Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Arbhi Kavya Darshan

Sadhu,shriyut Mahesh Prasad · 2011/01

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अरबी काव्य-दर्शन। 1 इतिहास, परिचय उत्कृष्ट रचनाओंका संग्रह। लेखक-- श्रीयुत घाबू महेशप्रसाद साधु, मौलची आलिम और फाजिल । (काशी हिन्दू-विश्वविद्यालयके अध्यापक 1) प्रकागक- हिन्दी-ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई । आपाढ, १९७८ नि। जुलाई, १९०१ ई०। प्रथमावृति] पुस्तक मिलने का प्रमय :1) जिल्दसहितका त्योमा बन्धकास प्रकाशक- नाथूराम प्रेमी हिन्दी-ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, हीरायाग, गिरगांव, बम्बई। मुद्रक---- गणपति कृष्ण गुर्जर, लक्ष्मीनारायण प्रेस, जतनवड़, काशी। नोट-प्रारंभके ८ पेज मगेश नारायण कुलकर्णी कनाटक प्रिंटिंग प्रेस, ४३४ ठाकुरद्वार, सम्बईमें छपे हैं।

DESSISERIES विषय-सूची। SSSSSS पृष्ठसंख्या १ ११ . .. १५ १८ १९ विषय-प्रवेश (भूमिका ) भरवी कविता कविताकी उत्पत्ति प्राचीनकालमें कविता भरवोंकी स्मरणशक्ति कविताका प्रभाव सात सर्वोत्तम कविताएँ युरोपमें आदर कवितामें स्त्रियों का भाग मुसलमानी कालमें कविता १-नीति सुनहरी शिक्षा बिखरे हुए मोती धन और निर्धनता जैसेको तैसा अच्छी मित्रता भद्र पुरुष पुनको उपदेश मनुष्य और उसका साहस अपरिचितका विश्वास नहीं चेतावनी १ २ ४ ८ ११ १२ १३ १४ महत्त्व किसम है नीति उद्यान पृष्ठसंरया १६ . १८ .. आदर्श नीति आदर्श जीवन देशत्याग यानासे लाभ विदेशगमन, नीतिभाण्डार ज्ञानगेह २० ... ... .. .. स्फुट नीति .. ... २२ २३ २४ २५ .. . चेतावनी उपदेश-विचार आदर्श उपदेश नीति रत्नावली २-युद्ध योद्धाका कर्तव्य लढाईके लिए भड़काना एक सप्रामका वर्णन अति कष्टमिय पराक्रमी पुलीनकी महिमा रणकुशलोंकी सराहना परस्पर युद्ध हमारी हीनता पितासा बदला समरस्थलमें मरना घायल रणधीर और उसकी पत्नी मेरा सप्राम .. ४१ ... ४५ । ४८ हमारा शौर्य ५० ५१ प्रशसनीय प्रामीण जीवन युद्ध ताण्डव ..

पृष्ठसल्या पेमकी माया, ५७ ५८ - ६१ ७२ प्रेमकी तरंग प्रेम-प्रार्थना प्रेम वृत्त प्रेम निकेतन, प्रेम विनोद प्रेमालिशन प्रेमपत्रावली प्रेमका भिसारी, प्रेमका दास प्रेम वशीभूत अपनी प्रेम कथा आदर्श प्रेम प्रियाकी याद प्रियाका वसान, विरहकातरता आपबीती उलटा जप सन्ताप आत्मप्रसाद प्रेमपिपासु, आत्मविस्मृति अपनी दुसगाथा मिलाप-याचना रामकहानी दुखगाथा प्रेमका शाप ८० ८२ ८४ ८५ ८७ ८८ ४-वैराग्य चेतावनी पिले हुए पुष्प कालकी सूचना धीरता फुलीनताका आभूषण सन्तोष मेरी बहादुरी ९८ ४ .. पृष्ठसख्या १०० १०५ १०७ १०९ ११० तिरस्कार निर्वेद संसारसे विरकि वैराग्य-रत्नाकर भारम-सुधार सफल जीवनके मूलमत्र बुढापेका स्वागत मनुष्य और मृत्यु ११७ ११९ १२० १२१ वैराग्य-कुज ५-प्रकीर्ण १२७ मेरी आदत विच्छूका स्वभाव, देवसेवा मेरा हाल कुछ खरी यातें एक अनोखा सयाल १२९ १३१ १३३ १३४ १३५ १३७ १३९ १४० आदर्श भाव व्यायाम पर वार्तालाप कुशल सहनशील प्रभुताका मार्तण्ड ऊँटनी, घोडा .. १४१ १४३ १४४ १४४ मेघ अभ्यागतसेवी कुटुम्ब भाईका दुखडा पुत्र और वधूसे दुखी स्त्री विदेशमें पुनका मारा जाना बादशाहकी माताका परलोक सुभाषित सग्रह १४५ १४६ १४७ १५३ कालिदास और भवभूति । - अनु०-५० रूपनारायण पाण्डेय । इस प्रन्यके मूल लेखक स्व. द्विजेन्द्रलाल राय है । इसको पढकर पाठक समझेंगे कि वे केवल कवि और नाटककार ही नहीं थे किन्तु एक मार्मिक और तलस्पर्शी समालोचक भी थे। महाकवि कालिदासके अभिज्ञान शाकुन्तल और महाकवि भवभूतिके उत्तर-रामचरितकी ऐसी गुणदोषविवेचिनी, ममस्पशिनी और तुल नात्मक समालोचना अब तक शायद ही किसी भारतीय विद्वानके द्वारा लिखी गई होगी। यह कहनेकी आवश्यकता नहीं कि द्विजेन्द्रबाबू इन नाटकोंकी समा- लोचना लिखनेके बहुत बडे अधिकारी थे। क्यों कि वे सर्वश्रेष्ठ कवि और नाटककार थे। इसमें सस्कृतके उक्त दोनों नाटकों के कथाभागकी, उनके प्रत्येक पात्रकी, उनके नाटकस्व, कवित्व, भाषा-रचना आदिकी खूब ही विस्तृत समा- लोचना की गई है और उसमें इस विषय सम्बन्धी इतना ज्ञान भर दिया है कि यह प्रत्येक कवि और नाटक लेखकके लिए अतीव उपयोगी है। संस्कृतके विद्यार्थियों के लिए तो यह पडे ही कामकी चीज है । इसे पढ कर वे नाटक- साहित्यके मार्मिक विद्वान हो सकते हैं । सस्कृतकी उच परीक्षाओं में यदि यह भरती किया जाय, तो बडा लाभ हो। इससे सस्कृतके विद्वानों में गुणदोप- विवेचिनी शक्तिका जागरण होगा। आयुर्वेदाचार्य और सुकवि ५० चतुरसेन शास्त्रीो इस ग्रन्थकी विस्तृत भूमिका लिखी है जिसे पढ़नेसे इस प्रन्थका महत्त्व और भी स्पष्ट हो जाता है। मूल्य १n), सजिल्दका २) साहित्य-मीमांसा। अनु०-५० रामदहिन मिश्र, काव्यतीर्थ । श्रीयुत पूर्णचन्द्र वसुके अपूर्व धगला प्रन्थका अनुवाद । यह भी एक समा लोचनात्मक प्रन्थ है । इसम पूर्वीय और पश्चिमी साहित्यकी, अथात् वाल्मीकि, ध्यास, कालिदास, भवभूति और होमर, शेक्सपीयर, वर्डस्वर्थ, शीलर आदिके काव्य नाटकोंकी तुलनात्मक आलोचना करके आर्य साहित्यकी महत्ता, मार्मि- - । . क्ता और अनुकरणीयत्ता प्रतिपादन की गई है। इसमें १ साहिल्यका आदर्श, २ साहित्यमें रकपात (ट्रेजेडी), ३ साहित्यम प्रेम, ४-५ साहित्यमें पशुत्व और मनुष्यत्व, ६ साहित्यमें वीरत्व और ७ साहित्य में देवत्व ये सात अध्याय हैं । इन अध्यायोंमें आर्य सभ्यता, आर्य सतीत्व, आर्य शृगार, आर्य वीरता आर्य परिवार, भात्मोत्सर्ग, स्वार्थत्याग आदि विषयोंकी उच्छुसित कण्ठसे महिमा गाई गई है। पढते पटते हदय स्फीत होने लगता है। प्रत्येक आर्यत्वाभिमानी साहित्यप्रेमीको यह ग्रन्थ पढना चाहिए और भार्यसाहित्यके महत्त्वको हृदयगम करना चाहिए । मूल्य ११) जिल्दसहितका १m) अन्तस्तल। लैसक-आयुर्वेदाचार्य प. चतुरसेनशास्त्री। इसमें सुख, दुरा, स्मृति, भय, क्रोध, लोभ, निराशा, आशा, घृणा, प्यार, लना, अतृप्ति, आदि अनेक मान. सिक भाव बड़े ही अनोखे ढगसे चित्रित किये गये हैं । लेसकने मानों मनुष्यके भीतरके अन्तस्तलके-भावों को बाहर निकाल कर रख दिया है। भाषा यही ही चुटीली और जानदार है। पढते समय गद्य काव्यका आनन्द भाता है। हिन्दीमे इस ढगकी यह सबसे पहली पुस्तक है । मूल्य लगभग 1) हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीज । हिन्दीकी यह सबसे पहली और सबसे श्रेष्ठ प्रन्थमाला है । प्राय सभी साहि- त्यसेवियों ने इसकी मुक्त कण्ठसे प्रशसा की गई है। इसमें प्रतिवर्ष ५-६ मह- त्वपूर्ण ग्रन्थ निकलते हैं। अब तक इस तरहके ४८ प्रन्थ निकल चुके हैं और परावर निक्लते जा रहे हैं । छपाई सुन्दर होती है और कागज बढिया लगाया जाता है। कोई भी पुस्तकालय इस अन्यमालासे साली न रहना चाहिए । इसके स्थायी प्राहकोंको सब ग्रन्थ पानी कीमतमें दिये जाते है । स्थायी ग्राहकोंके नियम और अन्योंका सूचीपत्र मँगाकर देखिए । मैनेजर, हिन्दी-ग्रन्थ रत्नाकर कार्यालय, हीरावाग, पो. गिरगाँव, बम्बई।

-- विषय-प्रवेश। प्राय नौ वर्ष हुए, मुझे पहले पहल अरथी कविताके पदनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ था । उसके बाद फिर मेरी प्रवृत्ति देव-योगसे अरबी कविताके स्वाध्यायकी ओर बढती ही गई। यहाँ तक कि पिछले पाँच वर्षोंमें मुझे अरबीके उच्च कोटिके प्रन्थोके अवलोकन करनेका सुअवसर मिला। मैंने भरबी काव्यका अधिक स्वादिष्ट रस चखा ओर देसा कि लैटिन, जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी आदि भाषाओंने अरबी कविनाओंके अनेक अनुवादोंसे अपना अपना भाण्डार भरा है। फिर तो मैंने दृढ सङ्कल्प कर लिया कि एक न एक दिन हिन्दीके प्रेमियों- को भी अरबी काव्यका कुछ न कुछ स्वाद अवश्यमेव चखा- ऊँगा। सो उसीका यह फल है कि मैं आज हिन्दी प्रेमियोके सम्मुस यह छोटीसी पुस्तक रस रहा हूँ। - पहले मेरा विचार था कि "सबा मुअल्लका" अर्थात् अर- यीकी उन सात कविताओंका अनुवाद करूँ, जो कि सर्वोत्तम समझी जानेके कारण मी काये (मन्दिर) की दीवारपर सुवर्णाक्षरों में लिखकर लटकाई गई थीं। परन्तु उनके भावोंको दर्शाने के लिये अधिक व्याख्याकी आवश्यकता थी। केवल २ अरवी काव्य-दर्शन। अनुवादसे उनका मर्म भली भाँति समझना अति कठिन था। इसी लिये भिन्न भिन्न अन्धोंसे अनेक विषयोंकी कविताओंका अनुवाद देना ही मैंने अधिक "उचित समझा जिसमें पाठकोंको हर प्रकारकी कविताका थोड़ा थोडा परिचय हो सके। इस कारण, यद्यपि इस प्रन्थकी तैय्यारीमे मुझे अरबीके अनेक काव्य-प्रन्थाको देसना पडा है और अनेक ग्रन्थोसे भिन्न भिन्न प्रकारकी सामग्री एकत्र करना आवश्यक प्रतीत हुआ है, तथापि मैने अधिक सामग्री ऐसे ही काव्य प्रन्थासे ली है, जिनका मान आज केवल भारतवर्ष में ही नहीं है, बल्कि अरब, मिन, इरान, तुर्किस्तान और शाम आदि मुसल्मानी देशाम भी जिनका सनस अधिक मान है और जिनकी प्रतिष्ठा पश्चिम- के धुरन्धर प्राच्य विद्वानोके हृदयोंमे भी घर किये हुए है। इसके आतरिक्त यह बात भी बतला देने योग्य है कि मैंने विशेषत रुचिकर तथा छोटी कविताओंका ही अनुवाद दिया है, जिसमें सब लोग सुगमतासे पढ़ें और किसीका जी न उकताय । जो कविता बहुत बडी थी, अथवा जिसमें अधिक व्याख्याकी आवश्यकता थी, उसमेंसे केवल उतना ही भाग ले लिया है जितना कि अधिक उपयोगी और सरल समझा है । साथ ही कुछ बडी कविताओंका भी अनुवाद दे दिया है जिसमे लोग यह जान सके कि अरवीमे उपमान, उपमेय आदि किस ढगके होते हैं, तुलनाएँ इत्यादि कैसे की जाती हैं, इत्यादि, इत्यादि । 'अरवी कवियोंने तुलनाओं तथा उपमाओंमें प्राय ऊँट और खजूरसे काम लिया है। और वास्तवमें उस देशकी विषय-प्रवेश। , अवस्थाके अनुसार ऐसा होना भी चाहिए था । परन्तु उनकी तुलनाएँ तथा उपमाएँ ऐसी सटीक और चुभती हुई होती हैं कि उनको पढकर विचारशील पुरुष मुक्त-कण्ठसे उनकी प्रशसा किये बिना नहीं रह सकते। साथ ही यह भी अच्छी तरह प्रकट है कि ऊँट अरयके मरुस्थलका जहाज है। घोडा भी अरब ऐसे युद्धवीरोंके लिये कुछ कम उपयोगी पशु नहीं। मेघ- के छा जाने तथा वर्षाके हो जानेसे भी अरबोंके सुसमें अपूर्व वृद्धि होती थी। अस्तु, ऊपर कहे हुए विपयो पर अरबी कवियोने जो विचार प्रकट किये हैं, उनकी चाशनी भी पाठकोंके घखनेके लिये थोडी सी रस दी गई है। अरय लडाईके पुतले थे । उनका समस्त जीवन समाममय होता था । घडी वीरताके साथ मरना मारना उनके वाये हाध. का खेल था । इसी लिये उनकी समाम सम्बन्धी कविताएँ बडी विलक्षण हैं । मैंने उस विषयकी भी अनेक कविताओंका अनु- वाद दिया है। परन्तु यह भी स्मरण रहे कि अरषी कवितामें केवल पुरुपोंने ही यश नहीं प्राप्त किया, बल्कि लियोंने भी पर्याप्त तथा आदरणीय कार्य किया है। इसलिये मैंने कई त्रियोंकी कविताओंका भी अनुवाद दिया है। परन्तु हिन्दी जाननेवालोंके लिये यह कठिन बात है कि वे भली भाँति जान सकें कि अमुक नाम किसी स्त्रीका है और अमुक पुरुपका । इसी लिये प्रत्येक कवित्रीके नामके बाद कोष्ठ में 'बी' शन्द लिख दिया गया है। अब पाठकगण जिस कविताके अन्तमें नामके - भरबी काव्य-दर्शन। साथ उपर्युक्त शब्द देखें, उसके विषयमें समझ लें कि यह नाम एक स्त्रीका है। अरबी एक ऐसी अपूर्व भाषा है कि उसके अनेक शब्दों. का भाव अंग्रेजी, उर्दू तथा हिन्दी ऐसी भाषाओं में निस्सन्देह एक बड़े वाक्य के बिना दर्शाया ही नहीं जा सकता। इसलिये अनुवाद में जितनी कठिनाइयोका सामना करना पड़ा है, उनको मैं ही जानता हूँ। इसके अतिरिक्त उच्च कोटिके ग्रन्थोसे सीधे अनुवाद करना भी कुछ सुगम कार्य न था। जिन लोगोने कभी ऐसा कार्य किया है, उनको इसका अच्छी तरह अनुभव होगा । इसलिये अधिक न लिसकर अनुवादके सम्बन्ध में मैं केवल यह यतला देना चाहता हूँ कि मेरा तात्पर्य इस अनुवादसे यह नहीं है कि लोग इसके द्वारा अरबीकी मूल कविताका स्वा- ध्याय करें । बल्कि मैंने इस बात पर लक्ष्य रखकर अनु- वाद किया है कि लोग इससे अरवी कविताका कुछ रस चख सकें। इसलिये अनुवादमें दो बातों पर विशेष रूपसे दृष्टि रक्खी है। एक यह कि अरबीका मर्म न जाय । दूसरे यह कि हिन्दी-प्रेमियोको स्वाद अच्छा मिल सके। अनुवादकी शुद्धताका कितना ध्यान रक्खा है, इस सम्ब- न्धमें मैं यह बतला देना उचित समझता हूँ कि जिन अन्यो तथा कविताओंकी टीकाएँ मिल सकी है, उनकी अनेक टीका- टिप्पणियोंको भी ध्यान देकर देस लिया है । परन्तु फिर भी यदि कहीं तनिक भी शका हुई है तो उसकी निवृत्ति अपने माननीय मौलाना हजरत सैय्यद मुहम्मद तलहा साहा और मौलाना हजरत नज्मठद्दीन साहय सरीखे अरबोफे धुरन्धर , विषय प्रवेश। , ore मौलानाओंसे कर ली है, जो कि मेरे आदरणीय उस्ताद है और जिनकी योग्यताके विषयमें केवल इतना ही कह देना पर्याप्त है कि दोनों माननीय मौलाना साहबान पजाय विश्व- विद्यालयके ओरिएण्टल कालिज, लाहौर में मौलवी आलिम और मौलवी फाजिल अर्थात् अरवीकी उच्च श्रेणियोंके अध्यापक यद्यपि मैंने अनुवादको यथाशक्ति सुगम ही रक्खा है, तथापि कहीं कहीं भावश्यकतानुसार टीका टिप्पणी भी कर दी है जिसमें उन लोगों की जो अरबी और अरबोंसे बिलकुल अन- भिज्ञ हैं, ममझनेमे लेशमात्र भी कठिनता न हो। फिर भी यदि पाठक निम्नलिखित बात ध्यानमे रक्सेंगे तो निस्सन्देह अनु- वादके समझनेमें बडी सुगमता हो जायगी (१) अरब कजूसीको बहुत ही बुरा समझते थे । (२) अरव एक बहुत गरम दश है। दिनके समय वहाँ यात्रा करना कठिन होता था। इसलिये लोग प्राय रात्रिमें यात्रा करते थे । किन्तु रेतमें राह भूलना साधारणसी बात थी। ऐसे यात्रियों की सुगमताके लिये गृहस्थोंके यहाँ अग्नि जलाई जाती थी। परन्तु ऐसी अनि उसीके यहाँ जलती थी जो अतिथि-सेवी होता था। आगतुकोंकी अच्छी तरह सेवा फरना और उनको उत्तम सानपानसे सुस देना पडा पवित्र, महत्त्वपूर्ण तथा प्रशसनीय कार्य समझा जाता था । जो गृहस्थ ऐसे अपरिचित आगन्तुकोंकी सेवामें किसी प्रकारको कसर करता था वह अच्छा नहीं समझा जाता था। जिसके द्वारसे आगतुक रुष्ट होकर जाते थे वह अति निन्दनीय होता था । साथ ही इसके यह भी जान लेना चाहिए कि प्राचीन अरवमें

अरवी काव्य-दर्शन।
अफालके दिनोमें भी जो कोई आगन्तुकोंको सुख पहुँचाता था;
वह विशेष रूपसे प्रशसाका भागी होता था।
(३) प्राचीन अरय जब कभी अपने सहायकोको युद्ध
ठाननेकी सूचना देना चाहते थे और उनके एकत्र होने के लिये
घोषणा करना चाहते थे, तब उस अवसर पर भी किसी ऊँची
जगह पर अमि प्रज्वलित किया करते थे। इसके अतिरिक्त
कई अन्य बातोंके चिह्नस्वरूप भी अग्नि प्रज्वलित की
जाती थी।
(४) अरब लडाईमे मर जाना अच्छा समझते थे।
(५) तलवारके कुन्द हो जाने अथवा उसमें दन्दाने
आदि पड़ जानेका अभिप्राय यह है कि अति घोर युद्ध हुआ ।
(६) बदला लेनेमे बडा गौरव समझा जाता था ।
(७) अरब लूटमार करके धन प्राप्त करना अच्छा सम.
झते थे। उनके खयालमें यह जीवनका एक अग था । लूटमार
प्राय अन्धेरी रात अथवा प्रात कालके समय होती थी।
(८) दोपहरके समय यात्रा करनेवाला बडा साहसी
समझा जाता था।
(९) किसीसे माँगनेके बदले दुख भोगना, यहाँ तक कि
मर जाना भी वे अच्छा समझते थे ।
(१०) अरबके कवि अपनी अथवा अपने पूर्वजों आदिकी
मशसा करना बुरा नहीं समझते थे ।
(११) अरवीके 'उम्म' शब्द का अर्थ है 'माता' | 'इन'
,

हो सका, विषय प्रवेश। अथवा 'बिन' का अर्थ 'पुत्र', 'बिन्त, का पुत्री' और 'नी' अथवा 'बनू' का अभिप्राय 'समुदाय' या 'कुटुम्बी' होता है। (१२) अरवीको किसी मूल कविता पर उसका शीर्षक नहीं दिया था। प्रत्येक शीर्षक मेरी ओरसे लगाया हुआ है। जिसको कविताका अनुवाद किया है उसका नाम नीचे दे दिया है। (१३) जिस कवि अथवा कवित्रीका नाम नहीं मालूम उसके नाम के बदले "एक कवि" अथवा "एक स्त्री" आदि ऐमे शब्द रख दिये गये हैं (१४) कई कवियों ने अपनी पत्नीको सयोधन क के कवि. ताएँ की है, और कई कवियोने अपने आपको सम्बोधन करते हुए शिक्षाप्रद कविताएँ की हैं। और कई कवियोंने तो मध्यम पुरुषको सबोधन किया है। किन्तु उनका अभिप्राय एक प्रकारसे सार्वभौमिक ही है। परन्तु कुछ कविताएँ ऐसी भी हैं जो कि विशेष घटनाओंकी सूचक हैं तथा अरबोंके आचार- विचार तथा व्यवहार आदिको भी प्रकट करती हैं। (१५) अनेक कवियोंकी कविताओंमे यह बात भी पाई जाती है कि उन्होंने अपनी कविताओंके प्रारभमें अपनी प्रिया अथवा किसी कपोलकल्पित प्रियाका ध्यान रखकर शृङ्गार रसके कुछ पद्य अवश्य कहे हैं। मुझे पूर्ण भाशा है कि इन सब बातोंपर ध्यान रखने से पाठकोंको अन्धके अवलोकनमे तनिक भी कठिनाई न पड़ेगी। और यदि कोइ कठिनाई उपस्थित भी होगी तो तनिक विचार- अरबी काव्य दर्शन। श्री महाशय दयालजी भीमभाई देसाई एम० ए० तथा श्रीमान् सन्तराम जी बी० ए०का भी मैं कृतज्ञ हूँ । इनके अतिरिक्त मैं श्रीस्वामी वेदानन्द तीर्थजी मीमासक चक्रवर्तीको विशेष रूपसे धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता क्योंकि आपने कृपापूर्वक प्रन्थका केवल अवलोकन ही नहीं किया, बल्कि यथास्थान सरक- तके श्लोक आदि देनेमे भी बड़ी सहायता की है। अनुवादक तथा सम्पादक।

अरबी कविता। यदि कोई मुहासे पूछे कि प्राचीन अरय क्या था, तो मै यही कहूगा कि लडाईका केन्द्र था। क्योंकि तुच्छसे तुच्छ याता पर भी अरवोंका लडाईके लिये कटिबद्ध हो जाना एक माधारणसा कार्य था। सहस्रो मनुष्योंका तलवारफे घाट उत्तर जाना एक छोटीसी बात थी। वो लड़ते रहना भानों उनमें एक प्राकृतिक गुण था, यहाँतक कि अपने सम्बन्धियाको भी तलवारों और भालोंसे साफ कर देना उनके स्वभावका क अग था। अपमानकी जो मर्यादा (Standard) उनकी रष्टिमे थी, उसकी परिभाषा यदि असम्भव नहीं ता दुस्तर अवश्य है। उनकी प्रत्येक लडाई तथा उत्तेजित करनेवाली या लड मरनेवाली पातमें निस्सन्देह एक न एक विलक्षणता या चमत्कार है। परन्तु जिस वस्तुने मित्रों और शत्रुओंके एक साथ बैठनेका वीज बोया, आगे पीछे बैठनेका भेद-भाव मिटाया, किसीकी बातको पान देकर सुनने सुनानेके लिये बाध्य किया, वह अरबी कविता ही थी। यह बात प्राय सभी लोग निर्विवाद रूपसे जानते और मानते हैं कि प्रत्येक भापामें कविता घड़ी ही मनोरन्जक होती है। हर एक भाषामें कविताको उच्च पद प्राप्त है। सस्कृत- में कविताको जो महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त हो चुका है, वह अकथ- .

भरयी काव्य-दर्शन।
नीय है। किन्तु अरयीमें भी कविताका जितना आदर किया
गया है और कवितासे जितना काम लिया गया है वह भी
कुछ कम प्रशसनीय नहीं है। कविताकी ही बदौलत लोग
अरवका इतिहास जाननेमें समर्थ हुए हैं। यदि प्राचीन अरबमें
कविताका प्रचार न होता तो लोग अरबका बहुत कुछ इतिहास
जान ही न सकते। इसके अतिरिफ एक विद्वानका यह भी
मत है कि यूरोपियन भापाओंके छन्द शास्त्रको रचना अरबी
कविताके ही आधार पर हुई है।
कविताकी उत्पत्ति।
अरवी कविताकी उत्पत्ति कब और क्योंकर हुई थी,
इस विषयमें अनेक लेसकोंके अनेक मत हैं जिनका साराश
इस प्रकार है -केवल अरबी कविताकी ही नहीं, बल्कि
समस्त ससारमें कविता मात्रकी उत्पत्ति बाया ( हजरत )
आदम द्वारा हुई है जो कि सृष्टिके आदि मनुष्य थे। उन्होंने
ही पहले अपने पुत्र हाबीलके शोकमें विलापमय पद्य कहे थे।
उनका कथन सृष्टिको एक प्राचीन भाषा सुर्यानीमें था।
परन्तु एक लेखकका मत है कि पाया आदमका कथन गद्यमें
था। तत्पश्चात् जब उस सुर्यानी गद्यका अनुवाद अरवीमें
साधारण रीति पर किया गया तो वह कविता रूपमें पाया
गया, और उसी समयसे अरबी कविताकी नींव पड़ी।
कविताकी उत्पत्ति चाहे जिसके द्वारा हुई हो, परन्तु पहले
कविता वास्तवमें किसी नियमबद्ध शैली पर नहीं होती थी।
उसमें और प्रचलित कविताके ढगमें बडा अन्तर था। फिर
यादको जिसने सशोधन करके कवितामें एक नया चमत्कार
.

