गतिम् ॥ १ ॥ जंघोवोंश्लेप्ममेदाभ्यां स- म्पूर्णो भवतौ बलो ।। ऊरुस्तम्भः सविज्ञेयो भिपग्भिः प्राकृते- भृशम् ॥ २॥ ऊरुस्तम्भलक्षण । ऊरुस्तम्भेति पीडा भवति चरणयो रोमहर्को जडलं शीतं सर्वा- कम्पो वयास शिथिलता छर्दिनिद्राकृशत्वम् ॥ कृच्छ्रान्न्यास- म्पदानामरुचिरतिवमिमन्दवह्निर्गुरुत्वं चिहान्येतानि नूनं मुनि- गणवचनात्कीर्तिता हंसराजेः॥३॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे उरुस्तम्भलक्षणम् ॥ अर्थ-कोपको प्राप्त हुई जो वात सो का और मेटाकं समूहको नाने ले जायकर जांघ कर जानू टकना इनमें व्याप्त करके चटनकी शतिको स्तम्भन करद, उसे (७८) हंसराजनिदानम् । ऊनस्तंभरोग कहते है ।। १॥ जांच ऊरू जब कफ और चर्बीसे परिपूर्ण हो जाय और चला न जाये उसको वैद्याने जरुस्तम्भ रोग कहाहे ॥ २ ॥ ऊरुस्तम्भ रोगमें ये लक्षण होते हैं दोनों पैरोंमें पीडा, रोमांच, जडत्व, शीतका लगना, सर्व देंहमें कंप, अंगोंमें शिथिलता, रद्द, निद्रा, कृशता, पैरोंका कठिनतासे उठना, अरुचि, मनका न लगना, वमन, मन्दाग्नि देहभारी, ये उरुस्तम रोगके लक्षण मुनीश्वरों के बचनके अनुसार हंसराज कविन कहेहैं ॥३॥ इति हंसराजार्थबोधिन्या उरुस्तम्भरोगनिदान सम्पूर्णम् ॥ , . अथामवातलक्षणम् । व्यायाममंदाग्निविरुद्धभोजनैः स्निग्धाशनेनातिविहारचेष्टया ॥ रात्री दिवाजागरणेन कोपितःश्लेप्मस्थले ह्यामचयं नयेन्मरुत्१॥ आमान्नस्य रसोपको मस्ताक्रियतेपुनः॥ दृपितः कफपित्ताभ्यां नाडीभिः पीयते निशम्॥ २ ॥आमसंज्ञःसएवायंयो जीर्णजनि- तोरसः ॥ रोगाणामाश्रयोघोरः स्रोतांसि तुदते भृशम् ॥३॥ अर्थ-तीन श्लोक कारके प्रथम आमरोगको उत्पत्ति लिखते हैं दंड कसरतके न करनेसे, विरुद्ध भोजनसे, चिकने पदार्थ खानेसे, अत्यन्त स्त्रीआदि सेवन करनेसे रातदित जागनेस, कोषको प्राप्त हुई जो बात सो कफके स्थानमें आमकं समूहको प्राप्त करती है ॥ १ ॥ अन्नका जो रस विनापका उसको पात दूपित कर तथा पित्त कफ कर दूपित भया हो उसको नाडी पीती है ॥ २ ॥ उसी अजीर्णसे पैदा हुये रसको आमरोग धोररोगोंका आश्रय करते हैं और यह आम नाडीके मागोंको रोक देती हैं ॥ ३॥ वातजन्यनामरोगके लक्षण। आमो रुग्विदधाति शोफमधिकं संकोपितो वायुना जंघोरुक- रसन्धिपादवृषणस्कन्धास्यनेनेपु च॥मांसास्थिनिककुञ्चनञ्च हृद- ये कम्पं ज्वरं शोपणं स्तब्धांगं वितनोति दारुणभयम्पाक तृपां' शून्यताम् ॥४॥ पित्तसेकुपितामलक्षण । आमः संकुरुते रुपांगमरुणं पित्तेन संकोपितः शीर्षेसन्धिषु पडिनं कटिरुजं सर्वांगदाहं ज्वरम् ॥ मूर्छा संभ्रमशोपणं च हृदये शलं महादारुणं वन्धं सूत्रपुरीपंयोनयनयोः पीतत्वमाति तृषाम् ॥५॥ A भापाटीकासहितम् । (७९) , ये आमः श्लेप्मयुतः करोति जडतां निद्रां गुरुत्वन्तनौ ह्यालस्य वहुमूत्रताञ्चगलके संकूजनं शीतताम्॥दौर्बल्यं मुखपादहस्तवृष- णे शोपगते स्स्तम्भनं वीयॊजोरुचितेजसां बलधियां नाशं प्रसेकं क्लमम् ॥६॥ अर्थ-बादीसे कुपित आमरोग जाघ ऊरू हाथ तथा देहकी संधी पैर अंडकोश कंधनमें मुख तथा नेत्रोंमें सूजन करदे, मास हड्डी त्रिक कहिये मकड इनका घटना, हृदयमें कंप, ज्वर, शोप, देहका जकडजाना, धोरभय, तथा देहका पकना, और प्यास और देहमें शून्यता लक्षण करती है ॥ ४ ॥ पित्तसे कुपित जो आमरोग सो देहको लाल करदे, मस्तक तय संधीनमें दर्द, सब देहमें दाह, तथा जर, मूर्छा, भ्रम, शोप, हृदयमें महादारुण शुल, मूत्रपूरीषक एकना, नेत्र पीले, प्यास और खद, ये लक्षण करता है ॥ ५॥ कफयुक्त आमरोगके ये लक्षण हैं शरीर जकडजाय, निद्रा, देहभारी,आलकस, पेशाब ज्यादा उतरे, गलेका [जना, जाड़ा लगे दुबलपना, मुख हाथ पैर अंडकोश इनमें सूजन, गतिका रुकना, वीर्य, ताकत, रुचि, तेज, बल बुद्धि इनका नाश; लारका गिरना, ग्लानी ॥ ६ ॥ आमस्त्रिदोपजोऽसाध्यः कष्टसाध्यो द्विदोपजः ॥ दोपैकसंयुतः सा- ध्यः सुखेनैव भिपग्वरैः ॥ ७ ॥ त्रिदोपजनितैः सर्वैर्लक्षणैर्लक्षितो हि यः॥ सन्निपातः स विज्ञेयो द्विदोपो हि द्विदोपजैः॥८॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे आमवातलक्षणम् ॥ अर्थ-त्रिदोषसे पैदा हुआ आमरोग असाध्य है, और ददोपोंसे जो हुआ सो कष्टसाध्य है, और एक दोषयुक्त साध्य है ऐसे सुषेणादि वैद्योंने कहाहै ।। ७ ॥ जिममें त्रिदोपके सत्र लक्षण "मिलते हो उसको सन्निपातका आमवातरोग कहते हैं, और जिसमें दोदोपोंके चिह्न हो उसे द्विदोपज कहते हैं ॥ ८ ॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां आमवातलक्षणं सम्पूर्णम् ॥ अथ परिणामनिदानम् । अयपरिणामशूललक्षणम् । विण्मूत्ररोधाद्विपमासनस्थात् शीतांबुपानात् पवनस्य रोधात् ।।
(८०) हंसराजनिदानम् । अत्युश्चभापादतिभक्ष्यपानाद्रूक्षाशनात्कुत्सितयानरूढात् ॥१॥ अपक्वपिष्टान्नविरुद्धभक्षणात्कयायतिक्ताशुचिदुष्टभोजनात् ॥दिवा निशंजागरणाद्विलंघनात्कराति शूलं पवनो रुपान्वितः ॥ २ ॥ नाभिमूले गुदे वस्तौ योनौ पार्श्वे त्रिकेस्थिषु ॥ शूलं वातकृतं. ज्ञेयं भिपरिभर्नात्र संशयः॥३॥ अर्थ-विष्टामूत्रके रोकनेस, खोटी सवारीपर बैठनेसे, शीतलजल पीनेसे, पवनके वेग रोक- नेसे, ऊंचे बोटनेसे अत्यंत भोजन और पानसे तथा रूखे पदार्थक भोजनसे, यह शूलरोग होता है ॥ १॥ विना पका पिसाहुआ ऐसे अन्नके खानेसे, विरुद्ध भोजनसे, कसेला तीखा अपवित्र. दुष्टभोजनसे, दिनरातके जागनेसे, लंघन करनेसे, रोपको प्राप्त हुई जो पवन सो शूलरोगको पैदा करती है |॥ २ ॥ नाभिमूलमें गुदामें मूत्रस्थानमें योनीमें पसवाडोंमें त्रिकस्थानमें हाडोंमें वादीका शूल वैद्य जाने इसमें सन्देह नहीं ॥ ३ ॥ वादीकेशूलके लक्षण। शूलं वातोद्भवं कुर्यात्प्रभातेंगविमर्दनम्॥विण्मूत्रबंधनं हिकामाध्मा-- नोद्गारस्तब्धताः ॥४॥ पित्तके शूलके लक्षण तीक्ष्णोष्णपिण्याकविदाहिपूगैस्तैलाम्लनिप्पाकटुसूर्यतापैः॥व्या- यामसौवीरसुराविकारैः प्रवुद्धपित्तं कुरुते हि शूलम्॥५॥पित्तोद्भवं शूलमतीव रौद्रं मध्यंदिने कुप्यति चार्द्धरात्रौ ॥ करोति मूर्छा भ्रमदाहमोहतृट्स्वेदमार्तिज्वरमुग्रशीतम् ॥ ६ ॥ अर्थ-प्रातःकाल शररिका टूटना, दस्त और पेशाबका बन्द होना, हिचकी, पेटका फूलना डकारका आना, जडता ये वातशूलके लक्षण हैं ॥ ४ ॥ तीक्ष्ण गरम पिण्याक दाहकरनेवाली वस्तु, सुपारी, तेल, खट्टा, निष्पात्र, कटु, सूर्यको धाममें डोलनेसे, दंड कसरतके करनेसे, कांजीके पीनेसे, मद्यके विकारसे, कोपको प्राप्त हुआ जो पित्त सो शूलरोगको करताहै ॥ ५॥ पित्तसे पैदा हुआ घोरशूल सो मध्याह्न और अर्द्धरात्रमें कोष करता है, और मूर्छा, भौर, दाह, वेहोशी, प्यास, पसीने, खेद, घोरबर और शीत ये करे है ॥ ६ ॥ d भापाटीकासहितम् । (८१) कुक्षौ सजठरे पाश्र्वे शूलं पित्तसमुद्भवम् ॥ सोष्माणं दारुणं ज्ञेयं वैद्यैराथुनिर्भुवम् ॥ ७॥ कफके शूलका लक्षण । मध्याज्यमासेर्मधुराम्लतवन्ताकशीतोदकदुग्धपानैः ॥ मापे- क्षुमजातिलतैलशीतैः श्लेष्मा प्रवृद्धः कुरुते हिशूलम्॥८॥वक्षःस्थल भवं शूलं कफान्तस्य समुद्भवम्॥ वमनेन शमं याति संध्ययोर्वल. वत्तरम् ॥९॥ अर्थ-कूख पेट पसवाडोंमें पित्तका झूल होता है, और दारुण गरमी ये लक्षण अबके वैद्याने कहेहे ॥७॥ सहत, घी, मांस, मीठा, खट्टा, छांछ, बैंगन, शीतलजल, दूध इनके सेवनसे, उडद, ईख, चरबी, तिल, तेल शरदीसे कुपित हुआ जो कफ सो शूलरोग पैदा करताहै ॥ ८ ॥ कफसे पंदा हुआ जो शूल सो वक्षस्थल तथा सन्धियोंमे बढता है, यह वमनके करानेसे आराम हो ॥ ९ ॥ शुलं कफात्म्यं कुरुते प्रसेकं तंद्रालसं गौरवां प्रकंपम् ॥ हल्ला- सकासारुचिछर्दिदाहं कंठेऽतिपीडास्तिमितांगशीतम् ॥ १०॥ वातकफशलकेलक्षण! पार्श्वयु वस्तो हृदये च शूलं वदति वैद्याः कफवातजातम् ॥ पित्ता- निलाभ्यां जनितं सदाहं कुक्षिद्वदये तद्धृदये प्रपीडयेत् ॥ ११ ॥ शूलरोगकीउत्पत्ति। चंडीशशस्त्रं कफपित्तसम्भवं जानीहि तं त्वं हृदयोदरस्थम् ॥रू- पाणि स्वं स्वं कुरुते स्वकाले दोषैः समस्तैःप्रभवं त्यजेत्तम्॥१२॥ अर्थ-कफसे पैदा हुआ जो शूल. पसीना, तट्टा, आटकस, देहभारी, कंप, सूखी, रह, खांसी, अरुचि, वमन, दाह, कंठमें पीडा, मंद जाडा लगे, ये लक्षण करै ॥ १० ॥ जिसमें ये लक्षण हो उसको बात कफका शूल वैद्य कहते हैं, पसबाडोंमें मूत्र स्थानमै हृदयमें शूल हो, वात- पित्तजनित शूल लक्षण | और' जिसमे दाहहो, कुखमें और हृदयमै पीडा हो उसे वात पित्तका शूल रोग जाने ॥ ११ ॥ श्रीमहादेवके शूलसे तथा कफपित्तसे पैदा हुआ शूल सो दृदयमें पेटमें अपना अनेक तरहका रूप धारण करें, और सत्र दोषांसे पैदा हो ऐसा दाटयान् रोगीको वैद्य त्याग दे॥ १२॥ , . । (८२) हंसराजनिदानम् । शूलकामसाध्यलक्षण । रायः संनिहितश्च पित्तकफयोः स्थानं समावर्तयेद्यः शूलं कुरुते तदेवमपरं भुक्तऽतिशांति ब्रजेत् ॥ तच्छुलं परिणामजं मुनि- वरेः प्रोक्तं च दोपान्वितं ज्ञेयं प्राकथितेनरः कफमरुत्पित्तोद्भवर्ल-, क्षणः ॥ १३॥ सोपद्रवं त्रिदोपोत्थमसाध्यं कथितं बुधैः ॥ कष्ट- साध्यं द्विदोपोत्थं सुखेन निरुपद्रवम् ॥ १४ ॥ शुलकेशउपदवकभेद । तंद्रामूर्छा ज्वरो दाहः श्वासः कासोऽतिवेदना । हिकाङ्गगौरवंछ दिः शूलस्योपद्रवादश ॥ १५ ॥ इति श्रीभिपकचक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेद्यशास्त्रे परिणामशूललक्षणं सम्पूर्णम्। अर्थ-जिसमें ये लक्षण हों उसे परिणाम शूल जानना जो वादीसे युत्ता और पित्त कफके स्थानमें प्राप्त होकर पीछे दर्दको करे, और दूसरा खानेसे शांति हो और विदोपयुक्त हो उसे असाध्य मुनीश्वरोने तथा प्राचीन वैद्योने कहाहै ॥ १३ ॥ जो उपद्रयके साथ हो और सन्नि- पातसे पैदा हुआ हो यो शूलरोग असाध्य है ऐसा वैद्योंने कहा है और जो दो दोपसे पैदा हुआ हो वो शूल कष्टसाध्य है और जो उपद्रव रहित हो यो मुग्वसाध्य है ॥ १४ ॥ १ तंद्रा; २ मूळ, ३ ज्वर, ४ दाह, ५ श्वास, ६ खांसी, ७ अतिदुःय, ८ हिचकी, ९ देहभारी, और १० वमन, ये शूटरोगके दश उपद्रवहैं ॥ १५ ॥ इति श्रीहंसराजाधबोधिन्यां शूलरोगनिदान नमातम् ।। अथ अनाहउदावर्तरोगनिदानं तस्यात्पत्तिः। पुरीपमूत्रानिलवेगरोधादनाहरोगः किलमर्मभेत्ता ॥ संजायतेसो कुरुते विकारान् वातामयान् वैद्यवरा वदन्ति॥१॥अपानवातसरो- थादूर्ध्ववातगतिर्भवेत् ॥ अनाहोऽसौ परैः प्रोक्तो मुनिभिस्तत्त्ववा- दिभिः ॥ २ ॥ हिकाश्वासवम्युद्गारक्षुत्तृष्णायावरोधनात् ॥ उदा- वो भवेद्रोगो वातवृद्धिप्रवर्तकः ॥३॥ अर्थ-दस्त, पेशाव, अधोवायु इनके रोकनेसे मर्ममर्ममे पाडाका करनेवाला अनाह रोग होताहै, और चादीकै विकारको करताहै ऐसे वैद्य कहते है ॥ १॥ अधोवायुके रोकनेसे जनरलमार्ग होकर वायुको गति होती है, इसीको अनाहरोंग तत्त्ववादी पापियोंने कहा है ॥२॥ -- भाषाटीकासहितम् । (८३) हिचकी, श्वास, यमन, डकार, भूख, प्यास, इनके रोकनेसे वातको बढानेवाला उदावत गेग पैदा होताहै ॥ ३॥ अधोवातरोकनेसपैदाउदा केलक्षण । अपानवातसंरोधाद्वातविण्मूत्रसंगमः॥शूलं मोरुजाध्मानः पीडा- टोपोमरुद्धमी॥४॥ विष्ठाकेवेगरोकनेकेलक्षण । विड्वेगे निहते पुंसो वातशूलं: गुदे रुजम् ॥ जठरे वातजाग्रंथिः पीडावस्तो भवेभृशम् ॥५॥ मृत्रकेरोकनेसेहुये उदावर्तके लक्षण । मुत्रस्य रोधनात्पुंसो मूत्रकृच्छू शिरो व्यथा ॥ वस्तिमेहनयोः कालमानाहोयमिति स्मृतः ॥६॥ अर्थ--अधोवायु रोकनेसे विष्ठा मूत्र आपसमें मिलकर शूल, ग्लानि, स्वेद, अफरा, दुःखका आटोप, याने समूह, पवनका मंद चलना भीर, ये रोग होते हैं ॥ ४ ॥ विष्टाके वेग रोकनेमे अनुष्यके वादीस दर्दही, गुदामें पीडाहो पेटमें वादीसे गोला हो, और मूत्रस्थानमें पीडा हो ॥५॥ पेशाबके गेकनेसे पुरुषांके मूत्रकृच्छ, शिरमें पीडा, मूत्रस्थान, लिंगेन्द्रिय इन स्थानों में शूल हो इमीको आनाह कहते है ॥ ६॥ 5भाईरोकनेसेहुयेउदावर्तकेलक्षण । जृम्भास्तम्भागलस्तम्भो मन्यास्तम्भः शिरोव्यथा ॥ कर्णास्य- नेत्रनासासु रोगस्तीवोभवेदृशम् ॥७॥ आंसूकरोकनेकेउपद्रव । गोकानंदभवास्रस्यप्राप्तोदं नैव मुंचति ॥ सरुक् शिरो गुरुत्वं स्यान्नेत्ररोगस्तु पीनसः॥८॥ छींककेरोकने के उपद्रव । अवयोर्धारणाच्छुलं मन्यास्तम्भः शिरोर्द्वरुक् ॥ इन्द्रियाणा च दाबल्यं भवेत्पीडास्वचक्षुपि॥ ९॥ अर्थ-जभाई रोकनेसे गला बैठ जाय, गटेके पिछली नसका जकाटना, शिरम पीडा, कान ना नाक मुर इनमें पीडा हो ॥ ७॥ जो पुरुष आनंदने अथा शोकसे पैदा हुआ आंसू रोको उसके सिर दर्द, तथा शिरम भारीपना, नेत्ररोग, और पीनमरोग, होय ॥ ८ ॥ीका रोक- (८४) हंसराजनिदानम् । नेसे शूल, गलेकी पिछली नसका जकडना, आधे शिरमें दर्द, इन्द्रियनमें दुर्घटता,, नत्रों और मुसमें पीडा होवे ॥९॥ डकाराकनकपद्रव । उद्वारेभिहते तोदः पूर्णत्वं वक्रकंठयोः ॥. पचनस्याप्रवृत्तित्वं कृजलं हृदये भवेत्॥१०॥छर्देर्निग्रहणाद्भवंति विविधा रोगाम- हादारुणाः हृल्लासारतिशोफकप्टरुचयो हिकाविसर्पज्वराः ॥ कोप्टाशुद्धिविवर्णदाहकृमयोबातमसूतारुजः कंडमोहविजृम्भणा- नि वहुशः पांड्वंगमर्दभ्रमाः ॥ ११ ॥ भूखरोकनेकेउपद्रव । क्षुधाभिघाताद्दलवीर्यहानिः स्यान्मन्ददृष्टिः कृशता शरीरे॥ प्यासरोकनेकेउपद्रव । तृष्णाभिघाताद्दहुरोगवाधाहृत्कंठशोपभ्रमदाहमूर्छाः ॥ १२ ॥ अर्थ-डकार आई दुईको रोकनेस मुख और कंटमें पीडा हो, और डकारका न आना, हृदयमें गुंजान शब्द हो ॥ १० ॥ अथ मनोपय ॥ आई हुई रद्दको रोकनेसे दारण अनेक तरहके रोग हों, सूखी उलटी हो, अरति, सूजन, कोड, अरचि, हिचकी, विसर्परोग, अर, . कोटमें अशुद्धता, विवर्ण, दाह, कृमिरोग वातव्याधि, खुजली, वेहोशी, बहुतजंभाईका आना, पीलिया, अंगोंका टूटना, भौर, ये रोग होते हैं ॥ ११ ॥ भूख रोकनेसे. बलवीर्यका नाशहो, तथा । मंददृष्टि हो शरीरमें कृशताहो, प्यास रोकनेसे बहुत रोग सताये, प्याससे कंठ सूखे, भीर, दाह, मूर्छा, ये रोग होते हैं ॥ १२ ॥ श्वासरोकनेकेउपद्रव । श्वासस्य निग्रहाद्गुल्मो हृद्रोगो विरतिर्भवेत् ॥ मोहो वातकृतो रोगे ह्याटोपो विद्राधिस्तथा ॥ १३ ॥ निद्रारोकनेकेउपद्रव । निद्राघाताद्भवेज्जृम्भा तंद्रालस्यांगगौरवम् ॥ अक्ष्णोः धूर्णत्वर क्तत्वद्वत्वं जडतारुचिः॥ १४ ॥ कपायाम्लद्रवै रूविरुद्वकटु भोजनेः॥ वातः संकुपितः कुर्यादुदावत हि लक्षणम् ॥१५॥ अर्थ-श्यास रोकनेसे पेटमें गोला, हृदयकारोग, मनका न लगाना, मोह, और वातके रोग पेटमें गुडगुडाहट, विधिरोग, ये होते हैं ॥ १३ ॥ निदारोकनेसे जंभाई, तन्द्रा, आलसक, . . देह - , भाषाटीकासहितम् । काभारी होना, नत्रटेढे, तथा लाल, अश्रुपातयुक्त, जडता, और अनुचि ये रोग होते है ।। १४ ॥ कसैली ग्यटी, पतली, रूखी, निरुद्ध, तथा कटुवस्तुके खानेसे कुपित हुई जो वात सो दाग उदावर्त रोगको करैहै ॥ १५ ॥ उदावर्तनिदानम् । स्रोतांस्युदावर्त्तयतनिलोयमपानविण्मूत्रकफादिकानाम् ॥वहानि- हृत्पार्श्वगुदोदरेषु ह्याटोपशूलं कुरुते शिरोतिम्॥१६॥ उदावर्त्तवातः करोत्यंगमर्द मरुद्रन्थिमाति पुरीपं सकप्टम् ॥ तृपोद्वारहिक्काभ्रम श्वासकासं वर्मि शून्यतां रूक्षतांगं प्रकम्पम् ॥ १७ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रेऽनाहो दावर्त्तलक्षणंसम्पूर्णम् ॥ अर्थ-विष्टा, भूत्र, कफ, आदिकी बहनेवाली जो अपानवायु सो नाडीनके मार्गको रोककर हृदय पसबाटा गुदा पेट इनका फूटना, और शूल तथा शिरमें दर्दको करहै ॥ १६ ॥ यातक उदावर्त्त रोग हडकल, पेटमे पवनकीगांट, नथा खेदहो, कष्टसे दस्तका होना, न्यास, डकार, दिचकी, भ्रम, श्वास, ग्यांसी, वमन, देहम शून्यता, शरीरखा, तथा कप, ये लक्षण करताहै ॥१७॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यामुदावतीनदानं समातम् ।। . अथ गुल्मरोगनिदानम् । गुल्मं वातोद्भवं पैत्त्यं कफजं इंद्वसम्भवम् ॥ संनिपातोत्थितं रोद्रं. रक्त कीर्तितं बुधैः ॥ १॥ हुन्नाभ्योरंतरे वस्तौ ग्रन्थिरूपं चला- चलम् ॥ चतुरंगुलपर्यंतं गुल्मन्तत्परिकीर्तितम् ॥२॥ वातगुल्मकेलक्षण। निवृटुंवरयोः फलस्य सदृशं गुल्मं मरुत्सम्भवमुद्गारं च मुहु- र्मुहुर्वितनुतेविषमूत्रयोर्वधनम्॥जृम्भाध्मानशरीरशोपकृशताइशूलं तृपां हृदु पीडामंत्रविकूजनं रुचिहरं भुक्ते मृदुत्वं ब्रजेत् ॥ ३॥ अर्थ-वानमे, कफसे, पित्तले, द्वंद्वज सन्निपातसे तथा रधिरसे आट प्रकारका गोटेकागेग वैद्योंने कहाहे ॥ १ ॥ दृदय नाभिके बीचमे मत्रस्थानमें गांठक आकार गोलाहो एकता चटायमान दूसरा अचल चारअंगुलके बीच उसको गुल्म अर्थात् गोलकारोग कहते है । 'फन्टके समानहीं रमे वादीका गोला जाने, जिसमें डकार येरवेर में आये दस्त पेशायमा बन्द होना जो नीबू गूलर
(८६)
हंसराजनिदानम् ।
जंभाई पेटकाफूलना, शरीरमें शोप, तथा कृशपना, और मूल, प्यास, हृदयरोग, पीडा, आंतोता
बोलना, अचि और भोजनकरनस नरम होजाग ये वादीके गोलाके लक्षणहै ॥३॥
पित्तगुल्मकेलक्षण।
गुल्मं कुक्षिगतं कपित्थसदृशं पीतं पुरीषं भवेदुप्मावलंके
रतिर्नशिमुखे शोपाः पिपासाधिका ॥ प्रस्वेदज्वरशूलदाहमधिक
स्पर्शा सहः संभ्रमः चिहं पीतसमुद्भवस्य कथितं गुल्मस्य वैद्यो-
त्तमः ॥४॥
कफगुल्मकेलक्षण।
स्तमित्यं कठिनोदरं शिथिलतालस्यं गुरुत्वं तनो वाद्ये शीत- '
लतांतरे ज्वलनता निद्राव्यथामस्तकस्वात्स्त्वचि गुल्ममान'
सदृशं कासोरुचिर्पाडुता गुल्मश्लेप्मसमुत्थितस्य भणितं चिहसु-
पेणादिभिः ॥ ५॥
रक्तगुल्मकेलक्षण।
गुल्मं रक्तसमुद्भवं दृढतरं जंवीरनिम्बूसमं हृन्नाभ्यंतरभूमिकासु.
