Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Jaypayad Nimitt Shastra

Purvacharya · 2012/08

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सिं घी जैन ग्रन्थमा ला
nenternet.....[अन्यांक ४३]....................
पूर्वाचार्यविरचित प्रश्नव्याकरणाख्य
जयपायड निमित्तशास्त्र
(प्रथमावृत्ति-संस्कृतव्याख्योपेत मूल प्राकृत ग्रन्थ)
SRI DAICHAND ENGH
卐ाडासंघदजी सिंधी
SINGHI JAIN SERIES
+[ NUMBER 43]HAmit
JAYAPAYADA NIMITTASASTRA
(A WORK OF The science oF PROGNOSTICS MAKINO PROPHESJES
ON THE BASIS OF THE LETTERS OF SPEECH)

कलकत्ता निया सी) साधुचरित-प्रेष्ठिवर्य श्रीमद् डालचन्दजी सिंधी पुण्यस्मृतिनिमित प्रतिष्ठापित एवं प्रकाशित सिंघी जैन ग्रन्थ मा ला [जैन भागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, कयात्मक-इलादि विविधविषयगुम्फित प्राकृत, सस्कृत, अपभ्रश, प्राचीनगर, राजस्थानी आदि नानाभापानिवद्ध सार्वजनीन पुरातन वाय तथा नूतन सयोधनात्मक साहित्य प्रकाशिनी सर्वश्रेष्ठ जैन मन्यावलि] प्रतिष्ठाता "श्रीमद्-डालचन्दजी-सिंधीसत्पुत्र ख. दानशील-साहित्यरसिक-संस्कृतिमिय श्रीमद् वहादुर सिंहजी सिंघी - 7 TIDYA TIYA BAL SN.. ww- LIBRAB प्रधान सम्पादक तथा संचारक आचार्य जिन विजय मुनि अधिष्ठाता, सिंघी जैन शास्त्र शिक्षापीठ ऑनररी डायरेक्टर राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान) निवृत्स ऑनररि डायरेक्टर भारतीय विद्या भवन, बम्बई ऑनररी मेंबर अर्मन ओरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी, भाण्डारकर मोरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, पूना (दक्षिण), गुजरात साहित्यसभा, अहमदाबाद (गुजरात), विधेश्वरानन्द वैदिक शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पाय) संरक्षक श्री राजेन्द्र सिंह सिंघी तथा श्री नरेन्द्र सिंह सिंघी प्रकाशना- अधिष्ठाता, सिं घी जै न शा स्त्र-शिक्षा पीठ भारतीय विद्याभवन, बम्बई प्रकाशक-जयन्तकण ह दवे, ऑनररी डायरेक्टर, भारतीय विद्या भवन, चौपाटी रोड, बम्बई, नं ७ मुदक-एक्ष्मीनाइ नारायण चौधरी, निर्णयसागर प्रेस, २६-२८ फोटभाट स्ट्रीट, बम्बई, २

पूर्वाचार्य विरचित प्रश्नव्याकरणाख्य
जयपायड निमित्तशास्त्र
प्रथमावृत्ति- संस्कृतव्याख्योपेत मूलं प्राकृत ग्रन्थ
जेसलमेरुदुर्गस्थ -प्राचीनजैनग्रन्थभाण्डागारोपलब्ध
ताडपत्रीयपुस्तकानुसार
संपादनकर्ता
आचार्य, जिनविजय मुनि
अधिष्ठाता, सिंघी जैनशास्त्र शिक्षापीठ
ऑनररी मेंबर-जर्मन भओरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी; भाण्डारकर मोरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट
पूना, (दक्षिण); गुजरात साहित्यसभा, अहमदाबाद (गुजरात) विश्वेश्वरानन्द वैदिक
शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पजाब)
ऑनररी डायरेक्टर
राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान)
...
निवृत्त ऑनररि डायरेक्टर-भारतीय विद्याभवन, पम्बई
प्रकाशनकर्ता
अधिष्ठाता, सिंघी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्या भवन, बम्बई
विक्रमाब्द २०१४]
प्रथमावृत्ति-५०० प्रति
[निस्वान्द १९५०
अन्धांक ४३]
सर्वाधिकार सुरक्षित
[मूल्य रू०६)६०

कलकत्ता नियासी । साधुचरित-प्रेष्टियर्य श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी पुण्यस्मृतिनिमित प्रतिष्ठापित एवं प्रकाशित सिंधी जैन ग्रन्थ मा ला [जैन भागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिए, कथारमक-इत्यादि विविधविषयगुपित प्राकृत, सह, अपभ्रंश, प्राचीनगूनी, राजस्थानी भादि नानाभापानिवद्ध सार्वजनीन पुरातन पाध्यय तथा नूतन सशोधनात्मक साहित्य प्रकाशिनी सर्वश्रेष्ठ जैन प्रन्यावलि] प्रतिष्पाता 'धीमद्-डालचन्दजी-सिंधीसत्पुत्र ख० दानशील-साहित्यरसिक-संस्कृतिप्रिय श्रीमद् वहादुर सिंहजी सिंघी - UPERusa . VIDYA Pr BE AVAN LIBRAR प्रधान सम्पादक तथा संचालक आचार्य जिन विजय मुनि अधिष्ठाता, सिंघी जैन शान शिक्षापीठ ऑनररी डायरेक्टर राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान) निवृत्त ऑनयरे डायरेक्टर भारतीय विद्या भवन, पम्बई ऑनररी मेंबर जर्मन भौरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी, भापडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट, पूना (दक्षिण), गुजरात साहित्यसमा, अहमदाबाद (गुजरात), विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पजाब) संरक्षक श्री राजेन्द्र सिंह सिंघी तथा श्री नरेन्द्र सिंह सिंघी प्रकाशनकर्ता- अधिष्ठाता, सिं घी जैन शास्त्र-शिक्षा पीठ भारतीय विद्याभवन, धम्बई प्रशिक-जयन्तण ह दवे, ऑनररी डायरेक्टर, भारतीय विदा भरन, चौपाटी रोड, बम्बई, न मुदक- लक्ष्मीबाई नारायण चौधरी, निर्गयसागर प्रेस, २६-२८ कोलभाट स्टोर, बम्बई, नं २ *

पूर्वाचार्य विरचित प्रश्नव्याकरणाख्य
जयपायड निमित्तशास्त्र
प्रथमावृत्ति-संस्कृतव्याख्योपेत मूल प्राकृत ग्रन्थ)
जैसलमेरुदुर्गस्थ-प्राचीनजैनग्रन्थभाण्डागारोपलब्ध
ताडपत्रीयपुस्तकानुसार
संपादनकर्ता
आचार्य, जिन वि जय मुनि
अधिष्ठाता, सिंघी जैनशास्त्र शिक्षापीठ
ऑनरेरी मेंबर - जर्मन ओरिएण्टल सोसाईटी, जर्मनी, भाण्डारकर ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट
पूना, (दक्षिण); गुजरात साहित्यसमा, महमदाबाद (गुजरात), विश्वेश्वरानन्द वैदिक
शोध प्रतिष्ठान, होसियारपुर (पाव)
८
ऑनररी डायरेक्टर
राजस्थान ओरिएण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट, जोधपुर (राजस्थान)
निवृत्त ऑनररि डायरेक्टर-भारतीय विद्याभवन, पम्बई
tot
प्रकाशनकर्ता
अधिष्ठाता, सिंघी जैन शास्त्र शिक्षा पीठ
भारतीय विद्या भवन, वम्वई
विक्रमाद २०१४]
प्रथमावृत्ति-५०० प्रति
[खिताब्द १९५८
ग्रन्थांक ४३]
सर्वाधिकार सुरक्षित
[मूल्य रू०६)६०

२ " " SINGHI JAIN SERIES Works in the Series already out. अद्यावधि मुद्रितग्रन्थनामावलि मेवाचार्यरचित प्रबन्धचिन्तामणि १९ भर्तृहरिकन शतकत्रयादि मुमापितसंग्रह. मूल संस्कृत प्रन्य, २० शान्याचार्यकृन न्यायावतारवादिक-गृत्ति, २ पुरातनबन्धसंग्रह महुविध ऐतिशतप्यपरिपूर्ण २. कवि धाहिलरचित पउममिरीचरिउ. (अप. भनेक निबन्ध संचय. २२ महेश्वररिकन नाणपंचमीकहा. (प्रा.) राजशेखरसरिरचित प्रबन्धोश. २३ धौभद्रबाहुआचार्यकृत भदयाहुसंहिवा. जिनप्रभसूरिकृत विविधतीर्थकल्प. २५ जिनेश्वरस्रित कथाकोपारण. (प्रा.) ५ मेघविजयोपाध्यायकृत देवानन्दमहासाग्य. २५ उदयप्रभरिकृत धर्माभ्युदयमहाकाम्य. १ यशेविजयोपाध्यायकृत जेनतईमापा. २६ जयसिंहरिकृत धर्मोपदेशमाला. (प्रा.) हेमचन्द्राचार्यकृत प्रमाणमीमांसा. २७ वोऊहलविरचित लीलाई कहा. (मा.) ८ भावलादेवकृत मलामन्यायी. २८ जिनदत्तास्यानद्वय. (प्रा.) ९ प्रबन्धचिन्तामणि-हिन्दी भाषांवर. २९ सयंमूविरचित पउमचरिउ. भाग 1 (अप०) १. प्रमाचन्द्रसूरिरचित प्रभावकचरित. सिद्धिचन्द्रोपाध्यायरचित भानुचन्द्राणिचरित, । सिद्विचन्द्रकृत काव्यप्रकाशण्डन. १२ यशोविजयोपाध्यायविरचित ज्ञानविन्दुप्रकरण. ३२ दामोदरपण्डित फ्त डसिव्यक्तिप्रकरण. १६ हरिषेणाचार्यकृत वृहत्कयाकोश. १३ मिन्नभिन्न विद्वत कुमारपालचरियसंग्रह. १३ जैनपुस्तकाशस्तिसंग्रह, प्रथम भाग. ३४ जिनपालोपाध्यायरचित स्वरतरगच्छ वृहदुर्वावलि १५ हरिमत्रिविरचित धूतोल्यान. (प्रान) ३५ उसोतनरिकृत कुवलयमाला कहा. (प्रा.) १६ दुर्गदेवकृत रिष्टसमुच्चय. (प्राकृत) ३६ गुणपालमुनिरचित जंबुचरियं (प्रा.) १० मेघविजयोपाध्यायकृत दिग्विजयमहाकाव्य. ३. पूर्वाचार्यविरचित जयपाय-निमित्तशास्त्र, (प्रा.) १८ कवि भब्दुल रहमानकृत सन्देशरासक. (अपभ्रंश) | ३८ भोजनृपतिरचित हारमझरी. (संस्कृत क्या) Shri Bahadur Singh Singhi Memoirs Dr. G. H. Buhler's Life of Hemachandrächārya. Translated from German by Dr. Manilal Patel, Ph. D. स्व. बाबू श्रीबहादुरसिंहजी सिंघी स्मृतिप्रन्थ [भारतीयविद्या भाग ३] सन १९४५. Late Babu Shri Bahadur Singhji Singhi Memorial volume. BHARATIYA VIDYA [Volume V]A.D. 1945. 3 Literary Circle of Mahātmātys Vastupāla and its Contribution to Sanskrit Literature. By Dr. Bhogilal J. Sandesara, M.A., Ph. D. (SJ.S.33.) 4-5 Studies in lodian Literary History. Two Volumes. By Prof. P. K.Gode, M. A.(S. J. S. No. 37-38.) Works in the Press. संप्रति मुद्यमाणग्रन्थनामावलि विविधष्ठीयपहावलिसंग्रह. ९ गुणप्रभाचार्यकृत विनयसूत्र. (बौद्धशास्त्र) २ जैनपुस्तकप्रशस्तिसंप्रह, भाग ३. १. धनसारगगीत-मदरशतकत्रयटीका. ३ विज्ञप्तिसंग्रह विज्ञप्ति महालेख-विज्ञप्ति निवेणी रामचन्द्रकविरचित-मलिकामकरन्दादिनाटकसंग्रह. आदि अनेक विज्ञप्तिलेख समुच्चय. १२ तरुणप्राभाचार्यकृत पडावश्यकबालाग्योपति, कीर्विकौमुदी आदि वस्तुपालप्रशस्तिसप्रह. ५ गुणचन्द्रविरचित मंत्रीकर्मचन्द्रवंशप्रयन्ध. १३ प्रद्युम्नमरिकृत मूलशुद्धिमकरपा-सटीक ६ नयचन्द्रविरचित हम्मीरमहाकाव्य. १४ हेमचन्दाचार्यकृत छन्दोऽनुशासन • महेन्द्ररिचत नर्मदासुन्दरीक्या. (प्रा.), १५ स्वयंभुकविरचित पउमचरिउ, मा०३ ८ कौटिन्यकृत मर्यशास्त्र-सटीक. (कतिपयश) १६ अर फेरूरचित अन्यावलि (प्रा.) .

सिंघी जैन ग्रन्थ माला]
[जयपायड निमित्तशास्त्र
Mya-भाभ
-
, कागजामासुवैज्ञायाकरकमलममित
लीनाशयक्तिमादिननसताराम
सिगारहितमाशार्थवालिमत्ताधी
मादीसंहारूयनादियमवियमण।
भणीसिरसावासिरसापास्यनिकि
RAIलमिवकालवयावझामाण्याची
मारायडायपाइडमानिमितमासस्यात
सिंहावीमादेवतासमकारकतामातदर्य' १
संगधियवीरोणमिकापन्सयलांतद्धयणमलयवडो
विसिवमतमधाबासिहरसासकामा
सातास्यविद्यारूपारुग
शाय नवपत्यमाध्यिानयतश्य
द्ययाणमयापधरावा, भानवतावास
शाददाताtarnalसिरसामावास्यतिमा
ध्ययकामयाmarue
लालायातकालाबादीमा दयाशिवाय
स्वातकालयसपणनित्यक्षातानावद्यमनवायद
न्यागतिश्यायाशयकर्मविदारमाहीती
बोभायाधचायनप्रवासितापवासाररूपाद्यत
वलय
रखसमलरमधनमसकलनामणिालाकाय
A
almalamuakumar.
जेसलमेरमें प्राप्त प्रतिके आध पत्र

सिंघी जैन अन्य माला]
[जयपायड निमित्तशास्त्र
Wh
वदिशाशवादिखाघादा सामान
यसनापानतिरस्मयशहादसामयामाल
दिनक्शामदिनाचतकायामासस्थान
गिलसनहायानादानासाहापाका
निगराधवरकमिकायासिदिमयता
साक्षरसाद शवायणायaraune
मयावत्रामतितासेडागकादशमी
नववत्सण्यासासनकायवाधिासाधायनापर
मासावियामादमाणात सहमकितिया।
PEमाणमस्यंगपतरियासिालसलाका
"
Cinema
*
घायदUTTEAtarra गानासियममामलायाastणालानाला
एसससाबमानसावजातयका
साक्षिकायमुरुषायमदिवलज्ञाधानता
पिनाशिकोहान्यामकलयुवा
नानसासिकायदयमितिमाहिद
यहावादाडामामंगवायादयापुरुषाया
सापदिसंशयनतारापति
पायामापायजामोशरकोपूर
Pyar,
जेसलमेर में प्राप्त ताडपत्रीय प्रति के अतिम पत्र
.
2

किञ्चित् प्रास्ताविक , प्रस्तुत जयपायड नामक निमित्त शास्त्रकी ताडपत्रपर लिखी हुई प्राचीन प्रति हमको जेसलमेरके एक ज्ञान भण्डारमें प्राप्त हुई थी। इससे पूर्व, हमारे दृष्टिगोचर यह अन्य नहीं हुआ था, इसलिये हमने इसकी प्रतिलिपि करवा ली, और फिर इसका विषयावलोकन करनेसे हमें यह एक महत्त्वकी रचना ज्ञात हुई, अतः इसको इस सिंघी ज न अन्य माला द्वारा प्रकाशित करनेका हमने संकल्प किया। जैसलमेरमें प्राप्त यह ताडपत्रीय पुस्तिका, जैसा कि इसके अन्तमें लिखा हुआ है--विक्रम संवत् १३३६ में लिखी गई थी अर्थात् आजसे कोई ६८० वर्ष पूर्वकी लिखी हुई है। इस पुस्तिकाके कुल मिलाकर २२७ ताडपत्र हैं । अक्षर सुवाच्य है; पर कहीं कहीं स्याही घिस जानेसे अक्षर अदृश्यसे हो गये हैं । लिपिकर्ता विषय और भाषासे अनभिज्ञ होनेके कारण प्रतिका पाठ बहुत ही अशुद्ध और भ्रष्टखरूप- वाला लिखा गया है। अन्यको प्रेसमें छपने के लिये देना निश्चित हुआ तब इसका कोई दूसरा प्रत्यन्तर कहीं से मिल सके तो पाठसंशोधनमें विशेप सहायक हो सके इस विचारसे, पूना, पाटण, अहमदावाद, वडोदा आदिके प्रसिद्ध जैन भण्डारोंमें इसकी खोज की गई, पर उसमें सफलता नहीं मिली । पीछेसे भावनगरके भण्डारमें एक कागज पर लिखी प्रति प्राप्त हुई, पर, वह जेसलमेरवाली प्रतिसे भी अधिक भ्रष्ट पाठवाली निकली; अतः संशोधनमें उसका कोई खास उपयोग नहीं हुआ। तब हमने केवल उक्त भ्रष्ट पाठवाली प्रतिके उपरसे ही यपामति पाठ संशोधन आदि करके प्रस्तुत आवृत्तिको, इस खरूप में प्रकट कर देनेका प्रयत्न किया है । प्रन्यके अवलोकन मात्रसे ही विशेषज्ञ विद्वानको ज्ञात हो जायगा कि इसका पाठसंशोधन करनेमें हमको कितना श्रम उठाना पड़ा है। पुस्तिकाकी प्रायः प्रत्येक पंक्ति भ्रष्ट पाठवाली प्रतीत हो रही है। न मालूम मूलप्रति लेखककी अज्ञानताके कारण ऐसा पाठभ्रष्ट हुआ है अथवा किसी भ्रमवश ऐसा अशुद्ध पाठ लिखा गया है । प्रन्यगत विषय बहुत ही गोपनीय माना जाता रहा है। कोई विरल ही व्यक्ति इसका अध्ययन-मनन कर सके-ऐसी रहस्यमयी भावना, इस विषयका ज्ञान प्राप्त करनेके विषयमें प्राचीन कालसे चली आ रही है; अतः इसकी दुर्लभता और अप्रसिद्धि खाभाविक है । प्रन्यका विषय निमित्तशास्त्रान्तर्गत प्रश्नविद्या विषयक है। अतः इस रचनाका अन्य नाम प्रश्न- व्याकरण ऐसा दिया गया है । प्रश्नचूडामणी, प्रश्नप्रकाश आदि नामके इस विषयके कई प्राचीन ग्रन्योंका उल्लेख अन्यान्य प्रन्योंमें मिलते हैं। इसी आवृत्तिके अन्तमें ज्ञानदीपक नामक एक संक्षिप्त चूडामणिसार । शास्त्र मी मुद्रित किया गया है जो इसी विषयकी एक संक्षिप्त रचना है। यह रचना मी हमें जेसलमेरके । एक भण्डारमें फुटक्ल पन्नोमें मिली है। . जिगनेरमें जो पुस्लिम प्राप्त हुई उसकी पट्टिकापर 'जयपाहुह' ऐसा नाम लिखा हुआ था इसलिये हमने प्रन्यके मुममें मुख्य विरोव इसी नामसे अकित कर दिया; पर पीने सहापोह करने पर 'जयपाहुड' नहीं परंतु 'जयपायर्ड ऐमा नान समुचित मादल दिया। अतः हमने मुसष्ठ पर इसी नामका उपयोग करना उचित समझा है। मूल प्रन्यकी तीसरी गापान इसी सन्द प्रयोग किया गया है । क ख ग घ ड जयपायड-किश्चित् प्रास्ताविक हमारे पूर्वज मनीषियोंने अज्ञात तच्चों और भानोंको जानने के लिये एवं कई प्रकारकी गूढ विद्या- ओंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये, नाना प्रकार चितन, मनन और निदिध्यासन किये हैं। इनके फरखरूप जो ज्ञातन्य उन्हें प्राप्त हुए उनको वे सक्षेपमें एस सूत्ररूपमें प्रथित करके प्रन्य या प्रकरणके रूपमें निबद्ध करते रहै जिससे भावी सन्ततिको उसका ज्ञान प्राप्त होता रहै । प्रस्तुत अन्य एक ऐसे ही अज्ञात तत्व और भावों का ज्ञान प्राप्त करने करानेका विशेप रहस्यमय शास्त्र है। यह शास्त्र जिस मनीपी या विद्वान्को अच्छी तरह अगत हो, यह इसके आधारसे, किसी भी प्रभकर्ताके लाभ-अलाम, शुम-अशुभ, सुख-दुख एष जीवन-मरण आदि की वातोंके विषयमें बहुत निश्चित और तथ्यपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है और प्रश्नकर्ता को बता सकता है। प्राचीन ब्राझी लिपि, जो हमारी भारतीय लिपियोंकी माता या मूल प्रकृति मानी जाती है, उसकी वर्णमाला या अक्षरमातृकामें मुख्य रूपसे ४५ अक्षर हैं । इनमें अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं . ये १२ खर है, और- क वर्ग -च वर्ग ट ट ड ढ ण -ट वर्ग त थ द ध न - त वर्ग प फ ब भ म-प वर्ग -प वर्ग श स प ह श वर्ग इस प्रकार ७ वर्गोंमें विभक ३३ व्यजन हैं । १२ खरोंका १ वर्ग है जिसकी सज्ञा 'अ' है। बाकीके ३३ व्यजनोंकी 'क. च. ट. त. प. य. श' इस प्रकार प्रमश. ७ सज्ञाए हैं। इस प्रकार सपूर्ण वर्णमाला ८ कोंमें विभक्त की गई है । प्रस्तु शास्त्र में इन वर्गगत अक्षरोंके अनेक प्रकारके मेद - उपभेद बताये गये हैं। ये अक्षर अनेकानेक गुण और धोंके वाचक और सूचक है। प्रत्येक अक्षर विशिष्ट प्रकारके खभाव और स्वरूप का सूचक है और फिर यह जब किसी दूसरे अक्षरके सयोगमें आता है तन, वह उस सयोगके कारण और मी अनेक प्रकारका खभाव और स्वरूप बतलानेवाला बन जाता है । अक्षरोंके स्वभाव और स्वरूपका निदर्शन कराने के लिये अभिधूमित, आलिंगित, दग्ध आदि सज्ञार बताई गई हैं। इन अक्षरोंमें कुछ अक्षर जीवसज्ञक हैं, कुछ धातुसज्ञक हैं और कुछ मूलसज्ञक हैं । इस प्रकार कई तरहसे अक्षरोंके खमाव, गुग और धोका प्रतिपादन इस शास्त्रमें किया गया है। यह एक बहुत विलक्षण और अद्भुत रहस्यमय शास्त्र है इसमें कोई शका नहीं है। प्राचीन जैन प्रथोंमें इस रहस्यमय अतिशयात्मक शास्त्रीय विपयका उल्लेख बहुत जगह मिलता है। इससे ज्ञात होता है कि प्राचीन कालके जैन आचार्य इस विषयवा बहुत ही विशिष्ट ज्ञान रखते थे। इस विषयका निरूपण करनेवाले छोटे-मोटे अनेक माय एय प्रकरण जैनाचार्यों द्वारा बनाए गये प्रतीत होते हैं जो प्राय अब विलुप्त से हो रहे है। यर ल व 1 -- जयपाड-किञ्चित् प्रास्ताविक इस विषयके ज्ञाताओं और शास्त्रकारोंका अभिमत है कि जिन अज्ञात और गूढ तत्त्वोंका परिज्ञान, सर्वज्ञ केवलज्ञानी अपने आध्यात्मिक अन्तरज्ञान द्वारा अनुभूत कर सकता है वैसा ही परिज्ञान, इस शास्त्रका विशिष्ट ज्ञाता, इस शास्त्र द्वारा अनुभूत कर सकता है और इस लिये इस विषयके शास्त्रको अर्हचूडा- मण,' 'केवली चूडामणि,' 'केवली परिज्ञान आदि नामोंसे मी व्यवहृत किया गया है । इस विषय पर प्रकाश डालनेवाली बहुत कुछ साहित्यिक सामग्री हमारे पास संग्रहीत हो गई है। पर उसका विस्तृत रूपसे आलेखन ,करनेका यथेष्ट अवकाश हमें प्राप्त नहीं हो रहा है । अतः अमी तो हमने इस ग्रन्थको, इस प्रकार, केवल मूल रूपमें ही प्रकट कर देनेका यन किया है, जिससे इस विषयके जिज्ञासु- ओंको इस शास्त्रका कुछ आभास प्राप्त हो सके। 2. इसकी पुनरावृत्ति, विशिष्ट रूपसे करनेका हमारा मनोरय है; जिसके साथ इस प्रकारकी कुछ अन्य रचनाएँ भी संकलित की जायेंगी और इस विषय पर प्रकाश डालनेवाली अनेक तथ्यपूर्ण बातें भी आलेखित की जायेंगी। . विजयादशमी, संवत् २०१४. (३१ अक्टूबर, १९५८) भनेकान्तविहार, अहमदाबाद -मुनि जिन विजय जयपायड निमित्तशास्त्रगत विषयानुक्रम पृ. विपय, १ सामासिक शिक्षाप्रकरण २ संकट-विकट प्रकरण ३ उत्तराधर प्रकरण ८-१२ ४ अमिघात प्रकरण १२-१६ ५ जीपसमास प्रकरण १६-१८ ६ मनुष्य प्रकरण १८-२० ७ पक्षि प्रकरण २०-२१ ८ चतुष्पद प्रकरण २१-२२ ९ जीवचिन्ता २२ १० धातुप्रकृति २२-२५ ११ धातुयोनि २५-२७ १२ मूलमेद २७-२९ १३ मूलयोनि २९ १४ मुटिविभाग प्रकरण ३०-३१ १५ वर्ण-रस-गंध-स्पर्श प्रकरण ३१-३३ १६ द्विपदादि द्रव्य दिक् प्रकरण ३३-३४ १७ नटिकाचक्र ३४-३८ १८ चिन्तामेद प्रकरण ३८-३९ १९ लेखगंडिकाधिकार संख्याप्रमाण ३९-४४ २० काल प्रकरण ४४-४६ २१ लामगंडिका प्रकरण ४६-५० विषय. पृ. २२ वर्गगंडिका ५०-५१ २३ नक्षत्रपंडिका ५१-५२ २४ व्यंजन विभाग ५२-५७ २५ स्ववर्गसंयोगकरण ५७-५८ २६ परवर्गसंयोगकरण २७ सिंहावलोकितकरण २८ चतुर्भेद गजविलुलित २९ गुणाकार प्रकरण ६३-६५ ३० उचराघरविमाग प्रकरण ३१ स्ववर्ग प्रकरण ३२ व्यंजन-स्वर प्रकरण ६७-६८ ३३ स्वभावप्रकृति ६८-६९ ३४ उत्तराधरसंपत्करण ६९-७३ ३५ चाक्षरसंयोगोत्पादन ७४-८० ३६ सर्वतोभद्र ३७ संकट-विकट प्रकरण ८१-८२ ३८ अंगसंबंधी अखविभाग प्रकरण ८२-८४ ३९ स्वरक्षेत्रभवन ४० तिथिनक्षत्रकांड ८४-८५ ४१ व्याधि-मृत्युविषयक प्रश्न ८५-८६ ४२ ज्ञानदीपक चूडामणिसारशास्त्र८७-९६ प्रश्नव्याकरणाख्यं जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । । औं नमः सर्वज्ञाय ।। करकमलकलितमौक्तिकफलमिव कालत्रयस्य विज्ञानम् । यो वेत्ति लीलयैव हि, तं सर्वज्ञं जिनं नमत ॥१॥ मन्थकृत्(ता!) प्रश्नाख्यस्य जयपाहुडस्य निमित्तशास्त्रस्यारम्भे अशेपदुरितप्रक्षयार्थ चामि- प्रेवार्थप्रसिद्ध्यर्थमिष्टदेवतानमस्कार(स)कर्तव्यः । तदर्थमाह - सिद्धमरूयमणिदियमक्कि(क)यमणवन(ज)मञ्चुयं वीरं । णमिऊण सयलतिहुयणमत्थयचूडामणी(णि) सिरसा ॥ १ ॥ वीरं शिरसा प्रणम्येति । किंविशिष्टमन्तमुच्यते--सिद्धं । सत्र शुभाशुभकर्मविमुक्तः ॥ [१०१,पा०२] सिद्धः । नास्य रूपं विद्यत इत्यरूपः। रूपं सु(शु)छ-कृष्णाद्यात्मकम् । श्रोनादी- नीन्द्रियाणि शब्दाद्यर्थविपये न प्रवर्त्तत(न्ते) इत्यनीन्द्रियम् । न कु(कि)यत इत्यकृतकः, द्रव्यरूपेण नित्यत्वात् । नायधमनवद्यः । अवयं पापम् , अपापं अगर इत्यर्थः । न स्वभावात् प्रच्यवति इत्युच्य(त्यच्युतः । अशेपकर्मविदारणाद् वीरः। वीरो देवताविशेपः । तं शिरसा प्रणम्येति सम्बन्धोऽयम् । अथवा यं न(१) एव सिद्धः अत एवासावरूपी अनिन्द्रिय अकृतक अनवद्य ।। अच्युतः वीरः इति बभूय(ब) स एव सफल(त्रि)भुवनमस्तकचूडामणि[:] लोकामे [प० २, पा० १] निवासित्वात् । अतस्त्रं देवताविशेष महावीराख्यं सि(शि)रसा प्रणम्य प्रश्नव्याकरणं शास्त्रं व्याख्यामीति वाक्यशेपालभ्यमिति । आरादुपकारित्वात् ॥ १॥ सुयदेवयं पणमिमो, जस्स पसाएण गहियव(ध)रियस्स । सुत्तरस अत्थपरिमियसपा(मा)दरो तीरए काउं ॥२॥ श्रुतं सास्त्र(शास्त्र) ज्ञानमित्यनर्थान्तरम् । तदेतत् श्रुतं देवता श्रुतदेवता। वां श्रुतदेवता मणता. (मा)मि । यस्याः प्रसादेन । प्रसाद इत्यनुमहोऽभिमुसपरितोप इत्युच्यते । गृहीतस्य (घ)तस्य च तस्य सूत्रस्यार्थः । सूनार्थः प्राप्त्यादरा शक्यते कर्तुमिति ॥ २॥ मइमाहाप० २, पा० २)प्पुप्पायं, भुवणभंतरपवंत(वत्त)वावारं । अइसयपुण्णं णाणं, पण्हं जयपायडं वोच्छं ॥३॥ मति(ति) बुद्धि(दिः) प्रक्षेति पर्यायाः । वुद्धिप्रभावोत्पत्तिभूतमित्यर्थः । कस्तस्या युद्ध(द्धः) प्रभाषः । नष्ट-मुष्टिचिन्ता-लामालाभ-मुख-दुःस-जीवित-मरणाभिव्यञ्जकत्वम् । किश्च मुवनाभ्य- न्वरप्रवृत्तव्यापारम् । व्यापारस्तद्वपदार्थोपलम्मनम् । अतिस(श)यपूर्ण ज्ञानम् । यदन्यसा(शा)- २ [गाथा ३-९] H 10 " जयपाहुडनाम निमित्तशाखम् । खानुपलब्धं सोऽतिस(श)यः । अतिर्य(शय)शानं निमित्तशास्त्रात्यु(दु)पलभ्यत इत्यतिस(श)यः । अतीवानाग[] वर्तमाननिमित्ताद्यनेकपकारं नष्ट-मुष्टिचिन्ताविकल्पायतिस(श)यपूर्ण प्रमज्ञान जर्गाप० ३,पा. १]प्रकटने हेतुभूतं जगत्प्रकटनं व्यायामीति ॥ ३॥ अक च ट तपयश पुचे, बग्गे लक्खेज पाहमादीए । उत्तरधरा य तेसिं, जाणे वग्गक्खरसराणं ॥४॥ इह शाद्विधा धर्गक्रमः उक्त(क्तः)। अष्टवर्गी क्रम(म.) पश्चवर्गी क्रमश्चेति । कृर्व एतत् । वथा शाले व्यवहारदर्शनात् । वत्रायमनायवर्गक्रमः- 'अ क घटतपयश' इत्येतेऽष्टौ प्रथमा वर्णा वर्गाणां सूचका इति । प्रना(भा)यामादो प्रमा(भ)मातृकायां या मात्रिकेत्यनेकार्थोपसङ्गह- स्वात् । वर्गाणां अफराणां स्वराणां च उत्तरत्वमधरत्वं च वक्ष्यमाणं अवगच्छ ॥४॥ जेत्तियमित्ते सको, [५० ३, पा० २] घेत्तुं पण्हक्खरे परमुहाओ । ते सचे ठावेउं, तेसिं पढमक्खरपाहुदिं ॥ ५ ॥ यावन्मात्रान् प्रभाक्षरान् परमुसानु(द) महीतुं शक्तः नैमिचिकः । ते सर्व स्थापयितव्याः प्रथमाक्षरात् प्रभृति नेपामक्षराणाम् ।। ५ ।। संजुत्तमसंजुत्तं, अणभिहयं अभियं च जाणित्ता । आलिंगियाभिधूमिय, दट्टाणि य लक्खए तेसि ॥ ६ ॥ तेषां पाफ्याक्षराणां पूर्वस्थापिताना सयुक्तमसयुक्तं इति । तत्र संयोगोऽनेकघाऽभिपास्यति । स्यकाय स्खवर्ग-परवर्ग इति । स्वभावस्थो वर्णोऽसयुक्तः । तथाभिधातो वक्ष्यमाणकर(नि)- विधः (प.४, पा• १] । आलिगित-अभिधूमित दग्धलक्षणः । अनभिहतः अभिधात:(तोरहिव- मे(च)ति ॥ ६॥ मोत्तो(तुं) पढमालावं, मित्ती अप्पणो य पडिपपहं । सेसेसु जीवमादीपरिचिचं वागरे मइमं ॥७॥ पृच्छत्स्य सम्भाषणादिकं प्रथमालापं मुक्त्वा प्रस्न(भ)शास्त्रवित् प्रतिप्रसा(भा)यात्मीर्या (य) प मुक्त्वा अन्यस्मात् प्रस्न(अं) गृहीत्वा बाल-मूर्ख-स्त्रीणां प्रथमवाक्यमेव प्रगृह्य जीव-मूल- पाक्षिाराणाणी) प्रयाणां येऽधिकसख्यास्तजी(/)वधातुमूलयोनि निर्देश्यम् ॥ ७ ॥ पढमो य सत्तमसरो, क च ट त प य शा य पढमओ वग्गो । बिदि-अट्ठमसरसहिया, ख छठ थाप०४, पा० २]फर पा वितीओ य ॥८॥ पंच-वर्गक्रम इदानी कथ्यते -अकारः प्रथमः स्वरः। एकारः सप्तमः स्वरः) कपट तप यश सहितौ प्रथमो वर्गः। आकारो द्वितीयः स्वरः । एकारोऽष्टमः स्वरः । स छठय फर' समेतौ द्वितीयो वर्गः ॥८॥ तइओ णवमेण सम, गजड द वलसा य तइयओ वग्गो । घउ-दसमसरेण समं, घ झढ घभ व हा य चउत्थो उ॥ ९॥ - । 4 ३ 10 [गाथा १०-१४] प्रश्नव्याकरणाख्यं इकारस्तृतीयः । उ(ओ)कार(रो) नवमः । 'गज ड द वलस' सहितौ तृतीयो वर्गः। ईकारश्चतुर्थः । औकार(रो) दशमः । 'घझ ढधभव हा(ह) समेतौ चतुर्थो वर्गः ॥९॥ अणुणासिया य [६०५,पा० १] पंच वि, पंचम-छट्ठा सरा य बोधवा । : दो चरिमसरा य तहा, पण्हक्खरमूलवत्थुस्स ॥१०॥ कमण न माः पञ्च अनुनासिकाः । 'उ ऊ' पञ्चमपष्ठौ । 'अं अः द्वौ चरिमस(ख)रौ। भवतः । एते पंच वर्गाः प्रभाक्षरमूलवस्तुनि ॥ १० ॥ वर्गरचना समाप्ता॥ इदानी जीव-धातु-मूलाक्षराणां विभागोपदर्शनार्थमाह - आइल्ला तिण्णि संरा, सत्तम णवमो य बारसे जीवं । पंचम-छट्ठ-सरस्स[य], धाउं सेसेसु तिसि(सु) मूलं ॥ ११ ॥ आद्याःवरात्रय 'अ आ इ सप्तम 'ए'कारः। नवम 'ओ'कारः। 'अ' द्वादशमः। एते पटू खराः जीवखराः विप०५, पा० २]ज्ञेयाः । 'उ'कार[] पंचमः । 'ऊ'कारः पाठः।' एकादशमः। त्रय एते धातुखराः। चतुर्थ 'ई'कारः। दशम 'औ'कारः। 'ऐ'कारोऽष्टमः। एते त्रयोमूलखरा॥११॥ क च ट चउक्के जीयं, अट्ठम-पढमंतिमे यकारे य । तप[य?] चउक्के धाउं, व से य मूलं तु सेसेसु ॥ १२ ॥ क ख ग घ, च छ ज झ ट ठ ड ढ' इत्येते पूर्वनिर्दिष्टा[:] प्रथमवर्गस्य । अष्टमः स(श)का- 15 (प०६,पा० १र:, अस्यान्तो हकारः, यकारश्च । जीवाक्षरा एते । 'त थ द ध, पफवभ' इत्येतेऽष्टौ । वकारः सकारश्चेत्येते धात्वक्षराः।मण न मा[:] तथा रकारः, लकारः, पकारश्च इत्येते मूलाक्षरा(राः) ॥ १२ ॥ जीवाद्यक्षराणामुपसंग्रहार्थ स्वराणां गाथामाह - जीवक्खरेकवीसा, तेरह धाउक्खरा मुणेयवा । एयारस मूलगया, पणयाला होति सबे वि ॥ १३ ॥ [५०६, पा० २] पूर्वनिर्दिष्टाः स्वराः पट् 'अआइएउ आ, क ख ग घ च छ ज झ ट ठ ड ढ, यशहा' एवे जीयाक्षराः एकविंशतिः२१ । पूर्वोक्ता धातुवरात्रयः 'उ ऊ दश चान्ये 'त थ द ध प फवभ वसा' पते धात्वक्षरास्त्रयोदश १३ । 'ई ऐऔ, डमण न मा; रल पा' एते मूलाक्षराः एकादश ११। जीव-धातु-मूलसमेताः पंचचत्वारिंस(श)दक्षराणि भवन्ति ॥ १३ ॥ [५०७,पा० १] पढमस(स्स)रसंजुत्ता, सधे लहुअक्खरा य अणभिहया । इच्छंति जीवचिंता मि(मोत्तासु विवजिया जाव ॥ १४ ॥ उत्सर्गसिद्धानां जीवाद्यक्षराणामपवादः । अकारः प्रथमस्वरः येपामक्षराणामन्वर्भूतः, ते जीवाक्षराः प्रथमसरसंयुक्ताः । अथवा अकारेण युक्ताः क च ट य श गजडा' एये (त)ऽष्टौ लघ्वक्षराः अनभिहता मात्रारहि{५०५, पा० २]ताच जीवचिन्तां कथयन्ति । अनुक्का अपि धातू.. 21 23 -- 0 . जयपाहुनाम निमित्तशाखम् । [गाधा १५-१८] (ख)मूलचिन्ताभ्यो गाधाया मान्तर्भूताने चेत्युच्यन्ते । तदुपवस' इत्येते पंच धात्वक्षराः अन- भिहताः लघवो मानारहिताच जीयधासुचिन्वां फथयन्ति । लकार एक एव मूलाक्षरो लघुः । अनभिहतो मात्राविवर्जितः स स्वजीवमूलचिन्तां कथयति ॥ १४ ॥ मत्तासु जो विअप्पो, जो त्रि य आलिगिओ वि अभियाओ। तं सधं वण्णेहं, जहफम आणुपुचीए ॥ १५ ॥ मात्रामु.यो विकल्प इति पक्ष्यमाणोपन्यासार्यगाथा । विकल्पग्रहणेन मात्राभेद एच्यते । स ए[व] तिर्यग्माना अधोमात्रा इति । [१०८, पा. १]आलिंगिताभू(मि)धूमिवदग्धलक्षणोपपा- ता] (त्रि)पा । तदेतत् समपंचं यथाक्रममानुपूर्व्या कथयिष्यामः ॥ १५ ॥ पढमो तइओ य सरो, सत्तम णवमो यं तिरियमायाओ। मूलसर उद्द(ड)मत्ता, पंचम-छट्ठा अहोमत्ता ॥ १६ ॥ अकारः प्रथमः स्वरः, इफारः तृतीयस्वरः, एकारः सप्तमस्वरः, ओकाये नवमस्वर:-एते चत्वारः स्वरास्तियन्मात्राः । एतेषु मूलयोनौ लब्धायां तिर्यग्लतायां पल्या(हया) शासायां पा संपन्धि मुष्टिगृहीतं किमपि कथयन्ति । नष्टप्रभेऽप्यन्तरीक्षतिर्यग्भागस्थितद्रव्यमेत एव स्वराः क्थयन्ति । ईकारश्चतुर्थः, ऐकारोऽष्टमः, ओकारो दशमः । [१०८, पा० २] एते त्रयः खरा ऊर्द्ध- मात्राः। मूलयोनौ लब्घायां यशस्योर्द्धमागसंवन्धि किमपि मुष्टिगृहीतं कथयन्ति । नष्टप्रने अर्द्ध- भागस्थितद्रव्यमेते अयः स्वराः यथयन्ति । पंचमः उकारा, पष्ठः औकारः, एतौ द्वौ स्वरौ अधोमानी मूलयोनी लब्धायां वृक्षस्याधोभागसंवन्धि किमपि मुष्टिप्र()हीत(त) क्थयत(वः) । नष्टप्रश्नेऽप्यधोभागव्यवस्थित्रा(त)मेतावेव स्वरी कथयतः ॥ १६ ॥ [५०९,पा. १] जीवाईसहाणं, णियमा द[रि]संति उट्ठ(ह)मत्ताओ। व(वि)वरीय अहोमत्ता, णायचा जीव-धाऊणं ॥ १७ ॥ ऊर्द्धमाना यि(येऽ)मिहतानयत्रयः खराः। ते जीवाक्षराणां पंचदशानामुपरिगता जीवमूल- संस्थानं दर्शयन्ति । काष्ठ मूलमुच्यते । वस्मिन्नुत्तीर्णमाणिगणस्यान्यतमजीपमूलसंस्थानमुच्यते इति । अधोमानो(नौ) द्वो खरावुक्तो(लो) तो यदा जीवाक्षरसंयुक्तौ दृश्य(इये)ते तदा जीवधा- तुं दर्शयतः । [५.९, पा. ३] को जीवधातुरित्यत्रोच्यते-सुवर्णरूप्यतामा(ताम्रा)ऽरकांस(सोपापा- - णादिष्वेवं विधेपु धातुपु(पू)त्कीर्णो जीवाकृतिसंस्थानः सकलपाणिगणो जीवधातुरित्युच्यते ॥१७॥ मूलक्खरा उ सबे, धाउं दंसंति जे अहोमचा । दंसंति तिरियमत्ता, परपक्खगया उभयपक्खं ॥ १८ ॥ मूलाक्षराः 'डम नम र ल पा' श्याष्टावते उक्ता व(अ)पोमात्रा(नाः) स्वरद्वयसमेवा यदा दृश्यन्ते तदा धातुद्रव्यं दर्शयन्ति । तिर्यग्माताभिप.१०, पा. १]हताश्चत्वारो जीवखरा, ते मूलाक्षराणामुपरिगता जीवमूलं दर्शयन्ति । जीवमूलस्य आकारः । पूर्वोकमेव । पात्यक्षराणा- मुपरिगवाश्चैते यदर जीवस्वराश्चत्रो दृश्यन्ते तदा जीवपातुं दर्शयन्ति । जोवधातुसंस्थान पोचमेव ॥ १८॥ + म ५ 1 - - [गाथा १९-२०] प्रश्नव्याकरणाख्य सविसग्ग-बिंदुसहिया, जीवाइ णिदि[दि]संति सट्टाणं । अहमत्तलक्षणं पुण, सबसि सकायगुरुयाणं ॥ १९ ॥ सविसर्ग-बिन्दुसहिता[]-विसर्गों द्वादसः (शः) स्वरः, विन्दुरेकादसा(शः)।[१०१०,पा०२] एतौ द्वौ जीवाक्षरसहितो जीवयोनि फुरुतः । यदा च द्वावेतौ वगै मूलाक्षरसहितौ दृश्येते, तदा मूलयोनि कुर(रु)तः । धात्वक्षरसहितौ धातुयोनि कुर(रु)तः । अधोमानलक्षणमहणेन पंच भण्यन्ते । तद्यथा-खकायगुरु[], स्ववर्गसंयोगः, परवर्गसंयोगः, अर्धानान्तं, यक्षरसंयो- गश्चेति । तत्र तावत् स्वकायगुरोर्लक्षणमुच्यते-द्वौ फकारी संयुक्तो, द्वौ गकारी, द्वौ डकारी, एवं सर्ववर्गेषु व्याख्या । वकायगुरवो जीवयोनौ लब्धायां प्रष्टुः खकायचिन्तां कथयन्ति । धातु- योनौ लब्धायां [५० ११,पा० १] आत्मार्थे धातुचिन्तां कथयन्ति । मूलयोनौ लब्धायां आत्मार्थे मूलचिन्तां कथयन्ति । स्ववर्गसंयोगस्य लक्षणमुच्यते-खकारस्योपरिगतः ककार:, पकार- " स्योपरिंगतो गकारः, एवं वर्गे द्वौ वा स्ववर्गसंयोगी भवतः । जीवयोनी लब्धायां प्रष्टुः स्वबन्धुचिन्तां कथयति(न्ति) । एतो धातुयोनौ लब्धायां स्थपन्धुकृते धातुचिन्तां कथयन्ति । मूलयोनौ लब्धायां स्वबन्धुकृते मूलचिन्तां कथयन्ति । परवर्गसंयोगस्य लक्षणमुच्यते - गकारस्य उपरिगतः चकार(र.), गकारस्य उपरिगतो जकारः, पकारस्योपरिगतो(तः) सकारः; इत्येव- मादयोऽन्येऽपि परवर्गसंयोगा जीवयोनी लब्धायां [प० ११, पा० २] प्रष्टुः पर[प]क्षचिन्तां दर्श- " यति(न्ति) । धातुयोनौ लब्धायां परपक्षकृते धातुचिन्तां कथयन्ति । अर्द्धक्रान्तस्य लक्षणमुच्यते-- उपरियबोधा(उपर्यघोs)क्षराणां तुल्यसंख्यया सो अर्द्धक्रान्तमित्युच्यते । निदर्शनं यथा- 'क्य-रूप- म' इत्येवमादयः । चिन्तायां जीययोनौ लब्धे श्री-पुरुषचिन्तां दर्शयन्ति । [प० १२,पा० १] धातु- योनी लब्धे स्त्रीसंबन्धेन धातुद्रव्यं लभ्यत इत्यादेश्यम् । मूलयोनौ लब्धे स्त्रीसंबन्धेन मूलद्रव्य लभ्यत इत्यादेश्यम् । यक्षरसंयोगस्य लक्षणमुच्यते-त्रिमिनिभिरक्षरैर्योगः सत्यक्षरयोगः यथा-॥ 'खि-क्रि-म्बि-स्थि-वय-प्य(?) एवमादयोऽन्येऽपि जीवयोनौ लब्धायां पृ (प्राः) [प०१२, पा० २] अपत्यचिन्त्यां कथयति(न्ति) । मूलयोनी लब्धायां अपत्यार्थे मूलचिन्तां कथयन्ति । धातुयोनौ लब्धायां अपत्यार्थे धातुचिन्तां कथयति (न्ति) ।। १९ ।। अभियगुरुअक्खरया, रेफ यकार उ ज(ऊ?)कारसंजुत्ता । सबे य अहोमत्ता, णायचा अप्पहाणा य ॥ २० ॥ रेफ व(य?)कार उकार ऊकार' एतेपाा प० १३, पा० १]मन्यतमेनाधोगतेन जीवधातुमूलाक्ष- राणां अन्यतनो(मो)ऽक्षरः संयुक्तमु(क्त उ)च्यते । वैरेवाधोगतैः अभिहत उच्यते । तैरेवाधोगतैर- प्रधानमुच्यते । जीवयोनौ लब्धायां यस्य कस्यचिदक्षरस्य तले यदा रेफो दृस्य(श्य)ते, तदा प्रष्टा यस्यार्थे पृच्छति तस्यापः का[१० १३,पा० २]ये स(श)खप्रहार आदेश्यः । जीवयोनौ लब्धायां यस्य 'कस्यचिद् अक्षरस्य तले यदा यकारो दृस्य(श्य)ते, तदा प्रष्टा यस्यार्थे पृच्छति तस्य स्रीनिमिर्च से बन्धनमादेश्यम्। जीवयोनी लब्धायां कस्यचिदक्षरस्य तले उकारो दृस्य(श्याते, उदा प्रष्टा यस्वार्थे पृच्छति तस्य मूलमादेश्यम्।जीवयोनी लब्धायां यस्य कस्यचिद् अक्षरस्य तले अकारो दृस्य(श्य)ते सदा प्रष्टा यस कृते पृच्छति तस्य [२०१४,पा० १] दीर्घकालं बन्धनमादेश्यम् । एते चार्या यद्यपि गाथायां नोकास्तथाप्येते (द्राष्टच्याः ॥ २० ।। 8 ܕ जयपाहुटनाम निमिचशाखम् । [गाधा २१-२५] जाणे संवग्गगरू(गुरु)ए, जोणी जा जरस अप्पणातणिय । परवग्गक्खरठाए, जो उवार तस्स सा जोणी ॥ २१ ॥ जानीहि स्ववर्गाक्षरेणाक्षरो गुरुय(य)यथा-'इस ग्ध' आभ्यां जीवो वक्तव्यः । 'त स्थ' आभ्यां धातुव(क)कन्यः । 'हन न्ल ना(?) एवमादिमिर्मूलम् । परवर्गेणापि योऽक्षरो गुरुर्य उपरिस्थिवस्ताप० १४,पा० २]स्य सा योनिः । निदर्शनं-ग्व डूप मच(1) इत्येवमादयो यथासंख्येन जीवधातुमूलानि ॥ २१ ॥ आइल्ला चत्तारि त्रि, जीवा पयडी हवंति ठाणाई । पंचमछट्ठा धाओ, मूलपयडी य दो चरिमा ॥ २२ ॥ आधा जीवस्वरा[:] चत्वारः । 'अइएउ'कारो वर्णागत एवानो(तो) न गृहीतः । एते ॥ जीवाक्षराणामुपरिगता नि(नि:)[प० १५, पा० संस(श)यं जीयमेव दर्शयन्ति । एतात) एव जीवस्वराः जीवप्रकृया धात्यक्षराणामुपरिगता जीवधार्नु कुर्वन्ति । मूलाक्षराणामुपरिगता जीव- मूलं दर्शयन्ति । जीवमूल-जीवधात्वोर्लक्षणं प्रागुक्तमिति । पंचम उकार(र.), पष्ठ ऊकारः, एती द्वौ धातुस्वरौ धात्यक्षराणामधोगती धातुमेव दर्शयतः। [१० १५, पा.२] ' धातुखरचरिमा केवलो धातुमेव कथयति । 'अ' चरिमो जीवसरः केवलो जीवमेव कथयति । पूर्वोक्तानां ॥ जीव(वा)क्षराणामुपरिगतो परिमसंज्ञानुस्वारो जीवमेव कथयति । तत्रस्थस्तदात्मको भयति । धाव- धराणामुपरिगतोऽनुस्खारो धातुमेय कथयति । मूलाक्षरोपरिगतोऽनुस्खारो मूलं दर्शयति । '' चरिमसंतो विसर्ग[:] जीवाक्षराणामन्यतमस्याग्रस्थित(लो)जीवमुपदर्शयवि । धात्वक्षरामतो धातुं दर्शयति । मूलाक्षराणामन्यतमस्सापतो व्यवस्थितो विसर्गः [मूल]मेव दर्शयति । परिमसंस्त्वं त(त्रि)स्वपि सप० १६,पा-१() भवतीति । सामान्ययोनि(नि.) समाप्ता ॥ २२ ॥ सी(शिक्षाक्षरविभागार्य प्रयोजनत्वाध तदुपन्यासः- उर-कंठ-जीहमूला तालवा तह य उद्धतालचा । दंता उट्ठा अणुणासिया य सुच्चखा(मुहक्ख)रा चेव ॥ २३ ॥ नव स्थानानि वर्णानां तथोत्पत्तेः । उरः(उरस्थाः), कण्ठ्याः, निहामूलीयाः, तालव्याः, अर्द्धतालव्याः, दन्याः, ओट्याः, अनुनासिकाः, मूर्द्धन्याश्चेति नवस्थानान्यक्षराणीति गामापा १२।। सविसगो य अकारो, उकारो (उरो) हकारो य जो हवई हस्सो । हस्सस(स्स)रा य कंठा, जीहामूला क ख ग था य॥ २४ ॥ सर्प (वि)सर्गः, अकारः, हकारश्च, द्वावेतौ उ(र)स्यो ज्ञातव्यो। हवस्वराः [५० १६, पा..! अइ ए चत्वारोऽप्येते कण्ठ्याः । क ख ग घ' इसेते चत्वार(रो) निहामूलीयाः ।। २४ ॥ सचट्ठआ(मा)ण पढमा, तालवा च छ जशा य चत्वारि । टठ ड ढ पीओ य सरो, हवंति खलु मुद्धतालबा ॥ २५ ॥ प्रथमवर्गस्य सप्तमो यकार(र.), यद्वा सप्तमवर्गस्य प्रथमो यकार:, अष्टमवर्गस्य प्रथमः । 20 .