भरबी कविता।
उत्पन्न किया वह अरयके एक बडे सरदार कुलैबका भाई था।
उसका नाम अदी था । वह स्वीाका पुत्र था। परन्तु उसने
कवितामे चमत्कार उत्पन्न किया था, इसलिये वह प्राय"
मुहलाहलके नामसे विख्यात है। इस कविका जन्म हजरत
मुहम्मद साहबके जन्मसे लगभग एक सौ वर्ष पहले हुआ था।
प्राचीन कालमे कविता।
वास्तविक अर्थात् प्रचलित अरबी कविताके जन्म कालका
जो पता चलता है वह हजरत मसीहसे ४० वर्ष बाद
अर्थात् हजरत मुहम्मदके जन्मसे लगभग १०० वर्ष
पहले ठहरता है। अपने जन्म कालसे लेकर हजरत
मुहम्मदके ममय तककी कविता अरबी साहित्य ससारमे
सबसे उच्च कोटिकी कविता थी। आज भी उसी कालकी
कविता प्रामाणिक रूपमें पेश की जाती है और उसका लोहा
आज भी अरबीके बडे बडे विद्वान् मानते हैं। इसके सिवा
यह भी एक महत्त्वपूर्ण बात है कि हजरत मुहम्मद साहवस
पहलेका समय 'अज्ञानताका समय' कहा जाता है। परन्तु
उस कालके कई कवियोंने काव्यमें ज्ञानयुक्त वातोंको भी
दर्शाया है। पर यह बात अवश्यमेव स्पष्ट है कि प्राचीन कवि.
ताओंमें किसी अद्भुत चीजका वर्णन नहीं है, किन्तु अरबके
घोस, ऊँटों और टीलों आदिके विषय में भी जो कुछ कहा
गया है, उसमें भी चित्ताकर्षणकी जबरदस्त शक्ति है। इसके
अतिरिक्त प्राचीन कवियोंका बहुत कुछ महत्व इस बातसे भी
जाना जा सकता है कि उस कालमें अनेक कवि ऐसे भी हुए

कहते
अरवी काव्य-दर्शन।
हैं जिन्होंने समय पड़ने पर तुरन्त बिना सोचे विचारे बडी
अपूर्व कविताएँ की हैं। इन सब बातोसे कुछ ऐसा प्रतीत
होता है कि प्राचीन अरवमें कविताका प्रबल संस्कार स्वा
भाविक ही था। इसी कारण कवि लोग अलंकृत कविताके
द्वारा लोगोंको जिधर चाहते थे, उधर ही फेर देते थे । यहाँ तक
कि यदि युद्धस्थलमे पूर्वजोंकी वीरता और गौरवका वर्णन
करते तो सहस्रों दुर्बल आत्माओंमे भी अदम्य उत्साह भर देते
थे । और यदि शोक प्रकट करने के लिये कभी कुछ ।
तो आँखोंस आँसुओंकी धारा बन्द न होने देते थे । कविता
की ही बदौलत लोग बडा सम्मान पाते थे। अरमें प्रत्येक
कुटुम्बके लाग पृथक् पृथक् रहा करते थे। इसलिये जिस
कधीले (समुदाय) के लाग कवि होते थे, वह भी बडा आदर.
णीय समझा जाता था। कविताका ही एक ऐसा द्वार था
जिससे किसीकी भलाई या बुराई बिना किसी समाचारपत्र
या नोटिसके समस्त अरवमें फैल जाती थी।
अरबोंकी स्मरण-शक्ति।
अरयोकी स्मरण शक्ति बढी अपूर्व थी । वे उसके बलस
केवल अपनी तथा अपने समुदायकी ही वशावली कण्ठस्थ
नहीं रखते थे बल्कि अपने घोडोंतककी वशावली भी अपनी
जबान पर रखते थे। अवश्य ही बहुतसे लोगोंको यह जान
कर आश्चर्य होगा कि अरबी साहित्यमें पहलेसे हो किसी
किसी वस्तुके महनों नाम हैं। जैसे तलवारके ४०००, ऊँट
और मदिरा, प्रत्येक १०००, सिंहके ५०० और अजगरके

. अरबी कविता। १५ " २०० नाम अरबीमें हैं । अरव इन सब नामोंको फष्ठस्थ रखते थे, और अपनी स्मरण-शक्तिकी ही बदौलत प्राय लिखनेको बुरा समझते थे । वे कहते थे कि यदि लेखमें सब बातें आ जायँगी तो स्मृतिका विश्वास जाता रहेगा। साथ ही लेखकी अशुद्धि भी प्रामाणिक समझी जा सकेगी। इस प्रकार समस्त , चातोंको वे स्मरण रसना ही सर्वोत्तम समझकर अनेक कविताएँ याद कर लेते थे। इसके अतिरिक्त बहुतसे लोगोंमें यह गुण भी था कि वे केवल एक बार सुनकर ही कविताएँ याद कर लेते थे । इसी लिये यदि एक बार किसीकी भलाई अथवा चुराई अरबमें फैल जाती, तो वह अमिट हो जाती थी। क्योंकि एक पीढीके बाद दूसरी पीढीवाले क्रमानुसार सय कुछ स्मरण कर लेते थे और इसी प्रणालीके कारण हम अरव- की कविताओंको जान सके हैं और उनके प्राचीन आचार- विचार बहुत कुछ मालूम कर सके हैं। जिस प्रकार सस्कृत- चालोन धर्मशास्त्र तथा इतिहास तकको कविताका रूप दे दिया है, उसी प्रकार अरबोंने भी अपने सम्बन्धको प्राय सभी बातोका कविताम वर्णन किया है। और इसी लिये सब लोगोंने माना है कि कविता ही भरवका कोप है। . कविताका प्रभाव। अरबी कविताके विषयमें यदि यह कहा जाय तो अनु. पित न होगा कि कविताने अरब निवासियोंपर जादूकासा काम कर दिखाया है । अरव निवासियोंका पहले यह हाल या कि वे एक दूसरेसे पृथक् पृथक् रहा करते थे। यरा पारा

जिस प्रकार आजकल अरबमें स्त्री-शिक्षाका कुछ भी प्रबन्ध
नहीं है, उसी प्रकार प्राचीन कालमें भी कोई प्रवन्ध नहीं था।
म्वी पद्य भी कहे हैं। और जिस प्रकार अरबी काव्यमे अनेक
पुरुपोंने अमिट यश पाया है, उसी प्रकार अनेक नियोने भी
अरबी मसारमें अक्षय कीर्ति प्राप्त की है । ऐतिहासिकोंका मत
है कि एक बार ओकाजके बाजारमें ही कवि-सम्राट् इमर
उल्कैस और एक अन्य कविके बीच में "काव्य विषयक कुछ
योग्यतामा परिचय दिया था, उसका लोहा आजकल के
जरचीके पडे बढे विद्वान और बुद्धिमान् भी निमकोच भावले
अरबी काव्य-दर्शन।
है; और न एक मात्र ऐसी ही बातोंका उदेख है जिनसे
दार्शनिक अथवा नास्तिक लोग ही किसी दशामें इन्कार कर
सकते हों। बल्कि अधिकाश वर्णन शूरता, वीरता, विलाप,
प्रेम, तलवार आदिका ही है । तथापि यूरोपियन विद्या प्रेमियोंने
अरपी कविताका बहुत अधिक आदर किया है।
कवितामें स्त्रियोंका भाग।
इस अवसर पर यह
है कि अरबी कवितामें स्त्रियोंने जो काम किया है, वह भी उस
कोटिमें परिगणित होता और आदर-से देखा जाना है।
फिर भी कविता तथा साहित्यको जो सेवा स्त्रियों द्वारा हुई है,
वह आज भी प्रशमनीय और आदरणीय समझी जाती है।
स्त्रियोके रचे पद्य प्राय शोक और विलापसे भरे हुए हैं
परन्तु किसी किसी स्त्रीने शौर्य और वीर रससे भर हुए
देना भी उचित प्रतीत होता
ओज.
झगडा पड गया था। उसको निपटान में एक स्त्रीने जिस
मानते हैं।

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नीति ।

DANTA
विपत्तिके समय यदि मनुष्य नीतिसे काम नहीं
लेता तो वह अपनी जान निरर्थक खोता है और दुर्दशामे
फंसकर कष्टका भागी होता है।
लेकिन चतुर पुरुप वह है जो किसी सकटमें
पडते ही झट नीतिपर दृष्टि डालता है।
ऐसा मनुष्य ससारमै आयु पर्यन्त एक अच्छा
सरदार बना रहता है, और जब उसका एक मार्ग बन्द
हो जाता है तब दूसरा खुल जाता है ।
-तासम्बत शरना

।
अरबी काव्य-दर्शन।
नीति।
सुनहरी शिक्षा।
जिस स्थानमें भद्र पुरुषकी दुर्गति होती है उस स्थानपर
तनिक भी ठहरनेसे सकटमें पड़ना पडता है ।
जातियोमें कोई कोई दूपित स्वभाव वैसा ही असाध्य हुआ
करता ह जैसा कि जलोदरका रोग असाध्य होता है।
किसी किसी यातसे कभी तो कुछ तत्व ही नहीं निकल
जैसे, पानी पिलोनेसे मक्सन नहीं निकला करता।
मनुष्य तो चाहता है कि मेरी इन्छाएँ पूर्ण हो, किन्तु
ईश्वर उसके अनुसार नहीं करता, बल्कि स्वय जो कुछ चाहता
है वही देता है।
जय किसी जातिपर कोई सख्ती आती है तब उस
सरतीके बाद शीघ्र ही नरमी आ जाती है।
सक्ता,

भाषी कास्य-वर्शन। लोभी पुरुष अपने लोभके कारण धनी नहीं हो जाया करना । बल्कि पदार पुरुष दान करने पर भी कभी कभी धन- वान् हो जाया करता है। उदार हृदयवाला पुरुष जयतफ जीता रहता है तबतक आनन्दसे ही रहता है। और सकीर्ण हृदयवाला आयु पर्यन्त दुसी ही रहता कजसको धनसे कुछ लाभ नहीं होता, और न दानीको अपने दानके कारण किसी प्रकारका दोष ही लगा करता है। किसी किसी अति कठिन रोगकी भी दवा है। लेकिन जड़ताकी तो कोई ओपधि ही नहीं है। -क्रम बिन इल नाम । है कुछ विखरे मोती। मान मर्यादा प्राप्त कर, चाहे वह नरकमें ही क्यों नामिल। और अपमानको त्याग, चाहे वह चिरस्थायी स्वर्गमें ही क्यो न हो। एक तुच्छ मनुष्य नपुसकको मार डालता है, चाहे वह तुच्छ पालक के सिरका कपडा भी न काट सके । . सर्वस्यौवयमस्ति शास्त्रविहिन मृर्वस्य नारत्यौपरम । महरि नीतिरातक। अपात , साम्सकी विधिमे माका भौषध, परतु मृखका कोई प्रोध नहीं है।

नीति।
न्यून हो।
ईश्वरकी सृष्टि में सबसे अधिक दुखी पुरुप वह है जिसका
साहस तो घढा चढा हो, परन्तु जिसकी शक्ति उसके लक्ष्य
से
प्रतिष्ठाकी प्राप्तिमे तू सारा धन व्यय न कर दे । नहीं तो
प्रभुताकी गाँठ, जो धनके कारण बँधी हुई है, खुल जायगी ।
ससारमै उसका कुछ भी मान नहीं जिसके पास धन
नहीं। और जिसका कुर मान नहीं, मानो उसके पास धन
भी नही है।
भेड़ें चगनेवाला गडरिया अपनी अज्ञानताकी अवस्थामे
भी वैसे ही मरेगा जैसे कि जालीनूस ऐमा भारी चिकित्सक
ज्ञानी होकर मरा था ।
अनेक बार ऐसा देसा गया है कि अज्ञानीकी आयु
अधिक होती है और उसकी जान भी अधिक सुरक्षित
रहती है।
क्या श्रेष्ठ नीच कहा जा सकता है ? अथवा स्वामी
अस्वच्छ बताया जा सकता है ?
यदि तू किसी कुलीनका सत्कार करेगा तो उसका स्वामी
बन जायगा। और यदि किमी दुष्टका सत्कार करेगा नो वह
तुझे दुख देगा।
तलवार चलानेके अवसर पर प्रभुताके लिये उदारवा उमी
प्रकार हानिकारक है, जिस प्रकार कि उदारताके अवसर पर
तलवारसे काम लेना हानिकारक है।

अरबी काव्य दर्शन।
किसी स्थानमे मेरा कोई मित्र (सहायक) ही नहीं मिल
सकता। क्योंकि जब किसी मनुष्यका लक्ष्य महान हो जाता
है तब उसके सहायक भी कम हो जाया करते हैं।
बुद्धिमत्तापूर्वक थोड़ासा प्रेम निस्सन्देह अच्छा है। और
निर्बुद्धिताके साथ अधिक प्रेम भी बुरा है।
जब किसी मामले में दिल ही हाथको न उठावे तब बाहु
ही हायको क्योकर उठावेगा ?
कालने अपने सप्रदायमे यह फैसला कर रक्खा है कि
एक जातिकी विपत्तियाँ, दूसरी जाति के लिये कल्याणकारी हो।"
-~-गुवनम्वी।
.
धन और निर्धनता।
जो मनुष्य अपनी जातिमें निधन हो जाता है वह, धनकी
ही प्रशसा करता है, चाहे वह अपनी जातिमे उचकुल-उत्पन्न,
भद्र पुरुष ही क्यों न हो।
निर्धनतासे मनुष्यको बुद्धि दूषित हो जाती है, चाहे वह
एक बहुत बड़ा नीतिज्ञ और सरदार ही क्यों न हो।
• जीयो भावस्प मोननम् ।
एक प्राली दूपरेकी खुराक है (एकही जान से मरेको मर्म निभा:

-
नीति।
G
मनुष्य जब वस्त्र धारण कर लेता है तब ऐसा प्रतीत
होता है कि मानों वह कभी नम ही नहीं था। और जब
अमीर हो जाता है तब ऐसा मालूम होता है कि मानों वह
कभी गरीब ही नहीं था !
जब तू किसी जगह तग हो जाय, तो किसी दूसरी जगह
चला जा, क्योंकि तुझे बहुतसे विश्वसनीय स्थान मिल जायेंगे।
-जादिर विन मालव उत-साई।
जैसेको तैसा।
उम्म सआद (सआदकी माता) मेरा फडवा स्वभाव तथा
तीखी प्रकृति देसती है, इसलिये वह मुझको सठियाया हुआ
बतलाती है। लेकिन सच तो यह है कि वह मेरी हालत
नहीं जानती।
मैने उमसे कहा कि भद्र पुरुष चाहे फिसना ही मुनील
क्यों न हो, तथापि किसी अवसरपर यह मुसम्पर (एलवा)
से भी अधिक कड़वा पाया जाता है।
.
परिगा देरी न समानो न हित पा ।
বন বিমান বি ই বির।
विसरामें न तो भार, न गुमास, Trjan विदामामि
सनम देशको स्वागदेना चाहिर

अरबी काव्य-दर्शन।
नम्रता निर्बलता है, कठोरतासे रोष-दाब रहता है, और
जिस मनुष्यका कुछ रोब-दाब नहीं हुआ करता उसकी बड़ी
दुर्दशा होती है।
जो मनुष्य मुझसे नम्रताके साथ मिलता है, मैं भी उसक
साथ धृष्टता नहीं करता। लेकिन दुष्टताके उत्तरमे मैं अति कटु
हूँ। मैं टेढेका टेढ़ापन दूर कर देता हूँ और उसको सीधा
करके पूर्ववत् कर देता हूँ। यहाँ तक कि उसकी नाकमे एक
नकेल डाल देता हूँ जिसमें वह अपनी सीमाका उल्लंघन न
कर सके।
ऐ उम्म सआद । यदि तू मुझको बुरा भला कहती है, तो
निस्सन्देह तू एक ऐसे पुरुपको बुरा-भला कहती है जिसकी
निर्धनता की कथा प्रशसनीय है, और जिसकी अमीरीमें सबका
हिस्सा है।
जय वह अखण्ड व्रत धारण करता है, तब अपनी दोनों
आँखोके सन्मुख अपनी प्रतिज्ञाको रस लेता है और पडिया
सुरैजी तलवारकी भाँति कर्मक्षेत्रमें प्रविष्ट हो जाता है।
-~ममा विनाशिव।
यदि तुझे किसीका अनुसन्धान करनेकी स्वतन्त्रता दी जाय,
तो किसी विवेकी और कुलीन को अपना मित्र बना ।

नीति।
.
अच्छी मित्रता।
मैं दुर्वल तथा नीच नहीं हूँ, और न ऐसा ही हूँ कि मेरा
मित्र यदि मुझसे मुँह मोड़े तो आतुर हो जाऊँ अथवा
कड़ने लगें।
परन्तु यदि मित्र प्रीति रक्से तो मैं भी निस्सन्देह प्रीति
रखता हूँ। और यदि उमका मार्ग मुझसे दूर हो जाता है तो
मेरा मार्ग भी उससे दूर हो जाता है।
ध्यान रहे कि अच्छी मित्रता वह है जिसे आत्मा पसन्द
करे, और वह नही, जो कि दु सदायी बनकर आवे ।
-अमद वशता क कवि।
जय मेरा कोई मित्र मुझसे नाता तोड़े और मुझसे
मित्रता रखना उचित न समझे, तय मैं ऐसा नहीं हूँ कि उस
पर कोई दोष आरोपण करूँ या उसको कोसँ। मैं उसको
विस्कुल छोड देता हूँ। फिर हम दोनों पृथक पृथक् जीवन
म्यतीत करते हैं । परन्तु मैं उस समय भी कोई अनुचित शब्द
मुंहसे नहीं निकाला करता।
पेट पापीकी मित्रतासे पृथक् रह, क्योंकि जब उसके
साथ मित्रताकी रस्सी टूट जाती है तब वह झूठी बातें बनाया
करता है।
-मुतवक्ति-मत लसी।

अरबी काव्य-दर्शन।
नम्रता निर्यलता है, कठोरतासे रोष-दाब रहता है और
जिस मनुष्यका कुछ रोब-दाय नहीं हुआ करता उसकी बरी
दुर्दशा होती है।
जो मनुष्य मुझसे नम्रताके माथ मिलता है, मैं भी उसक
साथ धृष्टता नहीं करता। लेकिन दुष्टताके उत्तरमे मैं अति कटु
हूँ। मैं टेढेका टेदापन दूर कर देता हूँ और उसको सीधा
करके पूर्ववत् कर देता हूँ। यहाँ तक कि उसकी नाकमे एक
नफेल डाल देता हूँ जिसमें वह अपनी सीमाका उल्धन ने
कर सके।
ऐ उम्म सआद । यदि तू मुझको तुरा भला कहती है, ता
निस्सन्देह तू एक ऐसे पुरुषको बुरा भला कहती है जिसकी
निर्धनता की कथा प्रशसनीय है, और जिसकी अमीरी में सबका
हिस्सा है।
जय वह अखण्ड व्रत धारण करता है, तब अपनी होनों
आँखोंके मन्मुख अपनी प्रतिज्ञाको रख लेता है और यदिया
सुरजी तलवारकी भाँति कर्मक्षेत्रमें प्रविष्ट हो जाता है ।
-~मभादविनागिरी
-
यदि तुझे किसीका अनुसन्धान करनेकी स्वतन्त्रता दी जाय,
तो किसी विवेकी और कुलीन को अपना मित्र बना।

नीति।
अच्छी मित्रता।
मैं दुर्बल तथा नीच नहीं हूँ, और न ऐसा ही हूँ कि मेरा
मित्र यदि मुझसे मुंह मोड़े तो आतुर हो जाऊँ अथवा
कड़ने लगूं।
परन्तु यदि मित्र प्रीति रक्से तो मैं भी निस्सन्देह प्रीति
रसता हूँ। और यदि उमका मार्ग मुझसे दूर हो जाता है तो
मेरा मार्ग भी उससे दूर हो जाता है ।
ध्यान रहे कि अच्छी मित्रता वह है जिसे आत्मा पसन्द
फरे, और वह नही, जो कि दु सदायी बनकर आये।
-अमद वशा पक करा
जब मेरा कोई मित्र मुझसे नाता तोड़े और मुझसे
मित्रता रसना उचित न समझे, तब मैं ऐसा नहीं हूँ कि उस
पर कोई दोष आरोपण करूँ या उमको कोतूं। मैं उसको
थिल्कुल छोड़ देता हूँ। फिर हम दोनों पृथक् पृथक् जीवन
व्यतीत करते हैं । परन्तु मैं उस समय भी कोई अनुचित गन्द
मुंहसे नहीं निकाला करता।
पेट पापीकी मित्रतासे पृथक् रह, क्योंकि जय उसके
साथ मित्रताकी रस्सी टूट जाती है तब वह झूठी बातें बताया
करता है।

अरवी काव्य-दर्शन।
। भद्र पुरुषः।
मैं उस पुरुषको अच्छा समझता हूँ जिसके कान बुरी
चातोको नहीं सुनते-मानों प्रत्येक बुरी बातकी ओरसे
बहरे हैं।
ऐसे पुरुपके विचार शुद्ध होते है । वह न बुरी बातोका
प्रचारक होता है, न अच्छे कामों में बाधक, और न वाचाल
ही होता है।
जब तू चाहे कि तू एक आदरणीय पुण्यात्मा कहलावे
और योग्य सद्व्यवहारी तथा प्रशसनीय कुलीन समझा जाय,
तो, जबकि तेरे किसी मित्रसे कोई अनुचित कार्य हो जाय,
उस समय तूही उसके लिये कोई कारण हँढ ले ।
हृदयका विशाल होना इस बातमें है कि आवश्यकताकी
पूर्ति पर तू सन्तोप करे । और यदि तू आवश्यकतासे अधिक
चाहे तो हृदयकी विशालता दरिद्रताका स्थान ले लेगी।
-सालिम दिन-चासयत-उल अमक्ष
अपनी आत्माको मनुष्य जिस प्रकारका चाहे, बना सकता
है, सो यदि मनुष्य अपनी आत्माको लालच में फंसाना चाहे
तो वह उसमें फँस जायगी । और यदि उसको सन्तोषका पाठ
पदाचे तो वह सन्तोपी धन जायगी।
भकुल इसन माग

नीति... 8 पुत्रको उपदेश । पुन बुद्धिमान पुरुष नौतिका उपदेश समझदार- को ही देता है। तू अपने मित्रसे सदैव मित्रता रस। वह मित्रता जो मदेव नहीं रहती, अच्छी नहीं है । अपने पड़ोसीफे स्वत्त्वको पहचान, और जान ले कि अच्छे मनुष्य ही पडोसीके स्वत्त्वको पहचाना करते हैं। समझ रस कि अतिथि कुछ समय बाद किसी न किसी दिन आतिथ्यकर्ताकी या तो प्रशसा करेगा, और या बुराई। लोग दो प्रकार के कार्य किया करते हैं--प्रशसनीय कार्य या निन्दनीय कार्य। हे मेरे पुत्र यह भी याद रस कि विद्वान् पुरुषको विद्या- से ही लाभ होता है। निस्सन्देह कुछ छोटी छोटी बातें ऐसी भी होती है कि जिनसे बड़े बडे बसेडे उठ खड़े होते हैं। बदला उस कर्जके समान है जो कि बारम्बार तुझमें माँगा जाता है। और यह कर्ज (बदला) कमी कभी ऋणदाता (बदला लेनेवाले) को दरसे मिलता है। दुष्टता दुष्टको पछाड़ डालती है, और अत्याचारको परागाह परो) का चारा अत्याचारीके अनुकूल नहीं होता।

मरबी काव्य दर्शन ।
कभी मुसाफिर तेरा भाई बन जाता है और सगा नाते.
दार नाता तोड बैठता है।
कभी धनके कारण मनुष्यका आदर किया जाता है और
निर्धनतासे निर्धनका अनादर होता है ।
कभी बडा नीतिज्ञ या धर्मात्मा पुरुप निर्धन हो जाता है
और पापी निर्बुद्धि धनवान हो जाता है।
कभी पापीको छोड दिया जाता है और धर्मात्माकी परीक्षा
की जाती है । सो उन दोनों में कौनसा धुरा है ?
मनुष्य उचित कार्यों में भी कजूसी करके धन इकट्ठा
करता है। परन्तु वे उँट जिनको कि वह चराता है, कभी कभी
ऐमे वारिमांकी जायदाद बनते हैं जो कि उसके वशके
नहीं होते।
उस मनुष्यकी कजूसी कितनी बुरी है जो कि काल और
नमके चक्रका ठीक निशाना है और देखता है, कि जातियाँ उसीके
मामने ऐसी पिस गई हैं, जैसे कि सूसी घास चूर चूर हो
जाती है।
सृष्टि नष्ट हो जायगी । सो न कोई सर्वदा दुखी रहेगा
और न सुखी।
जल्दी ही अपने पतिक मरनेसे स्त्री रोड हो जायगी, या
परनीकी मृत्युके कारण पुरुप रद्दुआ हो जायगा।

नीति।
किसीका पिता क्या कह सकता है कि मैं, अपने पुत्रसे
पहले मरूँगा अथवा मेरा पुत्र मुझसे पहले मर जायगा।
रणशूर वह है जो युद्ध स्थलकी कठिनाइयोंके समय
भी दृढ हृदयवाला हो, आपदाओंसे दुखी न हो और
मत्याग्रहमें मैदान न छोडे ।
स्मरण रहे कि भीरु तथा छिछोरे मनुष्यमें लडाईका भार
उठानेकी शक्ति नहीं होती।
अन्छे घोडोंमसे सर्वश्रेष्ठ घोडावह है जो बहुत दौडता और
खून लगाम चनाता है।
-यजीद निन हुक्म-उल सकी।
।
मनुष्य और उसका साहस ।
जिस मनुष्य में जितना साहस होता है उसीके अनुसार
उसके संकल्प भी होते हैं। और जिस मनुष्यका जैसा दान होता
है उसीके अनुसार उसके प्रशसनीय कार्य भी हुआ करते हैं।
जो मनुष्य भीरु है वह छोटे छोटे कायोंको भी बहुत
बड़े बड़े कार्य समझता है। और जो साहसी होता है वह
बहुत बडे बडे कार्योको भी छोटे ही छोटे कार्य समझता है।
मैं अपनी जातिके कारण श्रेष्ठ नहीं हुआ, बल्कि मेरे
कारण मेरी जाति श्रेष्ठ हुई है। और मुझे अपने आप पर गर्व
है, न कि अपने पाप-दादोंके कारण ।
वीर पुरुप उस समय भी सुरक्षित होता है जब कि
बडे बडे सरदारोंकी छातीके रक्त में माला घुसा होता है।
-मुतनी।
३

भरवी काव्य-दर्शन।
अपरिचितका विश्वास नहीं।
जब कि कोई मनुष्य क्रुद्ध हो और न तो उसके लिये मृत्युमे
भी भयभीत न होनेवाले सवार युद्ध हो, न अति दुस्तर
कार्य करनेवाले महाप्रतापी ही उसकी सहायता करें।
ऐसे मनुष्यको एक तुच्छ शत्रु भी तोड़ डालता है और
सदैव उस पर आफत आती रहती है, चाहे वह कितना ही
और शक्तिशाली क्यों न हो।
मैत्री-कालमें, तू जिससे चाहे, भात-भाव रख ले। किन्तु
यह जान ले कि निस्सन्देह तेरे चचेरे भाईके सिवा, ससारमें
प्रत्येक व्यक्ति अपरिचित है।
तेरा सथा भाई (तेरे चचेरे भाइयोसे) यह है जिसको
तू अपने सहायतार्थ बुलावे और वह प्रसन्नतापूर्वक तेरी
सहायताके लिये आवे-चाहे रणक्षेत्रमें रककी धारे ही
क्यों न बहती हों।
तू अपने चचेरे भाईसे विमुख मत हो, चाहे वह कुटिल
ही क्यों न हो, क्योंकि उसीकी बदौलत कार्य संवरने और
बिगड़ते हैं।
R
यदि
तू किसी मित्रका उत्सुक हो, वो प्रत्येकको जो कि
मित्रताका दम भरता है, अपना मित्र न समझ ।
-एक कवि

नीति। चेतावनी। जब कि तू धनी हो और अपनी आवश्यकतासे वच रहन- चाले धनको पुण्यार्थ न दे तो तेरी प्रशसा करनेवाला कोई न होगा। यदि तू उस मनुष्यकी रोक थाम नहीं करेगा जो तेरे निकट रहकर तुझे दुख देता है, तो दूरवाले तुझपर तीर चलावेंगे। जब कि तेरी शान्ति तेरी अज्ञानतापर प्रबल न रहेगी, तो तुझपर वहुनसी निजालयों और कड़ककी भरमार रहेगी। यदि तेरे सकल्पकी दृढता तेरे सशयको दूर न कर देगी तो तू अन्य लोगोंके अधीन रहेगा, जैसे ऊँटनी अपनी नकल वाले अधिकारीकी अधीनतामें रहती है। जव गाडनेवाले तुझको कयरमे गाड देंगे और तेरा माल और लागोंकी जायदाद बन जायगा, तब तुझको अपने धनसे भी लाभ न होगा। यदि तू अतिथिको अच्छा भोजन न देगा और उसको उत्तम आसन पर न बैठावेगा, तो तू ऐसे अपयशका वस्त्र धारण करेगा जिसको लोगोंकी गालियाँ, तथा उनके पद्य औ गय सदैव प्रकट करते रहेंगे। -मुहम्मद बिन प्रवीशहाज। जमा किये अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिश्त्तते । म तस्मै दुष्कृत दत्त्वा पुग्यमादाय गच्छनि ॥ जिसके घरमे गतिथि निगरा होकर लौटना है वह अपने पी उसे देर और उसके पुण्य लेकर जाना है (क्योंकि वह स्थान स्थान जाकर उसका अपयश करेगा और भपयश पापका फल है। अपयशके विम्नारसे मुकीर्तिका लोप हो हो जाता।

,
भरयी काव्य दर्शन।
महत्त्व किसमें है।
यद्यपि मैं बड़े डील-डालवाला नहीं हूँ तथापि उत्तम कार्यो-
की बदौलत महान हो सकता हूँ।
शरीरकी सुन्दरता तथा शोभासे कोई मनुष्य प्रशसाका
भागी नहीं हो सकता, जबतक कि शरीरकी कान्तिके अनुसारही
उसमे ज्ञान न हो।
जब मैं भद्र पुरुपोंकी सङ्गतिमे रहता हूँ, उस समय में
दान करनेमें उनसे बढ जाता हूँ। यहाँ तक कि मुझे ही सर्व
श्रेष्ट कहा जाता है।
प्राय हमने यह देखा है कि वे शाखाएँ सूख जाती हैं
जिनको उनकी जडोंने जीवित नहीं रक्खा है।
मैंने पुण्यके समान कोई ऐसी वस्तु नहीं देखी जिसका
स्वाद मीठा हो और आकृति भी चारु हो ।
-जारीनका एक कवि
कमीनाके पास बैठना कमीनगीका चिह्न है। और जो
मनुष्य किमी पडितके पास बैठा करता है, चतुर कहलाता है।
-एक कवि।
.
गयौवनसपना विगालकुलममा ।
विधाहीना न शोमन्ते निर्गधा व किंशुका ॥
मुदरसा तथा जवानीसे युक्त, उत्तम कुलोत्पन किंतु नानरहित मनुष्य
गयरहित हाककी भाँति शोभाशन्य रहने है।
* कविका अभिप्राय यह है कि जिम कुटुमके लोग अच्छे कार्य नहीं किया करते,
बरदुम्न नष्ट हो जाता है।
भनुवादका
.

