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Satyanarayan Vrat Katha

Ramdutt · 2010/05

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श्रीगणेशाय नमः । अथ श्रीसत्यनारायण पूजनादिविधिः॥ बनी रविसंक्रांतिदिने पौर्णमास्यामेका दस्यांयस्मिन्कस्मिन् शुभदिने वा सायंकाले 'स्नानं कृत्वा पूजास्थानमागत्यासनेउपविश्याचम्यपवित्रो धारणं कृत्वा मंडलस्थापितगणपत्यादि गौरीवरुणपंचलोकपालसर्यादिनवग्रहादि देवता प्रत्यधिदेवता दिशोचतुः षष्ठिदेवता ब्रह्म न्यादीनां प्रतिष्ठावाहनं कृत्वा संकल्पं कुर्यात् । ॐतत्सदयेत्यादि कालदेशाधु चार्य अमुकगांवोहममुकुशर्मात्मन सकलदुरितोपशमनसर्वापच्छान्तिं पूर्वक सकल मनोरथ सिद्धयर्थी यथासंपादितसामग्रीभि मंगडलस्थितगणेशादि देवता पूजन पूर्वकंपूर्वागीकृत श्रीसत्यनारायण पूजेनं तत् कथा श्रवणं च करिष्ये ॥ ततोऽपाद्याचमनीयस्नानगन्धाक्षतपुष्प 'धूपदीपनैवेद्यामनीयमुख वास्तांबुलगीफलद्रव्याणितत्तन्मत्रैःसमर्पयेत् । ततः सत्यनारायणपूजनम् ।। हस्तेपुमादाय ध्यान कुर्यात् ॥ ध्यायेत्सत्यं गुणातीतं गुणत्रय समन्वितम् ॥ लोकनाथं त्रिलोकेशकोस्तुभाभरणं हरिम।।१। पांचरं नीलवर्ण श्रीवत्सपदभूषितम् ।। गोविदंगोकुलानंद ब्रह्माद्यैरपि पूजितम् || इतियानम् का व्यक्ताव्यक्तस्वरूपाय हृषीकपतये नमः ॥ मया निवेदितो भक्त्या श्रोऽयंप्रतिगृह्यतां ॥शा इत्यर्थः ।। स नारायण नमस्तेस्तु नरकार्णवतारक ॥ पाद्यं गृहाण देवेश मम सौख्यं विवर्द्ध य॥४॥इति पाद्यम् ।। १. मन्दाकिन्यास्तु यदारि सर्वपापहरं शुभम् ॥ तदिदं कल्पितं देव सम्यगाचम्यतान्त्वया ॥५॥ इत्याच मनम् ।। स्लानपंचामृतदेव गृहाण पुरुषोत्तम ।। अनाथनाथ · सर्वज्ञ गीर्वाणप्रणतप्रिय ॥६॥ इति स्नानम् ।। वे सक्तसामयुक्त यज्ञसमासमन्विते । सर्ववर्ण प्रदे देव वाससी ते विनिर्मितम् ॥ ७ ॥ इतिवस्त्रम् ।। ब्रह्मविष्णुमहेशेन निर्मितं ब्रह्मसूत्रकम् ॥ गृहाण भगद्विष्णोः सर्वेष्टफलदो भव ॥ ८॥ इति यज्ञोपवीतम् ॥ श्रीखण्डचन्दनं दिव्यं गंधाढ्य सुमनोहरम् ।। विलेपनं सुरश्रेष्ठ प्रीत्यर्थ प्रतिगृह्यतां ॥ १॥ इति चन्दनम् ।।' मल्लिकादिसुगन्धीनि मालत्यादीनिक्षेप्रभो ॥ मया हृतोतिधजार्थ पुष्पाणि प्रतिगृह्यतां ।। १० इतिपुष्पम् ॥ वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाब्यः सुमनोहरः ॥ आघ्र यः सर्वदेवा नां धूपोयम्प्रतिगृह्यतां ।। ११॥ इति धूपम् ।। साज्यं चर्तिसंयुक्त वन्हिना दीपितं मया ॥ दीपं गृहाण ; देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम् ।। १२ ।। इति दीपम् ।। घृतपक्हविष्यान्नं पायसं वा सशकरम् ॥ नाना विधञ्च नैवेद्य विष्णो मे प्रति गृह्यताम् ॥ १३ ॥ इति नैवेद्यम् ।। सर्वपापहरं दिव्यं गांगेयं निलं जलम् ॥ पानार्थं च मया दत्तं गृहाण पुरुषोत्तम ॥१४॥ इति जलम् ।। आपो नारायण साक्षात्ताभिराव मने सदा ॥ कृपां कुरु जगत स्वामिन् गृहाणाचमनीयकम् ।।१५।। इत्याचमनीयम् ॥१५॥ लवंगकर्परयुतं तांबूलं सुरमजितम् ॥ प्रीत्या गृहाण देवेश मम सौख्यं विवर्द्धय ।।१६।।इतितांबूलं ॥ इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ॥ तेन मे सफजावाप्तिर्भवेन्ज्जन्मनि जन्मनि ॥ १७ ॥ इति पूगीफलं ॥ चतुर्वतिस मायुक्तं गोघृतेन च परितम् ॥ मीराजनेन सन्तुष्टो भवत्येव जगत्पते ॥ १८॥ इतिनोराजनं ।। यानि कानि च दुःखानि सर्वपापातीनि च ॥ त नि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥१९॥ इतिप्रद क्षिणा || ततः पुष्पांजलि गृहीत्वा स्तुति कुर्यात् ॥ यन्मया भक्तियोगेन पत्रं पुष्पं फलं जलम् पनिवे दितं च नैवेद्यं तं गृहाणा कम्पया ॥२०॥ त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समये ॥ गृहाणसुमुखो .

भूत्वा प्रसीद पुरषोत्तम ॥ २१ ॥ मन्त्रहीन कियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन । यत्वजितं मया देव (परिपूर्ण तदस्तुमे ॥ २२ ॥ अमोघं पुण्डरीकाक्ष नृसिंह दैत्य सूदनम् ॥ हृषीकेशं जगन्नाथं वागीशंवर का दायकम् ॥ २३॥ सगुणं च गुणातीत गोविन्दं गरुडचजम् ॥ जनार्दनंजनातीतं जानकीवल्लभं रिम ॥ २४ ॥ प्रणमामि सदा भक्त्या नारायणमतः परम् ॥ दुर्गमे विषमे घोरे शत्रुभिः परिपीडित ।।२५।। निस्तारयतुसर्वेषु तथानिष्टभयेषु च ।। नामान्येतानि संकीर्त्य इप्सितं. फलमाप्नुयात. ॥ २६ ॥ सत्यना रायणं देवं वन्देह कामदंप्रभुम् । लीलयाविततं विश्वं येन तस्मै नमो नमः॥२७॥ इति पूजनं समाप्तम् एक समय समस्त प्राणियोंका हित चाइन वाले मुनि लोगों ने परम रमणीय नैमिषारण्य वनमें मनको प्रसन्न करने वाली सभा का क्यिा ॥ १ ॥ उसी समय अति तेजस्वी व्योसजी के शिष्य * अथ कथा प्रसंग एकदा मुनयः सर्वे सर्वलोकहितेरताः।सुरम्ये नैमिषारण्ये। गोष्ठी चमनोरमाम्।।तदन्तरे महातेजो व्यासशिष्योमहा यशाः॥सूतः शिष्यगणैर्युक्तः समायातो हरिस्मरन् ।.२॥ तमा यान्तं उमालोक्य सृतं शास्त्रार्थपारगम् ।मुनि सर्वेसमुत्तस्थः सूतजी अपने शिष्योंका साथमें लिये हरिकानाम स्मरण करतहुये वहांआये ॥ २ ॥ समस्तशास्त्रोंक

जाननेवाने श्रीसूतजीको आतेदेख महातपस्वीशौनकादिअट्टासीहज ऋषि उठकरखड़े होगये३ सवधर्मके " का
स० जाननेवालोंमेंश्रेष्ठ सूतजी और परमवैष्णव शौनकादिऋषि परस्पर शीघ्रतासे पृथ्वीमें दंवतनमस्क
शौनकाधास्तपोधनाः।सोपितान् सहसाभक्तानमुनीन्परम
वैष्णवान् । ननामदण्डवद्भुलौसर्वधर्मविदाम्बरः॥४॥वरासने
महावुद्धिस्तैर्दत्तैमनिसत्तमैः।। उवास सदसोमध्ये सर्वैःशिष्य
गर्णवृतः॥ ५ ॥तत्रोपावष्टं तं सुत शौनको मुनिसत्तमः।वद्धां
जलिमिमां वाचं पप्रच्छविनयान्वितः॥६॥ महर्षे सूतसर्वज्ञ
करने लगे।४॥ शौनकादिक मुनियोके दियेहुए आसनपर सम्पूर्ण शिष्यों सहितयति बुद्धिमान सूत जी
बैठ गये ॥५॥ बेठे हुए सूतजीसे शौनकादिक मुनियोंने नमस्कार कर हाथ जोडके कहाकि ॥ ६ ॥

