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Tested Ways To Health

S. C. Menkal · 2011/03

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स्वास्थ्य के प्रयोग सिद्ध उपाय Tested Ways to Health (Hindi) ग

स्वास्थ्य के
प्रयोग
सिद्ध उपाय
लेषकगण
एसी मेन्चल, एम डी.
एस.बी हाइटहेड, डी एस. सी
एल.ई. युर्वक्स
सोसल पास्को
पार पी. एच. चालंटन, एल पी एम ई., एम. एस.
एफ, एम एस.सी. एच.
नारियंटल याचमन पब्लिशिग हाऊस
बॉक्स ३५, पना १, ईन्डया

First Edition 5,000 Copies Registered August 21, 1950 Second Edition 7,000 Copres Registered July 24, 1952 Third Edition 5,000 Copies Registered August 30, 1963 Fourth Edition 5,000 Copies Registered Dec 31, 1968 ALL RIGHTS RESERVED विषय सूची .... ... ..4 .... १८ .... ३० .... .... .... .... જૂર ૨૨ ४८ स्वास्थ्य को प्रानवार्यताएं हमें सास लेना चाहिए हमें खाना चार पीना ज्यावश्यक है हम लोगों को काम करना चार खेलना चाहिए हमें विश्राम करना चाहिए संतालत प्रहार सद्य पदार्थों के भोजन तत्वों की मात्रा के अनुसार समूह हम उम शक्ति उत्पादक खद्य नही खावे प्राप र मापके प्रोटीन घसा तथा शारीरक योग्यता मारतका प्रहार ... ज्याहार की समस्या खद्य पदार्थों की विभिन्नता से तत्वों की निश्चयता खद्य पदार्थ तथा यसपरपरागत एक सतलित पाहार चावल काप्राहार माहार में पर प्रोटीन खाद्य पदार्थ प्रोपांध के रूप में .... साम सम्जिया फल प्राणीजन्य पदार्थ .... .... ६ध अर्ड निरामिप अथवा साकाहारी माहार को सतुलित रखना जीवन सत्व (विटामिन) शारीरिक योग्यता को मनाए रखना नपने ग्राप की किस प्रकार शारीरिक जाच करनी चाहिए स्वास्थ्य के लिए व्यायाम प्राकृतिक चिकित्सा घर में जल चिकित्सा साधारण सदी लिए चिक्त्सिा स्वास्थ्य प्रार चगापन के लिए स्नान सायिक सुचनाए कब्ज को दर करने के दस उपाय मदाग्नि से बचने के दस उपाय उच्च रक्तचाप से बचने के लिए दस सामयिक उपाय सदी से बचने के लिए दस सामयिक उपाय मधुमेह से बचने के दस सामयिक उपाय धृक्क प्रदाह रोग से बचने के दस सामयिक उपाय ८० ८० ८६ ८७ ९५ ९५ .... ... ११० ११० ११५ ११९ .. .... १२५ १२७ १३० १३२ १३४ शारीरिक व्यायाम प्रदर्शन स्वास्थ्य की अनिवार्यताएं एस. बी व्हाइटहेड, डी एस सी. हमें सास लना चाहिए जीवित रहने के लिए यह कहना कि हम सास लेना आवश्यक है एक स्वय- सिदध वात है प्राधिकारिक अभिलेख से यह पता चलता है कि एक मनुष्य अपनी सास को ६ मिनट २९ २/५ संक्ड तक रोके रख सकता है। हम में से बहत थोडे ऐसे लोग है जो अधिक से अधिक तीन मिनट तक अपनी सास को रोके रख सक्ते है । सास लेने की बात यहत महत्व है, पर लोग इस पर अधिक ध्यान नहीं देते । गीत गायन, वक्तृता कला तथा व्यायाम आदि को छोड वर दसरे समय, इसकी पावश्यकता पर ध्यान नहीं दिया जाता । ऐसा करना बिलकल मचित भात है। क्योक सास ही ने सबसे पहिले शरीर तथा मस्तिष्क के प्रत्येक कोप के जीवन तथा गतिविधि को सीमावध कर दिया है और वह उनके कार्य करने का स्तर निर्धारित करती है। श्वास प्रश्वास का कार्य अपने ग्राप से चलता है ऐसा मान र अधिकाश सोग उस पर नियत्रित नहीं करते और न उसके व्यायाम की यावश्यक्ता समझते है, पर ऐसे क्षेत्र जैसे गीत गाने या व्यायाम करने के क्षेत्र में जहा श्वास प्रश्वास का प्रभावशाली महत्व है अनुभूति प्राप्त ह,या है। उनसे यह पता लगता है कि जो समभर कछ अश तक सास पर नियत्रण कर लेते है, उन्हीं का जीवन सफल माना जाता है । जव कि जीवन को इन अवस्थाओं में समुचित रूप से सास लेने का इतना महत्व है तो क्या स्वास्थ्य प्राप्त करने की दिशा में तथा उसकी सुरक्षा करने में इसका महत्व कम हो सकता है। इसका उत्तर यह है कि किस प्रकार सास लेना चाहिए इस बात का नित्य प्रतिदिन ध्यान देने दवारा न केवल हमारे शरीर के स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी हो सक्ती है अपितु हमारा मस्तिष्क तथा हष्ट- फाण का भी विकास हो सक्ता है जीयन शक्ति तथा प्रांतारक-शक्ति के लिए गहरी सांस पहन योई लोग है जो अपने शारीरिक तथा मानसिक हित के लिए अपने F2 १० स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय पंपड़ों को पुरी योग्यता के साथ धाम में लाने है अथवा यह समझते है कि उन पर (शारीरिक तथा मानसिक कल्याण) सास का कितना महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। हमें अपने शरीर के भीतर की जीवन की प्राग को युभन न देने के लिए सास लेना मावश्यक है। शरीर को गर्मी तथा ऊर्जा उन पदार्थों के प्रक्सीकरण (जारण प्रक्रिया) से प्राप्त होता है जो नतों के भोजन से ओषण किए जाते है । जारण प्रक्रिया प्रोपजन के साथ दूसरे तत्वों के मिश्रण से होती है । गोपजन रक्तदवारा फ्पड़े से तथा सास ली हई हवा से प्राप्त होती है। जितना पूर्ण रूप से हम सास लें उतना ही अधिक प्राधजन प्राप्त हाता है। प्रोपजन को पाकर जीवन की ग्राशा घधक उठती है। जब हम गहरा सास लेने की पादत डालते है तब हम अधिक उर्जा अधिक जीवन शक्ति पार अधिक प्रातरिक शक्ति प्राप्त करते है। हवा में पोषजन तथा अन्य सीय तत्व पाए जाते है। इनका प्रभाव शरीर क प्रत्येक प्रग ततयों स्नायग्रा तथा स्नायनों पर शक्तिशाली रूप से पड़ता है। ये (प्रोपजन तथा अन्य गैसीय तत्व) इन अगों को कार्यदक्षता तथा समन्वयता को बढाते है। पूर्ण तया गहरा सास भीतर लेने से पूर्ण रूप से गहरा सास याहर निकालना पडता है । उच्छयास अर्थात् श्वास त्याग के समय फफड़े निराकरण करने वाली ईन्द्रप्रो के रूप में महत्वपूर्ण कार्य करते है। ये रक्त से उन कार्यानिक एसिड गैस तथा क्षीण हया वाप्पीय तत्वों का निष्कासन करते है जो नियम पूर्वक कार्य करने वाली इद्रियों को विषाक्त करके अकर्मण्य बना देते है। पूर्ण रूप से सास लेने के दवारा हम रक्तधारा को नव जीवन प्रदान करते है तथा विशुदध प्राक्सिजनयुक्न रक्त की तुला को अराध रक्त की तुला से बोझ यनाते है। गहरा सास लेना होद्रयों के काम में तीव्रता उत्पन्न करता है गहरा सास लेने से जो उक्त उपयोवी यात होती है उतना ही नही लेकिन प्रार क, यहत होती है। श्वास प्रश्वास की क्रिया का इद्रियों के काम पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वास्तव में मास लेने के दवारा नाड़ी से सर्वाधत असदध रक्त को शुद्ध करने के लिए फेफ्ई में ले जाते है । इस प्रकार हृदय की दहिनी ओर स्थित बडे नस के सांतमूल में असदय रफ्त एकत्र होता है और यहा से यह दय से गुजरते हए फेफड़े में चला जाता है। फेफड़े में जब विशुदध हवा भर जाती निय रक्त रहता यह अपने दांपत पदार्थों तथा या को निकाल कर प्रोपजन से लेना है। इस प्रकार फेफई विदय रक्त को रखने का अस्थायी सोतमल है।

स्वास्थ्य की अनिवार्यताए । यहा से यह हृदय में प्रवेश करता है। हदय से वह शरीर के चारों और विभिन्न अगों में वितरित होने के लिए प्रवेश करता है हल्की तार तथा प्रचंतनता के साथ सास लेने से बड़े नस में अधिक अशुदध रक्त जमा होता है। इस के परिणाम स्वरूप हृदय म दवाव बढता जाता है लेकिन मगहरा तथा पूर्ण रूपसे सास लेने से इसका उलटा प्रभाव पड़ता है । यह हदय के रक्त वितरित करने के कार्य का सरल बनाता है जिससे सभी सवध इन्द्रियों पर कम दवाव पड़ता है। श्वास प्रश्वास प्रार मन शारीरिक क्रिया जो सुचारू रूप से चलती है वह केवल प्रभावित नहीं होती अपितु फेफड़ों के पूरे उपयोग का हमारी भावना तथा मानसिक स्थिति पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। उत्तेजना भय चिन्ता व्याकलता तथा अन्य मनोविकार के समय श्वास प्रश्वास की गति तीब होती है हल्की रहती तथा प्रभावनात्मक होती है। भावनात्मक तनाव की दोहक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप सास बहत हल्का तथा तीव गति से चलता है। परत यदि हम जानबुझकर पूरी चेतना के साथ नियमित रूप से महरा सास लेने लग जाए तो अपनं भय पर हम पूर्ण रूप से प्रभुत्व करके नियंत्रण पा लेते है । सास जीवन है और जितना अधिक हम उस पर निश्चित रूप से निर्भर करते है उतना ही अधिक हम अपने शरीर में स्वास्थ्य और सुख के लिए नई गतिशील शक्ति सचारण करते है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सास लेने की गति ज म से पूर्व के प्रभावों दवारा निश्चित हो जाती है। श्वास प्रश्वास की गात आनीच्छक रूप से चलती है। यदि हम उसी प्रकार चलने दे तो स्वास प्रश्वास की मासपेशिया अपनी क्षमता खो दे सक्त है जिसके फ्लस्वरूप हमारी सास लेने की गति अधिक उम होने पर धीमी हो जाती है। इतना होने पर भी भासपछिया पार श्वास प्रशास की इट्रिया हमारी इच्छा के प्राक्ल रूप से नियत्रण में आ सकती है। यदि हम समझ झ रस्ने हए अपनी सास लन की विधि को सुधारने लग तां हम नया बल और प्रार स्वास्थ्य निर्माण के कार्य में ला जाते है। - कसे सर्माचत रूप स सास लें उनम स्पस सास लेने का माधारभूत मासन (पासचर) नमी अवस्था में एक-सा रहता है। हमें छाती की दीवाल को सीधा कर वक्षोदर मध्यपभी के स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय मंहताय के समान पना कर क को पीछे पार नीचे झया कर लया पार गहरा सास लते ए फेफड़ों को हवा से भरने हा एकचन से अपने शरीर को र्शियलन परना चाहिए। अगर हम चाहे तो कभी कभी अपने मुह से सास यार निकाल सफ्त है लकिन नामिया मार्ग से सास भीतर लेना चाहिए। यह निश्चय कर लें फि मास जिस हवा को लेते है उसकी गदी छन गई और पंफई में पह,चने के पहिल हवा गर्म हो गई है। पेपर्ड को पन प्रशिक्षण देने के लिए सास लेने के चार तरीकाए बतलाए ‘गए है सास भीतर खीचना तफ्ना सास बार निकालना रुक्ना अच्छा व्यायाम करने का तरीका है धीरे धीरे सास भीतर लेना परि मन में छह सात ब्राथवा पाठ मिनना यछ क्षण के लिए सास को रोक देना फिर पद्रह से बीस मिनट तक उस को दोहराना । इस प्रकार का साधारण व्यायाम सकिर उठने के समय पार फिर सांनं जाने के समय करना चाहिए। दिन के समय में किसी प्रासन में जब कि शरीर शिथिल हां और पंफ्डा स्वच्छदता पूर्वक काम कर सके ऐसा करना चाहिए। स्वच्छ जल का अधिक मात्रा में पीना स्वास्थ्यकर होता है।

स्वास्थ्य की अनिवार्यताए ३ वृदयों के लिए सात लेने का व्यायाम वृदध लोग जिनका सीना सदर का प्रारदा गया है उन्ह उचित है कि वे नपनी पीठ के बल लेट कर व्यायाम करें और उर प्राचीर (वक्ष स्थल को उदर से अलग करनेवाली पेशी) को अपने हाथ से उपर पार नीचं कर सास लेने में सहायता करें एक बार आधारभूत लाभ का पूर्ण रूप से अभ्यास होने पर अनेक प्रकार के सास व्यायाम किए जा सकते है। उदाहरणार्थ चारी बारी करके लबी तथा प्रकार के सास व्यायाम किए जा सकते है। उदाहरणार्थ पारी वारी करके लया तथा गहरा सास लने का अभ्यास कर सकते हैं। पहले सास बाहर निकालने के समय सास बाहर निकालने से दा गुना कर सकते है । सास को रोक रखने के समय को दीर्घ क्यिा जा सक्ता है और उसमें भिन्नता भी की जा सक्ती है लेकिन सीमा का प्रतिक्रमण नहीं करना चाहिए। ठहर ठहर कर सिसक्ने की तरह सास लना लाभप्रद होता है। इसके बाद लवा गहरा सास लेकर निकाल देना चाहिए। समय के बीतने पर फेफड़ों के ततयों में षित पदार्थों के एयत्रत होने की घातक प्रवृत्ति हो जाती है इसलिए सास लेन के तरीके को बदलने से दांपत पदार्थ दीले होकर का निकल जाते है सचेतन रूपसे निर्यात सास की प्रतिािम्या श्वास प्रश्वास इद्रियों पर होती है इसलिए सास लेने का व्यायाम शारीरिक व्यायाम के समय किया जा सकता है। शरीर को फलाने तथा लयात्मक गति के साथ श्वास प्रश्वास के लय को मिलना एक सबसे अच्छा तरीका है अर्थात् शरीर को फैलाते समय सास लेना कछ क्षण के लिए रोके रसना सिथिलन के समय सास निक्ल देना और जय शरीर स्थिर हो जाए उस समय सास रोके रखना चाहिए। - हमें खाना मार पीना प्रावश्यक है प्रवृतिने यह दखा कि खाने पीने के समय को ग्रानददायक बनाना अच्छा होगा। खाना पीना भावश्यक कार्य है जो हमारे जीवन की वार चार पाने वाली घटनाए है। वास्तव में खाने पीने की बात यहत रोचक होती है और हम में से यरत थोड़े। जो अपनी जीभ की तृप्ति करने की जो परीक्षा सदा सामने आती रारती से रोक सफ्त है। यहत से लोग यह समझत है कि खाना पीना ही जीयन और हम उसी के लिए जीने है। ऐसा विचार बहत भम है । एस विचार फो मन में स्थान देकर हम इस बात को भूलने है कि हम जीन पार स्वास्थ्य रहने के लिए वापर साते पीते है।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय १४ भोजन की तच तथा भूख को भर एंट खाने के याद योड़ा अधिक देने स सहज ही सतुष्ट कर सक्त है । लेक्नि एक सभ्य मनुष्य के लिए अपनी पौष्टय ग्राहार दी मावश्यक्ता की पूर्ति के लिए इस प्रकार खाने पीने का तरीका अच्छा नही । राशन तथा अनेक प्रतिवध के दिनों में भी ग्रसित वयस्क कम से कम हर तीस दिनों में एक बार अपनी इच्छा असार भर पेट भोजन खाता है । उसके खाने पीने क पदार्या से उसका शरीर जीर्णोदधार तथा नवीनीकरण पार गर्मी एवं शक्ति तथा स्वास्थ्य रक्षा और नियमानुसार कार्य के लिए जो क, व्यावश्यक तत्व है उसका शोषण करता है। इन आवश्यक्ताओं की पूर्ति तथा सफलता हमारे भांजन के पौष्टक पदार्थों के प्रकार गण तथा मात्रा पर निर्भर करती है। पांचाहार के हमारे याधुनिक ज्ञान की व्यावहारिक बात यह है कि हमारे दैनिक भोजन में पल ताजी सूखी सब्जी का रायता ताजी ब्जिया दध दध की वस्तुए पडे पूर्ण गेह की रोटी पूर्ण धान्य भाजन पांचों से प्राप्त प्रोटीन इत्यादि सम्मिलित होने चाहिए यदि जीयित शरीर की पॉप्य मावश्यक्तानों की पति करनी हो तो हमारे दीनक भोजन में उक्त पदार्थ कम से कम ९० प्रतिशत होना चाहिए। गण का महत्य अधिक होता है क्योंक हमार भोजन पदार्य के गण ही के कारण उनमें विटामिन और सनिज तत्व पाए जाते है हमारे पापाहार का ज्ञान इस यात से प्रकट होता है कि हम ताजा भोजन पदार्थ खाना उत्तम समझते है। यह सत्य है कि डव्या में तथा यफों में और सुरक्षित स्थाना म भाजन पदार्या पो रखने जो उपकरण तया साधन उपलब्ध है में भोजन तत्वों के नन होने की मात्रा को कम कर देते है पर ये नष्ट हो जाते है। जहा तक समय हो सके हम लो को रतु में उपजने वाले मांजन पदार्ण यो नाजा खाना चाहिए पंड या पौधों में तोड़नं ही अथवा जमीन स कोड़ने के याद शीघ ही उनको उप योग में लाना चाहिए । साचत भाजन पदार्य जैसे धाय के गण की पूणता तथा भने दे नाप चावल में अधिक पपप तत्व रहते है हनी प्रकार नफेद शक्कर की अशा प्रीमियत रान पर निमर करता है। मशीन से नाफ कि चायल की अपेक्षा मत अपयर में मदाटी प्रधान मंद की रानी को अपेक्षा पूर्ण ता. की रोटी में। प्रत्यापय खाने में सतरा जय माने पीने के पदापों के गुण नया प्रकार का श्रेष्ठ न्यान दिया जाता तो मारा था माय बम हो जाना सपनी न्याभाविक ममा में प्रधक राना - स्वास्थ्य की अनिवार्यताए पीना पाचक शक्ति के लिए वांझ हो जाता है। यह शरीर की कार्यक्षमता को बढ़ने नही देवाग्रार उसे जीर्णशीर्ण होने तथा रोग का शिकार बनने के लिए प्रन कल स्थिति उत्पन्न कर देता है। अपनी खाने की सामर्थ से कम खाने से विपतियों का बादल हट जाता है। जब हम अपनी ऊचाई, लिग भेद तथा अपनी उम्र के अनुसार शरीर भार को बनाए रखने के लिए आवश्यक्ता से कम खाते पीते है तो हम शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ और योग्य बनते है इस के अतिरिक्त हमारा पोपाहार जलवायु क्तु तथा व्यक्तिगत कार्य के आनुवल होना चाहिए। जव हम अधिक शारीरक परिश्रम करते है तो अधिक खाने की भी ग्रावश्यक्ता होती है । जलवायु अथवा ऋतु अधिक ठडा होने के कारण शरीर की गर्मी को बनाए रखने के लिए हमें अधिक खाना पडता है। । पाच त्रया की स्थिति पाच क्रया की चार ाितया होती है । इसका प्रारभ मुह में होता है। यहा भोजन पदार्थ के कोष तोड़ कर खोल डाले जाते है । इन में पाचक रस प्रदेश करता है। इसके बाद लार अथियों के रस से मिलते है। लार अथिया माड़ी को पचाकर प्रात्मसात करने योग्य बनाती है। पाचनक्रिया की दसरी स्थिति प्रामाश्चय में प्रारभ होती है। यहा प्रामाशय के जितने रस होते है वे भोजन पदार्थ के तत्वों विशेषकर प्रोटीन को पचाकर प्रात्मसात करने योग्य बनाते है। नीसरी स्थिति छोटी मात के प्रथम भाग में पाई जाती है। यहा यकृत का पित तथा क्लोम के रस ची को परिवर्तन करते है। इन दोनों यकृत के पित्त तथा क्लोम के रस या सम्पूर्ण भोजन पर खमीर जैसा असर पड़ता है । इसके प्रभाव से भोजन पदार्थ पचने लगते है। पाचन क्रिया की चौथी स्थिति वह है जब भोजन पदार्य पूर्ण रूप से पच जाते है मार पोषक तत्वों का अात्मसात हो जाता है और मलपदार्थों का निराकरण हो जाता है। - - । धीरे-धीरे खाना आवश्यक है । पाचन क्रिया की प्रत्यक स्थिति पिल्ले की सफलता पूर्वक समाप्ति पर निर्भर होती लाक्न पाचन क्रिया का सप से प्रधान काम है चयाना | भोजन पदार्थ को यहत पम चयाना और शोध निगल पर गले के नीचे उतारना एसी मादत । जो समय पावर पाचक समधी विकार उत्पन्न कने में समयक होती है। इन पादतों nt गाना- १६ स्यास्थ्य के प्रयोग सिदर उपाय से शरीर के पोपाहार सवधी हास होता रहता है उसकी बात तो यहना ही क्या है?रकार को धीरे-धीरे अच्छी तरह चया कर खाने से संच पड़ती है और मोजन पदार्थ को पूर्ण रूप से पचने सहायता मिलती है। जल यब पीना चाहिए भाजन के साथ पानी पीने की पादत पुरी है क्योंकि यह ठोस भजन को समय से पूर्व नीचे उतार देता है। यदि भाजन पदार्थ समुचित रूप से चबाया जाए और पानी धीरे-धीरे कम मात्रा में पीने के बाद मुह में इधर उधर कर के निगल लिया जाय तो भोजन पदार्ण के साथ जल नहीं पीने का कोई ऐसा वास्तविक शरीर त्रिया सबधी कारण नहीं हो सक्ता। ग्रामाशय का कोई भी तरल पदार्थ एक स्थान पर स्थायी रूपसे नहीं रहता, यह शीघृतर शरीर के विभिन्न भागों में चला जाता है । ठोस पदार्थ खाने के पूर्व अथवा पीछे जल पीने की प्रादत बनाने की सलाह इसलिए दी जाती है क्योंक एसा करने से भोजन पदार्थों को अच्छी तरह चबाने का अवसर प्राप्त हो सकता है। भोजन का समय ग्रानंदमय होना चाहिए खाने के समय भोजन पर हमारा पूरा ध्यान होना चाहिए क्योंकि हमारे शरीर की पाचन क्रिया हमारे मानसिक तया भावनात्मक स्थिति से जितना अधिक प्रभा- वित होती है उतना शरीर की दसरी त्रियाए नहीं होती। खाने के समय व्यनसाय सबधी घातें नहीं करनी चाहिए अथवा गृह सबंधी समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न करना उचित नहीं न पढने सबधी बातों से मन को वाभिल बनाए रखना चाहिए । भावनात्मक विकार तथा क्लात की स्थिति में भोजन नहीं खाना चाहिए क्योंक पाचन क्रिया में इतना योझ पड़ जाता है कि यह असमर्थ हो जाता है। भोजन का समय मानन्द का अवसर होना चाहिए । इस समय मन का पूर्ण रूप सशिथिलन हांना नितात ग्रावश्यक है। सुखद वातावरण के अतिरिक्त अन्य सभी बातें अच्छी स्थिति में होनी चाहिए जय भोजन खाने से पाचन क्रिया को पहन सहायता मिलती है। हमारे खाने पीने की प्रादत व्यक्तिगत विषय है। यहत से लोग दिन में कंवल तीन बार भर पेट खा कर सतुष्ट हो जाते है लेकिन यह खाने पीने की प्रावश्य. पना की अपेक्षा पादत तथा सविधा का नियम है । अनुसंधान से यह पता लगता स्वास्थ्य की अनिवार्यताए १७ है कि यदि अच्छे पोषाहार का सतुलन बनाए रखना सभव हो सके ता बहत स लोग विशेषकर स्त्रियों को योडायोड़ा कर के अनेकों बार खाना अच्छा है। इसके विपरीत वृद्ध लांग दर दर से पेट भर खाना अच्छा समझते है । चे पीच. बीच में जलपान या पय लेना भी अच्छा समझते है। पाचन क्रिया में विभिन्नता होती है इसलिए रीति के अनुकूल न र के व्यक्तिगत प्रेरणा जैसी मिल उसी के नियमानुसार खाना पीना उत्तम है। भोजन पदायों के पकाने की विधि भोजन पदार्थों के पकाने की विधि पर उनका पचना निर्भर करता है। असल में पकाना पचने की एक प्राभिक विधि है। पकाने की विधि म ताप का उपयोग Ja TA १८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय - - हाता है जिसके दवारा माजन पदायां तत्व यहत सहज से पचने योग्य बन कर चकर भी होते है। सेंक कर भाजन पदार्थों को पकाना सब से उत्तम विधि है। भाए दवारा पकाना उबालने की अपेक्षा अच्छा है। नले हए भोजन पदा को कम साना चाहिए क्योंकि दूसरे तत्वों के साय चवीं अथवा तेल को अधिक मिला दने स ये सहज से नही पचते। जब तक वं उदर के नीचे की छोटी मात तक नहीं पहचते तब तक में नही पचने । चर्या को प्रामाशय में दसरे तत्वों से प्रलग करना सहज नही है और इसका देर तक एक स्थान में रहने से तकलीफ होती है। हम लोगों को काम करना और खेलना चाहिए जीवन में सामान्य स्वास्थ्य तथा सुख प्राप्ति करने का एक महत्वपूर्ण फर्जी है शरीर तथा मस्तिष्क की क्रियाशीलता को ससतालत स्थिति में रखना । काम पार खेल द्वारा हम इस क्रियाशीलता को प्राप्त कर सक्ते है। काम और खेल में से किसी एक की अति सीमा तथा दसरे की प्रत्यन्त कमी से हम असुरखी नया अस्वस्थ रहेंगे। यदि हम बुदिधमान है तो काम पार खेल को न केवल प्रावश्यक क्रिया शीलता का रूप देखेंग पर उन्हें सपूर्णता का एक एक भाग समझेगे । उनके दवारा न केवल हमारे मन तथा मासपेशियों को स्वास्थ्यपूर्ण व्यायाम प्राप्त होता है लेक्नि मन की प्रवल भावनात्मक प्रायाक्षाए भी सतुष्ट होती है । असल बात तो यह है कि हम काम तथा खेल कद ट्वारा रचनात्मक रूप से अपने पापको प्रकट करना चाते है । हम अपनी शक्तियों तथा प्राकृतिक गुणों को इस प्रकार उपयोग करते है पर शरीर पर मस्तिष्क को इस प्रकार काम में लात है जिनसे उनकी योग्यता पढ़ती है तथा हमारे वातावरण पर प्रभुत्व प्राप्त करने का प्रारिक ज्ञान होता है। इन दो प्रकार की प्रियाशीलता अर्थात् काम और खेल कद याद सचित रूपसे उपयोग में लाया जाय तो वे एक दूसरे की सहायता करते है और वे जीवन निर्याह करने में हमारे अपूर्ण अस्तित्व को प्रकट करते है। प्रच्छ स्वास्थ्य के लिए काम करना प्रावश्यक है दर्भाग्य की बात है कि हम में से बहन से ऐसे है जो अाजकल काम को द, खदाई समझते है । वे यह समझते है कि उन्हें भोजन वस्त्र तया निवासस्थान

स्थाप्य को प्रानपार्यतार
१९
जीरा पानावश्यक पस्तुए उनका मूल्य पाने के लिए श्या प्रमाना पड़ना
हमारे मुख और परमाण के लिए पाम पनि संयनना नाम सामान पात
पर अनमय हमें गभी दांना जमाए परन के लिए नही। न्यास्थ्य के
लिए एन पी अपेक्षा मालस्य से अधिक भय ना है।
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२० स्वास्थ्य के प्रयोग सिदव उपाय बड़ा) की कहानी से होता है। वह एक उद्यान में घूम रहा था। उस उद्यान में गिजां. घर वन रहा था। उसने एक राजमिस्त्री से पूछा "तुम क्या कर रहे हो ? ' राज. मिस्त्रीने उत्तर दिया में इन पत्थर को पाट रहा है। दसरे को यही प्रश्न पूछने पर उसने उतर दिया में इस गिर्जे घर को बनाने में मदद कर रहा । फिर जय तीसरे पादमी को प्रश्न पूछा गया तो उसने कहा में ईश्वर की महिमा के लिए इसे बना रहा है।" उस समय जो काम में कर रहे थे उनसे उस बने हुए भवन के लिए थोड़ा सा भी लाभ नहीं हया लक्नि जिस विस्तार पूर्ण दृष्टिकोण से ये अपने कार्य में निमग्न थे उसी ने काम के प्रति उनके सुख तथा उत्साह को पढ़ाया पार यही उनके काम का जो परिणाम मिला उसका निर्णायक बना । कछ ऐसे है जिनका कार्य उददेश्य राहत तया महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। उन्हे अपने काम को सजीव तथा सतोषप्रद बनाने के लिए अपना हष्टिकोण विस्तृत करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि काम पूर्ण होने पर उन्हें कसा लगता है यदि आपके मन में यह विचार उत्पन्न होता है कि मैं एक बड़ी मशीन का छोटा सा चक्रदन्त मात्र ह तो समझिए यह अापके काम का एक नया रूप दिसला रहा है। इस बात की अवहेलना न कर उसके महत्व को खोजिए। इस बात का पता लगाइए कि उत्पादन में तथा उस उत्पादित वस्तु की उसमता में प्रापका क्या नश है। - खेलना कदना क्यों अनिवार्य है प्रधानत कार्य मानसिक या शारीरिक हो सक्ता है मानसिक या शारीरिक श्रम में स क्सिी एक की त्रात्यधिक्ता से सचित बल बहत शीघ सर्च हो जाता । घटों तक लगातार एक ही प्रकार के काम में लग रहने से भावनात्मक तथा मानस सवधी कारणों से थकावट महसूस होती 1 इसीलिए अत्यधिक श्रम अथवा संचकर कामों के विरुदय भावनात्मक परिणामों से बचने के लिए खल पद की आवश्यक्ता होती है। काम से खेल में इन बात में भिन्नता है कि खेल में हमारी स्वच्छदता रहती है। इतना होते हए भी खेलों के कछ नियम होते है जिनके अनकल हमें खेलना पड़ता है। यदि हमारा काम अधिकतर शारीरिक हो तो मानसिक मनबहलाव के वारा उसको सतुलन रखना चाहिए। जव मानसिक श्रम करना पड़ता है तय हमें प्रययाराम ममम, YAHदन-- स्वास्थ्य की अनिवार्यताए २१ शारीरिक मनयरलाब की ज्यावश्यक्ता हाती है। मानायल जीवन हे दनाव को सरलन रखना खल का काठन शारीरिक श्रम करने से शरीर की मस्त केकेद्रों में समन्वय स्थापित करने और *zear पवा है। इसलिए प्रतिदिन फ्छ घट मानसिक Par-मन्द्रीय शील होते है फ्लस्वरूप सरीर शियित घंटे पाम करने से मस्तिप्न नया मना हाती है तथा ईन्द्रय कार्य मन - यादर विचार तथा विश्लपण कदादा लिए प्रार शरीर को किया marrrrr कर खो की प्रापश्यना rrrrrrrr- प्रसल मरrary मक पायं के ना - 2 मे - पपल मान

२२
स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय
टहलना अच्छा घ्यायाम है।

स्वास्थ्य की अनिवार्यताए । । । शारीरिक श्रम की अावश्यकता होती है जैसे एत्थर खोदकर उसे किसी रूप में बनाना सिलाना बनाना इत्यादि रचनात्मक कार्य से यानन्द प्राप्त होता है। इसी प्रकार शारीरिक श्रम करनेवालों का अपने खेल कद का इस प्रकार प्रबंध करना चाहिए जिससे शरीर क काम म न लाए ६,ए अगों का व्यायाम हो तथा उनको पोषण मिलें । मार्नासन काय जैसे पढना डियो सुनना या किसी क्ला में भाग लेने के ट्वारा विश्राम लिया जा सकता है। पशमों तथा मानव जाति के बच्चा के लिए खेलना मुरय कार्य कलाप है। यदि इन सेल कदा का अध्ययन किया जाय तो शीघ्र उनका गहरा अर्थ स्पष्ट हा जाता है । जानवर के यच्च अपने खेलों में एकांचन तथा बड़े प्रेम के साय लीन रहते है । खेलमें उसकी तन्मयता तथा प्रेम की तुलना नहीं मिलती। उनके लिए खेलना स्वाभाविक है । खेला के द्वारा उनके शरीर तथा मस्तिष्क भविष्य जीवन के लिए गठन होता है । पयस्कों के लिए भी खल का वही महत्व होना चाहिए जो बच्चों का है। खेल का मतलव केवल शिथिलन करना अथवा मन बहलाने की प्रपक्षा और कछ अधिक है। यह कार्य कलाप है जिसके बारा हम अपने अपको पूर्ण रूप से व्यक्त कर सकते है। खेल कद के किसी भी रूप पर अधिकार प्राप्त कर लेन स हमारे मनमें यानन्द तथा परिणाम मिलन का ज्ञान होता है। वास्तव में खेल काम के घटों से उत्पन्न तनाव को हलका कता है। वह शरीर और मस्तिष्क के काम को एक सूत्रता लाने (समन्वय स्थापित करना) के लिए उजित करता है। एसा करके वह (खल) हम लोगों को दिन के अंत में शिथिल रखता है और इस प्रकार रात को निद्रा दवारा नई शक्ति प्राप्त होती है। उचित दृप्तिकरण से यदि देखा जाय तो कार्य पार खेल कद एक ही वस्तु के दो रूप है। इन दोनों में सालत रूप से भाग लेना शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य तथा आध्यात्मिक यातों की उन्नति के लिए पहत ग्रावश्यक है। 226 हमें विश्राम करना चाहिए र चांपीस घटा में हमारा हदय १००००० से अधिक बार घड़क्ता प्रार हमारी १२००० मील लयी रक्त धर्मानयों दवारा वह ५००० गैलन रक्त भेजता है। इतना गाते हुए भी जीवन निर्वाह गरि मृत्यु से सबंध रखनवाली तया अथक परिश्रम करनपाली इद्रिय (हृदय) के जीवन में अत्यत सारगभित पात काम नही पर विश्राम है। इतनी क्रियाशील इद्रिय (हृदय) विश्राम के बिना अपना कार्य करने

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kind
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Alms1
nantan
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+
६
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A
महरी नीद
शरीर को वास्तविक प्रारोग्यता प्राप्त होती है।

