Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Shudharshan Charitra
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जैन श्रादर्श ग्रन्थमाला का १ला ग्रन्य सुदर्शन चरित्र सुदर्शन सेठ का रंग-बिरंगे, १२ चित्रों से सुसजित, सुविस्तृत जीवन-चरित्र। अनुवादफ-.. पण्डित श्यामसुन्दर अवस्थी, एच. एल० एम० एस० प्रकाशक- महालकन्द क्येद, मोमाइटर- "पोसवाल प्रेस १६, सोनागोग स्ट्रीट, कसका। र निर्माणाद २५.] [ पिसमाग्द६८. समस्य..] [मूएफ ! मोभिएर ।
मुद्रक- (महालचन्द बयेद ओसवाल प्रेस १६, सोनागोगष्ट्रीट, कलकत्ता।
जैन शास्त्रों में ब्राह्मचर्य-व्रत की महिमा का वर्णन जितना अधिक किया गया है और दृष्टान्त स्वरूप, प्रसंगवश, जितने प्रमाण दिये गये हैं कि शायद ही किसी अन्य धर्म के शास्त्रों से इसकी तुलना हो सके । वास्तव में शोल-गुण समस्त गुणों का राजा है। सेठ सुदर्शन का जीवन चरित्र जैनियों का एक परम आदर- णीय पाट्य है। भिन्न २ जैन मुनियों ने सेठ सुदर्शन के चरित्र के आधार पर व्याख्यान तथा पद्य यन्ध कथा रचा है। परन्तु यह ग्रन्थ श्रीमद् भिक्षु स्वामी रचित सुदर्शन सेठ के व्याख्यान के आधार पर लिखा गया है। अनुवादक महोदय ने मूल पुस्तक के भाषों की रक्षा करते हुए सरल, सुललित, खड़ी योली में इसकी रचना को है। सुदर्शन चरित्र के विषय में कुछ लिखने के पहले प्रसंग घश इसके मूल.लेखक श्रीमद् भिक्षु स्वामी की ऐतिहासिक संक्षिप्त जीवनी यहां दी जाती है। मरुस्थल के फंटालिया प्राम में साह पालुजी सुखलेचा नामक मोसवाल सजन के औरस में "दीपांदे" माता की कुक्षि में श्रीमान् ।
a ] भिक्षु फा जन्म सं० १७८३ आषाढ़ शुका १३ के दिन हुआ। था- ल्यावस्था ही में यह मत्यन्त वैराग्य भाव के धारक थे। सं. १८०८ में स्थानकवासी एफ सम्प्रदाय के पुज्य रघुनाथ जी के पास इन्होंने दीक्षा ली। जब यह माता के गर्भ में थे तब इनकी माताजीने सिंह का स्वप्न देखा था । इस लिये पहले माताजी दीक्षा की आशा नहीं देती थी; परंतु रघुनाथ जी के यह विश्वास दिलाने पर फि "स्थान के फल स्वरूप श्रीमद् भिक्षु भविष्यत् में देश-देशां. तरों में विचरता हुआ सिंह के समान अप्रतिद्वन्दी होगा", माता जी ने आशा दी थी। कुछ दिन गुरु के साथ रह, उनका शिथिला- चार देखकर श्री भिक्षनजी ने अपाढ़ शुक्ल १५ सं० १८१७ को मेवाड़ देशांतर्गत "फेलवे".नगर में भगवान अरिहन्त का स्मरण कर पुनः भाव दीक्षा ग्रहण किया और वीतराग भगवान के धर्म का प्रचार करते हुए सं० १८६० भाद्र शुक्ल १३ के दिन स्वर्ग को पधारे । , आपके अनुयायी "तेरह पंधी" नाम से विख्यात हैं। जब स्थानक वासी से अलग हुए थे तव आपके अनुयायी यहुत थोड़े थे, परन्तु सत्य धर्म का उपदेश देने, अपूर्ध्व पैराग्य के धारक होने और केवली प्ररूपित धर्म को सूत्रों के निर्देशानुसार पालन करने के कारण इनके अनुयायी श्रावकों की संख्या लाखों में हो गयी है और दिन प्रति दिन दढ़ती ही जाती है। श्रीमान भिक्षु स्वामी ने इस सेट सुदर्शन के चरित्र को कथा के अनुसार, मार- वाडीभाषा में, सं० १८५० मिती कार्तिक सुदी५को नाय दुवार ما [ ग (मेवाट ) में रचा था ।आप के बनाये बहुत से व्याख्यान, कथा; और पद्यबन्ध जोड़ आदि हैं। काव्य के हिसाब से यदि देखा जाय तो वास्तव में वह अपूर्व हैं। जिन सजनों ने आपके बनाये मारवाड़ी भाषा के मूलग्रंथों को पढ़ा होगा, वही उनका प्रकृत रसास्वादन कर सके होंगे। खेद है कि मारवाड़ी बोली में लिखे हुए जैन आचाव्यों की रचनाओं पर हिन्दी भाषा भापियों की दृष्टि अभी तक नहीं पड़ी है। Comparative Study ( तुलनामूलक पठन ) के लिये हिन्दी विद्वानों को चाहिए कि तेरह पंथी आचार्य एवम् साधुओं के बनाये हुए. ग्रंथो को देखें। खास कर श्रीमद् भिक्षु स्वामी एवम् श्रीमजयाचार्य कृत ग्रंथ तो भाव सम्पत् में, शब्द गुम्फन चातुर्य में, एवं काव्य के हिसाब से प्रत्येक हिन्दीतथा अन्य भाग के विद्वानों के देखनेऔर विशेष भाव से पठन करने योग्य हैं। सुदर्शन सेठ के चरित्र में प्रसंगवश अनुवादक ने यड़ी साव- धानी से जैन धर्म के मूल तत्त्वों का दिग्दर्शन कराया है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, एवम् परिग्रहराहित्य का भी उचित स्थान में संक्षित उल्लेख किया है, किन्तु ब्रम्हचर्य के प्रभाव घ गुण वर्णन फरने में तो लेखक ने वास्तविक में ग्रंथको रोचक यनाया है। आशा है कि हिंदी भाषा के विद्वान इस ग्रंथ का समुचित आदर कर लेखक महाशय का उत्साद यढ़ापेंगे, ताफि घे भवि- प्यत् में तेरह पंधी-आचायों के ग्रंथों का अनुवाद पर अन्य फोई पुस्तर भी उपहार दे सय। लेखक तथा प्रकाशफ का [ घ ] उद्देश्य तो तभी सफल होगा, जब मूल ग्रंथों पर विद्वानों की दृष्टि भआकर्षित होगी। जैन धर्म के कठिन नियमों के कारण साधुगण कोई पुस्तक छपवा नहीं सकते। हस्त लिखित ग्रंथ को कंठस्थ करके कोई २ गृहस्थ छपाते हैं, परन्तु बहुत से ऐसे अमूल्य ग्रन्थ-रत्न साधुओं के पास हैं कि जिनका यदि हिंदी भाषा में प्रचार हो तो भन्य जीवों का यहुत फुछ उपकार हो सकता है। निवेदक- छोगमल चोपड़ा।
अनुवादक का निवेदन । .. "यथा चतुर्भिः कनक परीक्ष्यते, निघर्पणच्छेदन ताप ताइन: तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते, श्रुतेन शीलेन कुलेन कर्मणा"। जैसे सोने की परीक्षा उसे कसोटी पर घिसकर, काट कर, हथौड़ी से फूट कर और आग में तपाकर की जाती है। वैसे ही पुरुष की परीक्षा लोगों की सम्मति, आचरण, कुल और कर्म से की जाती है; ठीक इसी तरह सेट सुदर्शन स्वर्ण फी भी परीक्षा की गयी। पहले ये कपिला की कसौटी में फसे गये, फिर अभया ने अभय होकार अपनी काम-कतरनी से जांचा, इसके बाद उन्होंने ( तीन दिन अनशन रह कर ) घेश्या हथौड़ी के हाव- भाव की चोटें खायी और अन्त में भूतनी (मन्तरी ) के भभकते हुए उपद्रव-अग्नि कुण्ड में तपाये गये; किन्तु खरे सोने की भांति उनकी प्रभा बढ़ती ही गयी। वे अपने कर्तव्य पथ से विचलित न.हुए। संसार में ऐसे व्यक्ति कम होते हैं जो हजार दुःखों के दांत दिखाने पर भी तलवार फी धार समान फठिन फर्तव्य मार्ग को पार कर जाते हैं, और जे पार कर जाते हैं वही महात्मा मोर महापुरुष के नाम से पुकारे जाते हैं। उन्ही महापुरुषों में से मुर्शन का नान बाज भी जेन जगत में जगमगा रहा है ] * [ च सुदर्शन का त्याग भी उनके चरित्र की महत्ता का एक प्रधान हेतु है सुदर्शन परम जितेन्द्रिय थे। निर्मल चरित्र के प्रभावसे ही मनुष्य संसार में पूजित होता है और सच्चरित्रताही एक दिन सर्वशता के सिंहासन पर विठाती है। अतः उन्ही त्याग मूर्ति के पवित्र, चरित्र का दिग्दर्शन कराने की अभिलापा से यह पुस्तक लिखी गयी है। इधर कुछ दिनो से भिन्न २ धर्मावलम्बियों के धर्म-प्रथों को पढ़ कर, उनके सिद्धान्तों को जानने की मेरी इच्छा रहा करती है। सौभाग्यवश मुझे कुछ जैन धर्म की पुस्तकों के देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। इस प्राचीन धर्म के धर्म-ग्रन्थावलो- कन से प्रतीत हुआ कि यदि इन के भाव हिन्दी भाषा भाषियों के सामने उपस्थित किये जाय तो कम से कम नैतिक दृष्टि से हमारे नवयुवकों के बढ़ते हुए वर्तमान कामोद्दीपन केशान्त करने मैं ऐसी पुस्तकें बहुत कुछ काम करेंगी। इसी उद्देश को सामने मैं आज यह तुच्छ भेंट लेकर मातु-भाषा के मन्दिर में प्रवेश कर रहा हूं। यह कैसी है, इसका विचार पाठकों और पाठिका- ओं पर ही छोड़ता है। यदि जन जाति और विशेष कर नव- युवक शिक्षित समाज इसको पढ़ कर कुछ भी लाभ उठावेगा, तो मैं अपने परिश्रम को सफल समझंगा और हो सका तो कोई दूसरी भेंट भी लेकर उपस्थित होऊंगा। यह अनुवाद मैने मूल पुस्तक के आधार पर किया है, यथासाध्य भावों में कहीं हेर-फेर नहीं होने पाया । ..इसके रख, السا [ छ लिए मैं याबू रायचन्द जी सुराना का कृतश ई, जिन्होंने मुझे भाव-भाषा की उलझने सुलझाने में यड़ीसहायता दी है। भूमिका के लेखक बाबू छोगमल जी चोपड़ा, वी० ए० बी० एल० ने नोट लिखने में बड़ी मदद दी है अतः उनका कृतज्ञ है। चरित्र- मुद्रिका की शोभा बढ़ाने की इच्छा से, उपयुक्त स्थानों में, कई एक. मासिकपत्रों तथा पुस्तकों से संग्रहीत, पद्यों का नगीना जड़ा गया है, अतः उनके रचयितों के प्रति कृतज्ञता. प्रकाश करना अपना कर्त्तव्य समझता हूं। साथही वाबू महालचन्द जी वयेद' का भी मैं आभारी हूं जिन्होंने मुझे ऐसी उपयोगी पुस्तक के लिखने का परामर्श दिया और उसे प्रकाशित किया। संशोधन में कई एक अशुद्धियां रह गयी हैं पाठक उनके लिए क्षमा करेंगे। तौरा-उन्नाव (युक्तप्रान्त) शिवरात्रि-फाल्गुन, सं०१६८० विनीत- श्याम सुन्दर अवस्थी. - प्रकाशक का निवेदन । एक समय था जब कि लोग ऐप्यारी, तिलस्मी और जासूसी उपन्यासों को बड़े चावसे पढ़ा करते थे, परन्तु कुछ लेखकों और प्रकाशकोंने, सदुद्देश्य से प्रेरित हो, जबसे धार्मिक, पौराणिक उपन्यास, नाटक, जीवनचरित्रादि लिखने और प्रकाशित करने किये तवले लोक रुचि ने भी पलटा खाया। गंदे, कुरुचि. पूर्ण, भ्रष्ट उपन्यासों की जगह धीरे धीरे इनका प्रचार हो चला । 'वास्तवमें लोकरुचिको पलटने की साहित्यमें बड़ी भारी शक्ति है। किसी भी समाज के लोगों के मनोभावों का पता उनके तत्कालीन साहित्य से भली भांति लग सकता है. क्योंकि जो जैसे साहित्य क्षेत्रमें विचरण करता है उसके विचार भी वैसे ही हुआ करते हैं। जैसे गंदे साहित्यके पठन पाठन से लोकरुचि विकृत हो जाती है वैसे ही उत्तम, उपदेशपूर्ण धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्यके अध्ययन से सुधर भी जाती है, साथ ही यह भी निर्विवाद, सिद्ध है कि, मानव चरित्र को उन्नत बनाने के जितने साधन हैं उनमें से "आदर्श पुरुषोंके जीवनचरित्रों का •पठन-पाठन" भी अन्यतम है। कोमल मति यालकों और चञ्चल मति युवाओं के चरित्र-सङ्गठन का इससे अच्छा साधन और हो ही नहीं सकता। यूरोप, अमेरिका में भी जो इस समय आधुनिक विद्याभोंके केन्द्र है-आदर्श चरित्रों की बड़ी कदर की जाती है। वहीं के विद्वानों ने हमारे यहां के कथा-साहित्यका गहरा अध्ययन किया है और उसमें से अच्छे २ उपाख्यानों का वहां की भापामों में अनुवाद कर जनताके सामने रक्खा है। हमारा प्राचीन पौराणिक साहित्य विशेषतः जैन धर्मका कथा-साहित्य इतना गम्भीर एवं विस्तृत है और उसमें ऐसे २ " [ म ] रम भरे पड़े हैं जिनका मुकाबला करने में अबतक किसी भी देश का साहित्य समर्थ नहीं हुआ। इन्हीं रतोंमें से "सुदर्शन चरित्र" भी एक है जिसका हिन्दी अनुवाद कराकर प्रकाशित करने की मेरी बहुत दिनों से उत्कट इच्छा थी, क्योंकि ब्रह्मचर्य के महत्त्व को प्रदर्शित करने में याह अन्य अद्वितीय है और आवश्यकता भी इस समय ऐसे ही ग्रन्थों की है, जो ग्रह्मचर्य के महत्त्व को भली- भांति दरशा कर नवयुवकों के चरित्र-सुधार में सहायक हों। अतएव जैन श्वेताम्बर तेरहपंथ नायक भावाचार्य श्रीभिक्षुगणि रचित “सेठ सुदर्शन को व्याख्यान" नामक पुस्तक का हिन्दी अनुवाद करने के लिये मैंने पण्डित श्यामसुन्दरजी अवस्थी से अनुरोध किया, बड़े ही हर्प की यात है कि आपने उसे सहर्ष स्वीकार कर, शीघ्र पूरा कर दिया, एतदर्थ आपको धन्यवाद । पुस्तकके अनुवादके सम्बन्ध में भोर तो कुछ कह नहीं सकता धयोंकि मैं कोई भाषाका विद्वान, लेखक या समालोचक नहीं ; परंतु इतना कह सकता हूं कि मेरे देखनेमें इसे सर्वगुण-सम्पन्न यनानेमें पण्डितजी ने कुछ कसर उठा नहीं रखी, फिर भी यह पुस्तक बहुत जल्दी में लिखी गयी है इससे विविध दोपों का रह जाना स्वाभाविक ही है। आशा है विज्ञजन क्षमा करेंगे। हां, पुस्तक की छपाई सफाई और स्थानानुकूल चित्रोंके लगाने में मैंने भरसक परिश्रम और मुक्तहस्त से द्रव्य-व्यय किया है। यदि पाठकगण इसे अपनायेंगे और पढ़कर धारिशिक लाभ उठावेंगे तो मैं अपने को सफलफाम समझंगा और शीघ्र ही कोई दूसरी भेंट लेकर सेवामें उपस्थित होऊंगा। निवेदक- महालचन्द वयेद।
पृष्ठ १ चिन- १-मुदर्शन सेठ २-कपिला के महल में सुदर्शन सेठ ३-बाटिका में भाये हुए मुदर्शन सेठ को देखकर रानी मोहित ... ... ३६ ... ... ७३ UC ४--पुतले को पटक कर धाय ने द्वारपालों पर रौब जमाया ५- अभया रानी के लाख चेष्टा करने पर भी सदन सेठ न डिगे (बहुरङ्गा) --राजा ने प्रजा की कुछ भी न सनी और सेठ को शूली की प्राज्ञा दे दी ७-मनोरमा ने कठिन अभिग्रह धारण किया... -देवताओंने शूली का सिंहासन बना दिया... - -नवकार मन्त्र की महिमा १०-दीक्षा महोत्सव-आगे २ सेना, पीछे हाथी पर राजा और उसके पीछे पालकी पर सेठ मुदर्शन जा रहे हैं । बहुरङ्गा) ११-माविका के भेष में वश्या गौचरी (भिक्षा) के लिये प्रार्थना कर रही है, १२--प्रमशान में धर्म-ध्यान करते हुए "चिड़िया के रूप में उनपर १०१ १०७ विषय- मची पृष्ठ १ (पहला अध्याय) विषय- १-देश और काल २-उदर्शन को सेट की पदवी ३-दाम्पत्य प्रेम "-माँ का भोग ... ७ ... ह (दूसरा अध्याय) '५-सेट पर मोहित होना ६-सेठ को धोखा देकर लाना •७-कपिला को देख कर सेट का घबढ़ाना ८-स्त्री-गमन का त्याग है-गदर्शन की चाल . १. कपिला.का पश्चात्ताप ११-दूसरे के घर जाने का त्याग १५-निया-चरित्र थोर कुशीला वर्णन ... १७ पृष्ठ or १४ चित्र- १-सुदर्शन सेठ २-कपिला फे महल में सुदर्शन सेठ ३-बाटिका में पाये हुए सुदर्शन सेठ को देखकर रानी मोहित हो गई ४-पुतले को पटक कर धाय ने द्वारपालों पर रौब जमाया ५-अभया रानी के लाख चेष्टा करने पर भी सुदर्शन सेठ न डिंग (बहुरङ्गा) ३. -राजा ने प्रजा की कुछ भी न सुनी और सेठ को शूली की ... ... ... याज्ञा दे दी ७३ १०१ ७-मनोरमा ने कठिन अभिग्रह धारण किया... -देवतामोंने शूली का सिंहासन बना दिया... -नवकार मन्त्र की महिमा १०-दीक्षा महोत्सव-मागे २ सेना, पीछे हाथी पर राजा और उसके पीछे पालकी पर सेठ सुदर्शन जा रहे हैं । यहुरगा) ११-श्राविका के भेष में वेश्या गौरी (भिज्ञा) के लिये प्रार्थना कर रही है १२-मशान में धर्म-ध्यान करते हुए साधु सुदर्शन को, भूतनी "चिड़िया के रूप में उनपर जल बिहा कर, सता रही है १०७ ११२ ११६ -- ] . ... ... Ys ... ७६ ८. ... ३५-संचित कमों का पिन्तवन ३६-पील-सहायक देवताभों का प्रागमन ३७-ली का सिंहासन ३८-राज सेना का धावा ३६-देवता और राजसेना का संग्राम ४०-राजा सेठ की शरण माये ४१-देवता की फटकार ४२-राजा का ग्लश निवारण ४३-राजा द्वारा सेठ का महोत्सव ४४-सेठ का अपने घर पाना ४५-अमया रानी का भात्मघात ... ८१ ८४: ... C. ... ... CE ६५ ... ... १०२ (छठवां अध्याय) ४६-सेठने संयम लेने की टानी ४७-साधु दर्शन ४८-दर्शन का पूर्व भत्र ४६-नवकार की महिमा ५०-संठने मनोरमा से भाज्ञा मांगी (सातवां अध्याय) ५१-दीक्षा की तय्यारी ५२-सेठ का दीक्षित होना ५३-मनोरमा की विनय ५४-विहार और तप ५- साधु सदर्शन का एकान्त वास स-यापा धाविका यनी वेश्या द्वामा उपसर्ग ... .. ... ... .. १०६ ...
[ 7 ] ... ... ... ४६ ... (तीसरा अध्याय) १३-याटिका विवरण १४-माटिका में सुदर्शन सेट १५-कपिला और अभया की पातचीत... ११-अभया की सेट-मिलन-लालसा १४-पपिटता धाय की मुशिक्षा १८-बिनाशकाले विपरीत बुद्धिः १६-धाय का प्रण करना २०-द्वारपालों को धोखा (चौथा अध्याय) २१--रमशान से सेठ को उटा लाना २२-प्रभपा-एदन मिलन २३-सुदर्शन की दृढ़ता २४-संयम लेने की प्रतिज्ञा २५-सेठ का शुभ चिन्तवन २६--प्रभया की अन्तिम चेप्टा २७-अभयाका पश्चात्ताप २८-सेट पर झूठा दोषारोपण २६-राजा की दादाज्ञा ३०-प्रज्ञा की पुकार ३१-राजाने किसी की म मुनी ३२-सेठ को शूली देने के लिये मे जाना... ३३-मनोरमा का विलाप और प्रणा (पांचवा अध्याय) ३४-अभया रानी का प्रसस होगा .. ... ... २८ ...
[ ] .. ... ३५-संचित कमो का पिम्तवन ३६-पील-सहायक देवताओं का मागमम ३७-गुली का सिंहासन ३५-राज सेना का धावा ३६-देवता और राजसेना का संग्राम ४.-राजा सेठ की शरय भाये ४१ देवता की फटकार ४२-राजा का शनिवारण ४३-रामा द्वारा सेठ का महोत्सव ४४-सेठ का अपने घर माना ४५-अभया रानी का भात्मघात ... ८१ ... ... ... ८७. ... ... ६५ ... ... ... १६ ... ૧૦૨ (छठवां अध्याय) ४६-सेठने संयम नेने की रानी ४७-साधु दयन ४५-मुदर्शन फा पूर्व भव ४६-नवकार की महिमा ५०-सेठने मनोरमा से भाज्ञा मांगी (सातवां अध्याय) ५१-दीक्षा की तय्यारी ५३-सेठ का दीक्षित होना ५३-मनोरमा की विनय ५४-विहार और सप ५५-साधु सदर्शन का एकान्त पास ५६-चण्या भाविका बनी ५७-वेण्या द्वारा उपसर्ग ... १०३. ... ... १०६ ... १९० ... ...
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सुदर्शया चरित्र
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सुदर्शन सेट।
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सुदर्शया-चरित्र
ANTA
I Bapinjoni
सुदर्शन सेठ।
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पहला अध्याय
* जन्म और बाल्यकाल ।
.