हे महर्षिन। हे सर्वज्ञाह सूतजी। इसकलि कालमें मनुष्योंको हरिभक्ति किस उपायसे प्राप्त हो सोकहिये ? पाक्योंकि कलिकाल में सर्वप्राणीपाप करनेमें तत्पर और वेदविद्या विहीन होगये हैं उनका कल्याण कलिकालेसमागते केनापायेनभगवन्हरिभक्तिर्भवेन्नणाम् कलौसर्वे भविष्यति पापकर्म परायणावेदविद्या विहीना श्च तेषां श्रेयःकथं भवत ॥८॥कलावन्नगतप्राणा.लोकाःस्व ल्पायुपस्था॥निर्द्धनाश्चभविष्यन्ति नाना पीडाप्रपीडिताः ॥९॥प्रयाससाध्यंसुकृतं शास्त्रेषुप्रथितं द्विजः।तस्मात्कोपिकरि किसप्रकारसे होगा ?|| इस कलियुगमें मनुष्य का प्राण अन्नके आधोन,थोडी आयु निर्धनी अनेक पीडासे युक्तहोगा। प्रायः पुराय अतिपरिश्रमसे होत है इससे कलियुगमें काई मनुष्य पुराय न करेगा X ४ । १०॥ और पुण्य न होनेसे प्रवृत्ति पापमय होजायगी तब तुच्छ मनवाले सब मनुष्य अपने वंश सहित नष्ट हो.जावेंगे ॥११॥हे सूतजी ! जिसतरह थोडे परिश्रम थोडे घर और समय में पुण्यप्राप्त कर स० व्यन्ति कलौनसुकृतंजनाः॥१०॥सुकृतेषुविनष्टेषुप्रवृत्तपापक मणि । सर्वशाःप्रलयं सर्वे गमिष्यन्ति दुराशयाः।११शस्वल्पा श्रमैरल्पवित्तै रल्पकालश्चसत्तमः।यथा भवेन्महापुण्य तथा कथय सूतनः॥१२॥तस्योपदेशतःपुण्यं पापम्बा कुरुतेजनः। सतद्भागी भवेन्मर्त्य इतिशास्त्रेषुनिर्णयः॥१३॥पुण्योपदेशी होवे ऐसा कोई उपायवरणन कीजिये? ॥१२॥ जिसके उपदेश से मनुष्य पुराय व पापकरता है उसके पुराय पापका भागी और उपदेश कहीं होता है यह शास्त्र का निर्णय है १३ पुराय को उपदेश करनेवाला - और दयावान कपट रहित निष्पापहोकर निर्विरोध यह चार तरहके मनुष्य नागयण समान है १४संसार । में ज्ञानी होकर जो दुसरेको ज्ञान नहीं देता उससे ज्ञान रूपी परमेश्वर प्रसन्न नहीं होते ॥ १५ ॥ जो सदाकतवैश्च विवजितः। अपापी चाविरोधीचचत्वार केश बोपमाः॥१४॥ज्ञानसंप्राप्य ससारयः परेभ्योल यच्छतिज्ञान रूपीहरिस्तस्सैप्रसन्न इन नेक्षते।.१५॥ज्ञानरत्नैश्च युक्तोय:पर सन्तोपकृन्नरः॥सज्ञेयःसमतैनूनं नररूपधरो हारः॥१६॥ ते नतपसा किंवा प्राप्यतेवांछितं फेलातत्सर्वं श्रोतुमिच्छामिकथ पुरुष रत्न रूपी ज्ञान से दूसरे कोसन्तोष वरते हैं उन्हें मनुष्य रूप धारण किये नारायणही जाना ॥ १६ ।। सों हे महामते ! ऐसा कौनव्रत है कि जिसके करने से मनवॉछित फल प्राप्त होसे हमारी ५ सुनने को इच्छा है मुझसे कहिये ॥१७ाह मुनियोंमे श्रेष्ठ!आपबेदवेदांगके ज्ञाना है यापके ऐसादूसरा का स० कोई वक्ता मुझे नहीं दिखलाईदेता क्योंकि आपश्रीवेदव्यासजी के शिष्य हैं॥१८॥सूतजी बोले हे यस्त्र महासते॥१७॥ त्वमेवमुनिशार्दूल वेदवेदांगपारगः। त्व इते नहिं वक्तान्यो यतस्त्वव्यासशिक्षितः॥१॥सूतउवाच।। धन्योसि त्वमुनि श्रेष्ठ त्वमेव वैष्णवाग्रणी:आयत:समस्तलोक नां हितमिच्छसि सर्वदा॥१९॥शृणुशौनक वक्ष्यामि यत्त्वया श्रोतुमिष्यते। नारदेनैव सम्प्रोक्त: भगवान कमलापतिः ॥सुर मुनि श्रेष्ठ ? तुम धन्यहोतुमही वैष्णवो में अग्रगण्यहो कारणके सब प्राणियों का आप सदेव हित चाहते हैं ॥११॥ हे शौनक | सुनो आपसे उस उत्तम व्रतका कहूँगा कि जित व्रतका नारद ने

'लक्ष्मीपति से पूछा था, और जिसप्रकार भगवान ने नारद से कहा सो हे ऋषि लोगों!
सावधान होकर सुनो ॥ २० ॥
पये यथेवाईतच्छृणुध्वसमाहिताः॥२०॥इति श्रीस्कंदपुराणे
रेवाखण्डे सत्यनारायणव्रतकथायां प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
एकदा नारदायोगीपरानुग्रहवाञ्छयापर्यटन्विविधान्लोका
नमृत्युलोकमुपागमत् ।तत्र दृष्ट्वा जनास्सर्वे नानाक्लेशस
मन्विताः।नानायोनिसमुत्पन्नाःक्लिश्यन्तेपापकर्मभिः॥२॥
* इति श्रोस्कन्दपुगणेवाखराडेसत्यनारायणवतकथायां प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
एक समय नारदजी समस्त प्राणियों के हितकी इच्छाकरकेपृथ्वीपर घूमते हुए मृत्युलोक में आये॥१॥

कक तो वहां देखा कि सत्र प्रणा अनेक पीड़ाओं से युक्त और थनेक योनिमें उत्पन्न होकर पापकर्म से दुःख पा रहे हैं यह देखकर विचार किया कि इन सब लोगोंका दुःख किस उपायसे नाश होगा ऐसा मनमें विचास्कर विष्णुलोकको गये ।। ३ ॥ वहां ' शुक्ल वर्ण चार भुजावाले केनोपायेन चैतेषांदुःखनाशोभवेद्बुवम्।।इतिसंचित्यमनसा विष्णुलोकंगतस्तदा ॥३॥तत्र नारायणं देवं शुक्लवर्णचतुर्भु जम्॥शंख चक्रधरंदेवं वनमालाविभूषितम् ॥ ४॥ दृष्ट्वातं दे देवेशस्तोतु समुपचक्रमे॥न र उवाच॥नमरते वाङ्मनोनीत शंख चक्र को धारण किये वनमाला से सुशोभित जो देवेश नारायण हैं उनको देखकर स्तुति करने लगे ॥ ४॥ नारदजी बोले कि हे भगवन् - वचन और मनसे न कहने. और ।

