Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shri Sangh Pattak
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ANTOSHOOTION
श्राजिनदत्तसूरिमाचीनपुस्तकोद्वारफण्ड(सुरत) प्रथा-६६
अईम् ।
श्रीसरतरगच्छेश्वर नवापृत्तिकार श्रीजिनमयदरसरिपट्टालद्वार कविचक्रवर्ति
श्रीमजिनवल्लमसूरिरिचित -
श्रीसङ्घपट्टकः।
श्रीसाधुकीतिगणि निर्मितावचूर्याविभूषित', लक्ष्मीसेनरचिती या
ममलतः हर्पराज उपाध्यायविहित लघुकृत्या सनाधीकृतश्च ।
धीमजिनकपाचन्द्रसूरीश्वरशिष्य उपाध्यायपदालत मुनिश्रीसुग्वसागरोप
देशात् अष्ठिपर्य्य वायू प्रमनचन्द्र बोधरा, गावू गोविन्दचन्द्र भूरा तथा
महासमद श्रीसद्ध इत्यादि श्राद्धक्यपिहितेन द्रव्यसाहाय्येन,
प्रकाशक
MEET
श्रीजिनदत्तसूरिज्ञानभण्डार,
मु.सुरत
वि० स० २००९]
मेट.
[प्रति ५००
TOTRIOTO
-AMAawww formane पुस्तक, प्राधियान-- श्रा जिनदत्तनिशानमार, लि. गोपीग, योग: मोहा, मुल तुरत (गुणगा)। wpanwww Miniym - श्री सापक के द्रव्य साहाय्यक महाशयों की शुभ नामावली:- महासमुंद । .... ४५०) बालू प्रसन्न वन्दनी बोथरा २५०) बाबू गोविन्दचन्दनी शुभ २५०) महासमुंद श्रीमह के गानखाते से- हम्ने-ठणुतमलजी पींचा .... १०१) स्व० गुलाबचंदनी सेठिया स्मरणार्थ- तत्पुत्र तेजमलजी सेठिया.... १०१) श्रीयुत सुखलालजी जमकरणजी चोपड़ा.... १५१) खुशालचंद लुणावत धर्मपत्नी गौभाग्यवती मंगुबाई २१) एक बाई की तरफ से बालाघाट। राजनांदगांव। नरसिंहपुर । नरसिंहपुर। २०१) श्री छोटमलजि मनमालीजि की मौ० चपागाइ, १००) सेठ सोमागमलजि तथा महेन्द्रकुमारजि डागा मु० नागपुर मु. हिंगणघाट मुद्रक. शाह गुलायचंद लल्लुमाई, श्री महोदय प्री प्रेस-भावनगर । - -:नि वे द..न:- संघपट्टक, जो आप के करकमलों में विराजित है, के-रचयिता आचार्य श्री जिन उल्लममरिजी महाराज हैं। उनका अस्तित्व समय वि सं ११२५-६७ है, जैसा कि- भी जिनचद्रसरि रचित सवेगरगशाला से सिद्ध है। सूरिजीने उपयुक्त अन्य का संशोधन वि सं ११२५ में किया था। इस संघपट्टक की रचना आकस्मिक घटना नहीं पर एक सत्याश्रित सिद्धान्त पर आधृत है। श्री निनवालमसूरिजी के जीवन से ज्ञात होता है कि, उनका चित्रकूट-चित्रौड़ में अच्छा प्रभाव था। आपने वहाँ पर, अनेक प्रकार के कर व यातनाएँ सह कर, 37 शासन की जो सेवा की है, वह उल्लेखनीय है। जैन संस्कृति के इतिहास में इन सेवाओं का बहुत पहा महत्त्व है। यही कारण है कि, चित्तौड का श्री संघ सूरिजी का परम भक्त और माता- नुवर्ती था। आप के सदुपदेश से, वहाँ के श्रावकोंने शासननायक महावीरस्वामी का नवीन विधिचत्य निर्माण करवाया था। सूरिजी द्वारा ही इस की प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हुआ था और सघ व्यवस्था सूचक प्रस्तुत सघपट्टक" मूल, (४० श्लोक) उपयुक्त विधिचैत्य के मुख्य द्वार पर पापाण-शिला पर खुदवा कर, लगाया गया था, जैसा कि अचलगच्छीय श्री महेद्रसरि प्रणीत 'शतपदी' से सिद्ध होता है। जैन साहित्य में, इस ग्रन्थ का स्थान कितना आदरणीय समझा जाता है, इस का अध्ययन कितने व्यापक रूप से होता आया है, इस का ज्ञान हमें, उन वृतियों से होता है, जो समय समय पर, विभिन्न आचार्य, मुनि और जैन गृहस्थों द्वारा इस पर रची गयी, टीकाओं से विदित होता है कि मध्यकालीन जैन संस्कृति और साहित्य में यही एक ऐसी मूल्यवान् कृति है, जिस पर प्रकाण्ड पडित्तों को माप्य लिखना पडा। यह आपण व्यक्ति मूलक नहीं पर गुणमूलक है। अधावधि रचित वृत्तियों की संख्या आठ तो ज्ञात हो चुकी है। इन का उल्लेख प्रो - . १ बसरमेर जेन भण्डार सूची ११.।
हरि दामोदर वेलणकर गुम्फित “जिनमत्तभोग" में हुआ है। वृत्तियों में सर्वश्रेष्ठ व प्राचीन " वृत्ति" है, जिसका प्रणयन प्रकाण्ड पंडिन और शालार्थी श्रीजिनपति- सेरिजी म. द्वारा हुआ। यह वृत्ति क्या है ? एक प्रकार से महाभाष्य है । इस में आचार्य महाराजने अपने सद्धान्तिक ज्ञानवल से तर्कयुक्त शैली में, सुन्दर रूप से मूल अन्थगत विषय का समर्थन किया है। प्रस्तुत संस्करण तैयार करने में निम्न हरतलिखित प्रतियों का उपयोग किया है, जिन का परिचय इस प्रकार है- प्रति परिचय- (१) A संघपट्टक-अवचूरि, साधुकीर्ति गणि रचित, रचनाकाल सं. १६१९ । यह " प्रति " मुनि कान्तिसागरजी के निजी संग्रह की है। पत्र ६, त्रिपाठ, जिस का चित्र इस प्रन्थ में दिया जा रहा है। इस की लेखन प्रशस्ति इस - प्रकार है- यह " प्रति, "सं. १८५३ वर्षे कार्तिक कृष्णपक्षे पञ्चम्यां कर्मवाट्यां ॥पं.॥ भीमविजय मुनिना लिलेखि भी फलबर्द्धिकायां चतुर्मासी चक्रे ॥ श्रीरस्तु ॥ B संघपक-अवचूरि, बावू पूर्णचंदजी नाहर के संग्रह से उनके सुयोग्य-पुत्र राष्ट्रसेवी श्री विजयसिंहजी नाहर की उदारता से प्राप्त हुई थीं। वि. सं. २००३-४ के हमारे कलकत्ता चतुर्मास के सयय इस की प्रतिलिपि करली गयी थी । प्रति सुंदर सुवाच्य व प्रायः शुद्ध है। (२) A संघपट्टक-टीका, कर्ता, लक्ष्मीसेन, रचनाकाल सं. १५१३, इसकी " प्रति" हमें रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल के १ प्रकागक, श्रावक जेठालाल दलसुग्व, अमदावाद, सं. १९६३, वृहत्वृत्ति का यह भाषान्तर पठनीय ह और आज की स्थिति को देखते हुए विचारणीय भी। २ भाचार्य महाराज न केवल स्वयं अद्वितीय प्रतिभासम्पन्न विद्वान् ही ये अपितु विद्वत्परम्परा के निर्माता भी थे। आप के अधिकतर शिष्य उच्च कोटि के ग्रन्थ रचयिता व प्रखर पाण्डित्यपूर्ण विचारपरम्परा के सृष्टा थे।
५ अन्तर्गत "ओरियण्टल लापनेरी" से प्राछ हुई थी। सापेक्षत यह प्राचीन है । मन्तिम इस मकार है- ॥ इति श्री सघपट्टकस्य टीका परिपूर्णा, लिखिवा ५. स्नियसोमेन, स्ववाचनार्यम् ॥ B सरपट्टा-टीका, यह " प्रति " अनुयोगाचार्य स्व. श्री कारमनिजी गणि के शिष्य मुनिवर प, युद्धिमुनिजी गणिने प्रतिरिपि मैनी थी। A सपपट्टफ-लघुपति, फा-हर्पराज उपाध्याय, यह "प्रति" हमें भी अगरचंदजी हा द्वारा प्राप्त हुई थी। मूल पति " भांढारकर ऑरियण्टल रीमर्च इन्स्टिटयूट "-पूना में सुरक्षित है। पत्र संख्या २७, प्रति प्राचीन व पच पाठ है। इस की लिपि बहुत सुन्दर और सुपाच्य है। देखिये ब्लोक। B सपपटक-लघुपति, यह " प्रति " अनुयोगाचार्य स्व. श्री फेयरमनिनी गणि के शिष्य मुनियर प युद्धिगुनिनी गणिने इस की प्रतिरिपि भिजवाई थी। मूल पति के लेपन प्रशस्ति इस प्रकार है- सपत् १६०८ वर्षे माद मुदि ५ दिने शनिवारे श्रीखरतरगचे श्रीनिनमाणिरुप परिस्नियराज्ये श्रीरिकमनगरे गणधर-घोपडागोगे सा० देशराजस्तत्पुत्र मा० जगसिंह स्तरपु० सा० सम्मा मा० था. सौतिकदाः पु० रन मा० रायपाल सुरताण समार प्रमुमपरिपारमतेन मा० रामपालन शापगीतपस उपापने सीसहपहारपुचिप्रतिविदरा पिना भीषनराजोपाध्यायान याच्यमान पिर नन्दतु । शुम कल्याणमन्तु । श्रीधनराजो पापापनिमें प्रसादीकृता प्रतिरिय या. पपसुन्दरगणे । शुभ ग रेनपाठस्यो । कस्यापमस्तु । श्री। सर्वप्रथम हम परमपूय गुरप्यं उपाध्नाय पर विपित १००८ मुग्यमागरजी महाराज मा. मति दम अपनी ना कर परते हैं, निर समसे पर --- संस्करण तैयार हो सका। इस में प्रयुक्त प्रतियों के प्रेषण में जिन महानुभावों (नाम ऊपर प्रासंगिक रूप से आ चुके हैं ) सहायता कर हमारा कार्य सरल किया, उनको, व पूज्य गुरुदेव के सदुपदेश से जिन जिन श्रावकोंने, ज्ञानवृद्ध्यर्थ आर्थिक मदद की, उन सब को धन्यवाद देना आवश्यक ही नहीं, अपितु अनिवार्य कर्तव्य समझते हैं। श्री जिनवल्लभ- सरिजी महाराजा का जो चित्र (काष्ठपट्टिका) प्रकाशित किया जा रहा है, उसका ब्लोक बीकानेर से भवरलालजी नाहटा द्वारा प्राप्त हुआ था । तदर्थ वे भी धन्यवाद के पात्र हैं । इस के शोधन में दृष्टिदोष से या तथाकथित कारण से यदि स्खलना रह गई हो तो पाठक सहानुभूतिपूर्वक सुझाने का कष्ट करेंगे । सिवनी, (सी० पी०) था. शु० ७, स. २००९ शुभाकांक्षी, मुनि मंगलसागर Decekler, gehackt प्रेस में छप रहे है- १ महावीर स्तोत्र अव चूरिसह A मृल-श्री जिनबल्ल मसूरिजी, अग्चूरि, कर्ता-श्री नरसुन्दर गणि । चन्ददूत-काव्य B कर्ता-श्री विमलकीर्ति गणि, विद्वत्प्रवोध C कर्ता-श्रीवल्लभ गणि, २ सप्तोपधानविधि ३ पंचप्रतिक्रमण सविधि जिलदत्तसूरि ज्ञानभंडार, सुरत. प्रकाशक:-- SEELTODAE POST
समर्पण
जगम-युगप्रधान-भट्टारक-१००८
श्री जिनकृपाचन्द्रसूरीश्वरजी महाराज
परम गुरुवर्य
के
करकमलों में श्रद्धापूर्वक
समर्पित
मुनि भगलसागर
उपोद्घात - . जुगपवरागमपीऊस-पाणपीणियमणाकया भवा । जेण जिणवल्लहेणं, गुरुणा तं सव्वहा वंदे ॥ जिस समय चैत्यवामी आचार्यगण ज्ञानवाद को प्रधानता देकर भगवत्प्ररूपित सैद्धान्तिक आचरणों की अवहेलना कर रहे थे, भगवन्नाम से ही चैत्यों में निवास कर रहे थे, मठपतियों की तरह चैत्यों के सर्वाधिकारी वन कर वैभव माम्राज्य में आनन्द-उत्सव मना रहे थे, उस समय में इस चैत्यवास की दुर्व्यवस्था से व्यथित होकर सर्वप्रथम आवार्य श्री हरिभद्ररिने इस दुराचार का उप विरोध किया था, पर इसका कोई ठोस परिणाम हुआ हो, कहा नहीं जा सकता। तदनन्तर प्रमुखरूप से उग्र विरोध करनेवाले आचार्य श्री जिनेश्वरमूरि हुए, जिन्होंने चैत्यवासियों की प्रमुख नगरी अणहिलपुरपत्तन में जाकर, महाराजा श्री दुर्लभराज के समक्ष चैत्यवासि आवायों के सन्मुख ही मेद्धान्तिक आचरणाओं की शुद्ध प्ररूरगा कर सुपिहित पक्ष [खरतर पक्ष ) की स्थापना की यी। सुविहित पक्षीय आचरणाओं के प्ररूपक और चयवासी उन्मार्गगामिता के निर्देशक रूप में ही इस काव्यरचना हुई थी। काव्यकार-इस काव्य के प्रणेता 'श्रीजिनवालमगणि' हैं। यह इस काव्य ३८वीं कारिका से स्पष्ट है- विभ्राजिष्णुमगर्वस्मरमनासौंद श्रुतोलवेन, सज्ज्ञानामगिं जिनं वरवपुः श्रीन्द्रिकाभेश्वरम् । वन्दे वर्ण्यमनेकधासुरनरैः शक्रेग चैनच्छिदं, दम्भारि विदुपां सदा सुवचसाऽनेकान्तरङ्गप्रदम् ।। ॥ ३८ ॥ " जिनवल्लभेन गणिनेदं चक्र" ये जिनवालम गणि कौन थे ? कहा के थे ? किनके शिष्य थे ? इत्यादि विषयों का निर्गय वाय एवं अन्तरा प्रमाणो से किया जा सकता है। श्रीजिनपतिसूरि शिष्य श्रीजिनपालोपाध्यायप्रणीत' खरतरगच्छालद्वार युगप्रधानाचार्य गुर्वावली में और श्रीसुमतिगणिरचित गणवरसार्द्धशतक की वृहद्वृत्ति में इस प्रकार उल्लेख मिलता है। जिनवल्लभ आसिका दुर्गनिवासी कूर्चपुरीय श्रीजिनेश्वराचार्य के शिष्य थे । सिद्धान्ताध्ययन के लिये पत्तन-स्थित आचार्यप्रवर श्रीअभयदेवसूरि के पास गये थे। आगमाध्ययनोपरान्त सुविहित आचरणाओं से प्रभावित होकर, गुरु जिनेश्वराचार्य की आज्ञा प्राप्त कर, चैत्यवास का त्याग कर उन्होंने अभयदेवाचार्य के पास उपसम्पदा ग्रहण की। इन्ही को अभयदेवाचार्य के विनेय प्रसन्नचन्द्राचार्य के शिष्य श्री देवभद्राचार्यने सं ११६७ चित्रकूट में अमयदेवाचार्य के पट्ट पर अभिषिक्त कर जिनवालमसूरि नाम उद्घोषित किया, और सं. ११६७ के ही कार्तिक कृष्णा द्वादशी के दिन उनका खर्गवास हुआ। - इन तीन्ही प्रसंगों की पुष्टि अन्य खरतरगच्छीय पट्टावलियों से भी होती है। १ जिनवालम आसिका दुर्गनिवासी चैत्यवासी श्रीजिनेश्वराचार्य के शिष्य थे।
- 16 २ भीममयदेवाचार्य पास सिखातों के अध्यया के लिये वे गये थे, और पीछे से भावार्यश्री पारा ही उपसम्पदा प्रहण की थी, अर्थात अभयदेव के ही शिष्य बने थे। १ श्रीदेवमाचार्यने ही इन को अमयदेवाचाय के पद पर स्थापित किया था। अतरण प्रमाणों में सरचित (पिनासमरचित ) 'प्रश्नोत्तरकशितक काव्य जो तपसमा से पूर्व ही रखा गया था उसमें वे श्रीजिनेश्वराचार्य को 'मद्गुरवो जिनेश्वरसूरप' सम्बोधन से और भावार्य श्रीअभयदेव को ‘सहरवोऽत्र चारवरणीसुथुना विश्रुता श्रीमदमयदेगचार्या । सम्बोधन से पक करते हैं। इससे यह तो निश्चित हो हो जाता है कि जिनेश्वराचार्य इनके मूल धीशाणुक ये और सैधान्तिक (विशगुरु ) गुरु थे आचार्य अगयदेव । (२)दी श्रीजिनवादमणिरचित सूधमार्थविचारमारोबार प्रकरण (सार्द्धशतक) पर हर गच्छीय श्रीधनेश्वरावायने स 101 में टीका की रचना की है। वम १५२ . पथ को व्याया पे लिखते हैं कि- দিগন্যালিখি" বিননামালিনামৰ বিয়া কামাহিয়ালাবীবাশ্বমাঙ্গাহিয়ার तिविधानावावदातवीतिमुपापरलिइपरामण्डलामा प्रोमदमयदेवसूरीगो शिग लिखित कर्मप्रकरयादिगम्भीर शालेय पमुत्य हन्ध जिनयाममणिलिखितम् । इन प्रमाणों से यह स्पष्ट प्रतीत है कि 'जिनलमण नवाशीतिकारक भाचार्य अमयदेवमूरि के शिष्य थे। तदुपरान्त सुविहितपशीय जिनेश्वराचार्य के पर भाचार्यप्रवर श्रीनिवन्दरि रचित सयेग गशाला को पुणिका " इति श्रीमबिनयन्तरिकता तस्नेिय औषमा प्रसूरि रामभ्यर्षितेन गुगम दाणे [ना] प्रतिसकता, निगलमणिना च सगरमालाराधना समाता!" से यह नूननरस्तु प्रकाय में भाती है कि गुणधर गधि को भाचार्य यनने पर देवमनाचार्य के नाम से मिल हुए उनने सगरमा- जिवकी रचना ११२५ में हुइ थी-उसका संस्कार किया और श्रीनिवाम गांगेने उपका प्रशोधन किया। १५ ये मी यही गिर होता है , मिस ११२५ के पूर्व ही नोतिनतमने अमयदेवाचार्य के पास उपसम्पदा प्रहण करली पो। श्रीनिपलम उपसम्पर पूर्व गणिते नहीं थे यह बात के-उपसम्पदा पूर्व रचित उनके जो दो अन्य प्राप्त होते है। उनकी निम्ननिधि पतियों से प्रतीत होता है-प्रयम कृनि पार्थनायस्तोत्र ५५ ॥ {आदि-नास्पद्रोगाधिपतिरतिस्तोमदिनयत्' में नया अपामार' कह कर अपना नाम केरल स्यादरमनि पारिवायमवति । कोपिन इत्यय', लोक (ई) प्राह हय प्रयोगनिपुणे : शन्दधातु स्मृत ।। ते पारयिताऽत्र दुघरतर पर अभ्यतोऽम्मोनिधे । महि श्रीजिनवावमतिपद कोरपिया के ताम् !"१५६५ मदशावो जिनेवरवरय ' पार पातुरलाधिक कमवतो मौरी मन' प्रीत पारद्वाविदापया पद कया गयन्ति विना ।। पापी मुरशिद्विति मुक्ति पायति या के सदा के या हरवोत्र गारुचरण नौमता विधुना १५ মংশষবােখা | গাণিীর tিuৰ সাপ্তা ভাববেন যন। খিযিমুনগোষ্য ময়া ॥ १ " ' - -- 'जिनवल्लभ सूचित करते हैं। और इसी प्रकार प्रश्नोत्तरेकपष्टिशतककाव्य में भी जिनबहमेन पद से भी यही सूचित करने हैं । अत. उपसम्पदा पक्षात, ही आचार्य अमयदेवने 'गणि' गणि' पद प्रदान किया हो, ऐसा प्रतीत होता है। इनके अलावा इन्हीं के पट्टधर युगप्रधान श्रीजिनदत्तसूरि सरचित गणधरसार्द्धशतक में ५० आर्याओं से 'सूरिजिनवल्लदो' की स्तुति करते हैं तथा अपने प्रणीत समस्त प्रन्यों में 'जिनवादमसूरि' को नमस्कार एवं उनकी स्तुति तो श्रद्धापूर्वक करते ही हैं। अतः परि उहिखित बाय एवं अन्तर प्रमाणों से यह निषित है कि जिनवल्लम गणि मुविहित [खरतरगच्छीय ] श्रीममयदेवमरि के शिष्य एवं पट्टधर थे। ग्रन्धरचना। गणिवर १२वीं शती के उद्भट विद्वानों में से एक थे। इनका अलवारशास्त्र, छन्दशास्त्र, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष और सैद्धान्तिक विषयों पर एकाधिपत्य था। इनने अपने जीवन काल में विविध विषयों पर सेकड़ों प्रन्यों की रचना की थी, किन्तु देव दुर्विपाक से बहुत से अमूल्य प्रन्य नष्ट हो गए। और इस वजह इस समय इनके केवल ४३ ग्रन्य ही प्राप्त होते हैं। उपलब्ध प्रन्यों की तालिका निम्न है- १ सूक्ष्मार्थविचारसारोद्धार प्रकरण (साईशतक), २ आगमिकवस्तुविचारवार प्रकरण (पडशोति), ३ पिण्डविशुद्धि प्रकरण, ४ द्वादशकुलक, ५ धर्मशिक्षा प्रकरण, ६ संघपट्टक, ७ पौषधविधि प्रकरण, ८ प्रति- क्रमण समाचारी प्रा. गा ४०, ९ आप्तपरीक्षा (उल्लेख-पडावश्यक वाला. तरुणप्रभसूरिकृत), १० प्रश्नोत्तरेकषष्ठिगतकाव्यम्, ११ मारशतक (अनुपलब्ध), १२ खप्पाष्टरुविचार (अनुपलब्ध), १३ अष्ट- सप्तति ( अनुपलब्ध), १४ सर्वजीवगरीरावगाहना स्तव प्रा गा. १५ श्रावकवतकुलक प्रा. गा. १६-२० आदिनाथादि चरित्र पञ्चक स २१ वीरचरित्र (जयमववण०) प्रा गा. १५, २२ भावादिवारण स्तोत्र गा ३०, २३ लघु अजितगान्तिस्तव (उल्लासि०) प्रा गा. १७, २४ पंचकल्याणकस्तव (सम्म नमिउण) प्रा गा २६, २५ सर्वजिनपञ्चकल्याणक स्तव (पणमिय सुर०) प्रा. गा. ८, २६ पञ्चकल्याणक स्तोत्र (प्रीतिद्वात्रिंशत् ) सं पद्य १३, २७ कल्याणक स्तव (पुरन्दर- पुरस्पर्द्धि) सं. पद्य ५, २८ महाभक्तिगर्भासर्वविज्ञप्तिका ( लोयालोय० ) प्रा गा. २५, २१ पार्श्वस्तोत्र ( नमस्यद्गीर्वाण ) स. पद्म ३३, ३० पार्श्व स्तोत्र ( पायात्पाव. ) सं पद्य ३९, ३१ पार्श्वस्तोत्र (सिरि- भवणथंभणपुरे) प्रा. गा ११, ३२ पार्श्व स्तोत्र ( त्वमेव माता त्वं पिता) सं. प. ९, ३२ पार्श्व स्तोत्र ३४ महावीरविज्ञप्तिका (सुरनरवइकयवंदण) प्रा. गा. १२, ३५ वीतरागस्तुति. (देवाधीशकृते ) सं प १०, ३६ ऋषभजिन स्तोत्र (सयलमुवणिद्ध ) प्रा. गा ३३, ३७ क्षुद्रोपद्रवहरपार्श्वस्तोत्र ( नमिरसुरासुर) प्रा. गा. २२, ३८ नंदीधरस्तोत्र ( वदिय नंदिय ) प्रा. गा. २५, ३९ सर्वजिनस्तोत्र (प्रीतिप्रसन्नमुख ) सं १, २३, ४० चतुर्विंशति जिन स्तोत्र (भीमभव. ) प्रा. गा १४४, ४१ ऋषभस्तुति. (मरुदेवीनाभि० ) प्रा गा. ४, ४२ सरस्वती स्तोत्र ( सरमसलसद्) सं. प २५, ४३ नवकारस्तव (किं किं कप्पतरु ) अपभ्रंश १३ ! ) १. पद्य ३२. २ पद्य १५९, १६०० " इन 'म यो में माशतक, पति और पिण्डविगुद्धि ये तीनों ही सैद्धान्तिक प्रय बहुत ही महत्व के थे। इन प्रयों पर आचार्य मलयगिरि, धनेश्वराचार्य, हरिमप्राचार्य श्रीचन्द्राचाय भादि तत्काल दी अपर्णात् की शती में ही टीकाए रचकर इनकी सार्वजनिक उपयोगिता घोषित की, और इनके प्राम समप्र प्रपों पर अनेकों रोकाए प्राप्त होती हैं। . इनके समप्र मूल प्रयों का 'पष्टभमारती' के नाम से मैं सम्पादन कर रहा हूँ। उसमें गणिजी' के काम्यवैशिथ्य पर प्रकाश डाल्या । अत यहाँ पर उनकी विशदाहना पर विचार नहीं कर रहा है। • या पिण्डविशुद्धि के फर्चा पृथक् है " वर्तमाा युग में कर मुनिगण 'पिण्डविगुद्धि के पत्तो परतर जिनाम नहीं है किन्तु इसी नाम के कोई पृपा आचार्य की मह रचना है ' ऐसा मानते है। उनमें अग्रगण्य माग प यास मुनि-मापिजपजी मजते है। ये अपनी दिविशुद्धि की प्रस्तावना में गच्छव्यामोह से अनेक बातें इतिहासविरुद, प्रमाणा भाव सह, स्वकपोलकलानौलवित अनेक प्रकारको शकाए उपस्थित कर ऐमा प्रतिपादित करते है कि श्री जिनेश्वरमूरि श्रीमभयदेवसरि गुपिहिमपकीय (सरतरगच्चीय) नहीं थे, उनका यह प्रतिपादन कहाँ तक युक्कियुफ है। इसका विचार मैं अपनी पाममारती' की प्रस्ताव में विशद्रपये करूगा। किन्तु जिन पाम के सम्बन्ध में जो पुछा उमा गाराश प्रस्तावना पृष्ठ २-३-४ में निम्नलिखित है- १ जिनवा मरि वरतर है इस प्रकार का प्राप स्वगच्च का उत्कर्ष पढाने के लिये किया गया है। २ षट् कल्याणक फी उत्सूत्रप्ररूपणा करने के कारण परतर जियम को सपपहिन किया गया था भात अभयदेवाचार्य के शिष्य भी नहीं हो सबसे। , सत्काली। रचित टीकाओं में किसी भी टीकाकार भाचार्यने यह निर्देश नहीं किया कि ये सरवर पछीय पे और समयदेवाचार्य के शिष्य थे। ४ ऐसे राज यहिफ्त उत्स्य प्ररूपस के प्रप पर प्रीपरि जसे समष टीकाकार टोसा नहीं रच सकते। अब यह मुस्पर है पिर-विमुद्धिवार परतर नहीं है कि तु पृथक् एतमामधारक को श्रापार्य है। इस गायता पर विचार करें तो केवल यही प्रतीत होता है फि प्रस्ताव ऐतक ऐविधायिक परपराओं से मिशप्रमाणों में देर सेना का प्रमाण दिया है। इस प्रमाण से भी किसी जगह पि विगनिहार पृथन ई, इस विषय में कोई प्रयास नहीं पड़ता। मी पात-निपामधूरि १२मी शादिमें हुए हैं और प्रकार १५ तादि में सपा मेनप्राम की राना मी उपाध्याय धर्मगागरजी के उमार्गप्रस्पा के पक्षात् ही हुइ है मत धर्मसागरीय यो का प्रमावस पर पूर्णम्प से पदाद। मत ऐसी अस्था में अपफार कलीया और प्रयों पर विचार करने के घिरे का उपयोग पवित् गी नही किया जा सकता। पर लागेन प्राा प्रमाणे के माधार पर ही निणय करना चाहिये कि क्या जिनाम वसूमर थे? राषति में और बापदेशराम के नहीं थे!- 'गनिजी' की परकाया प्रपा-उरा नही थी, किन्तु मातक ही थी। यदि उस होतो तो NT रामप्र गच्छों के आचार्य का उपरोप दरले, भौर दुईम . रानी टीका पद पियारि प्रयमाग पुरत में १९९५ में प्रगति ६ कदम भी उठाते !-पर आश्चर्य है कि इस प्ररूपणा का किसी भी आचार्यने इसका विरोध किया हो ऐसा प्रमाण प्राप्त नहीं होता है। प्रत्युत प्रतिपादन के प्रमाण अनेकों उपलब्ध होते है। अतः यह मिद्ध है कि- यह प्ररपणा तत्कालीन समग्र आचार्यों को मान्य-सी ही थी। परन्तु इसका सर्वप्रथम विरोध, १७वी शती में 'स्वरतरों के उपजीव्य न हों' इस दृष्टिविन्दु को रखकर अभयदेवाचार्य को पृथक् करने के निमित्त उद्भट विद्वान् उपाध्याय धर्मसागरजीने किया। तत्पश्चात् यह वाद गच्छ्वाद के रूप में स्वीकृत हो गया और परम्परा से चलता रहा, जो आज भी विद्यमान है। उ० धर्मसागर को इस उन्मार्ग प्ररूपणा के कारण तत्कालीन तपगच्छ सम्राद पू. श्रीविजयदानसूरिने ७ वोल निकालकर, इनके एतद्विपयक प्रन्यों को जलशरण किया, और उ०जी को गच्छबहिष्कृत भी। इसी प्रकार सूरिसम्राट श्रीहीरविजयसूरिजी मने भी इनके प्रति ११ वोलों का आदेगपत्र निकाला या । अत. ऐसे व्यक्ति का विरोध शास्त्रसम्मत नहीं माना जा सकता। और जिनवल्लभ गणिने अपने स्तोत्रों में सामान्यापेक्षया पंचकल्याणक लिखे हैं तो मी विशेषापेक्षया पटूकल्याणक की प्ररूपणा में किञ्चिद् भी बाधा उपस्थित नहीं होती। वस्तुतः पटकल्याणक प्ररूपणा शास्त्रोचित है या नहीं ? इसका विचार मेरे दिवंगत पूज्येश्वर गुरुदेव श्रीजिनमणिसागरसूरिजी म०ने पट्कल्याणकनिर्णयः में विशदरूप से किया है, उसको देखकर ही निर्णय करना चाहिए। अतः जव 'जिनवल्लभ' उत्सूत्रप्ररुपक ही नहीं हैं तो फिर संघ बहिष्कृत की मान्यता तो कपोल- कल्पित ठहरती ही है। यदि प्रस्तावना लेखक के पास संघवहिष्कृत का कोई भी प्रमाण हो तो उपस्थित करें। उस पर अवश्यमेव विचार किया जायगा । पूर्वोदत सार्द्धशतक की टीकानुसार नवाङ्गवृत्तिकारक श्रीअभयदेवसूरि के शिष्य जिनवल्लभ हैं ही। यदि विचार करे कि पिण्डविशुद्धिकार पृथकू है ? तो फिर वे कौन थे और किस गच्छ के थे? इनके एतद्विषयक कोई प्रमाण नहीं मिलता है । तत्कालीन ३-४ शताद्वियों में खरतर जिनवल्लभगणि से पृथक् कोई आचार्य की उपलब्धि ही जैन साहित्य में नहीं होती है। और इनके सम्बन्ध में खरतरगच्छीय गुरुपरम्पराओं के अतिरिक्त उल्लेस भी नहीं मिलता । अतः यह सिद्ध है कि पिण्डविशुद्धिकार जिनवल्लभगणि पृथक् नहीं है, किन्तु अभयदेवाचार्य के शिष्य खरतरगच्छीय ही है। और इनके सिद्धान्त सर्वमान्य भी हैं। सद्ध पट्टक-प्रस्तुत काव्य की रचना 'गणिजी' के जीवन की चरमोत्कर्ष कहानी है। उपसम्पदा के पश्चात् चैत्यवास का सक्रिय विरोध कर आमूलोच्छेदन करने का प्रयत्न किया और इस प्रयत्न में इनको पूर्ण सफलता भी प्राप्त हुई। इनके पश्चात् युगप्रधान श्रीजिनदत्तसूरि और आचार्यप्रवर श्रीजिनपतिसूरिने तो अपने सवल प्रयत्नों से इस परंपरा का उच्छेदन ही कर डाला था। गणिजीने इस लघु काव्य में तत्कालीन चैत्यवासी आचार्यों की शिथिलता, उनकी उन्मार्गप्ररूपणा और सुविहितपय-प्रकाशक गुणिजनों के प्रति द्वेष इत्यादि का सुन्दर विश्लेषण किया है। इस काव्य में ४० पद्य है । उनमें प्रथम श्लोक में श्रीपार्श्वनाथ को नमस्कार कर 'पण्डितों को कुपथ - - १. देखें श्री अगरचन्द भवरलाल नाहटा द्वारा लिखित युगप्रधान जिनचन्द्रसूरि । २. ऐतिहासिक राससंग्रह. (विजयतिलकसूरि-रास) भाग ४ ।
त्याग करने का उपदेश दिया है। दूसरे पय में श्रोताओं की योग्यता को दिलाया है। ३-४ १२ में उपमानों द्वारा चल्यवासियों को 'जिनोकि प्रत्या' सिद्ध करते हुए पूर्व पद्य में । औरोशिक मजन, ३ जिनराह में निवास, ३ यमतिवास के प्रति मात्सर्य, ४ यसप्रद, ५ प्रारक भकों के प्रति ममरप, ६ चैल स्वीकार (चिता), ७ गद्दी आदि का मायन, ८ सावध भाचरणा, सिमासमार्ग को अवशा और • गुणियों के प्रति द्वेष का विवेवन । इस प्रकार विवेचनीय दा द्वारों का उलेन किया । इसे ३३ पर पर्यत दश द्वारों का विशद् वर्णन किया है। १४-१५ में मसरचना का कारण कह कर, १६-३७ में मुविहित धाधु बन्द के पूताचार की प्रशला की है। ३८ ३९-४०३ पच में भस्मकम्लेच्छ सैन्य की उपमा प्रदान कर कदर्दना कसे हुए उपसहार किया है। इस पुकाम बार्षिक प्रथ को भी गणिनीने निदाना अप्रस्तुत प्रशमा अर्थातरम्यास, तुल्ययोगिता, रूपक, उपमा, उप्रासादि भलकारों से सजित पर अपनी यहुमुपी प्रतिमा का मुन्दर परिचय दिया है। साथ ही इसमें सम्परा शादूलपिमाहित मदाar at शिखरिणी, द्विगदी, पृथ्वी मालिनी गन्ततिलका भादि पर २ छन्दों में प्रथित कर छ दशास्त्र पर एकाधिपत्य भी सिद्ध किया है। समभ काम्य ओज गुण से परिपूर्ण होने के कारण पाठक के हृदय में भी आनद ही उसम कर देता है। सापक की टीकाएं-इम र भाग्यमय पर अनेक मोपियोंने भाष्य गृति, आरि, घालायपोध आदि रच कर इसकी महत्ता, उपयोगिता स्थापित की है। वर्तमाा महरा पर स्ति भादि ८ माठ पत्तिय हो प्रा होती है। विद्यको सालिका निनलिखित है। 1 यहादति जिापवियरि २ सघुपति श्रीलक्ष्मीसेन ३ लघुवृत्ति য়ের গলি ४ अवार उ साधुकीति ५पमिका देवराज पति विकररनर ७ पति पालाययोघ उ लक्ष्मीवनाम। इनमें आचार्य श्रीजिनपतिसूरि को टीकाराम ये पदी है और सर्वश्रेष्ठ भी। यह टोका अनुराद सह पूर्वमें प्रकाशित हो चुकी है। फिर हाल यह मय आपूरि और दो लघुत्तियों के साथ प्रकाशित हो रहा है। अवरिकार महोपाध्याय साधुकी िखरतरगच्छीय श्रीजिनमद्रसूरि की परम्परा में यात्रा पार्य धीममरमाणिक्य के शिष्य थे। आपो स १६१७ में युगप्रधान घोजिनवदम्हि रचित पोषध विधिप्रकरणति का सशोधन किया था। रा १६१५ में भामरा में सम्राट अकयर को समा में पौषध विधि विषय में भी घुद्धिसागरजी के साथ शालार्थ कर उन्हें निकतर हिया या 1 १६१३ में पेशाम पुदि १५ को धोजिनपदपूरिजीरे आरको उपाध्याय पद प्रदान किया था। स १६४६ माप पदि १४ को पालोर में आप का स्वगवारा हुआ था। आपने अपने जीपनगल में सप्तसारण यालाययोघ मादि भनेको प्रायोको स्पना ही जिन में २३ छोटे-मोटे प्रय प्राप्त होते है। प्रातुन अपरि की रचना १९ माघ गुदि की ५ परमी को पूर्व र है। यह अबधूरि होते हुए भी सायं प्रकाशित होने के कारण रोका का ही साध्य रसती है। लमीसे। इनके गम्बप में अन्य सोहगी चलेग प्राप्त नहीं होते हैं। केवल इय रोकाको प्रतिको मात होता है शि- सरगरीय सिमर्तिवाले पापक पीरदास के पौत्र और पौरपोर xमें ५-६-५, जिनरलकोसार से युगप्रथा जिनपरि १९९ो उपरा मो मायके ४३.४४ को 2-1-४-५ - - श्रीहमीर के पुन थे । इन्होने यह स्फुटार्था नाम की टीका रचना सं. १५१३ में की है। संघपटक जैसे दुसरे काव्य की टीका १६ वर्ष की अवस्था में बनाना उन के पाण्डित्य का द्योतक है। यह स्फुटार्था नाम की टीका सामान्य सी ही है। टीकाकार कई २ स्थलों पर शान्दिक पर्यायों का कथन त्याग कर भावार्थ-तात्पर्य मात्र ही प्रकट करने को उत्सुक प्रतीत होती है, अत. कई स्थलों का विवेचन अस्पष्टता रह गया है। साथ ही इनके सन्मुख वृहट्टीका होने के कारण कई स्थानों में उन्हीं शन्दों का अक्षरसः वाक्यविन्यास कर दिया है इस में आश्चर्य की वस्तु यह है कि इस काव्य की केवल २९ पद्य की टीका-प्राप्त नही होती है। इस सम्पादन में पू. उपाध्यायजीने तीन प्रतियों का उपयोग किया है, और इस की एक प्रति मेरे संग्रह में भी है, पर किसी में भी इस श्लोक की टीका दृष्टिगोचर नहीं होती हैं। अतः इस प्रकाशन में स्थानरिक न रखकर श्रीहर्षराज गणि की ही २९वें पद्य की टीका के रूप में दी है। हर्षराज-ये श्रीजिनभद्रसूरि के शिष्य महोपाध्याय थीसिद्धान्तरुचि के प्रशिष्य उ. श्री अभयसोम के शिष्य थे। इन के सम्बन्ध में विशेष वृत्तान्त ज्ञात नहीं होता है । इस की प्रशस्ति में रचना- संवत् का उल्लेख भी नहीं है, पर महो० . श्री सिद्धान्तरुचि के प्रशिष्य होने कारण इसकी रचना १६वीं शताब्दि के प्रारभ में ही हुई है। यह लघुवृत्ति वस्तुत. लघुवृत्ति नहीं है, किन्तु श्रीजिनपति की वृहट्टीका का संक्षिप्त संस्करण मात्र ही है। वृहट्टीका मे प्रपचित पक्ष विपक्षप्रतिपादन, आगमिक उद्धरण इत्यादि का त्याग कर मूलग्रन्थानुसारिणी समग्र टीका का प्रारम्भ से अन्त तक पंक्ति-पक्ति अक्षर-अक्षर का उद्धरण कर संक्षिप्त संस्करण तैयार किया है। उदाहणार्थ केवल ३८वें पद्य की टीका की कुछ पंक्तियें ही देखिये जिनपतिसूरि टीका-" साम्प्रतं प्रकरणकार. प्रकरणं समाप्नुवन्निष्टदेवतास्तवछमनाऽवसानमालं सूचयंश्चक्रवन्धेन स्वनामधेयमाविविभावयिषुराह- 'विभ्राजिष्णु' । व्याख्या --जिनं वन्दे इति सम्बन्ध. । 'विधाजेष्णुं' त्रिभुवनाविशायि चतुस्त्रिंशदति शयत्वेनात्यन्तं शोभमानं, 'अगर्व' उच्छिन्नाऽहवारं 'अस्मरं' मयितमन्मथं 'श्रुतोलड्ने ' सिद्धान्ताज्ञाऽतिक्रमे 'अनाशादं' आशा-मनोरथ ददाति-पूरयति आशाद.,न आशादो-अनाशादस्तं श्रुताऽऽज्ञाऽतिक्रमकारिणः पुंसो नानु- मन्तारमित्यर्थः । 'सज्ज्ञानामणि' सज्ज्ञानेन-केवलज्ञानेन लोकालोकावभासकत्वाद् भास्वन्त 'जिन' तीर्थकरं इत्यादि। अतः यह स्पष्टतया प्रतिपादित हो जाता है कि, यह केवल 'संस्करण' ही है, मौलिक टीका नहीं। पूज्य उपाध्यायपदालकृत मुनि-श्रीसुखसागरजी म.ने प्रस्तुत उपोद्घात लिखने का जो मुझे अवसर दिया है एतदर्थ में आपका कृतज्ञ हूँ। अहमदावाद लणसावाडा जैन उपाश्रय पूज्य श्रीजिनमणिसागरसूरीश्वरान्तेवासि शा. वि. उपाध्याय विनयसागर 'साहित्याचार्य, जैन दर्शनशास्त्री, साहित्यरत्न [संस्कृत, हिन्दी] काव्यतीर्थ । १९-९-५२॥ ga श्री जिनवल्लभसरि-रचित संघपट्टक वृत्ति mymarateeminasuya AnnapMMMensteamethamerama MARA-MAawasagreatmareewanatimemapanes A- NAMENSaamanamaravatADMANTRA REPRENERAwadamamrowomemwarea-samalainamuagnetworkhawam PERemiummedwalANKdkimamalanddonmentallammar HMANTIPSummaramanawriyafqammu-samarMRANI wwwumanmamisa-udiessetwderstarrernamanema meaninenerolomogadwomalayamaramataonkaniwomemaanemarwarenem जपामाश्चमानका AROATAWA-नितिनम्म नियमनमाना Pिarakee nakews wagaलमानायनि जमविgyaeraare कापी रकमदागमध्यराथमिकARTMERECrat लसकरमयकायकवानीविरषिeficश्रीपादकास marg Anamnimelinesamaya memamachyatimemurtaintinutritishwakarmerlanwahastmeteratory wayamantarwdimanomwww.wattpanasamarewatimwww NormananetsmmsrwadiSeronmentawranamavammar Mainamain-musaRamkrnymootapamwanshmi SEARCamerammatorsmmentCHARAwtime mamiAmergemararrantiewmarawaite- 4 marpawmommmsamasome पभRA meinmegapkeewanalorelewanentrismikarawwarentNARY --- MAYShasDONARAYANIRULItahamacRALSEELANKERators PAR मधमादनकाय विपराविििवPिROVIsrep Tipravity मना) मारका विशिषयिनिरनिरम कानुनियाद नानानावरलवरंदगति रियमनतिरEिRENERese RRRRRENTalkatiya एममय angaroo जतानमसावधानात रतमासायEिReine PAPER Ema TRनिधादिजसाधलाबराना,कालाकिरदासपना Rearn CATIO Ras aurtatusuvan कास्यसदासयमध्यापाकदीमा नियामक/ARam PRESEAR HINHATIकरणमाNTUnirl riLIPEDIA ARRECENT RAINोगरम and rrorgParaTERRRREERArनिक्षल २० UrkestabjajyONNERSTANDA Kheta 44221 अद्र S PR ताडपत्राय प्रथ काष्टपरिया पर चित्रित श्री जिनपालभरि मूति (मरमर)
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॥ धीस्तम्मनपार्श्वनाथाय Tम || - श्रीवरतरगच्छालकार-नवानीवृत्तिकार-श्रीजिनअभयदेनसूरिशिष्य-कपीन्द्रचूडामणी श्रीजिनवालमसूरिविरचित । जिनभद्रसूरिशाखान्तर्गत-साधुकीनिंगणिनिर्मितावचूरीसमलकवा श्रीसंघपट्टकः श्रीमत्पार्धजिन नत्वा, सर्वसम्पत्तिदायकम् । सपट्टकशास्त्रस्या-ऽक्षरार्थ वितनोम्यहम् ॥ १॥ इह हि पुरा दशशताशीतिवर्षे थीमदणहिल्लपचने दुर्लभराजसभायां चैत्यवासिनी विनिर्जित्य प्राप्तसरतरविरुद श्रीजिनेश्वरमूरि, तत्पट्टे जिनचन्द्रयार, द्विनेय' श्री स्तम्भनकपार्थप्राकट्यकृद् नमानीवृचिनिधाता च श्रीअभयदेवमूरिः, तउिप्य. श्री जिनवल्लभमरि शिथिलाचारनिरासाय परोपकारकरणाय च धीमहस्य पट्टकरूप श्रीसपराज्यपदृकशास्त्र चकार, तस्यायकाव्यम्- यद्विक्वालावलीट फुपथमयनधीर्मातुरस्तोकलोक,- श्यामे सदयं नाग कमठमुनितपः स्पष्टयन् दुष्टमुन्छ । या फारुण्यामृताधिविधुरमपि फिल स्वस्य सह प्रपद, प्राक्षा कार्य कुमार्गस्खलनमिति जगादेव देव स्तुमत्तम् ॥ १ ॥ व्याख्या-"पहिल" त देव स्तुम । समिति का ? यो भगवान् मातुरने अस्तोफलोकस्प-समस्तलोकस्य अग्रे नाग-सर्प सदर्य-दर्शयिता प्राज्ञ -पण्डित 'कुमार्गस्खलन कार्यम्' इति जगादेव-इति कथयामासेर । कथम्भूत नाग ? पहिवा लावलीदम्-अग्निज्जालाव्याप्तम् । कथम्भूतो भगवान् ? कृपथस्प-कमार्गस्य मभने धी'- मुद्धिर्यस्य । पुनर्मगान किन ? उॐ -अत्यर्थ कमठमनितप दुष्ट स्पष्टयन्-प्रकटी कुर्वन् । कथम्भूतो भगवान् । कारुण्यमृताधि -कामण्यम्पामृतस्य अन्धि -ममुद्र । किं कृत्वा कुमार्गस्खलन कार्य ? तत्राह-'दिन' इति मत्यै सस्य-मात्मन सब चीन विधुरमपि-कष्टमपि प्रपप-अङ्गीकृत्य । इति प्रथमकाम्पार्थः ॥ १।।
२ - कल्याणाभिनिवेशवानिति गुणग्राहीति मिथ्यापथ,- प्रत्यर्थीति विनीत इत्यशठ इत्यौचित्यकारीति च । दाक्षिण्यीति दमीति नीतिभूदिति स्थैर्योति धैर्याति सद्,- धर्मार्थीति विवेकवानिति सुधीरित्युच्यसे त्वं मया ॥ २ ॥ व्याख्या-कल्या०॥ कल्याण:-शुभः, अभिनिवेशः-मनःपरिणामो यस्येति कल्याणाभिनिवेशवान् इति । गुणग्राहीति। मिथ्यापथस्य-कुमार्गस्य प्रत्यर्थी-वैरी, इति । विनीत इति । अशठः-सरल(इति) औचित्यकारीति-योग्यताकारीति । च-पुन: दाक्षिण्यीति । दमी-जितेन्द्रिय इति । नीतिभृत्-न्यायमार्गधारक इति। स्थैर्या- स्थिरत्ववान् इति । धी-धीरत्सवानिति । सद्धर्मस्यार्थीति । विवेकवानिति । सुधी:- सुबुद्धिरिति । हे शिष्य ! एवंगुणविशिष्टस्त्वम्, अत एव मयोच्यसे त्वमिति, त्वां प्रत्यहं वच्मीति काव्यार्थः ॥ २ ॥ इह किल कलिकालव्यालवक्त्रान्तराल-स्थितिजुपि गततत्वप्रीतिनीतिप्रचारे। प्रसरदनवबोधप्रस्फुरत्कापथौघ,-स्थगितसुगतिमार्गे सम्प्रति प्राणिवर्गे ॥ ३ ॥ प्रोत्सर्पदस्मरासिग्रहसखदशमाश्चर्यसाम्राज्यपुप्य,- मिथ्यात्वध्वान्तरुद्धे जगति विरलता यति जैनेन्द्रमार्गे । सलिष्टद्विष्टमूढप्रखलजडजनाम्रायरक्वेर्जिनोक्ति,- प्रत्यर्थी साधुवैषैर्विपयिभिरभितः सोऽयमप्राथि पन्थाः ॥ ४ ॥ व्याख्या-इह० ।। प्रो० ॥ विषयिभिः-विषयसेवकैः साधुवे:-लिङ्गधारि- भिहींनाचारः चैत्यवासिभिः अभितः समन्तात् सोऽयं पन्था-मार्गः अप्राथि-विस्तारितः। क सति ? सम्प्रति इह-दुष्पमाकाले किलेति सत्ये प्राणिवर्ग एवंविधे सति । कथम्भूते प्राणिवर्गे ? कलिकाल एव-दुष्पमाकाल एव व्याल:-सर्पस्तस्य वक्त्रान्तरालं-मुखान्त- रालं, तत्र स्थितिः-स्थानं तां जुपते-सेवते यः सः। पुनः कथम्भूते १ गततय- प्रीतिनीतिप्रचारे-गतौ तत्वप्रीतिः, नीतिप्रचारश्च न्यायप्रचारस्तो यस्य सः । पुनः कथम्भूते ? प्रसरत्-प्रसरणशीलो योऽनवबोधः-अज्ञानं तेन प्रस्फुरत्कापथौधः-कुमार्ग- समूहस्तेन स्थगित:-आच्छादितः सुगतिमार्गः-देवगत्यादिसम्बन्धो यस्य सः ॥३॥ पुनः क सति ? जगति जैनेन्द्रमार्गे विरलतां याति सति । कथम्भूते जैनेन्द्रमार्गे ? "प्रोत्सप्प " प्रोत्सर्पन्-उल्लसत् यः भस्मराशिग्रहस्तस्य सखा-मित्रं यद्दशमाश्चर्यम्- असंयतिपूजालक्षणं तस्य साम्राज्यं तेन पुष्यन्-प्रवर्द्धन् मिथ्यात्वमेव धान्त-तमस्तेन रुद्ध । कथम्भूत' माधुः १, मदलिटो-ौद्राध्यवसायमान् द्विष्टो-मत्सरी मूद्रा-मुखेः प्रखल.-दुर्जनः जहा-दुर्मेधा एवम्भूतो यो जनस्तस्य सङ्घस्तस्य आम्नाया-परम्परा तत्र रक्तः । कथम्भूतः पन्था ? जिनोक्तो-भगवद्ववनस्य प्रत्यर्थीति काव्यार्थः ॥ ४॥ अथ द्वारमाह- यौदेशिकभोजन जिनगृहे वासो यसत्यक्षमा, स्वीकारोऽगृहस्थय त्यसदनेप्वप्रेक्षिताधासनम् । सावधापरिवादर श्रुतपथाऽक्षा गुणिद्वेषधी ,- धर्म फर्महरोऽत्र चेपयि भवे मेरुस्तदाऽधौ वरेत् ॥ ५ ॥ व्याख्या-पत्रौ ॥ यत्र मार्गे औदेशिकस्य-आधाकर्मणो भोजनम् ॥१॥ जिन गृह वास:-बसनम् ॥ २॥ वसत्यक्षमा-मतिम्-उपाश्रय प्रति अक्षमा- मात्सर्यम् ॥ ३॥ अर्थ ॥ ४ ॥ गृहस्थः ॥ ५॥ चत्यमदनेषु-चैत्यगृहेषु स्वीकार' ॥ ६ ॥ अप्रैक्षिवादि-अप्रमार्जितादि आमनम् ।। ७॥ सावद्याचरणायामादर ॥८॥ श्रुतपयस्य-सिद्धान्तमार्गस्य अज्ञा-हीला ॥९॥ गुणिषु द्वेषधीः ॥ १०॥ अब पये- दशद्वारसयुक्त चेद्-पदि धर्मः कर्महर. स्यात्तदा मेरुपर्वते 'अब्धौ तरेत् । इति निषेध वाक्य, कदापि न भवति ॥५॥ औदेशिकमोजनद्वार व्याख्यानयति- पट्टकायानुपमर्थ नियमूपीनाधाय यत्साधित, शास्त्रेपु प्रतिषिध्यते यदसनिस्तृशनाsधायि यत् । गोमासाधुपम यवाहुरथ यद् भुक्त्वा यतियात्यध , तत्को नाम निघत्सतीह सपृण सहादिमक विदन ॥ ६ ॥ व्याख्या-पट० ॥ पटकायान्-पृथिव्यादीन् निर्दयम् उपमध-आरम्प यत् आधाकर्म ऋपीन्-माधून आपाय-मनस्यवधार्य साधित-निपादित यत् शास्त्रेषु असक-वारवार प्रतिपिध्यते, यत्पुनर्निनि(स्व)शतापायि-निविंशताया:-निःशूक- स्वस्य आधायि-कारक य गोमांसाधुपम-गोमासादितुल्यमाहुस्तीर्थकरा, अथ यद्- अशन भुक्त्वा यति. अघ -नरके याति । एष दूपणस्थामाधाम न्द सहादिनिमित्त मशन तदिति कोमलामन्त्रणे इह-जगतिक सण -सदयो जिपित्सति-भोक्तुमिच्छति । किं कर्मन् १ चिदन्-जानन्, एतापवा झाला न कोऽपि भोमिच्छतीति ॥ ६ ॥ .