स्वास्थ्य की प्रानवायताए में असमर्थ हो जाएगी । वह अपने फैलने पार सिकड़ने के समय जो थोड़ी देर के लिए रुक जाती उसी समय विश्राम ले लेती है । हृदय के फैलने तथा सिकड़ने के समय जो थोड़ा क्षण स्क जाता है वह यह मूल्य अवसर है जिसे वह अपने पोषण सेवा तथा नव शक्ति प्राप्त करने के लिए उपयोग करता है जिससे वह दिन रात हमारी सेवा कर सके। जब तक हदय इस विश्राम काल को नियमित रूप से अपने लिए उपयोग में लाता है तब तक वह अपना कार्य सुचारु रूप से सपादन करता है। जब उसके लय (एक रस करने की अवस्था) में बाधा होती है तब उसकी क्रिया ठीक से नहीं होती । प्रत्येक जीव को समय से पूर्व जीर्ण शीर्ण पार नष्ट होने से रोक्ने के लिए निर्यामत तथा उचित रूपसे विश्राम करना चाहिए । जो बात हदय के लिए सत्य है वह मानव सरचना के प्रत्येक प्रग के लिए है तथा समस्त मानव प्राणी । के लिए लाा - अधिक योग्यता के लिए समर्माचत विश्राम इन प्राधानक या के चंग पार तनाव के दिनों में शरीर और मस्तिष्क को स्वास्थ्य तथा प्रच्छी स्थिति में रखने का जो कार्य विश्राम करता है उसकी प्रव हेलना की जाती है उसका उचित प्रबंध नहीं क्यिा जाता। तभी जितना अधिक हम करना चाहते है उतनी ही अधिक शिथिलन तया विश्राम लेने के रहस्य का ज्ञान प्राप्त करना महत्त्वपूर्ण विषय है। पिछले विश्वव्यापी महायुद्ध के समय विन्सटन चांचल को प्रधानमत्री का बोझ सभाल सकने की योग्यता के गुढ रहस्यों में से एक रहस्य यह था कि दिन में जय कभी उसे अवसर प्राप्त हो जाता था पर उनका उपयोग करते थे मार कछ विश्राम कर लेते थे । समय का अधिक भाग जिसे हम कठिन शारीरिक श्रम में व्यतीत करते है उसे मस्तिष्क तथा शरीर को विश्राम देने के लिए उपयोग कर सकते है। एक चिकित्सक अधिकारी करते है विश्राम सर से उत्तम् प्रांपध है।' विश्राम नीरोग्य होने की प्रक्रिया है अर्थात् विश्राम से ही नीरोग्य होने की क्रिया ग्रारम्म होती है। विश्राम के विषय में यह कह सक्त है कि यह प्रापध से भी बढ पर है। यह हमारे जीवन शक्ति को सुरक्षित रखता है और खाई शक्ति को F3 स्वास्थ्य के प्रपांग सिदध उपाय पन प्राप्त करने पर प्रारोग्यता के लिए शरीर नया मस्तिष्क को प्रांत महत्वपूर्ण तथा प्रत्यावश्यक अवसर प्रदान करता है। शारीरक गतिशीलता, भावनात्मक प्रतिक्रिया पार सोच विचार में इत्यादि त्रियाशील जीवन में निरन्तर हमारी जीवन. दायिनी शक्ति नष्ट होती है, हमारी स्फति (ऊजां) खर्च होती है. रक्त तथा भासतत विकृत होते है और शरीर की सरचना जीर्ण शीर्ण होती है। शात तथा स्थिर जीवन यापन में विश्राम प्रारथिलता की बात दसरी तरह से होती है। पुन स्वास्थ्य शक्ति तथा प्रारोग्य प्राप्ति की शक्तिया अपने उपर कार्य भार ले लेती है। ऐसी परिस्थिति में शरीर अपने सजीव पदार्थों को हास होने देने की अपेक्षा उनकी पूर्ति करती है । हम अपने कार्य पार विश्राम दोनों के बीच में जितना अधिक सतुलन रख सक्त है उतना ही अधिक हम क्सिी काम करने के योग्य होते है और उतना ही अधिक दिन हम जीते है। लोक्न दि हम नियमित रूप से विना विश्राम के कार्य तथा क्रियाशीलता के बोझ से अपने को बोभिल करे तो हमारी जीवन शक्ति तथा सहनशक्ति हास हो जाती है। चारपाई पर चेतनता को खोए बिना लेटे रह कर अपने शरीर तथा मनके तनाव को शिथिलन करते ही क्षण उच्च रक्तचाप कम हो जाता है हदय की गति धीमी हो जाती है नाडी का स्फरण मद हो जाता है स्नाय पिल होता है पर समस्त शरीर की इट्रिया तथा कोष घड़ी सममता के साथ सुचारू रूपसे अपना काम करने लगते है। मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वाभाविक तनाव कम हो जाता है और स्नाय स्वतत्रता पाकर इन्द्रयों की प्रक्रियायों के निर्देशन का मार्य भार अपने ऊपर लेता है और पुनर्जीवन के कार्य को प्रत तथा जारी रखता है। शरीर का तापमान कछ ऊपर छ र मनिष्कासन तथा शक्ति बढ़ाने की प्रक्रिया की गति को तेज करने के बाद फिर कट जाता है। प्राधिक दर सोने की अपेक्षा नीद की गहराई का अधिक महत्त्य यह सच बात है कि हम नीद से पूर्ण विश्राम पाते है। निद्रा के समय ही हमारे शरीर के अधिकाश अगों तथा मस्तिष्क की पुनर्रचना होती है। कसा सोना पार पय सोना चाहिए ये बातें हमारे यस की है 1 यहधा ऐसा होता है कि रात या अधिकाश समय जिससे हमारा शरीर और मन को ताजापन मिलना चाहिए 1 स्वास्थ्य की अनिवार्यताए २७ बैचनी की अवस्था में करवट बदलते बीत जाता है। हम लोगों को सोना तो चाहिए क्योकि यह निद्रा स्वास्थ्य के लिए तथा अपने जीवन के लिए नितान्त अावश्यक है। वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह स्पष्ट रूप से दिखला दिया है कि शरीर को प्रारोग्य रखने के विचार से अधिक देर तक सोने की अपेक्षा नीद की गहराई का महत्व अधिक है। नीद को तीन काल में पाटा जा सकता है पहला यह समय है जय हमें नीद ग्राने लगती है इस समय हम लोगों की मासपेशिया शिथिल हो जाती है, शरीर अपनी उचित स्थिति में आने लगता है, मानसिक तनाव दूर होने लगता है और भावनात्मक समस्याए दर हो जाती है । इसके बाद गहरी नीद का समय माता है। इस समय हम विस्मरण की गहराई में पर,चाते है। इस नीद की गहराई में नई शक्ति प्राप्त होती है। तीसरा काल है वह जब हम गहरी नीद से जाग उठते है - चारपाई में सोने के समय ही हम अपने अपने व्यक्तित्व में रहते है। जितना जल्दी हम गहरी नीद में पड़ जाते उतना ही कम हम लोगों का विश्राम का समय कम होना चाहिए। शिथिलन करने की सामर्थ तथा सो जाना विभिन्न लोगा फ अनुसार भिन्न होता है। सोने का विभिन्न समय पार गति का जो सम्बन्ध है वह उनकी गहरी नीद पर प्रभाव डालता है। यदि हम अच्छी तरह सोना चाहते है तो हम लोगों को मानसिक तथा भावनात्मक समस्याओं को अपने मन से दर करने तथा शीघ शिथिलन करने की क्ला का ज्ञान प्राप्त करना अावश्यक है। कसे सो सकते है गहरी नीद के सबंध में, शरीर का ध्यान रखते हुए समुचित खान पान की व्यवस्था करनी चाहिए और निर्यामत रूप से अपने दौनक कार्य का सतलन रखना चाहिए। अपने दौनक शारीरिक कार्य में व्यायाम भी सम्मिलित है। ये सब गहरी नीद प्राप्त करने में सहायता करते है। शारीरिक तथा मानसिक रूप से विना अधिक थके दिन को स्वास्थ्यपूर्ण रूप से समाप्त करने का ध्यान रखना चाहिए । वंठे मंठे काम करने वालों के लिए सोने जाने के पूर्व कछ पंदल । चलना लाभप्रद होता है । कछ लोग शिथिलन प्राप्त करने के लिए निर्यामत रूप से स्नान और टट्टी करते, शरीर को फैलाते श्वास-व्यायाम करतं तया साने के लिए विधिपूर्वक तैयारी करते है जो यहत लाभप्रद सिदध हए शारीरिक अथवा स्नायविक तनाव मार थकावट के कारण महरी नीद नही २८ स्वास्थ्य के प्रयोग सदय उपाय माती । शरीर की यह स्थिति घड़ी के स्प्रिग को अधिक चावी दंनी जैसी है। स्प्रिम को अधिक पमा देने से पिर इसके खुलने पर तनार को फम करने में पटिनाई या सामना करना पड़ता है। भावनात्मक अथवा मानसिक तनाव को दर याने या साज उपाय है सोने के पूर्व सूप तेज से चलना । यदि शारीरक यका यट या दर यरना हो तो गर्म जल से स्नान करना अच्छा है। जप ग्राप सोने जान है उस समय डियो से फाई मधुर यात सने प्रथया चित को शात करने याली कोई पुस्तक पढ़े। सोने जाने से पूर्व कठिनवा से समझने वाली पुस्तकों पो पढ़ना चाहिए पर रोमाचकारी अथया उपन्यास पुस्तक नही पढ़नी चाहिए फ्याँक किसी दयाच विचार को समझने की कोशिश से नीद पार हो माप या जाती है। - एक साधारण मल यद्दत से लोग केवल निद्रा ही को विनाम लेने का साधन बना लेते है हम लोग यह सोचते है कि दिन के समय विश्राम करना पालसपन का लक्षण है अथवा निन्दनीय कार्य है । एसा सांचना भूल है क्योंक जब हम अपने दौनक कार्यक्रम के साथ दिन में कुछ समय के लिए अपने शरीर को शिथिलन का समय निकाल सक्त है तो हमारे स्वास्थ्य के हित के विचार से यह समय अधिक वह मूल्य धन है। शरीर तथा मस्तिष्क के सब प्रकार के तनावों को दर करके शिथिलन करने यो क्ला का अभ्यास करना चाहिए । शरीर को पाराम पाने योग्य बनाना चाहिए। अपने पीठ के बल लेटकर अपने पैरों तथा टागों को ऊपर उठा कर रखना यि लन का एक साधन है । यदि कसी से अपनी छाती को सीधा बैठकर सास लने रहे तो यह भी शिथिलन का एक साधन है। मानसिक समस्याओं को क्षणमात्र में दूर करने का रहस्य है अपने मन को सास लेने के साधारण म्यिा पर एकाग्र करना। एक बार जब शरीर विश्राम की स्थिति में आ जाता है और उसके बोझ हल्के हो जाते है तब लय के साथ गहरी सास लेनी चाहिए। सास लेने के समय ह्या भीतर लेने और बाहर निकालने के बीच में कछ क्षण विश्राम करना चाहिए । तव सास दवारा भीतर ली गई जिस पोषजन को फिर रक्त धारा समस्त शरीर में ले जाती है उसकी मानसिक रूप से पीछा करनी चाहिए और जब तक समस्त शरीर शियल होकर निद्रावस्या में न आजाए तब हरक अगों तथा मास परियों को धीरे धीरे शिथिन करना चाहिए।

स्वास्थ्य की अनिवार्यताए
विश्राम करने के इन कछ समयाँ म विश्राम करने को जो अवसर मिलते
है वे हमार दौनक कार्यक्र्म के अनुसार भिन्न भिन्न होने है । भोजन करने के
याद विसंप कर दापहर के भोजन के बाद दस से पद्रह मिनिट तथा यिश्राम करने
स स्वास्थ्य लाभ होता है और विशेषकर गृहणया को तो दोपहर की तीस से
चालीस मिनट की निद्रा जीवनशक्ति क्षमताशक्ति तथा स्थिर स्नाय प्राप्त करने
के लिए नितान्त आवश्यक समझनी चाहिए।
नत
से
मर
ARI

संतुलित आहार एस. बी. व्हाइटहेड, डी. एस सी. क्वल उचत खाद्य पदार्य ही खाना नहीं है। हम लोगों को यह ध्यान रसना चाहिए कि जब हम खाने बैठते है तब उनका न केवल सतुलन रर्स पर उनको पूर्ण रूप में खाए । हमें जितने प्रकार के खाद्यान्न प्राप्त हो उतना ही है भीतर खाने के लिए स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए। खाने पीने की बात का हम व्यक्ति गत रूप से निर्णय करते है पर खाद्य पदार्थों को मिला कर खाना पीना में व्यक्तिगत पात है। सतुलित आहार दा सारभूत बात यह है कि वह न केवल शरीर के स्वास्ट की सुरक्षा करें और उसे बनाए रखें पर उसको पुष्ट भी बनावें । खाद्यसयधी पहली मुख्य बात तो यह है कि हम जो कछ खाते है वह हमा शरीर को पोषण देने की अपेक्षा स्वस्थ और सुरक्षित रखे । जब तक हम का शरीर स्वास्थ्यपूर्ण रूप से अपना कार्य न करे तब तक वह खाद्य पदार्थों तत्वों का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं कर सकता पार न उनसे लाभ उठा हमारा खाद्यान्न जितना सीमित हो उतना ही पोषक की अपेक्षा रक्षा का होना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रातरिक साव जैसे हार्मन्स एन्जा इम. प्रतिकाय इत्यादि पर शरीर को स्वास्थ्यपूर्ण कार्य करने का दायित्व है इसलिए हम अपने नित्य के भोजन पदार्थों से उन्हे हमारे शरीर निर्माण, सो. धन, तथा शक्ति पार उताप के लिए प्राप्त करना चाहिए। पोषण संबंधी मानिक ज्ञान के प्रसार से हम यह पता लगता है कि यद्यपि किसी पिसी भांजन पदार्य के तत्वों से स्वास्थ्यवर्धक तथा पोषण दोनों प्राप्त होने सयापि यहत से सद्य पदार्थों में एक ही तत्य रहता है, जैसे जीवन सत्य, (यटामिन) सोनम, प्रात्तार यस्त (सीठी), एन्जाइम (पाचकरस) तया जल स्वास्थ्य सिप तत्य ने सहा पदार्थों से प्राप्त होते है। प्रेटील. काहाइड्दत, (माई (३०) सलित प्राशर ग्रार सरर) तथा वसा विशेषकर पोषक तत्व माने जाते है। खध पदार्थों के इन दानों प्रकार के तत्वां (स्वास्थ्य रक्षक पार पांषक तत्व) के मिश्रण से मुक्ताहार बनता है। यही हमारा साधारभूत आहार है। सतालत पाहार से देह मजबूत बनती है। प्रकृति किस प्रकार सहायता करती है सएलन की समस्या को हल करने के लिए एसे खध पदार्थों का ग्राहार मनाना चाहिए जो स्वय सलित है। ऐसा करने में कठिनाई का कोई प्रश्न नही उठता क्योंकि प्रकृति स्वय हर एक खाद्य पदार्थ को अपना स्वास्थ्यपूर्ण पोषण प्रदान करने के लिए सतलित बनाता है। प्राकृतिक रूप से सतलित सध पदार्थों को हम कृत्रिम विधि से नहीं बना सकते उदाहरणार्थ हम इस बात को जानते है कि माडी का पूर्ण रूप से पचाकर प्रात्मसात करने के लिए पर्याप्त मात्रा में जीवन सत्व ( विमिन) वी१ की यावश्यकता होती है। ऐसे माडीयुक्त खाद्यान्न ३२ स्वास्थ्य के प्रयांन सिदध उपाय जसे धान्य में प्रवृति ने माड़ी के साथ-साथ पयांप्त मात्रा में जीवन सत्व बी? प्रदान किया है। अन्न को कृतिम विधि से पाटे के रूप में बदलने के समय अथवा खाने के योग्य बनाने के समय स्वास्थ्य रक्षक जीवन सत्व (विटामिन) के साथ पोचक कार्बोहाइड्रेट का जो उचित समिश्रण है यह नष्ट हो जा सकता है पार प्राय नष्ट ही हो जाता है, जिससे हमारे शरीर के लिए पोषण नहीं मिलता पार हमारा स्वास्थ्य विगड़ जाता है। इसी प्रकार हम प्राकृतिक वसा (चीं) में जीवनसत्व ए पाते है। दिन दैन के जीवन के लिए हम लोगों को दीनक स्वास्थ्यपूर्ण भोजन पर्याप्त मात्रा में प्रवृत्रिम तथा प्राकृतिक रूप से तैयार क्यिा हया मिलना चाहिए। पूर्ण धान्य फ्लों साग सब्जियों, दाल. सख्त छिलके वाला मेवा इत्यादि प्राकृतिक सधान्तों से प्रकृति हमारे लिए ऐसे पावश्यक तत्यों को एकत्र करती है जो हमारे स्वास्थ्य लिए पोषण ही केवल नहीं अपित रक्षक तथा आवश्यक उपयोगिता समझे जाते हैं। - जीवनसत्व (विटामिन) खनिज भोजन तत्व. ग्रासार वस्तु (सीठी) इत्यादि खादा तत्व है। इन्हें प्रति उत्पादन करके सभी प्राकृतिक खाद्य पदार्थों में रखता है। इन तत्व खाद्य पदार्थों के पोषक तत्वों को उपयोग में लाने के लिए शरीर सहायता करते है । इस प्रकार र प्राकृतिक खद्य पदार्थ सतलित है। इसलिए हमारे नित्य के भाजन में ८० प्रतिशत ऐसे खाद्य पदार्थों को रखना चाहिए। पोपण की योजना पोषण के विचार से प्राकृतिक वद्य पदार्थ युक्ताहार नहीं है। कछ खे पदार्थों में प्रोटीन की प्रचरता है तो काछ में कार्यानहाइड्रेट की पार कप में ही को हमारे शरीर के लिए जो पोषण तत्व की आवश्यक्ता है उसकी पत्ति के बार से सद्य पदार्थों को दिधमानी के साथ मिला कर खाना चाहिए। इस ७५५ से खाद्य पदार्थों को उनके भिन्न भिन्न तत्वों की मात्रा का विचार कर। खाना चाहिए। . m स्वाहा पदार्थों के भोजन तत्वों की मात्रा अनुसार समूह १ । खाद्य पदार्थ जिन सं प्रचर मात्रा में प्रोटीन प्राप्त होता है। यह (प्रोटीन) कोपों के नवनिकरण तथा सशंधन के लिए प्रावश्यक होता है सतालत ग्राहार २ । खाद्य पदार्थ जिनसे प्रचुर मात्रा में कार्याहाइडट (माडी अथवा शक्कर) प्राप्त होता है। यह तत्व शक्ति प्रदान करता है। ३ । खाद्य पदार्थ जिस से प्रचुर मात्रा में वसा प्राप्त होता है । यह तत्व शरीर को उष्णता तथा शक्ति प्रदान के लिए आवश्यक होता है। ४ । खाद्य पदार्थ जिन से प्रचर मात्रा में स्वास्थ्य सुरक्षक तथा नियामक वत्व प्राप्त होते है वे है जीवन सत्व (विटामिन) खनिज, सेल्युलोस, जल ग्रादि। नीचे के चार्ट (विवरण तालिका) में खाध समूहों को दिखाया गया है। प्रचर मात्रा में प्रचर मात्रा में वसामय खाद्य पदार्थ प्रचुर मात्रा में सरक्षक तथा नियामक खाहा पदार्थ पूर्ण खद्या धान्य पूर्ण अन्न मक्खन मलाई प्रचुर मात्रा में प्रोटीनयुक्त कार्यानयुक्त खद्य पदार्थ साहा पदार्थ पूर्ण अनाज सब प्रकार का पनीर गेह की रोटिया प्रडे पूर्ण अन्नधान्य भरी शक्कर मेवा शहद दाल सूखे फल पूर्ण सद्या धान्य पके फ्ल पूर्ण अन्न माल जंतून ताजे फ्ल जैतून तेल ताजी सब्जिया मेवा सब्जियों का रायता पनीर (सिलाद) डे का पीला मागहरी पत्तीदार सब्जिया मृगफ्ली प्रातक वद्य कदमूल सब्जिया चार्ट के प्रत्येक खद्य समूह को सतुलित पाहार के विचार से अति प्राव. श्यक खाद्यान्न के छोटे समूह में विभक्त कर सकते है और उन परक खाध पदायाँ को जिन्हे सभ्य जगत में रीत रिवाज के अनुसार लोकप्रिय बनाया है आप चाहे नो परित्याग कर सकते है। ऊपर की चार्ट सुसतुलित भोजन की फजी प्रस्तुत करता। यदि हम प्रत्येक समूह सं का भोजन पदार्प चुन लें तो हमारे लिए प्रोटीन कावाज वसा तया नियामक पदार्थ हमारे भोजन के लिए प्राप्त होंगे।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय - उक्त खाद्य पदार्थों की मात्रा प्राप्त करने के लिए कोई ठीक ठीक माप की मावश्यकता नहीं होती व्यावहारिक रूप से चारों समूह से यदि कोई साधारण व्यक्ति अपने खान के लिए कछ कछ चुन ले तो उनका मिश्रण एक पाश्चर्यरूप से हलका तथा पचने योग्य सतलित भोजन बन जाएगा। हम उमा शक्ति उत्पादक खद्य नही खाते भोजन-खाहा समस्याग्रो के इन दिनों में हम कलोरी (डमा शक्ति) के विषय में अधिक पढ़ते और सुनते है। खयर कागज पढते समय रिपोर्ट में, रौड़यों वक्तता तथा वातालाप करते समय हम इस शब्द को बराबर पाते है और उपयोग करते है। उपसल में हम कैलोरी नहीं खाते। हम खाते है खाद्य पदार्थ 1 कलोरी तो एकाई है जिसके दवारा खाद्य पदार्थों से प्राप्त उष्मा(गमी) को मापा जाता है कैलोरी ताप की वह मात्रा है जो एक ग्राम पानी के ताप को एक प्रश सेंटीग्रेड ऊचा कर देता है । जव खाद्य पदार्य पचकर शरीर में प्रात्मसात हो जाते है तब कोषों में जल कर भस्म होते है। उससे गमी उत्पन्न होती है। इस प्रकार उत्पन्न हई गर्मी का अधिकाश भाग शरीर के सामान्य ९८ अस ताप को बनाए रखने वे लिए उपयोग होता है। इनकी कछ गर्मी गति तथा या क्रियाशीलता के लिए शक्ति में यदल दी जाती है। सोते समय भी हम प्रत्येक घटा ६५ से लेकर ७० कलोरी का उपयोग करते | हम जितना अधिक क्रियाशील होते है उतना ही अधिक हमें कैलोरी की पावश्यक्ता होती है। एक बैठे रहकर काम करने वाले मनुष्य को व्यायाम करने याले पहलवान अथवा शारीरिक श्रम करने वाले मनुष्य से कम कैलोरी को प्राव श्यकता होती है। एक छोटे प्रादमी को भी बड़े प्रादमी की प्रपंक्षा कम कैलोरी की पावश्यक्ता होती है। घर्ड प्रादमी का शरीर घडा होने के कारण उसके शरीर की गर्मी शीघ हास हो जाती है। ठडे के दिनों में हमें गमी दिनों की अपेक्षा अधिक फलोरी की प्रावश्यकता होती हमारा शरीर मार क्यों घटता है और क्यों हम पढ़ता है याद हम ऐसा सद्य पदार्थ खाए जिससे हमारे दीनक जीवन की आवश्यक मात्रा से कम कलारी प्राप्त हो तो शरीर अपने को सतुलित रखने के लिए सांचत भडार में ले लेता है और अपने में निहित कछ पदायों को जला कर भस्म कर देता। ममा परिणाम यह होता है कि हमारे शरीर का वजन घटता है। इनके सतुलित पाहार ३५ विपरीत यदि हम खाद्य पदार्थों को इतना अधिक खा कर गर्मी तथा शक्ति उत्पन्न करने के लिए उन्हें जला न सके तो शरीर अतिरिक्त प्रश को उत्तकों में वसा के रूप में सचित करता है जिसके परिणाम स्वरूप शरीर भार बढ जाता है। यह वसा (चीं) शरीर के ऐसे स्थानों में सचित होता है जहा ऊत्तक पार मासपेशिया का उपयोग में लाई जाती है । इसलिए यदि हम पलारी की मात्रा कम खावे तो हम अपने शरीर भार तथा प्राकार पर नियत्रण कर सकते है जिसके परिणाम स्वरूप उनकी वृदिध नहीं होगी। हमारा जीवन फेवल कलोरी पर ही निर्भर नहीं करता । अधिकाय स्वाहा पदार्थो से कछ न कछ कलोरी प्राप्त होता है लेकिन विशेष पर तीन जैवी खाध पदार्थ कार्योहाइडट्स और वसा से कलोरी प्राप्त होता है। स्वास्थ्य के विचार से यही कलोरी मूल्यवान समझे जाते है जो ऐसे खध पदापों से प्राप्त होते है जिनको पूर्ण रूप से पचाकर यात्मसात कर सकते है। ऊपर की बातों स अव हम लोगों को यह मालूम हो गया है कि प्रोटीन कार्याहाइट्स वसा (चवीं) को पूर्ण से परिवर्तन करना तभी सभव हो सकता है जब हमारे पाहार में एक साथ खष्टा तत्व जैसे जीवन सत्व (विटामिन) और खाद्य खनिज का पर्याप्त रूप से सरलन रहता है। जिन खाद्य पदार्थो से कैलोरी प्राप्त होता है उन्हे समाचत अनुपात में खाना महत्यपूर्ण बात है । एक ग्राम प्रोटीन के जलने पर ४१ कैलोरी प्राप्त होता है । एक ग्राम कार्वोहाइडट्स से ४१ कलोरी प्राप्त होता है लेकिन एक ग्राम यसा से ९३ कलोरी मिलता है। यह प्रोटीन अथवा कार्योहाइडट्स के क्लोरी की मात्रा से दो गुना है। । प्रोटीन या प्रमुख काम कांपों की मरम्मत तथा नवीनीकरण की सामग्री जुटानी प्रोटीन का प्रमुख कार्य है। प्रोटीन से शक्ति प्राप्त करने की व्याशा करनी पुदिधमानी की बात नहीं है। इसके कई कारण है पहला यह है कि इसके चयापचय (यन शरीर की यह क्रिया है जिससे भोजन जीवित पदार्थों में बदल जाता है) से सड (अल्म) बनता है दसरा अत्यधिक प्रोटीन शरीर को सुचारू रूप से कार्य करने में बाधा देता है तीसरा जिन सध पदार्थों से प्रोटीन प्राप्त होता है यहन महगे होते है। जिन खध पदार्यों से प्रचुर मात्रा में घसा (ची) प्राप्त होती है वे शक्ति स्यास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय प्रथया कलाशयम प्राप्त करने के महत्वपूर्ण साधनसोत समझ जाते है । जय. प्रक्रिया की सुरक्षा के लिए शरीर में कुछ मात्रा में वसा का साचत रहना पावश्यक है। लेकिन पसा प्रोटीन के समान यहन महमी होती है। जिन सघ पदायाँ से कार्योहाइडदस प्राप्त होते है उनमें शक्कर मार निशस्ता (माड़ी) प्रचूर मात्रा में होते है । उन से कैलोरी हमारे लिए यहत सस्ता प्राप्त होता है। इसलिए उन्हें अत्यधिक खाते है और हम प्रोटीन और वसा नहीं खाते । एसा नहीं होने देना चाहिए। प्रादर्श मात्रा फलोरी के विचार से हमारे आहार में निम्न अनुपात से तत्वों का मिश्रण होना चाहिए । प्रोटीन का १ पसा २५ पार कार्योहाइड़ दस ४ । यह अनुपात हमारी आवश्यकता की पत्ति के लिए पर्याप्त हो जाना चाहिए। कैलोरीयुक्त खाद्य पदार्थों को गर्मी और शक्ति में बदलना उन्हें अच्छी तरह पचाने तया यात्मसात करने एष चयापचय के समय जो अवसंघ दषित पदार्थ रहते है। उनका निराकरण करने तथा समतुल्य बनाने (एक वस्तुको दसरे में मिलाकर उसका गण नष्ट करना जैस) अम्ल से धार को नष्ट करना) पर निर्भर है। इन क्रियायों की चाल रखने के लिए प्रोटीन यसा तथा कार्यात्तइइटस के साथ पर्याप्त मात्रा में ऐसे भोजन पदार्थों को खाना चाहिए जिसमें जीवन सत्व पार खनिज प्रचुर मात्रा में रहते है। कछ दनिक खद्यपदार्थों की बलवर्धक उपयोगिता प्रत्येक १०० ग्राम (३ १/२ पास) में कलोरी की मात्रा जैतून का तेल ९३० गंह का माटा ३६१ पड़े १६१ मछली का तेल ९३० दाल ३४८ सुखावर मेवा काष्ठफल का मक्खन९३० शहद २९४ चौड़ीसम १०९ मारीन ७८० छहारा १०८ ७७२ भरव्या २८६ चकदर ९८ प्रासत मेवा हरीमदर ८९ चाकलेट ५५४ किशमिश ७३ मलाई ५०८ अजीर २४४ दध ६७ सखा दध ४६९ मंद की रोटी २२९ प्याज ५० ४२७ खयानी २२९ संव २९३ केला मक्खन ६५० साडिन २६३ माल -- पनीर सालत प्रातार ३७ जई का प्राटा सफेद शक्कर भी सक्कर मलाई का पनीर ४११ भरी रोटी ४१० सलमन मछली ४०२ हॉरंग मछली ३८५ २२३ सतरा २१३ यद गंभी २०० ककड़ी ११ प्राप पर आपके प्रोटीन कार्यान, हाइड्रोजन प्रोपजन, नाइट्रोजन तथा काछ खनिज जैसे सलफर और फासफोरस के जटिल सुक्ष्म कण का मिश्रण ही प्रोटीन है । इन विभिन्न तत्वों को पांधे उत्पन्न करते है। एमोनियम तथा अन्य खनिज नमक जो मिट्टी से प्राप्त होते है उनको पांध प्रांटीन के कणों में परिवर्तन कर सकते हैं। मानव तथा पसजीव में परिवतन करने का गुण नही है। इसलिए हम लोगों को पाँधो तथा पांधों से उत्पन्न की हई चीजों पर पोषण के लिए निर्भर करना पड़ता है प्राटीन सब पांधों तथा पश्यों के कोष में रहता है । यह कांप के जीवित जीव द्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) का प्रधान अश है। शरीर के जिस किसी भाग में वसा अथवा कार्गनहाइट पाया जाता है उसमें भिन्नता नहीं रहती पर प्रोटीन शरीर के विभिन्न भागो के कोषों में पाया जाता है यहा तक कि एक ही इन्द्रिय में किसी विशेष कोष की जीव सवधी विशिष्टता के कारण भिन्न हो सकता है। उक्त परिच्छेद की बातें इसलिए ऐसी है क्योंकि रासायनिक रूप से प्रत्येक प्रोटीन सर्वसाधारण यगिक या पदार्थ का क्षुद्रतम श से बना है जिसको एमनो एसिड कहते है । इन एमिनो एसिडों को शरीर की ईट कह सकते है। सब से पहला एमिनो एसिड का आविष्कार सन १८२० ई में हया था। अभी हम लोग कम से कम पच्चीस एमनो एसिड को जानते है जिनमें से बाइस की पहचान की गई है। इन एमिनो एसिड़ों के यहत मिश्रण किए जा सक्ते है और इस प्रकार प्रकृति में पाए जानेवाले असख्य प्रोटीन का विकास किया जा मानव पोषण के सबंध में यह कहा जाता है कि यदि पाठ एमिनो एसिडा २ में से किसी एक का ग्राहार में कछ समय तक प्रभाव रहे तो हमारी मृत्यु हो ३ जाएगी। इसलिए हम लोगों को खाद्य पदार्थों से इन प्रावश्यक एमिनो एसिडों ५ को विकृत रूप में प्राप्त करना चाहिए। हम स्वयं अपनी शक्ति से निष्प्राणिक १६ नमक अथवा दसरे एमिनो एसिड से उनको (एमिनो एसिडों को) नही बना १७ सकते । सद्य पदार्थों को एमनो एसड से यने हुए प्रोटीनों में बाट सकते । स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय ३८ मार एसे प्रोटीनों में जो एमिनो एसिड से नहीं बने है । जो प्रोटीन एमिनो एसड से बने उनको दसरों से भिन्नता यतलाने के लिए प्रथम वर्ग के खाद्य प्रोटीन अथवा पूर्ण प्रोटीन वहते है। मुख प्रथम श्रेणी का खाद्य-प्रोटीन पर से प्राप्त होते है जैसे अडे, दध, पनीर, मास इत्यादि । खाध सब्जियों से जो प्रोटीन प्राप्त होते है वे यद्यपि बहत विभिन्न होते है तथापि उनमें एक या अधिक मुख्य एमिनो एसिड का प्रभाव साधारणतया रहता ही है । इसलिए शाकाहारी की अावश्यक्ता पूर्ति के लिए अपने ग्राहार का सतुलित करने के लिए मासाहारी की अपेक्षा अधिक सावधानी बरतनी पड़ती है। पूर्ण अन्न धान्य. दाल और मेवा में अति महत्वपूर्ण वनस्पति प्रोटीन रहते है। यद्यपि हरी सब्जी और फ्ल प्रोटीन प्रदान करता है तथापि उसमें एमनो एसिड अपूर्ण रूप से रहता है। इसलिए विभिन्न खाद्य पदार्थों के खाने से प्रोटीन की यावश्यक्ता पर्याप्त मात्रा में पूर्ण क्यिा जा सकता है। ग्रामाशय का रस पहले प्रोटीन को पचाता है । इसके बाद क्लाम प्राय और ग्रात की दीवारों से साव होने वाले पाचक रस पचने में सहायता करता है। वह (प्रोटीन) छोटे छोटे कण में दकडे होते हात-माल्यकल पेपटाइड प्रोटियांसेस पार पेपटोन्स अंत में एमिनो एसिड्स में पृथक हो जाता है। इसके बाद एमिना एसड समस्त शरीर में वितरित किए जाने के लिए रक्त में चला जाता है। अपने को स्वस्थ बनाए रखने के लिए कितनी मात्रा में हमें प्रोटीन खाना चाहिए यह अमी तक प्राधी सुलभाई एई एक समस्या बनी हुई है। अधिक प्रोटीन खाना शरीर के लिए हानिकारक है। शरीर उनमें से कछ को शक्ति में नहीं बदल सकता लेकिन धीरे-धीरे म से एसड निर्माण करने वाले पदार्थ अलग हो जाते है नार अंत में अम्लता गुर्दे तथा उच्च रक्तचाप की शिकायत में अधिक प्रोटीन पाया है। - यसा तथा शतरिय योग्यता बनायपत सा पदार्थ के पक्ष में लंग यह समर्थन करना है कि यह शरीर को एमना को बढ़ाता है। सायन बनायुक्त सद्य पदाणे ने हर भार यदाता है. लोग रोम के शिकार होते है पर उत्तर मोटा हो जाता है। इन यातों के तने हर भी माती मादार नंयपी अनुमान न एक महत्वपूर्ण नप्य स्पष्ट होता रफ बना को पर्याप्त मात्रा पोषण दंन को निरिक्त हमारे स्वास्थ्य-रया नया उने यनाए रखने के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। ।

