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Parshav - Puran
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होलिमानी ॥ नम श्रीपाश्यनाथाय ।। स्वर्गीय कविवर भूधरदास विरचित पाश्र्व पुराण (नैन सिद्धान्त गभित सुन्दर काव्य ग्रंथ ) मानाति भारतीय प्रति-दर्शन केन्द्र सपुर प्रकाशक- वीर पुस्तक भंडार मनिहारों का रास्ता, जयपुर-३ Rs5-00 हरि २५- होलिया,
प्रकाशक
वोर पुस्तक भडार
मनिहारो का रास्ता,
जयपुर-३
-
मूल्य
२५
भ
मुद्रका
श्री वीर प्रेस
। कविवर भूधरदासजी इस पापुराण के रचयिता कविवर भूधरदासजी है। अठारहवी शती के उत्तरार्द्ध मे कविवर ने आगरा मे इसकी रचना की । कवि आगरा के रहने वाले खडेलवाल दि. जैन थे। इनका समय विक्रम सं० १७५० से १८०६ माना जाता है। पाश्वपुराण की रचना से पूर्व आध्यात्मिक एवं उपदेशी एकसौ से अधिक छन्द उनने लिखे, जिन्हे जयपुर नरेश सवाई जयसिंहजी के सूबेदार ( सूबा के हाकिम ) श्री गुलावचदजी के कहने से एकत्र कर पीप कृष्णा त्रयोदशी रविवार वि स० १७८१ मे पूर्ण किया। शतक में १०६ छन्द हैं । अन्तिम छन्द मे अपना परिचय देते हुए उनने लिखा है- प्रागरे मे बाल-बुद्धि भूघर खडेलवाल बालक के ख्याल सौं कवित्त कर जाने है ऐसे ही करत भयो जैमिह सवाई मूबा-हामि गुलावद पाये तिहि थान हैं । हरीसिंह साह के मुवम धर्मरागा नर, तिनके कहे मी जोरि कोनी एक ठाने है। फिरि फिरि प्रेरे मेरे पालस को अतमयो, उनको सहाय यह मेरो मन मान है। दोहा-सतरह से इक्यासिया, पोह पाख तमलीन । तिथि तेरस रविवार को, सतक ममापत कीन । शतक के पश्चात् पार्श्व पुराण को रचना हुई जो प्राषाढ शुक्ला पचमी वि स १७८६ मे पूर्ण हुई । इन दो ग्रथो के अतिरिक्त कवि के बनाये लगभग ७० पद भी उपलब्ध हैं जो विभिन्न राग रागनियो मे गाये जा सकते हैं। खोज करने पर सभवत और भी पद मिलें । पर जितने उपलब्ध हैं वे बडे ही महत्वपूरण प्रार हृदय कवि के पद, छन्द आदि एक से एक बढकर है और सासारिक प्राणी को झर झोर देने वाले है। ममार की अमारता, भोगो की नि सारता और मानव जीवन की उपादेयता पर कवि ने खूब हो लिखा है । इतने प्रभावक है शतक के छन्द एव भजन कि जो काय लम्बे चौडे अनेक उपदेशो और शास्त्रो के अध्ययन से नहीं हो सकता-वह पद्य को दो लाइना में हो जाता है । वडा प्रानन्द पाना है इनके पढने मात्र से ही। को छूनेवाले - - - पावपुराण मे भी कवि ने कमाल कर दिया है । सचमुच पार्श्व पुराण जैन काव्य-साहित्य मे एक उच्च कोटिका काव्य-ग्रथ है । इसमे भगवान पार्श्वनाथ का जीवन चरित्र है-पर साथ ही जैन सिद्धान्त का सार भी इसमे कवि ने भर दिया है। पच कल्याणक वर्णन के साथ तत्त्वचर्चा और आध्यात्मिक उपदेशो से सराबोर है-यह प्रथ । शब्द विन्यास, भावगाभीर्य और प्रसादादिगुण स्थान स्थान पर देखने को मिलते है इस छोटे से पुराण मे । विभिन्न छन्दो मे निबद्ध यह अथ कवि को छन्द-शास्त्र की जानकारी प्रकट करता है। यद्यपि कवि ने अपनी लघुता प्रकट करते हुए लिखा है कि- अमर कोष नहिं पढयो, मैं न कहिं पिंगल पेख्यो। काव्य कठ नहिं करो, सारसुत सो नहिं सीख्यो। अच्छर-सधि-समास-ज्ञान वजित बुधि हीनी । धर्म-भावना हेत-किमपि भाषा यह कोनी। किन्तु वे एक विद्वान् थे-माहित्य, दशन और सिद्धान्त के अच्छे जानकार । यह पाश्वपुराण किसी का अनुवाद नही यह कवि की एक स्वतत्र मौलिक रचना है। जैन काव्यो में ऐसा अन्य कोई चरित्र ग्रथ नही है। कवि का प्रभाव इसीसे स्पष्ट है कि उनका पार्श्वपुराण, जैन शतक एव पद मग्रह का समाज मे काफी प्रचार है और बडे चाव से लोग इन्हे पढते है। इसीलिए इनकी रचनामो के बार २ प्रकाशन की आवश्यकता पड जाती है। प्रस्तुत सस्करण भी ग्रथ उपलब्ध नही होने से छपाया गया है। उनके भजन तो सकडो प्रकाशनो मे मिलेगे। कोई भजन संग्रह इनके पद विना अधूरा ही समझा जावेगा। अब तक के प्रकाशित पार्श्वपुराणो के सस्करणो मे यह सस्करण विशेष महत्व रखता है । इसमे कठिन शब्दो के अथ भी दिये गये हैं- धारण को समझने के लिए और भी शब्दार्थ अपेक्षित ने दिये हैं-वे भी बडे उपयोगी हैं। इस शब्गथ श्री गुलाबचदजी जैन दशनाचाय, एम ए भंवरलाल न्यायतोथ शुद्धि-पत्रक प्रस्तुत पार्श्वपुराण मे प्रारभ के १६ पृष्ठो के शब्दार्थ नही छप सके हैं । अत निम्न प्रकार पाठ शुद्धि करके शब्दार्थ यथास्थान पढने का कष्ट करें। शुद्धाशुद्धि २ पृष्ठ सख्या पक्ति सख्या प्रशुद्ध शुद्ध ॥१॥ २ ॥४॥ १२ २२ भूताचलपव भूताचलपवत शास्त्र भहार शस्त्र भडार २. द्रोणाचार्य जमे चारसी ( या सख्या विशेप) ग्रामो मेंप्रधान पृष्ठो के अनुसार शब्दार्थ निम्न प्रकार हैं- पृष्ठ १ भुवनतिलक-तीनलोक मे महान, दिवायर=सूर्य, गुणसायर-गुणों के समुद्र, नाग-हाथी, मयमतमतवाला, उच्छेपन%Dउखाहनेवाले, रमाकत: प्रनत चतुष्टय रूप लक्ष्मी के पति, बोध-जान मार कामदेव, मातग-हाथी, मृगेमर सिंह, मुखमयक-मुसरूपी चन्द्रमा, रक-गरीब, रजनीपति चन्द्रमा, पन्नग-सांप। पृष्ठ २ शक इन्द्र, चचत्रवर्ती, भव जल घि-ससार-समुद्र, तर=नाव, विषधर साप, डकाटे, व्याल सांप, मेरे नजदीक, वादिस्यथ, उर कोप3 हृदय रूपी खजाना, रक-घन-गरीब वे धन के समान, हेठ-हीन विगतविरोध- गेर को दूर करनेवाला ।
[ ग ) पृष्ठ ३ गज-मन, रिपाचाय, गप:नायो, मगर गरमाग, निरव उठाये, यिमस्त-चिना (निना) गोप=7म । पृष्ठ ४ पुगे 7 मोमगिरी न सुमारे, रगेनीपर, विटा, जग-गाप, प्रालि, 'माTTI, founान, दीमत- सगो।। पृष्ठ ५ गयारि-पारग ररस, प्रतयर' पुर (गगयाम ) यमनम्न । पृष्ठ ६ नरगयराजा, पुति-अनुनि, यि -यो, गनगन गगयर यानिधिः ममुद्र, प्रगमगार, मतिमा जन-सि । पृष्ठ ७ उनहार-गमान, दन-पो, मागगनगमर) मनोर गुदर मठानप्रासार पण प्रत्यना । दोगे), तनने, द्वारजन% पारापासी, जनाम:मागुन, पुपाति:नगगे की पति मंलगन (पवता, तु ग%3 Tी, गौरयोगा, गोपुर-दग्याना frौपान।। पृष्ठ ८ पुरंद-सुरेट (55), पट तर=उपमा, जेठोबा, मतिहटा-मदबुद्धि, जमधि-समुद्र, नारजा (मार्या)=ी, मिराम सुन्दर, टेव-प्रादत, ३५% टेढो, मन-म, लोहायच-नोरा बतर, पाटा ननगर, T-हित कर, देह-गरीर। पृष्ठ ६ इट-मला, नह-प्रेम, संत (श्वेत) सफेद, स-मन्देह, गजा बाहिास में, पहनिन-रातदिन, सोमप्रकृति-मरल स्वभाव, भूपण-भूपित- प्राभूषण पहने हुए, निहार-देव, वितन-पाकुल । पृष्ठ १० प्रवेव-पविवेका, मदनमत्ताम म मतगाले, जरो जरो जनो जलो (नष्ट हो), यार मित्र, रवि-गूय, नीरानी, परसाश करे, प्रबुज-कमल, पलिमोरा, विचार-मूख, फल-चैन, विसेस-विशेप व्याधि=राग, सिन्धा- वचन:शिक्षास्प वचन तूल-तुल्य (बरावर), जेठति का वडा भाई (ज्यठ) पृष्ठ ११ अपमस-प्रशसनीय (बुराई योग्य।, सतभाव-शोघ्र निवर्मनसे, परपचमायाचार, माय =भाई की स्त्री, वन-परनीन पी इथिनी, रज = ग्ज यमान ग्रा, भगताट डाला, "Y-श । .
1 ग । पृष्ठ १२ विवाहाण, दुजविन (ग्राहाण), निग्रहमोग-पना का पात्र, करुणा-या, गच्छ-जग, सयान-चतुर, सेद-दुय, रिम-गुस्सा, वर-गधा, पोर-पीटा, बीघोगली, स्वारी-तिरस्कार, पुरवासी नागरिक, विलसतम्रोवत, वदन-मुम्ब । पृष्ठ १३ अधोमुग्न-पोधेमुग्य, पाम=पीना, अरघमुखी- चे मुखयाले, प्रधोर: प्रधोर=, सर्वभक्षी), दुविधि दया-स्वदया, परदया । परच-परिचय, नम्प- माखून, प्रनम्यो नमस्कार किया, फनी-सांप, सहोदर-माई, खल-दुष्ट, परज्यो मना किया पंग-काच, छार-राय । पृष्ठ १४ टेक्-प्रादत, सुवास-सुगधित, एकाकी-परेला, विनयो नम्रोगूत हा, सरल यायक-सरल वचन, सुम्पमास-मुख से घोले, चीनयो-बिनती को मलेखमा श्लेम (खासी या कफ), पिमुन-मूर्ख, पियूप-अमृत. दुर्जनहिततरु-दुष्ट की प्रीति रूपी वृक्ष । पृष्ठ १५ मूसम-चोरी करना या ठगना, कर पायो-पकडा गया, इन्द्रायन:- गहवा (कढवे फल की नेल), पिनट्ठी-नष्ट हुई, कमलपत्र परसग-कमल के पत्ते की संगति करके, दिछी दिखाई पडो, मुक्ताफल मोती। पृष्ठ १६ पत्र पुज-पत्तों का ढेर, सिकताथल-बालुका प्रदेश, तुग-क चे, तमाल-ताउ के वृक्ष, कपि-वन्दर, उतग-ऊचे, फुरग-हरिण, मव-जीवन- झरना-मद जल का झरना,तम वरन-कामा, जगम-चलता फिरता, मुसलोपम- मूसल के समान, धवल-सफेद, गह-गाल, वह-कादो झोल पा झोपड, अग लेय-शरोर के लपेटले । .
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कविवर भूधरदासजी विरचित - पाइर्द-पुराण थोपाएवनाथजी की स्तुति । दोहा। मोह-महा-तम-दलन दिन, तपलक्ष्मी भरतार । ते पारस परमेस मुझ, होहु सुमतिरातार ।। १ ॥ वामानंदन-फलपतरु, जयो जगत-हितकार । मुनिजन नाको प्रास करि, नाचे सिवफल सार ॥२॥ छप्पय । भुवनतिलक भगवंत, सतजन-कमल-दिवायर । जगतजतु-बन्धव अनंत, अनुपम गुणसायर ।। राग-नाग-मयमंत,-दंत-उच्छेपन बलि प्रति । रमाकत अरहंत, अतुल जसवन्त जगतपति ।। महिमा महत मुनिजन जपत, प्रादि अत सबको सरन ।.. सो परमदेव मुझ मन बसो, पासनाह मंगलकरन ॥३॥ विमल-बोध-दातार, विश्व-विद्या-परमेसर । लछमीकमलकुमार, मार-मातंग-मृगेसर ।। मुखमयक अवलोकि, रंक रजनीपति लाज। नाम-मंत्र-परताप, पाप पनगरि भाजै ॥
२] पार्चपुराण जय अस्वसेन-कुल-चन्द्र जिन, सक्र-चक्र-पूजित-चरन । तारो अपार भव-जलधितै, तुम तरंड तारन तरन ॥ बाघ सिंह बम होहिं, विषम विषधर नहि डंके । भूत प्रेत बेताल, व्याल बैरी मन सके । साफिनि हाकिनि अगनि, चोर नहिं भय उपजावै । रोग सोग सब जाहि, विपत नेरे नहि पावै ।। श्रीपार्सदेवके पदकमल, हिय धरत निज एकमन । छूट प्रनादि बधन बधे, कौन कथा विनस विधन ॥५॥ चहुँगति भ्रमत अनादि, वादि बहुकाल गमायो । रही सदा सुख-प्रास, प्यास, जल कहूं न पायो । सुख-करता जिनराज, आज लौ हिये न पाये । अब मुझ माथे भाग, चरन-चितामनि पाये ॥ राखौ सभाल उर कोषमै, नहिं बिसरौं पल रक-धन । परमावचोर टालन निमित, करौं पार्सजिनगुनकथन ॥ चौपई [ १५ मात्रा ] बन्दौं तीर्थंकर चौबीस । बन्दौ सिद्ध बस जगसीस । बन्दौ प्राचारज उवझाय । बन्दौं परम साधु के पाय ॥७॥ ये ही पद पाचौँ परमेठ । ये ही साच और सब हेठ । ये ही मगल पूज्य अतीव । ये ही उत्तम सरन सदोव ।। बदों जिनवानी मन सोध । आदि प्रत जो विगत-विरोध । सकलवस्तु वरसावनहार । भ्रमविषहरन प्रोषधो सार है। ।
पीठिका
[३
दोहा।
बरतो जग जयवत नित, जिनप्रवचन प्रमलान ।
लोक-महलमै जगमग, मानिक-दीप समान ॥१०॥
हरो भरम दारिद्र दुख, भरो हमारी प्रास ।
करो सारदा लच्छमी, मुझ उर अवुज बास ॥११॥
चौपई।
बन्यों वृषभसेन गनराज । गुरु गौतम भवजलधिजहाज ।
कुंदकुंद-मुनि-प्रमुख सुपंथ । जे सब प्राचारज निरग्रंथ ॥१२॥
जनतत्त्व के जाननहार । भये जथारथ कथक उदार।
तिनके धरनकमल कर जोरि । करौं प्रनाम मान-मव-छोरि।।
दोहा।
सफल पूज्य-पद पूजक, प्रलपबुद्धि अनुसार ।
भाषा पार्सपुरान की, करौं स्वपरहितकार ॥१४॥
चौपई
जिनगुनकथन अगमविस्तार । बुधिबल कोन लहैं कवि पार ।
जिनसेनादिक सूरि महत । वरनन करि पायो नहिं अंत ॥१५॥
तो अब अलपमति जन और । कौन गिनतिमें तिनको दौर।
को बहुभार गयंद न बहै । सो क्यो दोन ससक निरबहै ।१६॥
दोहा
कह जाने ते यो कहैं, हम कछु वरन्यो नाहिं ।
जे कह जान ही नहीं, ते अब कहा कहाहि ॥१७॥
नभ विलस्त नापं नहीं, चुलू न सागर तोय ।
भोजिनगुनसंख्या सुजस, त्यों कवि कर न कोय ॥१८॥
४] पाशवपुराण 4 चौपई यह उत्तम नर अवतार । जिनचरचा बिन अफल अर... . सुनि पुरान जो घुमै न सीस । सो थोथे नारेल सरीस ।१९। जिनचरित्र जे सुनै न कान । देहगेह के छिद्र समान । जामुख जैनकथा नहि होय । जीभ भुजगनिको बिल सोय ॥२०॥ या प्रकार यह उद्यम जोग । कहत पुरानन पडित लोग । जिनगुनगान सुधारसन्याय । सेवत अलप जनम-जुर-जाय ।२१। घनाक्षरी। जो लौ कवि काब्यहेत आगम के अच्छर को, प्ररथ विचारै तौलौं सिद्धि सुभ ध्यान की। और वह पाठ जब भूपर प्रगट होय, पढे सुनै जोब तिन्है प्रापति हू ग्यानको ।। ऐसे निज-परको विचार हित हेतु हम, उद्यम कियो है नहिं बान अभिमानको । ग्यानप्रस चाखा भई ऐसी अभिलाखा अब, करू जोरि भाखा जिन पारसपुरानको ॥२२॥ श्राग जैन ग्रन्थनि के करता कवोन्द्र भये, करी देवभासा महाबुद्धिफल लीनो है । प्रच्छर-मिताई तथा अर्थ की गभीरताई, पदललिताई जहा आई रीति तीनो है। काल के प्रभाव तिन ग्रन्यनिके पाठी प्रव, टोमत प्रलप ऐसो, प्रायो दिन होनो है।
पीठिका'
[५
तात इह समै जोग पढे बालबुद्धि लोग ।
पारसपुरानपाठ भाषाबद्ध कोनो है ॥२३॥
दोहा।
सक्तिभक्तिबल कविनप, जिनगुन बरने जाहि ।।
मैं भव बरनों भक्तिवस, सक्ति मूल मुझ नाहिं ।।२४॥
परनों पूरवकथितक्रम, ग्रंथप्रर्थ अवधारि ।
सुगमरूप सछेपसौं, सुनौ सबहि नरनारि ॥२५॥
चौपई।
मगधदेस देसनि-परधान । राजगृही नगरी सुभथान ।।
राज कर श्रेनिक भूपाल । नीतवंत नृप पुन्यविसाल ॥२६॥
छायक-सम्यकदरसनसार । रूप सील सबगुनप्राधार ।।
तिनके घर प्रतेवर धना। पटरानी रानी चेलना ॥२७॥
जाके गुन बरनत बहु भाय । बिरिया लगे कथा वढि जाया
एक दिना निज सभा नरेस । निवस जैसे सुरग-सुरेसा॥२८॥
रोमाञ्चित बनपालक ताम । प्राय राय प्रति कियो प्रनाम ।।
छह रितुके फल फूल अनूप । प्रागे धरे अनुपम रूप ॥२६॥
हाथ जोरि विनवै वनपाल । विपुलाचल पर्वत के भाल ।।
वर्द्ध मान तीर्थकर आप । प्राये राजन-पुन्यप्रताप ॥३०॥
महिमा कछु बरनी नहिं जाय । इद्रादिक सेवै सब पाय ।।
समोसरनसपतिको कथा । मोपै कही जाय किमि तथा ॥३१॥
माली वचन सुनै सुखदाय । हरण्यौ राजा अंग न माय ।।
दोन भूषन वसन उतार । बनमाली लोने सिरधार ॥३२॥
६] पावपुराण ----- सात पैड़ गिरिसम्मुख जाय । कियो परोच्छ विनय नरराय ॥ प्रानंदभेरि नगरमैं दई । सबहीर्को दरसनरुचि भई ॥३३॥ चल्यो संग पुरजन समुदाय । वदे वर्द्धमान जिनराय ।। लोकोत्तर लछमी अवलोक । गये सकल भूपतिके सोक ||३४॥ धुति प्रारभ करी बहुभाय । बार बार भुवि सीस नवाय ।। गौतम गुरु पूजे कर जोरि । नरकोठे बैठ्यौ मद छोरि ॥३॥ कियो प्रश्न श्रेणिक बड भूप । प्रभु पारस निजकथा अनूप।। जाके सुनत पाप छ्य होय । कहिये देव कृपाकरि सोय ॥३६॥ तब गनघर बोले हितकाज । जोग प्रस्न कोनो नरराज ।। सुन पुनीत पारसजिनकथा । सफल होय मानुषभव जया (३७॥ दोहा। इहि विधि जो मगषेस प्रति, कहाँ चरित गनराज ॥ ताही कम प्राये कहत, प्राचारज परकाज ।। ३८ ॥ तिनहीके अनुसार अब, कहूं किमपि विस्तार ।। जैनकथा फलपित नहीं, यह जानो निरधार ।। ३६ ।। जनवचनवारिधि प्रगम, पानी मर्थ मतिभाजन भर भर लिये, यह जिनमागमरूप ॥ ४० ॥ भन्नुप ॥ इति पीठिका।
पहला अधिकार
[७
पहला अधिकार
चौपई।
जबूवीप विप इह सार। सूरज मंडल की उनहार ॥
मध्य सुमेरुकरिणकाभास । बने छेत्र दल दीरघ जास ॥४१॥
तारागन मकरद मनोग। सुरनरसग भ्रमरकुलजोग ।।
लवनसमुद्र सरोवरथान । दीप किधों यह कमल महान॥४२॥
लच्छ महा जोजन विस्तार । बस विविध-रचना-प्राधार ॥
वच्छिन भरत धनुष-सठान।। पर्वत फरणच नदीजुग वान ।।४।।
मानों सागरप्रति अनुमानि । तानत तीर छार-जल जानि ॥
ऐसी भांति विराजत खेत । छहो-खंड-मंडित छवि देत ॥४४॥
पांच मलेच्छ बस तामाहि । धर्म कर्म कछु जाने नाहिं ॥
उत्तम प्रारजखंडमझार । देस सुरम्य बस मनहार ॥४५॥
जनकुल जहां रहैं बहु भांति । पास पास सोहे पुर-पांति ।।
सरवर नदी सैल उद्यान । वन उपवनसौं सोभामान ॥४६॥
तहां नगर पोदनपुर नाम । मानों भूमितिलक अभिराम ।।
अवलोककी उपमा धरै । सब ही विध देखत मनहरै ॥run
दोहा।
तुंग कोट खाई सजल, सघन बाग गृह-पांति ।।
चौपथ चौक बजारसौं, सोहै पुर बहुभांति ॥४॥
ठाम ठाम गोपुर लसै, वापी सरवर कूप ।।
किषों स्वर्ग ने भूमिकौं, भेजी भेंट अनूप ॥४६॥
१] पाश्वपुराण चौपई। जैनी प्रजा जहां परवीन । बसै दानपूजावतलीन । नभवन ऊचे अति बने । सिखर धुजासौं सोभित घने ॥५०॥ इहि विधि पुरसोभा अधिकार । वरनन करत लगे बहुबार । राज कर राजा अरविंद । सोहै मानो स्वर्ग सुरिद ॥५१॥ पाल प्रजा कुमति जिन दली। नीतिबेलमडित भुजबली । दयाधाम सज्जन गंभीर । गुनरागी त्यागी रनधीर ॥५२॥ तिस भूपतिक विप्र सुजान । विस्वभूति मत्री बुधिवान । ताक तिया अनदरि सती । रूपसील-गुन-लच्छनवती ॥५३॥ दोय पुत्र तिनकै अवतरे। पापपुन्य की पटतर घरे । जेठो नदन कमठ कुपूत । दूजो पुत्र सुधी मरुभूत ॥५४॥ दोहा । जेठो मतिहेठो कुटिल, लघुसुत सरल सुभाय । विष अमृत उपजे जुगल, विप्र जलधिके जाय ॥ ५५ ॥ बड़े पुत्रने भारजा, ज्याही बरुना नाम । लघुने बरी विसुन्दरी, रूपवती अभिराम ॥ ५६ ।। चौपई। यों सुख निवसै बाधव दोय । निज निज टेव न टारे कोय । पक्र चाल विषधर नहिं तनै । हस वक्रता भूल न भजे ॥५७॥ दोहा। उपजे एकहि गर्भसौ, सज्जन दुर्जन येह । लोह-कवच रच्छा कर, खाडो खंडे देह ॥५८।।
पहला भधिकार। [8 .. चौपई। अति सज्जन मरुभूति-कुमार । नीति-शास्त्रको जाननहार । सवों इष्ट सकलगुनगेह । राजा प्रजा करै सब नेह ॥५६॥ एक दिना भूपति-मंत्रीस । सेत बाल देख्यौ निज सीस ।। उपज्यो विप्र-हिये वैराग । जान्यो सब जग अथिर सुहाग ।।६० दोहा। जरा मौतको लघु बहिन, यामै ससै नाहि ॥ तो भी सुहित न चितवै, बड़ी भूल जगमाहिं ।।६१।। चौपई। यह विचार मंत्री मनमाहिं । निज सुत सौपि रायको बाहिं।। सुगुरु-साखि जिन-चारित लियो । वनोवास प्रातमहित कियो। अब मरुभूति विप्र सुख करे । अहनिस नीतिपंथ पग धरै ।। 'राजा प्रीति कर बहु भाय । सोमप्रकृति सवौं सुखदाय ।।६३ एक समय प्रापन अरविंद । मंत्री सेनासहित नरिद ।। राय वजवीरजपर चढ़े। क्रोधभाव उरमै अति बढ़े ॥६॥ पीछे कमठ निरकुश होय । लग्यौ अनीति करन सठ सोय ।। जो मन पावै सो हठ गहै । 'मैं राजा' सबसौं इम कहै ॥६५ एक दिना निजभ्रातानारि । भूषन-भूषितरूप निहारि ॥ 'रागध अति विह्वल भयो । तीच्छन कामताप उर तयौ ॥६६ महा मलिन उर बसे कुभाव । दुर्गतिगामी जीव सुभाव ।। पुत्री सम लघुभ्रातानारि । तहां कुविष्ट घरी अविचारि ॥६७ १०] पावपुराण --- दोहा। पाप कर्मको डर नहीं, नहीं लोककी लाज ॥ कामी जनकी रीति यह, घिक तिस जन्म प्रकान ।।६।। कामी कान अकाजमैं, हो हैं अब अवेव ।। मदनमत्त मदमत्त सम, जरो जरो यह टेव ॥६६॥ पिता नीर परसै नहीं, दूर रहे रवि यार ।। ता अंबुजम मूड अलि, उरभि मरै अविचार ॥७॥ त्यों ही कुविसनरत पुरुष, होय अवस अविवेक ।। हितअनहित सोच नहीं, हिय विसनकी टेक ॥७१॥ चौपई। बनमें सघन लतागृह जहां । गयौ कमठ कामातुर तहा ।। बड़ी वेदना कल नहिं परें । छिन छिन काम-विथा दुख करं ।। कम सखा कलहंस विसेख । पूछत भयो दुखी तिह देख ॥ कौन व्याधि उपजी तुम अंग । अतिव्याकुल दीखत सरवग ।। तब तिन लाज छोरि सब सही । मनकी बात मित्रों कही ।। सुनि कलहंस कया विपरीति । सिच्छावचन कहे करि प्रोति ।। प्रति प्रजोग कारज इह वीर । सो तुम चित्यो साहस-धीर ।। परनारोमम पाप न मान । परभवदुख इह भव जस-हान ।।७५ इस ही बंद्यासौं अघ भरे । रावण आदि नरकम परे ।। नगमै जेठ पितासमतूल । बात कहत लाजै नहिं मूल ।।७।। ताते यह हा नूल न करो । सुहित सोख मेरो मन धरी ।। लोकनिंद कारन यह जान । धर्मनिद निहचं उर प्रान ।।७७ पहला अधिकार [." --.. दोहा यो कलहम अनेक विध, दई मीन सुखदैन । से मर कमठमीनप्रनि, भये विफल हिनवन ।। ७८ ॥ प्रायहीन नर को जया, प्रोपधि मग न लग ।। याँ ही रागी पुरुष प्रति, वृया घग्म-उपदेन ॥ ७६ ।। बोल्यो नब कामो क्रमठ, मुनी मित्र निरधार ।। मी महि मिले विमुंदरी, तो मुझ मरन विचार ॥ ५० ॥ बस क्रमटकी अधिक हक, कुमति करी कलहम ।। बाय करें, ता नाग्मिी, मट वचन अपगंस ॥१॥ प्रहित पुन विदरी प्रान कमट बनमें दुली। ताकी मृघ मेहदीय जिहि विधि मन्त्री ।। मृनत ही मामाच गई बनमें तहाँ। नियम कर परपंच कमट कपटी महाँ ।। १२ ॥ दीक्षा सुमनल का भीगर सई, अनिता गई प्रजान । राग प्रचन भाग विविध, दुराचारको प्रान 13 ॥ पामा गणमानो कमट करनी । अधमों मनमा नदि की। भावज बन-करनी मोनित्र मीमनीवर मंत्री ||४॥ रिपुमीत विजयमा पार्यो । परविंद नृपनि घर प्रायो । भ कमने कौन । बाबा ममते न मानेन ।। ॥
१२ ] पावपुराण मंत्री मरुभूति बुलायो । ताकी सब भेद मुनायो ।। कहु विप्र सुधी क्या कोजे । क्या दड इस अव दोजे ।।६।। दुज कहे सरल परिनामो । अपराध छिमा कर स्वामी ।। जो एक दोष सुन लोज । तार्की प्रभु दंड न दीजै ।। ८७ ॥ तब भूप कहै सुन भाई । जो निग्रहजोग अन्याई ।। तात करना किम होहै । यह न्याय नृपति नहिं सोहै ॥८॥ तात गृह गच्छ सयाने । मत खेद हियै कछु अाने ।। ऐसे कह विप्र पठायौ । तिस पोछ कम० बुलायो ।।८६ प्रति निदो नीच कुकर्मी । जानो निरधार अधर्मी ।। राजा प्रति ही रिस कीनों । सिर मुंड दंड बहु दोनों ॥६॥ मुखक कालोस लगाई। खर रोप्यो पोर न पाई ।। फिर सारे नगर फिरायो । प्रति वीथी ढोल वजायौ ॥१॥ इस भाति कमठको स्वारी । देखें सव हो नरनारी ॥ पुरवासी लोक धिकार । वालक मिलि कंकर मारै ।।२।। यो दड दियो अति भारी । फिर दोनों देश निकारी ।। जो दीरघ पाप कमाये । ततकाल उदै बहु आये ।। ६३ ।। दोहा। इहि विधि फूल्यो पाप तर, देख्यौ सब ससार । प्रागे फल है नरक फल, धिक दुर्विसन असार ।। ६४ ।। चौपई। महादड भूपति जब दयौ । कमठ कुसील दुखी अति भयो ।। विलखत वदन गयो चल तहाँ । भूताचलपा है जहा ।।५।। । - Nov~~- पहला अधिकार। रहै तहां तपसी-समुदाय । ग्यान बिना सब सोखं काय ॥ केई रहे अधोमुख झूल । धूमां पान करै अघमूल ॥६६॥ केई ऊरधमुखी अघोर । देखें सबै गगनको पोर ।। केई निवस ऊरध बाहिं । दुविध दयासौं परच नाहिं ॥१७॥ फेई पच अगनि भल सह । केई सदा मौनमुख रहैं ।। केई बैठे भसम चढाय । केई मृगछाला तन लाय ॥६॥ नख बढाय केई दुख भरै । केई जटा-भार सिर धरै ।। यो अग्यान तपलीन मलोन । कर खेद परमारथ हीन ॥६६॥ तिनमे एक तापसीनाथ । प्रनम्यो ताहि घरे सिर हाथ ।। तिन असीस दे पादर कियो । दिच्छादान कमठ तह लियौ१०० करन लग्यौ तब कायकलेस । उर वैराग विवेक न लेस । ठाढो भयो सिला कर लिये। किधौं फनी फन ऊँचो किये।१०१ मंत्री बंधवकी सुधि पाय । राजासौं विनयो इमि प्राय ॥ भूताचलपर्वतको प्रोर । भ्राता कमठ कर तप घोर ॥१०२॥ जो नरनायक प्राग्या होय । देखू जाय सहोदर सोय । पूछ नृपति कौन तप करै । भो प्रभु तापसके व्रत धरै ॥१३॥ एक बार मिलि पाऊँ ताहि । राय कहै मत्री मत जाहि ॥ खलसौं मिले कहा सुख होय । विषघर भेंटे लाभ न कोय ॥१०४ बरजौ रह्यो न बारबार । महा सरलचित विप्रकुमार ।। भ्रातमोहबस उद्यम कियो । कोमल होत सुजनको हियो ।१०५ दोहा दुर्जनखित संतको, सरल सुभाव दर्पणकी छवि छारसी, अधिकहि उज्ज्वल थाय ॥१०६॥ न जाय।