७ 10 [गाथा २६-२७] प्रायोफरणाग्य रा(श)कारः । 'पज' श्रोरो परयारमाालव्या: । ' दस इसे (प.१५, गा० १) पत्यारा, द्वितीयस्थर आकार, पश्य पो गूगालायाः ॥ २५ ॥ त थ द ध सा पु(प)ण दंता, प फ ब भ धातुस्सरा वकारोडा(ट्टा)। वग्गचरिमाणुणासी, मुदण्णा सेसया सद्ये ॥ २६ ॥ rapध सा' इत्येसे पा पन्या[:] । 'पफगग' इथे पत्यार(n), पातुमरी छौ पञ्चगपाठी उ ऊ, 'प' फारा, रास भीष्माः । पर्गपरिगमणेन पयमागुनासिका कप मन मा' गृहानो । (प.१५, पा. २] गथया पर्गपाहणेगानुनासिया, पराणा प मध्ये परिगो ऽनुगासि[को] पितुः, it' इत्येरोप परतुनासिफाः । शेषा-गिरा फेरी ? यी' प्रयः । पारम(या)रा रसपा इसरो प्रयः । एषन पए, गूर्सन्याः । सि(शिक्षामकरणं समासम् ॥ २६ ॥ पापसरप्राप्त पारयरिया, [at] नागप्रकरणेऽभिधाग्यति । ति(गु) प्राप्तिमाय- गुच्यते । सपथ गापि०१८, १० १]थागाद- ठाणं ठाणं एफेफयं तु आलिंगिधा(या) हायति । उरसादी ठाणाणं, तालचे उबरिमो टाइ ॥ २७ ॥ खान खान फैकगालिंगिसानिधूगिराधारयन्ति । उरग्या निधनागालये[ग] इन्गेयं मग अभिदा इति । अगिहरामणेनालिगिताभिधूगिसम्भा उगारो । उराग्यो(परग्यो)ऽन. भितो असंयुष उरग्य एय छारो [.१८, TI• ] अक्षरग । परम्प भालिंगिएफण्टणानं लगी। घरसोऽभिधूगिंगो गितामूलीयं समते । परग्यो पाधशालच्यं हमरो । फण्टयोऽनभिहसागर फण्टंग एप छगते । फण्टग शालिग्य(नि)यो निहागूठीय लाये । पण्टगोऽगिनिरालालम्पं छगरे। फण्टयो पग्धो गूगनालयं लगते । निक्षागूगीयोऽगनिहगारांयुक्तो गिहागूलीय गरी । " एपासिगिपणालय [५० १९, १० १] उभरी । गएषामिभूगिरा गाध्य भरी । स एपा(?). . पग्धो पन्सं उभरो । तालग्यो अभियानयुगणालयं खासे । रा एप बग्धो इन्सं छगरो । पालल्यो(प्य) आलिंगिता छ सालव्यं सगरो । रा पपाधूिगियो पर लगो । । एप पभो(ध) (यो)टयं लगते । मूसालम्पोऽमिहासंयुक्तः सया लगते । रापपार्थिगिती पन्स छगये। स एषामि[भूगि] उष्टय समारो । स एपा(?)ो भनुनासिफ गरे । । पन्त्यो पनभिहारीयुक्त (प.)गलानं लगते । म एपालि[५० १९, १० २]गिल औद्ययं लभरो । स पयागिगिसो अनुपातिक हमले। ग एष ग्धो गन्य हो । जाप्यो (E)नमि दगारयुगा समान छभो। ग यालिंगिगोऽनुनासिक हासे । जौटयोऽभिगियो गुर्गम्य उग। पाय उरण्य लभते । जनुनासियो मिहगागयुतः गलान पाते । जालिंगितो मूर्धन्य छगते 1 १० ३०, १० 11 अभिभूगिय परग्य छगये । दमः फण्टा लगने । गुम्यो भागितासंयुक्ता लानं समरो । बालिंगित उरण्यं लगते । अभिभूगिरा: फाण्ट पारे । रा पप ग्धो गिलागलीय छमते ॥ २७ ॥ ॥पयं म(सा)माप्ति(सिक शिक्षाप्रपारणं समाप्तम् ॥ .

६ , जयपाहुडनाम निमित्तशालम् । [गाथा २१-२५] जाणे सवग्गगरू(गुरु)ए, जोणी जा जस्स अप्पणातणिय । परवग्गक्खरठाए, जो उवार तस्स सा जोणी ॥ २१॥ जानीहि स्ववर्गाक्षरेणाक्षरो गुरुय(य)। यथा-क्स ग्घ आभ्यां जीवो वक्तव्यः । 'त्त त्य' आभ्यां पातुव(4)तव्यः । 'हनन्ल ना() एवमादिमिर्मूलम् । परवर्गेणापि योऽक्षरो गुरुर्य उपरिस्थिताप० १४, पा० २]स सा योनिः । निदर्शन-ग्व ड्य श्च(ly इत्येवमादयो यथासंख्येन जीवधातुमूलानि ।। २१ ॥ आइल्ला चत्वारि वि, जीवा पयडी हवंति ठाणाई। पंचमछट्ठा धाओ, मूलपयडी य दो चरिमा ॥ २२ ॥ आद्या जीवस्वराः चत्वारः । 'अइए उकारो वर्णागत एवानो(सो) न गृहीतः । एदे ॥ जीवाक्षराणामुपरिगता नि(निः)[प० १५, पा. संस(शोयं जीयमेव दर्शयन्ति । एता(ते) एव जीवस्वराः जीवप्रकृत्या धात्वक्षराणामुपरिगता जीवधातुं कुर्वन्ति । मूलाक्षराणामुपरिगता जीव- मूलं दर्शयन्ति । जीवमूल-जीवधात्वोर्लक्षणं प्रागुक्तमिति । पंचम उकार(e), पष्ठ कारः, एतौ द्वौ धातुखरौ धात्वक्षरागामधोगती धातुमेव दर्शयः। {प०१५, पा.२] '' धातुस्वरम्परिमा केवलो धातुमेव कथयति । 'अ' चरिमो जीवस्वरः केवलो जीवमेव कथयति । पूर्वोक्तानां । जीव(वा)क्षराणामुपरिगतो चरिमसज्ञानुवारो जीवमेव कथयति । तत्रस्थस्सदात्मको भवति । धात्व- क्षराणामुपरिगतोऽनुस्वारो धातुमेय कथयति । मूलाक्षरोपरिगतोऽनुखारो मूलं दर्शयति । 'अ' चरिमसझो विसर्ग[:] जीवाक्षराणामन्यतमस्याग्रस्थित(तो)जीवमुपदर्शयति । धात्वक्षरामती धातुं दर्शयति । मूलाक्षराणामन्यतमस्यामतो व्यवस्थितो विसर्गः [मूलीमेव दर्शयति । चरिमसंज्ञत्वं (नि)ध्वपि साप० १६,पा. १स() भवतीति । सामान्ययोनि(निः) समासा ॥ २२ ।। सी(शिक्षाक्षरविभागार्थ प्रयोजनवाच तदुपन्यासः उर-कंठ-जीहमूला तालवा तह य उड़तालवा । दंता उट्ठा अणुणासिया य सुच्चखा(मुद्धक्ख)रा चेव ॥ २३ ॥ नव स्थानानि वर्णानां तथोत्पत्तेः । उर:(उरस्याः), कण्ठ्याः, जिह्वामूलीयाः, तालव्या, सर्द्धतालव्याः, दन्त्याः, ओष्ठ्याः, अनुनासिकाः, मूर्धन्याति नवस्थानान्यक्षराणीति गाथार्थः ॥ २३ ॥ सविसग्गो य अकारो, उकारो (उरो) हकारी य जो हबई हस्सो । हस्सस(स्स)रा य कंठा, जीहामूला क ख ग घा य ॥ २४ ॥ सर्प (वि)सर्गः, अकारः, हकारश्च, द्वावेतौ उ(र)स्यौ ज्ञातव्यो। हस्वस्वराः [प. १६,पा•३] अइ ए उ चत्वारोऽप्येते फण्ठ्याः । 'कखगघ' इत्येते चत्वार(गे) जिह्वामूलीयाः ।। २४ ॥ सत्तहआ(मा)ण पढमा, तालवा च छ ज झा य चचारि । टठ ड ढ बीओ य सरो, हवंति खलु मुद्धत्तालबा ॥ २५ ॥ प्रथमवर्गस्य सप्तमो यकार(र.), यद्वा सप्तमवर्गस्य प्रथमो यकार:, अष्टमवर्गस्य प्रथमः 20 - ७ - . , [गाथा २६-२७] प्रभव्यांकरणाख्य स(श)कारः । 'च छ ज झ' इत्येते चत्वारस्तालव्याः । 'द ठ ड ढ' इत्येते [प०१७, पा.१] चत्वारः, द्वितीयंवर आकारः, पञ्च एते मूर्द्धतालव्याः ॥ २५ ॥ तथदध सा पु(प)ण दंता, पफ ब भ धातुस्सरा वकारोद्धा(ट्टा)। वग्गचरिमाणुणासी, मुद्धण्णा सेसया सबे ॥ २६ ॥ 'त थ द ध सा' इत्येते पञ्च दन्त्या[:] । 'पफयभ' इत्येते चत्वार(र.), धातुखरौ च । द्वौ पञ्चमपष्ठौ उ ऊ, 'व' कारश्च, सप्तते औष्ठयाः । वर्गचरिमप्रणेन पश्चमानुनासिका 'डब ण नयाः' गृह्यन्ते । [५० १७, पा०२]अथवा वर्गमहणेनानुनासिकाः, स्वराणां च मध्ये चरिमो ऽनुनासिको] विन्दुः, 'अ' इत्येते च पडनुनासिकाः। शेपा:-स्वराः के ते १ 'ई ऐ ओ' त्रयः । शेपास्त्र(श्चा)क्षराः 'रल पा' इत्येते त्रयः । एकत्र पडू मूर्द्धन्याः । सि(शिक्षाप्रकरणं समाप्तम् ॥ २६॥ अत्रावसरप्राप्ता अक्षरलब्धिः, [तां] नामप्रकरणेऽभिधास्यति । इह ति(तु) प्राप्तिमात्र- मुच्यते । तदर्थं गाईप०१८, पा० १]थामाह- ठाणं ठाणं एकेकयं तु आलिंगिधा(या)इ हायति । उरसादी ठाणाणं, तालचे उवरिमो ठाइ ॥ २७ ॥ स्थानं स्थानमेकैकमालिंगिताभिधूमितदग्धास्त्यजन्ति । उरस्या निहताखालच्येन] इत्येवं क्रम अभिहत इति । अमिहतमहणेनालिंगिताभिधूमितदग्धा उच्यते । उत्तरस्यो (उरस्यो)ऽन- भिहतो असंयुक्त उरस्य एव लभते [प० १८, पा. २] अक्षरम् । उरस्य आलिंगितकण्ठस्थानं लभते । उरसोऽभिधूर्मितो जिह्वामूलीयं लभते । उरस्यो दग्धतालव्यं लभते । कण्ठ्योऽनभिहतासंयुक्तः कण्ठ्य एव लभते । कण्ठ्य आलिंग्य(गि)तो जिह्वामूलीयं लभते । कण्ठ्योऽभिधूमितस्तालव्यं लभते। कण्ठ्यो दग्धो मूर्द्धतालव्यं लभते । जिह्वामूलीयोऽनभिहतासंयुक्तो जिह्वामूलीयं लभते । सस एवालिंगितस्तालव्यं [५० १९, पा. 1] लभते । स एवाभिधूमित ऊर्द्धतालव्यं लभते । स एवा(?)-1 दग्धो दन्यं लभते । तालव्यो अनभिहतासंयुक्तस्तालव्यं लभते । स एव दग्धो दन्यं लभते । तालव्यो(व्य) आलिंगितः ऊर्द्धतालव्यं लभते । स एवाभिधूमितो दन्यं लभते । स एवं दन्धो(ग्ध) उ(ओं)ध्यं लभते । मूर्खतालव्योऽनभिहतासंयुक्तः स्वस्थान लभते । स एवालिंगितो दन्यं लभते । स एवाभि[धूमि]त उ(औ)ष्ठ्यं लभते । स एवा(वा)दग्धो अनुनासिकं लभते । । दन्त्यो अनमिहतासंयुक्त(क्तः)स्वस्थानं लभते । स एवालि[प० १९,पा० २]गित औष्ठ्यं लभते । स एवाभिधूमितो अनुनासिकं लभते । स एव दग्धो मूर्द्धन्यं लभते । औष्ठ्यो अ(ड)नमि हतासंयुक्तः स्वस्थानं लभते । स एवालिंगितोऽनुनासिकं लभते । औष्ठ्योऽभिधूमितो मूर्धन्यं लभते । दग्ध उरस्यं लभते । अनुनासिको अनभिहतासंयुक्तः स्वस्थानं लभते । आलिंगितो भून्यं लभते । [१० २०,पा० १] अभिधूमित उरस्यं लभते । दुग्धः कण्ठ्यं लभते । मूर्द्धन्यो अनभिहतासंयुक्तः स्वस्थानं लभते । आलिंगित उरस्यं लभते । अभिधूमितः कण्ठ्यं लभते । स एव दुग्यो जिह्वामूलीयं लभते ॥ २७ ॥ ॥ एवं स(सा)माप्ति(सिक शिक्षाप्रकरणं समाप्तम् ॥ प 30 ट . जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । गाथा २८-३11 पढमो तइओ य सरो, सत्तम णवमो य संकडा हस्सा । वियडा.अंतरदीप०१०,पा०२ हा वि चउत्थो पंचमो चेव ॥२८॥ अकार-इकार-एकार-ओकारः, पत्यारोऽमी संकटसंज्ञाश्च हस्थाश्च ।प्रभाक्षराणां मध्ये यदा संकटस्वरयाहुल्यं भवति तदा प्रष्टा यस्पार्थे मोक्षं पृच्छति आत्मनो(नः) परस्य वा बद्धस्य तदा • मोक्षो [न?] भव[सी]त्यादेस्य (श्यम् ।) नष्टमपि न लभते । दुर्गभङ्गाविक न प्राप्नोतीत्यादेस्य (श्यम्)! एतद् व्यतिरिक्तमन्यद् यदापि० २१, पा० १] पृच्छति तदे(द)पां संकटसंज्ञानां स्वराणां माहुल्ये सर्व मेव लभ्यत इत्यादेश्यम् । विकटा अन्तरदीर्घाः। के इत्यत्रोच्यते-द्वितीय आकारा, चतुर्थ ईकारा, पंचम उकार, प्रयो विकटसंज्ञा अन्तरदीर्घाश्च । प्रभाक्षराणां मध्ये यदा विकटसंज्ञानां खराणां बाहुल्यं भवति तदा प्रष्टा यस्य कस्यचित् परस्यात्मनो या घद्धस्य मोक्षं [प० २१, पा० २] पृस्छति " तदा मोक्षो भवतीत्यादेश्यम् । नष्टमपि लभते। दुर्गादिभंगच सिध्यति, इयादेश्यम् । एतद व्यतिरिक्तं यदन्यनु(त्तु) लाभादिकं पृच्छति तन्न भवतीत्यादेश्यम् ॥ २८॥ संकडा(ड)विअडा सेसा, सहा[व]दीहा य तिणि णि[य]मेणं । छट्ठमा य वेणि विसमस्सरी चेय णायचो ॥ २९ ॥ संकट-विक्टा: शेपाः खभावदीर्घाश्च । पष्ठ ऊकारः, ऐकारोऽष्टमः, ओकारो दशमः, ॥ इत्येते त्रयः । शेषग्रहणाद् विन्दु-विसर्जनीयौ । प्रभाक्षराणां मध्ये संकट-विकटसंज्ञानां बाहुल्यं भवति तदा प्रष्ट्या यदात्मनो यदि वा परस्यार्थे पद्धस्य मोक्षं प०१२, पा. १] पृच्छति तदा भेदेन मुच्यत इति वक्तव्यम् । नष्टमपि किंचिद्रव्यं भेदेनेय लभ्यते । दुर्गभंगोऽपि भेदेनैव भवती- सादेश्यम् । यदन्यदेतद् व्यतिरिक्तं शुभमभं वा पृच्छति तन्मभ्यमं भवतीत्यादेश्यम् ॥ २९॥ पढमा(म त)इया य वियडा, बीय चउत्था य संकडा वग्गा । सेसा क(सं)कड-वियडी(डा), अड ई दंडस्स भेदतियं ॥ ३ ॥ प्रथमा:- क प ट त पय सा(शा), [तृतीयाः] गज उदयल सा' एतो विकटसंझौ । प्रागवत् फलम् । द्वितीय(याः) - 'सछ ठथ फरपाः', चतुर्थ(याः) - 'घझ ढघम वहा' एते संकटसंज्ञाः । पूर्ववत् फलम् । शेषग्रहणा[] 'डबण न मा' एते उभयस्वभाषाः।दण्ड विप्रनष्टं द्रव्यमुच्यते ॥ ३० ॥ [प० २१,पा०२] ॥ एवं संकट-विकटप्रकरणं समाप्तम् ।। 11 " वग्गे गणणादेसे, स(द)चेसु य उत्तराहरो होइ । वग्ग(ग्गु)त्तरा य नियमा, अ च त य यग्गंत(ग्गुत्त)रा चउरो ॥ १॥ उत्तराधरं चतुर्विध-वर्गोत्तरं गणनोत्तरं आदेशोत्तरं द्रव्योत्तरं चेति । अथ च संवन्धः आह-२१२२'वेवेक उत्तर अहरा य तेसिं जाणे यगक्सरसराण । तदर्थ प्राग वर्गोत्तरमु- " च्यते--[५०२३,पा.१] 'अच त य एते चत्वारः वर्गाः। उत्तरा प्रधाना इत्यर्थः । ततश्चापे(न्ये) कटपश' संज्ञाश्चत्वारः अघरा अप्रधानाचेति ॥ ३१ ॥ ।

. - 15 [गाथा ३२-३६] प्रभव्याकरणाख्यं • एतदेवाह - सेसा हवंति अहरा, वग्गा चत्तारि क ट प सा जाण । एककमि चउक्के, पुणो वि इणमो कमो णेओ ॥३२॥ अष्टवर्गक्रम एव, चत्वारो वर्गा अधराः। के ते? 'कट पसा(शा) शेपमहणाद् भण्यते ॥ ३२ ॥ गाथापश्चार्द्धस्यान्याप० २३, पा० २ गाथया विभापा क्रियते-- एकेकंनि(मि) चउक्के, पुणो पि(वि) इणमो कमो उ विण्णेओ। दो उत्तरा उ तेसिं, दो चिअ अहराधरा विदिए ॥ ३३॥ निरूपितं उत्तरचतुष्क अधरचतुष्कं चेति । तत्र चतुष्कद्वये भू[:] प्रधानाप्रधानदर्श- नार्थ क्रमोऽयं विज्ञातव्यः । उत्तरचतुष्के द्वौ यथा-अच वर्गों प्रागुत्पन्नत्वाद् । द्वौ च इति ।। द्वितीयचतुष्कमाह । तत्रान्यौ द्वौ वर्गों पश' अधराधराविति मन्तव्यौ । अथवा द्वितीयवर्गों द्वौ हा[व]धराविति । द्वौ अधरौ 'फट' संज्ञो।वो अधराधरौ प स (श)' संज्ञौ। एवं चा नेयम् ॥३३॥ अनु(मु)मेवार्थ विशेषयन्नाह - दो चेव उ {५० २४,पा० १)त्तरोत्तर, तेसिं दो उत्तराधर(रा) पढमे । अधरुत्तरा य दोण्णि य दोण्णि य अहराहरा विदिए ॥ ३४ ॥ तत्र उत्तरचतुष्के पूर्वोत्पनत्वात् प्रधानत्वाच 'अच' एतौ उत्तरोत्तरौ । आभ्यामनन्तरप- तित्वात् त य एतौ उत्तराधरौ एव प्रथमचतुष्के । द्वितीये तु 'कट' इत्येतौ अधरोत्तरौ। अधर- चतुष्कत्वादधरी प्रागुत्पन्नत्वादुत्तरौ। द्वौ अधराधरौ । 'पस[श' संज्ञौ अधरचतुष्क(त्वादधरौ। 'कट' वर्गयोः पश्चादुत्पन्नत्वाद् अधराधराविति । एवं अष्टवर्गक्रमेण वर्गोत्तरमुक्तम् ॥ ३४ ॥ पंचवर्गीयेत्(यमेतत् ?-)। पढम-तइया उ वग्गा, पण्हस्स य उत्तरक्खरा होति । वितिय-चउत्था अंहरा, अहिराहर होप० २४, पा० २]ति अणुणासी ॥३५॥ प्रथमवर्ग:]- फ च ट त प य स (श)' इति । तृतीयो- 'गज ड द बल स' । एतौ वर्गों उत्तरोत्तरी, उत्तरावित्यर्थः । द्वितीय[:]- 'ख छ ठ थ फरप'; चतुर्थः - 'घझ ड ध म वह', इत्येतो वर्गों अधरसंज्ञौ । घणनम' इत्येपो(प) वर्ग: अधराधरसंज्ञः । एवं वर्गोत्तरम् ।।३५।। 25 साम्प्रतं गणनोत्तरम् , तदर्थ [गाथा]- गणणाए छा[५० २५, पा० १] इल्ला, सरुत्तरा छस्सराधरा इयरे । विसमा वि उत्तरा वंजणेसु अहरा समा भणिया ॥ ३६ ॥ गणना-अनुक्रमो भण्यते । तत्र स्वरागामाद्याः पद् उत्तराः, पूर्वोत्पन्नत्वात् । 'अ आ इ ई उ, अपवादुत्पन्नत्वाद् अधरा 'एऐ ओ औ अंः। यद्वाऽन्यथा गणनोत्तर(१) स्वराणाम् 'अइ उप ओ' द्वयोर्द्वयोः प्रागुत्पा प०३५, पा० २]न्नत्वादेते उत्तराः । पश्चादुत्पन्नत्वाद् 'आईजऐ औ ' इत्येते अपराः । यत इदमाह- "विसमा वि उत्तरा बंजणेसु अहरा समा भणियो ।" 20 , . नि.पा.२ 11 U जयपाइरानाम निमित्तशामम् । [गाथा ३५-४१] इहापि गणनमेवाहीकृत्योचम् । विषमा[:]-प्रथम-तृतीय-पंचम-वर्गीया वर्णाः। द्वितीय. पतुर्थाः समा इति । विपमवर्गीया उत्तराः, समवर्गीया अघरा इति । एवं गणनोचरम् ॥३६।। हस्सा अयारसहिया, सरुत्तरादेसओऽधरा इयरे । कचटतपय सा णुगओ य अकारो उत्तरो पढमो ॥ ३७॥ मादेशोत्तरमेतत् -हस्वाः खरा अफारसहिवा इति । 'अफार इकार उकार एकार ओकार इत्येते उत्तरत्वेना[१०२६, पा. १]दिष्टाः । एतेषां यद्यपि मध्ये उकारो अप्रधानो दाहात्मकः, "तथाप्युत्तर एव द्रष्टव्यः । उकारो यद्यप्युत्तरं दहति स उत्तर एव । यद्यर्घा दहति स अधरो दग्धः उत्तरी भवति । रोपाः पड् अधराः पूर्वोक्ता अपि भेदोत्तरेण पुनरादिष्टाः।आई उऐ औजा, अक घ ट त प य शेष्यन्तर्भूतोऽयकार उत्तर(रो) द्रष्टव्यः पृधगादौ ।। ३७ ॥ क गचज टडत द प च य ल, अट्टमवग्गस्स पढम तइओ य । एते [य] उत्तरा घंजणेसु सेसा अ(s)धरादेसे ॥ ३८ ॥ 'फगपजट ड स द प प य ल श सा' एते प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराः। प्रथमवर्गस्याष्टमः स(श)- कारः । तस्मात् तृतीयः प.२६, पा०२] 'स'कारः। एते सर्वे उत्तरत्वेनादिष्टाः। शेषा अपरा इति। 'सप छठ थप फभर व पहा' इत्येते द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षराः अधरा आदिष्टाः ॥ ३८ ॥ उत्तरसरसंजुचा, वग्गे लहु अक्खर(रु)त्तरादेसे । अहरसरेसु य अहरा, हवंति ये उत्तरा लहुया ॥ ३९ ॥ संयोग प्रति उत्तरखरसंयुक्ता] । के ते उत्तरस्वराः १ उच्यन्ते-अ इ उ ए ओ अं' [प-२५.पा. १ एते । प्रथम-तृतीय-वर्गप्रतिबद्धा ये अक्षराले लघवः । के ते? उच्यन्ते-कग चजट ड त ६५ प य ल का सा' इत्येते । अनन्तरोता उत्तरस(वारसंयुत्ता उत्तरा एवादिस्य- (श्योन्ते । एन एव क ग घ जट ड त द प प य य ल श सा' उत्तराधरखरैः 'आई ऐ औ अ' इत्येते(तैः) संयुक्ता अधरा इत्यादिस्स(श्य)न्ते । एवमादेशोत्तरम् ।। ३९ ।। दसु जे पहााप• २७, पा० २]णा, पुचप(चुप्पोन्ना य उत्तरा सके । अघरा य अप्पहाणा, पञ्चुप(पच्छुप्पाण्णा य जे दहा ॥ ४०॥ द्रध्याक्षरेषु ये प्रधानतमाः पूर्वोत्पनाच प्रथम-तृतीयवर्णाक्षरास्ते उत्तराः प्रधाना दातव्याः। ५ अधराय पश्चादुत्पन्नाः। 2 ते १ द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षराः । अप्रधाना ज्ञातव्या अपराभेति ॥४०॥ णा(णे)मित्तिएण जे [५० १८, पा• 1} वा, उत्तरबुद्धीए अत्तणो गहिया । ते तस्स उत्तराणि उ, सेसा अहरीकया अहरा ॥४१॥ चत्वारो ये विकल्पा उत्तराधरप्रकरणे उक्तास्तांतिरस्कृत्य, वा क(का)दाचित्कं विधानमुरी- कृत्य विकल्पान्तरस्य चोपदर्शनार्थ आहितसंस्कारस निमित्तज्ञानवतो द्रागिति पुयुत्पादः। उत्तरेष में अधरनुप• १८,पा. २]द्धिा, अधरेषु उत्तरबुद्धिर्वा यत्रोत्पन्ना फलतोऽपि तागा(गे)यासौ । यथा- मामणकुळनिवासतुल्यो गोत्रवयोगुणादिपूर्वोत्तरसमानितेषु तद्वद् विश्वासबुद्धिवदिति ।। ४१ ।। ॥ एवं चतुर्विधम(सु)त्तराधरं समाप्तम् ॥ 20 10 । - प्रश्नव्याकरणाख्यं ११ [गाया ४२-४५] 'अहवा इमं अहविहं उत्तराधरं होइ' सूत्रवचक(न)मेतत् । अथवाऽष्टप्रकारमेतदुत्तराधरं भवतीति वचनस्यार्थः। अक्खरसरसंजोए, बलाबलविसेसओ अणति(हि)घाए । तत्तो य उत्तरोत्तर, अहराअ(5)हर अट्ठमं जाणे ॥ ४२ ॥ साम्प्रतं गाथार्थमुर्थ उ)च्यते-खरोत्तरं प्रथम, अक्षरोत्तरं द्वितीयं, संयोगोत्तरं, बलाब- 5 लोत्तरं, विभागोत्तरं, अनमिप० २९,पा० १ हतोत्तरं, [उत्तरं,] उत्तरोत्तरं चेति । एवमधरमपि अष्टप्रकारमेव सप्रतिपक्षत्वाद् वस्तुम(नः)स्वराधर, अक्षराधरं, संयोगाधरं; [बलाबलाधरं, विभागाधरं] अनभिहताधरं, अधरं, अधराधरं चेति ॥ ४२ ॥ हस्सस(स्स)रुत्तरं अक्खरुत्तरं उत्तराख(रक्ख)रा सके । हस्सस(स्स)रसंजुत्ता, संजोएणुत्तरा लहुया ॥ ४३ ॥ अत्र खरोत्तरमुच्यते गाथाया अवयवेनाद्येन । हस्वस्वरोत्तरम् । के हवा: स्वराः ? 'अ इए ओ' इत्येते चत्वारः । अक्खरुत्तरं उत्तरक्खरा सधे । क्वे (के) च ते ? प्रथम-तृतीय- वर्गीया गृह्यन्ते । साम्प्रतं संयोगोत्तरमुच्यते-हखस्वरसंयुक्ता ला(ल)घको वर्णाः 'कग च जट उ तदप य य ल श सा' इत्येते । यथा-[प० २९, पा. २] 'क कि के को, ग गिगेगो, पचि चे चो, जजिजेजो' इत्यादि संयोगोत्तरम् ॥ ४३ ॥ इदानी विभागोत्तरं फममुलक्ष्योच्यते, संयोगस्य प्रक्रान्तत्वात् - गरुयक्खरा य सधे, उत्तरसरसंजुआ विभाएणं । सो ठवइ उत्तरो खलु, होंति अ से तिण्णि या(आ)देसा ॥४४॥ गुर्वा (प)क्षरा उता द्वितीय-चतुर्थवर्गीयाः । ते उत्तरस्वरसंयुक्ताः । यथा-'ससिखे सो पघि घे पो' । इत्यादिविभागेनोत्तराः । विभागो वदनं अस(श) इत्यनर्थान्तरम् । यावता ॥ खस्वरसंयोगः । एतावता अंसे (शे)नोत्तरत्वं भजन्तो मुख्यतश्चाधरा एव । तस्मात् स्वर आदेशत्रयविभापि०३०, पा० १गेन भवति । लघुस्वराः, इस्वाः, उत्तराश्चेति । शेपा दु(दीर्घा:, गुरु(र)का, अपराश्चेति । एवं विभागोचरम् ॥ ४४ ॥ जो उत्तरेण अहरो, अभिहणंतो ठ(य) उत्तरो होइ । अहरेण उत्तरो वा, बलावलं उत्तरं एयं ॥ ४५ ॥ य उत्तरेणापरः अभिवतः। उत्तरस्यायलीयस्त्वात् । सद्यया-'सफ' । अत्र सफारः आलिं- गिवा, फसा(का)रस्सालिंगितस्यात् । एका संख्या इसति । इसी(सि)तेफसंख्या(ख्य)श्व, सका- (ः) फे(फ)कारो भवति । प्रतिपन्नश्चोत्तरभावं सकारो(रः,) अयलत्वात् । []या अघरेणामि- हन्यमान उत्तरोत्तरो भवति । यथा-'घ' । अत्र पकारोऽभिभूमिकः । गकारस्य संख्या- प... पमपनयन्ति(ति) । (त्रि)संख्यत्वादि] गकारस । इसिते व संख्याद्रये ॥ पपरवान् । गकारः फरारत्वमापा इति । एवमन्यत्रापि बलापलिनोत्तरं परमम् ॥ ४५ ॥ 15 25 - जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गायीं ॥ साम्प्रतमनभिघातोत्तरमुच्यते- पढमस(स्स)रसंजुत्ता, अणभिया जे तु ते अणभिया । उत्तरमधरं वेति य, संजोएणेव दो चरिमा ॥ ४६ ॥ प्रथमस्वरसंयुक्ताः । कः प्रथमस्वरः ? अकारा । तेन अकारेण संयुक्ताः । के ते १ ध्वक्षरा: अनभिहता भण्यन्ते । 'क ग च ज ट ट प द प य य ल श सा' इत्येते अनभि- हवा(तसंज्ञाः । शेषवर्गास्त्वभिहतसज्ञा इति प्रतिपक्षत्वाल()भ्यन्ते । एतदनमिहतोत्तर उत्तप. ११,पा. १]रेण चरिमेण बिन्दुना युत्तोऽक्षर उत्तरत्व प्रजति । अपरेण विसर्जनीयेन युक्तोऽक्षरः अधरत्वं प्रजतीत्यर्थः। एवं पष्ठो भेदस्ततोऽयम् । उत्तरा उक्ताः । उत्तरोत्तराचोक्ताः। उत्तरप्रतिपक्षेणाघरा [अ]प्युक्ताः । उत्तरोत्तरप्रतिपक्षेणाधराधयः प्रोताः । इत्येवं अष्टप्रकारमुक्त- "राघरव्याख्यानम् ॥ ४६॥ एवं सरुत्तरादिसु, बलाबलं सबओ पलोएउं । चिन्तादीए भावे, जीवाइ व(वि)णिदिसे मइमं ॥ ४७ ॥ तस्वस्वरो ह्रस्वासर(१) घलावलं सर्वतो विलोक्य चिन्ता-नष्ट-मुष्टि-जीव-धातु-मूलयोनि वा विलोक्य घलाधिक्येनारे(रा)णामादिशेन्मतिमान् ॥ ४७ ।। जीवं जाणसु दोसुत्तरेसु [५० ३१, पा. २] अहरेसु दोसु भण धाओ(3)। अहरुत्तरेसु मूलं, उत्तरमधरे तहा धाउं ॥४८॥ जीव जानीहि । प्रश्नावराणामादौ पतिते उत्तराक्षरद्वये जीवं, प्रभाक्षराणां आदी पतिते अधराक्षरद्वये धातुं, प्रभाक्षराणा आदौ पतिले अघरे द्वितीये पोत्तरेऽनन्तरं पतिते मूलमव. गच्छ । ५० ३३, पा. १] प्रभाक्षराणा मा]दी यदा उत्सरो दृश्यते ततोऽनन्तरं श्वा(चा)घरा। ॥ तदाऽपि धातुमेपागच्छ ॥४८॥ ॥ इत्येवं उत्तराधरं प्रकरणं समाप्तम् ॥ 5 दुविहो खलु अभिघाओ, सहगओ चेव अक्खरा(र)गेओ य । सदगओ तिविगप्पो, मंदो मझो य तिबो य ॥'४९ ॥ द्विविधोऽभिपातः शब्दगतोऽक्षरगतश्च । तत्र शाप४११, पा. दगती अनक्षरात्मको ऽनेकप्रकारः पदह-स(शीख-भेरी-कुड्यपतन-मुद्गर-जालाभिघातादिलक्षणः । स ऐ(त्रि)विकल्पः (खोल्पो मध्यमौ महाचैते(हांश्चेति ) । क्रमसः(शः) आलिंगिदाभिधूमितदग्धलक्षणः । अझ- []गतमभिघातमुपरिष्टाद् वक्ष्यति ॥ ४९ ॥ एकेको पुण दुविहो, होइ पसत्यो य अप्पसत्यो य । [अ]पसत्थो भंदादी, कुबइ आलिंगियादीणि ॥ ५० ॥ स शब्दों द्विविधा-प्रशला(स्तोs)प्रशस्तश्च । धीमा-वैणु-सं(शीख-भेरी-पटहादिगता प्रस्तापिपत[न-भाण्डाविमङ्ग-रासमादिशग्दाप्रशतायः शमोऽल्प आलिहिता मा. " , । - मनमिला अमिहता वा ये प्रमाक्षराः । अथवा प्रयम-तृतीयो वैयमिड्ससंहो। नसंसाः। एते अन्तरदीपा(प)स्वरयुक्ताः । के ते अन्तरदीर्घसराः। आकारा, भारप्रति एते प्रयः। एतैरन्तरदीर्घस्य। संयुका अमिधूम्पन्ने [५.१५.1Jmamaरमवासितः । फे वे उध्वक्षरा फिगजटासदपपयशसा' नेपकारण ईकारेण अकारेण च संयुका अमतो याऽनन्तरमपसिनहन्ते गुवा(प)- [गावां ५१-५३1 प्रभव्याकरणाख्य १६ सो वाऽप्रशस्तो चेति । मध्यमो यः शब्दो {५० ३३, पा. १] भिधूमितसंज्ञः प्रशला, अप्रशस्तो पा। एवं प्रशता, अप्रशस्तो या यः पशब्दस्तीः स दग्धसंज्ञः । प्रशस्तो यः शब्दोऽल्पः सोऽल्प- फलं ददाति, विरं च करोति । प्रशस्तो यः शब्दो मध्यमः स मध्यमफलं ददाति, मध्यमं वैये करोति । प्रशस्तो या शब्दसीनः स महत् फलं करोति, स्थैयं च तस्याल्पकालमिति । अप्रशस्त यः शब्दोऽल्पः सोऽल्पमान्यं करोति, स्पैयं च तस्य मान्यं करोति ।अप्रशस्तो यः शब्दो मध्यमः । स मध्यममान्धं करोति, मध्यमं च स्थैर्य मान्धस्स करोति । अप्रशस्तो यः शब्दः तीन स महामान्य करोति, अवस्वानं च ताप० ३३, पा• २]स्य मान्यस्याल्पफालमित्येतदपि शुभाशुभमल्प- मण्यम-महत्त्वेन द्रव्यम् । एवं शब्दाभिघातः ॥ ५० ॥ अक्षराभिघातार्य:- वि-चउत्थ-पंचमाणं, वग्गाणं अक्खरा अभिहणंति । एक्कुत्तरिया य सरा, अणमिहया सेसया चग्गा ॥ ५१ ।। द्वितीय चतुर्प-पचमवगैः प्रथम-तृतीयौ वर्गावभिन्यों प० ३४, पाते । एकान्तरिवा- ल(म) AnD] के भंण्यन्ते ? इत्यत्रोच्यते - यद्यप्येकान्वरिता यहवः, तथापि 'आई' कारब एते त्रय एकान्तरिता[:] प्रथम-तृतीयौ वर्गा[प]भिनन्ति । प्रथम-तृतीयपर्गा स्वस्वराध पत्यार एते परस्परं नामिनन्ति ।। ५१॥ अणमिहया अनि(न्याभिहया वा, पिल्लिजंता उऑभिधा[प०१४, पा० १Jतीहि । आलिंगियाभिधूमितद(ड) व लहंति ते नामं ॥ ५२ ॥ अनमिहता वर्गा उका अभिहताश्चे एते अनमिहता पा के ते प्रभाक्षरा[:] १ तेषां प्रभा- राणां स्थापितानां किमपि पोतोऽस्ति नास्ति च इति चिन्त्यम् । यदा प्रभाक्षराणां परस्परामि- पात सध्यते सदा प्रियमाक्षरद्वितीयाक्षरनि(स्तु)तीयामरममिहन्ति । सृतीयाक्षरं चतुर्याक्षरं " अभिहन्ति । एवं चतुर्याक्षरं पञ्चमाक्षरं, पञ्चमं पटा, पष्ठं सप्तमः, सप्तमोऽमिहन्त्यभिधाते सति । दो यरूपानन्तरं स वमिति । अभिपातस्यालिनिवाभिधूमि]तदग्धलक्षणमुपरिप० ३५, पाटाद् पसरेम व्यास्यास्पति । यदा प्रभाक्षराः स परस्परमभिहताः, तदा अप्रधाना निफ(क)लास्य() पाहवारन् स्वरामियाता उच्यन्ते- अणवि(मि)ह[य] अभिहया वा, अंतरदीहस(स)रेहि संजुत्ता । अभिघूम(मि)यति लहुया, दहति गरुया वितेचेव ॥ ५३ ॥ U पानीति ॥५२॥ --- प्रधापो तपते ।

, 11 १४ जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ५४-५७ भराः । के ते गुर्वा(क)क्षराः ? 'स छ ठ थ फर पा' इत्येते सप्त । आफारेण ईकारेण ऊकारेण च [५.३६,पा. १] संयुक्ता अप्रतो वाऽनन्तरमवस्थितैदेखते(न्ते) परेण । गुवा(ब)क्ष)राः के ते ? घझ ढघ भवहा' इत्येते सप्त ॥ ५३॥ आलिंगियन्ति हस्सस(स्स)रा हु दीहस्सरा रि(इ)ह दहति । पण्हक्खरा उ सबे, संजुत्ता आणुपुबीए ॥ ५४ ॥ आलिंग्यन्ते हस्वस्वराः। फे ते हस्वस्वराः 'अ इ उ एते चत्वारः । के ते आलि- अपते(न्ते) 'ख छ उथ [प०३६, पा० २] फरपाः, घझ द ध भ वहा' श्वेत्येते द्वितीय-चतुर्थवर्गा- क्षराः सप्त । 'घझड(ढ)घ भ व हा'श्चतुर्थवर्गाक्षरा दह्यन्ते चतुर्भिः स्वरैः । के ते चत्वारः 'ओ औ अं अः । एवं संयुक्ताः आनुपूर्या आलिंजयन्ते, अभिधूम्यन्ते, दह्यन्ते च ॥ ५४ ।। अमुमेवार्थ गाथान्तरेण प्रतिपादयन्नाह - अंतरदोहा अमिधूमियंति आलिंग(गि)यंति जे हस्सा । टिट्ट(दिड)दो चरिमसरा, अ(सोहावदीहाणुणासीया ॥ ५५ ॥ अन्तरदीर्घ्य(C) उक्ता 'आई' एतेऽभिधूमितसंज्ञा[] । हस्या उक्ता 'अइएर' एते आलिङ्गितसंज्ञाः । [ऐऔ] द्वौ स्वरौ परिमसंज्ञौ वा अ(आ)नयो तो दहतः । [५० ३७, पा..] समावदीर्घाः 'ऊऐ औ' अनुनासिका घणन माः' इत्येते ॥ ५५ ॥ स्वरास्तृ(खि)धा निरूप्यान्यगाथा(थ)या फलमुच्यते- आलिंगिया य आलिंगियंति अभिधूमिया य धूमेति । दट्ठा(डा) य दहति सरा, तेसिं जुत्तं च वरिपं(म)च ॥ ५६ ।। आलिंगितसंज्ञाः, के ते 'अइए ओ' एतैश्चतुर्भिः स्वः ये आलिंग्यन्ते । द्वितीय-चतुर्थ- " बागीशराः नक्का एव । अभिघूमितसंज्ञानय 'आई' एतैरभिधूभ्यन्ते । प्रथम-तृतीयवर्गाक्षरा- स्तेऽयुक्ताः । एवं दग्धसंज्ञा 'उजअं अः एते प्रथम-तृतीयवर्ग दहन्ति । एतदप्युक्तम् । 'ओ ओ अं अः एते चत्वारस्तैः स्वरैः संयुक्तस्वराः[५० ३७, मा० २] प्रथम-तृतीय-चतुर्यवर्गाक्षरा दहन्ति । इत्येतदुकमपि पुनरुक्तम् । ऐऔ' एतौ द्वौ खरौ प्रथम-तृतीय-पञ्चमवर्गा दहन्ति । इत्येतदप्यु- तम् । एतैर्दहनारमः संयुक्तोऽक्षरस्तं दहन्ति पूर्वाक्षरं वानन्तरमिति संयोगभावे सति ॥५६॥ एवं स्वराभिपात उक्तः । इदानी वर्गाभिघात:- बीओ य पढम-तइयं, पढम-तइया य जायदो(जे य दु.) चउत्थं । आलिंगियंति वग्गं, चउत्थ पुण पंचमं वग्गं ॥ ५७ ॥ [५०३८. पा..] द्वितीयो प्रथमवर्ग तृतीयं चालिङ्गयति । तथा प्रथमवर्गस्तृतीयवर्गश्च द्वितीयवर्ग- मालिनयनाति)। तथा प्रथमवर्गस्तृतीयवर्गश्चतुर्थवर्गमालिङ्गयति । तदुक्तम्-प्रथम-तृतीयों दोविय * द्वितीयद्वयचतुर्य []ति । चतुर्थवर्गः पञ्चममालिनयति । अत्र प्रथमवर्गः पृथिव्यात्मकः। द्वितीयो याणा(प्वां)त्मकः । तृतीय उदकात्मकः । चतुर्थ आकासा(शात्मकः । पञ्चमः अन्यात्मकः । इसेवं पञ्चमहाप.३८,पा.२]भूतात्मकं जगदि[ति] ॥ ५७ ॥ .. । । 3 7 १५ 1 [गाथा ५८-६३] प्रभव्याकरणाल्य अभिधूमेइ चउत्थो, आइमवग्गे उ तिणि नियमेणं । पंचम-चउत्थवग्गे, दोण्णि य अभिधूमये बितिओ ॥ ५८ ॥ अभिधूमयति चतुर्थो वर्गः प्रथमवर्ग(ग) तृ(द्वितीयवर्ग तृयतीवर्ग च । द्वितीयवर्गश्चतु- पंवर्ग पञ्चमवर्गचे(ग )ति ॥ ५८ ॥ आइल्ला चत्वारि वि, डझंति पंचमेण वग्गेण । पंचमओ पुण डझइ, पढम-तइजेसु दोसुं पि ॥ ५९ ॥ प्रथम-द्वितीय-[तुतीय] चतुर्यवर्गा दान्ते पञ्चमवर्गेण अन्यात्मकत्वात् । पञ्चमवर्गस्तु दहाते विनास्य(श्य)ते प्रथम-गृतीयों (यैः) पृथिव्यो(व्यु)दकात्मकैः ॥ ५९॥ जे जे समाभिलावा, अण्णोप- ३९, पा. १]ण्णं ते उणं अभिहणवेति)ति। जह क ग च ज मादीया, दो दो लहुआ सुआ अण्णा ॥६० ॥ जे जे(ये ये) समानसी(शी)ला लपवश्च मायेने(१) लघवः अन्योन्याना(ना)मिनन्ति । के वे समानसी(शी)लाः, ते उच्यन्ते-'कग च ज टडत द प य ल स (श) सा' इत्येते । प्रथम- वर्ग(स्तु)तीयवर्गश्च लघुसंज्ञौ । अनयोरासनो(नौ) द्वितीय-चतुर्थवर्गौ गुरुसंज्ञौ भवतः । पर- परामिघातको चेति ॥६०॥ अभिहणमाणे दिवो(?), जोणीसंठाणवण्णमाईणि । अभिहणमाणस्स ऊ (1) भवे, ण जो उ अभिहण्णए तस्स ॥ ११ ॥ अमिहन्यमाने दृष्टे । कोऽभिहण्यन्ते(न्यते) । दो(यो)भिप. ३९, पा०२हन्तीत्युक्तमपि पुनरू- च्यते-पूर्व (पं)पूर्वाक्षरोऽप्रिमेणात्क(क्षोरेण यादृशेन यादश इति । पूर्वोक्तं योऽमिहन्ति तस्याभियं- तु(हन्तुः) योनि-स्थान-वर्णप्रमाणादीनि वक्तव्यानीति । कस्मात्कारणादित्युच्यते--येन सर्योऽमि. हन्ति पलीयानीति (पलवान् इति?) ॥ ६१ ॥ परवग्गेण उ वग्गो, जो जेण अमिहण्णए उ तो तस्स । अभिघ(घा)यं जाणेज्जा, राजादिसंथ(घ)वणा(ग्णा)णं ।। ६२ ।। परवर्गेण वर्गो यो येनाभिहन्यत इति । परवर्गस इत्यक्षरस्य संज्ञा । एतत्तु प्र(घ)पक- (क)व सा(शा)त् । पराक्षरेण(१) योक्षरोऽभिहन्यन्ते (त) तस्याभिहन्याप०४०,पा०1]मानस्स पराजओ(यो) वक्तव्यः । अभिह (न्तु)जयो वक्तव्यः । एवं माझणादिवर्णानां राजन्यस वा युद्धे विवादे मा जय(य:)पराजयो याच्य इति । आलिङ्ग(नि)ते भागहानिः । अमिधूमित-अभिपाते द्वै हानिः क्षयो वा । दग्धे निशे(शे)पतप्रक्षयो मृत्युर्या ॥ ६२ ॥ आलिंगियंमि जीवं, मूलं अभिधूमियंमि पण्हंमि । द8(डोमि भणसु धाउं, एत्तो उड़ जहा वोच्छं ॥ ६३ ॥ प्रशस्तापशवाय ये शन्दा[:] पटइफुट्यपतनादिगवासे पूर्वोता [.,पा-१ २]आलिंगि- वाभिनितदप्पलक्षणाः। तत्रालिहिते शन्दे [जीय आवेश्यः । अभिभूमिते शन्दे] भूटमादे- पम् । दमे पादे पातुरादेस (श्यः) । तमाम पूर्ये (ई) 'पपेवि मत्पमाग भम् ॥६॥ 21 , 15 " १६ जयपाहुनाम निमित्तशालम् । [गाथा ६४-६८ आलिंगियंमि कलहो, मंदं अभिधूमियंमि पण्हंमि । दटुंमि भणसु सरणं, एतो उद्धं जहा वोच्छं ॥६॥ अस्मिन(१)पि प्रशस्ताप्रशस्तशब्दत एवानक्षररूपो ध्यनिरधिकृत्या(यो)पदिष्टम् ।। ६४ ॥ । अभिघातप्रकरणं समाप्तम् ॥ . " , वग्गाणं जइ पढमा, पिरंतरं वा तिहि पण्हमाइए । तो सुण्णं जाणेज्जा, []वि किंचि वि चितियं तथे(त्थ) ॥ ५ ॥ वर्गाणा यदि [प०४१,पा..] प्रथमा इनि प्रथममहणेन न(ख)राणां प्रथमः अकारः, 'क' वर्गस्य च प्रथमः फकारः, 'च' वर्गस्य च प्रथमच()कारः। एते त्रयो यदा निरन्तर प्रभादी दृश्यन्ते तदा सू(१)न्य जानीयात् । न किलिपि चिन्तितं तत्रेति । तया मण्डुक्किायाम् ॥६५॥ अभियविदुषिसम्गे, चिंता मुट्ठी य सुन्निया होइ । वग्गेकबहुलवण्णो, तत्थ ण कजं मुणेयवा(छ) ।। ६६ ॥ अ(य)त्र प्रभाक्षरा आरम्मादेव बिन्दुविसर्गाधभिहताः। तत्र चिन्तायां मुष्टी प ()म्यम्। वथा एकवर्गीया नैरंतर्येण बहवो वर्णास्त्रत्रापि न कार्य सू(शू)न्यमित्यर्थः ।। ६६ ॥ मीसेसु [५०४१, पा- २] अस्थि चिंता, आधाराधेयमिस्सय[ति] दुविहा । धम्माधम्मागासा आहारा तिणि विन्नेया ।। ६७ ॥ प्रभाक्षराणां मध्ये 'अ क पा' यदाऽन्यवर्गे[ग] सहिता दृस्य(श्योन्ते तदाऽस्ति चिन्ता । सा पद्विविधा आधारविपया, आधेयविषया वा । उभयाप.४२,पा. विपयाऽपि सभवा ए(त्रि)विधा भवतीति । आधारा [अक्षराणि, आपि()या मात्रा। अक्षर-मात्राभेदेन द्विविधा चिन्ता धातु- योनी लब्धायाम् । धातुस्त(खि)विधो धाम्यः, अधाम्या, आकाशमिति - एवं केचिद् व्याख्या नयन्ति । देतदुपरिगाथया सांप०४२, पा.है विरुष्यते । तस्मादन्यया व्याख्यायते-आधारस्त- (खि)विध:-धर्माधर्माकाशालयो [s]मूर्चाः । पत्र धर्माधर्मों लोकम्यापिनी । आकाशस्तु लोकालोक- व्यापी । तत्र गतिलक्षणो धर्मास्तिकायो गतिमा जीवानां पुंग(पुत्र)लानां च गत्युपमहे पर्चते । स्थितिलक्षणा:(प.) अपर्मास्तिकायः स्थितिमतां स्थितिहेतुः। अवमा(गा)हलक्षणमाकार्श, अब- गाहिनामवगाहाहेरिदि ऐते प्रयोऽपि अमूर्चा जीव-मूल-घातूनां आपारं, आधेया जीवधातुमूला इति [१.४३,पा..] ॥ ६ ॥ एतंतवद्) एवाह- जीवं धाउं मूलं, आधेयं तत्थ पढमओ जीवो। न(१)इदीसइ सो दुविहो, जीयावयत्रो य जीवो वा ॥ ६ ॥ जीवाः), प्रथम[:], धातुपदार्थो द्विवीच[1], मूलपदार्थस्तृतीयः । एवं (त्रि)मिः पदार्थेपा(मा)सं जगदिति । त्रिविभैर योनिर्भपति । तत्र सावत् प्रथमो जीपदाप सप विविधो एसयो जीपो [बी]पामयपश्चेति ।। ६८ ।।

१७
S
[गाथा ६९-७५]
प्रभव्याकरणाख्य
जीवे दिटे जीवं, जीवावयवं च तत्थ नायचं ।
पुणरवि उत्तरसहिए, पण्हे जीवं हवे नियमा ॥ ६९ ॥
जीवाक्षरेष्वनभिहतेषु [१०४३, पा० २] जीव इत्यादेश्यम् । तेष्वेवाभिहतेपु जीवावययो
वक्तव्यः । पुनरप्युत्तरखरैरक्षरैर्वा बहुले प्रश्ने जीवेनैव तिसंस(निस्संश)यं भवितव्यम् ॥ ६९ ॥
अहरसहिए उ पयो(ण्हे), जीवं वावयवं नु(? तु) मुणिज्जासु ।
जीवे लदंमि पुणो, दुवय-अपदाहि(इ)पभेदा [य] ॥ ७० ॥
अधराहुतो (अधरसहिते? ) प्रश्ने जीवावयव(व) जानीहि । जीवयोनी लब्धायां द्विपद-
चतुष्पदापदपादसंकुला भेदा वक्ष्यमाणाश्चिन्त्याः ॥ ७० ॥
लोमाणि तया रुहिरं, मेदो मंस-ट्ठि-मज्ज-सुधाइ ।
जीवावयवा [य] पदे, जीवा सिद्धा असिद्धा य ।। ७ ।।
रोमाणि स्वग् रुधिरं मांसं मेदोऽस्थिपि० ४४,पा० १]मजाशुक्राम्य(ज्य)ष्टावेति जीवाव-
यवाः । जीयाः सिद्धा असिद्धाश्च द्विविधा भण्यन्ते ॥७१॥
सिद्धा एगवियप्पा, [अ]सिद्ध संसारिणो चउवियप्पा।
दुपया चउप्पयावि य, अपया पयसंकुला चेव ॥ ७२ ॥
तत्र सिद्धा एकभेदाः संसारविनिर्मुक्ताः।असिद्धाः संसारिणः । ते चतु......[विकल्पा:]|
चतुरो भेदाना(ना)ह-देवगतिः, मनुष्यगतिः, तिर्यग्गतिः, नारकगतिश्चेति । द्विपद-चतुष्पद-
अपदाः[पद] संकुलाश्चेत्यमरचकमेभेधा (श्वेत्यपरचतुर्भेदाः) ॥ ७२ ॥
दुपया माणुस्स(स)देवा, पक्खी तह नारया मुणेयबा ।
मणुया हु चउवियप्पा, णायचा पण्हइत्तेहि ॥ ७३ ॥
द्विपदा मानुप(पा:) देवाः [प० ४४, पा० २] पक्षिणो नारकावेति वक्तव्याः । मनुजाश्चतु- 20
10
18
मैदाः ॥७३॥
तेपामन्यगाथया चतुरो भेदान] वक्ष्यति -
पढमो ह बंभणाणं, बीओ वग्गो य हवइ वेसाणं ।
तइओ [य] खत्तियाणं, सेसा दो होति सुहाणं ।। ७४ ।।
प्रथमो वर्ग: 'कच ट त पयसा (शा)' इति माह्मणाः(नां) ज्ञेया:(यः)। द्वितीयो वर्ग:15
सछठय फर पा' इति भवति वेस्याविश्या)नाम् । तृतीयवर्गा(र्ग:) 'गज डबल सा' क्षत्रिया.
णाम् । चतुर्थो वर्गः 'पझ ढध भयो' [१०४५, पा० १] शूद्राणाम् । हुमण नमा' पञ्चमो
वर्ग[:] श(सं)करजातीनाम् ॥७४।।
दुविहा एते णेया, इत्थी पुरिसा पुणो वि ते विव(तिवि)हा ।
बाला तरुणा थेरा, उत्तम-मझा-धमा तिबिहा ॥७५ ॥

- जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाया ७६-७९] ये एते चतुर्विधा ब्राह्मणादय उक्ताः, तेप्वेय पूर्वोक्तवर्गेषु प्रथमो घर्गस्तृतीयवर्गा(ग)श्च पुमान् शेयः । द्वितीय-चतुर्थवर्गों खीसंज्ञो । पश्चमो वर्गों नपुंसकसंज्ञः । तत्र पुमांस्तु(लि)विधो पाल-तरुण-स्थविर इति । योपि[५० ४५, पा०पि निविधा याला तरुणी स्थविरा चेति । नपुंसक- मिति(मपि) त्रिविधमेव यालं तरुणं स्थविरं चेति । स्त्री-पु-नपुं]सकान्येतानि प्रत्येकं त्रिविघान्युचम- मध्यमाधमत्वेन द्रष्टव्यानि । विवेकमेपां वक्ष(क्ष्य)माणलक्षणगाथया दर्शयिष्यति ॥ ७५ ।। तह चेय कम्ममा(भू)मा, अकम्मभूमा य अंतरदी(ही)या । एदे कमेण सचे, सणामणिदेदि)सउ(ओ) जाण || ७६ ॥. तथा चेक(य) फर्मभूमयः । देवाः प्रथमवर्गाक्षराः, अन्तरदीर्घखरैयुक्ताः । कर्मभूमयो मनुष्या भवन्ति । अन्तरदीर्घस्वराश्च 'आई'। [प.४६, पा.१] एतेऽवय[वा] उका अपि स्फुटाः पुनरु- काः । तृतीयवर्गाक्षराः अन्तरदीर्घस्वरैर्युक्ता अकर्मभूमयो भवन्ति देवाः । एषां कर्मभूमिजानां अकर्मभूमिजानां योनि[:] खभाव[:] चेष्टा च वर्णाकृतिः प्रमाणमिति वक्तव्यानि । अन्तरदी(द्वी)पानां पपंचास(श)तां एफोरूकादीनां प्रपञ्चो नेपा(ऽनेकधा!) । तेषां च स्वनामनिर्देश[त् परिज्ञानं फर्तव्याव्य)मिति ।। ७६ ॥ ॥जीवसमा[स]प्रकरणं समाप्तम् ॥ 5 . 1 1 धातुस्सरा सहस्सा, कगादिवग्गाणुरासिया दुपए । बीओ दसमो य सरो, चउप्पए खाइवग्गो य ॥ ७७ ॥ प्रभे प्रथम प०४६, पा० २]तृतीय-पंचमवाक्षराणिघ(राधि)के प्रथम-तृतीय-पञ्चमवर्गाणा- 'मेवाक्षरा एकस्मिन् उकारेण धातुखरेण हखेन युक्तो(ताः) तेषामेवान्यतमस्यामतो वाऽनन्तरम- पस्थितेन द्विपदजीवचिन्ता विज्ञेया । प्रश्ने द्वितीयवर्गाक्षरबहुले द्वितीय आकारो दशम औकारो(र)स्तयोरन्यतरेण द्वितीयवर्गाक्षरेषु युक्तेपु द्वाभ्यां वा चतुष्पदचिन्ता विज्ञावव्या ७७|| अपयाणं घझदा खलु, पयाकुलयाण(प्लाणं च) धभव हा चउरो। चउरट्ठमबारसमा, [प.४७, प.1] सरा य दोण्हंमि सामण्णा ॥ ७८ ॥ घ झढ बहुले प्रभ ईकारे ऐकारे अकारेण च सविसर्गेण एभिस्त(खि)भिः स्वरैयुक्तेषु । एषां चान्यतमाक्षरस्यानन्तरामकान्तस्वराणामन्यतमोऽप्रतोऽनन्तरमवस्थिते अपदा ज्ञेयाः घभ व हाश्वत्वारः, एतैरेव स्वरैनिभिर्युकाः पूर्वोक्ता(क)न्यायेन पादसंकुलाः प्राणिनो हेया ॥ इति ॥ ७८॥ जइ पढ़म-तइय-पञ्चम-वग्गे पण्हक्खराइ दीसंति । तो दुपय-जीयचिंता, चउप्पयाणं पि [बि]चउत्थे ॥ ७९ ॥ । अन्या ९.४५, २][]पि परिपाट्या उक्तमपि किनिद्विशेषमधिकृत्योच्यते-प्रथमवर्गस्य तृतीयवर्गस्य पञ्चमवर्गस प सम्यन्धिनो यदा प्रभाक्षरा'बाहुल्येन दृश्यन्ते तदा द्विपदजीप- * चिन्ता ज्ञातव्या । द्विचतुर्थवर्गाक्षराणां बाहुल्ये पतुष्पदा क्षेया ॥ ९ ॥ .