सतालत पाहार ३९ यह बात सच है कि वसा वहत से कोन्द्रत रूप में कलोरी (खध शक्ति) प्रदान भरती है। एक ग्राम वसा ९३ कलोरी प्रदान करती है जब कि उतनी मात्रा शक्कर या माड़ी ४१ कलोरी प्रदान करती है। खाद्यशक्ति का यह रूप शीघ मास ततयों में सचित हो जाता है। इस प्रकार अत्यधिक वसामय खद्य पदार्थों से शरीर भार बढता है और वसा से भरे ऊत्तक अस्वस्थ रहते है। इसके विपरीत वसा की अपर्याप्त मात्रा से शरीर स्वस्थ रहता है पार भयकर सकामका शंग का शिकार बना रहता है महासार के साथ जंव एसिड के मिश्रण से घसा बनती है ! उसमें (वसाम) कारोंन हाइडोजन ग्रार प्रापजन का सयोग रहता है। चयापचय समय यह धीरे धीरे जल कर भस्म हो जाती है और शरीर के लिए गर्मी प्रदान करनेवाले प्रमुख सोत बनती है। हमारे खाद्य पदार्य की वसा कोयले से तुलना की जा सकती है जा धीरे धीरे गर्मी को बढ़ाकर तेज करती है शक्कर और माड़ी ऐसे तत्व है जो जीवन की प्राग की ला जैसी है । (तत्व) क्षय होने वाली गमी प्रदान करती है । इस गर्मी को हम शक्तिशाली कार्यों में खर्च करते है। वसा हमारे पोषण के लिए इस बड़े योगदान के अतिरिक्त शरीर के दसरे महत्वपूर्ण कार्यों को करती है। वसा हमारी सब ईन्द्रयों तथा मासपेशियों के ऊत्तको की पुरानी वसा के स्थान में प्रावश्यक वसा देती है। यह नई वसा मास पश्चियों पर इंद्रियों को यात्रिक चोट तापमान को एकाएक परिवर्तन तथा कपित होने से बचाती है। स्नायविक (नाडी) स्वास्थ्य तथा स्नायविक क्रिया को सुचारु रूप से बनाए रखने के लिए वसा की पर्याप्त मात्रा प्रावश्यक है। यह यसा स्वास्थ्य मोर सादरता के लिए अनिवार्य 1 घसा (चपी) का प्राणिज एसड एक तत्व है ओ य, रोगों को होने नहीं देता। यदि का काल तक शरीर को पर्याप्त मात्रा में वसा न मिले तो उसका तापमान परिवर्तन हो जाता है शरीर भार हास होने लगता है और रोग की प्रतिरोधक शक्ति दयल होने लगती है। यह बात विशेषकर राजयक्ष्मा जैसे रोनों में सही उतरती है। वसा के प्रभाव से कछ त्वचा रोगों की शिकायत हात्ती है। पाल्यकाल तणावस्था गांधान तथा स्तनपान का समय विशेष पोषणावस्या माने जाते है । यदि ऐसे समय में जैसा मिलना चाहिए पंसा ग्राहार में वसा न मिले तो स्वास्थ्य यिगड जाता है। सीमा से अधिक वसा भी शरीर को हानि पहचाती है । अत्यधिक शरीरभार तथा नकों के मोटे यनाने के अतिरिक्त पसा की प्राधिक अम्लता अथवा 1 स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय , कटोसिस की स्थिति उत्पन्न कर देती है और मनुष्य रोग का शिकार बन जाता है। हम जो वसा खाते है उसकी मात्रा का नहीं पर गुण का अधिक महत्व रहता है। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो किस प्रकार का वसामय खाद्य पदार्थ खाते है यही बात हमारी योग्यता का निर्णय करती है । अच्छी वसा विटामिन पर निर्भर है। अच्छी वसा में विटामिन ए और डी की प्रचुरता रहती है। दध में उत्तम वसा रहती । दूध से बने पदार्थों में भी उत्तम वसा रहती है जैसे मक्खन मलाई पार पनीर । अर्ड के पीलं भाग से भी उत्तम वसा प्राप्त होती है । समर की चीं यहत निम्न कांटी की बसा है क्योंकि उसमें जीवन सत्व नहीं रहते ! जितने तेल पकाने के लिए उपयोग में लाए जाते है ये अच्छी श्रेणी की वसा नहीं है। एक समय जो मारिन उपयोग में लाया जाता था उसमें विटामिन नहीं होता था लेकिन प्राजक्ल जो मारिन तैयार Composion and Food Requ rements भक 154 Pound Mon mportion Body Da ly Intake of food nister otes702 107810 Hydrogen Orygen Proten 194 192016 Carbon Hydropen Orygen Nogen Subh kar75715503 Carben Hydropen O'ygen taranypreesmn korbon Herogen Duygen nữ )3 162 1, Chlorine Fhorine Toore Iron resson prera गा Protents Fot2B.. दाता hydrate it 500/- nreral 44 सतुलित पाहार किया जाता है उसमें विटामिन रहत है. इसलिए माज इसकी मक्खन से तुलना की जा सकती है। पूर्ण पाथण के लिए दोनक क्तिनी यसा की आवश्यक्ता होती है सपाटीक ठीक अभी नक मूल्यावन नहीं किया गया है। यना के विषय में प्रतिम यात यह है कि यसायुक्त सहा पदार्थों को पचाने से हम उससे लाभ उठा सकते है। डडम (क्षद्र पर या प्रथम भाम) में क्लोम प्राय का रस तथा पित्त के साय होने पर बसा का पचना निर्भर करता र। पाचनक्रिया के प्रत में यसा पचती है यहा पद (पसा) दसरे साप नवा से अलग होकर ड्यूडनम में पहचती है और ऐसे रूप में जिस पर पित प्रारमण पर पचाने में सहायता कर सकता। प्रकृति में वसा या रूप यहत छाटा गोलाकार रहता है। उस पर एक छाटा सा सावरण रहता है। पचने की क्रिया जय चाल रहती है तय यता के इन छोटे अनेक गोलाकार रूप ग्रामाशय में सद्य के दूसरे तत्वों से अलग रहते है इसीलिए साज से पच जाते हैं। भजने और तलने के समय जय घसा के गोलाकार रूप गर्म हो जाते है तब वे पट जाते हैं। जय वे पट जाते है तब वे सधाहार की माडी पार रेशों में पूर्ण से मिल जाते है। ऐसी स्पिति में पाचनक्रिया के समय वसा को रवटा पदार्थों के दसरे तत्वों से अलग करना कठिन हो जाता है जिसके परिणाम स्वरूप बरायर प्रामाशय में शिकायत होती रहती है। यदि हम यसा का सहज और पूर्ण रूप से पक्ने देना चाहते है तो भूनने और तलने की विधि को कम करे पार इस विधि से पकाने की कोशिश करे कि धसा गोलाकार यावरण से फ्ट कर न निकले। - भारत का आहार एच. सी मेनकल, एम. डी. नाहार की समस्या मनुष्य ऊपर से रग-रूप, प्राति ऊचाई तथा स्वभाव में भिन्न भिन्न होते है। वे राजनीतक, धार्मिक, बौद्धिक तथा नौनक बातों में एक दूसरे से भिन्न भिन्न होते है लौक्न पोषणहार यावश्यकताए, पातावरण तथा यश पर परा के विचार उनमें कछ ही भिन्नता होती है । साधारणतया समस्त जगत के लोगों को खाद्याहार आवश्यकताए के विचार से एक ही है। पावश्यक्ता, रीत-दस्तुर र धार्मिक सिदधान्त के कारण खाद्य पदार्थों के चयन तथा पादत के विचार से कछ कछ तर हो गया है। इन अतरों के (सधान पावश्यकतानुसार परिवर्तन करना) तथा क्षति पति के लिए शरीर में अपनी योग्यता का विकास कर लिया है । खाद्यपदायों के प्रतिवर्धा तथा रीत. दस्तुर के ये उपयोग्यन (बदली हुई परिस्थितियों तया नवीन उपयोगों के मनकल अपने को बनाना) की वात उन लडाक जातियों के समान है जिन्हे युद्धकाल के समय अपने दीनक प्रावश्यक खाद्य पदार्थो के उपलब्ध नहीं होने से वर्तमान स्थिति के अनकल करना पड़ता है मनुष्य अपनी त्वचा के भीतर जैसा हं बसा ही मान लें, उसके बाहरी नाव. रण तथा उसके मानसिक विकारों का ध्यान न दे और उनको वैसा ही देखें जैसा दिखाई दे मानो एक जीवित क्रियाशील मशीन हो. तो हम लोगों को शीघ्र यह पता लग जावेगा कि उसको साधारण मोटी घस्तुत्र्यों की नितात यावश्यकता है । घे वस्तुए तो माडी शक्कर, वसा और प्रोटीन है जिनमें सोलह एमना एमड बीस खनिज पार लगमग पाठ अथवा उससे अधिक विटामिन रहते है। इनके अतिरिक्त एक अवर्णनीय जीवन-क्ति की आवश्यक्ता है जिसे क्यल नाजे कच्चे सहा पदार्थों से प्राप्त कर सकते है। खध पदार्थों को विभिन्नता से तत्वों को निश्चयता पांतपय पोषक तत्य है जिनका स्वास्थ्य तथा बीमारियों से सवध निर्विवाद रूप से स्थापित किया गया है। इसके विषय में हम अधिकारियों तथा सत्य पर - (४२) भारत का प्रातर विश्वास करने वालों के मुंह से दिलचस्पची कहानी यतला सकते है । नीचे हम इस विषय में पिछले महायुदय के यूटन के खाद्य-मत्री के यचन उदधृत करते है। "पापाणार की बात लीजिए जिसके विषय में हम इतना अधिक सनत है' विज्ञान इस यात का पता लगा रहा है कि क्यों मिश्रित पाहार, जिसमें ऐसे खद्य पदार्थ रहते है और जिनको विभिन्न पकाने की विधि से दापत नही करे तो वह स्वास्थ्यवर्धक होता है। इसके विपरीत क्यों ऐसा माहार, जो ठीक तरह से मिश्रित नही रहता अथवा जिसमें ताजे पदार्थ नहीं रहते, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इस का असल कारण यह है कि खाद्य पदार्थ जो शरीर वर्धक" "शरीर रक्षक" "शारीरिक श्रम" और "शरीर ताप रक्षक" है मिश्रित भोजन में रहते है। उनमें से कछ का अल्पाहार में प्रभाव रहता है अथवा उनका योड़ा अंश रहता है। दूसरे शब्द में हम यह कह सकते है कि हमारे पूर्वज जो स्वस्थ होते ये अनजाने संतुलित पाहार खाते थे । । "यह नया ज्ञान हम लोगों के लिए यहत महत्व का है क्योंकि इसके दवारा किसी जाति को पोषण नही मिल रहा है इस बातका पता लगता है। इतना ही नही पर इस अमाव को किस प्रकार दर करना होगा उसका उपाय सुभाता है । इस नए ज्ञान के फल स्वरूप कछ महत्वपूर्ण सिधान्त बना लिए जाते है। उनमें से एक यह है कि जितना सरल तथा साधारण भोजन हो उसे पकाने की विधि तथा खाद्य पदार्य बनाने के समय पोषण तत्व को कम नष्ट करें । पूर्ण गेहं के आटे से रोटी बनानी चाहिए, पाल का कोई अस नही फेक्ना चाहिए और चावल पूर्ण होना चाहिए। इसके विपरीत यदि विभिन्न खाद्य पदायों को अलग करके प्राहार बनाया जाए तो एक की कमी दूसरे से पूर्ण हो जायनी । याप ऊपर के किसी एक तरीके से अपने भोजन को सतुलित कर सकते है लेकिन अमीरों की अपेक्षा दरिद्रों के भोजन को विज्ञान के अनसधान की प्रावश्यक्ता है । "हेल्थ एण्ड ए डे", पृष्ठ १०५. १०६ । फरनास नामक विद्वान ने अपनी पुस्तक मेन, वड एण्ड डॉस्टनी में भांजन फा पानवशिक बातों से कसा संबंध है उसका विशद वर्णन क्यिा हैं। "अनु. संधानों से यह प्रमाणित करता है कि पशु जति के साधारण गुणविशेष प्रान- वाशक होते है। जीवन भर हम अपने निवासस्थान के पास पास की वस्तयों

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय
VITAMINS
MINERALS
fAT
25% of Calories
CARBOHYDRATES
65% of Calories
PROTEIn
10% of Calories
BULK
WATER
पूर्ण ग्राहार के लिए सात सद्य तत्व
का खाते है । वे ही यह निश्चित करती है कि पशुजाति के साधारण गण विशेष
होते है अथवा नहीं । एक मनुष्य के लिए अपनी वयस्वावस्था में पाच फट
पाठ इच की ऊचाई प्राप्त करने के सय तत्व उपलब्ध होते है। लेकिन दनिया
के सव खाद्य खा जान पर वह किसी हालत से पाच फट दस इच पढने की माया
नहीं कर सकता न वह साच पर एक हाथ अपनी ऊचाई को वढा सक्ता है।
इतना होते हए भी यही पर गड़बडी उत्पन्न होती है अर्थात् यदि युवक के
खध पदार्थ का परिणाम तथा गुण दोनों का प्रभाव हो तो वह अपने सामान्य
निधारित पाच फट साठ ईच की ऊचाई नहीं प्राप्त कर सकता। उसकी ऊचाई
क्यल पाच फट छह इच तक वद वर स्क जाती है।

मारव का प्राद्वार साध पदार्थ तथा घशपरपरागत यानुवाशक यात के बाद साध पदार्य कछ पार फंसे होने की बात निश्चित करता है। हमारा भोजन ही इस यात को निर्णय करता है कि हमारी किस बीमारी से मृत्यु हानी और हम किस उपाय को प्राप्त करेंगे। दक्षिण भारत स्थित फनर के गवर्मेन्ट प्राव इडिया न्यूटिशनल रिसर्च लबरोटरी में में अनुसधान कार्य दयारा तथा अन्य केन्द्रों में इसी प्रकार के अध्ययन से इस बात का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त हो गया है कि भोजन के प्रभाव से भिनभिन्न प्रकार की बीमारियों का सबध गणित के हिसाव की तरह होता है। प्रयोगशालामा में इस प्रयोग किए गए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य रक्षक परिणााँ को लोग प्रिय बनाना तथा सर्वत्र प्रचार चाहिए जिनसे लोगों को लाभ हो। भारत में गान्वषण कार्य का मा प्रशस्त करनेवाला तथा पथप्रदर्शक सर रोबर्ट मक्कोरसन का इस काम के विषय में बतलाने के लिए अवरोध किया गया था। इस उद्देश्य से मद्रास में विदाई के समय उसने जो वकृता दी थी तथा दी मारियटल याचमेन एड हेरल्ड प्राव हेल्थ के मई १९३५ में जो रिपोर्ट दी गई थी उसे उदधृत करत है बीमारिया क्सि प्रकार उत्पन्न होती है इस बात का पता लगाना मारा काम है पर विशेषकर इस यात को सीखना है कि कैसे पूर्ण भोजन शरीर को पूर्ण स्वास्थ्य की स्थिति रखता है और कसे अपूर्ण भोजन अयोग्य बनाता है जिसके परिणाम स्वरूप कार्य करने की क्षमता नहीं रहती पार त में रोग है जिसके परिणाम स्वरूप कार्य करने की क्षमता नहीं रहती पार त में शरीर रामग्रस्त हा जाता है। कनर में मेरा प्रयोगशाला है ! वह पूर्ण स्वास्थ्यवृत स्थिति में है। वहा में लगभग १००० चूहे अनुसधान कार्य के लिए रखता है । वे पपाल से भरे हए बादार पिजड़े में पद एक बड़े कमरे में रहते है । वे रोज सूर्य के प्रकाश में रत्ते जाते है। उनको ठीक उसी प्रकार के खध अन्न दिए जाते है जिन्हें उतर भारत की काछ जातियों दवारा खाए जाते है । उन जातियों में से कछ हट कटे गौर सुन्दर डील डॉल के होते है जो मनुष्यों के प्रादर्श समझ जाते है। उनके पाहार में पूर्ण गैह का पाटा रहता है। चपाती में ताजा मक्खन लगाते है यगाल का अकरित चना ताजा कच्चा गाजर बदगोभी विना उबाला या पूर्ण दध जल पर्याप्त मात्रा में पीते और उससे स्नान भी करते है। इनरी खध अन्न में चार वर्षों से चूहों को खिलात पा रहा हैं। उनमें बीमारी की शिकायत नहीं - स्वास्थ्य के प्रयोन तिदय उपाय हुई है। बड़े चूहे किसी प्राकृतिक कारण से नहीं मरे है । न याल्यावस्या में क्सिी की मृत्यु हुई अगर मृत्यु हुई है तो केवल अचानक दर्घटना से । पास पास की तीन परिस्थितियों पर-सफाई पाराम सुख तथा खाद्य पदार्थो ध्यान देने से रोग पास फटकने नहीं पाया है। अपने प्रयोगशालाओं के विषय में यह कहना है कि यहा पचनों के मूह पिजरे सफाई तथा सूर्य किरण पदचने का सम प्रबंध एक ही प्रकार का हं केवल पशुओं को खिलाने पिलाने में अतर है। उनके खाने पीने में किसी न किसी प्रकार का दोष है। किसी के भोजन में जीवन सत्व का प्रभाव तो दूसरे में खनिज नमक का अथवा दोनों का प्रभाव है। एक भोजन म एक की मात्रा यहत अधिक है तो दूसरे में उसकी मात्रा बहत कम है। यही एक विशेष अतर है जिसमें एक पदा के आहार में प्रभाव है जब कि दसरे को पूर्ण रूप से खिलाया पिलाया जाता है । दसरी यात जिसे में सीखने का इच्छ,क ह वह यह है कि भारत के लोगों के खाद्याहार रोगों का कंसा सबंध है। खद्य पदार्य जो विभिन दोष पूर्ण प्राहार में पाए जाते है वे है जिनको भारत के लोग उपयोग में लाते है। इन खाद्य पदार्थों को इस प्रकार मिश्रण क्यिा जाता है कि उनके पाहार के उचित अनुपात नहीं होता। कभी माड़ी प्रचर मात्रा में होता है तो सामा य पोषण के लिए जो कछ तत्वों एवं जो मिश्रण को अावश्यकता है उसका प्रभाव होता है। विगत चार वर्षों में ३००० से अधिक उन चहाँ की मृत्यु के बाद परीक्षा की गई है जो अनुचित ति से खिलाए थे। दसरे चहाँ की जाच की गई जो अच्छी तरह से सिलाए गए ये । जाच से यह पता लगा कि वे रोग से मुक्त थे। अनुचित रत से खिलाए पिलाए गए चूहों की जाच करने के बाद उनके पीच में जो यिमिन्न रोमों की अयस्या पाई गई ये ये है फेप के भिन्न भिन रोग तथा निमोनिया नासिका मार्ग का रोग कान तथा कान पक्ने के रोन एंडनायड ग्राप की यीमारिया जिनसे विलकल मधे रान की स्थिति उत्पन्न हो जाती है यात तया उदर के रोग जैसी पेटको सूजन और प्रामाशय या ग्रल्सर मत्राशय में पत्थरी समय के पूर्व यच्चों का उत्पन होना या समय के पूर्व माता के मर्भ में मृत्यु होना त्वचा की पीमारी जैसे वालों का झड़ना त्वचा प्रदाह फोडा रक्त अल्पता जलघर ग्रन्थियों का बढ़ना नडमाला यातनाड़ी शांघ मेरी हदय वा रोग । दसरे पच जमे ।नी पियों को अनाचत रूप से सिलाने पर एक पोषणामावनित रो। दातों को सरापी मुसा प्रथमा दियों का कोमल होना होना वृदन्त्रप्रदार पंचश यदि अन्य प्रकार की पीमारिय। - भारत का प्राहार एक और दसरी बात है जिसमें अल्पसर प्राप्त चुहे पूर्ण पोषण प्राप्त किए हए चूहों से भिन्न होते है, पहली श्रेणी के चहें प्राय स्नायविक रोग के शिकार होते है "मार शीघ कापत होते है। वे दल के दल उपनिवेश बासी होते है और उनमें से जो शक्तिशाली होते है ये दर्यलों पर आक्रमण करके उनको अपना शिकार बना लेते है। पूर्ण पापण प्राप्त किए हुए चूहे शात अच्छ' स्वभाव के तथा विनीत होते है। 'ऊपर वणित विधि से पशुओं को रोगमुक्त रखना सभव हो सकता है वो मनुष्यों में भी यह बात सही उतरेगी। मनुष्यों में ऐसा हो सकना सभव हो सकता है इसका क्या प्रणाम है ? यहत से बच्चों को एक समूह को कपोषण देकर नियत्रित स्थिति में रखना सभव नही हो सकता । कपापण पच्चे बहत स उन्ही व्याधियों से कष्ट पाते है जिनसे चूहे अल्पाहार के कारण कष्ट पाते है। इस स्थिति को देखकर में वो निश्चित रूप से इस बात को मालूम करता दकि कपोपण के फल स्वरूम में व्याधिया उत्पन्न हुई है पर इस बात को जन साधारण को किसी प्रकार विश्वास दिलाना होगा कि यह यात सत्य है। मेरे रोग मुक्त चूहों के ग्राहार में वही गुण है जो उत्तर भारत की कछ जातियों के ग्राहार में है। उन जातियों का शारीरिक गठन यहत सन्दर तथा बजाड़ है। उनके साहार में निम्नलिखित खद्य पदार्य होने के फलस्वरूप ऊपर बतलाई गई विशेषताए पाई जाती है। उत्तर भारत का प्राहार "१ कोई अच्छा पूर्ण अन्न धान्य जैसे जई का पाटा, पूर्ण गेंह, अथवा ढेको कटा चावल अथवा इन सर्वोका मिश्रण । "२ पूर्ण दध मार दूध से बनी चीजे-मक्रवन, दही छाछ । "३ ताजा. हरी पत्तीदार सब्जिया, गाजर, टमाटर इत्यादि प्रचर मात्रा में होने चाहिए। "४ ताजे फल। "५ दध पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिए। इन भिन्न भिन्न श्रेणियों के वधपदार्थ सभी बच्चों को खाद्य सामग्रियों में अवश्य होने चाहिए। पाई किसी दरिद्र या धनी परिवार के हो, चाहे वे यरोप मा या भारत का निवासी हो। क्या में पाएको यह विश्वास दिलाने के लिए इतनी बातें कर सको कि ४८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय पृथ्वी में जितनी दवाइया बनाई जाती है उसमें भोजन ही विशेष प्राधि है ! क्या मंने ग्राको इितना कहा कि आप अपने शरीर के विषय में तथा यह भीम शरीर के लिए पापण देती है इन अद्भत यातों को सुन कर गदगद हो भए ! इतने वर्षों से में अपने सहयोगियों के साथ जो कछ कर रहा ह इस विषय में प्रापके मन में कछ मलक सावं एसी इतनी याते पतला सका ? क्या मनं अन्वेषण, अनुसधान के अप्रतिम गुणों, पाश्चर्यपूर्ण विशेषतानां तथा विस्मय विमुग्धकारी भक्तिर्य का एक लघु परिचय प्रापके सन्मुख उपस्थित कर सका ' क्या में मापको यह अनुभव करा सका कि हम में से कोई भी क्विनी ही अधिक कर सकता है वह जो कार्य करने को रह गया है उसकी तुलना में बहत थेडा है ? जितने अनुसधान के कार्य रह गए है उनको इस मुल्यवान पांचाहार सबधी अन. सधान घ्यावहारिक रूप देंगे । "मैं सोचता ह कि सव से पहले सर प्राता के पोषणातार संबंधी अन्वेषण घर के यह पता लगाया जाए कि आहार में क्या विशेष ध्रुटिया रह गई है। इसके बाद चिकित्सक अधिकारियों को कृषिशास्त्र विशंपा से साक्षातकार कर क्सि प्रकार के अनाज, फल तथा साग-सब्जिया उपजाई जाए इस बात का निर्णय करे जिससे उन तत्वों की पूति कर सके जिसका अभाव हो गया है। इन तत्व की जितनी मात्रा की पत्ति करने की प्रावश्यकता रह गई है उसका विचार करके पि-कर्मचारी देहात विकास अधिकारियों के साथ इस अनाजों सान सोम्जयों और फ्लों को उपजाने के लिए ययाक्ति प्रोत्साहन दे। भारत के किसी भी भाग में खाने की पादत कसी भी क्यों न हो अथवा किसी भी कारण या स्थिति से विवश हो कर इन प्रादतों को अपनाना पडा हो. नावश्यक खाद्यपदार्थ है जिन्हे भारत के प्रत्यक पत्र और पुत्री के सामान्य शारी- रिक तथा मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए खाना चाहिए। जिन सद्य पदायाँ का क्सिी रूप में. क्सिी भी समय देश के राष्ट्रीय ग्राहार में रहना पारश्यक है उनकी मची निश्चित किए गए अनुपात के ताप नीचे दी जाती है। यह पाया की जाती है कि यह प्रातर ससार के पोयाहार अन्वेषण के अनकल हांगा । एक संतुलित प्रहार दध ८ से १६ सि नपा मक्सन प्रयवा 'पी' २ प्रति पनीर प्रपया ददी ४ प्रसि ती पतीदार सांग (ककच्ची) से ६ प्रति तय मारत का प्राहार १९ मिना-पतीवाली (कंदमूल) सन्जियां ६ से ८ मसि तक पाटा या दसरं पूर्ण गेई ८ प्रसि ताजे पल २ पास उपर के खाद्य-पदायों में सय तत्व है जैसे प्रोटीन विटामिन खनिज, मनो एसिड, जीवन शक्ति देने वाली वस्तुए तथा गर्मी र स्फति प्रदान करने वाले कार्वोहाइड्रेट । इन वृदिध-वर्धक तथा सरक्षक तत्वों के विना सामान्य स्वास्थ्य पार जीवन नही हो सकता। इन प्राधार खाद्य पदार्थों में हम अपनी इच्छा तथा प्रथिक याग्यता के अनुसार अधिक शक्ति प्राप्त करने तथा भिन्नता के लिए मास. मछली मुर्गी, अडे तथा भिन्न भिन्न प्राकार की सब्जिया, दाल, अच्छे फल, धान्य तथा दसरे स्वादिष्ट भोजन खा सकते है। चावल का प्राहार चावल भारत के अधिकाश लोगों का प्रधान खाद्य पदार्थ चावल है। इसके साथ थोड़ी मात्रा में पत्तीवाली पार विना पत्तीवाली सब्जिया दाल र तेल मिलाए खाते है किन्तु IKTर का सब से प्रधान पदार्थ चावल है। नीचे की सूची प्रत्येक खाद्य पदार्थ मात्रा तथा वास्तविक मिश्रण को दिख. लाता है जो भारत के करोड़ों दीन दरिद्रों तथा सहायहीनों का दौनक अाहार है। ૨૦ प्रास कद मूल की सब्जिया ३ दाल १ पत्तीदार सब्जिया १ ०.५ मछली मास अथवा पडे ०५ जव इस पाहार को पूर्व वतलाए गए सामान्य पर्याप्त तथा प्रचर पाहार जो मापदड के स्वरूप दिए है उससे तुलना की जाय तो इसमें पद्दत गभीर रूप विटामिन तथा ऐसे अावश्यक खनिज जैसे कलसियम, फॉसफांस प्राइरन तेल और वसा .. तथा प्रोटीन का प्रभाव मिलेगा।

५० स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाप माताए जो पच्चे उत्पन्न करती है ऐसे प्रातार सावर सामान्य पच्चे पैदा नहीं कर सकती। एसी मातायों के गर्भ से उत्पन्न बच्चों के यिकास में अवश्य फाई कोई त्रुटि रह जाएमी गार ययस्क तो दर्षल हाकर तरह तरह के शारीरक व्याधि के शिकार बने रहेंगे भार उनमें काम करने तथा कमाने की क्षमता नहीं रहे।1 दनिक याहार में विटामिन, खनिज तया उचित प्रोटीन को अपर्याप्त मात्रा के हो ये परिणाम है। इस स्थिति का फसे निश्चित प्रभावदायी वथा थिक रूप से परिवतन किया जा सकता है। इस स्थिति का प्रमावदायी रूप से परिवर्तन करना सभव हो सकता है लेकिन जैसी दशा है उसका ज्याथिक रूप से परिवर्तन करना कठिन है। लोगों को चापल के हिसाब से कम से कम दध ८ यांस पीने के लिए १० सि सजिया खाने के लिए (जिसमें गाजर तथा हरी पत्तीदार सब्जिया रहेगी) दो ग्रांस फल तया २ प्रांस मक्खन ची खाने के लिए अपनी आमदनी बढ़नी पडेगी। चावल धान्य के रूप में प्रोटीन की कमी है। उसका कछ अस पूर्ण गेह दवारा पति की जा सकती है। चावल के पादश ग्राहार में गेह की कछ मात्रा मिलाने से जीवन शक्ति तथा गर्भाधान माता को नवजीवन निर्माण की शक्ति प्राप्त होती है। पढ़ने वाले बालक की मानसिक तथा शारीरिक विकास में माशातीत सफलता मिलेगी जय कि वयस्कों के लिए यह बहत सी व्याधियों तथा दोर्चा के लिए प्रभावदायी महा प्रांषध सिदध होगा।

मारत का माहार ग्राहार में पञ्च प्रोटीन पब्लिक हेल्य सविस प्राय डेलही प्रोविन्स दवारा सिफारिश नीचे दिए गए दो प्रकार के आहार है जो उस दफ्तर से प्रकाशित पत्रिका में दिए गए थे। भारतीय पुरुष ग्रांस योप के पुरुष यैठे-बैठे क्रियाशील! बैठे-बैठे क्रियाशील जीवन जीवन के जीवन जीनन के ध्यतीत लिए व्यतीत लिए करने करन वालों के वालों के लिए लिए प्रसि पाटा (पूर्ण तथा प्रास मली ४ विशुदध) अथवा मास चावल (ढका सब्जिया कटा) १० १२ ८ ज्वार, बाजार, ८ ८ प्रादि ५ ८ १० ८ १६ मक्खन ૨ ૨ दाल ३ ३ पनीर १ १ वनस्पति तेल, १ प्रई ૨ ३ अथवा घी २ २ राटी ८ १२ बिना पत्तीवाली शक्कर १ ३ सब्जिया ८ वसा १/२ १/२ हरी पत्तीवाली फ्ल २ ८ सब्जिया ४ ८ मैदा २ २ ८ शक्कर हरी पत्तीदार यिना पतीदार or कैलोरीकों में २,४४० ३००० क्लोरीकों में २.४४० *पकाने के समय की मात्रा सम्मिलित है।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदव प्रयांन पशु के मास से प्राप्त प्रोटीन के पोषण तत्व को खोज करने के बाद जो परिणाम मिला उसे आधार मान कर उपर के दोनों युरोपियन तथा भारतीय माहार के सुभाष दिए गए है। दोनों पादारों में युरोपियन अभिलंच की मलक है। ये पदानों का मास लाकर श्रष्ठ प्रोटीन प्राप्त करना चाहते है। इसलिए उक्त प्राहार भारत की उन जातियों के लिए उपयुक्त है जिनके भोजन में मछली मी, अड़े इत्यादि रहते है। यहा पर यह उल्लेस कर देना अच्छा होगा कि दिल्ली के सुझाव के अनुसार जो ग्राहार की सूची में प्रोटीन की मात्रा यतलाई गई उसमें ययंष्ठ उदारता दिखलाई गई है प्रतएव उसकी मात्रा को पढ़ाना उचित नहीं है। भारतीय आहार में प्राटीन की मात्रा का यहत भारी अमाव रहता है विशेषकर उन जातियाँ के ग्राहार में जो शाकाहारी है। इस प्रभाव की पूर्ति के लिए हम मास खाने की सलाह नहीं दे सकते क्योक भारत की यहसख्यक जातिया अपने विश्वास में प्रटल रहेगे पार अपने धार्मिक विश्वास में रहकर मास खाकर प्रोटीन के प्रभाव की पूर्ति करने की अपेक्षा फस्ट सहना पसद करेंगे। प्रोटीन के प्रभाव को दसरे तरीके से पूरा किया जा सकता है और इन शाकाहारियों की अनसधान संवा से विशेष सहायता मिलनी चाहिए। सचमुच मास को छड र दसरे साधन उत्तम प्रोटीन पाना एक कठिन समस्या की बात है क्योक मास नही खाने वालों की सरया यहत बडी है। लेकिन यह तो प्रोटीन की प्रावश्यकता को और भी अधिक महत्वपूर्ण तथा नावश्यक बना देता है। सुझाव दिए गए उपाहारों का एक दसरा हष्टिकोण है जिस पर जो देना प्रावश्यक है । उक्त ग्राहार की सूची में जितनी साग सब्जिया फल तथा दध खान खान का निर्दशन दिया गया है उससे कम खाने की प्रवृत्ति हो सकती है। ऐसा करना यहत गभीर भुल होगी क्योंकि जो ग्राहार बताए गए हैं उनके खाद्य पदार्या में ग्रसल स्वास्थ्य वर्धक तत्व है। इन्ही खद्य पदार्थो से प्रावश्यक विमिन और खनिज लवण प्राप्त होते है । इस सूची के खाद्यपदार्थों की जो मात्रा बताई गई है वह नो यदत अल्प है । उनको पदि पढाने से लाभ हो तो यहायी जा सकती है लेकिन उनकी मात्रा क्म करना आपूर्णता की स्थिति उत्पन्न करना है। 1 खाद्य पदार्थ औषधि के रूपमें एच सी मेनकल एम डी. साम सब्जिया भोजन स सांधत उत्पन्न बीमारिया के कारण तथा उनके परिणामों के विस्तारपूर्वक विवरणों को दाहराने के याद इस यात का भली भाति ज्ञान मिल जावा है कि क्यों बहत सी चिकित्सा प्रणालियों के होते हुए पार तरह तरह की पतिया के होते हए तथा भारत में दया के हजारों कारखानों के होते हए भी क्या यहत थोड़े रोगी अच्छे होते है । इसका असल कारण जसे ऊपर सममा दिया गया है प्रधान भोजन तत्वों का प्रभाव है। जब तक पोषण का प्रभाव जो असल सा का कारण है दर न किया जाए तब तक किसी प्रणाली या पदात से इसकी चिकित्सा सभय नहीं हो सकती चाहे वह पश्चिमी या पूर्वी हो। प्राकृतिक खाटा पदार्थों की विभिन्नता से असल रोग निवारण सभव है। खध पदार्थों के अधिक उपयोगी तथा प्रावश्यक तत्व जिनमें प्राधियों के Tण है अगले पृष्ठों म सक्षेप से उल्लेख किए जाएगे। वधगांभी शायद आपने इस साधारण सब्जी को एक वहमुल्य पथ के रूप में कभी नहीं ध्यान दिया होगा । इस यधगोभी के परिवार में पसेल्स स्प्रांट फलगोभी मोकोली काले खजूर वधगांभी सम्मिलित है । इन सब्जियों का अषिध गुण उन्हे बच्चे खाने से प्राप्त होता है। चिकित्सा की सफलता जीवन सत्व ए बी और सी के साथ साथ कलशियम माइरन पोटसियम सोडियम और फासफोरस पर निर्भर करती हैं। वधमाभी का रस पकाया हया जूस भी मासततया (ऊत्तको) के सचित वार को पुष्ट करने के लिए यह मूल्य समभा जाता है। इसके द्वारा सडोसिस अर्थात् अधिक एसड होन की स्थिति सरलतापूर्वक निवारण किया जा सकता है । ।