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पहला अधिकार [ १५ चौपई । फेरि भीलनतै मिल्यो । भयो चोर घर मूसन' हिल्यौ ।। पाप करत कर पायो जबै । बांधि बुरी विधि मारयो तबै ।। दोहा। जैसी करनी प्राचर, तैसो हो फल होय । इन्द्रायनको बेलिके, प्रांब न लागै कोय ॥११॥ चौपई। एक विना अरविंद नरिंद । पूछ कर जुग जोरि मुनिद ।। भो प्रभु मुझ मंत्री मरुभूत । क्यो नहिं पायौ ब्राह्मनपूत।।११९। यह सुनि अवधिवत मुनिराय । सब बिरतंत कह्यौ समुझाय ॥ गजा मन अति भयौ मलीन । हा मत्री सज्जनता लीन ।१२० बरजत गयौ दुष्टके पास । कुमरन लौ सह्यो बहु त्रास ॥ होनहार सोई विधि होय । ताहि मिटाय सके नहि कोय।।।१२१ यों विचारि मन सोक मिटाय । साधु पूजि घर आये राय ॥ यह सुनि दुष्टसग परिहरो। सुखदायक सतसंगति करो ॥१२२ छप्पय। तपे तवापर प्राय, स्वातिजलद विनट्ठी। कमलपत्रपरसंग, वही मोतीसम विहो। सागरसीप समीप, भयो मुक्ताफल सोई । सगतको परभाव, प्रगट देखो सब कोई।। यों नीचसंगते नीचफल, मध्यमते मध्यम सही ।। उत्तमसंजोगते जोधको, उत्तमफलप्रापति कही ॥१२३॥ इतिश्रीपार्श्वपुराणभाषाया मरुभूतिभववर्णन । मूसनः चोरी करना योगना कर आयो 'विभाटी नर-मालपत्र परसग कमर ।
पार्श्वपरान दूसरा अधिकार दोहा। अस्वसेन-कुल-चद्रमा, बामा-उर-अवतार । बदौं पारसपदकमल, भविजनअलि प्राधार ॥१॥ पद्धरी छद इसभाति तजे मरुभूति प्रान । अब सुनो कथा आगे सुजान ।। अतिसघन सल्लकी बन विशाल । जह तरुवर तुंग तमाल ताल ।। बहु बेलजाल छाये निकुंज । कहिं सूखि परे तिन पत्रपु ज ॥ कहिं सिकताथल कहिं सुद्ध भूमि । कहिं कपि तरुडारन रहे झूमि लिकामा कहि सजलथान कहिं गिरि उतगाहिं रोछ रोज विचरै कुरंग।। तिस थानक पारतध्यानदोष । उपज्यो वनहस्ती वजुघोष ।। अति उन्नत मस्तकसिखर जास । मद-जीवनझरना झरहि तास दीस तमवरन विसाल देह । मनों गिरिजंगम दूसरो येहा॥ जाको तन नख शिख छोमवत । मुसलोपम दीरघ धवल दत॥ मदभीजे झलकै जुगल गंड । छिन छिनसौं फेरै सुड दड।।६।। जो बरुना नामै कमठ नार । पोदनपुर निवसै निराधार । सो मरि तिहि हथिनो हुई प्रान । तिससग रमै नित रजमान।। कबही बहु खडै बिरछबेलि । कबही रजरंजित करहि केलि । कबही सरवरमै तिरहि जाय । कबही जल छिरकै मत्तकाय॥ कबही मुख पंकज तोरि देय । कबही दह-कादो अंग लेय।।६।। भीलवावीचड़ दूसरा अधिकार। [ १७ ~~ -~- । दोहा । यो सुछद क्रीडा करे, बरुना-हथिनी सत्थ । बन निवस बारण' बली, मारण-सील समत्थ ॥१०॥ चौपई। एक दिवस अरविंद नरेस । ज्यो विमानमै स्वर्ग सुरेस ।। यो निजमहलन निवस भूप । देख्यौ बादल एक अनूप ॥११॥ तुंग सिखर अति उज्जल महा। मानो मंदिर ही बनि रहा। नर व निरखि चितवं ताम। ऐसो ही करिये जिनधाम ।।१२।। लिखन हेत कागद कर लयौ । इतने सो सरूप मिटि गयो । तब भूपति उरकर विचार । जगतरीति सव अथिर असार ।१३ तन धन राज-संपदा सबै । यो हो विनसि जायगी अब ।। मोहमत्त प्रानी हठ गहै । अथिर वस्तुओं थिर सरदहै ॥१४॥ जो पररूप पदारथजाति । ते अपने माने दिनराति ॥ भोगभाव सब दुखके हेत । तिनहीकों जाने सुखखेत ॥१५॥ ज्यों मार्च'-कोदो परभाव । जाय जथारथ दिष्टि स्वभाव ।। समझे पुरुष औरकी और । त्यों ही जगजीवनको दौर ।१६। पुत्र कलत्र मित्रजन जेह । स्वारथ लगे सगे सब एह ।। सुपनसरूप सकल संभोग । निजहितहेत विलब न जोग ।१७। यो भूपति वैराग विचारि । डारी पोट परिग्रह भारि ॥ राजसमाज पुत्रौ दियो । सुगुरुसाखि नृप चारित लियो ।१८। घरी दिगंबरमुद्रा सार । कर उचित आहार विहार ।। १. हाथी २. समर्थ ३.कपा ४ राजा ५ उम्मत्त ६ एकधान . स्त्री।
१८ ] पार्श्वपुराण - बारहविध दुद्धर तपलीन । छहोकाय पोहर' परवीन ॥१६॥ एकसमय अरविंद मुनीस । सारथवाहीके सग ईस ।। सिखर सुमेरु बदनाहेत । चले ईरज्यापथ पग देत ।।२०।। गये सल्लको बनमै लघ । तहा जाय उत्तरयो सब सघ । निजसिज्झाय समय मन लाय । प्रतिमाजोग दियौ मुनिराय।२१ तावत दत्रघोष गजराज । आयौ कोपि कालसम गाज । सफलसघमै खलबल परी। भाजे लोग कोकि' धुनि करी॥२२॥ गजके धकै परयो जो कोय । सो प्रानी पहुच्यौ परलोय ।। मारे तुरग तिसाये गैल । मारे मारगहारे बैल ।। २३ ॥ मारे भूखे करहा खरे । मारे जन भाजे भय भरे ॥ इहिविध हाथी करत सँघार । मुनि सनमुख पायौ किलकार ।२४ अति विकराल रोषविष भरौ । मुनि मारनको उद्यम करौ ॥ साधु सुदर्सन मेरु समान । सिरीवच्छ लच्छन उर थान ।२५।। सुचिन्ह गज देख्यौ जाम । जाती-सुमरन उपज्यौ ताम ।। ततखिन सांत भयौ गजईस । मुनिके चरन धरयौ निज सीस। तब मुनि चवै मधुर धुनि महा । रे गयद यह कोनों कहा।। हिंसा करम परम अघहेत । हिंसा दुरगतिके दुखदेत ॥२७॥ हिंसासौ भमिये ससार । हिसा निजपरकों दुखकार ।। ते ये जीव विधु से प्राय । पातकतै न डरयौ गजराय ॥२८॥ देखि देखि अघके फल कौन । लई विप्रतै कु जर'-जौन ।। १ पीर हरने वाले । २ रवाध्याय ३ किलकारी ४ घोडा ५ ऊ ट ६ कहै ७ हाथी ८ हाथी ६ योनि । ।
दूसरा अधिकार [ १६ - तू मंत्री मरुभूति सुजान । मै अरविंद क्यो न पहिचान ।।२६।। धर्मविमुख भारतके दोष । पसु-परजाय लई दुखकोष ॥ अब गजपति ये भाव निवारि । धर्मभावना हिरदै धारि ॥३० सम्यकदरसन-पूरब जान । पालि अणुक्त जब लौं प्रान । सुन करिद' उर कोमल थयौ । किये पाप निज निदत भयौ।३१ दोहा। फिर गुरु-पाँयन सिर धरचौ, धर्म गहन उर हेत ।। तब सत्यारथ धर्मविधि, कही साधु समचेत ॥३२॥ चौपई। सुन हस्ती सासन अनुकूल । सकल धरमको दर्सन मूल ॥ सब गुनरत्नकोष यह जान । मुक्ति-धौरहर-धुर-सोपान १३३ ताते यह सबहीको सार । या बिन सब प्राचरन असार ।। जो सरदहै औरकी और । सो मिथ्यातभावको दौर ॥३४॥ दोष अठारह-वरजित देव । दुविधसंगत्यागी गुरु एव । हिसावरजित धरम अनूप । यह सरधा समकितको रूप ।३५॥ दोहा।। सकादिक दूषन बिना, पाठो अग समेत । मोख-बिरछ-अंकूर यह, उपजै भवि-उर-खेत ॥३६॥ चौपई । अंगहीन दरसन जगमाहिं । भवदुखमेटन समरथ नाहिं ।। प्रच्छरऊन मत्र जो होय । विषवाधा मेट नहिं सोय ॥३७॥ १ हायी १. महल ३ ध्र. ४. सीढी ५. परिग्रह त्यागी ६. कम ।
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दूसरा अधिकार [ २१ परमेष्ठि परमपद ध्यावै । ऐसे गज काल गमावै ॥ एक दिन अधिक तिसायौ । तब वेगवती तट पायो ॥४७॥ जल पोवन उद्यम कोधौ । कादो द्रह कुंजर बोधौ । निहचै जब मरन विचारौ । सन्यास सुधी' तब धारौ।।४।। सो कमठ कलंकी मूवो । ता बन कुरकट अहि हूवौ ॥ तिन प्राय उस्यौ गज ग्याता । यह बैर महादुखदाता ॥४६॥ दोहा। मरन करयौ गजराज तब, राखे निर्मल भाव । सुरग बारवै सुर भयो, देखौ धर्मप्रभाव ॥५०॥ चौपई। तहां स्वयप्रभ नाम विमान । ससिप्रभदेव भयो तिहि थान ।। अवधि जोड सब जान्यौ देव । व्रतको फल पूरबभव भेव ॥५१॥ जिनसासन ससौ बहुभाय । धर्मविष दिढता मन लाय ।। सदा सासते श्रीजिनधाम । पूजा करी तहां अभिराम ॥५२॥ महामेरु नन्दीसुर आदि । पूजे तहा जिनबिंब अनादि । कल्यानक-पूजा बिस्तरै । पुन्य भंडार देव यो भरै ॥५३॥ सोलह सागर अायु प्रमान । साढ़े तीन हाथ तन जान । सोलह सहस वर्ष जब जाहिं । असन' चाह उपजे उरमाहि।५४। अनुपम अमृतमय पाहार । मनसौं भुज देवकुमार। प्राठदुगुन' पख बीत जास । तब सो लेय सुगंध उसास ॥५५॥ अवधि चतुर्थ अवनि परजत । यही विक्रियाबल विरतत । १ समझदार २ भोजन ३ सोलह ।
२२ ] पार्श्वपुराण अवधिछेत्र जावत परमान । होय विक्रिया तावत मान ॥५६॥ दोहा। वदनचद्र' उपमा धरै, विकसित वारिज' नैन । अग अग भूषन लसै, सब बानक सुखदैन ।।५७॥ सुन्दर तन सुन्दर वचन, सुन्दर स्वर्गनिवास । सुन्दर वनितामडली, सुन्दर सुरगन दास ॥५॥ परिणमा महिमा आदि दे, पाठ रिद्धि फल पाय ।। सुर सुछदक्रीडा कर, जो मन वरतै प्राय ॥५६॥ सुनत गोत-सगीत-धुनि, निरखत निरत रसाल ।। सुखसागरमै मगन सुर, जात न जाने काल ॥६०॥ लोकोत्तम सब सपदा, अनुपम इन्द्री-भोग ॥ सुफल फल्यौ तपकल्पतरु, मिल्यौ सकल सुखजोग ॥६१॥ जैवतो बरतो सदा, जैनधर्म जग माहि । जाके सेवत दुखसमुद, पसुपछो तिर जाहि ॥६२॥ छन्द। इसही जम्बूदीप, पूर्व विदेह मझार , पुहकलावतो देस, विकसत नैन निहारै ।।६३॥ तहा विजयारध नाम, सौहै सैल रवानो' । उज्जल वरन विसाल, रूपमई गिरिरानो' ।।६४॥ जोजन परम पचास, भूमिविस चौड़ाई । १ चन्द्रमुख २ कमल ३ वनाव । ४ सुन्दर ५ पहाडो का राजा दूसरा अधिकार। RAAN तु ग' पचीस प्रमान सोभा कही न जाई ॥६५॥ चौथाई भूमांझ, नौ सिर कूट विराजै । सिद्धसिखर जिनधाम, मणिप्रतिमा तहां छाजै ॥६६॥ उत्तर दक्षिन ओर, श्रेणी दोय जहां हैं। दोय गुफा गिरि हेठ, अति अधियार तहा है ॥६७॥ तापर स्वर्ग समान, लोकोत्तम पुर सोहै । वापी-कूप-तलाव,-मडित सुर मनमोहै ॥६॥ विद्य तगति भूपाल, न्याय प्रजा प्रतिपाले । नीतिनिपुन धर्मज्ञ, संत सुमारग चाले ॥६६॥ विद्यु तमाला नांव, ता घर नारि सयानी। मानौं मनमथ जोग, प्राय मिली रतिरानी ॥७॥ तिनकै सो सुर प्राय, पुत्र भयो बड़भागी । अगनिवेग तसु नाम, अति' सुन्दर सौभागी ॥७१।। सोमप्रकृति परवीन, सकलसुलच्छनधारी। जिनपदभक्ति पुनोत, सवहीकौं सुखकारी ॥७२॥ राजसंपदा भोग, भुजत पुन्यनियोग । एक दिना इन साधु, भेटे भाग सजोगै ॥७३॥ स्रवन सुन्यौ उपदेश, भर जोबन वैराग्यौ । प्रासनभव्य कुमार, संजमसौ अनुराग्यौ ॥७४॥ तजि परिग्रह गुरुसाख, पचमहावत लीनै । १ऊना २ पास ३, कामदेव ४ सौम्म स्वभावी ५ निकट भव्य ।
२४ ] पाश्वंपुगरण दुद्धर तप प्राराघ, रागादिफ कृस कीने ॥७॥ छोन किये परमाद, विचर एकबिहारी। बारह अग ममुद्र, पार भयौ श्रुतधारी ॥७॥ एक दिवस धरि जोग, हिमगिर कवर'माहीं । निवस' प्रातमलीन, बाहरको सुधि नाहीं ॥७७॥ दाहा। कुरकट नामा कमठचर, दुटनाग दुखदाय । सो मरि पचम नरकमै, परयो पापवस जाय ॥७॥ छेदन भेदन आदि बहु, तहा वेदना घोर । सहस जीभसी वरनिये, तऊ न आवै प्रोर ॥७॥ ऐसे दुखमै कमठ जिय, कोनो पूरन प्राव । सत्रह सागर भुगतक, निकस्यो कूरसुभाव 1200 चौपई। बैर भाव उरत नहि टरयो । फेरि प्राय अजगर अवतरयो॥ ससकारवस पायौ तहा। हिमगिरि गुफा मुनीसुर जहा ॥१॥ मिले साधु सजमधर धीर । समभावनत तज्यो सरीर ॥ लोनी स्वर्गसोलवै वास । जो नितनिरुपमभोगनिवास ॥२॥ जन्म-सेजले जोबन पाय । उठ्यो अमर सपूरन काय॥ देखि सपदा विस्मय भयौ । अवधि होत ससै सब गयो ।।८३॥ पूजा करी जिनालय जाय। भक्ति-भाव-रोमाचित काय ।। पूरवसचित पुन्यसजोग । कर तहां सुर वाछित भोग ॥४॥ १ गुफा २ वमै ३ देव ।
तीसरा अधिकार [ २५ NAAN A PM गये बरस बाईस हजार । भोजन मुंजै मनसाहार ॥ तावतमान पच्छ जव जाय । तब उसासौं' दिसि महकाय ८५॥ देख पंचम- भूपरजंत । अवधिग्यानबल मूरतिवत ।। तितनै मान विक्रिया करें । गमनागमन हिय जव धरै ।।८६॥ तीन हाथ अति सुन्दर काय । लेस्या सुकल महा सुखदाय ।। थिति सागर बाईस विसाल । इहिविध बीते सुखमै काल ।।५७ दोहा। प्रादि अंत जिस धर्मसी, सुखी होय सब जीव । ताको तनमनवचनकरि, हे नर सेव सदीव || इतिश्रीमत्पावनाथपुराणभाषाया गजस्वगंगमविद्याधरभध- विद्युत्प्रभदेव भववर्णन नाम द्वितीयोऽधिकार ॥२॥ तीसरा अधिकार दोहा अस्वसेनकुल-कमल रवि', वामावर कृपाल । वन्दी पारसचरन जुग, सरनागत-प्रतिपाल ॥१॥ चौपई जम्बूदीप बसै चहुफेर । जाके मध्य सुदर्शन मेर । कंचनमनिमय अतुलसुहाग । ता पर्वतके पच्छिम भाग ॥२॥ अपरविदेह विराज खेत । सो नित चौथेकाल समेत । १ उछ,वास २ दिशा ३ पाच नरक ४ रुय ५ पश्चिम विवेह । ।
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तीसरा अधिकार [ २७ क्रमक्रमसौं सिसु भयौ कुमार । पढ लीनी विद्या सव सार । जोवनवत कुमर जव भयो । निर्मल नीतिपथ पग व्यौ । रूप-तेज-बल-बुद्धि-विज्ञान । सकल सारगुणरत्ननिधान ।१४॥ कोनी पिता व्याह विधि जोग । राजसुता बहु वरी मनोग' । क्रमकरि कुमर पितापद पाय । राज कर थुति करिय न जाय।। पुन्यजोग प्रायुधगृह जहां । चकरतन वर उपज्यौ तहा । छहोखडवरती भूपाल । वस कीन नाये निजभाल ॥१६॥ देव दत्य विद्याधर नये । नृप मलेच्छ सव सेवक भये । वढी सपदा पुन्यसयोग । इन्द्रसमान कर सुखभोग ।।१७।। दोहा। सपूरन सुख भोगवै, वज्रनाभि चक्रस । तिस विभूतिवल वरनऊ, जथासकति लवलेस ॥१८॥ चौपई। सहस बतीस सासते देस । धनकनकचन भरै विसेस । विपुल बाड बेढे चहुंओर । ते सब गांव छानव कोर ।।१९। कोट कोट दरवाजे चार । ऐसे पुर छब्बीसहजार । जिनों लग पाचौं गाव । ते प्रटंव चउ सहस सुठाव ॥२० पर्वत और नदीके पेट । सोलह सहस कहे वे खेट । कर्वट नाम सहस चौवीस । केवल गिरिधर वेढे दीप ॥२१॥ पत्तन प्रडतालीस हजार । रतन जहा उपज अति सार । १ मुदर २ स्तुति ३ शास्त्र मंदार ४ थोडी ५ घने ६ चार हमार । --- २८1 पार्श्वपुराण -AAAAAAAAPAA" । । एकलाख द्रोणीमुख' वीर । सहस घाट सागरके तीर ॥२२॥ गिरि ऊपर सबाहन जान । चौदह सहस मनोहर थान । अट्ठाईस हजार असेस । दुर्ग जहा रिपुको न प्रवेस ।।२३।। उपसमुद्रके मध्य महान । अंतरदीप छपन परिमान । रतनाकर छब्बीस हजार । बहु विध सार वस्तुभंडार ॥२४॥ रतनकुच्छ सुन्दर सातसै । रतनधरा थानक जहँ लसै । इन पुरसौ वस राज खरे। जैनधाम धरनी जनभरै ॥२५॥ वर गयद चौरासोलाख । इतने ही रथ आगम-साख । तेज तुरग अठारह कोर । जे बढ चले पदनते जोर ॥२६॥ पुनि चौरासी कोटि प्रमान । पायक सघ बड़े बलवान । सहस छानवै वनिता गेह । तिनको अब विवरन सुन लेह।।२७ प्रारजखड बसै नरईस । तिनको कन्या सहस बतीस । इतनी ही अतिरूप रसाल । विद्याधरपुत्री गुनमाल ॥२८॥ पुनि मलेच्छ भूपनकी जान । राजकुमारी तावतमान । नाटकिगन बत्तीस हजार । चक्री नृपकौं सुखदातार ॥२६॥ प्रादि सरीर प्रादि सठान । पूर्वकथित तन लच्छन जान । बहुविध विजन सहित मनोग। हेमवरन तन सहजनिरोग।३० छहो खड भूपति बलरास । तिनसौं अधिक देहबल जास । सहस वतीस चरनतल रमै । मुकटबधराजा नित नमै ॥३१॥ नारी सरयाविशेषागाशमोमेप्रधान १ द्रौपानाय जैसे २ निवास स्थान ३ किले ४ रलो की खान ५ पैदल सिपाही ६ स्त्रो ७ परमौदारिक शरीर ८ समचतुरस्रसस्थान ६ तिल आदि चिह्न १० स्वर्ण के ममान रग । ।
पहला मधिकार। । २९ -~-- भूप मलेच्छ छोरि अभिमान । सहस अठारह मान प्रान । पुनि गनबद्ध बखान देव । सोलह सहस कर नृप सेव ।।३२॥ कोटि थाल कंचननिर्मान । लाखकोटि हलसहित किसान । नाना वरन गऊकुल' भरे । तीनकोटि व्रज' पागम घरे ।३३। दोहा। अब नवनिधिके नाम गुन, सुनो जथारथरूप । जनी विन जान नहीं, जिनकी सहज सरूप ॥३४॥ चौपई। प्रथम कालनिधि सुभ प्राकार । सो अनेक पुस्तफदातार । महाकालनिधि दूजी कही । याको महिमा सुनियो सहो॥३॥ असि ममि प्रादिक साधन जोग । सामग्री सब देय मनोग । तोजी निधि नैसर्प महान । नाना विध भाजनको खान ।३६॥ पाडुक नाम चतुरथी होय । सब रसधान समप्प सोय । पदम पचमी सुक्रत खेत । वाछित वसन निरंतर देत ॥३७॥ मानव नाम छठी निधि जेइ । प्रायुधजात जन्मभू देह । ससम सुभग पिंगला नाम । बहुभूषन प्रापै अभिराम ॥३८।। संख निधान पाठमी गनी । सव वाजिन-भूमिका बनी । सर्वरत्न नवमी निधि सार । सो नित सर्वरत्नभडार ।।३।। दोहा। ये नौनिधि चक्रसके, सकटाकृत सठान । पाठचक्रसंजुक्त सुभ, चौखू टी सब जान ॥४०॥ १. गोशामा २ पशु स्थान ३. शस्त्र निर्माण ४, गाडी के प्राकार ५. प्राकार ३० ] पार्श्वपुगण ..-1 ---------- जोजन आठ उतग अति, नव जोजन विस्तार । बारह मित' दीरघ सकल, बसे गगन निरधार ॥४१॥ एक एकके सहस मित, रखवाले जखदेव । ये निधि नरपति पुन्यसौं, सुखदायक स्वयमेव ॥४२।। चौपई । प्रथमसुदरसन चक्रपसत्थ' । छहोखडसाधन समरस्थ । चडवेग दिढदड दुतीय । जिस बल खुलै गुफा गिरिकोय ।४३। चर्मरत्न सो तृतिय निवेद । महा वज्रमय नीर अभेद । चतुरथ चूडामनि मति-रेन । अधकारनासक सुखदैन ॥४४।। पचम रत्न काकिनी जान । चितामनि जाकौ अभिधान' । इन दोनौतै गुफामझार । ससिसूरज लखिये निरधार ॥४५॥ सूरजप्रभ सुभ छत्र महान । सो अति जगमगाय ज्यों भान'। सोनदक असि अधिक प्रचड । डरै देखि बैरी बलबड ।४६। पुनि अजोध सेनापति सूर । जो दिगविजय करै बल भूर । बुधसागर प्रोहित परवीन । बुधिनिधान विद्यागुनलीन ।।४७।। थपित भद्रमुख नाम महत । सिल्पकलाकोविद गुनवत । कामबृद्ध गृहपति विख्यात । सब गृहकाज कर दिनरात ।४८। व्याल विजयगिरि अति अभिराम । तुरग तेज पवनजय नाम। वनिता नाम सुभद्रा कही । पूरै वज्ज पानि सौं सही।४६। १ प्रमाण २ यक्षदेव १ प्रशस्त ४ नाम ५ सूय ६ तलवार ७ शिल्पकार ८ विद्वान है घोडा १० हाथ ।
तीसग अधिकार [ ३१ -------- --- महादेहवल धारै सोय । जा पटतर' तिय अवर न कोय । मुख्यरतन यह चौवह जान । और रतनको कौन प्रमाना'५०॥ दोहा। राजप्रग चौदह रतन, विविध भाति सुखकार । जिनकी सुर सेवा कर, पुन्यतरोवर-डार ॥५१॥ चक्र छत्र असि दडमनि, चर्म काकिनी नाम । सात रतन निर्जीव यह, चक्रवर्ति के धाम ॥५२॥ सेनापति गृहपति थपित, प्रोहित नाम तुरग । वनिता मिलि सातौं रतन, ये सजीव सरवग ।।५३।। चक्र छत्र असि दड ये, उपजे आयुधयान । चर्म काकिनी मनिरतन, श्रीगृह उतपति जान ॥५४॥ गज तुरग तिय तीन ये, रूपाचलते होत । चार रतन बाको विमल, निजपुर लहैं उदोत ॥५॥ चौपई। मुख्य संपदाको विरतत । प्रागै और सुनौ मतिवत । सिहवाहनी सेज मनोग । सिंहारूढ' चक्रव' जोग ॥५६॥ आसन तुग अनुत्तर नाम । मानिकजालजटित अभिराम । अनुपम नामा चमर अनूप । गगातरल-तरग-सरूप ॥५७।। विद्य तदुति मनिकुंडल जोट । छिपे और दुति जाकी प्रोट । कवच अभेद अभेद महान । जाम भिदै न बैरीवान ॥४८॥ विसमोचिनी पादुका दोय । परपदसौं विष मुचे सोय । १ तुलना में २ सिंहो पर रखी हुई ३ चक्रवति के योग्य ४ खसक।
१. ] पाश्वपुगग । अजितज रथ महारवन्न' । जलप थलवत कर गवन्न ॥५६॥ वज्रफाड चक्रोधर चाप । जाहिं चढावत नरपति प्राप । वान अमोघ'जवे कर लेत । रनमै मदा विजय वर देत १६०१ विकट वज्रतु डा अभिधान' । सत्रुसडिनी मकती जान । सिंहाटक बरछो विकराल । रतनदड लागी रिपुकाल ॥६१।। लोहवाहिनो तोखन छुरी। जिमि चमक चपलादुति दुरी'। ये सब वस्तुजाति भूमाहिं । चत्रो छूट और घर नाहि ।।२। दाहा। मनोवेग नामा करणय । ?), ग्रथन कह्यो विरयात । खेटभूतमुख नाग है, दोनो आयुध जात ।। ६३ ।। चौपई। प्रानन्दन भेरो दस दोय । वारह जोजन लो धनि होय । वज्रघोस पुनि जिनको नाम। वारह पटह नृपति के घाम ।६४। वर गभीरावतं गरीस । सोभनरूप सख चौवीस । नानावरन धुजा रमनीय । अडतालीस कोट मित कोय ।६५। इत्यादिक बहुवस्तु अपार । वरनन करत न लहिये पार । महलतनो रचना असमान । जिनमत कही सो लीजै जान । दोहा । चक्रो नृपको सपदा, कहै कहां लौं कोय । पुन्यवेल पूरब बई, फली साधनी सोय ॥६॥ १ सुन्दर २ गमन ३, मचूक ४ नाम ५ विजली ६ तेज ७ नकारे ८ घनी गप . इहि चिप बननाभि नरराय । कर भाग चोपद पाय । धमध्यान महनिमियाचरं । निमल नीतिपय पग धरै ।।६।। पूजा फरें जिनानर जाय । पूजे मदा गुर के पाय । गामायिक माधं प्रधनाम । फर पर पधापयाम ॥६६॥ चारप्रकार दान रित देय । यौगुन त्याग गुन गाहा मग । मम सोन पास भाग । मनयनकाय मंगोगा ॥७॥ सिंहासनपर बैठ नरेश । परे पुनीत धर्म उपदेश । सुजन समाजन फिफरलोग। देय मुहिमिदा मन जोग।।७।। -- 1 । ខ្ញុំ ។ वीजरावि फल भोगवे, ज्यो पिमान जगमाहि । त्यो चक्रीनृप सुख पारं, घमं विमार नाहि ॥७२॥ नराप्रपा गीगमा इहिविध राज फर नन्नायफ, भोगं पुन्य यिसालो। मुखमागरमें रमत निरतर, गत न जाने फालो ॥७३॥ एक दिना सुभकर्मसनोगे, टेमकर मुनि वन्दे । देसे श्रीगुर के पदपंकज, लोचन अलि अानन्दे ।।७४।। तीन प्रदच्छन दे सिरनायो, फरि पूजा युति कोनी । माधु समीप विनय कर चल्यो, पायनमें दिठ दोनी ।।७।। गुरु उपदेस्यो धर्म सिरोमनि, सुनि राजा वैरागे । रान रमा वनितादिफ जे रस, ते-रस बरस लागे ॥७६॥ १ रात-दिन २ पटमी धनुर्दशी । पवित्र ४ ष्टि ५ सदमी : पुरे - --- स्वाद वाले।
३४ ] पाश्वगण -- -- . मुनिसूरजकथनी फिरनावलि, लगत भरमबुध भागी। भव-नन-भोगमस्प विचार, परम-धरम-अनुगगी ॥७७।। इस संसार महावनभोतर, भ्रमते पोर न प्राव । जामन मरन-जरा-दो' दायौ, जीव महादुख पावै ॥७॥ फवही जाय नरकथिति भुज छेदन भेदन भारी। फवही पसु परजाय घरं तह, बध वधन भयकारी ।।७।। सुरगतमै परमपति देखें, रागउदा दुख होई । मानुष जोनि अनेक विपतिमय, सर्वमुखी नहिं कोई ॥८॥ कोई इष्टवियोगी बिलख, कोई असुभसंजोगी । कोई दोन दारिद्र विगूचे', कोई तनके रोगी ।।८१॥ किसही घर कलिहारी' नारो, के वैरी सम भाई । किसहोके दुख वाहर दोखे, किसही उर दुचिताई ॥२॥ कोई पुत्र विना नित भूर, होय मरै तब रोवै । खोटी सततिसौं दुख उपज, क्यो प्रानी सुख सौवै ॥३॥ पुन्यउदय जिनके तिनी भी, नाहिं सदा सुख साता । यो जगवास जथारथ देखत, सब दोखै दुखदाता ।।८४॥ जो ससारविर्ष सुख हो तो, तीर्थङ्कर क्यो त्यागे । काहेकौं सिवसाधनकर ते, सजमसौ अनुराग ।।५॥ देह अपावन अथिर घिनावन, यामै सार न कोई । सागरके जलसौं सुचि' कीजै, तो भी सुचि नहिं होई ॥६॥ सात कुधातमई मलमूरति, चामलपेटी सोहै। १पाग २ दुग्नी ३ लडाई करने वाली ४ चिन्ता ५ सन्तान से पवित्र ।
तोगरा अधिकार। । ३५ MA- अतर देखत या सम जगमै, और अपावन को है ॥७॥ नव मलद्वार' स्रव निसिवासर नाव लिये घिन प्राव । च्याघि उपाधि अनेक जहा तहा, कौन सुधी सुख पावै ॥८॥ पोखत तौ दुख दोख कर सब, सोखत सुख उपजावे । दुर्जन देहसुभाव बरावर, मूरख प्रीति बढावै ॥६॥ राचनजोग स्वरूप न याको, विरचनजोग सही है। यह तन पाय महा तप कोजे, याम सार यही है ।।६।। भोग बुरे भवरोग बढावै, वैरी है जग जीके । बेरस' होहिं विपाक' समै अति, सेवत लागै नोके ।।१।। वज्र अगनि विषसौं विषधरसों, ये अधिके दुखदाई । धर्मरतनके चोर चपल ये, दुर्गतिपथ सहाई ॥२॥ ज्यों ज्यो भोग संजोग मनोहर, मनवाछित जन पावै । तिसना नागनि त्यो त्यो डक, लहर जहरको प्रावै ॥३॥ मोह उदय यह जीव अग्यानी, भोग भले कर जाने । ज्यों कोई जन खाय धतूरो, सो सव कंचन' मान ।।६४॥ मै चक्री पद पाय निरंतर, भोगे भोग घनेरे । तो भी तनिक भये नहिं पूरन, भोगमनोरथ मेरे ॥६।। रान-समाज महा अघकारन, वैर बढावनहारा । वेस्यासम लछमी प्रति चचल, याको कौन पत्यारा' ॥६॥ (१दो कान, दो नाक, दो प्रोख, मुह, गुदा, लिंग या योनी-ये हमस द्वार हैं ) २ मानसिक चिन्ता ३ प्रेम करने योग्य ४ विरक्त होने योग्य । ५मानन्दहीन ६ फल ७ सांप ८ सोना ९ विश्वास । .
