Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Meghdoot

Sukul, Lalita Prasad · 2010/04

PDF Proofread

Front matter

Xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx निवेदन आज परिषद अत्यन्त पुनीत भावना के साथ माँ भारती के चरणों में "श्रीराम- कुमार भुवालका ग्रन्थमाला" के द्वितीय पुप्प को अर्पित करती है। इस ग्रन्थ- माला का प्रथम पुष्प था मुशीदेवीप्रसाद कृत "मीराबाई का जीवनचरित्र" जिसे परिषद ने नव-सम्पादित करके सन् १९५४ में प्रकाशित किया था। आशा है कि हिन्दी साहित्य के उपवन को ये नवप्रस्फुटित मुकुल सुरभित करेंगे और श्री शारदा की माला मे अर्चना के नव- कुसुम परिषद के द्वारा जुडते ही रहेगे । xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx 'अनामिका सार्थवती बभूव' , भारतवर्ष केवल अपनी भौगोलिक विचित्रता के लिये ही संसार के आकर्षण का केन्द्र नहीं रहा है, वरन् इसके अतिरिक्त इसके जीवन में ही युगों से कुछ ऐसी विलक्षणता रही है, कि जिसके कारण यहाँ के मनन-शील व्यक्तियों ने तथा विविध कलाकारों ने संसार को केवल नवीन-दर्शन ही नहीं दिया, वरन् नवीन-दृष्टि भी दी। मर्त्यलोक का वासी मानव अमरता की अभिलाषा करे यह अपने आप में कोई विशेष बात नहीं। लेकिन यदि अमरता का वरदान प्राप्त करने में सफल भी हो जाये, तब तो इसे विधाता को मानव की चुनौती ही कहना पड़ेगा। भारत का सास्कृतिक इतिहास ऐसी अमर विभूतियों की श्रृंखला से पग-पग पर आमण्डित है। युगों पहले के वेद और उपनिषद-कालीन ऋपि, वाल्मीकि और व्यास तथा उन्हीं की परम्परा में पाणिनि, भरत, भास, कालिदास, भवभूति, सूर और तुलसी इत्यादि अगणित ऐसे नाम स्वर्णाक्षरों में लिखे हमें मिलते हैं, जो पार्थिव शरीर को छोड़ कर केवल अपने यश से ही नहीं वरन् अपनी वाणी की साधना को लिये हुए आज भी हमारे साथ हैं। यह तो नहीं कहा जा सकता कि ऐसी विभूतियाँ केवल इसी देश को प्राप्त है, प्रायः सभी समुन्नत एवं सभ्य देश ऐसे वरदानों के अधिकारी रहे हैं, किन्तु अपेक्षाकृत समय और संख्या के अनुपात में भारत का भाग्य निश्चय ही अधिक समुज्वल रहा है। विनाश का ही दूसरा नाम मृत्यु है, और अविनाश जीवन है। शिव जीवन का पोषक है, अशिव विनाश का। यह केवल व्यक्ति के जीवन का ही नहीं वरन् विश्व-जीवन का रहस्य है। शाश्वत् सिद्धान्त ये ( ख ) तो यह है कि कारण के अनुरूप ही कार्य होना चाहिये। सृष्टि के आदि कारण शिव और शक्ति अथवा प्रकृति और पुरुप अविनाशी है, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उनकी शक्ति से विरचित यह जगत नाशवान् क्यों है ? यह जिज्ञासा चैतन्य मानव की शायद आदि काल से ही रही है और उपनिषदों में उत्तर यही मिला कि शिव और शक्ति का अनायास निरन्तर आंशिक योग ही प्रपंचजन्य सृष्टि का मूल कारण है। इस शाश्वत अनायास संयोग का प्रथम 'आभास' शिवाश 'आकाश' है और शक्त्यांश का 'आभास' प्रपंच का द्वितीय तत्व 'वायु' है। 'आकाश' और 'वायु' का युग्म अपने क्रम से अग्नि, जल और पृथ्वी के तत्त्वों को उपस्थित करता है और विविध रूपा सृष्टि प्रत्यक्ष होती है। गुह्य रहस्य वेद-कालीन ऋषियों को उद्भासित बान के रूप मे प्राप्त हो चुके थे, जिनकी अभिव्यक्ति प्रायः उसी काल से वाणी के उन वरद-पुत्रो के द्वारा 'प्राकृत ध्वनि चिह, जो 'अक्षर' के नाम से प्रसिद्ध है, के माध्यम से प्रस्तुत होकर सुरक्षित एवं प्रतिष्टित की गई थी। इस रहस्य का परिचय इस लिये और आवश्यक हो जाता है कि हम भारतीय वाङ्गमय मे अनेक महत्त्व-पूर्ण ऐसे शब्द देखते चले आ रहे है जो केवल गंभीरार्थी ही नहीं, अत्यन्त गूढार्थी, तथा संकेतार्थी के रूप मे युगो से व्यवहृत होते आ रहे है। 'काल, 'कला, 'रम, 'काली, 'वाणी, इत्यादि अगणित शब्द जो हमारे द्वारा आज भी व्यवहत होते हैं, उनके विषय में लोचना पड़ता है कि उनकी व्युत्पत्ति क्यो और कैसे हुई होगी। केवल उनकी प्राचीनता ही नहीं वरन् उनकी 'अर्थ-समूह-वद्धता' भी अपना विशेष महत्व रखती है। यही जिन्नासा हमे वाध्य करती है कि हम इन विशिष्ट शमी के गठन की अनि-प्राचीन पद्धति को जानने की चेष्टा करें। उन पृष्टभूमि में न शब्दों में व्यक्त समस्त भारतीय मानराशि कुछ दूसरे ही रूप में हमारे सामने आती है। इस रहस्य को नमनाने में परम्परागत प्रचलित देववाणी के विविध स्वीकृत एकाक्षरी-कांप बहुत दर तक हमारी सहायता करते है। उन्हीं के , ( ग ) ग . आधार पर यदि 'काल,' 'काली,' और 'कला' शब्द पर विचार किया जाये तो समझने में देर न लगेगी कि अक्षर 'क' प्रतीक है शिव और शक्ति के उस अनायास संयोग से उद्भूत प्रथम तत्त्व शिवाश'आकाश' का। उसमें 'आ' की मात्रा का योग प्रसार का द्योतक है। अक्षर 'ल' आकाश अंश के साथ 'शक्त्यांश' का प्रतीक है। 'काल' शब्द का मूल अर्थ है 'त्रिगुणात्मिका शक्ति से युक्त व्याप्त आकाश, जिसमें इस संयोग से उद्भूत जगत वर्तमान रहता हुआ सतत् क्रियाशील है; इसके तीन शाश्वत् धर्म हैं—'सृष्टि, स्थिति' और 'लय'। इसी को भारतीय वाङ्गमय में कहा गया है 'महा काल'। इस तात्त्विक रहस्यानुभूति के पश्चात् भारतीय ऋषियों को Time और Space जैसी स्थिति-द्वय की स्वीकृति की आवश्यकता कैसे रहती ? उपर्युक्त सिद्धान्त के आधार पर ही स्वर 'ई' का स्वीकृत अर्थ है शिव के धर्म 'आकर्षण' से 'प्रसमन्वित' शक्त्यांशकी शैवी-क्रिया, 'का' के उपर्युक्त अंश के साथ शक्त्यांश 'ल' का 'ई' से युक्त यह रूप सिद्ध करता है शब्द 'काली', जिसका मूल अर्थ है सृष्टि का वह 'तात्विक' रूप जो परम-आकर्षण से युक्त है; अर्थात् 'काली' विश्व की वह परम सौन्दर्य-मयी 'तात्विक विभूति' है जिसका धर्म है 'चिदाकर्षण' और जिसकी प्रतिक्रिया है स्रष्ट-विश्व की 'रति-चेतना'। इसी सिद्धान्त के आधार पर 'कला' को भी समझना होगा । शिवांश 'क' (अर्थात आकाश) में शक्त्यांश 'ल' (अर्थात त्रिगुणात्मिका शक्ति) का 'आ' से युक्त हो जाना अर्थात अति-व्याप्त होकर सृजन शीला हो जाना है। 'आकाश' में त्रिगुणात्मिका शक्ति के 'उदार प्रयोग' से विविध रूपात्मकता की सृष्टि के हेतु' अथवा 'अभिकरण' का नाम है 'कला'। सृजन चाहे 'विधि' का हो या मानव का, अपने मूल मे उपयुक्त तत्त्वों के सन्तुलित एवं आनुपातिक संगठन का ही आश्रयी है। 'संतुलन' और 'अनुपात' की स्थिरता में ही सष्ट रूप की स्थिरता है और इन दोनों के 'विकार' में विनाश है। कलाकार अपनी रचना ( घ) मे की सृष्टि भी इन्हीं शाश्वत् नियमों के आधार पर ही करता आया है और करता रहेगा। 'महाकाल' जहाँ एक ओर 'आकाश' की सूचना देता है वहीं शक्ति के 'त्रिगुणात्मक' होने का साक्षी भी है। शृष्टि-क्रम में यदि शक्ति की सतोगुण प्रधानता तात्त्विक समन्वय की स्थिति की सूचना है, तो उसी शक्ति की 'रजोगुण-प्रधानता' अपनी सहज प्रक्रियात्मकता के परिणाम-स्वरूप तात्त्विक सन्तुलन और अनु- पात को उग्र करती है। और शक्ति की ही वृद्धिंगत रजोगुण-प्रधान प्रक्रियात्मकता अनुपात और सन्तुलन एक सीमा के बाद विकार उत्पन्न कर देती है। सीमा स्पर्शोपरान्त प्रक्रियात्मक आवर्तन शक्ति का 'नमोगुण वृत्त-प्रवेश' हे और उससे उत्पन्न विकार जन्य विनाश नष्ट-रूप का परिवर्तनात्मक विध्वंस है। हमारा मूल प्रश्न था अविनाशी शिव और शक्ति के योग से उत्पन्न विश्व-सृष्टि का विनाश क्यों और कैसे ? उत्तर स्पष्ट है-विश्व सृष्टि के हेतु हैं अविनाशी शिव और शक्ति के संयोग से उद्भूत पंच-तत्त्व, जो अपने कारण के अनुरूप ही अविनाशी है किन्तु उनसे निर्मित रूप परिवर्तन-शील होने की वजह से नाशवान है। इस परम रहस्य को यदि कोई केवल जान कर ही सन्तुष्ट न होजाये, वरन् उसके दार्शनिक' मर्म का अधिकारी हो जाये तो, निश्चय ही वह 'महाकाल' को चुनौती दे सकता है। उसका नित्य सिद्ध माध्यम है 'कला' की माधना से 'काली' की उपासना। संसार के साहित्य मे जिन अमर निभूनियों के नाम समय का चुनौनी दिये आज तक हमें मिलते है उनकी उल अमरता का रहस्य उपर्युक्त स्थापनाकी अकाट्य साक्षी है। भारतीय काव्य-परम्परा अपनी प्राचीनता और दिव्य प्रतिभा सम्पन्नता में अप्रतिम है। कालिदास का नाम शिरमौर है। जाने कितने देशी और विदेशी इतिहास-वत्ता अपने जीवन के अमूल्य क्षण नल परम-अग्निद्ध कवि का जीवन वृत्त खोज निकालने में खपा है, किन्तु थोड़ी सी प्रचलित किंवदन्तियो को छोडकर और कोई तथ्य उनके पल्ले न पड़ा। यही हमे मानना पडता है कि किंवदन्तिया ड ) भी अपना कितना अधिक मूल्य रखती हैं । अति शक्तिशाली सम्राटों के पुराने से पुराने शिलालेख और ताम्रपत्र पृथ्वी के गर्भ में गड़े हुए जहाँ मौन हैं, वहीं लोक प्रचलित किंवदन्तिया हमारे स्मृति-पटल पर अंकित होती हुई आये दिन हमें आवश्यक और उपयोगी ज्ञान से आलोकित करती रहती हैं। कवि-कुल-गुरु कालिदास के संबंध में बटोरी गई समस्त किंवदन्तियों का सार केवल इतना ही निकलता है कि वे जन्म से किसी अति-सामान्य परिवार के ही व्यक्ति थे, दैव संयोग से उनका संबंध अपने समय के सर्वश्रेष्ठ एवं शक्तिशाली राज्य परिवार से हो गया था। किंवदन्तियां तो यह भी सूचना देती हैं कि वे केवल निर्धन परिवार के ही व्यक्ति नहीं थे वरन् विशिष्ठ शिक्षा से भी युक्त नहीं थे। जैसी लोक-कथा है राज-कन्या से असन्तुष्ट होकर राज-पुरोहित (शायद वराहामिहिर) ने वैमनस्य के कारण परम विदुषी एवं तेजस्विनी राजकुमारी का विवाह निपट अयोग्य व्यक्ति से करा दिया था। कालान्तर में वही व्यक्ति अपनी तपस्या के बल से विश्व-रमणीयता की अधिष्ठात्री देवी 'काली' का प्रसाद भाजन बन गया और उसे अलौकिक प्रतिभा का वरदान मिला। यही रहस्य है जगत-प्रसिद्ध कवि-कुल-गुरु कालिदास के जीवन का। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि "कालिदास” जैसा लोक-अप्रचलित नाम उस व्यक्ति का जन्म-नाम नहीं हो सकता 12 *भारत का पुरावृत्त देश और विदेशके विद्वानों की गवेषणा का प्रधान विपय अब तक इस पर पर्याप्त प्रकाश पड़ भी चुका है। उस काल के जीवन पर निम्नलिखित कतिपय खोज-पूर्ण अध्ययन उपयोगी हैं। Foieign elements in Hindu Population DR Bhandarker Damodarpur Copper plate Inscriptions Dr Radha Govind Basak 3. Junagach Rock Inscriptions of Rudra Damana Epigraphia Indica Vo] VIII उपर्युक्त आधारों से निष्कर्ष यही निकलता है कि उस काल में 'दास' शब्द के नाम के साथ नामांशके रूपमें जोडने की प्रथा नहीं सी थी । 'सदुक्तिकर्णामृतम्' के रचयिता श्रीधर दास तथा उनके पिता बटु दास का उल्लेख है किन्तु ऐसे स्थलों पर 'दास' नामांश नहीं वरन् वर्ग या जाति का द्योतक है। रहा है। 1 2 से भले ही कालिदास के जन्म का नाम, जन्मस्थान का नाम या उनकं कुल-शील का पता न हो, किन्तु किंवदन्तियो मे कही गई उनकी देवी 'काली' की साधना और उनके द्वारा विरचित विपुल काव्य-राशि मे सम्भावित पारस्परिक समन्वय का गुप्त रहस्य, हमे अवश्य रूपसे सृष्टि के आदि और चिरलन क्रम में निहित शाश्वत नियम का संकेत देना है। 'काली' का उपर्युक्त विवेचन सिद्ध कर चुका है कि सृष्टि की समग्र तात्विक परम-रमणीयता' का केन्द्रीभूत प्रतीक ही 'काली' है। रमात्मकता उसकी अनिवार्य चेतना है। इस नाते 'काली' की माधना, उसकी उपलब्धि और उसकी सागोपाग प्रतिष्ठारस के माध्यम से ही संभव हो सकती है। कालिदास भी रस-सिद्ध कवि थे। 'कला' के विवेचन से स्पष्ट है कि समस्त सृजनशीलता उसी रस की आश्रयिणी है। लौन्दर्य-शास्त्र, क्या प्राचीन और क्या नवीन सी, एक स्वर स्वीकार करता है कि सन्तुलन और अनुपातिक नियोजन का समन्वय ही सौन्दर्य का प्राण है, अतएव कला की सावना सौन्दर्य-साधना है। जो अपने विधान मे रमाश्रित है। कवि कलाकार होने के नाते ही 'कला' और उमसे सम्बद्ध समस्त योजना का 'संयमी साधक है, इसी लिये वह 'काली' के व्यक्त रूप 'मरस्वती' का उपासक है । ऋग्वेद से लेकर विविध उपनिपद, पुराण, प्राचीन और अर्वाचीन काव्य तथा उपाख्यान देवी 'मरस्वती' की अर्चना करते नहीं थकते, उनके आहान-मंत्र एवं उनकी स्तुति मे गाये गये स्तोत्र सभी एक स्वर से उन्हें परम वाच्छनीय बान की अधिष्ठात्री के रूप में पूजते चले आये है। ज्ञान प्रकाशमय है। ज्ञान की अविष्ठात्री की कल्पना क्या माकार और क्या निराकार सर्वत्र ही भाखर, प्रकाशमय स्वीकृत है। उमीके आधार पर वे रूप, गुण, वेशभूषा इत्यादि मे भी 'शुभ्र' और वेतप्रिया' मानी गई है। प्रकाश नान का प्रतीक है, उसी के विपरीत अन्य कार अनान और अनात का। प्रकाश निर्भयता का दाता है, अन्वकार भय का जनक है। प्रकाश का अर्थ ही है अभिव्यक्ति, अवांत अभिव्यक्ति के माध्यम से ही प्रकाशन होता है।

( छ ) 'काली' अपनी स्थिति में विशुद्ध तात्त्विक' होने के नाते केवल साधनीय है, किन्तु साधनापूर्ण होने पर उसी तात्त्विक सिद्धि की नैसर्गिक अभिव्यक्ति अपनी सहज रसभयता को लिये हुए सरस्वती के रूप में व्यक्त होकर उपासित होती है। यही सिद्धि है कवि और कलाकार की। गोचर और अगोचर विश्व के मूल में उपस्थित चिरन्तन सिद्धान्तों की प्रत्यक्ष प्रतीति के लिये ही मानो कालिदास में हसे 'काली' का प्रसाद और 'वाणी' का वरदान साकार होता देख पड़ता है। काव्य-रसिक-जन युगों से कहते चले आये हैं कि 'उपमाकालि- दासस्य' अर्थात जहाँ तक नवीनतम और मार्मिक उपमाओं का प्रश्न है कालिदास अप्रतिम हैं। इसमें भी रघुवंश में इन्दुमति के स्वयंवर स्थल पर दी गई दीप-शिखा की उनकी उपमा बेजोड़ मानी जाती है। अनेक स्थलों पर कालिदास का उल्लेख 'दीपशिखा-कवि' के नाम से भी मिलता है। लेकिन जरा सोचना पड़ेगा कि कालिदास की कविता का अमरत्व क्या केवल उनकी उपमाओं के आधार पर ही टिका है ? और यदि उनकी अनुपम उपमाओंके वैचित्र्य की सत्ता को भी स्वीकार कर लिया जाए, तब भी विचार करना ही पड़ेगा कि उनमे ऐसी कौनसी शक्ति थी जो उनकी उपमाओं को इतनी ख्याति प्रदान करवा सकी ? उच्चकोटि के आलोचक उनके उक्ति चातुर्य पर भी कम मुग्ध नहीं है, अर्थात 'व्यंग्य' जो काव्य-रीति का मुख्य आधार है, उस पर भी कालिदास का एकछत्र अधिकार था । काव्य के इन मूल तत्वों का विश्लेपण आज तक अगणित आचार्यों की पैनी बुद्धि की गवेषणा का विषय रहा है और निष्कर्ष स्वरूप जो तथ्य निर्धारित है वह कुछ इस प्रकार है कि कविता केवल विचार नहीं, केवल उक्ति चातुर्य नहीं, केवल शब्द-सौन्दर्य ही नहीं वरन् इन तीनों का संयुक्त रसमय निर्वाह है जो सिद्ध कवि के द्वारा उसकी सजीव कल्पना-शक्ति के सहारे सम्पन्न होता है। भारतीय वाङ्गमय से, विशेष कर काव्य-शास्त्र में ( ज ) कल्पना का महत्त्व विशेष है । इसे कलाकार की शक्ति कहा गया है। कल्पना केवल मानसिक उड़ान नहीं, 'कल्प' शब्द का कोषगत अर्थ है 'सृजन'। कल्पना वह है जो सूक्ष्मतम् भावो को, विचारो को रूप प्रदान कर सके। 'व्यंग्य' शब्द की वह अद्भुत् शक्ति है जो उन्हीं गूढ़ एवं सूक्ष्म विचारों और भावों के 'कल्पित' रूपों को रससिक्त शब्दो के माध्यम से प्रत्यक्ष कर दे। इसी आधार पर 'कल्पना' को 'अलंकार जननी' भी माना गया है । कल्पना के ही द्वारा कवि प्रस्तुत और अप्रस्तुत में सामञ्जस्य स्थिर करता है और विविध अलंकारो की योजना उपस्थित हो जाती है। सजीव कल्पना के बल पर ही कवि सूक्ष्म भावों और विचारों का 'दर्शन' करता है और उसकी रसवती वाणी शब्दगत 'प्रदर्शन' मे उसकी सहायक बनती है। कवि की सूक्ष्मदर्शिता की परीक्षा का यही स्थल है। अतिसाधारण अनुभव या विचार भी सफल कवि के हाथो पड़ कर असाधारण बन जाता है। 'कुमार सम्भव' मे पार्वती का वर्णन करते हुए कवि कहता है :- मध्येन सा वेदि विलग्न मध्या वलित्रयं चारु वभार वाला। आरोहणार्थं नव यौवनेन कामस्य सोपानमिव प्रयुक्ततम् ।। किसी सुन्दरी के अंग-उपाग की शोभा की ओर आकृष्ट होना सहदय मानव का सहज व्यापार है। उसे निरखना तथा उसकी सराहना करना भी कुछ वैसा ही व्यापार है, किन्तु उन सौन्दर्य स्थलों में सार्थकता के साथ प्रकृति का निमित्त उसी की वाणी मे समझना और उसे 'रसिकों को भी समझा देना कवि काही काम है । 'त्रिवलि' को यौवन आरोहण के साथ काम का सोपान कहना एक सार्थक उक्ति है। कवि या कलाकार स्वभाव से केवल सौन्दयान्वेपी ही नहीं होता, सौन्दर्योपासक भी होता है । कालिदास का तो कहना ही क्या, उनकी - ( क ) विवध कृतियों का एक-एक शब्द सौन्दर्य की आराधना का मंत्रोच्चार सा करता सुन पड़ता है; लेकिन सौन्दर्य असीम है; यह सत्य जितना अधिक कालिदास की कृतियों में सिद्ध होता है उतना शायद अन्यत्र नहीं। यदि नर और नारी का सौन्दर्य उन्होंने देखा तो पशु, पक्षी, घास, फूल, वन और तड़ाग, सरिता और सागर, पर्वत और आकाश का सौन्दर्य भी उनकी आंखों के सामने प्रतिक्षण झूलता देख पड़ता है। उनकी पैनी लेखनी ने गिन-गिन कर विश्व की विमोहक छबि को आंक कर स्थिर कर देने की सी चेष्टा की है। यक्ष की अलकापुरी भले ही आज हमारी-ऑखों के सामने से ओझल हो गई हो लेकिन 'मेघदूत' के पन्नों में वह युगों तक सुरक्षित रहेगी। कण्व का आश्रम आज अपना अस्तित्व खो चुका है लेकिन वहाँ के मृग-छौने और वहां का पुनीत शान्त वातावरण 'अभिज्ञान शाकुन्तल' की पंक्तियों में अमिट है। सौन्दर्य का यह पारखी उपासक 'कुमार संभव' और 'ऋतु-संहार' में वर्णित उन्मुक्त शृंगार के मिस दीवानेपन की ख्याति भी प्राप्त कर चुका है किन्तु आश्चर्य तो तब होता है कि सुन्दरता का यह चित्रकार अगणित चित्र अंकित करता हुआ भी कहीं किसी नारी के नखशिख का आद्यान्त वर्णन शायद नहीं करता। कालिदास की नारी-सृष्टि एक यक्षिणी को छोड़ कर शायद सभी इतिहास प्रसिद्ध रमणियों को लेकर की गई। परम रूपवती स्त्रियां ही हैं-उर्वशी इन्द्र के अखाड़ेकी अप्सराओं की नायिका है, 'कुमार-संभव' में नगाधिराज की कन्या पार्वती साक्षात सौन्दर्य की मूर्ति हैं, शकुन्तला वेद-व्यास प्रणीत.महाभारत की सुकुमार, सहजहृदया परम सरला, लावण्यवती ऋषि कन्या है। ऐसे रम्य प्रतीकों को पाकर भी चिररूपातृप्त कवि कालिदास की तूलिका उनके रूप-विलास की मादकता में न उलझ कर निरन्तर उनके मानसिक और तलस्पर्शी हृदय सौन्दर्य के मर्म- चित्रण में ही तल्लीन देख पड़ती है। यह समस्या आलोचक वर्ग के लिये एक अनबूझ पहेली न बन जाये शायद इसी लिये कवि-कुल-गुरू ने स्वयं हो 'रघुवंश' और 'कुपार संभव' में एक परम सिद्ध दार्शनिक ( अ ) की भांति जीवन के शाश्वत रहस्य की ओर संकेत करते हुए कहा है कि "महाकाल के राजपथ पर सतत् गतिमान जीवन रथ के दो पहिये है जो स्व' -वह है, किन्तु इनकी गति एक दूसरे के विपरीत है। बढ़ता हुआ शरीर जव' क्रमशः क्षीणतानुगामी होता है, मन का पहिया निरन्तर अभिनव प्रौढ़ता और पुष्टता प्राप्त करता है।” अर्थात शारीरिक सौन्दर्य क्षणिक है, किन्तु मानसिक सौन्दर्य अपेक्षाकृत अधिक स्थायी और एपणीय है। कविकी इसी दृष्टिने उसे अन्तरोन्मुख बना दिया, और इसी के कारण शायद उसकी विविध उक्तियों में सत्य का वह स्वर गूंज उठा कि जो उसे आज तक देश और काल की सीमाओं में न वॉध सका । कालिदास भारतके थे लेकिन भौतिकवाद का उपासक पाश्चात्य का अंचल भी उनका कम अनुरागी नहीं । जर्मनी का अति प्रसिद्ध कवि 'गर्दा' अपने 'फाउस्ट' की भूमिका में कालिदास की वन्दना जिन शब्दों में करता है वे एक उदात्त मानव हृदय के सरल उद्गार है। केवल आज का ही नहीं १६ वीं शताब्दी का रूस भी कालिदास पर विमुग्ध है। मेघदूत' के संसार की विवध भाषाओं में अनुवाद सिद्ध कर देते है कि उनकी वाणी की प्रतिध्वनि विश्व व्यापिनी थी। इसका रहस्य है कालिदास का सौन्दर्य के माध्यम से सत्यान्वेपण । सत्य अपने रूप और धर्म में यदि अपरिवर्तन-शील माना गया है तो सार्वदेशिकता और सार्वभौमता उअका लक्षण है। कलात्मक साहित्य के देश-देशान्तरों में विविध स्वीकृत रूप वर्गी- कृत हैं दो प्रकारों मे-नाटक और काव्य । अर्थात दृश्य-काव्य और यह भी कालिदास की असाधारण प्रतिभा का ही प्रमाण है कि उन्होन दोनो रूपी से काव्य की साधना समान भाव से ही की। नाटक के क्षेत्र में उनके नाटक जहा सर्वश्रेष्ठ माने जाते है वहीं महाकाव्य के क्षेत्र मे उनका 'रघुवंश' और 'कुमार संभव' लासाना । यह सब कुछ लिख चुकने के बाद भी उन्होंने 'मेघदूत' के रूप में एक खण्डकाव्य प्रस्तुत किया, जो अपने कलेवर में लघु होता हुआ काव्यमी को चरम-सीमा का प्रतीक माना जाना है। किसी कृति श्रव्य काव्य । ste 44. TH ( ट ) , . अथवा किसी व्यक्ति की महानता का एक सिद्ध प्रमाण यह भी है कि उसका अनायास प्रभाव किस परिमाण में पड़ा । मेघ-दूत के अनुकरण पर सैंकड़ों दूत-काव्यों का लिखा जाना स्वतः उसकी श्रेष्ठता का प्रमाण है। दूत-काव्य का लिखा जाना, जहा तक सूचना प्राप्त है, भारतीय काव्य-जगत की प्राचीन परिपाटी है। इसके संबंध में स्वयं कविश्रेष्ठ कालिदास की ही स्वीकृति प्राप्त है कि 'मेघदूत' के लिखने में उनकी प्रेरणा का स्तोत्र था वाल्मीकि रामायण का वह प्रसंग जिसमें पवन-सुत हनूमान का प्रसिद्ध दौत्य कर्म वर्णित है। अब सहसा प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि मेघदूत की रचना कालिदासने केवल दूत-काव्य लिखने की परम्परा के निर्वाह के निमित्त की ? या इसका कुछ और प्रयोजन था ? यदि दूत-काव्य परम्परा का निर्वाह ही कवि-का निमित्त होता तो संभवतः कवि को ऐसे अनेक स्थल 'रघुवंश' और 'कुमार संभव' में ही प्राप्त हो जाते । किन्तु उनमें इसका निर्वाह कहीं नहीं किया गया; तब निश्चय ही इसकी रचना का प्रयोजन कुछ और होना चाहिये। मेघ-दूत में स्थल-स्थल पर कवि की रसात्मक उक्तिया कुछ इतनी हृदय स्पर्शिणी हैं, उनमें स्वसंवेद्यता का पुट कुछ इतना उभर आया है, कि जिसे देख कर अनेक आलोचक निष्कर्ष निकालते हैं कि 'मेघ-दूत' में कवि के अपने जीवन की घटना का प्रतिबिम्ब देख पड़ता है। किन्तु केवल उपर्युक्त आधार पर इस रचना को आत्मचरित्र मान बैठना भ्रामक बिचार है। काव्य की रसात्मकता सिद्ध ही तब होती है जब कवि स्वसंवेदन-शील होता है। यदि इसमें त्रुटि हो जाए और कवि परसंवेदनशीलोन्मुख होकर रस की सृष्टि करने बैठे तो उसे सफलता शायद ही मिले। इसलिये केवल 'मेघदूत' की अति रसात्मकता के आधार पर उसमें कालिदास के जीवन की झांकी देखने की चेष्टा बहुत सार्थक नहीं मानी जा सकती। लेकिन इसी के साथ एक अन्य आवश्यक प्रश्न भी उठ खड़ा होता है कि विरह निवेदन के निमित्त मेघ का आश्रय ही कवि के द्वारा क्यों चुना गया? यह तो ठीक है कि संसार के रसराज शृंगार काव्य में ( 8 ) की सर्वोत्कृष्ट निष्पत्ति वियोगावस्था के चित्रणमें जितनी निखरी उतनी संयोग मे नहीं। यह भी ठीक है कि वियोगावस्था को उभाड़ने में पावस-ऋतुकी ख्याति सर्व-स्वीकृत है, किन्तु वसन्तागमअथवा शिशिर इससे पीछे नहीं, स्वयं कालिदास ने अपने 'ऋतु-संहार' तथा अपनी अन्य कृतियों में भी स्थल-स्थल पर इस सत्य को स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है। सृष्टि-सौन्दर्य को अधिष्ठात्री महाकाली का वरद-पुत्र, कविता कामिनी का अचल सुहाग कालिदास जेसा परम रस-सिद्ध कवि जो अपनी अनन्त काव्य-राशि मे एक भी निरर्थक अथवा व्यर्थ अक्षर लिखने का दोपी नहीं, वह 'मेघ-दूत' जैसी अपनी जगत-प्रसिद्ध रचना निष्प्रयोजन अथवा असुविनिश्चित निमित्त के क्षणिक आवेश मे कर डाले, यह संभव नहीं। उनकी कृतियों का निश्चित क्रम तो स्थिर नहीं, किन्तु प्रौढ़ापौढ़ विवेक के आधार पर प्रायः स्थिर-सा है कि 'मेघ-दूत' उनकी प्रौढ़तम कृति है। यह निष्कर्प भी 'मेघ-दूत' के लिखे जाने के प्रयोजन पर प्रकाश डालने में कुछ सहायक सिद्ध हो सकता है। 'मेघ' शब्द देव-वाणीका अति प्राचीन और प्रतिष्ठित शब्द है। इसका उल्लेख ऋग्वेद के सर्व प्रधान देवता इन्द्रके सहचरके रूप में स्वीकृत है। इसका मूल अर्थ है 'वर्पण-करने-वाला'। मेघ जिस तरल पदार्थ का वर्पण करता है वह अनेकार्थी अमृत कहा गया है। अपने 'मेघ-दूत' में ही कवि मेघ को सम्बोधित करते हुए वारम्वार अति आदरसूचक शब्दों का उसके लिये प्रयोग करता है। केवल 'मेघ-दूत' में ही नहीं 'रघुवंश' में भी एक स्थल पर कवि कहता है कि सूर्य पृथ्वी का जल शोषित कर लेता है किन्तु सागर के खारे जल को भी अमृत-तुल्य मधुर बना कर मेघ के द्वारा पृथ्वी को ही फिर दे डालता है। अर्थात निष्कर्ष स्पष्ट है कि मेघ प्रकृति में व्याप्त मधुर रस का प्रधान वितरक है-जीवन-दाता है। कदाचित् यह मेघ की सहज रसमयता का ही प्रभाव है कि उसके दर्शन मात्र से मानव ही क्यों प्राणीमात्र का हृदय सरसित हो उठता है । मेधकी इस रसमयताकी एक अनूठी लाक्षणिक प्रशस्ति दर्शनीय है-

ड
"प्रायः सवों भवति करुत्तिराद्रान्तरात्मा"।
केवल इतना ही नहीं जीवन में २५ के असीम
मूल्य
को आंकता
हुआ कवि बहुत
आगे बढ़ जाता है, जब वह कहता है-
स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्तेवभोगात्
इष्टे वस्तुन्युपचितरसाः प्रेम राशी भवन्ति ।।
इन कतिपय उक्तियोंमें कालिदास की चरमरस-सधिनाकी सूचना
मिलती है। स्पष्ट है कि उसने रस की सत्ता केवल काव्य और कला
के क्षेत्र में ही नहीं देखी, वरन् व्यष्टि और समष्टिके जीवनमें यह किस
सीमा तक व्याप्त है, इसका अनुभव कवि ने आजीवन किया है। रस
का प्रतीक मेघ है, उसीके मिस कवि रस की आराधना करता हुआ
अपने इस प्रौढ़तम काब्य में अंतिम घोषणा-सी करता है कि रस ही
सारहै-लौकिक, अलौकिक और पारलौकिक जीवन के तन्तुभी केवल
इसीसे सिंचित हैं। यही रहस्य है 'मेघ-दूत' की रचना का और
कालिदास की रस-सिद्धता का।
ललिता प्रसाद सुकुल

No text on this page.

राजा लक्ष्मण सिंह
भारतेन्दु
STALLSISTER
...
देवीप्रसाद 'पूर्ण

महावीर प्रसाद द्विवेदी सेठ कन्हैयालाल पोहार कालिदास का जीवन चरित्र ( भारतेन्दु बा० हरिश्चन्द्र ) पश्चिम प्रदेशीय पण्डित लोग भारतवर्षीय कवियों में कालिदास को सर्वो- चासन देते हैं। बम्बई के प्रसिद्ध पंडित भाऊदाजी ने केवल कालिदास की कविता ही नहीं पढ़ी वरन् बहुत परिश्रम करके प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ और ताम्रपत्रो से उनका जीवन वृत्तान्त भी संग्रह किया। हमने भी उनके प्रन्थ से कई एक बातें ग्रहण की हैं। कालिदास विख्यात महाराजा विक्रम के नवरत्नों में थे। इसके * अति- रिक्त उनके जीवन की और कोई प्रामाणिक बात लोग नहीं जानते। वंगदेश के कई अभिमानी पंडितो ने कालिदास को लंपट ठहरा कर उनके नाम से हास्यरस की कविताओं का प्रचार किया। पाठशाला के युवा ब्राह्मण थोडा सा मुग्धबोध व्याकरण पढ के इन इलोकों का अभ्यास करके धनिक लोगों का मनोरंजन करते हैं और इसी प्रकार धनी लोगों से प्रति वर्ष कुछ पाते हैं। यथार्थ में तो यह सब कविता कालिदास की नहीं हैं, परन्तु नवीन कवियों की बनाई हुई है। "प्रफुल्लित ज्ञान नेत्र” नामक पद्यमय पुस्तक बंगभाषा में मुद्रित हुई है। इस ग्रन्थ लोगों ने मिथ्या कल्पना करके कालिदास में ऊपर लिखा हुआ दोष ठहराया है। इसी प्रकार से इन दिनों अंगरेजी भूमिका सहित एक रघुवंश की सटीक पोथी मुद्रित हुई है। इसमें भी लोगों ने मिथ्या कल्पना किया है। कालिदास ने किसी भी ग्रन्थ में अपना वृत्तान्त कुछ भी नहीं लिखा है, केवल इतना ही प्रकट किया है। * राजा लस्मण सिंह रघुवंश के उत्था में यों लिखते हैं :-कालिदास नाम के कई कवि हुए हैं। उनमें दो मुख्य गिने जाते हैं-~-एक वह जो राजा वीर विक्रमाजीत की समा के नौरत्नों में था, दूसरा जो राजा भोज के समय में हुआ । इनमें भी पण्डित लोग पहले को दूसरे से श्रेष्ठ मानते हैं और उसी के रचे हुए रघुवंश, कुमारसम्भव, मेघदूत, ऋतुसंहार इत्यादि काव्य और शाकुतल नाटक- विक्रमोर्वसो त्रोटक और और अच्छे अच्छे ग्रन्थ समझे गये हैं।

[ २ ] धन्वन्तरि-क्षपणकामरसिंहशंकु-बेतालभट्टघटखर्परकालिदासाः । ख्यातीवराहमिहिरोनृपतेःसभायारत्नानिवैवररुचिर्नवविक्रमस्य ।। केवल इतना ही परिचय नवरत्नों का लिखा है। अभिज्ञानशाकुन्तल-ग्रन्थ- कर्ना के इतने ही परिचय से संतुष्ट न रह सके और-और संस्कृत ग्रन्थो से इस विषय का अनुसधान करना उचित है। प्रायः ५०० वर्ष हुए कि कोलाचल मल्लिनाथ सूरि ने कालिदास कृत काव्यो की टीका की है। उन्होने यह टीका दक्षिणावर- नाय की टीका देख कर वनाई । परन्तु वह अव दुष्प्राप्य है। भाषातत्ववित् लासेन साहब ने यह लिखा है कि कालिदास ईसवी दो संवत् में समुद्रगुप्त की सभा में वर्तमान थे। लासेन ने एक पत्थर देखा था, जिस पर यह लिखा था कि 'समुद्र गुप्त कवि बंधु काव्य प्रिय' और इसी से वह अनुमान करते हैं कि कविश्रेष्ठ कालिदास उनके सभासद थे। वेण्टली ने एशियाटिक नामक पत्रिका में भोज प्रबध का फरासीसी अनुवाद और 'आईने अकबरी' को देख कर लिखा है कि भोज राजा के राज्यके ८०० वर्ष पश्चात् विक्रमादित्य की सभा में कालिदास वर्त- मान थे, परन्तु यह बात क्टापि नहीं हो सकती। वेटली ने स्वीय ग्रन्थों में कई एक ऐमी अशुद्ध बातें लिखी हैं जिनके पढने से बोध होता है कि वह इन्दुिओं का इतिहास कुछ भी नहीं जानते । कर्नेल विलफोर्ड, प्रिसेप और एलफिनस्टन ने लिखा है कि कालिदास प्रायः १४०० वर्ष पूर्व वर्तमान थे। भोज प्रबंध के प्रमाणानुसार गुजरात, मालव और दक्षिण के पटिन कहते हैं कि कालिदास सन ११०० ईस्वी मे भोज राजा के सभासद थे। उज्जैन के राज- सिहासन पर कई विक्रमादित्य और मोजराज नामक राजा बैठे, परतु सबसे अंतके गोजराजा नो मबत् ११०० ईस्वी में राज्य करते थे । और इससे बोध होता है कि अनके विक्रम ही को भोजराज कहते हैं और उन्हीं की नवरत्न की सभा थी। हमने स्वयं भोजप्रबन्ध' पाठ कर के देखा है कि उसमें यह लिखा है कि मालव देशात- गत धारानगराधिप भोज मिन्बल के पुत्र और मुज भ्रातपुत्र थे भोज की वान्यायम्या में उनके पिता ग परलोक हुआ तो उनके पितृज्य मुज राजपद पर अगिपिन और भोज ने उनके मन्त्री बन कर बहुत विद्या उपार्जन किया और उनी प्रहार भोज दिन प्रतिदिन विग्यात होने लगे। मुज के - - के - ता मन में यह [ ३ ] ? - पर आप शंका हुई कि अब लोग हमको पदच्युत करेंगे और यह विचार करने लगे कि क्सिी. प्रकार से भोज का प्राणनाश करूँ। इसी हेतु मुज ने वत्सराज राजा को बुला कर अपना दुष्ट विचार प्रकाशित किया और कहा कि भोज को शीघ्र ही अरण्य में ले जाकर इसका प्राणनाश करो। परन्तु इस राजा ने भोज को तो छिपा रक्खा और पशु के रक्त से भरे हुए खड्ग को राजा मुज के पास भेज दिया। इसको देख कर उन्होंने सानन्द चित्त से पूछा कि भोज ने मानव लीला समाप्त किया ? यह सुन वत्सराज ने एक पत्र पर लिख दिया कि-'मान्धाता, जो भोज क्या, एक समय नृप कुल का शिरोमणि था अब परलोक में है। रावणारि रामचन्द्र जिन्होंने समुद्र में सेतु बांधा था वह कहाँ हैं ? और बहुत से महोदय गण और राजा युधिष्ठिर ने स्वर्गारोहण किया है, परन्तु पृथ्वी उनके साथ नहीं गयी । के साथ पृथ्वी अवश्य रसातल को जायगी।' इस पत्र के पढते ही मुज का शरीर रोमाञ्चित हुआ और भोज के लिये अत्यन्त व्याकुल हुए । परन्तु जब उन्होने सुना कि भोज जीता है, तो उनको वत्सराज से शीघ्र बुलवा कर वारानगर के राज सिंहासन पर बैठाया और आप ईश्वराराधनके निमित्त अरण्यमे प्रवेश किया। भोज ने पितृ सिहासन पा के बहुत से पण्डितों को अपनी सभा में बुलाया । हमको भोज प्रबन्ध में कालिदास के सहित नीचे लिखे हुये पण्डितों के नाम मिले हैं:- कर्पूर, कलिग, कामदेव, कोकिल, श्रीदचन्द्र, (2) गोपालदेव, जयदेव, तारेचन्द्र, दामोदर, सोमनाथ, धनपाल, वाण, भवभूति, भाष्कर, मयूर, मल्लिनाथ, महेश्वर, माघ, मुचकुन्द, रामचन्द्र, रामेश्वर, भक्त हरिवंश, विद्याविनोद, विश्ववसु, विष्णु- कवि, शकर, सामदेव, शुक, सीता, सोम, सुबंधु इत्यादि । सीता अवश्य किसी स्त्री का नाम है और इसी से बोध होता है कि स्त्री शिक्षा उस समय प्रचलित थी। तो हम नहीं समझते कि हम लोगो के स्वदेशीय अब इसको क्यो बुरा समझ के अपने देश की उन्नति नहीं होने देते। देखिये, अमेरिका में स्त्री शिक्षा कैसी प्रचलित है और जो लोग एक समय अत्यन्त मूर्ख अवस्था में थे अब यूरोप के लोगों को भी दवा लिया चाहते हैं, तो यह देख कर हे हिन्दुस्तानियो! क्या तुमको थोडी भी लज्जा नहीं आती ? पण्डित शेषगिरि शास्त्री ने लिखा है कि वल्लालसेन ने १२० ईस्वी में भोज- - [ ४ ] प्रवन्ध बनाया। इससे वोध होता है कि उन्होंने भोजराजके विद्योत्साही और उनके सम्मान की वृद्धि के हेतु कालिदास, भवभूति इत्यादि कवियों को केवल अनुमान ही से मोजराज का समासद ठहराया है। भोजचरित्र में इन सब कवियों के नाम मिलते हैं इसलिये भोजप्रवन्ध को कैसे प्रामाणिक ग्रन्थ कहैं ? इसी भोजराज के चंपू रामायण, सरस्वती कंठाभरण, अमरटीका, राजवार्तिक, पातंजलिटीका और चारुचार्य इत्यादि बहुत से ग्रन्थ मिलते हैं, परन्तु कालिदास, भवभूति आदि कवियो के नाम इनमें से एक भी ग्रन्थ में नहीं लिखे हैं। विश्वगुणादर्शक ग्रन्थ- कार वेदाताचार्य कालिदास श्री हर्ष और भवभूति एक समय भोजराजके सभा में वर्तमान थे, जैसा लिखा भी है। माघश्चौरो मयूरो मुररिपुरपरो भारविः सारविद्यः । श्री हर्पःकालिदासः कविरथ भवभूत्यादयो भोजराजः ।। इसमें वे भी भोजप्रबन्धप्रणेता बल्लाल के न्याय महाभ्रम में पतित हुए हैं, क्योंकि श्री हर्प, कालिदास और भवभूति एक काल में वर्तमान नहीं थे। इस विषय में वहुत से प्रमाण भी हैं। भारतवर्ष के बहुत से राजाभो का नाम विक्रमादित्य था। उज्जयिनी के अधीदवर विक्रमादित्य जो ५७ ई० पू० में राज्य करते थे और जिन्होंने 'संवत्' म्यापन किया है तो अब हम लोगो को देखना चाहिये कि कालिदास इस विक्रम की सभा में उपस्थित थे वा नहीं। हम्बोल्ट लिखते हैं कि कविवर होरेस और वर्जिल कालिदास के समकालीन थे। इस बात को बहुत से यूरोपीय पण्डितों ने स्वीकार किया है। कर्नल टॉड ने अपने राजस्थान के इतिहास में लिखा है कि 'जब तक हिन्द साहित्य वर्तमान रहेगा तब तक लोग भोज प्रमार और उनके नवरत्नों को न भूलेंगे।' परन्तु यह ठहराना बहुत कठिन है कि वह गुण-पटिन नीन भोजराजो में से किस भोजराज की नवरत्न की सभा थी। कर्नेल टोड ने यह निरूपण किया है-प्रथम भोजराज सवत् ६३१ में, द्वितीय ७२१ और तृतीय भोजराज संवत् ११०० में वर्तमान थे। 'सिंहासनबत्तीसी', पीमी' और 'विक्रमचरित्र' आदि प्रन्यों में महाराज विक्रमादित्य की बहुत सी अगफिक फ्या मरी हुई है, इमी कारण इनमे कोई सत्य इतिहास नहीं मिल मस्ता। मंस्तुग कृत 'प्रबन्ध चितामणि' और राजशेखरकृत 'चतुविशति प्रबंध' [५] और एक में लिखा है कि महाराजा विक्रमादित्य अति शूर वीर और महावल पराक्रांत नृपति थे। परन्तु उनमे नवरत्न और कालिदास आदि कवियो का कुछ भी वृत्तांत नहीं लिखा है। जैन ग्रन्थों में लिखा है कि सिद्धसेन नामक जैन पुरोहित विक्रमादित्य के उपदेष्टा थे। परन्तु हम नहीं कह सकते थे कि यह बात कहाँ तक शुद्ध है। जैन लेखक कहते हैं कि ७२३ संवत् मे भोजराज के राज्य में बहुत से लोग उज्जयिनी नगर में जा बसे थे। यह और बृद्ध भोज दोनों जैन मतावलम्बी थे। यह सब वृतांत जैन ग्रन्थों से ज्ञात होते हैं। और और संस्कृत गन्थों में ये सब प्रमाण नहीं मिलते। वृद्धभोज मनान्तुङ्ग सूरि के शिष्य थे। मनान्तुङ्ग और वाप्प मयूर भट्ट के समकालकि जैनाचार्य थे। बाणकृत हर्षचरित पढने से ज्ञात होता है कि उन्होने सन् ७०० ईस्वी में श्रीकंठाधिपति हर्षवर्द्धन के साथ भेंट किया था। यही कान्यकुब्जाधिपति हर्षवर्धन शिलादित्य थे और इन्हीं की सभा में हियांग सियांग नामक चैनिक परिव्राजक बुलाए गए थे। वाण कवि ने हियांगसियांग के प्रन्थ को पाठ करके अपना गन्थ बनाया। हर्षवर्द्धन के साथ चैनिकाचार्य की भेंट का वृत्तांत हर्ष चरित में 'यवन प्रोक्त पुराण' नामक ग्रन्थ से लिया गया है। महर्षि कण्व ने अपने कथा ‘सरित्सागर' के १८ वे अध्याय में नरवाहन दत्त को विक्रमादित्य का उपन्यास कहा है। उसमें लिखा है कि विक्रमादित्य सन् ५०० ईस्वी में राज्य करते थे। नरवाइन दत्त जैन ग्रन्थ, सरित्सागर और मत्स्य-पुराण के मतानुसार शतानिक के पौत्र थे। नासिक में एक पत्थर की चट्टान मिली है जिस पर विक्रमादित्य का नाम लिखा है और उनको नामाग, नहुष, जन्मेजय, ययाति और बलराम के नाई योद्धा वर्णन किया है। पाठकजनो को देखना उचित है कि एक विक्रमादित्य के इतिहास में कितनी गडबड है। लोगों में जो केवल एक ही विक्रमादित्य प्रसिद्ध हैं, इस समय के भारतवर्षीय इतिहासो में कई एक विक्रमादित्यो के नाम मिले हैं। परन्तु हमको उस विक्रमादित्य का इतिहास ज्ञात होना आवश्यक है जिससे हम लोगो का सन्देह दूर हो और यह जान पड़े कि नबरत्नों के अमूल्यरत्न कवि-चक्रचूड़ामणि कालिदास का विक्रमादित्य से कुछ सम्बन्ध है व नहीं।