- द्वितीयद्वारमाह-- गायद्गन्धर्वनृत्यत्पणरमणिरणद्वेणुगुञ्जन्मृदङ्ग- प्रेसत्पुष्पसगुद्यन्मृगमदलसदुल्लोचचञ्चजनौधे । देवद्रव्योपभोगध्रुवमठपतिताऽऽशातनाभ्यनसन्तः, सन्तः सद्भक्तियोग्ये न खलु जिनगृहेऽहन्मतज्ञा वसन्ति ॥७॥ व्याख्या-गाय० ॥ जिनगृहे अर्हत् चैत्ये अर्हन्मतज्ञा-अर्हन्मतज्ञातारः सन्तः खलु-निश्चितं न वसन्ति । कथम्भूते चैत्ये गायद्गन्धर्वाः गायन्तो गन्धर्वा यत्र, नृत्यन्ती पणरमणी-वेश्या यत्र, रणद्वेणुः-रणन्त-शब्दं कुर्वन्तो वेणवो-वंशा यत्र, गुञ्जन्तो मृदङ्गाः-मृदला यत्र तद् गुजन्मृदङ्गं, प्रेसत्पुष्पस्रक्-प्रेवन्त्यो-लहलहाय- मानाः पुष्पसजा-पुष्पमाला यत्र, उद्यत्-समुच्छलद्गन्धो-मृगमदः-कस्तूरिका यत्र, लसन्तः दीप्यमानाः उल्लोचा:-चन्द्रोदया यत्र, चञ्चजनौध:-चश्चन्त:-महाधनवस्त्रादि- भूपणभूषिता जनौघा:-श्रावकसङ्घा यत्र स सर्वपदैकयसमासः। चैत्ये एतत्सर्व भवति । किम्भूताः सन्तः ? देव० देवद्रव्यस्योपभोगं ध्रुव-निश्चितं या मठपतिता आशातना च ताम्बूलभक्षणशयनासनादिरूपा, ताभ्यः वसन्तः । कथम्भूते चैत्ये ? सद्भक्तियोग्ये, एतावता चैत्यभक्तिः कार्या, तत्र वासो न कार्यः ॥ ७ ॥ तृतीयद्वारमाह- साक्षाजिनर्गणधरैश्च निषेवितोक्तां, निस्सङ्गताऽग्रिमपदं मुनिपुङ्गवानाम् । शय्यातरोक्तिमनगारपदं च जानन्, विद्वेष्टि कः परगृहे वसति सकर्णः ॥ ८ ॥ व्याख्या-साक्षा० ॥ कः सकर्ण:-विद्वान् परगृहे-श्रावकोपाश्रये वसति- स्थान विद्वेष्टि-तत्र द्वेष धत्ते अपितु न कोऽपि । कथम्भूतां वसति १ साक्षाजिनः-तीर्थकरैः, गणधरैश्च-गौतमादिभिः निपेवितोक्तां-निषेविता-सेविता उक्ता च भव्येभ्यः। पुन: किम्भूतां वसतिं ? मुनिपुङ्गवानां-मुनिप्रवराणां निस्सङ्गताग्रिमपदं-निस्सङ्गताया अग्रिम-प्रधान पद-स्थान परगृहे वसतां साधूनां सङ्गोऽपि न स्यात् । सकर्णः किं कुर्वन् । शय्यारोक्तिं शय्यया-वसत्या तरति संसारसागरमिति शय्यातरस्तस्य उक्तिः कथनं, च पुन:-अनगारपदं, न विद्यते अगारं-गृहं यस्य सः अनगारस्तस्य पदं जानन् , एतावता अनगारस्य श्राद्धगृहे वसनमेव श्रेयः ॥ ८ ॥ -- - . पुनरपि तद्द्वारमेवाह- चित्रौत्सर्गापवादे यविह शिवपुरीदूतभूते निशीथे, प्रागुता भूरिभेदा गृहिग्रहधसती कारणेऽपोध पश्चात् । मीससत्यादियुक्तेऽप्यमिहितयतनाकारिण सयमाना, सर्वश्रागारिधाम्नि न्ययमि न तु मत• कापि वैत्ये निषास• ॥ ९ ॥ व्याख्या-चित्रो० ॥ यत्-यस्मात् , इह-प्रवचने निशीथे-निशीथान्ये निशीथनाम्नि छैदान्थे सर्वत्र अगारघाम्नि-थाद्धगृहे सपताना-साधूना निवासो न्ययमि-नियमेन प्रतिपादित । कथम्भूते निशीथे ? चित्रोत्सर्गापवादे-चित्रौ-नाना प्रकारौ उत्सर्गापवादौ नयौ यत्र नन्, तर नयद्वयस्य विस्तर पाख्याऽस्तीति । पुनः किम्भूते ? शिवपुरीतभूत-शिवपुर्या:-मोक्षनगर्या दुतभूते तत्र ग्रन्थे प्राक्-प्रथम भूरिमेदा:-अनेकप्रकाराः गृहिगृहवसती -गृहिण्ण गृहमेव वसतयः-उपाश्रयास्वा उक्त्वा पथात्कारणे सति अपोय-अपवादविषयीकत्य पूर्वमुत्मर्गेण 'स्त्रीससत्यादियुक्त उपाश्रये न घस्तव्य साधुना' इत्युक्त पश्चादपवादमाण तत्र वसनीयमित्यपि प्रोक्तम् । कथम्भूते अगारघाम्नि ? स्त्रीसमक्त्यादियुक्तऽपि-स्त्रीपशुपण्डकानां ससगादि युक्तेऽपि वसनीयम् । कथम्भूताना सयतानाम् ? अभिहित-पतनाकारिणाम्-अभि हिता-प्रोक्ता या यतना-परिच्छदादानरूपा तत्कारिणाम् । एवमुत्सर्गेण अपवादेनापि गृहस्थगृह एव वसनीय न पुनः कापि चैत्ये निवासोऽनुमतः ॥९॥ अप्रयाप्रतिपयन ननु धनस्वीकारमाहुर्जिना , सर्वारम्मिपरिग्रह त्वतिमहासावधमाघश्यते । चैत्यस्वीकरणे तु गर्हिततम स्यान्माउपत्य यते,- रित्येव प्रतपरिणीति ममता युका न मुत्यर्थिनाम् ॥ १० ॥ व्यारया-प्रव०॥ ननु-निवित जिना'-तीर्थकरा धनस्वीकारम्-अर्याङ्गीकार प्रमज्याप्रतिपन्धिन-दीक्षापिरोधिनम् आहु'-कथयन्ति तु-पुन. सर्वारम्भिपरिग्रह, सर्वारम्मिणां-गृहस्थानां परिग्रह-स्वीकार ममते गृहस्था इति, अतिमहामावयम्- अत्यन्त महापापम् आचक्षते पदन्ति । तु-पुन: यते:-सापोः चैत्यस्त्रीकरणे-चैत्पममत्वे गहिवतमम्-अत्यन्तगईणीय मादपत्य-मदपतित्व स्यात् । इत्येवप्रकारेण मुक्तार्थिनां-
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मुक्तेः प्रार्थकानां साधूनां ममता न युक्ता, कथम्भृता ममता ? व्रतवैरिणी, इति-अर्थ-
गृहस्थचैत्यस्वीकारः । इति द्वारत्रयं व्याख्यातम् ।। १० ।।
भवति नियतमत्रासंयमः स्याद्विभूपा, नृपतिककुदमेतल्लोकहासश्च भिक्षोः ।
स्फुटतर इह सगः सातशीलत्वमुच्चै-रिति न खलु मुमुक्षोः संगतं गद्विकाऽदि ॥ ११ ॥
व्याख्या-भवति । अत्र-गन्दिकाद्यासने नियतं-निश्चितम् असंयमो भवति
गन्दिकादीनां प्रतिलेखयितुमशक्यत्वात् । विभृपा-शोमा स्यात् महापुरुषसेवनीयत्वात् ।
एतद्-आसनसेवनं नृपतिककुद-राजचिह्नं च पुनः भिक्षोः-साधोः लोकहासः स्यात्-
'अहो ! मुण्डितोऽप्येवंविधासनेषु उपविशति' इह गन्दिआसने संगपरिग्रहः स्फुटतर:-
प्रकटतरः उच्चैः-अत्यर्थ सातशीलत्वं-सुखलम्पटत्वम् । इति हेतोः खलु-निश्चितं मुमुक्षोः
साधोः गन्दिकादि, आदिशब्दात् मसूरकसिंहासनादेः परिग्रहः, तत् न संगतं- न युक्तम् ।
अप्रेक्षिताद्यासनद्वारं व्याख्यातम् ॥ ११ ॥
सावधाचरितद्वारमाह---
गृही नियतगच्छभाग जिनगृहेऽधिकारो यतेः, प्रदेयमशनादि साधुपु यथा तथाऽरम्भिभिः ।
व्रतादिविधिवारणां सुविहितान्तिकेऽगारिणां, गतानुगतिकैरदः कथमसंस्तुनं प्रस्तुतं ।। १२ ।।
व्याख्या गृही०॥ गृही-श्रावका नियतगच्छभाक्, नियतं-निश्चितं स्त्रगच्छ-
मेव भजतीति नियतगच्छभाक्, स्वगच्छं मुक्त्वाऽन्यत्र न गन्तव्यम्, यतेः-साधो:-
जिनगृहे-चैत्येऽधिकार:-तचिन्ताकरण 'प्रदेयमशनादी' त्यादि, आरम्भिभि:-गृहस्थैः
साधुषु अशनादि-अशनपानखादिमस्वादिमादि यथातथा-येन तेनापि प्रकारेण प्रदेयं
तत्राशुद्धदानेऽपि दोपो न अगारिणां-गृहस्थानां सुविहितान्तिके-साधुसमीपे व्रतादि-
विधिवारणं साधुसमीपे शीलवतादि नाङ्गीकरणीयं गतानुगतिकैः-एडकावत्प्रवाहपतितः
चैत्यवासिभिः अदः-पूर्वोक्तम् असंस्तुतम्-अयुक्तं कर्थ-केन प्रकारेण प्रस्तुतं-
प्रारब्धम् ।। १२ ॥
श्रुतपथावज्ञाद्वारमाह-
निर्वाहार्थिनमुज्झितं गुणलवैरजातशीलान्वयं,
तादृगू वंशजतद्गुणेन गुरुणा स्वार्थाय मुण्डीकृतम् ।
यद्विख्यातगुणान्वया अपि जना लग्नोग्रगच्छग्रहा,-
देवेभ्योऽधिकमर्चयन्ति महतो मोहस्य तज्जृम्भितम् ॥ १३ ॥
व्याख्या-निर्वाहा०॥ यत्-यस्मात्कारणाद् एवविधा जना एवविध गुरु देवेभ्योऽधिकमर्चयन्ति तत् महत. प्रवलस्य मोहम्य-मोहनीयकर्मणो जृम्मित- महात्म्यम् । कयम्भूत गुरु १ निर्वाहाथिन-निहिस्य-उदरमरणस्पार्थिनम् । पुन: किम्भूतम् गुणल.-गुणलेशैः उज्झित-त्यक्तम् । पुन किम्भूतम् ? अज्ञावशीलान्वयम्- अज्ञात शोलम्-आचार. अन्वयश्व-कुल यस्य स (तम् ।) पुन' किम्भूतम् १ वाग्वराज तद्गुणेन गुरुणा शिष्यतुल्याज्ञातादिवशेन तद्गुणेन-शिष्यतुल्यगुणेन एवविधेन गुरुणा सा य-सीदरमरणाय मुण्डीकृत तादृशतादृशमेर मुण्डयते । कथम्भूता जना. विख्यात गुणान्वया अपि विख्याता'-प्रसिद्धा' गुणान्चयो शो येपा ते सगुणा:-सुकुलोत्पन्ना अपि । पुन किम्भूता ? लग्नोग्रगच्छग्रहा', लग्न उग्रः-उत्कटो गडग्रहो येषा ते ॥ १३ ॥ पुनरप्येतद्वारमाह- दुष्पापा गुरुकर्मसञ्चयवता सद्धमवुद्धिर्नृणा, जातायामपि दुर्लभ शुभगुरु प्राप्त म पुण्येा चेतू । फतुं न स्वहित तथाऽयलममी गच्छस्थितिव्याहता , क बम फमिहाश्रयेमहि फमाराध्येम कि कुमहे ॥ १४ ॥ व्यारया-दुधापा० !! गुरुकर्मगचपाता-गुरुकर्मममूहमता नृणा मर्म युद्धिः-प्रधानधर्मवुद्धिः दुष्प्रापा गुरुकर्मत्वात् मद्धर्मयुद्धिर्न कदाचित् मद्धर्मयुद्वौ जाता यामपि पुनरपि शुमगुरु' दुर्लभ:-दुष्प्राप. चेद्-यदि म गुरु: पुण्येन प्राप्तः, तथापि-एव सामनीयोगेऽपि अभी बादा' सहित कत्तुं नाल-न समर्याः । कथम्भूना जनाः ? गच्छस्थितिच्याहता -गच्छस्थित्या-गच्छमर्यादया व्याहवा--पशी कृताः। एप स्थिते क पुरुप चूम , क पुरुषम् इह-जगति आश्रयमहि शरण प्रपद्ये महि, क पुरुषम् आगध्येमहि- आराध्याम' किं कुर्महे ।। १४ ॥ क्षुरक्षाम मिल कोऽपि शिशुभ प्रनय चैत्ये फचित्, कृत्वा पचन पक्षमक्षितपालि प्राप्तस्तदाचार्यकम् । चित्र त्यगृहे गृही यति निजे गच्छे फुटुम्बीयति, स शमीयति पालिशीयति चुधान विश्व यगकीयति ॥ १५ ॥ पारया सुरक्षाम० ॥ फिलति समारनाया कोऽपि सुरक्षामा सुधया धाम -दीग. सुरक्षाम एवम्भूतो रकशिशुक -रहस्यपाल. म वैराग्यामावऽपि कपिद -- जिनगृहे चैत्ये प्रव्रज्य-दीक्षा गृहीत्वा ततः कश्चन पुरुपं पक्ष-स्ववशं कृत्वा क्रमेण तद् आचार्यकम्-आचार्यन्वं प्राप्तः । कथम्भृतः सः ? अक्षितकलि:-अक्षित:-अनिध कलिः-कलहो यस्य स कलहयुक्तः। एतत् चित्रम्-आश्चयं स आचार्यपदवीप्राप्तो निर्गुणोऽपि चैत्यगृहे गृहीयति-'ममेदं चैत्य'-मिति गृहस्थवदाचरति । निजे गच्छे कुटुम्बीयति-कुटुम्बिपुरुपयदाचरति । स्त्रम्-आत्मानं शक्रीयति-शक्रवत्-इन्द्रवदाचरति । चुधान्-पण्डितान् वालिशीयनि-मृ«यति । विश्व-जगन् , यगकीयति-वराकवदाचरति चैत्यवासिपु एतत् साक्षाद् दृश्यते ॥ १५ ॥ पुनरपि श्रुतपथावज्ञाद्वारमाह- यैर्जातो न च वर्द्धितो न च न च क्रीतोऽधमों न च, प्रागदृष्टो न च वान्धवो न च न च प्रेयान्न च प्रीणितः । तैरेवात्यधमाधमैः कृतमुनिन्याला वाहते, न स्योतःपशुवन्ननोऽयमनिशं नीराजकं हा ! जगत् ॥ १६ ॥ व्याख्या-यैर्जातो० ॥ यः-शिथिलावारिगुरुभिः अयं जन:-श्राद्धलोकः पितृरूपेण तेन न जनितः-जन्म प्रापितः, च पुन: वर्द्धितः-वृद्धि नीतः, न क्रीत:- मूल्येन गृहीतः, न च येषां गुरूणाम् अधमर्ण:-अर्थदाता, न च ग्राहकस्तु उत्तमर्णः, प्राक् प्रथम दृष्टः-विलोकितः, न च तेषां बान्धवः-भ्राता, न च प्रेयान्-बल्लमः, न च यैर्गुरुभिः प्रीणितः-अर्थादिप्रदानेन सन्तोपितः, न च तैरेव गुरुभिः अनिश-निर. न्तरम् अयं जनः बलात्-हठात् नस्योतः पशुवत्-नस्तित वृपमवत् वाह्यते-इतस्ततो भ्राम्यते । कथम्भूतस्तैः ? अत्यधमाधमैः-अति अत्यर्थम् अधमेभ्योऽधमाः। पुनः कथम्भूतः १ कृत-मुनिव्याजः-विहितमुनिकपटः, अत एव ' हा !' इति खेदे जगत् नीराजकम्-अधिपतिवियुक्तं, यस्याने प्रक्रियते स राजा नास्तीति ॥ १६ ॥ किं दिङ्मोहमिताः किमन्ध-वविराः किं योगचूर्णीकृताः, कि देवोपहताः किमङ्ग! ठकिताः किं वा ग्रहावेशिताः । कृत्वा मूर्द्धिपदं श्रुतस्य यदमी दृष्टोरुदोषा अपि, व्यावृत्ति कुपथाजहा न दधतेऽसूयन्ति चैतत्कृते ॥ १७ ॥ व्याख्या-किं दिहमोहा।। अमी जडा:-मृर्खाः किं दिकमोह-दिशाभ्रमम् इताः-प्राप्ताः । किम् अन्धविरा:-अन्धाश्च बधिराश्च, श्रवणविकलः पादविप्रलेपादि- -
-
योग, अञ्जनादि चूर्ण, योगपूर्णकता--मस्तकादिषु योगचूर्णप्रक्षेपेण वशीकता, कि
देवोपहता:-देवेन-प्रतिकूलदेवेन किमुपहता , किमत किता'-'अझै पति कोमला
मन्त्रणे किं किता:-धूत्रेण च पश्चिता? किंवा ग्रहावेशिता ?, ग्रहै'-उपन्तरा
दिभिः आवेशिता:-अधिष्ठिताः । एते तत्व न जानन्तीति शान्तः । यता-यस्मात्
अमी जहाः कुपथात्-कृमार्गाद् ज्यावृत्ति-निवृत्ति न दधते-न कन्ति । किं कृत्वा ?
श्रुतस्य-सिद्धान्तस्य मूर्थिन-मस्तके पद-पाद कृत्वा-सिद्धान्तोक्तमविगणय्येत्यर्थः।
फयम्भूता जडा' १ दृष्योरुदोपा अपि, दृष्टा उस -गरिष्ठा दोपा यैस्ते, प्रत्यक्षतो
दोपान् पश्यमाना कुमार्गनिति न कुन्ति अत एव दिङ्मोहादिविशेषणम् । च-पुन:
एतत्तवे-कुपधच्यावृत्तिकते पुरुषा ये असूयन्ति-ईयां कुर्वन्ति, स्वय कुपधच्याति न
कुर्वन्ति, ये कन्ति तेम्पो जडा असूयन्तीति विशेषणमफलता ॥ १७ ॥
श्रुतपथावनाद्वारमाह-
इटावाप्तितुष्टनटविटभटचेटकपेटकापुल,
निधुवनयिधिनियखदोहदनरनारीनिफरसहरम् ।
रागद्वेषमस्सरेयों पनमयप निमजन,
जनयत्येव मूढजन विहितमविधिना जैनमजनम् ॥ १८ ॥
व्याख्या-इष्ठावाप्ति० ॥ अविधिना-प्रविधिप्रकारेण रात्रौ इत्ययः, मूद-
जननिहित-मूर्सलोककृत जैनमञ्जन-तीर्थकरस्नानम् अघपर निमअन-पापपके घुडन
जनयत्येव-करोत्ये । एवकारो निश्चयार्थे । किम्भूत रानिस्तानम् । इष्टापाप्तितुटपिट
नटमटचेटकपेटकाइलम्-इटा-पाठमा स्त्री रामागता तस्या आति:-प्राप्तिम्तया
तुष्टा--सन्तुष्टा ये विटा.-वेश्यापतय, नटा-नाटकिन , मटा'-सुमटाः, चेटका:-
दासास्तेषां पेटक-समुदायस्तेन आकुलम् , रात्रौ प्रायस्वे समागच्छन्ति । पुन कि
म्भूव १ निघुरनविधि निघुनन-मैपुन तस्य विधि:-विलसित, तर निबद्ध-कतो
दोहद.-अभिलापो येन त । एवविध नरनारी निकर-मनुप्पस्नीन्द वेन सहल-पाप्तम् ।
पुन. किम्भूत ? रागद्वेपमत्सरेपिन, रागा-स्नेहा,-देप-मोध , मत्सर'-कोषविशेषा,
पएण्णाऽमहिष्णुता-ईया-सबष्टमा परण जल्पती दृष्ट्या मोधकरण, पन-निरिड
बहरयादिपिटादिसम रात्रौ निषिद्ध मगामान बहमममप्रचित्ताच ॥ १८॥
जिनमतविमुन्नविहितमहिताय न मजनमेव केवलं, किन्तु तपश्चरित्र-दानाद्यपि जनयति न पलु शिवफलम । अविधि-विधिकमाजिनानापि पशुम-शुभाय जायते, किं पुनरिति विडम्बवाहितहेतुन प्रतायते ॥ १९ ॥ व्याख्या-जिन || मजनमेव-स्नात्रमेव जिनमतविमुखविहितं-जिनमतान- भगवन्मतात् विमुख-विपरीतम् अविधितया विहित-कृतं केवलं-निकेवलम् अहिताय न किन्तु तपश्चरित्रदानाद्यपि-तपः-अनशनादि, चारित्रं-देशमविरतिरूप, दानम्-अभया- दिरूपम् , आदिशब्दाद् विनयवैयावृत्यादिग्रहणं, तदापि अविधिक खलु-निश्चितं शिव- फलं-मुक्तिफलं न जनयति, हि-निश्चितं जिनाज्ञाऽपि-भगवदानापि अविधिविधिक्रमान- अविधिश्च विधिश्च तयोः क्रमात् अशुभशुभाय जायते-भवति, अविधिना अशुभाय, विधिना शुभाय किं पुनरिति विडम्बवाहितहेतुर्न प्रतायते, इत्यमुना प्रकारेणाऽविधि- क्रियाविडम्बना एवाहितहेतु अहितस्य संसारभ्य हेतुः कारणं किं पुनः न प्रतायते न विस्तार्यते अपितु विस्तार्यत एव एतावता अविधिक्रिया विडंबना एव अहितहेतुश्च कथ्यत एव ॥१९॥ -- जिनगृह-जिनविय-जिनपूजन-जिनयात्रादि विधिकृतं, दानतपोव्रतादिगुरुभक्तिश्रुतपठनादि चाहतम् । स्यादिह कुमतकुगुरुकुग्राहकुबोधदेशनांशतः, स्फुटमनभिमतकारित वरभोजनमिव विपलवनिवेशतः ॥ २० ॥ - व्याख्या-जिन ॥ जिनगृह-जिनभवन, जिनविम्ब-भगवत्प्रतिमा, जिन- पूजनं-भगवत्पूजा, जिनयात्रा-अष्टाह्निकादिमहोत्सवः, आदिशब्दाजिनप्रतिष्ठादिग्रहः, एवं धर्मकृत्यं विधिकृतं-शास्त्रोक्तप्रकारेण विहितं दानम्-अभयदानादि, तपः-द्वादश- प्रकार, व्रतानि-स्थूलप्राणातिपातविरमणानि, आदिशब्दात् अभिग्रहादिः, गुरुभक्ति:- धर्माचार्यभक्तिः, श्रुतपठन-सिद्धान्तपठनम् , आदिशब्दात् सिद्धान्तार्थश्रवणादिग्रहणं, च पुनः आवृतम्-आदरेण कृतम् , एमत्सर्वम् इह-प्रवचने कुमत-कुगुरु-कुग्राह-कुबोध- कुदेशनांशत:-कुमत-परतीर्थिकमतं, कुगुता-सिद्धान्तार्थमोटकः, कुग्राह:-कदाग्रहः, कुबोधः-कुत्सितज्ञानं, कुदेशना-कुधर्मकथा तासास् अंश:-लेशस्तस्मात् , स्फुटं-प्रकटम् , अनभिमतकारि-अनिष्टकारि संसारकारणं स्यात् । दृष्टान्तमाह-विषलवनिवेशतो वर- भोजनामिर, यथा विपलाशेण परमोननं-प्रधान मोजनमपि अनिएकारि तथा विधि धर्मकत्यमपि कुमतिकगुर्वादिदेशनामिश्रित ससारकारणमिति ॥ २० ॥ थाक्रष्टु मुग्ध-मीनार पटिशपिशितषद्विम्बमादय जैन, समाम्ना रम्यरूपानपवर-फमठान् स्वेष्टमिद्धय विधाप्य । यात्रा-स्नानाद्युपायर्नमस्तिफ-निशाजागरादिच्उला, श्रद्धालुन म अनश्चलित इस शठेवदयते हा । जनोऽयम् ॥ २१ ॥ व्यापा-आमटु० ॥ नाम जैन:-नाममात्रेण जैना नामजैनास्त:-लिङ्ग धारिमिः 'हा' इति से अय श्रद्धालर्जना-आरकननो वक्ष्यते-परास्यावे । कथम्भव मिर्जेनः १ गठ-धूः । कथम्भूतः श्रद्धालुः ? छलिन इव-पन्तराधिष्ठित र अथिल माछलनप्रकारमाह-मुग्धमीनान-मूर्खमत्स्यान् आक्रप्टु-आकर्षितु पदिशपिशितमत्- घडिश-मत्स्यग्रहणाय लोहकण्टक, तपिशित मासयोटक तद्वत् जैन विम्म-जिनप्रतिमा आदर्य-दर्शयित्वा, पधा, मासखण्डेन मत्स्या वशीक्रियन्ते तथा मुग्धप्रतारणाय तेरपि जैनविम्ब दर्शितम् । ननु निनपिम्पस्प कथ पडिशपिशितोपमा ? उच्पने-अविधि प्ररूपिवस्प हीनाचारिप्रतिष्ठितस्य युक्कैव न तु विधिप्रतिष्ठितस्य । पुना कि हत्या ! वनाम्ना-जिननाम्ना रम्यरूपान्-मनोहरसरूपान् अपवरकमठान्, अपवरका अन्त निलपा मठा:-स्थानविशेषास्तान विधाय-काराप्य, कस्य १ स्पेष्टमिस-सस्थेष्टमाघ नाय, 'अस्माकमिष्ट भरिप्यता'-मिति मिपेण मगरद्माण्डागारमठादिनिर्मापण कारयन्ति । ते पुनः के श्राद्वान् छलन्ति ? यानास्नानायुपायैः, यात्रा-जाादेशेन निनगृहे यात्रा स्नाय च कर्तव्यम् , आदिशन्दाद श्रुतानुक्तपर्वग्रहा, एरप्रकार उपाय:- मिपा, त।। पुनः नमसित फनिशानागरादिच्छलैथ, नममितकजिनादीन् उद्दिश्य द्रव्ये सिनस्तारणम् उपद्रपनिवृत्तये इपद् द्रव्य व्ययामीति नियमाकरण निशाजागरो-त्रि- जागरगम् आदिशन्दा शान्तिपोष्टिकादिग्रहः, एतच्छदा-एतत्मकार दायित्वा जनान् पत्रपति। अनेन काम्येन अविधिनिनरिम्बयामास्नानममिवकनिशानागरण निषिद्ध, विधिना तु सर्व कर्तव्य, उत्कर्तव्यस्य सप्तमकाय शितितमकाव्य पूोंने स्थापितत्वादिति ॥२१॥ समारयनितानमा सविपपच्यासमद्रिया, पसादगौरवपदण्तुरगा पुप्यरकपायोरगा । . ।
૨૨ ? . सर्वाकृत्यकृतोऽपि फष्टमधुनान्त्याश्चर्यराजाश्रिताः, स्थित्वा सन्मुनिमूर्द्धसूदनधियन्तुष्यन्ति पुष्यन्ति च ॥ २२ ॥ व्याख्या-सर्व०॥ अहो! कष्ट एवंविधा हीनाचारिणोऽधुना सन्मुनिमूर्धसु-सत्सा- धुमस्तकेषु स्थित्वा तुष्यन्ति-तोपं प्राप्नुवन्ति, च पुनः पुष्यन्ति-वर्दन्ते । कथम्भूताः (हीनाचारिणः ) ? सर्वत्र अस्थगिताबा:-अनाच्छादितास्रवाः । पुनः किम्भूताः ? स्वविषयेपु-आत्मात्मविपयेपु व्यासक्तानि-व्यापारितानि सर्वेन्द्रियाणि-स्पर्शनादीनि यस्तैः । पुनः किम्भूताः ? वलगन्तः-उच्छलन्तः गौरवैः शातादिभिः चण्डा-रौद्रा दण्डा-मनोदण्डादिकास्तुरगा येषां ते दण्डानां चपलत्वात्तुरगोपमानम् | पुनः कथ- म्भूताः ? पुष्यत्कपायोरगाः, पुष्यन्तः-प्रवर्धमानाः कपायोरगाः-कपायस येपां ते । पुनः किम्भूताः ? सर्वाकृत्यकृत्योऽपि-सर्वाकार्यकारका अपि । पुनः किम्भूताः ? अन्त्याश्चर्य राजाश्रिताः, अन्त्यमाश्चर्यम्-असंयतपूजालक्षणं तदेव राजा तदाश्रिताः । पुनः किम्भूताः ? उद्धतधियः-उत्कटवुद्धयः ।। २२ ॥ सर्वारम्भपरिग्रहस्य गृहिणोऽप्येकाशनायेकदा, प्रत्याख्याय न रक्षितो हृदि भवेत्तीप्रोऽनुतापस्तदा । पद्कृत्वत्रिविधं त्रिघेत्यनुदिनं प्रोच्यापि भञ्जन्ति ये, तेपां तु क तपः क सत्यवचनं क मानिता क व्रतम् ? ॥ २३ ॥ व्याख्या-सर्वा० ॥ सर्वारम्भपरिग्रहस्य-सकलसावधव्यापारधनधान्यादिसला. हतत्परस्य गृहिणोऽपि-गृहस्थस्य एकाशनादि-एकवारमशनं यत्तत् एकाशनं तदादिर्य- स्य तत् एकाशनादि, आदिशब्दात् निर्विकृतिकादि प्रत्याख्यातम् एकदा-पर्वादिदिवसे प्रत्याख्याय-कृत्वा कदाचिद् विस्मरणेन न रक्षितस्तस्य रक्षणं न कृतं चेद् भङ्गः स्यात्तदा हृदि तीवोऽनुतापः-पश्चात्तापो भवेत्-'अहो ! मया मन्दभाग्येन प्रत्याख्यान भग्नम् ' । ये हीनाचारिणः पट्कृत्व:-पड़वारान् त्रिवार-सन्ध्याप्रतिक्रमणे त्रिवार प्रातः प्रतिक्रमणे इति त्रिविधं, विधा-मनोवाकायैः-करणकारणानुमतिवर्जनेनेति, अनुदिनं- निरन्तरं प्रोच्य-मुखे उच्चापि भञ्जन्ति तेषां तपः क ?, सत्यवचनं व १, ज्ञानिता क ?, व्रतं व ? अपि तु न कथञ्चित् ॥ २३ ॥ देवार्थव्ययतो यथारुचिकृते सर्व रम्ये मठे, नित्यस्थाः शुचिपट्टतूलशयनाः सद्गब्दिकायासनाः । .
सारम्मा सपरिमहा सविपया सेया सफारक्षा, सदा,
साधुव्याजविटा अहो । सितपटा कष्ट घरन्ति प्रतम् ॥ २४॥
व्याख्या-देवा० ॥ अहो ! इति आवर्य सितपटा:-श्वेताम्बराः मत कष्ट-
दुखतया चरन्ति-समाचरन्ति । किम्भूताः ? मठे-सस्थाने नित्यस्था:-नित्यवासिनः ।
कथम्भूते मठे? देवार्थव्ययत:-देवदन्यव्ययाद् यथारुचिकते-स्वेच्छया विरचिते, ते
स्वेच्छाचारिणो देवद्रव्य सस्थानेषु लगयन्ति । पुनः कथम्भूते १ सर्वरि रम्ये अनेक-
जालिकागाक्षादिकरणे परितुमनोहरे । पुनः किम्भूतास्ते १ शुचया पविना या
पट्टतूल्यो-हसरतादिमयाः शरयाविशेषास्ता शयनाः। पुन. किम्भूताः १ सद्गन्दिका
वासना-प्रधानगन्दिकायासना', आदिश दान्मसूरकादिग्रहः । पुनः किम्भूताः ?
सारम्मा:-आरम्ममहिताः । पुनः किम्भूताः १ सपरिग्रहा:-परिग्रहेण सहिता, पुन:
किम्भूताः सविपयाः विषयः पञ्चप्रकारस्तेन सहिता । पुनः सेाः, सहईयया
वर्तत इति सेया । पुनः किम्भूताः सदा-निरन्तर सफाइक्षा, सहकासया-द्रव्यादि-
वाञ्छया वचते ये वे सकासाः। पुनः साधुच्याजेन-मापुच्छलेन विटा:-लम्पटा इय,
दुराचारदर्शनेन तेषां निन्दनम् ॥ २४ ॥
'इत्यायुद्धतसोपहासवचस स्यु प्रेक्ष्य लोकाः स्थिति,
श्रुत्वाऽन्येऽभिमुसा अपि श्रुतपयाद् मुख्यमातन्वते ।
मियोध्या सुटशोऽपि पिनावि मन मन्देहदोलाचल,
येथा ते ननु सर्पयाजिनपथप्रत्यर्थिनोऽमी वत ॥ २५ ॥
व्यारया-इत्या० ॥ लोका.-परतीथिकादयः स्थिति-हीनाचारिसामाचारी
प्रेक्ष्य-विलोक्य इत्यादतसोपहासक्चसः, इत्यादिपूोकपिटादिप्रकारेण उद्धतानि-
उत्कटानि सोपहासानि-हास्पसहितानि पचासि येपा ते, एवविधाः स्यु:-भवेयुः, हास्य
कुर्वन्तीत्यर्थ: । जन्ये केचन तेपामाचार श्रुषा अभिमुखा-सन्मुसा वाऽपि श्रुतपथात्-
सिद्धान्तमार्गात् वैमुख्य-परामुखत्वम् आतन्त्रते-भजन्ते। येषां हीनाचारिणा मिथ्यो
कृत्पा-मिध्यामापणेन अहो! अमी अन्यथावादिनोऽन्यथाकारिणा, इतिरूपेण सुदशोऽपि-
सम्पादशोऽपि पुरुषाः मनःसन्देहदोलाचल पिम्रति-धारयन्ति, सन्देह एव दोला वया
पलम् , 'इद सत्यमिद या मत्य'-मिति सन्देहास्पद मनः स्याद, ननु-निधित तेऽमी-
पैत्यवामिनः वता-तस्मात्सर्वधा जिनमतप्रत्यर्पिन.-निनमतरिणः ॥ २५ ॥
१४
सवैरुत्कटकालकूटपटलेः सर्वैरपुण्योश्चयः,
सर्वव्यालकुलः समस्तविधुराधि-व्याधि-दुधग्रहः ।
नूनं करमकारि मानसममुं दुर्मार्गमासेदुपां,
दौरात्म्येन निजध्नुपां जिनपथं वाचपसेत्यूचुपाम् अतः ।। २६ ॥
व्याख्या-सर्वैः ॥ अनु-प्रसिद्ध चैत्यवासिविहितं दुर्मार्गम् आसेदुपां-सेव्य.
मानानां मानसं-चित्तं नूनं-निश्चितं क्रूरम् अकारि-कृतम् । कैः क्रूरं कृतं ? तत्राइ-
सर्वैरुत्कटकालकूटपटलैः-अत्युग्रसद्योघातिविपसमूह, स-समस्तः अपुण्योचयैः-
पापराशिभिः । पुनः सर्वव्यालकुलैः-समस्ताशीविपसमूहैः । पुनः समस्तविधुराधि-
व्याधिदुष्टग्रहः, सर्व विधुर-कष्टम्, आधिः-मानसी पीडा, व्याधिः-रोगः दुष्टग्रहास्तैः ।
एतैः पुद्गलमहादुष्टं तेषां मनः कृतम् । कथम्भूतानां तेषां ? दौरात्म्येन-दुष्टात्म्यत्वेन
जिनपर्थ-जिनमार्ग निजस्नुखाम्-उच्छेत्तु कामानाम् । पुनःकिम्भूतानां ? वाचा-वाण्या
'एप यः स मार्गः' इत्यूपा-कथयितृणां दुर्मार्गमपि सुमार्गतया प्ररूपकाणामिति ।।
अतः' इति मिन्नपदम्-अस्मात्कारणात् ॥ २६ ।।
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तत्र कारणमाह-
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दुर्भेदस्फुरदुग्रकुग्रहतमःस्तोमास्तधी चक्षुषां,
सिद्धान्तद्विषतां निरन्तरमहामोहादहम्मानिनाम् ।
नष्टानां स्वयमन्यनाशनकृते बद्धोद्यमानां सदा,
मिथ्याचारवतां वांसि कुरुते कर्णे सकर्णः कथम् ॥ २७ ।।
व्याख्या-दुर्भेद० ॥ मिथ्याचारवतां मिथ्या-विपरीत आचारो येषां ते
मिथ्याचारवंतस्तेषां हीनाचारिणां वांसि-वाक्यानि सकों-विद्वान् कणे कथं केन
प्रकारेण कुरुते अपितु हीनाचारि धर्मोपदेशवाक्यमपि न श्रोतव्यं कथंभूतानां दुर्भेद.
दुर्मेदो-दुरुच्छेदः स्फुरन्-दीप्त उग्र-उत्कटो यः कुग्रहः कदाग्रहः सएव तमस्तमोऽधंकार-
पटलं तेन अस्त आच्छादितं धीचक्षु-ज्ञानलोचनं येषां ते । पुनः कथंभूतानां सिद्धांत-
द्विएता-सिद्धांतवेरिणां पुनः कथं भूतानां निरंतरमहामोहान्-निरंतरमहामोहनीय-
कर्मणः सकाशात् अहंमानिनां-अभिमानवतां पुनः किं स्वयमात्मनानष्टानां-भ्रष्टानां
पुनः कथंभूतानां सदा अन्य नाशनकृतैऽन्यभ्रंशकगय बद्धोधमानां-कृतोद्यमानां स्वयं
नष्टोऽन्यानाशयति इति अतएव तेषां वचो न श्रोतव्यभिति ॥ २७ ॥
. यत्किनिद्वितथ यदप्यनुचित यलोकलोकोत्तरो- तीर्ण यद् भवतुरेव भविना यच्छानयाधाकरम् । तत्तद्धर्म इति झुपति कुधियो मूढास्तदहन्मत, भ्रान्या लात पहा दुरन्तशमाश्चर्यस्य विस्फुर्जितम् ॥ २८ ॥ व्याच्या-यत्किश्चि०॥ कुधिया-कुपण्डितास्तचत् वस्तुधर्मरूपतया त्रुवति, तरिक ? यत् कि तपाइ-प किंचित निधन अलीक श्रेणिकराजरजोहरणवदनादि पदपि अनुचितं अयोग्य पित्राद्युद्देशेन यानाकरणादि अथवा जिनमदिरे लकुडक्रीडादिअयोग्य, यत् लोकलोकोत्तरोचीण-लोग्लोकोत्तरमार्गत उचीणं चाय सूतकगृहे भिक्षाप्रणादि. रजस्वलापूजा, हीनजाविम्य. परमेष्ठिमन्नपाठन दीक्षण जैनेन्द्रप्रतिमाकारण च, तथा यद् भचिना-मध्याना मनहेतु:-सप्तारहेतु' । एव निधयन जिनमन्दिरे जलक्रीडादि यद शाखस्प बाधाकर-सिद्धान्तविरुद्धम् आधाकर्ममोजनादि । अथ श्रारणाधिक्ये पर्युष- गाया अशीतितमेऽहि विधानम् , इत्यादि धर्मतया प्ररूपयन्ति मूढा.-मूर्खास्तद् अर्ह न्मत्तान्त्या-भगवन्मतभ्रमेण लान्ति-स्सीकुर्वन्ति शुक्तिशकले रजतपद । 'हा' इति खेदे दुरन्तदशमाचर्यस्य-दुष्टासयतपूजालक्षणस्य निमाणित-विलसित पश्यतेति ॥२८॥ फष्ट नष्टदिशा नृणा यदहशा जासन्धौदेशिक, फा तारे प्रविशत्यभीप्सितपुराधान किलोत्कन्धर । एतत्कटतर तु सोऽपि सुहश मन्मार्गगारतद्विद,- स्तद्वाक्याननुवतिनो हसति यत्सायज्ञमज्ञानि च ॥ २९॥ व्यारया-कष्ट० ॥ यस्मात्कारणाद किलेवि सत्येन नृणां-मनुष्याणा जात्य धौदेशिक , जात्या-जन्मना अन्ध नेत्रपिकल , स चासो वैदेशिका-विनिशोत्पन्नः। एवम्भूतः कश्चित् कान्तारे-अटव्याम् अभीप्सितपुरापानम् , अभीपिमतस्य-इष्टस्य पुरस्य अधान-मार्ग प्रदिशति दर्शयति तत्कटम् । कथम्भूताना नृणा ? नदियार- दिङ्मूढानाम् । पुनः कथम्भूताम् ? अदृशा-दृष्टिविकलानामन्या-नाम् कथम्भूवो जात्पन्धपैदशिका ? उत्कन्धरा-ऊधीकृतग्रीन', यो मार्ग दर्शपति स ग्रीवामी करोति । तु-पुनः एतन् कहतरम्-अतिशयेन कष्ट, उदाह-सोऽपि जात्यन्ध वैदेशिका यत्-यस्मात सुदृश -सुनेनान् पुरुषान् हमति तत्कटतरम् । कथम्भूतान् सुदृशः । सन्मार्गमान्-शोगनमार्गगमनशीलान् । पुनः कथम्भूतान् ? तद्विद'-शोभनमार्गगमन शासन पुनः कथम्भूतान् ? वद्वाक्याननुपतिना, तद्वाक्य-जात्पन्धवाक्ये अनुवर्तिन- ? न प्रवर्तकास्तान् । कथं हसति ? तत्राह-सावज़-साहकारम् अज्ञानिव-मूर्खानिव, यथा अज्ञा हसन्ति तथा सोऽपि हसति-अहो! मद्वाक्येन गच्छति । एतत्तु कटतरं यत्तस्य मार्गदर्शनं तत्तु कष्टम् ।। २९ ।। सैपा हुण्डावसर्पिण्यनुसमयहसव्यभावानुभावा,- निशचोप्रग्रहोऽयं खखनखमितवर्षस्थितिमस्मराशिः। अन्त्यं चाश्चर्यमेतन्जिनमतहवये तत्समा दुप्पमा चे,- त्येवं दुष्टेषु पुष्टेष्वनुकलमधुना दुर्लभो जैनमार्गः ॥ ३० ॥ व्याख्या-सैपा० ॥ सा एपा-प्रत्यक्षा हुण्डावमर्पिणी-हुण्डसंस्थानेन सहिता- ऽवसर्पिणी-एतत्कालः । कथम्भूता ? अनुसमयहसद्भव्य भावानुभावा, अनुसमय-प्रति- समयं इसन्तः-हीयमानाः भव्याः-प्रधानाः, भावा:-पदार्थास्तेषामनुभावः-प्रभावो यस्यां सा-अनुसमय हसद्भव्यभावानुभावा | च-पुनः त्रिंशः-त्रिंशत्तमोऽयं भस्मराशि- रुप्रग्रहः-उत्कटग्रहः । कथम्भूतः १ एकराशी ख-ख-नखमितवपस्थितिः, खं ख-शून्य शून्यं नखाः विंशतिस्तन्मित(२०००) वर्षस्थिति:-अट्वानां चक्रगत्या द्विसहस्त्रवर्ष- स्थितिः । च-पुनः एतत्-प्रत्यक्षम् अन्त्यमाश्चर्यम्-असंयतपूजालक्षण तत्समा-पूर्वोक्त- त्रिवैरितुल्या, दुष्पमाकालभेदः, जिनमतहतये-जिनमतहानिकरणाय, इत्येवं चतुर्यु दुष्टेपु-शत्रुषु अनुकलं-निरन्तरं पुष्टेषु सत्सु अधुना जैनमार्गो दुर्लभः । एकस्यापि वैरिणः पोपे साधुवृद्धिर्न कथं चतु:शत्रुपोपे जैनमार्ग इद्धिः ? ॥ ३० ।। अथ गुणिद्वेषधीद्वारं दर्शयति- सम्यगमार्गपुपः प्रशान्तवपुषः प्रीतोल्लसच्चक्षुषः, श्रामण्यर्द्धिमुपेयुषः स्मयमुपः कन्दर्पकक्षप्लुपः । सिद्धान्ताध्वनि तस्थुषः शमयुपः मत्सूज्यतां जग्मुषः, सत्साधून विदुषः खलाः कृतदुषः क्षाम्यन्ति नोद्यद्रुषः ॥ ३१ ॥ व्याख्या-सम्यग् ॥ खला-दुर्जनाः चैत्यवासिनः सत्साधून-शोभनानन- गारान् न शाम्यन्ति । कथम्भूतान् ? सम्यग्मार्गपुपः-शुद्धमार्गपोषकान् । पुनः किं विशिष्टान् ? प्रशान्तवपुपः-प्रशान्तस्वरूपशरीरान् । पुनः कथम्भूतान् ? प्रीते उल्लसन्ती चक्षुपी येषां ते तान् । पुनः किम्भूतान् ? श्रामण्यर्द्धिचरित्रसमृद्धिमुपेयुषः-प्राप्नुवन्तः । पुनः किम्भूतान् ? स्मयमुपः, स्मयम्-अहकारं मुष्णन्तीति अहङ्कारतिरस्कारिणः पुनः किम्भूतान् ? कन्दर्पकक्षप्लुप:-कन्दर्प एर कक्ष-शुष्कतण त प्लुपन्ति-दहन्ति ये ते । पुनः किम्भूतान् ? मिद्धान्ताध्वनि-सिद्धान्तमागें तस्थुपः-स्थितवन्तः । शमयुपा- उशपमयुक्तान् । पुनः किम्भूतान् । मत्पूज्यता-पिवकिपूज्पत्य जग्मुपा-मासान् । पूना विदुपः-दक्षान् । अथ कीदृशा. खला. १ कृतदुषा-विहितदोषा । पुनः किम्भूताः ? उघदुपा,उधन्-प्रकटीमान रुपा-पो येषा ते, एवम्भूता, गुणिषु द्वेप वहन्त्येव ॥३१॥ देवीयत्युरुदोपिणः क्षतमहारोपानदेवीयति, सर्पहीयति मूर्यमुख्यनिवह सस्वक्षमझीयति । उन्मार्गायति लेनमार्गमपथ सम्यापपीयपहो ?, मिथ्यात्वादिलो जनः स्वमगुणामण्य कृतार्थायति ॥ ३२ ॥ ध्याख्या-देवी०॥'अहो ?' इत्याच मिथ्यात्वग्रहिलो जन:-मिथ्यात्वेन गर्गीभूतो लोका, एच कुरुो, तबाह-उरुदोषिणः-प्रपलदोपयुक्तान् देवीयति-देवतया मन्यते । अथ क्षवमहादोपान् , क्षता--(वि)नाशिता महादोपा यैस्ते तान् गीतरागान् भ्रमत्वेन अदवीपति-देवतया नागीकरोति, पुन• मूर्खमुख्यनियह-मूर्पप्रधानसमूह सर्वशीयति-सर्वज्ञतया मन्यते, तरचन-तचज्ञातारम् अज्ञीयति-अवतया मन्यते । जैनमार्गमुन्मार्गीपति । पुन: अपथ-कुमार्ग सम्यक् पथपति-सुमार्गवया मन्यते । अगुणैरग्रण्य-निर्गणप्राधान्य खम्-आत्मान कवार्थीपति-गुणपतया मन्यते ॥ ३२ ॥ सत्रातचैत्यकूटपतिवस्यान्तस्वरा वाम्पच,- स्तन्मुद्रापाशधनयत शक्तस्य न पदितुम् । मुख्य फल्पितदानशीलतपसोऽप्येतत्क्रमस्थायिन , स यावशस्य जन्तुहरिणमावस्य मोक्ष फुत १॥ ३३ ॥ व्याख्या सत्रा० ॥ जन्तुहरिणवातस्प, जन्तर -प्राणिनो भव्यास्त एस हरिण -भृगास्तेपा प्रात-समूहस्तस्य-भव्पजनमृगसमूहस्य मोक्ष-मुक्ति कपमपि तु न। कथम्भूतस्य जन्तुहरिणग्रातस्य ? सहव्याघ्रायस्प, सव-हीनाचारिसमुदाया, म एप ध्यान. मृगारिस्तदशस्य-वशीभूतस्य । यथा व्याघ्र-शस्य हरिणस्प मोक्ष-छुटन न तथा कुमव्याप्रमशस्य भन्पहरिणस्य मुक्तिगमन न । कथम्भूतस्य जन्तुहरिणमातस्य ? सत्रातचैत्यकूटपतितस्य, सहस्प-लिसिसादायस्य दानाय कृतानि सनाकतानि यानि पत्यानि-जिनमयनानि यावनिर्माप्य लिगम्यो दत्तानि, दये 'ना' प्रत्यय., " - ३ " तान्येव-चैत्यान्येव कूटः हरिणयन्धनयन्त्राणि तत्र पतितस्यान्यस्य मृगस्य कटे पतितस्य मोक्षः कप्टेन । पुनः कथम्भृतस्य ? तराम्-अत्यर्थम् अन्तः-मध्यहृदये ताम्यतः खेदं कुर्वत: 'कदाछुटिष्येऽह'-मिति खिद्यमानस्य । पुनः कथम्भूतस्य ? तन्मुद्रादृढपाबन्धनवतः, तस्य कुसदस्य मुद्रा-मर्यादा 'अस्मचैत्य एव समागन्तव्य'-मिति, संव दृढः-निविडो या पाशस्तस्य बन्धनं यस्य स तस्यान्यस्य हरिणस्य दवरिकादिनिर्मितग्रंथिविशेष- पाशे पतितस्य मोक्षो नेति । पुनः किम्भूतस्य ? स्पन्दितु-चलितुं न शक्तस्य-न समर्थस्य । पुनः किम्भृतस्य भन्यजन्तोः १ मुक्त्यै-मुक्त्यर्थ कल्पितदानशीलतपसोऽपि, कल्पितम्-आचरितं स्वयुझ्या दानं शीलं तपो येन तस्य, यद्यपि तपाप्रभृति मुत्यर्थ करोति तथापि न मोक्षः । पुनः कथम्भूतस्य ? एतत्क्रमस्थायिनः, एतस्य-कुमङ्घस्य या क्रमा-परम्परा तत्र स्थायिनः । हरिणपक्ष एतस्य मृगस्य प्रहारार्थ सजितः क्रम:- चरणस्तत्र स्थायिनः पादपतितस्येत्यर्थः ।। ३३ ।। ।। इति द्वारदशकं व्याख्यातम् ।। पुनरप्याह- इत्थं मिथ्यापथकवनया तथ्ययाऽपीह कश्चिन्- भेदं ज्ञासीदनुचितमयो मा कुपत्कोऽपि यस्मान् । जैनभ्रान्त्या कुपथपतितान् प्रेक्ष्य नूस्तत्प्रमोहा,- पोहायेदं किमपि कृपया कल्पितं जल्पितं च ॥ ३४ ॥ व्याख्या-इत्थं० ॥ इत्थम्-अमुना प्रकारेण तथ्ययाऽपि-सत्ययाऽपि मिथ्या- पथकथनया, मिथ्यापथस्य-हीनाचारिमार्गस्य कथना-प्रकटना तया, इह प्रवचने कवि- जन्तुर्जिनशासनस्थः मा इदं नासीत् , यदिदं परदोपोद्घाटनम् अनुचितम्-अयोग्यम् । अथो-अथवा कोऽपि-कश्चिदपि मा कुप्यत्-मा क्रुध्यते यत् 'किमनेन रागद्वेषवाक्येने'- ति कोपं-द्वेषं मा करोतु यस्मात्कारणात् जैनभ्रान्त्या-जैनमार्गभ्रमेण कुपथपति तान् कुपथे हीनाचारीप्ररूपिते पतीतान् नृन्-नरान् प्रेक्ष्य अथ तत्प्रमोहापोहाय, तेषां-जन्तूनां प्रमोहः-अज्ञानं तस्याऽपोहः-निराकरणं तस्मै, तन्मोहनिराकरणाय इदं-प्रत्यक्षं किमपि कियन्मानं कृपया-दयया 'अहो ! अमी वराकाः कथं भविष्यन्ती? ति कृपया कल्पितं- प्रोक्तं च-पुनर्जल्पितं-ग्रन्धरचनया प्रारब्धं न तु रागद्वेषाम्यामिति ॥ ३४ ॥ तत्र कारणमाह- प्रोद्भूतेऽनन्तकालात्कलिमलनिलये नाम नेपथ्यतोऽईन, मार्गभ्रान्ति दधानेऽथ च तदभिमरे तत्वतोऽस्मिन् दुरध्वे ।
फारुण्याद् य कुयोध नृषु निरसिसिपुर्दोपसख्या विषझे, दम्मोऽस्मोधे प्रमिसेत् स सफलगगनोलद्धन या यिधित्सेत् ॥ ३५ ॥ व्याख्या-मोद्भः ॥ य. पुरुषः अस्मिन् दुरध्वे-दुष्टमार्गे हीनाचारिप्ररूपिते दोषसख्याम्-इयचया दोपपरिमाण विनक्षेत-वक्तुमिच्छेद स पुरुषः अम्भोधेः-समुद्रस्य अम्मा-जल अमित्सेत्-प्रमातुमिच्छेत् वा-अथना सकलगगनोलाइन-ममस्ताकाशस्य पयामुल्लखन विधित्सेत्-कर्तुमिच्छेत् । यथा समुद्रजलमानम् आकाशलहन कर्तुम- शक्य तथा हीनाचारिंदोपसख्या वक्तु न पार्यत इति । कथम्भूत. ? य: कारुण्यात्- दयातो नृषु-नरेपु कुचोघ-कुतत्वज्ञान निरसिसिपु.-मक्तुमिच्छु । कथम्भूते दुरपे । अनन्तकालात्-अनन्तकालेन प्रोजूते-सजाते । पुनः किम्भूते ? कलिमलनिलये-पाप- स्थाने । पुनः किम्भूते ? नामनेपथ्यतः, नाम्ना नेपथ्य-वेपस्तस्मात् नाममात्रवेप- धारणतोरहन्मार्गम्रान्ति दराने 'अहो ! अमी वेपमानधारका अपि माधव ' इति प्रान्ति विधायके । अथ च-पुनरपि तचतः-परमार्थतः-तदमिमरे, तस्य-भईन्मतस्प अमिमरे-घातके चौरमाये, यथा चौरा: प्रच्छनत्या वेपपरावर्तेन राजादिक भत्ति तथा एतेऽपि लिङ्गमात्रधारकत्वेनाईन्मार्गपातका एवेति ॥ ३५ ॥ न सावधाम्नाया न पकुश-फुशीलोपिश्यति, क्रियामुका युका न मद-ममता-जीवनमये । न सोशापेशा न पदाभिनिवेशा न फपद,- प्रिया ये सेऽद्यापि स्युरिह यतया सूपरतय ॥ ३६ ॥ व्याख्या-न सा० ॥ ते अद्यापि-साम्प्रतमपि इह-जिनशासने यतया-साधवः स्युः ये एवविधा । किम्भूता ? न सावधाम्नाया, साधा-सा. आचार्म- मोजनादिरूपम् आम्नाय.-परम्परा येपा ते तथा चैत्यवामाधाम्नायवन्तो ये नेत्यर्थ । पुन किम्भूता. १ अकराशीलोचितयति-प्रियामुक्ता न, यकुश-सबलम् अविचारपद्धेन चारित्र येषां ते प्रकृशा, कुत्सित शील-चरण येषां ते कुशीला , तेपासचिता-योग्या या पतिक्रिया-साघुसामाचारी नया मुक्ता-वियुक्ता न ये तार पराशील क्रियान्वस्ते अधुना सुमाधव एक, " पशफुशीले हि पष्टपरितित्य" इविचपनात् । अब पत्र निर्गन्या--पास-फशील-पुलाक-निर्गन्ध-स्नातकमेदान् । अशा विविधा उपपरण-देहमेदार । ये वर्षे प्रत्पासचिमन्तरेणापि कदाचित् वनादिक धापति प्रणा पशुकादि निपूक्षन्ति, कदाचित्परिदधते, पापदण्डकायपि पृष्टतेलादिमक्षणोत्पादित - तेजस्कं च धारयन्ति, उपकरणमप्यतिरिक्तं चार्थयन्ते ते उपकरणवकुमाः । ये करचरण- नखादीन् कदाचिनिनिमित्तं भूषयन्ति ते देहबकुशाः । इमे द्विविधा अपि शिष्यादि- परिवागदिकां विभूति तपश्याण्डित्यादिप्रभवं च यशः प्रार्थयन्ते, प्रमोदन्ते छैदाश्चाति- चारैहुमिः शवलिता अपि कर्मक्षयार्थमुद्यता इत्यादि । कुशीलो द्विविधा आसेवना- कपायभेदात् , ये ज्ञानदर्शनचारित्रतपांसि किञ्चिदुपजीवन्ति ते आसेवनाकुशीलाः, ये क्रोधादिभिः कपायै-जानादिगुणान् विराधयन्ति ते कपायकुशीला मूलोचरगुणविराधकाच पञ्चनिग्रन्थमध्ये केपि । पञ्चानां विस्तरतः स्वरूपं श्री भगवतीसूत्रादिभ्यश्च नेयम् । ननु ये एवं शिथिलक्रियायुक्ताः कतितकेशा उपकरणधारकाः मृलोत्तरगुणविराधकास्ते निग्रन्थाः कथं तेषां स्वरूपं केन प्रकारेण ? इति चेदुच्यते-एतेषां कर्तव्यता तावत् प्रवाह- मार्गेण नास्ति किन्तु कदाचिन्महति कारणे जाते घावनादिका क्रिया, इति, मूलगुण- विराधनं च मनश्च विराधनादिप्रकारेणेति रहस्यं सदा तत्कर्तव्यता नास्तीति । पुनः किम्भूताः ? मदममताजीवनभयः, मदो-गर्वः, ममता-प्रतिबन्धः, आजीवनमयं मिक्षाद्या जीविकामय, तमदममताजीवनमयः न युक्ताः-न स्पृष्टाः । पुनः किम्भूताः १ न संक्लेशस्य-रौद्राध्यवसायस्य आवेश:-उत्कर्षो येषां ते न संक्लेशावेशाः। पुनर्न कद- भिनिवेशाः, कत्-कुत्सितः अभिनिवेश:-कदाग्रहो येषां ते, तथा कपटप्रिया:-माया- वल्लमा न पुनः किम्भूताः १ सूत्ररतयः सूत्रे रतिर्येषां ते सूत्ररतयः-सिद्धान्तरुचयः ॥३६॥ संविनाः सोपदेशाः श्रुतनिकपविदः क्षेत्र कालाद्यपेक्ष्या,- ऽनुष्टानाः शुद्धमार्गप्रकटनपटवः प्रान्तमिथ्यावादाः । वन्द्याः सत्माधवोऽस्मिन्नियम-दाम-दमौचित्य-गाम्भीर्य-धैर्य,- स्थैयौदार्यायचर्याविनय-नय-दया-दक्ष्य-दाक्षिण्यपुण्याः ।। ३७ ।। व्याख्या-संविना० ॥ अस्मिन्-जिनशासने एवम्भूताः सत्साधवः-शोभन- माधवो वन्द्याः । किम्भूताः ? संविना:-मोक्षामिलापुकाः । पुनः किम्भूताः ? सोप- देशाः, सह उपदेशेन-धर्मोपदेशेन वर्तन्ते ये ते सोपदेशाः । पुनः किम्भूताः ? श्रुतनि- कपविद:-श्रुतमेव-शास्त्रमेव निकप:-कपपट्टस्तद्विदः-आगमरहस्यनिपुणाः । पुन: किम्भूताः १ क्षेत्रकालाद्यपेक्ष्यानुष्ठानाः,क्षेत्र-कालाद्यपेक्ष्य-क्षेत्रकालाधनुसारि, आदि शब्दाच्छरीरबलादिग्रहः, अनुष्टानं कर्तव्यता येषां ते द्रव्यक्षेत्रकालभावानपेक्ष्य क्रिया- कार इति । पुनः किम्भूताः ? शुद्धमार्गप्रकटनपटवः, शुद्धमार्गस्य प्रकटने पटव:- मावधानाः । पुनः किम्भृताः ? प्रास्तः-दरीकृतः मिथ्याप्रवादो यस्ते प्रास्तमिथ्या.