३६ ] पाएगा मोह महा रिपु बैर विचारा, जगजिय मफ्ट डाले । घर कारागृह वनिता बेडो, परिजन जन रखवाले ॥१७॥ सम्यकदरसन ग्यान-चरन-नप, ये जियके हितकारो। ये ही मार अमार और मब, यह चको चित धारी ||६|| छोडे चौदह रतन नवी निधि, अन छोडे सग सायो । कोडि अठारह घोडे छोडे, औरासो लस हाथी IIEI इत्यादिक नपति बहुतेरी, जोरन-तिन' ज्यो त्यागी । नोति विचार नियोगी सुती, राज दियौ वडभागी ॥१००। होय निसल्य अनेक नृपति संग, भूपन वमन उतारे । श्री गुरुचरन धरी जिनमुद्रा, पच महाव्रत धारे ।।१०१॥ धन यह समझ सुबुद्धि जगात्तम', धन यह धीरजभारी । ऐसी सपति छोरि वसे वन, तिन पद ढोक हमारी॥१०२॥ दोहा । परिग्रहपोट उतारि सब, लीनो चारित पथ । निज सुभावमै थिर भये, वज्रनाभि निरपथ ।।१०३॥ चौरई। बारहविध दुद्धरतप करं । दसलच्छनी धरम अनुसरै ।। पढे अग-पूरव 'श्रुत सार । एकाकी विचर अनगार ।।१०४ ग्रीषमकाल बस गिरिसोस । बरसामै तरुतल मुनिईस ।। सीतमास तटिनीतट रहै । ध्यान अगनिमै कर्मनि दहैं । १०५ १ पुराना तिनका २ हकदार (बडा) ३ ससार में उत्तम ४ ग्यारह अग चौदह पूर्व । ५ नदी किनारे।
तीसरा अधिकार
[७
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एक दिना बनमै थिर काय । जोग दिये ठाडे मुनिराय ।
कमठजीव अजगर-तन छोरि । उपज्यो छठे नरक प्रतिघोर ।
थिति सागर बाईस प्रमान । देखे दुख जानै भगवान ।।
पूरनमायु भोगकर मरयो । बनहिं कुरंग'भोल अवतरचौ।१०७
कालसरूप वदन विकराल । धनचर जीवनको छयकाल' ।
धनुषबान लोये निजपान' । भ्रमै मासलोभी बन थान ।।१०।।
सो पापी चल पायौ तहा । जोगारूढ खड़े मुनि जहा ।।
सत्रुमित्रसौं सम कर भाव । लगे प्रापमै सुद्धसुभाव ॥१०६।।
कु कुम' कादो महल मसान । कोमल सेज कठिन पाषान ।
कचन काच दुष्ट अरु दास । जीवन मरन बराबर जास ।।११०
निर्ममत्त तनकी सुधि नाहि । सातौं भय वरजित उरमाहि ।।
देखि दिगबर कोप्यौ नीच । कपित अधर दसनतल भीच।१११
तान कमान कान लौ लई । तीखन'सर' मारयौ निरदई ।।
मुनिवर धर्मध्यान प्राराध । दुखमै धीरज तज्यो न साध ।११२॥
दरसनग्यानचरन तप सार । चारौ अाराधन चित धार ।।
देहत्याग तब गये मुनिद्र । मध्यम ग्रेयिक अहमिंद्र ११३।।
तह उपपादसिला निकलक'" । हसतूल''जुत रतन पलक ।
उठ्यो सेज तजि दीपत 'काय । अल्पकाल मै जोबन पाय।११४
देखे दिसि अतिविस्मयरूप । महा मनोग विमान अनूप ।।
अतुल तेज अहमिंद्र निहार । अवधिज्ञान उपज्यौ तिहिं बार।११५
१ बदसूरत
२ नष्ट करने वाला ३ अपने हाथ मे ४ केशर ५ कीचड
६ मुनि ७ दात ८ तीक्ष्ण बाण १० कलकरहित ११ रुई १२ चमकतीहुई।
३८ ] पाश्वपुगण जान्यों मव पूरब-भव-मेव । चारित विरछ फल्यो सुखदेव ।। अनुपम प्राठी दरव संजोय । रतनविव पूजे थिर होय ॥११६॥ प्रायौ सुर हर्षित निजथान । महारिद्धि महिमा असमान । तीनभवनवरती जिनधाम । भावभक्ति निन कर प्रनाम ।११७। तीथडर फेवलि-समुदाय । निजथानक धित पूजे पाय ।। पचकल्यानक फाल विचारि । प्रनमै हस्तकमल मिरधारि।११। 1 दोहा। अनाहूत' अहमिद्रगन, प्रावै सहज नुभाय । धर्मकथा जिनगुनकथन कर मनेह बढाय ।।१६।। कवहीं रतनविमान, कवहीं महलमझार । फवही बनकोडा करे, मिलि अहमिद्रकुमार ।।१२०॥ और वास निज बासते, उत्तम दीसे नाहि ।। ताहीतं ते अमरगन', और कहीं नहि जाहिं ।।१२१॥ प्रोत भरे गुन आगरे', सुभग सोम श्रीमन्त । सातधात मलसौं रहित, लेस्या सुकल धरत ।।१२२।। सब समान-सपतिपनी सव माने हम इन्द्र । कला ग्यान विग्यानसम, ऐसे सुर अहमिद्र ॥१२३।। सुकल वरन तनमनहरन, दोय हाथ परिमान । मानौ प्रतिमा फटिकको", महातेज दुतिवान ॥१२४॥ . १ विना बुलाये २ निवासम्पान ३ देवता । भडार ५ सुन्दर ६ सौम्म प्रकृति ७ स्फटिकमरिग ।
तीसरा अधिकार [ ३६ कामदाह उरमै नहीं, नहिं वनिताको राग । कल्पलोकके सुर सुखी, असंख्यातवै भाग ॥१२५॥ सत्ताईस हजार मित बरस बीति जब जाहि । मानसीक आहारको, रुचि उपजै मनमाहिं ॥१२६॥ साढे तेरह पच्छपर, लेत सुगंध उसास । छठी अवनि लौं जिन कही, अवधिविक्रिया जास ॥१२७॥ सागर सत्ताईस मित, परम आयु तिहिं थान । सुभग सुभद्र विमानमैं, यो सुख कर महान ॥१२८।। चौपाई। अब सो भील महादुखदाय । रुद्रध्यानसौ छोडी काय ।। मुनिहत्या-पातकतै मरयौ । चरम सुभ्रसागरमै परयो ।१२६। दोहा। कथा तहाके कष्टको, को कर सके बखान । भुगतै सो जान सहो, के जाने भगवान ॥१३०॥ दोहा । जनमथान सब नरकमै, अध अधोमुख जौन । घटाकार' घिनावनी, दुसह बास दुखभौन ॥१३१॥ तिनमै उपजे नारकी, तल सिर ऊपर पाय । विषम वन कटकमई, परै भूमिपर प्राय ॥१३२॥ जो विषैल बीछू सहस, लगे देह दुख होय । १ मन्तिम २ नरक ३ लटकते हुए विजयघट की तरह ४ न सहने योग्य ५ दुख का घर ।
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तीसरा अधिकार । [ ४ पूरबपापकलाप' सब, आप जाप कर लेय । तब विलापको ताप तप, पश्चात्ताप करेय ॥१४२॥ मै मानुष परजाय धरि, धन-जोबन-मदलीन । अधम काज ऐसे किये, नरकबास जिन दीन ।।१४३।। सरसोसम सुखहेत तब, भयौ लपटी जान । ताहीको अब फल लग्यो, यह दुख मेरु समान ॥१४४।। कदमूल मद मास मधु, और अभच्छ अनेक । अच्छन-बप्त भच्छन किये, अटक न मानी एक ॥१४५॥ जल थल नभचारी विबिघ, बिलवासी बहु जीव । मै पापी अपराध बिन, मारे दोन अतीव ॥१४६ नगरदाह कोनों निठुर, गाम जलाये जान । अटवीमै दोनी अगनि, हिंसा कर सुखमान ।।१४७।। अपने इद्रीलोभको, बोल्यो मृषा मलीन । कलपित ग्रथ बनायक, बहकाये बहु दीन ।।१४८।। दावघातपरपचौं, परलछमी हर लीय । छलबल हठबल दरबबल, परवनिता बस कोय ।।१४९। बढी परिग्रहपोट सिर, घटी न घटको चाह । ज्यो ईन्धनके जोगसौं, अगनि कर अतिदाह ।।१५०।। बिन छान्यो पानी पियौ, निसि भुज्यौ अविचारि । देवदरब खायौ सही, रुद्रध्यान उर धारि ।।१५ समूह २ याद कर ३ सरसो के दान के समान थोडामा ४ इन्दिर ५ नावट ६ परस्त्री ७ रात्रि में ।
४२ ] पार्श्वपुराण कोनी सेव कुदेवको, कुगुरुनको गुरु मानि । तिनहींके उपदेशसौं, पशु होमै हित जानि ॥१५२॥ दियौ न उत्तमदान मै, लियो न सजमभार । पियौ मूढ़ मिथ्यातमद, कियौ न तप जगसार ॥१५३।। जो धर्मोजन दयाकरि, दीनी सोख निहोर' । मै तिनसों रिस कार अधम, भाखे बचन कठोर ।।१५४।। करी कमाई परजनम, सो आई मुझ तोर । हा हा अब कैसे धरू, नरकधरामै घोर ॥१५५।। दुलभ नरभव पायक, केई पुरुष प्रधान । तपकरि साधै सुरग सिव, मैं अभागि यह थान ॥१५६॥ पूरब सतन यो कहो, करनी चालै लार । सो अब अांखन देखिये, तब न करो निरधार' ॥१५७।। जिस कुदु ब के हेत मै, कीने बहुबिध पाप । ते सब साथी बीछडे परयौ नरकमै आप ॥१५८।। मेरो लछमी खानकों, सोरो' भये अनेक । अब इस विपत बिलापमै, कोउ न दोखै एक ।।१५।। सारस सरवर तजि गये, सूखो नोर निराट । फलबिन बिरख बिलौकक, पछी लागे बाट ॥१६०॥ पचकरन-पोषन प्ररथ, अनरथ किये अपार । ते रिपु ज्यो न्यारे भये, मोहि नरकमै डार ॥१६॥ । उपकार करके २ निर्णय ३ सामोदार ४ नितान्त ( बिलकुत ) ५ राम्ना ६ पाचो इन्द्रिया ७ पुष्ट करने । ।
तासरा अधिकार। [ ४३ ----- तब तिलभर दुख सहनौं, हुतो अधीरज भाव । अब ये कैसे दुसह दुख, भरिहौं दीरघ प्राव' ॥१६२॥ अघ बैरीके बस परयो, कहा करू कित जाउ । सुनै कौन पूछू किसे, सरन कौन इस ठाउ ।१६३॥ यहां कछू दुःख हतनको', उक्त' उपाव न भूर' । थिति बिन बिपतसमुद्र यह, कब तिरहौं तट दूर ॥१६४॥ ऐसी चिता करत हू, बढे बेदना एम । घीव तेलके जोगते, पावक प्रजुले जेम ॥१५॥ सोरठा। इहिबिध पूरब पाप, प्रथम नारकी सुधि करें । दुखउपजावन जाप, होय विभगा अवधित ॥१६६॥ दोहा। तब ही नारकि निर्दई, नयो नारकी देख । धाय धाय मारन उठे, महादुष्ट दुरभेख ॥१६७॥ सव क्रोधी कलही सकल, सबके नेत्र फुलिंग । दुख देनको अति निपुन, निठुर नपुंसकलिंग ॥१६८।। कुत कृपान' कमान सर, सकती" मुगदर दड। इत्यादिक प्रायुध विबिध, लिये हाथ परचड ।।१६६।। कहि कठोर दुर्वचन बहु, तिल तिल खडे काय । सो तबही ततकाल तन, पारे-वत मिल जाय ॥१७०॥ १ प्रायु २ नाश करने को ३ युक्ति ४ मूल ५ भग्नि ६ लडाई करने वाले मग्नि बरसाने वाले ८ माला ९ तलवार १० एकमात्र ।
४४ ] पार्श्वपुराण ~~~-- कॉटेकर छेदै चरन, भेदै मरम विचारि । अस्थिजाल चूरन करे, कुचल खाल उपारि ॥ ७१॥ चोरै करवत काठ ज्यो, फारै पकरि कुठार ।। तोड़े अतरमालिका, अतर उदर बिदार ।।१७२।। पेल कोल्हू मेलकै, पोसै घरटी' घाल । तावै ताते तेलमै, दह दहन' परजाल ।। १७३॥ पकरि पाय पटक पुहुमि', झटकि परसपर लेहि । कटक सेज सुवावहीं, सूलीपर धरि देहिं ।।१७४।। घसै सकटक रूखसौं, बैतरनी ले जाहि । घायल घेरि घसीटिए, किंचित करना नाहिं ॥१७॥ केई रक्त चुवाव तन विलवल भाजे ताम । पर्वत अतर जायके, कर बैठि विसराम ॥१७६॥ तहा भयानक नारको, धारि विक्रिया मेख । बाघ मिह अहि' रूपसौं, दारै देह विसेख ॥१७७॥ केई करसौं पाय गहि, गिरसौं देहि गिराय । पर पान दुर्भूमिपर, खड खंड हो जाय ॥१७८।। दुखसौं कायर चित्तकरि, ढूढे सरन सहाय । वे प्रति निर्दय घातकी, यह अति दोन घिघाय ॥१७६।। वरण -वेदन नोकी करै, ऐसे करि विश्वास । सीचे खारे नीरसौं, जो अति उपज त्रास ॥१८०।। १ चची २ अग्नि ३ पृथ्वी ४ सांप ५ विदारे ६ चिल्लाना ७ घाव ।
तीसरा अधिकार [ ४५ ----- ~~ - केई जकरि जंजीरसी, खैचि थम अति बांधि । सुध कराय अव मारिये, नाना प्रायुध साधि ।।१८१॥ जिन उद्धत अभिमानसों कोने परभव पाप ।। तपतलोह प्रासनविर्ष, त्रास दिखावं थाप ॥१८२।। तातो पुतली लोहको, लाय लगावै अग । प्रीत करी जिन पूर्वभव, परकामिनि'के सग ॥१८३।। लोचनदोषो जानिक, लोचन लेहि निकाल । मदिरापानी पुरुषकों प्याव तावो गाल ।।१८४॥ जिन अगनसौं अघ किये, तेई छेदे जाहिं । पल भच्छनके पापते, तोडि तोडि तन खाहि ॥१८॥ केई पूरब बंरके, याद दिवावै नाम । कह दुर्वचन अनेक विध, करै कोप सग्राम ।।१८६।। भये विक्रिया देहसौ, बहुविध आयुधजात' । तिनहीसौं अति रिस' भरे, कर परस्पर घात ।।१८७।। सिथिल होय चिर युद्धतै, दोन नारको जाम । हिंसानंदी असुर दुठ, प्रान भिरावं ताम ।।१८।। सोरठा। तृतिय नरक परजत, असुरादिक दुख देत हैं । भाख्यो जिनसिद्धन्त, असुरगमन आगे नहीं ॥१६॥ दोहा । इहिविध नरक-निवासमै, चैन एकपल नाहिं । १ परस्त्री २ मांस ३ शस्त्र ४ गुम्सा ।
१६ ] पावपुरागा तपै निरतर नारकी, दुखदावानलमाहिं ।। १६०॥ मार मार सुनिये सदा, छेत्र महा दुरगध । बहै बात' असुहावनी, असुध छेत्र सबध ॥१६॥ तीनलोकको नाज सब, जो भच्छन कर लेय । तौहू भूख न उपसमै', कौन एक कन देय ॥१९२॥ सागरके जलसौं जहा, पीवत प्यास न जाय । लहै न पानी बू दभर, दहै निरतर काय ॥१६३।। बायपित्तकफजनित जे, रोगजात जावत । तिन सबहीको नरकमै, उदय कह्यौ भगवत ॥१६४॥ कटुतु बी सौ कटुक रस, करवतको सो फास । जिनकी मृत मजारौ', अधिक देहदरबास ॥१६५।। जोजन लाख प्रमान जह, लोहपिंड गल जाय । ऐसी ही प्रति उसनता, ऐसी सोत सुभाय ॥१६॥ डिल्ल छद पकप्रभापरजत उसनता अति कही । धूमप्रभामै सीत उसन दोनों सही ॥ छठी सातमी भूमि मे केवल सीत है । ताकी उपमा नाहि महा विपरीत है ॥१७॥ दोहा। स्वान' स्यार मजारकी, पडी कलेवर-रास । मास वसा अरु रुधिरको, कादौ जहा कुबास ॥१८॥ १ हवा २ शान्त ३ कडवीतूमडी ४ बिल्ली से ५ दुर्गन्ध ६ कुना ७ शरीर ८ चर्चा तीसरा अधिकार [ ४७ -------- -rrrrrrrrr.com दुखदायक जोग। ठाम ठाम असुहावने, सेंभल तरुवर भूर । पैनै दुखदैन विकट, कटककलित करूर'॥१६६।। और जहा असिपत्र' बन, भीम तरोवर खेत । जिनके दल तरवारसे, लगत घाव करदेत ॥२०॥ वैतरिना सरिता समल, लोहित लहर भयान । बहै खार सोनित भरी, मासकोच घिन घान ॥२०१॥ पछी वायस' गोधगन, लोहतुंडौं जेह । मरम विदारै दुख करै, चूंटै चहुदिस देह ।।२०२॥ पचेंद्रो मनकौं महा, ते सब नरकनिफेतमै , एकपिंड अमनोग ॥२०३।। कथा अपार कलेसकी, कहै कहा लौ कोय । कोड़ जोभसौं बरनिये, तऊ न पूरी होय ॥२०४॥ सागरबध प्रमानथिति, छिनछिन तीखन त्रास । ये दुख देख नारकी, परवस परे निवास ॥ २०५॥ जैसी परवस बेदना, सहै जीव बहु भाय । स्वधस सहै जो अस भी, तो भवजल तिरजाय ।। २.६ ॥ ऐसे नरकहिं नारकी, भयौ भोल दुठ भाव । सागर सत्ताईसकी, धारी मध्यम प्राव ॥ २०७॥ सागर काल प्रमान अब, बरनों औसर पाय । जिनसौं नरकनिवासको, थिति सब जानी जाय ॥२०८।। १ क्रूर २ तलवार की धार समान पत्ते ३ खून ४ कोमा ५ लोहे की सी पोप ६ घर।
४८ ] पाश्वपुराण लेव ॥ चौपई। पहले तीन पल्यके भेव । एकचित्तकरि सो सुन जिनौं सागर उपज सही । जथागत जिनसासन कही।।२०६॥ सोरठा। प्रथम पल्य ब्योहार, दुतिय नाम उद्धार भन । अर्धा त्रितिय विचार, अब इनको विस्तार सुन ।।२१०।। चौपई। पहले गोल कूप कलपिये' । जोजन बडे मान थरपिये ॥ इतनी ही करिये गंभीर । बुधिबल' ताहि भरौ नर धीर।२११॥ सात दिवसके भीतर जेह । जने' भेडके बालक' लेह । उत्तम भोगभूमिके जान । तिनके रोमअन मनान ॥२१२।। ऐसे सूच्छम करिये सोय । फेरि खड जिनको नहि होय ॥ तिन सौं महाकूप वह भरौ । बारंबार कूट दिढ करौ॥२१३।। तिन रोमनकी सख्या जान । पैतालीस प्रक परवान ।। ते श्रीजिनसासनमै कहे । कर प्रतीत जैनी सरदहे ॥२१४॥ चामर छन्द । चार एक तीन चार पाच दो छ तीन ले। सुन्न तीन सुन्न पाठ दोय अंक सुन्न दे ।। तीन एक सात सात सात चार नौ करौ । पाच एक दोय एक नौ समार दो धरौ ॥२१५।। १ कल्पना कीजिए २ वुद्धि प्रमाण ३ पैदा हुए ४ भेड का बच्चा ५ बिन्दू तीमरा अधिकार [४६ -- दोहा। सात वीस ये अंक लिखि, और अठारह सुन्न । प्रथम पल्यके रोमको, यह संख्या परिपुन्न' । नीपई। सौ सौ बरस बीत जब जाहिं । एक एक काढौ यामाहिं ।। ऐसी विध सब करते सोय । कूप उदर जव खाली होय ।२१७ जो कछु लग काल परवान' । सो व्योहार पल्य उरमान ।। प्रथम पल्य सवतं लघुरूप । बोजभूत भाख्यौ जिनभूप ।२१८॥ दोहा संख्या कारन जिन कहो, और न यासौं काज । दुतिय पल्य विवरन सुनों, जो भाख्यो जिनराज ।।२१।। चौपई पूरवकथित रोम सब धरौ । तिनके प्रस कल्पना करौ ।। बरस असंख कोटिके जिते । समय होहिं मातम परिमिते १२२०॥ एक एकके तावत' मान । करौ भाग विकलप' मन पान ।। याविध ठान रोमको रास । समय समय प्रति एक निकास ।। जितनों काल होय सब येह । सो उद्धार पल्य सुन लेह ।। या रोमनसों परवान । दीपोदधिको सख्या जान ।।२२२॥ दोहा । कोडाकोडि पचीसके, पल्य रोम जावंत । तितने दीप समुद्र सब, वरने जैनसिघंत ॥२२॥ १ परिपूरणं २ कुर्मा ३. प्रमाण ४ प्रमाण उतने इ. विचार ।
५० पागण चोदई। अब सुन वितिय पल्य की कया । श्रीजिनमासन बरनो जथा।। दुतियपल्यये अमित' अपार । रोम अंस लीज निर्धार ।२२४। एक एकके भाग प्रमान । करि सौ वरम समय परवान ।। इहिबिच रानि होय फिर एह । ममय ममय प्रति लीज तेह ।। ऐसे करत लग जो काल । मोई प्रर्धापल्य विसाल ॥ परमनको थिति यानों जान । यह उत्कृष्ट कही भगवान ।२२६। दोहा। प्रथम पल्य मरयातमिन, दुतिर अमत्यप्रमान । प्रसत्यातगुन तोमरी, लियो जिनागम जान ।।२२७।। इन नब तीनों पल्यमै, प्रद्धापल्य महान । दस कोडाकोडी गये, अद्धासागर ठान ॥२२८॥ इस हो अद्वामिघुमौ. पुन्यपाप परभाव । समारोजन भोगवे, सुरगनरकको प्राव ।।२२६।। ऐसे दोरघ' काल लों, नरक सातवै यान । कम जोव दुख भोगवे, परचौ कर्मवत्स प्रान ॥२३०॥ धिक धिक विषयकपायमल, ये वैरी जगमाहि । ये हो मोहित जीवकों, अवसि नरक ले जाहिं ॥२३१।। धर्म पदारथ धन्य जग, जा पटतर' कछु नाहिं । दुर्गतिवाम बचायक, घरै सुरगसिवमाहिं ॥२३२॥ १ मप्रगत २ जान्या मनान ।
- चौथा अधिकार [ ५१ यही जान जिनधर्मकों, सेवो बुद्धिविशाल । मन तन वचन लगायक, तिहु पन' तीनौं काल ॥२३३॥ इति श्रीमत्पार्श्वपुराणभाषाया वज्रनाभग्रहमिन्द्रसुख मिल्लनरक- दु खवर्णन नाम तृतियोधिकार ॥३॥ चौथा अधिकार। मोरठा-मारूथल' ससार, वामानदन कलपतरु । वाछितफलदातार, सुखकामी सेवो सदा ॥१॥ चौपई। इसही जवूदीपमझार । भरतखंड दच्छिन विसि सार । कौसलदेस बस अभिराम । नगर अजोध्या उत्तम ठान ॥२॥ प्रारजखडमाहि परधान । मध्यभाग राजे सुभथान ।। गढ़ गोपुर खाई गृहपांति । घनबनसौं सोहै बहुभांति ॥३॥ ऊँचे जिनमदिर मनहरे । कचन कलस धुजा फरहरै ।। वज्रबाहु भूपति तिहि थान । वर-इख्वाकवंस-नभ-भान॥४॥ जैनधर्म पाले बडभाग । जिनपद-कमलनि मधुप सराग ।। प्रभाकरी तिय ताघर सती । जीती जिन रंभा-रति-रती ।।५।। दोहा । यथा हसके वंसकौं, चाल न सिखवै कोय । त्यौं कुलीन नर-नारिक, सहज नमन-गुण होय ॥६॥ १ बाल, युवा पौर वृद्धपन २ मरुस्थल ३ मोरा।
५२ ] पाश्र्वपरागण ------ ---- वोपई। वह अहमिंद्र तहातै चयौं' । तिनकै सुदिन पुत्र सो भयो । नांव घरचौ पानदकुमार । अतुल तेन सब लच्छन सार ||७|| सुभग सोम श्रीवत' महान । बल-बीरज-धीरजगुनथान ॥ नरनारी-मन-मानिक-चोर । देखत नयन रह जा ओर ॥८॥ जाके सुगुन सेस कह थक । और कौन बरनन कर सके। जोबनवंत जनक तिस देख । व्याहमहोत्सव कियौ विसैख ।।६।। परनी राजसुता बहु भाय । जिनकी छवि बरनी नहिं जाय ।। क्रमसौं कुमर पितापद पाय । बलसौं बस कीये बहुराय ॥१०॥ दोहा। जोबन वय' संपति बडी, मिल्यौ सकल सुखजोग । 'महामडली' पद लह्यो, पूरव-पुन्य-नियोग ॥१०॥ चौपाई। अव सुन पाठ जातिके भूप । जिनको जिनमत कह्यो सम्पा। कोटि ग्रामको अधिपति होय । राजा नाम कहावै सोय ॥१२ न' पांचसौ राजा जाहिं । अधिराजा नृप कहिये ताहिं ॥ महस राय जिस मान पान । महाराज राजा वह जान ।।१३।। दोय सहन नृप नवै असेस । मडलीक वह अर्थ नरेस ॥ चार सहस जिस पूजे पाय । सोई मंडलीक नरराय ॥१४॥ माठ सहम भूपतिको ईम । मडलीक सो महा महीस ।। सोलह सहस नव भूपाल । सो अधचको पुन्यविसाल ॥१५॥ १ उन7 नमीशन : बहन से राजा पत्र ५ गिर गुमाने हैं ।
चौपा प्रपिकार 4.mah... सहस बतीस प्रान जिस बहैं । ताहि सकलचक्री बुध कहें ।। इनमें श्रीमानंदनरेस । महामंडली पद परमेस ।।१६॥ मोरठा। पाठ सहस सुखहेत, नृप नराध से सदा । कीरति-फिरन-समेत, सोहं नरपतिचद्रमा ॥१७॥ - पाप। एक दिना प्रानंद महीस । मंठो सभा सिंहासनसोस ।। मंत्रो तहा स्दामिहित नाम । कहै विवेको सुपचन ताम ।१८॥ स्वामी यह वमंत रितुराज । मर जन कर महोच्छवफाज ।। नंदीसुर प्रत अवसर येह । करिये प्रभु-पूजा जिन गेह ।।१६।। पूजा सदा पाप निरवल' । पसंजोग महाफल फस ॥ परम पुन्यको कारन मान । नहीं जगतमै जग्यसमाम ॥२०॥ दोहा। जिनपूजा की भावना, सब दुखहरन-उपाय । करते जो फल संपजे', यो बरन्यो किमि जाय। (२१॥ घोपई। सुनि राजा मत्री उपदेस । नगर महोच्छव फियो विसेस ।। करि सनान जिनमदिर जाय । जनविव पूजे विहसाय ॥२२॥ बहुविध पूजा दरच मनोग । घरे प्रान जिनपूजनजोग ।। भावभक्तिसौ मगल ठयो । राजाके मन ससय भयो ॥२३॥ । १, नष्ट परे । पूमा ममान, . उत्पन्न गरे।
K१ ] पाईपुराण विपुलमती मुनिवर तिहि थान । दरसन कारन पाये जान ।। तिनै पूजि नृप पूछ येह । मो मुनींद्र मुन्ध मन संदेह ॥२४॥ दोहा। प्रतिमा घात पसानक्षी, प्रगट प्रचेतन अग। पूजक जनकौं पुन्यफल, क्यो कर देय अभग' ॥२५॥ तुम जगने समय-तिमिर-दूरकरन रविरूप । ग्रह नुन्स भरम मिलाइये, करै बीनती नूप ॥२६॥ तर ज्यानो गनघर पह, समाधान मुन राय । भवि-जनकी प्रतिमा भगति, महापुन्य-मलनाय ।।२७॥ भाव मुभासुन जीवके, उपजे कारन पाय । पुन्य पाण् तिनों वर्ध, यों भायो जिनराय ।।२।। कुमुम' बरन को जोग लहि, जैसे फटिक' पखान । अत्नस्याम दुतिकी घरं, यही जोकी वान' ॥२६॥ सो कारन है दोर विध, अतरंग बहिरग ।। तिनके हो उर लाय है, जे नम: मरवग' ॥३०॥ वाहिन कानन जानियों, अतरगको हेन । मोई अंतरभाद नित. कर्मवरकों देत ।।३।। जिन परिनामन पुन्य बहु, बधै अन्यथा नाहिं । तिन भावनकों निनित है, जिनप्रतिमा जगमाहिं ।।३२॥ १ पूना • फल ३ म्फटिकमरिण ४ प्रादत । पूरणतया ।
पोमा प्रधिकार [ ५५ वीतरागमुद्रा निरखि, सुधि' प्राव भगवान । वही भाव कारन महा, पुन्ययंधको जान ॥३॥ रागढीषजित प्रमल', सुखदुखदाता नाहिं । वपनवत भगवान हैं, यह पानी उरमाहि ॥३४॥ तिनको चितन ध्यान जप, थुति पूजाविविधान ।। सुफल फलं निज भावसो. हं मुफती सुग्यदान ॥३५॥ जैसे गुन प्रमुके पहे, ते जिन मुद्रामाहि । थिरसरप रागादिपिन, भूपन प्रायुध माहि ।।३६॥ जपि सिल्पीकृत कृतम, जिनवरविम्य प्रचेत । तदपि सही प्रतविप, मुमभायनों हेत ॥३७॥ और एक दिष्टांत' प्रय, सुन प्रवनीपति' सोय । जियके उर दृष्टांतसौं, समै ररे न फोय ॥३॥ - चौपाई। गनिका धरी चितामै जाय । विसनी पुरुप देखि पछताय ।। जो जीवत मुझ मिलती जोग । तो में फरतो वाछित भोग ।। स्वान' कहै उर क्यों यह दही । म निज भच्छन करती रही। पुनि तिहि देख कहे मुनिराय । क्यों न कियो तप यह तन पाय। इहिविध देखि प्रचेतन अंग । उपजे भाव पाय परसग ।। तिन ही भावनके अनुसार । लाग्यो फल तिनों तिहि वारा --- १ याद निमस ३ ता ५ वैश्या ता जली -निमिमा ५६ ] पापुराण दोहा। व्यसनी नर नरकहिं गयौ, लह्यों भूखदुख स्थान ॥ साधु सुरग पहुंचे सही, भावनको फल जान ॥४२॥ चौपई। यो जिनबिंब अचेतनरूप । सुखदायक तुम जानो नूप ॥ कारनसम कारज संपज । यामैं बुध' ससै नहिं भजे ॥४॥ दोहा। जैसै चितामनि रतन, मनवांछितदातार । तथा अचेतन बिंब यह, वाछापूरनहार ।।४।। ज्यो जांचत सुख कलपतर, दानी जनकौं देय ॥ त्यो अचेत यह देत है, पूजककौं सुख श्रेय ॥४५॥ मनिमत्रादिक औषधी, हैं प्रतच्छ नड़ल्प । विषरोगादिकको हरे, त्यो यह अघहर भूप ॥४६॥ जडसरूपको पूज पद, प्रगट देखिये लोय ॥ राजपत्र सिर धारिये, मुद्रा अकित होय ।।४७॥ राजपत्र सिर धारिये, राजाको भय मानि । जिनवरमुद्रा पूजिये, पातकको डर जानि ॥४॥ प्रतिमापूजन चितवन, दरसनयादि विधान । हैं प्रमान तिहुँ कालमै, तीन लोकमै जान ।।४।। ने प्रतिमा पूजे नहीं निदा कर अजान । तीन लोक तिहुकालम, तिनमम अधम न मान ॥५॥ १ब्ने २ बुद्धिमान ३ लोक ४ राजा का परमर ५ म्होर नही हुई पर ७ नीच = दूसरा ।
चौपा पधिकार [ ५७ - । जे प्रतिमा पूर्ण सदा, भावभगति-विधि-सुद्धि । तिनको जनम सराहिये, धन तिनको सद्बुद्धि ॥५१॥ इत्यादिक उपदेस सुनि, प्राई उर परतीत' । जिनप्रतिमापूजनविणे, घरी राय दिढ प्रोत ॥५२॥ मोरई। तिस प्रोसर' मुनि वरन ताम । तीनभवनवरती जिनधाम।। भानुविमानविष मिनगेह । सो पहले यरन धरि नेह ॥५३॥ रतनमई प्रतिमा जगमगं । कोटभानुय' छोनो' लगे । निरपम रचना विविध विसाल । सूरजदेव नमै तिहुँ फाला५४॥ सुन प्रानंदी आनंदराय । विकसत मानन' प्रग न माय ।। जब सदेहसल्य निरवर' । तब प्रवस्य उर सुम्य विस्तर ।५५॥ प्रात साझ मदिर चदि सोय । प्रघं देय रविसम्मुख होय ।। करि जिनविबनको मन ध्यान । प्रस्तुति कर राग मन प्रान ।। रविविमान मनिकचनमई । निरमापो अद्भुत छवि छई ।। जनभवनकरि मडित सोय । देग्यत जनमन अचरज होय ।।५७।। पूजा तहाँ कर नित राय । महा महोच्यव हर्ष बढाय ।। प्रतिदिन देय क्या उर पान । दीन दुखित जनकी बहु दान ।५८॥ यह नितनेम करै भूपाल । चली नगरमै सोई चाल । सब सूरजकों करै प्रनाम । देखादेखि चल्यो मत ताम ॥५६॥ । . १ विवाम २ ममय ३ करोड मूय की गामा ४ पीरो ५ प्रमनपा ६ मुम शहाब। .
- । ५८ ] पावपुराण समझ नही मूढ परनये । भानुउपासक तबसौं भये । जो महत' नर कारज करै । ताकी रीत जगत प्राचरं ॥६०॥ यो बहु पुन्य कर भूपाल । सुखमै जात न जान्यो काल ।। एक दिना निजसभा नरेस । निवसै मानों सुरगसुरेस ॥६॥ धवल' केस देख्यो निज सोस । मन कप्यो सोचै नरईस ।। जाहि देखि मनउत्सव घटे । कामी जीवनको उर फट।।६२॥ सो लखि सेत' वाल भूपाल । भोगउदास भये ततकाल ।। जगतरीति सब अथिर असार । चितै चितमै मोह निवार ।६३। बाल अवस्था भई वितीत । तरुनाई आई निज रीत ॥ सो अब बीती जरा बसाय । मरन दिवस यो पहुचे प्राय ।६४। बालक काया कूपल सोय । पत्ररूप जोवनमै होय ।। पाको पात जरा तन करै । काल बयारि चलत झर' पर।। कोई गर्भमाहि खिर जाय । कोई जनमत छोडे काय ।। कोई बाल दसा धरि मरै । तरुन अवस्था तन परिहर ॥६६॥ मरन दिवसको नेम न कोय । याते कछु सुधि पर न लोय ॥ एक नेम यह तो परमान । जन्म धरै सो मरे निदान ॥६७।। महापुरुष उपजे बडभागि । सब परलोक गये तन त्यागि ।। ससारी जन अपनी बार । पूरबउदै करै अनुसार ॥६॥ परवत पतित नदोके न्याय"छिनही छिन थिति बीतो जाय। रागअघप्रानो जगमाहि । भोगमगन कछु सोचै नाहिं ।।६९॥ बडे २ बसे ३ सफेद ४ सफेद ५ बुढापा ६ पत्ता ७ हवा ८ झडपडे ६ प्रातिर १. पहाड मे गिरने बाली ११ तरह १२ स्थिति । - घोपा अधिकार प्रतकाल जव पहुंचे प्राय । कहा होय जो तव पछताय ।। पानी पहले वध जो पाल । वही काम प्राय जल-फाल ७० पही जान प्रातमहितहेत । कर पिलव' न संत सुचेत । प्राज काल जे करत रहाहि । ते प्रजान पीछे पड़ताहि .७१। रात विवस घटमाल' सुभाव । मरि मरि जलजीवनको प्राय ।। सूरन चाद बैल ये दोय । काल रहट नित फेरै सोय ।।७२।। दोहा। राजा राना छत्रपति, हाथिन के पसबार । मरना सवकों एक दिन, प्रपनी अपनी बार ।।७३॥ दलवल' देई देवता, मात पिता परिवार । मरती विरिया' जीवकी, कोट न राखनहार ॥७४।। दामविना निर्धन दुखो, तिसनावस धनवान । कह न सुख ससारमै, सब जग देख्यौ छान ॥७॥ पाप अकेला अवतर', मर अकेला होय । यों कवही इस जीवफा, सायी सगा न कोय ॥७६॥ जहा देह अपनी नहीं, तहा न अपनो कोय । परमम्पति पर प्रगट ये, पर हैं परिजन लोय ॥७७।। दिप' चाम -चादर-मढी, हाड पीजरा देह । भीतर या सम जगतमै, और नहीं घिनगेह । ७८।। - -- १ देर २ मरहट के पडो को माला ३. मना की शक्ति ४ ममय ५ पैदा हा ७ मा घृग्गा का स्थान ।
६. ------- पार्श्वपुराण सोरा मोहनीद के जोर, जगवासी घूमै सदा । फर्मचोर चहुँ ओर, सरवस लूट सुधि नहीं ॥७९॥ सतगुरु देहिं जगाय, मोहनींद जव उपसमै'। तव कछु बने उपाय, कर्मचोर पावत के ।।८०॥ दोहा। ग्यान दीप तप तेल भरि, घर तीर्घ भ्रम छोर । याविध बिन निकस नहीं, पैठे पूरब चोर ।।८१॥ पंचमहाव्रत-सचरन, समिति पंच परकार । प्रबलपच इंद्रीविजय, घार निर्जरा सार ॥२॥ चौदह राजु उतग नभ, लोक पुरुषसतान' । तामैं जीव अनादिौ, भरमन है विन ग्यान ।।३।। जाचे" सुरतरु देहिं सुख, चितत चितारन । विन जाचे विन चितव, धर्म सकल सुख-दैन ।।४।। घन-कन-कचन-राजसुख, सबै सुलभ करि जान । दुर्लभ है ससारमें, एक जथारथ ग्यान ॥८॥ चोपई। इहिविध भूप भावना भाय । हित उद्यम चित्यों मन लाय ।। पवर्मी मोह ममत निरवारि । उठ्यो घोर धीरज उर धारि ८६ जेठे मुतौ दोनों राज । आप चल्यो सिवसाधनकाज ।। १. शान्त हो २ बोजे : धुमै । एक नाप । कथा ६ पुरुष ७ मागन पर ८ मन्पवृक्ष चाय-मन्य १० दई ।
नांचा प्रधिकार ... सागरदत्त मुनीसुरपास । संजम लियौ तजी नगमास ॥७॥ घनै भूप भूपतिके संग । घरे महावत निर्भय अंग ।। प्रव प्रानन्द महामुनि घोर । वननिवास विचरं बन बोर।। दुद्धर' तप बारह विध करं । दुविध सग-ममता परिहर ।। तिनके नाम कहू कछु धार । जिनसासन जिनको विस्तार IEE प्रयम महातप अनसन' नाम । दूजो उनोदर गुनधाम । तोजो है व्रतपरिसरयान । रसपरित्याग चतुर्थम मान IIEI पचम भिन-सयनासन सार । कायकलेस छठौ अविकार ।। यह पटविध बाहज तप जान । अव अन्तर तप सुनौ सुजान ।६१ पहले प्रालित विनय दुतीय । वैयायत तोजो गन लीय ।। चौथौ अन्तरग सिम्झाय' । पंचम तप व्युत्सर्ग बताय 118२|| षष्ठम ध्यान हरै सब खेद । ये अन्तरतप के सब भेद ॥ अब इनको संक्षेप सरूप । सुनौ सत तजि भाव विरुप ॥१३॥ जिनके सुनत बंध सुभध्यान । सेवत पद लहिये निरवान ।। तप बिन तीनकाल तिहुं लोय । कर्मनास कवही नाह होया। दिनसौं लेय वरस लगि करें। चार प्रकार असन परिहर ।। राग-रोग-निर्दलन उपाय । सो अनसन भाख्यो जिनराय ।। पौन अर्ध चौथाई टेक । एक ग्रास अथवा कन एक ।। ऐसी विध जो भोजन लेत । ऊनोवर मालस हर लेत ॥६६॥ जैसी प्रथम प्रतिग्या कर । ताही विध भोजन पावर ।। १ घोर २ उपवाम ३ भूम्य से कम माना ४. प्रायश्चित ५ स्वाध्याय ।
६२ ] पाण्वपुराण मो कहिये व्रतपरिसख्यान । आसाव्याधि-विनासन जान ।९७ लवनादिक रस छारि उपाध । नीरसभोजन भुज साध ।। रसपरित्याग कहावै एम । इद्रियमदनासन यह नेम ।।६।। सून्यगेह गिरि गुफा मसान । नारि-नपु मक-वजित थान ।। वसै भिन्न-सयनासन सोय । यार्सी सिद्धि ध्यानकी होय IEI ग्रीषमकाल वसै गिरि-सीस । पावसमै तरुवरतल दीस ॥ सीतसमय तटिनीतट' रहै । काय कलेस कहावै यहै ॥१०॥ दोहा । या तपके पाचरनसी, सहनसोल मुनि होय । अब अन्तर-तप-भेद छह, कहू जिनागम जोय ॥१०॥ चौपई। जो प्रमादवस लागे दोष । सोधे ताहि छोरि छल रोष ।। प्राचारजवानी अनुसार । यही प्रथम प्राछित तप सार ।१०२२ जे गुनजेठे साधु महत । दरसन ग्यानी चारितवत ।। तिनकी विनय करै मनलाय । विनय नाम तपसो सुखदाय १०३ रोगादिक पीडित अविलोय । वाल बिरध मुनिवर जो होय सेव कर निजसंजम राखि । सो वैयावत प्रागमसाखि ११०४। सकतिसमान सकल गुन ठाठ । करै साधु परमागमपाठ ।। परमोत्तम तप सो सिज्झाय । जासौ सब ससय मिटजाय१०५ निजसरीरममता परिहरै । काउसग्गमुद्रा विढ धरै ।। अन्तर बाहर परिग्रह छार। सोई तप व्युत्सर्ग उदार ॥१०६॥ । १ मदी के किनारे २, बड़े ३ प्रवलोकन करे ।
जोमा प्रमिला। । - भारत रोत निवार सोय । धर्म सपाल प्यापं घिर होय । जहा सफल चिता मिट जाहिं । यही प्यानतप जिनमतमारि१०७ पह बारह विध तप विषम', तपं महामुनि पोर ।। महै पह योग दो, ते पय बरनो चोर ॥१०॥ दुधा तृपा हिम उसन, इस मंतक दुग्यभारो। निरावरन तन प्रति, व उपजावन नारी ।। चरिया प्रासन मयन, सुष्ट यायफ' बघ बधन । जाचे नहीं पलाम रोग, तिन-फरस निबंधन || मलजनित मान-सनमानथम, प्रग्या' और प्रग्यान कर। दरसन मलीन बाईम सब, साघपरीषह आन मर 1१०६। HER सूयपाठ अनुमार थे, कहे परोपह नाम ।। इनके दुस जे मुनि सह, तिनप्रति मदा प्रनाम ॥११०।। मोमायनी एन्ट अनसन अनोदर तप पोपत, पाखमास दिन बीत गये हैं। जोग न वन जोग भिच्छाविधि, सूप अंग सय सिथिल भये हैं। तव बहु दुसह भूखको वेवन, सहत साधु नहिं नेक नये हैं। तिनके चरनफमल प्रति दिन दिन, हाय जोरि हम सीस ठये हैं। पराधीन मुनिवरको भिच्छा, परघर लेहिं कहें कछु नाहीं। १ हुन पठिम २. मार . मग ४. कारण ..दुटि। PM-
६४ ]
पार्श्वपुगण
प्रकृति-विरोधि पारना मुंजत, बढत प्यातको त्रास तहाहीं।
ग्रीषमकाल पित्त अति कोपे, लोचन दोय फिरे जब नाहीं ।
नीर न चहैं सहै ऐसे मुनि, जयवते वरतो जगमाहीं ।।११२।।
सीतकाल सबही जन कापै, खडे जहा बन विरछ' उहै हैं ।