श्री देवकृत विक्रमचरित में लिखा है कि विक्रमादित्य नीयंकर बर्द्धमान के नाश होने के ४७० वर्ष परे उज्जयिनी में राज्य करते थे और इन्होंने ही संवत् स्थापन किया है, परन्तु इस ग्रन्थ में कालिदास का नाम भी नहीं लिखा है। पण्डित तारानाथ तर्कवाचस्पति कहते हैं कि महाकवि कालिदास ने 'रघुवंश', 'कुमारसम्भव' और 'मेघदृत' बनाने के अनन्तर ३०६८ कलिगताब्द में 'ज्योतिर्वि- टाभरण' नामक कालज्ञान शास्त्र बनाया। मेघदूत प्रकाशक वायू प्राणनाथ पंटित महागय ने भी इस बात को अपनी भूमिका में लिखा है, परन्तु यह किसी प्रन्यकार की दृष्टि में नहीं पड़ा कि 'ज्योतिर्विदाभरण' रघुकार कालिदास रचित है। तर्कवाचस्पति महाशयके मत को सहायता देने के निमित्त 'ज्योतिर्विदामरण' के कतिपय श्लोको का अनुवाद करके नीचे लिखते हैं, जैसा कालिदास ने लिखा। मैन इस प्रफुल्लकर ग्रन्थ को भारतवर्षान्तरगत मालव देश में ( जिसमें १८० नगर हैं) राजा विक्रमादित्य के राज्य के समय रचा है ॥ ७ ॥ शंकु, वररुचि, मणि, अंशुदत्त, जिष्णु, त्रिलोचन हरि, घंटखर्पर, अमर सिंह और और बहुत से कवियों ने उनकी समा को सुशोभित किया था ॥ ८ ॥ सत्य, वराह मिहिर, अतिसेन, श्रीवादरायणी, भनिथ्व, कुमार सिंह और कई एक महागय ज्योतिपशास्त्र के अध्यापक थे ॥ ९ ॥ धन्वंतरि, क्षपणक, अमर सिंह, शकु, वैतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास और वराहमिहिर और घररुचि ये सब महाशय विक्रम के नवरत्न थे ॥ १० ॥ विक्रम की सभा में ८०० छोटे-छोटे राजा और उनकी महासभा में १६ वाग्मी १. ज्योतिषी, ६ वैद्य और १६ वेद-पारग पण्डित उपस्थित रहते थे ॥ ११ ॥ कोई कहते है कि यह कवि, मालवा के इर्प विक्रमादित्य के समय, हज़रत इमा फी दवी मदी में था। टम राजा की राजधानी टज्जन नगरी थी। इसी मारण कालिदाम भी वहां रहा था। राजा विक्रम की समा में नौ रत्न थे, मग मे एक कालिदान था। कहते हैं कि लड़कपन में इसने कुछ भी नहीं पढ़ा सिम्ला, ऐपल एग्री के कारण रमे यद अनमोल विद्या का धन हाथ लगा। प्रमही पया यो प्रमिद है कि राजा शारदानन्द की लरकी विद्योत्तमा बड़ी पंडिता [ ७ ] सभा ‘थी। उसने यह प्रतिज्ञा की कि जो मुझे शास्त्रार्थ में जीतेगा, उसी को ब्याहूंगी। उस राजकुमारी के रूप, यौवन, विद्या की प्रशंसा सुन कर दूर-दूर से पंडित आते थे पर शास्त्रार्थ के समय उससे सब हार जाते थे। जब पंडितो ने देखा कि यह लडकी किसी तरह वश में नहीं आती और सब को हरा देती है, तो मन में अत्यन्त लज्जित होकर सबने पक्का किया कि किसी ढब विद्योत्तमा का विवाह किसी ऐसे मूर्ख के साथ करावे, जिसमें वह जन्म भर अपने घमंड पर पछताती रहे । निदान वे लोग मूर्ख की खोज में निकले। जाते-जाते देखा कि एक आदमी पेड के ऊपर जिस टहनी के ऊपर बैठा है, उसी को जड से काट रहा है ! पंडितों ने उसे महामूर्ख समझ कर बडी आवभगतसे नीचे बुलाया और कहा कि चलो हम तुम्हारा व्याह राजा की लड़की से करा देवें। पर खबरदार राजा की में मुह से कुछ भी बात न कहो, जो बात करनी हो इशारों से कहियो । निदान जब वह राजा की सभा में पहुचा, जितने पंडित वहां बैठे थे, सब ने उठ कर उसकी पूजा की, ऊँची जगह बैठने को दी और विद्योत्तमा से यों निवे- दन क्यिा कि ये वृहस्पति के समान विद्वान हमारे गुरु आप के व्याहने को आये हैं। परन्तु इन्होंने तप के लिये मौन साधन किया है। जो कुछ आप को शास्त्रार्थ करना हो, इशारों से कीजिये। निदान उस राजकुमारी ने इस आशय से, कि ईश्वर एक है, एक उंगली उठाई। मुर्ख ने यह समझकर कि धमकाने के लिये उंगली दिखाकर आँख फोड देने का इशारा करती है, अपनी दो उंगलिया दिखलायीं। पण्डितों ने उन दो उंगलियो के ऐसे अर्थ निकाले कि उस राज- कुमारी को होर माननी पडी और विवाह भी उसी दम हो गया । रात के समय जब दोनो का एकात हुआ, किसी तरफ से एक ऊँट चित्ला उठा। राजकन्या ने पूछा कि यह क्या शोर है, मूर्ख तो कोई भी शब्द शुद्ध नहीं बोल सकता था, कह उठा उद्र चिल्लाता है। और जब राजकुमारी ने दुहरा कर पूछा तो, उद्र की जगह उस्ट्र कहने लगा, पर शुद्ध उष्ट्र का उच्चारण न कर सका । तब तो विद्योत्तमा को पडितों की दगाबाजी मालूम हुई और अपने धोखा खाने पर पछताकर फूट-फूटकर रोने लगी। वह मूर्ख भी अपने मन में बडा लज्जित हुआ। पहिले तो चाहा कि जान ही दे डालू पर सोच समझकर घरसे निकल विद्या उपार्जन मे परिश्रम करने लगा। और थोड़े ही दिनो मे ऐसा पंडित दो [ ८ ] गया, जिसका नाम आज तक चला जाता है। जब वह मूर्ख पंडित होकर घर में आया, तो जैसा आनन्द विद्योत्तमा के मन को हुआ, लिखने के वाहर है। सच है, परिश्रम से सब कुछ हो सकता है। कालिदास के समय घटखर्पर, वररुचि आदि और भी कवि थे। कालिदास ने काव्य, नाटकादि अनेक ग्रन्थ सस्कृत-भपा में लिखे हैं । इनकी काव्य-रचना बहुत सादी, मधुर और विपयानुसारिणी है । अंगरेज लोग कालिदास को अपने शेक्स- पियर के सदृश उपमा देते हैं। इसके समय में भवभूति नामक एक कवि था। कहते हैं कि उसकी विद्या कालिदास से अधिक थी। परन्तु कवित्वशक्ति कालि- दास की सी न थी। भवभूति कालिदास के श्रेष्ठत्व को मानता था। कालिदास सारस्वत ब्राह्मण था। उमको आखेट आदि खेलों की बडी चाह थी और उसने अपने ग्रन्य में इसका वर्णन किया है कि मनुष्य के शरीर पर ऐसे खेलों से क्या-क्या उपकारी परिणाम होते है। विक्रमादित्य ने उनको कश्मीर का राजा बनाया और यह राज्य उसने चार चरस नौ महीने किया। कालिदास उज्जैन में रहता था, परन्तु उसकी जन्मभूमि कश्मीर थी । देशातर होने पर स्त्री के वियोग से जो जो दु ख उसने पाये, उनका बखान मेघदूत-काव्य में लिया है। कालिदास बडा चतुर पुख्य था। उसकी चतुराई की वहत सी कहानियां है और वे सब मनोरजक हैं, यथा उनमें से कई एक ये हैं। (१) भोजराजा को कवित्व पर बडी प्रीति थी। जो कोई नया कवि उसके पास आता और कविताचातुर्य बताना, तो उसको वह अच्छा पारितोपिक देता, और चाहना तो अपनी सभा में भी रखता । इस प्रकार से यह कवि- गण्डल बहुत बह गया। उसमे कई कवि तो ऐसे थे कि वे एक बार कोई नया लोक मुन लेने, तो उसे ण्ठ कर सकते थे। जब कोई मनुप्य राजा के पास थाकर नया टोक मुनाता था, तो कहने लगते थे, कि यह तो हमारा पहिले ही से जाना हुआ है और तुरन्त पढ़ कर सुना देते थे। एक दिन कालिदास के पास एक कवि ने आपर कहा कि महाराज, आप यदि रामा रे पाम ले चले और बुद्ध धन दिला देवें, तो मुझ पर आप का वडा उपहारोगा। तो में कोई नया इलोक बनाकर राजममा में मुनाऊँ, तो उसका [६ ] नूतनत्व मान होना कठिन है इसलिये कोई युक्ति बताइये । कालिदास ने कहा कि तुम श्लोक में ऐसा कहो कि राजा से मुझको रत्नों का हार लेना है, और जो कुछ मैं कहता हूँ, सो यहां के कई पंडितों को भी मालूम होगा। इस पर यदि पंडित लोग कहें कि यह इलोक पुराना है, तो तुमको रत्नों का हार मिल जायगा, नहीं नये श्लोक का अच्छा पारितोषिक मिलेगा। उस कवि ने कालिदास की बताई हुई युक्ति को मानकर वैसा ही श्लोक बनाया और जब उसको राजसभा में पढा, तो कविमंडल चुपचाप हो रहा और उस कवि को बहुत सा धन मिला। ( २ ) एक समय कालिदास के पास एक मूढ़ ब्राह्मण आया और कहने लगा कि कविराज मैं अति दरिद्री हूँ और मुझमें कुछ गुण भी नहीं है, मुझ पर आप कुछ उपकार करें तो भला होगा। कालिदास ने कहा, अच्छा हम एक दिन तुमको राजा के पास ले चलेंगे, आगे तुम्हारा प्रारब्ध । परन्तु रोति है कि जब राजा के दर्शन निमित्त जाते हैं, तो कुछ भेंट ले जाया करते हैं * इसलिये मैं जो ये साँटे के चार टुकड़े देता हूँ सो ले चलो। ब्राह्मण घर लौटा और उन साँटे के टुकडों को उसने धोती में लपेट रक्खा। यह देख किसी ठग ने उसके बिन जाने उन टुकडों को निकाल लिया और उनके बदले लकडी के उतने ही टुकड़े बांध दिये। राजा के दर्शनों को चलने के समय ब्राह्मण ने सांटे के टुकड़ों को नहीं देखा। जब राजसभा में पहुँचा तब यह काष्ठ की भेंट राजा को अर्पण की। उसको देखते ही बहुत क्रोधित हुआ। उस समय कालिदास पास ही था। उसने कहा, महाराज, इस ब्राह्मण ने अपनी दरिद्ररूपी लकड़ी आप के पास लाकर रक्खी है इसलिये कि उसको जलाकर इस ब्राह्मण को आप सुखी करें। यह बात कवि के मुख से सुनते ही राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उस ब्राह्मण को बहुत धन दिया। ( ३ ) एक समय राजा भोज कालिदास को साथ ले वनक्रीड़ा के हेतु अरण्य को गए, और घूमते घूमते थके मांदे हो, एक नदी के किनारे जा बैठे * राजा कन्या ज्योतिषी, वैद गुरू सुर सिद्ध । भरे हाथ इन पै गये, शेष कार्य सब सिद्ध । । -

[ १२ ]
को दो बार, नीमरे को तीन बार और चौथे को चार बार सुनने से नया दलोक
कठम्य हो जाता था। मो जब कोई परदेगी पण्डित राजा की सभा मे नवीन
आगय का लोक बना के लाना तो वह राजा के सम्मुख पढ के सुनाता या । उस
समय राजा अपने पण्डितो से पूछना था कि वह इलोक नया है वा पुराना ।
तब वह मनुष्य जिसको कि एक वार के सुनने से कंठस्थ होने का अभ्यास था
कहना कि यह पुराने आशय का इलोक है और आप भी पढ के सुना देता था ।
इनके अनन्तर वह मनुष्य जिसको दो बार सुनने से कंठ हो जाता था पढ़ के
सुनाता और इसी प्रकार वह मनुष्य जिसको तीन बार और वह भी जिसको चार
बार के मुनने से कंठस्य होने का अभ्यास था, क्रम से सब राजा को कंठाग्र सुना
देत। इस कारण परदेशी विद्वान अपने प्रयोजन से रहित हो जाते थे और
एम बात की चर्चा देश देशातर में फैली। सो एक विद्वान ऐसा देशकालमें चतुर
और बुद्धिमान था कि उसके बनाये हुए आशय को इन चार मनुष्यो को भी
अंगीकार करना पडा कि यह नवीन आशय है और वह इलोक यही है ।
श्लोक
गजन् श्रीभोजराज त्रिभुवन विजयी धार्मिकस्ते पिताऽभूत ।
पित्रा तेन गृहीता नवनवतिमिता रत्नकोटिर्मदीया ।।
ता त्वं देहि त्वदीयैस्सकल बुधवरैर्जायते वृत्तमेत-
नोचेञ्जानंतितेवैनवकृतमथवा देहि लक्षं ततो
हे राजा मोज, तीनों लोक के जीतने वाले, तुम्हारे पिता बड़े धर्मिष्ट हुए
है। उन्होने मुझसे निन्नानवे करोड रत्न लिया है सो मुझे भाप दीजिये और इस
वृत्तांत को तुम्हारे नमासद विद्वान जानते होंगे, उनसे पूछ लीजिये। जो वह कहें
कि यह भागय केवल नवीन कविता मात्र है, तो अपने प्रण के अनुसार एक लाख
रुपया मुझे दीजिये। इम आगय को सुन कर चारो विद्वानो ने विचाराश
दिया जो इसको पुराना भागय ठहरावें, तो महाराज को निन्नानवे करोड़
द्रव्य देना पटता है और नवीन कहने में केवल एक लाख । सो उन चारो ने
प्रम में यही कहा कि पृथ्वीनाथ, यह नवीन आशय का इलोक है। इस पर
रामे उम विद्वान को चार लाख रुपया दिया ।
मे ॥ २॥

कालिदास की विद्वता-कवित्व-शक्ति कालिदास ने यद्यपि अपने जन्म से भारत ही को अलंकृत किया, तथापि वे अकेले भारत ही के कवि नहीं। उन्हें इस भूमण्डल का महाकवि कहना चाहिये। उनकी कविता से भारतवासियों ही की आनन्द-वृद्धि नहीं होती। उसमें कुछ ऐसे गुण हैं कि अन्य देशों के निवासियों को भी उसके पाठ और परिशीलन से वैसा ही आनन्द मिलता है जैसा भारतवासियों को मिलता है। जिसमें जितनी अधिक सहृदयता है, जिसने प्रकृति के प्रसार और मानव-हृदय के भिन्न-भिन्न भावों का जितना ही अधिक ज्ञान प्राप्त किया है, कालिदास की कविता से उसे उतना ही अधिक प्रमोदानुभव होता है। कविकुल की कविता में प्रभावोत्पादन की जो शक्ति है वह अविनाशिनी है। हजारों वर्षों से न उसमें कमी हुई है-न उसमें किसी प्रकार का विकार उत्पन्न हुआ है और न आगे होने का भय ही है। जब तक इस विशाल विश्व के साक्षर जन सच्ची और सरस, खाभाविक और सुन्दर, कविता का आदर करते रहेंगे तब तक कालिदास के विषय में उनकी पूज्य बुद्धि भी अक्षुण्ण रहेगी। प्रमोदजनक और शिक्षादायक वस्तुओं को जब तक मनुष्य-समुदाय अपने लिये हितकर समझेगा तब तक कालिदास की कीर्ति यदि उत्तरोत्तर बढ़ेगी नहीं, तो कम भी न होगी। कालिदास को संस्कृत-कविता रूपी आकाश का पूर्ण चन्द्रमा कहना चाहिये । उनके किस गुण की प्रशंसा की जाय ? संस्कृत भाषा पर उनका अधिकार असा- मान्य था। उन्होंने अपनी कविता में चुन-चुन कर सरल, पर सरस और प्रसं- गानुरूप शब्दों की ऐसी योजना की है जैसी आज तक किसी कवि की कविता में नहीं पाई जाती। उनकी प्रतिमा विश्वतोमुखी थी। उनकी कल्पनाओं की पहुँच पृथ्वी, आकाश, पाताल-सब कहीं थी। उनके वर्णन का ढंग बडा ही सुन्दर और हृदयस्पर्शी है। व्याकरण, ज्योतिष, अलंकार-शास्त्र, नीति-शास्त्र वेदान्त, सांख्य, पदार्थ-विज्ञान, इतिहास, पुराण आदि जिस शास्त्र, जिस विद्या [ १४ ] । और जिस विषय में उन्हें जो वात अपने मतलब की देख पडी है उसी को वहां से खींच कर उसके उपयोग द्वारा उन्होंने अपने मनोभावों को मनोहर से मनोहर रूप टेकर व्यक्त किया है। कालिदास और शेक्सपियर रचना-नैपुण्य और प्रतिमा के विकास-सम्बन्ध में कालिदास की बराबरी का यदि और कोई कवि हुआ है तो वह शेक्सपियर ही है। भिन्न-भिन्न देशो में जन्म लेकर मी सारे ससार को अपने कवित्व-कौशल से एकसा मुग्ध करने वाले यही दो कवि है। इनकी रचनायें इस बात का प्रमाण हैं कि इन दोनो के हृदय-क्षेत्र में एक ही सा कवित वीज वपन हुआ था। इनके विचार, इनके भाव, इनकी उक्तिया अनेक स्थलो में परस्पर लड गयी हैं। जिस वस्तु को जिस दृष्टि से कालिदास ने देखा है प्राय. उसी दृष्टि से शेक्सपियर ने भो देखा है। शेक्सपियर ने अपने नाटको में भिन्न-भिन्न स्वभाव वाले मनुष्यों के भिन्न- मिन्न चित्र अङ्कित किये हैं। कालिदास ने भी ठीक वैसा ही किया है। जिसका जैसा स्वभाव है उसका वैसा चित्र उन्होने उतारा है। जिस कार्य का परिणाम जैसा होना चाहिये वैसा ही निदर्शन उन्होने किया है। प्रेमियो की जो दशा होती है, उनके हृदय में जिन विकारो का प्रादुर्भाव होता है, वे अपने प्रेम-पात्र को निस दृष्टि से देखते है-कालिदास और शेक्सपियर दोनों के नाटकों में इन बातो का मजीव चित्र देखने को मिलता है, शेक्सपियर के मेकत्रेय, ओथेलो, रोमियो जूलियट, मिरेण्डा और टेस्डेमोना आदि चित्रो का मिलान कालिदास के दुप्यन्न, अग्निमित्र, पुरखा, शकुन्तला, प्रियवदा आदि के चित्रो से करने पर यह यात अच्छी तरह समझ में आ जाती है कि इन दोनों महाकवियो को मानवी वमान का फिनना तलम्पर्गी ज्ञान था। कहीं-कही पर तो इन महाकवियो के माटर-पानी ने तुल्य प्रसंग आने पर, ठीक एक ही सा व्यवहार किया है। मानका विषय में दुष्यन्त कहता है- अभिमुरे गाय महननीक्षित, दसितमन्यनिमित्त कयोदयम् । गमियो मा जुलियट के विषय में प्रायः यही कहना है-She will not ofloring terms, Nor bide the encounter of assatling re -- [ १५ ] - शेक्सपियर और कालिदास में यदि कुछ भेद-भाव है तो यह है कि कालि- दास प्रकृति-ज्ञान में अद्वितीय थे और शेक्सपियर मानव-मनोभाव ज्ञान में । मानव-जाति के मनोभावो का जैसा सजीव चित्र शेक्सपियर ने चित्रण किया है वैसा ही कालिदास ने प्राकृतिक पदार्थों का चित्रण किया है। कालिदास बहि- जगत के चित्रकार या व्याख्याता थे और शेक्सपियर अतजगत के। मानवी मनोविकारों का कोई भेद शेक्सपियर से छिपा नहीं रहा । उसी तरह सृष्टि में जितने प्राकृतिक पदार्थ हैं-जितने प्राकृतिक दृश्य हैं-उनका कोई भी रहस्य कालिदास से छिपा नहीं रहा। कवित्व-शक्ति दोनो में ऊँचे दर्जे की थी, परन्तु एक की शक्ति अर्न्तजगत के रहस्यो का विश्लेषण करने की तरफ विशेष झुकी हुई थी, दूसरे की बहिर्जगत के । इस निष्कर्ष से सब लोग सहमत हो या न हो, परन्तु इन दोनो महाकवियो की रचनाओं को खूब ध्यान से पढने और उन पर विचार करने वाले इस बात से अवश्य सहमत होंगे कि कालिदास की तुलना यदि किसी महाकवि से की जा सकती है तो शेक्सपियर ही से की जा सकती है। कालिदास और भवभूति भवभूति भी नाटक रचना में सिद्धहस्त थे। करुण रस का जैसा परिपाक उनकी कविता में देखा जाता है वैसा किसी अन्य कवि की कविता मे नहीं देखा जाता। मानवी हृदय के अन्तर्गतभावो को जान लेने और उनके शब्दचित्र बना कर तद्द्वारा उन्हें सामाजिको को हृदयङ्गम करा देने की विद्या भवभूति को खूब ही 'साभ्य' थी। करूण रस का यत्र तत्र शृङ्गार और वीर का भी- भवभूति ने जहां तहाँ उत्थान किया है वहां बहा घटनाक्रम के अनुमार उस रस का धीरे धीरे तूफान सा आ गया है। कालिदास ने जिस बात को बडी खूबी के साथ थोड़े में कह दिया है उसी को भवभूति ने बेहद बढाया है। मनोभावों को बढा कर वर्णन करना कहीं अच्छा लगता है, कहीं नहीं अच्छा लगता। देश, काल, पात्र और अवस्था का खयाल रख कर प्रसगोपात विषय का आकुचन किंवा प्रसारण किया जाना चाहिए । युद्ध के लिये किसी को उत्तेजित करने के लिये वीर-रस-परिपोषक लम्बी वक्तृता असामयिक और अशोभित नहीं होती। परन्तु जो मनुष्य इष्ट-वियोग अथवा किसी कारण से व्यथित है उसके मुख से . १६ ] निकली हुई धाराप्रवाही वकृता अप्राकृतिक मालम होती है। थोड़े में अपनो व्यथाकथा कह कर त्रुप हो जाना ही व्यथा की गम्भीरता का दर्शक है। शकु- न्तला के वियोग मे दुष्यन्त ने, और मालती के वियोग में माधव ने, जो कुछ कहा है वह इस बात का प्रमाण है कि जिस बात को भवभूति बड़े बड़े इलोकों में लम्बे लम्बे समासो और बुने हुए शब्दो में, कह कर भी पाठको का उतना मनोरंजन न कर सक्ते थे, उसी को कालिदास थोड़े में इस खूबी से कह सकते ये कि दर्शको के चित्त में चुम सी जाती थी। शब्द चित्रण में भवभूति बढ़े चटे घे; मावोवोधन में कालिदास । एक उदाहरण लीजिए। भवभूति का शब्द चित्रण है- सन्तानवाहीरायदि (१) मानुपाणां, दुःखानि सद्वन्धुवियोगजानि । हप्टे जने प्रेयसि दुःसहानि, स्रोतः सहस्रखि संप्लवन्ते ।। अर्थात्-प्रेमी जन को देखने पर वन्धु-वियोग जन्य दुःख मानों हजार गुणा अधिक हो जाता है वह इतना बढ़ जाता है मानो उससे हजारों सोते फूट निकलते हैं। हमी बात को-सी भाव को-देखिए कालिदास थोड़े ही शब्दों में, पर किम वबी से कहते हैं- स्वजनस्य हि दुःखमग्रतो, विवृत द्वारमिवोपजायते । अर्थात--स्वजनों के आगे छुपे हुये दुःख को बाहर निकल आने के लिये रदय का फाटक खुल सा जाता है । इसी से कहते हैं कि भवभूति के भाव शब्द समूह के सघन वेष्टन से वेप्टित है। कालिदास के मायों का प्टन इतना बारीक और थोड़ा है कि वे उमफे मौतर मलाते हुए देख पड़ते है यदी इन दोनों नाट्यकारों की कविता की विशेषता है। कालिदास की उपमायें सुन्दर नविन और निर्दोष उपमाओं के लिये कालिदाम की 'जो इतनी मामि है पर मरंधा यथा । रिमी देश और किसी भाषा का अन्य कोई हम पिद में कालिदाम की पराबरी नहीं कर सकता। इनकी उपमाये [ १७ ] अलौकिक हैं। उनमें उपमान और उपमेय का अद्भुत सादृश्य है। जिस भाव, जिस भाषा विचार, जिस शक्ति को स्पष्टतर करने के लिये कालिदास ने उपमा का प्रयोग किया है उस उक्ति और उपमा का संयोग ऐसा बन पडा है जैसा कि दूध-बूरे का संयोग होता है । उपमा को उक्ति से अलग कर देने से वह अत्यन्त फीकी किवा नीरस हो जाती है। यह बात केवल उपमाओं ही के लिये नहीं कही जा सकती, उपमाओ के सिवा उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त और निदर्श- नालंकारो का भी प्रायः यही हाल है अन्य कवियो की उपमाओ में उपमान और उपमेय के लिग और वचन मे कहीं-कहीं विभिन्नता पाई जाती है, पर कालिदास की उपमाओं में शायद ही कहीं यह दोष हो। देखिये- (१) प्रवालशोभा इव पादपानां, शृंगार चेष्टा विविधा बभूवुः । (२) नरेन्द्रमार्गाट्टइव प्रपेदे, विवर्णभावं सस भूमिपालः । (३) समीरणोत्थेव तरंग लेखा, पद्मान्तरं मानसराजहंसीम् । (४) विभार्पि चाकारमनिवृताना, मृणालिनी हैममिवोपरागम् । (५) पर्याप्तपुष्पस्तवकावनम्रा, सचारिणी पल्लविनी लतेव । (६) नेत्रै पपुस्तृप्तिमनाप्नुवद्भिनवोदयं नाथमिवौषधीनाम् । कैसी सुन्दर उपमायें है, कैसो श्रुति-सुखद और प्रसाद गुण-पूर्ण पदावली है। किसकी प्रशंसा की जाय ! उपमा की "कोमल-कान्त पदावली" की अथवा हृदयहारिणी उक्ति की ? कालिदास की कुछ उपमायें बहुत छोटी छोटी है, अनुष्टुप् छन्द के एक चरण मे वे कही गई हैं। ऐसी उपमाओं में भी वही खूबी है जो लम्बे लम्बे श्लोका मे गुम्फित उपमाओ में है। वे छोटी छोटी उपमायें नीति, सदाचार और लोक-रीति-सम्बन्धिनी सत्यता से भरी हुई हैं। इसी से वे पंडितो के कठ का भूषण हो रही हैं। साधारण वात-चीत और लेख आदि में उनका बेहद व्यवहार होता है- (१) आदानं हि विसर्गाय सता वारिमुचा मित्र । (२) त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदढ्गुलोवोरगक्षता । (३) विषवृक्षोऽपि संवर्य स्खयं छेत्तुमसाम्प्रतम् ।

[ १८ ] (२) हमोहि क्षीरमाटते नन्मित्रा वर्जयत्यपः। (५) उपवाय लोगन धूमरेनुरिवोत्थितः । जादिनीही उपमार्य है। शान्व-नान कालिदार के काव्य और नाटक इस बात का माक्ष्य दे रहे हैं कि कालिदास यन, महावि ही न थे, कोई गात्र ऐमा न था जिसमें उनकी गति न हो। असमान्य वयारण थे। अलंकार-शास्त्र के वे पारगामी पंटित थे। सस्कृत- मारा पर उनी निमीम सत्ता थी। जो वान वे कहना चाहते थे उसे कविता आग पर करने के लिये मयमे अधिक मुन्दर और भाव-व्यजक शब्दों के समूह उनी जिहा पर नृत्य ना करने लगते थे। कालिदास की कविता में शायद ही गद न हो जो अमुन्दर और अनुपयोगी अयया भावोवेधन में असमर्थ नाम वदान्न के वे जाता थे, सांत्य, न्याय और योग के ज्ञाता थे, यानिशाना ये, पदार्थ-विज्ञान में जाना थे। कोकाचार, राजनीति, नानि आदि में भी उनसी अमामान्य गति थी। प्रकृति-परिनान के को ५६ ला पंटिन थे। प्रहति की मारी करामाते, उसके सारे कार्य, उनकी प्रतिमा मुकुर में प्रतिविम्यिन होकर, उन्हें इस तरह टेस पडते ये जिम तरह ीि पर रवाना हुआ मामला देग्न पडता है। वे उन्हें हस्तामलक हो रहे । उनी परमना में प्रमाण उनकी उक्तियों और उपमाओं में, जगह जगह पर मर रहे है। कान-नालों का ज्ञान : गगरिदार की रचना मे यद्यपि यह मूचित होता है या किसी और उनकी प्राति अधिक थी, तथापि में दान की ही तरह जानते थे। ईश्वर 1.1, R. HERE र परमात्मा के मायन्य को वे बसा ही 7 १ मे - १५ दिने पांग में माना है। इंसर की मध्यापरता "मामा पहना ही लोक-“य मटि. - [ १६ ] स्रष्टुराद्या"-इस बात का साक्षी है। उसमें उन्होंने यह बात स्पष्टता-पूर्वक स्वीकार की है कि ईश्वर की सत्ता सर्वत्र विद्यमान है। परमात्मा की अनन्तता का प्रमाण इस श्लोक में है- ता तामवस्था प्रतिपद्यमानं स्थितं दशव्याप्य दिशो महिम्ना । विष्णोरिवास्यानवधारणीयमीहत्तया रूपमियत्तया वा ॥ पुनर्जन्म अथवा आत्मा की अविनश्वरता का प्रमाण रघुवंश के निम्नोद्धृत पद्यार्थ में पाया जाता है-. मरणं प्रकृतिः शरीरिणा विकृतिर्जीवनमुच्यते बुधैः । कालिदास की योग-शास्त्र-सम्बन्विनी विज्ञता उनकी इस उक्ति से स्पष्ट है- तमसः परमापदव्ययं पुरुषं योगसमाधिना रघुः । माया का आवरण हट जाने और संचित कर्म क्षीणता को प्राप्त हो जाने से आत्मा का योग परमात्मा से हो जाता है। यह वेदान्त तत्व है। इसे कालि- यह बात भो उनकी पूर्वोक्त उक्ति से सिद्ध है। वेदान्तियों का सिद्धान्त है कि कर्मों या संस्कारो का बीज नष्ट नहीं होता। कालिदास ने- (१) प्रपेदिरे प्राक्तन जन्म विद्याः । और (२) भावस्थिराणि जननान्तर सौहृदानि । कह कर इस सिद्धान्त को भी स्वीकार किया है। सांख्य शास्त्र-सम्बन्विनी उनकी अभिज्ञता के दर्शक एक इलोक का अवतरण किसी पिछले लेख मे पहले ही दिया जा चुका है। दास जानते थे। ज्योतिष का ज्ञान इसमे तो कुछ भी सन्देह नहीं कि कालिदास ज्योतिष शास्त्र के पण्डित थे। इस बात के कितने ही प्रमाण उनके ग्रन्थों में पाये जाते हैं। उज्जयिनी बहुन काल तक ज्योतिर्विद्या का केन्द्र थी। जिस समय शास्त्र की वडी ही ऊज्जिता- वस्था थी उसी समय, अथवा उसके कुछ काल आगे पीछे, कालिदास का प्रादुर्भाव [ २० सतएव ज्योनिप से उनका परिचय होना बहुत ही स्वाभाविक या-- (1) दृष्टिप्रशात परिहल नन्य आम पुर शुक्रमित्रप्रयाणे । (२) प्रोन पंचामत्यमस्त्राय मुहत्तं किल तस्य देवी । (:) मंत्र मुहतं गगलानन योग गतामूत्तरफ गुनी । (1) दिमन्तियागि चित्राव मोरिव । (-) निधी च जामित्रगुणान्वितायाम् । दयादि नगी मिलनी ही उनिया कालिदान के ग्रन्या में विदामान है जो उनी मनिष- माता के भी नष्ट न होने वाले सार्टिफिकेट ह। बदा-विद्या से परिचय गरिनाम चाहे अनुभवमाटी वैद्य न रहे हो चाहे उन्होंने आयुर्वेद का 14 अन्याम न यिा हो परन्तु इम शास्त्र ने भी उनका थोडा बहुत ५. निदया। और सभी नववियों का परिचय प्रधान प्रधान शास्त्री से * ही दाना चाहिये। बिना मांगामा -यिना प्रधान प्रधान शाम्रो का को जान पात स्किषियों की सविता भर्वमान्य नहीं हो सकी। मह मिनी मरद के जान की बटी ही गावश्यकता होती है। fa नीमकदा है बहुत ठीक रहा है। वद्य-विटा क तत्वों 12. Fi। एमार सम्भव रे दमरे मग में नारक के दारात्म्य ; 714। उस प्रमग में कालिदाम ने लिखा है- नम्मिन्नुपाया. मन करे प्रनिहनक्रियाः । वाग्यन्यारवानीव विकार मान्निपातक ।। - - .in विनि विषय में कवियुल गुरु श्री सामाया तम्याग्नमोक्षणम न मात्राणाप्या. प्रनिषत्तय. ।। १. दाम दाम दाम में भी गति . 1 १ - " ।

[ २१ ] पदार्थ-विज्ञान से परिचय - ~ ग्रहण के यथार्थ कारण को कालिदास अन्छी तरह जानते थे। इस बात को उन्होने अपने काव्यो में निःसन्देह रीति से लिखा है। कुमार-सम्भव के- हरस्तु किञ्जित्प्रविलुप्तधैर्य्य (श्चन्द्रो ) दयारम्भ इवाम्बुराशिः। इस श्लोक से सूचित होता है कि समुद्र में ज्वार भाटा आने का प्राकृतिक कारण भी उन्हें अच्छी तरह मालूम था। ध्रुव प्रदेश मे दीर्घकाल तक रहने चाले उषः काल का भी ज्ञान उन्हें था। उन्होने लिखा है- मेरोरूपान्तेष्विव वर्तमानमन्योन्यसंसक्त महस्त्रियामम् । उनके उष काल-सम्बन्धी ज्ञान का यह दृढ प्रमाण है। सूर्य की उष्णता से पानी भाफ बन कर उड जाता है। वही बरसता है। इस बात को भी वे जानते थे। कुम्मार सम्भव का चौथा सर्ग इस बात की गवाही दे रहा है- रविपीतजला तपात्यये पुनरोधेन हि युज्यते नदी । रघुवंश के- सहस्र गुणमुत्सृष्टुमादत्त हि रसं रविः । इस पद्यार्द्ध से भी यही बात सिद्ध होती है। "अयस्कान्तेन लोइवत्”—लिख कर उन्होंने यह सूचना दी है कि हम चुम्बक के गुणो से भी अनभिज्ञ नहीं। . राजनीति-ज्ञान इस विषय में तो कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं। रघुवंश मे राजो ही का वर्णन है। उसमे ऐसी सैकड़ो उक्तियो है जो इस बात की घोषणा कर रही हैं कि कालिदास बहुत बड़े राजनीतिज्ञ थे। राजा किसे कहते हैं, उसका सबसे प्रधान धर्म या कर्तव्य क्या है, प्रजा के साथ उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए-इन बातो को कालिदास जैसा समझते थे वेसा शायद आजकल के बढ़े से भी बड़े राजा और राजनीति निपुण अधिकारी न समझते होंगे। कालिदास [ २२ ] की-"मा पिता पितरम्नामा केवलं जन्महेतव"-सिर्फ यही एक उक्ति इस कथन के ममर्थन के लिये यथेष्ट है। भूगोल-ज्ञान मेघदन में कालिदाम ने जो अनेक देशों, नगरी, पर्वतों और नदियों का वर्णन किया है उसमे जान पडता है कि उन्हें भारत का भौगोलिक ज्ञान भी बहुन अच्छा था। उन्होंने अनेक देग-दर्शन करके-दूर दूर की यात्रा करके- यह ज्ञान प्राप्त किया होगा। चोल, करल और पाण्ड्य देश का उन्होने जैसा वर्णन किया ह; विन्ध्य-गिरि, हिमालय और कादमीर के विषय में उन्होंने जो कुछ लिखा है, रघुवंग के तेरहवें सर्ग में भारतीय समुद्र के सम्बन्ध में जो उक्तियां उन्नान कहीं है, उन्हें पढते समय जान पडता है, जैसे कोई इन सब का आँखों देवा हाल लिख रहा हो। उनके इन वर्णनो मे बहुत ही कम भौगोलिक भ्रम है , अतएव यही कहना पड़ता है कि कालिदास ने भारत में दूर दूर तक भ्रमण करके अनेक प्रकार के भौगोलिक दृश्यो का परिज्ञान प्राप्त किया था । सिनम्बर १९११ । कालिदाम के मेघदृत का रहस्य 1 कविता-कामिनी के कमनीय नगर में कालिदाम का मेघदूत एक ऐसे भव्य मयन के महा है जिनमें पद्य रूपी अनमोल रन जड़े हुए है.---एसे रत्न, जिनका गाल ताजमहाल में लगे हुए रसों मे मी कहीं अधिक है। ईट और पत्थर की इमारत पर जाम-वृष्टि का असर पड़ता है, आंधी तूफान से उसे हानि पहुँचती है, विज गिरने मे यह नष्ट-भ्रष्ट मी हो मम्नी है। पर इम अली क्कि भवन पर रन में मिमी या पुद भी जोर नहीं चलना । न यह गिर सकती है न घिस एक न टमका कोई अंग टूट ही सकता है। फाल पार और हमारत होकर भूमिमान हो जाती है, पर यह अद्भुत मयन न कभी जीर्ण होगा न भारपा पंग ही होगा। प्रत्युन इमकी रमणीयना वृद्धि ही की भागा है। सभी पर मगने ६ मीर अमर भी। 3,241 पनि गर र कर्मचारी पक्ष ने पुछ अपराध किया। उसे [ २३ ] कुवेर ने, एक वर्ष तक, अपनी प्रियतमा पत्नी से दूर जाकर रहने का दण्ड दिया । यक्ष ने इस दण्ड को चुपचाप स्वीकार कर लिया। अलका छोड़ कर वह मध्य प्रदेश के रामगिरि नामक पर्वत पर आया। वहीं उसने एक वर्ष बिताने का निश्चय किया। आषाढ़ का महीना आने पर बादल आकाश में छा गये। उन्हे देख कर यक्ष का पत्नी-वियोग-दुःख दूना हो गया। वह अपने को भूल सा गया। इसी दशा मे उस विरही यक्ष ने मेघ की दूत कल्पना करके, अपनी वार्ता अपनी पत्नी के पास पहुंचानी चाही। पहले कुछ थोड़ी सी भूमिका बांध कर उसने मेघ से अलका जाने का मार्ग बताया, फिर संदेश कहा। कालिदास ने मेघदूत में इन्हीं बातो का वर्णन किया है। मेघदूत की कविता सर्वोत्तम कविता का एक बहुत ही अच्छा नमूना है। उसे वही अच्छी तरह समझ सकता है जो स्वयं कवि है। कवितो करने से ही कवि-पदवी नहीं मिलती। कवि के हृदय को-कवि के काव्य-मर्म को-जो जान सकते हैं वे भी एक प्रकार के कवि हैं। किसी कवि के कार्य में आकलन करने वाले का हृदय यदि कहीं कवि ही के हृदय सदृश हुआ तो फिर कहना ही इस दशा मे आकलनकर्ता को वही आनन्द मिलेगा जो कवि को उस कविता के निर्माण करने से मिला होगा। जिस कविता से जितना ही अधिक आनन्द मिले उसे उतनी ही अधिक ऊचे दरजे की समझना चाहिए। इसी तरह, जिस कवि या समालोचक को किसी काव्य के पाठ या रसास्वादन से जितना ही अधिक आनन्द मिले उसे उतना ही अधिक उस कविता का मर्म जानने वाला समझना चाहिए। इन बातो को ध्यान में रख कर, आइए, देखें, कालिदास ने इस काव्य में क्या क्या करामाते दिखाई हैं । पर इससे कहीं यह न समझ लीजिएगा कि हम कवि या समालोचक होने का दावा करते हैं। हम् तो ऐसे महानुभावो के चरणो की रज भी नहीं । तथापि- नमः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः । इस कविता का विषय-यहा तक कि इसका नाम भी-कालिदास के परवर्ती कवियो को इतना पसन्द आया है कि इसकी छाया पर हंसदत, पदाकदृत, पवन- दूत, और कोकिलद्भुत आदि कितने ही दूत काव्य बन गये हैं। यह इस काव्य की लोक-प्रियता का प्रमाण है। क्या है।