जनितं पुसस्त्रियो योनिषु ॥ हृत्कंठास्यविशोषणं च कुरुते दाह
महादारुणं प्रस्वेदं ज्वरशूलमुग्रमधिका तृष्णारती संक्लमम् ॥६॥
अर्थ-जो कैथंक फल समान हो, कोग्रमहा पोलादस्त उतरे, हृदय और गलामे गरमी
हो, मनका. न लगना, नाक मुखमें शोप, प्यास, अधिक पसीना, घर, शूल, दाह,
अविक सशं न सहाजावे, भौर ये लक्षण, वैद्योंने पित्तके गोलाके कहे है ॥ ४ ॥
देह नीला, पेट कर्रा, शिथिलता, आलकस, देहभारी, बाहर शीतलता, भीतर ज्वालासी मालूमही
निद्रा, मस्तक पीडा, देहमें खाज, आम्रपलके समान गोला, खांसी, अरुचि, पीलिया ये लक्षण
सुषेणादि येथोंने कफसे पैदा गोलाके कहे हैं ॥ ५॥ जो गोला, जंभीरोनीम्बूके समानहो पुरुषके
हृदय नाभिक बीचमें पैदा हुआ हो, स्त्रियोंकी योनिक समीपहो हृदय, कण्ट, मुग्यका सूखना,
दारुण दाह पसीना, ज्वर, शूल, अतिप्यास, अरति, ग्लानि, ये लक्षण सुधिरसे पैदा हुये
-
गोलाके है ॥ ६॥
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भापाटीकासहितम् ।
(८७)
असाध्यगुल्मकेलक्षण । ।
अतीसारहिकारतिच्छदिशूलैः पिपासाकृशत्वार्तिहल्लासदाहैः ॥
ज्वरश्वासकासांगशोफैर्युतो यः स गुल्मी न जीवेत्सुपेणादि-
बद्यैः॥७॥
सन्निपातगुल्मकेलक्षण।
त्रिदोपसंभवः सर्वलक्षणेलक्षितंहि यत् ॥ तद्गुल्मं सन्निपाताख्यं
द्विदोषोत्थं द्विदोपजैः॥८॥
साध्ययाप्यअसाध्यकेलक्षण ।
एकदोपोद्भवं साध्यं द्विदोषं याप्यमुच्यते ह्यसाध्यं यत्रिदोषोत्थं
गुल्म सोपद्रवं त्यजेत् ॥ ९॥
अर्थ-अतीसार, हिचकी, अरति, रह. मूल, प्यास, कृशता, खेद, सूखी उलटी, दाह, ज्यर,
श्वास, खांसी, देहमें सूजन, ये लक्षण युक्त जो गुल्मरोगवाला वो सुपेणादिवेद्यासे अन्छा नहीं हो
अर्थात् असाध्यहै ।। ७ ।। जिसमें नीनों दोपोके चिह्न मिलतेही उसे सन्निपातका गोलाजाने, और
जिसमें दो दोपोंके चिह्न मिलतेही बो द्विदोपज गुल्म जाने ॥ ८ ॥ जो एक दोपसे पैदा
हुआही वो साध्य दा दोपयुक्त यायहै, त्रिदोपोन्थ असाध्यहै, और उपययुक्त गुल्मीको वैद्य
-
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त्यागदे ॥९॥
गुल्मकेदशउपद्रव ।
शोफस्तंद्रारुचिश्छर्दिहल्लासः कृशतातृपा ॥ शूलं स्वेदोगदाहश्च
गुल्मस्योपद्रवादश ॥ १०॥
इति हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे गुल्मलक्षणम् ।
अर्थ-२ सूजन, २ तंद्रा,३ अरुचि. ४ यमन, ५ हल्लास, ६ कृशता, ७ प्यास, शल९
पसीना, १० दाह, ये 'गुल्मरोगके ददा उपद्रवह ॥ १० ॥
इति श्रीहंसराजार्थवोधिन्यां गुल्मरोगनिदानम् ।।
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अथ हदोगनिदानम् ।
शस्त्राभिघातात्पवनस्य रोधनादत्युष्यतिक्ताम्लकपायभोजनात् ॥
अत्युच्चपाताद्वमनादतिश्रमाद्धदामयः स्याद्गुरुभारधारणात्॥१॥
(८८) हंसराजनिदानम् । वादीके हृद्रोगका लक्षण। हृद्वाधा कुरुते मरुत्प्रकुपितः संदूपयित्वा रसं हृत्स्थो गुंजति पीडयत्यनुदिनं मर्माणि संतोदते ॥पास्थिीनि विदारयत्यवि- रतं शोपं मुखे हृद्गले ह्याध्मानं च मुहुर्मुहुर्वितनुते श्वासं सकासं ज्वरम् ॥२॥. पित्तके हृद्रोगका लक्षण । पित्तः कोपसमन्वितो हृदि गतःसंशोपयित्वा रसं हृत्पीडामधि- ' का निरंतरतृपा दाहं शिरःपीडनम् ॥ ऊप्माणं हृदयोदरे नसि मुखे. शूलं महादारुणं मूर्छास्वेदविपाकमोहमरति जानीहि तं हृद्रुजम् ॥३॥ अर्थ-शस्त्रके लगनेसे पवनके वेगको रोकनसे, अतिगरम तथा कडुआ, खट्टा, कसला भारी ऐन भोजनसे, उच्चस्थानके गिरनेसे, वमनसे, अतिश्रमसे, भारीबोझ उठानेसे हृदयमें रोग होताहै ॥१॥ कुपित बात हृदयमें स्थित रसको विगाडकर हृदयरोगको करे, तथा गूंजे, नित्य हृदयमें, पीडाहो, मर्मस्थानों में पीड़ाहो पसवाटोंकी हडोनमें पीडा हो, मुख हृदय गलेमें शोप, अफरा बारबारमें हो श्वास,खांसी, ज्वर, ये बात के हृदयरोगके लक्षगहै ॥२॥कुपित हुआ जो पित्त सो हृदयमे प्रामहो- कर रसको बिगाड हृदयमें पीडा, प्यास, दाह, शिरमें दर्द, गरमी, हृदयमें पेटमें, नसोंमें, मुखेमे, शूलहो, मूर्छा, पसीना, पाक, बेहोशी, अरति, ये लक्षण पित्तके हृद्रोगके हैं।॥ ३ ॥ कफके हृद्रोगकालक्षण। श्लेप्मा संकुपितः करोति हृदये पीडां सकण्ठेऽरुचिं माधुर्यं वदने- ऽनलस्य कृशतां तंद्रां गुरुत्वं तनौ ॥ संसावं कफसंचयस्य वमनं हृल्लासशूलं ज्वरं हृद्रोगो भिपगुत्तमैर्निगदितश्चिहेरमीभिर्भृशम्।। सन्निपातकेहद्रोगकालक्षण । तद्धृद्रोगं त्रिदोपोत्थं विद्याञ्चितॄस्त्रिदोपजेः युक्तं सोपद्रवं वैद्य स्त्यजेन्नूनं विदूरतः ॥५॥ कृकिकेहद्रोगकालक्षण। शोफश्चेतसि संभ्रमो नयनयोः काप्यं तमो गौरवं चोदो वि. कृतिस्तृपा भवति तन्निष्ठीवनं मेहनम् ॥ हृल्लासोऽरुचिरंतरे कृश- मापाटीकासहितम्। (८९) - . वपुः शूलं सकंडूव्यथा हृद्रोगे कृमिसंभवे निगदितं चिहं सुपेणा- . 'दिभिः ॥ ६॥ शोपः क्लमो भ्रमः स्वेदो हृदुजः स्युरुपद्रवाः॥ चत्वारो घोररूपास्ते मुनिभिः परिकीर्तिताः ॥ ७ ॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे हृद्रोगलक्षणम् ॥ अर्थ-कुपित हुआ जो कफ सो हृदयमें, कंठमें पीडाकरे, अचि, मुख मीठा, अग्निमंद, तंद्रा, देहभारी, कफका गिरना, वमन, हलास, शूल, ज्वर, इन लक्षणोंसे काफ्का द्रोग कहाहै ॥ ४ ॥ त्रिदोपयुक्त चिहोंसे सन्निपातका हृद्रोग जाने और उपद्रव युक्तहो उमे वैद्य असाध्यजानकर त्या- गदे ॥ ५ ॥ सूजन चित्तम भ्रम, नेत्र काले, अँधेराआवे, देहभारी, उकलाहट, देहकी विकृति, प्यास, बारबार थूकना, मेहन, हुलास, अरुचि, देह कृश, शूल, खुजली, व्यथा, इन लक्षणोंसे मुपे गादि वैद्योंने कृमीका हृदय रोग कहा है ॥ ६ ॥ १ शोक २ ग्लानि ३ भ्रम ४ पसीना, ये चारहृदयके घोर उपद्रव मुनीश्वरोंने कहे हैं ॥ ७ ॥ इतिहंसराजार्थबोधिन्या हृद्रोगनिदानम् ।। अयमूत्रकृच्छ्रलक्षणम् । अनूपमांसाशनमद्यसेवनैः कपायतीक्ष्णोप्णविदाहिभोजनैः ॥ व्यायामधर्माध्यशनाध्वजागरैः स्यान्मृत्रकृच्छ्रे बहुकष्टदं नृणाम् ॥१॥ प्रपीडयत्यधोगत्वा मार्ग रुद्धाकफादयः ।। मूत्रं मुहुर्मुहुः स्वल्पं सकृच्छं कारयति ते ॥२॥ पातकेमूत्रकृच्छ्रकालक्षण। मुहुर्मुहुः कष्टतरेण तुच्छं मूत्रं भवेत् पीतनिभं सशूलम। मेढ़े च वस्तौ महती प्रपीडा तन्मूत्रकृच्छ्रे पवनात् प्रसृतम् ॥३॥ अर्थ-अनूप मांसके खानेते, मय पीनेसे, कसेली, तीखी, गरम, दाहकरनेवाली ऐसी वस्तु के खानेसे, दंड कसरतके करनेसे, घाम, अध्यशन, अर्थात् भोजनके ऊपर भोजनसे, रास्ताके चट- नेस, रातमें जागनेस, मनुष्यों के बहुत कष्टका देनेवाला आठ प्रकारका मूत्र कृन्छ रोग, होना||१॥ कमादिकदोष नांच जायकर मूत्रके मार्गको रोककर और पीडाकरें तब मनुष्यक काटिनम चारबार थोडाधोटा पेशाब उतरे उसे मूत्रन्ट्ररोग कहते हैं ॥ २ ॥ जो मनुष्य चारबारमें थोटााडा मूतै, पोल्टा, शूलयुक्त, अंडकोश तथा मूत्रस्थानमें पाटाहो, उसे बातका मूत्रान्छु चाहते हैं ।। ३॥
(९०) हंसराजनिदानम् । पित्तकेमृत्रकृच्छ्कालक्षण। मूत्रं भवेद्दाहयुक्तं मुहुर्मुहुः पीतारुणाभं रुधिरेण संप्लुतम् ॥ तसं सकष्टं गुदमेळूयोर्व्यथा तन्मूत्रकृच्छ्रङ्किलपित्तजं वदेत् ॥ ४ ॥ कफकेमूत्रकृच्छूकालक्षण। मूत्रं सिताभं परिवुवुदान्वितं सपिच्छिलं मेदुरमार्तिदं गुदे ॥ लिंगेच योनो बहुशोफगौरवं तन्मूत्रकृच्छ्रङफसंभवं त्यजेत् ॥५॥ कष्टसाध्यासाव्यलक्षण। द्विदोपोद्भवं मूत्रकृच्छ्रे सदाहं भवेत्कष्टसाध्यं प्रयत्नोपधीभिः ॥ त्रिदोपोत्थितं दारुणं प्राणनाशं निरुक्तं मुनींद्रेरसाध्यं नितांतम्॥ अर्थ--जिम रोगीका पेशाब दाहकेनाथ उतरे, बारवार और पीलाहो लालहो रुधिर मिलाहो, तप्त और कप्टसे उतरे, गुदा और अण्डकोशमें दर्दही उसे पित्तका मूत्रकृच्छू कहते हैं ॥ ४ ॥ जिसका मूत्र सफेद और बबूले सयुक्त गाढा और चिकनाहो, गुदामें दर्दहो, लिंग और योनीने. सूजनहो, देहभारी, ये लक्षण कफके मूत्रकृच्छकेहे ॥ ५ ॥ दो दोपसे हुआ जो मूत्रकृग्छ दाह- युक्त सो मंत्र औषधियोंसे कष्टसाध्य कहाहे,और निदोपसे हुआ सो प्राणकानाशक मुनीश्वराने असाध्य कहाहे ॥ ६॥ मूत्रकृच्छम्भवेद् घातात्संरोधान्मूत्रशुक्रयोः ॥ शल्यात्पातात्क्षता कप्टाद्दस्तिमेहनशूलकृत् ॥७॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेद्यशास्त्रे मूत्रकृच्छ्रलक्षणं समाप्तम् ॥ अर्थ-मन्त्र और वीर्य रोकनेस, वात, शल्यसे, पडनेसे, घावसे, कष्टसे मूत्रस्थान लिगमें दर्दका करनेवाला मूत्रकृच्छरोग पैदा होताहे ॥ ७ ॥ इति हंसराजार्थबोधिन्यो मूत्रनिदानम् ॥ मूत्राघातकीउत्पत्ति । नाभेरधोधः प्रगतास्त्रिदोषा भवन्ति ते कुंडलिकासमानाः ॥ स्वहेतुभिः संकुपिता भ्रमंति कुर्वति पश्चाबहुमूत्रघातान् ॥ १॥ नाभरधो यदा वायुः कुंडलाकारसंस्थितः ॥ आध्मापयन् गुदं वस्तिमूत्राघातो भवेत्तदा ॥ २॥ मूत्रस्य वेगं विदधाति तीनम- पानवायुः कुपितस्तु तेन ॥ नाभेरधोय महतीं प्रपीडां करोति यस्तस्य नरस्य नूनम् ॥ ३॥ ।
भापाटीकासहितम। (९१) अर्थ-दोष मानिक नीचे जाय कुंडलीके समान होकर और अपने हेतृनसे कुपितहो भमग करे पश्चात् मूत्रावातरोगको प्रगट करतेहैं ॥ १ ॥ जय पवन नाभीफे नात्रे कुंटलाकारही गुहा मूत्रस्थानमें भरजाये तब मनुष्यके मूत्राघात रोग होताहै ॥ २ ॥ जो पुल मूत्रयो बेगको रोक नर, उसके अपान वायु कुपिनहीं नाभीके ऊपर नीचे भारी पीडा कर उसे नत्रकृच्छू कहतेहैं ॥ ३ : वातकमूत्रकृच्छ्रकारक्षण। वातोधःप्रगता रुणद्धि पुरुतो सूत्रं पुरीपन्वितं मेढ़े वस्तिगुदे दधाति महती पाडांच शोफान्विताम्॥आध्मानं कुरुते मुहुर्मुहुरतो मूत्रं सकृत्कप्टदम।कृष्णाभं पवनोद्भवं निगदितं तन्मूत्रघातंपरे! पित्तकेमूत्रापातलक्षण। मेढ़ वस्ति गुदाग्रं दहति बहुतरं मूत्रमार्ग रुणद्धि स्वल्पं स्वल्पं सकृच्छ्रम्बहुरुधिरयुतं कारयत्येवमूत्रम् ॥धत्तेधोगत्यकोपं वितरति वलयाकाररूपं च पित्तं तत्पेत्त्यं मूत्रघातं निगदितमृपिभिर्मानस:- सद्धिपग्भिः॥५॥ कफकैमूत्राघातकालक्षण। लेप्माधोगत्यशोफ वितरति गुरुतां मूत्रमार्ग रुणद्धि मेदू वस्ती गुदाग्रे प्रवहति सरुजंकारयत्येवमूत्रम् ॥ तुच्छ तुच्छं सकष्टं क्वाचि- दपि वहुशो मेदुरं श्वेतवर्ण सांद्रं शीतं सफेनं कथितमृपिवर- मूत्रघातं कफस्य ॥६॥ अर्थ-यात नीच जायकर दरन पेशावको रोक अंडकोश और मूत्रस्थानमें मजनक माया भरीपीडा करे. अफरा, और वारवार कष्टसे थोडा पेशाब काटेरंगका उनरे, उसे यातका मूत्रा- पात रहते है ॥ ४ ॥ कुपित हुआजी पित्त मो नांचे जायकर कंकरके आकारही अंडकोश और मूत्रस्थानमें तथा गुदाग्रमें पीडाकरे, मूत्रके मार्गको रोकदे, थोडायोटा कठिनतासे बहुम रधिरमिता मूने, उस पि और बेयोंने पित्तका मूत्राघात रोग कहाहै ॥ ५ ॥ का. नाने प्राप्तहो सजनको फरे देहभारी, मूला मागोंको रोकाद, मेद्र वस्ति, गुदा इनमें पीडा करे, थोडा थोडा काटिननाग कभी व तसा निकना सोरंगका गाडा शीतट शामिया ऐसा पशाब उतरे, टसे फरमा मूनारानरोग पिने कहा है।॥६॥ " (९२) हंसराजनिदानम् । सूत्राघातं द्विदोपोत्थं त्रिदोपोत्थं भिपवरेः ज्ञायते लक्षणेः सर्व तिपित्तकफोद्भवः॥७॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे मूत्राघातलक्षणम् ॥ अर्थ-दो दोपोंके लक्षणोंने हिदोपका मूत्राघातरोग जानना त्रिदोषसे सन्निपातका मूत्रावान चैद्यों करके जानना ॥ ७॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां मूत्राघातनिदानम् ॥ अथाश्मरीरोगनिदानम् । स्त्रियां योनिरंध्रे शिशुनां च मेट्रे भवत्यश्मरी शूत्रवेगस्य रोधात्॥ मरुच्छेप्मपित्तैर्भवाशकजान्यामहादुःखदा प्राणहंत्री प्रसिद्धा॥१॥ वातकीअश्मरीकालक्षण । रक्षावातभवाश्मरी गुरुतरा भल्लातमज्जासमा शिनं छिद्रग- तारुणद्धि परितो मूत्रं विगंधान्वितम् ॥ पीडांमृत्रपुरीषयोर्वितनुते मेढ़े गुदे वस्तिषु ह्याध्मानं कुरुते रुचिं कृशतनुं ग्लानि ज्वरं विभ्रते ॥२॥ पित्तकीपथरीकलक्षण। सूक्ष्मापित्तसमुद्भवामाणिनिभा खजूरतुल्यारुणा तप्ता कंटकसं- युताथ चिपिटा शिश्नेगता याश्मरी ॥ छिद्रं मूत्रपुरीपयोर्दहति या योनो रुजं वर्द्धते मूत्रं कृच्छ्रतमं सदाहमनिशं तृष्णाङ्करोति द्रुतम् ॥३॥ अर्थ-मूत्रके वेग रोकनसे स्त्रियोंकी योनिमें और बालकोंके अंडकोशोमे पथरीका रोग होताहै ? बादीसे २ पित्तस, ३ कफस, ४ शुक्रसे, चार तरहको है महादुःश्यको देनेयाली प्राणको नाशक प्रसिद्धा॥ १ ॥वातको पथरी रूखी भारी भिलावेकी मनाके समानहो, इंद्री प्राप्तहो इन्द्रीके छिद्रको रोकदे मूत्रमें वास आवै, पेशाब और दस्त के समय गुदा मूत्रस्थान और पोतोंमें दर्द हो, अफरा, सरचि, कृशदेह, ग्लानि, ज्वर ये लक्षण वातको पथरीक, ॥ २॥ अटी हो, मणिके समानहो, खजूरक फलके तुल्य, लालही गरम तथा कांटे और चपटी लिंगमेंहो मूत्र दस्तके छिद्रको दहन करे, योनिमें दर्दही, कठिनतासे दाहयुक्त पेशाब उतरे, प्यासहा, ये लक्षण पित्तको पथरीके हैं ॥३॥ .
. , भाषाटीकासहितम् । शूलं मेदगुदे भगे. प्रलपनं कायं ज्वरं कंपनमूप्माणं विदधाति बस्तिगुदयोमूत्रस्य धारारुणम् ॥ वैक्षीण्यं परितो रुणद्धि सहसा पाश्चादरे पीडनं घोरा पित्तभवाइमरी निगदिता वेद्योत्तमः प्राणहा ॥४॥ कफकीपथरीकालक्षण। स्निग्धाम्रमज्जासहशाकफोद्भवा श्वेताश्मरीकंटकवेष्टितादृढा ॥ शीतातिमध्ये गुदशिश्नयोर्भवासंजायते मूत्रनिरोधनाच्छिशोः॥५॥ शैथिल्यंकुरुतेश्मरीकफभवा शिश्नान्तरे तोदनं धैर्य नाशयतेऽरुचि वितनुते ह्यङ्गं मुहुः कंपते ॥ मूत्रं श्वेतनिभं रुणद्धि गुरुतां काये शिरःपीडनं धत्ते पांडुरुजं तनो कृशवपुर्निद्रालसं विभ्रते ॥६॥ अर्थ-अंडकोश, गुदा, भग इनमें शूलहो, प्रलाप, कृशता, ज्वर, कम्प, गुदा और मूत्रस्थानमें गरमी, तथा मूत्रकीधार लालही, क्षीणता, पेशाबका रुकना, पसवाडोंमें तथा पेटमें दर्द ऐसे लक्ष- णोसे वैद्योंन प्राणकी नाशक पित्तको पथरी कहीहै ॥ ४ ॥ चिकनी, आमकी गुठलीके समान हो, सपेद और काटेयुक्त, दृद्ध, शीतल, तथा गुदा और लिनेंद्रियके मध्य हुई हो, ये बालकके मूत्रबाधा रोकनेसे पैदा होतीहै ये लक्षण कफकी पथरी के हैं ॥ ५ ॥ शिथिलता, इन्द्रियमे पीडा धैर्यका नाश, अरुचि, अगामे कम्प, सपेद पेशाबहो, और एकल्क कर उतरे, देहभारी, शिरमें दर्द, पाण्डु, और कृशता दहमें, निद्रा, आलस्य ये लक्षण कफर्की पथरी के हैं ॥ ६ ॥ वीर्यरोधकीपथरीकालक्षण । • यूनां वीर्यस्य रोधाद्भवति च महती शुक्रजाताइमरी या शिश्नं वस्तिं गुदां वै रुजयति वृपणं मूत्रमार्ग रुणद्विादोर्वल्यं कुक्षिरोगं वितरति सहसा शुक्रनाशं करोति तुच्छं तुच्छं सकप्टं क्वचिदपि बहुशः कारयत्येव मूत्रम् ॥७॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृतेये द्यशास्त्रे अश्मरीलक्षणम् । अर्थ-जयानपुरुषोकवार्यकै रोकनेसे जो पथरी रोगहो उसके ये लक्षण है, लिंग, मूत्रस्थान, गुदा, में पाटाहो, तथा अंडकोशीमें दर्दही मूत्रके मार्गको रोकदे, दुर्वलता, कूसमें दर्द, शुक्रका नाश, कष्टसे कभी थोडा कभी बहुत पेशावउतरे ॥ ७ ॥ इति श्रीहंसराजार्थोविन्यामरमरीलक्षणम् ॥ . - (९४) हंसराजनिदानम् । , अथममेहलक्षणम् । 'दधिमधुधृतदुग्धं मद्यपानं नवान्नं फलरसमतिमिष्टं तऋमिक्षोर्वि- कारम्॥ रविकृतपरितापःसुन्दरीस्त्रीकटाक्षेर्भवति विपमचेतो मह हेतुनितांतम् ॥ १॥ वातकीप्रमहकालक्षण। सूत्राग्रे वाथ पश्चात्प्रपतति सततं शुक्रमिक्षोरसाभं यामे याम व्ये वा कचिदपि समये पातमाप्नोति दोपेः॥ निर्ग, तकरूपं लवणजलनिभं दुग्धतुल्यं सुराभरूक्षं वातप्रमेहं प्रवदति चरकः कृष्णवर्णं च नीलम् ॥२॥ मेहो वातसमुद्भवः प्रकुरुते शूलं महा- दारुणं हृद्रोगं पिटिका मुखेमधुरतां श्वासं शरीरं कृशम्॥आध्मानं तनुपीडनं विकलतां शोपं च कासान्वितं झुन्निद्राम्बलनाश नञ्चपलतां रुक्षां त्वचं साहसम् ॥३॥ अर्य-दही,सहत,घी,दूध,मयके,पीनेसे नवीनअन्न फल रस अतिमीठा छांछ ईखके विकारसे सूर्यके पामसे मुंदरम्त्रीक कटाक्षसे चित्तमे प्रमेहका हेतु होताहै॥१॥पेशाब करने पहिले या पीछे ईखकासारंग ऐसा शुत्रा गिरे पहर पहरमे या दोपहरमें दापोंके हानेसे दुर्गंधयुक्त छांछके ममान,या नौनके पानीसर्राग्या, दूधके समान, मनके समान सम्वाहा ये लक्षण वातकी प्रमेहके चरक ऋपिने कहे हैं ॥ २ ॥ वातका प्रमेह दारणगृप हृदयरोग मगेडो मुखमे मिटास श्वास देहा अफरा देहमें पीडा बेकली शोप खांसी निद्रा बलका नाश चपलता त्वचा में रुखास साहस ये लक्षण करताहे ॥२॥ पित्तकीप्रमेहकालक्षण। धनं पावकाभं हरिद्रानिभं वारुणं रक्ततुल्यं च सिंदूरवणम् ॥ प्र- मेह च पित्तोद्भवं वैद्यराज विजानीहि मंजिप्टकावर्णतुल्यम् ॥४॥ कपायञ्च मूत्रं करोति प्रमेहो रतिं पित्ततः कष्टसाध्योऽतिकृच्छ्रम्॥ ज्वरं वस्तिशूलं कृशांगं पिपासां क्लमं मेट्दाहं भ्रमं शोपमंगे॥५॥ कफकेममेहकालक्षण। वृतदधिवसरूपं दुष्टदुगंधयुक्तं धनमधुसदृशं वा पिच्छिलं मेह- वर्णम्॥सितलवणनिभंवा मेदुरं तंतुमिश्रं वुधजन किलमेहं विद्धि साध्यं कफात्म्यम्॥६॥ १ भापाटीकासहितम्। अर्थ-गाढा अग्निके समान वर्ण, तथा पीला वा लाल, अथवा जलकेसदृश, या मंजीठके बा सिंदूरके रंगकासा पेशाब उतरे, उरो हे वैद्यराज ! पिनका प्रमेहमानो ॥ ४ ॥ कसैले रंगका रुधिरकरंगका वरकर मूत्रस्थानमें पीडा याश देह प्यास ग्लानि अंडकोशोमे दाह, भ्रम, शरीरमें शोप, अगति ये पित्तकी प्रमेहके लक्षणहै, य कष्टसाध्यहे ॥ ६ ॥ दही, घृत, चरबीक समान मूत, दुर्गध युक्त गाढा सहतके समान, तथा संपद मिश्री और नानक रंगसा और चिकना पेशाब उतरे सन्तु युक्तहो उसको पडित कफका प्रमेह कहते हैं ।। ६ ।। मेहः श्लेप्मसमुद्भवो वलहरः शुक्रस्य विध्वंसक आलस्यं कुरुते मचिपणयोः शोथं तनो पांडुताम्॥शैथिल्यं गुरुतां वमिं नयनयो- अशोकल्यं त्वचि स्फोटनं तंद्रारात्रिदिने निशं मलचयं दन्तांधि- हस्तेवलम् ॥ ७॥ प्रमेहरहितकेलक्षण । यदा प्रमेहिणो मूत्रं कटुतिक्तमपिच्छिलम् ॥ शुद्धरूक्षं शुभ्रधार तदारोग्यं वदेद्भिपक्॥८॥ साध्यअसाध्यकष्टसाध्यविचार । मेहः कफोत्थितः साध्यः साध्यः कप्टेन पित्तजः ॥ वातस्त्वृषि- भिः पूर्वैरसाध्यः परिकीर्तितः॥९॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सब हंसराजकृते वेद्यशास्त्रे प्रमेहलक्षणम् ॥ अर्थ -कफका प्रमेह बल हरता, शुक्रका नाशकरता, आलकस, अनि पोतोपर सूजन, मारीर पीला, और शिथिल तथा भारी, वमन, नेत्र सपेद, त्वचाका फटना, रात, दिन तन्द्राका होना, दांत, जीभ, हाथ, पैरोंमे मैलका मुग्रह होना ये रक्षण करताहै ॥ ७ ॥ जिन प्रमेहबाटेका पशाव कडुआ, तीग्वा, पतला, शुद्ध, गग्वा, सपद धारका उतरे, उसका प्रमेह दूरभना जानिये ॥ <|| कफका प्रमेह साध्यहै, पित्तका कष्टसाध्यहै, वातका प्रमेह पूर्व नपियोंने असाध्य महहि ॥९॥ इति श्रीमराजार्थबोधिन्यां प्रमेहनिटानम् ॥ अथपिटिकारोगनिदानम् । तिक्ताम्लोप्मविदाहिरूक्षकटकक्षारातपाध्याशनेर्मद्यस्निग्धविरू- द्धभोजनरसैर्दुष्टेनवान्नद्रवः। दोपं पित्तमसरकफाद्विदधते संदूप्य रक्तामिपं त्वसंभेद्यबहिर्गताश्च पिटिका रूपेण कुप्यन्तिते ॥१॥ , हंसराजानदानम् । दुष्टग्रहप्रकोपेन दोपामर्मप्रभेदिनः॥ जनयंति शरीरे पिटिका ब- हुधामताः ॥२॥ ज्वरश्छदिरतीसारो रक्तांगो तीव्रवेदना ॥ स्वेदे तृपासचिः श्वासो वैवयं विकलोरतिः ॥३॥ अर्थ-तिक, खट्टा, गरम, दाहकरनेवाला, कटु, रूखा, खारी भोजन घाममें डालनेसे भोजनपर. भोजन करनेसे मद्य चिकनी विरुद्ध भोजन और पानसे दुष्ट नवान्न और पतली वस्तुसे कुपितहुये जो वातपित्त का सो रुधेिर और मांसको बिगाड कर त्वचाको फाडकरपुंसोरुप पिटिका रोग कोप करताहै ॥ १ ॥ दुष्टमहके कोपसे तीनोदोष मर्मस्थानको भंदकर देहमे अनेक प्रकारके पिटिका रोग पैदा करते है ॥ २ ॥ ज्वर, रद्द, अतीसार, देहलाल, तीवदुःख, पसीना, प्यास, अरुचि, श्वास, विवर्ण, बेकली, अरति ॥३॥ पिटिकाका पूर्वरूप । अस्थिस्फोटोगदाहश्च शोपः कंवरुचिर्भमः ॥ पिटिकानां पूर्वरूपं मुनिभिः परिकीर्तितम् ॥४॥ वातकीपिटिकाकेलक्षण। तृष्णा पावकसंनिभाश्च पिटिका वातोद्भवास्त्वग्गताः सूक्ष्मा मु- द्समा मसूरसदृशाः सप्ताह्निपाकारुजाः ॥ सूक्ष्माभाश्चिपिटाघ नाश्च पारतः कुर्वति पीडाभयं दाहानाहतुपाक्षवार्तिवमथुश्वासा- तितापाकराः ॥५॥ पित्तकीपिटिकाकालक्षण। अस्थिस्फोटः पर्वभेदोंगदाहः श्वासः शोषो विड्ग्रहो मूत्रकृ- च्छ्रारोद्रास्फोटारक्तजारक्तवर्णा वैद्यैरुक्तं पित्तकोपस्य चिह्नम्॥६॥ । अर्थ--हडक्टन, देहमें दाह, शोप, खुजली, अरुचि, भ्रम, ये मुनीश्वरोने पिटका रोगका पूर्वरूप कहाहै ॥ ४ ॥ काली, अग्निके रंगकी, स्वचामें पुंसीहों छोठी और मूंगके समान तथा मसूरके समान सात दिनमें पके कमीखें चपटी और कठोरहो और पीडा भयको देनेवाली, दाह, आनाह, प्यास, छीक, मथवाय, श्वास, अत्यंत तापकी करनेवाली, वातकी, पिटिका जाने ॥५॥ हडफ्टन, गांठोंमें दर्द, अंगोंमे दाह, श्वास, शोप, दस्तका रुकना, मूत्रकृन्छु, रौद्र, फोटे, रक्तसे पैदा लाटरंगके हों तो वैद्य पित्तको पिटिका जाने ॥६॥ कफकीपिटिकाकेलक्षण। पिटिका कफकोपभवाः कठिनाः स्फटिकातयो बहुधा कृतयः ।। चिरपाकरुजास्तनुशोककरा बदरीफलपक्कसमारुचयः॥७॥ . . - (९७) - 4 भाषारीकासहितम् । श्लेप्मा कोपेन कुर्यात्त्वाचे पिटकशतं धुवुदाकारतुल्यं शोफ प्रांतं कठोरं वदरफलसमं मांसत्वग्भेदजातम् ॥ निद्रां तन्द्रां पिपासां भ्रममरुचिवमिं कासमंगेपु पीडां श्वासं कंडूप्रसेकं ह्यव- यवशिथिलं शीर्षरोगं ज्वरार्तिम् ॥८॥ वातपित्तभवानीला मध्ये निम्ना ज्वरान्विताः॥ भवंति पिटिकाः क्षुद्राः शोपदाहतृपा युताः॥९॥ अर्थ-कफ कोपको पिटिका, कठिन, स्फटिक मणिके समान, तरह तरहकी, देरमें पकें, देहमें सूजनहो, पके बेरके समान कान्तिहो ॥ ७ ॥ कफकोपको पिटिका त्वचामें सैंकडों फुन्सीको बबूलेके आकार, उसके चारों ओर सूजन, तथा कठिन वेरफलके समान मांसत्वचाको फाडकर प्रगटहो, निद्रा, तंद्रा, प्यास, भ्रम, अरुचि, चमन, खांसी, अगोंमें पीडा, श्वास, खुजली, लारका गिरना, शरीरके अवयव शिथिल, शिरमें दर्द, ज्वर तथा खेद ये कफको पिटिकाके लक्षणहैं ॥ ८ ॥ चात पित्तको पिटिका नीले रंगकी, बीचमें बैठीसहिो, उबरहो और क्षुद्रा पिटिका दाह, शोप, प्यासयुक्त होतीहैं ।। ९॥ स्थूलाः श्वेताः प्रोन्नता दुश्चिकित्स्याः पूयस्रावाः स्फोटकाः कप्ट- पाकाः ॥ स्निग्धाः कंडशोफतंद्रापिपासाकासश्वासारोचकाताप- युक्ताः ॥ १०॥संभूताः कफवाताभ्यां विज्ञेयाः पंडितैनरैः ।। अतः परं तु ज्ञातव्या विस्फोटाः कफपित्तजाः ॥ ११॥ रोगाः पिटिकाधना वुधजनैर्जेयाश्च निम्नोन्नताः पित्तश्लेप्मभवाविवृत्तव- दनास्थूलाः शिरोतिप्रदाः॥ वक्त्रेभ्यो रुधिरस्रवाश्चिमिचिमामूर्छा पिपासान्विता निद्राकंडुविवर्णताशिथिलताकंठांगपीडाकराः॥१२॥ अर्थ-मोटी, सफेद, ऊंची, जिनका कटिन उपाय, राधबहे, कष्टसे पके, चिकनी और खुजली, सूजन, तंद्रा, प्यास, खांसी, श्वास, अरुचि, वर ऐसी पिटिका वातकफको जाननी ॥ १० ॥ इस श्लोकका अन्वय दूसरे अगाडीके श्लोकमें लगता है ।। अब इसके आगे पिचकाकी पिटिकाके लक्षणजानो ॥ ११॥ रोगीकी फुन्सी कटिन, नीची, उंची, मोटी, खुले मुखकी, शिरमें दर्दकी करनेवाली, रुधिर चुचावे, चिमचिमीयुक्त, भूळ, प्यास, निद्रा, खुजली, विपर्णता, शिथि- लता, कंठ अड्डोंमें पीडाहो, ये लक्षण पित्तकफी पिटिकाके होते हैं ॥ १२ ॥ संनिपातकीपिटिकालक्षण। असाध्याः पिटिकाज्ञेया वातपित्तकफोद्भवाः ॥ उत्पद्यन्ते. विली- १ ७