झझा वायु बहै बरसा रित, बरसत बादल झूमरहे हैं ।।
तहा धीर तटिनोतट' चौवट, ताल-पालपै कर्म दहै हैं ।
सहैं संभाल सीतकी बाधा, ते मुनि तारनतरन कहे हैं । ११३॥
भूख प्यास पोडै उर अतर, प्रजल' आत देह सब दागे ।
अगनिमरूप घूप ग्रीषमकी, ताती बाल झालसी लागे ।।
तपै पहार ताप तन उपजे, कोपै पित्त दाहजुर जागे ।
इत्यादिक ग्रीषमको बाधा, सहत साधु धीरज नहिं त्यागे ।
डास मास माखी तन काटे, पी. बनपछी बहुतेरे ।
डस व्याल' विषयाले बीछु, लगै खजूरे प्रान घनेरे ॥
सिंह स्याल सुडाल" सतावै, रोछ रोझ दुख देहिं बडेरे ।
ऐसे कष्ट सह समभावन, ते मुनिराज हरौ अघ मेरे ।।११५॥
अतर विषय-वासना वरत, बाहर लोकलाजभय भारी।
तातै परम दिगवरमुद्रा, घर नहिं सके दोन ससारी ॥
ऐसी दुद्धर नगन परीषह, जीत साघु सीलव्रतधारी ।
निर्विकार बालकवत निर्भय, तिनके पायन ढोक हमारी॥११६
१ वृक्ष २ नदी किनारे ३ तालाब के किनारे ४ दुःख दे ५ जल ६ मुलसे
७. गरम हवा ८. तीक्ष्ण : सर्प १० कछले ११ हाथी ।
चोया अधिकार
देश कालको कारन लहिक, होत अचन' अनेक प्रकार ।
तब तहां खिन्न होहि जगवासी कलमलाय थिरतापद धार ।
ऐसी परति परोयह उपजत, तहा घोर धीरज उर धार ।
ऐसे साधनको उर अंतर, बसौं निरंतर नाम हमारं ॥११७।।
जे प्रधान केहरिकी पकर, पन्नग परि पावसों चपत ।
जिनको तनक देखि भी बाको, कोटिक सूर दीनता जपत ॥
ऐसो पुरुष-पहार-उडावन,-प्रलय-पवन तिय' वेद पयपत' ।
धन्य धन्य ते माधु साहतो, मनसुमेरु जिनको नहिं फंपत।११८
चारहाथ परवान निरखि पथ, चलत दिष्ट इत उत नहिं तान
कोमल पाय कठिन धरती पर, परत घोर बाधा नहि माने ।।
नाग तुरंग' पासको चढ़ते, ते सवाद' उर यादि न पाने ।
यों मुनिराज भरे चर्यादुख, तब विश्कर्म कुलाचल"भाने ।।
गुफा मसान सैल" तरु'२-कोटर, निवस जहा सुद्धि न हेरे।
परिमित काल रहें निहचल तन, वारवार प्रासन नहि फेरै ।।
मानुष देव प्रचेतन पसुकृत, बैठे विपत प्रान जब धेरै ।
ठौर न तजे भजे पिरता पद. ते गुरु सदा बसी उर मेरै ।१२०॥
जे महान सोनेके महलन, सुन्दरसेज सोय सुख जोवे ।
ते अब अचलअंग एकासन, कोमल कठिन भूमिपर सोवे ।।
पाहन-खर कठोर कांकरी, गडत कोर कायर नहिं होवे ।
ऐसी सयन-परीपह जीतत, ते मुनि कर्मकालिमा घोवे ।१२१॥
१. दुखी २. सिंह ३. सांप ४ कुचले ५ स्त्री वेद ६ प्रपत-पित
७. हापीक. पोहा ६ मानन्द १. पहार ११. पर्वत १२ वृक्षका खोखला भाग
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६६ ] पार्श्वपुराण जगत जीव जावत' चराचर, सबके हित सबके सुखदानो। तिनै देख दुर्वचन कहैं दुठ, पाखडी ठग यह अभिमानी ।। मारौ याहि पकरि पापीकौं, तपसी-भेष चोर है छानी' । ऐसे वचनवारणको वर्षा, छिमाढाल श्रोढे मुनिग्यानी ।।१२२॥ निरपराध निबर महा मुनि, तिनकों दुष्टलोग मिलि मारे । केई खैच थमसौं बाघत, केई पावकमै' परजार ।। तहा कोप नहिं करहिं कदाचित, पूरबकर्मविपाक विचार । समरथ होय सहै वध बधन, ते गुरु सदा सहाय हमारे ।१२३१ घोर वोर तप करत तपोधन, भयौ खीन सूखो गल बाहीं। अस्थि चाम अवसेस रह्यो तन, नसानाल झलक्यौ जिसमाहीं। प्रोषधि असन पान इत्यादिक, प्रान जाय पर जाचत नाहीं। दुद्धर अजाचीक व्रत धारै, करहिं न मलिन घरमपरछाहीं ॥ एक बार भोजनकी विरियाँ, मौन साधि बसती मै पावै । जो नहिं बने जोग भिच्छाबिधि, तौ महंत मन खेद न लावै । ऐसे भ्रमत बहुत दिन बीते, तब तप विरद भावना भावे । यो अलाभकी परम परोषह, सहैं साधु सोई सिव पावै ॥१२५॥ बात पित कफ सोनित चारौं, ये जब घट बढे तनमाहैं। रोगसजोग सोग तन उपजत, जगत जीव कायर हो जाहैं ।। ऐसी व्याधि वेदना दारुन', सहैं सूर उपचार न चाहैं । प्रातम-लीन देहसौं विरकत, जैन जती निज नेम निवाहै ।१२६॥ १ जितने २ छिग हमा ३ अग्नि मे ४ फल ५ हड्डी ६ भोजन ७ महीं मांगना ८ नगर-गांव ६ खून १० कठोर ।
चौथा अधिकार । सूखे तिन अरु तोखन काटे, कठिन काकरी पाय विदार। रज उड़ि प्राय पर लोचनमै, तोर फास तन पोर विचार ॥ तापर पर सहाय नहिं वाछत, अपने करसों काढ न डारे। यो तिन-परस-परोपहविजई, ते गुरु भवभव सरन हमारे । १२७॥ जावजीव' जलन्होन तज्यो जिन, नगनरूप वनथान खरे है। चल पसेव धूपकी बिरिया, उड़त धूल सव अग भरे हैं । मलिन देहकों देखि महामुनि, मलिन भाव उर नाहि करे हैं। यौं मलजनित परीषह जीत, तिनै हाथ हम सीस धरे हैं । १२८॥ जे महान विद्यानिधि विजई, चिरतपसी गुन अतुल भरे है। तिनकी विनय वचनी अथवा, उठिप्रनाम जन नाहिं करे हैं। तो मुनि तहा खेद नहिं मान, उर मलीनता भाव हरे है ।। ऐसे परमसाधुके अहनिसि', हाथ जोरि हम पाय परे हैं। १२६ । तर्क छन्द व्याकरन कलानिधि, आगम अलंकार पढ जाने । जाको सुमति देखि परवादी, बिलखे होहि लाज उर पाने ।। जैसे नाद* सुनत केहरिकी', बनगयन्द' भागत भय माने । ऐसी महाबुद्धिके भाजन, पै मुनीस मद रंच न ठाने ॥१३०॥ सावधान बरते निसिवासर, सजमसूर परमवैरागी। पालत गुपति गये दीरघ दिन, सकल संग-ममतापरित्यागी।। अवधिग्यान अथवा मनपरजय, केवलकिरन अर्जी नहिं जागी। यों विकलप नहि कर्राह तपोधन, सो अग्यानविजई बड़भागी। १ यावज्जीव २ चिरकास के साधु ३ रात दिन ४. मावाज ५. सिंहको १. बन का हाथी।
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चौथा अधिकार [६६ चौपाई। बिनादोष दुर्जन दुख देय । समरथ होय सकल सह लेय ।। क्रोध कषाय न उपज जहा । उत्तम छिमा कहावं तहां।१३६॥ माठ महामद पाय अनूप । निरभिमान बरते मृदु'रूप ॥ मानकषाय जहा नहिं होय । मार्दव नाम धरम है सोय।१३७॥ जो मनचित सो मुख कहै । कर कायौ कारज वहै ।। मायाचार न उर पाइये । प्रार्जव धर्म यही गाइये ।।१३।। बोल वचन स्वपरहितकार । सत्यस्वरूप सुधा-उनहार ॥ मिथ्यावचन कहै नहिं भूल । सोई सत्य धर्मतरुमूल ॥१३६।। पर-कामिनि पर-दरबमझार । जो विरक्त बरत छल छार ।। अतर सुद्ध होय सरवग । सोई सोच' धर्मको प्रग ।।१४०॥ 'मन समेत जो इंद्रो पच । इनकों सिपिल कर नहिं रंच ।। अस थावरकी रच्छा जोय । सजम धर्म बखान्यो सोय ।१४१॥ ख्याति लाभ पूजा सब छर । पच करन कौं दीजै दड ।। सो तपधर्म को जगसार । अनसनादि बारह परफार।।१४२॥ सजमधारी व्रती प्रधान । दीजे चउविध उत्तम दान ।। तथा दुष्टविकलप परिहार । त्यागधर्म बहु सुखदातार।१४३। बाहिज परिग्रहों परित्याग । अतर ममता रहै न लाग ।। प्राकिंचन यह धर्म महान । सिवपददायक निह जाना१४४। बड़ी नारि जननी सम जान । लघु पुत्री सम बहिन बखान । -तजि विकार मन बरते जेह । ब्रह्मचर्य परिपूरन एह ॥१४॥ १ कोमल २ मद न करना ३ निष्कपट ४ लोभ रहितपना ५ इन्द्रियाँ ।
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चौथा अधिकार। [७१ साधुसमाधि कहावै सोय । यही भावना अष्टम होय॥१५४॥ दसबिध साधु जिनागम कहे । पथ'पीडित रोगादिक गहे ।। तिनकी जो सेवा सतकार । यही भावना नौमी सार १५५॥ परमपूज्य प्रातम अरहंत । अतुल अनंत चतुष्टयवंत ॥ तिनको थुति नति' पूजा भाव । दसम भावना भवजल-नाव । जिनवरकथित अर्थ अवधार । रचना कर अनेक प्रकार ॥ प्राचारजकी भक्तिविधान । एकावसम भावना जान ।१५७। विद्यादायक विद्यालीन । गुणगरिष्ठ पाठक परवीन ।। तिनके चरन सदा चित रहै । बहुश्रुतिभक्ति बारमी यहै ।१५८। भगवतभाषित अर्थ अनूप । गनधरग्रंथित ग्रंथसरूप ।। तहा भक्ति बरत अमलान । प्रवचनभक्ति तेरमी जान ।१५६। षट प्रावश्यक क्रिया विधान । तिनको कबही करे न हान ।। सावधान बरतै थिरचित्त । सो चौदहमी परमपवित्त ।१६०॥ करि जप, तप पूजा व्रत भाव । प्रगट कर जिनधर्मप्रभाव ।। सोई मारग परभावना । यहै पचदसमी भावना ॥१६१।। चार प्रकार संघसौं प्रीति । राखै गाय-बच्छकी रोति ।। यही सोलमी सबसुखदाय । प्रवचनवात्सल्य अभिधाय ।१६२। दोहा सोलहकारन भावना, परम पुन्यको खेत । भिन्न भिन्न अरु सोलहो, तीर्थकरपद हेत ॥१६॥ बधप्रकृति जिनमतविष, कही एकसौ बीस । १ थके हुए २ नमस्कार ३. उपाध्याय ४ नाम ।
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७२ ]
पाश्वपृराण
सौ सत्रह मिथ्यातमै, वाचत है निसदोस ।।१६४॥
तीर्थकर प्राहार'-दुक, तीन प्रकृति ये जान ।।
इनको वध मिथ्यातमै, कह्यो नहीं भगवान ।।१६।।
तात तीर्थकर प्रकृति, तीनी समकितमाहिं ।।
सोलह कारनी वध, सबको निहचे नाहिं । १६६।।
सोरठा।
पूज्यपाद मुनिराय, श्रीसरवारथसिद्धि मै ।
कह्यौ कथन इहि भाय, देखि लीजियो सुबुधिजन ।१६७
कुसुलता
सोलह कारन ये भवतारन, सुमरत पावन होय हियौ ।
भावै श्रीमानन्दमहामुनि, तीर्थंकरपदवध कियौ ॥१६८।।
काय कषाय करी कृस' प्रति हो, सत सजम गुरण पोढ कियौ ।
तपवल नाना रिद्धि उपन्नी, राग विरोध निवार दियो ।
जिस बन जोग धरै जोगेसर, तिस बनको सब विपत टले ।
पानी भरहि सरोवर सूखे, सब रितुके फलफूल फलै ।१७०।
सिंहादिक जे नातविरोधी, ते सब वैरी वैर तजै ।
हस भुजगम मोर मजारी', अापसमैं मिलि प्रीति भजे ।१७१॥
सौहैं साधु चढे समतारथ, परमारथ पथ गमन करै।
सिवपुर पहुचनको उर वाछा, और न कछु चित चाह घरे ।
देहविरक्त ममत्तबिना मुनि, सबसौं मंत्री भाव बहैं ।
प्रातमलीन अदीन अनाकुल, गुन वरनत नहिं पार लहै ।
१ पाहारक माहारक मित्र २ दुवल ३ प्रौढ-मजबूत ४ बिल्ली
५ दीनता के माव विना ।
चौथा अधिकार एक विना ते छोर बनांतर, ठाड़े. मुनि वैराग भरे । पौनपरीषहसौं नहिं काप, मेरुसिखर ज्यो अचल खरे ।१७४। सो मर नरक कमठचर पापी, नानाभाति विपत्ति भरी। तिसही काननमै विकटानन', पचानन को देह धरी ।१७५॥ देखि दिगबर केहरि' कोप्यौ पूर्वभवातर बरदह्यौ । पायौ दुष्ट दहाड ततच्छन, प्रान अचानक कंठ गयौ ।१७६। तीखे नखन विदारै काया, हाथ कठोरन खड करै। बाकी दाढनौं तन भेदै, वदन' भयानक ग्रास भरै १७७। यो पसुकृत परचड परीषह, समभावनसौं साधु सही ॥ क्रोध विरोध हिये नहिं पान्यो, परमछिमा उरमझि बही । धनि धनि भीमानन्दमुनीसुर, धनि यह धोरजभाव भजे ॥ ऐसे घोर उपद्रवमै जिन, जोगजुगतसौं प्रान तजे ।१७६। प्रतसमयपरजत तपोधन, सुभभावनसौं नाहिं चये । मानत नाम स्वर्गमै स्वामी, सुरगनपूजित इन्द्र भये ।१८०। दोहा। सुरगलोक बरनन लिखों, जथासकति सुखरीत । धर्म धर्म के फलविङ्ग, ज्यो मन उपजे प्रीत ॥१८॥ चौपई। चदकाति मूगामनिमई। नानाबरन भूमि बरनई ।। रातदिवसको भेद न जहा। रतनउदोत निरंतर तहा ।१८२। मनि कगुरे कचन प्राकार । औंडी परिखा ऊचे द्वार। १ भयकर मुख पाने २ सिंह २ सिंह ४. मुख ५ खाई । - ७४ ] पाश्वपुराण तोरन तुग रतनगृह लसै । ऐसे सुरगलोकपुर बसे । १८२॥ चपक पारिजात मदार । फूलन फैल रही महकार ।। चैतविरछते वढयो सुहाग' । ऐसे सुरग रवाने वाग । १८४। विपुल' वापिका राजे खरीं । निर्मल नीर सुधामय भरी ॥ कचनकमलछई छविवान । मानिकखडखचित सोपान ॥१८॥ कामधेनु सोहैं सब गाय । कलपवृच्छ सबही तरुराय ।। रतनजाति चितामनि सबै । उपमा कौन सुरगी फवै ।१८६। गान फर कहिं सुरसुन्दरीं । बन-बीथिन बैठी रसभरी ।। कहीं देवगन वनितासग । लीलावन विवरै मनरग ॥१८७॥ मद सुगधि बहै नित वाय । पहुपरनुरजित सुखदाय ।। प्रांधी मेह न कबहीं होय । ताप तुसार न व्याप कोय ।१८८ रितुकी रीति फिरै नहिं कदा । सोमकाल सुखदायक सदा । छत्रभग चोरी उतपात । सुपने नहीं उपद्रवजात ॥१०॥ ईति भीति भूचाल न होय । बरी दुष्ट न दीस कोय ।। रोगो दोखी दुखिया दोन । बिरधवेस गुणसपतिहीन ।१९०। बढती अगविकलता कही । ये सब सुरगलोकमै नहीं। सहज सोम सुन्दर सरवग । सब प्राभरनअलकृत अग ।१६१॥ लच्छनलछित सुरभि सरीर । रिद्ध-सिद्धर्मादर मनधीर ।। कामसरूपी प्रानदकद । कामिनिनेत्रकमलिनीचद ॥१९२॥ बदन प्रसन्न प्रीतरस भरे । विनयबुद्धि विद्या प्रागरे ।। १ सौन्दर्य २ सुन्दर ३ घनी ४ बावडी ५ गली ६ पुष्प पराग से अनुरजित ७. पाला 5 बुढापा ।
घोपामपियार AAPr यों बहगुए मंडित स्वयमेव । ऐसे सुरगनियासी देय ।।१६।। दोहा सलितवचन सोलायतो, मुभलवान सुकुमाल । सहनसुगध सुहावनी, जया मालती माल ||१६४॥ सोलरप लावन्यनिधि, हायभायरसलीन । गोमा सुभगसिंगारफी, सफलकलापरपीन ॥१६॥ निरत गीत संगीत मुर, सब सरीतमनार ॥ कोविद होहि सुभावत, सुरगलोरको नार ॥१६॥ पंचइन्द्रिमनको मरा जे जगमें सुमहेत । तिन सवहीको मानियो, मुरगमोकमकेत ॥१६॥ पोपई। त्यादिक बहसपतिथान । देवलोकमहिमा प्रसमान' ।। प्रानतवर' विमान है जहा । घरची जनम सुरपतिने तहाँ ।। दोहा। उपज्यौ सपुट' गभंते, तेन पुज प्रति चद्ध । मानी जलधरपटलत, प्रगट्यो वामिनि"-दर ॥१९॥ एक महरनमें तहा, संपूरन तन धार । किधों रतनको सेज तजि, सोयत उठ्यो फुमार ॥२००।। मनिकिरीट माये दिप, प्रानन अधिकसुस्प। कानन कुण्डल जगमग, पानन फटफ अनूप ॥२०१॥ भुज भूपन भूपित भुजा, हिये हार छवि देत । ---- १ वृद्धिमान २ समानता रहित । trai ४. चार या ५ यिनली ७६ ] पार्श्वपुराण म अग अंग इत्यादि बहु, सब प्राभरनसमेत ॥२०२॥ चौपई। सनै सने देख दिस सही । लोचनकोर कान लगि रही । विसमयवत होय मन ताम । कहै कौन पायो किस धाम । अहो कौन यह उत्तम देस । सकलसपदाथान विसेस ।। कचनके मन्दिर मनिजरे । दोसै दिव्य अपराभरे ।।२०४।। अति उतंग' अति ही दुति धरै । मध्य सभा मंडप मनहरै ।। सिंहासन अद्भुत इहि ठाम । मानौं मेरुसिखर अभिराम ॥ अनुपम नाटक देखनजोग । श्रवणसुखद ये गीत मनोग ।। ये लावन्यवतीं वरनारि । रूपजलधिबेला उनहारि ।२०६। ये उतग हाथी मदभरे । तेज तुरगनके गन खरे ।। कंचनरथ पायकदल' जेह । मो प्रति सिर नावै सब येह ।२०७। सब प्रानन्द भरे मुझ देख । सब विनीत सब सुन्दर मेख । जयजयकार करै विहँसाय । कारन कछु जान्यौ नहिं जाय ।। दोहा। इन्द्रजाल अथवा सुपन, के माया भ्रम कोय । यो सुरेस सोचे हिये, पै निरनय नहिं होय ॥२०॥ चौपई। तब तिस थानक देव प्रधान । मनकी बात अवधिसौं जान ।। जोगवचन बोलै सिरनाय । ससयहरन स्त्रवनसुखदाय ।२१०। हम विनती सुनिये सुरराज । जीवन जनम सफल सब प्राज । १ ऊचा २ पाज ३ पैदल ।
चौथा अधिकार [ ७७ अब सनाथ स्वामी हम भये । जनमनोगते पावन थये ।२११॥ सूरजउदय कमलिनी-बाग । विकसै जथा जग्यौ सिर भाग ।। नन्दवर्ध' हम देहिं प्रसोस । चिर यह राज करौ सुरईस ।२१२॥ अहो नाथ यह उत्तम ठाम । सुरंग तेरमो मानत नाम ।। जगतसार लछमीको येह । निरुपमभोग निरतर गेह ।।२१३॥ तुम इहि थान इन्द्र अवतरे । पूर्वजन्म दुद्धर तप घरे ।। ये सब सुर सेवक तुमतनें । ये परिवार लोक हैं घनें ॥२१४॥ सोरठा। ये मनोग वनिता मडली । तुम प्रादेस चहै मनरली ।। ये पटदेवी' लावनखान' । सब देदी इन मान प्रान ।।२१।। ये विमान पुर महल उतंग । चमर छत्र सेना सप्तग ।। धुजासिंहासनमादि मनोग । सकल सम्पदा यह तुम जोग ।२१६ ऐसे वचन अनन्तर तब । जान्यो इन्द्र अवधिवल सवै । मैं पूरव कोनों तप घोर । दडे करम धरमधनचोर ।।२१७॥ जीवजातकों निर्भयदान । दोनों पाप बरावर जान । सब उपसर्ग सहे धरि धीर । जीत्यौ महारागरिपु वीर ।२१८॥ काम विषम वैरी बस कियो । अरु कषाय बनौं जारियो। जिनवरमान प्रखंडित पोष। चारित-चिर-पाल्यो-निरदोष२१९ इहि विध सेयौ धर्म महान । तिस प्रभाव बौख यह थान ।। दुरगतिपात निवारन करो। तिन मुझ इन्द्रलोक ले घरो२२० सो अब सुलभ नहीं इस देह । भोग जोग है थानक येह ॥ १. मानन्द पूर्वक बढना २ प्रमुखदेवी-इन्द्राणी ३ मावण्य से भरपूर ४. पश्चात् - ७८ ] पाश्वभगा गगनाग दुखदायक मदा । चारिनजन बिन बुझ न कदा ।। सो कारन मुग्गतिमै नाहि । व्रतको उदय न या पदमाहि ॥ ह्या सम्यक्दग्मन अधिकार । मकादिक मनवरजित मार२२२ के जिनवरको भक्ति महाय । और न दोग्य घमंउपाय ।। यह विचारि जिनपूजनहेत । उठ्यो इन्द्र परिवारममेत ।२२३॥ अमृतवापिकाम करि न्हौन । गयो जहा मनिमय जिनभान ।। रतनविम्ब बन्दे विहमाय । भावभगतनी मोम नवाय ।२२४॥ पूजा करी दरव धरि पाठ । पुनकितमग पढयो युनिपाठ' । चंतविरजिनप्रतिमा जहा । महामहोन्छय कोनी तहा ।२२५ यों बहु पुन्य उपायौ मही । फेरि प्राय निज सम्पत्ति गही ।। दिव्यभोग भुजे वडभाग । लोकोत्तम जिम सहजमुहाग ।२२६। सोभनरूप' प्रथम सठान' । वमुवक्रियक मुलच्दनवान ।। कोमल सुरभि सचिन देह । सातघातवरजित गुनगेह ।२२७॥ पलकपात लोचनमै नहीं । मलपसेव नख केस न कहीं । जरा कलेस न चिता मोग । नाहीं अलप मृत्युभय रोग ।२२८ इत्यादिक दुखजोग अनेक । तिनमैं नहीं अमरके एक ।। पाठरिद्धि अनिमादि पसत्य' । तिसवल सकलकाज समरत्व । सुरग लोकके सुखको कथा । कहै कहा लौ बुधवल जथा । वैठि मनोगत विमल विमान । विचर नभपथ वाछितयान ॥ कवही मेरु जिनालय गमै । कवही प्रान कुलाचल रमै ।। दीप समुद्र असख अपार । कर सुरेंद्र सुछंद विहार ॥२३१॥ १. स्तुति २ सुन्दर ३ समचतुरस्त्र सस्पान ४ माठ ५ प्रशस्त-उत्तम ।
चौथा अधिकार [ ७६ वर्ष वर्षमै हर्ष बढाय । तीन वार नन्दीसुर जाय । पंचकल्यानक समयसुजोग । कर तीर्थपदनमन नियोग ।२३२॥ और केवली प्रभुके पाय । दोय कल्यानक पूज प्राय । निज कोठे थिर होय सुग्यान । फर विन्यवानीरसपान ।२३३॥ सभासिंहासन वैठि सुरेस । देय सुरनप्रति हितउपदेस ।। कर तत्त्ववरनन विस्तार । अनेकांतवानी अनुसार ॥२३३॥ जे सुर सम्यकदरसनहीन । तपवल देव भये सुखलोन ।। तिनप्रति धर्मवचन उच्चर । दरसनगुनको प्रापति कर ॥२३५।। इहविध विविध करै सुभकाज । महापुन्य संच सुरराज ॥ दरसनग्यान रतनभंडार । चारित गुनको नहिं अधिकार (२३६। धर्मवासनावासित जोग । कर पुनीत' पुन्यफलभोग ।। कवहीं सुने अपछरा-गान । निरखं नाटक निरुपम थान ।२३७॥ कवहीं सुभ सिंगाररसलीन । हाव भाव जोवै' परवीन । कवहीं हास्यकथा विस्तरै । वनक्रीड़ा देविन संग कर ।२३८। यो नानाविध करत विलास । प्रतिविन सुखसागरमै वास ॥ साढे तीन हाथ परवान । दिव्यसरीर अतुल दुतिवान ।२३६। सागर बीस परमथिति जास । बीस पच्छ पर लेय उसास । वीसहजार वर्ष अवसान । मनसा भोजन फरै महान ।२४०। पंचम पिरथी लौ जिस सही । अवधिसकति जिनसासन कही। तावत मान विक्रियाखेत । सकलकाज साधनसुख हेत।२४१। १ पवित्र २ देखे ३ उत्कृष्ट स्पिति ४ पखवाडे ५. पन्त ।
पास्वंपुराण प्रसत्यात सुर सेवन पाय । देवोनेत्रकमलदिनराय ।। यो पूरवकृत पुन्यसजोग । कर इन्द्र इन्द्रामन भोग ॥२४२॥ दोहा । कहा इन्द्रग्रहमिंद्र पद, जनम धरै फिर प्राय ।। जनधम नृपकी पूजा, लोक-सिखर फहराय ॥२४३।। इति श्रीमत्पाश्वंपुगगग भापाया प्रानन्दगय इन्द्रपद प्राप्तिवर्णन नाम तुर्थोऽधिकार । पाँचवाँ अधिकार। दोहा । । बन्दी पारमपदकमल, अमलवुद्धि दातार ।। प्रय चरनी जिनराजके, पच कल्यानक सार ॥१॥ नोई प्रयम अनंत प्रलोकायाम । दमों दिसा मरजाद न जास ।। दूजो दग्य जहाँ नहि ौर । मुन्न मम्प गगन सब ठोर ॥२॥ तहा प्रनादि लोकपिति जान । छोदे' पाय पुरुष-सठान' ॥ कटिप'हाय सदा थिर है। यह माप जिनमासन कहे ॥३॥ पौन' पिर' येची मरयग । चौदह राजू गगन उतग ।। पनागर ग गन ईस । पहे तीन सौ तंतासीम ॥४॥ १ मा दुर पाकर कमर पर गमगा।
पाँचवाँ अधिकार [१ जीवादिक छह दरब सदीव । तिनसौं भरयो जथा घट धीव। स्वयंसिद्ध रचना यह बनी। ना इस करता हरता धनी ॥५॥ दरब दृष्टिसौं ध्रौव्यसरूप । परजयसौ उतपतछयरूप ॥ जैसे समुद सदा थिर लसै । लहर न्याय उपजे अरु नसे ॥६॥ लोक'-नाडि तिस मध्य महान । चौदह राजू व्योम उचान ।। राजूमित चौड़ी चहुंपास । यह त्रसखेत जिनागम भास । याके बाहर जगम जीव । समुदघात बिन नाहिं सदीव ।। तामै तीनों लोक बिसाल । ऊरध मध्य और पाताल ॥८॥ सोलह स्वर्ग पटल बावन्न । नव ग्रीवक नव जान रवन्न ।। अनुदिस और अनुत्तर येह । एक एक ही पटल गिनेह ॥६॥ ये सब सठ पटल बखान । सिद्धखेत सोहैं सिर थान ।। ऊरध लोक बस इहि भाय । उत्तम सुरथानक सुखदाय ॥१०॥ अधोलोकमै बहु बिध भेव । सात नरक असुरादिक देव ।। मध्यलोक पुनि तीजौ तहां । असख्यात दीपोदधि जहां ॥११॥ तिनमै सोभावंत सुहात । जबूदीप जगतविख्यात । लच्छ महाजोजन विस्तार । सूरजमडलको उनहार ॥१२॥ वनकोट जिस प्रोट अभंग' । परिमित जोजन पाठ उतंग ।। चारौं दिस दरवाजे चार । तिनके नाम लिखौं अवधार' १३ विजय नाम पूरबमैं जान । वैजयंत दच्छिन दिस ठान । पच्छिम भाग जयंत दुवार । उत्तरमैं अपराजित सार ।१४। १. स नाड़ी २ एक राजू प्रमाण ३ त्रस ४ एक लास योजन ५ भेद रहित ६ धारण करो। - २) पानमा लवन-समुद्र पातिकात्प' । चहुदिम बेट्यो मजल मन् । तहा सुदरमन मेरु महान । मध्य भाग मोमा प्रममान ।।१५॥ प्रति उतग लम्ब जोजन नोय । रिजुविमान जा ऊपर होय । सव सैलनम ऊचो यह । ग्रीव उठाय किचों इम कहै ॥१॥ कर कौन गिरि मेरी रीस । जिनपति न्हान होय मुझ मीन। चारों दिम चारों गजदत । नील निषधसों लगे महंत ।१७। छह कुलपवंत बडे विचार' । पूरब पच्छिम दीरघ सार ।। पाठ महागिरि दिग्गज नाम । मेरु निकट प्राठो दिन ठाम ।१८। कनक वरन सोलह वच्छार । महाविदेहविर्ष छविनार ॥ कचनगिरि दोस परवान । सीता सीतोदा तट थान ॥१६॥ कुरु भूमाहि जनक गिरि चार । नील निपचके निकट निहार। चार नाभिगिरि मिथ्या नाहि । मध्यम जघनभोगभूमाहि ॥२०॥ विजयारघ पर्वत चौतीस । इतने ही वृषभाचल दोस । ते मलेच्छमधिखडनविखे । चक्रो जहां नांव निज लिख ॥२१॥ यो गिरि दोपविर्ष वरनये । ग्यारह अधिक एक सौ भये ॥ भद्रसाल बन दोय सुवास । पूरव अपर मेरुके पान ।।२२॥ दो तर जवू-सेंभलतनै । उत्तम भोगभूमिमै वन ।। छह द्रह बडे कुलाचलसीस । पदम महापदमादिक दोस ।२३। बोस सरोवर और सुनेह । सीता सोतोदामधि तेह ॥ उत्तम मध्यम जघन विसेस । भोगभूमि छह कही जिनेस ।२४॥ महादेस चौतीस सुखेत । ऐरावत पर भरत समेत ।। १ खाई २ बरावरी ३ विन्नार ४ सोने जमे रग के ५ पश्चिम ।
पाँचवाँ अधिकार [ ८३ ३ इतनी ही नगरी परवान । प्रारजखंडमध्य थिर थान ।२५॥ उपसमुद्रको सख्या यही । कछू विनासिक कछु थिर सही ।। पूरब दिस दो बाग महत । देवारन्य दीपके अत ॥ २६ ॥ ऐसे ही पच्छिम दिस दोय । भूतारन्य नाम तिन होय ॥ गंगादिक सरिता दसचार । चौसठ महा विदेहमझार ॥२७॥ बारह विपुल विभंगा जेह । महानदी नव्वे सब येह ॥ इतने हो सब कुंड महान । जहां तरगिनि' उतरै पान १२८ सत्रह लाख सवन परिवार । सहसछानवै ऊपर धार । यह सब जबूदीपसमास । प्रागममै विस्तार प्रकास ॥२६॥ दोहा। यही कथन अगनविषै, वरन्यौ गनधर ईस । तीनलाख पदमै सही, ऊपर सहस पचीस ॥३०॥ चौपई। यो अनेक रचना प्राधार । दीपराज राज अधिकार ॥ तहां मेरुके दच्छिन भाग । किधौं भूमितिय सुभग सुहाग ।३१ भरतखड छहखड समेत । धनुषाकार विराजत खेत । तामै सबसुखधर्मनिवास । कासीदेश कुसलजनवास ॥३२॥ गाव खेट पुर पट्टन जहां । धन-कन भरे बस बहु तहां ।। निवस नागर जैनी लोय ।' दयाधर्म पाले सब कोय ॥३३॥ मिनमंदिर ऊचे जिनमाहिं । नरनारो नित पूजन जाहि ।। पद पद पुरपकित पेखिये । उदवसथान न कहिं देखिये ।३४ १ दूसरी नदी २ नगरों की पक्ति ३ ऊजह भूमि ।
८४ ] पार्श्वपुराण नीर अगाध नदी नित बहैं । जलचर जीव जहां नित रहैं ।। मुनिजनभूषित जिनके तीर । काउसग्ग' धरि ठाड़े धीर।३५॥ ऊचे परवत झरना झरे। मारग जात पथिक मन हरै ।। जिनमै सदा कंदराथान' । निहचल देह धरै मुनि ध्यान ।३६। जहां बडे निर्जनबनजाल । जिनमैं बहुबिध बिरछ विसाल । केला करपट कटहल कर । कैथ करोदा कौंच कनर ॥३७॥ किरमाला कंकोल कल्हार । कमरख कंज कदम कचनार ॥ खिरनी खारक पिडखजूर । खैर खिरहटी खेजड़ भूर ॥३८॥ अर्जुन अमलो पाम अनार । अगर अंजीर असोक अपार ॥ अरनी औंगा परलू भने । ऊबर अड अरीठा घने ॥३६॥ पाकर पीपल पूग प्रियग । पीलू पाटल' पाढ़ पतग ।। गौदी गुडहल गूलर जान । गांडर गुजा गोरख पान ।४।। पचा चीढ़ चिरोजी फली । चदन चोल चमेली भली ॥ जड जभीरी जामन कोट । नीम नारियल हीस हिगोट ।४१॥ सौना सीसम सेंभल साल । सालर सिरस सदा फलजाल ।। बास बबूल बकायन बेर । बेत बहेडा बड़हल पेर ॥४२॥ महुमा मौलसिरी मचकुन्द । मरुवा मोखा करना कुन्द ।। तूत तवोलनि ती ताल । तगर तिलक तालीस तमाल ।४३॥ इहि बिध रहे सरोवर छाय । सबही कहत कथा बढ़ जाय । तहा साधु एकात विचार । कर पठनपाठनविधि सार ॥४४॥ । १ कायोत्सग २ गुफा ३ सुपारी ४ गुलाब ५ खस ६ चिरमी ७ मोगरा पाँचवा अधिकार [८५ बिबिध सरोवर सीतल ठाम । पंथी बैठि लेहि बिसराम ॥ निर्मल नीर भरे मनहार । मानौं मुनिचित विगतविकार ।४। सोहैं सफल सालके' खेत । भये नम्र फलभारसमेत ॥ सज्जनजन ज्यो सपति पाय । छोड़ गुमान चले सिर नाय ।४६। केवलग्यानी करत विहार । जहां सदा सबसुखदातार ॥ प्राचारज चहुसंघसमेत । विहरमान भविजन हितहेत ॥४७॥ केई जहां महावत लेहिं । भवदुखवास जलांजलि देहिं ।। केई धीर उग्र तप करै । ते अहिमिंद्र जाय अवतरै ।।४।। केई श्रावकके व्रत पाल । अच्युत स्वर्ग बस चिरकाल ।। केई कर जिनजेंग्य विधान । पावै पुत्री अमरविमान |४|| केई मुनिवरदानप्रभाव । भोग भोगभूमिको प्राव ।। प्रतिपुनीत सब ही बिध देस । जहां जनम चाहे अमरेस ॥५० तहां बनारस नगरी बसे । देखत सुरनरमन उल्हस ।। है प्रसिद्ध धरनीपर सोय । तीरथराज कहँ सब कोय ॥५१॥ सोभा जाकी कहो न जाय । नाम लेत रसना सुचि थाय । जहां सरोवर नाना भांति । जिनके तीर तरोवर पांति ॥५२॥ निजजोवन जीवन सुख देहिं । कमलसुवास सिलोमुख लेहि सोहैं सघन रवाने बाग । फले फूल फल बढ्यो सुहाग ।५३। सजल खातिका राज खरी । उठ लहरि लोयन -गति-हरी कोट उतंग कांगुरे लसै । मानौं सुरगलोक दिस हंस ॥५४॥ १ चावल २ जिनेन्द्र पूजन ३ पुण्यवान ४ जीम ५ पानी ६ मोरा । - ७ खाई, नेत्र।
५६ ] पार्श्वपुराण ऊचे महल मनोहर लगे । सुवरन कलस सिखर जगमगे ॥ अति उन्नत जिनमदिर जहा । तिन महिमा वरनन वुध कहा। रतनबिंब राजे जिहि माहि । सिखर सुरग धुजा फहराहि । कचनके उपकरन समाज । पावै भविजन पूजाकाज ॥५६॥ जय जय सन्दसहित छवि छ । किधो धर्म-रतनायर' गर्ज। नगरनारि नित बदन जाहिं । जिनदरसनउच्छव उरमाहिं ।५७। भूषनभूषित सुन्दर देह । मानो सुभग अपछरा येह ।। सब गृहस्थ साध षट कर्म । पाल प्रजा अहिंसा धर्म ।।५।। दोष अठारहवजित देव । तिस प्रभुको पूजै बहु भेव ॥ चाह-चिहन -वरजित जो धीर । सोई गुरु सेवै वरवीर ॥५६॥ प्रादि प्रत जे विगत विरोध । तेई ग्रथ सुनै मन सोध ।। सत्य सील गुन पालै सदा । तातै लोग सुखी सर्वदा ॥६०॥ दोहा । प्रजा बनारस नगरकी, नागर नीत सुजान । चार रतनके पारखी, लहिये घर घर थान ॥६१।। देव धर्म गुरु ग्रथ ये, बडे रतन ससार । इनको परखि प्रमानिये, यह नर-भव-फल सार ॥६२॥ जे इनकी जानै परख, ते जग लोचनवान । जिनको यह सुधि ना परो, ते नर अध अजान ॥६३॥ लोचनहीने पुरुषकों, अध न कहिये भूल ।। उर लोचन जिनके मुंदे, ते प्राधे निमूल ॥६४॥ रत्नाकर-समुद्र २ इच्छा रहित ३ श्रेष्ठ ।
पाँचवाँ अधिकार। । ८७ -~- चौपई। इहि बिध नगर बस बहु भाय । सब सोभा बरनी नहिं जाय । अस्वसेन भूपति बडभाग । राज कर तहा अतुल सुहाग ।६५॥ कासिपगोत्र जगतपरसंस। बस-इख्वाक-विमल-सर-हंस ।। तेजवत दिनपति' ज्यौं दिप। प्रभुता देखि सचीपति' छिप।६६। कलपतरोवर सम दातार । रतिपति' लाजै रूप निहार ॥ रयनायर सम अति गभीर । पर्वतराज बराबर धीर ॥६७॥ सोम समान सबनि सुखदाय । कीरति-किरन रही जग छाय । तोन ग्यानसंजुगत सुजान । परम विवेकी दयानिधान ॥६७।। जिनपदभक्ति धर्म-धन-वास । गुरुसेवारति नीतिनिवास ।। कला-चातुरी-बुधि-विज्ञान । विद्या-विनय-सपदा-थान ॥६६। सकलसारगुरणमानिककोष । उभयपच्छ निर्मल निर्दोष ॥ जिनसूरजउदयाचल राय । तिस महिमा बरनी किमि जाय।७०। वामादेवी नाम पवित्त । तिनके घर रानी सुभ चित्त ।। निरुपम लावन सबगुनभरी । रूपजलधिबेला अवतरी॥७१॥ नखसिख सहज सुहागिनि नार । तीनलोकतियतिलक सिंगार सकल सुलच्छनमडित देह । भाषा मधुर भारती येह ।७२। रभा रति जिस आगे दीन । रोहिनिरूप लगै छबि छीन । इन्द्रवधू इमि दोस सोय । रविदुति प्रागे दोपकलोय ।७३। जनमनहरषबढावन एम । कातिक-चद्र-चद्रिका जेम ॥ १ सूर्य २ इन्द्र ३ कामदेव ४ रत्नाकर ५ सीमा ६ भारत की ७ इन्द्राणी ८ सूर्य का प्रकाश , चांदनी । - ८८ ] पार्श्वपुराण सफल सार गुनमनिकी खानि । सीलसंपदाको निधि जानि ७४॥ सज्जनताको अवधि अनूप । कला सुबुधिको सीमारूप ।। नाम लेत अघ तजे समीप । महापुरुप-मुक्ताफल-सीप ॥७॥ त्रिभुवननाथ रत्नको मही । वुधिवल महिमा जाय न कही। बहुबिध दंपति सपतिजोग । कर पुनीत पुन्यफलभोग ।।७६॥ उक्त च पट्पाहुडग्रन्थे-प्रार्या तित्थयरा' तप्पियरा' हलहर' चक्काइ वासदेवाइ' । पडिवास भोयभूमिय” प्राहारो गस्थि रगीहारो" १७७॥ चौपई। जिनवर जिनमाता जिनतात । वासदेव बलदेव विख्याल । चक्रीराय जुगलिया जोय । इन सबके मल मूत्र न होय ।७८) दोहा। पूरब गाथाको अरथ, लिख्यौ चौपई लाय ।। षट् पाहुडटीकाविष, देख लेहु इहि भाय ॥७९॥ चौपई। अब आगे भबिजन मन थभ । सुनो गर्भमगलानन्द ।। एक दिना सौधर्म सुरेस । धनपति' प्रति दोनों उपदेस 1401 १ तीर्थङ्कर २ माता पिता ३ बलदेव ४ चक्रवर्ती ५ नारायण ६ प्रति- नारायण ७ भोगभूमिया ८ भोजन ६ नहीं होते १. मल मूत्र त्याग ११ कुबेर ।
पांचवा अधिकार [ ८९ मानतेंद्रको थितिमै सही। आयु छ मास शेष सब रही । तेबीसम अवतार महान । होसी नगर बनारस-थान ॥५॥ अस्वसेन भूपतिके धाम । पचाचरज' करौ अभिराम ॥ यह सुरेन्द्रने आज्ञा करी । सौ कुवेर निज माथै धरी ॥२॥ चल्यो तुरत लाई नहिं बार । सोहै संग अमर-परिवार ।। हरषित अग पिता घर प्राय । करी रतन-वर्षा बहुभाय ।३। जिनके तेज तिमिर नहिं रहै । नाना वरन प्रभा लहलहै । ऐसे निर्मोलक नग भूर । बरसे नृपके प्रागन पूर ॥२४॥ दोहा। नभसौं प्राव झलकती, मनिधारा इहि माय ।। सुरगलोक-लछमी किधों, सेवन उतरी माय ॥२५॥ चौपई। साढ़े तीन कोड़ परवान । यौँ नित बरसे रतन महान ॥ सुरभि सुगंध कलपतरुफूल । बरसावै सुर प्रानन्दमूल ।।६॥ गंधोदककी बरसा करै । मानौं मुकताफल अवतरै ।। प्रतिदिन देव-दुन्दुभी बजै । किधौं महासागर यह गजै ।।८७॥ नंद वरद जय जय उच्चरे । मात पिता प्रति सुर यौँ करै । इहि विध पचाचरज विलोक । जनी भये मिथ्याती लोक दोहा । देवन किये छ मास लौं, पचाचरज अनूप ।। देखि देखि परजा-भई, प्रानन्द अचरजरूप ॥८६॥ १ पाच पाश्चय (मद सुगन्ध हवा, गधोदक वृष्टि, पुष्पवृष्टि, दुन्दुभि वामा जयघोष) २ अमूल्य ३ रन ४, बहुत । -
६. ]
पार्श्वपुराण
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चौपई ।
यो प्रतिमानदसौं दिन जाहिं । माता मगन सुखोदधि'माहिं ।
मानिकजटित मनोहर धाम । रत्नपलक सेज अभिराम 1801
मनिमय दीप जहा जगमगे । अति सुगन्ध पावत अलि पगे।
करि चतुर्थ प्रानन्द-सनानि । करै सयन जननी सुख
मानिाह?