- [ २४ 7 कालिदास को इस काव्य के निर्माण करने का बीज कहा से मिला 2 इसका उत्तर "इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखीसा” इत्यादि इसी काव्य मे है। "इतनो कहत तोहिं मम प्यारी । जिमि हनुमत को जनक-दुलारी ॥ सीस उठाय निरखि धन लहै। प्रफुलित - चित है आदर देहे ॥" यक्ष की तरह रामचन्द्र को भी वियोग-व्यथा सहनी पड़ी थी। उन्होंने पवनसुत हनुमान को अपना दूत बनाया था। यक्ष ने मेघ को दूत बनाया। मेघ का साथी पचन है, हनुमान की उत्पत्ति पवन से है। अतएव दोनो में पारम्परिक सम्बन्ध भी हुथा। यह सम्बन्ध काकतालीय-सम्बन्ध हो सकता है। परन्तु मैथिली के पास रामचन्द्र का सदेश भेजना वसा सम्बन्ध नहीं। बहुत सम्भव है, कालिदास को इसी सन्देश-स्मृति ने प्रेरित करके उनसे इस काव्य की रचना कराई हो, बहुत सम्भव है, यह मेघ-सन्देश कालिदाम ही का आत्म- सन्देग हो। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि कालिदास की जन्मभूमि काश्मीर है। वे बाराविप विक्रम के सभा-रत्न थे। यदि यह बात सत्य हो तो काठमीर से वारा के मार्ग में जो नदिया, नगर, पर्वत और देश आदि पडते हैं उनसे कालिदास का बहुत अच्छा परिचय रहा होगा। धारा और काश्मीर के आसपास के प्रदेश, नगर और पर्वत आदि भी उन्होने अवश्य देखे होगे। मेघ को बतलाये गये मार्ग में विगंप करके इन्हीं का वर्णन है और यह वर्णन बहुत ही मनोहर और प्राय. अतएव कोई आश्चर्य नही जो काश्मीर ही कालिदास की जन्मभूमि हो और जिन वस्तुओं और स्थलो का उन्होने इस काव्य में वर्णन किया है उनको उन्होंने प्रत्यक्ष देखा हो। यथार्य है। कवियों की यह सम्मति हे कि विषय के अनुकूल छन्दोयोजना करने से वर्ण्य विषय में सविता सी आ जाती है । वह विशेष खुलता है। उसकी मरलता, और महृदयां को आनन्दित करने की शक्ति, वह जाती है। इस काव्य में -2 गार और करुण-रस के मिश्रण की अधिकता है। यक्ष का सन्देश कारुणिक उनियों ने भरा हुआ है। जो मनुष्य कारुणिक आलाप करता है। या जो [ २५ ] । प्रेमोक के कारण अपने प्रेम-पात्र से मीठी मीठी बातें करता है, वह न तो सांप के सदृश टेढी-मेढ़ी चाल चलता है, न रथ के सदृश दौडता ही है। अतएव उसकी बातें भुजंगप्रयात या रथोद्धता या और ऐसे ही किसी वृत्त में अच्छी नही लगती। वह तो ठहर ठहर कर, कभी धीरे और कभी कुछ उंचे स्वर में, अपने मन के भाव प्रकट करता है। यही जानकर कालिदास ने मन्दाक्रान्ता वृत्त का उपयोग इस काव्य में किया है। और यही जानकर, उनकी देखा-देखी, औरों ने भी, दूत-काव्यों में, इसी वृत्त से काम लिया है। कवि यदि अपने मन के भाव ऐसे शब्दो में कहे जिनका मतलब, सुनने के साथ ही, सुनने वाले की समझ में आ जाय तो ऐसा काव्य प्रसाद-गुण से पूर्ण कहा जाता है। जिस तरह पके हुए अंगूर का रस बाहर से झलकता है उसी तरह प्रसाद गुण-~परिप्लुत कविता का भावार्थ शब्दो के भीतर से झलकता है। उसके हृदयङ्गम होने में देर नहीं लगती। अतएव, जिस काव्य मे करुणाई- सन्देश और प्रेमातिशय-द्योतक बातें हो उसमे प्रसाद-गुण की कितनी आवश्यकता है, यह सहृदय जनों को बताना न पड़ेगा। प्यार की बात यदि कहते ही समझ मे न आ गई-कारुणिक सन्देश यदि कानों की राह से तत्काल ही हृदय में न घुस गया तो उसे एक प्रकार निष्फल ही समझिए । प्रेमालाप के समय कोई कोष लेकर नहीं बैठना। करुणा-क्रन्दन करने वाले अपनी उक्तियो में 'वनि, व्यग्य और क्लिष्टता नहीं लाने बैठते। वे तो सीधी तरह, सरल शब्दो मे, अपने जी की बात कहते हैं। यही समझ कर महाकवि कालिदास ने मेघदूत को प्रसाद- गुण से ओत-प्रोत भर दिया है। यही सोच कर उन्होने इस काव्य की रचना वैदर्भी रीति में की है-चुन चुन कर सरल और कोमल शब्द रखे हैं, लम्बे लम्बे समासो को पास तक नहीं फटकने दिया। देवताओं, दानवों और मानवो को छोड कर कविकुल-गुरु ने इस काव्य में एक यक्ष को नायक बनाया है, इसका कारण है। यक्षो के राजा कुबेर हैं। वे धनाधिप हैं। ऋद्धियां और सिद्धियां उनकी दासियां हैं। धन ही की बदौलन प्राप्त होते हैं। जिनके पास धन ही नहीं वे इन्द्रियजन्य सुखो का यथेष्ट अनुभव नहीं कर सकते। कुवेर के अनुचर, कर्मचारी और पदा- धिकारी सब यक्ष ही हैं। अतएव कुबेर के ऐश्वर्य का योड़ा भाग उन्हे भी सासारिक सुख, उस [ २६ ] अवश्य ही प्राप्त होता है। इससे जिस यक्ष का वर्णन मेघदुत मे है उसके ऐश्वर्यवान और वैभव-सम्पन्न होने में कुछ भी सन्देह नहीं। उसके घर और पत्नी आदि के वर्णन में यह बात अच्छी तरह सावित होती है। निर्धन होने पर भी प्रेमी जनो में पति-पत्नी-सम्बन्धी प्रेम की मात्रा कम नहीं होती। फिर जो जन्म हो से धन-सम्पन्न है-जिसने लडकपन ही से नाना प्रकार के सुख भोग किये हैं-उसे पत्नी वियोग होने से कितना दुःख, कितनी हृदय व्यया, कितना शोक-सन्ताप हो सकता है, इसका अनुमान करना कठिन नहीं। ऐसा प्रेमी यदि दो-चार दिन के लिये नही, किन्तु पूरे साल भर के लिये, अपनी प्रेयसी से सकडो कोस दूर फेंक दिया जाय तो उसकी विरह-व्याकुलता की मात्रा बहुत ही बढ जायगी, इसमें कोई सन्देह नहीं। ऐसे प्रेमी का वियोग-ताप वर्षा मे और भी अधिक भीषणता धारण करता है। उस समय इस बात का निश्चय किया जा सकता है कि इस प्रेमी का प्रेम कैसा है और वह अपनी प्रेयसी को कितना चाहता है। कालिदास ने इस काव्य मे आदर्श प्रेम का चित्र खीचा है। चित्र की सविशेष हृदयग्राही यथार्थना व्यंजक करने के लिये यक्ष को नायक बना कर कालिदास ने अपने कवि-कौशल की पराकाष्ठा कर दी है। अतएव आप यह न समझ लीजिए कि कवि ने यो ही, बिना किसी कारण के, विप्रयोग- शृगार वर्णन करने के लिये, यक्ष का आश्रय लिया है। विषय वासनाओं की तृप्ति के लिये ही जिस प्रेम की उत्पत्ति होती है वह नीच प्रेम है। वह निन्ध और दूपित समझा जाता है। नित्यज प्रेम अवान्तर वाता की कुछ भी परवा नहीं करता। प्रेम-पथ में प्रयाण करते समय आई हुई वाधाभो को वह कुछ नहीं समझता। विनो को देख कर वह मुस्करा देता है । क्योंकि इन सब को उसके सामने हार माननी पड़ती है। मेघदूत का प्रेमी नित्यज प्रेमी है। उसका हृदय बडा ही उदार है। उसमें प्रेम की मात्रा इतनी अधिक है कि ईर्ष्या, द्वप क्रोब, हिमा आदि विकारो के लिये जगह ही नहीं। यक्ष को उसके स्वामी कुबेर ने निकाल दिया परन्तु उसने उसके कारण, अपने स्सामी पर जरा भी क्रोध प्रकट नहीं किया । उसको एक भी बुरे और कड़े शब्द से याद नहीं किया। उसको सारी विप्रयोग-पीडा का कारण कुवेर था । उमी निन्दा करने का ठमे खयाल तक नहीं हुआ। फिर, देखिए, उसने अपनी पर -- [ २७ ] विकार रह मूर्खता पर भी आक्रोश-विक्रोश नहीं किया। यदि वह अपने काम में असाव- धानता न करता तो क्यों वह अपनी पत्नी से वियुक्त कर दिया जाता। अपने सारे दु ख शोक का आदि कारण वह खुद ही था । परन्तु उसको इसका भी खयाल नहीं। उसने अपने को भी नहीं धिक्कारा । वह धिक्कारता कैसे ? उसके हृदय में इस प्रकार के भावो के लिये जगह ही न थी। उसका हृदय तो अपनी प्रेयसी के नित्यज प्रेम से ऊपर तक लबालब भरा हुआ था। वहा पर दूसरे कैसे सकते थे ? जो ऐसे सच्चे प्रेम-मद से मत्त हो रहा है, जिसकी सारी इन्द्रिया अन्यान्य विषयो से खिंच कर एक मात्र प्रेम-रस मे सर्वतोभाव से डूब रही हैं, जिसके प्रेम- परिपूर्ण हृदय में और कोई सांसारिक भावनायें या वासनायें आने का साहस तक नहीं कर सकतीं, वह यदि अचेतन मेघ को दृत बनावे तो आश्चर्य ही क्या है जो मत्त है और जो संसार की प्रत्येक वस्तु में अपने प्रेम-पात्र को देख रहा है उसे यदि जड-चेतन का भेद मालूम रहे तो फिर उसके प्रेम की उच्चता कैसे स्थिर रह सकती है ? वह प्रेम ही क्या जो इस तरह के भेद-भाव को दूर न कर दे। कीट-योनि में उत्पन्न पतंगों के लिये दीप शिखा की ज्वाला अपने प्राक्रित दाहक गुण से रहित मालूम होती है। महा-प्रेमी यक्ष को यदि मेघ की अचेतनता का खयाल न रहे तो इसमें कुछ भी अस्वाभाविकता नहीं। फिर, क्या यक्ष यह न जानता था कि मेघ क्या चीज है ? यह मेघदूत के आरम्भ ही मे कहता है- "घाम धूम नीर औ समीर मिले पाइ रहे ऐसो धन कैसे दृत काज भुगतावेगो । नेह को सदेसो हाथ चातुर पठैबो जोग बादर कहो जी ताहि कैसे को सुनावे गो।। बाढी उत्कण्ठा जक्ष बुद्धि विसरानी सब 2 . वाही सों निहास्यो जानि काज करि आवेगो। कामातुर होत हैं सदाई मति हीन तिन्हे चेत और अचेत माहि भेद कहां पावेगो ॥" उस समय यक्ष को केवल अपनी प्रेयसी का खयाल या। वही उसके तन - [ २८ ] परन्तु यदि कवि और मन में बमी हुई थी। अन्य सांसारिक जान उसके चित्त से एकदम तिरो- हित हो गया था। वह एक प्रकार की समाधि मे निमन था। इस समाधिस्थ अवस्था में यदि उसने निर्जीव मेघ की दूत कल्पना किया तो कोई ऐसी बात नही की जो समझ में न आ सके । कवि का काम वैज्ञानिक के काम से भिन्न है। वैज्ञानिक प्रत्येक पदार्थ को उसके यथार्थ रूप में देखता है। ऐसा करे तो उसकी कविता का सौन्दर्य प्रायः सारा विनष्ट हो जाय। कवि को आविष्कर्ता या कल्पक न समझना चाहिए। उसकी सृष्टि ही दूसरी है। वह निर्जीव को सजीव और सजीव को निर्जीव कर सकता है । अतएव मध्य-भारत से हिमालय की तरफ जाने वाले पवन-प्रेरित मेघ को सन्देश-वाहक बनाना जरा भी अनौचित्य-दर्शक नही । फिर, एक बात और भी है। कवि का यह आगय नहीं कि मेघ सचमुच ही यक्ष का सन्देश ले जाय। उसने इस बहाने विप्रयुक्त यक्ष की अवस्था का वर्णन मात्र किया है और उसके द्वारा यह दिखाया है कि इस तरह के सच्चे वियोगी प्रेमियो के हृदय की क्या दशा होती है, उन्हे कैसी कैसी बातें सूझती हैं, और उन्हें अपने प्रेम पात्र तक अपना कुशलवृत्त पहु- चाने की कितनी उत्कंठा होती है। भेजा था। यक्ष को अपने मरने-जीने का कुछ खयाल न था । खयाल उसे था केवल . अपनी प्रियतमा के जीवन का। "दयिता जीवितालम्वनार्थम्”-ही उसने सन्देश उसकी दयिता का जीवन उसके जीवन पर अवलम्वित था। उसके मरने अथवा जीवित होने में सन्देह उत्पन्न होने से उसकी दयिता जीती न रह सकती थी। अतएव यक्ष का सन्देश उसकी यक्षिणी को जीती रखने की रामबाण औषधि थी। यह औषधि वह जिसके द्वारा पहुचाना चाहता था, उसके सुख-दुख का भी उसे बहुत खयाल या इसी से उसने मेघ के लिये ऐसा मार्ग बतलाया जिससे जाने में जरा भी कष्ट न हो। उसके मार्ग श्रम का परिहार होता रहे, अच्छे अच्छे दृश्य भी उसे देखने को मिले, देवताओं और तीर्थी के दर्शन भी हो। ऐसा न होने से मेघ भी क्यो उसका सन्देश पहुचाने में राज़ी होता ? फिर एक बात और भी है। विरड-कातर यक्ष का सन्देश उसकी यतया तक पहुचा कर उसे जीवनदान देना कुछ क्म पुण्य का काम नहीं । ममार में परोपकार की बडी महिमा है। उसे करने का मौका भी मेघ को मिल [ २६ ] रहा है। सावन- फिर भला क्यों न वह यक्ष का सन्देश ले जाने के लिये राजी होता ? रामगिरि से अलका तक जाने में विदिशा, उज्जयिनी, अवन्ती, कनखल, रेवा, सिप्रा, भागीरथी, कैलास आदि नगरों, नदियो और पर्वतों के रमणीय दृश्यों का वर्णन कालिदास ने किया है। उन्हें देखने की किसे उत्कंठा न होती ? कौन ऐसा जीव हृदय-हीन होगा जो उज्जयिनी महाकाल के और कैलास मे शकर-पार्वती के दर्शनो से अपनी आत्मा को पावन करने की इच्छा न रखे १ कौन ऐसा आत्म-शत्रु होगा जो जंगल में लगी हुई आग को जल की धारा से शान्त करके चमरी आदि पशुओं को जल जाने से बचाने का पुण्य सचय करना न चाहे ? मार्ग रमणीय, देवताओं और तीर्थों के दर्शन, परोपकार करने के ये सब ऐसी बातें हैं जिसके लिये मूढ से मूढ मनुष्य भी थोडा बहुत कष्ट खुशी से उठा सकता है। मेघ की आत्मा तो आई होती है, सन्तप्तो को सुखी करना उसका विरुद है। अतएव वह यक्ष का सन्देश प्रसन्नता पूर्वक पहुंचाने को तैयार हो जायगा, इसमे सन्देह ही क्या। अपनी प्रियतमा को जीवित रखने में सहायता देनेवाले मेघ के लिए यक्ष ने जो एसा श्रमहारक और सुखद मार्ग बतलाया है यह उसके हृदय के औदार्य कर दर्शक है। कालिदास ने इस विषय में जो कवि-कौशल दिखाया है उसकी प्रशसा नहीं हो सकती। यदि मेघ का मार्ग सुखकर न होता-और, याद रखना चाहिए, उसे बहुत दूर जाना था-तो कौन आश्चर्य था कि वह अपने गन्तव्य स्थान तक न पहुंचता। और, इस दशा मे, यक्षिणी की क्या गति होती, इसका अनुमान पाठक स्वयं ही कर सकते हैं। इसी दुःखद दुर्घटना को टालने के लिये ऐसे अच्छे मार्ग की कल्पना कवि ने की है। वर्श आप कहेंगे, यह नित्यज प्रेम कैसा कि यक्ष ने, सन्देश मे, अपनी वियो- नी पत्नी का कुशल-समाचार तो पीछे पूछा, पहले अपने ही को “अव्यापन्न." क- कर अपना कुशल वृत बतलाने और अपनो हो वियाग व्यथा का वर्णन काम लगा। इससे तो यही सूचित होता है कि उसे अपने सुख दुःख का अधिक खयाल था, यक्षिणी के सुख दु ख का बहुत ही कम । नहीं, ऐसा न कहिए । यक्ष का यह काम उलटा आपके इस अनुमान का खंडन करता है। आप इस बात को - [ १० ] है। भूल गये हैं कि यक्षिणी का जीवन यक्ष के जीवन पर ही अवलम्बित है। उसमें संगय उत्पन्न होने से वह जीवित नहीं रह सकती। मेघदन को पढ कर यदि इतना भी न जाना तो कुछ न जाना। यक्षिणी के प्राणावलम्बन का हेतु यक्ष अतएव उसी के कुशल-समाचार सुनने से यक्षिणी अपना जीवन धारण करने में समर्थ हो सकती है। यक्ष को स्वार्थी न समझिए। वह अपनी दशा का वर्णन करके अपनी स्वार्थपरता नहीं प्रकट करता, वह अपनी दयिता के जीवन को नष्ट होने से बचाने की दवा कर रहा है । यक्ष के सन्देश की पहली पंक्ति है- । "भर्तुमित्रं प्रियमविधवे विद्धि मामम्बुवाहम्” । आप देखिए, इसमे यक्ष ने “भर्त.” पद रख कर पुर्वोक्त आशय को कितनी स्पष्टता से प्रकट किया है। जान-बूझ कर उसने सन्देश के आदि ही में पति- शब्द का वाचक भर्तृ-शब्द इसी लिये रखा है जिसमें यक्षिणी को तत्काल इस बात का ज्ञान हो जाय कि मेरा पति जीवित है। वियोगिनी पतिव्रताओं के कान में यह शब्द जैसी अमृत वर्षा करता है उसका अन्दाजा सभी सहृदय कर मत हैं। कवि यदि चाहता तो ‘भर्तुमित्रं' की जगह 'मित्र भर्तुः' कर सकता था। उससे भी छन्द की गति में व्याघात न माता । परन्तु नहीं, उसने यक्षिणी के कान में सबसे पहले ‘भर्तु ।' का सुनाना ही उचित समझा। पूर्वाक्त पंक्ति में ‘भर्तु' का समकक्ष और अर्थ-विशेष से भरा हुआ 'अविधव' पद भी है। सन्देश की पहली पंक्ति मे इसके रखने का भी कारण है। यक्ष ने इमके द्वारा अपनी सहवर्मचारिणी को यह सूचित किया है कि तू विधवा नहीं हो गई-सौभाग्यवती बनी हुई है, तेरा स्वामी अव तक जीता है। इससे औ' आनन्ददायक समाचार स्त्री के लिये क्या हो सकता है ? यक्ष का उसकी प। के लिये सचमुच ही 'श्रोत्रपेय' है। स्त्रिया नहीं चाहती कि उनके पति के प्रेम का छोटे से छोटा अंश भी कोई और ले जाय । वे उनके सर्वा श पर अपना अधिकार समझती है। वियोगा- वग्या में उन्हें अपने इस अधिकार छिन जाने का टर रहता है। यक्ष इस बान को अच्छी तरह जानता है। इसके परिणाम से भी वह अनभिज्ञ नहीं। यही - [ ३१ ] वह अपने यक्ष कारण है जो वह अपनी वियोग-कातरता का कारुणिक वर्णन कर रहा है। यही कारण है जो वह छोटी छोटी चोजो में भी अपनी पत्नी की सदृश्यता ढूढ रहा है । यही कारण है कि उत्तर-दिशा से आये हुए सुरभित पवन के स्पर्श को भी बहुत कुछ समझ रहा है। वह यह बतला रहा है कि दूर हो जाने से मेरे प्रेम में कमी नही हो गई; प्रत्युत वह पहले से भा अधिक प्रगाढ हो गया है। अतएव तू अपने मन में किसी प्रकार की अनुचित आशंका को स्थान न दे। यक्ष के निःस्वार्थ और नित्यज प्रेम की सीमा नहीं निर्धारित की जा सकती। कुशल-समाचार भेज कर और अपनी विरह-व्याकुलता का वर्णन करके ही चुप नहीं रहा। उसे शंका हुई कि कहीं मेरी पत्नी इस सन्देश को बनावटी न समझे। प्रेमियों की दशा बडी ही विचित्र होती है। वे न कुछ को बहुत कुछ समझने लगते हैं और हवा में गाठे लगाना भी वे खूब ही जानते हैं । की अजीब ही अवस्था है। उसे डर है कि कहीं ऐसा न हो कि इतना आश्वा- सन देने पर भी यक्षिणी इन बातो पर पूर्ण विश्वास न करे । अतएव इस संदेह का भजन करना भी उसने आवश्यक समझा। इसी लिये उसे सन्देश में यह कहना पड़ा- "और कहूं सुनि एक दिना हियरा लगि मेरे तू सोई रही आवत नींद न बेर भई जगि औचक रोय उठी तब ही । पूछी जु मैं धन बारहिबार तो ते मुसकाइ एसे कहीं देखति ही सपने छलिया तुमने एक सौत की बाह गही ॥" अब सन्देह करने का कोई कारण नही, यक्ष के जीवित होने का इससे अधिक विश्वसनीय समाचार और क्या हो सकता ? मेघदूत के यक्ष का प्रेम पत्नी-सम्बन्धी है। वह ऊंचे दरजे का है। वह नि स्वार्थ है-निर्दोष है। यक्ष अपने और पत्नी प्रेयसी के जीवन को अन्योन्याश्रित समझता है। यक्ष जिस तरह सन्देश भेज कर पत्नी की प्राण-रक्षा करना चाहता है उसी तरह, बहुत सम्भव है, उसकी पत्नी भी वियुक्त होने के कारण पति की प्राण वारणा के विषय में सशंक रही होगी, प्रेम से जीवन पवित्र हो सकता है, प्रेम से जीवन को अलौकिक सौन्दर्य प्राप्त हो सकता है, प्रेम से जीवन --

[ ३२ ]
मार्थक हो सकता है। मनुष्य-प्रेम से ईश्वर-मम्बन्धी प्रेम की उत्पत्ति हो सकती
है-इसके कितने ही उदाहरण इस देश में पाये जाते हैं। गोपियों के प्रेम को
आप लौविक न समभिए । वह सर्वया अलौकिका था।
अन्यया--
नो चेयं विरहजाग्न्युपयुक्त देहा ।
व्यानन याम पदयोः पदवीं सखे ते ।।
उनके
मुख
से कमी न निकलना। अतएव प्रेम की महिमा अकथनीय है।
जिसने उमे कुछ भी जाना है वह कालिदास के मेघदूत के रहस्य को भी जान
सकेगा।
परन्तु, जो लोग उस रास्ते नहीं गये उनके मनोरंजन और आनन्दोत्पादन की
भी मामी मंघदूत में है। उसमें आपको चित्रकूट के ऊपर बने हुए एमे कुज देखने
को मिलेग जिनमें वनचरा की स्त्रिया विहार किया करती है। पर्वतो के एसे.
दृट्य आप दबंग जिन्हें वर्षा ऋतु मे केवल वही लोग दस्त सकते हैं जो पर्वतवासी
है या जो विशेष करके इमी निमित पर्वना पर जाते है। दगार्ण की केतकी
कभी आपने देखी है ? विदिशा की वेगवनी की लहरों का त्रु-मंग कभी आपने
अवलोकन क्रिया है? उस प्रान्त के उपवनों में चमेली की कलियो को चुनने
बाली पुष्पावलिया मे आपका कभी परिचय हया है ? नहीं, तो आप मेघदूत
पहिए
उञ्चन की यदि आप सर करना चाहते है, उदयन का यदि आप
श्रीनिंगान मुनना चाहें, तो आप और कही न जाइए।
थाप मिर्फ मेघ
पहिए। प्राचीन दगपुर, प्राचीन ब्रह्मवर्त, प्राचीन कनरवल, प्राचीन कैलास,
प्राचीन अलका के दर्शन यत्र दुर्लभ है। तथापि उनकी छाया मेघदूत में है।
पाठक ! आपने इनको न देखा हो तो मेघदुत मे टेखिए ।
अगस्त १९११
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

- कालिदास का काव्य-वैभव और मेघदूत सेठ कन्हैया लाल पोद्दार - संस्कृत साहित्य में मेघदूत आबाल-वृद्ध प्रसिद्ध है। मेघदूत दो भागों में विभक्त है, पूर्व मेघ और उत्तर मेघ । पूर्व मेघ मे अलकाधीश कुवेर ने अपने एक यक्ष द्वारा कुछ अपराध किये जाने पर उसे एक वर्ष तक के लिये अलका से निर्वासित कर दिया, तब वह यक्ष रामगिरि नामक पर्वत पर जाकर रहने लगा। कुछ समय बाद वर्षाकाल के प्रारम्भ में उसने वर्षाकालीन मेघमण्डल का कामोद्दीपक दृश्य देखा तो वह अपनो प्रियतमा के वियोग में और भी अत्यन्त विकल हो गया और उसने अपनी विरहिणी प्रिया के समीप सन्देश भेजना चाहा, किन्तु रामगिरि से हिमालयान्तर्गत अलका तक सन्देश भेजने का और कोई साधन न देख कर विरह-विधुर यक्ष विचार-शून्य होकर आकाशस्थित अचेतन (2) मेघ द्वारा ही सन्देश भेजने को उद्यत हो गया, और उससे इस कार्य के लिये प्रार्थना करने लगा। महाकवि कालिदास ने इस प्रकार मेघदूत का प्रारम्भ करके यक्ष द्वारा पूर्व मेघ की समाप्ति तक रामगिरि से अलका तक के वर्षाकालिक मार्ग का वर्णन कराने के पश्चात् नगाधिराज हिमालय के हिमवेष्ठित गगनचुम्बी उत्तुंग शिखरिस्थ अलका के मनोहारी दृश्य का वर्णन कराया तदनन्तर उत्तर मेघ में कवि ने यक्ष द्वारा अलकापुरी के अलौकिक सौन्दर्य का, यक्ष के रमणीय निवासगृह और उसकी वियोगसन्तापिता पत्नो की विरहावस्था का वर्णन कराने के बाद अन्त में यक्ष द्वारा उसकी प्राणप्रिया को कहने के लिये सन्देश कहलाया है। बस इसी के अन्तर्गत कालिदास ने प्रावृट् कालीन मेघ मण्डल से प्रभावित होने वाले प्राकृतिक दृश्यों के नयनाभिराम विचित्र चित्र दृष्टिपथ कराये हैं, और पुराणेति- हासों में पर्वत, नदी और पवित्र स्थान जो भगवान श्री रामचन्द्र सीता देवाधिदेव शकर और कार्तिकेय आदि के सम्बन्ध से अद्यापि प्रसिद्ध हैं एवं हिमालय प्रान्त के जो विचित्र दृश्य हैं उनका यथावत् शब्द-चित्र अकित कर है ~ - [ ३४ ] - दिया है। विशेषत उज्जयिनी और अलका के मनोहर वर्णन द्वारा इस छोटे से खण्ड-काव्य की सुपमा में निरुपम अभिवृद्धि हो गई है। यक्ष पत्नी की विरहा- वस्था तथा यक्ष के सन्देश का विप्रलम्म शृङ्गारात्मक कारुणिक वर्णन सहृदयों के चित्त को एक वार ही द्रवित कर देता है। सत्य तो यह है कि इस प्रकार कल्पना की आनन्दमयी सृष्टि में यथेष्ट विहार करने का अधिकार मेघदूत के जैसे कवि का ही हो सकता है। । कवीन्द्र कालिदान ने यौवन के उद्यान में क्रीडासक्त यक्ष दम्पति को नायक और नायिका कल्पित करके प्रधानतया उनके विप्रलम्भ शृङ्गार का वर्णन किया है। विप्रलम्म द्वार के पाच भेद है-अमिलापा-हेतुक, डहेतुक, विरह-हेतुक, प्रवास-हेतुक और शाप-हेतुक । मेघदूत में शाप प्रवास-हेतुक विप्रलम्भ का वर्णन है। कविकुलगुरु कालिदाम की अभिरुचि शाप-प्रवास-हेतुक विप्रलम्भ के वर्णन मे अधिक देखी जाती है। गाकुन्तल और विक्रमोर्वशीय में भी उन्होने विशेष- तया इसी का वर्णन किया है। दाम्पत्य स्नेह के उन्नत भाव-गभित विप्रलम्भ हार के वर्णन में संस्कृत साहित्य के सिद्ध-इस्त दो ही कवि सर्वोच्च है, एक कालिदास और दूसरे भवभूति । भवभूति ने भी उत्तर रामचरित मे विप्रलम्म का चित्ताकर्षक सजीव चित्र उपस्थित कर दिया है । मेघदूत और वाल्मीकीय रामायण-~साहित्यमर्मन विद्वानो से यह अविदित नहीं है कि महर्षि वात्मीकि के सुक्ति सुबारस का निरन्तर आखादन करने वाले कालिदान ने प्रायः अपने सभी काव्य और नाटकों में न्यूनाधिक रूप में श्री रामायण का प्रतिविम्ब ग्रहण किया है। विशेषतया मेघदूत का यानपूर्वक अव्यवन करने पर तो यह प्रत्यक्ष हो जाता है कि महपि वामीकि द्वारा वणित भगवती जनकनन्दिनी की विरहवंदना से आकुलिन भगवान श्री रामचन्द्र का सन्टेग लेकर दक्षिणोदधि का उल्लघन करने के लिये गगन-मण्टल में मौदामिनी विलमित मेघ के समान गमन करते हुए पवनसुत हनुमान जी के प्रमग के काव्यामृत से आकृष्ट चित्त होकर ही कालिदास ने स्पान्तर में मेघदूत मे वियोगी यक्ष की मानमीवृत्ति का वर्णन किया है। मेघदूत नं प्रयुक-'जनकननया नानपुण्योदकेषु ।' 'रामगिथिमपु।' और 'रघुपति- पकिनम् । इत्यादि वाक्य खटो के द्वारा वाल्मीकीय रामायणोक्त कथा के साथ मेघदन का सम्बन्ध प्रतीत होता हो, सो नही, किन्तु रामायणोक्त इस प्रसंग के [ ३५ ] अनेक वर्णनों का सादृश्य मेघदूत में प्रत्यक्ष दृष्टिगत हो रहा है। कवि सार्वभौम महर्षि बाल्मीकि ने- "अयं स काल. सम्प्राप्तः समयोद्य जलागमः, संपश्यत्वं नमो मेधैः सवृतं गिरिसंनिभैः ।"-४।२८१२ । इत्यादि पद्यो मे मेघाछन्न गिरि शिखर के वर्षाकालीन दृश्य से परिवद्धित श्री रघुनाथ जी की विरहावस्था की वर्णना का आरम्भ किया है। मेघदूत मे भी- 'आषाढस्य प्रशमदिवसे मेघ माश्लिप्टसानु ।' (पूर्वमेघ २ ) इत्यादि पद्यो द्वारा नादृश वर्षाकालीन दृश्योत्पन्न यक्ष की वियोगावस्था का वर्णन आरम्भ किया गया है। रामायण में वानराधिपति सुग्रीव द्वारा वानरों के प्रति गन्तव्य मार्ग में आनेवाले स्थानो का वर्णन है, तदनुसार मेघदूत में यक्ष द्वारा मेघ के प्रति गन्तव्य मार्ग में आने वाले स्थानो का वर्णन किया गया है। रामायण में आकाश के वायु मार्ग में समुद्रोल्लंघन करते हुए हनुमान जी को सिद्धो द्वारा सपक्ष पर्वत की उपमा दी गई है- "शुशुभे स महातेजा महाकायो महाकपिः, वायुमार्गे निरालम्बे पक्ष- वानिव पर्वत." ५।१।७६। मेघदूत में भी सिद्धांगनाओ द्वारा मेघ को पर्वत की उपमा दी गई है- "अद्रः शृंगं हरति पवन. किंस्विदिप्युन्मुखी मि , दृष्टोत्साहश्चकितचकितं पूर्व मेघ १४॥ रामायण मे हनुमान जी की पुच्छ को इन्द्र-धनुप की उपमा दी गयी है। 'अम्बरे वायु पुत्रस्य शक्रध्वज इवोच्छितम् ।' (५।१।५९) मेघदूत में-'रत्नच्छा याव्यतिकर इव. ।' (पू० मे० १५) इत्यादि पद्य में इन्द्र-धनुप के सम्पर्क से मेघ का सुशोभित होना कहा गया है। रामायण मे आतिथ्य के लिये समुद्र द्वारा मैनाक ने हनुमान जी से कहा है-अतिथि. किल पूजार्हः प्राकृतोऽपि विजानता, धर्म जिज्ञासमानेन किं पुनयादृशो भवाम् । (वात्मी० ५।१।११२) इसी भाव को कलिदास ने सर्वाश मे मेघदूत के निम्नलिखित पद्य मे रख मुग्वसिद्धागनाभिः” भेजे हुए दिया है- -- 'न क्षुद्रोऽपि प्रथम सुकृतापेक्षया संश्रयाय, प्राप्त मित्रे भवति विमुखो किं पुनर्यस्तयोश्चः।' पू० मे० १७ ।

३६ ] - रामायण में जल-भार वहन करने वाले मेघ का पर्वत शृङ्गों पर विश्राम ले लेकर जाना कहा है। मेघदूत में यह भाव नीचे के पद्य में इस प्रकार लिया गया है- "उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे मत्प्रियार्थ यियासो, कालक्षेपं ककुभमुरभो। पर्वत पर्वते तं ।" पू० मे० २३ । रामायण मे लङ्का को पृथ्वी पर गिरा हुआ स्वर्ग कहा गया है। 'महीतले स्वर्गमिव प्रकीर्णम ।' ( 45 ) । मेघदूत में उनयिनी को स्वर्ग का एक खण्ड कहा गया है.---ॉप पुण्यह तमिव दिन कान्तिमत्खण्ड मेकम्', (पू० मे० ३१) इनके अतिरिक्त रामायण में वर्णित श्री जनक्र-नन्दिनी की विरहावस्था का तो कालिदास ने यक्ष पत्नी की वियोगावस्था के वर्णन में अधिकाश अनुकरण क्यिा है। रामायण में जानकी जी को शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा के चन्द्रमा की एक कला की उपमा दी गयी है ( ददर्श शुक्लपक्षादौ चन्द्ररेखामिवामलाम् ) ५।१५।१९। मेघदूत मे भी यक्ष पत्नी को यही उपमा दी गई है-"प्राचीमूले तनुमिव कलामात्र शेषां हिमाशोः।” (उ० मे० २८)। रामायण मे सीता जी को शीतकालीन शोमा विहीन कमलिनी की उपमा दी गयी है, मेघदूत में भी यक्ष पत्नी को यही उपमा दी गई है---"जाता मन्ये गिशिर मथिता पधिनी वान्यरूपाम् ।” (उ० मे० २२)। रामायण में शुभ गकुन सूचक सीता जी के वामनेत्र के स्फुरण को मीन द्वारा सञ्चालित कमलपत्र की उपमा दी गयी है- "प्रास्पन्दतकनयनं मुकेश्या मीनाहतं पद्ममिवभिनाम्रम" ( ५।२९।२ ) । मेघ- द्वत में इसके शब्द और अर्थ दोनो का अनुसरण है- "स्वव्यासन्ने नयनमुपरिस्पन्दिशंके मृगाक्ष्या, मीनक्षोभाच्चलकुवलयश्री तुलामप्यतीति ।" उ० मे० ३४ । इसी प्रकार उरुस्फुरण का भी रायायण के वर्णन का मेघदूत में अनुसरण है। यह नो दिग्दर्शनमात्र है। कालिदास ने मेघदूत के “इत्याख्याते पवन- तनयं मैथिलीवोन्मुन्सी सा।” (उ, मे० २९) इस वाक्य में तो श्री जनक- नन्दिनी का स्पष्ट नामोल्लेख करके नियाजरूप से स्पष्ट सूचित कर दिया है कि मेघदूत की रचना का आवार याल्मीकीय रामायण ही है। किन्तु इसके द्वारा [ ३७ ] यह समझना कि रामायण के वर्णनों का मेघदूत में अपहरण किया गया है, कविकुल दिवाकर कालिदास के साथ घोर अन्याय है। क्योकि प्रथम तो मेघदूत की कल्पना ही रामायणान्तर्गत इस प्रसङ्ग के चित्ताकर्षक वर्णनो पर निर्भर है, तो उसका अनुकरण ही क्यों यत्रतत्र शन्द साम्य भी होना स्वाभाविक ही है। फिर यह भी ध्यान देने योग्य है कि बाल्मीकीय रोमायण और महाभारत ऐसे महत्वपूर्ण आर्ष महाकाव्य है कि इनका अस्तित्व यदि न होता तो किसी भी काव्य या नाटक का भी अस्तित्व दृष्टिगोचर न होता । यही दोनों ग्रन्थ निर्विवाद रूप में संस्कृत साहित्य के पथ-प्रदर्शक हैं। साहित्य पथ-प्रदर्शको मे अग्रगण्य श्री मदानन्द वर्धनाचार्य के- बाल्मीकिव्यतिरिक्तस्ययद्य कस्यापिकस्यचित् । इष्यते प्रतिभानन्त्य तत्तदानन्त्यमक्षतम" ध्वन्यालोक ४१७ की वृत्ति । इस वाक्य से स्पष्ट है कि आदिकवि महर्षि वाल्मीकि का आदिकाव्य रामा- यण ही ऐसा अन्थ है, जिसमें किसी का अनुसरण नहीं किया गया है। अर्थात् तदितर कवियो के काव्यों में बाल्मीकीय का अनुसरण किये जाने पर भी वह अप- हरण दोष नहीं कहा जा सकता, प्रत्युत कवि-प्रतिभा-जन्य काव्य-वैचित्र्य का आनन्त्य है। अतएव केवल कालिदास ही क्यो उनके पूर्ववर्ती महामहिम पाणिनि और महाकवि भास आदि एवं परवर्ती भारवि, माघ और भवभूति आदि अनेक महाकवियों ने इन्हीं ग्रन्यों के आधार पर अपने काव्य-नाटको की रचना की है। किन्तु इस कार्य में सफलीभूत कविराट कालिदास ही हो सके हैं। यहाँ तक कि बाल्मीकीय में वर्णित पदार्थरत्नों को उन्होंने अपने प्रतिभा-कौशल से प्रसंगोचित स्थलो पर सुसज्जित करके और भी अधिक चमत्कृत कर दिया है। - कालिदास और अन्यान्य महाकवि कालिदास की मनोरम अलंकार-गर्भित सुक्तियों पर मोहित होकर उनके परवर्ती प्राय. बहुत से महाकवियो ने उनके वणों का अनुसरण करने के लोभ को संवरण नही करके अपनी रचना का गौरव बढाने की यथेष्ट चेष्टा की है। उदाह- रण रूप में यहा केवल मेघदूत की सूक्तियो का अन्य कवियो द्वारा किये गये अनु- करण का दिग्दर्शन कराया जाता है। देखिये, मेघदूत के- [ ३८ ] . - . "गन्तव्या ते वसतिरलका नाम यक्षेश्वराणाम, वाह्योद्यानस्थित हरशिरश्च- न्द्रिकाधौतहा” (पू० मेघ०,) । इस पद्यार्ध में और- “यत्रोन्मत्तभ्रमरमुखरा. पादपा नित्यपुप्पा, हसश्रेणीरचितरगना नित्य पद्मा नलिन्य. । केकोकण्ठा भवनगिखिनो नित्यमावत्कलापा, नित्यज्योत्सना. प्रतिहततमो वृत्ति रम्या. प्रदोपा ।” उ० मे० ३। इस पद्य में अलका के वाह्योद्यान में निवास करने वाले भगवान चन्द्रशेखर के ललाट पर स्थित चन्द्रमा की कान्ति से अलका के महलो का सर्वदा ( कृष्णपक्ष की रात्रियों में भी ) श्वेत प्रमायुक्त रहना और वहा सर्वदा चांदनी रात्रि का होना कहा गया है, इसी के अनुकरण पर महाकवि भारवि ने- "न्नपितनवलतास्तरुप्रवालैरमृतलवनु निशालिभिर्मयूखैः । मततमसिनयामिनीपुशम्भोरमलयतीह वनान्तमिन्दु लेखा ॥" किरातर्जुनीय ५४४ इस पद्य में कहा है-चन्द्रमा की किरणों से-ऐसी किरणो से जिनसे अमृत के विन्दु झरते रहते हैं, सिंचित रहने वाले लता और वृक्षो के पल्लवों के कारण हिमालय की वनभूमि सर्वदा ( कृष्ण पक्ष की अंधेरी रात्रियों में भी ) शुभ्रकान्ति- मयी रहती है। और इसी के अनुकरण पर दार्शनिक महाकवि श्री हर्प ने भी- "सितदीप्रमणिप्रकल्पिते यदगारे इसढकरोदसि । निखिलान्निशि पूर्णिमा- तिथीनुपतस्थेऽतिथिरे किकाऽतिथी.।"-नेपवीय चरित २१७६ । इस पद्य में कुण्डिनपुर के श्वेतमणि-निर्मित भवनों के प्रकाश द्वारा वहां प्रतिपदा आदि सारी तिथियो की अतिथि रूप होकर सर्वदा एक पूर्णिमा तिथि की स्थिति रहना कहा है। किन्तु कालिदास ने पद्य के चतुर्थ पाद में जो मात्र बड़ी खूबी के साथ रख दिया है, तादृश रोचकता भारवि के पूरे पद्य-मे भी नहीं आ पाई है। श्री हर्ष की कल्पना तो केवल अत्युक्ति मात्र है-सहृदयावादक नहीं मेघदूत के- "रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेन्यमेतत्पुरस्तात, इत्मीकानात्प्रभवति धनु. खण्डमाखण्डलस्य । येन श्याम वपुरतितरां कान्तिमायत्स्यते ते, वहणेवस्फुरितरुचिना गोपवेपस्य विष्णोः ॥” पू० मे० १५॥ ।

[ ३६ ] इस वर्णन पर गीत गोविन्द के प्रणेता भक्तवर श्री जयदेव जी ने- "चन्द्रकचारुमयूर शिखण्टकमण्डलवलयितकेशम्, प्रचुरपुरन्दर धनुरनुरज्जितमेदु रमुदितसुवेषम् ॥" -गीत गोविन्द । इस प्रकार रचना की है। इसमें और मेघदूत के वर्णन मे भेद केवल यही है कि मेघदूत में मयूर पिच्छ का मुकुट धारण किये हुए भगवान गोपालकृष्ण की उपमा इन्द्र धनुष से सुशोभित मेघ को दी गई है, और गीत गोविन्द मे तादृश मेघ की उपमा तादृश भगवान् गोपालकृष्ण को दी गई है। मेघदूत के इस वर्णन का अनुकरण महाकवि माघ ने- "अनुययौ विविधोपल कुण्डला तिवितानकसंचलितांशुकम् धृतधनुर्वलयस्य पयोमुचः शवलिमा बलिमानमुषोवपु शिशुपाल वध ६।२७ इस प्रकार किया है। इसमें इन्द्र धनुष से सुशोभित मेघ को भगवान् विष्णु के श्यामवर्ण की कान्ति की उपमा दी गई है-ऐसी कान्ति की जो अनेक रगो की मणियो के कुण्डल की प्रभाराशि से चमत्कृत हो रही थी। माघ का यह वर्णन भी वडा मनोहारी है। मेघदूत में उज्जयिनी के बाजार के- हारांस्तांरांस्तरलगुटिकान्कोटिशः शंखशुक्ती, शष्पश्यामान्मरकतमणीनुन्मयूखप्रहोरान् । दृष्ट्वा यस्यां विपणिरचितान्विद्रुमाणां च- भगान्सलक्ष्यन्ते सलिल निधयस्तोयमात्रावशेपा ।"-पूर्व मेघ ३३॥ इस वर्णन में कहा गया है-उज्जयिनी के बाजारो मे रखे हुए असंख्य भुक्ताहार, करोडों शंख-सीपियां, पन्नो की मणियां और प्रवालो के ढेर ठेख कर अनुमान होता है कि अब समुद्र में केवल पानी मात्र ही शेष रह गया होगा, जब कि समुद्र से इतनी रत्न राशि वहां आ गई है। इस वर्णन का अनुकरण उज्जयिनी के वर्णन में ही महाकवि बाणभट ने इस प्रकार किया है- "प्रकटशंखमुक्ति मुक्ता प्रवाल मरकत मणिराशिंभिश्चामीर चूर्णसिकता निकररचितैरायामभिरगस्त्यपरिपीतसलिलै सागरैखिमहाविपणियथैरुपशोभिता।' कादम्बरी।

[ ४० ] - इसका भावार्य यह है कि मंत्र, सीपी और मोनी आदि के ढेरी से एवं विखरे हुए सुवर्ण के चूरे से उज्जयिनी के विस्तृत वाजारों की गोमा ऐसी दृष्टिगत होती है, मानों महामुनि अगस्त्य जी द्वारा सारा पानी पिया जाने पर समुद्र में शेष रह गये शख, गीपी और रत्न ही दिखलाई पडते हो। मेघदत के इसी वर्णन का अनुकरण महाकवि माघ ने इस प्रकार किया है- "णिवपधे पूग कृनानि यत्रभ्रमागतैरम्बुभिरम्बुराशिः, लोलैरलोला तिमाजि- मुष्णन् रत्नानि रत्नाकरतामवाय ।"-शिशुपाल वध ३१३८ अर्थात् द्वारिका के बाजारों में रखे गये रत्नो के ढेर के ढेर जलमार्ग द्वारा वह कर समुद्र के तट पर आ जाने से द्वारिका के समुद्र का ही रत्नाकर (रत्नो का भडार ) नाम प्रत्यक्ष चरितार्थ होता है-अन्यत्र तो समुद्र में जल ही जल देखा जाता है, कहने मात्र को ही रत्नाकर है। महाकवि श्री हर्ष की भी कल्पना देखिये- "बहु कम्बुमणिराटिकागणनाटकरकर्कटोत्करः। हिमवालुक्याच्छ्वालुकः पटु दवान यदार्पणार्णव.।”—नेपधीयचरित २१८८१ इनमे कुण्डिनपुर के बाजार को समुद्र रूप वर्णन किया गया है। ममुद्र में गख और मोनी आदि रत्न होते हैं। कुण्टिनपुर के बाजार में भी शख आदि के ढेर लगे हुए हैं। ममुद्र ने कुलीर नाम के जल-जन्तु फिरते रहते हैं, उसमें भी कौडिया को गिनने के लिये चलायमान हाथ ही कुलीर स्प है। समुद्र मे वालू रेती होती है, उसमें भी अत्यधिक कर्पूर का चूर्ण विखरा रहता है। सत्य तो यह है कि सारे रत्न-समूह उज्जयिनी के बाजारों मे आ जाने के कारण समुद्र में पानीमात्र गेप रह जाने के वर्णन में जो कालिदास की उपयुक्त कल्पना है वैसी उज्जयिनी के वानारो मे वाणमट द्वारा की गयी जल-रहित समुद्र की उत्प्रेक्षा में नहीं, और श्री हर्प की कल्पना तो केवल अत्युक्तिमात्र है। माघ की फपना अवश्य अधिकाश में कालिदास के वर्णन के समकक्ष प्रतीत होती है। और देखिये- "तस्यादातु सुरगज इव व्योम्नि पश्चाईलम्वी, वं चेदच्छस्फटिक विशदं तयेस्तिर्यगम्भः। संसर्पन्त्या सपदि भवत. स्रोतसिच्याययाऽसौ, स्यादस्थानोप- गतयमुनासगमे वाभिरामा"-पूर्व मेघ ५४ ।

[ ४१ ] गंगा-यमुना ने मेघदूत के इस पद्य में श्री गंगा का जल लेने के लिये आकाश पर से नीचे को झुके हुए श्यामवर्ण के मेघ के दृश्य का बडा ही चित्ताकर्षक वर्णन है-यक्ष कहता है, हे मेघ, श्री गंगा के स्फटिक के समान शुभ्र और स्वच्छ जल पीने को जब तू इन्द्र के ऐरावन हस्ती के सदृश महत्काय श्याम वर्णबाला-आकाश में पिछले आधे भाग को ऊंचा किये और आगे के आधे भाग से तिरछा होकर नीचे झुकेगा, तब प्रवाह में गिरी हुई तेरी छाया से भगवती गंगा ऐसी सुशोभित होंगी मानो प्रयाग से अन्यत्र ही यमुना का नयनाभिराम संगम हो गया हो। कालिदास की श्री के संगम के दृश्य की इस कल्पना महा कषियो के चित्त को बहुत आकर्षित किया है। माघ ने इस सूक्ति पर मुग्ध होकर रैवतक गिरि की तलहटी में बहने वाली एक नदी का- “एकत्रस्फटिकतटांशुभिन्नतीरा नीलाश्मा तिभिदुराम्भसोऽपरत्र । कालिन्दी जलजनितश्रियः श्रयन्ते वैदग्धीमिह सरितः सुरापगायाः।" -शिशुपाल वध ४।२६। इस प्रकार वर्णन किया है कि एक ओर स्फटिक मणि के तट की श्वेत कान्ति के प्रतिबम्ब से शुभ्र और दूसरी ओर नीले पाषाणों के तट की छाया से नील प्रतीत होने वाले प्रवाह वालो यह नदी, कलिन्दनन्दिनी यमुना की शोभा से मिली हुई भगवनी गंगा की छवि धारण कर रही है। इस दृश्य का महाकवि मखूक भी अनुकरण किया है- "यस्या सकृत्प्रणमतो धृतमन्तुतन्तुर्नम्रानना गिरि सुता श्रुभिरजनांकः । मौलौ नव लिखति शीतरुचे. कलंकम्, पुष्णात्यकाण्डयमुनाप्रणयांच गंगाम् ।। श्रीकंठचरित ५।३। अर्थात मानवती श्री पार्वती जी को बारम्बार प्रणाम करते हुए श्री शङ्कर के ललाट स्थित चन्द्रमा के ऊपर नम्रमुखी श्री गिरिजा के अञ्जन मिश्रित अश्रु गिरते हैं, वे मानो चन्द्रमा के एक नवीन कलंक का उत्लेख कर रहे हैं और प्रयाग से अन्यत्र ही गंगा से यमुना का सङ्गम करा रहे हैं। इस वर्णन में उत्प्रेक्षा की कल्पना विचित्र अवश्य है किन्तु साथ ही उपमेय-उपमान का परिमाण काव्य मर्मज्ञो की दृष्टि में कुछ खटकता भी है। यह केवल मेघदूत की सूक्तियो के अनुकरण का दिग्दर्शनमात्र है। इनके ने [ ४२ ] अतिरिक्त कालिदास के और भी अनेक वर्णनों का अश्वघोप, दण्डी, भवभूति, शूदक और अमल आदि अनेक बड़े बड़े महाकवियो ने अनुकरण किया है। मेघदूत के अनुकरण पर अन्य दूत काव्य और टीकाएं मेघदूत के अनुकरण पर बहुत से दूत काव्यों की रचना भी सस्कृत साहित्य में अनेक प्रसिद्ध विद्वानों द्वारा की गयी है। उपलब्ध दूत काव्यो में सबसे प्रथम जिन सेनाचार्य ने (शक ७०४) पार्वाभ्युदय लिखा है, तदनन्तर भोजराज ने चकोरदूत, विक्रम कवि ने नेमिदृत, वेदान्तदेशिक वेकटाचार्य ने हस-सन्डेग, उदण्डशास्त्रीने कोकिल सन्देश, लक्ष्मीदास ने शुक्र सन्देश, धोइक ने पवनदूत, वादिचन्द्र ने पवनदूत विनयविजयगुणीने इन्दुदूत, तैलग व्रजनाथ ने मनोदूत, कृष्णसार्वभौम ने पदांगदूत, माधव कवीन्द्र ने उद्धवदूत, श्री स्प गोस्वामी ने हंसदूत, भगवहत्त ने मनोदृत और लक्ष्मीनारायण ने रयागदूत इत्यादि लिखे हैं। मेघदूत पर अनेक विद्वानों ने असख्य टीकायें भी लिखी है। निष्कर्ष यह है कि उत्तर में पंजाब से लेकर दक्षिण में मद्रास तक और पश्चिम में महाराष्ट्र से बंगाल तक सभी प्रान्तो के सुप्रसिद्ध विद्वानों ने कालिदास और उनके काव्यो पर बहुत कुछ लिखा है। केवल एतद्देशीय ही नहीं, द्वीपान्तरीय विद्वानो द्वारा पाश्चात्य भाषाओं में भी मेघदूत के कई अनुवाद और व्याख्याये लिखी गयी हैं। विलसन साहिब ने ई० सन् १८१३ में अग्रेजी में अनुवाद और व्याख्या लिखी है, गिल्डमीस्टर ने सन् १८४७ में बोन में लैटिन भाषा के कोप के साथ एक आवृत्ति निकाली थी। प्रोफेसर मोक्षमूलर ने भी इस्त्री सन् १८४७ मे एक आवृत्ति निकाली थी। अन्य पाश्चात्यो ने भी कई आवृत्तियां निकाली हैं। हमारी हिन्दी भाषा में मी मेघदत के अनेक अनुवाद हो चुके हैं। जिनमें स्वर्गीय राजा लक्ष्मण सिह का ब्रजभाषानुवाद कालक्रम में नहीं, काव्यमाधुरी की सरसता में भी सर्वप्रथम है। इन पक्तियो के लेखक ने भी मेघदत का समश्लोकी अनुवाद, हिन्दी मेघदृत विमर्श लिखने का दुःसाहस क्यिा है। बस उपसंहार में कालिदास के काव्य मर्मज्ञ भाष्यकार श्री महिनाय का निम्नलिखित पद्य लिख कर यह लेख समाप्त किया जाता है- कालिदामगिरी सार. कालिदास सरस्वती, चतुर्मुखोऽथवा साक्षाद्वि दुन्येि तुमादशाः।।

वाह्य मेघदूत- प्रसार तथा प्रभाव आचार्य बलदेव उपाध्याय मेघदूत संस्कृत साहित्य का वह जाज्वल्यमान हीरक है जिसकी प्रभा समय के प्रवाह से और भी अधिक बढती जाती है। वह बडी ही मंगलमयी घड़ी थी जब महाकवि कालिदास ने इस अमर काव्य की रचना की थी। प्रकृति की मनोरम झांकी प्रस्तुत करने में तथा अन्तस्तल में सन्तत उदय होने बाले भावों के चित्रण में यह काव्य अपनी तुलना नहीं रखता। किसी विरह विधुरा प्रेयसी के पास मेघ को प्रेम का सन्देशवाहक दूत बनाकर भेजनेकी कल्पना ही विश्व के साहित्य में अपूर्व कोमल तथा हृदयावर्जक है। बाल्मीकीय रामायण में अशोक बाटिका में रावण के द्वारा अपहृत जनकनन्दिनी के पास हनुमान को भेजना तथा महाभारत में हंस के द्वारा दमयन्ती के हृदय में राजा नल के प्रति प्रणयभाव के प्रादुर्भाव की कथा अवश्यमेव कालिदास से प्राचीनतर है। परन्तु इनमें चेतन पदार्थों से ही दौत्य-कार्य की सम्पति दीख पड़ती है। किसी अचे- तन वस्तु को प्रेम प्रसङ्ग में दौत्य कर्म के लिये भेजना तथा प्रणय में गाढ उत्क- ण्ठातिरेक की सद्यः अभिव्यक्ति करना सचमुच एक प्रतिभासम्पन्न कवि की मौलिक कल्पना है। ऐसे प्रसङ्ग की गूढ अभिव्यञ्जना की ओर लक्ष्य न करके संस्कृत के आद्य आलङ्कारिक भामह ने इसे 'अयुक्तिमत्' दोष के नाम से अभि- हित किया है। उनका तर्क है कि मेघ, शुक, चन्द्र आदि पदार्थों को दृत बना कर भेजना इसलिये युक्तिरहित है कि इनमें से कुछ पदार्थों की वाक्शक्ति ही नहीं है ( अवाचः ), कुछ की वाणी नितान्त अव्यक्त है जिससे वे अपने सन्देश को दूसरों से स्पष्टतया प्रकट नहीं कर सकते (अव्यक्तवाचः ) तथा कुछ दूर देशों में विचरण करने वाले हैं ( दूर देश विचारिण.)। फलन. इन्हें दृत बना कर भेजना युक्ति विहीन नहीं तो क्या है ? अवाचोऽव्यक्तवाचश्च दूर देश विचारिणः । कथं दूत्यं प्रपद्यरन्निति युक्त या न युज्यते ॥ काव्यालङ्कार १।४३ ।

[ ४४ ] वह तो इस प्रकार की विपरीत आलोचना का खण्डन कालिदास ने घडी भावुकता के साथ पहले ही कर दिया है-कामार्ता ही प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु। काम से पीडिन प्राणी चेतन तथा अचेतन के झमेले में नहीं पड़ता। उत्सुकता तथा उत्कण्ठा का शिकार बना रहता है। परन्तु फिर भी मेघ के दूत वनाने मे सुन्दर युक्ति को सत्ता है। मेघ तो सूखते हुए पौधो को जल से सींच कर भरने से बचाता है और यहा तो एक जीता प्राणी विरह के मारे अधमरा वना हुआ सिसक रहा है और वह भी किसी धन कुवेर के क्रोध का भाजन हुआ प्रेयसी से वियुक्त होकर जीवन-यापन कर रहा है (धनपति क्रोधविश्वेसितस्य)। फलन वह विशेष रूप से मेघ की दया का पात्र है-अनुकम्पा का भाजन है। कालिदास के इस समर्थन की ओर भामह ने स्वयं अपना सिर झुकाया है और 'सुमेधा' के द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इस कल्पना को ग्राह्य तथा अनुकरणीय माना है- यदि चोरवण्ठया यत्तद उन्मत्त इव भाषत । तथा भवतु भून्मेदं सुमेधोभि प्रज्युते ॥ (भामह १।४४) - नई-नई शताब्दियों में प्रेरणा तथा स्फूति प्रदान करना काव्य की महत्ता का स्पष्ट सूचक होता है और इस कसौटी पर कसने से 'मेघदूत' को सस्कृत साहित्य में एक नवीन काव्य प्रकार की उद्भावना का श्रेय प्राप्त है जो 'सन्देश काव्य' क नाम से प्रख्यात है। सर्वप्रथम महाकवि भवभूति ने अपने 'मालती माधव' मे मावव के द्वारा मालती के समीप मेघ को दूत बना कर भेजने की कल्पना का अनुसरण किया है। यहा (९ अङ्क, २५-२६ इलोक) दोनो पद्य 'मन्दाक्रान्ता' वृत्त में ही उपन्यस्त है । १ भवभूति के बाद एक शताब्दी के भीतर ही हम जैन कवियों को मेघदूत के प्रति विशेषत. आकृष्ट होते पात है। उन्हें यह काव्य इतना रुचिकर प्रतीत हुआ कि उन्होने इसके समस्त पद्यों की समस्यापूति - १-कच्चित मौम्य प्रियसहचर विधुरालिङ्गति त्वामाविर्भूत प्रणयसुमुखाश्चा- तका वा भजन्ते । पौरस्यो वा सुखयति मस्त साधु संवाहनाभित्रिवम् विभ्रत् मुरपनिधनुर्लक्ष्स लक्ष्मी तनोति ।।