नधारण करने योग्य अनन्त शक्ति युक्त निर्यणोत्म और सगुणात्म भी आपही हैं ।।।। हेमहाराज । आप सब प्राणियों के उत्पन्न करने वाले और भक्तांके नाशक हैं यह स्तुति सुनकर विष्णु भगवान रूपायानन्तशक्तये।आदिमध्यान्तहीनाय निर्गुणाय गुणात्म ने॥६॥सर्वेषामादिभूताय भक्तानामातिनाशिने।श्रुत्वास्तोत्रं ततोविष्णुर्नारदंप्रत्यभाषत॥७॥श्रीभगवानुवाचाकिमर्थमा गतोसत्वं किंत मनसिवर्तते। कथयस्व महाभागतत्सकथ यामि ते॥८॥नारदउवाच। मृत्यलोकेजनाःसर्वेनानाशोकस बोले ॥७॥ हे नारद ! किस थे से थाये हो तुन्हारे मन में क्यर है :सा हुमसे कहो जो पूछोगे य कहेंगे ॥८॥ नारदजी बोले-ई नाथ मृत्युलोकमें समस्त प्राणि अनेक योनिमें उत्पन्न होकर स० ७ अपने किएहुए पापकर्मद्राराक्नेशित होरहे हैं ।।६॥ हे महाराज जिस छोटे उपाय से उनका क्लेश दूरहि सोई में सुनना चाहता हूँ|१०|| भगवान बोले कि, समस्तजनों कृपाकरके तुमन बहुत अच्छा प्रश्न | का मन्विताः।नानायोनिसमुत्पन्नाःक्लिश्यन्तेपापकर्मभिः॥६॥ तत् कथंशमयेन्नाथ लघूपायेन तद्वद॥तत्सर्वश्रोतुमिच्छामि कृपास्तियदि ते मयि॥१०॥ भगवानुवाच॥ साधुपृष्टंत्वयावं त्स लोकानुग्रहवाञ्छया॥यत्कृत्वामुच्यते मोहात्तच्छृणुष्य वदामि ते।११।७तमस्ति महत्पुण्यस्वर्गेमत्येचदुर्लभम्तव पूछा कि, जिस के मनुष्य मोहसे छट जाय मैं ऐसा उपाय कहता हूं सुने। ॥ १॥ ह नारद जी ! ७ जोबततीनों लोक में अति दुर्लभ हैं सेई आम के कहनेसे मैं प्रकाशित करताहूं ॥१२। वह व्रत सत्यना रायण का व्रत है जिसके। विधि पूर्व करने से इस इललोक में मुख और अन्त में मोक्ष मिलतीहै ॥१३॥ स्नेहान्मया विप्र प्रकाशः क्रियतेऽधुना ॥ १२ ॥ सत्यनारा यणस्यैकंत्रतंसम्याग्विधानतः। कृत्वासद्यःसुखंभुक्त्वापरत्रमो क्षमाप्नुयात्॥१३॥ नारद उवाच॥किंफलंकिंविधानञ्चकृतंके नचतव्रतम्॥तत्सविस्तराब्रूहिकदाकार्यहितद्वतम्।१४॥ श्रीभगवानुवाच॥ दुःखशोकादिशमनं धनधान्यविवर्द्धन। सौ तब नारदजी यह सुनकर बोले कि इस व्रत का क्या फल है और पूर्व में किसने किया है किस समय यह व्रत करना चाहिये सो श्राप विस्तार कि कहिये ॥ १४ ॥ भगवानने कहा कि इसके -- करने से दुःख शोकादिकानाशऔरधनधान्यकी वृद्धि, सौभाग्य और सन्तति की प्राप्ति औरसर्वत्रवि- जय होती है।। १५ ।। इसव्रतमें मनुष्य भक्ति श्रद्धा युक्त किसी दिन सायंकाल सत्यनाराणका पूजन भाग्यसन्ततिकरसंवत्रविजयप्रदम्॥१५॥यस्मिन्कस्मिन्दिने मोभक्तिश्रद्धासमन्वितः॥सत्यनारायणो देवोयजेचैव नि शामुखे॥१६॥वान्धवैाह्मणै श्●वसहितो धर्मतत्परानैवेद्यंभ क्तितोदद्यात् सपादं भक्तिसंयुतम्॥१७॥रंभा फलंघृतंक्षीरं गो धूमस्यच चूर्णकम्।अभावेशालिचूर्णम्वा शर्करा चगुडतथा कर ॥ १६ ।। और भाई बन्धु ब्राह्मणों के साथ धर्म युक्त सेवाकरके उत्तम नैवेद्य भोग लगावे ॥१७॥ केलेकाफल, घी, दूध; गेहू काचूर्णलेवे गेहूँकाण न हो तो चावलका चूर्ण, खाँड अथवा गुड़मि- + लावे ॥ १८ ॥ सवाई करके (सवापाव सवासेर) के हिसाबसे एकमें मिलाकर भक्तिसे सत्यनारायणाको नवद्यलगावे बांधवों के साथ कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणादेवे ।। २१ ॥ श्रीसत्यनारायण के ॥१८॥ सपादं सर्वभक्ष्याणि चैकीकृत्यनिवदयेत् । विप्राय द क्षिणांदद्यात्कथां श्रुत्वा जनस्सह १६॥ततश्चवन्धुभिस्साद्ध विप्रेभ्यो प्रतिपादयेत्।प्रसादभक्षयेद्भक्त्यानृत्यगीतादिकं च रेता२०।ततस्तु स्वगृहं गच्छेत्सत्यनारायण स्मरन्।एवंकृत्वा मनुष्याणां वाञ्छासिद्धिर्भवेर्धवम॥२१॥विशेषतःकलियुगे प्रसादको अपने भाई बन्धुओंके साथ खाकर रात्रिमें नृत्यगीतादि कर ।। २० ॥ तदनन्तरसव श्रोतादि गण सत्यनारायणको स्मरण करते २ अपने अपने घर जायें इस प्रकार व्रत करने से. मनवांछित मा फल मिलता है ।। २१ ॥ कलिकाल में विशेष कर पृथ्वी पर इस से दूसरा कोई उपाय नहीं है, हे नारद ! जिन्होंने इस व्रतका पहिले किया है सेो कथा सुनो ॥ २२॥ काशी पुरी, में निर्धन शता नान्योपायोस्तिभूतले॥कथांसम्यक्प्रवक्ष्यामिकृतंयेनपुरा में ने॥२२॥कश्चित् काशीपुरेरम्येह्यासीद्विपोतिनिर्धनः॥ क्षुधा तृष्णाकुलो भूत्वा नित्यवभ्राम भूतले॥२३॥दुःखितं ब्राह्मणे दृष्ट्वा भगवान्ब्राह्मणाप्रियः वृद्धब्राह्मणरूपेण पप्रच्छ द्विज नन्द नामक एक ब्राह्मण क्षुधा पिपासासे दुखित नित्यही पृथ्वो में भिक्षा मांगने के हेतु धूपता था ।। २३.|| बाह्मणप्रमी भगवान नारायण. दुःखित ब्राह्मण को देख बूढ़े बाह्मण का रूप । ।