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२१
प्रवादा: । पुना किम्भूता ? नियम, नियम. अभिग्रहा, शमा-उपशमः, दमा-
इन्द्रियजया, औचित्य-योग्यता, गाम्भीर्यम्-अलक्ष्यविकारत्व, धैर्य-धीरत्व, स्थैर्य-
विमृष्टकारित्वम् , औदार्यम्-उदारत्वम् आर्यचर्या-सत्पुरुषप्रवृत्ति, विनया-अभ्यु
त्यानादि, नया-न्याया, दया-कृपा, दक्ष्य-धर्मक्रियाऽनालस्य, दाक्षिण्य-सरलता,
एमिर्गुणैः पुष्पा:-पवित्रा. ॥ ३७ ।।
सनामगर्मितकाव्यमाह---
विभाजिष्णुमगर्वमस्मरमनासाद शुतोलहने,
सशानधुमणि जिन वरवयु -श्रीचन्द्रिकामेश्वरम् ।
वन्ये वय॑मनेकधासुरनरे, शक्रेण पैनच्छिद,
दम्मारि विदुपा सदा सुवचसाऽनेकान्तरमापदम् ॥ ३८ ॥
व्याख्या-यिम्रा० ॥ जिन-ठीर्थकर बन्दै । फिम्भूत जिन १ विनाजिष्णुम्-
अतिशय शोभायमानम् । पुनः अगम्-अहङ्कासहितम् । पुन, अस्मर-कन्दपरहितम् ।
पुना किम्भूत श्रुतोलहने-सिद्धान्ताज्ञाऽतिक्रमे अनाशादम्, आशा मनोरथ ददातीति
आशादा, न आशादोऽनाशादस्तम् । घुन. किम्भूव । सज्ज्ञानमणि, सज्ञानेन प्रधान
केलझानेन शुमणि-सूर्यम् । पुना किम्भूत ? वरा-प्रधाना वपुःखी-शरीरकान्ति: सैव
चन्द्रिका-ज्योत्स्ना तया मेश्वर-नक्षत्रनाथ चन्द्रम् । असुरन:-दानवमानवैः शक्रेण-
इन्द्रेण अनेकधा-अनेकप्रकारेण वयं-वर्णनीयम् । पुन. एनच्छिदम्, एन-पाप
छिनतीति पापच्छेदमित्यर्थ । पुनः दम्भारि, दम्मस्य-कपटस्य अरि-री दम्मा
रिस्तम् । पुनः विदुपां-पण्डिताना सदा-निरन्तर सुपचमा-सुवाक्येन अनेकान्तरङ्ग
प्रदम् , अनेकान्ता-स्याद्वादस्तस्य रगस्त प्रददातीति अनेकान्तरङ्गपदस्वम् । वचनेन
भगवान् स्याद्वादत्व प्ररूपयन्तीति । चक्रमायसम, यथा माघकाव्ये चकमन्पत्या वर्तते
तथाऽत्र चक्रमाधतुल्य चक्रवन्ध 'जिनयल्भेन गणिनेद चो' इति नाम वर्चते।
पस्थापना प्रमिदेव ॥ ३८ ॥
जिनपतिमतदुर्गे कालत सावे,
विपयिभिरभिभूते भरमकम्लेच्छमन्ये ।
स्ववाजवजनाना शालेय स्थगच्छे,
हिचतिम्यिगधुना सरमाय स्वार्थसिद्धये ॥ ३९ ॥
૨૨.
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लोकास्तेषां शृङ्खला इव
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व्याख्या-जिनपति०॥ तै:-चैत्यवासिभिः इयं स्वगच्छस्थिति:-स्वगच्छ-
मर्यादा अधुना-साम्प्रतम् अप्रथि-विस्तारिता । कस्य ? स्वार्थसिद्धयै-स्वोदरभरणप्रयो-
जनाय । कथम्भूता? म्यवशजडजनानां, स्ववशा:-आत्मवशा ये जडा:-मूर्खाः जना:-
अस्मान् विमुच्य नान्यत्र गन्तव्यम् ' एवं श्रृङ्खला । क
सति ? साधुवेपैः-साधुवेपमात्रधारकैस्तैरेव कालतः पञ्चमारकात् जिनपतिमतदुर्गेः
अभिभूते-पराभूते, जिनपतेः-तीर्थकरस्य मत-शासनं तदेव दुर्ग:-कोट्टविशेषस्तस्मिन् ।
कथम्भृतः ? विपयिभि:-विपयसेवकैः । पुनः किम्भूतः ? भस्मकम्लेच्छसैन्यैः, भस्मक:-
भस्मग्रह एव म्लेच्छ:-तुरष्काधिपतिस्तस्य सैन्याः सैन्यस्वरूपास्ते, यथा तुरष्काधिपतेः
सैन्यं भवति तथा भस्मकस्यैते सैन्या इति ।। ३९ ।।
सम्प्रत्यप्रतिमे कुसञ्चवपुपि प्रोज्जम्भिते भस्मक-
म्लेच्छातुच्छवले दुरन्तदशमाश्चर्ये च विस्फूर्जिते ।
प्रौढिं जग्मुपि मोहराजकटके लोकैरतदाज्ञापरै-
रेकीभूय सदागमस्य कथयाऽपीत्थं कदामहे ॥ ४० ॥
॥ इति श्रीसङ्घपट्टकसूत्रं सम्पूर्णम् ।।
व्याख्या-सम्प्र०॥ लोकैर्वयम् इत्थम्-अमुना प्रकारेण कदर्थ्यामहे । कया?
सदागमस्य कथयाऽपि, सन्-प्रधानः आगमः-सिद्धान्तस्तस्य सदागमस्य कथयापि-
कथनेनापि । यदा शुद्धमार्गस्य कथाऽपि क्रियते तदा लोकाः कदर्थनां कुर्वन्तीति ।
क सति ? सम्प्रति-अधुना भस्मकम्लेच्छातुच्छरले प्रोज्जृम्भिते, भस्मका-भस्मग्रहः,
स एव म्लेच्छ:-तुरष्काधिपतिस्तस्य अतुच्छे-प्रचुर बलं तस्मिन् प्रोज्जृम्भिते-प्रोद्दीप्ते
सति । कथम्भूते चले ? अप्रतिमे-महातेजस्विनि, पुनः कथम्भूते ? कुसङ्घ:-वपुषि,
कुसङ्घः-हीनाचारिसङ्घ एव वपुः-शरीरं यस्य स तस्मिन् प्रत्यक्षतो दृश्यमानकुसङ्घशरीरे
च-पुनः दुरन्तदशमाश्चर्ये-दुष्टासंयतपूजालक्षणदशमाश्चर्ये विस्फूर्जिते-प्रकटीभूते सति ।
कविवचसा दशमाश्चर्यस्य पञ्चमारके प्रादुर्भावः । पुनः मोहराजकटके-मोहनीयकर्मरूप-
राजसैन्ये प्रौढ़ि-विस्तारत्वं जग्मुषि-प्राप्तवति । भस्मकग्रहचैत्यवास्यादयः सर्वेऽपि मोह-
नीयसैन्यरूपा एव । किं कृत्वा कदामहे ? एकीभूय-एकपक्षतां कृत्वा । कथम्भूतै-
लोकः ? तदाज्ञापरः, तस्य-मोहराजस्य आज्ञा, तत्र परा:-सावधानास्तैः-मोहाज्ञा-
वशवर्तिभिः । संसाररूपनगरे मोहराजा दुस्सङ्घस्तस्य सैन्य-भस्मग्रहो महासामन्तो
दशमाश्रय द्वितीयः सामन्त इति रहस्यमिति काव्यार्थः ॥ ४० ॥
२३ अन्धकारमशस्तिः , श्रीमत्परतरगच्छे श्रीमन्जिनमद्रसूरिशासायाम् । श्रीपलमेरसुगुरु-व्यवहार्यत्ययसुर दुरि च ॥१॥ तच्छिच्यो पाक्पतिरिह, श्रीमन्मतिवर्द्धनो गुरुर्जीयात् । श्रीमेरुतिलकनामा, वत्प्राथमकल्पिक समभूत् ॥ २ ॥ तच्छिष्यौ प्रवरगुणी, दयाफलशसगणिप्रभाधुमणिम् । अमरमाणिक्यसुगुरु , समस्तसिद्धान्तधौरेय ॥३॥ सच्छिष्येण सुविहिता, सुगमेय साधुकीसिंगणिनाऽपि । एकोनविंशसमधिक, पोडशसवत्सरे प्रयरे ॥४॥ माघमासे शुष्ठपक्ष, पश्चभ्या प्रवरयोगपूर्णायाम् । विबुधै प्रपद्यमाना, समस्तसुसदायिनी भवतु ॥ ५ ॥ - ॥ इति श्रीजिनवल्लभसूरिकृत-सहपट्टावचूरि सम्पूर्णा ॥
कविचक्रवर्ति श्रीजिनवल्लभसूरिचिरचितः पण्डितलक्ष्मिसेन विहिनया स्फुटार्था-
भिधया लघुकृत्यासनाथः ।
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सङ्घपट्टकः
इन्दीवरप्रभमनिदितकांतिशाति-
धामार्चित सुरवरः किल वासवाद्यः ॥
श्रीमजिनेशचरणं तरणाय सद्यः ।
सर्वेजना नमत किं कुरुतान्य चिन्ताम् ॥ १ ॥
गम्भीरार्थगतेलसत्पदरतेः श्रीसंघपट्टाभिध,-
प्रन्थस्यास्य यथामनि प्रकुरुते टीकां स्फुटार्थभिधाम् ।
लक्ष्मीसेनसुधीः सुधीरनिवह प्रीत्यै जिनेशप्रभोः
पादाब्जा-चनलब्ध सन्मति रति श्रीमान् हमीरात्मनः ॥ २ ॥
तत्र तावदाद्यश्लोकार्थविवेचनमारभ्यते-
वन्हिज्वालावलीढं कुपथमथनधीर्मातुरस्तोकलोक ॥ १ ॥
व्याख्या-'वहि'रिति-तं देव-पार्श्वनाथं वयं स्तुमः-प्रणमामः । तं ? यो
देवः इति जगादेव-उक्तवानिव इति, किं ? प्राः-पण्डितैः सद्यः-तत्क्षणादेव कुमार्ग-
स्खलन कार्य-कर्त्तव्यं, सिद्धान्तविरुद्धमतनिगकरणं कर्तव्य-मित्यर्थः । किं कृत्वा ?
स्वस्य आत्मनः विधुरमपि प्रपद्य । अपि सम्भावने कोऽर्थः १ कुमार्गस्खलनाद् यदि
आत्मनो विधुरमपि किञ्चिद् भवति तथापि इति । किं कुर्वन् उक्तवान् ? कमठमुनितपः
उच्चैः-अतिशयेन दुष्टं प्रकटयन्-प्रकटीं कुर्वन् । कोऽर्थः ? कमठनामतापसस्तावदेकः कश्चि-
चपस्त्री पञ्चाग्नि नाम तपः कुर्वन् पार्श्वनाथेनावलोकित, तस्य तत् तपो भगवता दुष्ट कृत-
मित्यर्थः ।। किं कुत्वा ? अखिललोकस्यग्रे ज्वलत्काष्ठमध्यात्सर्प सन्दर्य, न केवलं अखिल-
लोकस्याग्रे मातुर्वामदेव्याचाग्रे वामादेवी भगवन्माता, तस्या अपि पुरतः इत्यर्थः किं
विशिष्टं नागं ? " अग्निज्वालावलीढं" अग्निशिखाकवलित-अर्द्धदग्ध मित्यर्थः कथम्भूतो
यः परमेश्वरः ? कुमार्गछेदनबुद्धियुक्तः । पुनः कथम्भूतः ? कारुण्यामृतान्धिः-कपा-
पीयूपसागरः ॥ १॥
श्रीउपदेशमणनयोग्य श्रोतार निरूपितुमाह- कल्याणामिनिवेशवानिति गुणामाहीति मिथ्यापथ व्यारूपा-कल्याणाभि०-योवृणां चतुर्दशगुणा, श्रोतशब्दा। सऽप्यत्र हेत्वः । अथ श्लोकान्वया-भो श्रोता मया ग्रन्थका स्वमुच्यसे-कथ्यसे कथमिति ? कल्पाणामिनिवेशनानिति, कोऽयः शुमरूयाग्रहवान् शोमनस्य रूपस्य आग्रहो विद्यते अस्येति स तथा| पुनः कथमिति ? गुणग्राहीति गुणग्रहीतु शीलमस्येति गुणग्राही । पुनः कथमिति ? मिथ्यापथप्रत्यर्थीति पथा-उन्द प्ररूपितोत्सूत्रमार्गस्तस्य विरोधी, पुनः कथमिति १ विनीत इति मजुस्वभाव इति, अर्थाद् गुर्वादिपु । पुनः कथमिति अशठ इति अधूत इति । पुनः कथमिति ? औचित्यकारीति-उचितस्य मार औचित्य, तत् कतुं शीलमस्येति । पुनः कथमिति दाक्षिण्पीति दाक्षिन्ययुक्त' । पुन, कथमिति ? दमीवि-जितेन्द्रिय', पुनः कथमिति ? नीतिभूदिति-नीति विमर्तीति नीतिमृत्- सदाचारपरायण इत्यर्थः पुनः स्थमिति ? स्थैर्योति स्थैर्यगुणयुक्तः स्थिर इत्यर्थः । पुनः कथमिति ? धैर्याति-धीर इत्यर्थः । पुन' कथमिति ? मधर्मार्थीति-सतां धर्मः सद्घर्म तस्यार्थी, सोऽस्यास्तीति शोमनधर्म गयेपका। पुन' कथमिति ! विवेकानिति- युक्तायुक्तविचारपतुरा इत्यर्थः । पुनः कथमिति । सुधीरिति प्राज्ञ इत्यर्थः ॥ २ ॥ इदानीं युग्मलोकयो-कर्याख्यानमारम्यते- इह फिल कलिकालव्यालयकत्रातराल ॥३॥ प्रोत्सर्यदू भाइमराशिमहसम्पदामाचर्यसाम्राज्यपुष्य ॥४॥ व्याख्या-इर० ॥ प्रो० ॥ " किलेवि " प्रसिद्धि इह जगति विपयिभि. सरुचन्दनवनितादिसेरिभिः अमिता-समतात् । सोय पधा अप्रार्थि-प्राधित-रूपा पितः । कथम्भूत' पथा जिनोक्तिप्रत्यर्थी-जैनशास्त्रविरोधी, कस्मिन् सति प्राणियमें जीवसमूहे जैनेन्द्रमार्गे-जिनशासने विरलता-तुच्छता याति सति, कथम्भूते प्राणिनगें ? कलिकालण्यालयकान्तरालस्थितिजुपि । कलिकाल एर ज्याला सर्पस्तस्य चक्त्र तस्यान्तराल-मध्य बन स्थितिस्थान, तर जुपते सेवते य तस्मिन् । पुन कथम्भूते प्राणिवगें ? गततत्वप्रीतिनीतिप्रचारे । गती-नष्टौ ग्रीतिनीतिप्रचारी यम्प वस्मिन् , इदानी प्राणिवर्गे वचनीतिनास्ति । नीते. प्रचारो व्पाहारथ नास्तीत्यर्थः । -
"
पुनः कथम्भूने ? असरदनयबोधे-प्रादुर्भवन मम्यक सिद्धान्तापरिज्ञान, कोऽर्थः ?
सिद्धांतार्थसम्यग्ज्ञानरहिते । पुनः कथम्भृन ? प्रस्फुरत् कापथोथस्थगितमुगति-
सर्गे उन्मीलन्तः-प्रकटी भवंतः ये कुमा:-कुत्सितमार्गाः ते स्थगित:-तिरस्कतो
रुद्धः-अपवर्गलक्षणायाः मुगतेः सगों-निष्पत्तिर्यस्य तस्मिन् । कथम्भृतः साधुवर्षे
विपयिभिः १ संक्लिष्टद्विष्टमूहप्रखलजडजनाम्नायरक्तः । कोऽर्थः १ समानधर्मजनो-
पतापकारि-मत्सरि-हेयोपादयविमर्शशून्यप्रकर्षपिशुनः दुर्बुद्धिचतुर्विध संघः, तस्या-
म्नायः-शिष्यप्रशिप्यादिसंतानः, तत्र रक्ता-प्रीतिमतः, तैः । पुनः कथम्भूतैः ?
साधुवैः-सन्मुनिचिहधारिमिः कथम्भूने जैनेन्द्रमार्गे ? 'प्रोत्सर्प 'दित्यादि प्रोज्जृम्म-
माणो यो भस्मगशिनामा ऋरग्रहः, तस्य सखा-मित्रम् , असंयतपूजाख्यं रिपूविजय-
पुरस्सरं आश्चर्य बर्द्धमानं अतचे नचप्रतिपद्यमानरूपं यद् दशमाश्रयं तस्य साम्रा-
ज्येन-ग्राचुर्येण पुष्यन् प्रादुर्भवन मिथ्यात्वं, तदेव घांन-तमिसं तेन व्याप्त ।
अन्योऽपि मार्गो यधन्धकारावृतो भवति तदोच्छन्नतां यात्येव ।। ३-४ ॥
इदानी योग्यस्य श्रोतुः पुरतो धुर्चकल्पिते पथि दशभिस्तित्र निरूपित धर्म
प्रतिपादयन् तस्य धर्मम्य कर्मनिर्मूलने सामर्थ्यमसंभावयन्नाह-
.
यत्रौदेशिकभोजनं जिनगृहे वासो वसत्यक्षमा....॥ ५ ॥
व्याख्या-
" यत्रो०" यस्मिन्मार्गे औदेशिकभोजन, कोऽर्थः ? यतीन् मनसि
कृत्वा निष्पादितं, जिनगृहे वासः-अर्हद्भवन सर्वदा निवासः, वसत्यक्षमा-गृहस्थ-
गृहे वासं प्रति मात्सर्यम् , अर्थ गृहस्थचैत्यसदनेषु स्वीकार:-द्रव्यश्रावकजिनगृहेषु
अङ्गीकारः, अप्रैक्षिताद्यासन-स्वचक्षुपा अदृष्ट-मासनम् , सावद्याचरितादर:-सपाप-
यंदाचरितं, तस्यादरः, श्रुतपथावज्ञा-सिद्धान्तमार्गम्याऽनादरस, गुणिद्वेषधीः-यतिषु
द्वेपचुद्धिः, इति दशद्वाराणि । एतैर्दशद्वारैः प्ररूपितो धर्मः । अत्र-असाधुकल्पिते पथि
कर्महग्वेद् भवेत् कर्मक्षयकारी भवेद् तदा अन्धौ-समुद्रे मेरुस्तरेत् । यदा मेरूः
समुद्रे तरति तदा एतम्माद् धर्माद मोक्षो भवतीत्यर्थः ।। ५ ॥
.
साम्प्रतमेतेपामेव दशद्वाराणां यथाक्रमं प्रत्याख्याने चिकीर्षुः प्रथम तावजीवोप-
मर्ददोषदृष्टया औद्देशिकभोजनद्वारं निषेद्धमाह-
कायान् उपमद्य निर्दयमृषीनाधाय यत् साधितं....॥ ६ ॥
२७ - , - व्याख्या-पटकायानुपम । नामेति समावनायाम् , इह-प्रवचने सघृणो- दयालु का तद् भोजन मोतुमिच्छति । अपितु न कोऽपि इत्यर्थः । किं कुर्वन् ? महादिनिमित्तमेतनिष्पन्न मिति जानन् । कि तभोजन यत् पटकापान-पविधजीवनि कायान् उपमर्य-हत्वा निर्दय यथा स्यात्, एवम् ऋपीन्-यतीन् आदाप-मनसि कृत्वा यत् साधित निष्पादित यद् भोजनम् असकद्-वार वार शास्त्रेषु प्रतिषिध्यते-निवार्यते निशीथादिग्रन्थेषु यस्य निषेधो वर्तते, वद् मोजन निविंशताधायि निष्करुणताकारकम् । पुनः यत् मोजन पण्डिताः गोमामाग्रुपमम् आहु'-गोमामादिसदश कथयति मूलादि । पद् मोजन सुत्त्वा यविरघोयाति-नरक गच्छति तद् भोजन प्राज्ञः कोऽपि न मोक्तु मिच्छति-इत्यर्थः ॥ ६॥ प्रथम वापत् भोजनद्वार निषेध्य जिनगृहनिवास निपेषयितुमाह- गाय गार्चनृत्यत् परमणिरणद् वेणुगुञ्जन्मदा ॥७॥ घ्याख्या-"गायद् गन्धर्व०" खलु इति निश्चये अन्तिमवज्ञा:-जिनशास्त्र- निपुणा' सन्त, जिनगृहे न वसन्ति-न सततमातिष्ठन्ते । कुतः ? विकारहेत्वात् । कि विशिष्टाः सन्ता १ प्रसन्तः, काम्पः १ देवद्रव्योपभोगनुवमठपतिताऽऽशातनाम्यः । देवद्व्यस्य जिननैवेद्यादेः उपभोग., सतत शयन, मोजनादिकरणे उपभोग', ध्रुव- निश्चय मठपतिता-मठाधिपत्य, तथा भगवदशातना:-जिनानां चतुरशीतिराशावना', एतेभ्य. विम्यन्तः । कथम्भूते जिनगृहे ? ' गायद् गन्धर्षे 'त्यादि, गायन्तः गन्धर्वा: प्रधानगापनाः या नृत्पन्या पणरमण्यो-वैश्या पत्र, रणन्तो-मधुर धनन्तो वेण. यो-वशा' यत्र, गुञ्जन्तो गम्भीर स्वनन्तो मृदा प्रेवन्त्योलम्बमाना' पुष्पलज'-पुष्प- माला यत्र, उपत्-मर्वत प्रसर आमोदद्वारेण मृगमदा-फस्तूरिका पर, लमन्त पट्टफिमयत्वादीप्यमाना उल्लोचानि-वितानानि यत्र, महाधनामनपणारागादि भूषितशरीरत्वात् शोममाना जनौषा:-श्रावकममूहा यत्र, तस्मिन् ॥ ७ ॥ यसत्यक्षमाद्वारे निरसित गोकदयेनाह- सामाजिनर्गण निवितोकां ॥८॥ विनोसर्गापवादे परिद शिवपुरीदूत भूते रिशीये ॥९॥ व्याख्या-साक्षा मर्ण -सथाण क. पुमान् परगृह-गृहस्थगृहे उमति- , २८ निवासं विद्वेष्टि । अर्णः पुमान का विना सिद्धान्तोक्तामपि परगृवमतिम्-अनाकर्णयन् निषेधेदपि । यः पुनः सकर्ण:-त्रणः स परगृहवमति यतीनामनुमोदयत्येव, न तु द्वेष्टि। किं कुर्वन् ? मुनिपुङ्गवानां-यतिश्रेष्टानां अनगारपदं त्रानन्-न विद्यते अगारो यम्येति जानन् । अथवा कि विशिष्ट वसति ? 'शय्यानरोक्ति'मिनि, मुय्या वसतिरा. ख्याता यतिभ्यो दाननया, तरति मत्राम्माधि यया अनगारपदं गाने हि यतिवाच. कन्वेन प्रतिपदं श्रृयने । ननु स्वगृह एव किमिति यतयो न वसति ? तबाह- मनिपुङ्गवानां निःसंगता-वजनादि गहित्यं अग्रिमपद-मुख्यस्थानम् । किविग्रिष्टा निःसंगता ? साक्षान्-प्रत्यक्ष जिन:-तीर्थकमिः निषेविता-उपभुक्ता, स्वमुखेन उक्ता च कथिता, न केवलं जिनर्गणधरैश्च-गौतमप्रभृतिभिः । यतीनां स्वगृई नास्त्येव, अतः परगृहवसतिरेव श्रेयसीत्यर्थः ॥ ८ ॥ व्याख्या-'चित्रोत्सर्गा' सर्वत्र-सर्वस्मिन् वमति अधिकारे आगारधाम्नि- गृहस्य गृह एव यतीनां निवासो न्ययामि, कोऽर्थ: ? व्यवस्थापितः, न तु कापि-कस्मि- अपि ग्रन्थ, चत्त्ये-जिनगृह निवासो निरूपितः । किं कृत्वा ? प्रागुवा-प्रथम निशी भूरिभेदाः-बहुभेदाः बसतीः उक्त्वा । किं विशिष्टे निशीथे ? चित्रोत्मर्गापवाद । चित्रौ-नानाविधौ बहुप्रकारौ उन्मर्गापवादौ-सामान्यविधि-विशेषविधी यस्मिन् । पुनः कथम्भूने निशीथ ? शिवपुरीतभूने-मुक्तपुरीसन्देशहरसदृशे । पुनः किं कृत्वा ? पश्चात्-तदनन्तरं कारणपोद्य-अपवादविषयीकृत्य | किं विशिष्टे अगारधाम्नि ? स्त्रीसंमत्यादि युक्तेऽपि-स्वीपण्डकादिसहितेऽपि । नतु विकारसामग्रीसहित गृहस्थ- गृहे कथं यतीनां निवासः ? इत्याह-अमिहिनयतनाकारिणामिति-निशीथोक्तयतना सावधानानां मंगतानां किं विकारहेतुमिरित्यर्थः ॥ ९ ॥ A १ ननु एवं यतना सावधानानां चैत्ययासेऽपि को दोपः १ इत्यतः आह- प्रवव्यापरिपंथिनं ननु धनस्वीकारमाहुर्जिनाः ॥ १० ॥ व्याख्या- ननु निश्चित तीर्थकराः धनस्वीकार-द्रव्यस्याङ्गी- कारं प्रव्रज्यापरिपंथिनमाहुः | कोऽर्थः ? दीक्षाशत्रुभूतं कथयन्ति स्म । क धनसंग्रह। क दीक्षतिद्वारम् । तु पुनः सर्वारम-परिग्रह-सकलपापसहितानां गृहिणं । परिग्रहं अति- महासावध अतिशयमहामपापं आचक्षते-कथयति । तेन गृहस्थपरिग्रह, सर्वथा यतीनां नोचित इति द्वारम् । चैत्यस्वीकरणे तु माटपत्यमेव स्यात् । यदा यतीनां जिनगृहस्य प्रत्रज्या."
स्वीकारास्तदा मठाधिपत्यमेव भवेत् । कथम्भूत माठपत्यम् गर्हिततम-प्रकर्षण
निन्दित । यद्वा इति देतोर्मुक्यर्थिनां पुसाम् इति ममता युक्ता न-द्रव्यादिषु ममत्व
युक्त नेत्यर्थः । कथम्भूता ममता ? प्रतवैरिणी चारित्रशनुभूता ॥ १० ॥
तत्र दशद्वाराणां मध्ये पड् द्वारा निषेध्य अवशिष्टद्वारचतुष्टय निषेधयितुमाह श्लोक
चतुष्टयेन-
भवति नियतमन्नासयम स्याद् विभूषा ॥ ११ ॥
गृही ीयतगच्छभाक् जिनगृहेऽधिकारो यते ॥ १२ ॥
निर्वाहार्थिनमुज्झित गुणलपैरज्ञावशीलान्वय ॥ १३ ॥
दुप्मापा गुरुकर्मसघयवता सद्धर्मबुद्धिर्नृणां ॥ १४ ॥
व्याख्या-अन श्लोके सप्तम द्वार गन्दिकायासन निपिज्यते । अत्र गन्दिका-
द्यासने विभूषा स्यात्-शोमा भवेत् । न केवल शोमा, असयमश्च भवति । कोऽर्थ: ?
जीवरक्षाऽभावश्च भवति नियत-सर्वदा गन्दिकाधासने कथ शोभा भवेत् ? तबाद-
"नृपतिककुद" एतदिति, यतः एतदासन नृपतिककुद-राज्यचिवमिति । वर्हि शोमाऽप्य-
भीष्टवेत्याह-लोकहासश्चेति गन्दिकाद्यासने मिक्षोः केरल शोमैन न भवति किन्तु लोको
पहामश्च भवति-'अहो । मिक्षोपजीपिनो मुण्डिता अपि एवविधप्पामनेपूपविशति'।
इह सग' लोकविदित' गब्दिकादौ परिग्रहा, उच्चैः-अतिशयेन सातशीलत्व-सुख
लोलुपता, इति हेतो मुमुक्षोः मोक्षामिलापिण. पुरुषस्य गन्दिकायासन सगत न-युक्त
नेत्यर्थः । इति सप्तम द्वारम् ॥११॥
सायद्याचरितादरारूपमष्टम द्वार निरूपयमाह-
व्याख्या-'गृही नियतगच्छ० गतानुगतिकैः-गडरिकाप्रवाहरूपैः अन
गारिणी-यतीनाम् असस्तुतम्-अनुचितम् । अदा-एतत् कथ प्रस्तुत-प्रारब्धम् । एतत्
कि गृही-श्रावको नियतगच्छमाग् भवति, कोर्थ आत्मसशो गच्छो येपाम तेषा
मेव समुदाय मजनेन गुणदीपादिक विचारयति अन्य यतेः मुने जिनगृहे अधिकारा एतदपि
विरुद्ध-मेव, अपर च आरमिमि'-गृहिमिः साधुपु-यविषु यथा तथा, कोऽर्थः । येनैव
प्रकारेण तेनैव अशुद्धमपि अशनादि-भक्तपानादिप्रदेय-वितरणीयम् । एतदपि विरुद्धमेव ।
अपर च व्रतादिविधिधारण-सर्वविरत्यादिविधेरिण-निषेधः। एतदपि विरुद्धम् ।
सुविहितातिक सन्तिके-सन्मुनिसमिपे कथ प्रारब्धमित्यर्थः । अष्टम द्वारम् ॥ १२ ॥
३० MA ? नवमं द्वारं निशेधयितुमाह - व्याख्या-निर्वा० जना:-लोकाः यत् ईदृशं यति देवेभ्योऽपि-जिनेभ्योऽपि अधिकं यथा स्यात् तथा अर्चयन्ति-पूजयन्ति तत् महतः-प्रबलस्य मोहस्य-अज्ञानस्य जृम्भितं-लीलायितं । कीदृशं यति ? निर्वाहार्थिन, कथं । निर्वाहो-जीविका भवतीत्यय. मेवार्थः प्रयोजनं यस्य तम् । पुनः कीदृशं ? गुणलवै:-गुणलेशैरपि उज्झित-त्यक्तम् । पुनः कथम्भूतं ? अज्ञातशीलान्वयं अविदिताचारकुलं पुनः कथम्भूतं गुरुणा-आचार्येण स्वार्थाय-प्रयोजनाय मुण्डीकृतं-दीक्षा नीतम् । कथम्भूतेन गुरुणा ? तादृग्वंशजतद्- गुणेन-ताशिष्यवंशजातेन तद्गुणेन-शिष्यसदृशगुणेन । किविशिष्टा जनाः १ विख्यात गुणान्वया अपि-प्रसिद्धगुणवंशजाता अपि । अकुलीना:-कुलीनं पूजयति तदा पूजयन्तु, (किन्तु) कुलीना अपि अकुलीनं पूजयन्ति, इतिमोह प्रावल्यम् । पुनः किंविनिष्टाः ? लग्नो- गगच्छाहा:-चेतसि निविष्टो यः उग्रगच्छप्रतिवन्धः तद् युक्ता इत्यर्थः । द्वारम् ॥९-१३॥ 'गुणद्वेषधी 'इतिद्वारं निषेधयितुमाह- व्याख्या-दुष्प्राप्या०॥ गुरुकर्मसश्चयवता-गरिष्टसंसारबन्धहेतुकर्मयुक्तानां प्राणिनां सद्धर्मबुद्धिष्प्राप्या, कोऽर्थः ? दुःखेन प्राप्यते तस्यां सद्धर्मबुद्धौ जातायामपि उत्पन्नायामपि शुभगुरुर्दुर्लभः यो गुरुरिष्टतरं किश्चिदुपदिशति । सोऽपि शुभगुरुः पुण्येन यदि प्राप्यते तथापि अमी जनाः स्वहितं कर्तुं नालं-आत्मनो हितं कर्तुं न समर्थः। किं विशिष्टा जनाः १ गच्छस्थितिव्याहता:-'युष्मत्कुलाहतोऽयं गच्छस्तत एनं गच्छं त्यक्त्वा भवद्भिर्नान्यपावें श्रवण-सम्यक्त्यव्रतप्रतिपत्त्यादिकं विधेयम्' इति गृहस्थस्य यतिविहिता व्यवस्था, तया गच्छस्थित्या व्याहता:-वशीकृता इत्यर्थः, अतो हेतोः किं ब्रूम:-किं भणाम: ? इह-संसारे, किम् आश्रयेमहि-निपेवेमहि ! किम् आराध्येमहि- कस्याराधनां कुर्मः ? किं वा कुर्महे-विदध्मः, इति दशमं द्वारम् ॥ १४ ॥ एतेन प्रव्रज्याऽपि कुलीनस्यैव योग्येति प्रतिपादयन्नाह- क्षुत्क्षामः किल कोऽपि रङ्कशिशुकः प्रव्रज्य चैत्ये कचित् ।। १५ ।। , व्याख्या-'क्षुत्क्षामः 'किलेति संभावने कोऽपि रङ्कशिशुक:-अज्ञातनामा क्षुत्क्षांमसन्-बुभुक्षादुर्वलः सन् क्वचिदनिर्दिष्टनाम्नि चैत्ये-जिनगृहे प्रव्रज्य-दीक्षा गृहीत्वा कञ्चनं श्रावकं पक्षं कृत्वा तदाचार्यकं प्राप्त:-सूरिपदं गतः सन् , कथम्भूतः असतकलिः अवण्डितकलह चित्रम्-आश्चर्य-चैत्यगृहे गृहीयति गृह इव आचरति । निजे गृहे चुटम्नीयति-कुटुम्ब इघाचरति । स्व-आत्मान शक्रीयति-शक्रमिवाचरति युधान्-पण्डितान वालिशीयति-मूर्खानियाचरति । विन-जगत् वराकीयति-रमि वाचरति, अतो मूर्खबहुल जगत् , यता कुलशीलादिक न विचारयति किश्चित् मोहनोचा टनापद्भुतमवलोक्य दुष्टमपि यति दयब पूजयन्तीत्यर्थः ॥१५॥ अस्मिन्नेबाधे-अपरमपि वृत्तमाह- - थैर्जातो न च वर्द्धितो न पनप क्रीतोऽधमों न च ॥ १६ ॥ व्याख्या-यैर्जातो० ॥ तैरेव अधमाधम'-अत्यधमै यतिमिा अब जनो-लोक पलात् हटात् बाराते-पत्र तत्र नीयते अतः हा! इति कटे इद जगत् नीराजरु-नाजशून्य, राजा चेद् भवति तदा एतदनुचित न माति-इत्यर्थः । तैः कै ? य: यतिमिरय लोको न जाता-नोत्पादितः योगक्षेमानिसपादनेन, येर्न च चर्द्धिन -शरीरपोपण न प्रापिता, यैर्न च फ्रीता-अन्यम्मान्मृत्पदानेन न गृहीता, न च अधमर्णन-उद्धारादिप्रयोगण गृहीतः, न च प्राक्-पूर्व दृष्ट:-अपलोकिना, न च पान्धर पितृव्यभ्रामम्बन्धवान् , न च प्रेयान वाष्टमतरः, न च प्रीणित -वोषितः । एतारता ये पतय' न दृष्टा, न श्रुता., न च सबन्धिना, तैर्दुष्टैर्यतिमिः अय जनो लोकः बलाद् साह्यते । किंवत् ? नस्योत पशुवद यथा नस्थितः पशुर्य तर नीयते इत्यर्थः । चकार. सर्वममुच्चयार्थः ॥ १६ ॥ फुपथावस्थितजडजनानवलोक्य प्रकरणकारः प्राह---- frदिग्मोहमिता किमन्धयघिरा किं योगचूर्णाकृता ॥ १७ ॥ व्याख्या-'किं दिगमोर' यद् यम्माद्धेतोः अमी जड़ा -मूर्खा जना कुपथात्-समार्गात् व्यावृत्तिम्-अपमरण न दधते-न ति तम्मावतो एते नना.- लोकाः किं निग्मोहम् इता' पूर्वादिदिक्षु परिमादिविनमः दिग्मोहा त प्राप्ता. १। किं अन्धवहिरा जाता ? अन्धा:-नेत्रहीना: । यधिरा-वर्णहीनाः । किंवा योगचूर्णी कृताः ?-मस्तकादिषु चूर्णक्षेपेण वशीकवाः । किं वा देयोपहना देवेन-विधिना उपहता-निमश प्रापिताः । 'अगेति राबोधने । किंवा उगिता ? सायचीकता । किंवा ग्रहावशिना-भूतादिशरीराधिष्ठानाः। न केवल कृपथप्रयता. एर सति किन्तु एतन् कने, कोऽधः १ जिनमार्गकने जिनमार्गनिमित्त अनुपन्ति न-ई कुन्ति च । -- - ३२ किं कृत्वा ? श्रुतस्य मूर्थिन-शास्त्रमस्तके पदं-चरणं कृत्वा-विधायेत्यर्थः किंविशिष्टा अमी? दृष्टोरुदोषा अपि-साक्षादवलोकितकुपथदोषा अपि अदृष्टदोपा हि विवेकिनोऽपि कुपथान निवर्तितुं समीहन्ते किं पुनः अन्येऽपि दृष्टदोपाः ते मूर्खा अपि कुपथानिवर्तन्त एवेति श्लोकार्थः ॥ १७॥ सिद्धांते हि रजन्यां जिनस्नानं पापपंके निमजनाय प्रवदंति इत्यत आह- इटावाप्ति-तुष्ट-विटनटभटचेटकपेटकाकुलं ॥ १८ ॥ व्याख्या--' इष्टावाप्ति०' जिन मञ्जन-जिनस्नानं अविधिना-सिद्धानोक्तविधि- वैपरीत्येन मूढजनेन विहितः सन् अघपङ्के-पापकर्दमे निमजनमेव जनयति, कोऽर्थः ? सिद्धान्तोक्तप्रकारेण यदि देवस्नात्रं न विधीयते तदा स्नात्रादपि नरकपतनमेव भवती- त्यर्थः । कथभूतं स्नानम् ? इष्टा वाप्ति तुष्टविटनट-भटचेटक-पेटकाकुलम् , इष्टाया:- प्रियायाः स्नात्रदर्शन व्याजेनागताया अवाप्ति:-मिलनं, तया तुष्टाः विटाः 'निःशङ्क- मत्राधनः सुरतलीलाप्रवर्तिप्यते' इति धिया मुदिता विटा:-वेश्यापतयः, नटा:-नर्तका:, भटा:-शास्त्रादिकलाजीविना, चेटका:-मासादि नियमित[वृत्तिग्राहिणः, एतेषां पेटक:- समूहः, तेन आकुलं-क्षुभितम् , पुनः कथम्भूतं स्नात्रं निधुवनविधि निबद्ध दोहद नरनारी निकरसंकुलं-निधुवनं-सुरतं तदर्थ निबद्धो दोहदा-अभिलापो यैस्तैनरनारी निकुरैः- समृहै। संकुण-व्याप्तं । कथंभूतं स्नानं ? रागद्वेपमत्सरे वन-कस्यचित् परवर्णिनीं प्रति रागा-स्नेहः, स्वप्रेयसी मन्येन सह संगच्छमानां पश्यतस्तजिघांसया द्वेपः, मत्सरश्च-स्ववल्लाभामन्येन सह लपन्तीमविलोक्यतः पुरुषस्य, असहिष्णुता-ईर्षा, ताभिर्घनं-सान्द्रम् , एतावता सकलविकारसामग्री परिपूरितमूर्खजनवि हित-स्नानादपि नरके पतनमेव भवीत्यर्थः ॥ १८ ॥ न केवलं स्नात्रमेव नरकजनक किंतु अविधि कृतं व्रताद्यपीत्याह- . जिनमतविमुख-विदित-महिताय न मन्जनमेव केवलं ।। १९ ।। व्याख्यान 'जिनमत०' केवलं जिनमत-विमुखविहितं-जिनशास्त्रविपरीत- कृतं मजनमेव ' अहिताय' संसाराय न भवति किं तर्हि ? (किंतु) तपश्चरित्रदानाद्यपि अनशनादि सर्वविरति अपि शिवफलं-मुक्तिरूपफलं न जनयति । एतावता जिनशास्त्र. विपरीत कृतं सर्वमेव निष्फलमेवेति श्लोकार्थः । हि-यता कारणात् अविधिविधि क्रमात् सिद्धान्तानुक्तोकप्रकारेण, सिद्धान्ते यन्त्रोक्तं तेन प्रकारेण जिनाज्ञाऽपि-अहंदागमोक्ता.
नुष्ठानमपि अशुभशुमाय-अकल्याणसंपत्तये जायते । 'कि 'मित्याक्षेपे वास्यमेदे चा, 'पुन 'रिति हेहुप्रकारेण अहितहेतु:-ससारपन्धन हेतु विडम्बनेर-लोकोपदामा- स्पदमेव न प्रसार्यते न विस्तार्यते ? अपि तु विस्तार्पत एवेत्यर्थः ॥ १९ ॥ जिन गृह-जैनविम्ब जिनपूजन जिनयानादि विधिकृत ॥ २० ॥ व्याख्या-'जिनगृर' इह-प्रवचने एतदपि सर्व स्फुट-प्रगट व्यक्कमेत्र अनमिमतकारि माति-अनिष्टविद्यापि भवेत् ।। कस्मादित्याह--कुमत-कुगुरु-कुग्राह कुपोध-कुदेशनशित , अस्मार्थ:-कृत्सित मत कुमत, कुस्मितो गुमा कुगुरु, कुग्राह.- सिद्धान्तप्रायस्वमविकस्पितायत्पदार्थममर्थनानुष्ठाणविषयो मानसोऽमिनिवेशः, जिन शास्त्रस्याज्ञानादन्यथा परिच्छेद• कुवोधा, सिद्धान्तामिहितानि विन्यासेन प्ररूपणा मणिता कुदेशना, तामाम् अशत:-लेशत । एतत् कि जिनगृह-अईद्ववन, जैनषि- भागवती प्रतिमा, जिनपूजन भगवपूजा, जिनयात्रादि-मगवत्कल्याणकासाहि कादि, एवन मर्च विधिकतमपि-जिनोत्तप्रकारेण निष्पादितमपि दानतपोवतादि-दान तपसी पूर्व व्याख्यातम् , बतादि-स्थूलप्राणातिपातविरमणादि, गुरुभक्ति-आचार्य शुश्रूषा, श्रुतपठनादि--मिद्धान्ताध्ययन । एतत् सर्वमपि उक्तहेतो. अनिए विधायि भवेद आदृवमपि माहुमानमपि। किमित्र ? चरभोजनामिन यथावसर हृय भोजन विपलानिक्षेपत्ता-गरलकणनिपाद अनभिमतकारि भवति-अनिविधायि मरति, एवारता कमतादि समर्गाजिनपूजनादिकमपि शुमदापि न भरतीत्यर्थ ॥ २० ॥ सकपटपति वर्षयतुमाह- भारुण्ड मुग्ध-मीमान् पहिशपिशिसयद् विस्यमामय जैन ॥ २१ ॥ व्याख्या-'हा' इति कष्टे, अय जनो-लोक' शठे..तिमिः पश्यते- विग्रलम्पो । किविशिष्ट.? अदाल-पिवे कविकल' धर्मेच्छापान, कहा शाकि- ज्यादिवशीकत इव यथा शाकिन्यादिवशीकृतः कनविद् वयत | कैः १ यात्रामात्रा धुपायैः, यात्रा-जिनयात्रा, सात्र-जिनसानम् , इत्यादय उपाया--प्रकायस्तःन केरल पात्रायुपाय., नमितक-निशाजागरादिच्छलैग, नमहितक-उपयाचिवक " मयता मिदानी मीहा उपद्र, मधुपस्थितस्तस्माद् माहिस्तभिवृत्तय जिनगोत्रशासनसुराणा + " इयद् द्रव्यमेषणीय "मिति । निशाजागरादिच्छलैः-रात्रिजागरणादिव्याजः किं कृत्वा वश्यते ? जैनबिम्बं आदर्घ्य दर्शयित्वा, कोऽर्थः ? जिनप्रतिमा दर्शयित्वा । न केवलं जिनप्रतिमां दर्शयित्वा तन्नाम्ना-जिननामधेयेन स्वेष्टसिद्ध्यै-आत्माभिमतनिष्पत्तये गृहान् कारयित्वा, कथम्भूतान् गृहान् ? रम्यरूपान्-मनोहरान् किंवत् दर्शयित्वा ? मुग्धमीनान् आक्रष्टुं बडिशपिशितवत् , यथा व्याधो बडिशे-मत्सवेधने पिशितं-मांसं विधाय मुग्धमीनान्-मुग्धान् मत्स्यान आकर्षयति ? हेयोपायोदेयविचारशून्यतया धर्म- श्रद्धालवस्तएव मत्स्यास्तान् ॥ २१॥ सर्वत्रास्थगिताश्रवाः स्वविषयव्यासक्कसर्वेन्द्रियाः ॥ २२ ॥ व्याख्या--कष्टमिति खेदेन उद्धतधियः-' नास्त्यस्मत् समो जगति संप्रति कश्चने 'ति दर्पाध्मातबुद्धयः तुष्यन्ति-मोदन्ते, पुष्यन्ति-वर्द्धन्ते च, किं कृत्वा ? सन्मुनि- मूर्द्धसु स्थित्वा-मुनिमस्तकेषु स्थिति विधाय, किं विशिष्टाः १ अन्त्याश्चर्यराजाश्रिताः- दशमाश्चर्यनृपानुगताः, यथा नीचा अपि केचन राजादेवष्टम्भेन महतामपि मूनिमा- रुह्य पुष्यति । एवमेतेपि दशमाश्चर्यराजाश्रिता महामुनीन् परिभूय पुष्यन्तीत्यर्थः । पुनः किं विशिष्टाः ? सर्वाकृत्यकृतोऽपि-कोऽर्थः ? लोकलोकोत्तरविरुद्धा-ब्रह्म- सेवनपुष्पफलाद्युपभोगायसदाचारकारिणोऽपि सर्वमकृत्यं कुर्वन्तीत्यर्थः । सर्वत्रास्थ- गिताश्रवाः लोकसमक्षम् अनिरुद्धपश्चाश्रवाः । पुनः किम्भूताः ? स्वविषयव्यासक्त- सर्वेन्द्रियाः, स्त्रविषयेषु-स्पर्शादिषु व्यासक्तानि-विशेषणलग्नानि इन्द्रियाणि-त्वगा- दीनि येषां ते । पुनः किम्भूताः ? बल्गाद्गौरवचण्डदण्डतुरगाः, वल्गन्त:-यदृच्छया प्रसरंतः गौरवैः चंडा:-उत्कटाः, दंडा:-अकुशलमनोवाकाया एव तुरगा येषां ते । पुनः किम्भूताः ? पुष्यत् कषायोरगाः सुपुष्टक्रोधसाः। एतावता पंचावविरमणे- पञ्चेन्द्रियनिग्रह-दण्डत्रयविरैति-कषायचतुष्टयजय-लक्षणसप्तदशविधसंयमविहीना अपि ते सत्साधूनतिक्रामन्ति, इति श्लोकार्थः ।। इदानीं दुष्टयतिभ्यो गृहस्था एव श्रेष्ठा इति दर्शयितुमाह- सर्यारम्भ-परिग्रहस्य गृहिणोऽप्येकाशनायेकदा ॥ २३ ॥ व्याख्या-'सारम्भ गृहिणोऽपि हृदि तीव्रानुतापो भवेत् । निष्ठुर- पश्चात्तापो जायते । किं विशिष्टस्य गृहिणः ? न रक्षत:-न पालयतः, किम् ? एका. - शनादि-एकमतादि, किं कृत्वा ? प्रत्याख्याय-नियम्य ! क? एकदा-अष्टम्यादि तिथिषु । यदि कश्चिद् गृहस्थ' अष्टम्यादितिथिपु एकमतादेनियम गृह्णाति पश्चात् त-खण्डयति तस्य चेतसि महान् पश्चाचापो भरतीत्पर्थः। किं विशिष्टस्य गृहिण.१ मा रम्मस्य परिग्रहस्य-सकलपापव्यापारतत्परस्य सदा-सर्वदा, ये पुनः विधा-मनोवार- कायारूपेण प्रिरिष-कवकारितानुमतिलक्षण पाप पट करवा-पटारान् प्रतिदिन-प्रति यामर प्रोच्यापि उक्त्वाऽपि भजन्ति-खण्डयन्ति तेपाम् अमाधूनां क तपा! तपो नास्ति, सत्यपचन च नास्त्येव । ज्ञानिता-सिद्धान्तपरिच्छेत्तृत्व च नास्ति । व्रत दीक्षा व नास्तीत्यर्थ: ॥ २३ ॥ देवार्थ-व्ययतो यथारुविकृते सर्वतुरम्ये मठे ॥ २४ ॥ व्याख्या 'देवार्थ' अहो । इति आवर्य सिवपटा:-श्वेताम्बरा कर व्रत चरन्ति-दुष्कर चारित्र अनुतिष्ठन्ति । किविशिष्टा ? माधुव्याजविटा:-यतिव्याजेन धूर्ताः । पुनः कथम्भूताः १ यथा रुचिकते-स्वमनोमिलापरूपे मठे नित्यस्थाः सर्वदा मनोरमजिनगृहनियासिन । कि कुन्तः १ देवार्थ व्ययता-उद्देवद्रव्य व्यय कुन्तिः । कपम्भूते मठे मर्च रम्पे-पलवसवादिऋतुमनोहरे । पुनः कयम्भूता १ शुचिपट्ट- तूलशयना:-निर्मलपट्टवस्त्रयुत् तुलशयनाः कोमलशय्याशायिन इत्यर्थः । पुनः कथ- म्भूताः १ सद्गब्दिकाचामनार-कोमलगन्दिकाचामनमाजः। पुनः कथम्भूताः १ मार- म्मा आरमसहिताः । पुनः कथम्भूता ? सपरिग्रहा:-धनधान्यादिमाण्डसग्रहपरायणा., सरिपया-विषयासक्तचेतसः सेा-मक्रोधाः । साझा सम्भोगविलासोत्कण्ठिता, सदा सर्वदा ॥ २४॥ इत्याधुव्रतसोपहासषपस स्यु प्रेक्ष्य लोका स्थिति ॥ २५ ॥ व्याख्या-'इत्यायुद्धत.' ये मिल्पोच्या-मिथ्यात्ववचनेन सुदृशोऽपि सम्यग्रहाना अपि मनो विनति-धारयति । कथम्भूत मन ? सन्देहदोलाचल इद समाचीन इद वा इति य सदेह' स एव दोला-हिन्डोलकरतेन पश्चल, ननु निश्चित सर्वथा निनपपप्रत्यार्थिन., कोयअईत्पयशनुभूवाः लोका:-जना स्थितिम्-अना चाररूपां भूत्वा इत्यादतमोपहातवचमः स्युः, कोय। उक्तप्रकारेण मदास्परचना मवेयु:-'अहो जैनाः अन्पयारादिन: अन्यथाकारिणः, अस्माकमेव दर्शन श्रेया, इत्यादि वचनमन्दमण, अतो हेतोः अमिमुम्बा अपि जना धुतपपात्-जिनसिद्धान्त - मार्गाद् वैमुख्य-विमुखता आतन्यते-विस्तारयति । मिथ्यावादिना मिथ्यावचनेन अभिमुखा अपि जना जिनमार्गाद् विमुखा भवन्ति, इति श्लोकार्थः ॥ २५ ॥ सधैरुत्कटकालकूट पटलैः सँधैरपुण्योधयः, व्याख्या-'सर्वैरत्कट० ॥२६॥ ' ततः' इति पश्चात् श्लोकस्यान वर्तते । ततो हेतोः-पश्चादुक्त हेतोः-अमुं-दुर्मार्गम् आसेदुषां-प्रस्थितानां मानसं नूनं निश्चित एतैः क्रूरमकारि-क्रूरं कृतम् एतै कैः ? सर्वैः उत्कटकालकूटपटलैः अत्युग्रविषसमूहै। न केवलं उत्कटकालकूटपटलैः सच अपुण्योच्चयैः-सकलपापराशिभिः, न केवलमेतैः सर्वर्या लकुलेश्च-अशेपसर्पसमुहैः, न केवलमेतैः ममस्तविधुराधिव्याधिदुष्टग्रहः सकलदुःखमनो- व्यथामङ्गलादिपापग्रहै। कथम्भूतानां ? दौरात्म्येन-दुष्टागयत्वेन जिनपथं निजन्नु पाम्-उच्छेतृणां, पुनः कथम्भूतानाम् ? बचनेन इति ऊचुपाम्-अभिदधुपाम् ।। २६ ।। अत:- - ? + - दुर्भेद्यस्फुरदुमकुमहत्तमः स्तोमास्तधी चक्षुपां ॥ २७ ॥ व्याख्या-'दुर्भेद्यस्फुरदुग्र०' अतो हेतोः सदा-सर्वदा मिथ्याचारवतां- मोक्षमार्गविपरीताचारयुक्तानां वचांसि सकर्णः-सश्रवणः कथं कर्णे कुरुते ? कथं श्रवणे धारयति ? अपि तु न कथमपि इत्यर्थः । कथम्भूतानां मिथ्याचारवतां ? स्वयं नष्टा- नाम् पुनः कथम्भूतानाम् ? अन्यनाशनकृते-परनाशाय पद्धोद्यमानां स्वयम् नष्टा परा- नपि नाशयन्तीत्यर्थः । पुनः कथंभूतानां महामोहाद् 'घन-प्रचुरतरा-विवेकात् 'अहं मानिना'-अहमेव, नान्यः इति मानिनां । पुनः कथम्भूतानां ? सिद्धान्तद्विषतां- जिनशास्त्रवैरिणाम् । पुनः कथम्भूतानां ? दुर्भेद्यस्फुरदुग्रकुग्रहतमःस्तोमास्तधीचक्षुषा- दुर्भेद्याः दुच्छेध्या स्फुरंतो-मनसि जाग्रद्पाः ये उग्रकुनदा:-जिनगृहनिवासादयस्त एव तमःस्तोमा:-अन्धकारपटलानि, तैरस्तं प्रापितं धीरेव चक्षुर्येषां तेषाम् ॥ २७ ॥ यत्किश्चिद् वितथं यदप्यनुचितं यल्लोक-लोकोत्तरो |॥ २८ ॥ व्याख्या-' यत् किञ्चित् ' यत् कुधियः-कुबुद्धयः तत्तद्धर्म इति ब्रुवन्ति- अयमेव धर्म इति कथयन्ति तत् दुरन्त-दशमाश्चर्यस्य विस्फूर्जित-विजृम्भितं, तत् , किं यत् किश्चित् वितर्थ-अलीकं यदिति सामान्यतो निर्दिष्टं विशेषतोऽनिर्दिष्टनामा, यदप्यनुचितम्-अयोग्यं यल्लोकलोकोत्तरोत्तीर्ण-जिनमार्गाद् बहिर्भूतं जिनप्रवचनवाचं , - - जिनमार्गादतीतमित्पी, याविना-देहिनां भवहेतुरेव येन समारबन्धो मातीत्यर्थः, यत. शास्त्राधाकर-सिद्धान्तविरुद्धं न केवल धर्म इति कथयन्ति । अहन्मतम्रान्त्या लान्ति च, कोऽर्थः ? जिनमार्गोऽयमिति मिथ्याज्ञानेन गृहन्ति च, कथम्भूतास्ते ? मृदाः ।। २८॥ साम्प्रत मुग्ध जनान् प्रति स्वमत मोक्षपथतया दिशत, सत्पथगामिनश्च धार्मिकान् स्ववचनाननुरोधित्वेनाशतया अवज्ञानानस्य कस्यचिद्यधा छन्दाचार्य प्राम पयोऽप्रस्तुत प्रामया स्वरूपमाह- पष्ट नदिशा नृणां यदिशा जात्यन्यदेशिका ||२९॥ व्याख्या-कट' दु खमेवमवेतमि वर्चते, यत्किमित्याह-यदिति वाक्योप क्षेपे, पन्नृणामदृशा जात्यन्धदेशिका कान्तारेऽमीप्सितपुराधान प्रदिशतीति सम्बन्धः । तत्र 'नृणा' पुमा नष्टदृशा-अलोचनत्वात् कान्तारपातेन दिङ्मूढत्याच प्रमप्राची प्रतीच्यादिकपविभागपरिच्छेदानां, अदृशांकाचकामलादिनों दृविकलाना, न त जन्मान्धान, जन्मान्धो जन्माभिव्यात्या लोचनरहितः। ननु सोऽपि तद्देशजात इतरेभ्यः श्रवणादिना विज्ञाय कपश्चिदिष्टपुरपथ देक्ष्यतीति तत्रोक्त “पैदेशिक" इति, विदेशे- योजनशतन्यवहिते देशान्तरे जातो वर्द्धितश्चेति वैदेशिकः। महि तद्देशतरूपमात्रस्पा प्पनभिवतात्कथ प्रकृतमार्ग जानीयादपि । तत. कर्मधारयः। कान्तारे' जनमश्चार शून्ये दुर्गवर्मनि 'प्रदिशति ' प्रतिपादयति अमीप्मितपुराधान-जिगमिपिमनगरमार्ग, किलेति वार्तायां, उत्कन्धर-उद्ग्रीय कन्धरामुनमग्य मुजदण्डमुत्क्षिप्य कथयतीति- फ्टमेतत् । तु' पुनरथे, इद वक्ष्यमाण पुन कष्टनर-पूर्वसादपि कष्टान्महाकर, यत् किमित्याह- सोऽपि प्रागुक्तो मार्गदेष्टा 'सुदृशो निर्मलनयनानत एव 'सन्मार्गगान्' इटनगरसुगमपथपस्थितान् तद्विद.' सम्यकमन्मार्गज्ञान् यत् इमति, सावज्ञमिति क्रिया विशेषण, सापहेल अशानिव, यथा मार्गामित्रा मार्गमुपदिशन्त उपहस्यन्ते लोकेन, ततेऽपि तेन । एष प्रस्तुतापमान योनपित्वा प्रस्तुतमुपमेयमिदानीं योज्यते, कटमेवन-यद नगा' सत्पधेच्नुपुरुषाणा नशा-अतिमुग्धतया मत्स्यपथविमा गानभिज्ञानात् , अश- मम्परनानदर्शनविकलाना नात्यन्ध.-मिद्धान्तरहस्पलेशान मिस मर्पया अगीतार्थ., मोऽपि गीतार्थसवामादे, कपश्चिन्मोधपथकयनप्रवीणः स्या पाह-वैदेशिको गहिताचारवाद् गीतार्थमुनिपुङ्गवमामात्रयर्जितः एप चाधुनिकदुस्साह प्रबरी निगा नियमपधप्रत्याधिमार्गकपनदीथितोऽय ययान्दशिरोमणिः कश्चिदा - चायों मन्तव्यः । कान्तारे-मवमहाटव्यां प्रदिशति अभीप्सितपुराध्यान-मुक्तिमार्ग उत्कन्धरो-दर्गिताहकारविकारः, तथा च सोऽगीतार्थः उन्मूत्र भापको मिथ्यादृष्टिः कथञ्चिदपि सत्पथं मोक्षमार्ग न वेत्ति, नाप्यन्येन गीतार्थेन प्रतिपादितोऽपि प्रत्येति इति कष्ट, एतत्कष्टतरं विति पूर्ववत् , सोऽपि प्रागभिहितो यथाच्छन्दाचार्यः सुदृशः-सम्य. ग्ज्ञानदर्शनयुजः मन्मार्गगान् ज्ञानदर्शनचारित्रलक्षणमुक्तिपथप्रवृत्तान् तद्विदो-मुक्ति- मार्गविज्ञान् धार्मिकान् सुविहितमाधुन् यत् हसति सावत्रमनानिव, यथा-कममी अगी. तार्था मूर्खशिरोमणयः सिद्धान्तरहस्य जानन्ति ?, अहमेव सकलश्रुतपारावारपारदृश्चा, ततो यमहं ब्रवीमि स मुक्तिमार्ग इति । किमित्येवमुपहसतीत्यत आह-तन्महाकष्टमित्यु- पमानोपमेययोस्तुल्यतया योजना । अत्र च मुग्धजनपुरतो निरङ्कुशं स्वकल्पितं चैत्य- वासादिकमुत्सूत्रपथं प्रथयद्विधिविषयपारतन्त्र्यग्ररूपणानिपुणान् , सुगुरुसम्प्रदायानुवर्तिनः सुविहितानसूययोपहसन् सम्प्रति वर्तमानः कुसङ्घाचार्यवर्गोऽनया भङ्गया कविना प्रति- पादित इति वृत्तार्थः ।। २९ ॥ साम्प्रतं श्रुतपथावत्राद्वारमुपसञ्जिहीर्षुः शुद्धिनमार्गस्य दुष्टोपचितसमुदितका- रणकलापेन सम्प्रति दुर्लभत्वं प्रतिपादयन्नाह- सैषा हुण्डावसर्पिण्यनुसमयहसद्मव्यभावानुभावा ॥ ३० ॥ व्यख्या-'सैपा हुण्डा' ॥ एवं अमुना प्रकारेण अनुकूल-प्रतिसमयं दुष्टेषु- क्रूरेषु पुष्टेषु सत्सु जैनमार्गो दुर्लभ:-अर्हत्पथो दुष्प्राप्यः, यदा तु क्रूराः पुष्टास्तदा जैन- मार्गो दुर्लभो जात इत्यर्थः । एवं कथं ? सैषा हुण्डानाम्नी अवसर्पिणी-कालविशेषः । कथम्भूता- अवसर्पिणी ? अनुसमयं इसद्भव्यभावानुभावा, अनुसमयं-प्रतिसमयं प्रतिक्षणं इसन्-हीयमानः भव्यजनानां शुभभावस्यानुभावा-प्रभावो यस्यां सा । अयं त्रिंशत् उग्रग्रहश्च । जिनसिद्धान्तोक्ताष्टाशीतिग्रहमध्यात् त्रिंशतः पूरणो भसराशिः, कथम्भूतो भस्म- राशिः १ ख-ख-नखमितिवर्षस्थितिः " पश्चानुपूर्व्या अंकरचना ज्ञातव्या" । खं- शून्यं, तत्पश्चात् पुनः खं-शून्यं, तत् पश्चान्नख-विशतेरंकः एतावत् (२०००) स्थितिः। अन्त्यदशममाश्चर्य च असंयतपूजाऽनाचारप्रतिपादकमाश्चर्य च तत्समा दुष्षमा च तैरैव-सपिणीभस्मराशिदशमाश्चर्यैः समा तत्समा दुषमा दुःखकारिणी, तस्यै जिनमतइतये-जिनमर्गौच्छेदनिमित्तं यद्येते तुष्टास्तदा जैनमार्गो दुर्लभ इत्यर्थः ॥३०॥ एवं तावदष्टादशवृत्तः प्रबन्धेन लिङ्गिनां श्रुतपथावज्ञा प्रतिपादिता। संप्रति 'गुणद्वेषधी 'रिति द्वारं निराकुर्वस्तेषां गुणद्वेषं दर्शयन्नाह- - सम्यगमार्गपुप प्रशान्तवपुष प्रीत्योल्लसश्चक्षुप ॥ ३१ ॥ व्याख्या-'सम्यग्मार्गपुपः०' ॥ उद्यद्पा-प्रचण्डक्रोधा' मत्माधून सुविहितयतीन् न शाम्यन्ति-न सहन्ते । किविशिष्टान् सत्साधून् ? सम्यमार्गपुप - ज्ञानादिनयस्य मोक्षपथो स्य] विस्तारकान् सम्यग्ज्ञान-सम्यग्दर्शन सम्यक्चारित्रपथ पोपकान् । पुनः किविशिष्टान् ? प्रशान्तवपुप:-रागद्वेषादिरहितशरीरयुक्तान् । पुनः किंविशिष्टान् ? प्रीत्योछसचाप:-प्रसन्नोत्फल्लनयनान् सर्वन सदयावलोकिन इत्यर्थः । पुन: किंविशिष्टान् ? श्रामण्यर्द्धिमुपेयुपा-पञ्चमहानतसम्पत्ति आसेदुपा-पश्चमहानतानि- प्राणातिपात-मृषावादा-दत्तादान-मैथुन-परिग्रहाणा त्यागस्तस्य सम्पत्ति उपगतानि- इत्यर्थः । पुनः किम्भूतान् ? सयमुप.-निरहङ्कारिणः । पुन किम्भूतान् ? कन्दर्पकक्ष प्लुपः मन्मथशुष्कवणदाहिनः । पुनः किम्भूतान् ? सिद्धान्ताधनि तस्थुप:-जिनोक्त सम्यग्मार्गे स्थितान् तत्परानित्यर्थः । पुनः किम्भूतान् ? शमजुपः-शान्तियुक्तान पुनः किम्भूतान् ? सत्पूज्यता जग्मुपा-विवेकजनाराध्यत्व प्रापितान् । एव गुणविशिष्टानपि सद्यतीन् उद्यद्रूप.-प्रबलकोपाः न शाम्पति- न सहन्त हत्यर्थः ॥ ३१ ॥ देवीयत्युरुवोपिण क्षतमहादोपानदेवीयति ॥ ३२ ॥ व्याख्या-'देवीयत्यु अहो' इत्याचयं जनो-लोकः अगुणानण्य अगुणभण्डार स्व-आत्मान कृतार्थीयति-कृतार्थमिराचरति-आत्मान निहितमकल- कर्त्तव्यमिवाचरति, कथम्भूतो जनः १ मिथ्यात्वग्रहिल:-प्रवलमिथ्यात्वगम्भीर प्रच ण्डमिथ्यात्वाभिनिवेशग्रहग्रहीतः। पुन' किं करोति ? उरुदोषिण -प्रचुरापराधान् देवी यति-देयानियाचरति, ये प्रपलदोपास्तान् । देवान्-जिनमदृशान् मन्यत इत्यर्थः । पुनः किं करोति ? क्षतमहादोषान् प्रणष्टप्रचुरापराधान् अदवीपति-अदेशान् साचरत्ति । पुनः किं करोति ? मूर्खमुख्यनिवह-महामूर्खयम्ह महीयति-मज्ञमिपाचरति । पुन. किं करोति ? तचनम् अज्ञीयति-पड्दर्शनवेत्तार मूर्खमियाचरति । पुनः किं फरोति ? जैनमार्गम् उन्मार्गीयति-कुमार्गमिवाचरति । पुनः किं करोति ? अपथ-अ- मार्ग सम्यक-पथीयति-सन्मार्गमिवाचरति । एतावता सर्वमेव विपरीताचरणमाचरती- त्यर्थः ॥ ३२॥ ये केचन दुष्टयतिनो मुक्तमिवारमान मन्यन्ते तान् दुपयितुमाह- मानाकृतपैत्यक्टपतितस्यान्तस्तरा ताम्यत ॥ ३३ ॥ व्याग्या-'सङ्घनाकृ० ' जन्तुहरिणवातस्य कुतो मोक्ष. १ जन्तव एस . , ५० हरिणाः, तेषां समूहस्य कुतो मोक्षः-कुतो निर्वाणम् ? कथम्भूतस्य जन्तु हरिणवातस्य ? सङ्घव्याघ्रयशस्य उत्सूत्र प्रज्ञापकः स्वच्छन्दचारी विषयलोलुपः साधु-साधी-भावक- श्राविकासमवायो भूयानिह सङ्घ उच्यते, स एव व्याघ्रः, यथा व्याघ्रा यत्तस्य हरिण- वातस्य मोक्षः च्छुटनं न भवति तथैवेति । पुनः कथम्भूतस्य ? सङ्घत्रा-श्रावकलोकेन कृतचैत्यकूटपतितस्य भक्त्या तदायत्ती कृतानि जिनगृहाणि, एतान्येव कूटाः मृगबंधन- यन्त्रविशेषास्तेषु प्रतिबद्धस्य । पुनः किं विशिष्टस्य ? अन्तस्तरां चेतोमर्मणि ताम्यतः खिद्यमानस्य मृगोऽपि वद्धः सन् चेतोमर्मण्यतितरां खिद्यति पुनः किं विशिष्टस्य ? सन्मुद्रादृढपाशबन्धनवतः सन्-तस्य सङ्घस्य मुद्रा चतुर्दश्यादिपर्वतिथयस्ता एव दृढ. पाशा, तैर्वन्धनं, तयुक्तस्य । अत एव सन्दितु-चलितुं अपि न शक्तस्य-न समर्थस्य । पुनः कथम्भूतस्य मुक्त्यै-मोक्षार्थ कल्पितदानशीलतपस:--विहितदेशचारित्रानशना- देरपि । एतत्क्रमस्थायिनः-एतस्य-सङ्घस्य क्रमो-रात्रिस्नानादिका परिपाटी तद्वर्तिनः। एतावद्-बन्धनयुक्तस्य तत्रापि संघसार्दूलवशस्य जन्तु-हरिणबातस्य कुतो मोक्ष ? न कुतोऽपीत्यर्थः ।। ३३ ।। इत्थं मिथ्यापथकथनया तथ्ययाऽपीह कश्चित् ।। ३४ ॥ व्याख्या-'इत्थं मिथ्या०' ॥ इह-लोके इदं अनुचितं-अयोग्यं कश्चिन्मा- ज्ञासीत् । इदं जिनवल्लमे-नोक्तं संघपट्टाख्यं अनुचिमिति मा कश्चिन्मस्त कया ? इत्थं- पूर्वोक्तप्रकारेण मिथ्यापथकथनया-दिगम्बरोक्तमिथ्यापथप्रकथनया । कथम्भूतया ? तथ्ययापि-सत्ययापि। अथानन्तरं कश्चिन् मा कुपत्-मा क्रोधं कापीत् । अथ यद्येवं मिथ्यापथकथनेन परेषां क्रोधशङ्का तदासौ न कथनीय एवेत्याह-' यस्मा 'दिति यस्मात् कारणादेतत् किमपि दिग्मानं कृपया-अनुकंपया कल्पितं-सकृत-जल्पितं च- अतिशयेनोक्तं च । किं कृत्वा ? नृन्-मानवान् प्रेक्ष्य-अवलोक्य । कथम्भूतान् नृन् ? जैनभ्रान्त्या-'अयं जैनमार्गः' इति मिथ्याज्ञानेन कुपथपतितान्-कुमार्गप्रस्थितान् कस्मै कल्पितं ? तत्प्रमोहापोहाय-तेषां नृणां प्रचण्डमोहनाशाय । यथाऽमी मूढाः कुपथः स्वरूपं विज्ञाय तत्परित्यागेन सत्पथं गृहीत्वा संसारसागरं तरिष्यन्तिीति कृपया जल्पितमित्यर्थः ॥ ३४ ॥ किमपि दिग्मानं जल्पितम् ? इति कथमुक्तं यावता सकलमेव कथं नोक्त- मिति-अतः आह- प्रोद्भूतेऽनन्तकालात् कलिमलनिलये नाम नेपथ्यतोऽर्हन् ॥ ३५ ॥ ?