भ
देश और काल।
प्राचीन कालमें, किसी समय भरतक्षेत्र के अङ्गदेश में, इन्द्रपुरी
सरीखा चम्पा नामक एक नगर था। यहां पर उच्च जाति
का, निर्मल कुलवाला, राजशिरोमणि, धात्रीवाहन नाम का राजा
राज्य फरता था। अप्सराभों कोमात करनेवाली, सौन्दर्य में सुराग
माओं से बढ़ कर, अभया नाम फ्री उसकी पटरानी थी। उस नगर
के निवासी धर्म-कर्म में बड़े प्रवीण तथा जिन-धर्म के तत्वों के,
माशे शाता थे, शुद्धसाधु ओं का भावागमन अधिक होने के
सुदर्शया-चरित्र फारण वहाँ श्रावक-श्राविकाओं की संख्या और दया-धर्म की जानकारी विशेष थी। उसी नगर में ऋषभदास सेठ महा ऐश्व- र्यवान, चतुर-सुजान, अपनी जिनमती भार्या के साथ, श्राय कोचित काल्यों को करता हुभा, सपरिवार सुख से दिन व्यतीत करता था. धावक के बारह व्रतों को पालनेवाली, सुशीला, रूप पहला मत--स्था प्रायातिगत-विनाथ से निवृत होना। इसमें निरपराध अस जोयों को साक्रोश हरने को विधि कर के हिंसा करने कराने का मन, पचन, काया से त्याग करने का विधान है। दूसरा प्रतस्थूल भूकदोलने से निवृत होगा। इसमें शोध या लातय यश सुथील कन्या को दुःशील और दुःशीण को सुगीज कहना, ,अच्छे गौ भादिक पशु को युरा और गुरे को अच्छा बतलाना, जमीनादि के लिये मूठ योलना, किसो की रक्खी हुई धरोहर (थापन ) को दया लेना ( इजम कर जाना ) या दो गवाही देना इत्यादि प्रकार के झूठ का त्याग। तीसरा मत-म्यूल चोरो से निवृत होगा। इसमें दीवास में में लगा कर, गांठ खोल कर, ताले को अन्य मुल्जी से घोल कर, मासिक को भाज्ञा के विना मेनेवाला चोर कहलाता है ऐसे पदार्थों को उनके मालिक को श्रीक्षा के पिना लेने का त्याग। गैया प्रत--स्थूल मैथुन का त्याग । अर्थात् अपनी नी में सन्तोष रखने का या दूसरे को ध्यादी हुई अथवा रक्सी हुई ऐसो पत्रिों को स्मागने का विधान है। । पांचवां प्रत-प -परिग्रह का परिमाण । परिगह का सर्वधा स्याग करना गृहस्प के लिये प्रयभव है। इसलिये गृहस्प संग्रह की इच्छा का परिमास कर लेता है कि, अमुकं पोज इतने परिमार में हो रफगा, इस से अधिक मही, पर पांपयां मथुप्रय है।
एला प्रत- ३ सुदर्शया-चरित गुणों की खानि, जिनमती ने एक दिन रात्रि के समय पर्यड पर सोते हुए, स्वप्न में, सुदर्शन पर्चत देखा। उसने स्वप्न का संवाद अपने पतिसे कहा। उन्होंने प्रातःकाल होते ही स्वप्न-पाटक (ज्योतिपी पण्डित) को बुला कर स्वप्न का शुभाशुभ फल पूछा । विचारक ने कहा कि, तुम्हारे एक शुभलक्षणवाला, कीर्तिवान, वंश शिरोमणि, -दिशाओं की मर्यादा अपनी लोम-वृति की मांदित करने के लिये ई-दिशा में अर्थात पर्वत मादि पर, भणदिशा अर्थात् सानि मादि में और तीरछी अर्थात पूर्व, पश्चिम, मादि चार दिशामों में जाने का 'परिमाय नियत कर लेना। .. "सातवां मत: भोजन.और कर्म दो तरह से होता है। भोजन में जो मद्य, मांसादि बिल्कुल त्यागने योग्य है उनका त्याग करके वाकी में से थक्ष, जल भादि एक ही मार भोग में लाने वाली वस्तुओं का तथा पश शादिवार बार भोग में पानेवाली सस्तुओं का परिमाण कर लेना, इसी तरह कर्म में, भङ्गार कम्मं प्रादि भति दोपत्राने कमों का त्याग करके याकी के कर्मों का परिमाण कर लेना यह उपभोग परिभोग परिमाण रूप सातवां ग्रत है।.. भाठयां मत-मनर्थ दण्ड से निवृत होने का है। अनर्थ दगए चार प्रकार से होता है:-(१)भपध्यानाचरणं, माती पुरे विचार के करने से, (२) प्रमादाचरण, यानी भालस्य के कारण से, (३) प्राण हिंसा से, (४) पाप कमोपदेश, पानी पापजनक कमाँ के उपदेश से । अपनी और अपने कुटुम्यियों को जरूरत के सिवा उपरोक चार प्रकार के मनर्थ दयर से निवृत होगा, अनर्थ द विरमय रूप भारचा अनर्थ इस - , "मवमा मत-सावंद्य प्रति राया दुध्यांग का त्याग कर राग-रूप पाशे प्रसंगों में भी सममाय रसना, यह सामायिक रूपमा है।
सुदर्भया चरित्र सुपुत्र पैदा होगा। यह सुन सेटानी अत्यन्त प्रसन्न हुई और नान प्रकार के दान-सम्मान देकर, घड़ी अभिलापा के साथ पुत्रोत्परि को बाट जोहने लगीं। सवा नौ महीने पूरे होते ही, बहु मुलक्षण युक्त, विशाल वक्षस्थल, दीर्घ बाहु और यहे २ नेत्र पाला पालंग पैदा हुआ। सेठ ने बड़ी धूम-धाम के साथ पुत्र जन्मोत्सव मनाय और सुदर्शन पर्चत मा स्वम होने के कारण पालक का नाम सुदर्शन रखा । सुदर्शन का बाल्यकाल बड़े ही लाड़ प्यार के साथ व्यतीत हुआ। जब वे आठ वर्ष के हुए विद्याध्ययनारम्भ किया, कुशाप्रबुद्धि होने के कारण, अल्य काल में ही उन्होंने अनेक प्रकार की विद्यायें और कलायें सीखीं, उनका स्मृति शान बड़ा ही ती पशव प्रत प्रत में जो दिशाभों का. परिमाय भोर सातवें मत पो.उपभोग परिभोग का परिमाय किया, उसका प्रति दिन सोप करमा, बहादेवावकाधिक रूप दशमां प्रत है। ग्यारवां मतमष्टमी, चतुर्दशी भारि तिथियों में माहार का शरीर हुमा का और सवय व्यापार का त्याग करके अंशवर्य पूर्वक धर्म हिमा काना का पौधापवास नामक ग्यारहवां मत है। बारहवां मत-निमन्य साधनों को प्रासक-(अचित निशेष भतुर्विध भाधार ४ बम ५ पार -कम्बल पायपुर परियार अर्थात कार्यको बाने पहात फिरती दे नवाली चीज पाट बाजोटादि, अम्मा के लिये १. मगह ममोन, रहने के लिये ११ देवादिक सधार के लिये । पूषाविशत्यादिन बौर-प्रकार का दाम देना।
सुदर्शया-चरित्र यो दिन पश्चात् कपिल पुरोहित से उनकी मित्रता हुई। दोनों में खूब बनती थी, एक दूसरे के बड़े हितचिन्तक थे। जब सुदर्शन विवाह के योग्य हुए तब ऋषमदास ने सागरदच की सुपुत्री मनोरमा के साथ, अच्छे लग्न और शुभ मुहूर्त में, बड़े गाजे-गाजे के साथ, रीति-अनुसार धन खरचते हुए, विवाह कार्य सम्पन्न किया। तत्पश्चात् नियमानुकूल कुटुम्ब-परिवार वालों को भोजन कराया और सर्व-सजनों को भली-भांति सन्तुष्ट किया। घर सुदर्शन की पत्नी मनोरमा बड़ी पतिव्रता, प्रतों और शील पालन में प्रवीण तथा सुपात्र दान देने में अत्यन्त कुशल थी। उधर उनके मित्र कपिल पुरोहित की कपिला नामक श्री पड़ी दुश्चरित्रा, कुशीला और कुलक्ष्णा थी। श्रावक के बाद सुदर्शन को सेठ की पदवी। एक समय सेठ पभदास ने संसार की अनित्यता पर विचार करते हुए सपत्नीक संयम लेने की मन में ठानी और अपने सुयोग्य पुत्र सुदर्शन को गृह कार्य सौंप, आत्म कर गण के हेतु आपने दीक्षा प्रहण की। सुदर्शन अपनी गृहकार्य कुशलता, सौज- न्यता गौर दान शीलता के कारण तीनों लोक में प्रसिद्ध हो गया। ऋद्धि सम्पन्न, ऐश्वर्यवान और सुयोग्य पुरुप देख कर नगर के रामा ने उन्हें “सेठ" की पदवी प्रदान की। सुदर्शन सेठ मानन्द 'पूर्वक दृहख धर्म की मर्यादा के अन्तर्गत अपनी धर्मपरायण. मा के साथ संसारिक सुख भोगने लगे। कुछ दिन पश्चात् सेठ - + सुदृर्शया-चरित्र को पुत्र-मुखावलोकन का सुअवसर प्राप्त हुआ और उन्होंने उसका नाम सुकन्त रखा। सुदर्शन सेठ अपने धर्म-कर्म में बड़े कट्टर थे, चे नियमानुसार श्रावक के बारह व्रतों का पालन करते और महीने में चार पोसह कर, रातको निर्भय हो, श्मशान भूमि में जाकर सोते थे। लंगोटे के तो आप इतने सच्चे थे कि सुराग नाओं के भी डिगाये नहीं डिंग सकते थे, देश देशान्तरों में यह यात प्रख्यात् हो गयी थी कि भाप शील पालन में अद्वितीय पुरुष दाम्पत्य प्रेम। पढ़े सौभाग्य की बात तो यह थी कि जिस प्रकार आपकी मनोवृत्तियां सत्मार्ग की ओर प्रवृत्त थीं, उसी प्रकार आपकी भार्या का भी धावकोचित किया पर विशेष प्रेम था। यह दोनों ही पड़े प्रेमानन्द से, बारह व्रतों को पालते हुए, परस्पर की प्रगाढ़ प्रीति में जकड़े हुए थे। पूर्व सुकृत के बिना ऐसा.सुसंयोग होना बड़ा ही -दुर्लभ है-"दुर्लभा सदृशी भार्या | जगत में विद्या, सम्पत्ति, शरीर को सुख और पुरुष को सुलक्षणा स्त्री तथा स्त्री को सुयोग्य पतिःविना पूर्व सञ्चित मुकर्म के मिलना दुस्तर है...... श्रावक का ग्यारहयां मत पौषध (पासंह) कहलाता है। सो इसलिये कि, इसप्ते धर्म को पुष्टि होती है। यह प्रत भएमी चतुर्दशी भावि तिथियों में चार प्रहर या पाठ प्रदर संझ भिया जाता है। इसके माहार गरीर- खत्मर, मझवर्य मोर भव्यापार प धार मे।
. सुदर्शया-चरित्र कर्मों का भोग। 'देखो संसार में कोई विद्वान है तो फोई निरक्षरभट्टाचार्य, फोई घस्राभूषणों से सुसजित होता है तो कोई चिधड़ों के लिये तरसता है, कोई मालपुआ और खीर उड़ाता है तो कोई टुकड़े मांग कर भी पेट नहीं भर सकता: एकके घर सम्पत्ति का आगार है तो एक फोड़ी २ के लिये भटकता फिरता है। यहां पर "जैसी फरनी तेसी पार उतरनी" की कहावत पूर्णतयः चरितार्थ होती है। देखिये तो भला, फिसी मनुष्य को देख कर लोग स्वागत करते, योलने के लिये इच्छुक रहते और किसी को देख कर मुंह विजकाते. नाक-भौं सिकोड़ते तथा घृणा प्रकट करते हैं। कोई पड़ी ३ महालिकाओं में, सेज बिछा कर, शदन करता है तो कोई हाट-बाट में जा, ज्यों त्यों कर रात काटता है। कोई हाथी और पालकी पर चलता है तो कोई सिर पर बोफ लेकर गांच २ फिरता है। किसी के सामने लोग हाथ जोड़े “जी हुजूर" किया करते हैं और किसी पर दृष्टि भी नहीं डालते। कोई सुन्दर स्वस्थ शरीर वाला है तो कोई तन क्षीण हो रोग का घर बना है। एक दूसरे को देख कर जलता है तो एक सशान द्वारा दूसरे का निस्तार करता है। एक रूपयान जो देखने में सभी को अच्छा लगता है,तो एक फाला-कलूटा जो किसी को नहीं सुहाता । एक बाल-विधया है जिसका सारा समय दुःख में ही व्यतीत होता है तो एक सधवा सोलह शृङ्गार कर अत्यन्त. सुख भोगती है। एक संयम मार्ग द्वारा अपना काम बना रहा है तो एक भोग-विलास में पड़ा ।
.. सुदर्शा-चरित्र, हुआ "अपने हाथ अपने पैर कुल्हाड़ी मारता" है। अब सोचिय यदि एक मनुष्य, व्यभिचारी होकर, मदिरा-मांस का भक्षण करता है और उसके हृदय में दया का लेश-मात्र भी नहीं है है वह फैसे सुख पा सकता है, किन्तु एक वह जो शुद्ध साधुओं फं सेवा कर, शील व्रत का पालन करता है निश्चय ही आनन्द क मांगी है। नीतिकारों ने कहा है कि:- "पूर्व जन्म कृतकर्मणः फलं पाकमेति नियमेन देहिनां । नीति शास्त्र निपुणा बदंति यद् दृश्यते तद धुनान सत्यपत्" ।। मर्थात्-पूर्वजन्म के किये हुए कमो का फल प्राणीको अवश्य ही भोगना पड़ता है, ऐसा जो नीतिकारों का उपदेश है यह संधार्थ है। चाहे सदैव फलने वाला वृक्ष निष्फल हो जाय, श्री निष्फल हो जाय, परं कर्तव्य निष्फल नहीं जाता। उप- युक्त सिद्धान्तानुसार ही सेठ सुदर्शन ने पूर्व संचित साधुसेवा के योंग से मनोरमा जैसी सती-सुलक्षणा स्त्री प्राप्त की है। जिस प्रकार हिलमिल कर वे दोनो अपने धर्म-कर्म का प्रतिपादन करते 'येस प्रकार कार्य करने वाला संसार में विरला ही मिलेगा।
सध्या कपिला का कपट और सेठ की चाल। सेठ पर मोहित होना । एक दिन सुदर्शन सेठ किसी गृहकार्य वशं उधर गये थे, वापस लौटते समय अपने मित्र कपिल के घर विश्राम करने के लिये ठहरे। कपिल की कपिला नामक स्त्री पड़ी ही रूप- बती सुकोमल मौर सुन्दरतामें किसी रानी-महारानीसे कुछ कम नथी, किन्तुस्खभाषकी ऐसीखोटी और दुश्चरित्रा थी कि परपुरुष से मकरने में जरा भी नहीं हिचकती थी। यौवन प्राप्त, रूपवान मुद- शन सेठको देख कर उसके "मुंहमें पानी भर माया" और मन ही . . सुदर्शया-चरित्र १० मन सोचने लगी कि "वह स्त्री वड़ीही सौभाग्यवती है जिसका यह पति है वह धन्य है जो इसके साथ मुख भोगती है। यदि मुझे कोई ऐसा मौका मिलता तो इस सेठ के संग भोग-विलास कर रतिके आनन्दको प्राप्त करती"। इसी उधेड़-बुनमें पड़ी हुई, चि- न्तित हो, दुःखके साथ दिन काटने लगी। रातको नींद आनी थी, न दिनको चैन पड़ती थी। गृहके सभी कार्य उसको भरुचिकर थे, वह विषय-वासना में इस प्रकार उन्मत्त हो गयी कि उसे लोक लजा तथा आगे पीछे का कुछ भी ध्यान न रहा। अवगुणों की खानि, दृष्टा मायाविनीको, स्वयम् उसका प्राण-पति ही शत्रु सम दृष्टिगोचर होने लगा। उसकी.यह आन्तरिक इच्छा थी कि यदि यह कहीं चला जायं तो मुझे अपने प्राण-बल्लभ (सेठ) से मिलने का सुअवसर प्राप्त हो, यद्यपि जिन-भगवान की महिमा के जान कार, सञ्चे धायक सुदर्शन सेठ वीर्य रक्षा की उग्र तपस्या में सिद्धहस्त थे, उनके सामने कामातुर कपिला की दाल गलनी कठिन थी; तथापि वह निशि-वासर इसी चेष्टा में लगी रहती थी कि चाहे जो कुछ हो जाय, एकवार सेठ के संग रमण कर अपना जीवन अवश्य सफल, कलंगी.! :- :: संयोग वश एक दिन कपिला का पति गृह कार्य वश किसी गांव को गया था। यह सूना मौका पाकर फपिला ने त्रिया- चरित्र का जाल बिछाया और सरल हृदय, सेठ सुदर्शन-हंस को बुरी तरह से फंसाया | कुशीला लियों के चरित्र तो इतने पेचीदे होते हैं कि उनसे यचना,बड़ा ही कठिन है। इनकी लीलाबों का सुदर्शशा-चरित्र चारा-पार नहीं। यदि सात समुद्र के जलकी स्याही, तीन लोक का कागज और समस्त वनस्पत्तियों की लेखनी बनायी जाय तो भी स्त्री-चरित्र लेखबद्ध नहीं हो सकता। स्वयम् जिनेश्वर भग- चान ने, "तन्दुवियालिया" ग्रन्थ में, सती-कुसतीकी चर्चा करते हुए बतलाया है कि "जिस प्रकार सती शील गुणकी खानि है उसी प्रकार कुशीला मोगुण की जड़ है"। पाठक गण ! अब यहां फपिला की धूर्तता देखिये कि किस प्रकार माया-जाल बिछा कर सेठ को छकाती है। सेठ को धोखा देकर लाना। कपिला ने अपनी चेरी को बुला कर कहा कि "दासी तू सेठ सुदर्शन के निवास स्थान पर जा और बड़ी नम्रता.के साथ उनसे फहना कि आपके मित्र कपिल का स्वास्थ्य एका-एक अत्यन्त स्वराय हो गया है, अतः आप शीघ्र मेरे साथ चलिए"।. देख! मेरा यह कार्य यदि तू भली भांति सम्पादित करेगी तो सर्वदा के लिए मेरे हृदय में तेरा स्थान हो जायगा और तेरा रुतवा और भी पढ़ आयगा। इतना सुन दासी नविलम्ब सेठके घर पहुंची और वहां जाकर विनय पूर्वक, हाथ जोड़कर, सेठ सुदर्शन से गोली कि "महाराज! मापं जान्दी मेरे साय चलिए, आप के मित्र ने माप को अति शीघ्र घुलाया है" सेटने फहा "क्यों ! आज इतनी जल्दी बुलाने का क्या कारण है, फोनसा ऐसा कार्यमा उपस्थित हुमा है"! मांदी मे विनम्र हो उत्तर दिया कि "मापके मित्र शारीरिक सुदर्शया-चरित्र कष्ट से इस प्रकार घ्यथित है कि उन्हें दिन-रात चैन नहीं पड़ती, दुःख के मारे उनका चेहरा उतर गया है। मुख कान्ति क्षीण तथा मन मलीन हो रहा है" 1 मित्र के कष्ट को यात सुन कर हृदय का पहल उठना एक साधारण बात थी। सुदर्शन सेठ इस बात को भली-भांति जानते थे कि:- शुचित्वं त्यागिता शौर्य सामान्यं सुखदुःखयोः । दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः ॥ अर्थात्-पवित्रता यानी निष्कपटता, उदारता, शूरता, सुल- दुःख में समानता, अनुकूलता, प्रीति और सत्यता ये मित्रों के गुण हैं। अतः सुदर्शन सेठ मित्रानुराग से विहल हो गये, उनके रोमांच हो आया और वे अपने समस्त कार्य ज्यों के त्यों छोड़, दासी के साथ उठ कर चल दिये। सुदर्शन वात की बात में मित्र के घर पहुंचे और वहां जाकर दासी से पूंछा कि हमारे मित्र कपिल कहाँ पर हैं। दासो बोली "वे अपने शयना- गार में है। कृपया आप यहीं खड़े रहिए, मैं आपके शुभागमनं का सम्याद जाकर सुना आऊ और फिर आकर आपको लिवा . . . . इतना कह दासी तो महल पर चढ़ गयी और सेठ नीचे चौक में बड़े रहे। दासी नेजाकर फपिला को सेठ के आने की बात सुनायी। कपिला घड़ी प्रसन्न हुई, उसके हर्ष का पारा-पार म गा-"मानापरी निधि प्रायो" अपने प्रेमास्पद से मिलने सुदर्शया-चरित्र के लिये, तेल-फुलेल लगा, सोलहो रङ्गार कर, वस्राभूषणों से सुसजित हुई। कपिला ने दासी को आशा दी कि "तू जाफर सेठ को शीघ्र मेरे शयनागार में ले आ और जव घे कमरे के भीतर भाजावें, चारों ओर से किवांड़ यन्द कर लेना; किन्तु सावधान ! यह भेद सेट पर खुलने न पाये--यह बात वह न जान सकें"। उधर दासी तो सेठ को बुलाने के लिये नीचे गयी, इधर कपिला एफ मनोहारिणी, सुन्दर शय्या पर, शिख से नख तक, चदर तान कर लेट गयी; उसका कोई भी अंग बाहर से न दिखायी देता था। मित्रानुराग की प्रेम-रज्जु में जकड़े हुए सुदर्शन अथवा यो कहिये कि परिसा कर्मोदय के भवर में पड़कर, मित्र मिलन की लाळ. सासे, सेठ कपिला के महल में मा विराजे । पर्यड के समीप पड़ी हुई सुन्दर चौकी पर सेठ बैठ । गये। 'दासी ने पूर्व शिक्षा के अनुसार उस कपट-किले कमरे के कपाट बन्द कर लिये। सेठ मित्र को शय्या पर सोया हुआ खान बड़े मधुर स्वरों से बोले "प्रियवर! आप को या फट है फिस अङ्ग में कौन सी ध्यथा है और किस व्याधि से आप पी. ड़ित हैं"! इतना सुन कर कपटागार कपिला प्रथम तो मौन हो रही। [जब कोई मनुष्य किसी असत् कार्य करने के लिये उद्यत होता है तो किसी न किसी प्रकार से एफ यार अवश्य ही उसका आत्म ज्ञान वैसा करने से रोकता है किन्तु इच्छा और मान में जिसकी प्रबलता होती है, वही विजयी होता उसी भांति उस समय उन्ना-बान ने मानों मेचे निन्दनीय कार्य से -
सुदर्शया रहिट
रोकने के लिये उसका मुंह बन्द कर दिया, किन्तु यह विषय-वा-
सना में मन हो रही थी, वहां मनोज के मागे घेचारी 'लज्जा की
कुछ भी न चली। स्त्री से पुरुष सदैव बलवान होता है, परतु!
लजा के साथ मनोज की विजय अनिवार्थ थी। ] कपिलाने
सोचा कि लज्जा में पड़ कर ऐसे सुगवसर को हाथ से खोना बड़ी
मूर्खता है, सेठ सब प्रकार अपने वश में है। बस! फिर क्या
था, निर्मल माकाश-चद्दर को हटा कर मानो पूणमासी का
चन्द्रमा उदय हो गया। सुदर्शन सेठ को सामने बैठे हुए देखकर
उस चन्द्राननी के मुंह पर हंसी खेलने लगी; उत्साह-आनन्द के
कारण फपोलों पर पुलकापली छा गयी। विषय-भोग की प्रार्थना
के पश्चात् कपिला ने गलबहियां डाल कर सेठ को छाती से
लगा लिया और बड़े हाव-भाव तथा प्रेम पूर्वक कामोद्दीपन की
क्रियायें करने लगी। तदुपरान्त मायाविनी, छल पूर्ण, मधुर
वाणी से नम्रता पूर्वक इस प्रकार बोली "प्राण प्यारे ! बहुत
दिनों से तुम्हारे साथ रमण करने की लालसा लगी हुई थी, बहु
कालोपरान्त यह सुगवसर प्राप्त हुआ है। अतएव मेरी. मनोभि-
लापा को पूर्ण कर मेरा मानव जीवन सफल कीजिये।
कपिला को देख कर सेठका घबड़ाना।
। कपिला की करतूत और अनूप रूप देख कर सुदर्शन सेठ तो
चकित हो गये। उनका.शरीरकांपने लंगा और बदन से पसीना
छूटा । उसको सुद्दावनी सूरत उनके लिये भयावनी हो गयी
..
..
:-
।
सुदर्शया-चरित्र और वे घपड़ा से गये। सेठ ने मन में सोचा कि त्रिया चरित्र से अनभिन्न होने के कारणही में इस आपदा में मा फंसा है। और ! पुन्छ भी हो विपत्ति के समय मनुष्य को धैर्य पूर्वक कार्य करना चाहिये "आपति काल एरखिये चारी,धीरज, धर्म, मित्र पर नारी" मस्तु ! यहां घबड़ाने से काम न बनेगा। यदि मेरी थात्मा मेरे घश में है, मैं इन्द्रिय लोलुप नहीं है। मेरे मानसिक विचार शुद्ध है, तो.अनेकानेका उपाय करने पर भी यह मुझे न डिगा सकेगी। से सम्यग्दृष्टि सत्पुरुष ब्रह्मचर्य व्रत पालन में दृढ़ संकल्प हैं, उन्हे जितनी ही परिसा उपजेगी उनमें उतनी ही अधिक तपाये सोने फी भांति शील पालन के अनुराग को प्रभा बढ़ेगी। कर आने अथवा वैरी के पीछे पड़ने पर जो मनुष्य पैर रोप कर सामने खड़ा हो जाता है, उसका कोई भी अनिष्ट नहीं कर सकता। नारी की जाति बड़े २ विज्ञ जनों को भुला कर मूर्ख बना लेती है। जे लम्पट, दुराचारी और अजितेन्द्रिय पुरुष सुख..साधन की लालसा से स्त्रियों के वशीभूत हो जाते हैं, उन्हें दुःखही दुःख मिलता है सुख कुछ भी नहीं, प्योंकि यह विषय-भोग और अन्यान्य सांसारिक जितने कार्य हैं सब स्वप्न तुल्य हैं। अतएव उनके आधीन होना-उनकी परतन्त्रता में रहना बुद्धिमानी का काम नहीं। संसारिक जितने विषय है वे लोगों के विश्वास पात्र होने पर भी विश्वास घातक हैं। यद्यपि"फामिनी और कञ्चन लोगों को प्रीति जनक मालूम होते हैं तथापि अन्त में हैं धे सभी दुःख जनक
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१७ सुदर्शया-चरित्र. कारा पाना कठिन है, मतः कोई चाल चलनी चाहिये। सेठ ने कहा, ऐ! कपिला तू निपट नियोध और अत्यन्त अक्ष. देख पड़ती है, क्योंकि इतनी देर बाद भी तू यह न जान सकी कि मैं पुरुषत्व हीन हूं। यदि मुझ में कुछ भी पुरुपत्य-काम जोश-होता तो तुझ जैसी अप्सरा सरीखी रमणी से प्रेम करने में में क्यों यशित रहता । तू ने केवल नैन बाणों ही से नहीं, उरोज के.फुन्दों से मार कर भी मेरी काम परीक्षा कर ली है, इतने पर भी यदि मेरे क्लीयत्व , फा शान न हुआ तो अवश्य ही तू मूर्खा है। क्या तू नहीं जानती. कि बड़े २ इन्द्रादिक देव भी स्त्री के दासत्व को स्वीकार कर चुके हैं। जिन में कुछ भी पुरुष भाव होता है, वे तो स्त्री के गुलाम बन जाते हैं, मैं तो उसी रोहिंडे के (टेसू के ) फूल के सदृश हूं, जो गन्ध-रहित निष्फल होता है। मैंने तेरी सभी बातें ध्यान पूर्वक सुनी है, किन्तु एक पुरुष भाव के अभाव से निरुत्तर होकर मलिन मन हो रहा है। अस्तु! अब मुझे मेरे गृह जाने है, मैं तेरी आशा की पूर्ति करने में असमर्थ हूं। कपिला का. पश्चात्ताप । फपिला सुदर्शन सेठ की यह बातें सुन कर दुखित. हो लम्बी सांसें भरने लगी। उसकी आशा-लता पर तुपार की. वृष्टि हो गयी। अब यह हाथ मल २ कर पछताती और सिर धुनती है कि "हाय ! मेरी तो दोनों गयी-इच्छा की पूर्ति तो न हुई फिन्तु लज्जा रहित हो गयी. मेरी निर्लजतासेट पर प्रकट हो गयी, माम २ .