९ [गाथा ८०-८५] प्रभव्याकरणाख्य भवणवइ-वाणवंतर-जोइस-वेमाणिया तहा देवा । तेसि दस अट्ट पंच य, व(वा)रस णव पंच य वियप्पा ।। ८० ॥ दश प्रकारा भवनवासिनः, तद्यथा- असुर-नाग-विद्युत्-सुवर्णा-ऽग्नि-बात-स्तनितो-दधि- टीप-विकुमाराः । अष्ट प्रकारा व्यन्तरा:- किंनर-किंपुरुष-प०४८, पा० १]महोरगा(ग)-गान्धर्व- यक्ष-राक्षस-भूत-पिशाचाः । पञ्च भेदा ज्योतिष्काः-सूर्य-चन्द्रमसो-प्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णतारकाच ।। पैमानिका अनेकप्रकाराः-सौधर्मशान-सनत्कुमार-माहेन्द्र-अह्मलोक लान्तक-महाशुक्र-सहस्रार- आणत-प्राणत-आरण-अच्युताद्या द्वादशकल्पोपपन्नकाः । अपरे नववेयका:-अधोमध्यमोपरि- विभागस्था तथाऽनुत्रविमानवासिनः पञ्चप्रकाराः-विजय-वैजयन्त-जयन्ता-पराजिताः सर्वार्थ- सिद्धसंभाः । एते स्वभावनिर्देशको विज्ञातव्याः ॥ ८० ॥ सिद्धाण आदिवग्गो, देवाण होति तिण्णि बग्गाओ(उ) । दो चेव मानुपा(णुसा)णं, [१०४८, पा० २] सेसा तिरियास(ण) वग्गा हु॥१॥ लोकामे व्यवस्थिताः सिद्धा अशेपविमुक्ताश्च अकारयहुले प्रश्ने। [क घट बहुले प्रभे १] वैमानिका देवा देयाः । तपघहुले प्रने मनुष्या ज्ञातव्याः) यश पहले प्रश्ने उत्कृष्टाति(स्ति)र्य- 14 गगवयो ज्ञेयाः ॥ ८१॥ . 21 दुपयक्खरेसु दिखे, सधे दुपयक्खरा मणुस्साणं । जे पुण चउप्पयाणं, ते नियमा होति देवाणं ॥ ८२ ॥ हिपदाक्षाः । के ते? प्रथम-तृतीय-पञ्चमवर्गाक्षराः । एतद्वहुले प्रश्ने मनुष्या दृष्टव्याः । अकर्मभूमिकान्तरद्वीपकाश्च । चतुर्थ[प०४९, पा० १]वर्ता(गी ? याश्चातुष्पदाक्षराः, ते( १) उत्तरस्वरयुक्तैर्भवनपतिव्यन्तरा ज्ञेया इति ।। ८२ ॥ अपदाणं जो गमओ, सो चेव य होंति नारयाणं पि । बहुपायाणं तइओ, सर(सा)वयवो होइ पक्खीणं ॥ ८३॥ अपवाक्षरा घ झ ढ पूर्वोक्ताः । द्विपद-योनौ लब्धायां धनवहा नामत्यवसोय(त्याभि- ध्यक्षको भवति । तदा पक्षमे(क्षिणो?) सत्वा भवन्ति ।। ८३ ।। मणुअक्खरेसु मणुआ, इत्थीए सेसए नायचा । हस्सस्स] रा य णिडा, सेसा लालुक्खा सरा सवे ॥ ८४ ॥ मनुष्याक्षराः प्रागुक्ताः । विशेपोप[५०४१,०२]दर्शनार्य पुनरुपन्यास: 1 प्रभे मनु- जाभरयहुले मनुजा ज्ञेयाः । मSTE? | प्रथम तृतीयवर्गप्रतिवद्धाः । द्वितीयवर्णाक्षर- याटले प्रक्षे खी शातल्या , केसे १ अ६ए एते पञ्च(निग्धाः । एतद्यले प्रभे पुगपा [आदेश्याः। शेषाः दीर्घाः राप्त स्वराः । एतददुले प्रभे लिया(यो) यक्तव्याः ॥ ४ ॥ खरुघ(ध ?) मादिणो य वग्गा, पंच य अणुणासिया भवे लुक्खा। गिद्धा कगादिवग्गा, तत्थ य कच्चं तु सयणगया(?) ॥ ८५ ॥ U " जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ७६-४१] ये एते चतुर्विधा प्राक्षणादय उकाः, तेप्वेव पूर्वोत्तवर्गेपु प्रथमो यर्गस्तृतीयवर्गा(न)ध पुमान ज्ञेयः । द्वितीय-चतुर्थवर्गों स्त्रीसंशो। पञ्चमो वर्गो नपुंसकसंज्ञः । तत्र घुमास्तु(सिविधो पाल-तरुण-स्थविर इति । योपि[प० ४५, पा०पि त्रिविधा वाला तरणी सविरा वेति । नपुंसक- मिति(मपि) निविधमेव यालं तरुणं स्थविरं चेति । स्त्री-पुन]सकान्येतानि प्रत्येकं त्रिविधान्युत्म- मध्यमाधमत्वेन द्रष्टव्यानि । विवेकमेपो वक्ष(क्ष्य)माणलक्षणगायया दर्शयिष्यति ॥ ५ ॥ तह चेय कम्मन्भा(भूमा, अकम्मभूमा य अंतरदी(दी)वा । एदे कमेण सधे, सणामणिदे(द)सउ(ओ) जाण ॥ ६ ॥ तथा चैक(य) कर्मभूमयः । देवाः प्रथमवर्गाझराः, अन्तरदीर्घसारेर्युषाः। कर्मभूमयो मनुष्या भवन्ति । अन्तरदीर्घखराश्च 'आई। [4.४६, या १] एतेऽवय वा] उक्का अपि स्फुटाः पुनरु- काः । तृतीयवर्गाक्षराः अन्वरदीर्घस्वरैर्युका अकर्मभूमयो भवन्ति देवाः । एषां कर्मभूमिज्ञानां अकर्मभूमिजानां योनिहा स्वभाव[:] चेष्टा पवर्णाकृतिः प्रमाणमिति वक्तव्यानि । अन्वरदी (ही)पानां पदपंचास(श)ता एफोरूफादीनां प्रपञ्चो नैषधां(ऽनेका)। तेषां च स्यनामनिर्देशान] परिमान कर्तव्या(ध्यामिति ॥ ७६ ॥ ॥जीवसमा[स]प्रकरणं समाप्तम् ॥ 18 20 धातुस्सरा सहस्सा, कगादिवग्गाणुरासिया दुपए। बीओ दसमो य सरो, चउप्पए खाइवग्गो य ॥ ७७ ।। प्रश्भे प्रथम प०४६, पा• २]तृतीय-पंचमवर्गाक्षराणिध(धि)के मथम-तृतीय-पञ्चमवर्गाणा- मेवाक्षरा एकस्मिन् उकारेण धातुस्वरेण हखेन युक्तो(का) तेषामेवान्यतमस्यामतो पाऽनन्धरम- वस्थितेन द्विपदजीवचिन्ता विज्ञेया । प्रों द्वितीयवर्गाक्षरबटुले द्वितीय आकारो दशम ओकारो(र)स्तयोरम्यतरेण द्वितीयवर्गाक्षरेषु युक्तेषु द्वाभ्यां वा चतुष्पदचिन्ता विज्ञावव्या 110) अपयाणं घझ ढा खलु, पयाकुलयाण(लाणं च) धभव हा चउरो। चउरहमबारसमा, (१०४५.पा.१] सरा य दोहमि सामण्णा ॥ ७ ॥ घ झढ घहुले प्रभे ईकारे ऐकारे अकारेण च सविसर्गेण एभिस्त(वि)भिः स्वरैयुकेषु । एषां धान्यतमाक्षरस्थानन्तराप्रकान्तस्वराणामन्यतमोऽयतोऽनन्तरमवस्थिते अपदा जेयाः । धभपहा श्चत्वारः, एतैरेव स्वनिभिर्युकाः पूर्वोत्ता(कोन्यायेन पादसंकुलाः प्राणिनो रेया इति ॥ ७८॥ जइ पढम-तइय-पश्चम-बग्गे पण्हक्खराइ दीसति । तो दुपय-जीवचिंता, चउप्पयाणं पि बिचउत्थे ॥ ७९ ॥ अन्या१.४७, २] []पि परिपाच्या उक्तमपि किञ्चिद्विशेषमधिकृत्योच्यते-प्रथमवर्गस्य तृतीयवर्गस्य पञ्चमवर्गस्य च सम्बन्धिनो यदा प्रमाक्षरा बाहुल्येन दृश्यन्ते तदा द्विपदजीव- * चिन्ता हातन्या । द्विषतुर्थवर्गाक्षराणां बादल्ये चतुष्पदा झेया[:] ॥ ७९ ॥.

[गाथा ८०-८५] प्रश्नव्याकरणाख्यं भवणवइ-वाणवंतर-जोइस-वेमाणिया तहा देवा । तेसि दस अट्ठ पंच य, व(बा)रस णव पंच य वियप्पा ॥ ८॥ दश प्रकारा भवनवासिनः, तद्यथा-असुर-नाग-विद्युत्-सुवर्णा-ऽग्नि-बात-स्तनितो-दधि- द्वीप-दिकुमाराः । अष्ट प्रकारा व्यन्तरा:- किंनर-किंपुरुपप०४८, पा० १]महोरगा(ग)-गान्धर्व- यक्ष-राक्षस-भूत-पिशाचाः । पञ्च भेदा ज्योतिष्काः-सूर्य-चन्द्रमसो-ग्रह-नक्षत्र-प्रकीर्णतारकाश्च । । वैमानिका अनेकप्रकारा:- सौधर्मेशान-सनत्कुमार-माहेन्द्र-ब्रह्मलोक लान्तक-महाशुक्र-सहस्रार- आणत-प्राणत-आरण-अच्युताद्या द्वादशकल्पोपपन्नकाः । अपरे नवप्रैवेयका:-अधोमध्यमोपरि- विभागस्थाः । तथाऽनुत्तरविमानवासिनः पञ्चप्रकाराः-विजय-वैजयन्त-जयन्ता-पराजिताः सर्वार्थ- सिद्धसंहाः । एते स्वभावनिर्देशवो विज्ञातव्याः॥ ८०॥ सिद्धाण आदिवग्गो, देवाणं होति तिण्णि बग्गाओ(उ)। दो चेव मानुपा(गुसा)णं, प०४८, पा० २] सेसा तिरियास(ण) वग्गा हु॥१॥ लोकामे व्यवस्थिताः सिद्धा अशेपविमुक्ताश्च अकारबहुले प्रश्ने। [क घट बहुले प्रश्ने ? ] वैमानिका देवा ज्ञेयाः । तपबहुले प्रश्ने मनुष्या ज्ञातव्याः । यश बहुले प्रश्ने उत्कृष्टाति(स्ति)र्य- 10 गगतयो शेयाः ।। ८१ ॥ 3 मनुष्या 20 दुपयक्खरेसु दिढे, सधे दुपयक्खरा मणुस्साणं । जे पुण चउप्पयाणं, ते नियमा होति देवाणं ॥ ८२ ॥ . 'द्विपदाक्षराः । के ते? प्रथम-तृतीय-पश्चमवर्गाक्षराः । एतबहुले प्रभे द्रष्टव्याः । अकर्मभूमिकान्तरद्वीपकाश्च । चतुर्थी प० ४९, पा० १]व (गी ?)याश्चातुष्पदाक्षराः, ते(तै: १) उत्तरस्वरयुकैर्भवनपतिव्यन्तरा ज्ञेया इति ।। ८२।। अपदाणं जो गमओ, सो चेव य होति नारयाणं पि । बहुपायाणं तइओ, सर(सा)वयवो होइ पक्खीणं ॥ ८३ ॥ अपदाक्षरा घ झ ढ पूर्वोक्ताः । द्विपद-योनौ लब्धायां धन व हा नामत्यवसोय(१)त्वाभि- म्यञ्जको भवति । तदा पक्षमे (क्षिणो?) सत्त्वा भवन्ति ।। ८३ ॥ मणुअक्षरेसु मणुआ, इत्थीए सेसएसु नायवा । हस्स[स]रा य णिहा, सेसा लालुक्खा सरा सवे ॥ ८४ ॥ मनुष्याक्षराः प्रागुक्ताः । विशेपोपाप०४९, पा०२ दर्शनार्य पुनरुपन्यासः । प्रश्ने भनु- जाक्षरबहुले मनुजा शेयाः । के से मनुजाक्षराः ११ प्रथम-तृतीयवर्गप्रतिबद्धाः । द्वितीयवर्गक्षर- बहुले प्रभे श्री ज्ञातव्या । इस्वखराः, के त ? अइ उ ए एते पञ्च(१)स्निग्धाः । एतद्वहुले प्रश्ने पुरुषा [आदेश्याः । शेषाः दीर्घाः सप्त स्वराः । एतद्हुले प्रश्ने स्त्रिया(यो) वक्तव्याः ॥ ८४ ॥ खख्य(ध ?) मादिणो य वग्गा, पंच य अणुणासिया भवे लुक्खा । पिडा कगादिवग्गा, तत्थ य कजं तु सयणगया(१यं) ॥ ५ ॥ । " O जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । गाथा ८६-९०] द्वितीय-चतुर्थ-पञ्चम-वर्गा एते त्रयो वा रक्सा(रूक्षाः)। प्रथम-तृतीयवर्गौ[क्षिग्धौ] । स्निग्धवर्गाक्षरवहुले प्रश्ने स्व-जनसम्बन्धे कृते कार्य द्रष्टव्यम् । रूक्षाक्षरयहुले प्रश्ने पर-जनसंबन्धे कृतं कार्य द्रष्टव्यम् ॥ ८५ ।। एतदेवाह - परजणकयं [५० ५०, पा० १]च कच्चं, मुणेह सबं लुक्खएसं(क्सरेसु) पि() । मिरसे पमयासहियं, कजं तह [पुत्तभंडकयं ॥ ८६ ॥ रूवाक्षरयहुले प्रभे पर-जननं कार्यम् । स्निग्धरक्षाक्षरयह[ले] प्रश्ने प्रमदासंयोगार्थे भार्या- पुत्रकायं च ज्ञातव्यम् ।। ८६ ॥ पढमक्खरेसु वाला, मज्झेसु य जोवणमि वस॒ता । अतिगएसु अ थेरा, जीवा पण्हेसु णायचा ।। ८७ ॥ प्रथमवर्गाक्षरघहुले प्रश्ने वाला[:], पुमा(मान्) खी नपुंसकं च भवति । तृतीयवर्गाक्षरे- प्यधिकृतेषु दृष्टेषु एतान्येव स्त्री-पुं-नपुंसकानि सयौवनान्यादेस्या(श्या)नि । पञ्चमवर्गाक्षरा(३)प्व. धिकृतेषु दृष्टेपु व(१)द्धानि द्रष्टव्यानि । द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षराधिके दृष्टे एतान्येव मध्यमवयान्या- देश्यानि ॥ ८७ ॥ सामा कण्हस्सामा, गोरी णीला य रत्तसामाचेव(भा य?)। एवं पंच [५. ५०, पा०३] नि बग्गा, कमसो पाहमि य विभत्ता ॥ ८८ ॥ प्रथमवर्गः स्या(श्या)मः। द्वितीयो वर्ग: कृष्णश्यामः । तृतीयो ध! गौरः । चतुर्थी वर्ग(गों) नीलः । पञ्चमो रक्तश्यामः । एवं पश्चाप्येते वर्गाः क्रमस(शः) प्रविभक्ताः । एति]पा मध्ये येषां [वर्णानां ] बाहुल्यं भवति तैः वर्ण:(ण)निर्देश्य(शः) कार्यः ॥ ८८॥ जारिसय(य) परपक्वं, संजुवा तारिसा तहिं सामा । हीणा समाजहिया वा, सेसा परपक्खसंजुत्ता ॥ ८९ ॥ यादृशः परपक्षः। कोऽसौ परपक्ष ? इत्यभिहन्ता भण्य[ते । तस्याभिहन्तुः यादृशा रूकस्या(क्षश्या)माद(५०५१, पा० १]यो वर्णा येऽभिहताः] तादृश्या(शा)ले ज्ञेयाः । हीना(नाः) समा [अ]धिक्य(का) या ते वर्णास्तु(खि)विधाः । तत्र हीना आलिगिताः, समा अभिघूमिताः, अधिका दुग्धाः । परपक्षमहणेन च पूर्वाभिहता आलिंगिता [भिधूमिता दुग्धाः ॥ ८९ ॥ ॥ मनुप्पप्रफरणं समपञ्चं समासम् ॥ 11 - 11 पक्खी दिढे सत्तमसरे य वग्गे य पढमए जलया । दसमसरे य कवग्गे, थलया पखी(क्खी) हु णायचा ॥ ९०॥ सप्तमस्वरः एकारः। प्रथमवर्गो अकार(र.), तस्यामधि(स्याधिक्ये )के प्रभे जीवयोनी प्रामधे(लब्धे) जलप.५१,पा- २]ज: पक्षी ज्ञेयः। दशमस्वर औकारः कवर्गप्रहणेन ककार: " फेवल इच्यते । औकारे फकारस्योपरिगतोऽमतोवाऽनन्तरमपस्थिते जीवयोनी लम्धायां अलजाः पक्षिणो क्षेयाः ॥ ९०॥ prong प्रभव्याकरणाख्यं [गाथा ९१-९५] नवमसरे वगंमि, तइऍ पक्खिणो तहा जलया। थलया बारस अट्ठम, सरे चउत्थे टवगंमि ।। ९१ ॥ नवमस्वर उ(ओ)कारस्तृतीयवर्गचकारस्योपरिगतोऽप्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते जल जाः पक्षिणो ज्ञेयाः। द्वादशमस्वरः अकारः सविसर्गः, अष्टमस्वरः ऐकारश्चतुर्थवर्ग: टफारः । टकारेण च स्थलजा• पक्षिणो ज्ञेयाः पूर्वोक्तन्यायेनेति ॥ ९१ ॥ अणुणा५० ५२, पा० २)सिएसु पंचसु, तीसु य धाउस्सरेसु णायबा । पक्खीओ कुकिआ खलु, वायसगिद्धा य चडया य ॥ ९२ ॥ मणनम बहुले प्रश्ने एपामन्यतमे धातुस्वरात्रयोऽन्यतमयुक्त जीवयोनौ लब्धे पक्षिणो ग(हि)ता[:] भा(चा सादयश्वटका गृध्रा वायसाश्च ज्ञेयाः। धातुखराः के उजअं इत्येते त्रयः।।१२।। ॥ सप्रपञ्च पक्षिप्रकरणं समाप्तम् ।। 15 सं(सिं)गी कचाइवग्गे, गजा[इवग्गे चउप्पया ख(खु)रिणो । दुस्स[र]सरा हु सवे, सिंगीखुरीण तु सामण्णा ॥ ९३ ॥ फकारस्य चकारस्योपरिमतो(गते)न चतुर्णा इस्वस्वराणामन्यतमेन तयोरेप ककार-चकार- योरमतोवाऽवस्थितेन, ना [प०५३, पा० १] नराः] गिणश्चतुष्पदा शेयाः । के ते इस्वस्वराः अइउए । अधरस्वरेण ऐकारेण औकारेण च युक्तस्य ककारस्य च व(च?)फारस्य या तवो (तो)- पांच स्थितयोः एकारीकारयो आरण्याः शृंगिणो ज्ञेयाः । गकारस्य जकारस्योपरिगतो हखस्वरा- सामन्यतमेग(न) तयोरेव गकार-जकारयोरम(प्र)तो वाऽयस्थिते खुरिणच(श्च)तुष्पदा शेयाः। गकारे जकारे वा अपरखरसयुक्ते खुरिणश्चतुष्पदा ज्ञेयाः । गाथयाऽनुक्तमप्येतद्] व्याख्यातम् ॥९॥ वितिउ(ओ) दसमो य सरो, खछादिवगंमि चेव दंतीओ। अणुणासिएम पंचसु, पहिणो धातुस्सरेसुं च ॥ ९४ ॥ द्वितीय [५० ५३, पा० २] आकार:, अ(औ)कारो दशमः, खकार-ठ(छ)कारस्योपरि गतस्त- योरेष स-छयोरमतो वा व्यवस्थिते आकारे औफारे वा दन्तिनो ज्ञेयाः । उमण न मे सु(पु) पञ्चसु पातुखरयुक्तेषु सबनमा ना वाऽप्रतोऽनन्तरमवस्थितेषु नसिन्नो(नो) ज्ञेयाः । धातु- स्वराः उऊ !!९४ ॥ घ झढे सु होइ दाढी, दंती तह वस(ध न) व हे मु णायचा चउरहमबारसमस(स्स)रो य दोण्हं पि सामन्ना ॥ ९५ ॥ घसढा नासुपरिगते इ(ई)कारे (५०५४,पा० १] ण(ऐ)कारे सविसर्गे च(अ)कारे घझ ढा ना मस्थितेषु वा ईकापदिषु दहि(ष्ट्रि)ण: सूकरादयो द्रष्टव्याः। धनय हा नामुपरिगते तिसरेव समि(मास्वरैरप्रतो या व्यवस्थितर्दन्तिनो द्रष्टव्याः । के त्रयः खरा: १ ई ऐः ॥ ९५ ॥ 26 25 २२ जयपाहटनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ९६-१००] दिहे चउप्पयंमि य, पण्हे जय दीसए उवरि मचा । तो सिंगिणो ह मणिया, खुरिणो अह मत्तया होति ॥ ९६ ॥ गोर्विकारः क्षीरदध्यादिक: जीवावयव एव गाथया अनुषोऽपि द्रष्टव्यः ।[प० ५४,पा. २] यंगिषु सिद्धेषु अराक्षराभिव्यक्षको न(त) द्विकारो शेयः । चतुष्पदयोनी लच्चे यदोपरिमापायाहुल्य दृश्यते तदा रंगिणो शेयाः । तस्मिन्नेव चतुष्पदयोनी लब्धे यदा अधोमात्राबाहुल्यं दृश्यते सदा खुरिणो शेयाः । तस्मिन्नेव चतुष्पदयोनौ लन्धे उकारबाहुल्यं खुरिणो ज्ञेयाः । (औ?)कार:- कारयोस्तुल्ययोउ(रु)परिगतस्य साम(सर्प?)योनिः । उ(ओ)कारश्चो(स्यो)परिस्थितस्य नसिनो(नो) शेया। [प० ५५.पा. १] सत्रोत्तरेणाधरेण दृष्टेनोत्तमं नखिनं खुरिण या लक्षयेत् । अधरेणावसं- (धर्म)नसिन खुरिणं वा लक्षयेत् ॥ ९६ ॥ ॥ चतुष्पदपकरणं समाप्तम् ॥ । 10 , सिंगिससा(मा ?) किण्हादी, हचि(दन्ति)समा राइला(नायरा) मुणेया । सेसा तिणि वि वग्गा, वणंतरियाण सप्पाणं ॥ ९७ ॥ सेषु शंगिणोऽभिहतास्तेष्वेवाकृष्णपोरा द्रष्टव्याः । उत्तरखरैन गराः, अपरखरैरारण्याः । येपु पन्तिनोऽभिहतास्तेष्वेव गियष्ट(?) द्रष्टव्याः। शेषा तोवकारेणा()[५.५५, पा. २यपि(अव)- ॥ शिष्टानां भवहानो बाहुल्ये वर्णान्तरिको(का.) चिनकादयः सो द्रष्टन्याः ।.........उपायां अपदेषु घ लब्धेषु, पर्यविशिष्टो वाच्य इति ।। ९७ ॥ ॥जीवचिन्ता समासा ॥ " अघ तत्थ धाउचिंता, सा दुविहा होइ आणुपुबीए । धम्मा[5]घम्मा [य] तहा, धम्म(म्मा) लोहं अलोहं च ॥ ९८ ॥ धातुचिन्ता द्विविधा भवत्यानुपूर्ध्या धास्या [अधाम्या च । नन्न धाम्या लोहलक्षणा, अधाम्या मुक्कामवालादिलक्षणा ॥ ९८॥ कंचणरययं तमं, तउ सीसं आर कंस लोहं च । लोहं अट्ठवियप्पं, प्प(प)धाण तह अप(प्पाहाणं च ॥ ९९ ॥ काननं, रजतानां (रजत), [१.५६, पा• 1] तानं, पु, सीसक-वर्ग, आर-(प्र)स रीरिका वृत्तं लोई वा, कंसं कृष्णलोहानि(हमि)त्यष्टभेदम् । उत्तरा क्षर] बहुले प्रभे लोहमुत्तमं सुवर्णादि शेयम् । अह(घ)राक्षरपटुले प्रभे लोहमघमंत्रपु-सीसफ-कृष्णलोहादि ।। ९९ ॥ इट्टा य मट्टिया सकरा य घम्मा इमे य लोहा य । रयणा य पत्थरा पुढवि मट्टिया चेव णो धम्मा ॥ १० ॥ , एले भेरामरन्ति । म्पास्यामि मृत्तिकाभेदमिति वश्यमाणोपन्यासः ॥१०५.1 पावागजातिसामान्यादेका पापाणजातिः। सा द्विभेदा भवति । प्रधाना अप्रधानाच (स)पलंमा कार्य: खनागनि। परिकर्मिता[2] कमटिता।देशतश्च विज्ञातन्याअवंत्याचा भारता[:] क्षेत्राः । ब्रोगमुगाके यत्रागम्य यानपात्रान(ण्योवतिष्ठते(न्ते) ते ऐक्षा ब्रोणमुखसंशाकराः (ERGEL)सेटका, के १ उपप्रदेशबहुले भूभागे यो निवसते जनपदः स खेटफसंज्ञः। भिष्याः [गाथा १०१-१०५] प्रभव्याकरणाख्य इष्टका स्थूरकर्परा, [मृत्तिका], स(श)राश्च धाम्याः । त्रीण्येतान्यपि । लोहामि(नि)। रजाति (नि) पाषाणा[:], पृथीवि(वी), मृत्तिका चाधाम्या धातपश्चत्वारः ॥ १०॥ रयणा य इदनीला, मरगय तह वेरुलीयजाजी(ती)या । अयकंत-सूरकंता, [प०५६,पा०२] चंदकंता य नायवा ॥ १०१ ॥ इन्द्रनील महानील-भरक्त-वैडूर्याः, अयस्कन्ताः, सूर्यकान्ताः, पन्द्रकान्ता च(श्च) रन । विशेषा शेयाः ॥ १०१ ॥ मोचिय-पवालमाई, भवंति एवंविहा तिहा] अन्ने । ते स्सा(सा)रा णिस्सार(रा), य होति पुण संखमादीया ॥ १०२ ॥ मौक्तिक-प्रवालाः । एवंविधा[:] तथाऽन्ये सद्यादतियो (पि शंखादयो) विमलकारांदय[] से सारा असार(ग)च । तत्रोत्तराक्षरबहुले प्रश्भ धातुयोनी लब्धे ससारा मुक्ता-प्रवालादयो । आया। अधराक्षरवहुले प्रश्ने निःसारा विमल-संख(शको-मु(शुक्ति-कपर्दकप्रभृतयः ।। १०२॥ सीय-दहाय[स]मुदा(हा),णदीतडागा (५०५७,पा० १]तहेव पम्मध(स्सव)गा। एक ते दुविहं, थिरं चलं चेय नायचं ॥ १०३ ॥ सीतजला(? शीतहदा)नि समुद्रा नदी तटाकानि प्रम(न)वणमेककम् । तेषां द्विविधं- थिर घले घेति । तत्र स्थिरमवहमशोश() चोत्तराक्षरैः द्रष्टव्यम् । यद्वा वहति शुष्यति च तञ्चल-15 मघरामरैर्द्रष्टव्यम्। नामाक्षरलावे(प)न वस्तु-विचार-स्थानं सन्निघेसा(वैशा)दि ज्ञेयम् ॥ १०३॥ उण्हंगारा तह मोमुणा(मुन्मुरा) य अण्णा य एवमाईया । उक्का विजा(जू) अव(स)णी णिग्याउ(ओ) सूरकताउ ॥ १० ॥ उष्णावोगाराच मुमु(रग्रहणेन कुकूलगुच्यते । एतौ च धाम्यधातुसंज्ञौ वाक्या- चरैकौल प० ५७, १०२ व्यौ । उल्का विशुदशाति(नः) निर्धातः सूर्यकान्तं पश्चैते अधाम्यधाम् ।। एसा(गा?) पत्थरजी(जाई), से(सा) सवियप्पा पधाण अप्प(पोहाणा। सा परिकमि(म्मि)[य अपरा, णाअध(i) जं जहिं कमइ ॥ १०५ ॥ (9) । वन उच्चराक्षर (1) परिकममता पाषाणभति(जाति)टच्या । प्रधानाच (च) : अपराशरैः अपरिकर्म(मि)तपापाणजाति (ई)टव्या। [१०५८,पा० १] अप्रधाना च यथायोग ब- - सम्हाः । वाम्याक्षरो(र)नामतो ज्ञेयाः ॥ १०४ ।। न १ -- -- , 11 जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १०६-१११ हरियालमब्भपडलं, [५०५८, पा.१] मणसि(स्सिला पारयं च बोधवं । तह घ(चुण्णपारदो वि य, मट्टियभेदा मुणेयवा ॥ १०६ ॥ हरितालम्, अध्रप(ट)लम्, मनःसि(शि)ला, पारय(द), चूर्णपारव(द) । मृत्तिकाभेदाः पञ्च । तम चूर्णपारत(द) इति द्वितीयपादिजाति चूर्णाकारं द्रष्टव्यम् ॥ १०६ ॥ पण्हक्सरेहि एते, णायबा जे जहा समुदि(दि)ट्ठा । अधरोचरक(क)मेण व, सणामनिहो(द)सतो यावि ॥ १०७ ॥ प्रभाक्षररेतेर्यथोचा भेदा विज्ञयाः। यदा(था) एषां प्रधान्य(नताs)प्रधानता उत्तराघर- प्रमेण शेया। यावत्स्वनामनिर्देश इति ॥ १०७ ॥ ख छ ठ थफा घ झ[ढा] वि य, दिढे धाउंमि होइ धम्माओ । अट्ठक्खरा हु एते, सेसमधम्मख(क्ख)रा सबै ॥ १०८ ॥ खछठ थ फा(फ) घ झ ढा नामेपा मष्टानां घाहुल्येन धातुयोनी लब्धार्या धातुद्र()ट- व्य(व्यो) धाम्यः । शेपाच [५० ५९, पा० १] 'रपध भ व हा' इत्येते पडू गृह्यन्ते । ना(ता)न्येव धातुयोनी लब्धार्या एपा पण्णां बाहुल्येन धातुरधाम्य आदेश्य इति ॥ १०८ ॥ पढमेकारवररस रसवारसमसरे य कणयं तु क ख गधेसु च । पंचट्ठमयसरेसुं, पढ़मेऽणुणासिए य तउं ॥ १० ॥ पद(प्रथमवर अकारः, एकादशस्वरः अकारः सानुसारः, अकारः सविसर्ग(गों) द्वाद- स(श)स्परः । एतद्वहुले प्रभे धातुयोनी लब्धे कनकं ज्ञेयम् । कसग घ(पा) नामन्यतमस्योपरि- गतो)नेतेपामन्यतमेन वरेण कनकमेव ज्ञेयम् । क ख ग घा नामन्यतमाक्षरेण ऐकारेण युक्त धातुयोनी लव्याया वपु ज्ञेयम् ॥ १०९ ।। च छ ज झ य र ल व एसु य, रययं बीयस(स्स)रसत्तमेसु च । अणुणासिए य वितीए, छट्टे य सरे[१०५९, पा० २] हबइ सीसं ॥११०॥ च छ ज झ [य]र ल वे पु ष प्रश्ने बहुदुष्टेलि १)प्वेपामेवान्यतमाक्षरे द्वितीयखरैण सप्तम- खरेण च युक्त धातुयोनी लब्धायां रजतं ज्ञेयम् । च छ ज झ [य] रलचे युच, []पामन्यवमाक्षरा- ()बहुले प्रश्ने अनुनासिके च द्वितीये धातुयोनी लब्धाया ज(अ)कारेण च युक्त शशिक - शेप. ६..पा. १]यम् ।। ११०।। ट ठ ड ढई कारस्मि(म्मि) य, तंबं कंसं पुण तथ दधेि)सुं च । पफ ब भ णवमे य सरे, चउत्थ अणुणासिए आरं ॥ १११ ॥ ट ठडद(दा)नीमन्यतमाक्षरबहुले प्रभे चतुर्थस्वरेण युक्त धातुयोनी लब्धायां ताव(म)- मांदेश्यम् । तथा इमो(?) तथदधाना पञ्चाना बहुले प्रभे, तपघाना याऽन्यतमाक्षरै- " [१०६०, पा०] चनुर्धस्वरेण युक्ते कसमादेश्यम् । व(प) फषभ इत्येषां पञ्चानामन्यतमाक्षर पहले प्रमे तेषामेवान्यतमाक्षरेण नवमस्वरेण (ओ)कारेण युक्ते धातुरादेश्य आरं प्रदा रीरिका घट्टलोह वा ।। १११॥ 13 28 - २५ ३ [गाथा ११२-११७] प्रश्नव्याकरणाख्यं हत(व)इ मकारे लोहं, दसमसरे अट्ठमंमि वगंमि । एते उ धम्मभेया, अधम्मभेया इमे वोच्छा(च्छं)॥ ११२ ॥ मकारेबहुले प्रश्ने शकारोऽष्टसा(मा)क्षर(र:) तद्वहुले च, औकारः दशमः स्वरः, तेन तु युक्ते मकारे शकारे वा धा.. ..........*न पवालं हेममातिण्णो(?मोत्तियं)। कंतमाण(सं मणिं चोकायं सीसट्ठाणं चाय(च?) नीसासं(रं)॥ ११३ ॥ अधाम्यधातुयोनौ लघायां रजताक्षरा ये उक्तास्तेपु दृष्टेपु मौक्तिकं द्रष्टव्यम् । सुवर्णाक्षरा ये उक्तास्तेपु दृष्टि(दृष्टेपु?) स्वराश्च येऽभिहिता तेख(प्व)धाम्यधातुयोनौ लब्धायां प्रवालकं वक्तव्यम् । कंसाक्षरा येऽभिहिता स्वरयुक्तो(का) आ(अ)धाम्यधातुयोनौ लब्धायां तेषु मणयो निसा(स्सा)रा ज्ञातव्याः । कायमादिका येस्व(प्व)क्षरेपु सीसकं द्रष्टव्यम् । तेष्वेव अधाभ्यातुयोनौ लब्धायां ।। निःसाराम]मणयो विमि]लकादयो विज्ञातव्याः ।। ११३ ॥ [प०६१, पा०२] ॥ धातुप्रकृतिः समाप्ता॥ धम्ममि दिट्ठपुचे, [घडियम]घडियं च तत्थ णायचं । दुविहं च होइ तं पुण, णाणय अण्णाणयं चेव ॥ ११४ ॥ धाम्यधातौ दृष्टे तद् घटितमघटितं चेति । यच्च घटितं त[] द्विविधम् - केयूररूपक- द्रमादि, यत्तक(यच्च) [नाणकम्] । अनाणकम् - कुंडलनूपुररसनाकेयूरकटकादिकम् ॥ ११४ ॥ दिलुमि णाणयंमि [प०६२, पा. १] य, सम्मिस्सं होइ [तह य] उम्मिस्स। इतरं पि होइ दुविहं, आहरणं भायणवि[य]प्पं ॥ ११५ ॥ अक्षरलब्ध्यद्यातके (लब्ध्यंकिते?) नूपुरादौ नाणके । तद्व(स) नाणकं द्विविधम् - मिश्रममित्रं चेति । तन्न मिनं सुवर्णरजतताम्रविते (नैस्मिभिरितीरेपा द्वयेन वा यत् क्रियते तन्मिनम् ।। यत्सुवर्णेनैकेन रजतेन वा क्रियते नाणकं तदमित्रम् । सुवर्णा प० ६२, पा० २] दिद्विविधं भांडक्ष- (क)वमाभरणं चेति ॥ ११५ ॥ आभरणंमि य दिवे, तं दुविहं देवमाणुसाभरणं । हिट्ठमि(हिम)उवरिमकाए, एकेकं तं पुणो दुविहं ॥ ११६ ॥ अक्ष[]लाभेनाभरणं यद् दृष्टं तद् वि[वि]धमाभरणं देवामरसीसातुपाहरणावावा (?देवा- भरणं मानुपाभरणं वा ।) तत् पुनर्द्विविधम् - एकैकम् - अध:काय(यि)कं उपरिकायिक चेति । वधुपरिष्टा(द्वि)शेपत[:] कथयिष्यामः ॥ ११६ ॥ पचुय-पपुवयं(मपञ्चुय) वा, एफेकं तं पुणो दुहा होइ । पच्चोविए वि दिट्टे, मोत्तिय-माणिक-उम्मिस्सं ॥ ११७ ॥ अन मूलादर्श एका सपूर्ण पंफिरक्षरशून्या स्थिता लभ्यतेऽतोऽसा गाथायाष्टीकायाः कियान मागस्तथैवाने भादरों 'मोतियं ममानिम्मिाराएण' इति यहुविकृतपाठो स्यदे। 15 * तनगापापाः प्रपमः पादो विनरः। नि.शा.४ २६ 13 जयपाहुदनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ११८-१२३] यदाभरणमधाकायिकमीपरिका प०६३, पा. १]यिकं च द्विविधमुक्तम् । प्रत्युष्ट(त)म- प्रत्युप्तं च । तदेकैकं पुनः द्विविधम् । प्रत्युप्तमिति संशिष्टमणिमौक्तिकं कटकाद्याभरणमुच्यते । पूर्वोक्तहेममौक्तिकाक्षरयहुले प्रक्षे प्रागुकन्यायेनैव प्रत्युप्त ज्ञेयम् ॥ ११ ॥ उपरि[य]णवण(ण्ण)सहिया, उट्ठा(दट्टा) मत्ताउ जा य दीसंति । आभरणं जाणिज्जा, उवरि श(स)रीरंमि देहि(ही)णं ॥ ११८ ॥ प्रश्नाक्षराणां उपरि दग्धमात्रा दृश्यन्ते तदाऽऽभरणमवगच्छ, उपरि शरीरस्य देह- भृतामिति ॥ ११८ ॥ अहराओ अहरेसुं, मत्ताओ जारिसाओं तारिसयं । [१० ६३, पा० २] सं(त) ठाणं [प]ण्हंमि य, धाउविसेसेण नायचं ॥ ११९ ॥ अधराधिकाक्षरप्रश्ने अधःकायिकमाभरणं ज्ञेयम् । उत्तराक्षरबहुले प्रभे उपरिकायिकमा- भरणं ज्ञेयम् । अधोमात्राधिकप्रस्त(ञ) अधःकायिकमाभरणम्, तिर्यग्मानाधिकप्रश्ने तिर्यग्भागे नं (ऽलं)कारो शेयः । ऊर्द्धमात्राधिके प्रश्ने शरीरस्योर्द्धमागे ज्ञेयं धातुविशेषेणेति ॥ ११९ ॥ दिटे मणिमि पच्चोवियम्मि जीतय(जाती य?) होइ] इतरं वा । जातीए माणिक, पत्थाप०६४, पा० १ ]रजाती विजातीए ॥ १२० ॥ दृष्टेमगिभिः प्रद्यु(त्यु)तैः पूर्वन्यायेनैव यैरक्षरे। सारा उक्ता मुपादयो मणयः, से: सार- मणिप्रव्यु(त्यु)प्तमामरणं ज्ञेयम् । यैश्च नि(निः)सारा विमलकादय उत्तास्तैः प्रश्ने दृष्टे([)नि:- सारे[:] प्रा(त्युसमाभरणं ज्ञेयम् ॥ १२० ॥ तम्मिख(तं पि य खा)यमखय(खाय), जं तत्थ[ख]यं पुणो वितं दुविहं । दुवय(ए) चउप्पए वा, दुपए पखी(क्खी) मणुस्सो वा ॥ १२१ ॥ सदाभरणं वि(द्वि)विधं खातमखातं चेति । धाम्यधात्वक्षरवहुले प्रश्ने [प०६४,पा० २]जीवा- क्षररहिते अखावमाभरणं शेयम् । जीवाक्षर उक्त प सातमाभरणं ज्ञेयम् । वत्र जीवाक्षरैः पक्षिणो मनुजाश्च शेया[:] । चतुष्पद्जीवाक्षरैती नखी शृङ्गी खुरी का आयः । पूर्वो(यो)क्षर- ने(भ)देन पूर्वोक्तन्यायेन च ॥ १२१ ॥ दिढे चउप्पये गामवासिणो रण्णवास(सिणो चेव । दंती सिंगी य खुरी, णही य दाढी य वा होज्जा ॥ १२२ ॥ दृष्टे चतु[प]दे, के ते चतुष्पदाः ? द्विविधाः-प्रामवासिनोऽरण्यवासिनश्च । पूर्वोक्ताले दन्ती शृगी खुरी नखी दंष्ट्री चेति पञ्चविधाः । पूर्वोकन्यायेन स्वैस्व()[५० ६५,पा. 11 क्षरेः ज्ञेयाः ॥ १२२ ॥ पञ्चोविए वि दिट्टे, जो गमउ(ओ) देवमाणुसाभरणो । सो चेव य सविसेसो, णायचो भायणेसुं पि ॥ १२३ ॥ प्रत्युप्तेऽपि दृष्टे यैरक्षरेयानां मानुषाणां वा आभरणानि दृष्टानि तेरेयाक्षरैः प्रझे दृष्टे भाजनान्यपि शेयानि । हेमाद्यक्षरैश्च हेमानि कृतानि ज्ञेयानि । यैरक्षरैतानि योद्धव्यानि ॥१२॥ 20 2. , २७ गाथा १२४-१३०] प्रश्नव्याकरणाख्य धाउस्सराणुणासी, छिद्दा णिढि(च्छि)। सेसया वण्णा । छिद्देसु जाण छिद्दे, णि(मि?)स्सेसु य खुम्मियं दी(द)वं ॥ १२४ ॥ धातुस्वरौ द्वौ उकारो(र-3)कारौ,डमण न माः पञ्चानुनासिकाः, छिद्रा[:] प्रथाप०६५,पा०२] वर्गः तृतीयवर्गश्वान्या(न्या') यागाधेया(यरलवा') वक्ता(') नि(छि?)द्रा ये च द्रष्टव्या[:] । द्वितीय-चतुर्थवर्गों निछिद्रो(द्रौ) द्रष्टव्यौ । छिद्राक्षरवहुले प्रश्ने छिद्रे(द्रो) धातुरादेश्यः । घना- 3 क्षरबहुले धन(न:), छिद्राछिद्रेपु मिश्रेषु घटेपु स्थुमितं धातु द्रव्यमादेश्यम् ॥ १२४ ॥ ॥ धातुयोनि समाप्त(ता) । 15 रुखा(क्खा) ग(गु)च्छा गुम्मा, लया य वल्ली य पचया चेव । तण[प०६६, पा० १ ]वलय-हरित-ओसहि-जलरुह-कुहणा भवे मूले ॥१२५।। वृक्ष-ग(गु)च्छ-लता-गुल्म-वल्मी(ल्ली)-पर्वक-तृण-वलय-हरितौ-पधि-जलरुह-कुणा इति । मूलभेदा द्वादस(श) ॥ १२५ ॥ एगट्ठिय बहुबीया, रक्खाणं चेव होंति दो भेदा । सेसा वि ग(गु)च्छमादी, चण्णाण कमेण णायवा ॥ १२६ ॥ तत्रैकास्थि-बहुवीजाश्च द्विविधा वृक्षा भवन्ति । शेषा अपि [प० ६६,पा० २] ग(गु)च्छाद्या वर्णाकारप्रमाणादिभिरनुक्रमेण ज्ञातव्या[:] ॥ १२६ ॥ तय-मूल-कंद-साहा-पल्लव-फल-कुस(सु)ममेव णिज्जासो। रस-छीर-पसाहाओ, [य] मूलजाईअ(सु) भेयाई(?) ॥ १२७ ॥ त्वग्-मूल-स्कंद(ध)-शाखा-पल्लव-फल-कुसुम-बीज-रस-भेदाश्च मूल-जातिए विज्ञेयाः। को गुणभेदः । सुरभिः][५०६७.पा. १] दुर्गविश्वेति । को या रसनेवा (भेद: १) मधुर-लवण- फटुक-कपायादिलक्षणः ॥ १२७ ॥ ग(गु)च्छा बहुप्पयारा, कप्पास-करीर-पुप्फग(गु)च्छा य । गुम्मादिया य जाती-कुज्जय-कणवीर-वल्ली य ॥१२८ ॥ ग(ग)च्छा यहुप्रकाराः। के से ? कप्पा(प्पा)स-करीर-पुष्पग(गु)च्छाय(श्च)। के पुष्प- ग(गु)च्छा भण्यन्ते ? । ये पुष्पं केवलं प्रय[प०६७, पा• २]च्छन्ति न य(च) फलं यधन्ते । वन गुल्म(ल्मा) जाति(ती) फुञ्जका कणवीरं मल्लिका चेति ॥ १२८ ।। चंपय-असोय-चूया, कुंदलयाओ व होति विविहाओ। तंबोल-लवलि-पिप्पलि-मिरिया वि य होति क(वोल्लीओ ॥ १२९ ॥ चंपकासो(शो)कचूता लतासंज्ञकाः। कुंदश्च लतासंज्ञः । तांबो(ताम्बू)ल-पिप्पलि-मरी- चाद्या वल्या:(ह्यः) ॥ १२९॥ दूर्वा(दुवा)कुसणवध्वपय(यवसालिकंगुगोधूमादीया । जलसंभवा य हरिया, गंधेणुयादि मुणेयवा ॥ १३० ॥ 20 23 • ५८ जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १३१-१३७ दूर्वा-कुस(श)-तृण-ययकय()-यव-सा(शा)लि-कंगु-गोधूमाद्याः तृणसंक्षा[] | जलसंभवा अपि सृणा एव । हरितसंशाश्व गंधेनुकाद्या देसिकाः ।। १३० ।। वलया साहा विडवा, दलकंदलसरलधम्मणा(मा)दीया । तिलमुग्गमाषचण[प.६८,पा.१] या इय ओ]सहिओ मुणेयवा ॥ ११ ॥ पाला(पल)या सासा म(प)त्तल कंदल-सरल-धम्ममाद्या तिलमुगमापचणकाचा ओप- धयः ॥ १३१॥ पउम(मु)प्पलकुमुदाई, मेसे)बालकमे(से)रुया य जलपसुणा । ....मो(नाणा)विहा य अण्णा, सिंघा[ड]गरलि(वल्लि)यादीया ॥१३२॥ पद्मोत्पलकुसुमसेयालकसेरुकाः नमो(नाना)विधाश्चान्ये शृंगाटकवल्याचा जलरुह- ॥ संज्ञकाः॥ १३२॥ हो(हो)ति कुहणा अबीया, वसुधोर(धाए?) संभवा य जे अण्णे। तत्थ कुहणा च(व) इयरे, भूमीरसकंदली उच्च ॥ १३३ ॥ अवीजाः प्रान(द)काल आसण्णे पसुहा जलो(?ले) एयान्त[रसं मुंचंति तदसं(सं) भवास्छधका[:] कुणा[:],अपरेऽपि तदाकृतयो ये उत्पद्यन्ते क्षर(इक्षु?)संशा[:] कंदल्यश्चेति॥१३३॥ इज्जण-वेणुय-वेता-सरकंडसयंगपटगे हे(णे)या । [५० ६८, पा०२) बारसविभास(धा य) मूला, कहिया जिणसासणंमि सया ॥ १३४ ॥ इजणवेणुयवेन्यसरकंडिभंगाश्च नलसालि(?) मण्यन्ते । एते पवर्ग(वंग?) संज्ञाः । पर्वणि पर्वण्युक्तेभ्योऽप्रते(गे)भ्य उत्पद्यत इति पर्वगामा भण्यन्ते । द्वारस(दश)विधाति (नि) मूलावि(नि) कथितानि जिनसा(शा)ले ।। १३४ ॥ मूला कंदा य तया, साह य(प)वाला य तह य पत्तफलं । पुप्फाणि य [बीयाणि य, जाणिज्जा जं जहिं कमइ ॥ १३५ ॥ मूल-कंद-त्य[-]शाखा-प्रवाल-पत्र-फल-पुष्प-वीजा नि] [२०६९, पा.१] संजानीहि । वद्यथा वद्य(दु)[पारिष्टाय(ह)क्ष्यति ॥ १३५ ॥ भक्खाऽभक्खा य पुणो, भक्खिा] तिचादिया य पंचार]मा(सा)। गामारण्णा जल-थलय पहाणा अप्पहाणा य ॥ १३६ ॥ भल्या त्य(अ)भक्षा(क्ष्या) विविधाले। तत्र मक्षा(क्ष्या)स्तिक(कोकटुककपायाम्लमधुराः पञ्चरसाः । प्राम्या आरण्याश्च । पुनद्वि(दि)विधा जलजाः स्थलजाश्च । प्रधाना [अप्रधाना) श्यति ।। १२६॥ पण्हक्खरेहि एते, णायवा जे जहा समुदि(द्दि)हा । अधरुत्तरक(क)मेण व, सणामणिदेहिमओ आवि ॥१३७|| [५०६५, पा. २) ये यथा उक्ताले तथा उत्तराक्षरा(र)यहुले प्रभे मधुरमात्रा[:] झिग्यस्थवयश्च(1) सुगंधिना सुरभीविपुला द्रष्टव्याः । अधराधरणले मभेऽपि एवं पूर्वोजा अपमाना रुवारीरूभा)दुर्गधाः 13 23 N . [गाथा १३८-१४१] प्रश्रव्याकरणाख्य नीरसाः ह्रस्वाश्च भवन्ति । तैरेव प्रभाक्षरैः] तावद् ज्ञेया याव[] नीमति(नि) दृष्ट इति [प०७०,पा० १] ॥ १३७ ॥ ।। मूलभेदाः समाप्ताः॥ 18 19 संजुत्ते फलभेदे, खाधण्णे रिक्खं(क्खरं?)मि णिप्पु(फ)ला भणिया । उवरिल्ले उवरिल्ला, अधरा [अधरेसु नायबा ॥ १३८॥ संयुक्ताक्षरबहुले प्रभे सफला वृक्षा ज्ञातव्याः । के ते संयुक्ताक्षराः ? क्ख च्छ हत्थ । प्फ पर ग्घ झड्डद्ध ब्भ ल्व इत्येते। [प०७०,पा० २] च्छट्सखरैच(?)तुर्भिरिक्षर(ः) सफला वृक्षाः । उवरिले उवरिलाक्षरैरुत्तराक्षरित्यर्थः । तैरक्षराणामुपरिंगतेह()()क्षादीनामुपरि- भागे फलं इत्यादेश्यः(श्यम्)। अघराक्षरैः उत्तराक्षराणामुपरिगते दृष्टे वृक्षादि(दी)नामधोभागे फलं वक्तव्यम् ॥ १३८॥ पढमे नवमे य सरे, क-चादिवगंमि चेव रुक्खाओ। बितिय-दसमे य सरे, लताओ ख छ ठ क्खरेसुं च ॥ १३९ ॥ ककार-चकारबहुले प्रश्ने [प०७१,पा० १] ककारस्य चकारस्योपरिगते अकारे उ(ओ)कारे वा अन्यतरस्यामतो पाऽनन्तरमवस्थिते वृक्षा ज्ञेयाः । स छठ बहुले प्रभे खछठा नामेकस्मिन् द्वितीयेन आकारेण दशमेन औकारेण वा युक्तेऽग्रतोवाऽनन्तरमवस्थितानामन्यतरस्य लता[:] प्रत्येतव्याः ।। १३९॥ थ फरस एसुं वल्ली, तणं च धातुस्सराणुणासीया । चउरहमबारसमे, सरंमि ग(ग)च्छा य घझ ढे सुं ॥ १४० ।। थ फरस(?) [५०७१, पा० २] बहुले प्रश्ने वल्ली। डबण न माक्षरबहुले प्रभे तेपामेवान्यतमे धातुस्वरान्यतमयुक्ते तेपामेवान्यतमव्या(स्या)प्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते धातुस्वरे तृणं ज्ञेयम् । धातुस्वराः उ ऊ अं । घ झ ढ बहुले प्रश्ने घझ ढा नामेकस्मिंश्चतुर्थ(थोनाष्टमेन द्वादसे(शे)न वा स्वरेण युक्ते घ झ ढा नामेकस्यायतो वाऽनन्तरमवस्थितेन गरगु)च्छा शेयाः ॥ १४०॥ गुम्मा य ध भ व हे सुं, गज डे वलया हु णवम-तइएसुं। सत्तमसरे तह ओ सहीओ भणिया दब [ल] से सुं ॥ १४१ ॥ धस (भ) वह बहुले प्रश्ने गुल्मा भवति(न्ति)। गजड [प०७२,पा. १]बहुले प्रभे गजडा नामकस्मिन्नषमस्वरेण ओकारेण तृतीयेन उकारेण वा युक्तेन ग जडानां त्रयाणामेकस्याप्रतो । माऽनन्तरमपस्थितेन पलया क्षेयाः । वलयप्रणे च ताल-सजू()र-पूगफल-वृक्षादय उच्यन्ते। दपल स बहुले प्रभे तेषामेवान्यसमेन सप्तम स्वरेण एकारेण युक्त एतेपामेवान्यतम्य(म)- स्सामतो वाऽनन्तरमवस्थितेन सप्तामस्वरेण औषधयः प्रत्येतव्याः ॥ १४१॥ ॥ एवं भूलयोनिः समाप्ता॥ 21 . जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गायाँ १४२-१४६] जीवस्वरेसु मूलं, जीवं मूलक्खरेपु(सु) सु(पु)हेसु । मुट्ठीए नायचं, धातुं [प०७२, पा० २] धाउख(क्खारेसुं च ॥ १४२ ॥ अनया गाथया योनिप्राप्टमा(प्रश्नमे)वमुच्यते । इदानी प्रत्येकभागस्वरयुक्तेषु जीयाक्षरा- येऽभिहता:तेषु संप्याधिक मूलं ज्ञेयम् । [मूला]क्षरा येऽभिहतातेप्यपि संख्याधिकेपु मुष्टी 'जीवो शेयः । धात्वक्षरा येऽभिहतास्तेष्वप्यधिक्संख्येपु पु(स)ष्टौ धातु ज्ञेयम् ॥ १४२ ॥ जीववखरेसु मूलं, उत्तरसरसंजुएसु मुट्ठीए । अधार] सहिए[स] धाउं, जीवं च सभावदीहेसु ॥ १४३ ॥ शुद्धाः स्वरसहिवा[:] 1 के ते उत्तरस्वराः? 'अ इ उए' एते चत्वारः । तथ्य जीवा- क्षरा(।) युक्ता मुष्टी मूलं कुर्वन्ति । एते स्वरा जीवाक्षरा अधरस्वरसंयुक्ता मुष्टी धातुं " फुर्वन्ति । कोसौर(को तो )धरस्वरो(रों) ? । 'आ अ' इत्येती द्वौ । नान्यो गृह(ो)ते । त एव जीवाक्षराः 'स्वभाव-दीर्घस्वरैर्युक्ता मुष्टौ जीवं फुर्वन्ति । के ते स्वभावदीर्घाः स्वराः ! 'ईए (ऐ) औ' इत्येते स्वराः ॥ १४३ ॥ [प०७३,पा. १] अहरस्सरसंजुत्ता, मूलं धाउस्त्र(क्ख)रा उ मुट्ठीए । उत्तरसरसंजुत्ते, धाउं धातुख(क्खारेसुं च ॥ १४४ ॥ धातु(त्व)क्षरा अधरस्वरसंयुक्ता मुष्टौ मूलं फुर्वन्ति । अधरस्वराः 'आई [] औ इरोते पत्वारः । धात्वक्षरा उत्तरखरैर्युत्ता मुष्टौ धातुं कुर्वन्ति । के ते उत्तरा ? 'अइ एओ' एते उत्तराः। "अधरस्सरसंजुषा, मूलं धाउक्सरा उ मुट्ठीए । सेसा उ अधर धाउँ, धाउं धातुक्खरै धाई"। पाठान्तरं वा । मात्रा उक्ता एव 'अइएउ' ॥ १४४ ॥ इदानीं मूलाक्षरेषु प्राप्तिमु(रु)च्यते । [प०७३, पा० २] अहरस(स्स)रसंयु(ज)त्ते, धाउँ मूलक्खरेसु मुट्ठीए । उत्तरसहिए मूलं, जीवं सहावदीहेसु ॥ १४५ ॥ अधरखरौ । (को)ती १ 'आअ' इत्येतो तो............धातु क्षेया भवति । उनरा अइए ओ' धातुमूलाक्षरसहे(हि)तेपु मूलं शेयम् । मूलाक्षरा मुष्टो जीयं फुर्वन्ति। के ? स्वभाव- ७ दीर्घाः ई ऐ ओ' इत्येते प्रयः॥ १४५ ॥ हिट्ठमि म(अ)धोमते,[५० , पा. १] धाउं मूलक्खरा उ सुद्धी(मुट्ठी)ए । सेसासु(उ) सबमनी(चा), करन्नि(न्ति) मूलक्खरे जीवं ॥ १४६ ॥ मूलाक्षरा अधोमात्रावियुत्ताः । का अधोमात्राः ? स्वभावदीर्घस्वरयुक्ताः मुष्टी जीवं कुर्वन्ति दाहकत्वात् । शेषाः सर्वमात्राः । काश्च ताः सर्वमाना उता एव 'ऐ औ(?) एतास्तित्र- ॥ तान्ये(स्ता ए)व गृह्यते(न्ते) । "सेसवियप्पा जहा पुर्व"ति वचनकमेतत् । धातुप०७४, पा० २] जीवु-मूलानामन्यतमेऽस्मिन् दृष्टे द्वाभ्या तिसूणां वा द्रव्याणां नामाद्यभराप्य(ण्य)सखे (ख्ये)या- . . - [गाथा १५७-१५१] प्रश्नव्याकरणाख्यं भिघातमुद्धया(?) द्रव्यरूपसंशाज्ञानं ज्ञात्वा शेपे प्रपंचधातु-धान्यान्यविकल्पादिकः जीवोत(वस्त)- दवयवो वा द्विपदान्यतमस्य मूलं वृक्षगुच्छगुल्मलतादिकं एवं सप्रपंचं विज्ञाय मुष्टौ तथाss- देशः कार्य इति ॥ १४६॥ ॥ मुष्टिविभागप्रकरणं समाप्तम् ॥ दो दीह बट्टदीहा, वट्टो तसो य वट्टदीहा वि। [अत्र आदर्श तु 'यहो दीहो दि तेसो य एतरशो द्वितीयपदस्थो भ्रष्टपाठो दृश्यते।] चतुरस्सो बिय वट्टो,[प० ७५, पा. १Jहोइ तह यायणादि(ता वि)णि॥१७॥ अकार इकारश्च द्वौ वृत्त(?)दी! । आकारश्च ईकारश्च द्वौ [वृत्त?]दीधौं । उकारो वृत्तः । औ(?)कारस्यसः (रख्यतः)। एकारम्य ओकारश्च पुनौं वृत्तदीर्थी । ऐकार औकारश्च दीपौ । अंकार अः सविसर्गः दीर्घचतुरस्यै (स्रो)। मतांतरेण धनुरावेवा (चतुरस्रावेव)। एतेषां मध्ये " यस्य चाहुल्यं तेन तजानीयम् । पूर्वनिर्दिष्टा दीघी विज्ञेयं(याः) ॥ १४७ ।। दीह(हा) वट्टा तंसा, चतुरंसा आप(य)दा य संठाणे । क-खमादिणो य वग्गा, मीसामीसेसु [१० ७५, पा० २] नायथा ॥ १४८॥ कच द स प य शाः सप्त दीर्घाः। ख छ थे फरपाः सप्त वृताः। गजड दबलसा: सप्त त्यमा(व्यनाः)। घझ ढ[ध] भ व हाः सप्त चतुरस्राः । डमण न मा. पंच दीर्धेचतुरना।" प्रश्नाक्षराणां मध्ये यस्याक्षरबाहुल्यं भवति तेन तद्वस्तु निर्देशः(श्यम्) । वृत्तदीर्घाक्षरस्तु यदि पाहुल्येन श्यते तदा वृत्तदीर्घवस्तु निर्देश्यः (श्यम्) । एवमन्येऽपि मिश्रा ज्ञेयाः ॥ १४८॥ पढम-तइया यछि। प० ७६, पा० १]द्दा, सीयायघणोसिणा अपि(बि) चउत्था। पंचमओ पुण वग्गो, होतिदोसु(उण्होछिद्दो?) या(य वा) मीसो ॥१४९।। प्रथमवर्गस्तृतीयवर्गश्च, एतौ द्वौ छिद्रौ क-गादिको सी(शी)तौ च । द्वितीय-चतुर्थों 20 स-पादिको पनौ उष्णौ च । पञ्चमो धर्ग उष्णो घनछिद्रः। प्रश्ने एतेषां येन बाहुल्यं तेन निर्देश[:]कार्यः ।। १४९ ।। दो सेया धूमलओ, रत्तो चित्तो य किण्हवण्णो य । ये उ(ए ओ) य पुणो सेओ, दो नीला पीयला[५०७६, पा० २] चरिमा॥१५०॥ अफार इकारश्च द्वौ स्वरौ श्वेतौ। आकारो धूम्रः। ईकारो लोहितः । उकारश्चित्रला ऊकारः कृष्णः । एकार ओकारश्च द्वौ श्वेतौ । ऐकारो नीलः । औकारो(र:)पीत(नी)लः । एवं अंशः पीती । प्रभे एतेषां मध्ये यदा(६)भरबाहुल्यं भवति तेन वर्णनिर्देश[:] कार्यः ।। १५०॥ सेदा किन्हा रत्ता, नीला तध पीयला य वण्णेण । कखमादीओ.वग्गा, मीसा मीसेसु णायबा ॥ १५१ ॥ फादिवर्ग: श्वेतः । खादिवर्गः कृष्णः । गादिवर्गो रक्तः। घादिवर्गों नीलः। डब णनमाः पीवलाः । एतेषां यस्याक्षर बाहुपः ७७, पा० १]ल्यं प्रश्भे [तस्य वर्णनिर्देशः कार्यमा १५१॥ - , 4 -- --- H ३॥ जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १५२-१५४] सुरभी मंदो सुरभि(भी), मंदो सुगं(दुग्गीधिया तहा दोण्णि । सुरभी मंदो सुरभी, [मंदो] दुग्गंधियो मुरभी ॥ १५२ ॥ अकारः सुरभिः । आकार ईपत्सुरभिः । इकारः सुरभिः। ईकार ईपरसुरभिः । उक द्वौ दुगंधी । एकारः सुरमिः । ऐकारोऽल्पसुरभिः । ओकारः सुरभिः । औकारोऽल्पसुरभिः । अं दुर्गधिः। [अः सुरभिः] । प्रभाक्षराणां मध्ये सुगंधिस्वरखाहुल्यं भवति तदा मुगंधफल- कुसुमादिकं ज्ञेयम् । दुगंधार (धीवे)वमेव ।। १५२ ।। सुरभी क-गादिवग्गो, गगा(ग-जा)दिवग्गो य तह य नायचो । सेसा [प०७५, पा० २] तिण्णि वि वग्गा, दुग्गंधिव(व)जणा होति ॥१५३ ॥ क-गादिग-जादि]वर्गों द्वी सुरभी । शेपवर्गत्रयं स-पादि दुर्गधि । प्रमे एतेपां घाहुल्ये ॥ पूर्वायत् सुगंधादयो क्षेयाः ॥ १५३ ॥ एतस्मिन्नेवार्थे संवादकारिणो(ण्य:) अन्यान्यस्य गाथा लिख्यन्ते । तद्यथा- दो वरगा() दो दीहा, [दो संसा हो य होनि घर]सा । योपिण य होति तिकोणा, दो पा सरचि नायग्या ।। इ'महा, 'भाई' दीहा, 'उ ए' ते(२)सा 'ऐ' पारंसा । 'उ(लो) औ'तिकोणा । 'भ' पृत्ति(पट) नापावा ॥ २ ॥ [प.४८,पा.१] वढे जाण सुवणं, दीहेसु रूपयं पियाणादि । तसेण वेद सुप्वं (संवा) पउरसे फंस जाण तिकोणा(कोणे)हि य पिसला(), लो, वयं सीसयं च वित्तेहि । [आदर्श "विरोहि नायव्वं' इति पाठः।) पहे(वह) होइ पु(पपं दीहेसु घउप्पयं च पायव । वेसेसु होद दुपयं, चहु(उ)प्पय होइ घउरंसे ।। तिको (को)गेहि य चम, मसं पालहियं च धकेहि । बढेसु होइ गुम्मा, दीहेमु लया मुणेयावा । तसेमु होइ छली, घडरेसे एक(क) [२०४८, पा.२] भणिय । [उत्तराई1] तिकोणेहि य पुस्फफर, कपई (पतं कई) च होइ केहि ॥ [पूर्वा] जंज भामह सरो, वगं पाहं वह अक्सरणिहा। संपावर , केवल विमलाए जोपहार ॥ भमत्तेसु गिहाय, मत्तासहिएमु उस(मोरे जाय । बिदुसहिएमु पार, विसग्गसहिएमु पाहे (हि)रे जाण ॥ उत्तरप्तार] संज, उत्तर तह पंजगे सगेहमि । अहरसासंजुचे, महरख(सोरे जाण सयणगिहे ॥ परवग्गादिहएणं, मसपशगेहे गयं समत्तेसुम गाने, मतासहिएसुजाण नपरेसु ॥ वितु सहिएस भर, (२०४९.पा.11 पिसासाहिएम छमामो HिO॥ दो अंधा दो कुम्मा, दो सोडा दो बहिरा । दो पुमा दो डियतदो काण मुयम्वा । घोरपहाए भरिया, भरिमाण यह पेप भरपमरियावि(ए। भरमाणाजे पह, भरिया पायवा भोपाहाए । भम्यमन्यस पामन्ताम् । पढमो णवमो य सरो, क-गादिवग्गो य सीय लाह ओ [य] । कख(क्खीड लुक्खाय घखा(ख-घा?), विदियदसम वारिस]सरो या|१५४॥ प्रथमवरः अकारण(न)वम ओकारः । (फ-गा)दिवर्गा:-क घटस पयशाः, गजरद बलसा स्वस)। सी(शी)ता लघवथ । सछठयफरपा, पझप भवाश्च । द्वितीयस्वर " आकारः । दशम औकारः । द्वादशो अभारः सविसर्गः । एते कर्कसा(शा) रुक्षाघ । एपा- गुफानां ममे यदपि.४५, पा. १ पाहुल्यं तदीयं सी(शी)तादिकं वाच्यम् ॥ १५॥ " . [गाथा १५५-१६०] प्रश्नव्याकरणाख्यं तइओ [य] सत्तस(म)सरो, कमा(गा)दिवग्गो य मि(नि)हनिहाओ। लुक्खा उण्हा गरुया, खघा सरा य चउरट्ठमा दि(दो)णि ॥ १५५ ॥ सृतीया खर इकारः, सप्तम एकारः, स(क)गादिवर्गों च द्वौ । एतेषां बाहुल्ये सिग्ध- द्रध्यमादेश्यम् । ख[घा]दिवर्गः, चतुर्थस्वर इकारः, अष्टम ऐकारः । एते रूक्षाः उष्णा (गुरुकाः।] एतदक्षरस्वरबाहुल्येन तद्भवति ॥ १५५ ॥ धातुस्सरा य दोण्णि वि, पंचम(य?) अणुणासिया मउअ सीदा । वामिस्सा पुण सवे, मिस्सामिस्सा मुणेयवा ॥ १५६ ॥ धातुखरौ 'उ', पश्चानुनासिकात, मृदवः सी(शी)तलाश्च । मि[ग्ध]रूक्षाक्षरै] नास्निग्धो न(ना?)रुक्षो(क्ष) आदेश्यः । मृदु-कर्कसा(शा)क्षरेन(ग?) मृदु-कर्कसो(श) आदेश्यः । [प०८०,पा० १] उष्ण-सी(शी)ताक्षरै[:] न उष्णो न सी(शी)त आदेश्यः। यथोक्ताक्षरबाहु- " ल्येनेतद् भवति ॥ १५६ ॥ तित्तो कडुय कसाओ, अंधो(बो) महुरो य आणुपुबीए । को(का)दीणं वग्गाणं, सरपरिमाणं(णो) मुणेयवो ॥ १५७ ॥ फादिवर्गो तिक्तः । गादिवर्गो(न:) फटुकः । खादिवर्गः कपायः । पादिरम्लः । कादि- वर्गो मधुरः । अनयोरानुपूर्ध्या यथोक्तवर्गाऽक्षरयाहुल्ये स(स्वर)परिणामो(माणो) वाच्यः ।" एवं वर्गाणां स्वराणां संस्थानं च ।। १५७ ॥ ॥ वर्ण-रस-गंध-स्पर्शप्रकरणं समाप्तम् ॥ - बितिय चउत्थो य सरो, पढमो अणुणासिओ चपज(क ख ग)घाय। एते वाग्गेईए, अकगा........पुवदा तिणि ॥१५८ ॥ 'च(क) ख ज(ग) घ ड(ड)' इत्येषां पंचानां अन्यतमवाहुल्ये अ(आ)कारेण इ(ई)कारेण ॥ या युक्त एते प० ८०, पा०२]पाममतो वाऽनन्तरमवस्थिते आकारेण इ(ई)कारेण वा अमेयां(य्यां) दिशितद् वस्तु विशेयम् । अफगाक्षरबाहुल्ये अकारेण इकारेण वा युक्त]प्रभे पूर्वस्यां दिसि(शि) तद् वस्तु विज्ञेयम्, १५८॥ ट छ ड(च छ ज)झ तइओ, य सरो, बितिओ अणुणासिओ य जम्माए । अट्ठमसरो प(य) टठ ड ढ, हवंति णं(ण)कारो य णिरईए ॥ १५९ ॥ द छ ह(प छ,ज) झाश्चत्वारोऽक्षराः, तृतीयस्वरः इकारः, द्वितीयानुनासिकञ्च (ब) फारः । एतैः पूर्वोकन्यायेन याम्यायां दिशि सद् वस्तु विज्ञेयम् । अष्टमस्वर ऐकारः, त(ट) ठ ड ढा चत्वारोऽक्षराः, [५०८१,पा० १]णकारस्य(च) । एभिनेरु(न)त्यां दिसि(शि) द्रव्य स्पेशे)यं पूर्वोकन्यायेनेति ॥ १५१॥ अधरेण सत्तमसरो, चउत्थ अणुणासिओ अपव(तथद)धा य । दसमसरो सप(मोकारो, अधरुत्तरतो फभमा(प फवभा) य ॥१६॥ 4 10 नि.शा.५ जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १६१-१६५] पय व धायरत थ द धन)यहुले भने एतेषामेवान्यतमस्यामतो औ(ए)कारेण युक्त एपामेवान्यतमस्यापतो पाऽनन्तरमयस्थितेन एकारेण पश्चिमायां दिसि (शि) द्रव्यं ज्ञेयम् । पफल(प फरमम)बहुले प्रश्ने एतेपामेवान्यतमस्याग्रतो याऽनन्तरमवस्थिते[न] औकारेण वायव्यां ज्ञेया(यम्) ।। १६० ॥ धातुस्साप. ८१,पा. २ रा य स व हाहा);णायचा तह य उत्तरद(दि)साए। चरिमो णवम्मे(मो)य सरो, ईसाणीए सर पा(यरला?)य ॥ १६१ ॥ धातुस्वरौ द्वौ उऊ, सब हा श्च प्रयोऽक्षराः, एभिः पूर्वोकन्यायेन उत्तरस्यां दिशि द्रव्यं ज्ञेयम् । परिमो द्वौ अं अः। नवमस्वर ओकारः। चरपा (यरला १)श्च योऽक्षराः । एमिः पूर्वोकन्यायेन ऐशान्यां दिशि द्रव्यं ज्ञेयम् । एवं नष्टस्य द्रव्यं शेयम् ॥ १६१ ।। ॥ द्विपदादे(दि)द्रव्यस्य दिसि(शि) प० ८२, पा० १ प्रकरणं समाप्तम् ॥ - t उत्तरसरेसु गामे, जाणे अहरेसुं बाहिरओ [य]। उत्तरसरसंजुत्ते, गेहे अहरक्खरेसुं च ॥ १६२ ॥ उत्तराक्षरेपूत्तरखरयुक्तेषु यत्किचिन् पृ(प्र)टा प्र(प)च्छति मामे तदिति शेयम् । एप भाहुल्यै । उत्तराक्षराम्य पूर्वोक्ता एव । अधरस्वरसंयुक्तेपूत्तराक्षरेषु दृष्टेषु यत्किंचित् पृच्छति " तहहाहाबाह्यमिति वक्तव्यम् । एतेषां बाहुल्येन । उत्तरखरयुक्तरुवघराक्षाप० ८२, पा० १)रेपु यत्किचित् पृच्छति फश्चि[त्तदृहे शेयं पूर्वोक्तज्ञा(न्या)येन । उत्तरखराश्च पूर्वोक्ताः ॥ १६२ ॥ उत्तरसरसंजुत्ते, अहरे तं चेव होइ सयणघरे । परवग्गहए वग्गे, असयणवग्गे हवइ दुई ॥ १६३ ॥ उत्तरस्परसंयुक्त अघराक्षरे जानीहि स्वजनगृहे द्रव्यम् । परंवर्गहते धर्मे द्रव्यं परगृहे ॥ भवतीत्यादेश्यम् । आलिंगिताभिधूमिवदग्धाश्चैते त्रयोऽभिन्नन्ति । यथैते वर्गा [प०४३, पा० १] अभिनन्ति तथा पूर्वोक्तत्वानो(लो) कमिति ॥ १६३ ॥ जाणे सकारंय(काय)गरुए, अप(प)गगेहंमि ठवियय(ठावियं) दछ । परवग्गाभिहएणं, सयणग(गि)हे हो(हो)ति तं दबं ॥ १६४ ॥ तन स्खकायगुरुवर्गों प००३, पा. २]ऽत्र यो भवति । क्कग ध्यच्छ हस्थ ॥ इत्यादि । एतद्यहुले प्रभे स्वगृहे द्रव्यम् । परवर्गगुरुमिन(र)मिहतैः खजनगृहे द्रव्यम् ॥१६४॥ पढने चरमे [य] सरे, दिहे वत्थू य हों(हो)ति पुवेणं । बितियसरे य कवग्गे, अग्गेईए हवइ पत्थू ।। १६५ ॥ खगृहे परगृहेऽरण्ये या प्रभम् । गृहा(1) प्रथमसरो अवारः, आकारो द्वादशम[स] विसर्गः। आभ्यां केवलाभ्यां प्रभे यत्किंचित् पृच्छति तद् गृहाभ्यंतरे पूर्वेण शेयम् । द्वितीयखरे आकारे कवर्गाक्षरस्योपरिगतेऽप्रवो वाऽनन्तरमवस्थिते यत्किंचित् पृच्छति कश्चिचद् गृहस्या- भ्यन्वरे पूर्वाप.न.पा.दक्षिणदिग्रभागेन द्रव्यम् ॥ १६५ ॥ । .