- व्याख्या-प्रोद्भुत० या कश्चित नृपु-मनुष्येपु कुरोध निरसिमिपु सन् कुदेश- नोत्पादित दूरीकर्तुमनाः मन् दुरध्वे-कमार्ग दोपसख्या नियोक्-'कुमार्गे एतावत्- सख्या को दोप:' इति वक्तुमिच्छेत् म पुमान् अम्मोऽम्मोघे. प्रमित्सेत्-प्रमातुमिच्छेन् । घेति पक्षान्तर मालगगनोलाधन विधत्सेत-सकलाकाशस्याविक्रमणमिच्छन् । योऽम्मोs म्भोघेरगाहते, यक्ष ममस्तगनस्योधन करोति ममागें दोपसरव्यां वदति, अतो दिग्मान जल्पितमित्युक्त, तस्मात् कुषोध निरमिसिपु' कारुण्यात्-'माऽभी समारसागर सुडन्तु' इति कृपात. कथम्भूते दुरध्वे ? अनन्त कालात् प्रोद्भुते-अनन्तपर्पमामादिहेतना सजाते, कलिमलनिलये-दुःखमहापातकनिवारो। पुन कथम्भूते ? नाम नेपथ्यत:- नाममात्राचरणतः अर्हन्मार्गभ्रान्ति-ताधिकनिनमार्गमादृश्य दधाने-विनाणे । पुन: किम्भूते दुरचे तचत-परमार्यत' उदभिमरे-अहेन्मार्गघातक यथा अभिमरा प्रच्छन्न घातका, स्वचेपण राजदिक हनुमशक्नुवन्तो चेपपरिवर्जन कृत्रा राजादिक निमन्ती तथा- एतेऽपि गृहस्यवेपेणाईन्मार्गोच्छेद कर्तुमपारयतो यति-वेपेणोच्छेदयन्तीत्यर्थः ॥ ३५॥ न सायद्यानाया न यकुश-कुशीलोचितयति, ॥ ३६ ॥ - व्याख्या तथा 'न सावद्या०' इह-प्ररचन एते यतय-साधा अद्यापि दुपमा कालेऽपि त्ररतय. स्युर-सिद्धान्ताध्ययनाध्यापन-पाख्यान-श्रवणपरायणा. भवेयु । किम्भूता? येन सावधाम्नायाः न सपासप्रदाया.! पुनः किम्भूता. १ न शकशीलो चित यति-क्रियामुक्ता पकुरा शक्तमतिचारेण समल प्रक्रमाचारित्र, तथा पुत्सित धरण येषां, पाविता-पोग्या[क्रिपा]पाधु-सामाचारी क्या न पुक्का-न महिता., कृत्मित यति किपारहिता इत्यर्थः । पुन किनिशिया मदममताजीवनभपै.-न पुक्ता.-नात्पादि मदममता-गृहस्थादिपु जीविकानिहस्तस्माद् मप या ते तादृशान । पुन. fo विशिष्ट न सक्लेशासा-न रौद्राध्यवमायोत्कर्षा., पुन कि भूवा न कदमि निवेशान पत्सितमानमा प्रहयन्ता, पुन. कथ भूता १ न कपटप्रिया. न माया- षष्ठमा, एवाक्वा दुपमाफालतमाशद् अन्यत्कर्तुमपारयत इत्यर्थ ॥ ३६ ॥ सयिमा सोपदेशा ध्रुवकिपषिद क्षेत्र-कालापपेक्षा ॥३७॥ व्याख्या--'सपिमा सो०' अस्मिन्-निनशामन सत्सापा-मुविहित सुनय बन्या. । किविशिरा सरसाघर । सविधा-निवाणेच्छा । पुन. शिपिशिता?
- - सोपदेशा:-धर्मोपदेशतत्पराः। पुनः किंविशिष्टाः ? श्रुतनिकपविदः-शास्वरहस्य निपुणाः पुनः किम्भूताः क्षेत्रकालाद्यपेक्षानुष्ठाना:-देशकालानुमारेण विहारादिक्रियारम्भिणः । पुनः किंविशिष्टा ? शुद्धमार्गप्रकटनपटच:-यथार्थश्रुतपथप्रकाशनदक्षाः यथार्थमेव शास्त्र- पथं प्रकाशयन्तीत्यर्थः। पुनः किंविशिष्टाः ? प्रास्तमिथ्याप्रमादा-दूरीकृनमिथ्या शास्त्रोक्तयः । पुनः किम्भूताः ? नियमशमदमेत्यादि-नियमो-द्रव्याधग्रहः, शमः- कपायनिग्रहः,-दम-इन्द्रियदमन औचित्यं-सर्वत्र योग्यतानुसारेण विनयादि प्रयोक्तृत्वं, गाम्भीर्य-अलक्षहर्षादिविकारत्वं, धैर्य-विपत्सु अपि अविखिन्नत्वं चेतसोऽवैक्तव्यं, स्थैर्य - विचार्य करणीयकारित्वं, औदार्य-विनयादिनाऽध्यापनवितरणं, आर्यचर्या-सत्पुरुष- क्रमप्रवृत्तिता, विनयः-अभ्युत्थानादिना गुरुपु प्रतिपत्तिः, नयो-लोक लोकोत्तराविरुद्ध वर्तित्वं, दया-दुःस्थितादिदर्शना[दा ]न्ति -[ करणत्वं ] इति दाक्ष्य- धर्मक्रियासु नालस्य, दाक्षिण्यं- सरलचित्तता, ततो द्वन्द्वसमासः, एभिर्गुणैः पुण्याः पवित्राः । ईदृशाः साधवो चन्दनीया इत्यर्थः ।। ३७ ।। सांप्रत प्रकरणकारः प्रकरणं समाप्नुवन्-इष्टदेवता-व्याजेनावमानमङ्गलं, म चाय चक्रवन्धेन स्वनामधेयमाविर्विभावयितुमाह- विभ्राजिष्णुमगर्वमस्मरमनासाद श्रुतोलबने ॥ ३८ ॥ व्याख्या-अहं जिनं वन्दे-तीर्थङ्करं नमस्करोमि । किम्भूतं ? विभ्राजिष्णु-प्रत्यन्तं विराजमानम् । पुनः किम्भूतं ? अगवं-गर्व रहितं । पुनः किम्भूतं ? अस्मरं-जितकन्दर्प । पुनः किम्भूतं ? अनासादम्-अबसन्ननाशून्यम् । पुनः किम्भूतं ? श्रुतोल्लङ्घने सद्ज्ञानधुमणि- शास्त्रोल्लाने केवलज्ञान सूर्य । पुनः कथम्भृतं १ वरवपुः श्रीचन्द्रिकामेश्वर-श्रेष्ठशरीर-कार्तिक- कौमुदीनक्षत्रनाथं, पुनः किम्भूतं ? वयं-स्तुत्यं, कथम् ? अनेकधा-बहुधा, कैः ? असुर- नरैः-दैत्यमनुजैः, न केवलदैत्यमनुष्यैः शक्रेण च-इन्द्रेण च। पुनः कथम्भूतं १ एनच्छिदं- पापछेत्तारं । पुनः कथम्भूतं ? विदुपां-पण्डितानां दम्भारि-पापण्डश. पुनः कथम्भूतं ? सदा-सर्वदा एकान्तरङ्गप्रदं, केन ? सुवचसा-मधुरगिरा सदसन्नित्यादिरूपतया अनेकान्त- रङ्गप्रदातारम् । अत्र श्लोके सयत्नेन चक्रवन्ध उद्भावनीयः ॥ ३८ ॥ चक्रमिदमासन्नम् ।। जिनपतिमतदुर्गे कालतः साधुवेषैः, ॥ ३९ ।। व्याख्या-'जिनपतिमतदुर्गे' अधुना-इदानीं तैर्विषयिभिः इयं स्वगन्छ- स्थितिः अप्रथि विस्तारिता । कस्मै ? स्वार्थसिद्धयै-निजकार्यनिष्पत्तये, केवलं स्ववश- ? -
जननडाना धृतलेर आत्माऽऽयत्ती कृता ये मूर्वजनाः तेपा पन्धनाय भृहका-निगड
। कस्मिन् मति ? माधुवे -धूत: जिनपतिमतदुर्गे-अईलामनप्राकारे अमिभूने
मति, अईच्छासनमेव दुर्ग प्राकार' "कोट" इति मापया तस्मिन् विपयिमि-कामिमि
उपद्रुते मति पदा मगरच्छामनमेव दुर्ग प्रकार: धूः उपद्रुत तदा ते धूतः इस गच्छ
स्थिति निजगढ-मुद्रा विस्तारितेत्यर्थ. । कुन अमिभूते मति ? कालतः दुःपमाकाल-
दोपात् ! के ? मस्मकम्लेन्टमैन्य, यथा म्लेच्छमैन्य कस्मिंश्चिदपि दुर्गे स्वभुजबले।
गृहीते द्रव्पार्थ तदन्तचिनागरिकलोकबन्धनाय भृङ्खला प्रसारयति च तथा लिङ्गिन
स्वकार्यार्थ मूर्खजनबन्धनाय गच्छस्थितिं प्रमारितान्त इत्यर्थः ॥ ३९ ॥
सप्रत्यप्रतिमे कुमहवपुपि प्रोजृम्मिते भरमा ॥ ४० ॥
व्याख्या 'सप्रत्य-प्रतिमे ॥ इत्य-अमुना प्रकारेण लोक वय कदमहे-
उपहस्पामहे । कया ? मदागमस्य कथयापि-शुद्धसिद्धान्तधर्मस्य देशनाविचारमाने
णापि । किं कृत्वा ? एकीभूय-एकमत कृत्वा । कयम्भूतै लोंके ? तदानापर.-मोह
राजाज्ञापरे । कस्मिन् मति ? मोहराजकटकै प्रोटिं जग्मुपि मति, कोय. मिध्यान
राजमैन्ये प्रौढतां याति मति। न केवल मोहराजकटकै प्रोटिं जग्मुपि मति प्रागुक्तकमा
शरीरे प्रोज्मृम्भिते मति-अम्पद्यते सति, पुनः कस्मिन् मति ? दुरन्तदशमाश्चर्यम्-अस
पतपूनालक्षणम् , तस्मिन् पिस्फूर्जति मति । कुमहवपूपि । किम्भूते ? सप्रति-अधुना
अप्रतिम-अमरगे फयम्भूते दशमाश्चर्य ? भस्मकम्लेच्छातु उबले-मस्मराशितुरुष्काधि
पतिसैन्यैः-मस्मको मस्मराशिग्रह, स एवाईच्छामनरतानामेकपाषाविधापिन्वाद ने
कहा:-तुरुकास्तेपा सैन्यैः। यथा कश्चिन्महारानाधिराजो के छामहामामन्तै मण्डल
साधपति तथा अपमपि मोहराजा मसकादिमिर्जिनशामनमतिलहपतीत्यर्थः ॥ ४० ॥
वृत्तिकार-प्रशस्ति।
क जिनयामरिमरस्वती, पशिशोर्मम वागविमयोश्य ।
गुरुवपोवरिमा गुजा मल, मणयो फुगुजा प्रहरिप्पप ॥१॥
भीगीरदाम इति पीरजिनेश्वररण, पादाजपूजनपरायारितति ।
भीमानभूदमलीसिविमानरे, पेनाधा जगदिर परगारमा ॥
गरपारमोऽमदातगुणा ममप्र-मम्पत्यसंपदविवालिपुण्यराशि ।
भीमन् दमीर इति पीर , या कहगिनिश जिनपूजनाय ॥३॥
तत्पुत्रोऽतिपवित्रकर्मनिरतः सद्विद्यया सर्वतः, ख्यातः पोडशहायनोऽप्यरचयत् टीका स्फुटार्थाभिधाम । लक्ष्मीसेन इति प्रसिद्धमहिमा देवान् गुरूनर्चयन् , जीयाजीवदयापरः परपरीतापाऽर्तिहन्ता वरः ॥ ४ ॥ " अथ समर्थना- विमले श्रावणमासे, वर्षे त्रि-महिषु-चन्द्र-(१५१३) संगुणिते । कृतवान् लक्ष्मीसेन,-टीका श्रीसहापट्टस्य ॥ ५॥ अथांक ५०१ ।। ॥ इति श्रीलक्ष्मीसेनकृता श्रीसङ्घपदकटीका सम्पूर्णा ।।
অইমু নমঃ । श्रीजिनवल्लभसूरिविरचित श्रीहर्पराजोपाध्यायविहितलघुपतियुत श्रीसंघपट्टकः वन्दे शान्तिजिन शान्ति-फर कर्मोत्करोज्झितम् । महोदयेदिरोदारं, विसावपातकम् ॥१॥ भित्ता दुप्फर्मदुर्ग भामदमबलता साधिकद्वादशान्दै- उभे तीरश्री सदतिशयवती लीलया येन नृभ्य । भक्केभ्यश्च प्रदता स सुरमणिरहो । इष्टदस्त्व हि सार्व- स्तेनाल मा कुरुष्व स्वविमलकमलाल कृत वर्द्धमानः ॥२॥ जिनवल्लभसूरीन्द्र , कृत श्रीसपट्टकः । तद् व्याख्यामल्पपी कुत्रे, हट्टीकाऽनुसार ॥३॥ व्याख्या-~~अथ 'सपा क] ' इति क शब्दार्थ. १, उच्यते- सदस्य' ज्ञानादिगुणममुदायरूपस्य-साध्वादेश्चतुर्विधस्य 'पट्टको' व्यवस्थापन, यथा राजादयः स्वनियोगिम्यो व्यवस्थापन प्रयच्छन्ति ' अनया व्यवस्थया युष्मामिळ वहीव्य'-मिति, एवमिहापि साक्षाद्विपक्षदोपदर्शनद्वारेण स्वपक्षसुसदस्य व्यवस्था वक्ष्यमाणा दर्यत इति सद्धपट्टका । तत्रादि-इचम् ---- घहिज्वालावलीट सुपथमयनधीर्मातुरस्तोकलोक ॥१॥ व्याख्या-'स्तुम:' प्रणुम', अस्मत् य-प्रधुज्यमानेऽप्युत्तमपुरुषप्रयोगकथना द्वयमिति कर्तृपद स्वयमिह शेय, क ? देव, दीव्यते-स्तूयते शक्रादिमिरिति देव; म पात्र प्रकरणाव-अपिष्टदेवतात्वेन स्तवाईत्वालिना, सोऽपीह कमठचपोदुष्टतास्पटनलक्षणा साधारणविशेष[ग]योगात्पार्श्वनाथ त देव स्तुमा, यो जगादेव' प्रतिपादयामासेव । इव शन्दो उत्प्रेक्षाद्योतक किं ? इति तदेवाह-विधुरमित्यादि । 'माझे प्रेक्षाद्रिः 'कार्य' विधेय 'कुपवस्खलन' मर्वमामयेन पिराऽविसवादिशास्त्रविरुद्धमनिराकरण | " - किं कृत्वा ? 'प्रपद्य' अङ्गीकृत्य, किं ? ' विधुरमपि-व्यसनमपि । अपिः मम्भावने, एतत्सम्भावयति सति सामर्थ्य स्वापायशवया कुपथस्खलनाऽवधीरणं त्वनन्तजीवसंगार- कारणत्वेन महतेऽनयेति । कस्य विधुरं ? 'स्वस्य आत्मनः कथं ? मद्यस्तदक्षणात् । किलेत्याप्तवादे । कस्मादेवं जगादेव ? इत्यत आह-कारुण्यामृतान्धिः-'कथमयं जनो मया कुमार्गपथादुद्धरणीयः' इति कृपापीयूपसागरो भगवान् । नहि लोककृपां विना कश्चित्स्वकष्टमङ्गीकरोति । किं कुर्वाण एवं जगादेव ? इत्यत आह-'स्पष्टयन्' प्रकटी- कुर्वन् , किं ? कमठमुनितपः-कमठाभिधान-लौकिक-तपस्वि-पश्चाग्निरूप-कष्ठानुष्ठाता 'दुष्ट' प्राणिवध-लाम-पूजा-ख्यातिकामनादिदोषयुक्तं। कथं दुष्टं ? उच्चैरतिशयेन । कि कृत्वा ? 'सन्दर्य दर्शयित्वा, के ? 'नाग पञ्चाग्नितपोनिमित्तज्वलिताग्निकुण्डान्तर्वति काष्ठकोटरमध्यगं भुजङ्गं । किं विशिष्टं ? 'वहिज्वालावलीढ' निरन्तरं प्रज्वलद्वहिज्वाला- व्याप्तं अर्द्धदग्धमिति यावत् । क ? 'अग्रे पुरतः, कस्याः १ 'मातुः स्वजनन्याः, न केवलं मातुः, तथा समस्तलोकस्य । कस्मात्सकलजनमध्ये भगवांस्तत्तपस्तिरश्चकार ! यतः 'कुपथमथनधीः' असन्मार्गोच्छेददक्षः। एवं ज्ञानबल-ज्ञातकमठविधास्यमानजलघर- धारासम्पातादिस्वापायाभ्युपगमेनापि कमठतपसो दुष्टत्वं स्पष्टयतार्थादेतत्प्रत्यपादि- यत् मद् वद् भवद्भिरपि कुमार्गस्खलनं स्वकष्टाङ्गीकारेणापि कार्यमिति वृत्तार्थः ॥१॥ तदेवमिष्टदेवतास्तवमभिधाय-इदानीं सङ्घव्यवस्थोपदेशतचं कथनीयं. तच्च योग्यपुरुषस्य प्रतिपाद्यमानं साफल्यमासादयेत् , तेनोपदेशरहस्यभणनयोग्यं श्रोतारं निरूपयितुमाह- कल्याणाभिनिवेशवानिति गुणग्राहीति मिथ्यापथ ॥ २ ॥ व्याख्या-'उच्यसे' उपदिश्यसे, त्वमिति युष्मदो श्रोनिर्देशः, मयेति कर्तुरात्मनिर्देशः। ततश्च भोः श्रोतः! मया त्वं सङ्घव्यवस्था प्रतिपाद्यसे इत्यर्थः । कस्माद् ? इत्याह-कल्याणाभिनिवेशवानिति । इति शब्दा अत्र सर्वेऽपि हेत्वर्थाः । कल्याण:-शुभोऽभिनिवेश:-आग्रहः, सद्ग्रह इत्यर्थः, तद्वान् , सग्राहिणो हि सदुपदेश- रत्नश्रवणे परमानन्दः समुल्लसति १ । तथा गुणग्राहीति-अल्पीयसोऽपि गुणस्य ग्रहण- प्रवणः, दोपैकग्राहिणो हि अविद्यमानेऽपि दोपे तद्ग्राहकत्वमेव स्यात् २ । तथा मिथ्या- पथप्रत्यर्थीति, मिथ्यापथो वक्ष्यमाणो यथाछन्दप्ररूपितोत्सूत्रमार्गः तस्य 'प्रत्यर्थी' विरोधी, उत्सूत्रमार्ग श्रोतुमप्यनिच्छुः, उत्सूत्रपथाभिलाषुकस्य यथार्थसिद्धान्तोपदे- शस्त्रासाय स्यात् ३ । तथा विनीत इति गुर्वादिप्रभ्युत्थानादि करणलालसा, विनीतायैव - - - गुस्खा सिद्धान्तनच कथयन्ति ४ । तथा अशठ इति-जुस्वभाव , गुर्यादिपु जीविका (निहि.ति) निरपेक्षप्रवृत्तिरित्यर्थ, शठो हिन विद्यायोग्य: ५। तथा औचित्यकारीति च-लोयागमाविरोधेन गुर्वादिषु यथानुरूप मिनपादिप्रवृत्तिरौचित्य, तस्करणशील, औचित्प-हीनध्य शेषगुणा मन्तोऽपि कामसुममङ्कामा ६. तपा दाक्षिण्यीति, दाक्षि श्य-मनुकूलता-जनचित्तानुनर्तित्व, तद्वान्, निर्दाक्षिण्यो हि बन्धूनामप्युद्वेगकृत् । तथा दमिति-नितेन्द्रियः, अजितेन्द्रियो हि गुरुरोगयामपि मन्दायते ८) तथा नीतिभूदिति- सदाचारपरायणः, तदनो हि मऽपि माहाय्य भजन्त सदत्ते]९ तथा स्थीति, स्थैर्य- कार्यारम्मेऽनौत्सुक्य,तद्वान् ,उत्सुकाहि रामस्यन कार्यमारममाणा: शास्तारमप्युटेजयन्ति १० तथा धैर्यानि, घी-आपत्स्यपि मनमोऽक्षोम्पत्त, तद्वान् , अधीगेऽपि विमाकलित चेता गुरुमपि हीलयति ११ । तथा मद्धर्मार्थीति, म [व] न (?)-शोभनो धर्मो लोकप्रपाहरहित आजानुगतः शुद्धो मार्गः, तस्यार्थी-गवेषक १२ । तथा विषया निति, पारिणामिक्या बुद्धया युक्तायुक्तरिमझे विवेक, तद्वान् १३ । तथा सुधीरिति, सुधी:-प्रात:, असे हि वक्ताऽपि गुरुन किश्चित्सस्कारमाधातुमिष्टे १४ । तदेव पूोदित सकलगुणग्राममम्पन्ना व भोः श्रोता, तो मयोपदेशमन श्राव्य से इति वृत्तार्थ ॥२॥ इदानीं योग्यमीतार प्रति यहक्तव्य तत्प्रस्तावनामारचयितु धनद्वयमाह- इह किल कलिकालव्यालवत्रान्तराल ॥ ३ ॥ प्रोत्सपस्मराशिप्राइसरादशमाश्चर्यसाम्राज्यपुष्यन् ॥ ४ ॥ व्यारया-एव विधै प्राणिय, मति माधुवेपै मोऽय ' पन्धा मार्ग अप्रायोति मम्मन्यः । 'अतानि' विस्तारित , कोऽसौ ? 'पन्या:' म्वेच्छाकल्पित मत 'स' इति सकलजनप्रसिद्ध. 'अय'मिति इदानी प्रत्यक्षोपलक्ष्यमाण । करमप्राधि? 'अभित. 'समन्तादू भूरिदशेवियर्थ.। के ? माधुवै, माधो सुपिहितस्येव पो- रजोहरणादि नेपथ्य, न त्वाचारो, येषा ते तवति, मन्मुनिलिङ्गमापघारिभिः। कुत एत दित्याइ-विषयिमिा, विषयन्ति-समारगुप्ती बनन्ति आसेविन प्राणिनमिति विषया.- शन्दादय. तद्वदि , विषयामगो हि यतीना दीक्षया विरुदयते । फिरूप पन्था ? [निनोक्तिप्रत्यर्थी ] जिनानामुक्ति-वचनमागमः तम्य 'प्रत्यर्थी विरोधी । कस्मादेव रिष: पन्या अधिनस्त मल्लिरेत्यादि, मदग्लिए: सातत्यन धार्मिकजनोपनापकर्ता शैद्राध्य वमायवान् , द्विष्टो-मस्मर्ग-गुणवद् गुणधमनप्रगुणयुदि. मूढी-हयोपादेयरिमर्शशून्प', प्रखल:-प्रकण पिशुन. गुणपद् गुणासपणोरोपणचतुरा, जहो-दुर्मेधा योजन-स्तपामेव - , . - - चतुर्विधः स सङ्घस्तस्याम्नाय:-शिष्यप्रशिष्यादिमन्तानः तत्र रक्ता:-प्रीतिमन्तः, यद्वा सक्लिष्टादिविशेषणोपेतो जनो नाम सुविहितमझतस्याम्नायो-गुरुपारम्पर्यागतश्रुतविरुद्धा- चारणा, तत्र रक्ताः-पक्षपातिनस्तैः, ने हि स्वमदृशजनाचरितं प्रामाण्येन प्रतिपद्यन्ते, अत एव एवंविधा जिनोक्तप्रत्यर्थिनमेव मार्ग प्रथयन्ति । अथ दीप्यमान सूर्ये इत्र पारमेश्वरे पथि कुत एवं प्रथनस्य तमस इवावकाशस्तत्राह- जगति' लोके 'विरलता' स्तोकता-अल्पजनाभ्युपगमनीयता 'याति' प्राप्नुवति सनि । कस्मिन् ? जैनेन्द्रमार्गे- भगवत्प्रणीते शुद्ध प्रतिश्रोतसि पथि । कस्मादेतत् ? इत्यत आह-प्रोतसर्पदित्यादि, प्रोत्सर्पत्-श्रीवीरमुक्तिसमये तज्जन्मराशिसक्रान्त्या तत्पक्षसदस्य बाधाविधायित्वात् प्रोज्जृम्भमाणो भस्मराशिनामा-मङ्गलादिवत् क्रूरग्रहस्तस्य 'सखा' मित्रं, राजादित्वात् । ततश्च प्रोत्सर्पद्भस्मराशिग्रहसखं यद्दशमाश्चर्यम्-असंयतपूजालक्षण । अत्र च सख्यं भस्म- राशिदशमाश्चर्ययोलौकिकसखयोरिव द्वयोरपि साहचर्येण दुष्क[ऐकका]र्यकारित्वं यथा- छन्दप्राबल्यकारित्वेन मिथ्यात्वपोषस्तस्य साम्राज्यमित्र, साम्राज्यं यथा राज्ञः कस्यचित सकल-मण्डलाधिपत्य[रिपुवि] जयपुरस्सरमा श्वर्य साम्राज्यमुच्यते, एवमिहापि सुविहित जन-तिरस्कारेण सकललोकस्यासंयतजनवशवर्तित्वं दशमाश्चर्यस्य साम्राज्य, तेन 'पुष्यत्' एधमानं-बर्द्धमानं 'मिथ्यात्वं' अतचे तत्वप्रतिपत्तिरूप, तदेव 'वान्तं' अन्धकारं, सम्यग्ज्ञानावलोकन-निरासक्षमत्वात् , तेन 'रुद्धे' व्याप्ते जैनेन्द्रमार्गे । अथ क सति जैने- न्द्रमार्गे। मिथ्यात्व[ध्वान्त]रुद्धत्वाद्विरलतां प्राप्ते ? इत्याह-इह किलेत्यादि, इह-जगति, किल-शब्दार्थस्त्वग्रे वक्ष्यते, प्राणिवर्गे-मानव समुदाये सति । किंरूपे? लोकोक्त्या कलि कालो जिनोक्त्या दुःपमाकालस्तेन, कलिकाल एव-दुःपमाकाल एव निखिलानाचार- गरलनिलयत्वाद् व्याल:-सर्पस्तस्य 'वक्त्रान्तरालं' वदनमध्यं, तत्र स्थिति' अवस्थान 'जुषते' सेवते यः तस्मिन् । अत एव तत्त्वेषु भगवत्प्रणीतेषु जीवाजीवादिषु 'प्रीतिः एतान्येव वास्तवानि तत्त्वानि, न तु कुतीर्थिकप्रणीतानि, [इति] चेतसः प्रमोदः । तथा 'नीते' यायस्य-सदाचारस्य 'प्रचारः' प्रवृत्तिः । ततश्च गतौ-यथाक्रमं कुदर्शनाभ्यास-दुर्वि. दम्पत्वेन प्रमादाक्रान्तत्वेन च नष्टौ [तच्य]प्रीति-नीति-प्रचारौ यस्य स तथा, तस्मिन् । तथा, 'प्रसरत्' तथाविधगुरुसम्प्रदायाभावात्-प्रादुर्भवद् 'अनवबोधः' सम्यक- सिद्धान्तार्थापरिज्ञान, तेन परिस्फुरन्तः कापथानां 'ओघा' समूहास्तैः 'स्थगित!' तिरस्कृतः सुगतेरपवर्गलक्षणायाः 'सर्गो' निष्पत्तिर्यस्य स तथा, तस्मिन् । 'सम्प्रति' इदानी। किलेति सम्भावने, सम्भाव्यते एतत् यत्कलिकालानुभावात् सम्प्रत्येवंविधे प्राणिवर्ग इति वृत्तद्वयार्थः ॥ ३-४ ।। - , .
- - इदानी योग्यश्रोतुरग्रे साधुवैपकल्पिते पथि दशभिरे। तत्प्ररूपित धर्म कथयन् तस्य च कर्मनिर्मूलनक्षमत्वमसम्भावयन् इदमाह--- यत्रौदेशिकभोजन जिनगृहे वासो वसत्यक्षमा ॥ ५ ॥ व्याख्या -अत्र पथि अय धर्म:-चेत्कर्महरो भवेत् तदा मेरुरब्धौ तरेदिति सम्बन्ध । 'अत्र' अस्मिन् प्रत्यक्षोपलम्यमाने 'पथि' माग-लिनिकल्पिते मते धर्म औदेशिकभोजनादिः, अय ' चेत् ' यदि 'कर्महरो' ज्ञानापर्णादिध्वमदशो ' भवेत् । स्यात् तदानी मेरुलक्षयोजनमान:-पर्वतराजः 'अब्धौ' सागरे तरद । अय च 'निदर्शना लङ्कास-ततश्यायमर्थ -समुद्रे पापाणखण्डस्य तरणममम्भवि किं पुनमेंरोः १, ततो यथा मेरो ममुद्रतरणमघटमान एवमस्य धर्मस्य कर्महस्त्वमिति ! ' यत्र' यस्मिन्पथि, कि? यतीनामौदेशिकमोजनादिर्धर्म इष्यत इति सर्वत्र क्रियाऽध्याहार । तथा ' उद्देशेन' विकल्पेन-यतीन्मनसि कृत्वा निवृत्त-निष्पादित औदेशिक । क्रीतादिकत्वाद्-इकण् । तच तड़ोजन चाशनादि । यद्यपि सिद्धान्ते औदेशिकशब्द उद्गमदोपद्वितीयभेदार्थः श्रूयते, तथापीह वक्ष्यमाणवृत्तार्थपर्यालोचनेन आघाकर्मणि वर्तते, तस्यैवेह केरल यतिनिमित्त विधीयमानत्वेन महादोषतया विवक्षितत्वात् , उद्देशनिवृत्तस्य च सामान्य व्युत्पत्यर्थस्योभयत्रापि समानत्वात् । अत्र यत्तीनामौदेशिकभोजनग्रहणे यथाछन्दा युक्ति दर्शयन्ति-पूर्व हि बमोऽत्यन्त दानश्रद्धालयः श्राद्धा अभूवन , तेन यतीनां प्रासुकैपणीयेनापि भक्ष्येण निरावाध निर्वाहोऽभूव , इदानीं दुष्पमाकालदोपात् दरिद्रता मल्पता च गच्छत्सु श्राद्धेषु ऐदयुगीनमुनीना तथाविधशक्तिसहननविकलाना शुद्धेन मक्तादिना सयमनिहाभाचे यदि कश्चिच्यद्धालुस्तीर्थाविच्छेदमिच्छु श्राद्धः साधु सङ्घनिमित्तकृतभक्तादिनाऽपि धर्माघार शरीरमवष्टम्पयेत् तदा को दोष. १ आत्मा च यतिना यथा कथश्चन रक्षणीयः, तस्माद्यतीनामाधार्मिकभोजनमदुष्ट, सयम- शरीरोपष्टम्मकरसात् ,कल्पग्रहणाच्युद्धमोजनबद्वा। तथा यतिभिराधाकर्मिकमोजन विधेय, आश्रद्धावृद्धिहेतुत्यात, धर्मदशनवदिति प्रयोगावप्युपपद्यते १। तथा 'जिनानां' अर्हता गृह, तत्र यास' मर्वदाऽवस्थान । इह कचित्सुखशीलतयोद्यतविहार कर्तुमशक्नुवन्तो यतीना चैत्य एव मदानस्थान युक्तमिति प्रतिपेदिरे, ते चाहा-तस्मात् इदानीं जिनगृहनास एव साधूना समतः प्रतिमाति, न च तत्राधाकर्मिकादयो दोपा., तीर्थकरार्थ कतत्वात् । चैत्यम्-इदानीन्तनमुनीनामुपभोगयोग्य, आधार्मिकदोपरहित स्वात् , शुद्धाहारवदित्यादि । तदन सक्ष्मदृया विमृशता विदुषा चिचे चैत्यवास एवेदा- .
- - . नीन्तनमुनिनां सङ्गतिमङ्गति २। तथा चसत्यक्षमेति, वसतौ-परगृहे निवासं प्रति. अक्षमा-मात्सये, आधाकर्म-स्त्रीसंसक्त्यादिदोपजालरहितजिनगृहबासलाभे आधार्मिक- वसतिवासस्य अत्यन्तमनुचितत्वात् । को ह्युन्मत्तः पथ्याशनप्राप्तावपथ्यमश्नीयात् , तस्मा- त्परगृहवसतिरसमीचिनाऽधुनातनयतीनां । यश्चागमे परगृहयासः श्रूयते स तात्कालिक- सात्विक यति अत्यपेक्षयेति । तथा ' स्वीकारः ' स्वायत्तापादनं, केषु ? इत्याह-'अर्थो' द्रविणं 'गृहस्थः' श्राद्धः वैत्यसदनं ' जिनगृहं ततोऽर्थश्चेत्यादि द्वन्द्वः, तेषु । तत्र द्रव्य- स्वीकारस्यागमे निपिद्धत्वेऽपि साम्प्रतयतीनां तत्स्वीकारो युक्तः, तं विना ग्लान-परचक्र. दुर्मिक्षाद्यवस्थायां भैषजपथ्याद्यनुपपत्तेः । प्रायेण गृहमेधिनां कालदोपानिर्द्धनत्वेन निर्द्ध- मत्वेन च यतिचिन्ताद्यविधानात् , तेनार्थ स्वीकारः साम्प्रतिकमुनीनां सङ्गत इवाभातीति ४। तथा श्रावकस्वीकारोऽपि अद्यतनमुनीनामुत्सर्गापवादपदविदुराणां न नियुक्तिकः । पूर्व हि कालस्य सौस्थ्यादतिशयवत्पुरुषबाहुल्याञ्जनमतबाह्या अपि जनाः श्वेताम्बरभिक्षुभ्यः सवहुमानं भिक्षादिकं वितेसा, साम्प्रतं तु जैनमार्गवैमुख्येन तेषां तथाविध श्वेताम्बर- दित्साया अभावात् , अतः श्राद्धस्वीकारं विना भिक्षाऽवातेरप्यनुपपत्तयुक्तः सम्प्रति श्राद्धस्वीकारः ५॥ तथा चैत्यस्वीकारोऽपि मुनीना समीचीनः, सम्प्रति गृहस्थानां चैत्यचिन्तां प्रति निस्वधानतया यतिस्वीकारमन्तरेण कालेन तद्भश सम्भवाद मार्गलोपप्रसङ्गेन चागमे त्वर्थापत्या तत्स्वीकारस्याभिधानात् ६ । तथा न विद्यते 'प्रेक्षितं' 'चक्षुपानिरीक्षणं, आदिशब्दात्प्रमार्जन रजोहरणादिना यत्र तदासनं विष्टर स्यूतगब्दिकादौ शुपिरगम्भीरसिंहासनादौ च प्रत्युपेक्षणादि यतीनां न शुद्ध्यति, तेन च तत्र न कल्पते उपवेष्टुं । चैत्यावासिनश्चैवं प्रतिपद्यन्ते-प्रवचनप्रभावनाहेतोस्तादृशासनो पवेशनस्यापि साधियस्त्वात् , प्रवचनप्रभाश्नायाः प्रधानदर्शनाङ्गत्वेन यथाकथञ्चन विधेयत्वात् । ततः सिद्धमिदं-आचार्याणां गन्दिकाद्यासनमुपादेयं, प्रवचनप्रभावनाङ्ग- त्वात् , सम्मत्यादिप्रमाणशास्त्राध्ययनवत् ७ । तथा 'सावा' सपापं 'आचरित' आच- रणा, तत्र 'आदर' अग्रहः । आचरणा हि निरवथैव प्रमाणं, एपा तु सायद्या, गृहि]- ह (१) दिग्बन्धाद्याचरणाद्यभ्युपगमे यतेस्तद्विधीयमाननिखिलपापारम्भानुमत्याद्यापत्ते, तथा खेपा चैत्यवासिभिरादूता, यतस्तेपामयमाशया-प्रायेण सम्प्रतितन-यतीनां गृहस्था- न्योऽन्याकुट्या कलहेनाव्यवस्थया सर्वमसमञ्जसमापद्यते, तस्मादेपाऽप्याचरणाऽद्यतन- कालापेक्षया युक्तिमतीति ८। तथा 'श्रुतस्य सिद्धान्तस्य ' पन्था' मार्गस्तवावज्ञा- अनादरः । ते येवमाहुः-भगवत्सिद्धान्तो हि नैकान्तनिष्ठो, विहितानामपि केपञ्चिदनु- ष्ठानानां कचिनिषेधात् निपिद्धानामपि क्वचिद्विधानात् , अतो न आस्थां कृत्वा केवलया सिद्धान्तव्यवस्थया किमपि क परिहत वा पार्यते, तेनागमबहिष्टाऽपि काचित्सुकुमार . । . क्रिया अद्यतनमाधुप्रनिता विवेकिना नियमाय मविष्यति, किं तेनेति ९| तथा 'गुणिपु' पानादिवत्सु यति' 'द्वपधी' मात्मयबुद्धिा, सय निर्गुणाना तद्गुणानमहि- प्णूनां तदुपजिघांसया दुष्या मतिरिति एते च परगृहवामिनो धार्मिक मन्या आत्मान- मेवेक गुणैरुत्कय तो निखिलानप्यपरान् दुपपन्त ऐदयुगीन सहमध्यवमन्यमा नास्वत्प्रवृत्ति दरेण परिहरन्तो लोकव्यवहारमप्यजानानाः सहनाया एव, अतस्मांधते उच्छै त्तन्या, द्वेष एषु श्रेयान् १०३ "गौवमादिपु यतिवा-चादृशेषु यतिध्वनि । कथमेतेपु वःत ?, निर्गुणेष्वलसेति चेत् ॥१॥" "पक्षोगिरहा यद्, गुणायोगेऽपि यत्तते । निम्बादिषु सरुवानो,विना विप्रतिपत्तित ॥२॥" "यथा च जात्यरत्नाना, गुणामावेऽपि तादृशाम् । फाचे सान्द्राशु चारपिक्ये, मणिशन्द प्रयुज्यते" "गौतमादिगुणायोगे-पीदानी तामाधुपु । उघच्छत्सु स्वशत्यय, प्रवस्यति यविष्यनि ॥४॥" इति नास्ता क्षान्त्यादिदशपिघयतिधर्मस्पर्द्धयर यघाउन्दै प्रदर्शितो धर्मोऽय चेत्कर्महरो मवेदित्यादि पूर्वव्याख्यातमिति वृत्तार्थ. ॥५॥ इदानीमेवानि दशद्वाराणि यधाक्रम कथयन् प्रथम तापजीवोपमर्दाधनेकदोष प्रस्टनपूर्वमौदेशिकभोजनद्वार प्रत्याख्यातमाह- पट्झायानुपमध निर्दयपीनाधाय यत्सापित ॥ ६ ॥ व्याख्या-क 'सघृणो' दयालुपिंदन-महादिनिमित्तमेतन्निष्पन्नमिति जानन् इदेति प्राचो 'जियमति अतुमिच्छति ।। "अरे गनन्तस्प धमादेशे रूप"। किं तत् ? 'मह' साधुमाचीरूप श्रमण गणा आदिशब्दाद द्विवादिश्रमणपरिग्रहः, तस्य भक्त-- उरकते नितमशनादि, नामेति कुत्सापा, अवीन पुत्सितमेतद्भक्त यतीना, जानतो मुने कृपालोरेप विध मक्त मोक्तु न कल्पत इत्यर्थ । कय वरकृत्मित ? अव आह~ परमाधित, मच्छन्दस्य यच्छन्देन नित्यामिसम्बन्धात्, ततश्च यत 'माधित' निष्पादित, गृहस्पनेनि शेष । किं करवा ? 'आषाय ' उदिइय, कान् ! 'पीन्' पतीन् , यतिम्रो मयैतदेयमिति चिचे कत्वेत्यर्थः । अथ निरवद्यश्या यविनिमित्त कतेऽपस्मिन् को दो १ इत्याह- उपमृध' विषम्य ' पदकापान' पृथिम्पोनो पाप-चाम्पति-प्रमाणान् पदधिनीरनिरागान् । कथमुपमृय पाह-नियमिति हिपाविशेषण | Tनु मर वेतनत्यधं माधिन कस्मित, तथापि मिदातानिधान
दृष्यतीत्याह-' शास्त्रेषु' ग्रन्थेषु निशीथादिषु 'प्रतिषिध्यते । यतिभोज्यतया निवार्यते
यद्भक्तं, कथं ? असकत्-अत्यन्तदुष्टताख्यापनाय मुहुर्मुहुः, तथा च आहारोपधि-वसत्या-
चाकर्मविचारावसरे निशीथेऽभिहितं-
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एए सामनयरं, आहाकम्मं तु गिण्हए भुंअइ] जोउ ।
सो आणा अणवत्थ, मिच्छत्तविराहणं पावे ॥१॥" तथा पिण्डनियुक्तावपि-
'"आफम्म मुंजइ न पडिक्कमए य तस्स ठाणस्स । एमेव अडइ बोडो,लुत्तविलुत्तोजह कवोडो॥२"
दशवकालिकनियुकावपि-
" उद्दिट्टकडं भुंजइ छक्कायपमहणे घरं कुणह। पञ्चक्खं च जलगए,जो पीअइ कहन्नु सो साहू ॥३॥"
नन्वस्तु एवमागमनिपेधः तथापि तस्य मुनिना स्वयमकृताकारिताननुमतत्वात्त-
दा ददानस्य तस्य मुनेः को दोषः ? इत्याह-निस्त्रिंशता' निश्शूकता-निर्दयत्वं 'आधत्ते'
करोति यत्तत्तदाधायि-निश्शूकताकारकं यद्भक्तं । अयं भावः-स्वयमकृताचप्याधाकर्म-
जानन् गृहानो मुनिर्भक्तिमद् गृहिणः प्रसङ्गासञ्जनात् अत्यन्तगृध्नुनिश्शूकत्वेन सचित्तमपि
न जह्यात् , अतः कथं न दोपः ?, तदुक्तं--
"सञ्चं तहवि मुणतो, गिङ्गंतो वड्ढए पसंगं से । निद्धंधसो य गिद्धो,न मुअइ सजियं पि सो पच्छा॥१
अत एव अत्यन्तम् एतत् जिहापयिषया गणधरा आनुरूप्येण-उपमानानि
दर्शयामासुः। तथा चाह-गोमांसादीति, गो:-सुरभेर्मासं, आदिशब्दात् वान्तोचारसुरा-
ग्रहः तैरूपमा सादृश्यं यस्य तत्तथा । यद्भक्तमाहु-व॑वते गणधराः, यथाहि गोमांसमक्षणं
लोकधर्मविरुद्धत्वेन महापापहेतुत्वादत्यन्तनिन्दितत्वाच्च विवेकिनां सर्वथा हेयं, तथाऽऽधा-
कर्मभक्तमपि, एवं वान्तादिष्वपि यथासम्भवं योज्यं । अथेति प्रकारान्तरे, यद्भक्त
भुक्त्वा मुनिर्याति-गच्छति 'अधोऽधस्तात् , संयमादिति ज्ञेयं, अथवा अधोगति-नरकं ।
अत्र च घृत्ते एक वाक्यस्थेनैव यच्छब्देन सकलवाक्याथै दीपिते यत्प्रतिपदं यच्छन्दो.
पादानं तत्सङ्घादिभक्तस्यात्यन्तपरिहरणीयता ख्यापनार्थ । यत्साध्वाभासै:-इदानीन्तन-
कालापेक्षया यतीनामाधाकर्मभोजनमपीष्यते तदनुमानाभ्यां निषिध्यते, तथाहि-यतीना-
माधाकर्मभोजनमनुपादेयं, षड्जीवनिकायोपमर्द निष्पन्नत्वात् , तथाविध वसत्यादिवत् ।
तथा यतीनामाधाकमभोजनमभोज्य, धर्मलोकविरुद्धत्वाद्, गोमांसादिवदिति । एवं
चोपपत्रमेतत्-सङ्घादिभक्तं यतीना न भोक्तव्यमिति वृत्तार्थः ॥ ६ ॥
. - इदानीं देवडव्योपभोगदपणप्रर्शनद्वारेण जिनगृहवामनिराकरणायाह-- गायद्गन्धर्वनृत्यत्पणरमणिरपद्रेणुगुञ्जन्मृदङ्ग । व्याख्या-रानिधये, जिनगृहे ' अईन्मतज्ञा' मगरदागमनिपुणा यतयो नैव वसन्ति, दागमे तद् निवासम्यात्यन्त निवारणाद, मन्तो-विवेकिनः । कुतः । इत्यत आह-'सती' शोमनाऽकृत्रिमा भक्तिः तस्या 'योग्य' उचित, तस्मिन् , भक्तिरेन यतस्तर कर्तुं युज्यते । भक्तियोग्यतामेर विशेषतो विशेषणद्वारेण दर्शयति-गायदि- स्यादि, गायन्ती-भगवद् गुणानेपोत्कीर्तयन्तो ‘गन्धर्म.' प्रधानगायना यत्र तत्था, सुरपन्ती-नायाशास्त्रोक्तक्रमेण करचरणादि-अङ्गविक्षेप कुती'पणरमणी' पारस्त्री नृत्यकी यत्र तत्तथा, रणन्ती-मुखमरुताभिघातान्मधुर पनन्तो 'वेणयो' चशा यत्र तचथा, गुञ्जन्तो-मार्दतिक पाणिग्या ताडनाद् गम्भीर सनन्तो ' मृदगा' मरु[मुरजा यन्त्र वत्या, प्रेन्यो-लम्बमानत्वात् मन्दपवनेन कम्पमाना दयसेवार्थ विरचिताः पुष्प सना' पुष्पमाला यत्र तत्तथा, उद्य-भगवत्प्रतिमा पिलेपनार्थ विमर्दनममुच्छलद्ध द्वारेण प्रसन्मृगमदा-कस्तूरिका या तत्वधा, लमन्त:-पशुकमयत्वान्मुक्ताफलादि विच्छिति युक्तवाच दीप्यमाना उल्लोचा-यन्द्रोदया यत्र तत्तथा, चञ्चन्तो-महाधन- चखालकाराततशरीग्लाद प्राजिष्णो 'जनौपाः' श्रावकमा यत्र वचथा, ततश्व गायद्गन्ध च तवृत्यरपणरमणि चेत्यादि कर्मधारयस्तस्मिन् । एतानि दि भगवद्गुण गानादीनि प्रवराणि जिनगृह मक्तिहतुकानि, मध्यानां शुममावोडासहतुत्वाद प्रद्धालमि: नियन्ते, अथाविध मक्तियोग्यजिनगृहे किमिति साघरो न निवमन्ति ? अत आह- 'प्रसन्तो' विम्यन्त , कुतो ? दयद्रव्यस्य 'उपमोग: ' सतत तर शयनामनमोजनादि करणेन उपयोग तपा 'पा'शाबती-मारजीर अपना 'सुपरनिधित 'मठो' निनगृहजगतीमम्बद्धो यतिनिमित्तनिष्पन्न उपाश्रयस्तस्प 'पतिता' आधिपत्य-जिन गृहलेरयकोदाहिणिका कर्मान्तरादि सफलनिन्ताकारित्वेनाधिकारित्वमिति यावत् । तथा मगत्प्रतिमा-प्रत्यामत्ती भोजन-पनामन-निष्ठीपनाधविधिकरणेन मरत्याशावना आना, तवथ देवद्रव्योपमोगवेरपादि द्वन्द्व । ताभ्यः । अथ गृहिणा भगवत्रिमित स्त्र द्रविन निर्मापिते दागृहे चमतो देवद्रव्य कनकादिकमनुपमअमानस्य यते कर देव- द्रव्योपमोगा , निनद्रव्यनिष्पने हि तर नियमतस्नद्रव्य माक्षादानस्य गृण्डतो काम स्यादिति पेन, गृहिणा स्वदग्पनिर्मापितत्त्वेऽपि तम्मिन् दवा कृतन्वेन देनद्रव्यसाद, तपान तत्र पमतः माक्षानदामनुपसुबानम्यापि सुनेर्देवद्रव्योपमोगोपपरे, मासा दृध्यनिष्पन्न तु का वाता? इति पतिमिनिगृहे न पाम. कार्य इति पत्ता ॥ ७॥ . - .