पच्छिम रैन रही जब प्राय । सोलह सुपनै देखे माय ।।
तिनके नाम लिखौं अवलोय । पढत सुनत पातक छय होय।६२
पद्धडी
सुपनाबलि सोलह सुनहु मीत । जिनराजजनमसूचक पुनीत ।
ऐरावत हाथी प्रथम दीस । मदगोलो गड विसाल सीस।६३।
देख्यौ डक्कारत' वृषभराज' । अतिउज्जल मोतीबरन भ्राज।
देख्यौ पचानन धवलदेह । निज नाद करै ज्यौ सरद-मेह।९४
देख्यौ मनिपासनसोभमान । तहं हेमकलस कमला"
देखी दो पावन पहुपमाल" । भ्रमरावलि-बेढो अतिविसाला५
रविमडल देख्यौ तम दलत । उदयाचल ऊपर उदयवंत ।।
सपूरन तारापति -विमान । तारावलि-मध्य विराजमान ।६६
जलतिरत मनोहर मीन-जोट । देखे जिन-जननी पलकोट ।
देखे चामीकरकलस'५ दोय । अति झलक वारिजके सोय९७
-सनान॥
१ सुख-समुद्र २ रजो दर्शन के चतुर्थ दिन का स्नान ३ रात्रि की मन्तिम
प्रहर ४ गाल ५ उच्च स्वर से बोलता हुमा ६ बैल ७ सफेद ८ शोमा दे
१ सिंह १० सफेद शरीर वाला ११ लक्ष्मी १२ पुष्पमाला १३ चन्द्रमा
१४ मछली का जोडा १५ स्वर्णकलश ।
पाँचवाँ अधिकार। [ ६१ देख्यौ कमलाकर कमलछन्न । बहु हंसी हसनसौं रवन्न ।। देख्यौ रयनायर' गर्जमान । पुनि सिंहपीठ मानिकनिधाना६८। फिर देख्यौ देव-विमान जोग । धुज घंटा झालरसौं मनोग । प्रगट्यौ महि फोरि फनींद्रधाम । मनि कचनमय नयनाभिराम' पुनि रतनरासि देखी अनूप । इन्द्रायुधवरन' विचित्ररूप ॥ निर्धूम धनजय दीपमान । ये देखे सोलह सुपन जान ।१००। दोहा। गजप्रवेश मुखकमलमै, सुपनपत अविलोय ।। सुखनिद्रा पूरी भई, भयो प्रात तम खोय ॥१०१॥ पूर्व दिवाकर ऊगयौ, गयौ तिमिर सुखदाय ।। जैसे जैनसिधांत सुनि, भरमभाव मिट जाय ॥१०२॥ मद तेज तारे भये, कछु दीखै कछु नाहि । ज्यो तीर्थंकरके उदय, पाखंडी छिप जाहिं ॥१०३।। सूरजवसी जे कमल, खिले सरोवरमाहि । ज्यो जिनबिव विलोकिक, भविलोचन विकसाहि।१०४। चदविकासी कमल जे, विकसत भये न सोय । ज्यों अजान जिनवचन सुनि, मुदित मूल नहिं होय।१०५। चक्रवाक हरखित भये, ज्यो जिनमत-सजोग । जीव सुमति पिय-नारिको, मिट्यौ अनादिवियोग ।१०६। भूतलविष, प्राधे भये असूझ । १ समुद्र २ मिहासन ३ धरणेन्द्र विमान ४ सुन्दर ५ इन्द्र धनुष के रंग का ६ धूम रहित ७ अग्नि ८ सूर्य ६ चकवा १० उल्लू । घूघूगरण - ६२ ] पावपुराण जैनग्रन्यके रहसमै, ज्यों परमती अबूझ ॥१०७॥ कमलकोष मधुकर बधे, छुटे जग्यौ सिर-भाग। जथा जीव जिनधर्मसौं, मुक्त होय भवत्याग ॥१०॥ पथिक लोग मारग चले, सूझे घाट कुघाट । जिनधुनि सुनि सूझै जथा, सुरग मुकतिको बाट' ॥१०॥ इहि बिध भयो प्रभात सुभ, प्रानन्द भयो अतीव ।। धर्मध्यान आराधना, करन लगे भवि जोव ॥११०॥ जिनजननी रोमांच तन, जगी मुदित मुख जान । किधौं' सकटक कमलिनी, विकसी निसि अवसान॥१११॥ मगलीक वाजिन' धुनि, सुनि बंदीजन-गान । उठी सेज तजि सुखभरी, धरचौ हियै सुभ ध्यान ॥११॥ सामायिकबिध प्रादरी, पच परमपदलीन । और उचित प्राचार सब, स्नान-विलेपन कोन ॥११३॥ पहरे सुभ प्राभरन तन, सुन्दर वसन सुरग । कलपबेल जगम किधौ, चली सखीजन सग ॥११४॥ राजसिंहासन भूप तब, बैठे सभा-सुथान । देवी पावत देखक, कियो उचित सनमान ॥११५॥ अर्धासन बैठनि दियो, जोग वचन मुख भास । यीं रानी विकसत वदन, बैठी भूपति पास ॥११६॥ सभालोग तारे विबिध, भूपति चांद सरूप । २ रास्ता २ मानो ३ बाजा ४ कपडे ५ पलती फिर ।
पाँचवाँ अधिकार [ ६३ ३ श्रीवामादेवी तहां, दिपै चन्द्रिकारूप ॥११७॥ स्वामी सोलह सुपन हम, देखे पच्छिम रैन । श्रीमुखतै इनको सुफल, कही श्रवनसुखदैन ॥११॥ अस्वसेन भूपाल तब, बोले अवधि विचार । एकचित्त करि देवि तुम, सुनो सुपनफल सार ॥११॥ चौपई। धुरि' गजेंद्रदरसनते जान । होसी जगपति पुत्र प्रधान ।। महावृषभ पुनि देख्यौ सोय । जगजेठो नंदन तुम होय ।१२० सेत सिंह-दरसनफल भास । अतुल अनंती सकति-निवास ॥ कमलामज्जनते सुरईस । करै न्हौन कनकाचलसीस ॥१२॥ पहुपदाम दो देखी सार । तिसफल दुबिध धर्मदातार । । ससितै सकल लोकसुखदाय । तेजपुंज सूरजते थाय ।१२२॥ मीन जुगलतै सब सुखभाज । कुभविलोकनते निधिराज ॥ सरवरत सब लच्छनवान । सागरते गंभीर महान ॥१२३॥ सिंहपीठतै मृगलोचनी । होय बाल तुम त्रिभुवनधनी ।। सुरविमान देख्यौ सुख पाय । सुरगलोकतै उपजै प्राय १२४। नागराज -गृहको सुन हेत । जनमै मतिश्रुतिअवधिसमेत । रतनरासिस गुन-मनि-खान । कर्मदहन पावकतै जान ।१२।। गजप्रवेश जो वदनमझार । सुपन-अंत देख्यौ वरनार ॥ श्रीपारसजिन जगतप्रधान । गर्भ तुम्हारे उतरे पान ।१२६॥ १. ध्रुव रूप से २ जगज्ज्येष्ठ ३. स्नान ४. माला ५.हरिणी से नेत्र वाली ६ घरणेन्द्र ७ सुख में ८. हे उत्तम स्त्री।
..] पागा . । । । दोहा मुनि नामाद सुपनफल, रोमाचिन तन नूर । मुवचन-जल मीचन विची, उगे हाय ऋकूर ॥१२॥ चोरः अब नौरमं सुरेन विचार । स्वामिगभंग्रवमर निरबार । कुलगिरि-मलवामिनी जेह । श्रीग्रादिक देवी गुनगेह ।१२८॥ तिन्हें बुलाय की मुभ भाव । अम्बमेन भूपति घर जान ।। वामादेवोके उत्थान । तेवीमम जिन उतरे यान ।।१२।। तिनको गर्भसोचना करो। निज नियोगमेवा मन घरो॥ यह मुनि मब आनन्दित भई । इन्द्रमान माये घर लई।१३०॥ सुरगलोक तजि आई तहा । वस बनारमि नगरी जहां ।। महाकांत तन लावनभरी । मानौं नभदामिनी अवतरों।१३१ अंग अंग सब सजे सिंगार। रूपसंपदा अचरजकार ।। चूडामनि माथे जगमग । देखत चका/घ नी लगे ।।१३२।। सुरतत्सुमनदाम उर घरी । अति सुवास दसदिसि विम्तरी श्रवनसुखद नेवर-लंकार । सोभा क्हत न आवै पार ।१३३ प्राय नृपतिके पायन नई । प्रायस' मागि महलमै गई । सिंहासनथित माय निहार । करि प्रनाम कोनो कार ।१३४ दोहा-जननीदेह सुभावों, प्रतिनिर्मल अविकार ।। ताहि कुलाचलवासिनी, और करै सुचि सार ॥१३२॥ १ कुलाबलों पर स्थित सरोवरों के कमलों में रहने वाली देविया २ आकागकी विचनी : कल्पवृन फ़्लों की माना ४ माना।
पाँचवाँ अधिकार [ ६५ कृष्णपाख वैशाख दिन, दुतिया निसि-अवसान । विमल विशाखा नखतमै, बसे गर्भ जिन मान ।।१३३॥ जथा सीप'सपुरविणे, मोती उपज पान । त्योही निर्मल गर्भमै, निराबाध भगवान ॥१३७।। गर्भ बस पर गर्भते, बरते भिन्न सदीव । घटते घटवरती गगन', क्यो नहि भिन्न अतीव ।१३८ । चौपई। - तब जिन पुन्यपवनसे हले । चउबिध सुरके प्रासन चले ॥ चिहन देख इन्द्रादिकदेव । जानो अवधिज्ञानबल भेव ।१३६। जिनवर आज गर्भ अवतरे । यह विचार उर आनन्द भरे ॥ चढि विमान परिवारसमेत । चले गर्भकल्यानक हेत.।१४०। जयजयकार करत बहुभाय । उच्छवसहित पिताघर प्राय ॥ मातपिता आसन पर ठये । कंचनकलस नहावत भये ॥१४॥ गर्भमध्यवरती भगवान । प्रनमै देव धरो मन ध्यान ।। गीत निरत बाजि बजाय । पूजा भेंट करी सिर नाय।१४२। यो सुरगन सब साधि नियोग । गये गेह करि कारज जोग। इन्द्रराजको प्रायस पाय । रुचकवासिनी देवी प्राय ॥१४३।। जथाजोग सब सेवा करें। छिन छिन जिनजननीमन हरै ॥ रुचक दीप तेरहमो जहाँ । रुचकनाम पर्वत है तहां ॥१४४॥ सो चौरासी सहस प्रमान । इतने जोजन उन्नत जान ।। १ सीप के भीतर २ घडे का ३. आकाश ४. चिह्न।
२६ ] ཛ*i། इतनी ही विन्नीरन धार । दीप मत्रनों बलयाशर १८५ तारे मिर दूर बहुलनं । दिमामारी निन्म वनं ।। ते मब नेवन प्राव नार । म नियोग उनी मृतवार १४: हमुन्ना प्राई भनि नियोगिनि देवी, जिन जननोको मेट भजे । कोई न्हान-विलेपन ठाने । कोई मार मिगार मजे ॥१४॥ कोई नूपण बसन नमप्प, मोई भोजन मिट्ट करें। कोई देय तबोन रवाने, कोई सुन्दर गान करं ।।१४।। कोई ग्लन मिहानन याप, कोई हान चमर वरों । कोई सुन्दर नेल विद्यावं, कोई त्रापै चरन करो' ॥१४६॥ कोई चन्दननी घर नोंचं, मारे महल नुवान करी । कोई प्रागन देय बुहारो, भारं फूल-पराग परी ॥१५०।। कोई जनक्रीडा कर रंज, कोई बहुविध नेष किये । कोई मनिपन कर घार, कोई गाडी खडग लिये ॥१५॥ कोई थि मनोहर माना, पावै प्रान नुगध खरो । कोई फलपतरोवरसों ले, फल फूलनको नेट घरी ॥१५२॥ कोई काच कथारसपोख, कोई हास्य विलास व्वं । कोई गावं बीन बजादै, कोई नाचत नीन नवें ।।१५३।। दोहा। इह विध सेवा करत नित, नवं माम मुभ श्रेय । प्रश्न कर सुरकामिनी, माता उत्तर देय ।।१५४।। १ गोम ० पान ३ श्रेष्ठ ४ हाथ से ५ मरिनय नात्र : तलवार ।
पाँचवाँ अधिकार [ ६७ अतरलापि' पहेलिका, बहिरलापिका' एव । बिदुहीन निरहोठपर्द, क्रियागुप्त बहुभेव ॥१५५।। इत्यादिक आगमउकत, अलंकारको जात । अर्थगूढ़ गभीर सब, समझावै जिन-मात ॥१५६॥ चौपई। तुमसो त्रिया कौन जग पान । तीर्थकर सुत जनै महान ।। जगमै सुभट कौनसे माय । जे नर जीते विषय कषाय ।१५७ कौन कहावै कायर दीन । इन्द्रीमदमेटन बलहीन । पंडित कौन सुमारग चले । दुराचार दुर्मारग दले ॥१५॥ माता मूरख कौन महत । विषयो जीव जगत जावंत । कौन सत्पुरुष नरभव धार । जो साधै पुरुषारथ चार ॥१५॥ कौन कापुरुष कहिये मर्म । जो सठ साध न जाने धर्म ॥ धन्य कौन नर इस संसार । जोवन समै धरै व्रतभार॥१६॥ धिक किनकौं कहिये सवंग । जे धरि करै प्रतिग्या भग ।। कौन जीवके बैरी लोय । काम क्रोध हैं और न कोय।।१६१॥ जननी जगमै कौन मलीन । पातकपंकमलिन मतिहीन ॥ कहो कौन नर नित्त पवित्त । ब्रह्मचर्यघारी दिढ़ चित्त ।१६२ कौन पसू मानुष प्राकार । जिनके हिरदै नाहि विचार ॥ अंध कौन जो देव प्रदेव । कुगुरुसुगुरुको भेद न भेव ॥१६३॥ बधिर कौनसे उत्तर देह । जैनसिधांत सुनै नहिं जेह ॥ १ वह पहेली जिसका उत्तर उसी पहेली के अक्षरों में हो । २ जिसके उत्तर का शब्द पहेली के शब्दो से बाहर हो। ३ बिन्दुरहितपद ४ ऐसा पद जिसके उच्चारण में होठो से ध्वनि न निकलती हो । ५. कायर । ६ बहरा।
-
६८ ]
पाएगा
मूकनाम नर कंमें लहै । जो हिन मान वचन नहि कहै ।१६४
लावो भुना कोन करहीन । जिनपूजा मुनिदान न दोन ।।
फोन पागले पावममेन । जे तीन्य परमे न अचेत ॥१६५।।
फोन कुरुप जननि कहु एह। मी मगार विना नरजेह ॥
वेग कहा करिये बडभाग । दिच्छागहन जगत की त्याग ।।
मित्र कीन हिनवचक होय । धर्म दिदाय पालम सोय ॥
सत्रु कौन जो दिच्छालेत । विघन फर परभवटुसहेत । १६७।
जियों कोन सरन है माय । पचपरमगुरु मदा सहाय ॥
इहिविध प्रस्न फर सुरनारि । माता उत्तर देहि विचारि १६८
वामादेवो महज प्रवोन । सफल मरम' जानं गुननोन ॥
पुरुपरतन उरअन्तर बहें। क्यो नहिं ग्यान अधिकता लहै ।१६६
दोहा ।
निवसरे निर्मल गर्भम, तीन ग्यान-गुनवान ।
फटिकमहलमै जगमगे, ज्यो मनि दोप महान ।।१७०॥
उदयवान दिनकरसमय, पूर्व दिसा छवि जेम ।
त्रिभुवनपति-सुत उर धरै, सोहत जननी एम ॥१७१।।
गर्भभार व्याप नही, त्रिवली' भग न होय ।
देह न दीख पीतछवि, और विकार न कोय ।।१७२॥
ज्यो दर्पन प्रतिबिंबसौं, भारी कयौ न जाय ।
त्यों जिनपतिके गर्भसौं, खेद न पावै माय ।।१७३॥
कलपलतासी लसत अति, जननी छबिसयुक्त ।
१ रहस्य २ बसै ३ पेट के तीन सलवट भगवान के गर्भ में ग्राने पर भी
नष्ट नहीं हुए।
छठा अधिकार [६९ मदहास कुसुमित भई, अब फलि है फल पुत्त' ।।१७४।। देवराजके वचनसौं, अहनिस हरखत अंग । अलखरूप सेवै सची', लिये अपछरा संग ।।१७५।। पूरबवत नवमास लो, पंचाचरज अनूप । अस्वसेन भूपालघर, किये धनद सुखरूप ॥१७६॥ यो सुखसौं निसदिन गये, खेद नामकहिं नाहि ॥ यह सब पुन्य-प्रभाव है यही रहस इसमाहिं ॥१६७॥ इति श्रीपावपुराणभाषाया गर्भावतारवर्णन नाम पञ्चमोऽधिकार. । छठा अधिकार। दोहा। रागादिक जलसौं भरचौ, तन तलाब बहु भाय । पारस-रवि दरसत सुख, अघ सारस उड़ि जाय ॥१॥ गर्भ मास पूरन भये, नभ निर्मल श्राकार । पौष मास एकादसी, स्याम पच्छ सुभ बार ॥२॥ वामादेवी-पूर्व-दिसि, जनम्यौ जिनवर भान । मुदित भयौ त्रिभुवनकमल, प्रसुभतिमिर अवसान ॥३॥ अस्वसेन नृप उदयगिरि, उगयौ बाल दिनेस । तीन ग्यान-किरनावली, लिये जगत परमेस ॥४॥ १. पुत्र २. रातदिन ३. इन्द्राणी ४. कुबेर ५. मन्त ६ मति,मत,अवधि
बहन लगी
सुखसातिदाय
।
१०० ]
पार्श्वपुराण
पद्धडि।
जनम्यौ जब तीर्थकर कुमार । तिहुलोक बढयौ आनंदअपार
दोखै नभनिर्मल दिसि असेस । कहिं प्राधी मेह न धूलि लेस ।
अति सीतल मद सुगधि वाय । सो
सब सुजनलोक हरष विसेस । ज्यो कमल-खड प्रगटत दिनेस'
घटा धन गरजे देवलोक । ज्योतिषिघर केहरिनाद' थोक ।।
भवनालय बाजे सहज संख । बितर-निवास भेरी असंख ७
ये अनहद बाजे बजे जान । जिनराज-जनमअतिसय महान ।
बहु कलपतरोवर पहुपवृष्टि । स्वयमेव करन लागे विसिष्ट ।८
इंद्रालन कांपे अकसमात । ये करन किधौ सारथ (?)सुजात
जिनजनम भयौ भूलोकमाहि । उच्चासन अब तुम जोग नाहिं ।
पानम्र भये मणिमुकुट एम । श्रीजिनप्रति करत प्रनाम जेम।
ये चिहन देखि इंद्रादिदेव । तब अवधिग्यानबल जान भेव ॥
निरधार बनारसि-नगर-थान । तीरथपति जनम्यौ आज प्रान ।
प्रभुजन्मकल्यानककरनकाज । उद्यम प्रारंभ्यो देवराज ।११॥
परिवारसहित सब इन्द्रनाम । आये मिलि प्रथमसुरेद्रधाम ।
नानाविध बाहन चढे जेह । जिनभगतिसलिलसिंचतसुदेह
सप्ताग सैन तब चलो एम । यह महाजलधिको लहर जेम ॥
हाथी रथ पायक वृषभ बाज । गायनि नर्तकि सेनासमाज
एकेक सैनमै सात कच्छ । तिहिमाहिं प्रथम चउ असी लच्छ ।
फिर दुगुन दुगुन सातम लो जान, इस भाति सात सेना महान
सौ कोर और छकोर जोरि । अठसठ्ठ लाख ऊपर बहोरि ।।
१ सूय २ सिंहध्वनि ३ भुके ४ भेद ५ पैदल ६ वैल ७ घोहा।
छठा अधिकार यह एकहस्ति सेनाप्रमान । ऐसी ही सब सातौं समान ॥१५॥ तह नागदंत' सुर प्राभियोग । सो करह विक्रिया निजनियोग। ताप्रति प्राग्या दीनी सुरिंद । तिन कीनों ऐरावत गइन्द ॥१६॥ लख जोजन मान मतंगईस । प्रतिउन्नत देह उतंग सीस ।। सुभसेतवरन मनहरन काय । लीलागति धार ललित पाय ।१७ मदजीवनकलित कपोल स्याम । नख विद्रुमवरण मनोभिराम सव लसत सुलच्छन अंगभग । नहिं गिनीजाहिजिसछबितरंग गंभीर घनाघनघोष जास । बहु सुन्दर सुड सुगध सास ॥ हो कामसरूपी कामगौन । जादेख मोहत तीन भौन ॥१९॥ घनघोरत घंटा लवमान । मनि घूघुरमाला कठथान ।। सोवनपाखर सो दिपै देह । संपाजुत' मानौं सरद मेह ॥२० सौ वदन विराजत सोभवत । एकेकवदनमै पाठ दंत ।। प्रतिदंत सरोवर एक दोस । सरसरहें कमलिनो सौपचोस ।२१ एकेक कमलिनी प्रति महान । पच्चीस मनोहर कमल ठान ।। प्रतिफमल एकसौ पाठपत्र । सोभावरनी नहिं जाय तत्र ।२२। पत्रनपर नाचें देवनारि । जगमोहत जिनकी छबि निहारि । नव नवरस पौषे करत गान । लावन्यजलधि-बेलासमान ।२३ तिस हाथी ऊपर सचीसग । सौधर्मसुरगपति मुदित अंग ।। प्रारुढ भयो अति दिपत एम । उदयाचलमस्तक भानु जेम। चद्रोपम चामर छत्रसीस । दसजाति कलपसुरसहित ईस ।। १ भाभियोग्य जाति के देव २ सफेद रंग ३ मदजल ४ मूगा का रंग ५ स्वरण की भूल ६ बिजली ७ मुग्व 5. एक सौ पच्चीस ९ चढा ।
१०२ ] पाश्यपुगग --- - ईसानप्रमुख इमि देवराज । निज निज वाहनको चले साज ॥ परिजनसमेत उर हरपभाव । जिन जनमकल्यानक करन चाव वाजे सुरदु दुभि विविध नेव । जयकार कर मिलि सकलदेवर उपज्यो कोलाहल गगन थान । मब दिमि दीखं बाहन विमान । आकाससरोवर अतिगंभीर । इद्रादि अमर तन तेज नोर ॥२७॥ तहा विकसत मुख अपछरा एम । यह बिल्योकमलिनोवागजेम। इहि विध देवागम भयो जान । अवतरे बनारम नगर थान ।२८ चद्रादि जोतिषी पच जात । वस भेद भवनवासी विख्यात ॥ पुनि पाठ जातके वान देव । मब पाये इन्द्र समेत एव ।२६॥ निज निज वाहन चढि सपरिवार । जिन जन्म-महोच्छवाहियधार तब पुरप्रदच्छिना सुरन दीन । प्रतिहरखत उर जयकार कोन। बन बीथी मारग गगन रोक । सब ठाडे देवी देव थोक ।। सब सक सची मिलि भूप गेह । प्राये घर आगन भरो तेह ।३१ तब इद्रबलू अति रजमान' । सो गई गुफ्त जिनजनमथान ।। देखी जिनमात सपुत्त ताम । परदच्छिन दै कोनों प्रनाम ।३२ सुत-रागरंगो सुखसेजमाझ । ज्यो बालक-भानुसमेत साझ ।। कर जोरि जुगल सिर नाय नाय । युति कोनो बहु जान न माय सुखनींद रची तब सचो तास । मायामय राख्यौ पुत्र पास ॥ करकमलन बालक-रतन लोन । जिन कोटिभानुदि छोन कोन सुख उपजे जो प्रभु परस देह । कवि-बानोगोचर नाहि तेह । प्रभुको मुखवारिज देख देख । हरखै सुररानी उर विसेख ३५ १ गली २ आनन्दित होकर ३ पुत्रसहिन ४ घामल । ।
छठा अधिकार। [ १०३ वसु मंगलदरच विभूति सार । दिसदिध्यकुमारी अग्रचार । इहिबिध सौधर्मसुरेसनार । पान्यो सिवकन्या'वर कुमार ।३६ देख्यौ हरि बालकचंद जाम । प्रानंदजलधि उर बढ्यो ताम ।। सिर नाय इंद्र निज वार बार । थुति कीनो कर जुग सोस धार ।। छवि देखि तृपति नहिं होय लेस । तव सहस प्रांख कोनी सुरेस करि नमस्कार निजगोद लीन्ह । ईसान इंद्र सिर छत्र दोन्ह ।। तहां सनतकुमार महेंद्र सोय। ए चामर ढाल इन्द्र दोय ।। ब्रह्मादि सुरगवासी सुरेस । जय नंद वर्ष बौले विसेस ।।३।। नाचं सुर-रमनी रूपखान । गंधर्व करै जिनसुजसगान ।। सुरवाजे बाजे बहुप्रकार । कर धरहिं किन्नरी बीन सार ॥४० केई सुर श्रोजिनसुभगमेष । देख भरि लोचन निनिमेष । केई यो भाष सुरममाज । हम देवजन्मफल लह्यौ आज ४१ केई सरधायुत भये देव । मिथ्यात महाविष वम्यौ एव ।। इस भाति चतुरविध देवसंघ । सब चले जोतिषीपटल लघ। दोहा। जोजन सहस निन्यानवे, सुरगिरि-सिखर उतंग । गये सकल सुरगन तहां, भूषनभूषित अग ॥४३॥ . चौपई। महामेरुके मस्तकभाग । पाडुकबन बहु धरै सुहाग । जोजन सहस जासु बिस्तार । सुर चारन खग करे बिहार ॥४४ चहुंदिसि चार जिनालय तहां । सघन सासते तरुवर जहा । १. मुक्तिरूपी कन्या २ अपलक ३ उल्लघन करके ४ सौंदर्य ।
-4 .......... -- १०४ } पाश्वंपुराण मध्यचूलिका मुकट सरीस । सो उतग जोजन चालीस ॥४५ वारह जोजन जड़ विस्तार । प्राठमध्य पर ऊपर चार ।। जाके ऊपर रजकविमान । रोमातर'नरछेत्रप्रमान ।।४६।। तिस ईसानदिसा सुभ थान । मनिमय सिला सासती जान पाडुकनाम फटिक उनहार । प्राकृति प्रघं चंद्रमाकार ॥४७॥ सौ जोजन प्रायाम प्रभग । विस्तर प्राधो पाठ उतंग ।। सुरविद्याधर पूजत नित्त । भरतखंड-जिन-न्होन-पवित्त ।। तहा हेम-सिंहासन सार । रत्नजडित सो वलयाकार ।। धनुष पाचसी उन्नत जोय । भूमिभाग विस्तोरन सोय ।।४६ ऊपर जास अर्ध विस्तार । जाके तेज मिट अंधियार ॥ तिसहीपर पदमासन साज । पूरबमुख थापे जिनराज ॥५०॥ इस प्रोसर सोहैं इमि ईस । मानौं मेघ रतनगिरि सोस । धुजा कलस दर्पन भृ गार । चमर छत्र सुप्रतिष्ठक तार १५१॥ मगल दर्व मनोहर जहा । धरे अनादि-निधन ये तहा ।। प्रासन दोय उभय दिस और । जुगलइद्र ठाड़े तिहिं ठौर ॥५२ चारौं दिस चारौं दिगपाल । जथाजोग जिनमज्जनकाल ॥ सची सुरेंद्र प्रपछरा-थोक' । सव ठाडे पाडुकबन रोक ।।५३ चौबिध देव खड़े चहुंपास । जनम-न्हौन देखन हुल्लास । कियौ महामडप हरि तहा । तीनलोक जन निवस जहा ॥५४ कल्पकुसुममाला मनहार । लटकै मधुप करै झंकार ।। १ एक वाल का अन्तर २ लम्बाई ३ चौडाई ४ कलश ५ साथिया ६ पखा ७ अभिषेक ८ समूह ६ चार प्रकार के देव (मवनवामी, व्यनर, ज्योतिषी, कल्पवासी) छठा अधिकार सुर वाजिन बजे बहुभाय । सुरभि' सुगंध रही महकाय ।५५॥ मंगल मिल गावे सब सची । नाच सुर-वनिता रस-रची ।। तब मज्जन प्रारभ विसेस । उद्यम कियो प्रथम अमरेस ५६। दोहा। तहा कुबेर रतन खची', रची पंडका पत' । मेरु सिखरसौं सोहिये, छोरोदधिपरजत ॥५७|| सुर-श्रेणी सोपान-पथ, पचम सागर जाय । भर लाई कंचन-फलस, चदन-चरचित काय ॥५८।। जोजन एक प्रमान मुख, वसु' जोजन गभीर । यह मरजादा कलसकी, जिनशासनमै बीर ॥५६॥ मुकतमालमडित लसै, कचन-कलस महंत । नभवनिताके उरज ये, यो प्रति सोभावत ॥६॥ चौपई सहस' भुजा सुरपति तब करी। भूषनभूषित सोभा भरी। इस प्रोसर हरि सोहै एम । भूषणाक सुरतरुवर जेम ।।६।। फलस हाथ हरि लीने जाम । भाजनाग" सम सोभा ताम । तीन बार कोनी जयकार । फलसोडारन मंत्र उचार ॥५॥ इहिविध श्रीसौधर्माधीस । ढाले कलस स्वामिके सोस ।। तब सब इंद्र कियो जिनन्हौन । अतुल उछाव वढयो जगभौन । १. मनोरम २ सोयम स्वगत ३ रन जति ४.पत्ति ५ पचम ममुद्र तक ६ भाट - प्राकाम पोमो ८ सन रजार १.. मादन देने पासा पल्प वृक्ष।
१०६ ] पार्श्वपुराण महा धार जिनमस्तक ढरी । मानौं नभगंगा अवतरी ॥ मुदित असंख अमरगन तबै । जै जैकार कियौ मिलि सबै ६४॥ उपज्यौ अति कोलाहल सार । दसदिस बधिर' भई तिहिबार । भयो असम औसर इहि भाय । वचनद्वार बरन्यौ नहिं जाय । दोहा। जा धारासौं गिरिसिखर, खड खड हो जाय । सौ धारा जिनदेहपै, फूल-कली सम थाय ॥६६॥ अप्रमान वीरजधनी, तीर्थंकर प्रभु होय । तातै तिनकी सकतिकों, उपमा लगै न कोय ॥६॥ नीलबरन प्रभु देहपर, कलस-नोरछबि एम । नीलाचलसिर हेमके, बादल बरसै जेम ॥६॥ चली न्हौनके नीरको, उछल छटा नभमाहि । स्वामिसंग अघविन' भई, क्यो नहि ऊरध जाहि ।६६। न्हौनछटा तिरछोभई, तिन यह उपमा धार । दिगवनिता -मुख सोहियै, करनफूल उनहार ॥७॥ लोरठा । जिनतनपरस पवित्र, भई सकल जगसुचिकरन । सो धारा मम नित्त, पाप हरो पावन' करो॥७१॥ चौपई यो नरेंद्र मज्जनविधि ठान । फिर कोनों गधोदकन्हान ।। मो जल लेय विनय विस्तरी । सातिपाठ पढि पूजा करी।७२। १ बहगे • जिसकी ममानता नहीं की जा परती ३ निष्पाप ? दिशा छटा अधिकार [ १०७ सक सची सुर प्रानन्द भरे । यथाजोग सब कारज करे । परवच्छिन' दीनी बहु-भाय । बारंबार नये सिरनाय ॥७३॥ हरिगीत। सौधर्मपति अभिषेक कारक, न्हौनपीठ सुदंसनो । गधर्व गायक निरतकारक, अपछरा-जन संसनो । पंचम पयोनिध न्हौन-कुड, असंख सुर सेवक जहां । तिस जन्ममगलको बडाई, कहन समरथ बुध कहा ।।७४॥ चौपई। जन्महीनबिधि पूरन भई । सकल सुरासुर देवनि ठई ॥ अब इंद्रानी जिनवर अग। निर्जल कियौ वसन -सुचिसंगा७५॥ कुंकुमादि लेपन बहु लिये । प्रभुके देह विलेपन किये ।। इहि सोभा इह औसरमाझ । किधौं नीलगिरि फूली साझा७६ और सिंगार सकल सह कियौ । तिलक त्रिलोकनाथके दियो। मनिमय मुकुट सची सिर धरयो । चूडामनि माथे विस्तरचौ७७ लोचन अजन दियौ अनूप । सहज स्वामिहग अंजितरूप ॥ मनि कु डल कानन विस्तरे । किधौं चन्द्र सूरज अवतरे ।७८। कठ कठिका मोतीहार । मुक्तिरमनि झूला उनहार ।। भुजभूषनभूषित भुज करी । कटक मुद्रिका सोभित खरी।७। कटिभूषन कोनौं कटि-थान । मनिमयछुद्रघटिकावान ।। प्रय नेवर पहराये सार । जिनमै रतन झलक झकार ॥८॥ १ परिक्रमा २. स्नान का सिंहासन ३ सुदर्शन मेरु ४, प्रशसा ५ शरीर सुखाया ६ वस्त्र ७ कठी।
१०. ] पावपुराण M दोहा। अंगअग प्राभरनजुत', यह उपमा तिहि काल ॥ मुरतन्मम प्रभु सोहिये, नूपनभूषित-डाल' ॥१॥ चौपई। तब इंद्रादि लगे युति करन । जय जिनवर मब भारत हर त्रिभुवनभवन दोप उनहार । धन्य देव तेरो अवतार ॥२॥ जय श्रीअस्वसेनकुलचद । वामानंदन नीति अमद' ।। सुखसागरके वधनहार । सब जग श्रेय'-मांति दातार 1८३॥ तुम जग भ्रमनामन अवतरे । हममे दाम महासुख भरे ।। विन रविउदय तिमिर क्यो नाय । कमे कमलबाग विकसार मिथ्यामत रजनो अतिघोर । मूमै धर्म कुलिंगो चोर ।। जो प्रभुजन्मप्रभात न थाय । तो किमि प्रजा बसे सुखपाया५ ये अनादि संसारी जीव । विलखे भव-नगर-प्रसे अतात्र ॥ सो दुखमैंटन दयानिधान । राजवंद जनमै भगवान ॥८६॥ भरमकूपवरती बहु लोय | काढनहार तिन्हैं नहिं कोय ।। श्रीमुखवचननेज-बलधार । अब उद्धार लहैं निरधार 151 प्राप परमपावन परमेस । औरन हौं नुचि करहु विशेष ।। ज्यो मरि सेत प्रभा तन घरै । सेत मरूप सबनको करैप बिन सनान तुम निर्मल नित्त । अंतर वाहन सहज पवित्त । हम मज्जनविधि कीनी अाज । निजपवित्रकारन जिनराजः १ प्राभूषण • Bहनी ३ दुख ४ मुदा जगने वाली ५ कल्याण ६ अध कार ७ ८ चौर ६ कोटे भेषधारी १. गैग ११ लोग १२ रम्सी १३ सरोवर १४ सफेद ।
छटा अधिकार [ १०६ तुम जगपति देवनके देव । तुम जिन स्वयबुद्ध स्वयमेव ॥ तुम जगरच्छक तुम जगतात । तुम बिनकारन-बन्धु विख्यात॥ तुम गुनसागर अगम अपार । थुतिकर' कौन जाय जन पार॥ सूच्छम ग्यानी मुनि नहिं तरै । हमसे मंद कहा बल धरै ।६१ नमो देव असरन-प्राधार । नमो सर्वप्रतिसयभंडार ।। नमो सकलसिवसपतिकरन । नमो नमो जिनतारनतरन ।।२। दोहा । इहि बिध इन्द्रादिक अमर, सुरपदवीफल लेय । जन्म-न्हौन-विधि कर चले, मानौं निज शुभ श्रेय ॥१३॥ जन्ममहोच्छव देख कर, सुरपतिकी परतीत' । बहु सुर सरधानी भये, तजि सरधा विपरीत ॥१४॥ चौपई। तब सब देव जनमपुरथान । पूरवली बिधि कियौ पयान' । चढ्यौ इन्द्र ऐरावत शोश । गोद लिये त्रिभुवनपतिईस ।।५। पूरबवत दुदभि धुनिगाज । वे ही गीत निरत सब साज ।। पाये जय जय करत असेस । पिताभवन कीनों परवेस ।।६। मनिमय प्रांगनमै हरि पाप । हेम-सिंहासन पर प्रभु थाप ।। अस्वसेनभूपति तिहिं बार । देख्यौ नदन नयन पसार ।६७। तेजपुंज निरुपम छबि देह । रोमांचित तन बढ़यौ सनेह ।। माया नींद सची तब हरी । जिनजननी जागी सुखभरी। भूषनभूषित कांति विसाल । भर लोयन निरख्यो जिनवाल ।। १ स्तुति करके, २ विश्वास ३ गमन, ४ पुष, ५ जिनमाता।
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११. ]
पार्श्वपुराण
अति प्रमोद उर उमग्यौ तबै । पूरन भये मनोरथ सबै 188
तब सुरेस रोमाचितकाय । मात पिता पूजे मन लाय ।।
भूषन वसन भेंट बहुधरी। हाथ जोरि जुग थुति' विस्तरी१००
तुम जगमै उदयाचल भूप । पूरबदिसि देवी सुचिरूप ॥
उदय भये त्रिभुवनरवि जहां । तुम महिमा वरनन बुधि कहा
धनि धनि अस्वसेन भूपाल । जिनके जगगुरु जनम्यौ बाल।।
कोरतबेल अधिक तुम बढ़ी । तीनलोकमडप सिर चढी । १०२
धनि वामादेवी जगमाय । जिन जायौ नदन जगराय ।।
तोनलोकतिय-सृष्टिसिगार । धनि जननी तेरो अवतार ।१०३
तुम सम जगमै और न आन । जिनदेवल सम पूज्य प्रधान ।।
यो थुतिकरि हरि हिये प्रमोद । बाल दिवाकर दोनों गोद
कहो सकल पूरबली कथा। मेरु महोच्छव कोनौं जथा ॥
तब निज नगरविष भूपाल । जन्म उछाह कियौ तिहिंकाल ।
हरषत सव पुरजन परिवार । घर घर भये मगलाचार ॥
घर घर कामिनि गावै गीत । घर घर होय निरत-सगीत१०६
मगलोक बाजे बहु भेव । बाजन लगे सकल सुखदेव ॥
श्रीनिनभवन न्हौन विस्तार । किये सकल मगल प्राचार ॥
छिरक्यौ चदन नगरमंझार । रतन साथिया धरे सवार ।
जाचक-दान सुजन-सनमान । जथाजोग सब रीति-विधान ।।
इहि विध अस्वसेन नरनाह । कीनौ पुत्र-जनमउच्छाह ॥
पूरनास भये सब लोय । दुखी दीन दोख नहिं कोय ।१०६
१. स्तुति २ ससार का गुरु ३ स्त्री ४ जिन मदिर ५ इन्द्र, ६ अानद ७.स्त्री
छटा अधिकार। । १११ ---- दोहा। उदय भयो जिनचन्द्रमा, कुलनभतिलक' महत ।। सुखसमुद्रबेला तजी, बढ़यौ लोक-परजंत ॥११०॥ चौपई। तब बहु देवनसंग विसेस । प्रानन्द-नाटक ठयो सुरेस । कर गान गधर्व-समाज' । समयजोग सव बाजे साज ।१११॥ देखें अस्वसेन नरनाथ । पुत्रसहित सब परिजन साथ ॥ प्रथमरूप नव भव दरसाय । पुहपाजुलि खेपी सुरराय ।११२॥ ताडव नाम निरत प्रारंभ । कियो जगतजन करन प्रचंभ ।। नट सरूप धारचौ अमरेस । रगभूमि कोनों परवेस ।।११३।। मगलोक सिंगार सवार । सव सगीत वेद अनुसार ।। ताल मान विधिसहित सुभाय । रग-धरा पर फेरै पाय ।११४॥ कर कुसुमबरसा नभ देव । देखि इद्रको भक्ति सुभेव ।। वीना मुरज बासली ताल । बाजे गेह गीतकी चाल ।११५॥ करै किन्नरी मंगलपाठ । बिरियां जोग बन्यौ सब ठाठ॥ नाचे इन्द्र भमै बहु भाय । मोरे हाथ कंठ कटि पाय ।११६॥ अद्भत तांडवरस तिहिं बार । दरसाव जन अचरजकार ॥ सहस भुजा हरि कीनी तबै । भूषनभूषित सोहैं सबै ।११७। धारत चरन चपल अति चलै । पहुमी' कपि गिरिवर हले। भमै मुकुट चकफेरी लेत । ताकी रतनप्रभा छवि देत ।११८। १. माकाश कुल का तिलक २. सीमा ३. समूह ४ पुष्पांजलि ५ मृदग ६ बांसुरी ७. काल मोहैं ६ पृथ्वी । ।
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११२ ]
पार्श्वपुराण
वलयाकृति' झलक सोय । चक्राकार अगनि जिमि होय ।
छिनमै एक छिनक बहुरूप । छिन सूच्छम छिन थूलसहपा११६॥
छिनमै निकट दिखाई देय । छिनमै दूर देह धर लेय ।।
छिनाकासमाहिं सचरै । छिनमै निरत भूमि पर करै ।१२०॥
छिन छूवै तारावलि जाय । छिनक चंदसौं परसे काय ।।
इद्रजालवत यो अमरेस । दरसाई निज रिद्धिविसेस ।१२१॥
हाथ अगुलिनपै अपछरा । नाचे रूप रतनकी धरा ।।
अग अग भूषन झलकाहिं । विकसत लोचन मुख मुसकाहिं ।
निरत-भेदविधि धार पाव । कर कटाच्छ दिखावै भाव ।।
बहुविधकला प्रकासै सार । सुरकामिनि' दामिनि उनहार १२३