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(९८)
हंसराजनिदानम् ।
यंते शरीरे रोगिणां पुनः ॥१३॥ पित्तश्लेष्ममरुद्भवाश्च पिटिकाः
पूयस्रबारक्तदाआध्मानंतनुगौरवं विकलतां कुर्वंत्यसाध्यारुजाः
दाहं शोफतरं तृपां वहुमुखाः
पाके च दुःखप्रदाः
अस्थिस्फोट-
महर्निशं बहुतरं श्वासं विवृत्ताननाः ॥१४॥ रक्तस्रावं नासिका-
कर्णनेत्रास्येभ्यो मूर्छा मंडलं मांसकोचम् ॥ हिकांकासं मूत्रकृ-
च्छ्रागभेदं कृष्णाःस्फोटा मृत्युदा दुश्चिकित्स्याः॥ १५ ॥
अर्थ-वात पित्त कफकी पिटिका रोगीके देहमें पैदाहों और नाशहों वो असाध्य है ॥ १३॥
सन्निपातकी पिटिकामें रुधिर और राध चुचाय, अफरा, देहभारी, बेकली, दाह, सूजन, प्यास
बहुतसे मुखहों, पकनेके समय दुःखहो, हडकल हो, श्वास, तिरछे नेत्र ये असाध्य पिटिकाके लक्ष-
णहें ॥ १४ ॥ नाक कान नेत्र मुख इनसे रुधिर चुचाय, मू हो, खूनके चकत्तेहों,मांसका संको-
चहोना, हिचकी, खांसी, मूत्रकृच्छ, अंगोंमें पीडा, कालेरंगके फोडा ये लक्षणं मृत्युके करनेवाले
चिकित्सा रहित जानने ॥१५॥
त्वचामेंगतपिटिकालक्षण।
त्वग्गताःपिटिकाज्ञेया जलवुबुदसन्निभाः॥स्वल्पदोपजलस्रावाः
सुखसाध्या भिपग्वरैः ॥ १६॥
रक्तमप्राप्तपिडिकालक्षण ।
रक्तस्था रक्तभाः साध्याश्शीघपाकास्तनुत्वचः ॥ रक्तस्त्रवाविदी-
स्था विज्ञेया पिटिकाः परैः॥ १७॥
मांसमेंप्राप्तपिडिकालक्षण ।
सांसस्थाः पिटिकाः निधाः कठिनाः कठिनत्वचः ॥ चिरपाका
ज्वरश्वासकंदाहतृपान्विताः ॥ १८॥
मेदमप्राप्तपिडिकालक्षण।
मेदजाः पिटिकाः स्निग्धाः स्थूलाज्वरसमन्विताः॥ मृदवो मंड
लाकाराः पीताभाः किंचिदुन्नताः॥ १९ ॥
मजाममाप्तपिडिकालक्षण।
रुक्षामुद्गसमाः क्षुद्राश्चिरपाकसमन्विताः ॥ मजस्थाश्चिपटा ,
नेयाः सव्यथाः किंचिदुन्नताः ॥ २० ॥
५ भापाटीकासहितम् । (९९) अर्थ--जलके बबूलेके समानहो, थोडे दोषयुक्त, जल चुचावे और त्वचा हो यो वैद्योंने मुख साध्य कही है||१६||जो फुन्सी लालरंगकोहो, जल्दी पके, नर्मत्वचाहो, रुधिर चुचाय, खुलेमुखको, वो रक्तगत पिडिका जाननी येभी साध्यहै ॥१७॥ मांसमें प्राप्त पिडिका कठिन, चिकनी, करडी त्वचावाली, देरमें पके, ज्वर, श्वास, खुजली, दाह, प्यास इनसे युक्त होती है ॥ १८ ॥ चरबीमें प्राप्तपिडिका चिकनी, मोटी, ज्वरयुक्त, गरम, गोलमंडलके आकार, पीली, कुछ ऊंची होती है ॥ १९ ॥ रूखी, मूंगके समान छोटी, देरमें पकनेवाली, चपटी, दर्द युक्त, कुछऊंची, मन्नागत पिडिका जाननी ॥ २० ॥ हाडमप्राप्तपिडिकालक्षण । अस्थिस्थाः पिटिकाः कुर्युभ्रमं दाहं तृपां ज्वरम् ॥ छिंदंति मर्म धामानि प्राणानाशु हरंति च ॥ २१॥ शुक्रौप्राप्तपिडिकालक्षण। • शुक्रस्थाः पिटिकाः कुर्युः स्तमित्यं बहुवेदनाम् ॥ प्राणनाशं शिरःकंपं श्वासं कासं ज्वरान्वितम् ॥२२॥ असाध्यशीतलाकालक्षण। 'मसूराभिभूतस्य कर्णाक्षिनासामुखेभ्यः स्त्रवेदस्यरक्तनितांतम् ॥ विवर्तिहिकातृपापीडितस्य सरोगी यमस्यालये याति नूनम्२३ अर्थ--अस्थिमें प्राप्तपिडिका ये लक्षण करतीहे भ्रम, दाह, प्यास, ज्वर, मर्ममर्ममें पीडा और ज- ल्दी प्राणोंकानाश करे ॥ २१ ॥ शुक्रमें प्राप्त पिडिका देहगीला, बहुत दुःख, प्राणोंकानाश करे शिरमें कंप, खांसी, श्वास, ज्वर ये लक्षणकरतीहै ।। २२ ॥ शीतलावाले रोगीके कान नाक मुग्य नेत्रसे रुधिरगिरे विवर्ण तथा दर्द हिचकी प्यास ये लक्षण होनेसे असाध्य जानना ॥ २३ ॥ दोपैकेनोत्थिताः साध्याः कष्टसाध्याद्विदोपजाः॥ पिटिकाः सन्नि- पातोत्था मृत्युदाः कीर्तिताः परैः॥२४॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे मसूरिकानिदानम् ॥ अर्य-एकदोपस उठो साथ्य, द्विदोषसे उठी, कष्टसाध्य, त्रिदोषसे उठी वो पुन्नी मोनको देने- पाटी कहीहै ।॥ २४॥ इति हिंसराजार्थबोधिन्या पिटिकारोगनिदानम् ।
। (१००) हंसराजनिदानम् । अपिटिकारोगनिदानम्। सराविका कच्छपिकाथजालिनी मसूरिका सर्पपिका च पुत्रिणी। विदारिका विद्रधिका तु पिंडिका तथांजली ः पिटिका द.. शस्मृताः॥१॥ प्रमेहसेउत्पन्नपिटिका। महोत्थाः पिटिका भवंति दशधा वाल्ये क्वचिद्यौवने कायस्यां तरवाह्ययोः प्रजनिता नृणां स्त्रियां भूयशः ॥ ताः कुर्वति महज्ज्वरं नयनयोर्मुद्रां शिर-पीडनं हृल्लासांतरगुंजनं विकलतां निद्रांग विक्षेपणम् ||२|| अस्थिस्फोटनमंगदाहमरति श्वासं च कासं रुज दौगंध्यं परीतःस्रवं विलपनं शोपं शरीरेनिशम्॥मूकत्वं वधिरं कृ- शत्वमरुचिं संधिग्रहसंभ्रमं वैवयं शिथिलं नरंगतवलं कुर्वति वी- र्यक्षयम् ॥३॥ अर्थ-१ सराविका, २ कच्छपिका, ३ जालिनी, ४ मसूरिका, ५ सर्पपिका, ६ पुत्रिणी, ७ बिदारिफा, ८ विद्रधिका, ९ पिण्डिका, १० अंजली ये वैद्योंने दश प्रकारको पिटिका कही हैं ।। १ ।। प्रमेहसे उठी पिटिका दशतरहकी बालक अवस्थामें कभी जवानपनेमें होती हैं, देहके बाहर भीतर स्त्रीपुरुषों के बहुतसी वे ज्वर, नेत्रकामुंदजाना, शिरमें दर्द, सूखी रद, आंतोंका बोलना, बैकली, निद्रा, अंगोंका फैकना. इन लक्षणोंको करतीहैं ।। २ ।। हडकल, अंगोंमें जलन, अराचि श्वास, खांसी, दुर्गध, स्त्राव, विलाप, शोप, वहिरापना, तथा गूंगापना, कृशता, अरुचि, संधियोंमें पोडा भ्रम,, विवर्णता, शिथिलता, वलहीन, योर्यका क्षयपना, ये लक्षण पिटिका रोगके हैं ।। ३ ।। पिटिकाः करानीलामलिनांतर्गताः शिताः ॥ मृत्युप्रदारक्तवर्णाः पाटलाः कष्टदाः स्मृताः ॥ ४ ॥ किंचित्कष्टप्रदाः पीताः पिशंगाः पिंगलास्तथास्वभ्राः स्फटिकसंकाशाःस्निग्धाः सुखकराःस्मृताः ॥५॥मर्मस्थलेषुवांसेषु जायते संधिपून्नताः॥ पिटिकाः श्वेतरक्ता- भा मध्यगर्ताः सराविकाः॥६॥ अर्थ-धूसरे रंगकी, नीले रंगकी मलिन,भीतर सपेदहो यो मृत्युकी देनेवाली पिटिका जाननी और लाल वा गुलाबीरंगकी कष्टदेनेवाली होतीहै ।। १ ॥ पालेरंगकी हरतालके रंगकी पिटिका कुछ कष्टदेती है नीबुआ रंगकी, स्वच्छस्फटिक मणिके रंगकी,चिकनी, सुखकरनेवाली होती है ॥५॥ मर्ममें और मांसमें तथा संघियोंमे उठीहुई सफेदलाल रंगकी बीचमे गड्ढाहो उसको सराविका कहतेहैं।॥६॥ - , - - 220/06 - भाषाटीकासहितम् । (१०१) कर्मरूपामहापुष्टा व लाज्वरदाहदाः ॥ जायते पिटिकाः सर्वाः कच्छप्यस्ताउदाहृताः॥७॥तीत्रदाहप्रदामांसे सक्लेदावर्द्धतेरुजम् ॥ जालवद्वेष्टयत्यंतं प्रोक्ता सा जालिनीवुधैः ॥८॥ मसूरदेहवत्सूक्ष्मा रक्ताभासा मसूरिका।गौरसर्पपभा स्निग्धा तत्प्रमाणाच सर्पपा॥९॥ अर्थ-कछुएकैसा स्वरूपहो, ज्यादा मोटीहो, बत्तीकी तरहहो, ज्वर और जलनको करे ये लक्षण कच्छपिकाके हैं ॥ ७ ॥ तीन जलन, मांसमेंही क्लेशयुक्त पीडाको बढावे, और जालकी तरह चिपटे उसे पंडित जालिनी कहते हैं ॥ ८ ॥ मसूरकी दालकी समान छोटी, और लाल हो, उसे मसूरिका कहतेहैं और सपेद सरसोंके समानहो और चिकनी हो उसे सर्पपिका कहते हैं ॥९॥ पिटिकासु प्रजायते पिटिका घोरदर्शनाः॥ पुत्रिण्यस्त्वार्तिदानी- लाः प्रोक्तावैयविशारदैः॥१०॥ अतिदीर्घासशाफाया परस्परयुता रुणा ।। विद्रधेर्लक्षणैर्युका प्रोक्ता विद्रधिका बुधैः ॥११॥ विदारि- कंदवद्दीर्घा कठिना दुःखकारिणी ॥ज्वरार्तिदा क्षुधाहारी विज्ञेया सा विदारिका ॥ १२ ॥ अर्थ-जो फुन्सीमें दूसरी फुन्सी घोर पैदाहो और पीडायुक्त हो और नीलेरंगी हो उसे पुत्रिणी कहते हैं ॥ १० ॥ बहुत बडी सूजनयुक्त और परस्परमिली हुईहो लालरंगहो और विद्रधिके लक्षण मिलतेहों उसे वैद्याने विद्रधिका कही है ॥ ११ ॥ विदारीकदके समान मोटाहो कडी दुःखकारक ज्वर, खेद, भूखकानाश करनेवाली उसको विदारिका कहते हैं ॥ १२ ॥ पिंडीवत्पिडिका ज्ञेया देहशोफकरीसिता ॥ व्यक्तांजुल्याकृति- , ज्ञेया वैद्यैः सा विततांजुला ॥ १३॥ पिटिकाविनाशाय शीतलां पूजयेत्सुधीः ॥ पुष्पैथूपाक्षतैर्दीपैनवयुमंगलैस्तथा ॥ १४ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेद्यशास्त्रेमसूरिकापिटिकालक्षणम् । अर्थ-जो पिंडकि आकारहो उसे पिंडिका जाननी, यो देहमें सूजनको करतीहै जो मिटीईई अंजलीके आकारमेंहो उसे वैद्य विततांजुली कहते हैं ॥ १३॥ पिटिका और शीतला एकहींहै इसी वास्ते पिटिकाके दुःखके नाशनार्थ शीतलाका पूजन धूप दीप चावन्द पुष्प नैवेद्य और मंग- लाचरणके साथ करे ॥ १४ ॥ इति श्रीहंसराजार्थबोविन्यां पिटिकामनारकारोगनिदानं समाप्तम् ॥ ।
(१०२)
हंसराजनिदानम् ।।
अथमेदोरोगनिदानम्।
मेटत्पत्तिः ।
अव्यायामैर्दिवास्वप्नैमासमिष्टान्नभोजनैः ॥ अतिस्निग्धाशनैदेहे
मेदोवृद्धिः प्रजायते ॥१॥ जठरे मेदसोवृद्धिःकरोति वलसंक्ष-
यम् ॥ निद्रांदोर्गंध्यमंगेपुअशक्तिं सर्वकर्मसु ॥२॥ स्थूलोदर-
मनुत्साहं गौरवं तनुशीतलम् ॥ जठराग्नेः क्षयं जाड्यं श्वास
कंपनसादनम् ॥३॥
अर्थ-दंड कसरतके न करनेसे सोनेसे, मांस मिष्टान्नके खानेसे, अति चिकनी वस्तुके खानेसे
देहमें मेदबढाहै ॥ १ ॥ पेटमें मेदके वढनेसे बलका नाशहोताहै, और निद्रा तथा दुर्गंध देहमें और
सर्वकर्ममें अश्रद्धा होतीहै ॥२॥पेटको बढावे, उत्साह रहित, तथा देह भारी तथा शीतल,
राग्निकानाश और जडता, श्वास, कप और देहका रहजाना करेहैं ॥३॥.
कायं स्थूलतरं मेदः सस्वेदं स्वल्पमैथुनम् ॥ धातुक्षयं त्वचं पीतां
वहुमूत्रां शितेक्षिणीम् ॥ ४॥
इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते
वैद्यशास्त्रे मेदसोवृद्धिलक्षणम् ।
अर्थ-जिसी देह मोटी मेदसे और पसीने युक्त, मेथुन थोडा कराजाय, और
पीली त्वचा होजाय, मूत्र बहुत उतरे, सपेद नेत्रहो, ये मैद रोगके लक्षणहै ॥ ४ ॥
इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां मेदोरोगलक्षणम् ।
जठ-
धातु गिराकरे
गंडमालरोगनिदानम् ।
विस्फोटमालागलकेशशोफमेदोद्भवा तोदयुतातिरक्ता ॥ कर्क-
धुजंब्वामलकप्रमाणा तां गंडमालां प्रवदति वैद्याः ॥१॥
वातकीगंडमालाकेलक्षण ।
वातोद्भवा या गलगंडमाला कृष्णारुणाभा कुरुतेतितोदम् ॥
स्तब्धाशिरातालुंगलेप्रशोपं भिन्नस्वरं रूक्षतमं शरीरम् ॥२॥
वैरस्यमास्ये विदधातिकप्टं संस्रावयेद्रक्तनिभं च पूयमाभिन्नस्वरं
कप्टतरेण पाकं करोति वातात्मकगंडमाला ॥३॥
-
मापाटीकासहितम् ।
(१०३)
अर्थ-फोडे मालाकीतरह सूजनयुक्त गठेमें हो और लालहो तथा घेर जामुन आमलेके
प्रमाणहो मेदसे पैदा हुआहो उसे वैद्य गंडमाला रोग कहते हैं ॥ १ ॥ वातको गंडमालाके ये
लक्षणहैं कालीहो, लालहो, अतिपीडाकरे, नाडिनको स्तंभन करदे, तालू गलेमें शोपहो, बुरास्वर,
शरीररूखा करे ॥ २ ॥ मुखमें स्वाद न रहै, कष्टको बढावै, तथा राधरुधिरवहै, बुरास्वर होजाय
कष्टसे पकै यभी यातकी गंडमालाके लक्षणहैं ।। ३॥
पित्तकीगंडमालाकालक्षण ।
ज्वरं शोफशूलं करोत्युग्रदाहं कटुत्वं मुखे कंठताल्वोष्ठशोपम् ॥
महत्पित्तकोपोद्भवारक्तवर्णा गलेमुष्कपत्त्याकृतिगण्डमाला ॥४॥
कफकीगंडमालाकालक्षण ।
जम्बूकधुपूगीफलकलितरुभापक्वनारंगपिंगा काठिन्या ग्रंथि-
पंक्तिर्वितरतिपरतः कंठदेशेषु शोफम।कंडूपीडां विधत्ते प्रतिदिन-
मरुचिं गौरवाझंच कासं पूयं रक्तं सगंधं स्त्रवति भवति सा श्ले-
प्मजा गंडमाला ॥ ५॥
इति श्रीभिषक्चकचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्य-
शास्त्रे गंडमालालक्षणं समाप्तम् ।
अर्थ-अर, शूल, दाह, मुखकडुआ, कंठ ताल् ओठ इनका सूखना, लाल वर्ण, गलेमें अंड-
कोशको पंक्तिके आकारहो उसे पित्तकी गंडमाला कहते हैं ॥ ४ ॥ जामुन बेर सुपारी बहेडा, पके
नारंगांके समान पीलीहो, कठिन गांठकी पंक्तिभीहो, और कठमें सूजनहो खुजली पीडाको बढा
अरुचि, देहभारी, खांसी, राधरुधिर बासके साथ निकलै, उसे कफकी गंडमाला कहते हैं ॥ ५ ॥
इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां गंडमालारोगनिदानम् ॥
अयहीपदरोगनिदानम् ।
शोफो नृणां पादगतोऽतिरोद्रो वल्मीकतुल्योंतरमांसवर्ती ॥ मेदा-
श्रयःकंटकवेष्टितांगो वैद्योत्तमः श्लीहपदो निरुक्तः॥१॥
वातकालीपदकालक्षण ।
निमित्तशून्यं वहुशोफपादं कृष्णं च रूक्षं स्फुटतीव्रतोदनम् ॥
वातोद्भवं श्लीहपदं ज्वरातिनिरूपितं वैद्यवरैनितांतम् ॥२॥
(१०४) हंसराजनिदानम् । पित्तकीलीपदकालक्षण। शोफाधिकं रक्तज्वरार्तिदाह संस्रावयुक्तं वहुरक्तवर्णम्॥ पित्तात्म- कं श्लीहपदं गुरुत्वं ज्ञेयं भिपग्भिः किलकष्टसाध्यम् ॥३॥ अर्थ-मनुष्योंके पैमें सूजनहो, और क्रमसे वडके सर्पकी गांवीके समान लम्बी पेडू जया मां- समें प्राप्तहो, और मेदके आश्रयहो कांटेयुक्त हो उसे वैद्य श्लोपदरोग कहते हैं ॥ १ ॥ विनाकारण बहुत सूजन हो, काली रूखी फटी तीन वेदनायुक्त, ज्वर, स्वेदहो, उसे वैद्य वातका श्लीपदरोग, कहते हैं ॥२॥ जिसमें सूजन ज्यादा हो, लालरंगहो,ज्वर, खेद, दाह रुधिर गिरे, भारीहो वो वैद्याने कष्टसाध्य पित्तका श्लीपद कहा है ॥ ३ ॥ कफकेश्लीपदकालक्षण । स्निग्धं श्लीहपदं गुरुत्वमनिशं शोकाधिकं सज्वरं श्वेताभं बहुकं- टकैः परिवृतं वल्मीकतुल्यं दृढम्॥मेदोमांसपराश्रयं चरणगं स्थूलं च शीतान्वितं भोभोवैद्यविशारदाः कफभवंजानीहि तत्पांडुरम्४ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे श्लीहपदलक्षणम् ॥ अर्थ-चिकेना, भारी सूजन, विशेप ज्वर, सपेदरंग, बहुत कांटेयुक्त, बामाके तुल्यहो, और दृढ़हो मेदमांसके आश्रयहो, पैरोंमेंहो, मोटी और शीतल हो उसे हे वैद्य ! तू कफी श्लीपद रोग जानो ॥ ४ ॥ इति श्रीहंसराजर्थबोधिन्यां श्लोपदरोगनिदानम् ॥ अथविद्रधिरोगनिदानम् । स्वग्रतामिपमेदासि दूप्यदोषास्थिगाः पुनः॥ नाभेरधोमहच्छोफ ज्वरं कुर्वन्ति ते शनैः॥१॥सविद्रधीरुपारितोविचार्य प्रीमिष ग्भिःकिलशास्त्रपारगैः॥ महात्र्तिकृद्दाहविवर्द्धनोऽसौ शोफान्वितो हृज्जठरे च शूलम् ॥२॥ विद्रधिः पड्विधः प्रोक्तो मुनिभिस्तत्व दार्शभिः॥ दोपैयस्तैः समस्तैश्च रक्तजः सप्तमः स्मृतः॥ ३ ॥ अर्थ-यात, कफ, पित्त ये त्वचा, रुधिर, मांस, मेदा उनको विगाडकर हड्डीमें प्राप्त हो नाभीके नीचे भारी सूजन और ज्वरको पैदा करते हैं ॥ १ ॥ बहुत स्वेद और दाह और सूजनको बढ़ावै, तथा हृदय और पेटमें दर्दहो उसे वैद्योंने विचारकर विद्रधि रोग कहाहै ॥२॥ विद्रधि ग छः तरहकाहे १ यात २ पित्त ३ कफसे ४ वात पित्तसे, ५ यातकफसे ६ पित्तकफसे, और -सातौ ७ रुधिरसे ॥३॥ - - भाषाटीकासहितम् । (१०५) वातविद्रधिके लक्षण । रक्तश्यामोऽतिविपमो वेदना वहुभिर्युतः॥शीर्पपाको विचित्राभो- 'वातजो विद्रधिः स्मृतः॥४॥ पित्तके विद्रधिकेलक्षण। पक्कनिंबूफलाकारोरक्ताभोवरदाहकृत् ॥ शीर्पपाकोमहत्यातिवि- द्रधिः पित्तजो भवेत् ॥५॥ कफकेविद्रधिकेलक्षण। स्निग्धः शीतश्चिरोत्थोयं चिरपाकोल्पवेदनः ॥ श्लेष्मजो विद्रधिः पांडः शरावसदृशो भवेत्॥६॥ अर्थ-लाल और काली तथा विषम वहुतपीडायुक्त, जल्दीपके, और विचित्र स्वरूप हो ये चातके विद्रधिके लक्षण हैं ।। ४ ॥ पके नींबूके समान सूजन हो, लालरंग, ज्वर दाहके करने वाली, शार्प पाक हो, अत्यंत पीडायुक्त ये पित्तकी विद्रधिके लक्षण हैं ॥ ५॥ चिकनी, शी- तल, बहुत दिनकी उठी और बहुत कालमें पकै, मंदपीडा हो पीलेरंगकी, शरावके समान हो, ये कफकी विद्रधिके लक्षण हैं ॥ ६ ॥ सन्निपातकेविद्रधिकेलक्षण । नानावर्णो दाहशूलो ज्वरातिः कोप्टोत्थानं कष्ठपाकोऽतिरौद्रः॥ आधिस्रावोवस्तिहृत्कुक्षिशोथो वैयैः प्रोक्तोविद्रधिः सन्निपातः७॥ रुधिरकेविद्रधिकेलक्षण। दीर्घोष्णा परिपक्कचूतसदृशो विस्फोटको मांसलः कृष्णाभो वहुदाहकृज्ज्वरकरस्तृष्णान्वितःक्षुद्धरः॥कुक्षौवस्तिगुदोदरेषुह- दये पीडाकरोऽहर्निशंप्रोक्तो रक्तभवाभिषग्वरगणेः पित्तात्मको बि- द्रधिः॥ ८॥ विद्रधि रक्तजं विद्यात्कुक्षोलग्नमचञ्चलम् ॥मांसशो- णितयोथिं वस्तिहृन्नाभिसंभवम् ॥ ९ ॥ इति श्रीभिषक्चकचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रेविद्रधिलक्षणम् ॥ अर्थ-विचित्र रंगहो, दाह, शूल, पीटा, कोष्टमें पैदा हुई फटसे पके, अति रौद्र आवि साब मूत्रस्थान, हृदय, कूरा इन अस्थानों में सूजन हो, इसे वैद्योंने सानेपातका विद्रधि रोग कहा है।
(१०६)
हंसराजानिदानम् ।
दर्षि, गरम, पक्के आमके समान फोडा हो, तथा मोटाही, कालरंगके समान, बहुत दाह, ज्वर
भूखका नाशकर, प्यास बढावे, कूख, मूत्रस्थान, गुदा पेट,हृदय, इनमें रातदिन पीडा करे, ऐस
विद्रधिको वैद्यगणोंने पित्तात्मक रुधिरकी कही है ॥ ८॥ और नाभी मूत्रस्थान हृदयमें मांसकी गां
हो, उसे रुधिरकी चिद्रधि कहते हैं, तथा काखमें स्थिर जो हो ॥९॥
इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां विद्रधिरोगनिदानम् ॥
अथोपदंशलक्षणम् ।
हस्तस्य घातात्करजस्य पाताईतस्य दंशात्तृणकाप्टलग्नात् ॥ दुष्ट-
स्त्रियो योनिविकारसेवनात्पञ्चोपदंशाः प्रभवति शिश्ने॥१॥
वातके उपदंशकेलक्षण ।
वातोपदंशो बहुवेदनान्वितो विस्फोटसूक्ष्मैः स्फुरणैस्तु कृष्णभैः।
युक्तः सतोदैः किलजायते नृणां शिश्नस्य वाह्योपरितोऽन्तरे
निशम् ॥२॥
पित्तकंउपदंशकेलक्षण ।
पित्तोपदंशं तमवेहि नूनं तीवार्तिदाहं पिशितावभासम् ॥विशीर्ण-
मांसं पिटिकाभिपिक्तं शिश्नांतरे गर्तमतीवरौद्रम् ॥३॥
अर्थ-हाथके चोटसे तथा नखके लगनेसे, किसी तरहसे दांतके लगनेसे, तिनका, लकडीके
लगनसे, गरमीवाली औरतके संग करनेसे, लिंगमें पांच प्रकारका उपदंश रोग पैदा होता।
॥१॥ वातका उपदंशवाला पुरुष बहुत वेदनायुक्त हो, प्रकाशमान कालेरंगकी छोटी छोट
पिडिका हों, पीडायुक्त, लिंगके बाहर भीतर मनुष्योंके होती हैं ॥२ ॥ उसे पित्तका उपदंश जाने
जिसमें ये लक्षण हों, तीवदाह, मांसके रंग सरीखा तथा बिखरा हुआ मांस हो, पिटिका युक्त
लिंगके भीतरी भारी गढाहो ॥३॥
कफकेउपदंशकालक्षण ।
वैद्योपदंशं कफसंभवं हितं जानीहि कंडूपिटिकाभिराश्रितम् ॥
शोफ़ाधिकं पाडुरवर्णशीतलं स्निग्धं गरिष्ठं पिशितांकुरान्वितम्॥४॥
सन्निपातकेउपदंशकालक्षण।
आमुष्कशोर्फ कृमिजं तु जग्धं विशीर्णमांसं बहुगर्तशोफम् ।।
त्रिदोपजं विद्धयुपदंशमेतमसाध्यमार्तिज्वरशूलदाहम् ॥५॥ जात-
मात्रेमहारोगे चिकित्सानैवकारयेत् ॥ वद्धमूलेन रोगेण रोगी
यातियमालयम् ॥६॥
भाषाटीकासहितम् ।,
(१०७)
अर्थ-हे वैद्य ? उसे तू कफका उपदंशजान जिसमें खुजली हो, पिटिका हो, अधिक सूजनहीं
पोलारंग हो, शीतल और चिकना भारी मांसांकुर युक्त हो ॥ ४ ॥ लिंगसे अंडकोशों पर्यंत सूजन
' हो, कृमिपडगये हों, मांस बिखर गया हो, वडा गड्ढा हो, सूजनहो वर, शूल, दाह युक्त, ऐसे
लक्षणोंसे असाध्य त्रिदोपका उपदंश जानना ॥ ५ जो मनुष्य उपदंश रोगको पैदा होतेही इलाज
नहीं करे और रोग बद्धमूल होजाय तो वह रोगी यमराजके घर जाता है ॥ ६ ॥
महाक्षतो भवेद्यस्य शिश्ने स्फोटोनिशीर्यते ॥ शिरःपीडा ज्वरो
देहे निर्लोमो मुखमंडले ॥७॥ गुह्यदेशे महाशोफो नेत्रयोर्वहुर-
क्तता॥ पतेच्छिन्नः समुष्काभ्यां सरोगी नैव जीवति ॥८॥
इति श्रीभिषक्चक्रचितोत्सवे हंसराजकृते
वैद्यशास्त्रे उपदंशलक्षणम् ।
अर्थ-जिसके लिंगमें वडा घाव हो, और घाव फटजावे, तथा शिरमें दर्द, और ज्वर, मुखपर
'बाल न रहै ||७ ॥ गुह्यइन्द्रियमें महासूजनहो, और नेत्र लालहों, और जिसका अंडकोशके साथ
लिंग गिरपडे यह रोगी नहीं जीवै ।। ८ ।।
इति श्रीहसराजार्थबोधिन्यामुपदंशरोगनिदानम्॥
अथशूकदांपलक्षणम् ।
यो लिंगवृद्धिं मनुजोभिवांछति शूकोद्भवास्तस्य भवन्ति व्याधयः॥
अष्टादशाख्याः कफवातपित्तजा द्वंद्वोद्भवा रक्तभवा स्त्रिदोपजाः१
सर्पपिकाकालक्षण
'सर्पपिका सा सर्पपरूपा लिंगसमीपे दारुणशूका।वातकफाभ्या
संजनितारुक् स्यात्पिटिकेयं पुंस्त्वहरीति ॥२॥
कुम्भिकाकालक्षण।
रक्तपित्तोत्थिताकुम्भी पिटिका रक्तपूरिता ॥ शिश्नोपरिगताशू-
कदोपजा तीनवेदनां ॥३॥
अर्य-जो मनुष्य लिंग वढनेकी हन्टा करें, और दवैद्यक कहनेसे लेप वा पट्टी बांधे उसके
'अठारह तरहका, वात, पित्त, कफ ३ दो दोपॉके ३ और त्रिदोषका १ गुफसे पैदा व्याविही
ती है ॥ १ ॥ सपिका सरसोंके समान छोटी फुसी लिंगपर होतीहै, और वात, कफसे पैदा तथा
पुरुपपनेको दुरकरता है ।। २ ।। रक्तपित्तसेपैदा कुभिकाफुसी रधिरसे भारत और लिंगपर शुक्दोष.
