Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Dharmshastriya Vyavstha Sangrah

Sharma,subhadra · 2012/08

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Front matter

धर्मशास्त्रीयव्यवस्थासंग्रहः
सम्पादकः
श्रीसुभद्र शर्मा
राजकीयप्तरस्वतीभवनपस्तकालयाध्यक्षः

प्राप्तिस्थानम् -
उत्तरप्रदेशशासकीयमुद्रणालयाध्यक्षः
হাম্বার
मूल्यम्

समर्पणपद्यानि राजनीतिनिपुणोऽपि प्रत्याख्यातप्रियानृतव्याजः ॥ प्रेमोल्लसितसमाजः समाजनीयः समासद्भिः ॥१॥ आधुनिकोऽपि निबद्धनद्धः प्राचीनपद्धतौ सुकृती ॥ एतसंस्कृतसाहित्योद्धरणधुरश्चिद्विलासरसमधुरः ॥२॥ श्रीसम्पूर्णानन्दोऽप्यानन्दतु मत्समर्पितं विन्दन् । धर्मोत्तमव्यवस्थासंग्रहमुद्भासितं सधः ॥३॥ भयदादेशमहिम्ना ग्रन्योऽयं वै प्रकाशितः श्लाघ्यः ॥ स्फुरतु मवत्करतलयोः सहस्रपत्रश्रिया निहितः ॥ ४ ॥ राज्यधुरामिर्मवतः सुबन्धुरामिन शान्तिमनुभवतः ।। वस्त्वन्तरे लघुन्यपि प्रवृत्तिरच्चैरदाहार्या ॥५॥ ." इति श्रीसुभद्रस्य सावक्तव्य. सन् १९५४ ई. काशिक राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के उपाधिवितरणोत्सव के अवसर पर सरस्वती-भवन के कुछ चुने हुए हस्त- लिखित मन्यों को प्रदर्शनी हुई यो। उसमें इस राज्य के मुख्य मन्त्री डाक्टर श्री सम्पूर्णानन्दजो तथा भूतपूर्व शिक्षामन्त्री ठाकुर श्री हरगोविन्द सिह जी ने धर्मशास्त्रीय मास्था-सग्रह को सीन - पुस्तके देखकर इन्हें प्रकाशित कराने को इच्छा व्यक्त को। तदनन्तर शीघ्र ही प्रशासकीय श्रादेश हुया कि इस ग्रन्थ के अविलम्ब प्रकाशन की व्यवस्था की जाय । अतः इसे जनता के समक्ष उपस्थित किया जा रहा है। यह बात सर्वविदित है कि भारतवर्ष मे अग्नेजो राज्य को स्थापना के पार भिक दिनों में न्यायालयों को यह व्यवस्था यी कि यहां धर्मशास्त्र के ज्ञाता परिडत तथा शरियत के जानकार मौलवी इस कार्य के लिये नियुक्त थे वे व्यवहार-निर्णयाधिकारियों की सहायता सबद्ध धर्मशास्त्र की दृष्टि से किया करें । सन् १८२४ ई० के प्रारम्भ से लेकर सन् १८३६ साल तक की फलस्ते की सदर दीवानी अदालत द्वारा उससे सबद प्रधानतया पण्डित वैद्यनाथ मिश्र से धर्मशास्त्र विषय में जितनी जिज्ञासाये की गयी थी तथा उन्होंने जो परामर्श दिये थे वे ग्रन्थ रूप में प्रकाशित किये मा रहे हैं । इस प्रसग मे यह भी शातव्य है कि प्रारम्भिक वर्षों में पण्डित गमतनुशर्मविद्यावागीश मी पण्डित वैद्यनाथ मिश्र के साथ परामर्श दिया करते थे, तथा मिश्रजी की अस्वस्थता की अवधि में उनके इस कार्य का सम्पादन पण्डित हीरानन्द मिश्र ने किया था। पण्डितजी के पास अदालत से जो प्रश्न श्राते थे, प्रमाण सहित उनका नो उत्तर वे देते थे, उनकी प्रतिलिपि पण्डितजी अपने पास रख लेते थे। इन्दो प्रतिलिपियों के आधार पर यह ग्रन्थ संपादित हुना है। एक प्रति के प्रारम्भ में लिखा हुधा है 'श्रीवैद्यनाथमिश्रस्य पुस्तकमिदम् ।।

-- इस व्यवस्था संग्रह,में अदालतों द्वारा की गयो जिज्ञासानों की भाषा बगला है तथा पण्डितों ने उनके उत्तर संस्कृत में, दिये हैं । अनेक अपोल के मुकदमी. में ऐसा भी हुआ था कि छोटी अदालतों से पण्डितों की तथा वादियों एवं प्रतिवादियों द्वारा उपस्थापित स्वतन्त्र पण्डितों को व्यवस्था भी - पुननिरीक्षण के हेतु सदर दीवानी अदालत के परिडत के पास भेजी जातो या ! इस प्रकार की व्यवस्थाओं में भाषा विषयक नियमों में कुछ परिवर्तन भी हुया है । व्यवस्थायें वङ्गाक्षर में लिखी गयी है, यहाँ तक कि हिन्दी के वाक्य भी उसो लिपि में है | हॉ, पण्डित वैद्यनाथ मिश्र के हस्ताक्षर देवनागर में हैं । हिन्दुओं के उत्तराधिकार श्रादि से संबन्धित विषयों के नियम प्राज तक बहुत बदल चुके हैं, तथा इन व्यवस्थाओं के निर्णय बहुत अंशों में अमान्य हो गये हैं, पर इनका निजी महत्त्व कई दृष्टियों से स्पष्ट है । सर्वप्रथम तो १६वीं शताब्दी के पूर्व मध्यकालीन उत्तर भारत के समाज को स्थिति का बहुत कुछ परिचय हमे विश्वसनीय रूप से इसकी सहायता से प्राप्त होता है । वनभाषा में उस समय का इतना बड़ा गद्य ग्रन्य अभी तक उपलब्ध नहीं हुअा है । हमें इसकी सहायता से इस मापा की ध्वनियों तथा पदों का विवरण बहुत-कुछ ज्ञात हो सकता है । इनके अतिरिक्त भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास के अध्ययन के लिए बहुत हो उपयोगी सामग्री इस प्रत्य में निहित है। इस प्रकार के इस ग्रन्थ से अधिक से अधिक विद्वान् लाभ उठायें इस ध्येय से इसे बङ्गाला लिपि में नहीं छापकर देवनागरी लिपि में मुंद्रित पराया गया है। रङ्गला भाग की भाषा में कुछ भी परिवर्तन नहीं किया गया, पर संस्कृत अंशों में जो बहुत सी यशुद्धियाँ थीं उनका संशोधन कर दिया गया है । वनलिपि में अथवा मूल कोष में च-म का भेद नहीं है--इस बात को दृष्टि में रखकर इन दोनों व्यञ्जनों के स्थान पर बागला में 'व' ही लिखा गया है, एवं संस्कृत से भिन्न भाषाओं के 'व' घाले शब्द भी सस्कृत में भी वकार से ही लिखे गये हैं | संस्कृत भाग में उद्धृत वचनों के मूल ग्रन्थों का पत्रादि निर्देश यथासंभव दिया गया गावक्तव्य. सन् १६५४ ई० में फाशिक राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के उपाधिवितरणोत्सर के अवसर पर सरस्वती-भवन के कुछ चुने हुए इस्त. लिखित ग्रन्थों को प्रदर्शनी हुई थी। उसमें इस राज्य के मुख्य मन्त्री डाक्टर श्री सम्पूर्णानन्दजो तथा भुतपूर्व शिक्षामन्त्री ठाकुर श्री हरगोविन्द सिह जी ने धर्मशास्त्रीयव्यवस्था-समद को तीन पुस्तकें देखकर इन्हें प्रकाशित कराने की इच्छा व्यक्त को। तदनन्तर शोम ही प्रशासकीय अादेश हुया कि इन ग्रन्थ के अविलम्ब प्रकारान की व्यवस्था की जाय । अतः इसे जनता के समद उपस्थित किया जा रहा है। यह वात सर्वविदित है कि भारतवर्ष में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के बार- म्भिक दिनों में न्यायालयों की यह व्यवस्या थी कि वहां धर्मशास्त्र के ज्ञाता पण्डित तथा शरियत के जानकार मोल वो इस कार्य के लिये नियुक्त थे कि वे व्यवहार-निर्णयाधिकारियों की सहायता संबद्ध धर्मशास्त्र की दृष्टि से किया करें । सन् १८२४ ई० के प्रारम्भ से लेकर सन् १८३६ साल तक की फलकत्ते की सदर दीवानी अदालत द्वारा उससे संबद्ध प्रधानतया पण्डित वैद्यनाथ मिश्च से धर्मशास्त्र विषय में जितनी जिज्ञासाय की गयी थीं तथा उन्होंने जो परामर्श दिये थे वे अन्ध रूप में प्रकाशित किये जा रहे हैं । इस प्रसंग में यह भी ज्ञातव्य है कि प्रारम्भिक क्षों में परिडत रामतनुशर्मविद्यावागीश भी पण्डित वैद्यनाथ मिश्र के साथ परामर्श दिया करते थे, तथा मिथजी की अस्वस्थता की अवधि में उनके इस कार्य का सम्पादन पण्डित हीरानन्द मिश्र ने किया था। पण्डितजी के पास अदालत से जो प्रश्न पाते थे, प्रमाण सहित उनका जो उत्तर वे देते थे, उनकी प्रतिलिपि पण्डितजी अपने पास रख लेते थे। इन्हीं प्रतिलिपियों के आधार पर यह अन्य संपादित हुश्रा है। एक प्रति के प्रारम्भ में लिखा हुआ है 'श्रीवैद्यनाथमिश्भस्य पुस्तकमिदम् ।

इस व्यवस्था संग्रह में अदालतों द्वारा की गयो जिज्ञासाओ की भाषा बगला है तथा पण्डितों ने उनके उत्तर संस्कृत में, दिये हैं । अनेक अपोल के मुकदमा. में ऐसा भी हुआ था कि छोटी श्रदालतों से पण्डितों को तथा वादियों एवं प्रतिवादियों द्वारा उपस्थापित स्वतन्त्र पण्डितों को व्यवस्थायें भी--पुननिरीक्षण के हेतु.,सदर दीवानो अदालत के परिहत के पास भेजो जातो या । इस प्रकार की व्यवस्थानों में भाषा विषयक नियमों में कुछ परिवर्तन भी हुआ है । व्यवस्था बनाक्षर में लिखी गयी है, यहाँ तक कि हिन्दी के वाक्य भी उठो लिपि में है । हाँ, पशिडत वैद्यनाथ मिश्र के हस्ताक्षर देवनागर में है। हिन्दुओं के उत्तराधिकार आदि से संबन्धित विषयों के नियम श्राज तक बहुत बदल चुके हैं, तथा इन व्यवस्था नों के निर्णय बहुत अंशों में अमान्य हो गये हैं, पर इनका निजी महत्त्व कई दृष्टियों से स्पष्ट है। सर्वप्रथम तो १६वीं शताब्दी के पूर्व मध्यकालीन उत्तर भारत के समाज की स्थिति का बहुत कुछ परिचय हमें विश्वसनीय रूप से इसकी सहायता से पास होता है । वङ्गमाषा में उस समय का इतना बड़ा गद्य ग्रन्य अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। हमें इसकी सहायता से इस भाषा की ध्वनियों तथा पदों का विवरण बहुत कुछ ज्ञात हो सकता है । इनके अतिरिक्त भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास के अध्ययन के लिए बहुत दो उपयोगी सामग्री इस प्रत्य में निहित है। इप्त प्रकार के इस ग्रन्थ से अधिक से अधिक विद्वान् लाभ उठावें इस ध्येय से इसे बङ्गला लिपि में नहीं छापकर देवनागरी लिपि में मुंद्रित कराया गया है। बगला भाग की भाषा में कुछ मी परिवर्तन नहीं किया गया, पर संस्कृत अंशों में जो बहुत सी अशुद्धियाँ भी उनका संशोधन कर दिया गया है । वद्भलिपि में अथवा मूलकोप में व-य का भेद नहीं है--इस बात को दृष्टि में रखकर इन दोनों व्यजनों के स्थान पर मागला में 'व' ही लिखा गया है, एवं संस्कृत से भिन्न भाषाओं के 'ब' वाले शब्द भी संस्कृत में मी वकार से ही लिखे गये हैं। संस्कृत भाग में उद्धृत वचनों के मूल ग्रन्थों का पनादि निर्देश यथासंभव दिया गया o है। अन्तिम भाग में पढ़ने वाले ऐसे वचन जो बार-बार पूर्व भाग में आ चुके हैं उनके लिए ऐसा निर्देश प्रायः नहीं दिया गया है। खेद के साथ लिखना पड़ता है कि हमें कई अन्य उपलब्ध नहीं हो सके, अतः उनके वचनों के पाठों का मिलान हम नहीं कर सके हैं। इस मन्ध के सम्पादन में हमें महाविद्यालय के प्रधानाचार्य पण्डित भी कुबेरनाथ शुक्ल ने बार-चार प्रोत्साहन देकर सहायता की है। पुस्तकालय के हस्तलिखित ग्रन्पविभाग के मेरे साथियों में परिखत भीविभूतिभूषण मट्टाचार्य ने विभिन्न प्रकार से समय-समय पर सहयोग दिया है, पण्डित श्रीचन्द्रभानु पाण्डेय तथा पण्डित श्रीनिशाकान्त पाठक ने प्रतिलिपि बनाने में सहायता की थी, पण्डित तारकनाथजी ने श्रारम्भ से लेकर समाप्ति तक किसी न किसी रूप में मेरे इस कार्य में हाथ बॅटाया है, पण्डित श्रीरघुनाथ पाण्डेय संस्कृत के प्रूफ-सशोधन मे मेरे निरन्तर सहयोगी रहे हैं तथा इस कार्य में समय-समय पर पण्डित श्रीराजाराम भभहने भी सहयोग दिया है। मैं इन सब साथियों का ऋणी हूँ, साथ-साथ यह भी व्यक्त करना भावश्यक समझता हूँ कि इस अन्य को त्रुटियों का उत्तरदायित्व एक. मात्र मुझ पर ही है, मेरे इन सहायकों पर नहीं। मुझे दुःख है कि प्रेस के कर्मचारियों को असावधानो के कारण तथा मेरे दृष्टि दोष के कारण बहुत सी अशुद्धियों का संशोधन अन्य के प्रारम्भिक भाग में नहीं हो सका है। टाइयों के टूटने तथा प्रूफ को प्रसरता के कारण भी कई स्थानों पर श्रुटियां रह गयी है । प्रतः सावधान रहने पर भी शुद्धिपत्र कुछ लम्बा हो गया है। तद। चमाप्रार्थी हूँ। अन्त में मैं अपने माननीय गुरुदेव टाश्री मुनीतिकुमारवटी तथा कलकचा हाइकोर्ट के न्यायाधीश भी प्रशान्तविहारोमुखी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है, जिन्होंने इसे देखकर इसकी भूमिका की रचना में एवं ग्रन्थ के वसावर में भी प्रकाशित कराने के हेतु मेरी सब प्रकार की सहायता करने को उदारता प्रकट की है।

इस मन्थ के वैशिष्ट्यो का निदर्शन बृहद् भूमिका के बिना नहीं हो सकता है। इस कार्य में कुछ अधिक समय लगेगा, तथा पत मेरा कलकत्ते में कुछ सप्ताह बिताना आवश्यक है, मो अभी तक संभव मालम नहीं पड़ रहा है। अतः भूमिका की प्रतीक्षा में अन्य के प्रकाशन में विलम्ब न कर इसे विद्वानों के समक्ष इस आशा से रख रहा हूँ कि सहृदय विद्वानों की दृष्टि इस पर पड़ेगी, तया जिस भूमिका के लिखने की जो सुविधा मुझे नहीं हो सकी है, उसमें उनका भी सहयोग प्रात शे सकेगा। श्रीसुभद्रझा १९ चैत्र १८७९ शकान्द .

नमा नामसङ्कता विशेषविवरणम् ऊनविंशसहितान्तर्गता ( २ सस्करणम्) र आसं. उस. । . ३ " ग M ४ उत. " ५ कल्पत जीवानन्दविद्यासागर प्रकाशितम् (२ संस्करणम्) पुस्तकसंख्या १४०३१ पी० पी० काणे ६ कार ७ कापु द ग्रन्यनाम ग्रन्धप्रकाशन निभाएनस्थानम् लिखिनमुद्रितविश्वयम् ঋমিনা मावासोप्रेस, कलात्ता सन् १३१६ ३० मुद्रित आपस्तन्दसहिता उशन संहिता उदारतत्वम् नारायणप्रेस, कलकत्ता, ३० १५६५ कम्पतरुः सरखनीभवनस्तकालय०, ग० स० कालेज, काशी, लिहित कात्यायनरमृतिः आर्यसस्कृतिप्रेस, पूना, ई०, सन १९३९ कालिकापुराणम् सरसतीभवन पुस्तकालय०, ग. स. कालेज, काशी लिखित गायत्रीतन्त्रम् चन्द्रपभाप्रेस, काशी, ३० सन १९६७ मुद्रित गौतमसदिता पड्वासोपेस, कलकत्ता, सन १३१६ काद. तिवितत्वम् नारायणप्रेस, पालकता, ई. सन १८८५ दक्षमंहिता वावासीप्रेस, कतरुत्ता, सन १३१६ वहान 'दत्तकचन्द्रिका सूर्यप्रेस, कलकत्ता दामीमांसा दचकदर्पणः सरसवोभवनपुस्तकालय०, १० स कालेज, काशी, लिखित दत्तासौमुदी दायभागः सिदेसरप्रेस, कसपता, ई० सन १२६३ ६ गात, १० 1 वित. पुस्तकसंख्या ११६७४।१३४७६ हरिदासगुप्लेन प्रकाशितम् ऊनविंशसंहितान्तर्गता ( २ सस्मरणम् ) जीवानन्दविद्यासागरप्रकाशितम् ( २ सरकरणम् ) ऊनविंशहितान्तर्गता ( २ संस्करण) मधुसूदनस्मृतिरत्नप्रकाशितः १२ " " दमी. " उक्तमो. पुरतकसंख्या १२३०५ १२६११ जीवानन्दविद्यासागरप्रकाशित (२ संरकरण्यम् ) " लिखितमंद्रित विवरणम् विशेषविवरणम् जीवानन्द विद्यासागरप्रकाशित० (२ संस्करणम् ) माम नाममा प्रन्यनाम दात. " जीवानन्दविद्यासागरप्रकाशित० ( २ सस्करणम् ) " दायाम दानम. " २० " " २२ मर्यनारायणशुक्लप्रकाशित पुस्तकसंख्या १३३४१ लक्ष्मणशास्त्रीजोशीप्रकाशित लिखित मुदिता २४ दैतनि. रंतप पका. नास्म. प्रकाराननिशपनस्थानम् नारायणप्रेम, कलकत्ता, सन १६५ भवानीपुरमुरखनप्रेम, क्लात्ता, ई० सन १८७ दानवः गुजरातीप्रेम, मुम्बई, ई० सन १९२४ नारायणप्रेम, कलकत्ता, १० सन १६५ देवप्रतिष्ठातत्तम् तनिणयः सागवेदविद्यालयप्रेम, गनगर, काशी, सन् १८८५ परिशिष्टम् सरस्वतीभवनपुस्तकालय, ग० सं० कालेज, काशी धर्मकोशः भासस्कृतिप्रेस, पूना, १० सन १६३७ नारदस्मृति. एशियाटिकमोसाइटी, कलकत्ता नारदीयमनुमहिना गर्नमेण्टप्रेस, त्रिवेन्दुम् , ३० सन् १९२६ बालासीप्रेस, कलकत्ता, सन १३१६ वनाम प्रयोगतत्वम् नपायणप्रेस, कलकत्ता, ई० सन १८६५ प्रायश्चित्तविवेकः सिखरप्रेस, कलकत्ता, १० सन १८८३ बहरपतिस्मृतिः राजकीयमाच्यावयाविमर्शालय०, बडोदा, संवत् १६५ मनुस्मृति गुजरातीप्रेस, मुम्बई, १० सन १९१३ मठमविष्ठातत्त्व नारायणप्रेस, कलकत्ता, ३० १६५ मलमासत्ता २५ " के सम्बशिवशस्त्रिसशोधित उन्नविशसंदितान्तर्गता (२ सस्करणम् ) जीवानन्दविधामागरप्रकाशित०, (२ सस्करणम् ) २७ नामस. " परा.रसहिता २५ " २६ औरङ्गस्वामिशणा सम्पादिता, पराम. प्रयोत. प्रायति वृस्म मरम. " ३१ " जीवानन्दविद्यासागरप्रकाशित०(२ सस्करणम्) 1 मठम. " कमाइः नामसकता विशेषविवरणम् मदरा पुरतमसख्या ११६१५।१२०४३॥ मभा. मिना. - " ऊनविंशसंहितान्तर्गता ( २ संस्करणम्). ३६ यम यारम. यसिस " ४० " ऊनविंशसदिनान्तर्गता ( २ सम्कर पम् ) " ४२ बाल. विनि. विच, वि. प्रन्यनाम ग्रन्थप्रकाशननिधापनस्थानम् लिखितमुद्रित विवरणम् महनारिजात सरस्वतीभवनपुस्तकालय०, ग० सं० कालेज, काशी लिखित महाभारतम् पार्यसंस्कृतिप्रेस, पूना, ई० सन १९३७ मुद्रित मिताक्षरा निर्णयसागरप्रेस, मुम्बई, ई० सन १९०६ यमसंहिता वहवासीमेस, कलकत्ता, सन १२१६ वहाद याशक्यस्मृतिः निर्णयसागरप्रेस, मुम्बई, ३० सन १६०० वसिबसविता वासोप्रेम, कलकत्ता, सन १३१६ वाद बालम्भनी मद्रास, ब्रह्मवादिनप्रेस, ई. सन १९१२ । विवादचिन्तामणिः पालकतासारसुपानिधिप्रेस, लगत् १८६४ विवारचन्द्रः दरभंगानगया विद्यापतिधन्यालये मुद्रितः विवादरस्नाकरः शियाटिकसोसाटी, ६० सन १८५३ शकाद०, १६३१ विदार्यश्सेतुः वेइटेसरमेस, मुम्बई, सन १६४५ विवादमा सरस्वतीभवन पुस्तकालय, ग० स० कालेज काशी लिखित विषपुस्मृति एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता, ई० सन १८५१ मुद्रित. वीरभित्रोदयः सुचारुप्रेस, कलकत्ता, ई० सन १५७५ चौखम्बासंस्कृतसिरीज, बनारस वैखानसधर्मसूत्रम् ४३ ४४ " ४५ पिसे. विमः विरम पुस्तफसल्या-१२३२६ । ४५ " जीवानन्दविद्यासागरमकाशित०, व्यवहाराध्यायः। जयकृष्णदासहरिदासगुप्तपकाशित. वैधम "

अनुपलब्धपुस्तकनामानि--
१-व्यवहारकौस्तुमा
२-दापरहस्यम्
३-व्यवहारचिन्तामणिः
४-दत्तकदीधितिः
५-गौतमप्रश्न:
६-भक्तामरस्तुतिः
७-व्यवस्थार्णवः
८-धर्मरतम्

व्यवस्था-पत्र-संग्रहः
श्रीजयतितराम्
१-रोवकारि मिसिल प्रादालत देशोयानी सदर ईरेजी १८२४
साल तारिख १० माह जुलाइ मतावकं वद्गला १२३१ साल
तारिख २८ श्रापाढ रोज शनिवार श्रादालत मजकुरार द्वितीय
हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर वैठके
वावु हरप्रकाश सिंह ..."थापीलाण्ट ।
मृत वाजा' देलगञ्जन देओ
रप्पाडण्ट।
सन हालेर २५ मार्च मासेर होया ए बादालतेर
परिसप्टेर जवावे सन हालेर १५ मेइ मासेर लिखित एलाका
वारानसेर प्रवनसन कोटेर हाफिमदिगेरा पाठानो रिटरन श्री
ताहार सम्विलितेर रोवकारि श्रओ कागजात सहित लम्बरे
पँहुछिया दृष्टे श्राइल । ताहार पर लाला राधाकृष्ण श्रओ मौलपि
गोलाम एजदानि उकिलेरा मृत राजा देलगञ्जन देशोयेर स्त्री
रागी' गोलाय कोडरेर तरफ हइते पापनादिगेर नामिक एक केता
श्रोकागचनामा' द्वारा श्रो मौलवी नेयामत श्रालि वायु शुभनाथ
सिंहेर तरफ हइते आपन नामिक एक कता बोकागचनामा'.
दाखिल करिया हाजिर हइल । हाल शनेर ३ जुलाइ मासेर दाखिल
होया यात्रु हरकनाथ सिंहेर सोयाल इत्यादि । ऐ सोयालेर
सम्पर्कीय कागजात सम्वलित ताहार उफिल मुनशी हसन प्रालिर
हाजिरिते इष्टे (श्राइल | जाना गेल जे सरकारेर पाइने
राखा श्री राजार फथा नाहि,श्रो इरेजी १७६३ सालेर एगार
1
२. राणी गोलाव कोझर।
३. भोकालानामा।

२ - व्यवस्था पत्र-संख्या-१ आइन अनुसारे, जे इरेजी १७६५ सालेर चौयल्लिप आदन मते वारानसेर एलाकाते जारि हय, ये व्यक्ति घन श्रोत्ति राखिया मरे ताहार धन श्रोत्ति, यदि हिन्दुहय शास्त्र माफिक ओ यदि मशलमान हय शरा माफिक, ताहार उत्तराधिकारिदिगेर मध्ये विभाग हइवेक । ओ ए मकईगाते मजुन कागजात अनुसारे पार एइ दृष्टे ये राजा देलगञ्जन देनो अकस्मात दालानेर छात पडिया मरियाचे प्रकाश वटे योऐ व्यक्ति मरण पर्यन्त श्रापन धन श्रो त्तिर उपर दखिल ओ कावेज छिल, ओ जखन मरणेर किछु अनुमान छिल ना पारन समक्षे कोन व्यक्ति प्रापन धन ओ पृत्तिर उपर कखनो दखिल यो कावेश कराश्याछिल ना ! मत- एव आमार निकट ताहार स्त्री राणी गोलाव कोडरेर दखल एजाहार नितान्त अमूलक मो अनर्थक बरे ओ फले ए मकरदमार काजिया उपस्थित होन पर्यन्त कहारो दखल छिलो ना, ओ तिन परइ दखल ना थाकन 'प्रकरणे इरेजी १८१३ सालेर पष्ठ श्राइनेर निः सम्पर्क प्रकारा वटे। ए कारण शास्त्रर आशा जानान निमिते पण्डितदिगेर स्थाने सोयाल करण आवश्यक हइल । श्रो जाना गेल ये राजा भोयावल देओ राजा ईश्वरि वक्स देओ ओ राजा देलगञ्जन देयो प्रो वावु थाहुलाल' सिंह श्रो पावु . शुभनाथ सिंहके उत्तराधिकारि राखिया मरिल, नो पारि पुनेर मध्ये प्रथम राजा ईश्वरि यक्स देशो अप्राप्तन्यवहार एक ताहार नाम जाना गेलो ना, श्री वड स्त्री राणी सिउराज फोहर यो छोट स्त्री राणी अभिमान झोहरके उत्तराधिकारि राखिया मरिल। साहार पर ऐ अप्राप्तव्यवहार पुत्र मरिल। तदपरे यावु आहुलाल सिंह पाबु हरकनाथ ओ वायु जयनाथ सिंहके उत्तराधिकारि राखिया मरिल । ताहार पर राजा देलगञ्जन देयो राणी गोलाव कोडरके उत्तराधिकारि राखिया निःसन्तान १.भपावन देव। २.भाललद सिद्ध व्यवस्था पत्र-संख्या-१ मरिल, श्री वावु शुभनाथ सिंह अद्यापि वर्तमान पाछे । अतएव ए श्रदालतेर पण्डितदिगेर स्थाने जिज्ञासा जाय ये पश्चिम देशेर शास्त्रमते राजा देलगञ्जन देोवेर त्यक्त धन श्रो वृत्ति कोन व्यक्तिके, अर्थात् ताहार स्त्री राणी गोलाव कोहरके 'किम्वा ताहार भ्राता शुभनाथ सिंहके अथवा ताहार भ्रातुप्पुत्र हरकनाथ सिंह ओ जयनाथ सिंहके अर्श, जवाव लिखने मृत व्यक्ति ये राजा छिल ताहार पर दृष्टि करिवेन ना। ऐ व्यक्तिरा अन्य २ लोक हयोने जे प्रकार जवाव लिखितेन सेइ प्रकार जवाव लिखिवेन; ओ पण्डितदिगेर जवाय दाखिल होन परे पुनार कागजात दृष्टे आनिया मनाशीच हुकुम देओया जाइवेक, ओ एइ रोवकारि सोयालेर स्थाने जाना जाय, इहार नकल पण्डितदिगके समर्पण करा जाय । एइ सोयालेर श्रीर्जयतितराम एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाइवधर्माधिकरण- लिखितप्रश्नपत्रमवलोक्य याशवोधो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते-- यत्र पुत्रपौत्रप्रपौत्रपर्यन्तरहितो देलगंजननामा कश्चन व्यक्तिविशेषो गोलारकोमराख्यां पनीमेको शुभनाथसिंहनामानमेक सोदरभ्रातरं हरफनाथ- सिंह-जयनाथसिंहनामानौ द्वौ भ्रातुष्पुत्रौ च संरक्षस गृतः। तत्र तदीयविभक- स्थायरारपावरधने तरपन्या गोलावकोपाराल्याया एकाधिकारः। मनोया.' बलदेवसंक्षकः चतुरः पुत्रान् ईश्वरीवक्शदेव-देलावगनन देव-वायु-पाल्हाद- सिंह-यावु-शुभनायसिहानुत्तराधिकारिणः संरक्ष्य मृतस्तत्र तेपान्तन- मविभक्तं चेत्तदा देलगंजनयोग्यांशे सोदरभ्रातुः शुभनाथसिंहस्याधि. कारः, तत्पनी यावजीरमनाच्छादनमागिनीति पश्चिमदेशप्रचलित- मिताक्षरादिप्रत्यानुसारिणी व्यवस्था । १ मावत देवसशक २.पुत्राणि व्यवस्था-पत्र संख्या-२ . अंत्र प्रमाणम् पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । : तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः-- इत्यादि मिताक्षरामन्यधृत (पृ.२१७) याश- वल्क्य-वचनम् (२,१३५ ) ॥१॥ , अपुत्रघनं पल्यभिगामि तदमाये दुहितगामि तदभावे मातृगामि तदभावे पितृगामि तदभावे मातृगामि तदभावे मातृपुत्रगामि इत्यादि तद्धृत-बृहविष्णु-वचनम् ॥ २॥ पत्नी गृहणीयात् इत्येतद्वचनजातं विभक्तमातृस्रीविषयम् । इति मिताक्षरा (पृ० २१७ लिखनम् ॥ ३ ॥ अनन्तरः सपिण्डायरतस्य तस्य धनं भवत्-इति मनुवचनोति (६, १८७)। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीहरिः शरणम् २-लम्बर २०४२ .. २ सदर देमनी आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत फुर्टनी इशमिट साइवर हुजुर हइते। दुल्ली पा. ो गयरह श्रापीलाण्टान् फाशी पांडे श्रोगयरह रप्पाडण्टानेर २०४२ लम्बरेर मकईमाते इङ्गरेजी सन १८२४ सालेर २६ जुलाइ मासेर रोवकारिर लिखित बेहारेर शास्त्रमते श्राइन्दा मङ्गलवार दिवस दुइ प्रहर पर्य्यन्त जवाव दाखिल करणेर म्यादे ए आदालतेर पण्डित वैद्यनाथ मिशेर नामे सोयाल एई ये- व्यवस्था-पन्न-संख्या-२ - प्ररम सोयाल- वेहारदेशेर चलितशास्त्रमते कोन व्यक्तिके, जे से आपन पितार एक पुत्र वटे, दत्तक प्रकारे पुत्रताते लोन सिद्ध वटे कि ना। द्वितीय सोयाल- स्थावर किंवा अस्थावर साधारण ओ अविभक्त धनेर हेवा दाता व्यक्तिर अंशेर सम्वन्धे सिद्ध वटे किना। तृतीय सोयाल- महाब्राह्मणीय वृत्ति हस्तान्तर योग्य घटे कि ना । आर यद्यपि कयेक जन प्रमणेर मध्ये साधारणे थाके ताहार मध्ये कोनो व्यक्तिके विभाग ना होने विक्रय किम्या हेवा प्रकारे श्रापन हिस्या हस्तान्तर करणेर क्षमता पाछे कि ना। चतुर्थ सोयाल- महाब्राह्मणीय वृत्ति जे ताहार उपर अंशीरा दिन नियुक्त पाला प्रकारे दाखिल ओ भोगी थाके शास्त्रानुसारे एक पालार अंशी दिगेर अंश समस्त अंशीगणेर मध्ये साधारण ओ अवि- भक्त, किम्वा ऐ पालार अंशोदिगेरइ पृथक् ओ विभक्त जाना जाय इति। श्रीजयतितराम जवाब-व्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेवघाधिकरण-. लिखितमश्नपत्रमरज्ञोक्य यादृशोधो पावस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम् । यः कश्चित् स्वपितुर्जनकस्यैक एव पुत्रः स च वेहारदेशप्रचलितशास्त्रानुसारेणान्यस्य दत्तकपुत्रतान प्राप्नोतीति । १. भीनयतितराग-त्र्यप। २. कश्चित-व्यप..

व्यवस्थापन-संख्या-२ F प्रत्र प्रमाणम्- नैकपुत्रेण कर्तव्यं पुत्रदान कथश्चन । बहुपुत्रेण कर्त्तव्यं पुत्रदानं प्रयत्नतः ॥ इति दत्तकमीमांसा (पृष्ठ ६६) दत्तकचन्द्रिका (पृष्ठ ११) धृत-शौनकवचनम् । न त्येवैकं पुत्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद्वा स हि सन्तानाय मूपाम् इति मिताक्षरा-( २/२१३) दत्तकमीमांसा-दत्तकचन्द्रिका • (पृ १०) धृतवसिष्ठवचनम् । द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् । सामुदायिकानेकस्यत्वासदीभूतादिमत- साधारणस्थावरास्थावरधने स्वामिना मध्ये कश्चित् सबै स्वामिनामनुमति विना स्वारी वयित्वा तस्य दानं कर्तुं न शक्नोति । . श्रत्र प्रमाणम्- अविमता विभक्ता वा सापरडा स्थावरे समा। एको ह्यनीशः सर्वत्र दानाधमनविक्रये ॥ इति मिताक्षरा' (पृष्ट २१६) धृत-व्यासवचनम् । निक्षेपः पुत्रदाराश्च सर्वस्व चान्वये सति । आपस्वपि हि कष्टासु वर्तमानेन देहिना। अदेयान्याहुराचार्या यच्च साधारणं धनम् ॥ इति दत्तकमीमासा (पृष्ठ ११२) धृत-नारदवचनम् । तृतीयप्रश्नस्योत्तरमः महामाहाणानां वृत्तिर्महाबाहाण.)भिन्नगमनयोग्या भवति, मदाबाहाणानामेव प्रेतश्राद्धभोजन-प्रेतोद्देश्यकशय्या-वादनादि- न १.कसाचन इति पाठो दत्तवमीमांसायाम: ५, २. लेक पुत्रं याद धर्मकोरव २० स. १५/१-८, मिता०२/१३. १०मी०-१११ ३. सपिण्डा" इत्यस्य स्थाने "दायदा" पति वा पारः म. च. १९१६ करयोतिरियमिति मितादराया जातुं न शक्यते । ४.८० मी० पृ० ११२, १०को०-७१ ---

व्यवस्था-पत्र संख्या-२
का
दानस्वीकत त्वेन तेषां वृत्तिर्महाबाह्मणैकयोम्यत्वात् । • तत्र यदि बहूना
महावाम(रणा )नां साधारण्यविमका सा वृत्तिर्भवति तदा तेषां मध्ये
फस्यनिदप्येकस्य विभाग चिनाऽन्येषामशिनामनुमति विना तस्यांश
कल्पयित्वा विकयदानक्षमता नास्तीति ।
थन प्रमाणम्:-
पखालङ्कारशय्यादि पितुर्य द्वाहनादिकम् ।
गन्धमाल्यैः समभ्यर्च्य श्राद्धमोक्त्रे समर्पयेत् ॥ इति मिताक्षरा-
(पृ. २/११६ ) लिखित-बृहस्पति-वचनम् (28 ३४६ )।
निक्षेपः पुत्रदाराश्च सर्वस्य चान्वये सति-इत्यादिदत्तकमीमांसा-
धृतनारदवननञ्चा
चतुर्थप्रश्नस्योचरम्-
यत्र बहूनां महाब्राह्मणानां काचिद् वृत्तित्तस्यां वृत्तौ एतदिनोत्पनानि
दयाएयेतेवाम् , एतदिनोत्पन्नान्यन्येपामितिरीत्या ते नियुक्ता भोगिनध ।
तत्र एकदिनोत्पन्नद्रव्यभोगिनो दिनान्तरोत्पन्नद्रव्यभोगिभ्यो विभक्का एव ।
नदिनोपन्नं द्रव्यं तहिनोत्पन्नद्रव्यभोगिनामसाधारणं विभक्तं भवति ।
फिन्तु एकदिनोत्पन्नद्रव्यभोगिनां तद्दिनोत्पन्न द्रव्यं साधारयमविभकञ्चेति
मिताक्षरा दिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था।
अन प्रमाणम्-
विभागो - नाम
द्रव्यसमुदायविषयाणामने कस्वाम्यानान्तदेक
देशेषु विषयतया व्यवस्थापनम् ॥ इति . मिताक्षरा (पृ. २१३)
लिखनम् ।
श्रीजयतितराम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रण
प.को.--१२२३, 'समर्पयेव'बरपाय रथाने "वयेत्" इति श्मकोका पारः।

22 व्यवस्था पत्र-संख्या-३ ३-द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुटनी इशमिट साहेवेर वैठके सोयाल एइ ये- समोयाल ए श्रादालतेर पण्डितेरा फल्य द्विप्रहरेर मध्ये ए विषयेर जवाब दाखिल करेन-ये जिला सारन साकिनेर हिन्दुजाति एक व्यक्ति दुइ सहोदर भ्रातार दुइ पुत्र यो अन्य दुइ सहोदर' भ्रातार कएक जन पौत्र उत्तराधिकारि राखिया मरियाछे, ओ ऐ देशेर चलित शास्त्रमते मृतव्यक्तिर त्यक्त धन फेवल ताहार भ्राहपुत्रदिगेके अशें, किंवा ताहार भ्रातृपुत्रदिग्गे एवं साहार अन्य सहोदर दुइ भ्रातार पोत्र दिग्गेइ अशें इति । श्रीजयतितराम जवाव-व्यवस्था एतद्धम्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुर्टनीदशमिटसादेवधर्माधिकरण- लिसितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादराबोधो पातस्तदनुसारेणोचरं लिखते। पत्र सारणदेशीयहिन्दुबातीयः कश्चन व्यक्तिविशेष चतुर्णा सोदरभ्रातणां मध्ये योर्धात्रोर्दी पुत्रौ दूयोर्धात्रो. कतिपयपौत्रा श्रोत्तराधिकारिण• संरक्ष्य मृतस्तत्र वदीपने पुत्रोत्रमपौत्ररूपापत्यपल्यादिभ्रातृपर्यन्तानपत्यधनाधि- कार्यभावे तत्सोदरभाउप्पुत्रयोरधिकारो न तु तयोः सतो.' भानु-पौत्रापान-दवि सदशवलितमितादरादिग्रन्यानुसारिणो व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- पली दुहि सरस्व पितरौ प्रातरस्तथा । तत्सुतो गोप्रबो बन्युः इत्यादिम्तिादरादि-ग्रन्थ (४० २४१३५) भृत- पावरस्य-वचनम् ।। १.सोरकम्पप.. २. पौत्राम-स्यप. २.सरवेश्यप

व्यवस्था-पत्र-संख्या-३,४
अनपत्यस्य धने पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामि तदभावे
प्रातृपुनगामि ॥ इत्यादि मिताक्षरादिग्रन्थ (पृ० २११३५) धृत-विष्णु.
वचनम् ।।
बहवो ज्ञातयो यत्र सकुल्या बान्धवास्तथा ।
यस्यासन्नतरस्तेपी सोऽनपत्यधन हरेत् ॥
इत्यादि बृदसतिवचनश्चेति । ३।
श्रीजयतितराम्
श्रीहरिशरणम्
श्रीवैधनाथमिश्रण श्रीरामतनुशमविद्यावागीशेन
४-रोवकारि मिसिल आदालत देवोयानि सदर तारिख २५
माह आगस्त सन् १८२४ ई० मतावक १० माह भाद्र सन् १२३१
वाङ्गला ए अदालतेर काएम मकाम प्रथम हाकिम श्रीयुत जान
हरवट हारिण्टीन साहेवेर बैठके ।
मुसम्मात दिपु
पापीलाण्ट
गौरिशकर
रप्पाडएट
आपीलाएटेर उकिल वावु जगन्नाथ सिंह श्रो रप्पाडण्टेर
'एइ क्षणकार उकिलगण मुनशी प्रामजद आलि ओ मुनशी
"आमिनहिन आहमद सालि हाजीर आसिल । एइ सनेर जुन
मासेर ३० तारिखेर हुकुम मते रेप्पाउण्टेर उकिलगणेर दाखिल
करा व्यवस्था तनमा हझ्या ऐ तारिखे दाखिल हइया रेष्पा-
'डएटेर दरखाश्त सम्यि म्वलित पडा गेल । रेपाडण्टेर
उफिलगण जिज्ञासा कालीन जाहिर करिलेक जे गणेशदत्त शम्मी
'श्री त्रिपाठी वेदमणि शर्मा ओ चातुर्वेदि विश्वम्भरदत्त शर्मा
ओ रामनाथ शर्मा श्री विक्रम शर्मा ऐ जुन मासेर ३० तारिखेर
१. "वृहविष्णु-व्याप०"
२.घ. कोप-१५१८ 'वृहस्पति' इत्यस्यस्थाने 'मनु'-ति पाठ:--व्यप..

व्यवस्था पत्र संख्या-४ दाखिल होया.व्यवस्थार लेखक पण्डितगण:सदर आजिमा- वाद साकिमेर प्रधान पण्डित वटेन, किन्तु बादार मध्ये केह आदालतेर पण्डिति फर्म किम्वा सरकारेर अन्य कर्म राखे नाः इति । अतएष यद्यपि एमत याजे पण्डितगणर व्यवस्थार उपर ये सरकारेर चागजगर मध्ये नाइ श्रादालतेर प्रत्यह(य) हइते पारे ना ! किन्तु एइ दृष्टे ये एइ मकईमार तजविज ओ निष्पत्तिकालीन एइ भादालतेर पूर्वेर पण्डित शोमाशाखिर माजुलि प्रयुक्त एक पविडत अर्थात् रामंतनुविद्यावागीशेर' व्यवस्था लोया गिगाछे, एइ ज्ञण शोभाशातिर एमोजे वैद्य-- नाथ मिश्र पण्डित नियुक्त हइयाछन हुकुम हुइल, ये एइ. मकईमार कागज नधि वैद्यनाथ मिश्रर हाथोयाले करा जाय, दधे एइ सनेर फेोपरि मासेर, हतारिखेर रोवकारिर लिखित सोयाल सकलेर जवाब सुवे बेहारेर महाल सकल सहर पाटना प्रभृतिर चलित शास्त्रमते महरम ओ दशहरार तातिलेर पर १५ दिवसेर मध्ये व्यवस्था दाखिल फरेन । तये ताहार परे ए आदालतेर काएम मकाम हाकिमेर विवेचनाय एइ केताय जे उचित माना जाइवेक हुकुम देशोया जाइवेक इति। रोवकारि मिसिल पाराला देोयानी सदर तारिख ६ फेसरमोरे सन १८२४ इशारेजी मतावक पङ्गला १९३० साल सारिख १८ माप रोज सोमवार श्रादालत मजकुरार फाएम मकाम हाकिम श्रीयुत जान हरवट हारिण्टोन सादेवेर बैठके। मुसम्मान दिपु पापड श्रापीलाएट, হাল্ক . रप्पाडण्ट आपिलाण्टेर उम्लि घायु जगन्नाथ सिंह ओ खोद रप्याडएट श्रो ताहार उकिल मुनशी, दादारवकप्त ओ लाला याऽधलाल हाजिर ६इन । पइ मासेर ३ तारिखैर हुकुममते सेरस्तादार एक फेतापित्यत ताहार लिखित विषयेर मजमुने अनुप सिंहेर

व्यवस्था पत्र संख्या-४
११
सन्तानेर कुरशीनामा एक केता दाखिल करिन । दृष्टे आइल ।
तदपरे उभयेर उकिलेरा ऐ कुरशीनामार सत्यतार उपर स्वीकार
करिवेकः इति । ए मकईमार समस्त कागचेर अनुमोदने जाना
गेल ये रप्पाडएट मुदइ एइ एजहारे सहर अजिमावादेर मध्ये
जियाताम्बुल महल्या साकिमेर गुलु चौधुरि पितामहेर पो पितार
स्वोपार्जित मालामाल मिलकियत श्री मकररि ग्राम सकल
ओ शोना ओ रूपार अलङ्कार ओ ओ काँचा पाका वाटी संकल
ओ भोगहि पटी ओ शतरजी ओ गालिचा विछाना ओ
पितलिया हाडी आदि वासन श्रो पोपाकी कापड ओ दोशाला
धादि वस्न सफल ये मिलकियत मकररि प्राम सकल ग्रो प्रोगाहि
पाटार उपर स्वत्व यो वाटी सफल श्रो अलङ्कार श्रो तरजी
श्रो गालिचा श्रादिर किम्मत एकुने अान्दाजि मवलग ६००२
टाका निचेर लिखित माफिक हइवेक राखिया फसली १२१३
सालेर आश्विन मासे मुईइके ो आपन भ्रातुप्पुत्र जगुके
उत्तराधिकारि राखिया मरिलेक, ओ पूर्वाधिकारि मरणेर पर
आपन पूर्वाधिकारिर त्यक्त धनेर उपर दखिल ओ भोगी हइल ।
ताहार पर प्रामार भ्राता जगु फसली १२१६ सालेर १० माघ
मासे केवल आमाके उत्तराधिकारी) राखिमा मरिल ।
एइ क्षणे ऐ जगु(र) स्त्री मसम्मात दिपु त्यक्त धनेर उपर दखित
हइया दसु नाम जगुर भागिनेयके आपन मालिक मक्तार
जानिया समस्त धन, वस्त्र ओ प्राम आदिर उपस्वत्व भोग कराइते
छे, ओ आमाके, जो उत्तराधिकारि घटी, वेदखल करे इति ।
जगु वावुर खि दीपु पो ऐ जगु वावुर भागिनेय लालेर उपर
, करिलेन-इति साधीयान् पाठः
२. साकिनेर इति साधीयान् पाठः।
३. भोगादिकुठी।
४. 'भोगामिाटरी'त्यपि पठितु रास्यते।
३.साहार ताहार-ति व्यप० ।

व्यवस्था पत्र-संख्य.४ दावि करिलेक, श्रो मुद्दइर उकिल प्रवनसन फोटेर रह जवावे येोरा क्यान करिलेक जे आमार मोकल गुलु यापुर त्यक्त पने दावि राखे, ओ गुलु वावुर मृत्युर पर गुलु वावुर सहोदर भ्रातार पुत्र जगु दखिल रहिल, जगुर मृत्युर पर आमार मोफल व्यतित, जे गुलु वावुर खुडतुता भ्रातुप्पुत्र हय, गुलु वावुर अन्य उत्तराधिकारि नाइ इति । यो मुद्दामालेहेरा प्रवनसन कोट श्रादालतेर जवावे ओ बद्द' जवावे' ओ एइ क्षण सुनाखेर' मृत्युर पर मसम्मात दिपु श्रापीलाएट ए श्रादालतेर दाखिल फरा आरजी मजुवाते अनुपसिंहेर त्यक्त धन ताहार पुत्रदिग्गेर मध्ये, अर्थात् आपीलाण्टेर पत्ति जगु वावुर पितामह भोलानाथ प्रो रप्पाडल्टेर पितामह शम्भुनाथेर सहित, विभाग होन, ओ 'ऐ भोलानाथेर मौरसी हिस्यार दुइ केता बाटी व्यतित विरोधि समुदय धन गुलु वावुर निकट, ताहार पिता भोलानाथेर त्यक्त धन हइते, जे ऐ भोलानाथ हरनाथ सेठीर कन्या के विवाह करिया 'छिल, उपार्जन हश्रोन पो गुलु वावुर भ्रातुप्पुत्र जगन्नाथ बाबुर उत्तराधिकारित्व-सत्वे गुलु वावुर एकरार जे गुलु धावुर मृत्युर पर ऐ एकरार मते श्रो भ्रातुप्पुत्र सम्पर्केगुलुबाबुर मृत्युर आइयाम फसली १११२ सालेर माह आश्विन हइते थापन मृत्यु 'फसली २२१६ सालेर माघमास पर्यन्त मुद्दइर यो अन्य काहारो विना दाोया श्रो श्रापत्तिते गुलु वावुर त्यक्त धनेर पर दखिल रहियाछे। एजाहार मुद्दइर उत्तराधिकारिय सत्वेर उपर अस्वीकार हइल, ओ शाखमते आपन उत्तराधिकारित्व-सत्वेर जाहेर करिलेक, ओ प्रवनसन कोटेर जोयावे मुद्दामालेहेरा 'जाहेर करियादिल जे हरनाथ सेठीर खी भोलानाथेर प्रथम पुत्र वस्तीसमेर माहाता)मही ये, एइ भोलानाथ हरनाथ २.पवा ये भो इति म्यप २. दसनाथेर पनि साथीदान् पाठः। - व्यवस्था-पत्र-संख्या-४ १३. सेठोर कन्याके विवाह करियाछिल, ऐ वस्तीरामके आपन पुत्र करिया लइया समस्त धन, वन ओ ओगाहि कुठीर' फार- बारेर कर्ता करियाछिल। यथा वस्तीराम अापन जीवदशापर्य्यन्त ओगाहि ो गयरहेर कारवार करियाछे, ऐ वस्तीरामेर मृत्यु पर अक' प्रोगाहि कारवारेर पाजाम गुलु बाबु करियाछे, ओ वस्तीरामेर अर्द्धक हिस्यार प्राञ्जाम ताहार पुत्र जगुलाल ओ. दीहिन दशुलाल दियाछे। यथा ओगाहिर कारवारे अनेक टाका महाजनेर देना हइयाछिल दसुलाल आपन मातार अलङ्कार विक्रय करिआ महाजनान् देनाते दियाछे । एइ क्षणह महा- जनान् देना वाकी श्राछे इति । किन्तु इङ्गरेजी १८१३ सालेर १७ श्रापरेल मासेर होया प्रयनसन कोटेर रोवकारिते मुद्दामालेहे. दिगेर उफिल एइ विषय जिज्ञासाकालीन ये आपन जवाव दाविते लिखियाचं ये वस्तीरामके ऐ वस्तीरामेर माहा(ता) मही हरनाथ सेटीर' स्त्री प्रापन पुत्र करिया लइयाछे । जखन ऐ वस्तीराम अन्येर सन्तानेर मध्ये दाखिल हइल गुलुर मृत्युर पर वस्तीरामेर पुत्र जगु गुतुर उत्तराधिकारित्वे कि प्रकार श्रादालते हाजिर हइया मकद्दमार सोयाल जवाब करियाछ। जवाव दिलेक ये वस्तीराम आपन महा( ता)महीर दत्तक हइआ छिल ना, जवाव दायिते सहन्नामे लेखा गियाछे, ओ वस्ती- राम थापन जीवदशाय आपन पुत्र जगुके गुलुर स्थाने समर्पन, करिया दिल, ओ एइ हेतुते जगु गुलुर उत्तराधिकारित्वे पादालते हाजिर हइया नालिप करियाछिल इति । अर्थात् गुतु वावु मुदइ- मिवनजिवुल्वा ओ दोरदान खातुन मुद्दामालेहेदिगेर मकद्दमाते ये मौजे ममरिया यो अनेर ए विवरावत ऐ गुलुर जीबद्दशाते सहर पाटनार आदालते तजविजेर निचे छिल । ऐ गुलुर उत्तराधिकारि १.पाटीर। २. अका ३. सेगी।

व्यवस्था पत्र-संख्या-४ + तलवे इस्ताहार जारि होन कालीन जगु यावु उत्तराधिकारि- त्वे प्रकारे मुद्दइरा काएम मकाम हझ्या हाजिर हइया इंगरेजी १८०७ सालेर ११ युन मासेर होया ऐ श्रादालतेर डिकरि 'थापन सत्वे हासील करिलेक, ओ इङ्गरेजी १०२० सालेर २२ नवम्बर मासेर हओया ए आदालतेर सावेक चतुर्थ हाकीमेर हुकम करा तहकिकाते गुलु वावुर पितामह अनुपसिहेर त्यक्त ताहार मृत्युर पर ताहार पुत्र भोलानाथेर दखली साहताज मगल महल्वार छोटो दुइ फेता वाटी व्यतित विरोधिय अन्य किछु माल अनुप सिंहेर त्यक्त साम्यस्थ हय नाइ, श्रो ऐ छोटो दुइ केता याटीर परिवर्ते ये भोलानाथेर हिस्या हय ऐ महल्वार अनुप सिंहेर त्यक्त ओ ताहार पुत्र ऐ मुद्दइर पितामह शम्भुनायर दखली। बड एक केता पाका वाटी हिजरि १२२२ साल मतावक फसली १२२५ सालेर २२ सहरस ६ वान तारिख स्वयं मुद्दइर निकट हइते लाला मूलचन्द्ररे निकट विक्रय हइल । यथा स्वयं लाला मूलचन्द्रेर जवानवन्दिते तहकिकह हइल, ओ यद्यपि अनुपसिंहेर त्यक्त मालामाल ताहार पुत्र भोलानाथ ओ शम्भु नार मध्ये विभाग हओन दीर्घकालगत होन हेतुते आपी- लाण्टर'मानित साक्षीदिगेर साक्षाते उचित मत साध्यस्थ हइल ना। तत्रापि पृथक २ वाटीते ऐ दुइ भ्रातार उत्तराधिकारि दिगेर प्रथम दखल हेतुते भो रमाडण्टेर मानित साक्षीर द्वाराय दीर्घकाल पर्यन्त एकान्न यो साधारणेर कारवार साम्यस्थ ना होने प्रापिलाण्टेर पति जगु वावुर' मुरप भोलानाथ ओ मुरप शम्भुनाघेर मध्ये पूर्वे विभाग होनेर द्रुत योघ हय । अतएव हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर. नफल उभयेर उकिलगणेर स्वीकार फराकुरशीनामा सम्वलित ए आदालतेर पण्डितदिगके व्यवस्था-पन्न-संख्या-४ २५ -समर्पन' करा जाय ये सुवे येहारेर चलित शाखमवे एक सप्ताहेर मध्ये एइ सोयालेर जवाब व्यवस्था दाखिल करेन । प्रथम सोयाल:- उपरे उल्लेख करा विपय सकलेर ओ ऐ कुरशीनामार दृष्टे 'जगु वावुर मृत्युर पर गुलु वाबु श्री जगु वावुर त्यक्त धनेर उपर कोन व्यक्ति उत्तराधिकारित्वेर सत्व राखे, ओ यद्यपि जगु वावुर खो मसम्मात दिपु जीवईशा पर्यन्त ऐ धनेर उपर सत्व राखे, ताहार मृत्युर पर कोन व्यक्ति के वतिये । द्वितीय सोयाल:- यद्यपि जगु पावुर पिता वस्ती रामके ताहार मातामही हरनाथ सेठीर स्त्री आपन कर्ता पुत्र करिया थाके, ए हेतुते जगु वावुर खुडा गुलुवावुर त्यक्त धनेर उपर जगुवाचुर उत्तरा- 'धिकारित्व स्यत्य नष्ट हय कि ना इति । श्रीजयतितराम् । एतद्धर्मधिकरणप्रयमाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतनानहरवटहारिण्टीन- साहेब धर्माधिकरण-लिखित-प्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तदाशापितवंशावलीपत्रं बावलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम् । अनूपसिंहसंशकः कश्चिद् व्यक्तिविशेषः पूर्वमायीत्तस्य पुत्री मोला- नाथराम्भूनायो। तयोम्मन्ये भोलानाथोऽनूपरिहस्य हायंत्रयमध्ये लघु- हर्यद्वयमादाय विभागपत्रादिकमयापि यद्या ॐ शम्भूनाथोऽपि तथैव बृहत्तदीयेकहम्यंमादायासौतथापि तदिनमारम्प भोलानायशम्भूनाययोः पृथक् पृथक स्थिति.' वाणिज्यकरणकृष्यादिना । एवं तयोः पुत्रपौत्राणामपि १. पितार स्त्रीराम-व्यप। २. स्थिति स्यप १६ व्यवस्था-पत्र संख्या पृथगेव स्थिति, वाणिज्यकरणकृष्यादिना । एवं शम्भूनापगृहीतानूप- सिंहीयवृहदेकहनयंत्य फेवा तत्यौत्रगौरीशंकरपतृ कविक्रयेणापि चानूप- सिंदधनस्य विभाग एव निधितः। एवं निश्चिते विमागे मोलानाथपुत्र कश्चित् गुल्लुवासंचकः सोदरभातपुत्रादीनुत्तराधिकारिणः साक्ष्य मृत । तदीय-' समस्त स्थावरास्यारधनं तत्सोदरभातपुत्रेण नग्गुवायुमंजकेनोत्तराधिका- रित्वेन प्राप्तमिति । तदीयधनमपि अगुवासंदकरय स्वत्वासदीभूतं जातम् । अतो बगुवावुसंज्ञकस्य मरणोत्तरं तस्वस्वास्पदीभूतं यावदनं तदुत्तराधि- कारिणा(म) भवति । अतस्तदने जग्गुरुधुसंशस्य पनो दोपुनाम्नी भवत्यधि कारिणी । तत्पुत्राद्यन्वयाभावात् तन्मरणोत्तरं तदानी वर्तमानानो तस्या मत सपिण्डादीनां मध्ये य शासनतर' सपिण्डादिस्तस्य (तद्धन) भविष्य- सीति हारदेशमचलितमिताक्षरादिमन्यानुसारिणी व्यवस्था । थत्रमणीयम्- विमागस्य निवेऽपलापे शातिभिः पितृपन्धुभिः मातृपन्युभिः मातुलादिभिः साक्षिभिः पूर्वोक्तलक्षणैः लेख्पेन च विमागपत्रेण विभागभावना विभागनिश्चयो ज्ञातव्यः, तथा यौतकैः पृथक्कत ह- क्षेत्रश्च-इति मिताक्षरा (पृष्ठ २३१) लिखनम् ॥१॥ दानमहरापश्यनगृहक्षेत्रपरिमहाः। विमस्ता नास्थय ज्ञेयाः शकमागमव्यया ॥२॥ येपामेताः किया लोके प्रवर्तन्ते स्वरिस्थतः। विमशानवगच्छेयुलेल्यमप्यन्तरेण तान् ॥३॥ इति विवादचिन्ता. मणि (३२१०४ )-वीरमित्रोदय-व्यवहारमयूखाधनेक मन्यधृतनारदवचनम् (नाम १४४३६)। १.कृप्यादिनाच श्यपः। २. केवन-म्यप। १. निश्चयो यस्य रमाने 'नियोग मितारायान् ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-४ पली दुहितरश्नैव 'पितरौ प्रातरस्तथा। तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः शिष्यः सनमचारिणः इत्यादि मिताक्षरादिग्रन्यतयाज्ञवल्क्यवचनम् { २११३५ ) ॥ ४ ॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् यद्यपि जगुवायुसंज्ञकस्य पिता वस्तीरामः स्वमातामह्या हरलायसेटी' संज्ञकस्य स्त्रिया कृत्रिमपुत्र. कृतः, कृत्रिमपुत्रस्यैव मिथिलादेशे कर्तापुत्र इति प्रसिद्धिः, तथापि कृत्रिमपुत्रस्य जनकादिसपिएदानां पुत्रत्वकरस्य च धनाधिकारिस्वम् , तदुभयोः पादाधिकारित्वञ्च भैथिलगन्यकारसंमतं मिथिलादेशप्रचलितं च । अतो जगुवाबुसंज्ञकस्य पितृव्य( स्य) गुल्जुवायु- संशकस्य मरणोत्तरं तदीयधने नागुवावुसंज्ञकस्योत्तराधिकारित्वेन स्वल. नाशो न भवतीति। पत्र प्रमाणम् स च पुत्रत्वकरस्यापि पिण्डप्रदःनिजपित्रादीना(च) पिण्ड प्रदत्य तस्य तिष्ठत्येव इति शुद्धिविवेके' रुद्रघरोपाध्यायलिखितम् (पृ. ३१ ख. पहि) श्रीजयतितराम् श्रीहरिः शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशमविद्यावागीशेन १हरनापसेठी। २ तिष्ठेत्येव-ध्यप। ३ सन पुत्रस्वकरस्य पिण्प्रदः इति शुद्धिविवेकपाठः । २ . . व्यवस्था पत्र-संख्या- श्रीजयतिराम् . ५ रोवकारि, मिछिल, श्रादालत देशोयानी सदर इङ्गरेजी १८२४ साल तारिख २६ अकतुवर मतावक १२ माह कार्तिक सन १२३१ याला रोज मङ्गलबार श्रादालत' मजकुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर बैठके- शेख गोलाम पाली- वनाम-मिरज एवराहिम वेग मुनशी दादारवक्श उकिल विद्यमाने आसिया आपन नामिक एक केता ओकालतनामा सायेलेर तरप हइते दाखिल करिलेक । तत परे हालसालेर १० श्रागस्ति मासेर लिखित चारानसेर कोट प्रापीलेर रिटरन ताहार सम्बलितेर रोवकारि ओ मकई मार रोयदाद सहित पहुछिया ए आदालतेर दाखिल' करा सोलादिर सङ्गे अद्य दृष्ट आइल । हुकुम हइल जे ए' श्रादालतेर शरवे अधिकारीरा ५ लंबम्वे वरावत शेख गोलाम भालीर दाोयार प्रारजि ओ १० लेवरे वरायत श्रीमति धनवंत ओ श्रीमति धन्नार मोयालः २० लंपरे वरावत मिरजा एवराहिम वेग मुद्दामालेहेर दाखिल करा दाविर जवावर मजमुन वेत्ता हइया फतोत्रा लिखेन जे आमिर वक्शेर त्यक्त धन ऐ मुई के अशें, किम्बा' नाहार माता श्रो भगिनी सफल ओ भ्राता सकल के ये अद्यापि हिन्दु जातिते चिर पाछे, प्रो ए श्रादालतर पण्डितेरा ५ऐ तिन कागचेर मजमुनेर वेत्ता हइया ऐ सोयालेर जयाव वारानशेर शास्त्रानुसारे लिखेन । तवे फलोया प्रो व्यवस्था दृष्ट होन परे जे उचित हुकुम देोया जाइवेक। १दितीत-व्यप.1 २ समरेर बाव-ति साधीयान् पाठः। किम्वा किम्बा-म्पप० । ४ स्थिर :

व्यवस्थापन संख्या-५ श्रीजयतितराम् जवायव्यवस्था . एतद्धम्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीदशमिटसाहेवधर्माधिकरण- लिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशबोधो वातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रभारोगापितपत्रत्रयार्थपरिज्ञानेन मिरवक्शनाम्नी काचित् स्त्री पूर्व हिन्दु- जातीया ग्रासीत् , तजातिस्थितया तया यदुपानितं तत् स्त्रमान दवा पश्चाद्यवन'जातीयेन मिरजाएवराहिमवेगसंजकेन सह स्थिता, बहुकालं सद्गृह एव स्थित्वाऽकृतप्रायश्चित्तव मृतेति शताम् । तत्र तरया यवनजाति- संसर्गे'णाकृतप्रायश्चित्तया हिन्दु-जाति-बहिर्भूतत्वाद्ययनजातिस्थितया तया यदुपालितं द्रव्यजातं तत्र हिन्दुनातिस्थितानां तन्मातृमगिन्यादीनां तत्सम्बन्धा- भावात् न तद्धनाधिकार इति वाराणस्यादि प्रचलितमिताक्षरादिग्रन्था- नुसारिणी व्यवस्था। प्रत्र प्रमाणम्- याजनं योनिसंबन्ध स्वाध्यायं सहभोजनम् । कृवा सद्यः पतत्येव पतितेन न संशयः॥ इति मिताक्षराटि ( पृष्ठ ४१४ ) ग्रन्थधृतदेवलवचनम् ॥१॥ महापातकादौ व्यवहार्यत्वं निपिम्-इति मिताक्षरा-- (पृष्ठ ३७५) लिखितम् ||२|| : १ पश्चाधवच-व्यप० । .२ तद्ग़ज-व्यप० । १ संसगेण-व्यप० ॥ ४ उपाभितग ध्य५० ५ धारानयादिव्या .

२० व्यवस्था पत्र-संख्या-६ पुरुषस्य यानि पतननिमित्तानि स्त्रीणामपि तान्येव-इति मिताक्ष- राधृतशौनकवचनश्चेति ॥३॥ श्रीजयतितराम् श्री हरिःशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन . श्रीजयतितराम लम्बर २२६७ ६ रोवकारि मिसिल श्रादालत देमानी सदर इङ्गरेजी १८२४ साल तारिख २३ माह नवम्बर मतावक वागला १२३१ साल माह अग्रहायण रोज मङ्गलवार श्रादालत मजकुरार द्वितीय हाकिम श्री युत कुर्टनी इशमिट साहेवेर वैठके। रामसेवक सिंह आपीलाण्ट मृत हाजारि दमन सिंह ओ गायरह रप्पाडण्टान् रप्पाडण्ट दिगेर उकिल मौलवि नेयामत आलि हाजिर हइया १३ हाल मासेर हुकुमानुसारे निवेदन करिलेक ये हाजारि हरशहाय सिहेर भ्राता रामशहाय सिंह अप्राप्त व्यवहार घटे, ओ मृत हाजारिदमन सिंहेर खी श्रो दुइ कन्या वारान- सेर शाखानुसारे सत्याधिकारि नाइ, ए निमित्ते केवल हाजारि हरशहाय सिंहेर तरफ हइते ओकालतनामा दाखिल हय । हुकुम हइल ये एरोवकारिर नकल रो १३ तारिखेर हाल मासेर रोव- फारिर नकल एइ प्रश्नेते ये मृत हाजारिदमनसिंहेर त्यक्त धन शाहार उत्तराधिकारिदिगेर विवरण अनुसारे, जाहा १३ तारिखेर रोवकारिते लेसा गिया छे, कोन व्यक्ति के अशें, पण्डित दिगेके व्यवस्था-पत्र-संख्या-६ समर्पण करा जाय, पण्डित दिगेर जवाव दाखित होन परे उचित हुकुम देओया जाइवेक इति । १३ हाल मासेर रोवकारि एइ-ये हाल सालेर १६ पास्तुवर मासेर लिखित वारानसेर प्रवनसन कोटेर एक वेता रिटरन ताहार सम्बलितेर रोवकारिर सहित लम्बर पहुँछिया पडा गेल, जाना गेल-ये पूर्व इङ्गरेजी १८२० साले १७ जुलाई मासेर टीकासिंह सूत्रधर ओ गुरुदत्त तेोयारिर एजाहारे प्रतिपन्न हय जे हाजारि दमनसिंह रामशहाय ओ हरशहाय नाम दुइ पुत्र आर दुइ कन्या ओ एक स्त्री उत्तराधिकारि राखिया मरियाछे, श्रार ए श्रादालते केवल हाजारि हरशहायसिंहेर तरफ हइते श्रोकालत नामा मौलवी नेयामत आलि उकिलेर नामे दाखिल हय, अतएव ऐ उकिलके जिज्ञासा गेलो ये कि निमित्त पाच जन उत्तराधिकारिर मध्ये केवल एक उत्तराधि(कारि) प्रोफा- लत नामा दियाछे। जवाव दिलेक रप्पाडण्टदिगेर मध्ये राम सेठनसिंहेर स्थाने जे कलिकाता सहरे मजुत पाछे जानिया निवेदन करिवेक । ए मते हुकुम हइल जे एइ क्षण स्थकित थाके, उकिल आइन्दा रिटरन पडिवार दिवस पर्यन्त आपन करार माफिक आमार आपने इति । श्रीजयतितराम जवाव-व्यवस्था एतदर्माधिकरणनितीथाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेवधर्माधिकरण- लिखितप्रश्नप्रतिरूपपनमवलोक्य यादृशयोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते। यत्र हानारीदमनसिंहसंज्ञकः कश्चित्' रामसहायसिंहहरसहायसिंह- 1-अप्रप्त-व्यप। २-कश्चिन व्यप।

भवतः, a.--. व्यवस्था पत्र संख्या- संशको द्वौ पुत्री.पत्नीमेको द्वेच.कन्ये संरक्ष्य मृतस्तत्र तदीयपने द्वौ पुत्रावधि- कारिणी तयोः सतो: दरल्यास्तत्वन्ययोर्या नाधिकार ,इति धाराणस्यादिप्रचलितमिताक्षरादि-प्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । चत्र प्रमाणम् उत्पत्यैवार्थस्वामित्वं लमत' इत्याचार्याः-इति ,मिताक्षरादि ..पृ० १६८ अन्यधृतगीतमवचनम् । १ तस्मात्पैतके पैतामहे च द्रव्ये जन्मनैव स्वत्वम्---इति मिताक्षरा- लिखितम् ॥ २ अनपत्यस्य धन पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामि- इत्यादि मिताक्षरादि ( पृ० २१७ )प्रन्यधृतद्विष्णुवचनञ्चेति । श्री यतितराम् श्रीहरिः शरणम श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशाविद्यावागीशेन श्रीज्जयतितराम् लम्बर २२.४ सबोयाल- • ७ सदर देयोयानी आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुटनी इशमिट साहेवेर हुजुर हइते २२२४ वरेर वावत । १-सवे-श्यप २-समप्रमाणम्-ध्यप.1 -'लभते' इत्यस्य स्थाने 'लभेत' शत पाठः मिता। ४-पहदि.'त्यस्य स्थाने 'वृदविष्णु' इति पारः मिता। --मपुत्रचनापति या पारः व्यवस्था पन-संख्या-७ जगमोहन मुखोपाध्याय प्रभृति प्रापिलाण्टान पश्चानन चट्टोपाध्याय प्रभृति रप्पाउण्टानेर मकर्दमाते इङ्गारेजी १८२४ सालेर २५ नवम्वर मासेर रोवकारिर लिखित ए आदालतेर पण्डितदिगेर नामे अगोणे 'जवाव दाखिलकरण हुकुसे सोयाल एइ ये कुशलचन्द्र चट्टोपाध्याय मानिक ठाकुरानी स्त्री श्री "ताराचान्द्र ओ निमाइचरण पुत्रगणके उत्तराधिकारि राखिया मरिल, ओ निमाइचरण लुइधर पुत्रके उत्तराधिकारि राखिया मरिल, ओ लुइधर पञ्चानन ओ ईश्वरचन्द्र दुइ पुत्रगणके उत्तराधिकारि राखिया मरिल, ओ कुशलचन्द्रेर द्वितीय पुत्र ताराचान्द्र गोलकमनि कन्या ओ शशिमुखि स्त्रीके उत्तराधिकारि राखिया मरिल, ओ गोलकमनि जगमोहन मुखोपाध्याय ओ गोपीमोहन पुत्रगणके राखिया मरिल, तदपरे ताराघान्द्रेर स्त्री शशीमुखी मरिल, ओ मानिक ठाकुराणि आपन पुत्र ताराचान्द्र ओ निमाइचरणेर मृत्युर पर मरिल। वङ्गदेशेर शास्त्रमते कुशलचन्द्रेर अर्द्धक त्यक्त धनेर, जे ताहार पुत्र तारा- चान्द्रेर स्वत्व छिल, एइ क्षण निमाइचरणेर पौत्र पश्चानन यो ईश्वरचन्द्रके स्वत्व वत्त, किम्वा ताराचान्देर कन्या गोलक- मणिर पुत्र जगमोहन मुखोपाध्याय ओ गोपीमोहन मुखो- पाध्यायेर सत्व वटे इति । श्रीजयतितराम 'जनायव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइश.मसाहेवधर्माधिकरण- 'लिखितप्रश्न प्रतिरूपपत्रमवलोक्ष्य याशोधोजातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यत्र कुशलचन्द्रचट्टोपाध्यायस्ताराचादनिमाइचरणसंज्ञको द्वौ पुत्रावृत्त- राधिकारिणौ संरक्ष्य मृतस्तयोमध्ये निमाचरणसंज्ञकः लुइघरसंसर्फ व्यवस्था-पत्र-संख्या-७ पुत्रमुत्तराधिकारिणं 'संरक्ष्य मृतः, लुइधरोऽपि पञ्चानन-ईश्वरचन्द्रशंज्ञको द्वौ पुत्रावुत्तराधिकारिणौ संरक्ष्य मृतः, एवं ताराचाँदसंघकोऽपि 'शशि- मुखीनाम्नी पत्नीमुत्तराधिकारिणी संरक्ष्य मृतः, शशिमुख्यपि जगमोहन मुखोपाध्याय-गोपीमोहनमुखोपाध्यायसनको द्वौ दौहित्रावुत्तराधिकारिणी रोरदय मृता, तत्र कुशलचन्द्रधनादस्य तत्पुत्रताराचादसजकरपामिक- धनस्याधिकारियो ताराचाँदसंशकस्य दौहित्रौ जगमोहनमुखोपाध्याय- गोपीमोहनमुखोपाध्यायौ भवत । न तु दौहित्रयोः सतो (तुष्पौवाणामधिकार:- इति वद्गदेशप्रचलितदायभागादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । श्रत्र प्रमाण- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा । तसुतो गोत्रजो बन्धुः। इत्यादि दायभागाटि(पृ० १५१)अन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (पृ. २१६)। श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रारामतनुशर्मविद्यानागोशेन श्री हरिः शरणम् - श्रीजयतितराम सदर देशोयानी श्रादालतेर पण्डितगणेर स्याने सोयाल- मुञ्ज' कि, प्रो कोन वैदिक कर्मते व्यवहार्य हयः । ओ शास्त्रानु सारे स्वर्णकार जातिदिगेर प्रनि ऐ मुञ्ज' व्यवहार करणे निषेध पाछे कि ना । यद्यपि स्यात् निषेध थाके, तवे कोन शास्त्रानुसारे, एवं याङ्गलादेशेर स्वर्णकारदिगेर प्रति ताहार चलन पाछे कि ना, भार कंपिनी बहादूरेर सरकारेर शासित देशसकलेर मध्यगत कोन देशे ऐ मुञ्ज' व्यवहार्य श्राछे कि ना। अतएव १ सरवे-ध्यप २'तस्तोत्यस्य स्थाने-'तद स्ततो'-व्यप० । ३ मुज-व्यप व्यवस्था पत्र-संख्या- शास्त्रानुसारे ए सोयालेर जवाव लिखिया दाखिल करेन इति। जवावव्यवस्था प्रभुकृतप्रश्नानुसारेण उत्तरं लिख्यते- मुञ्जस्तृणविशेषः । तयाहि कमिश्रिद्दशे वाराणश्यादौ मध्यदेशादौ, च भाषायां 'काणा' इति प्रसिद्धोऽपरः कश्चिम्मिथिलादेशादौ 'शरकाणा' इति प्रसिद्धो, वनदेशादौ शरपाता इति प्रसिद्धः, कश्चिद् दीर्घपरिमाण- स्तुणवृक्षः, तस्य पुष्पगर्भकोषावरणरूपो मुञ्ज , भाषायाञ्च 'मुन' इति प्रसिद्धः । एषं तद्व्यवहारश्च ब्राह्मणजातेमौसोनिबन्धनात्मक उपनयन संस्काररूपवैदिककर्मणि मेखलानिर्माणे। एवं स्वर्णकारजातीनां शूद्र- रूपत्वेन ताहशमुजनिम्मित मेखलाव्यवहारः शास्त्रबोधितो न भवति । यद्यद् वैदिक कर्म लोके प्रसिद्धं भवति तत्तत्सर्च तत्तत्कर्मविधायकशास्त्रा- देवेति स्वर्णकारनातेरुपनयन विधायकशास्त्राभावात् निघवचनाच मुझ- निर्मितमेखलाव्यवहारस्य निषेध एव । एवं वङ्गदेशीयस्वर्णकारजाती नां तादृशमुञ्जनिर्मितमेखलाव्यवहारो नास्येव । एवं श्रीमत्सरकार- कंपिनीवाहादूराख्यसार्वभौमराजशासितदेशानामध्ये करिमश्चिदपि देशे स्वर्णकारजातीनां मौजीनिबन्धनात्मक उपनयनसंस्काररूपवैदिककर्मण्य- धिकाराभावात् तादृशमुअनिर्मितमेखलान्यवहागे नास्तीति शास्त्रानु- सारिणी व्यवस्था। यत्र प्रमाणम्- 'मुजःशरः। इति संस्कारतत्त्वे' रघुनन्दनमट्टाचार्यव्याख्यानम् । मौजीनिवन्धनुमुपनयनम् इति–मन्वर्थमुकावल्यां द्वितीयाध्याये कुल्लूक भट्टव्याख्यानम् (२१२७) ॥२॥ मौजी निवृत् समा श्लक्ष्णा कायो विप्रस्य मेखला। .१ पर करिमश्चिर-व्यप० । २ जाताना व्यप० । मृत० भाग १ (१०१३०) ४ कुल्लु -व्यप०1५वृद-व्य० ।

ज्यवस्था-पत्र-संख्या- : क्षित्रियस्य तु मौर्वी ज्या वैश्यस्य शणतान्तवा इति मनुवचनम् (२१४२)॥ ३ ॥ दण्डाजिनोपवीतानि मेखलाञ्चय धारयेत्-इत्यादिमिताक्ष- रादिधृतयाशयल्ल्यवचनम् (१।२६) ॥४ पालाशादिदण्डमजिनं कापर्णादि, उपवास कार्यासादिनिर्मितं, मेखला मुजादिनिर्मिता मानणादिर्माचारी धारयेत् इत्यादि मिताक्षरा (पृ०६) लिखनम् ॥५ द्विजाना पोडशैव स्युः शूद्राणा द्वादशैव हि। पञ्चय मिश्रजातीमा संस्काराः कुलधर्मतः ॥ वेदव्रतोपनयनमहानाम्ना महानतम् । पिनाद्वादश शूदा सस्काराणामभन्लत इति शुद्रकमलाकर (पृ० १६) धृतशारङ्गधरवचनञ्चति ॥ श्री पतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविधावागीशेन एइ व्यवस्था दाखिल इरेजि मिसिल मुजेर सोयालेर' . श्रीहरिः शरणम् जवावा :: श्रीजयतितराम ६-रोवकारि मिशिल आदालत देमानी सदर इगरेजी १८२५ साल तारिख ४माह जाननोरि मतावक वागला १२३१ माह पीप रोज मगलवार आदालत मजकुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी प्रशमिट साहेवेर पेठके- १सभोयालेप-एप।

यवस्था-पत्र-संख्या-
श्रीमति हेमलता चौधुरानी
'पापीलाण्ट
श्रीमति पद्ममणि
रप्पाडण्ट
आपीलाएटेर उकिलगण मुनशी महाम्मद पाना श्रो मुनशी
दादार यक्स ओ सदासुक पण्डित, श्री रप्पाडएटेर उकिलगण
मुनशी हसन आली ओ प्रोजरदारान राममणि दास्यार उकिल
मुनशी फकिर महाम्मद ओ गौरकिशोर मजुमदारेर उकिल
मुनशी गोलाम वतुन' ओ स्वयं गोरकिशोर मजुमदार हाजिर
हइल | मकईमा पूर्व इङ्गरेजी १८२४ सालेर जुलाइ मासेर
१४ ओ १५ ओभागस्त मासेर २१ तारिख सकले तृतीय हाकिमेर
बैठके रोयकार और प्रवनसन कोट आदालतेर कागज सकल १
लम्बर अवधि दर लम्बर पय॑न्त पडा गिया स्थकित छिल, श्री एइ
क्षण प्रामार वैठके रोवकार हइया प्रवनसन कोटेर कागज सफल
१ लन्वर हइते तथाफार फएसला पर्यन्त ओ ए आदालतेर
दाखिल होया प्रारजी मजुवात ओ जवाव श्री उजरदारान
राममणि दास्यार सोयाल ओ गौर किशोर मजुमदारेर
सोयाल दृष्टी आइल। तत्परे राममरिण दास्यार उकिलइ ये
मकईमार सम्पर्के' आपीलाएट प्रो रप्पाडएटेर कोनो सत्व ना-
करण श्री राममणि दास्यार ताहार सत्व अधिकारि थाकन योऐ
राममणि दास्यार दाखिल करा वंशावलीपन अनुसारे ऐ राममणि
आपन पितामातार धनेर उपर स्थायी होयार प्रार्थनाय विवरणे
एक कीता सोयाल लम्वरे - दाखिल करिलेक, पडा गेल.।
तदन्तर गौरकिशोर मजुमदारेर ओजरदारेर उकिल स्थाने, जे
ताहार ओजरेर सोयाल ७१ लम्वरे दाखिल पाछे,जिज्ञासा गेलो
जे तोमार मक्कार मातार नाम कि छिल, ओ से कोन सने
मरियाछे। जवाव दिलेक जे ताहार नाम नारायणि छोल, श्रो
-तुल-इति साधोयान् पाठः । २-मजुमदार-पप-1
३-सम्प-न्यप०।

२८ व्यवस्था-पत्र संख्या-8 वाङ्गला ११८८ साले श्रामार मफलेर मातामह चौधरि रघुराम- रायेर मृत्युर पर प्रामार मकलेर मातुल रामकिशोर रायेर समुखे मरियाछे। पुनार जिज्ञासा गेलो जे कोन आपीले कि निमित्ते तोमार मालेर तरप हइते भोजरेर सोयाल गुजरे नाइ। जवाव दिलेक जे श्रामार मकल ऐ रामकिशोर रायेर कन्या राममणिर पुत्र सकल एकथार मरण वाती हइते प्रज्ञात बिल, न तु या कोट आपीले ओजरेर सोयाल गुजराइत । तत्परे ऐ राममणि दास्यार उकिल स्थाने जिज्ञासा गेल जे तोमार मोकल कोट आपीले मफईमा दाएर थाकनकालीन कि निमित्ते भोजरेर सोयाल गुजराए नाइ। जवाव दिलेक जे श्रमार मकल वागला १२२५ साले वृन्दावन तीर्थे गीयाछिल, मकई मा निष्पत्तरे परे श्राशीयाछे, एकार(ण) कोट प्रापीले ताहार तर्प हइते सोयाल गुजरे नाइ। ताहार परे श्रापीलाएट ओरप्पाडण्टेर उकिलान स्थाने जिज्ञासा गेल जे पूर्व पुरुस रघुराम चौधुरि दुइ पुत्र व्यतित नारायणि नाम एक कन्याओ राखिया मरियाले कि ना; यद्यपि राखिया थाके गौरकिशोर मजुमदार भोजर- दार ऐ नारायणिर पुत्र बटे कि ना। पापीलाएटेर उकिलेरा जवाव दिलेक जे आमरा नोरायणिर वार्ता ज्ञात नाइ, एवं गौर किशोर मजुमदार ताहार कन्यार पुत्र एहाम्रो जानि ना, श्रो रप्पाडण्टेर उफिल श्रारजि करिलेक जे चौधुरि रघुरामराय कोन कन्या राखिया मरे नाइ, श्रओ ऐ गोरकिशोर मजुमदार ऐ रघुराम रायेर कन्यार पुत्र नहे, वरं कोटेर फयसलार परे ऐ मजुमदार श्रामार मोककलार तरप हइते श्रापनाके मोचारकार कहिया मकई मार सोयाल जयावर कारण आमार निकट रुजु छिल, श्री तत्कालीन आपन दौहित्रेर कोन उल्लेख करे नाइ, शेप द्वितीय पक्षेर सहित योग करिया दौहित्र मुस्व हइयाछे। रोज रदाररे' सम्प्रोयाल गुजराइया छ ।परे राम- १भोभरेर-व्यप।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-
मणि प्रोजरदारेर उकिल स्थाने जिज्ञासा गेल जे तोमार
मोफला गोरकिशोर मजुमदारेर एजाहार सत्य कहे कि
मिथ्या। जवाव दिलेक जे आमार मोकलार पाठानो वंशा-
वलि पत्रानुसारे गोरकिशोर मजुमदार यथार्थरूप रघुराम
रायेर कन्या नारायणिदास्यार पुत्र वोध हय, वरं हुकुम
अनुसारे सादा कागजे वंशावलि पत्र लंघरे गुजराइवेक ।
जाना गेल जे वाङ्गला १२०१ सालेर १४ भाद्रमासेर लिखित
पदामणि रप्पाडण्टेर दाखिलकरा अनुमति पत्र जे, कोटेर नथी
२३ लंवरे पाछे, कोट प्रापीले ताहार कोन साव्यस्त हय दाइ ।
ओ यद्यपि स्यात् इगरेजी १८१६ साले १३ आगस्त मासेर
होया ३८ लम्बर वावत केलेकटुरिर रोवकारिते रप्पाडण्टेर
पतिर अनुमतिर उल्लेख आछे। किन्तु ऐ रोवकारिर मजमुने
जाना जाय जे रप्पाडण्ट ताहार आपन कथार सत्यतार कोन
दस्तावेज तत्कालीन उपस्थित करे नाइ, ओ ताहार पति मरणेर
ति २२ वाइप वत्सर परे उल्लेख हइयाछे । अतएव अनुमति
पत्र एवं ऐ रूप आपीलाण्टेर समुर रामचन्द्र रायेर तरप हइते
लेखा जायोन एजाहारे वाङ्गला १२१६ सालेर ३ आश्विन
मासेर लिखित २८ लंवरेर एकरारनामा प्रत्ययेर किछु सत्यता
राखे ना। ओ इहाओ जाना जाइतेछे ऐ रप्पाउण्ट एइ क्षण
पर्यन्त ताहार आपन पतिर विना अनुमतिते किम्वा अनुमतिते
कोन व्यक्तिके आपन पुत्रताते लय नाइ। बाकी रहिल
उत्तराधिकारित्वेर कथा, अर्थात् ऐ जे रप्पाडण्टके द्वितीय सने
ताहार पति रामकुमार राय श्रो पतिर भ्राता रामजीवन यो
रामझमत रायेर त्यक्त धनेर मध्य फिछु आर्शिवेक किना।
श्रार जाना जाइतेछे जे उभय पक्षइ ए कथा स्वीकृत' पाछे ।
रप्पाडरटेर पति आपन पिता रामकेशव रायेर सम्मुखे मरि-
१. सिकृत-व्यप०। २. समुख्ये-व्यप० ।
मुदत

व्यवस्था-पत्र-संख्या- थाछे, ओ ताहार दुइ भ्राता ऐ रामकिशोर रायेर मृत्युर पर मरियाछे। एवं ताहायो जाना गेल जे ए मकईमा उभय पक्ष व्यतित ऐं रामकेशव रायेर कन्या राममणि ऐ रामकेशव रायर' सहोदर ज्येष्ठ भ्राता रामचन्द्र रायेर मध्यम पुत्र रामलोचन रायेरखी चन्द्रावली एइ क्षण पर्यन्त वर्तमान पाछे, श्रओ कोर्ट श्रापीलेर समस्त कागजे रघुरामराय चौधुरि(र) कन्या नारायणिर कोनो उल्लेख जे गौरफिशोर मजुमदार आपन के ऐ. नारायणिर पुत्र कहे पायोया जायना, श्रो ए श्रदालतें आपीलारट ओ रप्पाडण्टेर उकिलेरा अपनादिगेके नाराय- । गिरं उत्पत्ति हइते श्री गौरकिशोरमजुमदारेर दौहिंग्रता हइते अज्ञात जाहेर करितेछ । अतएव हुकुम हइल जे ए पादालतेर पण्डितेरा उपरेर विवरण करा वृत्तान्त ओ कोटेर नथिर २७ वरेर दाखिलि वंशावलि पत्र जे एइ मकई मार विवरण, माफिक चोध हइते छ पडिया प्रो वुझिया वगदेशेर शास्त्र अनुसारे व्यवस्था लिखिया देन जे रामकेशवरायरं पुत्र राम- कुमाररायेर अंश हइते में ऐ रामकुमारराय पितार सम्मुखे. मरियाछे, ओ ऐ रामकुमाररायेर सहोदर भ्राता रामजीवन राय ओ रामकमल रायेर हिस्सा हइते, जे तादारा पापनादिगेर पिंवार मृत्युर पर निःसन्तान मरियाछे दत्तक करणेर कथा उपक्ष्येय' पद्ममणि के स्त्रीत्व यावत किछु अशे कि ना। यदि अशें, कि परिमान अशें । उचित जे परस्व दिवस दुइ प्रहर. पर्य्यन्त एइ सोयालेर जवाव दाखिल करेन। श्री पण्डित- दिगेर जवाव दाखिल होय परे ताहार मजमुन दिष्टे उभयेर साक्षि सोननेर आवश्यक प्रो अनावश्यक विषय उचित हुकुम देनीया जाइवेक। १. समुख्दै-प्यप० । २. उपलक्ष्येन्दति साधीयान् पाठः ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-ह. श्रीजयतितराम् । एतद्धम्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेवधम्माधिकर- रग लिखितपत्र प्रतिरूपपत्रान्तर्गतप्रश्नमेवं तदाशापितवंशावलोपत्रं चावलो. क्यावगत्य च यादृशोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते--- 'यत्र रघुरामरायस्य द्वौ पुत्री, रामचन्द्ररायरामकेशवरायसंशको स्थिती। तयोर्मध्ये रामकेशवस्य प्रयः पुत्राः रामकुमाररामजीवन- रामकमलसंज्ञकाः। तेषां मध्ये पितरि जीवत्येव यद्यनपत्यो रामकुमार पद्ममणिनाग्नी स्त्रियं सरंक्ष्य मृतः, पश्चाद्रामकेशवोऽयशिष्टो द्वौ पुत्रा युत्तराधिकारिणौ संरक्ष्य मृतः, तत्र रामकेशवस्वामिकथने तु पितरि जीवति रामकुमारस्य मरणात् स्वत्वनिवृत्तेस्तत्पल्याः पञमण्याः स्वभर्तृ- पैतृकधने नाधिकारः, किन्तु प्रासाच्छादनमागित्वं स्वमरिसाधारणधने चोत्तराधिकारित्वेन यावजीवम'धिकार; एवं रामजीवनरामकमलयोर्मध्ये मातरि शङ्करीदास्यां सत्यां यद्य को मृतस्तदा तद्योग्यांशभागित्वं तन्मातु: शङ्करीदास्याः। एवं सत्यां च मातरि योमरणञ्चेत्तदा तन्मातु'यो- धनाधिकारित्वम् । एवं मृतायां च मातरि तयो'योमरणञ्च तदा यदि रामकेशवस्य कन्यायाः राममण्याः पुत्राःस्थितास्तदा तेषां तयोर्धना- धिकारः; तेषां मरणोत्तरं तदुत्तराधिकारित्वेन तन्मातू' राममण्या अधिकारः। यदि रामजीवन रामकमलयोः सतोरेव तयोर्माता शहरीदासी मृता, रामकेशवदौहित्राश्च मृतास्तदा राममण्यास्तयोर्भगिन्या न तद्ध- नाधिकार। किन्तु तयोमरणोत्तरं रघुरामरायतत्पुत्रतत्पौत्रतत्प्रपो भाणां मध्ये ये श्रासन्नास्तदानीं विद्यमानास्तेषांमधिकारः। तेषां मरणो- सरं तेषां ये उत्तराधिकारियस्तेषामधिकार' इति ‘बङ्गदेशमचलित- दायभागदायतत्त्वादिप्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- . १-यापनीयम्-व्यपः । २-तन्मातुरामण्या व्यप०1 व्यवस्था पत्र-संख्या-१० अत्र प्रमाणम्- उर्ध्व पितुश्च मातुश्च समेत्य प्रातरः समम् । भजेरन् पैतृक रिक्थमनीशास्ते हि जीवतो। इति दायभागादिग्रन्थ (४० ११) धृतमनुवचनम् (E१०४) ॥१॥ पितये परते पुना विभजेयुर्धन पितुः। अस्वाम्य हि भवेदेषां निर्दोपे पितार स्थिते इति तद्भुत'देवल- वचनम् (पृ० १३) ॥२॥ पली दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः-इत्यादि दायभागादिग्रन्थ (पृ० १५१): धृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (२१३५ ) ||३|| पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्ताभावेपिन्टदौहित्रस्याधिकारो बोदव्यः- इति दायभाग (४० २०८) लिखनञ्चति । श्रीजयवितराम् श्रीवैयनाथमिश्रा श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्री हरि शरणम् ॥ श्रीजयतितराम् १०-सदर देमानी श्रादालतेर कायेम मकाम प्रथम हाकिम श्री युत जान हरवरट हारिडटीन साहेवेर हजुर हइते ए श्रादा- लतेर पण्डितदिगेर नाम । श्याम सुन्दर महेन्द्र आपिलाएद कृष्ण चन्द्र भ्रमरवरराय पापड रप्पाडण्टेर २४ ६६ लंवरेर वावत मकई माते अंगरेजी १८२५ सालेर १-जीवितो:-व्यप। २दाय.१४ . रप्पाडएट . व्यवस्था-पत्र संख्या १० ..' १२ फियरवरी मासेर रोवकारिर लिखित ए मकईमाते मुर्दइर दाखिल करा ६५ वरेर दस्तावेज चटार अर्थात् लिसन ओ. जिला कटकेर कमिसनर साहेवेर काचारीते दाखिल होया उभयेर सोयाल यो जबाव दृष्टं सुचे उडिस्योर चलित शाखा नुसार एक समाहेर मध्ये व्यवस्था दाखिल करण निर्वन्धे सवाल एइये- लंवर २४६६ श्यामसुन्दरमहेन्द्र आपीलाएट कृष्णचन्द्रघमरवरराय यद्यपि विरोधीय राज्य ओ जमीदारिर दखिलकार राजा रामचन्द्र ऐ दस्तावेजेर मजमूने लिखन मुद्दइर निकट लिखिया थाके । तत्परे ऐ राज्य श्री जमीदारीते मुद्दइके विना दाखिल. कार करणे मरिया थाके, ऐ लिखनेर लिखित त्यागकरण अच्छियत ताहार साव्यस्त होन प्रकारे मुद्दइ सत्वेर ताहार लिखित राज्य ओ जमिदारीर दान श्री अन्छियत प्रो राजा रामचन्द्रर औरस पुत्र फुल विवाहेर वीर गर्भजात कृष्णचन्द्र महेन्द्र आसल गुदामाजेहेर उत्तराधिकारिव-सत्व असिद्धतार लिपिते ऐ सुवार चलित शास्त्रानुसारे वलवत्तर ओ गुणदायक बटे कि ना इति- श्रीजयतितराम प्रथम जवाब व्यवस्था--रामवनुविधावागीश- राशा रामचन्द्रेण मानसिंहस्य राज्ञो दत्तकपुत्रकृष्णचन्द्रभ्रमरवर- संज्ञकरय कवादिकरणार्य कृष्णचन्द्रभ्रमरवरागनिधानेऽपि यनिखित तलिखनानुसारेण दानकरणादयदकरणाच रामचन्द्रस्वत्वास्पदीभूतराज्यादौ तस्मत्वस्यागानन्तरं कृष्णचन्द्रभ्रमरवरस्य स्वत्वं जातम् । एवं गमचन्द्र- लिखना(नरोधात् दासीगर्भनातः कृष्णचन्द्रमहेन्द्रस्तु पितृदिट, अतस्त- द्राच्यादौ तस्य स्वत्वं मषितुं नाति इत्योद्देशचलितमनमिताक्षरा दिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- ३ ३४ व्यवस्था-पत्र-संख्या-१० + तत्र प्रमाणम्- प्रदान स्वाम्यकारणम्--इति मनुवचनम् (५।१५२)॥१॥ मनसा पानमुद्दिश्य भूमौ तोयं विनिःक्षिपेत् । विद्यते सागरस्यान्तो दानस्यान्तो न विद्यते ॥ इति नारदवचनम् ॥२॥ भूमि दत्त्वा तु यः पत्रं कुर्याचन्द्रार्कसाक्षिकम् । अनाळेद्यमनाहार्य दानलेख्यन्तु तद्विदुः ।। इति वृहस्पति( पृ० ६१)- वचनम् ॥३॥ पितृद्विट पतितः (पएढी) यश्च स्यादौपपातिकः । औरसा अपि नेतेऽशं लभेरन् क्षेत्रजाः कुतः।। इति नारदवचनञ्च इति (पृ० १६५) ॥४॥ श्रीहरिः शरणम् श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीजयतिराम द्वितीय व्यवस्था--- ---बैद्यनाथमिश्र- एतद्धर्माधिकरणप्रथमाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुक्तमानहरवरदहारिण्टीन. सादेवधर्माधिकरण लिखितमश्नपत्रमवलोक्य यादशमोधो मातस्तदनु सारेयोत्तरं लिख्यते। प्रभोगशापितवादिप्रतिवादिनोः प्रश्नोत्तरपत्रार्थपरिज्ञानेन राशा २.दानमग्वे नारद--(पृष्ठ० १२) । तत्र "दानस्यान्तो न विद्यते इत्यस्य स्थाने "तस्यान्तो पिडेवि पाठ! १. ०-०-३१४ । तत्र "चन्द्रासायिकम्। यिस्क रथाने "चन्द्रा- कालिकम् इति पाठ। "alke. यस्य स्थाने "तभूगु इति पाठ: न्य महे। ३. चार-१० १६५ । तत्र "औरमाग इत्यस्य स्थाने "मोरसा." इति पारः। TV व्यवस्था-पत्र संख्या-१० . बिलोचनसिंहेन फूलविवाहितायां नियामुत्पन्नो राजा रामचन्द्रः शौर्यरए तदुचराधिकारिविन वा समस्तमेव पैत्रं राज्यं प्राप्य कतिपयदिनान्युपभुन्य फुलविवाहितायां स्त्रियां कृष्णशरणनामानं कृष्णचन्द्रमहेन्द्रप्रसिद्ध पुत्रमुत्राय कृष्णचन्द्रभ्रमरवरस्यैतद्धर्माधिकरणप्रतिवादिनोऽन्तिके चर्चावसंज्ञक पत्र प्रेपयित्वा मृत इति ज्ञातम् । तत्र यदि तद्देशे फूलविवाह शब्देन शास्त्रोकगान्धर्वविवाह उच्यते तदा गान्धर्वविधाहसंस्कृतायां पल्यामुत्पन्नो राजा रामचन्द्रः स्वपितु: मुख्य एवौरसः पुत्रः, तथा रामचन्द्रस्य फूलविवाहितायां स्त्रियामुत्पन्नः कृष्णचन्द्रमहेन्द्रो मुख्य एयौरसः पुत्रः । यदि च तद्देशे दास्पेय फूलविवाहिताशब्देनोच्यते तदा दास्यामुत्पन्नो' राना रामचन्द्रस्तथापि स्वपितुरोरस एव । उभयया राजा रामचन्द्रः शूद्र एव । शूद्रेण विवाहितायां स्त्रियामुत्पन्नो दात्यामुत्पन्नश्च धनाधिकारी भवत्येव । सति पुत्रायन्वये धनाधिकारिणि विद्यमाने सर्वस्वदान तदनन· मत्या क्रमागतस्वाचितस्थावरदानं चासिद्धम् । अतो रामचन्द्र प्रेषितपत्र. लिखितत्यागकरणदिवृत्तान्तेन रामचन्द्रस्वामिकराज्जादी कृष्णचन्द्र भ्रमरवरस्यैतद्धर्माधिकरणप्रतिवादिनः स्वत्वं न भवति । एवं रामचन्द्रेण फूजविवाहितायां खियामुत्लन्नस्य कृष्ण चन्द्रमहेन्द्रस्य तदुत्तराधिकारित्वेन स्वत्वनाशो न भवति-इति उत्कल देशप्रचलितमनुमिताक्षरावोरमियोदय- व्यवहारमयूखप्रमृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- तत्र प्रमाणम्- एक एवोरसः पुत्रः पित्र्यस्य वसुनः प्रमुः--इत्यादि मनुवचनम् (६१६३)।।। स्वं कुटुम्बाविरोधेन देयं दारसुताहते। १. कृष्णनन्चच्यप० । २. उत्स्य-यए। ३. "चटार" इत्यपि मपितुमईति । ४. उतपत्रोक्यप ५.विवादितया व्यप। ६.न्यनये-व्यप।

व्यवस्था-पत्र संख्या-११ नान्वये सति सर्वस्वं यथान्यस्मै प्रतिश्रुतम् ॥ इति मिताक्षरा-चौर- मित्रोदयादि (पृ० ६५१ अन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (२५) २॥ पुत्रपौत्राद्यन्वये विद्यमाने सर्व धनं न दद्यात्-इति मितादरा- (पृ. २४५)लिखनम् ॥३॥ स्थावरे तु स्वाणिते पित्रादिप्राप्ते' च पुत्रादिपारतन्त्र्यमेव~- इति मिताक्षर( याच० २।११३ पृ० २०० )लिखनम् ॥४॥ जातोऽपि दास्यां शूद्रेण कामतोऽशहरो भवेत् । मृते पितरि कुर्यास्तं प्रातरस्त्वर्द्धमागिकम् ।। अमातृको हरेत्सर्व दुहितया सुताहते-इति मितादरा- वीरमित्रोदयादिमन्यधृतमाशवल्क्य(२।१३३-४ पृ. २१६)वचनश्चेति। श्रीजयवितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीजयतितराम् ११ एइ मकई माते प्रथमेते श्रीयुत कुर्टनी इशामिद साहेब द्वितीय हाकिमेर बैठकेते सोयाल । एइये सोयाल- जेला साहावाद साकिनेर एक व्यक्ति हिन्दु आपन सहोदर भ्रातार पुत्रके पुत्रताते ल इलेक । ताहार पर ए व्यक्तिर औरस पुन जन्मिल | ऐ व्यक्तिर मृत्युर पर ताहार त्यक्त धनेर मध्ये १. नागरे-यप। २. प्रतिपार-व्यप। ३. सकुटुम्बस्रोिधेन-पप० । ४. पुत्रपौत्रयपनये-यप १.साजिरे त्रादिक-पप।

व्यवस्था-पत्र संख्या-११ औरस पुत्र कि परिमान ओ दत्तक पुत्र कि परिमान पाइवेक, उचित-ये अतिशीघ्र एइ सोयालेर जवाव ऐ देशेर शास्त्रानुसारे दाखिल करेन इति । श्रीजयतितराम जवाब-व्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनोहरामिटसाहेवधर्माधिकरण- लिखितमश्नपत्रमवलोक्य यादृशवोघो वातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यत्र कश्चित् हिन्दूजातीयः शाहावादप्रदेशीयः सोदरभ्रातृपुत्रं दचकत्वेन गृहीत्वानन्तरमौरसपुत्रमेकमुत्पाच मृतः, तत्र तदीयसमस्तस्थावरास्थावरपन चतुर्दा विभज्य भागत्रयमौरसः पुत्रो गृहीयात्, दत्तकपुत्रस्त्वेकं भागं गृहीयादिति शाहाबादप्रदेशादिचलितमिताक्षरादत्तकमीमांसा दिगन्थान- सारिणी व्यवस्था इति । तत्र प्रमाणम्- तस्मिश्चेत् प्रतिगृहीते औरस उत्पद्यते । चतुर्थभागभागी स्यात्"दत्तकः ।। इति मिताक्षरा( याश०२१३२) दत्तकमीमांसादि(द०मी० १०३)धृतवशिष्ठवचनम् ॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरि शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामवनुशर्मविद्यावागीशेन १.नात्पुत्र-ध्यप०॥ २.मीर:-ज्यप.1 ३. गृहीत-व्यर० । ४. दत्तमीमांसा–व्यप० । ५. उापयते-च्या० । ६. सस्मिन् दसके प्रतिगृहीते यद्यौरस उत्पघट सदा दरकवतुर्थाशं लभवे न समा- शमित्यर्थः इति द०मी० पाठः।

व्यवस्था पत्र संख्या-१२-१३ श्रीजयतितराम् सोयाल- १२-योगि जातिर स्त्री स्वामिर मरणेर पर चापन इच्छा स्वामिर सहित दग्य हाते पारे किना। जवाब-व्यवस्था योगिनातेः सी स्वामिमरणानन्तरं स्वेच्छया स्वामिसहगमन क महतीति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन एर व्यवस्था दासिल रेजेष्टर मेषनाटन साहेयेर निकट । श्रीहरिः शरणम् श्रीजयतितराम' १३--मनोयाल- रामकृष्णेर पारि पुत्र, यह पुत्र रामहरि, द्वितीय रामचन्द्र, तृष्ठीय पुत्र राममोहन, पतुर्थ पुन रामकान्त । नाहार मध्ये राम- हरिर आपन ऐ तिन भ्राता पो पिता मर्तमाने दुइ पुत्र रासिया- मृत्यु हय । रामहरि पापन उपार्जन द्वारा धन समय करिया दुइ पुप्रेर नामे उडल अर्यात' विभागपत्र करिया देन । राम १.निमार-41 १.परमाने सामान पारः।

૨ व्यवस्था पत्र संख्या-१३ ३६ कृष्ण ओ रामचन्द्र पो राममोहन ओरामकान्त प्रत्येके एइ धनेर अंशेर दाोया करे। यद्यपि ऐ धन रामहरि अापन धन ओ श्रापन सरीरायास द्वारा उपार्जन करिया थाके, ताहाते ताहारा किम्बा के के, एवं ताहादिगेर मध्ये कोन व्यक्ति ऐ धनेर कत अंश पाइते पारे । यद्यपि ऐ धर पितार धन ओ ताहार सादाज्य- ताते एवं सुपारिप द्वारा उपार्जन करिया थाके ताहाते साहारा कि रूप अंश पाइवे । एकान्न किम्बा पृथकान थाकिले ऐ धन ग्रहणेर कि विशेष इति । श्रीजयतितराम जपानव्यवस्था प्रभुकृतप्रशानुसारेणोत्तरं लिख्यते ! यत्र चतुराणां सोदरभ्रातृणां मध्ये एको भ्राता पृथगन्नस्थितोऽपृथगनस्थितो वा विद्यमाने पितरि विद्यमानेषु त्रिषु भ्रातृपु चास्मदर्जितममस्तधनमस्मत्पुत्रयोरित्यभिप्रायेण विभागपत्रं कृत्वा मुतस्तत्र यदि तदनं यदि पितृधनोपघातेन पितुः शरीरायासेन वा उपार्जितं स्यात्तदा तदुपातिसमस्तपनास्याचभागित्वं चिनुरवशिष्टाचभागस्य पञ्च भागान् कृत्वा भागद्वयमुपाकस्पैकैको मागप्रयाणा भ्रातृणाम् । यदि च पितृधनानुपपातेन पितुः शरीरायामव्यापारव्यतिरेकेणोपार्जितं स्यात्तदा तद्भातणां न तद्धनाधिकारः, किन्तु समुदायद्रव्यस्पार्द्धभागित्य पिनुरमा- गित्वमुपार्ज कस्य । उमयपक्ष एयोपार्नकपुत्र योरुपाकमागभागित्वम् इति बङ्गदेशप्रचलितदायतत्वादिग्रन्धानुसारिणी व्यवस्था । अन प्रमाणम्। द्वय शहरोऽर्धहरो या पुत्रचित्तार्जनासिता इति दायभाग(पृ ४६, २०६५ )दायतमादि( दात-२४,५)- अन्यधृतकात्यायन( पृ८५१)बननम् । १. साहाय्यता-इति साधीयान् पाठः । २. योजयतितराम्-न्यप० । ३. रमदुजतन्यप० ।

४० व्यवस्था-पत्र-मंख्या-१४ तन पितृद्रव्योपघातेन पुत्राजितवित्तस्या, पितुरर्जकस्य पुत्रस्योश- द्वयमितरपामेकाशिता', अनुपधाते पितुरंशद्वयमकस्यापि तावदेव इतरेपाम शिवम्--इति दायभाग(पृ. ५१ २१७१ ) मन्थलिखितेत. दूचनव्याख्यानञ्चेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीहरिः शरणम् श्रीजयतितराम् १४--लम्बर २३३६ रोवकारि मिसिल श्रादालत देओयानी सदर इरेजी सन १८२५ माल तारिख ५ माह आपरेल मतायक वाङ्गला मन ५२३१ साल २४ चैत्र रोज मङ्गलबार श्रादालत मजकुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुन वुटनी इशमिट साहेवेर बैठके- प्रियागसिंह पापीलाएट अजध्यासिंह रप्पाडएट श्रापीलाएटेर उकिलगण मुनमी महम्मद पनाह ओ लाला श्रायुधलाल' श्रो रप्पाडण्टेर उकिलगण नवि नेयामत पाली विद्यमाने आइल । माईमा गेवकार हइल । कोट पापीलेर दाखिल होया कागज लम्बर हइते तथाकार फयममा पर्यन्त ओए आदालते दाग्निल होया भारजि मजुवात ओ जबाय प्रो २३३६ लम्बरे मकई मार कागजमकल पडागेल । तदपर आपिलाएटेर १. काशताव्यर। २. आयुश्नालायुक्तालयप।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४ उकिलेरा सनहिसिंह श्रो मुसम्मात पाना श्रापीलाण्ट वालमुकुन्द रप्पाडण्टेर मकद्दमाते इंरेजि १८१३ साले २० आपरेल मासेर होया एक केता फयसला(र) नकल प्रो जिला निहोटेर देओयानी आदालतेर पण्डितेर एक केता व्यवस्थार नकल ओ जिला साहा- वादेर देखोयानी श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्थार नकल छय टाका मूल्येर फेरस्त द्वारा लम्बरे दाखिल करिल दृष्टे प्राइल । तत्परे ए आदालतेर पण्डित दिगेर स्थाने सोयाल करागेज पइ वयाने जे जिला साहावाद साफिमेर एक व्यक्ति हिन्दु आपन सहोहर भ्रातार पुत्र के पुत्रताते इलेक । ताहार पर ऐ व्यक्तिर औरस पुत्र जन्मिल । ऐ व्यक्तिर मृत्युर पर ताहार त्यक्त धनेर मध्ये पोरस पुत्र कि परिमात ओ दत्तक पुत्र कि परिमान इवेक । उचित जे अतिशिघ्र एइ सोयालेर जबाव ऐ देशेर शास्त्रानुसारे दाखित करेन इति । सन १८२५ साल इशारेजी तारिख ५ आपरेल यथा पण्डितेरा जवाव दाखिल करिलेक, ताहार तरजमार विवरण एइ ये, यद्यपि जिला साहावाद साकिनेर एक व्यक्ति हिन्दु पापन सहोदरभ्रातृपुनके अपन पुनताते लइलेक। यो तत्परे ऐ व्यक्तिर औरस पुत्र जन्मिलेक । ताहार मृत्युर पर ताहार स्थावरा- स्थावर समुदाय धन चारि अंश हइया, ताहार मध्ये हइते तिन अंश ताहार औरस पुत्रके यो एकांश ताहार दत्तक पुत्रके वचिवेक । जिला साहावाद ो गयरहेर चलित मिताक्षरा ओ दत्तकमीमांसा प्रभृति ग्रन्थानुजाइ एइ व्यवस्था। इहार प्रमाण मिताक्षरा दत्तकमीमांसा ग्रन्थसकलेर लिखित वसिष्ठमुनिर वचन | अर्थ एइ--यद्यपि कोन व्यक्ति प्रथम दत्तक ग्रहण करिया थाके छो तदपरे ताहार औरस पुत्र जन्मे, से प्रकारे ताहार मृत्युर पर दत्तक पुत्रके चतुर्थ अंश वर्तिचेक इति । यथा ए १. मपिर-व्यप०! २. दत्त-व्यप.1 ४२ व्यवस्था-पर-संख्या-१४ - प्रादालतेर पण्डियदिगेर जवाव अनुसार उचित छिल जे कोटेर डिगरि रप्पाडण्टेर दाविर श्रद्धेकेर, कारण जे पूर्व हइते अर्द्धक स्यक्त धनेर पर दखिल आछे, हइतो। यो वृत्तान्त एइ ये आपील श्रादालतेर पण्डितेर जवाव अनुसारे दामओयार तिन एवं चौथा- इर डिगरि हइयाछे। पण्डितेर स्थाने आपीलेर हाकिमेर सओ- यालेर क्यान-जद्यपि हिन्दु जाति कोन व्यक्ति आपन धातु प्पुनके दत्तक करे, श्रोताहार दत्तक करणेर पर दत्तकग्रहीत- स्वीर एक पुत्र जन्मे । अतएव ए प्रकारे ऐ व्यक्तिर त्यक्त धनादि दत्तक ओरस' पुत्रेर सहित शास्त्रानुसारे कि प्रकार विभाग हइवेक । कोट प्रापीलेर जवावे(र) तरजमार विवरण- इहार मिताक्षरा श्रो व्यवहारमयूख प्रभृति शास्त्रानुसारे ऐ व्यक्तिर त्यक्त धनके दुइ अंश करिया परे एक अंशके चारि अंश करा जावेक । सेइ चारि अंशेर एकांश दत्तक पुत्रके वत्तिवेक, प्रो अवशिष्ट समुदाय त्यक्त धन ऐ औरस पुनेर सत्व वशिष्ठमुनि मो कात्यायनमुनिर कथित एइ कथा । अतएव हुकुम हइल ये एइ रोयकारिर नकल ए श्रादालतेर पण्डितदिगके समर्पन करा जाय । ये आपिल श्रादालतेर पण्डितेर जवावे ये तदनुसार मृत व्यक्तिर समस्त धन मध्ये सोलो अनार चोर्द्ध थाना औरस पुत्रके ो दुइ श्राना दत्तक पुत्रके वर्ते-शुद्ध वटे कि अशुद्ध, श्रो यदि शुद्ध हय, तवे कि प्रकारे ऐ श्रादालतेर पण्डिरादिगेर व्यवस्थाते सम्यक धनेर तिन चौथाइ, ये सोल पानार चार आना हय, औरस पुत्रे(र) सत्व, श्री चतुर्थांश' अर्थात् चारि पानार १.कापन भारन-व्यप० । २. फोरम-निकासीयान पाठ। ३. मृत्यु- यर.1 ५. पर्याश-न्य -- .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४-१५ ४३ दत्तक पुत्रेर सत्व लिखियाछे। उचित ये कल्य दुइ प्रहरेर मध्येः एइ सोयालेर जवाब दाखिल करेन इति । श्रीजयतितराम् जवावच्यवस्थापत्र। एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्श्रीयुतकुटनोहरामिटसाहेवधर्माधिकरण लिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य याहशयोघो जातस्तदनुमारेणोत्तरं लिख्यते। एतद्विवादविषये कोर्टश्रापीलाख्यधर्माधिकरण नियुक्तपरिडतेन यत्तत्स्थानाधिपतिकृतप्रश्नोत्तरव्यवस्थापये दत्तकपुत्रस्य ग्रहीतृधनाष्टमांश- भागित्वं लिखितम्, तलिखिोतवशिष्ठवचनकात्यायनवचनाम्शमेवमिदानी तद्देशप्रनलि तमन्यैश्च नायाति । तथा हि तल्लिलितवचनयोर्मध्ये वशिष्ठ वचनस्यायमर्थः-दत्तकपुत्रे गृहीते सति यद्यौरसपुत्र उत्पद्यते तदा दत्तकपुत्रश्चतुर्थभागभागीति, एवं कात्यायनवचनस्यायमर्यः--ौरसपुत्रे उत्पन्ने २ सति दत्तकादयः पुत्राश्चतुर्थाशमागिन इति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीहरिः शरणम् श्रीजयतितराम्' १५--रोवकारि मिसिल आदालत नेजामत इङ्गरेजी १८२५ साल तारिख ६ माह जुन मसावक सन १२३२ वागाला २५ माह १. लिलिया केप्याप०। २.उतपन्ने-व्यप०॥ ३. श्रीज यति-व्यप।

व्यवस्था पत्र संख्या-१५ ज्येष्ठ रोज सोमवार श्रादालत मजकुरार प्रथम हाकिमेर काएम मोकाम श्रीयुत कुर्टनी इशमिद साहेवेर बैठके। धर्मचन्द्र पो गयरह सायेलान साएलदीगेर उकिल मदासुकपण्डित हाजीर हइल । भौजे भूलुपुरेर मण्डलहायेर पुजारि-फर्मे भोजकजाति ओ शिव- नर्माल्य-प्राहक कालुरामेर वहालि विपये अन्य २ वयान सम्वलित सहर वारानशेर मेजष्टर साइव प्रो एलाका वारानशेर दायेर सायव आदालतेर द्वितीय हाकिमेर हुकुमसकलेर नारा- जीते सायेलदिगेर सोयाल, हुलासीराम ओ मानिकचन्द्रर नामिक मुक्तारनामा यो ऐ उकिलेर नामिक प्रोकालतनामा ओ इङ्गारेजी सन १८२० सालेर ५ ओ १६ मेइ ओ सन १८२३ सालेर ३१० आक्तुबर यो २ दिजम्बर ओ १८२४ सालेर गार्च मासेर लिखित सहर वारामशेर फौजदारि श्रदालतेर ६ कीता रोवकारिर नकल इगरेजि सन १८२४ सालेर ३ परेल यो सन हालेर २६३१ मार्च श्रो २८ श्री ३० धापरेल मासेर होया एलाका वारानशेर दायेर सायेर श्रादालतेर ६ फेता रोवकारिर मकल श्रो ४ फेता एजाहारेर नकल ओ ६ फेता दरखास्तेर नकल इत्यादि दस्तावेजा सहित, जे हाल मासेर ४ तारिख दाखिल हइयाछील, ताराचन्द्र ओ लालचन्द्रेर इकिल मुनशी हसन आलीर हाजिरिते, जे आपन नामिक नाहादिगेर पते ओकालत- नामा दाखिल करिलेऊ, दरपेश हइया दृष्टी पाइल ! वदपरे सायेल. दिगेर उकिल पण्डितदिगेर' व्यवस्थार तरजमाय नकल इगरेजी अक्षर ओ पाठे दासिल फरिलेक, पडागेल । परे जिज्ञासा गेल जे उभयेर मानित शालिपदीगेर हाल सालेर जानओरि मासेर २१ तारिखेर पाठानो कैफियत फोता। जबाव दिलेक 'मजूद नाई। १.परिटा पण्डित-~IR 1 व्यवस्था पत्र संख्या-१५ पुनराय जिज्ञासा गेल जे पाठशालार पण्डितेरा एमत लिखेन नाइ जे कालूराम पूजारिर वहालिर योग्य नहे, वरं एइ लिखिया छेन जे कोनो व्यक्ति भोजक पूजारि थाकने शास्त्रानुसारे हानि नाइ ।पार एइ लिखियाछेन जेअतएव देवालय स्वतंत्र की साधारण थाकनेर विवरण प्रामारदीगेर निटक प्रकाश नाइ । यदि साधारण हय ओ अतएव ओ कालूरामके रहित करावार योग्य जाने, रहितेर योग्य वटे, ओ यदि वहाल राखनेर योग्य जाने, वहालिर योग्य वटे। अतएव जिज्ञासा जाय जे तोमार मनोकालेर सोयाले कि निमित्त व्यवस्थार मजमुनेर व्यविक्रम लिखियाछे। जवाव दिलेक जे सोयाल लिखन पर्यन्त व्यवस्था पहुँछिया छिल ना। परे व्यवस्थार इगरेजीर तरजमायजे दिगम्बरि- दीगेर ओ सेतम्बरिदिगेर देवालय साधारण हय , कि स्वतन्त्र, ओ यद्यपि साधारण हय, साहार पुजारि रहित ओ नियुक्त करण एक श्रेणीर क्षमताते हइते पारे, किम्बा दुइ श्रेणारेइ क्षमतार आवश्यक राखे । थार कोन व्यक्ति भोजक जाति होन प्रकारे ऐ. देवालयेते तहाफे पूजारि होनेर निषेध शास्त्रानुसारे वोध हय कि ना । उचित् ये सायेलदीगेर सोयाल ओ एइ रोवकारि श्री इङ्गारेजी १८२४ सालेर ६ मार्च ओ १८२३ सालेर १० आक्तुवर मासेर लिखित सहर वारानशेर फौजदारि आदालतेर रोवकारि ओ सन हालेर २९ मार्च ओ २४॥३० आपरेल होया वारानशेर कोट सरकटेर रोवकारि अवगत हइया ऐ सोयाल सकलेर जवाव बुधवार पर दिवस दुइ प्रहर पन्तयं दाखिल करेन इति । १. पर्यन्त-प्रति साधीयान् पाठः ।

४६ व्यवस्था-पत्र संख्या-१५ श्रीजयतितराम्' जवाब-व्यवस्था एतद्धार्माधिकरणप्रथमाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुक्तकुटनीदशमिट- साहेवधर्माधिकरणलिखितप्रश्ननिरूपपत्रमेयं तदाशापिततधर्माधिकरण वादिना प्रश्नपत्रम् अगरेजीशन्दप्रतिपाद्य चतुर्विशत्यधिकाष्टादशशताब्दीय .मार्चमामीयपष्ठदिवालिखितत्रयोविशत्यधिकाष्टादशशताब्दीयाक्तूबरमासीय- दशमदिवसलिखितवाराणस्यधिकरणफौनदारिसंशकधर्माधिकरण लिखित विचारपत्रपञ्चविशत्यधिकाप्टादशशतान्दीयमार्चमासीयोनत्रिंशद्दिषसोयता. शान्दीयाष्टाविंशतिदिवसीयत्रिशदिवसीयापरेलमासीयवाराणस्यधिकरणक कोटसरफटसंज्ञकघरमाधिकरणलिखितविचारपत्राणि चावलोक्य याश- बोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । उपरिलिखितपत्राणामनिवगत्य वादिप्रनिवादिनोईयोरेव पारश- नायाख्यदेवोपासक्त्वमिति निश्चितम् । पारशनायाख्यदेवोपासनाच धर्मशास्त्र में क्वापि लिखितेति । पारशनायाख्यदेवोपासकान्तर्गतयोदिगम्बर श्वेताम्बरयोस्तद्देवालया साधारणा, पृथक् पृथग्देवालयद्वयं वेत्यत्रापि घर्मशास्त्रालिखितत्वेन धर्मशास्त्रानुसारेण तद्देवालस्य साधारण्या माधारयनिधयो भवतु नाईति । परन्तु पञ्चविंशत्यधिकाशादशशताब्दीय. मार्चमासीयोनविंशदिवसीयवाराणस्यधिकरणक-कोर्ट सरकट संज्ञक-धर्मा धिकरणलिखितविचारपत्रेण विवादास्पदीभूतमन्दिरद्वयमध्ये एक मन्दिरं दिगम्बरायाममाधारणमित्युभयवादिसिद्धमिति गम्यते। ततस्तस्मिन्न. १.मोज यतिनराम्-व्यप। २.दारानस्यधिकरणा-यप० । ३.पवायर०॥ ४.०ए-यप.1 ५ धर्मशालपितले नायप) ६. एकं एवं-स्य -व्यवस्था-पन्न-संख्या-१५ साधारणे मन्दिरे पूजकनियोगकरणं दोपसहितपूजकत्यागकरणं च दिगम्बरा पामिच्छया भवति । द्वितीयञ्च मन्दिर तयोर्द्ध योर्मध्ये कस्यामाधारणं भवतीत्युपरिलिखित- पत्र वगम्यते इति । द्वितीयं मन्दिरं तयोर्द्वयोः साधारगां चेत् तदा तत्र पूजकनियोगकरणं दोपसहितपूनकस्य त्यागकरणच तयोयोरे। वेच्छया भवति । यदि च तयोर्मध्ये एकस्यासाधारण तन्मन्दिरमिति निश्चयों भवति तदा यस्यासाधारणं तन्मन्दिरं भवति तदिन्छयैव तत्र पूजकनियोग- फरणं दोषष्ठहितस्य पूजकस्य त्यागकरणमिति लोके व्यवहारसिद्धमपि । श्रय च..धर्मशास्त्रोक्तभूर्जकएटकजातीय एव लोकभाषायां मोनक आति- शब्देन प्रसिद्धः। स न मूर्जकएटका पोडशवर्षपर्यन्तमुग्नयन- -संस्कारहीनस्वरूपवाल्याद्' ब्राह्मण्यामुत्पन्नो' भवति (कुल्लूकः--मनुः-- १०।२१) । नात्यस्य तूपनयन संस्कारहीनत्वेन पतितत्वाद् ब्राह्मण जात्युक्त- कर्मानहत्यम् । अतः सुतरां प्रात्योत्पन्नस्य भूर्ज करटकशब्दवाच्यत्य भाषाया भोजक नातिशब्देन प्रसिद्धस्य धर्मशास्रोतवाहाण कर्मानहत्वम्-इति मनु- 'मिताक्षराविवादचिन्तामण्यादिग्रन्यानुसारेणोतरम् । तन्त्र प्रमाणा- कामादिति अत्याज्यत्यागे ऋलिजः। सहत्विक्त्यागे याज्यस्य च पराशतद्वयं दण्डः ।। सदोपस्य तु त्यागे न दोपः इत्यर्थः । इति (पृ० ३३।१५-१६ ) विवादचिन्तामणिमन्यलिखनम् ॥२॥ द्विजातयः सवर्णासु जनयन्त्यव्रतांस्तु यान् । तान् मावित्रीपरिम्रष्टान् ब्रात्यानिति विनिर्दिशेत् ।। इति मनुवचनम् (१०१२.)। १.मात्यादिमानाझ-व्यप० । २. सपना-यप। ३, ऋत्विक.०-विमा व्यवस्था पत्र-संख्या वात्यात्तु जायते विषाद पापात्मा भूर्जकण्टकः । आवन्त्यबाटधानौ च पुष्पधः शेख एव च ।। इति मनुवचनम् (१०२१)। उपनयनानस्य परमावधिमाह- आपोडशादाद्वाविंशाचतुर्विशाच वत्सरात् । ब्रह्मक्षत्रविशां कालरे ओपनायनिकः परः ।। श्रत उद्ध्वं पतन्त्येते सर्वधर्मबहिष्कृताः । सावित्रारतिता नात्या नात्यस्तोमाहते ऋतोः॥ इति मिताक्षरा- लिखनम् (या स्मृ० ११३७-३८)। श्रीजयक्तिराम् श्रीहरिः शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीजयतितराम १६--रोयकारि मिसिल अदालत नेजामत सदर इङ्गरेजी १८२५ साल तारिख २२ माह सेतम्बर मतावक वागाला १२३२ साल ७ आश्विन रोज वृहस्पतिवार आदालत मजकुरार काएम मफाम प्रथम हाकिम श्रीयुत् कुटनी इशमिट साहेवेर वैठके । धर्मचन्द्रप्रभृति शायेल सायेलविंगेर उकिल सदासुख। 'पण्डित ओ ताराचान्द, सेताम्वरिर उकिल मुनशी मुहम्मद पानाह ओ मुनशी हशन १. भाशार-श्यप, २..चवासात-यप०॥ १.कालभोरमायनिक परस्पर ४. मा.सस्तोमा कटोधिनेटि-:

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१६ . प्रालि हाजिर हइल । हुजुरेर तलव करावारानशेन (वाराणसेय) पाटशाला(र) पण्डितदिगेर व्यवस्था असुद्ध, ओ ए आदालतेर पण्डितदिगेर व्यवस्था यथार्थ थाकन ओ शायेलदिगेर श्रेणीमत कोनो भोजाक जाति ठाकूर-पूजार कर्मेर योग्य ना होन विशये ओ जती जाति पपाकर द्वाराय, जे ताहादिगेर नाम एइ दरखास्तेर निचे लेखा गियाछे, ए विपयेर ताहाकी- कातेर प्रार्थनार सायेल दिगेर शोयाल अन्य-हेतु सम्बलित, ये हाल मासेर १७ तारिखे दाखिल हइया छिल, अद्य "कार पहुच्छा, हाल शनेर १२ आगस्त मासेर लिखित वारानशेर कोर्ट शरकटेर रिटरन प्रो रोवकारि इत्यादि कागज श्री पाटशालार पण्डित- दिगेर जवाव सम्बलित पड़ा गेल । जाना गेल जे पाटशालार पण्डितेरा हाल शालेर २६ जुन मासेर हुकुम माफिक कालुराम भोजक पूजा करणेर योग्य होन विशये द्वितीय व्यवस्था लिखियाछन । अतएव हुकुम हइल ये ए आदालतेर पण्डितेरा हालेर व्यवस्था सुन्दर रूप अनुमोदने पड़ीया ताहारदिगेर तजविजे शास्त्रानुसारे याहा हय लिखिया दाखिल करेन, श्रो यद्यपि आपनदिगेर पूर्व व्यवस्थार कोन विशय परिवर्तकरण विवेचना करेन ताहार वेोरा कैफियत लिखेन, ओ सोमवार दिवस दुइ प्रहर पर्यन्त जवाव दाखिल करेन; ताहा दृप्टेर परे उचित हुकुम देोया याइवेक इति । श्रीज्जयतितराम् । जवाच व्यवस्था एतद्धम्माधिकरणप्रथमाधिपति-स्थानाभिपित्त-श्रीयुत-कुर्टनी इशमिट महेव धम्माधिकरण-समर्पित-धाराणस्यधिकरणक-श्रीमत्-सरकार-कंपिनी १. श्रादालतेरा पाटशालार हालेर-व्यप० । ..