[ गाथा १६६-१७०] प्रभव्याकरणाख्यं तइए णवमे य सरे, तइए वग्गे हवइ जम्माए। ईकारेकारंमि य, चउत्थवग्गे य निरईए ॥ १६६ ॥ तृतीयवर्गश्वकार(र.), तस्योपरिगतेन तृतीयस्वरेण इकारेण णवमस[रेण] ओकारेण वा चकारस्य वाऽग्रतोऽनंतरमवस्थितेन द्वयोरन्यतरेण दृष्टेन यत्किंचित् पृच्छति तद्गृहस्याभ्यन्तरे दक्षिणस्यां विसि(शि) ज्ञेयम् । चतुर्थवर्गटकारस्योपरिगते[न] ईकारेण ए(ऐ)कारेण वा टकार- : स्यामतो याऽनन्तरमवस्थितेन स्वरदयस्याभ्यन्तरेण दृष्टेन यत्किंचित् पृच्छति तद्गृहस्याभ्यन्तरे नैरइस्यानित्या) दिसि (शि)[प० ८४,पा० २] ज्ञेयम् ॥ १६६ ॥ एकार सत्तस(म)सरे, पंचमवग्गे य वारुणीए उ । छठे दसमसरे [वा], वायचाए उ णायचं ॥ १६७ ।। एकादश स्वरः अं, सप्तम एकारः, वाभ्यां तकारयुक्तस्याग्रतो वाऽनन्तरमवस्थितेन ॥ उभयतः स्थिताभ्यां वा वारुण्यां द्रव्यं ज्ञेयम् । तथा पप्ठे वर्गे पकारे दशमवरेण युक्तेऽप्रतो वाऽनन्तरमवस्थिते वायव्यां [प०८५, पा० १] दिशि द्रव्यं ज्ञेयम् ॥ १६७ ।। पंचमरसे(सरे) य वग्गे, सत्तमए हवति सत्तमदिसाए । अट्ठमवग्गे छ88], सरे य ईसाणिए जाण ॥ १६८ ॥ सप्तमवर्गस्या(स्य) यकारस्याधोगते उकारे यकारस्योपरिगते वाऽनन्तरमवस्थिते यत्किंचित् ।। पृच्छति तद् गृहस्याभ्यन्तरे सौम्यां(सौम्यायां) दिशि द्रव्यं ज्ञेयम् । अष्टमवर्ग[स्य]सकारस्याधो गतो(ते) पष्ठस्तर ऊकार।()[प०८५, पा० २] सकारस्थानन्तरमवस्थिते पृच्छफस्य तगृहाभ्यन्तरे ऐशान्यां दिसि(शि) द्रव्यं ज्ञेयम् ॥ १६८ ॥ अहसरा आइल्ला, अट्ठ य वग्गा य आणुपुबीए । इंदाणीण दिसाणं, कमसो बग्गेसु पविभत्ता ॥ १६९ ॥ उक्तार्थे(३)व गाथाऽनन्तरमपश्चेन ॥ १६९ ॥ सो सट्ठाणाओ, सप(प्प)डिहता हवंति चउत्थाओ। उत्तर अह(हो) सवण्णा, हसंति पुवावरं वग्गं ॥ १७० ॥ प्रश्नायां पूर्ण(व)दिगृ(ग)क्षरसन्मित्रैः पश्चिमदिगक्षरेतुल्यैयोरपि दिशोन्म(म)ध्ये द्रव्य- मादेश्यम् । यदि पूर्व दिगा(ग)प०८६, पा० १]राणां बाहुल्यं सदा पूर्वस्या(स्या) दिति(शि)। 15 पश्चिमदिगा(ग)क्षराणां बाहुल्यं तदा पश्चिमादिक्समीपे द्रव्यमादेश्यम् । दक्षिणदिगा(ग)रै- रुत्तरदिगा(ग)क्षरसन्मिश्रेस्तुल्येय(स्य)योरपि दिशोरनयोम(म)ध्ये द्रव्यं शेयम् । दक्षिणदिग- क्षराणां याहुल्ये दक्षिणदिक्समीपे द्रव्यमवतिष्ठति । पूर्वदिगक्षरैरानेयादिगक्षरः सन्मित्रैम(माध्ये द्वयोरपि दिग्विद(दि)शोरन्तराले द्रव्यं तिष्ठतीति वक्तव्यम् । पूर्व दिगक्षराणां वाहुल्ये पूर्वस्यो दिसि(शि) समीप०८६, पा०२]पे द्रव्यं तिष्ठतीति आदेश्यम् । आग्नेयाक्षरयाहुल्ये आमेयायां दिशि" समीपे द्रव्यं तिष्ठतीति विज्ञेयम् । दक्षिणदिगा(ग)झरेरामेयादिगा(ग)क्षरमित्रैस्तुल्यैर्दक्षिणयां . +- जयपाहुउनाम निमिशास्त्रम् । [गाथा १७१-१७२] दिसि (शि) द्रव्यम् । आमेयायां च मध्ये द्रव्यमादेश्यम् । यदा द्वयोरनयोदि (दिग्विदिशोय(य). पक्षराधिक्ये बलं तदा तस्स(स्था:) समीपे द्रव्यमादेश्यम् । दक्षिणदिगक्षरैनैरु(न)त्यक्षरमिङ- स्तुल्ययोद()योरनयोदि(दि)विदिशोरावराले द्रव्यमवतिष्ठत इत्या[५० ८५, पा. १ देश्यम् । द्वयोरलयोदिग्विदिशोर्यस्य यदक्षराधिक्या पलमधिका(क) तस्याः समीपे द्रव्यं ज्ञेयम् । • पश्चिमदिगक्षरेनेरु(नेप्रत्यक्षरमिस्तुल्यैह(ह)योरनयोदि(दिगविदिशोमध्ये द्रव्यं वक्तव्यम् । यदा द्वयोरनयोर्दिगविदिशोर्यसा [अ]राधिक्याद् पलमधिकं तदा तस्य[स्था:] समीपे द्रव्यं ज्ञेयम् । पश्चिमदिगारमि(मि)श्रेस्तुल्ये (ल्यारनयोदिग्विदिशोर्मध्ये द्रव्यमादेश्यम् । यदा द्वयोरप्यनयोदि- (दिग्विदिसो(शो)र्यस्या दिशो विदिशो पाऽक्षा प० ८५,पा. २] राधिक्याद् बलमधिक सदा वस्याः समीपे द्रव्यमादेश्यम् । उत्तरदिंगक्षरेया(वा)यव्यादिंगक्षरमिश्रेस्तुल्यैरनयोदिग्विदिशोर्मध्ये अव- "तिष्ठते द्रव्यमित्यादेश्यम् । यदा द्वयोरनयोदि(दिग्विदिसो(शो) वाक्षराधिक्याद् [५०८८,पा• १] बलमधिकं तदा तस्याः समीपे द्रव्यं तिष्ठतीत्यादेश्यम् । उत्तरदिगक्षरेदीसा(रीशा)न्याक्षरमित्रैः समैरनयोर्दिग्विविशोर्मध्ये द्रव्यमवतिष्ठतीत्यादेश्यम् । यदा द्वयोरप्यनयोदि(दिग्विदिसो(शो)- [र्यस्य दिशो विदिशो]वाऽक्षराधिक्याद् बलाप०४८,पा]मधिकं तदा तस्य(स्या) समीप द्रव्यमादेश्यम् । पूर्वदिगक्षरैरैसा(शा)न्याक्षरमिभैस्तुल्यैरनयोदिग्यिदिशोर्मध्ये द्रव्यमवतिष्ठते इत्या- " देश्यम् । यदा द्वयोरप्यनयोति(दि)ग्विदिशोर्यस्या दिशो विदिशो पाऽक्षराधिक्याद् पलमधिकं तदा तस्या निकटे द्रव्यं वक्तव्यम् । [५०८९, पा० १] पूर्व दिगक्षरैद(द)क्षिणाक्षरमितुल्यैरनययो- दिविदिशोर्मध्ये द्रव्यमादेश्यम् । यदा द्वयोरप्यनयोदिशोर्यस्या अक्षराधिक्याद् मलमधिकं तदा तस्या निकटे द्रव्यमादेश्यम् । प्रभाक्षराणां मध्ये उक्तदिग्विविद्विधा(विदिगाक्षरबाहुल्येनैवो- वि()त्यादेश्य(श) व्यः ॥ १७ ॥१०८९,पा. २) बितिय चउत्थे वग्गे, समि(भिातर-बाहिरं भवे गेहं । अधरसरेपु(सु) य प(ब)हिया, अधरस(स्स)रसंतु(जु)तेसुं च ॥ १७१ ॥ द्वितीयवर्ग:-'ख छठ फर पाः', वाह्या [एते । एतद्वहुले प्रग्ने पहिगृहा[६] द्रव्यं ज्ञेयम् । चतुर्थवर्गी(2) -- ' घढ घ म यहा' इत्येते अभ्यन्तराः। एतबहुले प्रने गृहाभ्यन्तरे द्रव्यं शेयमिति । द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षरबहुले गृहाद् महि(ग)हाभ्यन्तरे द्रव्यं ज्ञेयम् । अधर- " स्वरसंयुफेश्चि(वि)त्ययमेवार्थः ।। १७१ ॥ 'सगिहम्मि य जं दवं, तं पञ्चा ५०९०, पा. १ ख भये परोक्खं वा । दिव(होमि परोख(क्ख)मि ओ(उ), उट्ठ(प)महो तिरियभागे वा ॥१७२ ॥ खगृहे यं (य)द्रव्यं स्थापित नष्टं घ वच्च प्रत्यक्षं च परोक्षं चेति अप्रत्यक्षमित्य। स्वकायगुर्वक्षरबहुले प्रभे स्वयं स्वया स्थापितमिति प्रष्टा वाच्यम् । स्वर्गसंयोगाक्षरैशष्टो(?) * पतापामा(पिना भ्रात्रा)पितृव्येनेयेवमादिमिः स्थापितं द्रव्यमिति वाच्यम् । अर्द्धकान्त(न्ता)शरै (E)ष्टेः खिया स्थापितमितिवाच्यम् । एवा(ब)मादिभिर्यत्र स्थापितं द्रव्यं तस्योप.४.पा पलब्धिः क्रियते । अर्द्धभागेऽधोना(भागे तिर्यग्भागे वा द्रव्यस्यावस्थितस्य उपरितनया गाया निर्नय(य) पक्षय(क्ष्योति ॥ १४२ ॥ . 4 [गाथा १७३-१७७] प्रश्नव्याकरणाख्य मूलस(स्स)रेसु उटुं(ई), अहो [य धातुस्सरेय(सु) सबसु । सेसेसु तिरि[य]भागे, गेहे दत्थं (ब) तु[ह?] परोक्खं ॥ १७३ ॥ मूलस्वराः 'ई ऐ औ' एतेषु दृष्टेषु प्रश्ने अद्धभागे द्रव्यं तिष्टतीत्यादेश्यम् । धाम्यधातु- स्वरी द्वौ 'उ' आभ्यां दृष्टाभ्यां अधोभागे-द्रव्यं तिष्ठतीयादेश्यम् । शेपेषु-अ आइएओ' एषां पञ्चानां अन्यतमाधिक्ये तिर्यग्भागे द्रव्यमवतिष्ठत इत्यादेश्यम् । स्वगृहे संचयं द्रव्यं नष्टं । तदेभिः स्वरै२०९१, पा० १]ज्ञा(ओ)तव्यमिति ॥ १७३ ॥ जल देवय अग्गिख(घोरं, दिढे वत्थुमि ति[नि?] नि(ति)ट्ठाणं । लक्खेज जीव धाउं, मूलाण य तिनि(नि) वाणइ(ठाणा)ई ॥ १७४ ।। कचटतपय सा(शा)नामान्यतमाधिके प्रश्ने जलगृहे द्रव्यमादेश्यम् । स छठथ • फर पाणां चतुर्थवर्गसंज्ञकानां चान्यतमाधिके प्रश्न गोशालायां द्रव्यमिति ज्ञेयम् । गजड" दवल सा नामन्यतमाधिके प्रश्ने देवगृहे द्रव्यमादेश्यम् । ङवण नमाधिके प्रश्ने अग्निगृहे द्रव्यमवतिष्ठत इत्यादेश्यम् । मिश्रेषु यत्संबंधिनोऽक्षरा वह[:] तस्मिन् द्रव्यमिति शेयम् । जीवयोनौ लब्धायां जीवो नष्टमि(ट इ)त्यादेश्यः । मूलयोनौ लब्धे मूलम्, धातुयोनी लब्धे धाप०९१, पा० २ तुद्रव्यम(व्यं नाटमित्यादेश्यम् । तच्च निखे(वे)व स्थानेविति नष्टिकाखगृहें- काण्डम् ।। १७४॥ छिद्दे तत्थंरिप(रत्यंतरियं), परवकु(त्यु)मणंतरं घणे दिट्टे । जो च्चिय वत्थु निवेसे, गमओ सो चेव रत्थासु ॥ १७५ ॥ फ-गादीनां प्रथम-तृतीयवर्गीयानां छिद्रसंज्ञकानां अन्यतमाक्षराधिके प्रश्ने रथ्यान्तरितं द्रव्यमादेश्यम् । ख-चादीनां वर्गाक्षराणां घनसंज्ञा प० ९२, पा. १]कानां अन्यतमाधिकानां प्रश्ने स्वगृहस्यानन्तरं यत्परगृहं [तस्मिन् द्रव्यमित्यादेश्यम् । एवं [व]स्तुनिवेशविधिरुक्तः । पूर्वाऽऽ- मेयी दक्षिणे(णा) नै(क)त्यपरा वायव्योत्तरेशानी चेति दिक्] । यैरक्षरैग(प)हाभ्यन्तरे एतासु दिक्षु द्रव्यमभिहतं तैरेवाक्षरैस्तेनेच प्रकारेण रथ्यास्वपि द्रष्टव्यम् ।। १७५ ॥ हस्सेसु समं ठाणं, सहावदीहे[प०९२, पा०२]सु उण्णय जाणे । पंचम छटे य सरे, दोसु वि ण्णि(णि)णं मुणेयचं ॥ १७६ ।। हस्वानां अइएओ' एतेपामन्यतमाधिके प्रभे समस्थाने द्रव्यं तिष्ठतीत्यादेश्यम् ।स्वभाव- दीर्घाणां []' एषामन्यतमाधिके प्रश्ने उन्नते भूभागे द्रव्यमवतिष्ठत इति वाच्यम् । पञ्चमस्त्र[उकारः],पष्टवर सकारः, अनयोष्टयोनि(नि)नोन्नतभूभागे द्रव्यं तिष्ठतीत्या- देश्यम् ॥ १७६ ॥ ततियस्सरो वि रत्थं, कवेथेि)ति जइ वंजाप०९३, पा० १ाणे यं संजुत्तो। उत्तर-यंजणसहिते, वितिए उच्चं हवइ ठाणं ॥ १७७ ॥ 15 N ।

,
जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १७८-१८२
तृतीयस्सर इकारः,
•स उक्तान्यतमाक्षरोपरिगतो 'स्थ्यायां द्रव्यमाचष्टे । द्वितीयस्वर
आकारः, सोऽभिवोत्तराक्षर(रा)न्यवमसंयुक्तो रथ्यायामेव द्रव्यं कथयति ॥ १७७ ॥
सविसग्गेसु चउक, साणुस्सारेसु अधरखरठाणं ।
लोइय-लोउत्तरियं, घणक्खरे देउलं लक्खे ॥ १८ ॥
सविसर्ग: 'अ'कारः, स यदा प्रभे अन्यतमाक्षरपार्थस्थि[प०९३, पा० तो दृश्यते केवलो
वा सदा चतुप्पये द्रव्यमादेश्यम् । एकादशमोऽनुस्वारः '' यदाऽन्यतमाक्षरोपरिगतो दृश्यते
केवलो वा तदा तस्य चतुष्पयस्य पश्चिमदिग्भागे द्रव्यमवतिष्ठत इसादेश्यम् । घनाक्षराणां
'सछ ठथ फर पाणां, घ झ ढ घ भ व हा नां पान्यतमवहुले प्रभे लौकिकदेवकुले द्रव्यमादेश्यम् ।
[५.९४,पा० १] लौकिकं देवकुलं शंकरायतनादिकम् । एतेष्वेव घनाक्षरेपूत्तरखरसंयुत्तेपु लोको.
तरदेवकुले द्रव्यमादेश्यम् । लोकोत्तरिकदेवकुले (लोमित्सईतायनं वक्तव्यम् ॥ १५८ ।।
सबत्थ [य] जीव-धातु-मूलाणं लक्खए तउठा(ओ ठाणा ।
एसो य गामदंडो, एसो वि य बाहिरो दंडो ॥ १७९ ।।
सर्वत्र जीव-धातु-मूलानां यदेतत्स्था(२०१४, पा० ३ नष्टस्योक्तं तच जीव (व) धातु(त)
मूलं चेति त्रयम(म)वावधार्यादेशः कार्य इति । तत्र तत्र स्थाने एप दंडो पहिरभ्यन्तरे च प्राम-
७ स्योक्तः । दंडशब्देन च नष्टं व(घ)नमुच्यते ॥ १७९ ॥
॥ नष्टिको(फा)चक्रं समाप्तम् ॥
॥
एतो(तो) चिंतविभागो, मुट्टिविसेसेण अक्खरुप्पत्ती ।
गेहिरिखा(गहरिक्खा)णं सूया,सधेसि उवगयविसेसो ॥ १८ ॥
अतः परं चिन्तावि[५०९५, पा. १ भागस्य मुष्टिविशेपस्य प्रहाणां नक्षत्राणां च सूचनं लेसो-
" (शो)देशेन यथावसरमुत्पत्तिप्रदर्शनं तथाक्षरोत्पादनं च मुवा प्रहरि(ऋक्षाणां च धर्णया-
(नाता)मुपगतविशेषमिति वक्ष(क्ष्य)माणोपन्यासार्थना(ता)। उपगतः शब्दमाप्तपर्यायः ॥१८॥
तह संइणिपणओ वि[य], सचे भावा य सबवाणं ।
गंदावते जोए, सत्त वियप्पा [प०९५, पा०२] हवंति इमे ॥ १८ ॥
पटहास्फोटित-फुट्यपतनादिशब्दो भावशब्देन निन(ण)यवर्णाकृतिप्रमाणादीनि भण्यन्ते ।
" सर्वभावा अक्षरप्रतिबद्धाः 'लाभालाभ-सुखदुःस-जीवितमरण' इत्याद्यक्षरप्रतिबद्धाः । सकल-
द्रव्याणां नन्दिकावाक्ये(ख्ये) करणे सप्त भेदा भयन्तीति वक्ष्यमाणोपन्यासः ॥ १८१ ।।
तथा चैतत् -
पंढमो चिंताभेदो, तस्त य भेदा हवंति अट्ट इमे ।
जीवादीणं जोणी, तिनिहो पढमो हवति भेदो ॥ १८२ ॥

[गाथा १८४-१८७] "प्रश्नव्याकरणाख्यं तेषां सप्तानां भेदानां [प० ९६, पा० १] मध्ये प्रथमचि(श्चि)न्ताभेदः । तस्य भेदा भय- न्त्यष्टौ वक्ष्यमाणाः । जीव-धातु-मूलानां योनिनिविधा या सा प्रथमचिन्ताभेदे पतति ।। १८२ ।। गुरु-लहुय अक्खराणं, संजोओ बितियओ हवंते(वति) भेदो । तितीओ पीडासद्धि(हि)ओ, ततो(तो) अभिघातिता तिनि ॥ १८३ ॥ गुरु-लघ्वक्षराणां सयोगो द्वितीयो भेदः। पीडाभेदस्तृतीयकः । क(क:) पुनरसौ ? अधा- 5 (धो)माना अप्रधाना येऽभिहताः रेफ-यकार-उकार-ऊकार-सहिताः । आलिंगितश्चतुर्थः । अभि- धूमितः पंचमः । दग्धः पष्ठो भेद [५० ९६, पा० २] इति ॥ १८३ ॥ एक्को पयडिविसेसो, सत्तमओ संकडाइ अट्ठमओ। एतो चिंताभेदा, पणयालीअक्खरुप(प्पाण्णा ।। १८४ ।। एक: प्र[क]तिविशेषकः । कु(क)पुनरसौ ? जीवप्रकृति-धातुप्रकृति-मूलप्रकृति रूपः] " सप्तमो भेदः । सकट-विकटभेदा(दो)ऽष्टम उक्त एव । एते चिन्ताभेदाः पचचत्वारिंशदक्षरप्रति- घद्धा इति ॥ १८४॥ ॥ चिन्ताभेदप्रकरणं समाप्तम् ॥ [प०९५, पा० १] ८९ दुगदुग तिग तिग य चतू, चतुक्क पण पण छ सत्त वसु णवया । णामक्खराण य सरा, हवं हों)ति आ(अ)कारादिणं कमसो॥ १८५ ॥ म आ इ ई उजए ओ औ अंभ अकारो द्विसंख्यः । आकारोऽप्य(पि) द्विसंख्य एव। [१०९५, पा० २] इकारस्तृ(स्त्रि)संख्यः। ईकारोऽपि (नि): सख्या(ख्य) एव । उकारच (श्रतुः सख्या(ख्यः) । ऊकारश्चतुःसंख्या(ख्य) एव । एकार[:] पञ्च- संख्या(ख्यः।) ऐकारोऽपि पञ्चसंख्या(ख्य) एव । ओकार[:] पटसंख्या(ख्यः) । औकार:] सप्तसख्या(ख्यः) । अंकार सा(सा)नुखरोऽष्टसंख्यो(ख्यः)। अकारः सविसर्गो नवसंख्याख्यः) । अफारादय[:] स्वरा द्वादश अक्षरैर्युक्ता [प.९८,पा० १] यथोक्तसंख्या द्रष्टव्या इति ॥ १८५।। द्वितीयप्रकार:- चउ ति ति चउक्क चउत्थ, चउ सत्त वयुहण(दृष्टणवय)वग्गं च । संखापरिमाणे तस(स्स)राणऽगाराइणं कमसो ॥ १८६ ॥ एगादीया पंच उ, कमादी(दि) अणुणासियावसाणाणं । कमसो णाम ए(प)माणं, पंचइ(चाण) वि आणुपुबीए ॥ १८७ ॥ ककार एकसख्या(ख्या)। सकार[रो] द्विसख्याख्यः) । गकारस्तु(बि)संख्या(ख्यः) । पकारचतु(श्चतु:)सख्य[:] 1 डकार[:] पनसंख्य इति । एवं क-गादि-कारपर्यवासानां मसा (श:) (१०९८,पा० २] सख्याऽभिहतेति ॥ १८७ ।। 23 ।

, . जयपाहुड़नाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १८८-१९३] जो दे(य)व कवरगकमो, चादीणं सेसयाण सो चेव । वग्गाण होइ गमओ, जाव ण केण(णा)वि संजुत्तो ॥ १८८ ॥ य एव संख्या प्रति [क]वर्गस्य क्रम[:], स एव चादीनां वर्माणां क्रमो शेयः। खरेगा- क्षरेण वा असंयुक्तानां अनमिहतानां चेति ॥ १८८॥ जावतिया संजुत्ता, पत्ते पत्तेसि(बि?) मेलिया संखा । आलिंगियाइ तत्तो, विसुद्धसेसा हवइ संखा ॥ १८९ ॥ स्वरेणाक्षरेण या युक्ते(को) वर्णेन वा अमतो वाऽनंतरमवस्थितेन यः पूर्वाक्षर[] स संयुक्त इत्युच्यते । स संयोगो येन फवः स आप०९९, पा• १]लिंग्यमालिंगयति, अभिधूम- यं(वि)तव्यमभिधूम[य]ति, दग्धव्यं दहतीति । आलिंगिवाभिधूमिवदग्यप्रकाराश्य पूर्वोताः । आलिंगिताभिधूमिवदग्धानां मध्ये यो(या) विद्यते संख्या तो सो(शो)पयित्वा विशुद्ध खाड)वसि- (रि)टा संख्या भवति तथा देस(श:) कार्यः मष्टाः सा भाप.९९, पा. २ ण्यते ॥ १८९॥ एकक तिय तिय दुय दुय, चतु चतु पण छक्क सच वस(सुहं च। कमसो अक्खरमाणं, अवग्गजोए ककारस्स ॥ १९० ॥ एवं सर्ववर्गेपु ज्ञेयम् । एकः [एकः] (त्रि)क: [त्रिकः द्विकः द्विकः] चतुष्कः चतुष्कम्य पंचा(प) पट् सप्ताटो अकारादिभिः स्वः सविसर्गाकारपर्यन्तेद्वा(न्नी)दशभिरन्विवानां फकारादीनां अक्षराणां ज्ञेया संख्या क्रमेण यावद् द्वादश इति ॥ १९ ॥ एमेव(व) {4.101,पा.२] सेसाणं, खाएही(दी)गणुणासिय(या)वसाणाणं । णामपमाण(ण) कमसो, उत्तरवट्ठी(डी)ए नायबो() ॥ १९१ ॥ एवमेव शेषाणामपि यथा फकारस्य अकारादिद्वादशस्वरयोगेन संख्या विहिता तथा खादीनामपि अनुनासिकपर्यन्वानि(ना) नामप्रमाणं क्रमसः(शः) । पोयो)सरथला(या) जातव्यमिति पूर्वगाथायामेष प्रसंगेनोपमिति ।। १९१।। छो (जो) चेव (२.१.२, पा०11 कवग्गकमो, होति उ सो चेव सेसवरगाणं । णामएमाण(ण) गमओ, अवग्गजीएण निप्पनो ॥ १९२ ।। य एष कवर्गस्य क्रमो भवति स एवायसि(शियानां पादिवर्गाणं सवर्गपर्यन्वानां नाम- प्रमाणे गमयतां अवर्गयोगेन निष्पन्न इति। अफारादीनां स्वराणो हफारांवानां संयुपानां था संख्या सा पूर्वगायायाः प्रसंगेन व्याख्याता ॥ १९२ ॥[.१.२, पा..] जह उ अवग्गेण सम, कवग्गमादीण सब(त)वग्गाणं । एवं चिय संजोओ, परोप(प) सेसयाणं पि ॥ १९३ ।। एकाव गाया। यथा भवर्गेण सह कवर्गादीनां सप्तादिना (सप्तानां) वर्गाणां संयोगो(गः) * एव मेव] परस्परा () कादीनां हफारपर्यतानां अक्षराणामपि संयोगो हेयः ॥ १९३ ॥ .