से पैदाई तीनपांडायुक्त ॥ ३ ॥
(१०८) हंसराजनिदानम् । मूढपिटिकाकालक्षण। पाणिभ्यां मृदितं शिश्नं पीडितं वातकोपतः। तस्मिन्वातसमु- द्भूतासामूढपिटिकाभवेत् ॥ ४॥ दीर्घिकापिटिकालक्षण । दीयते मध्यतो वद्धाः पिटिकारोमहर्पदाः॥ संधिमध्यगताःशुभ्राः कफजा दीर्घिकाः स्मृताः ॥५॥ पुष्करिका पिटिकाकालक्षण । पित्तोद्भवा पुष्करणिकासमा सिंदूरवर्णा निविडाऽतिदुःखदा ।। डाहादिपीडा महतीं करोति या सोक्ता परैः पुष्करिका मुनीन्द्रः॥ अर्थ--हाथके मीडनेसे, वातके कोपसे पैदाहुई लिंगपर फुसी उसे मूढपिटिका कहते हैं ॥४॥ रोमांचको करे, और बीचमेंसे फटजाय, और सन्धियोंके बचिमें सपेद रंगाहो, वो कफसे पैदा हुई दीर्घिकानाम पिटिका जाननी ॥ ५ ॥ पित्तसे पैदा कमटकी कार्णकाके समानहो, तथा लाल रंगहो, चिपटी, अतिदुःख देने हारी, दाह, पीडा बहुतकर, उसे मुनीश्वरोंने, पुष्कारका पीडिका कही हैं ॥ ६॥ स्पर्श नोत्सहते ज्वरं वितनुते पीडां करोति द्रुतं यःशूकं पिटि- काशतं बहुरुजं लिंगे विधत्ते चिरम्॥कृष्णारक्तनिभं विपाककठिनं पाकार्तिकृत्सद्रवं विद्यापित्तमरुद्भवं तमनिशं मुरादलाभं रुजम्॥७॥ कफपित्तकेशककैलक्षण। कफपित्तभवा विविधा कृतयः पिटिकाबहुशोफयुताः कठिनाः॥ ज्वरदाहविलापरुजो दधते कृमिशोणितपूयवहा विषमाः॥८॥ त्रिदोपजनितशूककेलक्षण । मांसपार्क बहुच्छिद्रं लिंगभंगं त्रिदोषजः ॥ कुर्याच्छूकोज्वरं दाहं शोथं च पिटिकान्वितम् ॥ ९॥ अर्थ-स्पर्श न सहाजाय, ज्वर, पीडा, और सैकरों फुन्सी लिंगके ऊपरकाली, लाल हों, कटि- नसे पके, दुःखकी देनेवाली, और चुचावे, उसे वातपित्तसे पैदाहुई पीडिका मूंगके पत्तेके समान जाननी ॥ ७ ॥ कफ पित्तसे पैदाहुआ जो शूक रोग उसके अनेक तरहको फुसीकी आकृतिहो, और सूजनहो, कठिनचर के और दाहके करनेवाली, रुदनकर, कृमी, और रुधिर तथा राधमहे, भापाटीकासहितम् । और विषम हो ॥८॥ मांसका पाक तथा बहुतसे छिद्र होजाय और लिंगगिरपडे, तथा जर, दाह, सूजन, और अनेक मरोडीहों, ये सान्निपातके शूकरोगके लक्षण हैं ॥ ९ ॥ मांसशोणितयोग्रन्थिमव॒दं तं विदुर्बुधाः ॥ विद्रधेर्विद्रधि विद्याः संनिपातसमुद्भवाम् ॥ १०॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रेशूकदोषलक्षणम्। अर्थ-मांस और रुधिरकी गांठ उसे पण्डित अर्बुद कहते हैं, 'और, विद्रधिकेआकार हो उसे: संनिपातसे पैदा विद्रधि कहतेहैं ॥ १० ॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्या शूकरोगनिदानम् ।। अथकुष्टरोगलक्षण। अथकुष्ठरोगोत्पत्तिः। महापापतः कुष्ठिनो देहदाहात्तथात्यंतसंसर्गतो मांसभक्षात् ॥ भवेत्कुष्ठरोगो गुडक्षीरपानादजीर्णाशनाद्रक्तपित्तस्य कोपात् ॥१॥ विरुद्धान्नपाता स्त्रियोत्यंतसंगादिवास्वापतोरौद्रधर्मादितापात्॥ गुरुस्निग्धरूक्षाशनान्मूत्रवंधाद्भवेद्रौद्रकुष्ठो जलस्यावगाहात्॥२॥ मांसचर्मविकारोत्थाः कुष्टाष्टादशसंज्ञकाः ॥ वातपित्तकफोद्भूता द्वंद्वोत्थाः सन्निपातजाः॥३॥ अर्थ-ब्रह्महत्यादि महापापके करनेसे कुष्ठीको दाह देनेसे कोढीके पासरहनेसे मांसके खानेमे भारी तथा दुग्ध आदि पदार्थ के सेवन करनेसे, अजीर्णमें खानेसे, रक्तपित्तके होनेसे, कुष्टरोग पैदा होताहै ॥ १ ॥ तथा विरुद्ध अन्न और जलके सेवन करनेसे अत्यन्त स्त्रीके संग कर नेसे, दिनमें सोनेसे, धूप आदि गरमीक खानेसे, भारी चिकना रूखे आदिके खानेसे, मू- प्रबंध होनेसे, बहुत जलमें रहनेसे, घोर कुष्टरोग पैदा होताहै ॥ २ ॥ मांस और चर्मके विकार- से पैदा कोढरोग अठारह प्रकारकाहै, वातसे, पित्तसे, कफसे, द्वन्द्वज और सन्निपातसे ॥ ३ ॥ उदुंबरकुष्ठकेलक्षण। यक्षं परुपं कपालसदृशं तोदं कपालेऽधिकं तत्कुष्टं विपमं वदति सुधियः कृष्णारुणाभं भृशम्॥यत्कुष्टं स्फुटितमुदुम्बरसमं रुग्दाह कडवृतं शुष्कं रक्तनिभं परेनिगदितं तत्कुष्टमोदंवरम् ॥ १। , .
हंसराजनिदानम् । मूकजिनामकुष्टकेलक्षण। वृपजिह्वोपमा जिह्वा रोमहर्षोन्तरव्यथा ॥ जायते येन कुष्टेन मूकजिह्वन्तदुच्यते ॥५॥ मंडलकुंष्ठकेलक्षण। श्वेतरक्तनिभं स्निग्धं स्थिरं कृच्छ्रसमुन्नतम् ॥ परस्परसमालग्नं कुष्ठं मंडलसंज्ञकम् ॥६॥ अर्थ-जो रूखा, कठोर, खोपडोके समान, कपाल में पीडा कर तथा काला, लाल उसे क- पाल संज्ञक कुष्ट कहते हैं, और जो फटगयाहो गूटरकेसमान पीटा दाह, खुजली, तथा सूखा हुआ रुधिरके समान उसे वैद्य उदुम्बर नाम कुष्ट कहते हैं ॥ ४ ॥ बैठकी जीमके समान जीमहो रोमांच तथा भीतरपीडाहो, उसे मृकजिह्व कुष्ठ कहते हैं।॥५॥ सपेद, लाल, चिकना स्थिर करडा ऊंचा, और आपसमें मिला हुआ हो उसे मण्डल कुष्ठ कहते हैं ॥ ६ ॥ करवालकुष्ठकेलक्षण। वर्द्धतेऽहर्निशं स्थूलं कृष्णकंडूभिरावृतम् ॥ रूक्षं बहुतरं कुठं कर वालं तदुच्यते ॥७॥ किणिकुष्ठकेलक्षण। तत्कुष्ठं किणिसंज्ञं स्यात्किणं शोथ समन्वितम् ॥ श्यामवर्णं खर • स्पर्श परुपं वहुवेदनम् ॥ ८॥ दादनामकोढकेलक्षण। कृष्णाभं मंडलाकारं कंडूभिर्वहुभिर्युतम् ॥ अतापे दुष्करं रूक्षं तत्कुष्ठं दद्रुसंज्ञकम् ॥९॥. अर्थ-जो नित्य बढता जावे, और मोटाहो काला और खुजली युक्त रूखा, उसे करवाल कुष्ठ कहते हैं ।। ७ ॥ वो कोढ किणी संज्ञकहै, जिसमें धात्र सूजनके साथ हो कालावर्ण,खरदरा, स्पर्श, कठोर, बहुत खेद युक्तहो ॥ ८ ॥ काला, गोल चकत्ते, खुजली होतीहो, गरमीमें दुःख बहुतहो, रूखा, उसको दादनाम कोढ कहते है ॥ ९॥ चर्मदलकोढकेलक्षण। कंडुमद्रक्तवर्णं च विस्फोटकसमन्वितम् ॥ साईस्पर्शासहं शूलं कुष्ठं चर्मदलं भवेत् ॥१०॥ और बहुतों - भाषाटीकासहितम् । (१११) गजचर्मकोट केलक्षण। गजचर्मसमारकारं स्थूलं बहुतरंदृढम्॥ कंडूमच्छयामवर्णं यत्कुष्टं तच्चर्मसंज्ञकम् ॥ ११॥ पामाकुष्ठकेलक्षण । स्फोटाभिर्वहुभिर्युक्ता सूक्ष्माभिः पाटलादिभिगाकंडूदाहातिभिर्य तापामा सा कीर्तिता वुधैः ॥ १२ ॥ अर्थ-जिसमें खुजलीहो, और लालवर्ण तथा फोडाहो गीला, स्पर्श न सहा जाय, शूलयुक्त, उसे चर्मदल नाम कुष्ठ कहते हैं ॥ १० ॥ जो हाथीके चर्मके आकार हो, और मोटाहो, तथा विशेष और दृढ हो, खुजलीयुक्त, कालारंगहो, उसे गजचर्म कुष्ठ कहते हैं ॥ ११ ॥ जिसमें फोड़ा छोटे और सपेद लाल रंगके बहुत हों, और खुजली दाह पीडा युक्तहो उसे 'पामा अर्थात् खाज कहते हैं ॥ १२॥ विचर्चिका और चित्रकुष्ठ। सैव नूनं बहुस्त्रावा कथिता सा विचर्चिका ॥ यत्पुष्पसदृशं वर्ण चित्रकुष्ठं तदुच्यते ॥ १३ ॥ वातकेकुष्टकालक्षण । श्यामारुणं खरस्पर्श रूक्षं वेदनयान्वितम् ॥ विवर्ण वातजं कुष्टं कथित तद्भिपग्वरैः॥१४॥ पित्तककुष्ठकेलक्षण। श्यामारुणनिभं नावं कंडूरोगार्तिदाहदम् ॥ तीक्ष्णपित्तोद्भवं कुष्टं कीर्तितं वैद्यसत्तमः ॥१५॥ अर्थ-वहीं श्यामा बहुत स्रवे तो उसेही विचार्चका कहते हैं, और जिसका पुष्पके वर्णके समा- न रंगहो उसे चित्रकुष्ठ कहते हैं ॥ १३ ॥ जिसका काला, लाल और खरदरा स्पर्श हो, सखा तथा पीडा युक्त विवर्ण उसे वातका कुष्ठ कहते हैं ॥ १४ ॥ जिसका काला, टालरंगहो, और लवे तथा खुजली दाह पीडा हो उसे तीखा पित्तका कुष्ट वैद्योंने कहहि ॥ १६॥ कफकेकुष्ठकेलक्षण। कुष्टं कफोद्भवं विद्यालिग्धं कंडुयुतं धनम् ॥ गौरवं शीतलं क्लेदि
(११२)
हंसराजनिदानम् ।
-
.
शोथस्त्रावसमन्वितम् ॥ १६ ॥ चिह्रविदोपर्युक्तं द्विदोपोत्यं
विदुर्बुधाः॥ त्रिभिोपेविमिदं यत्कुष्टं कप्टतरं भवेत् ॥ १७ ॥
त्वचामस्थितकुष्टकेलक्षण।
वहूपद्रवसंयुक्तमसाध्यं तत्प्रकीर्तितम् ॥ त्वक्स्थे कुष्ठे शरीरेषु वै-
वयं रुक्षता भवेत् ॥१८॥
अर्थ-जो चिकना और खुजलीयुक्त धन, भारी शीतल, छेदी, सूजनयुक्त, तथा स्त्रवे, उसे
कफका कुष्ठ कहते हैं ॥ १६॥ जिसमें द्विदोषके लक्षण मिलते हों, उसे पण्डित द्विदोपका कुष्ठ
कहते हैं, और त्रिदोपके लक्षण मिले हों, उसे क्रप्टतर जान वैद्य त्यागदे ॥१७॥ और बहुत उप-
द्रव युक्तहो, उसे वैद्योंने असाध्य कहाहै, त्वचामें स्थित कुष्ट शरीरको विवर्ग करदे, और रूखा
कर देताहे ॥ १८॥
रक्तगतकुष्ठकेलक्षण।
कुष्ठे रक्तगते नेत्रे क्लमो हर्पोरुचिर्भवेत् ॥ प्रस्वेदः कंटशोपश्चवि-
सपों रक्तमंडलम् ॥ १९॥
मांसगतकुष्ठकेलक्षण ।
हस्तांघ्रिपु नृणां शोफं विस्फोटं तोदगौरवम् ॥ कुष्टे मांसं गते
तस्य विरेको वमनं भवेत् ॥ २० ॥
मेदगतकुष्ठकेलक्षण।
गात्रभोंगदुर्गंधं क्षते पूयं च जंतवः ॥ गतिक्षयोऽग्निमंदत्वं कुष्ठे
मेदगते भवेत् ॥ २१॥
अर्थ-नेत्रोंमें लम, तथा, हर्पका नाश, अरुचि, पसीना, कंठका सूखना और विसर्प,
रुधिरके मण्डल ये रक्तगत कुष्ठके लक्षणहैं ॥१९॥ हाथ पैरों में सूजन, तथा फोडा पीडा,शरीरभारी
रहे रद्द, दस्त ये मांसगत कुष्टके लक्षण हैं ॥ २० ॥ शरीरका टूटना, देहमें दुर्गन्ध, मण, पीव,
कृमिहों, गतिका नाश, मन्दाग्नि, ये मेदगत कुष्टके लक्षणहैं ॥ २१ ॥
अस्थिमजागतकुष्ठकलक्षण।
नासाभंगोऽक्षिणी रक्ते क्षतेपुकृमिसंभवः । स्वरघातोवणे दाहः
कुष्ठे मजास्थिसंस्थिते ॥२२॥दंपत्योः कुष्ठिनोर्वीर्यशोणिताभ्यां च
संभवः ॥ यदपत्यविकाराभ्यां ज्ञेयं तदपि कुष्ठितम् ॥ २३ ॥
भायाटीकासहितम् । कुष्ठकंसाध्यलक्षण। त्वग्रक्तमासगं कुष्टं साध्यं यंत्रोपधादिभिः ॥ मेदोजं च द्विदोयो- त्यंदानस्तानजपादिभिः॥ २४ ॥ अर्थ-नाकका भंग, नेत्र लाल, धावामें कीडापडजाय, मन्दस्वर, प्रणोंमें दाह, ये हड्डी और मनागत कुष्टके लक्षणहै ॥ २२ ॥ माता और पिताके कोढी होनेसे उन्होंके वीर्य्य और रजसे पैदा जो सन्तान वो भी कोढी होता है ॥ २३ ॥ त्वचा, मधिर, मांसमें जो स्थित कुष्ठ सौ यंत्र मंत्र औषधियोसे साध्यहै, और जो मेदा मनामें प्रातहो और द्विदोबसे उठाहो वो स्नान दान जपादिसे शांतिहो ॥ २४ ॥ कुष्टकेअसाध्यलक्षण। नरं कुष्ठिनं हन्ति कुष्ठं प्रवृद्धं त्रिदोपोद्भवं संधिमज्जास्थिसंस्थमा प्रभिन्नस्वरं श्वासवाहं सदाहं कृमीणां क्षतेऽसृक् स्रवं रक्तनेत्रम् ॥२५॥अंगानि येन शीर्यते क्षतेषु कृमिसंभवः॥भ्रूनासाक्षिस्वरा भग्नाः कुठं तं परितस्त्यजेत् ।। २६ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे कुष्ठलक्षणम् ॥ अर्थ-संधि मजा अस्थिगत त्रिदोषसे पैदा हुआ जो कुष्ठ और बढा हुआ वो कोढी मनुष्यको मारडाले तथा भ्रष्टस्वर, श्वासवान्, दाह, और कामियुक्त धाव रुधिरस्रवे, लालनेत्र ॥ २५ ॥ जिससे अंग फटजाय, और धावाम कृमि पटजाय, तथा भृकुटी नाक नेत्र जाते रहै, स्वर बैठजाय, उस कोढीको वेद्य त्यागदे ॥ २६ ॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां कुष्ठरोगनिदानम् ॥ शीतपित्तोर्दलक्षपाम् । शीतवातस्य संस्पर्शाद्वातपित्तकफास्त्रयः ॥ त्वग्रक्तमांसंसंदूष्य विसर्पतोतरे वहिः॥१॥ उदर्दकलक्षण। वरटीदष्ठवच्छोथो जायते त्वचि सर्वतः ॥ दाहकंशिरस्तोदः स्यादुदर्दस्य लक्षणम् ॥२॥ मंडलानि विचित्राणि रागवति वहूनि च॥ सकंडूनि सतोदानि स्थूलानि परितस्त्वचि ॥३॥ ८ इंसराजानदानम् । अर्थ-शीतल परनके स्पर्शसे,वात,कफ, पित्त,तीनो रुधिर, मांस,त्यचा विगाड कर भीतर और बाहर शांत पित्तरोगको पैदाकरे है ॥ १॥ जैसे बरटी (मोहारको मक्खी के काटनेसे सूजन होती है इसीतरह, सब त्वचाहो और दाह, खुजली, शिरमें दर्दही, उसे शांत पित्तवायु जिसे लोकमें पित्तीका रोग कहते हैं ।। २ ।। और जिसमें चित्रविचित्र चकत्ते रागवान् हों, और बहुतसेहों उनमें खुजली और पीडाहो तथा मोटी त्वचाहो ॥ ३॥ भवंति सर्वतो देहे शीतवातोद्भवानि च॥ कफात्मकानि चिह्नानि उदर्दस्य विदुर्बुधाः ॥१॥ पित्ताधिकंभवेत्कोष्टमुदर्दतुकफाधिकम्।। वाताधिकं शीतपित्तं संनिपातं त्रिदोपजम् ॥५॥ उदर्दरोगकापूर्वरूप। पूर्वरूपमुदर्दस्य नेत्रयोरक्ततारुचिः ॥ हृल्लासतृड्ज्वरो दाहो देह सादोंगगौरवम् ॥६॥ अर्थ--सबदेहमें शीतल पवनसे और कफाधिक्यसे जो चकत्तहों, उसे पंडित, उदर्दरोग कहते हैं ॥ ४ ॥ पित्ताधिकसे कुष्टहोताहै, कफाधिकसे उदर्द होता है, याताधिकसे शीतपित्त, सन्निपातसे त्रिदोषज उक्तरोग होते हैं ॥ ५॥ नेत्र लालहों, अरुचि, खालीरद, प्यास, ज्वर, दाह, देहमें पीटा तथा भारीपना, ये उदर्दके पूर्वरूपहै ॥ ६ ॥ कोढउत्कोढकालक्षण। स्वक् संदूष्य वहिर्गतो रुग्महाकाये मरुच्छीततो देहे मंडलम- डितं वितनुते शोफ सरोगान्वितम्॥कंडू निस्त्वचिसर्वतो वमितरा तोदं च विड्यन्धनं शैथिल्यं चलनाशनं प्रकुरुते रोमोद्गमं गौरवम्॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे उदर्दकुष्टलक्षणम् अर्थ-दारदीसे पवन त्वचाको बिगाड शरीरके बाहर महादारुण रोगको प्रगट करे, देहमें रुधिरक चकत्ते, सजनयुक्तहों, उनमें खुजलीचले, त्वचा न रहै, यमन और पीडा तथा दस्तका बंद होना शिथिलता बलनाश, रोमांच, और देहभारी ॥ ७ ॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां शीतपित्तउर्दकोढउत्कोढनिदानम् ॥ अम्लपित्तकोउत्पत्ति । स्निग्धाम्लैबहुभोजनैरपचितवानरे!दरे रात्री जागरणेन वा सरमुख स्वापेन तापेन वा॥ संक्षोम्योपचिताम्लपित्तमुदरे हत्के- . - - भाषाटीकासहितम् । (११५) ठयोमस्तके नाभौ वस्तिगुदांतरेषु विविधं धत्ते रुजं दारुणाम्॥१॥ आध्मानं कुरुतेम्लपित्तमनिशं शोपं तनौ कृष्णतामुद्गारं वित- नोति धूमसहितं साम्लं मुहुर्दुःखदम्॥हृल्लासंभ्रममोहकंपमरुचिं दाहं च हृत्कंठयोः कंड्रमंडलमंडितं सपिटिकं देहं विधचेऽरतिम् ॥२॥ अम्लत्वमति भुक्तानमपक्कं याति वह्निना ॥ शिरोतिशूल दृच्छोपमम्लपित्तस्यलक्षणम् ॥३॥ अर्थ-चिकना, ग्वा, बहुतभोजन करनेसे, मंदाग्निसे रानमें जागने दिनमें सोनेसे, गर्मी, डोलनसे, कुपितहुआ अम्लपित्त पटमें, हृदयमे, कंठ और मस्तक तथा नाभी और मूत्रस्थानमें गुदामें नानाप्रकारका रोग पैदा करताहै ॥ १ ॥ अफरा, शोप, शरीर काला, धूमसहित खड़ी टकार वारवारमे आत्रे, ग्वाली रद्दहो, भौर, मोह, कम्प, अचि, हृदय, फण्ठम दाह खुजली, देहमें चकत्ते, और फुसी, नथा अरतिको करे ॥ २ ॥ खायाहुआ अन्न मंदाग्निके कारणसे अपक हुआ घटेपनको प्राप्त होताहै, शिरमें दर्द, शूल हृदयमें शोप, ये अम्लपित्त के लक्षणहें ॥ ३ ॥ वातकेअम्लपित्तलक्षण । वाताम्लपित्तं प्रकरोति पीडां शूलं भ्रमं हृत्कमलेऽतिशोपम् ॥ मृच्छा प्रकंपं पिटिकानि देहे कृष्णानि सूक्ष्मानि च मंडलानिया पित्ताम्लपितकेलक्षण । पित्ताम्लं शीतजन्यं रुजयति मनुजं पित्तकोपाधिकारं रक्तांगं- मण्डलाभं त्वचिगतमनिशं छर्दिमूर्छाविपाकम्॥ कंडूरूपं सशोर्फ पिटिकशतचितं मोहशोकादिकारिअंतर्बाह्येति दाहं हदिजठर- गुदेशूलकृञ्चमहारि ॥५॥ कफाम्लपित्तलक्षण । पित्ताम्लं कफजं करोति पिटिकां देहे सशोफान्वितामालस्यं मलबंधनं वितनुते कंडूरुजं दारुणाम् ॥ निद्राभंगविमईनं च जडतामुद्गारमम्लान्वितं हृत्पीडामाचं तमः कफचर्य कार्य गुरुत्वं बमिम् ॥६॥ इतिश्नीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेद्यशाने अम्लपित्तलक्षणम्॥
(११६)
हंसराजनिदानम् ।
अर्थ-वातका अम्लपित्त पीडा, शूल, भ्रम, हृदयमें शाप, मूर्छा, कंप, फुती, काले और छोटे
चकत्ते करताहै ॥ ४ ॥ पित्तका अन्लपित्त शीतसे पैदाहुआ मनुष्यको रोगीकरे, दहमें लाल नक-
तहो, रह, मूी, अजीर्ण, खुजली, सूजन, अनेक पुंसी, मोह, शोक, भीतर बाहर दाह, हृदय,
पेट. गुदा इनमें शूल, चर्मको दूरकरैहे ॥ ५ ॥ कफका अम्लपित्त फुसी, सूजन, आलसक, मल-
बंध, म्युजन्ती,जडता, दारुणपीडा, निद्राकानाश, अंगोंका टूटना ग्वीडकार, हृदयमें पीडा, अनि,
अंधेरा, कागिरे, भारीपना और रह ये लक्षण करे है ॥ ६ ॥
इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यामम्लपित्तरोगनिदानम् ।
विसपरोगलक्षणम् ।
लवणकटुरसानांसेवनादर्मतापात् प्रभवति किलरोगोदोषकोपा-
विसर्पः ॥वपुषि चलनशीलो दग्धविस्फोटरूपो बदरफलसमानः
श्वेतपीतारुणाभः ॥१॥
वातकेविसर्परोगकालक्षण।
संदूष्यामिपमेदचर्मरुधिरं जातो विसौ वहिर्वात्मा विदधाति
विद्रुमनिभान् विस्फोटकान् चञ्चलान् ॥ दीप्तांगारंसमानदाह
जनकान् पीडाकरान्कंडुरान् कासाध्मानमहाज्वरश्रमतथाशीर्षा-
तिमोहाकरान् ॥२॥
पित्तकविसर्परोगकालक्षण ।
मृी कुर्याद्विसर्पः प्रसरति बहुशः पैत्तिको घोररूपस्तप्ताग्न्यं
गारदाहं पिटिकचयशतं नीलपीतारुणाभम् ॥ निद्रानाशं शरीरं
ज्वरयति सततं रक्तमांसावशोपं कासं श्वासं विचेष्टां भ्रममरुचि
तृपास्फोटमंगेषु मोहम् ॥ ३॥
अर्थ-नानका खट्टा आदि पदार्थ खानेसे, धूपमें रहनेसे, कुपिनहुये जो वात, पित्त, कफ सो,
निमारोग फैलानेवाला दग्धफोडारूप वेरके समान सपेद पीला लालरंगके पदाकरते है ॥ १॥ वात-
का विमशिग मांस मेदाको बिगाडकर बाहर मुंगके समान चंचल पुंसोको पेदाकरे, जैसा प्रचलित
अंगार दाहको करनेवाले, तथा पीडा कारक खुजली, ग्वांसी, अफरा, महाचर, श्रम, प्यामशिरमें
दर्द, मोहको करनेवाले, करताहै ॥ २ ॥ पित्तकाविसर्प देहमें फैल जाये, मूर्छा हो, अंगारकं समान
दाह, नाली, पाली लालरंगको फुसी, निद्राकानाश, ज्वर, गधिर मांसका शोष, खाँसी, श्वास, चेष्टा
हीन, भ्रम, अरुचि, प्यास अंगोंका, पटना, और मोहको करेहे ॥ ३ ॥
भापाटीकासहितम् ।
(११७)
कफकेविसर्परोगकैलक्षण ।
पिटिकाश्च विसर्पकृता रुचिराः स्फटिकद्युतयो वलवीर्यहराः ।।
कफजामिलिता बहुदुःखयुता ज्वरकासतपालसशोफकराः ॥४॥
आग्नेयाख्यो विसर्पः स्याद्वातपित्तसमुद्भवः॥ कफवातोद्भवोग्रथिः
कईमः कफपित्तजः॥५॥ ससांनिपातिको ज्ञेयः सर्वलक्षणसं-
युतः । विसप्पों द्वंद्वजः साध्योऽसाध्यः स्याद्यस्त्रिदोपजः॥६॥
विसर्परोगकेउपद्रव ।
विसर्पोपद्रवा ज्ञेया मांसशोथो ज्वरो मदः॥मर्मरोधस्तृपाश्वासो
हिक्कादाहो भ्रमो सचिः॥७॥
इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते
वेद्यशास्त्रे विसर्पलक्षणम् ।
अर्थ-कफका विसर्प रोग रुचिर (रूपवाली ,, स्फटिक मणिके ममान, बल, वीर्य की नागक,
बहुत दुःखको देनेवाली, वर, खांसी, प्यास, आलकस, मूजनका, करै है ॥४॥ वात पित्तमे आग्नेय
विसर्प रोग होताहै, कफवातसे ग्रन्थिनाम गेग होताहै, और कफ पित्तसे कर्दमनाम बिसर्प रोग
पैदा होताहै ॥५॥ और जिसमें मव लक्षण मिलतहों उमे मनिपातका विसर्प रोग जानना द्विदोपसे
पैदा विमर्प गेग मायहे, और त्रिदोषका असाध्य काहे ॥ ६ ॥ये विसर्प रोगके उपन्य जानने
माममे नृजन, ज्वर, मस्ती, मोका रुकना, प्यास, श्वास, हिचर्का, दाह, भ्रम, अरुचि ॥ ७ ॥
इति श्रीहंसराजार्थवाधिन्या विसर्परोगनिटानम् ॥
J
-
।
क्षुद्ररोगलक्षणम् ।
अजगल्लिकालक्षण।
नुगासमानापिटिकासवर्णा निग्धामरुच्छ्लेप्मविकारजाता ॥ देहे
शिशनां प्रथिता च नीरुजां तामाजगल्ली प्रवदंति संतः॥३॥
यवमच्छाकालक्षण।
अरुणभापिटिका वहुवेदना कफमरुजनिताग्रथितामिपे ॥ यय-
समा कठिनाभिपजांवरेनिगदितावरकृत्किल सायवा ॥२॥
+ - भापाटीकाताहतम्। (११९) गर्दभिकाकेलक्षण। उन्नता मंडलाकारा शोफयुपिटिकान्विता ॥ वातपित्तभका रक्ता तां विद्यागर्दभी बुधः॥८॥ पापाणगर्दभिकाकलक्षण। हनुसंधिगतः शोथो मंदरुक्कफवातजः॥ स्थिरः स्निग्धो बुधैज्ञेयः सैव पापाणगईभः॥९॥ अर्थ-सूजनहीं, तथा कमलको कर्णिकाके समान हो, दाह, पीडा, तृष्णा, अरति. मोह, युक्त फुसीहों यो वातपित्तसे पैदा इन्द्रवृद्धि नाम कहते है ॥ ७ ॥ जो फुसी मंडलके आकार गोलही, ऊंचीहो सूजनको लिये लालहो उसे वातपित्तसे पैदा गर्दभिका कहते हैं ॥ ८ ॥ जो फुसी टोटी की संधीमें सूजन मंदपीडाको लिये हो स्थिर चिकनी यो कफवातसे पैदा पापाणगर्दभिका कहते है ॥२॥ पनसिकाकंलक्षण। पिटिकाकफवातविकारभवा वहुवेदनकृच्छ्रवणेन्तरजा ॥ ज्वरः- दाहतृपारतिमोहकरा पनसा मुनिभिर्गदिता किल सा ॥१०॥ जलगर्दभिकाकलक्षण । बिसर्पवत् सपति यो हि शोफो रुजाकरः पित्तविकारजातः ।। ज्वरार्तिदाहारतिमोहपूयकृत्परैर्निरुक्तो जलगर्दभोयन् ॥११॥ इरिवल्लिकाकेलक्षण। पिटिकां सर्वदोपोत्यां सचिहशिरोगताम्॥ वर्तुलां तां विजानीहि बुध त्वं इरिवोल्लिकाम् ॥ १२ ॥ अर्थ-जो पुंसी वात कफके विकारसे पैदाहो और पीटायुक्त कानके भीतरहो, ज्वर, दाह, प्यास, अरति, मोह, लियेहो उसे मुनीश्वर पनसिका कहते हैं ॥ १० ॥ जो सूजन पहले थोटीही फिर विसर्प रोगकी तरह फैलजाय पीटाकारक ज्वर, दाह, अरति, मोह, राय बहे, उसे जटगभिका कहते है, वो पित्तक विकारसे होतीहै ॥११॥ जो नस्तक फुसी त्रिदोपसही, गोन्टही और त्रिदोरके लक्षण मिळतेही उसे इस्पेिल्लिका कहते है ॥ १२ ॥ कसलाईकलक्षण । कृष्णास्फोटापार्श्वकक्षांसवाही संस्था नूनं वेदनादाहयुक्ता ।। कक्षासंज्ञपित्तकोपाभिजातांजानीहि खंबद्यराजोरुजाताम् ।।१३।। .