स्वास्थ्य के प्रांग सिदय उपाय पालक पत्ते वाले पांघाको प्रतिने एक प्रयोगशाला यना रखा है। उसमें रसायनिक कार्य चाल रहता है। हरी पतिया जीवन के अाधार है। उनके मिना जीवनचक्र मत हो जाएगा । दप जिसकी इतनी अधिक प्रशसा की जाती है यह ते असल में हरी पत्तियों का घोल है। इन भिन्न हरी पत्तियों के दवारा ही प्रकृति जीवन क प्रति प्रावश्यक तत्वों को मिश्रित करता है। हरी पत्तियों में सर्व साधारण तया उपयोगी सम्जी पालक साा है। इसका चिकित्सा सरधी मूल्ब कितना है इस यात को उसके तत्वों से स्पष्ट होता है। इसमें कलशियम, सोडियम, क्लोराइन, फॉसफोरस, आइरन विटामिन ए बी सी और ई तथा प्रोटीन और कार्वोहाइड्रेट है। पालक में लोहा, विटामिन, कलशियम, सजी हेमोग्लामिन तया प्रोटीन निर्माण करने पाला एमिनो एसिड अधिक परिमाण में है जिनके कारण इसका मूल्य प्रधिक है। वास्तव में हम लोगों को हरी पत्तीवाली सब्जियों में वृद्धि तथा विकास का रहल्या बढ़ना चाहिए क्योंकि उनमें एक ऐसा तत्व उत्पन्न किया जाता है जो म उमपालों को पढने की शक्ति देता है। इसीलिए हरी चीजों का जूस बच्चों को पहले देने के लिए सलाह दी जाती है, फिर पीछ' गुददे का अर्थ छान कर देना अच्छा होता है। बच्चों को हरी पती वाली सब्जिया खाने की इच्छा पैदा करनी चाहिए पर उनको उन्हें खाने के लिए विवश नही करना चाहिए। यह यात भारत के लिए बहत आवश्यक है क्योंकि वहा वृदिध तथा विकास की समस्या प्राय देखने में ग्राती है। विकास के विचार से इस बात को जानना आवश्यक है कि दूध और हरी पत्ती वाली सब्जिया जैसे पालक या अदल बदल प्रयोग होना चाहिए। जहा दप नहीं मिलता पहा सब्जिया उसके स्थान में उपयोग की जा सकती है अथवा दध पालनं को अयिक कठिनाई हां तो हरी सब्जियों के प्रयोग स उतना ही लाम होता है जितना दप से हो सकता है। वहत सी हरी पत्तीवाली सरिजया जो खान योग्य है भाड भरवाड की तरह याँ ही उग पाती है। उनको केवल बटोरने का ही कष्ट उठावर प्राप्त कर सकते है। पतीवाली पांधा जिसको हम ग्राजकल पालक करते है एक समय जगली पांधा समझकर खाने के लिए उपयोग नहीं किया जाता था जय किनी ने दनिया सद्य पदार्य के रूप में 1 के क्सिी स्थान में इसकी जांच कर यह पता लगाया कि इसमें पोषक तत्व तथा आपधि के गुण है। अभी तक यहत से हरे पांर्धा को जगली समझे जाते है जिनके विषय में पता लगाना है। हरी पत्ती वाली सब्जियों को "रक्षक भोजन" इसलिए कहते है क्योंकि उनमें खनिज तत्व रहते है जो चावल तथा अन्य मुख्य परिष्कृत खाद्यान्न में नहीं पाए जाते । हरी पत्ती वाली सब्जियों के मिश्रण में क्षारीय खनिज की मात्रा अधिक रहती है। इस कारण इनका महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि इससे शरीर के सक्रामक रोगों के कीटाणां से सामना करने की शक्ति बढ जाती है । मानव शरीर के प्रोटीन ज्तकों (मांस तत्मा) के निर्माण के लिए १८ एमिनों सिड की अावश्वक्ता होती है। भारत के लोगों को प्रोटीन केवल दाल से होता है। इसमें १८ एमिनो एसिड पूर्ण रूप से नहीं । इसी कारण यहा के लोगों का स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता । अभी इस बात का ज्ञान प्राप्त हो गया है कि दाल की इस त्रुटि को हरी पत्तीवाली सब्जियों के द्वारा पूर्ण की जा सकती है। इस सबंध में हरी सब्जियां यार एक महत्वपूर्ण सेवा करती है । दाल के प्रोटीन को पूर्ण रूप से पचने तथा यात्मसात करने के लिए कछ मात्रा में जीवन सत्व ए और वी की पावश्यक्ता होती है। इन जीवन सत्वों (विटामिन्स) की अावश्यकता ही पत्तियों से शीघ प्राप्त हो सकती है। इसी कारण हमारे आहार में जब दाल रहती है तब उसके साथ हरी पत्तीवाली सब्जिया जैसे पालक साग को मिलाना चाहिए जिससे प्रोटीन को पचाने वाला प्रावश्यक विटामिन मिले । पालक-साग की छोटी, नई और कोमल कांपलों तथा तुरन्त उगे हुए नवपल्लयों को आप सालाद या कच्चे साग के प्राचार या रायते में डाल सक्त है, क्योंकि उनका स्वाद लंदस के पत्तों के जैसा संचकर होता है । पालक का पाच प्रतिशत मधुमेह इत्यादि अन्य रांगों के लिए बहुत उपयोगी समभा जाता है। पालक को इतनं थोडे जल में पकाना चाहिए कि जब यह पक जाए तो उसका जल फेका न जाए। पकाने के पहले जय इसको कई बार जल से अच्छी तरह धोकर साफ किया जाए तो उसकी पत्तियों में इतना जल रह जाता है कि पकाने के लिए जल ऊपर से डालने की आवश्यकता नही होती। - स्वास्थ्य के प्रयोग सिदव उपाय सद्य पदार्थ के रूप में ५७ गाजर विज्ञान ने साधारण नाजर की एक सच्चे यहादर की सी प्रशसा की है इसका नाम अय से सदा के लिए पादर के साथ लिया जाएगा क्योंकि यह करी टीन के लिए लाणिक रूप में उपयोग नहीं किया गया है। इस में जो पीला रग है उसे प्रति रहस्यपूर्ण तथा विटामिन ए के मिश्रण के लिए उपयोग करता है। यह विटामिन युवावस्था के सतलित वृद्धि तथा विकास के लिए वहत यावश्यक है । इसमें जो गुण है यह ययस्क अवस्था के स्वास्थ्य को बनाए रखन के लिए लाभप्रद है। भारतीय ग्राहार में विटामिन ए का प्रभाव । इस देश के लिए यह एक बड़ी समस्या बनी है। इस यात दा कोन्द्रय सरकारी स्वास्थ्य कमिश्नर द्वारा हाल की एक प्रकाशित रिपोर्ट में समर्थन क्यिा गया था । ग्राहार में करोटीन का प्रभार ठिगनपन, अर्जीण स्वास्थ्यहीनता सत्रमणों का प्रतिरोध नहीं कर सक्ना विशेष कर ग्राख कान, वृण तथा फेफडों की बीमारियां का सक्रमण प्राधार करोटीन के प्रभाव के लक्षण है। विटामिन ए के अभाव का फल भारत व्यापक रूप से दिखाई देता है इस टि तथा इसके परिणाम का किसी प्रकार सशंधन किया जा सकता है यर एक बड़ी समस्या बन गई है जिस की और कनूर के न्यूट्रिशनल इन्स्टिट्यूट (पोषक सस्था) का ध्यान प्रापित हया है। उन्होंने आहार के साथ काँडलीवर प्रावल तथा लाल ताड के तेल की प्रचुर मात्रा में उपयोग करन की सिफारिश 1 की है। उक्त दोनो को भारत की जनसख्या उपयोग करने में असमर्थ है क्योंक उना मूल्य अधिक है और उन्' शीघ्र प्राप्त करना सभव नहीं हा सक्ता । दध भी विटामिन 'ए' का एक अच्छा सोत है लेकिन इसका अधिक मूल्य होने के कारण सब नहीं पी सकते । इस स्थिति में गाजर विटामिन ही केवल नही पर अधिक समस्या को सलमाने में मदद करता है । यह तुलना में काँडलीवर पायल, लाल ताइ अायल तथा दध के समान है। यह करोटीन अथवा विटामिन ए का सुलभ सोत है। इसको परिणाम-सवधी तुलना नीचे दी जाती है । F5 ५८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय रसाय * * * ★ * * * * * * * कांडीवर तेल * मक्खन पुर्ण दद्ध गाजर नारियल मगफली गंह का भता बच्चों तथा वयस्कों को प्रति दिन गाजर खिलाना चाहिए। उसे प्रच मात्रा में उपजाने के लिए जहा तक सभव हो सके प्रोत्साहित करना चाहिए। इस में जो विटामिन 'ए' है वह पकाने के ताप से कछ ही केवल नष्ट होता है पर बाहर या में रखने से ग्रार सूर्य के ताप के प्रभाव स उसी की शक्ति (गण) हास हो जाती है । इसी कारण जमीन से खोदने के बाद तुरन्त गाजर को पकाना चाहिए। उस पकाने की उसी विधि को सब से अच्छा समभा जाता ह जब पकाने के समय उसको हवा नहीं लगता र तत्य नष्ट नहीं होता । गाजर को घी में खुले वर्तन में पकाना अच्छा नहीं है क्योंकि विटामिन नष्ट हो जाता। प्रत्येक दिन एक या दो गिलास कच्चा गाजर का रस पीने से गाजर का पॉप्टक तत्व सहज से मिल सक्ता राजर में सडन का संयनवाला दसरा गुण है। इस गण की और मैचनीकाफ्ने सव से पहले लोगों का ध्यान प्रापित क्यिा । उसने यह पता लगाया कि परायों को गाजर खिलाने से उनके मल में हानिकारक जीवाण नार्ग रहते । युराप के कछ होटेल के मालिक इसके गुण क प्रभाव को देख कर उसका रस खाने के समय देते है। प्याज और लहसन समाज में तथा व्यापारियों के बीच में कच्चा प्याज और लहसन खाना जिन है। यदि मदिरा पार तयाक के धुए सभ्यता के विरुद्ध समझा जाता ना यहत अच्छा होता । प्याज परिवार के पदार्थों के खाने से दर्गध निकलती है उनका असल कारण है एक तेल इसलिए उसे खाने के बाद उसका ल फेफड़े के मार्ग से निकलता है। इसलिए प्याज को न निकलती है। प्याज की दर्नध को दूर करने के लिए उसे मर्म रात में पकाना चाहिए या संकने वाले यतन में रन से टाक कर रखना चाहिए और फिर चूल्हे में गर्म करना चाहिए। उच्च ताप के कारण नेल भाप यन कर उड़ जाता है। इस तरह यह कम दापत समझा जाना। - खद्य पदार्थ के रूप में ५९ यहा तक कि मन अपनी व्ययस्था के ए १९ पद में वे इस सकीर्ण विचार का समर्थन करते है। यहा उसने यह लिखा है, वह मनुष्य जिसका दो यार जन्म हो चुका हं जानते हए ककरमता गाय का समर लहसून गप का मुर्गा प्याज अथवा लीकर (प्याज की श्रेणी की एक वनस्पति) खाए तो वह जातिच्युत हो जाएगा। इसी एक तरीके से श्वासपूर्ण दापि समाज से दर की जा सकती थी। प्याज और लहसून के विषय में यह कहा गया है यर्धाप ये दोनों पदार्य हम लोनों को सामाजिक रूप से तोड़ फोड़ डालते है तथापि वे रम शारीरिक रूप से निर्माण करते है। प्याज परियार के विषय में जितनी प्रशसनीय यात काही जा सकती है उसम एक बात यह है कि वे धारीय खनिज के उत्तम सात है। उसके दसरे पहल के विषय में डाक्टर रापर्ट कंचनसन कहते है कि प्याज र एसपंरागस (एक प्रकार का गधमा सान) दो सम्जिया है जो युरिक एसिड उत्पन्न करते है। इसलिए जिनके शरीर में अधिक युरिक एसिड है और जितनों का इनके प्रति संच नही है उन्हें इन्हें नहीं खाना चाहिए। डाक्टर एस एस नेहरू प्याज के एक नए गुण के विषय में चर्चा करते है जिसका उन्होंने मणिपुरी के देहात विकास कार्य के समय पता लगाया विटामिनों ने अाज अपनी ख्याति प्राप्त की है। वर्ण माला के सभी अक्षरों में खद्य पदार्थों के नाम रखे गए है। इस वर्णमाला के अक्षरों दवारा खाध विश्वा रद लोगों का ध्यान खाद्य पदार्थों की ओर आकर्षित कर रहे है । शक्ति का एक नया सोत तथा नई विधि है जिनको खाद्यसपधी साधन दवारा मानव शरीर के लाभ के उपयोग लाया जा सकता है। इस विधि को गुरुवीच रॉडएशन कहते है । यह अल्टा यायलेट किरण का एक रूप है। यदि इस थोडी मात्रा में दी जाय तो यह यहत प्रभावदायी होता है । कछ कदमूल में इस रूप के रेडिएशन की मात्रा बहत अधिक है । वे कदमुल है प्याज गाजर शलजम चकदर इत्यादि । इनको देखतों में वहत सहज से प्राप्त कर सकते है। इनको देहातों के किसान अपनी यारी में उपजा कर अपने ग्राहार में सम्मिलित कर सक्ते प्राचीन विचारों से इतने जकड़े है कि नई अनुभूतियों के अनकल करने से हिचकिचाते है और प्याज तथा लहसून सबंधी जो नई बातों का पता गया है उसके प्रति उदासीन हप्टिकोण रखते है। उन्हें अब तक वे तुच्छ की दृष्टि से देखते है । ऐसे लोगों के लाभ के लिए इ०एफ०जी०ए० के सदस्यों द्वारा - - । कुछ लोग स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय जो अनुसधान क्यिा गया है उसे वहा यता देना यावश्यक है । वह यह है- प्याज पार गाजर की जड़ों में कुछ शक्ति है। उनकी जड़ों के सपर्क में यदि दुसरे पधि या जाए तो उनके पढ़ने को गति दो गना हो जाती है। विद्युत-रोडियो-जीव विज्ञान के प्रथम सतर्राष्ट्रीय कांग्रेस के जो सन १९३४ ई० में वेनिस नगर में बैठक हुई थी उसके कार्य का पृष्ठ ८७६ में इस प्रकार उल्लेख मिलता। एम किरणें छोटे प्याज में रहते है। ये किरणे उनके छोटे पांधों से निकलती है। ये पौधे जिनकी २ से १ इच परिधि रहती है जमीन से खांदन के याद २४ घटे तक अधिक क्रियाशील रहते है । एम-किरण बाहर से देखने में अल्ट्रा वायलेट घे समान दिखाई देते है पर वे बहत मृद, प्रर्वत के होते है। रोगग्रस्त ऊत्ता (मास नतयों) पर अल्ट्रा वायलेट की विकिरण के प्रभाव के कारण जो क्रिया शीलता उत्पन्न होती है उसका गभीर रूप से विचार करना चाहिए।" ककड़ी फकडी एक सजी है जिसे बहत से लोग गर्मी के दिनों में यहत रुचि के साथ खाते है क्योंकि इससे ठडक मिलती है और मन ताजा हो जाता है। एक DARA HARA नीलेग्य करने वाले गुण है सब से पहले पाटशियम की प्रत्यधिक मात्रा सहा पदार्थ के रूप मनुष्य के मुंह में किसी वस्तु की साने इच्छा से उतना पानी नहीं भर पाता जितना शिमला में एक पहाड़ी पादमी को देख कर जो माल की राह पर एक यड़ी रसमुक्त तथा ताजी ककड़ी खाते हए यात दरख कर । क्कड़ी खाते हुए राह चलवं-चलते यह आनंद प्राप्त करता है और उसको ऐसा अनुभव होता है मानों उनके मार्ग की दरी कम हो गई। दो हजार वर्षों से ककड़ी ने यहत दर्शा में राजनीतक तया धर्मिक विश्वास की अवहेलना करते हुए लोगों को ग्रानंद प्रदान क्यिा है। श्रीमती वाइजर ने अपनी पुस्तक. "दी फङ प्राव ए हिन्द, विलेज" में लिखती है. "गर्मी के दिनों में स्त्री-पत्य नार बच्चे हरी ककड़ी खाते है । सड़क किनारे दकानों में और धार्मिक मेलों में सस्ती पकड़यों की इतनी भरभार है कि आप चाहे घर में रह या याहर र कहीं ककड़ी दृष्टिगोचर होती है। फक्डी की स्तु में उसे कच्चा खाया जाता है पर भारत में तो सर्वत्र लोग अपने दोनक भोजन में अन्य तरकारियों के साथ पका कर अथवा उसमें मसाला लगा कर सम्मिलित करते है। इस सम्जी के अपने महत्वपूर्ण मूल्य है । यिना पानी के १००० भाग तत्व एसड संयोजित करने वाला ४१.२० १०.०० ७.३० ४.१५ १-४० ६४.०५ एसड उत्पन्न करनेवाला १७.४५ ३५.९५ जपर ककड़ी में जो खनिज तत्व दरवाए गए है ये क्रम से उनके में खनिज दिखाए गए है। पोटोसयम सोडियम कलशियम मेगशियम माइरन पासपोरस सलफर सिलिक्न क्लोराइन ७.०० ૬૨ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदन उपाय ००६० लगता है जो ४१ २० प्रतिशत है। इससे प्राकृतिक रूप में जब लसदार गोंद के तरह पोटाश की मात्रा प्राप्त होता है। इस संद्य खनिज का महत्व इस बात में है कि प्रकृतिने हमारे रक्त के लाल कोष बनाने में इसको (खाहा खनिज पदार क) प्रधानता दी है। रक्त कोपों के प्रत्येक हजार ग्राम में प्रर्जव (प्रचंतन) लवण की मात्र निम्नरूप में लोहे का फासफ्ट ०९९८ पोटोशयम सल्फेट ०१३२ पोटाशयम क्लोराइड ३०७९ पोटशियम फासफेट २३४३ सोडियम फासफेट ०६३३ सोडियम क्लोराइड ०३४४ कलशियम फासफेट ००९४ मैगनेशियम पासफ्ट एक दसरी पात स्मरण करने की यह है कि क्कड़ी में एसिड सोजित करने वाला खनिज (क्षार) की मात्रा ६४०५ प्रतिशत रहती जब कि उसमें ३५६५ प्रतिसत एसिड उत्पन्न करनेवाले खनिज को मात्रा होती है। इस प्रकार ककडी उन खाटा सामग्रियों में प्रति क्षारयुक्त होते है। ककड़ी के खनिजों का इस प्रकार ऋमवदध मूत्रत्याग के लिए उत्तम तथा पे प्राकृतिक रूप से उत्तजक का कार्य करते है और पेशाय के स्वतत्र रूप से प्रवाहित होने में मदद करते है। अर्थात् पेशाय को खुलासा करते है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए रस अच्छा है। यदि गाजर चकदर पार सलेरी का जूस मिश्रण करके गाँटया रोग की चिकित्सा की जाए तो उसका प्रभाव प्रच्छा होता है। इन रसों से लाम प्राप्त करने के लिए प्राहार के अन्न धाय की माड़ी नपा परिष्कृत यक्कर का उपयो। नहीं करना चाहिए। सारकृत (समादित) प्रोटीन जो खद्य पदार्य जैसे मास मडली ग अडे तया दालों से को प्राप्त होता उन चौबीस घटे में सर मिला यर चार प्रॉस से अधिक नहाना चाहा। हर बम छिन परिमार प्राप्त न बरे तर वा उपर नियमों का पालन करना उचित है। जो खनिज घोल यन पर उतकों (मास तता) की पुनर्रचना मया दांपत पदार्या के निराकरण के लिए प्रपश्यक होते है ये मोडियम से प्राप्त - हाते है।

सद्य पदार्य के रूपमें पधि के रूप में जां लाभ है वह ककडी से प्राप्त होता है। इसलिए दसरी चीजें जिनसे स्वास्थ्य के लिए अधिक लाभ न ही उन्हें कम खाना चाहिए और अधिक पकडी खाना चाहिए। संम (धीमी) तया बसंल के अंकर यं दो सब्जिया है जिनमें कई तत्व समान रूप से पाए जाते है। इन दानों सब्जियों में कलशियम, फासफोरस, आइरन और जीवन तत्व ए। बी सी की मात्रा प्रचर है। उनकी मात्रा क्रमशा इस प्रकार है-XX ार XXX है। इन सब्जियों के अतिरिक्त अन्य हरी सब्जिया है जिनमें इन तत्वों की मात्रा समान रूप से है अतएव इनके विषय में अधिक चर्चा न करके उन हरी सब्जियों का साधारण रूप से महत्व बताना उचित है जो खनिज तथा सरक्षक विटामिन के असल सोत है। हम लोगों का एक मुरय लक्ष्य है। वह लक्ष्य है उक्त दो सब्जियों का मधुमेह रोगी की यावश्यक्ताओं से क्या सवध है इस बात को समझना । मधुमेह रोगी को ऐसे खाद्य पदार्थों की अावश्यक्ता होती है जिनमें वारीय खनिज तथा जीवन सत्व (विटामिन) की मात्रा अधिक हो और कार्योहाइड्ट की मात्रा कम हो क्योंक मधुमेह रोग शक्कर की अधिकता तथा विषाक्त एसड की स्थिति है । सेम (छीमी) पार यासेल के प्रकर मधुमेह के लिए जो भोजन तत्व की यावश्यक्ता होती है उसकी वे पूर्ति करती है . इन दोनों सब्जियों में केवल ३ प्रतिशत काराज है और जैसा ऊपर वर्णन किया गया है दसरे तत्वों की मात्रा अधिक है पर पर इससे अधिक महत्वपूर्ण यात तो यह है कि उनमें प्राकृतिक रूप से तैयार किया गया इनलिन है जो उन मधुमेह रोगियों के लिए मूल्यवान समझा जाता है । यह इनस्पलिन उनके लिए लाभप्रद है जिनकी क्लोम थिया इनलिन निर्माण नहीं कर सकते । पलोम ग्रन्यि एक पाचक इद्रिय है जो रासायनिक पदार्थ (इनस्पलिन) का सवध करता है । यह इनलिन पहले माडी को साधारण शक्कर में परिणत करता है तब फिर उसे शारीरिक ऊर्जा में परिवर्तन करता है । मधुमेह रोगी में इनस्पलिन की उत्पादन शक्ति का कुछ अंश हास हो जाता है इसलिए उसे बाहर से इनस्पलिन की आवश्यकता होती है । सबसे पहले इनस्पलिन पशु-क्लाम ग्रीय से इनस्यलिन निकाल कर बनाया गया था। इसके याद फिर कृत्रिम रूप से बनाया गया । अभी हम लोग संभ और बसेल इत्यादि प्राकृतिक पार्धा तथा हरे खाद्य पदायों से इनस्यलिन प्राप्त करते है। । - - ६४ स्वास्थ्य के प्रयास सदर उपाय फम मात्रा म कार्याहाहडट उपन करने वाले सद्य पदार्थों को खाने के अतिरिक्त कच्चं संम र यसल कर को निकाला हा रस प्रति दिन प्रचर मात्रा म खाने से उत्तम परिणाम मिला है। गाजर नया लेटस का रस भी लाभदायक है। रसा को निकालने के पूर्व उहे छोटे छोटे दकई काट लना चाहिए उसके बाद साफ यपड़े म तह करके रखना चाहिए। फिर तेल निकालने वाली मशीन या काई दसरे साधन से जिससे उस पर अधिक दवाव पड़ता है रस निकलना चाहिए। इसी एक्मात्र विधि दवारा वह,मुल्य नीरोग्य करने वाला तथा शरीर का शुदध करनेवाला जूस प्राप्त क्यिा जा सकता है। रस निकालने वाली मशीन को रस निकालने के पूर्व तथा बाद खोलते हए जल से अच्छी तरह धोना चाहिए। लेटस वे जो भोजन पदार्थ के प्राकृतिक मधुर स्वाद पर सोच रखते है उनके लिए लेटस बहत प्राचीन काल से रचिकर भोजन पदार्थ रहा है। अगस्तुस कसर के विषय में यह कहा जाता है कि वे इस पौधे पर यहत रुचि रखते थे। लेटस खाने के कारण वे घातक रोग से प्रच्छे हो गए थे। इस साधारण छोटे पांध को स्मरण करने के लिए उसने उसके नाम से एक वेदी तथा मृति अर्पण कर दिया था। ऐसा मालूम होता है यह सब्जी इगलैंड उस समय सब से पहले लगाई गई थी जय महारानी एलिजवंद राज करती थी। उस समय से अाज तक यह एक लोकप्रिय खाध सजी बनी है। इगलंड पार अमरिका में लेटस का सलाद यहत से लोगों के दो पहर के भोजन में प्रधान प्राहार रहता है। इसके सलाद के साथ प्रोटीन अथवा कार्वोहाइडट उनके भोजन में होता है। लेटस प्रोटीन या पाहाइडट से अच्छा मेल खाता है। रोभी लोगों के हतास में लेटस के साथ डे को मिलाकर खाने की बात पार्ट जाती है। इस प्रकार की मिलावट यात एप्टिकारक नया अकल है। यदि लेटस के साथ क्सिी प्रकार की पतीदार सब्जिया या हरी सब्जिया मिलाई जा सक्ती है पर लेटस के साथ प्रर्ड का प्रोटीन मिलाया जाए तो उसके साथ कार्यों रादडट को किसी रूप में नहीं मिलाना चाहिए। मई के स्थान में प्रोटीन के लिए दध दरी पनीर त्राथवा पनीर मिला सकते है। जैतून का तेल चुपड लेने पर यह पार भी संचकर बन जाता ।

खध पदार्य के रूप । लेटत र कार्वोहाइडट का भोजन बनाने के लिए किसी प्रकार का कावा. हाइट जैसे रोटी, चावल, माल अथवा दसरी कद-मूल सम्जिया सम्मिलित की जा सकती है लेकिन इस भांजन के साथ किसी प्रकार का प्रोटीन नही मिलाना चाहिए। प्रोटीन और कार्वोहाइड्ट एक याहार में नही मिलते ! यह एक सिद्धान्त आधार पर कहा गया है और विशेष पर यह मिलानट उनके लिए अच्छा नहीं होता जिन की पाचन क्रिया दर्वल है। लेटस तीन प्रतिशत सब्जी जाति का है। इसका मतलब यह है कि इस जाति की सब्जियों में तीन प्रतिशत या उससे कम होता है। इसीलिए मधुमेह तथा मोटापा की चिकित्सा के लिए जो खाद्य पदार्थ दिए जाते है उसमें लटस प्रधान रहता है। इस पत्तीदार भोजन में पोपण तथा चिकित्सा सवधी मूल्य के विचार से विटामिन ए, बी, ई की प्रचुर मात्रा है। यह विटामिन सी के लिए भी उत्तम सोत है। इसके अतिरिक्त यह कलाशयम, फासफोरस लोहा तथा सब्जी होम्य. ग्लोचिन का भडार है। ऐसी हरी पत्तीदार सब्जिया रक्त अल्पता के लिए उत्तम लोहे का टानिक है । जव लोहे का टानिक जो प्राधि के रूप में विक्री होता है उनकी अपेक्षा इस प्रकार से प्राप्त लोहा और होम्यग्लोबिन बढ़ कर है । इनको (लोहा और होम्यग्लोथिन को) शरीर अात्मसात कर लेता है। इसमें जो खनिज है वह दधिमय जव मिश्रण के रूप में है । इस रूप में प्रति उसे तैयार करती है और शरीर निर्माण तथा स्वास्थ्य रक्षक के लिए उसके प्रति पावश्यक खनिज को वह शीघ ग्रहण करती है। लेटस हरी पत्तीदार भोजन के रूप में है। उसमें एक प्रकार का स्वाद है जिसके कारण यह अन्य अच्छ खाद्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक सोचकर होता है । इस पत्तीदार पौधे से एक रहस्यमय जीवन शक्ति प्राप्त होती है जो जीवन और स्वास्थ्य के लिए वहत आवश्यक है। इस तत्व के विषय में कोई रासार्यानक विश्लषण नहीं कर सका हैन उसकी परिभाषा कर सका है । इस अदभत तथा कच्चे भोजन के मूल्य से भारत के लोगों को अच्छी तरह परिचित होना चाहिए। नीचे एक अच्छा सुझाव दिया जाता है यदि आप का बनान भी हो तो लकड़ी की पेटियों और गमलों में इस रोप सकते है । इसकी व्याप एक बडे पाँधे होने की आशा में न ठहरे रहे। जब वह छोटा एक या दो इच का छोटा और कोमल रहता है उसी समय खाया जाए तो बहत रुचकर बता है । इतने छोटे रूप में इससे उतना ही लाभ होता है जितना अंकरित दाल से होता है ।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय कॉडलीवर पायल तया अल्ट्रा वायलेट किरण के विज्ञापन का प्रभाव हमारे मन में इतना अधिक हो गया कि हम हरी पत्तीवाली सब्जियों में सूखा रोग को रोक्न का जो गुण है उसको भूल जाते है। इस संबंध में प्राध्यापक एच एस शेरमन की यात उदधृत करना उचित है-'काँड मछली के तेल और अल्ट्रा वायलेट किरणों की बीमारी रोकने की शक्तियों का इतना प्रचार हत्या है कि सीमा से अधिक हमारा ध्यान उस और प्राषित हो गया है। साधारण खाद्य पदार्थों के गुणों की अवहेलना नही करनी चाहिए। अंडे के पीले भाग में पूर्ण दध भक्खन तथा हरी सब्जियों में विटामिन की जा मात्रा है उसकी कई स्थितियों में प्रामाणिक किया गया है जिससे हम उसका सत्य मान सकते है प्राध्यापक शर्मन दवारा भोजन पदार्थों का उल्लेख क्यिा गया है वह एक छोटे बच्चे या प्रांड पादमी के लिए उपयुक्त है। संगमक्ता नष्ट करने का कार्य भारत के यहत स लोग सालाद नही खातं । ये डरते है कि कच्चे दूषित साग सम्जियों को खाने से ग्रामाशय में किसी प्रकार का रोग न हो जाए। यह सच बात है कि सभी कच्चे खादा पदार्थों के खाने के पूर्व प्राधका की पात उत्पन्न होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें नहीं खाना चाहिए। उनको जीवाण नाशक प्राधांध से जीवाणहीन कर सकते है। कच्चे फ्ल ग्रार साा सब्जियों से ही येवल सक्रमण नहीं होता पित यर सयं विदित यात है कि अधिक मछलियों मुगियों और पशुओं के मास में कोई मरे रहते है। उबालने प्रयवा पकाने के बाद भी दै राजयक्ष्मा कन्सर मात के कीटाण टिनिया तथा दसरे प्रकार की बीमारिया फैलाते है । सालाद बनाने याली सब्जियों को अच्छी तरह धो लेना चाहिए। उसके याद फ्लोराइड ग्राय लाइम के घोल में (क्लोराइड प्राव डाइम पाव पास एक गैलन जल) उसको डया देना चाहिए। इसमें मम्जी को पाच मिनिट तक डया पर रखना चाहिए। उसके बाद फिर अच्छी तरह राड़ पर साफ करना चाहिए। इन ािंध में कच्ची सारजयों का सलाद यनाना सुरक्षित है - इलजम पाले यह एक समय अगली कद माना जाता था जिसकी ग्राज संती की खध पदार्थ के रूप ६७ जाती है। यह प्राज कदमूल पर्धाि में पादरणीय स्थान रखता है। कई प्रकार के शलगम होते है जिनमें स्वीड नामक शलगम यहत रुचिकर होता है। याप इसमें माडी नहीं होती तथापि यह काचौहाइड्ट भोजन है और मधुमेह रोग के लिए यहत लाभदायक है। वहत से भोजन बनाने वाले पुरुष मार स्त्रिया शलगम के कद को केवल पकाती है और ऊपर के हरे भाग अथवा पत्तियों को फेक दंती है । कद मूल नार पत्तिया दोनों से उत्तम पोषण मिलते है। कद मूल और पत्तिया दोनों को मिलाकर एक भोजन समझना चाहिए। पालक के समान दूसरी पत्तियों को तैयार कर के कद मूल के साथ खाना चाहिए। । TURNIPS Percentages of the total energy prolen qulcium phosphorus and Ion needed per mon per day which would be hurtighed by one pound of furnips .38 ENERGY PROTEIN. . 29% CALCIUM PHOSPHORUS IRON 11% 9% हम प्राय इसके विषय में उपहास करते सुनते है "शलजम से लाद निचोड़ कर निकालना". लेकिन इस सब्जी पत्तीस कोई दूसरी यस्त निचोड़ कर निकाली जा सकती है जो बढ़ने वाले जीव के लिए लाभप्रद होता है । जितनी ही पती बाली सब्जिया है उनमें शलगम की पत्तियों में कलशियम की मात्रा पाहत अधिक है। इन पत्तियों के रस से तैयार किया हया कच्चा ताजा जुत बढ़ने वाले बच्चों और उन यक्तियों को देना चाहिए जिनकी रीड्डयाँ, दातों नया मास ततों में कैलशियम का अभाव है। इसके अतिरिक्त साडियम, लोहा और पोटाश की मात्रा भी इसमें अधिक होती है । इसलिए शलजम का रस यदि प्रचुर मात्रा में दिया जाय तो शरीर का रक्त क्षारयुक्त होता है और पिप कर इसके रसमें गाजर और सैलेरी या जुस मिलाने से। जय यह जस कामल हड्डीको कड़ा बनाने के लिए उपयुक्त किया जाता तम इत्तम से आवश्यक मंगशियम प्राप्त करने के लिए लेटस का जूस मिलाने ६८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदर उपाय से लाभ होता है। यह मिश्रण दांतों को पृष्ट बनाने के लिए बहुत हितकर समझा जाता है। पत्तियों के साथ अधिक से अधिक शलजम खाइए। संलरी पश्चिम देशों में सेलेरी जैसा प्रचलित है ईसा भारत में नही । जब कभी अच्छी सैलरी की गड्डी मिल जाए और मन प्रसन्न हो जाए तो वे खाते है । इसको साधारणतया कच्चा ही खाया जाता है। इस प्रकार कच्चे खाने में कछ सकेत की बात का पता लगा सकते है अर्थात् अधिकार हरी सब्जियों से पौष्टिक, पोषक तथा ग्रारोग्यकर गुण तभी प्राप्त कर सकते है जव उन्हें बिना पकाए कच्चे खाए जाते है । सेलेरी को खाने से उसका गुण प्राप्त होता है। यह सब्जी संधि-प्रदाह रोन के उपचार के लिए अच्छा होता है क्योंक इसमें कलशियम की तुलना में जैव-सोडियम की मात्रा बहत अधिक ई । कल. सियम और सोडियम का अनुपात १.४ है । संधि प्रदाह में जोड़ों के पास अजब फलाशयम की जमावट होने लगती है। जब सोडियम, घने और ममनासयम को ट्रीवत रूप में रखता है और संधि-प्रदाह के जोडों के पास जमावट होने की प्रवृत्ति को रोक कर राहत पहुंचाता है। सेलेरी के इस गुण को प्राप्त करने के लिए उसे प्रचर मात्रा में खाना पावश्यक है--सालाद के रूप में खाने के समय इसको एक दो टकडे खाने की अपेक्षा बहन प्रधिक खाना चाहिए। यदि संधि प्रदाह की चिकित्सा के लिए इसको उपयोग करना हो तो ताजे जूस के रूप में लेना चाहिए। और भी अच्छा होगा जब सेलरी के रस में गाजर का रस यरायर मात्रा में मिश्रण किया जाए। इस मिश्रित जस का दो प्रयवा तीन पिन्ट दिन में पीना उचित है। नगमायन जधापन को लोग इसलिए अच्छी तरह जानते है क्योंकि यह श्रृंगार तया भोजन को स्वादिष्ट बनाने के काम में आता है। इस घरल साधत हो सजी के अन्य गण है जिन्हें हम नहीं जानते । इनमें पांच संबंधी नया पष्टिक शक्ति पढ़ाने की पांच है जिसे साधारणतया पहचाना नहीं जाता। मिश्लपण से यह पता चलता है कि इनके कई तत्वों में लोहा, क्षारीय खनिज सपा पिटामिन भी है।

खध पदार्थ के रूप ६९ हाल में लोगों का ध्यान अजवायन की और इसलिए ग्राषित हव्या है क्योंक जव इसे सलाद में उपयोग क्यिा जाता है तब इसमें से स्वाभाविक रूप स जंव पोटोशयम प्राप्त हाता है। युरोप और अमरिका के कछ चिकित्सा सस्था जस दवारा रोगियों को चिकित्सा करते है। रोगियों को विभिन्न प्रधि तक केवल सब्जियों प्रार फलों के रस दिए जाते है। इन्ही अस्पतालों में गाजर, लेटस सेलेरी तथा पालक के रस साथ अजवायन या जुस मिला कर गर्द. पित्ताशय, तथा मुत्राशय सबधी शिकायतों की र्चािक्त्सा की जाती है। एक अधिकारी ग्राख के अल्सर तथा ग्राख के अन्य रोगों के लिए इसका (रस) गणकारी यतलाते है। कच्चा अजवायन का जम यदत सारकृत होने के कारण वहत प्रभावशाली होता है इसलिए इसको एक या दो ब्रांस से अधिक मात्रा में उपयोग नहीं करना चानिए। इसे उन सब्जियों के जस से मिला कर पतला करना चाहिए जिनके साप इसका मिश्रण होता है। . प्राल इन जगत के लोगों के आहार में आज कल पाल का महत्वपूर्ण स्थान है । इसलिए कोई आश्चर्य करता है कि प्राचीन काल के लोग जो माल नही उपजावं थे उनके याहार किन खाद्य पदार्थों से बनता था। सर वाल्टर रेलेह के पहले इगलंड के निवासी इसको नहीं जानते थे । उसने अदन की बारी के उस नामी पंड के समान अपने देश के लोगों को उस पाल के भले बुरे का झान दिया। पाल को डेनमार्क निवासी खद्य विशेषज्ञ, डाक्टर हिंधेदी दवारा एक उत्तम दर्जे के खाद्य पदार्थ के रूपर्म प्रमाणित किया गया है । उसके विषय में उसने जिन वातों का निरीक्षण किया और जिस निष्कर्ष पर पहचा उसका कोल. विया विविद्यालय के डाक्टर रोज दवारा समर्थन क्यिा गया है । उस विषय में जो अनुसधान किए गए उससे यह मालूम होता है कि खध पदार्थों में पाल् प्रथम स्थान रखता है। यहाँप यह एक सब्जी है तथापि इसमें प्रोटीन की मात्रा अधिक है और जीवन व रक्षा के विचार से इसका मूल्य बहत अधिक है । यदि प्रति दिन इसे तीन पांड खाया जाए तो शरीर के लिए जितने प्रोटीन की अावश्यकता है उसको पूर्ण रूप से पति की जा सकती है। यह भारत - ७० स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय के लिए यहत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहा यही सहन से प्राप्त होने याला एक खध पदार्य है। वास्तविक लाभ के साथ पाल अन्न धान्य है। वह चावल का स्थान ल सकता है क्योंकि यह चालिस गना क्षारीय तत्व जैसे सांडा और पोटास प्रदान करता है ये क्षारीय तत्व अधिक अम्ल की स्थिति का नियत्रण करते है। माल में चुना का प्रभाव है इसलिए इसको हरी पती थाली सम्जियों से मिलाना चाहिए। माल को मास के साथ मिलाने की जो साधारण प्रादत है यह खराय है जिनका परित्याग परना चाहिए। दसरा उपयांनी तत्व अन्वेषण क्यिा गया है सो यह कि इसमें एटिस्को. pratce sul picofeta (antiscorbutic and antincuritic) foreta की प्रचुर मात्रा है। इससे पाल का शोरवा या लपसी को उपयानिता सुचित राती । नवजात बच्चों के यंत्रम भोजन में सतरा न देकर माल का शोरमा या लपसी देना चाहए। छोटे छोटे बच्चों को भी माल का शोरवा या लपती देना चाहता भारत के उन स्तयों में जम ग्रात् प्राप्त होना शौठन होता है तब मुले प्राल का उपयोन परना चाए । पाल को सुखा कर रखा जा सकता है।

७१ जो परते-पक्ते सुख जाए। मनुष्यों के प्रोटीन के प्रभाव को इन फलियो ने पूरा किया है। इसमें ४० प्रति. (मादी) प्रोटीन जैसा इसमें भी प्यूरिन (मित्की) की मात्रा यरत होगी। तथापि दो विशेष कारणों से यह अधिक प्रचलित नही हो पाया मत लोगों के लिए यह रुचिकर नहीं है। इसे रुचिकर बनाने के Hिएमा tent से तैयार करना पड़ता है। अभी तक तो खाद्य उद्योगयारखाना THI कारखाना में ला से सुरक्षित करके दयाय दवारा री पगागा जाता। सध पदार्थ के रूप अपरिपक्व माल, अंकर निकलं. जमीन के उपर बढ़ने के समय धूप खाए न्याल के विषय में एक चेतावनी की वाव कह देना चाहता हूं कि उनके उपयांन से शरीर में विष का प्रभाव हो सकता है। ऐसे साल में कपित करने वाले विधाक्त पदार्थ रहते है जिसको सोलनिन करते है। कछ स्थानों में लोग छांटे कच्चे अपरिपक्व माल पसद करते है लेकिन वास्तव में बड़े पाल ही अच्छे होते है। चूल्हे में पाल को संक कर पकाना ही सब से उत्तम तरीका समभा जाता है। उन्हें चूल्हे से निकाल दिए जाने के बाद छिलके को फटने के लिए जोर से दाना चाहिए जिससे उसके भीतर का पानी निकल जाए। माल के छिलके को निकाले विना उबालने से प्रांटीन यार खनिज तत्य सक्षित रहते है लेकिन उसको उबालने के लिए उतना ही पानी देना चाहिए माल को तैयार करते समय यदि छिलका हटा दिया जाए तो उसे ठंड पानी में डालने की अपेक्षा खालते हए पानी में डालना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से उसके खाद्य तत्व सुरक्षित रहते है। जिस पानी में पाल को उपाला जाता है वह मोरवा के लिए वहत मुल्यवान होता है क्योंकि उसमें पकाते समय प्रोटीन और निज घुले रहते है। सोया बीन्स सोया बीन्स की खेती ग्राज से चार हजार वर्ष पूर्व की जाती थी। उस समय चीन में इसकी खेती जाती थी। पूर्वीय देशों के करोड़ों असहाय एवं दीन दरिद्र सत प्रोटीन, अल्प मात्रा में माडी, २० प्रतिशत चर्स और चुना गया पिटामिन और 'वी' भी है । इसकी रासायनिक प्रतिक्रिया क्षारीय ई लेकिन सभी सारगृत पाचनाम्या के समय यरिक एसिड में परिणत हो जाते है। यद्यपि इसे मनुष्य के भोजन के उपयोग के लिए समर्थन पिणा जागा ॥ दयारा इसको सोचकर यनाने में सफलता प्राप्त की। इस were . उपकरणों - घर में इसे पकाना अमी नक एक मगाया mr. rulfri .