५० व्यवस्था-पत्र-संख्या-१६ . वहादुरारज्य-सार्बभौम-पाठशालास्थ-परिडत-लिखित-व्यवस्था पत्रम- वलोक्य विविच्य च शास्त्रानुसारेण पर्यावसितार्थों लिख्यते । उपरिलिखित- व्यवस्थापत्रे यानि प्रमाणानि लिखितानि तानि विश्वम्मरवालुशास्त्रत्यानि जातिविवेकस्यानि बालम्भट्टकृताचाराध्यायस्य मिताक्षराटोकारूपमन्य- स्थानोति ?)लिखितम् । परन्तु फेयां मुनीनां तानि पचनानीति तत्र न लिखितम् । तेषां ग्रन्थानामिदानी प्रचारामावात् कुत्रापि तदनुसारेण व्यवस्था न दीयते । केनापि यद्यप्यप्रचरिततत्तद्मन्यानुसारेणैव तत्तत्पण्डिवै. व्यवस्था दत्ता । परन्तु तद्व्यवस्था लिखितवचनजातैभॊजकजातिदेवमन्दिरे देवपूजायं नियोक्तव्य इति नायाति । तथा हि मोजकजावेरुत्पत्तिप्रकार- द्वयं लिखितम् । तैतद्वचनजातैः षोडशवर्षपर्यन्तमुपनयनसस्कारहीन- स्वरूपग्रात्याद्विमाद् ब्राह्मण्यामुतन्नो भूर्जकएटकजातिरित्येकः प्रकारः। द्वितीय तस्मादेव भूर्जकएटकाद् ब्राह्मण्याम् (उत्पन्नः) यावर्तकजाति, श्रावर्तकाद् ब्राह्मण्यामुत्पन्नः कटधानजातिः, कटधानाद् ब्राह्मण्यामुत्पन्न पुष्पशेखरजातिः, पुषशेखरजातीयायां स्त्रियां ब्राह्मणेनोत्पन्नो भोजक- जातिरिति। स एव भोजको मागध इत्यनयोर्पक्षयोर्मध्ये पूर्वः पदस्तेपामभिमत- श्चेत्तदा पूर्वपक्षोक्तभूजंकण्टकस्य देवपूजार्य देवमन्दिरे नियोगः शास्त्रानु- सारेण न सम्भवति,संस्कारहीनत्य नात्यस्य सावित्रीपतितत्वेन धर्मशास्त्रोक्त ब्राझण'जात्युक्तकनिधिकारित्वात् । तदुत्पत्नस्य सावित्रीपतितत्वेन मुतरां धर्मशास्त्रोकत्राझणजात्युक्तकर्मा नहत्वम् । द्वितीयः पक्षरतेपाममिमतश्चेत्तदा द्वितीयपक्षोकभोजकजातेदेवपूजार्थ देवमन्दिरे नियोगः शास्त्रानुसारेण कदाचिदपि न सम्भवति, सावित्रीपतितः भूर्जकएटकस्यापि १. बामनो०-पर० २. जन्युक्त-म्यप। ३. फर्मनई०-या व्यवस्था-पत्र-संख्या-१६ 35156 ५१ नात्यवंशोद्भवायां पुष्पशेखरायां स्त्रियां ब्राहाणेनोत्पन्नस्य भोजकस्य तदमिमत- मागधाभिधस्य पतितस्त्रीजातत्वेन पतितत्वात, मागधत्वेन वर्णसङ्करत्वाद' धर्मशास्त्रोक्तनाझणजात्युक्तकम्मनिहत्वम् । यत्तु तैरुक्त क्वचित् पुस्तके भूर्जकण्टकस्य पूजकत्यविषये निषेधाभावाद् देवमन्दिरे देवपूजाय नियुक्तो भोजकजातीय कालुरामाख्यो निष्कासयितुमयुक्त एव, तदपि न- अत अर्ध्व पतन्त्येते सर्वधर्मवहिष्कृताः। ( यास्मृ० ११३८) इत्यादिना योगीश्वरेण, सावित्रीपतिता नात्या भवन्त्यायेविगहिताः । ( २२६) इत्यनेन मनुगा [च] धर्मशास्त्रोचवालणजात्युत्ताकर्ममात्र एव नस्यानधिकारविधानान् । यत्क्तम्-भोजकापेक्षया निकृष्टस्य देवलकादेर्धर्मशास्त्रे देवपूज- यत्वमुक्तम्, तत्र प्रमाणं किमपि न लिखितं तैरस्माभिरपि न दृष्ट छापि, अतस्तदपि हेयमेव । तरमादरमाभिलिखिता पूर्वव्यवस्थाऽस्मिन् विवादे परावर्तनयोग्या न भवतीति । श्रीजयतितराम् श्रीवैयनाथमिनेगा श्रीहरिशरणम् श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन +- [.. २.शइर०-व्यप। २.कचित-यप।

. ५२ व्यवस्था पत्र-संख्या-१७ श्रीजयतितराम् लम्बर २३०२ १७ जानकीनाथराय प्रभृति आपीलाण्टान् गङ्गागोविन्दवन्योपाध्याय रस्साडएट सोयाल सदर देओयानी आदालतेर कायेम मोकाम प्रथम हाकिम श्रीयुत फुटनि इशमिट साहेवेर हजुर हइते जानकीनाथराय प्रभृति आपिलाण्टान गङ्गागोविन्द(वन्यो )पाध्याय रप्पाडण्टेर २३०२ लम्बरेर मोकदमाते अंगरेजी १८२५ सालेर २६ जुन मासेर लिखित ए आदालतेर पण्डितानेर नामे कल्य दुइ प्रहर पर्यन्त वचन प्रमाणेर तफसील संवलित जवाव दाखिल करणे हुकुम । सवाल एइ ये:- - प्रथम सोयाल-१ यादेश निवासी एक जन ब्राह्मण श्रापन मातार त्यक्त धनेर उपर दखिल थाकिया चैमात्रेय भ्राता श्रो उत्तराधिकारि राखिया मरियाछे, ओइ त्यक्त धन स्रोफे यतिवे, कि पैमानेय भ्राताके? "द्वितीय सोयाल-२ यद्यपि स्त्रीये. चत्ते, तवे स्त्री निःसन्ताना मरिले, श्रोइ त्यक्त धन मात्रेय भ्राताके आशिवे कि ना ? तृतीय सोयाल-३ ओइ दुइ जनेर मातामह पृथक थाफन, एक मात्रय भ्रातार उत्तराधिकारि द्वितीय वैमात्रेय भ्राता हओने शास्त्रमतो निषेध आहे कि ना? शाधमो-ति लगन् पाठः।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१७ चतुर्थ सोयाल-४ यद्यपि प्रथम सोयालेर जवावानुसार मृत व्यक्तिर त्यक्त धन स्त्रीके पतिर ऋण परिशोधनार्थ श्रो ताहार स्वर्गार्थ किम्या अन्य हेतुते किम्वा आपन इच्छाओ मतक्रमे ओइ सम्यक धन किम्वा तार मध्ये कतोक विक्रय ओ हेवाकरणेर क्षमता आछे कि ना? पश्चम सोयाल-५ यद्यपि प्रपौत्र ो पुत्रेर दौहित्रेर वैमात्रेय भ्राता वर्तमान आछे, श्रोई दुइ जनेर मध्ये दौहित्रेर स्रो, ने पतिमरणेर परे ताहार धनेते दखिलकार हिलो, निःसन्ताना मरिले पर मातामहेर त्यक्त धन'कोन व्यक्तिके अर्श ? श्रीजयतितराम जवाब-व्यवस्था एतद्धर्माधिकरणप्रथमाधिपतित्यानाभिषिक्तश्रीयुत्कुटनीदशमिटसाहेव- धर्माधिकरणलिखितमभपत्रमवलोक्य यादृशबोधो जातस्तद्नुसारेणोत्तरं लिख्यते। प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- वङ्गदेशीयः कश्चन ब्राह्मणः स्वमातृत्यक्तधनं प्राप्य तखन अायत्तत्वं सम्पाद्य स्वपत्नीमुत्तराधिकारिणी स्ववैमात्रयभ्रातरञ्चोत्तराधिकारिणं संरक्ष्य मृतस्तत्र तद्धन यदि स्वमातुरस्त्रीधनं स्यादयवा तस्याः पैतृक धनमुत्तराधि-- कारित्वेन तत्संकान्तं स्याद्, उभयथाप्युत्तराधिकारित्वेन पुत्रेण प्राप्तं तदनं पुत्रमरणानन्तरं पुत्रस्य ये उत्तराधिकारिणस्तेषामेव भवति, तत्र च सत्यां पल्या तस्या एवाधिकारो न तु वैमात्रेयनातुरिति ।, व्यवस्था पत्र-संख्या-१७ . अत्र प्रमाणम्- .... पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । इत्यादि दायभागादि( दाभा १११४ )ग्रन्थधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (२११३५) । द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- प्रथमप्रश्नोत्तरानुसारेण तद्धनाधिकारिण्याः पन्या मरणोत्तरं दुहितृदौहित्रपितृमातृसहोदर भ्रातृपया॑न्ताभावे तद्धने वैमात्रेयभ्रातुरधिकार इति । अत्र प्रमाणम् प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणम् ॥ १॥ तत्रापि प्रथम सोदरस्तदभावे वैमात्रयः--इति दायभागादिग्रन्थ (दाभा०-१११५१७.) लिखनम् ॥२॥1 तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- भिन्नमातामहकपैमात्रेयभ्रातृधने भिन्नमातामहकापरवैमात्रेयनातुरधि- फारे शास्त्रानुसारेण निषेधो नास्तीति । . अत्र प्रमाणम्- द्वितीयप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणम् ॥ ३॥ चतुर्थप्रश्नस्योचरम्- प्रथमप्रश्नोत्तरानुसारेण मृतस्य धनिनः पल्या गृहीतधनायाः पतिकृतः कुटुम्बभरणार्थर्णपरिशोधनार्थ स्वशरीरधारणार्थ मतृकुटुम्बभरणार्थ पत्युरावश्यकश्राद्धाद्ययं च तद्धनविक्रयाधिकारः। एवं पतिस्वर्गार्थधनानु सारेण दानाधिकारोऽपि ! परन्तु यावद्धनविक्रयेण' पतिकृतकुटुम्यभरणार्थर्ण- परिशोधनं पतिश्राद्धादि पतिकुटुम्बभरणं स्यशरीरधारणश्च भवति तावद्धन विक्रय एवाधिकागे, नवधिकधनविक्रये। यदि च समुदायधनविक्रय १. सहदर-ध्यप। .. भ्रातरतयेत्युक्तधातुरधिपारासरे प्रथम सोदरी गृहीयादित्यर्थ ! तस्य त्वभाने सापत्नो भ्राता, एकप्रभवत्वेन तस्यापि भ्रातृशम्दार्थत्वात्। (दाभाग 1)1 - ३. भियते व्यर। .. Pay व्यवस्था-पन्न-संख्या-१७ ॥ 3 व्यतिरेकेण पतिकृतकुटुम्बभरणार्थर्णपरिशोधनादिकमेव न भवति तदा तदर्थ समुदायधनविक्रयेऽप्यधिकारः, न. तु स्वेच्छया स्वाभिप्रायेण वा समुदायधनस्य यत्किञ्चिद्धनस्य वा दानविक्रयाधिकारः । अन प्रमाणम्- 'कर्तृकामेन वा भर्ना उक्ता देयमृणं त्वया । अप्रपन्नापि सा दाप्या धन' दद्यात् श्रितं स्त्रिया ।। इति विवादभन्नार्णव (१ विवाभ०पृ०२०६) विवादार्णवसेतु(पृ० ३०) धृतनारदवचनम् (पृ० ५१ ) ॥ १॥ यदि भर्तृधनं स्त्रिया गृहीतमा(पन्ना)पि स्वीकारमकुर्वत्यपि शोध- येत् । यदि तु मृत्युकाले भ; त्वया मम ऋणं देयमित्याज्ञापिता स्वीकारं करोति तदाऽगृहीतधनापि शोधयेत्-इति विवादमगार्णव- लिखनम् ( १, पृ० २०६ ख )॥२॥ एवञ्च पत्युरोर्दध्वदेहिकक्रियार्थ दानादिकमप्यनुमतमिति-दति दाय- भागलिखनम् ( ११।१।६१)॥३५॥ वर्तनाशक्ती आधानमप्यनुमतम्, तत्राप्यशक्ती विक्रयणेमपि-इत्यादि दायभागग्रन्थलिखनम् (११।१।६२)॥४॥ रिक्थयाही ऋणं दाप्यः-इत्यादि विवादभनार्णवादि(१,४०२१४ ख) ग्रन्यतयाज्ञवल्क्यवचनम् ( २५१ ) ॥५॥ नापहारं खियः कुर्युः पतिवित्तान कथञ्चन---इति भारतात (१३१४७१२४) अपहारशब्दार्थेन यथेष्टदानविक्रयाद्यनधिकार इति दायरहस्य लिखनञ्चेति ॥६॥ १. मतु कामेन–निभसे। २. धने ययानित त्रिपा-विमरो । ३. न स्त्री पतिकृत दद्याथ्ण पुत्रत तथा । अभ्यरेताहते यता सा पत्या कृतं मरे ।। नामसं० (पृ०२४)। विवाशवसेतो धृनमिदं नारदीय वचनं नारदमनुसंहिताय बहुभिभिन्नः परेपनिन् । ४. रिक्षमा प्राय दाय-इति यारम०पाठ, कावयाग्रही व्यप० । ५. दायात-इति पाठान्तरन् । पितृवितार शनि-मोरथ. पाठः ।

ज्यवस्था पत्र-संख्या-१७-१८ पश्चमप्रश्नस्योत्तरम्- प्रथमप्रश्नोत्तरानुसारेण धनाधिकारिणि दौहित्रेवगते संति दौहित्र- मरणानन्तरं गृहीतधनायास्तसल्या मरणोतरं दौहित्रमात्रेयभ्रातुरधिकारी न तु मभुलिसितप्रभाविगतधनाधिकारिदौहित्रप्रमातामहप्रपौत्रस्य वर्तमा- नत्याधिकार इति। वनदेशचलितदायभागदायतत्त्वविवादभङ्गार्णवविवा- दार्गवसेतुमभूतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था ॥५॥ अन्न प्रमाणम्- तृतीयप्रभोत्तरविहितप्रमाणम् ॥ ३ ॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन " नंबर २७२६ १८. रोवकारि मिसिल आदालत देमानी सदर अंरेजी १८२५ साल तारिख ३ माह अगस्ति मतावक वागला १२३२ साल तारिख २० माह श्रावण रोज वुधवार आदालत मजकुरार कायम मंकाम प्रथम हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर वैठके :- मृत राजा अरिमईनशाहि श्रापिलाएट शिवदयाल उपाध्याय रप्पाडण्ट हाल शालेर १६ जुन मासेर लिखित जिला गोरकपुरेर जज साहेवेर एक किता रिटरन ताहार शामिलेर रोवकारि आदि सम्पलित लम्पर पहुँछियाछे, अद्य पडा गेलो। हुकुम हइलो ये ए आदालतेर पण्डितेरा हाल सनेर २२ जुन मासेर होया जिला गोरकपुरेर देमानी पादालतेर रोक्कारिर मजमुन बोध फरिया फल्य दुइ प्रहर पर्यन्त निवेदन करेन जे ऐ देशेर शाखा ईयवस्था-पन्न-संख्या-२८ नुसारे देलमर्दनशाहि नो समशेरशाहि. दुइ सहोदर भ्राता,., श्रो पृथ्वीपतिशाहि सहोदर भ्रातुष्पुत्र, एहार मध्ये मृत राजा अरि- मईनशाहिर उत्तराधिकारि कोन व्यक्ति वोध हय । श्रो मुनसी महम्मद पनाह ओ लाला अवधलाल ये प्रकाशे ताहादिगेर नामिक ओकालतनामा ओइ देलमईनशाहिर तरफ हइते 'पँहुछियाचे ताहा कल्पकार मिशिले दाखिल करेन इति । श्रीजयतितराम जवार-व्यवस्था एतद्धम्माधिकरणप्रथमाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतकुर्टनीइशमिटसाहेब- धम्माधिकरणलिखितप्रश्रप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशार्थबोधो जातस्तदनुसा- रेणोत्तरं लिख्यते । यत्रानपत्यः पन्यादिपितृपय॑न्तरहितो राजा अरिमनशाहिसंज्ञकः कश्चिद् व्यक्तिविशेषो दलमर्दनशाहि-शमशेरशाहिसंशको द्वौ सोदभ्रातरौ पृथ्वीपतिशाहिसंज्ञकमेकं सोदरभ्रातृपुत्रं च सरदय मृतः, तत्र तत्सोदर- भ्रातरौ दलमर्दनशाहिशमशेरशाहिसंज्ञकावेव तदुत्तराधिकारिणौ । सतोः सोदरभात्रोः सोदरभ्रातृपुत्रस्य पृथ्वीपतिशाहिसंज्ञकस्य न तदुत्तराधिकारित्व- मिति । अन राशोऽरिमईनशाहिसंज्ञकस्य मरणोत्तरं तदुत्तराधिकारित्व- विषये विवदमानानां अंगरेजशब्दप्रतिपाद्यपञ्चविंशत्यधिकाष्टादश- शताब्दीय-जुनमासीयद्वाविंशतिदिवसीयगोरखपुरसंशकप्रदेशाधिकरणकदे- मानी-यादालत-संज्ञकधर्माधिकरण लिखितविचारपत्रनिविष्टानां त्रयाणां -मध्ये राशी वदनकुमारिनानी काचित् स्त्री यद्यपि लिखिता, परन्तु तस्याः कश्चिद् वृत्तान्तस्तद्विचारपत्रे न लिखित इति सा राशी राजा-अरिमर्दन- शाहि संज्ञकस्य का भवतीति न ज्ञातः । अतएव सा राज्ञी राज्ञोऽरिमन- साहि-संज्ञकस्योत्तराधिकारिणी भवति न वैत्यपि न लिखितः। एवं तत्पत्र निविष्ठानां त्रयाणां मध्ये पृथ्वीपतिशाहिसंशकस्य धनिनो राशः सोदर- व्यवस्था पत्र संख्या-१८-१९ भ्रातूपुत्रश्वाहं राजो दत्तकपुत्रः, एवं तमलिकनामाख्यं पत्रं राज्ञा मद्य दत्तमित्यादिवृत्तान्तो यद्यपि तत्पत्रे लिखितः, किन्तु यथाशास्त्र दत्तकपुत्र- ग्रहणं तेन राजा कृतं न वेत्यस्य, एवं तमलिकनामाख्यं पत्रं तस्मै राज्ञा दत्तं न वेत्यस्य च तत्पत्र()लिखितत्वेन तस्य दत्तकपुत्रत्वादिसिद्धिर्भवति न वेत्यपि निश्चयः कतुं न शक्यत इति गोरखपुर-संज्ञक प्रचलित- मिताक्षराचीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति । थत्र प्रमाणम् पली दुहितरश्चैव पितरौ आतरस्तथा । तत्सुता:- इत्यादि मिताक्षरा (पृ० २१६ )वीरभित्रोदय (पृ० ६०२)प्रभृति- अन्यधृतयाशवल्क्यवचनम् (२।१३५ ) ॥१॥ अनपत्यस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामि सदभावे मातृगामि तदभावे पितृगामि तदभावे भ्रातृगामि तदभावे भ्रातृपुत्रगामि-इत्यादि तद्धृतबृहद्विष्णुवचनम् ( मिता० पृ० २१७; वीर० पृ० ६०३ ) ॥२॥ अनन्तरः'सपिएडायस्तस्य तस्य धनं भवेत् । इत्यादि मनु(६।१८०० वचनञ्चेति॥ ३॥ श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागी रोन श्रीहरिः शरणम् श्रीर्जयतितराम १६. प्रथम हाफिम श्रीयुत फुर्टनी इशमिट साहेवेर बैठके सोयाल एइ ये- पण्डितदिगेर स्थाने सोयाल :- १. मनन्तरसरियर व्यवस्था पत्र संख्या-१६ ये हिन्दु ब्राह्मण हय, सोदरा दुइ भगिनीके विवाह फरिया ओइ दुइ जनकेइ एकत्र आपन वाटीते राखिते पारे कि. ना; वचन 'ओ कोन अन्थेर लिखित ताहा सहित जवाब तलव इति ।.. पण्डितदिगेर आरजि सन १८२५, १३ सेतम्वर दाखिल हइल। कल्य हुजुर हइते एइ मजमुने हुकुम हइयाछे ये हिन्दु ब्राह्मण जाति दुइ सहोदरा भग्नीके विवाह करिया एकत्र ऐ दुइ जनके आपन वाटीते राखिते पारे कि ना-वचन ओ ग्रन्थेर नाम सम्वलित अामरा जवाब दाखिल करि । खोदावन्द सहोदरा दुइ भगिनीके विवाह करण ओ ताहादिगेके एकत्र आपन वाटी- ते राखन वगन्देशे सम्यक प्रकारे ओ पश्चिमदेशे कोनो स्थले चलित अछे। ये विषयेर दलिल धर्मशास्त्रेर मन्थे एइ क्षण पर्यन्त पाइ नाइ । तलाप करितेछि, पाइले हुजुरे समर्पन करा प्रश्नेर जवाब दाखिल करिव । श्रीजयतितराम जनाच-व्यवस्था एतद्धम्माधिकरणप्रथमाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेब- धर्माधिकरण लिखितम् )केनचिद् ब्राह्मणेनैकोदरप्रसूते द्वे कन्ये विबाह्य स्व. गृहे स्थापयितुं शक्यते न वेत्यर्थकप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तद्- नुसारेणोत्तरं लिख्यते । बगदेशे सर्वत्र, पश्चिमदेशेऽपि क्वचिदेकनैकोदरप्रसूते कै कन्ये ततोप्यधिकतरा' विवाह स्वगृहे स्थाप्यन्ते इति व्यवहारः । अत्र विषये २. प्रश०-यप० । २. ततोयविकाग-था।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१६ यद्यपीदानी प्रसिधर्मशास्र कापि विधिनिषेधी ने लिखितो, तथापि पुराणादौ मुनीनां ताशाचारदर्शनात्तदनुसारेणेदानीन्त- नानामपि तादृशाचारः। अतएव तत्तद्देशाचायनुसारेणैव तत्तद्देशीयव्यव. शरनिश्चयो भवितुमर्हतीति धर्मशास्त्रानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- यावत् सूर्य उदेति स्म यावच प्रतितिष्ठति । सय तद्यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ (६०) शशविन्दोर्दुहितरि विन्दुमत्यामधान्नृपः । पुरुकुत्समम्बरीपं मुचुकुन्दय योगिनम् ॥ (३८) तेषां स्वसारः पञ्चाशत् सोभरि वनिरे पतिम् । (६३९-१) वृतास राजकन्याभिरेकः पञ्चशतावरः ॥ (३२), एवं गृहे वसन् कालं विरक्तो न्यासमास्थितः । वनं जगामानुपयुरतत्सल्यः पतिदेवताः ॥ (६५३) इति श्रीभागवतीयनवमस्कन्धे सोभयुपाख्यानम् ॥ १॥ देशजातिकुलानाञ्च ये धर्माः प्राक् प्रवर्तिताः । तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा ।। इतिवीरमित्रोदय अन्य( धको०-पृ० १९४१, स्मृच पृ. धर्मास्तत्व ०-इति पाठान्तरम् , तबृहस्पतिवचनम् ॥ २ ॥ जातिजानपदान धर्माश्रेणीधर्माश्च धर्मपित् । समीक्ष्य कुलधर्माय स्वधर्म प्रतिपादयेत् ॥ इति मनुवचनश्चेति (८१४१)||३|| श्रीजयतितराम् श्रीहरिःशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यायागीन १. श्लोकोऽयोरयन ट।

व्यवस्थापन-संख्या-२० श्रीजयतितराम् सोयाल- २०. रोवकारि मिसिल श्रादालत देओयानि सदर इरेजि .१८२५ साल तारिख ८ नवेम्बर मोतावक पाइला १२३२ साल तारिख २४ कार्तिक रोज मङ्गलवार श्रादालत मजकुरार कायेम मोकाम प्रथम हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर वैट- कुन्दनगिर आपिलाण्ट दुर्गागिर ओ गायरह रप्पाडण्टान एइ सनेर तारिख १३ सेतम्बर माहार जेला कानपुरेर यजसाहेवेर एक फेता रोवकारिर सम्वलित रिटरन "लम्बरे प्राप्त हइया अद्य पडा गेल । हुकुम हइल ये ए अदालतेर पण्डितेरा एइ सनेर तारिस १० श्रागष्ट माहार गुजरान शिवराजपुरेर कायेम मोकाम थानादार सयिद कादेर आलिर पारजि दृष्टि करिया आरज करेन ये गङ्गा पाखन' यवन जातीया वेश्यार गर्भ जन्मिया ओ श्रापनार ज्ञानावस्थावधि हिन्दुर धर्म आचरण स्वीकार करिया छे, ओ ताहार पिता हिन्दु छिल, एतत्प्रयुक्त शास्त्रानुसारे हिन्दुर गणनाय प्रासिवेक कि ना, एवम् ए श्रादालतेर आरवावशरा उपरे उक्त कागज पडिया फतोया लेखेन ये ऐ व्यक्ति अपनार यवनि मातार त्यक्तधनेर उत्तराधिकारि (शरा) नुसारे हइते पारे कि ना । पण्डितदिगेर ओ पारवावशरा. प्रभृतिर (व्यवस्था) अवलोकनानन्तर उचित हुकुम देोया याइवेक इति । १.मीजयति०-या। २. वासयति सतोपान् पाठः।

व्यवस्था पत्र-सख्या-२० श्रीजयतितराम जवाब-व्यवस्था एतराधिकरणप्रथमाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतकुटनीदशमिटसाहेव- घम्माधिकरणलिखिवप्रश्नपत्रमेवं तत्समर्पित अंगरेजी-शब्दप्रतिपाद्य 'पञ्च- विशत्यधिकाष्टादशशताब्दीयागस्तिमासीयदशदिवसलिखितशिवराजपुरनाम- स्थस्थानपालप्रतिनिधि-सैयद कादर-अली संशकस्य विशसिपरमरलोक्य याशार्थबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यवना उपारलिखितप्रभपत्रसमपितपत्राभ्यां गहावाससंज्ञकस्य जातीयवेश्यागर्भजातत्वेन लिखितस्य स्वज्ञानावधि हिन्दुजातीयधा- चरणेऽपि तपितुर्हिन्दुजातित्वेऽपि हिन्दुजातावन्तर्मायः शास्त्रानुसारेण भवितुं न शक्यते । प्रत्युत' गङ्गायक्सपितुर्हिन्दुजातीयस्य उमरावगिर- संज्ञकस्य सन्न्यासिनो' ज्ञानकृतयवनीगमनेनाकृतप्रायश्चित्तस्य यवन- जातितुल्यत्वेन तत्पुत्रस्य तबन्यत्वेन यवनीगर्भजातित्वेन च भुतरां यवन- जातीयत्वमेवेति वान्धपुराख्यप्रदेशप्रचलितमनुमिताक्षरानुसारिणी व्यवस्था- इति ।" ... तत्र प्रमाणम्--- चण्डालान्त्यसियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च । पतत्यज्ञानतो विनो ज्ञानात्साम्यन्तु गच्छति ।। १. पतिाप-पर - २. प्रत्यनज्यप। ... ३, सन्मानि-या।

-~- -- इयवस्था-पन्न-संख्या-२०-२१ इति मनुसंहिता (१२१०५ )मिताक्षरादिग्रन्य धृतमनुवचनम् । श्रीजयतितराम श्रीहरिशरणम श्रीवैधनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशे एइ व्यवस्था दाखिल कागेम मोकाम प्रथम हाकिम श्रीयुत कुट इश मिट साहेवेर वैटके- २१. सदर देओयानी श्रादालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुटा इशमिट साहेवेर सोयाल- यद्यपि दुइ जन हिन्दु ब्राह्मण जाति सरिकिमते मदिरा योत्तल सकल क्रय विक्रयेर वाणिज्य करे। ए प्रकार पाणिज्य वा देशे ओ पश्चिमदेशोर शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि प्रसिद्ध यद्यपि असिद्ध हय सरिकीर शेप' हइले पर एक अंशीफे अन् अंशीर उपर ताहार लभ्येर अंश दाश्रोया अशे कि ना । उचि 'ये ए विपयेर जवाव अगौणे दाखिल करेन इति । जवाव-व्यवस्था ग्रामणजातेर्मदिरापानव्यापारः शास्त्रसिद्धो न भवति । यद्यपि निन्दितत्वे तेन कम्मरणा दूयोर्ब्राह्मणयोः संभूयकारिणोरुत्पन्नं धनम् तन द्वयोः समांश इति शास्त्रानुसारिणी व्यवस्था । तत्र प्रमागम्- याजनाध्यापनप्रतिमहैर्द्विजो धनमर्जयेत् इति दायभाग मिताक्षरा- :(पृ. ३१.२ तमनुवचनम् ( १०७६ ) ||१|| - १. वचनमिदं मिताक्षरायामुपपातकशुद्धिप्रकरणे (यास्म० ३३२६५) नोपलभ्यते २. शेष शेष-ध्यप। ३, मत्र'येर-व्यप० । ४. परणां तु कर्मणामस्य भौषि कर्माणि जोरिका। याजनाध्यापने चैव विशुद्वाच प्रसिग्रहः ।। इति मनुस्मृतिवचनम् । तथा च मिताक्षरायाम् ।। ५. दायमागे वचनमिदं नोपलब्धम् । .

व्यवस्था पत्र संख्या-२९-२२ यदा तु स्वत्वं लौकिकं तदा- असत्प्रतिप्रहादिलब्धस्यापि स्वत्वात् इति मिताक्षरा (पृ० १६८-१६६) लिखनश्चेति ॥२॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीर्जयतितराम् समोयाल २२. नानाशाखाध्यापक श्रीयुत वैद्यनाथमिश्र तथा श्रीयुत रामतनुविद्यावागीशपण्डितान् सदर देोयानि आदालत सञ्च- रिने - यदि स्यात् कोन व्यक्तिर दुइ पुत्र थाके, सेइ व्यक्ति प्रापन जीवत्माने आपनार जमीदारी सेइ हुइ पुत्रके समर्पण करे, पार ताहार कतक दिवस परे ओइ का व्यक्तिर वर्तमाने ताहार ज्येष्ठ पुत्र एक स्त्री राखिया ताहाके पोप्यपुत्र राखिवार निमित्तक अनुमति पत्र लिखिया दिया मृत्यु हय । ताहार कतक दिवस परे ओइ कर्ता व्यक्ति, अर्थात् पुत्रदिगेर पितार, परलोक हय । तवे शास्त्रानुजाय ओइ कर्ता व्यक्तिर ज्येष्ठ पुत्रेर स्त्री जमीदारीर हिस्सा पाइते पारे कि, केवल खोरपोप पाय । यदि स्यात् खोर- पोप पाय, तवे कर्ता व्यक्तिर कनिष्ठ पुनेर नाम संवलित ओइ स्त्रीलोकेर नाम सेरस्ताते दाखिल करा श्रावश्यक कि, कि प्रकार, शास्त्रानुजाय जाहा यथार्थ हय इहार विवेचना करिया अतित्व- राय प्रत्युत्तर लिखिवेन इति । २२ फिवरवरि-. .

व्यवस्था पत्र-संख्या-२२ श्रीजयतितराम जवाब-व्यवस्था-पन। प रोवडाख्यस्थानाधिपतिप्रेपितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तद- नुसारेणोत्तरं लिख्यते-~~ यदि भित्रा द्वयोः पुत्रयोः स्वस्वामिकसमस्तस्थायरास्थावरधनं समर्पितम्, ततःकिञ्चित्कालानन्तराजीवत्येय पितरि तयोर्मध्ये ज्येष्ठ पुत्रः स्वजायां प्रति दत्त कपुत्रकरणार्थमनुमतिपत्रं लिखित्वा दत्त्वा मृतः, तदनन्तरं कनिष्ठपुत्रं संरक्ष्य तयोः पिता मृतः स्यात, अत्र प्रभोः पत्रलिखितसमर्पणशब्दस्यार्थद्वयं भवति । स्वस्वत्वत्यागपूर्वकपरस्व'लापादनरूपदानम्,सत्यपि स्वस्वत्वे धनसंरक्षणार्थ- माशाकरणं च । तत्र यदि पित्रा स्वस्वत्वत्यागपूर्वकपरस्वत्यापादनरूपं दानं कृतं स्यात्तदा तद्दानेन पितुः स्वत्वापगमात् पुत्रयोरेव तदनं जातम् । श्रतो जीवत्यपि पितरि मृतस्य ज्येषपुत्रस्यानुमत्या भविणत्तत्पनीकृतदत्तकः पुत्र- रतद्धने स्वपितृयोग्यांशं लब्धुमईति । यदि तदनुमत्या तत्पन्नीकृतो दत्तक पुत्रो नेव भविष्यति तथापि दानपक्षे स्त्रीत्वेन तत्पन्यपि स्वमत योग्यांशभागिनी मयति । यदि च पित्रा सत्यपि स्वस्खत्वे घनसंरक्षणार्थमाज्ञा कृता स्यात्तदा तदाशया पितुः स्वत्वाविनाशेन पुत्रयोस्तदनं न जातम् । अतो जीवति पितरि मृतस्य ज्येष्ठपुत्रस्य तद्धनांशयोग्यताविरहेण तदने स्त्रीत्वेन तत्सल्या नाधिकारः। किन्तु पत्यनुमत्या भविष्यदत्तकस्य पितामहधने याशोऽशो भविष्यति वादशांशसंरक्षणकतृत्वेन भविष्यद्'दत्तकायापासव्यवहारकाल- पर्यन्तं राज्ञा सा नियोक्तव्या । ततः सर्वथैव कर्तुः कनिष्टपुत्रनामसहित तस्या(पि)नाम राजस्थाने वश्यं लेख्यम् इति वद्गदेशचलितमनुदायभाग- व्यवहारतत्यप्रभृतिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- १०परखत्वादान-व्यप० । २०परसत्वासादान०-व्यप! ३. भविष्यत्-व्यप।

व्यवस्थापन संख्या-२२ तन्त्र प्रमाणम्- स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकपरस्वत्वापादनं दानम्-इति ( याशवल्क्यस्मृति- टीकासुबोधिनी पृ०७४१) कुल्लूकमट्टलिखनम् ॥ १॥ न भ्रातरो न पितरः पुत्रा रिक्थहराः पितुः इति मनुवचनम् ॥२॥ (१८५)। पली दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा इत्यादि दायभागादि(दायक २२११४)ग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ।। ३ ।। (२।१३५) अस्वाम्यं हि भवेदेषां निर्दोपे पितरि स्थिते-इति दायभागादिप्रन्यकृत देवलवचनम् ( दाय ६१।१८)॥४॥ पुत्रान् द्वादश यानाह नृणों स्वायम्भुवो मनुः । तेपो पबन्धुदायादाः पडदायादवन्धवाः ॥ औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च । गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवाश्च पट् ॥ -इति मनुवचनदयम् ॥ (६।१५८-१५६) ये जता येप्यजाताच ये च गर्ने व्यवस्थिताः। वृत्ति च येऽभिको क्षन्ति वृत्तिलोपो विगहितः ।। -इति दायभागादि अन्य-, दाय-२१४५ )धृतमनुवचनम् ॥६॥ प्रभावे वीजिनो माता तदभारे तु पूर्वकः । -इति व्यवहारतत्त्व(पृ. ६४६५ )पृतनारदवचनम् (नामसं० पृ०३० २०३३)100 । १.दान-न्या. २.पुशन-स्थर ३, न्यास्ववनमिमिति धर्मकोषाहावरे, मिताक्षरायाम् (१११११) दमदृतम् । मनुस्मृती तु पतन रस्ते । मनोवैवनमिदमिति दायमागे गुल्लिखितम् ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-२२-२३ ७ अप्राप्तव्यवहाराणां धनं व्ययविवर्जितम् । न्यसेयुर्वन्धुमित्रेषु प्रोपिताना तथैव च ॥ -इति दायभाग पृ. ६२ ३११६ )पृतकात्यायनवचनाचेति || (४५) श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन पद व्यवस्था दाखिल वोरडरमनु श्रीहरिः शरणम् श्रीर्जयतितराम २३-सदर ने जामत आदालतेर पण्डितदिगेर नामे सोयाल । श्रीहनियाशि एक व्यक्ति आपन दाशी, ताहार चारि पुत्र श्रो एक कन्या सहित मूल्य निर्वार्य करिया अन्य कोनो व्यक्तिर निकट विक्रय करिते चाहे । ताहारा अर्थात् ऐ दाशी-प्रभृतिरा आदालते एइ रूप दरखास्त गुजराइलेक ये अामरा आपन मनिवेर सेवा करिते सम्मत प्राछि, तथापि पामारदिगेर मनिव शत्रुता करिया जाहार निकट प्रामारदिगेके विक्रय करिते उद्यत हइयाछे ताहार सहित एइ प्रकार याग करियाचे ये श्रामादिगेके भिन्न देशे निया पृथक २ मिन्न २ स्थाने विक्रय करे। अतएव जिज्ञासा जाय-श्रादेशेर चलित शास्त्रमते एइरूप विक्रयेर स्थाने दास- दिगेर ए प्रकार भोजर सिद्ध हय कि ना; यदि सिद्ध हय तवे ऐ दासच्यक्तिरा आपनादिगेर स्वीकारमत अन्यन्त्रक जन क्रय- को निर्दिष्ट करिते पारे कि ना; किम्वा ताहार निद्धार्य होया मूल्य यद्यपि कोन प्रकारे मजुत करिते पारे, मूल्येर टाका आदाय , करिया सालाश पाइते पार कि ना इति । १. यालने मो ऋथ रक्षे तत्तान्तुसन्धुभि. कारगृहा. ४५|| व्यवस्था पत्र संख्या-२३ श्रीजयंतितराम जवाब-व्यवस्था प्रभुकृतमश्नानुसारेणोत्तरलिख्यते--उपरि लिखितप्रभावगमेन शास्त्रो- क्तपञ्चदशदासानां मध्ये एतत्मभलिखितदासप्रमतयो गृहजाता अवगम्यन्ते । तत्र च गृहजात-क्रीत-लब्ध-दायमासात्मविक्रतणां पञ्चानां दासानां स्वामिप्रसाद विना न दास्यमोक्षः। तथा च यदि दासविक्रये प्रसन्नः स्वामी गृहजातादीनां पञ्चानां दासानां स्वकल्पितमूल्यद्वारा विक्रयेण दास्यमोक्ष मिच्छति तदा प्रभुत्वात् स्वातन्त्र्याच' स्वामिसेवा कर्तुमिच्छ- तामपि दासानां विक्रय कर्तुमर्हति । तत्र यदि स्वामिनिर्दिष्टऋतुः सकाशात स्वकल्पितदासमूल्यग्रहणे दासानामात्यन्तिकं दुःखं स्यात्तदा दासनिर्दिष्ट- केतुः सकाशादन्यस्मात् केतुः सकाशादा ददेव स्वकल्पितदासमूल्यं गृहीत्वा स्वामिनो गृहजातादिदासमोक्षण शास्त्रीययुक्तिसिद्धं भवितुमर्हति, दास- निर्दिष्टकेतुः सकाशादन्यस्मात् फ्रेतुः सकाशाद्वा स्वकलितदासमूल्यग्रहणेऽ. पि स्यामिनः क्षतिविरहात्। परन्तु गृहजातादयो दासार स्वधनात् स्वामि- कल्पितमूल्यं दवा कदाचिदपि दास्यान मुच्यन्ते दासधनेऽपि स्वामिनः प्रभुत्वात् इति वद्देशान्तर्गतश्रीहप्रदेशमचालितविवादभनार्णवदायक्रम- • संग्रहदायभागप्रभृतिमन्यानुसारिणो व्यवस्थेति । . तत्र प्रमाणम्- गृह जातस्तथा क्रीतो लब्धो दायादुपागतः। अन्ना'कालभृतस्तदाहितः स्वामिना च यः ।। १. सामन्द्रमा चयन २.विशात-व्यप.) ३. अनाकाo-~-यप। प्रशनादिनम्नदापत खा" नाममे। अनाकान- धोका व्यवस्था पत्र-संख्या-२३ मोक्षितो महतश्चर्णाद् युद्ध प्राप्तः पणे जितः। तवाहमित्युपगतः प्रव्रज्यावसितः कृतः ।। भक्तदासश्च विज्ञेयस्तथैव वडवाभृतः विकता चात्मनः शाखें दासाः पञ्चदश स्मृताः॥ -इति विवादभगार्णव (१ विवाभ० ५१६ कदायक्रमस ग्रह (४० ५२)धृतनारदवचनम् (नामसं०-पृ० ६६ ), गृहजातो दास्यामुत्पन्नः' -इति दायक्रमसंग्रहव्याख्यानम् (पृ० ५२ ) ॥ २॥ एतेषां गृहजातादिचतुर्णामात्मविकेतुश्च स्वामिप्रसादं विना न दास्य. मोक्षः-इति दायक्रमसंग्रहलिखनम् (पृ० ५४ ) ॥ ३ ॥ केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्त्तव्यो विनिरर्णयः। युतिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते ।। ----इति व्यवहारतत्यादि(स्मृतसपृ० १६६)ग्रन्थधृतबृहस्पतिवचनम् (वृस्मृ०-१११११)॥४॥ गा- पुत्रश्च दासश्च त्रय एवाधनाः स्मृताः । यत्ते समधिगच्छन्ति यस्येते तस्य तद्धनम् ॥ .. १. पाच मोक्षितोऽनल्पाद् युद्धमाप्त-नामसं । २. प्रभज्यास्त:-नामसं०1 ३. हतः-धको। ४. "मुतपन्न'-व्यप०1 ५.एवं धना'-न्यप० । १. यस्यैते तस्यैतत्-इति विवाभ० पाठः।

१० व्यवस्था-पत्र-संख्या-२३-२४ इति विवादभनार्णव(१ विवाम० ५३३कोदायमाग'दायतत्त्वादिग्रन्थ- धृतमनुवचनम् (८४१६)चेति ।। ५ ।। श्रीज्जयतितराम श्रीहरिशरणम श्रीवैद्यनामिश्रण श्रीरामतनुशम्र्मविद्यावागीशेन एइ व्यवस्था दाखिल अंगरेजी मिसिलवे दासेर विषय । श्रीजयतितराम २४-प्रभ-यत्र कश्चिद् एतावत् कालपर्यन्तमर्यादशवर्षपर्यन्त विंशतिवर्षपर्यन्तं वा तब दास्यमई करिष्यामीति परिभाष्य स्थितः, तत्र दास्यावस्थायामुत्प'नान्यपत्यानि स्वामिनो दास्यं कर्तुमर्हन्ति न वेति । यद्यहन्ति तदा पिनुर्दास्यकालपर्यन्तमधिक न्यून वेति च । एतस्योत्तरम्- प्रमुकृतप्रश्नानुसारेणोत्तर लिख्यते- एतत्प्रश्नलिखितदासः शास्त्रोक्तपञ्चदशदासानां मध्ये क्रोतदासः मीत- दासस्य मोक्षः शीतकाल'व्यपगमेनैव । दास्यावस्थायां क्रीत कोतकाल- दासेनोत्पन्नानामपि दास्यमोक्षः पित्रा सहैव-इतिशास्त्रीययुक्तिसिद्धा व्यवस्था। श्रीपतितराम् श्रीहरि शरणम् भीवैद्यनाथमिश्रेण 'श्रीरामतनुशमविद्यावागीशेन एइ व्यवस्था दाखिल याशिपटएट साहेवेर निकटे। १. न च भार्या पुश्च त्यादिवद् अस्वातन्त्र्याभिप्रायमिति वाच्यम् , तदानीं स्वत्वे प्रमाणभावा। भार्यादिषु तु यो समधिगच्छन्ति अजयन्तीति स्वत्वे सिद्ध युनमस्वातन्यवर्णनम्-ति दायमागे (पृ० १२) मनुवचनसकेत । पचनमिद दामतरवे न टम् । २.एतावता--ध्यप० । २. उतश्ना-व्यप, व्यवस्था-पत्र संख्या-२५ श्रीजयतितराम ओगयरह- - ल०२३०० २५–सदर देओयानी श्रादालतेर पण्डित्तदिगेके सोयाल करा याइतेछ। ई० १८२६ सालेर मार्चमासेर १३ तारिखे ऐ सदर देओयानी आदालतेर प्रथम हाकिम श्रीयुत श्रोलीयम नसेप्टर साहेव ओ चतुर्थ हाकिम श्रीयुत पोलीयम डोविन साहेवेर बैठके- मृत भवानीचरणचन्द्रेर उत्तराधिकारी राधावन्धवचन्द्र आपीलाण्टान- मृत गोविन्दचन्द्रचौधुरिर उत्तराधिकारी जगतचन्द्र चौधरी ओगयरह- रेप्पाडण्टान- हुकुम हइल ये मृत राजा चित्रसेनेर प्रधाना रानी श्रापी- लाण्ट ओ कनिष्ठा रानी रेप्पाडण्डेर ५३२ लम्चरेर मोकदमार ओ जगतचन्द्रसेन श्रापीलाएट प्रो केशवानन्दगोस्वामी ओग- यरह रेप्पाडण्टेर ८३२ लम्बरेर मोकद्दमार दाखिल होया दुइ फेता व्यवस्था एवं १६ लम्वरेर भवाणीचरणेर नामिक मकररी पाट्टा श्री ११ लम्बरेर गाविन्दचन्द्रेर नामिक मकररी पाट्टा ओ ऐ पाट्टाजातेर सम्पर्कीय दुइ केता रसीद ल० १७२२ तोमारदिगके अर्पण करा जाय। उचित' ये नीचेर लिखित सायालेर जोयाय ३ तिन दिवसेर मध्ये दाखिल करेन । उपरेर लिखित मोकईमार दाखिल होया व्यवस्थाते जाना थाइतेछे ये देवशेवार भूमि हइते जाहा उत्पन्न हय ताहा देवतार वस्तु पटे, ओ शास्त्रानुसारे देवतार भूमि विक्रय कि दान कि यन्यककरण सिद्ध नहे, आर केवल देवतार सेवार निर्वाह यो सरववाह होनेर अर्थ देवत्र भूमिर रक्षणापेक्षणेर क्षमता देवत्र १.उचिर-व्यप०। -- व्यवस्था पत्र-संख्या-२५ करणीया व्यक्ति अर्थात् देवत्र भूमिर रक्षक ११ श्रो १६ लम्वरेर माट्टार न्याय अन्य कोनो व्यक्तिके पुत्रपौत्रादिनमे सेलामीर टाका (देोया पूर्व य ना)। एतावता पनेर टाकार वदले मकररी जमाते मकररी पाडा देय । एमत् पाहा शास्त्रमते सिद्ध वटे, कि सेवाती व्यक्तिर ऐ पाट्टा देओनेर क्षमता माहि; ओ पाहा देओ- यानीर व्यक्तिर मृत्यु परे ये व्यक्तिके ताहार रक्षणापेक्षणकरण उत्तराधिकारित्वे अर्श से ऐ पाट्टा रहित करणेर ओ देवत्र भूमिर नूतन वन्दवस्त करणेर क्षमता राखे ना, ओ ए विपये वागलादेशेर चलित शास्त्रानुसारे किछु हुकुम कि व्यवहार पाछे कि ना ओ एमत् मोकदमार सिद्ध असिद्ध हओन एइ अर्थे ये ऐ मकईमार देवत्र वस्तुर लाभ ो क्षति हथोने सम्पर्क राखे (कि ना) इति- एतद्धर्माधिकरणप्रथमाधिपतिश्रीयुत अलीयमनशष्ठरसाहेवचतुर्याधि- पतिश्रीयुत • अलीयमडोरणसाहेवतदुमयधर्माधिकरणलिखितप्रमप्रतिरूप- पप्रमेवं तत्समर्पितव्यवस्थापत्रद्वयं षोडशाहाकितैकादशाङ्काङ्कितमकररीपाटा- सशकपत्रद्वयं तत् सम्बन्धिसप्तदशाहाशितद्वादशाका वितरसोदसंज्ञकपत्र- यञ्चायलोक्य विविच्यच यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- देवसेवार्योत्स्पभूम्यादिस्तदुत्पन्नञ्च द्रव्य देवस्वम् । देवस्वभूम्यादि- विक्रय दान-अन्धक करण क्षमता देवार्थभूभ्युत्सर्जकस्य तदुत्तराधिकारिणां वा नास्ति । फेवलं देवसेवानियाहार्य देवस्वभूम्यादे रक्षणा-वेक्षणादि- फर्तृवं यो देवसेषां कारयति स एव वनदेशे' सेवाइतशन्देनप्रसिद्धो यद्यन्यस्मै कस्मैचिद् देयाय दर्शनीयमुद्रा गृहीत्वा प्रभुसमर्पितोपरिलिखित- मकररीपाटारांशकपत्रदयलिखितरीत्या मकररीपाहासंज्ञक नियमपत्रं . १. सम्र्पक व्यप। २. भूभ्युत्सब-व्यप। ३. देश-न्य व्यवस्था पत्र संख्या-२५ ७३ wr ददाति तदा तनियमपत्रं वदेशचलितव्यवहारानुसारेण च रिद्धं भवति, नहि देवस्वभूमेमंकररीपाटासंज्ञकनियमपत्रदानं विक्रयो न च दानं न या वन्धको भवति । मूल्यग्रहणप्रयुक्तस्वस्वत्वनाशकव्यापारस्यैव विक्रयग्दार्थ- त्वेन स्वस्वत्यनिवृत्तिपूर्वकपरस्वत्योत्पत्त्यनुकूलव्यापारस्य दानपदार्थत्वेन चाधमणेनोत्तमसमीपे ऋणपरिशोधनकालपर्यन्तं विश्वासार्थ स्थापितस्य स्वकीयद्रव्यस्य बन्धत्वेन च देवस्यभूमी मकररीपादासंशकपत्रदातुः स्वत्वा' भावेन मूल्यग्रहणपूर्वकतन्निवृत्तेर्वा दानप्रकारेण वा तन्निवृत्तेरसम्भवात् , वन्धनेन स्थापनाभावाच्च । यथा राज्ञा ग्रामाधिपतिना वा स्वकीयग्राम- क्षेत्रादिः प्रत्याब्दिककरग्रहणार्थमन्यस्यै प्रजायै वा कालनियमं कृत्वा प्रकृत्वा या पुत्रपौत्रादिक्रमेण प्रत्यब्दमेता मुद्रा दत्वा त्वयैतद्ग्रामः क्षेत्रादिर्वा भुज्यतामिति नियमपत्र पाट्टासज्ञकपन मकररीपाहावंशकं वा दत्त्वा सम- यंत', तथा देवसेवायोत्सृभूमिरपि वङ्गदेशसेवाइतपदवाच्ये नोपरिलिखित रीत्या समर्म्यते' इति वद्गदेशव्यवहारः । देवस्वभूमावेतादृशव्यवहारसिद्धी सद्भमाय तिवृष्टयानावृष्ट्या या शस्यानुत्पादेऽपि नियमितद्रव्यसाध्यदेवसे- वाया अवाधः, इत्येव लाभः । तदसिद्वौ अतिवृष्टयादिदोपेण शस्यानुत्पा- दाद्देवसेवाबाधोऽपि भवितुं शनोति, इत्येव क्षतिः । एवञ्च तद् विवादे यशुपरिलिखितमकररीपाटासंज्ञकपत्रद्वयान्तर्गतपोडशाङ्काङ्कितश्री देवमुद्रा- वित नियमपत्रं तत्सम्बन्धिरसीदसंज्ञकपत्रञ्च वयदेशे सेवाहतशब्दयाच्या या राजा देवसेवार्थ दर्शनीय मुद्रा देवकोये निवेश्य पुत्रपौत्रादिक्रमेण प्रत्यब्द- मेता मुद्रा दत्त्वा भुज्यतामित्युपरिलिखितनियमपत्रमन्यस्मै कस्मैचित् पोड- १. सत्वाभावेन-ज्यप० । २. त्वयेतन्व्यप। ३. समर्पते-ज्यप ४. पदवारयेन व्यप। ५ समप्यते-ज्यप० । ६. तभूमा-व्यप०। ७. चैतन्-व्यप०॥ म. मन्यस्ये करय-व्यप० ।

७४ व्यवस्था-पत्र संख्या-२५ शाधिकद्वादशशताब्दे दत्तं तनियमपत्रेऽन्यस्याधिककरदानुरुपस्थितिं यावत् प्रतिवर्ष त्वया भुज्यतामितिलिखनाभावात् तनियमपत्रदान्या सेवाहतशन्दः वाच्याया मरणोत्तरं यदुत्तराधिकारित्वेन तस्या एव । देवसेवार्थोत्सृष्टभूमे रक्षणावेक्षणादिकर्तृवं यस्य भवति स तु तत्पत्रमकर्मण्यं कला नियम- पत्रान्तरं दातुं न शक्नोति-इति वद्गदेशप्रचलितमनुकल्लुकभकृतमन्वर्थ- मुकावलीविवादभनार्णवप्रमृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । तत्र प्रमाणम्- देवस्वं बालास्वं वा लो भेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा परे लोके गृधोच्छिष्ट न जीवति ॥ -इति मनुवचनम् ॥१॥ (१२) प्रतिमादिदेवतार्थमुत्सृष्ट धनं देवस्वम् । -इति कुल्लूकमट्टव्याख्यानम् ॥२॥ (मनु०??।२९) देशजातिकुलानाच ये धाः प्राक् प्रवर्तिताः । तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रतुभ्यतेऽन्यथा ॥ -इति बृद्दस्पतिवचनम् ॥३॥ (१।१२६) एका बन्धस्यान्यत्रबन्धदानवद् एकत्र वशीभूताया भूमेरन्यत्र यशी- भवनमयोग्यमिति भूमिसमर्पणसमये अन्यस्याधिककरदातुरुपस्थिति यावत् प्रतिवर्ष वया भुज्यतामित्येव प्रतिक्षा कर्तव्या-इति विवादमगार्णव- (१ विवाभ.० ३१०)लिखनम् ॥४॥ एका बन्धीभूतद्रव्यस्यान्यत्रयन्धकरणे परवन्धस्येव एकत्र वशीकृत- १.कुलक-व्यप! २. या मेनो-व्यर० ३. पापी परे०-० ४. नो-प ५ देशजातिलादौना ये धर्मासत्प्रवर्निता इति वृस्मृतपाठ ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-२५ द्रव्यस्यान्यन वशीकरणेऽपि प्रसिद्धिरेव-इति विवादमावलिसनञ्चति. (१ विवाभ० पृ० ३१६ क)॥५॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरि शरणम् श्रीवैधनाथमिश्रण श्रीरामतनुशम्भंविधावागीशेन च एतद्धर्माधिकरणप्रथमाधिपति-श्रीयुतश्रोलियमलसेप्टरसाहेवैतद्धर्मा- धिकरणचतुर्थाधिपति - श्रीयुतश्रोलियमडोरनबहेपैतदुभयधम्माधिकरण- लिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेयं तत्समर्पितव्यवस्थापत्रद्वयं पोडशाङ्कासितै- कादशाङ्गाङ्कितमकररीपाटासंज्ञकपत्रद्वयं, तत्सम्बन्धिसप्तदशाङ्काङ्कित' द्वादशाकाङ्कितरसीदसंज्ञकपत्रद्वयमवलोक्य विविन्य यादशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । देवसेवार्थो(सृष्टभूमिरक्षकः सेवाइतशब्देन (उच्यते)। यद्यसावन्यस्मै करमैचित् देवार्थदर्शनीयमुद्रा गृहीत्वा प्रभुसमर्पितोपरिनिधितगकररी- पाटासंशक्रपत्रदयम् लिखितरीत्या मकररोपाटासंज्ञक पत्रं ददाति तदा तन्म- फररीपाटासंशकं पत्रं वङ्गदेशचलितव्यवहारानुसारेण शास्त्रानुसारेण च सिद्धंभवति | एयञ्च तन्मकररीपाटासंज्ञकपत्रदातृसेवायितकर्तु मरणानन्तरं तदुत्तराधिकारित्वेन तस्या एव | देवसेवार्थभूमे रक्षणावेक्षणादिकर्तृत्वं यस्य भवति स यदि तन्मकररीपाटासंज्ञकपत्रेऽन्यस्याधिकफरदातु'रुपस्थिति यावत्प्रतिवपं त्वया भुज्यताम्-इति लिखनं (करोति),न चेत्तदा तन्मकरशे- पाटयसंज्ञक पत्रमकर्मण्यं कृत्वा नूतनवन्दोवस्तसंज्ञकमायामं कर्तुन शक्नोति । एवञ्च देवसेवार्थभूमौ मकररो-पाटासंज्ञकपत्रदानं व्यवहारानुसारेण शास्त्रानु- सारेण च सिद्धं चेत् , अतिवृष्ट्याऽनादृष्ट्या वा तद्भूमौ शस्यानुत्पादेऽपि नियमितव्यसाध्यदेवसेवाया अबाधा-इत्येव लाभः। तदसिद्धापतिवृष्ट्यादि- १ सप्तदशादाविततद्राशा व्यप० । २ सेवारत व्यक्त मारण-व्यप० । ३०परिधत यायत-व्यप। ४ तभूमी-व्यप० ।

व्यवस्था पत्र-सल्य-२५-२६ दोपण शस्यानुसादाद देवसेवाबाधोऽपि भवितुं शक्नोति इत्येय क्षतिः-दति वगदेशप्रचलितमनुविवादभगावप्रभृतिग्रन्थानुमारिणी व्यवस्थेति । यत्र प्रमाणम्- जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्माश्च धर्मविद । समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपालयेत्-इतिमनुवचनम् (८।४१) ॥१॥ एकत्र बन्धद्रव्यास्यान्यत्रबन्धदानवत् एकत्र वशीभूताया भूमेरन्यत्र यशीभवनमयोग्यम्-इति भूमिसमर्पणसमयेऽन्यस्याधिककरदातुरुपस्थिति- यावत् प्रतिस्पं त्वया भुज्यतामित्व प्रतिज्ञा कर्तव्या-इति विवादभगा- चलिखनम् (१ पृ० ३१० ख) ॥२॥ एकत्र बन्धीभूतद्व्यस्यान्यप्रबन्धकरणे परवन्धस्येव एकत्र वशी- कृतद्रव्यस्यान्यत्रवशीकरणेऽपि, प्रसिद्धिरेव-इतिविवादमगार्णवलिख. मति (१ विवाभ० पृ०३१६क) ॥ ३ ॥ श्रीजयतितराम श्रीहरिशरणम् श्रीवौद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशन . साल २६ सदर देमानी पादालतेर प्रथम हाकिम श्रीयुत श्रोलियम लसेष्टर साहेब यो चतुर्थ हाकिम श्रीयुन श्रोलियम डोरण साहेवेर हुजुर हइते ओइ आदालतेर पण्डितगणेर प्रति अंगरेजी १८२६ साल १० अपरेल तारिकेर रोवकारिर हुकुमानुसारे- राधावल्लभचन्द्र ओगयरह पापीलाण्टान जगच्चन्द्रचौधुरी ओ गयरह रपाडएटान पूर्वे मोफदिमासकले लंबर ५३२ ओ ८३२ धावत ये व्यवस्थासकल दाखिल हइयाछे ताहार सत्वे देवोत्तर भूमिर नुन्साशार-व्यप! २ प्रतिपादये।-मामृ० व्यवस्था पत्र-सख्या-२६ सेवाइतेर लिखित पुत्र-पीनादि क्रमे मोकररी पाटा सिद्ध होनेर विषये तोमरा आपनारदिगेर मत उत्तरे लिखिया छ । अतएच पुनार जिज्ञासा करा जाइतेछे ये हिन्दुलोकेर कोनो शास्त्रे मोकररी पाटार प्रस्ताव आछे प्रवल सन्देहेर द्वाराय यदि एमत कोनो प्रस्तावशास्त्र पावा जाइतेछे ना,तवे पश्चाद्ग्रन्थकार- गनेर अन्धेर मध्ये कोनो ग्रन्थे वाहार प्रस्ताप आहे, 'यो तोमार- दिगेर उत्तरेर लिखनानुसारे व्यवहार यो अोइ व्यवहारेर सिद्ध- तार प्रस्ताव कोन ग्रन्थे पावा जाइतेछ । ये हेतुक एक्ष्यणे एइ विषयेर सन्देह पाछे ये कोनो वचन ए विपयेर जन्मे नाइ, वरं हिन्दुलोकेर ग्रन्थे श्रो ए विपयेर प्रसङ्गमात्र नाइ ओ ए विपयेर विचार पूर्व व्यवस्थासकल ओ चलित भइनसकलेर अनुसारे आदालतेर हाकिमानेर सहितइ सम्पर्क राखे इति । श्रीजयतितराम्' जवाय-व्यवस्था एतद्धर्माधिकरणप्रथमाधिपतिश्रीयुतश्रोलियमलसेप्टरसाहेवैत'छम्मा धिकरणचतुर्याधिपतिश्रीयुत-श्रोलियमडोरणसाहेवैतदुभयधर्माधिकरण- लिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । हिन्दुजातेधर्मशास्त्रीयस्मृतिचन्द्रिकावीरमित्रोदय-व्यवहारमातृकाव्य- वहारचिन्तामणि-विवादमनावग्रन्थेषु लोके भाषायां मकररीपाटा-- शब्देन प्रसिद्धस्य शास्त्रोक्त शासनपत्रस्यास्ति प्रस्तावः। एवमस्मदुत्तर- लिखितव्यवहारस्य इतायाश्चोपरिलिखितग्रन्थेभ्यः प्राप्तत्वात्-इत्युपरिलिखितग्रन्यानुसारेणोत्तरम् । १. पश्चात् न्यप । २थीनयति०-२५०? ३ वैनदर्भा-न्यारा ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-२६ अत्र प्रमाणम्- राजलेख्यं स्थानकृतं स्वहस्तलिखितं तथा । लेख्यं तु त्रिविधं प्रोक्तं मिन्नं तद् बहुधा पुनः ।। इति वीरमित्रोदय अन्धधृतवृहस्पतिवचनम् (वस्मृ. ६४)|१|| तत्रशासन निरूपयितुमाह याज्ञवल्क्यः शासनं कारयेद्धम्म्य स्थानवंशाभिसंयुतम् ।। (वृस्मृ० ६।१६) दत्या भूमिं निवन्धंवा कृत्वा लेख्यं तु कारयेत् । आगामिभद्रनृपतिपरिज्ञाना'य पार्थिवः ।। (यास्मृ १।३१८) निबन्धो वाणिज्यादिकरादिभिः प्रतिवर्ष प्रतिमा का किञ्चिद्धनमस्मै ब्राह्मणायास्यै देवतायै देयमित्यादिप्रभुसमयलभ्यमित्यर्थः। भूमिमिनि 'ग्रामारामादीनामुपलक्षणार्थम् । अतएव वृहस्पतिः-- दत्त्वा भूम्यादिकं राजा ताम्रपट्ट'ऽथवा पटे । शासनं कारयेद्धम्यं स्थानवंशाभिसंयुतम् ।। -~-इतिस्मृतिचन्द्रिकालिखनम् । २ (स्मृचव्य० २१५५) योगीश्वरः शासनमाह :- भूमि दत्त्वा निबन्धं वा कृत्वा लेख्यं तु कारयेत् । आगामिभद्रनृपतिपरिज्ञानाय पार्थिवः ।। ( यास्मृ० १।३१८ ) पटे वा ताम्रपट्टे वा स्वमुद्रापरिचिह्नितम्-इत्यादिवीरमित्रोदयर पृ. .३५६ )व्यवहारचिन्तामण्यादिग्रन्थलिखनम् ॥ ३॥ लाभिश्च वर्षोपयुक्तकरदानेन वर्षोपयुक्तम्वत्वमज्यंते । तदर्षे च राक्षा तद्भूमेरन्यत्र दानविक्रयणादिकरणं न सिद्ध्यति । यदि तु प्रतिवर्ष स्वया मुज्यतामित्यादि प्रतिज्ञाभवत् तदा तु यावदप्वेर स्वत्वानुमतेः कदापि दानविक्रयादिकं न कर्तव्यमिति विवादभङ्गार्णवलिसनम् ॥४॥ (१ विवाभ० पृ० ३०८ कख ) १ लिखित ताप विविध स्वालालमन्यत्कृतच-वी. मि० पृ० ५२०, यार" २.परिशामाय-व्यप०1 २२८५ श्यमा० ३३६ तमे पृष्ठे वचनमिदमुद्तमिति धको । ३, ताम्रपत्रेथवा पटे इति उस्म० पाठान्तरन्, तात्र तथा पटे स्पृश्य० ५५ ४. धर्मम्-स्मृ०।

व्यवस्था-पत्र संख्या-२६-२७ ७९ देशाचाराविरुद्ध यद्व्यक्ताधिविधि'लक्षणम् । तत्प्रमाणं स्मृतं लेख्यमविलुप्तक्रमाक्षरम् ॥ -इति वीरमित्रोदयग्रन्यधृतनारदवचनम् । (नामसं०२१११३) ।।५।। पृ०५२)। व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते । -इति व्यवहारतत्त्व(पृ० १६६)व्यवहारमातृका(पृ० २८४)धृतनारद- वचनम् । (नामसं-श३४) ॥६|| केवलं शास्त्रमाभित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः । युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते ॥ इति तत्तद्ग्रन्थधृत (व्यमा० २८२ : २६४ बृहस्पतिवचनम् , युक्तिल्लोकव्यवहारः-इति तत्तद्ग्रन्थलिखनचेति । श्रीर्जयतितराम् श्रीहरिः शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ओरामतनुशमविद्यावागीशेन २७ सदर देमानी आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुटनी इशमिट साहेवेर हुजुर हइते ऐ आदालतेर पण्डितदिगेर नामे मित्रजितसिंहेर ओ श्रीमति मनुविवी सायलार मकमाते तिन रोजेर मध्ये पश्चिमदेशेर एवं वनदेशेर शास्त्रमते यवाय दाखिल करणेर हुकुमे इंगरेजी १८२६ शालेर ३० मे मासेर रोवकारिर लिखित सवाल गइएक व्यक्ति क्षत्रिर स्त्री, ये ताहार आपन स्वामीर त्यक्त धने दाखिलकार छिल, ताहार आपन स्वामीर १.०वितला-नामसं० । २. मिताक्षरा इति पठनीय' । २. युकिायः स च लोकन्यवहारः इति व्यवहारमात्रिका-न्यतः पृ० १६६ ।

८० व्यवस्था-पत्र संख्या-२७ " मानुल पुत्र राखिया मरियाछे। अन्य उत्तराधिकारी ना थाफन , एवं ऐ मृत स्रोच्यक्तोर दत्तक पुत्र ना थाकन कालीन ऐ खीर त्यक्त धन ऐ पुत्र पाइते पारे कि ना इति । यवायव्यवस्था() एतद्धम्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेवधम्माधि- करणलिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते :- स्त्र कस्यचिद् अनपत्यस्य क्षत्रियस्य स्त्री स्वस्वामित्यक्तधने भोग- वती ग्रासीत् , खस्यामिमातुलपुत्रं संरक्ष्य मृतास्यात् तत्र यदि तस्याः स्वामिनः पश्चिमदेशचलितमिताक्षरादिनन्यलिखितक्रमेण पल्यादि-- मानुषत्रीयपर्यन्तानपत्यधनाधिकारिणो न स्युः, तदापश्चिमदेशचलित- मिताक्षरादिग्रन्थानुसारेण एवं वनदेशचलितश्रीकृष्णतकालकारकृत. दायक्रमसंग्रह-विवादार्णवसेतु-विवादभनार्णव ग्रन्थलिखितकमेण पत्न्यादि- मातुलपर्यन्तानपत्यधनाधिकारिणो यदि न स्युःतदा यङ्गदेशीयतत्तद्ग्रन्थानु- सारेण अथ च वङ्गदेशीयश्रीकृष्णतर्कालङ्कारकृतदायभागटीकारूपग्रन्थ- लिखितक्रमेण पल्यादिमातृष्पनीय पर्यन्ता धनाधिकारिणो यदि स्युः, तदा बगदेशीयतद्ग्रन्यानुसारेण एवञ्चतन्मतत्रय एव मृतायास्तस्या- स्त्रिया यदा दत्तक पुत्रो नास्ति तदा च तस्याः स्त्रियास्त्यकथनं तत्स्वामि- मातुल पुत्र प्रादावेव' बन्धुत्वेन प्राप्तुं शक्नोति-इति पश्रिमदेराचलित- मिताक्षरादिमन्यानुसारिणी वद्गदेशचलितदायभागश्रीकृष्णतकालङ्कार- कुतदायभागटीकाक्रमसेपद - विवादार्णवसेतु - विवादभनाएंवादि-ग्रन्थानु- सारिणी च व्यवस्था । -- १ मृता-स्यप०1 २ ०स्वतीय-व्यर। ३. प्राचं व-या व्यवस्थापन संख्या-२७ अत्र प्रमाणम्- पली दुहितरश्चेव पितरो भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः इत्यादि मिताक्षरादिनन्धलिखितयाज्ञवल्क्य- वचनम् ( यास्मृ० २।१३५)।१ गोत्रजाभावे बन्धवो धनभाजः। बन्धवश्व त्रिविधाः। आत्मवन्धवः पितृवन्धवो मातृवन्धयश्चेति ।। यथोक्तम- प्रात्मपितृप्यसुः पुत्रा आत्ममातृष्वसुः सुताः । प्रात्ममातुलपुत्राश्च विज्ञेया प्रात्मवान्धवाः ।। पितुः पितृप्वसुः पुत्राः पितुर्मातृवसुः सुताः । पितु(२)मातुलपुत्राश्च विज्ञेयाः पितृवान्धवाः ।। मातुः पितृवसुः पुत्रा मातुर्मातृष्वसुः सुताः। मातुर्मातुलपुत्राश्च विज्ञेया मातृवान्धवाः ।। • इति । तत्र चान्तरङ्गत्वात् प्रथममात्मबन्धवो धनमाजस्तदभावे पितृ- वन्धवस्तदभावे मोतृरन्धयः-इति क्रमो वेदितव्यः इति मिताक्षरादि- (मिता० २।१३, पृ० २१३) मन्यलिखनम् ॥ २ ॥ तदभावे मातुलस्तदभावे मातुलपुत्ररतदभावे मातुलपौत्रस्तदभाये मातामहदौहित्रोऽधिकारी-इत्यादिश्रीकृष्णतकालङ्कारकृत(दाय)क्रमसंग्रह ग्रन्थलिखनम् । (१०।१५, पृ०६)॥ ३॥ १. आरमपितृश्यमः पुत्रा पितृमातृ०--व्यप० । २. पितुर्मातुल०-व्यप० ।

व्यवस्था पत्र संख्या-२७-२८ तत्र प्रथम मातुलस्तदभावे मातृप्वस्त्रीयस्याधिकारस्तदभावे मातुल- पुत्रपौत्राणां क्रमेणाधिकार:-इति श्रीकृष्णतर्कालकारकृतदायमागटीका रूपग्रन्थलिखनम् । ॥४॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिःशरणम् श्रीवैद्य प्राथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन २८ लंबर- रोवकारी मिसिल आदालत देमाना सदर अंगरेजी १८२ साल तारीख ७ माहे दिशम्बर मतावक वाङ्गजा १२३३ साल २३ माहे अमहायण रोज वृहस्पतिवार श्रादालत मजकुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर बैठके। . श्रीमति मुलक्षणा-- . आपीलाण्ट श्यामाप्रसादनन्दी ो गयरह रप्पाडएटान सन हालेर २० लंवर (नवम्बर ) मासेर लिखित जिला मेदनीपुरेर जजसाहेवेर एक किता रिटरन, ताहार सामिलेर रोक्कारी प्रो गयरह संयलित पहुचिया अद्य श्यामाप्रसादनन्दी श्रो लक्ष्मीनारायणचौधुरीर उकिल मुनशी गोलाम वतुल ओ ग्रजलालचौधुरीर उकिल मुनसी दादारवकश ओ सदासुख पण्डित श्रो प्रानन्दलालचौधुरी प्रो नन्दलालचौधुरि प्रो हरिप्रियामणी राणीर' उकील सदामुख मसम्मात १. ततापि प्रथनं मातानासाभाने मापुरता ममेवाधिकार:-वि दार- भागशेगां कृपालिकासिनन् (पृ. २१८, १० परि०) २.हरिविरानो रचौर-व्यर व्यवस्था पत्र संख्या- पण्डितेर हाजीरीते तोनि आदालतेर कागजात सहित दरपेस' हइया पंडा गेलों। तत्परे झंजलाल चौधुरीरं उकीलेरा अयोध्याप्रसाददास मुद्दई श्यामाप्रसदिनन्दी ओ गैरह मुद्दाओं लेहेर मोकहिमांते अंगरेजी १८२२ सालेर मार्च मासेर होयाँ एलाका कलिकातार कोर्ट आपीलेर एक कित्ता रोक्कारिर नल। तंवरे दाखिल करिलेक, दृष्टि आइलो। जाना गेली ये श्रादीलतेरे साविक तृतीय हाकिम अंगरेजी १८२२ सालेर १४ शितम्बर मासेर हआया हुकुमे एइ लिखियाछेन ये विरोधी निष्पत्ति पर्यन्त मृत मधुसूदने हिस्सा सरवराहकारेर इलाकाते थाके, 'नो वाहार हिस्सार मोनफा सरबराहकारेर निकट आमानत थाके, पो कि प्रकारे विरोधी निप्पत्ति हय, यो कोन व्यकिर स्वत्व-ए विपयेर किछु तजवीज करेन नाइ, अतएव ए विपर हुकुम सादर करण आवश्यक हइलो, ओ अंगरेजी १८११ सालेर माइ मासेर लिखित ए पादालतेर फयसलार दृष्टे वोंघ हय जे दीहिनदिगेर मध्ये अर्थात् डिगरीदारानेर मध्ये एक जन मरिले, ताहार हिरसा कोन व्यक्तिके अर्शिवेक । अोई फयस- जाते ए विपर किछु हुकुम नाइ । श्रार अंगरेजी १८२२ सालेर मार्च मासेर ११ एगारह नारिकेर होगा कलिकाता(र) कोटेर रोयकारीते अन्य मोफदिमाते, अर्थात अयोध्याराम मुद्दइ बनाम श्यामाप्रसादनन्दी ो गैरह मुद्दामालेहेर मोकदिमाते सम्पर्क राखे, पद हुकुम पाछे ये मधुसूदन मुद्दामालेहेर पिता अन्य उत्तराधिकारीरा मौकदिमार तदविर करे, यो योइ रोषकारी अन्य मोकदिमार सम्पीय ए मोकदिमाय प्रवेश हइते पारना । वरं श्रोई रोकारीर गरज अयोध्याराम मुद्दइर मोकबिमार..."छिलो मृत मधुसूदनेर उत्तराधिकारीदिगेर विरोध निष्पत्तिर "छिलो ना, ओ से मोकदिमाते श्रोइ मुद्दइर नालिस कलिकातार कोटे डिसमिस हइया मृत मधुसूदनेर उत्तराधिकारीदिगेर विरोधेर किछु निष्पत्ति कोटे हय नाइ । + व्यवस्था-पत्र संख्या- भार जाना जाय ये छय ६ जन दौहित्र अर्थात डिगरी दारदिगार- मध्ये केवल अओइ मधुसूदन मरियाछे । वाकी पाच जन ( ताहार मध्ये मृत व्यक्तिर सहोदर भ्राता तिनि एइ क्षण पर्यन्त वर्तमान आछे, ओ ब्रजलालचौधुरीर स्त्री हरिप्रियामणीर गर्भ अन्य दौहित्र जन्मे नाइ, थार मधुसूदनचौधुरीर पिता ब्रजलाल. चौधुरो ओ माता हरिप्रिया श्रो सहोदर तीनि भ्राता, श्रानन्दलाल श्रो नन्दलाल ओ गङ्गानारायणचौधुरीके राखिया मरियाछे। अतएव हुकुम हइलो ये ए बादालतेर पण्डितार स्थाने सवान करा जाय ये श्रोइ प्रकारे मृत मधुसूदनेर अंश कोन व्यक्तिके अश; ताहार पिता श्रादि उत्तराधिकारिदिगेके किंवा मृत राजा जादवरायेर, ये ओइ छय जनेर मातामह छिलो, ताहार वाकी पाच जन दीहिलके अशें । उचित ये अंगरेजी १८११ सालेर २७ माइ मासेर होया ए आदालतेर फयसलार मजमून ज्ञात हझ्या दायभागशाख मते ये सेइ शास्त्र मते ए मोकहिमा ए श्रादालते निष्पत्ति हइयाछे ओइ सबालेर यवाय परसु दुइ प्रहर पर्य्यन्त वयनमन्थेर वेोरा सम्बलित दाखिल करेन। पण्डितदिगेर यवाव दाखिल हइले पर उचित हुकुम देया बाइवेक इति । . श्रीजयतितराम् जगावव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणदचोयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेवधर्माधिकर रणलिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपतिलामवलोक्यैव तत्समपितांगरेजीशन्द- प्रतिपाद्यैकादशाधिकाष्टादशशताब्दीयमाहमासीयसतविशतिदिवसीयतदाः १. धीन यति -1 १. काडा:-त्यमा व्यवस्था-पत्र-संख्या-२० 'धिकरणीयजयपनार्थमवगत्य च यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते । यत्र मधुसूदनचौधुरीसंशका कश्चिद् व्यक्तिविशेपो अजलालचौधुरीसंज्ञकं पितरं हरिप्रियामणीनाम्नी मातरमानन्दलाल- नन्दलालगङ्गानारायणचौधुरीसंज्ञकान् श्रीन् सोदरभ्रातृन्' संरक्ष्य मृतः तत्रोपरिलिखितैत धर्माधिकरणोयनयपत्रानुसारेणोत्तराधिकारित्वेन मधुसूदनचौधुरोसंज्ञकस्यत्यास्पदीभूताशस्य तदीयधनत्वेन तन्मरणोत्तरं तदुत्तराधिकारिणामेवाधिकारो न तु पूर्वस्वाम्युत्तराधिकारिणाम् । तत्र तत्पुत्र-पौत्र-पनी-दुहितृ-दौहित्र पर्यन्ताभावे तपितु('ब्रजलाल- चौधुरीसंशकस्याधिकारः, (अगति पितरि मातृ-सोदर-भ्रानादीनाम् , एवं मृतस्य राज्ञो यादवरामरायस्य पूर्वधनस्यामिनोऽवशिष्टा(at) पञ्चदौहित्राणां नाधिकारः-इति दायभागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । अन प्रमाणम् अपुत्रधनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितृगामि तदभावे पितृगामि तदभावे मातृगामि तदभावे प्रातृगामि तदभावे भ्रातृपुत्रगामि-इत्यादि दायभागादि( दाभा० पृ० १५१,११।११।४ ग्रन्यधृतविष्णुवचनम् (विष्णु० १७/४ )२ दोहित्रस्याभावे पितुर्न मातुः-इत्यादि दायभागग्रन्थ (दामा पृ० १८५, २१२३१)लिखनम् । २ तदभावे पिता तदभावे माता तदभावे माता-इत्यादि श्रीकृष्ण- तालङ्कारकृतदायभागटीकारूपग्रन्थ( दामा० टी० पृ० २१८, १० १२) लिखनञ्चति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्माविद्यावागीशेन श्रीहरिः शरणम् २. भात्रीन्यप० । २.तेते धर्मा०-न्यप।

व्यवस्था-पत्र संख्या-२ सवाल २६-सदर देमानी श्रादालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर हजुर हइते कमलाकान्तघोशाल ओ गैरह बनामे रामहरिनन्दिप्रामी यो गैरहेर, मोकदिमाते अंगरेजी १८२६ सालेर १३ दिशम्वर मासे रोवकारीर लिखित अदालत मजकुरार पण्डितानेर नामे परसु दुइ प्रहर पर्यन्त वचन को प्रमाऐर वेोरा संवलित यवाव तलव मजमुने सवाल एइ ये- . गोवर्द्धननन्दिग्रामी नरेन्द्रनित्यानन्दप्रामी ओ शीताराम- नन्दिमामी दुइ पुत्र के) उत्तराधिकारी राखिया मरिलो,श्री नरेन्द्र- नित्यानन्द एक पुत्र गोपीनाथके राखिया मरिलो, ओ सीताराम एक पुत्र सहदेव नाम श्रो एक कन्या, या हार नाम प्रकाश नाइ, उत्तराधिकारी राखिया मरिलो। यो श्रोइ गोपीनाथ तीनि पुत्र रामहरिनन्दिग्रामी श्री गौरहरिनन्दिग्रामी यो हारुनन्दिमामी- के राखिया मरिलो; ओ सहदेव निःसन्तान मरिलो, भो ताहार भगिनी एक कन्या राखिया मरिलो, ओ ओइ सहदेव भापन जीवृद्दशाते भगिनीर मृत्युर पर लापन भगिनीर कन्यार जीव- दुशाते साहार प्रापन भगिनीर पुत्र रामशङ्करघोशालके फयेक विधा ब्रह्मोत्तरं ओ देवत्तर भूमि दातव्य करियाछे श्रोताहार दानपत्र लिखिया दियाछे ओ ग्रहीताके दातव्य करा भूमिर उपर दखिल कराया ताहार तीनि वत्सर परे मरियाछे यो दानकालीन गोपीनाथनन्दिमामीर पुत्र रामहरी श्रो गौरहरी ओ हारु नन्दिमामी वर्तमान हिलो, एवं आछे । ओ श्रोइ गोपीनाथ मरियाछे, ओ दाता व्यक्तिर मृत्युर कएक वत्सर परे ग्रहीता व्यक्ति मरियाछे। ताहार पुत्रेरा दान करा. भूमीर उपर दखिल हइयाछे। पनदेशेर शास्त्रानुसारे प्रोइ व्यवस्था-पत्र-संरक्षा-२४ 'सहदेवेर लिखिया देया हेवा सिद्ध, कि असिद्ध, यो ताहा प्रसिद्ध हओन प्रकारे दान करा भूमि कोन व्यक्ति के अर्श इति । श्रीजयतितराम् यवान व्यवस्था एतद्धर्माधिकरण द्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुर्टनीइशमिटसाहेवधर्माधिकर- मलिलितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यत्र गोवर्द्धननन्दिग्रामोसंशकः कश्चिद् व्यक्तिविशेपो नरेन्द्रनित्यानन्द- नन्दिग्रामीसीतारामनन्दिग्रामीसंज्ञको द्वौ पुत्रावुत्तराधिकारिणी सरदम मृतः, नरेन्द्रनित्यानन्दोऽपि गोपीनायसंज्ञकमेकं पुत्रं संरक्ष्य मृतः, एवं सीतारामोऽपि सहदेवनामानमेकं पुत्रमेकां कन्या च संरक्ष्य मृतः, एवं गोपी- नायो रामहरी गोरहरी-हारूसंहकान् श्रीन् पुत्रान् संरदा मृतः, तयोपरिलिखितसहदेवः स्वजीवनदशायां सभगिनीदौहित्राय रामशकर- घोशालाय यदि फतिपयविधाशब्दवाच्या कांचिद् प्रहारभूमिदेवत्र भूमिव दत्त्वा, तस्याध दानपत्रं लिखित्वा दत्त्वा, तस्यां च ग्रहीतुराय'तत्व सम्पाद्य संवत्सरवयानन्तरमनपत्य एव मृतस्तदा दानकाले इदानीं च गोपीनाथपुत्रेषु रामायुपरिलिखितेषु त्रिषु सत्त्यप्यधिमकायां भूमी स्यांशयोग्याया: विभक्तायां च स्वांरारूपाया वा ब्रह्मभूमेर्यद्दानं कृतं तद् पद्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण सिद्धं भवति, स्वतन्त्रस्वामिऋतत्यात् , एवं दानपत्र लिखिताया देवत्रभूमेयंदानं तन्न सिदध्यति', देवत्रभूमी केवल देव- वाया एव स्वत्वं देवमिनानां फेपाश्चिदपि स्वत्वाभावात् । किन्तु देवप्रभूमेः संरक्षणावेक्षणादिकर्तृल लोकानामेव व्यवहाराद् दृश्यते । तत्र यद्यनेन * फेनचिद् भूम्पधिपतिना देवसेवार्थ काचिद् भूमिनियमिता तत्सरहणादि कतं तद्देवपूजकत्वं वा सहदेवाय, सत्पूळपुरुषाय वा दत्तं स्यात्तदा १. भोग्न यात०-व्यर० । २.वाच्या काचि नावभूमिवत्र भूमियदचा"दत्ता-पा० । . ३. रायन्त ध्या1 ४ मिसिव्यप।

व्यवस्था-पन्न-संख्या-२६ तदेव स्वकर्तव्यस्थवशीभूतमरक्षणादिकत्वं तद्द घपूजकर्व वा यदि सहदेवेनोपरिलिखितरामशङ्करयोशालाय दत्तं स्यात्तदा, यदि या स्वयमेव महदेवेन देवसेवार्थ स्वोयकाचिद्भूमिनियमिता तस्याः संरक्षणादिकर्तृत्वं तद्द व पूजकलं वा तरमै दत्त स्यात्, तदा चैतदुभयविधं दानं लोकन्य- यहारासिध्यतीति, श्रतः शास्त्रानुसारेणापि सिद्ध भवितुमर्हतीति पङ्गदेशचलितदायमागमनुष्यवहारतत्त्व व्यवहारमातृकादिप्रत्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- स्व'भागान् यदि दास्ते विक्रीणीयुरथापि या। कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य च ॥ इति दायभागादि दामा० २।२६, पृ० ३५ )ग्रन्थधृतनारदवचनम् (नामस० पृ० १५७, १४।४२)। १ प्रदान स्वाम्यकारणम्-इति मनुवचनम् । ( मस्मृ ५१५२ )२ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं वा। अतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः इति मनुवचनम् (मस्म' १६)३ व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते इति व्यवहारतत्त्वादि. ग्रन्य( व्यत० पृ० १६६)पृतनारदवचनम् (नामसं० पृ० ८, ११३४) श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन , श्रीहरिः शरणम् 14 १.०लदेव०-यप। २.मत्व-व्यप०1 ३. खानशान्-नामम०। ४. कुय्युयो०-व्यप 1 ५. मीराते-नाम। ६. माची-कामर्स व्यवस्था पत्र-संख्या-३० ८8 सवाल ३०-सदर देमानी अदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुटनी इशमिट साहेवेर हजुर हइते अोइ अादालतेर पण्डित दिगेर नामे अंगरेजी १८२६ सालेर १८ दिशम्यर मासेर रोक्कारिर लिखित भवानीलालेर नामे हरीशवीवीर मोदिमाते परसु दुइ प्रहर पर्य्यन्त वचन श्रो अन्धेर वेओरा संलित यवाव दाखिल करनेर हुकुमे सवाल, एइ ये- एक व्यक्ति हिन्दु, कायस्थ जाति, स्त्री ओ पिताके रास्त्रिया मरिलो । ताहार पर पिता स्त्रीके, ये प्रथम मृत व्यक्तिर माता नहे, 'पार अप्राप्त-व्यवहार पुत्र पो भगिनीर पुत्रके राखिया मरिलो । पश्चात् ऐ अप्राप्त व्यवहार पुत्र निःसन्तान मरिलो। तत्परे ऐ पितार स्त्री, ये अप्राप्त-व्यवहार पुत्रेर मृत्युर परे ऐ पितार त्यक्त धनेर उपर दखिलकार हइयाछिलो, श्रापन पतिर भगिनीर पुत्रके, ये उपरे उल्लेख हइलो, ऐ त्यक्त धनेर असियतनामा लिखिया दिया ग्रहीताके दान करा वस्तुर उपर दखिल ना करा- इतेइ मरिलो मैथिलदेश श्रो वङ्गदेशेर शास्त्रानुसारे ऐ असियत- नामा प्रथम मृत व्यक्तिर स्त्री थाकने ओ सिद्ध ओ चलित वटे, कि ना? आर यद्यपि असियतनामा लिखा ना हइतो, एइ स्वीकार ‘करा जाय उत्तराधिकारित्वक्रमे ऐ त्यक्त धन द्वितीय मृत व्यक्तिर भगिनीर पुत्रके किम्वा प्रथम मृत व्यक्तिर स्त्रीके अर्पितो इति । श्रीर्जयतितराम जगावव्यवस्था एतद्धम्माधिकरणद्वितीया(धि)पति - श्रीयुत-कुर्टनीदशमिटसाहेवधर्मा- धिकरणलिखितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- १. श्रीन यतितराग-व्यप०1 व्यवस्था पत्र-संख्या-३०- यदि कश्चित्कायस्थजातिः स्वस्त्रियं स्वपितरश संरक्ष्य मृतस्तदनन्तरं तत्पिता तद्विमातरमप्राप्तव्यवहारं पुत्रश्चै के स्वभगिनीपुत्रश्च संरक्ष्य मृतः, पश्चादप्राप्तव्यवहारः स पुत्रोऽप्यनपत्य एव मृतः, तदनन्तरमप्राप्त व्यवहारस्य पुत्रस्य पितुः पत्नो तस्मिन्विवादास्पदीभूतधने भोगवतो भूत्वा स्वपतिमगिनीपुत्राय उपरिलिखिनाय तस्यैव.स्वायत्तीभूतधनस्य असियत- नामाख्यं पत्रं लिखित्वा दत्त्वा गृहीततत्पत्र तत्पनलिखितवस्तुपु' भोगम- कारयित्वा मृता स्यात्तदा मिथिलादेशचलितशास्त्रानुसारेण वङ्गदेशचलित- शास्त्रानुसारेण च तदेव'असियतनामाख्यपत्रं प्रथममृतव्यक्तेः स्त्रियां सत्यामसत्या या सिद्धं प्रचलितं (च) भवितुं न शकोति । एवञ्च विवादास्पदी- भूतधने उत्तराधिकारिणामयं नमः । तथाहि जीवति पितरि प्रथममृतो यः पुत्रस्तदीयविभचामसाधारणञ्च धनं तत्पत्नी मिथिलादेशचलितशास्त्रा- नुसारेण वद्गदेशचलितशास्त्रानुगरेण च प्राप्तुमर्हति; यदि च तस्य स्योपार्जितं धन साधारणं स्थितं तदा तत्पनी तद्योग्यांशं वनदेशचलित- शास्त्रानुसारेण प्राप्तुमहीत, न तु मिथिलादेशचलितशास्त्रानुसारेण, तद्द शीयग्रन्थकारः साधारणधने विभागे सत्येव पत्न्याधकारालसनात् । एवञ्च प्रथममृतव्यक्तविभक्तासाधारणधनातिरिक्त विवादास्पदीभूतं धनं एतदु- भयविघतदीयधनाभावे च समस्तमेव विवादास्पदीभूत धने मिथिलादेश- चलितशास्त्रानुसारेण, अथ च तस्यैव पुत्रस्य विभक्तासाधारणं धनं विना तद्पार्जितसाधारणधनेऽपि तद्योग्यांशश्च विना विवादास्पदीभूत धनम्,एतत्तिति धधनाभाचे च समस्तमेव विवादास्पदोभूतं धनं यद्देशचलितशास्त्रानु सारेण प्रथमपुत्रमरणोत्तर तस्त्रियां सत्यामपि तत्पिनुः स्वत्वारपदीभूतम् , अतस्तस्मिन्मृते तस्यामाप्तयवहारस्य पुत्रस्य उपरिलिखितपितृत्वत्वासदीभूत- यावदनाधिकारे जाते सति तद्धनं तदीयमेव आतम् । अतस्तरिमननपत्ये मृते १. धनस्यासिनत्यप। २. गृहीतरततपत्रलिरित-व्यप। ३.देवासि०-दए। ४. सत्याम्वा--प्यर। ५. मिया-ध्यप०॥ ६ तम्मिन्नरत्ये-व्यपान व्यवस्था-पत्र संख्या-३० तदुचराधिकारिणामेव तद्धनाधिकारः। तत्र च तत्पल्यादिसगोत्रपर्यन्ता- मावे तपितु गिनेयस्य अत्मबन्धुत्वेन मिथिलादेशचलितशास्त्रा- नुसारेण, एवं पल्यादितपितामहप्रपौत्रपर्यन्ताभावे तपितामहदौहित्र- त्वेन पशदेशचलितशास्त्रानुसारेण चाधिकारः । एवञ्च सति प्रथममृत- व्यक्तेः स्त्री उपरिलिखितपतिस्यत्वास्पदोभूतधनाभावे एतद्धनादेव ग्रासाच्छादनाधिकारिणीति-इतिमिथिलादेशचलितविवादचिन्तामण्यादि- ग्रन्थानुसारिणी बगदेराचलितदायभागादिग्रन्यानुसारिणी च व्यवस्था । तत्र प्रमाणम्- स्त्रीणां स्यपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः। नापहारं त्रियः कुर्युः पतिपित्ता' कथञ्चन ।। इति विवादचिन्तामणि विचि० पृ० २३5) दायमागादि( दाभा० ४० १७३,११।१२६०)लिखितमहाभारतवचनम् (भारत-१३।४६७१२४)।१ अपहार ऐच्छिकं दानविक्रयादिकम् इति विवादचिन्तामणि- ग्रन्थलिखनम् (पृ० २३८)।२ अनपत्यस्य धनं पत्न्यभिगामि तदभावे दुहितृगामि तदभावे मातृ- गामि तदभाव पितृगामि तदभावे प्रातृगामि सदभावे भ्रातृपुत्रगामि- इत्यादि विवादचिन्तामण्यादि ( विचि० पृ० २३५ मन्थधृतविष्णुवचनम् (विस्मृ० पृ० ४६ )।३ इदं च विभक्तपतिधनपरम्-इति विवादचिन्तामणिलिखनम् (पृ. २३४)।४ १. स्त्रीयां तु पतिदायायम् -भारतन् । २. वित्तान-व्यप०, ०दायात-दाभा० ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-३० अतोऽविशेपेणैव विभक्तलायनपेक्ष्येव । अपुत्रस्य भर्तुः कृत्स्न- धने पल्यधिकार:-इत्यादि दायभागग्रन्थलिखनम् (पृ० १६६, १११११४६)।५ 'सगोत्राभावे बन्धुः याज्ञवल्क्य वचनात् , स (च) सबन्धुः 'पितृपन्धुर्मातबन्धुश्च । आत्मपितृप्पसुः पुत्रा आत्ममातृष्वसुः सुताः। आत्ममातुलपुत्राश्च' विज्ञेया श्रात्मवान्धवाः । पितुः पितृव सुः पुना पितुर्मातृष्वमुः सुता । पितुर्मानुलपुत्राश्च विज्ञेया पितृवान्धवाः ।। मातुः पितृप्पसुः पुत्राः मातुर्मातृप्वसुः सुताः । मातुर्मा तुलपुत्राश्च विजेयाः मातृवान्धवाः ।। एतेषां फमेणाधिकारः-इति विवादचिन्तामणिलिखनम् (पृ. २४२)।६ एवं पितामहमपितामहसन्ततेरपि दोहित्रान्तायाः पिण्डप्रत्यासचि-' क्रमेणाधिकारो चोदव्यः-इति दायभागप्रन्थलिखनम् (पृ. .२०८-६)। ७ अविभागे तु शङ्ख । प्रातृभार्यायो (च) स्नुपाणाय न्यायातः प्रवृत्तानामनपत्याना पिण्डमान गुरुर्दद्यात् ॥ १. नपेदायैव-दाभा.. २.०स्वमव्यप०1 ३.भमा-व्यप०1 ४. पितुर्मा.--व्या। ५. मातुपि०-व्यर। ६. प्रत्याशक्ति-यपान

व्यवस्था पत्र संख्या-३०-३१
जीर्णानि वासांस्यविकृतानि-इति विवादचिन्तामणिग्रन्थलिखना,
ञ्चेति ( पृ. २३६)
श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशमविद्यावागीशेन
३१-रोवकारि मिसिल पादालत देमानी सदर इङ्गरेजि
१८२६ साल तारिख २८ माह देशम्बर मतावक वाङ्गला १२३३
साल तारिख १४ पोप रोज वृहस्पतिवार आदालत मजकुरार
द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिद साहेवेर धैठके-
मृत गौरीप्रसादचौधुरि
श्रापिलाण्ट
मसात जयमालाचीधुराणी
रप्पाडएट
मृत्युञ्जयशर्मा शायेलेर उकिल सदासुखपण्डित विद्यमाने
आइल | जयमालाचीधुराणी मुद्दाथालेहेर जमिदारि निलाम
द्वाराय शायेलेर पोना डिगरिर टाका देथानेर बावत। शायेलेर
दरखास्त नामझुरिर विपये कोट प्रापिलेर तृतीय हाकिमेर
मञ्जर राखा सहर ढाकार जजसाहेवेर हुकुमेर असर्मतिते
ओ ऐ चौधुराणीर जमिदारिर किछु निलाम करिया डिगरिर
लिखित टाका देोयानेर निमित्ते कोर्ट आपोलेर हाकिमदिगेर
नामे ए आदालतेर हुकुम सादर होनेर प्रार्थनाय शापलेर
दरखास्त ऐ उकिलेर नामिक ओकालतनामा यो सन हालेर
१ मेइ मासेर लिखित जाहागीरनगरेर कोटेर रोवकारिर नकल
आर कोटे दाखिल होया शाएलेर सोयालेर नकल सम्बलित
जे हाल मासेर २३ तारिखे ए आदालते दाखिल हइयाछिल
अद्य दरपेप हइया दृष्ठे श्राइल | जाना गेल ये इङ्गरेजि १८१४
, 'यभितानि-व्यप

व्यवस्थापन संख्या-३२ शालेर' १६ देशम्बर मासेर होया ए प्रादालतेर फर्यशला अनुसारे गौविन्द्रप्रसादचौधुरिर त्यक्त परगने कांशीपुर शाशन- वाशन गयरह जमिदारिर श्राद आना रकमेर'मध्ये ऐ गोविन्द प्रसादचौधुरिर प्रथमा स्त्री मसम्मात् पार्वतीचीधुरागिर दत्तक पुत्र गौरिप्रसादचौधुरिर स्वत्व अर्द्धक परिमाने, या ऐ चौधुरिर द्वितीया स्त्री मसम्मात जयमालार दत्तक पुत्र शिव- प्रसादेर स्वत्व' द्वितीय अर्द्धक परिमाणे साव्यस्थ हइयाछे । ओ 'ए आदलतेर फएशलार परे द्वितीय स्त्रीर दत्तक पुत्र शिवप्रसाद- निःसन्तान मरिल; ओ ताहार मृत्यु होने हेतुते ऐं गौरिप्रसाद चौधुरिर ताहार त्यक्त चारि पाना स्वत्वेर दाोया करिनक, श्रो ए श्रादालतेर पण्डितेरा इङ्गरेजी १८१७ शालेर ७ फेघरोयारि मासे प्रथम हाझिमेर सोयालेर जवावे एक केता व्यवस्था एइ मजमुने, ये शिवप्रसादचौधुरीर त्यता चारि आना अंश ऐ अप्राप्त व्यवहारेर ग्रहीत-माता जयमालाके अशें, ताहार भ्राता गौरीप्रसादके अर्श ना, दाखिल करिलेन । ताहार पर तारिणी प्रसाद अप्राप्त-व्यवहार पुत्र राखिया ऐ गौरीप्रसाद मरिल, श्रो इगरेजि १८१६ शालेर ३१ अागष्ट मासे मृत्युञ्जय शर्मा शाएल ऐ जयमालार नामे, ये ए क्षण पर्य्यन्त वर्तमान आछे, प्रकाश हय, ६७९1)२ गण्डार डिगरि सहर ढाकार देओयानी प्रादा लत हइते पाइल; ओ चाहितेछे ये ए चारिश्राना हिस्या किन्या ताहार मध्ये किछु पापन हासिल करा डिगरिर टाका पायोनेर कारण विक्रय कराय, ओ तमसुकेर तारिख ये ए मृत्युञ्जयेर दाश्रोयार मूल बटे अनिर्णय "| धार मसम्मति जयमाला. पौधुरागीर एजहार, एइ जे सामार एक कन्या, ताहार सन्तान जन्मे नाइ सम्भावना पाछे, द्वितीय कन्या पति-वर्तमाना, साहार गर्भज, अप्राप्त व्यवहार एक पुत्र प्राहे, पो थामि स्वयं व्यवस्था-पत्र-संख्या-३१ द्वितीय एक पुत्रके दत्तक करियाछि । ए प्रकारे ए आदालतेर पण्डितदिगेर (स्थाने) जिज्ञासा जाय ये जयमालार एजहार सत्य- प्रकारे ऐ चारि थाना अंश, किम्वा ताहार मध्ये किछ मृत्युञ्जय शम्मीर पाोया डिगरि निमित्ते विक्रय हइते पारे कि ना, श्रो ताहार एजहार मिथ्या हान प्रकारे ताहार मृत्युर पर ऐ चारि अाना हिस्या ताहार सपनीर पौत्र अर्थात् गोरोप्रसादचौधुरिर पुत्र तारिणीप्रसादचौधुरिके, किम्वा कोन व्यक्तिके अर्शिवेक, श्रार ताहार एजहार ( प्रकारे) ताहार दुइ कन्या श्रो एक दत्तक पुत्र थाकनेय विपये मिथ्याइ स्वीकार करणेर जवाव बङ्गदेशेर शास्त्रानुसारे मङ्गलवार दिवस दुइ प्रहर पर्यन्त दाखिल करेन इति । जवायव्यवस्था एतद्धम्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुर्टनी - इशमिटसाहेवधर्माधि- करगलिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृराबोधो जातस्तदनु- सारणोत्तरं लिख्यते- मृत्युञ्जयशर्मणः प्रात जयपत्रलिखितमुणं यदि शिवप्रसादस्यावश्यक- श्राद्धाद्यौर्ध्वदेहिकक्रियार्थ स्वभरणपोषणार्थ या तन्मात्रा जयमालया कृतं तत्परिशोधनं यदि स्वसंमान्ततदीयाशविक्रयं विना न भवति तदा जय- मालोपस्थापितवृत्चान्तस्य सत्यत्वेऽसत्यत्वे वा तदर्थमुपरिलिखितण- 'परिशोधनोपयुक्तस्य तदोयांशान्तर्गतस्य विक्रयों मवितुमर्हति, न तु स्वेच्छया स्वाभिमायेण या जयमालया कृतस्य ऋणस्य परिशोधनार्थम् | यथा पतिधने पल्याः पतिश्रादायोर्ध्वदेहिकक्रियायं पतिकृतकुटुम्बभरणार्थ- परिशोधनार्य स्वमरणपोषणार्थसाधने विक्रयेऽशताधिकारस्तथा पुत्रधने मानुरपि। एपन जयमालामरणोत्तरं स एवांशत्तात्मपत्नीपोत्रस्य तारिणीप्रसादचतुर्धरिणस्य पूर्वधनस्वामिशिवप्रसादभ्रातृपुत्रस्य भविष्यति, यतः पुत्रधनस्योत्तराधिकारित्वेन मातृसंक्रान्तत्वेऽपि गृहीतपुत्रधनाया मातुरूपरमे पूर्वधनस्वामिपुत्रस्य ये उत्तराधिकारिणरतेषामेव तद्धनं व्यवस्था-पत्र संख्या-३१, भवति । तत्र च तद्भातृपय॑न्तामा' मुतरां भ्रातृपुत्रस्यैवाधिकारः, सति भातृपुत्रे पितृदौहित्रस्यानधिकारात् , स्यामिमरणोत्तरमेकत्रीकृवस्य द्वितीय- दत्तकशास्त्रलिखितत्वाच्च-इतिवङ्गदेशप्रचलितदायभागश्रीकृष्णतर्कालद्वार- कृतदायभागटोकाक्रमसंग्रहविवादमगार्णवादिग्रन्यानुसारिणो व्यवस्था--- अत्र प्रमाणम्:-- रिक्थमाह'ऋणं दाप्या- इत्यादिविवादभगार्णवादिनन्थ( १विवा१७६स)धृतयाज्ञवल्क्यवचनम्, (२१५१ )।१ पत्नी तद्धनं मुञ्जीतेव, परं न तु तस्य दानाधानविक्रयान् कर्तु- महति । तदाह-कात्यायनः अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता भुजीतामरणात् क्षान्ता दायादा उर्ध्वमाप्नुयुः ।। (फास्मृ० ६२१) इतिदायभाग पृ० १७१ अन्यलिखनम् ॥२॥ एवञ्च पत्युरोर्ध्वदेहिकक्रियाथ दानादिकमप्यनुमतम् । अतएव वर्तनाशक्तावाधानमपि, तत्राप्यशक्ती विक्रयएमपि-इत्यादि दायभाग- अन्धलिखनम् । (पृ० १६३, ११॥ ११६१-६२) यदा पत्नीत्युपलक्षणम्, सीमात्राधिकारेऽयमों बोदव्यः । पनी दुहितरश्चैव पितरों" मातरम्तया । तरसुतो गोप्रजो पन्धु :- इत्यादिदायभागादिग्रन्थ (दामा पृ° १५१) लिखितयाशवल्स्यवचनम् ॥ (२२१३५)। . १ पय्यन्त-व्यर.1 २ घायमाही-प.) ३ पत्थुरो-यप। ४ वर्तमाना--प॥ परितरोभावरस्तार व्यवस्था पत्र संख्या-३१-३३ भातपौत्रस्सामावे पितुदौहित्रस्याधिकारः इति (दाप)क्रमसंग्रह- लिखनञ्चोते (पृ. ६)।६ श्रीजयतितराम श्रीहरि शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्माविद्यावागीशेन श्री यतितराम्। ३२-या घनिनः सप्तमपुरुषशातिमातुलपुत्री विद्यते तर सयोमध्ये नीमूतवाहनकृतदायमा गमते घनिनो मातुलपुत्रस्यैव धगित्यक्तधने घनिनि मृतेऽधिकारः, विज्ञानेश्वरकृतमिताक्षरामते तु तयोर्मध्ये सतमपुरुषशाति- रेवाधिकारी न तु मातुलपुत्र इति- श्रीजयतितराम् श्रीहरिःशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्म विद्यावागीशेन एइ व्यवस्था दाखिल सदर देमानीका रजिष्टर साहेव श्री मेघनाटन साहेवका हनूर कलकत्तेका कोर्ट पापील प्रादालतिके हाकिमान के सवालके यवाय इति - श्रीवैद्यनाथपण्डित सवाल ३३--आगम केने प्रकार है ? सप्त प्रकार पागम कोन पुस्तयमे लिखा हो। मिताक्षरा किम्वा अन्य कोइ अन्यमे लिखा हो इति। ७ व्यवस्था-पत्र या १४ स यवाद शाखोक्त आगम सप्त प्रकार,श्रो सप्त प्रकार आगम मिताक्षरा वीरमिनोदय यो गैरह ग्रन्थमे लिखा है इति । श्रीर्जयतितराम् श्रीहरिःशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन एइ यवाव दाखिल नाएव रजिष्टर नीयुत विष्ट साहेवका हुजुरमो इति । श्रीजयतितराम प्रथम सवाल ३४--कुशलरायेर चारि पुत्रेरा ओहार त्यक्त जमिदारी प्रभृतीर अंश सकलेर उपर समान अंशते दखिलकार थाकिया कुशल- रायेर तृतीय पुत्र रामदुलाल आपन बी रंलादेव्याके राखिया निःसन्तान मरे, ओ ऐ स्त्रीलोक आपन जीवत्दशापर्यन्त आपन । स्वामीर त्यक्त जमिदारी-प्रभृतीर अंशेर उपर दखिल थाकिया राजीवलोचन श्री कृष्णचन्द्र श्रो रामगोपालेर पुत्रगण, जयराम- रायेर पुत्र हरिहरराय, ओ राधाचरणेर पारि पुत्र, राजचन्द्र ओ गयरहेर समक्षे मरिलो। अतएव रत्नादेव्या मजकुरार मृत्युर पर ताहार स्वामी अर्थात् कुशलराय मजकुरेर तृतीय पुत्र रामदुलाल- रायेर त्यक्त अंश शाखानुसारे ताहारदिगेर मध्ये काहाके, की परिमान अशे इति । द्वितीय सवाल रामगोपालरायेर औरस पुत्र कृष्णचन्द्रके रामदुलालराय पोप्यपुत्रकरण प्रयुक्त कृष्णचन्द्र मजकुर रामदुलालेर त्यक्तेरे + व्यवस्था-पत्र-सख्या-३४ स्वत्वे ताहार स्त्री रत्नादेव्यार मृत्युर पर प्रापन सहोदर भ्राता राजीवलोचन श्रो पितृव्यपुत्रगण राजचन्द्र (ओ) गयरहेर सहित समान मर्यादा राखिवेक, कि प्रोदारदिगेर सम्पर्के मोहार स्वत्व न्यून किम्वा अधिक हइवेक इति । यद्यपि रामगोपालरायेर पुत्र जयरामराय रत्नादेव्यार समक्षे मरियाथाके, ए प्रयुक्त ताहार पुत्र हरिहरराय रत्नादेव्या मजकुरार मृत्युर पर राजीवलोचन ओ गयरह रामदुलालेर भ्रातुप्पुत्रगणेर न्याय ऐ रामदुलालेर त्यक्त विपयेर अंशे स्वत्याधिकारी हइवेक, किन्या रनार समक्षे ताहार पितार मृत्यु हओन प्रयुक्त स्वत्वा- धिकारी हइचेक इति। भूलपुरुप कुशलराय प्र०पुत्रः द्वि०पुत्रः च० पुत्र रामरामराय रामगोपाल तुः पुत्रः रामदुलाल, तत्त्री रत्नादेव्या निःसन्ताना राधाचरण 'तत्पोप्यपुत्र कृपराचन्द्रराय प्र० द्वि० तृपुनः पपुत्र. राजचन्द्र मदनमोहन जगमोहन कालीदास प्र०पुत्र जयराम राजीवलोचन कृष्णचन्द्र, रामरामरायेर पोप्यपुत्र प्र पुत्रः द्वि०पुत्रः तपुत्र- महेशचन्द्र ईशानचन्द्र कालीमोहन ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-३४ श्रीजयतितराम जवाजव्यवस्था प्रभुसमर्पितवशावलीपत्रानुसारेण प्रभानुसारेण चोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यत्र कुशलरायस्य चत्वारः पुत्राः स्वपितृत्यत्तमराजकरस्थावराधेश- चतुष्टयं कृत्वा स्वस्वाशभोगवन्तः स्थिता':, ते मध्ये कुशलरायस्य तृतीय पुनो रामदुलाला स्वपत्नी रतादेवी सरदर श्रनपत्य एव मृतः, ततो रक्षा- देवी स्वजीवनकालपर्यन्त स्वपतित्यक्तसराजकरस्थावत्यंशभोगे कृत्वा रामगोपालपुत्रो, राजीवलोचनकृष्णचन्द्रसंशको, जयरामरायस्वैकं पुर्ष हरिहररायसज्ञकं, राधाचरणस्य चतुरः पुत्रान् राजचन्द्रमदनमोहन -ग- मोहनकालिदास.न् सरदर मृता स्यात् , तदा रलादेव्याः स्वामिनोऽधांत कुशलरायस्य तृतीयपुत्रस्य रामदुलालरायत्यांशं समस्तमेकादशधा वि- भज्य दो दो मागो राधाचरणपुत्राणां राजचन्द्रमदनमोइनजगमोहर- कालिदासाना प्रत्येकं भवतः, तथैव दो भागौ रामगोपालपुत्रस्य राजी. वलोचनस्य भवतः, अवशिश्नैको मागो वंशावलीपनायगतरामरामराय. दत्तकपुत्रस्य वृष्णचन्द्ररय मयते। द्वितीयममस्याप्या.दद मे कोचरम् इतिवद्देशप्रचलिवदायभागवि. वादभाएंवदत्तकचन्द्रिकादमन्पानुसारिणीव्यरस्यति । तृतीयप्रभस्योत्तरम्-- यदि रामगंपालग्यस्य पुत्रो जयगागरायो रमादेव्या सत्यां मृतः स्या- त्, तदा तत्सुको हरिहरर यो रनादेव्या मरणोत्तरं रामदुलालभ्रानुपुत्रराज 1. ममोहन-पप-1 १.पिro-401 २.दरपूर-मा व्यवस्था पत्र-संख्या-२४-३५ 35186१०२ चलोचनादिवद् रामदुलालत्सकधने अधिकारी न भवति, सत्यां रला. देव्यां मृतस्य जयरामरायस हरिहरराय पनुस्तद्धने स्वत्वाभावात् । हरिहर- ययस्य तु गमदुन लन नुमोनलेन सत्सु भ्र पुत्रेषु भ्रातृपौरस्य हरिहर- रायस्य तद्धनाधिकारामागाच (नाधिकारः) इति- अन प्रमाणम्- प्रथमद्वितीपपभोत्तरप्रमण न्तर्गतप्रथम दितीयप्राणमेव । अत्र यद्यपि द्वितीयाने कृष्ण चन्दस्य रामदु नानरायदत्त रुपवत्वं लिखा तथापि वैशावलोपने कृष्णचन्द्रस्य रामराम रायदत्त कनवं निश्चत्येयं व्यवस्था दत्ता । कृष्ण नन्द्रस्य र मदुन लण्यदत्तकपुन निश्चतं भवति चेतदा , निश्चयोत्तरं तदुत्तरं दास्यामीति- प्रोजयतितरा थी वैद्याथ मेश्रंग श्र राम तनुशर्मविद्यावागीशेन एइ व्यवस्था दाखिल रजेष्टर साहेब श्रीयुत मेघनाटन माहेवके हजुर कलकत्त का कार्ट प्रापाल अादालतोको हाकिमानके सवाल के यवावमो कुरशो नामा. मै सबाला । श्रीहरिशरणम् सवाल ३५-जिले कानपुर साकिनेर एक हिन्दु जमीदार तीन स्त्री राखितो। ओ ताहार एक बार गर्भ एक पुत्र श्रो द्वितीय स्त्रीर गर्भ ओ एक पुत्र एवं अन्य वीगर्भ पाँच पुत्र छिलो। ओ जमीदार मजकुर ओइ सात पुत्र वर्तमान राखिया लाकान्तर ह्य। जमी- दार मजकुरेर पेजमोदारी ओइ सात सन्तानेर मध्ये की प्रकार अंश हाइवेक इति ।

१०२ व्यवस्था पत्र-संख्या-३५ सवाल यदि स्यात् जमीदार मजकुरेर मन्तान सकलइ तीन स्त्रीर मध्ये एफेर गर्भजात हइया सकलइ परलोक प्राप्त हय तवे ओइ स्वीर कोनो सन्तान ना थाकाते ताहारदिगेर पैतृक हिस्सा की रूप वएटक हइवेक, एवं कोन कोन व्यक्तिके अर्शिवेक इति । '.- . यवारव्यवस्था प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशबोधो जावस्तदनुसारेणोतरं लिख्यते- यत्र कस्यचित् कानपुरप्रदेशीयस्य हिन्दुजातेभूस्वामिनस्तिमणां स्त्री मध्ये एकरया गर्भ एकः पुत्रो द्वितीयस्या श्रपि गर्भ एकः पुत्र एवम- न्यस्या गर्भ पञ्च पुत्राः स्थिताः स भूस्वामी यद्यपरिलिखितमतपुत्रान् संरक्ष्य मृतः स्यात्तदा तद्भूस्वामिनः पैतृक सराजकररथावरं समं सप्तधा विभज्य सप्तयुत्राणां प्रत्येकमेकैकांशो भवतीति- एकस्सा तत्र प्रमाणम्- अत' उद्ध्वं पितुः पुत्रा विभजेयुर्धनं समम्-इति मिताक्षरा( पृ. ५७५, यास्म० २।११४ )वीरमित्रोदयादिग्रन्थधृतनारदवचनम् धको पृ० ११५२)1 यापरिलिखितभूस्या(मि)नस्तिस्या स्त्रीणां मध्ये गर्भवाताः सन्ततयः सर्वाः परलोकं गतास्तदा सस्या मृतमन्नानायाः फरया: १. तत्भ०-व्यप०॥ २ सितयुग पुश भिरेरन् धन कमान-नाम्म० पृ. पित्यु परने पुत्रा, विभनेनुयन चितु-नास्ट स. पू. १४६। ३. वीरमित्रोदय वचनामिद न दृष्टम् । तत्रतदर्थकम् रिभान मुस्बिोस्या क्याप समम्-ववि ( या २१११७) तम् । ४. तिसरणाम् ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-३५ - (चि)दर्तमानसन्ततेरभावेन तास सतीनां पैतृकथनांशस्यायं विभागप्रकारः-यापरिलिखितप्रभलिखितसप्तसापलभ्रातणां पैतृक (धन) सराजकरस्थावरमविभक्तं स्यात्तदा वर्तमाना ये सापननातरस्ते एव मृतानां सापलभ्रातॄणां योऽशस्तस्य तत्पुत्रपोत्रप्रपात्रसोदरभ्रातृपय॑न्ताभावे समानांशमागिनो भवन्ति । यदि च ते प्रथम परस्परं विभक्ताः पुनर्विभक्तं धनं मिश्रीकृत्यैककधर्मेण संसृताः सन्तः केचन मृतास्तदा येन येन सह ते संसृष्टाः (सन्तस्ते) स्थितास्तेषामेव तद्धनम् , न त्यससृष्टानां पुत्रायभावेऽपि भवति । एतत्पवाद्वये मृतानां पनप्राहिण्यः सकाशात् तत्तत्तल्यः तत्तन्मा- तरो'वा यायजीवमनाच्छादनमागिन्यः । यदि च तेपा तद्धनं विभक्तमय- वोपरिलिखितरीत्या ते ससूया न स्थितास्तदा तेषां पुत्रपात्रप्रपात्ररूपापत्य- पनीदुहितुदोहनपर्य्यन्ताभाचे तेषां माता तत्तदंशमागिनी भवति-इति कानपुरप्रदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयादग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा-इत्यादि मिताक्षरादिग्रन्य- (मिता० पृ० २१६ )तयाज्ञवल्क्यवचनम् ( २।१३५ ) ॥१॥ सौदराणाममावे मिनोदरा घनभाजः-इति मिताक्षरालिखनम् (० २२२) ॥२॥ संसृष्टिनस्तु संसृष्टी-इत्यादि तद्धृत मिता• पृ. २२५)याश- वल्क्यवचनम् ( २।१३८)॥ ३ ॥ ..१.०णागशो तत्त०-ध्यप० । २ मेगनतुदन न च पुत्राधमाने भरति-न्यप० । इपनी माता वा-व्यर०1 ४. ०मागिनी-न्याः।

१०४ व्यवस्था पत्र-संख्या-३५-३६ श्रीहरिशरणम् स पती गृहीयादित्येतद्वचनातं विभक्तमातृतीविषयम् इतिमितादरा- लिखनम् (मिता पृ. २१७) ॥४॥ श्रीजयतितराम् ঋীন্তনাগমিথয श्रीरामतनुशम्मलिधागगीशेन एइ व्यवस्था दाखिल रजिष्टर साहेव श्रीयुत मेघनाटनसाइत्रका हजुर कलकत्तेका सदर कमिसनरके श्रायुत राससाहेव सदर देमानी आदालतीके पश्चम हाकिम के) सवालके यवाव । : ३६-श्रीयुत रेजष्टर मेपनाटन साहेवेर हेते सवाल- प्रसादसिंह नामे एक व्यक्ति राजपूतर औरसे धानक जाति स्वीर गर्भ जन्मियाछे । इहाते यद्यपि ताहार पितार सहित ताहार भावार विवाह हेया ना थाके, सोरपोप पायोनेर योग्यता राखे. कि ना-एइ सवालेर यवाव हिन्दुस्थानि पण्डित लिबिया दुन इति । यशवव्यवस्था यदि फश्चित् प्रसादसिंह राजपुनबीजो' धानकजातीयस्त्रीगर्ने उत्पन्न स्तत्र यद्यपि तत्रा सह तम्मानुविाहो नाभूत् तथापि अनछादन प्राप्तुं शक्नोतीति । গীনিৰাম श्रीवैद्यनाथमिश्रेष एइ व्यवस्था दाखिल रेजस्टर श्रीयुत मेकनटन साहेवेर हुजुरे- १. रावत मोजतेपर। २.प्राप्त.ज्यप। Hy.