सुदर्शा चरित्र १६ स्त्री-गमन का त्याग। सेठने सोचा कि यदि हम लक्ष्य-भ्रष्ट न होंगे तो यह हमें तिल-मात्र न डिगा सकेगी, किन्तु "येन केन प्रकारेण" इसके जाल से मुक्त होना हमारा पहला फर्त्तव्य है। अगर इस वार, इस विपत्ति की कालकोठरी से, निर्विन छुटकारा पा गया तो जाव. जीवन स्त्री-गमन का त्याग है। इस प्रकार मन स्पिर फर कठिन शील-प्रत को सर्वदा के लिये धारण किया। अव कपिला की कौन कहे, सेठ ने मनो. रमा के त्याग का गढ़ संकल्प कर लिया। अरिहन्त भगवान की साक्षी देकर, मनसा, वाचा, फर्मणा से सेठ ने सदा के लिये कान्ति-बर्द्धक शील-हार धारण किया। जे सत्पुरुष अरिहन्त, सिद्ध, साधु और धर्म की शरण में आकर मैथुन सेवन का त्याग करते हैं, उनका मन कभी चलाय मान होता ही नहीं। पर यह सब कुछ तो ठीक है किन्तु "बाया कम्बल छोड़ते है पर जब कम्बल बाबाको छोड़े" वाली लोकोकि के अनुसार सुदर्शन रे. मनिच्छुक रहने पर भी फपिला उन्हें नहीं छोड़ती। वह स्पष्ट शब्दों में कहती है कि “जब तक हमारे साथ भोग नहीं भोगोगे, मैं तुम्हे कदापि न छोड़ेगी, मेरी हां की पूर्ति किये बिना तुम से जा प्रफते हो"। सुदर्शन की चाल सुदर्शन ने देखा कि इस अपाचारिणी इसिहज में सुट . सुदर्शया-चरित्र. फारा पाना कठिन है, अतः कोई चाल चलनी चाहिये। सेठ ने कहा, ! कपिला तू निपट निवोध और अत्यन्त अज्ञ.देख.पड़ती है, क्योंकि इतनी देर बाद भी तू यह न जान सकी कि मैं पुरुषत्व हीन है। यदि मुझ में कुछ भी पुरुषत्व-काम जोश-होता तो तुझ जैसी अप्सरा सरीखी रमणी से प्रेम करने में मैं क्यों वञ्चित रहता तू ने केवल नैन वाणों ही से नहीं, उरोज के.फुन्दों से मार फर भी मेरी काम परीक्षा कर ली है, इतने पर भी यदि मेरे कोवत्व फा शान न हुआ तो अवश्य ही तु मूर्खा है। क्या तू नहीं जानती कि बढ़े २ इन्द्रादिक देव भी खीके दासत्व को स्वीकार कर चुके हैं। जिन में कुछ भी पुरुष भाव होता है, वे तो स्त्री के गुलाम बन जाते हैं, मैं तो उसी रोहिडे के ( टेसू के ) फूल के सदृश है, जो गन्ध-रहित निष्फल होता है। मैंने तेरी सभी बातें ध्यान पूर्वक सुनी है, किन्तु एक पुरुप भाव के अभाव से निरुत्तर होकर मलिन मन हो रहा है। अस्तु! अब मुझे मेरे गृह जाने में, मैं तेरी आशा की पूर्ति करने में असमर्थ हूं। कपिला का. पश्चात्ताप । फपिला सुदर्शन सेठ की यह बातें सुन कर दुखित. हो लम्बी सांसें भरने लगी। उसकी आशा-लता पर तुपार की वृष्टि हो गयी। अव वह हाथ मल २ कर पछताती और सिर धुनती है कि "हाय ! मेरी तो दोनों गयी इच्छा की पूर्ति तो न हुई किन्तु लजा रहित हो गयी. मेरी निर्लजतासेठ पर प्रकट हो गयी, भाम . 4
सुदर्शगा-चरित्र
१६
स्त्री-गमन का त्याग।
सेउने सोचा कि यदि हम लक्ष्य-भ्रष्ट न होंगे तो यह हमें
तिल-मात्र न डिगा सकेगी; किन्तु "येन केन प्रकारेण" इसके जाल
से मुक होना हमारा पहला फतव्य है। अगर इस वाद, इस
विपत्ति की कालकोठरी से, निर्विन छुटकारा पा गया तो जाव.
बीवन स्त्री-गमन का त्याग है।
इस प्रकार मन पिर कर फठिन शील-प्रत को सर्वदा के
लिये धारण किया। अव कपिला की कौन कहे, सेठ ने मनो-
रमा के त्याग का दृढ़ संकल्प कर लिया। अरिहन्त भगवान की
साक्षी देकर, मनसा, बाचा, फर्मणा से सेठ ने सदा के लिये
कान्ति-चर्द्धक शील-हार धारण किया। जे सत्पुरुप अरिहन्त,
सिद्ध, साधु और धर्म की शरण में आकर मैथुन सेवन का त्याग
फरते हैं, उनका मन कभी चलाय मान होता ही नहीं। पर यह
सब कुछ तो ठीक है किन्तु "बाया कम्बल छोड़ते है पर जब
कम्बल बाबाको छोडे" वाली लोकोक्ति के अनुसार सुदर्शन
भनिच्छुक राइने पर भी फपिला उन्हें नहीं छोड़ती। वह स्पष्ट
शब्दों में कहती है कि "जव तक हमारे साथ भोग नहीं भोगोगे,
मैं तुम्हे कदापि न छोडूंगी, मेरी इच्छा की पूर्ति किये बिना तुम
कैसे जा सकते हो"।
सुदर्शन की चान।
सदन ने देखा कि इस प्रथाचारिणी रासमेंट
.
सुदर्शया चरित्र उत्साह दिन दूना रात-चौगुना बढ़ता है। सेठ भी इस आपदा से निर्विघ्न निरापद हो गये; अस्तु ! शील-प्रत पर उनका प्रगाढ़ प्रेम और भी प्रौढ़ हो गया। त्रिया-चरित्र और कुशीला वर्णन । . कपिला बड़ी ही दुपा है। इसके दुश्चरित्रों, कपट की चालों तथा भीवत्स पूर्ण कौतुहलोंको देख कर इस बात में सन्देह नहीं रह जाता कि कुशीला हर प्रकार के निन्दनीय कार्य करने में समर्थ हो सकती है। प्रसङ्ग यश यहां कुछ ऐसी नियों का उल्लेख किया जाता है जिन्होंने अपने कर्तव्यों से यह सिद्ध कर दिया है कि सर्पिणी के दांत में, चींटी के मुंह में, और यिच्छू के फेवल पूंछ में ही विप होता है, किन्तु कुशीला स्त्री के सारे शरीर में विप ही विप भरा है। स्त्रियों के अवगुणों की कथा अवर्णीय है, इस बात को श्री जिनेश्वर भगवान ने भी स्वीकार किया है। "इनके अवगुणों का चारा-पार नहीं, मगर यहां लोगों की जान- फारी के लिये संक्षिप्त में कुछ आख्यायिकायें उल्लेख की जाती हैं। स्त्री कपट की पोटली, झूठ का घर, कलहकारिणी और राग-द्वेष की जड़ है। भाई २ को लड़ा देना, पिता पुत्र को अलग फर देना, प्रेम-विच्छेद कराना-फूट पैदा कराना-तो इसके बांये हाथ का खेल है। कहा है कि:--- अन्य संग जिसका जल्पन है अन्य और लोचन संपात । जिसकी हृदय चिन्तना औरहि ऐसी रमणी दुख उत्सात ॥
स
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सुदर्शया-चरित्र
से वे मुझे लज्जा हीन समझेगे। हाय ! हाय !! मुझ से बड़ी भू
हुई । इस प्रकार पश्चात्ताप करती हुई,कुछ क्रोधित हुई-खिसिर
सी गयी। कपिला ने सेठ को नामर्द समझ, दासी को आय
दी कि किवाड़ खोल कर इसे शीघ्र कमरे से निकाल दे। ज्यों
दासी ने किवाड़ खोले त्योंही सेठ, कारावास से मुक हुए कैद
की भांति, लम्बी चालले अपने घर आये। कपिला के चरि
प्रावलोकन से उनके छक्के छूट गये। "भापनि हारी केहि
फहै, पेट मसूसा देकर रहे"। वेचारे, ऐसी लजा पूर्ण वा
दूसरे से कह भी न सकते थे, क्योंकि:-
अर्थ नाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च ।
वचनचापमानञ्च मतिमान् न प्रकाशयेत् ।।
अर्थात्-चुद्धिमानों को धन की हानि, मनका दुःख, घर के
दोष, अपना अपमान और प्रतारणा (दूसरे से ठगा जाना) प्रकाश
नहीं करना चाहिये (क्योंकि इससे अपनी ही अप्रतिष्ठा होती है)।
दूसरे के घर जाने का त्याग।
सुदर्शन लम्बी सांसें भर कर मनही मन कहते हैं कि, "आह!
बड़ा ही भ्रम हुआ, भविष्य में अब कभी स्त्री मात्र का विश्वास
न करूंगा। इस बार तो कैले ही छुटकारा पा गया; किन्तु आज
से अब दूसरे के ( अकेली स्त्री वाले ) घर जाने का त्यागं है । जय
मनुष्य किसी कार्य में सफल मनोरथ हो जाता है तो, उसका
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सुदर्भशा-चरित्र निपल फर नरक-निगोद में डाल दिया है। स्वभाव में तो यह मोरनी से चढ़ पढ़ फर है। मोरनी मीठी योली योल कर सर्प को खाती है, तो यह रसीली बोली घोल फर पुशील मनुष्यों का प्राण हर लेती है। जैसे मनुष्य कटीली झाड़ी में उलझ जाता है धैसे ही इन्द्रिय लोलुप पुरुष स्त्री हाव-भाव में फंस जाता निगोद-मनन्तकायिक-एक निगोद में अनन्त जीव रहते हैं। निगोद के जीव एफेन्द्रिय होते हैं। जैन शाणानुसार एकेन्द्रियों का पांच 'मेद है। पृथ्वी, पू, भप्ति (तेज) वायु, एवं वनस्पति। निगोद इस शेष पयाय पनस्पति में ही होता है। जिस वनस्पति में एक शरीर में एक ही जीव है उसे प्रत्येक -यनस्पति कहा जाता है। जिस वनस्पति के पक .शरीर में अनन्त जीव हैं उसे साधारण वनस्पति कहते हैं। निगोद का जीव साधारण बनस्पति में है। प्रष्ट कर्म में नाम कर्म की एक प्रकृति को साधा- रण माम कर्म प्रकृति कहते हैं, इसी कर्म प्रकृति के उदय से जीव निगोद शरीर पाता है। नारकी जोषों की अपेक्षा निश्चय न्याय से निगोद जीव को जन्म मरणादिक एवं एक शरीर में अनन्त जीवों का अवस्थानादि रूप अत्यन्त दुःख जनक होता है, परन्तु मत्त या मूर्मित भवस्था में जैसे शरीर में भाधातादि जनित पीड़ा की भनुभूचि नहीं होती पैसे हो निगोद जीव को विशेष दुःख होते हुए भी भति दुःसह नहीं होता । मनादिकर्म सम्बन्ध से यह सब निगोद में रहते हैं। साधारण शरीर में कितने निगोद जीव हैं इसका अनुमान इतने ही से हो सकता है कि इन जीवों में से जीव निकलते जाते हैं तब भी भूत, भविष्यत, वर्तमानकाल में कभी भी एक थरीर न खाली हुमा, भौर न होगा। निगोद के भी दो भेद हैं। सूक्ष्म एवं बादर । सूक्म निगोदवी समस्त होक में मेरे एहै और बाघर निगोद स्कन्द मूलादि में ही हैं। • - २० सुदर्शया-चरित्र जो होती स्वभाव से वंचक, निर्दय, चंचल दुश्शीला । यह रमणी कब हो सकती है मानव गण को सुखशीला ॥ जिसका कथन धन्य ही होता मन का अन्य रूप व्यापार । करती अन्य क्रिया जो तन से उस बनिता से दुःख अपार ॥ सेवन करती यह कुशील नित खोती कुल मादा मान । .. पिता धादि की कीर्ति-लता का मी नहि रखती कुछमी ध्यान ॥ देव, दैत्य, अहि, व्याल आदि के कार्य ज्ञान में भी पंडित । रमणी के चरित्र वर्णन में हो जाते सहसा खंडित ॥' नारी-मकारी में तो इस प्रकार सिद्धहस्त होती है कि चौखट पर चढ़ते कांपती; परन्तु पर्वत पर चढ़ जाती है घर में अकेली भय भीत होती है, पर रात को श्मशान में चली जा सकती है। चूहे को देख कर कांपती है, पर सिर के नीचे सर्प रख कर सो 'सकती है। एक आंख से रोती है, तो एक आंख से हंसती है। कभी जोर से चिल्ला उठती है, तो कभी मौनव्रत धारण करती है। फभी दाता बन जाती है तो कभी सूम के कान काटती है । क्षण २में ऐसे २ रंग बदलती है जिन्हे सहज में जानना कठिन है अपने पुरुष को बन्दर की तरह नचाना और अपना भृत्य समझना तो कोई यात ही नहीं, यह धर्म-कर्म में भी वाधा पहुंचाती है । स्त्री को अबला फहना भ्रम है, क्योंकि इसने पढ़े २ सुर-नरों को २१ सुदर्भया चरित्र निपल फर नरफ निगोद * में डाल दिया है। स्वभाव में तो यह मोरनी से चढ़ पढ़ कर है। मोरनी मीठी बोली बोल कर सर्प को पाती है, तो यह रसीली बोली बोल कर कुशील मनुष्यों का प्राण हर लेती है। जैसे मनुष्य फटीली झाड़ी में उलझ जाता है वैसे ही इन्द्रिय लोलुप पुरुष स्त्री के हाव-भाव में फंस जाता निगोद-मनन्तकायिक-एक निगोद में मनन्त जीव रहते हैं। निगोद के जीव एकेन्द्रिय होते हैं। जैन ग्रानानुसार एकेन्द्रियों का पांच मेद है। पृथ्वी, अपू, भग्नि (तेज) वायु, एवं वनस्पति । निगोद इस शेष पप्यांय पनस्पति में ही होता है। जिस वनस्पति में एक परीर में एक ही जीवो उसे प्रत्येक वनस्पति कहा जाता है। जिस घनस्पति के एक .परीर में अनन्त जीव है उसे साधारण वनस्पति कहते हैं। निगोद का जीव साधारण धनस्पति में है। भ्रष्ट कर्म में नाम कर्म की एक प्रकृति को साधा- रण माम कर्म प्रकृति कहते हैं, इसी कर्म प्रकृति के उदय से जीव निगोद थरीर पाता है। नारकी जोषों की अपेक्षा निश्चय न्याय से निगोद जीय को जन्म भरयादिक एवं एक गरीर में अनन्त जीवों का अवस्थानादि रूप मस्यन्त दुःख जनक होता है, परन्तु मत्त या मूर्षित अवस्था में जैसे शरीर में प्राधातादि भनित पीड़ा को अनुभूति नहीं होती पैसे हो निगोद जीव को विशेष दुःस होते हुए भी मति दुःसह नहीं होता । अनादि कर्म सम्बन्ध से यह सव निगोद में रहते हैं। साधारण शरीर में कितने निगोद जीव हैं इसका अनुमान इतने ही से हो सकता है कि इन जीवों में से जीव निकलते जाते हैं तब भी भूत, भविष्यत, पर्तमानकाल में कभी भी एक शरीर न खाती दुभा, भौर न होगा। 'निगोद के भी दो भेद है। सूक्ष्म एवं बादर । सूक्ष्म निगोद ती समस्त कोक में मरे हुए हैं और बादर निगोव स्कन्द मूलादि में ही हैं।
. सुदर्शया-चरित्र है। नारी के नैन तीखे वाणों और वचन भाले से भी पढ़ कर है, किन्तु जब यह तिरछी दृष्टि से देखती है तो वही नैन तलवार का भी काम करते हैं। अन्यान्य शस्त्रों का मारा हुआ मनुष्य 'तुरन्त ही प्राण त्याग देता है, किन्तु इन शस्त्रों का घायल, मत- वाला हो, ज्ञान शून्य होकर, छटपटा २ कर मरता है। जोंक जिस स्थान पर लग जाती है वहां का रक्त पी लेती है, पर स्त्री जिस पुरुष से लगती है, उसका खून चूस, प्राण हीन बना देती है। सच बात तो यह है कि इस ठगिनी से-जो हाथ में जादू का काम करने वाली मेंहदी लगा, , नागिन से भय- कर सिर के बालों को बांध, तंग चोली से फुच-कमर को कस 'कर, संसार को ठगने के हेतु निकलती है-वही सत्पुरुष रंक्षित रह सकता है जिसने सत्गुरु के अमृत भय सदोपदेशों का पान किया हो। नारी नवग्रह से बढ़कर है। अरिष्ट ग्रह होने से कष्ट तथा प्राण नाश की शंका रहती है, परन्तु नारी जिस पर मुग्ध हो जाती है नरक निगोद में पहुंचा देती है। बड़े आश्चर्य की बात तो यह है कि इस असार संसार की अनित्यता तथा मोहजाल को जानते हुए भी लोंग "फूले २ फिरत है होत हमारो व्याह" हंसी खुशी के साथ काठ में पैर' डालते और नारी रूपी घेड़ी पहन कर भी आनन्द के गीत गाते हैं। देखिये ! उज्जैन नगरी का हरचन्द नामक राजा सोमला के ऊपर मोहित हुआ और उसने उस.को. मार कर नदी . में बहा दिया। यशोदा ने अपने पति को विष देकर मार डाला, उसके मृत शरीर ..
सुदर्शया-चरित्र के संग थाप भी चिता में जली और नरक गयी। प्रादत्त चक्रवर्ती की * चूलनी माता ने लम्पटता के कारण अपने पुत्रको चायती मझदत्त को माता का नाम पूलनी था। जय प्रादा के पिता का स्वर्गवास हो गया तो इसकी माता पूलनी ने पुराने प्रधान का पद हस्तान्तरित कर के अपने प्रिय सरदार को प्रधान का पद सौंपा और उसके सङ्ग भोग-विलास करने लगी। महादत्त के यहां एक काग और हंसनो पालो हुई थी। एक दिन काग पुरे भाय से इसनी की भोर लासी- लसो लगा फर लभराने लगा। यह देख प्रशदत्त पहुत बिगड़ा और कहने लगा कि मेरे नीच काग तेरे मुंह को यह हंसिनी ? मभागी मुंद को दाना । स्वयरदार हमारे यहां ऐसा अन्याय न होगा, भविष्य में मैंने फिर कभी यदि सेरी ऐसी पृष्टता देखी तो सू जान से मारा जायगा । यह यात ( प्रधान भौर रानी ) जय उन लोगों ने सुनी तो चौंक ठटे और सोचने लगे कि हो म हो यह यात हम दोनों ही पर लक्ष्य रख कर कही गयो है यहां पर "चोर की दाढ़ी में तिनका" को कहावत चरितार्थ हुई और प्रधान ने रानो से कहा कि अभी तो यह मालक हैं तय ऐसी दशा है जय सयाने होंगे तय हम दोनों के मुखोपभोग में अवश्य ही पाधा पहुंचायेंगे, मतः इन्हें किसी प्रकार मार दालना चाहिये। रानी भी इसपर सहमत हो गयी और पुन के यध को यांना से लाह का एक महान तैय्यार कराया, किन्तु यह भेद उतारे हुए (पुराने ) प्रधान को मालूम हो गया उसने प्रसादत्त से कहा कि तुम्हारी माता तुम्हें मार दालना चाहती है, इसी उद्देश्य से यह लाह का भवन निर्माण किया गया है। महादत्त ने प्रधान की इस बात का विश्वास न किया और कहने लगा कि मेरी मां मुझे मार डालेगी, यह कभी नहीं हो सकता, माता को पुन सय से अधिक प्यारा होता है, माता से पुत्र-वध का कार्य कदापि न होगा। प्रधान ने कहा यच्छा, पदि भाप मेरी बात का .
. सुदर्शया चरित्र मार डालना चाहा । कैकेयी के कारण राम-लक्ष्मण यारह वर्ष के लिये वन-यासी हुए और दशरथ ने क्लेश पाया । • पद्मावती ने ही विश्वास नहीं करते तो, जाने दो, मगर मैं एक सरङ्ग पृथ्वी के नीचे २ खोदवा रखता हूँ जब तुम विपत्ति में फंसना उसी स्थान को लात मार कर गिरा देना और सरङ्ग के मार्ग से चने माना, वहां मेरे दो घोड़े सजे हुए रहेंगे हम दोनों ही उन पर चढ़ कर अन्य देश को भाग चलेंगे। कुछ दिन बाद घूलनी ने ब्रह्मदत्त का विवाह किया और पुत्र से कहा कि विवाह के पश्चात सपलीक इस मकान में सोने की परिपाटी है, अतः वेटा तुम भी जायो। ज्योंही ब्रह्मदत्त लाह के भवन के भीतर गया शहर से भाग लगा दिया। मकान में चारों भोर से भाग लगी हुई देख कर ब्रह्मदत्त को प्रधान को यात यार मा गयी और लात के धक से सरङ्ग को खोल उसी मार्ग से भग गया। बहुत दिन तक प्रधान और प्रादस दोनों ही धोड़ों पर भ्रमण करते, नाना. प्रकार के कष्ट भोगते, ज्यों त्यों कर दिन काटते रहे। जय चक्रवर्ती का तेज भाया-मसाता वेदनीय कमों का अन्त हुमा-तब दोनों अपने घर को लौटे । ब्रह्मदत्त के भाने के पूर्व ही उसकी माता चूलनी ने संसार के भोग विलास को मृग तृष्णावत् समझ अपने दुश्चरियों पर पश्चात्ताप कर, दीक्षा. ले लिया था। ब्रह्मदत्रा के घर चलने की प्रार्थना करने पर उसने कहा कि मैने तो अब संसार छोड़ दिया है। अतः चक्रवती प्रादत्त अपने घर लौट माया भौर सुख के साथ राज-पाट का भानन्दोपभोग करने लगा। + श्रेणिक राजा के देहावधान का समय जव निकट भाया तव उसने. अपने लघु पात्मज वहलकुमार को एक देव प्रदत्त हार-हायो प्रदान किया। उसके मरने के थोड़े ही दिन पश्चात एक दिन पद्मावती-जो बहल कुमार के सहोदर भाई कोणक को प्रार्धाङ्गिनी थी- अपने पति से कहने सगी कि, हे स्वामिन् यह हार-हाथी भापके. पास रहना चाहिये, भाप .