- प्रश्नव्याकरणास्य गाथा १९४-१९५] ७ 09mar 102tur 41549 Œm an १०११ नोन नः ११ १२ .. घ घा G ल च चा 1-MBr08 RS%2 S orgarm Bur m دو سه ر سه قم به نام گریم m ७ Y 61405064 E 2015 اللي له ه تر کره ی قو م , Mpmmmur Isrfmadur 2009 4.wala CRPOEMS to ov Mrm120351 hit i ho er for mokybw IN 000 009 AN PROToto was.. 22 RTER 9 torr9 glur og V . 434931 FFFF2 Hridwt Tre. A8-449404040 FREE OF MANAGEMENaher - 9.8 " : "hts ar m (१००) . F St १० OP NRNbNb25 FFET ender 445-45s, Fr •N 9.0.00 040404040404 Pok MRO100mmrtmns سد و به مو م م ه هم سه ی هوم کر •v 1 Meanderder 0.04.4.64 ९ १० ११ Emp MANA तन संयोगो(गे) आलिंगिताभिधूमितद्ग्धसंख्या कथ्यते-विशेपसंख्या कथ्यते । विशेष- संख्यमानामा(संख्यानाम) प्रमाणमादेश्यम् ।- पढमक्खरसंखाए, जाणसु णामक्खराण परिमाणं । आलिंगिाप० १०३, पा० १]याइ तत्तो, एकोत्तरिया हवइ हाणी ॥ १९४ ॥ प्रभाक्षराणां प्रथमाक्षरस्य या संख्या हस्स(स)ति 1 अभिधूमिता द्वे, दग्धास्तिमा (स.)। संख्या इसति ॥ १९४॥ सेसं उ णामसंखा, णिस्सेसमणंतरस्स संखाए । तत्तो नामपमाणं, पढमिल(लोकमेण यवं ॥ १९५ ॥ नि.मा.

, जयपादुष्टनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा १९६-१९९] 'यस्मा(द)शराय(द)भिघातशुद्धाद्याः (द या) शेपा समानाक्षरसंख्या निर्दिश (टा) यदा पूर्वाक्षरो(स)भिघाव (त)न सफल(ला) शुख्यति बदा तस्या[:] पूर्वस्यानन्तरादभिघातगुदाद्यः (द्यः) शेष[] [न?] नामसंख्या ज्ञेया । तस्मान्नामाक्षरस्य [५० १०३, पा० २] प्रमाणं क्रमेण ज्ञातव्यमित्युक्तम् ॥ १९५ ।। पढ़मो(मा) तइया संपत्कराओ थोवं च संखमिच्छति । वितिय-चउत्था तेसिं, विपत्करा ते य बहुसंखा ॥ १९६ ॥ प्रथमाः- क च ट त प य शाः। तृतीयाः-गज ड द वल साः । तेपी संपत्कृर्वन्ति लो(ला)- भकरा[:]शुभैख(श्वर्यचिंतायाः प्रभुः । कालतरतु स्वल्पकालं भवति । तद्वहुले प्रश्ऽस्पनामाक्षर- संख्या ज्ञेया । द्वितीयो वर्ग:-स छठ थ फर पाः । चतुर्थो वर्ग:-घ झ ढ ध भ व हाः । एते " विपक्ष(क)रा अशुभकरा न लाभकरा इत्यर्थः । अल्पफलं पहुकालिकं च कुर्वन्ति । तदहुले प्रश्ने महती नामाक्षरसंख्या ज्ञातव्या ॥ १९६ ।। एस सराणं गमओ, वग्गाणं सत्तमट्ठा(ट्टमा)णं च । विसमक्खरम(वाग्गाणं, चरिमाणं थोविआ संखा ॥ १९७ ॥ एप स्वराणां विधिरिति यह(दु)क्त हस्वस्वराः संपत्कराले महति(ती) विभूतिं कुर्वन्ति । ॥ लाभकराश्च । नामसंख्याकरास्व(क्षराश्च ?) खल्पां कुर्वन्ति । शेपस्वरा विपत्करा अलाभ- फराः । नामाक्षरसंख्यां महतीं फुर्वन्ति । अमुमेयार्थ पूर्वोकं निर्दिशति । एवं स्वरवर्ग उक्तः । कादयस्तु पंच चान्ये वर्गा उताः । सप्तमवर्गस्याष्टमवर्गस्य च वर्गसंख्या इह(ई)वोक्ता- ऽष्टवर्गक्रमे । विपमाक्षरवर्गा ये, के ? क च ट त पय शाः, गज ड द बलसा स्व(च) । परिमा- स्व(श्च ।)पंचवर्गेण 'उमण न मा' स्व(च)। परिमौ च 'अ' अनयोरप्यल्पसंख्या ज्ञेया ॥१९७॥ जे जे जहा सपक्खा, तेसिं दोण्हं पि मेलिया संखा । अभिहयसुद्धा दुगुणा, काऊणं निदि(दि)से संखा ॥ १९८ ।। प्रभादो योऽक्षरस्तस्स ये स्वपक्षा उच्यन्ते। यैरभिघाताप० १.४, पा. ३] स्याक्षरस्य वत् (कियते । स चानभिघातकः । व्यवहितोऽव्यवहितस्तु न दोपः । तयोर्द्वयोर्मिलितयोर्या संख्या सथा(या ?)नामनिर्देश[:]कार्यः । इत्याद्यार्द्धकारिकाया व्याख्यानम् । एतत्तु विरुद्धम् । यत आदावु- । कम्-"पढमक्खरसंखाए जाणे नामक्खराण परिमाणं । आलिंगियाउ तत्तो, एकतरिया हवा हाणी ।।" इत्यनेन । उच्यते--अन्न उत्सर्गविहितो यो(ऽयं) विधिः । इह त्वपरपवादा(त्वपवादः) । उत्सर्गापपादाच सूत्रोपदेश [प. १०५, पा. 1] इति । प्रागर्द्धनामिहि(ह)तस्य पक्षे द्वयसंख्यायोगे संख्या नामाक्षराणामभिहता । यदा स्वपक्षौ अभिहतो भवतस्तदा सत्यभिपाते अभिपातोक्त- संख्याख्या) विशोध्य शेषा(पां) द्विगुणीकृत्य तदा प्रमाणे (वरप्रमाणो) नामनिर्देशः कार्यः ॥१९८|| परपक्खाणं संख, अभियसुद्धं परोप्परं गुणए । सुण्णेण(ण) विहिऊणं, दवाणं निहिसे संखं ॥ १९९ ॥ यदा धातु-मूल-जीव-संख्या विज्ञातव्या । कियत्परिमाणमिति । तदा स्वपक्षसंख्या नाही(गी)- कृ(क्रिीयते । परपक्षसंख्यैवार्मी(झी)कर्तव्या । अत्राप्युक्ता (क) एव विधिः । प्रश्नादौ योऽक्षर:, ।

- " " [गाथा २००-२०२] , प्रश्नव्याकरणाख्य योऽभिघातकः । तस्य यो व्यवहितोऽव्यवहितान्यः । अवव्यहितोकता(तोता)भ्यामभिघातसु(शु)- द्धाभ्यां परस्परं गुणिने(ते)ति संख्यारूपमिवोच्यते । परस्पर संख्या [या:?] एफपिंडमापाद्य दस- (शं)भिर्गुणय(यित्वा प्रष्टुद्र(द)व्यसंख्यानिर्देशः कार्यः ॥ १९९ ॥ बहुसंख-अप्पसंखा, वट्ठ(डाइ हाइति य अप्पसंखाओ। सोहे [५० १०६, पा. १] तु अप्पसंखं, दवाणं निद्द(दि)से संखं ॥ २० ॥ अथ द्रव्य अल्प[बहुसंख्याया आनयनोप(पा)यः प्रकारान्तरेण कथ्यते-सकला प्रश्नां गृह्य । बहुसंख्या द्वि-चतुर्थ-वर्गाक्षराः, अल्पसंख्या प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराः । तेषां विद्यमानामि- घातशुद्ध(द्धा)नामवसि(शि)टसंख्यापिंडं स्थापयेत् । बहुसंख्यानामपि विद्यमानाभिपातशुद्धानां संख्यापिंडमवस्थापयेत् । द्वयोरनयोः संख्यापिंडयोर्या यत्र सुद्ध्यति तां [५० १०६, पा० २] वत्र सोव(शोध)यित्वा या परिशिष्टा ना(तां) शून्येन विश्वा द्रव्यसंख्या शेया ।। २०० ।।. जह चेव दबसंखा, भणिया तह चेव कालपरिमाणं । एकमणसो करेजा, पुवाइतिउ(रिओ)वएसेणं ॥ २०१ ॥ यथैव द्रव्यसंख्याऽभिहिता तथा तेनैव प्रकारेण तस्या द्रव्यसंख्याया[:] कालपरिमाण फुर्यात् । अनन्यमहानैमित्तिः(त्तिक)पूर्वाचार्योपदेशेनेति । तच कालपरिणाम(माण) कालप्रकरणे यथा वक्ष(क्ष्योतीति नोक्तमिहेति । अन्ये पठन्ति 'तहेघ कालपरिमायणं यथा द्रव्यस्य कालपरिमाणं उपचयापचयं या प्रति । यथा पृष्टः(पु.) [प० १०७, पा० १] आयु[:]प्रमाणमपि वक्तव्यम् । तदुच्यते-देवकी(दैविकी) प्रश्नां परिगृह्य मानसिं(नुपी) या सेवाकाशप्रमोच्यते । प्रष्टुजर्ज)न्मकर्मनक्षत्रसंख्यामभिघातशुद्धामेकत्र संपिंड्य विसो(विंशो)त्तरस(श)तमध्यात्सो(च्छो)ध्यः । शेपं मध्यः । परमायुरेकांते स्थाप्य त[:] प्रत्येकं गर्भरि(क्षसंख्यां मेलयित्वा । स च एकोनविंशत्तमो ग्राह्यः । प्रश्नाच प्रत्येक यो(या) यत्र " शुद्धयति तो विशोध्य यत्से (च्छे)पं तत्पूर्वलब्धपरमायुम(म)ध्याच्छोध्यम् । प्रष्टना(टुर्ना)माक्षरी स्वकालरूपां गणयित्वा छो(शो)धयेत् । शेपः स्फुटः परमायुःपिंडक इति । (प० १०७, पा० २] गतकालपरिज्ञानार्य उदयनक्षत्रसंख्याभिघातशुद्धां संपिंड्यकत्र द्विगुणं फुर्यादेकान्ते अवस्थाप्य सतः जन्मकर्मगर्भरी()मायक्षरसंख्यामभिघातरहितां संपिठ्य(व्या)नन्तरं द्विगुणीकस्य संख्या विशोध्य (१) भूयः सकलां नामाक्षरां सो(शोधयित्या शेपेण अतीतकाल इति । परमायुःपिंडाद्वि- 4 शोभ्य शेपमागा(२०१०८,पा. १]मिनी भवतीति । एवं नैमित्तिकपूर्वाचार्योपदेशेनानत्यमानां (१ नायुप्यमानं) फुर्यादिति ॥ २०१ ॥ तथा लेसाक्षरसंख्यापरिज्ञानार्थम् - अक्खरमीसं दुग(गु)णं, वग्गेयचं सदा पयचेणं । पणपण्णभागसेसं, तंमि गुणा म(अ)क्खरं जाणे ॥ २०२॥ प्रभाक्षराणों या यस स्वरसंख्याऽमिहिता ता संख्यां सकलामेकीकृतां द्विगुणं कृत्वा तवो। पर्गपिरया प. १०८, पा• २]च्छा(प्रस्था)पयेत् । तस च (प्रोस्थापितस्य द्वे किये मयतः । तत्रैका लेसाक्षरसंस्त्यापरिशानक्रिया, द्वितीया घ यानयनफ्रिया। तत्र दायलेसिसाय(क्षारस्य संस्त्या- क्रिया मण्यते-बर्गेये(गायि)त्याऽऽयं स्थापितं प्रातप्रतिरास्स(इया!) पंचपंचास(स)ता मागमपहास - - , ,

जयपाइनाम निमित्तशास्त्रम् । [माथा २१३-२१६]
संवत्सरानरम्य प्रमाक्षराणांमादी स्थितस्य यदा गजहदम ल सा नामन्यतमाक्षरोऽनन्तरमेवापतो
रश्यते गदा ग्रीष्मकार आदेश्यः । तस्य संयत्सराक्षरस आदो स्थितस्य यदा पान ढपभय हा
नामन्यवमाक्षरो दृश्यते तदा मायद्यालो याच्यः ॥ २१२ ॥
पंचमयंमि य वरिसा, वसंतकालं च पढमकादीसु ।
आयक्खरेमु पंचसु, सरओ सेसेसु चड(उ)थं पि ॥ २१३ ॥
तस्यैय गंपरसराक्षरस्य, प्रभाक्षराणामाचल प.११५, पा. १] हमनगा नाम-पर-
माक्षरो पदाऽनन्तरमेपामतो दृश्यते तदा पर्पाकालो(ल:) । वस्वैप संपरसराक्षरस्य प्रभाधराणा-
मापस्प अएक पट इत्येतेपर पयानाम] नन्तरमेयापतो एश्यते तदा पसन
यसन्दफाटो(ल)
आदेश्यः । तस्यैय संवत्सराक्षरस्य प्रभावक्षराणामायस्य प य मा(शा?) इलेतेषां चतुर्गा फेचिन्
" मन्यते न द्वाभ्यां यकार-स()काराभ्यां वदा प्रथमपंचके 'अ-ए' स्वरद्वयं न गण्यते । क चत
इत्येते सद् गण्यन्ते । एषां यदाऽन(५.११६.पा. १ नरमेयान्यवगाक्षरो दृश्यते वदा शरत्काल
आदेश्यः। पोप-माघी हेमन्तः । पाल्गुन-पत्रो यसन्तः । वैशास-ज्येष्ठी मीमः । आपाढ-थायणी
प्रापट्कालः । भाद्रपद-अधयुनो धर्पाकालः । पार्तिक-मार्गशीपों शरत् । एवं क्रमः | गाथा-
पंधानुलोमतया यथा तथोक्तः ॥ २१३ ॥
पढमस्स पढमतइए, फग्गू चिचो य दोसु चाईमु ।
दोस(सु) य कत्तियमासो, मग्गसिरो दोसु चरिमेसु ॥ २१४ ॥
प्रथमवर्गस्य प्रथम-द्वितीय-तृतीये घ [4.118,41. 1] अ-ए-क फाल्गुनः। प्रभादी व्यर-
स्थिवैरि(त्वरैरनन्तरोकानां त्रयाणां मासाक्षराणामन्यतमो यदा दृश्यते तदा फाल्गुनो मासः ।
पर्ष क्रमेण धकार-टकारी क्षेत्रः । सकार-पकारी कार्तिकः । य-स(२) मार्गशीर्पः ।। २१४ ॥
एमेव सेसयाणं, उदुवग्गाणं पंच चउरो(स्था) य ।
मासक्खरा उ कमसो, पोसादी जाव अस्सजुज्जो(जो) ॥ २१५ ॥
आऐस छठ पोषः। फरप माघः । इओगज वैशासः। द वलस ज्येष्ठः ।
ईओघश आपाढा । घमवह श्रायणः । [प.११५,पा.१] उडवण भाद्रपदः । नम
अंशः अश्वयुजः। एवं पोपादिरश्वयुजपर्यवसानिमिति । सघ्र चतुर्थवर्गाक्षरा ये च वत्सर-
(स)क्षरा: 1 पंचमवर्गाक्षरा: मनमा भासाक्षराः। ते मासाक्षराः संवत्सराक्षराणामुपरि-
गता अमतो पा ध्यवसिवानां दहति । दम्धेषु तेषु वर्णाक्षरा मासाक्षरा भवन्ति । तेर्मासादेशः
फार्यः । अश्वयुलमासादारभ्य वर्पप्रवृत्तिः, समाप्तिश्च तस्य भाद्रपदमासे । एवं मासक्रमः उक्तः ।
अनेन लाभालाम[प० ११५, पा०२-सुखदुःस-गमनागमन-जीवितमरण-नष्टजातकादिषु संख्यया
लम्धया प्रश्नाक्षरे: काल आदेश्यः सुसमाहितेन निमित्ते(त)ज्ञान(ब)तेति ॥ २१५ ।।
॥ कालप्रकरणं समाप्तम् ॥
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लाभडि(वियरस लाभ, वदिज जइ उत्तरा हु अणभिया ।
• अहरेसु णत्थि लाहो, जे नि[य] अहराहरा चउरो ॥ २१६ ॥

४७ [गाथा २१७-२२१] प्रश्नव्याकरणाख्यं [प० ११८, पा० १] अनभिहतोत्तराक्षरबहुले प्रश्ने प्राला(ली)भ आदेश्यः । अधराक्षराधिके नास्ति लाभः।येऽपि चाधराधरा[:] चत्वारः स्वराः प्रागुक्ता[] तेऽप्यलाभकराः। 'आईऐ औ' एतेष्वधिके लाभो नास्तीति ॥ २१६ ॥ लब्भइ लहं(?) सजोणुत्तरेसु[प]रजोणि उत्तरे लाभं । लब्भइ विलंबियकाले, सपरिके(क)सं {५० ११८,पा० २] अहएसु ॥२१॥ उत्तरजीवाक्षरबहुले प्रश्ने अभिप्रेतमर्थ(थ) क्षिप्रं लभते स्वजना[त्], तैरेव जीवाक्षरै- रधिकेपु प्रश्ने उत्तरधात्वक्षरमिश्रेषु उत्तरमूलाक्षरमिश्रेषु वा परश(स)काशाह्याभो वाच्य(च्यः) । एपामेष जीवधातु-मूलाक्षराणा]मुत्तराणामधिकानां आलिंगिताभिधूमितानां चिरात् परिशेन वाऽभिग्रे मर्थ प्राप्नोति । यतः (कु)तश्चिद(६)ग्नवास्ति लाभ इति ॥ २१७ ॥ जह चेव य अभिघाते, तह चेव य उत्तराहरेसुं पि । धातुस्सरा य चरिमा, [प० ११९, पा० १] सभावदीहा य अहरहरा ॥२१८।। शुभाशुभं पृच्छत्तः अभिघातरा(ता)लिंगिताभिधूमितदग्धलक्षण उत्तराक्षरेणाधरेण आलिं- गितो(ते) उत्कृष्टात् सकाशादल्पशो भवति । प्रधुः उत्तराक्षरेणाधरो(रा)क्षरेणाभिधूमिते सत्यु- स्कृष्टात् सकाशान्मध्यमलेशो भवति । प्रष्टुः उत्तराक्षरेणाधरो(स)क्षरे दग्धे सत्युत्कृष्टात् सकाशान्म- हालेशो भवति । अधराक्षरेणोत्तराक्षरे आलिंगिते धर्मादल्पदुःखमवाप्नोति । अधराक्षरेणोत्तराक्षरे । अभिधूमिते धर्म(र्मात् ?)मध्यमं दुःखमवा[१० ११९,पा० २]नोति । अधराक्षरेण उत्तराक्षरे दग्धे धर्मान्मह[]दुःखमयामोति । एवं शुभाशुभं पृच्छतो वाच्यम् । धातुखरौ द्वौ 'उ', चरिमो 'अं अ', ङबण न माः । स्वभावदीर्घात्रयः स्वराः 'ई ऐ औ' । इत्येतेषां मध्ये ई औ' अधराघरो(रो) चतुर्थवर्गप्रतिवद्धत्वात् । एते दाह्या दहन्ति, न लाभं कुर्वन्त्यधिका: प्रो । दाह्य(घा)श्य पूर्वोक्ता एव ॥ २१८ ॥ अहरेसु अत्थि लाहो, जइ उत्तरवंजणेण अणुवलिओ। अहरबलाणुवलेणं, पुणो(1) भणिज लाभं तु णत्थि ति ॥ २१९ ॥ अह(ध)रेषु लाभः प्रतिबद्धः अपि वादार्थ भवत्यधरेषु लामो या[प० १२०, पा० १]त्तरे- प्वनुयलित्ता भवन्ति । यदा स्वधराः अधरानुवलास्ता(स्त)दा नास्त्येव लाभ इति ॥ २१९ ॥ जइ अक्खरअणमिहया, पण्हे दंसीति उचरा लहुआ। तो भणसु रायलाभ, अहराहरसंजुए णत्थि ।। २२० ॥ . प्रभायां उत्तराः लघवः जीवाक्षरा: अनभिहता शुद्धा यदा वयः, 'वदा क्षत्रियस्य राज्यार्थिनो राज्यलाभः । शेपवर्णानां यथाखमर्थलाभो वाच्यः । योनिधि(वि)शेपाचाक्षराणां ज्या देश्यम् । 'अधराधर' इति अधरैः अधरस्वरयुक्तर्नास्ति लाम इति प्रागुक्तमेवेति ॥ २२०॥ लाभमि पढमदिढे, [५. १२०, पा• २] तिविहं कालं तु निहिसे तस्स । अतिगतमेस्सं वट्टन्त पंचवरगाणुमाणेणं ॥ २२१.॥ लाभाधिकार एवायम् - लाभे प्रयमं दृष्टे (नि)विधे कालमतीवमनागतं वर्चमानं च । पाणां परिणामेन निशिदिसतत्सूत्रमुपरि गाथा(थ)या व्याख्यास्यति ॥ २२१ ।। 21 .

+ जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा २२२-२२६] पढमतइया हु बग्गा, वटुंते वितई(बियई)ओ अईअंमि । सेसा दोन्नि वि वग्गा, कालंमि अगामिय(य आगमि)संमि ॥२२२ ।। प्रथमवर्गाश्यप० १२१, पा० १]णां फ चरतपयशा नाम्, तृतीयवर्गाक्षराणां गजब दवल सा नाम्, अन्यतमाधिक प्रश्ने वर्तमानकालमवगच्छ । द्वितीयवर्गाक्षराणांस छ ठ थ फर पाणामन्य- 'तमाधिके अतीतकालयमगच्छ । शेपवर्गाक्षराणां घश ढध भय हा नाम, वणनमा नां चान्य तमाधिके भविष्यत्वालमवगच्छ । यदुक्तं वर्तमानकालाधिके प्रश्ने प्रष्टुव(वीर्तमानकालोलि) लाभः । अतीताक्षर प० १२१, पा. २]बहुले प्रश्ने आसीला( ? अतीताला)म: । भविष्यका- लाधिके प्रो भविष्यति लामः ॥ २२२ ।। जा जस्स पुषभणिया, जोणी तस्सक्खराइ लक्खेज्जा । तस्सेव वदे लाभ, वा पाविय णिहिसे तेणं ॥ २२३ ।। या यस्य जीव-धातुमूलानां योनिरुवा तस्यास्त्रिविधाया यौ (योने:) प्रभाक्षराणां मध्ये यदा जीवाक्षरा अधिया भयंति तदा जीवं लभ्यत इति [५० १२२, पा. १]प्रष्टावा(४)च्यम् । द्विपद-चतुष्पदस्य वा अक्षरानुमानेन पूर्वोत्तक्रमेणैव ज्ञेयम् । एवं धा(तु)त्वक्षरा यदा बहव[:] तदा धातुं प्राप्स(स)तीति मनुवा(वा)च्यः । यदा मूलाधिकः, सदा मूलद्रव्य- ॥ मयामोतीति धत्तव्यम् ॥ २२३ ॥ तदा वक्तव्य इति गाथान्तरेणाह- पण्हक्खरेसु पढमो, जारिसओ उद्दिसिज्ज जीवाई। तारिसयस्स य लाभो, दायाति य [५० १२२, पा० ३} णिहिसे तेणं ॥२२॥ उक्तार्थव गाथा ।। २२४ ॥ पढमाइ बंभणाणं, बीओ वग्गो हवइ वेसाणं । तइओ य खचियाणं, सुद्दाणं सेसया दोष्णि ॥ २२५ ॥ प्रथमवर्गाक्षराणां कपट त प य शा ना अन्यतमाधिके प्रश्ने ब्राह्मणसकाशालाभो(लाभ) आदेश्यः। द्वितीयवर्गाक्षराणां ख छठ थ फरपाणां अन्यतमाधिके प्रश्ने वैश्याला(हा)भो वपन्यः । तृतीयवर्गाक्षणां] गज ड द वल सा नामन्यतमाधिके प्रभे क्षत्रियाला(हा)भो वक्तव्यः । शेप- वर्गाणां घ झध भ व हानां वाहुल्ये तदा शूद्रा[] लाभो वक्तव्य [प. १२३, पा- 1] इति । दम पनमा [नां] अन्यतमबहुले संकरजातीयाला(ला)भ इति । अस्यैव जातीयका उक्ता उक्तं घ द्रष्टव्यम् ॥ २२५॥ अथे(प्प)वि यणभिहया, वणिया (ग्गिय ?) वग्गा(प्णा )सवग्गसंजुत्ता । अभिहयपरसंजुत्ता, णीया (णय) हीणाहियसमा भणिया ॥ २२६ ॥ अनभिहताः सर्ववर्णाक्षरा: तापलि(हिंगो भवति। तैः प्रमाधिके लामो भवति । ये पर- पा(स)रमभिनन्ति । क पटतपयशातरुपरिगतः, घझदय भव हा नां च गज हदम ल से 30 , 4 1 [गाथा २२७-२३०] प्रश्नव्याकरणाख्य रुपरिगतेभ(भ)यति । स्व[व]र्गसंयोगः । तदहुले प्रश्ने लाभो भवति । ये परस्परमभिन्नति । स चाभिप० १२३, पा० २]घातखिविधः । आलिंगितादिकः पूर्वोक्तः । योऽसौ मता तदभिघातेन यम्मा(१) कदाचित्संख्यया हीना[:] कदाचिर(द)धिका[6] कदाचित्समा भवति (न्ति) । एफै- (ते)न अभिम(ह)न्यते(१) । हीने(3) फललाभ[:] प्रश्ने समे ईपत्फलं भवति । एष्टैरधिकैख(श्च) फलाभावः । एवमेखि(भिः) शुद्धशेपैः शुभाशुभमध्यमादेश्यम् ।। २२६ ॥ पढम-तइज(जे) वग्गे, होइ [५० १२४, पा० १] सुही दुक्खिओं बीया-चउत्थे । पंचमए पुण वग्गे, सुह-दुक्खे(क्लं) मज्झिमं तस्स ॥ २२७ ॥ प्रथमवर्ग:- :-फचटतपय शाः। तृतीयो वर्ग:ज ल साः। एपामक्षराणां बाहुल्ये सुखविवक्षायां प्रष्टाः] सुखलाभो भविष्यति सुखायान्ति(प्ति)रित्यर्थः । द्वितीयवर्ग:-सछठथ फर पाः। चतुर्थी-घशधभव हारे(ए)तेषां अक्षराणां पाहुल्ये प्रष्टादु(शुरु)त्पातो प० ११४, पा.१] " शेयः । दु(उत्पाता]गमो वा भविष्यतीति । पंचमवर्गो-मापनमाः । तेषु च [सुखदुःसं मध्यममवाप्नोति । एवमसौ सुख-दुःखी (खानि ?) या तत्राप्ये (मो)ति येवं(ए) वाच्यम् ।।२२७|| बीय-चउत्था वग्गा, दिवा इच्छंति सुबहु आउं [च] । पंचमओ पुण वग्गो, ममि(ज्झि)मआउं सया इच्छे ।। २२८ ॥ द्वितीयवर्ग:-स छठ थ फर पाः । चतुर्य:-घश ढा प० १२५, पा० १]भ व हाः। एतेपाम ॥ क्षराणां घाहुल्ये भायु[:] पृच्छता, आयु[:] प्रच्छु(भूतं वक्तव्यम् । फलं लाभादिकं पृच्छवि(त:) अल्पं यफव्यम्। पंचमवर्गाक्षरा[ग] - हमण न मा नां बाहुल्ये मध्यमायुः पृच्छकस्य, लाममो मध्यमो लामो याच्यः ॥ २२८॥ उत्तरसरसंयु(जु)त्ता, सबे अप्पाउआ फलमुति । [१० १२५, पा० २) अहरस्सरसंजुत्ता, तुह (१सुवहुं) इ(य)च्छंति ते आउं ॥ २२९ ॥ उत्तरस्वराः पूर्वोक्तास्तैः संयुक्ता उत्तराभराः प्रथम-मृतीयवर्गीयाः । सद्बहुले प्रो यदि लाभादिकं फलं पृच्छति तेषां प्रभूतं फलं भवति । येऽप्यायुः पृच्छंति तेपामल्पमायुर्भयति(ती). यादेश्यम् । स एवाधिका उत्तराक्षरा अधरस्यरयुक्ता आयुःप्रश्ने प्रभूतमायुः प्रयच्छति । फल- प्रमे फलं पाल्पं लाभादिकमिति ।। २२९ ।। अब विसण्णो आयुमि होइ सुद्धेसु काइमाईसु । सत्तण्ह मेसममा(वसा?)दि सरसंजुत्तेसु विवज्जासो ॥ २३० ।। पंपपर्गन्यायेन स(सा)मान्यतः फलं पृच्छकस्सायु(५० १२६, पा.योम] | मष्ट- पर्गन्यायेन सममुपाय आयुर्विभागो नष्टविगागो नष्टजासमिति धाव्यमिति । कायादि- सप्तवर्गेषु शुदेष मेपादिराशयः । सप्त फर्य ? । प्रभाक्षरं गृह्य आधारं त्यक्त्या द्वितीये कप रतपयशाचा(दि)वर्गाक्षराणां यर्गान्यतमं शुद्धमात्रारहितं यद् घर्गमयं याति दृष्टं स रासि(शि). रुदयादिः। तत्र घ वर्गे यदि (यत?)मो वर्ण[] तति लिसा(फला?) शोम्या। पटस(स)को पर्णःवर्षे पटूलाः सोमो)प्याः। गुग्यमानस वर्णप्रमागेन पट्लाः शोभ्याः । पी(सपा)गस पंपमो रेफः, स- .

- ४८ . U जयपाहुटनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा २२२-२२६] पढमतइया हु बग्गा, वटुंते वितई(वियई)ओ अईमि । सेसा दोन्नि वि वग्गा, कालंमि अगामिय(य आगमि)रसंमि ॥ २२२ ।। प्रथमवर्गाक्षरापि० १२१, पा. १णांक घटतपय शा नाम्, तृतीययाक्षराणां गजब यह सानाम, अन्यतमाधिके प्रवर्तमानकालमवगच्छ। द्वितीयवर्णाक्षराणांस छठप फर पाणामन्य- तिमाधिके अतीतकालयमगच्छ। शेपवर्गाक्षराणां घ झ ढधभ वहा नाम, उमण न मा नां चान्य तमाधिके भविष्यत्कारमयगच्छ । यदुक्तं वर्तमानकालाधिफे प्रश्ने प्रव(वर्तमानकालोले) लाभः । अतीताक्षरी ५० १२१, पा. २ बहुले प्रश् आसीलाई ? अतीताला)भः । भविष्यका- लाधिके प्रश्ने भविष्यति लाभः ॥ २२२ ॥ जा जस्स पुवभणिया, जोणी तस्सक्खराइ लक्खेजा। तस्सेव वदे लाभ, वा पाविय णिहिसे तेणं ॥ २२३ ।। या यस्य जीव-धातुमूलानां योनिरुता तस्यानिविधाया यो (योनेः) प्रभाक्षराणां मध्ये यदा जीवाक्षरा अधिका भवंति बदा जीवं लभ्यत इति [प• १२२, पा. १)अष्टावा(टुर्या)च्यम् । द्विभद-चतुप्पदस्स या अक्षरानुमानेन पूर्वोत्तकमेणैव ज्ञेयम् । एवं धा(तु त्वक्षरा यदा वहव[:] तदा धातुं प्राप्स(प्स्य)तीति प्रष्टुपा(वा)च्यः । यदा मूलाधिकः, तदा मूलद्रव्य- 5 मवाप्नोतीति वक्तव्यम् ॥ २२३ ॥ तदा वक्तव्य इति गाथान्तरेणाह- पण्हक्खरेसु पढमो, जारिसओ उद्दिसिज जीवाई। तारिसयरस य लाभो, दायाति य [५० १२२, पा० २] णिहिसे तेणं ॥२२॥ उपाथैव गाथा ।। २२४ ] पढमाइ बंभणाणं, बीओ वग्गो हबइ वेसाणं । तइओ य खतियाणं, सुद्दाणं सेसया दोणि ॥ २२५ ।। प्रथमवर्गाक्षराणां च ट त पयशानां अन्यतमाधिके प्रश्ने ब्राह्मणसकाशालाभो(लाभ) आदेश्यः। द्वितीयवर्गाक्षराणां सछठ थ फर पाणां अन्यतमाधिके प्रश्न वैश्याला (ला)भो वक्तव्यः। तृतीयवर्गाक्षरा[f] गजड दुघल सा नामन्यवमाधिके प्रभे क्षत्रियाला(ला)भो वक्तव्यः । शेष- । वर्गाणां घझध भ व हानां बाहुल्ये तदा शूद्राति] लाभो वक्तव्य [५० ११३, पा. १] इति । इन पनमा [नां] अन्यतमबहुले संकरजातीयाला(सा)भ इति । अस्मैव जातीयका उका उक्तं प 20 . , द्रष्टव्यम् ॥ २२५ ।। अथे(प्पै)वि यणभिहया, वणिया (ग्गिय एवम्मा(ण्णा )सवग्गसंजुचा । अभियपरसंजुत्ता, णीया (णय) हीणाहियसमा भणिया ॥ २२६ ॥ 'अनभिहताः सर्ववर्णाक्षराः ताथलि (लि)गो भवति। ते प्रभाधिके थाभो भवति । ये पर- पा(प)रमभिनन्ति । क प ट त पयशास]रुपरिगतैः, पझ उघभव हा मां च गजर६ प ल सै [गाथा २२७-२३०] प्रभव्याकरणाख्य रुपरिगतेभ(भवति । स्थ[व]र्गसंयोगः । तद्वहुले प्रश्ने लाभो भवति । ये परस्परमभिनंति । स चापि०१२३,पा. २]पातत्रिविधः । आलिंगितादिकः पूर्वोक्तः । योऽसौ नता तदभिघातेन पम्मा(गः) कदाचित्संख्यया हीना[:] कदाचिर(द)धिका[:] कदाचित्समा भवति (न्ति) । एकै- ( ?)न अभिम(ह)न्यते(')। हीने(1) फललाम[३] प्रभे समे ईपत्फलं भवति । दृष्टैरधिकैख(च) फलाभावः । एवमेति मिः) शुद्धशेपैः शुभाशुभमध्यमादेश्यम् ।। २२६ ॥ पढम-तइज्ज(जे) वग्गे, होइ [१० १२४, पा० १] सुही दुक्खिओं बीयाचउत्थे । पंचमए पुण वग्गे, सुह-दुक्खे(क्ख) मज्झिमं तस्स ॥ २२७ ॥ प्रथमवर्ग:-फ च ट त प य शाः। तृतीयो वर्ग:ना ज ड द ब ल साः। एपामक्षराणां बाहुल्ये सुखविषक्षायां प्रष्टाः] सुखलाभो भविष्यति सुखापान्ति(प्ति)रित्यर्थः । द्वितीयवर्ग:-ख छ ठ थ फर पाः। पतुर्थो-घ झढ धभ व हाः। रे(ए)तेषां अक्षराणां पाहुल्ये प्रष्टादु(हरु)त्पातो[५० १२४, पा० २] " शेयः । दु(उ)पाता]गमो का भविष्यतीति । पंचमवर्गो-बनमाः । तेषु च [सुखदुःख मध्यममपामोति । एवमसौ सुख-दुःखी (खानि ?) वा तनाप्ये(मो)ति येवं(एवं) वाच्यम् ॥२२७॥ चीय-चउत्था धग्गा, दिवा इच्छंति सुबहु आउं [च । पंचमओ पुण वग्गो, मभि(ज्झि)मआउं सया इच्छे ॥ २२८ ॥ द्वितीयवर्ग:-ख छ ठ थ फर पाः । चतुर्थ:-घस ढाप० १२५, पा० १भ व हाः । एतेषाम- ।। क्षराणां पाहुल्ये आयु[:] पृच्छतः, आयु[:] प्रच्छु(भूत वक्तव्यम् । फलं लाभादिकं पृच्छति(तः) अस्पं वक्तव्यम् । पंचमपर्गाक्षरा[गां]- अणनमा नां बाहुल्ये मध्यमायुः पृच्छकस्य, लाभप्रभे मध्यमो लामो वाच्यः ॥ २२८॥ उत्तरसरसंयु(जु)चा, सचे अप्पाउआ फलमुवेति । [१० १२५, पा. २] अहरस्सरसंजुत्ता, तुह (सुबहुं) इ(य)च्छंति ते आउं ॥ २२९॥ उत्तरस्वराः पूर्वोक्तास्तैः संयुक्ता उत्तराक्षराः प्रथम-तृतीयवर्गीयाः । तद्बहुले प्रो यदि लाभादिकं फलं पृच्छति तेपी प्रभूतं फलं भवति । येऽप्यायुः पृच्छंति तेपामल्पमायुभवति(ती)- सादेश्यम् । त एवाधिका उत्तराक्षरा अधरसरयुक्का आयुःप्रभे प्रभूतमायुः प्रयच्छति । फल- मझे फलं पाल्पं लाभादिफमिति ॥ २२९ ॥ अहव विसण्णो आयुमि होइ सुद्धेसु काइमाईसु । सतह मेसममा(वसादि सरसंजुचेसु विवजासो ॥ २३० ॥ पंचयर्गन्यायेन स(सा)मान्यतः फलं पृच्छकस्यायु(प० १२६,पा० न्योताम्] । अष्ट- पर्गन्यायेन सप्तमुपाय आयुर्षिमागो नष्टविभागो नष्टजासकमिति वक्तव्यमिति । फाद्यादि- सप्तयर्गेषु शुद्धेषु मेपादिराशयः । सप्त कथं । प्रभाक्षरं गृह्य आद्यक्षरं त्यक्त्या द्वितीये कप टन प य शा'पा(दि)वर्गाक्षराणां वर्गान्यतमं शुद्धमात्रारहितं यद् वर्गमध्यं याति दृष्टं सरासि(शि)- सत्यारिः। तत्र प वर्गे यदि (यती)मो वा तति लिप्ता(फला?) शोध्या। पडस(श)को वर्णः ।वर्णे पट्ला। सोमो)प्याः । शुन्यमानस्य वर्णप्रमागेन पटूलाः शोध्याः। पड़(एवी)र्गस्य पंचमो रेफः, स- नि.१.७ । 40 जयपाहुडनाम निमिवशालम् । [गाथा २३१-२५३] [सम]वर्गस्य क्षकारः, यएर च[प.११६,पा.१/वर्गाश्च पृधिकादिकाः । एते खरा संवखयेव कुर्वन्ति । एवं खरयुक्त आयतत्यागेन वि१] पर्ययो द्रष्टव्यः । एवं वर्ग(?)मानं उ प्रभाशेरे- उत्साद्यते । अतः सिद्धाक्षराशिरुत्पद्य(पाद्या १)। यं द्वाश सरा द्विगुणीत्यास्थाप्याकाश- प्रभया दशकसंख्यया निव्यया गुण्य जातं शवयं चत्वारिंशप. ११५, पात्यधिक सिद्धरासि(शि) • स्थाय प्रभागतलमांश[] विशोध्य शेषमागं फफारगर्मेण फादिवर्गाष्टकगुणेन लब्धं एकान्ते खान्य, रूपमेकं शेपवणांकानां यथादृष्टी(९) स्थाप्य, पष्टिच्छेदं याऽत्रस्याप्य, उपरिवर्णराशिसव- ज्ये(१) पठिपंचमिगु(ग)ज्यं तेन भागोपरि राशे[:] लब्धानि वर्षाणि । शेपं स्वरगुणं लब्धा मा- सा[३] पाक्षरद्वयगर्भगुणे दिनानि । 'क घटत' चतुरक्षरवर्गगुणे [प- १२५, पा०२] पटिकाः । पवद्वविक्रमेण स्थाप्य ककारगर्भपड्वर्गगुणाद्विशोध्य पृच्छकस प्रथममध्यम-तृतीयावस्या निजा(शा)य धारयादिश्यंय देयम् । विसो या अष्टवर्ग ये आद्यन्तपाते पड्वर्गक्षेपोपवतो पा हतीयवसा(शा)यां एक पटतपयश' वर्ग शोध्य पाऽय(प)नीयं वा । एवमावृत्या यावति- (मि)विसकाल इति । यायंतस्य(च) पर्याया पात्यापि. १२८, पा(त्रि)करस बलाचवस्थामु शुष्यति (न्ति) प्रक्षिप्यन्ते पा धावपूर्णक्षेपादयोऽप्यसापाचोयण्ण(सावपि घुझ्या पासो देयो मा । एवं पृच्छकस्यातीतः कालः स्फुटः । आगामिकालपरिज्ञानार्थ य एपः अति (सी)वकाला, ॥ एप चतुष्टयगुणाकार:, गर्भाद्विसो(शो)घ्य वर्षादि । इदानीं तस्माद्याव(ती) दसा(शा) विभागां- सा(शा) प[स]ति दापति (सी) इह क्षेत्राक्षिप्तेषु पात्या । [५.१२८,पा.२] इह शेषमार्गादि- वर्गाविस(ग)ग उमययोगे सर्षे () वर्णाप्रमिति (1) || २३०॥ आउंमि जो वियप्पो, काले देसे य होइ सो चेव । अणुणासिया य सबे, चरिमा सेसा समा भणिया ॥ २३१ ॥ भायुपि या क्रमोऽभिहितः स एष फालो(ले) वक्तव्यः । उत्पाधिकः क्षिप्र लावतीति पकव्यम् । अधराक्षररचयक्षरान(नुवलिः, दृष्टि(टै)रधिः स्व(चि)रेण प्राप्स्यतीति प्रष्टा पाच्यः । सो(शो) माम-विपयादिलक्षणः । मामादिकस्य लाभो भवतीति प्रभे उत्तराक्षरैरधि- कैलब्धैः क्षिप्रं] अधराक्षेरैश्चोत्तरानुयलितः [प- १२९, पा० १] स्व[चिोरण लाभः । अघराक्षरै- श्वाधिकैर्नास्ति लाभः । अनुनासिकाश्चरिमसंज्ञास्तैः समो लामः खयोनिगुणतुल्य इति ।।२३१॥ ॥ लाभगंडिकाप्रकरणं समाप्तम् ।। I - इतरतइ)य-पढमेसु य जलं, पीय-चउत्थेसु अप्पपाणीय । पंचमए पुण वगे, णस्थि जलं चेव णायचं ॥ २३२ ॥ प्रथमवर्ग-तृतीययाक्षराधिके प्रो नाति अलमादेश्यम् । या मात्रा [:१] स्ववर्गप्रति- यद्धाः वाभिरप्येवमेवैति ।। २३२ ॥ पढम-तइएस [पर]मा, वितिए मज्झा उ सस्ससंपत्ती । चउ-पंचमए आयरिए (७) णत्थि सरसं ते(ति) जाणेज्जा ॥ २३३ ।।

[गाथा २३४-२३९] प्रभव्याकरणाख्यं प्रथम-तृतीय[५० १२९, पा० २]वर्गाक्षराधिके सस्यनिष्पत्तिः उत्कृष्टा । द्वितीयवर्गाक्ष- राधिके मध्यमा सस्यनिष्पत्तिः । चतुर्थवर्गाक्षराधिके स्तोकं निष्पद्यते । पंचसवर्गाक्षराधिके तोक- मपि नास्ति सस्यम् ॥ २३३ ॥ पढम-तइयंमि वग्गे, सइत्तणं तह य बीयए असई। चउत्थ-पंचमए बग्गंमि(ग्गे) णत्थि सइ चिय णायबा ॥ २३४ ॥ प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराधिके प्रश्ने महती सती ज्ञेया। द्वितीयवर्गाक्षराधिके प्रश्ने मध्यमा सती क्षेया। पतुर्थ-पंचमवर्गाक्षराधिके प्रश्ने सतीरेय नास्तीति निष्पत्त्यभावात् ।। २३४॥ ॥ वर्गस्य (प० १३०, पा० १] गंडिका समाप्ता॥ Priye आदा पुस्सो [य] महा, हत्थो चित्ता तहेव [साई य] । जिट्ठा [मू]लो एए, इ(दु)अक्खरा अट्ट नक्खत्ता ॥ २३५ ॥ आर्द्रा-पुष्य-मघा-हस्त-चित्रा-खाति-ज्येष्ठा-मूला अष्टौ रे(न्य)क्षराणि नक्षत्राणि ज्ञातव्यानि ।। अस्सिणि भरणि तह(य) कित्तिय, रोहिणि फणिदेवया विसाहा य । रेवय सवण धणिहा, तिअक(क्ख)रा णव उ नक्खत्ता ॥ २३६ ॥ अश्विनी-भरणि-कृत्तिका-रोहिणी-अश्लेपा-[विशाखा]-श्रवण-धरि(नि)या-रेवत्य इति नप- नक्षत्राणि अध्य)क्षराणीति ॥ २३६ [प० १३०, पा० २] मिगसिर पुणव(ब)सु विन्नि, पुवासादाणुराधजलदेवा । एए पंच वि (रि)क्खा, चउरक्खरनामया भणिया ॥ २३७ ॥ मृगसि(शि)र: पुनर्वसुः पूर्वापाढा अनुराधा शतभिपा एतानि पंच नक्षत्राणि [पतुर- क्षरनामकानि भणितानी]ति ॥ २३७ ।। भृगदेवा दगदेवा, रिक्खा पंचक्खरा दुवे एते । अष्ट(ज)म-विस्सा छफं, सचक्खवि(रि)याहिबुद्धी(बन्धु)या ॥ २३८ ।। पूर्वाफाल्गुनी उत्तरापाढा वे एते सभाव(भेड)पिपंचाक्षरी(२)। अर्यमदेयता-उचराफाल्गुनी, विधदेवता-पूर्वाभाद्रपदौ एतौ पडक्षरौ । अहियन्धुः उत्तराभाद्रपदा सप्ताक्षरा ॥ २३८ ॥ दोक्खरमादीणं, णक्खचग(ता?)णं [कमेण ?] ठावेउं । पण्हाइमसंखाए, [५० १३१, पा. १] णक्खत्तगणं वियाणाहि ॥ २३९ ॥ अक्षरादीनां नत्राणां सरा(मा)भरपर्यन्वानां क्रमेण स्थापयित्या प्रभाक्षराणां चापक्षर- संरत्ययाऽमिपातसुद्धा नक्षत्रगणमभ्या नक्षत्रगणं जानीहि पक्ष पर पतुरक्षरे पंचाक्षरं पडक्षरं सप्ताक्षरे पेति ॥ २३९ ।। "गण गावे ग्रेनि मादा नपाठः।