इदानीं जिनाद्यासेवितत्वेन सिद्धान्तोक्तत्वेन च यतीनां परगृहवमति व्यस्थापयन् वसत्यक्षमा द्वारं काव्यद्वयेन निरसिसिपुराह- साक्षाजिनगणवरेश्च निसेवितोक्तां ॥ ८ चित्रोत्सर्गापवादे यदिह शिवपुरीदूतभूते निशीथे ॥ ९ ॥ -- व्याख्या-कः सकर्णः पुमान् 'परगृहे' गृहस्थगृहे 'वसति' निवासं 'विद्वेष्टि' मात्सर्यात् न क्षमते-निषेधयति ? मुनिपुङ्गवाना-सुविहितयतीनां, न कश्चिदित्यर्थः । अयमर्थः-अकणों हि कौँ विना सिद्धान्तोक्तामपि परगृहवमतिमनाकर्णयन् द्विष्यादपि, यः पुन: 'मकर्णः' सश्रवणः अथ च सहदयः-परगृहयामचैत्यान्तर्वामगुणदोपविचारचतुर इति, स परगृहवसतिं यतीनामनुमोदयत्येव, न तु द्वेष्टि । किरूपां वसति ? 'निषेविता' च सोक्ता चेति कर्मधारयः। कथं ? 'साक्षात्' प्रत्यक्ष-स्त्रयमित्यर्थः । कः ? जिन-स्तीर्थ- कृद्भिर्गणधरै-गौतमस्त्रामिप्रभृतिभिः । चः समुच्चये । जिनादिभिरुक्ता, तां । नथा सज्यते सक्यते जनोऽस्मिन्निति सङ्गः-गृह-धन-कनक तनय वनिता स्वजन-परिजनादिपरिग्रहः, निर्गताः : सङ्गात् निःस्सङ्गास्तेषां भावस्तत्ता, तस्या 'अग्रिमं' मुख्यं 'पदं स्थान मुनीनां परगृहवसतिः, अथवा निस्सङ्गताया 'अग्रिमं' मौलं 'पदं लक्ष्म-लिङ्गमित्यर्थः "पदं व्यवसितत्राण-स्थानलक्ष्माचिस्तुपु" इत्यनेकार्थवचनात् । निस्सङ्गाता हि मुनित्व- लक्षणं, वतिरिव दाहपाकादियामर्थ्यभ्य, तस्याश्च लिङ्ग परगृहवसतिः, नहि स्वाधीने विभवे विद्वान् कश्चित्परमुपजीवेदिति । अत्र च पदशब्दस्यावि[ शि एलिङ्गत्वान्न विशेष्यलिङ्गता किं कुर्वन् विद्वेष्टि ? इत्यत आह-'जानन्' आगमश्रवणेनावबुद्ध्यमानेः। कां ? शय्यातर इत्युक्ति-पा, ताम् । सिद्धान्ते हि शय्यातर इति मापा श्रूयते, न चासौ माधूनां परगृहवासं विनोपपद्यते, तथाहि-'शव्याया' वसत्या यतिभ्यो दानं, तया तरति संसारसमुद्रमिति शय्यातरशब्दार्थः, परगृहवसतिं बिना यतीनां न कश्चि- साधुशय्यादाने यतेत, न च तरणमस्तीति शय्यातरशब्दस्य स्वार्थालामे निर्विषयत्वा. पत्त्या सिद्धान्ते प्रतिस्थानमुच्चारणं कथमिव शोमां विभृणात् १, तस्मादागमे शय्यातर- शब्दथुतेरपि परगृहवसतिर्मुनीनां ज्ञायते । तथा अनगारपदं च, जानन्निति सम्बध्यते । चः समुच्चये। न विद्यते ' अगारं ' गृहं यस्यासौ अनगारः, ततश्च अनगार इति पद- व्यपदेशः, श्रुने ह्यनगारपदं यतिवाचकं प्रतिपदं श्रूयते, तच्च तेपां स्वागराभावेन परा- गारवासेन च सङ्गच्छते । अन्यथा स्त्रागारसद्भावे चैत्यवासे वा यथाक्रमं यतेहपति- मठपति-व्यपदेशप्रसङ्गेना-नगारपदवैयर्थ्यमापयेतेति । ननु यदि हि सर्वागमे चैत्य- .
, धामोऽनमिमन' म्याचदा परगृहमतिः क्षम्येनापि, पहा तु तत्र कश्चित्पपासे बपितेऽपि ठेनर मादि परगृहरमतिगम्यीयने, तदा कप धम्पत? इस्पाह- निग्रोमगन्यादि, यास्मान् प्रथचन 'निमिय' प्रास्पाध्ययने पक्षमोदेशकादी मिते ? मामान्यविधिकमर्गः रिशेपयिधिरपवाद' । उस्मर्गापवादति इन्द्रः। सतय पिनो' नानारियौ यमत्यादिगोचरात्मापवादो-मामान्यविशेषविधी या म तया, ना तथा शिपूणां मोगनगर्या 'दतभूत" मन्देशहरमशस्तन, भूतशन्दम्पात्र महश- यापिन्चात, 'प्राइ' प्रथम 'उत्तया' प्रतिपाद्य 'भूरिमदा:' प्रभृतप्रकारा 'गृहिगृह पमती' गृहम्पमदनपोषापान पमान-सम कारणे तथविषयमत्पलामलक्षणे हो 'सपोप' अपपाटविषयीप, ना पति गम्यने । अयमर्थ:-निशीय पूर्वमौत्मणिका चमनिगंदा पनियामयोग्ययन रुविना । - - " ममागुणपिसुख, यी-पशु-गट विनियम | सेपिन माल, विगार नि दोगायो॥१॥ " विनिमा गुधिया, पमा जुत्ता सिमित यमदीओ। परमपीयागु गो, गस्य पदोमा मेहुनि ॥ २॥ गया मापीरुरियोगिन- "गागुणामपन सनि-गन-गभीर भीगारागारविर,mar मित्रायरे भगिए| VIRAr, गागामिनिगिमा पेरमा । FTERोगा, गिंदा (पादाना ) मदी॥ ॥ नदनाम पधागा पापवादोगिता. पया-ट्रम्पप्रनिदापामपि यमनौशारणेन - " ormat, शिमगुतो गEिT पर! Faranाप, मोटि" 'r माRARH, रमोया । मापन-न-TV, Haririt " अद्धाणानिग्गयाई, तिक्खुतो मम्गिऊण असईए । गीयस्था जयणाए, वसंति नो भावपडिनद्ध ॥ ३ ॥ जह कारणे पुरिसे मुं, नह कारणे इस्थियासु विवसति । अद्घाणवाससावय-तणेसु य कारणे वसइ ॥ ४ ॥ तत अपोद्य किं कृतमित्यत आह-न्ययमि, संयतानां निवास इति सम्बन्धः । 'संयताना' सुविहितानां निवासो-ऽवस्थानं न्ययमि क ? ' अगारिघाम्नि' गृहस्थगृहे । कीडशे ? स्त्रीणां ' संसक्तिः। संसगों-रूपाधापातप्रत्यात्तिः । आदिग्रहणात्पशुपण्ड- कादिग्रहः । तद् युक्तेऽपि तत्सहितेऽपि, आस्तां तद्रहित इत्यपि शब्दार्थः । ननु "बंभवयस्स अगुत्ती" इत्यादि वचनात्स्त्रीसंसक्तिमति- " पमुपंडगेसु वि इई, मोहानलदीवियाण जं होइ । पायमसुहा पवित्ती, पुन्वभवमासओ तह य ॥१॥" इत्यादि वचनात्पशुपण्डकसंसक्तिमति च परसदने वसतां संयतानां मन्मथोक- लिकाद्यनेकदोप सम्भवात् कथं तत्र चासो नियमितः ? तत्राह-अभिहिता निशीथे प्रतिपादिता यतना स्त्रीसंसत्यादि सम्भवत्कन्दर्पविकारा असत् प्रवृत्तिनिवृतिपटीयसी तिरस्करणी कटाद्यन्तनिरूपा चेष्टा, यदाह- " जीउ पभूयतरा, सप्पवित्ति विणिवित्तिलक्खणं वत्थु । सिजइ विगइ नओ, सा जयणाणाए विइयम्मि ॥ १॥" आणाए विइयंमिति आज्ञया-आप्तोपदेशनीत्या 'विपदि' द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावा- दीत्यर्थः । 'तत्कारिणां' तदुद्यतानां, यथाह- " भावम्मि ठायमाणा, पढमं ठायति रूवपडिबद्धे । तहियं कडगचिलिमिली, तस्सा सइठंति पासवणे ॥ १ ॥" " पासवणे मत्तएसुं, गणे अन्नत्य चिलिमिलीरूवे । सल्झाए झाणे वा, आवरणे सद्दकरणे य ॥ २ ॥" "जहि अप्पयरा दोसा, आभरणाईण दूर उमिया। चिलिमिलीनिसि जागरण, गीए सन्झाय झाणाई ॥ ३ ॥ .
५७ - - " अाणनिग्गयाई, तिक्तुत्तो मगिण अमईए । गीयस्था जयणाए, वसति तो छ सागरिए ॥८॥" "अद्धागनिग्गयाई, पासे साक्यमए प णभए । भापलिया तिविहे वी, वसति जयणाइ गीयत्या ॥ ९॥" इय पतना स्त्रीसमक्तिरमतिमधिकृत्योक्ता । पशुपण्डकसमक्तायामपि बसतो यमताम एतदनुमारेण सम्मचिनी यतना दृष्टव्या, तदयमा-स्त्रीसमक्यादि मम्मवेऽप्येव विध यतना मारधानानां मुनीना नअन्या दोषा. प्रादृष्यन्ति मर्वत्रेति, मस्मिन् अपि वमत्यधिकारप्रवृत्तोदेशकादौ । नन्वेर यतनायतां चैत्यगासेऽपि को दोप? इत्यत आह न तु, 'तु' पुनर्मदऽवधारणे वा तेन न पुनर का 'मत' इष्टः कापि उद्देशकादौ चैत्यजिन गृहे नियामो नियाम इत्युमपन योज्यते, एतदुक्त भाति-यदि हि चैत्यवामो यतीनां कचिन्मतः स्यात् तदा स्त्रीसमस्यादि युक्त इव गृहे यमता, नत्रापि काश्चित् यवनां चूयाद न ध, नतोऽसीयते-अगारिधान्येव सया-यतीनां मो, न चैत्य इति । तसाद न माणेन तद द्वेषो विधेप इति काव्यात्यार्थः ॥ ९ ॥ माम्प्रतमर्धादिश्य-गोवरस्वीकार-द्वारप्रयमेपत्तेनाह-- मप्रग्याप्रतिपन्थिन तु धनस्वीकारमार्जिना , ॥ १० ॥ न्याख्यानलित्यक्षमायो, न क्षम्यत एतत्, यदुत-माधूना धनस्वीकार इति, यतो 'पनस्वीकार' द्रव्यमानह 'आहुः'घुवन्ति जिना', अत्र जिनानाम् इदानी मतीवत्येनोपदशामम्मगाद 'आहु.' इत्यत्रातीतरिमक्तिमातापि यद्वर्तमानकथन तत्तेपा म्यागमे० ग्रन्थमा हरिपाकप्रतिपादक स्फुरदूपतयाऽध यापदनुचिभिग्मेदाध्यामायेन वमानतयामामात तदुपदशदानप्रदर्शनेन शियाणा घनस्वीकार प्रत्यतिजिहीर्षा यथा म्यादिति धापनार्थ, एर उत्तरपदेऽपि योज्यम् । कीदृश'प्राज्यायामसङ्ग त्यागरूपाया दीक्षापा 'प्रतिपनियन' विरोधिन, विरोधचान वध्यधातालक्षण तपाहि- द्ररुपमाहो म परिणाम प्रमज्या च तद्विरतिपरिणामः तयो चान पलता मूपिरि गामेन तद्विरतिपरिणामो माध्यत इति नया 'गारम्मिणा'मालमापवारम्मप्रवृत्तानां गृहिणा परिग्रहो मर्माहतु' मामा शुद्धिः म नया, त । तुशन्दोऽयम्वीकारात अस्य मे प्रदर्शनार्थ, । अतिशयेन ' महामाय' महामपाप ' आरक्षते' पदन्ति, जिना इति पूर्वस्मा अनुरुप्यते । अत्र पाइरिति क्रियानुवृषपर मारपमिदागारक्षा इति पुनरमिधान - , द्वारान्तर-निराकरणमेतदिति ज्ञापनार्थम् । अयमर्थः-गृहिपरिग्रहे हि तत्कृतकारितादि- सकलमहारम्भ-महापरिग्रह-जनितपापानुमत्यादिना यतीनामपि तत्कृतादिनिखिलपाप- प्रसङ्गोऽतः कथं तस्य नातिमहासावद्यता ?, परकृतमहापापस्यात्मन्यध्यारोपणमेत्र चातिशब्दार्थः। तदुक्तं-"आरम्भनिर्भर गृहस्थपरिग्रहेण, तत्पातकं सकलमात्मनि सन्दधानाः । सत्यात् पतन्त्य-ह ह !! तस्करमोपदोपं, माढव्यनिग्रहमयं सितभिक्षुपाशाः ॥१॥” इति । अतएव गृहिपरिग्रहो यतीनां प्राश्चित्तापच्या श्रुते निवारितः, यदुक्तं " ओसन्न-गिहिसु लहुगे" त्यादि । एतेन गृहिस्वीकारं प्रति यत्परस्य पूर्व हि कालस्य सौस्थ्यादिना युक्त्यभिधानं तदपि निरस्तम् । कालदोपात् कुनीर्थिकादि-भ्यस्त्वेऽपि गृहिस्वीकारमन्तरेणापि भद्रकादि श्राद्धेम्यो यतीनामधुनाऽपि मिक्षादिप्राप्तेरुपपत्तेः, अतः केवल औदरिकत्वापच्याऽतीयोपहासपदं विदुषां तदर्थस्तत्स्वीकार इति । योऽपि "जा जस्स ठिई जा जस्स संतिइ पुवपुरिस कय मेरो सो तं अइ कमंतो अनंत संसारी उ होइ । इत्यागमोपन्यासः सोऽपि न भवदभिमतप्रसाधकः, अन्यार्थत्वात् , न हि गृहि- परिग्रहसाधकोऽयं प्रकृतागमः, किन्तु गणधरादीनां शिष्य-प्रतिशिष्यपरिग्रहविषयः, तथाहि-या काचित् अस्य गणधरशिष्यप्रतिशिष्यादेः स्थितिः-प्रतिक्रमणवन्दनादौ न्यूना- धिक-क्षमाश्रमणदानादि-लक्षणा सामाचारी, या वा यस्य सन्ततिर्गुरुपारम्पर्येणालोच- नादि दानविषयः सम्प्रदायः, या च पूर्वपुरुपकृता गणधरादिप्रवर्तिता ' मेरा' मर्यादा- गच्छव्यवस्था, तामतिक्रामन् अनन्तसंसारिको भवतीति, अत्र हि गणधशिष्यादीनां स्वस्वगुरुप्रदर्शित-स्थित्याग्रतिक्रमेऽनन्तसंसारितापत्या प्रतिनियतगणघरपरिग्रहविषयत्व- मवसीयते, श्रावकाणां तु सर्वधार्मिकगच्छेबविशेपेण भक्तपानादि भक्त्यभिधानात् । धर्मगुरुषु तद्गच्छे वा विशेषेण दानभक्तिप्रतिपादनं तत्तेषां दुष्प्रतीकारतया, न तु तत् स्वीकारविषयतयेति । एवं गृहिपरिग्रहः सर्वथा यतीणां नोचित इति ५। तथा .' चैत्यस्य ' जिनगृहस्य 'स्वीकरणं ' स्वायत्ततापादनं, तत्र । तुरत्रापि प्रथमद्वारादस्य भेदमाह-' गर्हिततमं ' प्रत्यहं सकलचैत्यकृत्यचिन्ता तद्दव्योपभोगादिना लोकेऽप्यति- निन्दितं ' माठपत्यं ' मठनायकत्वं ' स्यात् ' भवेत् ' यतेः 'मुनेः । एतदुक्तं भवति- चैत्यस्वीकारे हि यतीनां तचिन्तनं सकलमनुष्ठेयं, तस्य चारम्भदोपवत्तया द्रव्यस्तवत्वेन यतीनां निवारणात् , एवं च त्वमेव परिभावय मार्गानुसारित् या वुझ्या यन्मुनेर्देवा. धिकारं चिन्तयतः कथं माठपत्यमतिकुत्सितं न प्रसज्यत ? इति । लौकिका अन्याहु:- तथा-" यदीच्छन्नरकं गन्तुं, सपुत्रपशुबान्धवः । देवेष्वधिकति कुर्यात्-गोषु च ब्राह्मणेषु च ।। १ ।। तथा " नरकाय मतिस्ते चेत् , पौरोहित्यं समाचर | वर्ष यावकिमन्येन, माठपत्यं दिनत्रयम् ।। १ ॥ ३ ॥ - - इदानी निगमयति-यस्मात् अर्थे यस्मात् एव-मित्युक्तकमेण 'प्रतवैरिणी' चारित्र- प्रतिपन्धिनी, इति हेत्वर्थे मिन्नक्रमः म चाग्रे योक्ष्यते, ममता-अर्यादिपु स्वीकारयुदिः, इति यस्माद्वेतोर्न युक्ता-नोपपन्ना-'मुक्त्यर्थिना' निर्माणाभिलापिणा मुनिनामिति वृत्ताः ॥ १-१०॥ ६ ॥ साम्प्रतम् असयमादि-दोषप्रदर्शनेनाप्रेक्षितायामन-द्वार निराकर्तुमाह- भवति नियतमत्रासयमः स्याद्विभूपा ॥ ११ ॥ व्या-भवति' जायते 'नियत' सर्वदा 'अत्र गन्दिकाद्यासनेऽसयमो जीर रक्षाऽभाषा, गन्दिकादेनित्यस्यूतत्वादिना प्रत्युपेक्षणादि अमावे विवरादिना तदन्तः प्रवि टानां तदन्तरे चोत्पन्नानां या मादीनां तत्रोपवेशनेन मिनाशमम्मपात् । भिक्षोरिति वृत्तमध्यस्थ पद सर्वत्र सम्बध्यते । 'स्पात् ' भवेत् ' विभूपा' शोमा, तत्रोपविष्टस्प जगतोऽप्युपरिवर्पहमिति विभूषा कार्यभिमानप्रवृत्तेः, विभपा च यतीनामवश्य वर्जनीया, यदुक्त-"विभूसावत्तिय मिक्खू, कम्म बघह चिकण । ससारसायरे घोरे, जेण पडइ दुरुत्तरे ॥१॥" इति । 'नृपते. राजः ककुद' चित, राजादीनामे प्रायेण महर्दिकानां तत्रोपवेशन-दर्शनात् । 'लोकहासो' जनतोत्सासन, पशब्दो दोपसमुचये । 'मिक्षोः यता' अहो !! मिक्षोपजीविनी मण्डिता अपि एवविधासनेप्पविशन्तीत्यादि सेय॑जनवचन थवणात् 'स्फुटतरो' लोकप्रकटः। इह गन्दिकादौ 'मग' परिग्रहो महाघनत्वेन मूळ हेतुत्वाद 'सातशीलल' सुखलालमत्त्व, तदन्तरेण हमरूवादिपूर्णेषु सुस्पर्शपु तथानिधा- मनेषु यति अनुचिततया सिद्धान्तनिपिद्धेपूपवेशोऽमम्मची, उच्च-रतिशयेन, इति हेतौ । - एम्पो हेतुम्यो 'न बलु' नव, बलरसधारणे मुमुक्षो-र्मोक्षाबिनो यत्तेः 'सद्गत' युक्तियुक्त गरिकाचामन, उपमोगतयेति शेप । लोकप्रसिद्धो रूतादिभृत आसनविशेपो गन्दिका। आदिशब्दाद-मरसिंहासनादिपरिग्रहः । एतेन यदपि "नाणाहिओ वरतर" इत्याद्या गमरलेन प्रवचनप्रमावनाङ्गत्या यतीनां गन्दिकामिहासनादि-आसनोपवेशनमर्थन तदपि सुखशीलवापिलसित । तदेव यतीनां गन्दिकापामनमनुपादेय, असयमहेतुत्वाद, आधार्मिकमोनादिति चा: ।। ११-७॥ साम्प्रत सनामोचार-यावद्याचरितामिधान-पुरस्सर-तदोषप्रदर्शनेन गावध्य- चरितद्वार निरस्यमाह- गृही निपगच्छभाग जिनगृहेऽधिकारो यते ॥ १२॥ (पृथ्वी) - -- व्याख्या-'गतस्य पूर्व प्रस्थितस्य कम्पचिन 'अनु' पश्चाद् 'गन' गमन- मन्यस्य यत्तद् गतानुगनं, तदेपामस्तीनि गतानुगनिकाः । अस्त्यथै इक प्रत्ययस्तद्धितः। अयमर्थः-यथा गडरिकाः काञ्चन दिशं प्रतीत्य काश्चिदेकामविवेकां पुरो गच्छन्नीमत्रलोक्य तदनुमागेण पाश्चात्याः सर्वा अपि तामनुगच्छन्ति, न मार्गस्य सुगम-दुर्गमत्वादिकं मृग- यन्ते, तथा जिनप्रवचने सुखलोलतया कञ्चिदेकं प्रवाहमार्गे गच्छन्तं वीक्ष्य तच्छीलतयाs- न्येऽपि तद् न्यायान्यायतामविचारयन्तो ये तमनुगच्छन्ति ने संसारपथाभिनन्दितत्वात् तथोच्यन्ते, तैर्गतानुगतिकै-र्लोकप्रवाहपतितै-यंत्यामा: 'अद' एनत्सकलजनप्रत्यक्ष गृहिनियतगच्छभजनादिकं मायद्याचारितम् , अस्य मावद्याचरितस्य अनेकविधस्यापि समुदायरूपतयकत्व विवक्षणात् । कथमिति क्षेप "गर्भप्रकारखचनो निपातः" केन कुत्सित- प्रकारेण 'असंस्तुतं' यतीनाम्-अकृत्यतया अपरिचितम् अपि अनुचितमिति यावत् । 'प्रस्तुतं' प्रारब्धमानमित्यर्थः । तदेव नाम ग्राहमाइ-गृही श्रावको 'नियत' गच्छान्तरपरिहारेण- एकतरं 'गच्छे आचार्य प्रतिबद्ध यतिसमुदाय 'भजते' परिगृह्णाति म तथा, गृहिणां नियत- गच्छभाक्त्वे हि यतीनामिदानी सर्व भक्तपानादि निराबाध निर्वहतीति धिया तादृश गुरूपदेशेन गृही निश्चितनिजगच्छभाग भवतीति क्रियापदं यथासम्भवमध्याहार्य, गृहि- नियतगच्छभाक्त्वश्च यतीनां तद्गतमकलारम्भानुमत्यादिना पापसत्वप्रसङ्गेना-संस्तुतं । तथा 'जिनगृहे देवसदने ऽधिकार सकलतत्कृत्यचिन्तनं नियोगो 'यते'च्नेः, श्राद्वाना- मिदानीं तचिन्तानिरवधानता-व्याजेन अस्य चासंस्तुतन्वं चैत्यस्वीकारद्वार-निराकरणे प्रागेव दर्शितं । तथा 'प्रदेयं' वितरणीयं अशनादि, अगनं-भोजनमोदनादि, आदि- शब्दात् पानकादिग्रहः 'साधुपु' यतिषु । अत्र च सम्प्रदानेऽपि विषयविवक्षया सप्तमी । 'यथा-तथा' येन तेन प्रकारेण-अशुद्धमपीत्यर्थः। 'आरम्मिभिहस्थैरधुना केवलेन शुढे- नाशनादिना निर्वाहामावादिति, छमना अशुद्धाशनादि दानप्रवर्तनस्य चासंस्तुनत्वम् औद्दे- शिकभोजननिरसनावसरे प्रतिपादित । तथा 'व्रतं' सर्वविरतिः, आदिशब्दाद्देशविरति- सम्यक्त्वारोपण तदन्तिकगमनादिग्रहः, ततश्च 'व्रतादिविधेः सर्वविरत्यादि-अभ्युपगमस्य 'वारणं' निषेधः 'सुविहितान्तिक सन्मुनिसमीपे अगारिणां-श्राद्धानां, एतत् देशनापरिण- तान्तःकरणा न अस्मत्पार्श्वे दीक्षादिकममी गृहीष्यन्ति इति बुद्ध्या, एतस्य चासंस्तुतत्वं तेषां सुविहिताम्यासे देशनाकर्णन-व्रतादिनिपेधेन यत्याभास उत्सूत्रदेशना असिलताऽ- लून-विवेकमस्तकतया, तद्धेतुकानिबारित-प्रसरदुर्गतिवज्रपाता-पातनात् , अन्यदुर्गति- पातनं च यतीनां पापादपि पापीयः । एवं च चिन्त्यमानमाधुनिकमुनीनां सावद्या- चरितमागमविरुद्धतायाः कथं न जाघटीति ? इति काव्यार्थः ।। १२ ।। ८ .
, - इदानीं श्रुतपथा-वज्ञा-द्वार-निरासमुपक्रमते- निर्वाहार्थिनमुजिझव गुणलक्षातशीलान्वय ॥ १३ ॥ याख्या--'निर्वाहार्थिन' केरलोदरभरणप्रयोजन, न तु ससारनिस्तार काक्षिण, उज्झित-हीन 'गुणलः क्षमानिलेशैरपि, प्रव्रज्यायोग्यो हि पुरुप क्षमादि गुणवान् भाति, तदुक्त-" पञ्चजाए जोग्गा, आरियदमम्मि जे समुप्पना । जाड इलेहि विमिट्ठा, तह सीणप्पायकम्ममला ॥ १॥ एप पवइए चिग, अगय ससारनिग्गु महावा । तत्तीय नविरता, पयणु-कमायऽपहामा य ॥२॥" अय तु क्षमादि अशेनापि स्यक्तः । तथा 'शील' स्वमाया मवृत्त च ' अन्वयश्च ' कुल, शील चान्वयश्चेति द्वन्द्व, तता अज्ञाता-वविदिती शीलान्चयो यस्य म तथा, ता परीक्षित-शीलकुलस्य हि प्रवज्या- दान शास्त्रेऽमिहित, अविदितस्त्रमागो हि कषायदुष्टादिना क्वचिदपराधे गुदिना शिक्षित तमपि जिधामति,मज्ञातवृत्तोऽपि तस्करादि प्रनजिता तच्छीलस्यात् सन्तैन्या दिक कदाचिदारचन् गच्छमपि तुलायामारोपयति, तथा अरिदितकुलो दीक्षित. कथमपि कर्मोदयाद दीक्षा जिहासुनिरहशतया जहात्येप, कुलीनस्तु कदाचिदकार्य चिकीर्षुरपि कोरिन्य-सततगुरुशिक्षा-निरिडनिगडनियमितो न करोत्ये । तया 'मुण्डीकत' दीक्षित 'गुरुणा' आचार्येण | तादृशि-विनेयवशसमे वशे जातः म तथाऽकृलोव इत्यर्थः । तथा तेन तद सजातीयषिीय तुल्या गुणा निशीलतादयो धर्मा यस्य स तया । तत कर्मधारयस्तेन कर्मधारयसमामारणेन च गुरुशिष्ययो वशगुणात्पन्तमाजात्य व्यनक्ति, तारयो हि तादृशमेव पुण्डयते "समानशीलव्यसनेषु मख्य"मिति रचनात् । 'सार्याय' सप्रयोजनाय-सशरीरशुश्रूपादिहतवे, नतु समारदुःखेम्यो मोचयित, तमेव विध 'गदर्चपन्ति' मलयन-घु-मण-धनमारादिना वस्त्रादिना व मनत पूनयन्ति । 'अधिक' मिति क्रियाविशेषण-अतिरिक्त 'देवेम्पो' जिनेभ्योऽपि 'जना ' पारकलोकाः । ननु ते व पूजपन्तः तारगुणा एव भविष्यन्तीत्यत आह-विख्यातगुणान्वया अपि' जगती प्रचीतगाम्मीयाँदार्य-श्रमादिगुणमहाकुला अपि, आम्ता तदितर इत्यपि शब्दार्थः । कम्मादेवमित्यत आह-लग्नोमान्उग्रहा इति हेतुगर्म विशेषण | लग्ना-चेतमि निपिष्ट उपो' दो 'गच्छाहो' गच्छातिमन्यो येषां ते तथा मरतु निगुणो वा गुणी वाऽप, कि नोऽनया चिन्ता ! गुरुमिरयमस्माफ प्रदर्शित , नया अस्मदश्यरपि अय गुरु वेनाम्पुपगतः, न च य तेभ्योऽपि परीक्षा दक्षा, अत' तत्परिपाटीमनुरुप्यमाना नेन हाशाम इति विहितगच्छगोधरमनोऽमिनिया इत्यर्थः । अथ निराणामपि तेषा - ताक्षे निर्वन्धे को हेतुरित्यत आह-'महतो' अतिप्रबलस्य 'मोहस्य' मिथ्यामिनिवेश- स्यापि तथाविधाभ्यर्चनादिकं 'जृम्मित' लीलायितं, तथाहि-न गुरूपदर्शितत्वं निर्गुणेऽपि तच्छिप्ये अभ्यर्चनादि निवन्धन, यदि हि गुरु स्वाजन्यादिना निमित्तेन निर्गुणमपि स्वशिष्य मोहाद् गुरुतया दर्शयति नैतावताऽसौ बहुमानमर्हति, विवेकिनां गुणानामेव बहुमान हेतुत्वाद, ने चेत् तत्र न सन्ति तदा किं निष्फलेन गुरूपदर्शितत्वेन ?, तथा स्ववंशजाभ्युपगमस्यापि निर्गुणगुरु बहुमानहेतुत्वे लक्ष्मीप्राप्तावपि नृणां स्वलक्रमा- गतदारिद्यादेरपरित्यागप्रसङ्गात न चैवं लोक उपलभ्यते, यदुक्तं-" मुगुरुप्राप्तौ कुगुरुं, क्रमानुपक्तमपि जहति धीमन्तः । चिरपरिचितमपि नोज्झति, निधिलामे को नु दौर्ग- त्यम् ।। १॥" ततश्च स्थिते यन्निर्गुणेऽपि गुरुत्वाभ्युपगमेनाभ्यर्चनामि सन्धिः म महामोह महिमा एव इति वृत्तार्थः ॥ १३ ॥ एतर्हि गच्छमुद्रामुद्रिततया लोकानां सद्धर्माप्रतिपत्त्यादिना श्रुतावज्ञामीक्षमाणाः मविपादमाह- दुष्प्रापा गुरुकर्मसञ्चयवतां सद्धर्मबुद्धिर्नृणां ॥ १४ ॥ व्याख्या-'दुष्प्रापा' दुर्लभा 'सद्धर्मबुद्धि भगवन्प्रणीत-निरुप-चरित-धर्मजि- धृक्षा । पारमेश्वरस्य धर्मस्य सर्वस्यापि शोमनत्वाविशेषात् किं सदिति विशेषणेनेति चेत् ? न,वस्यापीदानी कालदोपात् अनुश्रोतः-प्रति श्रोतोरूपत्वेन द्वैविध्य दर्शनात् ,तथाहि-सुख- शीलजनैः सिद्धान्तनिरपेक्ष-स्वच्छन्दमतिप्रवर्तितो बहुजनप्रवृत्तिगोचरः पन्था अनुश्रोतः, श्रुतोक्तसकलयुक्त्युपपन्नः स्वयं भगवत्-प्रजापिनः प्रेक्षावत् प्रवृत्तिविषयस्तु प्रतिश्रोतः, अंतोऽनुश्रोतोऽव्यवच्छेदेन प्रतिश्रोतः सङ्ग्रहीतुं सदिति विशेपण । केषां दुष्पापा ? 'नृणां' पुंसां 'गुरुकर्मसञ्चयवां' महाज्ञानावरगादिसम्भारमाजा, सम्प्रति हि गुरुकर्मवाजीवानां न प्रायेण प्रतिश्रोतसि प्रवृत्तिरुपलभ्यते, यदुक्तं-" अयोग्यभावाद् गुरुकर्मयोगा-लोक- प्रवाहस्पृहया दुरापा । प्रायो जनानामधुना प्रवृत्तिः, पथि प्रतिश्रोतसि जैनचन्द्रे ॥१॥" जातायामपि कथकिञ्चित् भव्यत्वपरिपाकात् प्रादुर्भूतायामपि सद्धर्मवुद्धौ ‘दुर्लभो' दुरासदः 'शुभगुरु यथार्थसिद्धान्तप्ररूपनिपुणो लोकप्रवाहबहिर्भूतचेतोवृत्तिः कालाद्यपेक्षानुष्ठान- पटियः सूरिः। अयमर्थः-सद्धर्ममनोरथभावेऽपि सदुपदेष्टगुरुं विना नामावासाद्यते, यदुक्तं-" धम्मायरिएण विणा, अलहंता सिद्धिसाहणो । वायं । अरयव तुंबलग्गा, भमंनि संसारचकम्मि ॥१॥" स च प्रयेण साम्प्रतमुत्सूत्रभाषकाचार्यप्राचुर्येण तयाविधो नाल्पभाग्यलम्यः, यदुक्तं-“यस्यानल्पविकल्पजल्पलहरीयुग्युक्तयः सूक्तयः, सजं जर्जर- - -- - - - यन्ति ससदि मद पिस्फूर्ततां गादिनाम् । पश्चोत्सूत्रपद न जातु दिशति व्याख्यासु स प्रापते, सम्बारित्रपवित्रित, शुमगुरु' पुण्यरगण्यैर्यदि ॥१॥" प्राप्त:-समासादिवः 'म' उदितगुणगुरुगुरु 'पुण्येन ' मनान्तरसम्मृतसुकतेन चेत् यदि, तथापि- शुभगुरुप्रासापि कर्तु' विधातु स्विहित ' आत्मन आपतिसुखावह फर्म मद्धर्म- प्रतिपचिलक्षण 'नाल' न ममर्था 'अमी' पुण्यप्राप्तशुमगुसो मार्या । अथा सादितसुगुरवोऽपि ते किमिति न सहिताय यवन्ते ? इत्यत आह-'गच्छस्य' स्वपशा भ्युपेत यतिवर्गस्य 'स्थिति: 'युप्मत्कुलादृतोऽय गच्छोऽत एन विहाय युष्माभिः नान्य देशना-प्रवण-सम्यक्त्व प्रतिपत्यादिक विधेयमिति गृहिणः प्रतीत्य लिङ्गिकता व्य वस्था, तपा 'याहवा ' एवविधशुमगुरु प्राप्तावपि नि सत्यतया किमेना गच्छस्थिति मुनामो न वेतीति कर्तव्यतोद्धान्तान्त करणा! एव गच्छस्थितिव्याहव तेषां सहित करणामामय॑मुपलभ्य तदुपचिकी' चेतः समुल्लमत्करुणापारावार, प्रकरण कारः प्राह- कम' इत्यादि, अतः क पुरुषविशेष 'मो' मणाम. १, क 'ह' जगति ' आप पेमहि सेवैमहि' क 'आराध्येम' दानादिनोपराम. १, एतपा मणनादीनां मध्याम्कि 'कुर्मह' विदध्महे १, यदि कस्यचिन्महात्मनो भणनेन आराधनेन वा गच्छस्थिति विमुच्य सद्धर्मप्रतिपक्ष्या एते स्वहितमाचरन्ति तदेतदपि क्रियते, परोपकृति दी-क्षित्वात्सु पुरुषाणामिति । अषया पदाहि प्राप्तसुगुरसोऽपि तप जानाना अप्येव गच्छस्थित्या व्यायन्ति तदा क मम इत्यादि, असमर्थ -अजानानो हि तत्व स्वय वा कस्यचिद्रण नाराधनाग्निा वा तबोधयित्वा सद्धमें स्थाप्येतापि, एते च मूढा जानन्तोऽपि गच्छ स्थितिष्पाहता, इति कथ तत्र स्थापयितु पार्यते ?, तत् सर्वथाऽस्मतस्पमीपा मन्मा गम्यवस्थापने न कचिदुपाय प्रतिस्फुरति, अत कि कुर्महे ' इति विपादाचन । दमदम्पयं-महासत्तमसोपादेयो झय मद्धर्म , एते चातिकीया., अन्यथा कि विदुर्गा गच्छस्थितिमिया', यदि हि लिङ्गिन बलामादिहेतुना गच्छस्थिनि दर्शयन्ति, तथापि गृहिणा परीक्षापूर्य धर्म' प्रतिपत्तव्य इति नाथ ॥ १४ ॥ इदानी कम्पतिदयोग्यस्पा-पार्यपदपाया नदमचेष्टितप्रदर्शनेन थुनावो माययमाह- सुरशाम फिल कोऽपि रतिगुरू प्रमश्य परये एचित् ॥ १५ ॥ पारपा-'सुत्क्षाम.' पुसुक्षा धीमधि गृहम्याचम्पायां, रिलेति गम्भावने, योऽपि-मातनामा यो मिशाको पन मितोऽशुकम्पितो चा 'शिशुको' पाल, "इसापामगुमने पाक" तो यूपामो शिरुति कर्मधारय । रहस्य पा , कस्यचित् शिशुक इति, प्रव्रज्य-मुण्डीभृय 'चत्ये' लिङ्गिसम्बन्धिजिनगृहे, कचि- दनिर्दिष्टनाम्नि 'कृत्वा' विधाय लञ्चादिना कञ्चन कमपि बद्धमूलं बलीयांसं यति श्रावक वा पक्षं सहाय, न ताक्साहाय्यं विना तादृशा:-आचार्यपदलामसम्भवः । 'अक्षतकलि' यत्किञ्चिनिमित्तमात्रं प्राप्य शिक्षादिभिः सह नित्यमखण्डितकलहः 'प्राप्त आसादित. [स्सन्वान् सन् (१) तदिति विवकिनां विडम्बनास्पदं 'आचार्यक' आचार्यत्वं-मूरि- पदमित्यर्थः । 'चित्रं' अद्भुतमेतत् 'चैत्यगृहे' देवभवने 'गृहीयति' गृहहवाचरनि, यथा निजगृहे गृही शयना-मन-पान-सम्भोग-ताम्बूलभक्षणादिकं निश्शत समाचरति, तथाऽयमपि । नथा 'निजे' स्वकीये गच्छे 'कुटुम्बी यति' कुटुम्बडवाचरति, यथाहि गृहस्थः कुटुम्वे पर्वदिनेषु दानानुप्रदानादिषु प्रवर्त्तते, एवं एपोऽपि माधुमाध्च्यादि वर्ग तथा प्रवर्त्तमान एवमुच्यने । यदि या आचार्येण हि स्मारणवारणादिपूर्वकं प्रत्युपेक्षणप्रमार्जन- शिष्याध्ययनाध्यापनादिनोत्तरोत्तरगुणस्थानाधिरोपणेन स्वगच्छो नित्यमेवेक्षणीयः यथा दोपं च शिक्षणीय इति सिद्धान्तस्थितिः । यथा गृही द्रव्यार्जनगृहकर्मादिकरणदक्षं पुत्रादिकं बहुमन्यते तदन्यं चात्रमन्यते तथा गच्छमध्याद्विश्रामणादि शुश्रूषाकारिणं सदोपमपि भृपयते तदन्यं च सद्गुणमपि दुपयति, इति गृहिकुटुम्बप्रक्रियावर्तित्वात् तथा- अभिधीयत इति । तथा 'स्व' आत्मानं 'शक्रीयति' शक्रमित्र-पुरन्दरमिवाचरति, सहि नीचत्वात् तथाविधचैत्यद्रव्य-शिष्यश्रावकादि-समृद्धिदर्शनात् उन्मदिष्णुः शक्रोऽहमित्य- भिमन्यत इति । तथा कतिपयशास्त्रसिद्धान्तज्ञ तया 'वालिशीयति' बालिशानिव-मूर्खा- निचाचरति 'बुधान् ' विचक्षणान् , अहमेव सकलशास्त्रपारगामी, किममी अज्ञा विदन्तीति । तथा अतएव विश्वं 'वराकीयति' बराकमिव-रङ्कमिवाचरति । अयमा- शयः-ईश्वरो हि कश्चित्प्रव्रज्य प्राप्ताचार्यपदः सन् निर्विवेकतया कथचित् चैत्यगृहादिषु गृहीयतीत्यादिकं विदधालोऽपि न तथा लोकानां चित्रीयते, गृहवासेऽपि लोकैस्तथा दर्शनात् , अयं तु रङ्कशिशुर्दीक्षित्वा मूरिपदासादनेन तथा कुर्वाणे जनानामुपहास- विषयतया महदाश्चर्यभाजनं, तदहो!! अत्यन्तमाचार्यादिअनुचितचैत्यगृहे गृही-यत्य- दिना असचेष्टितेन श्रुतपथावज्ञा पापानां मलिनयति प्रवचनमिति वृत्तार्थः ।। १५ ।। सम्प्रति पुत्रपित्रादिसम्बन्धं विनाऽपि हठाल्लिङ्गिकृतलोकवाहनोपालम्भद्वारेण श्रुताचज्ञा प्रतिपादयन्नाह- यैर्जातो न च वर्द्धितो न च न च क्रीतोऽधमों न च ॥१६॥ गाख्या-यैः लिङ्गिभिरयं जनो न च जातो, जनेरान्तर वितेनर्थत्वात्-न जनित:-पित्रादिरूपतया न जन्म लंभितः । चकाराः सर्वेऽपि समुच्चयार्था अवधारणार्था - - . वा । अथ माभूद जातस्तथापि वर्द्धितो मरिष्यति, एतावताऽपि बलात् तद्वाहन सिद्धि अत आह-वदितोन चेति, एवमुत्तरपदेषप्याशय योजना कार्या, गर्द्धितो-योगक्षेमादि- मम्पादनेन शरीर-पोषं प्रापितः। न च 'क्रीतो' मूल्पदानेनान्यस्माद् गृहीतः । अधमणों नच, उत्तमर्णम काशाद उद्धारादि प्रयोगेणार्यगृहीताऽधमणः। अत्र च यैरिति फर्वतया सम्बन्धानुपपचेयपामिति मम्मन्धविवक्षया यच्छन्दो गोज्य , अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति न्यायात् । तेन येषां लिहिनामय जनोऽधमणोऽधंधारपिता न भाति, एवमुत्तरमापि पधासम्भव येपामिति सम्बन्धनीय। तथा य: 'प्राद' पूर्व योनलोकितो नच, अयमधी-ये लिटिभिः सश्राद्धा दरदेशचित्वात् कदानिदपि न दृधास्तेऽपि स्वगच्छग्रह प्रस्तत्वादन्य गुरु नाचाऽपि न सम्मापन्ते, तमेर गच्छगुरु ध्यायन्त: कालमति वादयन्ति । पान्धरः 'पितृप-प्रातव्यादिसम्बन्धमाग् न च वेषां न च 'प्रेयान ' गल्लमवरी मैयादिमम्पन्धेन, न च 'प्रीणितो' दानज्ञानातिशयादिना वोषितः, तैरव प्रागुक्तमम्बन्धामावेन लोकवाहनयोग्यतारिकलैलिनिमिरेव । “एर इत्यव्ययमिह परिमवे ईपदर्थे वा" । ततश्च महापराभवोऽय-यत् तादशैरपि लिविभिलों को बाहत इति 'पलात् ' हठेन, न तु प्रणयेन वाहते' वशीकृत्य सकार्याणि कार्यते 'अप गच्छमहाग्रहगृहीना प्रत्यक्षोपलम्यमानो 'जनः श्राद्धलोको 'नयोतो नास्तिक 'पशुवत् ' खुपमादि इव लिङ्गिभिस्तूतमम्बन्ध पिनाऽपि यदेव लोको बाह्यते तन्महा परिमव इति, ननूक्तमम्बन्ध विनाऽपि सद्गुरुत्वेन तेषा नस्तितपशुवल्लोका कार्याणि निर्मापयिष्यन्ति, न अनुपकन-परहितरतानां गुरूणां धर्मदानोपकारस्य प्रत्युपकारः कातुं शक्यते, अत आह-अत्यधमाधमरिति, लोकलोकोत्तरगहिवतम-साध्वीप्रतिसेवा देवगप्पमक्षण-सुविहितपात-शामनोहाइप्रभृति-भृरिपापकर्मनिर्माणात् अतिशयेनाध मेभ्योऽपि-हीनजातीयेम्पोऽप्यधमेहनिः, अतः कथमपां सद्गुरुतपा लोको चाहनीयो भविष्यति, अवविध मि कथ तर्हि वाइयितु लोकः पार्यते ? अत आह-'कनमुनि- पाज' प्रपञ्चचतुरतया विश्वामोत्पादनेन मुग्धजनस्य विप्रलिप्मया रचितशान्तरूप मासोपनामकरणादि छमभिः । अयम-एवमममजमकारिणोऽपि लिनिनो विधम्म हेतु उपाविषयतिरपप्रदर्शनेन सुकरपथप्ररूपणेन न सुखलब्धान मुग्धान् प्रलोम्प यथेच्छ पामन्तीति । अमुमेार्थ ममर्थयितु प्रकारान्तरेण लोकनादनप्रतीकारमसम्मावपन् सविपाद वैधणार्यान्तान्याममाह-नीराज विगतमहालेश्वर्य-न्यायरक्षित-प्रनादुष्ट शिक्षामिष्टरया-पिचक्षणभूप। कि राजसहितमपि नीराजकमिव नीराजकमुच्यते ? हा इति विपादे, जग-दूसन, न धन्पयोदिता गुणभानि-राजनि पलाछोग्याहन का सम्पते । - " ६१ अयमाशयः यथा गगुणं राजानं बिना तोशः प्रतिभूप-मलिम्लुवादिमिः उपट्टयने एवं सम्प्रति प्रौढ सातिशय-बहुजनापेक्षणीय-गणवादि पुरुषामिदविहालिङ्गिभिग्गं श्राद्धजनो वायत प्रति घृत्तार्थः ॥ १६ ॥ अधुना लिङ्गिानां चशसं दृष्ट्वाऽपि कटाग्रहान् नत्प्रथिन-काप यान अनियमाना- स्मूढान् दिइमूढत्वादिना विकल्पयन्नाह- कि दिमोह मिनाः किमन्धयधिगः किं लोगनूगायनाः ।। १७ ।। व्याख्या--किशब्दाः सर्वेऽपि विकल्यार्थाः, किममी जहादियोहः-कुतश्चिद- दृष्टादि निमित्तान् प्राच्यादि दिक्ष प्रतीच्यादिभ्रमात मिताः प्रामाः । अयमय-यथा दिन- मूढाः प्राची प्रतीचीत्वेनाव्यवस्यन्तो लोशन युच्या नापिननच्या अपि नदध्यवसायात न निवर्तन्ते, एवमेतऽपि विदितकुपथदोषा अपि कुनोऽपि तोरनिवनमानाः तसाम्यान- थोच्यन्ते । किमन्धा-नयनहींना 'बधिरा' उपहनश्रयणाः, अन्धाश्च विराति द्वन्द्वः, ते किमन्धाः किं बधिरा इत्यर्थः । यथा अन्धा दृग्विकालत्यान्नम्यक्पत्यानम् अजानाना अपथमपि रात्पथतयानगम्य तत्र गच्छन्तो हितैषिणा तचं ज्ञाप्यमाना अपि स्वग्रहात् न निवर्तन्ते, यथा बधिराः श्रुतिविकलवादनाकर्णपन्तो दुवैतालिकादि वचो निन्दार्थ: रतुत्यर्थतयाऽवगम्य तदानादौ प्रवर्तमानास्तच बोधिता अपि सनिबन्धात् न निवर्तन्ते, एवमेनेऽपि सदोषमपि कुपधं स्वगच्छादिग्रहात् निदापितयाऽवबुध्य ततोऽनिवर्तमानास्त- थोच्यन्ते । एवमुत्तरपदेष्वपि भावनीयम् । तथा किं वशीकरणादिहेतुरनेकद्रव्यमेलका पादप्रलेपादियोगः, तादृगेव नयनाञ्जनादिवृण, योगश्च चूर्णं च, ते विद्यते येषामिति विग्रहे सदस्यास्तीतीन् । अयोगचूर्णितः योगचूर्णाकृता, अभूतनाये चिः । मस्तकादिपु योगचूर्णक्षेपण वशीकृता इत्यर्थः । यथा केनापि चर्चेन क्षिप्तयोगचूर्णाः पुमांस आत्म- नोऽहितैपिणमपि तं हितैपितया मन्यमाना केनापि तचं प्रत्याव्यमाना अपि योगादि- प्रभावेण तद्वचनकरणात् न निवर्तन्ते, तथैतेऽपि कुपथादिति पूर्ववत् । किं 'देवेन' प्रतिकूलविधिनोपहता:-सवुद्धिभ्रंशं प्रापिताः, तेहि विधिवशेन विपर्यस्तमतित्वात- सकृत्यमपि स्तेयादिकं कृत्यतया मन्वानस्तत्वं प्रतिपाद्यमाना अपि दुर्दैवमहिम्ना ततो न निवर्तन्त, तथैतेऽपि । किं अगति-पार्श्वव-मन्त्रण, ठकिता-मन्त्रादिप्रयोगेण, स्वाय. त्तीकृता, यथाहि केचन केनापि दुरमान्त्रिक्रेण वशीकरणमन्त्रेण तथाकृताः तद्वचनमत्यन्त समीचीनतयाऽभ्युपगच्छन्तः तच्चमवगमिता अपि मन्त्रमहिम्ना न ततो निवर्तन्ते, एव- मेतेऽपि । किन्चेति पक्षान्तरे। 'ग्रहः 'भूतादिभिः 'अवेशिताः कृतावेशा-विहितशरीरा- - - धिष्ठाना इति यार, यया भूताधिष्ठिताः तदावेशात् विधेयापरिज्ञानेनानिधेयमपि पिह- महारादिक विदधानास्ततो निवर्यमाना अपि न निान्ते, एवमेतेऽपि सदसद्विवेक निकलतया कृपयात् न निवर्तन्त इति । अन व दिदम्दादि बहुविकल्पप्रदर्शमाधुनिकबाद लोकानामत्यन्तानिवर्य म्वगच्छग्रहग्रस्तत्वज्ञापनार्थ । 'कवा' विधाय 'मुनि' पाद ' श्रुतस्य ' सिद्धान्तस्य, सिद्धान्तोक्तातिकमेण निश्शतया गुरुलिशिप्रार्चिता सन्मार्गपोपणमेव श्रुतमनिपादकरण, यतः "नवि किंची" त्यापागमशकलस्प इदम् पराई-"एमा तेसि आणा, कजे सच्चेण होय" इति । अस्य चायमर्थ:-एपा मग बवामाना, पत्कार्य सत्येन मस्तिव्य, कोय: १ कार्य-जानादित्रय, सत्यं च सयम', पथा यया धानादिक सयमयोत्सर्पस्तपातथा यतिना निर्माय पतितव्य, यदाह-" का नागाईप, सच पुण सजमो मुणेयवो । जब जह सो होइ थिरी, तह तह कापचय कुणसु ॥१॥दोमा जेण निरु झंति, जेण खिअति पुवकम्माइ । सो सो मुक्खोगायो, रोगाव स्थासु ममण ॥२॥" न चागमे सुग्वलिप्सया किश्चित्मवित, किं तर्हि ? यारता पिना सपमानादि यात्रा नोत्सर्पति तावन्माप्रस्यैर विहितनिवारणस्य निवारित विधानस्य च मगादिः पुशालम्भनेन कादाचित्काया तानुबानाद । एर घ कथ श्रुत स्पायरस्था। मादसन्मार्गम्य चौदेशिकमोजनादेः मनस्यापि मादिकतया निग्नि- मत्वेन फेवलसुखानुमोदेशना प्रवृतेः । तथा च तस्य महासापद्यत्येन गानादियाना दायायमागत्वात् फथ प्रामाण्यमित्याह-अफलितगुणदोपविभागा, स्वपक्षानुरागो यत्या भामाना पद्धगवन्मतस्याव्यवस्थाऽऽपादनेन समतस्योकप्रदर्शन । किञ्च-तीर्थकर- पूर्वधरादिमातिशयमहापुरुपपिरहे मम्प्रति मिद्धान्त एव न प्रमाण । यदुक्त-"यपि अम्द सरण, वाण घासू गई पईनो य । भयव मिद्ध वो चिया अविरुदो हद इहदि द्वेदिं ॥ १॥" तस्य च प्रामाण्यानम्युपगमे वत्प्रणेतुर्भगरतोऽप्पप्रामाण्याम्पुपगम प्रसलेन भरनम्तन्मूल रजोहरणादिपपरित्यागापत्तिा, वया पायं गुग्वाशया गर स्कषितः पन्थाः मोऽपि सिझते, एव च लिशिनां ध्रुवस्य मूनि पादकरणमनु वितमपि शारया यांनी प्रत्यक्षगोचराः धारक जनाः मुदगल ग्रहग्रन्थयो 'दृष्टोरु दोपा अपि ' माधारकगुरुतरपूर्वादितपपापरापा अपि, अदृष्टदोपा हि पिक्निोऽपि रियादपि न नितिमीप्रते, किं पुनरम्य इस्पपि शब्दार्थ । 'व्यावृत्ति ' अपसरण 'हायान् कुमार्गान् पिटा दिनादिनायिकाल्या. दयते 'न पेमि धार पनि न तोप नलगानि दपते अश्यन्ति धन्ति, मगुणेऽपि नोपमारोपय तीति पाइन् । पा गमुगये । एता कृपयध्याति फरोनि, एत , कृत् तस्मै, "कुध-दुहेर्येत्यादिना" चतुर्थी, महामच्चाय कम्मैचिन कुपथव्यावृत्तिविधायिने। अन चोत्तरवाक्यार्थगतत्वेन प्रयुज्यमानो यच्छब्दस्तच्छब्दोपादानं बिनाऽपि तदर्थ गमयति, तेनायमर्थः-नेपां हि दृष्टदोपत्वात् कुपथात् तावत्स्वयं व्यावृत्तिः कत्तुं युक्ता, अथ कृतोऽपि हेतोः स्वयं न व्यावर्तन्ते तदा तव्यावृत्तिकारिणि प्रमोदो विधातुं मङ्गता, यत् पुनरमी द्वयमध्यादेकमपि कत्तुं नोत्महन्ने, प्रत्युत कुपथनिवृत्तिविधायिनि कस्मिश्चिन एकस्मिन्नपि क्षुद्रोपद्रवाय यतन्ते, तत्किममी दिमोहमिता इत्यादि योज्यं, तेन- एतदुक्तं भवति-दिङ्मूढादयो हि हितैपिणा व्यावृत्तमाना अपि दिनमोहत्वादावृत्ति- मात्रमेव न कुर्वन्ति, एते तु न केवलं कुपयात् न व्यावय॑न्ते यावता कुपथव्यावृत्तिकारिणे. असूयन्त्यपीति तेभ्योऽप्यमी कुत्सिता इति वृत्तार्थः ॥ १७ ॥ साम्प्रतं लिझिदेशनया श्राद्धरविधिकृतस्य जिनमजनस्यापि दुर्गतिपातहेतुत्व. प्रतिपादनद्वारेण श्रुतपथावनां दर्शयन्नाह- इष्टावाप्तितुष्टविटनटभटचेटकपेटकाकुलं ॥ १८ ॥ व्याख्या-'जैनमजनं ' भगवविम्बस्नात्रं कर्नु 'जनयत्येव' सम्पादयत्येव, नतु कदाचित् न जनयत्यपीत्येवकारार्थः । 'अघपढ़े पापकर्दमे 'निमञ्जनं ' बुडनं कर्म, तत्कर्तृणामितिशेपः। अथ कथं पुण्याय विधीयमानं जिनस्नानं पापपङ्कनिमज्जनाय प्रभवति इति आह-शविधिना' सिद्धान्तोक्तक्रमविपर्ययेण, प्राक्तनविशेषणान्यथाऽनुप- पत्या रात्रावित्यर्थः, सिद्धान्ते हि रजन्यां जिनस्नानं निवारितमतस्तत्र तत्कुर्वतां कथं न पातकमित्यर्थः। अथ कं दोषमभिप्रेत्य सिद्धान्ते रात्रिस्नात्रनिवारणमिति दोपप्रदर्शनाय हेतुगर्भ विशेषणत्रयं मजनस्याह-इटावाप्ति इत्यादि, इटाया-बल्लभाया मजनदर्शनमिषे- णागताया 'अवाप्ति मेलकस्तया तुष्टा-निश्शङ्कमत्राय नः सुरतलीला प्रवर्यतीति धिया मुदिता 'विटा' वेश्यापतयः 'नटा' नाटकाभिनयकलोपजीवितः 'भट्टा' शस्त्रादिकला- जीविनः 'चेटका' मासादि-नियमितवृत्तिग्राहिणः, एपां 'पेटक' समुदायस्तेना-'कुलं' क्षुभितं,प्रेयसी प्राप्त्या साविकमावेनाकुलीकृतविटादिजनाकीर्णत्वात् मजमप्युपचारादाकुलं, तथा 'निधुवनविधिनिबद्धदोहदा' मोहनविलसितविहिताभिलापाः या 'नरनार्यः' पुरुष. योपिताः तासां 'निकरण' निचयेन 'सङ्कलं' व्याप्त। नारीणां प्रायो निधुवनार्थमेव मजनाव- लोकनछद्मना तत्र गमनात् , तथाविधव्याजमन्तरेण रात्रौ तत्राप्यागमनासम्भवात् , तथा- विधव्याजेन चान्यत्र गन्तुमशक्तत्वात् । अत एव 'रागः कश्चित् परस्त्रीं प्रत्यभिष्वङ्गः 'द्वप' स्वस्त्रीमन्येन सह सङ्गच्छमानां पश्यतः तजिघांसा 'मत्सर।' कञ्चित्सौभाग्येन कयाचित् " सघटमानमालोक्यतः स्वयं च ता कामयमानस्य च सौभाग्यव्ययेच्छा 'ईया' सय छमामन्येन साई सलपन्तीमीक्षमाणम्य असहिष्णुता, ततो रागश्वेत्यादि द्वन्द्वा,तामिा 'धनं' मान्द्र,अत्रापि-रागादिमल्लोकघनत्नात् मअनमध्युपचारात् तथा,कामुकलोकमेल के हि जिन- गृहेऽपि निशायां रागादय एपोज्जृम्भते, न सल्पापि धर्ममानना, तस्मात् दिन एव स्नान धर्मार्थिनां श्रेयो,न रात्राविति । अत्र कैबित् उच्यते-रात्रिस्नान कश्चिद्दोपा,जिनजन्ममज नस्य शक्रेण तथाविधानात् , तथाहि-मईऽपि जिनेन्द्रा रात्रियामद्वयममय एर जायन्ते, तदैव सुरेन्द्रा मेरुगिरिशिखर नीत्या तान् स्नपयन्तीति श्रूयते, तस्य च तथा म दोपत्वे शक्रः तथा न कुर्वीत, तस्मादिन्द्रा चरितप्रामाण्यात निशायामपि स्नपन विधातव्यमिति चेत् न शक्रो जिनमजन मेरौ करोतीति मन्यामह, न तु यामिनीयामद्वितीय इति, मेरु- शिखरे सूर्योदयास्तमयाभावेन रात्रिदिनव्यवहारामावात् । कथ नर्हि प्रकाशाभावे तत्रे न्द्राणां जिनमजनादिविधिरिति चेन, रत्नशङ्गस्य निरस्ततम स्तोममयूपद्योतेन विमल- माणिक्यशिलामरीचिनिचयेन देवमहिम्ना च निरन्तर भासुरत्वात् । एव च इन्द्राचरिता- वष्टम्मेन कथ रात्रिस्नान समयमान सङ्गच्छते १, श्राद्धानां त्रिसध्य जिनपूजाया दिन कृत्यत्वेन सिद्धान्तेऽभिधानात् । ततश्च "पित्ति-किरिया विरुद्धा" इत्यादेश्यमों-य: प्रमातादि-सन्ध्यायां वृत्तिनिमित्तवाणिज्यादिव्यग्रवाद कथश्चित् देवपूजाया न व्याप्रियते स दिनमध्ये एव मुहर्तादिना सन्ध्यातिकमेऽप्यपचादतः पूजा करोत, न पुनरस्यायमर्थो, यदुतापवादेन रात्रौ करोति, दिनकृत्यता हानिप्रसङ्गात् प्रभूतायतनाकरणादि दोपप्राप्ते- थेति । एतेन रानौ जिनसदने चलि दान न्दि प्रतिष्ठादि-विधानमपि निरस्त, प्रायो मज- नेन समानयोगक्षेमत्वात् , निशिस्नात्रोक्तदोषाणा बलिदानादावपि सम्भवात् । तथाहि- दीक्षाय नन्दिकरण, दीक्षा च स्थूलमहाप्राणातिपातविरविलक्षणा, रानौ च प्रकाश निमिचज्वलितभूरिदीपरूपतेजस्कायिकनीवाना सय शरीरस्पर्शनेन व्यापादनात्, प्रदी पेषु च सतत निपतता पतङ्गादि जन्तूनां व्यापचिभावात् । कीदृशी दागृहीत्री सर्वविरतिः १ । शिष्यस्य दीक्षाप्रथमक्षणादाराम्य प्राणातिपातप्रवृत्ते', दीभादातुश्च दोष- सङ्ख्याऽपि वक्तु न शक्यते, तच्छिया तायजन्तुजातव्याघातप्रवृत्ते । तदहो । मूढा ! एतावन्त पापकलापमात्मन्पारोपयन्तो मारिभाश्रमणात् मनागपि न पिम्पन्तीति। किश्च दिवसे दीक्षादिलग्नबलामा रात्रौ च तद्भावे तिहारक्रमवदपनादेन कदाचिद्रात्रावपि नन्दि विदधता को दोप• १ इति चेन्न, विहारकमस्यापादेन रानामपि प्रतिपादनात् तत्र कदाचित् उत्करण युक्त, नन्दिविधानस्य चापादेनाप्यागमे रात्रावनभिधानात् कथ तद्धि- धान वर सङ्ग छन् ? । किम्बापवादिक कृत्पान रात्रिविहारक्रमादीनां मर्वेपी प्रायश्चिच- - .