[ ४५ ] कर नवीन काव्यों की रचना की है। इनमें से कई कवियो ने मेघदूत के अन्तिम चरणों को ही समस्या रूप से ग्रहण कर उसकी पूर्ति अपनी ओर से को है, परन्तु आचार्य जिनसेन का कार्य इस दृष्टि से नितान्त इलाध्य है जिन्होने मेघदूत के समस्त पयो के समग्र चरणो की ही पूर्ति अपने 'पाइर्वाभ्युदय' काव्य मे बड़ी सफलता तथा रुचिरता के साथ की है। पाश्चभ्युिदय मे श्री जिनसेन ने ३६४ मन्दाक्रान्ता वृत्तो मे पार्श्वनाथ का जीवन चरित बड़े ही कौशल के साथ गुम्फित किया है। इसके प्रत्येक पद्य मे मेघदूत के एक या दो चरण वेष्टितकर शृङ्गार रसात्मक काव्य शान्तरस के रूप में परिणित किया गया है। समस्या पूर्ति होने पर इसमे मौलिकता की कमी नहीं है और कालिदास के मेघदूत के संकेत करने मे यह ऐतिहासिक महत्व रखता है। प्रो० पाठक (१) ने इसी के आधार पर मेघदूत का एक सुन्दर सस्करण प्रकाशित किया है। जिनसेन का समय नवी सदी है । फलतः यह अपने विषय का आदिम तया प्रचीन ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ की शैली से स्फूर्ति ग्रहण कर विशे- पत. जैन कवियो ने अनेक काव्यों का निर्माण किया जिसमे मुख्य हैं- (१) विक्रम कवि रचित नेमिदूत१ जिसमे बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ तथा राजीमनो का चरित्र मेघदूत के अन्त्यचरण के पादपूर्ति रूप मे १२६ इलोको में सुन्दरता के साथ वर्णित है ये साङ्गण के पुत्र थे तथा विक्रम की १५ वीं सदी मे इनका आविर्भाव हुआ था। (२) शीलदूत-बृहत्तपागच्छीय चारित्र सुन्दर गणिके द्वारा खम्भात मे सं० १४८४ में रचित हुआ जिसके १२५ श्लोको मे मेघदत के अन्त्य चरणों की समस्या पूर्ति की गई है। यशोविजय ग्रन्थमाला में प्रकाशित । (३) चन्द्रदूत-खरतरगच्छीय कवि विमल कीर्ति की १६८१ विक्रमी की रचना है। कवि ने इसमें १४१ श्लोकों में चन्द्र को शत्रुञ्जय जाकर ऋषभदेव की बन्दना के निमित्त भेजा है । अगरचन्द नाइटा २ के सग्रहमें हस्तलिखित प्रति है। १ जैन प्रेम कोटा ( राजस्थान ) से गुण विनय की संस्कृत टीका तथा हिन्दी पद्यानुवाद के साथ प्रकाशित, सं० २००५ । २ अगरचन्द नाहटा की श्री नेमिदूत की प्रस्तावना ६२१-२३ ।

[ ४६ ] (४) मेघदूत समस्या लेख--उपाध्याय मेघविजय की १३० इलोकों में रचना है जिसमें कवि ने मेघ के द्वारा गच्छाधिपति विजयप्रभुसूरि के पास विज्ञप्ति भेजी है। रचनाकाल १७२७ विक्रमी । (५) चेतोदूत-किसी अज्ञात जैनाचार्य की रचना जिसमें चित्र को दूत वना कर गुरु के पास विज्ञप्तिप्रेषण किया है। पद्य संख्या १२९ । यह नया ग्रन्थ (४) आत्मानन्द सभा, भावनगर से प्रकाशित है। इनके अतिरिक्त हंस पादाकदृत का भी संकेत मिलता है। जनेतर कवियो की दो पादपूर्तियाँ हैं-सिद्धदूत अववृतराम योगी की १४२३ वि० रचना है जिसमें कैलासस्थ ब्राह्मविज्ञा के पास छाया पुरुपको दूत बना कर भेजा गया है। श्लोक सख्या १३८१ श्री हेमचन्द्राचार्य ग्रन्थावली पाटन से १९२७ में प्रकाशित । हनुमत्दूत-जोधपुर के आधुनिक कवि नित्यानन्द शास्त्री द्वारा रचित तथा वेंकटेश्वर प्रेस से प्रकाशित । पवनदृत। १२ शती के अब्दुल सन्देश काव्य के अन्तर्गत मेघदृत का प्रथम अनुकरण है धोयी फवि का यह कवि महाकवि गीत गोविन्दकार जयदेव का समकालीन तथा राजा लक्ष्मणसेन के प्रति किसी दाक्षिणात्यरमणी की विरह व्यथा का रोचक वर्णन है । इसके अनन्तर तो वगाल तथा द्रविड देशके कवियोंने सन्देश काव्योक लिखने में वडा उत्साह दिखलाया। अपभ्रंश साहित्य भी कालिदास की इस मौलिक सम का उपासक या, इसका पता हाल में ही हमे चला है। रहमान नामक एक मुसलमान कवि ने 'सन्देश रासक' नामक एक सुन्दर सन्देश काव्य अपभ्रंश भाषा में लिखा है जो भाषा तथा भाव दोनों दृष्टियों से रोचक नया मनोरंजक है। वैष्णव कवियों के हाथो सन्देश काव्य में वडी कोमलता नया भावुकता का उदय हुआ क्योंकि उन्होने इसे राधा नथा कृष्ण की ललित लीलाओं नया अलौकिक प्रेम की अभिव्यंजना का माध्यम बनाया। रूप गोस्वामी ( १६ शनी ) का 'उद्धवदूत' ऐसी ही भव्य रचना है जिसमे उद्धवजी को भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों को समझाने तथा उनके दिव्य प्रेम को परखने के लिये भेजा या। गोपियों का यह टपालम्म कितना मार्मिक, हृदयस्पर्शी तथा मंजुल है।

[ ४७ ] भवता या पूर्व हरिणा प्रयाण समये संरोपिताऽऽशालना, साऽमृत् पल्लविता चिरात् कुसुमिता नेत्राम्बुसेकै सदा । विज्ञातं फलितेति हन्त ! तन्मूलमुन्मूलितं रे माधवदूत | जीव विहगः क्षीणः किमालम्बते ।। ऐसे संदेश काव्यो की संख्या चालीस-पैंतालीस से कम नहीं है ।१ दुख इतना ही है कि इनमें से अनेको का समय अज्ञात है : ऐसे काव्यों में से कतिपय के नाम ये हैं-कृष्णभट्ट सार्वभौम का पादांकदूत ( रचना काल १७२३ ई. ), लक्ष्मीदास का शुक सन्देश, विष्णुदास का मनोदूत तथा ब्रजनाथ का भी मनोदूत है। इस प्रकार का सबसे अन्तिम रुचिकर निदर्शन है- सन्देश रासक कालिदास के मेघदूत का प्रभाव एक साथ ही संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के कवियो के ऊपर पड़ा। संस्कृत कवियो की सामान्य चर्चा ऊपर की गयी है जिनके ऊपर मेघदूत का प्रभाव व्यक्त रूप से पडा। बारहवी शताब्दी में इसका प्रभाव अपभ्रंश भाषा एक कवि और मुसलान -के ऊपर विशेष रूप से पडा जिसका परिणित फल है--संदेश रासक नामक अपूर्व अपभ्रंश काव्य । कवि का नाम है अब्दुल रहमान जो जात्या मुसलमान जोलाहा था। पिता का नाम भीरसेन 'आर' ( तन्तुवाय ) बतलाता है जो पश्चिम में प्रसिद्ध म्लेच्छ वंश में उत्पन्न हुआ था । वह मूलस्थान ( मुल्तान ) का निवासी के वह भी वह अपने १-इनके परिचय के लिये देखिये चिन्ताहरण चक्रवर्ती का लेख इण्डियन हिस्टारिकल क्वार्टरली भाग ४ कलकत्ता। इनमें से अनेक दूत काव्यो को डा० चौधुरी ने कलकत्ते से प्रकाशित किया है। महामहोपाध्याय पंडित रामावतार शर्मा का मुग्दरदूत (पटना से प्रकाशित) जिसमें आजकल के चलते-फिरते तथा धार्मिक जनता को ठगने वाले साधु सन्तों के प्रतीक रूप श्री खामी मुग्दरानन्द सरस्वती का दिव्य चरित्र हास्यरत का आलम्बन कर बड़ी सुन्दरता से चित्रित किया गया है।

[ ४८ ] या जो अपनी न्यापारिक समृद्धि तथा कला-कौशल के कारण हिन्दुस्तान के नगरों में अग्रगण्य था। सदेग रासक कालिदास के सन्देश काव्य से स्फूति ग्रहण करता है। कवि ने आरम्भ में अपनी बडी नम्नता दिखलाई है। कथावस्तु वहुन थोडी है। मरुस्थली के विजय नगर में बैठी कोई प्रेयसि पति का अपने प्रवास गत पति की विरह वेदना से नितान्त सन्तप्त है और अपने जीवन को पति के दुःखद चिन्तन मे विना रही है। इसी समय कोई पथिक मुलतान के किसी समृद्ध मालिका का आदेश पाकर तथा सन्देश बाहक बन कर स्तम्भ तीर्थ (सभात ) जा रहा है। उसका पति भी वहीं वाणिज्य व्यवसाय करता है और इसलिए वह उसी पथिक के द्वारा अपना सन्देश भेजती है और इसी सन्देश का वर्णन इस काव्य का मुख्य विषय है कया की समाप्ति बड़े रोचक ढग से होती है। अपना संदेश कहने के बाद वह ज्यो हो पथिक को विदा करके अपने घर की ओर तेजी से जाती है, त्यो ही दक्षिण से अदम बढाता हुआ उसका पति दृष्टिगोचर होता है और इस अप्रत्याशित मिलन से वह आश्चर्य और आनन्द से विहुल हो उठनी है। अब्दुल रहमान ने सच्चा कवि-हृदय पाया है। वह नम्रता तथा विनय की मृति है । वह अपनी काव्य-प्रतिभा को बडी ही हीन समझता है, परन्तु है वह वास्तव में प्रतिभाशाली कवि । उसकी कविता बडी चमत्कारिणी तथा हृदय रखिका है। रमणी की सुन्दरता देख कर पयिक के मन में विस्मय होता है- कितु पयावइ अधलड अहवि वियडढलु अहि । - जिमि सरिसि तिय निम्मविय ठविय न अप्पहि पाहि प्रजापति या तो अन्धा है अथवा वह एकदम नपुसक है जिसने ऐसी स्त्री का निर्माण कर उसे अपने पास नहीं रखा । विरहाग्नि की वृद्धि के विषय में कवि की यह उत्प्रेक्षा कितनी सुहावनी है। नायिका कहनी है-मेरा अनुमान है कि विरह की आग वडवानल से उत्पन्न होती है। यदि ऐमा नहीं होता तो, घह आमुमो से सींचने पर झटपट केसे जल टली- - [ ४६ ] गया था पाइय पिय बड़वानलहु विरह ग्गिहि उप्पत्ति । जे सित्तउ घोरं सुपहि जलइ पडिल्लि झत्ति ॥ इस प्रकार अब्दुल रहमानका यह सन्देश१ काव्य मेघदूत के विपुल प्रभाव का परिचायक माना जा सकता है। भारतेतर देशों में मेघदृत के प्रचार की कहानी बडी मनोरञ्जक है। मेघदत का तिब्बती अनुवाद तेरहवीं शताब्दी में किया जो तंजूर मे विद्यमान है। इश तिब्बती अनुवाद का परिचय हमे जर्मन विद्वान डाक्टर बेख ( Dr. Beckt ) द्वारा १९०६ में किये गये जर्मन अनुवाद से मिलता है। यूरोप की समस्त मान्य भाषाओ में मेघदूत का सुन्दर अनुवाद किया गया मिलता है-अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेञ्च, रशियन आदि मे। सबसे विलक्षण बात यह है कि १८ वीं शती के अन्त में मेघटत का अनुवाद जर्मन भाषा में जव किया गया तब प्रसिद्ध जर्मन कवि शिलर (Schiller) को यह कत्पना इतनी पसन्द आई कि उन्होंने मेरिया स्टुअर्ट नामक काव्य में इसकी अवतारणा बड़े साहित्यिक ढंग से की। मेरिआ अस्टु- अर्ट कैदखाने में कैद है वह खिडकी से आकाश में स्काटलैंड की ओर उडते मेघो को देखती है। तथा उनसे प्रार्थना करती है कि वह उसके देशवासियों जाकर उसकी दयनीय दशा का परिचय दें। जिस प्रकार गेटे शाकुन्तल के महनीय प्रशंसक थे उसी प्रकार उनके मित्र शिलर मेघदूत के। प्रशंसक ही नहीं, सफल अनुक्र्ता भी! इस प्रकार मेघदूत की काव्य कल्पना जर्मन साहित्य के एक महनीय कवि की रचना मे स्वीकृत हो चुकी है। मेघदूत का सिहली अनुवाद भी काफी पुराना है। लड्का के किसी टी. बी, पानवोरे नामक विद्वान ने १८८३ ई. में कोलम्बो से मेघदृत का सिघली अनु- वाद भी प्रकाशित किया है। चीन के एक कवि ने पञ्चम शती मे मेघको इसी प्रकार दूत बना कर भेजा है परन्तु वह कालिदास के काव्य से परिचित नहीं सिंघी जैन ग्रन्थमाला मे मुनि जिन विजय जी द्वारा सम्पादित तथा भायानी द्वारा पाण्डियपूर्ण तथा उपयोगी भूमिका के साथ संकलित । बम्बई से प्रकाशित, संवत् २००१ । १ [ ५० ] प्रतीत होता। पक्षियों को सन्देश वाहक वनानेकी घटना बड़ी प्राचीन है। काम विलाप जातक २९७ में बडी विपत्ति में पड़ा हुआ एक मनुष्य अपनी स्त्री के पास कौत्र के द्वारा अपना सन्देश भेजता है । परन्तु कालिदास की यह कायना मौलिक है, इसमे सन्देह नहीं । भारतीय भाषाओं में मेघदूत के अनु- वाद में कमी नहीं। एक-एक भाषा में अनेक अनुवाद वर्तमान है । हमारी हिन्दी में ही अनेक अनुवाद हैं तथा आज भी नये-नये प्रकाशित हो रहे हैं। इसका भी कारण है। इस नवीन युग में भी मेघदूत से स्फूर्ति का स्रोत प्रवाहित हो रहा है। कालिदास प्राचीन पन्थी कवि न होकर प्रगतिशील कवि माने जाते हैं। उचित ही है। मेघदृत किसी धनी-मानी वदान्य नरपति की विरह वेदना का वर्णन नहीं है, अपितु समृद्धराजराज कुबेर के क्रोध भाजन बने एक दीन हीन अलिन यथा के व्यथित हृदय का करुण क्रन्दन है जो अपने मालिक की निर्दय आज्ञा को पीकर अपनी प्रेयसी से दूर नंगलो की खाक छानता फिरता है। नया कुन-कण्टकों में अपना दिन विताता है। सन्चा कवि देश तथा काल की परिघि ने कभी बांधा नहीं जाता। कालिदास भी ऐसे ही विश्व कवि है। कालिदास के प्रकृत-चित्रण की विशेपना तथा मेघदूत के आध्यात्मिक सन्टंग का वर्णन अन्यत्र किया जायगा । । में वीय हिन्दी परिषद के कार्यकर्ताभी को बधाई देता हू जिन्होंने व्रजभाषा के टन मान्य कवियो के मरस अनुवाद को एक साथ प्रकाशित कर रसिको का आनन्दवर्द्धन किया है। काव्य मर्मनो को इन अनुवादो में विशेष आनन्द प्राप्त होगा। कालिदाम की वाणी की यही महिमा है:- अस्पृष्टदोषा नलिनीव दृष्टा, हारावलीवयिता गुणोध । प्रियार पालीवविनया, न कालिदासापरम्य वाणी ।। महाशिवरात्रि, २०१२ नम्बत् बलदेव उपाध्याय प्रथम भूमिका उपमा अलंकार में कालिदास से बढकर अब तक कोई कवि भारतवर्ष में नहीं हुआ और उनके गन्थो में मेघदूत भी इसी अलकार की उत्कृष्टता के कारण सराहने योग्य गिना जाता है। इस छोटे से काव्य को पढ कर पढने वाले के चित्त पर अक-सा हो जाता है कि विधाता ने कालिदास को कितनी बडी कल्पनाशक्ति दी थी। मनुष्य की प्रकृति जानने और स्थान का वर्णन करने और स्वभाव का लालित्य दिखाने में यह कवि एक ही हुआ है। मेघदूत का अवलोकन करने से ये उत्तम गुण कालिदास के भली भांति दीखते हैं। उनके वाग्विलास की बडाई जितनी की जाय थोडी है। इस काव्य का प्रकरण संक्षेप में यह है कि कोई यक्ष अपने काम में असावधान हो गया। तब उसके स्वामी कुबेर ने कोप कर उसे बरस दिन के लिये देश निकाला दिया। इस शाप के वश वह अलकापुरी को छोड दक्षिण में रामगिरि पर्वत पर अकेला जा रहा। जब उस पहाड में रहते कुछ दिन बीत गये और असाढ़ का बादल उमडा, उस विरही को अपनी स्त्री की बहुत सुधि आई, उसने मन में सोचा कि प्यारी के पास कुछ कुशल का सन्देसा भेजना चाहिये। बादल के सामने खड़ा हुआ इसी सोच-विचार मे था कि प्रेम की अधिकता मे विह्वल हो गया, बादल ही को दूत बना कर अलका- पुरी का मार्ग बताने और अपना संदेसा सुनाने लगा। रामगिरिसे अलका तक जो- जो नदी और पहाड और तीर्थ और मुख्य-मुख्य नगर और देश हैं उनका थोडा- योडा पता देता गया है । पहले ६५ श्लोकोंमें अलका तक पहुँचाया है इसीका नाम 'पूर्व मेघ' है, फिर 'उत्तर मेघ' के ५१ श्लोकों मे अलकापुरी की शोभा और यक्षिणी की दशा वर्णन करके अपना संदेसा बतलाया है। निदान जव बादल से कहे हुए सदेसे का वृत्तान्त कुबेरे के कान तक पहुचा उसने दयालु होकर यक्ष का अपराध क्षमा किया और स्त्री-पुरुप का संयोग बरस दिन बीनने से पहले ही करा दिया। हमने हिन्दी छन्दों में यह उल्था अभी पूर्व मेघ का किया है, परन्तु

[ ५२ ]
एक भाषा के
विचार है कि यदि अवकाश मिला तो उत्तर का भी करेंगे।
छन्द को दूसरी भाषा के छन्द में उल्या करना कुछ तो आप ही कठिन होता
है तिस पर हमारा नियम है कि मूल से उन्था न्यूनाधिक न हो और भाव में भी
कुछ विरोध न आवे। इसी से कठिनाई अधिक दीसती है। फिर भी हम
आशा करते है कि हमारे इस तुच्छ आरम्भ को देख कर कोई हिन्दी भाषा की
अल्पता का दोष न दंगा किन्तु विदित होगा कि यह भाषा बड़े
विस्तार की है।
इति शुभम्
२८ जून १८८२ ई०
दूसरी भूमिका
सन् १८८२ ई० में मेघदत के पूर्वार्द्ध का अनुवाद हिन्दी भाषा के छन्दो में
करके मैंने प्रतिज्ञा की थी कि यदि अवकाश मिला तो उत्तरार्द्ध का अनुवाद भी
इसी भांति करके प्रकागित कराऊँगा। देवकृपा से वह प्रतिज्ञा पूरी हुई। अव
दोनो भाग इकटठे छापे जाते है।
२८ फरवरी १८८४ ई०
तीसरी भूमिका
जितनी आया थी उससे अधिक माग इस ग्रन्थ की हुई इससे जाना गया
कि हिन्दी के रसिका में इसने पूरा आदर पाया। पहले जो कुछ दोष रह गए
थे अव तीसरी बार के छापे में दूर कर दिये गए हैं।
आगरा, २२ जुलाई १८९३ ई०
--लक्ष्मण सिह

निवेदन राजा लक्ष्मण सिह का जन्म ९ अक्टूबर सन् १८२६ को आगरे में हुआ था। पांच वर्ष की अवस्था में इनका विद्यारम्भ कराया गया और ८ वर्ष तक ये घर पर संस्कृत, हिन्दी और फारसी पढते रहे। यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकने पर १३ वर्ष की अवस्था में ये स्कूल में पढने लगे और २० वर्ष की अवस्था में इन्होने उस समय की सबसे ऊँची परीक्षा में उत्तीर्ण हो कालिज की पढाई समाप्त की। सन् १८५० ई० मे ये अनुवादक के पद पर नौकर हुए। पांच ही वर्ष मे ये तहसील- दार नियत हुए यहां इन्होने इस योग्यता से काम किया कि दो ही वर्षों में ये डिप्टी कलक्टर बना दिये गये। इस पद पर ये निरन्तर उन्नति करतं गये और अन्त में सन् १८८८ में ४०० रु० मासिक की पेंशन लेकर अपने घर आगरे मे रहने लगे। इनका देहान्त आगरे ही में १४ जुलाई सन् १८९६ को हुआ। सन् १८५७ के बलवे के समय इन्होने गवर्नमेंट की बड़ी सहायता की थी। उसके उपलक्ष में इन्हे आगरे के पास ही एक इलाका माफी मिला और २००० रु० की खिलअत दी गई तथा सन् १८७७ के दिल्ली दर्बार में राजा की उपाधि अर्पित हुई। सबसे पहले सन् १८६१ में इन्होने शकुन्तला नाटक का हिन्दी गद्य में अनु- वाद किया। इस अनुवाद की वडी प्रशंसा हुई, यहा तक कि इङ्गलेण्ड में इसका एक संस्करण अंगरेजी में टीका टिप्पणी सहित छपा जो अब तक प्राप्य है । पीछे सन् १८८९ में राजा लक्ष्मण सिंह ने इस नाटक का दूसरा संस्करण किया जिसमे गदा के स्थान-गे गद्य और पद्य के स्थान मे पदा में अनुवाद हुआ। अनुवाद मी बहुत अच्छा हुआ। सच बात तो यह है कि राजा साहव ने इस नाटक के अनुवाद मे जैसी सुन्दर, रसीली और सीधी भाषा का प्रयोग किया है वेसी आज तक किसी और की लेखनी से नहीं निकली। यह [ ५४ ] नन १८७८ में राजा साहव ने रघुवंश का अनुवाद हिन्दी गद्य में किया। यह अनुवाद भी अच्छा हुआ है। नीमरा ग्रन्य राजा साहब का मेघदूत का पदयात्मक अनुवाद है। सन् १८८२ में इस ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध का अनुवाद प्रकाशित हुआ और सन् १८८४ मे सम्पूर्ण मून्य का। इसके अनन्तर सन् १८९३ में इस गन्थ का तीसरा संस्करण राजा गदव ने पवाया। अव यह गन्थ एक प्रकार से अप्राप्य है । कठिनता से ऋहीं कहीं इसकी प्रति देखने को मिल जाती है। यद्यपि मेघदूत के अनेक अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं और वरावर प्रक्रागिन होते जाते हैं पर इस बात के कहने में कोई भी सकोच नहीं होता कि राजा साहब का अनुवाद बहुत ही अच्छा हुआ है और कई बातों में इसकी समता दूसरे अनुवाद नहीं कर नकते। इन नीन गन्यो के अतिरिक्त राजा साहब ने 'प्रजाहित' नाम का एक पत्र निकाला था और 'दण्ड-संगह' नाम से नाजीरान हिन्द का हिन्दी में अनुवाद किया था। गवर्नमेंट के लिए इन्होंने कई अन्य गन्यों का अनुवाद भी किया है, परन्तु राजा साहब की उत्कृष्ट कृतियो में से केवल शकुन्तला, रघुवंग और मेघदत के अनुवाद है जो हिन्दी-संसार में उनकी कीर्ति को बनाए रखने के लिये अलम् है। यद्यपि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिन्दी गद्य को एक स्थिर रूप देकर उनको परिवृत और प्रभाद-गुण-सम्पन्न बनाया परन्तु लल्ललाल के पीछे राजा लक्ष्मण सिंह ने ही उनके नये रूप को काट छाट कर सुन्दर और मनोहर बनाया। हिन्दी गटय को उत्कृष्ट रूप देने का यश मारतेन्दु हरिश्चन्द्र को प्राप्त है पर इसमे नन्देह है कि यदि राजा लक्ष्मण सिंह अपनी लेखनी द्वारा उसे एक उत्तम रूप न दे गये होते तो भारतेन्ट जी को अपने उद्योग में इतनी सफलता प्राप्त न होनी। उखनऊ श्यामसुन्दर दास १-१०-१७ *:

"समर्पणा
To,
Fs Growse, Esr. C. I. E.,
Magistrate and Collectoř of Buland Shahar.
In recognition of his interest,
In the Development of Hindi
Literature.
This Metrical Hindi Version of the Cloud Messenger
of Kalidas is dedicated by the
Buland Shahar
Translator
24th June 1882
~
.
श्रीयुत
फ्रेडरिक सीलीन गुरूंस साहिब
एम० ए० सी० आई० ई०
.
को
हिन्दी भाषा के प्रद्योत्साही जानकर
कालिदास के मेघदूत काव्य का यह
हिन्दी छन्दवद्ध अनुवाद उलथाकार ने
उनको अर्पण किया ।

इनते समालोचना श्री ल० श्रीयुक्त क० व० सु० सम्पादक महाशय ! मेघदूत हिन्दी अनुवाद बुलन्द गहर के डिप्युटी कलेक्टर राजा लक्ष्मण सिह बहादुर कृत । दोहा - समालोचना धन्य वन्य भारत वरस, सकल वरस सिरताज । जहा व्यास वलमीक सम, प्रगटे कवि कुल राज ॥ १ कालिदास भारवि प्रभृति, उपजे याही ठौर । ऐसे अनत न होयंगे, भये नहीं कहुँ और ॥२ श्री गावर्द्धन भट्ट हरिचन्द्र आदि कवि राइ । रत्न सुभारत भूमि के, अधिक सुहाइ ॥३ इनकी रचना वाहिनी सज्जन हृदय सुटेस । सींच रही अभिनव रुचिर, तरल तरग असेस ॥ ४ जो भारत कवि सहज ही, कियो चित्र निर्मान । औरन से नहि हो सकी, प्रवल परिश्रम ठान ॥ ५ यह सौरभ माधुर्य्य पुनि, यह लालित्य रसाल । और कही नहि पाइयो, खोजो तीनहु काल ॥ ६ मेघदूत रचना मधुर, कालिदास कविराज । वनी अलौकिक रसमयी, जानत विवुध समाज ॥ ७ ता भापा अनुवाद अब, लक्ष्मण सिंह नरेश । कियो चन्द स्वच्छन्द है, कवि कुल कमल दिनेश ॥ ८ "जितनो आशय मूल में, जितने पद कवि उक्त । जितनो भाव जहा लिखो, उतनो कियो युयुक्त ॥ ९ उनहीं के पर्याय पद उनहीं के समर्थ । उनहीं ते वादित कियो लियो न और समर्थ ॥ १० विन संसय कहिये यही अति रसमय अनुवाद । बायन रसिकन के हृदय उपजे विविध प्रसाद ॥ ११ "देखी विरही एकविध समझायो निजदूत । गद्यपद्य कर तीन विध समझायो नृप दूत ॥ १२ दयाल ऐसे ऐसे सुनो जो विरही हितकार । मेघदत सा दूत सो समझायो कह वार । करत है मापा वारिध चन्द । औरहु रचना चन्द्रिका करि हरिह दुखद्वन्द ।। १३ -राधाचरण गोस्वामी को दयाल अव यह आगा राय देवीप्रसाद 'पूर्ण जीवनवृत्त - हिन्दी साहित्य-वाटिका को अपने “धारा-धर" की अजस्र पीयूष-धारा से सिंचित कर उसमें समस्त ऋतुओं के अनुपम वैभव-विलास का दिग्दर्शन कारानेवाले और 'चिर-वसंत' को प्राप्त करने की युक्ति वतानेवाले कवि पूर्ण का जन्म सवत् १९२५ मार्गशीर्ष-कृष्ण १३ को, जबलपुर में रायवंशीधर वकील के घर हुआ था । माता का नाम यमुना या जैसा कि ये स्वयं अपनी पुस्तक "राम-रावण-विरोध" में लिखते हैं- "सुमिरि जस पुलकि उठत मम गात, श्री जमुना जननी शुभ मेरी श्री वंशीधर तात, भद्र भद्रपुर सुठि गृह मेरो वृत्ति सुछंद सुहात, 'पूरन' चित्रगुप्तवंशी कवि-संगति लहि हरखात ।" इनके पूर्वजों का स्थान भदरस या भद्रपुर गाँव है जो कानपुर की घाटमपुर तहसील में स्थित है। मुगलों के समय में इनके पूर्वजों को ८४ गाँवो के साथ रु० ३०००) वार्षिक मिला था । उसी समय से इनकी वंश-परम्परा में 'राय' की पदवी चली आ रही है। इसी वंश मे कई पीढियों के बाद मुन्शी राम- गुलाम जी कानूनगो हुए जिनके एक पुत्री और चार पुत्र थे। इनके नाम थे, अयोध्याप्रसाद, लीलाधर, बंशीधर, और मुरलीधर । रामगुलाम जी बड़े सौभाग्यशालो थे क्यों कि इनके सभी पुत्र योग्यता में एक से एक बढ कर थे। लीलाधर जी मध्यप्रदेश मे “एक्सट्रा-असिस्टैन्ट-कमिश्नर" थे, अयोध्याप्रसाद जी पुलिस मे इन्स्पैक्टर थे और वशीधर जी जबलपुर मे वकालन कर रहे थे। शिशु देवीप्रसाद में अपने इस प्रतिष्ठित वश के सभी गुण पूर्णरूप से विद्यमान थे। किन्तु विधाता ने इस बालक के प्रति घोर अन्याय किया, चार वर्ष की अवस्था मे ही उसे अपने पिता की छत्रछाया से वचित होना पड़ा। परन्तु चचा लीला- धर ने कभी भी उसे पितृ-प्रेम के अभाव को खटकने न दिया और बड़े लाड-प्यार [ ५८ ] से उन्होने देवीप्रसाद का पालन-पोषण अपने पुत्र, दुर्गाप्रसाद के साथ किया। इसीलिए देवीप्रसाद जी का अपने भैया के साथ अन्तिम समय तक अत्यधिक प्रेम था। बाल्यावस्था से ही देवीप्रसाद अत्यन्त सुशील, शान्त और नम्र स्वभाव के थे किन्तु बुद्धि इनकी कुशाग्र थी। किसी सीमा के बन्धन में इनकी प्रतिभा नहीं रह सकती थी। इसीलिए ये जहाँ एक ओर सगीत और काव्य-कला के उपासक थे वहीं दूसरी ओर ये गणित जैसे नीरस विषय के भी अनुरागी थे । विनीत इतने थे कि कभी भी अपने ज्ञान-सचय की चर्चा न करते थे। अपने स्कूल-जीवन से ही ये चुपचाप हिन्दी साहित्य का अध्ययन कर रहे थे किन्तु उस समय इनके सहपाठियों तक को इस बात का पता न था । इनकी योग्यता का अनुमान तो इनके परीक्षाफलो से ही हो जाता है। इन्होंने मिडल-परीक्षा रायपुर जिलास्कूल से प्रथम श्रेणी में पास की और छात्रवृति प्राप्त की। सन् १८८४ में कलकत्ता विश्वविद्यालय की मैट्रिक परीक्षा में प्रथम आए। ( उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय के क्षेत्र में बंगाल हो नहीं देश का अविकाश भाग या) इसी प्रकार इन्होंने एफ. ए. और बी. ए. परीक्षाएँ मी फलकत्ता विश्वविद्यालय से पास की। इन्होने गणित लेकर बी० ए० ऑनर्स किया था। अपने पिता के पद-चिन्हों पर चलने की इच्छा के कारण इन्होने बी० ० एल० भी पास किया। कुछ दिन तक जबलपुर में ही अपने भाई रायदुर्गाप्रसाद के साथ वकालत की। उसके बाद कानपुर मे अपना काम शुरू किया। इनका विवाह भोपाल के मुशी शकरप्रसाद 'दास' की कन्या से हुआ। 'दास' जी ही वास्तव में इनके काव्य-गुरु हैं क्योंकि सर्वप्रथम उन्हीं ने पूर्ण जी की आरम्भिक कविताओ को शुद्ध किया था और साथ ही उनको काव्य-शास्त्र- सम्बन्धी मुख्य नियम भी समझाए थे। यों तो कानपुर के कवि "ललित” के सम्पर्क में आने से भी इन्हें बहुत प्रेरणा मिली होगी किन्तु 'ललित' उनके काव्य- गुरु नहीं कहे जा सकते क्यों कि उनसे भेंट होने से पहले ही पूर्ण जी ने कविता- कामिनी का गार करना आरम्भ कर दिया था। प्रथम पत्नी की मृत्यु के बाद इनका दमरा विवाह कानपुर के हो वकील बाबू गोपाललाल खरे की बहिन से [ ५६ ] हुआ। परन्तु इनके साथ जीवन सुखी न हो सका। तब मित्रो और सम्बन्धियों के अत्यधिक आग्रह पर इन्हे विवश हो तीसरा विवाह करना पड़ा। नाटक खेलने का इन्हें बहुत शौक था। फाल्गुन महीने मे ये अपने गाँव में धनुष - यज्ञ को लीला कराते थे और स्वय भी उसमें भाग लेते थे। अपनी मृत्यु का आभास शायद इन्हें पहले से ही हो गया था क्योंकि मृत्यु के दो महीने पहले इन्होने अपने भाईसाहब को लिख दिया था कि, "मेरा नृत्य समाप्त हो गया है। आपके और भावज के दर्शन की अभिलाषा है।" ३० जून सन् १९१५ को दिन के बारह बजे के करीव ४७ वर्ष की अवस्था में पूर्ण जी काल की गंभीर लहरों में विलीन हो गए। सार्वजनिक जीवन पूर्ण जी कानपुर के सभी सार्वजनिक कार्यों में बड़े उत्साह से भाग लेते थे। कानपुर-म्युनिसिपल बोर्ड के आप सदस्य थे तथा कानपुर-प्यूपिल्स एसोसिएशन के सभापति थे। सनातनधर्म प्रेमी होने के कारण इन्होंने "श्री ब्रह्मावर्त- सनातनधर्म-महामंडल" की स्थापना की और जुलाई १९११ में इस संस्था की ओर से “धर्मकुसुमाकर" नामक पत्र निकाला। पूर्ण जी की वक्तृत्व-शक्ति इतनी तीव्र थी कि वे किसी भी समय किसी भी विषय पर घंटो बड़े प्रभावोत्पादक ढग से धारा-प्रवाह बोल सकते थे । पूर्ण जी थियोसोफिकल-सोसाएटी के भी सदस्य थे और श्रीमती एनी वीसेंट के प्रति इनकी बडी श्रद्धा थी ! पूर्ण जी के जीवन के साथ कानपुर के "रसिक-समाज" का उल्लेख अत्यन्त आवश्यक है। इन दोनों का तो अन्योन्याश्रय सम्बन्ध था। कानपुर आकर पूर्ण जी ने इस "रसिक-समाज” में नवजीवन सचरित कर दिया था और “रसिक- समाज" ने पूर्ण जी की कवित्व-शक्ति को विकसित करने में पूरा सहयोग दिया । पूर्ण जी ने "रसिक-वाटिका" नामक एक पत्रिका निकाली थी जिसमे इस "रसिक- समाज" के कवियों की कविताएँ प्रकाशित होती थीं। इस पत्रिका का जन्म अप्रैल सन् १८९७ मे हुआ था। इसके बन्द हो जाने पर जनवरी १९०५ को "रसिक-मित्र" का जन्म हुआ।

[ ६० ] रचनाएँ तथा विचार इनके राजनीतिक विचार नरम दल के थे, गरम दल की उग्रता से ये सहमत न थे। अपने इन विचारों को इन्होंने “स्वदेशी कुडल" में अभिव्यक्त किया है। यू तो पूर्ण जी भी व्रजभाषा की मधुरता के पक्षपाती थे किन्तु सन् १९१० पचीस दिसम्बर में इन्होंने खडी बोली में "स्वदेशी कुंडल” की रचना की। पृष्टी की यह एक छोटी सी पुस्तिका है और इसे उन्होंने अर्पण किया था सर्व- मावारण के हृदय में खदेगी का उत्साह पैदा करने के लिये उस वर्ष की "प्रयाग- प्रदगिनी के चिरस्मरणार्य सच्चे खटेशी के सच्चे अनुरागियों को,” इसमें वे अपने देशवासियों से कहते है- "सरकारी कानून का रख कर पुरा ध्यान, कर सकते हो देश का सभी तरह कल्यान । सभी तरह कल्यान देश का कर सकते हो, करके कुछ उद्योग सोग सब हर सकते हो । जो हो तुममे जान, जान, आपदा भारी सारी, हो सकती है दूर, नहीं वाधा सरकारी ।" इन पक्तियों से स्पष्ट है कि पूर्ण जी देशभक्त तो पूरे थे किन्तु वे बुद्धिमानी से काम लेना चाहते थे। इसी लिये तो वे अपने देशवासियों को जागृत करने के लिये पुकार पुकार कर कहते हैं। "विगत आलस की रजनी भई, रुचिर उद्यम की धु नि की धुनि छै गई । कुमति - नींद अहो अव त्यागिए, भरतखंड प्रजागण जागिए। x x पुज मनोरथ के खिले, मधुप पुरुपारय के विहित कारज मे इठ लागिए, भरतखड সলাত 'जागिए' ॥ ( पूर्ण मंग्रह, पृ० २०३, जागिए ) - x जलज 4ji मिले ।

[ ६१ ] अपनी “वसन्त वियोग” कविता में भी पूर्ण जी ने प्रकृति वर्णन के माध्यम से अपने देश-प्रेम को अभिव्यक्त किया है। यह पहले सन् १९१० मे 'सरस्वती' पत्रिका में छपी थी, उसके बाद सन् १९१२ मे "धर्मकुसुमाकर" में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुई थी। इस कविता में भारत के स्वणिम अतीत, वर्तमान दुर्दशा और आशापूर्ण भविष्य का सुन्दर वर्णन है। प्राचीन काल में भारत रूपी उपवन मे मधुमास सदा नृत्य किया करता था किन्तु एक दिन- "था जहाँ बारामास ऋतुराज चारु विलास, पहुँचा वहाँ भी रोग, भारी वसंत वियोग ! x x X विधि हो गया कुछ वाम, मालो हुए उद्दाम, घटने लगा निष्काम उस बाटिका का काम । x X x - अन्तिम बसन्त बिभास, रक्षक सुशील निवास, माली सु कुल सरताज । रणधीर पृथ्वीराज ॥ अति प्रबल रिपुदल जीत, था सकल शंकातीत तात उसका पर एक विश्वास का , कर घात दे मिल शत्रुओं के साथ बाग उनके हाथ । मरा घोर कलंक, ह्यां मिटा सुख का लैं अक ।"

[ २ ] किन्तु इस कविता का अन्त कवि इस भविष्यवाणी के साथ करता है- "आनन्द - चन्द्रिका की होगी उजियाली, 'पूरन' प्रबोच रवि चमकेगा द्यु तिशाली । इस भौति निवासी वर्ग मोद पावेगा, तुम चर्य चरो फिर भी वसन्त आवेगा ।" ( पूर्ण सग्रह पृ० १६६ ) पूर्ण जी प्रकृति के प्रेमी थे। अत इन्होंने प्रकृति का स्वतत्र वर्णन भी किया है और उद्दीपन के रूप में भी। इन्होंने अपने काव्य की चित्रपटो पर समस्त ऋतुओ की छटा को अकित किया है और चानक, चकोर, वीरवहूटी आदि को भी नहीं भूले हैं। वसन्नागम से चारो ओर नव-उत्साह छा गया है किन्तु एक ऐसी भी 'बावरी' है जो इसके बारे मे विलकुल वेखवर है। कवि कहता है- लाल बन बागन की भूरि छवि होन लागी, विकसन लागी भीर टेसू कविवंत की, गुजन मलिद लागै, विलसन लागी रैन आमा निसिकत की। वजन लगी है कुज वशी मंजु सावरे की, मोहन लगी है भीर खोय के सुरति एक वैठी गृह मान ठानि, वावरी अजौ न तोहि खबरि वसन्त की । अरविंद-पुजन पै गोपिन अनत की; ( पूर्ण संग्रह, पृ० १०० वर्षा का स्वतन्त्र रूप से वर्णन पूर्ण जी ने इस प्रकार किया है- "सुखद सीतल सुचि सुगंधित पवन लागी बहन, सलिल वरसन लगो वसुधा लही सुखमा लहन लहलही लहरान लागी सुमन बेली मृदुल, हरित कुसुमित लगे झूमन विरिछ मजुल विपुल ।" ( पूर्ण संग्रह पृ० १०९) । कारन अबलान अग अनत "शरद-ऋतु के निर्मल आकाश मे तारागण,” की शोभा को देखकर मनुष्य आश्चर्यचकित रह जाता है। किन्तु पूर्ण जी के पास इसका सुन्दर समाधान है- "सरद-निसा मे व्योम लखि कै मयक बिन, पूरण हिये में इमि बिचारे हैं, विरह जराई को दहत चंद्र, तातें आज तापै विधि कोपे दयावारे है। निसिपति पातकी को तम की चटान बीच, पटकि पछारि निपट विदारे हैं, ताते भयो चूर-चूर उचटे क्न, छिटिके सघन सो गगन मध्य तारे हैं।" ( पूर्ण संग्रह। पृ० ११७) पूर्ण जी की काव्य-प्रतिभा शृगार, शान्त और भक्ति-रस के क्षेत्र में अधिक चमकी है। भक्ति के बारे में उनका बिचार है- "सजि लीजिए हार सरोजन के चहै पीजिए जो हिम को जल है, चहै न्हाइये अमृत के सर में चहै खाइए जौन सुधा फल है। निगमागम 'पूरन' टेरि कहै वृथा चंदन चांदनी को बल है, हरि के पद-पंकज धारे बिना नर-हीतल होत न शीतल है।" पूर्ण जी की शातरस की कविताएँ अविकतर खडी बोली मे ही हैं, जैसे- "शकर की कैसी माया है, दिन है कहीं कहीं है रजनी, कहीं धूप कहीं छाया है।" ( पू० स० पृ० १८० ) वेदान्त मे इनकी बहुत रुचि थी। इसीलिये इन्होने शंकराचार्य के प्रसिद्ध वेदान्त-ग्रन्थ "तत्वबोध” का छन्दबद्ध अनुवाद "तत्वतरगिणि” के नाम से किया। "मृत्युजय” का भी अनुवाद किया था। सस्कृत के प्रसिद्ध काव्य "रभा-शुक्- सवाद" का हिन्दी रूपान्तर तो अत्यन्त मनमोहक बना है- रमा--"वीयी वीथी आम की कुज भावे, कुजे कुजै कोकिला गावै । - मत्त [ ६४ ] मान जाते गाये गाये मानिनी जावे जाते काम को रंग आवे ।" शुक-बीयी बीथी साधु को सग पैये , संगै संगै कृष्ण की कीर्ति गये । गाए गाए एकनाई एकै एकै सच्चिदानंद भासे' प्रकास , x X x x डारी, रमा-"श्यामा कामा सुन्दरी रूपवारी, गोरी भोरी काम की-सी सवारी । वाकी वाहे आपने कंठ भेटी नाही तो वृथा देहधारी । शुक-~"लक्ष्मी पी की सांवरी मूर्ति प्यारी, देवी देव की टेनहारी । चंद्रामासी मंद मुस्क्यानधारी, ध्याई नाही, ती वृथा देह धारी ।।" देव मोद कालिदास रचित "मेघदृत" का अनुवाद पूर्ण जी ने “धराधरधावन" नाम से ब्रजभाषा में किया था। इसका पूर्व भाग जनवरी सन् १९०२ मे प्रकाशित हुआ था और द्वितीय भाग उसी वर्ष मई में छपा था। इसकी भूमिका में पूर्ण जी ने लिखा है-"दोनों एक साथ इसलिये नही छपवाये गये कि हमको समग्र ग्रन्य प्रकाशित कराने के पहिले यह जानने की इच्छा थी कि प्रथम भाग पर विद्वानो की क्या सम्मति होती है। पूर्व मेघ का अनुवाद अवन्तिका-प्रसंग तक हरिगीतिका छन्द में और शेप नरेन्द्र छन्द में किया है। द्वितीय भाग का अनुवाद ३७ वें श्लोक तक दण्डक छन्द में हुआ है। उसके बाद गधरा में। पूर्ण जी द्वारा लिखित "चद्रकला भानुकुमार नाटक यद्यपि काव्य-सौन्दर्य मे परिपूर्ण है तथापि अभिनेयना की दृष्टि से अधिक सफल नहीं है । इन्टीने “राम-रावण विरोध" नामक एक छोटा सा चपू भी लिखा। सर्व- [ ६५ ] प्रथम यह संवत् १९६३ में "भारतमित्र" के पूजावाले अंक के लिये लिखा गया था और बाद अकतृबर सन् १९०६ में पुस्तक रूप में छपा था "राजदर्शन” मे १६११ के दिल्ली दरबार का वर्णन है किन्तु इसका कोई साहित्यिक महत्व नहीं है क्यों कि उस समय के प्रायः सभी स्वदेश-भक्त कवियों को सरकार की कोप-दृष्टि से बचने के लिए अपनी राजभक्ति का प्रदर्शन करना पडता था। प्रो० उर्मिला भंडारी एम० ए० कालिदासत्रयी किसी से भी पूछ देखिये कह देगा कि कोलिदास विक्रमादित्य के सम- कालीन ये। कितने कालिदास और कितन विक्रमादित्य का प्रश्न उसके सामने नहीं। लेकिन पुराणवादी जो तीन तेरह के चक्कर में पड़े रहते हैं, उनका कहना है कौन सा कालिदास किस विक्रमादित्य के शासन में हुआ। पीछे की कौन कहे ? राजशेखर के पहले भी तो तीन कालिदास हो गये हैं और विक्रमादित्यों की तो गणना ही कौन करे। लेकिन भ्यान से देखना होगा स्वयं राजशेखर का मत क्या है एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो न केन चित् । शृंगारे ललितोद्गारे कालिदासत्रयी किमु ॥६० ॥ ( सूक्ति मुक्तावली, कविकाव्य प्रशसा) इसका निश्चित इसी के आधार पर तीन कालिदासो की सम्भावना स्थिर है। किन्तु राजशेखर की उक्ति का सीधा अर्थ यह है कि कालिदास का एक ही काव्य उन्हें सर्वोपरि सिद्ध करने में पर्याप्त है, फिर उनके तो तीन काव्य हैं और तीनो में ललितोद्गार है शृगार का। अस्तु शृङ्गार मे ललिन चित्रण में उनकी समता तो कोई कर ही नहीं सकता। इसकी कल्पना भी कठिन है। निर्देश हे कवि कालिदास के तीन ललित प्रवन्धों की भोर, न कि तीन कालिदासो को ओर । कुमारसम्भव और मेघदूत का तो कहना ही क्या ? रघुवश में भी इसी ललिनोद्गार की प्रमुखता है। यहा तक कि कवि नाडका' के निधन के प्रसग में लिखता है। राम मन्मय शरेण ताड़िता दु:महेन हृदये निशाचरी । गन्धवद्रुधिरचन्दनोक्षिता जीवितेश वसति जगाम सा ॥ २० ॥ ११ इनीने जाना जा सकता है कि शृङ्गार के ललितोद्गार तथा 'झार' और 'ललिनोदगार' में कालिदास का महत्त्र क्या है ? उनकी शत्रयी मे भी यही के साथ बात है। 'मालविकाग्नि मित्र', 'विक्रमोर्वशीय' एवं 'अभिज्ञानशाकुन्तल' तीनों में शृङ्गार और ललितोद्गार है। निदान राजशेखर के उपर्युक्त कथन के आधार पर एक कालिदास को तीन कालिदासों में बांटना ठीक नही। कालिदास का समय राजशेखर ने लिखा है- इह कालिदास मेण्ठावयामररूप सूर भारवयः । हरिश्चन्द्र चन्द्रगुप्तौ परीक्षिताविह विशालायाम् ॥ इसमे ‘परीक्षितौ प्रयोग बड़े काम का है जिससे सिद्ध होता है कालिदास तया मेण्ठ काव्यकार के रूप में परीक्षा हुई । इससे भी स्पष्ट होता है कि कालिदास तथा मेण्ठ समकालीन थे। मेण्ठ के विषय मे कल्हण का कयन कि 'विक्रमादित्य तोप्यासीदभिगम्यः शुभार्थिनाम् ॥ २५८ ॥ अन्तरज्ञतया तस्य तादृश्या कृतसत्कृतिः । भर्तृ मेण्ठ. कविमने पुनरुक्त श्रियोर्पणम् ॥ २६२ ॥ ( राजतरगिणी, तृतीय तरंग ) इससे जाना जाता है कि 'मेण्ठ' वा 'भर्तृ मेण्ठ' मातृगुप्त के समकालीन थे और मातृगुप्त काश्मीर के शासक थे 'विक्रमादित्य' की ओर से । इस प्रकार इन सब का एक ही काल में होना आप ही सिद्ध हो जाता है। किन्तु कल्हण ने विक्रमादित्य का जो परिचय दिया है वह स्थिति को स्पष्ट करने में पर्याप्त नहीं है। इस विक्रमादित्य का दूसरा नाम यदि 'हर्ष न दिया गया होता तो आप इसे चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ही समझते और इसी प्रकार यदि मातृगुप्त का नाम न होता तो आप इस 'कवि' को भी कालिदास ही समझते । कल्हण के 'शकारि' को लीजिये और देखिये उसके विषय में किसी और का कुछ कहना है अथवा नहीं। सो सौभाग्य से कवि अभिनन्दन की साखी सामने है। हालेनोत्तमपूजया कवि वृष. श्री पालितो लालितः ख्याति कामपि कालिदासकृतयो नीता शकरातिना । श्रीहो विततार गद्यकवये वाणाय वाणी फ्ल सद्यः सक्रिययाऽभिनन्दमपि च श्रीहार वर्षोऽग्रहीत् ।। ( रामचरित, गयकवाड प्राच्यमाला ४६ सर्ग ३३ ) [ ६८ ] इससे इतना तो स्पष्ट हो गया कि कालिदास की ख्याति में किसी कारि राजा का भी हाथ है। इसी 'शकारि' के सम्बन्ध में अभिनन्द कहता है। गफ भूपरिपोर नन्तरं कवयः कुन पवित्र संकथा. युवराज इवायमीक्षितो नृपति काव्य कला कुतुहली ।। ( रामचरित, सर्ग २२ ) नमो नृपतिचन्द्राय पृथ्वीपालाय येन सा । विकालमलिना दिक्षु दर्शिता कवि पद्धति. ॥ ( रामचरित, सर्ग ४ ) इमसे स्पष्ट है कि 'अभिनन्द' की दृष्टि में पृथ्वीपाल नृपति 'चन्द' ही 'शकारि' और कवि कालिदास की ख्याति के कारण हैं। किन्तु यह भी कहा गया है कि राजा विक्रमार्क को व्याख्यात किया है कवि कालिदास ने- वाल्मीक प्रभवण राम नृपतियासेन धर्मात्मजः । व्याख्यातः किलकालिदास कविना श्री विक्रमार्कोनृपः ॥ सुभाषित अस्तु कालिकाम का एक ओर 'शकाराति' से सम्बन्ध है तो दूसरी ओर 'विक्रमार्क' वा 'विक्रमादित्य' से। और इतिहास के जानकार कहते हैं कि वास्तव में 'विक्रमार्क' ही 'शकाराति' वा 'शकभूपरिपु' किवा शकारि भी हैं। चन्द्रगुप्त काव्यकार भी थे क्योंकि उनके विषय मे वाण का कथन है- पदवन्धोज्ज्वलोहारि कृतवर्ण क्रमस्थितिः । भट्टार हरिश्चन्द्रस्य गद्यबन्धो नृपायते ॥ १८ ॥ ( इ चरिन, प्रथम उछ्वास ) श्री भगवद्दत्त की गोध है- शक १०१ ( स० ११:८) का वेद्यराज तथा गद्यपद्य कवि महेश्वर अपने विश्वप्रकाश कोग की भूमिका में लिखता है श्री माहसाक नृपतरनवद्य वद्या विद्यानटग पदमद्वय मेव विभ्रत् । यवन्दचारुचरितो हरिचन्द्र नामा स्वव्याख्यया चरक तन्त्र मलचकार । सूक्ति मुनावली पृ. ८९, पृ० ४४, एपिग्राफिया इ डिका, भाग, ७ पृ० ३६ [ ६६ ] काम्बे ताम्रपत्र, संजन ताम्रपत्र, हषचरित पष्ठ उछ्वास, सरस्वती कण्ठाभरण तथा काव्य मीमासा अभ्याय १०, पृ० ५०, इत्यादि के आधार पर साइसाक तथा चन्द्र गुप्त और शकारि के एक होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। कहा जा सकता है कि उज्जयिनी का 'साहसाक' कोई और है, चन्द्रगुप्त तो मगव का सम्राट है। मुद्राओ इत्यादि के आवारपर तथा ताम्रपत्रो इत्यादिक के पुष्ट आवारो पर निश्चित हो जाता है कि ई० ४०१ तक चन्द्रगुप्त राजर्षि समझे जा रहे थे। इसी विजय से चन्द्रगुप्त विक्रमाक बने, विक्रमादित्य की प्रतिष्ठित उपाधि से विभूषित हुए और उज्जयिनी को राजधानी का पद मिला। कर्नाटक के कुछ शासको ने उन्हें उज्जयनीपुरपराधीश्वर कहा भी है। अस्तु चन्द्रगुप्त उज्जयिनी नाथ बिक्रमादित्य भी है। कालिदास का नीति चातुर्य 'कुन्तलेश्वर दौत्य' के आधार पर स्थिर होता है कि कभी कालिदास ने विक्रमादित्य की ओर से दूत का कार्य भी किया था। इसका उल्लेख कुन्त- लेश्वर ने 'औचित्य विचार चर्चा में किया है। इस प्रसग मे कालिदास के इस दौत्य कर्म का सम्बन्ध कुछ विद्वानो ने विवाह व्यापार से जोड़ा है। किन्तु हमारी समझ में इसका प्रणय से कोई सम्बन्ध नहीं । उसमें खरी राजनीति भरी थी। सामन्त और सम्राट की मर्यादा का प्रश्न था । भोमदेव के ऋगार प्रकाश, ( अष्टम प्रकाश ) से हो जाता है। इसका समर्थन 'कुन्तल' का जो प्रदेश ‘कदम्बकुल' से निकल कर 'वाकाटक' वश मे चला गया था वही जब फिर श्री कृष्ण वर्मा के उद्योग से कदम्बकुल के हाथ लगा और प्रभावती गुप्ता के हाथ से जाता रहा तब उस के पिता चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को इस की विशेष चिन्ता हुई। और जब उन्होंने उस के 'अश्वमेव' का रंग देखा तब ताड़ गए कि यह कुछ और चाहता है। तब उसे साधने के लिए कालिदास को दूत बना कर भेजा और कालिदास ने छूटते ही दिखा दिया कि चास्तव में सामान्त' और 'सम्राट' के व्यवहार में क्या भेद होता है और चक्रवर्ती के लक्षण क्या हैं ? ( कुन्तलेश्वर दौत्यम् ) यह उनकी नीति निपुणना का ज्वलन्त प्रमाण था।