ज्यवस्था-पत्र-संख्या-३७-३८ १०५ सओयाल २७-यद्यपि बिहोत जिला निवासी कोन व्यक्तिर भातुप्पुत्र- थाके से व्यक्ति दोहित्रके कृत्रिम पुत्र करिते पारे किना? याव तीरभुतिप्रेदेशीयेन केनचिदनपत्येन तद्देशचलितकेशवमिश्रकृतद्वैत- परिशि रुद्रधरोपाध्यायकृतशुदायवेकादमन्यविवेचनया मनुवचनानुस.रेण तद्देशीयपूर्वापरव्यवहारानुसारेण च सत्यपि भ्रातृपुत्र दो हनः कृत्रिमपुत्रः कुतुं शक्यते इति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण एइ व्यवस्था दाखिल श्रीयुत रेजेष्टर मेकनटन साहेवेर हजुरे। सायाल ३-एक विधवा खिलोक श्रापन पतिर अनुमतिते शास्त्रोक्त- विधि मत एक वालकके दत्तक फरिलेक । ए प्रकारे ऐ खीर जीव- दशाते ताहार मृत पतिर धन पायोनेर सत्वाधिकारी ऐ दत्तक ह्य किना। यान प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रप्रतिरूपमवलोक्य याशबोधो मातस्तदनुगरेयोचरं -लिख्यते । याकया विधयया स्त्रिया पत्यनुमत्या शास्त्रोक्तविधिना एको वालको दत्तकः कृतः स्यात्तदा तस्यां क्रियां नीवन्त्यामपि तस्या मृतपतिधनप्रास व्यवस्था-पन्द्र-संख्या-३८-३६. स्यत्वाधिकारी स एव ,दत्तक पुत्रो मपति शास्त्रोक्तमुख्यगोणपुत्राणामेवं पौत्रप्रपोत्राणां वाभाव एव पल्यादीनामधिकाराभिधानात् इति मिताक्षरा- दिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्था- - अत्र प्रमाणम्- एवं मुरत्यगौरापुत्राननुक्रम्यतेषां दायमहणे क्रममाह- पिण्डदोऽशहरश्चैपो पूर्वाभावे परः परः-( यास्मृ० २११३२) इति-मिताक्षसालखनम् (पृ. २१४ )॥१॥ मुरत्यगोणसुता दायं गृहन्ति इति निरूपितम् । तेपामभावे सपा वायादकम उच्यते । पली दुहितरश्चैव पितरों प्रातरस्तथा-( यास्ट २२१३५) इत्यादि मिनाक्षसादग्रन्थ लिखनम् (पृ० २१६ ) ॥२॥ श्रेजयतितराम् श्रीहरिशरणम श्रीवैद्यनाथामश्रण श्रीगमतनुशम्मविद्यावागीशेन एइ ब्यवस्था दाखिल इगरेजी मिशील सओयाल ३६-ये मंकमाते ऐसोयाल यग गियाछे-पाजमिर देशेर सम्पाय हिलजिज्ञासा जाइतछे ये बङ्ग देश दायभाग मते दत्तक पुत्रेर सत्वे ऐ श्राज्ञा सिद्ध वटे, कि ना। यदि सिद्ध ना हर नाहार हेतु पचन प्रमाण सम्लित निवेदन करेण इति । २६ शेतम्बर सन १८२६ इरेजि।

व्यवस्था-पत्र संख्या-४० २०७ यत्राव-व्यवस्था घङ्गदेशचलितदायभागा दिग्रन्थमते दत्तकपुत्रस्य सत्वे इयमेव व्यवस्था प्रमाणं भवतीति । श्रीजयतितराम श्रीवद्यनाथमिश्रण श्रीरान्तनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीहरिः शरणम् ४०-सदर देमानी श्रादालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुटनी इशमिट साहेवेर हुजुर हइते ऐ श्रादालतेर पण्डितदिगेर नामे अप्राप्त-व्यवहार शिवनाथघोपेर पक्षे अधिवनवामवमुर' नामे भानुमतीदास्यार मकई माते इगरेजि १८२७ शालेर ७ फिघरोरि मासेर रोवकारिर लिखित परस्त्र दुइ प्रहर पय्यन्त जवाब दाखिल करणेर हुकुमे सोयालात, एक ये- प्रथम सोयाल- वङ्ग देशनिवासी एक व्यक्ति हिन्दु प्रापन तालुक हइते . आपन वीके किछु भूमि पृथक करिया दिया थो स्त्रीक ताहार उपर दखिल कराइया ताहार कएक वत्सर परे ऐ स्त्रीके श्रो ताहार गर्भज तिन पुत्र राखिया मारयाछे । पश्चात् ऐ तिन पुत्रेर मध्ये एक जन स्वा राखिया मरियाछे। नत्परे प्रथम मृत व्यक्तिर स्त्री वाकी दुइ पुत्र गखिया मरियाछे। जिज्ञासा करा जाइतेछे ये ऐ भूमिते मृत पुनेर स्वीर पत्यंशेर दाोया अशें कि ना ? ॥ १ ॥ द्वितीय सोयाल- यद्यपि प्रथम मृत व्यक्तिर स्त्री ऐ पुनेर मृत्युर पुर्व किम्वा, ताहार पर ऐ सम्यक भूमिर हेवानामा वाकी दुइ पुत्रेर एक १ आश्विनरागवमु-दति साथीमान् पाठः ।

१०८ व्यवस्था-पत्र- स्या- जनार पुत्र के लिखिया दिया थाके, ओ गृहीताके हेवार' भूमिवे दखिल कराइया थाके ए प्रकार हेवा सिद्ध यो दात्रोर अन्य पुत्रादिगेर स्वत्वनाश वोधक घटे कि ना ॥२॥ तृतीय सोयाल- यद्यपि प्रथम मृत व्यक्तिर ऐ भूमि पृथक करिया देओन काल पर्यन्त केवल ऐ तिन पुनेर मध्ये एक जन, अर्थात् गृहीतार पिता, सन्मिया थ के ए प्रकारे शास्त्र अाज्ञाते उत्तराधिकारित्व स्वत्व भो हेवा सिद्ध तार विपये विशेष आछे कि ना?॥३॥ . . श्रीजयतितराम यवाव-व्यवस्था एतद्धम्माधिकरण द्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुर्टनीहशमेटसाहेवधर्माधिक- रणलिखितप्रभप्र तेरूपपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणांचर लिस्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यत्र यद्गादेशीयः कश्चन हिन्दुजातोयो व्यक्तिविशेषः स्वकीपसराज- फरस्थावरात् स्वन्त्रिी काञ्चिमि पृथक्ऋत्य दत्वा तदुपरि तस्याश्च भोगं फारयित्वा कतिपयवत्सरानन्तरं तां त्रियं तद्गभांस्त्रान् पुत्रांश्च सरदा मृतः, पश्चात्तेयं प्रयाणां मध्ये कश्चिदेकः पुत्रः स्वयं सरदर मृतः तदनन्तर प्रथममूतव्यक्ती स्त्री त वशिटो द्वौ पुत्रौ संरक्ष्य मृता स्यात् तत्र तद्भूमी मातरि जीवन्त्यां मृतस्य पुरस्य स्त्रो पत्य कला येत्या प्राणु' मई त । मातरि मृतायामेय विद्यमानानां पुत्राणां पुत्रत्वेन मतयो स्वत्वाताया १हेगाव-न्यर। १पत्यशं-या। १माप्त-न्यप व्यवस्था-पत्र-संख्या-४० . दायत्वं भवति, जीवन्त्याञ्च मातरि मृतस्य मातृधने स्वत्वोत्पत्यभावे दायत्वाभावात् तस्रियाः सुतरां तदनानधिकारित्वात् इति । 1 अत्र प्रमाणम्- पूर्वस्वामिसम्बन्धाधीनं तत्स्वाम्युपरमे यत्र द्रव्ये स्वत्वं तत्र निस्दो दायशब्दः - इति दायभागमन्यलिखितम् (४०५॥१॥ द्वितीय प्रश्नस्योत्तरम्- यदि प्रथममृतव्यक्ती स्त्री तत्पुत्रमरणात् पूव्वं तदनन्तरं वा तला- सळत्या एव भूमेनपत्रमवशिष्टयोयोः पुप्रयोर्मध्ये एकस्य पुत्राय लिखित्वा दत्त्वा ग्रहीतुनकृतभूमौ भोग कारितफ्ती स्य. त्तदैत, घरादानं सिद्ध भवितुम, एवं दाच्या अन्यपुत्रादीनामुत्तराधिकारित्वेन स्वत्वन,शबोधका भवितुं नई त यतो मत् दत्तस्यावरात्मकसादायकस्त्रीधने स्रया दनादनधि- कारस्य विशेषतो द.यभागादिग्रन्थ लखितत्वेनोपरि लखताववादास्पदीभून- .. धनस्य भर्नु दत्तस्थावरात्मकसौदायिकलाधनत्वामात । अन प्रगाणम् उढया कन्यया वापि पत्युः पितगृहेऽथवा । भत्तः सकाशात पित्रोर्या लब्धं सौदायिकं स्मृतम् -- इत्यादि दाय- भागादि( दाभा० पृ० ७६, ४।२२ ,प्रन्थ लिखितकात्यायनवचनम् (पास्मृ. ६०१)॥१॥ सौदायिक सदा स्त्रीणां स्वातन्त्र्य परिकीर्तितम् । विक्रये चैव दाने च यथे। स्थावरप्वपि-इते तद्वत दाभा. पृ. ७६, ४१२२ कात्यायनवचनम् (कारमृ. ६०५) ॥२॥ स्थावरेऽपि मर्तृ दत्तगात्रे मिया दानाद्यनधिकारः । यथाह नारदः- १ तस्याम्होप मे-दामा ।

- 'व्यवस्था-पत्र-संख्या-५०-४१ भर्ना प्रीतेन यंदत्तं त्रिय तस्मिन् मृतेऽपि तत् । सा यथांकाममश्नीयाद् दद्यात् वा स्थावराहते ॥ इत्यादि दाय भागग्रन्थलिखनम् (पृ० ७६७७, ४।२३, नास्मृ॰ पृ॰ ५६ ) ॥२॥ . तृतीयप्रश्नस्योत्तरम् - यद्यपि प्रथममृतव्यक्तिकत्र्तृकतद्भमिष्टयक्करणदानकालपर्यन्तं तेपा प्रयाणां पुत्राणा मध्ये केवलमेक एव अर्थाद् ग्रहीतुः पितेपोत्पन्नोऽभूद्, एतस्मिन् प्रकारे सत्यपि शास्त्राज्ञायामुत्तराधिकारित्वेन स्वत्वविषये एव दान सिद्ध्येसिद्धिविषये च विशेषो नास्ति-इति 'वङ्गदेशचलितयभागादि अन्यानुसारिणी व्यवस्था । श्रीजयतितराम् श्रीवैधनायमियेण औरामतनुशम्मवियागंगोशेन श्रीहरिशरणम् . ४१-रोवकारि मिसिल पादालत देओयानी सदर इंगरेजि “१८२७ शाल २४ माहे आपरेल मतालक (मतावक ) वाङ्गला १२३४ शाल १२ माहे वैशाख रोज मङ्गलवार आदालत मज- कुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर वैठके । नवक्शिोरदास 'सायल • सायेलेर सक्लि मुनसी गोलाम यतुल हाजीर हइल । साये- लेर सोयालेर लिखित निवेदनेर अनुमोदने श्रो दस्तावेज्ञातेर दृष्टे सायेलेर दखली स्थान हइते शरवराहकार महयुफी श्रो अन्य २ विषय सम्पलित ए आदालतेर टुयुम सादर होनेर . . - । १प्रथा-व्यप।

ध्यवस्था-पत्र-संख्या-११ १२१ -प्रार्थनाय ऐ सोयाल ो जगन्नाथ चक्रवत्तिर नामिक मक्तार- भामा ओ ऐ उकिलेरे, नामिक ओकालतनामा अओ इंगरेजी १ १८२६ शालेर २० शेतम्बर. मासेर-होया जिला मयमनसिंहेर अाहालतेर रोयकारिर नकल ओ सन हालेर जनोरि मासेर, २०।२७ तारिखेर लिखित जाहागीर'नगरेर कोट प्रापीलेर रोधकारिर नकल दुइ केता सम्वलित, जे हाल मासेर २१ तारिखे. दाखिल हइयाछिल, अद्य पडा गेल । तदपरे सदासुखपण्डित सकित सोयालेर शामिल दस्तावेजातेर दृष्ठे •सरवराहकार वहालीर, प्रार्थनाय एक केवा ‘सोयाल रामशङ्करराय ओ शोनारामसरकारेर नामिक मक्तारनामा ओ आपन नामिक ओकालतनामी श्रो वाङ्गला पाठ ओ अक्षर वागला १२३१ शालेर १३ पौष मासेर लिखित नवकिशोरदासेर लिखिया या एक कता एकरारनामार नकल सम्बलित अप्राप्त व्यवहार गोपीमोहनंदासेर माता राजेश्वरिदासीर पक्ष हइते दाखिल फरिलेका दृष्टि प्राइल | ओ गुनशी हयदर पाली उकिल हाजिरं हइया रामकिशोररायेर तरफ हइते ताहार हिरया क्रोक हइते : खालाश पाओनेर मजमुने एलाका साहागीरनगरेर कोटेर हाकिमदिगेर हुकुम वहालिर प्रार्थनाय अन्य विषय सम्वलित एक केता सोयोलमये रघुनाथरायेर नामिक मक्तारनामा .ो आपन नामेर ओकालतनामा दाखिल फरिलेक, पडा गेल 1, तदपरे सायेलेर किलेर स्थाने जिज्ञाशा गेल, जे आट भ्रातार मध्ये चारि, ध्रौता जे आपन खी राखिया निःसन्तान मरियाछे, से चारि भ्रातार नाम कि छिन । जबाव दिलेक जे शिवमोहन ओ ब्रजकिशोर ओशोभाराम ओ कुजकिशोर । साहार मध्ये पुलकिशोरेर स्त्री ओ शिवमोहनेर स्त्री मरियाछे, ओ शोभारामेर स्त्री ओ ब्रजकिशोरेर स्त्री वर्तमान आछे । जाना गेल जे नव किशोर १. गावगाहानीर०-या।

व्यवस्थापन सख्या-४१ । . - - ४ - दासेर सोयाले लेखा पाछे ये प्रामार भ्राता गौरिशोराब ससार त्यग हइया आपन प्रस्थावर वस्तु आपन स्त्री राजेश्वरी दास्याफे श्रो स्थावर वस्तु आमाके दिया वैराग्य धर्माश्रय करिया दशान्त र इझ्या बहु काल परे पुनरायं प्रापन वाटीते श्रासियाछल । तत्कालीन गोपीमोहनदास नामे एक पुत्र राजेश्वरीदास्पार गर्ने जन्मियाचे। कि तु शास्त्रमते मसम्मान मजकुरार ओ ताहार पुनर सत्व मिलकियते रहे नाइ इति । एमते हुकुम ६इलो जे, ए अदालतेर परिडतादगेर स्याने दुइ सोयाल करा जाय । एक एइ ये.यद्यप ऐ. नवकिशारदासेर एजहार,सत्य हय, मन्यत हाया नाय राजेश्वरीदारयार ओ ताहार पुत्र गोपीमोहनदासक गौररिशोरदासे मिलकिया अर्श किना द्वितीय, एइ ये सहोदर पाट भ्रातार मध्ये दुइ भ्रातार नि सन्तान दुइ स्त्री ने अद्यापि बत्तमान पाछे ताहारदिगेर । पतित्यक्त दुइ अष्टम अरोर सत्वाधिकारिणी वटे कि ना उचिव ये शनिवार पर्यन्त वह्नदशेर शाख नुसारे एई दुइ सोयालेर जवाब दाखिल करण। पण्डितदिगेर व्यवस्था दृष्ट उचिव' हुकुर्म देया जाइवेको सवारव्यवस्था। एतदमा धक्रयादतीयाधपातश्रीयुतकुटनीदश भटयादेवधर्माधि फरण लिखतावबारपन्तिगतपरन तरूपत्रमवलस्य य शबाधाजस्त दनुस रेणोत्तरलरपते। 'प्रथमप्रभत्योचरम्- यद्यपिनवविशोरदासोपस्थापतत्तन्तान्तर्गतना किशोरदाससम्मान गोरक्शोररायक्क्न्यस्वत्वं सदीभूतस्य वरधन यपयुक. स्वस्तीरातेश्वरी १ अधि:-- 4 . V - ܝ 4 है . व्यवस्था पत्र संख्या-४१, ११३ दासीसम्मंदानगोरकिशोररांयकत्तु कतत्स्वासदीभूत स्थावर नविषयकंच दानं सत्यत्वेन मन्यमानं सन्निरुपाधिकं स्यात्तदा राजेश्वरीदास्यास्तसुत्रस्य. गोपीमोहनदासस्य, वा गौरकिशोररायकर्तृ कनवकिशोरदाससम्प्रदान कस्यत्यासंदीभूतयनान्तर्गतनिरुपाधिदानकृतस्यापरवलुपु ताधिकार किन्तु" पविलिखितरांजेश्वरीदासीसंम्पदानकनिरुपाधिदानवास्थावरवस्तम् । राजेश्वरीदास्या भवत्येवाधिकारः, न तु तत्पुत्रस्य .गोपीमोहनदासस्य । एवं ययुपस्थापितगोरकिशोररायक कसंसारत्यागस्य.. वैराग्य:: धर्माश्रयणवृत्तान्तस्य च.सयत्वेन मन्यमानत्वेऽपि राजेश्वरीगर्मजातस्स • गोपीमोहनदासस्य' गोरकिशोररायोरसस्य तत्कृतोपरिलिखितदानविषयीभूत- स्यावरास्थावरातिरिक्ततत्स्वत्यास्पदीभूतस्थायरास्थावरंवस्तुषु तत्वत्वो- परमेऽधिकारः । यदि च उपरिलिखितं दानं सोपाधिकं स्यात्तदा तदुपाधि- निश्चयं विना .सोपाधिदानवतस्थावरास्थावरपतुषु राजेश्वरीदास्यास्त: पुनस्य गोपीमोहनदासस्यं या अधिकारो भवति न वेति निश्चयो भवितुं ने शक्रोति। अत्र प्रमाणम् स्वभागान् यदि दास्ते विक्रीणीयुरथापि वा । कुंयेर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वघनस्य वै ।। इति दायभागादि- (दामा ३५, २०३१ अन्यभृतनारदवचनम् (नामसं० ४० ११५७, १४१४२०) ॥ १॥ उत्पत्त्यवाय स्वामित्वं लमेत इति श्राचार्या इति गोतमवचनम् । .(गौघ०१०।४८)। तदपि पितृस्वत्वोपरमेऽहजत्लस्य स्वामिलहेतुत्वेनोत्प त्तिमानसम्बन्धेनान्यसम्बन्धाधिकेन , जनकपने पुत्राणां स्वामित्वाचन भूत-व्या। ते-नारमृसं०1 मोपी०-व्यप.1 अर्थ सामिलान्लभ.ज्यप। ३ दान-व्या एखादनम०-व्यप। ४खानशान-नस्सं । ६ जवहेवेनोपदि-न्यो। , ५ सर्पमीशते-जास्सं। . k -- . + व्यवस्था-पत्र संख्या-४१-४२ पुत्रो लभेत, नान्यः सम्बन्धीत्याचार्या मन्यन्ते इत्यर्थकम्-इतिदायदत्त्व- लिखनम् (पृ. २) द्वितीयमनस्योत्तरम्- अष्टाना सहोदरभ्रांतॄणां मध्ये दयोद्घोरनपत्ये द्वे स्त्रियो विद्यमाने स्याताम्, तयो स्वस्वपतित्यकाष्टभ्रातृसाधारण समुदायधनान्तर्गतस्वस्वपति- योग्याशेऽधिकार-ईते वगदेशचलितदायमागदायतत्त्वविवादमार्णव- विवादार्णवसेतप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । : अनं प्रमाणम:- पली दुहितरश्चैव पितरौ " मातरस्तथा" इत्यादि ! दायभागादि- (दामा पृ० १५१, १३४)अन्यधृतयाशवल्क्यवचनम् (२,. १३५) ॥१riti थीर्जयतितराम श्रीहरि शरणम् श्रीवैद्यनाथमश्रेण श्रीरामतनुशमविद्यामागीशेन . .. 1 . - . ४२ रोवकारि मिसिर्ल आदालत नेजामत इगरेजी १५२७ शाल तारिख । मैइ मतावक २६ माह. वैशारा सन १२३४ 'पागला रोज मङ्गलवार आदालत मजवुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुत पुर्टनी इशमिट साहेवेर बैठके- शङ्करदास- शायेल । शायेल हाजिर हइलो। हाल सनेर २६ मार्च मासेर लिखित साजिमायादेर कोटें सरफोटेर एक येता रिटरन ताहार सम्बलि- तेर रोक्कारि ओ मबईमार कागजात समेत पटुधिया ए भादा: लते दासिल होया सोयाल आदि सहित अद्य पड़ागेल । हुकुम हइलो ये ए श्रादालतेर पण्डितदिगेर स्थाने सोयाल फराजाय ये यद्यपि मन्यत होया जाय ये शहरदासपटन व्यवस्था-पत्र-संख्या-४२ ११५ 1 श्रोयार सायेल ४४ टाका नगद किम्वा ५० टाकार एक केता तमसुक रामचरनपटनोयार स्थाने लिखाइया , लइया आपन बी मसात रघुवंशीयाके ऐ रामचरण स्थाने समर्पन करिया थाके, ओ रामचरण ऐ, स्त्रीके आपन स्त्रीव व्यवहारे आनियाथाके ओ स्वयं ऐ स्त्री आपन आशल पतिर दौरात्म्येर एजहारे रामचरणपटनओयारेर निकट थाकिते सम्मत थाके । ए प्रकारे शङ्करदास शायेलेर निमित्तें सामित्व मत्व वाकि रहियाछे कि ना। श्रार ऐ स्त्री ऐ रामचरणेर निकटे रहिवेक, किम्मापाशल पति तलव करण प्रकारे, सम्मत किम्वा असम्मत हय, पुनराय प्राशल पतिर निकट नाइवेक। उचित ये फोज- दारिर कागजातेर मजमुन विवेचना करिया ए विपयेर जवाब पश्चिम देशेर शांखानुसारे शनिवार पर्य्यन्त दाखिल करेन । पत् कालीन उचित हुकुम देया जाइयेक इति- श्रीजयतितराम जंघाकव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीइशमिटसाहेवघाधिकर- एलिसितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितफौजादारिसज्ञक धर्माधिकरणीय पनाणि चावलोक्य विविच्य च यादृशबोधो जातस्तद्नुसा रेणोत्तर लिख्यते। यद्यर्थिशङ्करदासपटनोयारेण चतुश्चत्वारिंशद्वाजतमुद्रा' कि या पञ्चाशदानतमुद्राणामेकमृणलेख्य रामचरणपटनोपारसकाशाल्लेख यित्वा राहील्या स्वस्त्री रघुवशीयानाम्नी तद्रामचरणस्थाने समर्पितेति मन्यमान स्याद्, एव रामचरणपटनायारो रघुवीयया सह स्वस्तीवद् . १०रपोर-व्यप०। २ किम्वा-व्यप। ३० प०-व्यप।

व्यवस्था-पत्र संख्या-3२ व्यवहारं कृतवान् स्याद्, अथ च सा स्त्री स्वकीयपाणिग्राहकपतिदौराम्योप- स्थापनेन रामचरणपटनोयारस्य सन्निधौ स्थातुं सम्मता स्यादेतादृश-. 'प्रकारे सत्यप्पर्थिनः शङ्करदासस्य पतित्वप्रयुक्तस्वत्वमस्त्येव; एवं सा स्त्री स्वपतिकृताहाने सति तत्सन्निधौ स्थातुमसम्मता सम्मता वा पुनः स्व- फोयपाणिग्राहकपतिसन्निधौ गन्तुं योग्या भवति, यतः प्रभुसमर्पितफोजदारी- संशकघधिकरणीयपत्रजातविवेचनया अधिशङ्करदासकर्तृकस्वस्त्रीविक .(यस्य दानस्य वानवगमात्, प्रत्युत रक्तगोपालनामकसायुपस्थापितचा- न्सेनोपरिलिखितऋणलेख्यञ्च अधिशङ्करदासकर्तृकस्वीकाराभावावगमात् । एवं रघुवंशीयोपस्थापितवृत्तान्तेन तस्या रामचरणपटनश्रीयारस्थानस्थिती पतिदौरात्म्यमात्रस्यैव प्रयोजकत्वावगमात्,अथ च रामचरणपटनश्रीयारोप- स्थापितवृत्तान्तेन तस्याः पतिभगिनीपतित्वसम्बन्धेन वत्सन्निधानस्थित्यक- 'गमाच। एवं रामचरणपटनोयारसंशकप्रत्यर्थिनिर्दिष्टसाक्ष्युपस्थापित वृत्तान्तेनार्थिशङ्करदासकर्त करामचरणसकाशात् चतुश्चत्वारिंशद्वाजत मुद्राग्रहणपूर्वकमेताश्चतुश्चत्वारिंशद्राजतमुद्रा मया गृहीता इयं रघुवंशीया- नामी नी त्यतत्यर्थकलेख्यदानं प्रतीयते । परन्तु तल्लेख्यस्य प्रभु समर्पितपत्रेवदर्शनेन मुद्राग्रहणस्यापि सन्देहः । यद्यपि मुद्रा गृहीतास्तदा तत्पनजातनिविष्टऋणलेख्यस्य किमावश्यकत्वमिति । यदि च प्रत्यर्थिराम: चरणनिद्दिष्टसाक्ष्युपत्यापितवृत्तान्तस्यैव सत्यत्वेन स्वीकारस्तथाप्येताहरा- दारविनयस्य शास्त्रानुसारेण व्यवहारानुसारेण च सिदिर्भवितुं नाहति । अथ च यदि कश्चित् शास्त्रव्यवहारविरुद्ध कर्म करोति त दण्डयित्वा राशा वत्कार्यमवश्यं परावर्तनीयम् । तस्माद्रामचरणसकाशात् गृहीता रघुवंशीयानाग्नी स्त्री अपिना शङ्करदासेन स्वभा यत्नतो' भरणीया इति पधिमदेशचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमयूखस्मृतिचन्द्रिकादिप यानुसारिणी व्यवस्था- १०वाने-यप। २०लेख्यध-पर1 ३ ०दरवि०-यप। TH व्यवस्था-पत्र संख्या-४२ अत्र प्रमाणम्- निक्षेपः पुत्रदाराश्च सर्वस्वं चान्वये सति । आपत्स्वपि हि कष्टासु वर्तमानेन देहिना ॥ भदेयान्याहुराचार्या यचान्यस्मै प्रतिश्रुतम् -इति मिताक्षरा( पृ० २४४)वीरमिनोदयस्मृतिचन्द्रिका(पृ० १६१ )व्यवहारमयूखादिग्रन्थलिखितः । नारदवचनम् (नामसं०, पृ० ८६५२४,५)।१। गृहा'त्यदत्तं यो मोहाद् यचा देयं प्रयच्छ ते । दण्डनीयावुभाती धर्मज्ञेन महीक्षिता- इति (मिता पृ० २४६ २।१७६. )वीरमिनोदयबीमि० पृ० ३६३ स्मृतिचन्द्रिका दिग्रन्थ- (स्मृच० पृ० १६४ )धृतनारदवचनम् ( नामसं० ४० ६१, ५॥११॥ नास्मृ० १४०, ७/१२)।२। अदत्तादेयमहणाद् गृहीतस्य परावर्तनमपि कार्यमिति गम्यते- इति धीरमिनोदय' पृ० ३६४)ग्रन्थलिखनम् ॥३॥ रक्षेत्र कन्यां पिता विनां पतिः पुत्रास्तु वार्धके । अभावे ज्ञातयस्तेषां न स्वातन्त्र्यं कचित् सियाः॥ इति मिताक्षरा(पृ० २५ )वीरमित्रोदयादि( वीमि० पृ. १५०) मन्थलिखितयाशवल्क्यवचनम् (१,८५)४। पिता रक्षति कीमारे भर्ता रक्षति यौबने । रक्षन्ति स्थावरे पुन न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ इति मिताक्षरादि ग्रन्थधृतमनुवचनञ्चति ( भस्मृ॰ पृ॰ ३४६ )। श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मा विद्यावागीशेन १ निक्षेप पुत्रदारच-नास्म सक। २ सर्वस्व चात्र०-व्यप० । ३ राहत्य०-व्यप०। ४ लोभार-मिता० । ५०यचा-नास्मृ० स०, यच्चादेय-व्यए । ६ अदेयदायको दण्ड्यस्तयादत्तप्रतीक्षक-नास्म०, तथादेयस्य दायक-नमस० । ७ गृहौतस्यपरावर्तनमपि मदोमिता कार्यम्-रमतिचन्द्रिकायाम् । • पुत्राश्च- स्मृ०1 १ मिताक्षरायान्तु-चिपि स्त्रीयां नैव स्वातन्त्र्यम्-इति लभ्यते । - जवाव- व्यवस्था पत्र संख्या-४३' ४३-आदालत पापिल एलाके अजिमावाद- शदर देओयानी श्रादालतेर पण्डितदिगेर स्थाने सोयाल- -यद्यपि एक व्यक्ति गयाोयाल ब्राह्मण आपन सहोदरा भगीनि ओ ताहार पतिर नामे वाटीर दानपत्र, ये ताहार नकल पाठान याइतेछे, एइ प्रकार करियाथाके ये आपन जीवदशा पर्य्यन्त ऐ वाटीते थाकिया धामार मृत्युर परे उहारा आमार क्रिया फर्म फरिवेक, ओ सहोदरा भगिनी, ओ ताहार पति दातार पूवें मरियाछे, ओ ताहार परे दाता- मरियाछे, ए प्रकारे. शाखानुसारे ऐ. जायगा सहोदरा भगिनी ओ ताहार पतिर उत्तराधिकारिदिगेके अविक, किम्वा दातार उत्तराधिकारि दिगेके इति । शन १८२७ इगरेजि तारिख ५ माहे मार्च मवावकं २२ माहे फाल्गुण सन १२३४ फशली लेखा गेल- रोवकारि मिशील आदालते देो यानी सदर इंरेजी सन १८२७ साल तारिख ५५ मेइ मतावक-... लच्छिरांम- आपीलाएट- मंशात आनन्दिवाइ- रप्पाडण्ट- शन हालेर ५मा मासेर लिखित अजिमावादेर प्रवनशन कोटेर एक फेता सा पकिट ताहार सामिलेर रोवकारि आदि सहित पहुछिया अद्य दृष्टि प्राइल । हुकुम हइल ये पण्डिवदिगेर स्थाने जवाव शनिवार पर्यन्त दाखिल कराया दृष्टि करा. जावे इति । ईरेजी शन १८२७ शालेर २६ मेइ व्यवस्था दाखिल हइया. पाटन पाठानेर हुकुम सारद हइल- श्रीजयतितराम जरायव्यवस्था एतद्धम्माधिकरणदितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनीदशमिटसादेवधर्माधिकर पलिखितसप्तविंशत्यधिकाष्टादशशताब्दीयमेहमासीयपञ्चदशदिवटीयविचार २ . । .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-४३ ११४ पनलिखिताजानुसारेण ... तत्समर्पितपाटलिपुत्राख्यनगरसम्बन्धिकोटोपोला- ख्यधर्माधिकरणीयविचारपनादिनिविष्टप्रश्नपत्रमेवं दानपत्रप्रतिरूपपत्रञ्चाय- लोक्य विविच्य च याहरामोधो नातस्तदनुणरेणोत्तरं लिख्यते ।। योकः कश्चिद् गयावालबाह्मणः स्वकीयसहोदरभगिनीनामकमेव तत्पतिनामकञ्च वाट्या दानपत्रमेतत्प्रकारेण लिखितवान्'-स्वजीवन- पर्यन्तं तस्यां वाट्यामहं स्थास्यामि'; अस्मन्निधनानन्तरं तावस्मक्रियाः करिष्यतः,एवं दातरि विद्यमाने सति दी जायापती मृतौ स्यातामेवं तदनन्तरं दाता मृतश्चेत् एतत्प्रकारे सति उपरिलिखितदानपत्रलिखितरीत्या शास्त्रा- नुसारेण सा वाटी दातुः सहोदरमगिन्यास्तत्पत्युश्चोत्तराधिकारिणामेव भवति, न तु दातुरुत्तराधिका रिणाम् । यतो दानपत्रे श्रीविष्णुपदे सहोदर- भगिनीतत्पत्युभयसम्प्रदानक कुशोदकग्रहणपूर्घकसङ्कल्पकरणपूर्लक- याट्यादिसर्चस्पत्यागात्मकधर्मार्थदानं मया कृतमिति दात्रा लिखितम् । एतादृशवैधदानेन तदनन्तरकाल एष दातुः स्वत्वानिवृत्तिः, ग्रहीतुः स्वत्वो- सत्तिश्च भवति । एवं दात्रा सम्प्रदानभूतयोस्तयोर्जायापत्योः ससन्तानयोः स्वायत्तीभूतग्रहादिनिष्ठायत्तत्यसम्पादनमपि कृतमित्यपि लिखितम् । अथ च दानादिना बद्ध तद्गृहे तो सम्पदानभूतो जायापती दानपत्रानुसारेण तिष्ठतामायत्तत्वञ्च कुरुताम्, अस्मत्स्वत्वमद्यावधि किञ्चिदपि नास्तीति- दानपत्र लिखनेन दातुः स्वत्वविनाशस्य सम्प्रदानभूतयोस्तयोः स्वत्वस्य च दृष्टीभूतत्वेनावगमात् । अतएव दानकृतवाट्यां यावजोवं दातुः स्थिते सम्पदानकर्तृकदातुः श्राद्धाद्यौर्वदेहिकक्रियाकरणभावस्य च सम्प्रदान। स्वत्वोत्पत्तिप्रतिबन्ध)कोपाधिलं न सम्भवति, उपरिलिखितप्रकारेर्दानस्य वैघत्वेन धर्मप्रयोजनकल्येन मोगद्वारा पूर्णतया सम्पन्नत्वेन च सोपाधित्वा- भायात्-इति पाटलिपुत्रप्रदेशप्रचलितमनुमिताक्षरापोरमित्रोदयव्यवहार- मयूखादिअन्धानुसारिणी व्यवस्था- ३. वध्ये व्यप०॥ ---निखिनदान-व्यप० । २. स्याम्यस्मनिय-व्यप० ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-४३-४४ । ', . अत्र प्रमाणम्- देशे काल'उपायेन द्रव्यं श्रद्धासमन्वितम् । पात्रे प्रदीयते यत्तत् सकलं धर्मलक्षणम् इति मिताक्षरादिग्रन्थ (मितापृ०३)धृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ( ११६ )|| १ प्रदीयते यथा न प्रत्यावर्चते तथा परस्वत्वावसानं त्यज्यते । एतद्धर्मस्योत्पादकम् इति मिताक्षरालिखनम् (पृ. ३ ) ॥ २॥ प्रदानं स्वाम्यकारणम् इति मनुवचनम् (५१५२ ) ॥३॥ स्वामी रिक्थक्रयसंविभागपरिग्रहाधिगमेषु (गौघ० १०३८)। मासणस्याधिकं लब्धम्-(गौध० १०.३६)। क्षत्रियस्य विजितम् (गौध० १०४०)। निविष्टं वैश्यशूद्रयोः गोंध० १०४१) इति मिताक्षरा (४० १३५) धौरमित्रोदयव्यवहारमयूखा(व्यम०८८ उत्त)दिगन्यवृतगोतमवचनम् ॥४॥ तत्र च हिरण्यवसादादुदकदानानन्तरमेवोपादानादिसम्भवाद- इत्यादिमिताक्षरालिखनम् (४० १४१)॥५॥ थीज़यतितराम्. श्रीहरिशरणम् .श्रीवैद्यनाथमिण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन ४४-रोवकारि मिसिल श्रादालत देशोयानि सदर इगरेजि. १८२७ शाल तारिख १४ माहे जुन मतावक वागला १२३४ शाल पापाढ रोजगृहस्पतिवार आदालत मजकुरार द्वितीय हाकिम भोयुत फुर्टनी शमिट साहेवेर वैठके- राममोहनघोष "वनामे रामधनराय"ओगयरह शायेलेर उकिल मुनशी गोलाम वतुल हाजिर हइल । सन हालेर ३१ मेइ मासेर होया रोक्कारिर लिखित परम हाकिमेर हुकुमानुसारे सास आपीलेर सोयाल ओ गयरह तत्सम्पर्कीय १ काले-व्यप। .....

व्यवस्था-पत्र-संख्या-४४ १२१ -- कागजात प्रामार बैठके उपस्थित हइया दृष्टे आइल । उभयेर 'एक पारे जाना जाइतेछे ये विरोधि लाट अर्थात् लाट परला वर्द्धमानेर काचारि मोकामे रासयात्रा दिवस निलाम हइया छ। मुदिगेर एजहार एइ रूप जाना याइतेछे ये आमरा रास- यात्रार दिवस वाकि टाका जमिदारेर आगलाल निकट निया- छिलाम, जमिदारेर आमला रासयात्रार दिवस होनेर ओ- जरे से दिवस वाकीर टाका लोनेर स्वीकार ना करिया जवाव. दिलेक ये कल्य आइस, लोया जाइवेक, आमरा गेले परे यात्रार दिवस होनेश्रो महालेर द्वितीय चन्दवस्त फग्लेिक, पार इङ्गरेजि ८१६ शालेर अष्टम श्राइनेर द्वादश धाराते हुकुम आळे-निलाम, अर्थात् द्वितीय वन्दवस्त, ये एइ आएन निर्दिष्ट ह- ओयार पूर्व हइया थाके, तत्सम्पर्केओ ऐ डाँडा ये ऐं श्राइनेर एकादश धाराते लेखापाछे, निलाम-अर्थात् द्वितीय धन्दवस्त, पूर्व प्रसिद्ध श्रो विना शठताय श्रो देश व्यवस्थार मन होन नियमेओ वत्तिवेक । यथा सन्देह हइतेछे ये शास्त्रानुसारे एइ प्रकार कार्य रासयात्रार दिवस सिद्ध ना हय, विशेषतो रास- यानार दिवस कहिया वाकीर टाका लोने अस्वीकार हइया, आगत कल्य ताहा लओनेर करार करिया, वाकिदार दिगेक विदाय दिया, परे सेइ दिवस रासयात्रार दिवस होनेओ वाकि दाविर हेतुते महालेर द्वितीय वन्दवस्त ये वाकिदार- दिगेर असाक्षाते करायाय सिद्ध रहिवेक ना। एइ प्रयुक्त ए विपये वङ्गदेशेर शास्त्रेर जिज्ञासा करण आवश्यक हइलो। ए फारण हुकुम हइलो ये आदालतेर पण्डितेरा वङ्गदेशेर शाखा- गुसारे परस्व दुइ प्रहर पर्यन्त ए विपयेर जवाव लिखिया गुजराएन ये मुर्दै दिगेर एजहार सत्य ओ रासयात्रार दिवस निलाम हओन सत्वेओ ए प्रकार कार्य यथार्थ ओ सिद्ध हइते 'पारे कि ना, ओ पण्डितदिगेर जवाब दाखिल हइले परे उचित, हुकुम देओया जाइवेक इति । - १२ व्यवस्था-पत्र संख्या- श्रीजयतितराम् . P- . जवायव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुर्टनीदशमिटसाहेवधर्माधिक रणलिखितविचारपत्रान्तर्गतममप्रतिरूपपत्रमवलोक्य याहशयोघो जातस्वद- नुछारेणोत्तरं लिख्यते- यद्यार्थिवृत्तान्तस्य सत्यत्वं स्यात्तदैतादृशकार्यस्य छलकृवत्वेन, अप चार्थिनोऽवशिष्टकरदानानुकूलव्यापारे सत्यपि सराजकरभूखाम्यधिकृवैस्तर करमगृहीत्वा करदानानुरूपोपाधिसम्बन्धन' भूस्वामिकृतदाननिमित्तमर्थिनां भोगोपयुक्त स्वत्वं यत्र तस्य प्रयासान्तरकरणेन निष्पनत्वाञ्च सिद्धिर्भवितुं" नाईति; यतः सराजकरभूस्वामिसकाथात् फरदानरूपोपाधिसम्पन्धेन' तत्-' कृतदानान् प्रजादीनां भोगोपयुक्त स्वत्वमुत्पद्यते । तत्स्वत्वञ्च करदानरूपो- पाघिसम्पन्धेन तिष्ठति, तदभावे गच्छति । प्रकृते त्वर्युपस्थापितवृत्तान्तेन' अधिक फकरदानाभावानवगमात् सुतरा करदानरूपोपाधिसम्बन्धेन भूस्खा मिनो दाननिमित्तमर्थिनां भौगोपयुक्त स्वत्वं गन्नु न शक्नोति । थय च भाषायां निलामशब्दवाच्यस्य द्वितीयवन्दवस्तशब्देन मसिद्धस्य द्वितीय प्रयासस्य रासयात्रादिवसीयत्वेन सिद्धिर्भवति न घेत्यस्येदानी बगदेशचलित अन्येष्वलिखनात्-इति वदेशमचलितमनुविवादमङ्गाल्वादिग्रन्थान सारिणी व्यवस्था। - अत्र प्रमाणम्- योगाधमनविक्रीत योगदानप्रतिमहम् । यत्र वाप्युपाधि पश्येत् तत्सवं विनिवर्चयेत् ।। इति मनुवचनम् (१६५)॥१॥ : १.सम्पन्देन -1 ३. धन्देन-न्य ५ दिवशीय लेन-व्यप २.सिति०-यप। ४.०३ निति०-यप1 इ. निवियर-थप व्यवस्था-पत्र-संख्या-४४-४५ १२३ तामिश्च वर्षो(पोयुक्तकरदामेन वर्षोपयुक्तस्यत्वमयते । तह च राज्ञा तद्भुमेरन्यत्र दानविक्रयणादिकरणं न सिद्ध्यति । यदि तु प्रतिवर्ष मुज्यतां त्वया इत्यादि प्रतिज्ञाभवत्तदा तु यावर्षेप्येव स्वत्वानुमतेः कदापि दानविक्रयादिकं न कर्त्तव्यम् । यदि तु प्रजा करं न ददाति तदा सोपाधिदानमुपाध्यसिद्धावसिद्धमिति अन्यत्र दातुं शकोतीति-इति । विवादभङ्गार्णवलिखिनम् (१ विवाभ० पृ०३०८ क. ख) ॥२॥ फरदानरूपोपाधिसम्बन्धेन राज्ञो दाननिमित्तमेव प्रजानां स्वामित्व' जायते । अन्यत्र गमने च करदानाभाये उपाध्यसिद्ध्या दानासिदिः । न च राजसम्पन्धतुल्यसम्बन्धापत्तिरिति वाच्यम् , राजस्तथाविधेच्छा- भावात् । तथाहि-एतस्यां मम भूमौ मत्स्यत्वे विद्यमान एव निकृष्ट भोगो- पयुक्त तव स्वत्वं भवतु-इति राजस्तुष्टया तादृशमेव स्वत्वं जायते- इति ( १ विधाम० पृ. ३१० क) विवादभङ्गार्णवलिखनञ्चति ॥ ३ ॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्माविद्यावागीशेन ४५-सदर देओयानी श्रादालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत. कुर्टनी इशमिट साहेवेर हजुर हइते आदालत मजकुरार पण्डित- दिगेर नामे इङ्गरेजी १८२७ शालेर ३ जुलाइ मासेर रोयकारि लिखित छन्दासिंह आपिलाण्ट मशम्मात दुर्गाकुमार रप्पाडण्टेर मकईमाते वृहप्पतिवार दिवा दुइ प्रहरेर मध्ये वचन ो प्रन्थेर वेोरा सम्वलित जवाब दाखिल करणेर हुमे सोयाल- सकल, ये एइ- प्रथम सोयाल- पाटना सहर निवासी एक व्यक्ति हिन्दु धापन तिन स्त्री ओ. चारि कन्या थाकिते यापन धन आपन तिन स्त्रीर मध्ये एक १.सामित्व-न्यप।

व्यवस्था-पत्र संख्या-४५ १२४ - स्वीर भ्रावाके ओ तिन स्त्रीर मध्ये द्वितीय स्खोर गर्भज फन्यार पतिके फशली .१२१६ शालेर ४ माघ वारिखें लिखिया दिया फशलि १२१६ शालेर २ वैशाख तारिखे ऐ दिन सो श्रो चारि. कन्याके राखिया मरियाछे। तद्देशेर शाबानुसारे हेवानामा सिद्धि हइते पारे कि ना इति । द्वित्तीय सोयाल- "ऐ व्यक्ति ओ ताहार तिन नीर मध्ये दुइ स्री मरणेर परे तृतीय स्त्रीर तिन फन्यार मध्ये एक कन्या आपन दुइ भगिनीर विन सराकते, आपन मातार विद्यमाने, आपन' भ्रातार पत्नी-.. दिगेर मध्ये एक जन निःसन्तान मरण हेतुते ऐ दाता व्यक्तिर त्यक्त धनेर अर्द्धकेर दामओया करिलेक । ऐ दान, मिथ्या हश्रोन प्रकारे. मृत कर्ता व्यक्तिर कन्यार पक्ष हइते ए प्रकार दाोया, ये मुइयार मातार सम्मति क्रमे हइयाछे, सिद्ध हइते पारे कि ना इति । तृतीय सोयाल- ऐ दानेर सिद्धताते मुद्दाइयार माता प्रभृति ऐ मृत व्यकिर खीरदिगेर एक वार यद्यपि ऐ कन्यार दाओयार पूर्व संघटन हइयाथाके कन्यार दाोयार निषेधि वोधक वटे कि ना इति । श्रीजयतितराम जवायव्यवस्था एतदर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकर्टनीइशमिटसाहेवधर्माधिकर- एलिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य याशवोधो जातस्तदनुसारेणोचर विख्यते- 1.मध्ये मध्येकयप० । २.पारन मातार पत्नी-म्पए । .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-४५ १२५ यद्यकः कश्चित् पाटलिपुत्राख्यनगरनिवासी हिन्दुजातीयो व्यक्ति- विशेषः स्वकीयानां तिरुण स्त्रीणामेवं चतरुणां कन्यकानां विद्यमानानां मध्ये तिक्षणां स्त्रीयां मध्ये एकस्याः प्रिया भ्राने द्वितीयस्याः कस्याधि- ज्जामाने स्वस्वत्वास्पदीभूतघनस्य' दानपत्रं लिखित्वा दत्त्वोपरिलिखिसा- स्तिसः स्त्रियश्चतस्रः कन्याश्च संरक्ष्य मृतश्चेत्तदा तद्दानपत्रं यदि तिसूणां स्त्री(णा मनाच्छादनोपयुक्तं द्रव्यमेवं चतरुणां कन्यकानां मध्ये या न विवाहितारतासां विवाहकालपर्यन्तमन्नाच्छादनोपयुफ द्रव्यमय च विवा- होपयुक्त द्रव्यं विनाऽवशिष्टयनस्य चेत्तदा तदानपत्रलिखितदचधनस्य दानमेवप्रकाराभावे चोपरिलिखितानाच्छादनाद्युपयुक्तद्रव्यं विनाश्वशिष्ट- घनस्य दानश्च सिद्धं भवितुं शमोतीति- पत्र प्रमाणम् स्वं कुटुम्याविरोधेन देयम् इत्यादि मिताक्षरा( पृ० २४४ )वीरमित्रो. दय( पृ० ६५१ )व्यवहारमयूखन्यवहारकौस्तुमादिग्रन्यतयाशवल्क्यवचनम् (२।७५ ) ॥१॥ स्वमात्मीयं कुटुम्बाविरोधेन ( कुटुम्बानुपरोधेन ) कुटुम्यभरणा- पशिष्टमिति यावत्तधात तङ्गणस्यावश्यकत्वात् । तथा च मनु:- वृद्धौ च मातापितरो साध्वी भार्या सुतः शिशुः (३५)-इति मिताक्षरां- प्रन्पलिखनम् (पृ० २४४)। देयस्वरूपमाह नारदः (नामसंपृ० ८८,५६) द्रव्यं कुटुम्बभरणाद' यत्किश्चिदतिरिच्यते । तद्दे यमुपाहत्यान्यद् ददद्दोपमवाप्नुयात् इति । १.स्वत्वस्व०-यप०1 २.तिस्रः खियाश्च०-व्यप० । ३. कुटुम्बविरोपेन-व्यप! ४. यथाइ०-मिना। ५. स एव-व्यप० । ६ भरणात-व्यप० 1 ७ उपहत्यान्यानवदहो०-व्यप० । उपहत्यान्यं०-स्मृव०। म. दददागः समाप्नु०-नामत ।

. १२६ व्यवस्था-पत्र संख्या-४५ अन्य उपहृत्य मर्तव्यकुटुम्बमनवरुध्येत्यर्थः । उपरोपश्च(निस्वतया) भोजनाच्छादनादिराहित्यनिबन्धनतोऽत्राभिमतो, न ताम्बूलादिभोगसा- धनवैकल्यनिबन्धनः-इत्यादि (वीमि पृ० ३६४)मृतिचन्द्रिका ४०१६०) मन्थलिखनम् । ३॥ कन्याभ्यश्च पितृद्रव्यादे ये वैवाहिकं वसु-इति स्मृतिचन्द्रिका .(पृ० १६०.) अन्यलिखितदेवलवचनम् । ४ । द्वितीयप्रभस्योत्तरम्-~ तपक्वस्तिमणां तत्स्त्रीणां मध्ये द्वयोः स्त्रियोश्च मरणोत्तरं तृतीयस्याः स्त्रियाः कन्याः, श्रासां मध्ये एकस्याः कन्यफायाः स्वकीय भगिनोदय- साधारण्यं विना विद्यमानायां स्वमातरि सा परमातृणां मध्ये एकस्या निःसन्तानायाः मरणेन तस्या दातृव्यक्तेस्त्यञ्चना प्राप्तिस्तदानस्य मिथ्यास्यप्रकारे सत्यपि तन्मातृसम्मत्यापि' सिद्धां मवितुं न शक्नोति, यवस्तस्याः पूर्वमधिकारिएयां मावरि विद्यमानायां तस्याः खत्वमेव मोत्पद्यते इति- अत्र प्रमाणम् अनपत्यस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितृगामि-इत्यादि मिता- धादि(मिता००२१७)मन्थवृतवृहद्विष्णुवचनम् (विस्मृ०१७।६-७)।१। तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- तदानं दातृव्यक्त रेत्तराधिकारिणां स्वत्वोत्यत्तिप्रतिबन्धक चेदर्थिन्या मातृप्रभृतीनामान्मृतव्यको स्त्रीणां ततत्कन्याया पूर्वकालोनस्य स्वीकारस्य तदानसाधकत्वेन निदि इस तकन्याया- स्तद्धनप्रातिनिरोधक विना साधक नास्ति-इति पाटलिपुत्रारूप: १. अन्यन्-स्मृत २. उपमध्ये०-स्मृव०॥ ३ ०इनोच्छेदनो०-स्मृव० र ४ अवामनो0-स्मृव० । ५. वीरमित्रोदय-व्यप० । ६. विन्य-रच ५सम्मत्यनि-पर 4.च्दया-यप। धनप्राप्तीच्छाया व्यवस्था-पत्र संख्या-४५-४६ • १२७ । - नगरप्रभृतिचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयन्यवहारमयूखव्यवहारकौस्तुमादि- -अन्यातुसारिणी व्यवस्था- अन्न प्रमाणम्- (स्व)स्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादनञ्च दानम् इति सुबोधिनीलिखनम् (पृ०७४१) श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन . रप्पाडण्ट ४६-रोवकारि मिसिल · श्रादालत देओयानी सदर इंरेजि १८२७ शाल. तारिख २२ माहे जुलाइ मतावक वाङ्गला १२३४ शाल २६ आपाढ रोज वृहस्पतिवार आदालत मजकुरार द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट' साहेवेर बैठके । छन्दासिंह आपिलाएट मसम्मात दुर्गाकोडर ए आदालतेर पण्डितेरा हाल मासेर ३ तारिखेर हुकुमानुसारे व्यवस्था लम्बरे दाखिल करिलेन । प्रापिलएटेर उफिल मुनशी महम्मद पनाह ओ लाला भाउधलालेर हाजिरिते दृष्टे आइल। तत् पूरे मुनशी दादार वक्श ओ मौलवी गोनाम एजदानी उकि- लेरा पापनादिगेर 'नामिक एक केता प्रोकाजतनामा ओ ए प्रादालतेर नाएव तहविलदारेर दस्तखति प्रापनादिगेर मेहन- तानार चावत' मवलग २६६. श्रानार रशीद पो हाल शनेर (जुन मासेर होया आजिमावादेर कोटेर रोयकारिर नकल दुइ १.मिताक्षरात-व्यप० । मेहनतानाद वावता-यप०। २, १ व्यवस्था पत्र संख्या-४६, टाका मूल्यकेहर वण्ड' द्वाराय रप्पाडण्टेर पक्ष हइते लम्बरे दाखिल करिलेक, पडागेल । तत्परे रप्पाडण्टेर उकिल दिगेर स्थाने जिज्ञासा करागेल ये फयशला जारि महकुंफिर वावत तोमादिगेर मोक्केलार भोजर कि । जयाय दिलेक ये प्रामार- दिगेर मोकेलार योजर एइ ये फयशला जारि हइयाछे, ओ मोनारा दखल पाइयाछे । हुकुम हुइल ये ए पादानतेर पण्डितदिगेर स्थाने चतुर्थ शोयाल करा जाय । से, एइये सहर पाटना निवासी एक व्यक्ति हिन्दु तिन छी राखिया,, ये 'वाहार मध्ये एक खी निःसन्ताना, ओ एक स्त्रीर तिन कन्या, ओ एक स्त्रीर एक कन्या जन्मियाचे, मरियाछे। यो ताहार परे जे स्त्री निःसन्ताना हिल मरियाछे। तहेशशास्त्रानुसारे मृत घोर अंश कोन व्यक्तिके, ओताहार दामोया करणेर क्षमता कोन व्यक्तिके अर्श । एचित् ये एइ सोयालेर चर' परस्व दुइ प्रहर पर्यन्त मन्य ओ वचनेर वेश्रोरा सम्वलित दाखिल करेण। ताहार परे उचित हुकुम देशोया जाइवेक इति । श्रीजयतितराम जवायव्यवस्था রোখিযৱিকীঘিংবিখীলনীংযমিষেইমঘবিষ্ণ, रालिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादशमोधो जातस्त 'दनुपरेपोतरं लिख्यते। ययेकः कश्चित् पाटलिपुत्राप्यनगरनिवासी हिन्दुजातीयो व्यक्तिविशेष स्तितः स्त्रिय एवं ता तिसुणां स्त्रीया मध्ये एफरया एषां मन्यामेक- स्मास्तिस्रः कन्यका एषां निःसन्तानाच संरक्ष्य मृत तदनन्तरं निःसन्ताना स्त्री मता चेत्तदा मृतायास्तस्या निसन्तानायाः स्त्रियाः पतित्यसपनांगरे १.एद-पo1 ३.का निघतानाध-प० । - २ढदवार-न्यपण • 'व्यवस्थापन संख्या-४६-४७ १२६ जीवन्तीनां तत्पनीलामेव भवति, एवं तत्प्राप्तीच्छाकरणक्षमतापि तत्सपनोनामेव, यतोऽनपत्यपतिधनस्योचराधिकारित्वेन पनीसंक्रान्तत्वेऽपि तन्मरणोत्तरं तदनं तद्भर्तुत्तराधिकारिणामेव भवति । तत्र च भर्नु रुत्तराधिकारिणां मध्ये पुत्रपौत्रप्रपौत्राभावे पन्या एव प्राधान्यम्-इति पाटलिपुत्राख्यनगरप्रभृतिचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमयूखव्यवहा- रकौस्तुभादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । यत्र प्रमाणम्- अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । मुजीतामरणात क्षान्ता दायादा उद्ध्वमाप्नुयुः-इति वीरमित्रोदयादि- (वीमि पृ० ६२७ )प्रत्यकृतकात्यायनवचनम् (फास्मृ०६२१) ॥१॥ अनपत्यस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितृगामि इत्यादि मिता- क्षरादिनन्यवृत मिता० पृ० २१७)इद्विष्णुवचनम् ॥ २ ॥ पली दुहितरश्चेव-इत्यादि तत्तद्ग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (२।१३५) . श्रीजयतितराम्. श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीहरिशरणम् श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन + ४७-सदर देओयानी आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट शाईवेर हुजुर हइते राय वंशीधर वनामे मनोहर लाल ो गयरहेर मकईमाते इरेजी १८२७ शालेर २४ जुलाइ मासेर रोवकारिर लिखित परस्व दुइ प्रहर पर्य्यन्त वचन श्रो मन्थेर वेडोरां सम्बलित जवाब दाखिल करणेर हुकुमे श्रादालत मजकुरारार पण्डितदिंगेर नामे सोयाल सकल, एइ ये- प्रथम सोयाल-.. वेहार जिला निवासी एक व्यक्ति हिन्दु कायेत जाति पितृ- पन विभाग करणेर परे दुइ भ्रातःपुन ओ चारि दौहित्र राखिया व्यवस्था-पत्र संख्या-8. मरियाछे। ऐ देशेर शास्त्रानुसारे ताहार त्यक धन वाहार प्रातुपुत्रदिगके प्रशं कि ताहार दौहित्रदिगेके ? द्वितीय सोयाल- । यद्यपि ऐ व्यक्ति पिठ्धन विना विभाग करणे मरितो ताहार त्यक्त धन कोन व्यक्तिके प्रशितो ? श्रीजयतितराम . एतदर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनोदशमिटसाहेवधर्माधि करणलिखितप्रश्नप्रतिकात्रमवलोक्य याशबोधो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रभस्योत्तरम् - यदि वेहाराषप्रदेशनिवासी कश्चिदेकः कायस्थ जातिः पितृधनविभाग- करणानन्तरं द्वो भ्रातुपुत्रो चतुरो दोहिताश्च' सरदय मृतः स्यातदा वन त्याधने चतुणी दौहित्राणामधिकारो, यतो दौहित्रेषु विद्यमानेषु विभक्तधने भ्रातूपुवायां नाधिकार इति । अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतः इत्यादि मिलादरावीरमित्रोदयादि( बीमि. ६०२)न्यत. यांगल्क्यवचनम् ॥१॥ द्वित्तीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि नद्यक्तिविशेषः पितृधनविभागमकृत्वा मृतस्तदा पितृपने तो ग्यांशो भ्रातृपुत्रयोरेव भाति, न तु दौहित्राणां विभकधन एव पनोदुहितु- दोहित्राणामधिकारस्य मिताक्षरादिग्रन्थलिखिलात, अविभक्तमने तेषाधि करस्यालिखितत्वांच, व पालाकृमिताक्षगटीकायां विभकधन ए হহিমাধিকাৰিক্ৰংৰ বহষিকাময় ব, গ্রীকুরবানি ..दोदित्राक्ष-२ जालमम-AR. ३. Vas-० ॥

व्यवस्था-पत्र-संख्या-४७-४८ १३१ . वेहाराख्यप्रदेशचलितमिताक्षरायीरमित्रोदयबालम्भकृतमिताक्षराटीकादि- अत्यानुसारिणो व्यवस्था। अत्र प्रमाणम्- एवं दौहित्रभातृसुतसमवाये मृतस्य विभक्तत्वे दौहित्रस्य बलवत्त्वस्य अंशहरणे सत्त्वेऽपि पिण्डादौ स एव चलवान्, अविभक्तत्वे तु पितुः' मातृसुतानामेवांशहरत्वादपि इति व्यवहाराध्यायस्य मिताक्षराटीकायां (पृ. २०)वालम्भलिखनम् ॥ १॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्शेण श्रीरामतनुशर्मा विद्यावागीशेन ४८-सदर देोयानी श्रादालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर हुजुर हइते ऐ श्रादालतेर पण्डितदिगेर नामे स्वयं यो आपन अप्राम-व्यवहार भ्राता आनन्दीलालेर श्रोयाली रामधुमनलाल सायेलेर मकईमाते इगरेजी १८२७ शालेर ६ श्रागष्ट मासेर रोवकारिर लिखित सायेलेर सयोयाल ओ प्राजिमावादेर कोटेर फयशला ये ताहाते आदालतेर सो- याल श्री तथाकार राधाकृष्णपण्डितेर जवाब लिखा पाछे दृष्ट ओ सम्पूर्ण अनुमोदन परे वचन ओ प्रन्थेर वेओराते परस्व पर्यन्त जवाव दाखिल करणेर हुकुमे सोयाल, एइ ये- सोयाल- राधाकृष्एपण्डितेर लिखिया देया श्रापिल पादालतेर सओ- यालेर जवाव मिताक्षरा पुथि मत प्रसिद्ध बटे कि ना, अर्थात् दुइ दाोयार मध्ये सायेलदिगेर मासी जितकॉरेर दाोया किम्वा 'मायेलदिगेर दाोया प्रसिद्धवटे, अथवा दुइ दाओयाइ मिथ्या १. पितुरिति पाठो नास्ति बालग्भातटीकायाम् ।

१३२ व्यवस्था-पत्र संख्या-४८ ओ परिडतेर जवाब प्रसिद्ध। . राधाकृष्णपण्डितेर व्यवस्था, एइ ये- पतिमरणानन्तरं तत्पनी तीन पोष्य दुहितविहाय मृता । नवैका दुहितमती, द्वितीया पुत्रवती, द्वेऽपि विधवे, तृतीयास्ति' यौवना समत्त का अनमत्या ! नहिं तदने ताः समांशभागिन्यो भवितुमहन्ति, दोहि- त्रौ तु न तद्धनहारियो । पती दुहितरश्चैव-इति मिताक्षराधृतयाशवल्क्य- वचनात् (२२१३५)। अहादगात सम्भवति पुत्रपद दुहिता नृणाम् । तस्मात् पितृधनं वन्यः कथं गृहाति मानवः-इति (मिता ४० २२१) बृहस्पतिवचनात्, सहशी सहशेनोटा-इति वचनाच । त्रिवेदिश्रीराधाकृष्णशर्मणाम् । श्रीजयतितराम सदर देोयानी अदालतेर सोयालेर जवाव व्यवस्था- एतम्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुनोदशमिटसाहेवधम्माधिकर- एलिखितप्रभप्रतिरूपपत्र तत्समर्पितार्थिनिवेदनपत्रं चैवं पाटलिपुत्राख्य- नगरसम्बन्धि कोटोपीलाख्यधम्माधिकरणीयजयपत्रं तदन्तर्गततदधिकर- पीयप्रश्नमेवं राधाकृष्णाल्यपरिडतलिखिततत्प्रभोजरं चावलोक्य विविच्च च यादृशवोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । विवादास्पदीभूतं धनं यदि शनकोमराख्यायाः पतिमरणानन्तरं तदीय- घनत्वेनोत्तराधिकारित्वेन तत्सकान्तं स्यात् , श्रप च तिस्स एव दुहितरो निर्धनाः, सा एव या सपनास्तदा राधाकृष्णाज्यपरिहतलिखितकोर्ट- आपीलाख्यधम्माधिकरण प्रश्नोतरं मिताक्षराप्रत्यसम्मत भवति । यदि च तिहणां दुहितृणां मध्ये एका निधना द्वे वा निदने तदा तत्परिटतस्योत्तरं १.दुदिन--प २.लीया हतीया०-दए। २.निदनाच्या ४. सर्म-यप। ५ वा व्यपा व्यवस्था पत्र-संख्या-४८ १३३ तगन्यसम्मतं न भवति, मिताक्षरायां दुहितुः पितृधनाधिकारप्रकरणे अप्रविष्ठितानामनिर्घनागां दुहितृणाममाव एष प्रतिष्टितानामर्थात् सघनानां दुहितृणामधिकारविधानात् । एवं चैतत्परे द्वयोर्द्धनप्राप्ती- च्छयोर्मध्ये अर्थिनो मातृप्रमुबीतकोमराख्यायास्तत्समस्तधन मातीचा केवलं तस्या एव निर्धनत्वे, द्वयोनिर्धनत्ये तद्धनार्द्धप्रासीच्छा, तिसणां निर्धनत्ये तत्तृतीयांशप्रासोच्छव तद्ग्रन्थसम्मता भवति । यदि च विचादा- स्पदीभूतं धनं ग्यानकोमराख्यायास्तदीयशुल्काभिन्न स्त्रीधनं भवति, श्रय च तिसणां मध्ये पुत्रवत्या सधनत्वे जीतकोमराख्यायास्तद्धनार्द्ध- प्राप्तीच्छा तद्ग्रन्यसम्मता भवति, मिताक्षरायां तुहितॄणां मातुस्तादृशस्री- धनाधिकारप्रकरणे प्रतिष्ठितानामनिर्द्धनानाम् अनपल्याना वा दुहितणा- ममाव एवं प्रतिष्ठितानामर्थात् सधनानां सापत्यानां पा दुहिताणामधिकार- विधानात् । एवं तिसृणां मध्ये इयोः पुत्रपौत्ररूपापत्यरहितत्वावगमात् पुत्रवत्या निर्धनत्वे, नीतकोमराख्यायास्तद्धनतृतीयांशप्राप्तीच्चैव तद्गन्य- सम्मता भवति, तत्प्रकरणे मिताक्षरायां निर्द्धनानपत्ययोदिविषयोरेव दुहिनो प्रथममधिकारविधानात् । थर्थिनां तद्धनप्रासीच्छा चोपरि लिखित- पदय एवं विद्यमानत्वात् तन्मातृप्रभृतिषु तद्ग्रन्यसम्मता न भवतीति । अत्रप्रमाणम्-- पत्नी दुहितरश्चैव-इत्यादि मिताक्षरामन्यवृत( पृ० २१७ याज्ञ. वल्क्यवचनम् (२।१३५) ॥१॥ अप्रतिष्ठिताप्रतिष्ठितानां समवाये अप्रतिष्ठितव तदभावे प्रतिष्ठिता-- इति दुहितुः पितृधनाधिकारप्रकरणे मिताक्षराग्रन्थलिखनम् (पृ. २२१) ॥२॥ : अप्रतिष्ठिता निईना अनपत्या वा-इति मिताक्षराग्रन्थलिखनम् (पृ० २२१, खपुस्तके ) ॥ ३॥ प्रतिष्ठिताऽप्रतिष्ठितासमवायेऽप्रतिष्ठिता गृहाति, तदभावे प्रतिष्ठिता। यथा गोतमो मुनिः बीघनं दुहितणामत्तानामप्रतिष्ठितानां चेति । तत्र शब्दात् तत्र प्रतानां प्रतिष्ठितानाञ्च | अप्रतिष्ठिता निदना अनपत्या १३४ व्यवस्था पत्र-संख्या-४-५ वा । एतच शुल्कव्यतिरेकेण-इत्यादि दुहेतृणां मातुः स्त्रीधनाधिकार' प्रकरणे मिताक्षरानन्धलिखनं चेति (पृ. २२६ ) || ४ || श्रीर्जयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन i सओयाल- ४६-~सदर देओयानी आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर हुजुर' हइते ऐ आदालतेर पण्डितदिगेर नामे इगरेजि १८२७ सालेर ११ शेवम्बर मासेर रोपकारि. लिस्थित अभिमानवाय' सा(ए)लेर मकमाते परस्य दुइ प्रहर पर्य्यन्त वारानश देशेर शाबानुसारे वचन श्रो भन्थेर वेोरा सम्वलित जवाव दाखिल करणेर हुकुमे सोयाल, एइ ये- हिन्दु चारि व्यक्ति टीका लइया पापनादिगेर मिलकियतेर मोजा एक व्यक्ति हिन्दुर निकट बन्धक राखिलेक । ताहार परे वन्धक दाता धारि जनेर मध्ये एक जन चाहिलेक ये ऐ' बन्धकेर वैवाक टाका दिया समस्त मौजार वन्धक छाडाय, श्री वन्धक प्रहीता पाकि वन्धक दाता तिन जनेर असम्मति जानाइया एक जन वन्धक दातार स्थाने समुदाय बन्धकि टाका लयोन ओ समस्त मौजार बन्धक हइते छाडन स्वीकार न करिया चहिलेक ये ऐ एक व्यक्ति वन्धक दातार स्थाने बन्धक वावद चतुर्थ अंश टाका लइया ताहार अंश परिमाण अर्थात् वन्धक मौजार चतुर्थ अंश छाडिया दिया वाकि वारय भाना सौजार' पर पूर्व मत वाकि दिन जन पन्धक दातार पक्ष हइते बन्धक १.जरा इतेव-व्याकर अमिमानराय-रवि साधीयान् पाठः । ३.येक बन्द करे - 7 .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-४ १३५ ३ - छाडान पर्यन्तं दाखिलकार थाके। अतएव जिज्ञासा जाइते छ। यद्यपि यथार्थइ वाकि तिन जन वन्धक दाता आपन २' हिस्यार वन्धक चतुर्थ वन्धक दातार पक्ष हइते छाडानेते सम्मत ना थाके, ताहारदिगेर असम्मति याकी वारय आना हिस्यार वन्धक छाडानेते निपेधि पटे, किम्वा चतुर्थ वन्धक दाताके : वत्ते, ये निजे समस्त वन्धकि टाका आदाय करिया आपन' हिस्यार उपर अधिकार प्रकारे श्रो वाकि तिन जन वन्धक दातार हिस्यार उपर वन्धक ग्रहोता प्रकारे दखल पान इति । श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतफुर्टनीइशमिटसाहेवधम्माधिकरण लिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशत्रोधी जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते। प्रश्नार्थेन प्रश्नपत्रलिखिताशेप'श स्राक्त चर्तुविधाभ्यन्तर्गताकृतकालात्मक- भोग्याधित्वनिश्चयात् , तब यदि चतुर्भिहिन्दुजातीयैर्मुद्रा' गृहील्ला स्वस्व त्यास्पदीभुतग्राम एकस्य कस्यचित् हिन्दुजातीयस्य निकटे बन्धकीकृतः तदनन्तर बन्धकदा तणां चतुएर्णा मध्ये एका कश्चिद् बन्धकमामस्य समस्तमुद्रा दत्त्या सम्पूर्णग्रामो बन्धकात् मोक्तव्य इतीच्छति, तत्र यदि बन्धकीभूतनामश्चतुएण: साधारणश्चेत्,तदा तदन्तर्गतत्रयाणा यथार्थभूता स्वस्खयोग्यांशमोचनासम्म तिः मुतरमवशिष्टद्वादशाणकपरिमितांशत्रयस्य' बन्धकमोचने प्रतिबन्धिका भवति । एवं चतुर्थबन्धकदातुरवशिष्टंबन्धकदातणां त्रयाणां सम्मतिश्चेत् सदैव समस्तमुद्रा दत्त्वा स्वांशे स्वामित्वेनावशिष्ट्यन्धकदातणां प्रयाणामशे अन्धकाहीतृलेना यत्तत्वमासिवितुमर्हते, यतःसाधारणधने सर्वेषामशिना: मनुमति बिना तन्मध्ये एकस्य कस्यचिद्दानाधमनविक्रयक्षमता नास्तीति । अतः 'मुतरां 'साधारणधनाधिमोचमाक्षमताप्यर्थसिद्धव । यदि च बन्धक भूतग्रामे तेपामंशनिर्णयश्चेत्तदा बन्धकदात्रन्तर्गतत्रयाणामनुमति विनापि- .....तापेशशा-व्यप०1.. ३.प्रयापार-व्यप २ चत्वारो हिन्दुजातीया-व्यप। ४. गृहीत ध्यप01- १३६. व्यवस्था-पत्र-संख्या-४६-५० चतुर्थनन्धकदाता पृथइ निदिष्टस्वाशं बन्धकान्मोचयितुमईति-इति वाराण- सोप्रचलितमिताक्षरादिप्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- अविभक्तषु द्रव्यस्य मध्यस्थत्वाद्'एकस्यानिश्चयत्वात सर्वाभ्यनुज्ञावश्यं कार्यो । विभक्तेषु (तूत्तरकालं विमताविभक्तसंशययुदासेन व्यवहारसोक- र्याय सर्वाभ्यनुज्ञा, न पुनरेकस्यानीश्वरत्वेन । अतो) विमतानुमतिव्यतिरे- केणापि व्यवहारः सिद्धयत्येव इति व्याख्येयम् इति मिताक्षरादिग्रन्थ- लिखनम् (मिता. पृ० २०० )॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्य थमि श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन ५० सदर देशोयानी श्रादालसेर द्वितीय हाफिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर हुजुर हइते ऐ आदालतेर पण्डितदिगेर नामे इगरेजि १८२७ सालेर ११ शेतम्बर मासेर रोवकारीर लिखित भवानीचरणदत्त सायेलेर मकईमावे निचेर लिखित दस्ता- वेजेर अनुमोदन पूर्वक परस्व दुइ प्रहर पर्यन्त वचन ओ प्रन्धर वेभोरा सम्वलित जवाब दाखिल करणेर हुकुमे सोयालः-- एइ ये, सनातन हालदारेर स्त्री सुषम्मात जानकी, ये बापन पविर मृत्यु परे वागला १२३२ सालेर २६ चैत्र मासेर होया दस्तावेज भवानीचरणदत्तके लिखिया दियाछे, मुशम्मात मज- कुरार पक्ष हइते ए प्रकार दस्तावेज लिखिया देओन वङ्गदेशेर शाखानुसारे सिद्ध छिल कि ना; ओ दस्तावेज लिखार एक वतसर परे मुशम्मात मजकुरार मृत्यु होन हेतुते ऐ दस्तावेज जे वत्- सम्पर्क मशम्मात मजकुरार पतिर भ्रातारा ओ भ्रातुपुत्रेरा प्रति- चन्यको स्वीकार पाछे मिथ्या हय कि ना इति । १.पृथक-व्यप, २. मध्यगत्वा--पर!

व्यवस्था पत्र-संख्या-५० १३७ श्रीर्जयतितराम जवायव्यवस्था एतदर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुर्टनीहशमिटसाहेवधर्माधिकर- गलिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेयं तत्समपितवाङ्गलाख्यद्वात्रिंशदधिकद्वादश- शताब्दीयोनत्रिंश दिवसीयचैत्रमासीयदस्तावेजसंज्ञकपत्रयावलोक्य विविच्य च यादृशबोधो वातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यदि सनातनहालदार स्त्रिया जानक्या पतिमरणानन्तरमुपरिलिखित- दस्तावेजांशकपत्रं भवानीचरणदत्ताय लिखित्वा दत्तं तत्र तत्सत्रलिखित- वृत्तान्तस्य सत्यत्वञ्चेत्तदैतादृशपत्रदानं वङ्गदेशचलिराशास्त्रानुसारेण सिद्धमानीत्, यतोऽनपत्यपतिधनस्योत्तराधिकारित्वेन पनीसंक्रान्तत्वे पल्या वर्तनाद्ययको तदुपयुक्ततद्धनाधानविझयणं शास्त्रानुमतं भवति । पर्त नादिमूलीभूतस्य तद्धनरक्षणस्यावश्यकत्वेन' सुतरां तदनरक्षणाय तदुप- युक्तस्य तद्धनस्याधानविक्रयणं शास्त्रसम्मतं भवति । प्रकृते तूपरिलिखित तत्पत्रेण जानक्याः स्वामिमरणानन्तरं सत्पतिप्रत्यर्थिकतत्पतिभ्रासा- द्यर्थिकतपत्रलिखित विवादद्वयनिष्पचेरुत्तराधिकारित्वेन फेवलं त्या एवं कन्यत्वेन तत्र तस्या अशतया उपरिलिखितदस्तावेजसंज्ञकपत्रलिखित- घनदानात् तद्विवादनिष्पत्त्या अवश्यं तत्पतिकर्तव्यस्वधनरक्षणवत् तत्- पनलिखितधनादवशिष्टसमुदायपतित्यक्तपनरक्षणार्यत्वात् तत्पनत्य इत्यव- एवं उसनलिखनादनन्तरमेकसंवत्सरानन्तरं जानक्या मरणेन तत्पत्रं तस्याः पत्युः भ्रातृमिरेवं तत्पतिनातुप्पुत्रश्च प्रतिबन्धमस्वीकृत मिथ्या भवितुं नाईति उत्सरेण तल्लिखनसमये तत्पतिभ्रातृभिस्तत्पुत्रेवा उपरिलिखितविवादद्वयान्तर्गतैकस्मिन विवादे विरोधित्वेन तया सह विवादं गमाव, १. रक्षणस्थावस्यारस्यक०--न्यप०। २ पतिः पतिःव्यप०1 व्यवस्था पत्र संख्या-५०-५९ कृत्या तत्पत्र लिखनतस्तस्या निवारणं न कृतमित्यवगमाद, इदानीं तस्या मरणेन तत्पत्रास्वीकारस्य तत्प्रतिबन्धस्य च अप्रयोजकत्वात् इति घन- देशचलितदायभागविवादभनार्णवादिप्रन्यानुसारिणो व्यवस्था- . अत्र प्रमाणम्- अतएव वर्चनाशक्तावापानमप्यनुमतम् । , तत्राप्यशक्ती विक्रय- एमपि-इति दायभागलिखनम् (पृ. १७३, ११:११६२ )१ तथा च भग जीवन् यथा यस्य पोपणादिकं यद्यद्वा कर्म करोति मृतभर्तृ कापि स्वशक्त्यनुसारेण तथैव तस्य पे.पणं तय कर्म कुबीत- इति विवादमङ्गार्णव( २ विवाभ० पृ० ३१६ क लिखनवेति ॥ २॥ श्रीर्जयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्याचागीशेन ५१-सदर देमानी पादालतेर पञ्चम हाकिम श्रीयुत पालक सुन्दर राश साहेवेर हुजुर हैते ऐ पादालतेर पण्डितदिगेर नामे ईराजि १८२७ सालेर ११ सेतम्वर मासेर रोवकारिर लिखित १८५७ लम्वरेर' वायत गणेश आपलाएट विनसिया रप्पाडण्टेर मकईमाते वारानश देशेर चलित शास्त्र मते बृहस्पतिवार पर्य्यन्त जवाब दाखिल करणेर हुकुमे सोयाल सकल एइ ये- प्रथम सोयाल- पारानश साकिनेर फल्लुजाति एक नीलोफेर विवाह कोन व्यक्तिर सहित हइयाछिल, श्रोनाहार स्वामि अनुदेश हइल, -- ३. विलसिरा-ति साधीयान् पार । १०गमात--प्यप। २ लम्बो बावाव-व्यप.1 व्यवस्था-पत्र संख्या-५१ १३६ ओ ऐ स्त्रीलोक ताहार स्वामि अनुद्देश होयार तेर वत्सरेर परे ताहार पतिर कनिष्ठ भ्रातार सहित शाङ्गा करिते पारे कि ना, ए प्रकार (शाङ्गा) शास्त्र अनुसारे सिद्ध ह्य कि ना । द्वितीय सोयाल- यदापि ए प्रकार शाङ्गा सिद्ध हय, श्री ऐ स्त्रीलोकेर द्वितीय पति ऐ खीलोक व्यक्ति ओ श्रापन पिता श्री तिन सहोदरभ्राताके राखिया मरियाछ, ओ समस्त धन साधारण कि असाधारण हय, ए दुइ प्रकार मृत व्यक्तिर अस्थावर त्यक्त धन कोन व्यक्ति के (अशे ) इति । जवाव व्यवस्था एतद्धर्माधिकरणमथमाधिपतिश्रायुतपालकशएडरधम्माधिकरणलि- खितमश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- शास्त्रे शाङ्गाइशब्दयाच्यकार्यस्य प्रस्तायो नास्ति । परन्तु यदि वाराणसीप्रदेशीयानां लकारजातीयानां प्रश्नपनलिखितप्रकारकसगाइ- शन्दवाच्यस्य व्यवहारश्चत् तदा प्रश्नपत्रलिखितशास्त्रालिखितप्रकारक सागाइशब्दयाच्यं कार्य कर्तुं शक्नोति । एवमेतत्यकारकं सागादशब्दवाच्य तत्कार्यमुपरिलिखितव्यवहारसिद्धमिति चेत्तदा शास्त्रानुसारेणापि सिद्ध मवितुं शनोति, व्यवहारस्य शास्त्रानुसारेण बलवत्वादिति । अत्र प्रमाणम्- जातिजानपदान धर्मान् श्रेणीधमीश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधमांश्च स्वधम्म प्रतिपालयेत् ।। इति-मनुवचनम् (८४१)।१। 2 वारनी-व्या ३. कासार्य-व्यप २ शास्त्रामलिया व्यवस्थापन संख्या-५१ यस्मिन् देशे यदाचारो व्याहारः कुलस्थितिः । : तथैव परिपाल्योऽसो यदा परामुपागतः ।। इति मिताक्षरादि( मितापू० १०५ )ग्रन्यधृतयाशयलयवचनम् (११३४३)।२) स्पष्टशास्त्रानुपलम्भे तु देशव्यवहारानुरोध्ये निर्णयः कार्यः । इत्ययास एका तस्मात् शास्त्रानुसारेण राजकार्याणि साधयेद, वास्याभावे तु सर्वेपी देशष्टमतं नयेत् इति वीरमित्रोदयलिखनम् । ३ । द्वितीयप्रश्नस्योचरम्- यदि प्रश्नपत्रलिखितसगाइशब्दवाच्यं काय्यं प्रथमप्रश्नोत्तरलिखित- व्यवहारानुसारेण सिद्ध चेदय च तस्या एव स्त्रिया द्वितीयातिस्ता स्त्रियमे स्वपितरं श्रीन् स्वसोदरभ्रातन वसंरक्ष्य मृतः स्यादेवं तदीयसमतस्यावरधने पित्रा भ्रातृभिश्च सह साधारणं चेत्तदा तद्योग्यस्तदीयरथावरधनाय' भातणा च भवति; यदि च केवलं पित्रा सह धन साधारण चेत्तदा केवल वितुरेव; यदि वा केवले प्रातृभिः सह साधारण चेनदा केवलं भ्रातृणामेक भवति; यद्यसाधारणं तदनं चेदय च तशीयानां तजातीयानां यथा विवाहिता स्त्रो असाधारणपतिधने अधिकारिणी भवति तथैव सगार- संशककार्यकत् यति तद्धने अधिकारियो भवतीतिभ्यवहारश्वेता खा शास्त्रानुसारेणापि तदनं प्रार, शक्रोति । एवं व्यवहारो न चेत्तदा धनस्यासाधारणत्वपक्षे तपितुरेव(तदनम् इति वाराणसी प्रचलितमनु- मितादरावीरमित्रोदयादिप्रत्यानुसारिणी व्यवस्था । ५.धनांश-व्यर २.रोग्यानिक-व्यप .....सोस मातु स्वसंरक्ष्य-पर। ४. मिस्वर--म्यान ६.धनं सद साधाoया ५, तबातीवानापन प.शारत्र मानो-स्य! 1. पारापी-न्य० ॥

व्यवस्था-पन्न-संख्या-५१-५२ २४२ पत्र प्रमाणम्- तदुपरिलिखितमेव । १। पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा-इत्यादि मिताक्षरादि मिताभ पृ० २१६)अन्यतयाशवल्क्यवचनञ्चेति (२११३५)।२। श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशमविद्यावागीशेन लं०२८६७ ५२-रोवकारि मिसिल पादालते देखोयानी सदर इगरेजी १९२७ साल तारिख १५ माह सेतम्बर मोतावक वागला १२३४ साल रोज शनिवार आदालत मजकुरार पञ्चम हाकिम श्रीयुत. आलक सुन्दर राश साहेवेर वैठके- गणेश आपीलाण्ट मुशन्मति चेलसिया रप्पाडण्ट एइ मासेर ११ तारिखेर हुकुमानुसारे ए आदालतेर पण्डित- गण लम्बरे व्यवस्था दाखिले करिलेर दृष्टे आसिया द्वितीय सत्रो- याल उचित हइल । अतएव हुकुम हइल ये ए रोवकारिर नकल एइ हुकुमे पण्डितगरएके समर्पण करा जाय ये नीचेर लिखित सोयालेर जवाव तातिलेर परे दाखिल करेन । सोयाल-यद्यपि एइ मत सद्भाइ वारानश देशे सिद्ध हय आर ऐ दाखिल करा व्यवस्थार लिखित द्वितीय सोयालेर जवाव मते वोध हइते (छे ना ) ये सागाइ खीर द्वितीय पतिर त्यक धन किचु साझाइ खिके अर्शिवेक किना; यदि ना अर्श तवे ऐ स्त्रिर भरण पोपणेर अवधारण काहार जिम्वा थाकिवेक इति- १४२ व्यवस्था पत्र-संख्या-५२ श्रीजयतितराम् जयात्रव्यवस्था एतदम्माधिकरणपञ्चमाधिपतिश्रीयुतमालकमुन्दरसाहेवधर्माधि करणलिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशबोधो जात- स्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- यदि वाराणस्यादिप्रदेशे एतादृशमगाईशब्दवाच्यं काय व्यवहारानुसारेण सिद्ध' भवति; एवं सगाइशब्दवाच्यकार्यकृस्त्रिया द्वितीयपतित्यक्तधन यदि तसित्रा तद्भ्रातृभिश्च सह किंवा फेवलं तभ्रातृभिः सह साधारणं चेत्तदा सगाइशब्दवाच्यकार्यकृत्स्त्रीस्वामि- स्वेन किञ्चिदपि तद्धनात् प्राप्तुं न शक्रोति । एवं चेत्तदा तस्याः स्त्रिया भरणपोषणं यावज्जीवनमेतद्विवादे पूर्वलिखितास्मद्व्यवस्थान्तर्गतदितीय- प्रश्नोत्तरन्यवस्थानुसारेण तस्या द्वितीयपतित्यवसाधारणधनाधिकारिभिरेव झार्यम् । तत्र तस्य साधारणधनाधिकारिणो यदि पिता भ्रातरश्च सर्वे भवन्ति तदा तैः सबैरेव कर्तव्यम्, यदि च केवलं तसिता भवति अधिकारी तदा तेनैव कर्तव्यम् , यदि च केवलं तद्भातर एव भवन्ति तदा तैरेव' कर्तव्यम् इति वाराणस्यादिमचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयादि. प्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- पत्नी गृह्णीयादित्येतद्वचनजातं विभक्तमातृतीविषयम्-इति मिता- क्षरालिखनम् (पृ०.२१७ )।१। भरणं चास्य कुबीरन खीणामाजीवन क्षयात्-इत्यादि मिताक्षरा- (पृ. २२० ) वीर - मित्रोदय" पृ० ६३६ ख अन्यधृतनारदवचनम् (नास्मृ• पृ० १६६)।२ १. वारानश्यादि०-व्यप० । २. सि सि--व्यरः । १. प्राप्त-व्यप ४ देना-व्या० । ५. जीवित-नारमृ । ६ स्त्रीवामनरत्याना भरयमात्र नारदेन प्रतिपादितमिति घोमि०मधे। नारद- वचनं तु तत्र नोपहम्पम् ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-५२-५३ स्वर्याते स्वामिनि स्री तु ग्रासाच्छादनमागिनी । अविमको धनांशे तु प्राप्नोत्यामरणान्तिकम् ॥ इति वोरमित्रोदयादि(वीमि० पृ. ६५४ ख अन्यधृतकात्यायन- ... वचनं चेति ( फास्मृ. १२२)।२। श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीहरिः शरणम् ५३ - जिला गाजिपुरेर फौजदारि अदालतेर रोयकारि तारिख ५ छेतम्बर सन १८२७ इरेजी हेनरि छिमोनानओन फएड साहेव मेजेष्ठरेर' बैठके । सरकार ओमराओ राय शतिर श्रोयारिश- ओ दण्डधारि चौवे ओ मामराय मुद्दामालेहेम । श्रो परस आहिर कारण मुपम्मात रामकलिर शति हओ थानादानिवने दवसालि । अद्य मकईमा रुवकार हइल । मुद्दालेहेमे जोर- व, ओ भोदनराय श्रो सियोदयाल' यो वनोरि श्री सिव. जोरराय यो रामदेहलराय ओ आकुहुराय ओ अच्युत श्रानन्द ओ हरनाम रा(य)ो रोसन आली ओ दस्त साक्षीदिगेर एजाहार दस्तुर मत लिखा जाइया मकईमार मिलिल सामिल पडागेल । जे हेतुक एइ मकईमार कएक प्रकरण वोध करा आव- श्यक, अतएव हुकुम हइल ये ओमरानो राय एक सउ टाकार जामिन दिया हाजिर थाके, एवं अन्य अन्य प्रासामीयान साक्षी- यान सहित विदाय हये । एक किता इङ्गराजी चिटी एक विपयेर १. मैजेष्टा वेटेर। २. सिम्बेददयाल पप० ।

1 , . १४४ व्यवस्था पत्र संख्या-प३, जिज्ञासा पूर्वक जे ब्राह्मण जाति व्यतिरिक्त सती स्त्रीलोकेर प्रति- स्वामीर मृत्युसंवाद श्रवणेर परे कस दिवस किम्बा काल अंनुमरण हइवार रीति निरूपित पाछे-सदर नेजामते-पाठान जाय इति ।। श्रीजयतितराम यवावव्यवस्था प्रभुसमपिंतप्रश्नपत्रमवलोक्य याशबोधो जातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते- पतिमरण'श्रवणानन्तरं ब्राह्मणजातिव्यतिरित्ता स्त्री यद्यनुमरण- मिच्छति तदा शीघ्रमेवानुमरणं कर्तुमहंतीति शास्त्रे लिसितम् । किन्तु शीघ्रशब्दस्यार्थः कश्चिद् विशेषतो न लिखितः । परन्तु अनुमरणस्याय व्यवहारः पतिमरणश्रवणानन्तरमनुमरणकत्ती ब्राह्मणजातिव्यतिरिका स्त्री प्रथमतोऽनुमरणमहं कारिप्यामितीच्छति'। तत्र यदि कश्चिल्लौकिका प्रति- बन्धश्चेत्तदा तत्प्रतिबन्धकदूरीकरणानन्तरमपिशीघ्रमेवानुमरणं करोति । अथवा अनुमरणेच्छायां कृतायामपि यदि सा रजस्वला भवति सदा राज- स्वलाशौचानन्तरमपि अनुमरणं करोतिइति च व्यवहारः इति गाजिपुरा- ख्यादिप्रचलितमिताक्षरादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- अन्न प्रमाणम्- अयच्च सकल एव सासां स्त्रीणामगर्भिणीनामबालापत्याना- माचण्डालं साधारणो धर्मः इति मिताक्षराग्रन्थ लिखनम् (पृ० २५)।। दयितं यान्य देशस्थ मृतं श्रुत्वा पतिव्रता ।। समारोहति' दीप्ते ऽग्नौ तस्याः शक्ति नियोधत ॥ यदि प्रविष्टो नरकं बदः पारोः सुदारुणः। संप्राप्तो यातनास्थानं गृहीतो यमकिकरः ।। १. पातभरपा ए०प०॥ ४. समारोहेत-(म०० १५१)। २.मीतीच्छति-व्यप० । ५. शीलाग्नौ-यप०1 ३. दरी कस्पव्यप.15 --- *- .

में -: . व्यवस्था-पत्र संख्या-५३-५४ १४५ तिष्ठते विवशो दीनो यध्यमानः स्वकर्मभि । व्यालाही यथा व्यालं बला'गृहात्यशङ्कितः । 'तबद्भ रमादाय दिवे याति तपोबलात् । तत्र सा भर्तृ परमा स्तूयमानाप्सरोगणैः। कीडते पतिना साई यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।। इति व्यासपचनश्चेति । २। श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन एइ व्यवस्था दाखिल इगरेजि मिसिल सती विपयेर -- ५५-सदर देशोयानि आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कुर्टनी इशमिट साहेवेर हुजुर हइते कालिप्रसादराय सायेलेर. मकई माते इगरेजी १८२७ सालेर ३० श्राक्तुबर मासेर रोक्कारिर लिखित मते परस्त्र दुइ प्रहर पर्यन्त घङ्ग दश चलित शाखानुसारे इगरेजी १८२४ साजेर २२ दिजम्बर मासेर लिखित जिला वर्द्ध- मानेर रोवकारी ओ ई० हाल सालेर १६ आपरेल मासेर लिखित कलिकातार कोटेर रोवकारि ओ सायेलेर सोयालेर मजमुन सकलेर अनुमोदने जवाब दाखिल करार हुकुमे श्रादालत मजकुरेर । पण्डितगणेर नामे सोयाल । यद्यपि इहार परे मृत पार्वतीचरणेर भगिनीमशम्मात श्यामा- सुन्दरी गर्भे एक पुत्र जन्मे । ऐ पार्वतीचरणेर पितामही मुशम्मात राशर्माणर त्यक वस्तु ऐ पुत्रेर स्वत्व हइवेक कि ना? यदि हइ. वेक, एइ तण ऐ वस्तु मसम्मात श्यामासुन्दरीर जिम्माय किम्बा १.विशा-भ्या। २. वेष्टमान:-वीमि०। ३.बिलादुद्वरते दला-बीमिः। ४. तेनैव सह मोदते-वीमिः । ५. कपोतिकाचित्राकोपाख्यानम् । १० 1 , . ..... व्यवस्थापन संख्या-५४' . पार्वतीचरणेर खुहागण अर्थात् कालीप्रसादराय श्री दुर्गा- सुन्दररायेर जिम्याय राखा जाइदेक; श्रो यद्यपि उहार सुहा- गणेर जिम्वाय रहिवेक, विरोधीय वस्तुं हस्तान्तर ना करण'. कराते उहादिगेर स्थान हइते जामिन लोया शाखेर आज्ञा सम्मत वटे कि ना इति। श्रीजयतितराम जवावव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतकुटनोदशमिटसाहेवधर्माधिकर- पलिखितप्रभप्रतिरूपपत्रमेव तत्समर्पितेगरेजीशब्दप्रतिपायचविंशत्यधि- काष्टादशशताब्दीयद्वाविंशतिदिवसीयदिशम्बरमासीयवर्द्धमानजिलाख्यधर्मा- धिकरणीयविचारपत्रमय च इगरेजीशन्दप्रतिपाययतविशत्यधिकाष्टादश- शताब्दीयपोडशदिवसीयापरेलमासोयकलिकाताको पोशाख्यधर्माधिकर- रणीयविचारपत्रमेतद्धर्माधिकरणापिनिवेदनपत्रचावलोक्य. विषिष्य च यादृशशेधो वातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते- उपरिलिखितपत्रमा राममुन्दररायमरणानन्तरं तस्यक्तधनं तत्पुत्रए 'पावती चरणेन प्राप्तमिदं शामिति, "विवादासदीभूतधनं पालती- 'चरणस्यैव जगतम् । अतस्तन्मयानन्तरं सद्धनं तदुत्तराधिकारिणमेव भवते । तत्र च तदुत्तराधिकारिणां मध्ये पुत्रादिपितामहपर्यन्ताभावे तसितामह्या राशमण्या उत्तराधिकारित्वेन तदन प्राप्तम् । रारामपयां मृतायामेतत्तरं यद्यपि मृतस्य पार्वतीचरणस्य भगिन्याश्यामामुन्दा गन्में 'एक पुत्रो जनिष्यते तथापि पार्वतीचरणपितामहोरासमणिकान्ततदीय धने भविष्यतः पार्वतीचरण पितृदोहित्रस्याधिकारोन भविष्यति, यतो विवादा सदीभुतधनस्योत्तराधिकारित्वेन पार्वतीचरणपितामहीसंक्रान्तत्वे तन्म. स्योत्तरं तस्याः पूर्वमधिकारिपितामहादपि पूर्यमधिकारिणः पितृदोहित्र- १ करोष व्या व्यवस्था-पत्र-संख्या-५४-५५ स्याधिकारप्रतिपादकशास्त्राभायात्-इति वनदेशचलितश्रीकृष्णतालकार- दायभागटीकाविवादभनार्णवदायक्रमसंग्रहादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था--- प्रत्र प्रमाणम्- मातृपौत्राभावे पितृदोहित्रः तदभावे पितामहः तदभावे पितामही- इति श्रीकृष्णतर्कालङ्कारकृतदायभागटीकालिखनम् (पृ० २१८) ॥१॥ दौहित्रान्तपितृसन्तानाभावे पितामहो धनाधिकारी आसनत्वात तदभावे पितामही-इति विवादमगार्णयलिखनम् (२ विवाभ० पृ. ३६४ ख )॥२॥ दौहित्रान्तस्त्रसन्तानाभावे पितुरधिकारवत् पितृदोहित्रान्तसन्ताना- भावे पितामहाधिकारः, सांदृष्टिकन्यायसिद्धत्वाद् घनिभोग्यप्रपितामह- पिण्डदातृत्वाच पितामहाभाये पितामही इति दायक्रमसंग्रहलिखन चति (पृ० ७)॥३॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिःशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन ५५-नं०७१५५ प्रापील सदर आमीन- रोवकारि श्रादालत देओयानी जिला वर्द्धमान इंरेजि १८२७ साल ११ जुन प्रथम रेजेष्टर श्रीयुत मेस्तर जान एगलेश हारणी- •साहेवेर वैठके। रामप्रशादवन्द्योपाध्याय आपीलाएट अापन अमाप्तच्यवहारा कन्या अन्नपूर्णादेव्यार पक्ष हइते श्रीमतिदेल्या श्री गयरह पाडण्टान सुवर्णादेच्या भोजरदार भ्रान्पुत्राभावे भ्रानुपौत्र:...तभावे पितृदौहित्रः...तभाने पिना:-दायमान- टीमापार: २. पिडागहरय, सांदृष्टिकदापामसंग्रहपाठः ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-५५ ए मकई मार विवरण दृष्टे एइ जिलार पण्डितेर उपर व्य- वस्था तलवे एइ सोयाल हइयाछिल । यद्यपि हइ भग्नि पितृधने दखिलकार हझ्या, ताहार मध्ये एक जन भग्नि श्रो दुइ पुत्र समते मरे, तवे मृत व्यक्तिर धन भग्निके अशिवेक, किम्वा ताहार पुत्र- दिगेके अर्शिवेक। ताहाते एइ रूप व्यवस्था पहुछिल ये मृतार धन ताहार भमिके अशिवेक । एइ रूप प्रामार तलव करण मते एलाका फलिकातार कोट आपिल श्रादालतेर पण्डितेर निकट हइते ये व्यवस्था पहुछियाछे जिलार व्यवस्था ऐक्यता हइल। किन्तु विचारेर दाँडाते हजुरेर विवेचना सम्मत ना हइया उपरेर लिखित सोयाल एइ वेोराते ये दाश्रोया करा वस्तु साधारण ओ पृथक थाकन प्रकारे उपरेर धेश्रोरा करा कोन उत्तराधिकारिके अर्शिवेक-इरेजि चिटी द्वारा हुगुलि जिलाते पाठान गिया. छिल । हुगुलि जिलार पण्डित ए जिलार व्यवस्थार नितान्त व्यतिक्रम, अर्थात् दामोया करा वस्तु साधारण किम्बा पृथक, दुइ प्रकारेइ पुत्रदिगेके अर्शिवेक लिसियाछे। अतएव व्यवस्थार व्यतिक्रम होने सन्देह उत्पत्ति हइया ताहार निष्पत्ति कारण सदर देोयानि श्रादालतेर व्यवस्था तलय फरण आवश्यक बोध हइया हुकुम हइल ये सोयाल एइ रोयकारिर नकल द्वारा जज साहेवेर समीपे एइ प्रार्थनाय पाठान जाय ये सोयालेर व्यवस्था सदर देोयानी श्रादालत हइते श्रानाइया ए आदलते पाठायेन इति । रोवकारि आदालते देशोयानी जिला वर्द्धमान तारिख १६ माह जुन शन १८२७ शाल मेस्तर हेनरि मेरट जज साहेवेर बैठके- रामप्रसादयन्द्योपाध्याय पापीलाण्ट आपन अप्राप्तच्यवहारा कन्या अन्नपूर्णादेन्यार पक्ष हइते- रप्पाडण्टान् श्रीमतिदेन्या ओगयरह व्यवस्थापन संख्या-५५ १४६ सुवर्णादेव्या- प्रोजरदार एइ मासेर ११ तारिखेर लिखित ए जिलार रेजेष्टर साहेवेर रोवकारिर एक केता नकल एक मृता स्त्रीर भग्नि प्रो दुइ पुत्रर उत्तराधिकारत्वेर विशये ए आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था कोट यापिल श्रादालतेर व्यवस्थार सहित ऐक्य, श्रो जिला हुगुलिर 'आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थार सहित व्यतिक्रम हश्रोन मजमुने एक केता सोयाल सम्वलित सदर देओयानी श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था हासिल करणेर कारण ऐ सोयाल सदर देोयानी आदालते पाठानेर प्रार्थनाय उपुल हइल । हुकुम हइल ये साहेव गौपुकेर प्रासल रोवकारि ऐ सोयाल सम्वलित एइ रोवकारिर नकल आमार इरेजि चिदिर सामिल सदर देओयानि आदालतेर प्रबल प्रताप हाकिमानेर हजुरे पाठान जाय इति- सोयाल- यद्यपि कोन व्यक्ति प्रापन दुइ फन्या वर्तमाना राखिया, फौत् करे । ताहार पर ऐ दुइ कन्यार एक फन्या आपन दुइ पुत्र ओ भग्निके राखिया फौत् करे। इहाते मृता कन्यार विशय ताहार भमिके अर्श, कि ताहार पुत्रदिगेर अर्श ? इहार संसृष्ट मते ओ विभाग प्रयोगे पृथक २ शाखानुसारे जवाव लिखिवेन इति । श्रीजयतितराम जवायव्यवस्था प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते। यत्र कश्चिद्व्यक्तिविशेषः स्वकीये द्वे कन्ये संरक्ष्य मृतः, तदनन्तरं द्वयोः कन्ययोर्मध्ये एका कन्या द्वौ पुत्रौ एका भगिनीञ्च संरदय मृता स्याद, तत्र सा कन्या यदि अविवाहिता सती पितृधनाधिकारिणी चेत्तदा, यदि च उत्तराधिकारले च-व्यप०॥

१० व्यवस्था-पत्र संख्या-५५ विवाहिता सती पितृधनाधिकारिणी जाता, परन्तु तस्याः सा मगिनी बन्ध्या, 'पुत्रहीनी विधवा चेत्तदा च, तस्याः पितृत्ववधनांशे तत्पुत्रयोरधिकारः । 'यदि च ठा कन्या विवाहिता सती पितृधनाधिकारिणी जाता, अय च तस्याः सा भगिनी वन्ध्या, पुत्रहीना विधवा वा नो चेत्तदा तद्भगिन्या, अर्थात् पुत्रवत्याः सम्भावितपुत्रा(यावा, अधिकारः। पितृधने जताया दुहितुरधिकारे जातेऽपि तन्मरणोचरं पितुरुत्तराधिकारिणामेव क्रमेण तद्धन भवति । तत्र च पितुरुत्तराधिकारिणां मध्ये पुत्रादिपदोपर्यन्ताभाषे दुहितुरेप प्राधान्याद् विभक्तऽविभक्त या व्यावहारिकसंसृष्टिनि, असंष्टिनि वा सति 'पूर्वाधिकारिणी तदनन्तराधिकारिणां वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेणु अधिकाराभावाच्य-इति वद्देशचलिवदायभागश्रीकृष्णतालङ्कारकृत- दायभागटीकादायक्रमसंग्रहविवादार्णवसेतुविवादभनार्णवादिमन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्-- 'पल्यभावे दुहिता...तत्रापि प्रथमं कुमारी...तत्राय विशेषः । कन्या जाताधिकारा पश्चात् परिणीता सती अविधमानपुप्रा यदि नियेत तदा तपितृदाये सपुत्रायाः सम्भाषितपुत्रायाश्च भगिन्यास्तुल्याधिकारः । न तु तद्भत्रादीना, सीधन एव तेपामधिकारात् । कुमाय्यभावे चौढायाः पुत्रवत्याः सम्भाषितपुत्रायाश्च भगिन्यास्तुल्याधिकारः, तयारेकतराभावे एकतराधिकारः । पन्ध्यापुत्रहीनविधवयोस्तु पुत्रद्वारेण पाणपिण्डदा. नोपकाराभावात्, पुत्रवतीसम्भावितपुत्रयोरसत्त्वेऽपि नाधिकार: "सर्व- दुहित्रभावे दौहित्रत्याधिकारः इति दायक्रमसंग्रह पृ० ३.४ ) विवादा- वसेतु'पृ० ४३.४४ प्रभृतिग्रन्थलिखनम् ॥ १॥ ३. पत्यभारे कुमारी धनाधिकारियो। तदभारे चोदा"तत्राय विशेषः । कन्या माताविकारा पश्चात्परिणीता अविधमानपुत्रा यदि मृदा सदा तस्पिदाये पायाच मागिन्यारत्याधिकारो न तु ब दोना, सीपन एक तामविकारा तरमारे पुत्रवती सम्मावितपुत्रा व तुल्याधिकारिणी तयोरकेतरामा भन्दतग- पिकार ।"म्बपुत्रधारा पाणपिएडवातिया योरस्काराविरोषाध!"वन्ध्यापक.. होनविश्वयोस्तु नाधिकारः।"तयोरमा दौदित्र.-इति विवादावसेतुराट ।

व्यवस्थापन संख्या-५५-५६ १५१ प्रपञ्च दुहितुरम्यधिकारे-जाते तस्यां मृतायां तदभारोताः पितृधना- धिकारिणो गृहीयुः न.तु दुहितृधनाधिकारिणः-इति दायमाग पृ० ; १७४ ) मन्थलिख(न)ञ्चति । श्रीजयतितराम् थीहरिशरणम श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशम्मविद्यावागीशेन । नम्बर २५६५ ५६-रोवकारी मिसिल आदालते देोयानी सदर तारिख: २४ माहे जानओरि सन १८२८ इशारेजी,मतावेक १२.माहे माघ सन १२३४ यागाला रोज वृहस्पतिवार ऐ आदालतेर हाकिम, श्रीयुत कटवरट थरलेन सिलि साहेबर बैठके- देविदयाल प्रभृति आपीलाण्टानं हरहोरसिंह : रप्पाडण्ट पापीलाण्टेर उकिल मुनशी महम्मद पाणाह विद्यमान' श्राशील । ए मकईमा गत दिवस रपाडएटेर असाक्ष्याते आमार बैठके रोवकार, प्रो जिलार आदालतेर कागज-सकल'' १० लम्वर पर्यन्त पडागिया स्थकित छिल । पुनराय अध रोय- कार हइया ऐ आदालतेर वाकि कागज-सकल फयशला पर्यन्त ओ फोट श्रादालतेर तावत् कागज ओ ए आदालतेर समुदय कागज पडागेल । 'यथा ए मकईगार सम्पर्के नातक हुकुम सादर होनेर पूर्व एइ विषय जानन जे हरहोरसिंहेर पाशे वैशन शाखानुसारे साम्यवस्थं वटें किं ना आवश्यक हुइल । अतएव" हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल सहित ए मकदमार समस्त कागज एइ आदालतेर पण्डीतगणके एइ हुकुमे, समर्पण करा जाय ये मशहमार दाखिल होया सन्यक कागज ओ सकल दस्तावेज दृष्टी करिया व्यवस्था लेखेन ये हरहोरसिंहेरवाशे । .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-५५ विवाहिता सती. पितृधनाधिकारिणी जाता, परन्तु तस्याः सा मगिनी बन्ध्या, "पुत्रहीना विधवा चेत्तदा च, तत्याः पितृत्यक्तधनांशे वपुत्रयोरधिकारः। 'यादै च सा कन्या विवाहिता सती पितृधनाधिकारिणो जाता, अय च तस्याः मग भगिनी वन्थ्या, पुत्रहीना विधया या नो चेत्तदा तद्भगिन्याः, अर्थात् पुत्रवत्याः सम्मावितपुत्रा(या)वा, अधिकारः । पितृपने उदायो दुहितुरधिकारे जातेऽपि तन्मरणोतरं पितुरुत्तराधिकारिणामेव क्रमेण वदने भवति । तत्र च पितुरत्तराधिकारिणां मध्ये पुत्रादिपक्षोपर्यन्ताभावे दुहितुरे प्राधान्याद् विभक्त ऽविमो वा व्यावहारिकसंसृष्टिनि, असंघष्टिनि वा सात पूर्वाधिकारिणी तदनन्तराधिकारिणां वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण अधिकारामावाय-इति वङ्गदेशचलितदायभागश्रीकृष्णतकालङ्कारस्कृत दायमागटीकादायक्रमसंग्रहविवादार्णवसेतुविवादमझार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- 'पल्यभावे दुहिता...तत्रापि प्रथम कुमारी...तभायं विशेषः। कन्या जाताधिकारा पश्चात् परिणीता सती अविद्यमानपुत्रा यदि प्रियेत तदा तपितृदाये सपुत्रायाः सम्भावितपुत्रायाश्च भगिन्यास्तुल्याधिकारः। न तुतभादीनां, सीधन एव तेषामधिकारात् । कुमाथ्यभावे चौटायाः पुत्रवत्याः सम्भावितपुत्रायाश्च भगिन्यास्तुल्याधिकारः, तयारकतराभावे एकतराधिकारः । बन्ध्यापुत्रहीनविधवयोस्तु पुत्रद्वारेण पार्वणपिण्डदा- नोपकारामावात्, पुत्रपतीसम्भावितपुत्रयोरसत्वेऽपि नाधिकार "सबै- दुहिनभावे दौहित्रस्याधिकारः-इति दायक्रमसंग्रह पृ. ३.४ ) विवादा- रविसेतु'( पृ० ४३.४४ प्रतिमन्थलिखनम् ॥ १॥ १. पन्यभावे कुमारी धनापिकारिणी। "तदभारे चोदा "तत्राय विशेषः । कन्या . . नाताधिकारा पश्चात्परिणीता अविधमानपुरा यदि मृदा तदा तस्पिताये पुत्रायाच भगिन्यारतुल्याश्किारो न तु तत्रादीना, स्त्रीपन व देवाधिकारा। वदनारे पुत्रवती सम्भाक्तिपुत्रा च तुन्याधिकारिणी एतयोरफेनरामारे भन्यता रिकार "स्वपुत्रदारा पार्वपिण्डदानतया योरकाराविशेषाध!"वन्ध्यापुच.. होनविधवयोस्तु नाधिकारः।"तयोभावे दौहित्र.--ति विवादसेतुमठ ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-५५-५६ १५१ एपञ्च दुहितुरप्यधिकारे जाते तस्यां मृतायां तदभावोक्ताः पितृधना- धिकारिणो गृहीयुः न.तु 'दुहितृधनाधिकारिणः-इति दायमाग-पृ० १७४ ) ग्रन्थलिख(न)च्चति । श्री पतितराम् श्रीहरि शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशम्मेनियावागीशेन म . . । नम्वर २५६५ ५६-रोवक्रारी मिसिल आदालते देओयानी सदर तारिख, २४ माहे जानोरि सन १८२८ इङ्गरेजी मतावेक १२ माहे माघः सन १२३४ वाङ्गला रोज वृहस्पतिवार ऐ आदालतेर हाकिम, श्रीयुत कटवरट थरलेन सिलि साहेवरे घेठके- देविदयाल प्रभृति आपीलाण्टानं हरहोरसिंह रप्पाडंण्ट आपीलाण्टेर उकिल मुनशी महम्मद पाणाह विधमान श्राशील । ए मकईमा गत दिवस रप्पाडण्टेर असाक्ष्याते आमार वैठके रोषकार, श्रओ जिलार श्रादालतेर कागज-सकल १० लम्बर पर्यन्त पडागिया स्थकित छिल । पुनराय अद्य रोव-' कार हइया ऐ आदालतेर वाकि कागज-सकल फयशला पर्यन्त श्रो कोट आदालतेर तावत् कागज ओ ए आदालतेरे समुदय कागज पडागेल । यया ए मकईमार सम्पर्क नातक हुकुम सादर होनेर पूर्व एइ विपय जानन जे हरहोरसिंहेर वाशे वैशन शाम्रानुसारे साव्यवस्थ वटे कि ना आवश्यक हईल। अतएव' हुकुम हइल ये एइ रोवकारि नकल सहित ए मकईमार समस्त कागज एइ आदालतेर पण्डीवगणके एइ हुकुमे अर्पण करा जाय ये मकदेमार दाखिल होया सम्यक कागज श्री सकल दस्तावेज दृष्टी करिया व्यवस्था लेखेन ये हरहोरसिंहेर चाशे । - व्यवस्था-पत्र संख्या-५६ २५२ - . वैशन शास्त्रानुसारे साम्यवस्थ वटे कि ना; यो व्यवस्था दाखिल होन परे उचित हुकुम सादय हइवेक इति । एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटयरनेलसेलिगहेवधर्माधिकरण- लिखितविचारपत्रान्तर्गतमश्नप्रतिरूपपत्रमेवंतत्समर्पितेतद्विवादपदविषयनि । विष्टरमजात स्वावलोक्य विविच्य च याहशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- हरहोरसिंहनिर्दिष्टसाक्ष्युपस्थापितवृत्तान्तेन वाराणस्यधिकरणककोट- पापीलाख्यधर्माधिकरणनिविष्टससदशाङ्कासितव्यवस्थापत्रेणैव मष्टादशा झाड़िततव्यवस्थाप्रविरूपपत्रेण चैवं वद्व्यवस्थापनलिखितप्रभत्रयेण चैव- मेदिवादविषयनिविष्टपत्रजातैम हरहोरसिंहः स्वपितुर्जनकस्यैक एव पुत्रः, एवं जनकपितृमरणानन्तरं तन्मात्रा या मनेवाजसिंहाय भाषायां राशशिनी. शम्दप्रतिपाद्यदत्तकपुत्रकरणाथै दच इति शावम् । एताहरावृत्तान्ते सति हरहोरसिंहस्य या मनेवानसिंहकर्तृफ भाषायां राशनसिनोशन्दप्रतिपाद्य- दत्तकपुत्रत्वं सिद्ध भवितुं न शक्नोति । एकमात्रपुत्रो दत्तकपुप्रकरणाथै न दातन्या-शास्त्रे निषेघरमरणात्, मनमति विना स्त्रियाः पुत्रदान. निषेधाच । अयं च हरहोरसिंहनियुक्त रूकानशब्दवाच्ये यद्व्यवस्थापत्रं वाराणस्यधिकरणककोटापिलाख्यधर्माधिकरणे निषिष्टं तद्व्यवस्थापत्रे सत्प्रतिरूपपत्रे घेदमेव लिखितम् । काचिदेवपुत्रा तत्पुत्रभरण पोपणा. द्यसमा स्त्री स्वकीयमेकमुत्र दत्तवती' ! श्रावयोः सकलकार्यकारी श्रयं पुत्रः अस्तु । श्रतएवाय यामुष्यायपः पुत्रः सिद्धो भवतीति वदतीवा. शुदम् । वार संविदा सत्यत्वस्य प्रभुसमर्पितपत्र बावैरेव प्राप्तत्वात् पत्युरन मति विना फेवलभरपायसमर्थया मात्रा दत्तस्यैकमात्रपुत्रस्य दयामुपाय यस्य शास्त्रालिखितत्वाद् भर्तुरनुमते प्रभुसमर्पितेतद्विवादविषयनिविष्टपत्र लावेरेवमासवाघ । अथ च बिलाल्यधर्माधिकरणनिविष्टपत्रान्तर्गत १.पत्रेनः-स्यप १ सकियत देक पुत्रमलेनरा विद्यावाति---व्यप। ५. इति सारो पर। २. भवनोपापसा-यप० । ४.दाश-व्यस्त व्यवस्था-पत्र संख्या-५६ सदाधिकरणनियुक्तपण्डितलिखितव्यवस्थापत्रमेवं पाठशालास्थपरिडत- लिखितव्यवस्थापत्रं च शुद्धमशुद्धं वेत्यस्माभिर्न लिख्यते,' यतस्तद्व्यव. स्यादये हरहोरसिहस्य दत्तकपुत्रत्वसिद्धयसिद्धयोः प्रस्तावश्च नास्ति; इत्यत- स्तस्यानावश्यकत्वमेव-इति धाराणस्पादिप्रदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदय- व्यवहारमाधवव्यवहारमयूखव्यवहारकौस्तुभदत्तकमीमांसादत्तकदीधितिदत्तक- चन्द्रिकादत्तकनिर्णयादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- अन प्रमाणम्- मात्रा मर्तुरनुज्ञया प्रोपिते प्रेते वा भर्तरि पित्रा वोमाभ्यां वा सवर्णाय यो यस्मै दीयते स तस्य दत्तकः पुत्रः। यथाह मनु:- माता पिता या दद्यातो यगद्भिः पुत्रमापदि । सदृशं प्रीतिसंयुक्त स ज्ञेयो दनिमः सुतः।-इति (६१६८)। आपद्ग्रहणादनापदि न देयः । दातुरयं प्रतिपेधः। तथा एकपुत्रो नदेयः । "न वेवैकं पुत्रं दद्यात् प्रतिगृहीयादेति वशिष्ठस्मरणात", तथा "अनेक- पुत्रसद्भावेऽपि ज्येष्ठो न देयः। ज्येप्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः" इति ( मनु०-६/१०६ )। तस्यैव पुत्रकार्यकरणे मुख्यत्वात्---इति मिताक्षराग्रन्थलिखनम् (पृ. २१३-१४ ) ॥१॥ अपुत्रेणेति पुं(स्त्व)श्रवणात् न खिया अधिकार इति गम्यते । अतएव पशिष्ठः । न खी पुत्रं दद्यात् प्रतिगृहीयादा अन्यत्रानुज्ञाना:- इति दत्तकमीमांसाग्रन्थलिखनम् (पृ०७) ॥२॥ नेकपुत्रेण कर्त्तव्यं पुत्रदान कदाचन । बहुपुत्रेण कर्त्तव्यं पुत्रदानं प्रयलतः।। इति दत्तकचन्द्रिकादत्तक- मीमांसादि (पृ० ६६)ग्रन्यधृतशोनकवचनञ्चेति (४० ११॥३॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनार्थामधेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन १. लिखिने-म्पप० । २. भत्रनुशया०-या। .