७० ममिहितमागमे, न च निशि नन्दिविधानस्य ततोऽवगम्यते-नास्त्यपवादेनापि रजन्यां नन्दिविधान, एवं निशि जिनप्रतिमा प्रतिष्ठायामपि सकलगवद् दपणजातं विविच्य वाय, तदुक्तं-" भादुपदोपपोपायां, दोपायां साध्यन्ति थे। जिनविम्वप्रतिष्ठां ते, प्रतिष्ठा स्वस्य दुर्गती ॥ १ ॥" तदेवं दोपकलापदर्शनाद्रात्री मन्जनादि विधायिनां पापपङ्के निमअनं भवतीति व्यवस्थितं । इदं वक्ष्यमाणं च वृत्तद्वयं द्विपदीच्छन्द इति वृत्तार्थः ॥ १८ ॥ माम्प्रतं प्रसङ्गेन मञ्जनात् अन्यस्यापि धर्मकृत्यस्य संसारनिमित्तत्वं प्रकटयमाह- जिनमतविमुख विहितमहिताय न मन्जनमेव केवलं ॥ १९ ॥ . - - व्याख्या-' जिनमतविमुखविहितं ' भगवदागमवैपरीत्य-निर्मितं 'मजनमेव' म्नपनमेव 'केवल 'एफ 'अहिताय' संसाराय न भवति-स्नानमेबैंक अविधिविहित संसारकारणमिति नास्ति, किन्तु किं तर्हि ? तप्यते धातवोऽशुभकर्माणि चानेनेति तपो. ऽनशनादि, तथा 'चरित्रं सर्वविरतिः 'दान' पात्रेषु न्यायार्जितशुद्धमतादिवितरणं, आदिशब्दात् विनयवैय्यावृत्यादिग्रहः, ततस्तपञ्चेत्यादि द्वन्द्वगो बहुव्रीहिः । ततश्चैवमा- धप्यनुष्ठानं जिनमतवैपरीत्य त्रिहित, न केवलं मजनमित्यपि शब्दार्थः । ' न खलु' नैव 'जनयति' सम्पादयति 'शिवफलं' मुक्तिरूपं फलं । अथ कल्मादेवं ? इत्यत आह-'हिं यस्मात् 'अविधिविधिकमात्' सिद्वान्तानुक्त-तदुक्तप्रकारेण 'जिनाज्ञाऽपि ' भगवच्छास- नोक्तानुष्ठानमपि 'अशुभशुभाय' अत्रेयः श्रेषसे, द्वन्द्वेकवद्धाबादत्रैकवचनं । 'जायते' मम्पद्यते, यथासंखेयनात्र योजना, तेनायमर्थः-शिल जिनपूजा-तपःप्रभृतिप्रवचनप्रसिद्ध जिनाज्ञा, भगवता निःश्रेयसमाधनत्वेनाज्ञापितत्वात् । तथा च तदप्यविधिक्रमण-"काले सुहभृएणं" इत्यायुक्तविधिविपर्ययेण क्रियमाणमशुभाय भवति, विधिक्रमेण तु सन्ध्यात्र- या-राधनशुचिभूतत्वादिना तदेव शुभाय। विध्यविधिभ्यां भयवदाज्ञाऽऽराधना-नाराधन- योरेव मोक्षसंमारफलत्वात् । किं पुनरित्यादि वाक्यं काका योज्यं । अत्र च किमित्या. क्षेपे, पुनरिति वाक्य भेद, इति प्रकरणे । तेनपा प्रकृतारात्रिमञ्जनादिका क्रिया 'विडम्ब- नैव' प्रवचनापभ्राजनैव-लोकोपहासास्पदं, न त्वेपा जिनाज्ञाऽपीत्येवकारार्थः । अहित- हेतुः ' संसारनिबन्धनं न प्रतायने ' न विस्तार्यने, किन्तु अवहितहेवुत्वेन प्रख्याप्यते एव, इनमुक्तं भवति-जिनाबाऽपि तपाप्रभृतिका आपयादिका-याकर्मभोजनादिका वा यदा अविधिना विधीयमाना भवफला तदा किं पुनरस्या विडम्बनाया:-सर्वथा जिन- बचनपासाया रात्रिमजनादिकाया वक्तव्छ ? सुतरामेपा भवहेतुरेव, अतोऽहितहेतुत्वेन . - प्रख्याप्यते येन मा तथा प्रव्याप्यमाना कस्यापि पुण्यात्मना स्वतो निवर्तनाय प्रभव तीति भूतार्थः ॥ १९॥ -- इदानीं निर्वाणकारणमपि निमगण जिनगृहादि निर्मापण गृहिण मतादि निर्देलेशस्याप्यनुबन्धात् भवहेतब भवतीत्येतत् प्रदर्शनायाह- जिगृह-निविम्य-जिनपूजन जिनयात्रा-दि विधिकन ॥ २० ॥ - व्याख्या-'जिनगृह' जिनमन 'जनपिम्न ' भागरती प्रतिमा 'जिन पूजन' भगवत्प्रतिमायाः कुसुमादिमि जम्यर्चन 'जिनयाना जितान् पतीत्या-टालिका कल्याणक-रथनिष्कणादि महामहकरण, ततो जिनगृह चेत्यादिद्वन्द्वगर्मा बहुनीहि', एवमुत्तरपदयोरपि । आदिग्रहणात् जिनन्दनप्रतिष्ठादिगहः । इह चामजिापदोपादान मगवतोऽत्यन्तभक्तिगोचरतया तदुद्देशेन विधिना जिनगृहनिर्माणम्य परममुक्त्याल ख्यापनाये, एउमादि धर्मकर्मजातमिति शेप.। 'विधिना' तोक्तेन प्रकारेण कृत ' निर्मापित । तथाहि-निनगृहनिर्मापणविधिः शुद्धभूमिपरिग्रहादिका, जिनपिने विधिना निर्मापिते प्रतिष्ठापित चाय पूजननिधिा-सन्ध्या ये विधिना शुचिभूता भगवत् निम्म श्रद्धावान् पुप्पादिभिरर्चयति, तथा तत्र च कल्याणकादिदिनेषु यात्रा प्रस्तूपते, तत्र चाय निधिः-यथाशक्ति दान-तपश्चरण-शरीरविभूपा-जिनगुणगान-पादिनादिकरण । तथा 'दान'अभयदानादि तपो'ऽनशनादि 'प्रतानि' स्थूलप्राणातिपातविरमणादीनि । आदिशन्दाद-विचित्राभिग्रहः । ततो धन चेत्यादि द्वन्दः । तथा 'गुरोः 'धर्माचार्यस्य 'भक्ति' शभूपा आगच्छदभिमुखगमनोस्थिवाऽभ्युत्थान-गच्छदनुगमन-विधामणा- विशुद्धभक्तपानादि दानचित्तानुरजनादिकाः। तपठन' मिद्धान्ताध्ययन । गादिग्रहाणत् तदर्थश्रवणमननादिग्रहा। एतच विवैकिना विशेपेण विधेय, एतत्पुरस्सरत्वात्सकलपायुक्त जिनगृहादिकरणविधिप्रतिपत्तेः । यदाह-"अग्नेसि परिचीए, निषधण होड निहिसमारभो। सो सुचाउ ना, तो त पढम पढेयह ॥ १ ॥ सुचा अत्ये जत्तो, अहिगयरो नगरि होइ पायो । इनो उमयनिमुत्ति, सुयग केवल सुत्तमिति ॥ २ ॥" एतदन्तरेण ममस्त- स्थापि क्रियाकलापस्यान्धगूरु माम्यापः। ततो गुरुमक्तियेत्यादि द्वन्द्व', चः समुचये । आहत मबहुमाग, न सरहलया । एतत्सकल जिनग्रहादि-दानादि-गुरुमस्यायनुष्ठान, किमित्याह-'या' भवेत् इह प्रश्चने, अनमिमतकारीति सम्बन्ध । कस्मात् अत आह- कूमतत्यादि, वर 'कुमत' परतिथिममयामिति मियाकदम्बक श्राद्धचन्द्रसूर्योपराग- , , -- , , सङ्क्रान्ति-माघमाला-प्रपादानादि, कुगुरु-रुत्सूत्रदेशनाकरणप्रवणः सन्मार्गदुसनपरायणो धार्मिकजनक्षुद्रोपद्रवतत्परः सुखलोलतया यतिक्रियाविकलो जनविप्रतिलिप्सया दुष्कर- क्रियानिष्ठोऽपि वा लाभपूजाख्यातिकामः कुत्सित आचार्यः, कुग्राह:-सिद्धान्तवाद्य-स्व- मतिकल्पित-स्वाभ्युपेतासत्पदार्थसमर्थ-नानुष्ठानगोचरो मानसोऽभिनिवेशः,कुबोधो-ऽन्य- था व्यवस्थितस्य भगवदागमार्थस्याज्ञानाद्विशिष्टसम्प्रदायाभावाद्वाऽन्यथा परिच्छेदः, कुदेशना-श्रुतोक्तार्थानां संशयादज्ञानात् मिथ्याऽभिनिवेशाद्वा वैपरीत्येन प्ररूपणं, अत्र च कुगुरुग्रहणेन कुदेशनालामेऽपि पृथगुपादानं तस्याः सकलेतरदोपेभ्यो महत्त्वज्ञाप- नार्थ, ततः कुमतं चेत्यादि द्वन्द्वः, तासामंशो-लेशस्तस्मात्, आस्तां कुमतादिभ्यः समग्रेभ्यः, किन्तु तेषामंशमात्रादपि ' स्फुटं ' व्यक्तं निश्चितमिति यावत् , अनभिमत- कारि-अनिष्टविधायि दुरन्तसंसारकान्तारनिरन्तरपर्यटनकारणमित्यर्थः। ननु कथमेतानि गरीयांसि धर्मकृत्यादि लेशमात्रेणापि प्रतिरुद्धयन्ते ? नहि मृणालतन्तुना दन्तिनः प्रति- वधु पार्यन्त इत्याशङ्कय विवक्षितार्थप्रसाधनानुगुणघुपमानमाह-' घरभोजनमिव' स्निग्ध-मधुर-सुस्वादजेमनमिव, इवेत्युपमानद्योतकमव्ययं । 'विषलवनिवेशतो' गरलकण- प्रक्षेपात् । अयमर्थः-ईदृशी हि विषकणस्यापि पारिणामिका शक्तिर्यया हृद्यमपि बह्वपि भोजनं क्षणादेव सकलमसी स्वात्मभावेन परिणमयति, तथा परिणमितं च तत् भुज्यमान- मपायाय जायते यथा, तथा कुमतादिदेशस्यापि मिथ्यारूपतत्वात्-एवंविधो महिमा, येन महियोऽपि जिनगृहविधानादि धर्मकर्मस्वस्वरूपतया भावयति, तद्भक्तिं च तद्विधीय- भानमपि संसाराय सम्पद्यत इति, अत एव सम्यक्त्वशुद्धिहेतवे कर्त्तव्यतया अभिहिता. न्यप्येतान्यसमञ्जसवृत्या कियमाणानि तदभावापादकत्वेन श्रुयन्ते, यदाहुः श्रीहरिभद्र- सूरय:-" पाएणणंत देउल जिणपडिमा कारिया उ जीवेहिं । असमंजसवित्तीए, न य सिद्धो दसणलवो वि ॥१॥" तदेवं विषलवसंवलितभोजनोपमानेन जिनगृहादिविधा- नस्य कुमतादि लेशसंस्पर्शिनोऽप्यभिमतकारित्वं व्यवस्थितमिति वृत्तार्थः ॥ २० ॥ अधुना मुग्धजनाकर्षणनिमित्त-जिनबिम्बप्रदर्शनादि द्वारेण लिङ्गिना लोकप्रतारणं दर्शयन्नाह- आक्रष्टुं मुग्ध-मीनान विडिश-पिशितवत्-बिम्बमादय जैनं ।। २१ ॥ व्याख्या-आक्रष्टुं मुग्धमीनान जैनविम्बमादय नाम जैनर्जनोऽयं वश्यते इति सम्बन्धः । तत्राक्रष्टुमिति स्ववशमानेतं, न तु पुण्यमर्जयितुं, मुग्धा-हेयोपादेयविचार- - शून्यतपा धर्मश्रद्धालमा त एव जडप्रकृतितया सहिताहितपरिज्ञानपैकल्पमाषर्मात् मीनामत्स्यास्तान 'निम्ब' प्रतिमा 'जैन' भागान्त 'आदश्य दर्शयित्वा, यथा-मो भव्याः। ऐहिकामुमिकसुखविधानदक्षमिदमहद्विम्ब, तत पूजयत भत्त्येति मामान्यतोऽथना मा. पूर्वज एतद्विम्बमाईत निर्मापित, ते चेदमेर प्रत्यह नियमेनाप्पुजन् , ततो भवद्भिरपीद मेव विशेषेण पूजनीय, तथाऽई विम्बनिर्मापणमेव सम्प्रति मबजलधिनिपतजन्तुवारणा पालमिति मादि सोपसे नवीन मावद्विम्म स्वनाम्ना विधापनीयमिति विशेषतो मुग्धजनपुरत. अन्नाप्येत्यर्थः । किल यतिना देशनाद्वारेण जिनपिम्बार्चनादे-गृहिपुर फलमुपवर्णनीय, तत्फललिप्सया तदनुमारेण गृहिण स्वयमेव तत्करणादौ प्रवृत्तेः, न तु माक्षात् वनिर्माणनिर्मापणयोरुपदेशोदातव्या तदुपदेशस्य मापद्यतया यतेनिषेधाव ,लिङ्गि नस्तु कथमाजन्मामी गृहिणोऽस्माक या मरिष्यन्तीति धिया ऐहिकमे स्वार्थ केपल चिन्तयन्तो धूर्णतया पूर्वपुरुषसम्बन्धितादि क्रमेण मुग्धेभ्यो जिनविम्बमादर्शयन्ति, ते तु मुग्धत्वात् तदाशयमनवयुध्यमाना ऋजुश्रद्धालतानश्यस्नेह-सकारित-ममतादिना सत्र जिनविम्बादौ नित्य द्रव्य व्ययते, लिगिनश्च तदुपयुञ्जते स्वेच्छयेति भाति तदाकर्षणार्थ लिङ्गिनां जिनविम्बदर्शनमिति 1 किमिवेत्याह-निडिश' मत्स्यवेधन, तदने मत्स्यविलो मनाय स्थापित 'पिशित' मास, तद्वत । वतिरुपमाने, तदिव | यथा धीवरा मत्स्याकर्ष- गाय विडिशाग्रे पिशित स्थापयन्ति, ते च तल्लोलतया सापायमागामिनमविमापयन्तो गम्भीरादपि नीराशयानिर्गत्य मुग्धत्वात् तत्र पिलीयमाना यध्यन्ते, एव लिनिनोऽपि मुग्ध जनानां समयताविधानायोक्तविधिना भगवद्विम्वमादर्शयन्ति, न तु ससारनिस्तरणाय । ननु कथ जिनविम्बपिदिशपिशितयोरुपमानोपमेयमार ? ममानगुणयोरेसोमयोरलद्वार अन्धेप्पमानोपमेयमावप्रतिपादनाद, महाकविकाव्येषु तथैव दर्शनाद , अन तु जिन- निम्मस्य मकलत्रिभुवनातिशायिन सोपमातीतत्वात प्रत्युत्तममस्तूपमायोग्यत्वाद्वा, रिडिशपिशितस्य च सर्वात्यन्तहीन याकप तेनोपमा ?, उत्तममात्रस्यापि हीनमात्रेणा प्युपमानोपमेयमायो न युक्त , किम्पुन मोत्तमम्यात्यन्ताधमेन ?, एव च जिनरिम्मस्प मिडिशपिशितेनोपमानोपमेयमाप्रदर्शने कर्महापापप्रमझ , तथा नायमुपमानोप मेपमाो पटा प्रायतीति तन्ना लोकार्पणे सनिर्माहतोलिशिपरिगृहीवस्य जिन विम्बस्पोपमस्याप्यमदुपाधिशात् दुपरिवारपरिपृतराजादरिस याञ्छितफलासाधर- खान हीनताऽऽपारोपेणोपमानन माम्पापादनापमानोपमेयमारोपपत्ते । अत्र पापवित्रण रिहिपिशिननोपमान लिपिरिगृहीतम्प निविनस्पात्यन्तहेगवा झापनार्थ आगमेऽ 1 - तिहेयस्याधाकर्मादेः गोमांसादिनैवोपमानोपमेयदर्शनादिति युक्तमुक्तं 'बिडिशपिशितवद्- 'बिम्बमादय॑जैन मिति । साम्प्रतं प्रकृतमुपक्रम्यते-तथा 'तन्नाम्ना' जिननामधेयेन- भगवद्भाण्डागारनिमित्तमेते निर्माप्यन्ते, नास्मन्निमित्तमिति व्यपदेशेन 'रम्यरूपान्' रुचिररचनया दृष्टवन्धनया च मनोहराकारान् 'अपवरका अन्तहा 'मठा' निलय- विशेषास्ततो द्वन्द्वस्तान 'स्वेष्टसिद्ध्यै' वयमेवाजन्मसुखेन वत्स्याम इत्यात्माभिमतनिष्प- त्तये 'विधाप्य' कारयित्वा, ते हि शठाः स्वनिमित्तमपवरकादीन् निष्पादयन्ति मुग्धाश्च जानते-जिननिमित्तमित्यहो !! एतेषां जिनभक्तिरिति, तेषु ते रज्यन्ते तश्वोपजीव्यन्त इति वञ्चनप्रकारः। तथा 'यात्रा' पित्रााद्देशेन भवद्भिरत्राष्टाहिका कर्तव्या, अमुष्मिन्त्रा मासादावमुना श्राद्धेन श्रीमत्यत्र देवगृहे यात्राः कृतास्तस्माद्भवद्भिरपि तथैव विधेया। तथा 'स्नात्र श्राद्धपक्षादिपु पित्रादेः श्रेयसे युष्माभिरत्र स्नात्र कर्तव्यमित्युपदेशव्याजेन यात्रास्नात्रविधापन, ततो द्वन्द्वः। आदिशब्दाच्छुतानुक्तपर्वग्रहः । तदादय 'उपाया' मुग्धविप्रलम्भन प्रकारास्तैः । ननु कथमेवंविधयात्रादीनां मुग्धजनप्रतारकत्वं ? यावता यथातथा भगवत्पूजायाः कुशलानुबन्धहेतुत्वादिति चेन्न, एवं हि लोकोदाहरणप्रामाण्येन भगवत्पूजाविधाने भगवतोऽप्रामाण्यो(प)पादनेन मिथ्यात्वादिप्रसङ्गात्, यदुक्तं- "जिट्ठम्मि विजमाणे, उचिए अणुजिट्टपूअणमजुत्तं । लोगाहरण(च) व तहा, पयडे भगवंतवयणम्मि ॥१॥ लोगो गुरुतरगो खलु, एवं सह भगवओवि इवोत्ति । मिच्छ. त्तमो य एवं एसा आसायणा परमा ।।२॥" तथा 'नमसितकं उपयाचितक-भवता. मिदानीमीगुपद्रवः समुद्यस्थितः तस्माद्भवद्भिस्तनिवृत्तये जिनगोत्रदेवताऽम्बिकादिशा- सनसुराणामियद्रव्यमेषणीयमिति गृहिणः प्रतिजिनाद्युद्देशेन वित्तव्ययविधापनमिति यावत् 'निशाजागर' उपसर्गवोपशमनाय प्रवचनदेवतादीनां पुरतो बल्यादिस्थापन- गीत-वाघलास्यपुरस्सरं सकलरात्रिजागरणं । ततो द्वन्द्वः। आदिग्रहणादन्येषामपि शान्तिकपौष्टिकानां सङ्गहः । तदादीनि 'छलानि' छमानि-लोकोपजीवनार्थमागमान- भिहितत्वेन विलोभननिमित्तानीति यावत् , तैः करणभूतः, चशब्द उक्तवचनप्रकार- समुच्चये । श्रद्धालु-विवेकविकलधर्मेच्छावान् , विवेकिनो हि प्रायेण नैवंविधैः प्रतारणितुं पार्यन्ते । 'नामतः' संज्ञामात्रेण जैनै-र्जिनदेवतैर्न तु क्रियया, भ्रष्टाचारत्वात्तेपा, तेन लिङ्गिभिरित्यर्थः । 'शठैः' प्रपञ्चप्रपञ्चनचतुरैः, छलित इवेत्युपमान, यथा 'लितः' शाकिन्यादिभिर्वशीकृतः तथाविधचैतन्यराहित्यात्सुखेन वञ्चयितुं शक्यते, तथाऽयं-एप जनः' श्राद्धलोको हा !!! इति विपादे 'चञ्चयते' विप्रलभ्यते, महानयम् अस्मचेतसि विषादो-यद्धर्मार्थी लोको धृत्तः स्वार्थ वञ्चयित्वा दुर्गतौ पात्यत इति वृत्तार्थः ॥२१॥ -
इदानीम् अत्युच्छहलानामपि नाम जैनानां दशमाश्चर्यानुमावात् अभ्युदय स्त्र
विषादपुरस्मर दर्शयमाह-
सर्वत्राथगितामा स्वविषयव्यासकसद्रिया, ॥ २२ ॥
व्याख्या-'मर्वत्र' लोकममक्षमममक्ष च, आयति सचिनोति जीना करें
मिरित्याश्रवाः पञ्च प्राणातिपातादयः ततश्चास्थगिता-अनिरुद्धा आधा पैस्ते तथा ।
स्त्रविषयेषु आत्मप्रामेषु रूप-रस-गन्ध-स्पर्शशब्देपु यासक्तानि' उपभोगमपणानि
'मन्द्रि पाणि सकलकरबानि-चक्षु-मन-प्राण-त्व-श्रोत्राणि येषां ते वधा, यतिना
दि निगृहीतेन्द्रियेण मस्तिष्प, अन्यथा प्रवपापा जीवनमानतापत्तेः । तथा गौरवाणि'
आत्मन्युत्प्रत्ययहेतवोऽध्यवमायविशेषास्तानि च ऋद्धिरममावाऽतिरेक-हेतुकत्वेन
कारणे कार्यापचारात्-रिदिरममावसन्नान्येव त्रीणि, तैवण्डाः-वत्साहाय्येनोद्धा दण्डा,
दण्ड्यते-दुर्गतिपातेन दुःख स्थाप्यते आत्मा अमीभिरिति दण्डा-अकुशलमनोपाकापा
त एव देहिनामुत्पथप्रवर्तकत्वाचपलत्वाच 'तुरगा' अश्वा ततश्च 'वल्गतोऽनियमितत्या
पहल्या प्रसान्तो गौरवचण्डा दण्डतुरगा येषां ते तथा 'पुष्यन्तः' प्रवलीमवन्ता का
योरगा येषां ते तथा । यतीना हि धामण्पवैफल्योत्पादनात् कपाया फतुं न युज्यन्ते ।
एव तावत्पञ्चाश्रवचिरमण-पत्रेन्द्रियनिग्रह-दण्डत्रयविरति-कषायचतुष्टयजयलक्षणमप्त
दशविघसपमाभावेन तेषां लोकोचरवाहल प्रदर्य इदानी लोकलोकोचस्वायत्वमपि
दर्शयतीत्याह-मात्य कृतोऽपि' लोकलोकोचरविरुद्धानमसेवनपुष्पफलाद्युपमोगाध
मदाचारकारिणोऽपि नामनैना इति प्राकृत 'कट' महदुःखमेतत् 'अधुना' सम्प्रति
'स्थित्वा' आरम 'सन्मुनिमूर्द्धसु' सुविहिवनिमस्तके', प्रतिपदमपूपया सुपिहितानाम-
सदोषारोपेण लापत्रोन्पादनमेव हि तपां तन्मृर्दस्ववस्थान । 'उतधियो' नास्न्यस्मत्ममो
जगति सम्प्रति कषिदिति दर्पामातमुद्दय 'तप्यन्ति' सुविहित मन्या अप्येते अस्मा
मित पूछना इत्पानयेन मोदन्ते 'पुप्यन्ति च सापादिपरिवारेण धादादि पूजया च
वर्दन्ते । '' समुछये । अथ फयमेवविधा अपि मनमुनिमूत्रस्थानेन ते तुष्पन्ति
पुष्पन्ति पेस्पत माह-'अन्नपाराजाधिता" पायात्याधर्यपार्षियानुगवा, '
यति
हेतुगर्भ विशेषण । एतदुक्क भरति-रिधात्यरिधापिनो महामनीना मस्तरेपर
स्थान पर्नु पारपन्ति, कपत्रिणा अपि या न तोप पोप च ते प्राप्नुरन्ति, महामुनि
तिरपारमात्रेणापि वरसारिणामिहेय हानि श्रवणार , पर यदेवमनर्थकारियोऽपि लिङ्गिना
रापिहितातिरस्कृग्यापि नन्दन्ति नन्नन दामाश्रर्यमहिमाऽयमिति अधार्थ. ॥ २२ ॥
७६ साम्प्रतं तेषां प्रत्यहं सर्वविरतिरूपप्रत्याख्यानभङ्गकरणेन तपश्चरणाद्यभावं प्रति. पादयन्नाह- - सर्वारम्म-परिगृहस्य गृहिणोऽप्येकासनाघेकदा ॥ २३ ॥ - व्याख्या-'सर्वारम्भ-परिग्रहस्य सकलमावद्यव्यापार धनधान्यादिसङ्ग्रह-तत्परस्य 'गृहिणोऽपि' श्राद्धस्यापि, आस्तां महामुनेरित्यपि शब्दार्थः । 'एकाशनं' अन्तर्दिवसमें कवारनियमितभोजनः प्रत्याख्यातभेदः तदादिर्यस्य निर्विकृतिकादेः तदादिप्रत्याख्यान 'एकदा कदाचिदष्टम्यादितिथिषु प्रमादबाहुल्येन नित्यप्रत्याख्यानाभावात् 'प्रत्याख्याय' नियम्य, तदपि कदाचितकतमेकाशनादि 'न रक्षतो'ऽनाभोगसहसाकारादिना न पाल- यतो-भञ्जत इत्यर्थः । 'हृदि' चेतसि 'भवेत्'-जायेत 'तीतो' निष्ठुरोऽनुतापो-बहुना कालेन तावदद्य प्रत्याख्यानं कृतं तदपि मया मन्दभाग्येन भग्नमतो धिड्मां, कथं मे शुद्धिर्भविष्यतीत्येवरूपः पश्चात्तापः 'सदा सर्वदा यावद्भङ्ग-प्रायश्चित्तं गुरुभ्यो नामादयति । 'षट्कृत्वः' त्रीन् वारान्सायन्तनप्रतिक्रमणे । त्रीश्च प्रगेतनप्रतिक्रमणे पवारान् “सङ्- ख्याया वारे कृत्वस् तद्धितः" त्रिविधं त्रिविधेति, अनेन सामायिकसूत्रमुपलक्षयति, किल साधवः सायन् प्रातश्च प्रतिक्रमणे सामायिकसूत्रमुच्चारयन्तस्त्रिविधं त्रिविधेनेति पठन्ति, यथा-"[करेमि भंते ! सामाइयं सवं सावजं जोगं पञ्चक्खामि जावजीवाए, तिविह विविहेणं मणेणं वायाए कारण"मित्यादि । तत्र प्रिविधमिति तिस्रो विधा यस्येति त्रिविधं-कृतकारितानुमतलक्षणं, त्रिविधेति त्रिविधेन करणेन मनोवाकायरूपेण सावा योगं प्रत्याख्यामि इत्येवं रूपतया 'अनुदिन प्रतिवासरं 'प्रोच्य' अभिधाय-प्रतिज्ञाया- पीत्यर्थः, अप्रतिज्ञातानुष्ठानस्य हिं भङ्गेनापि न तथा दोष इत्यपि शब्दार्थः । 'भञ्जन्ति' खण्डयन्ति ये लिङ्गमात्रवृत्तयः तेषां । 'तु' गृहिणो भेदप्रदर्शनार्थः, क शब्दाः सर्वेऽप्य. क्षमाव्यञ्जकाक्षेपार्थाः । 'तपो'ऽनशनादि, नित्यप्रत्याख्यानस्य सर्वसावद्ययोगविरति- रूपस्य सकललोकसमक्षमभ्युपेतस्य भङ्गप्रदर्शनेन नैमित्तिकप्रत्याख्यानस्यापि कथञ्चि- लोकपतथा विहितस्योपवासादेः भङ्गानुमानात्-नास्त्येव तेषां कचित्तपः । क 'सत्यवचनं' तथ्यवान , सर्व सावधं योग न करोमीत्यभिधाय पुनस्तत्क्षणमेव तनिषेवणात् , प्रत्यक्षमृषावादिताप्रसङ्गेनांशेनापि सत्यवचनामावात् । छ 'ज्ञानिता' सिद्धान्तरहस्य- परिच्छेतृत्त्वं १, ज्ञानस्य हि फलं विरतिः तस्याश्च सातशीलतया तैः समूलमुन्मूलनात् तथा च कथञ्चित्सतोऽपि ज्ञानस्याकिश्चित्करत्वेन तदाभासत्वात् , ज्ञानगन्धोऽपि तेषां नास्तीति । क्व 'वत' दीक्षा, दीक्षोपादानेऽपि प्रत्याख्यानभङ्गादलीकभाषणेन दीक्षाया , अपाधपापादनाद् व्रत तेपा नास्ति । अत्र चामकृरकशब्दोपादानेन लोके लोकोत्तरे च उत्नपाप्रमृते तपस्वादिक न सम्भवतीति ज्ञाप्यते, तेनायमाशया-पदा किल गृहिणोऽपि सतत गृहारम्मसरम्मवत्वात्प्रमादमरनिर्मरा अप्पननगततचा अपि कदाचित्प्रत्याख्यान- मतेनेवमनुतप्यन्त, तदा सुतरा यतीनां समावद्ययोगविरताना विदितागममाराणां क्यचिन् विरविमरे पश्चात्तापः प्रायश्चित्तग्रहश्च युक्त', ये तु निश्शूकतया ता मअन्तो मनाग्लामपि सादधति तेपा नाम्त्या तप.प्रभृतीति वृत्तार्थः ।। २३ ।। इदानीं तेपो लोकोपहामपुरस्सर जिनपथपरिपन्थित्व वृत्तद्वयेन प्रकटयमाह-- देवार्थ ययतो यथारुचिकृते सर्परिभ्ये मठे ॥ २४ ॥ इयायुद्धतसोपहासपचस स्युः प्रेक्ष्य लोका स्थितिम् ॥ २५ ॥ व्यारया-येषां स्थिति प्रेक्ष्य लोका. मोपहामवचसः स्युरिति सम्बन्धः । क्थमित्याह-अहो इति विस्मये, मितपटा:-श्वनाम्परा 'कट' दुष्कर 'चरन्ति' अनुतिष्ठन्ति 'प्रत' प्रमज्या, महदार्यमेतत्-यत्-मितपटा कलाप्येवविध प्रकिटमनुभवन्ति, नहि मम्प्रतिनिर्मानवैरल्पमचरेवविध कष्ट पत्तुं शक्यते, अथ च मवैरप्येवरूप व्रत कषु पार्पत ण्व, सुसहेतुत्यादित्यपहास । अथ कथमेवमुपदामातेपा तैः क्रियत? इत्यत आह- 'माधुव्यात' यतिछपना पिटाः, नामी माधयः तलक्षणायोगात् , फिन्तु तद्व्याजेन पिया, गालवणोपपत्ते । तदेवाह-वार्थव्ययनो देवगृहाधिपत्ये न तद्रविणस्य सदधीनत्वात् जिनविन विनियोगेन 'यथारुचि समनोऽमिलापानुरूपमित्यर्थ । 'ते' निष्पादिते 'मर्य रम्य मकलयमन्तादिरूपता निभक्तकालनिशेपमनोहरे मटे प्रतीते, तत्र 'निस्पस्था' मातासिन , सुविहिता हि देवद्रव्योपभोगगयात् यतिनिमित्तनिर्मितत्वे। महामाश्यत्वाध मट्ठन उमन्ति, स्न्तुि याचित्रे याशि-वाशि परगृहादावेष, तप्रापि ना[न] परत बसन्ति, नित्यवामस्प च यतीनां प्रादादिप्रतिबन्धलापयादिहतुत्वेन प्रति पान, उपतविद्यारम्पैच ममकारापुच्छेदनिमित्तत्वेनामिधानात् । एते तु सातलम्पटतया पटे निस्पानस्पिायो विलमन्तीति कय न भवन्ति पिटा । तथा 'शुचयो' निर्मला' 'पट्टतूल्य.' पारुसवीता इमम्तादि मया गुग्याविशेषा, यद्वा ' पट्टा श्रीपर्णादि दारुनिर्मिना नायन' अपनीय या त नथा, माधवो हि कम्मलादि. सम्नारक एरा शेरते, न पडतल्पादिपु, तामा प्रमार्जनापशुढे विभूपामातशीलत्वपअ समाहोरोपहामहतुवाग, एते तु म पाना पिटव प्राट्यन्ति। तपा 'मद्गन्दिका पापता' श्रीमनगरिमायामना-मोमान्दिकामयूरकादि विष्टरमाजा, गन्दिकाएप - - ७८ " - वेशने च दोषा मुनीनां प्रागेवोक्ताः । 'सारम्भाः' मठ-वाटिका-कृष्यादि-महासावधा- व्यापारकरण-कारण-प्रवणाः 'सपरिग्रहाः' गृहिवत् वाणिज्यादिप्रयोजनेन धनधान्य- स्नेहादिभाण्डसमहपरायणाः 'सविपया' चक्षुरादीन्द्रियानुकूल-नर्तकीदर्शन-ताम्बूल- स्वादन-चन्दनाद्यङ्गराग-गन्धर्वगीत-श्रवणादिविषय-सततानुपक्तचेतसः 'सेव् ' विषयासक्तत्वात् कामुकत्स्वाभिमतां योपितमन्येन सार्द्धमालापादिविदधानामवेक्ष्य तं प्रत्यक्षमाभाज: 'सकांक्षाः सम्भोगविलासाभ्यासात्प्रतिक्षणं नवनवोपजायमानरिरंसो- स्कलिकाः। आरम्भादयश्च यतीनां बहुदोत्वादनेकधा निषिद्धा एव । 'सदा सर्वदा, विषयाणामनादिभवाभ्यासत् , कदाचित् सन्मुनेरपि कस्यापि चेतोविकारमात्रं प्रादुःष्यात्, न तु सर्वदा, तदैव तेषां ज्ञानाङ्कशेन स्वचित्तमाकृष्य मिथ्यादुष्कृतादि प्रायश्चित्तप्रति- पत्तेः, इति साधूक्तं-'साधुव्याजविटा' इति ।। २४ ।। 'इति' उक्तप्रकाराणि, आदिशब्दात् अन्यान्यप्येवं प्रायणि विडम्बना व्यञ्जकानि वचांसि गृह्यन्ते । ततश्च इत्यादीनि-उद्धतानि-बहुजनवदनस्य मुद्रयितुमशक्यत्वातनि- इशङ्कतयोद्भटानि, सर्वत्रास्खलितानीति यावत् । 'सोपहासानि' उत्पासमाजि 'वचांसि' वचनानि येषां ते तथा स्यु-भवेयुर्लोकाः-प्राकृतजनाः कुनीथिकमाविताश्च जैनपथमत्सरिणः 'प्रेक्ष्य' साक्षात्कृत्य, येषामिति पदं तुर्यपादस्थितं सकलं वाक्यं दीपयति, तेन येपो स्थितिमित्यादि सम्बध्यते । 'स्थिति' यति अनुचितासमञ्जमसामाचारी,स्वरूपेणैव तावत् मत्सरिणः सर्वस्याप्युपहासं कुर्वन्ति, किम्पुनः सम्प्रति निरतिशयस्य जिनशामनस्य ?, तत्रापि लिङ्गिना तथारूपं वैशसं व्यवहारं वीक्ष्य कथङ्कारं न कुर्युरित्यर्थः । तथा श्रुत्वा' आकर्ण्य येषां स्थिति ' अन्ये ' अपरे ' अभिमुखाः ' शेपदर्शनेभ्यः सकलो- पपत्तिकलितमिदं जैनदर्शनं, यतयोऽप्यत्र दर्शने शान्तात्मानः क्रियानिष्ठाचोपलभ्यन्ते, ततोऽस्माकमपीदमङ्गीकर्तुमुचितमिति चेतसोऽभ्युपगमविषयीकृतजिनशासनास्तेऽपि, आसतां तदपर इत्यर्थः । 'श्रुतपथात' जैनसिद्धान्तमार्गात् वैमुख्यं, एतावन्तमनेहसं वयमेवम् अज्ञास्याम-यदेतदेव तात्त्विकं धर्मदर्शनं निरपवाद, परं यदत्राप्येवं विधा असदा- चारकारिणो विलोक्यन्ते तदाऽलमनेन ताम्र-हिरण्मया-लङ्कारदेशीयेनान्तो निस्सारण बहिमांत्रमनोहरेण सर्वथा, प्राक्स्वीकृतमेवास्माकं दर्शनं श्रेयः, अहो जैना अन्यथा. वादिनोऽन्यथाकारिण इत्यादि वचनसन्दर्मेण 'वैमुख्यं' पराङ्मुखत्वं सर्वथा बहि- विमिति यावत 'आतन्वते' दर्शयन्ति । तथा येषां 'मिथ्योच्या' मृपावचनेन, ते हि स्खलिताचारत्वेन सर्वशङ्कितत्वात् असमञ्जसचेष्टितं प्रति केनचित्प्रष्टास्सन्तो मलि- म्लुचवदलीकं भाषन्ते, यथा-क एवमाह ?-न नयमेवंविधमेव कारिण इति । ततश्च . - 'सुदृशोऽपि' सम्यग्दृष्टयो जिनमतान्तःस्था अपि प्रायशः, किम्पुनरन्ये १ इत्य- पैरर्थः । 'विभ्रति धारयन्ति-कुर्वन्तीति यावत् , मन:-चेतः 'सन्देह' इद किमेवमन्यथा घेत्युमयकोटी उल्लेख्यनवधारणज्ञान सशया, स एव एकवानवस्थितरूपत्वसाधादोला, तया चल, यथा दोलारूढ वस्तु तस्याथलताचल, एस सुदृशामपि मनः । अथवा 'सन्दहेन करणभूतेन दोलापच्चल येपा नाम जैनाना ते अमी सर्वत्र सम्प्रति प्रसृतत्वात पुरोवर्तिनः । नन्वित्यक्षमाया। 'सर्वथा' सर्वेः प्रकार 'जिनपथप्रत्यार्थिनो' भगन्मत प्रत्यनीका', न तु केनापि प्रकारेण तदनुकूला अपि जैनदर्शनोहास-तदभिमुखवैमुख्या पादनादिना जिनशासनेनुपचयहेतुत्वेन वस्तुतस्तेषां तदुच्छेदकत्वात् । येषा चापराधेन शशधरकरविशदे भगवच्छासने लोकोपहासविपर्यामादयो दोपाः प्रादुःष्यन्ति तेऽनन्त ससारिणः सिद्धान्ते प्रतिपादिताः, महापापीयस्त्वात् । 'तत' इत्येतत्पदमग्रिमवृत्ती सम्भस्यत इति वृत्तद्वयार्थः ॥ २५॥ साम्प्रत कुपथवर्तिना निधिपथ प्रत्यैकान्तिकीमात्यन्तिकी च निरुपमा च मनसो दुष्टतामुपलम्प तदुत्पाद च इतरजनमन कारणसामग्र्या असम्भावय. तद्विलक्षणा तदुत्पाद सामग्री सम्मावनाद्वारेणाह- सर्यैरुत्कटकालकूटपटलः सर्वैरपुण्योच्य ॥ २६ ॥ व्याख्या-'तत' शब्दस्य प्राक्तनवृत्तस्यस्येह सम्बन्धात्तेन, यतोऽमी सर्वथा सत्पथ दुष्टचेतमा तत. तस्माद्धेतो', किमित्याह-नूनमिति सम्भावनाया, अहमेव सम्मा वयामि-यायन्त्यतिदुष्टवस्तूति जगति मन्ति तावद्भिर्युर्मागमासेदुपा कर मानसमकारीति सम्बन्धः, कथमन्यथा तन्मनसोऽतीन क्रूरता १ इतरजनमन माधारणकारणसामग्रीतः तदनुपपत्तेः, कारणानुरूपत्वाकार्यस्य, न च हि न्यग्रोधमीजास्पिचुमन्दप्ररोह । कैस्तैरित्याह-'' सकलैरुत्कटकालकूटपटलै-नूतनत्यादत्यग्रमद्योघातिपिपमेदसमूहै., एकद्विव्यादिभिरनुत्कटैच कालकूटशकलैस्तत्पटलैर्या तादृक् फरमनसो जनयितुमशक्य- वादेवमुक्त । एवमुत्तरपदेष्यपि योज्य | सकलकालटपटलैरेव केवले प्रकृतमनसः कर्तुमशक्यत्वात्-अपुण्योचयरित्यादि वाक्याता,ततश्च स..-अखिलैरपुण्योचये. पाप राशिमि , सर्वव्यालकुले -अशेपाशीरिपसन्दोहे 'समस्तपिधुराधिव्याधिदुष्टाहै ' कृत्स्नव्य सनचेतः पीडा-गद-मद्गलादि पापग्रहैरेभिरखिलंदुष्टेरेकसामग्रीमायेन मम्भूय 'कर' सन्मार्गपातुक ' मानस' चेत. 'अकारि निर्ममे। पूररूपस्य मनसो निर्माण विधेपमत्र, एवेनास्य मनम इतरमनोमि माजात्यमपि निरस्तमित्येतदपि सम्मापयामि इतरमनो. . . .
८० - - - - विलक्षणसामग्नीजन्यत्वेन वैमात्योपपत्तेः, न हि मृत्पिण्डदण्डादि-तन्तुवेमादिविसदृश सामग्रीजन्ययोर्घटपटयोः साजात्यं नाम, तथा च तन्मनसः कदाचिदपि न शुभभावता- पतिः, न हि भूनिम्बस्य-शर्कराभावः शिल्पिशतेनाप्यापादयितुं शक्यते, तत्कस्य हेतोः? स्वस्वसामय्या विजातीयतयैव तयोरुत्पत्तेरिति । अथवा मनः सिद्धमेव तस्य तु क्रूरत्वं विधेयं,तस्य कालकूटादिभिः साध्यं । अथास्मिन्पक्षे क्रूरत्वस्यौपाधिकत्वात् अपगमप्रसङ्गो, वस्त्रादिषु महारजनरागस्य तथा दर्शनादिति चेन्न, औपाधिवस्यापि धर्मस्य कयाचित् सामय्या जन्यमानस्यानगमदर्शनात् , यथा पट्टांशुकादिषु नीलीरागस्यौपाधिकस्यापि न कदाचिदपगम इति । तदुपपन्नमेतन्नूनं क्रूरमकारि मानसमिति । 'अमुं' प्रत्यक्ष दुर्माग' कुपथं 'आसे दुषां ' अभ्युपेयुपां लिगिनां तद्भक्तानां चेति शेषः । ननु भवतु तेषां क्रूरं मनस्तथापि किं न वन्छिन्नमित्यत आह-' दौरात्म्येन ' दुष्टाशयत्वेन 'निज- धनुषां' उच्चिच्छिदुषां ' जिनपथं' भगवत्प्रणीतं सत्पथं सन्मार्गवर्तिनामुपसर्गकरणेन वस्तुतो जिनमार्ग भ्रंशयद्भिर्बह्वस्माकं छिन्नमित्यर्थं । अथ जिनपथं नि [ज ] प्रता तेषां द्विजादीनामिव किं दर्शनान्तरपरिग्रहेण मतान्तर प्ररूपणा नेत्याह-वाचा वचनेन स्वमति कल्पितमप्यौदेशिक भोजनादिमार्ग ' एषसः' अयमेव स जिनप्रणीत: पन्था नान्य ' इति ' एवं प्रकारेण 'उचुपां' अभिदधुषां, न ते दर्शनान्तरस्थाः स्वमतं परूपयन्ति, तत्स्थैर्जिनपथवर्तिनो जनस्य प्रतारयितुमशक्यत्वात् , किन्तु अस्मि- नेव दर्शने वेषमात्रेण स्थिताः स्वप्ररूपित कुमार्ग जैनमार्गतया वदन्तो मुग्धलोकं व्यामो- हयन्तीत्यर्थः, एतावता संरम्भेण सत्पथं प्रत्यतीव, प्रत्यनीकत्वं तेषां प्रकटितं । इह च सेत्यत्र 'स' शब्दाद्विर्जनीयलोपे सन्धिप्रतिषेधेऽपि " ते तदा पादपूरतो सन्धि " रिति विशेषलक्षणेन सन्धिविधानमिति वृत्तार्थः ॥ २६ ॥ 'अत इत्य' न्तरा पदद्वयोरप्यनयोवृत्तद्वयोः सम्बन्धयोजनार्थ, तच्चाग्रिमवृत्त- स्यादौ योक्ष्यते, इदानीं तेषां वचनमात्रमपि विवेकिनः श्रोतुं न युज्झत इत्याह-अत:- दुर्भेदस्फुरदुमकुग्रहतमः स्तोमास्तधी चक्षुषांः ।। २७ ।। -यत एवं नामैते जैनपथं प्रति दुष्टा, अतो-ऽस्माद्वेतोः, किणित्याह तेषां 'वचांसि 'कुपथप्रतिपादकानि कनानि 'कुरुते ' विधत्ते कर्णो स्वश्रवणे 'सकर्णः' सश्रोत्रः। अथ च सहृदयः 'कथं ' केन प्रकारेण ? न कथश्चिदित्यर्थः । नहि सकर्णस्य कर्णकटूनि स्पृष्टपरमर्माणि वचनानि खलानां श्रोतुं युक्तानि, किन्तु कर्णयोरेतदेव फलं- यत्पीयूपवार्षका अपहसितमुक्ताः सतां सूक्तयः श्रूयन्ते । अथ च सकर्णस्य प्रेक्षावतः . - व्याख्या , . - पथदिनां माषितानि कणे कर्तुं न युज्यन्ते, वच्छवणस्य माधूनामपि मियावनि बन्यत्वेनामिधानात् । कीदृशामित्याह-'दुमदो' निविडत्याव-दुरुज्छेदा कारत् मनमि मततावस्थिततया जागरूक 'उग्रो' दा 'कुग्रहः चैत्यामादि प्रतिष्ठापन विषयो मिथ्या- अभिनिवेशः म पर 'तम स्तोम ' सपथदर्शनान्तर्धायकत्वादन्यतममः पटल, तेन 'अस्त' छन्न 'धी: प्रेक्षा, सव मत्पधप्रकाशकत्वात् चक्षुलोचन येषां ते तथा, वेपा, यथा तम स्तोमेन तिरोहितचक्षु. पन्थान न पश्यति तथा तेषामपि धी. कुग्रहेण तिरस्कृत स्वात् न मन्मार्ग मृगयते । तथा सिद्धान्तद्विपता' तद्विपर्यस्ता-प्ररूपणया तदुच्छेद प्र वृत्त्वादागमवैरिणा, निरन्तरमहामोहाद्-व्यमानातिरेकानिकात् । अहमिति निपातोऽस्म दर्थः ततश वयमेव श्रेष्ठा, नास्मत्मम' कश्चिदित्यात्मान मन्यन्ते ये ते अहम्मानिनस्तेपा, विवकिना हि गम्भीरत्वेन महति गुणगणे मत्यप्यनुत्सेका, मूढाना तु तुच्छतया स्वोरेऽपि तस्मिन्-जगतोऽपि तुणतया मननाद , तथा 'स्त्रय' आत्मना 'नष्टा ' सुखलो- लवयाऽनवरतम्-अन्याय्य पथि प्रपर्तमाना जनपुरत. सस्थापयितुमशक्नुवन्त' 'क धर्म १ क मम्प्रति वतिन 'इत्यादि नास्तिक्य प्रतिपन्ना तेपा, 'अन्येषा' आत्मपति रिक्ताना 'नाशनकते' नास्तितामादापादननिमित्त 'पद्धोद्यमान' यदि हि एतानप्यारमना कश्चित्समी कुर्मस्वदा सुन्दर भवत्यन्यथैते धार्मिकमन्या: परुपवामि अस्मान् मन्त. क्षिप्यन्तीत्याशयेन तन्नाशनाय निहित्प्रयत्नाना 'मदा ' मर्यदा — मिथ्याचारा' मुक्ति- पथरिपरीता' समाचारा मिथ्यावा-विरति-प्रमाद-पाय-दुष्टयोगलभणा, अधरा लोकप्रलम्मनहेतु-कपायेन्द्रियसयमपुरस्सर विषयप्रणिहितमनस्करर, यदाह " पायेन्द्रि- याणि सपम्प, य आस्ते मनमा स्मरन् । इन्द्रियार्थान् विमुदात्मा, मिथ्याचार' म उच्यते ॥२॥" ततश्च तद्वतां ' तयुक्ताना, अत. तद्भापितानि सुविहितः सुश्राय न . श्रोतव्यानीति तात्पर्यमिति चाथ. ॥ २७ ॥ अधुना निवयादिरूप धर्मदेशिनामपि तेगा कृपथस्य तथाविध-मुग्धजनोपादेयता मविपाद प्रतिपादयमाह-- RAN यम् किश्चित् वित्य यदायनुचित यलो-क लोकोतरो ॥ २८ ॥ पारुपा तत्तरिति वीप्या मर्यसमाह-धर्ममाघनमनुष्ठानमिह धर्म तत्तय धर्म इति' मुश्वमिदमित्येवरूपतया 'सुवन्ति ' बदन्ति 'इधियो' दुर्मेघसो नाम जैना.। यत्किमि याह-यत्किनिदिति, मामापतो निर्दिष्ट विशेपतोऽनिर्दिष्टनामा - ८२ 'वितथं ' अलीकं श्रेणिकराजग्जोहरणबन्दनादि, न होतदागमे कचिल्लिखितमस्ति, येन सत्यं स्यात् , परं लिङ्गिनः स्ववन्धतापादनाय तदपि धर्म इति भापन्ते, यदाह-" श्री- श्रेणिकः क्षितिपतिः किल सारमेय-लाट्गूलमूलनिहितं यतिवद्वचन्दे । भच्या रजोहरण- मित्यनृतं वदन्ति, ही !!! लिगिनो वृपतया कुधियः प्रलन्धुम् ॥ १ ॥ तथा यदपि, अपिः समुच्चये। यच्चानुचित-मयोग्यं पित्राघुद्देशन यात्राकरणादि निमित्तं हि धर्मनिमित्त हि कृत्यजातं जिनमन्दिरे कर्तुमुचितं, नान्यत् । पित्रााद्देशेन तु यात्रादि तत्र विधीय- मानं गुणवहुगानविकल केवलस्नेह निवन्धनत्वान्न धर्मः, परं तदपि लिङ्गनो धर्मोऽय- मित्यभिधाय स्वोपयोगाय विधापयन्ति । तथा यल्लोको-जैनमार्गरहिभूतः शिष्टजनः 'लोकोत्तरो' जिनप्रवचनं, ताभ्यामुत्तीर्ण-बाह्य सूतकभिक्षाग्रहणादि, एतत् हि लोकलोको- तरयोविरुद्धत्वात् न धर्मस्ते तु गार्यादिहेतु तदपि धर्म इत्यभिदधति, यदाह-"मिक्षा- सूतकमन्दिरे भगवतां पूजा मलिन्या खिया, हीनानां परमेष्ठि संस्तवविधिर्यच्छिक्षणं दीक्षणम् । जैनेन्द्रप्रतिमाविधापनमहो तल्लोकलोकोत्तर-व्यावृत्तेरथ-हेतुमप्यधिषणाः श्रेयस्तया चक्षते ॥१॥" तथा यद्भवहेतुरेव-संसारकारणमेव 'भविना' देहिनां जिन- मन्दिरे जलक्रीडादि । एतद्धि मदनोद्दीपनत्वात् क्रीडामात्रत्वेनातात्विकत्वाच्च संसारवर्द्धन- मेव, परमेतदपि लिङ्गिनो धर्मच्छमना स्वावलोकनकुतूहलेन कारयन्ति । तथा यत् 'शास्त्रवाधाकर सिद्धान्तविरोधाधायकम् औदेशिकभोजनादि, यथा चौदिशिकादीनां शाख. वाधितत्वं तथा प्राग्रेवोपपादितं, अथवा आषाढचतुर्मासकात् पञ्चाशत्तमदिनप्रतिपादितस्य पर्युषणापर्वणः श्रावणायाधिक्यवति वर्षेऽशीतितमेऽहि विधान । ननु ब्रुवन्तु ते स्वमति कल्पितं मार्ग, तथा वितथादिस्वभावत्वात्तं न कोऽपि ग्रहीष्यति, तथा चोक्तोऽप्यनुक्त- कल्पो लोकोपादानाभावेन प्रसराभावादित्यत आह-' मूढा' अज्ञानिनः तद्धर्मव्याजेन लिङ्गिप्ररूपितं मतं अर्हन्मतभ्रान्त्या जिनमागोऽयमिति मिथ्याज्ञाने 'लान्ति' उपपादते । अयमर्थः यथोभयगतचाकचिक्यादि सदृशधमोपलम्भात् परस्परव्यावर्त्तकदेशजात्यादि-भेद धर्मानुपलम्भाच अरजनेऽपि शुक्तिकायां रजतमेतदिति धिया प्रान्ताः प्रतन्ते, अथेदापि सन्मार्गासन्मार्गगतजिनदेवताऽभ्युपगमबाह्यवेषादि समानधर्मावगमादन्योन्यव्यवच्छेद- कविध्यविधिप्रवृत्त्यादि विशेषधर्मानवगमाञ्च वितथत्वादिना वस्तुतोऽनहन्मतेऽपि प्रकृत- मार्गेऽहन्मतमेतदिति बुद्धथा मूढाः प्रवर्तन्त इति, न केवलमेते कुमार्ग वदन्ति मूढास्तु तं गृह्णन्त्यपीति च शब्दार्थः । हा इति खेदे 'दुरन्तदशमाश्चर्यस्य' दुःखावसानान्त्यश्चार्यस्य 'विस्फूर्जित' विजृम्मितमेतदिति, कथमन्यथा कुपथस्याप्येतस्य बहुमुग्धजनोपादेयता स्या- दता कष्टमेतत् यद् अद्यापि अयं कुमार्गोऽस्खलितप्रसरोऽनुवर्तत इति वृत्तार्थः ॥ २८ ।। .