છર
स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय
1
यिधि या पालन करना पड़ता है। चीन देश की प्रचलित यांध अनुसार जल
में का समय इयानं फ याद मनते है। इसे पकाने का एक प्राधानक तरीका
है- दस घटे तक १० प्रतिशत नमक के घोल में डया पर रखना याचा घटा
सफ धीरे धीरे उयालना फिर भनना ।
दसरा उपाय उसे उक्त तरीके से प्रकराना जैसा दाल को कराया
जाता । कर पार दोनों को खाया है।
उसे पका कर कोमल करने का सबसे उत्तम साधन दवाव दकर स्टीम
ककर का उपयोग करना।
सांया बीन्स एक वनस्पति प्रोटीन भांजन है। यह प्रोटीन मास मछली
मुगी मार पडे के पर प्रोटीन के समान है। दसरे भोजन के समान इस वनस्पति
प्रोटीन को कछ कम खाना चाहिए । इस प्रोटीन को सदा नहीं खाना चाहिए।
इन बात का पुष्टिकरण सयुक्त राज्य अमेरिका ने किया है। उसने परमों को
भाजन देकर परीक्षा की है। इस सोयाबीन्स के प्रोटीन का प्रभाव वसा दिखाई
दता है जैसा क्सि दसरे सार कृत प्रोटीन का है।
क्सिी भी श्रोत से खाने वाले प्रोटीन को सामान्य स्थिति में चोवीस घटे
क भीतर अधिक से अधिक चार मांस तक खाया जा सकता है। अधिकारियों
A
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सांयावीन्स पष्टिकर और परोग्य भोजन है

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स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय छोटे छोटे जड़ों से उनका शोषण नहीं कर सक्तं । पेडो की लवी और छोटी जड खाा खनिज अधिक गहराई से प्राप्त कर सक्त है। इसीलिए फल में से मार लिए खाद्य खनिन निश्चित रूप से प्राप्त होते है। समय आ गया है जय फ्लों को माहार का एक मामूली पदार्थ समझना नहीं चाहिए लेक्नि उसे माष्य के प्राचार के लिए सब से उत्तम पार आवश्यक स्वास्थ्यप्रद भोजन पदार्थ समझना चाहिए। भारत में मांसमी फ्लों के अभाव है । इसके अतिरिक्त जो भी फ्ल पड़ों में लगते है वे यहधा पक्ने के परले ही तोड लिए जाते है या देलों से मार मार वर गिरा दिए जाते है। वे फ्ल जो पके नहीं रहते उनमें पके फलों के स्वास्थ्य वर्धक शरीर पोषक तया सरक्षक तत्व नहीं रहा । ग्राम के मुखिया के सहयोग से यह कानुन बना दिया जाय कि फ्लों को पूरे पके विना नही तोडना चाहिए। पल के वृक्षा र वर आदि भाडिया को लगाने के प्रोत्साहन देने के लिए ग्राभ यान चलाना चाहिए। भारत में ग्राम अमन्द पपीता पेर टमाटर तथा एसे ही प्रय पेड़ पार पौधे पटते है। कछ भागों में पश्चिमी फला के पंड भी अच्छी तरह उगते र फलते है। -- खध पदार्थ के रूप पलाहारी अमेरिका में कछ ऐसे लोग है जिनके आहार में फल, मेवा पांतदार सब्जिया, जैतून का तेल, शहद और कभी कभी कुछ मात्रामें पकाए हए धान्य रहते है। उनके प्रधान ग्राहार में फल ज्यावश्यक हो है। चिना एकाए रहते है। उनके आहार में पशु का मास तथा दालें नही रहती । कालिफॉनिया विश्वविद्यालय का प्राध्यापक जाफा ने कछ लोगों के दौनक याहार का परिणाम निकालने के लिए जाच की। उसने दौनक आहार का पासत इस प्रकार पाया. प्रोटीन ३३ ग्राम (१/५ ग्रास) घसा ५९ ग्राम (२ पास) कार्यासाइट १५० ग्राम (७ १/३ मांस) कए ठोस भोजन में ११ मांस १.५०० कलोरीज रहता है। प्राध्यापक जाफा में पढ़ने वाले एक परिवार के तीन बालकों का विशेष विवरण दिया । इन तीनों बच्चे ऐसा पाहार खाते थे कि सात वर्षा तक उन्होंने अपने स्वास्थ्य को बनाए रखा । उनके स्वास्थ्य की अच्छी स्थिति का कारण क्षारीय खनिज था जो साहार से प्रचर मात्रा में प्राप्त होता था। इन क्षारीय तत्व प्रोटीन उत्तकों (मासतर) के अणों को अकाल ट जाने अथवा नष्ट होने स यचाते है। इसीलिए अधिक एसिड क्षार निर्माण करने वाले आहार पर निर्भर परने वाले व्यक्ति के प्राहार में प्रोटीन की मात्रा में यहत कम रहती है। डेनमार्क का डाक्टर हिदद मार जर्मनी स्थित एफ्ट का डाक्टर सी रायसी ने यह प्रमाणित कर दिखाया कि जो ऊपर के क्षारीय ग्राहकार पर निर्भर परता है पर प्रतिदिन दो प्रोस से कम प्रोटीन साकर अपना स्वास्थ्य तथा सानशीलता को पनाए रख सकता है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए माहार में प्रचर मात्रा में सब प्रकार के क्षारीय खनिज होने चदए । प्रत्येक वर्ष प्रयोगशाला में रिमी नवमी वध तत्व में प्राविष्कार की घायर पो जाती है। इस प्राधिकार का उत्पादकों द्वारा विज्ञापन के उददेश्य से अभिमान चलाया जाता पे अपने विज्ञापन में यह ययता दिखलाने कि इन ना प्रवियत सहा तत्व या विषया अथवा शर्वन के रूप में लें। इन वा प्रांय. पियों को प्रसल यात तो यह है कि शरीर को सभी तस्य पूर्ण रूप में प्राप्त करने के लिए साधारण प्रानिक आहार खाना पड़ता है जिसमें सब्जिया. पल, मेवा (पलिया) नपा पूर्ण अन्न अधिक महत्व पूर्ण है। उन्दीनं संरक्षक पोपाहार प्रान्त ...... राता।

स्वास्थ्य के प्रयांग सिद्ध उपाय टमाटर यहत से लोगों ने टमाटर को अपने ग्राहार में इतना शीघु और विस्तृत रूम से अपना लिया है कि यह सब्जियों में प्रथम स्थान लेने के लिए ग्राल से होड लने लगा है। इसकी बनावट और तत्वों के विचार से यह सब्जियों की अपंक्षा फ्ला में श्रेणीवध क्यिा जा सकता है। फलों के समान इसमें क्षारीय खनिज और विटामिन ए वी और सी की मात्रा अधिक है। किसी भी रोग को चगा करने के गुण होने के कारण इसकी भैषज्य रयाति प्राप्त है। इसका यह मतलब है कि इसका पर्याप्त मात्रा में खाने से विटामिन के प्रभाव से जो रोग उत्पन्न होता है उसको न केवल अच्छा करता है अपित उसे हाने नहीं देता। स्ववीं (प्रशीताद) एक रोग है जो प्राहार में विटामिन सी के अभाव से उत्पन्न होता है। बच्चों में इस रोग के लक्षण दिखाई देते है वह पीलापन दिध में रुकावट भुक नहीं लगना शरीर भार घटना लाल सूजे हए मसूड़ो से रक्त का सहज से साव होना सिसक सिसक कर रोना और मुखडे में चिन्ता की छाया पड जाना। वयस्कों में इस संग के जो लक्षण होते है वे ये है-शक्ति का हास चेहरे म उदासीनता मसूड़े से रक्तसाव सास जल्दी जल्दी चलना पैरों में पीड़ा त्वचा में लाल धब्बे पार इन धब्बों रक्त का अल्प मात्रा में सान होना। इन की सब से उत्तम चिकित्सा टमाटर का रस अथवा दिन में ४ से ६ प्रति पूरे टमाटर का प्राटार करना । स्तनपान करने वाले बच्चों को विटामिन तीन महीने के बाद दिया जा सक्ना है। कच्चा टमाटर का जुस निचोड कर देना चाहिए। पहले छोटे चम्मच से दिन में दो चम्मच देना चाहिए इसके बाद धीरे धीरे मात्रा को बढ़ाना चाहिए पार नीन महिने के याद दिन में पूरे ६ छोटे चम्मच से देना चारिए । टमाटर का रम देने से बच्चे के शरीर में कछ ताप चढ़ सकता है पर इससे नही प्रय डाना चाहिए क्योक काय दिनों के बाद वह टीक हो जाए। टमाटर के जुस में पाषणाभाव जनित रोगों को दर करने की शक्ति वटा मन ए और वी अतिरिक्त इनमें चिविरमा सवधी तत्व प्रचर मात्रा मरान है जैसे पोटोशयम साटियम लाशयम और लाहा है। इसमें सिांटक सध पदार्थ के रूप एसड और मलिक असिड लगभग ०५ प्रतिशत है जब कि प्रासंलिक एसिड कवल १०००० भाग में केवल ०५ हैं। नीव यह फ्ल केवल अपनं जूस के लिए सम्मान पाता है। उसके पद्दत उपयोग है तथा उसका बहत मूल्य है। नीयू के रस में ७५ प्रतिशत सिट्रिक एसिड रहता है और २ से ३ प्रतिशत पोटाश पार फासफोरस है । पहत वर्षों से नीयू पोपणाभाव जनित रोगों को चना करने तथा नियन्त्रण करने के लिए वहत मुल्यवान समझा जाता है। पोषणामाव जनित रोग को नियत्रण में रखने की शक्ति क्सि तत्व में है इसका पता लग गया है। इस तत्व को सी विटा मिन करते है। यह विटामिन एक बहुत छोटा एसिड-तत्व है जिसको एसको बिक एसड नाम दिया गया है। नीव का पोर्टोशयम एक दूसरा तत्व है जिसका बहुत अधिक मूल्य है। यह स्वास्थ्य रक्षाके विचार स उतनी ही शक्तिशाली है जितना विटामिन सी है। पोटोशयम एक क्षारीय खनिज है। यह तत्व नीव का महत्व बढाता है क्पोक शरीर के ऊतकों में सचित करने के लिए इससे क्षार प्राप्त होता है। "ठिया मथा एसिड से दपित संग की चिकित्सा के लिए वार यहत गुणकारी समभा जाता है। फासफोरस नए मास तत की पदिय और विकास में के मदद के लिए वहत "मावश्यक तत्व समझा जाता है। यह शरीर के मास ततनों के भीतर की जारण प्रिया को उत्तेजित करता है। नीच का सिटिक एसिड बहन शक्तिशाली जीवाण नाशक प्राधि समझा जाता है। यह फोगणना को नाश करता हूँ पर मास तत के लिए हानिकारक नही है। इसीलिए नीबू का जूस पानी में मिला कर अथवा बिना पानी मिला र जैसी मावश्यकता हो बाहर या भीतर दोना का उपयोग क्यिा जा सक्ता है। उपयागी तयों का संग्रह और स्वास्थ्यवर्धक तथा नौराग्य करने के गुणों के कारण नीव को भारत के राष्ट्रीय उपाहार में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। मातियाविद पार का घाव मसूड़ों का पक्ना तथा फलना दाद और उदर राने के लिए दसरे फलों के साथ नीय या रस मिला कर चिकित्सा करने का अच्छा परिणाम मिलने की रिपार्ट प्रमरिदा से ज्या रही है। नीयू के रस में जो प्रारोपकारक तत्वों का प्रभावदायी मिश्रण है उसे न क्वल पान लाम हाता है लकिन यह यहत सरल घाल चिकित्ता है। भारत की यात सी बीमारियों की समस्याओं को सुलझाने के लिए भी का अधिक सध्ययन तया ध्यापक रूपसे उपय साना चाहा । किसी दिन जय इसका ७८ स्वास्थ्य के प्रयांम सिदध उपाय उपयोग लोग समझ जाएंगे तो यह पता लग जाएगा कि नीयू में प्रकृतिने प्राकृतिक चिकित्सा का गुण प्रदान क्यिा है। यह अपने पाराग्यकर एवं संरक्षक गुणों के लिए पार भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करेगा क्योंकि यह यहत सलम पार सस्ता पर छहारा प्राद कलांती के विचार से खजूर या पॉष्टिक मूल्य यात अधिक है- इसके प्रत्येक प्रांत में ६८.४ ऊजां उत्पन्न करने वाली शक्ति है। इस निहित उर्जा या मल्य साधारण शक्कर में (ग्लुकोस में) है। खजूर में लनमा ७० प्रतिसत अपयर ई । इस डेक्सट्रांस अथवा सजर का शक्यर साधारण शक्कर (मने से पते) से भिन्न होता है। उससे इस यात में मिन्न है कि वह शरीर के सय उत्तको (मांन नंतनों) र उसको आवश्यक्तायों के अनुकूल है अपांत के उत्तक सध पदार्थ के रूप ७९ उसको ग्रहण कर ल है क्योंक यह शरीर का प्राकृतिक ईधन है । इस प्रकार की सक्कर पक्न की प्रक्रिया के समय पकी रहती है प्रतएव पद शक्ति के लिए उपयाग में लान र शीघ शापण करन के लिए मार रहता है। दसरी महत्वपूर्ण यात यह है कि खजू की शक्कर में दसरे यावश्यक पापक वत्वों जैसे चूना लोहा प्रोटीन तथा विटामिन स्वाभाविक रूप मिश्रित रहते । वजन के यरावर खजूर में मास से अधिक खाध लोहा रहता है। इस प्रकार पाई सध तत्वों का मिश्रण करके सतुलन रखना प्रकृति का नियम है जा स्वास्थ्य वृद्धि के लिए सर्माचत पोषण देता है। इसके विपरीत नन्ने से पनी शक्कर अप्राकृतिक सारक्त मीठी वस्तु है जो पाचक पार मलोत्सर्जन करने वाली इंद्रियों में एसिड के समान वस्तु उत्पन्न करती है। इसी कारण यदि उस की शक्कर को सदा प्रचर मात्रा में खाने से मामासय में विकास होता है तथा अधिक एसिड होता है। इस शक्कर से कारण मधुमेह होता है। इन बातों का विचार करने से यह स्पष्ट मालूम होता है कि खजूर एक पुष्टिकारक तथा बद्दमोल साष्टा है और शरीर को ऊजां (शक्त स्फति) देने नया जस की शक्कर का स्थान लेने के लिए उतम सांत हैं। इसे जितना चाहे' उत्तना खा सकते है । इस से कुछ हानि नही पहच सक्ती । मंचनीकाफ्ने मात के कीटाणों की प्रकृति प्रवृत्ति में परिवर्तन लाने के लिए सब से पहले खजूर के उपयोग की सलाह दी थी ! इस साधन से विधाक्त सड़नेवाला जीपाण दर जाता है और एसडोफिलस जीवाणु पनपते है । सडनं वाले जीवाण से प्रार में पनप नही सक्त जहा खजूर ग्रादि प्रचर मात्रा में प्रयोग किया जाता है पर खजूर खाने से आत में मित्रवत जीवाणु वृदिध पाते है। जितने अपचन की शिकायत से प्रष्ट पाते है उन्हें प्रचुर मात्रा में खजूर साने की सलाद देनी चाहिए । खजूर को खाने के पूर्व अच्छी तरह धो लेना चाहिए क्योकि यपि के ऊपर से बिल्कल साफ दिखत है पर वे बहन ले रहते है। उसके ऊपर के कड़े छिलके को निकालने के लिए गर्म पानी में कछ देर के लिए डाल दीजए जिससे उसके छिलके ढीले हो जाने पर उसे सहज से हटाया जा सक्ता है। अधिक खजूर खाइए। - प्राणीजन्य पदार्थ ए सी मॅक्ल एम०डी० M हम सब लोग दध पीकर अपना जीवन का प्रारभ करते है । वह नवजात बच्चों का एकमात्र पूर्ण भोजन है । पढने वाले यालक को दध दिय के लिए पावश्यक पोषण तत्व देता है। प्रकृति ने एक सतुलित आहार के रूप दध की योजना की है जो सर प्राथमिक पौष्टिक तत्वों की पत्ति करता है। नवजात पालक के लिए माता का दूध और बडे होने पर कछ परिवर्तन किया हया गाय का दध देना चाहिए । अनुभव और परीक्षणों ने सारे जगत के लोगों को दूध के विचित मूल्य (गुण) का ज्ञान का सिखाया है। लॉर्ड लिनालयगो भारत के वायसराय थे। उन्होंने शिमला की अपनी पकृता में दध के विषय में अपना विचार प्रकट किया था 'यह विज्ञान का सत्य है। इसका कोई खडन नही कर सकता कि पढनेवाले पालक के लिए प्रचुर मात्रा में दध देना उसके याहार का एक व्यावश्यक पोष्टक श है। इसमें थोड़ी सी भी प्रासका की बात नहीं है कि जीवन के प्रारीभक काल में पौष्टिक आहार देना पिछले जीवन के लिए हष्ट पुष्ट शरीर बनाने के विचार से परत आवश्यक है। मुझे अपने देश (पटन) में महत सावधानीपूर्वक परीक्षण किए गए परिणामों को सक्षेप से बतलान दीजए 1 इस परीक्षण ने यह दिया दिया कि पढ़नेवाले लड़कों के दर्दानक साधारण ग्राहार में एक पिट दध प्रत्येक लड़के का ३ ८५ पांड मजन को पढाकर ६६८ पांड कर दिया और उनकी १८४ इच प्रोसत ऊचाई को २६३ इच यदा दिरा ।' - भारतीय ग्रार निमिप हाने के कारण गुणकारी प्राटीन पर्याप्त मात्रा में देने का प्रश्न पड़ा जरूरी प्रार महत्वपूर्ण हो गया है। इन दशा में दम का छोड़ पर पोई दसरा पदार्य नहीं है जिससे सनांप जनफ प्रोटीन प्राप्त हो (८०) प्राणीजन्य पदार्थ ८१ सकता है। असल परीक्षण ने यह प्रमाणित कर दिया है कि दध से जो प्रोटीन प्राप्त होता है वह मास के प्रोटीन से बढ़ कर है। इस यात महत्त्वपूर्ण अन्वेषण के विचार से यह स्पष्ट हा गया है कि भारत में अन्य बस्तनों को अपेक्षा गाय तथा भैसों के पालनं को मोर लोगों की तंच को बढ़ाना चाहिए। अमेरिका के लोगों के ग्राहार के सवध में लिखते हुए मक कोलम यह बतलाते है कि हम लोग अपने ग्राहार से मास को पूर्ण रूप से निराकरण कर दे तभी उसका कोई बुरा प्रभाव हम लागों पर नहीं पड़ेगा लक्नि यदि वयस्कों के आहार से दध की मात्रा क्म की जाए तो हमारे राष्टीय क्षमता इसके कारण प्रभावित होगी । अमरिका में प्रत्येक प्रादमी वर्ष में ०५२ गेलन दध पीता है। इसको यदि भारद से तुलना की जाए तो कितना अतर होता है जहा वर्ष में एक पादमी ६५ गैलन पीता है अथवा दिन में तीन ग्रांस से क्म फम पीता है। भारत के एक व्यावसायिक नगर के एक अनायालय के प्राहार चार्ट का देखा गया है । यहा के वृद्धि तथा विकास होने वाले वालकों को प्रति दिन फेवल तीन बड़े चम्मच से दप दिए जाते है । यह क्या ही प्राजीवन का द, खात घटना है ! माद एक पाय या आधा सेर दध अमेरिका के दौनक आहार से फम कर देने पर उसका स्वास्थ्य और शक्ति हासोन्मुख होती है तो भारत की जन सरया की क्या गति होगी जहा प्रत्येक प्रादपी को दीनक तीन पोल से भी कम दध मिलता है? उसके अनाथ यालकों की त्या क्या होगी जिनको प्रतिदिन जीवन के नितान्त आवश्यक तरल पदार्थ व काल तीन ही चम्मच मिलने का सौभाग्य है। 1 सर रापर्ट मेक्योरसन ने इस प्रकार लिखा है याद ग्राहार में दध से उत्पादित पदार्थ की मात्रा पर्याप्त हो वो मास खाने की प्रावश्यक्ता नहीं होगी एक या डेढ पाय दध से कम नहीं होना ही पर्याप्त मात्रा है परत भारत के इमे गिने बालक को इतनी मात्रा प्राप्त कर सक्ने का सामाग्य कहा। वर्तमाा समय में भारत के मासाहार के लिए सब से अधिक प्रावश्यक्ता है विशुदध दध की अधिक मात्रा में उत्पन्न करना है क्योंकि इससे पढ़ कर पाई दसरा अधिक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ नहीं है। ऐसा कोई पदार्य नहीं है जिस पर जन साधारण का स्वास्थ्य अधिक अवलवित रह सकता बढ़ती हई पीढी के लोगों के कल्याण के लिए विशुदध दध क्तिना महत्वपूर्ण है हम बात को ये पाप मममें और दूसरों को सममाने की कोशिश करें ८२ स्वास्थ्य के प्रयोन सदव उपाय 1 भारत की जनसरया को दप से उत्पादित पदार्प दध के वितरण के विषय में दसरे देश के समान ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।" दप के विषय में कोई नई यात प्रयास में नदी पाई है। इस विषय में नई यात यही है कि इसको केयल लायर्याप्रय बनाना पायनिक प्रयास नही है पर प्रभावदाई साधन नार यज्ञानिक रूप से उत्पादन यार वितरण पारा लोनों को उपलब्ध कराना है। दध नाहार यार अधि के रूपर्म क्यों इतना लाभप्रद सममा जाता है इस पात का प्राचीन यज्ञानिकों की अपेक्षा प्राधानक यज्ञानिक विस्तारपूर्वक समझे सक्त है। इस पात को स्मरण रसना चाहिए कि अच्छी तरह सिलाई गई स्वास्थ्य गाय से पिसदध और ताजा दध का मूल्य अधिक होता है 1 मानव जाति को अधिक दध की आवश्यकता के साथ साथ गाय को विवेकपूर्णता के साथ साल धानी बरतने की इच्छा रखनी चाहिए और समझ को भी यहत अावश्यकता है। उयालने पार जीवाणहीन करने की विधि से दप के मालिक मिश्रण में अवश्य कछ पहत परिवर्तन होता है लौकन भारत में दप को जीवाणहीन करना परम आवश्यक है इलिए उबालन नार जीवाणहीन करने की विधि दयारा जो पोषक तत्व नाश हो जाते है उन्हें पूरा करने के लिए अपन याहार में कच्चे फ्लों तथा हरी पत्तीवाली सब्जियों की मात्रा बढानी चाहिए। कई प्रकार के दध के सूखे पांडर प्रथया सूख दध की बनाई हुई चीजें बाजार में मिलती है। अमेरिका, कनाडा अथवा यास्ट्रोलया की अच्छी खिलाई पिलाई गई मोटी ताजी गायों के दूध को विभिन्न रूप में परिवर्तन करने पर भी उनके गण की स्थिति अच्छी रहती है । जय उन सूखे दूध में आवश्यक मात्रा में पानी दिया जाता है तब वह (सूखे दघ) पूर्ण दध के रूप में सब उद्देश्य को पति कर सकता है। दध में साधारण नमक नहीं डालना चाहिए क्योंकि पेट में उफान तथा याय रोग उत्पन्न कर सकता है। इसमें शक्कर डालने की अपेक्षा शहद डालना मच्छा होता है। दध को घुट घुट कर पीना चाहिए और लार से मिलाने के लिए मुह चयाना चाहिए। ऐसा करने से पेट में दही के बड़े बड़े कड़े देले नही जर्मने । वयस्कों के लिए दूधका सब से अधिक मूल्य उसी समय होता है जब उसको पुरक के रूप में प्रयोग किया जाता है अर्थात यह दसरे सद्य पदार्थों के प्राणीजन्य पदार्थ मुल तत्वों को पूरा करने के लिए उपयोग क्यिा जाता है विशेषकर सब्जियों मूल तत्वों को । भारतीय शाकाहार प्रभाव होता है। इस अपूर्णता को केवल दध तथा दध से बनी वस्तुओं की प्रचुर मात्रा से पति की जा सक्ती है जैसे दी पनीर। कछ उच्च वर्ग के प्राणियों की तरह बकरी का स्वभाव दो मुख वाला होता है-भला र पुरा । पुरे स्वभाव के विषय में काले घोस्ट ने बल देकर कहा है कि वह लोक क्या सत्य है जो यह दावा करता है कि इंतान ने बकरी को बनाया। उसने लिखा है यह ससार के जगलों का नाश करनेवाला हानिकारक जीव है। भूमध्यसागर के चारों ओर का देश सभ्यता का पुराना केन्द्र है। इस सभ्य जगत के जगल का विनाश उसके पर्वतों के नगेपन की स्थिति जो अवश्य प्रभावी परिणाम है तथा वाय की जो शुष्क्ता हुई है सभी इसी पश के दवारा हुई है। इस यात की सत्यता को हर एक मनुष्य मांटर गाड़ी में बैठ कर भारत के रास्ते पर यात्रा करते समय सड़क के दोनों ओर देख सकता है। बकरी जिनको नाश नही करने उनको उनकी रखवाली करने वाले चरवाहे घरवाद करते है। इस प्रकार कितने ही उपयोगी छायादार पंड नष्ट कर दिए जाते है। अधिक उपयोगी वात पतलाने तथा उस पर पल देने का भार महात्मा गाधी पर रहा था। जिस प्रकार छाता श्री चयरलेन से साधत है उसी प्रकार जन साधारण के मनमें बकरी का दूध श्री गाधी से सर्वाधत है। यवरी का दूध पाध्कारक है और यह दावा किया जाता है कि जिन व्यक्तियों का पोषण प्रभाव है ये बकरी के दद्ध को सहज से पचा सक्त है। यह बात कछ ही व्यक्ति पर खट सकती है । यह सर्व व्यापक नियम नहीं हो सकता । गाय के दूध से जैसा मक्खन और पनीर बनाया जाता है वैसा इस दध भी सभव हो सकता है। बकरी के दध को उपयोग में लाने के पूर्व उसको जीवाणहीन करना चाहिए क्योंकि गाय के दध के समान इसके दध से रोग सक्रमण होते है । एक प्रकार का धुरसार जिसको प्रग्रेजी में अनड्ब्लेंट ज्वर कहते है बकरी के दध से माय के दध से और समर मास खाने से होता है। सौभाग्य की बात है कि जीवाण होन करने की विधि प्रयवा उबालने से दध के सक्रमण होने के खतरे से बच । सकते है।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपय वक्री को 'दरिद्र यादमी का गाय कह गया है और इसलिए यह भारत में सचमुच बहत उपयोगी समभा जाता है। बकरी का मूल्य कम होता है जिसको सभी मोल कर स्वास्थ्य और बल का यावश्यक तत्व प्राप्त कर सक्त है । नीचे दिया गए विश्लंघण से बकरी का दध गाय के दूध में कितना समता एव अंतर है व स्पष्ट होता है। जल ठोस पदार्थ ची कसीन प्रोटीन शक्कर खार कल कलारी प्रति असि ४७००७ १८ गाय ८७८० १२२० ३४० २७० ३४० २० ४३००८ बक्री ८६३० १३७० ग्रड दो कारणों से मनुष्य के याहार में अडा बहत व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। पहला कारण यह है कि वह यहत सरलता से प्राप्त हो सकता है और इसे पकाने में यहत सहज है अर्थात् यहत जल्दी पक जाता है । पजार में रेल यात्रियों ने इसको अवश्य ध्यान दिया होगा कि प्राय प्रत्येक स्टेशन के प्लटफार्म पर उवाले हए अड़ों को बेचने वाले रहते है जो तत्काल खाने के योग्य होते है । यह खाद्य पदार्थ दनिया के किसी भाग में कच्चा उवाला हया पोच क्यिा हया भूना या अथवा ग्रामलेट के रूप में सहज से मिल सकता है। विदेशी भाषा के बीच में भी माँ के समान अावाज करना और अपनी अगलियों को आर्ड के रूप में बनाना एक भाषा है जिसको सभी जगह के लान समझत है । इस सार्यातक भाषा के दवारा प्रापको निस्सदेह मनोवाछित यस्त प्राप्त हो जाती है। अंडे का लोक प्रिय होने का दसरा कारण यह है कि ग्रडा पीक विचार से यान उच्च दर्जे या सद्य पदार्य और सज से पचता है। ये यात लोगों के मनमें धीरे धीरे यंटती जा रहाई पीक ग्राहार के विषय में जो पिचर लोगों के मनमें घर कर गया था उसे व यदलना पड़ा। नडे के जदी अपमा पीला मार में ही असल रूप में अईया पाष्टक मूल्य है। इनमें कई उपयोगी पोषक तत्व है जिनमें चूना लोहा जीवन सत्व ए यी प्राणीज य पदार्थ ८५ चीर पार डी भी सम्मिलित है। ये सच तत्व दो बातों पर निर्भर करते है पहला मा के खाद्य पदार्थ पर पार दसरा सूर्य की किरणों से कितनी मात्रा म अल्टा वायतट किरण वह ग्रहण करती है। इसका मतलब यह है कि प्रडे के रूप में ग्रडा दिखाई देता है लेक्नि वह असल में पडा नहीं है। पर्याप्त पाहार नहीं मिलने के कारण यच्चे रि पर दल तथा शक्तिहीन होते है वैसे ही अडों में भी सप तत्व नहीं पाए जाते । प्रार्ड के सफेद भाग के विषय में जो विचार है उसे भी बदलने की अावश्यक्ता है। पंज्ञानिकों ने यह सिदध कर दिया है कि कच्चे अर्ड का सफेद भार प्रचलिव विचार के विपरीत पाचक रसा के द्वारा बुलाया नहीं जा सकता इसलिए वह नही पचता। जिस रूप में वह शरीर के भीतर जाता है उसी रूप में वह पाहर निकल पाता है। इसका मतलब यह है कि अड़े का कच्चा सफेद भाग खाद्य पदार्थ के रूप में अच्छा नहीं है पर विशेष कर दर्बल रोनी मनुष्य और बच्चों के लिए अच्छा नही है। इसको थोड़ा पकाने से पचाने में सहज होता है । इसके विपरीत अडे का पीला भाग चा वच्चा या पकाकर खाया जाए सहज से पच जाता है। - पुरे पड़े में १२५ प्रतिशत प्रोटीन १२ प्रतिशत ची प्रार ११ प्रतिशत निज पदार्थ रहता है। इसमें नाइट्रोजन ची तया फॉसफोरिक एसिड की धक्ता होने के कारण पंट म एसिड उत्पन्न करते है। इसलिए इसको एसिड उपन करने वाले खाद्य पदार्था के वर्ग में श्रेणीबद्ध किया गया है। उसमें एसड उपन्न करने के गण होने के कारण हरी सब्जियों और दूसरे धारीय चार उत्पन्न परने या खाद्य पदार्थों के साथ मिला कर खाना चाहिए । प्राई का टॉस अर्ड को नगर के मास के साथ प्रार अर्ड के साथ भात (चावल) खाना गलत तरीका है। एक दसरी यात और है जिसका पूरी तरह नहीं समझ पाए है यह यह रफ पान से लांगों का प्रडा नही रुचता । ये उसकी ध नही सर सक्त ४ जप कभी ऐसा भाजन परत है जिसमें ग्रडा मिलाया गया है ता वीमार पड़ जाने । पर ये इस यात को नहीं जानते कि सिर में पीड़ा होना जी मचलना धवार साना दमा पार पासर या शिकार बनना सिर में टड ला जाना पारदन स्वचा म फन्सिया का उभरना ग्रान का शोय डाईरया इत्यादि से फिन वारण सहा है। प्रडेसान से उक्त शिकामा उपन्न ती ८६ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय है यह समझना कठिन है। हां का कारण अवश्य हो सकते है। कछ सद्य पदायाँ से इस प्रकार की गड़बड़ी उत्पन्न हो सकती है जिसको अंग्रेजी में एलजी कहते है। उन लोगों के लिए जो अपने ग्राहार में अंडे को सम्मिलित करना नहीं चाहते यह बतला देना अच्छा है कि जितने खद्य तत्व अडे में होते है उन्हें उस पाहार से प्राप्त कर सकते है जिसमें पर्याप्त मात्रा में दध. दध से उत्पादित पदार्य (मक्खन और दही) सब्जियां, ताजे फल और पूर्ण धान्य रहते है । अई में जितना चना (कलाशयम) Bार लोह' की मात्रा है उसकी दसरे पदार्या से तुलना करने से नीचे जो खाद्य पदार्थ दिए गए है ये हिन्द, भाई के लिए दिलचस्प पार महत्वपूर्ण होगा। थोड़ी मात्रा पालक में जिसको एक बार परोसा जाता है तीन या चार अंडे के पीले भाग के परामर लोहा रहता है। उंड़ पाव दध में दस अंड के पीले भाग के परावर घना रहता है। एक असि शलजम के ऊपर भार में चार अंडे के पीले भाग के बराबर बना रहता है और एक आँस सरसों के भाग में छह अंडों के पीले भाग के बराबर चूना रहता है। निरामिष प्रयवा शाकाहारी पाहार को संतुलन करना भारत के उन याहार की प्राधारभूत योजना को जिसमें मास सम्मिलित नहीं है विचार करके हम सर रोबर्ट मेककोरसन के विचारों का उल्लेख करना ही अच्छा समझते है । "उस ग्राहार जिसमें किसी प्रकार के अनाज के साथ दध, दध से उत्पादन पदार्थ तथा हरी पत्तीवाली सब्जियां सम्मिलित हो उसमें न केवल उचित तथा पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन रहता है अपित उसमें जितने शरीर के स्वास्थ्य, शक्ति तथा क्ल्याणकारक जिन पदार्थों की आवश्यकता है सभी रहते -फड, पेज २१ । "फल और वेर जाति की पलिया बसी ही गुणकारी होती है जैसी पत्ती वाली सब्जियां होती है । खाद्य पदार्थों में वे सर्वोतम है। हमारे दौनक पाहार में हलका चहत अश होना चाहिए। उसमें क्षारीय लवण की मात्रा वहत अधिक होती है जो रक्त को शुदध रखती है और उसे अम्ल अथवा खट्टापन होने से रोकती । फ्ल ग्रान को स्वास्थ्य और क्रियाशील बनाने के लिए उपयोगी होते है।" फड पंज ८८ । पष्टिक आहार के इस महान अधिकारी के विचार एवं भारत के अन्य अनुसंधान केन्द्रों से प्राप्त समाचार के निरामिष समुदाय नीचे दिए जाते है। उनके अनुसार पाहार की योजना बनाएं तो संतोषप्रद लाभ हो सक्ता है । सध प्राणीजन्य पदार्थ ८७ . .. एक शाकाहारी के लिए सालत ग्राहार ८ से १० यांस दध ४ से ८ हरी पत्तीदार सब्जिया विना पत्तीदार अथवा क्दमुल सब्जिया ४ दही पनीर अथवा २ अर्ड २ से ताजे मांसमी फल ६ से ८ घर में पिसा गेह चावल अथवा ज्वार याजरी २ मक्खन, मलाई घी अथवा तेल दाल . २ से ३ . पदार्थों की सूची का क्रम उनकी जीवनी शक्ति के विशेषता के अनुसार दिया जा रहा है। खाद्य पदार्थ भारत के मुख्य पाहार है । वे मंह चावल और ज्वार वाजरी सभी अनाज अथवा धान्य खाद्य पदार्थ माडी की प्रचुर मात्रा रहती है अथवा उनमें ताप प्रदायिनी शक्ति रहती है लेकिन उनमें प्रावश्यक खाद्य तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं रहते इसलिए इन तत्वों की पति उन खाटा पदाथों से करनी चाहिए जिनमें ये तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते है । ऐसा नहीं करने स शरीर का सामान्य सरचना पूर्ण रूपसे विकास नही हो सक्ता नार न स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी रह सक्ती है। ग्राहार के ऐसे प्रभाव को सुधारने के निश्चित साधन हे प्रचर मात्रा में पूर्व यतलाए गए वनस्पति तथा दध से उत्पादित चीजों को खाना (जैसे दध. दही मक्खन अथवा घी) ताजे फल तथा गैह के स्थान में चारल अथवा ज्वार बाजरी वापरावर भाग! जीवन सत्व (विटामिन) नीचं विभिन्न जीवन सत्वों के विषय में यतलाई गई बातों को ध्यानपूर्वक मध्ययन परके हम अपने शरीर के जीवन सत्यों के प्रभाव को दर कर सकते है। जीवन सत्व 'ए' यह जीवन सत्व बच्चों के लिए अत्यन्त प्रावश्यक है। यह यच्चों तथा वयस्कों के सामान्य विकास को पनाए रखता है यार सक्रमणों को सकता है।