१५४ . . व्यवस्था-पत्र संख्या:५७ ५७ रोवकारि मिसिल अादालत देओयानी सदर तारिख ५ माह मार्च सन १८२८ इगरेजी मतावक २३ माह फालगुण सन १२३४ याङ्गला रोज बुधवार ऐ आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत पालक सुन्दर राश-साहेवेर वैठके- जयरामगिर वनाम मयागिर ओ देविगिर साएल हाजीर आशील। इं० १८२७ शालेर १३ आगस्त माशेर लिखित मरसीदाबादेर प्रवलसिएल कोटेर एक केता रिट- रने तथाकार रोवकारि सहित ओ तहार सम्वलित मकईमार रोएदाद पौछिया ऐ सनेर जुलाइ माशेर २३ तारिखे दृष्टी होया: साएलेर सोयाल प्रभृति, ताहार समपर्कीय कागज-सकल अय दृष्टे आशिल । यथा साएलेर सोयाल सम्पर्के चुडन्त हुकुम सादर होनेर पूर्व शाख विवेचना करण उचित वोध हइलो, अतएव हुकुम हइलो ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे एइ श्रादालतेर पण्डितगनके अपेण फराजाय ये निचे लिखित. सोयालेर जवाव सोमवार पर्यन्त दाखिल करेण । सोयालयद्यपि एक व्यक्त गोसायी श्रापन गुरुर मयुर, पर उहार त्यक्त धने दाखिल हइया अन्य व्यक्तिके श्रापन चेला नियुक्त करे, श्रोताहार पर आपन चेलार असम्मतिते आपन गुरुर त्यक्त धन ओ.अापन स्वोपार्जित (धन)के गुरुर त्यक्त धन सम्वलित किम्वा पृथक् अन्य स्थाने हस्तान्तर करे। यद्गदेश, चलित शास्त्रानुसारे एमत हस्तान्तर सिद्ध वटे कि ना इति । श्रीजयतितराम्। एतदर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतश्रालकमुन्दरसाहेवधर्माधिकरण, लिखितविचारपत्रान्तर्गतमभप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनु सारेगोचर लिख्यते- योतत्प्रश्नलिखितकश्चित्सन्यासिगोस्वामी स्वगुरोमृत्योः परं तत्यक्त- धने प्रायत्तत्वं सम्पाधान्य कश्चिद्व्यक्तिविशेष सिध्यत्वेन नियुक्तवान् । : - व्यवस्था पत्र-संख्या-५७ सदनन्तरं तष्ठिम्यानुमति विना स्पगुस्त्य समन सोपानितधन फोहत्य पृथग्यान्यस्य 'फस्यचिनिकटे दस्तान्तरं कृतवान् सासर सदनं यदि देवसेराय नियमित भवति तदा देवस्थत्यासदीभूततदने हस्तान्तर कर्तुः स्थत्यामापेन, यदि च तदनमतिथिसेयाचं नियमित सायं नियमरचेदे. राधनादतिथिसेवैततधाननियुक्तेन कत्तंन्या, न तु दानपिझयायपि, तदा च शिष्यानुमला तदननुमत्या या हस्तान्तरकरणे शास्त्रानुसारेण सिद्ध मावि नाईति; यतः शास्त्रानुगरण पोप्ययगांमरये नरम मयति । अथ च गया सिनामिदानीन्तनानां प्रापयोऽतिथिरोगान्याहारो पत्तते । अथ चातिथिसेवार्य पननियमोऽपि यति । तदनदानविझयायपि न मयत इत्यपि व्यवहारः । व्यपहारस्यापि शास्त्रसिद्धप्रमाणत्वात् । श्रम च सन्यासिनामनेफे सम्प्रदाया अनेकाः अंगपत्ततत्प्रनलिखितसंन्यासिनो गोस्वामिनो गरम्परा मामेवयवदारश्चेत् सिम्पानुमति बिना गुरुणा गुरुपरम्परागतधगस्य हस्तान्तर न कर्तन तदा तादराव्यवहारात् शिष्यानुमति विना गुरुपरम्परा गतधनस्य दस्तान्तरफरणं शास्त्रानुसारेण मयितुं नाईति । यदि च नद्गुर- परमरायां ताराव्यवहारी न चेन्, तदेतत्पश्नलिखितधने यदि देवसेवार्थ- मतिथिसेवाय वा नियमितं न मयति बदा च स्वोपार्जितस्य गुरुपरम्परागत स्य वोमयविधधनस्यास्य' संन्यासिनातिव्यवहारात् शिष्यागुमति विनापि गरणा हस्तान्तरकरण शास्त्रानुसारेण सिद्धपति, अतः शास्त्रानुसारेणापि सिद्ध मविनुमति । व्यवहारस शास्त्र सिद्धप्रमाणत्यमुपरि लिखितमेव-इति वरदेशचलितमनुदायमागभीकमपतकालकारकृतदायमागटीसाव्यवहारवल व्यवहारमातृकादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- देवस्वं माझणवं वा लोभेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा परे लोके गधोच्छिप्टेन जीवति । - इति मनुवचनम् (११ । २६)।। ३. गरतान्तर-पर। २. शास्त्रानुसारेणापोय-न्य। १. धनस्यारम जातसन्यासिया-म्पर। -- १५६ व्यवस्थापन संख्या-५७ प्रतिमादिदेवतार्थमुत्सृष्टं धनं देवस्त्रम्-इति कुल्लूकमव्याख्यान मिति (पृ. ४३०)।२॥ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं पा । अकृतरस तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः।। इति मनुवचनम् (१६)।३। व्यवहारो हि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते-इति व्यवहारतत्त्व पृ. ४) व्यवहारमातृकादि(पृ. २८२ मन्यधृतनारदवचनम् । (४० १७) ११४०) भरणं पोप्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम् । नरकं पीडने चास्य तस्माचलेन तं भरेव ॥ इति दायभागादिप्रन्या धृत(दामा पृ० ३३ )मनुवचनम् ।। पिता माता गुरु • प्रजा दीनाः समाश्रिताः । अभ्यागतोऽतिथिश्चैव पोप्यवर्ग उदाहृतः । इति श्रीकृष्णता- लङ्कारधृतमनुवचनम्' (दाभाटी• पृ० ३४)। ६ । जातिजानपदान् धम्माञ्छणीवमीश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधम्मांश्च स्वधर्म प्रतिपालयेत् ।।-इति मनुवचन चेति (८४१)। श्रीजयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन श्रीहरिशरणम् -इजराजि दस्तखत- २. देवता तदर्थम-यपा २ मनुस्मृती वचनमिदं नोपलम्य। ३. पचनमिदं मनुस्मृती नोफ्लम्यते यद्यपि वाक्यमिद "मनुनैगेकम् दिदायमा गटीकालिखमम्। H व्यवस्था पत्र संख्या-५८ १५७ शोयाल- ५८--एक व्यक्ति सामन्त रजपूत जातीय राजा प्रथमा श्रो द्वतिया दुइ वनिता ओ द्वतीया वनितार एक दुहिता श्रो स्थावर ओ अस्थावर घस्तु स्वर्णादि राखिया निहतो अर्थात् मृत्यु हय । तदपरे ए निहतो व्यक्तिर दतिया पनितार एक दौहित्र हय । ऐ द्वतिय वनिता ओ ताहार दुहिता ो दुहितार पुत्र वर्तमान आछ। ए क्ष्यणे ऐ राजार प्रथमा यनिता आपन स्वामीर फोतेर पर ऐ सकल वस्तुते दखिलकार थकिया आपन सपनीर साम्ब- सरेर भरण पोपणेर वेतन दिया आपन सजातीय चरि वत्सरेर आयझमेर एक व्यक्तिके पोष्यपुत्र राखियाछे । एमते प्रस्ता जिज्ञासा करा जाइतेछे। ऐ युत राजार द्वितीया वनितार दीहिन यत्तेमाने प्रथमा पनिता आपन स्वामीर विना अनुमतिते पोष्यपुत्र करिते पारे कि ना । यदि पारे कोन शास्रेर मत, ओ शे शास्त्रेर नाम की, ओ कोन वचन ओ प्रमाण ताहा एइ शोलेर हे लिखियान । इति इंशन १८१८ साल, तारिख ७ माच्च । श्रीजयतितराम प्रभुरामर्पितप्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते प्रश्नपत्र लिखितस्य राशो द्वितीयवनिताया दौहित्रे विद्यमाने सति प्रयमा वनिता स्वस्वाम्यनुमति विना दत्तकपुत्रं कत्तुं न शझोति-इति दत्तकमीमांसा. दत्तकचन्द्रिका(पृ. ३)दत्तफदीधितिप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अन्न प्रगरणम्- स्त्री पुत्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयाद् वाऽन्यत्रानुज्ञानाद् भर्तुः-इति दत्तक मोमोसा(४०७)दत्तकचन्द्रिका(पृ० ३)दत्तादीधितिप्रभूतिग्रन्यधृतवशिठ- वचनम्। श्रीजयतितराम् - श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन व्यवस्था पत्र संख्या-५६ ११८ नं०२६५८ पह-रोवकारि मिपिल आदालत देओनि सदर तारिख १३ माह मार्च सन १८२८ इङ्गरेजी मोतावक २ चैत्रसन १२३४ वाङ्गला रोज वृहस्पतिवार ऐ श्रादालतेर हाकिम कटवरट थरनेल 'मिली साहेवेर वैठके- नफरमित्र ओ राजीवमित्र- आपीलाएटान रामकुमारचट्टोपाध्याय प्रभृति- रपाडण्टान पापीलाएटानेर उकिलगण मुनशी हयदरालि प्रो मुनशीगोलाम वतुल रेप्पाडण्टानेर उकीलगणेर मध्ये एक जन मौलवि फरम्- होशेन हाजिर आशील । पूर्वे एइ मकद्दमा एइ मासेर ११ श्री १२ तारिख सकले रोवकार हइया ओ शहर पादालत ओ प्रविनशल नोटेर कागजसकल तथाकार फयशला सहित पडागिया दिवा आवसान हेतु स्थकित छिल, पुनराय अद्य उपस्थित हइया खाप पापीलेर संयोल याहा मौछुवातेर स्थाने करार दियाछे श्रो ताहार जवाव इङ्गरेजी १८२४ शालेर १७५२६ (१) जुलाइ मासेर होया ए आदालतेर रोवकारि सकल ओ श्रादालतेर समुदाय फागज पडागेल । जानागेल ये एइमकद्दमाय सहरेर पण्डितेरनिकट हइते दुइ व्यवस्था श्रओ कोटेर पण्डितेर निकट हइते एक व्यवस्था दाखिल हइयाछे, ओ ऐ व्यवस्थासकल परस्पर अनक्य । श्रत- एव चूडान्त हुकुम सादर होनेर पूर्व एइ आदालतेर पण्डित- गणेर निकट व्यवस्था लोन उचित योध हइया हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल नीचेर लिखित सनो)लसकल लिखिया मकद्दमार समुदाय कागज सहित एइ आदालतेर पण्डितगणके. समर्पण कराजाय। प्रथम सोयाल । एजे यद्यपि रामकृष्णमित्रेर'खो मुसम्मात धनमणि आपन पतिर मृत्युर पर श्रापन पतिर अंश श्रोत्यक्त १.पार कृष्ण-यप। स ज्यवस्थापन-संख्या-५६ १५६ वावत मलहि किसमतेर उपर, याहा उत्तराधिकारित्व प्रकारे उहाके पौछियाछे, दखित हइया ताहा आपन दौहित्र मानिक- लालके हेवा करिया थाके; एमत हेवा सिद्ध वटे कि ना। द्वितीय । एइ ये यद्यपि हेवानामा लिखिया देओन परे मुस- म्मात मजकुरा ऐ लिखित वस्तुके पुनराय रप्पाटण्टानेर पिता डोमनचट्टोपाध्यायेर निकट विक्रि करियाथाके, एमत विक्री करार ऐ मुसम्मातर' क्षमता छिल कि ना। श्रो यदि स्यात् हेवा ओ विक्रय दुइओ सिद्धि ना हय तवे ऐ वस्तु आपीलाएटानके, ये धनमणिर पतिर भ्रातुप्पुत्र घटे, अर्श कि ना? तृतीय' । यद्यपि धनमणि एखन पर्यन्त जीवमान थाके तवे ऐ वस्तुते उहार स्वत्वाकी आछे कि ना। उचित ये पण्डितगण मकदमार समुदाय कागज दृष्टि करिया वङ्गदेश चनित शाखा नुसारे व्यवस्था दाखिल करेण इति । श्रीहरिशरणम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटयरनेलसिलीसाहेवधर्माभिकरण- लिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समपितैतद्विवादविषयनिवि- एपप्रजातं चावलोक्य विविच्य च यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते-- प्रथमप्रभस्योत्तरम्- उपरिलिखितपत्रान्तर्गतमुरुसिदा चादाख्यनगरसम्बन्धिधर्माधिकरणीय- जयपत्रेणेकत्रिंशदवासितविचारपत्रेण तद्धर्माधिकरणनियुक्तपण्डितसंगन्धि प्रभपत्रेण चैवं कोर्टापीलाख्यधर्माधिकरणीयजयपत्रेणकादशाकाङ्कितपिचा- रपत्रण नद्धमाधिकरणनियुक्तपण्डितसम्बन्धिप्रपत्रेण च रामकृष्ण मित्र- मरणानन्तरं तत्यक्तधनं गङ्गागोविन्दमित्रेण तत्पुत्रेणोत्तराधिकारित्वेन. प्रासमिति ज्ञातम् । अतो रामकृष्णमित्रस्वत्वास्पदीभूतयावद्धने तस्यैव १भसम्मात-ध्यप० । २. असम्मातर--101 ३. द्वितीय-न्यप। ४. मुरुसिदावादास्य-न्यप प. .

१६. R व्यवस्था-पत्र संख्या-४८-५६ सत्यं जातम् । अतस्तस्यानपत्यस्य पनीमारभ्य पितृपर्यन्तानपत्यधनाधि- कारिरहितस्य मृतस्य जोत्तराधिकारित्वेन तन्मात्रा धनमन्या तदनं प्राप्या- यत्त्य सम्पाद्य माणिक्यलालनाम्ने स्वदौहित्राय दत्तं चेत्, तदा तद्दानं सिद्धं भवितुं न शक्नोति, यतो दानपत्रे धनमन्या लिखितं मया स्वेच्छया तुभ्यमेतद्भापायामयादशगण्डाशम्दपतिगयं धनं दत्तम् , अतएव स्वे. च्छया स्त्रिया दानाधिकारस्योत्तराधिकारित्वेन संक्रान्तधने शास्त्रासिद्ध- स्यात् । यथा पवित्यक्ते पनीसंक्रान्ते धने पल्याः स्वेच्छया दानाद्यनधिकार- स्तयापुत्रत्यक्त ऽपि मातृसंक्रान्ते धने मातुरपोति ॥ ॥- अत्र प्रमाणम्- स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः । नापहारं स्त्रियः कुयुः पतिदायात् कथञ्चन ॥-दति दायभाग- (पृ० १७३ )विवादभङ्गार्णवादि(पृ. २ विवाभ० ३२१ क )प्रन्यधृत- भारतवचनम् ( १३१४७१२४)।१। नापहारं खियः कुर्युः पतिदायान् कथचनेति भारतादपहारशन्दा- थेन यथेष्टदानविक्रयादो नाधिकारः-इति दायरहस्यलिखनम् । २ । यदा पलीत्युपलक्षम् । स्त्रीमात्राधिकारेऽयमों बोदव्य-इतिदाय- भागादिग्रन्थलिखनम् ।।३।। द्वितीयप्रभस्योत्तरम्- प्रथमप्रभोत्तरानुसारेण शास्त्रासिद्धदानपत्र लिखनानन्तरं धनमणी तदानपत्रलिखितयस्तुनः पुनरेतदम्मधिकरणमत्यर्थिनां पितुः 'डोमनचट्टी- पाध्याय(स्य) सनिषौ विक्रयं कृतवतो स्यात्दैतादृशविक्रयकरणे तस्या धन- मण्याः क्षमता नासोत्, यतो विक्रयपत्रे स्वीकृतसंक्रान्तधनत्य' विक्रये शास्त्रोक्तावश्यकानां हेतूनामलिखनात् प्रभुसमर्पितायशिरपत्रमारप्राप्त- त्याच शास्त्रोक्तविक्रयहे तोविना पतित्यक्तधने यया पल्या विक्रये नाधिकार- स्तथा पुत्रत्यक्धने मातुरपि नाधिकारः । एवञ्चोपरिलिखितप्रकारेण २समपाथ-व्यप.1 २ रि-न्यप०। ३ नस्य शाखोचहेतूना विक्रये सातश्यकानामलिक-न्यप० ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-५६ सनविक्रययोरसिद्धौ सत्यां विवादास्पदीभूतधनान्तर्गतगङ्गागोविन्दमित्रस्य पूर्वस्वत्यास्पदीभूतभाषायामष्टादशगण्डाशब्दप्रतिपाद्यपरिमितवतुषु यदि गङ्गागोविन्दमित्रस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य वङ्गदेशचलितदायभागादिग्रन्य लखितक्रमेण पनीमारभ्य पितामहपुत्रपर्यन्तानपत्यस्य धनाधिकारिणो न युस्तदेतद्धर्माधिकरणार्थिनां गदागोविन्दमित्रस्य पितामहपौत्राणामधिकारो वतीति । अन्न प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरप्रमाणत्रयम् । तदभावे पितामही तदभावे पितुः सोदर- तदभावे पितुबैमात्रेयस्तदभावे पितृसोदरपुत्रस्तदमावे पितृवेमात्रेयपुत्रः- त्यादि श्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटीका लिसनम् । तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि धनमणी एतत्कालपर्यन्त जीवति तदा विवादास्पदीभूतधनान्त- तभाषायामष्टादशगएडाशब्दप्रतिपाद्यपरिमितं यद्रायकृष्णमित्रमरणोत्तरं त्पुत्रेण गङ्गागोविन्दमित्रेण प्राप्तं तद्धने धनमण्या मातृत्वेन स्वत्वम- येव, यतो गङ्गागोबिन्दमित्रस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्ररूपापत्यपनीदुहितदौहित्र- तृपर्यन्तानपल्यधनाधिकारिराहित्यात्' प्रभुसमर्पितत्रजातैरवगगादुपरि- खितपकारेण दानविक्रययोरसिद्धत्वाच-इति षड्नदेशचलितदायमागधी- गवर्कालङ्कारकृतदायभागीकाविवादभङ्गार्णवदायरहस्यादिग्रन्थानुसारियो विस्था। तृतीयप्रभोत्तरप्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरी म्रातरस्तथा तत्सुतः-इत्यादि दाय(४ १५१) गादिग्रन्धधृतयाशवल्क्यवचनम् (२।१३५) अन यद्यपि विवादास्पदीभूतं धनं भाषायामेकादशगएडाधिकैकाणाक- रेमितमिति विक्रयपत्रादिना शातम्, किन्तु तन्मध्ये भाषायामष्टादशगएडा- दप्रतिपाग्रं यदनमण्या उत्तराधिकारित्वेन प्राप्त तस्यैवेदमुत्तरं प्रभुसम- २.राहित्यस्य-व्यप० । १२ व्यवस्था पत्र संख्या-५६-६० पितभावानुसारेण दत्त, मावशिष्टस्य मापायां प्रयोदशगाडाशन्दप्रति- पाद्यस्य नयकान्त विश्वासविक्रीतस्य पविषयकामुमभाभावात्-इविनिवेदन- मिति।' श्रीर्जपतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्माविद्यावागीशेन . नम्बर २५६५ ६०-रोक्कारि मिसिल मादालते देयोनि सदर तारिख हमाह आपरेल शन १८१८ इरेजी मोतारक २६ माह चैत्र शन १२३४ वागला रोज बुधवार ऐ यादालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरट थरनेल सिली साहेवेर बैठके । मुसम्मात जानकॉमोर यो जयाको ओर थापिलण्टान दुःखवहनसिंह ओ दोवदत्त रप्पाइण्टान प्रापिलण्टनेर उकिलगण मोलवि गोलाम इजदाणी ओ लाला पाउधलाल, रपाडएटानेर उफिलगणेर मध्ये एक जन मदासुपरिडत हाजीर शासिल । कल्य एइ मकर्दमा रोपकार हइया नालिशी श्रारजि पढागिया दिवा अयसान प्रयुक्त स्थकिन बिल, पुनराय अद्य उपस्थित हइया प्रविन्शन कोटेर चाफि कागज फयशला पर्यन्त ओ आदालते दासिल होया प्रारजि मजूत्रात ओ जवाव प्रभुति समस्त कागज गृष्टे याशील । यथा ए मोफईमार सम्बन्धे चुडन्त हुकुम सादर हानेर पूर्व पादालतेर परिडनगणेर स्थाने व्यवस्था लोन उचित हल. अतएव हुकुम हइल ये एइ रोक्कारिर नकल मकई मार समुद्ग कागंज सम्बलिद पद सोयाले ए भादानतेर पण्डित हामओला करानाय ये मुसम्मात ज्ञानकोर पापन पिता केहरसिंहेर त्या पारयस्तुते ए आदालतेर डिकरि अनुमारे :

: . व्यवस्था-पत्र-संख्या-६० १६३ उत्तराधिकारि प्रकारे कावेज हइयाछे, ओ मुसम्मात मजकुरा वन्धुसिंह नामे एक पुत्र प्रो उम्मेदकाँओर ओ देोमुरत श्रो नन्नाकाँओर नामिक तिन कन्या वा त यो उहार पुत्र पन्धुसिंह जयाकाँपोर नामे एक खि राखिया निःसन्तान मरिल । तत्परे मुसम्मात देोमुरत द्वितीय कन्या दुइ पुन अर्थात् रप्पाडण्टान- के राखिया मृत्यु हइल, प्रो ताहार पर उहार तृतीय कन्या मुमम्मात नन्नााँओर मृन वन्धुसिंहेर स्त्री मुसम्मात जया- काँोरके ऐ समुदाय वस्तु किम्बा ताहार हइते किञ्चित दान करणेर क्षम निःसन्तान मरिल । अतएव मैथिल ओ पश्चिम देशेर चलित शास्त्रानुसारे ज्ञानकॉउरके (अपत्य) ना थाकाते तवे ताहार मृत्युर पर उहार सत्याधिकारि कोन व्यक्ति हुइवेक । उचित ये कागज-सकल दृष्टी ओ अनुमोदन करिया एइ सोयालेर जबाव शालेर प्रमाण सहित सप्ताह मध्ये दाखिल करि(वे)न इति । श्रीजयतितराम जवायव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटथरनेलमिलीसाहेवधर्माधिक- रणलिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितैतद् विवादविषय- निविटपत्र जातचापलोक्य विविय च यादृशबोधो जातस्तदनुसारेगोत्तरं लिख्यते । मभुसमर्पितपत्रान्तर्गतपट्विंशत्यकाङ्कितपूर्वलिखितैतद्धर्माधिकरणीय- जयपत्रानुसारेण केहरसिंहाजितसिंहयोविभक्तयोईयोः सोदरभ्रात्रोर्मध्ये केहर- सिहस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्रपतीपर्यन्तरहितस्य मृतस्य समस्तविभक्तस्थावरधनांशे सदुहितुर्शनकोडराख्याया उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे बाते सति, शानकोट- राग्ल्याया गिपिलादेशवलितशास्त्रानुसारेण पश्चिमदेशचलितथास्त्रानुसा- रेण चोपरिलिखितपैतृकसमुदायस्यावरघनांशस्य तदन्तर्गत किश्चिदनस्य वा तेलतव्यप व्यवस्था पत्र-संख्या-६० मृतलपुत्ररन्धसिंदपनी जयाकोमयख्यामुद्दिश्य दानकरणे क्षमता नास्ति,यतः शास्त्रे लिखितं पुत्रप्रपौत्रपर्यन्तरहितस्य मृतस्य विभक्तधने पल्या उत्तराधि- कारित्वेनाधिकारे जातेऽन्यदृष्टाय विना तदन्तर्गतकिञ्चिदनस्यापि दानानधि- कार। अत एव पत्नीतो जघन्याया दुहितुरर्थात् पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्प मृतस्य विभक्तधने प्रधानाधिकारिण्याः पल्या पदाधिकारिएया उत्तराधिकारित्वेन विभक्तपितृधनाधिकारे बातेऽप्यायं विना तदन्तर्गतकिश्चिदनस्य सुतरां दानाधिकारित्वेनोरिलिखितपैतृकसमुदायस्थायरधनाग्रस्य दानकरएक्षम- वाशः सुतरां दुरापास्तत्वाविवादासदीभूतधनस्य ज्ञानकोपराख्याया स्त्रीधनत्याभावाच । प्रश्ते तु ममुसमर्पितपत्रान्तर्गतोनचत्वारिंशदकाईव दानपणावशिष्टपनातेवावार्थदानानवगमात्, पैतृकसमुदायस्थायर- धनांशदानावगमाघ । एवोपरिलिखितमकारेण शानकोमरास्थाया उपरि- लिखितपैतृकसमस्तस्यावरधनांशस्य तदन्तर्गत विश्विद्धनस्य या दानकरण- क्षमतायामसयां, तस्या मरणोतरं सदनं धनिनः फेहरसिंहस्योत्तराधिका- रिणामेव भवति यतः शास्त्रानुसारेण पुत्रपौत्रप्रपीचरहितस्य मृतस्य विभक्तधने पल्या उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जातेऽपि तन्मरणोत्तर तदनं নবধিকাৰিব যথা সবর বা মানবিশ্বনব্য যুগবিথী- पर्यन्तरहितस्य मृतस्य विभक्तधने दुहितुरुत्तराधिकारित्वनाधिकारे जातेऽपि- तन्मरणोत्तर तदनं वलितुरुत्तराधिकारिणामेव भवति । प्रकृते तु मिधिल लादेशचलितशास्त्रानुसारेण प्रभुसमतिपत्रान्तर्गतवंशावलीपदफलिपितरप धनिमा केदसिंहस पितुः कृपासिंहस्य पितृपितामहपितामहादिसन्द- तौनां मध्ये यः कश्चित् फेहरसिंहस्यासप्रवरः सपिण्डो शानकोमरास्वाया मरणोत्तरं स्थापनि स एवाधिकारी भविधत, यतो शानकोमराख्याया- पितुनिनः येहरसिंहस्योत्तराधिकारित्वं प्रश्नपत्रलि खतानाम् , अर्थात হানাদাযা মুসষিস্থত্ব থাকবে হই মহল” कन्याया उमेदको मयख्याया एवं तदेवीयकन्याया देयमूर्तिकामाख्यायाः पुत्रयोरदेिवदर्माधिकरणमत्यविनाय, एतद्भिनानामरिलिखितवंशा धतीयटकल खिवाना मध्ये पस्यचिदी मिथिलादेशचणितशास्त्रानुसारेण न भवति, यतो मिथिलादेशचलितशासानुसारेण धनाधिकारिजलाया व्यवस्था-पत्र-संख्या-६० १६५ मेतादृशानां पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य सम्बन्धिनामुल्लेखाभावात् , पश्चिम: देशचलितशास्त्रानुसारेणोपरिलिखितवंशावलीपटलिखितस्तुतीसिंहाख्यो, यो धनिनः केहरसिंहस्य दौहित्रः, स यदि ज्ञानकोमराख्याया मरणोत्तरं स्था- स्यति तदा तस्याधिकारो भविष्यति, यतः प्रपत्र लिखितानामुपरिलिखिता- नामेवमुपरिलिखितवंशावलीपटलिखितानामन्येषां च पश्चिमदेशचलित शास्त्रानुसारेण ज्ञानकोमराख्यायाः पितुर्धनिनः केहरसिंहस्योत्तराधिकारित्वं न भवति, यतः पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसार्यपुत्रधनाधिकारिशृङ्खलाया. मेतादृशापुत्रसम्बन्धिनामुल्लेखाभायात्-इति मिथिलादेशचलितविवाद- चिन्तामणिविवादरत्नाकरविवादचन्द्रादिग्रन्थानुणरिणी पश्चिमदेशचलित मिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमाधवव्यवहारमयूग्यव्यवहारकोस्तुभादिग्रन्यानु- सारिणी च व्यवस्था। यत्र प्रमाणम्- मारते (१३।४५।१२):- स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः । नापहारं खियः कुर्यः पतिपित्तात् कथञ्चन । अपहारमैच्छिकदानविक्रयादिकम् इति विवादचिन्तामणि पृ० २३८) "लिखनम् ॥१॥ यथेष्टविनियोगार्थ तु कन्यायाः पितृधनग्रहणं दुरापास्तमेव-इति वीरमिनोदय (पृ. ६५६ ) ग्रन्थलिखनम् ॥ २ ॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । मुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा उद्धमाप्नुयुः ॥ इति विवादरनाकरवीरमित्रोदयादिप्रन्यवृतकात्यायनवचनम् ( कारमृ० ६२१) ॥३॥ स्वपुत्रस्तदभावे पोत्रस्तदमावे साध्वी भार्या तदभाये दुहिता तदभावे माता तदभावे पिता तदभावे भ्राता तदभावे तत्पुत्रस्तदभाचे आसन्न- १. स्त्रोणातु पतिवायायमुपभोगफल स्मृतम्-महाभा ।

व्यवस्था पत्र संख्या-६०-६१ सपिण्डस्तभावे यथाक्रमं व्यवहितसपिण्ड:-इत्यादि विवादचिन्तामणि (पृ. २४३ )ग्रन्थलिखनम् ।। ४ ।। दुहित्रभावे दौहित्रो धनभाग्-इति मिताक्षरा( पृ० २२१ ) प्रन्य- लिखनञ्चेति ॥ ५॥ दुहित्रभावे दौहित्रः-इति वीरमित्रोदयग्रन्थलिखनश्चेति ॥६॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन . . सोयाल- ६१-यदि कोन प्रहस्तेर कन्याके ताहार पिता माता मूल्यादि ना लइया काहारो नफरेर सझे वियाह देय, एवं विवाह देओया कालिन ऐ फन्यार पिता-माता ऐ कन्याके दासि फरिया देयोयार कोनो लिखित पडित अथवा अङ्गिकार ना करे, तवे सेइ कन्या श्रोताहार गर्भजात सन्तानसकल यथाशास्त्र दासि ओ नफर हइते पारे कि ना १ एवं कोन शास्त्रानुसारे एविपयेर निषेध कि विधिर व्यवस्था हय सेइ व्ययस्थार श्लोक ओ मापाते विवरण अवगत होया आवश्यक' इति । प्रमुसमर्पितमभपत्रमवलोक्य याशियोधो पातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते । पत्र पस्यचिद् गृहस्थस्य फन्याया विवाहस्तमित्र मात्रा या मूल्यादिक- मराहीत्वा कस्यचिमफरशन्दवाच्येनार्थादासेन सह कारितः, एवं विवाद 'समये तस्याः पित्रा माया पा दासीत्वेन दानस्य किञ्चिल्लिखितादिकमथवा स्वीकरण न कृत स्याचा यदि प्रश्नपत्रलिखितगृहस्पशन्दी पाभ्यः!) कस्यचिद् दासो(न)भयति, सतन्यापि कौमारावस्था कस्यचिद् दासीन थिता सदा, यदि या प्रमपत्रलिखितगृहस्थरान्देन (वाच्यः) सचिहासो १माविस्वक-यप.1 २.शम्देन कश्यायप।

व्यवस्था-पन्न संख्या-६१ १६७ भवति, वलन्यापि कौमारावस्थायां कस्यचिदासी स्थिता, कस्यचिद्दासेन यह विवाहे तस्याः स्वामिनो यद्यनुमतिस्तदा च सा परिणेतृदासेश्वरस्य दासी भवितु शक्रोति । एवञ्च सत्येतसक्षद्वये तस्या गर्भजाताः सन्ताना अपि तत्परिणेतृदासेश्वरस्य दास्यो दासाश्च भवितुं शक्नुवन्ति, उपरिलिखित- प्रकारेण तस्या दासीत्वेन तद्गर्भजातसन्तानानामपि शास्त्रोक्तपञ्चदश दासान्तःपातिगृहजातात्मकायमदासत्वात् । यदि च सा कन्या कोमारा- वस्थायां कस्यचिद्दाखी स्थिता किन्तु कस्यचिद्दासेन सह विवाहे तस्याः स्वा- मिनो नानुमतिस्तदा च सा कन्या परिणेतृदासेश्वरस्य दासी भवितुन शक्रोति, किन्तु पूर्वस्वामिन एव दासी भवति; एवं सत्येतसक्षे गर्भ जाताः सन्ताना नपि एकस्य दासोत्पन्नत्वेन द्वितीयस्य दास्युत्पनत्वेन च द्वाभ्यामेव स्वामिभ्यां विभज्य तन्या भवन्ति इति वनदेशचलित- विवादमगार्णवक्रमसंग्रहादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- अन प्रमाणम्- दासेनोढा त्वदासी या सापि दासीत्वमाप्नुयात् । यस्माद् मर्त्ता प्रभुस्तस्याः स्याम्यधीनः प्रभुर्यतः॥ इतिविवादमङ्गार्णव (१ विया पृ० ५३५ क )(दाय)क्रमसंग्रहादि. (दायक पृ० ५४ )अन्यधृतकात्यायनवचनम् ( कास्मृ० ७२५ ) ।। सा च द्विविधा । कस्यापि न दासी, अन्यदासी च । तत्र पूर्वा दासोदात्वमाप्रेणेव दासेश्वरस्य दासी, परा च तत्प्रमोरनुमतिसहकारेण अनुमता च न दासी-इति क्रमसंग्रहग्रन्थलिखनम् (पृ० ५४)।२। गृहजातस्तथा क्रीतो लन्धो दायादुपागतः। अना कालभृतस्तदाहितः स्वामिना च यः॥ मोक्षितो महतश्वर्णाद् युद्ध प्राप्तः परो जितः । तवाहमित्युपगतः प्रव्रज्या वसितः कृतः॥ १ तस्यान्दास २ ०प्रमज्यापस्त-नामसंक। ३ भरानादिभासददाश्तः सामिना न यः। अयाच मोसितोऽनल्या युद्धमासः पणे जित:-नामप्त।

१६८ व्यवस्था पत्र संख्या-६१-६२ मलदास व विज्ञेयस्तथैर वडयाभूतः। विकता चात्मनः शास्त्रे दासाः पचदश स्मृताः। इतिविवादभवार्णव (१ विवा. ५१६ क) दायक्रमसंप्रदादि (दाकर्म- पृ० ५२) ग्रन्थधृतनारदवचनम् (नाम -४०६६ ) ॥३!! ॥ •॥ एवञ्च यद्ययननुमत्या दासेन दासी परिणीता तदा च स्वखस्सा- मिनोरेव दासदास्यो, तयोरपत्यन्तु दाभ्यामेव स्वामिभ्यां विभजनीयम् इति (दाय क्रमसंग्रहमालखनति (पृ. ५५)"}}}| श्रीर्जयतितराम श्रीवैद्यनाथमिण ६२-सदर देोयानि आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत पालक सुन्दर रास साहेवेर हजुर हइते अप्राप्त-व्यवहार राजा राशीभूपणदेवरायेर पक्षे अशी ? कमलाकान्तयति अपिलाएट गुरुगोविन्दचौधुरि रप्पाडरटेर मकदमाय गरेजी १८२८ सालेर १३ माह सेतम्बर मतावक वागला १२३५ शालेर ३० माह भाद्र रोज शनिपारेर होया रोवकारिर लिखित ऐ भादालतेर पण्डित- गणेर नामे आएन्दा मिसिले जवाब दाखिल करणेर हुकुमे सोयान- सभोयाल- कागज-सकलेर द्वाराय पष्ट पारे ये परदेश निरासि राम शहरराय नामिक एक व्यक्ति आपन जमिदारिर मध्ये एक प्राम आपन मावा राजराजेश्वरीर भरण ओ पोपणेर परिवर्त याहा नगद निर्दिष्ट दिल आपन माताके एइ प्रकार प्रो एइ नियमे सरोपई फरिल ये ऐ भामेर विमाय फयाला कृष्णप्रसादनन्दो एक प्रमत्यारा नाम २ समत्या--दामा।

व्यवस्था-पत्र संख्या-६२ व्यक्तीर विनामे लिखिया अन्य कोन व्यक्ति ताहा विक्रय प्रो. हेवा ना करणा, श्री ऐ राजराजेश्वरि श्रापन जीयद्दशा पर्यन्त नाहार उपस्वत्वे भोगवान थाकन, यो ऐ मुसम्मातेर मृत्युर पर ऐ ग्राम ऐ रामसङ्करंर पुनेर होन सम्वलित श्रापन मातार स्थान दइते एक किता एकरारनामा, श्री कृष्णप्रसादनन्दि फरजि न्यक्ति इइते ऐ मुसम्मातेर लिखिया देशोया एकरारनामार मजमुन मदो द्वितीय एक किता एकरारनामा लिखाइया लइल । तत् परे यखन सरकारेर वाकी खाजानार जन्ये समुदय महालेर, याहा ऐ रामशङ्करगय श्रो ताहार पुत्र मोहनचन्द्रर नामे कालेकटरिर सिरस्ताते लेखाजाय, निलामेर इस्तहार कालेकटरि सिरस्ता हइते लटके, तखन ऐ राजराजेश्वरि ऐ रामशङ्करेर अभिप्राय यो फरजि व्यक्ति कृष्णप्रसादेर सम्मतिते ये ग्राम ऐ गमशकर आपन माता मुसम्मात राजराजेश्वरिके नगद ग्रास अच्छादनेर परिवः दियाच्छिल द्वितीय एक व्यक्तिर हस्ते सम्यक प्रकारे विकय करिल । ओ ऐ कृष्णप्रसादनन्दिर नाम हइते कवाला लेखा गेल । अतएव जिज्ञासा करा याइतेछे ये ऐ रामशरेर पुन मोहनचन्द्र प्राप्त व्यवहार थाकने, ओ द्वितीय विकार सम्बन्ध ताहार अनुमति ना थाकने, श्रो ऐ मोहनचन्द्रेर अप्राप्त व्यवहार ऐ द्वितीय विकिर सम्बन्धे उहार अनुमति थाकने, फरजी व्यक्ती कृष्णप्रसादनन्दिर लिखिया देोया द्वितीय विक्रयपत्र, याहा रामशङ्कर श्रो ताहार माता मुसम्मात राजराजेश्वरिर अभिप्राय मते हइयाछे, वङ्गदेश चलित शास्त्रानुसारे सिद्धि यो सङ्गत बंटे कि ना इति । एतद्धम्माधिकरण द्वितीयाधिपतिश्रीयुतमालकनन्दरराससाहेवधर्माधि- करणलिखितप्रश्नमतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते- प्रभपरलिखितमकारकरामराङ्कररायककखस्यत्वासदीभूतसराजकर- स्थायरान्तर्गतैकग्रामसम्बन्धिप्राथमिकछल विक्रयस्यात् स्वमा रामराजे.

१७० व्यवस्था पत्र संख्या-६२ श्वर्य यावज्जीवं तमामोत्पन्नोपस्वत्वभोगायं तमामसमर्पणस्य प्रश्नपत्र- लिखितप्रकारकाभ्यां राजराजेश्वरीलिखितसंवित्पत्रकृष्णप्रसादनन्दिनामक- व्यक्तयन्तरलिसितसंवित्रत्राभ्यां राजराजेश्वा यावजीव तद्मामोत्पन्नोप- स्वस्वभौगोपयुक्तमानस्यत्योत्पादकत्वपर्यवसायित्वेन तद्ग्रामसम्बन्धिन्यां भूमो रामशहररायस्य स्वत्वाविनाशकत्वात्, प्रश्नपत्रलिखितप्रकारेण राजरा- जेश्वर्य तामसमर्पणेन रामशङ्कररायस्य तद्भूमौ स्वत्वविनाशकयोर्वास्तवं दानविक्रययोरनयगमाच, एवञ्च सति पितृस्वत्वे विद्यमाने युनस्यत्वाभार- चोधकयङ्गदेशचलितशास्त्रेण प्रश्नपत्रलिखितप्रकारेण तद्ग्रामसम्बन्धिन्यां भूमौ मोहनचन्द्रस्य पित् रामशङ्कररायस्य स्वत्वे विद्यमाने मोहनचन्द्ररय स्वत्वोत्पत्तिर्न मवति । नहि राजराजेश्वरीलिखितसंवित्पत्रेण राजराजेश्वरी- मरणोचरं मोहनचन्द्रस्य स्वत्वं रामशङ्करस्य स्वत्यविनाशो वा तमामे तद्- ग्रामोत्पन्नोपस्वत्वे वा भवति । उपरिलिखितप्रकारेण राजराजेश्वर्या यापञ्जीव तमामोत्पन्नोपस्वत्वमात्रस्वामित्वेन तद्ग्रामस्वामित्वाभायात् स्वमरणोत्तर तमामोत्पन्नोपस्वत्यास्वामित्वात् राजराजेश्वरीलिखितैवाहशसंवित्पत्रस्य धर्म- शास्त्रोक्तस्वत्वोत्पादकहेत्वनन्तःपातित्वाच। एयञ्च सति बीवन्त्यां गजरा जेश्वर्या रामशङ्करराये च जीवति सति सर्वथैव तमामस्य तमामोत्पझोप: स्वत्वस्य चास्वामिनो मोहनचन्द्रस्य तद्मामसम्बन्धिद्वितीयविक्रये अनुम तेरनावश्यकत्वेन तस्यमाप्तव्यवहारतायां तदनुमतायसत्याममासव्यवहारवायां च तदनुमती सत्यामपि द्वितीयविक्रयस्य तद्ग्रामसम्बन्धिभूस्वामिरामशङ्कर- गयाभिप्रायेण कृष्णप्रसादनन्दिनामव्यक्त्त्यन्तयनुमत्या चोपरि लिखितप्र- कारेण यावज्जीवं तमामोत्पन्नोपस्वत्वस्यामिराजराजेश्वरीकृतत्वेनैवं यदा राजमाकरग्रहणाध समुदायस्य सराजकरस्थावरस्य यत्तद्रामशंकररायतत्पु त्रमोहनचन्द्रयो ना केलटरीमशकराजस्थाने लिखित तस्य निलामसंशक विक्रयाशा तस्थानाधिपतिना दत्ता,तदा उपरिलिखितप्रकारेण जातत्वेन च सिद्धनिष्पत्यूहल्येन तत्प्रमाणभूत कृष्णप्रसादनन्दिनामकव्यक्त्यन्टरनाम्ना लिखितं द्वितीयविक्रयपत्रं यत्तद्राराजेश्वरीरामशरोमयसम्मत्या जातं शा. नानुसारेण सिद्ध सङ्गतच भति, यतः स्वामिसम्मत्या स्वामिहतोऽपि विक्रयः शास्त्रासिक-दति बगदेशचलितमनुकुल्लूकभाकृतमन्वर्थमुक्तावली- व्यवस्था पत्र-संख्या-६२ १७१ दायमागदायतत्यविवादभड्डाणंवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- योगाधमनविक्रीत योगदानप्रतिग्रहम् । यत्र वाप्युपछि पश्येत्तात्सवं विनिवर्तयेत् ।। इति मनुवचनम्(८,१६५)॥१॥ योगशब्दश्चलयाची । चलेन ये बन्धकविझयदानप्रतिग्रहाः क्रियन्ते म तखतो, अन्यत्रापि निःक्षेपादो यत्र छम जानीयात्,पस्तुतो निक्षेपादि न कृतं तत्सर्च निवर्तते । इति मन्वर्थमुक्तावल्या (पृ. ३०३ ) कुल्लूक- भव्याख्यानम् ॥२॥ पित!परते पुत्रा विभजेयुर्धनं पितुः । अस्वाम्यं हि भवेदेषां निर्दोपे पितरि स्थिते ॥ इति दायभाग( पृ० १३)दायतत्व(पृ. ३)विवादमार्णवादि( २ विवा० ५ क )मन्थघृतदेवलवचनम् ।। ३ ।। सप्त वित्तागमा धा दायो लाभः भयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ इति मनुववचनम् (१०,११६ )॥४॥ स्वभागान् यदि दास्ते विक्रीपीयुरथापि वा । कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्चमीशास्ते स्वघनस्य वै ॥ इति दायमागादि(पृ. ३५ प्रन्यधृतनारद ( १३१४२-४३)वच. नम् ॥५॥ तथा च स्वामिनोऽनुमतिसत्त्वे तु अस्वामितविक्रयोऽपि सिद्ध्यति व्यवहारोऽपि तथा-इति विवादभन्नार्णव(१ विवा०३०३ ख)लिखनश्चेति ॥६॥०॥०॥०॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन

व्यवस्था-पत्र संख्या-६३
साएन
६३-रोवकारि मिसिल प्रादालत देोयानी सदर तारिख
२० माह माइ सन १८२० इ० मोतावक ८ माह ज्येष्ठ सन १२३५
वाला रोज मङ्गलबार एइ आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत
पालक मुन्दर रास साहेवेर बैठके-
रत्नसिंह
साएल हाजिर श्रासिल । साएतेर सोयाल एक भाना
छय दाम र कौडी नो चुडिर। मफईमा ताहार त्रिगुण
उपस्वत्व मयलग १३२०॥४ उनिप दामा तिन कौडीर तायदादे
खास आपिल मजुर करणेर विपय एलाके आजिमायादेर
प्रबिनसन फोटेर हाकिमगणैर नामे हुकुम सादर होरेर प्रार्थनाय
मसम्मात धुषु ओ फयसिंह श्रो नियधारिसिंह को घोकलसिंह
“ो कानायासिंहेर पर प्रापन नामिक मोक्तारनामा श्री एइ
सनेर फेरवोरि माहेर ६ तारिखेर लिखित अजिमावादेर
आपील आदालतेर एक फीता रोयकारिर नकल ओ ई १८२२.
शालेर डिसम्बर मासेर १६ तारिखैर लिखित जेला वेहारेर
रेजष्टर साहेवेर डिगरिर नकल एक केता भो ई० १८२५ शालेर
माइ मासेर ११ सारिखेर लिखित ऐ जिलार जज साहेवेर
डिगरिर नकल सहित ये गत दिवस हुजुरे दाखिल हइयाछिल
अद्य दृष्टे आसिल । यथा शाएलेर सोपालेर सम्बन्धे चूडान्त
हुकुम सादर होनेर पूर्व ए आदालतेर पण्डितदिगेर उपर
सोयाल फरा उचित वोध हइल, श्रतएव हुकुम हइल ये एइ
रोयकारिर नकल ए बादालतेर पण्डितगणक एइ हुकुमे अर्पन
करा जाय ये निचेर लिखित सोयालेर जवाव एक सप्ताह मध्ये
दासिल करेन।
सोयालयद्यपि जिले वेहार निवासिनी हिन्दु एक
बी श्राहालत हइते मापन पतिर हिस्या वापत एक पाना
छय दाम तेर कोडी नमो बुडी जमिदारिर गिरि हासिल

व्यवस्था पत्र संख्या-६३ १७३ फरिया ऐ रकमेर भूमि सकल स्वतन्त्र करिया लश्रोनेर ओ ऐ हिगरि मते ताहार उपर दखित होनेर अनुमति डिगरिते लिखा थाकनेश्रो आपन हिस्यार भूमि सफल पृथक करिया ना लइया. हिस्यार सदी मते ताहार उपस्वत्व लइया पुत्र सन्तान ना राखिया मरे, एवं ऐ मृत स्त्रीर कन्या ओ कन्यार पुत्रगण पापनादिगके ऐ हिस्यार स्वत्वाधिकार ओ एवं ऐ स्त्रीर पतिर भ्रातार सन्तानरा ऐ हिस्या श्रावश्यक थाकन एजहारे ऐ मृत स्त्रीर कन्या श्रो कन्यार पुत्रगणेर स्वत्वेर अस्वीकारे आपनादिग्के ऐ रकमेर स्वत्वाधिकार करार देय-एमत अपस्थाय डिगरि होया रकम वएटक किम्बा श्रवण्टक बोध हवेक, ओ ऐ मृत खीर कन्या यो दौहित्रगणके अथवा ताहार पतिर भ्रातार सन्तान- गएके ठार्पिक इति । श्री यतितराम् जयाचव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतनालकसुन्दरराससाहेवधर्माधि- करणलिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य याहशबोधो जातस्त. दनुसारेणोत्तर लिख्यते । प्रभुकृतप्रभपनलिखितवृत्तान्ते यदि तत्प्रभुपनलिखिताया: स्त्रिया जीवतः पत्युरंशो विभक्तो बातः स्यात्तन्मरणानन्तरं तस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहित- स्वेन ससतिनातृपुत्रादिभिर्बलात्कारेण विभस्तं तत्पत्यशं गृहीत्वा समुदायध- नमस्माकं साधारणगेव, नात्र विभागो जातः, अतएवेयं पत्यंशयोग्यं प्राप्तुं नाईतीत्युक्त्वा तस्यै विभक्तः पत्यशो न दत्तश्चेत्तदा यदि सा धर्माधिकरणे निवेदनं कृत्वा स्वपत्युर्विभवांशस्य जयपत्र प्राप्तवती, तजयपत्रलिखित- धनस्य पृथक्कृत्य' ग्रहणस्यान्ते सति तजयपत्रे लिखिते सत्यपि सा पृथक्- १. अन ये-ज्यप। २. प्राप्त नईनीन्युना त स वि०-व्यप० । ३. पृथक-व्यप०। ४. ग्रहणस्यान्तमतो तज्जयपत्रे लिखिताया अत्यामपि व्यप० ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-६३ कृत्य तद्गृहीत्वा तदुपयुक्तोपस्वत्वं गृहीत्वा च मृताचेत् वयापि तजयपत्र- लिखितघनं विभक्कमेवावगम्यते । एवं मृतायास्तस्याः स्त्रिया दुहितुस्त. दभावे दौहित्राणां तत्राधिकारस्तस्याः पत्युत्पुत्रादीनां नाधिकारः । यदि च तस्याः स्त्रिया बीवतः पत्युरंशो विभको न बातश्चेचदा प्रभुक्त प्रश्नपत्र लखितप्रकारेण तया अविभक्तधने पतियोग्यांशस्थावरोत्पन्नोपस्व त्वग्रहणेऽपि तजयपत्रलिखितधनमविभक्तमेवावगम्यते । एततक्षे तदने तस्याः पतिभ्रातृपुत्रादीनामधिकारः, न तु तदुहितृणाम् , तदभावे दौहि- प्राणां वा-इति वेहाराख्यप्रदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमा- धवव्यवहारमयूखव्यवहारकौस्तुभमिताक्षराटीकासुबोधिनीव्यवहाराध्यायशाल म्भकृतमिताक्षराटोकादिग्रन्यानुसारिणो व्यवस्था । पत्र प्रमाणम्- विभागो नाम द्रव्यसमुदायविषयाणामकस्वाम्यानां तदेकदेशेष विपयतया व्य स्थापनम् इति मिताक्षरा (पृ० १६७) अत्यलिसनम् ।।१।। विभागशब्दस्त्वनेकस्खाम्यानो द्रव्यसमुदायविषयाणां तत्तदेकदेशेव्य. वस्थापने शक्त:-इति वीरमित्रोदय (पृ० ५२२) अन्यलिखनम् ॥२॥ पल्यभावे दुहितरोऽपुनविभक्ता संसृष्टिधनमाजः (विमि पृ० ५५६)। दुहितुरभावे दौहित्रः-इति वीरमित्रोदयग्रन्थलिखनम् (० ६६१)॥३॥ एवं दौहित्रमातृमुतसमवाये मृतस्य विभक्तले दौहित्रस्य बलवत्व स्यशाहरणे सोऽपि पिएडादी स एव बलवान् । अविभक्तले (तु) तद्- प्रातृसुतानामेवांशहरत्वादपि-इति व्यवहाराघ्यायस्य मिताक्षराटीकायां चालम्म (पृ०८२०) लिखनञ्चेति ॥४॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण श्रीरामवनुशर्मविधावागीशेन श्रीहरिः शरणम् २.०सस विमव:--म्यप। १.दयप०1 - व्यवस्था पत्र-संख्या-६४ . ६४-रोवकारि मिसिल आदालत दिमानि सदर तारीख ७ माह आगष्ट सन १८२८ अगरेजी मतावक १४ माह श्रावण सन १२३(१) वाङ्गला रोज बृहसतिवार ओइ आदालतेर द्वितीय हाकिम श्रीयुत पालक सुन्दर रास साहेवेर वैठके- गङ्गाधरवाचस्पति साएल साएलेर उकील मुनसी फकिर महम्मद हाजिर बाइलो। साएलेर हस्त हइते फतेहपुर परगणार मोजे आमरसिर बन्धक खालास विपये वारानसेर कोर्ट प्रापीलेर हाकिमानेर हुकुमेर असम्मतिते ओ ताहार वन्धक होनेर विपये एइ' आदालत हइते उचित हुकुम सादर होनेर प्रार्थनाय अन्य हेतु सम्बलित सइलेर सोयाल अोइ उकिलेर नामिक उकालतनामा यो एइ' सनेर आपरेल मासेर - तारिखेर लिखित वारानशेर आपील आदालतेर रोवकारीर नकल ओ इ.१८ ( ? ) सालेर पागष्ट मासेर तारिखेर लिखित जिला फतेपुरेर आदालतेर एक- किता रोधकारिर नकल सम्वलित याहा' एइ मासेर २ तारिखे दाखिल हझ्याछिल, अद्य दृष्टे पासिल । यथा साइलेर सोयालेर सम्वन्धे हुकुम सादर होनेर पूर्व शास्त्रेर विवरण ज्ञात होन उचित चोध हइल, अतएव हुकुम हइल ये आदालतेर पण्डित- गण निचेर लिखित सोयालेर जवाव एक सप्ताह गध्ये दाक्षिल करेण । सोयाल यद्यपि वारानश देसेर कोन जमिदारि चारि सरीकेर मध्ये एकत्र ओ साधारणे थाके, प्रो जमिदारीर सरीकगण मध्ये दुइ जने आपन २ अवण्टक हिस्या काहारोनिकट वन्धक राखे, तवे पइ प्रकार वन्धक वारानस देसेर चलित शावानुसारे सिद्ध क्टे N १.रा-न्यर.1 २. मादा-व्यप-1 १७६ व्यवस्था पत्र संख्या-६४ . कि ना? थो ताहा सिद्धि होन विपये अन्य सरिकेर अनुमति श्रावश्यक कि ना इति। 4 एतद्धर्माधिकरणद्वितीयाधिपतिश्रीयुतयालकसुन्दरराससाहेवधम्माधि- करणलिखितविचारसत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य याहशबोषो जातस्त.' दनुसारेणोत्तर लिख्यते । यद्यपि वाराणसीप्रदेशीया काचित्सराजकरभूश्चतुमिशिनां मध्ये एकत्र साधारणे वर्तते । अथ च सराजकरभुवोऽशिना मध्ये द्वापविभत्तस्वस्यांश कस्यचिनिकटे बन्धकीकृत्य रक्षतः, तदैतादृशमन्धककरणमवशिष्टयोद्धयोर- शिनोरनुमति विना सिद्ध न भवनि । अतएव तत्सद्धया अरमन्तरानुमति रावश्यकी~इति वाराणसीप्रदेशचलितमिताक्षराधीरमित्रोदयादिनन्यानुः सारिणी व्यवस्था। अत्र प्रमाणम्- अविभक्तेषु द्रव्यस्य मध्यगत्वादेवस्थानीश्वरतात सर्माभ्यनुज्ञा अवश्यं कार्यो । विभक्तेषु तु ( उत्तरकालं विभक्कामिक्तसंशयन्यदा- सेन व्यवहारसोकाय सर्वाभ्युनज्ञा ने पुनरेकस्यानी घरलेन । अतो) विभक्तानुमतिव्यतिरेकेणापि व्यवहारः सिद्धयत्येवेति व्याख्येयः इति मिताक्षरा ( पृ २०० ) ग्रन्थलिखनम् ॥१॥1॥ ॥ ॥ एइ सपाल सोलही श्रगस्ति १६ रोज शनिवार प्रहर पाँच घाएटाके वखत मिला, बो एकमा २१ चयस्ति रोज दृहस्पतिवार चार घण्टा के व्यवस्था दाखिल किया सिरस्तामों। श्रीर्जयतितराम् श्रीहरि शरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन १. अनुमतिरस्पर १. सियन्नानुति-पा०) . व्यवस्था पत्र-संख्या-६५ . नं० २५५३ ६५-रोवकारि मिसिल श्रादालत देखोयानि सदर तारिख ११ माह श्रागस्त सन १८२८ इगरेजि मतावक २८ माह श्रावण शन १२३५ वाङ्गला रोज सोमवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरट थरनेल शेलि साहेवेर बैठके- जयरामधामि स्वयं भो मृत घखोरिधामिर स्त्री दिपुधामिनिर अप्राप्तव्यवहार पुत्र रामचन्द्र धामिर पक्षे अलि प्रकारे- आपिलाण्ट मुशनधामि रष्पाडएट स्वयं प्रापिलाण्ट योरप्पारण्टेर उकिल मोजयि गोलाम एज- दानि हाजिर श्रासिल । ए मकई ना इ १८२७ सालेर २५ आगस्त मासेर होगा रोक्कारिर लिखि। सात द्विनीय हाकिमेर हुकुम मते एइ मासेर सावेका तारखे रावकार हझ्या ओ जिलार आदालतेर दाखिल होया कागज सकल १ लम्बर हइते तथाकार फयशला श्री प्रवणसन कार्टर फागज सफल तथाकार फयशला ओ ए श्रादालतेर कागज़ सकल १ लम्बर इइते ३३ लम्वर तक पड़ागिया दिवा अवशान प्रयुक्त स्थकित छिलो, पुनराय श्रच उपस्थित हइया ए पादालतेर बाकि कागज सकल ई.८२७ शालेर २५ श्रागस्त मासर लिखित सावेक द्वितीय हाकिमेर राय सम्बलित दृष्ट्र आसिल । जानागेत ये जिला वेहारेर जज साहेव ऐ जिलार श्रादालतेर पण्डित हइते व्यवस्था लश्नोन परे प्रापिलाएटेर पूर्व पुरुस भोलाधामि ओरफे लछुमन धामि ो मृत वखोरिधामिर दापि डिकरि करेन । प्रवनसन कोर्टर हाकिमगण शास्त्रानुसारे भोलाधामि ओरफे लक्ष्मणधामिके मशम्मात नेवाजो मतोफिया पुष्यपुत्र करण ओ मशात मजकुरा वृत्ति रामशिला प्रभृति ऐ धामिके दान करणेर क्षमता ना थाकन ज्ञान करिया जेलार डिगरि रद करियाछेन। किन्तु १२ . यवस्था-पत्र संख्या-६५ तद्विवादप्रत्यापिनी नेवाजोनाम्नी दत्तोत्तरतात्पर्यायन च मननुमत्यमावस्य निश्चितत्वेनावगमात् । एवं तस्या नेवाजीनाम्न्या रामशिलावृत्तिप्रभृतिधनस्य तस्मै लक्ष्मणधामिप्रसिद्धभोलाघामिनाम्ने दानकरणक्षमतापिवास्तव नासीत् तत्पनजातान्तर्गतैतद्धर्माधिकरणार्थिनिवेदनपत्रेणवं कोटीपीलाख्यधर्माधि- करणीयजयपत्रेणाय च एतदर्माधिकरणीयपश्चविंशत्यकाङ्कितैतद्धम्माधि- करणप्रत्यधिनिवेदनपत्रेण च विवादास्पदीभूतस्य रामशिलावृत्तिप्रभृति- धनस्य तस्या नेवाजोनाम्न्याः पतिघनत्वेनायगमाद् अथ च तत्पन- शातान्तर्गततद्धम्माधिकरणीयचतुरङ्काङ्कितमाधवरामनामकाथिसम्बन्धिविवा- दनिविष्टनेवाजोनाम्रीप्रत्यर्थिनीदत्तोत्तरपत्रेणवं कोटीपीलाख्यधम्माधिकरणीव- पञ्चविंशत्यङ्काद्वितनद्धर्माधिकरणप्रत्यर्थिनिवेदनपत्रेण च विवादास्पदीभूत- रामशिलावृत्तिप्रभृतिधनस्य तस्या नेवाजीनाम्याः पत्युः क्रमागतत्वेनाव- गमाच । यतस्तदुपरिलिखितप्रकारकपशिधनस्योत्तराधिकारित्वेन पनीसंक्रान्त- स्वेप्यष्टार्थ विना तदन्तर्गतकिश्चिद्धनस्यापि पत्न्या दानानधिकारः । प्रकृते तु तत्पनजातान्तर्गतजिलाल्यधर्माधिकरणीयचतुर्विंशत्यवाङ्कितलक्ष्मण · यामिप्रसिद्धभोलाधामिनामकोद्देश्यकदानपत्रेण विवादास्पदीभूतधनस्याहटा थंकदानानवगमाद् परं विवादास्पदीभूतोपरिलिखितप्रकारकसमस्तपतिधनस्य स्वेच्छया स्वाभिप्रायेण च नेवाजीनाम्नीकत कदानावगमाच इति वेदारा ख्यप्रदेशचलितदत्तकमीमांसादत्तकचन्द्रिकादत्तकदीधितिमिताक्षरावीरमित्रो - दयादिमन्यानुसारिणी व्यवस्था-- अन प्रमाणम्- न स्त्री पुत्रं दद्यात प्रनिगृहीयावा अन्यत्रानुज्ञानाद्भर्तुः इति दत्तक- मीमांसा(पृ०७ दत्तकचन्द्रिका पृ० ३) दत्तकदीधितिप्रभृतिग्रन्यधृतवशि- प्रवचनम् ॥ १॥ अपुत्रा रायनं मर्तु : पाजयन्ती गुरी स्थिता । । मुजीतामरणान् क्षान्ता दायादा उर्जमाप्नुयुः ।। .. । १. 'धाग०-च.11 २. मार-स।

१८० व्यवस्था पत्र-संख्या-६५-६६ - इति वीरमित्रोदयादि वीमि० स . ६२७)अन्यधृतकात्यायन(कास्मू. ६२)वचनम् ॥ २॥ स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः। नापहारं खियः कुर्युः पतिवित्ता कयधन ।। इति वीरमित्रोदयादि(योमि खपृ० ६२८ अन्यधृतभारत(१३।४७।२४) वचनश्चेति ॥ ३॥ || 0 110॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिःशरणम् श्रीवैधनापमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन नं०२६८४ ६६-रोधकारि मिसिल प्रादालत देओयानी सदर वारिख १६ माह पागस्त सन २-ई मतारक माह ५भाद्र सन १२३४ वाङ्गला राज मङ्गलवार ऐ श्रादालतेर पञ्चम हाकिम श्रीयुत राव. रट हालडन राटार साहेवेर वैठके। राजा गिरीशचन्द्रराय आपिलाण्ट मृत राजा ईशानचन्द्रदेवरायेर अप्रामव्यवहार पुत्रगण रान कोदर नरहरिचन्ददेवराय प्रभृतिर छिराजा उमेशचन्द्रराय-- रपादण्ट- आपिलाएटेर एफिल मुनसि गोलाम मण्डल, रप्पाडण्टर उकिल सदामुक पण्डित हाजिर थासिल । पद मकईमा फल्य रोक्कार हझ्या प्रविशन कोटेर कागजसकल १ लम्बर हइते तथाकार फयशला पर्यन्त श्रोए श्रादालर दाखिल होया १, कीया पतिदायापापमोगफत स्वम्-~भार। १. सातवृणर-401 च्यवस्था-पत्र-संख्या-६६ श्रारसि' मजुयात पडागिया दिवा अवशान प्रयुक्त स्थकित स्थिल । पुनराय अद्य उपस्थित हइया ए आदालते दाखिल हइया जवाव दृष्टे आसिल । देशेर सर्वकालेर डाँडा पाछे ये हिन्दु जाति ये पितार मृत्युर परे ताहार धन ओ वस्तु उत्तराधिकारिंगणेर मध्ये वएटक हय । किन्तु ताहार वहिर्भूत उभयेर पूर्व पुरुप मृत राजा कृष्णचन्द्रराय आपन जीवद्दशाय कोटेर नथिते दाखिल होया हेवानामाय आपन समुदाय वस्तु अन्य पुत्रगणैर नैराशे अापिला- एटेर पितामह ज्येष्ठ पुत्र राजा शिवचन्द्ररायके लिखिया दियाछे। ग्यद्यपि ऐ राजा हइते देशेर ओ नियमेर डाँडार यहिभूत हइयाछे, तथा' च राजार दानकारण श्रो हेवानामा लिखिया देओनेर क्षमता ताहाके छिल । किन्तु यथा ऐ हेवानामाते लेखा गियाछे ये कोडर शम्भुचन्द्र देवरायेर अधिक पुष्य शालियाना मवलग १५००० हाजार टाका ओ कोङर महेशचन्द्रदेवरायेर शालियाना मवलग १०००० हाजार टाकाओ कोडर नरहरिचन्द्रदेवराय अप्राप्त- व्यवहार प्रभृतिर पिता कोडर ईशानचन्द्रदेवरायेर शालिबाना मवलग १०००० हाजार टाका ओ मृत भैरवचन्द्रदेवरायेर पुष्यपुत्र माधवचन्द्र देवराये)र २५०० आडाइ हाजार टाकाओ मृत कोडर हरचन्द्रदेवरायेर पोप्यपुत्र यज्ञचन्द्ररायेर शालिबाना मवलग २५०० प्राडाइ हाजार टाका मशहरा देयाइया पाइवेन इति, ओ हेवानामार मजमुनेर द्वाराय राजार आकांक्षा स्पष्ट बोध हइतेछेना ये मशहरा पाउयागणेर मृत्युर पर ताहादिगेर उत्तराधिकारिगण मशहरी देइया पाश्चेन, किम्या वन्ध हइवेको श्रो श्रामार युद्धे आइसे ये अन्य पुत्रगणैर जन्ये येसकल गशहरा नियुक्त राखि- याछे ताहा फलितार्थे जामिदारिप्रभृतिर अंशेर बदले ये ताहारो श्रोहार स्यत्वाधिकार छिल, हइयाछे । श्रो ऐ हेतुते ऐ मशहरा .१. पारजि-दति साधीयान् पाठः। ३. देवराय-ज्यप० । ५. रागिया रे-व्यप। २. तत्राच-व्यप० । ४. यावन्द्रराय शलि०-या। ६.जमिदारिरिप्रभू०-ध्यप० ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-६६. प)इया गणेर उत्तराधिकारिंगणसकल आपन आपन पूर्व पुरुप- गणेर सत्वे नियुक्त होया मशहरा, याहा उदादिगेर पूर्व पुरुष- गयेर जमिदारि प्रभृविर हिस्यार वदले घटे, पात्रोनेर बलवान स्वत्वाधिकारि बोध हय । किन्तु ऐ हेवानामाय मशहरार विस्ता- रित लेखाना थाकन सन्देह प्रयुक्त ये ऐ मशहरासकल ताहा पाइ- यागणेर जीवदशा पर्यन्त वहाल थाकिवेक, किम्वा ताहारदिगेर मृत्युर पर श्रोहादिगेर उत्तराधिकारिगणकेश्रोअर्शिवेकाऐ विपयेर उचित हुकुम सादर होया अनुचित । अतएव चूडान्त हुकुम सादर होनेर पूर्व सन्देह छेदनार्थे एइ आदालतेर पण्डिनगण हइते एइ विषय जिज्ञासा करण उचित हइल ये यद्यपि मृत राजा कृष्णचन्दरायेर अन्य पुत्रगण पितृ-जमिदारिर प्रभृति मालामालेर अंश हइते नैराश हइवेन, ओजमिदारिप्रभृतिर अंशेर वदले उहार दिगेर जन्ये मशाहेरा नियुक्त हइल, ए प्रयुक्त मशाहेरा पाओइया गणेर जीवद्दशा तक, किम्वा ताहारदिगेर मृत्युर परे उहादिगेर उत्तराधिकारीगणकेश्रो ऐसकल मशाहेरा अपन पण्डितगणेर विवेचनाय हय । उचित ये हेवानामार मजमुन सुन्दर प्रकार ज्ञात हइया ऐ विषयेर जवाव आएन्दा मङ्गलवारेर दश घण्टा पर्यन्त दाखिल करेन । श्रतएव हुकुम हइलो ये एइ रोवकारिर नकल हेवानामासहित पण्डितगणके अर्पन करा जाय ओ अद्य मकदमा स्थकित थाके इति । श्रीजयतितराम एतदर्माधिकरणपश्चमाधिपतिश्रीयुतरावहालबनराटरिमाहेवपाधि- करपलिखित विचारपत्रान्तर्गतप्रभाविरूपपत्रमवलोक्य वत्समस्तिदानपत्रा- मवगत्य च यादृशोभो जातस्तदनुसारेपोतरं लिख्यते- यद्यरि मृतस्य राम कृष्णचन्द्ररायत्यान्ये ये पुत्राः पैतृकराराजकरभू १.०सजकरयर।

व्यवस्था-पत्र संख्या-६६ १८३' प्रभृतिधनांशानिरस्ता': अय च सरामकरभूमभृतेरंशविनिमये तेषां प्रमुस- मर्पितविचारपत्रलिखितप्रकारेए वार्षिक नियुक्तम् । अतो यार्षिकग्राहिण मरणानन्तरं तेषामुत्तराधिकारिणामपि तत्समस्तवार्षिकसमर्पणमस्मद्विवेचने. सिद्धं भवति, यतः प्रभुसमर्पितदानपत्रेण मृतराजकृष्णचन्द्ररायकर्तृकराव. शिवचन्द्ररायोद्देश्यकस्वत्वास्पदीभूतसराजकरभूप्रभृतिघनदानावगमात् । तत्र यदि राजशिवचन्द्ररायमरणानन्तरं तदुत्तराधिकारिणांतदानाधीनराजशिव- चन्द्ररायस्वत्वास्पदीभूतसराजकरभूमभूतिघनाधिकारस्तदा तदानपत्रलिखि. तवार्षिकदानाधीनदानपत्रलिखितवार्षिकग्राहिस्वत्वास्पदीभूतयापिकवने तेषां मरणानन्तरं तदाधिकयाघुत्तराधिकारिणामप्यधिकारस्य शास्त्रसिद्धत्वाद, दानस्य उभयत्र तुल्यवाद् धार्षिकस्य तेषां सराजकरभूप्रभृतिधनांशविनिम- यत्वात् । यतस्तद्दानेन वापिकग्राहिणां स्वत्योत्पत्तिरत एव तदुत्तराधिकारियां सदार्षिकस्य दायत्वेन स्वत्वोत्पनिष्पत्यूहत्वात् । श्रथ च दानपत्रलिखित- प्रकारेण स्वपुत्रभैरवचन्द्रदेयत्य औरसपुत्रापेक्षपा जपन्यदत्तकपुत्रमाधष- चन्द्रदेवसंशकस्वपौत्रोद्देश्यकवार्षिकदागेन स्वपुत्रहरचन्द्रदेवस्य दत्तकपुत्र- यशचन्द्रदेवसंशकस्वपौत्रोद्देश्यकवार्षिकदानेन च एवं मया यो नियमः कृत- स्तस्योलघनं तैरेयं त्वया च कदाचिदपि न कर्त्तव्यम् ; यदि कश्चित् कदाचिदेतनियमस्यान्ययाचरणोद्युक्तस्तदा तदन्यथाचरणं लोकतो धर्मतच राजसन्निधो चामाधमितिदानपत्रलिखनेन च मृतस्य राराः कृष्णचन्द्ररायस्य तथाभिमायावगमाव-इति वद्गदेशालतमनुदायभागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्येति- -- पत्र प्रमाणम्- प्रदानं स्वाभ्यकारणम् इति मनुवचनम् । (२१५२ ) ॥१॥ सप्त विचागमा धा दायो लामः भयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ इति मनुवचनम् । (१०१११५) :१निरस:व्यप।

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व्यवस्था पत्र संख्या-६६-६७
ततश्च पूर्वस्वामिसम्बन्धाधीनं तत्स्वाम्योपरमे यत्र द्रव्ये खलं तत्र
निरूढो दायशब्दः-इति दायभाग(पृ० ५)ग्रन्यलिखनञ्चति ।
श्रीजयतितराम् श्रीहरिःशरणम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशमविद्यावागीशेन
लं० २५६०
-
.
६७-रोयकारि मिसिल श्रादालत देशोयानि सदर तारिख
२५. माह सेतम्बर सन १८२८ ई मतावक ११ माह आश्विन सन
१२३५ वागला रोज बृहस्पतिवार ऐ आदालतेर प्रथम हाकिम
श्रीयुत उलियम नसष्टर साहेवेर बैठके।
जयमणिदेव्या प्रभृति
आपिलाएटगण
फकिरचन्द्रचक्रवर्ति
रप्पाडएट
श्रापिलाएटगणेर उकिल मुनशी होसेन प्रालि ओरप्पाडण्टेर
उकिलगण मुनशी दादार वक्स ओ प्राणचन्द्र चट्टोपाध्याय हाजीर
आसिल । ए मकद्दमा एइ सनेर आगष्ट मासेर २६ तारीखे श्रामार
धैठके रोयकार हइया ए मकद्दामार खास श्रापिल मझुरिर हेतु
सम्वलित इं१८२३ सालेर नवम्बर मासेर ८ ओ ई १८२४ सालेर
जानओरि मासेर ७ तारिखेर लिखित ए आदालतेर रोपकारि.
..सकलेर दृष्टे योघ हइल ये ए मकद्दमा शास्त्रे सम्पर्क राखन ओ
साझेर हेतुसकल यथार्थ विवेचना ना होन दृष्टे ताहार आपित
मधुर हइयाछे। अतएव समुदय फागज दृष्ट होनेर पूर्व ऐ
श्रादालतेर पण्डितगण हइते निवेर सोयालसकलेर जवावे
व्यवस्था लोन उचित बोध हइया हुकूम हुइल ये एइ रोक्कारि
नकल ए आदालतेर पण्डितगपके समर्पण फरा जाय, ये ऐ
A.

" च्यवस्था पत्र-संख्या-६७ सोयालसकलेर जवाव वङ्गदेश चलित शास्त्रानुसारे एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण। प्रथम सोयाल । यद्यपि एक व्यक्ति पैतृक देवोत्तर भूमि- सकल ओ देवसेवार पालि राखिया आपन स्त्री ओ पुत्र श्रो पुत्रवधुर समक्षे मरे, ओ कथक दिवसान्तर मृत व्यक्तिर पुत्र यो माता श्री स्त्री राखिया निसन्तान मरे, तवे दुइ त्रिलोक अर्थात् सासुडि श्रो पुत्रवधुर मध्ये के ऐ त्यक्त धनेर स्वत्वाधिकारिणी हइवेक। द्वितीय सोयाल । यदि स्यात् मृत व्यक्तिर पुत्रेर मृत्युर पर सासुडि.ओ पुत्रवधु अनक्य प्रयुक्त ऐ सकल देवोत्तर भूमि सेवार पालि हिस्या करिया लइया ताहार नादावि पापनादिगेर हिस्या दान विक्रयेर क्षेमतार नियमे लिखित ओ पडित करिया थाके, तवे शाखानुसारे देवोत्तर भूमि प्रो ठाकुरसेवार पालि वावत एमत लिखित पडित सिद्धि कि ना ? तृतीय सोयाल । यदि दुइ स्त्रीलोक नादाविर लिखित पडि- तेर अनुसारे देवोत्तर भूमिसकल ओ सेवार पालिते दखिल हइया ऐ सासुडि आपन पुत्रवधुर जियदशाते आपन अंशेर देवो- तर भूमिसकल ओ सेवार पालि काहारो निकट बन्धक राखेन, किम्वा आपन परकालेर कमेर पैतृके अथवा पतिर ऋण परि- शोधनार्थ काहार हस्ते विक्रय करिया थाके, तवे एमत विक्रय सिद्धि इहवे कि ना इति। श्रीजयतितराम जनावव्यवस्था एतद्धम्माधिकरणप्रयमाधिपतिश्रीयुतअलियमनसष्टरसाहेवधर्माधिकर- एलिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदः "नुसारेणोत्तर लिख्यते- १८६ व्यवस्था-पत्र-संख्या-६७. प्रथमप्रभस्योतरम्- यद्यप्येकः कश्चित् पित्रावायत्तभूतां समस्तां देवत्रभूमिमय च देव सेवायाः कालिकाशं च संरदय विद्यमानायां स्वपल्या स्वपुत्रे च विद्यमाने पुत्रवध्वां च विद्यमानायां मृतः, ततः किञ्चित्कालानन्तरं मृतव्यस्त पुत्रोऽपि स्वमातरं स्वपत्नी च संरक्ष्य निःसन्तान एव मृतः, तदा द्वयोः. श्वश्रूपुत्रवध्वोर्मध्ये पुत्रवधूरेवोपरिलिखितप्रकारकघनेऽधिकारियो भवति, यत उपरिलिखितप्रकारेण पितृमरणोचरं तत्यधने तत्पुत्रस्याधिकारें जाते सति तद्धनं तत्पुत्रस्यैव जातम् । अतस्तन्मरणोत्तरं तदुत्तराधिकारि- णामेव तद्धनाधिकारः। तत्र च तदुत्तराधिकारिणां मध्ये तस्य प्रभपत्र लिखितप्रकारेण पुत्रपौत्रप्रपौत्राभावे तत्सल्या एव प्राधान्यमिति- अत्र प्रमाणम्- तत्र प्रथमं पुत्रस्तदभावे पौत्रस्तदभावे प्रपौत्रः-इति श्रीकृष्णतर्का- लङ्कारकृतदायभागटीका( पृ० २१८)लिखनम् ॥ १॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ प्रातरस्तथा-इत्यादि दायभागादिग्रन्थः (दामा ० १५१)तयाशवल्क्यवचनम् (२।१३५ ) ॥२॥॥ हितीयप्रभस्योत्तरम्- यद्यपि मृतम्यक्तेः पुत्रस्य मरणानन्तरं श्वश्रूपुत्रवध्वोरनैश्येन तत्समस्त- देवभूमिमय चदेवसेवायाः कालिकांशं च विमज्य वाभ्यां गृहीत्वा तस्य देवभूम्यादेः स्वस्वेतरांशप्राप्यनिच्छया कल्पितस्वस्वांशदानविक्रयक्षमता नियमेन लिखितं कृतं स्याचदा शास्त्रानुसारेण देवत्रभूमेदेवसेवायाभ' कालिकांशस्यैतादृशं लिखितं सिद्ध भवितुं न शनोति, प्रथमप्रश्नोत्तरलिखित प्रकारेण पुत्रवध्वा एव पतित्यचायनाधिकारित्वेन तस्याश्च तद्धने स्वेच्छया- दानविकयुवाशविगागकरणक्षमताविरहाद् देवभूमो देवभिमानो फेश- बिपि स्वत्वामावान्वेति- १. अधिकारो०-न्या.

व्यवस्था-पत्र-संख्या-६७ २८७ अत्र प्रमाणम्- देवस्वं ब्राह्मणवं वा लोभेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिप्टेन जीवति ॥ इति मनु (११०२६) वचनम् ॥ १॥ प्रतिमादिदेवतार्थमुत्सृष्टं धनं देवस्वम्-इति कुल्लूफभट्ट (पृ० ४३० ) व्याख्यानम् ॥ २ ॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । मुजीतामरणात क्षान्ता दायादा ऊर्ध्वमाप्नुयुमा-इति दायभागादि (पृ. १७१)प्रन्धधृतकात्यायन(कास्मृ. १२१)वचनम् ||३||०1100 तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि वे स्त्रियौ' स्वस्वेतरांशमाप्त्यनिच्छया लिखितानुसारेण समस्त- देवत्रभूमौ' देवसेवांशे चायत्तत्वं सम्पादितवत्यौ', तयोर्मध्ये श्वश्रूर्जीवन्त्यां स्वपुत्रवध्यां तल्लिखनानुसारेण स्वांशभूतत्वेन मन्यमाना या देवत्रभूमेस्तथा- विषस्य देवरोबांशस्य च कस्यचिनिकटे बन्धकमथवा स्वस्वर्गार्थोल्लेखे-- नाथवा पतिकृतपाकरणार्थोल्लेखेन विक्रयं वा कृतवती तदेतादृशविक्रय- करणं सिद्ध भवितुं न शक्नोति, प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रकारेण तस्यास्तद्ध नस्वामिलामावाद्, द्वितीयप्रश्नोत्तरलिखितप्रकारेण स्वस्वेतरांशप्राप्यनिच्छा- लिखितस्यासिद्धत्वेन तल्लिखितानुसारेणापि तस्यास्तद्धनस्वामित्वाभावाच्च- इति बङ्गदेशचलितमनुकुल्लूकभट्टकृतमन्वयमुक्तावलीदायभागश्रीकृष्ण- तर्कालकारकृतदायभागटीकाविवादमगार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था अन्न प्रमाणम्- अस्वामिविकयं दानमाधिच विनिवर्तयेत् ।। -विवादभङ्गार्णवादि (१ विवा ३१७ ख )प्रत्यधृतकात्यायन( कास्मृ०-६१२ वचनम् ॥१॥ १. देवदातदनु०-व्या। ३ देवा देवत्र भूमो -व्यप०॥ २खियो-य संपादितवत्योग-व्यप व्यवस्था-पत्र संख्या-६७-६८ श्रस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं वा। अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः ॥ इति मनु (E११EE) वचनश्चेति ॥२॥ श्रीजयतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविधावागीशेन साएल। ६८-रोवकारि मिसिल आदालत देओयानि सदर तारिख १ माह दिशम्बर सन १८२८ई मतावक १७ माह अग्रहायण शन १२३५ वाङ्गला रोज सोमवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत फट- वरट थरलेन सिलि साहेवेर बैठके। मृत वावु अभयनारायणसिंहेर स्त्री मुसम्मात पुनितकोडर श्रो कन्या मुसम्मात अस्यमेधकोडर- साएलानेर उकिलगण मुनशी दादार वक्स श्रो मुनशी महम्मद श्रालि खा ओवावु रूपनारायणसिंह, द्वितीय पर उकिल सदा; मुरु पण्डित हाजिर आसिल । एइ सनेर नवम्बर मासेर २६ तारिखे उभयेर दाखिल करा सोयाल प्रभृति ताहार सम्पीय कागजसकल आमार बैठके उपस्थित हइया दिवा अवसान प्रजुक्त स्थकित छिल, अद्य पुनराय रोवकार हइया ऐ कागजशकल एक सनेर २७ गस्त ओ २५ सितम्बर मासेर लिखित द्वितीय हाकिम ओ पञ्चम हाकिमेर राय सम्वलित दृष्टे श्रासिल । सत् परे वायु रूपनारायणसिंहेर उकिल ई १८२७ शालेर मार्च मासेर २४ तारि- फेर निवेदित श्राजिमावादेर प्रविनसन फोर दाखिल होया जेला निहोतेर फालेकट्टर साहेवेर सोयालेर एक किता नकल ओ इहरेजि छय किना चिटिर नकल दाखिल करिल, पहागेल । यथा .- व्यवस्था-पत्रसंख्या-६८ एइ मकदमार चूडन्त हुकुम सादर होनेर पूर्व ए आदालतेर पण्डितगण हइते व्यवस्था लओन उचित हइल अतएच हुकुम हइल ये ए श्रादालतेर दाखिल होया कागजसकलेर सम्वलित एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे ए श्रादालतेर पण्डितगणके सम- पण करा जाय ये ए प्रादालतेर पण्डितगण ऐ कागजसकनेर दृष्टे मैथिल देसेर चलित शास्त्रानुसारे निचेर लिखित सोयालेर जवाव एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण । सबोयाल- चौधरिरी आजितसिंहेर तिन पुत्र । प्रथम वायु दिगविजयसिंह, द्वितीय वावु सर्वजितसिंह, तृतीय वायु उमराओसिंह छिल । उम. राओसिंह तृतीय पुत्र निस्वन्तान मरिल । वावु दिगविजयसिंहेर पुत्र वायु मुपनारायनसिंह श्रो वायु सर्वजितसिंहेर पुत्र वावु रजीतसिंह उत्तराधिकारित्व स्वत्वे आपनर पितार माल ओ मिलकियते भोगवान् छिलेन । ताहारद्विगेर मृत्युर पर वावु भुष- नारायणसिंहेर पुत्र वावु अभय नारायणसिंह श्री वावु रञ्जित- सिंहेर पुत्र यावु रूपनारायणसिंह आपनर पिवार त्यक्त धन श्रो वस्तुते दखिलकार हइया या अभयनारायणसिंह मुसम्मात पुनितकोटर स्त्री ओ मुसम्मात अस्यमेधकोडर कन्या, श्रा तृतीय पुसिय खुडतात भ्राता वावु रूपनारायणसिंहके राखिया मृत्यु हय । अतएव जिज्ञासा जाय जे यद्यपि वा अभयनारायणसिंह आपन मृत्युर पूर्व तालुक केवल नारायणपुर प्रभृतिर अर्द्धक- हिस्यार उपर आपन खुडतुता भ्राता वावु रूपनारायणसिंहेर साधा-- रणे दखिल थाकिया मरिया थाके तवे ऐ मृत व्याक्तर त्यक्त वस्तु कोन व्यक्तिके अर्थात् खो, किम्वा कन्या, किम्वा यात्रु रूपनारा- यणसिंहके असिवेका श्रो यद्यपि ऐ मृत व्यक्तिर त्यक्त अर्द्धक हिस्या वादार मृत्युर पूर्व विभाग हइया ऐ मृत व्यक्ति विभाग अनुसारे ताहार उपर भोगवान हया मरिया थाके तवे ऐ व्यक्तिगपर मध्ये कोन व्यक्ति मृत व्यक्तिर त्यक्त वस्तु असिवेक इति ।

4 व्यवस्था-पत्र संख्या-६ श्रीजयतितराम जवायव्यवस्था सत- एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटयरलेनसिलीसाहेवधर्माधिकरण- लिखितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितेतद्विवादविषयनिविष्ट पप्रजातं चावलोक्य विविच्य च यादृशबोधोजातस्तद्नुसारेणोत्तरं लिख्यते- यद्यपि मृतवावुनमयनारायणसिंहः स्वमृत्योः पूर्व केशवनारायणपुर प्रमृतिसराजकरस्थावरस्याद्धांशे स्वपितृव्यपुत्रवाघुरूपनारायणसिंहस्य साधा- ‘रण्येन भुञानस्सन् मृतस्तदा तस्या एव मृतव्यक्तेस्त्यक्त केशवनारायण- पुरप्रभृतिसराजकरस्थावरस्याद्धांश चावुरूपनारायणसिंहासपिण्डत्वेन साधा रएपप्रतियोगित्वेन च प्राप्तुं शक्नोति, प्रभुसमतिपत्रजातैर्थिवादास्पदीभूत 'फमागतसराजकरस्यावरान्तर्गतकेशवनारायणपुरप्रभृतिप्रामाणां तत्तद्मामा- न्तर्गताया भूमेर्वा श्रशपरिच्छेदानवगमाद् परं तत्सप्रजातान्तर्गतारेजीशन्द प्रतिपाद्यपञ्चविंशत्यधिकाप्दादशशतान्दीयनवम्बरमासीयचतुर्थदिवसलिखित- तीरभुक्तिप्रदेशीयकलकटरपदाभिषिक्तसाहेवलिखितषिचारपत्रेणैवं' विंशत्यधिकाष्टादशशताब्दीयापरेलमासीयपञ्चमदिवसलिखितकलकटरपदा- भिषिक्तसाहेवकृतनिवेदनपत्रेण च विवादास्पदीभूतस्य केशवनारायणपुर प्रभृतिसराचकरस्थावरस्याभयनारायणसिंहरूपनारायणसिंहयोस्साधारण्याव 'गमाद् एतादृशक्रमागतसाधारणधने पतीदुहिनोरधिकारप्रतिपादकं मिथि लादेशचलितशास्त्रामावाच । यदि च तस्या एव मृतव्यक्तेस्त्यक्ताीयो विभक्तः, सा च मृतभ्यक्तिविभागानुसारेण तदुपरि श्रायत्तत्वं सम्पाद्य मृता, सदोपरिलिखितानां मध्ये पुनीतकोमराख्या, तत्पनी, तस्या एव मृतव्यक्ते. 'स्त्यक्तधनं प्राप्तुं शक्रोति, पुत्रौत्रप्रपौत्ररहितस्य मृतस्य विमतधने पल्या प्रधानाधिकारित्वात्-दति मिथिलादेशचलित वेवादरवाकरविवादचिन्ता- मणिविवादचन्द्रदेत निर्णयद्वैतररिशिष्टादिग्रन्यानुमारणी व्यवस्था- १.रो..-व्यप २ सास-या। ३.परेऐवं-यप।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-६० . प्रह अत्र प्रमाणम्- अपुत्रा शयनं मर्चः पालयन्ती व्रते स्थिता। पल्येव दद्यात् तसिण्डं फत्स्नमंशं लभेत च ॥ इति विवाद: रताकर (पृ०,५११ )विवादचिन्तामण्यादि(पृ० २३६ ग्रन्यधृतवृद्धमनु- न्यचनम् ॥ १॥ इदच विभक्तपतिधनपरम्हर्ति विवादचिन्तामणि(पृ. २३७) अन्य लिखनम् ॥ २॥ अविमको मृते पत्यो तस्योश एव नाभूदिति' किमियं गृहातु । न च सेवांशप्रतियोगिनी प्रापकामापात् । न चैतान्येव वाक्यानि प्रापकारिए तेषां विभक्तघनपरत्वेनाप्युपपत्तेः-इति विवादचिन्तामणि पृ० २३७ ) अन्थलिखनम् ॥३॥ प्रातृमार्थ्यायां विधवार्या पत्याहितगर्भायातदेवरादीना विभागे प्रकान्ते तस्या अपि शक्षितपुत्रप्रसवाया दाय प्राप्रसवं स्याप्यः । स च तस्याः पुत्रे जाते तत्पुत्रस्यैव भवति पुत्रेऽनुत्पन्ने तु देवरादिमिर्माह्यः- इत्यादि विवादचिन्तामणि (पृ० २३८) ग्रन्थलिखनम् ॥ ४ ॥ विभक्तानामपि यत्रांशपरिच्छेदो न जातस्तन्मध्यगमेव तिष्ठति तेन तत्र साधारणत्वमेव-इति विवादचिन्तामणि (ख विचि पृ० १६१) द्वैतपरिशिष्टादिमन्थलिखनम् ॥५॥ अनपत्यस्य घनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितृगामि तदमावे मातृ- गामि तदभावे पितृगामि तदमावे मातृगामि तदभावे प्रातृपुत्रगामि तद- १ भविभवमगोडे तु पत्यो०-विचि०। २ मून. किमि०-विचिः। ३ एषां-विचित ४.प्राजे-विचा ५. शादिनच्या ६ मा ०-विचिकन ५ पुने अनुत्पन्ने-विचित ८. नदभावे माझुगामि अरोऽयं विवादचिन्ताभयौ नोपरम्ते।

व्यवस्था-पत्र संख्या-६८-६९ १९२ । भावे बन्धुगामि इत्यादि विवादनिन्तमण्यादि(विचि० पृ. २३५ अन्य 'लिखनश्चेति ॥ ६॥- A श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीहरिःशरणम् श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन ६ ६९-सहर श्रीरामपुरेर देमानि आदालतेर जज साहेवेर हुजुर हइते सदर देमानि श्रादालतेर पण्डितेरदिगेर प्रति सोयाल- यदि कोन व्यक्ति तिन पुत्र वर्तमाने लोकान्तर ह्य, परे ऐ तिन पुत्रेर मध्ये ताहादिगेर ज्येष्ठ भ्राता अन्न प्रार्थक्य हइया पैतृक सर्व साधारणेर एक यागान, याहाते कतम प्रजार वसति पाछे एवं ताहादिगेर तिन भ्रातार शंशेर भिन्नर सिमा चिह्नित हय नाइ, वाहार तिन अंशेर एक अंश कोन अन्य व्यक्तिके विक्रय करे। ताहाते यदि पार दुइ भ्राता प्रतिवादि हइया हाकिमेर निकट नालिस करिया ऐ तिन अंशेर एक अंश, याहा ताहादिगेर ज्येष्ट भ्राता विक्रय करे, ताहार यथार्थ मूल्य दिया खरिदेर प्रार्थना राखे, तवे ऐ तिन अंशेर एफ अंश खरिद करिते काहार अधिकार हयः ऐ दुइ भ्रातार, अथवा ऐ खरिदारेर-इहार व्यवस्था शास्त्रानुसारे लिसिवेन इति । शन २८, ७ मेइ मों शन १२३५० २६ वैशाख। प्रमुखमर्पितप्रश्नपत्रमवलोस्प यादृशयोघोजातस्तदनुसारेयोचरं लिख्यते। यदि कश्चिद् व्यक्तिविशेषस्त्रीन् पुत्रान् संरक्ष्य मृतस्तदनन्तर तेषां प्रयाणां पुत्राणांमध्ये ज्येः पृथगन्नो भूत्वा पिनृत्यक्तमातृत्रयसाधारणैकात्मकसप्रमा भूमेस्रयाणां भ्रातृणां विभागम्यसकोमा/चहर हताया अंशत्रयमध्ये एकमरा मन्परमै कस्मेचिद् विक्रय कृतवान्', कर्तुमिच्छति वा, तत्र यायशिष्टौ झो करमापराया २ प्रासादेनोप.1 , १. व्यवस्था पत्र संख्या-६६-७ प्रातरौ प्रतिवादिनौ भूत्वा रानसन्निधौ निवेदनं कृत्वा तेषां प्रयाणामंशानामे- कमंशमर्थाज्ज्येऽभ्रात्रा विक्रीत, विक्रेतव्यं वा, तस्य यथार्थ मूल्यं दत्त्वा फेर्नु प्रार्थयतस्तथापि तेपा' त्रयाणामशानामेकमंशं केतुं यस्मै उपरिलिखित विक्रय- कर्ता प्रसन्नस्सन् विक्रेतुमिच्छति तस्यैवाधिकारः, यत इदानी बगदेशचलित- धर्मशास्त्र क्रयक विचारोन लिखितः-इति वद्गदेशचलितदायभागश्रीकृष्ण- तर्कालकारकृतदायभागटोकाविवादभगार्णवविवादार्णवसेतुप्रभृतिग्रन्थानुसा- रिणी व्यवस्था- अन प्रमाणम्- स्वगागान् यदि दद्युस्ते विक्रीणीयुरथापि वा। कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य थे ।। इति दायभाग(पृ० ३५) विवादभगार्णव(१ विभ० ख ४२३)विवादार्णवसेतु (पृ० ८३)मभृतिग्रन्थधृत- नारद(नामस० १३॥४२.४३ वचनम् ॥ १ ॥ तथा च विभक्तस्येवाविभक्तस्थायरस्यापि स्वामिकतदानादि सिक्ष्य त्येव अक्षपातादिना पश्चादेशपरिचयसम्भवादितिभावः- इति श्रीकृष्णा- तर्कालङ्कारकृतदायभागटीका (पृ० ३५) लिखनञ्चेति ॥ २ ॥ ० ॥ ॥ श्री यतितराम् श्रीहरिशरणम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीरामतनुशर्मविद्यावागीशेन -रोवकारि मिसिल आदालत देओयानि सदर तारिख ८ माह आपरेल सन १८२६ ई० मतावक २७ माह चैध शन १२३५ वाङ्गलारोज बुधवार ऐ पादालतेर प्रथम हाकिम श्रीयुत अलियम नसष्टर साहेवेर बैठके-- १.प्रतिवादिनो-न्यप। २. मथार्थमूल्य-व्यप। ३.वेगाव्या ४. दुररिलिरिक्त-व्यप० । ५. तया च विनमतरयाविभ०-व्यप० ६. सिद्धने च-पर १३ + १९४ व्यवस्था-पत्र-संख्या-७० राजचन्द्रराय सायेल एइ सनेर मारच मासेर १४ तारिखेर सायेलेर मकईमार कागज सकल रोवकार ओ दृष्टी हइया कोरक करा भूमि निला- मेर निपेधि हुकुम सादर' हओन परे अनुमोदनार्थे स्थकित छिल, अद्य पुनराय उपस्थित हइया अन्य कागज सकल दृष्ट करागेल । यथा ए मकद्दमार सम्पर्के हुकुम होनेर पूर्व देवोत्तर मुमि- सकलेर सम्बन्धे शाखेर कथन आज्ञा विवेचना करा उचित हइल, अतएव हुकुम हइल ये एइ रोवकारि एइ श्रादालतेर पण्डितगणके समर्पण कराजाय, ये निचेर सोयालसकलेर जवावे दुइ सप्ताह मध्ये शास्त्रानुसारे व्यवस्था दाखिल करेण । प्रथम सोयालयद्यपि शास्त्रानुसारे देवोत्तर भूमिसकल विक्रय करण एकान्त सिद्ध नहे । अतएव ताहार उपस्वत्य विक्रय करण (सिद्ध) हइवेक कि ना ? द्वितोय सोयाल-सरवराहकारि कीम्या सेवाइती प्रयुक्त देवोत्तर भूमि अथवा ताहार उपस्वत्वे सेवाइतेर किछु स्वत्व हय कि ना, श्रो यद्यपि हय, ताहार किछु निर्दिष्ट आछे कि ना? येमन एक विधा देवोत्तर भूमि किम्वा ताहार उपस्वत्व एक टाकार मध्ये सेवाइतेर स्वत्व कि परिमान हइवेक तृतीय सोयाल-यद्यपि देवोत्तर भूमि किम्वा ताहार उप स्वत्वे सेवाइतेर स्वत्य परिमाने निर्दिष्ट हइयाथाके, तवे सेवाइतेर देगार निमित्ते सेवाइतेर स्वत्वेर परिमानेर भूमि अथवा वाहा हइते ये परिमाने उपस्वत्व सेवाइतके(?)सकल हइते पारे विक्रय- हइवेक कि ना? चतुर्थ सोयाल-यद्यपि ये भूमिसकले किन्या ताहार उप स्वत्वते सेवाइतेर स्वत्त्य वत्तिया समुदय देवोत्तर भूमिसकलेर मम्मलित थाके, ओ सिमा चिह्नो भिन्न ना हइया थाके, तवे समुदय देवोत्तर भुमि, किम्या ता हइते किश्चित् चण्टक ना १. सोदर-व्यप।

च्यवस्था-पर-संख्या-७० १९५ हओन हेतुक सेवाइतेर देनार जन्ये विक्रयेर योज्ञ हइवेक, किन्या किछुइ नाइ इति । जवाचव्यवस्था एतदम्माधिकरणप्रथमाधिपतिश्रीयुतालियमनसष्टरसाइवधर्माधिकर- एलिखितैतदन्दीयापरेलमासीयाष्टमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तमासीयपोडशदिने सपादघटिकादयाधिकसमये मया प्राप्त वदवलोक्य यादशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्-- यता शास्त्रानुसारेण देवत्र भूमीनां विक्रयकरणं कदाचिदपि न सिध्दधति अतएव तदुत्पत्तोपस्वत्वस्यापि देवमात्र स्वत्वेन तदितरस्वत्वाभावात्तद्विक्रय- करणमपि न सिष्यति । प्रत्र प्रमाणम्- देवस्वं बाह्मणस्वं का लोभेनोपहिनस्ति यः । स पापात्मा परे लोके गृमोल्छिप्टेन जीवति ॥--इति मनुवचनम् (मनुस्मृ० ११।२६ ) ॥ १॥ प्रतिमा देवता । तदर्थमुत्सृष्टं धनं देवस्यम् ।। इति मन्वयमुक्ता- पल्या कुल्लुकभलिखनम् (पृ. ४३०)॥२॥ अस्वामिना कतो यस्तु दायो विक्रय एव वा । अतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः ।। इति मनुवचनम् (मस्मु० ८।१६६) ॥३॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरमू- भाषायां सरवयहकारशब्दवाच्यस्य रोयाइतशब्दवाच्यस्य या भापायां सरवराहकारीकर्मप्रयुक्त सेवाइतीकमंप्रयुक्तं वा देवनभूमो तदुत्पन्नोपस्वत्वे वा)किञ्चिदपि न स्वत्तं धर्मशास्त्रीयप्रमाणामावादिति । तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- द्वितीयपभोत्तरलिखितप्रकारेण देवत्रभूमौ तदुत्पन्नीरस्वत्वे या सेवाइत- राब्दवाच्यस स्वत्वामावेन तदेयपरिशोधनाथ देवभूमेस्तदुत्पन्नोपस्वत्त्वस्य १६६ व्यवस्था पत्र संख्या-5०-७१ वा विक्रयो भवितुं नार्हति । चतुर्थप्रश्नोत्तरमप्या(दा)यातमिति न पृथग लिखि- तम् । --इति मन्वादिधर्मशास्त्रानुसारिणी' व्यवस्था- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण लं० २०६६ ७१-रोवकारि मिसिल श्रादालत देओयानी सदर तारिख१५ माह श्रापरेल शन १८२६ मतावक ४ माह वेशास सन १२३६ वागला रोज बुधवार ऐ श्रादालतेर पञ्चम हाकिम श्रीयुत मान्त-- कियो हेनरि टरम्वन साहेवेर बैठके। चावु गङ्गाप्रसादनारायण पापीलाण्ट वावु लमिनारायण रप्पाडण्ट यापीलाण्टेर उकिल मुनसी दादारवस्क ओ रप्पाडएटेर उकिल लाला आउधलाल हाजिर आसिल । ए मकद्दमा एइ सनेर मारच मासेर ३१ तारिखेर हुकुममते अद्य श्रामार बैठके रोवफार हइया प्रविशन कोटेर दाखिल होया नालिसी आरजी प्रभृति कागच सकल तथाकार फयसला पर्यन्त थोए श्रादालते दाखिल होया आपीलेर मजुवात श्रोताहार जोयाव प्रभृति कागजसकल गत मारच मासेर ३१ नारिखेर ए पादालतेर तृतीय हाकिमेर विस्ति- म रोधकारि सम्वलित पडागेल । यथा चोध हहल ये मुद्दामा लेहे, एइ हरणकार प्रापीलाण्ट, एइ विपयेर आपत्ति राखे ये उभ- येर पूर्व पुरुष मृत वावु नरसिंहनारायणसिंहेर कनिष्ठ भ्राता वायु फतेनारायणसिंहेर स्त्री मुसम्मात रामकोडरेर सालिसि शास्त्रानु सारे सिद्ध ओ जारि होनेर योग्य नहे। अतएव श्री एवं जिला श्रो फोर पण्डितगणेर दाखिल करा व्यवस्थासकल ओ एइ दृष्टे मनादिया। २.विस्तीर्ण-ति साधीयान् पाठ.।

व्यवस्था पन्न-संख्या ७१ १९७ उभ- ये एकथा लोन वटे ऐ विपयेर सम्मन्चे शास्त्र आशासकल ज्ञात होन उचित्त हइया ए मकद्दमार सम्पर्के चूडन्त हुकुम चादर होनेर पूर्व हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल ए आदालतेर पण्डितगणके थर्पण करा जाय-ये निचेर मओयालसकलेर जवाब दुइ दिवसेर मध्ये व्यवस्था दाखिल करेण । प्रथम सोयाल-जिला वारानश चलित शास्त्रानुसारे खि- 'लोकेर सालिसी सिद्ध वटे कि ना? द्वितीय सोयालयद्यपि दुइ व्यक्ति, नेकट्य कुटुम्ब, येर विरोध प्रो आपत्ति निष्पत्त्येर जन्ये,याहाउदादिगेर मध्ये थाके, आपन वंशेर एक स्त्रीलोक्के, ये दुइ व्यक्तिर विस्वासी हय, पाप- नारदिगेर अभिप्राये सालिय नियुक्त करिया थाके, यो ऐ स्त्रीलोक निष्पत्ती करिया देय। तवे एमत स्त्रीलोकेर सालिसी शाखेर आज्ञासकलेर मते सिद्ध श्रोताहार फयसला जारि होनेर योग्य .हइवेक कि ना ? इति । जवायव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणपञ्चमाधिपतिश्रीयुतमान्तकिहेनरीटरम्बलसाहेवधर्मा- धिकरणलिखितैतदन्दीयापरैलमासीयपञ्चदशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रभप्र- तिरूपपत्रं यत्तन्मायीयपोडशदिने चतुर्यप्रहरे मया प्राप्तं तदवलोक्य या शबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रभस्योत्तरम्- मिताक्षरावीरमित्रोदयग्रन्यानुसारेण स्वीकृतव्यवहारनिर्णयोऽसिद्ध एव । 'विवाद चिन्तामणिविवादचन्द्रनारदस्मृत्यायनुसारेणापनिवारणाय स्रीकृतो- ऽपि व्यवहारनिर्णयः सिद्ध्यति । अन्न प्रमाणम्- वलोप()धिविनितान्व्यवहारान्निवर्तयेत् । खीनतमन्तरागारबहिःशनुकृतांस्तथा । १. भमय-यप।

१९ व्यवस्था-पत्र संख्या-७१ इति मिताक्षरा(पृ० १४३)व्यवहारचिन्तामणिधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (२३१)॥१॥ स्त्रीषु रात्री बहिर्मामादन्तर्वेश्मन्यरातिषु । व्यवहारः कृतोऽप्येषु पुनः कर्तव्यतामियात् ।। इत्यादि वीरमित्रोदयव्यवहारचिन्तामणियन्यधृतनारदवचनम् नामस- १,३७ ) ॥२॥ स्वीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुरनापदि । विशेषतो गृहक्षेत्रदानाघमनविक्रयाः ॥ इति व्यवहारचिन्तामणिविवाद चन्द्र(पृ० १४७ नारदरमृत्यादिधृतनारदवचनम्(नामसं० २।२२) ॥३॥ आपत्प्रतीकारार्थ खीकृतमपि प्रमाणमेव,अनापदीत्यभिधानात् - इति विवादचन्द्रग्रन्थलिखनम् (पृ० १४७ ) ॥ ४ ॥ अनापदीत्यनेनापत्प्रतीकारार्थ स्त्रीकृतान्यपि प्रमाणान्येवेत्युक्तम् इति व्यवहारचिन्तामणिग्रन्थलिखनम् ॥५॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि द्वयोः सन्निहितसम्बन्धिनोविरोधस्यापत्तेश्च कस्याश्चिनिष्पत्य वंशसम्बन्धिनी एका काचित् स्त्रो, या तदुभयोर्विश्वस्ता', ज्येष्ठा, श्रेष्ठा च, स्वस्वाभिप्रायेण स्वसम्बन्धिविवादनिर्णयकर्तुत्वेन द्वाभ्यामेव विरोधिम्या नियुक्ता सती सैव स्त्री तद्विादनिर्णय फवयती स्यात्तदैवं विधविवाद निर्णयो मिताक्षरा वीरमिवोदयअन्यानुसारेण सिमो भवितुं वकृतजयपत्रं चापिप्रच. लितं भवितुं नाति, व्यवहारमाधवमन्यानुसारेण च तन्निर्णयः सिद्धो भवितुं तत्प्रमाणभूनं तजयपत्रं च प्रचलितं भवितुमर्हति, प्रश्नपत्रलिखितप्रकारेण दाभ्यामेव विरोधिम्यां तदधिकारस्य तस्यै दत्तत्वेन तद्वियादनिष्यत्तेस्तदधौन- बात "यदि च तत्समय तया स्त्रिया यदि विवादनिर्णयो न भविष्यति तदा अस्माकं महत्पाप भविष्यति'-इति ज्ञात्वा द्वाभ्यामेव विरोधिभ्यां विश्वस्ता नियत-व्यर। २. °भयोविश्व-व्य॥ ३.०मितक्षराक्षा-व्यप ४. महदारविष्य-व्यप।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-७१-७२ १९६ ज्येष्टा श्रेष्ठा सा स्त्री तदापनिवारणाय' विवादनिर्णायकत्वेन नियुका तदा तत्स्त्रोकृतविवादनिर्णयो व्यवहारचिन्तामणिविवादचन्द्रनारदस्मृत्यायनुसारेण सिद्धो भवितुं तत्ममाणभूतं तत्कृतजयपत्रं च प्रचलितं भवितुमर्हति-इति सारणदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारचिन्तामणिविवादचन्द्रव्यव - हारमाधवनारदरमृत्यनुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणान्युपरिलिखितानि साण्येव । गुरुः स्वामी कुटुम्बी च पिता ज्येष्ठः पितामहः । पियादानथ' पश्येयुः स्वाधीने विपये नृणाम् ।।-इति व्यवहारमाधव- { पृ० २४ ) अन्यधृतव्यासवचनञ्चेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनायमिण लम्बर २७८६ ७२–ोवकारि मिसिल आदालत देओयानि सदर ४ माह माइ सन १८२६ मतावक २३ माह बैशाख सन १२३६ वाङ्गला रोज सोमवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरटथरलेनसिलि साहेवेर वैठके। मुसम्मातदुलादेइ ओ सोनोसिंह प्रापिलाएटान् क्षेमाजितराय श्रो किर्तिराय रप्पाडएट आपिलाण्टगणेर उकिल लाला श्राउधलाल, भोरप्पाडण्टानेर उकिल मुनशी दादार वक्स हाजिर अासिल । ए मकद्दमा पूर्वे एइ सनेर आपरेल मासेर २७ श्रो २८ ओ २६ तारिख सकले रोयकार हइया, ओ जिलार श्रादालतेर समुदय कागज १ लम्बर हइते तथा- कार फयशला पर्यन्त यो प्रविनसन कोर्टर कागजसकल फयश. १. निवारक विवाहनिर्णयफरवे-व्यय० । २. विवादानपि-धर्मकोप', ५०६४ ।

*- व्यवस्था पत्र-संख्या-७२ . लासहित ओ ए आदालतेर समस्त कागज ओक्षेमाजितराय प्रम- तिर नामिक सेक मछाहेर आलि प्रभृतिर मकद्दमा जिलार आदा- लतेर समस्त कागज ो कोर कागज १० लम्पर पर्य्यन्त पडा. गिया, दिवा अवसान प्रयुक्त स्थकित छिल, अद्य पुनराय उपस्थित हइया ऐ मकद्दमा वावत कोर वाकी कागज दृष्टे श्रासिल । तत् परे राडएटेर उकिल इ. १८२१ शालेर जुन मासेर २८ तारिखेर लिखित जिला वेहारेर श्रादालतेर एक किता फयशलार नकल ई १८२५ शालेर माइ मासेर २५ तारिखेर लिखित प्राजिमावादेर प्रयिनसन कोर्टर एक किता फयशलार नकल ओ इं १८२७ शालेर सेतम्बर मासेर ६ श्रो १३ तारिखेर लिखित ऐ प्रपिनसन कोटेंर दुइ किता रोवकारिर नकल ओ फशलि ११९६ सालेर रमजानेर १५ तारिखेर लिखित धर्मनारायणेर लिखा एक किता सराकत. नामा श्रोई १७९४ शालेर लवम्वर मासेर २० तारिखेर लिखित सैयद महम्मद, ओ सैयद होसेन प्रालि ओ सैयद रोस्तम प्रालि श्रो सैयद आलि अामजद मुद्दइगणेर उकिल सैयद केरामत होसे- नेर लिखा एक किता राजिनामार नकल १२ टाका मूल्येर फेहर- स्तेर द्वाराय लम्बरे दाखिल करिल, पडागेल । यथा ए मकद्दमार चुडन्त हुकम सादर होनेर पूर्व एइ आदालतेर पण्डित हइते व्यवस्था लोन उचित वोध हइल, अतएव हुकम हइल ये मकद्द- मार फागज सहित एइ रोयकारिर नकल पण्डितके समर्पण करा जाय। उचित ये पण्डित मी ..."प मकद्दमार समस्त कागजेर अनुमोदने निचेर लिखित दुइ सोयालेर जग्य एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण। प्रथम सोयाल-यद्यपि विरोधीय वस्तु वएटक हइयाथाके, ऐ अवस्थाय मुसम्मात दुलारदेइ आपिलाएट आपन जीवदशा- पर्यन्त केवल भरण-पोषण पाइवेक, किम्वा प्रापन पतिर त्यक्त हिस्याय दखिलकार थाकिया ताहार उपस्वत्वे भोगयान थाकिनेक यो ताहादानेर क्षमता राखिवेक कि ना इति ।

च्यवस्था-पत्र-संख्या-३२ २०१ द्वित्तीय सोयाल-विरोधीय वस्तु अवष्टक थाकने मुस- स्मात मजकुरा प्रथम सोयालेर विस्तिर्ण सत्व-सकल हइते कोन स्वत्वेर स्वत्वाधिकारि वटे इति । श्रीजयतितराम जवायव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटयरलेनसिलीसाहेवधम्माधिकरण- लिखितैतदब्दीयमैमासीयचतुर्थदिवसीय विचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तात्यमपितेतद्विवादविषयनिविष्टपत्र जातं यत्तत्मातीयपष्ठदिने यामद्वयानन्तरं मया प्राप्त तदयलोक्य याशबोधो जातस्तदनुसारेणोतरं लिख्यते । प्रथम प्रश्नस्योत्तरम्- यद्यपि विवादास्पदीभूतं यस्तु विमतमभूत्तदा दुलारदेवनानी एत. दाधिकरणार्थिनी स्वजीवनपर्यन्तं पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितवपतित्यत्तविभका- धनांशे श्रायत्तत्व सम्पाद्य तदुपस्वत्वे भोगवती स्थास्यति । एवं तदस्तुनो आवश्यकादृष्टाय विना दानक्षमता तस्या न स्थास्यति, यतः पुत्रपौत्रप्रपौत्र- रहितस्य मृतस्य विभत्ताधने पल्या उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जातेऽप्यावश्य- कादृष्टार्थ विना तद्धनस्य दानकरणक्षमता नास्तीति । अन्न प्रमाणम् तस्मादपुत्रस्य स्वर्यातस्या संसटिनो धनं परिणीता स्त्री संयता सकल मेव राहातीतिस्थितम्-इति मिताक्षरा(पृ० २२१)ग्रन्थलिखनम् ॥१॥ पत्नी गृहीयादित्येद्वचन जातं विमलस्त्रीविषयम्-इति मिताक्षरानन्य 'लिखनम् ॥२॥ स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः । नापहार खियः कुर्यु: पतिविचात् कथञ्चन ।। इति-चीरमित्रोदयादि (विमि० ख० पृ० ६२८) प्रत्यकृतमहाभारत- वचनम् (१३४७२४) ॥३॥०॥ • 11 | १.व्यालय-न्यपण २०२ व्यवस्था-पत्र-संख्या-७२-७३. द्वितीयप्रभस्योत्तरम् - विवादास्पदीभूतं धनमविभक्त चेत्तदैतद्धर्माधिकरणार्थिनी दुलारदेह- नानी प्रथमप्रश्नलिखितस्वत्वसमुदायान्तर्गतकेयलं यायनीय भरणपोषण- प्राप्तिरूपप्रथमप्रकारोपयुक्त स्वत्वाधिकारिणी भवति, प्रमुसमर्पितपत्रजातैर्विवा- दास्पदीभूतधनस्य विभागानवगमात्-इति वेहारदेशप्रचलितमिताक्षरावीर- मित्रोदयव्यवहारमयूखव्यवहारकौस्तुमादिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- स्वर्याते स्वामिनि स्त्री तु ग्रासाच्छादनमागिनी । अविभक्ते धनांशे तु प्राप्नोत्यामरणान्तिकम् ।। इति धौरमित्रोदयादि. (वीमि० ख० पृ० ६५४)ग्रन्यधृतकात्यायनवचनं (कास्मृ०६२२) चेति ।। १८ मै सन हाल, दो प्रहर याद दाखिल किया- श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण लं०१७६३ ७३--रोधकारी मिसिल श्रादालत देोयानि सदर तारिस ६ माह माइ सन १८२६ ई० मतावक २५ माह वैशाख सन' १२३६ वागला रोज बुधवार ऐ श्रादालतेर पश्चम हाकिम श्रीयुत मान्तेगियो हेनरि टरम्बल साहेवेर वैठके। गोवर्द्धनलाल- श्रापिलाएट मोहनलाल भो मृत सोहनलालेर उत्तराधिकारि गङ्गाप्रसाद- रेप्पाडण्टान आपिलाण्टेर उकिल मुनशी दादार वकस ओ रेप्पाडएटा- नेर मध्ये मोहनलाल रेपपाडण्टेर उकिल लाला आउधलाल हाजिर आसिल । अद्य ए मकद्दमा तरतिव' लम्बर मते प्रामार , तबधिप व्यवस्था-पत्र संख्या-७३ २०३५ निकट रोक्कार हइया ई १८२८ सालेर मारच मासेर ३१ तारि- खेर लिखित ए आदालतेर परिसिप्टेर उत्तरे एइ सणेर आपरेल- मासेर १६ तारिखैर लिखित जिलारामगडेर जसाहेवेर'पाठानो- विवरण ताहार समभिव्याहारीय रोवकारि प्रभृति कागजातसकल सहित लम्बरे पोहुछिया पड़ागेल । यथा वेचुसिंह ओ द्वितीय वेचुसिंह साक्षिगण, ओ गङ्गाप्रसादेर पिता मोहनलाल ओ भ्राता जोगललालेर एजाहारे ओ रेप्पाडण्टगणेर मध्ये एक रेप्पाडण्ट मृत सोहनलालेर स्त्री मुसम्मात धोपार दरखास्ते ऐ मृत व्यक्ति. गङ्गाप्रसादके पोप्यपुत्र लोन साव्यस्थ हइल, अतएव हुकुम हइल जे मृत रेप्पाडण्टेर स्थाने गङ्गाप्रसादेर नाम लेखा जाय । ताहाओ लेखागेल, ओ गङ्गाप्रसाद पे मत व्यक्तिर उत्तराधिकारि स्थ होनेओ स्वयं किम्बा उकिलेर द्वाराय ए अदालते हाजिरहय नाइ, अतएव ऐ व्यक्तिर सम्बन्धे एमकद्दमार तजविज एकसपार्टि प्रकारे कराजाय । किन्तु प्रकाश हय ये जद्यपिअन्यकेह मृत सोहनलालेर उत्तराधिकारि ओ गङ्गाप्रसादेर पोध्यपुत्रता मिथ्या हओनेर दावि करे। एइ हुकुम ताहारे दावि ओ स्वत्वेर तजविजेर निपेधीय हइवेकना । ततपरे प्रचिनसन कोठ दाखिल होया लालिसि पारजि प्रभृति कागजसकल तथाकार फय- सला पर्यन्त ए आदालते दाखिल हइया प्रापिलेर मजुवात श्रो ताहार जवाव पडागेल । जानागेल जे ए मकद्दमार तजविज सास्त्रे मम्पर्क राखे । अतएव ए मकद्दमार सम्मन्धे चूडन्ति हुकुम सादर होनेर पूर्वे सानेर) आज्ञासकल ज्ञात हओनार्थे व्यवस्था लोन उचित वोध हुइया हुकुम हइल ये ए मकद्दमा अद्य स्थकित थाके, ओ एइ रोवकारिर नकल ७० लम्बरेर ई १८१९ सालेर जानओरि मासेर १७ तारिखेर लिखित हेवानामा दस्तावेज सहित ए आदालतेर पण्डितके समापन कराजाय, जे पश्चिम देशेर, जाहाते रामगड जिला थाकिवेक, चलित शास्रानुसारेनिचेर १ साढेरे-व्यप० । २ सनम्यारीय--प० । ३. हेगनामा-न्या। ।

२०४
व्यवस्था पत्र संख्या-३
लिखित सोयालसकलेर जयावे एक सप्ताह मध्ये व्यवस्था
लिखिया दाखिल करेन।
प्रथम सोयाल यद्यपि हिन्दु जाति हइते एक व्यक्ति थापन
‘कृत स्थावर वस्तुसकल आपन पुत्रगण हइते एक पुत्रके दान
फरिया, दान गृहीताके साहार दखल देयोयाय । अतएव ऐ दान
गृहीतार अन्य भ्रातागण थाकनेश्रो ताहार स्वत्वे ऐ दान सिद्धि
हिइवेक कि ना, श्रो दातार मृत्युर पर प्रापन आपन अंश पाओनेर
अन्ये अन्य भ्रातागणेर दावि प्रशें कि ना ?
द्वितीय सोयालयद्यपि एक व्यक्ति हिन्दुर पाच पुत्र,
प्रो ताहारद्विगेर मध्ये ये पुत्र भ्रातागण हइते कनिष्ठ छिल अन्ध
थाके, ओ ऐ व्यक्ति आपन त अस्थावर वस्तुसकल चार पुत्रके,
याहारा अन्ध नहे, सुस्थ स्वरिर वटेन, दिया आपन कृत स्थायर
'वस्तु, जाहा मूल्येर द्वाराय चारि पुत्रेर एक २ पुनेर अस्थावर
‘चस्तुर अंश हइते तुल्यकिम्यानून थाके, अन्ध पुत्रके श्रापन विशय
उपजन करण हइते प्रक्षम थाकन दृष्टे दान करिया थाके, तवे ऐ
-दान एमत पुत्रेर स्यत्वे सिद्धि यो यथार्थ हइवेक कि ना ?
तृतीय सोयाल-चण्डाल १ वागदि २ साहा ३ सुडी ४
काँोरा ५ धोपा ६ थो डोम ७-एइ कय व्यक्तिर सुकृतिपत्रेर
द्वाराय शपथ हय कि ना इति ।
सोयाल सुप्रीम कोर्टादालतिका मेघनाटन साहेवका हुकुम
'यवाव देना होगा इति ।
है
नकलयवाव
प्रश्नपत्र लिखितजातीयानां शास्त्रानुसारेण स्वीकृतिपत्रद्वारा शपयो भवित
न शक्नोति प्रमाणाभावादिति--
एतद्धर्माधिकरणपसमाधिपतिश्रीयुतमान्तकोयूहेनरीटरम्वलसाहेवधर्मा
धिकरणलिखितैतदग्दीयमेमासीयपष्ठदिवस लिखितविचारपत्रान्तर्गतमभप्रति-
4