२५ मार, (राजपूताना.) सुदर्शया चरित्र हार-हाथी के कारण कोणक और पहल कुमार से घोर संग्राम - राज्याधिकारी है और ऐसी अनुपम वस्तुओं से ही राज को शोभा है, अतः माप पहल कुमार से उन्हे से लीजिये। कोणक के मांगने पर बहल कुमार ने यह कहकर देने से इन्कार किया कि "यह हार-हाथी पिता की मुझे दे गये हैं, श्राप को कैसे दे दूं और यदि याप लेना ही चाहते हैं तो मुझे प्राधा राज्य यांट दीजिये"। किन्तु कोणक इसपर राजी न हुमा और हार-हाथी लेने को प्रबल इच्छा प्रकट की । बहल कुमार ने जब देखा कि मेरे भाई के विचार अच्छे नहीं है, बहुत सम्भव है कि यह मुझ से धन पूर्वक (मार कर) घोन ले, ता वह अपने माना रागा चेंड़क के यहां चला गया यह सम्बाद पाते ही कोयक ने दूत द्वारा राजा चेंढक के पास यह समाचार भेजा कि "यासो माप यहल कुमार को यहां भेज दें अथवा हार-हाथी मुझे दिलाद, क्योंकि इस हार-हाथी से राज की शोभा है"। राजाने इसके उत्तर में यह कहला भेजा कि "हमारी दृष्टि में तुम दोनों भाई एक समान हो-दोनों ही पर हमारा प्रेम वरावर है, किन्तु देखो अन्याय-कार्य सदैव अनिष्टकर होता है, न्याय की अवहेलना करना अच्छा नहीं, यदि तुम उससे हार-हाथी चाहते हो तो प्राधा राज्य यांट देने में क्यों भानाकानो करते हो। बिना राज्याधिकार पाये वह पिता-प्रदत्त हार-हाथी तुम्हे कैसे दे दे।" यह सुनते हो कोणक भाग-बबूला हो गया, हृदय में क्रोध को ज्याला प्रज्वलित हो उठी और सत्रयातू एक दूत के द्वारा यह कहला भेजा कि "मेरे दुष्ट चेंडक, घर में फूट पैदा करानेघाला, पारस्परिक मोह बढ़ानेवाला, नराधम नीच, यातो पहल कुमार को अपने यहां से निकाल दे नहीं तो मेरे साथ संग्राम कर। कोयक को इस युद्ध-धोपमा को राजा ने यह विचार कर स्वीकार किया कि घरया- गत की रक्षा करना रामा का फत्तव्य है। राजा हक ने अपने सहयोगियों से भी इस विषय में परामर्ष किया किन्तु समोंने यही राय दी कि युद्ध के - सुदर्शया-चरित्र २६ फराया। रेवती अपने पति महासतक श्रावक को, पोसह में भय से शरणागत की रक्षा न करना एक निन्दनीय कार्य है। भाप युद्ध कोजिये हम सभी शाप का साथ देंगे । फिर क्या था, दोनों थोर से युद्ध की सय्यारियां होने लगी और कोणक तथा राजा दक का बड़ा घोर संग्राम हुभा । इस युद्ध में-उभय पक्ष के-१८००० मनुष्य काम आये। + प्राचीन काल में राजगृही नामक एक नगरी थी। वहांपर धन सम्पन्न महाशतक नामक (गाधापत्ति ) एक माहूकार रहता था। यह चौवोस दिरयम कोड़ का धनी और ८० हजार गौत्रों का स्वा था। इसके रेवती भादि तेरह प्रमुख स्त्रियां थीं। सन्दरता में सभी एक से एक चढ़-पढ़ कर यो। धन्य स्त्रियों के घनिस्बत रेवती अपने पिता के घर से सात गुनी सम्पत्ति अधिक लायी थी। विवाह के समय रेवतो के पिता ने अपने जामाता महाशतक को पाठ हिरण्य मोह -भाउ करोड़ सोने को मुमरें-और दश हजार गौ का एक वर्ग ऐसे माठ वर्ग गायों के दिये थे। एक समय श्रमया भगयन्त महायोर स्वामी विचरते हुए राजगृही नगरी में पधारे। नगर नर- मारियों के झुंड के झुंड दर्शनार्थ उनके पास गये और महाशतक श्रावक भी बढ़ी उत्सुकता के साथ दर्शनीक्षा से उनके समीप आया। धमोपदेश भवयो- परान्त मायतक ने श्रावक धर्म आङ्गीकार करने के साथ ही साथ श्रावक के बारह प्रतों को शिरोधार्य किया। प्रतों में यह अभिग्रह लिया कि पार करोड़ स्वर्ण मुदा पृथ्वी में, पाठ करोड़ गृहस्थी फे कार्य में और माठ करोड़ व्यापार के लिये तथा पाठ वर्ग गानों के रख कर बाकी सभी धन-सम्पास का त्याग है। उसी भांति अपनो तेरह स्त्रियों के उपरान्त 'मैथुन सेवा का त्याग किया। उसका एक यह भी अभिग्रह था कि सेर सुपर्ण से अधिक का व्यापार कभी न करूंगा इस भांति भ्रावक फे बारह बसों को पालता, चौयह प्रकार का दान देता और जोधादि गय-पदार्थों का ज्ञान ममता मा श्रावकारित क्रिया के साथ मामन्द में रहने समा।
२७ सुदर्शया-चरित्र (ध्यान मन) थैठे हुए, कामोन्मत्त हो-मदिरा-मतङ्ग पर सवार एक दिन राशि के समय रेवती ने विचार किया कि इन मारह सौतों के रहते हुए मुझे अपने स्वामी के साथ विषय-भोग करने का अधिक अवसर नहीं मिलता यदि किसी भांति इन्द मार डालूं ता अकेले मौज उनाऊ । एक समय शवपर पाकर उसने अपनी छः सौतों को अस्त्र द्वारा मोर छः को विष देकर मार दाला। उन सभों मरणोपरान्त सारी सम्पत्ति की अधिका- रिणो हुई और महाशतक धायक के साथ मौदार्य प्रधान मनुष्य सम्यन्धी भोगांपभोग, काम क्रीडा, करती हुई धानन्द से दिन व्यतीत करने लगी। रेवती को मांस-मदिरा खाने-पीने का व्यसन पड़ गया था, वह मांस साने फो इस प्रकार भादो हो गयो थो, कि नगरी के राजा श्रेणिक के जीव हिंसा (पंचेन्द्रिय जीव का वधा न करने की मनादी पिटया देने पर भी, गुप्त रूप से पिता के घर से सेवार्थ पाये हुए सेवक द्वारा मदिरा-मांस मंगा कर पाती हो रही। महागराक श्रावक ने अपने धर्म-कर्म का भलीभांति प्रतिपादन करते हुए सुख से चौदह वर्ष व्यतीत किये। जय पन्द्रहवां वर्ष लगा सोचा गृहस्थी का भार अपने पुत्र को सौंप, पौपधशाला में दर्म के पास पर भासीन होकर एकाग्र चिरा से धर्म-ध्यान करने लगे । एक दिन रवतो रारापान कर मदमस्त हो, सिर के बाल विखारे, मदन के वस्त्र नीचे गिराती, विकराल रूप धारण किये, पौषवधाला में महाशतक भायक के समीप भायो और फाम-उत्पादक हाव-भाव दिखाती, प्रेम-रस पगे भटपटे शब्दों से पो कहने लगी:-दे धनयोशतक महायतक! धर्म पुयय, स्वर्ग भोर मोक्ष फे इएफ पदि आप सच्चा सुख चाहते हैं तो इस शम, दम और तप में इतना ध्यर्थ परिश्रम कर काया को कट क्यों देते हैं । परिश्रम ही से एख चाहते है तो गुभा निगा की प्रीति सम्पादन में परिश्रम कीजिये। पिकामी, साथ भोग- पिनास किये धर्म, पुस्य, स्वर्ग धौर मौज्ञ का लाभ प्राप्त न कर सकोगे। उस कामोन्मत्त यावती की कर्ण-कटू भाषाको सन फर भी महापतक मारक - सुदर्शया-चरित्र २८ होकर लक्ष्य भ्रष्ट करने केलिये गयी। * देवदत्त सुनार चुप चाप ध्यान में बैठा रहा--किचित विचलित नहुमा । इस बार तो पति को कुछ बोलते न देख, अपना अपमान समझ लौट गयो किन्तु पुनः पूर्व की भांति जब अपरिवर्तित रूप में फिर पायी तो उसे लक्ष्य भ्रष्ट करने की घड़ी चेष्टा की। इस समय महाशतक श्रावन के शुभ परिणामों की वृद्धि होने के कारण उने अवधिज्ञान उत्पन्न हो चुका था। अतःमहाशतक श्रावक ने भवधिज्ञान से विचार कर कहा कि "थरी फुलक्या, निर्लजा, अपशब्द भापियो, काली चतुर्दशी को जनी, रेवती दू आज से सातवें दिन में मर कर लुलचुत नरक में जायगी और वहां चौरासी हजार दर्प नरिये पने में कष्ट भोगती रहेगी। यह सुन रेयती पड़ी भयभीत हुई और पिछले पांव हरसी- फांपतो अपने घर चली पायी। महाशतक श्रावक के कथनानुसार यह सात दिन के अन्दर भालस रोग से अनेक कष्ट भोगती हुई मर कर नरक में गयी। पाटक गण ! व्यभिचारिणी स्त्री क्या २ कर सकती है अब यह सहज ही अमेनुय है। राजगृही नगरी में एक ध्रन सम्पन्न देवदत्त नामक सुनार रहता था। उसके एक एकलौता लाहिला थेटा था। देवदत्त ने बालक को विवाह योग्य मान एक स्वर्णकार की बालिका से उसका पाणिग्रहण कराया। विवाहो- 'परान्त वे स्त्री-पुरुष बड़े प्रेम के साथ रहने लगे... एक दिन देवदत्त एनार को यह विदित हुआ कि मेरी पुत्र-वधू किसी अन्य पुरुष से फसी है । संयोग- पण एक दिन जब वह अपने यार के पास पयंत्र पर घेठध सोयी हुई थी, प्रमाणार्य देवदत्त ने दवे-पांव जा कर उसके एक पैर का आभूपण ( नूपुर ) "निकाल लिया। ससर ज्योंही नूपुर लेकर उधर चला त्योंही उसको अखि 'सुल गयो। बुढ़े को इस घालं को देख कर यह मन ही मन सोचने लगी कि प्रातःकाल होते ही यह अवश्य अपने पुत्र से सारा वृतान्त कहेगा, चल कर पहले ही से इसका प्रबन्ध फर दूं-पुढे की चाल पर पानी फेर सुदर्शया-चरित्र र, साना फी व्यभिचारिणी यह ने देवता को छल फर ससुर को झूठा ठह- । पह धीरे से भाकर अपने पति के पलङ्ग पर चुपके से मेट गयी। धौर थोड़ी देर याद उसे जगा कर कहने लगी कि "माज मैंने एक पड़ी विचित्र यात देखो, मापके पिताजी भभी पदा ( प्रयनागार में ) माये ये और मेरे पैर का प्राभूषण उतार ले गये हैं, गैलमा यग उनसे कुछ नहीं काइ सकी । मेरा अनुमान है कि वह मेरे ऊपर कोई झूटा अभियोग लगायेंगे। मैं नहीं जानती कि यद मुझसे क्यों इतना सार-साते हैं? यह सो भवरण को मेरे ऊपर झूठा दोषारोपण करेंगे, किन्तु सायधान माप उनके यहकाये में मभाइयेगा"। प्रातःकाल होत हो रामार ने अपने पुत्र से उसको स्त्री को फरतूत कही धौर नूपुर दिखलाया। पुन का काग तो पहले ही से फूंक दिया गया था-चतुर चिकित्सक ने सूची द्वारा सारे घरीर में कपोल- करिपत दवा की गर्मी फेला हो दी थी, उसने कहा पिताजो "भापतो सठिया गये है, भापकी मुद्धि मारी गयी है, अच पर पत्थर पद गये हैं। पतलाइये, पाप हक नाहक ही यह सब बनाक्टो जाल क्यों रचत , मेरी पतिव्रता स्त्री को झूटा कलंक क्यों लगाते हैं। माप हो कहिये कि जहां पर पुत्र अपनी स्त्री के साथ शयन करता हो, यहां पर भापको जाना चाहिये ? जय माप उसके पैर का माभूपए निकाल रहे थे वद नागतो थी, येचारी सुशीला सजा के मारे माप से कुछ न बोली। वह तो भाप के इस कार्य से सज्जित हो गया किन्तु भापको धर्म न पायो। पिताजी! माप को इस चाल का हाल तो उसने तुरन्त ही कहा था। मैं मापसे दाय के साथ कहता हूँ कि मेरो स्त्री सुशीला, पतियता धार निष्कलंक है। भाप निरर्थक ही उसपर झूठा. दापारोपण करते हैं। पुन को ऐसी बाते एन कर देवदत्त चकित हो गया. और अपना सा मुंह लेकर रह गया। अब वह ने भी सहर पर उल्टा घरा यांधना आरम्भ किया, वह कहने लगी कि सार को इस यात से मेरा यहा अपमान हुआ है, मेरे मुख पर कलंक को कालिमा माग गमी सुदर्शया-चरित्र राया। परदेशी राजा की सूरीकान्ता नारीने पति से अपना अभीष्ट पूरा न होते हुए जान उसे मार डाला। है, अब जबतक झूठ-सांव का निर्णय न होगा, मेरा मुख उज्ज्वल न हो सकेगा-मैं किसी को मुंह दिखाने योग्य न होऊंगी। उस नगर के देवालय एक यज्ञ को मूर्ति थी। जो कोई असत्यवादी यहां जाकर झूठ बोलता, यज्ञ उसे दवा लेता और सत्यवादी निर्भय होकर चला माता था। सुनार को बहू ने भी नहीं जाकर अपने को निर्दोष प्रमाणित करना निश्चय किया। देवालय में जाने के एक दिन पूर्व उसने अपने उपपति को यह सारा वृतान्त सनाया और कहा कि जब मैं वहां जाने लगू तय थाप मार्ग में पाकर किसी भांति मुझे छू लेना। यस मैं सब काम बना लूंगी। वैसा ही हुमा, जय पह देवालय में (धोज पढ़ने के निमित्त ) जाने लगो, उसे देखने के लिये पहुत से खा-पुरुष एकत्रित हो गये। उसी भीड़ के यौच से पागल को भांति यकत-झकते हुए उसके यार ने पाकर उसे छू लिया। वहं देवालय में गयी और यन के सन्मुख हाथ जोड़ कर कहने लगी कि "ह यन देय ! यदि पति और मार्ग में छू जाने वाले पुरुष के अंतिरिफ किसी पुरुष ने मेरा भङ्ग भी रूपर्श किया हो तो भाप मुझे दाब कर मार दालिये, नहीं तो निर्भय कर, मेरे कलङ्क का उन्मोचन कीजिये । यक्ष ने उसे यह देख कर छोड़ दिया कि यार की यात स्वीकार करती हुई जो कुछ कहती है ठीक है। जब यह निर्दोष होकर वहां से चली आयी तो पह सधो मौर सार' झूठा हो गया। यह बात सारे नगर में फैल गयो और जगह २ देवदत्त की निन्दा होने लगी। यह चरित्र देख बुड्ढे को बड़ा प्राधर्म्य हुमा और उसकी नींद 'हर गयो। सनार मन में पश्चात्ताप करने लगा कि देखो मैंने उसे साक्षातू पर पुरुष के सा सोते हुए देखा है मगर अंथ में झूठा और यह सच्ची है । घाहरे! निया के चरित्र, क्या खूब ! + प्राचीन काल में जम्बूद्वीप के भरतज्ञेल में श्वेताम्बिक मास की एक + ।
सुदर्शया चरित्र इस विषय में कितना ही प्रकाश डाला जाय, किन्तु अन्त में यही कहना होगा कि "विया-चरित जाने नहि कोय"। पाठक गण! सोचिये कि कपिला ब्राह्मणी ने सुदर्शन सेठ को कितना सताया, हार्दिक कष्ट पहुंचाया और प्रत भंग करने में कुछ नगरी थी। इस शद्धि-सिद्धि सम्रा नगरी में परदेथी नाम का राजा राज्य फरता था। परदेशी राजा स्वभाव का बड़ा हो कर तथा दुष्ट था। जीवों को बध करना और कुश पहुंचाना तो उसका सहज स्वभाव था। यह जीव भौर काया को एक ही मानता तथा पाप और पुण्य किस चिडिया का नाम है-जानता ही न था अर्थात जोव हिंसा से पाप होता है इस बात का कायल मथा। यह "चना-चयेनी" को ही मधुर मोदक समझता था। परीर से जीव पृय है या नहीं यह जानने के लिये वह सैकड़ों जीवों को काट- काट कर उसमें जीव की खोज करता था। इसी प्रकार घोर पाप कर्म करता हुमा अपनी प्राण यसमा सूरीकान्ता पटरानी के साथ मुखोपभोग से दिन व्यतीत करने लगा। पहुकालोपरान्त एक समय संयोगवश चार- ज्ञान के धनी फेशी स्वामी, उस नगर में पधार, राजा की प्रधान ग्यारह ग्रहाओं का समाधान कर उन्हें श्रावक-मत अङ्गीकार कराया। राजा जिस प्रकार पहले पाप-कार्य में संवोपरि था, उसी भांति भय धर्म-कार्य में 'श्रावक-शिरोमणि दो गया। यह प्रावक के पारह प्रतों को भलीभांति पालता हुआ येले २ पारणा करने लगा। राज-पाट तथा स्त्री-पुग्न पर पहले जितना माया-मोह था, उस से कहीं अधिक भव घृया हो गयी, यहां तक कि राज-काज का सार-सम्भाल भी त्याग दिया। जिस सूरीकान्ता पटरानी को यह प्रायों से भी अधिक मानता था, उसकी भी उसे परवाह न रही। सूरीकान्ता ने अपनी शोर से राजा को इस प्रकार उदासीन देख, मनमें सोचा 'कि जब राना मुझ से प्रेम ही नहीं करता-भाग-विलास से मुख मोड़ लिया I सुदर्शया-चरित्र ऐसी निन्दित नारियां बुध जनों को त्यागनी सर्वदा, प्रेतों के थल पे पड़ी गटकियों के तुल्य, दुःखप्रदा ।। स्जियां लालच से कभी खिलखिला उठती है, फभी फूट- फूट कर रोने लगती हैं, दूसरे को अपना विश्वास करा देती है परन्तु स्वयम् किसी का विश्वास नहीं करतीं। इस लिये बुद्धि- मानों को श्मशान भूमि में रखी हुई इंडियों के समान स्त्रियों फो त्याग देना चाहिये। सुदर्शन सेठ एक मास में चार पोलह करते और रात को श्मशान में जाकर सोते थे। धर्म-कर्म में लवलीन सेठ सपनीक सुपात्र दानादिक शुभ कार्यो को करते हुए सुख के साथ दिन व्यतीत करने लगे।
ET भरोदानमा दीक्षानेर, (राजपुताना) तीसरा अध्याय अभयाका कुविचार और धायकी शिक्षा। doe बाटिका विहरण। 4000 धात्री वाहन राजा को अभया पटरानी, बड़ी रूपवती, चन्द्र- Seपदनी, मृगनयनी और लावण्यता में सुराङ्गनाओं से कुछ कम न थी। वह संसार की विषय-वासनाओं में ही वास्तविक मुख समझ, मानन्द से दिन बिताती थी। चम्पा नगरी के ईशान कोण में एक सुन्दर रमणीय उपवन था, यों तो वह सदैव ही हरा-भरा तथा फूला-फला रहता था, किन्तु वसन्त ऋतु में उसके चत्ताकर्षक गुण और भी बढ़ जाते थे। उस परम रम्य वाटिका निगर के स्त्री-पुरुष सभी आमोद-प्रमोद कर नेत्रों का सुख उप-
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बैठी
सुदर्शया-चरित्र
सन पर विराजमान हुए। बढ़े २ सेठ-साहकार, वीर, सामन्त.
सेनापति, सकुटुम्ब आकर अपने २ उपयुक्त स्थानों पर भासीन हुए।
विषय-वासना में लीन, परभव चिन्ता विहीन अभया रानी. भी
सपरिवार, बड़े उत्साह पूर्वक वहां पर आ बैठी। संयोग से
अभया रानी की प्रेम-पात्री, कपिलानाहाणी भी वहीं आकर
जहां रानी बैठी थी। एक प्रकार का खभाव होने के कारण दोनों
में मेल होना स्वभाविक था। श्योंकि-
देखी मृग की मृग में प्रीती, रमणी की रमणी के संग ।
अंश्व प्रीति अश्व हि में करता मूरख जन मूरख के संग ।
जो होते हैं ज्ञानवान नर उनके प्रीतिपात्र ज्ञानी,
.इसी लिये सम शील. व्यसन के पुरुषों में प्रीती मानी ॥
पाठक गण! अव अभया रानी की वही दशा होगी जो
दुर्व्यसनियों के संग से हुआ करती है।
१
वाटिका में सुदर्शन सेठ।
वाग में सभी सेठ-साहूकार आये थे, अस्तु ! सेठ सुदर्शन भी
अपनी मनोरमा सुपनी और देवकुमार" सरीखे चारों पुत्रों के
साथ पधारे। ब्रह्मचर्य-वस्त्र तथा जिन भगवान की भक्ति-भूषण
को धारण किये हुए सेठ सव महाजनों के मध्य इस प्रकार
'शोभायमान हुए जैसे नक्षत्रों के बीच में चन्द्रमा। उस समय
पाग की शोभा ने और भी मुखमा धारण की। ज्योंही सुदर्शन
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३६ सुदर्भशा-चरित्र, सेठ भभया रानी के महल के नीचे आये त्योंही यह झरोखों से झांक कर, सेठ की सौन्दर्यता और रूप लावण्यता दिलोकि ज्ञान शून्य हो गयी। चकोरी कौमुदी को देख कर अपने आप को भूल जाती है, आलोक की छटा पर पतंग अपना जीवन भूल जाता है, अतएव चन्द्रकान्त आनन फो देख कर अभयारानी अपने को भूल गयी। प्रेमास्पद के मुखावलोकन का आनन्द प्रेमी ही जानता है। किसी को देखा २ पर भूले रहने में क्या कुछ कम माधुर्य है ? अस्तु ! रानी सेठ की ओर निर्निमेष दृष्टि से देखने लगी और उसके सर्या में एक प्रकार की सुधा का सञ्चार हो गया। वह मन ही मन विचार करने लगी कि जिस स्त्री को ऐसे पुरुप से सुख भोगने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है वह धन्य है। धन्य है जिसने इस पुरुप-शिरोमणि द्वारा देव कुमार तुल्य चार बाल-रत प्राप्त किये हैं। कपिला और अभया की बातचीत । रानी ने दासी से पूछा कि "यह चार पुत्रों सहित आये हुए स्त्री-पुरुष कौन है"। दासी चोली, "महाराणी यह सुदर्शन सेठ और उनकी मनोरमा स्त्री है, आप ही के ये चारो पुत्र हैं, आप नगर के सेटों में शिरताज हैं। दासी की बात सुन, समीप में बैठी हुई, कपिला नाहाणी मुंह मटका कर चोली "दासी तू इस बात से अनभिज्ञ है, तुझे इस बात का पूरा ज्ञान नहीं। यह पुर सेठ सुदर्शन के नहीं हैं, जैसे अग्नि से दग्ध सूखे वृक्ष
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दर्भया चरित्र सेठ अभया रानी के महल के नीचे माये त्योंही वह झरोखों से झांक कर, सेठ की सौन्दर्यता और रूप लावण्यता दिलोकि शान शून्य हो गयी। चकोरी कौमुदी को देख कर अपने आप को भूल जाती है, भालोक की छटा पर पतंग अपना जीवन भूल जाता है, अतएय चन्द्रकान्त आनन को देख कर अभयारानी अपने को भूल गयी। प्रेमास्पद के मुखावलोकन का थानन्द प्रेमी ही जानता है। किसी को देख २ फर भूले रहने में क्या कुछ कम माधुर्य है ? अस्तु! रानी सेठ की ओर निनिमेष दृष्टि से देखने लंगी और उसके सर्वाङ्ग में एक प्रकार की सुधा का सञ्चार हो गया। वह मन ही मन विचार करने लगी कि जिस स्त्री को ऐसे पुरुष से सुख भोगने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है यह धन्य है। धन्य हे जिसने इस पुरुष-शिरोमणि सारा देव कुमार तुल्य चार घाल-रत प्राप्त किये हैं। कपिला और अभया की वातचीत। रानी ने दासी से पूछा कि "यह चार पुत्रों सहित आये हुए स्त्री-पुरुष कौन हैं"। दासी चोली, "महाराणी यह सुदर्शन सेठ और उनकी मनोरमा स्त्री है, माप ही के ये चारो पुत्र हैं, आप नगर के सेठों में शिरताज है"। दासी की बात सुन, समीप में बैठी हुई, कपिला ब्राह्मणी मुंह मटका कर बोली "दासी तू इस बात से अनभिज्ञ है, तुझे इस बात का पूरा ज्ञान नहीं। यह . पुत्र सेठ सुदर्शन के नहीं हैं, जैसे अग्नि से दग्ध सूखे वृक्ष. .
। N सुदर्शया-चरित्र में फूल-फल नहीं लगते, वैसे हो पुरुषत्व हीन पुरुष के संतति नहीं हो सकती। सेठ नपुंसक है इसमें तिल-मात्र भी सन्देह नहीं। कपिला की यह बात सुन रानी चकित हो गयी और उसे एकान्त स्थान में ले जाकर सारी बातें पूछीं। रानी ने कहा "कपिला सेठ के नपुंसकत्वका भेद तूने कैसे गाना ? मुझे इस विषय की समस्त, बातें निस्सङ्कोच होकर बता"। कपिला ने अपनी सारी राम- कहानी, अक्षरसः ज्यों की त्यों कह सुनायी। अभया रानी ने हंस कर कहा कि “कपिला तू तो बड़ी नियोध और निपट अजान जान पड़ती है। मालूम होता है कि तुझे पुरुपपने का कुछ भी शान नहीं, तू पुरुष को यश करने की कला से विहीन है। सेठ : असत्य बोल कर तुझे छल ले गया"। यह सुन कपिला बोली "अच्छा रानी, तुम तो बड़ी चतुर-सुजान और जानकार हो, यदि सेठ सुदर्शन के संग भोग-विलास का सुख प्राप्त कर लो तो. तुम्हारी बात मेरे शिर-माथे है, मैं हारी और तुम जीती" । रानी ने गर्च पूर्ण शब्दों में कहा, "कपिला यदि संसार में रह कर मैं सेठ के सङ्ग रमणं न कल तो मेरे मुंह पर धूल डाल देना। क्या तू नहीं जानती कि स्त्री ने बड़े २ सुर, नर, योगी और यतियों को वश कर बन्दर की नाच नचाया है, तो यह बेचारा सुदर्शन सेठ किस खेत की मूली है। नारी की. मृटु मुस्कानि से निर्मित कपोलों की मदन-तलाई में कौन नहीं डूब जाता ? स्त्री के गुलाची गोल-गाल, लोना सलोना मुख, उलझन वाले बाल, लोल लोचन, सन्दन शील ओठ किस पर शासन नहीं कर सकते। नारी के . .