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स्वास्थ्य के प्रया सिदध उपाय
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केला विटामिन का उतम सांत

प्राणीजन्य पदार्थ ८९ भोजन में इस जीवन सत्वों के प्रभाव होने से पास की दर्यलता की सिकायत होती है, यदना तक जाता है. शरीर भार कम होता. रुच रन्यता की स्थिति उत्पन्न होती है, शरीर में रांग शीघ अाक्रमण करते है तथा श्वासनली का रोग हो जाता है। पूर्ण दध, मक्खन, मलाई, पनीर, कांडलीवर पायल, ताजी ती सम्जिया टमाटर गाजर, शकर कद. हरे मटर, प्राम, पके पपीते. छहारा या खजूर (परमिया का) क्टरल, सतरा, वगाल का चना, सोयाबीन धनिया । जीवन सत्व 'बी' यह जीवन सत्व जीवन के सभी प्राय में स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए परमावश्यक है । इसके प्रभाव से भूख मर जाती है. शारीरिक वृदिय में रुकावट होती है. पाचन तथा पोषण में गभीर रूपसे विकार उत्पन्न होती है, अपच तथा इलामक बृहदात्र प्रदाह होता है, कज, बेरी मेरी स्नाय प्रदाह इत्यादि रोग उत्पन्न 1 होते है। जीवन सत्व 'यी' के साधन-सोत समी हरी सब्जियों के रेशे, टमाटर, कद सब्जिया, मुगफली कछ पूर्ण धान्य, खमीर, चना. सोयाबीन, मूली, चकदर फलगांभी मकरसन निपाला हमा दध का पाउडर, शकरकद मुगी के अतिरिक्त अल्प पराओं के भीतर भाग जीवन सत्य 'सी' इस जीवन सत्व के प्रभाव से मसूड़ों पा रोग (पायरिया) दानों की सड़न प्रामाशय तथा मातों में धुण होना पाचन शक्ति पी दर्यलता चारपागार स्लीप्मक कला (भिल्ली) से रक्तसाप होना स्वचा में लाल चपन था उभरना मादि रोग होते है। जीवन सत्या 'सी' के साधन-सात नीय नारगी (सतरा), अनानास का फल डम्यहा प्रमाद, पपीता, टमाटर (नया, करमकल्ला (यथा गोभी), संजन, (डमास्टक) लेटस, पालक माजयायन, अमरय. संम. हरा मटर फलनोभी शलगम. सफरफद व्यपारस पोज, परंला, तमिचं तथा ती वस्तु खाने पाले पदों के प्रातरिक अंग ।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय जीवन सत्य 'डी' 'डी जीवन सत्व पालास्थिविकृति रोग (सूखा रोग) तथा अन्य प्रकार खनिज के पोषणाभाव रोगों को रोकता है। बच्चे के भोजन में इसके प्रभाव से शरीर करूप होता है और हड्डी के रोगों के साथ पाइरोग तथा अल्पाहार जनित रोग होता है। इस जीवन सत्व के अभाव में पड़ों को गांठया, स्नाय प्रदाह मधुमेह यार मुइटस की बीमारिया होती है। जीवन सत्व 'डी' के साधन सांत अल्टा वायलेट स्पेक्ट्रल किरण त्वचा सूर्य और स्फाटिक पारा (मरक्युरी) के भाफ उत्पन्न करने वाले यत्र की किरण के सपर्क में ग्राने पर रक्त उससे जीवन सत्य शोपित करता है। खाधान्न भी सूर्य की किरण से जीवन सत्व शोषित करके सचित करता है। यह कॉड लीवर ग्रायल अड का पीले भाग, दध से कभी भी प्राप्त होता है । इस जीवन सत्व प्राप्त होने का सब से उत्तम साधन सात स्पेक्टल किरण है। जीवन सत्व 'ई" जीवन सत्य ई स्त्री और पुरुष दोनों के बाझपन की स्थिति को दर करता है। जीवन सत्व 'ई' के साधन-सोत लेटस मास पूर्ण गैर का अकर गोल जई. पर्याप्त मात्रा में दध सुखी प्रलपाल्पा घास। डाक्टर शर्मन के मतानुसार खाद्य सामग्रिया तथा उनके जीवन सत्व ए भी सी खाद्य पदार्य जीवनसत्व 'ए' जीवनसत्व 'मी' जीवनसत्व 'सी' .... मादाम पच्चा संव अलसर शोपा पचा पला पूर्ण पाली x ....

प्राणीजन्य पदार्थ * * - x - खाद्य पदार्थ जीवनसत्य 'ए' जीवनसत्व 'यी जीवनसत्व 'सी' नेवी सेम A XXX सायावीन्स x प्रकरित सेम x xx? लतरवाला ताजा कच्चा सेम XX XX xx पकाया हया लतरवाला सेम xx XX चकदर के कद x चकदर के पते XX x चुकदर की डाली x मंदे की रोटी x पूर्ण गंद की रोटी मक्खन XXX ৮৪ x XX परिवर्तनशील कच्चा बन्द गोभी (करमकल्ला) xx XX XXX चन्दाोभी के ऊपरी भान x XX x ताजा और कच्चा गाजर XX XX पकाया हया गाजर x x x फूलगोभी x सिलेरी की रग ररित डाली XX सिलेरीके रग रहित पत्ते XX सिलेरी के हरे पत्ते XX XX पूर्ण दध का पनीर XX अखरोट (Chestnut) x नारियल x XX नारियल का तेल काड लीवर पायल XXX सफेद मक्का पीला मक्का 2 मक्का का तेल विनाले का खेल ? **************** पकाने पर ||2|| 84 * 8228* FMXMMA * * * * * * * * * || * * * X x * * X ९२ स्वास्थ्य के प्रयांन सिदय उपाय सहा पदार्थ विनसत्व ' जीवनसत्य 'मी' जीवनसत्व 'सी' परिवर्तनशील xx .... * + x sax? XC . - XXX * XX x मलाई चन (जलयाल) सारा (पकड़ी) प्रडा प्रड या सफेद भाग ग्रईया पीला भाग बैंगन एटाइम माटी माली पतली मछली मंदा पण गेर का प्राटा ग्लकास ग्रनूर प्रगर का रस प्रगर का फ्ल x -तकx x XX x For* * * * * * | | Ixx18 .... x x ** *** *** ******************* + .... XX XX? * Xx? XX प्रकरित सेम मटर इत्यादि नीबू का रस दाल सुखी लेटस ? * XX XX - XX XX जमीरी नीबू x X x तक X x x प्राम मास (मास पेशी) x पूर्ण दध XXX उवाला दध XXX XX जमाया हमादध XXX सुखाया पूर्ण हया दध Xxx XX मक्खन निकला हया सुखा दधx यक्री का मास -सेर तक x -सेर तक परिवर्तनशील परिवर्तनशील परिवर्तनशील परिवर्तनशील परिवर्तनशील x .... x ?

प्राणीजन्य पदार्थ ९३ सद्य पदार्थ जीवनसत्व 'ए' जीवनसत्व 'बी' जीवनसत्व 'सी' .... ।। x XXX XX x *X4 XX x .... .... जई का तेल -सेर तक xx जैतून का तेल ? क्च्चा प्याज -सेx तक xx पाया प्याज -सेर तक xx सतरा का रस -सेx तक xx सतरा का छिलका ताड़ का तेल प्रजवायन XX चकदर XX क्च्चा सतालू * मनफली मगफली का तेल नासपाती हरा पर जवाभा मटर xx XX सूखा मटर X XX अकरित मटर x xx? चिलगोजा x ताजा पार कच्चा प्रनानास XX xx सकर कद XX सफेद काला माल x पद्रह मिनिट तक उबाला हत्या x भना हान्या पाल x x जामन, सूरा घर मूली किशमिश ? X रेवततीनी * * सफेद मशीन परिष्कृत चावल पूर्ण दानेयाला चावल x स्तयाना .... xx? ? .... * XXX X * * * If x 1 x 1 x 1 1 3 .... सफेद पाल .... Xx XX x .... .... 1* XX स्यास्थ्य के प्रमान सिदध उपाय खाद्य पदार्थ जीवनसत्य 'ए' जीननसत्य 'पी' जीवनसत्व 'सी - XX पण राई XXX * XXX - * ४ Xx Xx XXX पच्चा पालक सत्ता पालक माड़ी (निशास्ता) उपकर ससी इमली पच्चा टमाटर पकाया टमाटर टिन में चन्द क्यिा टमाटर शलजम यछड़े का मास प्रखरोट गदका मुसा गंह का भूण पूर्ण गेर खमीर खमीर का सार * * x XX -सेर तक xx XX Xx? Xxx XX XX Xx XXX x XX चिन्ह यह सूचित करता है कि खद्य पदार्य में जीवन सत्य है। चिन्ह यह सूचित करता है कि खध पदार्य में जीवन सत्व का अच्छा सोत हैं। xxx चिन्ह यह सूचित करता है कि खाद्य पदार्थ जीवन सत्व का सर्वोत्तम सोत है। चिन्ह यह सूचित करता है कि खाद्य पदार्थ में जीवन सत्व सतोष जनक नहीं है। चिह यह सूचित करता है कि खाद्य पदार्य में जीवन सत्व सदेहपूर्ण ? चिन्ह यह स्चित करता है कि खाद्य पदार्थ में जीवन सत्व सदेह चिन्ह यह सूचित करता है कि खाद्य पदार्य में जीवन सत्व के होने का प्रमाण नहीं है। ? पूर्ण है।

शारीरिक योग्यता को बनाए रखना एल. ई. यबेक्स और सोसल पास्को अपने पाप की सि प्रकार शारीरिक जाच करानी चाहिए । प्रधिकार ला स्वय अपने शरीर के विकास तथा शक्ति का निर्णायक समझते है । वास्तव में ग्रांसत मनुष्य इस विषय में बहत ज्ञान रखता है। वह यह पतला सकता है कि एक मनुष्य उचा है या ठिगना है मोटा या पतला है लाल या पीला है इतनी ही यातों तक उसका ज्ञान सीमित है इससे प्रार्ग के भेदों को जानने की योग्यता उसमें नहीं है । विना वैज्ञानिक ज्ञान के उसके नापने का परिमाण स्वय अपने शरीर की बनावट है। उसके विचार के अनुसार अपने से कम शक्तिवाले मनुष्य दपल होते है और जितने उस से अधिक शक्ति सपन्न है व बाहत बड़े होते है । यही उनका मापदड है। शारीरिक जाच की कला कोई सरल बात नही है। इस विषय में बहत डाक्टर सामान्य मनुष्य के समान प्रज्ञान है यहा तक कि शारीरिक शिक्षकों को भी अच्छे स्वास्थ्य तथा बल के क्या लक्षण होते है उन्हें वे नहीं जानते । उचाई नार समानुपात हम उचाई प्रारम्भ करेंगे। यह महत्वपूर्ण यात है। इसे सब स्पष्ट रूप से जानत है। यदि कोई मनुष्य वहत नाटा होता हो तो उसका शरीर भार मी अधिक नहीं होता और उसकी शक्ति भी अधिक नहीं होती। बसा ही यह भी सत्य है कि अधिक शरीर भार वाले व्यक्ति को सन्दरता भी नहीं होती। यदि वह अधिक ऊचा हो तो यह शीघ शारीरक दलिता का शिकार बनता विशेषकर जब उसका दिय दर्पल होता है। उसकी मास पेशी को जाच करने से यह पता (९५) स्वास्थ्य के प्रयांन सिदय जय ९६ शारीरक योग्यता को बनाए रखना ९७ । । लाता है कि वह कठिन काम करने के योग्य नहीं होता । शक्ति के विचार से सब से उत्तम ऊचाई ५ फट ८ इच से ५ फूट १० इच के बीच हानी चाहिए। क्सिी भी ऊचाई पर शरीर का डील डॉल होना आवश्यक है। बैठने की ऊचाई सीर्थ खड़े होने की ऊचाई के समान अधिक हो तो वह भी शारीरिक शक्ति का चिन्ह है । ५ फट ८ इच ऊचाई वाले व्यक्तियों की चंठने की ग्रांसत ऊचाई पंतीस से छत्तीस इच तक हो सकती है। गर्दन का प्राकार प्रकार भी महत्वपूर्ण है । वडी गर्दन को लयी गर्दन की अपेक्षा धड़के पास छोटी चांडी र मजवत होनी चाहिए इसके साथ साथ यदि बड़ी नाक और बड़ा क्लेजा हो तो यह स्वाभाविक जीवन शक्ति का लक्षण है । शारीरिक शक्ति का दसरा लक्षण है सपना का सुविकसित मास पेशी एक सीधी अच्छी रूपवाली पीठ भी शारीरिक गति का अच्छा लक्षण है। कधे चाँड़ पार डालए होने चाहिए । कधे का ढालप्रारूप पंशीयादार होता है । हड्डी का ढालापन सकचित वक्षस्थल को सूचित करता है। 1 छाती, कमर पार कल्हा छाती की जाच करते समय ऊपर की भारी वाह्य मासपशियों का अधिक महत्व नहीं देना चाहिए । उनका अपने स्थान पर होना अवश्य है लेकिन भीतर की मासपेशियों का अधिक महत्व होता है। श्वास मापक या स उस मनुष्य की जाच कीजिए जिस की छाती की जाच परनी हो। उसकी याद ऊचाई के अनुसार शरीर भार सामान्य हो तो उसे अपने शरीर से वस्त्र उतारने के बाद स्पाइरोमिटर यत्र में फक्ने को पहिए। जितना उसका वजन है उसके अनुसार प्रत्येक पाप सेर पजन के हिसाय से दो घन इच उसे फफने फो यहिए । गत्री स्वास लेनी चाक्षिा पार इस किमी प्रकार की याचा नही होनी चाहिए। विश्राम पी नापल्या में उसकी सास कछ धीमी होनी चाहिए। मह स श्वात लना गरीर के लिए हानिकारय है। नाक से मल निकालने के समय केवल मह स सान सेना पड़ता। ort को गला में यमर यहत छोटी नहीं होनी m | यम . चाई पाले प्यांपा में 3 या सान इच पार ऊचे कद के मनुष्यों में ना या दन इच या अमर लामा ठौर है। प्रामाश्य यो मान पशियों को पूरी तरह से विकसित दांना पाता और उसे एसी होनी चाहिरक मनुष्य उस पर अपनी इच्छासार पूर्ण पने पत्रण पर सचे। - ९८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय माद पार टान का विकास चाहाँ विषय में विचार करते समय इस बात को स्मरण कीजए कि लवे अगों की अपेक्षा छार्ट मग याले बलवान होते है। ये अधिक भार उठा सकते है। लेकिन इसमें कोई नियम विरोध यात अवाछणीय है। याह की दिवशिरस्या पेशी मार त्रिशीर्ष दोनों का रूप से विकास होना चाहिए यार याहाँ की समानता का गुण गान लेना चाहिए और कशलतापूर्वक कार्य के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए। अग्रयाह, का विकास करने का समुचित रूप से ध्यान देना चाहिए । कछ शारिक शिक्षक इस यात पर ध्यान नही देते कि पकड़ने की शक्ति अग्रवाह, में होती है । छोट हाथ होने पर भी अधिक पड़ मासपेशी वाले अग्रवाह, किसी दस्तु को अच्छी तरह जोर से पकड़ सकते है। जाघ का माप यहत भूमकारी हो सकता है क्योक कपड़े नापने का फीता जाप के ऊपर रखा जाता है पर असल में पर की शक्ति विशेषकर घुटने के ऊपर रहती है। जाघ की मासपेशिया नितम्ब की पशियों के समान शीघ चवीं ग्रहण करती है। मासपेशिया सिकड़ने लगती है उस समय आप यहा पर रेखा जो स्पष्ट रूप से दिखाई देगी उसे देखिए ! एक मनुष्य जिसकी ऊचाई ५ फट २ इच नितम्य के नीचे जाय का मोटाई लगभग सतरह इच होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त एक इच पीछ' जाय की माटाई तीन चाथाई इच होती है। यदि मनुष्य की बनावट साल हो तो नियम के अनुसार उसका शरीर भार लगभग ठीक निकलेगा । यह अवश्य है कि दसरी यातों का प्रभाव उत्त पर पड़ेगा। शरीर भार में थोड़ा-बहन तर होने से कछ हानि नही होती लेकिन एड्डियों के ठोसपन और उसकी याय का इस पर सबंध रहता है। त्वचा, प्रांख बाल पार नख नापने जोखने की अपेक्षा त्वचा, प्रास तथा नखों की जाच करनी अच्छी यात है। कशल परीक्षक की दृष्टि में त्वचा की सामान्य स्थिति वहात महत्व का विषय है । उसको चिक्नी तथा काछ ग्राई होनी चाहिए और फोड़े फन्सी गर्म का प्रभाव क्या लचीली नहीं होनी चाहिए। उसका रंग पीला नही होना चाहिए न उसमें किसी प्रकार का लाल चिन्ह होना चाहिए। पीलेपन होने से रक्तअल्पता का लक्षण है और लाल रग फली हुई रक्त वाहिनी का परिणाम है। रक्त प्रयाह की जाच का एक सरल तरीका यह है कि अगली के अग्रवाल, कण क्षण के लिए जोर से दया । दये हए स्थान से अगली को टान पर शारीरक योग्यता को बनाए रखना यदि तुरत उस स्थान पर पहले के समान रग पाजावे तो यह समझना चाहिए कि रक्त स्वाभाविक रूप से रक्त सचारित हो रहा है अर्थात् रक्त प्रवाह की गति अच्छी है। हाथों ग्रार पैर के नखना की स्थिति को जानना अच्छा है यदि इनमें लाल रंग दिखाई दे, वे फ्ले हए हो तो रक्त संचार की स्थिति में कछ दवंलता समझनी चाहिए। t.mtaram साधारणतया अपने शरीर के स्वस्थ पार स्वस्थ होने की सूचना देती है और जब तक उसमें किसी प्रकार की शिकायत उत्पन्न नहीं होती ये ठीक ठीक सूचना देती है । नेत्र को स्वच्छ पार चमकीला होना चाहिए और पलिया गहरी काली होनी चाहिए। र्याद तारामडल में भूरे रंग की रेखा हो यार नियमित धव्य हो तो यह शाररिक निष्क्रियता का लक्षण है। ग्राख के नीचे सूजन हो तो यह दलता तथा चार बार अनिद्रा के शिकार बनने का लक्षण है। कछ लोग हमें यह विश्वास दिलाना चाहते है कि बालों की स्थिति शरीर के स्वास्थ्य का अचूक निर्देशक नहीं है। इसमें कछ महत्व तो अवश्य है । खोपड़ी की शिकायत के कारण कभी कभी हष्टपुष्ट व्यक्ति के सिर में घोडे बाल होते है। मैंने ऐसे लोगों के सिर में घने याल देखे है जिसका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता । उनको देख कर हष्टपष्ट पुस्प या स्त्री के मन में ईप उत्पन्न होती है। साधारणतया यह कह सकते है कि जिस के धने स्वस्थ बाल होते है स्वस्थ रहता । उनको देख कर हप्टपष्ट पुस्प या स्त्री के मन में ईयां उत्पन्न होती है। दलयक्त हो पर ऐसे हों जिन्हे सहज से बनाए जा सकते है उन्हें तभी सहज से यनाए जा सकते है जम ये हलके पार पतले हों।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदप उप स्वास्थ्य के लिए व्यायाम सबसे पहले शरीर मध्यभार का व्यायाम होना चाहिए। इसका एक विशप कारण है। वह हमारे सामान्य ज्ञान पर आधारित है। जितने शारीरिक विकास की प्रणाली है वे शरीर के स्वास्थ्य और शक्ति की वृदिध के लिए उतम है लेकिन इन प्रणालियों में यहत थोड़े है जो मध्य भार के व्यायाम की यावश्यक्ता का वर्णन करने की अपेक्षा पार कछ अधिक कहते। मानव शरीर का क्सि स्थान सब से पहले प्रधेड़ होता है। शरीर का मध्य भा। उसे हम मध्यावस्था का विस्तार पाते है। इतना होते हुए भी हम अपनी कमर तथा पेट को योवन काल की स्थिति में रख सकते है। पंट के ढीलेपन के कारण यहत सी शिकायतें होती है । अपच कब्ज शक्ति का हास मार दम नहीं होना और शरीर की गति में धीरे धीरे शिथिलता माना। शरीर का मध्यस्थान (ऊपर) पसली और (नीचे) उत्ताध के बीच में है पसली के नीचे वक्षोदर मध्यस्य पेशी है तथा वक्षोदर मध्यस्थ पेशी पार उत्तधि के बीच में उदर है। प्रकृतिनं स्त्री और पुरुष के लिए इस स्थानपर मासपेशी की प्राकृतिक चोली नियत की है। इसकी चतुर से चतर कारीगर नकल करने में मासपेशी की यह प्राकृतिक चोली दो काम करती है १-यह इस भाग में जितनी विशेष ईन्द्रया रहती है उह उचित रीति से सभाले रहती है और उन्हें दनार से बचाकर रसती है । २-यह मासपेशीय चोली जब यह पुरी मासपेशी की बनी रहती है तब यह पीछ' की भीतरी इन्द्रियों को मालिश (मास पशियाँ वे सिकड़ने और फैलने के दवारा) करती है। व्यायाम जिससे मदद मिलती है नीचे पहले के व्यायाम दवारा आप अपने स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति को उनति पर सक्त है जिसे प्रतिनं उस समय दिया था जब ग्राप छोटे थे । इसे बिस्तर पर लेटे हुए सयाह समय कीजिए। व्यायाम नवर१ अपनी पीठ के पल चारपाई पर पर फलाकर लेट जाइए। अपनी त्यालयों को पेट के निचले भा (अपनी गलियों के अग्रमाग से साधयों को स्पर्श परने हए) पर रखिए। उसे अपनी हयालयों से दवाइए पार पैट को ऊपर असमर्थ है।

शारीरिक योग्यता को पनाए रखना १०१ उठाइए। इस तरह कई वार (कम से कम पाच वार) कीजए और पेट के निचले भाग को विना हाथों के दबाव या सहायता से भीतर की पोर उठाइए। व्यायाम के विषय में जो कछ कहेंगे उनका ऊपर की बातें प्राकार स्वरूप है। अपने शरीर के जितन व्यायाम करते है उस समय अपने पंट के निचले भाग को भीतर करते हए ऊपर उठाए । व्यायाम नंबर २ परले नवर के व्यायाम की स्थिति में लंटे रह कर अपने एक पर के घुटने (वाये पैर के पहले) को ऊपर उठाइए जय तक माप के कपड़ों से एक तब का प्राकार न बन जाए (सावे समय पढने के लिए अपने पुस्तकों को सहारा देने के लिए जैसा दोनों घटना को उठाते है बसा ही रखें)। एक पैर से वैसा ही करे। अप अपन वार्य घुटने को दहिने के ऊपर उठावें । इस समय आप अपने पंट के सिकड़ने का अनुभव करेंगे । ऐसा पाच पार दादरा और तब इसी प्रकार दहिने पैर से करें। प्रापका पंट ग्रारम में पैर की गति का केवल पीछा रेंगा पर तो याद आप पर की मासपेसी को भीष सिकोडने के बाद में इस व्यायाम से अधिक लाभ पहचगा। यदि प्राप स्वस्थ नहीं है अथवा अधेडपन के कारण कष्ट पर रहे है तो केवल इन्ही दो व्यायामां को पहले पद्रह दिन तक कीजिए (सुबह और शाम) इसके याद दसरे व्यायाम दिए गए है उन्हें कजिए। व्यायाम नबर ३ सीधी पीठ वाली की पर बैठ जाइए । अपनी पीठ को सीधा करके ऐसा चंठ कि मापका मेरुदड की को स्पर्श करें। इसके बाद अपनी त्यालयों को अपने निचले पेट (पहले नवर का व्यायाम) पर रखिए और अपने पंट को ऊपर पार भीतर की पोर उठावें । पाच यार जल्दी जल्दी इस व्यायाम को कीजिए इसके बाद निचले पंट की मासपेशियों को सिकोड़ कर पाच की सरच्या गिनने तक सिकड़े रहे। इस पाच तेज और एक धीमी क्रिया" को पाच वार दहराइए। दिन में चलतं उठते बैठते समय ग्राप निचले पेट की मासपेशियों को पुष्ट करने का अभ्यास कभी कभी कर सकते है। यापकी मासपेशियों का स्वास्थ्य पाश्चर्यरूप से विकसित होगा जब कि पाप की कमर पतली होगी। जब प्राप कर्सी की पीट से अपने मेरुदड का चिपटाए तो पीठ को "मांटा" न होने देने का सदा ध्यान रखें। रीढ़ को सीधा रखने से काट प्रदेश का (प्रांत ।

१०२ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय का छोटा भाग, अथवा जहा प्रापको कट्विात की शिकायत है) तनाव दूर हो जाता है रीढ़ को सीधा रखने से पीठ का थका सा दर्द भी दूर हो जाएगा। व्यायाम नबर ४ सीधी पीठ वाली की पर बैठे रह कर दोनों पैरों को दृढ़तापूर्वक फर्श पर थामे रखे और एड़ियों से कसियों के पैरों को स्पर्श करें। अपने हाथों को कल्हे पर रख कर सामने जहा तक झकने की कोशिश कीजए (जती जब तक घटने को स्पर्श न कर) । पीठ विल्कल सीधी रहनी चाहिए। फिर सीधा हो जाइए । सामने झक्ने के पूर्व गहरी सास लीजिए यार निचले पंट को भीतर की पोर कर रखे रहे। पेट को ऊपर खीच कर सभाले रहे पार जसे धीरे धीरे मक्त पार ऊपर उठते समय सास छोड़िए। व्यायाम नबर व्यायाम नयर चार की स्थिति में बैठे रह कर अपने घयों को सिर के पीछ रखिए और जहा तक हो सके अपने शरीर को थायी और झकाइए। इसके बाद दहिनी ओर झकाइए। दस्सरे व्यायामों के समान इसको पाच पार कीजिए। इन सब व्यायामों को माता पिता और बच्चे पूर्ण सुरक्षित रहते हुए कर सक्त है। इसी मतलय से वे यहा दिए गए है। सास जीवन से बढ पर है माप विना पानी के कछ समय तक जीवित रह सकते पर विना भोजन के इत से कछ अधिक देर तक लेकिन विना वाय के विना पाच मिनिट तक भी जीयित रहना सभव नही हो सकता। पाप यह कहगे कि ऐसी या मुझे यताने की आवश्यक्ता नही है पर प्रापको यताने का एक कारण है। यह कारण तो यह है कि मनुष्य अपने सान पान की यातों पर तक्लीफ उठाने के लिए नहीं हिचकिचाता है पर सच यतलाइए सोक्तिने जो क्षण भर के भी सास लने की यात सोचते है। सास अच्छा स्वास्थ्य बना सकता है और बनाता भी है। यह मानसिक साक्न की पदय कर सकता है आपको अपने काम में सफलता प्राप्त करने लिए सहायता पर मकता है। यह प्रापको सतुलन र यक्तित्व विकास में मदद परचा सदा पूर्व देशों में ३०००० से अधिक पर्या तक सास लेना एक महान पना १. पश्चिमी देशों में सोए हर समय को फिर से प्राप्त करने की कोशिश कर - शारीरिक योग्यता को बनाए रखना १०३ । रहे है और सास लेने का जो संग नाशक गुण तथा मानसिक मूल्य है उसे समझ रहे है। नन कुछ व्यावहारिक बातों पर ध्यान दे हम लोगोने पूर्व चारपाई पर लेटे लेटे व्यायाम प्रारभ करने की बात बतलाई । इस मात को हम फिर से दहराव है। अपनी प्रगलियों के छोर को उर प्राचीर पर रख कर भीतर दवाते हुए सास बाहर निकालिए। इसके बाद सास भीतर लेते हुए उर प्राचीर को बाहर की ओर दबाइए। इस व्यायाम के दवारा आपने कई वर्षों के बाद प्रथम वार उचित रीत से सास ली है। बात से लोग सास लेने के समय अपने को या सीनों को फला देते है। ऐसा करना ठीक नहीं है। क्या आप भी छाते को मुदरी (अन्तिम सिरा) तक खोलने का यत्न करते है । कभी नहीं तोभी स्त्री व पुरुष जो सीना फलाने ग्रार कधे ऊचा करने की कोशिश करता है वह अपने फेफड़े से करता है। यदि आप अपने फेफड' को एक छाते के समान समझे (मदरी कथा और उर प्राचीरा का खोखला है) तो पापको एक साधारण रूप में ठीक ज्ञान हो जाएगा। "प्रापको पहले लेटे लेटे व्यायाम करने के कछ नियम बतलाए गए थे। नीचं कछ सरल सास लेने वाले व्यायाम दिए जा रहे है जिनको व्याप उनके (लेटे लेटे व्यायाम) याद कर सकते है। हम आप को लेटे रह कर सास लेने की सलाह देते हैं। ऐसी सलाह देने का कारण यह है क्योक इस स्थिति में रह कर उचित सति से सास लेना सहज होता है। माप सास को रोकर नहीं पर शीघता के सास भीतर लीजिए रि धीरे धीरे निकालिए । वास्ता में प्राप यह देखग कि याद ग्राप पूर्ण रूप से सास निकाल देते हैं तो जल्दी से सास लेना पड़ेगा। एम परावर सास लेते रहते है इसलिए दिन भर उचित रूप से सास लेने का अभ्यास करना सहन हांगा । पाप अपने काम पर जाते हए मार्ग में इसका अभ्यास कर सकते है। जल्दी से सास लेकर चार तक निनती करते अपनी सास को यार निकालिए । उतनी ही गति से सास लीजिए लेकिन धीरे धीरे सास यार निकालने का अभ्यास कीजए। धीरे धीरे सास लेने का मल्य तो इस बात से प्रकट होता है कि प्रत्येक बार सास लेते समय और सास बाहर निकालते समय हदय बार बार धडकने की कोशिश करता है। या मापको इस यात का पता लगता है कि क्यों यहत से खिलाड़ियों का प्रत में अपने हदय की मासपेशियों के तनाव से बाट उठाना ।

१०४ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय पडता है वे हापत है मार हदय सास की गलत लय के साथ अपनी गति को अनुकल नही कर सकता। व्यायाम नबर १ अपने दोनों पैरों को फैला कर खड़े हो जाइए । अपने दोनों तयों को पर के बगल में नीचे सीधा झकार रखिए। पूर्ण रूप से सास बाहर निकालिए । सामने कछ झक कर सास बाहर निकालिए (एसा करने से सात पूर्ण रूप से बाहर निकल जाता है) । अव अपने दोनों हाथों को बगल से लेकर अपने सिर के ऊपर उठाइए और इस समय सास लीजिए। अपने हाथों को धीरे धीरे नीचे उतारते समय सास निकालते हुए व्यायाम को पूरा कजिए। व्यायाम नबर २ एक नासिका छिद्र का पद रख कर दसरे से सास लीजिए इसके बाद बद लिए नासिका मार्ग को खाल कर उससे सास लीजिए और दसरे को पद रखिए! अपनी अगली को पायें नासिका मार्ग पर रख कर उसे दवाइए मार दहने से सास लीजिए। दहिने नासिका रथ सास भीतर लीजिए। अपनी अगली की दहिने नासिका रथ पर रख कर दवाइए और यायें से सास लीजिए। इस प्रकार प्रत्यक नासिका रध से सात यार कीजिए। व्यायाम नबर ३ फर्श पर बैठ जाइए और डाड़ खने जैसी गति चाल रखिए (हाय उर प्राचीर म प्रारभ हो कर पैर के आगठ' को स्पर्श क्र) जब पाप अगट' को एनं के लिए भक्ते है उस समय शीघ सास लीजिए और जय पीछे झवने सनते है तय नाम धीरे धीरे निकालिए और अपने राय को अगुठ से हटा पर र प्राचीर को स्पर्श कीजए। सात बार इस प्रकार कीजिए। प्यायाम नबर४ पी पर घुटन टेक । अपने प्यालयों को अपने पन्ने के करीब एक फट दर पर सामने पर्श पर लिए। सामने भाकर मार त्यालयों पर मर का माम डालिए (पाद सीधी संखए) और धीरे धीरे सास लीजिए। पर पी मारा और अपनी एड़यों पर पंठ गए। अपनी एड़यों में पंटते समय जल्दी से सान संजए । सात पारन व्यायाम को कजिए। इन प्यायाम या उंचत तसे परन परमार सास को टोक नीचे उर प्राचीर की ओर जाते हए अनुभव यन।