[ ७० ] इस प्रकरण से कालिदास को नोति निपुणता का आभास तो मिल ही जाता है , पर यदि कहा जाय कि वास्तव मे इन्ही कालिदास ने 'विक्रमादित्य' के शासन मे 'मातृगुप्त' के नाम से काश्मीर का शासन भी किया था तो आप को विश्वास शायद न हो। लेकिन इस प्रसंग में कत्हण ने क्या कहा है यदि उसे भी देखा जाय तो लाभ होगा- विक्रमादित्यमुसिक्तमुच्छेत्तु, यतते मन. मातृगुप्तप्रति न नो रोषेणारुपित मनः ॥२८२॥२॥ प्रवर सेन की श्री विक्रमादित्य से गहरी शत्रुता है। वह पितृशोक के कारण आंसू पीकर रह जाता है और विक्रमादित्य के उन्मूलन का सकाप करता है ( रा० त० २६६॥३॥ ) आगे चलकर यह कहता है कि मातृगुप्त का अभिषेक कुछ 'आमात्यो' को नहीं भाया और उन्होने युद्ध का उपाय सोचा किन्तु प्रवर सेनने उसे उचित नहीं समझा। (रा० त० २८१॥३॥) लेकिन बाद 'विगत' को जीतकर जब वह आगे बढ़ रहा था उसी समय उसने विक्रमादित्य के निधन का समाचार सुना । मातृगुप्त ने काश्मीर का त्याग कर काशी की शरण ली। प्रवरसेन की मातृगुप्त से भेंट हुई तब उसकी आँख खुली और वह समझ सका कि मातृगुप्त और विक्रमादित्य क्या थे ? करहण की दृष्टि में भी मातृगुप्त कवि ही हैं। नाना दिगन्तराख्यात गुणवत्सुलभ नृपम् । त कविर्मातृगुप्ताख्य. सर्वस्थानस्थमासदत् ॥१२९॥ रा० त० केवल कवि ही नहीं कहता उन्हे खुले रूप में 'कवीन्द्र' कहता है- तदाकर्ण्य महीपाल. सावुवादे. परिश्रमम् । अभिनन्द्य क्वीन्द्र त पूर्वग्थान व्यसर्जयत् ॥१८२॥३॥ रा० त० कालिदास के समय में उन्हें छोडकर किसकी दृष्टि में कोनसा कवि 'क्वीन्द्र' बना और आज भी उनको छोडकर कौनसा 'मातृगुप्त' उस का अधिकारी है ? काश्मीर में जाकर उसने जिस भागवतता का परिचय दिया वह उसकी नहीं उसके 'परम भागवत' प्रेपक की भावना थी। मातृगुप्त को केवल इस आधार पर कालिदाम से अलग नहीं किया जा सकता। अस्तु मातृगुप्त को [ ७१ ] कालिदास मानने में कोई बाधाशेष नहीं रह जाती, कालिदास यदि स्वच्छन्द कवि का प्रतीक है तो मातृगुप्त ‘शासक' और 'प्रतिरूप' का। परन्तु काव्य दोनो को इष्ट हैं। परिवार कल्हण की राजतरंगिणी से अवगत होता है कि विक्रमादित्य के यहां 'मातृगुप्त' का प्रवेश कवि के रूप में नहीं 'भृत्य' के रूप में हुआ था और 'भृत्य' के कार्य से प्रसन्न होकर ही राजा ने उन्हें काश्मीर का राज्य दिया था। लेकिन मेरुतुगाचार्य कुछ और ही गाथा सुनाते हैं और कालिदास को ‘पशुपाल, के रूप में विक्रमादित्य का जामाता बना देते हैं। उनके कहने का साराग - यह है- अवन्ती के राजा विक्रमादित्य की पुत्री प्रियंगुमंजरी' जब पढ़ लिख कर पंडिता हो गई तब यौवन मद के कारण उसे अपने आचार्य वररुचि से परिहास की सूझी। परिणाम यह हुआ कि उन्होने उसका गर्व चूर करने लिये किसी प्रकार उसका विवाह एक महामूर्ख पशुपाल से करा दिया । जब भेद खुला तब भर्त्सना के अतिरिक्त प्रियंगु' के लिये और क्या रह गया । लेकिन पशुपाल भी अपनी आराधना से कालिदास बन गया। [ प्रवन्ध चिन्तामणि, सिंघी जैन ग्रन्थमाला १९८९ वि० पृ० ४५ ] कालिदास की कृतियों के अध्ययन से इतना तो व्यक्त हो जाता है कि उज्ज- यिनी , उनकी भोगभूमि है। मेघदूत (२७, २८, २९, ३९, ४० ) अथवा रघुवंश ( ३५॥६॥ ) इत्यादि में उज्जयिनी का वर्णन मिलता है उससे वह उनकी क्रीडा भूमि ठहरती है। इनके जीवन के सम्बन्ध में एक अन्य सूचना भी मिलती है। श्री तारानाथ जैसे प्रसिद्ध विश्रुत बौद्ध का कहना है कि कालिदास का विवाह वाराणसी के राजा भीमशुक्र की विदुषी दुहिता 'वासन्ती' से हुआ। वररुचि यहा भी घटक हैं और कालिदास पशुपाल। भेद नाम मात्र का है। विशेषता यह है कि यहां कालिदास को 'मगध' का बताया गया है। यहा राजकन्या की प्रेरणा से कालिदास फूल जुटाते और काली की आराधना करते हैं। परिहास में उसकी [ ७२ ] हुआ है। दासी प्रसाद के रूप में अपना चबाया पान देती है और काली के प्रसाद को प्रत्यक्ष पाने से प्रसन्न हो वह उसको निगल जाते है। बस इसीसे उनमें दिव्य शक्ति का उदय होता है। दामी और वररुचि का उल्लेख प्रायः एक ही रूप में अन्तर केवल नाम और स्थान का है। मेस्तुगाचार्य के यहा 'उज्जयिनी है तो तारानाथ के यहा 'वाराणसी'। पहले में 'विक्रमादित्य' है तो दूसरे में 'भीमशुक्क'। 'प्रियंगुमजरी' तथा 'वासन्ती' का नाम भेद भी कुछ ऐमा ही है। समय की दृष्टि से पहला सन् १५७० ई० के पहले का है तो दूसरा सन् १६०८ ई० का। मैसूर नया मगव में प्रचलित प्रवादों से पता चलता है कि कालिदास जन्म से ब्राह्मण थे। माता पिता के अभाव में एक ग्वाले ने उनका पालन पोषण किया था। मिथिला मे तो दामोदरपुर का नाम भी बनाया जाता है और वहीं का ग्वाला इनका पालक कहा जाता है। जनश्रुतियों में जो समानतथ्य मिलता है वह भी बड़े काम का है चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का जो सम्बन्ध मगध और अवन्नी से है उसे हम जानते हैं और 'साइसाक, तथा 'भीम' एवं 'आदित्य' तथा शुक में जो ज्योति है उसे भी हम भूल नहीं सकते। 'विक्रमोर्वशीय' के प्रमंग में किसी 'काशीराजपुत्री' को किसी 'कुवेर नागा' के रूप में भी देखा जा चुका है। तो क्या इन के अधार पर यह स्थापना नहीं की जा सकती कि वास्तव में कालिदास का विवाह 'श्री प्रमावती गुप्ता' की किसी सगी वहिन से हुया था। विक्रमोर्वशीय की अपभ्रंश भी तो 'भाभीरादिगिर' का ही प्रमाण है। अत' यहो यात सत्य ठहरती है कि कालिदास का विवाह विक्रमादित्य साइमाक' की राजदुहिता से हुआ था और उम के संसर्ग से इनमें कविता का बीज फूटा। कालिदास का कुछ लगाव प्रमावती गुप्ता से प्रत्यक्ष है। . उस के पुत्र 'प्रवरमेन' के लिए 'सेतुबन्य' की रचना चाहे उन्होने न भी की हो पर उसका समोबन ठन्होने अवश्य किया था। 'ऋतुसहार' तया 'मेघदूत' में विन्ध्य नया आम्रकूट इत्यादि के ललिन वर्णनो से भी निश्चय स्थिर होता है कि इम अचल से कालिदास का कुछ अति घनिष्ट सम्बन्ध होना चाहिए। कालिदाम की रचनाओं में 'ऋतुमहार' और मेघदूत ही दो ऐसी रचनाएं हैं इस दृष्टि से देखा जाय तो. कवि की सयोग जिनमें कवि मर्वया स्वच्छन्द है।

[ ७३ ] और वियोग की लीला भूमि भी यही प्रदेश है। अतः अधिक सम्भावना है कि कवि का निवास भी यही कहीं रहा होगा। यहां का मार्ग भी कुछ वक्र है केवल उज्जयिनी का ही नहीं। त्वय्यायत्त कृषिफल मिति भूविकारनभिज्ञैः प्रीतिस्निग्धैर्जनपद वधूलोचनैः पीय मानः । सद्यः सीरोत्कषण सुरभिक्षेत्र भारूडमालं किंचित्पश्याद् व्रज लघुगतिर्भूय एवोत्तरेण ॥ १६ ।। कवि का जन्मस्थान यही अंचल है शायद इसी से उनकी 'रीति' को वैदमी कहा गया है। लिप्ता मधुद्रवेणासन् यस्य निविवशा गिरः । तनेदं वर्त्म वैदर्भ कालिदासेन शोधिनम् ॥ १५ ॥, ( दण्डी) ( अवन्तिसुन्दरी कथा, दक्षिण भारतीय ग्रन्थमाला) कालिदास की समस्त काव्य कृतियों के मंथन के बाद भी स्पष्ट यही देखने में आता है कि कालिदास ने जितना निकट से विन्ध्य प्रदेश को देखा है उतने निकट से शायद हिमालय को नहीं। कुमार सम्भव इत्यादि प्रायः सभी कृतियों में हिमालय के अद्भुत वर्णन है 'अवश्य' पर देव भूमि या देवता के ही रूप में । मानव की कर्मभूमि के रूप मे वहां का परिचय कम मिलता है। अर्थात कालिदास के जीवन का जितना घना लगाव विभ्य से है उतना हिमालय से नहीं। - निधन इनके निधन की कथा भी कम गुथी हुई नहीं है। 'विक्रम प्रवन्ध' (पुरा- तन प्रबन्धे सग्रह, सिघी जैन ग्रन्थमाला, १९२६ वि० पृ० १० ) के अनुसार "कुमार सम्भव महाकाव्य मे शृङ्गार बाहुल्य के कारण कालिदास को शाप मिला कि वे स्त्री व्यसन के कारण प्राण त्याग करें। वे वेश्याव्यसनी हो गये। इससे क्रुद्ध होकर महाराज विक्रम ने उन्हे निकाल दिया और वे एक वेश्या के यहा रहने लगे। कालान्तर महाराज ने एक समस्या की पूर्ति पर एक लाख सुवर्ण- मे [ ७४ ] - मुद्रा के पुरस्कार की घोषणा की। वेश्या ने इसकी सूचना कालिदास को दी। कालिदास ने कहा कि वे पूर्ति कर देंगे किन्तु उसे वेश्या अपने नाम से पेश करे । यही हुआ। इसके उपरान्त धन लोभ के कारण उस वेश्या ने कालिदास के जीवन का अन्त कर दिया । समस्या की पूर्ति प्रस्तुन होने पर महाराज ताड गये कि वह उस वेश्या की कदापि नहीं हो सकती। महाराज ने शंका की तब वेश्या ने सारा वृत्तान्त बता दिया जिसे सुन कर महाराज अत्यन्त दुखी हुए।" इसी का दूसरा रूप यह भी है कि कालिदास ने सिंहल द्वीप के राजा 'कुमार दास' के 'जानकी हरण' महाकाव्य की खूब प्रशसा की थी। इसे सुन कुमार दास ने कवि को सिहल में बुलाया। कालिदास वहा गये और राजा के अत्यन्त प्रिय पात्र बन गये कालिदास किसी दासी के यहां आया जाया करते थे उसने अपने दरवाजे पर यह श्लोक लिख रखा था- 'कमले कमकोत्पत्ति श्रूयते नतु दृश्यते'---कवि ने इसकी पूर्ति इस प्रकार की 'वाले। तब मुखाम्भोजे कयमिन्दीवरद्वयम् ।' कहा जाता है इसी सुन्दरी के कारण कालिदास मार डाले गये । कुमार दास इस दुर्घटना से अत्यन्त विचलित हुए और उन्होंने कवि की चिता पर आत्महत्या कर ली। अभी तक सिंहल द्वीप के दक्षिणी भाग में कालिदास की समाधि विद्यमान है। भारत में यह कथा इतनी प्रसिद्ध नहीं किन्तु सिंहल के अनेक प्राचीन ग्रन्थो में इसका उल्लेख है। कालिदास की मृत्यु का ठीक ठोक कारण तो किसी को भी ज्ञात नहीं किन्तु किसी सुन्दरी के द्वारा अथवा उसी के कारण इनका अन्त हुआ यही अति प्रसिद्ध है। भोज प्रबन्ध में श्री बलाल ने भी कालिदास के दुखद जीवन का वर्णन किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि उनके परामव में लोग कितने लीन थे। कहते है कवि मंडली के प्रपंच में आकर राजा भोज ने कालिदास को अपने राज्य से निकाल दिया। किन्तु उनकी स्त्री 'विलासवती' ने उन्हें कहीं जाने न दिया और कहा- त टेवास्य पर मित्र यत्र संक्रामति द्वयम् । दुखञ्च प्रतिच्छायेव दर्पणे ॥ हाटे सुखन [ ७५ ] लेकिन उसमें उनके विरूद्ध किये गये षड्यंत्रो को छोड कर मृत्यु का कोई जिक्र नहीं। निष्कर्ष केवल इतना ही निकलता है कि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के उपरान्त कुछ राजनीतिक दांव पेंच चले उन्हीं में कालिदास का अन्त हुआ और सम्भव है उनमें किसी सुन्दरी का भी हाथ रहा हो। कालिदास की रचनाएँ प्रामाणिक-१ शाकुन्तल-२ विक्रमोर्वशीय-३ मालविकाग्निमित्र-४ रघुवंश ५ कुमार सम्भव-६ मेघदूत-७ ऋतुसंहार-८ कुन्तलेश्वर दौत्य कथित-अम्बस्तव, कल्याणस्तव, कालीस्तोत्र, गंगाष्टक, घटकर्पर, चण्डिका दण्डकस्तोत्र, ज्योतिर्विदामरण, दुर्घटकाव्य, नलोदय पुष्पवाणविलास, मकरन्दस्तव, मङ्गलाष्टक, रत्नकोश, राक्षस काव्य, लक्ष्मीस्तव, विद्व- द्विनोद काव्य, वृन्दावन काव्य, वैद्यमनोरमा, शृङ्गार तिलक, श्रुतबोध, सेतुबन्ध आदि । (आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय कृत 'कालिदास' के आधार पर) -:*:-*:-*:-- .

मेघदूत परिशिष्ट (क) सुभाषित १-आपन्नाति प्रशमन फला' सम्पदोह्य त्तमानाम् । [ उत्तम जनों की सम्पत्ति पीडित जनों को शान्ति देने के लिये ही होती है । ] २--आशाबंध. कुसुम सदृश प्रायशो ह्यानानां, सद्य पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि ॥ १० ॥ [ विरहिणी वनिता के कुसुम से कोमल हृदय को आशा ही कुम्हलाने से बचाती है। ] ३-कामार्ताहि प्रकृति कृपणाश्चेतना चेतनेषु ॥ ५ ॥ [ काम से जो पुरुष आर्त है वह चेतन और अचेतन मे भेद नहीं कर सकता।] ४-केवा नस्युः परिभवपदं निप्फलारम्भ यत्नाः ॥ ५४ ॥ [ निप्फल यत्न करने से जगत में कौन नहीं हसा जाता ] ५-कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततोवा नीचर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ उ० ४६ ।। [ जीवन में कमी असीम सुख और कभी घोर क्लेश कुछ उसी प्रकार मिला करता है जसे पहिये का भाग कमी ऊपर कभी नीचे जाया करता है । ] ६-केपां न न स्यादभिमतफला प्रार्थनाा त्तमेपु । [ उत्तम जनों के द्वारा किसकी अमिलापा पूर्ण नहीं होती ? ] [ ७७ ] ७-न क्षुद्रोऽपि प्रथम सुकृता पेक्षया संश्रयाय प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किम्पुनर्यस्तथोच्चैः ॥ ७ ॥ [ क्षुद्र जन.भी किसी समय अपने साथ उपकार करने वाले मित्र को पाकर उससे विमुख नहीं होता तो फिर उच्च जना का तो कहना ही क्या है । ] 6नि:शब्दोऽपि प्रदिशसि जलं. याचितश्चातकेभ्यः । प्रत्युक्तं हि प्रणयिषु सतामीप्सितार्थक्रियैव ॥ ५१ ॥ [ चातक की याचना पर तुम चुपचाप ही आकर उसकी प्यास बुझा दिया करते हो। सत्पुरुष प्रेमियों के इन्कार करते.रहने पर भी उनकी अभिलाषा पूर्ण कर ही देते हैं। ] -प्रायः सर्वो भवति करुणावृत्ति रान्तरात्मा ॥ ३३० ॥ [ कारुणिक हृदय वालों का हृदय पिघल ही जाता है ] १०.-भूतानांहि क्षयुिषु करणेष्वाद्यमाश्वस्यमेतत् । [ इन्द्रियों के शिथिल हो जाने पर उन्हें सान्त्वना देना ही अधिक -आवश्यक है । ] - ११-मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथा वृत्ति चेतः कण्ठा श्लेष प्रणयिनि जने किंपुनर्दूरसंस्थे ।। ३ ।। [ जो सुखी हैं उनका चित्त भी बादलो को देखकर स्थिर नही रहता, फिर जो विरही दूर बैठे हैं उनकी तो बात ही क्या है। ] १२----मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः ॥ २८ ॥ [ मित्र का कार्य करने की प्रतिज्ञा से बद्ध व्यक्ति कार्यपूर्ण न होने तक शिथिल नहीं पड़ता।] १३-याचा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा ॥ ६ ॥ [ सज्जन से निष्फल याचना भी अच्छी, नीच से सफल याचना भी अच्छी नहीं ] [ ७८ ] १४-सदभावाः फलनि न चिरेणोपकारो महत्सु ॥ १९ ॥ [ सत्पुरुषों के साथ किया गया स्नेह अविलम्ब ही फल देने वाला होता है । ] १५-रिक्तः सर्वोभवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय [ खोखलापन लघु बना देता है और पूर्णता गौरव प्रदान करती है। १६-सीमन्तिनीना कान्तोदन्तः सुहृदुपगतः सनमात्किंचिदूनः [विरहिणी के लिये किसी मित्र के द्वारा प्राप्त प्रेमी का समाचार भी मिलन सुख से कुछ ही कम होता है।] १८-स्त्रीणामाद्य प्रणय वचन विभ्रमोहि वचन विभ्रमोहि प्रियेषु ॥ २८ ॥ [ कामिनियों की प्रारम्मिक रसपूर्ण बातें ही प्रणयीजनों मे विभ्रम उत्पन्न कर देती हैं।] १८-स्नेहानाहुः किमपि विरहे वसिनस्तेत्वभोगात् इप्टेवस्तुन्युपचितरसा. प्रेमराशी भवन्ति ॥ उ. ४९ ॥ [ जहां विरह के क्षणो में अमोग के कारण स्नेह शिथिल पड जाता है, वहीं अभीप्सित वातावरण में रस से सिंचित होकर प्रेम लहलहा उठता है।] -X:०:४:०:X:-

कालिदास कृत मेघदूत के कुछ
अनुकादों
की तालिका
परिशिष्ट (ख)
बॅगला
० मेघदूत- काव्यानुवाद- अनुवादक जगदीश्वरगुप्त, कलकत्ता, १८८५.
किशोरी मोहन सेनगुप्त
कलकत्तो, बसक प्रेस, १९०३.
क्षितिनाथ घोष, कलकत्ता, १९५२
"
नरेन्द्र देव, कलकत्ता, १९४३
० "
"
निताईचन्द सील, चिनसुरा, १९१०
"
"
राजनारायण लाहा ?
प्राणनाथ पण्डित, कलकत्ता १८७२
मुद्रक-कालीकिकर चक्रवर्ती
१
रघुनाथ सुकुल, कलकत्ता
बनर्जी प्रेस, १८७९
राजकृष्ण मुखर्जी, कलकत्ता
संस्कृत प्रेस डिपाजिटरी, १८८२
सतीश चन्द्र रे, कलकत्ता
एस० सी० मजूमदार, १९०६
सतीश चन्द्र सेन, गोपालपुर
हेमन्द्र राय - १९१३
"

[ ८० ] ० मेघदूत काव्यानुवाद अनुवादक सत्येन्द्रनाथ ठाकुर, कलकत्ता विक्टोरिया प्रेस वरद चरण मित्र कलकत्ता, १८९३ महेशचन्द्र भट्टाचार्या, कलकत्ता " छात्र पुस्तकालय, १९३८ द्विजेन्द्रनाथ ठाकुर सत्येन्द्रनाथ ठाकुर प्यारी मोहन सेनगुप्त " चीनी ( Chinese) ० मेघदूतम् चीनी ( Chinese ) में अनूदित, पेकिंग-१६५६ ) डेनिश ( Danish) - . 0 Skybudet, en indisk Elegi. Metnisk oversat of P. Marcussen. Kjebenhavn, 1882 (स्कीबुटेत एन इन दिस्क एलेगी मेतरिस्क ओवरजत.. •ऑफ पी० मरकुसेन क्षेवनहावन - १८८२ (मेघदूत : भारतीय कविता - मरकुसेन का पद्यानुवाद) ... अँगरेजी (English) . अनुवादक चार्ल्सकिग द क्लाउड मेसेञ्जर (the cloud messenger) ( charisking) ( विज़डम ऑफ द ईस्ट सिरिज़) लदन, जॉनमेरी, १६३० ८ मेघदूत • अंगरेजी गद्यानुवाद अनुवादक- एच ए. ऑउवरी लंदन, १८६८ संक्षिप्तनोट एवं टिप्पणियों अनुवादक एच एच चिलसन सहित-अँगरेजी काव्यानुवाद (फोर्ट विलियम कॉलेज की स्वीकृति पर १८१३ मे, फलकत्ते से प्रकाशित) [ ८१ ] " " " मेघदूत अनुवादक ( लंदन से १८४३ में द्वितीय संस्करण ) तृतीय संस्करण, (एफ. जॉनसन के शब्द- कोष सहित १८६७ में लंदन से प्रकाशित) एवं १८६८ में श्री केदारनाथ तारकरन्त द्वारा कलकत्ते में सम्पादित । टी. क्लार्क, लंदन, १८८२ ० मेघदूतम् के० बी० पाठक ( अंगरेजी टिप्पणियों सहित ) द्वितीय संस्करण-पूना-१६१६ ( अंगरेजी टिप्पणियों सहित ) अनुवादक मोरेश्वर रामचन्द्र काले, बम्बई, १६१६ ० मेसेञ्जर क्लाउड ( Messenger Cloud )-(अगरेजी काव्यानुवाद, प्राचीन भारतीय कव्य की अनुकृति के रूप मे) अनुवादक-आर. टी. एच. ग्रिफिथ इलाहाबाद-१६१४ (Cloud messenger) अनुवादक विल्सन Wintrnuse Vol III क्लाउड मेसेंजर Fin (French) मेघदूत मेघदूत Le Nuage Messager.........Traduction Francarce Par A Guerinat, Paris, Le-puy-en-velay ( Printed ), 1902 Le Nuager Messager ( Meghaduta ) Poeme, Tradnit du Sanscrit d 'apners I, explication de PE Faucaux ( Virgilus Maro ( Publius ), Virgile et Kalidasa, Les Bucoligues et Le Nuage Messeuger, Traduits en Vers, etc Paris 1866 ) ल नु आज मेसाजे-नदुक्स्यो फ्रांसेज पार ए गेरिनो-पेरिस मेघदूत गेरिनोकृत फ्रासीसी अनुवाद [ ८२ ] ल नु आज मेसांजे पोएम नादवी दु सस्कृ द् प्रे - सेक्स प्ली कासिओं द पी० ई० फुको ( मेघदूत, कविता, पी० ई० फुको की व्याख्या के अनुसार सस्कृत से अनूदित ) GERMAN 0 Kalidas's Wolkenbte Ubersetzt...... ...... Vonc sehutz Bielefeld, 1859 o Meghaduta, das 1st der Wikenbote. .Aus dem sankrit metrisch Ubersetzt von L. Fritze. Chemnitz, 1879 o Meghaduta, Oder der Walkenbote .......eine altındische elegie, dem K. nachgedichte Und mit Anmer kungen begleitet Von M Muller Konigsherg—1847 जर्मन Kalidas, वालकनबोतं यूवरज़त्स • फॉन सी गुत्स वी० ले. फेद १८५९. (कालिदास कृत मेघदूत सुत्स द्वारा अनूदित) मेघदूत दस इस्त देअर बालकनबोते..... आठश देम संस्कृत मेत्रिश यूवरजस-फोन, एल फित्से, चेन्नित्स १८७९. ( मेघदूत--फ्रिसे का संस्कृत से काव्यानुवाद ) मेघदूत ओटेरदेर वाल्कनबोते आइने अल्थ इन दिश एलेगी टेम कालिदास नहगेदिश्तेत-उन्य मिय अनमेर कुनगन बेग्लाइतेत फॉन एम मिलर, कोनिकावर, १८४७. (मेघदूत प्राचीन भारतीय कविता का मैक्समूलर द्वारा सटिप्पणी पद्यानुवाद) -- Italian Meghaduta O La Nube Messaggera Tradatto da Giouni Ficchia ( With a note on the geography of • [ ८३ ] the poem, by F L pulle ). ( Studi Italiani di Filologia Indo-Iranica etc. Vol I-III 1879, etc. ) Flonence, 1879-1899. इटैलियन मेघदूत ओ ल लुबे - मेसाजेरा, दत्तो द् जिअवन्नी फ्लेक्किया ( जिअवन्नी का अनुवाद ) Swedish Malnbudet ( Meghaduta ) Ett indiskt skuldestycke......... Fram Sanskrit Frith of versatt sant helyst of H. Edgren, Malmo, Gatebarg, 1875. स्वेडिश . मॉलनबुदेत-एट इन दिस्क्त स्कालदेस्तिक ....मान संस्कृत फ्रिथ ऑफ फर जथ, ज़म्थ, बोलिस्त ऑफ एच एदोन. मालमो गते गर्ग १८७५. (मेघदूत-भारतीय कविता-अनुवाद और टिप्पणी, एच० सद्ग्रेन.) हिन्दी अनुवादक नागार्जुन, राजप्रकाशन-पटना, १६५५ सत्यकाम विद्यालंकार, राजपाल एण्ड सस दिल्ली १६५६ . मेघदूत मेघसदेश कन्नड़ सुब्रहमण्यशास्त्री, शिमोगा कनटिक मेघसन्देश संघ १६३१ , एस. व्ही. परमेश्वर भट्ट, शारदा मन्दिरमैसूर १६५० मलयालम ए. आर, राजराजा वर्मा, कमलालय वुकडिपो त्रिवेन्दरम् १९५० मेघदूत [ ८४ ] मेघसन्देशम् कुट्टीकृष्ण मरार, कोझीकोडे, मट्ठभूमि १९५३ " . . " मराठी मेघदूत (सक्षिप्त) श्रीराम गोसेवी, वोरा एण्ड कम्पनी लि० वम्बई, १६५६ सी. डी. देशमुख, जनराज प्रकाशन- पूना १६५२ गणेश निल्कनाथ कातरे द्वारा भूल सस्कृत के छन्दी मे ही मराठी में अनूदित तथा उन्ही द्वारा कोल्हापुर से प्रकाशित-१९५५ काव्यानुवाद अनुवादक कुसुभराज, पॉपुलर वुकडिपो-बम्बई-१९५५ ० " " उड़िया राधामोहनगदानायक, उत्कलबुक एजेंसी कलकत्ता १६५३ तेलगु मेघसन्देशम् काव्यानुवाद अनुवादक दामेरा राजगोपाल राव १६५२ 0 Tibetan Die Tibetische ubersetzung Vou Kalidas as Meghaduta Nuch deu Roten bud schwarzen Tanjur heransgegeben and ins deutsche ubertragen Von Hermanu Beckh (Aus deu Anhang zu deu Abhand Lungen d kgl Preuss, Akademie d Wissenschofttn Von Jahre, 1906 ) Berlin Verlag der Konigl, 1907 ( In tibetan seript.) बंगला-हिन्दी-अंगरेजी . मेघदूतम् ( सम्पादित) गुरुनाथ भट्टाचार्य एवं कालिपद तारकाचार्य द्वारा हिन्दी एवं बगाली में अनूदित एव अँगरेजी मे ( काव्या- नुवाद एच एच. विलसन द्वारा अनूदित कलकत्ता-१६३४ ०.*.

दूतकाव्य-नामावली परिशिष्ट (ग) पुस्तक का नाम कवि का नाम विनय विजयाग्नि माधव शर्मा रूप गोस्वामी राम गोपाल १. इन्दु दूतम् २. उद्धव इतम् ३. उद्धव सन्देश ४. कीर दृतम् ५. कोकिल सन्देश ६. कोकिल सन्देश ७. कोकिल सन्देश ८. चकोर सन्देश उदण्डकवि ( १५ वीं शताब्दी) नृसिंह वेकटाचार्य अज्ञात 8. चन्द्र दूत कृष्णचन्द्र तरकालंकार १०. चन्द्रदूत जम्बू कवि विनय प्रभु अज्ञात ११. चन्द्र दूत १२. चातक सन्देश १३. चेतो दूत १४. जैन मेघदूत १५. तुलसी दूत १६. नेमिदूत १७. पदांक दूत मेरुतुग ( १५ वीं शताब्दी) वैद्यनाथ ( १८ वीं शताब्दी) विक्रम कवि कृष्ण सार्वभौम ( १७ वीं शताब्दी) धोई ( १२ वीं शताब्दी) सूरी वेदीचन्द्र ( १७ वीं शताब्दी) भोलानाथ १८ पवन दूत १६. पवन दूतम् '२०. पन्थ दूत अज्ञात दाधीचि ब्रह्मदेव शर्मा २१. पिक दूतम् २२. पिक सन्देश २३. भक्ति दूत २४ मंग सन्देश काली प्रसाद वासुदेव २५ भ्रमर दूत रुद्र [ ८६ ] विष्णु दास त्रैलंग व्रजनाथ (स० १८१४) रामाराम अज्ञात रंगाचार्य कालिदास मंत्री विक्रम मेघ विजय अज्ञात लक्ष्मण सृरि चरित्र सुन्दराग्नि २६ मनोदृत २७. मनो दूत २८. मनोदूत २६. मनो दूनिका काव्य ३० मनो दूत ३१ मयूर सन्देश ३२. मेघदूत ३३. मेघदत ३४. मेघदूत समस्या लेख ३५. रथाग दूत ३१. विप्र सन्देश ३७. शील दूत ३८. शुक दृतम् ३६ गुक सन्देश ४०. शुक सन्देश शुक सन्देश ४२. सिद्ध दूत ४३. सुगम सन्देश ४४. हंसदूत ४५. हम सन्देश ४६. हस सन्देश ४७. हंन दृत ४८. हम मन्देश ४६. हंस दून यादवचन्द्र लक्ष्मी दास करिंग पल्लि रगाचार्य ४१. अवधूत राम नारायण रूप गोस्वामी ( १६ वीं शताब्दी ) वैकेटेश मट्ट वामन रघुनाथ दास अज्ञात कविन्द्रराचार्य सरस्वती ५०. हृदय दृत भट्ट हरिहर ११. मान दृत कृष्णनाथ

-~
मे
घ
दू
त
( कालिदास-राजा लक्ष्मण सिंह-'पूर्ण')

No text on this page.

कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्पमत्तः
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः
यक्षश्चक्र जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु । १ ।
कारज मे उनमत्त भएँ एक जच्छ दई सब खोय बडाई
जोय ते दूर रहे बरसेकलौ सौह बडी निज नाथ खवाई
जाय बस्यो गिरि राम के आसम रूख घनेन मे गेह बनाई।
जानकी स्नानन पुन्य प्रताप भई जहँ नीरन में पविताई।
-लक्ष्मण सि ह ।
करि मद अधिक अधिकार मै, इक जच्छ प्रभुके साप सो,
वाम-बिरही बरस हित, महिमा रहित दुख दाप सो,
द्रुम सघन छाया राम गिरिवर धाम मे निवसन गयो,
श्री जनकजा मज्जन प्रभाव पवित्रजल जहँ ह रह्यो ।
--- पूर्ण ।
।
यक्ष --देवयोनिविशेष ।
विद्याधराप्सरोयक्षरक्षोगन्धर्वकिन्नरा,
पिशाचो गुह्यक सिद्धो भूतोऽमी देवयोनय ।

मेघदूत
तस्मिन्नद्रौ कतिचिदवलाविप्रयुक्तः स कामी
नीत्वा मासान्कनकवलयनं शरिक्तप्रकोष्ठः
आपाढस्य प्रथमदिवसे मेघमाश्लिप्टसार्नु
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श । २।
वमि ताहि महीवर में विरही कितनो एक मास बिताइ गयो ,
भुजबद गयं गिर मोरन के इतनो थकि दूबर गात भयो ,
फिरि लागत मास असाढ लख्यो घन सैल पै सोहनो आइ छयो
झ कि के मनह गजराज वली गढढावन खेल मचाइ रह्यो ।
-~-क्ष्मण सि ह ।
तह कछुक मास विनाइ अति दुग्न पाइ विरह प्रचडसी,
गिरि गौ कनक भुजबद जाके दूवरे भुजदटसी ,
आनाढ पहिले द्योम देग्यो, मैल पं धन तेहि घनौ,
भ कि गढ़ गिरावनहार सु दर तुगवर कु जर मनी ।
--पूर्ण।
प्रथम दिवने-पाठान्तरे 'प्ररामदिवसे।
-

मेघदूत
तस्य स्थित्वा कथमपि पुरः कौतुकाधानहेतो-
रन्तर्वाष्पश्चिरमनुचरो राजराजस्य दथ्यौ
मेघालोके भवति सुखिनोऽप्यन्यथावृत्तिचेतः
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनदरसंस्थे।३।
तिहि केतकी फूल फुलावनहार के सन्मुख दास कुवेर गयो ;
उर अन्तर में असुआ भरिक बडी बेर लौ सोचत ठाढो रह्यो ,
चित कण्ठ लगे सुखियानहु को न रहे थित देखत मेघ नयो
फिरि वात कहा उनकी कहिये जिन मीत से दूर बसेरौ लयो।
- लक्ष्मण सि ह ।
अभिलाख सौ वा मेघ आगे, जच्छ ज्यौ त्यो भौ खरी,
बडिबेर आसुन बेग रोकत, सोक सागर सो भरौ ,
कछु की कछू ह जात है, घन जोय सयोगिन दसा ;
कह गति बियोगिन की जिन्है सालति मिलन की लालसा ।
-पूर्ण।
कौतुकाधानहेतु-पाठान्तरे 'केतकाधानहेतु'-- केतक्या गर्भाधानस्य
कारणम् इत्यर्थ ।
३
-

मेघदूत
प्रत्यासन्ने नभसि दयिताजीवितालस्बनार्थी
जीमूतेन स्वकुशलमर्ग हारयिष्यन्प्रवृत्तिम् ।
स प्रत्ययः कुटजकुमुमैः कल्पितार्याय तस्मै
प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्नागतं व्याजहार । ४ ।
मावन आइ ममीप लग्यो नव नारि के प्रान वचावन काज,
बादर दून बनावन को कुसलात मदेस पठावन काज,
लूटज फूल नए कर ले मन कल्पित अर्घ वनावन काज ,
यो र उठ्यो हंसनो मुग्व ह वह मेव ते प्रीति वढावन काज ।
--लक्ष्मण सिह ।
नियरान मावन जानि मोच्यो नारि जीवन के लिये,
मदेम अपने छेम को यहि मेघ द्वारा भेजिय
बनमारती के फूल नीके ले अरघ दै नेम सौ,
मुद मानि बागनवानि वोल्यो वारियर प्रति प्रेम सौ।
-पूर्ण ।
जीमृतेन-जल परेण ।
-माप वीर कुगाग्राणि दधि सर्पिश्च तण्डुला
यवा निद्धार्यकञ्चैव अष्टाङ्गार्घ्य प्रकीर्तितम् ।।
पिच,
गतविल्वाक्षतं पुष्पदंघिदूर्वाकुगस्तिल
नामान्य गवंदेवानामघोज्य परिकीर्तित ।
'प्रत्तामन्ने नभमि' पाठान्नर 'प्रत्यामन्ने मनमि।

मेघदूत
धूमज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः
संदेशार्थाः क्व पटुकरणः प्राणिभिः प्रापणीयाः।
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन्गुह्यकस्तं ययाचे
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु । ५।
घाम धूम नीर औ समीर मिले पाई देह,
ऐसो घन कैसे दूतकाज भुगतावैगो।
नेह को सँदेसो हाथ चातुर पठंबे जोग,
बादर कहो जू ताहि कैसे कै सुनावैगो ।
बाढी उतकठा जच्छ बुद्धि बिसरानी सब,
वाही सो निहोर्यो जानि काज करि आवेगो।
कामातुर होत है सदाई मतिहीन तिन्है,
चेत औ अचेत माँहि भेद कहा पावैगो ।
--लक्ष्मण सिह ।
7
कह बापुरी धन धूम पावक पवन जलमय सर्वथा ?
कह चतुर धावन सो पठावन जोग प्रेमिन की कथा
इतनिहु बिथाबस जाचना कीन्ही जलद सो याचना
चेतन अचेतन भेद देत भुलाय मनमथ यातना।
-पूर्ण।

मेघदूत
जातं बंशे भुवन विदिते पुष्करावर्तकानां
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुपं कामरूपं मघोनः।
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद्दरवन्धुर्गतोऽहं
पाञ्चा मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा।६
पुस्करावर्तक प्रमिद्ध लोकलोकन में,
बम तिनही के नीके ते ने जन्म पायो है।
इच्छाम्प घारन की गति है दई ने दई,
मन्त्री नुरराजहू ने आपनो बनायो है।
एते गृन जानि तो पै मॅगिता भयोहूँ मेघ,
बवुन ते दूर मोहि विधि ने कमायो है।
मज्जन 4 मांगनो विनाहू मरे काज भलो,
नीच पै सन्ह काज बाछो ना बतायो है।
---लक्ष्मण मिह ।
पुस्करावर्तक विदित के बरवन को अवतस तु,
ह कामरूपी इंद्र को मग्री प्रसिद्ध प्रसन तू ।
गो में वियोगी भागवन गनवन गुनि तोहि जाच हू,
मांगेहु गुनी ना देहि ती भल, भल न खल ते लाभ हू ।
- पूर्ण।
पुरूगवतंगा-पुप्नग नाम ते मेण वृहतस्तोयमत्मरा ।
पुष्करावर्तकाम्तेन कारणेन ह गदिता ।
मधोन प्रातिपुप-न्द्रम्य प्रधान पुत्पम् ।

मेघदूत
संतप्तानां त्वमसि शरणं तत्पयोद प्रियायाः
संदेशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य ।
गन्तव्या ते वसतिरलका नाम योश्वराणां
बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहा। ७ ।
तू तो है सहाई तनताप के सताएन को,
भयो हूँ वियोगी मै कुबेर कोप पाइ कै ।
छम को संदेसो याते मेरी प्रानप्यारी पास,
अलकापुरी मे मीत दीजो पहुँचाइ के ।
देखन ही जोग आछी नगरी बनी है वह,
लीनो जच्छराजन सुबास जहाँ आइ के।
बागन मे बाहरें विराजै चन्द्रचूड जा के,
नित्त ही अटान रहै चदछटा छाइ कै ।
-लक्ष्मण सिह ।
तू है सरन दुखियान कौं, मै हौ दुखी प्रभु कोप सो,
प्यारी निकट सदेस मो, ले जाहु अलका चोप सो ।
सो राजधानी है धनद की धाम तह उज्जल लस,
लहि चादनी सिवचन्द्र की जो बाग मे बाहर बस ।
-~-पूर्ण।
सतप्तनाम्-आतपेन वा प्रवासविरहेण वा सज्वरितानाम् ।
धनपति -कुवेर ।

मेघदूत
त्वामारूहं पवनपदवीमुद गृहीतालकान्ताः
प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययादाश्वसन्त्यः।
कः संनद्ध विरहविधुरां त्वय्युपेशेत जायां
न स्यादन्योऽप्यहमिव जनो यः पराधीनत्तिः। ८ ।
वातपथ जात तोहि नारी परदेसिन की,
देवेगी वार बार अलक कर सो उठाइ ।
वालम के आवन की आसा उर लाइ लाइ,
धीरज घरगी नेक चिता जिय सो बिहाइ ।
आए तो समीप कोऊ नारी को विसार नाहि,
विरहाविथा में नर जोपै अपनी वसाइ ।
ऐमो मदभागी मै हौं दूसरो न और होइ,
पराधीनवृत्ति हेत वैठो ही सुख नसाइ ।
-लक्ष्मण सिंह।
परि धीर तीच पथीन की विसवास आस बढाइ के,
तोहि व्योम वीच विलोकि है अलकावलीन उठाइ के ।
तोहि पाइ रहै भूलि को निज वाम विरहिनि दीन को,
होवे न परआधीन जो मो सम परमदुख लीन सो ।
-~-पूर्ण ।
८

मेघदूत
मन्दं मन्दं नुदति पवनश्चानुकूलो यथा त्वां
वामश्चायं नदति मधुरं चातकस्ते सगन्धः ।
गर्भाधानक्षणपरिचयान्नूनमावद्धमालाः
सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः। ९ ।
मद मद मारुत बहै जैसो तोहि सुहाइ,
हरखित यह चातक मधुर बॉए बोल्यो आइ ।
बगुली हू नभ मे सुभग आई वाँधि कतार,
गरभदान समरथ समुझि तोहि देन मनुहार ।
-लक्ष्मण सिह ।
अनुकूल मारुत मजु ज्यो तोहि मन्द मन्द चलावही,
तुव बाम दिसि यह मत्त चातक मधुर सब्द सुनावही ।
सुभ जानि गर्भाधान उत्सव बक बधूटिन की अली,
हे नयन रजन गगन मे सेवा करैगी तुव भली ।
-पूर्ण ।
सगन्ध --पाठान्तरे सगर्व 'सहर्ष' इत्यर्थ ( श्यामसु दर दास द्वारा
सपादित प्रति में ) ।
चातक ~ बहिणश्चातकाश्चाजा ये च पु साङ्गिता खगा ।
मृगा वा वामगा हृष्टा सैन्यसम्पद् बलप्रदा ।
गर्भाधानक्षण परिचयात्-पाठान्तरे 'गर्भाधानक्षम परिचयात्,
( श्यामसु दर दास द्वारा सपादित प्रति मे )
९

मेघदूत
तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपनी-
मन्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायास् ।
आशावन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां
सद्यःपाति प्रणयि हृदयं विषयोगे रुणद्धि । १० ।
मग में रुके न तू कहूँ लखिहै भौजी जाइ ,
जीवति दिन गिनती करत पतिभरता चिनलाइ ।
नेही हिरदय नारि को कोमल जैसो फूल,
विग्ह माहि आमा करनि नाहि कछुक दृढमूल ।
-~-लक्ष्मण सिंह ।
नानी तिहारी हे सखा । नारी हमारी जो सती,
तेहि अवमि लखिही कामचर | दिन गिन विरह के जीवती ।
इस आ7 रायति रोकि के विरहिनि तिया के प्रान को,
प्रमानुकूल समूल नन नमि जाय फूल ममान सो।
-पूर्ण ।
१०

मेघदूत
कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्ध्रामवन्ध्यां
तच्छृ त्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः ।
आ कैलासाद्विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः
संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः । ११ ।
छत्रवती छिति को करति उच्छलिघ्र उपजाइ,
सो गरजन तेरी सुनत राजहस हुलसाइ ।
मानसरोवर चलन को कमलनाल लै पाथ,
उडि है धुर कैलास लौ गगनपथ तो साथ ।
-लक्ष्मण सिह ।
जो करत छित को सफल, छत्रक छाय सरस उछाह के,
सोई सुहावन सोर तुव सुनि मानसर की चाह के,
लैक कलेऊ कज कोपल राजहसन की अली,
कैलास लो आकास मे करिहै सखा सगति भली ।
—पूर्ण ।
उच्छिलीन्धामवन्ध्या-पाठान्तरे 'उच्छिलीन्धातपत्रा' 'शिलीन्धू एव
छत्र यस्या ताम्' इति अर्थ ( श्यामसु दर दास द्वारा सपादित
प्रति मे )।
बिसकिसलयच्छेद पाथेयवन्त
-मृणालाग्राणा छेदै शकलं पाथेयवन्त ।

मेघदूत
आपृच्छस्व प्रियसखममुं तुङ्गमालिङग्य शैलं
बन्छः पुंसां रघुपतिपदैरङ्कितं मेखलासु ।
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगमेत्य
स्नेहव्यक्तिचिरविरहनं मुञ्चतो वाप्पमुष्णम् । १२ ।
माँगि सीप गिरितु ग १ अव मीतहि भरि अक
पावन रघुपति-चरण मो अकित जाको लक ।
जब जब तू या ते मिलत बहुत दिनन मे आइ,
प्रीति प्रगट तो में करत ताती भाप उठाई।
लक्ष्मण मिह ।
श्री राम पद के अफ है अभिराम जाके लक मे,
यहि मेल को गुनि मीत बोलहु प्रीति सो भरि यक मे ।
प्रनि बग्म ये तोहि पाय पूरन प्रेम नेम जनावही,
दीरघ बिरह मताप मो सतप्त अ वहावही ।
-पूर्ण।
१२