. ४१ सुदर्शटार-चरित्र भ्रूभङ्ग भय से किस के प्राण नहीं कांपने लगते? कैकेयो की रुष्टता के कारण राजा दशरय धरड़ा उठे, राधा ने कृष्ण को मोहित किया, अहिल्या ने इन्द्र को वश में कर लिया, कहां तक गिना स्त्रियां तो इस विषय में स्वभावतः प्रवीण होती हैं, पुरुष को वश में करना स्त्रियों के बांये हाथ का खेल है। हजारों पुरुषों को मोहित कर नारी ने अपना दास यना रखा है। पर तू सेठ सुदर्शन को भी न डिगा सकी तो अवश्य ही गंवारिन और मूर्खा है"। कपिला ने उत्तर दिया कि महाराणी:- तावद्गर्जति फूत्कारैः काद्येया विपोत्कटाः। यायनो दृश्यते शुरो वैनतेयः खगेश्वरः ।। अर्थात्-विप से उत्कट सर्प तभी तक फुकार सकता है जब तक उसके मान को मर्दन करने वाला गरुड़ पक्षी आकर सामने उप- खित नहीं होता। तभी तक आप पढ़ २ या मारती हैं जब तक काम नहीं पड़ता, यदि सेठ सुदर्शन को आप वश में कर लोगी तो में तुम्हें विचक्षणा तथा प्रवीणा जानूंगी; नहीं तो मैं जैसी और तुम तैसी। रानी ने कहा- सुन ! मैं तेरी जीसी नहीं हूं, मगर मैं सेठ के सङ्ग सुख न भोगूं तो अभया मेरा नाम नहीं"। यात २ में यह घात बढ़ गयी, दोनों के जोश आ गया, जिद वाद बढ़ गया और इस वार्तालाप ने दूसरा रूप धारण किया। कपिला ने हाथ मार कर कहा "रानी साहवा! संसार में ऐसी कोई स्त्री नहीं है जो सुदर्शन सेट को वश में कर सके "इन तिलों में तेल नहीं" यह तो . - सुदर्शया-चरित्र ४२ भूड़के लड़ हैं "जो खायगा सो पछतायगा और जो न खायगा सो पछतायगा"। यदि सेठ नपुंसक है तब तो कोई यात ही नहीं और यदि लेठ में पुरुषत्व है तो देवांगना भी आकर इन्हें नहीं डिगा सकी। चाहे सुमेरु पर्वत चलायमान हो जाय, सूर्य पश्चिम में उदय हो, वेत फूलने-फलने लगे, पत्थर की नाव पानी में तैरने लगे किन्तु सेठ सुदर्शन का शील-व्रत भङ्ग होना असंभव हैं। इसलिये, रानीजी! मेरा कहा मानो, सेठ की आशा छोड़ दो "कहीं दूध के धोखे कपास न खा जाना"। मैंने हर पहलू से इनकी परीक्षा कर, माथा-पच्ची कर ली है। इस प्रकार अभया रानी और कपिला ब्राह्मणी में चन्द मिनट के लिये वाक्-युद्ध मच गया। आखिरकार, होनहार प्रबल होता है "जैसी हो भवत. व्यता वैसी उपजै बुद्धि" के अनुसार जय जैले कर्मों का उदय होता है वैसी ही मति पलट जाती है। अतः रानीने सेठ से मिलने की मन में ठान ली। अभया की सेठ मिलन लालसा । वसन्त ऋतु के आनन्दोपभोग के पश्चात् रानी महल में आकर सेठ से मिलने के अनेकानेक उपाय करने लगी करने पर भी कोई कान बनते न देख रानी ने अपनी पण्डिता नामक धाय को बुलाया और उस से कहा कि, "हे माता! . तूने बालकपन से, बड़े लाडू-प्यार के साथ, मुझे पाला-पोसातथा मेरी इच्छानों की पूर्ति में हाथ बटाया है, अतः तुझ से कोई यात छिपा लाख प्रयत सुदर्शया चरित्र कर रमना मैं उचित नहीं समझती। यद्यपि पात बड़ी लया पूर्ण है तथापि तुझ से कहे विना काम नहीं बनता। धाय! मेरा विश्वास है कि कार्य को तुझ से गोपन रखना ही उसकी सफ- लता को उपेक्षा की दृष्टि से देखना है। अस्तु ! तुम इसे ध्यान पूर्वक सुनो और मेरी अमिलापा को पूर्ण करो। मैं राजा के साथ उपवन में वसन्त ऋतु देखने के लिये गयी थी, यहां पर चम्पा नगर के सभी आवाल-मृद्ध-घनिता बड़ी सज-धज के साथ पधारे थे। बड़े २ सेठ-साहकार, सिपाही सामन्त, धीर धीर पुरुषों का जमघट था, किन्तु अपनी स्त्री मनोरमा तथा पुत्रों के सहित आये हुए सेठ सुदर्शन फी समता कोई नहीं कर सका। चन्द्रमा के उदय होने पर नक्षत्रों की जो दशा हो जाती है, ठीक वही दशा सुदर्शन सेठ के अवस्थित काल में अन्य श्रेष्ठ पुरुषों की उनका दिव्य शरीर, बड़े बड़े नेत्र, दीर्घबाहु, विशाल वक्ष- स्थल, सूर्य का सा प्रकाश, चन्द्रमा की सी शीतलता और समुद्र की सी गम्भीरता ने मेरे हृदय को वलात् अपने वश में कर लिया। हे माता! उस सुकुमार, लावण्यमय रूप में न जाने कौन सी शक्तिभरी थी जिलने चर-जोरी मेरे मन को खींच लिया। उस छैल के आगे बड़े २ राव-राजा झख मारते हैं। मेरा मन उससे लग गया है। मैं रात-दिन उनसे मिलने का उपाय सोचा करती जब से मैंने उन्हें देखा मेरी भूख-प्यास हर गयी, किसी काम में जी नहीं लगता, न कुछ अच्छा ही लगता और न कुछ सोहाता ही है। किसी की यात अच्छी नहीं लगती, दिल उचटा थी।
सुदर्शया चरित्र ४४ रहता है। मैं उनपर इस प्रकार मोहित हो गयी हूं कि जब तक उनसे मिलने का सुअवसर प्राप्त नहीं होता तब तक मैं दिन प्रति दिन तन क्षीण होती जा रही है। मैंने कपिला ब्राहाणी से हाथ मार कर कहा है कि मैं सेठ के संग रमण कर उन्हें अवश्य यश में करूगी।। यदि मैं ऐसा न कर सकी तो मेरी यात मिट्टी में मिल जायगी। इसलिए तू मेरी मनोकामना की पूर्ति करने में सहायक हो। मैंने हदय खोल कर कच्ची-पकी सभी बातें तेरे सामने कह दी है, अब तू मुझ सुदर्शन से से शीघ्र मिला। मेरा इतना उपकार कर। सौ बात की एक बात यह है कि यदि तू. सच्ची मेरी हितैपिणी है, मुझे दिल से चाहती है-जी-जान से मानती है तो बिना किसी आना-कानी के शीघ्र सुदर्शन सेठ को मेरे पास लिवाला"। पंडिता धाय की सुशिक्षा। रानी के वचन सुन कर पण्डिता धाय सन्न हो गयी। उसे हार्दिक वेदना हुई और वह सिर ध्रुन कर पश्चात्ताप करने लगी। बहुत कुछ सोच-विचार करने के पश्चात् धाय ने 'सदोपदेश पूर्ण यातों से रानी का चित्ताकर्षक कर, सत्मार्ग की ओर लाने की चेष्टा की। धाय ने कहा कि "रानी क्या तेरी मति मारी गयी है? तू बावली तो नहीं हो गयी? भला ऐसे गर्हित मार्ग में पैर रखना क्या तू जैसी पटरानी, सत्कुलोत्पन्न, रमणी को शोभा देता है? हाय! हाय !!' ऐसी चतुर-सुजान होकर तूने ऐसे निकृष्ट सुदर्शया-चरित्र विचारों को हरम में कई स्थान दिया-यह नीच बात मुंह से कैसे निकाली}" पुत्री! यह दुष्कर्म तुम्हारे उभय पक्ष-सात- ससुर और माता-पिता-की उज्ज्वल कीर्ति पर सदैव के लिये, कलङ्क का धव्या लगा देंगे। तुम्हारे द्वारा ऐसे निन्दनीय कार्य को सुन कर किसे आश्चर्य न होगा-जौन नहीं लजित होगा? बड़े २ राजा-महाराजाओं में इस समय तुम्हारी धाक जमी हुई है वह सब इजत धूल में मिल जायगी। जो सुनेगा यही चूंकेगा और फिर तू किसी भी तरह इस लोकापवाद का मार्जन न फर सकेगी। रानी! देखो तुम्हारे पिता ने सुन्दर वर देख, एक प्रति- ठित घराने के सुयोग्य पुरुष को तुम्हें सौंपा है, अब तुम्हारा कर्त्त- व्य है कि प्रेम के साथ, सद्भाव से, अपने स्वामी की सेवा करो। [अपना पति चाहे बूढा, रोगी, मूर्ख, कुरूप, कपटी, धनहीन, अन्धा, बहिरा, मोधी, और दुष्टया दुर्वल हो, किन्तु सुशीला-पतिव्रता स्त्री के लिये यह इन्द्रादि देवताओं से भी बढ़ कर है, उत्तम स्त्री के मन में ऐसा निश्चय हो जाता है कि उसके लिये जगत में अपने पति के सिवाय, स्वर में भी, और कोई पुरुष ही नहीं है। मध्यम स्त्री दूसरी स्त्री के पति को कैसे देखती है जैसे अपना भाई, पिता या पुत्र हो। जो स्त्री धर्म को. विचार कर और कुल फी रीति को समझ कर रह जाय (अर्थात् चित्त तो पर पुरुष को देख कर चलायमान हो जाय, पर मेरा धर्म बिगड़ जायगा, मेरे फुल में फलक लग जायगा इत्यादि पातों को सोच पर चित्त को रोफाले.). यह ली निरुप और जो स्त्री आपसरत I
सु
।
सुदर्भया-चरित्र
रही है और फिर भी आंखों में धूल डालती है। सच बता,
को लेकर तू कहां जायगी" द्वारपाल की ऐसी बातें
ही, धाय ने पुतले को पृथ्वी पर पटक कर सात खण्ड कर
और मोधित होकर बोली, "देख ! यह मिट्टी का नहीं तो किस
है। अरे मूर्ख द्वारपाल तू ने रानी के अंत में जो बाधा पहुंच
है, इसका मजा चखाऊंगी और रानी से कह कर तुझे प्राण-द
दिलाउंगी"। इतना सुनते ही द्वारपाल, कांपने लगा, उर
छक्के छूट गये और घबड़ा कर, धाय के चरण पकड़ कर बोर
“माता इस बार मेरी रक्षा करो, मुझे जीव-दान दो। तुम्ह
इस उपकार को मैं कमी न भूलूंगा"। धाय ने देखा कि काम तो.
गया, अतः वहां से चल दिया । दूसरा पुतला लेकर दूसरे फाट
पर पहुंची और इसी चालसे उसेभी अपने वश में कर लिया। उ
र्युक्त ढङ्ग से सभी द्वारपालों को अपनी मुट्ठी में कर, धाय 3
"निर्भय हो कर आने जाने लगी, उस से कोई चूं भी न कर सकत
था
सुदर्शया-चरित्र धाय ने पुतने को पृथ्वी पर पटक कर सात स्वराट कर ले और कोधित होकर योली, देश ! यह मिट्टी का नहीं तो दिमका है। [..
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चौथा अध्याय
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अभयाकी काम चेष्टा और सेठकी दृढ़ता।
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श्मशान से सेठ को उठा लाना।
अपण्डिता धाय जय फाटक-प्रवेश के जाल-युद्ध में विजयी हो
गयी, तब सेठ सुदर्शन के लाने का उपाय सोचने लगी।
एक दिन श्मशान में जाकर देखती है कि चारों ओर से धुएं के
वादल अन्धकार पर इस प्रकार से राज्य शासन कर रहे हैं कि
वहां मानो घेचारे दिवाकर की दाल ही नहीं गलने पाती। कहीं
श्वान और गाल मुर्दो की हड्डियों चूस रहे हैं तोकहीं कौवे आंख
और मांस नोच २ कर खा रहे हैं। कहीं घूधू बोलता है, तो
कही मंडगती हुई चीलें और हगिल्ल भयानक रव कर रहे है.।
सुदर्शया-चरित्र ऐसे भयावह स्थान में ध्यान लगाये हुए सुदर्शन सेठ बैठे हैं। पशु- पक्षियों और भूत-प्रेतों के कोलाहल से भी उनका ध्यान नहीं डिगता-चाहे पृथ्वी चलायमान हो जाय, सुमेरु पर्वत चलने लगे, सूर्य और चन्द्रमा अपने नियमों को भङ्ग कर दें, किन्तु अर्हत धर्मका उपासक, दृढ़ धर्मी और दृढ़ात्मा अपने धर्म-ध्यान से विचलित नहीं हो सकता। पण्डिता धायने उपयुक्त समय समझ साहस पूर्वक, सेठ को अपने कन्धे पर बिठा लिया। पाठक- गण! इसमें कोई आश्चर्य की यात नहीं, स्त्री बहुत कुछ कर सकती है, कहा है कि:- असत्यं साहसं माया मात्सर्य चातिलब्धता । निर्गुणत्वमशौचत्वं स्त्रीणां दोपाः स्वभावजाः ॥ अर्थात्-भूट, साहस, छल, ईर्षा, अत्यन्त लोभ, निर्गुणता और अशुद्धता ये दोप स्त्रियों के स्वभाव ही से होते हैं। धाय ऐसे कठिन कार्य के करने में जरा भी न हिचकी और सेठ सुदर्शन को श्मशान से अभया रानी के महल में ले आयो। धाय सेठ को एक कमरे में विठा कर, रानी से जाकर बोली "पुत्री! मैं सेठ को. सकुशल ले आयी है, अब तू जाकर अपने मनकी निकाल-हौसिला पूरा कर ले। अभया-सुदर्शन मिलन। धाय के मुख से सुदर्शन सेठ के महल में आने की बात सुनते ही रानीका शरीर पुलकित हो उठा, आनन्द की सीमा न ..
मौकानेर, (रागपुनाना.) सुदर्भशा-चरित्र रही और इस प्रकार प्रसन्न हुई कि “मनहु भन्ध फिर लोचन पाये"। यह मनमें विचार करने लगी कि, आज मेरा बड़ा सौभा- ग्य है, जो सेठ मेरे महल में आये हैं, यह समय और. यह घड़ी धन्य है, अब उनके पास चल कर मैं भी अपने को धन्यवाद का पात्र बनाऊं अर्थात् जीवन का फल भोगूं। रानी ने स्नान मर्दन फर, सुवासित अतर -फूलेल लगा, चोचा चन्दन का लेप किया और शिख से नष तक वस्त्राभूपण धारण कर, सोलहो श्रृङ्गार किया। रानी की सुन्दरता योंही कुछ कम न थी किन्तु अच्छे २ अलंकारों से अलंकृत होने के कारण शोभा और भी बढ़ गयी। कामदेव के मङ्गल कलश के समान उन्नत उरोज, गम्भीर नाभि, उन्नत नितम्ब, कदली स्तम्ब सी जवाएं और कमल के समान कोमल चरणवाली, देवांगनाओं की भांति, पान चबाती-मुस्क- राती, बढ़े गरूर के साथ, जवानी के जोम में, मत्तगयन्द की गति को लजाती हुई रानीसेठ सुदर्शन के समीप चली। चलते समय उसकी कंचन-फाया की प्रभा से विद्युत्छटा, और नपुर की झङ्कार से यीणा के मधुर-खर का अनुभव होता था। वह मन ही मन सोचती थी कि सेठ देखते ही मुझ पर आसक्त (मुग्ध) हो जायंगे, मेरी नेह भरी नज़रें उनके चित्त को चञ्चल बना देंगी। मैंने तो पहले ही कपिला से कह दिया था कि यदि मैं सेठ के संग सुख न भोगूं तो अभया मेरा नाम नहीं। इस प्रकार मन-मोदक खाती, प्रसन्न होती और मनोरथ-सिद्धि के लिए, कुलदेव, ग्राम- देव तथा देवी-देवताओं से प्रार्थना फरती हुई सेठ के निकट सुदर्शया-चरित्र आयी। प्रथम तो सेठकी सुन्दरता देख उसकी टक-टकी बार गयी, मोह में मुग्ध होकर कुछ देर के लिए चित्र की भांति ज्य की त्यों निर्निमेप खड़ी रही, मानों-"देखि लाग मधु कुटिल किराती, जिमि गंव तक लेउ केहि भांती"-सेठ को प्रेम-पाश फांसने की क्रिया सोचने लगी। तदुपरान्त रानी मधुर स्वर से नमता पूर्वक इस प्रकार बोली:--"प्यारे ! मैं अभया रानी हूं, आप से मेरा मन लग गया है। एतदर्थ मेरोधाय आपको यहाँ ले आयी है। कृपया मुझ काम-भिखारिनी की मनोमिलापा पूर्ण कर, मेरा मानव जीवन सफल कीजिये। आप नेत्र खोलिये और देखिये कि जिस सुख प्राप्ति की इच्छा से आप यह कठिन तप- स्या कर रहे हैं वह सुख आप को यहीं प्राप्त हुआ है,-पूर्व जन्म की बात कौन देख आया है, जो कुछ है सब यहीं हैं। अतएव मेरी प्रार्थना है कि लहलहाती हुई काम-वाटिका में विहार करते हुए जवानी के जोश में भरी हुई निम्बू नारंगियों का आनन्द लूटिये। देखिये:- कोमलता कंजते गुलाबते सुगन्ध ले के, चन्दते प्रकाश कियो उदित उजेरो है। रूप रति आननते चातुरी सुजाननते, नीर ले निवाननते कौतुक निबेरो है। रानी कहत ले मसालो विधि कारीगर, रचना निहारी जन होत चित चेरो है :.; -- सुदर्भया चरित्र कंचन को रंग ले सवाद लै सुधा को, यसुधा को सुस लूटिकै मनायो मुख मेरो है। अतः मुझ जैसी रमणी के संग रमण करने से मुखं न मोड़िये। आये हुएऐसे सुअवसर को हाथ से न जाने दीजिये। प्रेम में विहल होने के कारण उस समय उसकी आंखे अध खिले फूलों की भांति अक्षु-हिम कणों से आच्छादित हो गयीं। उसने कहा, प्राणयल्लम! मेरी आशा पूर्ण फरो, मैं तुम्हें हर प्रकार से सन्तुष्ट कर, किसी वस्तु फी कमी न रखूगी। धन. -दौलत,. मोती-माणिक और हीरा-जवाहिर से तुम्हे माला-माल कर दूंगी-जो चाहोगे वही दूंगी। सुदर्शन की दृढ़ता। रानी के अनुनय-विनय करने और नाना प्रकार से प्रलोभन देने पर भी सेठ का मन धर्म-ध्यान से विचलित न हुआ। थोड़ी देर याद जब सेठ ने ध्यान पूरा किया तो सामने कामोन्मत्त अभया रानी को देखकर उनका शरीर कांपने लगा। उन्हों ने सोचा कि यह एक बड़ी विकट समस्या आ उपस्थित हुई है। इस कलंक को कालिमा लगाने वाली कंकालिनी कामिनी से पीछा छुड़ाना-बड़ा ही कठिन है, किन्तु इस समय कायरता से काम न चलेगा। यदि मेरा मन दृढ़ है तो ऐसे सैकड़ों उपसर्ग आने पर भी याल यांका न होगा। आयी हुई विपत्ति को जान कर शूर- वीर सन्मुख उपस्थित होते हैं और कायर मुंह छिपा कर भाग जावे 'सुदर्शा-चरित्र हैं। भला इस यत्किञ्चित मोहनीय कर्म के चक्कर में पड़,कर- फल्पित उणिक सुख के लिये-मैं अपने सुख मूल जिन धर्म के सिद्धान्तों को. कैसे छोड़ सकता है। फिर भी इस भोग-विलास की मृगतृष्णा से क्या लाभ जिस में कि:- न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविपा कृष्णवत्सेव भूय एवाभिवईते. ॥ . अर्थात्-विषय भोगने से विषय की कभी भी शान्ति नहीं होती; किन्तु अग्नि में घृत डालने से जिस प्रकार अग्नि की अभि- वृद्धि होती है, उसी प्रकार काम की भी वृद्धि होती है । इत्यादि बातें विचार कर उन्होंने अपने मन को दृढ़ कर लिया और अभया रानी को सामने खड़ी हुई देख. शीलवत के गुणों का चिन्तयन करने लगे। ब्रह्मचर्य एक ऐसा बड़ा गुण है कि इसका सेवन करते रहने से दूसरे सब गुण स्वयम् ही आकर मिल जाते हैं ब्रह्मचारी पुरुष के लिये कोई भी काम, कोई भी सिद्धि, कौनसा भी ज्ञान दुष्कर नहीं है। वह चाहे तो कठिन से कठिन कार्य को भी पूरा कर सकता है। शास्त्र में लिखा है:- "देव दाणव गंधवा जक्ख स्खस्स किन्नरा यंभयारी ममं संति, दुष्करंजे करंति ते" अर्थात् ब्रह्मचर्य व्रत धारण करने वाले को देव, दानव, 'यक्ष, राक्षस, गन्धर्व और किन्नरादि सब नमन करते हैं। व्रतों में शील प्रधान व्रत है, इसके सहारे भव्य जीव सद्गति को प्राप्त इस उत्तम सुदर्शया-चरित्र होकर क्रमानुसार मोक्ष प्राप्त करते हैं। जैसे नक्षत्रों में चन्द्रमा, रक्षों में घेदुर्य, फूलों में अरबिन्द, समुद्रों में रसागर, आभूषणों में मुकुट और घरों में घूम ( मखमल) धेष्ट है, वैसे ही सूत्रों में भगवान् ने शील की उपमा दी है। शील से विष अमृत हो सकता है, अथाह समुद्र की थाह मिल सकती है और हर प्रकार की विपत्तियों का शमन हो सकता है। वे जीव धन्य हैं जिन्होंने इसके महत्व को जान कर, इसे अङ्गीकार किया है। शील-व्रत को धारण फर, - अनेक जीव संसार सागर से पार हो, सदा के लिये आवागमन रहित हो. गये हैं। जे लम्पट पुरुष (पैयुन सेवन कर ) शील-व्रत से विचलित हो गये हैं, वे नरक निगोद में जा, असा परिताप सहन कर, नाना प्रकार की व्या- धियों से व्यथित हुए हैं। अतएव इस रानो जैसी अनेकों रम- णियां आ जाय अथवा स्वयम् इन्द्राणी भी सामने आ कर खड़ी हो जाय तो भी मैं अपने शील-व्रत को भङ्ग न करूंगा-मेरे लिये 'जिनेश्वर भगवान् की माशा सर्वथा अनुलनीय है। संयम लेने की प्रतिज्ञा। सुदर्शन सेठ ने सात्विकता पूर्वक, साहस करके तत्क्षणात् यह अभिग्रह धारण किया कि यदि इस बार इस उपसर्ग से बच जाऊं-इस फाजल की कोठरी से घेदाग निकल जाऊं तो अपने पुत्र को गृहस्थो का भार सौंप, मैं संयम लेकर अपना बेड़ा पार कर दूं और सदैय के लिये इन सांसारिकं ममटों से उटकारा पा . सुदर्शया-चरित्र ६२ मायापिनी के माया जाल में पड़ कर निरन्तर दुःख ही दुःख झेलने पड़ेंगे। यदि योवनावस्था प्राप्त सुराङ्गना भी मेरे संन्मुख आकर उपस्थित हो तो मेरे लिये विप तुल्य है, मैं तो निर्वाण सुख का इच्छुक हूं। इत्यादि बातें सोच, मन में दृढ़ता धारण कर, तरङ्ग शून्य समुद्र के समान ध्यानावस्थित हो गये। अभया की अन्तिम चेष्टा । जय अभया रानी ने देखा कि मेरे कुटिल-कुचक के. कठिन आघात से भी इसका पाषाण हृदय दुर्भद्य ही. यना रहा तव तो उसे अत्यन्त अवसाद हुमा-यह लजित सी हो गयी। फिर उस. क्लान्तमना ने थामर्प पूर्ण शब्दों द्वारा. सेठ की. धूल झाड़नी आरम्भ की-"सेठ यदि तुम अपनी भलाई चाहते हो, तो मेरी, वात अङ्गीकार फरो, नहीं तो पीछे से पछताओगे। मैं बड़ी आग्रह से कहती हूं कि "ऊंची दुकान का फीका पकवान" मत बनाओ। लोगों के मुंह से मैंने तुम्हारी बड़ी प्रशंसा सुनी है पर यह तुम्हारी सठता पूर्ण हठता तुम्हारे सुनाम में बट्टा लगाती है। पुरुष का हृदय कोमल होता है पर तुम तो पाषाणसे भी कठोर हो देख सेठ ! मुझ जैसी रूप लावण्य सम्पन्ना नवयुवती के साथ यदि तूने रमण न किया.तो संसार में तेरा जीना . अजागलस्तन की भांति निरर्थक ही है। प्यारे! क्यों इतनी बेरहमी इख्तियार करते और अपनी जान जोखों में डालते हो। ये प्यारे! बोल, . मुंह खोल, मेरी इस वेचैनी पर तरस खा। कहा मान, मान जा, -
जीना प्रजागलस्तन की भांति
सुदर्शया-चरित्र
देख सेट! मुझ जैसी रूप-सायगय सम्पन्ना नपयुवती के साथ पदि
तू ने रमण न किया तो :
निरर्धक ही है।
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सुदर्शया चरित्रः अय भी आकर मेरे गले से लिपट जा, नहीं तो तेरे सिर पर झूठा कलङ्क मढ़ कर तुझे मुंह दिखाने योग्य न राखंगी। इस भांति नाना प्रकार की बातें योलती, शाम, दाम, दण्ड, भेद का उप- योग करती हुई रानी सेठ के सन्मुख विवर-मुख से भयङ्कर वचन निकाल रही है, परन्तु उसके सभी. प्रयन आरण्य रोदन की भांति निष्फल हो रहे हैं, सेठ पत्थर की मूर्ति की तरह निश्चल अभया का पश्चात्ताप । इसी रगड़े-झगड़े में इधर सारी रात बीत गयी उधर रानी की आशा लता पर तुपार की वर्षा हो गयी। जब रानी की दृष्टिः प्राची दिशि की अरुणता पर पड़ी तब निराश हो लम्बी सांसें भरने लगी। दिवाकर के प्रकट होते ही इस कुमोदिनी का चन्द्रानन कुम्हला गया और मनोरथ तारे मन्द पड़ गये। रानी सेठ की आशा छोड़, कमरे के बाहर आ खड़ी हुई, लज्जा के मारे मरी जा रही थी, आंखों से आंसुओं की धारा प्रवाहित हो रही थी। इसी समय उसने अपनी पण्डिता धाय को बुला कर कहा, . "माता!. अब कोई उपाय सोचो, सेठ तो नपुंसक निकला। हाय ! इसके साथ तो मुझे मुंह की खानी पड़ी। मेरा कोई भी कार्य न' सरा, उल्टे लेने के देने पड़े। हाय! लज्जाहीन होने पर भी मन की मन ही में रहीं। माता! इस समय मेरी मति मारी गयो है, मैं किंकर्तव्य विमूढ़ हो रही है। जान पड़ता है कि अब मेरे अशुभ -- सुदर्शया-चरित्र दी। राजा की यह दण्डाज्ञा विजली की भांति सारे शहर में फैले गयी और सम्पूर्ण नगर में मातङ्क छा गया नगर निवासी चिन्तित हो, चिन्ता के चाक में चढ़ चक्कर काटने लगे। वे बड़े . आश्चर्य के साथ परस्पर में विचार करते हैं कि ऐसे गुणश सेठ को राजा ने शूली की आशा कैसे दे दी ? जान पड़ता है कि राजा के निकट कोई सुमंत्रणा देनेवाला पुरुष नहीं रहा है, कहा है कि:- ''दुर मंत्र से नृप । नष्ट अरु यति संग से, सुत लाड से, द्विज ज्ञानके बिन, कुल कुसुत से, शील खल सहवास से । सखिपन अरातिक, कुनय से वृद्धी, विदेश निवास से .. रति, मद्य से लजा, कृषी विनं जांच, द्रव्य प्रमाद से। अर्थात्-दुर्विचार से राजा, बहुत परिग्रह के धारण करने से यति, अधिक लाड़-प्यार से पुत्र, विना विद्याभ्यास के ब्राह्मण, कुपुत्र से कुल, दुष्टों के सहवास से स्वभाव, लेह के न रखने से मित्रता, अनीति से समृद्धि, परदेश में रहने से स्नेह, मद्यपान ले लज्जा, देख-रेख न करने से खेती और छोड़ देने वा प्रमाद से, धन नष्ट हो जाता है। इसलिये राजा को चाहिये कि विना भली-भांति सोचे विचार किसी कार्य को शीघ्रता से न कर डाले। सुदर्शन सेठ बड़े गुणवान और अखण्ड शीलव्रत के धारक हैं.। भगवान् जानें, यदि उनके पूर्व संचित पाप काँका उदय हुआ हो तब तो बात ही दूसरी है, नहीं तो । .