साम्प्रतं मुग्धजनान् प्रति स्वमत मोक्षपथतया दिशत सस्पथगामिनश्च धार्मिकान सपचनाऽननुरोधित्वेनाज्ञतया अवजानानस्य कस्यभिप्रथा छन्दाचार्यग्रामण्यो प्रस्तुत प्रशसया स्वरूपमाह- - कष्ट नष्टविशा नृणा यशा नात्यम्धयेदेशिका || २९ ।। - म्पाख्या---'कष्ट' दुःखमेतत् ना वेतसि वचने, यत् किमिस्साह, पदिति वाक्योप- क्षेपे, यकृणामदृशां जात्यन्धवैदेशिका कान्तारेऽमीमितपुराधान प्रदिशतीति सम्बन्धः । तत्र 'नृणां ' पुमा 'नष्टदृश' अलोचनत्वारकान्तारपातेन दिङ्मूढत्वाच प्रनष्टप्राची प्रतीच्यादिककुपविमागपरिच्छिदानां ' अशा' काकामलादिना दृषिकलाना, न तु जन्मान्धानां, जन्मान्धो-जन्ममिव्याया लोचनरहित । न तु सोऽपि तद्देशजात इतरेम्या श्रवणादिना विनाय कथाश्चिदिष्टपुरपथ देक्ष्यतीति वत्रोक्त 'वैदेशिक ' इति । विदेशे- योजन व्यवहिते देशान्तरे जातो चर्दितवेति वैदेशिका | सहि तद्देशस्वरूपमात्रस्याप्य नमिझत्वात्कय प्रकृतमार्ग जानीयादपि, ततः कर्मधारयः। 'कान्वारे ' जनसञ्चार शून्ये दुर्गवर्मनि 'प्रदिशति ' प्रतिपादयति । 'अभीप्सितपुराचान ' जिगमिपिता नगरमार्ग, किलेति वायां ।' उत्कन्धर ' उग्रीवः कघरामुन्नमय्य भुजदण्डमुक्षिप्प कथयतीति कष्टमेतत् । तुः पुनरथे । 'इद' वक्ष्यमाण पुनः ‘कप्टवर ' पूर्वस्मादपि कष्टान्महत्कष्ट । यत् किमित्याह-' सोऽपि' प्रागुक्तो मार्गदेष्टा 'सुशो' निर्मलनयना- नत एव ' सन्मार्गगान् । इटनगरसुगमपथपस्थितान् ' तद्विदः ' सम्यक् सन्मार्गज्ञान यत् इसति, सावज्ञमिति क्रियाविशेषण-सायहेल 'अज्ञानिव ' मार्गानभिज्ञानिन । यथा मार्गानभित्रा मार्गमुपदिशन्त उपहस्यन्ते लोकेन, तथैनेऽपि तेन । एर प्रस्तुतापमान योजयित्वा प्रस्तुतमुपमेयमिदानी योज्यते--कष्टमेतत् यऋणा-सुत्पयेच्छुपुरुषाणा 'नए- दृशां' अतिमुग्धतया सत्पथपथविभागानभिज्ञानात् अदृशा-सम्पग्नानदर्शननिकलानां जात्ययः' सिद्धान्तरहस्यलेशनभिज्ञ सर्वथा अगीवार्थः । सोऽपि गीतार्थसबामादे: कथञ्चित् मोक्षपथकपनप्रवीण स्यात्-तत्राह-'वैदेशिको' गर्हिताचारत्वाद् गीतार्थमुनि पुङ्गवसङ्गमात्रवर्जितः। एप चाधुनिकदुसहप्रवरो निश्शङ्क निश्रेयसपथप्रत्यार्थिमार्ग कपनदीक्षितो ययाउन्दशिरोमणिः कथिदाचार्यो मन्तव्यः । 'कान्तारे ' मरमहा- टल्या 'प्रदिशति' अभीप्सितपुरावान-मुक्तिमार्ग 'उत्कन्धरो' दर्शिताइकार- विकार । तथा य सोऽगीतार्थ उत्स्त्रमापको मिथ्याष्टिः कश्चिदपि ' मत्पथ' मोधमार्ग न बेचि, नाप्यन्येन गीतायन प्रतिपादितोऽपि प्रस्पेति, इवि कट, , . - एतत्कष्टतरं 'तु' इति पूर्ववत् । सोऽपि प्रागविहितो यथाछन्दाचार्यः 'सुरशः ' सम्य. रज्ञानदर्शनयुजः 'सन्मार्गगान् ' ज्ञानदर्शनचारित्रलक्षणमुक्तिपथप्रवृत्तान् ' तद्विदो' मुक्तिमार्गाभिज्ञान धार्मिकान् सुविहितसाधुन् यद्धसति सावनमज्ञानिव, यथा-किममी अगीतार्था मूर्खशिरोमणयः सिद्धान्तरहस्य जानन्ति ?, अहमेव सकलश्रुतपारावारपार- दृश्या, ततो यमहं ब्रवीमि स मुक्तिमार्ग इति । किमित्येवमुपहसतीत्यत आह-तन्महा- कष्टमित्युपमानोपमेययोस्तुल्यतया योजना । अत्र च मुग्धजनपुरतो निरनुशं स्वकल्पितं चैत्यवासादिकमुत्सूत्रपथं प्रथयन् विधिविषयपारतन्यप्ररूपणनिपुणान् सुगुरुसम्प्रदाय- वर्तिनः सुविहितानऽसूययोपहसन् सम्प्रति वर्तमानः कुसङ्काचार्यवर्गोऽनया भग्या कविना प्रतिपादित इति वृतार्थः ।। २१ ॥ साम्प्रतं श्रुत-पथा-वज्ञा-द्वारमुपसजिहीर्पः शुद्धजिनमार्गस्य दुष्टोपचितसमुदित कारणकलापेन सम्प्रति दुर्लभत्वं प्रतिपादयन्नाह- सैपा हुण्डावसर्पिण्यनुसमयहूसद्भव्यभावानुभावा, ॥ ३० ॥ व्याख्या-या आगम-ग्रन्थेष्वागामितया लिखिताऽऽकीते, सा एमा सम्प्रति प्रत्यक्षा, कालस्याप्रत्यक्षत्वेऽपि तदुद्भवकार्याणां प्रत्यक्षेणोपलम्भेनोपचारादेपेत्युक्तं । 'अबसर्पन्ति ' प्रतिक्षणमायुः शरीरप्रमाणादयो भाषा हानि गच्छन्ति प्राणिनामस्या- मित्यवसर्पिणी सिद्धान्तप्रसिद्धः कालविशेपा, हुण्डं--सकलाङ्गोपाङ्गानां यथोक्तमान- वैकल्यहेतुः पष्ठ संस्थान, तेनोपलक्षिताऽवसर्पिणी हुण्डावसर्पिणी, व्युत्पत्तिमात्रं चेदं, तत्वतस्त्वनन्ततम-कालभाव्यसंयतपूजानिवन्धनं चैत्यवास्युत्पादहेतुःशुभभावहानिकारण कालभेदो हुण्डावर्पिणी, सा च भगवति मोक्षं-गते जातेति । समय:-परमसूक्ष्मः कालः, ततश्चानुसमय-प्रतिक्षणं 'भव्यानां' मुक्तिगामिना, अथवा ' भन्याः' शुभा भावाः' परिणामा 'अनुभावाश्च' प्रमावा मति-निश्चया वा, ततश्च 'इसन्तो' हीय. माना भव्यभावानुभावा यस्यां सा तथा । हुण्डावसर्पिण्यां हि कालस्वाभाव्यात् धर्मार्थ- नामपि प्रायेण भावा यादृशा वर्तमान क्षणे न तादृशाः क्षणान्तरे इत्यादि क्रमेण प्रति- क्षणं सङ्क्लेशतारतम्याघ्राततयोपजायमाना उपलभ्यन्ते, तथा च प्रकरणकारेणैव प्रकर- णान्तरे प्रदर्शितं-" कालस्स अइकिलित्तणेण अइसेसिपुरिस-विरहेण | पायमजुग्गत्तेण य, गुरुसम्मत्तेण य जियाण ॥ १॥ किर मुणियजिणमयावि हु, अंगीकयसरिसधम्म- मग्गावि । पायमहसंकिलिट्ठा, धमन्थी वित्थ दीसंति ॥२॥" अत्र च हसदित्यनेन संयोग- परत्वेऽपि पूर्ववर्णस्य न गुरुत्त्रं, छन्दः शास्त्रैर्व्यवस्थित[क्या] नुवृत्या कचितत्तनिषेधात् । - - तथा 'त्रिंश'जैनसिद्धान्तोक्ताष्टाशीतिग्रह-मध्यात्रिंशतः पूरण, च. समुच्चये, उपग्रहो- जिनप्रवचनस्योदग्रोपसर्गकारित्वात-दारुणो ग्रह', अय-मेप प्रत्यक्षोपलम्यमानझार्यों मस्मराशिनामा, सें-अफाश, तस्य च शून्यत्वात्खमिति गणितव्यवहारे शून्यस्य- विन्दोः सना, नवा इति च विशते सज्ञा, नखाना विंशतिसवख्यत्वात् , ततश्च सच ख च नखावेति द्वन्द्व, तैः पश्चानुपूर्पा अङ्करचया स्थापितः मितानि-परिमख्यातानि 'वर्षाणि' सबमरा. 'स्थिति' रेकस्मिन् राशा[व] स्थान यस्य म तथा, एकराशौ वर्ष- महसदयस्थितिकइत्यर्थ(२०००)। महि ग्रहो भगरनिर्वाण कालानन्तर वर्षमहसवय यावत् मूरत्वाव-भगवअन्मराशी सद्रान्तत्वात्-भगान्त च मुक्तत्वेन दुःखीकर्तुमशक्तत्वाद- तत्पश्तयेव प्रवचनस्य पाधा करिष्यति । तथा अन्त्य' दशम, च' समुच्चये । 'मावर्य' अनन्ततम-कालभाविवादम-सयतपूजाख्य 'एतत् ' इदानी प्रत्यक्ष 'जिनमतहतये' आईतमपचनापम्राजनापादनाय ' वत्ममा ' प्रागुक्तैखिमि. 'समा' तुल्यबला दुष्पमा ' दुष्टा-लोकदु खकारिण्य ' ममा' चर्पाणि यस्यां सा तथा, कालचक्रस्य पडररस्प पश्चमोऽरक , यथा प्राक्तनास्त्रय. ममुदिता जिनमत नन्ति तथा चतुर्थी दुप्पमाऽपि । च' पूर्ववत् । इति प्रकरणे । 'एपु' प्रकृतेषु हुण्डासमर्पियादिषु 'ए' दर्शितप्रकारेण प्रतिपद सुविहितलापनासयत्तगौरवापादनलक्षणदुए कार्यदर्शनादृष्टेविव 'दुष्टेषु 'रेषु 'पुष्टेषु' प्रर्पकोटि प्राप्तेषु हुण्डावसर्पिण्यादिषु चतुर्यु ' अनुकल' प्रतिसमय 'अधुना' माम्प्रत 'दुर्लमो' दुरापो जैनमार्गः, प्रतिपतिविघ्नकारिणां हपडा- पसपिण्यादीना दुएत्याचन्महिम्ना च भूयोलोकस्य भगाभिनन्दित्वात्कतिपयमाधिक जनोपादेय इति पात् 'जैनमार्ग ' प्रतिश्रोतोरूप-भगवत्पथ इति चाय: ॥ ३० ॥ एव तापदादशमियुत्ने प्रबन्धेन लिगिनां श्रुतपथाज्ञा प्रतिपादिता, मम्प्रति तेरेव धर्मतया प्रतिपादित गुणिद्वेषधीरिति द्वार निराकृर्वस्तेया गुणिद्वैप दर्शयन्नाइ- सम्यग मार्गपुष प्रशाषपुष प्रीतोहसशक्षुष ॥ ३१ ॥ व्याख्या-वला. मत्मापून न शाम्पातीवि सम्बन्ध । तर 'खला. 'गुणित भरमरिण प्रारणालिदिना । तदुप इति दुपधातु फिरन्तोन दोपपर्याय: | ववव कृता' पिहिता 'दुपो' दोषा -म्पपमनेऽनर्धा येस्ते तया, वस्त्रमारत्वाद तेषा अपना कता' आरोपिता 'दुपो' दोपा यस्ने तया, निर्मलेपपि सन्मुनिगुणेषु लोरमध्ये लापवापादनाय सधिया निहिनदोषारोपा इत्यर्थः । गुणस मद्दोपारो पणस्य तेषां कलमत वाघ । 'उद्यत् दुपः निनिमिच सुपिहितदर्शनमात्रेणैव प्रकदिव - . - - - - ललाटतटभ्रकुट्यादि क्रोधविकाराः 'न शाम्यन्ति' न सहन्ते, द्विषन्तीत्यर्थः। तत्र देशेऽमीषां प्रचारेण वयं लोकस्यागौरव्या भविष्याम इत्यादि बुद्ध्या मात्सर्यात्तत्रावस्था- तुमेव तेषां न ददतीत्यर्थः । सुविहित यतीन् सत्साधुत्वमेवानुगुणविशेषणैस्तेषां भावयति- 'सम्यङमार्गपुषः' भगवत्प्रणीतज्ञानादित्रयरूपमोक्षपथस्य भध्यानां शुद्धोपदेशप्रति- बोधद्वारेण विस्तारकाः। एतेन तेषामुत्सूत्रभाषणप्रतिषेधमाह । 'प्रशान्तवपुषः' बहिर- लक्षितरागादि विकारशरीरभाजः, एतेनान्तरपि प्रबलरागाद्यमावं प्रकाशयति, अन्तस्त- हावे वहिः सर्वदा प्रशान्तत्वानुपपत्तेः । 'प्रीतोल्लसचक्षुषः ' द्विष्टानपि प्रतीत्य प्रसनो- स्फुल्ललोचनाः, एतेन बहिः कोपविकारपरिहारमाविष्करोति । 'श्रामण्यद्धि' प्राणाति- पातचिरमणादिपश्चमहाव्रतविभृतिमुपेयुपः-आसेदुषः, एतेन दीक्षामूलं सर्वविरतिसम्पदं दर्शयति । ‘स्मयमुपः' अहङ्कारतिरस्कारिणः, एतेन वाग्मित्वविद्वत्तादावभिमान- हेतौ सत्यपि तदभावं प्रकटयति । 'कन्दर्पकक्षप्लुपः' मन्मथशुष्कतृणदाहिना, एतेन सर्वव्रतमध्ये निरपवादब्रह्मवतदाढयं द्रढयति । 'सिद्धान्ताध्वनि' शुद्धागममार्गे 'तस्थुषः' स्थितवतस्तत्परानित्यर्थः, एतेन स्वयमुत्स्त्रक्रियानिषेधं प्रतिपादयति । शमजुषः' क्षमामाजः, एतेनान्तरपि क्रोधनिरासं ज्ञापयति । 'सत्पूज्यतां' विवेकी. जनसेव्यतां 'जग्मुपः' प्राप्नुपः, एतेन सकलश्रमणगुणगणसम्पत्तिमाविर्भावयति, निर्गुणानां विवेकिलोकपूजनासम्भवात् । 'विदुषः' विचक्षणान् , एतेन स्वसमयपर. समयमार विदुरतां विस्फारयन्ति । न चैवं गुणशालिषु यतिषु द्वेषः कत्तुं युक्तः, अणीयसोऽपि तद्वेषस्य सकलगुणिगतगुणद्वेषरूपत्वेनानन्तभवभ्रमणनिबन्धनत्वात् , सिद्धा- न्तेऽप्यभिहितं " भरहेरवयविदेहे, पन्नरस वि कम्मभूमिया साहू । एकम्मि हीलियम्मी, सवे ते हीलिया हुंति ॥ १ ॥ संतगुणछायणा खलु, परपरिवाओ य होइ अलियं च । धम्मे य अवमाणो, साहूपओसे य संसारो ॥ २॥" ततः प्रेक्षावता गुणिषु बहुमान एक कर्तव्यो, न द्वेष, इति वृत्तार्थः ।। ३१ ।। अथ कथमेवं विधानपि सत्साधून खला न शाम्यन्ति ? मिथ्यात्वप्रावल्या. दिति ब्रूमः, अत एव तद्वतो मूढजनस्य नामजैनपधवर्तिनः स्वरूपं निरूपयन्नाह- देवीयत्युरुदोषिणः क्षतमहादोषा न देवीयति ॥ ३२ ॥ व्याख्या--अहो ! मिथ्तात्वपहिलो जन उरुदोषिणो देवीयतीत्यादि सम्बन्धः । 'अहो' इति विस्मये, ग्रहः चेतसोऽसत् निर्बन्धः सोऽस्यास्तीति,अस्त्यर्थे इलू प्रत्ययः तद्वितम इह मिथ्यात्वं प्रकरणादाभिनिवेशिकं गृह्यते, प्रायेण जैनमिथ्यादृष्टीनां " गोडामाहिल- , 40 . " माहणे" त्यादिनाऽऽमिनिवेशिकस्यैव तस्य प्रतिपादनात् । ततश्च तेन 'महिला' प्रबलमिच्याऽमिनिवेशगृहगृहीत इत्यर्थः । 'जनो' धर्मजि-भक्तश्राद्धलोका, उरखो- महान्तो यतिजनस्यात्यर्थमनुचितत्वेन 'दोषा' अपराधा रागद्वेषप्राणातिपातापादय उरुदोषाः तद्वत आचार्यादीनिति गम्य | 'देवीयति' देवानिव-जिनानिवाचरति, यादृशा देवा नीरागा अतिशयादि मन्तश्च तादृशा अमी, तस्मादाराध्या इति देव. वानु- पमिमीते, न च तादृशा तेपा तदुपमान समीचीन, तेषां महादोपयत्वेन देवोपमान- विधानस्य महापातक हेतुत्वात् पर मिथ्यात्तस्य विपर्यामरूपत्वात् विपरीवघुद्धिः तादृशा नपि तथोपमिनोति, एवमुत्तरपदेष्वपि भाननीय । 'क्षतमहादोपान ' प्रणष्टप्रागुक्तवृहद- पराधान् युगप्रधानादीनिति शेष । 'अदवीयति ' अदेवानियाचरति, नामी दव- सदृशाः, सदोषत्वात्-निरतिशय नाच, तस्मादनाराध्या इति । अत्र च क्षीणप्रायदोषाणा देवरुपमान सिद्धान्तेऽप्युदित-" पडिरुमसे तेयम्मी" इत्यादावाचार्यगुणवक्तव्यवायां 'प्रतिरूपः सिद्धान्त तात्पर्यपरिच्छेददेशनाऽतिशयवत्यादिना तद्विपययुद्धिजनकत्वातीर्थ- करप्रतिविम्बरूप इति व्याख्यानात् , म च विपर्यस्त-मतित्वात्तथा न करोति । एवमदेव प्राये देवघुद्धिदेंचप्राये पादयधुद्धिरिति मिथ्यात्वस्वरूप प्रतिपाद्या-गुरी गुरुपुयादिरूप वदाह-'सर्वज्ञीयति' सर्वज्ञमिन-सविदमिवाचरति ' मूर्खमुख्यनिरह' अज्ञबूडामणि समूह स्वाम्युपेतगच्छस्थित पतिजन, यथा-सर्वज्ञसदृशोऽय मदीयो यतिजना किंकि शास्त्रज्ञात न वेचीति । 'तचन' पड्दर्शनतर्ककर्कशघिय स्वपरममयनिर्णयभूमि सरि- विशेष 'अझीयति' अज्ञमिव-चालिशमिनाचरति, यथा-न किश्चिदप्येप जानाति । अपमर्थ न हि मूर्खशिरोमणे सर्वज्ञेनोपमान युक्त नापि तवज्ञस्यानेन, अत्यन्तमननु- रूपत्वाद, पर म मिथ्याज्ञानाद एवमपि करोति । अधुना अमागें मार्गउदयादिरूप मिथ्यात्व दर्शयति-'उन्मार्गीपति 'उन्मार्गमिव-उत्पथमिपाचरति । 'जैनमार्ग' शुद्ध मगवत्पथ, यथा-नाय मगरत्प्रणीतो मार्ग फिन्तूत्सूत्र इति । ' अपथ ' कुमार्ग प्राप्रति पादितमौदेशिकभोजनादिक स्वकल्पित 'सम्यक् पथियति' सम्पन पथमिय-सन्मार्गमिव- सन्मार्गमिचाचरति । अनापि यत्-जिनमार्गस्य चन्द्रवत्प्रकाशस्योन्मार्गेण-[वामसेन ] नाम जैनेन सादृश्यापादनमुन्मार्गस्य च सत्पथतुल्पतापादन तन्मिथ्यात्वोदयादिति । तथा 'स्व' आरमान 'अगुणाग्रण्य' निर्गुणधुरन्धर 'कतार्थीयति' कृतार्थमिर-विहित सक्लप्रयोजनमियाचरति । अत्रापि स्वस्य निर्गुणमुख्यस्य 'तार्थेन ' गुणिमुख्येनो पमानमवियाशादिति । एव ताल्लोकोचरिकजनविपय मिथ्यात्वस्वरूप प्रदश्य पाद्य लोकविषयममि प्रमगाद फिश्चित्-दर्यत-'मिथ्यात्वग्रहिलो जन' आमिहिकादि - मिथ्यात्वात्-जैनमतबहिभूतो लोकः 'देवीयति' देवानिवाचरति, मुक्त्यर्थमाराध्यतया देवत्वेनाभ्युपै[ती]ति यावत् । उरुदोषिणो-रागादिमतो लोकप्रतीतान् हरिहरादीन् , क्षत- महादोषान् वीतरागान् लोकोत्तरविश्रुतान् अदेवीयति-अनाराध्यत्वेनानुमन्यते । अथ कथ- म्-एतन्मिथ्यात्वमिति चेत् ? उच्यते-अतस्मिन्-तदिति प्रत्ययस्यैतल्लक्षणत्वात् , तस्मान् न रागादिमन्तो देवाः। तथा सर्वजीयति-सर्वविदयमित्यभिमन्यते मूर्खमुख्यनिवह- अन्यपरतीर्थिकसमूहं प्राणातिपाताद्यनिवृत्तं । तथा तत्वज्ञ-समस्तशास्त्ररहस्यवेदिनं पश्च. महाव्रतधारिणं सर्वज्ञप्राय युगप्रधानसूरि 'अज्ञीयति' मूर्खयति । एवं च तत्वज्ञे गुरावज्ञ- वारोपो मिथ्यात्व-विजृम्मित, एतावता चागुरौ गुरुभावना गुरौ चागुरुधीरिति मिथ्या- त्वं लक्षितं । उन्मार्गीयति-उत्पथत्वेन मन्यते जैनमार्ग, अपर्थ-कुतीर्थिकमतं सम्यक्प- थीयति सन् मार्गीयति तदा स्वमगुणाग्रण्यमित्यादि तु पूर्ववत् । तदाचर्यम्-एतन्मि- थ्यात्वोपहता यदेवं विपर्ययेण सर्वमवसाय सुणिनो द्विषन्तीति वृत्तार्थः ॥ ३२ ॥ ननु किमिदानी गुणिभिः प्रयोजन ? सङ्घ एव भगवान्-निशेपदोपमोपक्षमः समाश्रीयता, भगवताऽपि च तस्य महत्त्वेन नमस्कृतत्वात् तथा च तदाज्ञया वर्तमा- नानां मोक्षः प्राणिनां सम्पत्स्यत इत्याशङ्कथा-धुनातनसङ्घयशवर्तिनो भव्यजनस्याक्षेप- पूर्व मोक्षाभावमुपदिदर्शयिषुराह- सन्त्राकृतचैत्यकूटपतितस्यान्तस्तरां ताम्यत ॥ ३३ ॥ व्याख्या-'जन्तवो' धर्मार्थिनो भव्यसवाः त एवावलत्वात्-मुग्धत्वात् सव. रहितत्वात्-च 'हरिणा' मृगाः तद्रातस्य-तत्समुदायस्य-उत्पथप्रवृत्त-उत्सूत्रप्रज्ञायक: श्रुतज्ञाननिरपेक्षः स्वच्छन्दचारी सातलोलुपः साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविकासमवायो भूयानिह सङ्घ उच्यते, स एव वलिष्ठत्वात् क्रूरत्वाच 'व्याघ्रः' शार्दूलस्तद्वशस्य-तदधीन- स्य-दासवत्-यत्र तत्र नियोज्यस्येति यावत् । द्वितीयपक्षे ग्रासविषयीभूतस्य 'मोक्ष' इति श्लिष्टपदं, तेन जन्तुपक्षे ' मोक्षो' निर्वाण, हरिणपक्षे च छुटन व्याघ्रात्पलायनमिति यावत् । 'कुतः' का स्यात् ? न कथञ्चिदित्यर्थः । ननु मुक्त्यनुगुणा-नुष्ठाना-भावात्तस्य मोक्षामावर, किमायातं ? सद्यस्येत्यत आह-'मुक्त्यै ' निःश्रेयसार्थ 'कल्पितदानशील- तपसोऽपि ' स्वबुद्ध्याविहित जिनादिवितरण देशचारित्रानशनादेरप्यास्तां तदितरस्येत्यपि शब्दार्थः । कथं तर्हि मोक्षाभाव ? इत्यत आह-' सङ्घाय' लिनिसमुदायाय 'देयानि' कृतानि । दयेत्राचेति त्रा तद्धितः । ततश्च ' सन्त्राकृतानि ' श्रावकलोकेन भक्त्या स्वद्र- विणेन निर्माप्य लिगिभ्यः तत्-दशनयैव वासाद्यर्थं समर्पणेन तदायत्तीकृतानि 'चैत्यानि' - ।
. - , जिनायतनानि, तान्येच 'कूटा' हरिणबन्धनयत्रविशेषा । अथ कूटश मन्महेतुरमि. धीयते, मोचनहतु-बन्धनहेत्वोमडद्वपम्य, तथा च सिद्धान्तविधिना लिङ्गिनां निश्रा निवासविरहेण श्राद्धैर्यानि चैत्पानि विधाप्यन्ते तानि समारगुप्तिमोचननिरन्धनानि भवन्ति, एतानि प्रकृतस्यानि मुग्धान् प्रोत्साह्य स्त्रनित्रासाद्यर्थ कथम् आजन्मामी श्राद्धा अस्माक भोग्या भविष्यन्तीत्याशयेन तेपा तन ममकारोत्पादनेन नियमाद्ययं लिहिमिः कारितानि, तत्कथमेतेषां मोचनहेतुत्व ? प्रत्यूत बन्धननिवन्धनत्वमेर । एव चैत्याना टैरत्यन्त बन्धहतुसाम्येना-भेदविवक्षणाद्युक्त उपमानोपमेयमार इति । मकवाकतचैत्य कूटेषु 'पतितम्य' प्रतिबद्धस्य कश्चित् मत्पथ प्रतिपरसोरपि तत्र गोष्ठिकवादिना य. कारितप्रतिमा ममत्यादिना वा नियमितत्वात् ततो निर्गन्तुमशक्तस्येति याद । द्वितीय पक्षे 'पतितस्य' पद्धस्य । तथा ' अन्तस्तरा ताम्यतः' मन्मार्गबहुमानितातो निजि गमिपोरपि निर्गमालामात् भविता कदाचितदिन यत्रैतम्मात् असत्पयादव निर्गमिष्यामि इत्येव तरामतिशयेनान्तःकरणमध्ये 'ताम्यतः' खिद्यमानस्य, कुत १ इत्यत आह- तच्छन्दन सङ्घ परामृश्यते, तस्य-महस्य 'मुद्रा' चतुर्दश्यादिकाः पतिथयः, एतदा चार्यसवादेन तपोनियमादिकते प्रमाणीकर्तव्या, नान्यथेत्येवमादिका व्यवस्था, तत: क्षुद्रा प्रवर्तिता, पराकान् मुग्धमारङ्गान् हा! पटु वागुरा हर | ततय तन्मुद्भर ''निविड 'पायो' मृगादिवन्धनाथ दयरकादिनिर्मितग्रन्थिविशेष तेन 'बन्धन' सपमन, तद्वत-स्तदन्वितस्य । सहि महमुद्रामुद्रितः ततो निर्गमनामिपि कस्यापि पुरतो वक्तु न शक्नोति, किम्पुनर्निर्गन्तुमित्यर्थः । तथा एतस्य-महस्य क्रम-स्वनिर्दिष्टा रात्रिस्नानादिका परिपाटी, तत्स्थापिन-स्तद्वर्तिनः। द्वितीयपक्षे तु हरिणप्रहारार्थ- मुक्षिप्य सजित पादा क्रम तद्गोवरगतस्येति । ततोऽयमर्थ.-पथा व्याघ्रपासविषय- स्प तन् क्रमगोचरस्य, तथापि कूटपतितस्प, अन्यथा हि पलाग्यापि कचिचतो मोक्ष, मम्मरति । तत्रापि निजिंगमिपया चेतसि ताम्पतो पाशसयमितत्वेनामस्पन्दनमात्रमपि कर्तुमशक्तस्य हरिणजातस्य स कपश्चिचतो मोक्ष मम्मति, एवमस्यापि चैत्यप्रति पदस्य सन्मार्गम्पहया निर्गन्तु मनमि खियमानस्यापि समुद्रया कीलितत्वेन सत्पथा- म्युपगम प्रति उद्यन्तमप्यनुसता तत्क्रममनतिक्रामत सम्प्रतिमन महायावश्यस्य जन्तु मन्दोदस्य न निर्माण मआयत इति । अय कयमिह सहस्प करतया व्याघेणोपमान ? अत एव सुखशीलताऽनुरागाद सहमपि मन इत्यभिदधतां प्रायश्चित्त प्रतिपादित सिद्धान्ते । यदाह-" असप सप ने, भगति राग अर दोग। छोगा मूल पा, . पच्छित्तं जायए तेसि ॥१॥" तस्माद्युक्त क्रूरतया प्रकृतसहस्य व्याघतया[निरूपणं, तथा च सिद्धः तद्वशस्य प्राणिगणस्य मोशाभाव इति । नन्वेवं तर्हि सिद्धान्तोक्तलक्षणस्य सस्य सम्प्रत्यभावात् भवन्मते तीर्थोच्छेदः प्रसज्यत इति चेन्न, यदुक्तमागमे-"निम्मल- नाणपहाणो, सणसुद्धो चरित्तगुणजुत्तो। तित्ययरागाविजो, बुचद एयारिसो संयो॥१॥ आगममणियं जो, पनवेह सहहइ कुणइ जहसत्तिं । तेलुकवंदणिजो, ममकाले वि सो संघो ॥२॥" अन्यथा "दुप्पसहंत चरण" इत्यादेरादुःपमांतं चारित्रानुवृतिप्रतिपाद- कस्य भगवद्वचनस्य व्याघातापचेः, भावसवमन्तरेण तावन्तमनेहसं चारित्रानुवृत्तेरस- म्भवात् । ननु भवतु सिद्धान्तप्रामाण्यात्-इदानीमपि भावसकोऽल्पीयांस्तथापि मया तावन्न दृश्यत इति चेत् ? अर्वाग्दर्शितत्वेन मात्सर्येण वा भवतः तददर्शनस्या-न्यथा- सिद्धत्वात् , दृश्यते च कपायकलुपितचक्षुपां सन्निकऽपि निषेदुषो मनुष्यादेरनुपलम्मः, ततो यदि त्वं शुद्धपथस्पृहयालस्तदा मात्सर्यमुत्सार्य माध्यस्थ्यमास्थाय सूक्ष्मप्रेक्षया परीक्षस्त्र भावसई, येन कचित्प्रेक्षसे, मैवमेव नास्तिकतामवलम्ब्य भवाम्भोधौ मक्षी- रिति । तस्मात् भगवद्वचनान्यथाऽनुपपत्या सम्प्रत्यप्यस्ति भावसकः, स एव च प्रेक्षा- बता दुस्सश्चता परिहारेणाम्युपेतन्य इति वृत्तार्थः ॥ ३३ ॥ तदेवमौदेशिकभोजनादि द्वारदशकेन लिङ्गिमिः प्रज्ञापितस्य धर्मस्योत्पथत्वप्रकाश- नेन जडानां चेतसि कोपाविर्भावं सम्भावयंस्तक्षणं तत्प्रदर्शनप्रयोजनमाविश्चिकीर्षुराह- इत्थं मिथ्यापथकथनया तथ्ययाऽपीह कश्चिन् ॥ ३४ ॥ व्याख्या -' इत्थं ' प्राक्प्रतिपादितप्रकारेण 'मिथ्यापथकथनया' चैत्यवासि- प्ररूपितोत्सूत्रमार्गप्रकटनया करनभूतया 'तथ्ययाऽपि' यथार्थयापि, असत्यया हि तया कोपोत्पादाद्यपि कस्यापि सम्भाव्यते इत्यपि शब्दार्थः । इह' लोके प्रवचने वा 'कश्चित् 'जिनशासनस्थो मा ज्ञासीत् , यदिदं मिथ्यापथकृपयत्वप्रकटनं 'अनुचितं' असङ्गतं, यदि हीदं रागद्वेषाभ्यामतथ्यं विधियेत तदाऽनौचित्यं स्यात्-न चैवमस्ति । अथो इत्यानन्तर्येऽव्ययं । तेनानुचितज्ञानानन्तरं ' मा कुपत् ' मा क्रुध्यत् ' कोऽपि' कश्चित् । यदि यत्तदनुचितं स्यात्तदा तज्ज्ञानान्तरं कोपोऽपि कथञ्चित् युज्यत, न चैवं, तस्मान कोपनीयं । अथ यद्येवं मिथ्यापथकथनेन परेषां कोपाविर्मावशङ्का तदाऽसौ न कथनीय एव, परसङ्क्लेशहेतोः सत्यस्यापि वचनस्यावक्तव्यत्वेनाभिधानात् । यस्मात् हेतोजैन. भ्रान्त्या माधुसाध्वी-श्रावक श्राविका चैत्याद्याकारदर्शनात् आहेतमेतत्प्रवचनमिति मिथ्या- ज्ञानेन, नहि लिहण्यादयः तत्वत आर्हताः, उक्तन्यायेन तेषां तथा त्वस्यापाकरणात् । - - - तथा यतेऽपि जडा: कुवामनावासितान्ताकग्णा रस्तुतोऽनाईतम् अध्येतल्लिङ्गि यति मिति विपर्यस्यन्तीति जैनम्रान्तितया ' कृपयपतिवान् ' कुमार्गप्रस्थितान् 'नन् मानवान् 'प्रेक्ष्य अवलोक्य 'तत्प्रमोहापोहाय' कुपथपतितनर-मागुक्तप्रमल-मिथ्याज्ञानोपनोदाम 'इद' एतलिदिना मिथ्यापथस्वरूप 'किमपि ' दिङ्मात्र 'रुपया' कथममी मूदा। तीर्थ्यामामकदार्थता कुपथस्वरूप विज्ञाय तत्परिहारेण मत्पथमम्पुपेत्य मनोदधि तरि प्यन्तीत्पनुकम्पया कल्पित' मन्य प्रतिपिपादयिपया मकल मकलस्य प्रथम घेतसि ममित, ततो 'जल्पित ' अक्षररचनया एन्ध, तदन्तरेण परस्य पुरत सम्यक्प्रतिपादित दुशक्यत्वात् । चः समुचये। अत: कृपथपङ्कनिमजन-नरनिकरोद्धरणाय मया मिचिद जल्पितमिदमिति सुष्ठक्त भगवता प्रकरणकारेयोति घृक्षार्थः ।। ३४ ।। अथ कथमिति दिहमानमेवामिहित ! यावता निश्शेपटोपप्रकाशनेन हि मिथ्या. पथ: मुशानः मुत्पजच मातीत्याशक्य तन्निरासयोतकेन 'यत' इति पदेनान्तरापूर्व वहोपामानन्स्येनामिधानाशक्यत्व निदर्शनयावि भावयन्नाह-पता- मोदतेऽन तकालास्कलिमलनिलये नाम नेपथ्यतोऽईन् ॥ ३५ ॥ व्याख्या-'पत' इति यस्माद्धतोरस्मिन् दुरध्वेऽनन्तकालापोभूने यो दोष सकरूया विवक्षेदित्यादिमम्बन्धः । तत्र 'प्रोभूने ' साते 'अनन्तकालात् ' अनन्ते नानेहसा, अनन्तोत्मर्पियामर्पिणी परिवर्चनेनास्य कुमार्गस्पायर्यदशकान्त पातित्वेन सिद्धान्ते प्रादुर्भावप्रतिपादनात् । 'कलिमलनिलये दुष्पमापातकनिवासे, दुष्पमासालो हि अपरफालापेक्षपा महापापा, ततयाजातीवासमक्षमप्रवृत्तिदर्शनाद सम्भाव्यते-मकल दुप्पमामल दुरध्वेऽस्मिन्-नियमति, अथवा 'कलिरेव' कलह एव 'मल किड वसनिलये। तथा 'नाम' अमिधान, यथा लिङ्गदर्शनेऽपि लोका वकारो-मान्ति-प्रमी जेना अभी सि(घ)ताम्बरभिक्षा इत्यादि, नेपथ्य-रजोहरणादिवेप., ततो द्वन्द्वा । ततश्च नाम नेपथ्यता-सुविदितसाधारणात् नामश्रवणात नैपध्यदर्शनाचाईन्मार्ग प्रान्ति-तासिक जिनपथसादृश्य 'दधानेऽपि' विनाणे, नन्वय पन्थाः वर्हि जिनमार्ग एव भविष्यतीत्यत आह-अथ चेति प्रतिकूलपक्षान्तरद्योतकमव्ययम् 'तत्वतः परमार्थतः 'तुदमिमरे' अईन्मार्गधातुक, अयमर्यः-यथा' अमिमरा:' प्रच्छन्नपातुका: स्ववेषेण राजादिधान कर्तुमशक्नुवन्तो पेपपरावन राजादिक व्यापादयन्ति, तथैतपि गृहस्थवऐगाईन्मार्गो च्छेद तयारिघातुमपारयन्ती यतिवेपेण विरुद्धमरूपण रेटितादिनाऽईन्मार्गमुच्छिन्दन्तीति भवति-अमिमरा: 1 तय दुरध-दुरध्वचिनोरमेवोपचारात् इस्थरम्याम । 'अस्मिन् - , प्राग्वर्णितस्वरूपे 'दुरध्ये ' कुमागें 'कारुण्यात्' मास्मामी उन् जडा अस्मिन् इपथ- पक्ष इनि दयाऽध्यवसायात् ' यः कश्चिन्महायस्थो 'नृषु' लिङ्गिमावनामावितेषु मस्येषु 'कुधोधं ' कुदेशनोत्पादितममत्पथेपि मत्पथभ्रम 'निरसिसिषु' बिभित्सुः । यदि हि कथञ्चिदमीषां मृदानां दुरध्वदोपसामस्स दर्शनेनाय कुबोधो विघंसते तदाऽमी उपकृता भवन्तीत्याशयेन 'दोपसहल्या दूपणेयत्ता 'विवक्षेत' अभिधित्सेत् , एतावत् सहाख्या अत्र कुमार्गे दोपाः सन्तीति वक्तुमिच्छेदित्यर्थः। स पुमान् 'अम्भो' जलं अम्मोधे-रणवस्प जलं 'प्रमित्सेन ' हयदनाम्म इति चुलुकादिभिः संचिख्यासेत् । जलधिजलपमित्सानि- दर्शनेन दुरध्नदोषाणामसख्येयतासिझ्या अपरितुष्यन् विवक्षितानन्त्य चिस्यापयिषया निदर्शनान्तरमाह-'सकलगगनोल्लान' पद्यां समग्रान्तरिक्षान्त प्रापणे, चेति पक्षान्तरे, विधित्सेत-चिकीत । अयं च निदर्शननामालङ्कारः। ततोऽयमर्थ:-यथा सागराम्भो- ऽतिभूयस्त्वात् प्रमातुमशक्यं, तथा दुरध्वस्य महामिथ्यात्वरूपस्य लोकोत्तरविरुद्धाममा- सचेष्टित-शतसहस्रसम्भृ[संवृतत्वात् तदोपसख्याऽप्यतिमाहुल्यादतमशक्येति, अतो दिङ्मात्रमेवोदाहृतं, तावन्मात्रेणापि केपाश्चित्पुण्यात्मनां मोहापोहेन सत्पधाभ्युपगमो भविष्यतीति धियेति वृत्तार्थः ॥ ३५ ॥ मनु-उक्तन्यायेन लिङ्गिनः चेत् यतयो न भवन्ति तर्हि न सन्त्येव, कचित्सम्प्रति श्रुतीक्तलक्षणभाजो यतयोऽदर्शनात् , तथा च ज्ञानदर्शनाभ्यामेव भगवतीर्थमनुवर्तत इति मन्यते तं प्रत्याह-तथा- न सावद्याम्नाया न बकुश-कुशीलोचित-यतिः ॥ ३६॥ व्याख्या-तथेति, यथा सम्प्रति भूयासो लिङ्गिनः सन्ति ' तथा ' तेन प्रका- रेण विरलाः सुविहिता अपि, इत्येतदेवाह-तेऽद्यापि स्युरिह यतय इति सम्बन्धः। 'आम्नायो' गुरुशिष्यप्रतिशिष्यादिक्रमेण सम्प्रदायः 'सावद्यः' प्राग्यर्णित औदेशिक- भोजनाद्युपभोगादेः सपाप आम्नायो येषां ते तथा, नना तेषां निषेधः । अधुनातन- रुढ्यौदेशिकभोजन-चैत्यवासादिना सावद्यसम्प्रदायवन्तो येन भवन्ति, तथा 'बकुश शबल-मतिचारपद्धेन समलं, प्रक्रमाचारित्रं, ततश्च बकुशचारित्रयोगात्साधवोऽपि बकुशा: ते च द्विविधा-उपकरण-देहभेदात् । तत्रोपकरणबकुशा ये वर्षाप्रत्यासत्ति-मन्तरेणापि कदाचित् वस्त्रादिकं धावन्ति, लक्षणाद्यंशुकादि च जिघृक्षन्ति कदाचित्परिदधते च, पात्र- दण्डकाद्यपि घृष्ट तैलादिम्रक्षणोत्पादित तेजस्कं च धारयन्ति, उपकरणमप्यतिरिक्तं प्रार्थ- - . 4 यन्त इति । देवनकुमास्तु ये करचरणनखादीन् कदाचित् निनिमित्तं भूषपान्तीति । इमेज द्विविधा अपि शिष्यादिपरिवागादिकां विभूति तपः पाण्डित्यादि प्रमच च यशः प्रार्थयन्ते, तदामादने न च प्रमोदन्ते, छेदा श्वातिचारपडमिः शवलिता अपि कर्मक्षयार्थमुद्यता इत्यादिलक्षणयुक्ता प्रकृशाः । यदुक्त-" उवगरण-देह-चोखा, उड्डीरमगारवा सिया निष । पकुमबल छेयजुत्ता, निग्गंथा चाउमा भणिया ॥१॥" तथा कुत्मित'शील' चरण येषां ते तथा, तेऽपि द्विधा-आसेवना-पायमेदाद , तत्रासेवनाशीला ये ज्ञान- दर्शननारित्रतपासि किनिपजीवन्ति, कपायकृशीलास्तु ये क्रोधादिमि. कपायानादि- गुणान् युजन्ति, अथवा कपायैझनादीन् ये पिराधयन्ति भवोच्छेदापोपस्थिता अपीस्यादि लक्षणमाजय कुशीला इति । ततो बकुशाश्व कुशीलावेति द्वन्दः । तेपासचिता- योग्या ' पतिक्रिया' प्रत्युपेक्षाप्रमार्जनप्रमृतिका माधुमामाचारी, तथा ' मुक्ता हिता ये न भवन्ति, प्रत्यह यतिकृत्य च तत्-"पडिलेहणापमजणा-भिक्तिरिया-लोपाषणा घेव । पचगधुपणवियारा, थडिलमावस्मयाई ॥१॥" इत्यादि दशविधचक्रवालसामा चारीचरिण इत्यर्थः । यदुक्त श्रीउमास्वातिवाचककृततत्वार्थस्त्रे भाष्ये च "पुलाक- पश-शील-निर्ग्रन्थ-स्नातका निर्ग्रन्थाः" [अ. ९ सू. ४९] [भाष्ये] पुलाको बकुशा कशीलो निम्रन्थः स्नातक इत्येते पञ्च निर्गन्यविशेपा भनन्ति । तत्र सततमप्रतिपातिनो जिनोक्तादागमान-निन्थपुलाका. । नेग्रन्ध्य प्रति प्रस्थिताः शरीरोपकरण विभूपाऽनुव सिता ऋद्धियशस्कामाः स्वतगौरवाश्रिताः अनिविक्तपरिवारा आविविक्ता इति न असय मात् पृथग्भूता करिका कल्पितकेशाः, एवविधः परिवारो येषा ते, छेदशवलयुक्ताः सर्वदेशच्छेदाई अतीचारजनितशवलेन-वैचित्र्येण युक्ताः, वकशा, कुशीला द्विविधा- प्रतिसेवनाकुशीला कपाय कृशीलाच, तत्र प्रतिसेवनाकृशीला नन्थ्य प्रति प्रस्थिताः ये अनियतेन्द्रियाः अजितन्द्रिया रूपादिविषयेक्षणकतादरा कथश्चित् क्वचिदुत्तरगुणेषु विरा भयन्ता परन्ति, ते प्रतिसेवनाकशीला प्रतिसवनाधिकारे प्रतिसेवनापश्चाना मूलगुणानां रात्रिभोजनविषिष्ठाना पराभियोगाद् बलात्कारणान्यतम प्रतिसेउमाना पुलाक. स्यात् , मैथुनमित्येके । पशो द्विविधा-उपकरणपश' शरीरयकुशव । तत्रोपकरणामिवक्त चित्तो विविधविचित्रमहाधनोपकरणपरिग्रहयुक्त'-विविध दशमेदन, विचित्र-रक्तपीतादि मिर्वणैर्षहुमूल्योपकृतियुक् बहुविशेपोपकरणकासायुक्तो । पहु-विशेष[ण ] मृदु-दृढ-- रुचिर-वणादि-युक्तोपकरणे जाताभिलाप., नित्य तत्प्रतिसस्कारसेगी, नित्य-सर्वदा 'वस्य' उपकरणस्य 'प्रतिसस्कार' प्रक्षालन-दशाषन्धा-घटिकासवेष्टनादिक, सत्सेवी मिक्षुरुपकरणपशो भवति । शरीरामियुक्तचिनो विभपाय सत्प्रतिसस्कारखवी शरीर , - - , . कुशः । प्रतिसेवनाकुशीलश्च मूलगुणानविगधयन् नुत्तरगुणेषु काश्चिद्विराधना प्रतिसेवते । कषायकुशील-निर्ग्रन्थ-स्नातकानां प्रतिसेवना नास्ति । पुलाकस्योत्कृष्टस्थितिषु देवेषु सहस्रारे, वकुश-प्रतिसेवनाकुशीलयोविंशतिमागरोपस्थितिषु आरणाच्युतकल्पयो, सर्वेषामपि जघन्यः पल्योपमपृथक्त्वस्थितिषु सौधर्मे उपपातः । अत्र च पुलाक-निर्ग्रन्थ- स्नातकपरिहारेण यत् वकुसकुशीलोचितक्रियायुक्तयतिगवेपणं तत्तैरेव मर्वतीर्थकराणां तीर्थप्रवृत्तेः, “ मवजिणाणं जम्हा, बकुसकुसीलेहिं वट्टए तित्थं । " इति वचनात् । तथा न युक्ता' न स्पृष्टा ' मदो' जात्यादिभिरात्मोत्कर्षप्रत्ययः । ममता' गृहस्थादिषु प्रतिबन्धो, ममैते योगक्षेमं वहन्ति, ततो यद्यमीषां काप्यनिष्टं न सम्पद्यत इत्यादि- स्नेहेन तत्सुखदुःखाम्यां यतेरपि तद्वत्तेति यावत् । 'आजीवनं ' आजीविकानिर्वाह- स्तस्माद् भयं, तदभावसम्भावनया भीतिहिभिर्विदितशैथिल्याः सिद्धान्ताध्ययनादिविर- हिता वा गृहस्थच्छन्दोऽनुवृत्ति विना निस्पृहतया शुद्धं प्ररूपयन्तो वा, एतस्कृतनिर्वाहा- भावेन कथं वयं जीविष्याम । इत्याद्यध्यवसाय इत्यर्थः । ततश्च मदश्चेत्यादि द्वन्द्वः । तैः। महासत्चानां हि स्वजन--धन-पुत्र कलत्रादि--सङ्गत्यागेन प्रव्रज्याग्राहिणां कुतस्त्यो गृहस्थादिषु ममताधवकाशः १, क्लीवानामेव तद्भावात् । एवं च सति ये ममतादिभिर्व- र्जिताः। तथा 'सक्लेशः' अविच्छिन्नप्रवाहतया प्रतीयमानो रौद्राध्यवसायः तस्य 'आवेश' आवेगः-उत्कर्षों येषामिति व्यधिकरिणो बहुब्रीहिः । ते, तथा ये न भवन्ति, सज्वलन- कषायोदयत्वेन तेषां तन्निबन्धनत्वप्रथमादिकषायोदयाभावात् । न कदभिनिवेशा' अनाभोगादिनाऽन्यथाकारं स्वयं प्रज्ञप्ते अभ्युपगते वा वस्तुनि कुत्सितमानसाग्रहवन्तो ये न भवन्ति, तत्कारणमिथ्याभिमानाभावात् । न कपटप्रिया' मायाप्राधान्येनानु- छाननिष्ठा ये न भवन्ति, तनिमित्तजनरञ्जनापरिणामाभावात् । ममताजीवनभयादयब साधुत्ववादकत्वात्-यतीनां सर्वथा हेया एव इत्यतस्तेषामिह निषेधो विशेषेण प्रदर्शितः । यदुक्तं-" एवं च संकिलिट्ठा, माइट्ठाणम्मि निच्चतल्लिच्छा। आजीवियभयधत्था, मृदा नो साहुणो नेया ॥ १॥ य एवं गुणगणोपेतास्ते अद्यापि' सुसाधुरहिततया शङ्किते दुष्पमाकालेऽपि, आस्तां दुष्पमसुषमादावित्यपि शब्दार्थः । स्युर्भवेयुः ' इह ' प्रवचने सूत्ररतयः' सिद्धान्ताध्ययनाध्यापनव्याख्यानश्रावणपरा- यणाः, अध्ययनादिकर्तव्यता विषयतयैव तेषां शास्त्रीयशिक्षाश्रवणात् । यदुक्तं-" शास्त्रा- ध्ययने चाध्यापने च, सञ्चिन्तने तथात्मनि च । धर्मकथने च सततं, यत्नः सर्वात्मना कार्यः ॥ १॥" न तु लिङ्गिन इव प्रव्रज्यादिनमारभ्य व्यवहारमन्त्रादिप्रयोगतत्पराः । एतेन तेषामुन्मानाद्यभावप्रतिपादितः, महात्मनां सूत्राध्ययनादेरेव फलत्वात् । एतेन . - - ' यतयः । साधवः , . न सन्त्येष मम्प्रति यथोक्तलक्षणमानो यतयोऽदर्शनादित्यादि पदाधित तदपास्त, कालादिदोषाद-प्रायश' तथाविध-यतीनामदर्शनेऽपि कापि ते न सन्तीत्यनाघासस्य- कर्तुमयोग्यत्वात् , तदुक्त-" कालाइदोमओ कहथि, जावि दीसति तारिमा न जई । सहत्य तहवि नस्थिति, नेव कुशा अगास्सिास] पास (1) ॥१॥" आतीर्थमा गमे चकुश-कुशीलानामनुषत्तिश्रवणात् । पदाह-"न पिणा वित्थ नियठेहिं, नातित्थ व नियठया । छकायसजमो जाय, ताव अणुस्मजणा दुन्द ॥ १॥" इति, यकशकशील- योरनुचिरिति तत्र व्याख्यानात् , तथा च मानदर्शनाभ्यामेव मम्प्रति तीर्थमिति बुवाणस्य भवतः प्रायश्चित्तापत्ते', यदाह-" कसिंचि आएसो, दसणनाणेहिं बट्टए तित्थ । वुच्छिन च चरित, ययमाणे मारिया चउरो ॥ १॥" अमद्ग्रहात् तदनिन्छ- तश्च समाधवप्रसङ्गात् , यदुक्त-"जो भणइ नत्यि धम्मो, नय मामाइय न चेव य चयाइ । सो ममणसघयझो, काययो ममणसग ॥ ॥" तस्मात् सन्त्येवायापि विरला प्रामाणितगुणा मुनयो। यदाइ-" तो भामरामिगहनिहुरिए वि, तह दक्षिणे वि इह खित्ते । अयि हि[चि] य जा तित्य, विरलतरा के मणिपरा || १" इति वृत्तार्थ. ॥३६॥ तदव दुप्पमायामपि सुपिहित यतिमत्ता व्यवस्थाप्य साम्प्रत मामान्यविशेषगुण अचया पामेव वन्दनीयता प्रदर्शयन्नाह- सविना सोपदेशा श्रुतनिफपविद क्षेत्रकालापपेक्षा ॥ ३७ ॥ व्यारया- उन्धाः मत् माधोऽस्मिन्निति मम्बन्ध' । 'सविना' मोक्षामिला पुकाः मवमीग्यो पा, न तु परलोकोमुख्पेनेहलोकप्रतिबद्धा । एवविधा अपि सनि- स्तारका एर भविष्यन्ति, तथा च किं ? तैरित्यत आह-सोपडया' धर्मदेशाना तत्परा, न सालस्य मातमीलनादिना तहिमुखात, त विना भन्योपकारामातस्य चावश्य यतिना विधेयत्वात् , अन्यथा आत्मम्मरित्वमात्र प्रसाद, यथायश्चित् तद्भव- मुक्तिगानापि च कृतकृत्यन भगता भविकोपचिकीर्पया तदादरणात् , ग्लादि- नाऽप्याचार्येण धर्मव्याख्यानमवश्य कर्तव्यमित्यागमेऽभिधानाच । यदाह-" दो चेव मत्तगाइ, खेलकाइय सदोमगसुविए । एव मिनिच, वक्खाणिजत्ति भावत्यो ॥ १॥" 'श्रुतनिक्परिद.' आगमरहस्यनिपुणा, एतेन गीतार्थतया धर्मकथाधिकारित्वमाइ, अगीतार्थस्य तदयोगात् । एविधा अपि स्य क्रियाशिथिला भविष्यन्तीत्यत आह- 'क्षेत्रकालाद्यपेक्ष ' अस्मिन् क्षेत्र अनुष्मिन् काले, आदिग्रहणाच्छरीरवलादिग्रहः, एवविधे - " , -- - च बले मति विधीयमानमेतदनुष्ठानम् अस्माकमात्मसंयमशरीरयोरबाधक भविष्यतीति देशसमयबलानुसार्यनुष्ठानं विहारक्रमादि क्रियाकाण्डं येषां ते तथा, अनेन पददयेन ज्ञानक्रियातयानुगामित्वं तेषां निवेदितं, तत्प्रधानत्वात् दीक्षायाः केवलयोरनिष्टफलता- भिधानेन समुदितयोरेव तयोः पान्धयोरिवएफलसाधकतया तैः इयत्वात् । एवंरूपा अपि कृतोऽपि कदाग्रहगरलोद्गारात्-उत्सूत्रं प्रज्ञापयिष्यन्तीत्यत आह-'शुद्धमार्गप्रकट- नपटवः ' यथार्थश्रुतपथप्रकाशचतुराः, अणीयसोऽप्युत्सूत्रपदस्य दारुणं विपाकं विन्दतः कथमपि ते तन बदन्तीत्यर्थः, अत एवं कथञ्चित कर्मदोपात् चरणकरणालसेनापि शुद्ध एव मार्गः प्ररूपणीयः, यदुक्तं-' हुअ हु वमण पत्तो, मरीरालयाइ अयिह अस- मत्थो । चरणचरणे असुद्धो, सुद्धं मग्गं परूविजा ॥ १ ।" तथाविधस्यापि शुद्धपथ- प्ररूपणात् प्रेत्य बोधिप्राप्त्या कथञ्चित्संमारपारावार निस्तारात् , अशुद्रपथप्ररूपकस्य दुष्करक्रियाकारिणोऽप्यमुत्र बोधिहत्याऽनन्तभवनिर्वर्तनाद , अत एव तादृशस्य दर्शन- मात्रमपि श्रुतं निवारितं, यदाह-" उम्मग्गदेसणाए, चरणं नासंति जिणवरिंदाणं । बावन्नदसणा खलु, न हु लभा तारिमा द8 ।। १ ।। अतः शुद्धपथमेव ते प्रथयन्ति, अत एव 'प्रास्तमिथ्यावादा., ' म्वपक्षे निराकृतोत्सूत्रोचावव-वक्तव्यता परपक्षे तु निरस्तप्रवादुकमताः 'वन्द्याः' यथाऽहं द्वादशावर्त्तवन्दनादिना प्रगमनीयाः सत्साधवः' सुविहितयतयः अस्मिन् जिनशासने दुःपमाकाले वा 'नियमो' द्रव्याय- भिग्रहः ' शमः' कपायनिग्रहः 'दम' इन्द्रियवंशीकारः 'औचित्य सर्वत्र योग्यताऽनु- सारेण विनयादिप्रयोक्तृत्वं ' गाम्भीर्य ' अलक्ष्यपदेन्यादिविकारत्वं 'धैर्य ' विपत्स्वपि घेतसोऽक्तव्यं स्थैर्य' विमृश्य कार्यकारित्वं 'औदार्य' विनेयादीनामध्यापनादि- विपुलाशयता आयचर्या सत्पुरुपक्रमवृत्तिता 'विनयो' गुर्वादिष्वभ्युत्थानादि प्रति- पत्तिः 'नयो' लोकलोकोत्तरा-विरुद्ध-वर्तित्वं ' दया ' दुःस्थितादि दर्शनादान्ति:- करणत्वं ' दाक्ष्यं ' धर्मक्रियास्वनालस्यं ' दाक्षिण्यं ' सरलचित्तता, ततो द्वन्दः । एमि गुणेः ' पुण्याः' पवित्रा मनोज्ञा वा साधवो वन्दनाद्यहन्तीति वृत्तार्थः ।। ३७ ।। साम्प्रतं प्रकरणकारः प्रकरणं समाप्नुवन् इष्टदेवतास्तवच्छबनाऽवसानमङ्गलं सूचयन् अक्रवन्धन स्वनामधेयभाविर्भावयिषुराह- - - . - - - - - - विभ्राजिष्णुमगर्वमस्मरमनाशादं श्रुतोलाबने ॥ ३८ ॥ व्याख्या-जिनं वन्द इति सम्बन्धः । 'विभ्राजिष्णुं' त्रिभुवनातिशायिचतुति- सदतिशयत्वेन् आत्यन्तं शोभमानं ' अगवं' उच्छिन्नाहकार - अस्मरं' मथितमन्मथं - . . + 'श्रुतोल्लरने' मिद्धान्तातिकमे अनाशाद, आशा-मनोरथ 'ददाति' पूरयति आशाद., न आशादोऽनाशादा त, शुतानातिकमकारिणः पुसो नार्नुमन्तारमित्यर्थः । मद शानामणि, सत् जानेन-केवलबानेन लोकालोकारमामकत्वात्-भास्वन्त 'जिन' तीर्थकर, तथा " मवसुरा जइ रून, अगुट्ठपमाणय विउविजा । जिणपायगुहपहे, न सोहए त जहिं गालो ॥१॥" इत्यादिपचनेन ' वरा' मङ्गिमगा ' वपुः श्री शरीरकान्तिः, मैव चन्द्रिका ' जगतीजनप्रमोददायित्वात् कौमुदी, तया 'भेश्वर' नक्षत्रनाध, चन्द्रिकया चन्द्रवद्वपु.श्रिया त्रिजगदाहादकमित्यर्थ । 'वन्दे' माये 'वयं ' स्तुत्य अनकधा' पहुधा ' असुरनरै । दानवमान 'गण' मपोना, ' ' ममुचये, एनपिछद-कल्मपमर्वरूप 'दम्भारि' शाम्यनिष्ठापक 'विदुपा' विपषिमा 'सदा सर्वदा 'सुश्चमा' मधुरगिरा 'अनकान्तरङ्गमद ' किल जैनदर्शने प्रैलोकर यर्तिमकल वस्तुजात मदमग्नित्यानित्यादिरूपतयाऽनेकान्तान्मकमभ्युपगम्पो, नत्र प्रमाणोपपन्नत्तान्, न तु परतीथिकवत्सदवामदव पा नित्यमेगानित्यमेर घेत्यादिना. उपकान्तान्मक, तस्य विचारामहत्वात् । ततोऽनकान्ते-ऽनेकान्ता मकवादे रग- मग प्रदत्ते य म तथा त, अनेकान्तवादप्रीत्युपादक, तर्कसर्कगरसस्पन्दिन्या यापा गया मगराननकान्तराद व्युत्पादयति, यथा विद्वाम शेषदर्शनत्यागेन सप्रेस मा. इस्पर्ध.. चक्रमिद ' चक्रवन्ध 'माघमम' यादृश्या वर्गन्यामपरिपाच्या मापार स्थचक्रान्त. 'मायकाव्यमिद-शिशुपालवध' इत्येवरूपो नामपन्ध. प्रादुर्भपतrry तादृश्यैवति माघममता, अत्र च निनमालमेन गणिनेद नके म्थापना चेप-पतगैर चकाक्षरन्यायसम्पयक्तमिति वृत्तार्थ ॥ ३८ ॥ पच चानन प्रकरणेन मप्रपञ्च मिथ्यापपम्पम्पप्रकटिने प्रशुश्रीनिन । किमित्यय प्रकटपूच्या लिनिनो मागिपिता ? इति काप्पालपानपरा पिन तस्मै यक्ष्यमाणपूनदयनोपन्यस्त अतस्तरपि प्रकतानुपानि वादन निरत तदिदानी व्याम्याप न्याह- पिनपतिमतदुर्गे कारस माधुरफ ॥ ३९॥ पाण्या-निनपतिमतमव-मगवन्डामनमय मिध्यावादि free सान-पदमूलन प्रतिपधेरयाप्प रान उप्रतिमन्चन गरोगप: नम्मिन 'अमिभन' उपद्धा-पिडम्बित पर्थ । माधुयो-निकिमि राविद , ग पाडायनरताना नानारियापारिभापि गत सो . " 11 इति नाम . तस्य सैन्याः तदनुवर्तिचेष्टितन्यात सैनिकास्तैर्विषयिभिः-कामुकः । द्वितीयपक्षे वनी- कृतवाह्यदेशैः । अथ कथमेवंविधस्यापि जिनमतदुर्गस्य विषयिभिरपि लिगिभिरभिनव इत्यत आह-'कालतो' दुष्पमासमयदोपात , अभिभूयन्ते हि कालवशान्महातेजस्वि- नोऽपि, ततश्च 'स्ववशजडजनानां सम्यक्त्वाधारोपणव्याजेनात्मायनीतीकृतमुग्धलो- कानां 'स्वगच्छस्थितिः' एते वयं सम्प्रदायागता युष्माकं गुरवस्तस्मात् कदाचिदपि न मोक्तव्या इत्यादिका प्रावप्रतिपादिता निजगच्छमुद्रा 'इयं' एपा 'अधुना' इदानीं 'तैः' साधुवेः 'अप्रथि' सर्वत्रैकमत्येन अतानि । ' स्वार्थसिद्धयै ' कथमस्माक मेते भोग्या भविष्यतीति निजकार्यनिष्पत्तये, अबार्थेऽनुरूपमुपमानमाह-शृङ्खलेब निगड इव । एतदुक्तं भवति-यथा म्लेच्छसैन्याः कस्मिचिदपि दुर्गे स्वभुजबलेन गृहीते द्रविणाद्यर्थं तदन्तर्वतिनागरिकलोकसंयमनाय शृङ्खला प्रभारयन्ति, तथैतेऽपि लिङ्गिनः स्वोपभोगार्थ मुग्धजननियमनाय गच्छस्थिति प्रथयामसुरिति वृत्तार्थः ॥ ३१ ॥ ननु ते यदि गच्छस्थिति सर्वत्र विस्तारयामासुरेतावताऽपि किं ? इत्यत आह- सम्प्रत्य प्रतिमे कुसवपि प्रोज्जृम्भिते भस्मक--॥ ४० ॥ व्याख्या-मोहराजकटके प्रोहिं जम्मुपि लोरवयं कदामह इति सम्बन्धः । सम्प्रति ' अधुना 'प्रोज्जृम्भिते ' अभ्युदिते ' भस्मकम्लेच्छातुच्छरले ' भस्मराशि- तुरष्काधिपतिसारसन्ये 'अप्रतिम' तेजस्वितयाऽनन्यसाधारण 'कुसङ्घ एव' प्राग्वणित- निर्गुणसाध्वादिसमृदाय एवं वपुः' गरीरं स्वरूपं यस्य तत्तथा, तस्मिन् । भस्मक- म्लेच्छस्य हि दुस्सा एवं स्वसैन्यं, ततो यथा म्लेच्छोऽश्वादिसाधनेन परजनपदमभि- भवति, एवं भस्मकोऽपि प्रबलः दुस्माबलेन भगवच्छामनं मालिन्योत्पादनेन तिरस्कुरुते, तदा ' दुरन्तदशमाश्चर्ये ' दुप्पासंयतपूजाख्यान्ताश्चर्ये, चः समुच्चये, 'विस्फूर्जति' प्रभ- विष्णी, एवं च सति 'प्रोदि ' स्फाति 'जग्मुपि' प्राप्नुपि ' मोह एव' मिथ्याज्ञान- मेव, लिङ्गिप्रज्ञप्तसंसारमार्गस्यादिकारणत्वात् अतिदुर्जयत्वात् रागादिप्रभवत्वाच्च 'राजा' पार्थिवः तस्य ' कटके ' अनीके प्रागुक्तस्य भस्मकादेः सर्वस्यापि मोहराजपरिच्छदभू. तत्वेन तत्कटककल्पत्वात् , अयमर्थः-मोहो हि दुष्ट मौलराजकल्पः तस्य च दुःसङ्घ- लक्षणचतुरङ्गवलकलितो भस्मको म्लेच्छाख्यमहासामन्तकल्पः, दशमाश्चर्य तु स्वत एवातिप्रबलत्वात् साहायान्तरनिरपेक्षमेव द्वितीयमहासामन्तप्रख्यं, ततो यथा कश्चिन्म- हाराजाधिराजो म्लेच्छादिमहासामन्तै मण्डलं साधयति, तथाऽयमपि मोहराजो भस्म- कादिभिर्जिनशासनमभिभवतीति, ततो लोकैः' कुसजनैः तदापर-मोहराजशासन- . - - - - मनतिक्रामछिर्मूढत्वादविमृश्यत्वात् अविमृश्यकारिमिरित्यर्थः । 'एकीभ्य' दुष्टत्वेनैक मत्य विधाय, इत्थ सकलजनप्रतीतैराकोश-तर्जन-हीलादिभिः प्रकार राजपसे। चय कदामह ' पीडयामह-उपहास्यामह इत्यर्थः । केन हेतुनेत्याह- मदागमस्य' लिहिप्रथित-मिथ्यापथोत्पयत्वप्रतिपादकस्य शुद्धसिद्धान्तस्य 'कथयाऽपि ' धर्मदशाना- द्वारा विचारमानेणापि, यदि हि पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहेण साधनदूषणोपन्यासै प्रकृतपिय- परैः सह यादमुपक्रमामहे तदा न विमस्ते किमपि कुरिन् इत्यपि शब्दार्थ., तथा च वय शुद्धसिद्धान्तरिचार भव्येभ्योऽनुनिधृभयोपदिशन्तो नाल्पीयां ममप्युपालम्मममिः । यदुक्त-" ने निरीक्ष्य रिपकटकमर्पकीटान् , मम्यक् पथा व्रजत तान् परिहत्य मर्वान कुज्ञान-कश्रुति-कुदृष्टि-कुमार्गदोपान् , मम्यग्विचारयत कोऽत्र परापनाद' १ ॥१॥" इति वृत्ता: ॥४०॥ [ अथ ग्रन्थकृत्प्रशस्तिः] श्रीमति खरतरगच्छे, श्रीजिनभद्राभिधा गणाधीशाः । सिद्धान्तरुचिप्रौढा-नूचाना सन्ति तच्छिष्याः ।।१।। श्रीमदभयसोमास्तू-पाध्यायास्तद्विनेयविख्याताः । तच्छिष्यहर्पराजो-पाध्यायेन हि कृता वृत्तिः ॥२॥ लब्धिवाग्गुरुभद्रो-दयमाहाय्याच सापदृस्य । श्रीमजिनपतिसूरीश्वर-कृतसद् बृहत् टीकात' ॥३॥ त्रिमिा कुलकम् ॥ यदन हर्पराजेन, लिखित मतिमान्धतः । विरुद्ध च तदुत्सन बुधैः शोध्य सुबुद्धिभिः ॥ ४ ॥ ॥ इति सङ्घपट्टकलघुवृत्ति. मम्पूर्णा ।। [लेखक प्रशस्ति.] सवत् १६०८ वर्षे माहसुदि ५ दिने शनिवारे श्रीखरतरगच्छ श्रीजिनमाणिक्य- परिविजयराज्ये श्रीविक्रमनगर गणधर चोपडागोत्रे सा० देनराजस्तत्पुन सा० जग सिंहस्तत्पु० सा कम्मा मा० श्रा० कौतिकदेवापुरत्न मा० रायपाल सुरताण समार. चद प्रमुखपरिवारयुतेन मा० रायपालेन ज्ञानपश्चमीतपम उद्यापने श्रीमपटकलघुपत्ति प्रतिनिहरापिता श्रीधनराजोपाध्यायाना वाच्यमान चिर तन्दतु ॥ शुभ फल्याणमस्तु । श्रीपनराजोपाध्यायमित्रैः प्रमादीकता प्रतिरिय वा० जयसुन्दरगणेः। शुभ भवतु लेखक पाठकयोः। कल्याणमस्तु । श्रीः ।