. (१२०)
हंसगनिदानम् ।
.
1 , गंधमालाकंलक्षण ।
कक्षाकुक्षिभवामेकां पिटिकाम्पित्तकोपजाम् ॥ त्वग्गता दाहकृत्कृ-
प्णां गंधमालां च तांवदेत् ॥ १४ ॥
अग्निरोहिणीकंलक्षण ।
कक्षाया पिटिकोद्भवा ज्वरकरादीप्ताग्निदाहप्रदा मांसं भेद्यविनि-
गताः कफमरुत्पित्तोच्छ्रिता दारुणाः सप्ताहे दशमे दिनेच
मनुजं हंतीह नृनं हठाद् दनाद्यैर्भिपजांवरैर्निगदिता ज्वालामुखी
रोहिणी ॥१५॥
अर्थ--पसवाडोंमें व भुजाके एक देशमें व कंधाके एक देशमें: काला फाडा हो, और पीडा
दाह युक्तहो, उसे हे वैद्यराज ! तू कखलाई जान ये पित्तके कोपसे होती है ॥ १३ ॥
कारखमें अथवा पसवाडोंमें काले रंगका फोटाहो त्वचामहो दायुक्त उसे गंधमाला कहते हैं, येमी
पित्तके कोपस होती है ॥ १४ ॥ काखमें मांसको विटीर्णकर दीप्त अग्निके समान जो फोडाहो
चर, दाहका करनेवाला, उसे अश्विनीकुमारको आदिले वैद्याने बालामुखी रोहिणी नाम कहाह,
से रोग मनुष्यको सात या दशदिनमें मारडाले ये तन्निपातसे पैदा होती है ॥ १५ ॥
विदारिकाकेलक्षण ।
कक्षायां संधिदेशेषु विस्फोटो जायते नृणाम् ॥ विदारकिंववृत्तः
सर्वलक्षणलक्षितः ॥ १६ ॥ बहुशीर्पा विदीर्णास्या वातपित्तकफो-
द्भवा॥ चिरपाकारुणाभेयं प्रोक्ता वेद्यविदारिका ॥१७॥
शर्करार्बुदकेलक्षण ।
मेदःस्नायुशिरामांसं दूष्यवायुर्वहिर्गतः ॥ ग्रन्थि · शोप्यामिपं
कुर्यात्तं विद्याच्छर्कराव॒दम् ॥ १८ ॥
अर्थ-काखमे या संधियोंमें फोडा विदारी कंदके समान गोलहो, और सब लक्षण मिलतेहों,
॥ १६ ॥ बहुतसे शिरहो और खुलेमुखकी, देरमें पकै, लालरंगी इसे वैद्योंने विदारकानाम
महीहै, ये भी सन्निपातसे होतीहै ॥१७॥ वात, मेदा, मांस, नस इनमें प्राप्तहो और इनको विगा-
टकर बाहर प्राप्तहो फेर गांटको पैदाकरे और शोपको करे, उसे शर्करावुद कहते हैं ॥ १८ ॥
शर्करावुदरुक्कुर्याच्छर्करासदृशामिपम् ॥ शिरास्त्राचदुर्गधं क्लिन्न
गानं निरामिपम् ॥ १९ ॥
मापाटीकासहितम् ।
(१२१).
कदरफुन्सीकंलक्षण।
कटकैः शरैः पादे सक्षते ग्रन्थिरुद्भवः कीलवबर्द्धते नित्यंत
विद्यात्कदरं बुधैः ॥ २० ॥
विवाईकेलक्षण ।
अतिक्रमणशीलस्य पादयोरुक्षयोर्महत् ॥दारी च कुरुते कोपात्तं
विद्यात्तलसंश्रितम् ॥ २१ ॥
अर्थ-शर्करावुद रोग मांसको शर्कराके समान करदे और नस चुचायै तथा दुर्गंध युक्तहो
शरीरखदित और मांस रहित करदेनाहै || १९ । कांटे व कंकरके पैरमें लगनेसे जो गांठ पैदाहो
और कीलकी तरह वढे उसे, कदर नाम कहतेहै ॥ २० ॥ जो मनुष्य बहुत टोलाकर उसके
रोंमें मग्खापनहो और पैरकी एडी फट जाय उसे तलसंश्रित अर्थात् बिवाई कहते है ।। २१ ॥
खारुयेकेलक्षण।
दुष्टकर्दमसंस्पर्शात्पादांगुल्यांतरे बहुः ॥ कंडसुखाप्तिदाहार्ति-
शोथयुक्तोऽलसंविदुः ॥ २२ ॥
इन्द्रलुसकेलक्षण ।
रोमाणां कृपमध्येषु वातपित्तो विनिर्गतो ॥ मूर्छितो तत्र रोमाणां
तो प्रच्यावयतेहठात् ॥ २३ ॥ श्लेप्मासृग्रोमकृपांस्तु रुणदिप-
रितो भृशम् ॥ वन्धात्युत्पत्तिमन्येपामिंद्रलुप्तन्तमादिशेत् ॥२॥
अर्थ-दुष्टकोच पैरकी उंगलियोंमें लगनसे गूजनहीं और म्युजानस मुग्वहो दाह और पाटाहो
टसे अटसनाम अर्थात् खालए कहते है ॥ २२॥ रामकृपसे यात पित्त निकटकर मन्छित हो,
हटसे पाटोंको दूरकरदेवै ॥ २३ ॥ फिर कफ और गधिर बाद जमनके स्थानको रोकद याद उगने
नहीं दे उसे इन्द्रगुप्त कहते है ।। २४ ॥
इन्द्रलुप्तस्यनामानि प्रोक्तानि भिपजांवरैः।खालित्यमपरेसह्या प्रा-
हुश्चाचेति चापरे ॥२५॥
अरूपिकाकेलक्षण।
अतिरूक्षतमे शीर्षे बहुकण्डुसमन्विते ॥ जायत दारुणोरोगः
कफमारुतरोगतः ॥ २६ ॥ अत्यंत श्रमकोपाभ्या जातं पितं च
मृद्धनि ।। तेन पकाः कृताः केशाः यानि पलितानि च ॥२७॥
y
(१२२)
हंसराजनिदानम् ।
अर्थ--इंद्रलुप्तके ये नाम और भी वेद्य कहते हैं, खालित्य और राया तथा चांदलो ये रोग स्त्रीके
नहीं होता ॥ २५ ॥ केश पैदा होनेकी भूमिमें खुजली चले, और वह जगह रखी होजाय, उसके
वात कफसे अलंपिका दारुण रोगहो॥ २६ ॥ अति श्रम और क्रोधसे पित्तशिरमें प्राप्तहोकर वालोंको
सपेद करदेता है, उस पलित रोग कहतेहे ॥ २७ ॥
मुखदूपिकाकेलक्षण।
कफानिलाभ्यां सहशोणिताभ्यां यूनां शरीरे पिटिकाभिजाता॥
दाहातिकृत्कण्टकतीवेधी वुधैर्निरुक्ता मुखदूपिका सा ॥२८॥
तिलकंलक्षण ।
तिलप्रमाणानि च नीरुजानि स्थिराणि गात्रेषु समुद्भवानि ॥
कृष्णानि पित्तानिलकोपजानि तिलानि तानि प्रवदंति संतः॥२९॥
मस्सेकालक्षण।
दृढोन्नतं पित्तकफानिलोत्थं मापप्रमाणं पलग्रन्थिरूपम् ॥ कृष्णं
स्थिरं नीरुजवद्विपाकं तं मापसंझं कथयन्ति वैद्याः ।। ३० ।।
अर्थ-यात, कफ और रुधिरके कोपसे जवान पुरुषोंके जो फुसी मुखपरहो दाह और पीडा
तथा सेमलके कांटेकेसमान उसे मुखपिका अर्थात् मुहांसे कहते हैं ॥ २८ ॥ तिलके समान पीडो
रहित स्थिर देहमें जो कालादागहो उसे वातपित्तसे पैदा तिटनाम कहते है।।२९॥ दृढ़ और ऊंचा
तथा उडदके समान मांसकी गांठ काली और पीडा तथा पाकरहितहो उसे वेद्य मस्सा कहते हैं३०॥
न्यच्छकेलक्षण ।
गानोत्थं मंडलं कृष्णं शीतंवामहदल्पकम्॥ नीरुजं कफजं विद्या-
रुजन्यच्छसंज्ञकम्॥ ३१॥
व्यंगअर्थातझाइकलक्षण।
कोपश्रमाभ्यां कुपितोऽनिलोनिशमाश्रित्य व–वितनोति मंड-
लम्॥कृष्णं मुखोत्यं तनुनीरुजं भृशं व्यंगं रुजं तं प्रवदंति साधवः३२.
नीलिकाकेलक्षण।
ऊष्मणासहितो वायुर्वहिरागत्यकोपतः ॥ विदधाति मुखे छायां
नीलिकां तां विदुर्बुधाः ॥ ३३॥
"
भापाटीकासहितम् ।
(१२३)
अर्थ-शरीरमें काला वा तपेद मण्डल छोटा वा बडाहा, और पीडारहितहो, उसे लहसन संज्ञक
कहते हैं ।। ३१ ॥ कोप और श्रमसे कुपितहुये वात पित्त मो मुखमे प्राप्तहो मंडलको करे है, और
वो कालाहो पीडा रहित उसे महात्मा व्यंगरोग कहते है ॥ ३२ ॥ गर्मीके साथ पत्रन कोपहो बाहर
निकल मुखपर जो छाया करदे उसे पंडित नीलिका कहते हैं ॥ १३ ॥
कर्णिकाकेलक्षण।
संमर्दनात्पीडनताभिघातान्मेदस्य चर्मानुगतो हि वातः॥ मणे-
रवस्तात्प्रकरोति कोशं ग्रंथिं च विद्यात्किलकर्णिकां ताम्॥३४॥
अवपाटिकाकेलक्षण।
नखाभिघातायुवतीप्रसंगादुद्वर्तनाद्वीर्यगतेः प्ररोधात् ॥ संपी-
उनाद्यस्य च चर्मपाट्यते बुधैनिरुक्ताकिलपाटिका सा ॥३५ ।।
निरुद्धप्रकाशरोगलक्षण ।
स्रोतांसि मूत्रस्य रुणद्धि वातो मणिस्थितो वीर्यगतेर्निरोधात् ॥
मूत्रं प्रवत्त मणिं विदीर्य विद्यान्निरुद्धप्रकाशं हि वैद्यः॥ ३६॥
अर्थ--मसलनेसे वा पीडासे अथवा चोट लगनेसे अंडकोशी चर्ममें प्राप्तभई वात सो कुपि.
तहो सुपारीके नीचे गाठको पैदा करे, उस कार्णका कहते है ॥ ३४ ॥ नखके लगनसे अथवा
जिस स्त्रीको योनि छोटीहो उससे सग करनेसे उबटनेसे,वीर्यको गति रोकनेसे लिंगेन्द्रांक मोटनेसे
लिंगकी चाम उतर जाय उसे पंडित अवपाटिका कहते है ।। १५ । वीर्यको गति रांकनमे
लिंगकी सुपारीक बीचमें स्थित जो वात सो मूत्रके मार्गको रोकदे फेर मून सुपारीको खंदकरला
उतरे, उसे वैद्य निरुद्ध प्रकाशरोग कहते हैं ॥ १६ ॥
सन्निरुद्धगुदाकलक्षण।
अपानवातस्य गतेविघातात्प्रकुप्यवातो विहितो गुदस्थः॥ रुण-
द्धिमार्ग कुरुतेऽतिसूक्ष्मं द्वारं च विद्यात्किलदुस्तरं तत् ॥ ३७॥
गुदभ्रंशरोगकालक्षण ।
निर्गच्छन्ति वाहिर्गुदाः कृशतनोरुक्षाशिनोरोगिणोऽतीसारेण
युतस्य तं मुनिगणाः प्राहुर्गुदभ्रंशकम् ॥
करइंटरोगकालक्षण।
त्वक्पाको वहिनिर्गतः किलगुदः कंधरो दाहकृद्रोगः शूकर-
दंष्ट्रकों मुनिवरैः प्रोक्तो ज्वरातिप्रदः ॥ ३८॥
१ (१२४) हंसराजनिदानम् । वृषणकच्छूरोगकेलक्षण । वृपणस्थं मलं स्वेदात्कंडूस्फोटं वितन्वते ॥ संत्रावं कफपित्तो- त्थं विद्याद्वृषणकच्छुरम् ॥ ३९ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे क्षुद्ररोगाणां नानाप्रकाराणां लक्षणम् । अर्थ-अपान वातको गति रोकनेस कुपिन ई गुदाकी पवन सो गुदाके मार्गको छोटा करदे उसे दुस्तर रोग कहते हैं ॥ ३७ ॥ कृशदहवाले पुरुषको तथा ग्वा खानेयालेको तथा अतीसार वाले पुरुषकी गुदा बाहर निकल आये उसे गुदभ्रश रोग कहते है, जिसकी गुदा बाहर निकसिआय श्रीर त्वचा पकजाय उस जगह ग्बु जल्दी चले नशा कर पीडा दाह हो उमे मुनीश्वरोंने शूकरदंष्ट्र राग कहाहै ॥ ३८ ॥ अडकोशोंके नहीं धोनसे मैल जमजावे नब उस जगह पसीना आये और ग्युजली चले,और न्युजानेसे फोटा हो जाये, और यो नये उसे,वृषणकन्छु रोग कहते हैं, ये रोग साफ पिनसे होताहे ॥ ३९॥ इनिहंसराजार्थबोधिन्यांक्षुद्ररोगनिदानम् ॥ अथमुखरोगलक्षणभू । ओप्टी मारुतकोपतोऽतिपरुपी स्तब्धी महावदनी भिद्यते दल- संयुतो मुनिवरेः प्रोक्तो च वातात्मको ॥ रक्तौष्टो खरदाहपाकपि- टिकायुक्तौ च तो पित्तलो कृष्णो पिच्छिलशोफशीतपिटिका पीडान्वितौ श्लेमलौ ॥ १॥ सन्निपातजनितओष्टलक्षणम् । नानावर्णधरावोप्टो नानारोगसमन्वितो ॥ पिटिकाभिर्युतो स्थूलो विज्ञेयौ सान्निपातिको ॥२॥ दंतरोगनिदानम् । आवृत्यदंतान्परितोऽपि रक्तं प्रवर्त्तते दन्तपलं विशीर्यते ॥ सक्ने दुर्गधयुतं च कृष्णं शीतोदसंज्ञः कफरक्तजोयम् ॥३॥ अर्थ-प्रथम ओठके गेग कहते ॥ वादीसे ओठ फठोर और टेढे तथा पीडायुक्त और ‘फटजाय, ऐसे मुनीश्वरोंने कहाहै, और लाल करडे दाह युक्त और पकजावें पीडिकायुक्त हों, उनको पिन कोपमे जानना और काले तथा गाढे सूजन युक्त शीतल पिटिका युक्त तथा पडिायुक्त -- भाषाटीकासहितम् । (१२५) ऐसे लक्षणोसे कफका ओठमे रोग जानना ॥ १ ॥ जिनका अनेक प्रकारका वर्ण हो और अनेक रोगयुक्त हो, पीडिका और मोटेहों ऐसा, ओठोंका रोग सन्निपातका जानना ॥ २ ॥ दांतोंमे प्राप्त हो और रुधिर निकाले और दांतोंमे जो मास उसको दांतोसे छुड़ाय दे तथा क्लेद और दुर्गंध युक्त तथा काला हो वो कमरुधिरसे पैदा शीतोद संज्ञक दांतरोग जानना ॥ ३ ॥ दंतपुप्पुटरोगकंलक्षण। मध्येषु त्रिषु देतेषु नीरुक्शोफः प्रजायते ॥ दंतपुप्पुटको रोगो गदितो भिपजांवरैः॥४॥. दंतवेशरोगकंलक्षण! रचयति वहुशोर्फ दंतमुत्पाटनाये पचयतिकिलमांसंदंतसंल- ग्मजातम् ॥ व्यथयति मुखदेशं स्रावयत्याशुरक्तं कफपवनविका- रात्संभवो दंतवेशः॥ ५॥ सौपिरनामदंतरोगलक्षण । लालास्त्रावीमहातापी दंतमूलेयु शोफवान् ॥ सौपिराख्यो हि वि- ज्ञेयो रोगो रक्तसमुद्भवः ॥ ६ ॥ अर्थ-जो मध्यके तीन दांतोंमे पीडारहित सूजन हो उस दतपुप्पुटरोग कहते है ॥ ४ ॥जो' दांतों के उग्वाडनेके लिये सूजनको प्रगट करे, और दांतके संलग्न मांसको पृथक करे, और मुखमें पीडाकरे, रुधिर स्रये उसे वातकफसे पैदा दंतवश नाम रोगकहते हैं ॥ ५ ॥ लार टपका करे, महा ताप होय, दांतोंकी जड़मे सृजन हो यो रुधिर से पेदा सीपिर नामक दंत रोगहै ॥ ६ ॥ महासापिरदंतरोगलक्षण। दंतानावेष्टययस्तालुं दारयेच्च विसर्पवत् ॥ नानाव्याधिकरं विद्यात्तं महासौपिरं रुजम् ॥७॥ दंतसंलग्नमांसानि विदारयति शो- णितम् ॥निष्ठीवयति यः पित्तादसृपारपरोहिसः॥८॥ शाफकशदंतरोगलक्षण। दतानापीड्य यो रोगश्वालयेच्च मुहुर्मुहुः॥ पित्तरक्तकफोद्भूतो ज्ञेयः शोफकशोबुधैः ॥९॥ अर्थ--दांतोंको ढक कर और विसर्प रोग कोसी तरह तालुयको विदीर्ण करे, और नानाप्रकार- के रोग युक्त हों उसे महासौपिर दंतरोग कहते है||७|| जो दांतसे टगे मांसको विदीर्ण करे, और
(१२६)
हंसराजनिदानम् ।
रुधिर मुखसे गिरे, यो पित्तसे पैदा असृरुपारपर दंतरोग जानना ॥ ८॥ जो दातोंको पीडाकरे
और बारयार चलायमान करदे पित्त, कार और रविरम पैदाहा मो शफकश रोग जानना ।।९।।
बैदर्भरोगकेलक्षण।
बैदर्भरोगः कथितोभिघातजः सरक्तपित्तानिलकोपसंभवः॥संपी-
ड्यदंतान् परिचालयत्यलं क्वचित्कचिच्छावयतीव शोणितम्॥१०॥
करालनामदंतरोगकैलक्षण ।
वायुर्दतांतरे दतान्कुरुते तीबवेदनाम् ॥ बढते विकटान् रूक्षान्
सकरालोऽभिधीयते॥ ११ ॥
अधिकमांमरोगकेलाल।
हनुगते दशने किलपश्चिमेऽधिकतरार्तिकरेचहुशोफवान्।।कफकृतः
पवनेन युतोनिशं मुनिवरैर्गदितोधिकमांसकः ॥ १२ ॥
अर्थ-वैदर्भ रोग चोटके लगनेसे रुबिरसे वात और पित्तक कोपस दांतामें पीटाकर और
चलायमान करदे और कभी कभी रुधिर भी मुखसे गिरे ॥ १० ॥ वादी दांतोंके अन्दर दांत
को पैदा करे, और उनमें दर्द हो तथा ये टेडे हों, रूखे हों, और बड़े यो कराल नाम दंतरोग
कहाहै ॥ ११ ॥ टोडीक पश्चिम देशमें दांत पैदा हो और उसमें पीडा अधिक हो और सूजनहो,
वो बात कफसे पैदा मुनीश्वरोंने अधिक मामरोग कहाहै ॥ १२ ॥
कीटदंतरोगकेलक्षण।
दंते दंते कृष्णछिद्रं करोति लालास्रावी चञ्चलो दुष्टगंधिः ॥ पीडा
'युक्तः शोफसंरंभकारी प्रोक्तो वैद्यैः कीटदतः सरोगः ॥१३॥
भंजनकदंतरोगकेलक्षण ।
यो दंतभंगं कुरुते हि वक्के पापात्मनांभोजनदुःखितानाम् ॥वातेन
जातः कफमिश्रितेन जानीहि तं भजनकं हि वेद्यः॥१४॥
दंतविद्रधिरोगकेलक्षण ।
दंतसंलग्नजं मांसं बलाढ्यम्बहुशोफयुक् ॥ रक्तपूयाश्रयं क्लिन्नंतं
विद्याइंतविद्रधिम् ॥१५॥
---
भाषाटीकासहितम् ।
(१२७)
अर्थ-दांत दांतमें काले छिद्र करदे लार टपके चंचल और दुष्ट गन्धआवे पीडा और सूजन
को बढावे वो वैद्याने कोट दंतरोग कहा है ॥ १३॥ पापोमनुष्यों के मुखसे दांतोंको उखाडडाले
इसीसे भोजन करनेमें दुःखित हो वो वादासे और कसे प्रगट ऐसा भजनक नाम दंतरोग
जानना ॥१४॥ दांतोंसे मिलाहुआ जो मांस उसमे मैल बहुतहो और सूजनहो, तथा रुधिरराधन्त्रवै,
यो दंत विद्रधि रोग जानना ॥ १५ ॥
दंतहर्षरोगकेलक्षण ।
शीतवाताम्लसंस्पर्शादतपीडासहोगदः ॥ दंतहर्पः स विज्ञेयो
वातपित्तसमुद्भवः ॥१६॥
दंतशर्करारोगकेलक्षण।
मलोदंतगतः स्थूलः शर्करेव चिरस्थितः ॥ कफोद्भूतो बुधैर्तेयः
सारुजा दंतशर्करा ॥ १७ ॥
दंतश्यावरोगकेलक्षण।
• दंडादीनां विधाताद्वा कोपाच्छोणितपित्तयोः ॥ प्राप्नोति कृष्णता
दंतोदंतश्यावो रुगुच्यते ॥ १८ ॥
इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे
ओष्टदंतरोगलक्षणम् ॥
अर्थ-शीतल यात और खट्टी यस्तुके स्पर्शस जो दातोंमें पीडाहो वो यातपित्तसे प्रगट
दंतहर्पगंग जानना ॥ १६ ॥ दातोंमें मैल बहुत शर्कराकोसी तरह रहै, वो पण्डितोंने शर्करारोग
कहाहै ॥ १७ ॥ दंड आदि चोट लगनेसे और रुविर पित्तके कोपसे जो कालेदांत पड़जाय उसे
दन्नश्याबरोगकहतेहै ॥ १८॥
इति माथुरदत्तरामन्तहमराजाबोधिनीमाषाविवरण ओष्टदन्तरोगरक्षणम् ।
अथजिहारांगनिदानम् ।
वातेन स्फुटिता कठोररसना रक्षाप्रसुप्तातिदा पित्तेनोप्णतराति
दाहसहिता दीर्घारुणेः कंटकेः । संयुक्ता च कफेन सा गुरुतरा
मासोत्थितेरंकुरेः श्वेतेः शाल्मलिकंटकाकृतिधरैर्युक्तातिशोफा.
न्विता ॥१॥
(१२८) हंसराजनिदानम् ।. उल्लासनामनिवारांगकंलक्षण। जिह्वातले महाशोथो गुरुग्रंथियुतो दृढः॥ पूयशोणितयुक्पाक: सोल्लासः कथितो बुधैः ॥ २॥ जिह्वाग्रमानम्य करोति शोथं ला- लान्वितं तीव्रविपाकमुग्रम् ॥ कंड्रयुतं रक्तकफाधिशूलं रुक्शोफ- जिह्वा कथिता भिपग्भिः॥३॥ अर्थ-वादीसे जीभ कठोर और फटी तथा रूखी प्रसुप्त पीडायुक्त होतीहै, पित्तसे गरम, दाहयुक्त, बडे और लालकांटोसे युक्त जाननी कफसे भारी सपेद, सेमरके कांटे सरीखे कांटे और मूजन युक्त होतीहै ॥१॥ जीभके नीचे सूजन बहुत हो तथा भारी और कठिन गांठहो रुधिर और राधयुक्त हो वो पक जाय उसे उल्लासनाम जोभका रोग कहते हैं ॥ २ ॥ जीभक अग्रभागमें सूजन हो और लारगिरै वहुत पके तथा खुजलीचले और रुधिर कफसे शूल ज्यादे हो वो शोफ जिहानाम रोग कहाहे ॥३॥ तालुमूलोत्थितः शोथः कासश्वासतृषान्वितः॥ सव्यथः कफर- तात्मा कंठतुण्डः सकथ्यते ॥ ४॥तालुकोशगतः शोथश्चिरपा- की ज्वरान्वितः ॥ दाहार्तिकासकृत्स्रावी तुंडकेशी स उच्यते॥५॥ कच्छपरोगकेलक्षण । कर्माकारः प्रोन्नतस्तालुदेशे शोथः सोक्तः कच्छपो वैद्यराजैः ॥ रक्ताज्जातो रक्तवर्णो ज्वरादयः स्तब्धःशोफः कोलमात्रः कफा- स्मा॥६॥ अर्थ-और जो तालुयेक मूलमें सूजन, खांसी, श्वास, युक्त तथा प्यासके संयुक्त हो, और दर्द होताहो वो कफ पित्तसे प्रगट तुंडनाम रोग कहाहै ॥ ४ ॥ जो तालुके कोशमें सूजन हो और देरमें पके ज्वर युक्त और उसमे खांसी, दाह, पीडाहो, सबै, उसे तुंडकेशा रोग कहते है ॥ ५॥ तालुयेमें कछुयेके आकार ऊंची सूजनहो उसको वैद्योंने कच्छप नाम रोग कहाहै, रक्तसे पैदा भया और लालवर्ण तथा ज्वरयुक्त टेढा और सूजनही बेरक प्रमाण वो कफसे पैदा जानना ॥६॥ तालुपाकतालुशोपलक्षण। पित्ताजातं. शोथमुग्रं सदाहं तृष्णायुक्तं तालुपाकं वदेद्ज्ञः।। वातोद्भूतः श्वासकासार्तिशोपेर्युक्तः शोथस्तालुशोपो भवेत्सn७n इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेधशास्त्रे जिहातालूनां लक्षणानि॥
भाषाटीकासहितम् । (१२९) अर्थ-सूजन जार दाह तथा प्यासहो, उसे पण्डित तालुपाक रोग कहतेहैं, ये पित्तसे पैदा होताहै और जिसमें श्वास, खांसी, शोथ और सूजनहो वो वातसे पैदा तालुशोप रोगहै ॥ ७ ॥ इति माथुरदत्तरामपाठकप्रणीतायां हंसराजार्थबोधिनाटिकायां जिहातालुरोगनिदानं समाप्तम् ।। गलरोगस्पनिदानम् । पित्तश्लेष्मशरीरिणां गलगताः संदृष्यरक्तामिपं ते तत्रैव विमू- च्छिताः प्रकुपिताः कुर्वति नानागदान् ॥ मांसोत्थैः कठिनांकुरै- श्चपरितो रुंधति, कंठानिलं प्राणानाशु विकर्पयति मुनिभिः सा रोहिणी प्रोच्यते ॥१॥ वातरोहिणीकलक्षण । चिह्नानिवातरोहिण्यागले मांसभवांकुराः ॥ ज्वरार्तिकारिणी तीना शोपिणी कंठरोधिनी ॥२॥ पित्तरोहिणीकेलक्षण। मांसांकुरागलोत्पन्ना दाहिनस्तीनवेदनाः ॥ मूक्ष्मत्वचस्त्वरा- पाकाश्चिह्नः स्यात्पित्तरोहिणी ॥३॥ अर्थ-मनुष्यों के वात, पित्त, कफ गलेमें प्राप्तहो रुधिर और मांसको विगाड फेर आप दुष्ट हो नानाप्रकारके गलेमें रोग करते हैं, और माससे प्रगट भये जो कठिन अंकुर उनसे कटको रोक तथा श्वास को रोकद और प्राणको निकाल दे उसे रोहिणी नाम कंठरोग कहते हैं ॥ १ ॥ वातराहिणीके ये लक्षणहै, गलमें मांसके अंकुर हो, सा ज्वर और पीडा, शोप, तथा कंठको रोकदे ।। २ ।। मांसके अंकुर जो हों, उनमें दाह और तीग पीडा छोटे जल्दी पकें ये पित्तरोहिणीके रक्षण हैं ॥२॥ कफरोहिणीकेलक्षण । मांसांकुरेः स्थूलतरैरपाकैःकंठांतरोत्थैः कठिनैरवेदनैः ॥ दीर्घ स्थिरैः कंडुरशोथवद्भिज्ञेयाभिपग्भिः कफरोहिणीसा ॥४॥ रुधिरकीरोहिणीके लक्षण। कंठांतरोत्धैः पिटिकेरुजान्वितेः सूक्ष्मः सशोथैर्गलरोगकारकः॥ श्वासार्तिकासज्वरदाहमोहेजेंया धुधैरक्तभवा च रोहिणी ॥ ५॥ ९ (20) हंसराजनिदानम् । कंठशालूकरोगकेलक्षण। कंठे जातं ग्रन्थिरूपं कफोत्थं साध्यं शास्त्रैः कोलमज्जासमानम् ॥ स्थैर्य कण्डशोफयुक्तकठोरे विज्ञेयं तं कंठशालूकरोगम् ॥ ६ ॥ अर्थ-मांसके अंकुर गलेमें मोटेहों, पकेंनहीं, तथा काटिन पीडारहित, लंबेहीं, स्थिरहों, युजली, सूजन रहित,वो वैद्योंने कफरोहिणी कहीहै।।४॥कंठमें अंकुर छोटेहों और उनमें पीटा हो और सूजन तथा गलेके रोगोंको प्रगट करनेवाले, श्वास,पीडा,खांसी, ज्वर,दाह, मोहयुक्तहो,उसे रुधिरको रोहणी रोग कहते हैं ॥ ५॥ कोलकी मजा अर्थात् बेरकी गुठलीके समान कंटमें गोट पैदा हो या कफसे प्रगट साध्य है, स्थिर हो खुजली सूजन कठोर ये कंठशादक रोगके लक्षण कहे है ॥ ६ ॥ अधिजिहारोगकेलक्षण । शोथोजिह्वाग्रभागस्थः पाकरक्तकफोद्भवः जिह्वावंधो महोग्रार्ति- रधिजिह्वो विधीयते ॥७॥ वलासाक्षरोगकेलक्षण । श्लेष्मानिलो गले शोथं कुरुतः श्वाससंभवम्॥मर्मच्छिद्रं गुरुस्थूलं चलासाक्षं विदुर्बुधाः ॥ ८॥ नासाशतनीरोगकेलक्षण। वर्तिर्गलस्था बहुवेदनान्वितो मांसांकुरस्था परिकंठरोधिनी ॥ दोपैर्युता प्राणहरी सकंटका नासाशतनी परिकीर्तितावुधैः॥९॥ अर्थ-जिहाके अप्रभागमें सूजन हो, पके जीभ को स्तम्भन करदे, बहुत पीडा हो उसे रुधिर कफसे प्रगट अधिजिहरोग कहाहे ॥ ७ ॥ कफ और वात गलेमें सूजन कर तथा श्वास और मर्म स्थानमें छिद्र तथा मोटा और भारी हो उसे बलासाक्ष रोगकहा है ॥ ८॥ उसे पंडितोने नासा शतनारोग कहा है, जिसमें पीडायुक्त गलेमें बत्तीसीहो तथा मांसके अंकुरनसे कंट रुकाहो टोपास पारपूर्ण हो प्राणके हरनेवाली कांटे युक्त हो॥९॥- गलायुरोगकेलक्षण। ग्रन्थिर्गलस्थोवदरप्रमाणो नीरुस्थिरोसाध्यतमः कफात्मा ॥. प्रोक्तोगलायुर्मुनिभिः कदाचिद्रोगं सपक्षं परितो न पश्येत्॥१०॥ .