तिनसजुत,हरि सुरतरु एम । कलपलतागनबेढयौ जेम ।।
यो नाटकबिधि ठान अनूप । तिहुजग सक्र किये सुखरूप१२१
स्वामिजनम-अतिसयपरताप । जिनवरपिता सभापति प्राप।
इन्द्र महानट नाचै जहा । तिस अवसर-बरनन बुधि कहा ॥
तब तहां मातपिताको साख । पारस नाम सकल सुर भाख ।
राखि सुरासुर सेवा-जोग । चले देव सब साधि नियोग।१२६
दोहा।
इहिबिध इन्द्रादिक अमर, जन्मकल्यानक ठान ।
बहुबिध पुन्य उपायक, पहुँचे निज निज थान ।।१२७॥
१ गोल २ जादू ३ देवाङ्गना ४ विजली की तरह ५ उन सहित ६ कल्प
वेलि से निपटा हुमा ७ इन्द्र ।
सातवा अधिकार [ ११३ -~- हग्गिीति। इन्द्रादि जन्मसनान जिनको, करन कनकाचल' चढे । गधर्व देवन सुजस गायौ, अपछरा मगल पढे ।। इहविध सुरासुर निज नियोग, सकल सेवाबिधि ठई। ते पासप्रभु मुझ पास पुरवो, सरन सेवकने लई ॥१२॥ इति श्रीमत्पार्श्वपुराणभाषाया जिनेन्द्रजन्मोत्सववर्णन नाम षष्ठमाधिकार.. सातवां अधिकार - दोहा। पारस प्रभु तजि औरौं, जे नर पूजन जाहिं । कलपबिरछको छांडिक, बैठे थूहर' छाहि ॥१॥ चौपई । । अब जिन बालचन्द्रमा बढे । कोमल हास-किरन मुख कड़े ।। छिन छिन तात-मात-मन हरे । मुखसमुद्र दिन दिन विस्त।२। अमृत इन्द्र अगूठे देय । वही पोष' पयपान न लेय ॥ देवी पाय हरष मन घर । मज्जनमडन विधि सब करे ।। केई मनिभूषन पहराय । कर प्रलंकृत प्रभुको काय ।। केई कामिनि कर सिंगार । श्रीमुखचन्द्र निहार निहार ।४। १. सुमेरु पर्वत २ पोराटेदार मार ३ पोपए योग्य ४. दूर दीमा १.बरे को पालने वाली माता ६ भशार।
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मात प्रधिनार [ ११५ , निरुपम काति कला विग्यान । लावन रूप अतुलगुनथान।१४। मति-श्रुति-अवधि-ग्यानबल देव । जान सकल चराचर भेव । मोमसुभाव' सहज उपसत । निर्मल छायकदरसनवंत ॥१५॥ इहिविध प्राइवरसके भये । तब प्रभु आप अनुवत लये ।। देवकुमार रहें सग नित्त । ते छिन छिन रंज जिन-चित्त ।१६। पवहीं गज तुरंग तन धरै । तिनपै चढि प्रभु जनमन हरे॥ कवहीं हम मोर वन जाहि । तिनसी जगपति केलि कराहि।१७। कवहीं जलझोडायल गरें । फवहीं वनविहारभू रमै ।। कवहीं फर किनरो गान । सो प्रभु सुजस सुनै निज कान ।१८। कवहीं निरत ठवे' सुर-नार । देखे जिन लोचनसुखकार ।। कवहीं काव्यकथारस ठान । फर गोठ' जिन बुधि बलवान।१६। विना सिखाये विन अन्याम । सव विद्या सब कलानिवास । यो सुखअनुभव करत महान । भये पास जिन जोबनवाना२०॥ दोहा । संपूरन जीवन समय, प्रभुतन सोहै एम ।। सहनमनोहर चादको, सरदसमय छवि जेम ॥२१॥ चौपई। प्रभुके अंग पसेव न होय । सहज सदा मलवरजित सोय ।। उज्जलवरन रुधिर जिमि खोर । सुसमचतुरसठान सरीरा२२॥ प्रथम सारसंहननसरूप । इन्द्र-चन्द्र-मनहरन अनूप । १. सौम्य स्वभाव २ धोरा ३ करें. गोठी ५ शरीर मल रहित ६ दूध ७ सर्वांग मुन्दर ८. बचपमनाराच सहनन ।
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सातवा अधिकार [ ११७ re पर पासप्रभुको सुजसमाला, पहिरि दास कहावना ॥२८॥ दोहा। सहस अठोतर लछन ये, सोभित जिनवरदेह । किधौ कल्पतरुराजके, कुसुम विराजत येह ॥२६॥ चौपई। शुभ परमानमय जिन अग । नीलबरन नौ हाथ उतंग ।। छबि बरनत नहिं पावै ओर । त्रिभुवनजनमनमानिकचोरा३० सतसवत्सर' प्राव प्रमान । प्रतुल असाधारन गुनथान ॥ सत्रुमित्रऊपर समभाव । दयासरोवर सोमसुभाव ॥३१॥ सागरसौं प्रभु प्रति गंभीर । मेसिखरसौं अधिक धीर । कांति देखि लाजे मिरगांक' । तेज बिलोकि छिप रवि राक । कल्पविरछसौं अधिक उदार । तिहेजगमासापूरनहार ।। यौं जिनगुनकौं उपमा कहीं। तीनकाल त्रिभुवनमै नहीं ।३३। दोहा। यो सुख निवसत पास जिन, सेवत कमला पाय । सोलह बरस प्रमान प्रभु, भये जगतसुखदाय ॥३४॥ सभासिंहासन एक दिन, बैठे सहज जिनेन्द्र । सुरनरमै प्रभु यौँ दिपै, ज्यो उडगनमै चन्द्र ॥३५॥ अस्वसेन भूपाल तब, बोले अवसर पाय । नेहसलिल' भीजे वचन, सुनो कुमर जगराय ॥३६॥ एक राजकन्या घरो, करो उचित व्यवहार । १ सौ वष २ मायु ३ चन्द्रमा ४ गरीब ५ तारो मे ६ प्रेमबल ।
..--. ११८ ] पाश्वपुगरण बंमवेल आगे चल, मुख पावे परिवार ॥३७॥ नाभिराजको पास ज्यौं, भरी प्रथम अवतार । तया हमारी कामना, पूरन करो कुमार ॥३०॥ पितावचन मुनि प्रभु दियो, प्रतिउत्तर तिहिं बार। रिषभदेव सम मैं नहीं, देखो हिये विचार ॥३६॥ मेरी सब नौ वर्ष थिति, मोलह भये बितीत । तीम वर्ष मजम समय, फिर मत कहो पुनीत ॥४०॥ अल्पकालथिति अल्प नुख, अल्प प्रयोजनकाज । कौन उपद्रव संग्रहै समुझि देख नरराज ॥४१॥ सुन नरेंद्र लोचन भरे, रहे वदन' विलखाय । पुत्रव्याहवर्जनवचन', किसे नहीं दुखदाय ।।४२।। चौपई। इहिविध मंदराग जिनराय । निवस सबजोवनसुखदाय ।। पूरवकथित कमठचर मोह । पाप करत मानी नहिं चीहा४३। मुनिहत्यास दुर्गति गयौ । पंचमनरकवात सो लयौ ।। मत्रहजलधि तहां दुम्ब सहे । वचन द्वार जो जाहिं न कहे ।४४॥ थिति पूरन कर छोडो ठौर । मागर तीन भम्यो फिर और । पसुगतिमाहि विपत वहु भरी । प्रमयावरको काया घरो॥४५॥ इहिविध भयो पाप अवसान । काहू जन्मक्रिया सुभ ठान । महोपालपुर मोहै जहां । महोपालनृप उपज्यौ तहा ॥४६॥ पारमप्रभुको वामा माय । इनको पिता भयौ यह राय ।। १ नुम २ रोना : पुत्र के विवाहमा मना कर देना ४ मत्रह सागर ५ मत सातवां अधिकार [११६ H पटरानीके प्रानवियोग । उपज्यो विरह बढयो चित सोगा४७। तपसी भेष धरचौ दुख मान । पचागनि साध बनथान ।। सोस जटा मृगछाला संग । भसम पीस लाई सब अंग ॥४८॥ भ्रमत बनारसिके उद्यान । प्रायौ कष्ट करत बिनग्यान ।। इहि अवसर श्रीपार्श्वकुमार । गये सहज बन करन बिहार।४६। राजपुत्र बहु सुरगन साथ । गज प्रारूढ दिपै जिननाथ ॥ कर सुछन्द बनकेलि' अनूप । चलै नगरौं अानन्दरूप ॥५०॥ देख्यो मगमै जननी-तात। तपै पचपावक -तप गात ॥ सो समीप-प्रभुकों अविलौय । चित चित रोषातुर होय।५१॥ मै तपसी कुलवत महत । जननी-पिता पूज सब भत ॥ अहो कुमरके यह अभिमान । विनय प्रनाम कर नहिं मान । इतने ईधन कारन जान । लकडी चीरन लग्यौ अयान'। हाथ कुल्हाडी लीनी जबै । हितमितवचन चये प्रभु. तबै ।५३॥ भो तपसी यह काठ न चोर । यामै जुगल नाग हैं बीर ।। सुनि कठोर बोल्यौ रिस पान । भो बालक तुम ऐसो ग्यान हरिहर ब्रह्मा तुम ही भये । सकलचराचरग्याता ठये ।। मन करत उद्धत अविचार । चोरयो काठ न लाई,बार ।५५॥ ततखिन खड भये जुगजीव । जैनी बिन सब प्रदय प्रतीव । दयासरोवर जिन तब कहै । तपसो बृथा गरब तू बहै ॥५६॥ ग्यान बिना नित काया कसे । करुना तेरे उर नहिं बस ॥ १ बन क्रोडा २ माता का पिता (नाना) ३ पचाग्नि ४ कोषयुक्त ५ प्रज्ञानी ६ दो का जोहा ७ गुस्सा ८ तत्काल ६ दया रहित ।
१२० ] पार्श्वपुराण तव सठ' रोषवचन फिर चयो। जननी जनकर तपसी भयो। करै न मदवस विनयविधान । और उलट खडे मुझ पान ॥ पंच अगनि साधू तन-दाह । रहूं एकपद ऊरघवाह ॥५॥ भूख प्यास बाधा सब सहू । सूखे पत्र पारनेर गहूं ।। ग्यानहीन तप क्यो उच्चर । क्यो कुमार मुझ निदा करै ॥५६॥ तब प्रभुवचन कहे हितकार । तुझ तपमै हिंसाप्रघभार ॥ छहो कायके जीव अनेक । नास होहि नित नाहि विवेक ।६०। जहां जीवबध होय लगार । तहा पाप उपजे निरधार ॥ पाप सही दुर्गति दुख देह । यातै दयाहीन तप येह ॥६१॥ ग्यान बिना सब कायकलेस । उत्तम फलदायक नहिं लेस ।। जैसे तुस खडन कन छार । यो अजान तप अफल प्रसारा६२१ अधपुरुष वन-दौमै दहै । दौर मरै मारग नहिं लहै । त्यो अजान उद्यम करि पचै । भवदावानलसौं नहिं बचे ।६३॥ ऐसे ही किरिया बिन ग्यान । सो भी फलदायक नहिं जान । जथा पगु लोचनबल धरै । उद्यमबिन दावानल जरै ।।६४॥ तातै ग्यानसहित प्राचार । निहचे वाछितफलदातार । इहिबिध जिनमतके अनुसार । करि उत्तम तप यह हठछा।६५। तुझ वचन कहे हितकार । तू अपने उर देखि विचार ।। भली लग सोई करि मित्त । वृथा मलीन कर मति चित्त ६६॥ मै १ मूख २ उपवास के पश्चात् का भोजन ३ भूमा ४ टुबडे ५ बन की माग ६ दौडना ७ बिना पुरुषार्थ ८ मित्र ।
सातवां अधिकार। [ १२१ दोहा । नाग जुगल सुनि जिनबचन, क्रूरजीव अति निद । देह त्यागि ततखिन भये, पदमावति धरनिंद ॥६७॥ नाग जुगल'के भागकी, महिमा कही न जाय । जिनदरसन प्रापति भई, मरन समय सुखदाय ।।६।। चौपई। घर पाये श्री पार्सजिनन्द । सुरनरनेत्रकमलिनीचन्द ॥ समय पाय तपसी तजि देह । भयो जोतिषी संवर तेह ।६९। देखो जगमै तपपरभाव । ग्यान बिना बांधी सुराव' ।। जे नर करै जनतप सार । तिन्हें कहा दुर्लभ संसार ॥७॥ स्वामी मगन सुखोदधिमाहिं । हर्ष विनोद करत दिन जाहिं। प्रभुके इष्ट-वियोग न होय । सोगसंजोग न कबही कोय ।७१। वायपित्तकफजनित विकार । सुपन होय न सोच विचार ।। जरा न ब्याप तेज न जाय । ना मुखकमल कभी कुम्हलाय७२ होहि नहीं दुखकारन पान । पुन्यउदधिबेला भगवान ।। यो सुखभोग करत दिन गये । तब जिन तीस वर्षके भये।७३। नृप जयसेन प्रजुध्याधनी । भक्ति प्रीत प्रभुसौं प्रति घनी । तुरगादिक बहु वस्तु अनूप । पठई विनय वचन कहि भूप ७४ राजदूत चलि प्रायौ तहां । सभा थान जिन बैठे जहां ।। हेमासन पर सोहैं एम । हिमगिरि सिखर स्यामधन जेम ७५॥ देखि दुत रोमाचित भयो । बहुबिध चरन कमलकौं नयो । १ युगल २ देव भायु ३ भेजी।
1071 ३ कारण मान्यौ मफलजन्म निलमार । त्रिभुवनपनि परतन्छ निहार घरी भेंट लो राना दई । विनय प्रनाम वीनती चई॥ तब पूछ तहा त्रिभुवनधनो । पति नगर अजोयातनी ॥७॥ कहै दूत कर जुग सिर धार । बरने तोर अवतार ।। मोख गये बरन तिहिवाम । मुनि म्बामा चित उर ताम || देनी चान्न । - मुनि दूत वचन वैरागे । निज मन प्रभू मोचन लागे । मैं इन्द्रामन मुख कौन । लोकोत्तम भोग नबीनं ॥७॥ तब नृपति भई तहां नाहीं । कया होय मनुषपदमाहीं ॥ जो सागरके जलसेती । न बुन्नी तिम्ना' तिस एती 11८ell मो डाभ-अनौके पानी । पोवन प्रब मे नानो । ई घनौं अागि न घा५ । नदियों नहिं ममृद ममाणे ॥१॥ यों भोगविष प्रतिभारो । तृपते न कभी तनधारी ॥ जो अधिक उदय ये आये। तो अयिकी चाह बढ़ावै ॥२॥ जो इनौं तृपति विचारं । मो वयानर' घृत जारै ।। इन येवन जो मुन्न पावै । मो आर्को प्रांब" उन्हावै ॥ ये भीम भुजंग मरीखे । भ्रम-भाव-उदय मुभ दीखे ।। चाबतहीके मुख मोठे । परिपाक नमय क्तु दो ॥४॥ ज्यों खाय धतूरा कोई। देखें सब कचन मोई ।। घिक ये इन्द्री-मुख ऐमे । विषवेल लगे फल जैसे ॥५॥ १ प्रत्यक्ष • रहा। दोनों हाय १. दाम ५ हार का हिस्सा २.जगन्धारी माकोदोधा : ११ उपनगर सातवाँ अधिकार । १२३ १ इनही वस जीव अनादी। भव भांवर भ्रमत सवादी ।। इन ही बस सीख न मान । नानाविध पातक ठाने ।।६।। थिर जगम जीव संघार। इनके वस झूठ उचार ।। पर चोरीसौं चित लावै। परतिय संग सील गमावै ॥२७॥ परिग्रह-तिसना' विस्तारै । प्रारंभ उपाधि विचार ॥ इत्यादि अनर्थ अलेखे । करि घोर नरकदुख देखे ॥१८॥ ये ही सुखपर्वतकेरे । जग फोरन वज्र बड़ेरे ॥ ये ही सब दोषभडारे । धन-धर्म-चुरानवहारे ।।८६॥ मोही जन मोहैं योहीं । ये आदरजोग न क्यो ही ॥ इनसौं ममता तज दोज । पर त्यागत ढील न कीजै ॥१०॥ सामान पुरुष जग जैसे । हम खोये ये दिन ऐसे ।। सजम बिन काल गमायो । कछु लेखेमै नहिं लायौ ॥१॥ ममतावस तप नहि लीनौं । यह कारज जोग न कोनों ॥ अब खाली ढोल न कोज । चारित-चितामनि लीजै ॥१२॥ । दोहा। भोगविमुख जिनराज इमि, सुधि कोनी. सिवथान" । भावै बारह भावना, उदासीन हितदान ।।३।। चौपई। द्रव्य सुभाव बिना जगमाहिं । परज' रूप कछु थिर नाहिं ॥ तनधन प्रादिक वीखत जेह । कालप्रगनि सब ई धन तेह ॥१४॥ १ ससार परिभ्रमण २ स्वाद लेनेवाला ३ पाप ४. स ५ लालच ६ फैलावै ७ रोग-चिता ८ बेहिसाब , उदास १० मुक्तिस्थान ११ पर्याय १२४ ] पावपुराण ॥ भववन भ्रमत निरतर जीव । याहि न कोई सरन सदीव ।। व्योहार परमेठी-जाप । निहचे सरन पापों आप ॥६५॥ सर' कहावै जो सिर देय । खेत तजे सौ अपजस लेय ॥ इस अनुसार जगतकी रीति । सब असार सब ही विपरीत तीनकाल इस त्रिभुवनमाहिं । जीव-सगाती' कोई नाहिं ।। एकाको सुख दुख सब सहैं । पाप पुन्य करनीफल लहै ।।६७ जितने जग सजोगो भाव । ते सब जियसौं भिन्न सुभाव नितसंगी तन ही पर सोय । पुत्र सुजन पर क्यो नहि होय असुचि अस्थि-पिंजर तन येह । चामवसनबेढ्यौ घिनगेह" चेतनचिरा" तहां नित रहै । सो बिन ग्यान गिलानि न गहै मिथ्या अविरत जोग कषाय । ये प्रास्त्रवकारन समुदाय प्रास्रव कर्मबन्धको हेत । बन्ध चतुरगतिके दुख देत ।।१००॥ समिति गुपति अनुपेहा १२ धर्म । सहन परीषह संजम पर्म । ये सवरकारन निरदोख । संवर कर जीवको मोख ॥१०१। तपबल पूर्वकरम खिर जाहिं । नये ग्यानबल पावै नाहिं । यही निर्जरा सुखदातार । भवकारन-तारन निरधार ।१०२। स्वसिद्ध त्रिभुवनथित जान । कटिकर धरै पुरुषसठान" भ्रमत अनादि प्रातमा जहाँ । समकित बिन सिव होय न तहाँ। १ शूरवीर २ मस्तक कटावे ३ युद्ध क्षेत्र ४ साथी ५ सयोगी ६ सदा साथ रहने वाला ७ अपवित्र ८ हड्डियोका पीरा । चमडे का कपडा लिपटा हमा १० घृणा का स्थान ११ चेतन रूपी पक्षी १२ अनुप्रेक्षा ( बार बार चितन ) १३ करियो पर हाथ १४ पुरुष के प्राकार जैसा ।
itrintyफार । १२५ दुतंभ पम दमांग' पवित्त । सुपदायफ सहगामी नित्त ।। दुर्गति परत यही कर गई । देय तुरग सिवयानक यह।।१०४॥ सुसम जोवी सब गुग सदा । नौग्रीयक ताई संपवा ।। गधरतन दुर्लभ ससार । भयदरिददुम्पमेटनहार ॥१०॥ ये दस-दाय भावना भाय । दिख रागि भये जिनराय ॥ देहभोग संसार माप । म प्रसार जान्यौ जगभूप ।।१०६॥ इतनै लोपातिक सुर पाय । पुहपांजलि दे पूजे पाय ॥ बहालोकवासो गुनधाम । देष रिपोश्वर जिनको नाम :१०७। मरपूरचपाटो पर्वत । सहज मोममूरति उपसंत ।। अमितागग' हिय नहिं यह । एफजनम धरि सिवपन लहैं१०८ तीर्थकर जय विरकत' होय । हपंवत सब प्राव सोय ॥ और कल्यानक करें प्रनाम | सदा मुग्यो निवसे निजधामा१०६। हाय जोरि बोने गुनयूप' युतियायक" पर सिच्छारप । धनिविवेक यह पन्य सयान' । पनि यह प्रोसर दयानिधान ।। जान्यो प्रभु संमार प्रसार । अथिर अपायन देह निहार ।। इन्द्रिय सुख सुपने सम दोस । सो याही विध हैं जगईश ११ उदासीन असि तुम कर' परी। प्राज मोहसेना थरहरी । बढपी प्राज मिवरमनि सुहाग । श्राज जगे भविजन सिरभाग जग प्रमादनिद्रावस होय । सोवत है सुधि नाहीं कोय ।। प्रभु धनिकिरन पयास जब । होय सचेत जग जन तबै ।।११३ १.मगों वाला २ स्त्री प्रेम ३ विरक्त ४. गुमा ५. स्तुतिरूप वषम ६ गमभावार पवित्र सनवाराप १.. प्रकाशित हो। -on- १२६ ] पाश्वगण - यह भव दुस्तर' पारावार । दुखजलपूरित वार न पार । प्रभ उपदेश पोत' चढि धोर । अब सुखौं नेहें जन तीर।११४॥ सिवपुरि पौर’ भरमपट' जहा। मोह मुहर दिढ कोनो तहा॥ तुम वानी कूचो कर घार । अब भवि जीव लहैं पयसार ।११५ स्वयबुद्ध वोधन-समरत्य। तुम पर प्रतिबुध वचन प्रकत्यं ॥ ज्यो सूरज प्रागे जिनराज । दोप दिखावन है वेकाज ॥१६॥ हम नियोग प्रोसर यह भाय । तातै कर वीनती प्राय ।। धरिये देव महाव्रत भार । करिये कर्मसत्रुसघार ॥११७॥ हरिये भरम तिमिर सर्वथा । सूझ सुरगमुकतिपथ जथा ॥ यो थुति करि बहुभाव दिढाय । वारवार चरनन सिर नाय ११८ साधि नियोग' गये निजथान । लोकातिक सुर बडे सयान ।। अब चौविध इन्द्रादिक देव । चढि निज निज वाहन बहुभेव१६ हर्षित उर परिवारसमेत । प्राये तृतिय कल्यानक' हेत ।। सुर वनिता नाचै रस भरीं । गावै मधुरगीत किन्नरों ।।१२०॥ बाजे विविध वजे तिस बार । कर अमरगन जय जय कार । सोवन' कलस भरे सुरराय । विमल छोरसागर-जल लाय १२१ हेमासन' थापे जिनराय । उच्छवसहित न्हौन-विधि ठाय ।। भूषन वसन सकल पहिराय । चदनाँचत कोनी काय । १२२॥ इस औसर प्रभु सोहैं एम । मोखबघुवर दूलह जेम ॥ १ कठिनता से तरनेयोग्य २ समुद्र ३ जहाज ४ पोल ५ किवाड म्होर सो ७ प्रवेश ८ उपदेश योग्य ६ वेकार १. नियम से होनेवाला काय ११ तप कल्याण १२ सोने के १३ स्वर्ण सिंहासन ।
सातवा अधिकार [ १२७ -~- कहि वैराग वचन जिन तबै । प्रतिबोधे' परिजन जन सबं ।। प्रति हठसौ समझाई माय । लोचन भरे वदन विलखाय ।। विमला नाम पालको सान । पानी इन्द्र चढे जिनराज ।१२४॥ पहले भूमिगोचरी' राय । सात पैड़ लोनी सुखदाय ।। फिर विद्याधर राजा रले । पैड सात ही ते ले चले ॥१२५॥ पोछे इन्द्रादिक सुरसघ । कार्य षरी चले पुर लघ ।। ना प्रति निकट न दीसे दूर । नभ मारग देख जन भूर ।१२६। दोहा। जिस साहबको पालको, इन्द्र उठावनहार ॥ तिम गुनमहिमा कथन अब, पूरन होउ अपार ॥१२७।। चौपई। यो सुर नर हरषित भये । अस्व नाम वनमै चलि गये ।। बड़तरतले सिला सुभ जहां । कोनों सचो साथिया तहा ।। उतरे प्रभु अति उत्तम ठाम । सात भयो कोलाहल ताम ॥ सत्रुमित्र ऊपर समभाव । तिन-कचन गिन एकसुभाव ॥१२६ सोमभाव स्वामी उर धार । पटभूषन सब दीन डार ॥ उदासीन उत्तरमुख भये । हाथ जोर सिद्धन प्रति नये ॥१३० दुबिध परिग्रह ताज परमेस । पच'-मुष्टि लोचे सिरकेस ।। सिधकामिनिको दूती जोय । धरी दिगबरमुद्रा सोय ॥१३१॥ १ समझाये २ पृथ्वो पर चलने वाले ३, राजा ४ पदवीधारी पुरुष ५ इन्द्राणी ६ सौम्यसाध ( रागद्वेष, रहित ) ७ वस्त्राभूषण ८ पाच मुट्ठी है उसाडे।
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पाटयाधिकार । १२६ पाठवा अधिकार मान्ठा। जाप्रभुको जसहंस', तीनलोक पिंजर यसै ।। सो मम पाप विधंस, करी पास परमेस नित ॥१॥ पीप। प्र जिन उठे जोग-प्रवसान । देहहेत उद्यम उर पान ।। परमउदास प्रधोगत दोठ' । महजसातमुद्रा मनईठ ॥२॥ दया-नोर-निमंल-परवाह । गुलर-सेटपुर पहुचे नाह'। लाभ पलाम बरावर धार । निधन धनको नाहि विचार ।३। ब्रह्मदत्त नूपति बढ़भाग । प्रभुको देखि वढयो उरराग ।। उत्तमपात्र सफलगुनधाम । करि प्रनाम पड़िगाहे ताम ॥४॥ हेमासन थाप्यो नरराय । प्रासुफ जल परछाले' पाय ।। पाठभांति पूजा विस्तरी। हाथ जोर अजुलि सिर धरी ।। मन-तन-वायक सुद्धसरूप । नौ दातागुनसंजुत भूप । सुद्ध अन्न दोनों परवीन । प्रासुक मधुर दोषदुखहीन ।।६।। उत्तमपात्र दानविधि करी । तीनभवन कीरति विस्तरी॥ पंचाचरज भये नृपधाम । फिर स्वामी प्राये वन-ठाम ।।७।। कर घोर तप साधे जोग । दरसन करत मिट सब सोग ।। प्रचल अंग मुख सोहे मौन । एकचित्त निजपद चितौन ॥८ १.कोति रूपी हम २ नीचे देखना ३. दृष्टि ४ मन को भाने वाली ५ नाथ ६, पोये ७.बबन .. तिन ।
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पाठवाँ अधिकार [१३१ दोहा। यों दुद्धर तप करत प्रति, धर्मध्यानपदलीन ।। चार मास छदमस्त' जिन, रहे रागमलहीन ॥१५॥ चौपई। एक दिवस दोच्छाबन नहा । जोगलोन प्रभु निवस तहां ।। काउसग्ग तन विगतविरोध । ठाड़े जिनवर जोगनिरोध ।१६ संवर नाम जोतिषी देव । पूरवकथित कमठचर एव ।। अटक्यौ अबर' जात विमान । प्रभु पर रह्यो छत्रवत प्रान।१७ ततखिन अवधिग्यानबल तबै । पूरव बैर संभालो सबै ।। कोप्यो अधिक न थाम्यौ जाय। राते लोयन प्रजुली काय । प्रारंम्यौ उपसर्ग महान । कायर देखि भजे भयमान । अधकार छायो चहुंओर । गरज गरज बरखै धन घोर ।१९॥ झरे नीर मुसलोपम धार । वक्र बोज" झलक भयकार ।। बूड़े गिरि तरुवर बनजाल । झझा वायु बही विकराल ॥२०॥ जल थल भयो महोदधि"एम। प्रभु निवस कनकाचल जेम।। दुष्ट विक्रियावल अविवेक । और उपद्रव करे अनेक ॥२१॥ छप्पय। किलकिलंत बेताल'३, काल कज्जल"छबि सज्जहिं । भी कराल विकराल, भाल मदगज जिमि गजहि ।। । केवलज्ञान के पूर्व की दशा, २ कायोत्सर्ग ३. आकाश ४ इसी समय ५ माल .भाखें ७ जली ८. शरीर .. टेढी १.. बिजली ११. समुद्र १२. सुमेरु १६. व्यतरदेव १४, काजल के समानकाले । .
१३२ ] पार्श्वपुराण मुडमाल' गल धरहि, लाल लोयननि डहि जन । मुख फुलिग फुकरहि, करहिं निर्दय धुनि हन हन । इहि बिध अनेक दुर्भेष धरि, कमठजीव उपसर्ग किय । तिहुंलोकबद जिनचद्रप्रति, धूलि डाल निज सीस लिय ।।२२ दोहा। इत्यादिक उतपात सब, वृथा भये प्रति घोर । जैसे मानिक दीपकौं, लगन पौन झकोर ।।२३।। प्रभु चित चल्यो न तन हल्यो, टल्यौ न धीरज ध्यान । इन अपराधी क्रोधवस, करी वृथा निज हान ॥ २४ ॥ पावक पकर हाथसौं, अवसि हाथ जलि जाय । परके तन लागे नहीं वाके पुन्यसहाय ।। २५ ॥ प्रानी विषयकषायवस, कौन कौन विपरीत । करत हरत कल्यान निज, जलौ जलौ यह रीत ॥ २६ ॥ प्रभु अचित्य -महिमा-धनी, त्रिभुवनपूजित-पाय । तिनके यह क्यो सभव, सुर उपसर्ग कराय ।। २७ ॥ इहि बिध जो कोई पुरुष, पूछ संसय राखि । ताके समुझावन निमित, लिखूजिनागम साखि ।।२८।। चौपई। अवसर्पनि उतसर्पनि काल । होहिं अनतानत विसाल ॥ भरत तथा ऐरावतमाहिं । रहटघटोवत आवै जाहि ॥३१॥ १ कटे शिरो की माला २ भाग ३ खोटे भेष १ अग्नि ५ प्रवाश्य ६ चितन में न प्राने योग्य ।
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माठ अधिकार [ १९५ -RA चौपई। इहिविध वेसठ प्रकृति निवार । घाते कर्म घातिया चार ।। चंतअंधेरी चौदस जान । उपज्यो प्रभु के पंचम' ग्यान ।५०। लोकालोक चराचर भाव । बहुविध परजयवंत सुभाव ।। ते सब मान एक ही बार । झलके फेवल मुकुर मंझार॥५॥ भये अनंत चतुष्टयवंत । प्रगटी महिमा अतुल अनत ॥ दिव्य परम प्रौदारिफ देह । कोटि भानुदुति जीती जेह ।५२॥ अलोकोक अद्भत संपदा । मडित भये जिनेसुर तदा ।। बचनअगोचर महिमा सार । बरनन करत न पइये पार ।५३। दोहा। पाच हजार प्रमान धनु', उपजत केवलग्यान । अंतरिच्छ प्रभु तन भयो, ज्यों ससि अबस्थान *॥५४॥ चौपई। प्रकटी केवल रविकिरन जाम । परिफूल्यो त्रिभुवन कमल ताम प्राकास अमल दीसे अनूप । दिसि-विदिसि भई सब विमलरूप सुरलोक बजे घंटागरिष्ट । तरु करन लगे तहां पुहपविष्ट ।। इद्रासन कापे प्रतिगरीस । प्रानम्र भये मनिमुकुट सीस ॥५६ इत्यादिक बहुविध चिह्न चार । प्रभु केवलसूचक भये सार ॥ । * उक्त चगाया- जादे केवलणाणे परमोदार जिणाण सध्वाण । गच्छदि उबरे चाया पचसहस्सारिण पसुहायो। १ केवलज्ञान २ काष ३ धनुष ४ माकाश ५ झुझे।
1] - नय प्रयघि जोटि जान्ची मुरेमा पमं पागमटिमा. मिहामन तजि निज मीमनाय । प्रनमी पर्गम नप जानना द्रानी पहा रन । यो प्रामन नदिन नुन्न ।५। दिन सान्न न्वामी नयी नीम । याशी प्रतिउरईन ।। तव दोने विमिन देवगः । प्रन उपची पेवल्यान मार ॥ ऐरावनगज नजि मपन्धिार । प्रयमेट चन्यो प्रानद प्रचार बाजे वह पह पयान मं । नव बग्नन पन्त नगं प्रवेरा ईमानप्रमुख नर वगनाय । निस्वाहन चदि बाट बने नाय। हग्निाद' मुन्यो जोनिपी देव । नादिबने तर पत्र मेवा भावन-घर बाजे नत्र नि । सविध मुर निस्ने हरप पूरि।। वसु विनर-घर गरजे निमान। यों परिजन नब कीनी पयाना यो बली चतुरविध सुरनमाज । जिन-रेवनपूजा करन सार। अब जि माये अनिमाहिं । नहें नमोसरन घज फरहहि जो मुरपतिको उपदेश पाय । धनपतिने दोनों प्रथम प्राय ।। वर पचवन्न मनिमय अनूप । गलटमीको कुनगृह मरूप ।। दाहा। ममोमरनको नपदा, लोकोतर तिह भीन । वचनद्वार बन्ने तिम, मो बुध ममरय कौन ॥५॥ मोन्टा। पं यन्न अवसर पाय, धर्मध्यानकारन निरवि ।। नित्यो लेन मन लाय, पढन मुनत यानंद बड़े ॥६॥ बारा २ नम: ना. निद बी वान १ ६ प्रग ७ प० ८ पुर।
- पाठवाँ अधिकार [ १३७ चौपई पहले गोलपीठिका ' ठई । इद्रनोलमनिमय निर्मई ॥ पांच कोस चौड़ी परवान । तीनलोक उपमा नहिं पान ।। जाके चहुदिस गिरदाकार' । बनी पैडिका बीसहजार ।। हाथ हाथपर ऊचो लसें । नभपरजंत देखि दुख नसै ॥६७॥ तापर धूलीसाल उतग। पंचरतनरजमय सरवंग ।। विविध बरनौं बलयाकार' । झलकै इन्द्रधनुष उनहार ॥६८ कहीं स्याम कहि कंचनरूप । कहिं विनु म कहि हरित अनुप ।। समोसरन लछमीको एम । दिपै जड़ाऊ कु डल जेम ॥६६॥ चारौं दिसि तोरन बन रहे । कनक थभ ऊपर लहलहे ।। मागे मानभूमि है जहा। मानथभ चारोदिसि तहां ॥७०॥ तिनको प्रथम पीठिका बनी । सोलह पैड़ी संजुत ठनी । चार चार दरवाजे ठान । तीन तीन तहा कोट महान ७१ तिनमै और त्रिमेखलपोट । तिनपै मानथभ थिर दीठ ।। अति उतग कचनके ठये। छत्रधुजादिकसौं छबि छये ॥७२॥ जिन देखि मानी मद-बढे । उतरे मान-महागिरि-चढे । मूलभाग प्रतिमा मनहरै । इद्रादिक पूजा विसतरै ॥७३॥ एक एक दिसि चहुं दिसि ठई । सहज वापिका वारिज-छई नदादिक सुभ जिनके नाम । चारौं दिसि सोलह सुखधाम ।। प्रागे खाई सोभित खरी । औंडी अधिक विमलजलभरी ।। रतन-तीर राजे चहुँोर । हसकलाप करै जहं सोर ॥७॥ १ चबूतरा २ गोलाकार ३ सीढिया ४ गाल ५ मानस्तम्म तीन मेखला वाला चबूतरा ७. बावही ८ हसो का समूह ।
१३८ ] पार्श्वपुराण दोहा । बलयाकृति' खाई वनी, निर्मल जल लहरेय । किधी विमल गंगानदी, प्रभु परदछना देय ।।७।। चौपई मागे पुहपवेल-वन सार । महासुगध मधुपमुखकार ।। सघन छाह सब रितुके फूल । फूले जहां सकल सुखमूल ७७॥ याकै कछु अतर दुति धरै । कचन कोट प्रथम मनहरं ।। वलयाकृति अति उन्नत जेह । मानौं मानुषोत्र गिरि येह 155 चहुँदिसि सोहैं चार दुवार । रूपमई तिखने मनहार ।। रतनकूट ऊपर जगमगे । लाल बरन अतिसुन्दर लगे 11७६ किधौ अरुन-छबि हाथ उठाय । जगलछमी नाचे विहसाय । नौनिधि जहा रहैं अभिराम । पिंगलादि हैं जिनके नाम ८० प्रभुप्रजोग' गिन दीनी छार' । वे मचली सेवै दरबार ।। मंगल दरव एकसौ पाठ । घरे प्रतेक मनोहर ठाठ ।।८१॥ गावै जिनगुन देवकुमार । और विविध सोभा तह सार ।। वितरदेव खड़े दरवान । विनयहीनको देहि न जान ॥२॥ यह पहले गढ़को बिधि कही। आगे और सुनौ अब सही॥ गोपुर तजि चारौं दिसि गली । गमनहेत भोतरकौं चली।६३ तहां निरतसाला दुहुँ पास । सब दिसिमै जानौ सुखवास ।। सुवरनथभ फटिकमय भीत । तिखनी मनिमय सिखर पुनीत १ गोल २ पुष्प वेल ३ भौरे ४ अयोग्य ५ राख ६ गिरीपडी . दरवाजे ८ तीन खन का ।
पाठवा अधिकार [ १३६ सुरवनिता नाचै तह एम । लावन-तोय तरंगनि' जेम ॥ मदहास मुख सोहैं खरी । जिनमगल गावै सुखभरीं ॥५॥ बाजे बोन बासली ताल । महा मुरजधुनि होय रसाल ॥ मागे बीथी अतर धरे । दोनों दिसा धूपघट भरे ॥६॥ सोरठा। स्याम वरन यह जानि, धूप धुआं नभौं चल्यो। किधौं पुन्य-डर मानि, धूनां मिस पातक' भज्यो ।।७।। चौपई। प्रागे चार बाग चहुँ ओर । प्रथम असोक नाम चितचोर । सप्तपरन चंपक सहकार । ये इनकी संग्या' अविधार ।।८।। सब रितुके फल-फूलन-भरे । बिरछ बेलसो सोहत खरे॥ वापीमडप महल मनोग । राजै जहां जथाबिध जोग ॥८६॥ चैत-बिरछ चारों बनमाहि । मध्यभागसुन्दर छवि छाहि ॥ जिनमुद्रामडित मन हरे । सुर नर नित पूजा विस्तरै ॥१०॥ बाग प्रोट बेदी चहुंओर । चार द्वारमडित छबि-जोर ।। अब इस बन-बेदीतै सही । गढपरजत गली जे रही ॥१॥ तिनमैं धुजापाति फहराहि । कचनथभ लगी लहराहि ॥ दसप्रकार आकार समेत । तिनके भेद सुनौ सुखहेत ॥१२॥ माला वसनमोर अरविंद । हंस गरुड हरि वृषभ गयंद' चक्रसहित दस चिहन मनोग । धुजा दुकूलनि सोहैं जोग ।। १ जहर २ पाप ३ नाम ४ वस्त्र ५ कमल ६ हाथी ७ कपड़ा।
१८. ] ता ये दस एक जातको लान । एक एम्मी पाठ प्रमान । दमन अनी म मिल भई । एक दिमाम मन बरनई ॥४॥ चारों दिमिकी जोट मरीम । चार हजार तीन वीम॥ यह परमित जिनसामनमाहि । प्रतिबिचित्र मोमा अधिकाहि हाल धुजा पवन-बम येह । निनपूजन भवि प्राये जेह ।। पयसेद तिनको मन प्रान । करत रिची मनकार-विधान मानयम धुजयन अनूप । चतविरय बेदी गटप ॥ इत्यादिक ज्चे इमार । जिन-सनतं वाग्ह गुन घार ॥९७ । आगे रजतमयी निरमान' । ठग कोट अति धवल महान किर्धी सेत प्रभु-मुजस-प्रदान । फेरी देय फिरयो चहपान II पूरबवत दरवाजे चार । रतनमई अनुपमछदि-बार ।। नौनिधि मगलदरव नमाज । तोरनप्रमुम्ब और मब ताज 1 प्रयमकोरवग्ननसम जान । ठाउँ भवन देव दरवान । यासौं लगी और अब गली। चारों तरफ एक मो चली ॥१० कलपविरह-वन राज तहा । दस विध कलपतरोबर जहा।। भूषन वमन लगे जिन डार । नोभा रहत न लहिये पार ।। मध्यभाग जिनविवसमेत । सिद्धारथ तत्वर छवि देत ।। चहुँदिमि वेदो चहुँ दिमि हार । रचना और प्रनेक प्रकार ।। इम वेदीके बाहर भाग । प्रागे फटिक कोट लौ लाग ।। प्रति विचित्र महलनको पाति । जिन सिर रतनकूट बहुभाति ' बनाई २ श्री: एक वृक्ष विष । .