घर अति आदर से पूछा ॥ २४ ॥ कि हे विष ! किस हेतु पृथी.में आप नित्यही घूमा करते हैं हमारी सुनने की इच्छा है. यदि आपकी इच्छा हो तो कहिये ॥२४ा ब्राह्मण बोलाकि, मैं अत्यन्त मादरात् ॥२४ किमर्थं भ्रमसे विप्र मही नित्यं सुदुःखितः॥ तत्सर्वश्रोतुमिच्छामि कथ्यतांयदिरोचते॥२५॥ब्राह्मणोतिद रिद्रोहं भिक्षार्थवैभ्रमे महीम् । उपायं यदिजानासिकृपयाकथ यप्रभो॥२६॥वृद्धब्राह्मणउवाच॥ सत्यनारायणो देवः वांछि तार्थफलप्रदः ॥ तस्यत्वं द्विजशार्दूलंकुरुष्व व्रतमुत्तमम्।२७ दरिद्र ब्राह्मण हूँ भिक्षाके हु तु भूमिपर घूमता हूँ कुछ उपाय जानते हो तो हमसे कृपा करके कहिये।।२६।। वृद्धब्राह्मण वाले कि हे वाले कि हे द्विजश्रेष्ठ ! मनेररथके पूर्ण करने वाले श्रीसत्यनारायणकेउत्तमा -- सत्तम व्रतको करा ।। २७ ।। जिसके करने से मनुष्य सब दुखों से छूट जाते हैं, बृद्धब्राह्मणारूपी सत्य नारायणदेवने यह व्रतका विधान भी ब्राह्मण को बताया २८||आप तान होगये तब शतानन्द यत्कृत्वासर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवतिमानवः॥विधानं चव्रतस्या स्यविप्रायाभाष्य यत्नतः॥२८॥ सत्यनारायणो वृद्धस्तत्रैवा न्तरधीयत॥ ततः प्रातः करिष्यामि व्रतं मनसिनिश्चितम्॥ इति सञ्चिन्त्य विमोऽसौ रात्रौ निद्रा नलब्धवान्।।ततःप्रातः। समुत्थाय सत्यनारायणबतम्॥३०॥करिष्ये इति संकल्प्यभि ब्राह्मण ने मनमें यह निश्चय कियाकि मैं कलही श्रीसत्यनारायण का व्रत करूंग॥२॥शतानन्द ब्राह्मणको इस चिन्ता में रात को नींद न बाई फिर सबेरे उठकर यह निश्चय किया कि आज -- श्रीसत्यनारायण के व्रत को अवश्य करूंगा ॥ ३० ॥ यह संकल्प कर भिक्षा मांगने गया तो उस दिन द्रव्य भी बहुत पाया ।। ३१ ।। उसी. द्रव्य से अपने भाइयों के साथ- सत्यनारायण का व्रत क्षार्थमगमदद्विजः।तस्मिन्नेव दिनं विप्रःप्रचुर द्रव्यमाप्तवान ॥३१॥ तेनैव वन्धुभिःसाधू सत्यस्य व्रतमाचरेत् । सर्वदुःखवि निर्मुक्त.सर्वसंपत्समन्वितः॥३२॥वभूवसद्विज श्रेष्ठो ब्रतस्या स्यप्रसादतः।ततःप्रभृतिकालंच मासि मासि कृतंव्रतम्॥३३॥ श्रीभगवानुवाच ॥ एवं नारायणस्येदं व्रतं ज्ञात्वा द्विजोत्त किया और उसके प्रभाव से सब दुःखों से छूटकर सब संपत्ति से-संयुक्त होगया और तबही से वह ब्राह्मण इस महीने २ व्रत करने लगा-1॥ ३३ ॥ भगवान ने कहा कि यहा :शतानन्द द्वारा - किये हुए श्रीसत्यनारायण का पूजन है.इसको जानकर ॥३४॥ जो मनुष्य करता है वह सब पापों से छूटकर दुर्लभ मोक्षपाता है ।। ३५॥ जिस समय पृथ्वी में इस व्रतको मनुष्य करेंगे उस समय सबका कर १ मः॥ शतानन्दब्राह्मणस्यकुटुम्वैः सहपूजनम् ॥ ३४॥ सर्व पापविनिर्मुक्तादुर्लभमोक्षमाप्नुयात्॥३५॥त्रतंचेदंयदाविप्रा. पृथिव्यांसकरिष्यति ॥तदैव सर्वदुः खंच मनुजस्य विनश्यति ॥३६ ॥ इतिश्री० रेवा० सत्यनारायणव्रतक० द्वि ॥२॥ सूत उवाच॥ एवन्नारायणेनोक्तं नारदाय महात्मने । मया दुःख अवश्य नाश हो जायगा ।। ३६ ॥ इति श्रीसत्यनारायण व्रत कथायाः द्वितीयायायः ॥ २॥ सूतजी बोले हे शानक । विष्णुने इस तरह नारद से कहा सो तुमसे मैंने कहा और दूसरी बात जो पूछो सो कहूं ॥ १ ॥ शौनकजी बोले हे सूतजी ! उस ब्राह्मण के बाद अन्य किसने इस ब्रतको किया से सुनने की इच्छा है ॥ २ ॥ सूतजी बोले हे मुनिश्रेष्ठ सुनिये जिसने जिसने यह तत्कथित विप्रकिमन्यत्कथयामि ते ॥१॥शौनक उवाच । ततो विप्राद्वतंकेन पृथिव्यांचरितमुने।तत्सर्वश्रोतुमिच्छामि श्रद्वास्माकं प्रजायते ॥ २॥ सूत उवाच ॥ शृणुध्वं मुनयः सर्वे तस्माद्येन कृतं भुवि । एकदा स द्विजवरो निजवित्ता। नुम्गरतः॥३॥ वन्धुभिः स्वजनैस्सा व्रतंकत समुद्यतः। न बत पुनः किया एक समय वह ब्राह्मण निज धनानुसार । निज वान्धवों के साथ व्रत करने के । 6 क० २२ अद्यत हुआ कि उसी समय एक लकडिहारा वहाँ आया था भूख प्याससे-पीडित काष्ठके भारकों बाहर रखकर ब्राह्मणाके घरजा व्रत करते ब्राह्मण को देखा ॥५॥और हाथ जोड़ नम्रता से प्रणाम कर एतस्भिन्नेव काले तु काष्ठक्रेता समागतः ॥४॥ वहिः काष्ठ ञ्चसंस्थाप्य विप्रस्य मन्दिरं ययौ । क्षुधार्थपीडितात्मा च विप्रं दृष्ट्वा तथाविधम् ॥ ५ ॥ प्रणिपत्य द्विजं प्राह किमिदं क्रियतत्वया॥कृते किंफलमाप्नोतिविस्तराद्वदमेप्रभो॥६॥ विप्र उवाच ।। सत्यनारायणस्येदम्बतं सर्वेप्सितप्रदम् । दुःख बोला कि आप यह क्या कर रहें हैं ?-इसके करने से क्या फल होता है ? सो विस्तार पूर्वक कहिये १२ ।। ६ ।। ब्राह्मण बोला कि यह सबमनोरथ को देनेवाला दुःख शोकों के नाश • करने वालो विजय , 'प्रद श्रीसत्यनारायण का व्रत है ।। ७॥ जिसके प्रसाद से हमको यई धनधान्यादिक प्राप्त हुए हैं, यह वचन सुन लकड़िहारा प्रसन्न हुथा ॥ ८॥ और जलका पान कर प्रसाद को खांकर भगवान शोकादिशमनं सर्वत्रविजयप्रदम् ॥७॥ यस्यप्रसादान्मेसर्व धनधान्यादिकं महत् । ततस्तद्वचनं श्रुत्वा काष्ठक्रेतातिह र्षितः।।८॥ पपौजलंप्रसादंचभुक्त्वा तन्नगरंययौ।सत्यनाराय णं देवं चिंतयन स्थिरमानसः॥ ६ ॥काष्ठं विक्रयतो ग्रामे प्राप्यते चाद्य यद्धनम् ॥ तेनैव सत्यदेवस्य . करिष्येव्रतमुत्त सत्यनारायण का ध्यान करता हुयो उसी नगर में गया है | भाज़ लकड़ी बेचने में जो क० १३ कुछ प्राप्त होगा उसीसे सत्यदेव के उत्तमव्रत का 'मैं अवश्य करूंगा।। १० ।। ऐसा मनमें विचार कर लकड़ी माथेपर रखी और जहाँ धनी लोग वसते थे वहाँ गया ॥ ११ ॥ उसदिन लकड़िहारे को दूना मम ॥ १० ॥ इति सचित्य मनसा काष्ठं कृत्वा तु म- स्तके ॥ जगाम नगरे रम्ये धनिनां यत्र सस्थितिः ॥११॥ तदिने काष्ठमुल्यं च दिगुणं प्राप्तवानसौ ॥ ततः प्रसन्नहृद य: सुपक्वं कदलीफलम् ॥ १२॥ शर्कराघृतदुग्धं च गोधू मस्य च चूर्णकम् ॥ कृत्वैकत्र सपादचगृहीत्वा स्वगृहं ययौ धन प्राप्त हुया तव तो अत्यन्त प्रसन्न हो सुन्दर पक्के केला के फल ॥ १२ ॥ शक्कर दूध घी और गेहूं का चूर्ण सबको सवाई समेत लेकर घर को पाया ।। १३ ॥ तब अपने भाई बंधुओंको बुला

१
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कर विधिसे सत्यनारायण का व्रत करता भया । उसव्रतके प्रभावसे वह लकड़िहारा धन और पुत्रसे युक्त
हो गया ॥१५॥ इस लोक में सुख पाकर अन्त में सत्यदेवजी के लोकमें गया। हे मुनिलोग श्रव मैं
॥१३॥ ततोबन्धून्समाहृय चकार विधिना व्रतम् । तदव्रत-
स्य प्रसादेन धनपुत्रान्वितो भवत् ॥ १४ ॥ इह लोके सुखं
भुक्त्वाचान्ते सत्यपुरं ययौ॥अथान्यत्सम्भवक्ष्यामिशृणुध्वं
मुनिसत्तमाः॥ १५॥ इति श्री रेखाखण्डे सत्यनारायण
तकथायां तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ श्रीसूत उवाच ॥ आसी
और कथा कहता हूँ उसको सुनिये ।।१५।। इति श्रीसत्य कथायांभाषाटोकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥

कर स० सूत जीबोले कि, बलियोंमें श्रेष्ठ एक उल्कामुख नामक जितेन्द्रिय राजा थी, जो सदैव देवमन्दिरमें जाया करता था ॥१॥ वह राजा ब्राह्मणको नित्यही धन देकर सन्तुष्ट किया करता था उसकी कमल दुल्कामुखो नाम नृपतिबलिनांबरः ॥ जितेन्द्रियः सत्यवा- दी ययौ देवालयं प्रति ॥१॥दिनदिने धनं दत्वा द्विजानसन्तो षयेत्सुधीः॥भार्या तस्यप्रमुग्धाच सरोजवदना सती॥२॥ भद्र शीलानदीतीरे सत्यस्यवतमाचरेत्ाएतस्मिन्नन्तरे तत्र साधु रेकः समागतः ॥३॥बाणिज्यार्थबहुधनैः रत्नाद्यैःपरिपूरितः के संदृश मुखवाली प्रमुग्धा स्त्री थी ॥१॥ जो स्त्री के साथ भद्रशीलानदीतटपर सत्यदेवके व्रतको करता था उस समय वहां साधु ( बनिया) आता भया || ३ || बाणिज्य के वास्ते बहुत धन होगी तब मैं सत्यनारायण का नत अश्य करूंगा ॥१०॥ सत्यदेव, नों के पश्चात साधु' (बनियां) की स्त्रो'लीलावती आनन्द चित्तसे गर्भ- यदासे सन्ततिर्भवेत्।१०।अल्पकालेगतेतस्यामा लावती सती. गर्भयुक्तानन्दचित्ताऽभवद्धर्मपरायणा॥ ११॥ पूर्णे गर्भेततोजाताबालिका चातिनिर्मला, दिनदिनेव- ईमानाशुक्लपक्षयथाशशी॥१२॥ततोवणिकन्यकायाजात वती हो गई ॥ ११ ॥ दशवे मासमें धर्मपरायणा सती लीलावती के गर्भ से अति निर्मल एक कन्या ने जन्म लिया और दिन दिन वह कन्या शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की ज्योति के समान बुद्धि को प्राप्त होती गई ।। १२ । तंव साधु पनियों ने अपनी स्त्री के साथ कन्या का