भापाटीकासहितम् । बलविद्रधिरोगकेलक्षण । शोथः सर्व गल व्याप्य वर्द्धते वहुरोगवान् ॥ त्रिदोषोत्यो महा- वैद्यैः सज्ञेयो गलविद्रधिः ॥ ११॥ गलीघरोगकेलक्षण । शोथो गलस्थो बहुरूपधारी कंठावरोधी गलदाहकारी॥ श्लेष्मा सृगुत्थो बलवीर्यहारी प्रोक्तो गलौधो मुनिभिर्विकारी ॥ १२ ॥ अर्थ-गलेमें गांठ वेरके समान हो, पीडारहित, स्थिर हो तो असाथ्य कहा है ये कफसे प्रगट होताहै पक्षउपरांत नहीं रहै।। १०॥जो सूजन सबगलेमें व्याप्तहो फिर बढे और बहुतसे रोगयुक्त हो उसे सन्निपातसे प्रगट गलविद्रधि रोगकहाहै ॥ ११ ।। अनेक प्रकारकी सूजन गलेमेंहो और कंठको रोकनेवाली तथा गलमें दाहके करनेवाली और बल वीर्यका नाशक कफराधिरसे पेढा गलोचनाम रोग मुनीश्वरोंने कहाहे ॥ १२॥ अतिसूक्ष्मतरा वदनांतरगाः परितः खचिता मुखतोदकराः ॥ पवनस्य विकारभवा बहुधा परिपाकयुतासितभाज्वरदा ॥ १३ ॥ अरुणद्युतयो मुखमध्यभवास्तनुरूपधरा वलवीर्यहराः ॥ वदनार्ति तृपाज्वरदाहकराः पिटिका किल पित्तभवा भणिताः ॥ १४ ॥ चिरपाकयुताविरुजाकठिनाः कफकोपविकारभवामुखजाः ॥गुर- वोऽल्पमसूरदलाकृतयः खरकंडुरदा मुखपाककराः ॥ १५ ॥ अर्थ-बहुत छोटीफुसी मुखके भीतर पेदाहाय, और मुखमें पीडाकरें, तथा सपेद और ज्वरके करनेवाली और पकनेवाली ये बातके विकारसे पैदा होती हैं।।१शालालरगकी कुंसी मुखमेहों छोटी तथा बलवीर्यकीनाशक मुखमें पीडाकरे,तथा प्यास,ज्वर,दाहको करै,वो पित्तकं विकारमे पैदा होती हैं॥१४॥जो फुसी देरमें पके पीडाहो, या नहीं कठिन और मसूरकेदाली समानहों तोग्यो ग्वुजली चले और बडीहों तथा मुखके पाककरनेवाली ये कफके विकारसे होती है ॥ १५ ॥ पित्तशोणितकोपेन मुखपाकोभिजायते ॥ उप्मारतिव्यथादाह ज्वरशोपतृपातिकृत् ॥ १६ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे गलमुखरोगाणां लक्षणानि॥
1 (१३२) हंसराजनिदानम्। अर्थ-पित्त और रुधिरके कोपसे मुखपाक होताहै, वो गरमी तथा अरति पीडा, दाह, ज्वर, शोष, प्यास, इनका करनेवाला होताहै ॥ १६ ॥ इति माथुरदत्तरामपाठकप्रणीतहंसराजाधिनीटीकायां गलमुखरोगनिदानं समाप्तम् ।। अथकर्णरोगनिदान। वातः प्रचंडः स्वगतिं निरुध्य श्लेष्मान्वितो वक्रगतिं विधाय ।। कर्णांतरे पीडयतीव कोपात्तत्कर्णशूलं कथितं भिपग्भिः॥१॥ कर्णनादकेलक्षण। कर्णःस्रोतांसि संवेष्टय संभ्रमन्मारुतोवली ॥ करोति विविधा- ज्छब्दान्कर्णनादः सकथ्यते ॥२॥ स्रोतांसिकर्णयोर्यस्य वहति श्लेष्ममारुतौ ॥ समनुष्योऽल्पकालेन वधिरत्वं प्रजायते ॥३॥ अर्थ-प्रचड जो यात सो अपनी गतिको रोक और कफके संग है टेढी गतिसे चले, और कानमें पीडाफर उसे वैद्य कर्णशूल कहते हैं ॥ १ ॥ प्रवल जो वात सो भ्रमणकर्ताहुआ कानोंक छिद्रोंको बंदकर और अनेक प्रकारके शब्द करे, उसे कर्णनाद कहते हैं ॥ २॥ जिसके कानमें वात और कफ प्राप्तहो यो मनुष्य थोडेही कालमें बहिराहो ॥ ३॥ शब्दोडकेलक्षण । पित्तश्लेप्मान्वितो वायुः कर्णरन्धेषु संस्थितः ॥ करोति गुंजव- च्छब्दं स शब्दखेड उच्यते ॥४॥ .. स्रावगदरोगकेलक्षण। जलस्य पाताच्छुतिरन्ध्रमध्ये शस्त्रादिकैर्वा शिरसोभिघातात् ॥ वातार्दितो यः श्रवणः सरक्तं पृयं सवेत्स्रावगदो निरुक्तः॥५॥ कर्णगूथरोगकेलक्षण । वातेरितः कफः कुर्यात्कंडूश्रवणयोर्द्वयोः ॥ श्लेष्मापित्तोप्मणा- शुष्कः कर्णगूथः स जायते ॥६॥ अर्थ-पित्त कफयुक्त जो बात सो कानोंके छिद्रोंमे स्थित होय, तब.मनुष्यके कानोंमें गुआर शब्दहो, उसे शब्दष्ट्वेडरोग कहते हैं ॥ ४ ॥ कानमें जलके पडनेसे तथा शस्त्रआदिकै लगनेस अथवा शिरमें चोटके लगनेसे वातसे पीडित कानमेंसे जो रुधिर और राध निकले उसे स्त्रावगद ,
भापाटीकासहितम् ।
रोग कहते हैं ।। ५ ॥ बातकरके प्रेरित जो कफ सो दोनों कानोंमें खुजली पैदाकर और पित्तकी
गर्मीसे कफैशुष्क होजाय तब कर्णगूथ रोग पैदाहो ॥ ६ ॥
प्रतीनाहकेलक्षण ।
सकर्णगूथो द्रवतां यदा नयेत्पुनश्च तत्रैव विलीयतेऽनिशम् ॥ मुखं
च नासां सपुनः प्रपद्यते बुधैः प्रतीनाहमिहोच्यतेतत् ॥ ७॥
कृमिकर्णरोगकेलक्षण ।
श्लेष्मामूच्छांगतः कर्णे जंतूंश्च सृजते वहून् ॥ शिरो॰ कुरुते .
पीडां कृमिकों बुधैः स्मृतः॥८॥ श्रवणे श्लेष्मणा पूर्णे संप्रवि
श्येव मक्षिका ॥जंतूंश्च स्रवते शीघ्रं कृमिकोऽभिधीयते ॥ ९॥
अर्थ-योही कर्णगूथ रोग पतलाहोकर फेर जातारहै फेर मुख और नाकमें पैदाहो, उसे वैद्योंने
प्रतीनाह रोगकहाहै, ॥ ७ ॥ कफकानमें मूछितहो वहुत कृमि पैदाकरे, और आधे मस्तकमें
पीडाहो, उसे कृमिकर्ण रोग कहाहै ॥ ८॥ कफसे परिपूर्ण कानमें मक्खी प्रवेशकर कांडोंको
पैदाकरे, उसको भी कृमिकर्णरोग कहतेहैं ॥९॥
पतंगो वाथवा कीटः प्रविश्य श्रवणांतरे॥ नराणां कुरुते पीडां
व्याकुलं क्षतसंचयम् ॥१०॥ कीटः प्रविश्य कणांतेकिल्लीस्फोट-
यतेऽनिशम् ॥ विद्रधिं कुरुते शीघ्रम्बधिरत्वं प्रकल्पयेत् ॥ ११ ॥
'कर्णपाकरोगके लक्षण ।
कर्णस्य मध्ये पिटिकाजकर्णिका काराकृतिस्तोदतृपावरा-
न्विता ॥शोपोल्पपाकः पवनात्मकोयं प्रोक्तोभिपग्भिः किलकर्ण
पाकः॥१२॥
अर्थ-पतंग अथवा कोडा कानमें प्रवेशकर मनुष्यको पीडितकर, तथा कानमें घाव करदें॥१०॥
कोडा कानमें धसकर किल्लीमारे यो विद्रधि और बहिरापना करदे||११||कानमें फुसी कमल कार्ण-
काके आकार पैदाहो तथा पीडा, तृपा, ज्वर, शोष थोडा पाकयुक्तहो, वो यातसे पैदा वैद्योंने
कर्णपाकरोग कहाहै ॥ १२॥
पित्तकर्णपाककेलक्षण ।
कर्णातरे कोशविदीर्णकारी दाहातिलेदस्य विकारधारी विकल्य-
कृद्वीर्यबलोपहारी पित्तात्मकोयं किल कर्णपाकः ॥ १३ ॥
(१३४) हंसराजनिदानम् । कफकर्णपाककलक्षण। स्थूलत्वकविस्फोटकंशोपार्तिपाकवान् ॥ पूयस्रावीमहालदी कर्णपाकः कफात्मकः ॥ १४ ॥ क्षतोत्पाटनात्कर्णपावुपूर्णा- द्भवेद्विद्रधिः कर्णविध्वंसकारी॥महारुकरोतिप्रदोदीर्घशोफ मुहुः स्रावदुर्गंधकृत्कष्टपाकी ॥ १५॥ अर्थ-जो फुसी कानके भीतरी झिल्लीको फोडकर दाह, पीडा, लेदयुक्त वेकली, करे, तथा वीर्य बलका नाशकरे, उसे वैद्योंने पित्तका कर्णपाक कहाहै ॥ १३ ॥ स्थूलत्वचा और कानमें फूटन खुजली, शोप, पीडा, पाकयुक्तहो, राधनिकले, महालेदयुक्त, उसे वैद्य कफका कर्णपाक रोगकहतेहै ॥ १४ ॥ कानमें घाव होगयाहो उसपरसे खंड उखाडनेसे तथा कर्णपाकमें पानीक पडनेसे कानमें विद्रधिरोग कानका विध्वंस करनेवाला पेदा होताहै, उसमें पीडा और सूजन तथा खाव और दुर्गंध और कष्ठसेपर्क ये लक्षण होतेहै ॥ १५ ॥ वातपतिकर्णरोगकेलक्षण । पूयं स्रवेद्यःश्रवणोथपूर्ति विस्फोटपीडां रतिगुंजघोपः ॥ शोषा- बुदैर्युग्ज्वरशूलयुक्तः वातत्मकोऽयं खलु पूतिकर्णः ॥ १६ ॥ पित्तपृतिकर्णकलक्षण। अत्यंतदाहो बहुतीबवेदना नित्यं स्रवेद्यः श्रवणोतिपूतिः ॥ पूर्व च', पीतं परिपित्तजोय प्रोक्तो भिपग्भिः किल पूतिकर्णः ॥ १७ ॥ कफपृतिकर्णकेलक्षण। कर्णस्रावं पूयमुग्रं सपूर्ति शोथः स्निग्धः क्लेदवैश्रुत्यकंडूः ॥ शुक्ल- स्थैर्य श्लेष्मजं दीर्घपाकं विद्याद्रोगं पृतिकणं नितांतम्॥१८॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सबे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे कर्णरोगलक्षणानि । अर्थ-जिसमेंसे राध वहे. कानमें दुर्गध, तथा फूटन, पीटा, अरति, गुंजारहोना,शोप, अर्बुद, जर, शूल, इन करके युक्तहो उस वातको कर्णपूत रोग कहाहै ॥ १६॥ जिसमें दाहतीत्र, दुःख नित्यहो, कानमें राधस्त्रवे, तथा राधपीली निकसै, उसे वैद्योंने पित्तका कर्णपूति रोगकहाहै ॥१७॥ कानमेंसे पवि वासकेसाथ निकले, तथा चिकनी सूजन क्लेदयुक्तहो तथा कानमे खुजली चलतीहो सपेदहो देरमें पके यो कफका कर्णपूति रोग जानना ॥ १८ ॥ इति श्रीमाधुरदत्तरामपाठकनिर्मितार्या हंसराजार्थयोधिनाटोकायांकर्णरोगास्समाप्ताः ।। - .
मापाटीकासाहितम् ।
नासरोगलक्षणम् ।
आनह्यते येन गदेन नासिका विशुध्यते पूयति तुद्यते क्वचित्॥
न गंध्यते विद्यति खिद्यतेऽथवा स पीनसो रुकथितो भिषग्वरैः॥१॥
क्षक्थुरोगकेलक्षण।
यदा घ्राणमर्मस्थले संविकारे कफेनावलिष्टो मरुन्नासिकायाः ॥
तदायाति बाह्यांतराच्छब्दयुक्तो निरुक्तो भिषभिर्वरिष्ठःक्षवोयम्र
पूतिनस्यरोगकेलक्षण।
पक्कैर्दोषैर्यदावातस्ताल्वादौ मूर्छितो भवेत् ॥ नसो निस्स-
रते पूतिः पूतिनस्यं च तद्वदेत् ॥३॥
अर्थ-जिसमें कफसे नाक बंधजावे और पीवबहै, तथा क्लेशहो, और जिसमें सुगन्ध दुर्गन्धका
ज्ञान नहीं तथा पीडाहो उसे वैद्योंने पीनसका रोग कहाहै ॥ १ ॥ जिसकी नाकमें पवन दुष्टहोकर
नाकके मर्मस्थानोंको दुःखित करें फिर वहीनाककी पवन कफसे मिलकर शब्दयुक्त भीतरसे बाहर
निकसे, उसे वैद्योंने क्षयथु अर्थात् छींकका रोग कहाहै ॥ २॥ जिसके गला तालुके मूलकी
पवन दोपोंको बिगाडंकर आप गलेमें माछत हो नाकसे दुर्गध युक्त निकसै, उसे पूतिनस्य
कहते हैं ॥३॥
नासापाककेलक्षण।
नासिकायां स्थितं पित्तं परुपी कुरुतेनिशम् ॥ नासिकापाकमित्या
हुर्दाहक्लेदव्यथान्वितम् ॥४॥
पूयरक्तकालक्षण ।
दोषेषु पक्वेषु ललाटमध्ये पूर्व सरक्तं मुखनाशयुक्तम्॥दुर्गन्धियुक्त
बहुशः स्रवेत्तत्प्रोक्तम्भिपग्भिः किलपूयरक्तम् ॥ ५॥
प्रदीप्तरोगकेलक्षण।
दाहान्वितायाः परिनासिकायाः सन्निःसरेमधनंजयाभ्याम् ॥
साई शतोदी पवनप्रचंडो रोगं प्रदीप्तं प्रवदन्ति वेद्याः ॥ ५॥
अर्थ-नाकमें पित्तदुखितहो फुसीको पैदाकरे और यो पकजाय तथा दाह राध व्ययायुक्तही उसे
नासिकापाफरोग कहते हैं ॥ ४ ॥ ललाटमें दोयोक पकनेसे रुधिर राध और दुर्गध युक्त मुख
नाक बहुतलवे, उसे पूयरक्तरोग कहते है ॥ ५ ॥ जिसकी नाकसे दाहयुक्त प्रचंट पवन निकलें,
तथा धुंओनिकले, और पीटाहो उसे प्रदीप्तरोग कहते हैं ॥ ६ ॥
तब (१३६) हंसराजनिदानम् । प्रतीनाहरोगकेलक्षण । रंध्यान्मार्ग नसो वायुः श्लेष्मणा सहितो वली ॥ प्रतीनाहं चतरोग विद्यादाधुनिको भिपक् ॥ ७॥ नासाशोपकेलक्षण। घ्राणोत्थालेप्मसंधातः पक्वपित्तोप्मणानिशम् ।। वातेन शोपितः सोऽयं शोपः प्रोक्तो भिषग्वरैः॥८॥ पकंपीनसकेलक्षण । श्लेष्मातिसांद्रः परिगंधहीनः शिरोलघुत्वं स्वरवर्णशुद्धिः॥नासा- . वकाशं पवनप्रवृत्तिश्चिह्नानि पक्कस्य हि पीनसस्य ॥९॥ अर्थ-नाककी पयन कफसे मिलकर श्वासको रोकदे, उसे प्रतीनाहरोग अयके वैद्य कहते है ॥ ७॥ नाकमें उठाजो कफका समूह वो पित्तकी गर्मीसे पकजाय फिर वात उसको मुखाय देय, तब मनुष्य श्वास कठिनसे ले उसे नासाशोप कहते हैं ॥ ८ ॥जब पीनस पकजाताहै, ये लक्षण होतेहै, गंधरहित गाढा कफ निकले, शिरहलकाहो, स्वरका वर्णशुद्धहो, नाकशुद्ध, पवन अच्छीतरह निकले, ये पकीपीनसके लक्षण हैं ।। ९॥ सरेकमारोगकीउत्पत्ति । प्राणांतरे सूक्ष्मरजोनिपातादुद्भापणान्मैथुनतोऽर्कतापात् ॥ शी- पविघाताबहुशीतसेवनाद्वातः प्रतिश्यायगदं प्रकुर्यात् ॥ १० ॥ सरेकमारोगकापूर्वरूप। शिरोगुरुत्वं च प्रहृष्टरोम शरीरमा क्षवथुप्रवृत्तिः ॥ निद्राल- सत्वं नयनाश्रुपातो भवेत्प्रतिश्यायपुरो हि चिह्नम् ॥ ११॥ वातकीपीनसकेलक्षण। स्वरोपघातो गलतालुजिह्वाशोपोऽथनासापिहिताकचित्स्यातू ॥ स्रायोतिसूक्ष्मः परिशंखपीडा मरुत्पतिश्यायरुजोपचिहम् ॥१२॥ अर्थ-नाकमें धूलिके जानेसे, बहुत जोरसे बोलना, मैथुनके करनेसे, सूर्यके घाममें रहनेसे शिरमें चोट लगनेसे बहुतशीतके सेवनकरनेसे, कुपितजो वात सो पीनस रोगको पैदाकरे ॥१०॥ शिर भारी, रोमांच, शरीरकाटना, वारवार छौंककाआना, नींद और आलकस तथा नेत्रोंसे अवपातहो ये सरेकमाके पूर्व में होतेहैं ॥ ११ ॥ स्वर बैठजाय, गला, ताल, जीभ इनका सूखना, . , 1 भापाटीकासहितम् । नाकका मार्ग रुकजाय थोडापतला गरम पानी गिराकर, कनपटी दुखे ये चातके सरेकमांके लक्षणहें ॥ १२॥ पित्तकीपीनसकेलक्षण। नासास्नावो महातप्तपीनसोवनिधूमवान् ॥ सदाहः पैत्तिको ज्ञेयः श्लेष्मजः कथितो बुधैः ॥ १३ ॥ कफकीपीनसकेलक्षण। शुक्लाभो नासिकासावः गलोष्टतालुकंडुमान् ॥ शिरस्तोदाप्रति- श्यायः श्लेष्मजः कथितो बुधैः ॥ १४ ॥ रुधिरकीपीनसकेलक्षण । रक्तस्रावः शिरःपीडा दाहःशंखद्वये निशम् ॥रक्तत्वं नेत्रयोङ्गेयः प्रतिश्यायः सरक्तजः ॥१५॥ अर्थ-जिसके नाकसे गरम गरम पानी गिरे, और अग्निके समान धुआं निकल, तथा दाहहो, चो पित्तकी पीनस कहीहै ।। १३ ॥ नाकसे पानीसपेद गिरे, और गला, तालू, ओठ इनमें ग्युजली 'चले, मस्तकभारीरहे, उसे कफकी पीनस कहते हैं ॥ १४ ॥ जिसकी नाकसे रुविर गिरै मस्तकमें और दोनों कनपटीनमें दर्द, नेत्र लाल, इन लक्षणोंसे रुधिरकी सरेकमा अर्थात् पीनस जाननी॥१५॥ सन्निपातकीपीनसकेलक्षण । श्वासपूतिवहोनाहः क्लेदो जंतुषु निर्दितः ॥ चिरेतैरसाध्योऽयं प्रतिश्यायस्त्रिदोपजः ॥१६॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे नासारोगलक्षणानि। अर्थ-जिसकी नाकसे वासयुक्त पक्न निकले, अनाहरोग हो, लेदयुक्त तथा कृमिपडिजाय, ऐसे लक्षणोंसे सन्निपातकी पीनस कहीहै ॥ १६॥ इति श्रीमाथुरदत्तरामपाठकप्रणीतायां हंसराजार्थबोधिर्नाटीकायां नासारोगलक्षणानि ॥ अथ नेत्ररोगनिदानम्। नेत्ररोगोत्पत्तिः। शीर्पोपघाताद्विपतीक्ष्णसेवनान्नेनांतरेधूमरजोतिपातानासूर्येक्षणा- सूक्ष्मनिरीक्षणान्मुहुदोंपारुजं संजनयंति नेत्रयोः॥ १॥शुक्राव-
.
.
(१३८)
हंसराजनिदानम् ।
रोधायुवातिप्रसंगाद्धातोर्विकाराज्ज्वलनस्यतापात् ॥नाड्यादिमो-
क्षाहहुमैथुनाच्च नेत्रे रुजं संजनयंति दोपाः ॥२॥
वातकेनेत्ररोगकेलक्षण।
विशुष्कता स्पंदनतातिरूक्षता प्रतोदता कर्कशताद्यशुद्धता॥
प्रधर्षतास्तंभनताश्रुपातान्नृणां च नेत्रे पवनात्मको भवेत् ॥३॥
अर्थ-शिरमें चोट लगनेसे विप अथवा तीखी यस्तुके सेवनसे, नेत्रोंमें धुंआ और धूटिक
पडनेस, सूर्यके सामने देखनेसे, छोटी वस्तुके देखनेस, कुपितहुये जो वात, पित्त, कफ सो नेत्र
रोगको पैदा करते हैं ॥ १ ॥ वीर्यके रोकनेसे बहुत स्त्रीके संगसे, धातुके विकारसे, अग्निकेतापसे,
फस्तछुडानेसे, बहुत मैथुनसे नेत्रमे तीनों दोप नेत्ररोग करते है ॥ २ ॥ नेत्रोंका सूखना, तथा
फडकना, रूखापन, पीडा, कर्कशता, अशुद्धता, घिसासाहोना, स्तंभनता, आंसुओंका गिरना,
ये लक्षण वातके नेत्ररोगमें होते हैं ॥३॥
पित्तकेनेत्ररोगलक्षण।
उष्णोष्णवाप्पोरविणातितापः शूलारतिः पाडुरता शिरोऽर्तिः ॥
दाहोल्पपाको महती च पीडानेत्रे भवेत्पित्तमये नराणाम्॥४॥
कफकेनेत्ररोगकलक्षण ।
तंद्रातिशोफो गुरुता शिरोतिर्दाहोल्पपाको महती च पीडा ॥
ऊष्माविशेपोग्निसमानदाहः स्रावोरतिः शूलमतीव पीडा ॥५॥
नेत्रमंथकेलक्षण।
विवर्णता शोणितमाविपाको रक्तस्त्रवः स्यान्नयने नराणाम् ॥नि-
मथ्यनेत्रेदधिमंथलक्षणेर्वायुस्ततो गच्छति मूर्ध्निविक्रमम् ॥६॥
अर्थ-सूर्यके घामसे गरमीहो, तथा गरमगरमपानी निकले, शूल और अरति पीलियाहो,
शिरमें दर्दहो, दाहहो, थोडापके, पीडा ज्यादाहो, ये लक्षण पित्तके नेत्ररोगके हैं ॥ ४ ॥ तंद्रा,
सूजन, मस्तक भारी, दाह, थोडापके, पीडा बहुत हो, गरमीबहुतहो, अग्निकसमान दाहहो,
अश्रुपात हो अरति, शूल ये कफके नेत्ररोगके लक्षणहे ॥ ५॥ जिसके नेत्रबुरहो, पकजाय, रुधिर
गिरे, और दधिमंधलक्षणोंसे नेत्रोंको मथनकर पवन मस्तकमें प्राप्तहो ॥६॥
निपीड्यशी पुनरावृतस्ततो जानीहि तंपंडितनेत्रमंथनम्।आया-
तियाति प्रकरोति वेदनां वातःप्रचंडो नयनांतरे भ्रुवोः॥७॥
भाषाटीकासहितम् ।
११३९)
वातभ्रमणरोगकैलक्षण ।
शीर्षास्थिशंखन्त्वथ रक्तनेत्रे जानीहि वातभ्रमणं गदं तम्॥ अवे
दना-कंडुविशुष्कतास्याल्लधुत्वमक्ष्णोश्च प्रसन्नमार्गः ॥ ८॥ मल-
प्रवृत्तिर्वहुधानिशान्ते विपक्कदोपं प्रवदंति संतः ॥ पकोदुंबर-
वत्निग्धो गरिष्ठःकंडुशोफवान् ॥ जलस्रावोऽल्पसंतोदो नेत्रपाकः
कफोद्भवः॥ ९॥
अर्थ-और मस्तकमें पीडाकर फेर लौटकर नेत्रमें प्राप्तहो, ऐसही अवि और जाय और नेत्रम-
तथा भृकुटीमें पीडाकर, उसे पंडितोंने नेत्रमथ रोग कहाहै ॥ ७ ॥ मस्तककी हड्डीमें कनपटीने
मांसमें पीडाहो तथानेत्र लालहो, उसे वातभ्रमणरोग कहाहे, नेत्रपाकके लक्षण पीडारहित तथा
खुजली न चदै तथा अश्रुपात रहितहो और नेत्रोंमे हलकापनहो तथा नेत्रोंका मार्गस्वच्छहो ॥६॥
विशेप कीचडका आना रात्री के अंतमेंहो, तब जानना कि दोपपाकहुआ पके गूलरके समान तथा
चिकने और भारी नथा खुजली और सूजनयुक्त जल बहे थोडीपीडाहों इसको कफसे प्रगट
नेत्रपाकजानना ॥९॥
.