शरिक योग्यता को बनाए रखना १०५ सास का उचित रीति से नियन्त्रण करने पर न केवल प्रापके स्वास्थ्य की स्थिति अच्छी रहती है पर पाप स्पष्ट रूप से याल सक्ते है पर समतुल्यवा के प्राप्त होन स पाप का व्यक्तित्व निखर उठेगा। - निचले अंगों के लिए व्यायाम स्काटलंड की एक पुरानी कहावत है, पाय थक गया तो सब थक गया । यह सच बात है कि थके पावों से शरीर की अधिक क्षति होती है इस यातका साधारणत हम समझ नही सकते । ग्राप यह जानकर आश्चर्य होंग कि पाव की सुखी अथवा प्रसुखी रहने की स्थिति मुख पर शीशे की भाति झलकती है । पाप युरोप के सभी यस्ता का प्रयोग करके अपने मुखड़े की रेखा को दूर करने का प्रयत्न करेंगे लेकिन याद आपके पाव असखी हो तो प्रवृतिने जिस चिन्ह को अपने मुखडे पर रखा है उस किसी हालत दर नी र सक्ते । नीचे पाव के लिए कछ व्यायाम दिए जाते है इन्ह' नगे पाव कीजिए । अपने हाथों की कसी की पीठ पर रख कर खडे हा जाइए । अपनी एडियों को सटाकर रखिए पार पावों के अठों को फैलाकर अपने पावों के दवारा Vाकार बनाइए । व्यायाम नबर १ अपने हाथों को हिलनं डलने न देने के लिए उन्हें कर्सी पर रखिए । अपने प्राठों के यल खडे होकर फिर पहले की स्थिति में आ जाइए । फिर फछ समय तक अपने अगुठों के वल खड़े रहिए और उसके बाद अपनी एडियों से। व्यायाम नबर २ अपने दोनों पैरों के अगुठों को ऐसा रखें कि वे दोनों एक दूसरे का स्पर्श करे (क्यूतर की अगलियों की भाति) । इस स्थिति में रख कर पहले नवर के व्यायाम समान करें । अगुठों के बल से खड़े हो जाइए और फिर एडी के यल से। इनमें से प्रत्येक को घारह बार कीजिए। - ध्यायाम नबर ३ पसी की पीठ पक्डे हुए दहिने पर से खड़े हो जाइए । यायें पाव के तलवे को दहने पाय के तलवे के नीचे रखिए नार दहने टखने को उसके उपर तब F8 १०६ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय तक घमा जब तक वह जमीन को न छवं । इसके बाद पाव को घुमा कर सीधा कीजए। टखनों को मजबूत बनाने के लिए यह उत्तम व्यायाम है | फिर अप पार्य पाव के वल से खड़े हो जाइए और दहिने पाय के तलवे को पार्य पाव के नीचे रखिए। व्यायाम नबर ४ प्रय अपनी कर्सी पर बैठ जाइए। अपने पावों को सामने लाइए या डियों से जमीन को स्पर्श कीजिए। जितनी दर हो सके उतनी दर अपने पैर का फैलाइए और अनूठों को पावों के नीचे मराडिए । अव अपने टखनों को ऊपर का पार घुमाइए (अभी तक अपने पार्यो को जितना दर फैला कर रखे है पलाए रखिए) इस मरोडन फैलाव की गति को दोहराइए। व्यायाम नमर५ प्रपने पावों को इतना उपर उठाइए कि टागों से L का प्राकार बन जाए। अगठा इस मरोड़न फलाव व्यायाम को दोहराइए। इन व्यायामों का उददेश्य है प्रपने प्रगठों को गतिमान करना । व्यायाम नगर६ फी की पीठ पर अपनी पीठ को सटा कर पंठ जाइए और अपने घटना पो यड़ा करके अगुठों को सीधा करते हए पायों को ऊपर उठाइए । टखने से अपने पावों को चारों ओर घुमाइए-सय से पहले दहनी पोर तक उसके पाद मायी प्रोर । यह व्यायाम आपके टखनों को सुडाल पनाए। टागां मार पटना के कण अ घ्यायाम ज्पर जितने प्यायाम के नियम यतलाए गए है आपकी पिळलयों को पन पत्र पर साल यना पर नीचे के घ्यायामों के लिए तैयार करने जिनमें प्रय शक्ति का उपयोग करना पड़ता है। प्यायाम नगर७ प्रपनी पड़यों को सगर अगुठों को गला रस पर तथा दोनों चर्चा न पतों पर रस पर खड़े हो जाटों पर गई हो जाए। उसके बाद पटनों को मया पर अपने को धीरे धीरे पल्पी मार पर यटन पायात में शारिक योग्यता को बनाए रखना १०७ लाइए । माप इस व्यायाम को अच्छी तरह जानते है । यह घटना का मकाने का व्यायाम है जिसे मापने स्कूल में क्यिा था । व्यायाम नबर८ अपने पावों को फर्श पर लगभग एक फट की दूरी पर रख । हाया को शरीर के सामने फैला कर रखिए । इस स्थिति में रह कर धीरे धीरे उठते बैठते हए पल्थी बैठने वाला व्यायाम कीजिए (७ वें व्यायाम की भाति बैठे पर इस समय पाव के मठों के बल नहीं पर फर्श पर प्रपन पाव को पूर्ण रूप से रख क्र) । घ्यायाम नबर ९ वारी वारी कर के छ वार एक टाा से कदना अथवा फ,दक्ना । प्रत्येक पाव से तीन बार कीजिए। अब हम घुटनों के व्यायाम पर ध्यान देगे । यह शरीर के मध्य भा के व्यायाम के याद पाता है। इस मध्य भार के व्यायाम के विषय म हम लोगों ने इन अध्याय के प्रारम्भ में चर्चा की थी। इसके बाद बुढापा घुटन पर दिवाई दता है । हम लाा यात करते है कि लोग के घुटने दल हो जाते है लक्नि सरीर के इस स्थान पर बुढापा का दिखाई देना नहीं चाहिए। इसके लिए अापका दौनक व्यायाम भी यावश्यक है । इसके कछ व्यायाम नीचे दिए जा रहे है। 1 । व्यायाम नबर १० अपने पाव को विना हिलाए एक साथ सटा कर सड़े हो जाइए । धीरे धीरे भक्ते हुए अपने शरीर का भार अपने पाव पर डालिए । प्रारम्भ म अापको यह व्यायाम धीरे धीरे करना कठिन हो। इसलिए आप अपने हाथों का चारपाई की ओर अपने मुख को रख जय कि आप को क्छ शक्ति प्राप्त हा । मान पशियों पर नियत्रण प्राप्त करने तथा व्यायाम के सीवन के प्रारम्भ में घन के नीचे गद्दी रखना अच्छा हा धीरे धीरे धन्न टक्ने हुए प्रपन शरीर को धीरे धीरे अपने शरीर को ऊपर उठाते जाए जब तक कि आप फिर से सीथ अपने पर चल बडे न हा जाए। जाधों के लिए व्यायाम व्यायाम नबर ११ अपनी कर्ती में सामने क्छ झक कर अच्छी तरह ये जादा अपन पर्व को फैला कर ऐसा 43 किमी के सामने के पाद को एडिया स्पर्श कर (इसम मालय यह है कि वायी एड़ी की के वाय पर का एवं पार दहिनी गही कम * दोहने पाव को स्पर्श करने मक यर यं मार पीट संदी १०८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय --- पायर्या स्थली को बायें घुटने में रखें और दहिनी हथेली को दहिने घुटने में। अब अपनी एड़ियों को पारी वारी करके उठाइए। अपनी एड़ियों को उठाने के समय घुटने में रखी हुई हथेली को घुटने उठाते तथा नीचे करते समय दवाइए। (क,छ यहत हारमानियम वजाने के समान कजिए) । हाय का यह दवाव पर के ऊपर की मास पेशियों को क्रियाशील बनाती है। प्रत्येक पर से इस व्यायाम को पारह बार कीजिए। व्यायाम नबर १२ फर्श पर लेट कर अपने घर से साइक्ल चलाने के एसा घमाइए । अपने पर के अगुठों को सीधा कजिए। ऐसा करने के समय अपने दोहने घुटने को शरीर की ओर झकाइए । इस समय अपने याए घटने को पकड़ कर उसे शरीर वा पार झकाइए । पाए घटने को नीचे झका कर दहिने पाय के अंगुठों को सीधा करके पहिले के समान व्यायाम कजिए। इस परे व्यायाम को पारह पार जिए। व्यायाम नबर १३ दानों पैरों को सटा कर और कल्हे पर हाथ रख कर विना ग्राम पद कर अपने घटनों को ऊपर उठाइए (पहिले दहिना घटना फिर याद में पाया)। शरीर को सीधा रखकर पैर को उठाते समय अपने घुटने को छाती तक लाने की कोशिश परे । प्रत्येक पैर से यारह यार एसा कीजिए। उक्त व्यायामों को करते समय सास को न रोक रत्तिए पर स्वाभाविक "प्रा. सरलता पूर्वक सास लीजिए। इस बात को सदा स्मरण रखिए कि पीठ पिछल भाग में गड़टा न होने पावें। । . रोह को योचित दशाम रखना नीचे का व्यायाम दिए जाने है जिसके दधारा आप अपनी रीढ़ को उचित दशा में रख सकते है। प्यायाम नं. १- फलाना और शिलपरण (क) दोनों पैराको सटा पर सड़ जादर पार नाम लेने समय अपने सयों को धीरे-धीरे अपने सिर के उपर उठाए । अपनी प्रगलियों को छन को पार फलादर पार पर की नगालयों में बड़े हो जादरान व्यायाम को परने समय पार अपने पंट की मन पग्रियों को सड़ा लिए। (स) प्रगतियों के पल से पड़े होकर अपने शरीर को सामनं मापने हए पल पाजए जप सफ ार को पार मा पर पर अठों का न पर्व ।

शारीरक योग्यता को बनाए रखना १०९ इस दसरे व्यायाम के साथ आपके शरीर के कुल्हे से ऊपर की सव मासपेशिया हो जानी चाहिए। इस समय केवल टाम पार जाघ की मास पशिया शरीर के बोझ यो सभालने के लिए साचत होनी चाहिए। व्यायाम न. २- अपने घुटनों को फैलाकर और पैर को फर्श पर रखकर कर्सी पर मंठ जाइए। दोनों हाथों की अर्यालयों को जोड र सिरके पीछ रखिए। पेट की मास पेशियों को भीतर की और कड़ी कर दीजिए और जैसे जैसे अपने शरीर वो यायी और फिर दरनी ओर झकाते है धीरे धीरे सास लीजिए। सास लेवे और पाहर निकालते समय एक ओर से दूसरी ओर वाला व्यायाम कीजए। तीन मार सास लेने तक इस व्यायाम को दोहराइए। प्यायाम न ३-अपनी कमर से शरीर को घुमाना । अपने पैर को फर्श पर फैला कर रखें हाथ को कल्हे पर रखिए शरीर को घुमाइए । सब से पहिले सामने झविए उसके बाद अपने शरीर को दहिनी मार पीछ' थायी और सामने प्रार अत में सीधा कीजिए । इसको दोहनी पार से पायी पार करते हुए घुमाइए (अर्थात् पहले घडी जैसी झक्ती है बसी इसके याद उसका उल्टा)। प्यायाम न ४- गले का घुमाना | ऊपर तीसरे नवर वाले व्यायाम के समान खड़े रहिए पर इस समय अपने हाथ को पीछे की ओर जोड कर रखिए । मधे को चतुज प्राकार बना कर रखिए और अपने कधे को घूमने का केन्द्र मान कर सिर दहिने से पाये घमाइए और फिर वायी ओर से दहिनी ओर । व्यायाम न ५- प्रगलियों को नत्थी करके अपने हाथों को पीछे की प्रार रख कर ध्यालयों को उपर खुला रखिए । फिर शरीर को ढीला करके सामने झकिए। इसके याद अपने शरीर को ऊपर उठाकर अपने नत्थी किए हाथों को अपने पारीर से ऊपर उठाइए (एसा करने से पीठ घनप के समान होता) इसके याद अपने शरीर को (कमर से) दहिनी ओर झकात समय शिथिल कीजिए । दहिनी पार रह र उपर के समान अपनी पीठ को धनुष के समान बना कर रखिए । इस प्रकार पायी और कीजए । प्रत्येक व्यायाम को तीन बार दोहराइए । यह स्मरण रखिए कि बैठने या चलते समय आप की रीढ सीधी रहे इन यातको भी स्मरण रखिए कि पीठ का निचला भा झदा न रहे। देखने से तो अपनी रीट को विलकल सीधा रखना असभव मालूम होता है पर उसको सीधा रखने का विचार रीड़ को दरी तरह झवा कर रखने से रोकता है जिससे - - शनि हो सकती है।

प्राकृतिक चिकित्सा पार पी एच चाटन एल पी एम ई एम एस एफ एम एस एस सी एच घर में जल चिकित्सा जल स पकाने पार पाने के अतिरिक्त और कछ क्यिा जा सकता विषय में क्या पापने कभी कछ विचार क्यिा है ? दसरी चीजों में जल एक बहत उपयोगी चीज है। यह चिकित्सा के लिए उपयोग किया जा सकता है अर्थात् इसको रोगों की चिक्सिा के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। इस प्रकार की चिकित्सा का जिसमें जल उपयाग किया जाता है जल चिकित्सा करते है। दसरी पधि सहज से प्राप्त नही हो सक्ती जैसा जल प्रत्येक को सुलभ होता है। जल को शीघ ठोस तरल और गैस के रूपमें परिवर्तन किया जा सक्ता है इसलिए इन तीनों रूपमें यह यहत रोगों के लिए उपयोग किया जाता है। गुण उपयोग । जल को क्यों चिकित्सा के लिए उपयोगी समझा जाता है चिोक सा के लिए उपयोग म पाने वाली सभी वस्तयों में कछ विशेष गुण रहते है। इसीलिए रोग की चिक्सिा करते समय इन यसमा के में लाए जाते है। जल इस नियम का अपवाद ना है। उन गुणा का साधारण उददेश्य पति के लिए नीचे किरण क्यिा जा सकता है। १ । सपर्क दवारा जल ताप की अधिक मात्रा शोषण तथा प्रेषण कर सकता है। इसको छोड कर कोई दसरा पदार्थ इतनी अधिक मात्रा में ताप सचित नहीं कर सकता । गर्म जलमें प्रचर मात्रा में नाप सचित रहता है । इस ताप को याहर निकालने से तापमान में वहत योड़ा परिवर्तन होता है। इसी प्रकार ताप मान में विना अधिक पावर्तन हए ठडा जल अधिक ताप को शापित कर सकता । जलका इनी ताप अथवा टडा का विमिन प्रभाव शरीर पर पड़ता है। । (११०)

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प्राकृतिक चिकित्सा
Mardan

स्वास्थ्य में प्रयोग सिदय उपाय २ । तापको जल से अथवा अन्य किसी दूसरे पदार्य से शरीर में भेजने के लिए शरीर को जल अथवा दसरे पदार्थ के सपर्क में ग्राना चाहिए । जल ताप को वहत जल्दी शोषण करता है यार यहत जल्दी निकाल दता है इसलिए यहत देर तक दोनों वस्तयों का सपर्क रहना आवश्यक है। थोड़ी देर के सपर्क स ताप और ठड का प्रभाव हाता है। ३ । जल तरल पदार्थ है इसलिए यह चिकित्सा के यात्रिक रूप के साथ यहत जल्दी मिल जाता है विशेषकर मालिश चिकित्सा जैसे घर्षण और प्रत्या घाा में। ४ । जल घुलनशील पदार्थ है इसलिए इसको शेम्फ ड्रा र पिचकारी के लिए उपयोग में लाया जा सक्ता है। ५। जल प्रारिक रूपसे शरीर के लिए वहत लाभदायक है निशेषकर साफ करने घोलने तथा धांने इत्याद के लिए। शरीर के बहरत से दषित पदार्या को अधिक मात्रा में एकत्र हाने देने से व विप के समान काम करते है । इन पित पदार्था को जल की दर करने में सहायता पहचा सकता है। शरीर में कई दपित पदार्थ है जो वहत कम अश में घुलते है इसलिए शरीर के स्वास्थ्य के विचार से अधिक जल पीना प्रावश्यक है। गृह चिकित्सा सरल है जल सभी को यहत सरल से प्रचुर मात्रा म प्राप्त हाता है इसलिए उसको र्चािदत्सा के रूप में अधिक उपयोग करना चाहिए। आप यह सोच सकते होंगे कि जल चिकित्सा के लिए विशेष योग्यता की पारश्यकता है। हा यह सच बात है कि जटिल तथा गभीर रोग की चिकित्सा के लिए विशेष योग्यता की आवश्यक्ता है पर साधारण रोगों की चिकित्सा आप अपने साधारण ज्ञान से कर सकते है। आपके पास काछ ही सामान की अावश्यक्ता हानी चाहिए जने याल्टी या जल रसने के लिए यर्तन कवल गार रबड़ की चादर । चिकित्सा की कछ रूप रेखा दने के पूर्व हमलोगों का इस बात का विचार करना चाहिए कि किस प्रकार रोगों के लिए जल का उपयाग किया जाता है। इस बात को जानने में हम जल को चिक्त्सिा के लिए यदिधमानी के साथ उपयोग में ला सक्त है। गर्म र ठई जल का प्रभाव जय शरीर किसी कारण से पूर्णतया ठडा हा जाता है तो इसका यह मतलय है कि उसकी अावश्यक म्यिाग मद हो जाती है। नाड़ी वा स्पदन तथा श्यास प्राकृतिक चिकित्सा ११३ प्रश्वास क्रिया धीमी हो जाती है. रक्त संचार की गति धीमी हो जाती है, मास. पशिया र्शियल हार विधिपूर्वक अपना कार्य करने में असमर्थ हो जाती है। यदि इस ठड की स्थिति कछ काल तक रहे तो उक्त प्रभाव अधिक बढ़ जाता है और शरीर का तपमान कम हो जाता है। शरीर के ठड होने के कारण जो उक्त प्रभाव दिखाई देत है उनको अन्तनिहित (स्वाभाविक) प्रभाव या ठड का प्रभाव कहते है. मान लीजिए कि शरीर में थोड़ी दर के लिए ठड डालने से उल्लखित प्रभाव दिखाई दे ता यह हास करने वाले प्रभावों का नाश करने के लिए उद्यत हो जाता है । तब क्या होता है ? रक्त संचार की गति तेज हो जाती है नाड़ियों में स्फति या जाती है, सास प्रश्वास की क्रिया गहरी हो जाती है और हृदय की घडक्न शक्तिशाली हो जाती है। इन प्रभावों को प्रतिक्रियात्मक प्रभाव करते है और शरीर पर ठड के पड़ने से जिस प्रकार शरीर उत्तजित होता है उसे ठड की प्रतिज्यिा करते है। प्रतिक्रियाए प्रभाव शरीर में ठड डालने के फल स्वरूप नही होत पर शरीर पर ठड का उप्ण असर पड़ने के कारण होते है । शरीर पर अधिक देर तक ठड देने से उदासीनता प्रभाव पड़ता है जब कि थोड़ी देर के ठड से उत्तेजना होती है 1 ठड के कारण शरीर उत्तजित होता है पर अनिहित प्रभाव से शरीर प्रयसाद होता है। प्रय ताप से उत्पन्न प्रभाव पर विचार कीजिए । प्रनिहित प्रभाव ताप का अपना प्रभाव उत्तेजक होता है। ताप का प्रभाव उसी समय दिखाई देता है जब उनको थोड़े समय के लिए ताप दिया जाता है । जव ताप की अवधि बढा दी गती है तय उसका उदासीनता प्रभाव होता है। मासपेशिया काम नहीं करती रदय का स्परण तेज हो जाता है, पर जितना जोर से वह लोह, फेक्ता है उतना ही यह कम हो जाता है और कछ देर के बाद शरीर में दर्वलता आ जाती है । इस प्रकार शरीर पर ताप का उदासीनता प्रभाव पड़ता है। यहत देर तक ठड और थोड़ी देर तक ताप देने से अन्तनिहित स्वाभाविक प्रभाव पडता है योर्ड समय ठड और अधिक देर तक ताप देने से प्रतिक्रियात्मक प्रभाव पड़ता है। थोडी देर के लिए ठड र ताप देने से उत्तंजक प्रभाव पड़ता है । अधिक समय तक उडार गर्म देने से शामक प्रभाव पड़ता है। ।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय । प्राय और स्वास्थ्य का प्रभाव विभिन्न चिक्सिानों की प्रतिक्रियाओं को विभिन्न स्थितियों द्वारा निय त्रण किया जा सकता है। रोगी की याय का अयश्य सदा ध्यान रखना चाहिए। पद्दत वृध अथवा वाहत जवान पुरुष की प्रतिनिया की योग्यता समित है। धे किसी प्रकार के अधिक ठडचिकित्सा को सहन नहीं कर सकते । यदि रोगी क्सिी रोग से कष्ट पाता हो तो उसकी जीवन शक्ति सामान्य से कम होगा चाहे उसकी उम् क्तिनी भी क्यों न हो । इसलिए यह स्वास्थ्य व्यक्ति की अपेक्षा जल चिकित्सा को अधिक नहीं सह सकेगा। परिश्रम या उधांग दि शरीर को गर्म रखने के लिए पर्याप्त हो तो चिकित्सा की प्रतिक्रिया को वह बढ़ाएगा क्योंकि जब शरीर गर्म रहता है तव प्रतिक्रिया प्राय प्रधिक शीघ होती है थकावट से प्रतिक्र्यिा को सहायता नहीं मिलती है और यदि रोगी पूरी तरह थका हाया हो तो उसे ठड जल की चिकित्सा नही देनी चाहिए। क्सिी ठड जल चिकित्सा देने के पूर्व त्वचा को गर्म रखना चाहिए। यदि त्वचा गर्म न हो तो रक्त को त्वचा में लाने के लिए किसी प्रकार की जल चिकित्सा करनी चाहिए। ठडे जल की चिकित्सा करने से पूर्व पाय को गर्म रखना चाहिए। हम लोगों ने गर्म मार ठड की विभिन्न चिकित्सा के विषय में कहा है। गर्म र ठडा दो शब्द तुलनात्मक है इसलिए उन दोनों की स्पष्ट रूप से परिभाषा देनी अच्छी होगी । जव के विभिन्न तापमान का वर्गीकरण नीचे दिया जाता है। बहत गर्म कछ गर्म परनहाइट १०४ प्रशसे ऊपर गर्म १००१०४ प्रश ९२१०० प्रश गुन गुना ८०९२ प्रय कछ ठडा ७०८०प्रश्न ठडा ५५७० प्रश यहत ठडा ३२५५ प्रश इन तापमानों को सौंटांड में बदलने के लिए ३२ अश घटाइए पार ५९ सं गुना कीजए।

प्राकृतिक चिक्तिसा ११५ तापमान का हिसाब लगाने के लिए किसी अनिश्चित प्रणाली पर निर्भर कजिए 1 इस बात को स्मरण कीजिए कि जिसको श्राप गर्म कहते है वह एक रोगी के लिए यहत ठडा लगंगा और जो नाप के लिए कछ मं लगंगा वह रोगी के लिए वहत गर्म लगेगा । स्नानागार में रखने के लिए एक तापमान प्राप दया विक्रेता से मोल सक्ते है । उसके द्वारा प्रापका जल ठडा है अथवा गर्म उसका निश्चित रूप से पता लगा सकते है। साधारण सदी के लिए चिकित्सा 1 स्वास प्रश्वास क्रिया तथा उतकों (मास तया) का सक्रमण तथा प्रवा" उन सर्वसाधारण शारीरिक विकारों में से है जिनसे मनुष्य बन पाते है । उसी प्रकार की साधारण सदी क्सिी जटिल स्थिति में पहचा सकती है। जल चिकित्सा साधारण सर्दी के उपचार में एक महत्वपूर्ण कार्य कर सस्नी है। रोगी को जहा तक हो सके चारपाई में लेटे रहना चाहिए। यह उसके लिए लाभप्रद होगा पार रोग फैलाने से रुक जाएगा। लेकिन दर्भाग्य की यात या है कि ऐसा करना सर्यो के लिए सभव नहीं हो सकता । सदी से रोगग्रस्त रहे या न रहे काम करना ही पड़ता है। इसलिए साझ के समय जल चिकित्सा कर लनी अच्छी बात है। इस चिकित्सा के याद छ समय तक विश्राम मिलता है। नीचे लिखी हई विधि के ममान चिकित्सा करनी चाहिा राजी का एक गम यमरे में लेटा कर रखिए। उसे एक रबड़ की चादर पर लेटे रहना चाहिए। इनके अतिरिक्त और एक दसरे रयड़ की चादर पावश्यक होगी । यह विस्तर के कपड़े को पाद होने से सुरक्षित रखा। उसके शरीर के कपड़े उतार दो नए । मक के कपड़े को अधिक गर्म न रखिए क्योंक रोगी को पूर्ण चिकित्सा में समय तक लेटा रहना पड़ेगा। सेय के कपड़े को उतना लया रचिए जिनस उनकी गर्दन से पत नफ की रीढ़ को वह पुरा टक ले । याय के भाया से पचने के लिए रोगी का चादर से टाय दना चाहिए । हमके याद रानी के पैर को गर्म जल ये वतन में रौ । जल इतना वासी पाना चाफ जनये दोनों पैरा के टसन जल म डयं रोचयना ये माय जन को गर्म रखन के लिए यतन में नर्म जल डानते रहना चm ६२ पात का ध्यान राखानी र म उपर में म जल न डाला गया जयी की गई म म क दनात तय उसके पैर को उनमें पान के याद ने चारपाई में लिया पर एस चादर से टाफ दीन 1 स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय । । उसकी कठ तथा छाती पर गर्म सेंक दीजिए। इस बात का ध्यान दे कि छाती अच्छी तरह ढकी रहे ग्रार संक का कपडा दानों वगल में लपेटा रहे । संक के कपडे को उस स्थान पर तीन से चार मिनिट तक रहने दीजिए। उसे हटाने के बाद भीघ एक कडा तालिया बर्फ के समान ठडे जल में डालें और उसे निचाड कर रखिए । ठडे जल से भीगे हए इस तौलिए से छाती को शीघ्र पांछ डालिए प्रार फिर उसको पोछ कर सुखाने के वाद दसरा सेंक दीजिए । तीन बार ऐसा करने के बाद ठडे दस्ताने के घर्षण से इस उपचार का नत कर डालिए। इम चिकित्सा को दिन में दो यार करने से लाभ होगा। यदि रोगी घर के भीतर नहीं रह सक्ता तो कम से कम उसे चिकित्सा के बाद एक घटा तो अवश्य भीतर रखना चाहिए। ज्वर की बतलाई गई विधि के अनुसार यदि जलर्चािक्त्सा की जाए तों संगी का ठड नही किन गर्म और ताजा अनुभव होना चाहिए। यदि दिन में साझ के समय एक बार चिकित्सा की जाए तो उसकी छाती में कपूर का तेल या कोई इसी प्रकार का तेल लगा कर गर्म फ्लेनेल से ढाक देना चाहिए। व्यवसायी लोगों को इस चिकित्सा के स्थान में सोने से पूर्व गर्म जल से पद्रह मिनिट तक स्नान करना चाहिए । शरीर को शीघ्र पूर्णतया सुखा कर गर्म कपल से ढाक देना चाहिए। चारपाई में लेटे रहने पर गर्म पंय देना चाहिए जिससे उसके शरीर से पसीना निकले । प्रात काल बाहर जाने से पूर्व अपने शरीर का फर्ती से रगड़ कर पोछ डालिए। ज्पर की चिकित्सा की जो विधिया बतलाई गई है उन्हें नीचे लिखे अनुसार तैयार की जाती है । किस प्रकार संक देना चाहिए मापको सेंक के लिए कम से कम चार से कपड़े लगेंगे । इनको श्राप पुराने पायल से काट फर बना सक्ते है। इनकी लयाई चोड़ाई दोनों ३६ इच होनी चाहिए । इनके साथ क्यि अथवा उसी प्रकार के दो तालिए रोगी को टाक्न लिए एक चादर ठडे जल का वर्तन (याद सभव हो तो यर्फ का जल) एक या दो सख्त और मोटे नालिए और एक रबड़ की चादर । मज पर एक सुरती चादर का पिछा कर रिए। एक दूसरी चादर को लबी पट्टी बनाने ए तीन यार मोदिए । इनको एक याल्टि के साल ए जल में प्राकृतिक चिकित्सा (DHARTH संक की पट्टी को तैयार करने के लिये उबलते पानी में कपड़े को ड,पायो उसको खप तर करो फिर पानी से उसे निकाल लो और उसके दोनों किनारों को पकड़े हुये खव एंठों तक उसमें पानी न रहे। फिर मेज पर फैलाये हये सूखे कपड़े के बीचों बीच गरम सेक को रखो । सेंक की पट्टी के सूख किनारों को गीले कपड़े के बीच में पलट लो पार अव मेज पर विछ कपड़े में इसको खूप तहकर लपेट लो । अव इसको रोगी पर तुरन्त लगायो । ११७ ११८ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय डवों दीजिए । इसके दोनों छोरों को पानी के बाहर निकाल कर रखिए जिससे ग्राप उनको वाल्टी से निकालने के बाद सहज से पकड़ कर निचोड सकते है। निचोडने का कोई यत्र प्राप्त हो सके तो उसका उपयोग किया जा सकता है। जितनी शीघ्रता के साथ जितना अधिक कपड़े को निचोड सकते है उतना निचोड़िए । उसके बाद मेज पर विछाए गए कपड़े पर लपेट लीजिए। सेंक देने घाले कपडे को सेक देने वाले स्नान से कछ बडा होना चाहिए। साधारणतया एक स्थान में तीन बार सेंक दिया जाना चाहिए। सेंक देने वाले कपडे को त्वचा से बहत नजदीक रखा जाना चाहिए और उस सॅक के फपड़े को एक स्थान पर तीन से चार मिनिट तक रखे रहना चाहिए। यदि रोगी क्पड के ताप को सह सके तो उसे त्वचा कछ ऊपर रख कर त्वचा में जो जल या जाए उसे सूखे तालिये से पोछ डालिए अथवा सैंक के कपडे तालिए के उपर रखना चाहिए। सेक के कपड़े को शरीर से तब तक नहीं हटाना चाहिए जब तक दसरा तयार न हो जाए । सेक के दसरे क्पर्ड देने के पूर्व त्वचा को पाछ कर सुखा देना चाहिए। यदि ऐसा न करे तो त्वचा पर रहे जल के कारण सेंक के दूसरे चपडे की गर्मी को रोगी नही सह सकेगा। पिछले गर्म सेंक के याद चिकित्सा विए हए स्नान को ठडे जल से उडा कर देना चाहिए। यह मांटे यार सुखे तौलए के दवारा किया जा सकता है। सेंक दिए हुए स्थान को पोछ कर अच्छी तरह सखा देना चाहिए और ठड लगने से बचाना चाहिए। गर्म संक पीड़ा को दूर करता है इसलिए उसको जितना अधिक गर्म हो सके उतना उपयोग करना चाहिए और उससे अाराम लगने पर दोहराना चापिए। ठडसेंक नहीं देना चाहिए। सर्दी की चिकित्सा के लिए जो विधि पतलाई गई है उसके अनुसार संक दिया जा सकता है। यह संक पीड़ा दर करन के लिए उपयोग किया जाता है स्तेजक अथवा शामक प्रभावों के लिए यह लाभप्रद होता है। थाड़ी देर के लिए सेंब दने से उसेजना होती है लेकिन अधिक देर कछ ठड सेंक दने से शामक वा काम करता है। जिस स्थान पर शाम दिया जाता है उस स्यान की रक्न नलिया सेंक के प्रभाव से फैलती है। मेक या नाड़यों के छोरों पर सुखद प्रमार पड़ता है। - ।

प्राकृतिक चिकित्सा ११९ इस प्रकार यह शोषण अयवा नि सरण कार्य में सहायता पहचाना है और पीड़ा का दूर करने में सहायता करता है। दस्ताना पहने हाय को ठई पानी में भिगो कर शरीर को रगडना प्रापको एक बाल्टी ठडा पानी, याद सभव हो सके तो यर्फ का जल, एक चादर दो या तीन मार्ट तौलए और मोटे तौलिए या खुरदरे कपडे के वने दो दस्तान की यावश्यक्ता हागी। विधि का इस प्रकार प्रारभ कीजिए। विस्तर को मेक्निटोस अथवा नलिए से बचाने का बन्द प्रवध कजिए और रोगी को ढक कर रखिए । आवश्यक्ता से अधिक शरीर को खुला न रखिए। दस्ताने को अपने हाथों में पहन लें ग्रार याल्टी में भरे पानी में उन्हे (हार्था) डबो द फिर निकाल कर झट्का देकर अधिक जल उनमें से निकाल फेके । रोगी के ऊपर के ग्रा से प्रारभ कर वाह और हाथ को तेजी से ऊपर नीचे रगडते रहे जब तक गर्मी उत्पन्न हाकर तमतमाहट का अनुभव न हो ! फिर दस्ताने को वाल्टी में डाल दीजिए और सूखे तौलिए से अनों को सूखा डालिए। उन्हें तय तक रगडते रहिए जब तक वह लाल न दिखाई दे। नीचे के अगों को भी उसी प्रकार वजिए। इसके बाद छाती पार पेट की भी उसी प्रकार चिक्त्सिा कीजए जैसी अर्गा की करते है। फिर रोगी को उल्टा कर उसकी छाती के नीचे तकिया रख कर पीठ की उसी भाति चिकित्सा कांजए। उपचार समाप्त हो जाने पर इस बात का ध्यान रखिए कि रोगी विलकल सूखा पार गर्म रहे । उसे ठड न लगने दीजिए। स्वास्थ्य और चगापन के लिए स्नान जय हम क्सिी प्रकार के स्नान के विषय में चर्चा करते है तय हम स्नानागार में पाई जानीवाली चीजों के विषय में सोचने लाते है । जल चिकित्सा के लिए में स्नान शब्द उपयात क्यिा जाता है वह विभिन्न विधि का वर्णन करता है। इन विभिन्न विधियों में वहन कछ समानता रहती है । इस चिकित्सा के विभिन्न विधियों के स्नान सपूर्ण भाग है। दो प्रकार का स्नान हा सकता ई-प्राधा इवाकर स्नान करना । इस स्नान में एक बार में शरीर का कवल एक अश डवाया जाता है । दसरा पुरा ड्वाकर स्नान कना जिसमें पूरा शरीर इवाया जाता है। । 1 स्वास्थ्य में प्रयोग सिदय उपाय १२० पंर के स्नान जल चिकित्सा में यह एक अत्यन्त उपयोगी समभा जाता है। इसकी चिकित्सा तीन विभिन्न तरीकों से की जा सक्ती है-मर्म, ठडा अथवा ठडा पार गर्म का बारी यारी करके सेंक देना । बड़े बाल्टी अथवा चिलमची का उपयाग किया जा सक्ता है। वे इतना गहरा हो कि टखनों तक पानी रहे चारपाई में रोगी के पर स्नान करने के समय इस यात का स्मरण रखना चाहिए कि वाय के सचार को रोकने के लिए उसके शरीर को तथा पैर को कवल से लपट देना चाहिए और विस्तर में रबड की चादर बिछा देनी चाहिए। चिकित्सा के बाद पैर को अच्छी तरह पोछ कर सुखा देना चा ए और एक गर्म तथा सूखे कपल से ढक देना चा । यदि रोगी चारपाई में लेटा न हो तो उसके मोजे जूते अथवा चपल का बदल देना चाहिए । पर को गर्म पानी से स्नान कराने के लिए चिलमची में यथष्ट पानी रखना चाहिए जिससे टखने ड्य जाए । १०५ आर पारनहाइट गर्म जल से स्नान रम्भ करने के बाद उसमें धीरे-धीरे गर्म जल डाल कर १२० प्रश फारनहाइट कर देना चाहिए। यदि रोगी का पर गर्म पानी में पहले से रहे के ताप को सरलता पूर्वक सान कर सकेगा। इस चिकित्सा को सरलता पूर्वक सहन कर सकेगा। इस चिकित्सा को पाच मिनट अषं घटे तक कर सकते है। इसके बाद पानी से पर को निकालए। पर के ऊपर ठडा पानी शीघ्रता से डाल कर जल्दी से पोछ डालिए। जमे हए रक्त को स्थान से खीचने के लिए गर्म जल से पैर को स्नान कराना एक अच्छा तरीका है और स्नान के सात में ठडे जल का छोटा देने से उत्पन्न प्रभार बना रहता है। वह गर्म जल । ठई जलसं पर स्नान चिपित्सा प्रारम्भ करने से पूर्व पंतों का गर्म करना चाहिए। जल का तार ४५ से ६० प्रश पारनहाइट होना चाहिए। यतन में पानी यम से-यम दो से चार इच नफ हाना चाहिए । ठडे जलम य ६ए परा को एप दना से अथवा आर्या संमड़ना शाशी। पाप के इस स्नान को मस्तिष्य यकृत पस्तिमत्वर या हॉद्रयां की नाइय प्रातिक चिकित्सा १२१ ठडे जल से परफा स्नान पर प्रतिक्षिप्त क्रिया (Reflex Action) होती है। यह क्रिया उदर या पंड, सबधी सजन की उस स्थिति में और मासिक धर्म के समय विपरीत दिखाई देती है। गर्म प्रार ठडे जलका प्रदलबदल स्नान इस विधि से उपचार करने के लिए चिलमची प्रथवा दो बाल्टी की पावश्यकता होगी। एक गर्म जल रखने के लिए और दसरा ठडा जल के लिए। गर्म पार ठडे दोनों जल से टखनों तक डूबने के लिए काफी जल का प्रयोग कीजए। गर्म जलको उतना अधिक गर्म होना चाहिए जितना रोगी सह सके । सप से पहले कम से कम दो मिनट तक अपने पाप को गर्म जल से स्नान कीजिए उसके बाद दस से पद्रह सेकेंड तक अपने पार को डयो कर रखिए । पद्रह मिनिट तक इस प्रकार कीजए और सब से पीछे ठडे पानी में ड्या कर अत कीजिए। इसके बाद पर को अच्छी तरह गंछ कर सुखा डालिए। इस प्रकार के स्नान से जिस स्थान की चिकित्सा की जाती है उसमें रक्त सचार की गति तीव्र होती है। यह चिकित्सा रक्त संचय के कारण जो सिर दर्द हाता है उसके लिए यहत लाभप्रद है। जिस स्थान में इस स्नान का उपयोग क्यिा जाता है उसमें रक्त की गति तीव होती है। यह स्नान पर के विभिन्न सत्रमणों के लिए वहत उपयोगी सममा जाता - F9 १२२ स्वास्थ्य के प्रयाग सिदय उपाय गांद मार हाथ धा स्नान वाह पार हाय को भी पाय की भाति स्नान दिया जा सकता है । याह के स्नान के लिए एक बड़ी चिलमची यात उपयोगी होती है। यदि चिलमची उपलब्ध न हो तो एक बाल्टी उपयोग में लाया जा सकता क्योंक कर्दनरों को जल से ढाक्ना अत्यन्त प्रावश्यक है। पर के स्नान के समान ही पाह और हाय को स्नान देन की तरीका है, लक्नि इसमें प्रभाव उतना अधिक स्पष्ट नहीं होता। कर्दनयों तक से ठडे जल से हाय का स्नान करना नाक से रक्त पहन का रांगताई। यार और हायों का पर्याय ऋमिक स्नान (Contrast Baths) सम्मक चिकित्सा के लिए उपयोगी होता है। जल को जितना तक हो सके उतना गर्म रखना चाहिए। यदि रघुले घाव हो तो थोड़ी रोग नाशक औषधि जैसे लायसल या इंटाल को प्रावश्यक्ता अनुसार जल में मिला लिया जाए। पर को गर्म और उडे जल से मदल-बदल कर स्नान दीजिए और समय हो सके तो तीस मिनिट से एक घटे तक इस स्नान प्रम को चाल रखिए। स्नान देने के याद उस अंगको सूखा रखिए पार पटटी याध दजिए । रोगी की स्थिति को तीव्रता के अनुसार दिन में तीन या चार वार चिकित्सा कर सकते टांगों का स्नान 1 यह भी जिस प्रकार पांवों के स्नान का वर्णन किया गया है उसी भावि तीन वरीको दवारा दिया जा सकता है । वाल्टी इतनी बड़ी होनी चाहिए कि उसमें घटने तक पानी आ सके । साराम के लिए रोगी को स्टल में अथवा फसी में येठा दीजिए जिसमें गद्दी लगी हो । यह स्टल बाल्टी से दो या तीन इंच ऊचा रहे। नर्म जल से दाग को स्नान देने से वैसा ही प्रभाव पड़ता है जैसा पर को स्नान देने पर टागों के स्नान में प्रभाव अधिक वीद पड़ता है। याद पर के गर्म स्नान के साथ सैद अथवा छाती का संक दिया जाए तो यहत अधिक पसीना निकलता है। इस प्रकार को चिकित्सा को ठडे दस्तान के अर्पण से प्रत कर देना चाहिए। टाग का पर्याय ऋमिक स्नान पर के पर्यायमिक स्नान के समान है। लोकन सिर में टडा पधन या पल्ली लगाना जरूरी है।