नीति। नीति-उद्यान। जिस मनुष्यने अपने मामलोम कालके चक्रोसे कोई शिक्षा नहीं प्राप्त की, उसको बे-घरवाहेके उँटोके साथ चरना चाहिए। जो मनुष्य सावधानीको सो बैठता है, वह अपने कार्यमे सफल नहीं होता । और जो मनुष्य घमण्डके वाण चलाता है वह अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर सकता। जो जड़ोकी सगतम बैठेगा, वह अपने लिये लज्जाके फ्ल चुनेगा और किसी वडी आपत्तिका शिकार बनेगा। जो मनुष्य दान करता है वह सरदार बन जाता है और लोग उसके बिना दामके गुलाम बन जाते हैं। पर कजूसोकी हालत एक सी ही बनी रहती है। जो मनुष्य अपनी मान-मर्यादाकी रक्षा नहीं करता उसके स्वभावमे असाध्य त्रुटियाँ जड पकड लेती हैं जो मनुष्य अनुचित रीतिसे एकत्र किये हुए धनकी बदा. लत उच्च पद प्राप्त करना चाहता है, वस्तुत अपनी मूढताके कारण उसकी बड़ी दुर्दशा होती है और वह बडे सकटम पडता है। जो मनुष्य हिलमिलकर रहता है, वह अच्छी तरहसे जीवन व्यतीत करता है, और सर्वश्रेष्ठ जीवन उसका है जिम- मे भलमनसाहत है । पर जो कायरं तथा कजुस है, उसका जीवन अति निकृष्ट है। --सलाहउद्दीन सादी ।

अरबी काव्य-दर्शन। आदर्श नीति। सदाचारी विद्वान् । तू प्रसन्न हो, क्योकि तू बिना जलके ही खूब हरा भरा है। हे अल्पज्ञ । यद्यपि तू लहर मारनेवाले जलमे है, तथापि तू प्यासा ही रहेगा। जिन शुभ बातोका तूअभिलाषी है, उनके हेतु आलस्यको त्याग दे । क्योकि आलसी शुभ वस्तुओंकी प्राप्तिमे सफली भूत नहीं हो सकता। अपनी मर्यादा तु बनाये रख और उसका वस्त्र न फाई, क्योंकि केवल भद्र पुरुपही अपनी मर्यादा बट्टा नहीं लगने देता। समस्त लोगोंको एक जैसे स्वभावका मत समझ लो, क्योंकि उनकी प्रकृनियों इतने प्रकारकी हैं जिनकी तुम गणना नहीं कर सकते। लोग उस मनुष्यके भाई हैं जो अपनधनके वलसे सम्मान पाये हुए हैं। परन्तु जब वह धन जाता रहता है, तब वे उसके विरोधी बन जाते हैं। • "उधमेनैव सिध्यति कायाणि न मनोर) । नदि मुनस्य मिहरय प्रवि रान्ति मुखे सुगा ।" उद्योगसे ही कार्य सिद्ध होते हैं न कि मनोरथोंसे। मोये हुए रोरके हमें द्विग्न नहीं घुसने। "न लभन्ते विनोयोग सपद पद । सुरा क्षीरोद विक्षोममनुभ्यामृत पपु ॥" उपोको बिना जीव सपत्तिकी पदवी महापाते । देवतामोंने भी हारसागर मयन- पर अनुभव करके अमृत पिया था।

नीति। उभरती हुई जवानीमें चटक मटककर चलनेवाले । यता, क्या कभी कोई मतवाला मी नियत स्थानपर पहुँचा है ? तू अपनी उभरती हुई जवानीके धोखेमें न आ, क्योंकि कई नवयुवक अपनी युवावस्थामे ही परलोक सिधार गये है। यदि किसी मनुष्यके आचार विचार शुद्ध हो तो पर- मात्मा उसके पापोंको क्षमा कर देगा। जब तक बस चले, नेकी कर, क्योंकि मनुष्यमे सदैव नेकी करनेकी शाकि नहीं रहा करती। उद्यानकी सुगन्धि फलियोंसे हुआ करती है, और भद्र पुरुषकी प्रतिष्ठा न्याय और नेकीके कारण होती है। --अल-फत दिल-बुरती । . आदर्श जीवन । प्रत्येक पुण्यात्मा जो आगन्तुकोंके साथ सव्यवहार करता है, निन्दासे वचित रहता है, और साथ ही सत्पुरुषोंके बीचमे ऐसा यश प्राप्त कर लेता है जो कि अमिट होता है। है प्रिये मैं तेरी सौगन्द खाफर कहता हूँ कि कोई स्थान स्वय ही लोगोंकी रुचिके प्रतिकूल नहीं हुआ करता, पल्कि उस स्थानके निवासियोंके आचार विचार लोगोंको असन्तुष्ट कर दिया करते हैं। हे प्रिये तू मुझको धन खर्च करनेसे मत रोक, क्योंकि कजूसी मनुष्यक सद्गुणोंको चुरानेवाली है। है प्राणेश्वरि । तु मुझे इच्छानुसार खर्च करने दे, और .

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नीति।
यात्रासे लाभ ।
है समारफे लोगो तुम यात्रार्थ घरसे निकलो। जो कुछ
तुम छोडकर जाओगे, उसका बदला मिल जायगा। तुम भ्रमण
करो, क्योंकि जीवनका स्वाद निस्सन्देह कष्ट उठाने में ही है।
विवेकी और पण्डितके लिये कोई स्थान दुखदायी
नही हुआ करता । अस्तु, गृह त्यागकर भ्रमणार्थ विदेशकी
राह लो।.
निस्सन्देह मैं देसताहूँ कि एक ही स्थान पर ठहरे रहने के
कारण पानी गॅदला हो जाता है, और यदि वहता रहता
है तो स्वच्छ रहता है, नहीं तो स्वच्छ नहीं रहता I+
चन्द्रमा यदि एक स्थानको छोडकर दूसरे स्थानपर न
जाय, तो कभी यह नौवत नही आ सकती कि लोग उसके
दर्शनको प्रतीक्षा कर।
सिंह जब तक अपना वन नहीं छोडता तबतक शिकार
नहीं कर सकता। और तीर जबतक धनुषको छोडकर.पृथक नही
होता तबतक निशानेपर नहीं लगता।
सोना खदानोंमें मिट्टी समान पड़ा रहता है और रकडी
वृक्षमें रहते हुए भी लकडी ही रहती है।
यह सब जर अपने स्थानको त्याग देते हे तभी उच्च
आसन प्राप्त करते हैं, और यदि अपने स्थानमे हो रहे तो कभी
आदरणीय पद प्राप्त नहीं कर सकते।
-~पवित
.
विद्वान् सर्वत्र पूज्यने ।
+पानी वग्गादे रगदे परे रहदे।
-वारस शाह।

अरबी काव्य-दर्शन। मेरी इच्छाके अनुकूल ही तू भी हो जा; क्योंकि मैं इम यातसे डरता हूँ कि कजूसीके कारण कहीं मेरे सद्गुणोंको कुछ या न पहुंचे। तू मुझे मत राक, क्योंकि मैं उत्तम कार्य किया करता है और सासारिक आपत्तियो तथा लोगोंके दायित्वके निमित्त सदैव चिन्तित रहा करता हूँ। -~-अमर बिन अहतर। देश-त्याग । जब कि तू किसी जगहसे तग आ जाय तो उसे छोडकर किसी अन्य स्थानकी राह ले । ईश्वरकी रची हुई भूमि लम्बी चौड़ी है । फिर तो यह बडे आश्चर्यकी बात है कि ऐसा होने पर भी कोई मनुष्य अपमान- जनक भूमिमे रहे। वह मनुष्य तो बिल्कुल ही गिरा हुआ तथा निर्बुद्धि है जो यह नहीं जानता कि मुझपर कैसी चकी चल रही है। यदि तुझे अत्याचारका भय हो तो उस अवसरपर अपनी आत्माकी भलाईका अभिलाषी हो। और घर बनाने वालेको घरके क्षयका समाचार सुनाकर त्याग दे। निस्सन्देह तुझको एक स्थानके बदले दूसरा स्थान मिल जायगा। किन्तु तुझको इस आत्माके बदले अन्य आत्मा न मिल सकेगी।

नीति ।
प्रत्येक सुन्दर वस्तुमें शोभा होती है । अत विद्वानकी
शोभा सद्व्यवहारके कारण हुआ करती है।
यदि कोई मनुष्य किसी ऐसे मनुष्यके साथ भलाई करता है,
जो उसकी भलाईका अनुभव नहीं करता, तो वह भलाई करनेवाला
ऐमे मनुष्यके समान है, जो अन्धोके घरोंमे दीपक जलाता है।
जिस मनुष्यका पद सूर्यके स्थानसे भी ऊपर हो, उसको
न तो कोई वस्तु घटाही सकती है और न बढाही सकती है ।
यदि तुमसे कोई खल मेरी निन्दा करे, तो वास्तवमें वह
इम पातका साक्षी हो रहा है कि मैं श्रेष्ठ हूँ, क्योंकि खल तो
मदेव भद्र पुरुषोंकी निन्दा किया ही करते हैं।
-मित्र मिन मावि
ज्ञान-गेह।
जब तुझपर कोई आपत्ति आवे तो धैग्य धर, क्योंकि
मनुष्य के लिये सुख और दुस दोनोंका होना आवश्यक है।
मैं किसी मनुष्यसे मैत्री करनेसे पहले उसके स्वभावसे मित्रता
करता है और उसके कार्यों और विचारोंको परख लेता हूँ।
जब कि तूने किसीपर अत्याचार किया हो, तो उसके
ट्राइस यचे । क्योंकि जो मनुष्य काँटे बोता है वह अंगूर नहीं
काटा करता।
अपनी सोगद, जवानी मित्रतासे कुछ लाम नहीं है,
जबतक कि मित्रताकी जड़ हदयम न हो।
• सोए मूलको प्राम काहीसे न्याय ।

भरपी काव्य-दर्शन।
विदेश गमन।
सुचित यह है कि कुटुम्बियों और देशवासियोका प्रेम,
तुझे आनन्दमय जीवनके सुखसे न रोक ।
जिस स्थानमें तू सफर करते समय ठहरेगा, उसी स्थानमें
तुझं कुटुम्मियोके बदले कुटुम्बी और पड़ोसियोंके बदले पड़ोसी
मिल जायेंगे।
-एक कवि।
नीति-भाण्डार।
विद्या नाचको उच्च शिखरपर चदा देती है, और अविद्या
मनुष्यको पछाड़ डालती है ।
ईश्वर आपदाओंकी हर तरहसे भलाई करे, क्योंकि इन्हीं-
की बदौलत हमने अपने शत्रुओं तथा मित्रोंको परख लिया है।
जिसकी ओरसे अभिवादनकी आशा भी न थी, वह भी
आज अभिवादन करता है । और यदि धन न होता, तो कोई
मनुष्य अभिवादन न करता।
बहुतसे लोग ऐसे हैं जो मर गये, किन्तु उनके गुण नहीं
मरे । और बहुतसे लोग ऐसे हैं जो कि जीवित है, किन्तु सर्व
साधारणकी दृष्टिमे मृतक हैं।
प्रत्येक रोगके लिये औषध है, जिससे कि उसका इलाज
हो जाता है। किन्तु अज्ञानता अपने दवा करनेवालेको परेशान
कर देती है
कविने विदेश यात्राको भानन्दमय जीवनकी प्राप्तिका साधन बतलाया है।
भी एक कहावतका तापय है-'यामा मफलका साधन है।

नीति ।
२३.
.
जबानी जमाखर्च है। सो ईश्वर करे कि न वह रहे और न
उनके झूठे दान।
चुगुलखोरोंकी बारोंका प्रभाव मित्रोपर ऐसा नहीं पड़ा
करता जैसा कि शत्रुओं पर पड़ा करता है।
-मुतनब्बी।
चेतावनी।
तरी श्रेष्ठता इसी बातमे है कि तू ससारमे एक भीषण
गरज छोड़ ना, जिसकी ऐसी गॅज हो जैसी गूंज कानमे
उंगली देनेसे पैदा होती है।
यदि तेरी श्रेष्ठता तुझे किसी अधमको धन्यवाद देनेस न
बचा सके, तो वास्तवमे श्रष्ठता उसके निमित्त हो जायगी,
जिसको कि तू धन्यवाद देता है ।
जो मनुष्य दरिद्रतासे भयभीत होकर सदैव धनोपार्जनमें
लगा रहता है, उसका यह काम स्वयमेव दरिद्रता है।
अत्याचारियोंको करनेके निमित्त हमें उचित यह है
कि हम बडे बडे घोडोंका प्रबन्ध करें जिनपर कि नवयुवक
मवार हो । और उनमेंसे प्रत्येकका हृदय अत्याचारीके वैमनस्य
म भरा हुआ हो।
फिर उनका हाल यह हो कि उनमेसे प्रत्येक नवयुवक
अपने बरछोंकी अनीसे अत्याचारियोको उस क्षेत्रमें
मृत्युका
प्याला पिलाता हो, जिसमे मदिराकी इच्छा ही नहीं
की जाती।
-मुतनम्मी।
।

अत
भरखी काव्य-दर्शन।
दोपरहित मित्रका पाया जाना अति कठिन है।
मित्रोंके दोषोंका वर्णन करना नीचता है।
जो मनुष्य आनन्दमय जीवनके कारण ससारको प्रामा
करता है, निस्सन्देह वह अति शीघ्र उसके अवगुणों के कारण
नसको धिपारेगा भी।
तू अपना गुप्त भेद किसीको मत बतला, क्योंकि जो
भेद दोनों होठोंसे पाहर निकल जाता है वह प्रकागित हो
जाता है।
अपनी विधा, शान्ति, गुण और उदारताके कारण ही
मनुष्य द्रोहका निशाना बन जाता है।
यदि किसी भवनकी नीव न होगी, तो जो कुछ बनाया
जायगा उसका विध्वंस हो जायगा। -भिन्न भिन्न कवि
स्फुट नीति।
जो बातें मनुष्योंकी हार्दिक रुचिके अनुसार हुआ करती
हैं, वही मनुष्योंपर प्रभाव डाला करती हैं।
सम्मति प्रदान करनेवाला व्यक्ति कमी बिना सोचे समझे
ही शुभ सम्मति प्रदान कर दिया करता है । और कभी
बहुतेरा सोचने पर भी चूक जाया करता है ।
नम्रता यदि किसी में स्वाभाविक न हो, नो चिर आयु
'पाने पर भी वह नम्र नहीं हो सकता।
पुण्यात्माओंका दान हाथोंसे होता है, किन्तु झूठोका दान

२५ नीति। वेरी सचाई लोगोंके झूठके सामने दूषित हो गई। पर क्या कोई टेदी वस्तु किसी सीधी वस्तु के ममान हो सकती है ? --अबू इस्माइल तुगराई। आदर्श उपदेश। भाग्य उद्योगमें है, और आलस्यमें दुर्भाग्य है। सो तू कटिबद्ध होकर उद्योग कर, जिसमें तू अपनी अन्तिम इच्छा पूरी कर ले। जिस प्रकार कवचधारी योद्धाके हाथमें तलवार धैर्य धरे रहती है, उसी प्रकार काल-चक्रकी आपदाओमे तू भी धर्य धारण किये रह। जो कुछ तुझे मिले उसपर फूला न समा, और जो नष्ट हा जाय उसके लिये दुखी न हो। यदि तू लोभ और लालचसे दूर रहेगा, तो तेरी मनो- कामना शीघ्र ही पूर्ण होगी और गुप्त रीतिसे तुझे ईश्वरीय सहायता मिल जायगी। यदि तेरा पाला ऐसे मनुष्यसे पड़े जिसमें मनुष्यता नाम- को भी नहीं है, तो तू ऐसा बन जा मानों तूने उसकी कोई यात सुनी ही नहीं और न उसने कुछ कहा ही है। यदि कोई तुमसे मीठी मीठी बातें करे तो तुम फूल न जाओ, क्योंकि निस्सन्देह मधुमें कभी कभी विष भी हुआ करता है। यदि तू सफलता और मनोकामनाकी पूर्विका इच्छुक है, तो प्रत्येक अमीर और गरीममे अपनी बातोंको छिपाये रस। .

भरवी काय-दर्शन। उपदेश-विचार। मेरे विचारोकी दृढताने मुझे बकवाद करनेसे बचाया और 'प्राकृतिक आभूषणोंकी अनुपस्थितिम श्रेष्ठताके गहनोंने मुझको सुशोभित कर दिया। जीवन रक्षाका मोह, साहसीको उच्च पदोंकी प्राप्रिम वश्चित रखता है। यदि तू आलसी ही रहना चाहता है अथवा जीवनके मोह- में पडा है, तो पृथ्वीमे एक गुफा बना ले, या आकाश पर सीढी लगाकर चढ जा, जिससे तू एकान्तवासी बन जाय । तू उच्च पदोंकी प्रातिकी कठिनाइयोंको उन लोगोंके लिये छोड दे जो कि उन कठिनाइयोंको सहन कर सकते हैं, और तू नाममात्र सुस पर सन्तोप कर । नाममात्र सुख पर प्रसन्न रहना मनुष्यका बोदापन है क्योंकि भरपूर सुस तो भ्रमणकी अनेक प्रकारकी कठिनाइयाँ सहनेपर ही प्राप्त हो सकता है । निस्सन्देह उच्च पदोंने मुझसे कहा है कि सुख भ्रमणसे प्राप्त होता है, और वस्तुत उनका यह कहना सर्वथा ठीक ही है। यदि किसी अच्छे ठिकाने पर ही पड़े रहनसे किसीकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो सकती, तो सूर्य सदैव एक अच्छे स्थानमें ही पड़ा रहता। मुझसे निकृष्ट लोग यदि आगे चढ गये, तो कोई आश्चर्यको बात नहीं, क्योंकि मैं तो सूर्यका अनुयायी हूँ, जो चौथे आकाशमें रहता है, पर मनहस गनेश्वर सातवेंमें रहता है।

नीति ।
२७
नीति-रत्नावली ।
जिम घातका तू अभिलाषी है नसके लिये अकुला मत,
और सत्र पर दया दृष्ठि रस, ताकि तुझे भी किसी दयालु
से ही काम पड़े। ससारमें कोई हाथ ऐसा नहीं है कि
उसके उपर ईश्वरका हाथ न हो, और कोई आत्याचारी
ऐसा नहीं है कि उसे भी किसी अत्याचारीसे पाला न पडे ।
--एक कवि।
यदि तूने किसी मामिलेमे कुछ विचारा है तो दूसरेका मत
भी उस मामिलेमे जान और उससे सलाह ले। क्योंकि दो
मनुष्यों के विचार करनेसे कोई रहस्य छिपा नहीं रह सकता।
एक मनुष्य तो केवल एक दर्पणके समान है, जिससे
केवल मुस देखा जा सकता है, किन्तु दो दर्पणोके एकत्र हो
जानसे पीठ भी दिखाई पड़ती है।
-एक कवि।
तुये ऐश्वर्या मिले तो किसी पर अत्याचार न कर,
क्योंकि अत्याचारी बदलेके तट पर ही होता है।
त अत्याचार करता है और सोता है, पर अत्याचारसे
पीडित जागता रहता है, तुझे शाप देता रहता है, और ईश्वर
तो हर समय सब कुछ देखता रहता है।
-एक कवि।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो दूर बसनेवाले लोगो

"
.
अरबी काव्य दर्शन।
सम्रामके समय तू ठोस या बाणके समान बन जो और
ससारमें कहावतसे भी अधिक विख्यात हो जा।
जो मनुष्य तेरे साथ सच्ची प्रीति रखता हो, उसके साथ
नृ भी सधी ही प्रीति रस । और पेट पापीके साथ ऊँटसे भी
अधिक पेट पापी बन ।
यदि कोई मनुष्य अनेक प्रकारके वस्त्रोंसे ढका हुआ हो,
पर परहेज़गारीके वस्त्रोको धारण न किये हो, तो वास्तवमे वह
नम ही है।
-सलाह दीन-मपदी

नीति ।
ऐसे मनुष्यको मित्रता सदैव बनी रहती है। पर क्या
प्रत्येककी मित्रता ऐमी ही रहा करती है ?
-महमद अरजानी।
तू बादशाहकी मुसकुराहटसे घमड़ी न हो जा, क्योंकि
बिजलीके चमनेके समय ही यादल गरजा करता है ।
-इन दहान।
-न-दहान।
हँसी ठढेकी आदत मत डाल, क्योकि इससे हानि होती
ह । और हँसी ठठ्ठा न करनेसे लोगोंका मान बढता है ।
क्या तुम यह अभिलाषा रखते हो कि बुढापेमे पैसे ही
हो जाओ, जैसे युवास्थामे थे ? सो जान लो कि ऐसा होना
असभव है, क्योकि पुराना कपडा नयेके समान नहीं हो
सकता।
--जाहिज मोतश्ली।
यदि कोई मनुष्य विद्वत्तामे बढा चढा हो तो उसके दुबले
पतले होनेमे उसे कुछ हानि नहीं पहुँचती।
-मामिम।
द

अरबी काव्य-दर्शन! " जब कभी तू जातिका नेता बनना चाहे, तो शान्ति वारण करके बन, जल्दबाजी और गाली-गलौजसे नहीं। गान्ति उत्तम है और उसका फल अज्ञानतासे श्रेष्ठ है। परन्तु उस अवसर पर शान्ति अच्छी नहीं जबकि अत्याचार- के ढग पर, तू धूपमें बैठाया जाय । -मुरार-विन-सईद । जो लोग अपने घरोमे ही बैठे रहते है, वे संसार- की बातोंसे अधे होते है और अपनी कमाई सो बैठते हैं। --एक कवि। ईश्वरकी सृष्टि अति विशाल और विस्तृत है, और प्रत्येक स्थानमे वह पालनहार है। सो जिन लोगोका किसी स्थानमे घोर अपमान किया जा रहा हो, उनसे कह दो कि जन वे किसी स्थानसे तग आ जाये तो उसे छोडकर किसी अन्य स्थानके निमित्त प्रस्थान करें। -~-एक कवि विधाताकी अटल बातोसे डरकर जो मनुष्य दूर भागना चाहता है, वह वास्तवमे स्वयमेव भागकर उन्हीं आपत्तियोंम जा पडता है जो उसके निमित्त नियत हैं। --एक कवि। सच्चे मित्रकी ओरसे जब एक भूल हो जाती है, तब उसके गुण सहस्रों सिफारिशें लेकर आया करते हैं। -पक कषि। मैं उस मनुष्यके निमित्त प्रेम रसता हूँ जिसका बाहर और भीतर दोनो अपने मित्रके लिये शुद्ध हो ।

अरबी काव्य-दर्शन ।
२८-युद्ध।
योद्धाका
कर्तव्य ।
तू अपनी तलवारोंको बुरा भला कहनेवालोंकी गरदनें
मारनेका पूर्ण अधिकार दे दे। और यदि तू अपमानजनक
भूमिमें अचानक कभी उतर पड़े तो उसे त्यागकर अन्य
स्थानकी राह
सग्रामके दिन यदि कोई कायर तुझे इस भयसे रोके कि
समरसेवियोंके घमसानमें कदाचिन नू पिस न जाय, तो
उसकी बातको तू मत मान, और उसकी गातकी तनिक भी
परवा न करते हुए घमसान युद्धके ममयमें भी अगली ही
पक्तिकी ओर बढ ।
तृ अपने लिये ऐसा स्थान पसन्द कर जिससे तू कोई
उच्च पद प्राप्त कर सके, नहीं तो समरक्षेत्रकी धूलकी छायामें
ज्वेत हो जा।

3496956GB0694GRABADRAOBISEAL
युद्धको पैदा करनेवाली बात छोटीसी होती है और
वह मनुष्य, जो युद्धका मूल कारण होता है, सम्राममें
नही फँसता, बल्कि साफ अलग हो जाता है, और आफत
दूसरे लोगों पर आती है।
जो लोग युद्धको अच्छा नहीं समझते, किन्तु लडने-
वालोके निकट होते हैं, वे भी उसमें भाग ले लेते हैं।
जैसे अच्छा नीरोग ऊँट खारिशको तो बुरा मानता है,
परन्तु जब वह सारिशवाले ऊँटके निकट होता है, तर
अपनी इच्छा न रखते हुए भी खारिशमें भाग ले लता है।
- कवि
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3030wa

युद्ध।
३७
लड़ाई के लिये भड़काना।
[खुजाआ और असद नामके घरानेवालोंमें विग्रह हुआ।
पुजाआ समुदायवाले हार गये। फिर उन्होने किनाना नामी
समुदायसे सहायता माँगी, क्योंकि वे लोग उनके मित्र थे।
परन्तु किनाना और असद समुदायवालोमें घनिष्ट संबंध था,
इसलिये वे सुजाआके सहायक बनकर असद समुदायवालोसे
नहीं लड़ सकते थे। इसी अवसर पर किनाना समुदायमेंसे
शदास नामक कविने सुजाआ समुदायवालोको उत्तेजित
किया था।
-अनुवादक।
खुजाआ समुदायके लोगो' तुम असद वशवालोंसे लो।
तुममे उनकी लडाईसे कायरता न प्रविष्ट होने पाव ।
वे लोग भी तुम्हारे ही समान है। उनके सिरो पर भी
बाल ही हैं। और वे यदि मार डाले जाय तो फिर जीवित
नही हो जाते।
क्या हम खुजाआ समुदायवालोंकी माताके दास हैं ? सो
जब कि वे लोग किसीके साथ युद्ध ठानेंगे तो हमको भी घसीट
ले जायेंगे।
-रादारव बिन यामर ल किनानी ।
उच्च कुलोत्पत्रके निमित्त कालकी क्रूरताओंमेंसे एक करता
यह भी है कि उसका ऐसे शत्रुसे पाला पड़े जिससे मित्रता किये
बिना काम न चले।
-मुतनम्मी।

अरवी काव्य-दर्शन।
मैंने चमकदार नेजे और हिन्दी * तलवारसे ही उन पद
प्राप्त किया है, अपने मम्बन्धी अथवा किसी बडे समूहके द्वारा
नहीं प्राप्त किया।
रणभूमिमे जब कि तलवारोंकी धारोमे अग्नि बरस रही
थी, ऐसे समयमें झट मैंने अपने बछेडेको एड लगाई और वह
रणक्षेत्रमें जा कूदा।
खेतमे जानसे पहले मेरा बछेडा पचकल्यान था। पर जब
वह सेतसे लौटा तन रक्त और धूलके कारण पचकल्यान नही
प्रतीत होता था।
मुझे तू तिरस्कारमय अमृत न पिला, बल्कि मानयुक्त
इन्द्रायनका प्याला पिला। तिरस्कारमय अमृत नरक है और
मानयुक्त नरक सर्वश्रेष्ठ स्थान है।
--भतरा
* प्राचीन समयमै मारतवघको तलवारें समस्त अरबमें अति उत्तम समझो
जाती थी। प्राचीन परवी माहित्यमें अनेक स्थानों में भारतवर्षकी तलवारों और वहा
कहीं नेनोंका महत्वपूर्ण वर्णन है। , अब इसमे पाठक बड़ी सुगमतासे नतीजा निकान
मकते है कि जिन सलबारों तथा ने का अरब ऐसे युद्ध के पुतले महान पार करते थे,
व वितनी अच्छी बनती रही होगी।
-अनुवादका
रहिमन मोहिन सहाय अमिय पिप्रावत मान दिन ।
बरु विप देख पिप्राय माग सहित मरियो भलो।।