५४ । - 11 जयपाहुडनाम निमित्तशासम् । -गाथा २१७-२४९]. (हासं१) प्राप्नुवंति । निदर्शनम्-[ककारः] सकारेणालिंमितश्वकारं प्रामुवं(मो)ति । एवं पकारः इ(छ?)कारेणालिंगितः ट(ट)कारं प्राप्नुय(प्रो)ति । तथा गकारो [प०११७, पा०२] प्रकारेणाभिधू- मितः जकारं प्राप्नुय(मोति । जकारः झकारेणाभिधूमितः डकार प्राप्नोति । एवं पकारो ड(?) कारेण दग्धः ककार प्रामोति । एवमन्येऽपि [व]क्षगः संयुक्ता द्वितीयादिवर्गान प्राप्नुवंति । । द्वितीयवर्गमहणेन द्वितीयोऽक्षर उच्यते । त एव संयुक्ता आलिंगिताः स्थानद्वयहसि[व] त्वात् वे तदा तृतीय स्थान टवर्ग प्रामो(मुवं)ति। एवं गकारोऽपि संयुक्तो यदाऽऽलिंग्यते तदा[प० १३८, पा• 1] तृतीयं वर्ग प्रामोति । एवं संयुकाभिधूमिताश्चतुर्थो(र्थम्?) दग्धाः पंचममिति ॥ २४६ ।। सहाणमुति दढा, बत्तीस एस्थ होंति संयो(जो)गा। हस्सा य संति कमसो, चउवग्गकमेण एकेकं ॥ २७ ॥ स्वस्था[न] मुच (मुपय )न्ति दग्धाः । वत्र सरा(माक्षरसंयोगेमा(ना)लिंगिताभिधूमितद- ग्धसंयोगेन च द्वानिस(शन)संयोगा भवन्ति । तानुपरि निर्वयिष्यति । अष्टौ वर्गाः संयुक्का- लिंगिवदग्धाभिधूमिता इत्येते चतुभिर्विका प. १२८, पाल्पगुणिता द्वारीस(त्रिंश) भवति(न्ति)। हिस्ता(हसिता)येऽक्षरास्ते श्रालिंगितास्ते द्वितीय स्थान प्राप्नुवंति ।अभिधूमिता[]तृतीयम् दग्धा[] चतुर्थ स्थान प्राप्नुवंति । एतच निदर्शनेन पूर्वशेषा(?) वर्णिवमितो(त उ?)क्तम् । अनंतरगा- " यानुसारेणास्यायमर्थ:-'हस्सा लहंति कमसो' चतुर्थवर्गक्रमेणेति एकेक वर्ग प्राप्नुवन्ति । संयो- गस [५० १३९, पा. १] च भावत्वात् 'आइएओ' एते चत्वारः खमहणेन स्वरा गृह्यन्ते । तत्र अकारः प्रभादौ अन्यत्र वा निरुपहतः अवर्गमेव प्राप्नोति । कमारोपरिगत इकारः कवर्ग प्रामोति । चकारोपरिगव एकार[:] पवर्ग प्राप्नोति । टकारोपरिगता ओकारः टवर्ग प्रानोति ।। २४७ ॥ बितिय-चउत्थो पंचम-छट्ठो अण्णेसुलहदि (प०१३९, पा. २]आदेसा। लमदि अ चरिम चउको, तकारमादीस(सु) एकेकं ॥ २४८ द्वितीय आकारः, चतुर्थ ईफारः, पंचम [उकारः, प] अकारः । पते चत्वारः खरा अन्यवर्गाक्षराणामुपरि प्राप्नुवंति । के ते अन्यत्रर्गाक्षराः १ 'तपयशा' । तत्र वकारस्योपरिगत आकार[:] तपर्ग लभते । पकारस्योपरिगत ईकारः पवर्ग लभते ।[1०1४०, पा. 11(प)कार उकारेण युक्त प(य)वर्ग लभते । शफार कारेण युतः शवर्ग प्राप्नोति । शफारश्चरिमस्तनास्तीति प यशाः' चतु(वा)रोऽपि परिमसंज्ञाः । अत एवानि(पास्मिन्) पतुफे(के) इखाणां सराणां संयोगेन तत्प्रामोति (प्राप्ति)रुका ॥ २४८॥ अणुवलिया तिहदा वा, जुत्ता पुधावरेण एफेक । एस सराण णिवेदो(सो), ककारमादी[स] त(ब)ष्णेसु ॥ २४९ ॥ अनुवतियशब्द आलिंगितवापि(पी) । अनुवलिता द्विविधाः-उत्तरान(न)पलिता अपरा- " नुपलिताय 1 शत्र अपराक्षर उत्तरस्वरसंयुक्त उत्तरान(न)वलिवश(सन्दा १) । यद्वर्गसंबंधितेन स्वरेणाक्षरो युक्तस्तस्मिन्नेव घ घार्गे (प.४.पा. २ उत्तरान(न)पलिवत्वादुत्तराक्षरं लभते । खरा[णामपि मध्ये ब(त)मेय स्वरमुचरं प्रामोति । उत्तराशरोऽध्यधरस्वरयुपो अपरानुपलित- संज्ञः। यद्वर्गसंबंधी(घि )तेन खरेणाक्षरो युक्तस्वस्मिन्नेव व अपरानुवलितत्वादपराभर लमते । - ५५ 10 [गाथा २५०-२५३] प्रभव्याकरणाख्य खराणामपि मध्ये तमेव स्वरमुत्तर(मघर) प्राप्नोति । उत्तराक्षरोऽप्यधरस्वरयुक्तीधर.......... .............. भिधूम्यते स द्वितीयवर्ग- मवाप्नोति । निदर्शनम्- ककारोऽभिधूमितः खकारेण [च]वर्ग प्राप्नोति । खकारोऽभिधूमितो घकारेण छवर्ग प्राप्नोति । गकारोऽभिधूमितो कारण अवर्ग प्राप्नोति । ककारो दग्धः कारण टवर्ग प्राप्नोति । एवमन्येऽप्यक्षरा[:] पूर्वाभिहि[प० १४१, पा० २ तविस्तरक्रमेण द्रष्टव्याये संयुक्ताक्षरास्तेषामुपरि योऽक्षरः स स(स्थ)वर्गाक्षरं लमते । उत्तरः उत्तराक्षरमधरोऽप्यधराक्षर- मवानोति । एप स्वरनिवेशक(शः) सकारादिषु हकारान्तेष्वक्षरे[५] आलिंगिताभिधूमितदग्धलक्षण उक्तः । इखा लभंते । आदिचतुष्कम्-अकारप्रभृतयः । [५० १४२, पा० १]अन्यचतुष्कं प्राप्नो(- मुवं?)ति साभ्यां (१ सान्त्य) वर्ग लभन्त इति ॥२४९॥ अस्यैवार्थस्यातिदेशार्थ कारिकान्तरमाह - जह चेव सरवसेसो (विभागो), ककारमादीसु (व)जणेसु पि । एमेव (वि] रई(इ)यबो, णिरंतरं जाव [उ हकारो ॥ २५० ॥ एवमेव कर्तव्यो निरंतरं ककारादारभ्य यावत् हकार इत्येप वर्गलब्ध्यर्थ स्वरविभागो विज्ञातव्यो व्यंजनेषु । अयमर्थः पूर्वगाथयाऽभिहित इति नोक्तः ॥ २५० ॥ [१० १४२,पा० २] एवं अनानुपूर्वो(वी)प्रपंचेन पष्ठं प्र(?)करणम् ॥ जो य सराण विभाग, देसेदि य सत्तमो य सो करणो । एमेव वंजणाणं, विभावणो अट्ठमो होति ॥ २५१ ॥ उक्तातिदेशार्थ गाथेयं पठिता । पष्ठमुक्तमनानुपूर्वीकरणम् । अनन्तरं सरयोगाद्वर्ग- लब्धिरता । असौ स्वरविभागो नाम सप्तमं फरणम् । संयुक्तासंयुक्तविकल्पेन वर्गप्राप्तिरित्यष्टमं व्यंजनविभागो नाम प्र(१)फरणम् ।। २५१ ॥ दंसेति सर्वाग्ग]क्खर-संजोगं [५० १४३, पा० १] जो य सो हवे णवमो । । परवग्गखरसंजोयं, दंसेदि य दसमॉ करणे ॥ २५२ ॥ स्ववर्गाक्षरसंयोगेन नपमं करणम् । इदं यथा भवति तथा पूर्वमुक्तम् । परवर्गाक्षर- संयोगा[न] दशम फरणम् । परवर्गाक्षरसंयोगोऽपि पूर्वामिह (हि)व एव । अनयोः करणयो- ययाक्षरलाम[] तथोपरि वर्णयिष्यामः ॥ २५२ ।। अह उत्राणुवलिया, हस्सा उ लहंति हस्समन(न)यरं । अहरेणऽवि हम्मंता, प० १४३, पा०२तेसि चिय बग्गमण्णयरं ॥ २५३ ॥ अपराक्षरा उत्तराक्षरैसलिंगिता हसवर्ग अन्य भन्ने। निदर्शनं यथा-सकारः फफारे- पाठिंगितो दग्धः फवगं प्राप्नोति, तस्मिंश्चोत्तराक्षरम् । एवमन्ये(न्य)वर्गेभ्योऽक्षराः प्राप्नुवन्ति । उत्तराक्षरा अधराक्षरे[ग] अभिहन्यमाना लन्धवर्गेऽघराक्षरं प्राप्नुवन्ति । यथा ककारः सकारेणा- लिंगि:] चयर्गे अधराक्षरं पामोति, अधरानुवलितत्वात् । अथवा चाया गायाया अन्यया । [प. १४४, पा० न्याख्यानम् --अधरसरा उत्तरेखः स्वरैरनुवलिता हस्वस्वरमेवान्यतमं लमन्ते । मनाएँ -१ पंक्तयो बिनशरा लायन्ते । 25 , 해 जयपाहुडनाम निमित्वशास्त्रम् । [गाथा २६०-२६२] अनुनासिका डमणन मा, ते युज्यन्ते आद्यचतुप्फेण वर्ग (खवर्गेणी) यथा-कस गह। श्चन्छ सम्झ। ण्ट ण्ठ ण्ड ण्ट । न्वन्थ न्द न्ध । म्पम्फम्न म्भ । सप्तमो यकारः । अष्टमो(मः) शकारः । इत्येती स्व-स्वकायगुरु(स) झेयौ । [प० १५१, पा. १} यथा 'य्य श' इति ॥ २५९ ॥ पढमो तदियं वग्गं, विदिओ य चउत्थयं चउत्थो य । पंचमओ पुण णिचं, चउत्थया यादए वग्गं ॥ २६०॥ [५० १५१, पा०२] प्रथमवर्गस्तृतीयवर्गी(ग) तृतीयवर्ग(गो) द्वितीयवर्ग प प्राप्ततः ५ (प्रामोति) । द्वितीयो वर्गश्चतुर्थवर्ग लभते । चतुर्थः पंचमं प्राप्नोति । ऐ पंचमो वर्गश्चतुर्थं प्राप्नोति । किमत्र कारणमित्यत्रोच्यते-च(सी)कार- स्यामतो यहा ककारो दृश्यते तदा तेन ककारेण सकारो(क) आलिंगित मो भौ भः इत्येका(कां) संख्या(ख्या) सक्त्वा खकार : कारो[प० १५२, पा. 1] १२ न भवति । गकारस्याप्रतो यदा सकारो दृश्यते तदा तेन सकारेणा- लिंगिद इत्येकसंख्या(ख्या) त्यक्त्वा स गकार[:] सकारो भवति । पकारस्याप्रतो यदा सकारो दृश्यते तदा तेन खकारेणामिधूमित इति द्वे संख्ये हसित्वा धकार[] सकारो भवति । उकारो घकारेणाप्रतः स्थितेन यदा आलिंग्यते तदा एका(कां) संख्यां त्यक्त्वा डकारो पकारमापद्यते । एव- मन्ये[] घर्गेष्वपि ये आलिंग्यन्ते अभिधूम्यन्ते चा आकारास्तेनैवाभिहितक्रमेण द्रष्टव्याः॥२६०॥ ॥स्ववर्गसंयोगकरणं समासम् ॥ [प. १५२, पा• २] १ ૨ ३ ए ५ ९ - " परवग्गक्खरगरआ, पढमं पावंति अप्पणो वगं । अणुवलिता[श्या]भिहता, लभंति पुधावरेणेकं ॥ २६१ ॥ परवर्गा[क्षारगुरवः प्रथम प्रामुवन्त्यात्मनो वर्ग इ(मि)ति । यः उपर्यक्षरः स आत्म- या(ग)प्रतियद्धाक्षरं लभते। के ते प[र]वर्गाक्षराः ? ते उच्यते । 'स्त आप इत्येव- माया शेयाः । अनुवलितशब्द: आलिंगितपर्यायः । [१० १५३, पा.१] खकारेण यदा ककार आलिंग्यते तदा आलिंगितत्वात् एका संख्या हति(हसितीत्वात् फकारः पकारत्वं प्रामोति । घवर्गप्रतिवद्धाक्षरं च लभते । धकारः सकारे[नोअ]भिधूमयि(य)त्यभिधूमितत्वात् वे संख्ये हसि[नत्वात् ] स प्य(प)कारः खकारमापद्यते । सकारप्रतिबद्धाक्षरं च प्रामोत्येवमन्येऽपि । ड(क)कारो जकारणामतो [व] स्थित्तेन [प० १५३, पा० २) दह्यते । दग्धै सवि संख्यात्(...)पष्टवकार प्लभते । सकारप्रतियद्धाक्षरं च प्राप्नोत्येवमन्येऽपि आलिंगिताऽभिधूमितदग्धाः स्ववर्गप्रतियाक्षरे मामुवंति पूर्ण()पर्यायेणेति । आलिंगिताभिधूमितदग्धं च दर्शयन्ति ॥ २६१ ।। ॥ परवर्गसंयोगकरणं समाप्तम् ॥ सीहाविलोविउ(वलोइओ) पुणो, दुआदि कमसो बहुबिया(हा!)देसो संयो(जो गावियप्पेणं, पायंति [य] लोयणेणं वा ॥ २६२ ।। "अइए ओ' इत्येतेह(ह) स्यखरे(२)श्चतुर्भिर्युताः' 'कपटतपयशा'द्याः पंच वर्गाः सिंहावलोकितन्यायेन भात्मनो [प. १५४, पा..] यः उपर्यधरोऽनन्तरं स(२) प्रामुवन्ति । 'आईए S [गाथा २६३-२६६] प्रश्नव्याकरणाख्य औ' इत्येतेदी(तैर्दी)स्वरैश्चतुर्भिर्युक्ताः क च ट त प य शा' द्याः पंच वर्गा गजविलुलितन्यायेन आत्मनोव(ऽध)स्ताद्यः अक्षरोऽनन्तरः तं प्राप्नुवन्ति। निदर्शनं च-फकारो तस्वस्वरयुक्तः अकारं प्राप्नोति । चकारोऽपि ककार प्राप्नोति । एवं सर्वत्र सिंहावलोकितन्यायेन द्रष्टव्यम् । दीर्घस्वरयुक्तः ककारश्चकारं प्राप्नोति । चकारो दीर्घस्वरयुक्तः टकारं प्राप्नोति । दकारोऽपि [तकार प्राप्नोति । ] तकारोप्य(ऽपि)[पकारं] प्राप्नोयेवं पंचवर्गप्रतिवद्धाक्षरा [प० १५४,पा० २] गजविलुलितन्यायेन द्रष्टव्य(व्या) इति ॥ २६२ ॥ पत्तो वि परं ठाणं, आइलं यं पुणो पलोएइ । सिंहावलोइकरणं, एयारसमं मुणेयचं ॥ २६३ ॥ प्राप्नोति(तोऽपि) परं स्थानं तस्मात्परस्थानात् पूर्व यस्मादालोकयति तथाभिहित सिंहाव- लोकितकरणं एकादशमं भवति । सिंहश्चातिकान्तं पश्यतीति ॥ २६३ ।। ॥सिंहावलोकितकरणं समाप्तम् ॥ [५० १५५, पा० १] ॥ 20 लोएइ पुचभणियं, करणो गयविलुलिओ महा भणिओ। सूरकरविपर(पवि?)ट्ठो, गउ च सरपाणियं सरए ॥ २६४ ॥ लोलयति पूर्वोक्तं गजविलालितमहाकरणोऽमिमं अक्षरं पश्यति स्व(सू)रकराहतो गज इस सरसिकाल(शरत्काल?) इव अप्रिममक्षरं पश्यति । लोलयरसन्धिपतीति वाक्यार्थः ॥ २६४ ॥ चत्तारि मूलवत्थुणि, वह(हवं)ति म(ग)यविलुलियस्स करणस्स । सरवंजणेण [१० १५५, पा० २] कमसो, सवग्ग-परवग्गजोए य ॥ २६५ ॥ चत्वारि मूलवस्तूनि भवन्ति गजविलुलियस्य करण[स्य । स्वरवस्तु, व्यञ्जनवरतु । व्यञ्जनान्यक्षराणि । स्वर्गसंयोगवस्तु, परवर्गसंयोग[व] स्त्यिति ॥ २६५ ।। तत्थ सरवत्यु तिविहो, संकड-वियडा य मीसया चेव । पढमाण विवि(ति)य तहि(इ?)या, चरिमाणं आदिमा पक्खा ॥ २६६ ॥ सत्र स्वरवस्तु निविधः । संकट, [प० १५६, पा.१] विकटं, संकटविकटं चेति । प्रयगाः क प ट त पय शास्तै(दि)तीयानां सछठ थ फरपा'णामुपरिगतैः संयोगः । 'गजर ६वल सा' 'घझ ढध भ यहा'नामुपरिगतेस्ख(तेश्य)संयोगः । परिमा एमाणन मासैः सर्वेपा- मेवाक्षराणां उपरिगतेः संयोगवेति सूत्रम् ॥ अथवाऽस्या गाथाया अन्यथा व्याख्या (क्रिीयते- । "तस्य सरवर प. १५६, पा० २] तिपिहो" इति। संकटाः 'अइए उअं'। विकटाः 'आई । संकट-विफटाः 'ओ ऐ औ' । पंचवर्गीयो(या) घर्गा अपि । प्रथम-तृतीयौ संकटौ। द्वितीय- पतुर्षी विकटी। पंचमः संकट-विकट इति ॥ 'पढमा विदियाण परिमा' इत्यत्र सरेपु प्रयम- द्वितीयो 'अ आ', परिमो एप तुल्यता । कयं ? अफारस्य अनुस्वारः सपश्त्यान संकट एव भपति । अकार-विसर्जनीयो द्वादशमः स्वपक्षः, अतो विकटोऽयम् । सपक्षता परस्परं मैत्री- भाप इति ।। २६६ ॥

, ॥ " जयपाहुइनाम निमित्तशाखम् । [गाथा २६७-२७०] आइल्लाणं दोण्हं, सधे वि सरा हवंति सरिपक्खा । [१० १५७, पा.१] पंचम-चउत्थ-णवमा, होई(हो)ति इकारस्स सरपक्खा ॥ २६७ ॥ आयौ द्वो खरी 'अआ' तयोः सर्व खराः भवंति मित्राणि । पंचम उकारः, चतुर्य ईकारः, नवम ओकारः । इत्येते प्रय इकारस्य मित्राणि ॥ २६७ ।। अट्ठम-दसमा दोष्णि वि, एते सत्तमसरस्स सरिपक्खा। एकारस-बारसमा, छट्टो हवंति उकारसरिपक्खो(क्वा) ॥ २६८ ॥ अष्टम ऐकारः, दशम औकारः । इत्येते द्वौ सप्तमस्वरस्य एकारस्य मित्राणि । एकादशम- स्वर['अं', द्वादशमस्वर] 'अ' पाठखर ओ(3)कारः। एते प्रय(च) उकारस्य मित्राणि । ऐकारौकाराणं, दुविहा [५० १५७, पा०२] दिट्ठी उ होइ नाया । जइ उत्तराणुवलिया, लहंति तो संकडा एदे ॥ २६९ ॥ ऐकारस्य औकारस्य च द्विविधा संज्ञा संकट(टा) विकटा चेति । प्रयोजनमुपरिष्टाद- क्ष्यति । 'अइएउ' इत्येते स्वराश्वत्वारः संकटसंज्ञाः । एतैरुप[२]गतः क पत पय शा'चाः पंचवर्गाक्षराः संकटसंज्ञा भवंति । एतैरेव संकटस्वरीप१५८, पा.१युक्तानां अक्षराणां विद्यमानाभिपाते शोधिते सति योऽक्षर उत्पद्यति संकटविधिना लभ्यत इति संकट- "संज्ञा ।। २६९ ॥ अधरवलेण य वियडा, उत्तरअहरेण मिस्सया होति । अहरुत्तरेण वि(१)सेसं, लक्खेज बलाबलविसेसं ॥ २७० ।। 'आई ओ' इत्येते यो विकटसंज्ञाः । एतेयुक्ताः 'क पटतपयशा'चा: पंच [प. १५८, पा- २]वर्ग:(गः) संकटसंज्ञा भवन्ति । एतैरेव विकटस्वरैर्युकानां अक्षराणां विद्यमानाभिपाते " शोधिते सति योऽक्षरः प्रश्ने आकारयुक्तः स आलिंगितत्वात्स्वरसंख्यया द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । यथा ककार आकारेणालिंगितो द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । (यथा ककार आकारेणालिंगितो द्वितीयवर्ग प्रामोतीति।) [प.१५९,पा० १] अस्मिनप्यधराक्षरो(ग)नुवलितत्त्वादधराक्षरम् । स एष फकार इका- रेणाभिधूमितो देवर्गमित्रांतस्वरसंख्यया पवर्ग प्राप्नोति । तस्मिन्नप्यधरानुवलितत्वादपराक्षरम् । स एष ककार उकारयुक्तेन दह्यते । दग्धः स वर्ग मिश्रावस्वरसंख्यया तवर्ग प्राप्नोति । वय * उत्तरानुवलितत्वादुत्तराक्षरम् । एभिः स्वरैस्तृ(वि)भिरन्येऽप्य[५. १५९, पा० २]राः पूर्वोकन्यायेन द्रष्टव्याः । 'ऊ ऐ औ' इत्येते प्रयः संकट-विकटसंज्ञाः । एतैर्युक्ताः पूर्वपर्गीया:] पंच संकटविकट- संशा भयन्ति । एतैः संकटविकटैयु(यु)क्तानां अक्षराणां अभियाते शोधिते सति संकट-विकट- प्रकारेण योऽन्योऽक्षरो लभ्यते स संकट-विकटसंज्ञः । आलिंगिताभिधूमितदग्ध-शक्षणवर्गप्राप्तिश्च पूर्वाभिह(हि)वा । लक्षयेत् घलापलविशेपमिति । येऽक्षरा आलिंग्यन्तेऽभिधूम्यन्ते दसन्ते या " तेपार्मा प. १६०. पा. १]भिघातसुद्धानां या(यः) संख्याधिको भवति स पलीयान् सेनादेशः फार्य: ।। २७०॥ - साप्रमादात् भादरों द्विरुकः पाठोऽयम् ।

॥ 19 [गाथा २७१-२७३ (१-८)]. प्रश्नव्याकरणाख्यं जो य इकारो(रे) गमओ, इ(ई)कारम्मि वि वियाण सो चेव । जो ए(य उ?)कारे गमओ, क(अ)कारे हवइ सो चेव ॥ २७१ ॥ इकारस्य ईकारस्य च द्वयोरलि प्रीतिस्तबहुले प्रश्ने ग्रीतिमें भविष्यतीति ?' पृच्छन्तो- (तोऽस्ति प्रीतिरित्यादेश्यम् । ए(ड)कारस्य [अकारस्य च योरसि प्रीतिस्तद्वहुले प्रश्ने 'प्रीति- नेन सह मे भविष्यतीति ? चिन्ता(न्त)यतोऽस्ति प्रीतिरित्यादेश्यम् ॥२७१॥ [प० १६०, पा० २] । ऊकारे जं वुत्तं, छट्टे एयारसे य बारसमे । होइ सरे तं सबं, सवत्थ बलाबलविसेसो ॥ २७२ ॥ उकारस्य प्रकारेण अकारेण च सानुस्वारेण सविसर्गेण च सह प्रीतिः । उकाराधिके प्रश्न एप स्वराणामन्यतमे दृष्टे प्रीतिं पृच्छतोऽस्ति प्रीतिरिति वाच्यम् । बलाबलविशेपश्च द्रष्टव्यः । अनभिहतो अलियां (पलीयान) अभिहतो दुर्वलः । प्रथमो भेदः खरवस्तु ॥ २७२ ।। इदानी [५० १६१, पा० १] व्यंजनविभागकरणस्यादेशं कुर्वनाह- जो चेव पुवभणिओ, संजोओ वंजणाण परि(य वि?)भाओ। सो चेव इहं सबो, गयविलुलियवत्थुए बीए ॥ २७३ ॥ य एवं पूर्वोकव्यंजनानां स्वराणां च संयोगविभागलस्वाक्षरोत्पत्ती उपरिधाव वर्णयस्स- (यिष्योति गजविलुलितन्यायेन । एवं द्वितीयो भेद(दो) व्यंजनविभाग उक्तः ।। २७३ ।। लहति ककारो गरओ, सवग्गय(ग्गियौ) खकारसंजुओ च-बग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ ट-तवग्ग(गे) ॥ लभति गकारो गरुओ, सवग्गय(ग्गिय?) घकारसंजुओ पचग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ य-स-बग्गं(ग्गे) ।। लल(भ)ति चकारो गरुओ, [५० १६१, पा० २] सवग्गयं छकारसंजुओ ट-वर्ग। अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ त-प-बग्गे।। लहइ जकारो गरुओ, ज(स)वग्गयं झकारसंजुओ [य]वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ स-क-बग्गे ॥ (४) लहइ टकारो गरुओ, सवरगयं ठकारसंजुओ त-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ प-य-वग्गे ॥ लहइ डकारो गरुओ, सवग्गयाए० १६२, पा० १] ढकारसंजुओ स-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ क-च-बग्गे ॥ लहइ चकारो गरुओ, सबग्गय थकारसंजुओ प-वगं । अगुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ य-स-यग्गे ॥ (७) लहइ दकारी गरओ, सवग्गयं धयारसंजुओ कन्यग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ च-टबग्गे ॥ ७ , - , , Fa " 18 जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा २६७-२७०] आइल्लाणं दोण्हं, सधे वि सरा हवंति सरिपक्खा । [५० १५७, पा. 1] पंचम-चउत्थ-णवमा, होई(हों)ति इकारस्स सरपक्खा ॥ २६७ ॥ आयौ दो स्वरी अआ' तयोः सबै खराः भवंति मित्राणि । पंचम उकारः, चतुर्य ईकारः, नवम ओकारः । इत्येते प्रय इकारस्य मित्राणि ॥ २६७ ।। अट्ठम-दसमा दोण्णि वि, एते सत्तमसरस्स सरिपक्खा । एकारस-बारसमा, छट्टो हवंति उकारसरिपक्खो(क्खा) ॥ २६८ ।। अष्टम ऐकारः, दशम ओकारः । इत्येते द्वौ सप्तमस्वरस्य एकारस्य मित्राणि । एकादशम- स्वर 'अ', द्वादशमस्वर] 'अ' पाठस्वर ओ(ऊ)कारः । एते प्रय(च) उकारस्य मित्राणि । ऐकारौकाराणं, दुबिहा [१० १५७, पा० २] दिट्ठी उ होइ नायचा । जइ उत्तराणुवलिया, लहंति तो संकडा एदे ॥ २६९ ॥ ऐकारस्य औकारस्य च द्विविधा संज्ञा संकट(टा) विकटा चेति । प्रयोजनमुपरिटाद्व- क्ष्यति । 'अइएउ' इत्येते खराश्चत्वारः संकटसंज्ञाः । एतैरुपरि]गतेः 'क पटतपय शा'याः पंचवर्गाक्षराः संकटसंज्ञा भवंति । एतैरेव संकटस्वर प. १५८, पा. १ युक्तानां अक्षराणां विद्यमानाभिघाते शोधिते सति योऽक्षर उत्पद्यति संकटविधिना लभ्यत इति संकट- "संज्ञा ॥ २६९ ॥ अधरबलेण य वियडा, उत्तरअहरेण मिस्सया होति । अहरुतरेण वि()सेस, लक्खेज बलाबलविसेसं ॥ २७० ॥ 'आईओ' इत्येते प्रयो विकटसंज्ञाः । एतैर्युक्ताः 'कचटतपयशा'चाः पंच {५.१५४, २]वर्ग:(गः:१) संकटसंज्ञा भवन्ति । एतैरेव चिकटवरैर्युक्तानां अक्षराणां विद्यमानाभिधावे "शोधिते सति योऽक्षरः प्रभे आकारयुक्तः स आलिंगितत्वात्स्वरसंख्यया द्वितीयवर्ग प्राप्नोति। यथा फकार आकारेणालिंगितो द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । (यथा ककार आकारेणालिंगितो द्वितीयवर्ग मामोतीति ।) [१०१५९, पा. १] तस्मिनप्यघराक्षरो(ग)नुवलितत्वाधराक्षरम् । स एव फकार इका- रेणाभिधूमितो ट्वर्गमिश्रांतस्परसंख्यया पवर्ग प्राप्नोति । तस्मिन्नप्यधरानुवलितत्वाधराक्षरम् । स एव ककार उकारयुक्तेन दह्यते । दग्धः स पर्गे मिश्रांतस्वरसंख्यया तवर्ग प्राप्नोति । दवर्गे # उत्तरानुवलितत्वादुत्तराक्षरम् । एभिः स्वरैस्त(खि)भिरन्येऽप्या ५० १५९, पा. २ क्षराः पूर्वोतन्यायेन द्रष्टव्याः । 'ऐ ओ' इत्येते त्रयः संकट-विकटसंशाः । एतैर्युक्ताः पूर्ववर्गी[या:] पंच संकटविकट- संशा भयन्ति । एतैः संकटविकटैयु(यु)ताना अक्षराणां अभिघाते शोधिते सति संकट-विफट- प्रकारेण योऽन्योऽक्षरो लभ्यते स संकट-विकटसंशः । आलिंगिताभिधूमितदग्ध-लक्षणवर्गप्राप्तिय पूर्वाभिद(हि?)ता । लक्षयेत् चलायलविशेषमिति । येऽक्षरा आलिंग्यन्तेऽभिधूम्यन्ते दयन्ते या " तेषामा प. १९०, पा. १]भिपातशुद्धानां या(यः) संख्याधिको भवति स बलीयान सेनादेशः कार्य: ॥ २७० ॥ पा.३ सिकप्रमादान आदर्श विस्तः पाठोऽयम् ।

- [गाथा २७१-२७३ (१-८)]. प्रश्नव्याकरणाख्यं जो य इकारो(रे) गमओ, इ(ई)कारम्मि वि वियाण सो चेव । जो ए(य उ?)कारे गमओ, क(ऊ)कारे हवइ सो चेव ॥ २७१ ॥ इकारस्य ईकारस्य च द्वयोरस्ति प्रीतिस्तद्वहुले प्रश्ने 'प्रीति, भविष्यतीति ?' पृच्छन्तो- (तोऽस्ति प्रीतिरित्यादेश्यम् । ए(उ)कारस्य [अकारस्य च द्वयोरस्ति प्रीतिस्तद्वहुले प्रश्ने 'श्रीति- रनेन सह मे भविष्यतीति ? चिन्ता(न्त)यतोऽस्ति प्रीतिरित्यादेश्यम् ॥२७१॥ ५० १६०, पा० २] ऊकारे जं युत्तं, छठे एयारसे य बारसमे । होइ सरे तं सवं, सवत्थ बलाबलविसेसो ॥ २७२ ॥ उकारस्य अकारेण अकारेण च सानुस्वारेण सविसर्गेण च सह प्रीतिः । उकाराधिके प्रभे एषां स्वराणामन्यतमे इष्टे प्रीति पृच्छतोऽस्ति प्रीतिरिति वाच्यम् । बलाबलविशेपश्च द्रष्टव्यः । अनभिहतो अलियां (पलीयान्) अभिहतो दुर्बलः । प्रथमो भेदः स्वरवरतु ॥ २७२ ।। इदानी [प० १६१, पा० १] व्यंजनविभागकरणस्यादेशं कुर्वन्नाह- जो चेव पुवभणिओ, संजोओ वंजणाण परि(य वि?)भाओ। सो चेव इहं सबो, गयविलुलियवस्थुए बीए ॥ २७३ ॥ य एवं पूर्वोक्तव्यंजनानां स्वराणां च संयोगविभागस्तस्वाक्षरोत्पत्ती उपरिष्टाद् वर्णयस्य- (यिष्योति गजविलुलितन्यायेन । एवं द्वितीयो भेद(दो) व्यंजनविभाग उक्तः ॥ २७३ ।। लहति ककारो गरुओ, सवग्गय(ग्गिय?) खकारसंजुओ च-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ ट-तवग्गं(ग्गे) ॥ (१) लभति गकारो गरुओ, सवग्गय(ग्गिय?) घकारसंजुओ प-बग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ य-स-वग्ग(गे) । (२) लल(भ)ति चकारो गरुओ, {५० १६१, पा० २] सवग्गयंछकारसंजुओ ट-बग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ त-प-बग्गे ॥ लहइ जकारो गरुओ, ज(स)वग्गयं झकारसंजुओ [य] वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ स-क-बग्गे ॥ लहइ टकारो गरुओ, सवग्गयं ठकारसंजुओ त-यगं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ प-य-बग्गे ॥ लहइ डकारो गरुओ, सवग्गयं [५० १६२, पा० १] ढकारसंजुओ स-बग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ क-च-बग्गे ॥ लहइ चकारो गरुओ, सवग्गयं थकारसंजुओ प-वगं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ य-सम्बग्गे ॥ (७) लहइ दकारो गरुओ, सवग्गयं धयारसंजुओ क-वगं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ च-ट-बग्गे ॥ (८) 23 , . जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा २५३-(९-१४)] लहइ पकारो गरुओ, सबग्गय ५० १६२, पा० २] फकारसंजुओ य-वग्गं। अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ स-क-बग्गे ॥ (९) लभइ य(बोकारो गरुओ, सवग्गयं ह(भ)यारसंजुओ स(च) वगं । अणुणासियसंजुचो, कमसो पावेइ ट-त-वगे ॥ (१०) लहइ प(य)कारो गरुओ, सवग्गय रयारसंजुओ स-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ क-च-बग्गे ॥ (११) लहइ लकारो गरुओ, सवग्गयं वयारसंजुओ ट-वग्गं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ त-प-बग्गे ॥ लभइ स(श)कारो गरओ, सवग्गयं स(प)कारसंजुओ क-वरगं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ चन्टबग्गे।। लहइ सका[५-१६२, पा. १]री गरुओ, सवग्गयं हकारसंजुओ तन्वरगं । अणुणासियसंजुत्तो, कमसो पावेइ प-स(य)-वग्गे ॥ (१४) चतुर्दशानामपि गाथानां स्वर्गसंयोगवस्तुप्रदर्शकं प्रस्तारमुपदर्शयन्नाह -तिर्यचतुर्दश- गृहाणि, अर्द्ध सप्त कृत्या प्रथमा पंक्तिः । श्रा, क, क्स, च,३, ट, त, गा, ग, ग्य, प, ग, य, "स(श) ॥१॥ अस्याधस्तात्-च, प, च्छ, ट, च, त, प, ज्ञ, ज, झ, य, अ, स(श) क ॥२॥ अस्याधः-४, द, ह, त, ण्ट, प, य, इ, ड, ढ, स(श), ण्ड, क, च ॥ ३ ॥ [प. १६३, पा• २] अस्याधस्तात्-त, त, स्थ, प, न्त, य, स(श),६,द, द्र, क, न्द, च, ट॥४॥ अस्याधः--प्य, प, फ, य, म्प, स(श), क, य, व, भ, घ, श्व(म्ब), ट, त ॥१॥ अस्याय:- प्य, य, र्य, स(श), य, क, प, लाल, ल्य, र, ल, त, प॥ ६ ॥ अस्याधः-श, श, प, फ, स), "घ,ट, स्स, स, रह, त, स, प, य ॥ ७ ॥ यथा श्रुतिरेवाक्षरलब्धिरिति । [गाथाचतुर्दशकानुसारेण कोष्टकमिदं स्थापितम्-] क यस्त्र क ट ग उध य प च प क ट त ण्ट ह प च 24 त प त य द ६ द ट य प ब भ ब ट त य स्य त च ट ल प श श च ट स त मैं प य

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[गाथा २७४-२७९]
प्रभव्याकरणाख्य
एवं तु सभावस्था, लहति अह अणुवलाभिघाएणं ।
दिट्ठा पुवावरओ, लहंति तो णंतरं वग्गं ॥ २७४ ॥
एवं तु स्वभावत एवं प्रस्तारेण लब्धिरुता । प्रश्नाक्षराणामधरधातु(रानु)वलितत्वाचाक्षर
लक्षयेत् । उत्त[५० १६४, पा० १ रान(न)पलितत्वाच आलिंगिताभिधूमिवदग्धाप तमेवाक्षरं यथोक्तं
यथा लक्षयेत् । पूा(!)क्रमेण पूर्वोक्ताभिपातसु(शु)द्धेन आलिंगितत्वादनन्तरं वर्ग लभते ।।
अभिधूमितत्वात् द्वितीयवर्गम् , दग्धत्वात् तृतीयं वर्ग यथा प्राप्नुवंति तथा पूर्वोक्तम् । स्वरवर्गा-
क्षरसंयोगवस्तु तृतीयम् ॥ २७४ ।। इदानी चतुर्थो भेदः - [५० १६४, पा०२]
परवग्गक्खरगण्या, अ(ज)त्तियमिचेहि पण्ह आइल्ला ।
ते सबे पत्तेयं, पढम पावंति संठाणं ॥ २७५ ॥
प्रभाक्षराणां मध्ये यावन्मात्राः परयाक्षरगुरवो दृश्यन्ते तेपामुपरि अक्षरो यस
प्रत्येकं प्राप्नोत्यात्मनो वर्गम् । उत्तरानुवलितत्वात् उत्तरं, अधरानुवलितत्वादधरमिति ॥ २७५॥
सेसा सकायगरुया, सच्चे वि लहंति अप्पणो वग्गं
सेसाण वि एस कमो, सब(व)त्थ बलावलबिसेसो ॥ २७६ ॥
स्वकायगुरुव(स्वः) सर्वे [५० १६५,पा० १] यथा प्रामुवन्त्यात्मनो वर्ग तथा उक्तमेव ।
शेषाणामेप क्रमः । शेषग्रहणेनालिंगिताभिधूमितदग्ध (ग्धा) भण्यन्ते । ते यथा स्व[व]गं प्रानु- ।।
वन्ति तथा पूर्वमेवोक्तम्। सर्वत्र वलाबलविशेपो द्रष्टव्यः । इत्यभिहन्ता बलीयानी(नि)ति ॥२७॥
॥ चतुर्भेदं गजविललितं समाप्तम् ॥
पण्हाइमसंखाए, जाणिज्जा तंमि वग्ग एकेक ।
नामक्खरं तु लन्भइ, एवं से से]सु वि कमेणं ॥ २७७ ॥
प्रमादिमस्याक्षरस्य वाऽनवि(भि)हतस्य या संख्या तया नामा ५० १६५, पा. २ ]भरसंख्या।
क्षेगा । स एवानभिहतः स्वर्गाक्षरं लभते । एवं येऽपि तत्रावलिया अभिहतास्तेऽपि स्वर्गाक्षर
.
।
समन्त एष ॥२७॥
जत्थऽहगाइरित्ता, हवंति तत्थऽयं विसोहेत्ता ।
जं तत्थ हवइ सेसं, तं मिंद्रा(१)णामक्खरवग्गे ।। २७८ ॥
प्रभाक्षराणां निपतितानां यदा एभ्यो अक्षरेभ्योऽभि(ति)रिका [अ]क्षरा भयन्ति सदा
सपा या संख्या साऽऽधाराष्टकमध्ये शोधयित्या भष्टभिभा(मोगमपहत्य लब्धापसि(नि)टा,
दो वर्गो उभ्येते । [१०,
पावर्गादिगणनया प तो गण[य]तव्यो । उत्तराभरपहले प्रो
उत्तराक्षरो लभ्यते । अघराक्षराधिके प्रभे अघराक्षर इति ।। २७८ ॥
एवं तु सभावत्ये, कीरइ णामक्खराण उप्पची ।
अणुवलिहा(या)भिहया वि य, पुधावरवग्ग एकेयं ॥ २७९ ॥

. 1 . जयपाहुखनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा २९०-२१४] ओष्ठा(ध्या)नां मध्येऽक्षरं लभते । ओठा(ट्या)नामन्यतम आलिंगिवा, [दन्त्यानां मध्येऽक्षरं लभते ?] दन्यानामन्यतम आलिंगितः मूर्द्धचालव्यानां मध्येऽक्षरं लभते । मूर्धवालन्याना- मन्यवम आलिंगित: तालव्यानां मध्ये ५० १७१,पा० २ऽक्षरं लभते । परस्पानामन्यतम आलि. गिता मूर्धन्यानां मध्येऽक्षरं लभते ।। २८९ ।। पंचम-चउत्थयाणं, जीहामूलेहि होइ सह जोओ। तालवाणं जोगो, पढम-तइज्जेसु दोसुं पि ।। २९० ।। मूर्द्धन्यानामन्यतम अभिधूमितः मूर्द्धवालच्यानां मध्येऽक्षरं लभते । अनुनासिकानामन्य- तम अभिधूमितः दन्याना मध्येऽक्षरं लभते । पोष्टमानामन्यतम अभिधूमितः मूर्द्धतालव्यानां मध्ये ५० १७३, पा. १]sक्षर लमते । दसानामन्यतम अभिधूमितः तालव्यानां मध्येऽक्षरं लभते । ॥ मूर्द्धतालव्यानामन्यतमः अभिवः जिह्वामूलीयानां मध्येऽक्षरं उभरे । चालल्या अमिधुमिताः फंठ्यानां मध्येऽभरं प्रामुवन्ति । जिह्वामूलीया [अ]मिघुमिता उरस्यानां मध्येऽक्षरं प्राप्नुवन्ति । फंठ्यानामन्यतम अभिधूमित(तो) मूर्द्धन्यानां मध्येऽशरं लभते । उरस्यानामन्यतम अभिधूमित [५० १५३, पा० ३]आनुनासिकानां मध्येऽक्षरं प्रानोति । उत्तरा उत्तरमेव, अधरा त्व(स्त्व)घरमे- (ब)ति क्रममंगीकृत्य स्या(अस्मा )भिरुक्ता नु(न ?)गाथानुरूपमिति ।। २९० ॥ बि-तिय-चउत्थेहि समं, संजोगो होइ मुद्धतालाणं । पंचम-चउत्थएणं, जोगो बग्गाण दन्तेहिं ।। २९१ ॥ मूर्द्धन्यानामन्यतमो दग्धो दन्त्यानां मध्येऽक्षरं प्राप्नोति । अनुनासिकानामन्यतमः [प• १०४,पा. १] दुग्धो मूर्द्धन्यानां मध्येऽक्षरं प्राप्नोति । ओछयानामन्यतमो दग्य: तालव्यानां मध्येऽशर प्राप्नोति । इन्सानामन्यतमो दग्धः जिह्वामूलीयानां मध्येऽक्षरे लभते । मूर्खतालव्या- ॥ नामन्यतमो दग्धः प्रध्यानां मध्येऽक्षरं लभते । वालव्याचामन्यवमो दुग्ध उरस्थान मध्येऽक्षरं लमते । जिह्वामूलीयानामन्यतमो दुग्धः [प• १४४, पा• २] मूर्धन्यानां मध्येऽक्षरं लभते । कंठ्या- नामन्यतमो दग्धः अनुनासिकानां मध्येऽक्षरं लभते । उरस्थानामन्यतमो दुग्धः ओष्ठ्यानां मध्ये- उमर लभते । उत्तराक्षरैरुचराणि लम्यन्ते । अपराशरेवा[परा]क्षराणि[इति] क्रममंगीकृत्यो. 'कम् । म गा[थानुरूपम् ।। २९१ ॥ उठाणं पुण यो(जो)गो, पंचम-छठेहि होइ वग्गेहिं । छट्टेण सत्तमेणं, जोगो अणुणासियाणं च ॥ २९२ ।। झममंगीकृत्य यदभिह (हि)तं तथैव व्याख्यानं अर्थतो गाथेयमिति न धृत्ता(विवृता) ॥२९२॥ सचट्ठमेहि दोसु वि, मूढणा(मुद्धण्णा?)णं [v• १४५, ५.१) तहेव सो यो(जो)गो। वग्गे बग्गे एवं, तिष्णि हु णामक्खरा पढमे ॥ २९३ ।। आलिंगितत्वादेकमक्षरं लभते । अभिधूमितत्वाद् द्वितीय, दुग्धत्वात्तृतीयमक्षरमिति । एषा- याम(एषोऽपि गाथार्थः व्याख्यातः । अतो न विवृत इति ॥ २९३ ॥ सो(सा)हाविहा य एवं, पयडीए पठमओ हवइ णाम। उत्तरमहरचउके, बलाबलविसेसओ विइए ॥ २९४ ॥ , [गाथा २९५-२९७] प्रभव्याकरणाख्यं प्रभाक्षराणां मध्ये येऽक्षरा अनभिहतास्ते स्वभावतः प्राप्नुवन्ति आत्मवर्ग (ग )नाम- निर्देशः कार्यः । उत्तरचा प० १७५, पा० २ तुष्क इति 'अ च त या' निर्दिश्यन्ते । अधरचतुष्क इति *क चटतपय शा (कट प शा?)ना' निर्देशः । 'अच त या'नामन्यतमस्य 'कट प शा'नामन्यत- मोऽप्रतो यदा भवति तदा स्ववर्गप्रतिबद्धाक्षरं प्राप्नोति । यदा 'कट पशा'नामन्यतमस्य 'अपत या'नामन्यतम(मा)क्षरोऽमतो भवति तदा स्ववर्गप्रतिबद्धाक्षरं लभते ॥ २९४ ।। ॥ खवर्गप्रकरणं समाप्तम् ॥ - - मूलस्सरा सवग्गे, एक जुत्ता लभंति सट्ठाणो(णे) । [१० १७६, पा. १] परवग्गक्खरगरुजुत्ता, वितियं च अणंतरं अहरं ॥ २९५ ।। मूलस्यराः । के ते? अयः । तैयुक्ताः प्रश्ने 'डपणनमा' 'रल पा' एपामेव मध्येऽन्य- वमाक्षरं लभते । मूलवर्गप्रतिपद्धत्वात् । पंचमवर्गः स्थवर्गो मूलखराणाम्, शेपाः परवर्गाश्चत्वारः, ।। तेयुकास्त एव मूलस्वराः। येनाक्षरेण युक्तस्तस्याक्षरस्यानंतरो यो वर्गोऽधस्तद्वर्गप्रवियसमेवाक्षर प्राप्नुवंति ॥ २९५ ॥ उत्तरे(र)वग्गे एक, वीयं पुण होइ जत्थ संजुत्ता । अहरंमि लभे तइयं, दुविहा दिट्ठी उ आकारे ॥२९६ ॥ १५० १७६, पा० २] दृष्टिप्रयोगसंयुक्तेन असंयुक्तेन घ आकारेण एवमुपरिप्रयोगेष्वपि अक्षरलस्थि[:] द्विधा ।। गवतीति । उत्तरवर्गः ‘क घट त प य शाः, गडदघल सा' श्च । एपामन्यतमाक्षरस्योपरिगते मूलस्थर अनंतरमधोवर्ग प्राप्नोति । उदाहरणम्-कारस्योपरिगतो मूलस्वरः चवर्ग प्राप्नोति । पकारसोपरिगतः मूलस्वरः [५० १७७, पा. १] ( ?)वर्ग प्राप्नोति । वर्गस्योपरिगतो मूलस्वरः पयर्ग प्रामोति । एषमन्येष्वपि द्रष्टव्याः । एपामेव प्रथम-तृतीय-वर्गाक्षराणां प्रभायां यदावो मूलस्वरोऽसंयुक्तो यस्यापतो व्यवस्थितस्तत्ययाक्षरस्य पूर्वस संबंधिवर्ग प्रामोति । एवं " द्वितीय-पतुर्थवर्गाक्षराणां अमनो(त:) स्थिता मूलसरा असंयुणस्तृतीय[५० १७७, पा. २ मवः मामुपैति । यथा सकारस्यामतो प्य(व्य)यस्थितो मूलखर[:) टवर्ग प्रामोति । छकारख्यामतो उपस्थितो मूलसर द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । एवमन्येऽपि द्रष्टव्याः । भापाराय(दः फ)कार- स्वोपरिगत आकारः वस्यापोऽनंतर द्वितीय पामोति । वस्य द्वितीयस्य पर्गस्साघराक्षरमनंवर लभवे । यया कारस्योप [.viTRE कारवर्ग प्राप्नोति । पयर्गेऽप्यपराक्षरं । प्रामोति । एवं पफारस्योपरिगतः आकार वर्ग लभते । अवाप्यपराक्षरम् । एवमन्यप्रापि । पर फफारस्योपरिगतः सितः सफार फारमेव लभ्य(म)ते । वया अघराक्षरोपरिगत सप धारमा कारोम(s)नंतरं द्वितीयवर्ग प्राप्नोति । तस्या(स) द्वितीपयर्गानंतरमेवाघराभर १५.१०८, पा० २]प्राप्नोति । एवमनंतरोऽप्यसंयुकः । उदाहरणं यया-पारसोपरिगन मापारः सफारपर्गेऽप्यपरामरं मानोति। एवमन्येऽपि द्रष्टव्याः ॥ २९६ ॥ एवतु(न्तु) अहरवग्गे, एकं वितियं तु जत्थ संजुत्ता । धातुस्सराण एवं, दुविहा दिट्ठी उपयडीए ॥ २९७ ॥ - . 1 ६८ जयपाहुनान निमिचशास्त्रम् । [गाथा २९८-३०१) द्वितीय चतुर्थवर्गयोरधरपोयें अक्षरा धातुस्सरयुपास्ते अधोवर्ग द्वितीयानंतर द्वितीयवर्ग प्रामुयन्ति । यथा सकार उफारेण जकारेण चा युक्तः जकारं प्राप्नोत्येवमन्येऽपि द्रष्टव्याः । सयोरेव धासुस्थरयोरन्यवरो यदाऽधराक्षराणां समतो५० १७९, पा. १]मपत्यसंयुक्तः, तदा वमे. वाक्षरे प्रामोति । यथा सकारस्यापतो जकाररष्टः सफार लभते । द्विविधा दृष्टिरिति प्रयोग (उच्यते ॥ २९७ ॥ हस्सस(स्स)रा य भवे(सक्ग्गे?), एक(क) तु लभंति जत्य संजुत्ता। चितीयवग्गे तब(सय)गं, लभति अहरेण पढमितेलि) ॥ २९८ ॥ तस्वखराचरवार: एउ''क घटतपयशानाज डबल सा'नां चाम्यवमाक्षरे. [ग] युक्ताः स्ववर्ग फलं प्रानुवंति । यथा क्यार एकारेण युक्तः फकार प्रामोत्येयमन्येऽप्यक्षरा स्ववर्ग ॥ प्रामुवन्ति । संयुक्तासंयुफैरतुल्या प्राप्तिः । द्वितीयवर्णाक्षराणां 'स छ उथ फर पाणां अन्यतमा- [प०१५, पा• २]क्षरो यथा(दा?)न्यतमहखस्वरयुक्तः वदाधस्तृतीयवर्ग प्रामोति । यथा सकार: पतुर्थ अ इ एउ' अन्यतमेन युक्तः तृतीयवर्ग प्रामोति । एवं वद()प्युत्तरानुवलितत्वादुचराक्षर प्राप्नुयन्ति । 'कट' वर्गे घ तृतीयम् । एवमन्यनापि ॥ २९८ ।। ॥ व्यंजनस्वरप्रकरणं समाप्तम् ॥ जीया(हा मूलियकंठाइसंजुओ लहइ तिण्णि उ हकारो। उत्तरप[य]डिचउके, एफं दो दोसु चरिमेसु ॥ २९९ ।। अइएउ' इत्येते चत्वारः कंड्याः । क स ग घा' जिह्वामूलीयाश्चत्वारः । एषामन्यतमा- क्षरो अन्यतरं कंध्यवरयुफजिह्वामूली[प• १८०,पा. १ यानां मध्येऽक्षरं प्राप्नोत्युत्तराणा(न) पलि- वत्यात् । उत्तर उत्तरप्रकृतिचतुष्पमहणेन 'अघत या' उच्यन्ते । तेषां चतुर्णा अन्यतमोऽभरा, ": पती परिमौ अनयोरन्यतरेण युक्तस्तमेय युक्ताक्षरं लभते । यथा 'अ' अनेन युक्ते चकारे सति चकार एवं लभ्यते । 'अ' अनेन युक्ते चकारो लभ्यते । एवमन्येऽपि द्रष्टव्याः । 'लभा तिग्णि उहकारो' तृतीये वर्ग लभतीत्यर्थः जिह्वामूलीयैरिति ॥ २९९ ।। एमेन सेसयासु नि, दोसुरस) दोस) तु जासु संज्जोजो(जोग)। पयडीसु तासु एसो, हवइ हकारस्स [१० १८०, पा. १अहिलासो ॥३०॥ एवं 'कट पशा'यत्वारः क्कार-टकारावुत्तरी द्वौ परार-शकारावधरी पामन्यतमाक्षरो- उन्य[] मेन चरिमेण स्वरेण युक्तो येन युक्तः स चिर(परि)मः समेव (वा)क्षर लभते । सविसर्गो हकारः सानुस्खारो वा आत्मानमेव लभते स्वभावात् ।। ३००॥ उत्तरपयडीसु एक(ग), लहंति जामुं(सं) च संजुया तासु । एकेकमेव कंठा, उठाणं उवरिमि(मे) जाव ॥ ३०१ ।। दिर्पयेन (पर्येण) तु यो(यो)वर्गश्व(च)रिमो 'अं अः' । ओष्टयानां दंत्यानां मूर्खतालव्यानां वाऽन्यतमोऽक्षर उचरखराणां चतुर्णामन्यतमेन युक्तस्तमेषाक्षरं लभते । उत्तरवसा 'अइएओ। [प.१८१, पा. १] ॥ ३०१॥ - . 18 10 ६९ गाथा ३०२-३०६] प्रभव्याकरणाख्यं अहरासु लभे एक, एकेकं चेच जासु जं जुजो । अहरपयडीसु चउसु वि, दंतादी जाव सुद्धाहा (मुडण्णा ?)॥ ३०२॥ दत्यानामोठयानामनुनासिकानां मूर्धन्यानां मध्येऽधराक्षरो वाऽधरसरा: 'आई ऐऔं' एपां चतुर्णामन्यतमेन युक्तोऽधराक्षरोऽधराक्षरमेव लभते । उत्तरोऽप्येषां दंत्यादीनां मध्ये एतैरेवाघरापरवरैर्यदा युफो(क)स्तदा अधराक्षरमेव लभन्ते(ते) ॥ ३०२ ॥ । स्वभावप्रकृतिस्समाप्ता॥ - पदमसरा आइल्ला, तिण्णि वि उट्ठा य हो(हों)ति पयडीओ। दोसुत्तरपयडीसुं, दोन्नि य सो अक्खरे लहइ ॥ ३०३ ॥ प्रथा प० १८१,पा० २ मखरा आद्यालयः अआइ' ओष्ट्याक्षरैः सार्द्धमेणं खराणां मध्ये अकार इकारश्च द्वायुत्तरी अ(आ)कारोऽधरः | ओट्याक्षराणां उत्तरयोरन्यतरो यदा भवत्य- " प्रता, पदा उत्तराक्षरं प्रामोति । एषां मध्ये ओष्ठ्याक्षराणामन्यतमस्यामतो दृष्ट आकारोऽध- रस्तेषां मध्येऽधराक्षरमेय प्राप्नोति ॥ ३०३॥ [५० १८२, पा० १] अका(उत्त?)रसर(रा)उ कंठा, दोण्णि वि चरिमा हवंति पयडीए । एवं एस विसग्गो, तिण्णि हु नामक्खरे लहइ ।। ३०४ ॥ कंटया उत्तरसरा:- अइए ओ' चत्वारः । तेपामनुसारेण अफारेण सविसर्गेण प सह प्रीतिः । एवमेप (त्रि)संख्यः अकारः (नि)नामाक्षरं प्रामोत्येतयो(गो)परिगायया व्याख्या- म स्थति ॥ ३०४॥ अवस(घरु ?)त्तरासु एकेकयं तु एफ च ख(ल?)भइ मिस्सासु । पंचम-छठा [५. १८२, पा०२] तह सत्तमा य मौ तइउ(१)पयडी ॥३०५॥ मझे यदा अपरषौ दो अपरो द्वितीयवर्णाक्षराणां यदा प्रभे 'सछठथ फरपा' स्ववर्गा- क्षराणां पांवरही दृश्येते सदा व्योरन्तरोऽक्षरो लभ्यते । यथा सकारस्यामत: पफारोऽयस्थितः। पवमन्यत्रापि । तथा इसरेपु प्रथमवर्गाक्षराणां कपट उपयशाना सृतीयवर्गाक्षराणां पराज- द६५ सा'नो यदा प्रभे हावभरायनंदरा पा श्येते तदाऽनयोरेपो उभ्यते । यथा फफा. रखामसो गकारः । पवमन्यत्रापि । एवं प अधरोत्तरं लभत इति । उता पय निमा स्थिति। यदा प्रो एप उतर: मायः सामतोऽपरोऽयवाऽपर आयः (सायदोऽधरोऽयपायर आपा) वस्सामत परसदाभिपाते (५.१८३,पा-१ युद्ध सति दूयोरक्षारयोयों पटयान [स] सम्पते एक एप । पंचम उफारः, पष्ठ ऊकारा, सप्तम पारा, इत्येतेषां प्रयागो इकारेण राह भीतिकरि (प्रतिनिधि भीतिरुच्यते ।। कंठा(s)गुणासि उन्य(ट्टा), तिणि वि तइयरस सो लहइ (61 दोसुचारुपयडीमुं, एफ: अहामु तह जाण ॥ ३०६ ॥ . गुणगापितो शाः। माणे माप मीममा रवि पाहा।