मेघदूत
मार्ग तावच्छृणु कथयतस्त्वत्प्रयाणानुरूपं
संदेशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम् ।
खिन्नः खिन्नः शिखरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र
क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्त्रोतसां चोपभुज्य । १३ ।
गैल बतावो मेघ अव जिहि चलि पावै चैन,
फिरि सुनियो सदेस मम कानन अति सुख दैन ।
कानन अति सुख दैन थके वा मग मे जब तू,
चलियो धरि धरि पाव सिखर ऊँचिन पै तब तू ।
भूख लगे सोता मिले उथरे अरु विन मैल,
पी तिन को पानी तुरत लीजो अपनी गेल ।
लक्ष्मणसिह ।
सदेस निज पीछे कहींगौ जोग सवनन पान के,
धन प्रथम पथ बताइहौ जो जोग तेरे जान के।
तेहि गैल मे बिसराम को है ठाम सैल सिखान के,
तिमि छीनता मे सलिल भोजन बिमल वर सरितान के।
-पूर्ण ।
चोपभुज्य-पाठान्तरे 'चोपयुज्य' ( श्याम सु दर दास द्वारा सपादित
प्रप्ति मे )।
१३

मेघदूत
अद्रेः शृङ्ग हरति पवनः किंस्विदित्युन्मुखीभि-
दृष्टोत्साहश्चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः ।
स्थानादस्मात्सरसनिचुलादुत्पतोदङ्मुखः खं
दिङनागानां पथि परिहरन्स्थूलहस्तावलेपान् । १४ ।
जात तोहि ऊपर निरखि कहिहै सीस उठाई,
मुग्घा सिद्धवधू चकित आपस में बतराइ ।
आपस मे वतराइ बडो अचरज को लेखो,
पवन उडाये जात खड परबत को देखी।
निचुलसरम यहि भूमि तजि अब उत्तर चलि भ्रात,
मेटत मद दिग्गजनके के नभमारग मे जात ।
-लक्ष्मणसिह ।
गिरिनृ ग लीन्हे जात मास्त सोचि यो ऊपर चित,
चकि मिद्धरमनी मोहि तुव उत्साह देखेंगी हित ।
चढि यहि सुहावन बेतथल सो जाहु हे धन उत्तर,
दिसि कुजरन की पीन सु डन को दरप जासो हर ।
-
पूर्ण।
हरति-पाठान्तरे 'वहति' ( श्यामसु दर दास मपादित प्रति में )।
सरसनिचुलात्-आर्द्रस्थलवेतसा यस्मिन् तस्मात् ।
दिडनागाना-दिग्गजाना।
ऐरावत पुडरीकोवामन कुमुदोऽञ्जन ,
पुष्पदत सार्वभौम सुप्रतीकश्च दिग्गजा ।
अवलेपान-गर्वान् ।
१४

मेघदूत रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रक्ष्यमेतत्पुरस्ता- हलीमकापात्प्रभवति धनुःखण्डमाखण्डलस्य । येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापत्स्यते ते बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः । १५ । सोहत पूरब ओर यह रतनजाल अनुमान, बिकसत बाँबी ते भलो इन्द्रचाप रुचदान । इन्द्रचाप रुचदान जासु मिलि तो तन कारो, पावत है छबि अधिक लगत नैनन को प्यारो । मोरचन्द्रिका सग सुभग जैसे मन मोहत, गोपभेस गोबिद बहुत स्यामल तन सोहत । --लक्ष्मण सिह । सु दर सरासन पाक सासन को सुहावन सामने, यो लसत बाँबी सो निसरि ज्यो मनिन के रग मिलि घने । तेहि सो सजैगो रावरो बपु साँवरो सोभा सनो, मनु मोर पखन ओप सो हरि गोप भेस सुहावनो। -~~-~पूर्ण । आग्वण्डलस्य- इन्द्रस्य । - १५

मेघदूत
..
वय्यायत्त कृषिफलमिति भ्र विलासानभिन्न :
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः।
सद्यः सीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रमारुह्य मालं
किंचित्पश्चाब्रज लघुगतिथूय एवोत्तरेण । १६ ।
करिके दृग ऊचो लखै भोरे भरे पियार,
ग्रामवध तुहि जानिके खेती फल दातार ।
खेती फल दातार पहुँचियो मालभूमि पर,
नये जुते जह खेत सुगधित होइँ अधिकतर ।
कछु पच्छिम दिसि पलटि सीघ्र गति तन मे धरिक,
चलियो जलधर मीत फेरि उत्तरमुख करिक ।
लक्ष्मण सिह ।
तोहि जोवही भोरे दृगन जो भृकुटि भग न जानही,
सुख ऐन कृषि फल दैन तोको ग्राम बनिता मानही ।
चढि हाल की जोती सुगन्धित माल नामी भूमि पै,
चलि कछु प्रतीची घाइयो हे घन | उदीची घूमि के।
--पूर्ण ।
त्वय्यायत्त-त्वयि आयत्त--ते अधीनम् ।
भ्र विलासानभिज्ञ -भृकुटिविलासानामज्ञातृभि ।
om

मेघदूत
खामासारप्रशमितवनोपप्लवं साधु मूर्धा
वक्ष्यत्यध्वश्रमपरिगतं सानुमानाम्रकूटः।
न क्षुद्रोऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय
प्राप्ते मित्र भवति विसुखः किं पुनर्यस्तथोच्चैः। १७॥
अमूकूट तनताप मेटी ते बहुधा वरसि,
सो धरिहै सिर आप तो मारग के थकित को ।
मीतहि आए द्वार विमुख होत नहि नीचहू,
सुमिरि प्रथम उपकार ऊँच बिमुख कब ह सके ।
--लक्ष्मण सिह ।
जल बरखि दावानल समन को गुन तिहारो मानिक,
निज सिर बसहै अमरकटक समित तोको जानि के ।
नेकी सुमिरि के देत नीचहु अतिथि आदर मीत को,
किमि करहि फेरि अयोग ऊचे लोग तजिक नीति को ।
--
-पूर्ण ।
वनोपप्लव-दवाग्निम् ।
१७

मेघदूत छन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्र- स्वय्यारूढे शिखरमचल: स्निग्धवेणीसवर्णे। नूनं यास्यत्यमरमिथुनप्रेक्षणीयामवस्था मध्ये श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः । १८ । रह्यो चहूँ दिसि छाइ पके आम वन सैल जंह, ता सिर जव तू जाइ बैठ चिक्कन चिकुर रँग । तुरत लहै छवि सोइ जोग देवदम्पति लखन, मनहु स्यामता होइ गोरे भूमि उरोज विच । -लक्ष्मण सिह । चिक्कन चिकुर लो चारु तू जव सैल चोटी पै चढ, वन आमपु जन के पके अभिराम जह सोभा मढं । तव देवदपति लखन लायक लसै भूरि ललामता, महि के मनोहर पीत कुच के वीच मानो स्यामता । -पूर्ण। अमर मिथुन प्रेक्षणीया--खेचरदम्मती दर्शनीयाम् । - १८ मेधदूत अध्वक्लान्तं प्रतिमुखगत सानुमांश्चित्रकूट- स्तुङ्गन खां जलद शिरसा वक्ष्यति श्लाघमानः आसारेण खमपि शमयेस्तस्य नैदाघमग्नि सदभावाः फलति न चिरेणोपकारो महत्सु । १९ अ। थक्यो पथ चलि गात निकट रहै जब जाय तू, चित्रकूट विख्यात ऊँचे सिर तोहि धारि है । करियो धारासार हरन तासु ग्रीसम अगिनि, सज्जन सग उपकार फलत बिलब न कछु करै । -लक्ष्मण सिह । नैदाधम्-निदाघर्तु भवम् (निदाघ ग्रीष्म.) । -

मेघदूत
स्थिखा तस्मिन्वनचरवधूभुक्तकुञ्ज मुहूर्त
तोयोत्सर्गद्रुततरगतिस्तत्परं वर्त्म तीर्णः ।
रेवां द्रक्ष्यस्युपलविषमे विन्ध्यपाद विशीणी
भक्तिच्छेदैरिव विरचितां भूतिमङ्ग गजस्य । १९ ।
विलमि तहा कछु वार विहरति जह बनचर -वधू,
करियो वारासार फिरि द्रुतगति मग लाघियो ।
लम्बियो रेवा जाइ विन्ध्य मिलन पै यो वहै,
मानहु दई रचाइ गजतन रजरेखा विसद ।
-लक्ष्मण मिह ।
जेहि कुज विहरे वनचरं तहँ नेक वार विहार के,
वरमाय जल हलुकाय, आगे जाय मारग पार के ।
पाहन विनमथल विन्ध्यतल रेवा विपुल धारावली,
लखियो मतगज अग जनु मृगार की रेखावली ।
- पूर्ण ।
रेवा--नर्मदा,
रेवातु नर्मदा मोमोदभवा मेकलकन्यका-इत्यमर ।
भक्तिच्छेद --रेखारचना ।
२०

मेघदूत
तस्यास्तिक्तर्वनगजमदैर्वासितं वान्तदृष्टि-
जम्वृकुञ्जपतिहतरयं तोयमादाय गच्छेः।
अन्तःसारं घन तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति खां
रिक्तः सो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय । २० ।
ले चलियो वा नदि को नीरा। जमुनी कुञ्जन रुकि ब धीरा ।
बन-हाथिन जिनमे मद त्यागे । अधिक सुगन्धित तिन हित लागे ।
अन्तर जव तेरी भरि जाई। पवनहु रोकि न तोहि सकाई।
रीते सबहि तुच्छ जगमाही । बिन पूरनता गौरव नाही।
-लक्ष्मण सिह ।
वरसाय बारि सिधारियो पुनि धारि रेवा जल खरो,
जो रमत जामुनकु ज कु जरपुंज तीछन मद भरो।
भीतर भऐ ते सार मारुत झार तू सहजहि सहै,
छूछो सदा लघु होत हैं, पूरो बडाई को लहै ।
--पूर्ण ।
तिक्त --सुगन्धिभि ।
वासितम्--सुरभितम् ।
प्रतिहतरय-प्रतिरुद्धो वेगो यस्य तत् ।
२१

मेघदूत नोपं दृष्ट्वा हरितकपिशं केसररर्धरूढ- राविर्भूतप्रथममुकुलाः कन्दलीश्चानुकच्छम् । जग्ध्वारण्येप्वधिकसुरभि गन्धमाघ्राय चोर्व्याः सारङ्गास्ते जललवमुचः सूचयिष्यन्ति मार्गम् । २१ । देखि कदम्ब सुमन मनभाये, हरित स्याम मकरन्द सुहाये , कूलन माहि निरखि कन्दलिका, नवकुसुमित बहु सुन्दर कलिका । दावानल भसमित कानन मे, भूमि सुगध सूघि मुद मनमे , मोर जलद तोहि आदर देहै, आगे उडि उडि पथ दिखहे । -लक्ष्मण मिह । नव कलित केसर, वलित, हरित, सुपीत, नीप निहारि के, करि अमन बन कदलीन जो कलियाहि प्रथम कछार पै। हे घन विपिन थल अमल परिमल पाय भूतल की भली, मधुकर, पतग, कुरग वृद जनाइहै तेरी गली। -पूर्ण। जग्वारण्येषु -पाठान्तरे 'दग्ध्वारण्येषु' ( श्यामसु दर दास सपादित प्रतिमें) सारना-पाठान्तरे 'भारङ्गा'। २२

मेघदूत
अम्भोविन्दुग्रहण चतुरांश्चातकान्वीक्षमाणाः
श्रेणीभूताः परिगणनया निर्टिशन्तो बलाकाः।
त्वामासाद्य स्तनितसमये मानयिष्यान्ति सिद्धाः
सोत्कम्पानि प्रियसहचरीसम्भ्रमालिङ्गितानि । २२ अ ।
सिद्ध निरखि है तो मैंग आवत । चातक बारि द रट लावत ।।
बगपाती एकसँग लखि लहै । गिनती करि करि तियनि दिखे है ।
सो तिय सुनत घोर घन तोरी । काँपि चौकि अकुलायँ घनेरी ।।
अक लगाय बलम सुख पावै। बहुभाँतिन तेरो गुन गावै ।।
--लक्ष्मण सिह ।
बू दी गहन मे चातकन की चातुरी चित चावसो,
दिखरा इहै गिनिहै अली बगुलीन की रसभाव सो।
ते सिद्ध सुनिक घोर सोर अथोर जम तव मानिहै,
भयलीन निज प्यारीन सभ्रम पाय मिस उर आनि है।
-~पूर्ण ।
२३

मेघदूत
उत्पश्यामि द्रुतमपि सरखे । मत्प्रियार्थ यियासोः
कालोपं ककुभमुरभी पर्वते पर्वते ते ।
शुक्लापागः सजलनयनैः स्वागतीकृत्य केकाः
प्रत्युद्यातः कथमपि भवालगन्तुमाशु व्यवम्येत् ।। २२ ।
यद्यपि मम प्यारी हित लागे। तू नह चलन मदगति त्यागे ।।
नदपि डरी कहूँ विलमि न जाई। ककुभ सुगवित सैलन भाई ।।
मुनि आदरयुत वोल सिखिन के। सजल नैन कोये सित जिनके ।।
का विधि तुरत गमन होड तेरो। इहि सका व्याकुल मनमेरो ।।
- लक्ष्मण मिह ।
ककुभमुरभि -अर्जु नमुगधि ।
केका केका वाणी मयूरस्य ।
प्रत्युद्यात कृतातिथ्य ।
२४
-

मेघदूत
or
३
ar
२
४
उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे मणियार्थ यियासोः
८
६
७
५
कालोपं ककुमसुरभौ पर्वते पर्वते ते।
११
१०
१३
१२
शुक्लापांगैः सजलनयनः स्वागतीकृत्य केकाः
१४
१६
१५ १७ १८ १९
प्रत्युद्यातः कथयपि भवान्गन्तुमाशु व्यवस्येत् ।। २२ ।।
.
मम हेत करिहै तूं उतावलि तदपि देहुँ चेतावनी,
रमिह गिरिन तू मल्लिकन की लहि सुगध सुहावनी ।
अँसुवा भरे मोरवान को सुनि सोर स्वागत दान को,
लहि मान हा हा । भूलियो जिनि काज बेग पयान को ।
~~पूर्ण ।
२५

मेघदूत ४ ३ ५ पाण्डुच्छायोपवनकृतयः केतकः मूचियिन्तै- ७ ६ ८ नींदारम्भ हवलिभुजामाकुलग्रामचैत्याः। १ ९ त्वय्यासन्ने परिणतफलश्यामजम्बूवनान्ताः १० २ मंपत्स्यन्ते कतिपयदिनस्थायिह सा दशार्णाः ॥ २३ ॥ पहुँचि दसारन जव तू जाई , कछुदिन हस बसै तहँ भाई । कलित केतकी जहँ मन मोहै , उपवन सीम पडुरंग सोहै । नीड समय पछी बहु आवै , रुखन माहि कलोल मचावे । स्याम वरन सु दर दुतिमता , जमुनीफल पकि मे बनता। -लक्ष्मण सिह । सित केतकी कलियान सौं उद्यान ह्व है छविसने, निज धाम रचि है ग्राम वृच्छन पुज पछिन के घने । तोहि पाय जवू विपिन पाके फलन स्यामल छाजि है, कछु दिवस बसिह हस या विघि सो दसारन राजि है। -पूर्ण। त्वय्यासन्ने वनान्ता -पाठान्तरे 'त्वय्यासन्ने फलपरिणतिश्याम -जम्बूवनान्ता ( श्याम सुन्दर दास सम्पादित प्रति में ) नीड -पक्षिगृहम् । दशार्णा = नामदेश । - मेघदूत ३ १ २ ४ तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानी ५ ६ ९ ८ ७ १० गत्वा सबः फलमविकल कामुकत्वस्य लब्धा । १२ ११ तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यस्मा- १८ १९ १६ १७ १५ १४ सभ्र भङ्ग मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोमि ॥२४॥ बिदिसा नाम तहाँ रजधानी , देस देस विख्यात बखानी । ता ढिग पहुंचि जबहि तू' जैहै ; रसबिलास को अति फल पहै। बेत्रवती तट गरजत धीरा। लीजो मधुर तरगित नीरा। मनुहुँ कुटिल भृकुटी युत मुखतें । अधरामृत लीन्यौ अति सुखतें। -लक्ष्मण सिह । है राजधानी ता दिसन जो विदित 'विदिसा' नामकी, तहँ भोगिहै रूरी कला तूं सरस पूरी काम की। पीहै जबै करि धुनि मधुर अल बेतवन्ती को खरी, भ्र व भग भूसित मुख समान तरग रजित रस भरी। -पूर्ण । मत्वा सद्य फलमविकल-पाठान्तरे 'गत्वा सद्य फलमति महत्' (श्याम सुन्दर दास सपादित प्रति में ) फलमति महत्= 'कामिनामधरास्वाद सुरतादतिरिच्यते' इतिभाव । २७ मेघदूत ८ २ नीचराख्य गिरिमधिवसेस्तत्र विश्रामहेतो- ४ ५ ६ स्त्वत्संपर्कात्पुलकितमिव प्रौढपुष्पैः कदम्वैः ९ १० १२ v यः पण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर्नागराणा- १५ ११ १४ मुद्दामानि प्रथयति शिलादेश्मभियौवनानि ॥ २५ ॥ . है विदिसा ढिग 'नीच' गिरी करियो विसराम तहाँ धन जाइकै । तोहि मिले लखिह पुलकात सो आछे कदव के फूलन छाइ के । वेस्यन के अंगराग की गध गुफान ते व्यारि के सग उडाइ के, देह बताइ बिहार करे इहाँ नागर छैल नए नए आइ के । - ~ लक्ष्मण सिंह। पुनि 'नीच' नामक सैल पं विसराम कीजी विधि भली । लहलहे नीपन सो मनी तोहि लह लहै पुलकावली । तह कढि सुगव गुफान तें गनिकान के अंगराग की, वरने कथा स्वच्छन्द नागरवृन्द के अनुराग की। -पूर्ण । य पण्यस्त्री .नागराणा-~-पाठान्तरे 'य पण्यस्त्रीरति परिमलोद्वारिभिर्नागराणाम्' (श्यामसु दर दास सपादित प्रति में ) नीचरात्य गिरिम् =नीचगिरिम् । २८ मेघदूत ११ २ ६ विश्रान्तः सन्ब्रज वननदीतीरजातानि सिञ्च- ३ ५ ४ न्जुद्यानानां नवजलकणै' थिकाजालकानि । ७ गण्डस्वेदापनयनरुजालान्तकणों पलानां ९ १० ८ छायादानात्क्षणपरिचितः पुष्पलावीमुखानाम् ॥ २६ ॥ ठेरि के नेक तहाँ चलियो बरसावत नीर नई बुदियान ते, सीचत नाग नदी तट बागन छाइ चमेली रही कलियान तें, दै छिन छाँह को दान सखा करियौ पहिचानि तू मालिनियान ते, कान के फूल गये जिनके कुम्हिलाइ से पोछत स्वेद मुखान ते । -लक्ष्मण सिह । उद्यान है सरितान तट तहँ मालती कलियान को, सोचत सनेम सिधारियो, वरसाय नव वुदियान को। पहिचानि कीजो छाँह त्यौ छिन मालिनिन मुख छाइ के, स्रुतिकमल जिनके स्वेद पोछन सो रहे कुम्हिलाइ के। --पूर्ण । पुष्पलावी = पुष्पावचायिका - २९ - मेघदूत ६ ५ ३ २ वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशा ८ ९ ७ सौधोत्संगप्रणयविमुखो मा स्म भूरुज्जयिन्याः। १२ १० ११ विद्य दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौरागनानां १३ १५ १६ १४ १७ लोलापांगैयदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोसि ॥२७॥ तो दिमि उत्तर चालनहार के मारग केतोहु फेर परे किन, वा उज्जनि के याछे अटा परसे विन तू चलियो कितहू जिन । चचल नैन वहाँ अवलान के विज्जछटा चकचौच करै छिन, जो न लब उन नैनन तू हकनाहक देह वरेही फिरै गिन । ---लक्ष्मण सिंह । व पर मारग फेर उत्तरपय त मति पै न ए, मत मानियो मांक विना वांके अटा उज्जैन के। नवलान के चख चपल तह चपला चमक सो चौवहीं, है मखा | जीवनवृथा जो तू छटा मो देख नहीं । -~पूर्ण। उज्जयिनी स्थाद्विगालाऽवन्ती पुष्पकरण्डिनी। ३० मेघदूत २ वीचिक्षोभस्तनितविहगणिकांचीगुणायाः ४ ३ ५ संसर्पन्त्याः स्खलितसुभगं दर्शितावर्तनाः ।। ६ १ ९ ८ ७ निर्विन्ध्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः सन्निपत्य १० १२ १३ १४ ११ स्त्रीणामाद्य प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु ॥ २८ ॥ रस बीच में ले चलियौ निरविन्ध को जो मग तेरो निहारतो है, कटि किकिनि मानो विहगम पाँति तरग उठे झनकारती है। मनरजन चालि अनोखी चलै अरु भौंर की नाभि उघारती है, बतरान है मीत सो आदि यही तिय विभ्रम मोहनी डारती है। -~~-लक्ष्मण सिह । कूजति तरगन सग हसावलि सजे सोइ किकिनी, निज भ्रमर नाभि दिखावही मदमत्त मदर गामिनी। मग लीजियो रस तीन निर्विन्ध्या नदी को नेम सो, है प्रथम करिवो भावही तिय को बतवो प्रेम सो। -पूर्ण। निर्विन्ध्याः = नाम नदी। विभ्रम.-विलास ।

मेघदूत १० १ ११ ६ वेणीभूतप्रततुसलिलाऽसावतीतस्य सिन्धुः ३ २ पाण्डुच्छाया तटरुहतरुभ्र शिमिर्जीर्णपर्णः। ८ ७४ ५ ९ सौभाग्यं ते सुभग विरहावस्थया व्यब्जयन्ती १४ १२ १५ १३ १६ १७ काश्य येन त्यजति विधिना स खयैवोपपाद्यः ॥ २९ ॥ जल मूखत सिघु भई पतरी तन वेनी सरीखो दिखावती है, तट रुखन ते झरै पात पके छवि पीरी मनो अंग लावती है। धरि सोहनो रूप वियोगिनि को वह मनावती है, करियो घन | सो विवि वाके लए तन छीनता को जो मिटावती है । तोमें सुहाग --लक्ष्मण सिंह याकार बेनी के भई जलधार दुर्वल गात टो, तन पीत तीर तरून के झरे झर तहें पात जो, तव प्रेम-भाजनि सो दसा तुव विरह तापन सो लही, करि बेग मेघ । प्रबीनता सब छीनता हरियो मही। -पूर्ण । बेणीभूत सिन्धु --पाठान्तरे 'वेणीभूतप्रतन मलिला मामतीतम्यसिन्धु'। (श्याम सुन्दर दास मपादित प्रति में ) मिन्यु - नाम नदी। व्यञ्जयन्ती = प्रकाशयन्ती। ૨૨ मेघदूत ३ २ १ प्राप्याऽवन्तीजुदयनकथाकोविदग्रामद्धान् ४ ८ ७ ५ ६ पूर्वोद्दिष्टामनुसर पुरी श्रीविशालां विशालाम् । १० ९ १२ ११ स्वल्पीभूते सुचरितफले स्वर्गिणां गां गतानां १३ १४ १८ १५ १७ १६ शेषैः पुण्यह तमिव दिवः कांतिमत्खण्डमेकस् ॥ ३०॥ ख्यात है अवती जहाँ तेक निवास कर, पडित जनैया उद्दयन की कथान के। जाइ के तहाँ प्रवेस कीजौ वा बिसाला बीच, देखि लीजी सोभा साज सकल जहान के । भूमि ते गये जो नर देवलोक भोगिवे को, करि करि काज बडे धर्म औ प्रमान के। तेई फेरि आए सग सारभाग स्वर्ग लाए, प्रबल प्रताप मनो सेस पुन्नदान के। -लक्ष्मण सिह । जहँ ग्रामगुरुजन है चतुर उदयन चरित चरचान मे, जैयो अवन्ती प्रान्त में, उज्जैन स्त्री छवि खान में। जहँ अवनि आये जीव पावन पुन्य को फल बहु वित, फल सेस सो मनु स्वर्ग को इक खण्ड बर लाये इतै । -पूर्ण । अवन्तीम् = उज्जयिनीम्। उदयन नाम राजा, वत्सराज इति प्रसिद्ध । पूर्वो दिष्टापूर्वोक्ताम् । श्रीविशाला= सम्पत्ति महतीम् । विशाला पुरी= उज्जयिनीम् । ३३ मेघदूत ७ ३ ४ ६ । दोर्षीकुर्वन्पटुमदकलं कूजितं सारसानां २ ८ प्रत्यूपेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः। १५ १४ ९ यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिमंगानुकूलः १० १२ ११ शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः ॥ ३१ ॥ प्रात काल फूले नित्त कजन ते भेटि भेटि, रजन हिये की होत गध सरसानो है। दीरघ करत मदमाते बोल सारस के सुरन रमीले सुनि कान सुख मानो है। एते गृन साय तात सिप्रा नदी को वात, पीतम समान वीनती मे अति स्यानो है। सुरत गलानि हरत साई तहाँ नारिन की गातहितकारी जात याही ते वखानो है। -लक्ष्मण सिह । जो मद कलित धुनि मधुर पछिन की सरस सरसावही, कुसुमित कमल परिमल वलित जो अग लगि हुलसावही, मिप्रा पवन सो हरति रति को अरुचि प्रात तियान की, जैसे विनय की बात मनुहारी पिया रसखान की । —पूर्ण । गिप्रा शिप्रा नाम नदी। - ३४

मेघदूत
।
५
w
६
७
हारांस्तारांस्तरलगुटिकाकोटिशः शंखशुक्तीः
८
१०
९
शष्पश्यामान्मरकतमणीनुन्मयूखप्ररोहान् ।
१४
२
१२
११ १३
दृष्ट्वा यस्यां विपणिरचितान्विद्रुमाणां च भङ्गा-
१७
१५
१६
; संलक्ष्यन्ते सलिलनिधयस्तोयमात्रावशेषाः ॥३२क ॥
उस
विशाला नगरी की अनेक पण्यवीथिकाओ मे प्रसारित
बीच मे गुथेहुए महारत्नो से युक्त निर्मल हार, करोडो
शडख
और सीपियाँ, घासकी तरह नीली और छिटकती हुई किरणो से
सुशोभित मरकत मणियाँ तथा प्रवाल-खण्ड यह सकेत करते है
कि समुद्र में केवल जल ही शेष रह गया है
(उसकी समस्त
रत्नराशि इस नगरी में एकत्र हो गई है)।
३५

मेघदूत २ ३ ४ प्रद्योतस्य प्रियदुहितरं वत्सराजोऽत्र जह १० ९ ८ ७ ६ हैमं तालद्रुमवनमभूव तस्यैव रानः । ११ १५ १६ १४ १३ अत्रोद्भांतः किल नलगिरिः स्तम्भमुत्पाट्य दर्पा- २२ १९ १७ २१ १८ दित्याऽगन्तूनरमयति जनो यत्र वन्धूनभिः ॥ ३२ख । यहाँ (उज्जयिनी के राजा) प्रद्योत की प्रिय पुत्री (वासवदता) का (वत्स- राज) उदयन ने अपहरण किया था। उमी राजा (प्रद्योत) का सुवर्णमय तालवृक्षो का यहाँ एक वन या। यहाँ उनका नलगिरि (इन्द्रदत्त) नामक हाथी बी उग्वाड कर मद से मत्त घूमता या । इम कथा से परिचित विद्वान अन्यदेशो से विगाला में आये हुए अतिथियो का मनोविनोद करते है। इस के द्वारा ३६

मेघदूत
२
३
१
४
पत्रश्यामा दिनकरहयस्पद्धिनो यत्र बाहाः
५
७
or
८
w
औलोदशास्त्वमिव करिणो दृष्टिमन्तः प्रभेदात् ।
१३
११
१०
१२
योधानण्यः प्रतिदशमुस्वं संयुगे तस्थिवांसः
१५
१४
प्रत्यादिप्टाभरणरुचयश्चन्द्रहासवणाङ्कः ॥३२ग ॥
हे मेघ, उस विशाला नगरी मे पलाश वर्ण वाले धोड रग और चाल
में सूर्य के घोडो से प्रतिस्पर्धा करते है। वहाँ शैल के समान ऊँचे हाथी मद
साव के कारण तुम्हारी तरह वर्षा करते है।
युद्ध मे रावण के सम्मुख
खडे हो सकने वाले भटश्रेष्ट (रावण की तलवार) चन्द्रहास के आघात
चिन्हो ही से आभूपणो की काति को भी निष्प्रभ करदेते हैं ।

मेघदूत ३ २ जालोद्रोणरुपचितवपुः केशसंस्कारधूपै- ४ ५ बन्धुपौत्या भननशिखिभिर्दत्तनृत्योपहारः । ८ १२ हऱ्यावस्याः कुसुमसुरभिष्वध्वखेदं नयेथा १० ७ लक्ष्मी पश्यंल्ललितवनितापादरागाङ्कितेषु ॥ ३२॥ उडत झरोखन ने फेसगन्ध-धूप तहाँ होई अग ते ऐ पुष्ट मेघ बाहि पीजो तू । देखि तोहि बारबार नाचिहै घरेलू मोर, प्रीति मनकार मीत सोई मान लीजी तू । मोघे होई फलन त मदिर अवतिका के बैन थके गातन को नेक तहाँ दीजो तू । ललिन तियान पॉव रजित महावर ते, अस्ति अटानि जाइ विसराम कीजो तू । ~~~-लक्ष्मण सिंह। निमा करोखन केसरजन वूप तासो पीन ह, प्रेमी मिग्विन के नृत्यमय उपहार सो सुख लीन ह। नवलान पग जावक कलित फूलन वलित पहलान में, पन | जोडयो सुममा ललित, सम वोइयो मब आन में। -पूर्ण । गालोद्गीर्ण = गवाक्षमार्गनिर्गत । केगगम्कारपू =बनिताकेशवासनार्गन्धद्रव्यधूपं । ३८ - मेघदूत १ سه ४ ८ ६ ९ ७ २ पतुः कण्ठच्छविरिति गणैः सादरं वीक्ष्यमाणः १० पुण्यं यायास्त्रिभुवनगुरोर्धाय चण्डीश्वरस्य । १५ ११ १३ धूतोद्यानं कुवलयरजोन्धिभिर्गन्धवत्या- १२ १४ स्तोयक्रीडानिरतयुतिस्तानतिक्त यरुद्भिः ॥ ३३ ॥ जाइयो तू फेर मीत पावन पुनीत ठॉव चण्डेस्वर धाम तीन लोक अधिकारी के। नाथ के गरे की छबि देखि अग तेरे माहि आदर सो लेगे तोहि गण त्रिपुरारी के। कर जलकेलि नारि नागरि नवेली तहाँ गधित है नीर गधवती सिधु प्यारी के । नीरन ते मोद औ कमोदन ते लै पराग पवन झकोर नित्त रूख बागवारी के । -लक्ष्मण सिंह। सितिकठ कठ समान छवि सादर गनन दरसाइयो, भगवत भवानीनाथ त्रिभुवन राति भवन को जाइयो। तह बाग डोलहि कुमुद वासित 'गधवती' वातसो, सुरभित जु मिलि जलकेलिरत नव नागरिन के गात सो। -पूर्ण । पुण्य यायास्त्रिभुवनगुरोर्धाम चण्डीश्वरस्य-पाठन्तरे 'पुण्य मायास्त्रिभुवनगुरोर्धाम चण्डेश्वरस्य' (श्याम सु दर दास सपादित प्रति मे)। चण्डेश्वस्य चण्डाया ईश्वर, पार्वतीपति । गधवती-नाम नदी। - मेघदूत ३ १० ८ ६ ९ १६ अप्यन्यस्मिञ्जलधर महाकालमासाद्य काले ११ स्थातव्य' ते नयनविपर्य यावदत्येति भानुः। १४ ११ १२ फुर्वन्संध्यावलिपटदतां शूलिनः श्लाघनीया- १९ १८ २० १७ मायन्द्राणां फलमविकलं लप्स्यसे गर्जितानाम् ॥३४॥ माँझ के बिना जो कहूँ पहुंचे तू और काल महाकालजू के पुय आसूम मे जाइक । ठेर तहा लोजी ईम भानु रहे जौली दीठ दिवस उजारो रहे छिति छहराइ के । नध्यावलि पूजन जब होड सूलधारी की दु दुभि की ठौर दीजो गरज सुनाइ के। मद मद घोम की पावेगी फर अम्बड ऐसे बरदागी देव-देव को रिझाइ के। -लक्ष्मण सिह । श्री महाकाल विमाल गृह पहुंचे जु तू औरहि समै, तवलो ठहरियो जलद । जवलौं नयन सन्मुख रवि रमै, मिव अर्चना की दुदुभी सग मपुर बुनि पुनि कीजियो, गभीर गरजनि आपनी Sh सफल कर लीजियो । -पूर्ण । महाकाल = महाकालाव्य स्थानम् । आकारे तारक लिङ्ग पाताले हाटकेश्वरम् । मर्त्यलोके महाकाल दृष्ट्वा काममवाप्नुयात् । आमन्द्र =ईपद् गम्भीरम् । -- ४० मेघदूत २ पादन्यासैः कणितरशनास्तत्र लीलावधूत ४ रत्नच्छायाखचितवलिभिश्चामरैः क्लान्तहस्ताः। ५ ६ ७ ९ ८ वेश्यास्वत्तो नखपदसुखान्याप्य वर्षाग्रविन्दू- १२ १० नामोक्ष्यन्ते यि मधुवारश्रेणिदीर्घान्कटाक्षान् ।। ३५।। नाचति नवेली तहाँ बेस्या अलवेली वाल किकिनी बजति पगधरत सुहावनी । रतनजडी डॉडिन के डोलति है ठाढी चौर थकित भुजान करै लीला ललचावनी। जाइ नख रेखनि मे उनके परंगी जब नई बद तेरी मेघ सुखसरसावनी । बड़े से कटाच्छ तोपै भ्रमरावली समान डारैगी सनेह भरे वेई मन भावनी । ---लक्ष्मण सिह । किकिनि बजे जिनकी नचत तहँ बार बाला सुदरी कर थके जिनके सेइ के चवरे मनिन आभा भरी । नखछद सुखद तो प्रथम दन पाय तोहि निहारि है अलिअवलि सी तीछन कटाछन की छटा विसतारि है। -पूर्ण । पादन्यास क्वणितरशनास्तत्र लीलावधूत पाठान्तरे 'पादन्यास क्वणितरसनास्तत्र लीलावधूत' ( श्यामसु दर दास सपादित प्रति मे ) आमोक्ष्यन्ते इत्यादि = आमद्राणा गर्जितानामिद फलम् । ४१ मेघदूत १ पश्चादुच्चैर्भुजतरुवनं मंडलेनाभिलीनः ८ ६ ९ सान्ध्यं तेजः प्रतिनवजपापुष्परक्तं दधानः। ३ १४ २ नृत्यारम्भे हर पशुपतेरा नागाजिनेच्छां ११ १२ १० शान्तोद गस्तिमितनयनं दृष्ठभक्तिर्भवान्याः ॥३६॥ बांधि फेरि मण्डल जब लेगो तू छाइ मीत, लाँबी सी भुजान रूप ऊँचे रूखवारो वन, फूल है जवा को नयो ता समान लाल रग, तेज साँझ काल हू को धारि लेगी कारे तन नृत्य समै ओढ यो चहै आलो गजचर्म नाथ देखि तोहि भूलि जाइ ताको खरो प्यारोपन । ग्लानि के मिटे ते स्वम्थचित्त ह्व भवानी तोहि, प्यार सो लखैगी आज हररव्यौ हमारो मन । --लक्ष्मण सिह । पुनि नब जवा सम साँझ की सुठि लालिमा सो छाजि के, भव भुजन के तरु तु ग बन 4 मजु मडल साजि के, गज चर्म गीले को पुजयो नृत्यगत सिव कामना, इकटक भवानी देखिहै मुदभाव सो यह भावना । -पूर्ण । प्रतिनवजपापुष्परक्त = पाठान्तरे 'प्रतिवनजवापुष्परक्त' ( श्यामसु दर दास सम्पादित प्रति मे ) नागजिनेच्छा हर = गजचर्म धारणेच्छा निवर्तय । त्वमेव तत्स्थाने भवेति भाव । स्तिमित = निश्चलम् । ४२ मेघदूत ४ ३ ५ १ २ गच्छन्तीनां रमणवसतिं योपितां तत्र नक्त' ८ on ६ ७ रुद्धालोके नरपतिपथे सूचिभेद्य स्तमोभिः । ११ १० १३ १२ सौदामिन्या कनकनिकपस्निग्धया दर्शयोर्वी १४ १५ १७ १६ तोयोत्सर्गस्तनितमुखरो मा स्म भूर्विक्लवास्ताः ॥३७॥ मीतके मदिर जात चली मिलिहै तहँ केतिक रात मे नारी मारग सूझ जिन्है न परै जब सूचिकाभेद झुकै अँधियारी । कचनरेख कसौटी सी दामिनि तू चमकाइ दिखाइ अगारी, कीजियो ना कहुँ मेह की घोर मरै अवला अकुलाइ विचारी । --लक्ष्मण सिह । तह रैन मे रसियान गृह अभिसारिका गन जात है, अतिअधकार अपार मे नहि राज पथ लखात है, कचन कसौटी खचित सी छहराइयो छिति दामिनी, पै गरजियो जनि वरसियो जनि भीरु है वे कामिनी। -पूर्ण। मक्त-पाठान्तरे 'रात्रौ' (श्यामसु दर दास सपादित प्रति में) स्निग्धया-पाठान्तरे 'छायया' (,, ४३ मेवदूत ५ ३ ४ तां कस्यांचिद्भवनवलभी सुप्तपारावतायां ६ or नीला रात्रि चिरविलसनात्खिन्नविद्य कलत्रः। ९ ८ १० २ १२ ११ दृष्टे सूर्ये पुनरपि भवान्वाहयेदवशेष १६ १५ १३ १४ मन्दायन्ते न खलु मुहृदामभ्युपैतार्थ त्याः ॥ ३८ ॥ यकि जायगी दामिनि तेरी तिया वहु बेर लौं हास विलास करे, टिक रात में लीजियो काहू अटा जहाँ सोवत होई परेवा परे । दिन ऊगत फेरि उतै चलियो जित मे चलिवे की रह डगरे, सोहतात कहां नर वे जग में जिन मीत के कारज सीम वरे । लक्ष्मण मिह । वर विपुल विलसन सो म्रमित जिय जानि दामिनि भामिनी, जहँ करत सयन कपोत तह छत पै वितैयो जामिनी । पुनि गैल गहियो हे मखा | लहतहि दरस दिनराज को, नहि करत मज्जन देर जिय में ठानि मीत सुकाज को। -~-पूर्ण। भवनवलभी-गृहाच्छादनोपरिभाग । ४४ मेघदूत ५ ४ 3 तस्मिन्काले नयनसलिलं योषितां खण्डितानां w ७ २ ८ १० ९ १२ ११ शान्ति नयं प्रणयिभिरतो वर्त्म भानोस्त्यजाशु । १६ १५ १३ १७ १४ पालेयास्त्र कमलबदनात्सोऽपि हतु नलिन्याः १८ प्रत्यायत्तस्वयि कररुधि स्यादनल्पाभ्यसूयः ॥ ३९॥ २१ २० भोर भये बनिता खंडितान के मीत मिले अँसुवा पुछजात है, छोडियो याते तुरन्तहि सो मग जा मग आवत भानुप्रभात है। चाहत वेहु मिटावन को नलिनी-मुख ओस के आँसू दिखात है, रोकियो ना उनकी किरने अनखाइ बडे अनखान की बात है। - -- लक्ष्मण सिह । प्रियतम खण्डितान के आँसू पोछत भयो सबेरो, तातो रबि को पथ तजन मे जनि कीजियो अबेरो। नलिनी बदन ओस के अँसुवा पोछन सोऊ ऐहै, रुकत देखि निज किरन चडकर तो पै अधिक रिस है। -पूर्ण । प्रालेयास्र -पाठान्तरे 'पालेयाश्रु' (श्यामसु दर दास सम्पादित प्रति मे) प्रत्यावृत्त प्रत्यागत । ४५ मेघदूत ५ ६ ८ गम्भीगयाः पर्यास सस्तिश्चेतसीव प्रसन्न 3 ९ २ ८ छायात्मापि प्रकृतिसुभगो लप्स्यते त प्रवेशम् । १५ तस्मादस्याः कुमुद विशदान्यह सि वं न सी- १० ११ १८ १४ १७ १५ १६ १३ न्मोघीक चटुलशफरोद्वतनप्रेक्षितानि ॥ ४० ॥ अति उज्जल नीर गंभीरा नदी निरदोम हिये के समान घरे । मनभावन को प्रतिबिम्ब मुहावन ता जल जाइ पर ही परं । फिरि का विधि होडगो जोग जु तू निगई सखा इतनी पकर, मफरी गति चचल स्वच्छ सरोमह वाँकी चितौनि निगम करें । लक्ष्मण मिह । त्रित ममान निरमल जलबारी गभीरा सरि माँही परि है जब तब महज ध्वीली परमीली परछांही। कुमुदवरन मीनन उचकनि मिम तब वह चपल चितैहै, तू है तूं अवसि काम बस धरी वीरता रैहै । - पूर्ण। गम्भीरा-नामनदी। मोघी-विफली। सफर -मीन । उदृतनम् = उत्लुण्ठनम् । शफगद्वर्तन-पाठान्तरे 'सफरोहतन' (श्याममु दर दाम सम्पादित प्रति में)।

मेघदूत २ ४ سد तस्याः किंचित्करधृतमिव प्राप्तवानीरशारवं ८ ६ ७ ९ नीत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोधोनितम्बम् । ११ १० १२ १३ प्रस्थानं ते कथमपि सखे लम्बमानस्य भावि १४ १६ १५ १७ ज्ञातावादो विद्वतजघनां को विहातुं समर्थः ॥४१॥ तटसो उठि बाको सलिल लग्यौ डार वानीर, कर पकरत सरक्यो मनौ कटि ते नीलो चीर । लिए ताहि कैसे बने प्यारे तेरो गौन, नगन जघन के तजन को रसिया समरथ कौन । --लक्ष्मण सिह । नील नीर पट जब तव खैचे तट नितब ते खसिहै, जल गत वेतलता कर सो कछु पट पकरति सी लसिह । झुकि रस भारन कैसे तहँ ते हहै गमन तिहारो, जघन उघारी नारि सके तजि को रस जानन वारो। -पूर्ण। पू घानीरम् =वेतसम् । ४७ 'मेघदूत १ त्वन्निष्यन्दोच्छ्वलितवसुधागन्धसंपर्करम्यः २ स्रोतोरन्धध्वनितसुभगं दन्तिभिः पीयमानः। ७ ६ ८ नीचैर्वास्यत्युपजिगमिषोर्देवपूर्व गिरि ते ५ ४ ३ शीतो वायुः परिणमयिता काननोदुम्बराणाम् ॥४२॥ तो बरमत छितिगध मिलि होइ पवन रमनीय, बनगूलर पकवन प्रवल स्त्रवन सुभग गजप्रीय । सीतल मद सुगघ बहि करिहै पगपग सेव, मारग में जब तू चल पहुंचन को गिरिदेव । -~लक्ष्मण सिह तव मिचित पुलकित छितिसो मिलि होति सुगधित जोई, जाहि पियत कु जरगन सु डन सवद सुरजन होई । जासो सुन्दर पकत उदु बुर तीन पौन हित जोरी, झलिह मद विजन तव अगन जात देवगिरि ओरी । - पूर्ण। -- निष्यन्द-पाठान्तरे 'निस्यन्द' (श्यामसु दर दास सम्पादित प्रति में) स्रोत --पाठान्तरे 'श्रोत' देवपूर्वगिरिम् =देवगिरिम् । परिणमयिता-परिपाकयिता। ४८ मेघदूत ३ ५ १ तत्र स्कन्दं नियतवसतिं पुष्पमेघोकृतात्मा ७ ८ २ ६ पुष्पासारैः स्नपयतु भवान्व्योमगङ्गाजला। १२ १० ११ रक्षातोर्नवशशिभृता नासबौनां चमूना- १६ मत्यादित्यं हुतवहमुखे सम्भृतं तद्धि तेजः।। ४३ ॥ १५ १४ ९ नित्त निवास कुमार कर जहँ तू उनको अन्हवाइयो जाइके, पुष्पमई बदरा बनि के नभगग मिले फुलवा बरसाइ के। जन्म दियो हर पावक मॉहि जिनहि सुरराज चमू हित लाइके, मन्द करै रवि को परतापहु आपने मात पिता गुन पाइके । -लक्ष्मण सिह । स्वामि कारतिक धाम जानि तहँ सुमन मेध वन जैयो, सुरसरि सलिल सिचे सुमनन की बरसा करि अन्हवैयो । कीन्हो सचित तेज आपनो पावक मे हर जोई, भये भानु ते अधिक प्रतापी सुरसेनापति सोई। --पूर्ण। स्कन्द पार्वतीनन्दन स्कन्द सेनानीरग्निभूर्गह । कार्तिकेयो महासेन शरजन्मा पडानन ॥ ४९ मेघदूत ८ ३ २ ५ १ ज्योतिर्लेखावलयि गलितं यस्य वह भवानी ६ ८ पुत्रप्रेन्णा कुवलयदलमापि कर्णे करोति । १० ९ १२ धौतापांगं हरशशिरुचा पावकेस्तं मयूर १३ १८ १५ १६ पश्चाढद्रिग्रहणगुरुभिर्गर्जितैर्नर्तयेथाः॥४४॥ जा उनके बरही की पखा गिरि तारेजडी सी कहूँ परती है, गौरि उठाइ के पूत सनेह सो कानन कज सी ले धरती है। जामु वोएन की उज्जलता सिव के ससि सो समता करती है, ताहि नचाइयो घोर वडी करि माहि गुफान के जो भरती है । -~-लक्ष्मण मिह । जामु अमद मयूरवन मडित पग्ब बीनि हरवाई, पुत्र प्रेम मो मजति भीन मे गोरि सरोज विहाई। म्वामि मिखी के चख मित मोहै लहि सिव ससि उजियारी, ताहि नचंयो छाड महानि गिरि मह गूजन हारी। --पूर्ण । ज्योतिलेबावयितारापक्तिमण्डलयस्मिन् तत् । कुवलयदल = कमलदलम् । - मेघदूत ४ २ १ ३ ८ आराध्यैनं शरवणभवं देवमुल्ल'घितावा ६ ५ ७ सिद्धद्वन्द्व जलकणभयाद्वीणिभिर्युक्तमार्गः। १५ on १४ व्यालम्बेथाः सुरमितनयालम्भजां मानयिष्य- ११ १० १२ १३ स्रोतोमूर्त्या सुवि परिणतां रन्तिदेवस्य कीर्तिम् ॥ ४५ ॥ चलियो धन पूजि के वा सुर को शर को बन जासु की जन्म मही है । डर बू दन के मग तेरौ तजै जिन दम्पति सिद्धन वीन गही है। करि आदर हौले उलाँधियो तू गउमेधन तें सरिता जो बही है। मनु कीरति श्री रतिदेवजु की जलरूप मे भूतल फैलि रही है । -लक्ष्मण सिह । पूजि देव सिरमौर कुमारहि चलियो और अगारी तुव बुदन बरकाय बचहै बीन सिद्ध पिय प्यारी । चबल चारु उतरियो बदत जानि धेनु मख जाई, रन्ति देव की सुजस धार जनु धवल घरातल छाई । -पूर्ण। सुरभितनयालम्भजाम् = गोहननाज्जाताम् । रन्तिदेव नाम राजा।