का
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जातकर्म किया और इसका नाम कलावती रक्खा ॥ १३॥ उस समय लीलावती अपने
स्वामी से होथ जोडकर मधुर वचन बोली कि ह स्वामी आपने जो व्रत करने का संकल्प किया था
कर्मसमाचरेत् ॥ नाम्ना कलावती चेति तन्नामकरणं कृतम्
१३॥ततो लीलावतीप्राहस्वामिनं मधुरंवचः ॥नकरोषिकिम
थै वैपुरासंकल्पितंत्रतम्॥१४॥विवाहसमयेास्याःकरिप्यामि
ब्रतप्रिय।।इतिभा- समाश्वास्य जगाम नगरं प्रति।१५ततोक
उसे क्यों नहीं करते हैं ।। १४ ॥ साधु बोले हे प्रिये उस व्रत को मैं इसके विवाह के समय
अवश्य करूंगा: इस प्रकार अपनी स्त्री को समझाकर साधु वनियाँ वहाँ से चले गये ॥१५॥

॥ इधर कलावती पिता के घर नित्य बढ़ने लगी ॥ १६ ॥ तव धर्म साधु वनियाँ सखियों के साथ खेलती हुई लड़की को समर्थ देखकर दूतों को बुलाकर भेजा ॥ १७ ॥ कि विवाहनिमित्त लावती कन्याववृधपितृवेश्मनि॥१६||दृष्टवा कन्यां ततःसा धुनगरेसखिभिस्सह ॥ मंत्रयित्वाद्रुतं दूतं प्रेषयामासधर्मवित ॥१७॥ विवाहार्थेच कन्याया वरं श्रेष्ठ विचारय । तेनाज्ञप्त श्चदूतोसौ कांचनं नगरं ययौ॥१८॥ तस्मादेकं वणिकपत्रंस मादायागतोहि सः॥दृष्ट्रवातुसुन्दरंवालं वणिकपुत्रगुणान्वित कन्या के योग्य वर विचार करले आतों साधुकी आज्ञा पाकर दूत कांचन नामक नगर में गये ॥१८॥. उस नगर से एक-वणिक पुत्र को लेकर साधुके पास आये तव सुन्दर गुणयुक्त लम्केकों देखें ॥१|| जाति भाइयों के साथ प्रसन्नचित्त से कन्याका विधि-विधान से वंणिकपुत्र के साथ विवाह कर दिया ॥ २० ॥ और भाग्यवश विवाह के समय में भी उस व्रतकों साधु (वनियाँ) भूल गया तव म्॥१९॥ज्ञातिभिबन्धुभिस्सार्द्ध परितुष्टनचेतसादत्तवान्सा धुरान्हयकन्यांतस्मै विधानतः ॥२०॥ ततोऽभाग्यवशात्तेन विस्मृतव्रतमुत्तमम्॥विवाहसमयेनस्यास्तेन रुष्टोऽभवत्प्रभुः ॥२१॥ततः कालेन नि पतो निजकर्मविशारदः। वाणिज्यका क्षया शीघ्रं जामातृसहितो वणिक ॥२२॥ रत्नसारपुरेरम्ये ग सत्यनारायण जी क्रोधित हुए ॥ २१ ॥ तव कुछ दिनके बाद निजकर्म में अति चतुर साहूकार साधु व्यापार की इच्छासे अपने दामादको साथलेकर ।। २२ ।। समुद्रके निकट रत्नसार नामक नगर में जाकर व्यापार करने लगा ॥ २३ ॥ इतने ही समय में सत्यनारायण स्वामीने साधु वनियांकी भ्रष्ट' प्रतिज्ञा देख कर श्राप दिया कि ॥ ३४ ॥ तरे ऊपर वडा भारी कठिन दुःख पडेगा ।। २५ ॥ त्वासिंधुसमीपतः।वाणिज्यमकरोत्साधु मात्राश्रीमतासह २३॥ एतस्मिन्नेव काले तु सत्यनारायणः प्रभुः । भ्रष्ट नतिज्ञमालोक्यशापंतस्मै प्रदत्तवान् ॥ २४ ॥ दारुण कठिनं चास्य महदुःखंभाविष्यति॥२५॥तस्मिन्नेव दिनेराज्ञो धनमादाय तस्करः॥ तेनैववर्त्मनायातः पृष्टदेशे विलोकयन उसी दिन चोरोंने गजा के धन चुराये और अपने पीछे देखो हुए साधुके ही दिशा को गये ॥२६॥ श्व.प्रभृति कियाकाल महदुःखभविष्यति इति पाठान्तरम् ।

कल दौरते हुए राजाके दूतों को आते देखकर मनमें ढरके धनकों वहाँ ही रखकर आप छिप गये ॥२७॥ राजाके दूत साधुके निकट आराजाके धनकों देखो तो साधुको बाँध कर ॥ २८॥ श्रानन्दचित्त १८ ॥२६॥स्वपश्चाद्धावकान्दूतान्दृष्ट्वा भीतेनचेतसाधनसंस्था प्यतत्रैवसतुशीघ्रमलक्षितः॥२७॥ ततोदृताःसमायाता यत्रा सीत्सज्जनोवणिकादृष्ट्वानृपधनंतत्रबंधवानीतौवणिक्सुतौ२८ हर्षयुक्ताधावमानाऊचुर्नुपसमीपतः॥तस्करौौसमानीतौवि लोक्याज्ञापयप्रभो ॥२९॥ तेनाज्ञप्तस्ततःशीघंटंबध्वातुता होकर राजा के निकट लेजाकर बोले कि हे राजन् । दो चोर लाये हैं ईनको आज्ञा दीजिये ||२६|| राजाने साधुको देखकर जेलकी आज्ञा दिया, तव तो खूब मजबूत वाँधकर दोनो वनियोंको वन्दी खाने में बन्द कर दिग॥ ३० ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे-२० सत्यनारयातस्थायां भोपाटीकायांपतु थोऽध्यायः ॥शास्तजी बोले कि सत्यदेवजी की माया से चन्दकेतु राजा ने उन दोनों बनियों का वुभौ स्थापयामासुरेवाशकारागारेविचारतः॥३०॥ इति श्री स्कन्दपु०रेवा० सत्यनारायणब्रतकथायांचतुर्थो०॥४॥सूत उ वाच॥मायया सत्यदेवस्य न श्रुतंचतयोर्वचः। ततस्तयोधनंय च्चगृहीतंचन्द्रकेतुना॥१॥तच्छापाच्चतयोगेंहेमार्याचैवाती दुःखिता॥चौरेणापहृतं सर्वगृहे यच्चस्थितं धनी॥आधिव्या कुछ भी वक्न न सुना और सब धन उनका ले लिया। ॥ श्रीसत्यनारायणके श्रापसे साधु और- दामाद के घर पर स्त्री बड़ी दुःखी हो गई चोरों ने रका धन भी चुरा लिया-शा अधिन्याधि स० क० से पीड़ित भूखी प्यासी अन्न्नकी चिंता से युक्त घर २ घूमने लगीं ॥३॥ और कलावती कन्या भी घिसमायुक्ता क्षुत्पिपास्ग समाकुलाः॥ अन्नचिंतापरा भूत्वा बभ्रामचगृहे गृहे ॥३॥एवं कलावती कन्यावभाम प्रतिवास। म् ॥एकस्मिन्दिवसे रात्रौ क्षुधार्ता द्विजमन्दिरम् ॥४॥गत्वा पश्यव्रतं तत्रसत्यनारायणस्यच॥उपविश्य कथां श्रुत्वावर प्रार्थ्यभिवांछितम्॥५॥प्रसादभक्षणंकृत्वाययौं रात्रौ गृहंप्रति नित्यही घूमने लगी एके दिन रोतके समय कलावती कन्या भूख से दुखि होकर एक ब्राह्मण के घर पर गई ॥॥ वहाँ जो श्रीसत्यनारायण के व्रतको देख कथाको सुन निज मनोरथ को मांगा ।।५।। १९ प्रसादको खा कुछ रात गये अपने घरेपर आई, तब लीलावती कन्याको वहुत धिक्कारने लगी ॥ ६ ॥ कि हे 'पुत्री ! इतनी रात तकतू कहाँ रही, तेरे मन में क्या है ? तव कलावती कन्या मातासे ततोलीलावती कन्या भसयामास तां भृशम् ॥६॥ पुत्रि रा बौस्थिताकुत्रकिन्तेमनसिवर्त्ततेोकन्याकलावती पाहमात- रंपतिसत्वरम्॥७॥द्विजालयेतंमातर्दृष्ट्वा वांछितसिद्धिदम् च्छुत्वाकन्याकावाक्यंत्रतंकर्तुद्यता ॥८॥ सामुदातुवणि सत्य २ बचन बोली || किहे याते मनोस्थकोपरिपूर्ण करने वाले श्रीसत्यनारायण के व्रतको मैंने ब्राह्मणा के घर में देखा है। तबलीलावती कन्याकलावतो का वचन सुन कर श्रीसत्यनारायण व्रतको करने के लिये द्यत हुई ॥८॥ पतिव्रता साधुवी स्त्री अपनी 'कायासहित बंधु बान्धवा के साथ सत्यनारायण के व्रत को करत भई || और श्रीसत्यदेवजी से यह दिव्य वर मांगा कि हे सत्यदेव ! क०. भार्या सत्यनारायणस्य च ॥व्रतञ्चक्रे सैवसाध्वीबन्धुभिः स्वजनैस्सह॥६॥भर्तृजामातारौ क्षिप्रमागच्छेतां निजाश्रम म्॥इति दिव्यं वरंववेसत्यदेव पुनः पुनः॥१०॥अपराधं चमे भर्तुर्जामातुः क्षन्तुमर्हसि॥वतेनानेन सन्तुष्टो सत्यनारायण हमारे पति और दामाद जल्दी से अपने घर' आवे ।। १० । मेर पति और दामादके अपराधको आप क्षमा करने योग्य है मो. क्षमा कीजिये, तब श्रीसत्यनाराण स्वमी संतुष्ट होते भए और बन्दकेतु राजाको स्वप्न दिखाया कि हे सजन का सबेही दोनों सज्जन नियों को छोड़ देनी ||१२|| और उसका जो धन मापने ले लिया है। सो भी दे देना नहीं तोतोराराज्य प्रभुः॥११॥दर्शयामासस्वप्नं हिचन्द्रकेतुंनपोत्तमम् ॥वणि जौमोचय प्रातर्वन्दिनौ नृपसत्तम ॥१२॥ देयं धनं चतत्सर्व गृहीतं यत्त्वयानयोः॥नो चेत्त्वान्नाशयिष्यामि सराज्यधन पुत्रकम् ॥१३॥ एवमाभाष्य राजानं ध्यानगम्योभवत्पभुः। धनापुत्र के सहित नष्ट कर देखेंगे।। १३॥ यह राजा से कह कर श्रीसत्यनारायणजी प्रभु 'अर्ध्यान -- -- हो गये और प्रातःकाल राजाने निजमंत्रियों के साथ ||१४|| सभाके मध्य में बैठकर मंत्रीजनों से अपना स्वप्न कहा किबंधे हुए बनियोंकों शीघ्र छोड़ दो ॥१५ ।। राजाका यह बचन सुन दूतलोंग का स० ततःप्रभातसमये राजा 'स्वजनैःसह॥१४॥उपविश्यसभाम- २९ ध्ये प्राह मन्त्रिजनं प्रति ॥बद्धौ महाजनौ शीघ्रमोचयद्वौवणि क्सुतौ॥१५॥इति राजावचः श्रत्वा मोचयित्वा महाजनौ ॥ समानीय नृपस्यांग्रे पाहुस्ते विनयान्तिाः॥१६॥ आनीती द्वौ वणिपुत्रौ मुक्तौ निगड़बन्धानात्॥ततो महाजनौनत्वा दानों बनियोंको बन्धनसे छुड़ा कर राजा के निकट लाये और विनययुक्त बचन बोले ॥१६॥ कि हे महाराज इन दोनों बनियों को बन्धनसे छुड़ कर लाए हैं अब आपकी क्या आता है इनदोनोंने महा रोजचन्द्रकेतुको नमस्कार करके ।।.१७॥ पूर्व वृत्तान्त को स्मरण करते हुए डरके मारे महाराज' चन्द्रकेतु से साधु व दामादने कुछ न कहा तव वणिक पुत्रोंको देखकर राजा यादरसे बोलाकि॥१८॥ भाग्यवश तुम चन्द्रकेतु पात्तमम् ॥ १७॥ स्मरन्तौ पूर्ववृत्तांतं नोच तुर्भयविह्वलौ॥राजा वणिक्सुतौ वीक्ष्य वचः प्रोवाचसादरम् ॥१८॥दैवात्माप्तं महादुःखमिदानींनास्ति ते भयम् । इत्थं सम्मान्य बहुधाक्षौरकर्माद्यकारयत्॥१६॥वस्त्रालंकारकं द त्वा परितोष्य नृपश्चतौ ॥ पुरस्कृस्य वाणिक्पुत्रौ वचसातोष दोनोंको बडा दुख मिलो अब भय मतानो गजाने इसप्रकारकहकर हाथ और पैरोंकी हथकडी शृडख लो आदि कटवाई और नौरकर्मादि कराए।।१॥ वस्त्र और आभूषण देकर दोनों बनियों को अत्यन्त स० क० सन्तुष्ट किया ||२०आर'पहिले जितना धन लिया था उसका दना धन दिया और कहा कि 'श्राप अपने घर को जाव'।। २१ ।। साधुने गजा को प्रणाम करके कहा कि आपके प्रसादसे जाता हूँ यशम् ॥ २० ॥ पुरानीतं च यदव्यं द्विगुणीकृत्य दत्त वान ॥प्रोवाचतौततो राजा गच्छसाधोनिजाश्रमम्॥२१॥ राजानं प्रणिपत्याहगन्तव्यं त्वत्प्रसादतः। इत्युक्त्वातौमहा वैश्यो जग्मतुःस्वगृहंप्रति२२इतिश्रीस्कं०रे०सत्य०पंचमो० ॥ ॥ सूत उवाच ॥पूजांतु कृतवान्साधुमंगलाचारपूर्वकम्॥ ॥ २२ ॥ इति श्रीस्कंदपुराणे रेवाखण्डे सत्यनारायणवतकथायां पंचमोऽध्यायः ॥ ५॥ फिर सूतजी २५