शिरपाकनेत्रकेलक्षण ।
नेत्रे समर्थे परिवीक्षितुं दिशः स्फोटो ललाटे वहुवेदनान्वितः ॥
शूलश्च दाहोग्निसमो भ्रमो भवेद्रोगोभिपग्भिः शिरपाकरितः
॥ १० ॥आच्छाद्याष्टं नयने विनिर्गतं शुक्रं सिताभं परिवर्द्धते
निशम् ॥ सूच्याप्रविद्धं खलुनाशमति नोचेद्बुधाः शुक्रवणं वदन्ति
॥११॥ नेत्रातरे कज्जालमासमीपेशुक्रव्यं सूक्ष्मतरं चिरोत्थम् ।।
मुक्तावभासं गततोदपाकं तत्कष्टसाध्यं मुनयो बदन्ति ॥१२॥
अर्थ-नत्र चारों ओर देखनेको असमर्थहों, बहुतपोडा और शूलयुक्त ललाटमें फूटनहो,
अग्निके समान दाहहो, भ्रमहो, उसे वैद्योने शिरपाक रोग कहाहै ॥ १० ॥ जिसके नेत्रमें शुक्रकी
चूंद आय जाये उससे कुछ न दीख, और वो दिनदिनमें बड़े उसे शुक्रत्रण कहते हैं और मुईकसे
चभकाचलें ॥ ११॥ जिसके नेत्री काली जगपर छोटी छोटी दोबूद मोतीके समान बहुत
कालको प्रगटभई हो, और उनम पीडा न होतीहो और न पके रसे मोतियाबिंदु कटसाध्य मुनि
कहते हैं ॥ १२ ॥
(१४०)
हंसराजनिदानम् ।
-
असाध्यमोतियाबिंदुकेलक्षण ।
शुक्रद्वयं वा त्रितयं चतुष्टयं निवेदनं नेत्रगतं विपाकम् ॥ विहाय
सीचाभ्रदलावभासं स्यादप्यसाध्यं निविडं चिरोत्थम्॥१३॥ दोप-
त्रयोत्धं नयनांतरस्थं नीलावभासं निविडं विसर्पम्॥स्निग्धं दृढं
दृष्टिपथावरोधं स्पंदात्मकं शुक्रमसाध्यमाहुः॥ १४ ॥ नेत्रांतरस्थं
रुधिरावभासं मांसोस्थितं स्थूलदलं विशालम्॥विच्छिन्नमध्यं परि
चंचलं च शुक्र भिपग्भिस्तदसाध्यमुक्तम् ॥१५॥
अर्थ-जिसके नेत्रमें दो वा तीन वा चार बूंद वचिहों, उनमें पीडाहो, और पकजावे, और
यो बद्दल वा आकाशके रंगकी बूंदहों मिलीमई तथा बहुत दिनकी ये असाध्यहै ॥ १३ ॥ जो
तीनों दोषोंसे उठी होय और नीले रंगको मिलीहुई किञ्चित् चलायमान चिकनी और दृष्टिको
रोकदे ऐसी शुक्रकी बूंदभी असाध्यहै ॥१४॥ नेत्रमें रुधिरके रंगकी शुक्रकी बूंदहो और यो मोटी
तथा लंबी हो, विच्छिन्न मध्यहो और चंचलहो ऐसा रोगी वैद्याने असाध्य कहाहै ॥ १५ ॥
एकं द्वयं वात्रितयं चतुष्टयं संछायनेत्रं परिवर्द्धतेनिशम् ॥ शोफो-
प्णयाप्पो रविपाकसाधनं शुक्र विदग्धं तदसाध्यमादिशेत् ॥१६॥
इति नेत्रशुक्रलक्षणानि ।
नेत्रकेप्रथमपटलकेलक्षण ।
आवृत्यनेत्रे पटले व्यवस्थिते व्यक्तानि रूपाणि नरः प्रपश्येत् ॥
नेत्रद्वितीयपटलकेलक्षण।
एवं द्वितीये पटलेऽक्षिसंस्थे सूचीमुखं दृष्टिगतं न पश्यति॥१७॥
नेतृतीयपटलकेलक्षण।
नेत्रांतरस्थे पटले तृतीये दृष्टि शं विह्वलतां समेति ॥ आभा-
समानं खलुपश्यतीह साध्यं शिशुत्वे खलुनान्यवस्थम् ॥१८॥
अर्थ-एक दो तीन चार बूंद नेत्रमेंहों, और नेत्रकी दृष्टिको ढकदेवे, और नित्य बढे तथा
सूजन गर्मी अश्रुपातका पडना ये शुक्रविदग्धके लक्षणहें, येभी असाध्यहे ॥ १६ ॥ इतने रोग
नेत्रके शुलभागमें होते है, नेत्रके प्रथम प्रटलमें दोषोंके पहुंचनेसे मनुष्यको यथार्थ न दीखे, ऐसेही
नेत्रके दूसरे पटलमें दोष पहुंचनेसे सुईका तथा मक्खी मच्छर बालकामी समूह नहीं दीखे ॥१७॥
नेत्रके तीसरे पटलमे दोप पहुंचनेसे दृष्टी विहल होजाय, कुछ कुछ आई मालूमहो, ये बाल अवस्था
साभ्यहे औरमें नहीं ॥ १८॥
N भाषाटीकासहितम् । (१४१). नेत्रचतुर्थपटलकेलक्षण। यस्यावरुद्धे पटलेन नेत्रे दृष्टया न पश्येत्सनरोकविम्बम् ॥ विद्युल्लतां चन्द्रमसं सतारं तत्काचसंझं पटलं चतुथम् ॥ १९ ॥ वातकीदृष्टिरोगकेलक्षण। दृष्टया महत्या पटलेन रुद्धया समीरणोत्थेन विकारकारिणा रूपा- णि सर्वाण्यरुणानिमानवाःपश्यंति पीतप्रभया विदग्धया ॥२०॥ पित्तकीदृष्टिरोगकेलक्षण । पटलेनावृता दृप्टिः पित्तकोपोत्थितेन सा ॥ नीलानि सवर्णानि परिपश्यति सम्भ्रमम् ॥ २१ ॥ अर्थ-नेत्रके चतुर्थ पटलमें दोप पहुंचनेसे मनुष्यको सूर्य चंद्र और बिजली और तारागण ये न दीखे, वो कांचसंज्ञक और इसीको लिंगनाशक और नजला तथा मोतिया बिदभी कहते है ॥ १९॥ जिसकी दृष्टि वादीके विकारसे आच्छादितहो, उसे लालरंग पीला दन्तेि ॥ २० ॥ जिसको दृष्टी पित्तके कोपसे ढकीहो उसे भ्रमसे सब रंग नीलेदखेिं ॥ २१ ॥ कफकीदृष्टिरोगकेलक्षण । आच्छादिताया पटलैः कफौत्थैदृष्टिः सिताभैरिवसूर्यमत्रैः ॥ नेत्रांतरस्थैः परितो विपश्येत् सर्वाणि रूपाणि सितप्रभानि॥२२॥ दृष्टेरू स्थिते दोपे न पश्येदूसंस्थितान् ॥ दृष्टेरधः स्थिते दोषे नरोधस्थान्न पश्यति॥२३॥दृष्टेः पावें स्थिते दोपे पार्श्वस्थानव पश्यति ॥ दृष्टेमध्यगते दोपे चदेकं मन्यते द्विधा ॥२४॥ अर्थ- कफके विकारसे पटल जिसकी दृष्टिरोकदे उसको सूर्य और आकाश तथा सब रंग संपेइदोखा२२॥ दृष्टीके ऊर्बभागमें दोष स्थित होय तो ऊपरकी वस्तु न दाखे,और नीचके भागमें दोपहो तो नीचकी कोई वस्तु न दखेि ॥ २३ ॥ और दृष्टीक पृष्टभागमें दोप हो तो पृष्टस्थितको नहीं देखे, तथा दृष्टीक मध्यमें दोष होयतो एक वस्तुको दो दाखै ॥ २४ ॥ रक्तविन्दुर्भवेन्नेत्रे चंचलः परुपो निलात्॥ पित्तात्पीतं तथा नीलं स्रिग्धः पांडुः सितः कफात् ॥२५ ॥ यः सर्वधूम्राणि नरो विपश्येत्सधूम्रदर्शी मुनिभिः प्रदिष्टः॥यश्चित्ररूपाणि दिवा प्रब- . (१४२) हंसराजनिदानम् । श्येत् सवे मनुप्यो नकुलांधसंज्ञः॥२६॥ संकुच्याभ्यंतरे याति दृष्टिमाहुःकपर्दिकाम्।।वाह्यमायातिसंवृत्यगम्भीरतविदुषुधा२७॥ अर्थ-बादीसे मनुष्य के नेत्र चञ्चल और लालविन्दु युक्तहों, और पित्तसे पाले तथा नाले, और कफसे चिकने और सपेद तथा पांडुरंगके होतहैं ॥ २५ ॥ जिस मनुष्यको सब वस्तु धुएके रंगकी दोवं, उसे धूम्रदर्शी मुनियोंने कहाहै, और रातमें जिसको चित्रविचित्र रंगको दांग्यै उसे नकुांध अर्थात् रतीधका रोग कहाहै ॥ २६ ॥ जिस मनुष्यकी दृष्टी दर्पणकी संकोचको प्राप्तहो जब दर्पण हद जाये तब यथार्थ होजाये उसे गंभीररोग वेद्य कहते हैं ॥ २७ ॥ नेत्रसंधौ स्थितः शोफः पक्कं पूयं सवेत्तु यः ॥ पूतिसाद सरक्तं . वा पूयलाख्यं विदुर्बुधाः ॥ २८ ॥ संधौ वृहद्रन्थिमहारपाकी नीरुजो दृढः । उपनाहः सविज्ञेयो गदः कंडुरोगदः ॥२९॥ नेत्रसंधौ समुत्पन्ना पिडिका शोणितोद्भवा ॥ रक्तमुष्णं स्रवेन्नित्य- मसाध्या रुक् प्रकीर्तिता ॥३०॥ अर्थ-जिस मनुष्यके नेत्रकी सधीमे सूजनहो और वो पकजा तथा स्त्रये और वास युक्त तथा रुधिर नवे उसे पूयलाख्य रोग वैद्य कहते हैं ॥ २८ ॥ जिस मनुष्यके संधीमें बड़ी गांटहो और यह पके नहीं न पीडा करे दृढहो खुजली चले उसे वैद्याने उपनाह रोग कहाहे ॥ २९ । नेत्रकी संघीमें रुधिरसे फुसी पैदा हो उनसे रुधिरनवे यो असाध्य कहिये ॥ ३०॥ उद्धृत्य वर्त्म रोगाण जायतेऽभ्यंतरे मुहुः ॥ रुन्धति गोलके नेत्रे परिवाराणि तानि वै॥ ३१॥ संधौपक्ष्माणि मांसाभाकं शोफ समन्विता ॥ चिमुचिमांवुयुता वैद्यैर्वाह्मणी सानिगद्यते ॥ ३२॥ अक्ष्णोर्वमनि सम्भवाश्च पिडिकाः सूक्ष्माघनाः संवृताः पीताभा 'बहुवेदना खरतरा ज्ञेयाश्च वातोद्भवाः । पित्तोत्याःपिटिकाःखरा नयनयोरभ्यन्तरे संस्थितादुःस्पर्शावहुदाहशूलसहिताःसावान्वि- ताः कण्डुराः ॥ ३३ ॥ अर्थ-जिस मनुष्यके कोयेके बाल उखडकर भीतर चलेजायें और नेत्रके गोलको रोकदे उसे 'परवाल कहते हैं ॥ ३१ ॥ संधी पखवारोंमें मांसके आकार फुसीहो उसमें खुजली और सूजन तथा चिमचिमी युक्तहो जल लेवे उसे ब्राह्मणी रोग कहते हैं ॥ ३२ ॥ नेत्रके मार्गमें जो पुंसोहो यह छोटोकरडी गोल पीली पीडायुक्त खरदरीहो सो पातको जाननी और खरदरी तथा नेत्रके 'भीतरहो स्पर्श सहाजाय दाहशूल और स्लये तथा खुजली चले वो पित्तको फुसी जाननी ॥ ३३ ॥ . .
भापाटीकासहितम् । (१४३) अक्ष्णोर्वमनि जायन्ते पिटिकाः कफसम्भवाः॥स्थूलामांसांकुरा क्लिन्नाः कंडूशोफार्तिपाकिनः ॥ ३४॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वेद्यशास्त्रे नेत्ररोगलक्षणानि अर्थ-तथा मोटी मांसके अंकुरयुक्त गीली युजलीयुत सूजन पीडा और पकजावै, वो काकी मरोडी जाननो ।। ३४ ॥ इति श्रीहंसराजार्थवोधिन्यां नेत्ररोगलक्षणं समाप्तम् ॥ अथमस्तकरोगलक्षणम् । अत्यम्लसेवाच्छिरसोभिघाताद्भूमौशयानाजलमध्यपातात् ॥रात्री दिवाजागरणाच्च शीताद्वातादिदोपाः प्रभवन्ति शीर्षे ॥ ३५॥ वातपित्तकेमस्तकरोगकानिदान शीतेन शीर्षे निशि वातपीडा क्वचिद्दिवापि प्रभवेत्सर्ला ॥ तापेन पित्तप्रभावातितीवा ज्वालान्विता शूलवती सशोपा ॥३६॥ कफकेमस्तकरोगकेलक्षण। शीर्षे गुरुत्वश्च कफेन पीडा स्यादालसत्वं मुहुरश्रुपातः॥निद्राब- मित्वं मुखनासिकाभ्यां स्रावो विपाकः सशिरोभिघातः ॥ ३७॥ अर्थ-अत्यन्त खटाई खानेसे, शिरमें चोट लगनेसे, पृथ्वीपर सोनेसे, जलमें गिरनेसे, रातदिन जागनेसे, शरदीसे, कुपित हुये जो वात, पित्त, कफ सो मस्तफरोग पैदा करतहैं ॥ ३५॥ वासे मस्तकमें रातको दर्दहो, कभी दिनमेंभी शूल चले, पित्तसे पित्तजनितही अत्यन्त तीन ज्वाला और शोपयुक्त पीडाहो ।। ३६ ॥ शिरभारी, आलस्य, अश्रुपातका पडना, निद्रा, यमन, मुखनाकका स्राव तथा पाक और पीडा ये कफके दोपसे होताहे ॥ ३७॥ रुधिरंकेमस्तकरोगकेलक्षण। शीतिदाहो महती च पीडा नासामुखाभ्यां बहुरक्तपातः ॥ भवेमो धूमवती च नासा रक्तप्रकोपेन शिरोभिघातः॥३८॥ दोषेषु सर्वेषु शिरोगतेपु लिंगानि सर्वाणि भवन्ति शी ॥कासप्र- वृत्तिश्चिरकालपाकः प्रोक्तो भिपग्भिः शिरसोभिघातः॥३९॥ . .
(१४२) हंसराजनिदानम् । . कृमिकेमस्तकरोगकेलक्षण। निर्भियते जंतुभिस्मतुंडैः संतुद्यते यस्य शिरो नितान्तम् । घा- णात्सवेच्छोणितमुग्रवेदना शिरोभिघातः कृमिभिर्भवेत्सः ॥४०॥ अर्थ-शिरमें दाह, घोर पीडा, नाक और मुग्वस रुधिर गिरे, श्रम तथा नाकसे धूम निकले. ये रुधिरसे मस्तकरोग जानना ॥ ३८॥ सन्निपातके मस्तकरोगमें त्रिदोपके चिह मिलतहों तथा खांसी और देरमें पके वो वैद्योंने सन्निपातका कहा है ॥ ३९॥ जिसके शिरमें कृमि पडजावे, उसके शिरमें घोर पीडाहो, नाकसे रुचिर पडे, वो कृमिका मस्तकरोग कहाहै ॥ ४० ॥ आधाशीशीकालक्षण । भानूदयेऽर्दै शिरसि प्रपीडा संवर्द्धते चांशुमतासहैव ॥ निवर्त्तते शीतकरोदये या सूर्यात्प्रवृतं तमवेहि वैद्यः॥ ४ ॥ कफयुक्पवनः शीर्षे करोति विविधान् गदान् ॥ शिरोभूशंखकर्णाक्षिललाटे तीनवेदनाम् ॥४२॥ इति श्रीभिपकचक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे शीपरोगलक्षणम् ॥ अर्थ-जिसका सूर्योदयसे आधा मस्तक क्रमसे दूखने लगे, जब सूर्यास्त हो और चन्द्रमा उदयहो तब दर्दभी बंद होजाय, उसे आधाशीशी कहते हैं ॥४१॥ कफयुक्त पवन शिरमें अनेक रोग पैदा करे, और शिर कनपटी झुकुटी, कान, नेत्र, ललाट इनमें धोर पीडा होय ॥ ४२ ॥ इति श्रीमाथुरदत्तरामकृतहंसराजार्थबाधिर्नाटीकायां शीर्षरोगनिदानं समाप्तिमगमत् ।। अथस्त्रीरोगलक्षणम् । प्रदररोगकोउत्पत्ति। आयासतः कुत्सितयानरोहाच्छोकाविरुद्धाशनतः प्रपातात् ॥ अत्यंतभारोद्वहनादजीर्णात्स्यागर्भपातात् प्रदरोतिमैथुनात् ॥१॥ योनि विदीर्यसंजातं शोणितं सर्वदा स्त्रियाः ॥प्रदरन्तं विजानी हिवातपित्तकफोद्भवम् ॥२॥प्रवृत्ते प्रदरे नित्यं पाण्डुत्वं जायते स्त्रियाः ॥ मूर्छा भ्रमस्तृपादाहः प्रलापः कृशता रुचिः॥३॥. अर्थ-परिश्रमसे, खोटी सवारीमे बैटनेसे, शोकसे, खोटे भोजनेसे मिरपडनेसे भारी बोझ रयानसे, अजीर्णसे, गर्भके पडनेसे, अतिमथुनते, प्रदरनाम स्त्रियोंके रोग होताहै ॥ १ ॥ योनिको
भाषाटीकासहितम् ।
(१४५)
विदर्णि कर जो रुधिर सदा पडे उसे वातका, पित्तका, कफका, प्रदर रोग जानो ॥ २॥ प्रदर
रोग पैदा होनेसे स्त्रीका वर्ण पीला होजाय, और मुर्छ भ्रम, प्यास, दाह, बडबडाना, कृशता,
अरुचि ये रोग होते हैं ॥ ३॥
वातपित्तकेमदररोगकेलक्षण ।
योनिः स्रवेच्छोणितमल्पमल्पं श्यानं सकष्टं पवनात्मकं तत् ॥
पित्तोत्थितं सामिपरक्तमुष्णं दाहार्तिशूलभ्रमकम्पकारी ॥४॥
कफकेपदररोगलक्षण।
योनिक्षतोत्थं रुधिरञ्च फेनिलं पीतारुणं स्निग्धतरञ्च पिच्छिलम्।।
शैथिल्यकंडूकृमिशोथशीतकृज्जानीहि तं त्वं प्रदरं कफोद्भवम् ॥५॥
सन्निपातकप्रदरकालक्षण।
दोपत्रयोत्थे प्रदरे युवत्याः सर्वाणि लिंगानि भवन्ति काये ।
उच्छ्वास शूलारतिपूतियुक्ते तस्मिन्न कुर्वीत भिपक्चिकित्साम्॥६॥
इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे
प्रदरलक्षणम्।
अर्थ-जिस स्त्रीको योनिसे काढेरंगका रुधिर कप्टसे थोडायोडा निकलै, उसे वादीका जाना
और मांसयुक्त, गरम, और दाहयुक्त, रुधिर निकले तथा शूल भ्रम कंपसे पित्तका जानना ॥ ४ ॥
योनिमेंसे रुधिर झाग मिला, चिकना, पीला, गाढा, लाल, निकले और खुजली, कृमी, शिथि-
लता, सूजन, शीतलता युक्तहो, उसे कफका प्रदर रोग जानना ॥ ५ ॥ सन्निपातके प्रदरमें
विदापके चिह्न होते हैं,तथा श्वास, शूल, अरति, दुर्गंध युक्त ऐसे प्रदरकी वैद्यचिकित्सा न करे॥६॥
इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां प्रदररोगस्समाप्तः ।।
अथयोनिकन्दकेलक्षण।
उच्चैः प्रपातान्नखदन्तघाताध्वश्रमात्कुत्सितवीर्ययोगात् ॥
कुयानरोहादतिमैथुनाद्वा योनौ भवेत्कंदकसंज्ञकारक् ॥७॥ योनी
संजायते कन्दं लकुचाकृतिपूययुक् ॥ विवर्णस्फुटितं रूक्षंवांतक-
न्तंविदुर्बुधाः ॥८॥
पित्तकेयोनिकन्दकेलक्षण ।
रक्ताक्तं योनिसम्भूतं चिश्चिणीवीजसन्निभम्।।ज्वरदाहान्वितं पैत्तं
योनिकंदं तमादिशेत् ॥९॥
हंसराजनिदानम् ।
अर्थ--ऊंचे स्थानके गिरनेसे नखदातफे घातसे, रस्ता चलनेसे, खाटावीर्य, पडनेसे, खोटी,
सवारीमें बैटनेसे, अति मैथुनसे, योनिमें कंदसंज्ञक रोग होताहै ॥ ७ ॥ योनिमें बडहलके समान
कंदहो उसमेंसे राध निकले, और विवर्ण तथा फूटा, रूखा हो, उसे वातका योनिकंद कहते
॥ जिसमें से रुधिर निकले और वह इमलीक वीजके समानही तथा वर, दाह, युक्तहो,
उसको पित्तका योनि कंद कहते है ॥ ९ ॥
कफकेयोनिकन्दकेलक्षण ।
तिलपुष्पसमंस्निग्धं योनिमध्योद्भवं दृढम्॥कडूशोफान्वितं किन्नं
योनिकंदं कफात्मकम् ॥ १० ॥
सन्निपातकेयोनिकंदकेलक्षण।
सन्निपातोत्थितं रौद्रं सर्वलिंगसमन्वितम्॥योनिकंदं भिषक्तस्य
चिकित्सां नैवकारयेत् ॥ ११ ॥
इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते
वैद्यशास्त्रे योनिकंदलक्षणं समाप्तम् ॥
अर्थ-जो तिलके फूलके समान चिकना और दृढ कंदहो तथा खुजली और सूजन
गीलाहो, उसे कफका योनिकंद कहते हैं ॥ १० ॥ जिसमें सन्निपातके सब लक्षण मिलतहों,
उसे घोर सन्निपातका जानकर वैद्य इलाज न करे॥ ११ ॥
इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां योनिकंदलक्षणं समाप्तम् ॥
तथा
अथयोनिक्दादशरोगकेलक्षण ।
योनौ द्वादशदोपाः स्युः प्रोक्ता वैद्यैः पृथक्पृथक्केचिन्नैसर्गिकाः
केचिद्दोपजाः वीर्य्यदोपजा॥१॥अच्छिद्रा या भवेद्योनिः पंढाख्या
साभिधीयते॥सूक्ष्मच्छिद्रा तु या सूचीमुखा सा कथ्यते बुधैः॥२॥
विवृत्तास्या महास्थूला महायोनिः प्रकीर्तिता॥ रजो वातहतं
यस्या असौख्या सोच्यतेवुधैः ॥३॥
अर्थ-योनिर्म बारह दोष पृथक् पृथक् वेदोंने कहे हैं, कोई तो नेसागैक कोई दोपोंसे और
कोई वार्यके दोपसे ॥१॥ जिसकी योनिमें छिद्र नहो उसे पंढाख्ययोनि कहतेहैं, और जिसमें छोटा
छिद्रहो उसे सूचीमुख योनि कहते हैं ॥ २॥ जो गोल मुखको और मोटी हो उसे महायोनि
कहत है, और जिसका रजोदर्श वातसे चलागया हो उसे असौख्ययोनि कहते हैं ॥३॥
२
,
-
.
मापाटीकासहिवम्।
(१४७)
वातकीयोनिकेलक्षण।
हस्वातिरूक्षाकृशताल्पपुष्पाश्यामा विवर्णास्फुटिताविशुष्का ॥
वकाल्परोमापरुपासरोगा योनिर्बुधैर्वातवती निरुक्ता ॥४॥
पित्तकीयोनिकेलक्षण ।
ऊष्मान्विता कामवती विशाला लाक्षारसाभा परिपूर्णमांसा ॥
नीरोगता गर्भवती विशुद्धा योनिर्बुधैः पित्तवती निरुक्ता ॥ ५॥
कफकीयोनिकेलक्षण ।
स्थूला सदार्दा बहुकंडुरा सा कामान्विता दीर्घमुखी मनोज्ञा ॥
रोमाधिका स्निग्धतरातिशीता योनिर्निरुक्ता कफयुग्भिपग्भिः॥६॥
अर्थ-जो योनि छोटी, और रूखी, कृश, अल्पपुष्पकी, काली, श्याम वर्णकी, फटी हुई,
शुष्क, मुखपर थोडे बालहों, कठोर, रोग युक्त, ये वातकी योनिके लक्षण है ॥ ४ ॥ गरमी युक्त,
कामवती, बडी, लाखके रंगकीसी पूर्णमांस युक्त, निरोग गर्भवान् , शुद्ध हो, ये पित्तकी योनिके
लक्षणहैं ॥ ५॥ मोटी, सदागीली रहै, बहुत खुजली युक्त, कामयुक्त, दीर्घमुखकी, सुंदर, बहुत
रोमयुक्त; चिकनी, शीतल ये कफको योनिकै लक्षणहें ॥ ६ ॥
वातेन यस्या निहतं च पुष्पं तस्याः फलं नैव भवेत्कदाचित् ॥
'योन्यंतरस्थेन महाबलेन हृन्नाभिकट्यांतरदुःखवेदनाम् ॥ ७॥
पित्तेन दग्धं कुसुमं विशुद्धं शुक्रेण मिश्रम्बहिरुद्रेिद्या ॥ नात्यू-
प्मणाधारयितुं समर्था प्रस्रंसिनीयोनिरुदाहृता सा ॥८॥
विप्लुताकेलक्षण।
रतिक्रीडारुचिर्यस्याः परितो या प्लुताभवेत् ॥ नित्यवेदनयायुक्ता
विप्लुता सा प्रकीर्तिता ॥ ९॥
अर्थ-योनिमें बलवान यात पुष्पको नाश करदे तब सन्तान नहीं हो, और हृदय, नाभी,कमर
इनमें पीडा हो ॥ ७ ॥ जिसका पुष्प पित्तदग्ध करदे और शुक्रयुक्त रजको बाहर निकालदे और
पित्तकी गर्मीसे गर्भ न रहै, उसे प्रसंसिनी योनि कहीहै ॥८॥ रति क्रीडाके आनंदसे जिमको योनि
आई रहै, और नित्य पीडाहो उसे विष्टुता योनि कहते हैं ॥९॥
पूतिगंधयोनिकेलक्षण ।
• संनिपातान्वितायोनिर्दुर्गधंवहतेऽनिशम् ॥ शूलदाहार्तियुक्ता
सा पूतिगंधिविधीयते ॥ १०॥
है (१४८) हंसराजनिदानम् । वन्ध्यायोनिकेलक्षण। पित्तानिलाभ्यांपरिकोपिताभ्यांसंपीडिता कृच्छ्रतरेण योनिः॥ कृष्णं रजोमुंचति फेनिलं या वंध्यामुनींद्रैः परिकीर्तिता सा॥११॥ खंडितायोनिकेलक्षण । योनेरभ्यंतरे वाह्ये खरस्पर्शातु मैथुने ॥ न गृह्णाति सदावीर्य खंडिनी साभिधीयते ॥१२॥ अर्थ-सन्निपातसे योनिमें दुर्गंध आवे, तथा शूल दाहभीहो उस प्रतिगंध योनि कहते है॥१०॥ जिसकी योनि यात पित्तके कोपसे पारपीडितहो और जिसकी योनिसे काला और झाग युक्त रुधिर निकले उसे ऋपि वघ्यायोनि कहते हैं ॥ ११ ॥ योनिके बाहर और भीतर मैथुनके समय सदरास्पर्श मालूम पडे और वीर्यका जो ग्रहण न कर उसे खंडिता योनि कहते हैं।॥ १२ ॥ पिडिकाचितसर्वांगी मणिनांतरवाह्ययोः॥ सा योनिरुपदंशेनमूत्र फेनरुजार्दिता ।। १३ ॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्य- शास्त्रे योनिरोगलक्षणं समाप्तम् ॥ अर्थ-योनिके बाहर भीतर फुसीहों वो योनि उपदंशरोगकरके व्याप्त जाननी ॥ १३॥ इति श्रीहंसराजार्यबोधिन्यां योनिरोगलक्षणं समाप्तम् ।। अथप्रसूतिकारोगकालक्षण । उच्चैः प्रपातादृढमैथुनाद्वातीक्ष्णोष्णदुष्टौपधिसेवनाद्वा ॥ दंडा.. भिघाताहहुवेदनाद्वागर्भच्युतिः स्याद्भयतः श्रमाद्वा ॥ १४ ॥ स्रावोमासाञ्चतुर्थात्तापातः पंचमषष्ठयोः॥ मासयोर्भवति स्त्रीणां प्रसूतिस्तदनंतरम् ॥ १५॥ प्रसूतिसमये वायुः स्त्रियाः कुक्षिगतो यदि ॥ निरुध्य शोणितनावं करोति बहुवेदनाम् ॥ १६ ॥ अर्थ-उच्चस्थानके गिरनेसे दृढमेथुनसे तीखी गरम दुष्ट औषधके खानेसे दंड आदिकी चोट लगनेसे बहुत पीडासे भयसे श्रमसे गर्भपात होताहै ।।.१४ ॥ चारमहीनासे पूर्व गर्भ गिरे उसे साव कहते हैं, और पांचवें छठे महीनामें पात कहाता है, इसके अनंतर अर्थात् सातवें महीनासे उपरान्त प्रसूति कहते हैं ॥ १५॥ प्रसूति समयमें पवन स्त्रीको कूखमें प्राप्तहो रुकजावे यह रुधिरको निकाले तथा पीडाकरे ॥ १६ ॥ - (१४९) भाषाटीकासहितम् । वालेपृथिव्यापतितेतदानिशं संरक्षणीयामरुतः प्रसूता ॥ यस्याः शरीरेपवनेप्रविष्टेनूनंभवेद्रोगवती सदा सा ॥ १७ ॥ हृत्कुक्षिशूलं गुरुता शरीरे कंपः पिपासा कटिवस्तिपीडा ॥ दाहोंगमोल्परुचिः प्रलापः शोथः कृशत्वं प्रदरोतिसारः ॥ १८॥ निद्रालसत्वंबहु पांडुतांगे शीतं शिरोतिर्धमताविशुद्धिः ॥ तापोप्यनाहोचलता- तिकासः स्यात्सूतिकायाः परिरोगचिह्नम् ॥ १९ ॥ अर्थ--जिस समय वालक पृथ्वीमें गिरै उसी समय प्रसूतास्त्रीको पवनसे रक्षा करनी कदाचित 'पवन स्त्रीके लगजाय तो निश्चय प्रसूतिका रोग पैदाहोय ॥१७! जिस स्त्रीके प्रसूति रोगहों उसके ये रोगहों हृदय कूख इनमें शूलहो शरीर भारी कंप प्यास कमर और मूत्रस्थानमें पीडा दाह अंगोका टूटना अल्प रुचि प्रलाप सूजन कृशता प्रदर अतीसा॥१८॥निद्रा आलकस पौलिया शरदी मस्तकमें दर्द भ्रम भ्रष्टता वर अनाह दुर्बलता खांसी इतनरोग प्रसूतिसे होतेहैं ॥ १९॥ प्रसूतिरोगकेउपद्रव अतीसारोज्वरः शूलं वलहानिः शिरोव्यथा ॥शोफोनाहोतिदाहो- प्टौसृतिकायामुपद्रवाः॥२०॥ इति श्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवेहंसराजकृते वैद्यशास्त्रे प्रसूतिकारोगलक्षणानि ॥ १ अतीसार २ ज्वर, ३ शूल, ४ बलहानि, ५ मस्तकमें दर्द, ६ शोथ, ७ अनाह, ८ दाह, ये प्रसूतिके आठ उपद्रव हैं ॥ २० ॥ इति श्रीमाथुरदत्तरामपाठकप्रणीतायां हंसराजार्थबोधिनाटीकायां सूतिकारोगास्समासाः ।। . अथवालरोगलक्षणम्। वातलदुग्धकेगुण। स्तन्यं दुग्धं वातलं तोयतुल्यं रुक्ष गौर तुच्छसारं कपायम् ॥ वालोनित्यं तं पिवेत् स्यात्कृशांगः शब्दक्षामो बद्धविण्मत्रवातः१ पित्त युक्त दुग्धके गुण ।. सक्षारमुपणं कटुपित्तपितं वालोल्पसारः कुचज पयः पिवन् । तृष्णालुरूक्षावयवः सपेत्तिकः खिन्नो भवद्भिन्नमलासकामला॥
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८१५०),
हंसराजनिदानम् ।
कफपित दुग्यके गुण ।
दुग्धं श्लेष्मविदूपितं कुचभवं स्निग्धं घनं पिच्छिलं चो वाल:
प्रतिवासरं परिपिवन स्थूलोदरो जायते ॥ लालाढ्यः कफरोग-
वान् वलयुतो निद्रावृतछर्दिमाशून्यान्तःकरणोल्पघूर्ण
नयनः कंडादिरोगान्वितः॥३॥
अर्थ--स्तनका दूध जलके समानही रूखा तथा भारी वलरहितहो कसैला हो वो वातर्पित
दुग्ध है,उसे वालक जो पवि तो कृशांगहो मन्द शब्द तथा मल मूत्र कमउतरे॥१॥जो खारा गरम
तथा कड्डुआ हो पित्त दूपित दुग्ध है, उसे जो बालक पीये तो बलहीन हो तृष्णालू सखा देह
पित्तप्रकृति वाला दस्त बहुतहो पीलिया युक्तहो तथा खिन्नहीं॥राजो कुचका दूध कफसे दूपितही
वो चिकना गाढा मलाईदार होताहै, जो वालक ऐसे द्धको पौवै उसका वडा पेटहोजाय टार यहै
कफ रोगसे प्रसितरहै, वल युक्त नींद बहुत आवै उलटी करे शून्य अंत:करण कुछ टेढे नेत्र खुजली
आदिरोग करके युक्त रहै ।। ३॥
दोपरहितदुग्धकीपरीक्षा।
जले स्तन्यं परिक्षिप्तमेकीभूतं च पांडुरम् ॥ मधुरं स्वादुतदुग्धं
निर्दोष तद्विदुर्बुधाः ॥ ४॥ निर्दोपजं पयः पीत्वा नीरोगो
वालको भवेत् ॥ वलवीर्यान्वितो धारो वहु शक्तिसमन्वितः॥५॥
शिशोरंगपीडां च तीव्रामतीत्रां बुधो रोदनाल्लक्षयेदंगदेशे ॥
तनोः स्पर्शनाच्छ्रोतसां दर्शनाद्वा विदित्वा रुजं कारयेद्वै चिकि-
साम् ॥६॥
अर्थ-जो
दूध जलमे मिलानेसे पीला होजावे, तथा मोठा स्वादयुक्त हो, उसे निर्दोष दूध
जानना ॥ ४ ॥ जो बालक दोपहीन दूध पीताहे वह बलवीर्य धीरता शक्तिमान होताहै ॥ ५॥ वैद्य
बालकको अंग पीडा रोनेसे तथा शरीरके स्पर्शसे वा नेत्रों के देखनसे जानकर फिर इलाज करे ॥६॥
मातुः स्तन्यविकारेण वालानां नेत्रवमनि ॥ जायते कुक्कुणं तेन
नेत्रयोः कंडुरं भवेत् ॥७॥ कुक्कुणेनोरुजातेन सूर्याभां परिवीक्षि
तुम् ॥ न समर्थों भवेद्दालो नेत्रोन्मीलितुमक्षमः॥ ८॥
पारिगर्भिककेलक्षण।
भवेद्दालको गुर्विणीदुग्धपानाङ्गमश्वासनिद्रान्वितो वहिसादः॥
कृशांगोतिकासोसर्दितपातस्तमाहुर्बुधागर्भिकं कोष्ठबंधम् ॥५॥
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भाषाटीकासहितम्।
अर्थ-माताके स्तनविकारसे बालकके नेत्रों में कुकुण रोग हो,उससे नेत्रों में खुजली चलती है।
जब बालकके कुकुण रोग होजाताहै वो सूर्यके देखनको समर्थ नहीं,हो और नेत्रमिचेभी नहीं ॥८॥
गर्भिणी माताके दुग्धपानसे बालकको भ्रम, श्वास, निन्दा, अग्निमंद, कृशांग, अतिखांसी, अरुचि,
'दंतपात, ये होते हैं, इसे वैद्य गर्भिककोष्ठबंध वा पारिभिक कहते हैं ॥ ९॥
तालुकंठरोगकेशलक्षण।
शिशोस्ताल्वामिषे श्लेप्मवातयुक्तालुकंटकम्॥कुर्यात्तेन रुजामूर्ध्नि
भवेत्तालुनि निम्नता ॥ १० ॥ तालुपाकस्त्रिदोपोत्थः सर्वांगेषु
विसर्पति ॥ असाध्यायं बुधैरुक्तोयंत्रमंत्रैश्वसाधयेत् ॥ ११ ॥ क्षुद्र
रोगे च कथिते ह्यजगल्ल्याहिपूतन।।ज्वराद्या व्याधयः सर्वे महतां-
येपुरोगताः ।। बालदेहेपि ते तद्वजानीयात्कुशलो भिषक्॥
सामान्यग्रहयुक्तबालककेलक्षण ।
ग्रहैगृहीतोल्पशिशुः प्रवेपते मुहुर्मुहुस्त्रस्यति रौति जृम्भते ॥
परं नखैलुञ्चति खं समीक्षते क्वचिवचित्कूजति हन्ति रोदिति१२
अर्थ-बालककै तालूके मांसमे वात युक्त कफ प्राप्त होकर तालुकंटक रोग पैदा करें, उससे
तालू नीचे लटक आवे ।। १० । त्रिदोपका तालुपाक सब अंगमें फैल जाये है, सो असाथ्यहे, वो
यंत्रमंत्र आदिसे अच्छाहो ॥ ११ ॥ जो छुद्ररोगोंमें अजगली अहिपूतना रोग कहे हैं, यो और
ज्वरादि सर्वरोग जो बडे मनुष्यों के होते हैं, वो सब वालककी देहमें होते है, ऐसे कुशल वैद्यजाने
यह माधवाचार्यका मतहे, जो बालक ग्रहों करके गृहीत हो या कभी कांप त्रासखाय रोवे जंभाईले
नखोंसे अपनी देह नोचै आकाशको देखै कभी २ गूंजै और पीडाहो तथा रोवे ॥ १२ ॥
स्कंदग्रहकेलक्षण।
स्कंदग्रहेणेव शिशुहीतः फेनं बमेद्रोदिति साश्रुपातः॥ भिन्न
स्वरो फिन्नमलोरुणाक्षो जागर्ति रानो परितोल्पसंज्ञः ॥ १३ ॥
शकुनीग्रहकेलक्षण।
वालोगृहीतः परितः शकुन्यास्फोटैश्चितांगो बहुभिः स्रवद्भिः॥
दाहान्वितैः शोणितपूयगंधिभिभीत्यातिभिः संचकितो भवेत्तः१४
खेतीग्रहकेलक्षण ।
स्फोटः स्रवद्भिर्बहुभिर्युतांगो भिन्नस्वरो हीनवलो विवाः । तृ-
प्णातिसारज्वरदाहयुक्तःस्याद्रेवतीग्रस्ततनुश्च वालः ॥ १५॥
. (१५२) हंसराजनिदानम् । जो वालक स्कन्दप्रह करके आसा गया हो यो मुखसे झाग पटकै, रोध, भिन्न स्वरहो, दस्तहों, लालनेत्र, रात्रिम जागे, होश न रहे ॥ १३ ॥ जो वाटक शकुनीग्रहने प्रसाहो वो जिस्में राधनेह ऐसे फोडा करके व्याप्त हो, दाहयुक्त, रुधिर निकले, दुर्गन्धआये, डरपै ॥ १४ ॥ जिस वाटफकी देह फोडोंसे व्याप्तहो और वे उय, मिन्नस्वरहो बलरहित, तथा तेजरहित, तृष्णा, अतीसार, ज्वर, दाहबान हो उसे रेवतीग्रहप्रस्त जानना ॥ १५ ॥ पूतनाग्रहकेलक्षण । वसागंधियुक् पूतनाकांतदेहः सिशुर्लक्षणेर्जायते पंचपाभिः ॥ पिपासांगविस्फोटकंपार्तिदाह रश्वासकासातिसारांगकंपेः॥१६॥ मंडिताग्रहकेलक्षण। प्रसन्नवक्त्रो बहुभुशिशुः स्यादण यो मंडितया गृहीतः ॥ विशुद्धगात्रो मलमूत्रगंधितः शिराभिस्तुविनिर्गताभिः॥ १७॥ नैगमेयग्रहकेलक्षण । वहेत्पूतिगंधं मुखान्नाशिकाया रदैर्मातरं संदशेत् खंविपश्येत् ॥ भवेद्यस्य कंठोप्टवक्त्रेषु शोपो गृहीतः शिशुनेगमेयग्रहण ॥१८॥ इति श्रीभिपचकचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे शिशुरोगनिदानम् ॥ अर्थ-जिसकी देहमें चौकीसी बास मारे, तथा प्यास और अंगोंका टूटना, पीडा, दाह, ज्वर, श्वास, खांसी, अतीसार, कंपही इन लक्षणोंसे बालक पूतनाग्रहप्रस्त जानना ॥ १६ ॥ जिस बालकका मुख प्रसन्नही बहुत भोजन करे, शुद्ध देहहो, मल मूत्रकी दुर्गंध आवै, नाडीनसे व्याप्तहो, इन लक्षणोंसे बालक मण्डिताग्रहास्त जानना ॥ १७ ॥ जिसकी देहमें वासआवै, माताको दांतोंसे काटे, आकाशकी ओर देखे, कंठ ओठ मुख सूखे, उसे नेगमेय ब्रह्मस्त जानना ॥ १८॥ इति श्रीहंसराजार्थबोधिन्यां बालरोगनिदानं समाप्तम् ।।. अथविषरोगनिदानम् विपं स्थावरं मूलजं दुग्धजं वा भवेत्पत्रजं पुप्पजं त्वम्भवं वा॥ फलात्संभवं वीर्यनिर्यास वा द्वयोर्योगजं भूमि कृत्रिमं वा॥१॥ अयस्थावरविपकेअपगुण, मूर्छा श्वासं ज्वरं हिकां फेनं छर्दिगलग्रहम् ॥ दृष्टिनाशं भ्रम मत्तं कुरुते स्थावरं विषम् ॥ २॥ .