मेघदूत ३ ५ १ २ ४६ त्वय्यादातु जलमवनते शाङ्गिणो वर्णचौरे १० ९ ८ ११ तस्याः सिन्धोः पृथुमपि तनुं दूरभावात्प्रवाहम् । १२ १३ ३ १५ १४ प्रेक्षिष्यन्ते गगनगतयो नूनयावज्ये दृष्टी- १७ १९ १८ १६ रकमुक्तागुणमिव भुवः स्यूलमध्येन्द्रनीलम् ॥ ४६॥ विमनार के माहि बडी सरिता वह दूर ते दीखति है पतरी, हरि रंग के चोर पियं जब तू जल वामे झुकाइ के देह खरी। लग्वि लेहिगे खेचर तोहि घने करि दीठि तुरन्तहि चाव मरी, मनु भूमि की मोनिन माल म एक बडी मनि नीलम आइ धरी। -लक्ष्मण सिह । कृष्ण वरन को चोर जब तू झुके हरन को पानी, नाकी धारा भूरि दुरित लघु व लगिह छवि खानी । नभगामी लखिहे तव मुग्वमा ऐसी परम रसाला, मानो महि तन मोतिन माला नीलम मध्य विमाला। ~~पूर्ण । गादिगण = विष्णो । सिन्ध =नदी। ५२ मेघदूत १ ८ २ तामुत्तीर्य ब्रज परिचितभ्र लताविभ्रमाणां mm पक्ष्मोत्क्षे पादुपरिविलसत्कृष्णशारप्रभाणाम् । ४ ६ कुन्दक्ष पानुगमधुकरश्रीमुषामात्मविम्बं ७ ५ पात्रीकुर्वन्दशपुरवधूनेत्रकौतूहलानाम् ॥ ४७ ॥ उतरि ताहि आगे मग लीजो, दसपुर तियनि दरस चलि दीजो। भरे कुतूहल उनके नैना, जानत भ्र बिलास अरु सैना । लखन तोहि जब पलक उठेहै, अद्भुत मृग लोचन दुति पैहै । जिमि अलि पाँति कुन्द सग भाजति, सो छवि उन नैनन विच राजति । -लक्ष्मण मिह । विचल कुद के सग भृग की भ्रमन छटा जो धारे, पलक उठावत धारे प्यारे सित अनारे कारे । लखि तोहि तनछविऐन सुनैनन भ्र वविलासिनी वामा, रिहै प्रकट कामना मनकी दसपुर मे अभिरामा । -पूर्ण । दशपुरम् = रन्तिदेवस्यग्गरम् । ५३ मेघदूत २ ३ ब्रह्मावतं जनपदमथ च्छायया गाहमानः ८ ५ ७ ६ ९ क्षेत्र क्षत्रप्रधनपिशुनं कौरवं तद्भजेथाः। १३ १२ ११ राजन्यानां शितशरशतैर्यत्र गाण्डीवधन्वा १५ १७ १६ १८ १४ धारापातैस्खमिव कमलान्यभ्यवर्पन्मुखानि ।। ४८ ।। चलियो ब्रह्मावतहि छाई, अरु कुरुक्षेत्र पहुँचियो जाई । विकट जुद्ध छत्रिन जहँ कीन्हे, अजहुँ प्रगट तिनके है चीन्हे । वरमे जहें अर्जुन सितवाना, राजन के सर बेपरमाना । जिमि वरमति तेरी जलधारा, कमलमुखन अनगिनत अपरा । ~~~-लक्ष्मण सिह । ब्रह्यावतं प्रदेम प्रवेसन करि छाया के द्वारा, कुरुक्षेत्र जइयो जहँ छत्रिन सगर कियो अपारा। विपुल विसिख विकराल किरीटी नृपन मुखन तहँ मारे, हे जलवर । जलजात जालपर ज्यो जलपात तिहारे । -पूर्ण। अभ्यवर्पन पाठान्तरे 'अभ्यपिञ्चन्' (श्मामसु दर दास सम्पादित प्रति मे) मरम्बती दृपदृत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । नदेवनिर्मित देश ब्रह्यावर्त प्रचक्षते। मनु २।१७ । ५४ मेघदूत ७ ६ ४ हित्वा हालामभियतरसां रेवतीलोचनाका १ २ ३ ८ ९ बन्धुप्रीत्या समरविमुखो लाङ्गलो याः सिषेवे । १४ १० १३ १२ ११ कृत्वा तासामभिगममपां सौम्य सारखतीना- १६ १५ मन्तःशुद्धस्त्वमपि भविता वर्णमात्रण कृष्णः ॥ ४९ ॥ १७ १८ तजी प्यारी हाला विमल निज बाला दृगन सी, हली बन्धूस्नेही समर तजि सेई सरसुती। मिले जो तू वाही सुभग सरिता के जलन ते, करै अन्तस्सुद्धी तुव वरण ही सो कृष्ण की। -लक्ष्मण सिह । सुरस रेवती लोचन अकित त्यागहि लीने हाला, ऐयो जाको समर विमुख रहि वधु प्रेम प्रति पाला । सुइ सु दर सुरसुती सलिल की सेवा करि मति धीरा, तोहू हहै निरमल मानस यद्यपि श्याम शरीरा। --पूर्ण। लाडली = हलधर , वलदेव । ५५ - मेघदूत १ ६ २ ३ तस्माद्गच्छेरनुकनखल शैलराजावतीर्णा ५ ४ जबोः कन्यां सगरतनयस्वर्गसोपानपंत्तिम् । ७ १० ८ गौरीवक्त्रभ्र कुटिग्चनां या विहस्पेव फेनैः १२ १३ ११ शंभोः केगग्रहणमकरोदिन्दुलग्नोर्मिहस्ता ॥ ५० ॥ चल्यो आगे जइयो कनम्बल जहाँ जाह्नवलली, हिमालय तें आई सगर-कुल-वेनी मुरग की । करी जाने गौरी भ्र व कुटिल की फेनन हमी, जटा सम्भूजी की ससि सहित बीची कर घरी । --लक्ष्मण मिह । वहै हिमालय ते कनखल ढिग जन्हु सुता छवित्रेनी, लखियो सोइ मगर-मुत-तारनि सुरसरि स्वर्ग नसेनी । मेन फेन मो मौत सिवा की हंसति मनो 5 वभगनि, पवरि नभुकच परसि चद को करि कर तरल तरगनि । -पूर्ण। अनु कनपल हरिद्वारम् । खले को नाव मुक्ति वा भजते तत्र मज्जनात् । अन कनयल तीर्थ नाम्ना चक मुनीश्वरा । गटगजावतीर्णाम् =हिमालयादागताम् - मेघदूत ३ ६ ८ तस्याः पातु सुरगज इव व्योम्नि पश्चाद्ध लम्बी २ ४ ९ ७ वं चेदच्छस्फटिकविशदं तर्कयेस्तिर्यगम्भः। ११ १० १३ १२ १४ १५ संसर्पन्त्या सपदि भवतः स्रोतसि च्छाययासो १७ १६ स्यादस्थानोपगतयमुनासंगमेवाभिरामा ॥ ५१ ।। जु तू इच्छा वाको करि विमल पानी पियन की, झ के आधो लम्बो तन गगन मे ज्यो सुरकरी । बनै तव छाया ते तुरत वह धारा ललितसी, मनो है कालिन्दी अनतहि विना सगम मिली। लक्ष्मण सिह । सुर मतग सम श्याम रग तू अगलो अग झुके है, नासु फटिक सम सलिल पियन को जब तू नभ तिरछे है। छैहै तेहि छिन छहरि छटा यो तेरी छाँह छबीली, गग जमन सगम छवि जगम आई मनहु रंगीली । -~पूर्ण । पश्चार्ध-पाठान्तरे पूर्वाध' (श्यामसु दर दास सम्पादित प्रति में)। तर्कये =विचारये । तिर्यक् = तिरश्चीन यथा स्यात् तथा स्थानोपगत -प्रयागादन्यत्र प्राप्त । ५७ मेघदूत ४ ३ २ आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगंधैर्मुगाणां ६ ९ ५ १० ८ ७ १७ १२ तस्या एव प्रभवयचलं प्राप्य गौरं तुषारैः। ११ १३ १४ वक्ष्यस्यध्वश्रमविनयने तस्य श्रृङ्ग निषण्णः १५ शोभा शुभ्रधिनयनवृपोत्खातपकोपमेयाम् ॥५२॥ १६ पिताजी पै वाके नितहि कसतूरी-मृगवस, सिला सोघो याते अरु धवल पालो परि लसै । विराजगो जो तू समहरन ताकी सिग्वर पै, दिपंगो ज्यो गोरे सिव वृसभ खोदी कलिल है -लक्ष्मण सिह । कस्तूरी मृग करहि सुगधित रमि रमि जासु सिला को, हिम दल वलित अचल वर उज्जल हेतु जोन गगा को। मग समहारी यो तेहि नग 4 ह है घटा तिहारी, मानहु सुभ्र उनदी नदी पक सुखद बिदारी । -पूर्ण । प्रभव-कारण अथवा पितरम् । ५८ - मेघदूत २ १ ३ तं चेद्वायौ सरति सरलस्कन्धसंघट्टजन्या w ४ ५ बाधेतोल्काक्षपितचमरीवालभारो दवाग्निः। १२ ८ ११ १० अर्हस्येनं शमयितुमलं वारिधारासहस्र- ९ - १५ १३ रापन्नातिप्रशमनफला संपदो ह्य त्तमानाम् ॥ ५३ ॥ ॥ चलत पवन बन प्रबल घिसत तरु सरल परस्पर, प्रगटत अनल प्रचण्ड हरत कबरी मृग कचभर । सो दवागि यदि दहकि देह तिहिं अचल सतावै, उचित होइ तब तोहि तुरत ही जल बरसावै । करि सहस्रधारा जलद, दूर तासु बाधाकर , फल मुख्य सजन सम्पति यही, पीर पराई नितहरै । - --लक्ष्मण सिह । देवदारु द्रुम घिसे जु प्रगट पावक पवनहि पाई, गिरि दुख पावै ज्वाल जरावै सुरागाय समुदाई । तासु समन समरथ तू ह है सहसवार वरसाई, सज्जन सपति सफल दुखित को सकट जासो जाई । -पूर्ण । सरल =देवदारु । - ५९ मेघदूत २ ५ य संरम्भोत्पतनरभसाः स्वाङ्गभङ्गाय तस्मि- ६ ४ ९ ८ न्मुक्तावानं सपदि शरभा लङ्घयेयुभवन्तम् । १० १२ ११ तान्कुर्वीथास्तुमुलकरकाष्टिपातावकीर्णा- १४ १६ १५ १३ फेवा न स्युः परिभवपदं निष्फलारम्भयत्नाः ॥५४॥ सुनत मवद घनघोर सरभ तिहि परवत माहो, कुपित होडेंगे अधिक तोहि महि सकिद नाही। कूदि कूदि करि दर्प वृथा अपनो तन तोरे, तो अलध्य को चहै लाँघि ऊपर की ओरै । बरमाइ घने करका तिनहि, दीजो विहँसि भजाइ धन, को न जगत लज्जित भयो जिनि कीजो निष्फल जतन । -लक्ष्मण सिह । महि नहि मकिहे तेरी धुनि को मरभ गरव दिखरै है, निज तन भग करावन को तोहि नाहक नाँघन चैहै । चकनाचूर कीजियो तिनको विपुल उपल बरसाई । तिग्मार के जोग लोग जो करहि प्रयत्न विथाई । -पूर्ण । यहरलोक श्याममु दर दाम सम्पादित प्रति में इस प्रकार है- ये त्वा मुक्तध्वनिममहना म्वाङ्गभङ्गाय तस्मिन् दत्मेिकादुपरि गरभालड्वयेयुभवन्तम् । नान्कुयाम्तुमुलकरकावृष्टिहानावकीर्णान् के वा न म्यु परिगवपद निष्फलारम्भयत्ना । गरभा = अप्टापदमृगविशेपा ।

मेघदूत १ 3 २ ६ ५ तत्र व्यक्त दृपदि चरणन्यासपर्धेन्दुमौलेः ७ ८ शश्वत्सिद्धरुपचितवलिं भक्तिनम्रः परीयाः। ९ १२ यस्मिन्दृष्टे करणविगमादूर्ध्वमुद्ध तपापाः १४ १३ ११ संकल्पन्ते स्थिरगणपदप्राप्तये श्रद्दधानाः ॥ ५५॥ सिला एक विच लखत चिन्ह तहँ पद ससिसेखर, नितप्रति पूजत रहत जाहि जोगी सिद्धेश्वर । परिक्रमा घनतासु यथाविधि तू चलि दीजो, भक्तिभाव उरलाय नम आगे बनिलीजो। धरि अचल दीठि तिहि चरन में श्रद्धमान निष्पाप नर, तन तजत मिलत सिवगणन में सदा सदा को पाइ वर । --लक्ष्मण सिह । तहाँ सिला अकित मिवपद के दरसन धन करि लीजी, भक्ति लीन अति दीन भाव सो तासु प्रदच्छिन कीजी । सेवै सिद्ध सहित विधि ताको तासु दरस सुभ पाई, पावै सुखद प्रमथप्रद नीरद अत सत समुदाई। -पूण । उपचितवलिम् = रचितपूजाविधिम् । परीया = प्रदक्षिण कुरु । करणविगमादूर्ध्वम् = देहत्यागानन्तरम् ।

मेघदूत ५ ३ २ शब्दायन्ते मधुरमनिलैः कीचकाः पूर्यमाणाः ६ ८ ९ संसक्ताभिस्त्रिपुरविजयो गीयते किंनरीमिः। १२ ११ १३ १४ १७ १० १५ १६ निहादस्ते मुरज इव चेत्कन्दरेपु ध्वनिः स्या- २० २१ १९ १८ २३ २२ संगीतार्थो ननु पशुपतेस्तत्र भावी समग्रः ॥५६॥ वाँस रन्ध भरि करत पवन धुनि अधिक सुहावन, मानहु मुरली बजति मधुर सुर सो मन भावन । विह्वल किन्नर नारि आपनी तान सुनावति. हरखि हरखि जिय माँहि त्रिपुर विजयी गुन गावति । धनघोर जाइ यदि तू करै ज्यो मृदग गुमकत गृफन, पूरन समाज सगीत तहँ पशुपति को वनि जाइ घन । ---लक्ष्मण सिह । पवन साँम सो बाम पुज तहँ मज् मजु सुर छावै, मिलि निनमै गुन भरी किन्नरी त्रिपुर विजय जस गावै । तहँ मृदग सम नाद कदरन छैहै जो तू रूरो, तो शकर संगीत वाज को साज होडगो पूरो। -पूर्ण । 'वेणव की चकास्ते स्युये म्वनन्त्य निलोद्धता' इति अमर । 'कीचको दैत्यभेदे स्याच्छुष्कवशे द्रुमान्तरे' इति विश्व । ६२ मेघदूत १ ३ २ प्रालेयाद्ररुपतटमतिक्रम्य तांस्ताविशेषा- - ४ ५ ६ न्हंसदारं भृगुपतियशोवर्ल्स यत्क्रौञ्चरन्धम् । ७ १४ १५ तेनोदीची दिशमनुसरेस्तिर्यगायामशोभी १० ११ ८ १२ ९ श्यामः पादो बलिनियमनाभ्युद्यतस्येव विष्णोः ।।५७॥ आगे हिमपरबत तट पाटी, क्रौञ्चरन्धू नामक इक धाटी । है सोई हसन को द्वारा, भृगुपति जस प्रगटावन हारा। ता बिच कढि उत्तर चलि दीजी, तिरछी गति लम्बो तन कीजी। जिमि हरि श्याम पाँव विस्तार्यो, बलि छलिबे को जब व्रत धार्यो । -लक्ष्मण सिह । हिमि गिरि निकट बिपुल थल नीके तिन आगे सुठि न्यारो, बिदित क्रौञ्चविल हस द्वार है परसु राम जसवारो। उत्तर जैयो प्रविशि ताहि झुकि अग बढाय रसाला, ज्यो बलि बधन समय विष्णु को श्यामल चरण विसाला। -पूर्ण। लम्बो तन-पाठान्तर 'लम्बोत न' (श्यामसु दर दास सम्पादित प्रति में) भृगुपतियशोवर्म=परशुरामस्य यश प्रवृत्ति कारणम् ।

मेघदूत २ १ ३ गला चोवं दशमुख जोच्छ्वासितप्रस्थसधेः। ४ ५ ६ कैलासस्य विदशवनितादर्पणस्यातिथिः स्यः। ९ ८ ११ १७ १० शृङ्गोच्छायैः कुमुद विशदैयाँ वितत्य स्थितः खं १३ १२ १६ १४ १५ राशीभूतः प्रतिदिनमिव त्रयम्बकस्याट्टहासः ॥ ५८॥ उठि ऊँचो कैलामहि जइयो, अतिथी वा गिरि को बनि रहियो । है दर्पण वह सुर वनितन को, उकसायो लकेस भुजन को। तुग मिखर सो नभ में राजत, मितता तासु कुमुद लखि लाजत । मनु सिव अदृहास इक ठौरो, करत प्रकास दिसन विच धौरो। -लक्ष्मण सिह । रमियो चढिक रजत सैल वर दरपन देव तियन को, निज हाथन सो कियो दसानन विलग जातु सिखरनको । सो कैलास कुमुद छवि गजन सृ गन वेधि अकास, दिन दिन के सघट्ट मभु के अट्टहास लौ भास । ~~~पूर्ण। प्रतिदिनम्-पाठान्तरे 'प्रतिदिगम्' (श्यामसुन्दर दास सम्पादित प्रति में) अट्टहास = अतिहास । 'अट्टातिगय क्षीमो' इति यादव । धावल्याद्धासत्वेनोत्प्रेक्षा । हामादीना वावत्य कवि समय सिद्धम् । ६४ मेघदूत १४ २ उत्पश्यामि खयि तटगते स्निग्धभिन्नाञ्जनाये ३ ४ सद्यः कृत्तद्विरददशनच्छेदगौरस्य तस्य । १२ ११ १३ शोभायः स्तियितनयनन क्षणीयां भवित्री- ५ ८ ९ ३ ७ १० मंसन्यस्ते सति हलभृतो मेचके वाससीव ॥ ५९ ॥ बाके निकट जबहि तू जाई, रह रुचिर अजन रंग छाई । स्वेत बरन वह सैल निदाना, द्विरददत सदग्वड समाना । सोभा तुरत मनोहर पाव निरखत इकटक नैनन भाव । जिमि हलधरतन लसत सुहायो, नीलबसन काँधे लटकायो । -लक्ष्मण मिह । नूतन दारित दति दत सम सित दुतिवत लस सो, सज्जित अजन सरिस सुरजन तू तेहि स ग रमैगो । नयन विमोहिनि वा सुखमा की उपमा ह है प्यारी, जनु बलराम सँवारो काँधे पटी स्यामरग वारी । -पूर्ण । स्निग्धभिन्नाञ्जनाभे=मसृण मर्दित च यत् कज्जल तस्य आभा इव आभा यस्य तस्मिन् सद्य कृत्तद्विरददशनच्छेदगौरस्य तत्काल छिन्नस्य गजदन्तस्य छदवदवलम्य। ६५ मेघदूत ४ हिला तस्मिन्भुजगवलयं शंभुना दत्तहस्ता २ ७ १३ ९ ८ क्रीडाशैले यदि च विचरेत्पादचारेण गौरी। ११ भगीभक्त्या विरचितवपुःस्तम्भितान्तर्जालौघः १४ १३ १० सोपानवं कुरु मणितटारोहणाया ग्रयायी ॥६० ॥ लिए सम्भुकर निजकर माही, भुजगवलय जा कर विच नाही गौरि हो पायँन यदि फिरती, वा क्रीडागिरि मॉहि विचरती। पोरी रूप सुभग बनि लीजौ, पुष्ट नीर अन्तर को कीजौ। परि घरि पग तोपै जब चाव, चढत चरन कछु खेद न पावै । -~-लक्ष्मण सिह । अहि ककन विहीन मकर के कर को लिए सहारा, आवै जो तह गोरि करन को गिरि विहार सुखसारा, तो निजनीर वाधि बनि जैयो सोपानन की सनी, आरोहन मे तामु मजु पद कजन को सुखदेनी। ~पूर्ण । विनरेन् -पाठान्तरे 'विहरेत्' (श्याम सु दर दास सपादित प्रति मे ) भङ्गी भक्त्या = पर्वणा रचनया। म्नम्भितान्तर्जलोध = धनीभाव प्रापितोऽन्तर्जलस्य प्रवाहो यस्य स । - ६६ मेघदूत १ २ ४ तत्रावश्यं वलयकुलिशोट्टनोगीर्णतोगं ५ ३ ६ नेष्यन्ति त्वां सुरयुक्तयो यन्त्रधारागृहत्वम् । १२ १३ ११ ९ ८ १० १४ ताभ्यो मोक्षस्तव यदि सखे धर्मलब्धस्य न स्या- १५ १७ १८ १६ क्रीडालोलाः श्रवणपरुषैर्ग जितैीषोस्ताः ॥ ६१ ॥ सुर जुवती जुरि मिलि तहँ आवै, पकरि तोहि जलयन्त्र बनावै । रघसि रघसि हीरा कगनसो, नीर झरावै तव अगन सो। इन खिलवारन तें यदि तेरो, छुटकारो नहि होइ सबेरो। सवन कठोर घोर तवकीजो, यो डरपाय उनहि मग लीजो । -लक्ष्मण सिह । तहँ सुरनारी ककन कोरन वार बार तोहि मारी, बादि बनैहै बारिजत्र तोहि बारि अपार बिसारी । तिन पाले परि ग्रीसम मे जो पिण्ड न छूट तेरो, तो उन चपल तियन डरयो करि घन सवद धनेरो। -- पूर्ण । यन्त्रधारागृहत्वम् = यत्रेषु धारा यन्त्रधारा तासागृहत्वम् -~-कृत्रिमधारागृह्त्वम् ।

मेघदूत २ ४ ३ हेमाभ्योजप्रसवि सलिनं मानसस्यादढानः ६ ५ ८ १० १ कुर्वन्कामं अणमूग्वपटनीतिमैरावतस्य । ११ १० धुन्वन्कल्पद्रुमकिसलयान्यांशुकानीव वातै- १३ १५ १४ नानाचेष्टर्जलद ललितैनिर्विशेस्तं नगेन्द्रम् ।। ६२ ।। उपजत वृन्द वृन्द वारिज मुन्हेरी जामे, एमो मानमर को लै नीर मेघ पीजो तू । बू दन बन्यो मो मुरव बम्ब वाहि दइके नेक, दिग्गज ऐगवत मो प्रीति मानि लीजो तू । वारि भरी बातन में कल्पवृक्षपातन मे, कान की सुहानी मी पनि मनाइ दीजो तू । फटिक समान गोरे बिम्बित तेहि मैल माहि, जोई नाहि भावै मो बिहार फेरि कीजो तू । --लक्ष्मण सिंह। कनक मल उपजावन वागे मानस को जल पीजी , माटर पियन यो एरावत को मुख अंगोछ हित कीजो । करपलना दल बायु वेग मी पट समान फहरैयो यहि विवि भोग विलास विविध करि परवत पै सुख पयो । --- पूर्ण । श्याम सदर दाम नपादित प्रति मे अतिम दो पक्रिया इस प्रकार है - धन्वन् वाले सजट पृपत कल्पवृक्षागुकानि-- च्छायाभिन्नम्फटिक विगद निर्विरोम्न नगेन्द्रम् । पद्रम =पञ्चते देवतरवो मदार पारिजातक । मन्नान कल्पवृक्षश्च पु मिवा हरिचन्दनम् । निर्विन समुपभु दव। नगेन्द्रम्-कैलासम् । - ६८ मेघदूत ३ २ ९ ८ ६ ७ १३ १६ ७८ तस्योत्सङ्ग प्रणयिन इव स्वस्तगंगादुकलां ११ ५ न त्वं दृष्ट्वा न पुनरलकां जास्यसे कामचारिन। १२ १४ १९ १७ या वः काले वहनि सलिलोद्गारमुच्चैविमाना १५ मुक्काजालग्रथितमलकं कामिनीवाभ्रन्दम् ।। ६३ ।। देखि जानि लीजो वा नगेन्द्र के बसी है लङ्क, अलका हमारी तीर जहनु की दुलारी के । पीतम के अक माहि ए हो कामचारी मेघ, बैठी जिमि नारी छोरे छोर स्वेत मारी के । पाबस में सोई नीर चूवत धरेगी तोहि, ऊँचे से निकेत सात खन की अटारी के । अबला सँवारे मानो मोतिन सो गूथे जाल, मीस प सलोने चारु बनी बार कारी के। -लक्ष्मण सिह । नगपति अक लसै नागरि सो अलका नगरि सुहानी, सुरसरि सारी रही सरकि सित तू लहै पहिचानी। पावम मे अभिराम कामचर धाम तु ग अति वाके, धारत जलधर जाल-बाल ज्यो बाल गुथे मुकता के । -पूर्ण । 'विमाना' =पाठान्तरे 'विमान ' ( श्याम सु दरदास सम्पादित प्रति में ) दुकूल सूक्ष्मवस्त्रम् । न त्व दृष्ट्वा न पुरलका = पुनस्त्वन्तु न ज्ञाम्यमे इति न किन्तु ज्ञास्यसे एव । पूर्वमेघ समाप्त। ६९

No text on this page.

मेघदूत ८ २ ९ ३ विद्य वन्तं ललितवनिताः सेन्द्रचा सचित्राः ४ संगीताय प्रहत्सुरजाः स्निग्धगम्भीरघोषम् । ११ ५ १२ ६ अन्तस्तोयं मणिमयभुवस्तुगमभ्रं लिहाग्राः १५ १६ १४ प्रासादास्तां तुलयितुमलं यत्र तेस्तैविशेषैः ॥ १ ॥ ७ १३ १ होड उहाँ करिहै वह भॉतिन तो सग मन्दिर नीकी छटा के, तू चपला सुरचाप लिये उनमे अबला अरु चित्र अटा के । तो उर नीर उहाँ भुमि हीर मृदङ्ग उतै इत शोर घटा के, तुङ्ग है तू तो शिखा उनकी परमिद्ध है नाम सो अभ्रचटा के ।। -लक्ष्मण सिह तो मे दामिनी है नारु कामिनी विराजे उतै, तो मै सुरचाप उत चित्र रग वारे है। मधुर गराज तो मे गायन के काज तहाँ, सुन्दर मृदगन के शब्द होत न्यारे है। तो मे जलजाल जाल मनि के विशाल तहाँ, तेरे सम तिनके शिखर तु ग भारे है । अलकापुरी के दिव्य धामन में धाराधर, एते साज तेरी तुल्यताई के निहारे है ।। -पूर्ण । तुलयितु अल= समीकर्तुम् पर्याप्ता । ७१- मेघदूत ४ ५ ६ हस्ते लीलाकमलमलके वालकुन्दानुविद्धं ९ ८ १० नीता लोधप्रसवरजसा पाण्डुतामानने श्रीः। ११ १२ १४ चूडापागे नवकुरवकं चारु कर्णे शिरीषं १६ १५ १ १८ सीमन्ते च बदुपगमजं यत्र नीपं वधूनाम् ॥ २॥ ५ तिय हाथन केलिकमोद उहाँ अलककावलि सोहत कुदकली । रजलोवप्रसून परे मुब पं दुनि दीवति ज्यो पियराई मली।। कुरवा चए चोटिल माँहि लमै अरु कान मरीमन की अवली। तुहि देवन फूल कदम्ब ग्विले मोड मांग घरे मुग्वमा है भली ।। -लक्ष्मण मिह । कर में कमल कुन्द कलिका है अलकन में, लोध को पराग ओप आनन बढावे है। कुग्वक बेस केमपास माहि भाममान कानन मिर्गम को प्रमून चारु भाव है ।। अम्बुवर | नेरो उपजायो त्यो कदम्ब बर छवि अवलम्ब माग मध्य में सुहावं है । मुमन मिगार तहाँ नागरी नलिन को मदा ग्वट-ऋतु की बहार दरमाव है ।। -पूर्ण । लोकम्य उनगद पाठान्तरे -चूडापागं नव कुरुवक चारुकणे शिरीप सीमन्तेऽपि त्वदुपगमज यत्र नीप वधूनाम ।। (प्याममु दर दास नपादित प्रनि में) मेघदूत १ ४ २ ३ यत्रोन्मत्तभ्रमरमुखराः पादपा नित्यपुष्पा ७ ६ با हंसश्रेणोरचितग्शना नित्यपद्मा नलिन्यः। १० ८ ९ केकोत्कण्ठा भवनशिखिनो नित्यभास्वत्कलापा १२ ११ नित्यज्योत्स्नाः प्रतिहततमोवृत्तिरम्याः प्रदोषाः ॥ ३२ ॥ बारौ मास तामे मजु फूले द्रम पुजन मे, भृ गन के वृ दन को गु जन सुहावै है । माजे रहे तालन की सुखमा सरोजजाल, सोभा त्यो मरालन की माल सरसाव है । पालतू कलापिन कलाप बाँकी वानिक सो, ग्रीवाको नचाय नाचि आनंद बढाव है। लेस अँधियारी को न होवे वेस जामिनी को, पूरन प्रकास नीको चाँदनी को छावै है ।। --पूर्ण । .

मेघदूत
३
१
५
आनन्दोत्यं नयनसलिलं यत्र नान्यनिमित्तै-
८
७
६
न्यस्तापः कुसुमशरजादिप्टसंयोगसाध्यात् ।
१३
११
१२
नाप्यन्यस्मात्मणयकलहाद्विप्रयोगोपपक्ति-
२
१८ १४ १६
१७
१५
१९
वित्त ज्ञानां न च खलु वयो यौवनादन्यदस्ति ॥ ३२ ।।
केवल अनदवारे असुआ निहारे तहाँ,
दुग्व की निशानी कहूँ नेक ना लखानी है ।
ताप नहें देवी वस पाँचसर आँचवारी,
जानी जासु औषध विलास मुखदानी है।
मान के सिवाय है वियोग को न जोग दूजो,
पूरन जो रीति प्रीति नीति की वखानी है।
वैस ना दिग्वानी व्हाँ जवानी के सिवाय दूजी,
ऐसी मोदसानी अलका की राजधानी है।
-पूर्ण ।
७४

मेघदूत 3 ४ ७ ६ यस्यां यक्षाः सितमणिमयान्येत्य हर्म्यस्थलानि ५ २ ज्योतिश्छायाकुसुमरचितान्युत्तमस्त्रीसहायाः। १४ १३ १२ आसेवन्ते मधु रतिफलं कल्पवृक्षप्रमृतं ८ १० ९ ११ खद गम्भीरध्वनिषु शनकैः पुष्करेष्वाहतेषु ॥३॥ . स्वेत बिलौर के भौनन मे तहँ फल से तारक विम्ब परै नित । तो मधुरी धुनि के अनुमान मृदग बजे सुर मद भरै नित ।। कामिनि भामिन सग लिए वहु भाँतिन यक्ष विहार करै नित । पीवत कल्पप्रसूत मधू सिगरे रतिरग प्रसग सरै नित ।। - लक्ष्मण सिह । V चन्दमनि मडित अमद मन्दिरन मॉहि, तारन के बिम्ब फल भासत विमाला है। जैमी मन्दर घन । घनकै तिहारी घनी तैसी तहाँ ठनकै मृदगन की आला है ।। सग नव बामा लसे रूपरस धामा चारु. सुख के सकल साज सोहत रसाला है ।। 'रतिफल' नामवारी रति परिनाम वारी, कल्पबृच्छ हाला के पियत जच्छ प्याला है । -पूर्ण। है 'रतिफल' पाठान्तरे 'रतिरस' सितमणि-स्फटिकमणि । ७५--- मेघदूत ५ ८ ६ मन्दाकिन्याः सलिलशिशिरैः सेव्यमाना मरुद्भि- ८ .० मन्दागणामनुनटरुहां छायया वारितोग्णाः । ११ अन्वेष्टव्यैः कनकमिकतामुष्टिनिक्षे पगृदः १ १२ मंक्रीडन्त मणिभिगमरमार्थिता यत्र कन्याः॥ ४॥ धूप करि मनहारी देवता ह जाहि वारी ऐमी, रूप उजयारी छविवारी मुकुमारी है । के मम में मुर द्रुमन समूह छाँह, मुरमरि तीर मीर मेवही मुग्वारी है । आवै जो ममीर देवगगा को परमि नीर, ताके तन लागे मन पाव मोद भारी है । हमवारी रज में मुठी मो करि मल प्यारी, रोल मनि बोजवारी खेलती कुमारी है ।। -पूर्ण। ७६ मेघदूत ४ ८ नीवीबन्धोच्छ्वसितशिथिलं यत्र बिम्बाधराणां ५ २ ६ ३ क्षोमं रागादनिभृतकरेण्याक्षिपत्सु प्रियेषु । १० १२ ११ अर्चिस्तुगानभिखमपि प्राप्य रत्नप्रदीपा- ७ १४ १३ ९ न्हीसूढानां भवति विफलप्रेरणा चूर्णमुप्टिः ।। ५ ।। तह प्रीतम ढीठ भये रसके बस हाय चलावत जोरी करै । गिरि जच्छवधून के बस्त्र कछू खिच छोर छरान की डोरी पर ।। दुति निर्मल रत्नप्रदीप धरे सोइ लोइमी आँखिन ओरी जरै । तिन ऊपर कुकुम फेकि क्या गडि लाजन भोरी सी गोरी मरै ।। -लक्ष्मण मिह । तहाँ रमवन्त कन्त प्रेमबस आतुरी सो, चातुरी सो नीबी छोरि अम्बर छुटाव है । तब नव जोबना लाल अधरान वारी, प्यारी उजियारी मे बिवस ह लजावै है ।। ताही ते विशाल मनि दीपन बुझाइवे को, भोरी नव बाल यो उपाय ठहराव है । ताकि ताकि तिन पे चलावै मूठ कुकुम की, रतन-प्रभाव को बुझाय पै न पावै है ।। - 'विम्वाधराण' पाठान्तरे 'यक्षाङ्गनाना' 'क्षीम' पाठान्तरे 'वास 'अभिमुखमपि' पाठान्तरे ‘अभिमुखगतान्' ( श्यामसु दर दान मपादित प्रति मे ) ७७ मेघदूत ४ १ ३ नेत्रा नीताः सततगतिना यद्विमानाप्रभूमी- ८ ९ ५ रालेख्यानां नवजलकर्णद्रोपगत्पाद्य सद्यः । ११ १८ गहास्पृष्टा व जलमुचस्त्वादशो जालमाग- १२ १ १५ ● मोटगारानुऋतिनिपुणा जर्जरा निप्पतन्ति ॥ ६॥ तह पौन के पेरे किनेकहु वादर ता उनहार के आवत है । जल-दिन बी वरपा रिकै अंगनान के चित्र मिटावन है ।। भय गीत म फरि भरोवन द सिमटे नन नाहर धावत है । सहि जान का वगि वा वनि के बडे चातुर वेहु कहावत है ।। ~~~लक्ष्मण मिह । नहाँ गीन मदी पीन दूनी जी महाय पाय, ना में मात्र कनिक अटा वीच रह गई। चिनन की अगली विचिन जलबली निन्द रममई वन्दन विगार मन्द बहि वहि । यादी अपग मा मम पनि के अंदम, रिक पिट भम चानुरीन गहि गहि । निमरि पराय जान ह मा भरावन की, छिन्न भिन्न है है अझ बूमम्प लाह लहि । -~- पूर्ण । 'पद' पाठारे नवनटाणं पान्तरे मज वणिमा' *पादमी मारमा पाठान्नर 'वावमा यत्र जाले । ( ज्यानमुद दान संपादित प्रति में ) । मना-नान ना हामना । ८ मेघदूत १ ८ ७ यत्र स्त्रीणां प्रियतम जालिङ्गनोच्छ्वासिताना- १० .० मङ्गलानि सुरतजनितां तन्तुजालावलम्बाः। ३ २ खत्संरोधापगमविशदैश्चन्द्रपादैनिशीथे ११ ४ ६ व्यालुम्पन्ति स्फुटजललवस्यन्दिनश्चन्द्रकान्ताः ॥७॥ लटक तहाँ सूत के जाल घरी मणि इन्दुप्रिया छवि पावती है । सिन निर्धन चन्द मरीचिन को अपने तन खेचि मिलावती है ।। फिर उज्जल नीरन की बुदियाँ हरवे हरवे बरमावती है। गलबाँही पिया ते छुटी ललना तिनकी रनिग्लानि मिटावती है ।। -लक्ष्मण सिह । आधि रात बीते घनपॉति जव दूर होनि, छावत अमद नभ चद उजियाला है । मैनरम वाढ गाळे पिय के अलिगन मो, अग अग शिथिल मुहाति प्रीति बाला है । चदमनि माला चारु उर मे बिमाला वर, चादन में द्रवत सवत वुद जाला है । हीगल सुखद मजु मीत र विमद सोई तुगत निवारि देत मुरत कमाला है। - पूर्ण । - - 'भुजालिड गनोच्छवामितानाम्' पाठान्तरे भुजोच्छवामितलिडिगतानाम् ।' 'चन्द्रपादनिशीये पाठान्तरे 'प्रपिताश्चन्द्रपाद ।' ७