बोले कि साधु वनियां मंगलाचरपूर्व के देवता की पूजा करके बाहणों को धन दें निज 'नगर
को यात्रा किया ॥ १ ॥ कुछ दूर जाने पर श्रीसत्यनारायणाजी ने बनियां के मन की वार्ता
ब्राह्मणेभ्यो धनंदत्वातदातुनगरं ययौ॥१॥किय दूरेगतेसाधो
सत्यनारायणम्भु ॥जिज्ञासां कृतवान्सधोः किमस्ति तव
नौ स्थित॥२॥ततोमहाजनौमत्तौ हेलयाचप्रहस्यच। कथंपू
च्छासभादंडिन्मुद्रानेतुंकिमिच्छसि। ३. लतापत्रादिकं चैव
जानने के हेतु पछा कि तेरे नाव में क्या है ॥२॥ तब 'धनोन्मत्त महाजन साधु बनियाँ
हँसकर बोला कि हे दंडिन ! क्यों पूछते हो ? आपकी क्या रुपया लेने की इच्छा है ? ॥ ३ ॥

क . मेरे नाव में तो लतापत्रादिक है तब दंडी ऐसी निठुर बचन को 'सुन वोले कि तेरा वचन सत्य होवे ॥ ४॥ ऐसा कहकर आप समुद्र के पास जाकर बैठ गये ॥ ५॥ दराडीके चले जाने पर वर्तते तरणौ मम ॥ निष्ठुरंतद्वचःश्रुत्वा सत्यं भवतुतेवचः॥४॥ एवमुक्त्वागतःशघि दंडीतस्य समीपतेः।कियददूरेततोगत्वा स्थित सिंधुसमीपतः॥ ५ ॥ गते दाण्डानसाधुश्च कृतनित्य क्रियस्तदा॥ उत्थिता तरणीदृष्टवा विस्मयं परमं ययौ॥६॥ दृष्टग लतादिकं तत्र मूर्छितोन्यपतद्भुवि ॥ लब्धसंज्ञो व साधु नित्यक्रिया करके नावको उठी हुई देख याश्चर्यको प्राप्त हुआ । ६ ॥ज्यों ही नावसे लतादिक २३ देखा त्योंही मुर्छा को प्राप्त हो भृमिपर गिर पडे और - सचेत हो दोनों जन अतिचिता करने लगे ॥ ७ ॥ तव सोधु का दामाद वोला कि व्यर्थ शोक किसलिये करते हो दण्डी ने श्राप णिकपुत्रो भृशं चिन्तापरोऽभवत् ॥७॥तदातु दहितुः कान्तो बचनं चेदमब्रवीत् । किमर्थं क्रियते शोकः शापो दत्तश्च द ण्डिना॥८॥शक्यततेनसहि कर्तचात्र न संशयः॥ अल- सच्छरणं यामो वाञ्छितार्थो भविष्यति ॥६॥ जामातुर्व- चनं श्रुत्वा तत्सकाशं गतस्तदा॥ दृष्ट्वा च दंडिनं भक्त्या दिया हैं ।। ८ ॥ वह सब कुछ कर सकते हैं इसमें संशय नहीं है इस वास्ते चलो उन्ही के शरण में चलें मनेरिंथ उन्हों से सिद्ध होगा.॥ ॥ साधु दामाद का यह वचन सुन दराड़ी के क पास गया और दराडी को देखकर प्रणाम करके भक्ति से आदरयुक्त बचन बोला कि ॥१०॥ लो मैंने श्रापके सामने वहा सेो अपराध क्षमा कीजिये यह कहकर वारम्वार नमस्कार करके नत्वा प्रोवाच सादरम् ॥१०॥ क्षमस्वचापराधमे यदुक्तं तव सन्निधौ ॥ एवं पुनः पुनर्नवा महाशोकाकुलोभवत्॥११॥ प्रोवाच वचनं दंडी विलपंतं विलोक्यच॥मारोदीःशृणुमेवा क्यं मम पूजाबहिर्मुखः॥१२॥ममेच्छया च दुर्बुद्धेःलब्धंदुखं शोकाकुल होता मया ॥ ११ ।। तब दगडी उसे रोते देखकर बोले कि मत रो मेरे वचनो को मन तू मेरी पूजासे सदा मुंह फेर रहती है ।। १२ ।। इसीसे मेरी इच्छासे हे दुर्बुद्धि । तुझे २४.