सुदर्शया-चरित्र नगर में यह एक अघटित घटना घटेगी-अंट चढ़े पर कूकर काटने की यह एफ पहली यात होगी। प्रजा की पुकार । 'प्रजा ने मिल कर यह परामर्श किया कि, चलो हम सभी प्रजागण, राजा की शरण में चलें और एक स्वर से सेठ के छुट- कार के लिए प्रार्थना करें। राजा पिता के तुल्य है, राजभक्त प्रजा का कर्तव्य है कि राजा का शुभ चिन्तवन करते हुए यथा- साध्य राज्य में फिसी प्रकार का अन्याय न होने दे। निवासी एकत्रित हो, राजा के निकट जा,हाथ जोड़ कर बड़े करुणा पूर्ण शब्दों में योले, "महाराज ! सेठ सुदर्शन बड़े सज्जन और सत्पुरुष हैं। पर-स्त्री-गमन की यात तो दूर रही, इन्हों ने स्वयम् अपनी गृहणी का ही परिहार कर दिया है। नगर में यह सर्वमान्य और श्रेष्ठ पुरुष हैं। इनकी उदारता, परोपकारिता और गुणग्राहिता अवर्णनीय है। इनका यश देश-देशान्तरों में फैला हुआ है। यह यात सभी जानते हैं कि चाहे सुमेरु पर्वत चलायमान हो जाय, सूर्य शीतलता ग्रहण कर लें और चन्दमासे अग्नि के कण निकल ने लगें; किन्तु सेठ सुदर्शन शील-व्रत से विचलित नहीं हो सकते। जिस प्रकार नक्षत्रों के बीच में चन्द्रमा शोभायमान होता है, उसी प्रकार चम्पानगर में सेठ सुदर्शन । यदि सेठ के पूर्व संचित कमी का उदय हुआ हो तो हमें खबर नहीं, .शानी भगवान ही Panda, विवेकशील और ब्रह्मा- चर्य व्रत
सुदर्शा-चरित्र
न
महाराज ! सेठ सुदर्गन यड़े मनन और सत्पुरुष हैं। पर-श्री गमन
की बात तो दूर रही, इन्होंने स्वयम् अपनी गृहणी का ही परिहार कर
[पृष्ट-६७
दिया:
नगर सुदर्शया:चरिच नगर में यह एक अघटित घटना घटेगी-अंट चढ़े पर कूकर काटने की यह एफ पहली यात होगी। प्रजा की पुकार । प्रजा ने मिल कर यह परामर्श किया कि, चलो हम सभी प्रजागण, राजा की शरण में चलें और एक स्वर से सेठ के छुट- कार के लिए प्रार्थना करें। राजा पिता के तुल्य है, राजभक्त प्रजा का कर्तव्य है कि राजा का शुभ चिन्तवन करते हुए यथा- साध्य राज्य में किसी प्रकार का अन्याय न होने दे। निवासी एकत्रित हो, राजा के निकट जा,हाथ जोड़कर बड़े फरणा पूर्ण शब्दों में बोले, "महाराज ! सेठ सुदर्शन बड़े सज्जन और सत्पुरुष हैं। पर-स्त्री-गमन की बात तो दूर रही, इन्हों ने स्वयम् अपनी गृहणी का ही परिहार कर दिया है। नगर में यह सर्वमान्य और श्रेष्ठ पुरुप हैं। इनकी उदारता, परोपकारिता और गुणमाहिता अवर्णनीय है। इनका यश देश-देशान्तरों में फैला हुआ है। यह यात सभी जानते हैं कि चाहे सुमेरु पर्वत चलायमान हो जाय, सूर्य शीतलता ग्रहण कर लें और चन्द्रमासे अग्नि के कण निकल ने लगें; किन्तु सेठ सुदर्शन शील-व्रत से विचलित नहीं हो सकते। जिस प्रकार नक्षत्रों के बीच में चन्द्रमा शोभायमान होता है, उसी प्रकार चम्पानगर में सेठ सुदर्शन । यदि सेठ के पूर्व संचित कमों का उदय हुआ हो तो हमें स्वयर नहीं, शानी भगवान् ही जानें, किन्तु सेठ निष्कलंक, विवेकशील और ब्रह्म- चर्य व्रत के पालन करने में शिरोमणि है"।
- ६८ सुदर्शया चरित्र इस प्रकार नगर निवासियों ने सेठ का गुणगान करते हुए राजा को विश्वास दिलाया कि, महाराज! हम प्रजा की जमानत पर आप इन्हे रिहा कर दीजिये। राजाओं में श्रेष्ट, है नरपाल! अपनी गरीव प्रजा की पुकार पर ध्यान दीजिये और सेठ सुदर्शन को काल के गाल से मुक्त कीजिये। आप सब प्रकार से समथ और शक्तिमान है, कहा है कि:- गंडस्थलेषु मदवारिषु लोल्यलुब्ध- मत्तममद्भमर पादतलाहतोपि । कोपं न गच्छति नितान्त वलोऽपि नागः स्वल्पे बले न बलवान्परिकोपमेति ॥ अर्थात्-मद के जल से तलवतल गंडस्थल पर सुगन्धि से. आये हुए उन भ्रमरों से पीड़ित भी प्रचण्ड शक्ति का धारक हाथी जरा भी कोप नहीं करता। इससे स्पष्ट मालूम होता है कि बलवान पुरुष निर्यलों पर क्रोध नहीं करते। कृपानाथ ! मरे को क्या मारियेगा। देखिये आप के राज्य में सेठ जैसा नर-रक्ष होना कठिन है। अतः चार २ यही निवेदन है कि आप इन्हे अभय कर प्राण-दान दीजिये। राजा ने किसी की न सुनी। पुजा की यह विनम्र प्रार्थना भीराजा की क्रोधाग्नि में धृत फा कार्य कर गयी-नकटे को दर्पण दिखाने की भांति उल्टा ही .
m - सुदर्शया-चरित्र परिणाम हुआ | उन्मत्त मनुष्य से कहा गया हितकर और प्रिय वाक्य जैसे व्यर्थ जाता है, क्रोध से क्षुब्ध हुए नरनाथ से की हुई प्रार्थनायें भी उसी प्रकार निष्फल हुई। राजा सरोप होकर बोले:- क्षमा नहीं है खल साथ श्रेयसी, महान् लम्पट नर, दण्ड योग्य है। कुकर्म-कारी-नरका उबारना, सुकर्मियों को करता विपन्न है । यह दुष्टक्षमाके योग्य नहीं है, इसे अवश्य दण्ड दियाजायगा। तुम लोग यावले तो नहीं हो गये यह सेठ पक्का चोर है। भला महल में पकड़े हुए चोरके सम्बन्ध में अविश्वास कैसे किया जा सकता है। तुमलोग पानी विलोकर मक्खन निकालने की भांति असम्भव कार्य के करने की चेष्टा करते हो-अन्यायी को निकलङ्क पनाना चाहते हो। जावो, चले जाघो, नहीं तो सभों की खबर ली जायगी। घेचारी प्रजा अपनासा मुंह लेकर पीछे लौट आयी और मनहीमन सोचने लगी कि देखो प्रजाके सणे परामर्श से राजाफे काम बनते हैं किन्तु जैसे दुविनीत और भद. मत्त पुरुष के पास सम्पदायें अधिक फाल वफ नहीं ठहर सकती घेसे ही राजा की मोधाचरण युद्धि पर हम लोगों को युक्त-युक्ति और मंगलकारी प्रार्थनायें भी न टहर सकी। क्रोध मनुष्य फा यड़ा भारी शत्रु है, यह अपने ही शरीर तथा शरीरस्य इन्द्रियों को 8 सुदर्शया-चरित्र भी संतप्त किये बिना नहीं रहता। इस प्रकार से सोचती विसू. रती प्रजा निरुपाय हो अपने घरको लौट आयी। सेठको शूली देनेके लिये ले जाना । राजाके आशानुसार सेठ की मुस्के चढ़ा, हाथों में हथकड़ी पहना दी गयीं। और ये कड़े बन्धन से भलीभांति जकड़ दिये गये। राजदूत सिरके केश पकड़ कर, राजपथ से प्राणदण्ड देनेके लिए ले चले। मार्ग में कुभेष और कुमांति से सेठ को जाते हुए देख कर ऐसा कौन मनुष्य होगा जिसका हृदय विदीर्ण न हो जाता हो। जो देखता, वही सेठ का गुणगान करता और राजा की गयिवेकता, न्याय विहीनता तथा दुर्व्यवहार पर नालत मलामत करता था। दीवानों के व्यंग-वचन-वाण प्रजा के हृदय को छेद रहे थे; किन्तु वह जानती थी कि "खूटे के बल बछड़ा नाचता है" यदि राजा ही ऐसी आशा न देते तो यह लोग "छोटे मुंह बड़ी बात" कैसे बोलते। सेठ के दो दिन निराहार रहने- चाली वेदना हो :प्रजा के लिये असह्य हो रही थी, तिस पर भी राजदूतों की निठुरता “जले पर नमक छिड़कती थी"। मनोरमा का विलाप और प्रण। वन्धन से जकड़े हुए सेठ ज्यों ही अपने गृह के निकट आये, त्यों ही मार मार के भयानक तुमुल रब ने मनोरमा को द्वार पर ला खड़ी कर दिया। सेठ सुदर्शन की ऐसी धुरी दशा देख मनो- रमा शानशून्य हो, कटे हुए कदलि खम्भ की भांति धराशायी हो सुदर्शया-चरित्र ७१ गयी। वह नाना प्रकार से विलाप करती हुई हाथ मलमल कर सिर धुनने लगी। सेठ के हाथों में हथकड़ी पड़ी हुई देख कर दु:खिनी मनोरमा के दोनों नेत्रों से आंशुओं की झड़ी यन्ध गयी । यह पिलखि कर कहने लगी कि हाय! न जाने मेरे प्राणपति, जीवनाधार, त्रिलोकी नाथ को यह दुःखं कैसे हुआ। यद्यपि मनोरमा को यह विश्वास था कि मेरे पति शुद्ध ब्रह्मचारी हैं--- परस्त्री को स्वप्न में भी नहीं देख सकते-इनके सम्बन्ध की यह फैली हुई चर्चा निर्मूल और सत्यता से परे है तथापि दुःख से विहल हो उसने सेठ से पूछा कि स्वामिन् आज यह कैसा विघ्न उपस्थित हुआ है। इस कठिन वेदना के आविर्भाव का वृत्तान्त कृपा कर मुझ से कहिये। सेठ ने कहा है प्रिये ! पूर्व जन्म में मैंने अत्यन्त पाप कर्म किये थे उन्ही का उदय हुआ है। कर्मी को दिना भोगे छुटकारा नहीं मिलता, अतः इनके भोगने में आना- कानी करनी उचित नहीं। देखो इस सम्बन्ध में तुम किसी को दोष न देना तथा किसी से रोप भी न करना, क्योंकि:- रोग शोक परीताप यन्धनव्यसनानि च । प्रात्मापराध वृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ।। अर्थात्-रोग, शोक, पछताया, बन्धन और आपत्ति ये देह धारियों के लिये अपने अपराध रूपी वृक्ष के फल हैं। अतएव तुम शोक न करो, मैं सकुशल आकर यह सम्पूर्ण आख्यायिका तुम को सुनाऊंगा। सेठ के ऐसे मौदार्य, गाम्भीर्य और अर्थ- :- :
। सुदर्शगा-चरित्र भी संतप्त किये विना नहीं रहता। इस प्रकार से सोचती-विस्- रती प्रजा निरुपाय हो अपने घरको लौट आयी। सेठको शूली देनेके लिये ले जाना । राजाके आज्ञानुसार सेठ की मुस्के चढ़ा, हाथों में हथकड़ी पहना दी गयीं। और वे कड़े बन्धन से भलीभांति जकड़ दिये गये। राजदूत सिरके केश पकड़ कर, राजपथ से प्राणदण्ड देनेके लिए ले चले। मार्ग में कुभेष और कुभांति से सेठ को जाते हुए देख कर ऐसा कौन मनुष्य होगा जिसका हृदय विदीर्ण न हो जाता हो। जो देखता, वही सेठ का गुणगान करता और राजा की अधिकता, न्याय विहीनता तथा दुर्व्यवहार पर नालत मलामत करता था। दीवानों के व्यंग-बचन-वाण प्रजा के हृदय को छेद रहे थे, किन्तु वह जानती थी कि "खूटे के बल बछड़ा नाचता है" यदि राजा ही ऐसी आशा न देते तो यह लोग "छोटे मुंह बड़ी बात" कैसे बोलते। सेठ के दो दिन निराहार रहने- वाली वेदना ही :प्रजा के लिये भसह्य हो रही थी, तिस पर भी राजदूतों की निठुरता “जले पर नमक छिड़कती थी। मनोरमा का विलाप और प्रण । वन्धन से जकड़े हुए सेठ ज्यों ही अपने गृह के निकट आये, त्यों ही मार मार के भयानक तुमुल रव ने मनोरमा को द्वार पर ला खड़ी कर दिया। सेठ सुदर्शन की,ऐसी दुरी दशा देख मनो. रमा ज्ञानशून्य हो, कटे हुए कदलि खम्भ की भांति धराशायी हो - सुदर्शया चरित्र ७१ गयी। वह नाना प्रकार से विलाप करती हुई हाथ मलमल कर सिर धुनने लगी। सेठ के हाथों में हथकड़ी पड़ी हुई देख कर दुःखिनी मनोरमा के दोनों नेत्रों से आंशुओं की झड़ी बन्ध गयी। यह बिलखि कर कहने लगी कि हाय! न जाने मेरे प्राणपति, जीवनाधार, त्रिलोकी नाथ को यह दुःख कैसे हुआ। यद्यपि 'मनोरमा को यह विश्वास था कि मेरे पति शुद्ध ब्रह्मचारी हैं- परस्त्री को स्वप्न में भी नहीं देख सकते-इनके सम्बन्ध को यह फैली हुई चर्चा निर्मूल और सत्यता से परे है तथापि दुःख से विह्वल हो उसने सेठ से पूछा कि स्वामिन् आज यह कैसा विन उपस्थित हुआ है। इस कठिन वेदना के आविर्भाव का वृत्तान्त कृपा कर मुझ से कहिये। सेठ ने कहा है प्रिये ! पूर्व जन्म में मैने अत्यन्त पाप कर्म किये थे उन्ही का उदय हुआ है। कमाँ को दिना भोगे छुटकारा नहीं मिलता, अतः इनके भोगने में आना- कानी करनी उचित नहीं। देखो इस सम्बन्ध में तुम किसी को दोष न देना तथा किसी से रोप भी न करना, क्योंकि:- रोग शोक परीताप बन्धनव्यसनानि च । श्रात्मापराध वृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ।। अर्थात्-रोग, शोक, पछतावा, यन्धन और आपत्ति ये देह धारियों के लिये अपने अपराध रूपी वृक्ष के फल हैं। अतएव तुम शोक न करो, में सकुशल आकर यह सम्पूर्ण आख्यायिका तुम को सुनाऊंगा। सेठ के ऐसे औदार्य, गाम्भीर्य और अर्थ- ७८ सुदर्शया-चा इसकी कृपा कोप से बढ़ कर विपयी को हो जाती है, उसकी मति चपला चपला हो हन्नम से खो जाती है धर्म-कर्म को लात मार कर जो जन इसे मुकावें शीर- : . , तुरत कृद उस पर चढ़ता यह नीच-तमीचर-तुल्य रतीश जिस पर चढ़ा काम यह उस पर. राहु दशा भी. चढ़ती नींद, भूख उसकी घट जाती, चिन्ता, पीड़ा बढ़ती है पीत बदन दुर्वल हो कर वह, इस से दैन्यं दिखाता है, या हताश होकर अशरण सा, अपनी मृत्यु मनाता है आपने ऐसे काम पर भी विजय प्राप्त की है। अभया रा के लाख प्रयत्न करने और झूठा कलंक देने पर भी आप निश्चल: हो शील-ग्रत पर डटे रहे। आप धन्य हैं। आप के शील- के प्रताप से ही. आज हम लोग झूठे कलङ्क को मोचनः करने लिये यहां आये हैं। - शूली का सिंहासन । इस प्रकार देवताओं ने सेठ का गुणानुवाद गाते हुए उन सान्त्वना प्रदान की। उन्होंने शूलो का सिंहासन बना, सुदर्शन से को उस पर बिठा कर, ऊंचा उठा दिया। मणि जटित सुवर्ण सिंहासन के चारो पायों में मोतियों की झालर झूल रही थी बड़े २ मोतियों की मालायें बीच में लटक रही थीं, जिन में हीरव
सुदर्शशा-चरित्र
MORA
१-कहां में एदन सेटे और कहां प्राणनागिनी शुरली के मन्निवर
भाकर उपस्थित हुमा है। कमों के प्रयल प्रावेग का प्रत्याभ्यान कदिन है।
२-उन्होंने शूली का सिंहासन यना, सेठ सुदर्शन को उमपर बिठा कर,
ऊंचा उठा दिया।
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, सुदर्शया चरित्र हार की.छटा निरालो थी। सिंहासन का शिखर शिरोमणिं गगनांगन का दीपक यन कर मन को मोहित कर रहा था। ऐसे देव-निर्मित रत्न-जटित सिंहासन पर आसीन होते ही, देवताओं ने सेठ सुदर्शन को कान्तिमय बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से सुसजित किया और शूली देने के अभिप्राय से निकटावस्थित सेवकों को मार भगाया। राजदूतों ने उत्पीड़ित हो, राजा के समीप आ सेठ की समस्त बातें ज्यों की त्यों कह सुनायी। राज सेना का धावा। यह समाचार पा कर राजा का क्रोध और भी यढ़ गया,उन्हों ने विना उसका भेद भाव जाने ही-क्रोध के वशीभूत हो- सेवकों को आज्ञा दी कि शीघ्र चतुरंगिनी सेना तय्यार करो। राजा तत्काल ही गजारोही हो, चतुरंगिनी सेना साथ ले, घड़े २ शूर सामन्तों को आगे कर कूच का डंका बजा कर चले। महा घनघोर शब्द करती हुई सना चल पड़ी और धन्दीजनों ने जयजय- कार के तार यान्ध दिये । सेना के विकट वीरों का सिंहनाद और जयजयकार मिश्रित घोर रव ने चम्पानगर निवासी नर-नारियों के हृदय में एक नवीन कौतूहल मचा दिया । सुकुमारियां झरोखों से झांकने लगी; कायरों का फलेजा कांपने लगा और बालकों के भन्लान यदन कुम्हला गये। उस समय सभी के चित्तचिन्तित हो उठे कि हाय! यह कैसा उपद्रव होने लगा। नगर के बाहर जा, दूर से ही राजा.ने देवताओं की सेना ८० सुदर्शया चरित्र देखी और मन में विचार किया कि यह सेठ का ही कुछ फितूर है, इसी ने माया जाल से यह सब रचना रची है, अतः क्षण-मात्र में सभी को मार कर चकनाचूर कर डालूंगा। यह सोच राजा सेठ की सेना की ओर द्रुतगामी हुए। दोनों दलों के सम्मुख होते ही एक महा संग्राम का सामान जुट गया। एक ओर शील सहायी देवता और दूसरी ओर अभयापति । देवता और राजसेना का संग्राम । राजसेना के शरासनों के प्रत्यञ्चामों की टङ्कार और ढालों ‘की खड़-खड़ाहट की ध्वनि क्रमशः बढ़ने लगी। वाण विद्या के पारगामी राजवीरों ने बाण परसाना आरम्भ कर दिया और योद्धाओं के प्रकाण्ड धनुषों से सनसनाते हुए बिजली के समान शर छूटने लगे। यहे वेग से छोड़े जाने के कारण उन शरों से भयानक शब्द होने लगा। अन्यत्र जाने की इच्छा रखनेवाले पक्षियों के समूह जैसे किसी बहुत बड़े वन से चारों तरफ निकल ‘पड़ते हैं चैसे हो राजसेना के वीरों के शरासनों से निकले हुए सहस्रो शर चारों तरफ से उड़ उड़ कर सुदर्शन सेठ की ओर :आने लगे। राजा अपनी रण-निपुणता दिखलाते हुए भीषण संग्राम करने लगे। देवताओं ने राजा के इस विकट संग्राम को 'देख कर मन में सोचा कि यह व्यर्थ ही लड़ रहा है। अभयाप्रद झूठे कलङ्क की कालिमा मिटाने के लिये ही हमलोग यहां आये हैं, सेठ की सहायता करना ही हम लोगों का कर्तव्य है। राजा A सुदर्भया-चरित्र शील शिरोमणि सुदर्शन सेट के गुणों से अनमित है, भील की भांति यह चन्द्रकान्त मणि का मूल्य नहीं जान सकता। अतपय इसे रण-नेपुण्य का कुछ चमत्कार दिखाना चाहिये। देवताओं ने एक ऐसा मन्त्र पढ़ा-ऐसी विद्या चलायी-कि समस्त राज- सेना मूर्छित हो, धराशायी हो गयी। यह दशा देख कर राजा को यहुत परिताप शुआ और वे तेजहीन से हो गये, किन्तु खड़े रहे। उन्हें खड़ा देख कर एफ देवता ने उनका पीछा किया और घह भगे। देवता ने पुकारा कि, अरे तू भाग कर कहां जायगा, स्वर्ग-नरका कहीं भी तुझे आश्रय नहीं मिल सकता। हां यदि तू सेठ सुदर्शन की शरण में जा तो भले ही रक्षा हो जाय, नहीं तो तुझे मार कर चकनाचूर कर डालूंगा। राजा सेठ की शरण आये। देयता के इस प्रकार की बात सुन, राजा सेठ के सिंहासन के पास आ, नीचे बैठ, लम्बी सांसें भरने लगे। फिर वे विनम्र भाव से कर जोरि इस प्रकार प्रार्थना करने लगे:-"हे शानागार, ब्रह्माचारी, सेठ सुदर्शन आप बड़े ही सौम्य और शान्त पुरुष हैं। इसके पूर्व मैंने कभी भी भापकी किसी प्रकार की निन्दा नहीं सुनी थी। अभया रानी ने यह सब झूठा जाल फैलाया और मैंने भी उसी के फन्दू में पड़, क्रोध के वशीभूत हो, यिना कुछ सोचे विचार आप जैसे महान सत्पुरुष को कठिन दुःख दिया। नगर की सारी प्रजा ने आकर बिलाप किया किन्तु मैंने उसकी । ६ ८२ सुदर्शा: चरित्र आर्तनाद पर भी ध्यान न दिया। आपके इस सुदृढ़ शील-प्रत पर सभी का अटल विश्वास है, पर मैंने उसे न मान कर आप को अत्यन्त क्लेश पहुंचाया। मुझ से यह बड़ा भारी अपराध हुया है, अतः अव मैं नमित मस्तक हो, अपने इस गुरुतर पाप का प्राय- श्चित्त चाहता हूं--मेरा अपराधक्षमा करो। आप पुरुष शिरोमणि, नर-रत्न हो, आपके शान्त मन को देवता भी चञ्चल नहीं बना सकते । अभया बड़ी पापिनी और दुष्टा है जिसने आपको यह झूठा कलङ्क लगाया.। अब आप मेरी लज्जा रखो, मैं आपके इस उपकार को जावजीवन न भूलूंगा! त्राहिमाम् ! रक्षा करो!! रक्षा करो"!!! राजा के ऐसे बचन सुन सेट बोले "राजन् आप हमारे शिर-. धनी, मालिक हैं, किसी प्रकार की चिन्ता न कीजिये। हमारे पास खड़े हुए जान कर देवता आपको घात न करेंगे, आप निश्चिन्त हो जाइये"। सेठ की. ऐसी बात सुन राजा के जान में जान आयी और उन्हें विश्वास हो गया कि सेठ के समीप रहने पर मैं मारा-न-जाऊंगा, यह मेरी रक्षा करेंगे। शरणागत की रक्षा करना सत्पुरुषों का सहज स्वभाव होता है, अतः सेठ ने राजा को अमय-दान देकर, अपने समीप विठा लिया। '- देवता की फटकार । ... ;- राजा को सेठ सुदर्शन के समीप बैठा देख; देवता ने उनपर आमर्ष पूर्ण, कठोर वचन-याणों का प्रहार करना भारम्भ किया।