युद्ध।
४१
-
परस्पर युद्ध ।
मैं अपनी सौगद साकर कहता हूँ कि अभी पक्षी मेरे
समीपसे गये, और उन्होंने मुझे ऐसे मामलेकी सूचना दी, कि
जिसकी अब कोई ओषधि ही नहीं रही, क्योंकि अब पक्षी जा
चुके हैं।
अब मेरा हाल यह है कि मुझे उन लोगोंके साथ मृत्युके
प्यालोंको पीना-पिलाना पड रहा है, जिनका पिता और मेरा
पिता एक ही है।
हम दोनों निवारको उस समय सहायतार्थ बुलाते हैं जब
कि हम दोनोंके बीचमे खत्तीय अथना भारतवर्षीय भाल
पर्देके समान तन जाते हैं
हम निजारके समान श्रेष्ठ हैं जिन (हम) पर पैगम्बर
हजरत दाऊद साहबकी बनाई हुई अथवा सुरादकी तैग्यार की
हुई जिरहें हैं।
जब हम उनपर आक्रमण करते हैं, तब वे ऐसी तेज तल.
वारोंको लेकर हमारे सम्मुख सडे हो जाते हैं जो कि बाँहोको
साफ उड़ा देती हैं।
यदि हम उनके साथ तलवारोसे लड़ते हैं, तो वे हमारे
ही समान लोहे के वस्त्र धारण करके हम पर धावा कर देते हैं।
मेरे दुखी रहने के लिये यह यात पर्याप्त है कि मैं मदेव
•स पचमे भारतवर्ष के नेतो (मानों) का वर्णन है। किंतु आप भोक
प्राचीन तथा प्राचीन अरची पोंमें भारतको सरवारोंका ही वणन है जोकि
माझी ममझी जाती थी।
--मनुवारक।

१० अरबी काव्य-दर्शन। रणकुशल योद्धाओंकी सराहना। मेरा तन, मन, धन सब कुछ उन सवारों पर न्योछावर हो जिन्होंने अपने आपको मेरे विचारोंके अनुकूल साबित कर देखाया है। वे सवार ऐसे रणवीर हैं कि मृत्युसे उस समय भी भय. नीत नहीं होते जब कि घमासान युद्धकी चक्की लोगोंको पीस डालती है। वे सवार भलाईके बदले बुराई नहीं करते और न निष्ठुरता- के बदलेमे करुणा ही दर्शाते हैं। उनके शौर्यको हानि नहीं नहुँचती, चाहे वे सदैव युद्ध में लडते ही क्यों न रहें। उन्होंने वकबाके चरागाह (चरी) की रक्षा ऐसे वारासे की है, कि तलवारके एक एक वारमें शत्रुओंके कई कई वीर एक साथ ढेर होते थे। तलवारके धनी होनेके कारण उन सवारोंने शत्रुओंके ज्ञाथ झगडेका निपटारा किया और पागलपनकी दवा पागल- मनसे की। वे सवार ऐसे युद्धवीर और निडर हैं, कि जब किसी न्धान में डेरा डालते हैं तब अपने ऊँटोंको खराब जगहम नही चराते और न मित्रोंकी ही भूमिमें घराने हैं। बल्कि लडाई नोल लेनेसे भयभीत न होते हुए, अपने ऊँटोंको दुश्मनोंकी ही भूमिमें चराते हैं। -मदुल-उल गोल उत्तनाली ।

युद्ध-1
४३
लम्बाईमें उनके और हमारे भाले बराबर हैं। वे हमारे ही
ममान हैं। मानों हम दोनों एक ही चमडेके चर्मरज्जु हैं।
-उल बिन इल करख ।
हमारी हीनता।
[ कविके ३० उँट, जुहल समुदायमेंसे लकीता घराने के
लागोने लूट लिये। कविके समुदायमे यद्यपि बहुत से लोग थे,
तथापि उन्होंने सहायता देनेका साहस न किया। बादको
उसने माजिन नामकी एक बहादुर जातिसे सहायता माँगी।
उन्होंने लटनेवालोंके १०० ऊँट लूटकर कविको दे दिये । इसी
पर माजिनकी प्रशसा करते हुए अपने समुदायवालोंकी हीन
ताका विलक्षण चित्र कविने सींचा है
-अनुवादक]
यदि मे माजिन नामके समुदायमेंसे होता तो जुहल बिन
शेबानमेंसे ल्फीता नामक वशके लोग मेरे ऊँटो को लूटकर न
ले जा सकते।
और यदि ले भी जाते तो उसी समय मेरी सहायताके
लिये एक ऐसा समूह उठ सडा होता जिमके रणसेवी साधा
रणतया सरल स्वभावके हैं, किन्तु आत्म गौरवके अवसर पर
युद्धमे नृशस हैं।
माजिन जातिके लोग ऐसे वीर हैं, कि जिस समय लडाई
उनको अपनी डालें दिसाती हैं-अर्थात् घोर युद्धका समय
होता है, उस समय भी उनका दिल नहीं दहलता, बल्कि वे बड़ी

अरथी काव्य दर्शन। भालोको देखता हूँ कि वे मेरे हाथों और बाहोंके रक्तसे कुली करते हैं। यदि मै अपने भाइयोसेर तो निस्सन्देह मैं उस मनुष्य- के समान हूँ जो कि मृग ताणामे पडकर अपनी मशकका पानी गिग दे। अथवा मैं उस वीक समान हूँ जो अन्य लोगोके बनाको तो दूध पिलावे और अपनी सन्तानको नष्ट करे । ऐ निधारक पुत्री ' मैं तुम दोनोंको उपदेश देता हूँ कि तुम दोनों उसका उपदेश ग्रहण करो जो तुम्हारा हितैपी, विश्वस्त और प्रेमी है। तुम मेरी उपस्थितिमे न ल्डो और न मेरे बाद वाण चलाओ। तुम दोनोके लिये शोक है। क्या तुम दोनो अपने मामलेमे अमि (नरक)से नहीं डरते और स्वर्गमे ईश्वरके दर्शनकी अभिलाषा नहीं रसते ? निस्सन्देह यद्यपि मैने उनसे वर ससा और उनपर अत्याचार किया, तथापि मग हृदय इस वातसे दुसी है कि मैने अपने ही कलेजोको काटा है। इसलिये शोक क्या न हो, जन कि मर्यादाकी रक्षाके समय मेरा पिता, उनका पिता, उनका मामा, मेरा मामा और उनका दादा, मेरा दादा है ? . प्रमिद था। -निशार लहनेवालों के एवरका नाम था। और इमी नामसे उनका घराना -अनुवादका युद्ध। ४५ मोने पिताका बदला। [कवि मसूरके पिताको शत्रुओंने मार डाला। तत्पश्चात शत्र- घाहा कि मसूर धन लेकर बदलेका विचार छोड़ दे और दयासे काम ले । मसूरके कुछ सम्बन्धियोंने भी मसूरको ऐसा ही करने के लिये जोर दिया । पर मसूरने किसीकी भी न सुनी और निम्न-लिसित भावकी कविता पडे साहसके साथ कही । -अनुवादक उस मनुष्यके पश्चात जो कि कुवैकब पहाडकी घाटीमें मिट्टी और सख्त पत्थरकी कारमें गडा है, मुझसे घातकके निमित्त कृपालुतासे काम लेनेके लिये आशा क्योंकर को जा सकती है ? ऐसे अवसर पर तो मेरी कृपालुता यही है कि मैं बदला लेनेमें कोई कसर उठा न रक्खू । ऐ चचेरे भाइयों। यदि मैंने आज या कल तक बदला नहीं लिया, तो कुछ हर्ज नहीं । ममय तो बहुत पड़ा हुआ है, किसी न किसी दिन बदला ले ही लूंगा। ईश्वरकी सौगन्द, यदि मैं घातकको शीघ्र न मारूँ अथवा में ही न मारा जाऊँ, तो मेरी जाति मेरा तिरस्कार कर दे और मुझे किसी लड़ाई के निमिच न बुलावे। जिनके बाप अथवा भाई पर ऐसी विपत्ति नहीं पडी, वे लोग मुझसे कहते हैं कि कुछ दण्ड लेकर ही निपटारा कर लो। शत्रुओंने तो केवल एक बार ही हम पर युद्धका भार रक्सा, किन्तु हम शत्रुओं पर सदैव युद्धका भार रक्सा करेंगे। -~मसर दिन दुदया। होमा जैन पानीमानर,

N
भरबी काव्य-दर्शन।
निर्भयताके साथ झुण्डके झुण्ड और एक एक भी लड़ाईके
समय गग्रुओं पर टूट पड़ते हैं ।
उनका कोई भाई जब विपत्तिमें उनकी दुहाई देता है, तर
व उससे किसी प्रकारका प्रश्न नहीं करते, बल्कि उसी समय
तन्मय होकर उसकी सहायतामें लग जाते हैं।
परन्तु मरी जातिके लोग यद्यपि सख्यामें अधिक हैं,
तथापि किसी छोटीसी लड़ाईमे भी वे किसी काम के नहीं हैं।
बल्कि मेरी जाति के लोगों का हाल तो यह है कि अत्याचारियोंके
अत्याचार पर भी, वे क्षमाफी दृष्टि रखते हैं और बुराई करने
वालोके साथ भी भलाई ही करते हैं। मानों सृष्टि के रचने-
पालने जिन मनुष्योको पैदा किया है, उनमेंसे इनके सिवा
किसी औरको अपनेसे डरनेके लिये बनाया ही नहीं। *
क्या ही अच्छा हो कि मुझे इनके बदले एक ऐसी जाति
मिल जाय, जिसके लोग, जब घोडों और ऊँटों पर सवार
हुआ करे, तब खुव ही लूट मार किया करें।
~~करैत दिन उनैफ।
मेरी मृत्यु उसकी ऑसोंमें इस प्रकार छिपी हुई है, जैसे
तलवारकी धारमें मृत्यु छिपी रहती है
-मिरा रफा।
ध्यान रहे कि कविका कथन अपने समुदाय के विषयमें पहलपमें है।
-अनुवादक।

युद्ध।
४७
एक घायल रणधीर और उसकी पत्नी ।
मेरी पत्नीने देखा कि मेरे साथवाले सवार रणक्षेत्रम
खेत हुए, और घावोंकी बौछारसे मैं मूर्छित हूँ।
अत प्रात काल अपनी अज्ञानताके कारण वह मुझको युग
भला कहती हुई आई और अपनी मूढताके कारण बुरा भला
कहती हुई मुझको निकम्मा बतलाती थी। मैंने उससे कहा,
कि मैं ही आदि मनुष्य नहीं हूँ, जिसको काल और उन
कुलके रणसेवियोंने आज दु ख दिया है।
मैं उनसे लडता रहा। यहाँ तक कि सेनाके केन्द्रस्थानमें
वे एकत्र हो गये । घोड़े रक्तके वहावम तैरते थे । हमारे भालों
और तलवारोंकी मारामारका यह हाल था कि तमीम ममु
दायके वीर मुआकस घरानेवालोंका आश्रय लेते थे
मुआकस घरानेवाले वडे रण धनी हैं। ऐसे समर सेवियोंसे
मैं कभी नहीं लडा था। इनके अतिरिक्त जिनसे अब तक
लडा हूँ , उनका यह हाल होता था कि उनके कुछ घोड़े तो
स्वय भाग जाते थे और और कुछ भगा दिये जाते थे।
जय कि दोनों ओरके रणकुशलोकी मुठभेड हुई तोप्रत्येक
ने नेजाबाजीके हाथ दियाये । घोडे धूलमें लगामको खून
चचाने लगे।
फिर युद्धस्थलमें धूलसे घोडीकी आकृति यदल गई थी
और उनके शरीरमें बहुतसे घाव हो गये थे। उसी ममय
एक मुख्य सरदार पर मैंने एक ऐसा वार किया कि वह
-

है
६
अरबी काव्य-दर्शन।
समरस्थलमें मरना।
जो लोग जैशान नामके रणक्षेत्रमें सेत हुए हैं, उनकी
पाताएँ क्यों न दुखी हों ? क्योंकि वहाँके युद्धस्थानमे प्रभुता-
का बडा विध्वस
हुआ
उन समरसेवियोंकी छातीमें भाले घुसे हुए थे। लेकिन
से हृदय विदारक समयमे भी,उन्होंने मैदान छोडनेसे इन्कार
केया । और यह बात भी स्वीकार न की, कि मृत्युके भयसे
केसी सीढी पर चढ जायें । निस्सन्देह यदि चे रणबांकुरे भाग
पी जाते तो भी आदरणीय रहते ७ । परन्तु उन्होंने रणभू-
मेमे धैर्यको मृत्युसे श्रेष्ठ समझा । (अर्थात् समरस्थलमें ही
काम आये।)
~उम्म उस सरीह (सी)
जब कोई मनुष्य तरी मानहानि करे तब तू भी उसकी
मानहानि करे, चाहे उससे सम्बन्ध रसनेवाले कितने ही
अधिक क्यो न हों।
यदि तू ऐसा शक्तिशाली नहीं है कि उसकी मानहानि कर
पके, तो तू उससे उस समय तक कुछ मत फह जबतक कि
तू उसके लिये शक्तिशाली न हो जाय ।
-ग्रोस वितहा।
भर क कहावत है
-मल किरारी फी वक्त ही अफान अर्थात्
समापनमार मागना मी विजय दे।
-मनुवादक

युद्ध। ४६ जर फि समर स्थल में खूब धूल उड़ रही हो और अस्त्र- शस्त्रकी चमक अमिकी लपटके समान प्रतीत होती हो, ऐसे समयम समर-स्थलमें मेरा साहस देसकर मृत्युका भी फलेजा दहल जाता है। जिस समय मेरे शत्रु योद्धानिषट होकर अपने आसमानी रग के नेजोंसे अपने शत्रुओं पर वार करते हैं, उस समय तो मुझे लडनेमें पूर्व ही मजा मालम होता है । अनेक बार धूलसे भरे हुए मैदानमे जा कूदा हूँ, पर कभी तनिक भी नहीं हिचका। समर क्षेत्र ही मेरा आदर्श है, यहाँ तक कि मैं सदा उसीकी सांजमें लगा रहता हूँ। मैं अवश्यमेव ऐसे कार्य करूँगा जो अद्वितीय होंगे और पुस्तकोंके पृष्ठोंमें लिखे जायेंगे। मैं निस्सन्देह रण स्थल में घुस जाऊँगा, और ऐसी मार-धाड मचाऊँगा कि सारी नदियोंमें रक ही रक्त वह चलेगा, क्योंकि रक्तकी लहरें मेरे आनन्दको बढा देती हैं। निस्सन्देह मेरे रण स्थलमें इतनी धूल उड़ेगी कि उससे आकाश मण्डल में एक परदा छा जायगा और सारा आकाश- मण्डल काली रात्रिके समान बन जायगा। मेरे असली घोड़ेके सिवा, मेरी प्रत्येक लडाईमें किसी अन्यको मेरे साथ सहानुभूति नहीं, क्योकि सच तो यह है कि तलवार भी मेरे क्रोधकी शिकायत करती है। -मन्नर ।

भरबी काव्य दर्शन।
औंधे मुँह तृणके समान पृथ्वी पर आ लगा। जबकि मैंने उस
सरदार पर चोट की थी, उस अवसर पर मेरे साथ हनीफा
समुदायके शेर थे जिनके सिरों पर खोद (लोहेकी टोपी)।
के चित हैं।
हनीफा समुदायके लोग ऐसे हैं कि जब वे जिरहबकतर
और खोद पहनते हैं, तो चमकते हुए तारोंके समान प्रतीत
-
यदि मैं जीता रहा, तो अपनी ऊँटनीको ऐसे सम्रामके
लिये करूंगा जिसमे बहुतसा धन प्राप्त हो,
स्माकी मृत्यु मरूँ।
अथवा
मैं पुण्या-
-कतादा बिन सलमा।
मेरा संग्राम ।
आज मैं ऐसा घोर युद्ध ठानूंगा कि मेरे धैर्य्यके सम्मुग
बड़े बड़े प्रतिष्ठित प्राचीन योद्धा भी तुच्छ प्रतीत होंगे।
जब मैं अपनी तेज तलवार लेकर लोगों पर चढाई करूँगा,
चब उनके गलोंसे खून बहाकर ही छांहूँगा।
मेरी चदाईके समय बहुतसे सरदार मुझे देखते ही अपने
अस्त्र शस्त्र रख देंगे और अपने आपको भागनेके लिये
उत्तेजित करेंगे।
में
वह शूर वीर हूँ जो युद्धकी अनिको प्रचलित करवा
है, लोगोंकी नाकोंको रगड़ देता है और उनको तथा उनके
पोदॉफो पालफे हवाले कर देता है।

युद्ध। પર अनेक घार जव हमने युद्ध ठाना है तब उसका यथायोग्य ही निपटारा किया है, और हमारी कुलश्रेष्ठता तथा हमारी तलवार सदैव हमारे अनुकूल ही रही हैं। हम ऐसे सहनशील है कि चाहे हमपर कैसी ही विपत्ति क्यो न आवे, हमारी स्त्रियाँ मृतकोके लिये रोया नहीं करती। -कैम वशमा एक कपि। - . हमारा प्रशंसनीय ग्रामीण जीवन । नागरिक जीवन जिसको भाता हो, भावे । हे लोगो । भला ग्रामीण होने की हालतमे हमे कैसा पाते हो? जिसके घरमे गधोके बच्चे बँधे हों, बंधे रहें। हमार यहाँ तो अच्छे घोड़े और लम्बे भाले है । जव हमारे घोडे जनाय नामी समुदायको लूटने के लिये उद्यत होते हैं, तब जहाँ कही वह समुदाय होना है वहीं पहुँच- कर उसपर छापा मारते हैं। हमारे घोडे जिनाब और जर नामके सुप्रतिष्ठित समु- दायों पर भी डाका डालते है जो कि घरोंमें रहते हैं। और उनसे जो मर जाय वे मर जायँ, हमे कुछ चिन्ता नहीं। लूट मारके लिये जब कोई और नहीं मिलता, तब हम अपने भाई ग्रन्दो पर ही छापा मारते हैं । -विनामा।

५०
परयी काव्य-दर्शन।
हमारा शौर्य ।
,
हे प्रिये सलेम । मैं तेर मङ्गलका अभिलापी हूँ, सो तू भी
मेरे मङ्गलकी अभिलापिणी हो। और यदि तू भद्र पुरुषोंको
मदिरा पान करावे, तो मुझे भी मदिरापान करा ।
यदि तू किसी दिन लोगोंको किसी शुभ कार्यके निमित्त
अथवा युद्ध के लिये बुलावे तो मुझे भी उस समय अवश्यमेव बुला।
यद्यपि शुभ कार्यके हेतु लोग कठिन उद्योग करते हैं
तथापि उसमें पहला तथा दूसरा दरजा हमारा ही हुआ करता है।
ज्योंही हमारा कोई सरदार मर जाता है, त्योंही हम
अपने किसी बालकको अपना सरदार बना देते हैं। (अर्थात
हमारे बच्चोमें भी सरदारीकी योग्यता है।)
युद्धके दिन निस्सन्देह हम अपनी जाने सस्ती कर देते हैं,
पर शान्ति-कालमें उनका मूल्य बहुत अधिक होता है ।
शत्रु जब युद्धमे योद्धाओंको ललकारते थे, तब हमारे ही
पूर्वज घोडोंमे उतरकर पैदल + मुठ भेड करते थे ।
जब कि अन्य शूरवीर तलवारोंकी धारोंसे भयभीत होकर
सेतमें कतराते हैं, ऐसे समयमें भी हम अपनी तलवारें हाथमें
लेकर शत्रुओ पर टूट पड़ते हैं।
• युद्ध में दृरमे वाणों द्वारा लाने अथवा शेड़ोंपर सार होका नेनों और
नलवारोंसे लड़ने मदले, तनवार लेकर पैन लड़ना अधिक प्राननीय ममझा जाता
भा। और वास्नर यह शौर्य का बड़ा मारो निद है।
-मनुवार ।

युद्ध। अनेक बार जब हमने युद्ध ठाना है तब उसका यथायोग्य हो निपटारा किया है, और हमारी कुलश्रेष्ठता तथा हमारी तलवार सदेव हमारे अनुकूल ही रही हैं। हम ऐसे सहनशील है कि चाहे हमपर कैसी ही विपत्ति क्यों न आवे, हमारी स्त्रियाँ मृतकाके लिये गेया नहीं करती। -कम वशका एक रवि । - हमारा प्रशंसनीय ग्रामीण जीवन । नागरिक जीवन जिसको भाता हो, भावे । हे लोगो । भला ग्रामीण होने की हालतमे हम कैसा पाते हो? जिसके घरमे गधोके बचे बँधे हों, बंधे रहें । हमार यहाँ तो अच्छे घोड़े और लम्बे भाले हैं। जव हमारे घोड़े जनाव नामी समुदायको लूटनके लिये उद्यत होते हैं, नव जहाँ कहीं वह समुदाय होता है वहीं पहुँच- कर उसपर छापा मारते हैं । हमारे घोडे जिनाब और जन्न नामके सुप्रतिष्ठित समु- दायों पर भी डाका डालते हैं जो कि घरोंमें रहते है। और उनमेंसे जो मर जायें वे मर जाय, हमें कुछ चिन्ता नहीं, लूट मारके लिये जब कोई और अपने भाई बन्दों पर ही छापा मारते हैं है

५०
अरवी काव्य-दर्शन।
.
हमारा शौर्य ।
हे प्रिये सलेम । मैं तेर मद्गलका अभिलाषी हूँ, सो तू भी
मेरे मङ्गलकी अभिलाषिणी हो। और यदि तू भद्र पुरुपोंको
मदिरा पान करावे, तो मुझे भी मदिरापान करा ।
यदि तू किसी दिन लोगोंको किसी शुभ कार्यके निमित्त
अथवा युद्ध के लिये बुलावे तो मुझे भी उस समय अवश्यमेव बुला।
यद्यपि शुभ कार्यके हेतु लोग कठिन उद्योग करते हैं
तथापि उसमें पहला तथा दूसरा दरजा हमारा ही हुआ करता है।
ज्योंही हमारा कोई सरदार मर जाता है, त्योंही हम
अपने किसी बालकको अपना सरदार बना देते हैं। (अर्थान
हमारे बच्चोंमे भी सरदारीकी योग्यता है 1)
युद्धके दिन निस्सन्देह हम अपनी जाने सस्ती कर देते हैं,
पर शान्ति-कालमें उनका मूल्य बहुत अधिक होता है ।
शत्रु जब युद्वमे योद्धाओंको ललकारते थे, तब हमारे ही
पूर्वज घोडोंसे उतरकर पैदल • मुठ भेड करते थे ।
जब कि अन्य शूरवीर तलवारोंकी धारोंसे भयभीत हाफर
खेतमें फतराते हैं, ऐसे समय में भी हम अपनी तलवारें हाथ में
लेकर शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं ।
युदमें दूरसे वागों द्वारा लाने, भपया नोंपर सार होकर नजों और
नलगाम लड़ने वाले, तलवार लेकर वैन लाना अधिक प्रगनौर ममझा जाता
मा। और थानसमें यह शौर्य का बड़ा मारी निद है।
~प्रतुदा"।
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પૂર
अरवी काव्य-दर्शन।
युद्ध-ताण्डव ।
ईश्वरकी सौगद, यदि वह (शत्रु) एकातमें मिले तो हम
दोनोकी तलवारें उसके साथ जायें जो हममें से प्रबल हो।
मैंने उन (अपने सम्बन्धियों) की हत्या करके अपने
क्रोधकी अग्नि शातकी है। परन्तु वास्तवमे अपनी उगलियोंको
ही मैने काटा है।
कम बिन पर।
जो मुझसे नहीं डरता, मै भी उससे, नही डरता। और न
मै किसीके लिये वह निर्देश करता हूँ जो निर्देश वह मेरे
विषयमें नहीं करता।
-उबई बिन हमाम।
जब युद्ध के समय कालके दाँत तुझको काटें तो तू भी
उसको उस समय तक काटता रह जब तक काल तुझको
काटता रहे।
--जरयत विन इल अशीम ।
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इसमें सन्देह नहीं कि प्रेमी ही प्रेमका मीठा म्वाद
चखता है, क्योंकि भूमण्डल पर उससे बढकर बुरा
मनुष्य कोई नहीं, क्योंकि प्रियाके वियोगके , समय वह
मिलनेकी अभिलापामें रोया करता है और मिलापके
समय वियोगसे चिन्तित होकर रोता है। सो उसकी ।
आँसे वियोग और सयोग दोनों हालतोंमें गर्म ही
रहती है।
--एक करि।
4

अरबी काव्य-दर्शन । ३-शृंगार। ~+SHAKI- प्रेम। एक दिन एक अनुरागशून्य हृदयवालेने कहा कि प्रेम तो कोई चीज ही नहीं है। मैंने उत्तर दिया कि यदि तुम प्रेमका रस चखते, तो जान लेते । उसने कहा कि अनुराग क्या दिल्लगीके सिवा और भी कोई वस्तु है ? सो दिल्लगी यदि न भाई तो उसकी ओरसे मुंह फेर लिया। क्या रोने पीटनेके सिवा अनुराग कोई और वस्तु है ? इसलिये जब जीने चाहा तब उसे रोक लिया। इन परिभाषाओंको सुनने के पश्चात् मैंने कहा कि जब आपने अनुरागकी यह परिभाषा बतलाई है, वो वास्तवमें आपने अनुरागको पहचाना ही नहीं। -पुला सौरनाiti

भरपी काव्य दर्शन।
प्रेमकी
माया।
जो कुछ तू करती है,
वह
मेरी दृष्टिमें अति
सुन्दर
प्रतीत
होता है । और तेरे सिवा अन्य कोई यदि उसी कार्यको
फरता है तो वही मुझे अति घृणित जान पड़ता है।
-एक कवि।
प्रेमकी चञ्चल तरजें।
अनुराग एक भडकती हुई आग है, जो मुझमें बढती ही
जा रही है।
ऐ किसीके दिल । क्या तुझमें अनुरागी ऐसे अतिथिके
निमित्त भी कोई स्थान है ?
निस्सन्देह मै तेरे दरवाजे पर खड़ा हूँ, और आशा करता
हूँ कि तेरी ओरसे मुझे कोई उत्तर मिलेगा।
मुझको दुबलेपनका वस्त्र पहनानेवाली ' तुझको कुशलता-
का वस्त्र मुबारक (धन्य) रहे।
.
श्मी प्रकारका कथन एक उर्दू कविका है
का अजब ग है कि दो मारक कैमा ही।
चुरी भी हर अदा उसको भलो मालूम होनी है।
माता-तचीमतका ढग विलक्षण है। यह यह कि चाहे प्रिय वीमा ही पयों न
हो पर उसकी प्रत्येक बुरी बात भी भली हा प्रतीत होती है।
-अनुवादका

श्कार। मेरे शरीरमें तो पुराने चिह्नों अर्थात् हड़ियों और पञ्जर- के सिवा कुछ शेष नहीं रहा । और इस सूखे पञ्चरमें केवल साँसको ही अनुरागने धाकी रक्खा है। मैंने तेरे लिये अश्रुओंको सस्ता कर दिया है । यदि तू न होती तो मेरे आँसू बडे महंगे होते । यदि तू अपने प्रेमके कपाट मेरे लिये खोल न देगी, तो मेरा दुर्भाग्य और मेरा पतन मेरी जान तेरे हाथमें है । यदि त मेरे धनसे प्रसन्न है तो मेरा सारा धन भी तेरा ही है। हे विधात । मैं तेरे दरबारमें शिकायत करता हूँ परन्तु तू नो जानता ही है कि मुझपर क्या बीत रहा है। –विदा-उद दान [ईर। , प्रेम-प्रार्थना । पृथ्वी पर ही बैठे बैठे मैंने तेरे निमित्त ऐसी प्रार्थना की है कि वह आकाशके कोने कोने में छा गई है। साधु लोग नम्रतापूर्वक जो प्रार्थना किया करते हैं, मे ईश्वर कभी भूलता ही नहीं। ईश्वर तेरे दर्शनसे तेरे शुभचिन्तकोंके लिये आनन्द मगल, की सामग्री एकत्र कर दे । तेरे निमित्त ही मैं जो प्रार्थना करता हूँ, हे परमात्मन ' तू उसको अच्छी तरह स्वीकार कर । -विहाउदीन जर।