व्यवस्था-पत्र-संख्या-७३ २०५ रूपपत्रं यत्तन्मासोयनवमदिने यामदयानन्तरं (मया) प्राप्त तदवलोक्य एवं तत्समर्पितदानपत्रश्च विविन्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यद्येकः कश्चित् हिन्दुजातीयो व्यत्तिविशेषः स्वोपार्जितं सर्वमेव स्थावरं रवपुत्राणां मध्ये एकस्मै पुत्राय दत्त्वा दानग्रहीतुस्तदुपरि श्रायत्तत्वं सम्पादित वान् स्यात्तत्र तदान यदि पित्रा सर्वपुत्रानुमत्या कृतं तदा तदानमहोतुवन्त- रेषु विद्यमानेष्यपि तदर्थ तदानं सिद्ध भवितुं शक्नोति, एवं दातुमरणानन्तरं, दानग्रहीतुओचन्तराणां स्वयोग्यांरामातीच्छा न सम्भवति | यदा च पित्रा तहानं सर्चपुत्रानुमत्या न कृतं तदा तद्दानग्रहीनुर्धात्रन्तरेषु सत्नु तदर्थ तदानं सिद्ध भवितुं न शक्नोति, एवं दातुर्मरणानन्तरं दानग्रहीतुरन्तराणां स्वस्व- योग्यांशप्राप्त्यर्थ तत्प्राप्तीच्छा सम्भवत्येव, यतः सर्वपुत्रानुमति विना पितुः स्वार्जितस्थावरस्यापि दानकरणक्षमताया अभावेन ग तत्कृतदानेन तेषां तत्र स्वत्वविच्छेदाभावात् । प्रकृते तु प्रभुसमर्पितदानपत्रेण तद्दाने दानग्रहीतु. भ्रवन्तराणामनुमतेरनवगमाघ । अत्र प्रमाणम्- स्थावरेतु स्त्राजिते पित्रादिप्राप्ते च पुत्रादिपारतन्त्र्यमेव-इति मिचा- क्षरा(पृ. २००)वीरमित्रोदय ख. पृ० ५३२ व्यवहारमाधव पृ० ३३२) व्यवहारकौस्तुभादिग्रन्थलिखनम् ॥ १ ॥ स्थावरं द्विपदं चैव यद्यपि स्वयमर्जितम् । असम्भूय सुतान् सर्वान् न दानं न च विक्रयः ।। ये जाता येप्यजाताश्च ये च गर्भ व्यरस्थिताः। वृत्ति तेऽपि हि कांक्षन्ति न दानं न च विकयः||-दति उपरिलिखित. ग्रन्यधृतव्यास मिता पृ० २००)वचनद्वयञ्चेति ॥ २॥ १. विद्यमाणे-व्यप। २. रथारादी तु स्वामित मित्रादिपरम्परामा पुत्रादिपारतन्यं तुल्यमेवेति पाठः वीमिया १८६ व्यवस्थापन संख्या-७३-७४ द्वितीयप्रश्नस्योत्तर--- यद्यप्येकस्य कस्यचित् हिन्दुजातीपस्य पञ्चपुत्राः, एतेषां मध्ये या सभ्यो भ्रातृभ्यः कनिष्ठ श्रासीत् सोऽन्यः, एवं स एव व्यक्तिविशेषः स्वोपार्जितम- स्थावर सव्य रस्त शवभिन्नेभ्यः रयस्थशरीरेभ्यवराय पुत्रेभ्योऽदया -स्वोपार्जितं स्थावरं वस्तु यन्मूल्यद्वारा चतुर्णा पुत्राणाम् एकैकपुत्रांशास्था- वरधनांशात तुल्यं न्यून या भवति, तदन्धपुत्राय तदृष्ट्वा दत्तवान् । श्रयं च स्वयं धनोपार्जनाक्षमः । वापि सर्मपुत्रानुमत्या दत्तञ्चेत् सिद्धपति, -नो चेन सिद्धय ते, इति पश्चिमदेशान्तर्गतरामगडजिलास्यान्तरदेश- चलितमितादरापीरमिनोदयन्यवहारमामव्यवहारपौलुभादिअन्यानुसारिणी -व्यवस्था। अत्र प्रमाणानि श्रीएयुपरिलिखितान्येव ॥ ३॥०॥ ॥ ॥ श्रीर्जपक्तिराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ७४ रोधकारि मिसिल पादालत देखोयानि मदर तारिख २७ माह माइ सन १८२६ ईमतावक १५ माह ज्येष्ठ सन १९९६ पाइला रोज चुधवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत अलियस 'नसष्टर साहेवेर बैठके। हलधरमुखोपाध्याय श्रापिलाएट अन्नपूर्नादेड्या प्रभूति रप्पाडस्टोन श्रापिलाएटेर उकिल मुनशी सोहेन प्रालि ओ स्वयं श्रापि- लाएट हाजिर पासिल, श्री रप्पाहरटानेर उकिल सदामुक पण्डित काहिलिर""आपत्ये हाजिर हइलो ना । एइ मार २५ तारिखेर हुकुमानुमारे ए मकईमा श्रामार बैठके उपस्थित १ सरवशोरिय-TOt व्यवस्था-पत्र संख्या-७४ २०७ 'हइया नालिपि भारजि प्रभृति प्रविनप्सन कोर्टर कागचसकल ६६ लम्बर पर्य्यन्त पडागिया स्थकित छिल,अद्य पुनराय उपस्थित हइया प्रविणसन कोर्टेर वाकि कागजसकल तथाकार फयशला 'पर्य्यन्त ओ प्रापिलेर मजुवात श्रोताहार जवाव पड़ागेल । समस्त कागजेर अनुमोदने यद्यपि रप्पाडण्टानेर मध्ये एक रप्पाडण्ट । अन्नपूर्नादेव्यार लिखा एजाहार प्रापिलेण्टेर दरपेप करा ई १८ (?) ७ शालेर जुन मासेर १२ तारिखेर लिखित २६ लम्बरेर दानपत्र निदर्शनेर सत्यतार प्रति पूर्ण सन्देह हइतेछ । 'किन्तु चूडान्त हुकुम (सादर) होनेर पूर्व ए पादालतेर पण्डित हइते नीचेर विस्तीर्ण हेतुसकलेर विवेचना कारण उचित वोध हइया हुकुम हइल ये प्रविनसन फोटेर नथिर १ नम्बरेर वाङ्गला १२११ शालेर आश्विन मासेर १ तारिखेर लिखित मृत वलराम भट्टाचार्येर लिखा मोक्तारनामा श्रोच्छाविस २६ लम्बरेर दान- पत्र एइ रोयकारिर नकल सहित ए पादालतेर पण्डितके समर्पण करा जाय, ये ऐ निदर्शनसकलेर उपर अनुमोदन करिया, वाङ्गालार चलित शास्त्रानुसारे नीचेर लिखित प्रश्न सकलेर जवाय एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण । प्रथम सोयाल-मुसम्मात अन्नपूर्नार दान सिद्ध बटे कि ना, ओ द्वितीय व्यक्तिगणेर अंशेर सम्मन्थे ताहा प्रसिद्ध होने अन्नपूर्णादेव्यार स्वयं अंश वायत सिद्ध हइवेक कि ना । ओ यद्यपि सिद्ध हय, उहार कि परिमाण अंश हइवेक । द्वितीय ( सोयाल )-बलरामभट्टाचार्येर लिखा मोक्कार- नामा मते मुद्दामालेहेके किछु अंश अशें कि ना,श्रो वलरामभट्टा- चाय॑के ताहार आपन एक स्त्री उहार मृत पुत्रेर स्त्री पो उहार मृत पुत्रेर स्त्री श्री अविवाहिता एक कन्या थाकनेश्रो मुद्दालेहेके अंश देओनेर क्षमता दिल किना इति । १ लिन्दिन शाम्नानु सारुलेर-व्यप० ।

२०८ 'व्यवस्था-पत्र संख्या-७४ श्रीजयतितराम जावच्यवस्था एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतालियमनयरसाहेवधर्माधिकरणलिखि- तैतदन्दीयसतविंशतिदिवसीयमेहमासीयश्चिारपत्रान्तर्गतमप्रतिरूपपत्रमेय तत्समर्पितकोटपिलाख्यधम्माधिकरणनिविष्टपत्रान्तर्गतोनविशत्यवाद्वितवा- नालायैकादशाधिकद्वादशशताब्दीयाश्विनमासीयप्रयमदिवसीयमृतबलराम- भट्टाचार्यलिखितमोकारनामार्यशकएनमेपविशत्यवादितदानपत्रश्च यजु-- नमासीयपमददिने सादघटिकाचतुण्याधिक्यामदये मया प्राप्त तदय. लोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथमप्रभस्योत्तरम्- अन्नपूर्णाकृतदान सिद्धं मवितुं न शक्नोति, यतः प्रभुसमर्पितमोक्तार- নাম্যমাসগৱানবাবিবাহুবহীমুনঘনত্যৱহ্যবিন্যা বয়ে भट्टाचार्य्यस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य मृतस्योत्तराधिकारित्वेन तत्सक्रान्तत्वे. नावगमेन, तस्याश्च स्वेच्छया स्वाभिप्रायेय या गद्धने दानामधिकारात् । अहते तु भुसास्तिदानपत्रेण स्वेच्या स्वाभिप्रायेण च दानावगमात् पल्या विद्यमानायामन्येषामर्याद दुहिनादीनां कपाश्चिदपि पुत्रपौत्रप्रवरहि- वस्य मृतस्य धनेऽधिकारप्रतिपादकपद्गदेशचलितशास्त्राभावेनांशविवेचनाया अनावश्यकत्वादिति- अत्र प्रसाएम-- अपुना रापने भतुः पालयन्ती गुरो स्थिता। मुभीतामरणात क्षान्ता दायादा उ मायुः इति दायभागादि- (दामा पृ० १७१ ) अन्यधृतकात्यायनवचनम् ( कास्मृ० ६२१)121 सीको स्वपतिदायस्तु उपभोगफल स्मृतः। नापहारं सिया कुर्युः पतिविचात् कयधन ।। इति मारतादाहार- शब्दार्थेन यथेष्टदानविनयापनधिकारः इति दायरहस्यमन्यतिखनम् ।।३।। १धनेकाकार-व्यप P- व्यवस्था-पत्र संख्या-७४.०१. २०४ पत्नी दुहितरश्चैव पितरी भातरस्तथा-इत्यायुपरिलिखितग्रन्थधृत- याज्ञवल्क्यवचनञ्चेति (पृ० २१६, २२१३५) ।। ४ || 0 0 0 ॥ ॥ द्वितीयप्रभस्योत्तरम्- बलरामभट्टाचार्यलिखितमोकारनामासंज्ञकपत्रानुसारेण प्रत्यर्थिनः कि- चिदप्यंशत्वेन प्रानु नाईन्ति, तत्सत्रेण प्रत्यर्थिनामंशप्रासिनयोजकस्य तत्स्व- वोत्पत्तिप्रयोजकस्य प्रत्यर्थिन उद्दिश्य बलरामभट्टाचार्यकृतस्य दामादेरनव. गमात् । घलरामभट्टाचार्यस्य पत्न्यामेकस्यां पुत्रवध्यामदत्तायां कन्यायामेक- स्यां विद्यमानायामपि स्वातन्त्र्याद्वाधकाभावाच प्रत्यर्थिनांऽशदानक्षमता श्रासीत्-इति वङ्गदेशचलितदायमागदायरहस्यश्रीकृष्णतफलकारकृतदाय- कमसंग्रहतिवादभङ्गार्णवविवादार्णवसेत्वादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- जुनमासस्य पविशतिदिने शुक्रवासरे घटिकाधिकयामद्ये दत्तेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण लं०२४६६ ७५-रोवकारि मिसिल आदालत देोयानि सदर तारिख ३ माह जुन शन १८२६ ई मतावक २२ माह ज्येष्ठ शन १२३६ वाला रोज वुधवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत अलियम नस- टर साहेवेर बैठके- आकवरराय प्रभृति मोकलेशगण आपिलाएटान् यदुनाथसिह ओ साहेवसिंह प्रभृति रप्पाडण्टान् रप्पाडण्टानेर गध्ये रामप्रतापसिंह एक रप्पाडण्ट हाजिर आसिया ए मकर्दमार सानि तजविजेर प्रार्थनाय एक कितासमो- याल वारानशेर पाठशालार यो कलिकातार कालेजेर परिडत- गणेर दुइ किता व्यवस्था श्रोताहार एक किता इगरेजि तरजमा ओ १७५७ लम्बरेर मकईमा ओ ए मकद्दगा वावत इं१८२३ २१० . व्यवस्था पत्र संख्या-७५ सालेर माइ मासेर १० (तारिखैर) ओ एइ सनेर फेवरओरि मासेर २४ तारिखसकलेर लिखित आखेरि दुइ किता रोवकारिर नकल सम्वलित लं दाखिल करिल । एइ सनेर फेवरोरि मासेर २४ तारिखेर होया ए बादालतेर फयशला सहित पडागेल । यथा रप्पाडएटाणेर सोयालेर उपर चूडन्त हुकुम सादर होनेर पूर्व १७५७ लम्बरेर मकईमा वावत इंरेजि १८२१ शालेर फेवर- श्रोरि मासेर २ तारिखेर होया रोवकारिर लिखित सोयालेर जवावे ए श्रादालतेर एइक्षणकार पण्डित हइते व्यवस्था लोन ओ इहा अवगत हओन ये ऐ लम्वरेर सरेर नथिते ३३ लम्बरे प्रथित ए आदालतेर पूर्वेर पण्डितदिगेर व्यवस्था शास्त्रानुसारे यथार्थ घटे कि ना उचित हइल । अतएव हुकुम हइल ये एइ रोक्कारि श्री ई १८२१ शालेर फेवरोरि मासेर २ तारिखेर होया ए आदालतेर रोक्कारिर लिखित सोयान ओ ताहार जवावे ए आदालतेर पूर्वेर पण्डितगणेर व्यवस्था ओरप्पाडण्टेर दाखिल करा दुइ किता व्यवस्था सहित ए श्रादालतेर एइक्षण- कार पण्डितके समर्पण करा जाय, जे ई १८२१ शालेर फेवर. ओरि मासेर २ तारिखेर होया रोवकारिर लिखित सोयालेर श्रो समर्पित व्यवस्था सकर मजमुनसकलेर अनुमोदने चलित शास्त्रानुसारे व्यवस्था एइ कैफियत सम्पलित, ये पूर्चेर पण्डित- गणेर व्यवस्था शास्त्रेर आज्ञानुसारे कि, ताहार किछु विपर्याय वटे, लिखिया दुइ सप्ताह मध्ये दाखिल करेण इति । जवारव्यवस्था एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतालियमनशष्टरसाहेवधर्माधिकरणलि. खितैतदब्दीयजुनमासीयतृतीयदिवसीयविचारपत्रान्तर्गताशापितं तद्विचारपत्रम् एवमरेजीशन्दप्रतिपाद्यैकविंशत्यधिकाष्टादशशतान्दोयफेवर(रि)मागी- यद्वितीयदिवसीयैतद्धर्माधिकरणलिखितविचारपत्रलिखितप्रश्नप्रतिरूपपत्रं त- दुत्तरश्चैतद्धर्माधिकरणनियुक्ताभ्यां पूर्वपण्डिताभ्यां लिखितं व्यवस्थापत्र व्यवस्था पत्र-संख्या-७५ २११ मेवमेतदम्माधिकरणप्रत्यधिनिविष्टं व्यवस्थादयश यत्तन्माीय कादशदिने पटिकायाधिक्यामद्वये मया प्राप्तं तदवलोक्य विविन्य च याहरामोधो दातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यद्यपि कस्यचित् साधारणसराजकरस्थावरस्य कतिचिदंशिनः प्रयकर्ता- रथ, येपामुपरि रास्थायरसम्बन्धिराजकरदानसंरक्षणाक्षणादिक खमारः स्थितरते, तापदप्रासन्यवहारेवश्यन्तरेषु विद्यमानेष्येवं तेपामनुमति विना' रांजकरदानाय फस्यचिनिकटे रास्सैवरारामकरस्पावरस्य विनयं कृतवन्तः स्सुस्तदा स विक्रयः सिद्धो भवितुं प्रचलितुझ न शमोति, प्रभुकृतप्रभलि. खि तापामवस्थायां सत्यां साधारणस्थावरभने सबपामसिनामनुमति विना एकस्य द्वयोहूनां चा स्वस्वाशयोग्यस्य समुदायस्य या दानापमनवि- कयानधिकागद्, इदानी वेहारदेशप्रचलित मन्येषु प्रमुसमर्पितवाराणस्यधिकरः एकपाठशालास्थररितलिखितव्ययस्थापने कलकत्ताख्यमहानगरबन्धि'- पाटालात्यपण्डितलिखितव्यवस्थापने चामासन्यवहारेषु धेश्यन्तरेषु सत्सु प्रासन्यवहारैरंशिभिः साधारणसराजकरस्थावरसमुदायस्य स्वस्वांशयोग्यस्य वा राजकरदानार्थ विक्रयः कचुं शक्यते, तैध कृतो विक्रयः सिद्धो भवितु शमोतीत्येतविधायकस्य प्रमाणस्यालिखितत्वाच, शास्त्रानुसारेण बालकाना- गर्यादप्रासन्यवहाराणां धनस्य राजतोमावेग राशो रक्षकत्वेन राजकरदानार्थ. मप्राप्तव्यवहाराणां विक्रयरय मयितुमरास्यत्वाच'-दति वेदारदेशचलित. मनुमिताक्षरामितातराटोकामुबोधिनीवीरमियोदयव्यवहारमाधवव्यय हारमयू. खन्यवहारकौरतुमादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । एवञ्चैतद्धम्माधिकरणनियुक्ताभ्यां पूर्वपरिडताभ्यां पूर्व या व्यव- स्था दत्ता सा बहारदेशचलितशास्त्र सिद्धव । नहि नस्यां व्यवस्थायां कश्चित्तद्- अतिक्रमोप्यस्ति इति अगस्तिमासस्य चतुर्थदिने घटिकाधिकयामद्वये मयेय व्यवस्था दत्तेति । १. करयनितम्या." २.वेशामतिमतिम्निपना.-या। ३. यो-यप०1 ४. संवधि-व्यप०॥ ५. स्थावरस्थ-व्यप० । .६.०मशफाचाय-या २१२ व्यवस्था-पत्र-संख्या-४५-७६ अन प्रमागम- स्थावरस्य समस्तस्य गोप्रसाधारणस्य च । नैकः कुर्यात्कयं दान' परसरगतं विना ।।- इति घोरमित्रोदयादि- (पी० मि० ख० ० ५८६ ) अन्यधृतव्यासपचनम् ॥ १॥ अयिभक्तेषु द्रव्यस्य मध्य गत्वादेकस्यानीश्वरत्वात्सर्वाभ्यनुज्ञा अवश्य कार्या, विभक्तेषु तृचरकालं विभक्ताविभक्तसंशययुदासेन व्यवहारसौक- र्याय सर्वाभ्यनुज्ञा, न पुनरेकस्थानीश्वरत्वेन । अतो विभक्तानुमतिव्यतिरेफे- पापि व्यवहारः सिद्धपत्येव-इति मिताक्षरा(पृ०२००) ग्रन्लिखनम् ॥१॥ अगापि त्वविभक्तानुजामन्तरेण दानाधसिद्धिः साधारणलाद' द्रव्यस्य । विभक्तानुमतिव्यतिरेकेणापि दानादिकमुपपद्यते इत्यादि मिता. भराटीकामुबोधिनी (पु० ६११) अन्यलिखनम् ॥ ३ ॥ पालदायादिकं विय लावद्राजानुपालयेत् । यावत्स स्यात् समावृत्तो यावयातीतशैशवः ।।दनि मनु(२७) वचनञ्चेति ॥४॥10॥1॥ श्रीग्नयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रण ०२५५३ ७६-रोवफारि मिसिल आदालत देनोयानि सदर तारिख ४ माह आगस्त सन १८२६ ईमतावक २९ माह श्रावण सन १२३६ वागला रोज मङ्गलवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत धाव- रट हालडन राटरि साहेवेर धैठके -- २.दायप। १. मध्यस्थन्वार--मिता ३. साध्यापार-व्य ५.रायप।

- ज्यवस्था-पन्न-संख्या-७६ २३ जयरामधामि स्वयं उछि प्रकारे मृत वखेरि- धामिर स्त्री दिपु धामिनिर श्रमाप्तव्यवहार पुन रामचन्द्रधामिर पक्ष- आपिलाएट- मुशनधामि- रप्पाइएट- आपिलाण्ट स्वयं श्रो रप्पाडएटेर उकिल मौलवि गोलाम एजदानि हाजिर आसिल । एइ सनेर जुन मासेर ३० तारिखेर ह. ओया जेला वेहारेर जजसाहेवेर एक किता रिटरण, ताहार सम्ब- लित रोवकारि प्रभृति पीचिया अद्य एइ मकईमार नथि सम्वलित रोवकार हइया जिलार श्रादालतेर कागजसकत १ लम्वर हइते तथाकार फयशला पर्यन्त प्रो प्रविनशन कोर्टर कागजात फय- शला सहित श्रओ ए श्रादालतेर समस्त कागज ईराजि २८२७ शालेर आगस्त मासेर २५ तारिखेर होया एइ आदालतेर पूर्वर द्वितीय हाकिम श्रीयुत कोरटनि इपमिट साहेवेर ओ इं० १८२८ शालेर १५ सेतम्बर मासेर लिखित ए आदालतेर हाकिम श्रीयुत फटवरट थरलेन सिती साहेवेर रायसकलेर सम्वलित पडागेल । ये हेतुक ए मकद्दमाते स्वीलोकेर पक्ष हइते पोप्यपुत्र राखा जाओन विशये जेलार प्रादालतेर नथिर गृथित व्यवस्थासकल ओ ए पादालतेर पण्डितगणेर व्यवस्थार मध्ये एइ प्रकार अनक्य हइ- याछे ये जिला वेहारेर पादालतेर नथिर व्यवस्था लेखा आछे थे 'स्त्रीलोके स्वामिर विना अनुमतिते पोध्यपुत्र राखनेर क्षमता राखे ओ ए पादालतेर पण्डितगणेर व्यवस्थाय लेखागियाछे ये स्त्रीलोक -स्वामीर अनुमतिव्यतीत पोष्यपुत्र राखार क्षमता हवेक ना। अत- एव चूडान्त हुकुम सादर होनेर पूर्व बेहारदेशेर चलित शाख श्रो धामिदिगेर वसेर डाँडा श्री व्यवहार ये यद्यपि कोन स्त्रीलोके 'पतिर अनुमति व्यतीत पोष्यपुत्र राखिया थाके, ऐ पोष्यमुत्र शास्त्रानुसारे उहारदिगेर वंशेर डाँडा ओव्यवहार दृष्टे सिद्ध हइ- १ क्षमता ना हरयर २ होरेर--न्या०।१ तेर दांडाया।

२१४ व्यवस्था-पत्र संख्या-७६ याछे कि ना-अवगत होना आवश्यक हइया हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे ये ऐ जिलार जजसाहेब साकिम ऐ जिलार तिनचारिजनप्रधान पण्डितगणेर द्वाराय वथाकार चलित शार आज्ञा सकल ओ धामिगणेर घंशेर डाँडा ओ व्यवहार परेर लिखित प्रकारे तहकिकात् करिया ये साव्यस्त ह्य ताहार- कैफीयत लोयाजिमा कागजसकलेर सम्बलिन, ओ यद्यपि कखनो धामिरदिगेर पोष्यपुत्र विषय याहा पतिर अनुमति व्यतीत राखियाछे, अन्य कोन एक मकईमा ऐ जिलार आदालते उपस्थित ओ निष्पत्ति हइयाथाके सेइ मकईमार आशल रोयदाद- ओ पाठाएन एक मास मेयादे परिसिप्टर लेफाफा जेला वेहारेर जजसाहेवेर निकट पाठान याय, श्रो एइ रोयकारिर द्वितीय नकल.एड कारण ए आदालतेर पण्डित वैद्यनाथमिधेर हामओ. याला कराजाय ये ऐ पण्डित एइ कथासकलेर जवाव ये पद मक- ईमा वापत ताहान दाखिल करा व्यवस्था भो जेला चेहारेर आदा- लतेर नथिर गृथित व्यवस्थासकले ये ये अन्धेर नामसकल लेखा आछे, ऐ सफल व्यवस्था ऐ सकल मन्थेर यचनसफलेर मते घटे किना, एइ रोवकारिर नकल पामोनेर तारिख हइते एक सप्ताह मध्ये दखिल करेण इति । एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरावरटहालडनराटरीसाहेवधर्माधिक- रणलिखितैतदन्दीयागस्तिमासीपचनुर्थदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपतिरूप- पत्रं यत्तमासीयचविंशतिदिने घटियकाधिकयामदये मया प्राप्तं तदपलोस्य पाटशवोघो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते । अरमालखितव्यवस्थाया बेहारदेशीयजिलाल्यावान्तरधम्माधिकरणीय म्यवस्थाभिः सह विरोधे इदमेव कारणम्-दत्तकमीमांसादचकचन्द्रिकादचक- दीधितिदचकदर्पणदत्तककौमुदीवीरमित्रोदयव्यवहारमयूसा देदत्तकविषयक मन्थमात्र एव 'न स्त्री पुत्रं दद्यात् प्रतिराष्ट्रीयादाऽन्यत्रानुगानाद् मर्तुंः' इति स्त्रियामलं नुमति विना दचकपुषहणाधिकारनिपेक्यशिष्ठपचनस्य लिखि- तत्वात् परिमधिदपि वेहारदेशचलितमन्ये कस्यचिदपि मुनेताहरु पचन - व्यवस्थापन-संख्या-७६ लिखितं नास्ति तद्वचनानुसारेण स्त्रियाभलनुमति विनापि दत्तकपुत्रग्रहणा- धिकारो मवेत् । यद्विषयस्य मुनिवचनेन ग्रन्थमात्र एव निषेधो लिखितः स विषयः शास्त्रानुसारेण सिद्धो भवितुं न शनोति । एवं जिलाख्यधर्माधि- करणीयपत्रजावान्तर्गताश्चतसो व्यवस्थास्तासां प्रतिरूपाणि, एवञ्च मिलि- वा सप्तव्यवस्थासु च पहोरभट्टलिखितपञ्चविंशत्यकाशितव्यवस्थायां द्वात्रिं. शदकाशितव्यवस्थायां च मनुमति विनापि स्त्रिया दत्तकत्वेन गृहीतः पुत्रस्त्यस्तुं न शक्यत इति यत्तेन पण्डितेन लिखितं तमशास्त्रसम्मतं भवति । यस्मिन् विषये यस्याः खियाः सामथ्यं नास्ति तया कृतः स विषयो निवृत्तो भवितुं न शक्नोत्यर्थात् सिद्धो भवितुं शझोतीत्येतद्विधायकशास्त्राभावात् । एवं याज्ञवल्क्यस्य गुनेरिदं वचनं "यदि काचित् स्त्री पत्यनुमति विना फस्यचिद- तकपुत्रत्वेन ग्रहणं कृतवती' स्यात्ताण स्त्री स्वयं तं दत्तकपुत्रं त्यातुन शक्नोति । अनुमत्यभावेन यदि यस्याः पतिस्त्यक्तुमिच्छति तदा स दत्तकपुत्र- स्त्यको भवितुं शक्नोति" इति पञ्चविंशत्यवाद्वितव्यवस्थायां यत्तेन पशिडतेन लिखितं तददीवनिम्मूलं याज्ञवलयस्य मुनेरन्यस्य कस्यचिद्वा मुनेरेतादृशार्थ- प्रतिपादकवचनामावात् । अथ च पञ्चविंशत्याङ्कितलीलाधरपण्डितलिखितव्यवस्थायां पूच्वं यत्, प्रभुप्रभस्योत्तरे पतिपुत्रविहीना श्री रीत्यनुसारेण शास्त्राशानुसारेण (च) दत्तकपुत्रं ग्रहोतुं शक्रोति ससिद्धो भवति इति यल्लिखितं तत्र शास्त्राचाया श्रयमयों विवादचन्द्रवियादचिन्तामणिकल्पतरुप्रभृतिग्रन्थेषु लिखितः-स्त्री पत्युरनमत्या, यदि पतिर्नास्ति तदा ज्ञात्यनुमत्या, दत्तकपुत्र कत्त शनोति स सिद्धो भवति इति यत्तेन परिडतेन लिखितं तदतीवाशुद्धं मिथिलादेशचलि. तविवादचन्द्रविवादचिन्तामणिकल्पतरप्रभृतिग्रन्येष्वपि “न स्त्री पुत्रं दद्यात् प्रतिग्रहीयाद्वा" इत्यत्र "अनुज्ञानाद्भर्तुः" इति निया भर्तृनुमति विना दत्तकपुत्रग्रहणाधिकारनिषेधकवशिष्ठवचनस्य लिखितत्वात् । पत्युरमावे शत्य- १.लिसिब-न्यर ४ विहिना-न्यप०॥ ७.साव्यप०1 २, प्रतिरूप-पर ५. धानानु०-व्यप० । ३.कृत-व्यप॥ ६. गृहीतुं -म्यप . व्यवस्थापत्र संख्या-७६ नुमत्या स्त्रिया दत्तकपुत्रो ग्राह्य इत्यस्यालिखितत्वाद् परं वदन्तर्गतमिथिला- देशचलितविवादचिन्तामणिग्रन्ये दत्तामदानिकप्रकरणे "विशेपेण भलं नुमती सत्यामपि स्त्रिया दत्तापुत्रमाणे नाधिकारस्तदङ्गव्याहृतिहोमवाधादितिवर्तुः लाः इति लिखितत्वाच । एवं जिलाख्यधम्माधिकरणीयपनजातान्तर्गत व्यवस्थासु यद्यग्रन्थानां नामानि लिखितानि सन्ति ताः सवां एव व्यव- स्थास्तचगन्यधृतमुनिवचनानां धम्मता न भवन्ति; यतस्ततद्ग्रन्येषु सधैवे- पान्येषु मन्थनातेभ्यपि विशेषेण "न स्त्री पुत्र दद्यात् प्रविग्रहोयाद्वाऽन्यत्रा- नुशाना भ" इति स्त्रिया भनुमति विना दत्तापुत्रग्रहणाविकारनिषेधक- वशिष्ठवचनस्य लिखितत्वात् । कस्मिंश्चिदपि वेहारदेशचलितमन्ये वेहार- देशीयजिलाख्यावान्तरधर्माधिकरणीयव्यवस्थानु वा कस्यचिदपि मुनरेता- दृशं वचनं लिखितं नास्ति यद्यचनानुसारेण स्त्रिया भत्रनुमति विनापि दत्त- कपुत्रग्रहणाधिकारो भवेदिति। अत्र प्रमाणम्- न स्त्री पुत्रं दद्यात् प्रतिगृहीयादाऽन्यत्रानुज्ञानाइ-इतिदत्तक मीमांसा(पृ. ७)दत्तकचन्द्रिका(४० ३)दत्तकदीधितिदत्तादर्पण(पृ० १ पं० १२)दत्तकौमुदी(पृ. १ क, पं० १२ )वीरमित्रोदयव्यवहारमयूख- विवादचन्द्रविवादचिन्तामणिकल्पतरुपतिप्रत्यकृतशिवचनम् ॥१॥ अत्र'च निमित्तं भनुज्ञानं, ततश्च विधवाया भत्त भावेनानुज्ञानास- म्भवानिनिमित्तकप्रतिप्रसवात्या प्रापकान्तराभावाच नाधिकारः इति सळवादिसम्प्रतिपन्नमेव-इति दत्तकमीमांसामन्थलिखनम् (१० १२-१३) ॥२॥ भनुज्ञानेऽपि लिया न ग्रहणाधिकारः, तदङ्गव्याहृतिहोमबाधा- दिति वर्तुलार्थः। ननु 'अन्यत्रानुज्ञानाद्भर्तुः' इत्यविशेषेण श्रवणाद् भरत नुहादानवन् महणेऽपि स्त्र्यधिकारसिझौतदहाविद्याप्रयुक्तिरपि तस्याः कल्पते,इति चेत्,सत्य सहतेन तस्या अधिकार इष्टिवन पृथकत्वेन याघसा- पेक्ष्यविध्यापत्तेः-इति विवादचिन्तामणिग्रन्थलिखनञ्चति ॥ ३॥ १तत्र-इनमी। . -- च्यवस्था-पत्र संख्या-७६-७७ २१७ शीतम्बरमासस्योनविंशतिदिने घटिकैकाधिकयामदये मयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण -- ७-रोवकारि मिसिल आदालत देओयानि सदर तारिख २८ माह आगस्त शन १८२६ ई मतावक ३ माह भाद्र शन १२३६ पागला रोज मङ्गलवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत रावरट हाल- डन राटरी साहेवेर वैठके । सिओवकसमिछर चनाम देविप्रसादपाडे प्रभृति सारलेर उकिल मुनशी होसेन प्रालि हाजिर आसिल । पर- गणे घेसुवार मौजे पलाण एडिहार श्रद्धेकेर उपर आमल ओ दखल देयाइया पाओनेर मकद मार गुण सदर जमा ६०३ टाकार शंख्याय खास प्रापिल मन्जुरिर प्रार्थनाय ५० टाकार मूल्येर इष्टम्प कागजेर उपर सायेलेर सोयाल, याहा ऐ उकिलेर नामिक उकालतनामा ई १८२७ सालेर माइ मासेर १५ तारिखेर लिखित वारानशेर प्रविनशन कोटेर फयशलार नकल सहित, थाहा ऐ सनेर अक्तुवर मासेर २६ तारिखे दुइ टाकार मूल्येर फेह- रस्त द्वाराय दाखिल हइयाछिल, अद्य दृष्टे आसिल । हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एखने प्रापिलेर सम्पकिय कागजसकल एइ हुकुमे ए श्रादालतेर पण्डित वैद्यनाथमिश्रर हामओला करा जाय- ये ऐ ऐ कागजसकलेर ए दौहित्र मातामहेर दत्त कता सिद्धि होन सम्बलित कोट आपिलेर पण्डितेर व्यवस्था ये ताहार खोलासा मजमुन कोटेर फयसलार लिखा आग्रे, अनुमोदने ऐ ऐ व्यवस्थार सिद्धता ओ प्रसिद्धता लिखेन, यो पण्डितेर व्यवस्था ‘दाखिल होन पर्यन्त सैयद रहमत प्रालिर खास आपिलेर व्यवस्था-पत्र-संख्या-७७ संभोयाल मञ्जुर भो नामन्जुर होनेर धूडन्त हुकुम सादर होन स्थकित थाके इति । श्रीजयतितराम् । जवायव्यवस्था एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरावरटहालहनराररिसा देवधम्माधिकर- एलिखिताशरेजीशब्दप्रतिपाद्योनत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयागस्तिमासीया- धादशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेव तत्समर्पितेतद्विवादविष- यनिविष्टपत्रजातं यत्तदब्दीयदिसम्बरमासीयाटाविंशतिदिवसीयप्रवाशान्त रानुसारेण तब्दीयतन्मासीयत्रिशदिने घटिकात्रयाधिकयामद्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य विविच्य च यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । दौहित्रो मातामहस्य दत्तक सिद्धो भवतीत्येतदर्थप्रतिपादककोर्टापोलाल्य- धर्माधिकरणनियुक्तपण्डितलिखिता व्यवस्था, यस्याः तात्पर्यार्थः फोटा.. पीलाख्ये धर्माधिकरणीयजयपत्रे लिखितः, सा व्यवस्था शास्त्र सिद्धान. भवति । प्रभुसमर्पितपत्रमातेरधिप्रत्यर्थिनो योरेव झएजातीयत्वनिश्चयेन ब्राह्मणनातौ दौहित्रो मातामहस्य दसको भवितुं न शमोतीति शास्त्रे निपे- धाद् इति धाराणस्यादिप्रचलित दत्तकमीमांसादत्तकचन्द्रिकादत्तपदीधिति- दत्तकदर्पणदत्तकनिर्णयादिमन्यानुसारिणी व्यवस्या- अत्र प्रमाणम्-- दोहिनो भागिनेयश्च शूद्रैश्च क्रियते सुतः । भासणादिनये नारित भागिनेयः सुतः कचित् ॥ इति दशमीमांसा (पृ. ५६ )दचकचन्द्रिपा (पृ. ७दत्तकदीधितिप्रभृतिमन्यकृतशोनक- वचनम् ॥१॥ . तथा च मागिनेयपदं दोहिनस्याप्युपलक्षणमेव-इति दत्तकमीमांसा- (पृ०६६-६७ )मन्पलिखनम् ॥ २॥ १. भोराक्ष-यप। २, प्रार्थिनी-यप० । १. समाय-म्यप० ।

व्यवस्था-पन्न-संख्या-58-७८ २१६ तथापि भागिमेयदौहित्रवज विरुद्धसम्बन्धापत्या पुत्रत्वयुद्ध्यनह- मातृपितृन्यमातुलवज च त्रयाणां वर्णानां स्वसमानवर्ण एव-इति दत्तक- दीधितिप्रत्यलिखनञ्चेति ॥ ३॥- त्रिंशदधिकाप्टादशशताब्दीयजानवरीमासीयोनविशतिदिने घटिकाप्रया. घिकयामद्वये मयेयं व्यवस्था दत्तेति - श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण नं०२८२२ ७-रोवकारि मिसिल आदालत देओयानि सदर तारिख १६ माह सितम्बर सन १८२६६ मतावक १ माह आश्विन सन १२३६ याङ्गलारोज बुधवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरट थरलेन सिली साहेवेर वैठके। आनन्दनाथराय आप्राप्तव्यवहारेर उछिगन भवानीप्रसाद- चौधुरि ओ विश्वनाथ चङ्गदार- आपीलाण्टान- राणी जगदम्बा- रप्पाडण्ट- श्रापिलाण्टगणेर उकिल मुनशी होसेन प्रालि, रप्पाउण्टेर उकिल सदासुख पण्डित हाजिर पासिल । ए मकद्दमा पूर्व एइ मासेर ७ ओटओहो १० प्रो १५ तारिखसकले रोक्कार श्रो प्रविनशन कोटेर कागजसकल १ लम्बर हइते तथाकार फयशला पर्यन्त ए आदालतेर श्रारजी मजुधात पो जवाव पड़ागिया. दिवा अवसान प्रयुक्त स्थकित छिल, पुनराय अद्य उपस्थित हइया ए आदालतेर वाकी समस्त कागज एइ शनेर आगस्त मासेर १५ तारिखेर होया ए आदालतेर हाकिम श्रीयुत मान्तेगिओ हेनरि १.परलेत-व्यप० ।

२२० व्यवस्था-पत्र संख्या-2 'टरम्बल साहेवेर राय संवलित पडागेल । तत्पर रप्पाडरटेर उकिल चारि टाका मूल्येर फेहरेस्तेर द्वाराय विश्वनाथशर्मा चङ्गदार ओं भैरवनाथशम्मार जवावेर १ किता नकल ओ वागला अक्षरओ मजमुणेर एक किता दस्तावेजेर नकल लम्वरे दाखिल करिल, दृष्टे श्रासिल। यथा चूडन्त हुकुम सादर होनेर जवाप लोया उचित हइल, अंतएव हुकुम हुइल ये एइ रोयकारिर नकल एइ मकदमा वायत दुइ श्रादालतेर समुदय कागच एइ हुकुमे ए श्रादालतेर पण्डितके समर्पण क(राजाय ये ऐ पण्डित समस्त कागजेर दृष्ट श्रो अनुमोदने एइ विषयेर सोयालेर जवाव ये यद्यपि विरोधीय ग्रामसकल देवसेवा वापत यो ताहार उपर सरकारेर खाजाना मकरर थाके, ऐ प्रकारे देवतार सेवाइत व्यक्तिके ऐ सफल प्राम विक्रय करार क्षमता आथे कि ना, ओ बङ्गदेश चलित शाखानु सारे एमत विक्रय सिद्ध ो यथार्थ घटे कि ना, एइ रोवकारिर नकल पागोनेर तारिख हइते पञ्च दिवसेरमध्ये लिखिया दाखिल करेण इति। जनावच्यवस्था एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटचरटपरलेनसिलीसाहेवधम्माधिकर- रालिखितेतदन्दीयसितम्बरमासीयपोडशदिवसलिखित विचारपत्रान्तर्गतप्रम- प्रतिरूपपत्रमेव तत्समषितेतद्विवादविषयनिविष्टपप्रजातं यत्तन्मामीशष्टादश- दिन यामद्यानन्तरं मया माप्तं, तदवलोक्य विविच्य च याशचौधो जात. स्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते। यद्यपि विवादासदीभूताः सय ग्रामा देवतानां सराजका भवन्ति, तदा देवतायाः सेवाइतव्यक्तिशम्दयाव्यस्य व्यक्तिविशेषस्य तेषामेव मामाणां वि. प्रयकरणे क्षमता नास्ति, एवमेताइविक्रयो यद्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण यथार्थो भवितुं सिद्धो भवितुञ्च न शक्नोति । प्रभुसमर्षितपत्रजातर्विवादास्पदी. . भूताः स प्रामा एतादृशपिक्रयात् पूर्वमेतदर्थमेव नियमिता स्थिताः-यया एतेषां मामायां राजमाबकरं राशे दत्या अवशिष्टतमामोत्सदैवतानां . -- व्यवस्था-पत्र-संख्या- सेवा भविष्यतीत्यरगंमादेतादृशवृतान्ते सति देवतायाः सेवाइतराब्दयाच्यस्य तत्र संरक्षणावेदणादिकर्तृत्वं विना राजग्राह्यकरस्य राशे समर्पणञ्च विना कि. ञ्चिदपि स्वत्वाभावात् तत्तद्ग्रामाणां दानविक्रयकरणक्षमताया दुरापास्तत्वाद, अथ च शास्त्रानुसारेणास्वामितविक्रयस्य दानस्य वा राज्ञा परावर्तनीयवा- च्च-इति यङ्गदेशचलितमनुकुल्लूकमकृतमन्वर्थमुक्तावलीदायभागवि'- वादभनार्णवविवादार्णवसेत्यादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- देवस्वं ब्राह्मणस्वं वा लोमेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा परे लोके गृधोच्छिप्टेन जीवति ।। इति मनुवचनम् (१२२६) ॥१॥ प्रतिमादिदेवतार्थमुत्सृष्टं धनं देवस्वम्-इति मन्पर्थमुतायल्यां कु ल्लूकभट्टलिखनम् (पृ० ४३० ) ॥२॥ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव या। अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः ॥ इति मनुवचनम्। (८1१६६)॥३॥ अस्वामिविक्रय दानमाधिञ्च विनिवर्तयेत् इति विचादार्णवसेतु (पृ०. १३४ )विवादभनार्णवादि( १ विचाभ पृ० ३१७ ख )ग्रन्यवृतकात्यायन- ( कास्मृ॰ पृ० ७६ वचनञ्चेति ॥ ४ ॥ सितम्बरमासस्य पञ्चविशतिदिने प्रयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण परमात्मने नमः-- महामहिमश्नीयुक्तगयनरमेण्टसंस्कृतपाठशालास्थ पण्डितवर्गपु- १ मुक्तवती-व्यप० । २ ०देवतातदर्थ-व्यर० ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-७६ २२२ 4 . . ७-कोनो व्यक्ति थापनसकर तालुकेर मध्ये कोन कोन ग्राम 'देवसेवार्थ देवतार नामे नियमित करिया, किश्चित्काल देवसेवादि कारिया, कनिष्ठ पुत्रके ऐ देवसेवार्थ सकर स्थावर अर्पण पूर्वक 'देवसेवार्थ अनुमति करिया परलोकगामी हयेन । परे ऐ कनिष्ठ पुत्र बहुकाल देवसेवक रूपे प्रसिद्ध थाकिया, ऐ स्थावरेर करग्रहण राजस्वदान देवसेवादि करिया, ऐ स्थावर देवनाम सम्पलित 'आपन नामे दस्तखत करिया विक्रय करेन। ऐ विक्रय सिद्ध हय कि ना। इहार व्यवस्था गौडदेश प्रचलित शास्त्रानुसारे लिखिते 'प्राज्ञा हय इति। देवनाग्ना नियमितस्य सकरस्थावरस्य तद्देवसेवकेन देवनामसंवलितस्व'- मामाक्षितपत्रं कृत्वा कृतो विक्रयः सिद्ध एव । किन्त्वियान् विशेषः-विक्रतुर्यथा फरग्रहणराजस्वप्रदानादिसम्पादकं लोकसिद्धं स्वत्वं तत्रासीत् केनुरपि ताह शमेव लौकिकं स्वत्वं तत्र जातं देवस्वत्वस्य विजातीयतृस्वत्वं प्रत्यबाधक- 'त्वात् , स्वकरोपादानाय राजकृतविक्रये देवस्वत्वस्य ऋतृस्वत्वाबाधकत्ववत् स्वपितृकृतदानाद् विक्रेतृकनिष्ठपुत्रवत्ववद् विक्रयमकृत्वा तस्मिन् मृते तदु. तराधिकारिस्वत्ववच-इति गौडदेशप्रचलितश्रीकृष्णतकालद्वारकृतदाय- भागटीकामिताक्षरामन्थविदाम्परामर्शः॥०॥ राज्यान्तराधिकारिणः सकाशान्टपतिना फ्रीतेऽपि राज्यान्तरादौ विक्रेत. -स्वत्वसजातीयकरमहणोपयोगित्वत्वमेव तत्रास्य जायते, न तु दायप्रतिगृहीत- भूम्यादिवृत्तिस्वत्वसजातीयस्वत्वं तत्रत्यानां तत्र तत्र भूम्यादौ तथाविध- स्वत्वसत्त्वेन तद्विरोधात् तादृशस्वत्वोत्सत्त्यसम्भवात् समान जातीययोः स्वत्वयोब्बिरोधादिति । तथा स्वत्वधारावारणाय सजातीयस्वत्वं प्रतिस्वत्वं विरोधीति सजातीयमितिकरणात् क्रीतप्रतिगृहीतराज्यान्ववर्तिनि ताशस्था- वरादौ केत्रादेः क्रयाद्यधीनस्त्वत्वोत्पादे न व्यभिचार इति च दायभागटीका- कृद्धीकृष्णतर्कालङ्कारलिखनम् । अनेन यस्मिन् द्रव्ये यस्य यादृशं स्वत्वं तेन .तव्यविक्रये ऋतुस्तस्मिन् द्रव्ये ताहरामेव स्वत्वं जायते इति स्कुटमव- १. सम्बलित-व्यप। २. सावयो-यप ३. मेामे-यप०॥ AME व्यवस्था पत्र-संख्या-6-20 २२३ . गम्यते । उच्यते-लौकिकमेव स्वत्वं लौकिकार्थक्रियासाधनवादु ब्रीह्यादिवद्, अपि च प्रत्यन्तवासिनामप्यदृष्टशास्त्रव्यवहाराणां स्वस्वव्यवहारो दृश्यते, झयविक्रयादिदर्शनात् । किञ्च नियतोपायकं स्वत्वं लोकसिद्धमेवेति न्यायवि- दो मन्यन्ते इत्यादि मिताक्षरालिखनम् (पृ० १९७)। एतेन स्वत्वस्य लौकिकत्वात् (देव)सेवकस्यापितत्र स्थावरे विजातीयस्वत्यमस्त्येव । अन्यथा उदासीना अपि तस्यावरस्य करग्रहणादिकं देवसेवाञ्च कुय्युरिति । परमात्मने नमः- श्रीरामचन्द्रशमणाम् । श्रीहरिः शरणम् । नवद्वीपस्थ- महामहिमश्रीयुक्तपण्डितवर्गेपु'- ८०-तत्तद्देवसेवार्थ तत्तद्देवनाम्ना नियमितस्य सकरस्थावरस्य पहुकालकृत- -तत्तद्देवसेवकेन तत्तद्देवतानामसंवलितस्वनामाकितपत्र कृत्वा कृतो विक्रयः सिद्ध एव । तत्र विक्रेतृनिरूपितकरग्रहणोपयोगिराजस्वदानसम्पादक लौकिकस्वत्वसजातीयकतृस्वत्वोत्पत्तौ बाधकामायास जातीयस्वत्वं प्रति स्वस- जातीयस्वत्वप्रतिबन्धकतया देवस्वत्वादेविजातीयतया तादृशस्वत्वम्प्रत्य बाधकत्याद् इति विदुपाम्परामर्शः॥ ॥- अत्र प्रमाणम्- गौडदेशचलितदायभागटीकाकृच्छ्रीकृष्णतर्कालङ्कारभट्टाचार्यलिख- नम्--राज्यान्तराधिकारिणः सकाशान्नृपतिना' झीतेऽपि राज्यान्तरादी विकतृस्वत्लसजातीयकरमहणोपयोगि स्वत्वमेव तत्रास्य जायते, न तु दायप्रतिगृहीतभूम्यादिवृत्तिस्वत्वसजातीयस्वत्वं तत्रत्यानां, तत्र तत्र भूम्यादौ तथाविधत्त्वत्सलेन तद्विरोधात् तादृशस्वसोत्पत्यसम्भवात् समानजातीययोः स्वत्वयोन्विरोधादिति (दाभाटी० ए०१०), तथा स्वत्व- १ यथा ७६ अद्विवे व्यवस्थापत्रे तथा इदाप्यासीदित्यनुमीयो। २ .खजातीय-व्यप! ३ सकाशान्तृप०-व्यप० ।

२२४ . ." श्रीहरिः शरणम् विस्थापन संख्या-८०-८१ धारा(वा)रणाय सजातीयस्वत्वं प्रति स्वत्वं विरोधीति : सजातीयमिति करणात् । नीतप्रतिगृहीतरायान्तत्तिनि तादृशस्थावादी क्रेप्रादेः क्रयाधीनस्वत्वोत्पादेऽपि न व्यभिचारः (दामाटी० पृ० ६) इति च ॥०॥ श्रीहरिः- श्रीजगदीशो जयति श्रीरामलोचनशर्मणाम् श्रीकालिकाप्रसादशर्मणाम् "श्रीहरिः- श्रीहरिः- श्रीराममोहनशर्मणाम् श्रीरघुनाथशर्मणाम् श्रीहरिः- श्रीरामचन्द्रशर्मणाम् श्रीकाशीनाथशर्मणाम् श्रीहरिः- श्रीहरिः- श्रीरामशर्मणाम् श्रीमोलानाथशर्मणाम् श्रीहरिः- श्रीहरिः- श्रीकालीप्रसन्नशर्मणाम् श्रीराधानाथशर्मणाम् श्रीहरिः- श्रीहरिः- थीकालीदासशर्मणाम् श्रीहरिश्चन्द्रशर्मणाम् श्रीरामः- श्रीराममुन्दरशर्मणाम् - विद्यामन्दिरस्थपण्डितवर्गेपु- ८१-कश्चन स्वाधिकृतसकरमामान्तििकयमामान् देवसेवार्थ नियम्य, देवतानाम्ना विख्याप्य, कियत्कालं देवसेवादिकं कृत्वा कनिष्ठ पुत्रं तद्देवसेवाथ तमामाधिकारिस्पेन संस्थाप्य, लोकान्तरं गतः। अनन्तरं तत्कनिष्टपुत्रो देवसेवकत्वेन प्रसिद्धिमवलम्म्य, उग्रामसम्बन्धिफरमहण- न्यवस्था-पत्र-संख्या-८२ २२५ नियमितराजस्वप्रदानदेवसेवादिक बहुकालं कृत्वा, ताामान् देवनामसंव- लितस्वनामाङ्कितपत्रेण विक्रीतवान् । तत्कृततविक्रयः स्वस्वत्वास्पदद्रव्य- सम्बन्धितया सिद्धयत्येवेति विदुषां परामर्श- अत्र प्रमाणम्- अत्रोच्यते । “लौकिकमेव स्वत्वं लौकिकार्थक्रियासाधनत्वात् ब्रीह्यादि- वत्" इत्युपगम्य, “अपि च प्रत्यन्तवासिनामप्यदृष्टशासव्यवहाराणां स्वत्वव्यवहारो दृश्यते, कयविक्रयादिदर्शनात् । किञ्च नियतोपायकं स्वत्वं लोकसिद्धमेवेतिन्यायविदो मन्यन्ते" इत्यादि मिताक्षराद्भिः (पृ०१६७) स्वत्वस्य लौकिकत्वेन स्थिरीकतत्यात्, लोके देवसेवार्थनियमितसकरस्था- वरस्य स्वस्वत्वसंग्रहीतृस्वत्वजनकदानादिदर्शनाव' च स्वस्वत्वध्वंसपरस्व. वोत्पादनरूपदानान्यथानुपपरया, सकरभूमिदेवासेवार्थनियामकदेवसेवक- स्यापि तत्र स्वत्वमिति स्थितम् । म्वत्वस्य च यथेष्टविनियोगप्रयोजकत्वेन द्रव्ये स्वकीयं यादृशं स्वत्वं तादृशस्वत्वजनकदेवसेवककर्तृ कविक्रयसिद्धि- निराबाधेति युक्तिः । तादृशस्थावरस्य करग्रहरणराजस्वप्रदानदेवसेवादि- प्रयोजकतादश विकं तृस्वत्वसके तृस्वत्वोत्पत्तौ तु “पराजितनृपतिराज्या. न्तर्वतितत्तत्पुरुषीयक्रमागतस्थावरादी जयादिना जेतु पतेः करग्रहणो- पयोगिस्वत्वात्पादे तथा फ्रीतप्रतिगृहीतराज्यान्तर्वत्तिनि ताहशस्थावरादी के त्रादेःक्रयायधीनस्तत्वोत्पादेऽपि न व्यभिचारः" इति श्रीकृष्णतर्कालका- रलिखनं (पृ. ६) तुल्यस्थानीयत्वेन प्रमाणम् 11०॥ श्रीहरिर्जयति- श्रीहरि:- श्रीरामरत्नशर्मणाम् श्रीपातीचरणशर्मणाम् श्रीगुरूजर्जयति- श्रीहरिः- श्रीहरनाथशर्मणाम् श्रीजगन्मोहनशर्मणाम् श्रीहरिः- श्रीहरिः- श्रीनाथुरामशर्मणाम् श्रीयोगध्यानमिश्राणाम् २. समफेय-व्यंर० । - १.०सनगृतीतृ-व्यपः ।

२२६ व्यवस्था पत्र-संख्या-८१-८२ श्रीहरिशरणम्- श्रीशङ्करोजयति- श्रीलक्ष्मीनारायणशर्मणाम् श्रीशम्भुचन्द्रशमणाम् श्रीहरिः श्रीविप्पार्जयति- श्रीजयगोपालशर्मणाम् -श्रीनिमाइचन्द्रशर्मणाम् 'श्रीहरिः- श्रीहरिः- श्रीहरिप्रसादशर्मणाम् श्रीगंगाधरशर्मणाम् श्रीहरिर्जयति- श्रीपीताम्बरशर्मणाम् '- दर-प्रथमप्रश्न- यद्यपि कोन व्यक्ति'जामि सम्पत्त' कोन वस्तु ओ एक स्री श्रो दुई कन्या राखिया मृत्यु हय। परे ऐ स्री ऐ दुइ कन्यार प्रतिपालन श्रो श्राविश्यक खरचेर निमित्तेऐ जमिर मध्ये किछु विक्रय करिया मृत्यु हय । परे ऐ दुइ कन्यार अवशिष्ट जमि विभाग करिया लईया एक कन्या आपन अंश आपन भग्निके विक्रय करे। प्रार ऐ भमिर तिन सन्तान । ताहार मध्ये एक घय-प्राप्त, भार दुइ नावालग । एमत स्थले ऐ घेत्या आपन नावालग पुत्रदेर भरण- पोपण ओ श्रावश्यक खरचेर जन्य आपन वयप्राम ओ नापालग ओ स्वामी सकले एकाने थाकिया स्यामि ओ ययप्राप्त पुनर सन्. मतिते ऐ दुइ पुत्र नावालग थाकिते उपरेर लिखित पस्तु पन्धक किम्वा विक्रय करिले शास्त्र सम्मत सिद्ध हइते पारे कि ना इति । द्वितीय प्रश्न- कोन नावालगव्यक्तिदिगेर पिता श्री माता थाकिते नावालग वेक्तिहेर मालिक शास्र सम्मत अन्य केह हइते पारे फिना। १. पक्ष-साधीयान् पाट.। ।

व्यवस्थापन संख्या-२ २२७ ..एइ.दुइ. प्रश्नेर प्रत्युत्तर वचन, ओ,तस्य भाशा इहार पायें लिशिवेन इति,शन १८२९ तारिख १० जुन मो शन १२३६ साल यो त २६ ज्येष्ठ ॥10॥०॥ श्रीजयतितराम् यवावव्यवस्था प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदङ्गरेजीशब्दप्रतिपाद्योनविंशदधिकाष्टादशशता- ब्दीयलवम्बरमासीयद्वितीयदिनसम्बन्धिसोमवासरे माघटिकावयाधिकयाम- द्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यदि कश्चिद्व्यक्तिविशेषः कांचिद् भूमिमेकां पत्नों द्वे कन्ये च संरक्ष्य मृतः स्यात्,तदनन्तरं सैव मृतस्य पनी तयोरेव द्वयोः कन्ययोः प्रतिगलनार्थ स्वकीयावश्यकव्ययायं च तस्या भूमेः किञ्चिद्विक्रयं कृत्वा मृता स्यात्, तद- नन्तरं ते एव द्वे कन्येऽवशिष्ट भूमि विभज्य,गृहीत्वा तयोर्मध्ये एका कन्या, प्रभुरामर्पितविचारपत्रावगतो यस्तदीयावश्यकव्ययस्तदर्थ स्वांशं स्वभगिन्या निकटे विक्रीतवतो स्यात् , एवं क्रयका मगिन्यास्त्रयः सन्तानाः, तेषां मध्ये एकः प्रासव्यवहारो द्वायपासव्यवहारी, एतादृशवृत्तान्ते सति सैव ऋयकत्री अप्राप्तव्यवहारेण स्वपुत्रेणाप्राप्तव्यवहाराभ्यां स्वपुत्राभ्यां च स्वपतिना च सहेकाल्ने स्थिता सती,स्वपत्यनुमत्या प्रासव्यवहारत्वपुत्रानुमत्या च सतोयो- नप्रासव्यवहारयोः स्वपुत्रयोरुपरिलिखितवस्तुनो बन्धक विक्रयं या कृतवती स्यात् , तदा स बन्धको विक्रयो वा शास्त्रतः सिद्धो भवितुं शक्रोति । यथा पुत्रपौत्रप्रपौत्रपर्यन्तरहितस्य मृतस्य धने पल्या उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे नातेऽपि पल्या स्वभरणपोषणाय स्वकीयावश्यकव्ययाथ च तद्धने दानाधम- नविक्रपाधिकार तथा पल्यमाचे दुहिनुरुत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जातेऽपि १. काविन्यप०॥ २. सवाना-ज्य० ।। ३. कन्ययो व्यपः । 1 व्यवस्था-पत्र संख्या-२ २२८ तस्या अप्यावश्यकव्ययाय स्वभरणपोषणार्थ च तद्धने दानाधमनविक याधिकारोऽस्त्येव, सत्यां पुत्रवत्यां दुहितरि दौहित्रस्यानधिकारादिति । अत्र प्रमाणम्- स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः। नापहारं स्त्रियः कुर्य्यः पतिवित्तात् कथञ्चन ॥ इति दायभागा(दाभा पृ० १७२)दिग्रन्थधृतभारतवचनम् ममा०-१३।४७१२४ ) ॥ १ ॥ नापहारं स्त्रियः कुर्य्यः पतिपित्तात्कथञ्चनेति भारतादपहारशब्दार्थन यथेष्टदानविक्रयाद्यनधिकार:-इति दायरहस्पग्रन्थलिखनम् ।।२।। श्रतएव वर्तनाशक्ती आधानमप्यनुमतम् । तत्राप्यशक्तौ विक्रयण- मपि-इति दायभाग पृ० १७३ ग्रन्थलिखम् ॥ ३ ॥ यद्वा पत्नीत्युपलक्षणं, स्त्रीमात्राधिकारेऽयमों योद्धव्यः-इति दाय; भाग पृ० १८४ )ग्रन्थलिखनम् ॥ ४ ॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरो भातरस्तथा-इत्यादि दायभागादि( दाभा पृ० १५१ मन्यतयाशवल्क्य ( यास्मृ० २११३५ )वचनम् ॥ ५ ॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् - जीवति पितरि जीवन्त्यां च मातरि श्रमाप्तव्यवहाराणां धनस्य प्रश्न पत्रलिखितमालिकशब्दवाच्योऽर्थात् सरक्षणकर्ता, अन्यः पथिच्छास्त्रतो भवितुं नाईति, अप्राप्तव्यवहाराणां पिध्यपेक्ष्या मान्यपेक्षया चान्येषां सुहत्त- रत्याभावात्-इति यङ्गदेशचलितदायभागदायरहस्यविवादमार्णकव्यवहार- तत्वव्यवहारमातृकादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । अभावे बीजिनो माता तदभावे तु पूर्वजः।-इति व्यवहारतत्त्वादि- (पृ. ६५)अन्यकृतनारद (नामसं०-२१३५ )वचनम् ॥ १॥ अगरेजीशन्दप्रतिगायत्रिशदधिकाटादशशतान्दोयजानवरोमासोयनवम दिनसम्बन्धिशनिवासरे यामदयानन्तरं मयेयं व्यरत्या दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण अत्र प्रमाणम्- -- व्यवस्था-पत्र-संख्या-३. २२९ + रप्पाडएट ८३ -रोवकरि मिसिल श्रादालत देोयानि सदर तारिख १४ दिशम्बर शन १८२६ ई० मतायफ १ माह पाप शन १२१६ चाङ्गला रोज सोमवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत मान्तकियू हेनरी टरम्बल साहेवेर बैठके-- कृष्णलोचन प्रभृति श्रापिलाण्ट: तारामणिदास्या प्रभृति आफ्लिाण्टगणेर उकिल सदासुक पण्डित, रप्पाडण्टगणेर उकिल मुनशी गोलाम यतुल हाजिर आसिल । एइ मकईमा एइ मासेर हतारिखे आमार वैठके रोक्कार हइया जिलार आदाल- तेर, ओ प्रविशन कोटेर फयसलासकल ओ इं० १८२७ सालेर जानेओरि मासेर १० ओ १८ तारिखेर लिखित ए आदालतेर रोवकारिसकल ओखास आपिलेर दरखास्त,याहामजुवात करार देया जाय, भो ताहार जवाव प्रो ए आदालतेर दाखिल होया अन्य कागजसकल पडागिया स्थकित छिल, अद्य पुनराय रोव- कार हइया जिला ओ कोट आदालतेर नालिसि पारजि प्रभृति कागजात पडागेल । ये उभयेर पूर्वाधिकारि आदित्यराम चारि पुत्र राखिया मरे । प्रथम रामदुलाल ओ राधामोहन ओ गोविन्दप्रसा. देर पिता कृष्णप्रसाद; द्वितीय ए मकई मार पासल मुद्दाश्रालेहे- गण गङ्गावरनाग पो गदाधरनागैर पूर्वाधिकारि देविप्रसाद तृतीय मुद्दइगणेर पूर्वाधिकारि कालिकाप्रसाद; चतुर्थ शम्भुनाथः ओ चारि भ्रातागण श्रापनारदिगेर पूर्वाधिकारिर मृत्युर पर पृथक हइया पितॄत्यक्त वस्तु कण्टक फरिया दखिल हइलेन । ये फातिन कालिकाप्रसाद राधाकान्त नामे एक पुत्र प्रोअन्नपूर्ना नामे एक स्त्री, प्रो मुद्दइगणेर माता राजेश्वरी नामे एक कन्या राखिया मरे । ताहार परे ऐ राधाकान्तह अप्राप्तव्यवहार समये मरिल । श्रो ताहार मृत्युर पर रामदुलाल प्रभृति कालिकाप्रसादेर उच्छि. १, एटक-इति साधीयानपाठः।

व्यवस्था-पत्र संख्या-८२ २२८ तस्या अप्यावश्यकव्ययार्थ स्वमरणपोषणार्थ च तद्धने दानाघमनविक्र- याविकारोऽस्त्येव, सत्यां पुत्रवत्यां दुहितरि दौहित्रस्यानधिकारादिति । अत्र प्रमाणम्- स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः। नापहारं स्त्रियः कुर्युः पतिवित्तात् कथच्चन ॥ इति दायगागा(दाभा० पृ० १७२)दिग्रन्थधृतमारतवचनम् ममा०-१३॥४७१२४ ) ॥ १ ॥ नापहारं त्रियः कुर्यः पतिवित्तात्कथञ्चनेति भारतादपहारशब्दार्थन यथेष्टदानविक्रयाघनधिकार:-इति दायरहस्यग्रन्यलिखनम् ॥२॥ अतएव वर्त्तनाशक्ती आधानमप्यनुमतम् । तत्राप्यशक्ती विक्रयण- मपि-इति दायभाग पृ० १७३ ग्रन्थलिखम् ॥ ३ ॥ यद्वा पत्नीत्युपलक्षणं, खीमात्राधिकारेऽयमों वोद्धव्यः--इति दाय: भाग पृ० १८४ )ग्रन्थलिखनम् ॥ ४॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा-इत्यादि दायभागादि दाभा० पृ० १५१ )अन्यधृतयाशवल्क्य ( यास्मृ० २११३५ )वचनम् ॥ ५॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- जीवति पितरि जीवन्त्यां च मातरि अप्राप्तव्यवहाराणां धनस्स प्रम- पत्रलिखितमालिकशब्दवाच्योऽर्थात् संरक्षणकर्ता, अन्यः कश्चिच्छास्त्रतो भवितुं नाहति, अप्राप्तव्यवहाराणां पित्र्यपेक्षया मान्यपेक्षया चान्येषां सुहत्त- रसाभावात् इति बङ्गदेशचलितदायभागदायरहस्यविवादमलार्णवव्यवहार- तरचव्यवहारमातृकादिमन्यानुसारिणी व्यवस्था । अभावे वीजिनो माता तदभारे तु पूर्वजः।-दनि व्यवहारतत्त्वादि. (पृ. ६५)अन्वधृतनारद (नामसं०-२।३५ )वचनम् ॥१॥ अगरेजोरान्दप्रतिपाद्यत्रिशदधिकाटादशशतान्दोयजानवरोमासीयनयम दिनसम्बन्धिशनिवासरे यामद्यानन्तरं मये व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण अत्र प्रमाणम्- व्यवस्था-पत्र संख्या-८३. २२६ ८३ -रोवकरि मिसिल आदालत देओयानि सदर तारिख १४ दिशम्बर शन १८२६ ई० मतावक १ माह पोप शन १२३६ वाङ्गला रोज सोमवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत मान्तकियू हेनरी टरम्बल साहेवेर वैठके- कृष्णलोचन प्रभृति श्रापिलाण्ट' . :: तारामणिदास्या प्रभृति रप्पाडएट श्रापिलास्टगणेर उकिल सदासुक पण्डित, रप्पाडण्टगणेर उकिल मुनशी गोलाम धतुल हाजिर आसिल । एइ मकर्दमा एइ मासेर हतारिखे आमार वैठके रोषकार हझ्या जिलार आदाल- तेर, यो प्रविशन कोटेर फयसलासकल प्रो इं० १८२७ सालेर जानेोरि मासेर १० श्री १८ तारिखेर लिखित ए श्रादालतेर रोवफारिसकल अोखास प्रापिलेर दरखास्त,याहा मजुवात करार देया जाय, ओ ताहार जवाव ओ ए श्रादालतेर दाखिल होया अन्य कागजसकल पडागिया स्थकित छिल, अद्य पुनराय रोव- कार हइया जिला ओ कोट आदालतेर नालिसि प्रारजि प्रभृति कागजात पडागेल । ये उभयेर पूर्वाधिकारि आदित्यराम चारि पुत्र राखिया मरे । प्रथम रामदुलाल ओ राधामोहन ओ गोविन्दप्रसा. देर पिता कृष्णप्रसाद; द्वितीय ए मकई मार प्रासल मुद्दापालेहे. गण गङ्गाधरनाग ओ गदाधरनागेर पूर्वाधिकारि देविप्रसाद; तृतीय मुद्दइगणेर पूर्वाधिकारि कालिकाप्रसाद; चतुर्थ शम्मुनाथः ओ चारि भ्रातागण आपनारदिगेर पूर्वाधिकारिर मृत्युर पर पृथक हइया पितृत्यक्त वस्तु कण्टक' करिया दखिल हइलेन । ये फालिन कालिकाप्रसाद राधाकान्त नामे एक पुत्र ओअन्नपूर्ना नामे एक नी, ओ मुद्दइगणेर माता राजेश्वरी नामे एक कन्या राखिया मरे । ताहार परे ऐ राधाकान्तह अप्राप्तव्यवहार समये मरिल ! श्रो ताहार मृत्युर पर रामदुलाल प्रभृति कालिकाप्रसादेर उच्छि १.घण्टक-पति साधीयान्पाठः। ..

व्यवस्था-पत्र संख्या- २३० . यत ओ ऐ राधाकान्तेर हेवार एजहारे मृत कालिकाप्रसादेर संम- स्त पैतृक ओ कृत' वस्तुसंकलर उपर दखिल हइलेन । तत्कालिन प्रथमत गङ्गाधरनाग प्रभृति मृत कालिकाप्रसादेर त्यक्त वस्तुर- मध्ये तृतीय अंशेर दाविते, ओ ताहार परे मृत व्यक्तिर स्त्री मुश- म्मात अन्नपूर्णा ओ कन्या मुशम्मात राजेश्वरि ऐ मृत व्यक्तिर समुदाय त्यक्त वस्तुते दखल पाओनेर जन्ये आपनादिगेर सत्वेर एजहारे आदालते नालिश फरिलेन, ओ ई० १८०६ शालेर दिश- म्बर मासेर ३१ तारिखेर जिलार जज साहेवेर तजबिजे रामदु- लाल नाग प्रभृतिर एजहारि हेवा'साव्यस्त होन कारण दुई मकद्दमार मुद्दईगणेर दावि डिसमिप हइल, औ ई० १९१२ सालेर जुन मासेर ३० तारिखें अपिलेर आदालते गङ्गाधरनाग प्रभृतिर मकरमा सम्बन्धे जिलार फेयशला बहाल थकिल, ओ राजेश्वरिर मकदमाय आंदालतेर पण्डित हुइते व्यवस्था लोन परे एई साव्यस्थे, ये कालिकाप्रसादेर मृत्युर पर ताहार त्यक्तं (धन) उहार पुत्र राधाकान्तके अर्श, ओराधाकान्तेर मृत्युर पर मुद्दइगण ईइवें एकजन मुंशम्मात राजेश्वरिर प्राप्तव्यवहार पुत्रगण, कृष्णलो- चन प्रभृतिर स्वत्व हंइया जिलार फयशला वह औं एई हुकुमें डिकरि हाल ये राजेश्वरि श्रीपिलाण्ट आपन अप्राप्नव्यवहार पुत्रगणेर स्वत्वे विरोधीय तालुकेर उपर दखल पाय, ओ मुशम्मति अभपूना राधाकान्तेर त्यक्त वस्तु हइते भरण-पोपणं पाइवेफ इति । ओताहार खास आपिल पण्डितगण हइते व्यवस्था लोन परे एं आदालते नाम र हेइल, ओए मकईमार नालिशेर एइ मूल ज्ञान इल-ये यत्कालिन मुंशम्मावान् अन्नपूर्ण ओ राजेश्वरि कालि- कापसादेर त्यक्त वस्तु दखल पात्रोनेर दाविते नालिश करिलेन। तत्कालिन एई मकदमार मुद्दामालेगण गङ्गाधरनोंग प्रभृति वाङ्गला १२१३ सालेर २० भाद्र मतायक ई०९८०६ शालेर ४ सेत- पर मासेर लिखित ८४ लम्बरे गोथत गङ्गाधरनाग प्रभृतिर मामि- १. कौत-रवि साधीयान् पाठ। २.र-दति साधीयान् पांड व्यवस्थापन-संख्या--३ २३१ पति दुर्गाचरण नामे मुशम्मातान हइते पइ खोलासा मजमुने एक किता एकरार लेखाइयाछे-ये मकद्दमाय' ये परिमान खरच हाइवेक तोमरा दिवा, प्रो.आमरा आदालत हइते डिगरि पाइले कालिकाप्रसादेर त्यक्त हइते आमादिगेर सोल पाना स्वत्व हइते म्यानार कमेर विक्रय कवाला लिखियादिव, श्रो ताहार पर यखन ई०.१८१२ सालेर जुन मासेर ३० तारिख प्रापिल भादालत हइते.ऐ.राजेश्वरिर अप्राप्तव्यवहार पुत्रगण कृष्णलोचन प्रभृतिर स्वत्वे ठिकरि हइन एइ मकहमार मुद्दइगणैर माता मुशम्मोत राजेश्वरि हाइते याङ्गला.१२१६ शालेर १४ पौष मतावक ई० १८२२ सालेर दिशम्बर मासेर २७ तारिखेर लिखित-८५ लम्बरे,गृथित विरोधीयारफम यावताकवाला, ओ ऐ तारिखेर लिखित मवलग २५००.टाका निर्वधे८६ नम्बरेर रसिद लिखाइया ताहार द्वाराय विरोधीय वस्तुर उपर दखिलकार हइलेन, श्रो श्रापिलाएटान, आर्थात मुद्दइगण, ऐ छय पाना रकमेर उपर दखल पाओनेर जन्ये एइ दलिले गङ्गाधरनाग प्रभृतिर नामे नालिस करियाछे ये उहार- दिगेर माता' मुशम्मात राजेश्वरि शास्त्रानुसारे ताहारदिगेर स्वत्व हस्तान्तर फरणेर क्षमताराखित नाओ रप्पाडण्टान ताहार जपावे जाहेर करे ये उहारद्विगेर माता राजेश्वरि नष्ट उद्धार, अर्थात् उहा- हिंगेर स्वत्व स्थिर राखन जन्ये ताहाहइते किछु विक्रय करिलेक अतएव एमत विक्रय शास्त्रानुसारे सिद्धि थाकिबेक इति । ये हेतुक उपरेर लिखितसकल हइते, पष्ट पाछे ये अन्नपूर्णा ओ राजेश्वरिर पक्ष हइते कालिकाप्रसादेर त्यक्तेर सम्वन्धे उहादिगेर स्यत्व दृष्टे ओ केवल श्रादालतेर सरचार जन्ये ८४ लम्बरेर एकरारनार्मा निदर्शन लिखित हइयाछे, ओ ऐ मुशर्मातेर नालिसि मकद्दमाय ई० १८१२ सालेर जुन मासेर ३० तारिखेर लिखित प्रविशन कोटेर डिकरि श्रापिलाएटगणेर स्वत्व दृष्टे हइयाछे, ऐ मुशा- तानेर स्वत्वे हय नाइ ओ इहाओ पष्ट पाछे-ये सरकारेर चलित, १.ये मकक्ष्माय ये माइमाय-व्यप० ।

०२० व्यवस्था पत्र संख्या-३ यत ओ ऐ राधाकान्तेर हेवार एनहारे मृत कालिकाप्रसादेर सम स्त पैतृक ओ कृत वस्तुसकलेर उपर दखिल हइलेन । तत्कालिन- प्रथमत गङ्गाधरनाग प्रभृति मृत कालिकाप्रसादेर त्यक्त वस्तुरे- मध्ये तृतीय अंशेर दाविते, ओ ताहार परे मृत व्यक्तिर स्त्री मुश म्मात अन्नपूर्णा श्रो कन्या मुशम्मात राजेश्वरि ऐ मृत व्यक्तिर समुदाय त्यक्त वस्तुते दखल पाओनेर जन्ये आपनाद्दिगेर सत्वेर एजहारे आदालते नालिश करिलेन, ओ इ० १८०६ शालेर दिश म्बर मासेर ३१ तारिखर जिलार जज साहेवेर तजविजे रोमदु- ला(ल नागं प्रभृतिर एजहारि हेवा साव्यस्त होन कारण दुई मकहमार मुंइंगणेर दावि डिसमिप हइल औ इ० १८९२ सालेर जुन मासेरै ३० तारिखे अपिलेर आदालते गद्गाधरनाग प्रतिर मकमा सम्बन्धे जिलार फयशला वहाल थक्लि ओ राजेश्वरिर मकदमार्य आदालतेर पण्डित हंइते व्यवस्था लोन परे एड साव्यस्थे, ये कालिकाप्रसादेर मृत्युर पर ताहार त्यक्त (धन) उहार पुन राधाकान्तके अशें, श्री राधाकान्तेर मृत्युर पर भुइगण हइते एक जन मुशम्मात राजेश्वरिर आप्राप्तव्यवहार पुत्रगण, कृष्णलो- चन प्रभृतिर स्वत्व हइया जिलार फर्यशला यह प्रो एइ हुकुमे डिकरि हाल ये राजेश्वरि श्रापिलाण्ट आपन अमामव्यवहार पुगणेर स्वत्वे विरोधीय तालुकेर उपर दखल पाय, यो मुशांत अन्नपूर्ना राधाकान्तेर त्यक्त वस्तु हइते भरण पोपण पाइवेक इति । श्रोताहार वास आपिल पण्डितगण हइते व्यवस्था लोन परे ए आदालते नामधुर हइल श्रोए मकरमार नालिशेर एइ मूल ज्ञान हइल-ये यत्कालिन मुशम्माताम् अन्नपूर्णा ओ राजेरि कालि काप्रसादेर त्यक वस्तु दर्पल पाओनेर दाविते नालिश करिलेन । तत्कालिन एइ मकहमार मुहाभालेहगण गङ्गाधरोग प्रभृति वागलो १२१३ सालेर २० भाद्र मतावक ई०१८०६ शालेर ४ सेत म्वर मासेर लिसिव ८४ लेम्बरे गृथित गदाधरनाग प्रभृतिर भमि- १त रवि साधीयान पाल) २-कवि साशयान पाल।

व्यवस्था-पन्न-संख्या-८३ २३१ पति दुर्गाचरण नामे मुशम्मातान हइते एइ सोलासा मजमुने एक किता एकरार लेखाइयाछे-ये मकहमाय' ये परिमान खरच हइवेक तोमरा दिवा, श्रो श्रामराादालत हइते डिगरि पाइले' कालिकाप्रसादेर त्यक्त हइतेः मादिगेर सोल आना स्वत्व हइते स्थानार कमेर विक्रायः कवाना लिखियादिव, भो ताहार पर, यखन इं० १८१२ सालेर जुन मासेर ३० तारिखे आपिल आदालत हइते ऐराजेश्वरिर अप्राप्तव्यवहार पुत्रगण कृपणलोचन प्रभृतिर स्वत्वे डिकरि हइल एइ मकहमार मुद्दइगणेर माता मुशम्मति राजेश्वरि हइते वाङ्गलाः१२१६ शालेर १४ पौष मतावक इं० १८२२ सालेर दिशम्बर मासेर २७ तारिखेर लिखित ८५ लम्बरे. गृधित विरोधीय रकम वापत कवाला, श्रो ऐ तारिखेर लिखित मवलग, १५००.टाका निर्वघे८६ लम्बरेर रसिद लिखाइया ताहार द्वाराय विरोधीय वस्तुर उपर दखिलकार हइलेन, यो आपिलाण्टान, आर्थात मुद्दगण, ऐ छय पाना रकमेर उपर दखल पागोनेर जन्ये एइ दलिले गङ्गाधरनाग प्रभृतिर नामे नालिस करियाले ये उदार.. दिगेर माता मुशम्मात राजेश्वरि शास्त्रानुसारे ताहारदिगेर स्वत्व हस्तान्तर करणेर क्षमता राखित ना ओ रप्पाडएटान ताहार जवावे जाहेर करे ये उहारद्विगेर माता राजेश्वरि नष्ट उद्धार, अर्थात् उहा- दिगेर स्वत्व स्थिर राखन जन्ये ताहाहइते किछु विक्रय करिलेक, अतएव एमत विक्रय शास्त्रानुसारे सिद्धि थाकिवेक इति । ये हेतुक. उपरेर लिखितसफल हइते. पष्ट पाछे ये अन्नपूर्णा ओ राजेश्वरिर पक्ष हइते कालिकाप्रसादेर त्यफेर सम्वन्धे उहाद्दिगेर स्वत्व दृष्टे ओ केवल आदालतेर खरचार जन्ये ८४ लम्बरेर एकरारनामा निदर्शन लिखित हइयाछे, ओ ऐ मुशर्मातेर नालिसि मकदमाय इं० १८१२ सालेर जुन मासेर ३० तारिखेर लिखित प्रविशन कोटेर डिकरि थापिलाण्टगणेर स्वत्व दृष्टे हइयाछे, ऐ. मुशर्मा- तानेर स्वत्वे. हय नाइ ओ इहाम्रो पष्ट पाछे ये सरकारेर चलित १.ये मकदमाय ये मादमाय-न्यप० ।

२३२ व्यवस्था-पत्र-संख्या-८३ 'इनसफल अनुसारे ऐ मुशम्मातानेर मफलसिते नालिस करणेर क्ष्यमता छिल, ओ श्रादालतेर खरचार निमित्तको एवं आपि- लाण्टगणेर प्रतिपालनार्थे उहाद्दिगेर गुजराणेर कोनो हेतुना थाकन प्रयुक्त ८५ लम्बरेर कवालार लिखित मुल्येर टाका देओन विषय ए मकद्दमार मुद्दामालेहेगणेर एजहार विसिष्ट रूपे प्रतिपन्न नहे। केनना आपिलाण्टगणेर पिता रामलोचन वर्तमान थाकने उहा- दिगेर भरण पो पोषणेर भार ताहार पर उचित छिल । उहाद्दिगेर माता राजेश्वरिर पर छिलना । अतएव चूडन्त हुकुम सादर हो- नेर पूर्व ए आदालतेर पण्डित हइते व्यवस्था लोन उचित बोध हइया हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल मकद्दमार कागज सम्ब- लित ए श्रादालतेर पण्डितके एइ हुकुमे समर्पन कराजाय ये उपरे जे प्रकार लेखागेल मकद्दमार अवस्थार पर अनुमोदन परे एवं ८४ ओ८५ लम्बरेर एकरारनामा ओ कवाला दस्तावेजात ओसाक्षि- गणेर एजहारसकल दृष्टे याहा इं० १८२४ सालेर आगस्त मासेर १० तारिखैर होया कोटेर हुकुम मते लोया गियाछे, श्रो एइ दृष्टे ये कोनो करार विक्रयेर दस्तावेज लिखिन कालिन राजेश्वरिर स्वामी रामलोचन, अर्थात् मुद्दइगणेर पिता, जियवान् छिल, यो एवं पूर्वेर मकद्दमार विरोधीय वस्तु हरण कारक व्यक्तिर हस्त हइते निकालन जन्ये सरकारेर आइन मते पूर्वेर नालिश उपस्थित करणार्थे श्रादालतेर किछु खरचार प्राविश्वक' छिल ना- इहार व्यवस्था एक सप्ताह मध्ये लिखेन-ये ऐ विक्रय बङ्गादेश चलित शास्त्रानुसारे सिद्धि वटे कि ना ? इति ।- श्री यतितराम् यवायव्यरस्था एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतमान्तकीयूहेनरीटरम्बलसाहेवधर्माधिक १. भावश्यक-वि साधीरान् शार।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-८३ २३३ रणलिखितागरेजोशब्दप्रतिपाद्योनत्रिंशदधिकाष्टोदराशताब्दीयदिशम्बरमा - सीयचतुर्दशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्रप्रतिरूपपत्रमेव तत्समर्पितेतद्विवा- -दविषयनिविष्टपत्रजातान्तर्गतचतुरशीत्यङ्काङ्कितसंवित्पत्रं पश्चाशीत्यङ्कासित- विक्रयपत्रं, साक्षिणां साक्ष्यपत्रजातं च यत्तदन्दीयतन्मासीयत्रयोविंशतितम दिनसम्बन्धिबुधवासरे घटिकैकाधिक्यामद्वये मया प्राप्त तवलोक्य विविच्य च पाशशेधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रभुसमर्पितविचारपत्रलिखितवृत्तान्ते सति, मृतराधाकान्तत्यकघने 'तपितृदौहित्रत्वेनैतद्धर्माधिकरणार्थिनां कृष्णलोचनप्रभृतीनां स्वत्वे, एतद्ध. म्माधिकरणाज्ञायां जातायामपि तन्मातूराजेश्वर्यास्तद्धनस्वामित्वस्य सर्वथैव दूरापास्तत्वेन, तत्कृतैतादृशप्रभुकृतपनपत्रलिखितविक्रयः सिद्धो न भवति, प्रभुरामर्पितचतुरशीत्यज्ञाङ्कितसवित्पत्रे अन्नपूर्णयाराजेश्वय्यां चेत्येव लिखित -मदीयेतद्विवादे यावान् व्ययो भविष्यति,स भवता देयः, अस्माभिः पोडशाण- .. कपरिमितविवादास्पदीभूतसराजकरस्थावरसमुदायात् पडाणकाः स्वस्वत्य- त्यागपूर्वकं तुभ्यं दत्ताः । अतएवैतादृशनियमलिखनमेवैतक्रियस्य मूलम् । -तत्र च शास्त्रानुसारेणानपूर्णयाः राजेश्वर्या वा तद्धनस्वामित्वस्याजातत्वेन, धर्माधिकरणविचारेणापि तथा पर्यवसानेन च, तत्कृततत्सवित्पत्रस्य तन्नियमानाक्रान्तत्याद्,श्रस्वामिकृतविक्रयस्य शास्त्रानुसारेण परावर्तनीयत्वा- च इति रङ्गदेशचलितमनुदायभागविवादमगार्णवादिग्रन्थानुसारिणी व्यय- -स्था ।। ० ॥०॥०॥ अत्र प्रमाणम्- अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं वा । अतः स तु विज्ञयो व्यवहारे यथा स्थितिः ।। इति मनु(पृ०३०६) वचनम् ||१॥ अस्वामिविक्रयं दानमाधिच विनिवर्तयेद-इति पियादभङ्गाणंवादि (१ विवाभ० पृ० ३१७ सग्रन्यधृतकात्यायन (कास्मृ.१०७६)वचनश्चेति ॥२॥०॥ ०||०॥ १. सचिन-ध्यप०। २. वनपूर्णपा–न्यप० ।

व्यवस्था पत्र संख्या-द३८४ अशोजीशन्दप्रतिपाद्यनिंगदधिकाष्टादशशतान्दीयजानवरीमासीयप मदिने मन्नलवासरे घटिकैकार्घिकयामद्वपानन्तरं मयेये व्यवस्था दत्तति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण. ०८ईशन १८२७. ८४-रोवकारि कोट प्रापिल, एलाका मरसिदावाद, तारिख माहे जानेओरि, शन १८२६ ई, मतावक २७ माहे शन १२३५ वाङ्गला, रोज शुक्रवार काएममोकाम हाकिमश्रीयुत रावट हेनरिः नेटवट साहेवेर बैठकें। वदनचन्द्रसिंह मतालके मरशिदावाद ओ अप्राप्तव्यवहार रामनारायणघोपेर पिता जिवनकृष्णधोप पापिलाएदान राधानाथसिंह रप्पाडण्ट तालुक कमलनयन बाटो प्रभृतिर हिस्याय दखल पायोन- मवलग १३८1८गएडा मकद्दमा। एइ मकहमार मिडिल भिन्न २ तारिखसकले रोक्कार हइया ए प्रादालतेर पण्डित ६इते व्यवस्था लोन परे स्थकित दिल, अद्य पुनराय श्रापिलाएटेर सकिल रामपानराय,रप्पाडएटेर उकिला चैतन्यप्रसादरायेर हाजिरिते ए मकद्दमा उपस्थित हइल | यथा श्रापिलाएटगणेर उकिल एश्रादालतेर परिडतेर व्यवस्थार पर श्रमतायो उचित मत आमारो विश्वास हइल ना। श्री मकदमार व्यवस्था एइये पानाथेर दुइ.पत्र, प्रथम मुरलिमजुमदार, द्वितीय, १ १पाक्त-स्थापक च्यवस्था पत्र संख्या भवानीमजुमदार, ओ एक कन्या ओ दीहिन राखिया मृत्यु इयः श्रो मुरलिर अंश ताहार दौहित्रे पाइयाँछे यो भवानीमजु- मदारेर चारि पुत्र, प्रथम हरगोविन्द, द्वितीय गङ्गाप्रसाद, तृतीय कालीप्रसाद, चतुर्थ रमिप्रसाद छिल । ताहार मध्ये गद्गाप्रसाद नि:सन्तान ओ हरगोविन्द नफर नामें प्रापन एक पुन 'श्रो तिन- कन्या राखियां पितार समझें मरे। तत्परे भवानीमजुमदारेर मृत्युर पर प्रयम कालीप्रसाद, ताहार पर रामप्रसाद निःसन्तान मरे ।' तदपरे ऐ नफरो'निःसन्तान'मरे । तत्परे प्रथम रामप्रसादेरखी; ताहार पर हरंगोविन्देर स्त्री'मरे । ओ हरगोविन्देर दोहिनगए। वर्तमान श्री राधानाथ, ये रामप्रसाद ओ हरगोविन्द प्रभृतीर पितामह कृपानाथेर दीहिन पटे, हरगोविन्देर दीहिगणेर नामे त्यक्त वस्तुरदाविदार हुइल । अतएव उपरेर लिखित अयस्यायंत्यफ. वस्तु'फोन व्यक्तीके अर्श-इहार व्यवस्थाशदर श्रादालतेर पण्डित- गण'हइते लोन आयिश्वक । ए कारण हुकुम हईल ये एई रोयका- रिरनकल इगरेजी चिठीर मध्ये पुरशीनामा ओ सोयाल सहित सदरेद रेजेष्टर शाहेवेर हुजुरे एइ प्रार्थनाय पाठान जाय जे साहेब मौसुफ शदरेर पण्डीतगण हइते ऐ सऑयालेर जबाव लइया एइ. आदालते पाठान, ओ ए मकदमा स्थकित थाके इति । बदनचन्द्रसिंह श्रो गयरह आपिलाण्टा(न) राधानाथसिंह रप्पाडण्ट एंई मंकद्दमार विवरण एइये पानाथ ओपन दुइ पुत्र, अर्थात् मुरलिमजुमदार ओभवानी मर्जुमदार, बार एक फन्या श्रोदौहित्रः राखिया मृत्यु हय। मुरलिमजुमदारेर हिस्या ताहार दौहित्रे पाइयाछ, पार भवानीमंजुमदार मजकुरेर चारि पुत्र. प्रथम हर- गोविन्द, द्वितीय गङ्गाप्रसाद, तृतीय कालीप्रसाद, चतुर्थ रामप्रसाद छिल। ओ चारिजणेर मध्ये गङ्गाप्रसाद निःसन्तान, ओ हर- गोविन्द नफर नाम एक पुत्र श्री तिन कन्या रासिया प्रापन पितार सन्मुखे मृत्यु हय । तदपरे ऐ भवानीमजुमदारेर मृत्युर पर प्रथम .

व्यवस्था-पत्र संख्या-८४ कालीप्रसाद, ताहार पर रामप्रसाद निःसन्तान परलोक हय । सदपरे नफरेर मृत्यु हय । ताहार पर प्रथम रामप्रसादेर त्री, तदपरे हरगोविन्देर स्त्री मृत्यु हय, श्री हरगोविन्देर दौहित्ररा वर्त्त- मान-श्राछे। कृपानाथेर दौहित्र, अर्थात् रामप्रसाद यो हरगो- विन्द पो गयरहेर पितामहेर दौहित्र राधानाथ तेय्य वस्तुर दावि हरगोविन्देर दौहित्रद्विगेर नामे राखे । एजन्ये शदरेर पण्डित- द्विगेर निकट शास्त्रानुसारे व्यवस्था एइ विषय लोया प्रावि- श्वक ! ये उपरेर प्रकरणानुसारे एइ वस्तु के पाइते पारे । अतएव कुरसिनामा दृष्टे इहार यो ए शाषानुसारे लिखेन इति। तारिख ६ जानेमोरि । सन १८२६ इं० । प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्रमेवं वंशावलीपत्रञ्चावलोय यादृशबोधो जातस्तद- नुसारेणोचरं लिख्यते । प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति गङ्गाप्रसादस्य द्वितीयपुत्रस्य निःसन्ता- नस्य भवानीमजुमदारे पितरि विद्यमाने सति. मृतस्य पितृस्वस्वास्पदीभूतघने स्वत्वानुत्पादात्, तदनन्तरं मृतस्य भवानीमजुमदारस्यांशे जीवति पितरि मृतस्य प्रथमपुत्रस्य हरगोविन्दस्य पुत्रो नफरसंशको भवानीमजुमदारस्य सदानी विद्यमानौ तृतीयचतुर्थों दो पुत्रावर्थात् कालोप्रसादरामप्रसादौ च एते त्रय एव समानाधिकारिणो जातास्तत्रापि नफरसंशकस्य मरणोत्तर तत्स्वत्वा- स्पदीभूततत्सितृयोग्यतृतीयांशे तत्पितुहरगोविन्दस्य दौहित्राणामर्याद् राम- -नारायणयदनचन्द्रदोलगोविन्दानामधिकारो, यतो नफरसंशके स्वपितृयोग्य- तृतीयांशाधिकारिएयनपत्ये पनीमारभ्य पितृपय॑न्तानपत्यधनाधिकारिरहिते मृते सति तन्मातुरुचयधिकारित्वेनाधिकारे जाते सति तन्मरणोतरं तद्धने तदु- त्तराधिकारिणामेवाधिकारः, तत्र च वदुत्तराधिकारिणां मध्ये प्रभुसमर्पित- वंशावलीपत्रेण नफरसंशकस्य पितुः प्रपौत्रपर्यन्तस्य पितृदौहित्रात् पूर्व -मधिकारिणोऽसत्वायगमाद् । अथ च विशिष्टांशदये रामप्रसादस्य पितामहक- पानायदौहित्रस्यार्थाद्राधानाथस्याधिकारो यतो रामप्रसादे भ्रातरि जीवति सति मृतस्य कालीप्रसादस्यांशे भ्रातृत्वेन रामप्रसादस्याधिकारे जाते सति वन रामप्रसादस्यैव जातम् । अतस्तस्मिन्ननपत्ये मृते सति तत्स्वत्वास्पदीभूत- व्यवस्था-पत्र संख्या-८४ यावद्धने अर्थाः भवानीमजुमदारस्यांशस्य विधा विभक्कस्यांशद्वये रामप्रसाद स्त्रियाः शास्त्रानुसारेण पतिस्वत्वास्पदोभूतधनाधिकारिण्या नफरसंज्ञके राम- प्रसादनातृपुत्रे मृते सत्यपि जीवन्यास्तस्या मरणोत्तरं तदने रामप्रसादस्य ये उत्तराधिकारिणस्तेपामेवाधिकारः, तत्र च तदुत्तराधिकारिणामध्ये प्रभु- समर्पितवंशावलीपत्रेण रामप्रसादस्य पितामहप्रपौत्रपर्यन्तस्य पितामह.. दौहित्रात् पूर्वमधिकारिणोऽसत्त्वावगमाच्च-इति वङ्गदेशचलितदायभाग. श्रीकृष्णतर्कालकारकृतदायभागटीकाविवादभनार्णवविवादार्णवसेत्यादिग्रन्था- नुसारिणी व्यवस्था ।। ||- अत्र प्रमाणम्- पितुर्दापरते पुत्रा विमजेयुर्धनं पितुः । अस्साम्यं हि भवेदेषां निदोष पितरि स्थिते॥ इति दायभाग(पृ. १३). श्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटीका,(पृ० १३) विवादभनार्णव (२ विवाभ. पृ. ५ क ) विवादार्णवसेत्यादिग्रन्थधृतदेवलवचनम् ।। १ ।। यथा पेतामहे धने पितुः स्याम्यं तथैन तस्मिन् गते तत्पुत्राणामपि, न तत्र सन्निकर्षविप्रकर्पाभ्यां कोऽपि विशेषः-इति दायभाग (पृ. २६) ग्रन्यलिखनम् ॥ २॥ किन्तु पितुरपि प्रपीत्रपर्य्यन्ताभावे पितृदौहित्रस्याधिकारी वोद्धव्यः-- इति दायभाग (पृ० २०८ )ग्रन्थलिखनम् ॥ ३॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । मुजीतामरणात् क्षान्ता दायादा अर्ध्वमाप्नुयुः ।। इति दायभाग्न दि(दामा पृ० १७१ अन्यधृतकात्यायन (कारमृ ६२१ )वचनम् ॥४॥ यद्वा पत्नीत्युपलक्षणम् । स्त्रीमात्राधिकार अयमों बोद्धयः-इति दायभाग (पृ० १८४ ) ग्रन्थलिखनम् ॥ ५ ॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरो मातरस्तथा । तत्सुतः इत्यादि दायमांगादि. (पृ० १५१ अन्यधृतयाज्ञवल्क्य ( यास्मृ० २।१३५ वचनम् ॥ ६ ॥ १क्षन्ता व्यर २ चानम् व्यप०॥

व्यवस्था-पत्र संख्या-४-८५ •एवं पितामहप्रपितामहसन्ततेरपि दौहित्रान्तायाः पिण्डप्रत्यासत्ति- कमेणाधिकारो वोद्भव्यः इति दायभागपृ० २०८)प्रन्थलिखनम् ७|| तदभावे पुनः पितृदोहित्र:- इति श्रीकृष्णतालद्धारकृतदायमागटोका- (पृ०.२१८) रूपग्रन्थलिखनम् ॥८॥ :-सदभावे पितामहदौहित्र:-इति श्रीकृष्णतर्कालङ्कारकृतदायभागटीका (पृ० २१८) रूपग्रन्थलिखनश्चेति.।। ६ ॥ 0 11 0 1 ॥- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण प्रश्न:- ८५--यद्यपि कोन स्रोलाकेर स्वामी वायुमस्त ..अर्थात् वातुल हय । तत्कालीन ऐ वातुल व्यक्तिर पैतृक वस्तु विक्रयार्थे ऐ व्यक्ति 'आपन स्त्रोफे अनुमति' देया, ना देया तुल्य । एमते ऐ स्त्रीलोक आपन श्वशुरेर श्राद्धेर देना परिशोध श्री ऐ यातुल स्वामीर चिकि, सा कारण आपन स्वामीर पैतृक कोन वस्तु ऐ स्वामीर विना अनुमतिते विक्रय करे। ताहा सिद्ध हइते पारे किना । इहार प्रत्युत्तर शास्त्रानुसारे वचन श्रोताहार भापा एइ प्रश्नेर पार्थे, लिखिवेन । इति शन १८२६ शाल, तारिख हमेई । मोतायक “शन १२३६ शाल तारिख २८ वैशाख ।।- श्रीजयतितराम् प्रमुसमर्पितप्रभपत्रमवलोक्य पादशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते । यत्र कस्याश्चित् स्त्रियाः पतिर्मायुमलस्तत्समये तेनैव घायुग्रस्तेन पत्या स्वपैतृकधनविक्रयाय स्वपल्यै अनुमतिदानमदानञ्च तुल्यमिति मत्या सा स्त्री १. मनुमनु देया-या। २. साम्रीय-व्यपा व्यवस्था पत्र-संख्या- ५ शुरस्य अावश्यक भाद्धार्यर्णपरिशोधनार्थम् एवं तस्यैव वायुमस्तस्य पत्युः 'चिकित्याय तत्त्वत्वास्पदीभूतस्य तपैतृकस्य कस्यचिद्वस्सुनस्तस्यैव पत्युरनु.. 'मति विना विक्रय कृतवतो स्यात्तदा स विक्रयः सिद्धो भवितुं शकोति, यतः शास्त्रानुसारेण प्रेतश्राद्धकरणाद्ययं चिकित्सार्थ वा येन केनापि सम्बन्धिना -दासेन वा कृतं तदुपयुक्तमृणं विक्रयादिकञ्च सिद्धयति-इति बनदेशचलि. समनुदायतत्त्वव्यवहारतत्त्वविवादभङ्गार्णवविवादार्णवसेत्यादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था। अत्र प्रमाणम्- 'कुटुम्बार्थेऽध्यधीनोपि व्यवहारं यमाचरेत् । स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान विचालयेत् ।। इति मनु (पृ.८। १६७) वचनम् ॥ १॥ कुटुम्बार्थमशक्ते तु गृहीत व्याधितेऽथवा । उपलवनिमित्तञ्च विद्यादापत्तन्तु तत् ॥२॥ कन्यायेवाहिकञ्चैव प्रेतकार्येषु यत्कृतम् । एतत्सव्वं प्रदातव्यं कुटुम्बेन कृतं प्रभोः ।। इति व्ययहारतत्त्व(पृ. । '६५)दायतस्व( पृ० ३० विवादमलाणवादि(१ विवा १६६ ख )अन्य- घृतकात्यायन( का. रमृ० ५४२-५४३ )वचनम् || ३ || 'अत्रेदमवधेयम् । कुटुम्बमरणादिरूपयादृशयादृशकायें उपस्थिते दासकृतमृणं प्रमुणा शोधनीयमिति प्रतीयते, तादृशताशकार्यनिप्पत्त्यर्थ प्रमुघनविक्रयो सिद्धयति । तदतिरिक्त एव स्वाम्यनुमतपदेन योध्यते-- इति विवादमगार्णवग्रन्थ( १ विवा ३३० क )लिखनञ्चेति ॥ ४ ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १.मावस्यायप। ३. अराक्तेन इनि पाठः न्यत। ५.निमितजामृ । २.परिसोधन-व्यप० । ४. न्याधिवेन इति पाठ व्यत० । ६. कृते-तु-कास्मृ०॥

२४० व्यवस्था पत्र-संख्या-८६- .: ८६-रोयकारि पादालत देओयानि जिला यशर जिला मज-- कुरेर जज श्रीजान वित्रभ्यार्फटविष्ट साहेवेर बैठके सन १८२६ शाल ६ माइ मतावेक संत १२३६ शाल वागला २५ वैशाख रोज बुधवार । . गङ्गागोविन्दसेन फरियादि रामलोचनसाहा आशामि मकईमा डिगरि जारि अद्य फरियादिर उकिल वैद्यनाथ मजुमदार श्री मुनशी माहा. मुद ,छादकै ओ वैद्यनाथ मुनशी ओ श्रोजरदार चित्रामणिर उकिलं गोलकचन्द्र चौधुरी श्री गुरुप्रसाद मुनशी हाजिर हइलेन । हाल सनेर ७ श्रापरेल श्रो २२ मार्च तारिखेर दाखिल हो फरियादिर दरखास्त ओ माहा(जन) मजकुरेर १३ तारिखेर दाखिल होया चित्रामणिर भोजरेर दरखास्त दृष्टि करागेल । यद्यपि ए मकईमार डिगरिजारिर कागज फलिकातार प्रक्निसियान कोट आदालतेर पाठान गियाछे, किन्तु एइ श्रादालतेर प्रस्तुत कागजातेर द्वाराय जानागेल। ए मकईमार विवरणः-एइ ये, आसामि मजकुर फरियादिके जानिन' दिया कोट श्रापक्डेछेर सिरिस्तार कार निकट राजा शशिभूपणदेवराय नावालगेर जमिदारि इजारा लइया, ताहार मालगुजारि परिशोध ना कराते फरियादिर तालुक निलाम हइया इजारार पाकि मालगुजारि ६६००'टाका उसुल हइयाछे । फरियादि ताहार नालिप करिया श्रासामि मजकुरेर पर मवलग मजकुरेर डिगरि पाइयाछे। सेइ डिगरि जारि करिया आसामिर कीर्तिनगरेर वसति चाटीथोनीलेर फुटी श्रो गरु यो घोडा निलाम करिया, मयलगे १०२९४० टाका वमुया पाइयादिल । आसामिर पिता रामजिसाहा विक्रिर वस्तुके आपनार वलिया, निलाम प्रसिद्ध करिवार' दरखास्त करिया- जामिन-साधीयान् पाठः । : २.करियार-भ्यर..

२४१ । व्यवस्था-पत्र संख्या- बिल । ताहाते सदर देशोयानिर हाकिमेरदिगेर विचारे ऐ वस्तुर निलाम प्रसिद्ध हइया फेरियादिके. नालिप करिवार अाशा इ. याछिल ! एमते फरियादि मजगुर नीलेर कुटी यो वमती वाटीर दायिते दुइ लन्चरे रामलोचनशाहा श्री रामजिशाहा दुइजनेर नामे एइ श्रादालते नालिप फरिले । ए आदालतेर पूर्वकार जज सादेवेर विचारे नीलेर फुटी ओ वसति वाटीर अधिपति श्री कर्ता शामि रामलोचनसाहाके-बोध हझ्या करियादिव-दुइ नालिप डिगरि ६इयादिल । परे श्रासामिर पिता गमजिसाहा साहेय मौलफेर फयशलाते नाराज हइया एइ भोजरे प्रापित फरियाछित ये नीलेर युटी, पसति पाटी, मजकुर पामार हक, अामार पुत्र रामलोचनसाहार सहित कोनो विषय नाइ । परे मरेजि शन १८२८ शालेर १७ सेतम्बर तारिस फलिकातारं फोट आपिलेर हाकिमेदिगेर विचारे पद हेतुक पइ आदालतेर दुइ फयशला प्रसिद्ध हइयाछे। ये फुटि यो यसति याटीर प्रति डिगरिर टाकार देन्दार रामलोचनसाहार आधिपत्यता श्रादालते सुस्पष्ट प्रकाश हइलगा। ओ रामजिसादा पापन नामेर एक पाहा यो मोनसफेर तिन केता फयशला कुटि मजकुरेर जायगा आपन साव्यस्त कारण दरपेप कग्लेिका पार पितृ वर्तमाने पितृवस्तु पुनर देनाय विक्रि हइते पारंजा । एइ धणे फरियादि शग १२३५ शालेर फाल्गुण मासे रामलोचनसाहार पिता रामजि सादार मृत्यु हुइयाये, प्रो रामलोचन मजकुर ापन पितार तायत विषयेर सत्याधिकारि हइया बलिया सेइसफल पारन पाप्रोना टिंगरिर टाका उमुलेर जन्य ऐसफल विषय क्रोक थो निलामेर दरखास्त करियाछे। साहाते क्रोटेर हुकुम हइले परे रामलोचन प्रासामिर खी चित्रामणि दरखास्त गुजराइलेक जे आमार श्वशुर रामजिसाहार येकिछु जोतजमा ओ निष्कर भूमि ओ वसति बाटोसमेत् एमारत् ओ नोलेर कुटी ओ तेजसादि अलद्वार आदि स्थावर ो प्रस्थावर प्रापन स्वकत ये करि- ५.

व्यवस्था पत्र संख्या-६ . . याछिलेन ताहा आपन मृत्युर पूर्वे शन १२३५ शालेर १६ माच्च -तारिखे आमाके दान करिया ऐ तारिखमजकुर दानपत्र लिखिया दियाछेनआमार स्वामि रामलोचनसाहा मार स्वशुरेर अवा- ध्य स्थितेन। ताहार देनार जन्य आमार श्वशुरेर दत्त वस्तुपामार हक, ताहा क्रोक विक्रि हइते पारेना। परे तलवानुसारे चित्राम- हिर उकिल शन १२३५ शालेर २६ माघ तारिखेर एक केता दान- पत्र प्रकाश्य रामजिसाहा दातार लिखित चित्रामणिग्रहीतार नामे वाला भाषा भो अक्षरेते लिखित एइ अदालतेर रेजष्टर साहेवेर निशानित दरपेप करिलेक । ताहा दृष्टे फरियादिर उकिल वैद्य- नाथ मजुमदारेर स्थाने जिज्ञासा करागेल ये चित्रामगिर नामेर रामनिसाहार दानपत्रेर सत्यताते तोमार मओकेलेर किछु पाप- त्य आछे कि ना । जवाय दिलेफ ये एमत दानपन लिखित पडिन होयार सम्भव बटे । किन्तु एमत धारार दस्तावेज लिखिवार कारण केवल पामार मोकेलेर डिगरिर टाका जीर्ण करिवेक । चित्रामणिर उकिलेर स्थाने जिज्ञासा करागेल ये रामलोचनसाहा व्यतिरेक रामजिसाहार भार पुत्र श्राछे कि ना । जबाव दिलेक ये रामलोचन भिन्न रामजिसाहार बार पुत्र माइ इति । तजविज हुइलो ये चूडन्त हुकुम प्रकाशेर पूर्वे ए मकई माते एइ कथा ज्ञातो हयोया धावश्यक हइल चे चित्रामणिर दापिल करा दानपान शास्त्रानुसारे सिद्ध हवार योग्य वटे कि ना। ए विषय शाखसदिगेर निकट तिन फवा प्रभ करा उचित हइन । प्रथमनो एइ यद्यपि दानपत्रेर लिखित वस्तु रामजि- साहार स्वापार्जित हय, पार रामजिसाहा ऐ वस्तुर दान विक्रयेर स्वत्साधिकारि करियां पुत्र पौत्र वर्तमान धाफिले ऐ वस्तु आपन :पुत्रवधूचे दान करे, एमत सर्वस्वान्त दानपत्र यथाशास्त्र प्राोर याग्य कि ना। ओ द्विनीयर-यद्यपि सेइ सकल वस्तु रामजि मनकुरार पैदा हय, तवे एमत दान प्रापन पुत्रवधू देया मिद्ध यह कि ना हिनोयत्र-यद्यपि दानेर पस्तुर मध्ये किछु पैनुरू, श्री . 1 व्यवस्था-पत्र संख्या-६ २४३ .. किछु रामजिसाहार स्वकृत हय, ताहा हुइले एमत दीनपत्रेर द्वाराय ताहा हस्तान्तरं करा सम्यक प्रकारे सिद्ध, कि प्रसिद्ध, किम्वा कतो सिद्ध,कतो यसिद्ध । एइ आदालतेर पण्डित श्रीश्रीराम तकालझार विदाय हइया श्रापन वाटी गियाछेन । ए जन्य हुकुम . हइल ये दानपत्र मजकुरेर नकल समेत रोवकारिर नकल सम्ब- लित ओ ताहार वाङ्गला तरजमा इङ्गरेजि लिपि समभिव्याहारे सदर देशोयानि श्रादालतेर हाकिमेरदिगेर निकट पाठान जाय एई प्रार्थनाय ये सदर देयोयानि श्रादालतेर हाकिमेरा अनुग्रह-'. पूर्वक कागजात् मजकुरान ऐ श्रादालतेर पण्डितेरदिगेर स्थाने दिया हुकुम करिवेन-ये एइ मकर्दमार तायत विपयेर पर दृष्टि करिया प्रश्नसकलेर उत्तर शास्त्रानुसारे लिखेन । लेखा होनेर परे ताहार उत्तर एइ श्रादालते अनुग्रह करिया पाठान । पार आदालतेर नाजिरेर नामे परयाना लेखा जाय । नाजिर दोशरां हुकुम प्रकाश हो। पर्यन्त आपन नाएव मपश्चलेर पाठाइया फरियादिर दरखास्तेर निचेर लिखित वस्तु माफिक यावेता क्रोक फरिया, एक जम् पेयादा ताहार रक्षार्थ नियुक्त करे, ये क्रोकी वस्तु स्थानान्तर हइते ना पाय। पेयादार वेतन फरियादिर स्थाने लय । आर एइ मकईमार डिगरि जारिर प्रासल कागजेर नकल ना राखिया कोट आपिल आदालते पाठान गियाछे, श्रार अरि- शादिर' नालिपि मकईमार श्रासल कागज ये ताहाते नीलेर कुटि ओ वसति वाटीते रामलोचनेर स्वत्व आछे-एइसकल कागज दृष्टि करा आवश्यक । एजन्ये पुनराय हुकुम हइल ये एक प्रस्त चुम्बक रोवकारि सेइसकल कागज अनुग्रह मते पाठानेर प्रार्थ- नाय क्रोट आपीले पाठान जाय इति । प्रभुसमर्पितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं दानपत्रञ्चावलोक्य यादृश- बोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- १. फरियादिर-साधीयान् पारः।

व्यवस्था पत्र संख्या-२६ प्रमप्रश्नस्योत्तरम्- यदि दानपत्रलिखितं वस्तु रामजीसाहासंशकस्य स्वोपाजित भवति एवं रामजीसाहासंज्ञका स्वपुत्रप तस्तुनो दानविक्रयस्यामिनी कृत्वा पुत्रे विद्या माने पौत्रेषु च विद्यमानेषु सय पनं तस्यै दत्तञ्चेत्तदा वदानं प्रमुसमर्पितवि- चारपत्रदानपत्रोमयलिखितवृत्तान्ते सति राम्रानुसारेण छलफ़्तत्वेन कोप- कृतत्वेन च सिद्ध भवितुं न शक्नोति, शास्त्रानुसारेण क्रोधकृतदानस्य छल- कृतदानस्य च राज्ञा परावर्यत्वात् । प्रभुसमर्पितविचारपत्रदानपत्रोमयलि- खितवृत्तान्ते सति एकमात्रपुत्रस्य पितुर्व्यवहारयोग्ये तस्मिन्नेकरिमन पुत्र विध- माने श्रमाप्तव्यवहारेषु कतिएयेषु पौत्रेषु विद्यमानेष्वपि तेपामनाच्छादनोप- युक्तं धनमसरदर स्वपुत्रवध्यै व्यवहारिकतादृशादेयसचवदानस्य छला- दिक विना असम्भवाच । श्रतएव तत्प्रमाणभूतं तदानपत्रमपि शास्त्रानुसा- रेण माह्य भवितुं न शक्रोवीति /- अत्र प्रमाणम्- योगाघमनविक्रीतं योगदानप्रतिमहम् । यत्र याप्युपधि पश्येत्तत्सव्वं विनिवर्तयेत् ।। इति मनुवचनम् (८, अदत्तन्तु भवनोपशोकवेगरुगन्वितैः ।। तथोलोचपरीहासव्यत्यासछलयोगतः। --इत्यादि विवादार्णवसेतु- (४० १५२) विवादमझायादि ( ६ विवाभ० पृ. ४८५ ख अन्यधृत- नारद(नाम सं० ६वचनम् ॥ २ ॥ एवं यत्र धनिकादिप्रतारणार्थ स्वकीयद्रव्यमान्यायति अपने दमिति तत्रापि दानासिद्धिः-रत्यादि विवादभाव(१ विवा ४८५ ख) लिखनम् ॥ ३॥ १०हजान्वित:नाम, गन्नित:

व्यवस्था पत्र संख्या-८६ २४५ स्वं कुटुम्बाविरोधेन देयं दारसुताहते । नान्वये सति सर्वस्वं यच्चान्यस्मै प्रतिश्रुतम् ॥ इति विवादार्णव- सेतु (४० १४८ ) विवादभनार्णवादि( १ विवा० ४४५ ख )अन्यधृतयाज्ञ- यल्क्य( याज पृ० २४४ )वचनञ्चेति २।१७५ ॥ ४ ॥ द्वितीयप्रभस्योत्तरम्- यदि च तदेव सर्व वस्तु रामजीसाहासंज्ञकस्य पैतृकं भवति तदा स्व- पुत्रवधूमुद्दिश्यैतादृशदानं प्रयमप्रभोत्तरलिखितप्रकारेण छलकृतत्वात् कोप- कृतत्वात् पैतामहे स्थावरादौ पुत्रपौत्राद्यनुमति विना पितुरेतादृशदाने प्रभु स्वाभावाच सिद्धं भवितुं न शक्नोति । अत्र प्रमाणम्- उपरिलिसितप्रमाण चतुष्टयम् ॥ ४॥ मणिमुक्ताप्रपालानां सर्वस्यैव पिता प्रभुः॥ स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः।। इति दायमागादि(पृ. ३३ अन्यधृवयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥ ५ ॥ पितामहश्रुतेस्तद्धनविषयं वचनम् । मणिमुक्ताद्युपादाय पुनः सर्व- स्येति वचनात् सर्वेषां भूम्यादिव्यतिरिक्तानां दानादिषु पितुः प्रमुत्यं न स्थावरनिबन्धद्व्याणाम् इति दायभाग (पृ० ३३) ग्रन्यलिखन. चेति ॥ ६॥ तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि दानकृतवस्तुपु किञ्चिद्रामजीसाहासंशकस्य पैतृकं किश्चित् स्वो- पार्जितं भवति तदेताशदानपत्रद्वारा हस्तान्तरकरणं सर्व्यस्य यस्तुनस्तदन्त- गंतस्य किञ्चिदरतुनो वा प्रथमद्वितीयप्रश्नोत्तरलिखितप्रकारेण सिद्धं भवितुं न शाकोति-इति वनदेशचलितमनुदायभागविवादभनार्यय विवादास्वसेत्यादि- अन्यानुसारिणी व्यवस्था - १ नेद याशाल्ल्यावनम् , १६६ तमे पृष्ठे मिताक्षरायां चे लभ्यते । २ सर्वस्येत्युदानार-दामा !