५५ मराठा पाए। पोशानेर, गजपताना, सुदर्शया-चरित्र "अरे मह! धात्रीवाहन राजा, निर्लज, काली अमावश्या का जना, पापी, अकालही काल के गाल में जाने वाला, क्या तेरी हिये-कपार की फूट गयीं ! तुम्छे सूझता नहीं है ! तूने शील-प्रत धारय, महा गुणखान, ऐश्वर्यवान, सेठ सुदर्शन फो शूली देने को तय्यारी की है और ऐसे सत्पुरुष को फामलोलुप समझ रखा है। तू अभी सेठ के अवगुणों को यता,नहीं तो अपनी खैर न समझा देख राजा:- नपरस्या पराधेन परेपो दण्डमाचरेत् । प्रात्मनावगतं कृला वन्धीयात्पूजयेथ वा ।। अर्थात्-किसीके यहकाने से दूसरेको दण्ड न देना चाहिये। मारने और सम्मान करने के पूर्व अपने आप भली-भांति उसकी जानकारी कर लेनी चाहिये। तू ने अपनी स्त्री की बात मान कर सेठ को व्यभिचारी ठहराया और शूली का हुक्म दिया। न्यायी को अन्यायी और अन्यायी को न्यायी समझा। "उल्टा चोर कोतवाल को डाटै" वाली कहावत चरितार्थ कर अपनी दुष्ट भार्या के अवगुणों पर ध्यान न दे, सेठ को ही मुल्ज़िम बनाया। इसके पश्चात् धाय जैसे सेठ को महल में लायी और रानी ने यातना पहुंचायी, देवताओं ने उनकी सारी करतूत राजा से कह सुनायी। रानी की सारी राम कहानी सुन, राजा का जी फट गया और दुःखित हो विचार करने लगे कि देखो, रानी ने मुझ से कहा था कि मैने बड़ी कठिनाई के साथ सेट से अपन ८४ . सुदर्शया-चरित्र लाज बचायी है पर वह सब झूठ निकला 1 : इससे मुझे मालूम होता है कि रानी के चाल-चलन में कुछ दाल में. काला है राजा का क्लेश निवारण। सेठ ने जब देखा कि : राजा अत्यन्त लजित हो, नमित मुख बैठे हैं और देवता उन्हें खरी-खोटी सुना अपमानित कर रहे हैं, तब देवताओं से बोले कि भाई! इनके प्रति कटु वाक्यों का प्रयोग न करो। रानी मेरी माता और यह राजा मेरे पिता के तुल्य हैं। इन्होंने मेरी भलाई की है। मैं समझता हूं कि रानी ने मेरे साथ कपट कर के फूठा कलंक लगा के एक प्रकार से मेरा उपकार ही किया है। रानी के ऐसे व्यवहार ने ही लोगों को मेरे सम्बन्ध का यथार्थ शान कराया है। अतएव रानी और. राजा को किसी प्रकार का क्वेश न दीजिये। सुदर्शन सेठ की ऐसी वाणी सुन देवता अत्यन्त हर्पित हुए । और मन में विचार करने लगे कि देखो रानी और राजा ने इन्हें अत्यन्त क्लेश पहुंचाया, झूठा कलंकलगाया, नगर में अपने सेवकों द्वारा अपमानितकराया किन्तु यद उन्हें सम्मानित करते हुए श्रमय-दान देते हैं। धन्य है वह पुरुष जो बुराई का बवला भलाई से चुकाता है-- मार्ग में झांटे विछाने पाले के लिए फूल विकाता है। धन्य हैं सुदर्शन सेठ, जिन्हों ने लाख कठिनाइयों का सामना करते हुए भी अपने शील-व्रत को न त्यागा! इन्होंने खयम् दुःख सहा, फिन्तु दूसरे को सन्तापन पहुंचाया। इस प्रकार सुदर्शगा-चरित्र सेठ का गुणगान करते हुए देवताओं ने राजा की मूर्छित सेना को सचेत फार दिया और ब्रह्मचर्य के महत्त्व की प्रशंसा की। सुदर्शन सेठ की महिमा सुन, नगर निवासी आहादित हो उठे और उनके हर्ष का वारापार न रहा। तदनन्तर देव-प्रद रताभरणों से सेठ का अंग-प्रत्यंग प्रच्छन्न होगया। अमृत फेन के समान उनके उज्ज्वल दुफूलों की छटा निराली छिटक रही थी। दोनों भुजाओं में धारण किये हुए बाजूबन्दों से मालूम होता था कि मानो ला लक्ष्मी को बांध रखा है। देवताओं ने बड़ी धूम-धाम के साथ सेठ का महोत्सव किया और अनेकानेक भांति से यश गान के पश्चात् वह जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से चले गये। राजा द्वारा सेठ का महोत्सव । देवताओं के चले जाने के पश्चात्, राजा ने सेठ के महोत्सव करने की मन में ठानी और सेवकों को बुला कर आशा दी कि तुम लोग अति शीघ्र चम्पानगरी को सजाओ, गगन-स्पर्शी प्रासादों में ध्वजा-पताका उड़ाओ, हर्ष की दुन्दु भी बजाओ और सारे नगर में उच्चस्वर से महोत्सव का मूल कारण कह कर प्रजा को प्रसन्न करो। सेठ की सुभाा मनोरमा से इसकी यधाई दो और चतुरंगिनी सेना तय्यार कर, पट हस्ती को सजा कर यहां लावो"। सेवकों ने राजाज्ञा का अविलम्ब पालन कर राजा को जनाया। राजा ने सेठ से विनत्र हो प्रार्थना की "आप का महोत्सव करने के लिए मेरा मन लालायित हो रहा है। मैने सुदर्शया-चरित्र लाज यचायी है पर वह सब झूठ निकला। इससे मुझे मालूम होता है फिरानी के चाल-चलन में कुछ दाल में काला है राजा का क्लेश निवारण । सेठ ने जब देखा कि राजा अत्यन्त लजित हो, नमित मुख बैटे हैं और देवता उन्हें खरी-खोटी सुना अपमानित कर रहे हैं, तर देवताओं से बोले कि भाई! इनके प्रति कटु वाक्यों का प्रयोग न करो। रानी मेरी माता और यह.राजा मेरे पिता के तुल्य हैं। इन्होंने मेरी भलाई की है। मैं समझता हूं कि रानी ने मेरे साथ कपट कर के लूटा कलंक लगा के एक प्रकार से मेरा उपकार ही किया है। रानी के ऐसे व्यवहार ने ही लोगों को मेरे सम्बन्ध का यथार्थ शान: कराया है। अतएव रानी और राजा को किसी प्रकार का क्लेश न दीजिये। सुदर्शन सेठ की ऐसी वाणी सुन देवता अत्यन्त हर्षित हुए । और मन में विचार करने लगे कि देखो रानी और राजा ने इन्हें अत्यन्त क्लेमा पहुंचाया, झूठा कलंकलगाया, नगर में अपने सेवकों द्वारा अपमानितकराया किन्तु यह उन्हें सम्मानित करते हुए अभय-दान देते हैं। धन्य है वह पुरुष जो बुराई का यवला भलाई से चुकाता है-~मार्ग में कांटे विछाने पाले के लिए फूल विछाता है । धन्य है सुदर्शन सेठ, जिन्हों ने लास कठिनाइयों का सामना करते हुए भी अपने शील-प्रत को म त्यागा। इन्होने वयम् दुःल सहा, फिन्तु दूसरे को सन्तापन पहुंचाया। इस प्रकार ।
सुदर्शया-चरित्र सेठ का गुणगान करते हुए देवताशों ने राजा की मूर्छित सेना को सचेत कर दिया और ब्रह्मचर्य के महत्त्व की प्रशंसा की। सुदर्शन सेठ की महिमा सुन, नगर निवासी आहादित हो उठे और उनके हर्ष का चारापार न रहा। तदनन्तर देव-प्रद रखाभरणों से सेठ का अंग-प्रत्यंग प्रच्छन्न होगया। अमृत फेन के समान उनके उज्वल सुफलों की छटा निराली छिटक रही थी। दोनों भुजाओं में धारण किये हुए वाजयन्दों से मालूम होता था कि मानो बञ्चला सक्ष्मी को यांध रस्सा है। देवताओं ने बड़ी धूम-धाम के साथ सेठ का महोत्सव किया और अनेकानेक भांति ले यश मान के पश्चात् वह जिस मार्ग से आये थे उसी मार्ग से चले गये। राजा द्वारा सेठ का महोत्सव । देवताओं के चले जाने के पश्चात्, राजा ने सेट के महोत्सव करने की मन में रानी और सेवकों को बुला कर आशा दी कि तुम लोग अति शीघ्र चम्पानगरी को सजाओ, गगन-स्पर्शी प्रासादों में ध्वजा-पताका उड़ाओ, हर्ष की दुन्दु भी बजाओ और सारे नगर में उच्चस्तर से महोत्सव का मूल कारण कह कर प्रजा को प्रसन्न करो। सेठ की सुभाा मनोरमा से इसकी बधाई दो और चतुरंगिनी सेना तय्यार कर, पट हस्ती को सजा कर यहां लावो"। सेवकों ने राजाज्ञा का अविलम्ब पालन कर राजा को जनाया । राजा ने सेठ से विनम्र हो प्रार्थना की आप का महोत्सव करने के लिए मेरा मन लालायित हो रहा है। मैंने सुदर्शया-चरित्र ८६ आप के गुणों को न पहचान, आप का निरादर किया और बुरा समझकर आपसे अप्रीति की। मेरे द्वारा की गयीं ऐसी बड़ी भूलें अव भी मेरे हृदय को संतप्त कर रही हैं। मैं अपनी करनी पर पश्चात्ताप करता है और आप का यश गाकर अपराध की मार्जना चाहता हूं। इस चम्पानगरी में मेरा राज्याधिकार है, आज से मैं इसका शासन-भार आपको सौंपता हूं। आप नियमानुसार राज- काज संभालिये, मैं आज्ञाकारी बन कर रहूंगा और आप का दिया हुआ अन्न-वस्त्र ग्रहण करूंगा। राज्य में आप जैसा परि- वर्तन चाहोगे वैसा ही होगा और आप की आज्ञा सभी को मान्य होगी। , राजा की ऐसी बात सुन सुदर्शन सेठ ने कहा "राजन् आप हमारे पिता तुल्य हो, यदि आप ऐसा नहीं कहोगे तो कौन कहेगा? किन्तु आपसे मेरी एक प्रार्थना है, कृपया इसे सुन लीजिये, रानी के द्वारा जब मुझे इस विपत्ति का सामना करना पड़ा--मैं इस अभियोग का अभियुक्त बनाया गया -तब मैने हृदय में यह अभिग्रह धारण किया था-मन में प्रतिज्ञा की थी-कि यदि इस यातना से सकुशल मुक्त हो जाऊंगा तो संयम ‘भार ग्रहण मैने संसार की निस्सारता जानली है, अतः आप कृपा कर दें तो मैं कुटुम्ब-परिवार को त्याग कर अपना बेड़ा पार कर दू। अभया रानी और पण्डिता धाय के प्रति मेरे द्वारा यदि कोई अपकार हुआ हो---उन्हें राग-द्वेष हमा हो तो उसके लिये मैं वारम्बार क्षमाप्रार्थी हूँ।" राजा करूंगा। .
सुदर्शशा-चरिन, ने कहा कि "दुष्ट अभया रानी और पापिनी पण्डिता धाय ने आपकी उज्ज्वल कीर्ति पर कलङ्क का धब्या लगाना चाहा, इन्द्रिय निग्रह के दिवाकर को कुशील की मुट्ठी भर धूल से धूसर करना चाहा, अतः इन्हे अवश्य प्राण दण्ड दिया जायगा"। सुदर्शन सेठ ने कहा "महाराज! आप मन में विचार कर देखें कि अभयारानी और पण्डिताधाय के ही कर्त्तव्य ने मुझे आज यश-भाजन बनाया है। यदि वे मुझे इस प्रकार का कष्ट न देती, भूठा कलङ्कन लगाती, तो आप मेरे सम्बन्ध की यथार्थ वातें शायदन जान सकते । देव- ताओं का आगमन यहां न होता और न मेरी इतनी कीर्ति ही ही फैलती। अत एव उन्होंने मेरा अपकार नहीं बल्कि उपकार ही किया है। एतदर्थ आप से नम्र निवेदन है कि आप उन्हें किसी प्रकार का क्लेशनदीजियेगा । सेठ के ऐसे मानसिक विकार रहित विचारों को देख कर राजा फूलेअङ्ग न समाये और कहने लगे कि चुराई का बदला भलाई से चुकाने वाले आप सरीखे सत्पुरुप इस जगत में विरले ही हैं। सेठका अपने घर आना। सुदर्शन सेठ की यह अमिलापा हुई कि घर चल कर कुटुम्ब- परिवार से मिलूं और वियोग- संतप्त हितैपियों को प्रदान करूं। राजा ने सेठ की ऐसी इच्छा देख, हाथी पर मणि जटित कंचन होदा रखवाया और चतुरंगिनी सेना तयार की। पट इस्ती पर सुदर्शन सेठ को बिठाकर आप उनके पीछे बैठ, सुख- शान्ति सुदर्शया चरित्र १२ की दुन्दुभी बज रही है, नौबत मड़ रही है और नगर नर-नारियों का आवागमन हो रहा है। राजा भी स्वयम् . द्वार पर बैठे हैं अतः अब तुम निश्चिन्त हो जावो और यदि तुमने मेरा, अभिग्रह लिया हो तो अपना ध्यान पूरा करो, तुम्हारा नेम पूरा हुआ"। इतनी बात सुनते ही उसने अपना ध्यान पूरा किया और सानन्द सेठ के चरणों में अपने को समर्पण कर उनका गुणगान करने लगी। उस समय उसके आनन्द का वारा-पार न रहा। किसी कृपण की खोयी हुई लक्ष्मी आ जाय, अन्धे को आंख मिल जाय वैसे ही आज मनोरमा का मीन-मन अपने प्राणनाथ, पति- देवता के शरण-सरोवर में आ मिला। मनोरमा के अंग प्रेम से पुलकायमान और नेत्र जल से पूर्ण हो गये। हृदय के अन्तस्तल में सलिला के समान छिपा हुआ प्रगाढ़ प्रेम उमड़ पड़ा और उसने सेठ को हृदय से लगा लिया। फिर सेठ को मौत के मुंह से यचा हुआ जान, नया जन्म.मान, वह मोह मन्दिर के प्राङ्गण में विक्षित सी हो गयी। सेठ अपनी मंगलमयी प्रेम दृष्टि से सौन्द- र्य-सम्पत्ति की अधिकारिणी मनोरमा की ओर देख कर बोले, "हे विनीता, पतिव्रत-प्रवीणा, तु धन्य है और मुझे तेरे इस अटल अनुराग पर बड़ा हर्ष है"। इस मांति सेठ सुदर्शन ने अपनी अर्धाङ्गिनी मनोरमा का दुःख विमोचन कर, पुत्र-वधू तथा समस्त परिवार को हर्पित किया और फिर राजा के पास आये। राजा ने विलम्ब होने का कारण पूछा तो सेठ ने मनोरमा के अभिग्रह की बात सुनायी। उसफे कायोत्सर्ग का वृत्तान्त सुन, राजा
सुदर्भशा-चरित्र,
S
A
प्रय तुम निश्चिन्त हो जायो और यदि तुमने मेरा अभिग्रह लिया हो
सो अपना ध्यान पुरा कगे, नुम्हारा नेम पूरा हुमा । [पृष्ट-१२]
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सुदर्शा-चरित्र हजार, (राजपुताना.) बड़े भानन्दित हुए और मन में सोचने लगे कि देखो सेठ सुदर्शन के घर कैसी सुलक्षणा स्त्री है। धर्म-ध्यान और पति-भक्ति में इतनी पकी हैं कि पति वियोग में उसने माहार-पानी का त्याग कर दिया। नारी नामको सार्थक यनानेवाली ऐसी ललनाओं को धन्य है। धन्य है यह स्त्री जो पातिव्रत धर्म की मर्यादा को सुदृढ़ करती और पति को देवतुल्य मानती है। एक मेरी स्त्री है जिसके कथनानुसार यदि मैं सेठ को शूली देने में सफल मनोरथ हो जाता, तो सेठ की सुशीला सी भी प्राण त्याग देती और मैं दो निरापराधी मनुष्यों का घातक बनता। देवताभों ने सेठ की प्राण रक्षा के साथ २ मुझे भी पातकी होने से बचाया। अस्तु ! स्त्री-पुरुष का यह उपयुक्त संयोग मिला है भौर यही कारण है कि इनकी यश-पताका चारों ओर फहरा रही है"। फिर राजाने सेट को नाना प्रकार के वस्त्राभूपण तथा हीरा-माणक भेंट दे, चरणों गिर फर, क्षमा चाही। सेठ ने नम्रतापूर्वक अपनी दीनता दिखाते हुए राजा से भोजन करने के लिये प्रार्थना की। राजा पुलकित हृदय हो, सेठ के घर विविध भांति के पटरस भोजनों से सन्तुष्ट हो, सभी को दान-सम्मान देकर अपने घर आये और राज-काज देखने लगे। राजा के चले जाने के पश्चात् मनोरमा ने अपना त पूरा हुमा जान, शुद्ध-साधु को आहार-पानी दे, पति को भोजन कराय, पारणा किया। सभी हितैषी तथा परिजन केलोग बड़ी रुचि के साथ भोजन कर तृप्त हुए। तदनन्तर नगर निवासियों को
३४
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सुदर्शया-चरित्र
भोनन-यन द्वारा सन्तुष्ट किया गया। चम्पानगर में घर घर
बधावा बजते और
मङ्गलाचार होते थे। चारों ओर से मानों
ऋद्धि-सिद्ध सम्पत्ति की सरितायें उमड़ रही थीं। उस समय
वहां का मानन्द भवर्णनीय था।
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छठा अध्याध ६ साधु-दर्शन और सदोपदेश । जा सेठने संयम लेने की ठानी। शाल-व्रत के प्रभाव से सभी विनों का विनाश हो गया और सामुग्य-शान्ति की स्थापना हुई। इन्द्रिय-निग्रह के प्रबल प्रतापसे सुदर्शन सेट जय फामदेव की विश्वविद्यालय में, कामिनी परीक्षक : के हाथ से, द्वितीय पार भी परीक्षोत्तीर्ण हुए तय इनके ज्ञान का और भी विकाश हुआ। सेठ सुदर्शन ने सोचा कि संयम द्वारा कर्म-क्षय किये बिना इस जीव का फल्यान नहीं और न यह जन्म- मरण, के बन्धन से. ही मुक्त हो सकता है। संसार में रह कर कभी नरक, कभी तिर्यच, और कभी देवता के रूप में भ्रमण करना पड़ेगा, कभी प्यारे का संयोग, कभी. वियोग, कभी मुल, कभी दुःख, कभी राग और कमी वेषादि कर्मों के चक्कर में तेली सुदर्शया-चरित्र के बैल की भांति जुता रहूंगा। अतएव श्रीजिनेश्वर भगवान् के यताये हुए धर्म में मनुरक्त हो कर्मों के बन्धन को क्रमशः शिथिल कलं, क्योंकि इस कर्मपाश को काट कर मुक होना ही जीव का 'एक मात्र कल्याणकर कर्तव्य है। ऐसा मानव शरीर पाकर जिसने संञ्चे धर्म, 'देव, गुरु को पहिचान कर, उसमें श्रद्धा न की उसने अपना जीवन व्यर्थ ही खोया। भतः भव में गृह त्यागी बन, पंच महाव्रत को पाल, चारह भेदों से तपस्या करते हुए इस रहस्यमय जगत के जालों से निकल कर संयम के उत्तुङ्ग पर्चत 'पर चढ़ चलूं। इस प्रकार शिव-पथ के आनन्द का अनुभव करते हुए, सुदर्शन सेठ के हृदयोद्यान में वैराग्य का पुप्प-प्रस्फुटित हो गया और उन्होंने मन में ठान लिया कि अब जब साधु मुनिराज यहां पधारेंगे, संसार को छोड़ कर संयम ग्रहण करूंगा। उसका धर्म पर ऐसा गुढ़ प्रेम-चैराग्य पर अटल अनुराग-शुक्ल पक्षके चन्द्रमा की भांति बढ़ता ही गया। साधु-दर्शन। कुछ कालोपरान्त चार शान के धनी साधु मुनिराज विचरते हुए, कतिपय साधुनों के संग चम्पानगर में पधारे। बम-रक्षक ने सेठ सुदर्शन को यह सुसम्वाद आफरसुनाया और वे बड़े प्रसन्न हुए। सेठ प्रफुल्ल यदन हो, मन में सोचने लगे कि, भाज मेरा बड़ा सौभाग्य है, अब शीघ्र चल कर साधु-दर्शन का लाभ उठाऊं और नपना मनोरथ सिद्ध कर जीवन को सफल बनाऊं। इस प्रकार सुदर्शशा-चरित्र विचार कर सेट सपतीक, यहे समारोह तथा विधान के साथ, दर्शनार्थ, साधु मुनिराज के निकट आये। साधु-मुनिराज के निकट आफर ननस्कार-यन्दना के पश्चात् श्रोतागों में बैठ फर धर्म कथा श्रवण करने लगे। श्री पुज्य मुनि- राज ने प्रेम के साथ यहे चाय से साधु-श्रावकों को इस प्रकार धर्मापदेश देना आरम्भ किया:- भन्य प्राणियो, धम्मो मंगलमुफ्टिं अहिंसा संयमो तवो । देवावि तं नमसंति, जरस धम्मे सया महो।। अर्थात्-धर्म उत्कृष्ट मंगल का रूप है। इसके अहिंसा, संयम और तप इत्यादि अनेक भेद हैं। देवता भी इसे नमस्कार करते हैं। अतः धर्म की धारणा प्रत्येक प्राणीको करनी चाहिये। देखोजीवकी पांच गति इस प्रकार होती हैं जो पाणी पञ्चे- न्द्रियजीवोंका हनन कर, मद्य-मांस का भक्षण करते हुए आमोद- प्रमोद करता है, यह जीवकी पहली गति नरफ में जाता है। जो प्राणी हिंसक, असत्यवादी, व्यभिचारी, और झूठी वात लिखता तथा झूठा दोपारोपण करता है यह दूसरी तियंच गति में जाता है। जो प्राणी धर्म के कारण हिंसा कर प्रसन्न होता है, दूसरों पर झूठा फलंक लगाता तथा दम्भी, कपटी, और पाखण्डी होता है, यह नरफ निगोद में जाता है। जो प्राणी यिनीत, नम्न, सजन, अहंकार रहित, सत्यवादी और करणा पूर्ण होता है, वह तीसरी गति मनुष्य योनि में जन्म लेता है। मनुष्य जन्म पाकर । दर्शशा-चरित्र स्थान में ध्यान मम साधु को, बस्त्र विहीन बैठा हुआ देख, तुम ने मन में विचार किया कि ऐले शीतकाल में इस बेचारे की रात कैसे कटेगी। इस प्रकार हृदय में दया भाव ला; तुम घर से लौट फर, आग और ईधन के साथ उसी जंगल में आये। साधु के चारों ओर मागजला कर तुमने उन्हे सारी रात तपाया। प्रात:- काल होते ही सप साधु का ध्यान पूरा हुआ तो उन्होंने तुम्हे यहां बैठा हुआ देखाऔर मन में विचार किया कि 'यह ग्वाल-बाल जैन धर्म से बिलकुल अनभिज्ञ है, । अतः साधु ने तुम्हे इस प्रकार उप- देश दिया। "देख भाई साधु के निमित्त कोई भी कार्य करना (जिससे किसी जीव को होश पहुंचे) पाप का कार्य हैं"। तुम्हारी अच्छी बुद्धि और सुन्दर प्रकृति को देख कर मुनि ने यह भी कहा कि "किसी जीव को कभी लंशन देना और नवकार मंत्र को सदैव जपते रहना एक शुभ कार्य है"। उसी समय से तुम्हारा साधु-वचन पर दृढ़ विश्वास तथा नवकार मंत्र पर प्रगाढ़ प्रेम हो गया और तुम सदेव नवकार मंत्र का जाप करते रहे। इस महामंत्र के प्रभाव और अच्छे परिणामों के कारण तुम भायु पूरी कर सेठ ऋषभ दास के घर पैदा हुए, तुम्हारा नाम मुदर्शन रखा गया। यह तुम्हारा चौथा भव है। कुरङ्गणी नामक भीलनी मर फर राजा के द्वार पर छैली हुई मौर फार्मानुसार उसने मनुष्य योनि में जन्म पाया। फिर तपादि कर साधु-संगति के प्रभाव से यह मनोरमा स्त्री हुई। इस प्रकार सुदर्शन सेठ और मनोरमा के पिछले भव की कथा सुना १०१ सुदर्शशा-चरितु मुनिराज ने नवकार. मंत्र की महिमा-वर्णन करना आरम्भ किया। नवकारकी महिमा । नवकार मंत्र की महिमा अपार है, जगत में यह एक सार वस्तु है। इससे कर्म कटते, संकट मिटते और क्रमशः निर्वाण पद की भी प्राति होती है। इससे भूत-प्रेत, चोर-चाण्डाल, दैत्य- दानव, किसीका भय नहीं रहता और सभी प्रकार के विघ्न याधावों का शमन हो कर शान्ति स्थापित होती है। जे सत् पुरुष अपने हृदय कमल पर इस सर्वोत्तम मंत्र को धारणा कर लेते हैं वे सच्च- रित्र, संयमी, सत्यवादी होकर झमानुसार मोक्ष पद की प्राप्ति करते हैं। चौदह पूर्व के ज्ञानों में नवकार मंत्र सार है। एक समय एक बालक कुछ गोरु चरा रहा था कि अचानक नदी की निक- राल बाढ़ आयी, किन्तु चालक ने गवकार मंत्र का ध्यान फिया, जिसके प्रभाव से नदी ने वालक को मार्गदे दिया यानी जल फट कर बीच में रास्ता हो गया। नवकार मंत्र के ही प्रभाव से सेठ की सुकोमला 'श्री मती' नामक पुत्री ने सर्प से अपनी रक्षा की। एक समय राजाने एक तस्कर को शूली का दण्ड दिया, सेट ने उसे नवकार मंत्र सिखाया और उसके जपके : पान से र में जा कर पैदा हुआ। नवकार मंत्र समुद्र में डूबती हुई सेठ को नौका को लंग" इस महामंत्र के महत्त्व का