4 बारम्बार दुःख मिला भगवान का यह वचन सुन कर साधु . स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥ साधु बोले कि हे स्वामी ! आपकी माया से ब्रह्मादिक देवता भी मोहित होकर आपके बडे श्रद्भुत मुहुर्मुहुः ॥ तच्छ्रुत्वा भगवद्वाक्यं स्तुति कर्तुं समुद्यतः ॥ ॥१३॥साधुरुवाच॥ त्वन्मायामोहिताःसर्वे ब्रह्माद्यास्त्रिदिवौ कसः।। नजानन्ति गुणं रूपं तवाश्चर्यमिदंप्रभो॥१४॥मुद्रोह त्वां कथं जाने मोहितस्तव मायया ॥ प्रसीद पूजयिष्यामि यथाविभवविस्तरैः ॥ १५ ॥ पुरावित्तं च सर्व हि त्राहिमां गुण और रूप को नहीं जानते ॥ १४ ॥ आपकी मायासे मोहित मूढ़ मैं आपको कैसे जानू हम पर प्रसन्न होइये यथा विभव विस्तारसे में आपका पूजन करूंगा ।। १५ ।। मुझे पहिले -- कासा धन दीजिये मैं आपके शरणागत हूँ भक्तियुक्त यह बचन सुन जनार्दन भगवान संतुष्ट हुये क. ॥१६॥ और मनोवांछितवरदेका उही श्रावन होगपे तर साधुनावका धनसे,पूर्ण देख उसपरचना ॥१७॥ शरणागतम् । श्रुत्वा भक्तियुतं वाक्यं परितुष्टो जनार्दनः ॥ १६ । बरञ्च वांछित दत्वा तत्रैवान्तर्दधे हरिः ॥ ततो नावं समारुह्य दष्ट्वा वित्तप्रपूरिताम् ॥ १७॥ कृपया सत्यदेवस्य सफलं वांछितं मम ॥ इत्युक्त्वा स्वजनैःसद्धिं पूजां कृत्वा यथाविधि ॥१८। हर्षेणसोऽभवत्पूर्णः सत्यदेव सत्यदेव की कृपासे मेरा मनोरथ पूर्ण भया यह अपने जानोंसे कहकर यथाविधि पूजन करके ।।१।।

॥ सत्यदेवके प्रसादसे बड़ाहर्षित हुआ और नावको यत्नसे चलने योग्य करके निजदेश को चल दिया ॥१६ ।। जब साधु अपने नगरके निकट थाया तब दामादसे कहने लगा कि मेरी रत्नपुरी देखा ऐसा प्रसादतः॥नावं संयोज्य यत्नेन स्वदेश गमनं कृतम्॥१६॥ ततो जामातरप्राप्यपश्य रत्नपुरी मम॥ दूतं च प्रेषयामास निजावत्तस्य रक्षकम् ॥२०॥ स दूतो नगरं गत्वा साचोभायी विलोक्य च ॥ प्रोवाच वांछितं वाक्यं नत्वा वद्धांजलिस्तदा ॥ २१॥ निकटेनगरस्यैवजामात्रा सहितो वणिक् ॥ आगतै कह धन की रक्षा करनेवाले दुतोंका वहां भेजा ।। २०.॥वे दूत नगर में जाय साधुको स्त्रीका देख हाथ जोड़ प्रणाम कर वांछित बचता बोले कि ॥ २१ ॥ प्रामके निकट दामाद सहित साहूकार क. बहुतसे इष्ट मित्र और धनयुक्त आगये ।। २२ ॥ दृत के मुख से ऐसे बचन सुन का साधुकी स्त्री यही हर्षित हो सत्यदेव की पूजा कर केन्यासे कहने लगी कि ॥ २३ ॥ मैं जाती हूँ तुम भी शीघ्र वधुवगैश्चवित्तैश्चवहुभिर्युतः ॥२२॥ श्रुत्वादूतमुखाद्वाक्यं महाहर्षवती सती॥सत्यपूजां ततः कृत्वा प्रोवाच तनुज प्रति ॥२३॥ ब्रजाति शीघमागच्छ साधुस्सन्दर्शनाय च ॥ इति मातृवचः श्रुत्वा व्रतं कृत्वा समाप्य च ॥२४॥ प्रसादं च परि त्यज्य गता सापि प्रति प्रति॥ तेन रुष्टःसत्यदेवो भर्तारन्तर ब्रतको समाप्त करके यायो लडकी इस प्रकार माताके वचन को सुनकर व्रतको समाप्त करक आप ॥ २४ ॥ प्रसाद को त्याग पति को देखने चली गई तब सत्यदेवजी ने क्रोधित होकर उसके २१ + SH पति का अन्तर्धान कर दिया ॥ २५ ॥ धनके साथही जल में डुवा दिया तव कलावती कन्या अपने पतिका न देख ॥ २६ ॥ वडे शोकसे रोती हुई भूमि में गिर पड़ी तव साधुने कन्याको णिन्तथा ॥२५॥ सहृत्य च धनस्साध जले तत्रावमज्जयत्॥ ततः कलावती कन्या न विलोक्यनिजं पतिम्॥२६॥शोकेन महता युक्ता रुदन्ती चापतद्भुवि। दृष्ट्वा तथाविधां कन्या बिधवां वहुदुःखिताम् ॥२७॥ भीतेन मनसा प्राह किमाश्चर्य अतिदुःखित' देखकर ।। २७ ।। डोले हुये मनसें कहा कि यह क्या आश्चर्य हुथी और नावे २७ चलानेवाले भी सब चिन्ता करने लगे ॥ २८॥ तव लीलावती कन्याको दुखी देख अति विव्हल होकर रोने और पतिसे कहने लगी कि ॥ २६ ॥ अभी २ नावके साथ ये कैसे अलक्षित क. मिदं भवेत् ॥ चिन्तमानाचते सर्वेवभूवुस्तरिवाहकाः॥२८॥ ततो लीलावती कन्यां दृष्ट्वा सा विव्हलाभवत्॥विललापा तिदुःखेन भर्तारंचेदमब्रवीत्॥२९॥ इदानीं नौकया साबै कथं सोऽभूदलक्षितः । न जाने केन देवेन हेलया चैव तत्कृतम् ॥ ३० ॥ सत्यदेवस्य महात्म्यं ज्ञातुं वा केन शक्यते।इत्यु होगये न जाने किस देवताके अनादरसे नौका जल में नहीं देख पडी ॥ ३०॥ श्रीसत्यदेवक महास्य को कान जान सकता है यह कहकर अपने ननोंके साथ रोती हुई ॥३१कन्याको गोदमें लेकर रोनेलगी और कलावती भी स्वामी को न-देखने से अतिदुःखित होकर ॥३शा पतिकी पादुका स्यमाहात्म्यंज्ञातुंवा केनशक्यते।इत्युक्त्वाविललापैवंततश्च स्वजनैः सह॥३१॥ ततोलीलावतीकन्यांक्रोडे कृत्वारुरोदह। ततः कलावतीकन्यानष्टेस्वामिनि दुःखिता ॥३२॥ गृहीत्वा पादुकातस्यानगतुं च मनोदधे। कन्यायाश्चरितं दृष्ट्वासभा र्यः सज्जनोवणिक् ॥ ३३ ॥ अतिशोकेन संतप्तश्चितया ले सती होने की इच्छा करने लगी कन्याका-यह हाल देख धर्मज्ञ साधुवनियाँ बीके माथ ॥३३|| | m अत्यन्त शोक से युक्त चिन्ता करने लगा कि श्रीसत्यदेव की मायां 'से बारम्बार छला गया हूँ ॥ ३४॥ किन्तु अब यथा विस्तार से श्रीसत्यनारायणका पूजन करूँगा इस प्रकार मासधर्मवित् । हृतंवा सत्यदेवेनभ्रांतोहंसत्यमायया ॥३४॥ सत्यपूजांकरिष्यामि यथाविभवविस्तरैः।इतिसर्वानसमाहृय कथितं च मनोरथम् ॥ ३५ ॥ नत्वाचदण्डवद्भूमौसत्यदेवं पुनःपुनः॥ततस्तुष्टः सत्यदेवो दीनानां परिपालकः ॥२६॥ पोवाचवचनं चैतत्कृपया भक्तवत्सलः॥ त्यक्त्वा प्रसादं ते क सवको बुलाकर कहने लगा ॥ ३५ ॥ और पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग दण्डवत् किया इसपर दोनों के पालन करनेवाले सत्यदेवजी सन्तुष्ट हुए ॥ ३६ ॥ भक्तवत्सख सत्यदेवजी की कृपा से