व्यवस्था-पत्र संख्या---- श्रत्र प्रमाणान्युपरिलिखितान्येवेति ॥ ६॥ श्रीजयवितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण -- सोयाल- ८७-फरियादियान नन्दकुमारगोस्वामी ओ रामचन्द्र- गोस्वामी दिगर असामी वैष्णवानन्दगोस्वामिदिगरेर नामे हिस्या वावति ५८७ टाकार दाविते १०२६ लम्बरे नालिप करियाछन । फरियादियान आपन आरजिते लिखेन ये फरियादियान श्रीधी- नित्यानन्दजिउठाकुरेर परिवार तावत देशीय वैष्णवसकल श्रीश्री- नित्यानन्दजिउठाकुरेर परिवारेर सासित वैष्णव होन कालीन माला चन्दन इत्यादि जाहा प्रथा आछे उहारा वैष्णव दिग्येदेर, बार ऐ महालेर नाम भावकमहाल । अत्र विपये हाकिमेर विना दलिले नित्यानन्द जिउर परिवारे साम्यक भावे साध्य पाछे,ओ एइ महाल राजदत्त नय । ये ये स्थाने नित्यानन्दजिउर परिवार- सकल वास करिया पाछेन,सेह २ स्थाने जे जे प्रकारेर हिन्दुलोक ओवैष्णवलोक घास करेण । ताहादेर मध्ये ये केह नित्यानन्देर उपर देशीय हन ते हा नित्यानन्देर परिवारेर निकट हाजिर हन इति । आसामि लेखेन जे एइ महाल राजगुरुर शासन। राजदत्त विशयसकलेर एइ महाल राजा हइते राजगुरुके अर्पण श्राछे, ओ भावक महाल कोन समय हइते पाछे, श्रोकि प्रकारे नित्या- नन्देर परिवारके अशिछे, एवं एइ महालेते किम्वाहाकिमेर द्वाराय कोन प्रकारे किछु सम्पर्क पाछे कि ना। यदि भेकाश्रित वैष्णव हइते चाहे से व्यक्तिके नित्यानन्दजिउर परिवार व्यतिरेक अन्य, फेह सेवक करिते पारेन कि ना। एवं यदि स्यात् तावत् देशीय भावकमहाल नित्यानन्देर परिवार सकलेर अंश हइया थाके,आर नित्यानन्दजिउर परिवारेर मध्ये एक स्थानेर परिवार कोन व्यक्ति व्यवस्था-पत्र संख्या-८७ २४७ अन्य स्थानेर परिवारेर सेवक हइते चाहिले सेवक हइते पारे कि ना, ओ ऐ परिवारेर मिन्य स्थानवासी ऐ व्यक्तिके सेवक करिते पारेन कि ना, एवं नित्यानन्दजिउर परिवार ये ये स्थाने यास करिया आछेन ऐ जायगाय उहादिग्येर अधिकार कि। ये ये स्थाने नित्यानन्देर पन्थीय वैष्णवसकल पाछेन ऐसकल स्थान उहा- दिग्येर शासन कि, तावतर्देससकल उहादिग्येर प्रत्यक्ष अंश आले, अर्थात् नित्यानन्देर परिवार केहो सिंहभूगवासी एवं केहो वराह- भूमवासी, इहाते सिंहभूमनिवासी कोन व्यक्ति ऐ चराहभूम- निवासी नित्यानन्देर परिवारेर स्थाने सेवक हइते पारे कि ना। एवं नित्यानन्देर ये परिवार सिंहभूमे वास करिया आछेन, ताहार अधिकार केवल सींहभूम कि वराहभूमी पटे। फलत तावत देशीय चैष्णवसकल नित्यानन्द जिउर तावत परिवार- सकलेर साधारण मते अधिकार कि । ये ये स्याने नित्यानन्देर ये परिवार वास करिया पाछेन ताहार सेइ जायगाय अधिकार, तव्यतिरिक्त अन्य देशे नाइ । अत्र विशये शास्रते किमत विधि पाछे ज्ञातो होया अविश्यक । अतएव सदर देओयानि प्रादा- लतेर पण्डित एइ सोयालेर जवाव दक्षिण' पार्वे लेखेन इति । शन १८२६ साल तारिख २५ युन मतावक शन १२३६ साल १३आपाढा श्रीजयतितराम यावव्यवस्था प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदन्दीयागस्तिमासोयपञ्चविंश तेदिने घटिका- त्रयाधिकयामदयानन्तरं मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशवोधो जातस्तदनुसा- रेणोत्तर लिख्यते। यजातीयानां यच्छणीनां या यस्मिन् विपये विशेषतः शास्त्राशा नास्ति तस्मिन् विषये तनातीयानां तच्छणोनां वा यथा पूर्वापरव्यवहारस्तदनुसारे णैव निरणयो भवितुमर्हति । प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र लिखितविषयसमुदायस्यार्थीद १. पक्षिण-व्यप।

व्यवस्था पत्र-संख्या- भावकमहालयेजकवस्तुविशेषः करमात् समयाहतते इत्यस्य, एवं फेन प्रकारेण श्रीमनित्यानन्दस्य परिवारस्तवस्तु प्राप्तमित्यस्यैवं तेपु' यस्नुषु सराजकरभूस्वामिनो राजश्व का केनापि प्रकारेण कश्चिदपि सम्बन्धो वर्तते न वेत्यस्य, एवं यदि कविझेकाभितरेष्यको भवितुमिच्छति तदा म श्रीमनित्यानन्दपरिवारव्यतिरिक्तेनान्येन केनचित् सेवकः कतुं शक्यते न वेत्यस्य, एवं तावद्देशीयभावकमहालसैज्ञकस्य विशेषो यदि श्रीमनित्यान- न्दस्य परिवाराणामंशोऽभूदु,अथ च श्रीमन्नित्यानन्दपरिवाराणाम्मध्ये एक- स्थानस्य कश्चित्परिवारः स्थानान्तरवासिपरिवाराणां सेवको भवितुमिच्छति चेत्तदा सेवको भवितुं ( शक्रोति) न वेत्यस्य, एवं तत्परिवारवासस्थाना- द्भिवस्थाननिवासी कश्चिच्छीमन्नित्यानन्दपरिवारस्त व्यक्तिविशेष सेवकं कर्तुं शक्नोति ने वेत्यस्य, एवं श्रीमन्नित्यानन्दस्य परिवारो यस्मिन् यस्मिन् स्थाने श्रीमलित्यानन्दस्य सम्प्रदाया वैष्णवाः सन्ति (तस्मिन् ) तरिमन्नेव स्थाने तेषामधिकारः, किंवा सर्वस्मिन्देशे तेषामंशोऽर्थात् श्रीमन्नित्यानन्दस्य परिवायः फेचित् सिंहभूमिकासिनः केचिच्च वराहभूमिवासिना, तत्र सिंह भूमिनिवासी कश्चिद्वयक्षिविशेषो वराहभूमिनिवासिनः श्रीमनित्यानन्दपरि- वारस्य स्पाने सेवको भवितुं शक्नोति न घेत्यस्य, एवं भोमनित्यानन्दस्य ये परिवागः सिंहभूमिनिवासिनस्वेषां केवल सिंहभूमावधिकारः किवा वराह- भूमापि, अर्थात् तावद्देशीयवैष्णवेषु श्रीनित्यानन्दस्य परिवाराः वावं कुर्वन्ति तस्मिन् स्थान एवं नेपामधिकारो नान्यत्रेयस्य चेदानी प्रचलितास्मज्जातधर्मशास्त्रालिखितत्वात् प्रश्रपत्रलिखित श्रीमनित्यानन्दस्य परिवाराणामध्ये प्रश्नपत्रलिखित विषयसमुदायेषु पूर्वापरं यया व्यवहारस्तद- नुसारेण निरर्णयो मवितुमर्हनि,इति मनुदायतत्त-कल्पतरु-वियादरक्षाकर- व्यवहारमातृकाव्यवहारतव-चौरमित्रोदयादिग्रन्धानुसारिणी व्यवस्था । पत्र प्रमाणम्- जाति ज्ञानपदान धर्माच्छणीधम्माच धर्मवित । समीक्ष्य कुलपम्मीश्च स्वधम्म प्रतिपालयेत् ॥ इति मनुवचनम् (1 ४१) १0 १, तस्मिनयर व्यवस्था पत्र-संख्या-७ २४६ देशस्य जातसंघस्य धम्मो ग्रामस्य यो भृगुः । उदितः स्यात् स तेनैव दायभागं प्रकल्पयेत् ।। इति दायतत्त्व(पृ. ७)फल्मतरविवादरत्नाकरप्रभृतिग्रन्यधृतकात्यायनवचनम् कास्मृ ८४) ॥२॥ व्यवहारो हि बलवान्धर्मस्तेनावहीयते इति व्यवहारमातृका(पृ. २८२ )व्यवहारतत्त्वादि पृ० ४ )ग्रन्थधृतनारदवचनम् (नास्मृ॰ पृ०१७) केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः। युक्तिहीनविचारेण धर्महानिः प्रजायते ।। इति व्यवहारमातृका( पृ० २८२ वीरमित्रोदयः पृ० २८)व्यवहारतत्त्वादिनन्यधृतबृहस्पतिवचनम् (बस्मृ० पृ० १६) ॥ ४ ॥ कीनाशाः कारुकाः शिल्पिकुसीदियोरिएनर्तकाः । लिहिनस्तस्कराः कुर्युः स्वेन धर्मेण निर्णयम्॥-इतिवीरमित्रोदय- ( वोमि० ख पृ. ३० व्यवहारमातृकादि व्यमा० पृ० २८१)मन्यधृत- वृहस्पतिवचनम् (वृस्मृ• पृ० १२)॥ ५॥ युक्तिल्लोकव्यवहारः-इति व्यवहारमातुका ( २८२) व्ययहारतत्त्व- (पृ०४) अन्धलिखनञ्चेति ॥६॥ दिसम्बरमासस्य प्रथमदिने यामदयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण तेनापचीयते-इति पाठान्तरम् । २ काका मल्लाः बुसीद पिवर्तकाः। लिदिनस्तस्कगरचा स्वेन धर्मण निर्णयः ॥ (अस्मृ ०पाठः) ३. युचिायः । स च लोकव्यवहार:-इति व्यवहारमातृका-व्यप० ।

व्यवस्था पत्र-संख्या- सोयालce-यदि दुइ अथवा अधिक भ्राता थाके । एक जन ताहार. बयप्राप्त । एवं अन्यसफल नावालग। एवं ताहारदिगेर कोन गारडियेन् अर्थात् रक्षक विशेषरूपे मोकरर ना हइया थाके । एवं ताहारदिगेर ज्येष्ठ भ्राता, ये प्राप्तव्यवहार हयाछे, स्थावर वस्तु हस्तान्तर करे,ये स्थावर वस्तुते नाहार घातारदिगेर अंश पाये। ऐ स्थावर वस्तु विभाग करणे ताहार दिगेरके अंशी बोध करा जाय । एमत हस्तान्तर करण शाखमते नावालोर पक्षे सिद्धहइले पारे कि ना? श्रीजयतितराम मभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदन्दीयनयम्वरमासीय कविंशतिदिने यामद्वया- नमार मया प्राप्त दवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यदि द्वौ ततोष्यधिका या भ्रातरत्सन्ति, तेषां मध्ये एका प्रासव्यवहारो- ऽन्ये प्रामव्यवहारास्तेपासप्रामव्यवहाराणां विशेषतो रक्षकः कश्चिन् नियुक्तो नाभूत्स्यादेवं तेषा पेठो भ्राता यः मासव्यवदारोऽभूत् स यदि एवंभूत स्थावर हस्तान्तरं कृतवान् स्यात् , यन्त्र स्थावरे तद्भातणामंशोऽस्ति, एवं तस्यादरविभागकरणे तेपामासन्यवहाराणामशिस्वेन शानं भवति, एता- যেনালী যদি ঘনায়বিক আঞ্জরী সালাহা ই- स्वामिकृतत्वात् सिद्ध भवितुं न शमोति । शास्त्रानुसारेणास्वामितविक्रयस्य निवर्तनीयत्वात् इति बङ्गदेशचलितमनुदायमागश्रीकृष्णनर्माणकारत दायभागटीकाविवादमार्णवादिमन्यानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- अखामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं वा। अकृतस तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः ॥ इति मनुवचनम् (CIRS) व्यवस्था-पत्र संख्या-z-८६ २५१ अस्वामिविक्रय दानमाधिच विनिवर्जयेत् इति विवादभनार्णवादि- (१ विवाभ० पृ० ३१७ ख)ग्रन्यधृतकात्यायनवचनम् ( कास्मृ० ६१२) ॥२॥०॥०॥०॥ विभक्तस्येवा विभक्तस्थावरस्यापि स्वामिकृतदानादि सिद्ध्यत्येव,अक्ष- पातादिना पश्चादेशपरिचयसम्मवादितिभावः इति श्रीकृष्णतालङ्कारकृत- दायभागटीका (पृ० ३५) लिखनम् ॥ ३ ॥ अत्र साधारणद्रव्यस्य समुदायस्यैकेन विक्रये परांशयोग्येऽसिद्धिः स्वांशयोग्ये तु सिद्धि:- इत्यादि विवादभगार्णव ( १ विवाम० पृ० ३०५ क) अन्य लिखनञ्चेति ।। ४॥ दिसम्बरमासस्य द्वादश दिने शनिवासरे यामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण प्रथम सोयाल- दह-यदि कोन हिन्दु जाती एक स्त्री, ओकएक जन पुत्र वर्त- मान थाकिते आपन पैतृक स्थावर वस्तु,याहा श्रापन पितार मृत्युर पर उत्तराधिकारित्व प्रकारे उहाके आशियाछिल, ताहा समुदाय, किम्वा ताहा हइते किश्चित विक्रय करियाथाके, तवे एमत विक्रय सिद्ध हइवेक कि ना, श्रो विक्रयकर्ता किम्वा ताहार मृत्युर पर उहार पुत्रगणेर द्वाराय क्रयक के दखल देशोयानेर , आज्ञा देनोयार क्षमता आदालतेर हाकिमगणेर आछे कि ना ? द्वितीय सोयाल- यद्यपि क्रयक के दखल दिया उहाके वेदखल करियाथाफे तवे हाकिमगण क्रयक के दखल देबोयानेर आज्ञा दिते पारेन कि ना? १ विमकस्यैव-व्यर। २ समुदायस्येन-व्यप।

व्यवस्थापन संख्य २५२ तृतीय सोयाल- यदि क्रयकता दखल ना पाइयाथाके तवे हाकिमगण क्रय- क र सद्मन्धे दखल देओयार श्राज्ञा दिते पारेन कि ना? प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रमवलोक्य याहरामोघो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते। प्रथमप्रभस्पोत्तरम्- प्रभपत्रलिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकं समुदाय- स्थावरं तदन्तर्गतकिञ्चित्यावरं वा कुटुम्बमरणपित्रादिश्राद्धाद्यावश्यक- कर्मकरणायं पुत्रषु विद्यमानेष्वपि यदि पित्रा विक्रीतं तदा पुत्राणामनुमति विनापि स विक्रयः सिद्धो भवितुं शक्नोति । यद्यपरिलिखित कुटुम्बभरणाद्या- यश्यककर्मकरणाय पित्रान विक्रीतं किन्तु स्वेच्छयास्वाभिप्रायेण वा विक्रीतं तदापुत्राणामनुमतिश्चेत् सिद्ध्यति, नोचेन सिद्ध्यति । एवज्ञ सति तद्वि- क्रयस्य सिद्धत्वपक्षे विक्रयकार प्रति तन्मरणानन्तरं तसुत्रान् प्रति वा ऋयक रायचत्वसम्मादिकाया नाशाया दाने क्षमता धर्माधिकरणाधिपतो नामस्त्येव, सिद्धन तद्विक्रयेण विक्रयकर्तुः स्वत्वविनाशेन तत्पुत्राणामपि तत्र स्वत्वानुत्पादात् कयकर्तुः स्वत्वोत्सत्तेश्चेति । अत्र प्रमाणम्- मणिमुक्ताप्रवालाना सर्वस्यैव पिता प्रमुः। स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः॥ इति दायमागा. दिमन्य (दाभा पृ० ३३) धृतयाशवल्ल्यवचनम् ॥१॥ पितामहश्रुतेस्तद्धनविषयक वचनम् । मणिमुक्ताधुपादाय पुनः सर्वस्येति वचनात् सर्वेषां भूम्यादिव्यतिरिक्तानां दानादिपु पितुः प्रमुत् न स्थावर निवन्धद्रव्याणाम् इति दायभाग(पृ. ३३ अन्यलिखनम् ॥२॥ १. वचनमिद यादवलवस्मृतौ न रयते। २.दान विषय-म्यान ३. उपादानादाभा०॥

व्यवस्था-पन्न-संख्या-26 २५३. यदि पुनः सर्वस्थावरादिविक्रयमन्तरेण कुटुम्बवर्तनमेव न भवति. तदा सव्वस्यापि विक्रयणादिकमर्थात् सिद्ध्यति इति दायभाग(पृ०३३)- अन्यलिखनम् ।। ३ ।। विकीय पण्यं मूल्येन केतुर्यो' न प्रयच्छति । स्थावरस्य क्षयं दाप्यो जङ्गमस्य कियाफलम् ।। इति विवादमावविवादार्णवसेत्यादि(पृ० १७८) ग्रन्थधृतनारद (नामसं० ६.१, ४) वचनम् ॥ ४॥ मूल्यग्रहणपूर्वकस्वत्वनाशकव्यापारस्यैव विनायपदार्थत्वाद्-इति विवादभगाएंवलिखनम् ।। ५ ॥ सप्त वित्तागमा धा दायो लामः कयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगश्च सत्प्रतिग्रह एव च ॥ इति मनुवचन- ञ्चति (१०।११५)॥ ६ ॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदिक्रयक रायत्तत्वं सम्पाद्यायत्तत्त्वमुत्थापितवान् स्यात्तदा क्रयक राय- तत्त्वसम्पादिकामाशां धर्माधिकरणाधिपतयो दातुं शक्नुवन्तीति । श्रत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणान्तर्गतचतुर्थप्रमाणम् । यदि कयकर्ता नायत्तत्वं माप्तं तदा धर्माधिकरणाधिपतयः क्रयकर्त्त- रायत्तस्वसम्पादिकामाज्ञां दातुं शक्नुवन्ति- इति वङ्गदेशचलितमनुदायभाग- विवादभगार्णवविवादार्णवसेत्वादिप्रन्यानुसारिणो व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- द्वितीयप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणमेवेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १.यन्त्र--नामस० । २, मायंन्यप।

व्यवस्था-पत्र संख्या- . श्रीहरिः शरणम्। २६ लम्बर दरखास्त खास आपिल- सन १८२६ साल- प्रश्न:- ९०-यद्यपि कोन व्यक्ति आपन सुपार्जित' ओ पैतृक कोन वस्तु पापन स्वर्गार्थ काहाकेमो दान करे श्रार ऐ दाता व्यक्ति . दानपत्रे एमत सरत राखे ये श्रापन जीवद्दशा पर्यन्त खोरपोप पाइवेक, अतएव ए प्रकार सरतेर दोन ये ताहाते केवल दाता व्यक्तिर जीवशा पर्यन्तखोरोपोप सरत लेखा थाके-शास्त्र सम्मत सिद्धवटे कि ना-इहार प्रतिउत्तर एइ प्रश्नेर पार्चे, ओ तस्य भाषा लिखिवेन । इति १८२६ साल ता २६ नवम्बर मो० शन १२३६ साल ता०१२ अग्रहायन । श्रीर्जयतितराम् जवाबव्यवस्था प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदगरेजीशन्दप्रतिपाद्यत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दी- यजानवरीमासीयपञ्चमदिनसम्बन्धिमगलवासरे घटिकाप्रयाधिकयामद्ये मया प्राप्त तदवलोक्य याहराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यदि कश्चिद् व्यतिविशेषः स्योपार्जितं पैतृकं च कियस्तु सस्वर्गा, फरमैचिद्दत्तान', अथ च तेनैव दात्रा दानपत्रे एतादृशनियमो रक्षितः "स्वजीवनपर्यन्तमह प्रासाच्छादनं प्रामोमि । अतएव यद्दानपत्रे केवलं दातुर्जीवनपर्यन्त मासाच्छादननियमो लिखितस्तदानं यदि दाना खजीवन- पर्यन्तं प्रागच्छादन प्राप्त तदा सिद्धयति, नोचेन सिद्धपति, यतः सोपाधि- दानमुपाधिमिद्धो सिद्धम्, आध्यसिद्धावसिद्धं भवति इति घनदेशचलित. दायभागपिघादममार्ण गदिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । २मानित व्यर० रदोशर्जित-दनि साधीयान् पाठः । ३ दत्तमय-व्यर। ४.स पर दावा-या1 १ प्ररा-चर.1 व्यवस्था-पत्र-संख्या-६०-६१ अत्र प्रमाणम्- स्वभागान् यदि दास्ते विफ्रीणीयुरथापि वा । कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य वै ।। इति दायभागादि- (दामा० पृ० ३० ग्रन्थधृतनारद नामस० १४॥४२ वचनम् ॥ १॥ सोपाधिदानमुपाध्यसिद्धावसिद्धम्-इति विवादभद्गार्णव(१ विवाभ० 'पृ० ३०८ ख ) ग्रन्थलिखनम् ॥२॥ अत्रेदमवधेयम्-यदि कतिचिदुपाघयः यावज्जीवपर्यन्तं पोपणादयः कृताः कतिचिचोदैहिकक्रिया (कलाप)रूपा न कृतास्तत्र का व्यव- स्था इति चेद् यावद्व्यापाराकरणेन सम्प्रदानप्रतिज्ञागहादुद्देश्यफलानां किञ्चिदंशे विसंपादाच न दानसिद्धिः-इति विवादमङ्गावग्रन्थ(१ विवा- 'भ० पृ. ४६५ क ) लिखनञ्चति ।। ३ ॥ ० ॥ • !! • त्रिंशदधिकाप्टादशशताब्दीयफेवरवरीमासीयचतुर्थदिनसम्बन्धिबृहस्पति- वासरे घटिकैकाधिकयामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीजयतितराम ८७लम्बर पास आपिल शन १८२७ प्रश्न:- ६१-यद्यपि कोन व्यक्ति किछु भुमि आपन कन्यार विवाह १ स्थानसानिवि नामसं पाठ' । कमान-ति विभ. मूले पाठ।

२५६ व्यवस्था-पत्र संख्या- कालिन आपन जामाताके दान करिया थाके, पार ऐ कन्यार गर्ने सेयोया एक कन्या श्रीमतीकुमारी नामे, पुत्र सन्तान ना हइया थाके; ए प्रकारे ऐ वस्तु यथाशास्त्र श्रीमतीकुमारीके कि ऐ ग्रहीता व्यक्तिर द्वितीय पक्षेर सन्तानद्विगके अरों-इहार प्रति उत्तर वचन ओ तध्य ताहा एइ प्रश्नेर पारों लिखिवेन इति । शन १८२६ तारिख २२ दिशम्बर मोतावाक शन १२३६ तारिख हपौष। श्रीजयतितराम जबावच्यवस्था प्रभुसमर्पितप्रभपत्रं यदेतदन्दोपफेवरखरीमागीयपञ्चमदिनसम्बन्धिशुक्र- वासरे पटिफात्रयाधिकयामद्ये मया प्राप्त तदवलोक्य याशियोधो जातस्तद- नुसारेणोत्तरं लिख्यते। यत्र कश्चिद्व्यक्तिविशेषः किविद्भमि स्वकीयकन्याविवाहसमये स्वजामात्रे दत्तवान्, थप च तस्या गर्ने श्रीमतीकुमारीनाम्नीमेकां कन्यां विना धन्यः फश्चित् पुत्रादिसन्तानो न जात्तश्चेचा तदानं यदि “कन्याया इदं भा" इत्यभिसन्धिना कृतं तदा तापदेव यलु श्रीमतीकुमारीनासी प्राप्तुं शनोति, वन्मानुयॊतुक्सोधनवाद, यौतुकम्नीधने दुहितुरधिकारस्य निष्पत्यूहत्वात् । यदि च सदानं तादृयाभिसन्धि विना कृतमर्याद्, “जामानुरिदं भयु" इत्यभिसन्धिना कृत तदा तदल जामागुरुचाधिकारिगामर्थात्तत्पुत्रपौत्र- प्रपौत्रपदीदुहित्रादीनामेव भवति । प्राते तु प्रभुसमरितविचारपत्रलिसि. तापितिसितत्चान्ततात्सप्पर्थिनार्याद राममण्या धोरणपुत्रामायेन शास्त्रा- नुसारेणाधिन एवोत्तराधिकारिण इत्यनेन विवादास्पदीभूतमनस्य राममणी मुद्दिश्य तरियतस्तदानावगमेन ताराधनं राममण्या यौतुर्फ स्त्रीधनं भवत्येव, योनुकस्रोपने विद्यमानायां दुहितारे सपनोपुत्राणामांदथिनामधि- कारप्रतिरादकग्रास्त्राभावाद्-इति यनदेशचलितदायमागभीरप्पतालका रस्त्वदायमागटोकादायमसंग्रहरियादभमार्णवादिअन्धानुसारियो म्यवस्था ।

व्यवस्था पत्र संख्या-९१-६२ २५७ - 1. विवाहकाले यत्किञ्चिद्वरायोहिश्या दीयते । कन्यायास्तदनं सर्वमविभाज्यं च यन्धुभिः ।। इति दायमाग(पृ०७५) दायक्रमसंग्रहादि(दाक्रसं० पृ० १३) अन्यधृतभ्यासवचनम् ॥ १ ॥ “उरिश्येति कन्याया इदं भवलित्युद्दिश्य वराय यदान न पुनरेतदभि- सन्धि विनापीत्यर्थः । अतएव विवाहकाल-इति प्रदर्शनार्थम् न पुनरेतदेव प्रयोजकं दात्रभिसन्धिनिमित्तत्वात् स्वत्वस्य-इति दायभाग(पृ०.७५)अन्य- --लिखनम् ॥ २॥ का अत्र प्रथम पुत्रस्तदमावे पौत्रस्तदमावे प्रपोत्र:-इति श्रीकृष्णताल- हारकृतदायमाग पृ० २१८)लिखनम् ॥ ३॥ अपनी दुहितरश्चैव-इत्यादि दायभाग(पृ०,१५१ )श्रीकृष्णतालङ्कार- कृतदायभागटीका (४० १५.१ )नियमसङ्ग्रह विवादभगार्णवादि (२ विधा- भ. पृ० ३१४ )प्रन्यवृतयारावल्क्य( २।१३५) पचनम् ॥ ४ ॥ तत्र यौतुकधने प्रथम कुमार्या अधिकारस्तदभावे पादत्तायास्तद- भावे चाढायाः पुत्रपत्याः सम्भावितपुत्रायाश्च युगपदधिकार इति । तदभावे ' बन्ध्याविधवयोरपि तुल्यवदधिकार इति च । सर्वदुहित्रभावे पुत्रस्याधि- "कारः-इति च दायक्रमसंगह(पृ० २३ अन्यलिखनश्चति ||५||0|10|10|| एतदन्दीयमहमासीपत्रयोदशदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे घटिकैकाधिक- यामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्ता इति । . श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीजयतितराम - नं०-२६५ १२-रोवकारि मिसिल आदालत देशोयानि सदर तारिक २१ माह जानोरि शन १८३० इ० मतावक माह माघ सन वावु फोडर सिंह २५८ व्यवस्थापत्र संख्या-६२ १२३६ वागला रोज बृहस्पतिवार ऐ श्रादालटेर हाकिम श्रीयुक्त मान्तेगियु हेनरिटरम्बल साडेचेर पैठके। गोपालचन्द्र प्रभृति आपिलाएटगण, रप्पाइण्ट श्रापिलाण्टगणेर उकिल मुनशी होसेन आलि ओ मौलवी न्यामत प्रालि,रष्पाडएटेर उकिल मुनशी दादार वक्स ओमुनशी यदर पालि ओ मौलवी करमत होसेन हाजिर हइल । ए मक- ईमा गत सनेर दिसम्बर मासेर ३० तारिखैर हुकुमानुसारे एइ मासेर ११तारिख प्रामार धैठके रोवकार हइया जिला ओ कोटेंर आदालतेर फयसलासकल ओई १८२७ सालेर मार्च मासेर ६ ओ २७ तारिखसकलेर लिखित ए पादालतेर वाकि कागज- सकल ओ खास श्रापीलेर दरखास्त, याहा मजुवात फरियाचे, ओए आदालते दाखिल होया साहार जवाव ओ इ० १८२६ सालेर दिसम्बर मासेर ३० तारिखेर रोवफारिर विस्तिन ए पादा- लतेर हाकिम श्रीयुक्त उलियम नसष्टर साहेवेर राय ओ एवं मक- ईमार आविश्यकीय अन्य कागजात पुनराय पडागेल । यथा उभ- येर भोजरसकल ओ एजहारसकलेर दृष्टे ए माईमार सम्बन्धे चूडन्त हूकुम सादर होनेर पूर्व निर समोयालेर जवावे ए आदालतेर पण्डित हपते व्यवस्था लोन उचित हइल, अतएव हुकुम हइल जे मकईमा अद्य स्थापत थाके, ओ एइ रोवकारि नकल एइ हुकुमे ए श्रादालतेर पण्डितके समर्पण कराजाय ये जिला माहावादेर चलित शाखानुमारे निचेर लिखित सोयालेर जवावे एक समाह मध्ये व्यवस्था दाखिल करेण । सोयालयद्यपि हिन्दु जाति हइवे केहो आपन पैतृक- स्थावर वस्तुसाल हुइले किशु ग्राम जाति हइते एक व्यकिके दान करे। यो दान गृहीता श्रोताहार मृत्युर पर बहार पत्तरा- कम सोहेन-दए।

च्यवस्था पत्र संख्या २ धिकारिंगण दान करा वस्तुर उपर दखिल हड्या थाके, श्रो वा. हार पर दाता व्यक्तिर पुत्रगणेर मध्ये एक जन आपन पिता वर्च- माने ऐ दान सिद्धिन होयार एजाहारे आदालते नालिस करे। तवे एमत दान शाबानुसारे सिद्धि ओ चलित हइवेक कि ना इति। श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतमान्तकीयूहेनरीटरंवलसाहेवधर्माधिक रणलिखितैतदन्दीयजान( प्रो रीमासीयैकविंशतिदिवसीयविचारपत्रान्तर्गत प्रभप्रतिरूपपत्रं यत् फेवरवरीमासीयतृतीयदिनसम्बन्धिबुधवासरे घटिकैका- धिकयामद्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणो. त्तरं लिख्यते- यद्यपि हिन्दुनारयन्तःपाती फश्चिस्वपैतृकस्थावरसमुदायात् किश्चिद्: ब्राक्षणजातीयायैकस्मै कस्मैचिदत्तवान्, अथ च दानप्रदीना तन्मरणा- नन्तरं तदुत्तराधिकारिभिस्तदानकृतवलुनि प्रायत्तत्वं संगदितम् , तदनन्तरं दातुः पुत्राणां मध्ये एकः कश्चिद् विद्यमाने पितरि स्वपितृकृतदानं सिदं न मयतीति वदन धर्माधिकरणेऽभियोगं कृतवान् स्यात्-तत्र विद्यमाने पितरि प्रश्नपत्र लिखितप्रकारकपुत्रकृताभियोगदृष्ट्या तद्दानं यदि विवा स्वेच्छया स्वाभिप्रायेण वा प्रसन्नतया वा कृतम् , तत्र पुत्राणामनुमतिश्चेत् सिद्धं चलितं च भवितुं शक्नोति, नो चेन शक्नोति, पैतामहे स्थावरादौ पितापुत्र. योस्तुल्पस्वामित्वेन साधारणतया तद्दानविक्रयादो पुत्राणामनुमतेरावश्य- कत्वात् । यदि च तद्दानं पित्रा भयकोधादिषोडशप्रकारान्तर्गतेन फेनचित् प्रकारेण कृतम्, ये घोडशप्रकार: पञ्चप्रमाणे स्पष्टीकृतास्तत्र पुत्राणा. मनुमतावननुमतौ वा सिद्ध चलितं च भवितु नाहवि । यदि च तद्दानं पित्राऽवश्यकर्तव्यपित्रादिश्राद्धादिषु यज्ञादिषु वा ब्राझणत्वेन धर्माय वा, अर्थात् तत्तद्देशचलितपित्रादिश्राद्धादिदक्षिणा यज्ञादिदक्षिणा वा अझ वा १ सामिप्रायेण-व्यप.1 "व्यवस्था पत्र संख्या-हर कायदान पर FDM कृता)पणं वा पादायों वा संकलो या "वृत्तिा, विष्णवादिदेयताप्रीत्यय तेत्यादिरीत्या कृतं तदा घर्थित्वेन सिद्ध चलितं च भवितुमर्हति । घाथ पितुरधिकारः धर्मार्थ श्रदत्त्वैव मृतश्चेत्तथापि राज्ञा तद्धनं तत्पुत्रा दापनीयाः(1) इति मिताक्षरादिमन्येषु विशेषतो लिखि- तत्वात्-इति साहावादनदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमाधवव्य- वहारकौस्तुभादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । "अन प्रमाणम्- मणिमुक्तापवालाना सव्वस्यैव पिता प्रमुः। स्थावरम्य तु सर्वस्यं न पिता न पितामहः ॥ इति मिताक्षरा. (पृ० १६६ )योरमित्रोदय( पृ० ५२४ व्यवहारमाधव( पृ० ३३१ व्यव- हारकौस्तुमादिमन्यधृतयाज्ञवल्क्य'(पृ० १६६ )वचनम् ॥ १ ॥ भूर्या पितामहोपात्ता नियन्धो द्रव्यमेव वा ।। तत्र स्यात् संदेश स्वाम्य पितुः पुत्रस्य (चैव हि)। इत्युपरिलि. खितमन्यधृतयाज्ञवल्क्या पृ० २०६, २१२१ वचनम् ॥ २ ॥ तस्मात् पैतृके पैतामहे च द्रव्ये जन्मनैव स्वत्वं तथापि पितुरावश्य- केषु धर्मकृत्येषु वाचनिकेषु प्रसाददानकुटुम्बभरणा(पदि मोक्षादिषु च स्थावरव्यतिरिक्तद्रव्यविनियोगे स्वातन्तयमिति स्थितम् । स्थापरे तु स्वा- जिते पित्रादिप्राप्ते च पुत्रादिपारतन्त्र्यमेव । - इत्युपरिलिखितग्रन्ध( मिता- पृ०२०० )लिखनम् ॥ ३॥ स्थावर द्विपदं चैव यद्यपि स्वयमर्जितम् । असम्भूय सुतान् सर्वान् न दानं न च विक्रयः ।। ये जाता येप्यजाताश्च ये च गर्ने व्यवस्थिताः । वृत्ति तेऽपि हि फक्षिन्ति न दानं न च विक्रयः ॥ इति चोपरि- लिखितान्यता मिता पृ. २०० यासवचनद्वयम् ॥४॥ १.पादाभ्यो वा संकल्पोवा-व्यप २. विष्ट्यादिदेवताप्रत्यर्थम् --म्पए। १. पारवल्यस्मृती वचनमिदं नोपलभ्यते।

pil व्यवस्थापन संख्या-१२-१३ २६१ प्रदत्तं तु भयकोपशोकोगरुगन्वितैः । तथोलोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ॥ बालमूदास्वतन्वामित्तोन्मत्तापवर्जितः। का ममेंद' कर्मति प्रतिलाभेच्छया च यद् ।। अपाने पात्रमित्युक्त कार्य चाधर्मसंज्ञिते । यदत्त त्यादविज्ञानाददत्तमिति तत्स्मृतम् ।।-इति चोपरिलिखितग्रन्थ- (मिताः पृ०,२४५ पृतनारद नामसं० ६० वचनम् ॥ ५ ॥ घस्यापवादः॥ एकोऽपि स्थापरे,कुर्यादानाधमनविक्रयम् । आपत्काले कुटुम्बार्थ धर्मार्थं च विशेतः ॥ इत्युपरिलिखितग्रन्थ- (मिता० पृ० २९०)घृतमुनि वचनम् ॥६॥ स्वस्थेनाउँन या दत्तं श्रापितं धर्मकारणात् । प्रदत्त्वा तु मृते दाप्यस्तत्सुतो नात्र संशयः॥-दवि चोपरि लिखित अन्य( मिता पृ० २४६)वृतकात्यायन( कास्मृ. ५६६ )वचनं चेति ।।जा" मार्चमासस्य त्रयोदशदिनसम्बन्धिशनिवारे घटिकैकाधिकयामद्ये मये यं व्यवस्था दत्तेति । श्रीर्जपतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण - श्रीजयतितराम्- १३.रोवकारि मिसिन आदालत देओयानी सदर तारिख ११ माह फेवरओरि शन १८३० इ० मविक माह फाल्गुण १. रुमान्वितैः नामस० २. पवर्जितन:- नामस, मिता! ५.ममाय-नामस०। ४. सहिद-मिता, नामर्स ५. प्रमोदितम्-ज्यप।

२६२ व्यवस्था पत्र-संख्या-१३ शन १९३६ वागला ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुक्त अलियम नश- टर साहेवेर बैठके। अप्राप्तव्यवहार हरनाथसिंहेर मावा मुसम्मात धोविवि तुझ्यप्त नेजामगिनेर मावा मुसम्मात करिमन ओ अमामव्यव- हार कालीचरणेर माता मुसम्मात पद्म श्री मुसम्मान वदासु श्रो मुसम्मात उदासी साएलगणा । छयोविविर उकिलगण मौलवी गोलाम इजदानी प्रो मुनसी महम्मद आलिखा ओ मुसम्मावान करिमन ओ पत्व प्रो उदाशीर उफिलगा सदासुकपण्डित ओ लाला वस्तिलाल हाजिर श्रासिल । १२ १८२६ शालेर सिवम्बर मासेर २५ तारिखेर हुकुमानुसारे सायेलगणार सोयालसकल भो साहार सम्पीय अन्य कागजात ओ सालिसगर फयसला ऐ तारिखेर विस्तिने रोवकारि ए आदालतेर हाकिम श्रीयुत हालडन यावरट, रादार साहेवेर राय सम्वलित पलागेल । जेहेतुक कागचसकलेर द्वाराय दोष हइते थे ये सायेलगणा, ये पापनादिगके मृत पावु जगन्नाथसिंहेर स्त्री ओ उत्तराधिकारिणी प्रकाश करितेछ, केह मृत पावुर स्वजाति प्रो फेह भिन्न जाति, भो एवं साहार मध्ये केह सन्तानवति वटे। अतएप ए मकरमार सम्मन्ये चुडन्त हुकम सादर होनेर पूर्व हुकुम हइल ये मका- मार कागजात एइरोधकारिर नकल सहित एइ प्रादालतेर पण्डितके समर्पण कराजाय-ये ताहार दृष्टे एप सोयालेर जवावे ये सायेलगणार मध्ये मृत वावुर कोन २ बी ओ एवं ताहारदिगेर गर्भ हाइवे ये सन्तान हुइयाले शास्त्रानुसारे ऐ मृत व्यफिर पुत्र ओ.पत्तराधिकारि हय, ओ यद्यपि ऐ सायेलगणार मध्ये केह किम्वा साहादिगेर पुत्र ऐ मृत व्यक्तिर. उत्तराधिकारि हय, सवे अन्य सायेलगणा ओ नादादिगेर सन्तान पा ऐ मृत व्यक्तिर--- त्यक पतु इ मरण ओ पोपणैर किछु सत्ता राखे कि मा-ये १, सोनिवि शिलिस नेमारनेर मावा मुसम्मान सोमन-ति सामान था। . PM mir व्यवस्था-पत्र-संख्या-१३ २६३ मृत व्यक्तिर याजिर' चलित शास्त्रानुसारे व्यवस्था लिखिया दाखिल करेण इति । श्रीज्जयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतअलियमनसष्टरसाहेवधर्माधिकरणलि - खितैतदन्दीमफेयरवरीमासीकाददिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपतिरूपपत्र- मेवं तत्समर्पितत द्विवादविषयनिविष्टपनजातं यन्मार्चमासीयचतुर्थदिनसम्ब- धिवृहस्पतिवासरे घटिकैकाधिकयामद्यानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य विविच्य च यादृराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- अर्थिनीनां मध्ये पदामूविवीनाम्नी मृतस्य वावुजगन्नाथसिंहस्य पती भवति, शास्त्रे पनीशब्दस्य विवाहसंस्कृतस्त्रीवाचकत्वात्, प्रभुसमर्पित- पत्रजातान्तर्गतविदितनेजामनीनमातुः करिमननाम्न्या अप्राप्तव्यवहार- कालीचरणमातुः पदुनाम्न्याश्चोदासीनाम्न्याश्च निवेदनपत्रणांगरेजोशन्दम तिपाद्योनत्रिंशदधिकाटादशशताब्दीयसितम्बरमाप्तीपत्रयोविंशतिदिवसीयनृपा- धिकृतकृतजयपत्रेण च वदामूविधीनाम्न्या मृतस्य वावुजगन्नाथसिंह- विवाहितपनातीयस्त्रीत्वावगमात् । एवं यदामूपिवीनाम्न्येवोत्तराधिकारि- एयपि भवति, उत्तराधिकारित्वेनेदानों उजातिव्यव(हारानुसारेण) दत्त- कृत्रिमपुत्राणां पुत्रपौत्राणां च मृतव्यक्तेरभावात् । एवं मृतस्य वायुजगन्ना- थसिंहत्य सजातीया विवाहित(स्त्री)सद्धोवियोनाम्नीगर्भोत्पन्नस्याप्राप्तव्यबहा- रस्य हरनायसिंहस्य शास्त्रोक्तद्वादशविघपुत्रान्तर्गतपौनवपुत्रत्वेऽपि पौनर्मव- पुत्रस्येदानी व्यवहाराभावात् शास्त्रनिषिद्धत्वाच्चोत्तराधिकारित्वं न सम्म वति । · एवं भिनजातीयपद्नाम्नीगर्भोसंन्नस्यामाप्तव्यवहारस्य काली- चरणस्य शरजोकद्वादशविधपुत्रानन्तर्गतस्य मृतस्य याबुजगन्नाथसिंहस्य शास्त्रानुणरेणावरुद्धपुत्राचेऽप्पाहासीपुत्रनुल्यत्वेधी तर च क्षत्रिपजाती- यस्य मृतस्य वावुनगमायसिंहस्स सकपने शास्त्रानुसारेणाधिकारित्वं न सम्भवति । एवं चोपरिलिखितप्रकारेण यदामूविकीनाम्न्या मृतस्य वायु १. आदिर-इति साधीयान् पाठः ।.. २. पत्रस्य-व्यप०॥

व्यवस्था पत्र-संख्या २६४ जगनाथसिंहस्य पत्नीत्वे उत्तराधिकारित्वे च सति अन्यासामर्थिनीनां तार्मा सन्तानानां च तस्येव मृतव्यक्तिविशेषस्य त्यक्तधनादं ग्रा(स)च्छादनस्य किञ्चित्स्वत्वे अयं विशेषः-या सजातीया. विवाहिता' सद्घोविवीनाम्नी, सा या च भिन्नजातीया पर्दुनाम्नी च यदि मृतस्य वावुजगन्नाथसिंहस्यो- तराधिकारिणां प्रतिकूला व्यभिचारिणी या न भवति तदा यावीवं ग्रासा- च्छादनमागिनी भवति नान्यथा । अथ चे सजातीयविवाहितस्त्रीग टर. नस्याप्राप्तव्यवहारस्य हरनायसिंहस्योपरिलिखितप्रकारेण पौनर्मवपुत्रस्य मृतव्यक्त्युत्तराधिकारिणामनुकूलखे प्रतिकूलत्वेऽपि - वोभयथैव यावजीवं प्रासाच्छादनमागित्वम्, मिन्नजातीयपटुनाम्नोगोत्पन्नस्यामाप्तव्यवहारस्व कालीचरणस्य मृतव्यक्त्युत्तराधिकारिणामनुकूलत्वे यावनीवं मासाच्छादन- भागित्वं नान्यथा, यवनजातीयस्य विक्षिप्तनेजामद्दीनस्य तन्मातुः फरिमन. नाम्न्याश्च रजकजातीयोदासीनाम्न्याचे मृतव्यक्तित्यक्तधनाद् मासाच्छादना- धिकारानधिकार विधायकशास्त्राभावाद्--इति -मृतस्य वावुजगन्नाथसिंहस्य क्षत्रियजातीयस्य प्रचलितमनुमितादयवीरमित्रोदयदचकमीमांसादचकचन्द्रिः कादत्तकदीधितिदत्तकनिर्णयादिनन्यानुसारिणी व्यवस्था:- अत्र प्रमाणम् पली विवाहसंस्कृता'-इति 'मिवादर(पृ. २१७३ वीरमित्रोदयादि- (वीमि ख० पृ० ६२३ )प्रन्थलिखनम् ॥१॥ पाली दुहितरश्चैव पितरौ प्रातरस्तथा-इत्यादि मिताक्षरा(पृ. २२६)- यौरमित्रोदया( पृ० ६२३)दिग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्य(२।१३५ वचनम् ॥ २॥ या पत्या वा परित्यक्ता विधवा या स्वयेच्छयाग उत्पादयेत्पुनर्भत्सा स पौन व उच्यते।।:- इति मनु( पृ०३७५) वचनम् ॥१॥ पोनर्भवस्तु पुत्रोऽक्षतायो क्षतीयों था पुनर्वा) सवर्णादुत्पनः इति । मिताक्षरादि (मि पृ० २१६)मन्थलिखनम् ॥ १'सत्नान-ध्यप २ विभाहिता-म्प। ३ नाम्नीयाच-ज्य1. ४ सजातीया-पप-1 व्यवस्था-पत्र-संख्या-६३-६४ २६५ . दत्तोरसेतरेपौ तु पुत्रत्वेन परिग्रहः । इमान्'धर्मान् कलियुगे वानाहुर्मनीषिणः ॥ इति दत्तकमीमांसा-.. '(पृ०.३०)दिग्रन्थधृतशोन कवचनम् ॥ ५ ॥ . निर्यास्या व्यभिचारिण्यः प्रतिकूलास्तथैव च ।।-इति मिताक्षरा- दिग्रन्यधृतयाशयल्स्य ( २।१४२) वचनम् ॥ ६ ॥ गव्यास्त्वपरे सुताः -इति वीरमित्रोदयादि (पीमिख० पृ. ६१४ ) अन्यधृतवृहस्पतिः २०७१ वचनम् ॥ ७ ॥ द्विजातिना दास्यामुत्पन्नः पितुरिच्छयाप्यंशं न लभते, नाप्य दूरत.. एव : कृतस्नम् । किन्त्यनुकूनश्चेजीवनमात्रं लमते- इति मिताक्षरा- (पु.२१६ )वीरमित्रोदयादि (पृ० ६२३, ग्रन्थलिखनम् ॥८॥ . बन्धूनामेकधर्माणामेकस्यापि यदुच्यते । सर्वेषामेव तज्ज्ञेयमेकरूपा हि ते स्मृताः ॥ इति मिताक्षरादिनन्य- धृवीशनसवचनञ्चति ॥ ६॥ एतदन्दीयापरेलमासोपपड्विंशतिदिनसम्पन्धिसोमवासरे घटिकात्रया- धिक्रयामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण T ९४-रोवकारि मिपिल पादालत देओयानि सदर-तारिख २२ माह माइ.सन १८३०३० मोतावक.१० माह.ज्येष्ठ.सन १९३० वाङ्गला रोज.शनिवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत मान्तगियो, हेनरिटरम्बल साहेवेर बैठके । वावु माधोस्वहाय ओ.वेनिस्वहाय, अप्राप्तव्यबहारगणेर मोकार- आपिलाएट.। वावु रामचरणलाल- मोसम्मात वादामो प्रभृति, रस्साडएटान्। १. इमान्-मनीषिग्य.-दत्तकमीमासाया नोपलभ्यते।। २. मिताक्षरायां प्रौरानसरस्वी च नोपलम्बम् ।

व्यवस्था पत्र संख्या-६४ 1 आपिलाएटेर उकिल मुसि दादारवक्स हाजिर प्राइल । रस्साडेण्टगण ए आदालते एयालास शमार' पृष्ठे रसिद लिखिया, ओ स्वयं किम्या उकिलेर द्वारा हाजिर हइल ना। अतएव एइ मकईमा वाहारदिगेर असाक्ष्याते अद्य प्रामार बैठके सवकार हइया नालिशि आरजि प्रभृति प्रविनशल कोटेर कागजसकल फयशला पर्यन्त ओए आदालनेर प्रापिलेर मौजुवात् पडागेल । तत् परे आपिलाएटेर उकिल चारि टाकार मूल्येर एक केता फेरेस्तेर धराय' इंराजी अक्षर ओ एवारतेवई......."किंवा दस्तावेज लम्बरे दाखिल करिल,दृष्ट थासिल । जानागेल जे रस्सा- डएटान, सावेक मुद्दइगण, मृत वावु द्वारिकादासेर त्यो सृतीय अंश २५००००० टाका देयाश्या पाओनेर जन्ये एइ एज. हारे नालिस करिलेक-ये मृत वावुर दुइ स्त्री। प्रथमा खीर गर्भ हइते, ये ऐ वावुर साक्षाते मृत्यु हय, दुई कन्या' ओ द्वितीयां खी, अर्थात् मुपम्मात् शिवलवहुर गर्भ हइते एक कन्या जन्मे ओ ऐ वा(कुर मृत्युर (पर) मुषम्मात् शिवलवहु प्रापन जीव- दशा पर्य्यन्त त्यक धन ओ फुटीसकलेर उपरे कावेज थाकिया देना ओ लेना ओ फुटीर कर्म जारि करिया मृत्यु हया ओ ताहार मृत्युर पर उहार कन्या मुसम्मात् नछमन् ओ नछमनेर पुत्रगणेर माधोस्वहाय ओ वेणिस्वहाय त्यक्तधनप्रभृतिते दखिल हइयाछे । ये हेतुक शास्र ओ देशेर व्यवहारमते मृत वावुद्वारिकादासेर कन्यागणेरं पुत्रगण व्यतित अन्य फेह उत्तराधिकारी नहे, भो यावुद्वारिकादासेर प्रथमा नीर गर्भज कन्यागणेर मध्ये एक कन्या आमि' मुसम्मात पादामुर पुत्र जगन्नाथदास उत्तराधिकारी ओ हकदार वटे । अतएव नालिश करितेछि। १. एजलासेर हुकुमनामार-इति सायौपान् पाठः । २. दाराय-इति साधीयान् पाठ। ३. एवाबदेश-ठि साधीयान् पाठः । ४. काव्यप०। ५. मादित्यः । -- व्यवस्था-पत्र संख्या-६४ २६७. ओ जोयावेर खोलासा एइ ये यखन वावुद्वारिकादास आपन जीवद्दशार मुहैयार विवाह दिया,ये देना छिल ताहा दिया,. विदाय करियाछेन हिन्दु जातिर व्यवहार ओ शास्त्र मते मुदगणेर किछु स्वत्व ओ हिस्या दावि वाकि (रहि)ल ना, श्रो यद्यपि मुदगणेर किछु दावि थाकित तवे ऐ वावुर जीवद्दशाते अथवा साहार मृत्युर पर शीतलवहुर उपर, ये १५ वत्सर पर्यन्त कावेज. ओ दखिल थाकिया, आपन दौहित्रगणके उत्तराधिकारी ओ रास- नसीन कराइया ओ तमलिकनामा लिखिया दियाछेन, आपत्ति. करित । यो जवाव मजवाय (ये)-मुसम्मात् शीतलवहुमाधो-- स्वहायके, ये रामचरणलाल, अर्थात् मुसम्मात् नछमिर पविर. वड पुत्र वटे, रासनसीन् करण असिद्ध, ओ शीतलवहुर मृत्युर. पर तमलिकनामा प्रस्तुत होन यो मृत वावुर सकल दौहित्रगण तुल्यांशे स्वत्वाधिकारि थाकन सम्वलित वटे, श्रओ कोटेर हाकिम वारानसेर पाठशालार पण्डितगण हइते व्यवस्था लोन परे मुगणेर दावि डिगरि करिलेन । यथा प्रापिलाएट एइ आपत्ति- सकले ये-ऐ व्यवस्था शास्त्र-पहिर्भूत वटे आपिल करिलेक, श्रो प्रकाश फरिलेक, ओ प्रकाश फरे ये उपरेर लिखित हेतु मते शाखा-- नुसारे विरोधीय वस्तुर उपर माधोस्वहाय ए वेनिस्वहायेर स्वत्वा साव्यस्थ यो प्रामाण्य वदे। अतएव एइ आदालतेर, पण्डित हइते नीचेर सोयालेर जोवे व्यवस्था लश्रोन उचित वोघ हइया हुकुम हइलो-ये एइ. रोवकारिर नकल ६५ लम्बरे प्रथित आशल हेवानामा दस्तावेज सम्वलित, एइ आदालतेर पण्डितके अर्पण करा याय-ये धारा-. नस देशेर चलित शास्त्रानुसारे नीचेर समोयालेर जवावे एक, सप्ताहेर मध्ये व्यवस्था दाखिल करेन । सोल-यद्यपि आगरोयाला महाजन जाति हइते केह" एक खी श्रोताहार गर्भज एक कन्या ओ प्रथमा ली, ये पविर साक्षाते मृत्यु हइयाछे, ताहार गर्भर दुइ कन्या ओ धनादि त्यक्तः . . व्यवस्था पन्न:संख्या,९४. वस्तु राक्षिया.मरे, मो वाहार पर द्वितीया स्री प्रापन ,जीवद्दशा पर्यन्त पतिर त्यक्त वस्तुते दुखिलकार थाकिया आपन. गर्भ कन्यार पुत्रगणके. रासनसिन् करिया.ऐ समुदय वस्तुर तमलि:, कनामा य: उहादिग्के लिखिया दियाथाके ,तवे केवल द्वितीया. स्त्रीर तमलिक मते ताहार कन्यारं पुत्रगण,मृत, व्यक्तिर, वस्तुर; कर्त्ता हाइवेक, किम्वा प्रथमा घोर, ये पतिर साक्षाते मरियाछे,', -फन्यागणेर पुत्रगणे का हइवेक, ओ मृत व्यक्तिर द्वितीया खीर। आपन गर्भज कन्यार पुत्रगणके आपन पविर अनुमति व्यतित , -रास्नसीन फरण, ओ खोलोक आपनार पतिर त्यक स्थायर-, किम्वा अस्थावर, सकल आपन गर्भज कन्यार पुत्रगणके तमलिक: •करण शास्त्रानुसारे सिद्ध पदे कि ना इति।। श्रीजयतितराम्। एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतमान्तकिउहेनरिटरम्बलसाहेवधर्माधि: करणलिखितैतदन्दीयमाहमासीयद्वाविंशतिदिनसम्बन्धिविचारपत्रान्तर्गतमः -भपतिरूपपत्रमेवं पशपथ्यकाशितदानपनञ्च यज्जुनमासीयचतुर्दशदिनसम्म धिचन्द्रवासरे पञ्चघटिकाधिकयामद्रये मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोघो. जावस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते। यद्यपि कश्चिदगरवालामहाजनो व्यक्तिविशेपो दितीयविवाहितां. पी. - तद्गर्मजामेका कन्या - तथा स्वाग्रे, मृतप्रथमपत्नीगर्भजकन्यादयं हेमरूप्य- कुप्यादिधनञ्च (संरक्ष्य दिवंगतः। तदनन्तरं सैव द्वितीया पनी स्वजीवदयाः,, पर्यन्त पतित्यक्तसर्ववस्तुन्यायत्तत्वं, सम्पाद्य, स्वगर्भजकन्याया पुत्र रायन सीनमर्थादत्तकपुत्रं कृत्वा, अयं च तस्या एव पुत्राय' सर्ववस्तुनस्तमलिक, नामा अर्थात् दानपत्रं लिखित्वा दत्तवती स्यात् , सयापि मृततद्व्यक्तेदिती; यपनीकृतदानपत्रानुसारेण तद्गर्भजकन्यापुत्रयोः केवलयोमूतव्यस्त प्रथम पनीगर्मजकन्यापुत्रम(न)पेय तस्मिन् सर्ववस्तुनि स्वामित्व.न एम्भवति, किन्तु सर्वेषामेव मृतव्यक्तेः प्रथमपनोगभंजकन्यापुत्रस्य तथा द्वितीयपनी, "भय व दस्या व पुत्रायास्तस्यैव सर्व-म्यप, "व्यवस्था पत्र संख्या-६४ गर्भजकन्यापुत्रयोस्तुल्याधिकारिलोर , उत्तरोतराधिकारिक्रमबोधकशास्त्रे दौ. हिनविशेराभवणात पत्यनुमतिव्यतिरेकेण स्त्रीकृतस्य कन्यापुत्ररासनचीनक-- रणस्याहत्तककरणस्य, तथा स्वपतित्यक्तस्थावरास्थावरसववस्तुनः स्वगर्भ- जकन्यायाः पुत्रद्वयसम्प्रदानकदानपत्रकरणस्य च शास्त्रासम्मतत्वाच-इति. काशीप्रदेशचलितदत्तकमीमांसा-मिताक्षरा-धीरमित्रोदय-कृत्यकल्पतरु-विवाद- चिन्तामणि-प्रभृतिग्रन्यानुयारिणी व्यवस्था । प्रत्र प्रमाणम्- दुहित्रमावे दोहित्रो धनभाक्-इति मिताक्षरा( पृ० २२१ )वारमि- त्रोदय पृ० ६६१ ग्रन्थलिखनम् ॥ १॥ अपुत्रेण सुतः कार्यों यादृक्ताहक प्रयत्नतः । पिण्डोदकक्रियाहे तो मसङ्कीर्तनाय च ॥ इति दत्तकमीमांसा- (पृ०५) धृतमंनुवचनम् ॥ २ ॥ अपुत्रे(णे)ति पुंस्त्वश्रपणात् न स्त्रिया अधिकार इति गम्यते इति । अतएवं पशिष्ठः- न सी पुत्रं दद्यात् प्रतिगृह्णीयावा अन्यत्रानुशानाद्भर्तुः- इति. दत्तकमीमांसा पृ०७ ) विवादचिन्तामणि कल्पतरुप्रभृतिग्रन्यधृतवशिष्ठ- वचनम् ॥ ३॥ भनेन विधवाया भनुज्ञानासम्भवादनधिकारो गम्यते इति तद्ग्रन्थ-- (दमी० पृ० ७)लिखनम् ॥ ४॥ भारत (१३१४७/२४)स्त्रीणां स्वपतिदायस्तु उपभोगफलःस्मृतः । नापहार स्त्रियाकुयुः पतिपित्तात् कथञ्चन ।। अपहारमैच्छिकदानविक्रयादिकम् । इति विवादचिन्तामणि पृ. २३८ ग्रन्थलिखनम् || ५॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । मुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा उर्ध्वमाप्नुयुः ॥ इति विवादरता- 'कर (पृ० ५११) कृत्यकल्पतरुयोरमित्रोदयादि वीमि• पृ० ६२७ )ग्रन्थ- मतकात्यायन( कास्मृ० पृ० ११२)वचनञ्चेति ॥ ६ ॥ विचिः पुरतके वचनमिदन प्रान् !' ३. वचनमिद मनुस्मृतौ नोपलभ्यते ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-६४-६५ जुनमासीयसप्तदशदिनसम्बन्धिगुरुवासरे घटिकाचतुष्टयाधिकयामदये दयं मया व्यवस्था। श्रीजयतितराम् श्रीहोरानन्दमिश्रेण ९५-रोवकारि मिसिल पादालत देओनि सदर तारिख २१ माह आगस्त सन १८३० इं० मतावक ६माह भाद्र सन १२३७ वाङ्गला रोज शनिवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत पालक सुन्दर रास साहेवेर वैठके। फन्दसिंह मोकशेल- आपिलाण्ट । मृत राजामोहनलालखार खीगण राणी सुगन्धलता ओ राणी बगलताप्रभृति- रस्पाडएटान् । प्रापिलाएटेर उकिलगण मुनसि दारवक्स ओ मौलवि करम होसेन ओ स्वयं श्रापिलाएट प्रो रप्पाडण्टगणेर उकिलगण मुनसि होसेनप्रालि मुनसि गोलामवतुल श्री सदासुकपण्डित हाजिर पासिल । ए मकईमा एलाका कलिकातार प्रविनशल फोर्टर रिटरण पौचन मते ए मासेर १४ तारिखे आमार निकट पुनराय उपस्थित हइया ऐ तारिखेर रोयकारिर लिखित कागज- सकल पहागिया स्थकित छिल, अद्य पुनराय रोवकार हइया प्रविनशल कोर्ट आदालतेर वाकी कागजात् श्री ए श्रादालते दाखिल होया कागजसकल पडागेल। ए मकईमार कागज- सकल ओ मोहनलालखाँ आपिलाएट ओ राणी शिरोमणि रप्पा. हएटेर ५८ ल. माईमा ओ रूपचरणमहापात्र मोफपेल प्रापि. लाएट आनन्दलालसाँपर भ्राता मोहनलालखाँ रप्पाडएटेर ६५८ ल मकईमा वावत् ए आदालतेर फयशलासकलेर द्वारा प्रामार साव्यस्त हइल-ये राजा अजिसिंह यो राणी शिरोमणिर वंशे व्यवस्था पत्र-संख्या-१५ २७१ दायभागशास्त्र चलित वटे, ओ ऐ शाख ऐ फयशलासकलेर अनुसार राजा अजित्सिंहेर स्त्री राणि शिरोमणिर मृत्युर पर, ये ऐ राजार त्यक जमिदारिर उपर उत्तराधिकारि प्रकारे दखिलकार छिल, राजा अजिसिंहेर मातुलपुत्रगण उहार वलवान उत्तरा- धिकारि ओ उत्तराधि(कोर)प्रकारे उहार मतरुकार स्वत्वाधि- कार घटे। श्रो इद्दा येश्रो स्पष्ट-ये मोहनलालखाएर भ्राता आन- न्दलालखार नामिक राणि शिरोमणिर निखिया देशोया हेवा- नामा, ताहाते राजा अजितसिंहेर उत्तराधिकारिगणेर अनुमति ना पायोने प्रसिद्ध ओ मिथ्या हइयाछे,श्रो रूपचरण श्रापिलाएट श्रो मोहनलालखाँ रस्साडएटेर मकई माय, ये आपिलाएट आपनाके लक्ष्मणसिंहेर भ्राता श्यामसिंहेर सन्तान करार दिया विरो- 'धीय जमिदारिर कारण नालिप करियाछिल । दाखिल होया व्यवस्था द्वाराय याहेर ये राणि शिरोमणिर मृत्युर पर यदि राजा अजिसिंहेर कोन निकटस्थ उत्तराधिकारि ना थाकित, राजा अजिसिंहेर मतरुकाते रूपचरणमहापात्र उत्तराधिकारि स्वत्व हाइत । ओ एइ क्षण कन्दर्पसिंह लक्ष्मणसिंहके राजा अजिसिंहेर आदिपुरुप ओ श्रापनाके ओ सप्तमपुरुपीय स्वगोत्र पलिया उत्तराधिकारिरूपे विरोधीय वस्तुर दाविदार वटे, श्रो आपिला- एटेर दाखिल करा फुरसिनामा ओ रूपचरणमहापात्र प्रापिला- एटेर मकद्दमार श्रामलि ११८८ शालेर भाद्रमासेर १५ तारिखेर लिखित राणि शिरोमणिर दाखिल करा कुरसिनामा ओ मोहन- लालखा आपिलाएट' राणि शिरोमणि रप्पाडएटर मकई मार दाखिल होया ऐ राणिर दरखास्तेर नकल द्वाराय जाना याइतेछे ये फन्दसिंह प्रापिलाण्ट ओ लक्ष्मणसिंह आदिपुरुपेर सहित नवम पुरुप ओ अजितसिंह लक्ष्मणसिंहेर सहित सप्तम पुरुष बटे । ओ दुइ व्यक्तिर तपसिन एइ ये। आदि पुरुष लक्ष्मणसिंह - तस्य पुन पुरुषोत्तम व्यवस्था-पत्र संख्या- २७२ " . , AR ज्येष्ठ पुत्र संग्राम प्रतापनारायण महापात्र तस्य पुत्र रघुनाथ "द्वितीय तस्य पुत्र सुबुद्धि तस्य पुत्र रामसिंह तस्य पुत्र दुर्योधन तस्य पुत्र यशोमन्तसिंह तस्य पुत्र रसिक तस्य पुत्र अजितसिंह तस्य पुत्र वैष्णवचरण " तस्य पुत्र समिर' 'तस्य पुत्र कन्दर्पसिंह 'ओ विरोधीय वस्तुर दखिलंकार राजा मोहनलालखा राजा "अजितसिंहेर सकल मातुलपुत्रगणेर लिखिया देयो नादावि द्वाराय श्रापनाके विरोधीय जमिदारिर स्वत्वाधिकारिर 'करार देय । अतएव शास्त्र द्वाराय एइ कथार तहकिकात्ये मातुलपुत्रगणेर लिखिया देशोया नादावि मुद्दे, अर्थात् प्रापिलाएटर दाविर निषे- धीय हइते पारे किना, आवश्यक बोध हइया, हुकुम हइल ये-एइ रोवकारिर नकल रूपचरणमहापात्र प्रापिलाण्ट मोहनलालखा “रपाडण्ट श्री मोहनलालखा प्रापिलाएट राणि शिरोमणि रप्पा- - डण्टेरं मकहमार दाखिल होया व्यवस्थासकल सहित एइ 7. हुकुमे ए आदालतेर पण्डितेर हाअोलात'फरा याय ये ताहार दृष्टे राजा अजिसिंहेर वंशेर चलित दायमागशाबानुसारे नीचेर . लिखित सोलेर जवाव सोयान पाओनेर तारिख हइते ..'चारि दिवसेर मध्ये दाखिल करे। सोया(स)-ऐ व्यवस्थासकल ओ ऐ मकद्दमासकलेर' - वायत् ए श्रादालतेर फयशलासकलेर द्वारायसाव्यस्थ पाछे । ये राजा अजितसिंहेर घंशेर पलित दायभागशास्त्रानुसारे राजा अजितसिंहेरं खीराणी शिरोमणिर मृत्युर पर ऐ राजा:ो राणिर त्यत विरोधीय वस्तु राजा अजितसिंहेर मातुलपुत्रगणके, ये उहार वलयान् उत्तराधिकारि घटे, अशिवक, श्रोताहारा ताहार स्वत्त्वाधिकारि वटे; ओ उहादिगेर समीदये सगोन उत्तराधिकारि हवेक ना, यो कागजातेर द्वाराय साध्यस्थ ये ए आदालतेर - 1 44 ५.

व्यवस्था-पत्र-संख्या-९५ २७३ पूर्व पण्डितगणेर व्यवस्थासका ओ फयशलासकलेर द्वाराय . राणि शिरोमणिर मृत्युर पर मातुलपुत्रगण प्रापन विरोधीय वस्तुर स्वत्त्वाधिकार थाकनेश्रो, विरोधीय वस्तुके मोहनलालखाँ- यर दखले छाडिया दिया, ताहार नादावि लिखिया दियाछे। अतएव जिज्ञासा याय ये नादावि लिखिया देवोनिया मातुल- पुत्रगण, ये राणी शिरोमणिर मृत्युर पर राजा अजितसिंहेर वल. वार उत्तराधिकारी ओ विरोधीय जमिदारिर स्वत्वाधिकारि वटे, अजिसिंहेर अतिवृद्धप्रपितामहेर भ्रातार सन्तान, ये स्व- गोत्र वटे, थाकनेश्रो ऐ सफल वस्तु हइते पापनादिगेर एक्कारे किछु ना राखिया, किम्बा श्राद्ध प्रो पापनादिगेर निर्वाहार्थे ताहा हइते किछु राखिया, मोहनलालखाके, ये भिन्न व्यक्ति वटे, विरोधीय पस्तुर नादावि लिखिया देशोयार क्षमता राखे कि ना, श्रो ऐ नादावि आपिलाण्टेर स्वत्वेर ये स्वगोत्रवटे अपचय कारक हइवेक कि ना इति । एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतालकसुन्दरराससाहेवधर्माधिकरण- लिखितखरामाष्टेन्दुमिताब्दीयागस्तमासीयैकविंशतिदिवसीयविचारपत्रानार्ग- तप्रश्नपत्रमेवमेतद्विवादनिवियपत्रजातान्तर्गतात्रत्यपूर्वधर्माधिकरणलिखित- द्वीन्दष्टेन्दुमिताब्दीयजनवरीमासीयद्वाविंशतिदिवसीयविचारपत्रसवलितव्यव. स्थापत्रद्वयन यदेतदब्दीयागस्तमासीयसतविंशतिदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे न- यमिनटाधिकयामद्वये मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोघो जातस्तद्नुसारे- णोत्तरं लिख्यते । राशिशिरोमण्या मरणोत्तरं राशोऽजितसिंहस्य बलवदुत्तराधिकारिवि- यादास्पदीभूतसराजकरस्थावरस्वत्याधिकार्यानभियोगपत्रलेखकमातुलपुत्रकर्तृ- काजितसिंहस्य सगोत्रवृद्धप्रपितामहभ्रातुपुत्रसन्ताने वर्तमान एच सति तस्मात् सराजकरस्थावरात् स्वायत्तं किञ्चिदप्यरक्षित्वाध्यया श्रादार्थ तथा स्वीयनिहाय तस्मादेवसराजकरस्थावरात् किञ्चिद्रक्षित्वोदासीनमोहनलाल- खाँसम्प्रदानकविवादास्पदोभूतवस्त्वनभियोगपत्रदाने यद्यपि तस्मात्सराजकर- व्यवस्था पत्र-संख्या-६५ २७४ स्थावरात् किञ्चिदप्यरक्षित्वेति' कल्पे शास्त्रासिदवृत्तिलोपात्मकत्वेन मृतधनिव्यक्तेरजितसिंहस्य श्रादार्थमर्द्धस्यारक्षणत्वेन तथान्वयसवप्रयुक्त निषिद्धसर्वस्वदानत्वेन लोकविरुद्धत्वादिना च सत्यसत्यपि वाऽयिन्येतादृश- सराजकरस्थावरविषयकानभियोगपत्रदानस्य शास्त्रानुसारित्वं नास्ति, तथापि राजाऽजितसिंहवंशचलितदायभागानुसारेण तु तैर्मानानुसारेण स्वेच्छापूर्वक- सम्मत्या दानासिद्धिसाधनवलभीतिच्छलादिविरहेण' पुत्रादिसम्मत्या च स. त्यपि राशोऽजितसिंहस्य सगोत्रे वृद्धप्रपितामहभ्रातुःपुत्रसन्ताने उदासीन- मोहनलालखाँसम्प्रदानकैताहशसराजकरस्थावरविषयकमप्यन भियोगपत्रं दातुं शक्यते, राज्ञोऽजितसिंहस्य बलवदुत्तराधिकारिमातुलपुत्राणां राशोऽजि. तसिंहस्य वृद्धप्रपितामहभ्रातुप्पुत्रसन्तानस्यार्थिन उदासीनसहशत्वेन तस्य तन्मातुलपुत्रकत कानभियोगपत्रदाने प्रतिबन्धकत्वात् , तादृशस्य च वि. वादास्पदोभूतसराजकरस्थावरस्य तेषां तन्मातुलपुत्राणां दायरूपत्वाद्दाय- रूपेण तस्मिन् स्वाच्छन्द्यस्य लोकप्रसिद्धत्वात् । परन्तु एतच्छास्त्रानुसारेण दातुर्दोषो भविष्यति । तस्मात् किञ्चिद्रक्षित्वेति फल्पे श्रादाय तत्सराजकर- स्थावरस्याद तथा तस्मादेव स्थावरात् स्वपोष्यवर्गमरणाहं धनं रक्षित्वा तु शानानुसारेण स्वेच्छापूर्वकसम्मत्या बलभीतिच्छलादिविरहत्वेन पुत्रादि'. सम्मत्या च स्वाच्छन्येनोदासीनमोहनलालखॉसम्प्रदानकमनभियोगपत्रं दातुं शक्यते। यदि च किञ्चिदित्यनेन मानवर्द्धनमात्र रक्षितं तथापि पूर्यो- क्तज्ञानानुसारेणेत्यादितदानरीत्यान्यसम्प्रदानकमपि तद्दातुं शक्यते; परन्त्वे. तद्रक्षणस्याप्यरक्षणसमत्वेन दातुर्दोषो मविपति । राशोऽजितसिंहस्य बल- यदुत्तराधिकारिमानुलपुत्रक काजितसिंहस्य त्यकस्वदायरूपसराजकरस्थाय- रविष कोदासीनमोहनलालखाँसम्प्रदानकानभियोगपत्रदानेनाजितसिंहस्य स. गोत्रवृद्धप्रपितामहभ्रानुष्पुत्रसन्तानस्यार्थिनोऽश्चयो नास्ति, तत्पूर्वमुपचया- भावात्तन्मातुलपुत्रसत्वे सगोत्रस्य तस्य स्वत्वाभावात्-इति तदंशुचलिक- दायमागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । १. सद्रि-म्पर। ३ सिसिमाधना-प्य० ॥ २. नर-व्यप, ४ पुत्रगामादि-न्यर व्यवस्था-पत्र-संख्या-६५ २७५ अत्र प्रमाणम्- ये जाता येऽप्यजाताश्च ये च गर्ने व्यवस्थिताः । वृत्ति तेऽपि हि काङ्क्षन्ति वृत्तिलोपो विगहितः ॥ इति (दामा० २४)मनुवचनम् ॥ १॥ समुत्पनादनादई तदर्थ स्थापयेत्पृथक् । मासंपारमासिके श्राद्धे वार्पिके व प्रयततः॥ इति दायमाग(पृ० २०६।२१०)धृतबृहस्पति(पृ. २१६ वचनम् ॥ २ ॥ निक्षेपः पुत्रदारांश्च सर्वस्वञ्चान्वये सति । आपत्स्वपि हि कष्टासु वर्तमानेन देहिना ।। अदेयान्याहुराचार्या:-इत्यादि विवादमार्णव( ० १.पृ० ४२१ ख)धृतनारद( नास्मृपृ० १३७ )वचनम् ॥ ३ ॥ बलादत्तं बलामुक्तं बलाद् यचापि लेखितम् । सर्वान् बलकताननिकृतान्मनुरबवीत् ।। इति मनु(पृ० १६८)- वचनम् ॥ ४॥ स्वग्रामनातिसामन्तदायादानुमतेन च । हिरण्योदकदानेन पड्भिर्गच्छति मेदिनी । - इति दायतत्त्व( Zo १७६ )धृतमुनिवचनम् ॥ ५॥ पूर्वस्वामिसम्बन्धाधीनं तत्स्वाम्योपरमे यत्र (द्रव्ये) स्वत्वं तत्र निरू- ढो दायशब्दः-इति दायभाग( पृ०५ अन्धलिखनम् ।। ६ ।। भरण पोष्यवर्गस्य प्रशस्त स्वर्गसाधनम् । नरकं पीडने तस्य तस्माद् यत्नेन तं मरेत् ।। इति दायमाग पृ. ३३ अन्यधृतमनुवचनम् (1) ॥७॥ केवलं शाखमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः । युतिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते ।।-इति व्यवहारतत्व- (पृ०४ धृतवृहस्पति( पृ० १६ वचनम् ॥ ८ ॥ १, भ्यासवचन मिति हारीवाचन मिति वा पठनीयम् । तत्र च चतुर्थे पादे-वृत्तिदान में सिध्यति-पति हारीनपाउ, न दान नच विक्रय:-इति न्यासाठः । २. तद-दाभा ३.चास्य-दामा २७६ व्यवस्था-पत्र-संख्या-५-१६.. स्वभागान् यदि दास्ते विक्रीणीयुरथापि या । कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्तेस्वधनस्य वै 11 इति दायभाग(पृ०३५). पृतनारद नामसं० १० १५७ वचनम् ॥६॥ व्यासपचनं तु ( स्वामित्वेन दुचपुरुषगोचरविक्रयदानादिना ) कुटुमविरोधादधर्मभागिताज्ञापनार्थ निषेधरूपं न तु विक्रयाद्यनिष्प- त्यर्थम् इति तत्करणाद्विध्यतिक्रमो भवति, न तु दानाधनिमत्तिः- इति च दापभाग पृ० ३४.३५ अन्यलिसनम् ॥ १० ॥ तदभाये मातुलपुत्रपौत्राणां क्रमेणाधिकारः तदभावे चाधस्तनसकु- ल्यानां धनिमोग्यलेपदातयां प्रतिप्राप्तप्रभूतिपुरपभयाणां क्रमेणा- धिकारः । तदभावे पुनरूर्खतनसकुल्यानो घनिदेयलेपदातृणां वृदापि तामहादिसन्ततीनामासत्तिकमेणाधिकार:- इति श्रीकृष्णतालद्वारकृत- दायभागटीकामन्य(पृ. २१८ )लिखनचोति । शेतम्बरमासीयसप्तदिनसम्बन्धिभौमवासरे सायटिकायाधिकयामद्ये दत्तेवं मया व्यवस्था। श्रीजंपतिवराम् श्रीवैद्यनाथमिण . १६-सोयाल आदालत देओयानी कमिसनरी प्रातराक मुसरक जिला रङ्गपूर वनामे पण्डितान् सदर देश्नोयानी पादालत सन् १८३० इरेजी चारिख १० जुन मोतावक १२३७ वादला तारिख २६ ज्येष्ट। विष्णुराम मुराद धीरचन्द्रवड्या जमिदार मुद्दायाले परगणे घूएर्णा श्री गयरह दादि १५०० टाका १.पनिदेयलेपदातयां सांप्रपितामद-म्पप० ।

1:व्यवस्था पत्र संख्या-१६ पर से वावन् लोयावाद फउरि परगणार उपस्वत्वे मुद्दे मजकुर ापन मातुल मेघनारायण चौधुरिर वित्तर पर दखिलकार थाका, बार मुद्दायाले परगणा मजकुरेर फएक मौजा जवरदस्तीते दखल करा एजहारे उपरेर लिखित मवलग मजकुरेर दायाते मुद्दायालेर नामे नालिप करे। तध्यिकालीन जाना- गियाछे-ये शिवनारायण नामे एक व्यक्ति परगणे लोयावाद कमोरिर जमिदार छिल। ताहार मृत्यु होयार पर तस्य पुत्र शम्भुनारायण आपन पितृवितेते दखिलकार हइया निःसन्तान रुपे मृत्यु हय । ए प्रयुक्त शिवनारायणेर दोहित्र मेघनारायण ऐ स्थावर विसेर अधिकारी हइयाछिल । कथक निःसन्तान मृत्यु हइयाछे। मुई मेघनारायण मजकुरेर भागिनेय हय । से मते सोयाल करा पाइतेछे-ये मेघनारायण निः- सन्तान मृत्यु होयाते शिवनारायणेर स्थावर वस्तुते, ये तादार पुग्ने अधिकारी हइया परे मेघनारायणेर हस्तगत हय, शाखा- नुसारे मुद्दे ताहा पाओयार त्वत्ववान् हय कि ना । यदि मुद्दे के ना अशे एवं मेघनारायणेर अथवा ताहार पूर्वाधिकारीर उत्तरा- धिकारी केह नाथाके, तवे ऐ स्थावर वस्तु काहाके अर्शिते पारे इति । प्रभुरमर्पितममात्रं यदेतदन्दीयजुलाइमासोयरञ्चमदिनसम्बन्धिसोम- यासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यद्यपि शिवनारायणस्य मृतस्य तत्यक्त्वसम्बन्धिस्यावरवस्तुनि शिय- -नारायणस्य पुत्रः शम्मनारायण उचराधिकारित्वेनाधिकार संपाद निःसन्तान एव सर्गतः, तदनन्तरं तद्भागिनेयो मेघनारायणस्तदेव वस्तु हस्तगतं -(वरदय निःसन्तानो मृतस्तथापि वन्मरणोचरं वङ्गदेशचलित शास्त्रानुसारे- साप्यान्मेपनारायणस्य मागिनेय एव तद्ग्रहणे सत्ववान् भवति-पत र 'रिलिखितशास्त्रे मृतन्मस्तेभ्रांनुपौत्राय॑न्तोत्तराधिकार्यभावे तत्यपने १. कविम्या व्यवस्थापत्र संख्या-२६-१७ पितृदोहित्रस्यार्थान्मृतव्यक्ते गिनेयस्याधिकारोऽभिव्यक्तोऽतः सुतरां मृतव्य- तेस्तद्व्यतिरिक्तोउत्तराधिकारिसामान्यामावस्य तथा मूतव्यक्तःपूर्वाधिका- .रिणोऽयांच्छम्भुनारायणसोत्तराधिकारिसामान्यामावस्य च सद्भावात्-इति ,वङ्गदेशचलितदायभागश्रीकृष्णतालझारकृतदायभागटोकादायक्रमसंप्रददि- वांदभार्णवविवादार्णवसेतुप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- किन्तु पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्तामा पितृदौहित्राधिकारी बोहव्यः- इति दायभाग ०२०० ग्रन्थलिखनम् ॥१॥ तदमावे पितृदोहिनः इति श्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभाग(१०२१८) ग्रन्पलिखनम् ॥२॥ प्रातृपौत्रस्याभावे पितृदौहित्रस्याधिकारः, पनिपित्रादिप्रयपिण्डदा. तृत्वाव-इति दायक्रमसंग्रहादि( पृ० प्रन्यालखनचेति ।। ३ ।। अगस्तमासीयदशमदिनसम्बन्धिभौमवासरे घटिकैकाधिकयामध्ये दचेयं मया व्यवस्था इति- श्रीश्रीजयनितराम् श्रीहीरानन्दमिश्रण . सदर देोयानि आदालतेर पण्डितेर प्रति प्रभा- ९७ सयोयाल :-एक व्यक्ति युगि परामाणिकी मर्यादार कउडिर दावि करे। अतएव एमत् प्रकार मर्यादार कउहि देया बो लोया शास्त्रसम्मत कि; उहादिगेर जातिर भो समाजस्य लोकेरा स्वेछावे विभाग हय-हार प्रत्युत्तर ययाशाख लिखिवा इति । व कश्चिद्योगी व्यक्तिविशेषः परामाणिकोमर्यादासम्बन्धिका का* यामेक्द्रयविषयकखत्वाभियोगं कुर्यात्, तत्र यद्यपि विशेषेण युगोमुप क्रम्य मर्यादाद्रव्यल्प दरानग्रहणे कुत्रापि शास्त्रे न लिखिते तथापि तत्र यदि बनातीय राश वा फेनचित् संविदिशेपेणार्थात् समुहै। कैशिदा कृतसरेतेन .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-६७ , , समूहकार्यचिन्तनाद्यर्थः प्रधानत्वेन व्यवस्थाप्य वृत्तिरुपकल्पिता, प्रय तज्जातीयानां पारम्परिकाचारोपि वा भवेत् ,अथवा तजातीयानां तच्छृणीनां वा घर्मों भवेत् , तदैतादृशद्रव्यस्य दानादानयोस्तजातितोणितत्समूहस्य या व्यवहारसिद्धत्वात् तदानादानयोनिष्प्रत्यूहमेव शास्त्रसिद्धत्वम्, यतो यच्छणीनां यजातीयानां या ययापूर्व्यापरव्यवहारस्तदनुसारेण यस्मिन् विषये विशेषतः शास्त्राज्ञा नास्ति तस्मिन् विषये तच्छणीनां तजातीयानां वा यथा पूर्वापरव्यवहारस्तदनुसारेणैव निर्णयस्य शास्त्रसम्मतत्वात्- इति यनदेशचलितमनुदायमागव्यवहारतत्त्वव्यवहारमातृकाविवादचिन्ताम- णिविवादभनार्णवादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । परन्वेतद्विवादमूलन्तु नृसिंहपरामाणिक रामकृष्णनयनयोः सहोदर- स्वम् , तथा च प्रभुसमर्पितेतद्विवादनिविष्टपत्र जातान्तर्गतार्थिप्रत्यथिसम्मत- साक्षिभाषापत्रान्मृसिंहोऽपि कश्चिदासीत् , अनयोराद्रामकृष्णनयनयो - तेति नावगम्यत इति तु विभावनीयम् - अत्र प्रमाणम्- तथा च यस्य कस्यचिद् गणस्य या संचित् सेव प्रतिपाल्या । तेन नापितादीनां प्रामाणिकत्वेन ख्यातस्य वचनातिकमे दोषो व्यवहारसिद्धः सङ्गच्छते-इति विवादभगाएंवग्रन्थलिसनम् ॥ १ ।। यो धर्मः कर्म चैवैपामुपस्थानविधिश्च यः । यच्चैपांत्युपादानमनुमन्येत तत्तथा ॥ (नास्मृ० १२३) धर्मः पारम्परिकाचारः कर्म जीवनानुकूलोचितव्यापारः वृत्त्युपादान- मुंपादीयमाना वृत्तिः इति (विवाद )रलाफरः (पृ० १७६')। अनुमन्येत राज्ञा इति शेषः । तथा चैो पारम्परिकाचारादीन् को- प्यन्यथाकर्तुं न शक्नुयात् इत्यमिहितम् इति च तद्ग्रन्यलिखमम् ।।२।। जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधम्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधमाश्च स्वधर्म प्रतिपादयेत् ||-इति मनु(पृ. २८१ वचनम् ।। ३॥ १ कर्म यापैगम्-नार।

व्यवस्था पत्र-संख्या-१७-६८ व्यवहारोऽपि यलवान् धर्मस्तेनावहीयते इति व्यवहारमातृका- (पृ० २८२)न्यवहारतत्त्वादि(पृ. ४)अन्यधृतनारद नामसं० पृ०८) वचनम् ॥४॥ केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्त्तव्यो विनिर्णयः । युक्तिहीनविचारेण धर्महानिः प्रजायते ॥-इति व्यवहारमातृका. (पृ० २८२ वोरमित्रोदयादि( वीमि० ख-१८)ग्रन्थधृतबृहस्पति(पृ०१६). -वचनम् ॥५॥ युक्तिलोकव्यवहार :- इति व्यवहारमातृका (पृ० २८२) व्यवहार तत्त्व(पृ०४ ग्रन्थलिखनञ्चति ॥ ६ ॥ श्रीजयतितराम् श्रीहीरानन्दमिण ४२-लं खास प्रापिल । सन १८२६ शाल ई० सदर देवी- यानि आदालतेर पण्डितेर प्रति सोल । ९८-यद्यपि कोन व्यक्ति दुइ पुत्र राखिया लोकान्तर हय, 'पार ऐ दुइ पुत्रेर मध्ये एक जन महाव्याधिमस्त ओ अपुत्रक, ओ द्वितीय जन सुस्थशरीर थाके, तवे पितार धने ऐ दुइ पुत्र अधि- कारी हय कि ना। आर ऐ महान्याधिप्रस्त व्यक्ति आपन अंशेर दान विक्रयेर क्षमता राखे कि ना। शास्त्रानुसारे इहार व्यवस्था लिखिया। सन १८३० शाल, तारिख १० जुन । प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदन्दीयजुलाइमासीयपञ्चदशदिनसम्बन्धिगुरु- पासरे घटिकैकाधिकयामद्वये मया प्राप्तं तदवलोक्य याशयोधो नात. स्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- यद्यपि कश्चिद्व्यक्तिविशेषः पुत्रदयं (स)रक्ष्य स्वर्गलोकमगमत् । एक तयोर्दयोः पुत्रयोर्मध्ये एको महान्याधिग्रस्तः, अथ च निःसन्तानो दिती- यश्च स्वस्थशरीरो भवेत् तथापि पितृत्यक्तधने निरुपाधिकपुत्र एक एयाधि- पारी, नहि महाव्याधिग्रस्तशरोरोऽपि, यतः शास्त्रेऽन्धत्वपगुल्वलीनत्वा- १.मन्यञ्च-व्यर।

व्यवस्था पत्र-संख्या-हट-88 २८२ दिनानोपाध्याट्यतनोः भकान्छादनातिरेकेण धनांशाभावप्रतिपादनात् । 'सिद्धे चांशाभावे मुतरां तद्दानविक्रययोः क्षमताभावः-इति बगदेशचलित- मनुदायमागश्रीकृष्णतालझारकृनदायभागटोकादायक्रमसंग्रहविवादभगा । -स्वादिप्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- क्लीयोऽथ पतितस्तनः पङ्गुरुन्मत्तको जडः। अन्धोऽचिकित्स्यरोगाद्या भव्याः स्युनिरंशकाः ।। इति दायभागादि- '(पृ० १०२ अन्यधृतमाशवलाय{ २११४० वचनम् ॥ १॥ अनंशी क्लीयपतिती जात्यन्धबधिरी तथा। उन्मत्तजडमूकाश्च ये च केचिनिरिन्द्रियाः ।। इति मनु।२०१) -वचनम् ॥ २॥ मृते पितरि न क्लीयकुष्ठ्युन्मत्तजडान्धकाः। पतितः पतितापत्यं लिङ्गी दायांशमागिनः॥ तेषां पतितवजेभ्यो भक्तवस्त्र प्रदीयते ।।-इति दायभाग (पृ० १०२) विवादमगार्णय( २ विवा० पृ० २११ सदायतत्वादिग्रन्थ दात• पृ० १७२ )धृतदेवलवचनम् ।। ३ ।। प्रतीतव्यवहारान् मासान्यादनेविभृयुः । अन्धजडलीयव्यसनिव्याधितादीश्चाकर्मिणः। पतितत्तजातवर्जम्- इति दायमागादि(दामा पृ० १०२)अन्यधृतबोधायवचनचेति !|४|| अागस्तमासीयैकविंशतिदिनसम्बन्धिशनिवासरे घटिकत्रयाधिकयामद्वये दत्तेयं मया व्यवस्था- श्रीजयतितराम् श्रीहीरानन्दमिश्रेण सदर देखोयानि आदालतेर पण्डितेर प्रति सोयाल- 86-कालीप्रसादरायघोपाल-प्रापिलाएट-कोर्ट कालिकाता दुर्गाप्रसाद-रस्साडण्ट-मार्टसाहेव- व्यवस्थापन-संख्या-8 २८२ . ७-लम्बर । आपिल सन १८२७ साल-- । यद्यपि एक व्यक्तिएक स्त्री ओ एक पुत्र ओ एक कन्या रातिया मृत्यु हय, आर ऐ पुत्र आपन माता ओ भगिनीर संमुख अवि-- वाहित लोकान्तर हयः ताहार पर ऐ कन्यार एक पुत्र जन्मिया आपन मातामही ओ मातार जीवद्दशाय ओ महाव्याधि ओ यक्ष्मा फाशप्रस्त हइया, एक खी ओ दुइ कन्या राक्षिया, आपन मातार संमुखे मृत्यु हय । अतएव ऐ व्यक्ति ये ताहार लोकान्तर हइले, ताहार पुन आपन मातार संमुखे लोकान्त(र) हय, ताहार पितार उत्तराधिकारिरा थाकिते उहार स्थावरास्थावर धन काहाके अर्श, एवं दौहित्रेर स्त्री ताहा पत्तनि पुरते विक्रय करिते पारे कि ना. शाघानुसारे इहार प्रत्युत्तर भापाय एइ सोयालेर पार्श लिखिवेन. इति । सन १८३० शाल तारिख १५ जुलाइ । प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदन्दीयागस्तमासीयपञ्चमदिनसम्बन्धिगुरुवा- सरे घटिकादयाधिकयामद्ये मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशमोधो जातस्त. दनुसारेणोत्तरं लिख्यते- यद्यपि कश्चिद्व्यक्तिविशेषः एको पदीमेकं पुत्रं कन्याञ्चैका (स)रौनं. लोकमत्यजत्, अथ च स बालोऽपि मातृभगिन्योरमेऽविवाहित एव स्वर्लोक- मगमत् , तदनन्तरञ्च तस्याः कन्यायाः पुत्रो भूत्वा स्वमातामहीमात्रोनीव- दशावधिमहाव्याधियक्ष्माकासप्रस्तः' सन्नेव स्वमातृसमक्षमेकां पदों द्वेच कन्ये (सोरेक्ष्य मृतः स्यात् ,तथाप्यविवाहितस्य मृतस्य तस्य मातृसेकान्वे स्थावरास्यावरधने, तस्यां •मातरि मृतायां स्वमातामहीवर्तमानावधि या कुष्ठयक्ष्माकासप्रस्तस्य पितृदोहित्रस्याधिकारो नास्ति, शास्त्रेऽचिकित्स्य रोगिणोऽनधिकारबोधनात् , यक्ष्माकासादिरोगेऽचिकित्स्यत्वस्यायुर्वेदसिद्ध त्वात् , चिकित्सयाप्यनुपशमेन मरणपर्यन्तस्थायित्याय, शास्त्रे कुष्ठिनोऽप्य. नधिकारबोधनात्, कुठयक्ष्माकासरोगप्रस्तस्य तु सुतयमनधिकारम् । यदन्यतरसत्त्वे अनधिकारस्तत्समुदायसत्त्वेऽनधिकारस्य लोकव्यवहारप्रसिद्ध १मावामहिक-व्यप २. पश्माकारायस्थ-व्यप, .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-६ त्वात् । एवञ्च सति तत्सत्त्वस्याप्यसत्त्वसमत्यादौहित्रान्तपितृसन्तानाभावे पिता- महसन्ताना(ना)मेवाधिकारो, न तु भगिन्यादीनाम् इति। मातुलघनेऽधि- कारिणस्तु पल्याः कीदृशेऽपि पतिमातुलधनस्य विक्रये क्षमता नास्ति, पति- सत्त्वेऽसत्त्वेऽपि वा स्यसंक्रान्तपतिस्थावरस्यापि स्त्रीकत कविक्रयनिषेधोऽस्ति यतोऽतः सुतरां पत्युर्यदनेऽनधिकारः, तस्यास्तद्धने पतिद्वारमन्तरेणाधिन कारित्वप्रतिपादकशास्त्राभावेनानधिकारित्वनिश्चयात्, अनधिकारिणो विक्रया- सामर्य्यस्य लोकप्रसिद्धत्यात्-इति वङ्गदेशचलितदायभागविवादमगार्णव- दायतत्त्वन्यवहारमातृकादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । प्रत्र प्रमाणम्- कीवोऽय पतितस्तजा पगुरुन्मत्तको जडः। अन्धोऽचिकित्स्यरोगातों भर्तव्याः स्युनिरंशकाः ।।-इति दायमा गादि( दाभ पृ० १०२ )अन्यधृतयाज्ञवल्क्य पृ०२२६ )वचनम् ॥१॥ अचिकित्स्यरोगः अप्रतसमाधेययक्ष्मादिरोगप्रस्तः।-इति मिता- क्षरा(पृ० २२७ ग्रन्थलिखनम् ॥ २॥ महाशन महाक्षीणमतीव(च) निपीडितम् । शुलशुष्कोदरंश्चैव यक्ष्मिण परिवर्जयेत् ।। इति श्रायुर्वेदीयवचनम् ॥३॥ मृते पितरि न क्लीवकुष्ठयुन्मतजडान्धकाः। पतितः पतितापत्यं लिङ्गी दायांशमागिनः ।। इति दायभागादि- (पृ० १०२ )अन्यभृतदेवलपचनम् ।। ४ ।। किन्तु पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्ताभावे पितृदोहिनस्याधिकारो बोद्धव्यः धनिदोहित्रस्येव एवं पितामहप्रपितामहसन्ततेरपि दोहिनान्तायाः पिरड- प्रत्यासात्तिकमेणाधिकारो बोद्धव्यः- इति दायमाग(४० २०८ ग्रन्थ- लिखनम् ॥ ५॥ पत्नी च भर्तृधनं मुजीतेव, परं न नु तस्य दानाधानविक्रयान् कर्तुमर्हति-इति दायभाग( पृ० १७१ )अन्यलिखनम् ॥ ६ ॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । मुञ्जीतामरणाद क्षान्ता दायादा उर्ध्वमाप्नुयुः ॥ इति च तमन्य- (दाभा पृ० १७१ )यतकात्यायन( कास्मृ पृ० ११२ वचनम् ॥ ७॥ . .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-दह-१०० २८४ -- व्यवहारोऽपि बलवान् धर्मस्तेनावहीयते । युक्तिहीनविचारेण धर्महानिः प्रजायते ॥--इति व्यवहारमानुकाधृत (पृ० २८२)वचनञ्चति ॥८॥ द्विजम्बरमासोयाष्टमदिनसम्बन्धिबुधवासरे घोटकायाधि कयामद्ये -दत्तेयं मया व्यवस्था- श्रीजयतितराम् श्रीहीरानन्दमिश्रेण मुपम्मात चित्रादासी १००-रोवकारि कोर्ट श्रापिल एलाके कलिकाता तारिख •५ माह मार्च सन १८३० ई मतावक २३ माह फाल्गुण सन १२३६ वाङ्गला रोज शुक्रवार ऐ आदालवेर हाकिम श्रीयुत गेलब चटकामोण्टरि माष्टर साहेवेर बैठके। मतालके जिलेय शहर शाएला इंराजी १८२६ सालेर शेतम्बर मासे दाखिल होया साए- 'लार सोयाल । ऐ तारिखेर लिखित ए अदालतेर हुकुमानुसारे यजसाहेवेर पाठान कागजात श्रो गङ्गागोविन्द तरपसानिर सोयाल ओ अनुमति पो चन्द्रमुखिदास्यार मजाहेमदाराणेर सोयालात ओई १८१२ शालेर नवम्बर मासेर १० ओ २४ 'सारिखेर लिखित ७५८ लम्परेर मकईमा यायव सदर देोयानि अदालतेर दुइ किता रोयकारि, ये ताहाते रामकुमारन्यायवाचः सति आपिलाण्ट, कृष्णकिकरवर्कमूषण रप्पाडण्ट छिल, ऐ आदालतेर पण्डितगणेर दुइ किता व्यवस्था ओ ई १८२५ शालेर माइ मासेर २ ओ३० तारिखेर लिखित सदर अदालतेर २किता रोवकारिर नकल ये ताहाते सारलार श्वशुर रामजयः साहा साएल छिल ओ साएलार उकिलगण रसिकलालदत्त ओ व्यवस्था पत्र-संख्या-२८० शिवनारायणचट्टोपाध्यायेर अद्य दाखिल' पण्डितगणेर व्यय- स्था सम्बलित अद्य ताहारदिगेर ो गङ्गागोविन्दसेनेर उकिल रूपचन्द्रसेन ओ मजाहेमदाराणेर उकिल राजनारायणदत्तेर समीक्षे दृष्टे आसिल । जानागेल ये गङ्गागोविन्दसेन म०६६०० ढाकार दाविते ये शाएलार पति रामलोचनसाहार इजारा तभ्य वावत ताहार तालुक निलम हइया उसुल हइयाछिल । पे: रामलोचनेर नामे नालिप करिया डिगरि हासिल करिया डिगरि जारिते डिगरिर देइनदारेर जायदाद करारे नीलेर कुटी प्रो वास्तु वाटी प्रभृति वस्तुसकल निलाम कराइयाछे । यो देइन- दारेर पिता रामजयसाहार दरखास्त मते ऐ जायदादके यापन जोयदाद जाहिर फराइया छिल । सदर देओयानि श्रादालत हइते ऐ निलाम वद्ध हइया ऐसेन(?)प्रति नालिसेर अनुमति हय । तत परे ऐ सेनेर नालिप मते रामलोचनसाहा भो ताहार पिताहर) नामे १ लम्बरे नीचेर कुटिर डिगरि ओ २ लम्बरे वास्तु याटीर डिगरि जिलार आदालते हासिल हइल । ए आदालते ऐ जाय- दादसकल रामजयसाहार थाकन हेतुक जिलार दुइ डिगरि वद्ध हइल, ओ एइ क्षणे ऐ रामजयसाहार मृत्युर पर ऐ डिगरि- दार रामजयसाहार, त्यक्त समुदय वस्तु देइनदारेर स्वत्व करार दिया ताहा विक्रय द्वाराय डिगरि(र) टाका आदाय होयार जन्ये जिलार आंदालते' दरखास्त दाखिल करिलेक, श्रोताहार रोवकारिर हुकुम सादर होनेर परे साएला एइ एजहारे एक किता दरखास्त दाखिल करिलेक ये रामजय मजकुर अनेक दिव- (स) हइते आपन पुत्र रामलोचनके आज्ञावाहक ना थाकन प्रयु- क्त पुत्रत्व ह्इते दूर करियाछे। रामलोचन मजकुर पितार वस्तु हइते नैरास होनेर पर मेहनत ो मशमत श्रो इजारा प्रभृति द्वाराय दिन जापन करित, ओ वागला १२३५शालेर १६ बैशा- १य दास्ति भय प०-व्यप। २ मादातर-व्यप० ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-१०० खे रामजय मजकुर ापन वृद्धावस्थार दृष्टे साएलार नावालंक पुनेर, ये उहार पौत्र वटे,ओ प्रतिपालन पो तरवियतेर फराापन स्वकृत समुदय स्थावर ओ अस्थावर वस्तु साएलाके हेवा करि- याछे। जिलार यजसाहेव ऐ हेवा सिद्धि कि असिद्धि ताहा सदर देोयानि श्रादालतेर पण्डितगण हइते ज्ञात हओनार्थे ऐ श्रादा- लते आपन रोयकारि पाठाएन । सदर श्रादालतेर पण्डित गणेर व्यवस्था पौछिल । परे ऐ हेवानामाके श्रसिद्ध ज्ञान करिया ऐ जायदाद विक्रयेर हुकुम एइ हेतुते सादर करिलेन-ये रामलोचन- साहा व्यतित मृत रामजयसाहार अन्य सन्तान नाइ। अत. •एव ताहार स्वत्वार प्रमाण तलव करार प्राविश्वक हइल ना। श्रो रामकुमारन्यायवाचस्पतिर मकई मा वावत सदर आदा- लतेर इनफशालि रोवकारिर नकलेर द्वाराय जानागेल ये ऐ मक- ईमाते ऐ आदालतेर हाकिमगणेर मध्ये हुजुर हइते पण्डितग. र निकट ए विपयेर सोयाल हइल-ये यद्यपि कोन ब्राह्मण ज्येष्ठ पुत्र विद्यमान राखिया थाकने आपन पैतृक ओ स्वकृत स्थावर ओ अस्थावर समुदय विषय कनिष्ठ पुत्रके दान करे, से दान घनदेशचलित शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे किना। ऐ आदालतेर पण्डितगण ताहार जवावे लिखिलेन-ये यद्यपि फोन ब्राह्मणजाति ज्येष्ठपुत्र यतमान थाकनेश्रो पैतृक ओ स्वकृत समुदाय स्थावर वस्तु ज्येष्ठ पुत्रके हेवा करे से हेवा सिद्ध वटे । किन्तु ये हेतुक पैतृक स्थावर समुदाय वस्तु दान करण शाखनिपिद्ध वटे, अतएव पैतृक समुदाय वस्तु दान करणे पाप हय-पद्देश. चलित शास्त्रानुसारे ए व्यवस्था वटे इति । सदर आदालतेर पण्डित ए मकईमार यवावे लिखेन-ये यद्यपि हेवार लिखित वस्तुसफल रामजयसाहार स्वकृत हय, श्रो साहा मजकुर आपन पुत्र ओ पौत्र मौजुद थानेश्रो ताहा समुदाय अापन पुत्रवधूके तादा दान ओ विक्रय करणेर सम्बन्धे उद्दार क्षेमता फत्तृत्व नियमे हेवा करिया थाके, एमत व्यवस्थार व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०० २८७ 'अनैक्य हेतुक ये रोवकारिर समुदय वृत्तान्ते श्रो हुजुरेर समर्पित हेवानामा' सठता ओ क्रोधमते हइयाछे, शास्त्रानुसारे सिद्ध हइते पारे ना। केन ना शास्त्रानुसारे हाकिमके उचित ये ये हेवा, सठता ओ क्रोघ क्रमे हइछे, अकर्मण्य करेन । श्री रोवकारिर विस्तीर्ण मते पिता एक पुत्रके हेवाकरण, ओ आपन आप्राप्तव्य- वहार ओ अज्ञान पुत्र श्री अप्राप्तव्यवहार पौत्र थाकनेश्रो पुत्र ओ 'पोत्रेर भरण पोपणेर योग्य मिनाह ना दिया हेवार अयोग्य वस्तु हइते आपन पुत्रवधूके हेवाकरण शठता व्यतित हय ना। 'अतएव एइ दृष्टे ये आदालतेर फयशला ओ सदर देोयानि आदालतेर रोवकारिर नकलेर अनुसारे ए मकस्माते साव्यस्थ नाइये! रामजयसाहा हेवा करणेर पूर्व आपन पुत्र रामलोचनके त्याग फरियाछे, ओ ऐ हेवानामा लिखन कालिन रामजयसाहा ऐ रामलोचनेर सम्बन्वे शठता ओ क्रोध क्रमे साएलाके हेवा करियाछे, वरंगे हेवानामाते शापलार अप्राप्तव्यवहार पुत्रेर, ये रामजयेर पोत्र वटे, प्रतिपालनेर उल्लेख लिखा नाइ । ताहाते साएलार सम्बन्ध हेवानामार लिखित समुदय वस्तु विक्रय श्रो दानकरार क्षमता नाइ। ओ काहारो पिता विना क्रोधे ओ अप- राधे पुत्र त्याग करे ना। श्री रामकुमारन्यायवाचस्पतिर मकई मार व्यवस्थार नकलेर द्वाराय जाहेर ये वड पुत्र थाकनेश्रो कनिष्ठ पुत्रके हेवा करा सिद्ध ओ ताहाते ज्येष्ठ पुनेर मरण-पोपणेर परिमाणेर किछु मिना लिखा नाइ । किन्तु से मकद्दमाते ब्राह्मण जाति शब्द लिखा गियाछे। ओ साएला अन्य पण्डितानेर व्यवस्था एइ कारण दरपेप करिलेक ये रामकुमारन्यायवाचस्पतिर मक- ईमार व्यवस्था शास्त्रानुसारे ब्राह्मण यो हिन्दु अन्य जाति स्वत्वे एक पटे;ये हेतुक रामकुमारन्यायवाचस्पति आपिलाएट प्रो कृपए- किङ्करतभूपण रप्पाडण्टेर मकई मा यावत सदर देशोयानि आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था श्रो ए मकई मा वावत व्यवस्था, १.हेवानामार-व्यप।

- व्यवस्था-पत्र संख्या-१० याहा आदालतेर सोयाल मते ऐ पण्डितगण दियाछेन,अनक्या अतएव उभय व्यवस्थार अनैक्यता परिष्कारार्थे, श्रो पारो एइ ये रामकुमारन्यायवाचस्पतिर मकई मार ब्राह्मणेर स्वत्वे ये हुकुम', पाछे, ताहा समस्त हिन्दु जातिर मकई माते सम्पर्क राखे ना। हुकुम हइल ये एइ रोधकारिर नकल ओ दुइ व्यवस्थार नाल सहित इङ्गरेजी चिटीर सम्वलित सदर श्रादालतेर रेजष्टर साहे. वेर निकट एइ प्रार्धनाय पाठान जाय--सहेव मौपुफा ताहाके पण्डितगणेर निकट समर्पण करिया ताहार दृष्टे दुइ व्यवस्थार अनैक्यतार परिष्कारेर विपय एवं वाचस्पतिर मकई मार व्यवस्थार श्राज्ञा समस्त हिन्दु जातिर मकई मार सम्पर्क राखन, ना राखन विपये व्यवस्था दाखिल करेन-ताहा अनुग्रह पूर्वक ए पादालते पाठाएन इति । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रप्रतिरूपपत्रं सदरदेशोयानीपदवाच्यधर्माधिकरणा- धिकृतपूर्तापरपण्डितव्यवस्थाद्वयश्च यदेतदन्दीयजुलाइमागीयचतुर्विशतिदि- वसीयशनी घटिकाधिकयामदये मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यद्यपि रामकुमारल्यायवाचस्पतीयविवादसम्बन्धिव्ययस्थायाः श्रीमती- चित्रादासीयविवादसम्बन्धिव्ययस्थातो ब्राह्मणवाझणेतरभेदफतू कभेदो नास्ति शास्त्रे एतद्विषये जातिविषये जातिविशेषाधवरणात् , तथापि रामकुमार न्यायवाचस्पतीयविवादसम्बन्धिव्यवस्थायाः शानबहिर्भूतत्वात् श्रीमती- चित्रादासीयश्विादधन्वन्धिव्यवस्थायाश्च शास्त्रसम्मतत्वात् , शास्त्राशास्त्र कृतयोस्तु व्यवस्थयोर्भेदोऽरत्येय । पैतामहे स्थावरारयावरधने पितुः पुत्रस्य च तुल्यस्वामित्वेन बहुस्यामिकैकपदार्थस्य परस्परानुमतिव्यतिरेफेणेकक तूफदानविन यादौ स्वांशदानादिसिभिव्यतिरेकेण पराशदानाद्यसिद्धः,शास्त्र- लोकव्यवहारोभयसिदत्वात् , पैतामहे स्थावरधने पितुविशेषतः स्वच्छन्द वृत्तिताया अपि.निषेधाच्च, शारने पुत्राद्यनुमतिव्यतिरेफेण स्वोपानितसन- व्यवस्था-पत्र संख्या-१०० . स्थापरास्थावरधनदानस्यापि निषेधोऽस्ति, पोष्यवर्गस्यावश्यम्मरणीयत्वात् , तथान्वयस्वत्वप्रयुक्तसर्वस्वदानस्य वृत्तिलोपस्य च निषेधात्। एवञ्च सति रामकुमारन्यायवाचस्पतीयविवादनिविष्टव्यवस्थाधृतप्रायश्चित्तमोधकवचनस्य प्रसविस्तु तत्रैव, यत्र फेनचिद् दुर्वृत्तपुरुषेणै'तादृशविधिमुल्लव स्वोपार्जितसळधनस्य दानं कृतं स्यात् , विहितपोध्यवर्गभरणस्याननुठाना- निन्दितस्य चान्ययस्वत्वप्रयुक्तसळस्वदानस्य वृत्तिलोपस्य च करणात् । न तु पैतामहस्थावरधनदाने तत्र पितुरेकस्य प्रभुत्वाभावात् शास्त्रानुसारात् किञ्चिदपि पुत्रवधूक कोपकाराश्रयणादुत्तराधिकारिकोटावनन्त तत्वात् , विना निमित्र स्वमिन्नस्य कस्यापि कृतनपाकारित्वाच्च तस्याः। तथा च कृते रात्यपि स्वाशोल्लङ्घनकारित्वेन पुत्रत्यागे अप्राप्तव्यवहारत्वेनाविदितगु. णदोपेष्यथ च मुख्योत्तराधिकारिषु, स्वस्यार्थाद्रामजीसाहस्य तथाणमस्तस्य' स्वपुत्रस्यार्थाद्रामलोचनसाहस्य कृतोपाकर्तृषु सत्स्वेवाप्रासब्यवहारेषु पौत्रेषु, तेषामदत्या स्वकुटुम्बादन्यमदत्त्वा च पुत्रवधूराम्प्रदानकदानपत्रस्य छलादिव्यतिरेकेपासम्मवात् । अथ च यद्यप्राप्तव्यवहाराणां तेषां भरणार्थ- मेव तद्दानपत्रं द स्यात्, अथ च तस्य छलादिकं नाभिमतं स्यात् , तदा पुत्रवधूमर्थात्तन्मातरं मध्यस्थां कृत्वैव पौत्रसम्प्रदानकं कुतो न दत्तम्-एवा- दृशरीत्याप्यदानात् छलादेः स्पष्टतरतया प्रतीतेः छलादिकृतव्यवहारे पराव- तनीयत्वस्य शास्त्रसिद्धल्यात्-इति बनदेशचलितमनुदायभागदायकमसंग्रह- विवादभद्गार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था - अत्र प्रमाणम् भू• पितामहोपात्ता निबन्धो द्रव्यमेव या। तम स्यात् सदृशं स्वाम्यं पितुः पुत्रस्य चैव हि ॥ इति दायभाग(पृ० २९.)अन्यघृतयाज्ञवल्क्य (१।१२१)वचनम् ॥१॥ स्वभागान् यदि दास्ते विक्रीणीयुरथापि वा । कुर्युगथेप्टं तत्समीशास्ते स्वघनस्य वै ।। -इति तद्दामा पृ० ३५. अन्मभृतनारद(नामसं १४|४२)वचनम् ।। १ थानपरत्वप्रयुक्तमर्वस्परव्यर०।२ प्रशक्तिरतु-व्यप० । ३ पुरुशैताल-व्यप० । ४ पुरसैनाश-व्यप० । ५. प्रस्थस्य-व्यप० । ६. खानशान्-नाम । , २६०. व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०० पिता चेत् पुत्रान् यिभजेत्तस्य सेच्छा स्वयमुपात्तेऽर्थे। पैतामहे तु पि- तापुत्रयोस्तुल्यं स्वामित्वम् ।।-इति तान्य( दामा०पृ० ३१) धृतविष्णु- वचनम् ॥ ३॥ यदि पिता पुत्रान् विभजति तदा स्त्रोपार्जितेऽर्थे न्यूनाधिकविमागं खेच्छया पुत्रेभ्यो दद्यात् । पैतामहे तु नैतत्, यस्मात् तत्र तुल्यं स्वामित्वम्, न पुनः पितुः स्वच्छन्दवृत्तिता-इति तद् दाम पृ० ३१ ग्रन्थलिख- नम् ॥ ४॥ . . पूर्वोक्तगुणवत्यादिनिमित्तेनापि पितामहधनस्य भूमिनिवन्धद्विपद (न्यतम स्वरूपस्य न्यूनाधिकदाने पितुर्न प्रभुत्वम् -इति दायक्रमसंग्रह (पृ० ४० ग्रन्थलिखनम् ।।५।। स्थावर द्विपदचव यद्यपि स्वयमर्जितम् । असम्भूय सुतान् सर्वान् न दानं न च विक्रयः ।।-इति दायमा- गादि( दाभा०पृ० ३५)ग्रन्यधृतवचनम् ।। ६ ॥ भरणं पोष्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम् । नरकं पीडने चास्य तस्माद् यत्नेन तं मरेत् ।। -इति मनु(?)वच. नम्॥७॥ निःक्षेपः पुत्रदाराधिः सर्वखञ्चान्वये सति । आपत्स्वपि हि कष्टासु वर्तमानेन देहिना ॥ श्रदेयान्याहुराचार्याः-इत्यादि विवादमहार्णवादि(विभ पृ० ४२१ .: ख)-प्रत्यपृतनारद(नामस० ५१५ )वचनम् ॥ ८॥ ये जाता येऽप्यजाताश्च ये च गर्ने व्यवस्थिताः । वृत्तिं तेऽपि हि कान्ति वृत्तिलोपो विगहितः॥ -इति व्यास (धको पृ० १५८७ वचनम् ॥६॥ विहितस्याननुष्ठानाबिन्दितस्य च सेवनात् । अनिग्रहाच्चेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति ॥ इति प्रायश्चित्तविवेक- (पृ. १०)धृतयाज्ञवलय( ३३२१६ वचनम् ॥१०॥ १. मुनि-यास्मृ० । २. निक्षेप पुत्रदारच -नामस० । ४.०मिदनि-व्य१०1 . ३. गनु०-व्यर .* च्यवस्था-पत्र-संख्या-१००-१०१ २६१ त्र पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ प्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः ॥ एपामभावे पूर्वस्य धनभागुत्तरोत्तरः । स्वर्यातस्य ह्यपुत्रस्य सर्ववर्णेष्वयं विधिः ।। -इति दायभागादि(पृ. २५१ )ग्रन्यतयाज्ञवल्क्य( २।१३५ )वचनम् ॥१२॥ प्रतिपन स्त्रिया देयं पत्या या सह यत् कृतम् । स्वयं कृतं वा यहणं नान्यत् स्त्री दातुमर्हति ।। --इति विवादभङ्गार्णवादि(१ विवा०पृ०२०६ क)ग्रन्थधृततद्याश २४६)वचनम् ॥ १२॥ तत्र प्रथम पुत्रस्तदभावे पोत्रस्तदभावे प्रपौत्रः। इति श्रीकृष्णत- कालकारकृतदायभागटीका पृ० २१८ यन्यलिखनम् ॥१३॥ पितरि प्रोपिते प्रेते व्यसनाभिप्लुतेऽपि वा । पुत्रपौत्र-एं देयं निहवे सातिमावितम् ॥ इति विवादभङ्गार्णव (पृ०१७८ ख) धृनयाज्ञवल्य(२०५०)वचनम् ॥१४॥ योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् । यत्र वाप्युपधि पश्येन् तत्सर्व विनिवर्तयेत् ।। इति मनु (८।१६५ वचनचे ति ।। १५ ॥ ० ॥ ० ॥ दिजम्बरमासीय कनिशदिनसम्बन्धिभृगुवासरे घटिका)प्रयाधिकयामद्वये दत्तेयं मया व्यवस्था ॥०॥ श्रीजयतितराम् श्रीहीरानन्दमिण . १०१---प्रभुपमस्तितधम्माधिकरणप्राचीनाधिपतिकृतस्य रामकुमार- सायवाचवतीयविवादसम्बन्धिप्रश्नयैतद्धम्माधिकरणप्राचीनपण्डितद्वयलि. खितव्यवस्थापन कलकातापमहानगरसम्बन्धिकोयंगेलाख्ययम्माधिक-* गाधिरतिकतर चिनावासोकोपारसम्बन्धिपनौतदम्माधिकरणारा व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०१ २९२ वस्थानाभिषिक्तहीरानन्दमिभाख्यपण्डितलिखितव्यवस्थापत्रमन्यदप्यगरेजी- लिपिसमभिव्याहृतविचारपत्रदयं तत्प्रेपितमेवं यशहरजिलाख्यावान्तरभम्मा- धिकरणाधिपतिकृतस्य चित्रादासीयविवादसम्बन्धिप्रश्नस्यारमल्लिखितव्यव- स्थापनं चावलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेण निवेदन क्रियते । रामकुमारन्यायवाचस्पतीयविवादसम्बन्धिव्यवस्थेतद्धाधिकरणे अन-- रेजीशब्दप्रतिपाद्यद्वादशाधिकाटादशशतान्दे एतद्धर्माधिकरणप्राचीनप- रिडताभ्यां वनदेशचलितशास्रव्यवहारोभयावलोकनेनैवोपस्थापिता। एतद्धर्माधिकरणप्राचीनाधिपतिभिस्तदनुसारेणातायां दत्ताया सत्यां वङ्ग- देशे तादृशव्यवहारः शास्त्रतोऽपि दृढीभूतः । अतएव मुद्रायन्त्रालये मुद्रिः तः । एवञ्च सति वनदेशचलितशास्त्रेऽपि प्रायशो मुनिवचनानां प्रन्यानां या परस्परमनैक्यमस्त्येव । तथापि यन्मतं यस्मिन् देशे पूर्वापरप्रचलितं. भवति सस्मिन् देशे तदेव रक्षणीयम्, अन्यथा प्रजाप्रक्षोभः स्यात् । अय च घनदेशीयैः सवरेव प्राचीना चीनैः ग्रन्यकारैः स्वस्यग्रन्थयु जीवति पितरि- पुत्राणा पैतृकधने पैतामहधने च किश्चिदपि स्वत्वं नास्तीति लिखितम् । केषुचिद् अन्येषु विवादभङ्गार्णवप्रभृतिष्यव्यांचीनेषु पुत्र विद्यमाने तदनुमति' विना पितुःस्वाजितस्यावरस्य' पैतृकस्थावरस्य वा समुदायस्य दानविक्रयनिये- घकान्येतद्धम्माधिकरणपण्डितस्थानाभिषिक्तहीरानन्दमिश्राख्यपण्डितलिखि- तव्यवस्थालिखितवचनानि लिखित्वा इदमपि लिखितं पुत्रानुमति विना पितुः स्वार्जितस्थावरस्य पैतृकस्थावरस्य वा समुदायस्य दानविक्रयकरणं नोचित भवतीत्येव । ताहरावचनानां तासा-यदि च पिता तदेव शास्त्रोक्ताज्ञा जातमुल्लडध्य स्वोपाजितस्थायरसमुदायस्य पैतृकसमुदायस्य वा पुत्रानुमति विना दानं विक्रयं वा करोति, तदा तद्दानं विक्रयो वा सिद्ध्यत्येव, किन्नु पितुः शास्त्रोलद्धनवन्यः प्रत्यवायो भवति । तत्रापि यदि छलादिना क्रोधादिना या वाहशदाने विक्रयं वा करोति तदान सिद्धयतीत्यपि लिखितम् । एवञ्च सति रामकुमारल्यायवाचस्पतीयविवादसम्बन्धिव्यवस्थायाः श्रीमतीचित्रादासीय. विवादसम्बन्ध्यस्मल्लिखितव्यवस्थातो वास्तवमनैक्यं नास्त्येव । प्रकृते तु १.साव्या २.अनुमतिबिना-व्यप। ३.०वानिव-व्यय ४. शामोश-न्यप।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-२०१ २६३ यशहरजिलाख्यावान्तरधम्माधिकरणाधिपतिकृतांगरेजीशब्दप्रतिपाद्योनत्रिश- दधिकायादशशताब्दीयमैमासीयपष्ठदिवसलिखित विचारपत्रान्तर्गतवृत्तान्ते स. ति, तत्समर्पितदानपत्रलिखितवृत्तान्ते च सति, एकमात्रपुत्रस्य पितुर्व्यवहार योग्ये तस्मिन्नेकस्मिन् पुग्ने विद्यमाने अप्राप्तव्यवहारेषु कतिपयेषु पौनेषु च विद्यमानेषु तेषामनाच्छादनोपयुचामपि धनमसंरक्ष्य पुत्रपदामविक्रयस्त्र वाधिकारिणी कृत्वा व्यावहारिकतादृशसर्वस्वदानस्य छलादिकं विना अस- भवत्वेिन तादृशदानस्य छलादिकृतत्वं क्रोधादिकृत(त्व)ञ्च (अतस्तरमाद्) -दानासिदिप्रमाणीभूता व्यवस्था मया दत्ता । अत्र यद्यपि कलिकाताख्य- महानगरसम्बन्धिको पीलाख्यधर्माधिकरणीयविचारपत्रद्वये तहानपत्रे -रामजीसाहसंशकस्याप्राप्तव्यवहाराणां पौत्राणामयांदर्थिन्याश्चित्रादास्याः पुत्राणं मरणपोपणं लिखितं नास्ति; श्रतएवाधिन्याश्चित्रादास्या दानपत्र । लिखितवस्तुनः समुदायस्य दानविकयादिकरणक्षमता नास्तीति लिखित. मस्ति । परन्तु तद्दानपत्रे दाना रामजीसाहसंश केन लिखितम् एतस्य -दानविरुययोः स्वत्वाधिकारोऽस्त्येव; एतद्विषये मया किंवा ममान्यैः कैश्वि- दुत्तराधिकारिभिः प्राप्तीच्छा क्रियते चेत्तहि सा माप्तीच्छा न ग्राह्या नैव शुद्धा भवतीति । अतएव तहानपने एतादृशलिखनेनाप्यर्थिन्याश्चित्रादास्यास्त- दानाहीच्या यदि तद्धने दानविक्रयादिकरणक्षमता न भवति । तर्हि तदानपत्र तस्याः स्वत्योत्त्पत्तेः प्रमाणं कथं भवति । तदानपत्रमप्रमाणञ्चत् कथं तत् 'प्रमाणेन तद्दारसिद्धिरिति । एवञ्च सति यदि जिलावावान्तरधर्माधि- फरणाधिपतिकृततद्विचारपत्रलिखितवृत्तान्तेन तदानपत्रेण वा छलादेः कोषाा निधयो वास्तवं न भवति तदा चित्रादासीय विशदसम्बन्धिन्य. समल्लिखितव्यवस्था सुतरां प्रचारणीया नैवं भवति, किन्तु रामकुमार: न्यायवाचस्पतीयविवादसम्बन्धिनी व्यवस्थैव प्रचारणीया मवति । यदि च द्विचारपत्रेण दानपत्रेण वा छतादेः मोधादेर्वा वास्तवं निभयो भवति वेदा चित्रादीसोंयविवादसम्बन्धिनी अमंल्लिखितव्ययस्यैवं प्रचार- पीया भवति । एषश्च सति एतद्धम्माधिकरणनियुक्तपरिडतदयसम्मता व्यवस्था चैवमर्माधिरणनियुक्वैकारिडतसम्मतव्यवस्थया परावर्तनयोग्या में भवतीति । अतएव एतद्धम्माधिकरणपरिडवस्थानाभिषिक्तहारानन्द --- २६४. व्यवस्थापन संख्या-१०४ मिश्राख्य पण्डितलिखितव्यवत्यालिसिटेन रामकुमारन्यायवाचस्पतीय- विवादसम्बन्धिव्यवस्थायाः शास्त्र वहि तत्वादिति । अनेनापि रामकुमार- न्यायवाचस्पतीयविवादसम्बन्धिनी व्यवस्था परावर्त्तनयोग्या भवितुं न शक्नोति-इति बगदेशचलितदायमागश्रीकृष्णतर्वालङ्कारकृतदायभागटी-- कादायतत्वव्यवहारतत्वव्यवहारमातृकाविवादभङ्गार्णवविवादार्णवसेनुदाय-- मसंग्रहादिग्रन्थानुसारेण निवेदनम्-इति अत्र प्रमाणानि-प्रभुसमर्पितव्यवस्थात्रयलिखितानि चतुविशति-- संख्याकानि ॥ २४ ॥ स्थावरं द्विपदं चैव यद्यपि स्वयमजितम् । असम्भूय सुतान् सर्वान् न दानं नच विक्रयः ।। इत्येवमादिकम् तदप्येवमेव वर्णनीयम् । तथापि कर्त्तव्यपदमवश्यमत्राध्याहार्य्यम् ।। तेन दानविक्रयकर्तव्यतानिषेधात् तत्करणादिष्यतिक्रमो भवति, नं तु दानाद्यनिष्पत्तिः, वचनशतेनापि वस्तुनोऽन्यथाकरणाशक्तेः- इत्यादि दायभाग(पृ० ३५ )ग्रन्थलिखनम् ॥ २५ ॥ देशजातिकुलानाञ्च ये धर्माः प्रावप्रवर्तिताः । " तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रतुभ्यतेऽन्यथा--इति विवादभशाव- प्रन्यधृतहस्पति( पृ०२१ वचनम् ।। २६ ।। देशस्य जाते. सदस्य धम्मो ग्रामस्य यो भृगुः । उदितः स्यात् स तेनैव दायभाग. प्रकल्पयेत् ॥ इति दायतत्त्वादि- (दात पृ० १६५ ग्रिन्यधृतकात्यायन (पृ० १०७ )वचनम् ।। २७ ।। (लोक) धर्मशास्त्र यो) स्तु विरोधे लोक्व्यवहार एवादरणीयः-- इत्याह स एव- ..'धर्मशास्त्रविरोधे तु युक्तियुक्तो विधिः स्मृतः । च्यवहारो हि बलवान धर्मस्तेनावहीयते । हीयते अवगम्यते, हीगतावित्यरमाद्धातोः। अतएव बृहस्पतिः- -- केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्त्तव्यो विनिर्णयः। १ युक्तिहीनविचारे, तु धर्महानिः प्रजायते ।। ११. उजेलीना-मन-- .. २. तत्प्रतिताः-इस्म।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०१ युक्तियायः, स च लोकव्यवहारः-इतिव्यवहारमातृका (४० २८२) : इति व्यवहारतत्त्वादि व्यत० पृ० ४ ग्रन्थलिसनम् ॥ २८ ॥ पित[परते पुना भिजेयुर्धनं पितुः ।, अस्साम्य हि भनेदेपा निर्दोपे पितरि स्थिते इति दायभागादि- (दामा० पृ० १३ )ग्रन्यघृतदेवलवचनम् || २६ ।। यदि च परस्वत्योत्पत्तिफलफत्यागरूपं दानमेव करोति तदा उदा- सीनवत् सिद्धयत्येव स्वाजिते पैतामहेऽपि स्थावरादौ धने । परन्तु पुत्रानुमति विना पैतामहस्थावरं ददतः पितुर्दुरदृष्टमेव भवतीत्येव तत्त्वम्-इति वियादभङ्गार्णवग्रन्थ(पू. ४८ क लिसनम् ॥ ३० ॥ नहि यः पुनादिशरीरदाने प्रगुः स स्थायरदाने पुनाद्यनुमतिं विना न प्रभुरिति वक्तुं युज्यते-इति विवादमझायग्रन्थ लेसनम् ॥ ३१ ॥ एवञ्च यः कश्चित् पिता शास्त्रमुल्लड्ध्य करमैचित् पुनाय अन्यरमे वा म्यपेतृकं स्वाजित या समस्तमद्ध' या स्थावरमन्यस्मै ददाति तत्तु दानं सिद्ध्यत्येव । इदं कामक्रोधच्छलादिविभक्तत्वे सत्येवं । परन्तु शास्रोलाइनजन्यं दुरदृष्ट भवति । इति विवादभगावग्रन्थ( २ विवा० पृ०६४ स )लिखनम् ।। ३२ ।। देघे यहूना वचनम् इत्यादि व्यवहार'तत्त्वादि (व्यतः पृ० ३३ ) अन्यधृतयाज्ञवल्लप (२।७८) वचनञ्चेति ॥ ३३ ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीर्जयतितराम सदर नेजामतेर श्रादालतेर पण्डिते र प्रति प्रश्नः- (प्रथम) प्रश:-- २ न्यवहारतले गौतमबचन मिति पनिम्। 12.अत्यत-१० m - . "२६८ व्यवस्था-पर-संख्या-१०३. एतदीयापरेलमासीयद्वितीयदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकाद्वयाधिक-- यामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति । सोयाल- १०३-शूद्रजातिर मध्ये एक व्यक्ति स्योपाग्नित स्थावरादि धने अधिकार थाकिया परलोक होयार पर ताहार पुत्र तद्वि- पये उत्तराधिकारिसत्वे अधिकारि हइया ऐ समस्त वस्तु यापन विमाताके हेवा करिया मृत्यु हइयाछे। ए स्थले ऐ हेवार वस्तु सकल विमातार स्त्रीधन हय कि ना। परे ऐ विमाता केवल अापना पतिर भागिनेय विद्यमाने हेवार स्थावरादि सम्यदाय वस्तु स्वजातीय एक जनके हेया फरियाछे। यद्यपि सपनिर पुनेर हेवा अनुसारे ऐ वस्तु विमातार स्त्रीधन हइया थाके, तवे एमत् वस्तु ऐ विमातार दान करा सिद्ध हय कि ना-यथाशास्त्र इहार उत्तर लिखिवा इति । जिलार जोयाच एइ सोयालेर उत्तर निवेदन फरितेछिन्यथा ऐ. पुरुष विमाताके पैतृक श्रापन धन हेवा अर्थात् दान करियाछे से दान एवं ऐ स्त्रीलोक ये सपनिपुत्र हइते लब्ध धन दान करियाछे, से दान कि प्रकार व्यक्त लिखा नाहि मते ऐ हेवा-द्वयेर किरूप शब्द 'प्रयोग आछ, ताहा ना जानाते ऐ दान सिद्धि योया नादमओया दुइ प्रकार निवेदन करि। यथा दान सिद्धि ना होयारं ये हेतु पाछे, ताहा विने ऐपुरप आपनःसत्वे त्यागकरिया विमाताके ऐ स्थावरादि . सकल धन दिया थाके तवे ऐ सपन्निपुत्र देया धन भनु दत्त स्थायरातिरिक्त स्त्रीधन हय । एमत् सौदायिक स्रो- धन दान सिद्धर ये २ कारण पाछे ताहा चिने ऐ स्त्रीलोक श्रापन सत्व त्याग करिया दिया थाके, तवे से दोन अर्थात् हेवा सिद्ध हय । आर ऐ पुरुप.कि स्त्रीलोक दान सिद्धि नाहयोयार ये २ कारण पाछे से कारणे दियाथाके, तवे दान सिद्धि हयना । दान व्यवस्था-पर-संख्या-१०३ 4 असिद्धेर कथक हेतु लिखि । यथा-कामे भये क्रोधे पीडाते भ्रमे शोके रोगे अथवा प्रतिलाभेछाते अर्थात् कोण शरते अपात्रके पात्र शशाते एवं उन्मादादिते दिया थाके वये से देया सिद्ध. हयना। तार प्रमाण कथक लिखि । यथा- प्रदत्तन्तु भयोधकामशोकगन्वितैः । तथोकोचपरीहासव्यत्यासच्छलयोगतः ।। प्रतिलाभेच्छया दत्तमपाणे पात्रशङ्कया । इत्यादि नारद-कात्यायन-मुनि प्रभृति लिखित नाना बच- नादि । ताहासकल लिखाते अधिक हय । मते किछु लिखि- लाम् । ऐसकल हेवावे कि २ शब्द प्रयोग पाछे, कि अभिप्राय, ये होया ताझ ना जानाते सिद्ध होया नाहोया दुइ मतेरि कारण यथाशाख निवेदन करिलाम् । साहेव का येमत् अभि: प्राय निवेदनमेत(त) इति । प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र व्यवस्थापत्रद्वयञ्च दानपत्राद्वयञ्च यदेतदब्दीया- परेलमासीयचतुर्विंशतिदिनसम्बन्धिशनिवासरे घटिककाधिकयामद्वयानन्वर मया प्राप्त तवलोक्य विविच्य च यादशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं. लिख्यते। यदि शगजात्यन्तःपातो कश्चिद् व्यक्तिविशेषः स्वोपार्जिवस्थावरादिघने . प्रायत्तत्व उभ्याय मृतस्तदनन्तरं तत्पुत्रोऽपि स्वपितृत्यक्तधने उत्तरा- धिकारित्वेनाधिकारी भूत्वा तदेव सर्व वस्लु स्वविमाने दत्त्वा मृतः, तदा तदेव । द सर्व वस्तु विमातुः स्त्रीधनं भवितुं न शक्रोति, देवीप्रसादसंबक सपनीपुत्रलिखितचित्वासीसंशचिमातृसम्पदानुकंदानपत्रे : तेनैव देवी- प्रसादेन लिखितं त्वया. यथाशक्ति अस्माकं पुरुषानुक्रमेण ; वाय. ये मिपाकरमदय प्रतितास्तान संरक्ष्य भुज्यताम् इति । नन बताय. -लिखनेन चितवास्यास्तद्धने दानमियांनधिकार यस्मिन धने दानविक्रया-- अधिकार स्त्रियास्तदनं धनं भिवत्येतद्विधायकशास्त्रामापात् ।। एवं कोपोप पठन व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०३-१०४ तंदानात् परं सैव विमाता केवलं सपतिभागिनेये विद्यमाने सति दानकृत. -स्थावरादि सर्व वस्तु खातीयायैकमै कस्मैचिद्दत्तवतीस्यात् तत्रोपरिलिखित. प्रकारेण तदेव सर्व वस्तु विमातुः स्त्रीधन न भवति । श्रतएव तस्यैव वस्तु- नस्तया विमात्रा कृतदानं सिद्ध भवितुं न शक्नोति अस्वामिकृतत्वात्, अत्यार्मिकृतदानस्स विक्रयस्य च आधेश्च परावर्तनीयत्वात्-इति बङ्ग- देशचलितमनुदायभागश्रीकृष्णतकालङ्कारकृतदायमागटीकादायक्रमसंग्रदवि- -बादमदाणवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था। अत्र प्रमाणम्- अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं वा । अतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः । इति मनु- (पृ० १६६) वचनम् ॥ १॥ अस्वामिविकयं दानमाधिच विनिवर्तयेत् इति विवादमार्णवादि- पिया ३१७ ख अन्यधृतकात्यायन( पृ०७६ )वचनश्चेति ।।२।। एतदग्दीयमैमासीयश्रष्टाविंशतिदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिककाधिक यामदयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दवेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १०४-रोवकारि मिसिल आदालत देओयानि सदर सन .१८३१ इमरेजि तारिख १५ जानेोरि मतावक सन १२३७ -याला तारिस ३माघ रोज शनिवार ऐ आदालतेर हाकिम "श्रीयुत मान्तकीयू हेनरि दरम्बल साहेवेर वैठके। फाशीनायदत्त मतफार श्रीकरणामयी) ओ गयरह- आपिलाएटानं चन्द्रमाला मंदफार स्वामी जयचन्द्रघोष-रस्साडएट आपिलाएटदिगेर मध्ये एक जन रामकिशोरदत्तेर उकिल अनशी दादारपस ओ वनचन्द्रदत्त, नवालगेर मावा फालाचाँद- व्ययस्था-पत्र-संग्ख्या-१०४ ३०१ . दत्त मतफार स्त्री मसम्मात कृष्णप्रिया यो काशीनाथदत्त श्रो मसम्मात फरणामयी मतफारदिगेर नावालग पुन भैरवचन्द्र- दत्तेर अधिमदान नारायणघोष उकिल मुनशी गोलाम यतुल हाजिर हइल । प्रापिलएटदिगेर मध्ये एक जन रामकिशोरदत्त ओ मसम्मात कृष्णप्रिया ो गयरह सोयाल ए मकहमार राजविज सानि प्रार्थनाय, ताहार सम्पर्कर कागजात सहित, धार सन १८३० इमरेजी नवम्यर मासेर ४ नारिखेर होया प पादालतेर हाकिम श्रीयुत अलियम नशष्टर साइवर हुकुम माफिक मकई मार फागज श्रय पामार बैठफे उपस्थित हइया नालिसि, भारजि, ओ सन २८२७ इगरेजि जुलाइ मासेर ३ तारिखर ओ सन १८२८ गरेजि जानेोरि मासेर १७ तारिखर लिसित ए मकई मार साम पापिल मधुरिर रोयकारिमकल ओ सन २८३० इ० जुलाइ मासेर १५ तारिखर होया प मकई मा पाखेरि रोवकारि यो अद्य जारि कागघसकल रस्पाउण्टर उकिल सदामुपण्डितेर समक्ष्ये दृष्टे श्राशील । ए आदालतेर काएम-मकाम पण्डित हीरानन्दमिर एजाहार असिद्ध सम्य लित प्रापिलाएट प्रोजरारेर दृष्टे जे सेइ पुनियाद मकई मार तजयित हुइयाछे, ए श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने लिखित व्यवस्था लोन उचित योय हइया हुम्म ६इल-ये एइ रोयकारिर नकल पार जाहादिरनगरेर फोर्ट आपीलेर पण्डितेर श्रासल व्यवस्था ५४ लम्बर नथाकार नीर सामिल, ओए आदालतेर नधिर सामिल रप्पाडण्टेर दाखिल करा व्यवस्था महित ए पादालतेर पण्डित वैद्यनाथमिशेर हाथोयाने करा.. जाय, एइ हुकुमे से उपरेर व्ययस्थासकल वेत्ता हइया सप्ताह मध्ये जवाब लिखन-ये ऐ व्यवस्था यद्दश चलित शास्त्रानुमारे सिद्धि कि प्रसिद्धि मात्र । पण्डितेर व्यवस्था दाखिल होयार पर 'पापिलाएटेर तजविज सानिर सथोयालेर सम्पर्क मनाशीय हुकुम प्रकाश पाइवेक इति ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-१०४ श्री यतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतमान्तीयूहेनरीटरम्बलसाहेश्याधिक- : रणलिखितैतदन्दीयजानवरीमासीयपञ्चदशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपति- रूपपत्रमेयं तत्समर्पितजाहागिरनगरसम्बन्धिको पोलाख्यधम्माधिकरणनि- युक्तपरिहतलिखितव्यवस्थापनमेवमेतद्धम्माधिकरणप्रल्थसमुपस्थापितमेत- धम्माधिकरणीयव्यवस्थापत्रञ्च यत्फेवरवरीमासीयसप्तमदिनसम्बन्धिसोमवा- सरे घटिकैकाधिकयामद्वये मया प्रातन्तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनु- सारेणोत्तरं लिख्यते । उपरिलिखितव्यवस्थापनद्वयान्तर्गतजाहारिनगरसम्बन्धिको गीलाख्य- धर्माधिकरणनियुक्तरण्डितलिरिस्तम्भवस्थापनोपरिलिखितात् मनात् कीर्ति- • नारायणदत्तस्य मरणोत्तरं तद्योगांरो शास्त्रानुसारेण तत्पुत्रस्याधिकारे जाते सति तन्मरणोत्तरमनुमानादूनविंशतिवर्षोत्तरं विशतिवषोंचरं या कीर्तिनारा. यणदत्तस्यैको दौहित्र उत्पन्न इति ज्ञातम्।तथा सति कोत्तिनारायणदत्तन्याप्रात व्यवहारस्य पुत्रस्य मरणोत्तर तस्वैगामासनमहारस्य ये उत्तराधिकारिणस्त एवं सदनाधिकारियो भवन्ति । एयञ्च सति बगदेशचलितशास्त्रे एतादृशं किमपि प्रमाण लिखितं नास्ति यदनुसारेणोपरिलिखितप्रकारेण विवादास- दोभूतधनस्वामिनः कीर्तिनारायणदत्तपुत्रस्यामाप्तत्र्यवहारस्य मरणसमये तत्पु- प्रमारभ्य पितृदोहित्रान्ताभावे तदानीं विद्यमानस्य तसेतामहस्य तद- मावे तदानी विद्यमानायास्त सेतामह्यास्तदभावे तदानी विद्यमानानां वत् पितोपाना तदभावे पितृमपुत्राणां तदभावे पितृवयौवाणां वा अघो- लिखितप्रमाणेस्तक्षणादेवोत्पन्नं स्वत्वं नश्येत । अथवा तन्मरणादूनविंशति- वर्षोचरं विशतिधर्मोत्तरं वोत्पत्स्यमानपितृदोहेवार्य वदनमत्वामिकमेव तावत्कालपर्यन्तं तिष्ठेत् । अथवा तलिदौहित्रोत्पत्तेः प्राक् तद्धनं कोऽपि रक्षेत् । एवं प्रभुमरितव्यवस्थापत्रयान्तर्गततधम्माधिकरण- प्रत्यविसनुपस्थापिततद्धम्माधिकरणीयव्यवस्थापत्र दायभागलिखित प्रमा- ण्यं लिखितमस्ति । तयोर्मध्ये प्रथमप्रमाणेन मातुलस्य मरणोतरं -तदीयधने ऊनविंशतिवर्पोत्तरं विंशतिवर्षोंत्तरं वात्पन्नस्य भागिनेयत्स स्वत्व- .