मेघदूत
६
२
अक्षयान्तर्भवन निधयः प्रत्यहं रक्तकण्ठे-
८
९
१०
१
११
रुद गायद्भिर्धनपतियगः किन्नरैर्यत्र सार्द्धम् ॥
१२
३
वभ्राजाख्यं विबुधवनितावाग्मुख्यासहाया
१३
५
१०
वद्धालापा बहिरूपवन कामिनो निर्विन्ति ।। ८॥
निधि अधिराम धाम जिन रहति पूरी,
विविध विलास वर नितही अधीन है ।
लोग अलका के रम एन रम वैन गते,
लीन्हे निज मग जो विबुध कचनीन है।
युभग अगम जोन चैतन्य नाम तामे,
प्रति दिन करत प्रवेग
सुख
लीन है।
मग मग ऊँचे मज माधुरे सुग्न माहि,
गावत कुबेर जस किन्नर प्रवीन है।
~~~पूर्ण।
-
८०

- मेघदूत 6 १ ५ गत्युत्कन्पादलकपतितैगेत्र मन्दारपुप्पैः ६ ८ ७ ९ पत्रच्छेदैः कनककमलैः कर्णविभ्रशिभिश्च । ११ १३ १२ मुक्ताजालैः स्तनपरिसरच्छिन्नमूत्र श्च हारै- ३ १४ १५ २ तेशो मार्गः सवितुरुदये सूच्यते कामिनीनाम् ॥ ९ ॥ अलकावलि ते गिरि फूल परे गति आतुर माँहि मदारन के । अरु कानन ते खिसके अवतस बने कलधौत कल्हारन के ।। गुन विखरे गुन टूटत हारन के । इनते वहाँ भोरहि जानि परै मग राति भए अभिसारन के ।। कुच उन्नति के ते मुकता विखरे । --लक्ष्मण सिह । लोल अलकावलि ते छूटे जे गमन माहि, कल्पद्रुम सुमन अवनि पै सो सुहात है। मजु पल्लवन के परे है झरि खड रूरे, कानन ते खसके कनक जलजात है ।। माग ते झरे है मुकताहल विमल तैसे, हीतल के हार त्यो महीतल लखात है। रात अभिसारिका नवेलिन के मारग के, प्रात के समय मे चिन्ह एते दरसात है । -~पूर्ण - ८१ - ६ ३ मत्वा देवं धनपतिसवं यत्र साक्षाद्वसन्तं ar ५ ७ १० ११ प्रायश्चापं न वहति भयान्मन्मथः पट्पदज्यम् । ८ २ १३ ९ १४ २ सभ्र भङ्गप्रहितनयनः कामिलक्ष्येप्वमो- १५ १६ स्तस्यारम्भश्चतुरवनिताविभ्रमैरेव सिद्धः ॥ १० ॥ मीत किन्नरेश रहै नित्त ही महेश इहाँ, जानि या रतीश चित्त का बिसरावै ना। ताही टर बार-बार अलकापुरी के माहि, भृ ग की प्रतिञ्चा खैचि चाप पं चढाव ना ।। नागार नियान नैन विभ्रम प्रताप पाय, कारज म वाके तऊ हानि होन पावै ना। छूटन कटाक्ष वाँकी भौह की कमानन ते, कामीरूप वको विना बेध्यो रहि जावै ना ।। -लक्ष्मण सिह । धनद भुवाल के सनेही चदभालजू का, प्रकट निवास रतिनाथ तहें जानो है कुमुम कमान मधुपावली प्रतिचा जुक्त, ताही ते न ताने हीय रहत सकानी है । तदपि प्रवोन प्रमदान के सहारे सदा, काम को सकल काम सफल लखानो है भृकुटी कमानन अचूक नैन बानन को, हीय काम वानन को वनत निसानो है। १ ८२ - ---पूर्ण।

मेघदूत ३ ५ ४ वासश्चित्र मधु नयनयोबिभ्रमादेशदक्ष ७ ६ ८ पुप्पोद भेदं सह किसलयौद्भू पणानां विकल्पान । ११ १० ९ १ लाक्षारागं चरणकमलन्यासयोग्यं च यस्या- १३ १५ १२ १४ मेकः मृते सकलमवलामण्डनं कल्पवृक्षः ॥ ११॥ देत है बसन वर बरन वरन वारे, सुरा देत नैनन विलास जो सिखाव है। मजुल सुमन देत पल्लव मृदुल देत, भूपन विपुल को सुपास दरमा है ।। चारुपद कजन को रजन करन जोग, को चोखो सरमाव है। एक ही कलपतरु चारि हू प्रकारन के, अवला सिगारन के साज उपजा है ।। लाख मुरग रग - पूर्ण। - ८३ - मेघदूत तत्रागारं पनपतिगृहादुनरणामदीयं , दगलक्ष्ण मुरपनिधनुचारुणा तोरणेन । ८ यस्योपान्ते कृतकतनयः कान्तया वद्धि तो ये हस्तप्राप्यस्तरकनमितो बालमन्दारवृक्षः ॥ १२ ॥ पक्ष गज भीगन ने उत्तर की ओर नैक, ताही अग्का में मीत मन्दिर हमागे है। दूर ने पिलान्यो जान चित्र चार तोग्न ने, बार पे मजे जो मानो वाप इन्द्रवारी है। बाके वाग बीव एक नतन मन्दार-वक्ष मेरी नीय पात्यो मानि पुत्र मो दुलारी है। गुच्छन के भार ने जुकी है बार बार पाछी, आय जान हाथ फूल बीनत मुबारी है । -लक्ष्मण मिह । घनद भवान के महालय के उत्तर में, मोहत समीप मौन मेरो अभिगम है। न्द्र की कमान के समान नासु नोरण है. नानी दरमात दूर ही छवि धाम है। तादि नीर गजन है वाल पारिजान प्यारी, मुन के समान जाहि पोम्यो मम वाम कोछपाई देन वारे चार गच्छन यो पाय गमवाई जय मोहत लठाम है। - पूर्ण। गोपान्ने' पाठान्तरे 'यम्योद्याने' ( याममुदर दास मपादिन प्रति मे ) ८८ - मेघदूत ८ १ २३ वापी चास्मिन्मरकतशिलाबद्धसोपानमार्गा ५ ६ हैमैश्छन्ना विकचकमलैः स्निग्धवैद्यनालैः । on १५ १४ यस्यास्तोये कृतवसतयो मानसं संनिकृष्टं १६ १० १२ १३ ११ नाध्यास्यन्ति व्यपगतशुचस्वामभिप्रेक्ष्य हंसाः ।। १३ ।। ताही भौन माहि ताल सुन्दर बन्यो है एक, सीढी लगी है जामें मरकत शिलान की। जातरूप कज की कलीन ते रह्यो है छाय, अद्भुत सजी है नाल नीले उपलान की ।। आय के बसे है जेते राज हस वाके नीर, नेक ना रही है चित्त चिन्ता आपदान की । तोहू को विलोकि वे न यात सुधि लावै नेक, निकट रहे ह मानसर के पयान की ।। - लक्ष्मण सिह । मेघ । तामे वापी एक सोभा की निधान सोह नीलम शिला की जामे पैरी भूरि भाव है। पत्रन मृणाल वारे सुख मणि विशाल धारे सोने के सरोज जाल फूले ओज छावे है । ताही के विमल मुख-दायक सलिल माहि हसन के बस निज वास ठहराव है। आनंद में पागे सखा | पावसौ के लागे तीन पासहू के मानस को ध्यान मे न लावै है । -पूण । 'विकच कमलै' पाठान्तरे 'कमलमुकुलै ।' (श्या० म० दा०) व्यपगतशुच --अकलुप जलत्वाद् वीतदु ग्वा ।

मेघदूत ४ ३ तस्यास्तीरे रचित शिखरः पेशलेरिन्द्रनीलः ५ . क्रीडाशैलः कनककदलीवेटनप्रेक्षणीयः । ८ १ १० ९ मट्गेहिन्याः प्रिय इति सखे चेतसा कातरेण १ प्रेक्ष्योपान्तस्फुरिततडितं वां तमेव स्मगमि ॥ १४ ॥ १३ १२ १४ बाही नाल नीर पै हमागे बन्यो क्रीडाशैल, चोटी चारु जाप इन्द्रनील की सजाई है। जातल्प केलन की वारि चहुँ ओर लगी, नैनन मृहाती माती गोभा मग्माई है ।। दग्नि-देखि नोहि मीत मग चचना के आज, नरी उनहारि मोहि वाकी मुधि आई है। जानन हैं प्यागे पगे मेरी वनिता को वह, आए मुधि होति चित्त याने भीमताई है। -लक्ष्मण मिह । नाके नीर मोहै प्यारो गिरिवर केलि वारो नीलम मंवारी ता गिम्बर मुहाव है। मुन्दर बनरु वारे बदली कनक वारे आम पाम लागे भली आभा भूरि भाव है । रे नील नीग्द। मुहावनी ममीप तेरे जनदा वहरि चार चोखी छटा छाव है। नानं याद आवट माई प्रिय भामिनी का मेरे मात्रा । मेरो मन भीक अकुलाव है। -~पूर्ण । नगरानी' पाठालरे' 'यथाम्नी' 'घाटनप्रेक्षणार पाठान्नर वप्न प्रक्षणीय ' (श्या० मु० दा०) -- ८६ मेघदूत ६ ५ ८ ९ ७ १ रक्ताशोकश्च किसलयः केसरश्चात्र कान्तः २ ३ प्रत्यासन्नौ कुरवकवृतेर्माधवीमण्डपस्य । १० १४ १३ १२ ११ १५ एकः सख्यास्तव सह मया वामपादाभिलाषी २० १६ १७ १८ कांक्षत्यन्यो वदनमदिरा दोहदच्छद्मनाऽस्याः ॥ १५ ॥ मडप है माधवीलता को रमनीक तहॉ, सुन्दर कुरे की बारि ओर पास छाई है। नेरे ही अशोक लाल सोहै लोल पल्लव लै, दूजी ओर केशर हू ठाढो सुखदायी है ।' दोहद बहाने एक तेरी वा सखी को पाव, बायो छूयबे को आस मेरी सी लगाई है। प्यारी मुख आसव के लेन काज दूसरे मे, ताही मिम मेरी माँति लालसा समायी है ।। -लक्ष्मण सिह । माधवी निकु ज को कुरैयन के पुज घेरे नेरे ही अशोक औ बकुल दोनो राजही । लाल रग वारो लोल पल्लव वलित एक, दूजे मे ललित माज मुखमा के भ्राजही ।। बनिता हमारी प्यारी सखी जो तिहारी मेघ । ताकी अभिलास दोऊ मेरे मग साजही । एक पद बाम चाहै दूजो मुखमध वाको, फूले और फरिबे की कामना के व्याज ही ।। - पूण ! 1 केशरश्चात्र' पाठान्तरे 'केशरस्तव, 'प्रत्यामन्नो' पाठान्तरे ‘पत्यामन्न' (श्या० मु. दा.) - - ८७ - मेघदूत ५ तन्मध्ये च स्फटिकफलका काश्चनी वासयप्टि- ३ २ ९ ८ मूले बद्धा मणिभिरनतिप्रौढवंशप्रकाशैः। १० तालैः शिखावलयसुभगेने तितः कान्तया मे १. १४ १२ ११ यामध्यास्ते दिवसविगमे नीलकण्ठः मुहृदः ॥ १६ ॥ उनही के बीच में बन्यो है ग्वम्भ कचन को, पटुली मु जाप घरी फटिक गिला की है। मूल में जडी है कनी चोखी चार पन्नन की, मोह छवि माछी नए वांस मजला आयक विराज ताप नीलकण्ठ तेरा मीत, बेला जब होति मानु खडित कला की है ।। प्यार मो नन वै नाहि मेरी प्रान प्यारी नित्त, द दै भनकीली ताल ककन छला की है -लक्ष्मण मिह । की है। मध्य तिन दोहुन के मोने को मुहायो एक खभ रमनीय अति विलमन छविधाम है। मूल म लगे है हरे बाँस मी प्रभा के मनि ऊपर टिक चौकी घरी चोखी अभिगम है ।। रामघ । ताही तिहाग मम्वा नील कठ माँझ मम बैठके करत विसगम है। कान की माधुरी रमीली झनकार मग नाली दं नचायो जाहि मेरी प्रिय बाम है ।। -~-पूर्ण। ----- 'निन पान्नयाने पाठान्तरे 'कान्तया नतितामे' । (य्या० सु० दा०) - ८८ मेघदूत २ mr १२ एभिः साधो हृदयनिहितलक्षणैर्लक्षयेथा ५ ६ ४ ७ द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शङ्कपद्मौ च दृष्ट्वा । ११ ९ १० ८ क्षामच्छायं भवनमधुना मद्वियोगेन नूनं ४ १७ १३ १५ १८ १६ मूर्यापाये न खलु कमल पुष्यति स्वामभिख्याम् ॥ १७ ॥ इन चिन्हन पहिचानियो मेरो नगर सुजान । शख पद्म द्वारे लिखे करि तिनहू पै ध्यान ।। अब तो मो बिन होयगो वह घर शोभा हीन । अस्त भएँ जिमि भानु के बारिजवन छबिहीन ।। -लक्ष्मण सिंह। चतुर सुजान हे बलाहक जू मीत मेरे एते सब चिन्हन को राग्विके हिय म ध्यान । देखि के पवित्र पुनि शख औ पदम निधि चित्र जिनको है मम द्वार पै विराजमान ।। एती पहिचान सो सदन मेरो पावहुगे देखहुगे मो विन है फीकी सुन्वमा महान । जैसे ओज कहूँ भॉति धारत सरोज नाहि होवै जगमाही अशुमाली जो न भासनान ।। -पूर्ण। 'क्षामच्छाय' पाठान्तरे 'मन्दच्छाय' ( श्या० सु० दा० )। ८९ मेघदूत ४ २ ३ गला सद्यः कलभतनुतां शीघ्रसंपातहेतोः ६ ५ ७ ८ क्रीडाशैले प्रथमकथिते रम्यसानो निपण्णः। १३ १२ ९ अहस्यन्तर्भवनपतितां कर्तु मल्पाल्पभासं १० खद्योतालीविलसितनिभां विद्य दुन्मेषदृष्टिम् ॥ १८ ।। गजगिगु मम लघु वनि तुरत मम प्यारी हित लाय । क्रीडागिरि प वैठियो जो में दियो बताय।। भवन बीच चपला चमक मन्दी कीजो मीत । लसति पांति जुगनू मनो अबला होइ न भीत ।। -लक्ष्मण सिंह। - वेग ही मदन में प्रवेम करिवे के हेतु जघर तू भेस बाल कुजर का धारियो । सुन्दर सिग्वर वारो सुखद विहार शैल प्रथम बतायो जोन ताही पै पधारियो ।। जोगन अवलि की सुदीपति मी भासभान दामिनी दमक दीठि रुचिर पसारियो। चक ही रचक सुरोचक प्रकाम करि भीतर भवन ओर नीरद निहारियो । -~-पूर्ण। 'शीघ सपात हेतो.' पाठान्तरे 'कत्तु मल्पाल्पभास' ( श्या० सु० दा० ) ।

मेघदूत - २ ३ ४ तन्वी श्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी ५ ur ८ ९ मध्ये क्षामा चकितहरिणीप्रक्षणा निम्ननाभिः। १० श्रोणीभारादलसगमना स्तोकनम्रा स्तनाभ्यां १५ १६ १७ ११ १४ १३ १२ या तत्र स्याद्य वतिविषये सृष्टिराद्य व धातुः ।। १९ ।। बिम्बाधर दाडिम-दशन निम्न-नाभि कृग-गात । बसति तहाँ मृगलोचनी युवति छीनकटि तान ।। श्रोणिभार अलसान गति झुकति कछुक कुचभार । मानहु ललना सृष्टि में मुख्य रची करतार ।। लक्ष्मण मिह । दत दुतिवतन की सघन सुहाति पाँनि अधरन बिब ऐसी आभा अरुनारी है। चकित मृगी मी चारु चचल चितौन चोवी मु दरी कृशोदरी गंभीर नाभिवारी है। उन्नत उरोजन उभार सो नमित नेक भार सो नितवन के मद गति धारी है । देख हुगे ऐसी रूपवारी मम प्यारी मनो नारिन मे पहिली बिरचि ने सँवारी है । -पूर्ण । 'शिखरिदशना' पाठान्तरे 'गिखर दसना (श्या० सु० दा.) 'सृष्टिराद्येव' पाठान्तरे 'सृष्टिराद्यैव' शिखर =दाडिम बीज मदृशरक्तमणिविशेष । ९१ मेघदूत ६ .० ८ तां जानीयाः परिमितकयां जीवितं मे द्वितीयं ३ १ ५ दरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिकाम् । ११ १३ १८ १२ गाढोत्कण्टां गुरुपु दिवसेप्वेषु गच्छत्सु वाला १८ १६ जातां मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनी वान्यरूपाम् ॥ २० ॥ नाहि मजन घन जानियो मेगे आपो जीउ। रहति अकेली मो बिना चकई ज्यो विन पीउ ।। मित भापिनि उत्कठिना विरह कठिन दिन जान । गीत हनी जिमि कमलिनी औरहि म्प दिग्वात ।। -लक्ष्मण मिह । मेगे मग छूटे प्रिय अगना नवेली वह व्है रही अकेली चत्र बाकी अकुलाई मी। पनि विहाल नाते अधिक न बोले बात जानियो सु मे दूजे प्रान मुखदाई मी ।। दाग्न वियोग वारे भाग इन द्योमन में मोफ बाकी मूरति ही दूमरी बनाई सी मेरे जान व्हे है मुकुमारी प्रान प्यारी 17, मुन्दरी मरोजिनी तुनार को मनाई मी ।। - -पूर्ण - १० मेघदूत १५ ८ ९ नूनं तस्याः प्रबलरुदितोच्छ्ननेत्रप्रियाया २ ३ ४ निःश्वासानाम शिशिरतया भिन्नवर्णाधरोष्ठम् । १० ७ ६ हस्तन्यस्तं मुखमसकलव्यक्ति लम्बालकखा- १३ ११ दिन्दोर्दैन्यं वदनुसरणक्लिष्टकान्तेबिभर्ति ॥ २१ ॥ १२ १४ रोड रोड सूजे मरवा वा प्यारी के नैन । तानी म्वासन ते रह्यो वह रंग होठन पै न ।। खुले बार कर पै धर्यो आनन कछुक लग्वात । ज्यो घन घेर्यो चन्द्रमा छबि मलीन दिग्व रात ।। -लक्ष्मण मिह । निपट बिहाल व्है के अधिक विलाप कीन्हे मूजन गई है पान प्यारी के दृगन में। कारन बिया के तप्त मॉमन की झारन मो रगति रही है नाहि नीके अधरन मे ।। कर पै कपोल दीन्हे चिता मे मगन बैठी वदन दुरो है नेक बिखरी लटन मे । ए हो मेघ । मुखकी दमा सो दरमात जैसे मद परिजात चद आभा घने घन में ।। --पूर्ण।

मेघदूत ar २१ २२ २ २० आलोके ते निपतति पुरा सा वलिव्याकुला वा- ३ ४ ५ मत्सादृश्यं विरहतनु वा भावगम्यं लिखन्ती। १९ ८ १० पृच्छन्ती वा मधुरवचनां सारिका पञ्जरस्था १२ १४ ११ १६ १५ १७ १८ कच्चिभतु : स्मरसि गसिके वंहि तस्य प्रियेति ॥ २२ ॥ धरणि गिरेगी मित्र वलि देती वह देखि तुहि । के लिखती मम चित्र विरह कृशित 'नुमान करि ।। के कहुँ पूछति होइ पिंजरा बैठी सारिकहि । कवहँ आवति तोहि सुधि प्यारी वा नाह की ।। -- लक्ष्मण सिह । के हो तू बिलोकि है विकल वाहि पूजा माहि मेरे आगमन काज देवन मनावती। अथवा मु मेरी छीनता को अनुमान करि ध्यान धरि व्है है मम चित्रहि बनावती ।। पीजरे में मैना जोन माधुरे वचन वारी वाही सो बताती न तो व्है है इमि भावती। 'मारिके रसिक, तू तो स्वामी की पियारी ए री । उनकी कछूक कहु तोको सुधि आवती ?" ---पूर्ण। 'कच्चिद्भर्तु रसिके' पाठान्तरे 'कश्चिद्भतु स्मरसि निभृते' । ( श्या० सु० दा० )। निभृते एकाकिनि, एकान्तवासिनि । पुरासद्य रिव्याकुला= देवतागधने तत्परा ॥ ९४ मेघदूत ३ २ १ ५ उत्सङ्ग वा मलिनवसने सौख्य निक्षिप्य वीणां ५ ६ ७ मद्गोत्राङ्क विरचितपदं -गेयमुद्गातुकामा। १० ९ ८ १२ ११ तन्त्रीमाः नयनसलिलैः सारयिखा कथंचिद - १३ १४ १५ १६ भूयो, भूयः स्वयमपि कृतां मूर्च्छनां विस्मरन्ती ॥ २३ ॥ के धरि बैठी बीन मलिन वमन जघान पै । गावन काज प्रवीन अकित पद मम गोत कुल ।। अँसुअन भिजई रोइ के वीना को पोछती। कंधो भूलति होइ फिर फिर मीखी तान हू ।। -~~ लक्ष्मण सिंह । अथवा लखैगो मेघ सज्जन | वियोगिनी को, बसन मलीन वीन जघा १ सवारती। ऊचे ऊचे बोलन मे मेरे गोत वारे गीत भावन सो गावन को मन में विचारती ।। ऑसुन की धारा परे तत्री तव तीती होति ज्यो त्यो पोछि ताहू को सुगान अनुसारतो । शोक की सताई गाय पावै नही बार बार आपही उठाव तान आपही विसारती ।। - पूर्ण। ९५ पान्मासान्विरहदिवसस्थापितस्यावधेर्चा १ विन्यस्यन्ती भुवि गणनया देहलीढत्नपुप्पैः। ६ ५ ८ मत्सद्ग वा हृदयनिहितारम्भमास्वादयंती ५१ १२ १८ १३ प्रायणते रमणविरहेप्वंगनानां विनोदाः ।। २४ ॥ १५ १६ के मन वग्न प्रतीत रहे महीना अवधि के । गिनि गिनि धनी मीत मुमन देहरी के चट ।। के मावनि नयोग मम आगम अनुमान करि । नही नारि-नियोग होत नाह के विरह मे ॥ --दमण मिह । अपवा जरद मीन। जब ने बिलोह भयो चढे गेह देहरी पं फूल जीन दिन दिन । अवधि विमृरि गम मामन के लेग्निवे को धति धगतल पै है तिन्है गिन गिन ।। अथवा प्रमग जीन मेरे परिरमन के है है रम लेती गत ही मान तिन तिन । बढवा वियाग माहि सुन्दरी विया की गरी ही विनादन वितावती है छिन छिन । 'दहलीदनपुर पै पाठान्तरे 'दहाली मस्तपुष्प पग' पाठान्तरे 'मयोग (श्या० सु० दा०) सगाग' मा पाटभद मिलीग' दागरताप = प्रपितमठार्य माम गमे दहरमा समपितानि यानिपुष्पाणित --पूण । , मेघदूत ६ ८ ५ २१ सव्यापारामहनि न तथा पीडयेन्मद्वियोगः १२ ९ १० ११ ४ ३ शके रात्रौ गुरुतरशुचं निर्विनोदां सखी ते। १८ २० १२ २२ १६ १३ मत्संदेशः सुखयितुमलं पश्य साध्वी निशीथे १७ १४ १५ २१ तामुन्निद्रामवनिशयनां सौधवातायनस्थः ॥ २५ ॥ लगी रहति इन कामन प्यारी। दिन बिरहा दुख होत न मारी। डरी अधिक रातिन दुख होई । करन काज जव काज न कोई ।। तू मम दूत तासु हितकारी। रहियो बैठि अर्धनिशि वारी । लखियो नारि पतिव्रत करती। विगत नीद शय्या करि धरती।। -लक्ष्मण सिह । - दिन मे अनेक काज लागे रहे ताते वाहि व्यापत बिमेम न प्रभाव दुख भारी को। पर घन । जामिनी निपट सोक धामिनी में मालति अपार पीर व्हं है सुकुमारी को ।। नीद ते रहित परी छिति पै अचन चित देखहुगे सखा सती भामिनी हमारी को। बैठि के झरोखे माँहि कहि के सदेस मेरो आनंद अमेम दीजो दुखिया विचारी को ।। - पूर्ण । 'मोधवातायनम्य' पाठान्तरे ‘सन्नवातायनस्थ' (श्या० मु० दा०) । ९७ मेघदूत १ आधिक्षामां विरहशयन संनिषण्णकपार्था ३ ६ ५ प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः । ११ १० नीता रात्रिः क्षण इव मया सामिच्छारतैर्या १४ १५ १६ तामेवोप्णविरहमहतीमश्र भिर्यापयन्तीम् ।। २६ ॥ चिन्ना वियित परी तन छीना। एक करोट सेज पतिहीना ।। जिमि पूरब दिशि देत दिग्वाई। कला मात्र निकम्यो शशि आई ।। छिन समान बीततिही रतियां। मो सँग करन केलि रमवतियाँ ।। गेड रोड अब तिनहि विनावति । विरह तप्त आँसू वरमावति । -लक्ष्मण सिंह। देखदा मन की विथा मो तन छीन परी एकही करोट तृन परलव विछाय के । माना दिमि पूरब के मूल में विदित वेग उदित निर्मम कला का दरमाय के ।। निमिरव मी रेन जी बिताई चेन करि मरं मग दा ने न माने मुख पायक मोट रेन बाही ग, पीर बम ताको, हाय, म्ही मा विताय नात आमुन बहाय के ।। --पूर्ण। 1 'मन्निपण कपात्रा' पाठान्तरे 'मन्निकीर्णकपारवा, 'क्षण व पाठालरे अणमिव' विग्हमहनीम' पाठान्तरे विग्हर्जाननं । (श्या० ० दा०) ९८ मेघदूत ३ २ १ पादानिन्दोरमृतशिशिराञ्जालमार्गप्रविष्टा- ५ ९ ८ पूर्वप्रीत्या गतमभिमुखं सनिवृत्त तथैव १२ १० ११ चक्षुःखेदात्सलिलगुरुभिः पक्ष्मभिश्छादयन्तौं १४ १६ १५ १७ १८ साभ्रऽवीव स्थलकमलिनी न प्रबुद्धां न सुप्ताम् ॥ २७ ॥ शीतल अमृत किरनि हिमकर की। परति आई झंझरिन विच घर की। पूर्व प्रीति हित तिहि सँग धावत । तुरत नैन पाछे हटि आवत ।। सजल पलक तिन ऊपर लावति । बस वियोग अतिशय दुख पावति ।। खन सोवति जागति सी खन मे। भूमि कमलिनी जिमि उनमन मे ॥ -लक्ष्मण सिह। किरनै सुधाकर की सीतल सुधा के सम धाम मे झरोखन सो होहि जौन प्रविसित । जानि सुखदाई तिन्हे जाय तिन सनमुख ज्यो की त्यो चितौन लौटि आवे सोक सरसित ।। आँसुन के भारन झुको ही वरुनीगन सो छाये निज नैन कामिनी यो होति दरमित । मानौ मेघमाला भई पावस के द्योम मांहि थल की सरोजिनी न वन्द है न विकसित ।। पूर्ण मेघदूत ६ निःश्वासेनारकिसलयले शिना विक्षिपन्ती २ ८ ९ शुद्धस्नानात्परुपमलकं नृनमागण्डलम्बम् । १० १२ मत्संभोगः कथमुपनगेत्स्वप्रजोऽपीति निद्रा- १३ ११ माकांक्षन्ती नयनसलिलोत्पोडरुद्धावकाशाम् ।। २८ ।। ताती म्वास भई तिय मुखकी। दायक मृदु होठन अति दुख की ।। फ़कि कि तिन सो सरकावति । रूखी अलक कपालन धावति ।। चाहति तनक नीद झुकि आवे। मति सपने अपना पति पावै ।। पं अमुआ ननन भरि लेही। लगन पलक छिनहू नहि देही ।। - लक्ष्मण मिह । बिन ही फुलल तंट मज्जन करत मुहृद तात अव कामल है अलके ललाम ना। मजल अवर की दहन हारी मामन मा व्ह रही अचल न पावे विमगम ना॥ मार बम स्वप्न ही म चाहति मिलाप मेगे वान जब केहूँ भांति पावति अराम ना। आंसू भरे नैनन मे नेक हू न ठौर ती हूँ कामिनि करत नीद आवन की कामना ।। -पूर्ण। 'नूनमागण्डलग्नम् ' पाठान्तरे नूनमागण्डलम्बम् यमुपनयन्' पाठान्तरे 'क्षणमयि भवेत' (श्या० मु० दा०)। १००- मेघदूत १ ५ २ ४ ३ आद्य बद्धा विरहदिवसे या शिखा दाम हिखा w १० ७ ८ १४ शापस्यान्ते विगलितशुचा तां मयोष्टनीयाम् । ११ स्पर्श क्लिष्टामयमितनखेनासकृत्सारयन्ती १३ गण्टाभोगात्कठिन विषमामेकवेणी करेण ।। २९ ।। ९ १२ विरहा प्रथम दिवस मृगनैनी। बिन माला बॉधी जो बैनी । मेरेहि हाथन खोलन जोगू। शाप अन्त जब रहे न सोगू ।। भई कठोर गई न सँवारी। परति कपोलन पै दुखकारी ।। मरका ति फिर फिर अँगुरिन ते । नख न बने जिनके बहु दिन ते । -~-लक्ष्मण सिंह। माला छोरि ताकी मैने बाँधी हुती वेनी जौन सोग भरे दारुन वियोग के प्रथम बार । ग्वोलहुगो ताहि में ही बितंगी जवहि गाप दाप निरवारि सब आनद हिये मे धार । बार ताहि बेनी के अकोमल अमम रूखे बिग्वरि-बिखरि परे प्यारी मुग्व के गभार । दीरघ नग्वन वारे प्यारे-प्यारे हाथन सो बाल तिन बारन सम्हागे कर बारबार ।। --पूण। (श्या० मु० दा०) 'ना मयोद्वेष्टनीयाम' पाठान्तरे 'या मयोदृष्टनीया' । दाम हित्वाः माला त्यक्वा । -- मेघदूत ८ २ ५ सा संन्यस्ताभरणमवला पंगलं धारयन्ती ८ ३ ९ ११ १० १२ शाय्योत्संगे निहितमसकृद दुःखदुःखेन गात्रम् । १३ खामप्यस्र नवजलमयं मोचयिप्त्यवश्यं १८ १७ प्रायः सर्वो भवति करुणात्तिरान्तिरात्मा ॥३०॥ १४ १६ १५ मेज परे कोमल खरे बिन आभूपण गात । राग्वति अबला होइगी परी विकल बिलवान ।। तेरेह आंसू मरवा देगी अवसि वहाय । मरस हृदय जन होत है वहृया मृदुल स्वभाव ।। लक्ष्यण मिह । अबला के अग के उतरि गिरे आभरन उन्नति मृदुल्ता में ऐसी कृगता की है। मेज परे जीवन को राग्विवो कठिन भयो दगा मुकुमारी की रहति मुरछा की है ।। ओम् नवनीर बारे तेरे टू उमगि ऐहैं नीग्द । प्रिया की गति भी करना की है। कोमल मग्म हात जिनके हृदय मीत । निनकी सुवानि होनि बहुधा दया की है ।। -पूण । पदार' पाठान्तरे 'कोमल' । 'स्वभाव' का पाठान्तर 'स्वभाय' । ( श्या० मु० दा० ) -१०२-- मेघदूत २ or ३ जाने सख्यास्तव मयि मनः संभृतस्नेहमस्मा- १० ८ ९ ११ १३ १५ १६ दित्थंभूतां प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि । १४ १७ १२ वाचालं मां न खलु सुभगम्मन्यभावः करोति १८ २० १९ प्रत्यक्षन्ते निखिलमचिराद भ्रातरुक्तं मया यत् ॥ ३१ ॥ २४ २३ २१ २२ जानत हूँ मो में लगी वाके मन की प्रीति । याते प्रथम वियोग मे ऐसी करतु प्रतीति ।। अपन बडाई करि कछू में न बजावतु गाल । बेगि तुह लग्वि लेहिगो मेरो कह्यो हवाल ।। लक्ष्मण मिह । मोही में ममानो रहै मेरी कामिनी को मन जाम भरपूर प्रीति मेरी ही समाई है। ताते में विचारत हूँ मेरी प्रिया अगना की एमी दमा पहिले बियोग ने बनाई है ।। ऐमो जिन चित्त मे विचारियो बलाहक । के निज को सुभग जानि गाई मै बडाई है । योरे ही मर्म मे तुम देग्विही प्रतच्छ आप दमा तासु तैसी मब जैमी में बताई है ॥ -पूर्ण । -१०- मघदूत २ १ रुद्धापाङ्गप्रसरमलकैरञ्जनस्नेहशून्य w ५ ८ प्रन्यादेशादपि च मधुनो विस्मृतभ्र विलासम् । १० ८ ९ त्यस्यासन्ने नयनमुपरिस्पन्दि शके मृगाच्या १२ मीनक्षोभाच्चलकुवलयश्रीतुलामेष्यतीति ॥ ३२ ॥ विन अजन मूनो भयो अलकन रोकी मेन । विन मदिग भूत्यो मब भ्र विलाम मुग्न दैन ।। दृग बायो मृगनयनि को हलि है पहुँचन तोहि । मीन भकार्यो जलज जिमि गोभा भामति मोहि ।। -लक्ष्मण मिह । घरे रहे अलकै सो पलके मकै न डोल, कामिनी के नीके नैन अजन विहीन की । विरह महान बस त्यागो मद पान तामो, भूली है भृकुटि भग ऐमी गति दीन की ।। गुम घरी ताको पाय ए हा मीत जलधर । वायी आम्ब फरकैगी प्यारी छवि लीन की। मुग्वमा मुपद में है एमी वा ममं की मना कज नो विचल कीन्हो हल-चल मीन की। - पूर्ण । दोनाचर' पाठान्तर 'नोभाकुल' । ( श्या० सु. दा० नयनम - वाममिति गप । श्रीतुलाम् = श्रीमादृश्यम् । १०८....

मेघदूत १४ ३ २ वामश्वास्याः कररुहपदैमुच्यमानो मदीयै- ५ ४ ६ मुक्ताजालं चिरपरिचितं त्याजितो दैवगत्या। ८ १ ११ १० सम्भोगान्ते मम समुचितो हस्तसंवाहनानां १७ यास्यत्यूरुः सरसकटलीस्तम्भगौरश्चलखम् ।। ३३ ।। १५ १२ १६ बाम उरू वा बाम की मम नरव अक विहीन । नित की मुक्ताकिकनी विधिवशात् तजि दीन ।। सहरावन के जोग वह मेरे हाथन मीत । कचन कदलीखम्भ लो फरकेगी रंग पीत ।। -लक्ष्मण सिह । गोरी छवि लीन नख रेखन विहीन जा मे चारुता है कदली सरस अभिराम की। सोग मे वियोग के भई है दूर जाते प्रभा सदा सुखदायी मुकताहल ललाम की ।। सुखद समागम के अत में जु मेरे कर सेवन की जोग रीति जैसी रस काम की। मेघ, सुखधाम, तेरे धाम मे पधारत ही सोई बाम जघा फरकैगी प्रिय वाम की ।। --पूर्ण । 'परिचित' पाठान्तरे 'विरचित' (श्या० मु० दा०)। ---१०५- मेघदूत १ ३ ४ ५ - तस्मिन्काले जलद यदि सा लब्धनिद्रासुखा स्या- ७ ६ ८ ९ दन्वास्यैनां स्तनितविमुखो याममात्र सहस्व । १० ११ १३ १२ माभूदस्याः प्रणयिनि मयि स्वप्नलव्धे कथंचि- १५ १४ त्सद्यः कण्टच्युतभुजलताग्रन्धिगाढोपगृढम् ॥ ३४ ॥ नाछिन यदि मोवति मिल मुग्व निद्रा वह वाल । मौन गहे वैठयो तहाँ तू रहियो कछु काल ।। मरे गलबाही दिये मति मपने में होड । गरज मुनत तेरी जलद सो मुग्व देड न ग्बोइ ।। --लक्ष्मण मिह । बिननी इनी है मया । भीन में पहुचि मेरे मेरी प्रिय प्रेमिनी को जागनी जु पावै ना। नौ तु नाम पीछे अवसर इक जाम पीज ने कहूँ गरज का मरद तू मुनावै ना ।। म्वप्न में मिलन, मो मो मनमोहिनी मो न। मार ताकी मुख नीद उचटावना। नई छिन् माहि मेरे कट ते मर्राक हाथ मगु भुज वेरिन की ग्राय टि जावै ना ।। - पूर्ण । 'अन्याम्पना' पाठान्नो 'नयामीन ।' 'महम्ब पाठान्तरे 'महेया' (श्या० मु० दा०)। - -- १०६ - मेघदूत २ तामुत्थाप्य स्वजलकणिकाशीतलेनानिलेन ८ ७ ४ w ५ प्रत्याश्वस्तां सममभिनवैर्जालकैर्मालतीनाम् । १३ ११ ९ १० विद्य गर्भः स्तिमितनयनां वत्सनाथे गवाक्षे १६ १४ १५ १२ १७ वक्त धीरः स्तनितवचनैर्मानिनी प्रक्रमेथाः ॥ ३५ ॥ फिर जल शीतल पवन करि दीजो वाहि जगाय । मृदुल मालती कलिन सँग प्रफुलित चित व जाय ।। चमकन बारी मॉहि तुहि लखिहै दीटि उठाय । तब तू वातें मन्दधुनि यो कहियो समुझाय ।। लक्ष्मण सिह । परमि मलिल तेरो सीतल है पौन जौन ताके मद झूकन जगैयो प्रान प्यारी को। मुकुलित मालती समूहन के साथ माथ प्रफुलित कीजियो पयोद | मुकुमारी को । व्हे के चकित जबै ताक मो झरोखे ओर दामिनी वलित वेस वानिक तिहारी को। लागियो सुनावन सरस मोर वारे बैन वा मान जोग नारी को।। नीरद सुहावन । -पूण । - 'गभ' पाठान्तरे 'कम्प' (म्या० सु० दा० )। --१.७- मेघदूत १ ૨ १० भतु मित्र प्रियमविधवे विद्धि मामम्बुवाह ७ ६ ९ ८ तत्सन्देशैर्ह दयनिहितैरागतं वत्समोपम् । १२ १७ १८ १३ १६ यो वृन्दानि खरयति पथि श्राम्यतां पोषितानां १४ १५ मन्द्रस्निग्धैर्ध्वनिभिरवलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥३६॥ सखी। मग्वा तेरे पी को जलद में हूँ पतिवती । सदेसो लै वाकौ तव निकट आयो सुनु चलें मेरी मन्दी धुनि मुनि विदेमी तुरत ही । करै वाञ्छा वोलै पहुँचि घर बेनी तियन की ।। --लक्ष्मण सिह । हे हे सौभाग्यवती । तुव प्रिय पति को में सवा आहुँ प्यारो। लायो ताको मेंदेमो तुव निकट सखी । मेघ में प्रीति वारो ॥ उत्कठा सो विदेसी चलत तियन की छोरिवे काज वेनी। धावै है मो थकेहू मम धुनि सुनि के श्रीन मानद देनी ।। पूर्ण 'तत्मदेगह दयनिहत ' पाठान्तरे 'तत्मदेगान्मनसि निहिताद' (श्या० सु० दा०)। -१०८-- मेघदूत ३ ४ ५ प्रत्याख्यातं पवनतनयं मैथिलोवोन्मुखी सा ७ ६ ८ ९ १० त्वामुत्कण्ठोच्दसितहदया वीक्ष्य सम्भाव्य चैवम् । १३ ११ १२ १४ श्रोष्यत्यस्मात्परमवहिता सौम्य सोमन्तिनानां १५ १७ १८ कान्तोदन्तः सुहृदुपनतः संगमात्किंचिदनः ॥३७॥ । इतनो कहत तोहि मम प्यारी । जिमि हनुमत को जनक दुलारी । सीस उठाय निरखि घन लहे । प्रफुलित चित ह्व आदर द है ।। सुनि है तिहि विधि कान लगाई । तेरो बचन सुभग सुखदाई ।। सुहृद हाथ तिय पिय मुधि पावति । सो मिलाप ते कछु घटि भावति -लक्ष्मण मिह । ज्यो सीता पोन पूर्त, तिमि सुनि इतनो बाम तोको लखंगी। द के सत्कार पूरो, प्रमुदित चित व्ह वैन तेरी सुनेगी।। जो नारी मित्र द्वारा निज प्रिय पति की छम की बात जाने । तो वे प्यारे पिया के मिलन सरिस ही चित्त मे मोद माने । -पूर्ण। सम्भाव्य-सत्कृत्य । १०९-- मेघदूत ६ ४ ३ २ तामायुप्मन्मम च वचनादात्मनश्चोपकतु ८ ७ १० ११ व्र यादेवं तव सहचरो रामगिर्याश्रमस्थः। १२ १५ ९ १४ ११ अव्यापन्नः कुशलमवले पृच्छति त्वां वियुक्तः १९ १७ १८ पूर्वाभाष्यं सुलभविपदा प्राणिनामेतदेव ॥ ३८ ॥ - मम बचनन निज बचन मिलाई । यो वा मो कहियो समुझाई ।। क्षेम सहित भरता निय तेगे। करन गमगिरि माहि बसेरो ।। पूछन है तेरी कुगलाता । कहि विरहिनि अपनी तू बाता ।। प्रानी मवहि काल के भोगू । प्रथम कुगल ही पूछन जोगू ।। -लक्ष्मण सिह। तू है जीवोपकारी नेहि हित अथवा मानि के वात मेरी । नामो यो बालियो के तुव पति निवस राम के मेल ऐ री ।। जीव है मो वियोगी अरु कुशल समाचार पूछ मु तेरे । ऐसी ही बात बोले मर तजि पहिले आपदा जाहि घरे ।। -पूर्ण। 'त्र याद' पाठान्नरे ‘ब या' , 'वियुक्त' पाठान्तरे 'वियुक्ता।' 'पूर्वानाच.. प्राणिनामेनदेव' पाठान्तरे 'भूताना हि क्षयिषु करणेष्वाद्यमाश्वास्यमेतत् ।' क्षयिषु करणेषु = नव्यमानेषु गरीरेषु । (श्या० सु० दा०)। .- मेघदूत १० १६ ११ ५ ६ १२ ७ अङ्ग नाङ्ग प्रतनु तनुना गाढतप्तन तप्त ७ १३ ४ ८ सास्रणाश्रु द्रुतमविरतोत्कण्ठमुत्कण्ठितेन । १५ ९ १ उष्णोच्छवासं समधिकतरोच्छ्वासिना दूरवर्ती १८ १७ १९ ३ २ ४ सङ्कल्पैस्तैर्विशति विधिना वैरिणा रुद्धमार्गः॥३९॥ दूबरी तुहू कीनो विधि बैर रोकि दीनो पन्थ आवन को दूर पै बसायो जाय केतो पछतायौ है ।। चित्त की उमग तेरे अगन मिला अग तो वह दूबर सवायो है ।। बिरहा तपाई देह दीरघ तू लेति स्वास दोऊ इन बातन मे तोते अधिकायो है ।। तेरे उत्कण्ठ गात नीर जात ननन ते बाढी अभिलापा सोऊ आँसू झरिलायो है ।। -लक्ष्मण सिह । जैसी तू दूबरी व्हे तपति तिमि अहं तप्त औ छीन सोऊ। तो मै आँसू उसामै जिमि लखियतु त्यो है विथा लीन सोऊ ।। उत्कठा है दुहुँ को, विवस विछुरि सो आय नाही सके है। तो ह सकल्प द्वारा सब विधि सम व्हे पीव तो मे मिल है। -पूर्ण। 'प्रतनु' पाठान्तरे 'मुतनु' 'उष्णोच्छ्वास' पाठान्तरे 'दीघोच्छ्वास ।' (श्या० मु० दा०)। -१११- मेघदूत ३ ६ शब्दाख्येयं यदपि किल ते यः सखीनां पुरस्ता- ७ ४ ९ ८ कर्णे लोलः कथयितुमभूदाननस्पर्शलोभात् । १८ १२ ११ १३ सोऽतिक्रान्तः श्रवणविषयं लोचनाभ्यामदृष्ट- १५ १६ १७ १८ स्त्वामुत्कण्ठाविरचितपदं मन्मुखेनेदमाह ॥ ४० ॥ प्रगट कहन हूँ जोग बात सग्वियन के आगे। तो मुख परसन लोभ कहतु ही कान न लागे । परयो दूरि अब जाय दृप्टि जहें पहुंचि न पावति । श्रवन सुनन गति काम जहाँ तनकहु नहि आवति ।। म्वामि माप-बम पायके उत्कण्ठित निस दिन रहत । ह सुनावन वचन ये रचि रचि मो मुग्वते कहत ।। लक्ष्मण मिह । होगी जो बात नऊ प्रगट पहन को सामने हसखी के । नौ हैं या हौंम होती मुग लगि कहिये कान मे भावती के ।। गो प्रेमी रन्न नेरो दरस परस को जाहि मौभाग्य नाही । मेरे द्वारा नुनाव नोहि मुवचन ये जो रचे गोक माही ।। -~पूर्ण । ११२-- मेघदूत १ २ श्यामास्वङ्ग चकितहरिणीप्रेक्षणे दृष्टिपातं ४ aw ५ ६ वस्त्रच्छायां शशनि शिखिनां वह भारेषु केशान् । ८ उत्पश्यामि प्रतनुषु नदीवीचिषु भ्र विलासान्- १५ हन्तकस्मिन्वचिदपि न ते चण्डि सादृश्यमस्ति ॥ ४१ ॥ १० १३ १२ १६ १४ ११ मिले भामा तेरो सुभग तन श्यामा लतन मे । मुखामा चन्दा मे चकित हरिणी मे दृग मिलें ॥ चलोर्मी में भौहे चिकुर बरही की पुछन मे । न पं हाँ काहू मे महि सकल तो आकृति मिले ।। - लक्ष्मण सिह । भामा श्यामा लता मे तन चितवन हू चारु चौकी मृगी में। केकी पख माही कच मुख सुखमा सोहती है ससी मे ।। भासै भू भ्र ग सी त्यो लहर नदिन मे पै अहो प्रान प्यारी । जैसी शोभा तिहारी तेहि सरिस नहीं एक हू मे निहारी ।। -पूर्ण। 'दृष्टिपात' पाठान्तरे 'दृष्टिपातान्' 'वक्त्रच्छाया' पाठान्तरे गडच्छाया' (श्या० सु० दा०) मेघदूत ३ त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया- or ६ ८ मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कत्तम् । १२ ११ १४ १३ अस्तावन्मुहुरुपचितै ष्टिरालुप्यते मे १६ १५ २० १९ १८ १७ क्र रस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः ॥ ४२ ॥ गिला पै गेरू ते कुपित ललना तोहि लिखि के। धर्यो जोली चाहूँ तन अपन तेरे पगन मे ।। चले आँसू तीली दृगनमग रोकै उमगि के । नही पाता घाती चहत हम याहू विधि मिले ।। -~-लक्ष्मण सिह । गेरु मो चित्र तेरो विरचि विच शिला मान के कोप वारो। चाई है मै चित्र द्वारा परि तुव पग पै मान मोचू तिहारो।। त्यो ही आँसू वह सजल दृगन सो जाय नाही निहारो। हा हा वैरी विधाता महत न मिलिवो चित्र हूँ मे हमारो॥ -पूर्ण। -११४- मेघदूत ३ ४ २ १ धाणसिक्तस्थलसुरभिणस्त्वन्मुखस्यास्य वाले ६ ७ ८ ९ दूरीभूतं प्रतनुमपि मां पंचवाणः क्षिणोति । ११ १० १४ १३ १५ घन्तेिऽस्मिन् विगणय कथं वासराणि ब्रजेयुः १२ दिक्ससक्त प्रविततघनव्यस्त सूर्यातपानि ॥ ४३ ॥ पर्यो हूँ मै तेरे सुखद मुखते दूर युवती, खरो छेदै मेरे कृशित तनहूँ को रतिपती । कट कैसे प्यारी दिवस अब वर्षा ऋतु लगी, मिटी भानुज्ज्वाला उमडि धनमाला नभचढी ।। -लक्ष्मण सिह । -११५--- M मेघदूत मामाकाशप्रणिहितभुज निर्दयाइलेपत्तो- ८ २ १ ९ १६ लव्यायास्ते कथमपि यया स्वप्नदर्शनेषु । १८ १० पश्यान्तीनां न खलु बहुगो न स्थलीदेवतानां ११ मुक्तास्थूलास्तरुकिसलयेप्नथ लेशाः पतन्ति ॥ ४३ ॥ १३ १२ १५ ज़ तू प्यारी मोको मिलति कहुँ भावी स्वपन में। भुजा ऊँची दोऊ करि चहतु' लागू तव गरे ।। दशा ऐमी मेरी निरखि वनदेवा दृग गरे । बड़े डारै आँसू पतन पर मोती जिमि झरै ।। -- लक्ष्मण सिंह । कमे ह स्वप्न मे जो लहि भरन चहूँ अक मे तोहि प्यारी। ती निद्रा जो दगा मे गगन विच दोऊ देहु वाहे पसारी ।। देवा नो अपम्या वनमुरवनिता गोक वारे महान । जांनू के विन्दु न्यागे द्रुमन दठन पै स्यूल मोती समान ।। ---पूर्ण ।

मेघदूत ४ ३ २ भित्त्वा सद्यः किसलयपुटान्देवदारुद्रुमाणां ८ ६ با ये तत्क्षीरस तिसुरभयो दक्षिणेन प्रवृत्ताः। २२ ९ २१ १० ११ आलिङ ग्यन्ते गुणवति मया ते तुषाराद्रिवाताः १२ १६ १८ १९ १७ १४ १५ १३ २० पूर्व स्पृष्ट यदि किल भवेदङ्गमभिस्तवेति ॥ ४४ ॥ दक्खिन मुख आवति चली मिलि तुसार सँग व्यारि । देवदारुपुट तोरती तिहि रस सोधो सारि ।। सो भरि अपने अक मी या हित लेतु लगाय । नागरि तो तन परसि मति मो तन परसे आय । -लक्ष्मण मिह । हे प्यारी पौन जोई परसि लहलले सोहने देवदार । आव है या दिसा को परिमल तिनके छीर की लै अपार ।। भेटू हूँ कामना के हिम गिरिवर की पौन सोई सुहाई। होवै है भाव ऐसो सुखद पवन सो भेटि के तोहि आई ।। --पूर्ण । - --११७- मेघदूत ज १ २ संक्षिप्त क्षण इब कथं दोघयामा त्रियामा ६ . ९ ८ मर्वावस्थास्वहरपि कथं मन्दमन्दातपं स्यात्। १२ १३ १८ इत्यं चेतश्चटुलनयनं दुर्लभप्रार्थनं मे १६ १८ १७ गाहोमाभिः कुनमगरणं खद्वियोगव्यथाभिः ॥ ४५ ॥ चाहनु भारी रेन ह छिन समान बाटि जाय दिवस भोर ते मांझ लो विन मताप नमाय ।। ररिपरि दुलभ आम ये गा मन भयो बिहाल । तेरे कठिन वियोग में मुनि मृगनैनी वाल । -~लक्ष्मण सिह । में है जायँ छोटी निमिग्व मरिम ये जामिनी जीन भारी । कसे है जाय योग ठिन दिवम की पीर मन्तापकारी ।। पनी एगी बार है दुरलभ बिनती चित्त मेरो दुखारी। गाटी भारी विया गो बिन गरन भयो मो अहो प्रान प्यारी ।। ~~ पूर्ण । 'मातीपमानि' पाठाना 'गादाणानि । ( श्या० मु० दा०) ---११८ मेघदूत १ २ नन्वात्मानं बहु विगणयन्नात्मनैवावलम्वे ५ ६ ७ ८ १० ९ तत्कल्याणि खपि नितरां मा गमः कातरत्वम् । ११ १२ १५ १४ १३ कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा १८ १६ १७ नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ।। ४६ ।। मै अपनो तन राग्वि रह्यो धरि के अभिलाप हिये बिच भारी। धीरज तूहँ धरे किनि भामिनि जाइ मरी मति सोचकी मारी ।। काहु प दु ख सदा न रह्यो न रह्यो सुख काहु के नित्त अगारी । चक्रनिमी सम दोउ फिर तर ऊपर आपनी आपनी बारी ।। लक्ष्मण मिह । आशा ही के सहारे अतुलिन दुख माहि मै धरूं धीर जैसे। तू हू हे भागवन्ती दुसह विरह मे राखु री बोध तैसे ॥ ना कोऊ नित्य भोगै अति सुख, अरु ना नित्य ही दुख भारी । ऊँची नीची अवस्था लखियतु जग माहि चाल ज्यो चक्रवारी ।। पूण। 'विगणयन्नात्मनवावलम्बे पाठान्तरे 'विगणयन्नात्मनानावलम्बे ।' 'नितरा' पाठान्तरे 'सुतग' 'सुखमुपनत' पाठान्तरे 'मुग्वमुपगत ( दया ० मु. दा. ) ११९ - मेघदूत " १ ३ २ जापान्तो मे भुजगशयनादुत्थिते शाङ्गपाणी ६ ८ १० ७ ९ शेपान्मासान्गमय चतुगे लोचने मौलयिखा। १४ पश्चादायां विरहगुणितं तं तमात्माभिला १६ निर्वक्ष्यानः परिणतशरच्चन्द्रिकासु क्षपासु ॥ ४७॥ १७ १५ मम शाप की औधि मिटे तबही जव शेप की सेज पै जागे हरी । इन चार महीनन को अब तू दृग मीचि बिताय दै भागि भरी ।। मिलि है फिर कातिकी रातिन में हम देवि है चांदनी चारु खरी । कि जायगी होस सबै जियकी बिन्हा दुग्व जा दिन दूनी करी ।। -लक्ष्मण सिंह । बीनगो माप मेगे भजग गयन ने विष्णु जागै जवै री। तामो ये माम चारी तिय दृग अपने म दि के दै वितै री। पूर्णब्द है उमगै सकल दिनन वी वा समै प्रान प्यारी । ऐ है आगद वारी जयहि सन्द की जामिनी चदवारी ।। . पूर्ण। 'बोलनरन्' पाठान्तरे 'मामानेतान् ।' ( श्या० सु० दा० ) । -११० मेघदूत m ५ २ ४ भूयश्चाह खमपि शयने कण्ठलग्ना पुरा मे w ९ ८ १० २२ २३ १२ निद्रां गखा किमपि रुदती सस्वतं विप्रबुद्धा । ११ २१ सान्तसं कथितयसकृत्पृच्छतश्च त्वया मे १२ १८ १४ १७ २० दृष्टः स्वप्ने कितव रमयन्कामपि त्वं मयेति ॥ ४८ ॥ १३ १५ और कहूँ सुनु एक दिना हियरा लगि मेरे तू सोइ रही । आवत नीद न बेर भई जगि औचक रोइ उठी तब ही ।। पूछी जु म धन बारहि बार तो ते मुसकाइ के ऐसे कही। देखति ही सपने छलिया तुमने एक सौत की वाह गही ।। -लक्ष्मण सिह । या हू वा ने कही है इक निसि गर सो लागि सोई हुती तू । जागी तू औचके ही पुनि अति दु ख सो वाल रोई हुती तू ।। में बार बार पूछ्यो तबहि बिहॅसि ते वैन ऐसे उचारे। मैं देख्यौ स्वप्न ऐसो रमत इक तिय तू छली प्रान प्यारे ।। -पूर्ण । 'भूयश्चाह त्वमपि' पाठान्तरे 'भूयश्चापि त्वमत्ति ।' 'सस्वन' पाठान्तरे 'सत्वर ।'

मेघदूत द ४ २ ५ एतस्मान्यां कुगलिनमभिनानदानाद्विदित्वा ६ १० ८ या कोलीनाच्चकिननयने मविश्वासिनी सूः। १२ १८ ११ स्नेहानाहुः किमपि विरहे वंसिनस्त त्वभोगा- १८ १९ दिष्ट वस्तुन्युपचितरसाः प्रेमराशीभवन्ति ।। ४९ ॥ पाय पते इनने मृगलोचनि जानि ल जीवत है पति तेरो। लोग लुगाइन वी चरचा सुनि तु विश्वास तजे मति मेरो ।। नेह की रीति बडे न कही कुम्हलात कछू जव मीत न नेगे। गोग बिना मिलाप बढावत चिन्ह लखे बढि जात घनेरो ।। -~-लक्ष्मण सिह। बात ऐसी पते की मुनि मृगनयनी । जानु तू छम मेरी । या मे विश्वास के तू पुरजन चरचे नेक ना कान दे री ।। तू या न सोच बहुन बिरह मे होत है नेह ऊनो। पूरी होवे न ही दिन दिन तेहि मो होत है प्रेम दूनो।। प्यारी। --पूर्ण। 'कितनपने पाठान्नरे अगितनयने' "विग्हेध्यमिनन्ते तु पाठान्तरे दिह व्यापदस्ते हि।' ( ज्या० सु० दा० ) योगन जनप्रवाद । --१२२-- मेघदूत ५ ४ ३ २ आश्वास्यैवं प्रथमविरहोदनशोकां सखी ते ८ ६ ९ शैलादाशु त्रिनयनषोत्वातकटानिवृत्तः। १२ साभिज्ञानप्रहितकुशलैस्तचोभिर्समापि ११ १३ १४ प्रातःकुन्दप्रसवशिथिलं जीवितं धारयेथाः ॥ ५० ॥ - दै धीरज मेरी पतिनी को । प्रथम विरह व्याकुल सजनी को ।। चलियो तुरत जलद वा गिरि ते । खोदी त्र्यम्वक वपभ गिग्लिरि ते ।। लाइ प्रिया की कछुक निसानी । अरु वा मुख की कुशल कहानी ।। मेरेहु प्रान राखियो ताता । भए मलिन जिमि कुन्द प्रभाता ।। लक्ष्यण सिह । नारी है मो सताई प्रथम विरह की धीर ताको धरैयौ । नदी जाके बिदारे शिखर तेहि महागंल तें लौटि ऐयो । लयो वा की निसानी कुशल वचन हू मोहि वा के सुनै यो । ये बासे कुद ऐमे अतिसय मुरझे प्रान मेरे बचैयो ।। -पूर्ण । 'आश्वास्यव' पाठान्तरे 'आश्वास्यना।' 'मे' पाठान्तरे 'ते।' 'शैलादाशु' पाठान्तरे 'शैलादम्मात् ।' (श्या० मु० दा०) --१२३- मेघदूत ६ ५ ४ w अच्चितमोस्य व्यवसितमिदं वन्धुत्यं लया मे १० प्रत्यादेशान्न खलु भवतो धीरतां कल्पपामि। ११ ८ ९ १२ १५ १४ निःशब्दोऽपि प्रदिनयि जलं याचितश्चातभ्यः १८ प्रत्युत्त हि प्रणयिषु सतामोप्सितार्थक्रियेच ।। ५१ ॥ २१ १९ २० बन्चु जाज मम ते इनो ग्वीकृत किया कि नाहि । नटन गक तव मीन ते नंक न मो मन माहि ।। नृ पित बोलह बरमि मेटत चातक प्यास । मज्जन जन उत्तर यही पुरावल याचक आम ।। -~~लक्ष्मण मिह । Tा अगोशार कीन्ही हि करि करियो व को काज ए तू भर गीता मे नलवर लग जो "करेंगो" कहै तू ।। गाचे ही इन पानी परिहन गन को त् सदा मौन ठानी। नीर पूरे गुगत जनन ती मोइ स्वीकार दानी ।। -पूण । *Toयामि' पानान्तर कयामि ।' (श्या० सु० दा.) अन्यमान् = जनगीवागत्। धीरतातूष्णीम्भावम् ।

मेघदूत ७ ९ एतत्कृत्वा प्रियमनुचितप्रार्थनावर्तिनो मे २ ३ सौहाद्वा विधुर इति वा मय्यनुक्रोशबुद्ध या । ११ १ १२ १० इष्टान्देशाञ्जलद विचर प्राषा संभृतश्री- १८ १७ १५ १४ १६ माभूदेवं क्षणमपि च ते विद्य ता विप्रयोगः ।। ५२ ॥ कै बिरही के सखा सुमिरि के । दया दृष्टि मो ऊपर करिके । पूरन कीजो बिनती मोरी । सब विधि उचित सुहृद जन केरी ॥ चलियो फिर मन मे जित आवै । पावस सुखमा सङ्ग सुहावै ।। पलहु न विज्जु बिरह होइ तो को। जैसो भयो शाप बस मो को ।। -लक्ष्मण सिह । - भ्राता के भाव सो वा धरि हिय करुना दीन वा मोहि जानी। के दीजे काज मेरो अनुचित विनती हे सखा चित्त आनी ।। भावै जो देस तो को तिन विच विचरौ पावसी सोभ धारी । न्यारी होवै न तो सो इक छन छनदा रावरी प्रान प्यारी ।। --पूर्ण 'प्रियमनुचित प्रार्थनावर्तिनो' पाठान्तरे 'प्रियसमुचित प्रार्थन चेतसो।' 'क्षणमपि च' पाठान्तरे 'क्वचिदपि न ।' (श्या० सु० दा०) इति श्रीकालिदास विरचिते मेघदूतकाव्ये उत्तरमेघः। -~-१२५- - मेघदूत केचन प्रक्षिप्ता श्लोकाः २ १ m me इत्याख्याते सुरपतिसखः शैलकुल्यापुरीषु ४ ८ ६ ९ स्थिखा स्थिखा धनपतिपुरी वासरैः कैश्चिदाप । १४ १३ १२ ११ १० मखागारं कनकरुचिरं लक्षणैः पूर्व मुक्तः १६ तस्योत्संगे क्षितितलगतां तां च दीनां ददर्श ॥१॥ १५ १८ १९ १७ २० - इन्द्रसखा ( मेघ ) ने इस प्रकार कहे जाने पर पर्वतो, नदियो और पुरियो पर रुक रुक कर कुछ दिनो में धनपति की पुरी को प्राप्त किया और पूर्वोक्त लक्षणो से ( यसके ) स्वणों पम गृह को समझ कर उसके भीतर भूमितल पर पडी हुई दीन उस ( यक्षपत्नी ) को देखा । -१२६-- मेघदूत ५ १ २ ७ ८ ६ तस्माद निगदितमथो शीघ्रमेत्यालकायां १० or १२ यक्षागारं विगलितनिभं दृष्टिचिह्नविदिखा। - १६ १५ १३ १४ यत्संदिष्टं प्रणयमधुरं गुह्यकेन प्रयत्नात् १७ १९ १८ २० ३ ४ तद्गहिन्याः सकलयवदत् कामरूपी पयोदः॥२॥ कहा जाता है कि तदननर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले नेघ मे उस पर्वत से अलकापुरी मे शीघ्र आकर और कातिहीन जैसे यक्षगृह को दर्शनीय चिन्हो से जानकर यक्ष द्वारा प्रयत्न पूर्वक जो प्रणय मधुर सदेश दिया गया था वह सब उसकी पत्नी से कह दिया। -१२७ - -- मेघदूत ४ २ ९ १० तं संदेश जलधरवरो दिव्यवाचाचचक्षे १ ८ ६ प्राणांस्तस्य जनहितरतो रक्षितु यक्षवध्वाः। १४ १३ ११ ११ १६ २ प्राप्योदन्तं प्रमुदितमना सापि तस्थौ स्वभतु : १९ २२ २३ २१ २० १७ १८ केपा न स्यादभिमतफला प्रार्थना ह्य त्तमेषु ॥३॥ जच्छयच कुगलातहित धरि हिय मित्र उछाह, कही मदेसो जाइ सो दिव्यवचन जलवाह । पाः कुगर भरतार की हरवी मो मन माँहि, करि मज्जन मो वीनती को तुप्ट्यो जग नाहि । -लक्ष्मण मिह । -१२८..- पित ४ mr २ ८ श्रुत्वा वार्ता जलदकथितां तां धनेशोऽपि सद्यः १० शापस्यान्तं सदयहृदयः संविधायास्तकोपः। ९ ६ ११ ५ १६ १२ १५ १४ संयोज्यैतौ विगलितशुचौ दम्पती हृष्टचित्तौ १८ १७ १९ २१ २० भोगानिष्टानविरतसुखं भोजयामास शाश्वत् ॥ ४ ॥ सुनी एती बाते धनपति जु भाषी जलद की, दया जी मे आई रिम मिटत ताही छिन भई । मिलाये दोउन को विपति हरि लीनी शपथ की, सदा भोगौ वाञ्छाफल हरखि यो आसिस दई । - लक्ष्मण सिह । जानी ज्योही कहानी विरह दुखित वा यक्ष की यक्षपाल, मोच्यौ त्यो शाप ताको रिस तजि सवही हीय हू के दयाल । प्यारी प्यारे मिलाये सबदुख तजिक पूर्ण आनद पूरे, दोऊ स्वच्छन्द भोगे नित प्रति मन के भोग के साज रूरे । - पूर्ण। -१२९- - मेघदूत १३ १6 इत्यंभूतं सुरचितपदं मेवदूताभिधानं ७ ६ ८ कामक्रीडाविरहितजने विप्रयुक्त विनोदः । ४ २ मेघस्यास्मिन्नतिनिपुणता, बुद्धिभावः कवीनाम् ११ ९ १० १२ १६ नत्वार्यायाश्चरणकमलं कालिदासश्चकार ॥ ५ ॥ इम ( काव्य ) में मेघ का विशिष्ट कौशल, कवियो की वृद्धिमत्ता और वियोगी तथा कामक्रीडा से रहित जनो का विनोद है। आर्या के चरण वामल को नमस्कार कर कालिदास ने इस प्रकार के ललित पदोवाले मेघदून काव्य की रचना की । --१३०-

No text on this page.

Meghdoot

Author
Sukul, Lalita Prasad
Title
Meghdoot
File name
Meghdoot
Text
OCR done
Published
2010/04
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
234
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327475
Barcode
99999990003064.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
DV3hEPdxtSI
Download PDF

Meghdoot