श्राकाशवाणी हुई कि तुम्हारी कन्या प्रसाद कोत्याग पतिका- देखने चली बाई है ॥ ३७॥
इस कारण इसका पति अदृश्य होगया है वह जो प्रसोदका खाकर यदि फिर आवेतो ॥ ३८॥
न्यापतिंद्रष्टुंसमागता ॥३७॥ अतोऽदृष्टोऽभवत्तस्याः कन्य
कायाः पतिर्बुवम् ॥ गृहं गत्वाप्रसादं च भुक्त्वाचायातिचेत
पुनः ॥३८॥ लब्धभत्री सुता साधो भविष्यति न संशयः ।।
कन्यका तादृशं वाक्यं श्रुत्वा गगनमण्डलात् ॥ ३९ ॥क्षि
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अपने पतिको निःसन्देह पावेगी कन्याने आकाशमंडल से बचन- सुन ॥ ३१ ॥

- २१ शीघंही घर जाकर प्रसाद को खाया और फिर आकर अपने पतिका देखा ॥ ४० ॥ तब कला. वती सन्तुष्ट हो पितासे कहने लगी कि अब आप घर चलिये देरी क्यों करते हैं ॥४१॥ कन्याका प्रमेवगृहगत्वा प्रसादं चबुभोजसां।तत्पश्चात्पुनरागत्यसादद शनिबंपतिम् ॥४०॥ततः कलावती तुष्टा जगाद पितरम्पति इदानींतुगृहंयाहि विलम्वंकुरुषेकथम् ॥ ४१॥ तक्रुत्वाकन्य कावाक्यं सन्तुष्टोभूद्वणिक्सुतः॥ धनैर्वन्धुजनैस्सा जगाम निजमन्दिरम् ॥ ४२ ॥ मासि मासि च संक्रांती पूजांकृत्वा' वचन सुन साघु दामाद सहित सन्तुष्ट होकर धन-और बंधुओं के साथ अपने घरको गया ॥४२॥ २१ पर जाकर सत्यदेवकी पूजाको हर महीने २ संक्रांति में विधिपूर्वक करने लगा, इसलाको संखपांकर अन्तमें सत्यदेव के लोकमें चला गया॥४३॥ सतजी कहने लगे कि हे मुनिश्रेष्ठ! आपसे और भी क्या यथाविधिम् । इहलोकेसुखंभुक्त्वाचान्तेसत्यपुरंययौ ॥४३॥ अथान्यच्च प्रवक्ष्यामि शृणुध्वंमुनिसत्तमाः॥४४॥ इति- श्रस्कि० रेवाखण्डे सत्यनारायणव्रतकथायां षष्टोऽध्यायः ॥६॥ सूत उवाच ॥ आसीत् तुंगध्वजो राजा प्रजापाल न तत्परः ॥ प्रसादं सत्यदेवस्य त्यक्त्वा दुःखमवापसः॥१॥ अब हम कहते हैं ॥४४॥ इति श्रीस्कन्दपुरागरेवाखगडेसत्यनारायणानंतकर्यायां भाषाटीकायांपठोऽध्यायः श्रीसूतजी बोले कि प्रजाके पालन में तत्परः एक तुगध्वज नामक राजा था जिसने सत्यदेवके प्रसादको त्यागने से अति दुख पाया ।। १।। एकं-दिन वह मन में जो मृगादि अनेक पशुओं को मारकर पीछे ओयकर चटके नीचे श्री सत्यदेवके प्रजनको देखा ॥ २॥ जिसका गौप लोग ३. एकदा सवनं गत्वाहत्वा बहुविधानपशून ॥ आगत्य वटमूलं च दृष्ट्वासत्यस्य पूजनम् ॥ २॥ गोपाः कुर्वन्ति संतुष्टा भक्तियुक्ताः सवान्धवाः ॥राजा दष्ट्वा त दर्पण नगतोन ननाम सः॥३॥ ततो गोपगणाः सर्वे प्रसादं नृपसन्निधौ । संस्थाप्यपुनरागत्य भक्त्वा सर्वे यथेप्सितम् ॥ ४॥ इदं बन्धुबान्धवयुक्त संतुष्टं चित्तसे करते थे अहंकारसे राजा वहां न गया और न सत्यदेवजीको प्रणामही किया -३॥ तब वे गोप राजा को प्रसाद देनेलगे राजगने प्रसादभी नहीं लिया तब वे लोग वहीं प्रसाद रखकर चले आए राजाने प्रसादका अनादर किया ॥ ४ ॥ इस तरह प्रसादत्याग करनेसे अति दुःख पायां उस रोजाके एकसौ पुत्रथे सो सब मर गये जो व धन था वह भी नष्ट हो प्रसादं संत्यज्य राजा दुःखमाप सः ॥ तस्य पुत्रशतं नष्टं धनधान्यादिकं च यत् ॥५॥ · सत्यदेवेन तत्सर्व नारीतम म निश्चितम् । अतस्त्रैवगच्छामियत्रदेवस्य पूजनम् ॥६॥ इतिसंचिन्त्यमनसाययौगोप लसन्निधौ । ततोऽसौ सत्यदेव स्यपूजांगोपगणैः स ह॥७॥भक्तिश्रद्वान्विता भूत्वा चकारवि गया ।।५।। तब राजाने अपने मन में विचार किया कि सत्यदेवने मेरा धन नष्ट कर दिया है इसलिये जहाँ ॥ सत्यदेव जी का होती थी वहीं जाऊँगा ।। ६ ॥ यहीं विचार करके वहां जाकर अहीरों के साथ||७|| ॥३१॥ भक्तिव श्रद्धायुक्त विधिसे सत्यदेवके पूजनको किया तब सत्यदेवके प्रसादसे धनपुत्रादि से स० युक्त भया ॥ ८ ॥ आर इस लोकमें सुख पाकर अन्त में सत्यलोक में गया जो प्राणी अति का घना नृपः ॥ सत्यदेवप्रसादेन धनपुत्रान्वितोऽभवत् ॥८॥ इह लोकसुखं भुक्त्वापश्चात्सत्यपुरययौ। यइदं कुरुतेसत्यत्र तं परमदुर्लभम् ॥६॥शृणोति च का पुण्यां भक्तियुक्त फलप्रदाम्॥धनधान्यादिकंतस्य भवेत् सत्यप्रसादतः॥१०॥ दरिद्रोलभतोवत्तबद्धोमुच्येतबन्धनाता भीतोभयात्प्रमुच्यते दुर्लभ इस सत्यदेवके व्रतको करता है ॥ १ ॥ और भक्तियुक्त होकर पवित्र फल देनेवाली ॥३१॥ कथा सुनता है उसको सत्यदेवके प्रसादसे धनधान्योदिक होते हैं । ॥ दखिी होय तो धन ।

पावें कैद में बंधा होय तो छुट जाय भय होवे तो भयसे छूटे इसमें कुछ भी सशय नहीं है ।। ११ ॥ इस पुनीत व्रतके करनेसे यहां पर सुखका पाकर अन्त में सत्यदेवके लोकमें जाना है सूतजो कहते हैं सत्यमेवनसंशयः ॥ ११॥ ईप्सितञ्चफलं भक्त्वा चान्तेस त्यपुरंत्रजेत् । इतिवःकथितम्विप्राःसत्यनारायवतम् ॥१२॥ यत्कृत्वासर्वद:खेभ्यो मक्तोभवति मानवः ॥ विशेषत:कलियु गे सत्यपूजा फलप्रदा॥१३॥ कचित्कालं वदिष्यंति सत्यमी किभो विप्र ? मैंने इस तरह सत्यनारायणके व्रतको आपलोगोंसे कहो ॥१२॥ जिसके करने से मनुष्य सब दुःखोंसे छुटजाता है विशेष करेके सत्यदेवकी पूजा कलिकालमें फल देनेवालीहै।।१३।।कोईकाल स० ||३२|| कर कोई सय परमेश्वर काई सत्यनाराण काई सत्यदेव उन्हींका कहेंगे ।। १४॥ विष्णु सत्य रूपो सना तन कलियुगमें अनेक रूप धारण करके सबके वांछित फल देनेवाले होंगे ॥१५॥ हे मुनिश्रेष्ठ?जो शन्तमेवहि। सत्नारायणं क चित्सत्य देवन्तथापरे ॥१४॥ नानारूपधरो भूत्वा सर्वेषामप्सितप्रदः॥भविष्यातकलौवि ष्णुसत्यरूपीसनातनः॥१५॥ य इदं पठते नित्यं शणोति म ॥३२॥ नसत्तमाः॥ तस्य नश्यन्तिपापानिसत्यदेवप्रसादतः॥१६॥ इति श्रीस्मन्द पुराणे रवाखण्डे सत्यनारायण ब्रामयायां मप्तमोऽध्यायः ॥ प्राणी इसका पढता है अथवा सुनता है उसके सम्पूर्ण पाप सत्यदेवके प्रसादसे नठहोजाता हैं इसमें कुछ भी संशय नहीं।॥१६॥ इति श्रीहन्दिपुगणेरेवाखराडे सत्यनारायण व्रतकथायां सप्तमोऽध्यायः॥७॥ वा काशी प्रसाद भार्गव द्वारा, भार्गयभूपण प्रस, गायघाट काशी में मुद्रित ।

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Satyanarayan Vrat Katha

Author
Ramdutt
Title
Satyanarayan Vrat Katha
File name
Satyanarayan Vrat Katha
Text
OCR done
Published
2010/05
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
66
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
325760
Barcode
99999990003656.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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DPXu23NRQlH
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