अरबी काव्य-दर्शन।
馬
प्रेम-वृत्त ।
हे कान्ते । जबतक तू मेरी आँखोंसे ओझल रहती है,
मारा ससार मुझे उजाड मालूम होता है । सो हे चन्द्रमुखी
तू बता कि कब तेरा दर्शन प्राप्त होगा।
मैंने अपनी जानको तेरे अनुरागमें सपा दिया है। सो
मेरी प्यारी जान, मेरे निमित्त तू क्या करेगी?
मैं तो इसी वातसे प्रसन्न हूँ कि तू आनन्दपूर्वक जीवित
रहे । मैं दुनियों में इसीसे सतुष्ट हूँ।
अब मै अपने मोहको दूना कर दूं तो क्या वह निरर्थक
जायगा और क्या अश्रुओंके वहानेस लाभ नही होगा?
तेरे सिवा यदि किसी औरने मेरे साथ अपना वचन पूरा
किया है तो मैंने उसकी ओर आँस उठाकर देखा भी नहीं,
और यदि किसी औरने बुलाया है तो सुना तक नहीं ।
-~-विहाउदोन जुहर।
मेरी कान्ता एक उज्ज्वल कुरता पहने हुए निकली। उसकी
आँखें मतवाली थी। मैंन कहा कि पास होकर निकले, पर
मलाम भी नहीं किया, ऐसी सचमुच जब फि मैं तेरे सलामसे
ही राजी हूँ।
--एक कवि

कार।
प्रेम-निकेतन ।
"मेरे हृदयमें प्रेमकी प्रचड अग्नि प्रज्वलित है"-निस्सन्देह
मैं ऐसी बात उस समय कह सकता हूँ जब कि यदि मेरा
हृदय, केवल एक नेजेके लगभग दहकती हुई अनिके निकट
हो जाय तो उस अनिको ही जला दे।
क्या यह न्यायकी बात है कि मैं तो तेरा दुखिया प्रेमी हूँ,
परन्तु तुझसे न तो मुझको कुछ लाभ ही पहुंच रहा है और
न हानि ही?
यदि मैं रोगी हूँ तो सदैव रोगी ही धना रहूँ, और यदि
गुझपर जादू किया गया है तो ईश्वर करे, मेरा जादू अच्छा
होनेमें ही न आवे ।
-एक कवि।
प्रेम-विनोद।
हे कान्ते तूने मेरे हृदयमें निषास किया और इसीमें
तेरा गुप्त भेद है। सो ऐसा घर और ऐसे पड़ोसी दोनों धन्य है।
इसमें तेरे भेदके सिवा मैंने किसी औरको स्थान नहीं
रिया है। तूही अपनी दोनों ऑसोंसे देख ले कि क्या कोई
और इसमें निवास करता है।

भरवी काव्य-दर्शन।
हे घातक ! मेरे अनहित में भी जो कुछ तू करती है, मैं
उससे प्रसन्न होता हूँ, और जो कुछ तू अच्छा समझती है, मैं
भी उसे अच्छा ही समझता हूँ।
मेरा हृदय अगारेके समान जलता हुआ है । पर ईश्वरकी
सौगन्द, वह खिन्न नहीं है और न अपने वचनसे टलना ही
चाहता है।
मैं अपने आपको ऐसी मृगनयनी पर न्योछावर करता हूँ
जिसका प्रकाश चन्द्रमाके समान है और जिसको देखकर
बुद्धि और ऑखें हैरान हो जाती हैं।
यह एक अति अद्भुत दृश्य है कि उसके वालों में अग्नि
और जल प्रतीत होता है, पर वास्तवमें न तो उनमें अग्नि ही
है और न जल।
जिस रातको मैं जागता रहता हूँ, वह बहुत ही अच्छी
होती है, क्योंकि उस रातमें मेरे अश्रु मेरे निमित्त कहानी
कहनेवालेका काम देते हैं।
वियोगकी रात चाहे छोटी हो चाहे घडी, पर वह मेरी
अभिलापाओं और स्मृतिसे सहानुभूति रखती है।
-विहाउदोन जुर।
जिस दिन किसी कान्ताका कान्त अपनी कान्तासे रुष्ट
रहता है और उसके वियोगमें पड़ा रहता है, कान्ता द्वारा उस
दिनफे किय हुए शुम कार्यको ईश्वर स्वीकार नहीं करवा ।
-भक युवती ली।

शृङ्गार"
प्रेम-आलिङ्गन ।
हे मित्रो । यदि मैं अपने विचारोंसे टल जाऊँ तो उच्च
पदाके निमित्त और प्रेमके मार्गमें मेरी प्रतिज्ञाएँ पूर्ण न हों।
तुमसे प्रेम करने के बाद यदि मैं किसी अन्य पर मोहित हो
जाऊँ, तो ईश्वर करे कि उच्च स्थानकी चोटियो तक मेरा साहस
भी न पहुँचे। (अर्थात् मैं साहसहीन हो जाऊँ।)
यदि मेरे मोहकी अग्नि शान्तिसे बुझ जाय, तो ईश्वर मुझे
किसी कार्य में सफल न करे और न मेरी नीतियाँ ज्ञानका
स्रोत बनें।
मैने तो तुम्हारे प्रेममें अपनी सवारी त्याग दी है और
अकेला हो गया हूँ, यहाँ तक कि पारितोषिकमें मुझे घीमारी
मिली है।
तुमने अपनी शरणमें आनेवाले प्रेमीपर निस्सन्देह अत्या
चार फरनेका फैसला कर लिया है। सो हे अत्याचारियो।
भय तुम्हारे अत्याचारकी दुहाई है।
तुम्हारे प्रेममें प्रत्येक कड़वी वस्तु पर धैर्य धरता हूँ। सो
है भले लोगो। तुम्हारे कारण दु समें भी मुझे कैसा अच्छा
स्वाद मालूम होता है।
ईश्वर करे, तुम्हारा दिल उस प्रेमी पर पसीजे, जिसके
स्पमायमें तुम्हारा प्रेम सृष्टिके आदिसे है।

अरबो काव्य-दर्शन।
जब मैं प्याससे कष्टमें होता हूँ और उस समय भी यदि
तुम्हारी याद आ जाती है, तो शीतल जल तक पहुँचना भूल
जाता हूँ।
मेरा प्रेम जीवित है और मेरी शान्ति मर चुकी है। मेरे
शरीरमें हृदय है, पर उसकी उपस्थिति भी अनुपस्थितिके बरा
बर ही है।
अब इस जानके मामलेमें ईश्वरसे डरो, जो तुम्हारे
शरण अथवा पडोसमें है। पड़ोसीके साथ नकी करना
एक प्रशंसनीय गुण है।
अहा ! वह भरपूर आनन्द कैसा अच्छा था, जब कि बुरे
दिन भी हँसमुख मुखबा दिसलाते थे।
मना पहाड़के किनारेकी सुन्दर रात्रियाँ कैसी अच्छी और
छोटी थी, पर उनके वियोगके पश्चात् लम्बी हो गई।
वे लोग कैसे उदार हृदयके और प्रतापी थे जिन्होंने अपने
सव्यवहारसे प्रत्येक कुलीनको अपना दास बना लिया था।
वह अपनी तिरछी चितवनसे क्षयके वाणोकी बौछार
करते थे, और उनकी आँखोंमें लगे हुए सुरमेने पाणोको
अधिक विषैला बना रक्खा था ।
-इन मार्क।

श्कार। प्रेम-पत्रावली। (अनुरागीकी ओरसे) हे प्राणोंकी जान । तू अपने मिलनका दान उसको दे, जिसको तेरे वियोगने घुला दिया है । मैं पहले आनन्दमय जीवन व्यतीत करता था, पर आज मैं एक दीन-हीन दुखिया हूँ। मैं सारी राज जागता रहता हूँ और रानिमें मेरे दुख ही मेरी कथा वाचक होते हैं। सो ऐसे हीन दुखियापर दया कर जिसका हाल बहुत ही शोचनीय हो गया है। जव कि सवेरा होता है, उस समय प्रेमकी मदिरासे मत- वाला हो जाता है। ( अनुरागिनीका उत्तर) हे नाना प्रकारके दुस सहनेवाले और अनुरागका दम भरनेवाले | क्या तू चन्द्रमासे मिलनेका आमिलापी है ? तू धोखमें है। क्या कोई चन्द्रमासे अपनी इच्छाएं पूर्ण कर सफा है ? मैंने तो तुम्हें सुनाकर बातों यातोंमें उपदेश दिया था कि अव थम जाओ, क्योंकि तुम मृत्यु और आपत्तिके पगुलमें मा फैसे हो। .

अरयी काव्य-दर्शन।
अब तुमने मिलनका प्रश्न फिर उठाया, तो तुम्हें हमारी
ओरसे बड़ी भारी हानि पहुंचेगी।
अब तुम्हारे लिये उचित यह है कि तनिक बुद्धिसे काम
लो, और भली भाँति जान लो कि मैंने अपनी ओरसे तुम्हें
उपदेश दे दिया।
उस ईश्वरकी शपथ, जिसने सारी वस्तुओंको उत्पन्न
किया है और आकाश-मण्डलको तारागणसे सुशोभित किया
है, यदि तुमने फिर कभी मुंहसे वह बातनिकाली जो अभी
कही है, तो किसी वृक्ष की डाल पर तुम्हें फाँसी दे दूंगी।
(अनुरागीका प्रत्युत्तर)
प्रेमके कारण तुम मुझे मार डालनेकी धमकी देती हो,
पर सच तो यह है कि मृत्यु तो एक दिन आवेगी ही, सो
मरना मेरे लिये वस्तुत आनन्द दायक है ।
जो अनुरागी कान्ताके घरसे निकाला और दुतकारा
गया है, वास्तवमें मृत्यु उसके लिये चिर आयुसे अधिक
उत्तम है।
जिस मनुष्यके सहायक थोडे हैं, यदि तुम उससे मिलने
जाओ तो बहुत अच्छी बात है, क्योकि वास्तव में जो मनुष्य
दूसरोंकी भलाईमे लगता है, वह धन्यवादका पात्र होता है ।
यदि तुमने मुझे मार डालनेका निश्चय किया है, तो मैं
हाजिर हूँ, क्योंकि मैं तो तुझारा दास हूँ। और दास तो कैदमें
होता ही है।
..

श्टहार।
६५
मैं तो तुम्हारे लिये अति व्याकुल हूँ, पर तुम्हारे मिलनेकी
कोई राह सूझ ही नहीं पड़ती। हाँ, व्याकुलचित्त भला क्योंकर
कोई उपाय सोच सकता है ?
हे जानकी मालिका | तुम मुझपर दया करो, क्योंकि जो
मनुष्य सौन्दर्य पर मोहित होता है, वह बेबस हो जाता है।
( अनुरागिनीकी ओरसे प्रत्युत्तर )
हे मिलनफे भूखे अज्ञानी । तू अनुरागके पजेमें धुरी
तरह फंसा है । क्या तू चतुर्दशीके प्रकाशमान चन्द्रमाके पास
पहुँच जायगा?
अब मैं तुझे ऐसी प्रज्वलित अग्निमें डालूँगी जिसकी
लपट कभी ठण्डी ही न होगी, और तुझे ऐसाघायल बनाऊँगी
जिस पर अनगिनत तेज़ तलवारें पडी हों।
हे प्रेम करनेवाले । मेरे मिलनसे पहले बड़ी कठिन दूरी
है, और साथही साथ ऐसी बुरी और टेढी उलझन है कि आयु
पर्यन्त उसका सुलझना दुस्तर है।
तू अनुरागका परित्याग कर और उससे मुंह मोड़ । मेरी
यह शिक्षा मान ले, क्योंकि यह अच्छी वस्तु नहीं है।
-एक कवि।
प्रमियोंके वियोगको छोड़कर ससारकी सारी मापदाप
मुझको तो सुगम ही प्रतीत हुई हैं।
-एक कषि।

भरबी काव्य-दर्शन। प्रेमका भिखारी। अनुरागी लोग विरहकी वेदनाकी शिकायत करते हैं । परन्तु मेरी अभिलाषा तो यह है कि परमात्मा वह सबका सब विरह कष्ट, जो अन्य समस्त लोग इस मार्गमें उठाते हैं, मुझे अकेले ही उसका उठानेवाला बना दे। ऐसी दशामें सारेका सारा प्रेम मेरे ही हिस्से में हो जायगा । यहाँ तक कि वैसा स्वाद न तो मुझसे पहले किसीने चग्वा था और न आगे कभी चसेगा ही। . -एक कवि। प्रेमका दास। वियोगने जबसे मेरे हृदयमें चिरफाल, तक न बुझनेवाली अग्नि प्रज्वलित की, तबसे मैं दुर्बल हो गया हूँ । नहीं तो मै इससे पहले बहुत शक्तिशाली था। मुझे आशा थी कि जव बहुत समय बीत जायगा तब मेरा अनुराग लुप्त हो जायगा, किन्तु ऐसा न हुआ। अनुरागने तो अब मेरे हृदयके बीचो बीच तथा अंतडियों- में भी मूसलाधार वर्षा कर दी है। पर बादमें भी रह रह- फर जोरकी झड़ी लगती है। वास्तवमें उनका हाल बडा आश्चर्यजनक है जो मुझको आँख उठाकर बार बार देखते हैं, मानों मुझे देखनेसे पहले और बाद उन्होंने कोई आशिक (प्रेमी) देखा ही नहीं था।

लोग कहते है कि यदि तू अपनी कान्तासे नाता तोड ले
सो सेरी सुध-बुध ठीक हो जायगी। परन्तु सच तो यह है
कि यारसे नाता तोडनेमें तो सुध-बुध औरभी ठिकाने न रहेगी।
ऐ लोगो, क्या यह भाश्वर्यकी बात नहीं कि जो मेरा
पातक है, मैं उसीके साथ प्रेम रखता हूँ ? मानों उस घातक.
को उसके घातके बदले में मित्रता देवा।
मेरे प्रेमके प्रमाणोंमेसे एफ प्रमाण यह भी है कि मेरी
कान्ताका फुटुम्ब मेरे हृदय और आँखोंमें मेरे कुटुम्बियोंसे
भी अधिक प्यारा है।
-सन-दिन-मुनेर ।
प्रेमका वशीभूत ।
मेरा एक मित्र है जिमका में न तो नाम ही बतलाऊँगा
और न जिसकी कोई बात ही बतलाऊँगा।
अपने मनमें तो मैं उसका नाम लेता ही हूँ, पर यदि अपनी
जबानसे भी उसका नाम ले सकता, तो मेरे लिये यह एक
अच्छा ढग था कि मैं उसका नाम लोगोंको बतला सकता।
मैं अपने मित्रके विषयमें यह बात पसन्द नहीं करता कि
लोगों में उसको चर्चा की जाय ।
वह विख्यात तो है, किन्तु वह अज्ञात विख्यात है । अर्थात्
उसका ठीक ठीक हाल किसीको मालूम ही नहीं है।

अरबी काव्य-दर्शन।
वह हिरन है, परन्तु जब मैं उससे मिलापके लिये सके
करता हूँ, तो चीतेके समान हो जाता है ।
अब मेरा हाल यह है कि अश्रु मेरे नयनोसे बन्द ना
होते और जीभ लडखड़ा रही है।
वास्तवमै मेरी व्यथाकी कथाने मुझे बुरा-भला कहने
वालोंका भी बुरा हाल कर दिया और उनको बड़ी भार
परेशानीमे डाल दिया है
मेरे शुभचिन्तको । चुगुलसोरोकी बातो पर तनिक में
ध्यान न दो, चाहे वे थोडा कहे चाहे ज्यादा ।
मेरी राम कहानी बहुत ही लम्बी-चौड़ी है और गुल
खारोंके अनुमान तथा समझके बाहर हैं।
प्रेमके पथमें वचन भङ्ग फरनेका पाप निस्सन्देह एक
ऐसा पाप है जिसका कोई प्रायश्चित्त ही नहीं है।
~-विदाउद्दीन जुरेर।
ससारक शूरवीरोंसे हम लडते हैं और उनको मार डालते
हैं, पर कोमलाङ्गी नवयौवनाओंकी तिरछी चितवन हमको
शान्तिक कालमें ही मार डालती है।
-मुमलिम बिन वलीद।

श्कार।
अपनी प्रेम-कथा ।
जब कि कोई उसके निकट नहीं होता, तब मैं उससे वार्ता-
लाप करता हूँ और उत्तरके लिये कहता हूँ, किन्तु वह उत्तर
नहीं देती।
जय कि मैं उसकी कोई मीठी बात सुनता हूँ तो घुल
जाता हूँ। यही नहीं, बल्कि ऐसी भी सभावना है कि
उसके मीठे वचनके कारण मिठास भी धुल जाय ।
मैं जब उसको देखता हूँ,तब मेरा दिल लहराने लगता है,
और प्रसन्नवृत्ति चित्त यदि नाचने लगे तो भी आश्चर्यजनक
पात न होगी।
इस ससारमें मेरे भाग्यमें भी कुछ वस्तु आई है। किन्तु
उसकी ओरसे तो मुझे कुछ भी नहीं मिला ।
हे विधाता तू ही बता कि मेरी जो यह दुर्दशा हो रही
है वह किस पापके कारण है, जिसमें मैं उससे तोबा
(प्रायश्चित्त पश्चात्ताप) कर लूं।
हे कान्ले ! मेरी दुर्दशा देखकर तो समस्त लोगोंके हृदय
पसीज गये हैं, परन्तु तू ऐसी निठुर है कि तेरा हृदय पसीजता
है। नहीं।
हे कान्ते तू ही बता फि तू मित्र है अथवा शत्रु, क्योंकि
तेरे कार्य मित्रकेसे नहीं हैं।

अरबी काव्य-दर्शन।
कान्ते । तेरे सम्बन्धमें मेरे शत्रु नाना प्रकारके हैं। कुछ
तो डाही, कुछ बुरा-भला कहनेवाले, कुछ चुगुलखोर और
कुछ रकीब (प्रतिद्वन्द्वी) हैं। परन्तु मैं उनकी करनी पर
हँसता हूँ।
वास्तवमें मुझे तेरे विषयमें घोर सपाम करना पडा है ।
सो आशा है, तेरे मिलनसे विजयी होनेका सौभाग्य प्राप्त
हो जायगा।
थोडे ही कालके पश्चात् मैं अपने अनुरागका गुप्त रहस्य तेरे
सन्मुख रख दूंगा। परन्तु मैं नहीं समझता कि ऐसा करनेमें
मैं कहाँ तक भलाई या बुराई करूँगा।
मैं तेरे सौन्दर्यको भलाईका शकुन समझता हूँ। क्योकि
इससे मुझे इस बातकी शुभ सूचना मिलती है कि मैं घाटेमें
न रहूँगा।
-विहाउद्दीन जुहैर।
जिस स्थानमे मेरी प्यारी सुलेमा उतरती है उसे मैं बहुत
प्यार करता हूँ, चाहे अकाल ही सदैव उस भूमिके स्वामी
रहें। अर्थात् चाहे निरन्तर वहाँ अकाल ही क्यों न बास
करता हो ।
-पक कवि।
+

आदर्श प्रेम। हे सुन्दरी ' तू अपने अनुरागको मुझमें अधिक न बढा, क्योंकि अनुरागकी अधिकतासे मनुष्य कुमार्गी हो जाता है । जब मामला हाथसे निकल चुका है तब भला मैं अनु. रागको क्योंकर छिपा सकता हूँ? मैं तो अनुरागसे मर गया हूँ, पर मुझे धिकारनेवाले कहते हैं कि तू जीवित है। मेरे हृदयमें अनुरागका बसेरा तो बचपनसे है, और उसी- का बहुत कुछ अश अब भी बाकी है। हे लोगो तुम मुझसे यह न पूछो कि मैं किस बातपर मोहित हो गया हूँ, और वह कैसी है। वह सौन्दर्यमें सूर्य- से भी अपूर्व है और उसके ऊपर काले घुघरवाले बालोंकी छाया है। वह मेरे लिये दुखदायी तो है, पर मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मानों परम्परासे ही वह मुझ पर कृपालु है। -बिदाउदीन जुहेर। . मैं उस व्यक्तिके प्रेमकी शिकायत करता हूँ जिसकी दूरीने मुझे दुर्बल कर रखा है, और मेरे हृदय में ऐसी अग्नि प्रज्वलित कर रखी है जो बुझाई ही नहीं जा सकती। -सातारी मरांक।

७२ अरवी काव्य दर्शन। प्रियाकी याद । [अरबमे हीर नामी देशके बादशाहकी रानी अति सुन्दर थी। रानीका नाम "हिन्द' था पर वह 'मुतजररिद 'के नामसे भी विख्यात थी। दैवयोगसे ऐसा हुआ कि एक बार महलके नीचेवाले वागमें रानी अपनी सहेलियोंके साथ सैर कर रही थी। वहीं रानी और कविकी आँखें चार हो गई। कवि भी अपने शौर्य तथा कुटुम्बके लिहाजसे कुछ कम यश प्राप्त किये हुए न था । अत दोनोंमें गाढा प्रेम हो गया । कुछ काल तक बादशाहको बिल्कुल सवर ही नहीं लगी। बादमें जब एक दिन बादशाहने अपनी आँखोंसे दोनोंको एक साथ बैठे देखा तब कविको धन्दीगृहमें डाल दिया । उसी कैदकी हालतमें अपनी प्रेमिकाका ध्यान धरकर कविन जो सीधे सादे पद्य कहे थे, उन्हींका अनुवाद नीचे दिया जा रहा है। -अनुवादक हे कान्ते । यदि तू मुझे निधन समझकर घिकारती है तो मेरे साथ इराकको चल और वहाँसे मत लौट । अव तू मेरी आर्थिक पूजी न देख, बल्कि मेरी श्रेष्ठता और मेरी भलमनसत पर दृष्टि डाल । मेरी अधीनतामें ऐसे तेज सवार हैं जो अनिकी लपट- के समान वेज हैं और नर घोड़े सदैव उनकी रानोंके नीचे रहते हैं। -

तार।
उन सवारोंकी जिरहों और कवचोंमें मजबूत कीलें हैं।
उन्हींसे उन्होंने अपने खोदोंके किनारोंको बाँध लिया है
जिसमें वे लड़ाई में गिर न जाय ।
उन सवारोंने जिरह (कवच) पहनी, फिर गाती बाँधी,
और गाती बाँधना प्रत्येक अस्त्र-शस्त्रधारीके निमित्त उचित है।
वह सवार सबके सर एकही रग ढगके बाँके तिरछे है
और चर्स पक्षीके समान बडे उद्योगी हैं ।
उन घोड़ोंके बहुत तेज दौड़नेके कारण बड़ी धूल उड़ा
फरती है और जिन पशुओं तथा ऊँटों पर वे छापा डालते हैं
उनको झटपट उठा ले जाते हैं।
मैंने अपनी ऑ- ऐसे सवारोंसे ठण्डी की हैं जिनसे
अधीर-गुलालके समान सुगन्धि आती थी।
जब घोर अकाल पड़ता था उस समय मेरे पूर्वज धर्मार्थ
कार्य करते हो देसे जाते थे।
मैं अपनी कान्ता 'मुतजोरद' के पास निस्सन्देह उस
दिन गया था जिस दिन वर्षा हो रही थी।
उसके कुछ उस समय उभरे हुए थे और वह श्वेत रेश्मी
वस्त्र धारण किये हुए थी।
मैंने उसे परदेसे निकाला । फिर यह मेरे साथ चली और
अति प्रसन्न होकर चली । मानों कता (मटतीतर) पक्षी पानीकी
ओर जा रहा था।
मैंने उसका चुम्यन किया तो उसने ऐसी साँस ली जैसे
हिरनका छोटा यथा भयके अवसर पर दम चदा लेता है।

-
.
अरषी काव्य-दर्शन।
फिर वह मेरे पास आ गई और बोली कि मुनस्खल, तू
दुर्बल क्यों हो गया है ? तेरा शरीर इतना गर्म क्यों है ?
मैंने कहा कि तेरे प्रेमके सिवा और किसने मुझे दुर्बल
किया ? सो मेरा हाल न पूछ और चली चल।
मैं उससे प्रेम करता हूँ और वह मुझसे, पर उसके प्रेमकी
सीमा यही तक नहीं है कि वह मुझसे प्रेम करती है, बल्कि
उसकी ऊँटनी भी मेरे ऊँट के साथ प्रेम करती है।
मेने केवल छोटे छोटे प्यालों भर शराब नहीं पी, बल्कि
बडे बडे प्यालों-भर शराब पी है।
जब मैं शराबमें खूब मतवाला हो जाता हूँ तब अपने
आपको बडा भारी बादशाह समझता हूँ।
पर जब नशा उतर जाता है तब फिर उस समय ऊँटों
और बकरियोंका स्वामी हो जाता हूँ।
है कान्ते ! भला उसका कौन मिन्न होता है जिसकी मिट्टी
प्रेमने खराब फर रक्खी है ? और हे कान्ते । दुखी कैदीका
भला कौन सहायक होता है ?
-मुनख्खलयशकरी।
वह प्रेम जिसका तुम दम भरते हो, यदि सहा होता
तो तुम पानीपर भी चलनेका साहस करते ।
-विशा उद्दीन जुहेर।

शारा
प्रियाका बखान ।
मैने चन्द्रमा और कान्ताके मुसदेको देखा, सो दोनांके
दोनों दृष्टिमें चाँद ही प्रतीत होते थे ।
मैं ऐसा दृश्य देखकर भोचकासा हो गया और बिलकुल
ही न जान सका कि कौनसा आकाश मण्डलका चन्द्रमा है,
और कौनसा मनुष्य-जातिका ।
यदि कान्ताके गालोंपर गुलाबकीसी रगत न होती और
वह मुझे अपन काले बालोसे न डराती, तो मैं चन्द्रमाको
कान्ता और कान्ताको चन्द्रमा ही समझ बैठता।
हाँ, आकाशका चन्द्रमा तो छिप जाया करता है, पर यह
चन्द्रमा कभी छिपता ही नहीं। फिर भला छिप जानेवाले
चन्द्रमाकी तुलना इस न छिपनेवाले चन्द्रमाके साथ क्योंकर
हो सकती है?
-नर लिन शुमैन ।
प्रेमीकी विरह-कातरता ।
मेरी कान्ताने मेरे विषयमें न्याय नहीं किया, क्योंकि जय
मैं उससे मिलना चाहता हूँ तब वह दूर हो जाती है। और
जब मैं उससे दूर रहना चाहता हूँ तब उसका वियोग उससे
मिलनेके निमित्त उत्तेजित करता है ।
वह उस मनुष्यसे, जो उससे मिलना चाहता है, दूर भागती
है। मानों वह उससे प्रौति रसती है जो उससे प्रीति
नहीं रखता।
-कदि।
.