थी सरतरगन्यीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर १८ - ल पक्रयन्धोऽयम्-- "जिनवल्लभेन गणिनेदं चक्रे" इति नामनन्धः स्थापना । सं० १० श्लोक-३८ ॥ दुया १ वि स १ जि १ ष्णु घ णि ८ प जि स्म २ ar diye १२ के an भ ने ९ पर्य म ना पु. श्री १२च १० दं न्द्रि । श्रु चसाड का तो ५ मे श्च प श्री संघपट्टक का हिन्दी भाषानुवाद । 'वहिज्वाला०'-कुपथ-कुंधर्म के खण्डन करने में तत्पर, करुणारुपी अमृत के सागर पार्थप्रभुने अपनी माता तथा अन्य बहुत से लोगों के सामने कमठमुनि (तापस ) की धूनी मे जलती हुई लकडी क छिद्र में धूनी की ज्वाला से ज्वलितप्राय नाग को दिखलाकर कमठमुनि के तप को दुष्टतप उद्घोषित किया और प्रसने तनिमित्त अनेक उपसर्गों का भी सहन किया । कमठमुनि के तपको दुष्ट तप उद्घोषित करते हुए भगवानने मानो लोगों से कहा कि "प्राज्ञों को उचित है कि वे कष्ट उठाकर भी लोगों को कुमार्ग पर जाने से रोकें " दुष्प्रवृत्ति से लोगों को, परावर्तन करने-हटाने मे तत्पर ऐसे पार्श्वनाथनामक जिनदेव की हम स्तुति करते हैं ॥१॥ 'करयाणाभि-हे शिष्य ! तुम्हारा मानसिक परिणाम शुम है, तुम गुणग्राही हो, कुमार्ग के प्रत्यर्थी-शत्रु हो, विनयशील हो, सरल हो, यथोचित कार्य करने में सर्वदा प्रवृत्त रहते हो, उदार, जितेन्द्रिय, नीतिमान् , स्थिरता एवं धीरता से युक्त, सदर्म के अभिलापी, विवेक एव सद्बुद्धि से युक्त हो इसीलिये हम तुमको उपदेश देते हैं अर्थात् सह व्यवस्था का प्रतिपादन करते हैं ॥२॥ इह किल.' इति-इस दुष्पमा काल म प्राणिवर्ग कलिकालरूपी महासर्प के दाद में पड़े हुए है, प्राणियों में तच के प्रति प्रीति तथा नीतिमत्ता का मिलकुल अभाव हो गया है, अज्ञान एव कुपथ की अहर्निश पृद्धि के कारण प्राणियों का सुगतिमार्ग अर्थात् देवगति आदिसे सम्बन्ध एकदम विच्छिन्न हो गया है । एसे ममय इस जगत में मस्मग्रह और उमका मित्र असयतियों की पूजारूप दशम आश्चर्य खून उन्नति पा रहे हैं, मिव्यात्वरूप अन्धकार दिन दोगुगा रात चौगुना पड़ रहा है। इस मिथ्यात्व के कारण जैनेन्द्र मार्ग विरलता अर्थात् क्षीणता को प्राप्त हो चुका है। एसे अवसर में रौद्र अध्यवसायवाले द्वेषी, मूर्य, दुर्जन तथा दुर्गुदियों क सघ की परम्परा में अनुरक्त, विषयसेरी, माधुवेषधारी, आधारहीन पैत्यवामिपोन जिनोक्तमार्ग से विरुद्ध मार्ग को चारों और फैला रखा है ॥ ३ ॥ ४ ॥ 'पत्रौदेशिक. --आधार्मिक भोजन १, जिनालय में वाम २, (वमति) २ - - उपाश्रय के प्रति मत्सरता ३, धन अर्थग्वीकार ४, गृह श्राद्धस्वीकार ५, तथा चैत्यसदन का स्वीकार ६, अप्रत्युपेक्षित आसन गद्दी पर बैठना ७, मावध आचरण में आदर रखना ८, श्रुतमार्ग का अपमान करना ९, और गुणिजनों के प्रति द्वेष रखना १०, ये दश द्वार- रूप जिस मार्ग में धर्म माना गया है । यदि इस प्रकार का धर्म कर्म-मल को दूर करनेवाला हो तो मेरुपर्वत भी समुद्र में तैरने लग जाय । अर्थात् जैसे मेरुपर्वत समुद्र नहीं तिर सकता, उसी प्रकार यह धर्म भी कदाचिदपि कर्मदारक नहीं हो सकता ॥५॥ (१) औद्देशिक आहार विषयक प्रथम द्वार कहते हैं- 'पट्काया०'-इति । पृथिवी आदि षट्काय के जीवों को निर्दयतापूर्वक उप- मर्दित करके मुनियों के निमित्त जो आहार बनाया गया है, जिस आहार का शास्त्र में वारंवार निषेध किया गया है, जो आहार निसुशता-निर्दयता का सूचक है, जिस आहार को तीर्थङ्करआदिने गोमांसतुल्य कहा है, जिसको खाकर मुनि नरकगामी होता है । श्रमणसङ्घ आदि के निमित्त बनाये गये एसे आधार्मिक आहार को कौन दयालु मुनि ग्रहण करनेकी इच्छा करेगा ? अर्थात् कोई नहीं ।। ६ ॥ (२) अब जिनगृहनिवास विषयक दूसरा द्वार कहते हैं- गाय०' इति-गन्धर्व( गायक) जहां गीत गा रहे हैं, वेश्यायें जहां नांच रही हैं, जहां वंशी की ध्वनि मुखरित हो रही है, जहां मृदङ्ग ध्वनि गूंज रही है, जहां पुष्पमालाएं लहलहा रही है, कस्तूरी की सुगन्ध से जहां देवभवन सुरभित हो रहा है, जहां पर जरीदार चंदोवा चमचम चमक रहा है, तथा खूब सुन्दर वस्त्राभूषणों से सुसजित श्रावक-श्राविकाओं के समुदाय का जहां आने-जाने का तांता (परम्परा) लगा हुआ है, जो कि मात्र भगवद्गुणगान भक्ति के लिये उपयुक्त हैं। उन चैत्यों-मन्दिरों में देवद्रव्य का उपभोग, ताम्बूल भक्षण, शयन, आसन आदि करने रूप आशातनाओं से डरते हुए जैनसिद्धान्त के मर्मज्ञ मुनि कभी भी निवास नहीं करते हैं ।।७।। (३) परगृहवास विषयक तीसरा द्वार कहते हैं- साक्षा०' इति--भगवान् तीर्थङ्करोने तथा गणधरोंने जहां स्वयं निवास किया है, और दूसरे साधुओं को भी वहां पर निवास करने की आज्ञा दी , जो श्रेष्ठ मुनियों के लिये निस्सङ्गता का प्रधान स्थान परगृह( उपाश्रय ) है, उसका शय्यातर ( वसतिदान द्वारा संसारसागर को पार करनेवाला श्रावक ) और अनगार( अगार-घर - रहित ) इन दोनों का अर्थ जाननवाला कौन ण्मा विद्वान होगा बो द्वैप करेगा? र्यान् विद्वान पुरुप कमी गी उमका द्वेप नहीं करेगा ।। ८॥ फिर भी करते है- 'निप्रोत्मगांति-हम निन प्रवचन में जो निशीथराम नाम का छेदसूत्र है यह तो मानो मोशनगरी का एक दन ही है। यह निशीयन अनक प्रकार के उत्मर्ग और अपपादनय क प्रतिपादन से युक्त है। उम निशीथय में गृहम्धों क घर में उत्तरने के बहुत से मेद पह गये है। उसमें पहले उत्सर्गरूप स कहा गया है फिर अपवाद से स्त्री, पच, पण्डक आदि के समर्ग से युक्त वमति में माधु से नहीं उतरना चाहिय, इस प्रकार से पहफर उसका अपवाद भी किया है कि-मालोग ऐमी प्रमती में भी यत्सना स रह मरते हैं । इस निष्कर्ष यही मा कि निशीवसर म स्त्री पशुपण्डक आदि स युक्त अथवा उमसे रहित, इन दोनों प्रकार के गृहस्थ क घरों म माधुओं का उतरना नियमत. प्रतिपादित है । पर तु जिनमन्दिर में उतरने के लिय कहीं भी नहीं कहा गया है ॥९॥ (४-५-६ ) अघ गृहम्य और चत्य, इनका सीपार विपपर चतुर्थ, पश्चिम तपा पठन तीन द्वारों को पहले है- मनज्या. ' इति-तीर्थहरोन धन बीमार करनको प्रमज्याका विरोधी कहा है। फिर 'य मर भापक है 'इम प्रकार से गाम्भी धारकों पर ममत्व रखना तो अपन्न मावच है। फिर पदि 'गह निनालय मरा हम प्रकार निनालय क पनि साधु, ममता से सो पिर उमम अप व निन्दनीय महानि -मठधारीपना-आ जाना हम निय मुनि क अमितापी माधुओं से चाहिये शिव अर्ध श्रापक और जिनालय, इन मयों पर प्रसपा का पिन करनवाली मगना कभी भी न करें ॥ १० ॥ (७) अप्रमाणित यामन सिया मानमा वाइने है- मगमिशी-गहरी पर पड़ने में प्रसपम आश्यम्मापी है, क्योंकि उगी प्रासनानttो गाना नया गद्दी पर पटने र रिभूषा-बोमा होती है और माधुनों के निमिता का नाम निरोध किया गया है। गीपा पेठना पर गजनि अ. माधुयों लिया है। गी पर पेठन ग नांग गायों या उसरा कि ऐश यह गहिर होशर मी गदी पर भटनाग प्रा लागों म निदानी होती है। और इसम परिग्रह दो तो मर है पर पेटम मा को मुममा नव अभिनापा मी प्राट हाती - .
- है । इस लिये साधुओं को गद्दी पर कभी भी नहीं बैठना चाहिये । इसी प्रकार मसूरक सिंहासन-तकियेदार आसन-आदि पर भी नहीं बैठना चाहिये ॥ ११ ॥ (८) सावधाचरित विषयक आठमा द्वार कहते हैं गृही. गडरिया प्रवाह में पडे हुए इन चैत्यवासियोंने इन आगे कही जानेवाली अयुक्त बातें कैसी फैला रखी हैं ? । वे इस प्रकार कहते हैं-श्रावक अपने अपने नियत किये हुए गच्छ के ही साधुओं को मानें । जिनालय में साधुओं का अधिकार हो । गृहस्थ लोग साधुओं को अशन पान खादिम स्वादिमरूप चतुर्विध आहार शुद्धि अशुद्धि का विचार किये बिना ही दें तो कोई दोष नहीं है । तथा श्रावक लोग सुविहित साधुओं के समीप शीलादि व्रत न लें, इत्यादि ।। १२ ।। (९) श्रुतपथ अवज्ञा विषयक नौवाँ द्वार कहते हैं- 'निर्वाहा' इति-ऐसा गुरु कि-जिस के शील और वंश का कुछ भी पता नहीं है, जो गुण से हीन है, जिसने सिर्फ अपना पेट भरने के लिये ही प्रव्रज्या ली है, वह गुरु उदरम्भरी-पेटू, गुणहीन, अज्ञातशील वंशवाले लोगों को खार्थ के कारण मूंढते हैं, उन मुण्डितों की प्रसिद्ध गुण वंशवाले श्रावक भी गच्छरूपी महाग्रह से गृहीत होकर देवता से भी वढकर उनकी (चैत्यवासियो की) पूजा करते हैं, यह एक मोहनीय कर्मोदय का प्रभाव है ॥ १३ ॥ फिर भी- दुष्पापा०' इति-गुरुकर्मी (भारेकर्मी) लोगों को प्रथम तो सद्धर्मबुद्धि होना ही कठिन है। यदि कथञ्चित् सद्धर्मबुद्धि हुई भी तो शुभ गुरु का मिलना दुर्लभ है। यदि पूर्वपुण्य के प्रभाव से ऐसे गुरु भी मिल गये तो भी ये श्रावकलोग गच्छ- स्थिति के वशीभूत हो अपनी आत्मा का हित नहीं कर सकते। अरे ! जब ऐसी स्थिति है तब हम अपनी मानसिक वेदना किम के आगे प्रगट करें ? किस की शरण में जाय ? किस की आराधना करें ? अरे ! कुछ भी नहीं सूझता कि क्या करें ? क्या न करें ? ।। १४ ॥ फिर भी- क्षुत्क्षामः' इति-भूख के मारे जिसका जी जा रहा था ऐमा कोई दरिद्र के बालकने वैराग्य के न रहते हुए भी किसी जिनालय में प्रव्रज्या लेली। फिर कालक्रम से उसने किसी पुरुष को अपने पक्ष में छल-प्रपञ्च के द्वारा कर लिया । फिर वह आचार्य बन बैठा। यह अत्यन्त आश्चर्य है कि ऐसे साधु को आचार्यपद्वी मिल गई । जप आचार्यपद प्राप्त कर लिया तब वह गुणहीन साधु जिनालय को अपना घर समझता है । अपने को इन्द्र मानता है। विद्वानों को मूर्ख जानता है और समार को तुच्छ समझता है । चेत्यवासियों की यह बात मर्मविदित है ।। १५ ॥ फिर भी- 'यैर्जातो' इति-अधों में मी अघम, मुनिवेषधारी ठग, इन श्रावकों को नाथे हुए बैल के ममान इधर-उधर जहाँ चाहें वहाँ नचाते हैं । ये धारक न उनके पुत्र है, न उन से पालित है, न खरीदे हुए हैं, न उनके प्राणी हैं, न पहले कमी मेट हुई थी, न ये उनके मित्र है, न इन ठगोंने पहले मी रुपये-पैमों से उन को मन्तुष्ट किया है। अरे ! तो मी देखो यह क्या विधिौचित्य है जो ये श्रावक लोग इन ठगों क अधीन हो गये । अहो ! इम अधापतन का प्रतीकार कैसे हो ? अनर्थ का प्रतीकार नहीं हो रहा है । इमसे यही ज्ञात होता है कि इस समय ससार में कोई शासक नहीं रहा, कि जिमके आगे जाकर पुकार की जाय ॥ १६ ॥ फिरभी- किं.' इति-अर! क्या इन मूर्ख लोगों को दिग्भ्रम( समझी ) हो गया है ? क्या य अन्धे और पहर हो गये हैं? क्या इन लोगों को योग(मन्नादि प्रयोग) और चूर्ण( शिरपर डालने की भुरकी ) द्वारा वश म कर लिया है ?, क्या इनका भाग्य खराब हो गया है ? अथवा धूर्मोन इन्हें ठगलिया है क्या ? या ये लोग ग्रह गृहीत( पागल ) तो नहीं हो गये है ? जो कि प्रचुर दोपों को देखते हुए भी वे मूर्ख लोग जिनागम के शिरपर पैर रखकर कुमार्ग पर पड़े हुए है, उम परसे हटने का नाम ही नहीं लेते । अर ! इतना ही नहीं जो लोग कुपय को दूर करने का प्रयत्न करते है सो उनसे ये मूर्य लोग द्वेष भी करते हैं, अहो ! यह कैमा भयङ्कर पतन है ? ॥ १७॥ फिरमी- 'इटावाप्ति०'-प्रविधिपूर्वक अर्थात् रात्रि में मूर्व लोकों द्वारा विहित तीर्थरस्नात्र, पापरूपी परम अवश्य मेन दुपाता है। क्योंकि अब रात्रि में वीर्यवरस्नात्र किया जाता है उस समय इकट्ठे हुए जनसमुदाय अर्थात् स्त्री पुरुषों क झुण्ड में बहुतसी एमी स्त्रियाँ आती है जो स्टिों की अर्थात् वेश्यापतियों की, नटों की अर्थात् नाटक करनेवालों की, मटों की अर्थात् मुस्तण्ड गुण्डों की अर्थात् दासों की प्रिय उपनायिकायें होती है, इस लिये ये विट नट आदि भी रात्रि में तीर्थरस्तान में एकत्रित होत हैं। व ममी नर-नारिया हृदय में सगम की अभिलापा लिये हुए रहती हैं । तया वे लोग- राग, द्वेष, मत्मर-दूगरे क गुणों के प्रति अमहिष्णुता, तया इयर्या अर्थात् अपनी - ६ - प्रियतमा को दूसरे पुरुप से बातें करते देखकर क्रोध करना, इन सवों से भरे हुए रहने हैं । रात्रि में किये गये तीर्थङ्करस्नात्र में तो ऐसे स्त्री-पुरुप एकत्रित होते हैं जिससे जिनालय में असमञ्जस प्रवृत्ति होती है इस लिए रात्रि में तीर्थङ्कर स्नात्र सर्वथा वर्जनीय है ॥ १८ ॥ फिर भी- जिनमत' इति-जिनोक्त मत से विरुद्ध प्रकार से किया गया अर्थात् अविधिपूर्वक किया गया स्नात्र ही केवल अहित के लिये होता है, इतनाही मत समझो किन्तु जिनमत विरुद्ध विधि से किये गये तप-अनशन आदि, चारित्र-देशविरति और सर्वविरति, दान-अभयदान आदि, तथा विनय वैयावृत्य आदि भी मुक्तिरूप फल के दायक नहीं होते हैं । क्यों कि जिनाज्ञा भी यदि अविधिपूर्वक की जाती है तो वह अशुभ फल देनेवाली होती है, और यदि विधिपूर्वक की जाती है तो शुभ फल देनेवाली होती है । फिर इन चैत्यवासियोंने जो अविधि क्रिया का ढोंग फैला रखा है उससे क्या अनन्तसंसार की प्राप्ति नहीं होगी ? होगी ही ।। १९ ॥ फिर भी- 'जिनगृह०' इति-विधिपूर्वक-अर्थात् शास्त्रोक्त प्रकारसे किये गये जिन- भवन, जिनविम्ब-भगवान की प्रतिमा, जिनपूजन, जिनयात्रा अर्थात् अष्टाहिकादि महोत्सव, जिनप्रतिष्ठा, तथा दान-अभयदानादि, तप-अनशन आदि बारह प्रकार का तप, व्रत आदि अर्थात् स्थूल प्राणातिपातविरमण और अभिग्रह आदि, गुरुभक्ति- धर्माचार्य की भक्ति और श्रुतपठन अर्थात् सिद्धान्त का स्वाध्याय तथा सिद्धान्त के अर्थों का श्रवण आदि, ये सब आदरपूर्वक किये जाने पर भी यदि इन में कुमत, कुगुरु, कदाग्रह-कुत्सित आग्रह, कुवोध और कुदेशना का अंश मात्र भी मिल जाय तो ये जिनभवन आदि सब अनन्त संमार के कारण हो जाते हैं । जैसे उत्तम से उत्तम भोजन क्यों न हो ? यदि उसमें थोडासा भी विष मिल गया हो तो वह अनिष्टकारी हो ही जाता है ॥ २०॥ 'आक्रष्टुं ' इति-जैसे मच्छीमार बडिश-बन्सी (मच्छी पकडने का कांटा) में मांस के टुकड़े को लगाकर मछलियों को आकृष्ट करते हैं उसी प्रकार ये धूर्त चैत्य वासी लोग भगवान की प्रतिमा दिखलाकर श्रद्धालु श्रावक लोगों को आकृष्ट करते हैं। भगवान् के नाम पर अपनी इष्ट सिद्धि के लिये ये सुन्दर २ अन्तर्गृह और मठ, उन श्रावकों से बनवाते हैं । लक्ष्य तो केवल उनका अपने स्वार्थ पर है, परन्तु भगवान के नाम पर भावकों को ठगकर उनसे ये सब बनवाते हैं । तथा-यात्रा मात्र अर्थात् . .
पूर्वजों के उद्देश्य से जिनालय में यात्रा और जिनस्नान आदिक उपायों से और
तमसितक-अर्थात् अमुक उपद्रव की निवृचि के लिये जिनभगवान के उद्देश्य से 'इतना
द्रव्य देता हूँ' इस प्रकार के नियम कराने के, रानिजागरण और शान्तिक पौष्टिक
आदि कर्म के छल ( याहना ) से नाम मात्र के जैन इन धूर्त चैत्यगामी लोगों के
द्वारा ये श्रद्धाल भोलेभाले श्रापक भूतलगे के समान ठगे आ रहे हैं, यह अत्यन्त
खेद की बात है । इस विषयमें समझने की बात इतनी है कि ये मभी इन लोगों के
द्वारा अविधिपूर्वक कराये जाते हैं इस लिये इन मय का प्रतिषेध किया गया है,
विधिपूर्वक तो इन की कर्तव्यता इष्ट ही है । इन की कर्तव्यता का स्थापन पूर्वोक्त
मातवें और वीसवें काव्य में किया गया है ॥ २१॥
'सर्वत्रा०-इति-जिनके आसा अर्थात् पापागमन के द्वार खुले हुए हैं,
जिनकी धोनादि पाचौं इन्द्रियाँ अपने पियों में आसक्त है, गौरस अर्थात् ऋद्वि रस
शाता, इन तीन गौरस से चण्ड-गौद्र मनोदण्डरूपी तूफानी घोडा जिसका उछल रहा
है, कपायरूपी मर्प जिनके बढ़ रहे हैं, जो सभी प्रकार के अत्य कर्म करने में सर्वदा
तत्पर रहते हैं, जो सभी प्रकार के अकृत्य कर्म करने में सर्वदा तत्पर रहते हैं-जो
अन्त्य अन्तिम अर्थात् दशा आश्चर्य-अमयतियों की पूजारूप जो कि सर-दशों
आचों का राजा है उसके आश्रित होकर उद्धत बुद्धिवाले ये हीनाचारी लोग श्रेष्ठ-
सदाचारी मुनियों के मस्तक पर खड़े हो कर खुश हो रहे हैं, एव ममाज में प्रतिष्ठा
भी पा रहे हैं, अहहह !!! यह कैमा अनर्थ हो रहा है १ ॥ २२ ॥
सर्वारम्भ० 'सभी प्रकार के सावध व्यापार-धनधान्यादि सग्रहम-तत्पर
गृहस्थ लोग भी यदि पर्व आदि दिनों में एकाशन विगयरहित भोजन आदि का
प्रत्याख्यान-नियम लेकर उनके पालन में कथश्चित् भूल कर बैठते हैं तो वे भी
अत्यन्त अनुताप-पछतावा-करते है कि-' मुझ कर्ममागी का प्रत्याख्यान भग्न हो
गया' परन्तु ये हीनाचारी लोग छ पार-तीन पार मध्या के प्रतिक्रमण में और
तीन बार प्रात:काल के प्रतिक्रमण में, इस प्रकार छ बार-'त्रिविध-मन वचन काया क
तीन योगों स, विधा-करण १, कारण २, अनुमोदन ३, इन तीन कारणों में प्रत्या
ख्यान करता हूँ ' इस प्रकार गतिदिन दोनों ममय मुह से घोलकर भी स्वयमेव उमसा
खण्डन करते हैं। एसे हीनाचारी लोग क्या कमी तपस्सी, ज्ञानी या व्रती हो सकते
है ? कमी मी नहीं। इनमें तप ज्ञान और व्रत का होना तो शश जमा ही समझना
चाहिये ॥२३॥
- 'देवार्थ' इति-देवोद्देश्यक धन-देवद्रव्य-से अपनी रुचि के अनुकूल, एवं सभी तुओं में सुखप्रद एसे मठ बनवाकर उम मठ में सर्वदा रहनेवाले ये हीना- पारी लोग खूब स्वच्छ कोमल रुई से भरे हुए सुन्दर विछौने पर सोते हैं। इसी प्रकार के गही आदि आसनों एवं मसूरियों-तकियेदार आमनों पर बैठते हैं। ये सर्वदा आरम्भ, परिग्रह और श्रोनादि पांचों इन्द्रियों के विषयों से युक्त, तथा ईर्ष्या और द्रध्यादि की आकाङ्क्षा से सर्वदा आन्दोलित हृदयबाले होकर रहा करते हैं । ऐसे श्वेत बनधारी, साधु के वेप में छिपे हुए लम्पट ये हीनाचारी लोग महावतों को भी लाञ्छित कर दिये हैं । इनके द्वारा साधुमार्ग कलङ्कित हो चुका है ।। २४ ॥ इत्या०' इति-परतीर्थिक लोग इन हीनाचारियों की सामाचारी को देखकर 'ये लोग साधुवेषमें छिपे हुए लम्पट हैं ' इस प्रकार सभी जैनमुनियों के विषय में वे उपहास करते हैं । और इन हीनाचारियों की लीला सुनकर श्रुतमार्ग के अभिमुख हुए लोग भी इस से विमुख हो जाते हैं। इन हीनाचारियों की मिथ्यानरूपणा के कारण सम्यग्दृष्टि लोग भी सन्देहयुक्त होने लगते हैं । इस लिये यह निश्चित हुआ कि-ये हीनाचारी चैत्यवासी लोग जिनप्ररूपित सिद्धान्त से सर्वथा विरुद्ध आचरण करनेवाले हैं ॥ २५ ॥ 'सवै० ' इति-चैत्यवासियों द्वारा विहित कुमार्ग को सेवन करनेवाले, इसी कुमार्ग को जिनमार्ग कहनेवाले, तथा अपनी दुरात्मता से जिनमार्ग का उच्छेदन करनेवाले लोगों के मन को, संसार के समस्त सयोघाती अत्युत्कट कालकूट विपों के समूहने, संसार के समस्त पापोंने, सभी विषैले सोने और समस्त कष्ट, आधि-मान- सिकव्यथा, व्याधि-रोग तथा दुष्ट ग्रहोने निश्चय ही क्रूर बना डाला है ।। २६ ।। इस कारण से यहां कारण कहते हैं- दुर्भेद० ' इति-इन हीनाचारी चैत्यवासियों के बुद्धिरूपी नेत्र जो कभी भी नहीं दूर होसकते ऐसे कदाग्रहरूपी अत्यन्त गाढ अन्धकार-पुञ्ज से आच्छादित हैं। ये चैत्यवासी लोग सिद्धान्त के श हैं। निरन्तर महामोहनीय कर्म के उपार्जन करते रहने के कारण ये महाअभिमानी हैं । ये स्वयं तो नष्ट हो ही चुके हैं और दूसरों को भी विनाश करने में सर्वदा उद्यत हैं । ऐसे जो ये मिथ्याचारवाले चैत्यवासी लोग हैं इन के वचन पर कोई विद्वान् मनुष्य कैसे ध्यान देगा ? अर्थात् इन के वचनों को कैसे मानेगा ? विद्वान् मनुष्य ऐसे लोगों के वचन को सुन ही नहीं सकते इस लिये हे शिष्य ! तुम भी इन के वचनों को कभी नहीं सुनना ।। २७ !! क्यों कि- , " " . 'यत्किचिः' इति~जो एकदम अमत्य है, जैसे कि श्रेणिक राजा का रजोहरण को वन्दन करना आदि, तथा जो अत्यन्त अनुचित है, जैसे पिता आदि के उद्देश्य से यात्रा आदि करना, अथवा जिनालयमे लकुटक्रीडा (गसलीला) करना आदि, और जो लौकिक तथा लोकोत्तर दोनों से पास है, जैसे-सुनकवाले घर से मिक्षा लेना, रजस्वलाका जिनेन्द्रपूजन, हीनजातियों को परमेष्ठि मन्त्र पढ़ाना, उन को दीक्षा दना और उनसे जिनेन्द्र की प्रतिमा पराना, तथा जो भव्य प्राणियों के लिये समार का कारण है, जैसे-जिनमन्दिरम जलक्रीडा आदि, एव जो शास्त्राज्ञासे विरुद्ध है, जैसे आधाकर्मिक भोजन आदि, अथवा अधिक श्रारण हो जाय तो अस्सी चें दिन पर्युपणपर्य करना आदि, इन मयों को ये मूर्ख कुबुद्वि चत्यवासी लोग धर्म कहते हैं और ये मूर्य लोग इनको सीपम चांदी के ममान भ्रमसे निनमवानुसार समझकर स्वय इनका स्वीकार भी करते है। अरे ! दखो यह दुरन्त-परिणाममें अहितकर हम असयतपूनारूप दशम आर्थर्य की कैसी करतूत है ? ॥ २८ ॥ कष्ट ' इति-यह अत्यन्त खेद की बात है कि-जन्मसे ही अन्धा और वैदेशिक ( वहा का नहीं रहनेवाला) होनेसे मार्ग को अच्छी तरह नहीं जाननेवाला मनुष्य अपनी गर्दन उठाकर दिशा भूले हुए अन्धों को महामयङ्कर अरण्यमें उनके गन्तव्य नगर का मार्ग दिखला रहा है ( १ )। इससे भी अधिक सेद की पात यह है कि-जिनकी आँसें अच्छी हैं, जो सुन्दर एव विभ रहित मार्ग को जानते है उनको भी वह वैदशिक जन्मान्ध मनुष्य मार्ग दिखलाने का माहम करता है (२)। तीसरी खेद की पात सबसे अधिक यह है कि अब वे मार्गज्ञ नेमान् मनुष्य उस वैदेशिक जन्मान्ध की बात नहीं मानते हैं तो यह उनकी इस प्रकार हंसी करता है जैसे किमी मूर्ख की हँसी की जाती है ॥ २९ ॥ सैपा' इति-निममें ममय-समय अर्थात् प्रतिममय मध्य मावों का झाम हो रहा है एमा हुण्ड सस्थानवाला अपमर्पिणी काल इस ममय विद्यमान है (१)। दो हजार वर्ष तक एक राशि पर टिकोपाला मम्मराशि नामक तीमा फर ग्रह का अधिकार है (0) और तीमरा असयति पूजारूप यह प्रत्यक्ष दशा आवर्य रखूप वैगसे अपना प्रभार जमा रहा है (३)। य तीन और चौथा दुप्पमानाल (४)। ये चारों जिनसिद्धान्त को बत-विभुत करने के लिये पर्या पद्धपरिकर है। चारों अनु इस समय प्रतिपल-निरन्तर खूप परिपुष्ट हो रहे हैं, ऐसे ममय में मोत्कृष्ट विशुद्ध जैन मार्ग अत्यन्त दुर्लभ हो गया है। जब एक शर के रहने पर भी माधुद्धि नहीं - होती है तो परिपुष्ट बराबरी के चार शत्रुओं की विद्यमानता में जैनमार्ग की वृद्धि कैसे होसकती हैं ? ॥ ३०॥ (१०) अब गुणिद्वेषधी नामका दशवां द्वार कहते हैं- लस्यग०' इति--जो मस्यामार्ग अर्थात् विशुद्ध मार्ग के पोपक हैं, स्वरूप ही जिनका प्रशम भाव को प्रकट करता है, जिनके नेत्रों में पटकाय जीवों के प्रति करुणा का भाव उमड रहा है, जो विशुद्ध चारित्र के आराधक हैं, जिन्होंने अहङ्कार को मार भगाया है, सूखे हुए घासों के ढेर को जितनी मरलतासे जलाकर राख कर दी जाती है उसी प्रकार जिन्होंने कामको जलाकर राख कर डाला है, जो सर्वदा सिद्धान्तरूपी गजमार्ग पर चलते हैं, उन्मार्ग पर कभी नहीं, तथा जो उपशम भा युक्त है, एवं विवेकी सजन लोग जिनका सर्वदा आदर-सम्मान किया करते हैं एसे विद्वान् सत्साधुओं से भी दोपों के भण्डार तीक्ष्ण स्वभाववाले ( अत्यन्त क्रोधी) महागठ ये चैत्यवासी लोग द्वेप किया करते है ।। ३१ ॥ अब उनके मिथ्यात्व का वर्णन करते हैं- देवीय० ' इति-मिथ्यात्वरूप ग्रहसे ग्रहिल (उन्मत्त ) मनुष्य इस कालमें दोपों के भण्डार को देव मानते हैं, जिन्होंने बडे २ दोषों को नष्ट कर डाला है अर्थात् वीतराग देव हैं उनको देवरूपमें स्वीकार नहीं करते हैं। महामूर्खराजों को सर्वज्ञ मानते हैं और तस्त्रज्ञों को असर्वज्ञ मानते हैं । जैनमार्ग को उन्मार्ग कहते हैं और कुमार्ग को सन्मार्ग कहते हैं । तथ दुर्गुणों के शिरोमणि होते हुए भी अपने को गुणवान् कहते हैं यह सव कितने आश्चर्य की बात है ॥ ३२ ॥ सङ्घ०' इति-इन हीन आचारवाले चैत्यवासियों को देने के लिए बनवाये गये चैत्यरूप कूट अर्थात् जालमें जो फसे हुए हैं, इसी हेतु जो अन्तःकरण से छटपटा रहे है, परन्तु इन चैत्यवासियों की मुद्रा अर्थात् ' हमारे चैत्य को छोड़कर अन्यत्र मत जाओ ' ऐसी राजाज्ञा( हकूमत )रूप दृढ़ वन्धन से वन्धे हुए होने के कारण जो जरा भी हिल-डुल नहीं सकते हैं। मुक्ति के लिये जो दान शील तप बादि करते हैं, परन्तु इन होनाचारियों के कुसङ्घ की परम्परामें पड़े हुए हैं। ऐसे जो ये दयनीय भव्य प्राणीरूप हरिणों के झुण्ड हैं, उनका हीनाचारियों के कुसङ्घरूपी व्याघ्र छुटकारा कहाँ ? अर्थात् जैसे हरिण समूह जब व्याघ्रक्रम-व्याघ्रपरम्परार्मे आजाता है। तब उसका छुटकारा असम्भव हो जाता है। उसी प्रकार इन हीनाचारियों के सङ्घरूप । - व्याघ्रके क्रम (फन्द) में पड़े हुए भव्यप्राणीरूप हरिणोंका छुटकारा कहा ? अर्थात् उनका मुक्तिगमन के से हो सकता है ? ॥ ३३ ॥ इत्थ' इति-हम पूर्वोक्त प्रभारसे जो मैने मिथ्या पथ के विषयम चिलकुल मत्य पात कही है, इसे कोई ऐमा न समझे कि-' इन्हों ने परदोषोद्धारनरूप अनुचित कार्य किया है।" अथवा-'इन रागद्वेषात्मक वाक्य मे क्या लाभ ?' इस प्रकार मेरे ऊपर कोई सजन क्रोध भी न करें। क्योंकि मैने-इन हीनाचारी चैत्यवासियों द्वारा प्रकल्पित जैनमार्ग क श्रमसे कुमार्ग में पड़े हुए लोगों को दखकर उनकी भ्रान्ति को दूर करने के लिये हे अर्थात् इन विचारों का क्या होगा ?' इस उद्देश्य से ही करुण भारसे आक्रान्त हो यह मन कहा है, और इमको ग्रन्यरूपमे रचना भी की है । इमम राग, द्वेप अथवा पैशुन्य कारण नहीं है ।। ३४ ॥ इसमें कारण कहते हैं- 'प्रोभूते' इति~जो कोई मजन करुणा के वश हो लोगोंमे कहते हुए फुधोध को दूर हटाने की इच्छा से हीनाचारी इन चैन्यबासियों द्वारा प्ररूपित दुष्ट मार्ग क- जो यह मार्ग अनन्त काल से उद्भुत हुआ है अर्थात् जो पहले अनन्त कालम कमी नहीं था, तया यह पाप का स्थान है, नाममान के वपसे जो जिनमार्गकी भ्रान्ति को उत्पन्न करता है, वस्तुतः यह निनमार्ग का घातक है, एमा जो यह दुए मार्ग है उमके-दोपों की सख्याको कोई कहना कह तो मानो यह ममुद्र क जलको मापनाचा हता है, अथवा पग से ममस्त आकाश को लोपना चाहता है, अर्थात् जमे समुद्र क जल का मापना, पग मे आकाशको लापना कठिन है इसी प्रकार हम मार्ग क दोपों का कहना भी कठिन है अर्थात् इस मार्गमें इतन अमख्य दोप है कि जिनकी इयत्ता (इतने दोष है ए सी सख्या ) हो नहीं सकती ॥ ३५ ॥ अप सत्माधुओं का वर्णन करते है- न सावया० ' इति-जो सावध आम्नायवाले नहीं हैं, अर्थात् आधार्मिक आहारादि का ग्रहण करना जिनकी परम्पराग नहीं है, अर्थात् जो चेत्यवासी नहीं है, वथा जो यश और कुशीला की क्रियास रहिा है अर्थात् बहश और कुशील को किया था आचरण नहीं करनवाले हैं। मद ममता और आनीरिका क गपमे जो रहित हैं। सहेश अर्थात् रौद्र अध्यवमाय जिन्हें नहीं होता है, नो कदाग्रही अर्थान दठी नहीं है । कपटी अर्थात् मायाची मी नहीं हैं। तथा जो सयो-सिद्धान्तों म रुचि रखनेवाले हैं एसे मुनि लोग तो आज भी इस जगतमें सत्साधु कहलायेंगे ही अर्थात् एसे मुनि को विवेकी जन सत्साधु कहेंगे ही ।। प्रसङ्ग से यहां वश आदिकी व्याख्या की जाती है- पांच प्रकार के निर्ग्रन्थ होते हैं-बकुश १, कुशील २, पुलाक ३, निर्गन्थ ४, और स्नातक ५ । इनमें वकुश दो प्रकार के होते हैं (१) उपकरणवकुश और ( २) देहवकुश । उपकरणवकुश वे कहलाते है जो वर्षमें विना आवश्यकता के भी कभी कभी वस्त्रादिको धोते हैं, लक्षणचिकने रेशमी वस्त्रों को ग्रहण करने की इच्छा रखते हैं एवं कभी पहिनते भी हैं, पात्र दण्डा आदि को घी तेल माक्खन आदिसे चमकदार बनाते हैं, अधिक उपकरणो की भी याचना करते हैं (१)। देह- पकुश वे होते हैं जो विना कारण ही हाथ पैर नख आदि को विभूपित-सुशोभित करते रहते हैं (२), दोनों प्रकारके ये वश शिष्यादि परिवार आदि विभूतिको तथा तप और पाण्डित्य आदिसे उत्पन्न हुए यशको चाहते हैं और आनन्द मनाते हैं, तथा छेदयोग्य बहुत अतिचारों से शवलित -कर्बुरित अर्थात् मलिन होते हुए भी कर्म क्षयके लिए उद्यत रहते हैं, इत्यादि लक्षणवाले होते हैं ॥१॥ कुशील भी दो प्रकार के होते हैं-आसेवनाकुशील और कपायकुशील । जो ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप का किञ्चिन्मात्र आराधन करते है वे आसेवनाकुशील है । और जो क्रोधादिक भावों के वश होकर ज्ञानादि गुगों की विराधना करते हैं और मूलोत्तर गुणों के विपायक होते हैं वे कपायकुशील हैं ।। २ ।। इन पांचो का विस्तृत स्वरूप श्रीभगवतीसूत्र आदि से जान लेवें। यहां शङ्का होती है कि जब ये शिथिल क्रियावाले हैं, केशों का लोचन करके कैंची से केश काटते हैं, सुन्दर-सुन्दर उपकरण रखते हैं और मूल गुण उत्तर गुण के विराधक हैं तो फिर ये 'निग्रन्थ' शब्दसे कैसे कहे जाते हैं ? इनका स्वरूप किस प्रका- रसे है १, इसका समाधान यह है कि-इनकी पूर्वोक्त क्रियाएँ प्रवाह रूपसे (हमेशा- सर्वदा) नहीं हैं-कभी कभी विशेष कारण को लेकर धावनादि क्रिया करते है, और मूलोत्तर गुणों की विराधना मानसिक विराधनाको लेकर है अर्थात् मनसे कभी विरा. धना कर बैठते हैं, यह यहां सारांश है, किन्तु इनके सदा इन क्रियाओं की कर्तव्यता नहीं है, इस लिये इनको 'निर्ग्रन्थ' शब्दसे कहा है ।। ३६ ॥ अब सत्साधुओं का वर्णन करते हैं- - . 'सविनाति--जो मोक्ष के अभिलाषी है, सर्वदा लोगों को धर्मोपदेश देते रहते हैं, आगम के रहस्य को जानते हैं, द्रव्य क्षेन काल और भाव को देखकर किया करते हैं, शुद्ध मार्ग-अर्थात् जिनमार्ग को प्रकट करने में सर्वदा सावधान रहते है, तथा जिन्होंने मिथ्याप्रवादों को दूर करदिये है, एव जो नियम-अभिग्रह, उपशम, दम-इन्द्रियविजय, औचित्य-योग्यता, गाम्भीर्य, धैर्य, स्थैर्य, औदार्य, आर्यचर्या- सत्पुरपोचित प्रवृत्ति, विनय-अभ्युत्थानादि, न्याय, दया, धर्मक्रिया, इन में आलस्या भाव-उद्यतपना और सरलता आदि गुणों से पवित्र हैं, एसे जो जिनशासन क सत्साधु है वे तो सर्वदा वन्दनीय है ।। ३७ ।। अब अथकार जिन मगवान को चन्दन करते हुए चक्रस्थापनासे स्वनामगर्मित काव्य कहते हैं- 'यिभ्राजिष्णु०' इति-अपने अतिशयों से शोभायमान, अहवार एव कामस सर्वदा रहित, सिद्धान्त की आज्ञा के उल्लङ्घन का निषेध करनेवाले, सवलज्ञानद्वारा लोकालोक के प्रकाशक होने से सूर्यसमान, श्रेष्ठ शरीर की कान्तिरूप चन्द्रिका के द्वारा चन्द्रमा के समान शीतल कान्तिवाले, असुर नर और इन्द्र से प्रशसित, पापको नष्ट करनेवाले, दम्भ-( कपट-माया) के लिये शत्रुसमान, विद्वानों को अपनी सुन्दर वाणीद्वारा स्याद्वाद के आनन्दसे आनन्दित करनेवाले, ऐसे जो जिन भगवान हैं उनको मैं चन्दन करता हूँ, यह काव्य चक्रनन्ध काव्य है । ग्रन्थकारने इसमे "जिनवल्लभेन गणिनेद चक्रे" (जिनवष्टमगणिने इस को बनाया है) इस वाक्य को अपनी काव्यरचना चातुरी के प्रमानसे काव्यान्तर्मित कर दिया है ॥ ३८ ॥ 'जिनपति-इति-विपयलोलुप, साधुवेपधारी और भस्मग्रहरूप, म्लेच्छ राज के सैन्यसमान जो ये चत्यासी लोग है, इन चैत्यवासियों से इस पश्चम काल (आरा) के कारण जिनेन्द्र का मतरूप दुर्ग(किल्ला) आक्रान्त हो गया है अर्थात् भस्मक ग्रह के सैन्यरूप इन चैत्यवासियोंने जिनेन्द्र मतरूप दुर्ग पर आक्रमण कर लिया है, इसी लिये इस समय ये लोग अपने वशवर्ती धारकों के लिये हमको छोडकर "अन्यत्र कहीं नहीं जाना" इस प्रकारकी श्रृहला समान अपने गच्छ की मर्यादा को स्वार्थ- सिद्धि अर्थात् अपना पेट भरनेके लिये विस्तारित किये हुए है ।। ३९ ॥ 'सम्प्रत्य-इति-इस ममय-इस पश्चम आरा में होनाचारी चैत्यवासियों के कुमद्ध का शरीर अप्रतिम अर्थात् अनुपम बलशाली हो रहा है, भस्मनहरूप म्लेच्छ . " बायरतरगच्छीय शान मान्द , जयपुर १४ राज के सैन्य दिनानुदिन पढते ही जा रहे है । दुष्ट असंयतियों की पूजारूप दशम आश्चर्य प्रतिदिन. अधिक से अधिक रूप में बलिष्ठ हो रहा है, मोहनीय-कर्मरूपी राजा के वे पूर्वोक्त सैन्य चारों और फैलकर अपना अधिकार जमा बैठे है। एस समयमें यदि हमारे मुंहसे 'सदागस-शुद्धमार्ग' वह शब्द भी निकल जाता है तो मोहनीय कर्मरूपी राजा की आज्ञा में सदा तत्पर रहनेवाले आजकल के लोग हमारी कदर्थना-वेहालात- करडालते है ।। यह संसार नगर है, मोहनीय कर्म इसका राजा है, कुसङ्घ इस राजा का सैन्य है, भस्मग्रह महा-सामन्त-महामन्त्री है, और दुष्ट असंयतियों की पूजारूप दशम आश्चर्य उसका दूसरा सामन्त है ॥ ४० ॥ ॥ इति श्रीजिनवल्लभसूरिविरचित सङ्घपट्टक का हिन्दी भाषानुवाद सम्पूर्ण ॥ श्री जिनदत्तसूरि ज्ञानभंडार के प्रकाशन । गणधरसार्घशतक। पह्स्थानप्रकरणम् । (अंतर्गतप्रकरणम् )। धन्यशालिभद्रचरित्रम् । जयतिहुअणवृत्ति । धन्यचरित्रम् । दिवालीकल्पः। सामाचारीशतकम् । प्रश्नोत्तरसार्धशतकम् । कल्पसूत्र-कल्पलताव्याख्या। विशेषशतका। प्राकृतव्याकरणं। संदेहदोलावलीवृत्तिः। विधिमार्गप्रपा। पंचलिंगिप्रकरणम् । सप्तस्मरणटीका। चैत्यवंदनकुलकवृति:(तिः) गाथासहस्त्री। अनुयोगहारसूत्रमूलं । अतिमुक्तकमुनिचरित्रम् । कल्पद्रुमकलिकाभाषांतरम् । गणधरसार्धशतकलघुवृत्तिः । संवेगरंगशाला। कल्पद्रुमकलिकाटीका। श्रीपालचरित्र माकृत-भाषांतर। पुण्यसारकथानकम् । द्वादशपर्वव्याख्यानभाषा। चर्चर्यादि अन्धत्रयी। जीवविचारादि प्रकरणभाषा। जैन धातुप्रतिमा लेख। कल्याणमंदिरस्तोत्रटीका । प्राचीन हिंदी पद्य संग्रह । भक्तामरस्तोत्रटीका। वीशस्थानक तप विधि । द्वादशकुलकविवरणम् । रणसिंह चरियम् ।
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