Par- -~-~- NWAR - प्राठवा प्रधिकार [ १४१ चंद्रकांतिमनि-भासुर' भीत । सुवरनमय तहा थभ पुनीत ।। सुरनरनाग रमै जिनमाहि । किन्नरगन बहु केलि फराहि।१०४ वीथो'मध्यदेस सुभस्प । पद्मराग-मनिमय नव तूप ।। घुजा छन घंटा छवि देहिं । जिनमुद्रासी मन हर लेहि ।।१०५ प्रागं तृतिय कोट वन एम । फटिकमई निर्मल नभ जेम ।। अति उतग सो वलयाकार । लालवरन मनिनिमित द्वार ।। और कथन पुरववत जान । ठाड़े सुरगदेव दरवान ।। महामनोहर लोचनहारि । अनुपमसोभा अचरजकारि ।१०७॥ अव सुनि मध्य भूमिको कथा । फटिककोटभीतर विधि जथा। गढी प्रथमपीठ लग लगी। फटिफभीत सोलह जगमगी।१०८ तिनपं रतनयम छवि देहिं । प्रभा-जालसौं तम हर लेहि ।। तिनही श्रीमडप छयो । फटिकमई नभमै निरमयौ ॥१०॥ सोरठा। या श्रीमंडपमाहि, निरावाध' तिहुं जग बसे । भीर होय तहां नाहि, त्रिभुवनपति अतिसय अतुल ॥११०॥ चौपई। भीतन बीच गली जे रहीं । बारहसभा तहां जिन कहीं। बैठे मुनि अपछर अज्जिया । जोतिष-वान-असुर-सुर-तिया। भावन वितर जोतिषि देव । कल्पनिवासी नर-पसु एव ।। तिनमें प्रथम पीठिका ठई । अनुपम बैंडूरज-मनिमई ।।११२॥ १ चमकदार २ गली ५ चमक ४ वाधारहित ५ मीह ६ प्रायिका ।
१८. 16गा। मोरकाठवत प्राभा जाम । मोलह पं: माल नई पाम ।। वारह सभा महा दिम चार । निनकी यह पय मातह मार। मगलदरव जहा मब धरे । जरदेव मेवर तहा परे ।। धमचक तिन सिर दिप । जिनगी देग्मिदिवाकर दिपं ११४ तापर दुतिय पोठिका बनी । चामोकरमय राजत धनी ॥ मेरुशृङ्गवत उन्नत एम । जगमगाय मउल रवि जेम ॥११॥ पाठधुजा पाठी दिमि जहा । तिन मोभा बग्नन बुधि कहा। तिनम पाठ चिहन चित्राम । चफ गयद वृषभ अभिराम ११ वारिज वसन केहरोत्प । गा माल अाकार अनूप ॥ मदपवनवस हाले जेह । किधी पापरज भारत येह ।।११७॥ तापर तृतिय पोठिका और । तीन मेग्वला-मडित ठौर ।। सर्वरतनमय झलकत सगे। फिरन जास दस दिसि विस्तरो। गधकुटो तहा बनी अनूप । पचरतनमय जडित सरूप ।। जाके चार द्वार चहुंओर । झलक मानिक होरा-होर ।११६ तीनपीठ सिर सोहत खरी । कि!' त्रिजगछवि नोची करो परम सुगध न बरनी जाय । सुन्दर सिखर धुजा फहराय तहां हेम-सिंहासन सार । तेजसरूप तिमिर छयकार ॥ नानारतन प्रभामय लसै । जगलछमी प्रति किरनन हस ॥ वचनगम्य नहिं सोभा जहा । अतरीच्छ प्रभु राजै तहा ।। त्रिभुवनपूजित पासजिनेस । ज्यो जगसिखर सिद्धपरमेस ।। ॥ १ सूर्य २ सोना ३ चोटी ४ मानो ५ भाका मे।
पाठवा अधिकार। । १४३ दोहा। समवसरन रचना अतुल, ताको अति विस्तार । संपति श्रीभगवानकी, कहत लहत को पार ॥१२३।। सोरठा। जिन-बरनन-नभमाहि, मुनि विहग उद्यम करै । पै उड़ि पार न जाहिं, कौन कथा नर दीनको ॥१२४॥ गीता राजत उमंग असोक तरुवर, पवनप्रेरित थरहरै ॥ प्रभु निकट पाय प्रमोद नाटक, करत मानौं मनहरै ।। तिस फूलगुच्छन भ्रमर गुंजत, यही तान सुहावनी । सो जयौ पासजिनेन्द्र, पातकहरन जगचूडामनी' ।।१२।। निज मरन देखि अनग डरप्यो, सरन ढूढत जग फिरयो । कोऊ न राख चोर प्रभुको, प्राय पुनि पायन गिरयौ ।। यो हार निज हथियार डारे, पुहप-बरसा मिस भनी । सो जयौ पासजिनेन्द्र, पातकहरन जगचूडामनी ॥१२६।। प्रभु अग नील उतग नगते, वानि सुचि सीता ढली । सो भेदि भ्रम गजदत पर्वत, ग्यानसागरमै रली ॥ नय सप्तभगतरंगमडित, पापतापविधसनी । सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूड़ामनो ॥११७॥ चद्राचिचय छबि चार चचल, चमरबंद सुहावने । ढोले निरतर जच्छनायक, कहत क्यों उपमा बने ।। १. शिखामणी २. पहाड ३. वाणी ४ पयी ५, चन्द्रिका ।
पापुराग यह नीलगिरि मिगर मानौ, मेघकर लागो घनी । मो जयो पामजिनद्र, पातकरन जगनामनी ॥१२॥ होराजवाहरचित' वविध, हेमग्रामन गजाए। तह जगतजनमनहरन प्रभुतन, नीलवन विगए । यह जटित वारिज मध्य मानी, नीलमनिकलिका' बनी। सो जयो पामजिनेंद्र, पातकहरन जगनूडामनी ।। १२६।। जगजीत मोह महान जोधा, जगतमै पदहा दियो । सो सुफलध्यान कृपानवल, जिन बिकट वरी बम कियो । ये वजत विजय निमान दु दुभि, जोत सूचं प्रभुननो। सो जयो पासजिनेंद्र, पातकहग्न जगचूडामनी ।।१३०।। छदमस्त पदमै प्रथम दरसन, ग्यान चारित प्रादरे । अव तीन तेई छत्र छलसी, करत छाया छवि-भरे ।। अति धवलरूप अनूप उन्नत, सोमविवप्रभा' हनी । सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूडामनी ।।१३१॥ दुति देखि जाको चाव सरमै', तेजर्सी रवि लाजए। मव प्रभामडलजोग जगमे, कौन उपमा छाजए॥ इत्यादि अतुल विभूतिमडित, सोहिए त्रिभुवनधनो । सो जयौ पासजिनेंद्र, पातकहरन जगचूडामनी ॥१३२॥ यो असम महिमासिंधु साहब, सक्र पार न पावही । तजि हासभय तुम दास 'भूधर', भगतिवस जस गावही ॥ १ जडित २ कमल ३ कलो ४ चन्द्रबिब ५-६ सज्जितहो ७ उपमारहित पाठव अधिकार । १४५ अव होउ भव भव स्वामि मेरे, मै सदा सेवक रही। कर जोर यह वरदान मार्गों मोखपद जावत' लहौ ।१३३। चौपई। इह विध समोसरनमडान । कियो कुबेर जथाबिध थान ॥ प्राये सुर वरसावत फूल । जयजयकार करत सुखमूल ।१३४। अति प्रसन्नता सब विध भई । हरसत तीन प्रदछिना दई । धूलसालिमे कियौ प्रवेश । चकितभयौ छवि देखि सुरेस ।१३॥ मुदित महधिक देवन साथ । जिनसनमुख पायौ सुरनाथ । हस्तकमल जोरे अमरेस' । देखे हग भरि पासजिनेस ।१३६। मनि उतग आसन पर ईस । मानौं मेघ रतनगिरि-सीस ।। फैल रही तनकिरनकलाप। कोटभानुसौं अधिक प्रताप।१३७। विकसत चित रोमांचित काय । प्रनम्यौ चरन सोस भुविलाय।। मनिझारी भरि तीरथतोय । पूजे मघवा जिनपद दोय।१३८ । सुरग-सुगन्धनि भक्ति बढ़ाय । अरचे इन्द्र जिनेसुरपाय ।। मुक्ताफलमय अच्छत" लिये। पुज" परमगुरु आगे दिये१३६ पारिजात मंदार मनोग । पुहप चढ़ाये जिनवर जोग ।। सुधापिड चरु लेय पवित्त । पूजा करी सक्र धरि चित्त ।१४।। रतनप्रदीप रवाने खरे । श्रीपति पांय सचीपति धरे ।। देवलोककी अगर अनूप । पासचरन खेई सुरभूप ॥१४१॥ १ जवतक २ महा अदिघारी ३. इन्द्र ४. बादल ५ समूह ६ करोडों सूर्यो से ७. इन्द्र ८ पूजे ६ मोती समान १. चावल ११ समूह ।
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प्राठवाँ अधिकार [१४७ - क्रोधमहानलमेघ प्रचड । मानमहीधरदामिनिदंड ।। मायाबेलधनजयदाह । लोभसलिलसोषक दिननाह॥१५१।। तुम गुनसागर अगम अपार । ग्यानजिहाज न पहुँच पार ।। तट ही तट पर डोलत सोय । स्वारथ सिद्ध तहांहो होय।१५२॥ प्रभु तुम कोतिबेल बहु बढी । जतनबिना जगमडप चढी ।। और अदेव सुजस नित चहैं । ये अपने घरही जस लहै ।१५३। जगतजीव धूमैं बिनग्यान । कीने मोहमहाविषपान ।। तुमसेवा विषनासन जरी । यह मुनिजन मिलि निहच करी । जन्मलता मिथ्यामतमूल । जामनमरन लगै जिहि फूल ।। सो कबही बिन भगतिकुठार । कट नहीं दुखफलदातार।१५५। कलपतरोवर चित्राबेल । काम-पोरसा नौनिधि मेल । चितामनि पारस पाषान । पुन्यपदारथ और महान ॥१५६॥ ये सब एकजनमसंजोग । किंचित सुखदातारनियोग ।। त्रिभुवननाथ तुमारी सेव । जनमजनम सुखदायक देव ।१५७। तुम जगबाधव तुम जगतात । असरनसरन-विरद-विख्यात । तुम जगजीवनके रछपाल । तुम दाता तुम परमदयाला १५८ । तुम पुनीत तुम पुरुष-पुरान' । तुम समदरसी तुम सबजान । तुम जिन जग्यपुरुष परमेस । तुम ब्रह्मा तुम विष्णु महेस।१५। तुमही जगभरता जगजान । स्वामि स्वयंभू तुम अमलान । तुम बिन तीनकाल तिहुलोय । नहिं नहिं सरन जीवकों कोय।। १ भग्नि २. सूर्य ३ मद्भुत बेल ४. इच्छापूर्ण करने वाली ५ पौराणिक पुरुष । १४८ ] पार्श्वपुराण तिस कारन करनानिधि नाथ । प्रभु सनमुख जोरे हम हाथ । जबलौ निकट होय निरवान । जगनिवास छूट दुखदान ।१६१ तब लो तुम चरनाबुज-बास । हम उर होहु यही अरदास' । और न कछु बाछा भगवान । यह दयाल दीजै वरदान ।१६. दोहा। इहिबिध इन्द्रादिक अमर, करि बहु भगति विधान । निज कोठे बैठे सकल, प्रभु सम्मुख सुखमान ॥१६३॥ जीति कर्मरिपु जे भये, केवललब्धि-निवास । ते श्रीपारसप्रभु सदा, करो विधन-धन' नास ॥१६४॥ इति श्रीपार्श्वपुराणभाषाया भगवत्ज्ञानकल्याणकवर्णन नाम अष्टमोधिकार । नौवाँ अधिकार सोरठा। पारसप्रभुको नाउँ, सार सुधारस जगतमै । मै याकी बलि जाउँ, अजर-अमर-पदमूल यह ॥१॥ दोहा। बारह सभा सुथानमधि, यो प्रभु प्रानन्दहेत । जथा कमलिनो खंडको, ससिमंडल सुख देत ॥२॥ विकसितमुख सुरनर सकल, जिनसन्मुख करजोर । निवसै प्यासे अमृतधुनि, ज्यौं चातक धनमोर ॥३॥ १ प्राथना २ बादल-समूह ३ कुमोदिनी।
नौवां अधिकार। [ १४९ । - चौपई। तब-गनराज स्वयभू नाम । चार ग्यानधारी गुनधाम ।। करि प्रनाम पारसप्रभुप्रोर । विनती करी करांजुलि जोर॥४॥ भो स्वामी त्रिभुवनघर येह । मिथ्यातिमिर छयौ प्रति जेह । भूले जीव भमै तामाहिं । हितअनहित कछु सूझ नाहिं ॥५॥ श्रीजिनवानी दीपक-लोय । ता बिन तहां उदोत' न होय । ताते करुनानिधि स्वयमेव । करि उपदेश अनुग्रह देव ॥६॥ जाननजोग कहा है ईस । गहनजोग सो कह जगदीस ॥ त्यागनजोग कहो भगवान । तुम सबदरसी पुरुष प्रमान ॥७॥ कैसे जीव नरकमै परै । क्यो पसुजौनि पाय दुख भरे ।। काहेसौं उपज सुरलोय । कौन कर्मतै मानुष होय ॥८॥ कौन पापफल जनमै अध । बहरा कौन क्रियासम्बन्ध ।। किस अघ उदय होय नर पग । गूगा किस पातक-परसंग ।। कौन पुण्यते दरव अतीव । क्यो यह होय दरिद्री जीव ।। पुरुष-वेद' किस कर्म उदोत । नारि नपु सक किस विध होत । किम आचरन बडी थितिधर । क्यों करि अलप आयु धरि मरे। भोगहीन अरु भोगसमेत । सुखी दुखी दीख किस हेत ॥११॥ किस कारन मूरख मतिहीन । क्यो उपज पडित परवीन ।। किस करनीत होय सरोग । किस अधर्मतै पुत्रवियोग ।।१२।। विकल सरीर पाय दुख सहै । नीच ऊंचकुल कैसे लहै ।। किनभावनि भवथिति विस्तर। भवथितिभेद कहाकरि करें। १ प्रकाश २, दया ३ लिंग।
-- १५० ] पावपुराण क्योकर होय सुरगमै इन्द्र । कस पद पावै अहमिंद्र ।। चक्रीपद किस पुन्यउवोत । किमि वाध तीर्थकरगोत ॥१५॥ इत्यादिक यह प्रस्न समाज । इनको उत्तर कह जिनराज ॥ तुम सब संसयहरन जिनेस । जैसे भवतमदलन दिनेस ॥१५॥ दोहा। तब श्रीमुखवानी विमल, विन अच्छर गम्भीर ।। महामेघकी गरज सम, खिरी हरन जगपीर' ॥१६॥ तालु होठ सपरस बिना, मुखविकार बिन सोय । सब भाषामय मधुरतर, श्रीजिनकी धुनि होय ॥१७॥ जया मेघजल परिनमैं, निबादिक रसरूप । तथा सर्वभाषामई, श्रीजिनवचन अनूप ॥१८॥ चौपई। छहाँ दरब पंचासतिकाय । सात तत्त' नौ पद समुदाय ॥ जाननजोग जगतमै येह । जिनसौं जाहिं सकल सदेह ।।१६।। सब बिध उत्तम मोखनिवास । आवागमन मिटै जिहिं वास ।। ताते जे सिवकारन भाव । तेई गहनजोग मन लाव ॥१०॥ यह जगवास महादुखरूप । तातै भ्रमत दुखी चिद्रूप ॥ जिनभावन उपजे संसार । ते सब त्यागजोग निरधार ॥२१॥ नरकादिक जग-दुख जावत । पापकर्मबसतै बहुभंत ॥ सुरगादिक सुखसति जेह । पुन्य तरोवरको फल तेह ॥२२॥ । १ ससार के दुख २ नीम आदि ३ तत्त्व ।
नोर्वा अधिकार [ १५१ दोहा। इहि बिध प्रस्नसमाजको, यह उत्तर सामान । अब विसेस इनको लिखौं, जथासकति कछु जान ॥२३॥ जीव अजीव विसेस बिन, मूल दरब ये दोय । इनहीको फैलाव सब, तीनकाल तिहुँ लोय ॥२४॥ चेतन जीव अजीव जड़, यह सामान्यसरूप । अनेकांत जिनमतविर्ष, कहयौ जथारथरूप ॥२६॥ दरव अनेक नयातमक', एक एक नय साधि । भयो विबिध मतभेद यौं, जगमै बढी उपाधि ॥२६॥ जन्मअध गजरूप' ज्यो, नहिं जाने सरवंग । त्यो जगमै एकात मत, गहै एक ही अंग ॥२७॥ ता विरोधके हरनौं, स्यादवाद जिनवैन । सब ससयमेटन विमल, सत्यारथ सुखदैन ॥२८॥ सात भगसौं साधिये, दरवजात जामाहिं । सधै वस्तु निरविघन तब, सब दूषन मिट जाहिं ।।२९।। धनाक्षरी। अपने-चतुष्टको' अपेच्छा दर्व 'अस्ति' रूप, परकी अपेच्छा वही 'नासति' वखानिये । एकही समै सो 'अस्ति नासति' सुभाव धरै, ज्यों है त्यो न कहा जाय 'प्रवक्तव्य मानिये ॥ अस्ति कहै नासति प्रभाव 'अस्ति प्रवक्तव्य', १ नयात्मक २ हाथी का स्वरूप ३. स्व चतुष्टय (द्रव्य, क्षेत्र काल, भाव ) १५२ ] पाश्वपुराण त्यों ही नास्ति कहैं 'नास्ति प्रवक्तव्य' जानिये ।। एक बार अस्ति नास्ति कह्यौ जाय कैसै ताते, 'अस्तिनास्तिप्रवक्तव्य' ऐसे परवानिये ॥ ३० ॥ दोहा। इहि विध ये एकातौं, सात भंग भ्रमखेत । स्यादवाद पौरुष घर, सव भ्रमनासन हेत ॥३१॥ स्याक्सन्दको अर्थ जिन, कह्यौ कथचित जान । नागरूप' नयविषहरन, यह जग मंत्र महान ॥३२॥ ज्यों रससिद्ध कुधातु जग, कंचन होय अनूप । स्यादवाद-संजोगते, सब नय सत्यसरूप ॥३३॥ ....) चौपई। दरवदिष्टि जिय नित्तसरूप । परजयन्याय अथिर चिद्र प॥ नित्यानित्य कचित होय । कह्यौ न जाय कथचित सोय ।। नित्य अवाचि' कचित वही । अथिर अवाचि कथचित सही। नित्यानित्यवाचक जान । कहत कचित सव परवान ॥३५॥ इहिविध म्यादवाद नयछाहिं । साध्यौ जीव जनमतमाहिं ।। और भाति विकलप जे करें । तिनके मत दूपन विमतर।३६। जीव नाम उपयोगी जान । करता भुगता देहप्रमान । जगतम्प मिवरूप अत्प । ऊरधगमन मुभावसरूप ॥३७॥ १ कप २ मा प्रवनव्यह बराबर !
नौवा अधिकार [ १५३ सोरठा। ये सब नौ अधिकार, जीवसिद्धिकारन कहे। इनको कछु विस्तार, लिखौं जिनागम देखिकै ॥३८॥ चौपई। चार भेद व्यौहारी प्रान । निहचं एक चेतना जान ।। जो इनसौं नित जीवित रहै । सोई जीव जैनमत कहै ।३६। सोरठा । खाणारण आयु प्रथम प्राव अवधार', इन्द्री सांस उसांस बल । मूल प्रान ये चार, इनके उत्तरभेद दूस ॥४०॥ दोहा। पांच प्रान इन्द्रीजनित, तीनभेद बलप्रान । एक सास उस्वास गनि, अविसहित दस जान ॥४१॥ चौपई। सैनी जीव जगतमैं जेह । दसौं प्रानसौं जोवे तेह ॥ मनसों रहित असनी जात । ते नौप्रान धरै दिनरात ।४२॥ कान बिना चौइन्द्री जिते । पाठ प्रानके धारक तिते ।। तेइन्द्रीके प्राख न भनी । तातै सात प्रानके धनी ॥४३॥ नासा बिन वेइन्द्री जीव । तिन सबके षट प्रान सदीव ।। जीभ-वचनजित तन तास । एकेंद्रो चउ प्राननिवास ॥४४॥ दोहा । इहिबिध जीव अजीव सब, तीनकाल जगथान । सत्तासुख प्रवबोध चित, मुकतजीव के प्रान ॥४५॥ १ अवधारण करना २ नाक ३ दो इन्द्रिय ।
Frj । दोप्रकार उपयोग ज्ञान । वरन्न बार प्रा० विध मान ।। चन्छु प्रचन्छु अबधि प्रवधार । वन रे नव वरन्न डा।। प्रद मुन वनुविधयान-विधान । मनि-नवधानान मनपजय केवल निरहनेत । इनर प्रतन्छ परोह ॥४॥ मनितियान मादि दोय । रे परोह जान मद कोय ।। प्रधि और मनपरनाम्यान । एन्ज परतन्छ मन ।४) केवलग्णन सरल परनन्छ । लोशलोर-विनोन्न दन्छ । नहा अनंत दरमपराय । एक बार नाना प्राय ४३ रतन चार प्राविध प्यान । ये बहार बिह्न होगा निहाप विदात ह । बह ग्यान उमा गुनगेह ।।५।। कल्पित प्रसन्नत व्यवहार । तिन न पाहि मार ।। प्रनुपररित प्रजयारय । मंपिक करता विदरूप ॥५१॥ जब अनुनिहवल परं । तब यह रागदोपतों हरे ।। यही नु निह र जीव । युद्ध भावनातार ननोर ॥१२॥ का। प्रानी सुख दुख प्राप, नुगत पुगलमफन । यह व्यवहारी छाप, निहर्च निजनुभोगता ॥३॥ डोहा। रहमान व्यवहार कर, को ब्रह्म भगवान । दरवित नयको दिष्टिनों. लोकप्रदेशसमान ॥४॥ ३. सार २ घोड़ेला, नन ४ द्रव्य दृष्टि !