J व्यवस्था-पत्र संख्या-१५४ मुत्पद्यते इत्यों न प्रतीयते । वरं मातुलस्य मरणानन्तरं तत्यत्तधने यदि सस्य पुत्रमारम्य पितुःप्रपौत्रपर्यन्तो न स्यात्, पितृदौहित्रस्तु विद्यते, तदा - स एवाधिकारी भवतीत्यर्थः प्रतीयते, प्रकृते तु पितृदोहिनस्य तदानी विद्य. मानवाभावात् । यत्तु तद्व्यवस्थायां द्वितीयं प्रमाणं लिखितं, तस्य चायम थी-ये जाता उत्पन्नाः । येन्यजाताः भविष्यद्गर्भसम्बन्धाः । ये च गर्ने व्यवस्थितास्तेऽति वृत्तिमाकाक्षन्ति गृत्तिलोपस्तेषां विहितो भवति-इत्य- नेनापि ताशभागिनेयस्य मातुलधने स्वत्वमुत्पद्यत इत्यर्थो न प्रतीयते, तद्वचनस्य स्वत्योत्पत्तिकारणत्वाभावात् । अयच दायभागअन्य पृ०२५). तद्वचन विभागप्रकरणे लिखितम् । यदि पित्रा स्वेच्छया क्रमागतधनस्य : विभागो विभागप्रतियोगिनों मातृरजोनिवृत्तिमन्तरा क्रियते तदा विभागोत्तर- जाताना वृत्तिलोपापत्तिः,अतएवासी विभागो न युक्त इति विभागप्रतियोगिनी मातरजोनिवृत्तिमन्तरा क्रमागतधनस्य विभागनिधाय नद्वचनं पञ्चमप्रमाणे स्पष्टीकृतं च । तत्रापि वृत्तिलोपो विगहित इत्यत्र वृत्तिराब्दस्यार्थी दायमा गटीकाकृतश्रीकृष्णतालहारैदायमागटीकाश(४० २५. )मेव व्याख्यातः- वृत्तिलोम पितामहधने निरंशत्यमिति ( दा०भा०टी०४० २५)। विधा दभगारांवग्रन्येऽपि तस्यैव वृत्ति राब्दस्य क्रमगतधनमित्यर्थी व्याख्यातः । अतएव मातुलधनं भागिनेयस्य वृत्तिनं भवति, तस्स क्रमागतत्वामावात् । किन्नु नाकस्मिकमेव सत्प्राप्तिभागिनेषस्य । अथ च वृत्तिलोको विहित इत्यनेन यदि केनचिद् विभागकरणेन दानविकारऐन वा कस्यचिद् । वृत्तिलोपः क्रियते तदात्वतो अपराधो मवति । प्रकृते तु विगागादिकरणेन वृत्तिलोपः फेनापि न कृतः। अथ च वनदेशचलिदायभागादिग्रन्थमने दायस्थज्ञे पिशेषतः सत्यकारणं धनस्वामिसम्बन्धो भनस्ताम्योपरमथ पूर्व पूर्वसम्बन्धिनामभावश्चेति त्रितयं भवति । अथ च केपाश्चित् अन्यानां मते: जन्मैव पुत्रपौत्रप्रपौत्राणां स्वत्वकारखं भवति । तत्र जन्म द्विविधम् यस्मिन् काले यस्य गर्भाधानं तदेकविधं यस्मिन् काले गर्भतो निर्गतस्तद्वितीयम् । प्रकृते तु कीर्तिनारायणपुत्रस्य कीर्तिनारायणमरणोत्तरं तयोग्यांरास्वा: मिनोऽप्रातमवहारस्य मरणसमये तद्रागिनेयस्य गर्भसम्बन्धस्याप्यमान तत्सम्बन्धस्य दूरापास्तत्वात् तत्त्यत(धने तत्सत्वोत्यत्तिीयेनुमरा- व्ययस्था-पन्न-संख्या-१०४ . श्यैव । अथ चोनपोडशवर्षवयस्कानो बालकानामर्यादपासव्यवहाराणों घनरक्षणे मुनिभिरुपायः कृतः तस्मादपि क्लिष्टतमे प्रकृतस्थाने अनियमित. फालेनोत्पस्ममानाना धनरक्षणे कोप्युपायो मुनिभिर्गन्धकारैर्ध्या न कृतः। तरमादपि अनुत्पन्नानां स्वत्व भवितुं न शक्रोति । तस्मात्मभुसमर्पितव्य- वस्थाद्वयं वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण सिद्धं मयितुमहंतीति न प्रतिभाति- इति यद्भदेशचलितमनुदायभागश्रीकृष्णतकालङ्कारकृतदायभागटीकादाय-- तत्त्वदायक्रमसंग्रह विवादभङ्गार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरो मातरस्तथा। तन्मुला गोत्रजो बन्धुःशिष्यः सब्रह्मचारिणः ।। एपामभावपूर्वस्य धनभागुत्तरोत्तरः । स्वातस्य ह्यपुत्रस्य सर्ववर्गाप्यय विधिः-इति दायभागादिक्षिात पृ० १५१ ) मन्यधृतयाज्ञवल्क्य ( २११३५) वचनम् ॥ १॥ तदभारे पुनः पितृदोहिनः इति । तदमावे पितामहरतदभावे पिता- महीं, तदभावे पितु. सोदरस्तदभावे पितु मात्रेयस्तदभावे पितृसोदर. पुत्रपितृवैमात्रेयपुत्रपितृसोदरपौत्रपितृवैमात्रेयपीनाणो क्रमेणाधिकारः- इति च श्रीकृष्ण तालद्वारकृतदायटीका । पृ० २१८ ) लिखनम् ॥ २॥ दौहित्रान्तपितृसन्तानाभाय पितामहो धनाधिकारी प्रासनत्वात,. तदभावे पितामही-इत्यादि विवादमगार्णव( २ विधा० पृ० ३६४ स) अन्य लखनम् ॥३॥ तदभावे पितामहाधिकारः दौहित्रान्तरवसन्तानामा पितुरधिकार-- पत्-इात दायर मसंग्रह (पृ० ७ अन्य लखनम् ॥ ४॥ तस्मात् पतितत्वनिस्पृहत्वोपरमैः स्वत्तापगम इत्येकः कालोऽपरश्व' सति रयत्वे तादच्छातपतिकालयमेव युक्तम् । मातुर्निवृत्तरजीतितत्' पितामहधनाभिप्रायम् । निहत्तरजसि पुत्रान्तरसम्भावनाभावात् तदा. नीमाप पतुरी छयैव पुत्राण विभागः । श्ननिवृत्चे रजसि ममागतधन- विमागे पश्चाज्जाताना तिलोपायो । न चासौ युक्तः। .

व्यवस्था पत्र-संख्या-१०४ ये जाता येप्यजाताश्च ये च गर्ने व्यवस्थिताः। वृत्ति तेऽपि हि शाडक्षान्ति वृत्तिलोपो विगहिंतः।- इति मनुवचनात्, इति दायभागपन्य( पृ० २४ लिखनम् ॥ ५॥ वृत्तिलोपः पितामहधने निरंशफलम् - इति श्रीकृष्णतकालद्वारकृत. दायभागटीका(पृ० २५)लिखनम् ॥ ६ ॥ जीमूतवाहनास्तु अनिवृत्ते रजसि क्रमागतधनविभागे पश्चाजाताना वृत्तिलोपापत्तेन चासो युक्तः। ये जाता येप्यजाताश्च ये च गर्ने व्यवस्थिताः। वृत्ति तेऽपि हि काङ्क्षन्ति वृत्तिलोपो विगहितः । इति मनुवचनादित्याहुः । मागतजीवनोपाय एस वृत्तिरादेनोच्यते -इति ' तेपामभिप्राय: इति विवादभनार्याव(२ विचा० पृ०७२ क अन्थलिखनम् ॥७॥ सात पित्तागमा धा दायो लाभः भयो जयः-इत्यादि वचनम् (मनु० पृ० ४२२)॥८॥ ततश्च पूर्वस्वामिसम्बन्धाधीनं तत्स्वाम्योपरमे यत्र द्रव्ये स्वत्वं तत्र- निरुढी दायराब्दा-इति दायभाग( पृ० ५ ग्रन्थलिखनम् ।।६।। तथा च तावदन्यतमसम्बन्धाधीनं सद् यत् पूर्वम्यामिस्वस्वनाश- जन्यं स्वत्वं तद्वति धने निरूढो दायशब्द इत्यर्थः। न तु स्वत्वनाशानन्तरं चेतस्पलोत्पत्तिरिति, तदा तत्क्षणेऽग्यामिकतया निध्यादिवदुदासीनस्या- प्युपादानात् स्वत्वापत्तिरितिचेच, तत्र पुत्रादिसत्ताया एत्र विरोधित्यस्य पुत्राधिकारबोधकशास्त्रसिदत्वात-इति श्रीकृष्णतकालङ्कारकृतदायभाग, टीका(पृ. ५)लिखनम् ॥ १०॥ वस्तुतस्तु पितृस्वत्वमेव पुत्रस्सलोत्पत्ती हेतुः । न चैवं पितृस्वत्वे विद्यमानेऽपि तदने पुत्रस्तत्वापत्तिः। तत्र पितृस्वलनाशकस्यापि सहका- रित्वात् । स्वत्वनाराकाच मरणपातित्यादि । तेपो खत्तनाशकत्वेन स्मृति- प्रतिपादितानां मरणत्यपातित्यत्वादिविशेषरूपेणैवाव्याहतोत्तरायन्त- १. निरशिवम् --दाभाटी।

व्यवस्था-पत्र संख्या-२०४ ३०६ विण पुत्रससोत्पत्ती हेतुत्वम्-इत्यादि श्रीकृष्णतकालद्वारकृतदायभा- गटीका(पृ० ५६ लिखनम् ॥ ११ ॥ ततश्च उत्पत्येवार्थ स्वामित्वाल्लभेत इत्याचा• मन्यन्ते-इति मिता• रा(पृ. १६६ धृतगीतमवचनम् ॥ १२ ॥ अमूलं समूलत्वे वा यस्मिन् गर्भस्थे पित्रादितः तत्परम्-इत्यादि- श्रीकृष्णतकालङ्कारकृतदायभागटोका(पृ. १४ लिखनम् ॥ १३ ॥ पितृनिधन कालीनं वा जीवनमेव पुत्रस्यार्जनं भविष्यति-इति दाय- माग( पृ० १६ )प्रत्यालिखनम् ।। १४ ॥ पुत्रजीवनमेव स्वलहेतुः । तत्र पितृनिधनकालः सहकारीत्यर्थः । । इति श्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटोका( पृ० १६ )लिखनम् ॥ १५ ॥ बालदायादिकं रिक्थं तावदाजानुपालयेत् । यावत् स स्यात् समारत्तो यावचातीतशैशवः ॥ इति मनुवचन- पति (पृ.८,२७)॥ १५ ॥ अयचैतद्धर्माधिकरणमत्यथिसमुपस्थापितैतद्धर्माधिकरणीयव्यवस्था- लिखितद्धितीयप्रमाणस्य तद्व्यवस्थालिखितपारसिकप्रतिरूपेण यादृशार्थो- ऽवगम्यते ताशार्थस्तु कस्मिन्नपि अन्थे न लिखितः। दायभागमन्ये तत्- प्रमाणस्य यादृशार्थो व्याख्यातः स तु श्रीयुतहेनरीकुलवोकसाहेवाभिधानव- धर्माधिकरणप्राचीनाधिपतिकृतधर्मशास्त्रान्तर्गतवद्देशचलितदायभागम. विरूपे इरेजीलिपिनिम्मिते विभागकालदयनिरूपएप्रकरणे विंशतिपत्रे एकविंशतिपत्रे च एतव्यवस्थायाः पञ्चमप्रमाणेऽपि च स्पष्टीकृतः इति निवेदनमिति । एतदन्दीयमार्चमासीयनवमदिनसम्बन्धिबुधवासरे घटिकैकाधिकयाम- से दसेर मया व्यवस्था। श्रीनपतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्था पत्र-संख्या-१०५ ३०७ १०५-रोवकारि मिसिल आदालत देोयानि सदर तारिस १० माहे माइ सन १८३१ इङ्गरेजि मतावक तारिख २६ माहे बैशाख सन १२३८ साल वाङ्गला बुधवार ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुत मान्तगीओ हेनरि दरम्बल साहेवेर बैठके । शीउमलुकसिंह- आपिलाएट रामप्रकाशसिंह- रेपाडण्ट आपिलाएटेर उकिलगण मौलवि नियामत प्रालि ओ सदा- सुख पण्डित रप्पाडण्टेर उकिल मुनसि होसन प्रालि हाजिर हइल । आपरेल मासेर २७ ओ २८ ओ हाल मासेर ६ तारिखे ए मकद्दमा प्रामार बैठके उपस्थित हइया ऐ रोवकारिसकलेर विस्तुणे कागजसकल पडागिया स्थकिद स्थिल । अद्य पुनराय उपस्थित हइया एइ मासेर ६ तारिखे आपिलाएटेर उकिलगए साक्षिदिगेर एजहारेर नकल समस्त जे दाखिल हइयाछिल ओ आवश्यकीय अनेक फागजात पुनराय पडागेल । वोध हइल जे तालुकजखनिर कर्ता उभयेर पूर्वपुरुष रामरुचसिंह तिन पुन राखिन। एक जन प्रापिलाएट सिउमलुकसिंहेर पिता भुपनारायण सिंह, ओ द्वितीय पेमनारायण सिंह ने मुकुन्द नामे एक पुत्र प्रो दुइ एक जन धक्ककोडर, द्वितीय मुकुन्दसिंह मजकुरेर माता नियत कोडरके राखिया मरिया। श्रार ऐ रामरुचमिहेर तृतीय पुत्र हिङ्गलसिंहेर पिता ओ ए मकईमार मुद्दालेहे रामप्रकाशसिंहेर पितामह देनजितसिंह, पार इहाओ प्रकाशजे ऐ प्रेमनारायन आपन जीवदसाते जखनि तालुक हइते आपन तृतीय हिस्या वावत मुकुन्दसिंह पुत्र श्री ममर्मात वखतकोहर यो नियत फोडर आपन स्त्रीगणेर नामे प्रत्येकेर अंशेर विना शङ्काय एक फेता देवानामा लिसियादेय, ओ प्रेमनारायणसिंहेर मृत्युर पर ताहार पुत्र मुकुन्दसिंह अप्राप्तव्यवहार कालिन ओ वाहार पर उहार स्त्री मसस्मात बखतकोर ओ मसम्मात नियतकोहरेर मृत्यु पर मृत भुपनारायणसिंहेर पुत्र शीउमलुकसिंह भो मृतः +4 व्यवस्था पत्र-संख्या-१०१ देनजीतसिंहेर पुत्र हिङ्गलसिंह वर्तमाने पाछे। चुडन्त हुकुम होनेर पूर्व एइ मकद्दमाते ए आदालतेर पण्डित हइते निचेर सोयालसकलेर जवाब व्यवस्था लोन उचिव बोध हइया हुकुम हइल जे मसम्मात वखतकोङर ओ नियतकोहर मुद्दइयाँ वायु सीउमलुकसिंह ओ देनजितसिंह मुद्दालेहेदिगेर नालिसो मकद्दमाय हिजरि सान) १२६१ सालेर सहर जमादियाोनेर २५ तारिखेर लेखा, मृत प्रेमनारायणसिंहेर लिखित एक केता हेवाना- मा यो १८५४ सम्मत मिति कोओयारा वदि सप्तमी तारिखेर लेखा, सोउमलुकसिहेर लेखा, एक फेता एकरारनामा लम्बर १३ ओ १५ सम्वलित एइरोवकारिर नकल ए आदालतेर पण्टि- तेर स्थाने समापन कराजाय जे सप्ताह मध्ये ऐ सोयालेर जवाने व्यवस्था लिरोन। प्रथम--एइ जे मुकुन्दसिंह पुत्र ओमसम्मात वखतकोडर श्रो नियतकोडर आपन स्त्रीगणके ताहारदिगेर प्रत्येकेर अंशेर विना शङ्काय ऐ प्रेमनारायण श्रापन पैतृक अंश हेवा करण शास्त्रानुसारे सिसि' पटि कि ना। श्रो मसम्मात मजकुरा ऐ हेवा मते मुकुन्दसिंहेर मृत्युर पर हेवा करा तृनीय हित्या हइते कि परिमाण अंशेर सत्वाधिकारि हइवेक । द्वितीय-एइ जे मसम्मात मजकुरारा मुकुन्दसिंहेर मृत्युर पर स्थावर वस्तु हइते श्रापन स्वत्वेर समर्पके' ऐ हेवा अनुसारे दान ओ विक्रय ओ अन्य प्रकार हस्तान्तर करणेर क्षेमता थाकिवेक किना। तृतीय-एइ जे ऐ मुकुन्दसिंहेर मृत्युर पर ताहार माता नियतकोडर ओ विमाता बखतकोडर ो ताहार खुडा देन'- जीतसिंह से कालिन वर्तमान छिल, ओ उहार खुडतात नाता शोउम लुफसिंह जियसाय थाकने प्रेमनाराययोर अंशेर स्वत्वा- धिकारि के हइवेक। १.सिद्धवटे। २. सपके। ३. दलजीतसिंह।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०५ चतुर्थ-एइ जे यद्यपि मृत मुकुन्दसिंहेर त्यक अंशेर दखल ओ कावेजेर सत्वाधिकारि ताहार माता मसर्माता वखतकोडर ओ,नियतकोडर हवेक, तवे उहादिगेर मृत्युर पर ऐ प्रेमनारायण सिंहेर दान करा अंशेर सत्याधिकारि कोण व्यक्ति, भुपनारायण सिंहेर पुत्र शोउमलुकसिंह किम्वा देनजितसिंहेर पुत्र हिङ्गल सिंह अथवा दुइ जनाइ तुल्यांश हइवेक इति । श्रीजयतितराम् एतद्धापिकरणाधिपतिश्रीयुत-मान्तकीयूहेनरीटरम्पलसाहेवधर्मापि. फरएलिखितैतदद्वीपमेमासीयैकादशदिवयीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नप्रतिरूप - पत्रमेवं तत्समर्पितत्रयोदशाङ्कातितमृतप्रेमनारायणसिंहलिखितदानपत्रं पञ्चदशाङ्गाङ्कितश्रीमनोगसिहलिखितसंयित(?) पत्रञ्च यत्तन्मासीयैकविंशति- दिनसंबन्धिशनिवासरे यामद्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य याशियोधी जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिहपते ।। प्रथमप्रश्नस्योचरम्- यदि तेनैव प्रेमनारायणसिंहेन स्वपैतृकधनस्य स्वांशो मुकुन्दसिंहनाम्ने स्वपुत्राय वखतकुमरिनाम्न्यै नियतिकुमरिनाम्यै च स्वपल्यै तेषां त्रयाणा दानप्राहिणां मध्ये प्रत्येकमंशसंख्यामकृत्वैव दत्तः स्यात्तदा तहान शास्त्रानुः सारेण सिद्ध्यति, शास्त्रीयावश्यकदानादो सामान्यतः पुत्राणामनुमतेरनाव- श्यकत्वेनामाह्यरूपाया अप्राप्तव्यवहारपुत्रानुमतेरनावश्यकत्वस्यार्थसिद्धत्वात्, पत्या पत्नीच्या स्त्रीधनशनस्यादत्तस्त्रीधनाभ्यस्ताभ्यो वा पुप्रसमानांशदानस्य च शास्त्रीयत्वात् , प्रभुखमर्पितत्रयोदशाङ्काङ्कितदानपत्रेण प्रेमनारायण सिं- हस्य पैतृकस्वांशस्य भ्रात्रादिमिः साधारएयाभावावगमेनानात्रादीनां तत्रानु. मतेरप्पनपेक्षितत्वात्, प्रात्रादीनां साधारण्येऽप्यप्रतिपेयरूपायास्तेवामनुमते. रक्षतलाच, पञ्चदशाङ्गाड़ितश्रीमनोगसिंह लिखितसंवित्()पयेण क्या पर्यवसानाच । एवं नदानानुसारेण पूर्व प्रेमनारायण सिंहसत्यास्पदीभूत स्यांशस्य तृतीयांशाधिकारिणस्तत्पुत्रस्य मुकुन्दसिंहस्य मरणोत्तरं तन्माता नियतिकुमराख्या अंशद्वयाधिकारिणी, तद्विमाता बखतकुमराट्या प व्यवस्था पत्र संख्या-१०० तत्तृतीयांश रूपैकांशाधिकारिणी भवति । यतो यत्र दानादो दानप्राहिणा. मनियमो न कृतस्तत्र शास्त्रानुसारेण ते दानादिग्राहिणः समानांशिनो भवन्ति । तत्र मुकुन्दसिंहस्य पुत्रमारभ्य दौहित्रपर्यन्तरहितस्य मृतस्य चदानानुसारेण साधारणधनांशे तन्मातुनियतकुमराख्याया अधिकारस्य' यावसिद्धत्वाद् इति ॥॥॥॥ अत्र प्रमाणम्- प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनु(५।१५२ वचनम् ॥ १॥ अवश्यकर्त्तव्येषु' पित्रादिश्राद्धादिषु स्यावरस्य दानाधमनविक्रयमे- कोऽपि समर्थः कुर्याद्-इति मिताक्षरादिग्रन्थलिखनम् (पृ०२००)॥२॥ तत्र तद्विधानवलादेवाधिकारो गम्यते इति मितादादिमन्थ- लिखनम् (मिता पृ. २००)।। ३ ।। पितृमातृपतिम्रातृदत्तमध्यग्न्युपागतम् । भाघिवेदनिकाधञ्च स्त्रीधनं परिकीर्तितम् ।।-इति मिताक्षरादिग्रन्थ- धृतयाज्ञवल्क्यवचनम् (याश० २।१४३ ) वचनम् ॥ ४॥ यदि कुर्यात् समानांशान् पल्यः कार्याः समाशिकाः । न दत्तं सीधनं यासां भी वा स्वशुरेण वा॥ इति मिताक्षरादिग्रन्थ- तयाज्ञवल्क्यवचनम् ( याज्ञ० २।११५)॥५॥ अप्रतिपिद्धं परममतमप्यनुमत' भवति-इति दत्तकचन्द्रिकादिनन्य. लिखनम् ( दचच० पृ० १२)॥६॥ समै स्यादतत्वादशेपस्य-इति पोरमित्रोदयादिग्रन्थलिखनम् (वी० मि. पृ० ५६५) ॥७॥ पली दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतो गोजो बन्धुः-इत्यादि मिताक्षरादिनन्यतयाशवल्क्य- (२।१३५)वचनम् ।।८॥ १.धुच २. पितृलादादिषु रति मिटा ३. परमनुमदम्-दउच०। ४. भविशेषमवये सति सम स्यादव तत्वाद-वि चौमि० पाठ.

व्यवस्था-पत्र-संख्या-२०५ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- : मुकुन्दसिंहस्य मरणोत्तरं तन्मातुर्विमातुर्या प्रथमप्रश्नोत्तर लिखितप्रका• रेण स्वस्ववास्पदीभूतान्तर्गतस्यावरधने श्रदृष्टाय दृष्टादृष्टावश्यककार्याय सस्वभरणपोषणार्थ वा दानप्रकारेण विक्रयप्रकारेण वा अन्य प्रकारेण वा हस्तान्तरकरणे क्षमता स्यास्यत्येव, अन्यथा न स्थास्यत्येव । यतश्शास्त्रा नुसारेण भदत्तस्थावरे पल्या उपरिलिखितादृष्टायदिव्यतिरेकेण यथेष्ट- दानविक्रयादौ नाधिकारः, पुत्रादिदौहित्रान्तरहितस्य मृतस्य पुत्रस्य धने उत्तराधिकारित्वेन मातुरधिकारे जातेऽपि तस्या उपरिलिखितादृष्टार्यादिव्यति. रेकेण तद्धनेऽपि यथेष्टदानविक्रयाद्यनाधिकारश्चेति ।। ०|| अत्र प्रमाणम्- गर्ना प्रीतेन यदत्तं स्रिय तस्मिन् मृतेऽपि तत् । सा यथाकाममश्नीयाद् दद्याहा स्थायराहते ॥ इति मिताक्षरा(पृ० १६६)वीरमित्रोदयादि(पृ० ६६१ अन्धधृतनारद- (नामसं० २।२४)वचनम् ॥ १ ॥ अष्टार्थे दाने दृष्टादृष्टावश्यककार्यार्थमाधौ विक्रये चास्त्येव पल्याः सकलमधनविषयोऽधिकारः-इति चौरमियोदय पृ० ६३०)ग्रन्थलिख- नम् ॥२॥ एकत्र निर्णीता शासार्थों वाधकं विनाऽन्यत्रापि प्रवर्त्तते-इति उप- रिलिखितमन्थलिखितम् || ३ || तृतीयप्रश्नस्योचरम्-~ यदि तस्यैव मुकुन्दसिंहस्य मरणोत्तरं तन्मातानियतकोमराख्या तद्वि- माता पखतकोमराख्या च तदानीं जीवन्त्यासोत , तपितृव्ये दलजीतसिंहे पितृव्यपुत्र श्रीमनोगसिहे च जीवति सत्यपि प्रेमनारायणसिंहस्य पूर्वरवत्या. स्पदीभूतांशस्य प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रकारेणाधिकारिएपी नियरािकुमरि- बखतकुम-वेय' भवतः, तयोर्जीवन्त्योः मुकुन्दसिंह पितृव्यस्य पितृव्यपुत्रस्य घा वत्र नाधिकार इति ॥ १ कुमार्यो व्यप० ।

व्यवस्था पत्र-संन्या-१०५ भत्र प्रमाणानि-प्रथमप्रश्नोचरप्रमाणानि सारयेवेति- चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- यद्यपि मृतस्य मुकुन्दसिंहस्य त्यक्तधनांशस्य स्वत्वाधिकारिणी तन्माता नियतकुमराख्या प्रपमप्रश्नोत्तरलिखितप्रकारेण जाता, तदातन्मरणानन्तरं तत्प्रेमनारायणसिंहकृतदानकृतस्यांशस्यान्तर्गतस्य प्रथमप्रश्नोचरलिखितम फारेण मुकुन्दसिहस्वत्वास्पदीभूतस्य तत्तृतीयांशस्याधिकारी मुकुन्दसिंहस्य पुत्रमारभ्य पितामहपर्य्यन्तो नास्ति, तपितृव्यो भूपनारायणसिंहो दलजीत. सिंहो वा कश्चिद् विद्यमानश्चेत्तदा स एव भवति । नौ द्वौ चेद् द्वावेव तुल्यांशिनौ' भवतः । पितृव्या मध्ये पस्यचिदपि एकस्य तदानीं विद्यमा- नवाभावे तपितृव्यपुत्रौ श्रीमनोगसिंहहिङ्गलसिंहाख्यो द्वावेव तुल्यांशिनी भवतः। नियतकुमराख्याया बखतकुमराख्यायाश्च प्रत्येकं (!) मरणोत्तरं तयोः स्वस्वत्यास्पदीभूततृतीयांशस्याधिकारी । यदि तयोः प्रत्येकं दुहित दौहित्रीदौहित्रपुत्रपौत्रप्रपौत्रमर्तृसपक्षीपुत्रपौत्रपौत्रदुहितृदौहित्रश्व श्वशु. रपय॑न्तानां स्त्रोधनाधिकारिणा मध्ये फश्चिन्नास्ति तयोः पतिभ्राता भुपनारायणसिंहो दलजीतसिहो वा कश्चित् तदानी विद्यमानस्तदा स एवा- धिकारी भवति, तो दो चेद् द्वावेच तुल्याधिकारिणौ भवतः । तयोर्मध्ये एफस्याप्यभावे तयोः पुत्रौ श्रीमनोगसिंहहीगलसिंहाख्यो द्वावेव नुल्यां- शिनौ भवतः-इति पश्चिमदेशचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदयव्य- यहारमाधवव्यवहारकौस्तुभदत्तकचन्द्रिकादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति । श्रत्र प्रमाणम्-- पती दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः इत्यादि मिताक्षरादिनन्यतयाशवल्क्य- (२।१३५) वचनम् ॥ १॥ तत्र च पितृसन्तानाभावे पितामही पितामहः पितृभ्यास्तत्पुत्राश्च फमेण धनभाज:-इति मिताक्षराग्रन्थलिखनम् (४० २२३ ) ॥२॥ पूर्वोक्त' सीधनमजस्यनपत्यायो दुहितृदौहित्रीदोहिम्रपुत्रपौत्र- १ तुलाशिन्यो-मप० ।

: व्यवस्था-पत्र संख्या-१०५-१०६ ३१३ प्रपोगरहितायां खियामतीतायां वान्धवा भर्नादयो वक्ष्यमाणा गृहन्ति- इति मिताक्षराग्रन्थलिखनम् ( पृ० २२६ ) ॥३॥ अप्रजसः स्त्रियाः पूर्वोक्तरूपाया माझदैवार्यप्राजापत्येषु चतु विवाहेषु भार्यात्वं प्राप्ताया अतीतायाः पूच्चोंक धनं प्रथम मर्भिवति, रादमावे रात्प्रत्यासन्नानां सपिण्डानां भवति-इति मिताक्षरादिग्रन्थ- लिखनश्चेति ( पृ० २२६)। जूनमासीयद्वितोदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे दत्तेयं मया व्यवस्था इति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १०६ रोधकारि मिशिल सदर देओयानि श्रादालत तारिख १८ माइ सन १८३१ साल इगरेजि मोतावफ ६ ज्येष्टी शन १२३८ साल वाइला रोज चुधवार ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरट थरलेन शिलि साहेवेर बैठके- राजा गोविन्दनाथराय यापिलाण्ट गोलालचन्द्र पोरफे लालकायाधुगं रेप्पाडण्ट प्रापिलाण्टेर उकिल मुनशि होसेन प्रालि ओ रेप्पाडएट- गणेर उकिल सक मुनशी गोलाम चतुल श्रो सदाशुक पण्डित हाजिर भाइलेन । एइ मकर्दमा एइ माहार १०।१११२।१६।११ तारिखसकले आमार बैठके स्वकार हइया नालिसि श्रारजि प्रभृति प्रेषिनशेल कोटेर कागजसकल फयशला पर्यन्त प्रो एइ यादालते दाखिलि होया सोयाल जवाव ो गयरह काय- जात पहागिया स्थकित छिल, अद्य पुनराय रवकार हइया गत दिवसेर दाखिल होया कागजात हप्टे पासिल । यथा,चूडन्त- हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व एइ प्रादालतेर पण्डितेर स्थाने एइ १.कागजात।

३१४ व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०६ विशय ज्ञात हयोन उचित हइलये अछियतनामा अनुसारे ये तद्वाराय मुतिचन्द्र के पुष्य पुत्र विवेचना करणेर क्षमता राखे कि ना। अतएव हुकुम हइल ये एइ रुवकारिर नकल अछियतनामा सम्वलित एइ आदालतेर पण्डितेर स्थाने एइ हुकुमे समर्पण कराजाय ये निचेर लिखित प्रश्नशकलेर उत्तर जेइन शाघानुसारे यद्यपि थाके नतुवा एतद्देशीय चलित शास्त्रानुसारे दुइ सप्ताह मध्ये लिखेन। प्रथम प्रश्न-एइ ये विरोधिय लाटसकलेर का उत्तमचन्द्र लाहार पुप्य पुत्र विवेचना करण जैन्ये ो उहार सत्य रक्षणार्थे मुतिचन्द्र के श्रोधि मकरर फरिया अछियतनामा लिखियादिया मृत्यु हइल । ऐ मुतिचन्द्र मजकुरके श्रापन जीवत दशाय पुष्य पुत्रेर विवेचना करणेर सावकाश ना हइया प्राप्ति हय । अतएव मुतिचन्द्रेर मृत्युर पर उत्तमचन्द्रेर स्त्री मुसम्मात मायाकोडर पुष्य पुत्र विवेचना करणेर क्षमता राखे किना । द्वितीय प्रश्न यद्यपि जेइन शाखे थाके तवे ऐ शास्त्रानुसारे ज्येष्ठ पुष्य पुत्र इइते पारे किना। तृतीय प्रश्न--एइ ये जेइन शास्त्र मते कत पतसरेर पुत्र दत्तक- हइते पारे, एवं ताहार संख्या कि। चतुर्थ प्रश्न-एइ ये पुष्य पुत्र राखनेर एवं ताहार सिद्धि होनेर जैन्ये कि कि नियम घटे इति । श्रीजयतितराम् एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटयरलेनसिलीसाहेवधर्माधिकर- गलिखितैतदब्दीयमेमासीयाष्टादशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र - मेवं तत्समर्पितमसीयतनामाख्यं पत्रं च यदेतदन्दीयजुनमासीयप्रथमदिन- सम्बन्धिबुधवासरे सापटिकावयाधिकयामदयानन्तरं मया प्राप्त तदव- लोक्य यादृशबोधो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- व्यवस्था-पत्र संख्या-१०६ प्रथमप्रभस्योत्तरम्- विवादास्पदीभूतसराजकार)स्थावरसमुदायस्य स्वामी उत्तमचन्द्रनाहारः स्वकीयपोप्यपुत्र विवेचनाफरणार्थ मतिचन्द्रनामोऽसीशब्दप्रतिपाद्यत्वेन नियोगं कृत्वा तस्मै चासीयनामाख्यं पत्र लिखित्वा दवा मृतः स्यात्तस्यैव मतिचन्द्रस्य स्खजीयनदशायामुत्तमचन्द्रस्य पोष्पपुत्रविवेचनाकरणस्या- वकाशेऽजाते सल्लेव गरणेनोत्तमचन्द्रस्य पत्नी मायाकोमराख्या पोष्यपुत्र विवेचनाकरणक्षमतां रक्षत्येव' जैगशास्त्रानुसारेण पतिमरणानन्तरं पुत्र- वत्याः पल्याः पतिवत् कार्य्यमात्रकरणे स्वाच्छन्दयेन पुत्रशून्यायाः पत्यनु- मतो सत्यामसत्यां या गतीनाम् श्राशयां सत्यामसत्यां या सर्वथैव पोष्म.. पुत्रकरणक्षमताया अर्थसिद्धत्वात् । तत्र चोत्तमचन्द्रनाहारेण स्वपितुः पाल- कपुत्राय मतिचन्द्राय स्यकीयपोग्यपुत्रविवेचनाकरणासायां दत्तायामपि. देवात् तदकृत्येय मतिचन्द्रस्य मरणे सत्यपि जैनशास्त्रायुयारेण पत्यनु- मतिमन्तरेणापि पोष्यपुत्रग्रहणाधिकारिएयाः पतिमरणानन्तरं पतियत् स्या- च्छन्दयेन, कार्यमानाधिकारिणश्चोत्तमचन्द्रनाहारस्य पत्न्या मायाकोम- राख्या(या स्तद्विवेचनाकरणक्षमतायामपि वाधकाभावाञ्चेति ।। • ||- अत्र प्रमाणम् यस्या स्त्रिया भत्तो नास्ति सा यद् भव्यं तदापयतु इति गीतममश्नी- यमन्यधृतवर्षमानस्यामिवचनम् अस्मिञ् जम्बूद्वीपे भरतक्षेने कुरुजङ्गलदेशः स्थितः । तस्मिन् हस्तिनापुरे वज्रजहारयो राजाऽभूत् । तस्य मह यवतीयतिदेवता . वजूमतीपहराज्ञी" आसीत् । तस्मिन्नेव नगरे कमलकान्तारख्यः कश्चि- देको धनी स्थितस्तस्य कमलाश्रीनाम्री पत्नी बभूव । तस्य श्रेष्ठिनो १. पौष्यपुत्र-व्यप० २, पुन्यपुत्र-4901 ४. लेन-व्यप ५. स्वाच्छन्देन व्या०1 ७. यतीनाम् –स्यप० । म.पौष्यव्य १०. भत्ता-व्यय ११.८०-न्दप ३. रक्षत्र-व्या ६.पुत्रशुन्याया.प.1 १.माणे-व्यप।

३१६ व्यवस्था पन्न-संख्या-१०६ द्वात्रिशत्कोटिपरिमिता मुद्राः स्थिताः। तासु मध्येऽएकोटयो मुद्रा -मृन्मध्ये निसाताः पुनरप्टो कोटयो मुद्रास्तरणीपु, व्यवहारार्थ स्थापिताः, पुनरप्टो कोटयो मुद्राः देशान्तरे व्यवहाराय पिताः, तदनन्तरमष्टो कोटयो मुद्राः गृहेषु स्थापिताः। एवं त्रिंशत्सहस्रोत्तरद्विलक्षपरिमिता धेनवः स्थिताः । एवं तस्य पञ्चशतपरिमिता अधिकारिणः स्थिताः । तेषु मध्ये एको गायापतिवंशोद्भवः सुमतिशिरोमणिनामधेयो महा- मतिरासीत् । स तु धनिना कमलाकान्तेन पुत्रवन्मन्यते । स तु कमला. कान्तः किञ्चित्कालानन्तरं वरातुरः सन् परलोकं गतवान् । ततः सप्तवर्षानन्तरं स गाथापतिवंशोभूयः सुमतिशिरोमणिविद्युत्सातेन प्रगटः। तदनन्तरं कमलास्त्रियाः सहायाभावाद्धनरक्षाप्रमादो जातः । तदैकस्मिन् समये उदासीनतया मनस्य तद्विवेचितमिति । यदात्मीयं विना संसारादि- रक्षा नो भवितुमर्हति,अत एकः पालकपुत्रो विधेयः । ततस्तस्मिन्नेव समये तदुद्यानपालेनागत्य श्रेष्ठिकां प्रति निवेदितम् । यदशोकवाटिकायां पञ्चद- शशतपिभियुक्तश्चतुर्विधवोधशासी(योधर्मघोप सरितानामाचार्यस्समा- गतः। तस्य दर्शनार्थं हस्तिनापुरवासिभिस्तत्रैव गम्यत इति । तत उद्यानपालाभिहित निशम्य कमलास्त्रिया श्रेष्ठिकया धनवत्या तहपेर्दर्श- नार्थ तत्रैवोपस्थितम् । (तत्र च) धर्मपुराणीयकथानिशम्य तमाचार्य- मञ्जलिं बवा " भो भगवन्, मम स्वामिनामरक्षा धनरक्षा प्रात्मनोऽपि रक्षा कथं भवेदिति” पृष्टम् । तदा श्रेष्ठिकाभिहितं श्रुत्ता प्राचार्येष चातुमारग्धम् । “वरं यदद्य"प्रभृति मासाभ्यन्तरेऽशोकवाटिकायां खलु 'पशोरालये" क्षत्रियजातयो द्वात्रिंशदर्पवयस्मद्धदेवराजसप्तविंशतिवर्ष- १. निस्वाता-व्यप०॥ ३. नामध्येयो-व्यर० ५. मनसे-व्या ७.०स्तमागत :। १.वर्क-न्यर। २१. पौ-यप। २. अटो व्य०प०॥ ४. विघुन्यारेन-व्यप01--- ६. चम्बोधशा नीर्मयोप-व्यप० । म. पष्टन्यप० । १०. यद्य-व्यप०1 व्यवस्था पत्र-संख्या-१०६ ३१७. वयस्कद्वितीयहंसराजद्वाविंशतिवर्पवयस्कतृतीयधनराजपोडशवर्पवयस्कर- तुर्थधर्मराजाख्या एकमातृका महाजना आगमिष्यन्ति । तन्मध्ये अभिलपितमेकं कञ्चित् पुत्रत्वेन स्वीकुर्विति" तदनन्तरमाचार्यमुखात श्रेष्ठिका तेषां पातः श्रुत्वा सुप्रसन्नेव तन्नमस्कृत्य पुनः पृच्छति । “यतः कि कृत्वा स्खे......." इति ।" तदभिहित निशम्याचायों वदति स्म । "यदये ऋपभदेवस्य नपाङ्गानि पूज्यानि, तदनन्तरं गुरुपुस्तकयोः पञ्- चोपचारेण, पोडशोपचारेण वा पूजा कार्या" इत्युक्तम् । एवं गुरुभक्ति- विधेया, पश्चाद् गुरुमुखान्मङ्गलवाक्यं श्रुत्वा पश्चानिजकुलदेवी अपूज्य तदनन्तरं चतुविधसिंहसाक्षिक एवं देशाधिपतिसमीपे पुत्र गृहीत्वा निज- ज्ञातीयभोजनाय भक्तिर्विधेया इत्य "दम्पतीगोंजयित्वा एवं शुभ- मुहर्त वा 'नमो अरिहताणम्' इत्युक्त्वा तं म्यपदे निवेश्य यद्रोलीति- लकविन्दुमुस्तादामतृणफुलफलचूर्णानि तस्मै दातव्यानि एवं राज- ध्वनिभेरी ध्वनिः) पुनर्नानावाद्यनृत्यादिकं कत्तेव्यम् । एवं प्रकारेण पुनः सौभाग्यवतीभिः सीभिः सहगीतध्वनिः स्वीयस्त्रीयमुखेन नानाविध. मङ्गलाचारो विधेयः । एव अद्भया निजज्ञातिभ्य एवाथयाऽन्येभ्यो'द्रव्य- मथवा श्रीफलादि दातव्यम् । एवं निर्दनश्चेत्तेन पुगी'फलभेव दातव्यम् । रानिजागरणमपि विधेयम् । तम्बूलादिकमपि प्रत्येक प्रत्येकं दातव्यम् । अधिकं तु आचारादि पाकरे द्रष्टव्यम् (१) । अत्र किंचिन्मात्रमुक्तम् । श्रीवर्द्धमानरयामिहितं वाक्य श्रुत्वा पुनर्वदति "भगवन् , कदाचिः दसी धर्मे न स्थास्यति, यतः स्वे(?) " पुत्रो यदि मम सेवानिरता न गचेदेव कुव्यसनेन धनक्षयं कुर्यात, तदा मया कि कर्तव्यम्" इति । तदीयं वाक्यमाचार्येण श्रुत्वा पुनरा "यद्यप्यसो धर्मे न स्थास्यति तदा त्यायो यथा अहिना दटमङ्ग प्ठंजनस्त्यज्यते, तथा यः पोष्यपुत्रस्त कथं न त्यजेत्" इति तदीयाभिहितं श्रुत्वा पुनरतमाचार्य नमस्कृत्य निजगृह- १. निः-व्या.. ३. निनश्चेतेन-व्यर० ५ किञ्चिन्माए-व्यप०1 यो पुमुनन्-ध्या । २, निनशातिम्परेवनथवा न्यद्रव्यन-व्यप ! ४. श्चेतेन पुगाफनन-व्यर ६. पुन वदति-व्य व्यवस्था-पन्न-संख्या-६५ मागत्य तमाशोकवाटिकायां चलारः सेवका नियोजिताः। यदा मासः पूणों जातस्तदा आचार्यनिर्दिष्टाश्चत्वारो महाजनास्तस्यामशोकवाटि- फायामागताः। तेपामागमनं दृष्ट्वा श्रेष्ठिकानियोजिता आगत्य फमला- श्रिय प्रति तेपामागमनवृत्तान्तं विज्ञापितवन्तः । कमलाश्रीरपि तवृत्तान्तं श्रुत्वा ताश्चतुरों गृहमानीय प्राचार्याज्ञया पुनत्वेन तेषां ज्येष्ठं देवराजाख्यं स्वीकृतवतीति गौतमप्रश्नीयग्रन्थलिखनम् ||१|| श्रीसिंहपुरनगराधिपतेः सिंहसेनस्य सिंहावतीनामी महिप्यासीत् । तया सह सुखेन राज्य कृतम् । तत्रानन्दपरमानन्ददेवानन्दाः क्षत्रिय- वंशोद्भवाः दुःखिनस्रयो मातरः। तेषु मध्ये प्रानन्दाभिधान एको माता धेनं जुगोप । परमानन्दाभिधानो द्वितीयो भ्राता विविधकाष्ठमानीय विक- यामास । देवानन्दाभिधानस्तृतीयो साता शिशुः स्थितः । तदा सर्वन- गरस्थेजनेरानन्दस्य गोपाल इति नाम कृतम् , द्वितीयस्य परमानन्दस्य. काष्ठजीवीत्यभिधानं कृतम् परन्तु ते प्रयो भ्रातर एकस्मिन्नेव स्थाने स्वकी स्वकीय फार्य कृतवन्तः। तत्रैक यति विलोक्य त्रिभितृभिमिलित्वातं यति नत्या स्थितम् । तदा स यतिस्तान् प्रति धर्ममुपदिष्टवान् । तदा ते मुनिधर्मोपदेशं निशम्य प्रीतिरता बभूवुः। पुनः साध्वाननात् परिमितं वाक्यं श्रुत्वा तेनाभ्यस्तं रात्री जलं न पातव्यमिति । तत्र कानने पुनश्च धेनुपालयता तत्रैव निनगाकूले श्रीऋपभदेवस्य मृन्मयी प्रति- मां विधाय तत्रैवेकं गृहं कारयित्वा तन्मध्ये श्रीभगवतः प्रतिमा स्थापिता। तत्र प्रतिदिनं तेन तदर्चनं कृतम् । तत एकस्मिन् समये ऋपिमुखात भक्तामरस्य माहात्म्यं शुश्राव । ततः ऋपिरानन्दं भक्तामरं पाठयित्रा जगाम । तदनन्तरमानन्दाख्यः श्रीभगवतोऽये प्रतिदिनं भक्तामरं स्मरतिस्म । तदेकस्मिन् दिने चकेश्वरीनामी देवी प्रत्यक्षमागत्या- , १. सत्रानेवाटिकायम् म्यप! ३. हत्तान्तम् न्य०५०1 ५, मृरामयीं व्या। ७. स्मृति सभ्यप २. तदा न्यर1 ४. ताश्चतुरो व्यप०३ ६. प्रतिमामनिधाय व्यप० । ८. प्रत्यक्ष प्रागत्य व्यप।

4 च्यवस्था पत्र-संख्या-१०६ ३१६ स्मिनगरेऽधिपति (स्व) भविष्यसीति वरं दत्वा अन्तहिता' जाता । ततः किश्चित्कालानन्तरं तनगरस्याधिपतिभृतातस्यात्मजो न स्थितः । तदनन्तरं तस्य महिपी सिंहावती नानीपुत्रशाकातुरा परमास दिन पर्यन्तं राज्यं कृतवती । तदैकस्मिन् समये वनयात्रार्थ महिनी सखीभिः' सह मिलित्या वनं जगाम । तत्र कानने निमगाकूले एकं स्थानं दृष्टयती । सिंहावतीनाम्नी राजी तत्रालये गत्वा श्रीपादेवस्य मृन्मयी प्रतिर्मा विलोक्य तस्याः प्रतिमायाः स्तुति चकार । पुनस्तस्याय मानन्दो भक्ता- मरं स्मरति स्म । तत्रैव परमानन्ददेवानन्दी स्थितौ । तान् प्रीन् प्रातून विलोक्य मनस्येतद्विवेचितम्-यतो मम पुत्रा न स्थिताः किन्त्वय मगवता ऋपभदेवेन त्रयः पुत्रा मत्य दत्ताः, अधैव मदीयं सर्वं दुःखं गत- मिति" महिपी विचार्य आनायितान् तान् पुनः पुनर्विलोक्य पृच्छति स्म "हे वत्साः, युप्माकं क्रिमाख्यास्तद् ग्रुष्माभिः प्रकाशनीयाः।" तदा प्रयो श्रातरोऽञ्जलि यया, तन्मध्ये आनन्दाभिधेयो ज्येष्ठभ्राता बदति स्म "हे अध, वयं त्रयः सहोदराः, मम आनन्द इत्यभिधानम्, द्वितीयस्य परमानन्द इत्यभिधानम्, तृतीयस्य देवानन्द इत्यभिधानम् । तन्मध्ये ज्येष्ठ मानन्दाभिधानः श्रीनटपभदेवस्याग्रे सिंहवत्या महिया पत्रपेन स्वीकृतः। तस्मात् काननात् कश्चिदेको मृत्यः स्वग्रामे प्रेषितः 'त्वया तत्र गत्वा सुमत्यधिशरिणं प्रति वक्तव्यम् भवता-चन्द्रशेखर-कर्णलोचन-रूपसेना- ख्यैरगात्यैः सह पञ्च द्रव्याणि शहादीनि गृहीत्वा तत्र गन्तव्यमिति'। तो तस्मिन् समये श्रीसिंहकेरारसूरि नामाचार्यसमागतः। तत्र वानन्दाख्येन पुत्रेण सह महिपी धर्मोपदेशमाकप तमाचार्य पृच्छतिस्म "भगवता पोष्यपुत्रोत्सवो वक्तव्यः" तदीयाभिहितं निशम्य यातुमारब्धम् "यतो गोतमप्रश्नीयात् श्रीमन्जिनेश्वरस्य नवाङ्गों पूजां कृला पश्चाद् १. पाहता-व्यप. ३. सषिभिः-व्यप01 ५. भक्तारमरम्प.! ७. मप्रपुभान-प्यप-। सरि-व्यप-1 २. पइमास-1 ४. मृामयीं.--.-यप.1 ६. स्मृतिरम-यप०1 ६. गत्रा-ज्यप०॥ १०. पतो-यर।

३२० । व्यवस्था-पत्र संख्या-१०६ गुरुपुस्तकज्ञानोपकरणवतद्रव्यादिपूजा पञ्चोपचारेण पोडशोपचारेण या कार्या"इत्युक्तम् "पोरस पुत्र जन्माचरसमयोत्सववत् पालकपुत्रोत्सवः कर्त्तव्यः । तदनन्तरं चतुविधसिंहसाक्षिके निजकुलदेवी पूजनीया, तदनन्तरं स्वकीयज्ञातिभ्यो भोजनं मिष्टान्ने रससंयुक्तैर्दद्यात् । तदनन्तरं ताम्बूलवखद्रव्यश्रीफल पूगीफगानि च प्रत्येकं दातव्यनि एतदपेक्षयाधिक-पुत्रोत्स'पविधिराचारदिनकरे द्रष्टव्यः । एतत् सिंहके- सरसूरिणाचा गोकम् तदा पूजाद्रव्यं गृहीत्या अमात्यैः सह सुमिति- राजगाम | पुनः सिहायती राज्ञी प्रानन्देन सह श्रीऋषभदेवस्य मृन् मयी प्रतिमा विधायपोडशोपचारेण प्रतिमा प्रपूजितवती । तदनत्तरं तस्य स्तुतिसमये श्रीपभदेवस्य सकाशात् पुष्पमानन्दस्य' शिरसि पपात । तदा भाकाशात् “जय जय" इति शब्दो जातः । इत्याश्चर्यम् तदा सुमतिना चन्द्रशेसरकर्णलोचनरूपसेनारयैर्मन्निभिः सह पञ्च) तद्रव्याणि गृहादानीय तस्य अानन्दत्याने स्थापितानि । तदनन्तरं तेः पञ्चद्रव्य तत्चत्कार्याणि तेन कृतानि । तदनन्तरं तस्मात् काननात् अमात्यैः सह शड्सवादिनभेरीनानाप्रकारादिघनिगीतादिजातिसौभा(न्य- वती"दिभिः) सह महामहोत्सवमानीय स्वगृहमागत्य शानन्देन राज्य- सिहासने स्थिता । तस्य परमानन्दो द्वितीयो भाता युवराजः कृतः। तस्य देवानन्दस्तृतीयो भाता भटपतिः कृतः । किञ्चित् कालानन्तरं तद्देशा. पिपतिभिः सह तस्य युद्धमभूत् । पुनरतान् जित्वा सुसेन राज्यं कृतवान् । इति भस्तामरस्तुतिमन्य लिसनम् ॥३॥ द्वितीय प्रश्नस्योत्तरम्- चैनशासानुसारेण ज्येष्ठपुनः पोप्यपुनो भवितुं शमोति, बेनशस्त्रे ज्येष्ठपुत्रस्य पोष्यपुत्रताया निषेधाभावात् , तच्छा पूर्वेषां तच्छासानु सारण व्यवहरता राजा परिणजा च वीणा ज्येष्ठ पुत्रस्य पोप्यपुत्रकरणस्य लिसितत्वेनेदानीन्तनानापि जैनशास्त्रानुसारेण व्यवहीणां सीणा तथा व्यवहारस्य भक्तुि शक्यत्वाच्चेति - १.पुकानन्या ५०1 -- २. प्रोटमानमिया-दर-1 १.माचन्दव्यप० ।

. . व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०६ ३२१ अत्र प्रमाणानि उपरिलिखितानि त्रीणि ॥२॥ भो गौतम, अस्माकं मते ज्येष्ठकनिष्टत्वे दत्तकः शिशुाह्यः सर्वलक्षणसंयुतः--इति गोतमप्रश्नीयग्रन्थधृतपर्द्धमानस्वामिवच- नम् ॥ तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- जैनशास्त्रानुसारेणे गर्भाधानदिवसमारभ्य द्वात्रिंशद्वर्षपर्यन्तवयस्कर पोप्य पुत्रो मवितुं शक्नोति ||०॥ol] अन्न प्रमाणम्- कियदायनमितवयसका पुत्री ग्राह्य इति गौतममुनेः प्रश्नः । यदा तदा भगवता बर्द्धमानर वामिनोक्तम् स गर्भमारभ्य द्वात्रिंशद्वर्षपारमित- अयस्कः पुत्रोप्रायः- इवि गोतमप्रश्नोयग्रन्थलिखनम् ||olloll०|| चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- जैनशास्त्रानुसारेण पोष्यपुत्ररक्षणार्थमेवं तसिद्ध्यर्थमेते' नियमा। तथाहि--ऋषभदेवाख्यस्य तद्देवस्य प्रथमतो नपाङ्गपूजनं तदनन्तरं गुरु- पुस्तकयोःपञ्चोपचारेण पोडशोपचारेण या पूजा कार्या एवं गुरुभक्तिर्वि- धैया, पश्चाद् गुरुमुखान् मगलवाक्यं श्रुका निजगुरुदेवी प्रपूज्य गुरु- गुरुपलीज्ञातिज्ञातिपल्लीनां चतुर्णामेवं ग्रामाधिपतेनिवेदनं कृत्या पुत्र गृहीत्वा निजज्ञातीनां सपत्नीकानां भोजनं दत्वा शुभमुहत्तं दृष्ट्वा माला- पाठपूर्वक स्वस्थाने पालकमुपवेश्य रोलीयतिलकविन्दुमुक्तबिन्दु तण्डुलचूर्णानि वा तस्मे ललाटे दातव्यानि, एवं शङ्खध्वनिभेरीत्यादि- नानावाद्यनृत्यगीतादि नानाप्रकारेण सौभाग्यवतीभिः स्त्रीमिः स्वीयस्वीय- मुखेन नानाविधमङ्गलाचारो विधेयः । एवं श्रद्धया' खज्ञातिभ्यो बछ. द्रव्यताग्मूलनीफलपूगीफलानि दातव्यानि'; निर्धनश्चेत् पूर्गीफलमैव दातव्यम्, रात्रिजागरणमपि विधेयम इति गौतमप्रश्नीयमतामरस्तुति- १. सिदर्थम् न्यप० । ३. अद्याव्या २१ २.दृश व्यप०॥ ४. दालन्यानि ग्यप।

३२२ व्यवस्था पत्र संख्या-१०६-१०७ सन्तनाथचरित्ररूपसेनचरित्रप्रश्नोत्तरसार्द्धशतकयजप्रश्नसूनिसिद्धान्तादिजे. 'नशास्त्रानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणानि प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणान्येवेति- एतदन्दीयजुलाइमासीयाष्टाविंशतिदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे यामद- यानन्तरं मयेय व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवेद्यनाथमिश्रेण श्रीदुर्गा १०७-रुवकारि आदालत देओनी सदर इ.सन १८३१ शाल तारिख ४ माहे जुन मोतावेक सन १२३८ शाल वारिस २३ ज्येष्ठ रोज शनिवार एइ पादालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरट थरनेल शिली साहेवेर बैठके- कमलाकान्तराय ओ शम्भुचन्द्रराय बनाम गडाचरणसेन । साएलानेर उकिल मुनशी होशन प्रालि ओ सदासुक- पण्डित, विपक्षेर उकिल मुनशो गोलाम वतुल श्री मुनशी फजर होसेन हाजिर आसिलेन । एइ आदालतेर हाल सनेर २१ आपरे- लेर हुकुमानुसारे शाएलानेर सास प्रापिलेर सोयाल ओ ताहार सम्पीय फागजातसकल अद्य प्रामार बैठके दरपेप हइया एइ श्रादालतेर हाफिम रावरट' हालहन राटरि साहेवेर ऐ तारिख मजकुरेर रुखकारि ओ आदालत मज- फुरेर हाकिम हेनरि शिकिपपिएर साहेवेर हाल सनेर १४ माचर रुवकारि सम्वलित मोलाइजा हइवाने एद मकईमार चूहान्त २. सम्बन्धि-व्यप०1 २.गावा-या व्यवस्था-पत्र संख्या-१०७ ३२३ हुकुम प्रकाश हइवार पूर्वे एइ श्रादालतेर पण्डितेर द्वाराय ए विषय ज्ञात होया श्राविश्वक हइलो-ये जगमोहनरायेर पुत्र महेश- चन्द्ररायेर मृत्युर पर महेशचन्द्ररायेर भगिनी श्रीमती ऐ मृत्यु व्यक्तिर त्याज्य वस्तुते ओयारिप मते हिस्या पाइवार सत्व राखे कि, ताहार खुल्यतावगण कमलाकान्तराय ओ शम्मुचन्द्रराय । श्रतएव हुकुम देया पाइतेछे-ये पे रुवकारिर ..सकल कागजात सम्वलित एइ हुकुमे एइ आदालतेर पण्डितेर स्थाने समर्पण करा जाय-ये कागचसकल सृष्टे करिया निचेर प्रश्नेर उत्तर ओ पाच दिवसेर मध्ये लिखेन । यदि स्यात् परगणे हावेलि शिलामावादेर -१० देड पानार मालिक कृष्णकिङ्कररायेर पुत्र लक्ष्मीकान्तराय ओ जगमोहन- राय ओ शम्भुचन्द्रराय, एइचारि भ्राता पैतृक जमिदारिर उपर आफ्नर हिस्या मते दखिलकारथाकेन। प्रथमत लक्ष्मीकान्त- राय निःसन्तान, भो ताहार पर जगमोहन आपन पुत्र महेश- चन्द्रराय प्रो श्रीमती कन्याके राखिया मृत्यु हय । महेशचन्द्र- राय श्रापन पैतृक हिस्यार उपर दखिलकार थाकिया ओ श्रीमती भगिनी ओ कमलाकान्तराय ओ शम्मुचन्द्रराय खुल्यतातगण राखिया निःसन्तान मृत्यु हय, ओ ताहार वी सहगामिनी हय । अतएव महेशचन्द्ररायेर त्यज्य वस्तु वाहार भगिनी श्रीमती, ये -एइ क्षण नाहार एक नावालक पुत्र प्राछे, अर्शिवेक, कि ताहार बुडागण शम्भुचन्द्रराय ओ कमलाकान्तरायेके अपिवेक इति 101 श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतकटवरटयरनेलसिलीसाहेवधर्माधिकर- पलिखितैतदन्दीयजुनमासीयचतुर्थदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपप- । ३२४ व्यवस्था पत्र-संख्या-१०७ प्रमेयं तत्समर्पितवदिवादविषयनिविष्टपनजातं च यदेतदन्दीयजुलाइमासीय- 'नवमदिनसम्बन्धियनिवासरे सार्द्धघटिकाप्रयाधिकयामद्ये मया प्राप्तं तदध- लोक्य यादशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति महेशचन्द्ररायस्य मरणोत्तरं तत्- स्वत्वास्पदीभूतधने यदि तस्य पुत्रमारभ्य पितु':) प्रगैत्रपर्यन्तो म स्यात्, पितृदौहित्रो गर्ने व्यवस्थितो भूमिष्टो वा तन्मरणसमये स्यात् , तदा तस्या- धिकारः । जाते च तस्याधिकारे पुनरुत्पत्स्यमानानां सद्भावन्तराणा- मर्यान्महेशचन्द्रस्य पितृदौहित्रान्तराणामप्यधिकारः समान एव भविष्यति । सति च पितृदोहिने तपितृव्ययोः शम्भुचन्द्ररायकमलाकान्तराययोना- धिकारः। यदि च महेशचन्द्ररायस्य पुत्रमारम्य पितुः प्रपौत्रपर्यन्तरहि- तस्य पितृदोहित्रो गर्ने व्यवस्थितो भूमिष्ठो वा तन्मरणसमये नासीत्, तदा तपितृदौहित्राणां स्वत्वान्यथानुपपत्त्या तभगिन्याः श्रीमत्यास्तपितृ- दौहिनोत्पत्तिमूलीभूतायारतत्सम्बन्धमूलीभूतायाश्च स्वपुत्रोत्पत्तेः प्राधाल- पर्यन्तं यथा पुत्रादिपलीपर्य्यन्तरहितस्य मृतस्य पितृधने दुहितुरधिकारस्त- या भ्रातृधनेऽप्यधिकारः । सति च महेशचन्द्रस्य पितृदौहित्रे स्वतो महेश- चन्द्रस्य पितुः पार्वणश्राद्धपिण्डदातरि स्वतो महेशचन्द्रस्य पितुः पाण- भादपिण्डदानानधिकारिण्यास्तभगिन्याः श्रीमत्या नाधिकारः। किन्तु तस्याः पुत्रत्यैव पुत्राणां वोपरिलिखितप्रकारेणाधिकारः-इति यनदेशच- लितदायभागश्रीकृष्णतर्कालद्वारकृतदायभागटीकाविवादभन्नार्णवादिग्रन्था- नुसारिणी व्यवस्था ॥१०॥ अत्र प्रमाणम्- पितुरपि प्रपौत्रपय॑न्तामा पितृदोहिनस्याधिकारो बोध्यो घनि-- दौहित्रस्येव इति-दायभागी पृ० २०८)मन्पलिखनम् ॥ १॥ दृश्यादा तद्विभागः स्यादायव्ययविशोधिताद्-इति दायभागादि (दाम भा. पृ० १३२ ग्रन्थधृतयाज्ञवल्क्य( २२१२२ वचनम् ॥ २ ॥ तदभावे पुनः पितृदौहित्र इति, तदभावे पितामहस्तदभावे पिता- मही, तदभ.वे पितुः सोदरस्तदभावे पितुर्वेमात्रेयः-इति च श्रीकृष्णतर्का- लङ्कारकृतदायमागटीका(४० २१८ लिखनम् ॥शा व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०७-१०८ पत्नीदुहितरश्चैव-इत्यादि दायभागादि(दामा. पृ० १५१)प्रत्य. भृतयाशवल्क्य(२।१३५,वचनम् ॥४॥ यद्यपि दुहित्रभावे दौहित्रस्येव भगिन्या एव भागधिकारो युक्तः तथापि तस्याः सीत्वेन पार्वण पिण्डदत्याभावाचाधिकारः, दुहितुस्तु दौहित्रात् पूर्वमङ्गादङ्गात् सम्भवति-इत्यादिविशेषवचनादेवावकारः इति भावः--इति श्रीकृष्णतालकारकृतदायभागटोका(पृ. २१०) लिखनम् || एतदन्दीय अगत्यमासीयप्रथमदिनसम्बन्धिसोमवासरे घटिकैकाधिक यामदयानन्तरं मयेय व्यवस्था दचा इति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १०८ रोयकारि मिछिल सदर देओयानि श्रादालत हेनरि शिकशीपियेर साहेव आदालत मजकुरेर हाकिमेर बैठके तारिख ७ शेतम्बर इ. सन १८३१ मोतायाक २३ भाद्र वागला सन १२३८ साल रोज वुधवार । आनन्दमयीदेवी छाएला छाएलार उकिल मुनशी गोलाम वतुल ओ राधामोहनमिश्रिर सकिल मुनशी होशन प्रालि ओ श्रीमन्तमिनि ओ रामनायर प्राचार्येर उकिलान् मुनशी दादार वक्शी पो मोलुवि करम होशन हाजिर श्राइल । एइ आदालतेर हाकिम माएटेकु हेनरि दरम्बल साहेवेर शन हालेर १६ श्रागष्ट तारिखैर हुकुम मोता- वक एइ मोकईमार शोयाल ओ गयरह कागजात एइ श्रादा- लतेर हाकिमान रावट हालदन राटरि शाहेव श्रो पालक सुन्दर रास साहेव ओमाएटेकु हेनरिटरम्बल साहेवेरसन हालेर जुन ओ १६ जुलाइ प्रो १६ आगटेर लिखित राय सम्वलित २.लिलित-न्यप०॥

व्यवस्था-पत्र संख्या-१०८ " ऐ श्राइल । तत परे छायेलार उकिल मुनशी गोलाम चतुल पाएलार तरफ हइते एक केता सोयाल दाखिल करिलेक, पडा- .लि । यथा ए विपय ये नावालकेर मृत्युर पर प्रथमतो शास्त्रानु- जाई कोन व्यक्तिके ताहार उत्तराधिकारित्य, शिंवे, पार कि प्रकारे मोछुर्माच आनन्दमयी श्री राधामोहन नावालफेर उत्तरा- धिकारि श्रो हकदार हइवेक, अनुमोदन करा उचित हेइल ! अतएव हुकुम हइल ये-आनन्दमयो श्रो राधामोहनमिश्रिर थाइल दुइ दरखास्त, जाहा एइ श्रादालतेर हाकिमानेर राय ले- ग्वार पर दाखिल हुइयाछे, एइ आदालतेर पण्डितके एइ हुकुमें समर्पण करा जाय-ये पण्डित मजकुर उपरेर लिखित विशवेर जोयाव ततक्षणात लिखिया दाखिल फरे, एवं मोकदमा मुलतवि थाके इति। श्रीजयतितराम् Ta एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुदहेनरीसिकिस्पीयरमाहेवधम्माधिकरण- लिखितैतदन्दीयसितम्बरमासीयसप्तमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपतिरूप- पत्रमेवं तत्समपितमानन्दमयीदेव्या निवेदनपत्रं राधामोहनमिश्रस्य निवेदन पत्रञ्च यत्तन्मासीयसप्तदशदिनसम्बन्धिशनिवासरे पादोनघटिकाचतुष्टया- धिकयामदयानन्तरं मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारे- गोत्तर लिख्यते । पुत्रमारम्प पितुः प्रपौत्रपय॑न्तरहितस्यापासव्यवहारस्य' मरणोत्तर प्रथमतस्तपितृदौहित्रस्याधिकारः, यदि च तपितृदौहित्रस्तस्यैवाप्राप्तव्ययः । हारस्य मरणसमये गर्ने व्यवस्थिनो भूमिष्ठो वा न भविष्यति, तदा तपितृ- दौहित्राणां स्वत्वान्यथानुपपत्या तद्भगिन्योराहिल्याक्मिण्योः तत्पित.. दौहित्रोत्पत्तिमूलीभूतयोस्तत्सम्बन्धमूलीभूतयोश्च' तपितृदोहित्रोत्पत्तः माक्कालपर्यन्तं यया पुत्रादिपतीपर्यन्तरहितत्य मृतस्य रिनुर्धने दुहितु-' १.०वहितस्य-व्यप! २.०सम्भन्ध०-व्यप1- व्यवस्था-पन्न-संख्या-१०८ रधिकारस्तथा अतृधनेऽप्यधिकारः। सत्सु चाप्रासन्यवहारस्य पितृदोहित्रेषु स्वतोऽप्राप्तव्यवहारस्य पितुः पाण्श्राद्धपिण्डदातृषु स्वतोप्राप्तव्यवहारस्य पितुः पार्वण श्राद्धपिण्डदानानधिकारिण्योरप्राप्तव्यवहारस्य भगिन्योरा- दहिल्याक्मिण्योनाधिकार; किन्त्वप्राप्तव्यपहारस्य भगिन्योः पुत्राणामेवा- धिकारः तपितृदौहित्राभावे तपितामहस्य, तदभावे तपितामह्या अर्था- दानन्दमय्यास्तदभावे तपितुः सोदरश्नासुस्तदभावे तसिनुवैमाप्रेयधातुस्तद- भावे सोदरभातृपुत्रस्य तदमाये तत्पिनुमात्रेयभ्रातूपुत्राणामर्थाद्राधामोह- नप्रभृतीनामधिकारः-इति बनदेशचलितदायभागश्रीकृष्णतकालकारकत- दायमागटीकाचियादमार्णवविवादाणवसेतुदायक्रमसंग्रहादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- श्रत्र प्रमाणम् पली दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा। तत्सुतः-इत्याद्युपरि- लिखित(दाभा. पृ० १५१ अन्यभृतयाशयलय(२।१३५ वचनम् ॥१॥ पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्ताभावे पितृदोहनरयाधिकारो घोद्धव्यो पनि- दोहित्रस्येव-इति दायभाग (पृ० २०८ ) ग्रन्थलिखनम् ||२|| यद्यपि दुहिनभावे दोहित्रस्येव भगिन्या एप प्राधिकारी युतस्तथापि तस्याः त्रीत्वेन पार्वणपिण्डदत्वाभायानाधिकारः, दुहितुस्तु दौहित्रात् पूर्वमहादगात् सम्भवति इत्यादिविशेषवचनादेवाधिकार इति भावः- इतिश्रीकृष्यतर्कालङ्कारकृतदायभागटीमा पृ० २१०)लिखनम् ||३|| तदभाये पुनः पितृदोहित्र इति । तदभावे पितामहस्तदमावे पिता- मही तदभावे पितुः सोदरस्तदभावे पितुर्वमान्नेयस्तदभावे पितृसोदरः पुत्रपितृमात्रेयपुत्रपितृमोदरपोश्रपितृवमानेयपोत्राणां क्रमेणाधिकार:--- इति भीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटीकालिखनञ्चेति ॥४॥ एतदब्ददीयसेतम्बरमासीयपड्विंशतिदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्य- वस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्था-पत्र संख्या-१०६ १०९ रोवकारि मिसिल प्रादालत देशोयानि सदर तारिस २२ माह नवम्बर शन १८३१ इ० मतावक ८माह अग्रहायण शन १२१८ वागला रोज मङ्गलवार ए श्रादालतेर हाकिम श्री- युत मान्तेगिओ हेनरिटरम्बल साहेवेर बैठके । मृत काशीनाथदत्तेर स्त्री करणामयी प्रभृति--पापीलाण्टान चन्द्रमालार पति जयचन्द्र घोप- रेपाडण्ट श्रापोलाण्टगणेर उकिलगण मुनशि दादार वक्स प्रो मुनशी गोलाम धतुल, रेप्पाडण्टेर उकिल सदासुक पण्डित हाजिर श्रासिल । ए मकद्दमा एइ शनेर माइ मासेर २५ तारिखेर हुकुमा- नुसारे अद्य आमार वैठके उपस्थित हइया एइ मकद्दमा वावत आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था श्रो कोटेंर फयशला ओ छानि तजविजेर दरखास्त यो इ० १८३० शालेर जुलाइ मासेर १५ तारि- खेर लिखित ए मकद्दमार इनफशालि रोवकारि यो कमलाकान्त- राय प्रभृति वनाम गङ्गाचरणसेनेर मकदमा चावत ए श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्थार नकल याहा रप्पाडएदेर उकिले दुइ टाका मुल्लेर एक किता फेहरेस्त द्वाराय अद्य लम्बरे दाखिल करिलेक दृष्टे आसिल । ताहार पर प्रादालतेर पण्डितके हुजुरे तलव दिया (जिज्ञासा करागेल-ये तोमार दाखिल करा व्यवस्थाय चन्द्रमालार स्वत्वेर उल्लेख केन छुटीयाछे, एइ क्षण तोमार श्रन्य व्यवस्थार द्वाराय, थाहा रेप्पाडण्टेर उकीले अद्य दाखिल करि लेक, जाना जाइतेछे ये चन्द्रमाला श्रो श्रीमतिर न्याय ये दौहित्र. गणेर उतपत्तिर करण वटे, गोराचान्देर त्यक्तर स्वत्वाधिकारिणि वटे। ताहार उत्तर निवेदन कग्लेिन ये हजुर हइते एइ परिमाण सोयाल हइयाछिल ये शास्त्रानुसारे फोर्टर पण्डितेर व्यवस्था यथार्थ घटे कि ना, ओ ऐ व्यवस्थाय कोर्टर पण्डिते चन्द्रमालार पुत्रके स्वत्वाधि(कारि) लिखियाछिल, ओ ततकालिन अर्थात पूर्वाधिकारिर मृत्युर पर लालमोहनेर, ये ताहार माता अप्राप्त व्यवहारा स्थिल, जर्म हइयाछिल ना, यो ये व्यक्तिर उत्पत्ति व्यवस्था-पत्र-संख्या-१०६ ३२६ 'ना थाके ताहार स्वत्व कोथा हइते अर्शिवेक । एइ हेतुक ताहाके अयथार्थ लिखियाछिलाम, प्रो फलितार्थ गोराचान्देर मृत्युर- "पर ताहार अन्य उत्तराधिकारिगण वर्तमान ना थाकने गोराचा- न्देर भग्नि मुसम्मात चन्द्रमाला, ये से गोराचान्देर पितृदौहित्र गणेर उत्पत्तिर कारण वटे, आपन भ्रातार मिलकीयतेर स्वत्वा- धिकारिणि हइवेक; एवं ए विशयेर विस्तारित एइव्यवस्थाय. याहा अद्य रप्पाडण्टेर उकिले दाखिल करिलेक, लिखा आछे इति । ऐ पण्डितेर एजहार दृष्टे उचित हइल ये निचेर सोयाल एइ आदालतेर पण्डितेर पर करा जाय । सोयालयद्यपि पूर्वाधिकारि निलकण्ठ तिन पुत्र, प्रथम कृष्णप्रसाद, द्वितीय प्रतापनारायण, तृतीय किर्तिनारायणके, राखिया मरे; ओ कृष्णप्रसादह तिन पुत्र रामराजा ओ राम- कृष्ण ओ काशीनाथके राखिया मरिलेक; श्रो प्रतापनारायण ओ एक पुत्र कालाचादके सखया मरिल ओ कीत्तिनारायणह पुत्र गोराचान्द' ओ चन्द्रमाला कन्याके राखिया मरिलेक; ओ सतपरे गोराचान्दह निस्वन्तान मरिलेक। अतएव शास्त्रानुसारे किर्तिनागयाणेर त्यत्य, याता ताहार पुत्र गोराचन्द्र के अशिया- छिल, चन्द्रमालाके अर्श, किम्वा कोन व्यक्तिके । उचित ये ताहार जवाब तिन दिवसेर मध्ये दाखिल करेण इति ।।०॥ एतदर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतमान्तकीयूहेनरीटरम्बलसाहेवधर्माधि फरणलिखितैतब्दीयलवम्परमासीयद्वाविंशतिदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रभम- "तिरूपपत्रं यत्तदन्दीयत-मासीय चतुविशतिदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे पटि- -काचतुष्टयाधिकयामद्वयानन्तरं मया प्राप्त तवलोक्य याहरामोघो नातस्त- दनुसारेणोत्तरं लिख्यते-- प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति कीर्तिनारायणस्य मरणानन्तर- मुत्तराधिकारित्वेन प्रासपतृधनस्य तत्पुत्रस्य गोराचाँदसंशकस्य मरणोत्तरं •वस्तलास्पदीभूतघने यदि तस्य पुत्रमारभ्य पितुः पौत्रपर्य्यन्तो न स्यात् ३३० व्यवस्था पत्र-संख्या-१०६ तद्भगिन्याश्चन्द्रमालायाः कश्चिदेकोऽपि पुत्रोद्' गोराचाँदसंशयस्य पितृ दौहित्रो गर्भ व्यवस्थितो भूमिष्ठो या तन्मरणसमये स्यात्तदा तस्याधिकारः। जाते तस्याधिकारे पुनरुत्पत्स्यमानानांतद्धानन्तराणामर्याद् गोराचाँदसश- कस्य पितृदौहित्रान्तराणामप्यधिकारः समान एव भविष्यति । सति च पितृदो.. दिने तपितृव्यपुत्राणां प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रलिखितानां मध्ये तदानों विद्यमा- नानांनाधिकारः । यदि च गोराचाँदसंशस्य पुत्रमारभ्य पितुः प्रपौत्रपर्यन्त- रहितस्य पितृदौहित्रो गर्ने व्यवस्थितो भूमिठो या तन्मरणसमये नासीत्तदा तपितृदौहित्राणां स्वत्वान्यथानुपपत्त्या तद्भगिन्याश्चन्द्रमालायास्तपितृ दौहित्रोत्पत्तिमूलीभूतायास्तत्सम्बन्धमूलीभूतायाश्च स्वपुत्रोत्पत्तेः पावकाल- पर्यन्तं यया पुत्रादिपनीपर्यन्तरहितस्य मृतस्य पिनुर्द्धने दुहितुरधिकार: तथा भ्रातृधनेऽप्यधिकारः। सति च गोराचाँदसंज्ञफस्य पितृदौहित्रे स्वनो गोराचाँदसंशकस्य पितुः पार्वतश्राद्धपिण्डदातरि स्वतो गोराचाँदसशकस्य पितुः पार्वणश्राद्धपिण्डदानानधिकारिण्यास्तद्भगिन्याश्चन्द्रमालाया नापित कारः, किन्तु तस्याः पुत्रस्यैव, पुत्राणां चोपरिलिखितप्रकारेणाधिकारः-- इति बगदेशचलितदापभागश्रीकृष्णातालद्वारकृतदायभागटीका विवाद . भनार्णवादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था-- अत्र प्रमाणम्- पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्ताभावे पितृदोहित्रस्याधिकारो बोद्धव्यो घनिदो- हित्रस्येव-इति दायभाग(पृ. २०८)मन्थलिखनम् ॥ १ ॥ दृश्यादा तद्विभागः स्यादायव्ययविशोधितात्-इतिदायभागादि- (दा. मा० १३२ अन्यधृतयाज्ञवल्क्य (पृ० २।१२२) वचनम् ॥२॥ तदभावे पुनः पितृदौहित्र इति, तदभावे पितामह स्तदभावे पिता- मही, तदभावे पितुः सोदरस्तदभावे रितुबैमात्रेयस्तदभावे पितृसादर- पुत्रपितृवैमात्रेयपुत्रः- इत्यादि च श्रीकृष्णतालझारकृतदायमागटोका(पृ. २१८) लिखनम् ॥३॥ पत्नी दुहितरश्चैव । इत्यादि दायभागादि(दाभा०पृ० १५१ मन्थ- धृत याज्ञवल्क्य (२२१३५) वचनम् ॥ ४॥ १. देगार-प २. वोपरि०-म्यप .

३३१ व्यवस्था-पत्र संख्या-१०६-११० यद्यपि दुहित्रमावे दौहित्रस्येव भगिन्या एवं प्रागधिकारो युक्तस्त- थापि तस्याः सीखेन पाणपिण्डदत्याभावानाधिकारः, दुहितुस्तु दौहित्रात् पूर्वम्-"महादगात् सम्भवति" इत्यादिविशेषवचनादेवा- धिकार इति भावः-इति श्रीकृष्णतालवारकृतदायभागटीका (पृ० २१०) लिखने चेति ॥५॥ एतदब्दीयलवम्बरमासीपविशतिदिनसम्बन्धिसोपवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति। श्री पतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ११०-रोवकारि मिछिल शदर देशोयानि श्रादालत मज- कुरेर हाकिम हेनरि सिकिसपीयेर साहेवेर वैठके तारिख ५ दिन- म्वर इ. शन १८३१ साल गोतावक २१ अप्रहायण वागला शन १२२८ साल रोज सोमवार- दलमर्दनसाहि पापीलाएट राजा पृथ्वीपतिसाहि ताहार मृत्युर पर सडर्गवाहादुरेर अलि ओ माता राजेश्वर कोडर प्रो मोधर्मात् मदनकोडर- रेष्पाइण्टान- श्रापीलाएटेर उकिता सदासुख पण्डित श्रो रेप्पाडएटानेर उ.. किल मुनशी होशन श्रालि हाजिर हइल | तारिख १५ श्री २१ श्रो २२ ओ २६ माह नवम्बरे एइ मोकईमा रोवकारि यो प्रीविण शीयान क्रोटेर समुदाय कागजात श्रो एइ मकई मार पायत एइ प्रादालतेर दाखिल करा सावेक कागजात पाठ हइया स्थक्ति छिल, अद्य पुनराय रोयकार हइल । प्रामार रायते राजा अरि- मईनसाहिर राजा पृथ्वीपंनिसाहिके पुप्यपुत्र राखनेते इच्छा ये प्रकार उचित साक्षीगणेर साइदेर द्वाराय कवार ओ याककाइ शाछ पोछिल । एवं इहाश्रो तहकित हइत्त ये राजा मजकुर आपन h व्यवस्था पत्र-संख्या-११० होस वहाले ओ स्थिर बुद्धिते हेवानामा सकल राजा प्रथ्योपति साहिर नामे लिखिया दियाछिल । किन्तु एतदभिन्य प्रो गोरक पुरेर जाहाते उभय विवादि वसति राखे, ताहार सर्वदार रेओ. याज' मते एवं शाखेर दाडाते श्रो समुदाइक शरत शफामते राजा प्रथ्वीपतिसाहिर पुष्यपुत्रता सर्वतोभावे साव्यस्थ आसिया- छिल । से हेवानामा सकल शाखेर श्राज्ञानुसारे उचित घटे कि ना ? द्वितीयत्व ये ताहार तजविज नितान्त शालेर दाडाँते .एलाका हइतेछे इति । श्रार अजिमावादेर प्रीविणशीयान कोटेर प्रादालतेर पण्डितेर एइ मोकईमार मिछिले दाखिल करा व्यव- स्थार द्वाराय प्रकाश हइतेछे-ये राजा प्रथ्वीपतिसाहिर पुप्य- पुत्रता उचित वोध हइल, श्रार शन हालेर २२ शेतम्बर तारिखेर होया एइ श्रादालतेर हाकिम माण्टेकु हेनरि टरम्वल साहेवेर रोवकारिर लिखित एइ श्रादालतेर पण्डितेर जवानि जोयावेते “पष्ट बोध हय ना- ये पण्डित मजकुरेर ऐ व्यवस्थाते अस्यता हइ- याछे कि ना। आर यदि स्यात् ना हइयाथाके कि जन्य हय नाहि । पार हाकिम मौछफेर रोवकारिर लिखित पण्डित मजकुरेर जोयावेते वोध हय ये ज्येष्ठ पुत्र पुष्यपुत्र हइते पारे । एइ शर- तते ये उभय पुष्यपुत्रदाता श्रोत्रिहिस्या(?) एइ विपये स्वीकृत हय- ये पुत्र मजकुर उभय दुइ व्यक्तिर श्राद्ध पिण्डदान करिवेक । किन्तु इहाते सस्पष्ट हयना-ये पुष्यपुत्रतार निर्धारितेर पूर्व ये रुप एइ मोकईमाय प्रकाश आछे, श्राप्त पितार मृत्युते ऐ प्रकार शरत वहाल धाके कि ना। एइ सकलेर प्रति दृष्टे आमार निकट सन्देह भञ्जनार्थे उचित ये मोकईमार कागजात एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे-ये पण्डित मजकुर कोट आ गयर- हर व्यवस्था श्रो साक्षीगणेर एजहार यो मिछिलेर कागजात अनुमोदने निचेर लिखित सोयालसकर जोयाव वत्- क्षणात लिखिया दाखिल करेण पाठान जाय । १ वेमोयाज-व्यप। २. भवनायव्यप।

व्यवस्था-पन्न-संख्या-११० ३३३ १. प्रथमतो एइ ये साक्षीगणेर साक्षीर द्वाराय राजा प्रथ्वी- पतिसाहिके पुष्यपुत्र देोया ओ लोया उभय उहार माता श्रो राजा अरिमनसाहि ओ रानी मदनकोडर ये रूप उचित शास्त्रानुजाइक पायान आशीयाछे कि ना। २. द्वितीय-पुष्यपुत्रतार दाडासकलेर पूर्व प्रध्यीपति- साहिर आपन पीता रणवाहादुरसाहिर मरणेते ताहार सत्य- तार किछु क्ष्यति हय कि ना। बार यदि ताहाते क्ष्यति बोध हय, एमत क्ष्यति रणवाहादुरसाहिर पक्ष्य हइते पूर्व समये पुष्यपुत्रतार कछुल करणेर सवार ये प्रकार मोछम्मात मदन- कोडर एइ मोकगार पापीलेर जोयावे लेखे दुर हइते पारे किना। ३तृतीय-ये खि सहगामिनी हय, सेइ स्त्री सहगामी होयार पूर्व आपन पुत्र अन्य कोन व्यक्तिके पुष्यपुत्र देओयाते यथा- शास्त्र पष्ट रूप निषेध आछे कि ना। ४चतुर्थ-प्रथ्वीपतिसाहिर छय पतसर वयक्रमे ताहार पुष्य-- पुत्रवार निषेध कि ना। ५पञ्चम-ज्येष्ठ पुन हेतुक तस्य पुष्यपुत्रतार प्रापत्य जेला- गोरकपुरेर प्रचलित दाडा ओ शाच्छादात ये प्रकार राजा उद्योतनारायणसिंह एवं द्वितीय राजासकलेर साक्षीते शाछद पौछिल दुर हइते पारे कि ना। ६पप्ठ-राजा अरिमईनसाहिर लिखिया देओया हेवा- नामा सकल दोरस्त हय कि ना। श्रार यदि स्यात् दोरस्त हय,. तवे राजा प्रथ्वीपतिसाहि पुष्यपुत्रताभिन्य ताहार द्वाराय इवार विपये हकदार हय कि ना। सप्तम-यदि स्यात् पुष्पपुत्रता श्रो हेवानामासकल दुइ. ना दोरस्त हय, राजा अरिमर्दनसाहिर स्त्री रानी' मदन कोड. १.वानी-व्यप व्यवस्था-पत्र संख्या-११० ३४. र ८५ लम्बरेर इ० शन १८२६ शालेर २८ मार्च तारिखेर लिखि- त एइ पादालतेर सावेक हाकिम कोर्ट नि इश्मिट साहेवेर रोव- कारिते ये प्रकार लेखा, आछे थापन जीवद्दशा पर्यन्त उहार स्वामीर विपये कावेज ओ दखिलकारिर हकदार हइते पारे कि ना इति । श्रीर्जयतितराम् एताधिकरणाधिपति श्रीहेनरी सिक्सिपोयरसाहेव-धर्माधिकरणलि- खितारेजीशन्दप्रतिपाद्यकत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयदिशम्बरमावीयपञ्च- मदिवसीयविचारपत्रान्वर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेव तत्समर्पितैतद्विवादविषयनि- विष्टपत्रबातञ्च यत्तदन्दीयतन्मासोयपञ्चदशदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे घटि- केकाधिकयामद्वयानन्तरं मया प्रास तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनु- -सारेणोत्तरं लिख्यते- . प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्-- साक्षिणां साक्ष्यद्वारा राशः पृथ्वीपतिसाहिसंज्ञकस्य पुत्रप्रतिनिधित्वेन दानं महणं चेतयं तस्य मात्र राशी अरिमईनसाहिसंशकस्य चैवं राज्या मदनकोमराख्यायाश्च यथोचितं भवति तथा शास्त्रानुसारेण जावमिति । अन प्रमाणम्- माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि । सदृशं प्रीतिसंयुक्त स यो दनिमः सुतः॥ इति मिताक्षय (पृ० २१३) यौरमित्रोदयादि-(पृ० ६०५ अन्यधृतमनु( ६१६८ वचनम् ॥१॥ पुत्रं प्रतिमहीप्यन् बन्धूनाहूय राजनि चावेद्य निवेशनस्य मध्ये च्यातिभिहुंता अदूरयान्धवं बन्धुसविकृष्टमेव मनिगडीयाद्युप-रि- लिसित( मिता पृ० २१४ प्रन्यवृतवशिष्ठवचनम् ॥ २॥ -- १ मयन् म्यप। ३ पदमि म्यप० । २ निमेशनममिता।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-२१० ३३३ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् पुत्रप्रतिनिधिताया रीतीनां पूर्व पृथ्वीपतिसाहिरांशकस्य जनकपित् रण- वहादुरसाहिसंशकस्य मरणात् पृथ्वीपतिसाहिसंशकस्य पुत्रप्रतिनिधितासत्य- -तायाः क्षतिर्यद्यपि सन्देहविषयीभूता भवति तथाप्येतादृशो क्षतो रणवहादुर- साहिसंजकस्य सकाशात् पूर्वसमये पुत्रप्रतिनिधितायाः स्वीकारेशैतद्रियादे 'एसद्धर्माधिकरणोत्तरपत्रे राश्या मदनकोमराख्यया लिखितेन दूरीभवितुं श- -कोति, रणवहादुरसाहिसंज्ञकस्य तादृशस्वीकारेण तत्रानुमतेरयगमादिति- अन्न प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रथमप्रमाणम् ॥ १ ॥ मात्रा भत्रनुशया प्रोपिते प्रेते वा भरि पिना चोभाभ्यां वा सवर्णाय यो यस्मे दीयते स तस्य दत्तकः पुत्रः-इति मिताक्षरा (पृ०२१३) अन्य- लिखनम् ॥ २॥ तृतीयप्ररनरपोत्तरम्- या स्त्री सहगामिनी अनुगामिनी वा भवति सा स्त्री सहमरणात् पूर्व: मनुमरणात्पूर्व वा स्वकीयपुत्रस्य' पुत्रप्रतिनिधिकरणार्थमन्यस्मै ,सम 'एं. कत्तु न शक्रोतीति शास्त्रे निषेधो नास्तीति ।- चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- पृथ्वीपतिसाहिसंज्ञकस्य पडवर्षवयस्कत्वेन पुत्रप्रतिनिधिताया निषेधो नासीत् । तत्रायं विशेषः यदि तत्समये स नोपनोतः, अथ च तज्जनकेन पिना जनकपित्रभिप्रायेण तजनन्या मात्रा वा "श्रावयोरयं पुत्रः” इति सम्प्रतिपच्या ग्रहोत्रे दत्तः स्यात्तदा पुत्रपतिनिध्यन्तर्गतनित्यद्यामुष्यायणपु. प्रताया अपि निपेयो नासीत् , जनकपुत्रतायास्तत्राक्षतत्वात् । यदि च ता. हरासम्प्रतिपत्तिं विनैव दत्तः स्वादश च चूडान्तस्संस्कारैजनकेन संस्कृतः प्र. तिमहीना चोपनयनादिमिरसंस्कृतस्तत्रापि तस्य पुत्रप्रतिनिध्यन्तर्गतानित्य यामुष्पायणपुत्रताया निषेधो नासीत् , तत्रापि ननकपुत्रतायास्तस्मिन् अक्षतत्वात् । किन्तु यदि षड्वर्षवयस्कः पृथ्वोपतिमाहिसंज्ञकस्तदानीमुपनीतः १. यो इति मिलाइयां नास्ति। २. पूत्रस्य-व्या।

३३६ : . व्यवस्था-पत्र संख्या-११०० स्यात्तदा दत्तकपुत्रताया निषेध श्रासोन्नतु कृत्रिमपुत्रताया:;यतः कृत्रिमपुत्र- करणे ज्येष्ठ कनिष्ठयोनियमो नास्ति, उपनीतानुग्नोतयोरपि नियमो मास्ति, दानस्याप्यावश्यकता नास्ति, केवलं सजातीयत्वपुत्रत्वकरणयोरेव प्रयोज- कत्वम् । अथ च जनकपितुः पुत्रत्वं नैव गच्छति । श्रयश्च सर्वथैव दया. मुष्यायएः जनकपुत्रत्वकरयोईयोररि धादादिकरः । अयमेव कृत्रिमपुत्र: पाटलिपुत्राख्यनगरसम्बन्धिका पीलाख्यधर्माधिकरणनियुकरण्डितेन लि. खित इति। थत्र प्रमाणम्- तथाहि विविधा दत्तकादयो नित्याव्यामुष्यायणा, अनित्यपद्- द्वयामुप्यायणाश्चेति । तत्र नित्ययामुयायणा न,म ये जनकपतिगृही. तृभ्यामावयोरयं पुत्र इति संप्रतिपना अनित्यद्वयामुयायपास्तु ये चूडान्त- (संस्कारे जनकेन संस्कृताः उपनयनादिभिश्च प्रतिगृहीत्रा, तेषां गोत्र द्वयेनापि सस्कृतत्वावयामुष्यायएवं परन्खनित्यम्-इतिदत्तकमीमांसादि. (पृ० १३० ) अन्यालखनम् ॥२॥ सदृशं यं प्रकुर्वीत'गुणदोषविचक्षणम् । पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्त सविज्ञेयस्तु' कृत्रिमः ।। -इति मनु ( पृ० ३७४, ६१७६) वचनम् ।।२।। स च पुत्रत्वकरस्य पिण्डप्रदः, निजपित्रादीनां पिण्डप्रदले तस्य तिष्ठत्येव-इतिशुद्धविवेकान्य( ३१ ख ६ पं० )लिखनम् ॥३॥ चुडामा यदि संस्कयरा निजगोत्रण व कृताः । दचायास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते॥ इतिदत्तकमीमांसा(पृ०७४) दचकचन्द्रिकादि दच पृ० १६. अन्यधृतकालिकापुराणवचनम् ।।४।। चूडाद्या इत्यतद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिणा द्विजातीनामुपनयनलाभः, शुदस्य तु विवाहादिलाभः इति दत्तकचन्द्रिका( पृ० २१ ग्रन्थ- लिखनम् ॥ वस्तुतस्तु यस्य पञ्चदशवर्षपर्यन्त दैववशाच्चूडादिसंस्कारो न जात. स्तस्य यथाविधि गृहणोत्तरसंस्कारा अतिपत्येररित्यादिवचनात् प्रायश्चि- १. तुपर्यायम्-ति मनुपा . A २. विज्ञयश्चेति मनुपाय।

ज्यवस्था-पत्र-संख्या-११० : ३३७. चात् महाव्याहृतिहोमं विधाय चूडादिसंस्कारे कृते दत्तकत्वं सिद्धत्येव । न चोद्ध्यं वित्यादिवचनविरोध इति वाच्यम्, तस्येष्टिपदश्रवणाव साग्निक- परत्वात् । पञ्च च पञ्च च पञ्चचेत्येकशेपात् पञ्च तेषां प्रण: पञ्चमः पञ्चदश इति यावत्, तस्माद्ध्वं न दत्ताद्याः सुता इत्यर्थाच । एवञ्च पञ्चमवर्षपदं स्वस्वजात्युक्तोपनयनकालोपान्त्यवर्षपरम् । उध्वन्तु पञ्चमा- वर्षादित्यादिवचनारम्भस्तु ब्राह्मणादीनां षोडशादिवर्पव्यावर्तनाय-इति शुद्धिचन्द्रिकानन्धलिखनम् ! ६ 11 (1) पञ्चमप्रश्नस्योत्तरम्- ज्येष्ठपुत्रत्वेन तस्य पुत्रप्रतिनिधिताया अापत्तिर्गोरखपुरप्रदेशचलि- तरीत्या राश उद्योतनारायणसिंहस्यान्येषां राज्ञां साक्षिणां साक्ष्येण च.. यथा निश्चित तेन दूरीभवितुं शक्नोति, तद्देशचलितरीतिसाक्ष्युपस्था पितवृत्तान्ताभ्यां गोरखपुरप्रदेशे ज्येष्ठपुत्रस्य पुत्रप्रतिनिधीकरणस्य सिद्धत्वेन, तद्देशीयव्यवहारविरुद्धाया ज्येष्ठपुत्रस्य पुत्रप्रतिनिधिताया थापतेः शास्त्रानु सारेणापि दूरीकृतत्वस्यार्थसिद्धत्वात् तद्देशीयव्यवहारविरुद्धस्य कस्यचिदपि. कर्मणःशास्त्रानुसारेण तस्मिन् देशे कदाचिदपि भवितुमशक्यत्वाञ्चेति।०॥ अत्र प्रमाणम्- जातिजानपदान् धर्मान्प्रेणीधर्मा व धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्माच स्वधर्म प्रतिपालयेत् ।।-ति मनुवचनम् (मनुमा४१) ॥१॥ देशजातिकुलानाध ये धर्माः प्राक्प्रवर्तिताः । तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुम्यतेऽन्यथा ॥ इति वीरमित्रोदयादि- अन्यधृतबृहस्पतिवचनम् ॥२॥ यस्मिन् देशे य श्राचारो व्यवहारः कुलस्थितिः। तथैव परिपाल्योऽसो यदा वशमुपागतः।।-इति याशरलय- वचनम् ॥३॥ २२ . ३३८ व्यवस्था पत्र संख्या-११० केवल शाखमानित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः । युक्तिहीनविचारे तु धर्महानिः प्रजायते ॥ इति वीरमित्रोदयादि- अन्यधृतवृहस्पतिवचनम् ॥ ४॥ • • •॥ षष्ठप्रश्नस्योत्तरम् राज्ञा अरिमर्दनसाहिसंशकेन लिखितं दानपत्र जातं तत्पल्या गरया म- दनकोमराख्वाया यावजीवं तत्कुलोपयुक्तप्रासाच्छादनोपयुवावश्यकविधवा- धर्माद्याचरणोपयुकातिरिक्तधने सिद्ध्यति, प्रभुसमर्पितपत्र जाते राशोर- मईनसाहिसंशकस्य चतुराणां भ्रातृणां मध्ये स्वकुलोचितव्यवहारानुसारेण ज्येष्ठत्वेनावशिष्टानां प्रयाणां भ्रातृणां पृथक् पृथक् स्वकुलोचितप्रासाच्छाद- नोपयुक्तातिरिक्तराज्ये असाधारणस्वत्वेनासाधारणस्वत्वासदीभूतस्य राज्य- स्प आप्रन्तरसाधारएयाभावावगमेन तत्र भ्रात्रादीनामनुमति विनापि दाना- यधिकारित्वेन सिद्धनिष्पत्यूहत्वात् । एवं तदानस्य सिद्धौ सत्यां राजा पृथ्वी- । पतिसाहिसंशका पुत्रप्रतिनिधितां विनारि दानानुसारेण दानकृतधनस्याधि- कारी भवितुं शक्रोति । तद्दानेन ग्रहीतुः स्वत्वोत्पादात्सप्तममश्नस्योत्तरम- यांदुपरि लिखितोत्तरगनरेव पर्यवसन्नमिति पृथड न लिखितम् इति गोरख.. पुरप्रदेशचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदयन्यवहारमयूखव्यवहारकौस्तुभदत्तक- चन्द्रिकाशुदिचन्द्रिकादत्तकदीधितिदत्तकनिर्णयादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- कुटुम्रभक्तवसनादेयं यदतिरिच्यते-इति वीर मित्रोदयादि (पृ० ३६४) अन्यधृतबहस्पति पृ० १३७ )वचनम् ।। विभक्तेषु तूतरकाल विभशाविभक्तसंशयव्युदासेन व्यवहारसीकर्याय सर्वाभ्यनुता न पुनरेकस्यानी वरत्वेन, अतो विभक्तानुमतिव्यतिरेकेणापि व्यवहारः सिद्धयत्येव-रवि मिताक्षरा पृ० २०० )प्रन्यलिखनम् ॥ २ ॥ स्वस्वसनिवृत्तिपूर्वकारस्यतापादनं दानम् इति मिताक्षरादि ( मुंबो चिनी पृ० ७४१ ग्रन्थलिखनम् ।। ३ ।। प्रदान स्वाम्यकारणम् - इति मनुवनमध्येति ॥ ४ ||01016I रापर।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-११०-१११ ३३४ • अंगरेजीशन्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशतान्दीयजानवरीमातीयस. समदिनसम्बन्धिशनिवासरे घटिकैकाधिकयामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था इत्तेति ।।- थीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण . १११-गोवकारि सदर देओयानि श्रादालत श्रोयाके तारिख २६ दिजम्वर शन १८३१ साल मोतामेक शन १२३८ सालेर १२ पौष सोमवार श्रीयुत अालक सुन्दर राश साहेव ऐ आदालतेर, हाकिमेर बैठके बदनचन्द्रहालदार ओगायरह वनाम रामचॉद- मुखोपाध्याय सापलानेर उकिल मुनशी गोलाम वतुल ओ तरप- छानिर उकिल सदासुकपण्डित, हाजिर अइल । सन १८३१ शालेर १५ शेतम्बर तारिखेर ए आदालतेर हाकिम श्रीयुत कटवरट थरनएल शेली साहेवेर हुकुमानुसारे सायेलानेर खास आपीलेर सोयाल श्री गायरह ऐ मोतालकेर कागचसकल अद्य प्रामार वैठके दरपेप हइया हाकिम मौछुफेर तारिख मज- कुरेर रोधकारिर लिखित राय ओ सन १८३१ सालेर २८ शेतम्बर तारिखेर दृष्ट करा तरफछानिर सोयालेर सहित दृष्टे प्राइल । तरफछानि जेलार मुद्दाइ जाहेर करे जे राधाकान्तहालदार मोत- ओकफार स्रीमोलुम्मात सुभद्रादेव्या खासपुर परगनार कालीघाट ग्रामेर मोट सात विघा देवसेवार जमीर मध्ये एक विघा श्रो -सालियाना पाच दिवस लार मध्ये एक दिवस पाला कालि- धाकुरानिर सेवा सहित आपन स्वामीर साथै मुद्दाइके दान- करियाछे । यद्यपि स्यात् जेलार फयछलार लिखित जेला पधिप परगानार पण्डितेर, व्यवस्थार मजमुने प्रकाश पाछे-ये देव- सेवार जमी श्री सेवार पाला सेवा सहित अविरा खोर दान .

३५० व्यवस्था पत्र संख्या-१११ करिवार क्षमता अाछे, किन्तु जेलार मुद्दापालेहोम बदनचन्द्र- हालदार ओ गायरह छाएलान् जाहेर करे ये श्रवोरा बोर ठाकुराणीर पाला ओ देवसेवार जमी दान करिवार क्षमता नाइ । एजन्य हुकुम लादेर होनेर पूज्य ए आदालतेर पण्डितेर स्थाने व्यवस्था लोया उचित वोध हइया हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल ओ राजचन्द्ररायेर मोकदमार दाखिल होया ए आदालतेर सावेक पण्डितेर व्यवस्थार नकल, ये एइ दर- खास्तेर सामिल पाछे, एइ हुकुमे ये निचेर लिखित सोयालेर जवाव व्यवस्था मजकुर दृष्ट करिया एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण, ए आदालतेर पण्डितेर हाओला करा जाय। यद्यपि स्यात् अवीरा खी मोट शात विधा देवसेवार जमीर मध्ये मोजी एक विघा जमी श्री सालियानापाच दिवस पालार मध्ये एक दिवस पाला सेवा सहित स्वामीर स्वर्गाय कोन-वैक्तिके दान करे, ए प्रकार दान वागलादेसेर शाखा नुसारे यथार्थ वटे कि ना इति-- श्री यतितराम् एतसम्माधिकरणाधिपवित्रीयुतबलकसुन्दररासमाहेवधर्माधिकरणलि- सितारेजोशब्दप्रतिगोकत्रिंशदषिकाष्टादशतान्दोयदिसम्बरमासीयघड्- विरातिदिवसीयविचारपत्रान्तर्गत प्रश्नपतिरूपपत्रमेवं तत्समपितराजचन्द्ररा- यसम्बन्धिविवादविषयनिविष्टव्यवस्थामतिरूपएप्रञ्च यदेतदन्दीयजानवरोमासी. ययमदिन सम्बन्धिहस्पतिवासरे घटिकेकाधिकयामदयानन्तरं मया प्राम तदवलोक्य याहराबोधो बनस्तरनुसारेणोचरं लिख्यते ।। यदि काचिदवीण स्त्री सप्तविघाशब्दप्रावपायदेवसेवासम्पादकभूमिसमु. दायान्तर्गतकविधाशन्दप्रतिपावभूमिमेवं वापिकाचदिवसीयपालाराष्ट्र प्रतिभाशालगतेकदिवसीयपालाशब्दपविपायच देवसेवासहित सात्यु स्वर्गार्थ करचिद्दसतो स्याचदा तहानं यथार्थमेव भवति, देवसेवाया: देव. सेवापालारान्दप्रतिपादन च सेवाइवरान्दवान्यस्यायन वेन सेवाइवराब्द. - व्यवस्था पत्र-संख्या-१११ ३४१ वाच्यस्य पुत्रपौत्रप्रीत्ररहितस्य मृतस्य परयुद्धने जाताधिकारिण्या उपरि- लिखितप्रकारफतादृशदानकाः पल्यास्तादृशदानविषयीभूतदेवसेवायाः देवसेवापालाशब्दप्रतिपाद्यस्य च तत्सम्पादकदेवत्रभूमेः समर्पणं विना अनिष्पाद्यत्वेन तत्समर्पणरूपदानस्याप्यावश्यकत्वेन च यथोत्तराधिकारि- त्वेन सेवाइतशब्दवाच्यस्य पल्यास्तारादेवत्रभूमौ स्वत्वम्, अर्थात् तत्संरक्ष- गावेक्षणादिकतत्वोपयुक्तं कारयितृत्वोपयुक्त वा तदुत्सकोपस्वत्वेन च देव- सेवादिक त्योपयुक्त कारयितृत्वोपयुक्त वा तथैव तया पल्या कृतदानेन ताशं स्वत्वं प्रतिग्रहीतुरपि मयितुं शकोत त्यत्र बाधकामावाद्-इति पङ्ग देशचलितदायभागश्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटीकादायतत्त्वदायनमसन- इदायरहस्यव्यवस्था विवादमार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । .अन्न प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव-इत्यादि दायभागादिमन्यतयाशवल्स्यवचनम् अपुत्रधने पौत्रप्रपौत्रामाय साध्व्याः पल्या अधिकारः, तत्रापि भर्तृ. स्वर्गमुद्दिश्य दाने यथाकथञ्चिच्छरीररक्षार्थ भक्षणे चाधिकारः, एतदति- रिक्तयथेष्टा चरणे स्थावरविक्रयादौ च नाधिकारः- इति व्यवस्थार्णवग्रन्थ- लिखनम् ॥ २॥ स्वस्थत्वानिवृत्तिपूर्वकारस्वत्वापादनं दानम्-इति विवादमङ्गार्णय- (१ विवा० ३१८ ख )अन्पलिखनम् ॥ ३ ॥ विक्रतुर्यादृशं स्वत्वं केतुस्ताहशमेव स्वत्वं कयाजायते इति श्रीकृष्णकालङ्कारकृतदायमाग पृ. १०)टीकालिखनश्चेति । एतदन्दीयजानवरीमासोबैकविंशतिदिनसम्बन्धिशनिवासरे घटिकाद्वयाधि- कयामद्वयानन्तरं मयेय व्यवस्था दत्तेति | श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण * . ३४२ व्यवस्था पत्र संख्या-११२ २१२--सदर देोयानि आदालतेर पण्डितेर-प्रति प्रश्न- भरणार्थ प्राप्त व्यक्तीर मरणानन्तर ताहार उत्तराधिकारिंगण पहुकालावधि ऐवस्तुते भोगवान थाकिले मरणार्थ वस्तुवे भरणार्थ प्राप्त व्यक्तीर उत्तराधिकारिगणेर सत्व लोप हय कि ना ? इति- प्रभुसमपितप्रश्नपत्रमेवमेतदिवादविषयनिविष्टपत्रमातं यदङ्गरेबीयन्दनः तिपाद्यत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयजुलाइमासीयोनविंशदिवसोयशुक्रवासरे घटिकादयाधिकयामद्ये प्राप्तं तदवलोक्य विविच्य च याशबोघो जातस्त. दनुसारेणोत्तरं लिख्यते- यदि कयाचित् कन्यया स्वपितुः सकाशाद्भरणार्थ किश्चित् स्थावर धनं प्राप्तम्, तन्मरणोत्तरं तदुत्तराधिकारिभिर्बहुकालावधिकं तदेव वस्तुस्व. भोगास्पदीभूतं कृतं स्यात्तत्र यदि तया व्यक्त्या तदस्तु केवलं स्वजीवनपर्य- न्तमेव भरणार्य प्राप्त स्यादेवं तन्मरणोत्तर तदुत्तराधिकारिभिः प्रभुसम- पिंतपत्रावगतसम्बन्धेन प्रोत्या वा बहुकालपर्यन्तं तदस्तु भुक्तं चेदपि सेपा तत्र स्वत्वानुत्सादेन स्वत्वसामान्याभावस्य विद्यमानत्वात् स्वत्वध्वंसो दूरापास्त एव, एतादराभोगस्य स्वत्वोत्पादकत्वाभावात् स्वत्वोत्पादकस्य, दानाद्यागमस्यात्राप्राप्तत्त्वाच, सम्बन्धप्रयुक्तभोगस्य प्रीतिप्रयुक्तभोगस्य, वा स्वत्वे प्रमाणत्वामावाच । यदि च तया व्यक्त्या तदस्तु' पुत्रपौत्रादिकमेण भरणार्थ प्राप्तं स्यात्तदा तन्मरपोचरं गदुत्तराधिकारिणामपि ताहराभर- णार्थप्रातिरूपागमेन तादृराभरणोपयुक्त स्वत्वमुत्यन्नं नएं भवितु, न शक्रोति, वर बहुकालावधिकताहराभोगेन तायमरणोपयुक्तस्वत्वोत्पाद- कस्तादृशमरणार्थप्राप्तिरूपागमो दीभूतः-इति वङ्गदेशचलिमनुव्यवहार- मातृकान्याहारतत्वदायतत्त्वविवादभनार्णवादिनन्यानुसारिणो व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्-- सप्त वित्तागमा धा दायो लाभः कयो जयः। प्रयोगः कर्मयोगम सत्प्रतिग्रह एव च ॥ इति मनुवचनम् (पृ. ४२२, १०।११५) ॥१॥ १ववेत्यादयस्य-व्यर.। २. स्यजवास्तुभ्यर.1 । ..