भरवी काव्य दर्शन। सन्ताप। ऐ नजद देशकी पुरवाई हवा तू नजदसे कब चली थी ? सुन, निस्सन्देह तेरे चलनेने तो मेरे ऊपर विरहकी तह चदा दी हैं। प्रात.काल कुछ दिन चढे जब कुमरी बेतकी कोमल हरी भरी डालीपर बोली, तो मैं बच्चोंके समान रो पडा, अपने हृदय- को थाम न सका । और उस समय इतना व्याकुल हुआ कि में कभी उतना व्याकुल हुआ ही न था। बहुतसे लोगोंने निस्सन्देह यह समझ रखा है कि कान्त जब कान्ताके पास होता है, तब उस कान्तका दिल दुखी रहा करता है, और कान्ताके दूर रहनेसे कान्त कुछ शान्त रहता है। मैने प्रत्येक ढगसे दवा की, लेकिन मुझे तो किसी प्रकार- से शान्ति न मिली। हाँ, फिर भी कान्ताका घर दूर होने के बदले निकट होना अधिक उत्तम है। पर कान्ताक घरके निकट होनेसे क्या लाभ, यदि कान्ता मिलनसार न हो ? -अम्दुल्ला दुमैगी। . प्रमके मार्गमें जिसने दुख भोगा है, वही उमको पह- चानता है। -~ -माला बरामद

टहार।
५६
आत्म-प्रमाद।
हे प्रिये । मुझको तेरे प्रेमने ऐसे स्थानपर सडा कर
दिया जहाँ तू है। सो उस स्थानमें न तो आगेही बढ़
सकता हूँ और न पीछेही हट सकता हूँ।
जो लोग तेरे प्रेमके कारण मुझको बुरा-भला कहते हैं,
उनको चाहिए कि वे दिल खोलकर मुझे बुरा-भला कहे,
क्योकि वे चुरा भला कहते हैं तब तेरी चर्चा करते हैं जो
मेरे लिये अति रुचिकर है।
मुझको जिस प्रकार शत्रु कष्ट देते है उसी प्रकार तूभी
कष्ट देती है। इसलिये अब जब कि तू शत्रुओंके समान हो
गई तो मैं अब शत्रुओंके साथभी प्रेम करने लगा हूँ ।
जब तूने मेरा तिरस्कार किया तो मैंने अपने आपको
अन्यन्त तिरस्कृत किया, क्योंकि जो तेरी दृष्टिमे तिरस्कृत है,
वह प्रतिष्ठाका भागी नहीं हो सकता।
जब
.
-प्रवुल शैमा
समर क्षेत्रमें घाण हमारे प्राणोंके घातक नहीं होते, पर
वह तीर जो भंवोंकी धनुषमें लगाये जाते हैं, हमारा अन्त
कर देते हैं।
-मुमलिम मिन-वलीद।

भरयो काव्य-दर्शन। , . सन्ताप। ए नजद देशकी पुरवाई हवा तू नजदसे कब चली थी ? सुन, निस्सन्देह तेर चलनेने तो मेरे ऊपर विरहकी तह चदा दी है। प्रात काल कुछ दिन चढ़े जब कुमरी घेतकी कोमल हरी भरी डालीपर बोली, तो मैं बच्चोंके समान रो पडा, अपने हृदय- को थाम न सका । और उस समय इतना व्याकुल हुआ कि मैं कभी उतना व्याकुल हुआ ही न था। बहुतसे लोगाने निस्सन्देह यह समझ रखा है कि कान्त जब कान्ताके पास होता है, तब उस कान्तका दिल दुखी रहा करता है, और कान्ताके दूर रहनेसे कान्त कुछ शान्त रहता है। मैने प्रत्येक ढगसे दवा की, लेकिन मुझे तो किसी प्रकार- स शान्ति न मिली। हाँ, फिर भी कान्ताका घर दूर होनेके बदले निकट होना अधिक उत्तम है। पर कान्ताक घरके निकट होनेसे क्या लाभ, कान्ता मिलनसार न हो ? -अम्दुल्ला दुमैनी। . यदि . प्रेम मार्गमें जिसने दुख भोगा है, वहीं उसको पह- चानता है। -मयू मग्दुल्ला बगदाद।।

श्टर।
आत्म-प्रमाद।
हे प्रिये । मुझको तेरे प्रेमने ऐसे स्थानपर खडा कर
दिया जहाँ तू है। सो उस स्थानमे न तो आगही घढ
मकता हूँ और न पीछेही हट सकता हूँ।
जो लोग तेरे प्रेमके कारण मुझको बुरा-भला कहते हैं,
उनको चाहिए कि वे दिल सोलकर मुझे चुरा-भला कहें,
क्योकि जब वे बुरा भला कहते हैं तब तेरी चर्चा करते हैं जो
मेरे लिये अति रुचिकर है।
मुझको जिस प्रकार शत्रु कष्ट देते हैं उसी प्रकार तूभी
कष्ट देती है। इसलिये अब जब कि तू शत्रुओंके समान हो
गई तो मैं अब शत्रुओंके साथभी प्रेम करने लगा हूँ।
जय तूने मेरा तिरस्कार किया तो मैंने अपने आपको
अत्यन्त तिरस्कृत किया, क्योंकि जो तेरी दृष्टिमे तिरस्कृत है,
वह प्रतिष्ठाका भागी नहीं हो सकता।
-~-अबुल शेम।
समर क्षेत्रमें पाण हमारे प्राणोंके घातक नहीं होते, पर /
वह तीर जो भँवोंकी धमुपमें लगाये जाते हैं, हमारा अन्त
कर देते हैं।
-मुमलिम दिन-वलीद।

अरवी काव्य-दर्शन ।
.
प्रेम-पिपासु ।
हे कान्ते । तेरे लिये मेरा वह हाल है जो किसी ऐसे
प्यासेका होता है जिसने कि केवल एक ही बारकी प्यास
बुझाने के लिये ऐसे स्थान में पानी देखा हो जिससे पहले एक
गढा हो और उसमें भी मृत्युका भय हो ।
उस प्यासेने अपनी दोनों आँखोंसे ऐसा पानी देखा हो
जिसके घाट तक पहुँचना कठिन हो और जिसे विना पिये
प्यासा लौट भी न सकता हो।
-एक पवि।
आत्म-विस्मृति ।
हे प्रिये । मैं तेरे प्रेमके वश में ऐसा हो गया हूँ जैसे नकेल.
वाला ऊँट, कि जिधर इच्छा हो उसी ओर वह सींचा जा
सकता है।
मेरे हृदयमें जितना प्रेम है, वह सब प्रकट नहीं किया
जा सकता, और जिन बातोंके छिपानेमें मैं अशक्त हूँ, उनमें
एकता भी नहीं।
बोननयों में रह ना सक्का
जीम ना बने सहाई।
मरज द रथ जोड़देयाई
पौ यानां विच पाई।।
-पूरए नारक ।

हार।
मैं तुझसे मिलापकी वैसी ही अभिलाषा रखता हूँ जैसी
कि एक प्यासा पानीकी, परन्तु उस प्यासेको कूआँ खोदते
समय पानीसे भी पहले पत्थरकी ऐसी एक कडी शिला मिल
जाय जिसको वह तोड हो न सके ।
भला ऐसे निष्ठुर व्यक्तिसे क्या आशा की जा सकती है
जो मरी जान निकलती देसे तो कहे कि निस्सदेह यह स्वस्थ
है और बडे पके हृदयवाला है । . --अमद समुदायका एक कवि।
(ख)
हे कान्ते ' तू झाऊके वृक्षोंसे ही पूछ ल कि क्या मैंने तेरे
घरके टूटे फूटे चिह्नोंकी वन्दना नहीं की है, क्या मैं वहाँ
टीलोंपर दुखियाके समान खडा नहीं हुआ, क्या खड़े होनेके
समय खुश था, और फिर प्रात काल मेरी आँखोंसे क्या ऐसे
आँसू नहीं बहे जो टूटी हुई लडीके मोतियोंके समान
नथे ।
मैं लोगोंको देखता हूँ कि वे वसन्त ऋतु की आभि-
लाषा रखते हैं। किन्तु मेरे लिये तेरा मिलना ही वसन्त
ऋतु
है
•पर जान मेरी है जोपोंमें, जालिम ।
उधर तू कहे -यह तो अच्छा मना है।
+ मादीभूत बन' सर्व
क शुओ मे न दृश्वने ?
* मुक्ताहारस्त्रुटितपतिन चोपने नेत्रयों में ।
- लोको कददे आई वमत ।
जद मेरो भो प्राणपारी आवे
भावेनदही आई धम्त।

भरबी काव्य-दर्शन।
मैं देखता हूँ कि लोग अकालसे डरते हैं, परन्तु मैं जिस
अकालसे डरता हूँ वह तेरा प्रस्थान है ।
ईश्वरकी शपथ, यदि मुझे इस बातसे दुस पहुंचा है
कि तूने मुझे कष्ट पहुँचाया है तो कुछ हर्ज नहीं, क्योंकि मैं
इस बातसे प्रसन्न हूँ कि तेरे दिल में मेरे विषयमें कुछ ख्याल ,
तो पैदा हुआ।
--एक कवि।
.
अपनी दुःख-गाथा ।
मेरे हृदय में तुम्हारे लिये अक्षय प्रेम है, और अपने लिये
सकटमय अभिलाषा ।
मैंने तुम्हारे पास बहुत पत्र और दूत भेजे, पर वे मेरी
व्यथाको भली भाँति दर्शा न सके।
मेरे अन्त करणमें ऐसी ऐसी बाते भरी पड़ी हैं जिनकी
में चर्चा ही नहीं कर सकता । यहाँ तक कि दूतको जतलाना
अथवा पत्रो द्वारा ही उनको प्रकट करना उचित नहीं
समझता।
तुमने यह ख्याल कर लिया कि मैंने प्रतिमाओका भग
कर दिया है, पर वास्तवमें वह पिशुन पापी है जिसने अपने
आपको तुम्हारा शुभचिन्तक जतलाकर मेरे विषय में हलाहल
वेष उगला है।

श्तार।
यदि पिशुन झूठा नहीं है, तो सम्भव है कि बेहोशीकी
हालतमे रहा हो, अथवा हँसी ठठेके समय शायद भूलसे
प्रतिवा-भगका कोई शब्द उसके मुँहसे निकल गया हो ।
प्रतिज्ञा-पालनका गुण जन्मसे ही मेरे स्वभावमें है।
प्रेमके मार्गमे वचन-भगका दोप मुझमें नहीं, और मेरा भाव
कदापि तनिक भी बदल नहीं सकता।
तुम्हारे वियोगके पश्चात् मैंने जिस प्रकार प्रतिज्ञाका
पालन किया है, उसका हाल मुझसे न पूछो, बल्कि अन्य
लोगोंसे पूछो, क्योंकि अपने मुँह मियाँ-मिटठू बनना मुझे बुरा
मालम होता है।
हे मित्रो । यताओ तो सही कि कब तक और कहाँ तक
मैं अपनी दु ख गाथा तथा सकेतकी यात तुम्हें प्रकट रूपमें
सुनाता ही रहूँगा?
जबसे
तुम्हारा विछोह हुआ है, तवसे मेरा जीवन और
मेरा सतोप दोनों अनाथ हैं, कोई इनका सहायक नहीं।
और मेरे आँसू इन दोनों अनाथोंकी दशाको दर्शा रहे हैं।
-विहाउदीन जुबैर।
अपने अनुरागीके मार डालनेसे अनुरागिनीको पुण्य नहीं
होता, बल्कि अनुरागी ही पुण्यका भागी ठहरता है।
-एक्युबनी ली।

कार।
५
राम-कहानी।
मुझ पर दुखोंका पहाड टूट पडा है, मैं वियोगसे सिज
लाया हुआ हूँ, मेरे नेत्र अश्रु बहा रहे हैं और मेरा दिल जला
जा रहा है।
परन्तु मुझ जैसे दुखिया पर अनुरागकी जलन और
ज्यादा हो गई है, यहाँ तक कि सन्ताप और विलापके कारण
मेरी दशा अधिक शोचनीय हो गई है।
हे परमात्मन | यदि मेरे लिये तनिक भी भलाई इसीमे
हो, तो जबतक जानमें जान बाकी रहे, मेरे ऊपर दुखोकी
ही मारामार रहे।
उस मृगनयनीके वियोगमें मेरा शरीर दुखोंका पर
बन गया है
हे पुरवाई हवा ' तू उस सुन्दरीके गृहकी ओर प्रस्थान
कर और उस पर क्रोध कर, क्योंकि सभव है कि सेरे क्रोधसे
उसका हृदय कुछ नर्म हो जाय ।
जब उसका दिल नर्म हो जाय और वह तेरी बात
सुन्ने लगे तो मीठे शब्दोंमे प्रेमियोंकी दुर्दशाकी भी
चर्चा कर।
ईश्वर तेरा भला करे, तू मेरी भी चर्चा छेडना और
पूछना कि क्या तुम्हें भी कुछ सबर है ?

अरबी काव्य-दर्शन। m - कैराग्य। कर देते हैं। मनुष्य जीवित है, उसकी आवश्य- चेतावनी। सुबह और शामके आने और जानेने छौटेको जवान और बुढेको नष्ट कर दिया। हम अपनी आवश्यकताओंकी पूर्तिमें रात दिन सब एक परन्तु जो कताएं पूरी ही नहीं होती। जीवितके वनोंको मृत्यु उतार लेती है, और मृत्यु ही उसको उसकी इच्छासे रोक दिया करती है। मनुष्य जब मर जाता है, तब उमीके साथ उसकी आवश्यकताएँ भी मर जाती हैं। किन्तु जबतक वह जीवित है, तयतक उसकी कोई न कोई आवश्यकता बनी ही रहती है। "

वैराग्य ।
खिले हुए पुष्प ।
काल जिसको चाहता है, बदल देता है, परन्तु मेरी
आत्माको नहीं बदल सकता। और मैं अन्तिम आयुको प्राप्त
हूँगा, किन्तु मेरी आत्मा युवा ही रहेगी।
मुझमें गुप्र बात के लिये एक स्थान है, जहाँतक न मेर
किसी स्नेहीकी पहुँच है और न मदिराका ही प्रभाव पड
मकता हे।
जो मनुष्य अति शान्तिप्रिय होता है, उसका परिणाम
भी उसी मनुष्य के समान होता है जो कि बड़ा समर-प्रेमी
होता है।
ममुप्यका धैर्य उसकी प्रशसाम गिना जाता है, और
उसका रोना-चिल्लाना उसका अवगुण समझा जाता है ।
प्रत्येक मनुष्यको कबरमे ऐसे लेटना होगा कि वह
अपनी जगह पर ही करवट तक न बदल सकेगा।
प्रतिष्ठित होकर जीवित रह । अथवा उदार होकर लहराते
हुए झोके नीचे भालाके घावोसे स्वर्गलोककी राह
हे मेरी आत्मा
तु, उस प्रकार मत जीवित रह जिस
प्रकार अब तक प्रशसारहित होकर जीती रही है। और हे
आत्मा | जब तू मरे तब इस प्रकार मरे, मानों मरी ही नहीं।
कालने मुझको अकेला (बिना इष्टमित्रके) देखा और
दुखको भी अफेरा देखा। इसलिये उसको मेरा मित्र
बना दिया।
-

मर जानाभन्दाकिनीनाकपामगFRIL
वैराग्य।
६७
उम ममयमें मन्तोष ही सारे बन्द मागाको मटी भाँति गाल
सन्तोष ।
नीच लोगोंके कृपापात्र बनने के बदले, मैं अपने लिये
यह अच्छा समझता हूँ कि पुराने कपड़ोंमें नगा रहकर
दिन काहूँ और थोड़ी सी जीविकापर ही सन्तोय करूँ।
यद्यपि मेरी शक्ति मेरे साहससे न्यून हो और मरा धन
मेरे स्वभावानुसार पुण्यके लिये कम हो, तथापि मैं अपया
तथा नीचताके घाट पर कदापि न उतरूँगा।
तू बहुतसे लोगोंको देखेगा कि उनके पग वृत्ति के मार्ग में
नही उठते, परन्तु वे वृत्तिके कामोंमें सफलीभूत है।
फिर कौन सी वस्तु है जो तुझको सायकाल और रातके
ममय यात्रार्थ कष्ट देती है ? यहाँ तक कि तृ कभी स्थल-यात्रा
करता है और कभी जल-यात्रा।
जबकि समस्त कार्योंके मार्ग बन्द हो जाते हैं, निम्मन्देश
देता है।
• घर विभवहीन प्राणे सतपितोऽनल ।
नोपनारपरिभ्रष्ट कृपण प्रार्थितोचना।
तथा
पर प्राणायागो न पुनराधमानामुपगम ।
(21) इभाना सादा पर उपाहीन
निधन और पापों द्वारा भाग
अपर प्रार्थ वरना अच्छा नहीं।

अरबी काव्य-दर्शन। यदि त अपने उद्देश्योंकी पूर्तिके लिये सन्तोप धारण करके प्रार्थना करता है, तो हताश न हो, क्योंकि एक न एक दिन तृ सफलता प्राप्त कर लेगा। सन्तोषी पुरुप अवश्यमेव सफलताका अधिकारी है, जैसे कि दरवाजेको सटखटानेवाला प्रविष्ट होनेका भागी है। अपने पगको उठानेमे पहले उसके रखनेका स्थान लेग्य ले, क्योंकि यदि पैर फिसलने के स्थानमें पडेगा तो तू फिमल जायगा। स्वच्छ जल, जिसे तू पीता है, फहीं तुझे धोखा न दे, क्योंकि कभी कभी उममें भी गन्दी वस्तु मिली हुई होती है। --मुहम्मद-विनयशीर। मेरी बहादुरी । मै सवारोकी एक ऐसी टोलीसे, जिसमें एक सवार काल- चक्र भी है, अकेले ही नेजाबाजी करता हूँ। मैं अकेला ही सग्राम नहीं करता, बलिक इस सग्राममें मेरा माथी धैर्य भी है। प्रत्येक दिन मेरा जीवन मुझसे अधिक शूर-धीर साबित दुआ है और निस्सन्देह उसके अधिक शूर वीर सामित होनेमें अवश्यमेव कोई गुम रहस्य है।

वैराग्य ।'
मैं विपत्तियोंको अपने सिर पर उठानेका ऐसा अभ्यामी
हो गया हूँ कि अब विपत्तियाँ मुझसे पृथक् होकर आश्चर्यके
माथ कहती हैं कि यह मनुष्य आपदाओंसे न मरता ही है
और न भयभीत ही होता है। फिर क्या मौतको मौत आ
गई है अथवा भयको ही भयभीत कर दिया गया है ? जिसके
कारण वे ही इसके पास नहीं फटकते ।
मैं पानी के भयकर भीषण प्रवाह के ममान अति भवकर
अवसरों पर भी आगे ही बढ़ता हूँ। मानो मेरे लिये इस जानके
अतिरिक्त कोई अन्य जान भी है जिसके कारण मैं इसकी
कुछ पर्वाह ही नहीं रखता। अथवा मुझे इस जानके साथ
वैमनस्य है।
तू अपने जीको मत रोक, जिसमे वह अपनी शक्तिके
अनुसार प्रत्येक वस्तु प्राप्त कर ले, क्योंकि आत्मा और शरीर
दोनों पडोसी, जिनका घर आयु है, एक दूसरेसे शीन पृथक
होनेवाले हैं।
तू शराब और वेश्याओंका श्रेष्ठताका कारण न जान,
क्योकि वास्तवम श्रेष्ठता तलवार और प्रत्येक
नृतन
आक्रमणमें
होती है।
इसके अतिरिक्त श्रेष्ठता शत्रु राजाओका वध करने और
इस वातमें है कि तेरे माथ एक ऐसी बड़ी सेना हो जिनके
कारण आकाश-मण्डलमे कालिमा छा जाती हो।
-गुरान की।

भरबी काव्य-दर्शन। जो मनुष्य ईश्वरसे डरता है, उसके कोयोका फल अन्छा हुआ करता है और ईश्वर उसे प्रत्येक बुराईसे बचाता है। जिसको भाई और मित्र छोड दें, उसे चाहिए कि अपने विवेकको ही मित्र बना ले। तू ऐसे उच्च कुलोत्पन्न और बुद्धिमान पुरुपसे, जो बाहर भीतर एक समान हो, सदैव सम्मति लिया कर । प्रत्येक कार्यके लिये समय नियत है और प्रत्येक कार्य- की सीमा भी निश्चित है। जिसने सारी बातों में नम्रतासे काम लिया है, वह न तो किसी कार्य में लजित हुआ और न किसीने उसकी निन्दा ही की। सन्तापी अपनी वृत्तिमें सन्तुष्ट रहता है, किन्तु लालची यदि धनी भी हो जाय तो भी रुष्ट ही रहता है। . जो मनुष्य लोगोंमें शान्तिके साथ रहता है, वह उनकी बुराइयोंसे बचा रहता है और आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। (क) सतोपामृत तृप्तानां यत्सुख शातचेतसाम् कुतरतद्धनलुग्धानामितश्चेतश्च धावताम् ।। सतापापा अमृतमे तृप्त हुए, शात चित्तवालोको जो सुख होता है, वह इधर उपर दौड़नेवाले धनके लोभियोंको कहाँ ? (1) शवमाये मन्तोष धन, सर धन धरि समान । -तुलसी।

वैराग्य।
१०४
यदि किसी उच्च कुलोत्पन्नको कोई स्थान रुचिकर न हो तो
कुछ हर्ज नहीं; क्योंकि उसके लिये भूमंडल पर और अनेक
स्थान है।
आनन्दको चिरस्थायी और सदैव रहनेवाला मत समझ,
क्योंकि इस काल चक्रमें एक बार जो प्रसन्न किया जाता है,
वह अनेक बार कष्टमें डाला जाता है।
अबुल-फतह-युस्ती।
वैराग्य-रत्नाकर।
अपने मनको बुरी बातोंसे बचा और उसे ऐसी बातों
लिये उत्तेजित कर, जिनसे उसकी शोभा बढे । ऐसी दशाम
तेरा जीवन आनन्दमय होगा और लोग तेरी प्रशसा करेंगे ।
लोगोंको अपनी बाहरी हालतके सिवा और कुछ न
दिखा। चाहे समय तेरे अनुकूल न हो, अथवा कोई मित्रही क्यों
न तुझपर अत्याचार कर रहा हो।
यदि आजकी वृत्ति तुझ पर कठिन हो, तो सन्तोप कर ।
आशा है कि समयका फेर कल तक जाता रहेगा।
•(क) नीचेगच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ।
-कालिदास ।
अपांत-चारे धुरेकी भाँनि दशा ऊपर नीचे होती रहती है।
(ख) चक्रवत् परिक्त्त ते दु खानि मुग्दानि च ।
अथात्-दुख और मुख चक्के समान घूमने रहते हैं।

अरबो कास्य-दर्शन। धनसे धनीके पास द्रव्य होता है। पर - उसको वह पद नहीं प्राप्त होता जो कि हृदयके धनीको होता है, चाहे उसके पास कम ही धन क्यों न हो। उस मनुष्यकी मिताईसे कुछ भी लाभ नहीं जिसका चित्त चलायमान है, और जिधरकी वायु होती हो उधर ही झुक जाता है। जब तक तेरे पास सम्पत्ति है, तबतक सल मित्र तेरे प्रति बड़ी उदारता प्रकट करेगा। पर निर्धनताके समय वह तेरे निमित्त कजूस हो जायगा । धनके समय तो तेरे बहुतसे भाई निकल आते है, पर आपदाओंके अवसर पर उनकी सख्या बहुत कम हो जाता है। --इजरत अली। आत्म-सुधार। जो मनुष्य आधिक बोलता है, उसकी क्रियाओंमे अवश्य- मेव त्रुटि होती है, और मनुष्यका वचन कभी उसीको ठोकर खिलाता है। मनुष्यको जिहा छोटी होती है, परन्तु वह बडे बडे दोष कर बैठती है। ऐसा ही अनेक कहावतोंमे कहा गया है । • आत्मनो मुखदोषेण वध्याले शुरुमारिका । बकास्तत्र न वध्यन्ते मौन सवार्थसाधनन् ।। अर्थ-अपने मुखके दौरसे सोते भौर मेना पर किये जान ई। बगलों को को पिंजरोंमें नहीं डालता 1 मीन सब कामोका साधन है। *यानों हाथी पाश्यों बातों पाव ।

पैराग्य।
अनेक बार ऐसा हुआ है कि मनुष्यको उस बात पर
लजित होना पड़ा है जिसको उसने कहा है, किन्तु उस यात
पर कभी लजित ही नहीं होना पड़ा जिसको कि उसने कहा
ही नहीं।
कठिन कायोंमेंसे अत्यन्त कठिन वह कार्य है जिसमे
तेरा कोई सहायक अथवा सन्मार्गका दिखलानेवाला न हो ।
तुच्छ मनुष्य जो बात तुझसे कहे, उसे तुच्छ मत जान,
क्योंकि मधुमक्खी एक मक्खी ही है, परन्तुमयकी स्वामिनी है।
मतलबी आदमीको उसके मतलबकी पूर्तिसे पहले ही
परग्व ले, जिसमें उसकी मित्रतासे धोखा न खाना पड़े।
यदि शत्रु किसी मजबूरीके कारण मित्रता पर राजी है,
फलैविमवाद मुपागता गिर
प्रयान्ति लोके परिहामवस्तुताम् ।
पचतन्त्र
मध-वह पाणियों जो अपने फलमे विरुद्ध होती है, लोकौ परिक्षामका
कारण है।
(क) तृणेन कार्य भवत्तीश्वराणा
किमन वाग्बनाता नरेण ।
हितोपदेश।
मर्थ-तिनकेमे मी पड़ोंको पाम पड़ता है, जीम भोर हाथवाले मनुष्यका
क्या कहना
है
(ख) योऽन्त स्वादुनल प्रीत्यै लोकस्य न समुद्र ।
पचनन्न।
अप--मीठे जलवाला नों लोकप्रिय है, ममुद्र नहीं।
।

अरवी काव्य-दर्शन ।
तो उस मजबूरीके दूर हो जाने पर उसकी शत्रुता फिर लौट
आवेगी । १
जिस आपदामें किसी उद्योगसे काम न निकल सकता
हो, उसमें घबराना न चाहिए । यदि किसी ढगसे काम निकल
सकता हो तो उसे प्रयोगमें लानेसे चूकना भी न चाहिए ।।
प्राप्तिके पश्चात् जो वस्तु जाती रहे, उससे भी न घबरा,
और न उसके लिये ही प्रलाप कर जो हाथमें आनेसे पहले
ही जाती रही हो।
मनुष्यका नियत समय जब समाप्त हो चुकता है, तब
उसकी सारी सम्पत्ति उसके किसी काम नहीं आती।
स्वतन्त्रताका भङ्ग हो जाना अथवा प्रिय घस्तुका नष्ट हे।
जाना, ये घटनाएँ ऐसी हैं कि इन्हीसे तुझे सबसे अधिक
भयभीत रहना चाहिए।
+ (क) शनुणा नहि सध्या मुश्लिष्टेनापि साधना
अर्थ-शत्रुके साथ इद सथिमे भी न मिले ।
(ख ) कारणामित्रतामेति कारणदेनि शत्रुतार
भाव- क्योंकि वह कारणमे मित्रता और शनुना ठानता है।
(क) त्याग्य 7 धैर्य विधुरेऽपि देवे।
अर्थ-भाग्यके विरोधी होने पर भी धौरन न छोड़ना चाहिए ।
(ख) येन केनाप्युपायेन शुभेनाप्यशुभेवा उद्धरदीनमात्मानम् ।
अर्थ-किसी भी शुभ या अशुम उपायमे अपने भापको सकटसे निकाले ।
(क)समानने नयनयोनहि विचिदस्ति।
अर्थ-माखौको मिच जाने पर कुछ भी नहीं है।
(स) मुदा बाद कतई कोउ नाही।
भोज प्राधा

वैराग्य।
अन्य लोगोंके ठोकर सानेपर फूला न समा और न
दृमरोकी हँसी हो उडा, बल्कि कालके चक्रोंसे डरता रह ।
वह वस्तु सबसे अधिक रद्द होनेके योग्य है जिमके
विरुद्ध काल साक्षी है।
मनुत्यका मूल्य वह है जो उसे श्रेष्ट वनावे । अत प्रत्येक
मनुष्यको चाहिए कि वह शुभ कार्य करे और अपने लिये ऐसी
वस्तुओंका अभिलाषी हो जिनके सहारे उच्च पद प्राप्त कर सके ।
यह बात असम्भव नहीं कि किसी रोगका औषध न मिले,
परन्तु दरिद्रताके साथ यदि आलस्य भी हो जाय, तो ऐसे
रोगके औषधी सम्भावना ही नहीं है ।
तू अपनी मृत्युके पश्चात् अपने धनका वारिस चाहे शत्रु.
* आपद्गत इससि रे द्रविणोऽसि मृद
लक्ष्मी स्थिरामवति कत्यवगे विधातु ।
एतान पश्यसि घटीनलय चक्र
रिमा भवन्ति भरिता मरिताश्च रिक्ता ॥
मावाय-मापदामें फंसे हुए किमी पर, हे मूख, तू हँसना है। क्या रहट परकी
मागबारीसे भर जाने और साली होनेवाली हैदियोंको नहीं देखता ?
(क) सर्वस्योषधमग्नि शाम्नविदितम् ।
भर्तृहरि ।
मय-सम रोगोंकी दवा शासमें मिल जाती है।
(ख) मालरयहि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपु ।
गृपचापल्या
मर्थ-पालस्य मनुष्योंका बड़ा भारी शत्रु है।