भारतक चिक्त्तिा १२३ यह स्नान शरीर नीचे फेरी के रक्त संचार को गतिमान करता है। यह नीचे के अगों की सूजन की चिकित्सायों के लिए उपयानी होता है। स्नान का समय इस प्रकार होनी चाहिए दो मिनट गर्म जल से पार ठडा पानी से तीस सड तक। यह स्नान अस्तर केशिरा प्रसारण काचविरसा के लिए उपयानी हा सक्ता है । इस स्थिति में गर्म जलमें टान को केवल एक मिनिट तक रखना चाहिए र ठडे जल में पल एक मिनिट रखना चाहिए। यदि ऐसा न पिया जाम ता नास्र के चारों मोर की सूजन यद जाएगी। परा याकर स्नान रोगी के समस्त शरीर को सिर छोड़कर) स्नान करना चाहिए। इसके लिए उतना ही समय लना चाहिए जितना में पूरा शरीर डर जाए न सिरको रखने के लिए एक तक्यिा होना चाहिए। यदि रोगी यहत दपला पतला हो तो उसके पैठने के लिए चादर रख देना चाहिए जिससे उसे पाराम मिले। जय नर्म स्नान दिया जा रहा हो उस समय रोगी के सिर पर ठडी पट्टी (कम्प्रेस) रखने से अच्छा होता है । इस स्नान के समय स्नानार के तापमापक यन्त्र से जल के ताप को देखना चाहिए। नम जल से केवल स्नान देना चाहिए। उसका तापमान १०० अश से १०६ प्रय पारनहाइट होना चाहिए। यह स्नान ठड चिकित्सा की यारी के लिए दिया जाता है। यह शरीर के ताप को बढ़ा कर पसीना निकलने के उद्देश्य से दिया जाता है। १०० अस ताप जल का स्नान यहत स ऐसे रोगों के लिए लाभप्रद होता है जिसमें मासपेशी की ऐठन हो । रोगी गर्म जल में दो से वीस मिनट तक रहने के बाद उड़े जल से स्नान कर या ठडे जल का यांछार देकर समाप्त कर दे। ठंडे उपले जल का स्नान इस प्रकार का स्नान एक महत्वपूर्ण टानिक है। इस स्नान लिए पाच या छ इच की नहराई तक टब में जल होना चाहिए। उसमें रोगी बैठ पर अपनी थाह और पैर को जोर से रगड़े। इस समय इसका सहायक उसकी पीठ प्रार छाती को रगड़ने में मदद करे। इसके बाद रोगी के शरीर में ठडा जल डालना चाहिए। फिर वर टच में लेट कर प्रपनी छाती और पेट को रगड़े। यह चिकित्सा अधिक देर तक नही परनी चाहिए। पाच मिनट यथेष्ट स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय । क्सिी किसी के लिए पाच मिनिट यस है। जब रोगी टव से निकल जाता है तब उसे ठडा नही लेकिन गर्म अनुभव करना चाहिए । इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि किसी ठडे जल के उपचार से रोगी को गर्म अनुभव करना चाहिए। यदि वह गर्म अनुभव नहीं करता तो इसका मतलब है उसमें कछ गडबडी है अतएव अापको उसे गर्म रखने का प्रयध करना चाहिए। आप उसे गर्म जल भरे यांतल का उपयोग कर कवल अथवा शीघ गर्म पय पदार्थ देकर उसमें ऊणता ला सकते है। जिन उपचारों का हमने ऊपर वर्णन क्यिा है उनमें सभी वार्ते नहीं है पर वे सरल एवं प्रभावकारी है। अपने रोगी के लिए जल चिकित्सा का प्रयोग करने से पूर्व डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए। एक डाक्टर रोग के लक्षण त्वचा चिकित्सा के विपरित लक्षणों को पहचान सकता है जब कि एक साधारण मनुष्य उन्हें नहीं पहचान सकता। M सामयिक सूचनाएं एस वी हवाइकांड, डी एस सी कब्ज को दर धरने के दस उपाय १ "प्रपने स्वास्थ्य को अच्छी स्थिति में रखने के लिए पात में कछ दषित पदार्य र जाते है उनको नियमित रूप से निष्कासन करना बहत यावश्यक है। नीच दिए गए उपायों द्वारा बडी पात को क्रिया समुचित रूप से चाल रखी जा सकती है। समीरचक पदार्थ का परित्याग करें। ऐसे पदार्थों से सात की मास पेशियों में बहत जोर उत्तेजना होती है जिससे उसकी क्षति होती है । रेचक पदार्थ दर्पलता की अोर घसीट कर ले जाते चार प्रान की प्रतिक्रिया भी मद पड़ पड़ जाती है। यात को साफ करने के लिए जय भई रेचक पदार्थ लेने की अावश्यक्ता हो वो एसी अवस्था में कशल हाय दवारा गर्म जल का प्रयोग क्यिा जाता। २ निर्यामत रूप से नित्य व्यायाम करना । मल निष्कासन की क्रिया विशेष करके मास पेशी की प्रतिक्रिया है। इसलिए प्रातारक मासपेशियों को ध्यायाम दवारा स्वस्थ रखना अावश्यक है। पेट तथा नाड़ी की मास पेशियों को जीवन प्रदान करने के लिए प्रत्येक दिन दो बार दस मिनिटमा व्यायाम कीजिए। अधिक शक्ति या ताकत लगाकर व्यायाम करने की आवश्यकता नहीं है केवल पावश्यक मासपेशियों को झकाना फलाना मोडना और ग्यना चाहिए । टानों को सीधा करके झकिए और पैर के अंगूठों को छन की कोशिश कीजिए पीठ के बल लेट कर अपनी टागों को ऊपर उठाइए पार फिर धीरे धीरे नीचे कीजिए अपनी कमर को बैठने की स्थिति में रख कर धीरे धीरे झपाइए अपने पैरों को या में साईकल चलाने की भाति करते हए कल्हों को हाथों पर रख कर सभालिए । प्रत्येक दिन तीन मील पैदल चलिए। (१२५)

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय
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क्सिी क्सिी के लिए पाच मिनिट यस है। जब रोगी टय से निकल जाता है तब
उसे ठडा नही लेकिन गर्म अनुभव करना चाहिए ।
इस बात को स्मरण रखना चाहिए कि किसी ठडे जल के उपचार से रोगी
को गर्म अनुभव करना चाहिए। यदि वह गर्म अनुभव नहीं करता
इसका
मतलब है उसमें कछ गड़बडी है अतएव आपको उसे गर्म रखने का प्रवध करना
चाहिए। आप उसे मर्म जल भरे बोतल का उपयोग कर, कवल अथवा शीघ्र गर्म
पंय पदार्थ देकर उसमें उष्णता ला सकते है।
जिन उपचारों का हमने ऊपर वर्णन किया है उनमें सभी बातें नही है पर
सरल एवं प्रभावकारी है । अपने रोगी के लिए जल-कित्सा का प्रयोग करने
से पूर्व डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए। एक डाक्टर रोग के लक्षण त्वचा चिकित्सा
के विपरित लक्षणों को पहचान सकता है जब कि एक साधारण मनुष्य उन्हें नही
पहचान सक्ता।
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सामयिक सूचनाएं एस बी हवाइड, डी एस सी. कब्ज को दर करने के दस उपाय - "प्रपने स्वास्थ्य को अच्छी स्थिति में रखने के लिए सात में कछ दषित पदार्प रह जाते है उनको नियमित रूप से निष्कासन करना बहत यावश्यक है। नीचे दिए गए उपायों दवारा बड़ी मात की क्रिया सन्चत रूप से चाल रखी जा सकती है। १ सभी रेचक पदार्थ का परित्याग करें। ऐसे पदार्थों से यात की मास पश्चियों में बहुत जोर उत्तजना होती है जिससे उसकी क्षति होती है । रेचक पदार्थ दर्बलता की यार घसीट कर ले जाते और मात की प्रतिक्रिया भी मद पड़ पड जाती है। प्रात को साफ करने के लिए जब कई रेचक पदार्थ लेने की आवश्यक्ता हो तो ऐसी अवस्था में कशल हाय दवारा गर्म जल का प्रयोग किया जाता है। ૨ निर्यामत रूप से नित्य ध्यायाम करना । मल निष्कासन की क्रिया विरंप करके मास पेशी की प्रतिक्रिया है। इसलिए प्रातरिक मासाशयों को व्यायाम दवारा स्वस्थ रखना आवश्यक है। पेट तथा नाड़ी की मास पेशियों को जीवन प्रदान करने के लिए प्रत्येक दिन दो बार दस मिनिट या व्यायाम कीजिए। अधिक शक्ति या ताकत लगाकर व्यायाम करने की यावश्यकता नही है क्वल आवश्यक मासपेशियों को झवाना फैलाना मांडना पार नयना चाहिए। टागों को सीधा करके झांकर और पैर के अन्ठा को छन की कोशिस कीजिए पीठ के बल लेट कर अपनी टागों को ऊपर उठाइए पार फिर धीरे धीरे नीचे कजिए अपनी कमर को बैठने की स्थिति में रख कर धीरे धीरे मयादए अपने पैरों को या में साइक्ल चलाने की भाति घरते हए कल्दों को हाथों पर रख कर समालिए । प्रत्येक दिन तीन मील पंदल चलिए । (१२५) १२६ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय 1 ३. अपनी प्रादतों का नियमित रूप दजिए। कब्ज या कोष्टवद्ध की तकलीफ किसी दूसरे कारण से नहीं लौक्न अधिक तर घरी पादतों से होती है। शरीर प्रत्येक दिन के नियमित घटों का महत्व देता है और उसके अनुसार उसकी प्रतिक्रिया होती है। शरीर में दापत पदार्थों का परित्याग करने की जो स्वाभाविक इच्छा उत्पन्न होती है उसको कभी नहीं दवाना चाहिए। मलत्याग करने के समय स्वाभाविक रूप से बौठए । घुटनों को छाती तक ऊपर की ओर लाकर पलयी मार कर बैठने की स्थिति में होकर मलत्याग का उत्तम और सरल तरीका है। इस तरीके से मलत्याग की क्रिया में सहायता मिलती है अर्थात शीघ मल मात से निकलता है। जीवन प्रदान करने वाले तथा रेचक खाद्य पदार्थ खाइए । कच्चा सलाद (रायता) और सब्जिया. ताजी पकाई हुई सब्जिया, सेके हए पाल, फल, शहद, सूखे फल, गेंद की रोटी, पूर्ण अन्न-धान्य का फल, दाल, दध इत्यादि जीवन प्रदान करने वाले तथा रेचक खाद्य पदार्थ है । कम- से कम इन खाद्य पदार्थों में से एक या दो के विना भोजन खाने का नियम बना लें। ६. कृत्रिम खाद्य पदार्थों का परित्याग कीजिए। मंदे से बनी रोटी इत्यादि अन्य चीजें, शक्कर, परिष्कृत अन्य धान्य, मिठाइया तथा वनावटी सद्य पदार्थ जैसे कस्टर्ड पांडर जिनमें शक्ति प्रदान करने वाले गण नही होते । भने हए पदार्थ तथा मास का परित्याग करना चाहिए। भोजन के बीच में जल पीना । जठर रस पतला होने तथा प्रत्येक दिन पर्याप्त मात्रा में जल नही पीने से पाचक क्रिया मद हा जाती है जिसके फलस्वरूप कब्ज की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अधिक विटामिन 'बी' पाले खाद्य पदार्थों को खाइए। विटामिन 'बी' पाचक क्रिया को अच्छी स्थिति में रखने यार मलत्याम के लिए आवश्यक है। मेह की रोटी पूर्ण धान्य, गेदं का प्रकर खमीर तथा पत्तीदार सब्जियों में विटामिन बी की मात्रा बहत रहती है। प्रधिक मानसिक तनाव को दर कजिए। अपने तीर मानसिक परिश्रम को शारीरिक श्रम प्रथया किसी प्रिय कार्य ९.

सामयिक सूचनाए ૧૨૭ दवारा सतलित रखना सीखए । मानसिक तनाव से स्नाययों में तनाव पड़ता है और स्वाभाविक रूप से हाने वाले मल त्याग में बाधा होता है। १०. मल त्याग को एक ससद कार्य समर्माभए। या परम पावश्यक, स्वास्थ्य रक्षक तथा स्वाभाविक कार्य है । यदि बाल्य- काल के प्रशिक्षण के कारण आपके मन में मल त्याग करने के प्रति प्रतीचकर तथा घृणास्पद भावना घर कर ली ही तो इस विचार को बदल दीजिए। इस मानसिक अभिवृति के कारण ही क्ज की स्थिति उत्पन्न होती है। मंदाग्नि से बचने के दस साायक उपाय इस बात को स्मरण रखना उचत् है कि पाचक विकार मानसिक तथा शारीरिक कारणों से उत्पन्न होता है। १. खाने के समय कोई भी पेय ग्रहण न कीजिए। यदि आपको कोई पेय प्रयोग करना प्रावश्यक ही हो जाए तो भांजन खाने के पूर्व पीजिए विशेषकर छोटे गिलास से सब्जी अथवा फल का रस । यह भोजन पदार्थो को पचाने के लिए जठर के रस को एक जगह सचित करता है। २. पचाने में कठिन खाद्य पदार्थों को न खाइए। भने हए पदार्थ तले हए खध, राजसी भोजन, केक पेस्ट्रीज अधिक मसालेदार चटनी, आचार, भरव्या असतुलित तया पालिस किए हए खध पदार्थ जसे मंदे की रोटी परिष्कृत चावल, साा इत्यादि पचाने में कठिन होते है। ३. पूर्ण सद्य पदार्थों में से अपना आहार चनिए। पूर्ण गंह की रोटी पूर्ण अन्न धान्य, सब्जिया. दप अडे, फ्ल सुखें मटर पलिया मसूर की दाल मारकांनी सेवनी तया काष्ठफल इत्यादि में विभिन्न प्रकार के साथ पाहार प्राप्त होते है । जित करने वाले मास भोजन और सत्व (एसेन्स) से परे रहना चाहिए और मदिरा को भी दर रखना चाहिए। सय राटियों को सेंकना चाहिए। चूल्हे में रोटी को पूर्ण रूप से सेंकने के दवारा यह काम पूरा होता है। रोटी का सेक्ने से उसका सत्व (स्टार्च) निकल जाता है। इसलिए इस रोटी को पचाने में सहज होता है। इस प्रकार संकोई रोटी को अच्छी तरह चबाना पड़ता।

स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय १२८ ५. दिन में एक बार सलाद खाइए। सेलेरी, दकडा क्यिा हया गाजर, क्तरी हुई गांभी, देवकीनर, ककड़ी, लेटस, प्याज, टमाटर, मूली, इंडलियोन की पत्तिया, खरासानी, अजवायन, पोदीना इत्यादि से तीन सब्जिया चुन कर सलाद बनाइए । इस सलाद को पनीर अथवा काष्ठफल अथवा रिएसोल दवारा संतुलित कर्मजए। ६. थोडा तथा संतुलित आहार खाइए। प्रत्यक याहार में कछ फल अथवा कछ सब्जिया रहनी चाहिए। कछ धान्य (अथवा यदि पकाई हुई सब्जियों का ग्राहार रहे तो उसमें पाल मिलाना चाहिए) प्राटीन खाद्य पदार्थ (पनीर, दाल, वादाम, अड) स्वादिष्ट भोजन के लिए रखिए। प्रसल भूख लगने पर ही खाइए। यदि सारीरक क्रियाए और मल त्याग को नियमित रूप से बनाए रखें तां बाहर या चालीस घटे तक उपवास करना लाभप्रद है। 2. धीरे-धीरे खाइए। खाद्य पदार्थों को तय तक अच्छी तरक्ष चयाइए जब तक उसका स्वाद न चला जाए । अच्छी तरह चबाने से आमाशय, ड्यूडोनम (प्रत का प्रथम भाग) मार यकृत अपना कार्य कर सकेगें । ९. प्रत्येक भोजन के बाद लकडी कोयले का अंश खाइए। इस कोयले को मिठाई के रूप में लीजिए (यह दवाई बेचने पाले बड़ी दकान से मिल सकता ह) अथवा कोयले का विस्कट। १०. भोजन करते समय मानसिक रूप से पिल हो जाइए। अपने भोजन से जितना अधिक ग्रानद प्राप्त कर सकते है पर लीजिए। खाने के समय चिन्ता रोडयो, समाचार पत्र, पुस्तकों को अलग रसे। भोजन के याद पद्रद मिनिट तक विश्राम कीजिए। उच्च रक्तचाप से बचने के लिए दस सामयिक उपाय फ्या ग्राप उच्च रक्तचाप से कष्ट पाते है?र्याद पष्ट पाने है तो नाचे कछ सलाह दी जाती जिससे ग्रापको मदद मिलेगी। १. यह स्मरण रखएक उच्च रक्तचाप कोईरांग नहीं है। यह किसी रोग के भीतर भीतर यदने या चिन्ह है।

सामयिक सूचनाए १२९ २, अपने स्वास प्रश्वास का विकास कीजए। गहरी सास लेने पार धीरे धीरे याहर निकालने का अभ्यास कीजिए 1 रक्त का दयाव विशेष कर हदय तया रक्त नालियों पर निर्भर करता है और इनके दवार रवंत सचारित होने पर उनकी (रक्त नालिया तथा हृदय) स्थिति निर्भर करती हैं। ३ सावधानी रखते हुए नियमित रूप से व्यायाम कीजए। व्यायाम एट्रिक क्रिया को उचित अवस्था में रखता है। रक्त को स्वच्छद तथा समान रूप से प्रवाहित होने के लिए व्यायाम की प्रावश्यक्ता है। सिथिल हो जाए। मानसिक तयापारिक दोनों के तनाव रक्त का दबाव बढ़ जाता है। मानसिक श्रम से प्रत्येक दो घटे के पाच मिनिट के लिए शिथिल हो जाना चाहिए इस समय चाहे आप अपने ना को फैलावं अथवा कमरे में इधर-उधर चले। शारीरिक क्रियाशीलता को भोजन के बाद कछ समय लिए शिथिलन दवारा समलित कीजिए-पर्याप्त मात्रा में विश्राम लेने के दयारा यह सभव हो सकता है रात में कम से कम पाठ घटे सोइए। ५ नियमित रूप से मलत्याग कीजिए। एक अधिक विषाक्त रक्त धारा धीरे धीरे प्रवाहित होती है और दबाव उत्पन्न करती है। दिन कम से कम दो बार टट्टी करनी चाहिए और छह कार पेचार । त्वचा की उत्तम छिद्रयुक्त क्रियाशीलता भी नितात आवश्यक शरीर के क्षार की मात्रा अधिक रखिए। क्षार ऊत्तकों (मास तया) को परिष्कृत करने तथा कोमल यांवन कांपों का निर्माण करने के लिए अति आवश्यक है। ताजी सब्जिया सालाद फल तया दध उत्तम क्षार प्रदान करने वाले खाद्य पदार्य है। अधिक मास रहित भोजन खाए। रक्त नालियों की दीवालों में मोम के समान पदार्थ जिसको कॉल स्ट्राल कहते है जम जाता है। इसके फल स्वरूप नालिया कड़ी हो जाती है यार नाड़ियाँ के कड़े होने के कारण उच्च रक्तचाप की स्थिति उत्पन्न हाती है । मास में यह पदार्य अधिक रहता है। इसलिए मास के स्थान में दूध पनीर दाल पलिया, बादाम (काज फ्ल) तथा पूर्ण धाय का प्रयोग कीजए। 1 ७ १३० स्वास्थ्य के प्रयोग सिदय उपाय ८. लहत्तन के प्रयोग दयारा रक्तचाप कम कीजिए। रक्तचाप को कम करने में लहसन का प्राधि-संबंधी गुण विशेषकर वह मूल्य समझा जाता है । लहसुन को सुप के रूप में तथा खध बढ़ाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। टानिक के लिए लहसन याचे हिस्से को दस मिनिट तक दध में उबाल कर रात के समय पीजिए। भावनात्मक संकटों से सावधान रहए। तीव चित-वृतियां जैसे क्रोध, ईयां, घृणा, चिन्ता इत्यादि रक्त दवाव को बढाते है विशेषकर मस्तिष्क के केन्द्र के दबाव को, इसलिए सुखद तथा मानसिक शिथिल हष्टिकोण रोखए। १०. समय का पालन कर्मजए। उच्च रक्तचाप से बचने के लिए संयम होना यावश्यक है सदी से बचने के लिए दस सामयिक उपाय सदी अधिक श्लेष्मा उत्पन्न होने के कारण होती है । दषित तथा कपित करने वाले पदार्थों को त्यागने के लिए शरीर को जो परिश्रम करना पडता है उसीके फल स्वरूप श्लेष्मा उत्पन्न होता है । जब श्लेष्मा गले या सिर के विकास तक पहुंच जाता है तय यहत कष्ट होता है । इसकी चिकित्सा करने का एकमात्र उपाय है श्लैष्मिक झिल्ली के सामान्य कार्य को फिर से चालू करना। कार्य को सामान्य रूप से चाल करने के लिए कपित या उत्तजिक करने वाले कारण को दर करना और शरीर को मदद पहुंचाना चाहिए जिससे श्लप्मा स्वाभाविक रूप से प्रांत की राह से निकल जावे। १. परको सर्दी लगने से बचाइए। पाचनक्रिया प्रणाली में श्लंघमा जमा होता है 1 पर ठंडा होने का मतलप है स्नाय ठंड से प्रभावित होते है। इस प्रभाव का लक्षण आमाशय के क्षेत्र में दिखाई देता है, अर्थात् पाचनक्रिया मंद हो जाती है और बहन अधिक श्लप्मा निर्माण होता है। जितने सदी का शिकार बनते है उनका पर ठंडा रहता है। याद अाप उनमें से है तो रात के समय अपने घर को ठंडा और गर्म जल से स्नान दीजए। एक मिनिट के लिए पैर को गर्म जल में रखए उसके याद एक मिनिट ठंडे पानी में डाले रखिए। यारी यारी करके दस मिनिट तक एसा कीजए पिर इसके बाद अच्छी तरह पोछ कर सुखा दीजए।

सायिक सूचनाए २. प्रत्येक भार को त्वचा-स्नान लीजिए। व्यायाम करते समय या ठडा अथवा गुनगने जल से स्नान करने के समय अपने शरीर को हल्का यहती हुई वाय में खुला रखने से त्वचा स्नान होता है। यह त्वचा को स्वास्थ्य प्रदान करता यार नाकर्षक बनता है। इस विधिका मुख्य उद्देश्य दषित पदार्थों को निकाल कर श्लोप्मक भिल्लयों को राहत दना है। त्वचा को अर्थात् भीतरी भिल्लियों के बाहरी प्रतिरूप को जित परन के दवारा ऐसा करना सभव हो सकता है। स्नान करने के बाद खुरदरें तौलया से शरीर को रगडिए। ३. प्रत्येक दिन स्वच्छ वाय तथा सूर्य की किरण में प्रत्येक दिन पंदल चलिए जब तक ग्राप की त्वचा चमकने न लगे । गहरी सास लीजिए। जलवायु अनुकल होने पर ग्राप स्यं स्नान लेने से न हिचकिचाए। ४. कब्ज से बचे रहिए। मान में किसी प्रकार की रुकावट होने के परिणाम स्वरूप शरीर के नियमों में श्लेष्मा की मात्रा बढ़ने लगता है । पात को साफ करने के लिए याद रेचक पदार्थ की आवश्यकता हो तो भोजन खाने के पूर्व फल अथवा साग सब्जियों का रस लेना उतम है। ५. श्लेष्मा बनने वाले खाद्य पदार्थों का त्याग कीजिए। पनीर, मक्खन, दध, समीर से बनी हुई रोटिया, तले हुए खाद्य तथा कृत्रिम भाजन पदार्थ विशेषकर पेट में श्लेष्मा के बढ़ने में सहायता पहचाते है। इसलिए कछ सप्ताह के लिए जब तक पात साफ न हो जाए इन खाद्य पदार्थों को न खाइए । जव पात ठीक हो जाए तब इन खध पदार्थों को धीरे-धीरे खाना यारभ कीजिए। ६. जीवन-क्ति प्रदान करनेवाले खाद्य पदार्थ खाए। सलाद, सब्जिया. शोरया, संकी अथवा सुरक्षित रूप से पकाई ,ई सब्जियों, ही पत्तीवाली सब्जिया, फ्ल, सूखे पल इत्यादि पाहार में होना आवश्यक है। सय अन्न पार रोटियों को लचदार बनाए । में की रोटी धान्य, और धान्य के बने मिस्कटो श्लमा उत्पन्न करने वाले खमीर तथा ककरमत्ता को नष्ट करने तथा सामता से पचने तथा उनके तत्वों को मात्मसात करने के विचार से संक्ना चाहिए।

१३२ स्वास्थ्य के प्रयोग सिदध उपाय ८ अपने शरीर को सुबह और शाम रगडिए। त्वचा के तत्वों को साफ रखने पर उनके रक्त सचार को गतिमान करने तथा स्नायु क्रिया बनाए रखने पार दषित पदार्थों को नियमित रूप से त्याग करने के लिए प्रतिदिन भोर को कछ देर ह्या में रहने के बाद अथवा जल से स्नान करने के बाद एक मोटे तौलिए से समस्त शरीर को पांछ डालना चाहिए और प्रत्येक शाम को हाथमें कछ मुगफ्ली के तेल से मालिश करनी चाहिए। इसका प्रभाव चार अथवा पाच सप्ताह तक रहता है। यह प्रभाव यहत आश्चर्यपूर्ण - होता है। ९ 1 सिर के निकासों को सोहागा से साफ कीजिए। प्रत्येक दिन सुबह में नाक के छिद्र में पिसे हुए सांधने की चटकी में लेकर सघे । इसके बाद गीले अगठे को सोहागे में इवा लीजिए यार ताल के ऊपर रखिए । इसको निगल न जाइए । एक मिनिट तक ताल के ऊपर रखने के याद खखार निकालने के समान कजिए और नाक से सास अचानक छाडिए। ऐसा दरने से सब श्लेष्मा निक्ल जाता है। १० प्रति दिन अपने शरीर के छोरों का व्यायाम कजिए। मधुमेह से बचने के दस सार्मायक उपाय शरीर शक्कर को इन्स्युलिन की सहायता से उपयोग करता है । पर क्लोम थि पर्याप्त मात्रा में इन्स्युलिन उत्पन्न नही कर सक्ता जिसके फल स्वरूप मधुमेह की स्थिति उत्पन्न होती है। मधुमेह की स्थिति को दर करने के लिए पशुसांत इन्स्युलिन का निर्यामत रूप से चिकित्सा करना यावश्यक है लेकिन इस उपचार के अतिरिक्त अन्य तरीकों से रोगी अपने जीवन को स्वास्थ्य और सुखी बना सकता है। १ अपने शरीर भार वा बराबर ध्यान रखिए। असल मधुमेह से ग्रसित रोगी दबला पतला रहता है । उसका शरीर भार प्रधिक हाने की अपेक्षा सामान्य से भी कम रहता है। यदि रोगी का शरीर भार अधिक हो तो उस के आहार को फछ कम कर मधुमेह के लक्षण दर करने में सहायता प्राप्त कर सकते शक्कर खाद्य पदार्थ तथा माडी कम कीजए। माड़ी को रक्त में शोषित करने के पूर्व शक्कर में परिणत किया जाता है। द,बल क्लाम थि को अधिक परिणाम करने से यचाने के लिए रक्त में जो २ सायिक नचनाए सक्कर की मात्रा रहती है उसे क्सिी उपयोग में लाने के योग्य बनाना चाहिए जिससे सरीर उससे लाभ उठा सके अर्थात् जितनी सचय करने की सामर्थ हो उसे सचित करके शेप को त्याग दें। इसकी पेशव दवारा जाच की जा सकती। माडीयुक्त भोजन रोटी, धान्य, मिठाइया, केक, पेस्ट्री, दाल इत्यादि उतना ही म कजिए जिससे पेशाव में शक्कर न दिखाई दे। मीठे खाद्य पदार्थ, शक्कर, जाम इत्यादि पदार्या का भोजन से निराकरण करना चाहिए। ३. एती रोटियां साइए जिनमें माडी अथवा लसलसा पदार्थ कम हो। माड़ी की मात्रा को कम करने के उद्देश्य से मधुमेह रोगी के लिए विशेष धान्य भोजन प्राप्त हो सकत है । मधुमेह रोगी के लिए याद विशेष रूपसे प्रस्तुत किए हुए जाम, सुरक्षित किए हए भोजन पार चाकलेट प्राप्त हो सके तो वे लाभदायक है। ४. कम-से-कम दिन में एक बार सालाद खाइए । ताजी सब्जियों का रायता भीतरी ग्राथ रसो को गतिमान करती है। रायता (सालाद) के लिए हरी पत्तवाली सब्जिया. टमाटर, दकडे किए हुए गाजर लाभप्रद होते है। ५. मार्डी की कमी को घसा (घी) द्वारा पूर्ण कीजिए। मक्कन, दध तथा दध से उत्पादन खाद्य पदार्थ जो अतिरिक्त प्रसा के रूप में रहते है वे शक्ति को बनाए रखते है। ६. प्रतिदिन गर्म जल से पांव को स्नान दे। मधुमेह रोगियों के पैर मार टाग की धमनियों में विकार उत्पन्न होने की सभावनाए रहती है विशेषकर याद रोगी के अधेड़ अथवा पाय के होने पर । रोगी के पैर को जल में नमक देकर स्नान दीजिए और मालिश कीजिए। ऐसा करने से वे ठड अथवा चेतना शून्य होने से सुरक्षित किए जा सक्त है रक्त सचार को बताए रखने के लिए नियमित व्यायाम कीजए । नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर के समस्त ऊपरी भाग में सदा प्रवाहित होता है। यह रक्त शक्कर को समान रूपसं वितरित करता है और चयापचय क्रिया को बनाए रखता है। व्यायाम के लिए साधारण लयात्मक गति. विधि, मलिश तथा प्रतिदिन खुली हवा में कछ काम करना या खेलना चाहिए। -

स्वास्थ्य के प्रयाग सिदध उपाय
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८. घमपान या परित्याग कजिए।
पर के रक्त सचार में तयाक, के प्रयोग का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सिट
अथवा यीड़ी पीने के समय रक्तवाहिनया दव सी जाती है पर रक्त के प्रयाद
में थापा होती।
९.
पक जाने पर गर्म जल से स्नान कजिए।
गर्म जल का ताप ४०६ सोटाड होना चाहिए। इस गर्म जस से दस मिनिट
स्नान कीजए।
१०. सात दिनों में एक दिन उपवास रसिए।
उपवास यात्म नीरोग्य की स्थिति में रखने के लिए शरीर को मदद पण,चाता
है। ठोस सहा पदार्थ न साइए पर मुत्त लाने पर विसय जल अपपा पल य
सांग्जयां का रस पीजाए।
परय प्रदाद रोग से पचने के दस सामाया पाय
पृषक प्रदर यया यरन । गुर्द का पीमारियां या साधारण नाम ।
।

सायिक सूचनाए १३५ यह स्थानीय विकार की अपेक्षा पार कछ अधिक अवयों में विकार उत्पन्न करता है । इसके कारण समस्त शरीर में दर्वलता की शिकायत या जाती है। १. माहार में प्रोटीन की मात्रा कम कीजिए। शरीर के दषित प्राटीन अवशेषों को त्यागना गुर्दे का काम है । गर्दै के काम को कम करने के अभिप्राय से तथा उन्हें स्वय नीरोग्य होने की क्षमता प्रदान का अवसर देने के लिए प्रधिक मात्रा में प्रोटीनयुक्त खद्य जसे मास मछली प्रडे इत्यादि को याहार से एकदम निकाल देना चाहिए । दध पनीर ककरमता तया वनस्पति प्रोटीन जैसे मटर पलिया (पीन्स) दाल काष्ठफ्ल को अपने भोजन को उपयोग कीजिए और मास भोजन का परित्याग कीजिए। २ प्राधिक मात्रा में जल न पीजिए। ३ अम्ल उत्पन्न करने वाले खाद्य-पदार्य न खाइए । गुर्दे का शरीर से अम्ल को निकालने का प्रधान काम है। इसलिए अम्ल उत्पन्न करने वाले खाद्य पदार्थ जैसे अडे, मास मछली मुर्गी जई चावल पर इत्यादि का परहेज करके गुर्दे की सहायता कीजिए। ४ तीन भोजनों में से दो में सम्जियां खाइए। ५ सालत खाद्य पदार्थों या आपना प्राधार मनाइए । माड़ी प्राप्त करने के लिए मंद से पनी रई रोटियों के स्थान में गेह, से बनी तथा पूर्ण धान्य का उपयोग कीजए । शक्कर के लिए भरी शक्कर अथवा शहद खाइए । वसा (ची) के लिए मक्खन जैतून का तेल बनस्पति मार्गीरन, पश ची अथवा तेल के स्थान में उपयोग कीजिए। अधिक मात्रा में नमक तथा मसालेदार खाद्य पदार्थों से परे राहए । जई या पानी और सेलरी बीज की चाय पीजिए। त्वचा को स्वस्थ रखिए। त्रियाशील त्वचा गर्दा के भार को मुक्त करती है । सदा घर्षण रगड़ ९. प्रतिदिन यहत दर तक पैदल चलिए। वाय स्नान और सूर्य स्नान कीजिए। पैदल चलना विशेष कर जनन मत्र संस्थान को लाम पह,चाता है १० किसी प्रकार की अधिकता और सक्ट से पचे रहिए। ८ समाप्त Pablubed and printed by v Raju at and for the Oricotal Watchman Publisb nt Owned by the Oriental watchmen Publashing House, Salisbury Park Poonal Heure Salisbury Park Poona 1 568-69

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Tested Ways To Health

Author
S. C. Menkal
Title
Tested Ways To Health
File name
Tested Ways To Health
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Oriental Wachman Publishing House India
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
550900
Barcode
4990010031694.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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DY1IKbg7Ao4
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