६८ जयपाहुनाम निमिचशास्त्रम् । [गाथा २९८-३०१] द्वितीय-पतुर्यवर्गयोरपरयोर्ये अक्षरा धातुस्वरयुकाने अधोवर्ग द्वितीयानंतरं द्वितीयवर्ग प्रामुपन्ति । यथा सफार उकारेण जकारेण या युक्तः जकारं प्राप्नोत्येवमन्येऽपि द्रष्टव्या। सयोरेव धातुस्थरयोरन्यवरो यदाऽधराक्षराणां असतो. र. १७९, पा० १ भषससंयुक्तः, तदा तमे- वाक्ष प्रामोति । यथा सकारस्थागतो जकारष्टः सफार लभते । द्विविधा दृष्टिरिति प्रयोग उच्यते ।। २९७ ॥ हस्सस(स्स)रा य भवे(सवग्गे), एक(क) तु लभंति जत्थ संजुत्ता। बितीयवग्गे तब(सव)ग्गं, लभति अहरेण पढमिचेले) ॥ २९८ ॥ द्वस्वस्वराज्यत्वारः 'अइएउ।'क घटतपयशाना भाजपलसानां पाम्यवमाक्षरे- [ग] युक्ताः स्ववर्ग फलं प्रामुवति । यथा कफार एकारेण युक्तः फकार प्रामोत्येयमन्येऽप्यक्षरा स्ववर्ग "प्रामुवन्ति । संयुक्तासंयुकैतुल्या प्राप्तिः । द्वितीयवर्गाक्षराणां पछठथ फर पाणां धन्यवमा. [प.१४९,पा• २]क्षरो यथा(दा)न्यतमहखखरयुक्तः वदाधस्तृतीयवर्ग प्रामोति । यथा सकारः पतुर्थ 'अइएउ' अन्यतमेन युक्तः तृतीयवर्ग प्रामोति । एवं यद()व्युत्तरानुवलितत्वादुसराक्षर प्राप्नुवन्ति । 'फद' वर्गे च तृतीयम् । एवमन्यनापि ॥ २९८ ॥ ॥ व्यंजनस्वरमकरणं समाप्तम् ॥ जीया(हा)मूलियकंठाइसंजुओ लहइ तिणि उ हकारो । उत्तरपयोडिचउके, एक दो दोमु चरिमेसु ॥ २९९ ॥ 'अइएउ' इत्येते चत्वारः कंठयाः । क स ग पा' जिह्वामूलीयाश्चत्वारः । पपामन्यतमा- क्षरो अग्यतर कंव्यस्वरयुक्तजिह्वामूली[प. १००, पा० १]यानां मध्येऽक्षरं प्राप्नोत्युचराणा (नु) पलि- तत्वात् । उत्तरं उचरप्रकृतिचतुक्महणेन अपत या' उच्यन्ते । तेषां चतुर्णा अन्यतमोऽक्षर, ॥ एवी परिमौ अनयोरन्यतरेण युत्तस्तमेव युचाक्षरं लभते । यथा '' अनेन युके धकारे सति धकार एव लभ्यते । 'अ' अनेन युक्ते चकारो लभ्यते । एवमन्येऽपि द्रष्टव्याः । 'लम्मद विग्णि उ इकारो' तृतीये वर्गे लभतीत्यर्थः जिझामूलीयैरिति ।। २९९ ।। एमेव सेसयासु बि, दोसु(स) दोस(B) तु जासु संज्जोजो(जोगो)। पयडीसु तासु एसो, हवइ हकारस्स [प०१८०, पा. १ अहिलासो॥३०॥ एवं 'कटप शाश्वत्वारः कार-टवारावुत्तरौ द्वौ पार-शकारावधरौ नेपामन्यतमाक्षरो- ऽन्य[a]मेन परिमेण स्वरेण युत्तो येन युक्तः स चिर(परि)मः तमेव(वा)क्षर लभते । सविसर्गों हकारः सानुसारो वा आत्मानमेव लभते स्वभावात् ॥ ३०० ॥ उत्तरपयडीसु एक(ग), लहंति जामुं(K) च संजुया तासु । एकेकामेव कंठा, उठाणं उवरिमि(मे) जाव ॥ ३.१ ॥ वियेन(पर्येण) तु यो(यो)वर्गश्च(च)रिमो 'ॐ' ओट्यानां दैत्यानां मूर्द्धवाडच्यानां वाऽन्यवमोऽक्षर उत्तरसराणा पतुर्णामन्यतमेन युक्तसमेवाक्षरं लमते । उत्तरखराः 'अइएओ। [प.१८१,पा. १] ॥ ३०१॥ 18 , . I n [गाथा ३०२-३०६] प्रश्नव्याकरणाख्यं अहरासु लभे एक, एकेकं चेव जासु जं जुजो । अहरपयडीसु चउसु बि, दंतादी जाव सुद्धाहा (मुद्धण्णा )॥ ३०२ ॥ दत्यानामोष्टयानामनुनासिकानां मूर्द्धन्यानां मध्येऽधराक्षरो वाऽधरस्वराः 'आई ऐ औ' एषां चतुर्णामन्यतमेन युक्तोऽधराक्षरोऽधराक्षरमेव लभते । उत्तरोऽन्येषां दंत्यादीनां मध्ये एतैरेवाघराघरखरैर्यदा युक्तो(क्तस्तदा अधराक्षरमेव लभन्ते (ते) ॥ ३०२ ॥ ॥खभावप्रकृतिस्समाप्ता॥ 1 पढमसरा आइल्ला, तिणि वि उट्ठा य हो(हो)ति पयडीओ। दोसुत्तरपयडीसुं, दोन्नि य सो अक्सरे लहइ ॥ ३०३ ॥ प्रथा ५० १८१, पा०२मसरा आयात्रयः 'अ आई' ओष्ठ्याक्षरैः सार्द्धभेषां स्वराणां मध्ये अकार इकारश्च वायुत्तरी अजा)कारोऽधरः । ओट्याक्षराणां उत्तरयोरन्यतरो यदा भवत्य- प्रता, वदा उत्सराक्षरं प्राप्नोति । एषां मध्ये ओष्ठ्याक्षराणामन्यतमस्यामतो दृष्ट आकारोऽध. रस्तेषां मध्येऽधराक्षरमेय प्राप्नोति ।। ३०३ ।। [१० १८२, पा० १] अका(उत्त?)रसर(रा)3 कंठा, दोणि वि चरिमा हवंति पयडीए । एवं एस विसग्गो, तिण्णि हु नामक्खरे लहइ ॥ ३०४ ॥ फंट्या उत्तरखरा:-- 'अइएओ' चत्वारः । तेपामनुस्यारेण अकारेण सविसर्गेण च सह ।। प्रीतिः । एवमेप (नि)संख्यः अकारः तृ(नि)नामाभर प्राप्नोसेतथो(यो)परिगाथया व्याख्या- । स्पति ।। ३०४॥ अवस(घर)त्तरासु एकेकायं तु एकं च ख(ल ?)भइ मिस्सासु । पंचम-छहा [प०१८२, पा० २] तह सत्तमा य मी तइउ(१)पयडी ॥३०५॥ प्रभे यदा अधरवर्गों द्वौ अपरो द्वितीयवर्णाक्षराणां यदा प्रोसछ उथ फर पार' खवर्गा-- क्षराणी पांतरही दृश्येते तदा तयोरन्तरोऽक्षरो लभ्यते । यथा सकारस्यामतः पकारोऽवस्थितः । एवमन्यत्रापि । तथा उत्तरेषु प्रथमवर्गाक्षराणां कपट त पयशा'ना एतीयवर्गाक्षराणां पग- टपलसानां यदा प्रभे द्वावभावनंतरा या द्वी दृश्यते तदाऽनयोरेयो लभ्यते । यथा पका- रखापतो गकारः । पयमन्यनापि । एवं प अधरोत्तर उमत इति । उपा एय मिश्रा सितिः । यदा प्रभे एक उत्तर आधः तस्याप्रतोऽपरोऽयवाऽपर आपः (सामतोऽपरोऽययापर आप:) पस्लामत उत्तरस्तदाभिपाते [५.१४३,पा. १] युद्ध सति योरक्षरयोयों पळपान [स] लभ्यते एफ एय । पंचम उफारः, पट उकार, सतम एकार, इत्येतेषां प्रयाणा इकारेण सद भीविफति(प्रकृति)रिति प्रीतिरुच्यते ॥ ३०५ ॥ कंठा(गुणासि उन्य(१), तिणि वि तइयरस सो लहइ 01 दोसुचारपयडीमुं, एपं. अहामु तह जाण ॥ ३०६ ॥ 1 लाल दिवार शिपिठोऽयं पारा। १ भागें मनमाप मीपमा गर' इति पार । M जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ३०७-३११] अकारस्य एकारस्य उकारस्य वा कंठ(व्य)स्य यदाऽमतोऽनंतर इकारो दृश्यते, तदा समेव पूर्वखरमवामोति । अनुनासिकानां 'डमण न मा'मां ओष्ठयानां 'फय फ ब ना (मे फघ मा) नां च एषामन्यतमसोपरिगत इफारसमेयाक्षरं लभते । प्रश्नोत्तरप्रकृतिरुक्ता ) प्रतिशब्दो मैत्री- पर्यायः । 'एक अघरासु जानीह(हि)' इसेतदुपरिष्टा[] व्याख्यास्यति ॥ ३०६ ।) ईका[५० १८३, पा० २ रस्स चउत्था, मुदहा(खण्णा?) सेसया जहा तइए। अक्खरलंभो जो उत्तरासु सो चेव अहरासु ॥ ३०७ ॥ एकारस्य मूर्द्धन्या(न्य)स्यामतः स्थित ईकारे(र) ऐकारं लभते । औकारो(रस्सी)मूर्धन्यस्याप्रसोऽव. स्थित ईकार औफारमेय प्राप्नोति । 'रल पाना(mi) मूर्धन्यानामन्यतमस्योपरिगतः ईकारस्तमेवाक्षर प्राप्नोति । ईकारस्य यथाऽक्षरलाभ उक्तः,[प०१४४, पा• १]एवं इकारस्याप्यघरप्रकृतेरुकः ॥३०७।। जा ईकारे पयडी, चउरो सा चेव होइ उ(य?) उकारे । अक्खरलंभो जो पंचमस्स सो चेव एयरस ।। ३०८ ॥ चतुर्थस्य ईकारस्य उकारेण सह प्रीतिः। प्रीतिशब्दः स्वभावपर्यायः । ईऐ औ' इत्येतेषां व(पोयाणां अन्यतमस्यामतोऽनंतरस्थित उकारस्तमेव पूर्वस्वरं लभते । [ल?]पा' णामन्यतम- स्या(स्य) यस्यायोपि० १०४,पा. २ ]युक्त उकारस्तमेव लभते । पंचम डकारो यथाक्षो लभते इकारोऽपि तथैव प्रामोति ॥ ३०८ ॥ जीहामूलियकंठा, तालवाणुणासिया य एकारे । अक्सरलंभो तइए, जो वि य सो चेव इहयं पि ॥ ३०९ ॥ जिह्वामूलीयानां कंठ्यानां नालन्यानामनुनासिकानां पान्यतमाक्षर एकारेण युक्ता उपरि- गतेन तमेवाक्षरं एकारः प्राप्नोति । कंठा(ध्या)नामपि खराणां अन्यतमस्यानंतरमप्रतोऽवस्थित " एफारस्तमेव पूर्वखरं लभते । एकारेण योऽक्षरलाभः स उकः । ऐकारेण वक्ष्यति ॥ ३०९ ॥ अधर(उर)कंठोहा दंता, मुद्ध(खण्ण)गुणासियाप०१८५, पा. १य अट्ठमए। अक्खरलंभं इक, तं पि य अहराहरे लहइ ॥ ३१० ॥ उरसाना कंठ्यानां ओष्ट्यानां दंत्यानां मूर्द्धन्याना अनुनासिकाना धान्यतमाघर(ग)क्षर ऐकारेण युकोऽघराक्षरं प्राप्नोति । उत्तराक्षरोऽप्येषां मध्ये ऐकारेण युफोऽधराक्षरमेव मामोति । एषां मध्ये ये स्पराते(स्ते)पामन्यतमस्यामदा(:) स्थित ऐकारस्तमेव स्वरमामोति ॥ ३१॥ जीहामूलियकंठा, उट्ठा अणुणासिया य ऐकारे । अक्खरलंभ एसो, लहइ तइज्जस्स गमणेणं ॥ ३११ ॥ जिहामूलीया 'चछजझा'च्या 'अ इ उ ए ओष्ट्या प. १०५, पा. १ऐफ घमा। अनुनासिका 'इवण नमा' । एपामन्यतमस्य यस्योपरिगत ऐकारस्तमेवाक्षरं लभते । स्वराणा- "मपि यस्यामवोऽनंदरमवस्थिस्तमेव पूर्वखरं लभते । यथा तृतीय इकारो ऊफारमवामोति । उकारोऽपि तथैवेति ॥ ३११ ।।

[गाया ३१२-३१६] प्रश्नव्याकरणाख्य मुदणुणासियकंठा, तालबा मुद्धतालदंतोट्ठा । दस[मसरे पयडीओ,(५० १८६, पा० १] अक्खरलंभंजहम्मा(हम?)ए॥३१२॥ मूर्वन्यानुनासिककंठख्य)तालव्य-दंतोष्ठाः (त्यौष्ट्याः) । तैपामन्यतमोऽधराक्षरस्योपरिगतः दश- मस्वरस्तमेवाक्षरं लभते । उत्तराक्षरोपरिगतः उकारोऽधराक्षरमेव लभते । एतत्प्रतिवद्धवराणां 'आ ईऐ अन्यतमस्यांपतो संच(ऽनन्त)रमवस्थित औकार पूर्ववरं लभते । यथाष्टमप० १८६, पा० ३] ' ऐकारोऽक्षरं लमते । एवमौकारोऽपीति ।। ३१२ ॥ मोत्तुं पंचमपयडी, एकारसमस सेसया अह । एकेक दंतोडे, मुद्धण्णे अक्सरे एकं ॥ ३१३ ॥ उरस्पाः कंव्याः जितामूलीयाः तालव्या मूर्खतालव्या दंया औठ्या मूर्धन्याः । एषां अष्टानां अन्यतमोऽक्षर एकादशमः(?)स्वरेण युक्तः समेवाक्षरं लभते । (एपामंधानां य: ॥ [५० १०५, पा० १] एकादशस्वरेण युक्तः तमेवाक्षरं लभते ।) एपामष्टानां य एकादशखरेण युक स एव लभ्यत इति ॥ ३१३ ॥ जो हका(का)रे म(ग)मओ, पुह(ख)त्तो सो इह विसग्गमि । एयस्स णविर(वरि ?)पयडी, संखा वि य तचियो चेव ॥ ३१४ ॥ अकारः सानुस्वारः यथा हर(१)कार प्राप्नुवन्ति (प्राप्नोति)। एवं हकार[:] सविसर्ग-15 हकारमेव प्राप्नोति । द्वादशाना (५० १८७, पा० २] स्वराणां यस्तु (परतु)भावः स पर्णितः । प्रकृतिशब्दः स्वभावपर्याय इति ॥ ३१४ ॥ समाप्त ॥ अणमिनगगय(हते य अ ?)यारे, अजखाटच तथा वाय(0) एकारे । अभिघाइ अिट्ठमे पंचमंमि ॥ ३१५ ॥ अकारेण असाम हात ट(?)कफारस्वत्य(साम)तो व्यवस्थितेन कफार एव लभ्यते । अकारे । अनमिइते व(प)कारस्वामतः स्थिते चकार एव लभ्यते । आफारे अनभिहतं (त) सकारस्याप्रता थिते टकार एव लभ्यते । अकारे अनभिहते तकारखामतः स्थिते तकार एव लभ्यते । अकारे अनभित्ते यकारस्पामतः स्थिते (प. १८८, पा-१] यफार एव लभ्यते । एकारेण युक्त सकारोरे) फकारो उभ्यते । एकारेण युक्के छकारे घ(प)कारो लभ्यते । एकारयुक्त ठकारे टफारो लभ्यते । पकारेण युफे यफारे समारो लभ्यते । एफारेण युक्त रेफे यफारो लभ्यते । अष्टमस ऐफार[स: एकार सेव संयोगफलमुक्तम् ॥ ३१५ ॥ अणमिहते आकारे, ख छ ज झतह अभिहयंति दो चरिमा । उचटत ईकारंमि, उ फर पय चउरो [अ]आरंमि ॥ ३१६ ॥ सारस्वामतः स्थितेन अनभिहतेन (आ)फारेण एकारो लभ्यते । एकारस्वामतः स्थितेन अनभिहतेनाप.१०८,पा. २ कारेण छारो लभ्यते । सफारः सानुस्वारः जफारमेय सम्य(मोवे ।। (कारस्यामः शितेन अनभिहतेनागरेण पारो सभ्यते । उफारः सानुम्पारः जसारमेय TREAL पार पप गरमा। मात्र ५-६ मरिमिता पति शम्याक्षरा विचने ......... - ।

- जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ३१७-३१९] लभ्यते) प्रकारः सविम! झकार एष लभ्यते । (8?)कार इकारयुको टकार लभते । वकार ईफारयुक्तः थफारमेय प्राप्नोति । फकार कारयुक्तः पकार लभते । रेफ उकारेण युक्तः यकारं लभते ॥ ३१६ ॥५.१८९,पा..] , जह पढम-सत्तमाणं, तइज(योणवमाण तह य सहाणे पढम-तइयाणुणासिय, घ झा य छटुंमि अणभिहते ॥ ३१७ ॥ गकारस्पामतोऽनंतरमपस्थितः अनभिहत फारो गकारमेव लभते । जफारस्यापतोऽनघर- मयस्थितः अनभिहत इकारो कारमेव लभते । कारस्थानतोऽनंतरमयस्थित अनमिहत इकारो हफारमेव लभते । दकारस्यापतोऽनंतरमवस्थितः [प. १८९, पा०२] अनभिहत इकारो दकारमेव प्राप्नोति । प(प)कारस्यामवोऽनंतरमवस्थितो(तः) इकारो(र.) प(प)कारमेष ठभते। सफारस्याम- ॥ तोऽनंतरमपस्थितेन अनभिहत इकारो[लकार मेव लभते । सकारस्याप्रतो वाऽनंतरमवस्थितेन [अन- मिहत: १] इकारः सकारमयामोति । सकार (ओ) कारसंयुक्तः कोकारं लभते । छकारः ओका- रसंयुक[प० १९०, पा. १चोकारं लभते । ठकार ओकारसंयुक्तः टोकारं लभते । थफार ओकार- संयुकोः [तो कारं लभते । फकार ओकारसंयुक्तः पोकारं लभते । रेफ ओकारसंयुक्तः योकार लभते । पकार ओकारसंयुक्त स(सो)कारं लभते । षष्ठ औकारेना(णा)भिहतः धकारस्यामतोऽनं. " वरमयस्थिते घकारमेव लमते । उकारोप० १९०, पा. २ अनभिहतो झकारस्यामतोऽनंतरमवस्थितः झकारमेव लभते । झकारोऽनभिहत अकारस्याप्रतः स्थितः अकारं लभते । ओकारोऽनभिहत इकारस्याप्रतः स्थितः इकार लभते । कारोऽनभिहतः सानुसारस्याकारो(र)स्यामतोऽनंतर मपस्थितः अनुस्वारमेव अंकारं लभते । यथा पूर्वगायया प्रथमस्य अफारस्य, सप्तमस्य च एकारस्य प्रयोग उक्तः, तथा तृतीयस्य इकारस्य, नवमस्य ओकारस्य प्रयोगो वर्णितः पश्चास्यापि गाथान्तरेणार्थः ॥ ३१७ ।। अभिघाइएसु छठे, हवइ ह्यारो हु अट्ठमो णवमो । [१० १९१, पा. १) ड ढ चतु तइयऽणुणासा, दसमसरे तिण्णि ऊ भवमा ॥ ३१८ ॥ उकारोऽप्रतोऽनंतरमवस्थितेन ओकारी(रेणाभिहतो हकारं प्रामोति । मकारस्याप्रतो ऽनंतरमवस्थितो णकारः चतुर्थवकारं प्राप्नोति । टफारो दशमस्वरेण युक्तस्तृतीयं बली)कार प्रामोति । 'भवमा'शब्द एकान्तपर्याय [] ॥ ३१८ ॥ पढम-तइयाणुणासा, घ झा य दोण्हं पि अंतिमसराणं । वावा(बावी)सइमो करणो, णामेण य(?) हयमोहिओ एस ॥ ३१९ ॥ प्रथमो टकारः अनुसारेण अकारेण युक्तो डकार प्रामोति । डकारः सविसर्गः डकारं लभते । तृतीयो णकारः सानुखारोप. १९१, पा. २] कार लभते । णकारः सविसर्ग: णकारमेव ॥ लभते । पकारः सानुस्वारः धकार प्रामोति । उ(झ)कारः सविसर्गः सकारमेव लभते । झकार: सानुखारः झकार प्राप्नोति ॥ ३१९ ॥ ॥ द्वाविंशतिकरणं समाप्तं । अश्वमोहितं नाम समाप्तम् ॥ एतदन्तर्गतः पाठो द्विलिसिसोऽता पुनरतः ।

. 19 , [गाथा ३२०-३२३] प्रश्नव्याकरणाख्य उत्तरसरसंजुत्तो, जइ उत्तरवंजणो य दीसेज्जा । पावइ य पढमवग्गं, अहरस्सरसंजुओ तइयं ॥ ३२० ॥ उत्तराः के ? 'अइएउ' इत्येतेषां चतुर्णामन्यतमेन युक्त[:] प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराणां क पटतपय शा नां, गज ड द वल सानां अन्या प० १९२,पा० १]तमोऽक्षर आत्मीयं वर्ग लभते। यथा 'कि' क स ग घा नां मध्येऽक्षरं प्राप्नोत्युत्तरानुवलितत्वात् उत्तराक्षरम् । एवं सर्वत्र । अधर- खराः के ? 'आई ऐ औ' । एषां चतुर्णामन्यतमेन स्वरेण युक्तः तेषां प्रथम-तृतीयवर्गाक्षराणां अन्यवमाक्षरं तृतीयं वर्ग प्राप्नुवन्ति(मोति)। यथा 'की' ट ठ ड ढा नां तृतीयवर्गाक्षराणां मध्ये ढकाराक्षरं प्राप्नोति ॥ ३२० ॥ उत्तरसरसंजुत्तो, पंचमवग्गं तु पावए अहरो। अहरस्सरसंजुत्तो, सत्तमं पावए अहरो ॥ ३२१ ॥ उत्तरस्वराः के ? 'अइएउ' । एतेपां [५० १९२,पा० २]चतुर्णामन्यतमेन युक्तोऽधराणां सछठथ फरपाणां, घ झ ढध भ व हा नां चान्यतमाक्षरः पंचमवर्ग लभते । यथा खफारस्यो- परिगतोऽकार: पंचमवर्गाक्षरं प्राप्नोति । उत्तरानुवलितत्वादुत्तरम् । एवमन्येऽपि । तथा घकारो- ऽन्युत्तरस्परसंयुक्त पंचमवर्गाक्षरं [प० १९३, पा० १]लभते। एवं सर्वेऽधरा उत्तरवरसंयुक्ताः पंचमवर्ग प्राप्नुवन्ति । अधरस्वरा आईऐ औ' एतेषां चतुर्णामन्यतमेन युक्तः द्वितीय-चतुर्थ- ।। वर्गाक्षराणामधराक्षराणामन्यतमः सप्तमवर्ग प्राप्नुवन्ति( नोति)। यथा सकारो अधरखरसंयुक्ताः स[समवर्ग प्रामोति । अधरानुवलितत्वाधरः । एवं छका(५० १९३, पा० २]रोऽधरखरसंयुक्ताः सप्तमिवर्ग प्राप्नोति । तत्राप्यघरम् । तथाऽधरोऽज्यधरस्वरसंयुक्ताः] सप्तम]वर्ग पामोति । सनाप्यधराक्षरम्(?) । एवं फरपा इति । तथा कारः सप्तमवर्ग प्राप्नोत्यधरानुयलितत्वाद- धराक्षरम् ।। ३२१ ॥ एवं लभंति पढम(मे), वग्गे सरवंजणेहि संजुत्तो(चा) । उत्तर-अहराणुवला, लमंति पुवाचरं वग्गं ॥ ३२२ ॥ यथा प्रथमवर्गे सु(स्वोराक्षारसयुक्ता लभंति अक्षरान् तथाभिहितं पूर्वमेव । ते घ सरा उत्तरानुवलितत्यादुत्तराक्षरं प्राप्नुयति । [१०१९४,पा. १] अधरानुयलितत्यात अपराक्षर भामुवंतीत्येतदपि पूर्वोक्तं पुनरनेन स्थिरतामापादयता चर्गितम् । पूर्व इत्युत्तराक्षर उच्यते । अपर । इति चाधरो भण्यते ।। ३२२ ॥ उत्तर-अहरसरो वा, लग्गो जो जमि बंजणे होज । उत्तर-अहराणुवला, लभंति तइ(ई)यसरं तत्तो ॥ ३२३ ॥ उत्तरस्परा(र) इकारः, अघरसर ईशार[:] उत्तरापिरो(?) विलन उत्तराः उपरो पिलम[:] यस्मात्तृतीयखरं प्राप्नोति । इया:?] तृतीयस्वर प्रामोति ।। ३२३ ॥ ॥ उत्तराघरसंपत्करणं समासम् ।। 20 1 'उणाशीतरो विशा, मारपरो दिम" रति मम्प मूमानुपारे। .

. . " जयपाहुइनाम निमित्वशास्त्रम् । [गाथा ३२४-३२६] पढमो तइओ य सरो, पण्हाईए समं ककारेण । [१०१९४, पान १] जइ दीसइ सो लस(भ)ए, कबग्गए अक्खरं एक ॥ ३२४ ॥ प्रश्नावराणामादी फकारस्यावस्थितस्याप्रतोऽनंतरं यदा प्रथमः स्वरः अकारो दृश्यते तदा अकार[:] फकार प्रामोति । तृतीयस्वरेण युः] सकार आदिस्थितप्रभाक्षराणां फकारवर्गादेकमक्ष लमते । उत्तरानुयलितत्वात् उत्तरम् । एवमन्येऽपि प्रथम-तृतीयवर्गाक्षरा[३] प्रश्नाक्षराणामादिस्थिता अकारे(ग)प्रतोऽनंतरमवस्थिता इकारेण या युक्ता(ताः) स्ववर्गाक्षर लभन्ते ॥ ३२४ ॥ एएहि चैव सहिओ, लहइ खकारो चवग्ग एकेक । तइय-चरिमा [प. १९५, पा० सवग्गे, लहइ धकारो टवरगंमि ॥ ३२५ ॥ प्रथमवरेण अकारेणाप्रवोऽनंतरमवस्थितेन इकारेण या युक्तः सकार:] घषर्गादेकमक्षर लभते । उत्तरानुचलितत्यादुत्तरम् । सृतीयवर्गाक्षराणां ग ज ड द व लसानां परिमाणां इषणन मानां अन्यतमोऽक्षरोअकारेऽमतोऽनंवरमयस्थिते इकारेण युवा स्ववर्गादेकमक्षरं लभते। उत्तरा- नुपलितत्यादुत्तरस्य घकारे(र)स्य अकारेऽप्रतोनंतरमयस्थिते इकारेण वा युक्त धकार(०) टवर्गा- देकमक्ष प्राप्नोति उत्तरानुवलितत्वादुत्तरमेवेति ।[प० १९५, पा०२]गाथाद्वयस्यापि अर्थ व्याख्याय प्रस्तारेण दर्शने(श्यते) रचना-फका(च) कि ग एता एव स्वरो() सकारयुक्तो यदा तदा प्रथम- " स्वरेण घफार लभते । तृतीयेन य(ज)कारम् । सकारोऽधरत्वाद् द्वितीयवर्गा(ग)माही खरानु पलितस्यादक्षरलब्धिः । रचनापूर्वकवर्गा अघस्तात् स छ सिज । तथा पकारः प्रथमसर() युक्तः टकार लभते, तृतीययुक्तः डकार । रचना-घट पिट(ड)। एवं चयादीनां शेपवर्गादीनां च शेपयर्गाक्षराणां लब्धिा:?]रचनामा दर्शते (दर्यते--) वर्गस्य अयुक्तस्य च चा चिज। अस्याध:-ज जा निज । अस्याधः - ब चा निज । अस्साध:-- इ त झि (द)। एवं पवर्ग- " वर्ग-रचना । टटिड। अस्याधः-ठत ठिद। अस्याप:-हड डिड [4.१९१, पा..] अस्याधः-ण ट पिट । अस्याधः टपटिव । तवर्गस्य रचना-ततविद । अस्याध:- थपधिप । अस्याधः-द् त दिद । अस्याधः-नव निद । अस्वाधः-चय विल । पवर्गस्य पपपिप । फय फिल । व पविय। म य मिव । भश भिश । यवर्गस्य रचना-यय यि छ । अस्याधः-रसरिस । ल ल ल ल । अस्याधः-वक विग। शवर्गस्य प्रस्तार:-शश शिश। "पक पिग। अस्याधः-सससिस । अस्याः- (ह) क डि ड(हि ह)। एवं विरच्याक्षालब्धि उक्तवद्र(E)ष्टव्या ।। ३२५ ।। सत्तम-णवमेहि समं, लहइ ककारी चवग्ग एफेकं । तइय चरिमा वि एवं, खटवग्गे घ तवग्गे य ॥ ३२६ ॥ प्रश्नादौ ककारः सप्तमेन एकारेण युक्तः नवमेन (ओ)कारेण युक्तः चवर्गा[५० १९६, पा. २]- " देकमक्षरं लभते । तथा तृतीयो गकारः, चरिमो डकारः, सप्तम-नवम-स्वरयुक्तः चर्वर्गादेवा- क्षरम् । एवमुक्त इति । तथा सकारः सप्तमेन नवमेन या स्वरेण युक्तः स्वर्गादेकमक्षरं उत्तरानु- चलितत्वादुत्तरम् । तथा धकारः सप्तमेन नवमेन या खरेण] युक्तः सवर्गादेकमक्षरं लमवे उत्तरानुवलितत्वादुत्तरमिति ।। ३२६ ॥ - - प - -- -- , [गाथा ३२७-३३०] प्रश्नव्याकरणाख्यं सेसाण वि एस कमो, चादीणं अट्ठमाप० १९७, पा० १]वसाणाणं । अहरुवि(व)रि एफेकं, परिहा[य]इ वट्ट(ड)इ अहरो ॥ ३२७ ॥ प्रसारणास्यार्थो दर्शयितध्यः । शेपाणामप्येप क्रम इति । प्रश्नाक्षराणामाविस्थितस्य ककारस्य चकारस्य या कारेण वा ककारस्य युक्तस्य यथावस्थवर्गाक्षरलाभ उक्तः । चादयोऽपि इकारान्ताः सप्त सप्त प्रस्त(सा)रेणयुक्ता उकारयुक्ता[:] पूर्ववरसवर्गादेकमक्षरं लभन्ते । उत्तराक्षरी ऽघरखरयुक्तः परिदीयन्ते (त) [प० १९७, पा० २) अल्पसंख्यो भवतीत्यर्थः । अधराक्षरोऽधरस्वर- युक्तो पद्धते बहुसंख्यो भवतीत्यर्थः । एतच्च विस्तरेण वर्णितमिति नोक्तम् ।। ३२७ ॥ आकारीकारेहि, लभइ समेओं ककारो [य] चवग्गे । तइय-चरिमादि एवं, लभइ खकारो य-ट-तवग्गे ॥ ३२८ ॥ ककारः आकारेण युक्तः चवर्गादेकमक्षरमधरानुयलितत्वाद[१० १९८, पा० १]धरं प्राप्नोति ।। ककार ईकारेण युक्त[:] टवगें अधराक्षरं अधरानुवलितत्वात् । एवं तृतीयगकारः, पंचम- ड(क)कारः क्रमेणाकारयुक्तः पवर्गाक्षर, ईकारेण युक्तः टवर्गाक्षरं अधरं अधरानुवलिरात्यात् । सकार थाकारेण [युक्तः] टवार्गे अधराक्षरं प्राप्नोति । प(ख)कार इ(ई)कारेण युक्त[] सवर्गादेकमक्षरं [१० १९८,पा० २] लभते अधरानुवलितत्वाधरम् । एवं द्वितीयवर्णाक्षराः शेपाः खकारेण क्रमेणाकारयुक्तास्तृतीयवर्गाक्षराणि लभन्ते । इ(ई)कारयुक्ताश्चतुर्थवर्गाक्षरं प्रामोति ।। (नुयन्ति) अधरानुवलितत्वादधरम् । अन्यगाथया अमुमेवार्थ प्रस्तार्यते-ककार आकारयुक्तः ईकारयुक्तच झमसा(श:) चवर्ग-टवर्गी लभते । यथा-काच कीट । अस्याधः (प. १९९, पा० १] सकार-थकाररचना -खा रखी थ । अस्याप: --गाचगीठ । अस्साघः पकारः आ(आई?)कार- युक्तश्च । त-पघर्गों प्राप्नुवन्तः (मानोति) ॥ ३२८ ॥ तदर्धगाथामाह- त-पवग्गेसु धकारो, दोसु वि एकेकायं लभे कमसो । सेसाण वि एस कमो, चादीणं सघवग्गाणं ॥ ३२९ ।। पकार आकारयुक्तः तवर्गादधराक्षरमवाप्नोति । पकार इ(ई)कारेण युक्तः पवर्गादेकमया- मोति । फ() फारादयश्चतुर्यवर्गाक्षराः शेपाः पट् आफारेण युजाश्चतुर्थवाधार प्रामुयंति । (६)कारयुताः पंपमवर्गाक्षरानघराक्षरानि] लभन्ते अपरागुयलितत्वात् । यता संयोफ)वर- 2 (१०१५९,पा. २ मेण । एवं प पफारादयो इकारान्ताक्षरा आकारेण ईकारेण या युक्ता यथा प्रामु- पन्ति पर्गाधर (रा)सथाभिहत (हिना: i) प्रवारोऽन लिख्यते - अनन्तरख्याधस्तान-पाथ पीभ। पषं हाकारः धकार । दी टफारम् । स्थापनादनन्तरम्याधस्सात् - उप डीहा। एवमेतो द्वितीय पवर्षमानी शेपवर्गानुस्वारे(सार)तोऽपि पहच्यापा(न्यो या)यत् स्वर्ग {५०२...पा. वि पूर्पत्या गायया पपा भासोकान्तकमेणेति ॥ ३२९ ॥ क-च-दादीनां पढमा, चरिमो(मा) य समं लहसु (हं तु) कारेण लभइ तयग्गे एवं, साणुस्सारे य सविसग्गे ॥ ३३० ।। फकार(?) पर वर्ग-अयम्स प्रहपम् । आशिपापयर्गानामपि वर्ग-पर्या. वर्गरूप प्रमाःकार-पपार-टफारोपे(राग)पम् । एवं प्रभादी उफारेण सह रायमान मारेगामापा 'अमुमेका प्रचारपति' इति भारम् । 4 " अयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ३३०] [प०१.०, T• २]कि छभंत इत्यत आह-पयस फैझारा उकारयुंचाः पकारं लमंते । चकार उकारेण युक्तः यफारम्। टकार: शफारम् ।मात्रासंख्यानियमेन शेषवर्गाणामपि घरमः। एपामेव क्रमेण-षण एते उकारयुक्ता एस श्य लभते (न्ते)। यथा सुकार पकार(१) बुकार यकार गुशार सकारं [१०३०, पा• १]रचना-कुपवुय दुरा(स) । अस्याधस्तात्-खुप छुर बुप। अस्याघलात्-गु जायु ल । दुस । वत: पंचमः-हुप । पुय । णुस । अस्याः चतुर्थ:- शुभाशुप। दुह । एवं लन्धिक(?)ककारवर्गस्य वथा रचना ककारस्थापि टकारस्य च । कप दादीनां पढमा चरिमा य समं उकारेणेति गाथार्थः [प० १.१, पा० २] व्याख्यातःलमा तागे' इत्येतत्पदं व्याख्यायते-'तपयम(स) चतुर्णामेपां वर्णानां लब्धिरर्द्धक्रान्तिन्यायेन यथा तकार- पकार-यफार-शकाराणां उकारसहितानां क्रमेणैव लब्धिः। फेपां! अकार-कार-कार-टकाराणां स्थापनात् । अपुक । युक। शुट । अस्याः थुआ। कुसहठपु। 31 अस्थाधा-दुह। युगलु । जमुन । अस्याधस्तात् - तु अ । मुआ। युम् । गुण । अस्थापः-ई। भुष। वुक । छुढ । एवं यथा वप यस वर्गायराणां लग्धिक(?) ककारेण सह तथा शेषाणामपि । यथा-उकारेण सह लम्धि[:]वक्तव्या इति । व्याख्यातमेतत्पदं [५० २०२,पा. १] 'लभति ववरों एव"मिति । 'साणुस्सारे य सविसग्गे' इत्यस्य गाथापश्चार्द्धस्य व्याख्या कृ(कि)यते-- कवर्ग-घवर्ग- ॥ वर्गाक्षराः ककार-चकार-टकाराः सानुस्वारा:- कंपंट एते पूर्ववद् यथा उकारसहिता लभन्ते । तद् बिंदुविसर्गाभ्यां अपि । विन्दोर्युक्तस्योदाहरणम् – फकार[:] विन्दुसहित पकार लभते, 'च' इत्येषा(प) प(य)कारम् , '' इत्येप शकारम् । स्थापना-कंप । चंय । टंश । अस्यापा-खंफ । छंर । ठप । अस्याधः-म व(गंध)। जंछ। डंस । अस्याधः-म! संघ । दंए । अस्याधः-डा म घुट घ(ईम । संय।) अंश । उत्तरं समासादयति । अधर- "(स्तु) अधरमेय । सविसर्गोघे(प्ये)वं यथा-काप। चःय । टःश । [प. ३०२,पा. २] अस्याधः-साफ। छार। घ(8):प। अस्याधः-गव । जाल । डास । अस्याधः- काम । माय । णःश । अस्याधः-घः । शव । ह । यथा एषां सानुस्वारस्य (स)- विसर्गक्रमेण लबिधरुका तथा व पयस' इत्येतेषामपि प्रस्तारः-भ(d) अ 1 पंक । य च । सं(श)ट । अस्याधः-आ। पं(फ)ख। ।रंछ। [५] दं। पं(ब)ग। भलं)ज । ॥मंड । अस्सापा-नं अः। मंद:(:) । यमाग(श) णः । प० २०३, पा? अस्थाधा-घंई। भंघ । वं झ । ईद । सविसर्गे(?)प्येवं यथा--तः अ । पाक । याच । साट । अस्याप:- थः आ। फाख । छ। पाठ । अस्याधः-दः ।। पःश । [वःग] । लाज । साद। अस्साघः-न: अमः। यःम। सःण । अस्थाय: -घाई। भाघ । वहाहाह। सानुस्वार-विसर्गावेतौ । अथवाऽन्यथा रचनाक्रमेण गुरुरान(इ) ॥ ३३० ॥ + मूलादर्श सर्वाऽपीयमदरस्थापना प्रभ्रष्टपाठालिका उपलभ्यते भतोऽयस्तात् कोष्ठकेषु शुरूपैणेषा प्रदर्यवे भस्माभि । -संपादकः । सानुस्खाराणा सविसगौण सानुस्वाराण सविसगोणी अपयशानी कचढाना स्थापना- फघटानां स्थापना तपयशानां स्थापना- । पच पर श २ख फछरह प |३ग यज लड स स्थापना १. पचः यश मप यच, त: अप: या चार २ फछ. र उप २ धमाफखर छप |२थःआफ-खजप ट गचज'लाडस ३ दब गल जस ३ग काज स.. घ.मशःयटः६ भघव शहद धःहाभाघव.स. ५डामजायणश ५न अमय अशण ५मः अमायः मघाण ५ मजयणश ७७ [गाथा ३३१-३३३] भनव्याकरणाख्य .. कचया(टा)दीणं पढमो, चरिमो य समं लभंतुकारेण । लमहाप० २०३, पा० २] तबग्गे एक, साणुस्सारे य सविसग्गे ॥ ३३१ ॥ 'कचटा दि' इत्यनेन क च देतपयशानां प्रथमो वर्गः । तृतीयखराः(वर्गः) गजड दघल सा नां । पञ्चगः डमण नमाः। एवमेवादिग्रहणं समर्थितं भवति । एते कच टा दयः चकारसहिता यथा-कुचुडतुपुयु शु।मसो(एते?)धस्तात् पंचमवर्गोत्तरान् लभन्ते यथा-तपय : स(२) । अ क च ट । तृतीया प० २०४, पा० १]स्तु गजडा दयः उकारसहिता यथा-जुगु(गुजु) हुदु(बु) लुसु । एतेऽपि त्य(स्वगात् क्रमेण पञ्चमो पञ्चगो लगते(?) द य ल स ग जड दया (हादयः) 1 अंत्या उकारयुक्ता यथा-डुअणुनुमु । ग(य)वर्ग-शवर्गयोः पञ्चमः क्रथाशब्दः, हिवाशब्दश्च । प्रश्नकाले तावपि श्रुत्वा पंचमस्य य-सवर्गप्राप्तिर्भवति । यथा- म य य स दु । कथ- शब्दः, हिकाश प० २०४,पा० २ दश्च । एते सप्त । "कच टा दीणं पटमो तहओ चरिमो समं उकारेण लमइ तवरगं" इत्येतद् व्याख्यातम् ॥ ३३१ ॥ ख-छ-ठादिएहि सहिया, एते उ हवंति छट्ठए वग्गे । घ-झ-टाइएहिं सहिया, सत्तमबग्गे लभे एक ॥ ३३२ ॥ सफार उकारयुक्तः पठे पयगेऽक्षरमुत्तरं प्रामोत्युत्तरानुवलितत्वात् । छकार उकारयुक्तः शायर्गे उत्तरानुवलितत्वादुत्तरम् । ठकार उफारयुक्तः अवर्गे उत्तरानुयलितत्वात् उत्तरस्परम् । । एवं थफर खा(पा)[अपि । सकारः अनुस्वारयुक्तः पप्ठे पवर्गे उत्त प० २०५, पा० १] राक्षरं लभते। स एव सविसर्गो युक्तोऽधरम् । छकारः सानुस्वारः सवर्गे उत्तरमवाप्नोति । धकारः सानुसार अपवर्गे उत्तरं लभते । विसर्गयुक्तोऽधरम् । एवं छकारोऽपि [स]विसर्गयुत्तो यमर्गेऽपरमिति । एवं यफरपा यक्तव्याः । एवं गाथापागर्दशक्त(मागईशब्दार्थः । ) घझ टाइएहिं सहिया' उकारविन्दुविसर्गाः । (प)कार ओ(ड)कारयुक्तः सर्यो उत्तरं लभते । यिन्दुयुक्तः सवर्ग एवोत्तरं ॥ उमते । स एप पकारः विसर्गयुक्तः तत्रैवाधरमिति । एवं अ(घ)फार उकारयुक्तः सप्तमे सय, उचरानुवलितत्यादुत्तरं, स एव पिन्दुयुक्तः [प० ३०५, पा० २] तस्मिन्नेवोत्तरं लभते । विसर्गयुक्तः अपरम् । एपं ढकारोऽपि । एवं प सर्पहा(म यहा) अपि सस्मात्सप्तमं वर्गाक्ष लभन्ते ॥३३२।। उत्तरवंजणसहि[या), सत्तमवग्गे लभंति सेससरा । अहरेहि अ संयु(जु)चा, लभंति अहराहरे वग्गे ॥ ३३३ ॥ उत्तराः [५.२०६.पा.१प्रपम-मृतीय-पचमवाधिराः परिशिष्टेः खरेः 'का' इत्येते. स्व(लि)भिर्युताः आत्मीयादात्मीया[] सप्तम ईफारयुतो उभ्यते । प्रश्नाक्षाणामादिस्थितम्य यदाऽमतः बार इसारयुतो श्यते पदा दफार इफाप० २०९, पारयुषो उभ्यते । प्रमा. सपनामारिस्थितम्प यदापनः टकार औयारयुगोपवे सदा पारो लभ्यते । अधरय [ परापरमर लभन्ते अपरस्परयुगाः । इत्येप पया(गायायः ।। अपपा(मा) गाय(पा)या गया- सरपंजनशेपम्पराः 'ऐशो प्रयोऽयेते বনয়কাে -দূঃমূহ। মা অঘ ঘদেয়নাছিগী মন भगंगा() सगर्ग यया-पराया अपरम्पशना येषु वर्गेषु अमावनि- .

॥ जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ३३४-३५ तत्वाधराक्षरान् । तथा उत्तरव्यञ्जनाः-गूजूदूदू प० १०५, पाबूलसू एषा लन्धि । क्रमेणैव स इ गजर दवाः, एषु वर्गेषु अधरानुवलितत्वाधरं लभन्ते । तथा मूणूनूम् क्रमस(श:) सप्तमवर्ग यथा रमेण चि(चे)त्यधरानुवलितत्वादधरा(र)मिति । (ऐ)कार उत्तर- व्यञ्जनसहितः यथा-कै चैट है पै पै शै । लन्धिस्तु प्रमस:(:) एषु पु (त्रि)या भवति । [t..................] तत्त्वादधराक्षरं । ।अ कपट नपाएवं गज डा योऽपि ऐकारयुक्ता वकन्याः । हबणा देयश्चेति । तथा अ(औ)कारयुक्ता उत्तरव्यञ्जनाः । को चौटौ सौ पो यो सो(शो)।लब्धिस्तु सप्तमवर्गात् अधरानुवलितत्वाधरान् । स क च ट व पाः। एवं गजडा दयो हमणा योऽपीति । एवं बार-ऐकार-ओकारयुताः अधरा अधरा[न] लभन्ते । सूरतूयू फूरूपू । लब्धिस्तूच्यते अपरानुवलितत्वादधरानेय {प० २०७, पा० २१ आस छठयफ। ॥ तथा, घूझ्दू धूभूयूह । लब्धिम्मो वर्गेपु अधरानुवलितत्वादधराघरलब्धिः । जह यह उपभ यथा ऊकारयुक्तास्तथा ऐकारीगरावपि चाच्याविति एवं अधराधरेषु लभते । इत्युक्तो गाथार्थ इति ॥ ३३३ ॥ लभइ ककारो जुत्तो, चकारवग्गंमि तइय-चरिमेण । टति]वग्गे जइ पण्हे, दसमसरो [५० २०८,५०१ तइओं यादीए ॥ ३३ ॥ वफारः प्रभाक्षराणामादिल्लिति (त) ईकारेण सानुसारेण युषः पवर्गादेवमक्षरं लभते । उत्तरमुत्तरानुवलितत्वालमते। प्रभाक्षराणामोकारस्यादिस्यस्य यदापत आकारयुफो टकारो श्यते सदा आकारयुक्तटकार एच लभ्यते । उपारस्यादिस्थितस्य प्रमाक्षर(रेषु) यदामतः १.१.४, पा.२ टकारा इकारयुक्तो दृश्यते सदा दकार एय ईकारयुषो लभ्यते । प्रमाक्षराणामीफारस यदामतः सकारा अकारयुक्तो दृश्यते तदा ताकारो लभ्यते । औकारादिस्वस्य यदाऽमता तकार ईकार- * युको दृश्यते सदा वीपारो लभ्यते । प्रभाक्षराणामादिस्यस्य इकारस्य पथा(दा)मा सकार आकारयुतो दृश्यते सदा सकार आरमान रभते । प्रभाक्षराणामादिस्यस्प इफारस यदाऽप्रवः सकार इकारयुक्तो दृश्यते सदा तयारो सभ्यते । औकारस्यापता यापारी यदा रयते सदा [५० २०९पा.1] याकारो लभ्यते । औकारस्यामतः पारो दृष्ट ईसार एवं लभ्यते । पार- स्थामतः पापार आत्मानं लभते ॥ ३३४ ॥ बितिय-चउत्थेहि समं, सरेहि सो चेव लभइ त-पवग्गे। सत्तम-णवमेहि समं, सेसेहि समं अहरवग्गे ॥ ३३५ ।। पूर्वार्दो अस्प(स्या) गाय(था)या अनन्तराधान्तमायया पर्णितः । प्रभाक्षराणामादित्यस्य फारसामतः वोकार लमते । औपारस्य प्रमादिस्थस्य पकार एवारयुतः पेफार मते । ओकारस्म प्रमादिस्सस्वामता पापार औयारयुषः पो(पौ)पार लमते । शारस्य ममारिस्पता- .. [५.२.९, पा. २]प्रतः इषार:(तकार.) सपा समवे । कारस्य प्रभादिश्यसापत: टो(सकारा टोमा एभते । ईसारस प्रभादिस्वरूपामतः खित.तपार] रार लमते । वारम्प माविस्थ- सामत: वकारः तोगार एमते । ईकारण प्रमादरममा स्थित यमरः] कार समवे। इकारस प्रमादिस्सस्स ॥ ३३५ ।। भिवाद किया पाया पतिका प्रतिभाति । - ७९ - 13 [गाथा ३३६-३४२] प्रश्नव्याकरणाख्यं बितिएण य संजुत्तो, चकारवग्गो लभइ [५० २१०, पा. १] तइयवग्गे । प-यवग्गे पुण लभइ, चत्तारिस(म)एण संजुत्तो ॥ ३३६ ॥ चकार एकसंख्याकाकः], ककारोऽप्येकसंख्य एव । ततः संयोगाद] क्रान्तिकसंतः। कस्मात् ? तुल्यसंख्यत्वात् । यथा 'च'। स यत्रतत्रस्थः प्रश्ने प्व(स्व)वर्गान् प्राप्नुतः(प्राप्नोति) 1 टकारः ककारयुक्तोऽर्द्धक्रान्तिकसंज्ञः यथा 'द' । स यत्रतत्रस्थः प्रश्ने पवर्ग प्राप्नोति । चतुर्थतकारेण युक्तः [१० ११०,पा० २] ककारोऽर्द्धक्रान्तमापन्नो यथोक्तः स यत्रतत्रस्थे(स्थः) प्रश्ने तृतीयवर्ग प्राप्नोतीति ॥ ३३६ ॥ जो अ ककारे गमओ, भणिओ सो चेव तइय-चरिमाणं । आइम-तझ्याभिहए, लभइ तकारो हु त-पवग्गे ॥ ३३७ ॥ यथा ककारः प्रथमस्वरेण तृतीयस्वरेण वा युक्तः सवर्गाक्षरं लभते । एवं तृतीयवर्गाक्ष- ।। राणां गज ड द घल साना, चरिपि० २११,पा० १]माणां पणन मानां चान्यतमाक्षरप्रश्ने प्रथम- स्वरेण तृतीयस्वरेण वा युक्तः आत्मीयवर्गेऽक्षरमवामोति उत्तरानुवलितत्यादुत्तरम् । खकारः प्रथमखरेण युक्तः तपर्गेऽक्षरमेकं प्राप्नोति उत्तरानुवलितत्वादुत्तरम् । स एव खकारः तृतीयस्वरेण युक्तः पर्वर्गेऽक्षरमेकमयामोति उत्तरानुवलितत्वाउ(दु)त्तरम् ।। ३३७ ॥ लभए वीव(इ)यजुत्तो, चकारवग्गो य तइया प० २११, पा० २ वग्गं च । चत्तारिमएण समं, लभइ यकारो पवग्गं उ ॥ ३३८ ॥ चकारो द्वितीयस्वरयुक्तः टवर्ग प्राप्नोति । यकारश्चतुर्थवरेण य(प)वर्ग लभते ।। ३३८।। जह भेओ उ चवरगे, तह य कवरगंमि चेव णायचो । एवं चिय दा(ता)दीहिं, सरेहिं भेओ मुणेयधो ॥ ३३९ ।। यथा धकारो द्वितीयस्वरयुक्तः तृतीय वर्ग प्राप्नोति एव्याव) ककारोऽपि द्वितीयस्वरयुको द्वितीयं वर्ग प्राप्नोति । तकार-चकारामप्येवमेव ॥ ३३९ ॥ एमेव सेसयाणं, चादीणं अट्ठमावसाणाणं । सरवग्गाण य जोगी, अद्धकंतकमो होइ [प० २१२, पा० १] ॥ ३४० ॥ एवं यया प्रयमवर्ग: शेपाक्षराणां शकाराष्टसप्त(टमां)वानां तृतीयवर्गाक्षराणां गज उदय उ सानां चतुःसंख्यानामक्षराणां यः संयोगः सार्व(आख)क्रान्तिकसंशः । तस्स संयोगस्य अधस्तात् । योऽक्षरः स तृतीयवर्ग प्राप्नोति । तुल्यसंस्यस्य स्वरस्याक्षरस्य च यः संयोगः सोऽप्यर्द्धक्रान्तिक- संहाः तृतीयवर्ग प्राप्नोति ॥ ३४० ।। पण्हाइमसंखाए, सधे पण्हक्खरे गुणेऊणं । उवरिछे पक्खे, आइल्छे अट्ठहि विभाए ॥ ३४१ ॥ सेसं वग्गे णामक्खरं होइ ।* जइ पुच्छइ के म(स)रं तो, करेन अहाप. २११,८०० २ रुचरं कमसो॥३४२॥ मूलादर्श अस्या गाशा पलाय एप पूषोई उपमम्यगे । टिनप्राय इनागाल। , , , 1 तेन गुण- जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाया ३४३-३४४] 'मभाक्षरमध्ये उप(प)रिस्वराणां संख्या उपरिमानारहितानां च संयुक्ताक्षराणां या उपर्य- क्षरसंख्या सामेकीकृस पृथग (क) स्थापयेत्। परिस(शि)टाना प्रभाक्षराणां विद्यमानापरवराणांप या संख्या वामेकीकृत्य स्थापयेत् । अ क घट त पयश वर्गाणां वसु-मुनि-रस-स(शोर-सागरा-मि- यम-चन्द्राः क्रमसो(शो) गुणकारा[:] | प्रश्नाक्षराणां मानाधक्षर-प्रतियद्धो गुणाकारः, 'यित्वा स्थापितां अधोऽक्षरसल्यामुपरि प० २१३, पा० १]खराक्षरं पृथक् स्थापितां वर प्रक्षिप्याष्ट- भिर्भागेऽपहृते लब्धाच्छेपाच द्वौ वर्गों लभ्य(भ्ये)ते । लब्धवर्गों यदाधिका(क)स्वदास्त्राभिः पुनर्भागे हृते लब्धाच्छेपाश्च(च)द्वी धर्टी पुनर्लभ्य(भ्ये)ते । फकारादयो लघवर्गाः शेषाश्च ज्ञेयाः ।। ३४१-३४२ ॥ एमेव सेसबग्गे, णामक्खरपा(या)ण हवद एकं तु । जइ इच्छसि तं करणं, करणे(२)ज अधराधरं तत्तौ ॥ ३४३ ॥ तत्र शेपवर्गाल(लो)धवर्गाच एकैकं नामाक्षरं लभ्यते । प्रश्नाक्षराणां निपतिताना मध्ये पूर्वोक्ताधराधरक्रमेणाक्षरमुत्तरमधर वाया ।। ३४३ ।। ॥वर्गाक्षरसंपों प. २१३, पा• गोत्पादनं समाप्तम् ॥ . , U . । अत्यु(णु)सार-विसग्गविही, ण(णा)यचो होइ सबओमणे(है)। चउसु वि दिसासु एवं, वग्गे ण(णा)मक्खरुप्पत्ती ॥ ३४४ ॥ सर्वतोभद्र[:] प्रस्तारमतरेण न शक्यते दर्शयितुम् । अनुखारविसर्गप्रहणेन शेषखराणामपि सूचना कृता । अतो व्यंजनखरयोगाच(च)तुर्वपि दिक्षु(क्ष्वाक्षरपातनिकया सुखदुःसलाभालाभ- जीवितमरणाद्यपि नामाक्षरोस्पचिरपीति प्रस्तारेण दर्श()व इति सर्वतोभद्रस्य महाफरश(ण)स्य मूलप्रतियद्धादारस्या(भ्या)वरणपंचदशपर्यन्ति(न्त) न्यासमात्रं [प० २१४, पा. १) पति पंक्ति() " लिख्यते । तत्र मूलप्रतिबद्ध अष्टमंडलमध्ये अकार तस्य पूर्वतः एकारः । दक्षिणतः ऐकारः । अपरतः उकारः । उत्तरतः ओकारः। द्वितीयवर्गे पूर्वादिगादि अक च ट प य श । तृतीयावरणे दक्षिणादि आ सछठ थ फरप। चतुर्थे अपरादि ६ गजड पलस। पंचमे उत्तरादि उ प्रझमह । भूगः प्रावरणे पूर्वादि आदिय-भौम-शुक्र-बुध-गुरु-शनि-चन्द-राहु-पर्यन्ता प्रहाः। सूर्यो(य) भीमापु(तोरे पुनर्वसु-पुष्याशेपा । भौमशुक्रान्तरे मघा फाल्गुनीद्वयं च । * शुक्र हस्तः । शुक्रवुपि. २१४,पा. २]धान्तरे चित्रा स्वाति विशाखा । बु[प] रा(हसत्यन्तरे अनुराधा ज्येष्ठामूलानि । गुरुसनेश्वरांतरे आपाढाऽभिजिस्श्रवण । वृहस्पत्योपरि पूर्वाषाढाः । सनेश्वरांतरे धनिष्ठा शतभिषा पूर्वभाद्रपदा। चन्द्रोपरि उत्तराभाद्रपदा । चन्द्रराह न(अ)न्तरे रेवती अश्विनी भरणी चेति । राहूसूर्यान्तरे कृतिका [प० २१५, पा• १] रोहिणी मृगसिरश्चेति । सूर्योपरि आर्द्रा । एतत् पष्टावरण पूर्व दिगादिवः ।। मेष क स ग घड । वृषः पछजझव । मिथुन घृपोपरि म(ग)कारः । जकारोपरि मिथुनः । दक्षिणस्या फर्कटकः। ततः ट ठ ड ढ ण डकारस्योपरि सिंहः । तथ६ घन दकार- स्योपरि कम्पः(न्या)। अपरदिसा(शा)यां तुल्यः(ला)। पफवभम [फ. ११५, पा. १ प्रकार- श्रुटितोऽत्र कियान पाठ , इनि प्रतिभाति ।

[गाथा ३४५-३४६] प्रमव्याकरणाख्यं स्योपरि वृश्चिक । य र ल व पंचमोऽयं कुंथशब्दो लकारोपरि धनुः । उत्तरतो मकरः । शप सह पंचमोऽयं हिंकृतः शब्दः शफारोपरि कुम्भः । क ख ग घ ङ गकारोपरि मीनः । एवं सप्तमा- धरणम् । अष्टममिदानी-पूर्वादितः कच छ ज झ म । बट ठ ड ढ ण । च तथदधन । पफ चभम । दयरलव । शपसह । त क ख ग घ ङ । च छ ज झब । एवा(वमोष्टमम् । नवमं इदानी-पूर्वादितः च ट ठ ड ढ ण । य त थ द ध न । प फ ब भ म । श यरलव । त श प स । ह। क क ख ग घ ङ । पच छ ज झ ब । च ट ठ ड ढ ण । दशममिदानीम् - ट त थ द धन । शप फवभम । त यरलव। क श प सह च । पक ख ग घ ङ । चच छपि० २१६, पाजश भ। य ट ठ ड ढ ण । क त थ द धन । एकादश(म)मिदानी - -तपफयभम। फयरलव। पशपसह । चश क ख ग घड । जच छ ज झब । प ट ठ ड ढ ण । वथ द ध न । कप फ ब भ म । द्वादशम]मिदानीम् -प य र ल य । श प सहन । य क ख ग घ । टप छ । जसम । शट ठ ड ढ ण ! त थ द ध न । क प फ ब भ म । प यरल व । प्रयोदश[म]मिदानीम् - यशपसह । ट क ख ग घड । शच छजझम त ट ठ ड ढ ण । क त थ द ध न । पफयभम। वायरल धाय श प स ह य । चतुर्दश[म]मिदानीम् - श , क आ, खइ, गई, घड(उl), न उ (?), तए, पए(२), छ उ(ओ), ज ऊ(औ), झ अं, मः। क अ, आ, इ, द(ह)ई, ढउ, गज(अ), पए, व ऐ, प ओ, द औ, घ अं, न । [अ], पा, फइ,पई, (प० २१६, पा० २] " भाउ, मऊ, य ए, रऐ, व उ(ओ), ल (), प, अः। दुअ, [श] आ, [N] इ, सई, हर, सज(अ), गए, फ ऐ, ख उ(ओ), ग अ(औ), घरं, गः(ड) अः । पंचदशमि] पूर्वादितः अफ च ट त पयश । ए। ऐख छ ठथ करप | आ। इ गज उदघल स । ओ । नौ घझट पभवह। ई। अकचटतपयश । ए। आस छठ थ फरप । ऐ । गज उदवलस । ईप झदधभव ह। औ। एवं पंचदशावर्ण(रण)पर्यन्तोऽयम् ॥ ३४४ ।। [५० २१७, पा० १] . ॥ सर्वतोभद्रः समाप्तः॥ सर्वतोभद्र इति महरि (8)क्षराश्यक्षरविधानेन येन केनचिद् यथादिस(श)मायावस्या- देखो(या)क्षराण(गि) च प्रामानि । अन्यत्र विधानं इति । मंगलार्थ च इह लिखितमिति ॥७॥ । 24 कंठंतरिओ वि उरो, उ(प?)रभारं(१) सो न गच्छए मोत्तुं । अवसेसंति(समंतारिओ पुण, आइल्लमणंतरं पावे ॥ ३४५ ।। 'अइएउ' एते कंठ्याः । एतेपामन्यतमोपि० २१७,पा. २] हकारस्ये(स्य) प्रभाभरादिस्यस्य यदाऽमतः तदा हकार एव लभ्यते। 'अइएउ' एतेषां कंठयानां अन्यतमादिखस्य 'आई ऐऔ' एतेषां अपरिशिष्टस्वराणां अन्यवमो यदाऽप्रतः स्थितमेयाधमन्यतरं तदा कंट्या(ट्य) खालमते ॥ ३४५ ॥ उकारादिसु एवं, पढमंतरिओ ण एइ परभावं । अभिहम(म्मोतो पुरओ, आदित(ल)मणंतरं लभइ ॥ ३४६ ॥ उफारस हफारस्य प्रयमस्प प्रभाक्षरादिवस ययाऽमतोऽनंतरं फकारः प्रथमो दृश्यते पदा हकार एप उभ्यते । एकार(रे) फकारेणालिंगिने आदिस्थो [५. ११८,पा-कार एप लभ्यते । उकारस्य कंपयोगकरणम् ॥ ३४६ ।। नि.."