नौवां अधिकार [ १५५ प्रडिल्ल छद। लघुगुरु देहप्रमान, जीव यह जानिये । सो विथार' संकोच-सफतिसौं मानिये ।। ज्यो भाजन परवान, दीपदुति विस्तरै । समुरघात विन राम, यही उपमा धरै ॥५५॥ चौपई। तैजस कारमानजुत भेस । बाहर निकस जीवप्रदेस ।। छोड़े नहीं मूल तन ठाम । समुदघातविधि याको नाम ।५६। सातभेद सब ताके कहे । गोमटसार देखि सरदहे ॥ प्रथम वेदना नाम बखान । दुतिय कषाय नाम उर पाना५७। तन-विकुर्वना तीजो येह । चौथो मारनात' सुनि लेह ।। पंचम तेजस संग्या जान । छट्टम आहारक अभिधान ।५८। केवल समुदघात सातमा । ऐसी सकति धरै प्रातमा ॥५६॥ दुसह वेदनाके वस जहां । जीवप्रदेस कढत हैं तहां ।। किसी जीवक हो परवान । पहला समुदधात यह जान ।६०॥ जब नाहू रिपु करन विधंस । बाहर जाहिं जीवके अस ॥ अतिकषायसौं हो है तेह । दूजो समुदघात है येह ।।६१।। माना जात विक्रियाहेत । निकस ब्रह्मप्रदेस सचेत ।। देवनारकोके यह होय । तीजो समुदघात है सोय ॥६२॥ किसी जोक्के मरते समै । हस अंस तन बाहर गम' ।। १ विस्तार २ सिकुड़ना ३. वर्तन ४ जीव ५ विक्रिया ६ मारणास्तिक ७ नाममात्मा ९ निकले।
१५६ ] पाश्वपुराण बाधी गतिके परसन' काज । चौथो भेद कह्यौ जिनराज ।६३' जो मुनिक कछु कारन पाय । उपजे क्रोध न थाभ्यौ जाय ॥ तैजस तनको औसर यही । वाम' कघसौं प्रगट सही ॥६४॥ ज्वालामह काहलाकार' । पर सिदूरपु ज उनहार ॥ बारह जोजन दीरघ सोय । नौ जोजन विस्तीरन होय ॥६५॥ दंडकपुर वत प्रलय करेय । साधुसमेत भस्म कर देय ॥ असुभकषाय यही विख्यात । अब सुनि सुभ तैजसको बात ।। दुभिच्छादिक दुख अविलोय' । दयाभाव मुनिवरक होय ॥ सुभप्राकृतिसौ निकस ताम । दच्छिन काधेसौं अभिराम ।६७ पूरवकथित देह-विस्तार । रोगसोग सब दोष निवार ।। फिर निज थान कर पंसार । पचम समुदघात यह धार ।६८ करत साधु पदर्थ-विचार । मन ससय उपजे तिहि बार ।। तहा तपोधन' चिता करै । कैसे यह विकलप निरवर ॥६६॥ भरतखेत प्रादिक भूमाहि । अब ह्या निकट केवली नाहि ॥ ताते करिये कौन उपाय । बिनभगवान भरम नहि जाय।७० तब मुनि-मस्तकसौ गुनगेह । प्रगट होय आहारक देह ॥ एक हाथ तिस परमित कही। श्रीजिनसासनसौं सरदही ७१॥ फटिक वरन मनहरन अनूप । तहा बाय जह केवलभूप ॥ दरसनकरि सदेह मिटाय । फेरि प्रानि निजथान समाय ।७२। अष्टम समुदघात यह मान । मुनिके होहि छठे गुनथान ॥ जब सजोगि जिनकै परदेस । बाहर निकस अलख अभेसा७३। १ छूने २ बाये कधे से ३ बजाने का वाक्या ४ देखना ५ साधु ।
नौवा अधिकार [ १५७ दड-कपाटादिक-विधि ठान । क्रमसौं होहिं लोकपरवान ।। सप्तम समुदधात यह भाय । सरधा करो भविक मनलाया७४। मरनातक आहारक जेह । एक दिसागत जानौ येह ।। बाको पाच रहे जे पान । ते सब दसौ दिसागत जान ॥७॥ दुबिध रास संसारी जीव । थावर जगमरूप सदीव ।। तहा पांच बिध थावरकाय । भू जल तेज वनस्पति वाया७६। चार जातके जगम जंत । चलत फिरत दीखै बहुभंत ॥ सख सीप कौडी कृमि' जोक । इत्यादिक बेइन्द्री-थोक।।७७॥ चैटी दीम कुथ पुनियादि । ये तेइन्द्री जीव अनादि ।। माखो माछर मुंगीदेह । भ्रमरप्रमुख चौइन्द्री येह ॥७८।। देव नारकी नर विख्यात । केतक पसू पचंद्रो जात ।। ये सब स थावरके भेव । इनको विषयछेत्र सुन लेव ॥७९॥ छप्पय। फरस चार पाच, जीभ चौसठ सौ नासा । हग जोजन उनतीस, सतक चौवन क्रम भासा ।। दुगुन असैनी अत, श्रवन वसु सहस धनुष सुनि । सैनी सपरस विषे, कह्यौ नौ जोजन श्रीमुनि ।। नौ रसन प्राण नो चच्छुप्रति, सैतालीस हजार गिन दोसै त्रेसठि बारह लवनविष-छेत्रपरवान भन ॥८६॥ ५ लट २ मौरी ३ नाक ४ जीम ५ नाक ।
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नौवा अधिकार [ १५६ PAR- AnmomvNAV दोहा अथिर अर्थपरयाय' जो, हानिवृद्धमय रूप । तिसमै सिद्ध बखानिये, उतपति नाससरूप ।।७।। ग्येय' त्रिविध परनति धरै, ग्यान तदाकृत भास । यो भी सिवपदमै सधे, थित उतपत्ति विनास ॥८॥ अथवा सब परनति नसे, भई सिद्धपर्याय । सुद्धजीव निहचल सदा, यों तीनों ठहराय ॥६॥ अडिल्ल । बरन पाच रस पांच, गंध दो लोजिए। पाठ फरस गुन जोर', बोस सब कीजिए। जीवविष इनमाहि, एक नहिं पाइए। यात मूरतिहीन, चिदातम गाइए ॥१०॥ जगमै जीव अनादि, बघ-सजोगते । छूट्यौ कवही नाहि, कर्मफलभोगते ॥ असदभूत व्यवहार, पच्छ जो ठानिए। तो यह मूरतिवंत, कथंचित मानिए ॥६॥ दोहा । प्रकृतिबंध थितिबंध पुनि, अरु अनुभाग प्रदेस ।। चारभेद यह बधके, कहे पास परमेस ॥२॥ बन्धविजित प्रातमा, करधगमन करेय । एकसमयकरि सरलगति, लोकअंत निवसेय ॥६॥ १. सूक्ष्म पर्याय २ जानने योग्य पदार्थ १ मोड़ ४ मूर्तरूप ।
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नौवाँ अधिकार [ १६१ ये परमान पंचगुन, सात बन्धमै जान । वरनादिक जे बीस हैं, ते गुन जात बखान ।।१०४॥ आगे पुद्गल बन्धके, सुनो भेद खट' सोय । सरधा करते समझते, ससय रहै न कोय ॥१०॥ चौपई। प्रथम भेद अतिथूल बखान । दुतिय थूल' संग्या उर पान ।। तृतिय थूल-सूच्छम सरदहो । सूच्छम -थूल चतुर्थम गहो १०६ पंचम सूच्छम नाम गिनेह । छट्ठम अतिसूच्छम खट येह ॥ अब इनको बरनन विरतंत । सुनौ एक मनसौं मतिवत ।१०६ खंडखंड कीने जे बन्ध । फेर न मिले प्रापसौं सध ।। माटी ईंट काठ पाखान । इत्यादिक अतिथूल बखान ॥१०॥ छिन्न भिन्न हो फिर मिल जाहिं । ऐसे पुद्गल जे जगमाहिं । घृत अरु तेल जलादिक जान । ये सब थूल कहे भगवान ।१०६। देखत लगै दिष्टिसौं थूल । करमै गहे जाहिं नहिं मूल ।। धूप चांदनी आदि समस्त । जान थूल ते सूच्छम वस्त ।११०॥ आंखनसों दीख नहिं जेह । चारौं इन्द्रीगोचर तैह ।। विविध सपर्स सब्द रस गंध । सूच्छमथूल जान ते बंध।१११॥ नाना भांति वर्गना भिड । कारमान परमान पिंड ॥ काहू इन्द्रीगोचर नाहि । ते सूच्छम जिनसासनमाहि ॥११॥ कर्मवर्गना सो ही कहा । जो अति ही सूच्छम सरदहा ।। १. छ. २ स्थूम स्थूल ३ स्थूल ४ स्थूल-सूक्ष्म ५. सूक्ष्म-स्थूल ६. सूक्ष्म ७. सूक्ष्म-सूक्ष्म ८ हाथ मे ।
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नौवाँ अधिकार तात पचअथिकाय है, काय काल बिन मान ॥१२३॥ सवैय्या छन्द । जीवरुधर्म अधर्म दरब ये, तीनों कहे लोक-परवान । असंख्यात परदेसी राज, नभ अनंतपरदेसी जान ।। सख असख अनतप्रदेसी, त्रिबिधरूप पुद्गल पहिचान ।। एकप्रदेस धरै कालान, तातै काल कायबिन मान ॥१२४॥ दोहा। काल काय बिन तुम कहो, एकप्रदेसी जोय । पुद्गल परमानू तथा, सो सकाय' क्यों होय ॥१२॥ सवैया अलख असंख्य दरब कालान, भिन्नभिन्न जगमाहिं बसाहिं । आपसमाहिं मिले नहिं कबहीं, ताते कायवंत सो नाहिं । रूप सचिवनत परमान, ततखिन बंधरूप हो जाहि । यो पुद्गलको कायकलपना, कही जिनेसुरके मतमाहि ॥१२॥ जितने मान एक अविभागी, परमानू रोक पाकास । ताको नाव प्रदेस कहावै, देय सर्व दरवनकौं बास ।। तहां एक कालानू निवस, धर्म अधर्म प्रदेस निवास । रहैं अनंत प्रदेस जीवके, पुद्गल बन्ध लहैं अवकास ॥१२७॥ पोमावती धर्म अधर्म कालभर चेतन, चारो दरव अरूपी गाये । ताते एक प्रकास-देसमै, प्रभु सबके परदेस समाये ॥ १ परि मस्तिकाय १. काय सहित ।
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नौवा अधिकार। [ १६५ पद्धडी। प्रास्त्रव अविरोधनहेत भाव । सो जान भावसंवर सुभाव ।। जो दवित पालव सुद्धरूप । सो होय दरव संवरसरूप ।१३६॥ व्रत पंच समिति पांचों सुकर्म । वर तीन गुप्ति दस भेद धर्म ।। बारह बिध अनुप्रेच्छाविचार । बाईस परीषहविजय सार१३७ पुनि पाच जात चारित असेस । ये सर्व भावसंवर विसेस ।। इनसौं कर्मास्त्रव रुके एम । परनालीके' मुख डाट जेम ।१३८॥ दोहा। सुभ उपयोगी जीवके, ब्रत प्रादिक प्राचार । पापास्त्रव अवरोधों, कारन हैं निर्धार ।।१३६॥ सुध उपयोगी साध जे, तिनके ये प्राचार । पुन्यपाप दोऊनौं, संवरहेत विचार ॥१४०॥ चौपई। तपबल कर्म तथा थिति पात । जिन भावो रस देखिर जात।। तेई भाव भावनिर्जरा । संवरपूरब है सिनकरा ॥ १४१ ॥ बंधे कर्म छूट जिसबार । दरब'निर्जरा सो निर्धार ॥ इहिबिध जिनसासनमै कह्यो। समकितवत सांच सरदहौ । जो अभेद रतनत्रय भाव । सोई भावमोख ठहराव । जीव कर्मौ न्यारा होय । दरवमोच्छ अविनासी सोय ।१४३॥ ये सब सात तत्त्व बरनये । पुन्यपाप मिलि नौपद भये ॥ प्रास्रवतत्त्वविष ये दोय । गभित जान लीजिये सोय ।१४४॥ १ नाली २ रुकावट ३ साधु ४ फल ५ द्रव्य ६ नौ पदाय ।
१६६ ] וזהוי जीव जयाग्यदिरिमो', गरयं तन्यमाप । मो सम्यकदरमन मही, महिमा जाम अनप ॥१४॥ नयप्रमान निच्चेप फरि, भेदानेद विधान । जो तत्त्वनको जाननो, मोई मम्यफम्यान ॥१४६॥ सो सामान्य बिलोकिये, दरग्रन फहिये जोय । जो विसेम फर जानिये, ग्यान कहावं मोय ॥१४७॥ चारित किरियाम्प है, मो पुनि दुविध पवित । एक सफल चारित्र है, दुतिय देमचारित्त ।।१४८।। प्रति जहाँ सकल सावध, सर्वथा परिहर। सो पूरन चारित्र, महा मुनिवर धरै ॥ लेश'-त्याग जह होय, देशचारित वही। सो गृहस्थको धर्म, गृही पाले सही ॥१४९।। दोहा। तीर्थंकर निरग्रन्थपद, घर साधो सिवपथ । सोई प्रभु उपदेसियो, मोखपथ निरग्रन्थ ॥१५०॥ दसविध वाहिज' ग्रन्थमै', राखै तिल-तुस भान । तो मुनिपद कहिये नहीं, मुनि विन नहि निर्वान ।१५१ जे जन परिग्रहवतको, मान मुक्तिनिवास । १ यथाय दृष्टि से २ सदोष ३ छोडे ४ एक देश त्याग ५ गृहस्थ ६ वाह्य ७ परिग्रह ८ थोडासा मी।
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१६८ ] पाग्यपुगणा नीपज, श्रीगुरु सिच्छा मामलो', (ग्यानी) सात व्यसन परित्यागौरे। ये जगमै पातक बडे, (ग्यानी) इन मारग मत लागौरे ।१६। जवा खेल न माडिये, (न्यानी) जो धन धर्म गवांवरे ।। सब विसननको वीज है, (ग्यानी) देखता दुख पावरे ।१६१॥ रजवीरजले (ग्यानो) मो तन मान कहावरे । जीव हते विन होय ना, (ग्यानी) नाव लिया घिन पावरे । सडि उपज कीड़ा भरी, (ग्यानी) मद दुर्गन्ध निवासरे। छीयासी सुचिता मिट, (ग्यानी) पीया बुद्ध विनासरे ॥१६॥ धिक वेस्या बाजारनी, (ग्यानी) रमती नोचन सायरे ।। घनकारन तन पापिनी, (ग्यानी) बेच विसनो हाथरे ।१६४ अतिकायर सवसी डरे, (ग्यानी) दोन मिरग वनचारीरे । तिनपै प्रायुच साधते, (ग्यानी) हा प्रतिकूर सिकारीरे।१६५॥ प्रगट जगतमै देखिये, (ग्यानी) प्रानन धनते प्यारौरे । जे पापो परधन हरे, (ग्यानी) तिनसम कौन हत्यारौरे ।१६६। परतिय' व्यसन महा बुरो, (ग्यानी) यामै दोष बडेरोरे । इहि भव तनघनजम हरे, (ग्यानी) परभव नरकवसेरोरे १६७ पांडवादि दुखी भये, (ग्यानी) एक व्यसन रति मानोरे । सातनौं जे सठ रचे, (ग्यानी) तिनकी कौन कहानीरे १६८ १ समझो २ म्यान : स्पन मात्र से ४ पवित्रता ५ अस्त्र ६ पापी ७ पर-स्त्री-भवन ८ बड ।
मोनागार । १६६ * . -~- दो। पंच उदंबर फल कहे, मधु' मद मास मफार । इनके अपन परिहरो, परली प्रतिमा पार ॥१६॥ पांच अनुमत गुमयत नोन । सियाग्रत चारों मलहीन ॥ बारहवत धारं निदॉग । यह दूजी प्रतिमा प्रतपोप ॥१७०।। दोह।। प्रब इन यारह पतनको, लिपी लेग पिरतंत । जिनको फन जिनमत पायो, प्रत्तुतस्वगं'परजंत ।१७१। मो नित मनवचयापतों, मृतपादिकसी जेहो जो ॥ प्रमको पाम न दीजिये, प्रथम अनुयत एहो जी । वारहयत-विध परन ॥१७२॥ भूठवचन नहि बोलिये, गव ही दोष निवासो जी। दूजो ग्रन मो जानिये, हितमित वचन सभासो' जी ।। बारहवत विध घरनक ॥१७३॥ मूलो विमगे परी', जो परधन बह भायो जी ।। विन दीयं लीज नहीं, जनम जनम दुग्यदायो जी ।। बारहवत विध घरन ॥१७४|| व्याही वनिता' होय जो, तासीं कर सतोपो जी ।। परिहरिये परफामिनी', यासम और न वोषो जी। १ शाम २ नगय : गोमय म्यगतY समापण करना ५ जमीन पर गिरा ६ श्री पर स्त्री।
१७० ] पाश्वपुगरण वारहवत विध बरनऊ ॥१७॥ धन-कन-कंचन आदि दे, परिग्रह सख्या ठानो जी ।। तिसना' नागिनि वस करो यह व्रत मत्र महानो जी ।। बारहव्रत बिध बरनऊ ॥१७६।। अवधि दसो दिसि खेतकी, कीजै सवर जानो जी ॥ बाहर पाव न दीजिये, जब लग घटमै प्रानो जी ।। बारहवत विध बरनऊ ॥१७७॥ कर मरजादा कालकी, करिये देस-प्रमानो जी॥ वन-पुर'-सरिता' आदि दे, नित्त गमनको थानो जी ।। बारहवत बिध बरनऊ ॥१७॥ जहां स्वारथ नहि सपजै , उपजे पाप अपारो जी ।। अनरथदड वही कह्यौ, त्यागौ पच प्रकारो जी॥ बारहवत बिध बरनऊ ॥१७६।। सामायिक-बिधि प्रादरो, थल एकात विचारो जो ॥ उर धरिये सुभ भावना, भारत रौद्र निवारो जी। बारहवत बिघ बरनऊ ।।१८०।। पोषह व्रत पाराधिये, चारौं-परब--मझारो जी ॥ चहुबिध भोजन परिहरो, घरमारभ सब छारो जो ॥ बारहवत बिध बरनऊ ॥१८१॥ भोजन पान तंबोल लिय', पटभूषण बहु एमो जी ॥ १ तृष्णा २ मगर ३ नदी ४ उपजना ५ प्रोपधोपवास ६ चार पर्व (दो अष्टमी दो चतुर्दशी ) ७ पान ८ स्त्री ।
w मंगामा । १७१ भोग तथा उपभोग है। करि इनको जम नमो जी ।। बारहवत विध बरन ॥१२॥ उत्तम प्रतिपिनको सवा, बीजे चौविध दानो जी ।। मान बढ़ाई त्याग, हिन्दं सरधा सानो जो ।। भारत विष बरन ॥१३॥ अंत समय मलेपना, कोज सकति संभालो जी ।। जासों यत संजम मवं, ये फल देहि यिसालो जी ॥ धारहयत धिध बरन ।।१८४॥ गा। तीनमाल सामायिक करं । पाची प्रतीचार परिहर ।। मत्र मित्र जान इफगार । सो नर तोजो प्रतिमाघार||१८५॥ परच चतुष्टय तति प्रारभ । पोपह प्रत मांई मनयभ' । सोलह पहर घर सुम ध्यान । सोई चौथी प्रतिमावान ।१८६॥ त्याग हरीनात जावत । दस फल कद चीज बहु भत ।। प्रामुफ जल पोच तजि राग । सो सचित्तत्यागो बडभाग१७॥ जो दिनमें मथुन' परिहर । मनयचफाय सील दिढ धरै ।। पष्टमप्रतिमाघारी धीर । यह जघन्य श्रावफ वर चीर ।१८८। जो मय नारि सर्वथा तज । नौ विध सदा सोल प्रत भजे ॥ कामकथारत कहिं न होय । सप्तमप्रतिमाघारी सोय ॥१६॥ जिन मव तजे विनज व्योहार । निरारभ बरते मद छार ।। अहनिसि हिसासी भयभीत । अष्टमप्रतिमावत पुनीत ।१६० । १. मन बगरम २ गत ३ पामीरा ४. रात दिन ।
१७२ ] पार्श्वपुराण जो समस्त परिग्रह परित्याग । उचित वसन राख विनराग सो नौमी प्रतिमा निरग्रय' । यह मध्यम श्रावकको पथ ।१६१॥ जो गृहस्थकारज अघमूल । तिनकों अनुमति देय न भूल ।। भोजनसमय बुलायो जाय । सो दसमी प्रतिमा सुखदाय ।१६॥ दोहा । अब एकादसमी सुनो, उत्तम प्रतिमा सोय । ताके भेद सिधातमै, छुल्लक ऐलक दोय ॥१९३॥ चौपई। जो गुरुनिकट जाय व्रत गहै । घर तजि मठ-मडपमै रहै ॥ एकवसन तन पीछी साथ । कटि कोपीन' कमडल हाथ।१६४। भिच्छा-भाजन राख पास । चारों परब कर उपवास ।। ले उदडभोजननिर्दोष । लाभ अलाभ राग ना रोष ।१६५। उचित काल उतरावै केस । डाढो मू छ न राख लेस । तपविधान आगम अभ्यास । सक्तिसमान कर गुरुपास ।१९६॥ यह छुल्लक श्रावकको रोत । दूजो ऐलक अधिक पुनीत ॥ जाके एक कमर कोपीन । हाथ कमडल पोछी लीन ॥१९॥ बिधिसौं बैठि लेहि आहार । पानिपात्र आगम अनुसार ।। कर केसलु चन अति धीर । सीत घाम सब सहै सरीर ।१९६ सोरठा । पानिपात्र आहार, कर जलाजुलि जोडि मुनि । खड़ो रहै तिहि बार, शक्ति-हीन भोजन तजै ।।१६६॥ १ परिग्रह त्याग २ अनुमोदना ३ लगोठी ४ अनुदिष्ट भोजन ५ हाथ मे भोजन करना।
नौवा अधिकार [ १७३ दोहा । एक हाथप ग्रास धरि, एक हाथसौं लेय । श्रावकके घर आयके, ऐलक असन' करेय ॥२०॥ यह ग्यारह प्रतिमा कथन, लिख्यौ सिधात निहार । और प्रश्न बाकी रहे, अब तिनको अधिकार ॥२०१॥ चौपई। जे जगमै पापी परधान । सात व्यसनसेवक अग्यान । रुद्रध्यान' धारै प्रघमई । अति हो कूरफर्म निर्दई ।।२०२।। झूठवचन बोलै सत छोर । परधन परवनिताके चोर ॥ बहु आरभी बहुपरिग्रही। मिथ्यामतको पोषे सही ॥२०३।। चड कषायी अधिक सराग । जिनप्रतिमानिदक निर्भाग' ।। मुनिवर निदि पाप सिर लेहिं । जैनधर्मकौं दूषन देहिं ।२०४। नीचदेवसेवारसरचे । धरै कृस्नलेस्या मद-मचे ॥ इत्यादिक करनी-रत रहैं । ऐसे नीच नरकगति लहै ॥२०॥ छप्पय सप्तमसौं पसु होय, देस-संयम न संभाले । छठे नरकसौं मनुष, होय व्रत नाहीं पाले । पचमसौं व्रत धर, मोखगतिको नहिं साधै । चौथेसौं सिव जाय, नहीं तीरथपद लाधं ।। सब सुभ्रवाससौं पायक, वासुदेव भव नहिं धरै ।। प्रति-वासुदेव बलदेव पुनि, चक्रवति नहिं अवत।२०६। १ भोजन २ रौद्र ध्यान ३ प्रचड ४ प्रभागा ५ घमण्ड में चूर ६ एक देश सयम ७ तीर्थंकर पद ८. नरकवास ६. नारायण १०. प्रतिनारायण । .
१७४ ] पार्श्वपुगण -- चौपई। मायाचारी जे दुठ जीव । परपचनमै' निपुन अतीव ।। झूठ लिखे अरु चुगलो खाहि । झूठी साखि भरत भय नाहि सोल न पाले मोहउदोत । लेस्या जिनके नील कपोत ॥ भारतध्यानी धर्मविहीन । पसुपर्याय लहै अकुलीन ॥२०८।। भारतरौद्ररहित नोराग । धर्म-सुकल-ध्यानी बड़भाग ॥ जिनसेवक पाल व्रत सोल । कसै करन मदमाते कीला२०६। जिनप्रतिमा जिनमन्दिर ठवे । सातखेत उत्तम धन वव' ।। सदाचार सुन त्रावक होय । जथाजोग पावै सुर लोय ।२१०॥ सहज सरल-परनामी जीव । भद्रभाव उर धरै सदीय ॥ मद मोह जिनके देखिये । मंदकषायप्रकृति पेखिये ॥२११॥ अलपारंभ अलप धन चहै । उर कपोतलेस्या निर्बहै ।। पुण्यपाप नहिं बरतै दोय । मिस्रभावसौं मानुष होय ॥२१२॥ परके दोष सुनै मन लाय । विकथा-बानी बहुत सुहाय ॥ कुकविकाव्य सुन हरष जोय । ते बहरे उपजे परलोया२१३॥ पढ़े सुछन्द विवेक न करै । मृषापाठ विकथा विस्तरै ।। परनिंदा भाव बहुभाय । निजपरससा कर बढ़ाय ॥२१४॥ मलमूत्रादिक-भोजन-काल । मौन छाडि बोल वाचाल । झूठ कहत कछु सके नाहिं । ते गूगे जनमै जगमाहि ॥२१॥ परतियमुख देख करि नेह । निरख सब योनादिक देह ॥ १ इधर उधर की लगाने वाले २ गवाह ३ इन्द्रिय ४ खच करें ५ उत्तम परिणामी।
नौ अधिकार [ १७५ वधवधन याxधरि राग । ते मरि प्राधे होहिं प्रभाव ।२१६॥ जे नर कर कुत्तारथ-गौन' । बहुत बोझ लादै बिनमौन ।। वृथाविहारी' देख न चले । होय पगु ते पातक फले ॥२१७॥ नीति-बमिज करि लछमी लेहिं । अधिका लेहि न प्रोझा देहि अलप वित्त दानादिक करें । ते नर दबंधनी अवतरै ।।२१८॥ जे धन पाय धरै अभिमान । समरथ होकर देहिं न दान ।। धनकारन छलछिद्र कराहिं । बढत परिग्रह धाप नाहिं ।२१६। लछमीवत कृपन जन जेह । परभव होहिं दरिद्री तेह ।। मदकषायो सरलसुभाव । प्रहनिसि वरतै पूजाभाव ।।२२०॥ निजवनिता-सप्तोपो सदा । मदराग दोखै सर्वदा ।। दुराचार जिनके नहिं होय । पुरुषवेद पावै सुरलोय ॥२२१।। जे प्रतिकामी कुटिल अतीव । महा सरागी मोहित जीव । परवनितारत सोकसंजुक्त । ते कामिनी-तन लहै निरुक्त।२२२॥ रागअध अति जे जगमाहिं । कामभोगसौं तृपते नाहिं ।। वेस्यादासीरक्त कुसील । ते नर लहै नपुंसकडोल ॥२२३॥ मनवचकाय महानिर्दई । वध बंधन ठाने अधमई ।। परकी पीड़ा बहुविध करै । ते जिय अलप प्रायु धरि मरै ।। कृपावत कोमल परिनाम । देखि विचारि करै सब काम ।। जोवदयामै तत्पर सदा । परकौं पीड़ा देहि न कदा ॥२२५।। सबही जीवनसौं हितभाव । धरै पुरुष ते दीरघ पाव । ४ पाठ भेद जोवे ( देखें १ खोटे तीर्थ को गमन २ विना काम भ्रमण करने वाले ३ कम ४ कामपायी ५ पारीर ।
१७६ ] पावपुराण जे जिनजग्यपरायन' नित्त । पात्रदानरत सीलपवित्त ।२२६ इन्द्रीजीत हिये सतोष । ते नर भोग लहैं व्रत-पोष ॥ पूजादानविमुख मवलीन । इन्द्रीलुब्ध दयागुनहीन ।।२२७॥ दुराचार दुरध्यानी लोग । इनकौं प्रापत हौहि न भोग ।। समय विचारि पढ़े जिनग्रंथ । पढ़े पढ़ावै जे सुभपंथ ॥२२८॥ हितसौ धर्मदेसना कहैं । ते परभव पडितपद लहैं ।। ग्यानगरब हिरदै धर लेहिं । जिनसिधांतकों दूषन देहि २२६। इच्छाचारी पढ़े असुद्ध । ग्यानविनयवरजित जड़बुद्ध ।। पढनेजोग पढावै नाहिं । ऐसे मरि मूरख उपजाहिं ।।२३०॥ अनाचाररत प्रारंभवान । परकों पीड़न कर अयान ।। पापकर्मरत धर्म न गहै । ते परभवमै रोगी रहै ॥२३१॥ परदुख देखि हरख उर धरै । परवनिता परधन जो हरै ।। नरपसुजीव बिछोहैं जोय । सो पुत्रादिवियोगी होय ॥२३२।। नीचकर्मरत करुना नाहि । हाथ पांव छेदै छिनमाहिं ।। जे परको उपजावै पीर । ते नर पावै विकल सरीर ।२३३। जो मिथ्यामत मदिरा पिय । पापसूत्रकी सरधा हिये । धर्मनिमित्त जीववध करै । महाकषायकलुषता धरै ॥२३४॥ नास्तिकमती पाप-मग गहैं । ते अनतससारी रहै । रतनत्रयधारी मुनिराज । आगमध्यानी धर्मजहाज ॥२३५॥ इच्छारहित घोर तप करें। कर्म नास करि भवजल तिरै ।। । १ जिन पूजा में लीन २. धोंपदेश ३ दया ४. दु ख ।
नौवाँ अधिकार [ १७७ । उत्तम देव नमै सिरनाय । पूजे परम साधुके पाय ॥२३६॥ साधरमी-वत्सल मुनिप्रीत । उत्तम गोत बधै इहि रीत ।। जे जिन जती जिनागम जान । नमै नही सठ करि अभिमान । मान नीच देव गुरु धर्म । ये सब नीच गोतके कर्म ।। जिनके हियै रमै' वैराग । धार संजम तिसना त्याग ।२३८। प्रतिनिर्मल चारितभडार । ग्यानध्यानतत्पर अविकार ।। ख्याति लाभ पूजा नहि चहैं । ते अहमिद-सपदा गहैं ।२३६। पच-करन बेरी वस पान । चारित पाले प्रति अमलान ।। दुदर तप कर सोखे काय । चक्री होय देवपद पाय ॥२४०।। जे सम्यकदृष्टी गुनग्रही । सोलहकारन भाव सही ।। ते तीर्थंकर त्रिभुवनधनी । होहि तीन-जगचूडामनी ॥२४१॥ दोहा । इहिबिध पूछनहारको, समाधान जिनराज । कीनौ गनधरदेवप्रति, जगतजीवहितकाज ॥२४२॥ बानी सुन बारह सभा, भयो सबन आनन्द । जैसे सूरजके उदय, विकसै वारिजवृन्द ।।२४३॥ वचनकिरनसौं मोहतम, मिट्यौ महा दुखदाय । वैरागे जगजीव बहु, काललब्धिबल पाय ॥२४४॥ चौपई। केई मुक्तिजोग बड़भाग । भये दिगम्बर परिग्रह त्याग ।। किनही श्रावक-श्रत पावरे । पसुपर्याय अनुव्रत धरे ॥२४५।। १. व्याप्त-धारण करें। पच इन्द्रिय ३. श्रेष्ठ ४. कमलों का समूह ।
१७८ ]
पार्श्वपुराण
केई नारि अजिका भई। भर्ताके' संग वनकों गई ।
केई नर पसु देवी देव । सम्यकरत्न लो तहां एव ।२४६
केई सक्तिहीन संसारि । व्रत भावना करी सुखकारि ॥
पूनादानभाव परिनये । जथाजोग सब सेवक भये । २४७॥
दोहा।
कमठ जीव सुरजोतिषी, करि वचनामृतपान
वयों बैर मिथ्यात्व विष, नम्यौं चरन जुग पान १२४८
सम्यकदरसन पादरचौ, मुक्तितरोदरमूल ।
सकादिक मल परिहरे, गई जनमकी सूल' ॥२४६ ।
तहां सात तापसी, करत कष्ट अग्यान ।
देखि जिनेसुरसंपदा, जग्यौ जथारथ ग्यान ।।२५० ।
दई तीन परदच्छिना, प्रनमै पारसदेव ।
स्वामि-चरन संयम घरचौ, निदी पूरव टेव ॥२५१।।
धन्य जिनेसुरके वचन, महामंत्र दुखहत ।।
मिथ्यामत-विषधर -उसे', निविष होहिं तुरत ।२५११
कहाँ कमठसे पातकी, पायो दरसन सार ।।
कहाँ पाप-तप-तापसी, घरचौ महाव्रत-भार ॥२५३।।
जिनके वचनजहाज चद्धि, उतरे भवनलपार ।।
ते प्रतच्छ पाये सरन, क्यों न होय उद्धार ॥२५४।।
अव श्रीगनघरदेव तह, चार ग्यान परवीन ।
१ पति • वमन किया ३ दुव ( 'भूल' नी पाठ है ) ४ माप ५ का
६ दिप रहिन ।
नौवाँ अधिकार [ १७६ - जिन-समुद्रत अर्थजल, मतिभाजन' भर लीन ॥२५५।। नाम स्वयंभू दयानिधि, विविधरिद्धिगुनखेत । द्वादसांग रचना करी, जगतजीवहितहेत ॥२५६।। परमागम ' अमृतजलधि, अवगाहै मुनिराय । जन्मजरामृतदाह हरि, होंय सुखी सिव पाय ॥२५७।। चौपई। प्रथम एकसौ बारह कोड़ । लाख तिरान ऊपर जोड़ । बावन सहस पांच पद सही । द्वादसागकी परमित कही २५८ पद्धडी। इक्यावन कोड़ी पाठ लाख । चौरासो सहस सिलोक भाख ॥ छस्स साढ़े इक्कीस जान । यह एक महापदको प्रमान ।२५६ । दोहा। इहि बिध सभासमूह सब, निवर्स प्रानन्दरूप । मानों अमृत नीरसौं, सिंचत देह अनूप ॥२६०॥ चौपई। तब सुरेस उठि विनती करी। हाथ जोर सिर अजुलि धरी। भो जगनायक जगप्राधार । तीन भवनजनतारनहार ।२६१॥ यह विहारअवसर भगवान । करिये देव दया उर धान ।। भविकजीवखेती कुम्हलाय । मिथ्यातपसौं सूखी जाय ।२६२॥ भो परमेस' अनुग्रह करो । बानीबरसासौं तप हरो॥ मोखमहापुरके परधान । तुम बिनजारे दयानिधान ।२६३। १ बुद्धि रूपी पात्र २ मिमग्न हुए ३ जनन ४ प्रमाण ५ इन्द्र ६ परमेश्वर । ७ प्रधान ।
।
।
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प्रभुमहाय नदि मुपपद न । प्रागगमन ग्नानि वहि ।।
दहिबिध कन्ट प्रापंना पनं । मामनाम पनि पुति बिन्नगे।
भयो निम्तागमन जिनेम । विजीवनरे भावबिनम ।।
नरनमुरामुरव्य उयरियो।जिनविहारमतन्न पिचर
गमनममय प्रोरे विनमः। मनोमानरचना गिर गई।
घले मग नुर चतुरनिकाय' । पदिय मयन बने मुरराय२६३
मुरतुन्दनि बाजं सुधार । जिनमगन गायं मुन्नार ।।
हाय अनाजुत देवयुमार । बने जाहि नभने नि मारा।
चहुदिनि चार वाग्मो फोन । होय सुमिन्छ' सदा निर्दोन ।
नविहार जिनवन्कं होय । जोवधान नहीं करं न कोय २६
मब उपमगरहित भगवत । निराहार प्रायुपरजंत ॥
चतुरानन' देवं ममार । मवविद्यापनि परमउदार ।।२६।।
प्रनुके तनकी परं न याहि । पल पलको लाग नाहि ॥
नख प्रम केम बट नहिं जाम । ये दम केवल प्रतिमय भास२७०
भाषा सरल प्रबंमागधी । विरं सकल-समयहर सबी ॥
नरपमु जातिविरोधी जीव । सब उर मंत्री घरै नदीव ।२७१।
नानाजाति विरछ दुख दल । मब रितुके फल फूलनि फलं ।
प्रभुनचारभूमि मनिमई । पनवत प्रागम बरनई ॥२७२।।
सुरभि पवन पोछ अनुसरं । वायुकुमारजनित सुख कर ।।
नुरनरपनू नभागत जेह । परमानदमाहित नव तेह ।।२७३॥
१ इन्च हिन • चार प्रका* : नुनिल ( मुरान ) ४ बार व
५ टिमगर रहिन मा मृगन्धित ।
-
नौवा अधिकार [ १०१ मारुतसुर' जोजनमित मही। करै धूलितृनवजित सही ॥ मेघकुमार कर मन लाय । गंधोदकबरसा सुखदाय ॥२७४॥ चरनकमल जिन धारै जहां । कचन कमल रचे सुर तहां ॥ सातकमलते प्रागै ठान । पीछे सात एक मधि जान ।।२७५।। यों पंकजको पंद्रह पांति । सवा दोइ से सब इहिभांति ॥ सुकलग्यान उपजे बहुभाय । निर्मलदिसि निर्मल नभ थाय२७६ मुदित बुलावै देवसमाज । भविजनौं जिन-पूजनकाज ॥ धर्मचक्र आगे संचरै। सूरजमंडलकी छबि हरै ॥२७७॥ मगलदर्व आठ झलकाहिं । जथाजोग सुर लीये जाहिं ।। ये चौदह देवनकृत जान । वरप्रतिसयमंडितभगवान ॥२७८।। कर विहार परमसुख होत । भविजोवनके भाग उदोत ।। स्वर्गमोखमारग प्रभु सार । प्रगट कियौ समतिमर निवार२७६ कहीं कुलिंगी दोखै नाहिं । भानु उदय ज्यौं चोर पलाहिं ॥ सब निज निज वाछा अनुसार । पूरमास भये तनधार २८० कासी कोसलपुर पचाल । मरहठ मारूदेस विसाल ॥ मगध प्रवंती मालवठाम । अगबग इत्यादिक नाम ॥२८॥ कोनी आरजखड विहार । मेटौ जगमिथ्याअंधियार ॥ अब सब गणको गणना सुनो। नथापुरानकथित बिध मुनो। प्रथम स्वयम्भूप्रमुख प्रधान । दस गनधर सर्वागमजान ॥ पूरवधारी परमउदास । सर्व तीन सै अरु पंचास ॥२८॥ १ वायु कुमार के देव २. मेघकुमार देव ३ खोटे भेषी । मराठो का देश ५ मारवाड । ।
१८२] पाएगा सिष्य मुनीसुर कहे पुरान । दमहजार नौ से परवान ।। अवधिवत चौदह से मार । केवलजानी एकहजार ॥२४॥ विविध विक्रियारिद्विवलिष्ट । एकसहम जानो उतकृष्ट ॥ मनपरजयग्यानी गुनवत । मातसतक पचाम महत ।।२८५।। छस वादविजयो' मुनिराज । सब मुनि मोलहमहन ममान । सहस छबीस अजिका गनी । एकलास लावक व्रतचनी ।२८६। तीनलाख स्रावकनी जान । बरनी सत्या मूल पुरान ॥ देवीदेव असख्य अपार । पसुगन मख्याते निरचार ।।२८७।। इहबिघ बारह सभासमेत । रतनत्रयमारगविध देत ।। विहरमान' दरसावत बाट । सत्तर वरस भये कछु घाट२८८ सम्मेदाचल सिसर जिनेस । प्राये श्रीपारसपरमेस ।। एक मास निन जोग निरोध । मनवचकाय क्रिया सब रोघ२८६ सूच्छम कायजोगथिति ठान । त्रितियसुकलसजुत तिहिं ठान । तजि सयोगिथानक स्वयमेव । आये फिर अयोगिपद देवा२६०। पच-लघुच्छर है थिति जहा । चतुरथ सुकलध्यानवल तहा दोयचरम सनये जिन भनी । प्रकृति बहत्तर तेरह हनी।२९१ इहिबिध कर्म जीत भगवान । एक समय पहुँचे निर्वान ।। औ छत्तीस मुनीसुर साथ । लोकसिखर निवसे जिननाथ।२६२ सावन सुदि सातै सुभ वार । विमल विसाखा नखतमझार । तजि ससार मोखमै गये । परमसिद्ध परमातम भये ।२६३। १ पाद विवाद मे जोतने वाले २ श्राविकायें ३ विहार करते हुए रास्ता ५ अ इ, उ ऋ, ल ६ चतुथ ७ दो अन्तिम समय । । ।
नौवा अधिकार [ १८३ Phran" पूरव चरम देहत लेस । भये हीन पातम परदेस । अष्टगुनातममय व्यवहार । निहचै गुन अनंतभंडार ॥२६४॥ सादि अनंतदसा परिनये । सिद्धभाव वसुगुनजुत थये ।। परमसुखालय' वासो लियौ । पावागमन जलांजलि दियौ२६५ दोहा। पच कल्यानक पाय सुख, जगतजीव उद्धार । भये पूज्य परमातमा, जय जय पासकुमार ॥२६६॥ जिनके सुखकों ग्यानको, नहिं उपमा जगमाहिं । जोतिरूप सुपिड थिर, इन्द्रीगोचर नाहिं ।।२६७।। अब तिनको प्राकार कछु, एकदेस अवधार । लिखों एक दृष्टात करि, जिनसासन अनुसार ॥२६८।। चौपई। मोममई इक पुतला ठान । नखसिख समचतुरस्त्रसंठान ।। सब तन सुन्दर पुरुषाकार । नराकार इसही बिष सारा२६९। माटीसौं इमि लेपहु सोय । जैसे त्वचा देहपर होय ॥ कहीं अग खाली नहि रहै । सब उपचारकल्पना यहै ।३००। पुनि सो लीजै अनि तपाय । सांचा रहै मोम गल जाय। अब ता भीतर करो विचार । कहा रह्यौ बुध ताहि निहार३०१ अतर मूस पोल है जहाँ । पुरुषाकार रह्यो नभ' तहा ॥ याही अंबरके उनहार' । ब्रह्मस्वरूप जान निरधार ५३०२। २'अन्तिम २ परम सुख का स्थान ३ मोम का ४ शरीर ५ लपेटना ६ घमा ७ व्यवहार कल्पना ८ मिट्टी का लोन ६ माफाश १. समान ।
१०४ ]
टोहा।
१ शिवालय २ पालकी १. कपूर ४ मुकुटों की अग्नि ५ नृत्य ६ मुक्तिरूपी
पायगा
यह प्राकाम मून्य जडप । वह पूरन चेतन चिद्रूप ।।
यही फेर है या वा माहि । प्राकृतिमें फ्छु अतर नाहिं।।३।।
या विध परब्रह्मकी रूप । निराकार माकाग्मस्प ।
यह हष्टात हिये निज घरो । भवि जिय अनुभवगोचर करो।
वने निह निवखेतम', ज्यो दपंनम छाहि ।
ग्यान-नननों प्रगट हैं, चमननीं नाहि ॥३०५।।
चौपई।
तब इन्द्रादिक सुरममुदाय । मोख गये जाने जिनराय ॥
श्रोनिर्वानकल्यानक काज । प्राये निज निज वाहन साज ।
परमपवित्त जानि जिनदेह । मनि-मिविकापर' थापी तेह ।।
करी महापूजा तिहि वार । लिये अगर चन्दन घनसार ३०७
और मुगन्धदरव सुचि लाय । नमे सुरासुर सीस नमाय ॥
अगनिकुमार इन्द्रत ताम । मुकटानल' प्रगटी अभिरामा३०८
ततखिन भस्म भई जिनकाय । परम सुगंध दसौं दिसि थाय ।
सो तन भस्म सुरासुर लई । क हिये कर मस्तक ठई।३०६
भक्ति भरे सुर चतुरनिकाय । इहविध महा पुन्य उपजाय ।
कर प्रानन्द निरत वहुनेव । निज निज थान गये सब देव।।
पंचकल्यानकपूज्य प्रभु, सिवसिरिकंत जिनेस ।।
सब जग सुख संपति करो, श्रीपारसपरमेत ॥३११।।
दोहा।
श्री (लक्ष्मी) के पति ।
नौवां प्रधिकार
[ १८५
पदसी।
पहले भव वामन कुलपवित्त । मरुभूत उपन्नो' सरलचित्त ।।
दूजे वनहस्ती बनघोष । जिन पाले वारहवत प्रदोष ॥३१२
तीजे भव द्वादस स्वर्गवास । सहस्रार नाम सब सुखनिवास ॥
चौथे भव विद्याधरफुमार । लघु वंस लियो चारित्रभार ।।३१३
पचम भव अच्युत सुरगथान । बाईस जलघि जहं थिति प्रमान
छ? भवमै चफ्रीनरेस । जिन साधे सहस बतीस देस ॥३१४
सातवे जनम महमिंद्र होय । सुख कोने चिर उपमा न कोय ॥
पाठम भव श्रीमानदराय । तजि राजरिद्धि बन बसे जाय ३१५
सोलहकारन भाये मुनिंद्र । पुनि भये वारमै स्वर्ग इन्द्र ।।
इहि विध उत्तम नौ जनम पाय । वामाजननी उर बसे प्राय ।।
गरभ जनम तप ग्यान काल । निर्वानपूज्य कोरतिविसाल ।।
सुर नर मुनि जाकी करें सेव । सो जयौ पास देवाधिदेव ॥३१७
दोहा
नाम लेत पातक' भज, सुमरत सफट जाहि ।
तेईमम अवतार मुझ, बसो सदा हियमाहि ॥३१८।।
छप्पया
कमठ जीव तन छोरि, दुतिय कुरकट अहि जायौ ।।
नरक पचम जाय, पाय अजगर तन पायो ।
धूमप्रभामै उपजि, भील अति भयो भयानक ।
चरम नरक पुनि सिंघ, फेर पचमभू-थानक ।।
१ पैदा हुप्रा २ पाप ३ माप ४ सप्तम नरक ।
मुरार पमुनोनि कि हिमाल नृप, र जोतिषी अजरा.' इहि विन अनेर भाख भरे, वैरभाव-विशता रोग जिनामा फल पासजिन र फलान । शेन जित बिलोन' जो हित जो उरभान ॥३॥ जीव जाति जावंत सवसी नीव रि। गर्न हन्ति रविरोध न कोन्।ि २२ । मा गे नाबान शान करी लि. को पुर गौतन्ने र मा। नापर आइ रचना तु वास अंग नुशरत नानी ! ना अनुगर अचारसंघ मुबीवली गाय व्हान । गॅग्निपंच जयारच है जवारय' हैद और कहानी । जितने इनस्ट्रिांत जप, ते सद सत्यमन। पर्ननावना हेत तर हिननित निन्दाल्प ॥२॥ लपित क्या नुहावनी, सुन्ने मैन अरस्य । लाह शम किस कान लेखन लिहे ॥२४.'
नौवा अधिकार। । १८७ सोरठा। सुन श्रीपार्सपुरान, जान सुभासुभ कर्मफल । सुहित हेत उर प्रान, जगत जीव उद्यम करो ॥३२॥ दोहा। प्रभुचरित्र मिस' किमपि यह, कीनौ प्रभु-गुनगान । श्रीपारस परमेसको, पूरन भयौ पुरान ॥ ३२६ ॥ पूरव चरित विलोकिक, भूधर बुद्धिप्रमान । भाषाबंध प्रबंध' यह, कियौ प्रागरे थान ॥ ३२७ ॥ छप्पय। अमरकोष नहिं पढयौ, मै न कहिं पिंगल' पेख्यौ । काव्य कंठ नहिं करी, सारसुत सो नहिं सीख्यौ ।। अच्छर-संधि-समास-ग्यानजित बुधि होनी । धर्मभावना हेत, किमपि भाषा यह कीनी ।। जो अर्थ छंद अनमिल कहीं, सो बुध फेर सवारियो । सामान्यबुद्धि कविकी निरखि, छिमाभाव उर धारियो । दोहा। जिनसासन अनुसार सब, कथन कियौ अवसान ॥ निज कपोलकल्पित कहीं, मति समझो मतिवान ३२६ छयउपसमको पोछसौं, के प्रमादवस कोय । इहिबिध भूल्यौ पाठ मै, फेर सवांरो सोय ॥३३०॥ १ बहाना २ प्रवन्ध काव्य ३ छद शास्त्र ४ सारस्वतव्याकरण ५ सुधार लेना ६ अन्त ७ मिथ्या कल्पना ८ क्षयोपशम ६ लाघव ।
15% पाश्वयुगमा पच बग्म कछ सरससे, लागे करतन वेर ।। बुधि थोरी थिरता अलप, ताते लगी अवेर' ॥३३॥ सुलभ' काज गरुवो' गर्न, अलपबुद्धिको' रोत' ।। यौं कीडी कन ले चल, किधी चली गढ जीत ॥३३२॥ विधनहरन निरभयकरन, अरुन वरन अभिराम ।। पामचरन मकटहरन, नर्मो नमो गुनधाम ॥३३३॥ य। नमो देव अरहत, सकल तत्त्वार यभामी ।। नमो मिद्ध भगवान, ग्यानमूरति अविनाशा ।। नमो माघ निरग्रय, दुबिध परिग्रहपरित्यागो । जयाजान जिलिग धारि, बन बमे विगगी ।। बदी सिनेमभापित घरम, देय म गुग सम्पदा ।। पे गार गार तिमोरुम, गेम मगल मदा । ३३ / मन मनगर में ममय, और नामी लीय । मबिगार निधि पनमी, प्रथ ममापन पीर ।।३।।
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