सुदर्शशा-चरित्र
मम्मा
नमो अरिहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं,
नमो उवझायाणं, नमो लोए सव्यसाहणं ।
[101 ]
सुदर्शया-चरित्र रचनों को न सम्भाल सकने के कारण मूर्छित हो धराशायी हो गयी। फुटम्ब-परिवार, चाले भी यह समाचार पाकर शोक- सागर में निमग्न हो गये; चंश-लिके थाधारस्तम्भ सेठ के उस वियोग चाक्य ने उन्हे शुष्क बना दिया और सब के सय व्याफुल हो सोचने लगे कि "हाय ! सुख में यह दुःख कहां से आया, इस मनोरथ के फलते हुए वृक्ष पर यत्राघात कैसे हुआ? कुछ देर पाद मनोरमा को कुछ छान हुआ और उसने सोचा कि भव में चकोरी, उस चन्द्रानन के देखे बिना फेसे जीऊंगी! इतने ही में फिर मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी। उस समय दुर्निवार और दुर्गम मोह के प्रलयकारी वेगने मनोरमा के अविचल चित्तको भी चंचल बना दिया। सुदर्शन सेठ उसे विक्षिप्त देख, मोह जाल में पड़ी हुई जान, इस प्रकार उपदेश देने लगेः- यस "देखो इस जीवन धन का काल-चोर सदैव सिर पर बड़ा है, न जाने कब लूट ले जाय । परभव जाते हुए जीव के मार्ग में फंटक होना सच्चे फुटवियों और हितैषियों का कार्य नहीं है। सांसारिक कार्यों में लिप्त रह कर वास्तविक आनन्द का अमि- लापी बालू को पेर कर तेल निकालना चाहता है। तेरा मेरा और मेरा तेरा यह सब कर्मों का ही मायाजाल है। इन्हीं के प्रपंच में पड़ फर यह पंचेन्द्रियां भी राव को रंक बना देती है। जैसा कि कहा है:- सुदर्शया-चरित्र, १०२ यारापार नहीं, इसके अवर्णनीय गुणों के वर्णन करनेमें सभी असमर्थ हैं। अतः साधु-मुनिराज के कंठ से निकले हुए नवकार गुण के खरों ने सुदर्शन की प्राण-तंत्री वजा दिया, वे अतिहर्पित हो चरणों में शीस मुका, करबद्ध हो बोले "हे स्वामी नाथ ! जान-बूझ कर अब मैं सांसारिक अनुत्ताप की भीपण ज्वालाओं में दग्ध होना नहीं चाहता। मैं अपने पुत्र को गृहस्थी का भार सौंप कर संयम ग्रहण करने का इच्छुक हूं। मुनिराज ने सेठ के ऐसे भाव पूर्ण शब्दों को सुन कर और उनकी मनोमिलाप को जान कर कहा कि 'ऐसे शुभ कार्यों में विलम्य न करना चाहिए, फ्योंकि जो आयु बीती जा रही है फिर हाथ न आवेगी, शुभस्य शीघ्रम् । सेठ ने मनोरमा से आज्ञा मांगी। सुदर्शन सेठ प्रसन्न चित्त हो, बड़े भाव से बन्दना कर, अपने घर आये। उन्होंने फुटम्ब-परिवार, खजन-हितैपियोंको भोजन कराया और दान सम्मानसे सबको संतुष्ट किया। तदुपरान्त अपने सुयोग्य पुत्र को बस्त्राभूषणों से भूपित कर नियमानुसार पाट पर बिठाया और परिवारवालों के सन्मुख उसे गृह का सम्पूर्ण भार सौंप दिया। फिर अपनो अर्धाङ्गिनी मनोरमा से सेठ ने चारित्र ग्रहण करने की आज्ञा मांगी। यह सुनते ही वह अवाक् हो गयी और उसके नेत्रों सेवारि-वर्षा होने लगी। स्वामी के ऐसे विरहयुक mरोगाला झार, I सुदर्शशा-चरित्र यही धूम-धाम के साथ दीक्षा-महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए भाये। सेठ के प्रयाण ममय बन्योजनों ने साखोच्चार और विरदावली का प्रारम्भ किया। संगमें हजारों सेवक नेजा, निशान मोर ध्वजा, पताफा के साथ चले। हाथी, घोड़ा, रथ, पालकी की छटा निराली धी। आगे राजा फी चतुरहिनी सेना और उसके पीछे गुलाब नीर छोड़फयाते, चांदी-सोने के फूल यरसाते राजा जा रहे थे, उसके पीछे २ सुदर्शन सेठ की पालकी जाती थी। सिपाही-सामंत और पैदल सैन्या का तांता यन्धा था। फुटम्ब-परिवार और स्नेही मित्रों के अतिरिक्त नगर के सहस्त्रों नर-नारी उत्सव में सम्मिलित थे। चारों ओर से जय- जयकार की ध्वनि हो रही थी। उस समय सभी की यह लालसा थी कि सुदर्शन सेठ को देख कर नेत्रों का मानन्द लूटें और जन्म को सफल बनायें । दर्शकों की भीड़ इतनी अधिक थी कि जिधर दृष्टि डालिये उधर नर मुंड ही नर मुंड दृष्टिं गोचर होते थे। नगर नारियां अपने २ अटा से छवि निरख रही थी इस प्रकार यसो धूम-धाम के साथ सैठ साधु अवस्थित-वाटिका में पहुंचे। उस समय उनके मुख से ही चर्या के आन्तरिक भाव प्रकट हो रहे थे। सेठ का दीक्षित होना साधु समाव वाले सुदर्शन सेठ कुछ " ।
PATI
irrA
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दीक्षा-महोत्सव।
जागरट भरोशान नाम: जोमानेर, राजा सुदर्शया-चरित्र बड़ी धूम-धाम के साथ दीक्षा-महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए आये। सेठ के प्रयाण समय चन्दीजनों ने साखोचार और विरदावली का प्रारम्भ किया। संग में हजारों सेवक नेजा, निशान और ध्वजा, पताका के साथ चले। हाथी, घोड़ा, रथ, पालकी की छटा निराली धी। आगे राजा की चतुरङ्गिनी सेना और उसके पीछे गुलाब नीर छोड़कवाते, चांदी-सोने के फूल घरसाते राजा जा रहे थे, उसके पीछे २ सुदर्शन सेठ की पालकी लासी थी। सिपाही-सामंत और पैदल सैन्या का तांता बन्धा था। कुटम्ब-परिवार और स्नेही मित्रों के अतिरिक्त नगर के सहस्रों नर-नारी उत्सय में सम्मिलित थे। चारों ओर से जय- जयकार की ध्वनि हो रही थी। उस समय सभी की यह लालसा थी कि सुदर्शन सेठ को देख फर नेत्रों का आनन्द लूटें और जन्म को सफल बनावें । दर्शकों की भीड़ इतनी अधिक थी कि जिधर सृष्टि डालिये उधर नर मुंड ही नर मुंह दृष्टिं गोचर होते थे। नगर नारियां अपने २ अटा से छवि निरख रही थीं इस प्रकार बड़ी धूम-धाम के साथ सेठ साधु अपस्थित-वाटिका में पहुंचे। उस समय उनके मुख से ही चर्या के मान्तरिक भाव प्रकट हो रहे थे। सेठ का दीक्षित होना । साधु स्वभाव वाले सुदर्शन सेठ फुछ दूरही से,पालकी छोड़, -
सुशाचा
ALLES
दीक्षा-महोत्सव।
भाग राजा की चतुरङ्गिनी सेना और उसके पोछे गुलाव नीर छिड़कवाते, चांदी-सोने के फल वरसाते
राजा जा रहे थे, उसके पीछे २ सुदर्शन मेठ की पालकी जाती थी। [पृष्ठ-१०७]
गरप: भरोसान चौतार, सुदर्शया चरित्र बड़ी धूम-धाम के साथ दीक्षा-महोत्सय में सम्मिलित होने के लिए आये। सेठ के प्रयाण ममय यन्दीजनों ने सायोचार और विरदावली का प्रारम्भ किया। संग में हजारों सेवक नेजा, निशान और ध्वजा, पताफा के साथ चले। हाथी, घोड़ा, रथ, पालको की छटा निराली धी। आगे राजा को चतुरङ्गिनी सेना और उसके पीछे गुलाव नीर छोड़फयाते, चांदी-सोने के फूल परसाते राजा जा रहे थे, उसके पीछे २ सुदर्शन सेठ की पालकी जाती थी। सिपाही-सामंत और पैदल सैन्या का तांता यन्धा था। कुटम्ब-परिवार और स्नेही-मित्रों के अतिरिक्त नगर के सहस्रों नर-नारी उत्सव में सम्मिलित थे। चारों ओर से जय- जयकार की ध्वनि हो रही थी। उस समय सभी की यह लालसा थी कि सुदर्शन सेट को देख कर नेत्रों का आनन्द लूटे और जन्म को सफल बनावें । दर्शकों की भीड़ इतनी अधिक थी कि जिधर दूष्टि डालिये उधर नर मुंड ही नर मुंड दृष्टिगोचर नगर नारियां अपने २ अटा से छवि निरख रही थीं इस प्रकार बड़ी धूम-धाम के साथ सेठ साधु अवस्थित-वाटिका में पहुंचे। उस समय उनके मुख से ही चर्या के आन्तरिक भाव प्रकट हो रहे थे। सेठ का दीलित होना। साधु सभाव वाले सुदर्शन सेठ कुछ दूरही से,पालकी छोड़, । होते थे।
सुदर्शया-चरिट साधु को देख कर वह पण्डिता धाय ताड़ गयी फि हो न हो यह वही सुदर्शन सेठ है। अतः उसने शीघ्र जाकर घेश्या से साधु आगमन और कपिला ब्राह्मणी तथा अभया रानी की सारी बातें सुनायी और सुदर्शन के इन्द्रियनिग्रह की प्रशंसा की। यह सुन दवदन्ती ने मुंह मटका कर कहा कि वे वैसी ही होंगी। भला संसार में ऐसा कौन पुरुष है जिसे मैं वश न कर सकू। देख मैं अभी अपना जाल बिछाती और साधु सुदर्शन को फांस कर अपना दाल बनाती हूं। इतना कह कर उसने एक सुशील श्राविका का भेष धारण किया। उसकी कपट-चातुरी के कारण उसे देख कर यह कोई न कह सकता था कि यह एक प्रतिष्ठित घराने की श्राविका नहीं है। मायाविनी वेश्या श्राविका के रूप में धीरे २ इरिया (जीव-जन्तु को देख कर पैर रपती हुई ) सहित साधु सुदर्शन के समीप आयी। हाथ जोड़, वन्दना कर कपट-जयणा * के साथ गुण गान के पश्चात् इस प्रकार बोली:--"भगवन् ! मैं बड़ी देर से आप की भावना भा रही हूं। आपने दर्शन दे मुझे कृतार्थ किया, अब कृपया मेरे मन्दिर में पधार कर भिक्षा लीजिये और गृह को पवित्र कीजिये" । सरल हृदय साधु सुदर्शन उसके कपट फोन जान सके और आहार-पानी लेने के निमित्त उसके भवन के भीतर चले गये। मोट:-उधारे मुंह न बोलने को जयया कहते हैं।
सुदर्शया चरित्र
"भगवन ! में गढ़ी दर से भागको भावना भा रही है। मापने दगंन
६ मुझे पता किया, 'मय कृपया मेरे मन्दिर में पधार पर मिला सीनिंग
मोर गृह को पनिय कीजिये" !
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सुदर्भशा-चरित वेश्या द्वारा उपसर्ग। मुनि को घर में भाये हुए देख कर उसके आगन्द का पारा- पार न रहा। यह प्रसश चित्त हो, प्रार्थना करने लगी कि हे स्वामिनाथ! मैने भोजन मंगाया है, नाप शान्ति से चैट कर, विथाम के पश्चात्, मानन्द से भोजन पीजियेगा। थोड़ी ही देर में सुस्वाद, पटरस भोजन, नाना प्रकार के मेवा-मिष्टाश और पक- धान पूर्ण थाल साधु के सामने लाया गया। नवीन पदार्थों और न्ये ढङ्ग को देख कर साधु सहिम गये कि यह तो श्राविफा नहीं कोई फुपान सी है और काग होकर हंस फी चाल. चलती है। यहां पा रङ्ग-दङ्ग देख साधु सुदर्शन पीछे पैर लौटे तो चारो भोर से किंचांड़ चन्द पाये । अतः बेधारे पुनः जाफर आंगन में खड़े हो गये। इतने में वेश्या सोलह श्टङ्गार कर सामने आकर खड़ी हुई। उसकी कटि अत्यन्त क्षीण और सारे अव-यवों में चपला फी सम्पूर्ण शक्ति विद्यमान थी। वह पढ़े हाव-भाव के साथ योलो कि, “प्यारे मैंने तुम्हारे लिये धाविका का रूप बनाया था, मैं दवदन्ती पैश्या है। भायो निस्सकोच होकर मेरे साथ रमण फर अपने मनुष्य जन्म को सफल रो। संसार में भाकर जिसने भोग-विलास का सुख नहीं भोगा, कठोर स्तन, मृदु स्वभाव और गौर वर्ण घाली बीके अवरात का पाय नहीं किया, उसका जीवन वृथाही गया। देखो यह 'मनुप्प जन्म बार नहीं मिलता, गतः रस्ते घर२ भीष मांगो में
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सुदर-बाहिर
गंवायो। प्यारे.! आप हमारे यहां रहो और आनन्द पूर्वफ सब
प्रकार के सुख भोगो पट ऋतु के आनन्द का उपभोग करो।
भला इस साधु भेष में क्या सुख है ? न रपया-पैसा पास रहता,
म समय पर "उत्तम भोजन मिलता।' सवारी की दाल तो दूर
रही, पैर में जूता तक मयस्सर नहीं होता। भिक्षा के लिए प्रति
दिन झार २ भटकना पड़ता है। तेल-उवटन तो क्या नहाने-
धोने का भी ठिकाना नहीं और तिस पर भी सिर का लोच करना
पड़ता है। शायद तुम समझते होगे कि इस प्रकार शरीर को
फाछ देने से अगले जन्म में मुखे सुख मिलेगा, परन्तु यह तुम्हारा
भ्रम है। आगे जन्म की बात कोन देस माया है, जो कुछ है सब
यही है। इस लिए जब तक जीते हो आनन्द के साथ मौज
उड़ावो और चैन की चंशी यजायो, धागे फी मागे देखी आयगी।
जो सारे मामोद-प्रमोद से हाथ धोकर बारिश-नय के पीछे
पदा है, भला उस पर इस निस्सार शिक्षा का क्या प्रभाव पड
सकता था। साधु सुदर्शन ने मन में सोचा कि:-"को नामा.
मृतमालाध-विषमापातु मिच्छति" ऐसा कौन है, जो अमृत का
आस्वादन करके फिर विय के पीने की इच्छा करता हो।
उन्होंने घेश्या की बात पर कुछ भी ध्यान न दिया।
वेश्या की दाल न गली।
लिरोह तपस्वी से भी यथेच्छ मत्सर करने वाली येश्या
साधु सुदर्शन मा चित्त चलाय गान न होते देन्त्र, हाथ पकड़,
अतः
- मुहर्नस चरित्र पल पूर्वक पर्या पर पींच ले गयो। काम के मद से मदमाती गणिका पहले तो अपने दहिने फर पर कपोल ख, तिरजी द्वधि फरके कनखियों से देखने लगी, फिर कमी पाणि-पल्लव नचाती, कभी सीने पर हाथ रख सीत्कार करती और फभी आंखों का गद्धाशमीच स्वलित यचन घोलती थी। फिन्तु आनन्द भय' संग के सरोवर में सराबोर होने वाले साधु सुदर्शन अपने रापन्य जीवन काल में ही (शील-प्रत के विश्वविद्यालय में परोक्षोसीन होने के पूर्व हो ) अध्ययन कर चुके थे कि:- अम के यश में फंसि कुकर ज्यों, रस के हित अस्थि पवावत है। निन श्रोणित पाखा मोद मरो, पर ने विवेक न लारत है । गर हू यनिता तन रोजन ते, तनिको न कभू सुल पावत है । निग पेह परिश्रम के मिसते, मुख नी सठ गायना भावत है। सतएव इस विछा-मूत्र मौर दुर्गन्ध को गुफा, धर्म-ध्यान में पाधा पहुंचानेवाली, लोगों की पिसन्मगा कर, परक निनोद में ले जाने पाली फामिनी से सदैव सावधान रहना चाहिये । यह दुर्लभ मालव जन्म पाझर आनन्द मय मुक्ति के मार्ग का शवल- भदन करना ही एकमात्र फर्सच है। इत्यादि बातें सोचते ध्यान गहो पर्वत के समान निश्चल बने रहे। मोम का गोला आंच लगते ही गल जाता है; किन्तु गामी के गोले को जितना ही तपाया. ভাৰ ও ছী বই বা নীল ছানা না । ভী दशा साधु मुसंग यी हुई, जो उन्हें फष्ट मिलने गये त्यों - -
आठवा का
कर्म क्षय और केवलज्ञान ।
भूतनी का कोप ।
अभया रानी जो मरणान्त में व्यन्तरी (भूतनी) गति को
Tagात हुई थी। उसने विचारा कि यह पड़ा ही उपयुक्त
समय है, उस जन्म में न सही तो इसी जन्म में चल फर
सुदर्शन को डिगा और अपने बचन-मर्याद की रक्षा करूं।
यह सोच राक्षसी एक रमणीय युपती का रूप धारण कर, साधु
के समीप गाकर छेड़-छाड़ करने लगी। उसने कहा “हे साधु
मुनिराज! भापही के कारपए मैं आत्मघात कर इस दशा को प्राप्त
इईई, तो भला सब तो एक बार गले से लग कर मेरे हृदय की
...चमानो। पेलो. फटा मानो और मेरी हात मान लो.नहीं
. 'तुदर्शयाबाट "मग तुम्हारी खैर नहीं। यहां तो तुम्हारी रक्षा देवताओंने की, थी, पर यहां तुम्हारा सहायक कोई नहीं है, हर प्रकार से तुम मेरे वश में हो" इतना कह कर वह राक्षसी साधु के शरीर से लिपट गयी और विविध सांति से उन्हें लक्ष्य-ब्रट करने की चेष्टायें की, पर मचलचित साधु न डिगे तो न डिगे। भूतनी ने सीधी मङ्गली घी न निकलते देख एक डाकिनी का विकराल रूप धारण किया और नाना प्रकार से साधु सुदर्शन को भयभीत :फरने लगी; किन्तु.सोना धूल में भी चमझता है, . हजार विपत्तियों के दांत दिखाने पर भी निश्चल ही यने रहे। फिर यह अत्यन्त शोधित हो, एक पक्षी का रूप धारण कर, पंख और चोंच में पानी ला ला कर उनके ऊपर छोड़ने लगी। उसने सभी प्रकार के अनुकूल और प्रतिकूल उपसगों द्वारा साधु सुदर्शन को पीड़ित किया, परन्तु "मरज यढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की"। जितना ही यह भ्रष्ट करने की इच्छा से फष्ट पहुंचाती थी उतना ही अधिक ये धर्म-ध्यान में ढूढ़ होते जाते थे। घे जानते थे कि विपत्ति की पराकाष्टाही सुखोदय का पूर्व रूप है, अतः सुदर्शन मुनि ने भूतनी के उपसर्ग को भी उपकार ही माना और भव-भ्रान्ति फो भस्म फरने की इच्छा से समता भाव धारण कर उन्होंने अपने कर्मों का भय फर सला। मगर भरोडान देवता फिर आये। दोकानेर, राजा - साधु सुदर्शन पर.विशेष कष्ट पड़ने के कारण देवतानों का सुदशेगा-चरित्र वह अत्यन्त क्रोधित हो, एक पत्नी का रूप धारण कर, पंख मौर चोंच में पानी ला ला कर उनफे कर छोड़ने लगी। [पृष्ट-१९०) "तुदशा-चारे “मम तुम्हारी खैर नहीं। "यहां तो तुम्हारी रक्षा देवताओंने की, थी, पर यहां तुम्हारा सहायक कोई नहीं है, हर प्रकार से तुम मेरे यश में.हो" इतना कह कर वह राक्षसी साधु के शरीर से लिपट गयी और विविध सांति से उन्हें लक्ष्य ऋष्ट करने की चेष्टायें की, पर भचचलचित्त साधु न डिगे तो न डिगे। भूतनी ने सीधी माली घी न निकलते.देख एक डाकिनी का विकराल रूप धारण किया और नाना प्रकार से साधु सुदर्शन को भयभीत करने लगी; किन्तु सोना धूल में भी चमकता है, वे हजार विपत्तियों के दांत दिखाने पर भी निश्चल ही बने रहे। फिर यह अत्यन्त फोधित हो, एक पक्षी का रूप धारण कर, पंख' और चोंच में पानी ला ला.फर उनके ऊपर छांड़ने लगी। उसने सभी प्रकार के अनुकूल और प्रतिकूल उपसर्गों द्वारा साधु सुदर्शन को पीड़ित किया, परन्तु “मरज यढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की"। जितना ही यह भ्रष्ट करने की इच्छा से फट पहुंचाती थी उतना ही अधिक घे धर्म-ध्यान में दृढ़ होते जाते थे। ये जानते थे कि विपत्ति की पराफाटाही सुखोदय का पूर्व रूप है, मतः सुदर्शन मुनि ने भूतनी के उपसर्ग को भी उपकार ही माना और भव-भ्रान्ति फो भस्म फरने की इच्छा से सनता भाव धारण कर उन्होंने अपने फमा मगर भरोशान का क्षय कर डाला। मैन, rarer. देवता फिर आये। बीकानेर, (or: 'साधु मुदर्शन पर विशेष कष्ट पड़ने के कारण देवतामों फा