अरबो काव्य-दर्शन।
को ही बनावे, किन्तु तू धनसश्चय कर और अपने जीते जी
खाने-पीनेमें अपने भाइयोंके अधीन न हो ।
सदा दान वह है जिसे तू न तो किसीके बदलेम करे
और न बाद में उसके बदलेकी प्रतीक्षा ही करनेवाला बने ।।
नीचसे कोई बात पूछोगे तो वह सकोच करेगा, यहाँ तक
कि पूछनेवालेकी जवान भी बन्द हो जायगी ।
तेरी परखी हुई बातोंमे सबसे अधिक खरी बात यह है
जिसके द्वारा तू वेबसी और निखट्दूपनमें पड़नेसे बच सके ।
बुद्धिमान उन मनोरजक बातोंको भी छोड़ देते हैं जिनसे
बुरी बातोंमें फँस जानेका भय होता है।
जिस मनुष्यकी तू उसके सन्मुख खूब दिल खोलकर
। प्रशसा करता है, पीछे उसकी बुराई करनेसे लज्जा कर,
और
उस मनुष्यकी प्रशसासे भी लजा कर जिसके चले जानेके
पश्चात् तू बकरी बन जाता हो ।
कुलीन उसीसे मुठभेड करता है जो उसकी टक्करका
हो । पर नीच अपनेसे भी नीचपर हो हाथ बढाता है।
+नबन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ।
चाणक्य।
पोंमें धनहीन होकर रहना बनुन पुरा है।
तदान सात्विक स्मृतम् ।
गोता।
अपार वस्तुत निष्काम दान होदान है।
(क) यपपिरति सरोप मृगपतिपुरतोऽपि मत्तगोमायु ।
तदपि न कुर्याद मिहोऽप्यमहरापुरुषेषु के कोप ।

घेराग्य।
वास्तवमें वह बडा भारी त्यागी है जो अपने अपराधीको
अपने काबूमे पा जाय और उसको दण्ड देनेकी भी शक्ति रग्वता
हो, पर उसको उदारताके साथ छोड़ दे।*
मनुष्यका उत्तम धन वह है जिसके सहारे वह अपनी
मर्यादा सुरक्षित रक्से और शुभ कार्यों में उसे खर्च करे ।
सब नेकियोमेंसे सर्वश्रेष्ठ नेकी वह है जिसके बाद
उपकार न जताया जाय और न जिसके करनेमे किसी प्रकार
से विलम्यही किया गया हो।
उन जडी बूटियोके भरोसेपर, जो भली भाँति परमी /
हुई हैं, कदापि विष न पी।
मर्थ-चाहे पागल गौड़ सिंहके सामने आकर तोरमे भरके, पर मिहको बोध
नहीं माना । जो अपने जैसे नहीं, उन पर क्रोध काईका ?
(ख) दोहा-कीजे आप ममानसो, वैर प्रोति यवहार ।
कबहुँ न कीजै नाचौं चरचा कथा विचार ।
-(क)ज्ञानस्य भूपणक्षमा
आमा शानका मलकार
(ख) शक्तामा मषण धमा
शौका क्षमा भूषण है।
+(क)जो उपकार करके जताने लगा।
वह अपने कियेको मिटाने लगा।
(ख) तधिगस्तु कनयन्नपि वांछाम्
अथिवागवसर महते य ।
अर्थ-विक है उसे जो अर्थीको लम्रत रेम्वता हुआ उमझे बोलने तर
विलम्ब करता है।

- अरवी,काव्य दर्शन। अपने भाइयों और मित्रोंके साथ- सप्रेम मिल, चाई उन्होने तुझसे नाताही तोड लिया हो । सब बातो और कायाँका एक अन्त अवश्य होता है मोतू काई कार्य ऐसा न कर जिसके कारण कोई मनुष्य तुझसे बदला लेने की ठाने और तुझपर अकस्मात् कुछ आपत्ति आ जाय। सारे ससारमे सबसे अधिक विवेकभ्रष्ट वह मनुष्य है जो लोगाकी निन्दामें दत्तचित्त रहता है जैसे मक्सी रुग्ण- स्थानोंको ही ताडा करती है । * मीधे होने में चाहे तृ चाणके समानही हो, तथापि लोग यही कहेंगे कि यह सीधा है ही नहीं । जिस मनुष्यने एक ऐसे मनुष्य पर अनेक बार अत्या चार किया है, जिसका ईश्वरके सिवा कोई और सहायक ही नहीं है, चाहिए कि वह अत्याचारी सचेत रहे और अपने अत्याचारका फल शीघ्र न पानेस भ्रममे न पड जाय।। --इस्माईल इन्न अवीवकर । •न विना परिवादेन रमते दुर्जनो जग । काय मबरमान भुक्त्वा 'वना भेध्य न तृष्यति ॥ ~महाभारत । अथान्-दुर्जनोंको निन्दामें ही आनद आता है, मारे रोंको, चखकर चौका गदगोम ही तृप्त होता है। कर्मवशतो भाव्यस्य नाश कुन । अर्थ-जो कर्मवश होनी है वह नहीं टलनी।

वैराग्य।
तू कुछ दिनों बाद अवश्य मर जायगा। फिर परमात्मा
तेरा और तरे अत्याचारीका ठीक ठीक न्याय चुकावेगा, यहाँ
तक कि उसमे तनिक भी त्रुटि न होगी।
-
सफल जीवनके मूल मत्र ।
अपने जीवन कालमे ही अपनी आत्माके लिये मार्ग-व्यय
पहले भेज, क्योकि तू थोडे ही काल के बाद इस जीवनको छोड़-
कर अपनी राह लेगा।
मृत्युके लिये तैयारी कर, क्योंकि मृत्युका मार्ग सामा-
रिक मागासे अधिक कठिन है।
ईश्वरसे भय करने और बुरी बातोंसे बचनेको अपना
मार्ग-व्यय बना, क्योंकि तेरी मृत्यु अति शीघ्र आनेवाली है ।
अपनी वृत्ति पर सन्तोष कर, क्योंकि सन्तोष ही अमीरी
है। और जो सन्तोप नहीं किया करता, दरिद्रता उसकी मित्र
बन जाती है।
नीचोंकी मित्रतासे बच, क्योकि वह शुद्ध भाव रसकर
मित्रता नहीं करते, बल्कि बनावटसे काम लेते हैं।
नोचाको जबतक कुछ मिलता जुलता रहता है,
वे मित्र बने रहते हैं। और जब तू उनको कुछ न देगा,
सवाचनका विष तेरे लिये घातक हो जायगा।
.
तबतक

मृत्यु।
१२०
भरबी काव्य-दर्शन।
मनुष्य और
जब कि मनुष्य ऐसा हो कि उसके पास ऊँट न हॉ-जिन
को वह प्रात काल चरानेके लिये ले जाय और सायकार
घर लावे तथा उसके सम्बन्धी भी उसपर कृपालु न हों,
ऐसे निष्क्रिय मनुष्य के लिये अति उत्तम है कि निखवरहने
के बदले अथवा कपटी भाईके साथी होने के स्थानमें मृत्यु
शरण ले।
बहुतसे असीम और अखण्ड जगल है जिनमें अबू-नश
नाशकी ( मेरी) सवारियाँ चफर लगागा करती हैं ।
मेरी सवारियोका भ्रमण इस सबबसे है कि प्रभुता
प्राप्त हो, अथवा उसमें लूटका धन मिले । और ससारकी
विचित्रताएँ ता असंख्य हैं।
बहुतसे स्त्री पुरुष मुझसे बहुतसी बातें पूछा करते है।
भला गरीबसे कहाँ कोई पूछता है कि तेरी हालत क्या है ?
मैंने गरीवीके समान अन्य कोई वस्तु युवकके लिये
अधिक दुखदायी नहीं देसी । और न कोई अन्य बुरी रात्रि
उस काली, अॅवरी रातके ममान देखी है जिसमें लूट-मार
करनेवाला निराश होकर लौट आता है।
तूं चाहंगरीपीसे दिन काटे और चाहे पुण्यात्मा होकर मरे,
पर निस्सन्दह मैं देखता हूँ कि मृत्युसे भागनेवाला कभी उससे
नहीं बच सकता।

वैराग्य।
यदि कोई नीवित मनुष्य (भागनेवाला ) मृत्युसे मुक्त
हो सकता तो मैं मृत्युसे बच जाता, क्योंकि मेरी सवारियाँ
बहुत तेज भागनेवाली हैं।
-अनू-नशनाश ।
-
वैराग्य-कुंज।
मैं अपने गुप्त विचारोंको नहीं छिपाया करता,
और
ऐसी नौबतही आने देता हूँ कि मेरे गुप्त विचार प्रकट होने के
निमित्त दिलमें खलबली पैदा करे ।
न
-कवि
यदि तेरे लिये कुछ शुभ कार्य हो जाय अथवा तुझे कुछ
सुस मिल जाय, तो उसे बहुत समझ, क्योंकि तू अति शीन
नाना प्रकारके कष्टोंमें प्रस्त होगा।
--प्रयास 47इल इम ।
यदि तूने कुछ नहीं बोया, तो अन्य किसी बोनेवालेको
जब तू कुछ काटते हुए देसेगा, उस समय तू अपने व्यर्थ
-समय गंवाने पर लजित होगा।
.
--कषि
तू विद्याकी प्राप्तिके निमित्त अथवा अपनी दशा सुधारनेक
हेतु अवश्य लोगोंसे मिला जुला कर, अन्यथा मिलनेसे कुछ
लाभ नहीं, क्योंकि मेल-जोलसे व्यर्थ वफवासही बढ़ती है।
-एकदिन

भरवी काव्य-दर्शन ।
घोर दुःखोसे पीडित उदासीन भी यद्यपि कभी कभी हँस
पडता है, तथापि मैं यदि कभी लोगोंकी देखा-देसी हँस पड़ता
हूँ तो अपनी आत्माको एकान्तमे धिकारता हूँ।
-~-इलीफ ।
जो लोग मुझसे डाह रखते हैं, मै उनको बुरा-भला नहीं
कहता, क्योंकि मुझसे पहले भी गुणवान मनुष्य हुए हैं और
उनमे भी डाह रक्सी गई थी।
--एक कवि।
निस्सन्देह हमसे पहले भी लोग अपने मित्रोंसे पृथक्
हुए हैं और मृत्युको ओपधिने प्रत्येक चिकित्सकको थका
दिया है।
-मुतनबी।
विशाल हृदयवाला मनुष्य जानता है कि दु सके पश्चात्
सुस होता है । अन्तु, जब सुखी होता है, तब वह इस बातको
म्मरण रसता है कि यह सुख सदैव रहनवाला नहीं है।
-कितालबउल-किशादी।
यदि तू अपनी आवश्यकतासे अधिक धन पुण्यार्थ दे, तो
कोई बड़ी बात नहीं है। बल्कि प्रशसनीय बात तो यह है
कि तू उसमेंसे कुछ पुण्यार्थ दे, जो कि तेरी आवश्यकताके
लिये भी काफी नहीं है।
--अल-मुकन्नमा उल किन्दी।
जब कि हमने यह जान लिया कि हम सदैव जीवित नहीं
रहेगे, तो हमे पता लग गया कि हमें वियोगका दासत्व शीन
ही स्वीकार करना पडेगा।

बैराग्य। १२३ जब किसी विवेकीने ससारकी परीक्षा की, तो उसे ज्ञा ताकि समारम मित्रके रूपमें कैसे कैसे शत्रु हैं। -अतिवाम। मनुष्यको मृत्युके पश्चात् उसी मकानमें निवास करना होगा जिसको कि उसने अपनी मृत्युसे पहले बनाया है - - हजरत अला। ससारमें दो वस्तुएँ बहुत ही कम पाई जाती हैं। एक तो शुद्ध कमाईका धन और दूसरे सत्य-शिक्षक मित्र । -अनुन जवायन। कालचक्रकी बदौलत आनन्द तो कभी ही कभी मिला करता है, पर उसकी आपदाएँ प्राय सदैव बनी रहती । -प्न रावि । जब कि मैं जानता हूँ कि मेरा जीवन केवल एक क्षण- मात्र है, तो मैं क्या उसको ईश्वरकी स्तुति, प्रार्थना और उपा- सनामें न लगाऊँ? -सुलैमान दागी। मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं रही जो एक पैसेंमें भी बेची जा सके और मेरी शकल मेरी हालतको दर्शा रही है। -प्न प्रम । १०

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प्रकीर्ण।

JARABAD
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20७५३०TAS
कभी कभी पुरुषार्थहीन घरमें खाली बैठकर
आनन्द उडानेवाले पुरुपको भी वृत्ति मिल जाती है,
चाहे उसने अपनी ऊँटनी पर कभी पालान और नमदा
भी न कसा हो।
कभी वह मनुष्य भी धनसे वत्रित रहता है जो
अपनी उँटनी पर पालान कसे हुए सदैव यात्रामे ही
रहा करता है।
पीठ-लगा गदहा जबतक पीटा नहीं जाता, अन्छी
तरह काम नहीं देता। इमी प्रकार प्रभुता न चाहनेवाला
अधम उस समय तक कुछ नहीं देता, जबतक कि
डराया नहीं जाता।
-हुस्म-दिन-प्रमुल प्रम।
WR

अरबी काव्य-दर्शन।
५-प्रकीर्ण।
मेरी आदत ।
,
मेरी जातिके लोग मेरे ऋण लेने पर रुष्ट होते हैं, यदापि
मेरा ऋण निस्सन्देह ऐसे कायोंके लिये होता है जिनसे यश
फरता है।
मै उधारके जरियेसे अपने उन स्वत्वाकी सीमाओको बाँधता
हूँ जिनको उन्होने निगाड़कर नष्ट कर दिया है और अब
बनानेकी शक्ति नही रसते ।
मेरा उधार अच्छे घोडेके निमित्त है जिसको मैने घरका
परता बना रसा है और जिसके लिये नौकर भी रस छोड़ा है।
मेरे और मेरे सगे तथा चचेरे भाइयों के बीच में जो अन्तर
है, वह निस्सन्देह बहुत बड़ा है ।

१२८
अरबी काव्य दर्शन।
मेरे भाई यदि मुझे हानि पहुंचाते हैं तो मै उनको लाभ
पहुँचाता हूँ। और चाहे वे मेरी प्रतिष्ठाको भङ्ग करें, तथापि मैं
उनका मान करता हूँ।
वे पीठ पीछे मेरी बुराई करे, परन्तु मैं उनकी बुराई नहीं
करता । और यद्यपि वे मेरी दुर्गतिके अभिलापी हो, तथापि
मै उनकी सुगतिकी ही लालमा रसता हूँ।
मै पूर्व वैमनस्यको मनमे नहीं लाता, क्योकि जातिका नेता
वह मनुष्य नहीं हुआ करता जो मनमें कपट रखनेवाला हो।
जब कि मुझ पर लक्ष्मी की कृपा रहती है, तब मेरी सारी
सम्पत्ति उनके लिये होती है । और जब मैं द्रव्यहीन हो जाता
हूँ, तो उनकी करुणाका पात्र नहीं बना करता ।
अतिथि जबतक मेरे गृहमें निवास करता है, मैं
निस्सन्देह उसका दास हूँ। इसके अतिरिक्त किसी अन्य
अवसर पर मेरी टेक दासत्वकी नहीं है ।
+
तबतक
--मन-मुकना-उल-विन्दी
अर्थात जब
मब्यवहारकी स्थितिका ही नाम जाति है।
तक कि किसी जाति, सम्यवहार पाया जाता है, वह जाति
कायम रहता है। और जब उससे सम्यवहार चला जाता है,
तो यह जाति भी नष्ट हो जाया करती है ।
- कवि।

प्रकीर्ण।
मेरा हाल।
जब
मैं धनवान हो जाता हूँ तय निस्सन्दह फल नहीं
जाया करता। उस समय जो कोई मुझसे उार माँगता है,
मै उसको अपनी शक्तिके अनुसार उधार देता हूँ
कभी कभी मैं द्रव्यहीन हो जाता हूँ। यहाँ तक कि मेरी
हीनता बहुत बढ़ जाती है। परन्तु अपनी मर्यादाको स्थिर
रखते ही मैं फिर अमीर हो जाता हूँ।
मरी हीनता इतनी जल्दी आती और चली भी जाती है,
कि उम समय मेरा कोई आभिन्नहदय मित्र उधार अथवा
बचित स्वत्व सहित सहायतार्थ नहीं पहुंचा सकता ।
एक मात्र मेरा धनी हो जाना निदान ईश्वरकी कृपा है
और उँटोंके सीनोंको तगोंसे कसकर यात्रा करनेके कारण है।
प्रत्येक पुण्यात्माके हदय (काल के दिनोंमें) जन सकुचित
हो जाते हैं, उस समय भी में शुद्ध भाव रग्यकर ही दान
दिया करता हूँ।
मैं अपने चचर भाईको उस समय महान् सकटसे मुक्त
कर देता हूँ जब कि वह ऐसा गिर पडता है, जैसे उँट फिस
लावसे गिर पडता है।
मैं उसको धन देता हूँ, उससे प्रेम रसता हूँ और उसको
सहायता देता हूँ, चाहे वह अपने मनमें मेरे लिये छलही
रों न रखता हो।

भरबी काव्य-दर्शन।
वह अपने बाद सुगन्धित लकडीको शुद्ध सुगन्धके समान
अपनी शुद्ध कीर्ति छोड़ जायगा। उसके बाद उसकी पवित्र
कीर्तिसे मसौकी ध्वनि के समान यह वात गूंजा करेगी।
"जो मनुष्य पवित्र जीवन व्यतीत करेगा,
वास्तव में षही देशकी सेवा करेगा । और
नानामकारकी आपदाओको झेलते हुए भी
देशका भार बॅटायेगा।"
यदि वह मनुष्य युवक हो और वेतकी डालोके तुल्य हो,
तो भी उच्च पदकी प्राप्तिके निमित्त पवित्र उद्योगसे काम लेगा।
वह उच्च पदकी प्राप्तिके मार्गमें प्रत्येक बुराईमे हाथ रोके
रखेगा, और ऐसे स्थानपर पहुंचेगा जहाँ यह गाया जा रहा
होगा
"जो मनुष्य पवित्र जीवन व्यतीत करेगा,
चास्तव में वही देशकी सेवा करेगा। और नाना
प्रकारकी आपदाओंको झेलते हुप भी देशका
भार बॅटावेगा
जमीन पाहिए।
-
जब कि कडी भूख और अनुराग दोनो इकट्ठे हो जाते हैं
और किसी दरिद्र पर टूट पड़ते है, तो वह मृतप्राय हो
आता है।
-एक कवि।

प्रकीर्ण।
जब
मेरा हाल।
धनवान हो जाता हूँ तब निस्सन्देह फूल नहीं
जाया करता । उस समय जो कोई मुझसे उधार माँगता है,
मैं उसको अपनी शक्तिके अनुसार उधार देता हूँ।
कभी कभी मैं द्रव्यहीन हो जाता हूँ। यहाँ तक कि मेरी
हीनता बहुत बढ़ जाती है। परन्तु अपनी मर्यादाको स्थिर
रखते ही मैं फिर अमीर हो जाता हूँ।
मरी हीनता इतनी जल्दी आती और चली भी जाती है,
कि उस समय मेरा कोई आभिन्नहदय मित्र उधार अथवा
उचित स्वत्व सहित सहायतार्थ नहीं पहुँचा मकता ।
एक मात्र मेरा धनी हो जाना निदान ईश्वरकी कृपा है
और ऊँटोंके सोनोंको तहोंसे कसकर यात्रा करनेके कारण है।
प्रत्येक पुण्यात्माके हृदय (कालके दिनों में) जब सकुचित
हो जाते हैं, उस समय भी में शुद्ध भाव रखकर ही दान
दिया करना हूँ।
मैं अपने चचेरे भाईको उस समय महान् सकटसे मुक्त
कर देता हूँ जब कि वह ऐसा गिर पडता है, जैसे ऊँट फिस
लावमे गिर पडता है।
मैं उसको धन देता हूँ, उससे प्रेम रखता हूँ और उसको
सहायता देता हूँ, चाहे वह अपने मनम मेरे लिये छलाही
क्यो न रखता हो।

१३२
अरबी काव्य-दर्शन।
मैं चाहता तो उसको ऐसे कठोर वचन कह सकता या
जो उसकी हड्डी तकको काट सकते थे। परन्तु उसको मरी
शान्ति ढंक लेती है।
जब कोई मामला आ पडता है तो मैं अपने मनको
आदेश देता हूँ। परन्तु ससारमे ऐसे भी मनुष्य हैं जिनपर
उनके मनका आदेश हुआ करता है, और वे अपने मनपर
आदेश नहीं किया करते ।
जिसको मैं भली भाँति परख लेता हूँ, उससे मुंहदेसी बात
नहीं करता और न किसी हालतमें ही कजूसी करता हूँ।
मैं उदारचित्त और शीलवान हूँ, और कालकी राताका
चक्र अपन हेर फेरसे मेरी प्रकृतिको नहीं बदलता ।
मैं सक्टमय आपदाओंको अपने सबधियोंसे रोकता हूँ
और उनके कष्टोंका निवारक हूँ। परन्तु जो कोई मुझसे मुँह
फेर लेता है, मैं भी उमसे मुँह मोड लेता हूँ।
मैं अपने समस्त विचारोंको, दृढताके साथ, उन लोगोंके
निमित्त पूरा करता हूँ, जो उन विचारोके सुपात्र होते हैं ।
पर अन्य लोगोका हाल यह है कि उनके थोडे विचार भी
पूर्ण नहीं होते।
-इन दुल-इल-भसदी।
.
काल-चकने मेरे हदय और तनमें कुछ भी नहीं छोडा
जिसको कि किसी सुन्दरीको आँख अपना दास बना ले।
। -मुतनदी।
.

प्रकीर्ण। कुछ खरी खरी बातें। जिस मनुष्यको ईश्वर लक्ष्मी दे, पर वह सासारिक यशकी प्राप्ति तथा परलोकके निमित्त कुछ भी सर्च न करे, तो निस्सन्देह वह वडा अधम है। भाग्यसे ही प्रत्येक दूरकी वस्तु निकट हो जाती है और चन्द कपाट खुल जाता है। ईश्वरकी सृष्टिमें सबमे अधिक दुसी पुरुष वह है जिस- का माहस तो बढा चढा हो, पर पळे फूटी कौडी भी न हो। ईश्वरकी सत्ता और उसके अटल सिद्धान्तोके हेतु जो युक्तियाँ हैं, उनमेंसे एक युक्ति यह भी है कि विद्वान तो दुसी अनस्था- में है और एक मूढ खब मजे उडा रहा है । जब तुम सुनो कि किमी श्रीपतिके हाथमे रहनी फूटी और उसमे पत्ते निकले, तो तुम उसका अनुमोदन कर दो । जब यह सुनो कि कोई दुखिया पानी पीनेके लिये किसी घाट पर आया तो पानी ही मूस गया, तो ऐसी बातको भी च ही कहो। -प्रबू-मुहम्मद-*-रवीन । A दरिद्री महामना वियुधमढ़ उच्यते ॥ (विदुर) अर्ध-पदे रिलवाला फितु दरिद्र मूर करलाना है।

१६४ भरबी काव्य दर्शन। एक अनोखा खयाल । [बगदादके मुसलमानी राज्यकालमे यहिया नामका एक तापी प्रधान सचिव हुआ था। उसीके मुहम्मद नामक पुत्र- के मरने पर एक कविने शोकपूर्ण पदोंमे एक ऐसा अनोसा न्याल बाँधा है, जिसको सराहे बिना कोई सहदय मनुष्य नहीं रह सकता। -अनुवादक। मैंने दान और पुण्यसे पूछा कि तुम्हे क्या हो गया जो तुमने चिरस्थायी यशके बदले में अमिट तिरस्कार ग्रहण कर लिया है ? और मान-मर्यादाका स्तम्भ क्यों ढह गया है ? उन्होने उत्तर दिया कि हम पर यहिया के पुत्र मुहम्मद का दुख पडा है। इस पर मैंन कहा कि तुम लोग प्रत्येक स्थानमें उसके दास थे। तुम्हारे लिये तो उचित यह था कि तुम उसके मरने. से पहले ही मर जाते। उन्होंने कहा कि उसका शोक मनाने के निमित्त कवल आज ही एक दिन हम ठहर गये हैं। कल हम भी चले (मर) जायग। एक कषि मैंने अपनी मर्यादाको विकनेसे रचा रखा है, और उसका गरीदनेवाला तो कोई है ही नहीं। -~-मामूबरन भयूम।

प्रकीर्ण। आदर्श भाव । जो मनुष्य अपने कामाम ईश्वरके अतिरिक्त किसी और- को अपना परम सहायक ममझता है, उसे नाना प्रकार के उद्योग करने पर भी दुःख ही टु य भोगना पडता है। किसी कार्यम यदि तू उसके किसी अन्य मार्गसे प्रविष्ट होगा तो तू भूल भटर जायगा और यदि दरवाजेकी ही राहसे आवेगा तो सीधे मार्ग पर रहेगा। शत्रुको हालत और उसके छलको तुन्छ न जान, क्योंकि अनेक बार लोमडीने मिहाका पछाड दिया है।। जिस मनुष्यने उच्च पद प्राप्त किया है, उसके हृदय पर द्रोहका नोझ नहीं हुआ करता । और जिसके स्वभाव कोध हो, वह उच्च पद नहीं प्राप्त कर सकता। निपिद्ध वस्तुको ग्रहण मत कर, क्योंकि उसकी मिठास जाती रहेगी और उसकी पडुवाहट वाकी रह जायगी। गदहा रेशमी वस्त्र भी पहन ले तो भी लोग उसे गदहा ही कहेंगे। आकाशमें अनगिनत तारे हैं, किन्तु प्रहण केवल सूर्य . * मागाश सरसन्न। मथ-मामभरभरियेकय पर लाना रागुमप विधा वानपुरेने रहिचित् । -पोरे अथवा विषन गरी मो कमा उपेना गरे।

१३६
अरबी काव्य दर्शन।
और चन्द्रको ही लगा करता है अर्थान विपत्तियाँ केवल बडे
बड़े मनुध्या पर ही आया करती है । )*
जब कि आयुकी सीमा अन्तम मृत्यु है तब आयुका
अधिक नथा न्यून होना बरावरसा ही है ।
जब कि ईश्वर किसी मनुष्यकी सहायता करने के लिये
ठान लेता है, तो उसके शत्रु भी उसके सहायक वन जाते हैं ।
लोग दिसलाने के लिये मेरी आव भगत करते हैं, किन्तु यदि
व मुझपर एकान्तमे अधिकार जमा सकें तो मुझे उसी समय
मार डालें।
वास्तवमे साधुता उस युवकमे जो है अपनी इच्छाओसे
उस कालमे दूर रहे जबकि वह उन पर अपना अधिकार रखता
हो।
यदि तूने किसीके साथ भलाई की है तो उससे भलाईकी
आशा रख, और यदि तूने कोई बुराई नहीं की तो किसीकी
बुराईमे न डर।
--दीवानुल भरवसे अनुवादित ।
* मपदो महतामेव महतामेव चापद ।
वयते क्षीयतेच हो नतु तारागण धचित् ॥
अर्थ-बड़ों को ही मपत्ति और बड़ाफोही विपत्ति आती है। चद्र दो घटना
बना है, न कि तारा समूह
7 (क) गृहेषु पधेन्द्रियनिग्रहस्तप ।
प्र--घरमें रहकर इद्रियदमन करना नप है।
(ब) निवृत्त रागस्य गृह तपोरनम् ।
अर्थ-जिमका राग दूर हो गया है उसके लिये घर भी तपोवन है।

प्रकीर्ण।
व्यायाम पर वार्तालाप ।
खलीलका कथन अनीससे ।
अनीस ! तुम हमसे क्यों कतराते हो और सेलाडियों के
साथ सेलमे क्यों नहीं सम्मिलित होते ?
क्या तुम नहीं देसते कि मित्र एक दूसरेको सेलनेक
लिये
पुकार
रहे हैं, और कैसे प्रसन्न चित्त है ? वे इस प्रकार
हाथ फैलाते और सिकोडते हैं कि दर्शक लोग उनको देसकर
मुग्ध हो जाते हैं।
हिरनीके समान उनमे मुडनेकी शक्ति है, पर जब वे
थाडो को फाँदते हैं तो सिंह होते हैं।
जब वे सीधे खडे हो जाते हैं तब स्तम्भके समान प्रतीत
होते हैं। पर लचकनेके अवसर पर कोमल डालियाकी नाईही है।
अनीसका उत्तर।
हे खलील । चलो, दूर हटो । मरे पाससे जाओ।
निस्मन्देह तुम लोग बड़े शठ हो ।
घोडा कुदाने और कूद-फॉद करनेसे क्या लाभ ? और
भला लकडीके खेल और गेंद खेलनेसे लाभ ही क्या ?
.
. म व्यायामके विषयका कथन परम्पर वातालापकी शैली पर है। खलील
और अनीस इस बातालापके नायकोंके कम्पिन नाम है।
--अनुवादक