१२ -- जयपाहुर्डनाम निमित्तशास्त्रम्। गाथा ३४७-३५१] ....................तीस भायए सदा कालं । जं सेसं सा ह तिही, वोच्छं णक्खत्तकरणं से ॥ लडाओ जा तिथीओ, या(हीणा) रूपेण कण्ण(पह)पक्खस(स्स)। मुक्कं पि दोहि भाए, माससनामादिरिक्खगणं ॥ सर्वदा प्रश्नकालिनी छाया राम(श)यो द्वादश होरेति पचदशाना सज्ञा प्रभाक्षरचा सर्वमेतदे- कीकृस नृन्स(निशीपचगुणाक्षेप. । वर्तमानतिथियुक्त घ कृत्वा शेष गतार्यः ॥अन्य(ना?)दर्शमेतत्] पढमो विसमो उ सरो, वितिओ य समो तइजओ सम्मो । विसमसमो य चउत्थो, सेसा एवं सरचउक्का ।। ३४७ ॥ प्रश्नाक्षराणामादिस्थो गकारो विप[म] इति इकारयुक्त गकारमेव लभते । प्रश्नाक्षरादिस्यो ॥ धकार स ईकारयुक्तो घकार एव लभते । दकारो विषम उकारयुत्तो दकार एव लभते ॥३४७ ।। एवं समवग्गाणं, चउकया विसमरगयाणं च । णायघा णंतरओ, विसमा [५० २१९, पा० १] विसमाण संजोए ॥ ३४८ ॥ समस्वरे[ग] युक्तसमाक्षरस्तमेव लभते । विस(प)मस्वरेण युत्तो विषमाक्षरो लभ्यते । एवं सर्वे ककारादयो हकारान्ता समखरे(३)र्युताः समाक्षरास्तमेव लभन्ते । विपमखरेयुका । विषमाक्षरास्त एव लभ्यन्ते ॥ ३४८।। समसंजोएण समो, लभइ अ विसमो य विसमसंजोए । वग्गे दिह्रो एसो, भणिओ बग्गक्खरविाप० २१९ पा० २]भाओ ॥ ३४९ ॥ समखरयोगे व्यजन सम लभ्यते । स्वर च विषमस्वरसयोगे उत्तरत्वाद् विषमाक्षरो लभ्यते । स्वरश्न विषम एव प्राग्व[दार्थ । ततोऽक्षरस्वरविभागे लब्धिरिति ॥ ३४९ ॥ ॥ संकट-विकटं समाप्तम् ॥ , वगक्खरा तिपु(गुणिया, खेवो पढमक्खरस्स वग्गंमि । तिसु चउसु अधो अहे, तंमि य णा[म]क्खरं वग्गे ।। ३५० ॥ "प्रभाक्षराः। एव घर्गाक्षराः। प्रभाक्षराणा विद्यमानखराणा या सख्या वामेकीकृत्य तू(त्रि)गुणा कृत्या प्रभाक्षराणा ककारादीना हकारावाना अयतमादौ दृष्टा पूर्वत(त्रि)गुणित- पिंडात् पर्व प्रक्षिप्य ये ककारादीना हकाराताना [प. २२०, पा. १ प्रभाक्षराणामन्यतमादौ दृष्टे तस्मिन्नेव सरया पिंडाख्या पतुरक्षिप्यास्ताभिर्भागेऽपहते शेये तकारादिधौ लभ्यते । लब्धानां . पुनः सप्तभिर्मागे पल(यहोब्ध यच शेष तयोः फकारादिवर्गों लभ्यते ॥ ३५० ।। अक्खरसरिसा जोणी, मत्तासरिसं च जाणए रुवं । एवं सेण विभत्ते, वग्गेण निरूविओ भेओ ॥ ३५१ ।। भिसा गाथाया एष पूर्वाई खण्डितरूपेण उपलम्पतेऽत्राद”। परं अने ८५ तमे पृष्ठे इय गाया भण्डारिमका पुनर्निखिता कम्पते । मादर्शान्तरमे देनेयं पुनकिरन आता सम्माम्यते । ।

. [गाथा ३५२-३५७J प्रश्नव्याकरणाख्यं जीय-धातु-मूलीमरैः पूर्योक्तिजीवधातुमूलयोनि निर्देशकार्यः() मानाभिर्द्रष्टव्यम् । रूपं शुलं कृष्णं पीतं रत्तादि । लक्षणं दीर्घमसं वृत्तं इति । जीव-धातु-मूलोत्तराधरैः पंचभिर्भेदः प्रमाक्षराणां निरूपयितव्यो वर्गप्रतिबन्धः ।। ३५१॥ [१० २२०.पा.३] पढम-तइए य चरिमा, वग्गा पासंडिया तहा भणिया । सेसा य अपासंडी, णिहिट्ठा पण्हइत्तेहिं ॥ ३५२ ॥ प्रथम-तृतीय-पंचमवर्गाणां अन्यतमबहुले प्रश्ने पासंडिनो ज्ञेयाः । के ते १ प्रबजिताः अरहन्तादयः आजीविकादयश्च । शेपाणां द्वितीय-चतुर्थ-वर्गाक्षराणां अन्यतमाधिके प्रभे अपा- खंडिनो ज्ञेयाः । (५० २२१, पा० १] अपापंडिन इति गृहस्था मण्यन्ते ॥ ३५२ ॥ पढमो वग्गो पासंदाहिण (दाहिणपासं?) विद(ई)य एव चउत्थे य। रा(वा)मं तइए मज्झं, दो पासे पंचमं जाण ॥ ३५३ ॥ प्रथमवर्गाक्षरवहुले प्रभे तैरेव प्रथमवर्गाक्षरैरनभित्तैर्दक्षिणपार्श्वे पुरुषस्य लांछनं ज्ञेयम् । अनभिहतः स(श)नप्रहार इति । द्वितीय-चतुर्थवर्गाक्षराणामन्यतमपहुले [५० २२१, पा० २] प्रश्ने वैरेव द्वितीय-चतुर्थवारैिग्नभिहते वामपाधै लांछन प्रत्येतव्यम् । अभिहतस्तैरेष शत्रैः महारादिकम् ॥ ३५३ ॥ पढमसरे सिरभागं, पिडालयं होइ तह कवरगंमि । चिबुयं[च] चवग्गंमि, गिवप्पएसो टवगंमि ॥ ३५४ ॥ प्रथमस्वरमणैन अवर्गो गृह्यते । तेन सिरो शेयः। कवर्गे निडालं । चवर्गे! ५० २२२, पा० १] चिबुकं । टवर्ग प्रीवाप्रदेशा(शः) || ३५४ ॥ हिययं च तवगंमि, कडिय पवामि होइ नायचा । ऊरू [य] यवगंमि, जाणु पव(ए)सो सवग्गंमि ॥ ३५५ ॥ तवर्गाक्षरयहुले प्रश्ने हृदयं ज्ञेयम् । पवर्गबहुले प्रश्ने फटी ज्ञेया । ज(य)वर्गबहुले अरू शेयौ । जाणु(नु)पादौ सवर्गबहुले ॥ एवं अष्टविभागांगफल्पना । (प० २१२, पा• २] पंच(ए?)- प्रदेशभागकल्पनार्थः(र्थमाही) ॥ ३५५॥ सीसो य अवगंमि, णिडालदेसो तहा कवग्गमि । अच्छी य चवग्गंमि अ, णासा हु तहा टवग्गंमि ॥ ३५६ ॥ यभिहितं अवर्गबहुले प्रश्ने शिरो झया, तस्वेदानीमवयवान] तैरेव वर्गाक्षरैराह- अवर्गाक्षरयहुले प्रझे मूर्द्धजाः प्रत्येतव्याः। [१० २१३, पा• १] क्वर्गाक्षरयगुले प्रो ललाट शेयम् । पवर्गबहुले प्रभे लोचने । टवर्गे नासिका ।। ३५६ ॥ वक होइ तवग्गे, अहरोटा तह पवग्गए मणिया। चिवुयं च [य]वग्गमि, होइ य गीवा शवगंमि ॥ ३५७ ॥. तकारा(वर्मा)धिके वस्त्रम् । पवर्गाधिके ओष्ठौ । यवर्ग चियुकः । शयर्गे पीवा इति ॥३५॥ 5 -- - जयपाहुइनाम निमित्तशास्त्रम् । [गागा ३५८-३६५] एतेसु पए[५० २२३ पा०२ सेसुं, एतेभि अभिहएहि वग्गेहिं । मसयं तिलयं सत्य-क्खयं च कमसो वियाणाहि ॥ ३५८ ॥ सिर(शिर)प्रभृवयो ये प्रदेशा यरक्षरा()रकाः रनि(न)भिहतः अधिक प्रभ(अ) स प्रदेशो निरुपद्रयो ववव्यः । अभिहतैरुपर(द्र)पयुक्तः । चचा शस्त्रा)भिघातस्तु(खि)वियः । तत्र 'तैर्षर्गाक्षरैरालिंगितः मस(ज) तिलकं च वक्तव्यम् । अभिधूमितमाह्मणं (गण) दग्धैस्तु स(शोष- प्रहारः तत्र प्रदेशे वक्तव्यः ।। ३५८ ।। भणिएहि वयणदेसे, घग्गेहि य अभिहएहि जाणिज्जा । मसय-तिलयाइ सध, चिण्हं गुरुप(ज्झप्प)एसेसु ।। ३५९ ।। वदने यानि प० २२४, पा. १] चिह्नानि अभिह(हि)वानि वैरभिहतरक्षरस्तानि मशकतिल, " कादीनि गुषप्रदेशे ज्ञेयानीति ॥ ३५९ ॥ ॥ अस्त्रविभागप्रकरणमंगस्य ॥ सत्तम-णवमो य रवी, चंदो वि य होइ पढम-तइएणं । भोमो बीय-चउत्थे, पंचम-छट्ठो य ससिसुओं भणिओ ॥ ३६० ॥ सप्तमस्खर एकारः, णवम उ(ओ)कारः। एतौ सूर्यस्य । चन्द्रः प्रथम-मृतीयः अभौमी द्वितीय-चतु: 'आई। बुधः 'उ' ॥ ३६० ।। एकारस सूरसुओ, जीवो दसमे य अट्ठमे सुको । घारसमो वि य राहू, एते सरसामिया भणिया ॥ ३६१ ॥ * शनिः । ओ गुरुः । शुक्र ऐ । सः [प० २१४,पा० २] राहुः । स्वराणां सा(खा)मित्वं महाल्यावं तनामप्रतिबद्धवस्तूपचयापचयोदया-स्तमन-जया जयोत्पातादिना ज्ञेयाः ॥ ३६१ ॥ ॥ स्वरक्षेत्रभवनम् ॥ रवि-भीम-सुफ घुह-गुरु-सणि-य(च)दो राहु अहमो एते । अकचटतपय श वग्गाण होति खेत्ताहिवा णिययं ॥ ३६२ ॥ अ क प ट त प य श वर्गाणां ग्रहाः क्षेत्राधिपा उताः । तत्प्रतियद्धाक्षरवस्तुपई। अख- मिदा(मना)दिवासद्धिया इति ॥ ३६२ ॥ पण्हक्खरसतमु(गुणं, तिहिसहियं उ(ओ)मरचपरिसुदं। मत्त(सिते)हि भागसेसे, सुजा(जा)हाप० १२५, पा• 1 गहा मुणेयवा ॥३६३॥ सुन्नं छएण वा (च?)उरो, तिणि य दो तह य रूवमिकं तु । सूरादीणं एते, उमा(ऊसा?) संझा तहा कमतो ॥ ३६४ ॥ दिनकरानयनम् ॥ ३६३-३६४ ॥ छाया रासी होरा, पण्हक्खरयं च होइ तीसगुणं । पक्खो या तिणि सया, सट्ठासतिहि() तं सई ।। ३६५ ॥ 26 8 ८५ , , [गाथा ३६६-३७३] प्रमव्याकरणाख्यं तीसगुणं काऊणं, सीया(तीसा)ए हायए सया कालं । जं सेसं सा उ तिही, वोच्छं णक्खत्त-करणं से ॥ ३६६ ॥ लद्धाइ(ओ) जा तिहीओ, हीणा रूवेण कण्हपक्खस्स । सुरमु)कमि(पि१) दोहिं च भवे, मासस्स नामरिक्खगणं ॥ ३६७ ॥ सर्वदा प्रभकालिनी छाया रास्य(स)यो द्वादश । होरेति पंचदशानां संज्ञा । प्रभाक्षरश्च ।। [प० २२५, पा०२[सर्व?]मेतदेकीकृत्य तृत्सत्या(त्रिंशवा)गुणा शून्यक्षेपः ३६० पर्वमानातिथि- युक्त व कृत्वा । शेपं गतार्थम् । अनादर्थ (१)मेतत्तिथी (थि)नक्षत्रकांडम् ॥ ३६५-३६७ ॥ गंधधाह(इ) अवग्गे, दिट्टे विजाहरा कवरगंमि । पमाहाहा(१) [च वग्गंमि, णागय(?) य(ट)वग्गमिति ॥ ३६८ ॥ [इयं गाथा अस्पष्टार्था । न चास्या व्याख्यालेशो लभ्यते । - संपादक । ] जक्खा य त]वग्गंमि, देवा भणिया तहा पवग्गंमि । णागा य यवग्गंमि, भूया जाणे सवग्गंमि ॥ ३६९ ।। ववर्गाधिके प्रक्षे यक्षा । पयर्गाधिके देया। यवर्गाधिके नागा । स(श)वर्गाधिके भूताः ॥ ३६९॥ पेया य पवग्गंमि, जाण सकारे य तह पिसाया य । कोहंडा य हकारे, एवं जाणिज[प- २२६, पाणुक(क)मसो ॥ ३७॥ ख(प)काराधिके प्रभे प्रेताः । सकाराधिफे पिशाचाः । हकाराधिके फुष्मांडाः ॥ ३७० ॥ अणुणासिएसु असुरा, णायचा य(मि दीसए जमो । सविसग्गंमि अकारे, जक्खा सुणया य संजोए ॥ ३७१ ॥ अनुनासिकबहुले असुरा । अ(अं)कारः सानुस्वारः, तदधिके प्रभे यमो शेयः । अकारा । सविसर्गः, तदधिके प्रभे यक्षा क्षेयाः । संयोगाक्षराधिके प्रक्षे खा(वा)नरूपिणो यक्षा ।" - झेया: ।। ३७१ ॥ भ एएहि अक्सरेहिं, जाणसु अभिघाइएसु मरणं तु । जो(जा) जस्स देवया अक्खरि]स्स तेणेव सा भणिया ॥ ३७२ ॥ यस्य यस्य देवताविशेपस्य येऽक्षराः पूर्वाभिहितास्तरहि(रभि६)तस्तस्मात् सस्मात् देवता- विशेषात् सफासा(शा)न्म[प० २२६,पा० २रणमपि शेयम् ॥ ३७२ ॥ पढमय-चीय(वि-तिय)चउत्थो, पंचमवग्गो य तह ध णायचो । वाइय-पित्तिय-सिभिय-सन्निवाइय अक्खरा कमसो ॥ ३७३ ॥ प्रथमवर्गाधिके प्रमे वातिका व्याधिरादेस्या(श्या)। द्वितीयवर्गे पेत्तिका। तृतीयवर्ग सेमा । चतुर्यवर्गाक्षराधिके प्रभे साग्निपातः । पनमवर्गाक्षराधिके प्रभे क्षयो व्याधिरादेश्यः ।। महान्यस्य षा यं व्याधिशाहच्छतीति ।। ३७३ ॥

जयपाहुडनाम निमित्तशास्त्रम् । [गाथा ३७४-३७८] पणयालसयं अहुत्तर च दोहावग्गाहिवुव(घ) रासी । अवसा(से)साणं छहं, एकोनरिया बइ विट्ठी(डी)॥ ३७४ ॥ पूर्वादिस्थस्य प्रादक्षण्येन बुधना(?)विन्यस्य प्रभाक्षरसहित मृत्वा गुणयेत् ॥ ३७४ ।। पंच य सच य णव तेरसे य अट्ठादसमे य सोलसय । बचीसं तिचीसं, जाणसु गुणकार रासीओ ॥ ३७५ ॥ पूर्वादितः प्रभा सहिता सुधका(1) यथास्थितप्रव[त] दिक्चर गुण्य सोधनिका यथास्त विशोषयेत् ॥ ३७५ ॥ पंचगतिगछसचट्ठमा य ते होंति सोहणा कमसो । घय धूमे(म) सीह साणा, वसहमि पुफितिया एते ॥ ३७६ ॥ णियव(श्णपयोक्खरमि जाणे, सोहणय चोदसे तु वाणि(१) । पण्णरसगए भरिया, सोल्सढके वियाणाहि ॥ ३७७ ॥ एसो सो सखेवो, भणिओ जिणभासिओ समासेण । जाव य गिट्ठइ णाम, लाभालाभेसु ससु ॥ ३७८ ॥ एप स. उपेन प्रकारेण सात्त्यिकाय पुरुषाय वुद्धियल ज्ञात्वा, नेनि)वदभव्यापि(य) नास्तिके(का)यामद्धधानया(नाय) अकुलपुत्राय जात्यादा(द)नात्यसपनाय देयम् । गुरुशुभूपकाय हानवते चास्तिकाय देयमिति । जिनमहणपरिज्ञानार्य कृत यो यन्नामाक्षरैरक्षरै लामालामादि स सर्व वक्तव्य प्रो []ति ।। ३७६-३७८।। ॥ प्रश्नव्याकरणं समाप्तम् ॥ U ॥ ॥ सवत् १३३६ वर्षे चैत्र शु०१॥ इति सपूर्णम् ॥

ज्ञानदीपकाख्यं चूडामणिसारशास्त्रम् । 3 . नमिऊण जिणं सुरअणचूडामणिकिरणसोहिपयजुयलं । इय चूडामणिसारं कहिय मए जा(ना)णदीवक्वं ॥१॥ जिनमहंत सुरगणचूडामणिकिरणशोभितपादयुगलं नत्वा इदं चूडामणिसारं ज्ञानमपी-1 पाख्यं मया कथ्यत इति ॥ १ ॥ पढम-तईय-सत्तम-रंधसरा पढम-तईयवग्गवण्णाई। आलिंगियाई सुहया उत्तर-संकडअणामाई ॥२॥ अइएओ एते प्रथम-तृतीय-सप्तम-नवमाश्चत्वारः, तथा कचरतपयशा गज दय ल सा एते प्रथम-तृतीय[वर्ग]चतुर्दशवर्णाश्च आलिंगिताः, मुभगाः, उत्तराः, संकटनामकाश्च ।। भवन्तीति ॥ २॥ कुच-जुग-वसु-दिस-सरआ बीय-चउत्थाई वग्गवण्णाई। अहिधूमिआई मज्झा ते उण अहराई वियडाई ॥ ३ ॥ आई ऐ ओ एते द्वितीय-चतुर्थाष्टम-दशमाञ्चत्वारः स्वराः, तथा ख छ उथ फरपाः पश उधभव हाः एते द्वितीय-चतुर्थवर्गाणां चतुर्दशवर्णाः अभिधूमित्ताः, मध्यास्तथा उत्तराधरा 15 विकटाश्च भवन्तीति ॥ ३ ॥ सर-रिउ-रुद्द-दिवाअर-सराई वग्गाण पंचमा वण्णा । दडाई वियड-संकड-अहराहर-असुहणामाई ॥४॥ उऊः एते पंचम-पष्ठिका एकादशम-द्वादशमाश्चत्वारः स्वराः, तथा हमण नमा इति वर्गाणां पंचमा वर्णाः दग्धाः विकटसंकटा अधरा अशुभनामफाश्च भवन्ति ॥ ४ ॥ . सवाण होइ सिद्धी पण्हे आलिंगिएहि सवेहिं । अहिधूमिएहिं मझा णासइ दष्टेहिं सयलेहिं ॥ ५ ॥ प्रश्ने आलिंगितः सः सर्वेपामेव सिद्धिर्भवति, [अभिधूमितैर्मच्या सिद्धिः] दग्धः सर्वैः सिद्धिर्नश्यति ॥ ५॥ उत्तरसरसंजुत्ता उत्तरआ उत्तरुत्तरा हुँति । अहरेहिं उत्तरतमा अहरा अहरेहिं णायचा ॥६॥ उत्तरसंशः स्वरैः संयुक्ता उत्तरसंज्ञया एव वर्णा उत्तरतमा भवन्ति । त पक्ष अपरा. धरसंझकैः स्वरैः संयुषा उत्तरसंज्ञका अधरसंक्षकाच मवन्तीति ॥ ६॥ -20 S " ।

८८
घूढामणिसारशावम् ।
गाधर ७-१४
अहरसरेहिं जुत्ता ते दहा हुंति अहरअहरतमा ।
कजाई साहंति सु(इ)रं अधमा अघमाई किं बहुणा ॥ ७ ॥
अघरसंज्ञक: स्वरैः संयुक्ता दग्या वर्णा अधरापरतरसंज्ञरा मवति । ते च सुचिरका-
लेन अधमाधमानि कार्याणि साधयन्ति किंबहुनेति ॥ ७ ॥
दट्टसरेहिं जुचा दट्टतमा हुति दृढ़या वण्णा ।
ते णासयंति कजं बलारलं मीसयेसु सयलेसु ॥८॥
दग्धसशकैः स्वरैः सयुक्ता दग्घसंज्ञका वर्णा दग्घतमसंज्ञका भवन्ति तेषां बलत्वाग्निा-
फलं भवति ॥ ८॥
आलिंगिएहिं पुरिसो महिला अहिधूमिएहिं सबेहिं ।
दष्टेहिं होइ संढो जाणिज्वइ पण्हपडिएहिं ॥ ९॥
आलिंगितैर्वर्ग:प्रोपतितः पुरुपो भवति । अभिघूमितेः स्त्री। दग्धैर्नपुंसकमिति जानीतेति ॥९॥
जइ वग्गाण य बण्णा पढम-बीय-तीय-चउत्थ-पंचमया ।
तह विष्प-राय-वयसा सुद्दो विय संकरा य सयलाई ॥१०॥
यदि वर्गाणो वर्णाः प्रथम-द्वितीय-मृतीय-चतुर्थ-पंचमका, तदा विप्र-राजन्य-विद-शुदाः,
अपि च संकरजातयः सर्व एव भवन्तीति ॥ १० ॥
एदेहिं वपणेहिं कमेण वालो कुमारओं तरुणो ।
मज्झिमवयो वि थविरो जाणिज्जइ पहाडिएहि ॥ ११ ॥
तथा एतैरेव वर्ण: प्रभे पतितः क्रमेण यालः कुमारस्वरुणो मध्यमवया वृद्धश्च भवतीति
जानीहि ॥११॥
आलिंगिएहिं विट्ठी मन्झा अहिधूमिएहि सा होइ ।
दड्डेहिं णत्थि विठ्ठी जिणवयणं सञ्चियं जाण ॥ १२ ॥
आलिंगिष्टिः, अभिधूमिवैर्मध्यमा वृष्टिः, दग्धे नास्ति पृष्टिरिति जिनवचनं सत्यमेष
जानीहि ॥ १२॥
अइउप्पजह सस्सं पण्हे आलिंगिएहि वण्णेहिं ।
अहिधूमिएहिं किंचण णासइ ददेहिं णो चित्रं ॥ १३ ॥
अतिशयेनोत्पद्यते सस्यं प्रमे आलिंगितैर्वर्गः, अभिधूमितेः किंचिदुसयते, दग्धैर्नश्यति,
अत्र नो चित्रमिति ॥ १३ ॥
संपदिकालं पण्हे वण्णो आलिंगिओं पयासेइ ।
अहिधूमिओ वि भूअं दडो उण भावियं णूणं ॥ १४ ॥
प्रश्न आर्किगितो वर्णः सप्रतिकालं प्रकाशयति । अमिमितोऽपि भूतम् । दया पुनर्मा-
विकालं नूनमिति ॥ १४॥

1. विजयं उत्तरवण्णो ण जयं ण पराजयं वि अहरेहिं । अहराहरो पयासइ पराजयं णत्यि संदेहो ॥ २२ ॥ उत्तरो वर्णो विजयं प्रकाशयति, अधरोयों न जयं न पराजय, अपराधरश्च पराजय गाथा १५-२२j ज्ञानदीपकार्य ८९ तह पढम बीय तइआ वण्णा वुच्चंति तिणि कालाई । मा इत्य करह भंती जहसंखं सयलवग्गाणं ॥१५॥ तथा समस्तवर्गाणां प्रथम-द्वितीय-तृतीयवर्णाः यथासंख्यं त्रीन कालान् ब्रुवन्ति । अन मा भ्रांति प्रकुरुतेति ॥ १५॥ आलिंगिएहि मुकाइ वाहिं अहिधूमिएहिं.ण हु रोई। अहवा चिरेण कटुं दड़ो मरणं पयासेइ.॥.१६ ॥ आलिंगितैर्व्याधि रोगी मुंचति, अभिधूमितैर्न मुंचति, अथवा चिरेण कष्टात्, मुंचति, दग्धश्च मरणमेव प्रकाशयति ॥ १६ ॥ विसमा दाहिणपासे वामे य वणं समा य पयडंति । वण्णा पण्हे पडिया पंचमया बेवि पासंमि ॥ १७ ॥ प्रभे पतिता विपमाः प्रथम-तृतीयवर्णा दक्षिणपाधै तथा समाः द्वि-चतुर्था वर्णाः वाम- पार्श्व पंचमका वर्णाः उत्तरपार्थे व्रणं प्रकाशयन्ति ॥ १७ ॥ अट्ठ सिरो-मणि-वयण-हियय-कडि-उरु-जाणु-चरणजुयलेहिं । पण्हविलग्गा वग्गा वणाई दरिसंति जहसंखं ॥ १८ ॥ अष्टौ वर्गाः प्रश्नविलब्धाः यथासंख्यं शिरोललाटवदने[I] तथा हृदय-कटि-ऊर-जानु- ।। चरण-युगलेषु णा निदर्शयन्ति ॥ १८ ॥ अणिलय-पित्तय-सेफय-संसग्गय-आहिघाययं रोगं । पयडंति पंचवग्गा जहसंखं पढम उद्दिट्ठा ॥ १९ ॥ प्रथमोद्दिष्टाः पंचवर्गाः यथासंख्य अनिलजं पित्तजं श्लेष्मजं संसर्गजं अभिपात रोग प्रकटयन्ति ॥ १९॥ अइमंद-मज्झ-दारुणपीडाई दिति पण्हपडिआई। आलिंगियाहिधूमियदहा वण्णा जहासंखं ॥ २०॥ आलिंगिताभिधूमितदग्धा वर्णाः प्रश्नपतिता यथासंख्यं असन्तमन्दमध्यदारुणां पीसी प्रकटयन्तीति ॥ २० ॥ आलिंगिएहि संधी ण हु संघी विग्गहे(हो) ण अहरेहि । अहराहरेहिं कहिओ समरो सुहडाण णासयरो ॥ २१ ॥ आलिंगितः संधिर्भवति, अपरैर्न च संधि घ विप्रहः, अधराधरैः संग्रामः सुभटानां नाशकर इति ॥ २१ ॥ 1. मेवेत्यत्र नास्ति संदेहः ॥ २२ ॥ लि.प्र.१५ ९० . तथा - चुडामगिसारशालम् । [गाथा २६-२९] जइ पढमक्खरमहरं अवसाणे उचरक्खरं पण्हे । ता उत्तरो सुपलिओ विवरीओ ताण विवरीयं ॥ २३ ॥ जयपराजयप्रभे यदा प्रथमाक्षरमधरं अवसाने ध उत्तरमक्षरं भवति तदा उत्तरो बली भवति ।। २३ ॥ पढमसरेण य जुत्ता पण्हे भत्ताविवज्जिया वण्णा । अणभिहिअणामआ दे पअडंति य जीवचिंताई ॥ २४ ॥ प्रथमस्वरेण युक्ता अन्यमानाविवर्जिता वर्णाश्च ते प्रभे अनभिहितनामका भवंति ते च जीवचिंता प्रक्टयन्ति ॥ २४ ॥ ससि-तइअ-पंच-सत्तम-नवमसरा रहसंखसरसहिया । क-च-टा पंचमहीणा सहिया य-स-हेहिं जीवक्खा ॥ २५ ॥ प्रथम-तृतीय-पंच-सप्तम-नवमाः स्वराः एकादशस्वरसहिताः, क्वर्ग-चवर्ग-टवर्गाः पंचमहीनाः, यकार-शकार-कारसहिता एते एकविंशतिवर्णाः जीवाख्या भवन्तीति ।। २५ ॥ बीओ छटो सरओ सविसग्गो तह व-सक्खरोपेओ। तह उण पंचमहीणा त-पवग्गा धाउणामा उ ॥ २६ ॥ द्वितीयः पठः स्वरः, सविसर्गः, तथा यकार-सकारोपेतः, तथा पुनस्तवर्गः पवर्ग: पंच- महीन एते त्रयोदशवर्णा धातुनामका भवन्ति ॥ २६ ॥ ई ऐ औ सरजुत्ता र-ल-पा ङ-अ-ग-न-माई वण्णाई । एआरह मूलक्खा पयासिया जिणवरिंदेण ॥ २७ ॥ चतुर्थाष्टमदशमस्वरयुक्ता र-ल-पकारा ङ-ब-ण-न-माश्चेत्येकादश वर्णा मूलाक्षरप्रकाशका ॥ भवतीति । एतेनैतदुक्त भवति लाभप्रभे धातुलाभः, मूलाक्षीवलामा, धात्वरैर्जीवाक्षरैर्मू- ललाम इति नान कार्या विचारणा ॥ २७ ॥ मुट्रीजीवक्खरए मूलं जीवं वि मूलअक्खरए । धाउं उण जाणिजह धाउक्खरएण किं चोजं ॥ २८ ॥ मुष्टी जीवाक्षरैर्मूलं ज्ञातव्यम् , जीवं च मूलाक्षरः, धातुं धात्वरैरेवेति किमित्याश्चर्य- समिति ॥२८॥ बहुपढमवग्गवण्णा अह बहुबिंदू विसग्गसंजुत्ता । बहुवन्ना जह पण्हे ता सुन्नं मुट्ठिचिंताई ॥ २९ ॥ प्रभे यदि बहवः प्रथमवर्गवर्णी भषन्तीति, अथवा बहुविंदुविसर्गसंयुत्ता भवन्ति, अथवा प्रभा एप बहयो भवन्ति तदा मुष्टिचिन्तायां शून्यं भवति ॥ २९ ॥ नीदकरा। 15 . [गाथा ३०-१६] ज्ञानदीपकाल्यं विसमसरा ऊआरो बग्गाणं पढम-तइयवण्णाई। दुप्पय णराण एसा एआहाराण णहु होइ ॥ ३० ॥ विषमस्वराः प्रथम-तृतीय-पंचम सप्तम-नवमैकादशमाः, तथा ऊकारश्च, तथा वर्गाणां प्रथम-तृतीयवर्णाश्च एते द्विपदेषु नराणां वर्णाः, एतदाहाराणां राक्षसानां न भवन्तीति ॥३०॥ बीओ दसमो सरओ वग्गाणं बीयवण्णया सयला । दिसंति जइअ पण्हे ता मुणह चउप्पयं जीवं ॥ ३१ ॥ यदि प्रश्ने चतुर्थाष्टद्वादशः स्वरो भवति, तथा घृश्चिकादीना जातिं दृष्टिं च व्याघ्रादिकं तं तवर्गवर्णों वदति, तथा वर्गाणा चतुर्था वर्णाश्च तदा चतुप्पादा जीवा भवन्ति ।। ३१ ॥ जइ वग्गाण य वण्णा पंचमया हुंति पण्हपडियाई । ता मुणह गरअवासिय भूअपिसाचाई सबाई ॥ ३२ ॥ यदि वर्गाणां पंचमा वर्णाः प्रश्ने पतन्ति भवन्ति, तदा नारकवासिनो भूतपिशाचाच सकलान् जानीतेति ॥ ३२ ॥ मत्ता त-पवग्गेहिं य-शवग्गेहि हुँति सउणा य । सिद्धा सरेहि भणिया देवा उण क-च-टवग्गेहिं ॥ ३३ ॥ तवर्ग-पवर्गाभ्यां मर्त्याः, यवर्ग-शवर्गाभ्यां शकुनाः, खरैः सर्वरेव सिद्धाः, देवाः पुनः ।। कवर्ग-पवर्ग-टवगैर्भवन्तीति ॥ ३३ ॥ चवइ कवग्गो पण्हे लडो थलचारियं विहंगमयं । तं चिअ अइप्पहाणं तबग्गओ पत्थि संदेहो ।। ३६ ॥ प्रश्नलब्धः फवर्गः स्थलचारिणं विहगमं वक्ति । तमेव स्थलचारिणं विहंगमं अतिप्रधान मयूरादिकं तवर्गों वक्तीति सदेहो नास्ति ॥ ३४ ॥ जइ अ चवग्गो लदो तह पक्खी' होइ जलयरो पूर्ण । तं पि टवग्गे सिट्ठ चवइ पवग्गो गुहसयंधं ॥ ३५ ॥ यदि चघर्गों लब्धः तदा जलचराः पक्षिणो भवन्ति । नूनं तमपि जलचरं पक्षिणं श्रेष्ठ इंसादिकं टपर्गो पक्तीति । अधर्म (अन्धं ?) घ गुहाशयं उलुकादिकं पवर्गो वतीति ॥ ३५ ॥ पण्हे कवग्गवण्णा कालोरय-सिंगिणो पयासंति । राजीवसप्पजाई चवग्गवण्णा य दंतत्थं ॥ ३६ ॥ प्रमे फवर्गवर्णाः कालोरगाश्च भंगिणश्च वृपमादीनि प्रकाशयन्ति । राजीवसर्पजाति शंखचूडादिकं दंतानं घ हस्तिप्रभृतिकं घवर्गवर्णाः प्रकाशयन्तीति ॥ ३६॥ १३. पनी। य. पद पवग्गो सभषम। " 23 १. मुणदु। २० भइपमान।

J 10 14 चूडामणिसारशास्त्रम् [गाया ३७-४४] गोणाससप्पजाई टवग्गवण्णा फुडं:पयासंति । लहुअविसाणं जाई दिट्ठीणं होई तवग्गवण्णेहिं ॥ ३७॥ गोनसो सर्पजाति टवर्गवर्णाः स्फुट प्रवाशयन्ति । रघुपविषाणा जंतूनां पृश्चिकादीना जाति दृष्टिं च व्याघ्रादिकं तं तवग्गों वर्णों वदति ।। ३७ ॥ विसमच्छ-दाहि(ढि ? )दुंदुहि-कीडविसेसाई कि चुजं । जइ किर लडो पण्हे पवग्गओ पण्हचउरेण ॥ ३८ ॥ यदि प्रश्नचतुरेण प्रश्श पवर्गो विलब्धलदा विपमत्स्यान् शृंगिकाप्रभृतीन दंष्ट्रान् मकर- नक्रप्रभृतीन् दुंदुभिप्रभृतिकीटविशेषमान् वक्ति अब क्मिाश्चर्यमिति ॥ ३८ ॥ ससि-जलण-बाण-मुणि-गह-रुद्द-सरा वग्गाण दु-तीयवण्णा य । वुच्चंति धम्मधाउं अधर्म चिय सेससरवण्णा ॥ ३९ ॥ प्रथम-तृतीय-पंचम-सप्तम-नवमैकादशमाः स्वराः, तथा कवर्गादिसप्तवर्गाणा द्वितीयवर्णाश्च धाम्यधातु बदन्तीति ॥ ३९॥ रवि-रुद्द-पक्खसरओ पंचमहीणा कवग्गवण्णा य । कणयं चवन्ति तारं सत्तमवग्गो मुणिंदुसरओ य ॥ १० ॥ द्वादशमैकादशम-द्वितीयस्वराः पंचमहीनाः कवर्गवर्णाश्च कनक वदन्ति । रजतं च सप्तमी वर्ग: तथा सप्तमः प्रथमः स्वरश्चेति ॥ ४०॥ तवं च तइओ सरओ पंचमहीणो चउत्थओ वग्गो। लोहं दसमो सरओ अट्ठमवग्गो मैकारो य ॥४१॥ ताप्नं सृतीयस्वर। पंचमहीनः चतुर्थो वर्गश्न, लोहं दशमस्वरः तथाष्टमो धगों मकारश्च " वदति वचनपरिणामेन पूर्वतो न वर्तत इति ॥४१॥ वंगं तइओ वग्गो पंचमहीणो कवग्गपंचमओ । अहम-पंचमसरओ पण्हे लहो पयासेइ ॥ १२ ॥ वगं वपु पचमहीनस्तृतीयो वर्ग:, तथा क्वर्गपचमो वर्णेश्च, तथाऽष्टमः पंचमा स्वरा प्रश्ने लब्धः प्रकाशयतीति ॥ ४२ ॥ छठुसरो एकंतो पंचमवण्णों अ तईयवग्गस्स । जइ पाविज्जइ पण्हे ता णूणं सीसों मुणहें ॥ ४३ ॥ पष्टस्वर एकाकी तथा तृतीयवर्गस्य पंचमो वर्णश्च यदि प्रश्ने प्राप्यते तदा नूनं सीसके कथयन्ति ॥ ४३ ॥ न-प-फ-म-भा ज वण्णा पण्हे लडा कुणंति पित्तलयं । गन्त-था दधा इ-आरा कंसं ण हु अत्थि संदेहो ॥ ४ ॥ म. धाम । १० तम। ३० म.प्र.वगो वि। 13 24 ५० भणए।

पुनरन्याने सर्व एवोत्तरवर्णाः सुरलोकानामाभरणं युवन्ति । अधराक्षराणि मानवलोकस, [गाथा ४५-५१] ज्ञानदीपकाक्ष्यं नकार-पकार-फकार-[मकार-भकारस्तथा ऊकारश्च एते प्रश्ने लब्धाः पित्तलक कथ- यन्ति । णकार-तकार-थकार-दकार-धकार-इकारश्च एते कांस्यं कथयन्ति । तथा अन न सलु संदेहोऽस्तीति ॥४४॥ कणयक्खरं पयासइ मरगयमाणिकपहुईरयणाई । मुत्ताहीरयपहुई तारक्खरयं णे संदेहो ॥ ४५ ॥ कनकाक्षरं मरकतमाणिक्यप्रभृतिरनानि प्रकाशयति, ताराक्षरं च मुक्काहीरकप्रभृतिक प्रकाशयति ॥ ४५ ॥ ककरतालयपहुदि []वक्खरयं च] भणइ णो चित्तं । लोहक्खरेहि जाणह रयणाई इंदनीलपहुदीणि ॥ ४६ ॥ ताम्राक्षरः तालकप्रभृति भणति नात्र चित्रम् , लोहाक्षरेश्च इंद्रनीलप्रभृतीनि रत्नानि । जानीतेति ॥ ४६॥ कंसक्खरं पयासइ रयणऽसेसाई काचपहुदीणि । सेसं सीसयपहदि पित्तलसीसाइ अक्खरयं ॥ १७ ॥ कंसाक्षरं काचप्रभृतीनि रत्नविशेपाणि प्रकाशयति । शेपं पित्तलसीसकायक्षरं शीशक- भृतीनि रलविशेपं प्रकाशयति ॥ ४७ ॥ उत्तरवण्णपहाणं पण्हे गढियं पयासए णिचं । धाउमगढिअं अहरं अक्खरयं भणइ सच्चमियं ॥ ४८॥ . प्रभे उत्तरवर्णाः प्रश्नमक्षरं घटितं पातुं प्रकाशयति । अधरमक्षरं अघटितं धातुं भणतीति सत्यमिदम् ॥ ४८ ॥ आलिगिएहिं जाणह कंकणकेऊरपहुदि आहरणं । अहरक्सरेहिं गढिअं कच्चोलयपहुति भायणयं ।। ४९ ॥ घटिते धातोर्लध्धे सति पुनरपि प्रश्ने आलिंगिताक्षेरैः घटितं केयूरप्रभृतिकमाभरणक भवतीति । अधराक्षरैर्घटित कयोलकप्रभृति भाजनं भवति ।। ४९ ॥ उत्तरवण्णपहाणं पण्हे दरिसेइ अहिणवाहरणं । अहरक्खर अपहाणं उवभुत्तं णत्थि संदेहो ॥ ५० ॥ आभरणे प्राप्ते सति पुनरल्याने उत्तरवर्गप्रधान मनमभिनयाभरणं दर्शयति । अधरा- झरेयानं च उपाभरणं दर्शयतीति नासि संदेहः ।। ५० ॥ सवे उत्तरवण्णा भवंति सुरलोअलोअणाहरणं । अहरक्खराइ णूणं माणवलोयस्स जंतूणं ॥ ५१ ॥ 3 ." -- " द्विपदचतुष्पदजंतूनामाभरणं ग्रुवन्ति ॥५१॥ म. पहाति। २५० परिय। १० सपंध।

1 10 ९४ चूडामणिसारशाखम् । [गाथा ५२-५९. दुप्पयवण्णा पण्हे दुप्पअजंतूण चवइ आहरणं । • सो वि णर-णारयाणं विहगाणं विहगवण्णेहिं ॥ ५२ ॥ पुनरम्य द्विपदव द्विपदजंतूनामाभरणं मुवन्तीति । विहगवर्णाश्च विहंगानामाभरणं मुवन्ति ॥ ५२ ॥ जइ य चउप्पयवण्णा पण्हे लडाई हुंति पउराई । मा करहु इत्य भंती जाणिज्ज चउप्पयाहरणं ॥ ५३ ॥ पुनरन्यप्र यदि चतुष्पदवर्णाः प्रश्ने लब्धाः प्रचुरा भवति तदा मा प्रोति कुरुत धतु- प्पदामरणं जानीतेति ॥ ५३ ॥ दिस-कुच-वेयट्ठमया सरया दरिसंति उद्धआहरणं । ससि-तिय-गह-सत्तमया मझंगे सेस अद्धाणं ॥ ५४ ॥ दशम-द्वितीय-चतुर्थाष्टमकाः स्वराः उबुंदेहाभरणं दर्शयन्ति । प्रथम-तृतीय-नवम- सप्तमकाश्च मध्यदेहाभरणं दर्शयति ॥ ५४॥ आहरणाण य वण्णा संसिट्ठा हुंति जई य त-पउरा । ता तं रयणणिबद्धं भायणयं ताण यण्णेहिं ॥ ५५ ॥ यद्याभरणानां वर्णाः संश्लिष्टाः संवद्धाः तवर्गप्रचुरा भवन्ति तदाऽऽभरणं रननिवद्धं भववि, भाजनवगैश्च संवद्धभीजनं रत्ननियद्धं भवति ॥ ५५ ॥ जइ पउरउत्तरई ता रयणं सुद्धजाइयं मुणहु । तं अहरक्खरबद्धं कित्तिमयं मीसिए मिस्सं ।। ५६ ॥ यदि ततः प्रचुरोत्तराधरसंबंधे......कृनिमजातिमिश्रितं च इतः हास्यतेति ।। ५६ ॥ उत्तम-मज्झिम-अधमा हुति य णाणा तहा जहासंखं । आलिंगियाहिधूमियदट्टयपत्तेहिं पण्हेहिं ।। ५७ ॥ तथा आलिंगिताभिधूमितदग्धके प्राप्त प्रश्ने उत्तममध्यमाघमानि नाणकानि टंककानि शिवांकादिकानि यथासंख्यं भवन्तीति ।। ५७ ।। पढम तरूण वण्णा तह ससि-गहसंमिओ सरो चेव । क-च-टादुआण(? °ण दुइय)वण्णा दसमओ दुबो सरो वेवि ॥ ५४॥ क-च-टादिवर्गानां सप्तानां प्रथमो यर्णस्तथा प्रथम-नवमखरश्च एते नववर्णाः तरूणा- माम्रादीनां वाचका:, कवर्ग-चवर्ग-टवर्गाणां च द्वितीयवर्णाः ख-छ-डासया दशम-द्वितीयौ खरो च एते पंच वर्णा लतानां द्राक्षादीनां वाचका इति ।। ५८।। रिउन्बाण-रुद्दसरओ पंचमवण्णा तिणाइ जपंति । सेसदुइज्जा वण्णा वल्ली वग्गाण चचारि ॥ ५९ ॥ 15 " 20 4 " प 30 . लाममुसादिकं चिन्तितं भवति । सर्वद्धितीयवर्गीसे उद्भवति, सर्वे तृतीयवर्णे पक्षे उद्भवति, ' सर्वे चतुर्थवणे पुनर्मोसे पर उद्भवति, सर्वे पंचमवणे संवत्सरे उद्भवति ॥ ६५ ॥ अहरवखरेसु पैण्हे दक्खिणअयणं ण संदेहो ॥ ६६ ॥ [गाया ६०-६६] ज्ञानदीपकाख्यं पष्ठ-पंचमैकादशस्यरस, तथा वर्गाणां कवर्गाणां सप्तानां पंचमाश्च वर्णास्तृणानि दूर्वादीनि जल्पन्ति । शेषा द्वितीया वर्णाः चत्वारि तवर्ग-पवर्ग-यवर्ग-शवर्गाणां चतुर्णा वल्लीनां धूलीप्रभू- तिको जल्पन्ति ॥ ५९॥ अट्ठम-चउअंतिसरा चउत्थवण्णेण ठाइआ तिषिण । जपंति ख-छ-ठ-फाओ जाइविसेसाई गुम्माई ॥ ६ ॥ कवर्गादिसप्तवर्गाणां चतुर्थवर्णेन स्थापिताश्चतुर्थाष्टमांतिमात्रयः स्वराः स-छ-ठ-फा जातिविशेषान् गुल्मान जल्पन्ति ।। ६० ॥ ग-ज-डेहिं होति य लया सालादि सत्तमसरेहिं गहिएहिं । गहिएहिं दबलसेहिं प(ध ?)ग्णापहुदीनि जाणेह ॥ ६१ ॥ कवर्ग-चवर्ग-टवर्गाणां तृतीयवर्णन भवन्ति तृतीय-सप्तमाभ्यां स्वराभ्यां शालादिकान् । वृक्षान्, तवर्ग-पवर्ग-यवर्ग-शवर्गाणां चतुर्णा तृतीये वर्णे गृहीत धान्यकादीन जानीतेति ॥६१॥ जल-साहारण-जंगलदेसपभूयं चवंति भूरुयं । आलिंगिय-अहिधूमिय-दड्डयवण्णा जहासंखं ।। ६२ ।। जलसाधारणं जांगलदेशप्रभूतं भूरुहं यथा जलज कमलोत्पलादिकं जांगलजं करीरकर- मादिक तानेतान् यथासंख्य आलिंगिताभिधूमिता वर्णा धुवन्तीति ॥ ६२ ॥ तरवो हुति असोया संणिहिया उत्तरेहि वण्णेहिं । अधरसरेहि अधमा पण्हे पडिएहिं दूरठ्ठा ॥ ६३ ॥ उत्तराक्षरैरशोकाद्यास्तरवः प्रत्यासन्ना भवन्ति । अधराक्षरैरधमा वृक्षाः सर्वत्र शाखोट- कादयो दूरस्था भवन्ति ॥ ६३ ॥ संजुत्त-असंजुत्ता जहाकम लह[पण्हवण्णेहिं । फलियाफलिया तरुणो केवलिनाणेण भासंति ॥ ६ ॥ संयुक्ता असंयुक्ता लब्धाः प्रभवर्णाः यथाक्रमं फलिताफलितान् तरून फेवलिकामानेन तह दिवस-मास-पक्खय पुणो वि मासे वि तह य वच्छरए । जहसंखं लाहसुहं एसु य सयलेसु वग्गेसु ॥ ६५ ।। उत्तरवण्णपहाणो उत्तरअयण' पयासए पण्हे । " मापन्ति इति ।। ६४ ॥ S मा १. उत्तरापर्य । २ ० भवरावरपदाणे । ३ म० दक्षिणपणं गरिया,

Jaypayad Nimitt Shastra

Author
Purvacharya
Title
Jaypayad Nimitt Shastra
File name
Jaypayad Nimitt Shastra
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,bhartiya Vidhya Bhawan
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311056
Barcode
99999990319981.00
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Banasthali University
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