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भापाटीकासहितम् ।
(१५३)
जंगमाविपकेअपगुण ।
"जीबांगजं जंगममुग्रवीर्यंहालाहलं दाहमतीवनिद्राम् ॥ शोथं
विसंज्ञां तमकं क्लमत्वं रोमांचितांगं कुरुतेऽतिनिद्राम् ॥३॥
अर्थ-विष दोप्रकारका है, एक स्थावर, दूसरा जंगम स्थावरविष मूल आदि और जंगम सी-
दिकका विपादि उत्पन्न करे, इसीसे इसको विपकहते है, स्थावर विष, मूठ,दल,फल, त्वचा, दूध,
फूल, वीर्य, गोंद, भूमिस पैदा हीरा आदि और कृत्रिम अर्थात् बनाभया ॥ १॥ मूर्छा, श्वास,
ज्वर, हिचकी, झाग, रद्द, गलग्रह, दृष्टिनाश भ्रम, मस्तपना इतने अपगुण स्थावर विष करती है
॥२॥ प्राणीसे पैदा जो विप वो जंगम विपहै वह इतने अवगुण करै दाह, घोर, निदा, सूजन,
चेहोशी, अंधकार, ग्लानि, रोमांच, अतिनिद्रा ॥ ३ ॥
विपदेनेवालेमनुष्यकीपरीक्षा।
पृष्टो विपादो न ददाति चोत्तरं यस्तो ग्रहेणेव मुहुर्निरीक्षते ॥
नाना विचेष्टां कुरुते विकंपते कंडूयतेङ्गं रूदते विशंकते ॥४॥
मूलजविपकेलक्षण ।
मूलजं भक्षितं कुर्याद्विपं मोहं विजृम्भणम् ॥ प्रलापं वेपनं श्वासं
'मोह दाहं विचेष्टनम् ॥५॥
पत्रविपकेलक्षण।
पत्रोद्भवं विपं कुर्यान्मुखशोथं च शोपणम् ॥
फलकेविपकेलक्षण।
फलोत्थं दाहमन्नाहं वैकल्यं दृष्टिनाशनम् ॥६॥
अर्थ-जो पूछनेसे उत्तर न दे, मानों किसी प्रहने असलिया, वारवार देखने लगे, नाना प्रका-
रकी चेष्टाकरे, कांपे की खुजानेलगै, कभी रोवै, तथा शंकाकर, उसको जानले फि किसीने विप
दियाहै ॥ ४ ॥ जो मनुष्य मूलज कहिये जड कंद आदि जैसे मिगीमोहरा ऐस विष खान
मोह, जंभाई, प्रलाप, कंप, श्रास, मोह, दाह, चेष्टाहीन होताहे ॥ ५ ॥ मुखशोष, देहशोप ये अप-
गुण पत्रका विषभक्षण करे है, दाह, अनाह, बैकली, दृष्टिनाश, ये फट विपके अपगुण है ॥ ६ ॥
फूलगोंदत्वचाकोविषकलक्षण।
पुप्पोत्थं छर्दिराध्मानं मोहं च कुरुते विपम् ॥ त्वनिर्यासोद्भव
स्रावं पूर्तिकंपशिरोरुजम् ॥७॥
(१५४) हंसराजनिदानम् । दुग्धविपके लक्षण। विषं क्षीरसमुद्भूतमाध्मानं कंठशोषणम् ॥ विड्वंधमूत्रसंरोध दृढांगं कुरुते भ्रमम् ॥ ८॥ धातुहरतालआदिकेलक्षण। धातूत्थं यद्विपंकुयान्मूच्र्छा दाहं च तालुनि ॥ विपाणि प्राण- घातीनि सर्वाणि कथितानि च ॥९॥ अर्थ-फूलका विप रह अफरा मोहको करै, तथा गोंद और त्वचाका विष स्राव दुर्गंध, कंप, शिरमें दर्द ॥ ७ ॥ दूधका विप अफरा, कंठ शोप, दस्त, मूत्रका रुकना, दृढांग और भ्रम करे॥८॥ हीरा हरताल आदि धातुका विप मूछी, तालुयेमें दाह तथा सर्व विष प्राणके हर्ता जानने ॥९॥ सर्पकाटेकेलक्षण। भुजंगेन दृष्टस्य नासामुखाभ्यां पतेद्रक्तधारांगदेशेषु शोफः ॥ भवेन्मंडलैमंडितांगो विवों विशीणांगमांसोथ निःशोणितांगः ॥ १०॥ विपादोंगकंपो भयो रोमहर्षः शरीरे गुरुत्वं भ्रमो दृष्टि- नाशः ॥ तृपाध्मानमानीलता गात्रदेशे पनाहो रतिर्जुम्भणं मुर्च्छता स्यात् ॥ ११ ॥ देशविशपऔरकालविशेपमेजोसर्पकाटेउसकेलक्षण । अश्वत्थमूले पिचुमंदमूले चतुष्पथे देवगृहे श्मशाने ॥ वाल्मीक देशे दिनसंध्ययोर्वा सण दष्टः सुधया न जीवेत् ॥ १२ ॥ अर्थ-जिसे सर्पकाटे उसकी नाक और मुखसे रुधिरको धार गिरे, सबदेहमें सूजन हो, देहमें रुधिरके चकत्तेहों,देहका मांस बिखर जाय,तथा देहमें रुधिर न रहै ॥१०॥ खेद, अंग कंप, तथा विवर्ण हो, भय, रोमांच, देहभारी, भ्रम, नेत्रोसे न दीखे,प्यास,अफरा,शरीरनीला, अनाह, अरति, मूर्छा, जंभाई,ये लक्षण सर्प काटेके हैं ।।११पीपलके वृक्षके नाचे, तथा निम्बके वृक्षके नीचे, चौराहेमें, मन्दिरमें, श्मशानमें,बांबीके पास, संध्याके समय ( भरणी,आर्द्रा,लेपा,मघा,मूल,कृत्तिका, इननक्षत्रोंमें ) जो सर्पकांट तो मनुष्य मरजावै ॥ १२ ॥ भूपकविषलक्षण। भृषकस्य विपं कुर्याच्छाएँ शोर्फ विवर्णताम् ॥ मूच्र्छा मंदश्रुति श्वासं लालास्त्राव शिरोरुजम् ॥ १३ ॥ " भापाटीकासहितम् । (१५५), कीटआदिविपकेलक्षण। दष्टस्य कीटैर्विपदिग्धतुंडैः कृष्णाभमंगं बहुवेदनास्यात् ॥ शोफोति दाहः परिभिन्नवा मोहप्रलापोधिकरोमहर्पः॥ १४ ॥ कालेविच्छूकेलक्षण । दृष्टो मनुष्योऽसितवृश्चिकेन नाना विचेष्टां कुरुते विपातः॥ भीतो विपण्णोग्निसमानदाहः पीडार्दितो रौति विलापमुच्चैः ॥ १५ ॥ अर्थ-विपेल मूपेका विप रट, मूजन, विवर्ण, मूर्छा, मंद सुने, श्वास, लार टपकें, शिरमपीडा ये लक्षण हों ॥ १३ ॥ कोट अथवा जिसे विपैल डाढवाला जानवर काटे उसके लक्षण देहकाला तथा पीडायुक्त सूजन दाह तेजरहित मोह, प्रलाप, रोमांच ये हों ॥ १४ ॥ काले विच्छू काटेके ये लक्षण है, नानाप्रकारकी चेष्टाकरे, डरपे, शून्यता, अग्निके समान दाह, घोर पीडा, पुकारकर रोवे ॥ १५ ॥ विपं वृश्चिकं दुःसहं प्राणहारि महामोहदं सौख्यविध्वंसकारि ॥ बलज्ञानविज्ञानतेजोपहारि व्यथाशोफवैकल्यदाहार्तिकारी ॥१६॥ वहींसर्पकाटकेलक्षण । ज्वरो घोरतरं शूलं छर्दिशोफो विसर्पति ॥ वर्णनाशोभवेत्पीडा वहिदष्टस्य लक्षणम्॥१७॥प्राणीदंशेन संदप्टो हृष्टरोमा क्षता र्तिमान् ॥ स्तब्धलिंगो भवेच्छोफो विनिद्रश्चकितोनिशम् ॥१८॥ अर्थ-बिच्छूका विप नहीं सहाजाय, प्राणहर्ता, महामोह करे, सुखको दूर करें, वल, ज्ञान, तेज, इनको दूर करे व्यथा, सूजन, बेकली दाह, और पीडा करे ॥ १६ ॥ घोरवर, शूल, रद, मूजनता बढे, वर्णका नाश और पीडा होय, ये वहीं नाम सर्पकाटेके लक्षणहै।।१७||प्राणीके विषसे इसद्धयेके ये लक्षणहैं, रोमांच, पावसे पीडित, टेढा लिंग, सूजन, निद्राहीन और चक्ति ॥१८॥ मंडकमछलीकेविपके लक्षण । शोफ छातृपानिद्रामंडूकविपलक्षणम्॥ मत्स्योत्थितं विपं कुर्या- द्दाहं शोफ तृषां व्यथाम् ॥ १९॥ जोककेविषकालक्षण । मूछा शोफज्वरं कंडू तृपां कुर्युर्जलौकसः ॥ छिपकलीकेविपकालक्षण । दाहं स्वेदं व्यथां शोथं कुर्याच गृहगोधिका ॥ २० ॥ .
, (१५६) हंसराजनिदानम् । शतपदी ( खानखजूरा) कैविपकेलक्षण । शतपद्याविपं कुर्यात्स्वेदं दाहं रुजं वहु॥ मच्छरकेविपकालक्षण। मशकानां विषं कुर्याच्छोफाल्पं तुच्छ्वेदनाम् ॥२१॥ अर्थ-मैडकमा विष सूजन, रद्द, प्यास, निद्राकरेहै, और मछलीका विष दाह, सूजन, प्यास और, व्यथाको करै ॥ १९॥ विपेल जोंककाटे तो मूछी, मूजन, ज्वर, खुजली, प्यासहो, दाह, पसीना, पीडा सूजन, ये छिपकली काटेसे होतेहैं ॥ २० ॥ कातरके काटनेते पसीना, दाह, पीडाहो मच्छरका विष थोडी सूजन, और थोडीही पीडा करैहै ॥ २१ ॥ लूताविपकेलक्षण । लूताविषं महाघोरं पिंडिकां वहुवेदनाम् ॥ कुरुते चंचलां तीत्रां पाकदाहज्वरान्विताम् ॥ २२॥ मक्खीकोविषकेलक्षण। मक्षिकाणां विप तुच्छं शोफतोदसमन्वितम् ॥ नखदंतविपकेलक्षण। नखदंतविषं रोद्रं दाहस्रावव्यथाकरम् ॥ २३ ॥ सादिककाटेकाअसाध्यलक्षण। दृष्टिगता यस्य पतंति केशा नासामुखाभ्यां रुधिरस्य पातः ॥ वकं मुखं यस्य विवर्णमंगं विषाभिभूतं परिवर्जयेत्तम् ॥ २४ ॥ अर्थ-लूताविष महाघोर ये लक्षण करैहे, पीडिका चंचलतीवपीडा, पाक, दाह, ज्वर ॥ २२ ॥ विपलमक्खी काटे उसको थोडी सूजन, और पीडायुक्त हो जिसके सिंह आदिका नख लगाहो मगर आदिकी दाढ लगीहो उसके लक्षण दाहहो, धावहो, व्यथाहो ॥ २३ ॥ जिस पुरुषकी दृष्टि माजिाय, और शिरकै बाल गिरप?, नाक मुखसे रुधिर . गिरे, टेढामुख होजाय, तथा विवर्ण ऐसे रोगीको वैद्य त्यागदे ॥ २४ ॥ (तथा) हीनस्वरं यस्य पतंति दंष्ट्राः सर्वांगशीतं रसनातिकृष्णा॥ बेकल्यमंगे वदनं करालं विपार्दितं दृरतरं त्यजेत्तम् ॥२५॥ दूपीविपकेलक्षण। जलस्य पानाद्विपदूषितस्य दिग्देशकालांतरसंभवस्य ॥ नरस्य देहे विपलक्षणस्य दृपीविपं चोच्छलते कृशस्य ॥ २६॥ दृषी- . भापाटीकासहितम् । (१५७) विषं संकुरुते नरस्य हस्तांघ्रिशोथं मुखकंठशोषम् ॥ मूछा ज्वरं मंडलचर्चितांगं कुष्ठं रुजत्वं जठरस्य वृद्धिम् ॥ २७॥ अर्थ-हीनस्वर होजाय, दांत डाडाँ गिरपडे, सागमें शीतलगे, कालीजीभ हो जाय, देहमे बेकली, करालमुखही, ऐसे विषादित मनुष्यको वैद्य त्याग करदे॥२६॥दिशा देश कालमें प्रगट ऐसे विघदूषित जल पीनेसे विषके वा विपमिले पदार्थके खानेसे कृशमनुष्यकी देहमें नाना प्रकारके रोग करे है ॥२६॥ दूपी विष ये लक्षण करेहै, हाथ, पैरमें सूजन, मुख कण्ठका सूखना मूर्छा, ज्वर, रुधिरके चकत्ते, कोढ, पेटका वढजाना ॥ २७ ॥ मांसक्षयं पाण्डुरचर्चितांगं निद्रां विजृम्भां वलवीर्यनाशम् ॥छार्दै पिपासां विकलं विवर्ण दूपीविषं संकुरुते विकारम् ॥२८॥ दूपी- विषं त्रिदोषोत्थं यन्त्रमंत्रोपधादिभिः ॥ असाध्यं मुनिभिः प्रोक्तं तस्य जाप्यं हितं भवेत् ॥ २९ ॥ इति श्रीभिषक्क्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्य. शास्त्रे विपलक्षणनिदानं संपूर्णम् ॥ अर्थ-पीलिया, मासकाक्षय, निद्रा, जंभाई, बल वायंका नाश, रद, प्यास, बैकली, देहका विवर्ण ये, दूविप विकार करे है ।। २८ ॥ त्रिदोपसे उठा दीविष असाध्यहै, वो मंत्र औषधियोंस और जाप्यसे हित होय ॥ २९ ॥ इति श्रीमाथुरदत्तरामपाठककृतहंसराजार्थबोधिन्यां विपरोगनिदानम् ।। मूत्रपरीक्षा। सुपाने समादाय मृत्रं गदीनां प्रभाते भिपचिंतयेत्तैलावंदुम्॥ विनिक्षिप्य तस्मिन्विकाशं समेति तदासाध्यमेवं वदेद्रोगिणतम् ॥१॥ यदा विंदुरूपस्थितं मूत्रमध्ये तले संश्रितं वात्तदा साध्य- मेवम् ॥ त्रिकोणस्थितं तैलबिंदुर्यदिस्यात्तदा चैव दोपं वदेन्मान- वानाम् ॥ २॥ क्षुरादंडकोदंडतूणीरखगंगदाचक्रवाणासिरूपं विधत्ते॥ यदा तेलबिंदुस्त्रिशूलाकृतिर्वा तदा रोगिणो यास्यते मृत्यु वक्रे॥३॥ अर्थ-वेद्य रोगीके सूत्रको प्रातःकाल कांसीके पात्रमें वा कांचके पात्रमें तेलकी बूंद डाटकर परक्षिा करे, यदि मूत्रने तेलकी बूंद प्रकाशमान देख तो रोगीको साध्य कहै ॥ १ ॥ और जो तेलको बूंद मूत्रमें डूबजाय तो असाध्य कहै, और जो मूत्रको बूंद त्रिकोणके आकार होजाय तो विदोप युक्त, . .. , (१५८) हंसराजनिदानम् । मनुष्य जाने ॥ २॥ कदाचित् तेटकी बूंद छुराके वा दण्डके या गदा या तत्वारके वा वाणके या खड्गके वा धनुपके वा फरसाके आकार होजाय, अथवा त्रिशूलके आकार होजाय, वो रोगी मौतक मुखमें जाय ॥ ३॥ ज्वरार्तस्य मूत्रे यदातैलविन्दुर्विधत्ते भुजङ्गाकृतिं मध्यरंध्रम् ॥ विरूपं कृतान्ताकृति वृश्चिकाभं स रोगी यमस्यालये शीघ्रगंता ॥॥ज्वरातस्य पुंसो यदा मूत्रमध्ये समादायतैलं तृणेन प्रभात।। विनिक्षिप्य सिंहासनाभं विधत्ते तडागाकृति दीर्घमायुर्वदति ॥५॥ भेरीदुंदुभिशंखगोमुखतुरीतुल्यंमृदंगाकृति वीणातोरणहं सकम्बुसुरभीछत्राश्वयानासमम् ॥ ढकाकुम्भाकिरीटहारसदृशं केयूररत्नाति सन्धत्ते तिलतैलविंदुरनिशं मूत्रे महारोगिणः॥६॥ अर्थ-ज्वरवान् पुरुपके मूत्रमें तेलकी बूंद सर्पके आकार और वीचमें छिद्रहों तथा धुरी और मौतके आकारही तथा बिच्छ्के आकारहो वो रोगी जल्दी यमराजके घरजाय ॥ ४ ॥ और जिस ज्वरवाले पुरुषके मूत्रमें तेलकी बूंद डारनेसे सिंहासनके आकार, अथवा तालावके आकार होजाय, उस रोगीको दीर्घआयु जानना ॥५॥ भेरी, दुंदुभी शंख, गोमुख, तुरही, मृदङ्ग, तमरा, तोरग, हेस, कमल, गौ, छत्र, घोडा, सवारी, ढका, घट, किरीट, हार, केयूर, ल्न, इनकीसी आकृतिके सदृश तेलकी बूंद होय वो महारोगी जानना ॥ ६ ॥ प्रसरति यादि मूत्रे रोगिणस्तैलविन्दुर्दिशि विदिशि समंतानी रुजंतं हि विद्यात् ॥ ब्रजति दिशि मघोनः पश्चिमायां दिशाया पवनककुभि रोगी रोगमुक्तं नितान्तम् ॥७॥ वातपित्तकफकेमूत्रकीपरीक्षा श्यामं स्निग्ध तारकाभिर्युतं तद्विद्यान्सूत्रं रोगिणो वातभूतम् ॥ पीतं रक्तं पित्तजम्बुद्दुदोक्तं श्लेप्मोद्भूतं पल्वलंवारितुल्यम् ॥८॥ दिदोपऔरविदोपमूत्रकीपरीक्षा रोगीमूत्रं द्विदोपोत्थं सर्पपतैलसन्निभम्॥संनिपातोत्थितं कृष्णं विद्याइहुदसंयुतम् ॥ ९॥ अर्थ-जिस रोगांके मुत्रमें तेलको बूंद दिशा और विदिशामें फैल जाय, उसे नैरोग्य जानना चाहिये, औरतेलको बूंद पूर्व दिशामें या पश्चिमदिशामें तथा यायव्य और उत्तरदिशामें फैलजाय तोमी रोगी रोगमुक्त जानना ॥ ७ ॥ यातसे मत्र नाला, और चिकना, उतरताहै, पित्तसे लाल, और पीला तथा बबूलेयुक्त उतरे है, कासे गाढा, और चिकना तथा तलैयाके जल समान उत्तरे . . .
2006 भापाटीकासहितम् । (१५९) ।। ८ ॥ द्विदोषवाले पुरुषका मूत्र सरसोंके तेलके समान उतरै, और सन्निपात्तवाले पुरुषका मूत्र काला और वबूलेयुक्त उतरता है ॥ ९ ॥ अजीर्णसंभवं मूत्रमजामूत्रसमं भवेत् ॥ ज्वरोत्थं कुंकुमाकारं सुखिनो जलसन्निभम् ॥ १०॥ भिषक्चक्रचित्तोत्सववेद्यशास्त्र कृतं हंसराजेन पद्यैर्मनोज्ञैः ॥ सुहृद्यैरदोपै रुजोवांतनाशं हरे घिसंसेवनानंदमूर्तेः॥ ११॥ इतिश्रीभिपक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्य शास्त्रे रोगमूत्रलक्षणानिसमाप्तानि ॥ अर्थ-अजीर्णसे मूत्र वकरीके मुत्रके समानउतरे, अरसे केसरियारंग सर्राखा उतरे है, सुखी पुरुषका मूत्र जलके समान उतरै ॥ १० ॥ भिषक्चक्रचित्तोत्सव वैद्यशास्त्र हंसराज कविने मनको प्रसनकारक पदोंसे तथा हृदयके हरणकारक दोष रहित पदोंसे रोगका हरणकरनेवाला श्रीनिकुं- जविहारके चरणारबिन्द सेवकने बनायाहै ॥ ११ ॥ इति श्रीमाथुरदत्तरामपाठकप्रणीतायां हसराजार्थसुबोधिनीटीकायांरोगमूत्रलक्षणानिसमाप्तानि ।। नपुंसकलक्षणानि सुश्रुताल्लिख्यते ॥ आसेक्यनपुंसककेलक्षण। पित्रोरत्यल्पवीर्यत्वादासेक्यः पुरुषो भवेत् ॥ सशुक्रप्रास्य लभते ध्वंजोच्छ्रायमसंशयम् ॥१॥ सौगंधिकनपुंसककेलक्षण। यः पूतियोनौ जायेत स सौगंधिकसंज्ञितः ॥ सयोनिशेफसोगंध- माघ्राय लभते वलम् ॥ २॥ कुंभिकनपुंसककेलक्षण। स्वगुदेऽब्रह्मचर्याद्यः स्त्रीपु पुंवत्प्रवर्तते ॥ कुभिकः स तु विज्ञेय ईर्ण्यक शृणु चापरम् ॥३॥ अर्थ -माता पिताके अति अल्पवीर्यसे जा गर्भ रहता है, वो पुरुष आसेक्य नाम नपुंसक होता है,वो दूसरेके मैथुनके करनेसे पेदा शुक्र खाय जाये तब उसको चतन्यता पैदाहो तब विषय करनेको प्रवृत्तहो इसका दूसरा नाम मुखयोनि है ।। १ ॥ जो पुरुष दृष्टयोनिसे पैदाहुआ हो वो योनि वा लिंगको सूंघले तव चैतन्यता प्राप्तहो उसे सौगंधिक कहते हैं और दूसरा नाम नासा- स 20/06 - (१६०) हंसराजनिदानम् । योनि कहतेहै ॥ २ ॥ जो पुरुष पहले दूसरे पुरुषसे अपनी गुदामंजन करावे, तब उसको चेतन्यता प्राप्तहो, तब स्त्रीके विपे पुरुषताको प्राप्तहों, उसे कुम्भिक नपुंसक कहते हैं ॥ ३ ॥ ईयकके लक्षणोंको सुनो। इय॑क्रकेलक्षण। दृष्ट्वा व्यवायमन्येषां व्यवाये यः प्रवर्तते ॥ ईर्ष्णकः सतु विज्ञेयो हायोनिरयमीर्ण्यकः ॥४॥ महापंढके लक्षण योभाव्यामृतो मोहादंगनेव प्रवर्तते ॥ तत्र स्त्रीचेष्टिताकारो जायते पंढसंज्ञितः ॥५॥ नारीपंढके लक्षण। तो पुरुषवद्वापि प्रवतांगना यदि ॥ तत्र कन्या यदिभवेत्सा भवेन्नरचेष्टिता॥६॥ इति श्रीभिषक्चक्रचित्तोत्सवे हंसराजकृते वैद्यशास्त्रे नपुं सफलक्षणानि समाप्तानि ।। अर्थ-जो पुरुष दुसरको मैथुन करतादेख आप मैथुन करनेको प्रवृत्त हो, उसे ईर्ण्यक नपुंसक कहते है, दूसरा नाम क्योनिहै ।। ४ ।। जो पुरुष ऋतुके समय स्त्रीके प्रमाण प्रवृत्तहो अर्थात् विपरीत रतिकरे, उसके वोNपैदा जो बालक वो स्त्रीकोसी चेष्टावान् हो, और स्त्रीके आकार युक्तहो उसे महापण्ड कहते है ॥५॥ तुकाल के समय जो स्त्री पुरुषके प्रमाण प्रवृत्तहो अर्थात् पुरुषको नीचे सुलाय आप ऊपर चढ मेथुन कर उसमें जो कन्या पैदाहो वह पुरुषके आकारहो और पुरुपकासी चेष्टावालाहो ॥६॥ इति श्रीमाथुरवंशोत्पन्नप्रशंसनीयगुणगणालंकृतकन्हैया लालपाठकतनयदत्तरामप्रणीतहंसराजार्थ सुबोधिनीटीकासमातिमगात् ।। इति हंसराजनिदानसम्पूर्णम् ॥ पुस्तक मिटनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टोम् प्रेस-वंबई