अरबी काव्य दर्शन।
और चन्द्रको ही लगा करता है (अर्थान् विपत्तियाँ केवल बड़े
बड़े मनुष्यों पर ही आया करती है। )*
जब कि आयुकी सीमा अन्त में मृत्यु है तब आयुका
अधिक नथा न्यून होना बराबरसा ही है ।
जब कि ईश्वर किसी मनुष्यकी सहायता करनेके लिये
ठान लेता है, तो उसके शत्रु भी उसके सहायक बन जाते हैं
लांग दिसलानेके लिये मेरी आव भगत करते हैं, किन्तु यदि
व मुझपर एकान्तमे अधिकार जमा सकें तो मुझे उसी समय
मार डाले।
वास्तवमें साधुता उस युवकमें जो है अपनी इच्छाओंसे
उस काल में दूर रहे जब कि वह उन पर अपना अधिकार रखता
.
यदि तूने किसीके साथ भलाई की है तो उससे भलाईकी
आशा रस, और यदि तूने कोई बुराई नहीं की तो किसीकी
बुराईसे न डर।
-~-वामुलभर बसे "अनुवादित ।
मपदो महनामेव महनामेव चापद ।
बधते चोयनेच होतु तारागण चित् ।।
प्र-यहाँको ही मात्ति और वहाँकोही विपत्ति प्राती है। चद्र ही घटना
अग्ना है, न कि तागसमूह
(क) गृहेषु पद्रियनिग्रदस्तप ।
प्रथ-घरमें रहकर इद्रियदमन करना नप है।
(a) निरा रागस्य एनपोवनम् ।
--निमका राग दूर हो गया है उमक लिये वर मी तपोवन है।

मकी। तुमने तो मुझे सन्तुष्ट कर दिया और अब मेरी छाती गज भरकी हो गई। सोअप तुम कल ही मुझको खेलाडियों के साथ पाओगे। -महमद महम्मद उनी। कुशल सहनशील। हे मेरे मित्रो, याद रक्खो कि कोई आपत्ति पाहे कितनी ही भीपण क्यों न हो, पर ईश्वरकी सौगन्द कि मदेव किसी जीव पर नहीं रहेगी। सो यदि किसी दिन तुम पर कोई आपत्ति आ जाय तो उससे व्याकुल न हो जाओ, और यदि तुम्हारी फुछ हानि हो जाय तो सबसे शिकायत न करते फिरो। निस्सदेह बहुतसे ऐसे कुलीन हैं कि उनपर आपदाएँ आई तो वे धैर्य धारण किये रहे, यहाँ तक कि वे सब आप- दाएँ मुँह मिकोड़े हुए स्वय चली गई। कुछ ऐसी भी घोर विपत्तियाँ पड़ी जो अथाह जलके समान लहरे मारनेवाली थीं। पर धैर्ग्यके साथ ही मैंने उनका भी स्वागत किया। यहाँ तक कि वे लुप्त हो गई। कालके चक्रोंफे निमित्त मेरी आत्मी तो सदैवसे पड़ी इकड़ है, परन्तु जब उसने देखा कि मैं आपत्तिके अवसर पर धैर्य धारण कर लेताहूँ, सब उसने भी धैर्य धारण कर लिया। 1 नौचंगमायुरिच दरा चक्रनेमिक्रमेण । मेषत। मय-चाके पुरेकी नाति परारा ऊपर नीचे होती रहती।

।
भरखी काव्य-दर्शन।
ओ शरीर दास । कही विद्वान् मनुष्य अपने अन्य
समयको खेल-कूदमें लगाता है ? खेल कूद तो बच्चोंके लिये
छोड दो। बस उठो और किसी काम-काजमें लग जाओ।
खलील।
अरे अनीस ' तुम्हारी बात तो निस्सन्देह ऐसी है कि
उससे सुननेवाले धोखमें पड सकते हैं। परन्तु हमपर हमारे
शरीरका प्रभुत्व है।
सो यदि हम उसको पुष्ट करेंगे तो वस्तुत वह हमारा
महायक बनेगा।
क्या उस निर्वलसे कुछ भलाईकी आशा की जा
सकती है, जिसका हृदय सदैव सिन्न और अप्रसन्न रहता है ?
वास्तवमें लोगोका यह कहना सच है कि शरीरकी म्य
स्थताके पिना मनुष्यको बुद्धि भी ठीक नहीं रहती।
तुम अब अपने और मेरे शरीरकी ओर देखो, तो तुम्हें
ठीक ठीक पता चल जायगा और सच या झूठका निर्णत्र
हो जायगा।
तुम विद्या और विवेकमें भी मुझसे आगे न बढ सकोगे,
और अच्छी नरहमे जान लोगे कि तुम नहीं, बल्कि मैं ही
श्रेष्ठ हूँ।
अनीस।
तुम्हारी पाने लिय मैं धन्यवाद देता हूँ। और ऐ खलीठ,
ईश्वर करे कि तुम सदैव सुरक्षित और प्रसन्नताके साथ
जीवित रहो।

- प्रकीर्ण २३४ तुमने तो मुझे सन्तुष्ट कर दिया और अप। मेरी छाती ज भरकी हो गई। सो अप तुम कल ही मुझको खेलाडियोंके साथ पाओगे। -महमद महम्मद उनी। कुशल सहनशील। हे मेरे मित्रो, याद रक्खो कि कोई आपत्ति चाहे कितनी । भीपण क्यों न हो, पर ईश्वरकी सौगन्द कि सदैव फिसी व पर नहीं रहेगी। मो यदि किसी दिन तुम पर कोई आपत्ति मा जाय तो ससे व्याकुल न हो जाओ, और यदि तुम्हारी फुछ हानि ो जाय तो सबसे शिकायत न करते फिरो। निस्सदेह बहुतसे ऐसे फुलीन हैं कि उनपर आपदाएँ नाई तो वे धर्म्य धारण किये रहे, यहाँ तक कि वे सप आप- ताएँ मुँह सिकोड़े हुए स्वय चली गई। कुछ ऐसी भी घोर विपत्तियाँ पड़ी जो अथाह जलके समान लहरें मारनेवाली थीं। पर धैर्यके साथ ही मैंने उनका भी स्वागत किया। यहाँ तक कि वे लुप्त हो गई। कालके चक्रोंके निमित्त मेरी आत्मी तो सदैवसे बड़ी हेफड़ है, परन्तु जब उसने देखा कि मैं आपत्तिफे अवसर पर धैर्य धारण कर लेता हूँ, सब उसने भी धैर्य धारण कर लिया। नौगच्छत्युरिच दरा चाहनेमिक्रमेख । मेषदूत। प्रथ-चाके धुरकी भौति दरारा ऊपर नीचे होनी रातोरे।

भरखी काम्य-दर्शन। यह देखकर मैंने अपनी आत्मासे कहा कि तू एक प्रति- ठित पुरुषके समान जान दे दे। और सच तो यह है कि दुनियाँ कभी हमारी थी, पर उसने अब हमसे मुंह मोड़ लिया है। -एक कवि। . प्रभुताका मार्तण्डा मेरे गुणोंसे तो तू अनभिज्ञ नहीं है, और वास्तवमें उन्हीके कारण लोग मुझसे जलते हैं । परन्तु लोगोंके जलने-भुननेपर भी मै सदैव उन्नतिके शिखर पर चढ़ता रहता हूँ। मुझ पर जो विपत्तियाँ आती हैं, वे मेरे गौरवको यथेष्ट रूपसे बढा ही दिया करती हैं। हे मेरे मित्र । जब कि तू मुझसे पृथक् हो जायगा, तो वास्तवमें तू ऐसे शक्तिशाली पुरुषसे नाता तोड़ बैठेगा, जिस- की फुरतियाँ उसके सहयोगियों के हृदयोंको कपा देती हैं। जब कि अन्य लोग छिप जाते हैं, उस समयमें भी तू मुझे सूर्यके समान पावेगा, जो कभी किसी स्थानमे छिपा नहीं करता। --मावस-दिन-मुहम्मद अनसारी। मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं रही जो कि एक पैसेमे भी देखी जा सके। और मेरी शकल मेरी हालतको दर्शा रही है। -न भम्म।

- प्रकीर्ण। ऊँटनी। मेरी ऊंटनी जगली गदहेके समान बड़ी मजवृत्त और पतुर है। मैंने उस पर ऐसी कड़ी दुपहरमें सफर किया है, जिसकी लपट नीलगायोंको भी भून देती हैं। उसकी दोनों कोखें एक दूसरीसे दूर और चौड़ी हैं। वह हजरमूत देशके ऊँटोंके वशसे है । उसके जोड़ गठीले हैं और वह यमन-देशीय महरी गोत्रकी है। मैंने उसको हॉका तो ऐसी चली मानो उडती थी। वह मोटी ताजी है और यदि सनस्त ऊँटोंके घरानोंका पता लगाया जाय तो उसका घराना सर्वश्रेष्ठ निकलेगा । मैंने इसको उच्च कुलके ऊँट और ऊँटनीसे पाया । फिर जब इसके सरीदनेका विचार किया, तो इसके मालिकको दामका अधिकार दे दिया। यहाँ तक कि उसीके माँगनेके अनुसार दाम देकर इसका मालिक हो गया । ---दाम-उल-इनफी। घोड़ा। मै प्रात काल उस समय यात्रा करता हूँ , जब कि आकाश- मण्डलमे लाली छाई होती है और रात्रिके अन्त तथा भोरके प्रारमका समय होता है मेरे जानेके समय तारे भगारोंके समान होते हैं और मैं ऐसे घोड़े पर जाता हूँ, जो स्वयमेव पहुत तेज जाता है। यहाँ तक कि उसकी गर्दन तथा माथेके माल कमी इघर और कभी उधर हो जाया करते हैं।

भरवी काम्य-दर्शन।
यह घोड़ा उस घोड़-दौड़में प्रथम रहा था, जिसमें समस्त
वर्शक एकत्र थे, और यह फिर उस समय एक बाजके समान
व की बून्दोंको झाड़ता था।
यह उस अच्छे शिकारी वाजके समान है जो दूरसे ही
शिकार पर चोट करता है और जिसके छोटे परोंसे समीपके
पक्षी भयभीत रहते हैं।
जिसके भयसे पक्षी वृक्षोंकी डालियोमें शरण लेते हैं, जो
शिकारको दूरसे ही देख लेता है और जब उसके निकट आ
जाता है, तो शिकार उसके पजेसे निकल नहीं सकता।
जो कि ऐसा अच्छा शिकारी बात है कि शिकारके
निकट पहुँचनेसे ही, शिकारको ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह
उस पर टूट पड़ा।
उसकी आँखें बड़ी ताड़नेवाली हैं, और ऐसा मालूम
होता है कि मानों एक पत्थरके दोनों किनारोमें रक्खी हुई है।
यहाँ तक कि सूईसे कभी सी भी नहीं गई।
-हुमयद-उल-भरकत ।
काल-चक्रकी बदौलत आनन्द तो कभी कभी ही मिला
करता है, पर उसकी आपदाएँ प्राय सदैव बनी रहती हैं।
-इग्न राबिन्दी।
• च्यान रहे कि जर कोई बड़ा बाज पकड़ा जाता है तो उसकी पाखें पहले
मी दी जाती है जिममें वह पालतू हो जाय । परतु कविने अपने पोरेको तुलना
ऐसे नामक माय की है जो स्वेच्छानुसार विचरकर शिकार करनेवाला है और
न कमी पा गया है और न उमको मासं ही सो गई है।
भनुवादका
-

प्रकीर्ण।
मेघ।
मैं रात्रिको जाग रहा था कि वह रात ऐसे विद्युन्मय मेघ
कारण लम्बी प्रतीत होने लगी, जो कि बहुत गाढ़ा था और
एक भूमिसे दूसरी भूमिकी ओर जा रहा था।
रानिके पहले भागमे मेघ मतवालोके समान छोटे छोटे
भागोंमें विभक्त था । और उसका एक टुकडा ही अकालसे
पीड़ित भूमिके लिये ऐसा पर्याप्त था, कि वैसा दूसरा कोई पूरा
मेघ भी काफी नहीं था।
झुण्ड के झुण्ड बादल जगलोंमे ऐसे गरज रहे हैं, मानों
बड़ी बड़ी ऊँटनियों एक दूसरेको देखकर बड़बड़ा रही हैं।
इस गादे और श्वेत मेघके ऊँचे ऊँचे किनारे क्या है,
मानों लयनान पहाडकी ऊँची ऊँची लम्बी-चौड़ी चोटियाँ है।
बह जलमय मेघ अपने पलते-फिरते टुकड़ोंकी सहा-
यतासे उन अति प्रचण्ड वायुओंका सामना करता है जो दार
भूतकी ओरसे आती हैं।
यह मेघ अपने पीछे शुद्ध और स्वच्छ जल छोड़ जाता।
और यदि ससारमे पवित्र जल होता है तो इसीफा होगा।
यह मेघ ऊँचे स्थानके अरफ़ज वृक्ष, गया और
साखी घासोंकी जड़ोंफे उन सुतरामे जीयन हाल पता है,
जो कि पुराने हो जाने के कारण सूखफर मर गये थे।
यह गादा वेत मेघ यहुत जलसे भरा होने कारण ने
शनै, उस ॐटके समान पलता रहा जो कि यहा और दुक

४४
अरबी काव्य दर्शन।
हो। साथही साथ जिसकी नकेलकी डोर भी तग हो और
वह ऐसी भूमिपर आगे बढता हो जिसमे पैर धंसते हों।
-मिलहत-उल-जिरगे।
।
एक अभ्यागत-सेवी कुटुम्ब । ॐ
जाड़के दिनोंमें मैं मुहल्लबके परिवारका अतिथि था।
के दिन अकालके थे और मैं विदेशमें एक यात्री था।
उन्होने निरन्तर मेरा सत्कार किया था, बराबर
मेरा
हाल पूछा था और सदैव मुझ पर करुणा रखी थी । यहाँ तक
कि उनको मैंने अपना परिवार ही समझ लिया था।
--एकसवि।
भाईका दुखड़ा ।
ऐ मेरी आँख । प्रत्येक दिन जब कि भोर हो, उस समय
भाई जरीह पर चार आँसू बहाया कर ।
निस्सन्देह मेरा भाई मेरे लिये एक पहाड़के समान था
जिसकी छायामे में शरण लेती थी। परन्तु मर जानेके बाद तू
( मेरा भाई ) मुझे ऐसे घटियल मैदान में छोड़ गया है, जिसमें
कहीं छया नहीं, और मैं अब धूपमें पड़ी हूँ।
• प्राचीन भरमें अतिथि सेवाकी बड़ी प्रथा थी। विशेषत भकालफे समय
जो कोई भागतुओंको सान पानादिमे सम्म पहुँगता था, वह असीम भादरणोय,
तथा महत्वपूर्ण प्रशमाका भागी होता था। और जो कोई मभ्यागतोंकी सेवामें किसी
प्रकारको नसर रयमा था वा प्रति निन्दनीय माना जाना था।
-अनुवादक।

प्रकीर्ण। १४५ । - जब तू जीवित था तब मैं साहसवाली थी, निडर होकर मैदानमें फिरा करती थी और तू मेरा बाहुबल था । आज मैं एक तुच्छके सन्मुख भी होन हूँ और उससे डरती हूँ, और यदि कोई मुझ पर अत्याचार करता है, तो मैं (नि शस्त्र होने के कारण) उसको अब अपने हाथोंसे रोकती हूँ। मुझको अब मजबूर होकर अपनी आँख धन्द कर लेनी पड़ती है, क्योंकि मैं जानती हूँ कि मेरे सवारो और नेजोंकी तेजी तेरी मृत्युके कारण जाती रही है। जब कि कुमरी (चिड़िया) दिनमें, वृक्षकी किसी डाली पर बैठकर 'वाशजनाहो' कहती है, मैं उस समयमें 'वासबाहो' ऐ मेरी सुबह मुझ पर दया कर-कहता हूँ • -~~फतिमा-पित-इल-मजइम (स्त्री)। पुत्र और बघूसे दुःखी त्री। मैंने अपने पुत्रका पालन पोषण उस समय किया जय कि वह पक्षीके एक ऐसे नन्हे पके समान था जिसके शरीर पर छोटे ही छोटे बाल होते हैं और जिसके शरीरका सबसे पहा अङ्ग पेट ही होता है। अब वह खजूरके एक ऐसे मजबूत वृक्षके सदृश हो गया है जिसकी टहनियोंको छाँट दिया गया हो और जिम- • प्राचीन भाबमें प्रात और सायकान्फे समय नये मृतकों पर शोक मनानेका दारा भौर प्रान फाल ही माय लूट मार हाती थी। मलिये सुरक्षा कुशल पूर्वक बीतना बहुत अच्छा समझा जाता था। अनुवादक।

भरणी काम्बरमा
के तनेसे मोटी मोटी रालियोंको काट दिया गया हो। परन्तु
इतना बड़ा होकर जब उसने मुझे मारना शुरू किया और
मुझे शिक्षा देना आरभ किया। परन्तु बुढ़ापे के बाद मैं सभ्यता
सील, यह आशा उसको न रखनी चाहिए ।
अब जब मैं उसके मनाव-कारको देखती हूँ तो बडा
आश्चर्य होता है। यहाँ तक कि उसकी वादीके बालोंसे भी
पडी विचित्रता पकती है।
एक दिन उसकी बहूने मुझको सुनाते हुए उससे कहा
कि दुष्कमोंको छोड दे, क्योंकि माताके साथ समझ बूझकर
व्यवहार करना चाहिए ।
उसकी बहूने तो मुझे सुनाकर ऐसा कहा, किन्तु उमका
वास्तविक हाल यह है कि यदि वह मुझे जलती हुई अमिम पडी
देसे, तो निकालनेके बदले उलटे आगमें कुछ लकड़ियाँ और
डाल दे।
-जान वराको एक स्त्री।
विदेशमें पुत्रका मारा जाना ।
लूट-मार करके धनोपार्जनकी इच्छासे तू रात्रिके समय
गया। परन्तु उलटा तू ही मृत्यु के घाट उतार गया ।
मैं नहीं जानती कि किसने तुझे मार साला! ईश्वर करे
कि मुझे तेरे धातकका पता लग जाय ।
यदि तू मारा नहीं गया, तो फिर क्या तू बीमार है जो
घर लौटकर नहीं आया ? अथवा तू शत्रुओंके घगुल में फंसा

प्रकीर्ण।
क्या ऐसा तो नहीं हुमा फि तुझे उन विपचियोंने मृत्युका
मुँह दिखाया हो, जिन्होंने कि धोरके बचोका क्षय कर दिया है।
मनुष्य चाहे जहाँ जाय, मृत्यु उसकी घातमें वहीं लगी
रहती है।
कौन सा अन्छा गुण है जो तुझमें न था और अन्य
किसीम था ( अर्थात् तू सकल गुण सपन्न था)
हे लोगो । जब कि मृत्युका समय आ जायगा, उस समय
प्रत्येक
वस्तु तुम्हारी घातक बन जायगी।
बिना किसी कष्टक अनेक वार अपने उद्योगमे सफली-
भूत रहा।
निस्सन्देह किमी आपदाने ही तुझको इस बातसे रोका
है, कि तू मुझे उत्तर दे । अब मैं धैर्य धारण करूँगी, क्योंकि
तू अपने पूछनेवालेको उत्तर ही नहीं देता।
ईश्वर करे कि मेरा हमय तेरी ओरसे एक क्षणके लिये
धैर्य धरे।
क्या ही अच्छा होता कि मैं तेरे बदलेमें मृत्यु की भेंट होती।
-स्त्री
एक बादशाहकी माताका परलोकगमन ।
हम शत्रुओंको मारने के लिये उत्तम प्रत्तम तलवारें और
यडे बडे भाले तैय्यार करते हैं। परन्तु मृत्यु रिना लहे ही
हमारा सफाया कर देती है।
सक-उद-दोन नामी साम (STI) बादशाको मालाको माया
ये शोकण पर कहे गये थे।
.

अरबी काव्य दर्शन ।
हम अच्छे अच्छे तेज घोडोंके स्वामी होते है। फिर में
वे हमको कालचक्र धावोसे मुक्त नहीं करते।
कोन है जो ससार पर सदेवसे मोहित नहीं पर
ससारमे सर्वदा रहने के लिये कोई मार्ग ही नहीं ।
मित्रसे मिलना-जुलना तेरे भागमें ऐसा ही है जैसे कि
सुषुप्तिकी अवस्थामे तेरे विचारकी दशा होती है।
कालने मुझ पर आपदाओके इतने वाण फेके कि मेरा
हृदय तीरोंके परदेमे हो गया ।
सो जब मुझ पर बहुतसे तीरोकी बौछार हुई तो मैं ऐसा
विध गया कि बाणोंके फलों पर फल टूटे ।
मुझ पर दुस सुगम हो गये । अब मैं उनकी कुछ तितिक्षा
नहीं करता, क्योंकि जिस पर सर्वदा आपत्तियों आती रहती
हैं, उसके लिये कोई केश दुस्तर नहीं हो सकता ।
जिसने बादशाह की माताके परलोकगमनका समाचार
दिया, उसने निस्सन्देह आज प्रथम वार (ससारमें) इतनी
बडी फुलवतीको मृत्युका समाचार दिया है ।
अब इस समाचारस लोगोफी हालत ऐसी हो गई है, मानो
इसस पहले किसीका मृत्युने दु स ही नहीं दिया था और न
किसीके मनमें ऐसी आपत्तिकी स्फुरणा ही हुई थी।
सुगन्धिके बदलं, उस स्वर्गवासिनीक मुस पर ईश्वरकी
कृपा सुशोभित है और सौन्दर्य उसपर लपटे हुए कफनके
समान है।
यह स्वर्गवासिनी कायरमे देंकनेसे पूर्व चतुराईसे ढंकी हुई
थी और उच्च भावोंसे पूर्ण थी।

प्रकीर्ण। रे १४ पृथ्वोके नीचे एक ऐसी स्थिति है जो कि उसके नीचे पुरानी हो जायगी। परन्तु हमारी स्मृति उसके विषयमें सदैव नवीन ही रहेगी। कोई मनुष्य ससारमें नित्य नहीं रहेगा, मल्कि सभी लोग क्षयको प्राप्त होंगे। मेरी आत्मा इस पातसे सन्तुष्ट है कि तू ऐसी मौत मरी है जिसकी अभिलापा समस्त जीवित स्त्रियों और पुरुष रखते हैं। तू शुभ दिवस प्राप्त करके मरी है। और उनमेंसे कोई दिन भी ऐसा सकटमय नहीं हुआ कि जिसमें तूने जीवनके स्थानमें मृत्युको श्रेष्ठ न समझा हो । मानका परदा तुझपर तना हुआ है, क्योंकि राज्य तेरे पुत्र अली (सैफ-उद दौल) के हाथमे उच्च अवस्थामे है। तेरी कमर पर (ईश्वर करे) प्रात कालके समय बरसने- वाला मेघ ऐसा बरसे जैसा कि तेरा हाथ दानकी वर्षा किया फरता था। वह चारों ओर फैला हुआ मेघ मूसलाधार बरसे और भामको ऐसा सखा डाले जैसे जैसे तोबही (दानेवाले पात्रो) को देसकर घोड़े भूमिको उखाड देते हैं । मैं तेरा हाल प्रत्येक प्रभुतासे पूछता हूँ, क्योंकि तेरे विषय- में मुझे यह पता है कि कोई प्रमुता तुझसे पश्चित नहीं थी। कोई भिखारी जब तेरी कपरके समीपसे जाता है तो वह रो पडता है। यहाँ तक कि रोते रोते भिक्षा माँगना भूल जाता है।

भरती काग्व-पर्शमा
-
तू अनेक प्रकार से दान किया करती थी । क्या हो जच्छा
होता कि इस समय में भी तुझे दान करनेकी शकि होती।
मैं तुझे तेरे जीवनकी सौगद देकर पूछता हूँ, कि क्या तू
औषन और उसकी बात भूल गई? और मैं यद्यपि तेरे निवास
स्थानसे दूर हूँ, तथापि तुझको नहीं भूलता।
तूने हमारी इन्छाके प्रतिकूल अब ऐसे स्थानमें जाकर ।
निवास किया है जहाँ कि उत्तरी तथा दक्षिणी वायु पहुँचती
ही नहीं।
अब सुजामा झाडियोंकी सुगधि तेरे निकट नहीं पहुँचती
और मेघकी फुहार (छोटी छोटी हलकी बूंदें) भी तेरे समीप
जानेसे रुक गई है।
तू अब ऐसे स्थानमें है जिसका निवासी अपने गृहसे दूर
होता है और सम्बन्धियोंसे नाता तोड़े हुए पृथक रहता
तू अदासी, मेधके जल के समान पवित्र थी, और अपने
भेदोंको गुम रखनेवाली तथा वातकी सची थी।
तेरी बीमारीके दिन में तेग दवा एक बड़ा निपुण चिकि
स्सक करता था। परन्तु तेरा अद्वितीय पूत्र प्रभुताका बड़ा
भारी चिकित्सक है।
जब कि किसी सीमाका रोग, तेरे पुत्रके समुख लोग प्रकट
करते है तो उसके लम्बे भालोंके फल उस सीमाको नीरोग
And
.
.
करते हैं।
तु अन्य खियोंके समान नहीं थी। और न तू उन त्रियों
के समान थी जिनकी कवरें उनके लिये परदेके समान
सममी जाय।

प्रकीर्ण। लौटनेक तेरी लाश के साथ व्यापारी लोग नहीं गये थे जो कि पश्चात् अपना अपना जूता साफ करते। नेरी लाशके चारों ओर बड़े बड़े लोग नङ्गे पैर और पैदल थे। और छोटे छोटे ककर-पत्थर उनके पैरोंके नीचे शुतुर-मुर्ग- (Jट पक्षी) के पचोंके परोंके समान थे। तेरी मृत्युके शोकसे परदे में रहनेवाली नियोंको परटेने प्रकट कर दिया। और उन्होंने केवल काले वनको धारण नहीं किया बल्कि सुगधित उपटनके स्थानमें मुखपर स्याही मल ली। इन स्त्रियोंको जब आपत्ति जनक समाचार मिला तोहसी- खुशीफे कारण, उनकी आँखों में जो नीर था वह आपत्तिके नीरमें परिवर्तित हो गया । जैसी तू योग्य थी, यदि उसी प्रकार अन्य नियों भी होती तो निस्सन्देह खियोंको पुरुषोंसे श्रेष्ठ गिना जाता । सूर्य ( ज्योति केंद्र) का वाचकशब्द (शम्स) स्त्री लिङ्ग नाम है तो कुछ हर्ज नही । और चन्द्रमाके लिये पुलिङ्ग शब्द है, तो इससे चन्द्रमाके लिये कोई गौरव नहीं। . जो लोग मर गये है उनमसे उसका मरना सबसे अधिक दुखदायी है जो मरनेसे पूर्व अद्वितीय हो । हममें से कुछ लोग, कुछ लोगोंका अन्त्येष्टि सस्कार करते हैं और पिछले लोग अगलोंको सिरों पर चलते हैं। बहुत सी ऑखें ऐसी हैं कि उनके किनारोंको चूमा जाता , • भरती भाषामें मूर्य याचक राम्रो कि है मौर चन्द्रमावारा पुनित है। अनुगरका

१५४
अरयी काव्य दर्शन।
ससारमे हमसे पहले जो लोग पैदा किये गये थे,
वे जीवित रहते तो हम पृथ्वी पर आने-जानेसे .
दिये जाते।
ऐ सुननेवाले। क्या तुझ बात नहीं कि पृथ्वी पौड़ी-
चकली है । फिर क्या कोई भाग मुझे रहनं न देगा ?
अयास-पिन-कीम।
जब किसी विवकीने ससारकी परीक्षा की, तो उसे ज्ञात
हुआ कि ससारमे मित्रके वनोगें कैस कैसे शत्रु हैं।
-अयूनिवास।
मनुष्यको मृत्युके पश्चात् उसी मकानमें निवास करना
होगा जिसको कि उसने अपनी मृत्युसे पहले पनाया है।
ममारमे दो वस्तुएँ बहुत ही कम पाई जाती हैं-एक तो
शुद्ध कमाईका धन, दूसरे सत्य शिक्षक मित्र ।
-हजरतमली।
--गुलवाया
नब कि मैं जानता हूँ कि मेरा जीवन केवल एक क्षण
मात्र है, तो मैं क्यों उसको ईश्वरकी स्तुति, प्रार्थना और उपा
सनामें न लगाऊँ?
লমান নারী।
। समाप्त।

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Arbhi Kavya Darshan

Author
Sadhu,shriyut Mahesh Prasad
Title
Arbhi Kavya Darshan
File name
Arbhi Kavya Darshan
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2011/01
Publisher
Hindi Granth Ratnakar Karyalaya Bombay
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546454
Barcode
4990010024927.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
DO4aNsGSXFu
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