व्यवस्था पत्र-संख्या-११२-११३ अस्वामिना तु यमुक्त गृहक्षेत्रापणादिकम् । सुहृयन्धुसफुल्यस्य न तद्भोगेन हीयते ।। इति दायतत्त्रव्यवहारः तत्त्वादि पृ० ५४ )ग्रन्यधृतवृहसति पृ० ७५ वचनम् ॥२।। आगमेन विशुद्धेन भोगो याति प्रमाणताम् । अविशुद्धागमो भोगः प्रामाण्यं नैव गच्छति ।।-इति व्यवहारमातृ. कादि पृ० ३४५ मन्यतनारद(नास्मृ पृ० ७० वचनञ्चेति ॥३॥ श्रत्र भरणार्थ तद्वतु तया व्यक्त्या केन प्रकारेण केन नियमेन वा प्राप्तमिति प्रभुसमर्पितपत्रजातातुमशक्य एव तत्पनजातेषु प्रमाणभूतं दानपत्रादिकं न प्रातमत एवं व्यवस्थायां प्रकारद्वयं लिखितमिति निवेदनम् ।। अगरेजोशब्दप्रतिपाद्यकत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयजानवरीमासीयैक- विशतिदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकैकाधिकयामद्वये मयेयं व्यवस्था दति- श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण । , ११३-सदर देशोयानिर पण्डिर पर सोयाल- जद्यपि एक वेक्ती हिन्दुर दुइ कन्या थाके । ताहाते एक कन्या एक पुत्र प्रापन गर्भर राखिया आपन पितार साक्षाते मृतु हए । नाहार पर ऐ वेक्ती आपनार द्वितीय कन्यार साक्षात मृतु हए । से मते मृत वेक्तीर तेक्त वस्तु वर्तमान फन्याय अरसे, फि ताहार दौहित्रके, जे ताहार माता पुत्र राखियां आपन पीतार वर्तमाने मृत्तु हइयाछे, ताहाके मृत वेतीर तेक्त वस्तुर कीछु अरसे किना। जद्यपि अरसे तवे की प्रमाण ?|| प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदङ्गरेजीशन्दप्रतिपाद्यत्रिंशदधिकाष्टादशशता- ब्दीयदिशम्बरमासीयाप्टमदिनसम्बन्धिबुधवासरे घटिकादयाधिकयामद्वये प्रास तदवलोक्य यादृशबोयो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-११३ यद्येकस्य कस्यचित् हिन्दूनातीयस्य दुहितृदयमासोत, तयोर्मध्ये एका दुहिता स्वगर्भोत्पनमेकं पुत्रं सरदय विद्यमाने स्वपितरि मृता, तदनन्तरं 8 एव व्यक्तिविशेषो परस्यां दुहितरि विद्यमानायां मृतस्तदा तस्यैव विवि- शेषस्य त्यक्तधनं विद्यमाना दुहिता, या प्रभुसमर्पितविचारपत्रेण पुत्रव- त्यवगम्यते, सा प्राप्तुं शक्कोति, तस्यां पुत्रवत्यां दुहितरि विद्यमानायां सत्यां सच दौहित्रो यस्य माता विद्यमाने स्वपितरि मृता प्राप्तुं न शक्नोति, यतः शास्त्रानुसारेण पुत्रवत्या दुहितरि जीवन्त्यां सत्यां कस्यचिदपि दौहि. त्रस्य विद्यमानमानूकस्य मृतमातृकस्य वा मातामहधने नाधिकार:- इति वनदेशचलितदायभागश्रीकृष्णतर्कालकारकृतदायभागटीकादायतत्त्व- दायक्रमसमहविवादभनार्णवादिग्रन्यानुसारिणो व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- पली दुहितरश्चेव पितरो भातरस्तथा इत्याद्युपरिलिखितमन्यपृत- याशवल्क्य पृ० २१६।२।१३५)वचनम् ।।१।। अपुत्रस्य मृतस्य कुमारी ऋक्थं गृहीयात्तदभावे पोदा-इत्युपरि- लिखितमन्यधृत( दाक सं० पृ० ३ )पराशरवचनम् ॥ २ ॥ कुमार्यभावे चोढायाः पुत्रवत्याः सम्भावितपुत्रा(या)श्च, (भगिन्याः) तुल्योऽधिकारः, तयोरेकतराभावे एकतराधिकार:-ति, स्वपुत्रद्वारेण पार्वणपिण्डदावृतया तयोरुपकाराविशेषाच्च-इति च, सर्वदुहित्रमावे दौहित्रस्याधिकारः-इति च दायकमसंमह (पृ. ४ )मन्थलिखन- ब्चेति ॥३॥ इहार सोयाल पापिते छिल, एइ निमिचे एइ पत्रे लेखा- गेलना। अगरेजीशन्दप्रतिपाद्यकत्रिंशदषिकाष्टादशशतान्दीयफेवरवरोमासीयच. तुर्यदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकैकाधिकयामदये मयेयं दत्त ।। .. !!.॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्था + व्यवस्था पत्र-संख्या-११४ ३४५ १२४ सयोधाल-आमार झात. हइयार कारण एविसपर जिज्ञासा करा आविश्वक हइल जे जद्यपि एक वेक्ती हिन्दुर दुइ- पुत्र थाके । ताहाते एक पुत्र प्रापन पितार साक्षाते एक पुत्र जिव- मान रासिया मूर्तुं हय । ताहार पर ऐ वैक्ति पापन द्वितीय पुन श्रो मृत पुत्रेर वालकेर साताते गृर्नु हए। सवे ऐ मृत वेतोर तेक्त धन काहाफे अर्श इति । प्रभुसमर्पितविचारपत्रे यत्प्रश्नान्तरं तदपलोक्य यादृशमोधो जात- तदनुसारेणोत्तर लिख्यते ॥ यदि कस्यचित् हिन्दूनातीयस्य व्यचिविशेषस्य पुत्रस्यमासीत् तपोमध्ये एफ एर्फ पुत्र संरक्ष्य विद्यमाने पितरि मृतस्तदनन्तरं सोऽपि व्यक्ति- विशेषो द्वितीये पुणे विद्यमाने मृतपितृकपोत्रे च विद्यमाने गति मृतस्तदा तस्यैव घनिनो मृतस्य तदनस्य सम द्विधा विमक्तस्यैकोऽशो विद्यमानपुर- स्यापरोऽयो मृतपितृकपोत्रस्य भवति । अत्र विशेषतः शास्त्रानुशाया अपो. लिखितप्रमाणेधेव स्पष्टीकृतत्वाद् इति यनदेशचलितदायमागश्रीकृष्ण तर्कालकारकृतदायमागटोकादायतत्त्वदायक्रमसंग्रहवियादमार्णवादिग्रन्यानु- सारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम् अविमो मृते पुत्र तत्सुक्यमागिनम् । : कुयीत जीवनं येन लन्यं नैव पितामहात् ॥ लभेतांशं स्वपित्र्यंन्तु पितृन्यातस्य वा सुतात् । स एपारास्तु सयेषां मातृणां न्यायतो भवेत् ।। लभेत तत्सुतो वापि नियात्रः परतो मवेद्-इति दायतत्त्वविवाद- मनासयादिप्रन्पधुतकात्यायनवचनम्( कास्मृ• पृ० १०३) यमा पैतामहे घने पितुः स्वाम्यं तयेत्र तस्मिन् मृते तत्सुत्राणामपि, न तन सभिकर्षविप्रकर्षाम्यो फोऽपि विशेषः, पार्वणविधिना पिण्डदानेन .. निजे प्रे-रति मेरेरारम भविमनेनु प्रेदे, नि मायापारवि ३४६ व्यवस्थापन संख्या-११४-११५ द्वयोरपि तदुपकारकत्वाविशेषाद् इति दायभागः पृ० २६ अन्धलिख- नम् ॥२॥ । मृतपितृकपोत्रमृतपितृपितामहकप्रपो नयोः पुत्रेण सह तुल्याधिकारः, तेपो पार्वणपिण्डदातृत्वेनोपकाराविशेषाद्-इति दायक्रमसग्रह(पृ. २) अन्धलिखनञ्चेति ॥३॥ एहार सोयाल पापिते छिल, एइ निमिते एइ पत्रे लेखा- गेलना। अगरेजीशन्दप्रतिपाद्यकत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयफेवरवरीमासीयच- तुर्थदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकैकाधिकयामदये मयेयं व्यवस्था दसैति ।। श्रीजनयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण ११५ सदर देोयानि भादालतेर पण्डित उपर सोयाल- नं २ खास पापील शन १८३० साल- मथुरराय ओ लक्षणराय श्रापिलाएटान राजुपाइक रप्पाडण्ट . १दफा गुरुप्रसाद नामक एक व्यक्ति अपुत्रक कारण सि. वर्तमाना थाकिते ओ नापनार सकल विषय दानपत्रेर लेखार सरत मते अन्य व्यक्तिके दान फरिते पारें कि ना, आर दान करिले शांखा- नुसारे से दान जथार्थ हइते पारे कि ना ? २दफा- दानेर परे गुरुप्रसाद मजकुरेर मृत्यु हइले परे यद्यपि ये व्यक्ति दान पाय से दानपत्रेर लेखार सरत मते गुरुप्रसाद मजकुरेर अग्निकार्य ओ श्राद्धादि करियापार उहार निर अन्न-पत्र दिया याके, तवे दान मजकुरा यथार्थ हइते पारे कि ना?.

व्यवस्था-पत्र-संख्या-२१५ ३४७ ३ दफा- गुरुप्रसाद मजकुरार ऐ प्रकार दान करिले परे सेइ दानेर द्रव्यादि अन्य कोन व्यक्तिके कवालार द्वाराय विक्रय करिते पारे कि ना इति ॥ श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदब्दीयमार्चमासीयोनविंशतिदिनसम्बन्धि- शनिवासरे यामदयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनु- सारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योचरम्-- कश्चिद्गुरुप्रसादनामा व्यक्तिविशेषो निःसन्तानत्वेन हेतुना विद्यमाना- यामपि पल्यां स्वस्वत्वास्पदीभूतसमुदायधनं प्रभुसमर्पितदानपत्रलिखितनि: यमेनान्यस्मै दातुं शक्नोति । अथ च कृते च दाने शास्त्रानुसारेण तद्दानं यथार्थ भवति, शास्त्रानुसारेणेतादृशदानसिद्धी बाधकामावादिति ॥- अत्र प्रमाणम्- कुटुम्बभक्तवसनादेयं यदतिरिष्यते ।-इति विवादभनाावादिनन्य, ( १ विम० ४४८ क तबृहस्पति( पृ० १३७ वचनम् ॥ १ ॥ स्वभागान् यदि दद्युस्ते विकीपीयुरथापि वा। कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य वै ! इति दायभागादिअन्य धृतनारदवचनम् ॥ २॥ प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनुवचनम् ॥ ३ ॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- • यदि दानानन्तरं तस्यैव गुरुप्रसादस्य मरणे दानग्रहीत्रा दानपत्र- लिखितनियमानुसारेण तस्यैव गुरुप्रसादस्य अग्न्यादि सम्पाद्य दाहादिकार्य आधादिकार्यञ्च कृत्वा अथ च तत्पल्या प्रासाच्छादनादिकं दत्तमभुत्, तदा तद्दानं यथार्य भवितुं शक्नोति शास्त्रानुसारेण सोपाधिदानस्योपाधि सिद्धी सिनिष्प्रत्यूहत्वादिति- . .

३४२ व्यवस्था पत्र-संख्या-११५ .. भत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरप्रमाणत्रयम् ॥३॥ सोपाधिदानमुपाध्यसिद्धारसिद्धम् इति विवादमनावग्रन्थलिखनम् ॥२॥ तृतीयप्रश्नस्योत्तरम् स एवं गुरुप्रसादस्तादृशदानकरणानन्तरं तद्दामकृतद्रन्यादेः अन्यस्मै कस्मैचिद् विक्रयपत्रद्वारा विक्रयं कर्तुं न शक्नोति प्राथमिकतादृशदानकर- गणेन गुरुप्रसादस्य तद्रव्ये यावनीवं दम्पत्योभरणपोषणाद्युपयुक्तस्वत्वाति- रिकस्वत्वस्यार्थाद्दानविक्र याद्युपयुक्तस्वत्वस्याभावेन प्राथमिकदानानन्तरं तत्- कृतविक्रयस्यास्वामिकृतत्वेन, अस्वामिकृतविक्रयस्यासिद्धनिष्प्रत्यूहत्वात्-इति वनदेशचलितदायभागश्रीकृष्णतर्कालङ्कारकृतदायभागटीकामनुविवादमङ्गा- संवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था-" अत्र प्रमाणम् तथा च पूनस्वामिस्वत्वनिवृत्तिपरस्वामिस्वत्वोत्पत्तिफलकत्यागलेन रूपेण त्यागशक्तस्य दाधातो:- इत्यादि श्रीकृष्णतर्कालङ्कारकृत(पृ०४) दायभागटीकालिखनम् ॥१॥ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एवं वा। अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः॥ इतिमनु(पृ. ३.६॥ २६)वचनम् ।। १२ । अस्वामिविक्रय दानमाधिच विनिवर्तयेद्-इति विवादमझाएं- वादिग्रन्थ(१ विवा० ३१७ ख)कृतकात्यायन(कास्मृ. ६१२, पृ. ७६) बचनति ॥ ३॥ । अापरेलमासीयद्वितीयदिनसम्बन्धिशनिवासरे दत्तेयं मया व्यवस्था!loll श्रीजयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण व्यवस्थापन-संख्या-११६ सदर देखोयाणी आदालतेर पण्डितेर प्रति प्रश्न:- ११६-एक व्यक्ति अवीरा खी आपन स्वामीर परकालेर क्रिया कम्मर खरचेरदेना परिशोध प्रयुक्त स्वामीर उत्तराधिका- रीगण वर्तमाने देवत्र भूमि देव सेवा समेत टाकार परिवत्त' दान करित पारैकिना। श्रार ताहा सिद्ध हय कि ना ? इति । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रमेतद्विवादविषयनिविष्टपत्रज्ञातं च यदेतदन्दीय- मार्चमासीयोनविंशतिदिनसम्बन्धिशनियासरे यामद्वयानन्तरं ममा नारा तदवज्ञोस्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते ।। ।। एका काचिदवीय स्त्री स्वपत्युः पारलौकिककार्यव्ययपरियोधनार्य पत्सुरुत्तराधिकारिषु विद्यमानेषु देवभूमि राजतमुद्रा विनिमये दातुं न शक्रोति, एवं तद्दानं न सिद्ध्यति, देवत्रभूमी देवभिन्नाा केपाश्चिदपि स्व- त्वामावेन दानायोग्यत्वात् । देवसेवायाश्च सेवायितशब्दवाच्यस्यायनत्वेन सेवायितशब्दवाच्यस्य पुत्रपौत्रप्रवरहितस्य मृतस्य पत्युरंशे उत्तराधि. कारिस्वेन जाताधिकारा पनी । यदि राजतमुद्राविनिमये स्वपतियोग्यांशदेव- सवादानमन्तरेण स्वपस्युः पारलौकिककार्यार्थव्ययपरिशोधनं कमशक्का स्यात्तदा तदर्थ स्वपनियोग्यांशरूपाया देवसेवाया राजतमुद्राविनिमये दानं कनुं शक्नोति, तद्दानश्च सिद्धयति । तत्र च द्रव्यसाध्यदेवसेवाया द्रव्यं विनाऽनिष्पाद्यत्वेन स्वपतियोग्यांशदेवसेवानिर्वाहकदेवत्रभूमेः संरक्षणावेक्ष- पादिकर्तृत्वादेः कारपितृत्वादेर्वा तदुत्पनोपस्वत्वेन च देवसेवाकर्तृत्वादेः कारयितृत्वादेवोपरिलिखितप्रकारेणोचराधिकारित्वेन पल्या प्राप्तस्य देव- सेवान्यथानुपपत्या समपंणं भवितुमईति, यतः सेवायितशब्दवाच्यस्य सन्मरणानन्तरं तदुत्तराधिकारिणो वा देवसेवानिर्लाहकदेवत्रभूमेः संर- क्षणावेक्षणादिकर्तृत्वादेः कारयितृत्वादेवा देवसेवान्यथानुपपत्त्या क्षमता• स्यैव । प्रकृते तु प्रभुसमर्पितपत्र नातान्तर्गतकविंशत्यकाङ्कितदेवसेवार्पण --हेवावेल एग्रोन--संकपत्रे अस्मत्स्वले वं वर्तमानो भूत्वा- १. परिवर्तन २. विनाऽपिपा० न्यप० ।

. . व्यवस्था-पत्र-संख्या-११६ श्रीमत्याः परमेश्वर्याः सेवां भूमिसहितां स्वायत्तीकृत्य पुत्रपौत्राद्युत्तराधि कारिक्रमेण तद्भुमेरुपस्वत्यादिकमादाय श्रीमत्शः परमेश्वर्याः सेवां कुरु इति लिखनेन स्वपतियोग्यांशरूपया देवमेवायास्तत्सेवासम्मादकदेवप्र. 'भूमिसहिताया राजतमुद्राविनिमये श्रीमाया: परमेश्वर्याः सेवार्य समर्पण मेव स्पष्टीकृतम् इति वङ्गदेशचलितमनुकुल्लूकमकृतमन्वर्थमुक्ताव- लीदायभागश्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटोकादायतत्त्वदायक्रमसंग्रहविवा- दमहार्णवादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था 10|| प्रत्र प्रमाणम- देवस्वं नामास्वं वा लोभेनोपहिनस्ति यः। समापात्मा परे लोके गृघोच्छिप्टेन जीवति-इति मनु(११।२६) वचनम् ॥ १॥ प्रतिमादिदेवतार्थमुत्सृष्टं धनं देवस्वम्-इति कुल्लूकमकृतमन्वर्थ- मुक्तावली(पृ० ४३० अन्यलिखनम् ॥ २ ॥ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव था। अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथा स्थितिः- इति मनुवचनम् ॥३॥ पली दुहितरश्चैव-इरयादिदायमागादिग्रन्यतयाज्ञवल्क्यवचनम्।।४।। भर्तुरीबदेहिकक्रियाद्यर्थ दानादिकमप्यनुमतम् इति दायभाग- दायक्रमसग्रहान्थलिखनम् ।। ५।। विक्रतुर्यादृशं स्वत्वं केतुस्तादृशमेव स्वत्वं क्रयाजायते इति श्री- कृष्मातर्मलङ्कारकृतदायभागटीका लिखनञ्चेति ॥ ६ ॥ एतदन्दीयापरेलमासीयत्रयोविंशतिदिनसम्बन्धिशनिवासरे दत्तयं मया म्यवस्था श्रीजयतितगम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण -- . hi. - व्यवस्था-पत्र-संख्या-११७-११८ ३५१ श्रीजयतितराम् ११७ प्रभुकृतप्रश्नमवगत्य याशयोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । यद्यप्येकत्यां पल्यामेकस्यां दुहितरि च विद्यमानायां विद्यमानयोईयोः सोदरभ्रात्रोः पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितो राधाकृष्णाख्य एतद्धम्माधिकरणनियुक्त उकिलशन्दयाच्यो मृतः स्यात्तदा तत्त्पत्तधनं यदि सोदरभ्रातृभ्यां साधा. रणं न भवति तदा तत्पको प्राप्तुं शक्नोति । यदि च तदनं सोदरभातम्या साधारणं भवति तदा तद्धने सोदरधानोरेवाधिकारः, तत्पनी च यायजीव तनाद् मासान्छादनमागिनी भवति-इति पश्चिमदेशचलितमिताक्ष- रायोरमित्रोदयादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था ॥ • ॥ अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ प्रातरस्तथा। ., तत्सुतः--इत्यादि मिताक्षरावीरमित्रोदयादिग्रन्यायाशवल्स्पयच. नम् ॥१॥ पली गृह्णीयादित्येतद्वचनजात विभक्तमातृस्त्रीविषयम्-इति मिताक्ष. रामन्थलिग्वनम् ॥ २॥ स्वाते स्वामिनि स्त्री तु ग्रासाच्छादनागिनी । अविभक्ते धनांशे तु प्राप्नोत्यामरणान्तिकम् ।। इति वीरमित्रो दयादिनन्यधृतकात्यायनवचनश्चेति ।। ३ ।। श्रीजयतितराम् । श्रीवैद्यनाथमिश्रण -- . १रत:- यपि कोनेह मृत व्यक्तिर श्रवीरा पंनी प्रापन उत्तराधिकारि वर्तमाने आपन स्वामिर त्यक्त पैतृक अथवा निजे अर्थात् "स्त्री

-
..
३५२
व्यवस्था पत्र संख्या-१९८
धनरूप कोनह वागान आपन मृत स्वामिर विषयान्तर ग्राम
हइया ताहार रक्षार्थ आदालतेर खरचार कारण विक्रय करे तवे
सेह विक्रय शास्त्र सिद्ध हय कि ना?
.
प्रश्न:-
यद्यपि उचराधिकारिर लिखित दलि तेर द्वारा ऐ अवीरार
उपरेर लिखित विषयेर दान विक्रयेर क्षमता बोध हय तवे सेह
विक्रय शास्त्र सिद्धहय कि ना ॥
श्रोर्जयतितराम
प्रमुसमातिप्रश्नपत्रमवलोक्य याराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर
लिख्यते-
प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्-
प्रश्नपत्रलिखितप्रकारककृचान्ते सति ताशविक्रयः शास्त्रसिदो मवति,
यतः पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्योपरतस्य पत्युदनस्योचराधिकारित्वेन पली
संक्रान्तत्वेऽपि तस्याध वर्तनाद्यश को तदुपयुक्तस्य तदनस्याधान विक्रय
(च) शास्त्रानुमत भवति । अतएत वर्तनादिमूलीभूतस्य तदनरक्षणस्याप्या-
वश्यकत्वेन तदनरक्षणार्थ तदुपयुक्तस्य तदनस्य शकावशक्ती वामय.
थैव स्वकीयस्त्रीधनस्य चाधान विक्रयणं (च) शास्त्रसम्मतं भवतीति निष-
त्यूहमेव ।
द्वितीयप्रश्नोतरमप्यर्यादव पर्यवसन्नमिति पृषा न लिखितम्-रवि.
वनदेशचलितदायमागविवादमनार्णवादिग्रन्यानुसारियो व्यवस्पेति ||
अत्र प्रमाणम्-
अतएव पनाशक्तावाधानमप्यनुमतम् । तत्राप्यरातो विकरण-
मपि इति दायभागग्रन्थलिखनम् ॥१॥
तथा च मर्ग जोवन् यया यस्य पोपणादक यह यदा कर्म करोति
मृतभकापि स्वशक्त्पनुसारेण तथैव तस्य पापणं तय कर्म कुम्वीत-
इति विवादमार्णवप्रन्पलिखनम् ॥ २॥

व्यवस्था-पत्र संख्या-११८-११६ सौदायिक सदा खीणां स्वातन्त्र्यं परिकीर्तितम् । विक्रये चैत्र दाने च यथेष्ट स्थावरेवपि ।। इति दायभागादि- (पृ० ७६ )गन्मघृतकात्यायन पृ० ११०,६०६ )वचनञ्चेति ॥३॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिथेण ११६-आदालते देशोयानि जङ्गल गहाल सन १८३१ साल ता० १९ मेइ- सखोयाल जोयाव कोनो फनज ब्राह्मण तिन चारि पुरुप वाङ्गला देसे वास करिया विवाह आदि क्रिया कलाप मिताक्षराशास्त्रानुसारे करियाश्रासिते. छिल, एवं वाङ्गला देसे किछु जमिदारि फालेकट रि खरिदा ओ दोपरा तालुक ओ गयरह सोपार्जित करिया कथोक दिन भोगवान थकिया दस एगार वत्सरेर अधिक हइवेक प्रवर्त्तमान हइयाछ । ऐ चारि पुत्र आपन पितार मरणान्ते कथोक दिन एक भन्ने थकिया पृथक अन्न हुन । किन्तु यदि जमिदारि गयरह एजमालिते थाकिया मालगुजारि श्रो सख्यामि श्रो सेवा प्रो सदावर्त खरच पत्र वादे वाकि गुनफा चारि भ्राताते समान हिस्या लझ्या था, ओ चारि भ्रातार मर्दै एक भ्राता प्रापन नामोलद अर्थाद अविरा एक कविला राखिया अवर्तमान हय । तवे शाख- अर्थात ये भ्राता मरियाछे, ताहार मतरुका वस्तु, जाहा चिन्हित ना हइया एजमालिते आछे, ऐ सफल वस्तुते धनाधिकारि फौति व्यक्तिर भ्रातारा, कि ताहार कविला हइते मते फौतीभ्रातार, पारे ।। २-तयोयाल- यदि चारि भ्राता वर्त्तमाने जमिदारि गयर एजमालिते राखिया चारि चारि पाना जमिदारिर खजनार टाका आपन २३ , . ३५४ व्यवस्था पत्र संख्या-११६ २ हिस्या प्रजागर पास उसुल तहशील करियाथाके, तवे शाखा- नुसारे उपरेर लिखित ओयारिसान मध्ये धनाधिकारि कविला कि भ्रातारा हइते पारे-इहार जोयाय शास्त्रानुसारे लिखिया ए आदालते पाठाइवेन- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदम्दीयमेहमासीयाष्टाविंशतिदिनसम्वन्धिश. निवासरे पादोनघटिकाचतुष्टयाधिकयामद्वये मया प्राप्तन्तदवलोक्य याहय बोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति यदि चतुभिर्धामिः कान्यकुब्ज. साक्षणजातोयैः पुरुषचतुष्टयावधि पञ्चपुरुषावधि वा वङ्गदेशनिवासिभिः पश्चिमदेशचलितमिताक्षरादिप्रन्यानुसारेण स्वकीयविवाहादिक्रियाकलापादि- कर्म कुर्वद्भिः पृथगले साधारणपैतृकपैतामहसराजकरस्थावरधनैः साधारण्येन राजकरदानरानाशयाऽवश्यकराजदएडादिदानदेवसेवादि'- सदावतादिकर्म कुर्वद्भिस्तत्तत्कर्म व्ययितावशिष्टजनमधनं विभज्य प्रत्येक तस्य समानांशो गृहीतः स्यातेषां चतुर्णा भ्रातृणां च मध्ये एका कश्चत् पनीमेकां संरदय पुत्रपौत्रमरीत्ररहितो मृतश्चेनदा तदीयविभक्त- पैतृकपेत.महधनांशे तदीयस्योपाजितासाधारणधने तत्सल्येवाधिकारिणी', न तु भातरः । तदीया विभत्त.साधारणसराजकरास्थावर धनांशे च तद्भत तर एवाधिकारणो न तु तरक्षी । यदि च तदीयविभक्तपैतृकपैतामधनेन स्वोपार्जितासाधारणधनेन वा तत्पल्या पायजेथे तत्कुलीपयुक्तस्य मासा. कछादनादेरावश्यक विधवाधर्माद्य.चरणस्य वा निर्वाहो भाषतुं न शक्यते तदा मृतस्य तस्य पछी तदीयाविभक्तसाधारणसराजकास्थायरधनांशादपि यावजीव तस्कुलोपयुक्तस्य ग्रासाच्छादनारयुत्तधनस्यावश्यकविधवाधर्मा- द्याचरण नहोपयुक्तधनस्य च भागिनी मरतीति ||~- रानवा०-५०। २ - व्यवस्था पत्र-संख्या-१ ३५५ अत्र प्रमाणम्- पत्ती दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा ॥ तत्पुतः इत्यादि मिताक्षरावीरमित्रोदयादिग्रन्यतयाज्ञवल्क्यवच- नम् ॥२॥ पत्नी गृह्णीयादित्येतद्वचनजातं विभक्तमातृतीविषयम्-इति मिता- क्षरामन्थलिखनम् ॥२॥ स्वर्याते स्वामिनि स्त्री तु प्रासान्छादनभागिनी। अविभपते धनांशे तु प्रमोत्यामरणान्तिकम्।। इति वीरमित्रोदयादि- अन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥ ३ ॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्-- यदि विद्यमानेश्चतुर्भिातृभिः सराजकरस्थावरादिधन साधारण रहित्या प्रत्येक तत्सराजकरस्थापरोपस्वत्वस्य राजतमुद्रात्मकस्य स्वस्वांशरूपश्चतु या शा प्रजानां सन्निधौ गृहीतः स्यात्यां चतुर्णा भ्रातॄणां च मध्ये मृतस्यैकस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य विभक्तपैतृकपैतामहधनांशे स्वोपार्जितासाधारणपणे च तत्पल्येवाधिकारियो, न तु मातरःअविभक्तमाधारणमराजकरस्थावरधनांशे च तद्भातर एवाधिकारिणो, न तु तत्पन्नी । यदि च तदीयविभक्तपैतृकपैताम- हधनेन स्वोपार्जितासाधारणधनेन वा तसल्या यावजीव तस्कुलोपयुक्त. स्य प्रासच्छादनादेरावश्यक विधवाधमांद्याचरणस्य वा निवाहो मवितुं न शक्यते तदा मृतस्य तस्य पक्षी तदीयाविभक्कसाधारणसराजकरस्थावरधनां- शादपि यावजीयं तत्कुलोपयुक्तस्य ग्रासाच्छादनोपयुक्तधनस्यावश्यकविधवा- धर्माद्याचरणोपयुक्तधनस्य च भागिनी भवति-इति पश्चिमदेशचलित- मिताक्षरावीरमित्रोदयादिनन्यानुसारिणी व्यवस्थेति || 0 ||॥ • ॥ • ||- अंत्र प्रमाणम्- प्रयमप्रश्नोत्तर लिखितप्रमाणत्रयम् ॥ ३ ॥ विभागो नाम द्रव्यसमुदायविषया सामनेकस्वाभ्यानां तदेकदेशेषु विषयतया व्यवस्थापनम्-इति मिताक्षरादि ग्रन्थतिखनश्चेति ॥ ४ ॥ .

व्यवस्था पत्र संख्या-११६-१२० एतदन्दीयजुनमासीयदशमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे दत्तेयं मया व्यवस्थेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण रेष्पाउण्ट हय १२०–सोल श्रादालत देशोयानी कमिसनरि प्रातराफ मसरक जिला रङ्गपुर वनामे पण्डीताने सदर देशोयानि श्रादालत शन १८३१ इङ्गरेजि तारिख ३१ माच्चै मोतावेक सन १२३७ शाल वाङ्गला तारिख १६ चैत्र- रामप्रसादचक्रवत्ति पापीलाण्ट पेनका ओ पचिवेत्ता दावि ३० टाका वावत दाश दाशीर मूल्य- एइ मोकद्देमाते एइ विशयेर व्यवस्था लो आविश्वक हइया समोल करा जाइतेछे जे जादि कोन दास कि दाशी ताहार स्वामीर ताच्छल्य क्रमे अथवा अन्य कोन हेतुते पृथक थाकिया वहु काल पर्यन्त आपन उपार्जित धन करणक दिन पात करे, तवे वहु काल परे ऐ स्वामिर कि स्वामिर उत्तराधिकारिर दामो शास्त्रानुसारे ऐ दास कि दासिर प्रति अर्शिते पारे 'कि ना इति !! श्रीजयतितराम प्रभुसमतिप्रश्नपत्रं यदेतदन्दोयापरेलमासोयपविशतिदिनसम्बन्धि- 'मङ्गलवासरे यामद्वयानन्तरं मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्त- दनुसारेणोत्तरं लिख्यते- यदि कश्चिद्दासः काचिद्दासो वा स्वस्वामिनस्तान्छील्यक्रमेणाथवान्येन हेतुना केनचित् पृयक स्थित्वा बहुकालपर्यन्तं स्वापानितधनेन स्वनिर्वाह कृतवान् कृतवती स्यादा, तत्र यदि स एव दासः सा दासी या शास्त्रोक्त-

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व्यवस्था पत्र-संख्या-१२०
पञ्चदशदासान्तर्गतमक्तदासो भक्कदासी वा भवति तदा बहुकालानन्तरं
तस्यैव स्वामिनस्तदुत्तराधिकारिणो वा शास्त्रानुसारेण तदासम्प्रति दासी-
म्भति वा तत्प्रासीच्या भवितुं न शक्नोति, स्वामिनो भवत्यागादेव तयो-
मतदासदास्योद्दास्यमुक्तेः, तत्स्वामिनस्तदुत्तराधिकारिणो वा स्वत्वा-
भावात् । यदि च स एव दासः सा दासी या शास्त्रोक्तपञ्चदशदासान्तर्गत-
भक्तदासो भक्तदासी या न भवति एवं तयोर्दासदास्योः स्वस्वामिनस्ता-
च्छ(ल्यकमेणान्येन केनचितुना वा पृथक् स्थित्या बहुकाल पर्यन्तं
स्वोपार्जितघनकरणकनिवाहे सत्यपि वहुकालानन्तरमपि दास्यान्मुक्तिमंयितु
न शनोति । अतएव तत्स्यामिनस्तदुत्तराधिकारिणो वा त्योः प्रामीच्छा-
भवितुं शक्नोत्येव, स्वस्वामिनस्ताच्छोल्पकमेणान्येन केनचिद्धतुना वा
पृथक् स्थित्या बहुकाल पर्यन्तं स्वोपार्जितधनकरणकनिर्वाहस्य भक्त-
दासभकादास्यतिरिक्तानां चतुर्दशप्रमेदानां दासदासीनां दासमुक्तिहेतुत्वाभा-
वेन पूर्ववत् तत्स्वामिनस्तदुत्तराधिकारिणो वा स्वत्वस्यानपायात्---
इति वनदेशचलितनारदस्मृतिवियादभङ्गार्णवविवादार्णवसेनुदायक्रमसग्रहा-
दिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था ।
अथ प्रमाणम्-
गृहजातस्तथा क्रीतो लब्धो दायादुपागतः ।
अनाकालभृतस्तद्वदाहितः स्वामिना च यः॥
मोक्षितो महतश्वर्णाद् युद्धप्राप्तः पणेजितः ।
तवाहमित्युपगतः प्रव्रज्यावसितः कृतः ।।
भक्तदासश्च विज्ञेयस्तथैव वडवाभृतः ।
विक्रेता चात्मनः शास्त्रे दासाः पञ्चदश स्मृताः ।।इत्युपरि लखितमन्यः
धृतनारदवचनम्नास्मृ. पृ. ६६) ॥ १ ॥
एतेषां मध्ये तु गृह जातादिचतुरमात्मविकेतुश्च स्वामिप्रसाद विना
न दास्यमोक्षः। अनाकालमृतस्तु दुनिने याक्षित्रं तद्गोयुगसहितं
दत्त्वा मुच्येत । भक्तदासो मसात्यागात्-इति दायक्रमममहादि(पृ.
५।५३)अन्थलिखनशति॥२॥

१५८ व्यवस्था पत्र-सख्या-१२०-१२१ आगष्टमासीयसप्तदशदिनसम्बन्धिबुधवासरे घटिकैकाधिकय.मदयानन्तरं दत्तेयं मया व्यवस्था । श्रीर्जपतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १२१-सदर देशोयानि पादालतेर पण्डितेर प्रति प्रश्न- सोयाल- यदि कोन वीर स्वामि प्रायश्चित्त करे, एवं ताहार वाटीते ब्राह्मणसकले आहारादि करे, प्रोप्रापन सरिकानेर सहित विषया- दिर विभाग हइयाथाके, तवे ताहार मरणोत्तर ऐ विषये ताहार खि अधिकारिणी हय कि ना, एवं ऐ खिर साक्षिरा उहार स्वामिर प्रायश्चित्त करा एवं जाति पाोया ये प्रकार कहियाछे शास्त्र- सम्मत यथार्थ वटे किना-मिछिलेर कागजात दृष्टे यथाशास्त्र व्यवस्था लिखिवा इति । १५ श्रापरेल ई १८३१ साल || श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रमेव तत्समर्पितैतद्विवादविषयनिविष्टपत्रजातञ्च यदे. तदन्दीयमैमासीयकविंशतिदिनसम्बन्धिशनिवासरे यामद्वयानन्तर मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबीघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ॥ यदि कस्याश्चित् स्त्रियाः स्वामिना प्रायश्चित्तं कृतम् , एवं तद्गृहे माझौराहारादिकमपि कृतम्, अपच तत्स्वामिनः स्वांशिभिः सह धनस्य विभागोऽभूत् तदा तत्स्वामिमरणोचरं तत्यक्तधने तस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्रा- भावे तत्पल्येवाधिकारिणी भवति । पल्यां विद्यमानायामन्येषां नाधिकारः। अथच तस्याः स्त्रियाः सातिभित्तस्याः स्वामिनः प्रायश्चित्तकरणं यथोक्त जातिप्राप्तिर्वा यथोता तच्छास्त्रानुसारेण यथार्थमेव भरति इति वनदेश- चलितदायभागश्रीकृष्णतकालद्वारक्तदायमागटीकादायतत्त्वविवादभङ्गा- बदायक्रमसंग्रहादिग्रन्थानुसारियो व्यवस्था ।

ज्यवस्था-पत्र-संख्या-१२१-१२२ ३५६ अत्र प्रमाणम्- पतितानामपि स्वधनसाध्यप्रायश्चित्तश्रुतेः पातित्येन स्वत्वनाशः प्रायश्चित्तवैमुख्य बोध्या--इति दायतत्त्व(पृ० १६२ ग्रन्थ लिखनम् ।।१।। पली दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तया-इत्यादि । दायभागादि- अन्यधृतयाशयल्ल्यवचनञ्चति ॥ २ ॥ एतदन्दीयसितम्बरमासीयप्रथमदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे घटिकैका- धिकयामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्रीजयनितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १२२-लं० २६ सन १८३० इगरेजी वहमव' फएज गजर खोदापोन्द न्यामत श्रीयुत कमिशनर साहेब आदालत देओयानि कमिशनरि आतवाफ मशवक जेला रपूर दाम एक वानहु ॥ आरजदास्त श्रीमोहनलाल सदर प्रामिन मतालके आदालत मजकुर गरिय परशोर सेलामत ) परगने पर्चत जोयारेर भीयुत राजेन्द्र नारायण चौधुरि जमिदार कृतनारायणचौधुरि' मोसफार २)आना जमिदारि पाोयार प्रार्थनाते परगना मजकुरेर जमि- दारान् श्रीअमृतसिंहचौधुरिओ शरणसिंहचौधुरि ओ जगदीश्वरी. चौधुराणी जोजे अमृतनारायण चौधुरि मोतफार मादरे गौरीनारायणसिंहचौधुरि मोतफार नामे १८२॥ ) १२॥ गएडार दायिते' नालिस करे । नथिर कागजात विवेचनाते १. वश्या प्रकार कामा मपि परितु राक्यते । २. कुडनारायण श्यरि पठित शक्यते । १. दारिद-व्य 1 ३६० व्यवस्था पत्र-संख्या-१२२ जानागेल,जे परगणे पळत जोयारेर सावेक जमिदार कलप. चन्द्रचीधुरिर ३ पुत्र । ताहार एक पुत्र किशोरिसिंह निःसन्तान मृत्यु हय, द्वितीय पुत्र फुलसिंहचौधुरिर २ पुत्र । ताहार १ एक पुन श्राजवसिंह नि सन्तान मृत्यु हय, पार १ पुत्र सुलतान- सिंहचौधुरि । ऐ कलपचन्द्रेर पुत्र दलसिंहचौधुरि ताहार २ पुत्र अवनसिंह ओ किर्तीनारायाणसिंहचौधुरि । किचिनारायणेर २ पंक्षे ४ पुत्र । एक पक्षे राजेन्द्रनारायणसिंह ओ सरलसिंह । ऐ सरलसिंह सुलतानसिंहेर पुष्य पुत्र हइया ||० आना जमिदारिर अधिकारि हइयाछे। भार एक पक्षे अर्थात् प्रथम पक्षेर पुत्र अमृतसिंह ओ कृष्णनारायणसिंहचौधुरि । ऐ अमृतसिंह अवन- सिंहचौधुरिर पुष्यपुत्र हइया ।० आना जमिदारिर अधिकारि हइयाछे, वाकि 10 आना, याहा कीर्तिनारायणसिंह मोतफार हक, ताहार मध्ये -) आना राजेन्द्रनारायण ओ-) आना कृष्णनारायणसिंह अधिकारि हइयाछे। कृष्णनारायण मजकुर निःसन्तान मृत्यु हय । ताहार माता रुद्रेश्वरी ओ वैमात्रेय भ्राता राजेन्द्रनारायण श्रो सहोदर भ्राता अमृतनारायणसिह, जे आपन पितृव्येर पुष्यपुत्र हहयाछे, श्रार सरलसिंह वैमात्रेय भ्राता, जे सुलतानसिंहेर पुष्यपुत्र हइयाछे, इहारा सकलि वर्तमान आले । राजेन्द्रनारायण वैमात्रेय भ्राता विधाय ऐ कृष्णनारायण मोत- .फार) श्रानार दाश्रोया राखे । अमृतनारायणसिंह पूर्वसहोदर भ्रांता विधाय ऐ कृष्णनारायणेर) पाना अंशे श्रापन सन्व वर्ताय, एवं हेवानामा राखा श्री श्राद्धादि करा जाहेर करे । हेवा नामा दरपेय करिते पारिलना। अतएव ऐ कृष्णनारायणेर) 'श्राना अंशे कोन व्यक्ति अधिकारि ह्य-यथाशास्त्र इहार व्यवस्था निमित्त प्रो पष्ट वुमार जन्ये एक कुरशीनामा एइ आरजि सह- कारे पठाइया उमेदोयार जे हजुरेर रोवकारिर द्वाराय कुरशीनामा सदर देओयानि श्रादालतेर पण्डितदिगेर निकट पाठाइया व्यवस्था पानाइया ए आदालते देलाइते मरजि हय । इह व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२२ 'पारज । इति सन १८३१ साल ईरेजी वा० ६ जुन मोतावेक सन १२३८ साल वागला तारिख २७ ज्यैष्ठ॥ श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं वंशावलीपत्रं च यदेतदब्दीयजुलाइमासीयोनत्रि- शद्दिनसम्बन्धिशुन यासरे घटिकाद्वयाधिक्यामद्वयान्तरं मया प्रासम् तदवलोक्य यादृराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।- प्रश्नपत्रवंशावलीपत्रोभयलिखितवृत्तान्ते सति कृष्णा नारायणसिंहस्य मरणोत्तरं तत्यक्ताणकद्वयपरिमिताशे यदि तस्य पुत्रपौत्रपपोत्रपत्नीदुहितः दौहित्रपितृपय॑न्तो न स्यात्तदा तन्मात् रुद्रेश्वर्या एकाधिकारः, तन्मातरि रुद्रेश्वर्या विद्यमानायां तद्वैमात्रेयभात् राजेन्द्रनारायणसिहस्य, तत्सहोदर- भ्रातुरमृतनारायणसिहस्य, अर्थात् स्वपितृव्यस्यायनसिंहस्य दत्तकपुत्रत्वेने- दानी स्वपितृव्यपुत्रस्य च तद्वैमात्रेयभ्रातुः सवलसिंहस्य' अर्थात् स्वप्रपिता- महकलपचन्द्रचातुर्द्धरिकपुत्रफुलसिंहचातुईरिकपुत्रमुलतानसिंहचातुर्द्धरिकस्य टत्तकपुत्रत्वेनेदानी स्वपितामहमपौत्रस्य च नाधिकारः-इति घन- देशालतदायमागश्रीकृपणतर्कालङ्कारक्तदायमागटीकादायक्रमसंग्रहविवा. दभावाववादार्णवसेतुप्रभृतिमन्थानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ प्रातरस्तथा । तत्सुतो गोनजो बन्धुः--इत्याद्युपरिलिखितमन्यधृतयाशवल्लय- वचनम् ॥१॥ एतदन्दीयसेत्तम्वरमासीयसतमदिनसम्बन्धिबुधवासरे घटिकैकाधिक यामद्वयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीर्जयतितराम् श्रीवैधनायमिश्रेण १सालसिंहस्य-व्यप।

२६२ व्यवस्था-पत्र संख्या-१२३ १२३-सयोयाल यदि एक विषयार कन्या थाके, तवे सेइ विधवा यापन स्वामिर पैतृक धनेर अधिकारिणी हइते . पारे कि ना. अथवा सेइ कन्या माता वर्तमाने .आपन मृत पितार पैक धनेर अधिकारिणी हइते पारे कि ना इति 11- श्रीजयतितराम् प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदन्दोयागलिमासीयविशति देनसम्बन्धि शनिवामरे घटिकाधि कयामद्वये मया प्राप्त तस्वलोक्य यादृशवोघो जात. स्तदनुमारेणोत्तरं लिख्यते- यदि कस्याश्चिद् विधवाय:: स्त्रियाः कन्या तिष्ठते । सा विधया यदि पत्युः 'पुत्रपौत्रन गैत्राणां मध्ये कश्चिन्नास्ति तदा तादृशस्य पत्युः पैतृकघनस्याधिका- 'रिणो मवेतुं शकादि । तस्यां विधवायां मातरि विद्यमानायां सा दुदेता मृतस्य स्वपिनुः पैतृकधनस्याधिकारिणो भवितुं न शक्रोति, पुत्रऔनप्रीत्र रहितस्त्र मृतस्य घने शास्त्रानुसारेण पल्याः प्रधानाधिकारितात्, पल्या - श्रभाव एवं दुहितुरधिकाराच-इति बङ्गदेशचलितदायभागश्रीकृष्ण- বঙ্কালঙ্কানরাধমালীকৰিবাৰত্নাৱাৰিসবনুষী ৰংখ্য। अत्र प्रमाणम् - पली दुहितरश्चैव-इत्याद्युरिलिखित ग्रन्यतयाश्वल्क्यवचनम् ॥१॥ अनपत्यधनं पल्यभिगामि, तदभावे दुहितृगामि-इत्यादि तत्तद्- अ.यधृनविष्णुवचनञ्चेति ॥२॥- एतदन्दोय दशम्मरमासीयपश्चमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था "दति।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२४ १२४-प्रश्न- कोन अपुत्रक त्रिलोक, ये ताहर चारि कन्या वर्तमाना, श्रोताहार मध्ये एक कन्या निःसन्ताना थाके, यद्यपि आपन स्वामिर परलोक प्राप्त होनेर परे स्वामिर स्थावर वस्तु पुत्रवति निन कन्यार मध्ये एक कन्यार स्वामिके, ये सेइ वेक्ति ऐ वस्तु नष्टोद्धार प्रो स्त्रीलोकेर सेवा सुश्रुषा एवं पति पालनेर निमित्त प्रापन अर्थ व्यय श्रो परिश्रम करे, ताहारि परिचर्ते एक कन्यार सन्मति पूर्वक दान करे, एवं तत्परे द्वितीय कन्या ओ दौहित्र सकल ऐ दाने सन्मति लिखने देय-ए रूप दान शास्त्रोक्त सिद्ध हय कि ना इति ।। श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदब्दीयागस्तिमासीयविरातिदिनसम्बन्धिशनि- यासरे घटिकैका धकयामद्वये मया प्रासम्, तदवलोक्य यादृशमोधो जातस्त दनुसारेणोत्तर लिख्यते- प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति पतिमरणानन्तरं पुत्रपौत्रप्रपौन' रहिता पनी यद्युत्तराधिकारित्वेन स्वसंक्रान्तपतिस्थावरधन पुत्रवतीना तिसणां दुहितृणां मध्ये कस्याश्चिदप्येकस्याः पत्ये तत्स्यावरनष्टोद्धत्तं च स्वरयला सदीभूतद्रव्यव्ययेन तस्याः स्त्रियाः सेवाशुश्रूषाप्रतिपालनादिपरिश्रमक. च ताराद्रव्यव्ययविनिमये स्वानन्तरोत्तराधिकारिणीनां दुहितॄणां दुहित्र- नन्तरोत्तराधिकारिणां सम्बंपा दौहित्राणां च सम्मत्या दत्तवती स्यात्, तदै ताहादानं शास्त्रानुसारेण सिद्धं गवति, पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्योपरतत्य पत्यु- धनस्योत्तराधिकारित्वेन पत्नीसंक्रान्तत्वेऽपि तस्याश्च वर्तनाद्यशक्तौ तद्धनसम्ब न्थ्याधानविक्रयणादेः शास्त्रानुमतत्वेन वर्तनादिमूलीभूतस्य तद्धनसम्बन्धि नप्टोद्धारस्यान्यावश्यकत्वेन तादृशनष्टोद्धृतद्रव्यदानस्य तस्याः स्त्रियाः सेवाः शुश्रूषाप्रतिपालनाथुपयोगिद्रव्यविनिमयत्वेन च तसिद्धः शास्त्रानुमतत्वस्या- र्थसिद्धत्वात्, त्वाम्यनुस्याऽस्वामिकतदानस्य विक्रयस्य वा शास्त्रानुसारेण सिद्धनिष्प्रत्यूहत्येन स्वानन्तरोत्तराधिकार्यनुमत्या स्वानन्तरोत्तराधिकार्य: नन्तराधिकार्यानुमत्या च धनस्वामिपूाधिकारिफ़तदानस्य शास्त्रानुसारेण ३६४ व्यवस्था-पत्र संख्या १२४-१२५ सिद्धनिष्पत्यूहत्वस्यार्थसिद्धयाच-दति वङ्गदेशचलितदायमायश्रीकृष्ण- तालङ्कारकृतदायभागटोकाविवादमहासंवादिमन्यानुसारिणी व्यवस्था । अन्न प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भातरस्तभा-इलमापरि लिखितमन्य- भृतयाशवल्क्यवचनम् ॥१॥ अतएव वर्त्तनाशक्तावापानमप्यनुमतम्, तत्राप्यशक्तो विक्रयण- मपि-इति दायमागग्रन्यलिखनम् ॥२॥ तथा च भर्ता जीवन् यथा यस्य पोषणादिकं यद् यद्वा कर्म करोति मृतभरी कापि स्वशक्त्यनुसारेण तथैव तस्य पोषणं तच कर्म कुर्वीत- इति विवादमनाएंवग्रन्यलिखनम् ॥शा तथा च स्वामिनोऽनुमतिसत्वे तु अस्वामितविक्रयोऽपि सिद्ध्यति, व्यवहारोपि तथा-इति विवादमार्णवग्रन्थलिखनञ्चेत || एतदन्द यदिशम्मरमासोयपञ्चमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दचेति॥ श्रीजयतितराम् श्रीबंद्यनाथमिश्रेण १२५-समयालादालते मापिल कलिकाता वनामे पण्डित श्रादालते देोपानि सदर- १ प्रथम सोयाल- राममोहन तेश्रोयारि अापन भ्राता ओभ्रातुप्पुत्र, उपपत्नी श्रो साहार गर्भजात दुइ कन्या श्रो एक पुन वर्तमाने आपन समुदय- विषय उत्पनीर गर्भजात आपन औरस पुत्रके दान करिया लोकान्तर हइया थाके, वदे शाखानुसारे ऐ दानपत्र सिद्ध हय ओए विधाने ऐ मृत व्यक्तिर भ्राता ओ भ्रातुष्पुत्र मृवं व्यकिर धनाधिकारि हम कि ना। किना, . - ' च्यवस्था-पत्र संख्या-१२५ ३६५ द्वितीय सोयाल- यदि शास्त्रानुमारे ऐ दानपन्न सिद्ध ना हय, तवे ऐ मृत व्यकिर 'भ्राता थो भ्रातुप्पुत्र प्रो उपपन्नीर गर्भनात औरस पुत्र श्रो दुइ.. ‘कन्यार मध्ये कान व्यक्ति मृत व्यक्तिर धनाधिकारि हइते पारे- यथाशास्त्र इहार जोयाव लिखह इति ।। श्रीर्जयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतब्दीयागस्तिमासीयत्रयोदशदिनसम्बन्धिशनि- यासरे घटिकैकाधिकयामद्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।। प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यद्यपि राममोहनत्रिवेदी सकीये सहोदरभ्रातरि भ्रातृपुत्रे च विद्यमाने सति स्वोपपल्यां च विद्यमानायां तद्गर्भ जातयोर्द्वयोः कन्ययोविद्यमानयो- रेवं वद्गर्भजनिते चेकरिमन पुने विद्यमाने सति स्वस्वत्यारपदीभूतसमुदाय- धनं स्वकीयोपरनीगर्भनाताय स्वकीयौरसपुत्राय दत्त्वा मृतः स्यात्तत्र यदि सदनं भ्राता भ्रा पुत्रेण वा सह साधारणं भवति, एवं वद्दाने धारण्य- प्रतियोगिनोऽत्तिद्भातुर्धातपुत्रस्य वा अनुमतिस्तदा तदान प्रभुममर्पित प्रश्नपत्रावगतस्य विवाहसस्कृतपतीगर्भजातपुत्रपौत्रप्रपौत्रहितस्य मृतस्य राममोहननिवेदिनः प्रभुसमर्पितविचारपत्रावगतायाः विवाहसस्कृताया:- पल्याः सुगन्धानाम्न्या यावजीर्य प्रासाच्छादनोपयुक्तावश्यकतत्कुलोपयुक्त विधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तातिरिक्तसमुदायधन एव बनदेशचलितशास्त्रा- नुसारेण पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसारेण च सिद्ध मचितुं शक्नोति । तेषा- -मनुमतःचमत्यामपि वङ्गदेशचलितशास्त्रानुमारेणोपरिलिखितविवाहणंस्कः तायाः पल्याः सुगन्धानाम्न्या उपरिलिखितप्रकारकमासाच्छादनायुपयुक्ताति रिकस्वां रायोग्ये सिद्धं भवितुं शक्नोति स्वेतगंशयोग्ये च सिद्धं भक्तुिं न शक्रोति । पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसारेण तु साधारण्यप्रतियोगिनो भ्रातु- १. माता-व्यप।

,
व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२५ः
तृपुत्रस्य वा अनुमति विना समुदाये स्वासयोग्येशी वा सिद्ध भवितुं न
शक्रोति, स्वेतराशयोग्येतसिद्धिगालैव, पश्चिमदेशचलित शास्त्रानुसारेण
. साधारणपने विभागं विना अशानर्णयाभावेन स्वांशयोग्येऽप्येकस्य स्वतरा-
श्यनुमतिमन्तय दानापनधिकारित्वात् । यदि च तद्धन मृतस्य राममाहनं.
त्रिवेदिनोऽमाधारणं विभक्त वा भवति, तदा वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण
पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसारेण च मृतस्य राममोहनत्रिवेदिनः पल्पा,
सुगन्धानाम्न्या यादजीवमुपरिलिखित प्रकारकप्रासाच्छादनायुयुक्तातिरक
घनशे सिद्धः भवितु शमाति । एवञ्च सति तदानस्स सिद्धत्याने मृतव्यः
क्तेशीता भ्रातृपुत्रो वा मृतव्यक्तेर्धनाधिकारी न भवति तद्दानेन मृतस्य तस्य.
दानुः स्वत्वविच्छेदात्, प्रतग्रहीतुः स्वत्वोत्पादाच्च । तद्दानस्यामिद्धत्व.
पचे अर्थात्चदनस्य भ्रात्रा भ्रातृपुत्रेण वा सह साधारण्ये पश्चिमदेशचालत-
शास्त्रानुमारेण तेषामनुमति विना तदानस्यासिद्धत्वे मृतस्य रानमोहन-
विवेदिना पल्यादानाम्, श्रथत् सुगन्धानाम्नीप्रभृतीना द्वितायप्रश्नाचर-
लिखितप्रकारकासाच्छ दनायुपयुक्तातिरिक्ताविभक्तसाधारणतदीयांशे मृत-
न्यक्तेः पुत्र नाम पितृपर्यन्तानाम्मध्ये यदि कश्चिन्न स्ति तदा तत्-
सहोदरभ्राता भवत्यधिकारी, सहोदरभ्रातरि विद्यमाने भ्रातृपुत्रो नाधिकारी
मपवीति ।।
.
अत्र प्रमाणम्-
कुटुम्बभक्तरसनादेय यदतिरिच्यते-इति वद्गदेशचलितविवादभना-
वादिग्रन्यवृतम्, पधिमदेशच लिसवारमिनोदयादिग्रन्थकृतश्च नारदः
वचनम् पृ०६६)॥१॥
स्वभागान् यदि दा स्ते विक्री पीयुस्थापि वा।
कुर्युर्ययेष्ट तत्सर्वमीशास्ते सधनस्य वै ।। इति वदेशचलितदाय-
मागादिअन्धधृतनारदवचनम् ॥ २॥
साधारणद्रव्यस्य समुदायस्यै केन विक्रये परांशयांग्येऽसिद्धिः।।
स्वाशयोग्ये तु सिदिः अन्यानुमत्या विक्रये तु तसिदि-इति पङ्गदेश-
चलितविवादमझाएंवग्रन्थ १ विवा० ३०५ क लिखनम् ॥ ३ ॥

२ व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२५ अविभक्तेषु द्रव्यस्य मध्यगत्वाद् एकस्यानीश्वरत्वान सर्वाभ्यनुज्ञाऽ- वश्यं कार्या, विभक्तेषु तु विभक्तानुमतिव्यतिरेकेणापि व्यवहारः सिद्ध, "सेव-इति पश्चिमदेशचलितमिताक्षगन्यालखनम् ॥ ४ ॥ रथावरस्य सगस्तस्यं गोत्रसाधारणस्य च। निकः कुर्यात् कसं दानं परस्परमतं विना ।। इति - पश्चिमदेश. चलितवीर मित्रोदयादिग्रन्थधृतव्यासयचनम् ॥ ५॥ स्वरचत्वानिवृत्तिपूव्यकपरस्वत्यापादनं दानम्-इति वनदेशचलित विवादभनार्णवादिपश्चिमदेशलितमिताक्षरादिप्रन्धलिखनम् ॥ ६ ॥ पनी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतः इत्यादि पश्चिमदेशचलितमिताक्षरादिनन्यभृतयाज्ञवलाय. वचनम् ॥ ७॥ पती 1.गृहीयादित्येतद्वचनजात विभत्तामातीविषयम्-इति पश्चिमदेशचलितमिताक्षराग्रन्थलिखम् ॥ ७ ॥ ॥ .. द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- प्रथममश्नोत्तरलिखितप्रकारेण तद्दानस्यासिद्धत्वपक्षे अर्थात् तदन. स्य भ्रात्रा भ्रातृपुत्रेण वा सह साधारण्ये राति तेषामनुमति विना पश्चिम. -देशचलि नशास्त्रानुसारेण तादृशदानस्यासिद्धत्वपचे प्रभुसमर्पितविचार- पत्रलिखितानां मृतस्य राममोहननिवेदिनः पन्यादीनां सुगन्धानाप्नीम- -तीनां मध्ये धनाधिकारे अयं विशेषः । सुगन्धानानी तत्पती यावत्रीय तकु- लोपयुक्त मासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तधनस्साधिका- रियो भवति । मृतस्य वस्योपपती यदि मृतस्य राममोहननिवेदिन उत्तरा- .धिकारिणां प्रतिकूला व्यभिचारिणी वा न भवति तदा सापि स्वकुलोपयुक्त- ग्र साच्छादनोपयुक्तावश्यकविधयाधम्मांधाचरणोपयुक्तधनस्य च यावजीवं भागिनी भवति । एवं तदुपपनी गर्भजातीरसपुत्रोऽपि यावजीवं प्रासाच्छा- दनभागी भवति । एवं तदुपपत्नीगर्भजाते द्वे कन्येऽपि विवाहसंस्कारपर्यन्तं ग्रासाच्छादनस्य विवाहोपयुवधनस्य च भागिन्यो भवतः-दति यनदेश- चलितदायभागश्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटीकाविवादमार्णवदायक्रम . व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२५. संहादिग्रन्यानुसारिणी पश्चिमदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमा धन्यवहारकौस्तुभा दग्रन्यानुसारिणी च व्यवस्था !!--. अन प्रमाण- स्वाते म्वामिनि स्त्री तु मासाच्छादनमागिनी । . भविभक्ते घनांशे तु प्रामोत्यामरणान्तिकम् ॥ इति उपरिलिखित- अन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥१॥ तिर्चास्या व्यभिचारिण्यः प्रतिकूलास्तथैव च । इति तत्तद्ग्रन्थत वागवल्क्यवचनम् ॥ २॥ भरणं चास्य कुरिन् खीणामाजीवनक्षयात् । रक्षन्ति शय्यां मर्तुश्चेदाच्छिन्धु रितरासु च-इति तत्तद्ग्रन्यधृत नारदवचनम् ।। ३ ।। भर्चव्यास्त्वपरे सुताः।-इति तत्तद्ग्रन्यधृतबृहस्पतिवचनम् || अपरिणीताजातस्य तु प्रतिपिद्धपुत्रत्वेनापकर्षान भागिता, किन्तु पासाछादनमानार्हता-इति वङ्गदेशचलितश्रीकृष्णतर्कालङ्करकृतायभाग टीका(पृ० १४२,लिखनम् ॥५॥ सुताश्चैपाञ्च भव्या यावत्रो भर्तृ सात्कृताः। इति तत्तद्ग्रन्थधृत- थाशवल्क्यवचनम् ॥६॥ कन्याम्यश्वपितृद्रव्याइयं वैवाहिकं वसु-इति तत्तद्ग्रन्य घृतदेवल- 'वचनचेति ॥७॥ अपराममोहननिवेदिनो वंशे वङ्गदेशचलितशास्त्रस्य पश्चिमदेश- चलितशास्त्रस्य वा प्रचार 'इति अनवगमात् प्रभुसमर्पितविचारपत्रेजी वनदेशचलितशास्त्रानुसारेण पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसारेण वा व्यवस्था दातव्येति श्राशाया अलिखितत्वाच वनदेशचलितशास्त्रानुसारेण पश्चिम- देशचलितशास्त्रानुसारेण च व्यवस्था लिखितेति निवेदनम् ।। एतदन्दीयदिसम्बरमासीयत्रयोदशदिनसम्बन्धिमगलवासरे मयेयं व्यव- स्था दचेति ।। . श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण A ३७२ व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ च ऋक्थक्रयसैविमागपरिग्रहाधिगमप्राप्समितिव्याख्यानाच ! मातृस्वत्वा- स्पदीभूतद्रव्यमानस्य निश्चितस्त्रीधनत्वेन मातुरूर्व तदुत्तराधिकारिदुहिया-. दीनामेवाधिकारः । तत्र यदि अविमस्तैव माता मृता, तथापि तद्योग्यमंशं तदुत्तराधिकारिएया दुहिता विभज्य ग्रहीतुं शक्यत एव । यथा काचिनारी दुहितद्वयं रक्षित्वा स्वलोकमगमत, तत्त्रोधने जाताधिकारयोहित्रोरवि. भक्तैवैका मृता, अनन्तरं तदुहित्रा स्वमातृयोग्यभागं मातृष्वस्तो विभज्य गृह्यत एष । दायभागमते तु तद्धनस्य संक्रान्तधनत्वेन स्त्रीधनत्याभावात् विमला विमतभेदानादरेणैव मातुरपरमे दायादा अर्ध्वमाप्नुयुः-इति वचनेन पूर्वस्वामिधनाधिकारिणां पुत्रादीनामेवाधिकार इति निशेषः- प्रश्नपत्र लिखितप्रकारकवृत्तान्ते सति शास्त्रानुसारेण मानुर्भागो नैव भवति; प्रमाणाभावात् , एकपुत्रस्थले पितृधनविभागस्यासंभवाच । माता "पितरि प्रेते पुत्रतुल्यांशहारिणी - इति कात्यायनवचनस्य समांशहारिणी माता पुत्राणां स्यान्मृते पती- इति नारदवचनस्य च पितुरुवं विभजतां माताप्यशं समं हरेद्-इते याज्ञवल्क्य वचनस्य च मृते पितरि जीवन्त्यां च मातरि, यदि दुर्वृत्ताः पुत्राः पैतृकध- नस्य विमाग कुर्वन्ति तदा मात्र स्वस्वभागसमभागं दारित्यर्थक्तया मिता- क्षरादिग्रन्थेषु व्याख्यातत्वाश । तदभावे तु जननी तनयांशसमाशिनी । समाशा मातरस्तेर्पा तुरीयांशा तु कन्यका ।। इति बृहस्पतिवचनस्य च विशेषत इति व्याख्यानेन । अर्थात् अस्यार्थ:- 'पितुरभावे....."पुत्र विभागे क्रियमाणे जननी पुत्रवती, मातरोऽपुत्रा विमातरः एताः सर्वाः पुत्रनुल्यांशभागिन्य इति । अनेन पुत्रैविभागे' क्रियमाणे एवं मातु गाधिकारित्वप्रतिपादकत्वावगमानान्यथा । यदि च बहुपुत्रस्थले पुत्राणां विभागोपक्रम विनापि विभागसंभावनारहिते एकपुत्र- रचले या पुत्रेण सह मातुस्तुल्याधिकारित्व स्यातदा मातुः प्रथमाधिकार- १. पितुरभारे-न्यर। २. पुरे-व्यप० । ३. पुविभावे क्रियमाने व्या व्यवस्था पत्र संख्या-१२६ ३७३ (सात्) ""सेन पुत्र-पौत्र प्रपोवरहितस्प मृतस्य धने पतो दुहित-दौहित्रा. दीनामधिकारप्रतिपादकस्य पाली दुहितरश्चैव-इत्यादि याज्ञवल्ल्ययचनस्य, अनपत्यस्य धनं पत्न्यभिगामि तदमावे दुहितगामि--इत्यादि विष्णु- वचनस्य दत्तबला लियाद-इति द्वितीयतृतीयप्रभयोरुचरञ्चा" तत्रैवार्यत्रमन्नमित पृयटन) लिखितमिति-- पूर्वप्रेषितव्ययस्यापत्रस्योत्तरमस्माभिटाम् ), पाटय़ालात्यारोपसर्थद- र्शनाभिशन रीढतानुमोदितादन्यदलया। तब चत्वारों हेतय उपन्यस्ताः । तान् दृष्ट्वास्माभिनिशिनतम् । अस्मदत्त रास्त्रार्थ त्वया नादर्शि, यतो भवदुकोनामाशवाकोटी प्रविष्टानां समाधानस्य बहुशस्तरिमन शास्त्रार्थ- पत्रे कृतत्वात् । हरर चेततः"ताहोत्तरदाने भातहेतुःखण्ड. नत्यापि खण्डनं भरता कृन स्यात् । श्रतो यहुपकारकरावासमाधानयुक्त पूर्नलिखितरा:स्वार्थ पुनरपि प्रेऽपते । तत्सवस्य समाधानानां प्रत्येक खएदने कृत्या गपना उत्तरेण सह प्रेमिष्यते । तदा भादत्तनुत्तरं परिटतानां मनोरमसात् । तस्मान् राम्रो समाधानानां दूषणं विना मगदुचरम- नुत्तरमिति | यापि शास्त्रार्यपत्रे भवदुकच गुणा हेतूनां रामाधानानि पूर्वमेव कृतानि परि उस्तपादानी पुनरपि रामाधानान्तराणि चोच्यन्ते । ऽस्माभिः ।। मातुभागो नैव भाति प्रमाणाभावादिति प्रथमो हेतुस्त्रया दत्त रान शोभनः॥॥ माता तु पितरि प्रेते पुत्रनुल्यांशहारिणी-इति कात्यायनीय-समार्शल हारिणी गाता पुत्राणां स्यान्मृते पतो--इतिनारदीय-पिनुरूध पिभजतो माताप्पंशं सगे हरेद-दति यागवल्कोय-समांशा मातरस्त्वेषान्तुरीयां शास्तु कन्यका-इति बार्हस्पत्यवचनसाम्यसिद्धप्रमाणानां सत्यात् ॥ गन्वेव मेभिर्रचनैः पुना यदि विभागं कुर्युस्तदा जन स्वभागसममेकं मागं दयुरि सुमते, न तु विभागोरक्रममन्तरा क्या मागं ग्रहीतुं शक्यते इनि चेत् । एता. सार्थकरणे प्रमाणाभावात् फेनापि ग्रन्थकारेणालिखितत्वाच ॥ याशवलय पचास्पवर्तमानार्थक " सराय(१)विमागं कुर्वतामित्यर्थकविभजतामितिपद- १.घरमा ततंत्र। २. मनोगन-व्यस ३७४ च्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ मेव प्रमाणमिति न वचनीयम् । अनुवादविशेषणत्वेन लडथस्य विवक्षित- त्वात् , कातीयादिवचरमु तदभावाच ।। किञ्च हरेदित्यत्र विधौ लिविधिनिम- त्रणे-इति पाणिनिस्मरणात् । विधित्यं चात्यन्तामाप्ते मापकत्व"(म्) ॥ अध्वं पितुश्च मातुश्च-- इत्यादिमन्यादिवचनैर्जनकमरणोत्तर पुत्रकतुक- विभागकालः पुत्रकत्तू कविभागश्चोभौ विधीयते । एवञ्च तैरुत्तत्तिविधिभि- तृणां परस्परं विमागे सिद्धे मातुभांगो न प्राप्तः तावान् पूर्वांश माताप्यंश समं होताया स्मृ. २६१२३)इत्यादिना च विधीयते । एवञ्च पति- मरणोत्तरं स्वेच्छया मात्रापि पुत्रसमांशस्वांशो हर्त्तव्य इति विधेः शरीरं निष्प- न्नम् । तत्राय फलितार्थः। यथा पित्राद्युपरते तनयादिमिः पृथग्यानु- छानाय व्यवहारे यथेष्टविनियोगार्हस्वत्यसम्पादनाय जन्मनैव स्वत्वमितिमूलको भेागो गृह्यते, तथैव मात्रारि पुत्रैः सह पूर्वोक्ता तसिद्धये ..."विवाह जन्यस्यत्वमितिमूलको मागो ग्राह्य इति ।। भवदुक्तरीत्या तु पुत्रकपमशदाने सम्प्रदानीभूतया मात्रा मायमितिविधिशरीरै माताप्यंशं समं हरेत यास्मृ० २१२३)इत्यादिना निपन्नं भवेत्तय न शोभनम् । ईदृशस्य विधेः भूपे. रक्षादनुत्पत्तेमहरोहराविधी विवक्षिते विभजन्तः पितुश्चोर्ध दयुर्माने समांशकम् इति-महर्पिणा पठितव्ये तथा पाठस्य कृतत्वाद् , भवदुक्तवचः नाथै विधित्वाभावापतेध । पितरि मृते संस्थितायां भातरि यदि दुर्घत्तौ पुत्री भाग कुर्यातो तदामात्रे भाग दद्यातामित्यत्र विमजतामित्यत्रस्थभवत्सम्मत- ....

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ यदि कुर्या-समानांशान् पल्यः कार्या:समांशिका:--इति यायलय वचसि पुत्रविभागकरणे प्रवृत्तस्य पल्या अपि विभागायगतेस्तदभिप्रायेण दम्पत्योरित्यभिधाननिति समादधे । एवं विभिनमातृकारतेषां मातृभागःप्रशस्यते । इति वचनं पुत्राणां भागग्राहकत्वं मातृद्वारेणेव बोधयति । तस्या भागाभावेतद्वारेण तद्ग्राहकाणां तद्ग्रहणानां पतिः स्यादितिमहा कोपः स्मृतीनाम् । तस्माद् बहुमुनिसिद्धान्तिते अन्यकृभिर्विरोधी कृते प्रमाणसिद्धे সামা সাশ্যামাহিইয়াঙ্কালশিয়ালণ (?)ইবাস प्रकटयति । इति मातुभांगे प्रमाणाभावखण्डनम् । यदपि प्रलपितमातु: मांगो नास्ति एकपुत्रस्यलेऽपि विभागस्यासम्भवाद् इति द्वितीयं कारणम् तदपि न । एकपुषस्थलेऽपि विमागमम्भवस्य शास्त्रोकल्यात् । तद्यथा यदा एकात्मजः पिता स्वेच्छया स्त्रोपार्जितधनस्य त्रीन् भागान् कृत्वा द्वावंशौं' प्रतिपद्येत विभजनात्मनः पितेत्यादिवचः(वचनापिता दो भागो स्वयं गृहणाति पुत्रायैकम्म ग ददाति तदैकपुनस्थले विभागो न्याय एव । एता- दृशस्थले मिताक्षरा दिमते स्वोपा जिवधने एव पितुरंशद्वयग्रहणम्भवति थीभूतवाहनादिमते नु नितामहापार्जितधने पुत्रोपार्जितधने च' पितुरंशद्वय- ग्रहणम्, यतस्तेषां मते भूर्या पितामहोपात्ता इत्यादीनि वचनानि या स्मृ० २।१२१) पितृकर्तृ कन्यूनाधिकविभागनिषेधकानि, न तु पितुरंशद्धय- ग्रहणामायबोधकानीति विचारान्तरम् । परन्तु सर्वेषां निबन्धकाराणां मते एतादृशस्थले एकपुत्रस्वत्वे भागो जायते; यथान जनको मागद्वयमेकस्मात् पुत्रादुपादाति तथा पस्यौ मृतेऽगृहीतस्त्रीधना माता तथाभूतात् पुत्राद्- भागं ग्रहीतुं शमोत्येव समांशहारिणी माता-इत्यादिवचनात् ।। नचैवं द्वादशी प्रतिपद्यत विमजनात्मनः पिता इत्यादि(ना स्मृ' पृ०१२)कम प वचनमेकपुत्रस्थलातिरिक्तविषयमिति वाच्यम्, शङ्खलिखित- वाक्यविरोधात् । तथा च शहलिखितावानुः सा कपुत्रः स्याद्वौ मागावात्मनः कुर्यात् । न चैव एकस्य पुत्र एकथुत्रः न पुनरेक एव पुत्रो यस्येति बहुमीहि- १. विरोदी न्यप. २. शो व्यप. ३. पितरश-न्यप.

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ स्तस्यावादार्थप्रधानसेन पष्ठीतत्पुरुषाद दुर्बलत्याद्-इनि जोनूतबाद- नाचार्यकृतेन नेनायेनैकपुत्रस्यलातिरिक्तविषय' एवं शुभलिखितो वोध- यतः पिनुदिभागमिति वाच्यम् । जीमूतवाहनतः प्राचीनानां नवीनानां च मन्यातणां मध्ये तु बहुधीहेरेव तत्र मिद्धान्तितत्वात् , वीरमित्रोदये दायभागप्रकरणे शसवचनस्थैकपुत्रपदन्याख्यावसरे तत्पुरुषस्वीकारे दोप- दानेन जीमूतवाहनोक्तेदर्शितत्वात् च ॥ अतएव शुद्धिचिन्तामणौ तीर्थचिन्तामणौ मुण्डनप्रकरणे-मुण्डनं चोपवासश्च सर्वतीर्थप्वयं विधिः-इत्यत्र दूपणभयाद् बहुमोहितः प्रवलभूती तत्पुरुष कर्मधारयो त्यक्त्या यहुनो हरेवाश्रिनो' महामहो. पाप्यायवाचस्पतिमिरैः, इति एकपुत्रस्यले भागाभावादिति हेतुखएड- नम् || यच माता तु पितरि प्रेते पुत्रः इति कातोयस्य समांश- हारिणी माता इति नारदीयस्य पितुरुध्य विभजतां माता इति योगीशवचनत्य च मृते पितरि मातरि जीवन्त्याञ्च यदा दुर्वृत्ताः पुत्राः पैतृकस्य धनस्य विभागं कुर्वन्ति तदा मात्र स्वस्वभागसमें दद्य : इत्यर्थकतया मिताक्षरादिग्रन्येषु व्याख्यातत्वादितिमातुर्मा'गे तृतीयो हेतुः सोऽपि न, मिताक्षरादिनिबन्धेषु एतादृशस्यार्थस्या प्यलाभात्, भवत्कृ- तमिताक्षरादिनिबन्धस्याप्रमाणत्वादरमाभिरदृष्टत्वाच्च अत्रेदं विचारणीयम् । यथा पुत्रादीनां जन्मनैव सामुदायिक प्रादेशिक वोत्पन्नमनि स्वत्वम् ऊय पितुश्च मातुश्च इत्यादि (मनु० ६।१०४) वचनानुराधेन पितुर निच्छया दाक्षिणात्यपाश्चात्वमैथिलसद्ग्रन्थकृन्मते पित्रार्जितघने, जीमूत- वाहनाचार्यामते रितामहाजितधनेऽपि विभागानहता बोधाति । यथा वा पत्यो जीवति जायापत्योविभागो न विद्यते पाणिग्रहणाद्धि सहत्वम् इत्पापस्तम्बोयेन पल्यः कार्यास्समांशिकाः इति याज्ञवल्कीयेन ( या. स्मृ० २।१.५) च पत्या सह भार्यया भागो न लभ्यते; तथा भत्र विवाहजन्यं मातुः स्वत्वं पुत्राणामनिच्छया मात्रा पुत्रेभ्यः स्वीयभागो १. विशय-व्या। ४. मानुरभागे-व्या. 1.चतोयप.. ६.०पत्योन्यर ५.शायना-व्यप, व्यवस्था पत्र-संख्या-१२६ न लभ्य इति न बोधयति, पूर्वस्थलवदन संकोचकव'चनाभावात् ॥ प्रत्युत मानुरगे पुत्राणागेवास्वातन्त्र्यम्, अर्ध्वपितुश्च-इत्यादीनि (मनु० ६.१०४) वाति विदधति । अतएव तत्तनियन्यकारा मातुरमे पुत्रकर्त विभागो न धोऽतदनुज्ञया-इत्याहुः । अतोऽसाधारणं मातुः स्वत्वं पुत्राणां -विभागोगाम विना सङ्कोचकर्षिवाक्याभावेग मातुर्भागं बोधयनीति मामा पुनानिच्छया विभागो ग्राह्य इति । न चैवं पिता रक्षति पाल्ये हि भर्ता रतति यौवने, 'पुत्रास्तु स्थापिरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति-इत्यादि- नारदादि( ना० स्मृ॰ पृ० १६८)वचनेम्यो मातुरप्यस्वातन्य मतिविभा- गोपक्रम विना तस्या न भाग इति वाच्यम् ।। अकार्यकरणाद्रक्षेत्-- इत्यर्थस्य महानिबन्धेषु दर्शनात् त्रीणां वपतिदायस्तु-इत्यादिवच- नानुसारेण वृथादानादायस्वातन्य धनात् माताप्यंशं समं हरेत् -इत्या- दिवचनानुरोधेन भागग्रहणातिरिक्तस्थले तद्वचनेनालातन्न्यविधानाच ॥३।। इति तृतीयहेनुस्खएडनम् ।। यच सदभावे तु जननी इति बार्हस्पत्यं वच!-अस्यार्थः पितुरमाये पुयिभागे क्रियमाणे जननी पुत्रवती मातरोऽपुत्रा विमातर एताः सर्वाः पुत्रतुल्यांश मागिन्य इत्यनेन पुत्रैविभागे नियमाणे मातुर्मा- गाधिकारित्वावगमादित्यनू'द्य विभागभावनारहिते एकपुत्रस्थले, विभाग- 'गम्भावनायक्त बहुपुत्रस्थले, पुत्राणां विभागोपक्रममन्तरा तनयैः सह मातुस्तल्याधिकारित्व चेन्मातुः प्रथमाधिकारिणी मात्रा धनिनः) पातित्वेन पली दुहितरश्चैवात्यादीनां दत्तजलाञ्जलिता स्यादिति तुरीय हेनुपर्णनम्, तदयतितुच्छम् । एतादृशार्थकरणे प्रमाणभावाद् बार्हस्पत्यवाक्याक्षराद- लाभात् स्वकपोलक( मि तत्वात्, तदभावे तु जननी इत्यस्य-माता. प्यंशं समम् - इत्येतत्समानार्थकत्वाद, उत्तरार्धन्तु पल्यः कार्याः समां- शिकाः इत्येतत्समानार्थकत्वाच ! तदुत्तसिद्धान्तवदस्यापि सिद्धान्ति- (तत्वात् अक्षरादलाभादेव श्रीकृष्णतालकारैरादि(र)प्युक्तमवाधे" न्यसाम्यादितिन्यायाचस्यापि पिमिन्नत्वात् ।। १ ।। यथा .... । १.चदना-व्य.प. २. तन्त्र--व्यप० । ३. नुच-व्यप, . व्यवस्था पत्र-संख्या-१२६. स्वेभ्योऽशेभ्यस्तु कन्याभ्यः प्रदयुर्घातरः पृथक् । खात्स्वादंशाचतुर्भागं पतिताः स्युरदित्सवः, इति मनु (३।११८)- पचने, भगिन्यश्च निजादशाहत्यांशं तु तुरीयकम्--इति याज्ञवल्क्य- (२।१२३ वचने च, प्रदयुदयेत्यस्य कर्तृतया भ्रातृणामन्ययात्तेपामधोन- स्वाभ्यो दान तथा जननीग्राह्य भागे परतन्त्रविधायकवाक्यामायाद्विभागो- पक्रम विनापि बहुपुत्रस्थले विभागाभावस्थले एकपुत्रसत्व स्वेच्छया मात्रा भागग्रहणं कार्यम् [ • ॥ पली दुहितरश्चैव-इति याशवल्स्य (२।१३५), वचनम्, अनपत्यस्य धन पन्यभिगामि-इति विष्णुवचस्तु पुत्रादिदौहित्रान्तरहितस्य मृतस्य यशदत्तत्य धने मिताक्षरादिमते पूर्व माता समनधनापिकारिणी, जीमूत- वाहनमते पुत्रादिपिरन्तर तयशदत्तस्य समग्रभने माताधिकारिणी भवति इत्यथ व्रते ॥ पितुरुध्य विभजतां माताप्यंशं समं हरेद्-इत्यादि (या स्मृ०२११२३) मातृभागप्रापकवचनानि तु विष्णुमित्रस्य पुत्रादिसत्त्वेऽशी मात्रा स्वभाग• अहणं कर्त्तव्यमितिधनेकदेशग्रहण"""दधने इति भिन्नविषयत्वव्यवस्था पनेन चरितार्थानां वैयर्थाभावादत्तजलालितोपपादनमशक्यं कत्तुं त्वया । किञ्च भवतामेव विरोधः स यथा देवदत्तः पञ्चभ्यः पुत्रेभ्यो यथाशास्त्रं पञ्चभा. गान् दत्त्वा स्वयं द्वावंशी प्रतिपद्येत विभजेनात्मनः इति (नास्मृ००१६२) प्रतिशास्त्रानुरोधेन दावंशी प्रतिपय विभक्तोऽभवत् । तत्र वि मक्तेषु एक: पुत्रादिदौहित्रान्तर हतो मृतः । तद्धने पली दुहितरश्चैय-इति याशवल्कीय- अनपत्यस्य धनं परत्यभिगामि- इति वैष्णवयचोभ्या जीमूतवाहनमते पिता समप्रधनाधिकारी, तदन्यमते माता समग्रधनस्वामिनी भवति । यथा वा पितृमरणोत्तर सब्य भ्रातरो विमत्तारतेध्येकः कश्चन भ्राता पुत्रादिपित्रन्त- रहितो ममार ! तदने भ्रात गणामधिकारोऽधिकारिक्रमबोधन शाख बोधितो भवति । भवन्मते उत्तस्थलयोः पित्रोर्धातुश्च प्रथमाधिकारिता) तापातित्वेन तेपामाधिकारः स्यात् । अरमन्मते उत्तस्थलयोर्यथायर्थ पृथ्वं पिता अंशद्वयाधिकारी, माता तु एकांशाधिकारिणो, भ्रातरस्तु खांशाधिकारिणः पश्चादेतादृशरथले पूर्वोत्ता मृतस्य समग्रधनाधिकारियो. - व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ ३८६ भवन्तीति विषयपरथापनेन भयदुपतेरेव दत्ततिलायलिता याति । तस्माद् घनस्य कृतस्यैकदेशरूपा व्यवस्था त्वया फतव्या ॥ यच केनाप्युक्तम् ।। यत्र पतिपुत्रकर्तृ को विमागः पत्या पुत्रेण वांशो दीयते, तव मानुर्भागो- भवति । अत्र तु निना पनिपुत्रेग या विभाग एवं न तोऽतोमातुरंश एक नास्ति; कुतो दुहिनादिभिलधन्यामिति । तदपमोचीनम् । पत्या यह भा-या भागमरणेऽस्वातन्त्र्येऽनि पत्युरिच्छयेय तया भागो लब्धव्य इति तावत् सपा निम्यिवादेऽपि पुत्राणां रितुरम इव मानुरऽनि स्वातन्त्र्य(1) मावस्य राबदेशीयमन्येपूपलभ्यमानत्वेग मानुगादाने स्वेच्छया दाने च पुत्राणामनधिकार एव । किन मानुग्गुमत्या पितृधने दुहिन भावे सति जननीधी च पुभांगो मायः, माना गुस्पेन्रीय पुत्राणामनिया सत्येरि भागो माया ! अनीशास्ते हि जीवतोः इत्यादि मन्यायु क्तः मातारी समं हरे-इत्यादिविधियोधकप्रत्ययाधुदितस्मृतः (१), एवं यम्भावितमातृभागेऽपि दुहितुरधिकारी तेः। एतविचारस्तु तृतीयतुरीय- हेतुखएहने यहुनरं रिचारितस्तत एवापधार्यः ।। एवंप्रकारकान्ये भव 'पग्णगणे जाते परिडतानां मातृमाघमाग- विर्षायणी अनुकमा यहुपुत्रस्थले विभागोपक्रम विना सकृतपुत्रस्यले (योचपि मात्रा माहम् भागं बोधयन्ती मातुभांगो नेव भवताति प्रयतुर्माता भगिन्योऽध्य(भागि त्वं बोधयति; यतः शास्त्रासिद्धस्यायस्यापलपन(म्म)का. प्रमूलकमेव भवति इत्याग्रहन्त्य क्या कृतयुदिभिरन्यैः (रपक्षपातः सद त्वयाऽवधार्यम् । भवदत्तोत्तरे शब्द शुद्धयोऽनन्वितत्तयास्माभिर्न दृषि तास्तदूषणे प्रयोजनामावात् । अप्रत्यैः)"पाठशालास्थैरपाठशालास्थेच सरपि गतागतशासार्थो दृष्टा, गुणशेषधाववारितः। श्रर शास्त्रार्थ सर्वेषामनुमती भरतामप्यनुमोतिरेवस्या, भूयमा व्यपदेश इति न्यायाद् इत्यस्माकं प्रतिमानि । किश्च माणामित्र परिडतानामपि व नापण्डितेन भवता न काय्या, यतः शास्त्रार्यपत्रं समालोच्य प्रतियादिकृतशास्त्रार्थ- निराकरणपूर्व स्वमत महद्भिलिख्यते इति महतो र यो तथा त्या २ भदायपरी-व्यय० ।

३८० व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ न कृत इति पण्डितानामने पाण्डित्यप्रयुक्तं गौरवं तत्तन्मतनिराकरणं विना कदापि न भवति । समाधानपूर्वपक्षादिकमरिमन् शास्त्रार्थे बहूनि जातानि, वानि सर्वाणि विस्तरमयान्न लिखितानि । भवत्पूर्वपक्षाणां समाधानान्येव पण्डितैलिखितानि । शास्त्रार्थनात्र पण्डितानां वर्षशतेनापि पराजयो न भवति इति श्रीमद्भिनिश्चेयम् । सुहृद्भावेनोन्यते मया प्रयं शास्त्रार्थो भवते रोचते तहि व्यवस्थायां सम्मतिं कृत्ला परिडताना" (1)भवे साहवाय देया इति सतामरामर्शः शिवम् || 0 || 0 |॥ ॥ श्रीचन्द्रनारायणशर्मणः- अत्रार्थे सम्मतिस्मुकुशर्मणाम् । सम्मतिरबार्थे- अत्रायें सम्मनिर्विहन शास्त्रिणाम् । मदर्थे तदर्थजाते जातेष्टि चतु- दहीरानन्दशर्मपण्डितस्य । अत्रायें सम्मतिः श्रीकान्त श्रीकृष्णदेवशर्मणां सम्मतिः । शर्मणाम् । सम्मतिरेतदर्थे काशीनाथ श्रनाथै सम्मतिः श्रीलज्जाशङ्कर- शास्त्रियः। शर्मणाम् । अत्रार्थे सम्मतिः श्रीयदुना यशुक्ल- सम्मति शर्मणाम् । शर्मणाम् । पूर्वप्रेपितोप रिलिखितव्यवस्थया पुत्राणा पैतृकधनविभागोपक्रमे मातृभागो निश्चित एव । एवञ्च मति विभागमन्तरा मातृभागाभावप्रति पादकहेतुपएडने यो हेतु:-माता तु पितरि प्रेते पुत्रतुल्याशहारिणो इति कातोय -समांशहारिणो माता पुत्राणों स्यान्मृते पतो-इति नारदीय- पितुरूष विभजतां माताप्यंशं समं हरेत्-इति याज्ञवल्कोय-समांशा मातरस्त्वेषां तुरीयांशास्तु कन्यका:-इति बार्हस्पत्यवचसा प्रसिद्धप्रमाणानां सत्वादिति दत्त सातदातृ णा शुकवत्तद्वचनपाठपरायण पराणां धर्मशास्त्रा निभिज्ञानां विदुषां पुरः प्रकाशयति । तेषां चतुर्णामपि वचनानां सति विभागोपक्रम एव मातुः पुत्रभागसमभागप्रतिपादकत्वात् । नचैतादृशान सम्भवत्येतादृशार्यकरणे प्रमाणामावात्, केनापि ग्रन्थकारेणालिखितत्वा. चेति वस्तुं युक्तम् । तेषु प्रथमस्य-माता तु पितरि प्रेते पुत्रतुल्यांश- ...

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ २८२ हारिणी-इति कातीय (वचनस्य विभज्यते तदा मातुर्भागमाह इत्यनेन दायतत्त्वे रघुनन्दनस्मार्त्तमाचार्येरवतारितत्वात् , विवादमङ्गार्यावविवा. दार्णवसेतुश्रीकृष्णतर्कालद्वारादिकृतदायमागटीकासु बहुशः समुदितत्त्वाचा तेषु समांशहारिणी माता-इति द्वितीयस्य नारदवचनस्य, पितरि चोपरते सोदरभ्रातृभिर्विमागे नियमाणे माने पुत्रसमांशो दातव्यः-इत्यर्थकतया जीमूतवाहनमट्टाचार्ययमागे व्याख्यातत्वात् । अथ तृतीयस्य-पितुरुध्वं विभजतां माताप्यंशं समं हरेत् इति याश- वल्कीयस्य पितुरूध्वं विमागेऽपि पलीनां स्यपुत्रसमांशित्वं दर्शयितुमाह इत्यनेन मिताक्षरायामेव श्रीविज्ञानेश्वरैरवतारितत्वात् । किञ्च पितुरूध्वं विभजतां माताप्यंशं समं हरेत् इति याज्ञवल्कीयवननस्य, पितृद्रव्य- विभागः स्यात् जीवन्त्यामपि मातरि । न स्वतन्त्रतया स्वाम्यं यस्मान्मातुः पति विना-इति वोरमित्रोदयस्मृतिचन्द्रिकादिनियन्धधृत-संग्रहकारी येन स्वतन्त्रतया पितर्यपरते तद्धनरय विभाग कुळतां पुत्राणामस्वतन्त्रापि माता पुत्रांशसमाश हरेनतु भात्रादियात्) (पूर्णस्या) पोत्यर्थस्य सम्बसम्मत- त्या(त्) । श्रजीवद्विभागे मानुरंशक नामात्यवत' "कया याशवल्क्य. वचोऽवतार्य एतच्च स्त्र'धनस्याप्रदाने येदितव्यमित्याद्य (परि व्याख्यात एव । स्मृत्यन्तरे जनन्यस्वधना पुत्रविभागेऽशं समं हरेत-इति अस्वधना प्रातिस्विकसीधनशून्या जननी पुत्रैविभागे क्रियमाणे पुत्रांशसममंशं हरेत्-इत्यर्थः इति व्यवहारमाधये माघयापरपव्यश्रीविद्यारण्यपादै- विशिष्य प्रतिपादनेनेवमेव स्मृतिचन्द्रिकायां श्रीदेवा(नन्दाभट्ट तयाहि पतिद्वारागतं खीधनं नित्यं विभागानहमेव, लोके दम्पत्यो. र्धने विभागादर्शनात् जायापत्योर्न विभागो विद्यते-इति हारोतस्मर- रणाच । एतेनात्र मातुः स्वस्वव्यवस्थापको दायविभागः। किन्तु यावदर्थ मेवार्थहरणमिति मन्तव्यम् । अतएव स्मृत्यन्तरे निर्धनमातृविषयमेवांशहरगं न मातृमात्रविषयमिदमिति ायते, जनन्यस्वघना पुत्रैविभागेऽशं सम- हरेत् इतिस्मरणात्, अस्वघना प्रातिस्थिकलीघनशुन्या जननी पुत्र- रजीवदिमागे क्रियमाणे पुत्रांशसममेयांश हरेत इत्यर्थः । नननीयहरणं तत्स्वपल्यादेपलक्षणार्थम् । मातरः पुत्रभागानुसारिभागहारिण्यः-दति व्यवस्था-पत्र संख्या-१२६ विष्णुरमरणात् । अखधनेति विशेषणोपादानात् स्वधनादेव सकीयजीव. नस्थ स्यानुष्ठेय ..."साध्यस्वकर्मणः सिद्धिसम्म जनन्यादीनां न भाग- ‘ग्रहणमिति गम्यते । तथा च स्वधने मात्रा तयोः सिद्ध्यसम्भवे जनन्या- दीनां सधनानामपि न समभागहरणम्, किन्तु यथोपयोगं न्यूनभागस्यैव हरणमिति च गम्यते । तथा च विभा"वसोरतिबहुत्वे निर्घना- नामपि जनन्यादीनां न समांशहरणं किन्तु ययास्वोपयोगं समांशन्यूनस्यैवांश- हरणमित्यपि गम्यते । अस्वधनेतिविशेषणोपयोगवशादशहरणं जनन्या न पुनर्धातृव (त्) (स्व)चरशादितिशापनार्थत्वात् । सममिति विशेषण- स्पोपयोगवशादसमाशस्य हरणेप्यौयथ्यम् । अल्पविभाज्यवसोरधिकपूर- णस्य प्राप्तस्य निवृत्त्यर्थत्वादिति प्रतिपादनेन भवदभिमतार्यस्य विभागोप- कममन्तरापि मातृभागमापकत्वस्य दूरावस्तत्वात । न च पुत्राणां पितृधन- विभागस्वातन्त्र्ये ऊध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातरः समम्- इति मान- थीयेन, पुत्र"वोधन विरोध इति वाच्यम् । ऊध्वं पितुः--इनि पितृधन- विभागकालः मातुरूपम्-इति मातृधनविभागकालः । ततश्नैतदुक्त भवति पिनुरूवं मातरि जीवन्त्यामरि पितृधनविभागस्तथा मातुरूर्व- स्तिरि जीवत्यपि मातृधनविभागः कार्य एव, अन्यतरधनविभागे उभयो. रूर्वकालप्रवीक्षणानुपयोगादिति माधवीयव्याख्यानुपालोचनया तथा श्रतएव पितुरूवम्-इति पितृधनविभागकालः मातुरूर्ध्वम्-इति मातृ. धनविभागकालोऽभिहितः इत्यारभ्य, अतश्चानीशास्ते हि जीवतोः इत्यपि तत्तद्धने व्यवस्थाया अस्वातन्त्र्यप्रतिपादक न स्वत्वप्रतिपादक जन्मना स्वत्व स्य पुत्रारण पितृधने व्यवस्थापनादित्यन्तेन वीरमित्रोदयस्मृति चन्द्रिकादिनि- अन्वलिसनेन अशोरपि तद्दोपाप्रतोतेः।युक्तं चैतन्जीवविभागोक्तं पितुःस्वा- तन्यात् । अजीपद्विभागे पुत्राणां स्वातन्त्र्यादित्यादिना विशेषतो वीरमि- प्रादयादावजीवद्विभागे पुत्राणामेव स्वातन्त्र्यप्रतिपादनाच, अस्वातन्ध्यप्रति- पादकानां च जीनतोरस्वतन्त्रः स्यात्-इत्यादिवचनाना सकलनिबन्धकारैः -मृतेऽपि पितरि जीवन्त्यां च मातरि पुत्रकर्तृको यो विभागः (स?) धर्म्य इत्येतत्परत्वव्यवस्थापनात् । अतएवारमहत्तपूनमवस्थायां पुत्रे दुचत्व- विशेषणं सार्थकमि(ति सूक्ष्म सावधातव्यम् । न चानुवादविशेष- व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२६ ३८३ शीभूतस्यअर्थस्याविवक्षिवत्वेन विभागोपक्रमे मृतेऽपि मातृभागमापक- स्वसिद्धिरिति वाच्यम् । अविवक्षायां प्रमाणाभावात् । नयनुवादविशेपणत्व कथनेनैव सोऽर्थोऽपैति | यदपि पूर्वोत्तवचनद्वयैकरूप्यार्थ' (१.' तथा (कथ) नमिति तदपि न, तयोरपि सकलनिबन्धकारैरेतद्वचनसमानार्थकत्वेनयोपपा- दितत्वात् । किञ्च लडर्थस्याविवक्षितत्वेन विभागोपक्रममन्तरापि मातृभागमा. पकत्वस्यपितात्पर्य विषयत्वे विमजतामिति विशेषणपदस्यैवानर्थक्यापत्तिः । पितुरूवं तु पुत्राणां माताप्यंशं समं हरेत्--इत्येतावतैव भवभिमतार्थ- स्यावगमात् अध्याहाराभावप्रयुक्तलाघवानुरोधेन तादृशवचनप्रणयनस्यै- वोचितत्वाच । पितरि मृते सति पुत्रैः क्रियमाणे विमागेऽपि मातुः समांश एव ! तथान योगीश्वरः पितुरूर्ध्व विभजतां माताप्यंशं समं हरेत् । पितुरूयं पितृमरणानन्तरम् । अत्रापि न दत्तं स्त्रीधनं यासा भर्ना या श्वशुरेण वा-इति, दातुरूय प्रकल्पयेत् - इति च वचनद्वयं योज्यं समा- नन्यायत्वात्, प्रतिषेधाभावाच्च । एवमेव विज्ञानेश्वरधारेश्वरादीनां मतम्-- इति मदनपारिजातलिखनात् । पौरमित्रोदयादौ तदुपरमविभागेऽपि पुत्र. स्ताः स्वसमांशभागिन्यः कार्याः :-इत्याहेतियाज्ञवल्क्यवचनस्यावतारित. त्वाच्चेति सुबुद्धिचञ्चवश्चिरञ्चिन्तयन्तु ॥ न च वरेत् -इति विधौ लिख.. विधित्वञ्चात्यन्ताप्राप्तप्रापकत्वम् तच न घटत इति वाच्यम् । अर्च. पितुश्च मातुश्च-इत्यादिमन्वादिवचनैः पितृधने जानाधिकारैः पुत्रै विभागे क्रियमाणे मातुरपि तत्समांशभागित्यमित्यपूर्वयोधनेनैव कृतार्थत्वात्, एतेनेदृशस्य विधेपेरक्षरादनुत्पत्तेरित्यादिविधित्वाभावापत्तेश्चेत्यन्तं तद्व- चनाशयमजाननिरुक्तमपास्तम् । मातृभागप्रापकस्य समांशा मातरस्त्वेषां तुरीयांशास्तु कन्यकाः इत्यवशिष्टस्य तुरीयस्यापि पुवक कविभागप्रक रण एव सर्वरुतात्यात्तस्यामि तदर्धबोधकत्वेग न तानि भवदर्थसाधकानीति मुधीभिराकलनीयम् ॥ यदपि प्रलपितं विभक्त पु सुतो जातः सवर्णायां वि- भागभाग इति, मातृणामथ दम्पत्योः पितुःपुत्रस्य चैव हि । प्रातिभाव्यमृखं साक्ष्यमविभक्त न तत्स्मृतम् इति च तदतितुच्छम् । तयोविभक्तेष्यि- त्यस्य विभागोत्तरं जायमानस्यासत्या दुहितरि भागप्रापकत्वात्, तदर्थस्य चाविभाज्यत्वात् । न च तत्र सम्भावितभागमा दायैव वचनप्रवृचिरिति- व्यवस्था-पन्न-संख्या-१२६६ वाच्यम्, पचनासदाप्रतीतेः । स्वकपोलकलितस्यार्थस्याप्नमाणस्वाच । द्वितीयस्य तु भ्रातृणामध दम्पत्योः पितुः पुत्रस्य चैव हि- इति वच- नस्य मितृकृतविमाश्यियत्वात् पितृस्तविभागे मातृभागो भवति नवे- त्यस्यावियाह्यत्वात् ? यदपि विभिन्नमातृकास्तेपो मातृभागः प्रशस्यते-- इति वचनं तदपि वीरमित्रोदये यदपि व्यासवृहस्पतिवचसोरित्यादि कृतमधिकेनेत्यन्तेन अन्थेन । तजीवनावधि तदाशारशवदतयारथे- यमिति समर्पितम् । अतस्तत एवावधातव्यमिति प्रथमहतोत्समर्थनम् । यदपि एकपुत्रस्यले विभागासम्मवादित्यत्रदोषो वनं तदपि देवानां "दान- ददायकमेव । पितृकर्तृ? पविभागस्याधिवाह्यत्वात् पितर्युपरते तदभावस्या- स्मदभिप्रेतत्याच विवादास्पदभूतस्थलाभिप्रायकमेव लिखमाञ्चेत्यलमति' जल्पनेनेतिविशे, यमिति द्वितीयहेतुसमर्थनम् ॥ यदपि तृतीयहेतुखण्डनेऽधिमिताक्षरमेतद्व्याख्यान'लाभादिति तदपि ग्रन्थार्या सूत्रकमेव मिताक्षरायां जीवदिमागे स्वपुत्र- उमाशिव पनीनामुकम् यदि कुर्यात् समानशान्-इत्यादिना पिनुरूल विभागेऽपि पत्नोना स्वपुत्रसमोशित्व दयित्माहेत्यवतर- किया पितुरूवं विभजतामित्यवतारित्वात् । अजीवदिमागे माव- रशपल्लनामाइति याज्ञवल्क्यवचोऽवतायं एतच्चेत्यादिना विशेष- मुलिख्य जनन्यस्वधना पुत्रविमार्गेऽशं समं हरे-इति स्मृत्यन्तर- अस्वधना प्रातिस्विास्त्रीधनशन्या (१) जननीपुत्रधिमा- गैशे नियमाणे पुत्राशसम हरेदित्यर्थः । इति माधवीयात् , जीवपितृर- विभागे पित्रायया पुत्रांशसमांशभागिन्यः स्वपल्या कार्यारतथा तदुपरम- विभागेऽपि पुत्ररताः स्वसमाशभागिन्यः कार्या:-इति वीरमित्रोदय: जिसनेन याचवल्यः पितुरूय विभजतां माताप्यंशं सम हरेत, विष्णुः- मातरः पुत्रभागानुसारिभागहारिएयः, स्मृत्यन्तरे-जनन्यस्वधना पुत्रै विभागेऽशं समं हरेत् , स्वपना तु यापता स्वधनस्य पुत्रांशसमभागता भवति तावदेव हरत-इत्यर्थः । अशाधिकधनायास्तु नाश- इति व्यव- हारमयूखे नीलक्राउभलिखनेन च स्पष्टतया तदवगामाय । यत्रे विचा १.पनाचे यलमनात जल्पनेमारा। - २चनमुपन्यस्य व्यवस्था-पत्र संख्या-१२६ .. रणीयमित्यादिभागग्रहणा तरिक्तस्थले तद्वचनेनास्वांतत्र्योधनान् न) तदप्यत्याग्रहग्रस्तत्वाद्धेयमेव । पुत्राणां जन्मनैव सामुदायिकस्य प्रादे- शिकस्य वा स्वत्वस्य सत्वेऽपि जीवति पितरि तदनुमतिमन्तरा पितृधन- विभागाभावस्य मैथिलगौडपश्चात्यदाक्षिणात्यमकलनिबन्धकृत्मम्मत. त्वेऽपि तदुररमे ऊर्ध्व पितुश्च मातुश्च-इत्यादिवचनेने परस्परं तेषां तद्धन विभागस्य सर्वमम्मतत्वेऽपि पाणिग्रहणनिबन्धस्य नीरनी ग्वदेकलोलो. मावा सहकारिकोपयो गनो मातृस्वत्वस्य सत्वेऽपि पल्याः भाग- प्रापकर्षियचनामावाद् यथा पत्युः सकारात्" पल्या मागो ग्रहीतुं शक्यते, तथा तत्य पकर्षियाक्यमन्सरा सद्ग्रन्धकारकतव्याख्यानमा नारापि वा विना विभ गोपक्रम पुनेम्योऽपि तद्ग्रहो मशक्यत्वात्, अस्था- सन्यचकमनवन्धकारकृतवर वानस्य तत्संकाचरुत्य प्रत्युत सत्वात् । अतएव योरामत्रोदये प-या:पतिद्रव्ये स्वत्वं क्षीरनोरवदेकलोलीभ वा- पन्नमहकारिकोपयोगिन तु तृणामिव परस्परमतएव तेषां विम गो न ज, यापत्या रस्य युक्त सद्गच्छन । न च क्षीरनीरवदे कलोलोम वापन्नस्यैक- स्यैव पाणिमहणानबन्धस्य पल्याः स्वत्वस्य स्वीकारे पत्युरुपरमे स्वत्व- प्रयोजक भूतदा म पत्यभावाभावात् कयमपुत्रायाः कृत्स्नधाधिकारबोधका अजीबद् वभ गे पुरासमाराधिकारमाधकाश्च ग्रन्थाः सङ्गच्छन्त इते वाच्यम् । पत्नी दुहितरश्चैव -इति पितुरुध्यविभजताम्-इत्यादि याच- वल्क्य दिवचनैः पृथगधिकाग्बोधनेनादापात् मातुः स्वातन्त्र्यम वस्य पूर्वमेव बहुशःसमु देतत्वात् पुत्रेभ्या भागमहणातिरिक्तस्थलेऽस्वतन्यमित्यर्थ कल्लने प्रमाणामायाच समांशहारणो माता-इत्यादिवचनस्यान्यार्थत्वस्योक्त- साच्चेति मात्सर्यमुत्मार्थ विच थमायरिति तृतीयस्य हेता समर्थनम् । यदपि चतुर्थहेनुखएडने एताहशार्थकरणे प्रमाण भावाद् चाहत्य- वाक्याचरादलामा च कपाल कस्तत्वाच्चेति हेतुत्रयं तदतिफ "महामहो- पाध्यायवाचस्प.तामझतविवादचिन्तामणावेवैतादृशार्थस्यसष्टतरतया प्रती तेर्भयदुक्तेपालो तप्रायत्यान्मदुक्तेः सप्रमाणत्या बाईपत्यवाक्याक्षरादला. भादिति अस्वोत्तरं तु भवद्दत्तपूर्वव्यवस्थायाम् । अस्याः स्तुिरमावे अर्थात् १.०५चे तन्मयततापहभ्यय० । २५ - १८६ व्यवस्था पत्र संख्या-१२६-१२७ पुत्रैविभागे क्रियमाणे जननी पुत्रवती मातरोऽपुत्रा विमावर एताः सवाः पुत्रतुल्याशभागिन्यः, एषां भागिनां मगिन्यश्चा विवाहिताविवाहार्य खम्रात्रशतुरीयांशभाजो विवाहोचितधनमागिन्यो भवन्तीति मदनरक्ष- विवादग्न.करविवादचिन्तामणिदायक्रमनिबन्धकारैः कृत इति लिखन मेवेत्यलमधिकेन । एतेन स्वकोलकल्लितत्या दत्यपि प्रत्यास्यातमित्यवधा- तव्यम् । यदपि भगिन्या भागे भ्रातृणां स्वातन्त्र्योधकमनुयाज्ञवल्क्य- घननयन्मातृभागे तदभावात्तया स्वेच्छया भागग्रहणं कार्यमिात तदप्यत्य- न्ताग्रहग्रस्तत्वाद्धेयमेव । प्रसिद्धप्रमाणानि याज्ञवल्क्यादिवचासि प्रथम- हेतुव्यवस्थापने लिखिततचनिबन्धकारकृतव्याख्यानानि च युक्तयामास- रपलाप्य प्रमाणगन्धशून्यस्वोक्त्या तदर्थस्य व्यवस्थापनेनाममाणत्वादिति चतुहितुममर्थनम् ।। अथ भवन्मते विरोधो(भा)वनम् । कस्यचित् पुत्रिकाकरणान्तर- मौरसपुत्रोऽजनि । तदनन्तरं पत्नों पुत्रिकां च त्यक्त्या स लोकान्तरमग मत् । तत्पल्यपि पश्चा)दिम लोकमजदात् । तयोनिधनानन्तरं पुत्रिकापुन- योविभागसमुत्थानेऽस्मन्मते समस्तत्र विभाग स्यात्-इत्यादिषचनेन करनधनस्य सम एव विभागः सकलनियन्धसिद्धः । भवतां तु सा मातृभागं पूर्व गृहीत्वा पश्चात् पुनरवशिष्टाई महीतुमईनीति तत्तापयचनव्याकोदो पर्पसहरैरपि दुनिवार्य इति सूक्ष्माशाश्वधातव्यम् ।। यत्तु दत्तजलाञ्जलि. तोपादनमशक्यं कर्तुं लयेति तदाशयान वयोधता बोधयति । विद्यमान- मातृमस्याजातपुपादेवदत्तस्य मरणानन्तरं पत्नी दुहितरश्च - इति याशव- कीय पुत्रस्य धनं पत्न्यभिगामि-इति वैष्णववचनाम्यां पल्या अधिकारित्व- आधनेऽपि अधिमक्तसमुपभ्रातृतो भागाभावाय पूर्वोक्तवचनयोरविभक्तसंसृष्ट धनान्यविषयवमित्यर्थस्य गौडातिरिक्तसकल मुनिवचनव्याख्यातृसम्मतत्वेन सत्य मपि मातरि तद्धनस्य अविभक्तसस्थत्वेन मातृतः पूर्व पत्न्यधिकार- योधनस्य दत्तजलाअलिता सहसास्यैरपि दुनिंबारा इति तन्त्रतत्त्वशा विभावयन्तु ।। १२७-रोवकारी मिछिल सदर देोयानि पादालत ओयाके सन १८३२ सालेर ५ जानेर मोतावक सन १२३८ सालेर व्यवस्था-पत्र संख्या-१२७ ३८० २२ पौष वृहस्पतिवार श्रीयुत हेनरी सिकिसपीयर साइव से आदालतेर हाकिमेर वैठके- मैरवीदासी वनामे नवकृष्णवसु साएजार उकिल मुनसी गोलाम आहम्मद हाजिर थाइल। 'पूर्व सन १८३१ सालेर १ दिजम्बर तारिखे साएलार खास आपोलेर दरखास्त दरपेप हइया जेलार फैसला दिष्टि करण जन्ये मूलतथि छिल, तदनुमारे गत क्ल्य सारलार द्वितीय दरखास्त फैसला आगैरह सम्वलित उपस्थित हइया साविक दरखास्तेर सम्मलित करिया उपस्थित करणेर हुकुम हइयाछिल । से प्रयुक्त अद्य साएलार खास आपोलेर दरखास्त तत्समभिन्याहारि काग- जात सम्बलित उपस्थित ओ पाठ होइल । हुकुम हइल ये जिलार फैमला ओ साएनार ओकीलेर अद्यकार दाखिल करा व्यवस्था ए विपये यवार तलवे ये यदापि स्यात् उक्त फैसलार लिखित प्रकरण सकल सत्य अथवा फैमलार लिखित व्यवस्था अथवा साएतार उकिलेर दाखल करा व्यवस्था-एहार कोन व्यवस्था यथार्थ ए आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठानो जाय ये पण्डित मजकुर उपरेर लिखित प्रकरणेर उत्तर अति त्वराय लिखेन इति । श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीविकिम्पीयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखिनैतदन्दीय जानवरीमासीयपश्चमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूप- 'पत्रमेवं तत्समर्पितजिलाख्यावान्तरधर्माधिकरणीयजयपत्रमेतद्धम्माधिकर पाथिनीनियुक्तोकोलशब्दवाच्येन तद्दिने निविष्टं व्यवस्थापत्रञ्च यत्तदन्दी- यतन्मासीय कविंशतिदिनसम्बन्विशनिवासरे घटिकाद्वयाधिकयामद्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदयलोक्य पाहाबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।। प्रमुसमर्पित जयपत्रलिखितप्रकरणानां मध्ये एतदर्माधिकरणार्थिन्या उत्तरपत्रलिखितप्रकरणानाँ सत्यत्वे सत्येतद्धर्माधिकरणार्थिनी नियुक्तीक ३८ व्यवस्था-पत्र संख्या-१२०-१२८ शब्दवाच्यनिविष्टव्यवस्यैव शास्त्रसम्मता मवति । तदुत्तरपत्रलिखितप्रकर- णानामसत्त्वे तजयपत्रलिखितव्यवस्थैव शास्त्रसम्मता भवतीति ॥ एतदन्दीयफेवरखरीमासीयचतुर्थदिनसम्बन्धिशनिवासरे मयेयं व्यवस्था 1 श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण बनाम १२८-रोवकारि मिछिल सदर देोयानि आदालत श्रोयाके तारिख ७ जानेर सन १८३२ साल मोतावेक सन १२३८ सालेर २४ पोपं शनिवार श्रीयुत पालक सुन्दर राश साहेव ऐ वादालतेर हाकिमेर बैठके ॥ वदनचन्द्रसिंह मथुगमोहनपालीत ओ महेशचन्द्रसिंह साएलेर उकिल मौलवि करम होछेन श्रो तरफटानिर उकिल मुनशी गोलाम वतुल हाजिर पाइल । सायेलेर सोयाल एक शत पश्चाश टाका दामेर फागजेर पर दोस्तपुर श्रागयेरह तालुक विरोधि विषयेर दखल पाइवार मोकईमाय मयलगे पाँच हाजार दाका ए विषयेर दामेर तायदादे ओ उकिल मजकुरेर नामेर एक देता ओकालतनामा ओ रामवृष्णवन्द्योपाध्यायर नामेर एक येता मोक्तारनामा ओशन १८२८ सालेर २१ जुन तारिखर हुईल देलार देनोयानि पादालतेर एक केता फयछलार नकल श्री सन १८३० सालेर ५७ नागष्ट तारिखेर लिखित एलाका कलिकातार मोट बापालेर एक फेता फयशलार नकल श्री सन १८२६ सालेर २३ शेतम्बर तारिखेर लिखित कलिकातारकोट प्रापीलेर एक फेता रोवकारिर नरल सहित ये, सन १८३० सालेर १६ दिजम्वर पारिखे दाखिल हइया दिल, अद्य तरफछानिर शन १८६१ सालेर १३ आपरेल तारिखेर दृष्टि फया सोयालेर साहूतं दृष्टे श्राइल, Y व्यवस्था पत्र-संख्या-१२८ योध हइल ये पार्वतीचरण मोतोफफार तेज्य विषय लाट नारायण पाडा उहार चारि पुत्रेर मध्ये अर्थात् वदनचन्द्रसिंह 'प्रामव्यवहार प्रो महेशचन्द्रसिंह श्री ईशानचन्द्र श्री हरिशचन्द्र 'अप्राप्तव्यवहार एकत्तर श्रो साधारणे छिल, ओ बदनचन्द्रसिंह मजकुर ये मालिक ओ कारवारेर कर्ता एवं भ्रातासकलेर सहित एकानं छिल लाट मजकुरेर मोतालकेर मोजे दोस्तपुर प्रोगयरह बिरोधि विषय द्वितीय भ्रातासकलेर अंश सहित तरफलानिर जेनार मुद्दाइ मथुरमोहनपालीतेर निकट वयवलोफार ? प्रकरणे, दरपत्तनि तालुक विक्रय करिया जखन वयवलोफार मेयादेर मध्ये पोनेर टाका आदाय करिलेसना। मुद्दाइ सेइ समय शन १८०६शालेर १७ कानुनेर नियम आमले आनिया वयवात सम्पन्य हबार जन्य एइ नालिप दरपेप करिया जे ना ओ क्रोट हइते ईशानचन्द्र ओ हरिशचन्द्रर अंशेर कर्तन वादे वदन चन्द्र श्रो. महेशचन्द्रेर अंश वयवातेर वावत डिगरि हाशील करियाछे, प्रो महेशचन्द्र जाहेर करे ये वयवलोफा होनेर समय मामि अमामव्यवहार छिनाम, प्रामार पन हइते बदनचन्द्र कोलाते। दस्तखत करिया दियाछे ओ बदनचन्दर क्षमता छिल ना ये आमि अप्राप्तव्यबहारेर अंश वयवल पोका अथवा मम्पूने विक्रय करे । एजन्य आमार निकट हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व ए श्रादालतेर पण्डितेर निकट व्यवस्था लोया उचित बोध हइया हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुगे ये निचेर लिखित सोयानेर जोयाब एइ रोवकारि पाओयार तारिख हइते एक सप्ताह मेयाद मध्ये दाखिल करेण-ए श्रादालतेर पण्डितेर हामओला करा जाय इति ॥ • सोयाल- यद्यपि स्यात् सहोदर दुइ भ्राता अथवा तिन चारि भ्राता थापनारा एकानमुक्त, श्रो ताहार मध्ये एक जन प्राप्त-ययहार; 'ओ द्वितीय सकल अप्राप्तव्यवहार थाके, ओ प्राप्तव्यवहार भ्राता व्यवस्था-पत्र संख्या-१२८ मोरशी साधारण विशयेर मध्ये किछु अप्राप्तव्यवहारसक्लेर अंश सहित हस्तान्तर करे, तवे ए प्रकार हस्तान्तर मिद्ध कि ना एवं प्रात- व्यवहार भ्रातार मौरूशी साधारण विशय अप्राप्तव्यवहार भ्राता सकलेर अंशसहित, ये एकाने थाके, कोन प्रकारे हस्तान्तर फरणेर तमता वागलादेशेर चलित शालानुसारे आहे कि ना इति ।- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतअलकसुन्दरराससाहेवधर्माधिकरणलि. खितैतदन्दीयजानवरीमासीयसप्तमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं पत्तदन्दीयतन्मासीयोनविशतिदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे घटिकादयाधिकया. मदयानन्तरं मया प्राप्त तदवलोक्य ग्राहशबोघो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- यद्यपि सहोदरी द्वौ भ्रातरी प्रयश्चत्वारो वा भ्रातर एकपाकेन भोकारः,. तेषां मध्ये एक: प्रातव्यवहारोभन्ये चाप्राप्तव्यवहारा भवन्ति । एवञ्च सति मासन्यवहारो भ्राता मागतसाधारणपनानाम्मध्ये किञ्चिद्धनमप्रासन्यव. हाराणां सर्वेषामंशसहितं हस्तान्तरं कृतवान् स्यात् , तत्र यदि तादृशहस्ता. न्तरमधो लिखितहेतुसमुदायान्तर्गतेकरिमन्नपि हेतौ सति कृतवान् स्यात्तदा वांशयोग्ये स्वेतराशयोग्ये च सिद्ध्यति, तादृश हेतुसमुदायान्तर्गतैस्मादपि. तोविना तादृशहस्तान्तरफानुरंशे सिद्ध्यति, तदितरांशे न सिद्ध्यति । एवमेकपाक्न भोक्नुः प्राप्तव्यवहारस्य भानुः क्रमागतसाधारणधनस्यामाप्त. व्यवहाराणां सर्वेषां भ्रातृणामथसहितत्य कुटुम्बभरणाद्यर्थ मगिन्यादिविवा- हाद्यर्थ वा भ्रात्रादिविवाहाद्यर्थ वा रोगोपशमनाद्यर्थ वा पित्रादिकृत- पाकरणाचर्य वा पित्रादिश्रादाद्यावश्यक कार्यादिसम्पत्यर्थ वा हस्तान्तर करणक्षमतास्त्येव | उपरि लिखितकुटुम्बभरणाद्यावश्यककार्यार्थ दासा- दीनामपि स्वामिधनस्य हस्तान्तरकरणक्षमतायाः शास्त्रीयत्वेन चतुर्णा सोदरभ्रातृणामेकपाकेन बसताम्मध्ये प्राप्तव्यवहारस्य ज्येष्ठधातुरमातव्यव. पाराणामशिष्टानां त्रयाणां प्रातृणां शास्त्रानुसारेण पितृवप्रतिगलना- आवश्यककार्यकरणक्षमस्योपरिलिखितकुटुम्बभरणाद्यावश्यक कार्यकरणार्यः व्यवस्था-पत्र संख्या-१२८ साधारणक्रमागतधनानाम्मप्ये तत्तत्मार्योपयुक्तस्य धनस्य हस्तान्तरकरपक्ष- मताया अर्थसिद्धत्वात् इति बनदेशचलितमनुदायभागश्रीकृष्णतर्कालङ्का- रक्तदायमागरीकादायतत्त्वव्यवहारतत्त्वव्यवहारमातृकाविवादार्णवसेतुविवा • दमार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- स्वभागान् यदि दद्युस्ते विक्रोणीयुस्थापि वा। कुठर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य वै ।। इति दायभागादिग्रन्थ- धवनारदवचनम् ॥२॥ अन साधारणद्रव्यस्य समुदायस्यैकेन विक्रये पगरायोग्ये प्रसिद्धि, स्वांशयाग्ये तु सिद्धिः अन्यानुमत्या विक्रये तु तसिद्धिः--इति विवाद- भन्नार्णवप्रथलिखनम् ॥२॥ कुटुम्बार्थेऽध्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् । स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ।। इत्युपरिलिखित- ग्रन्यधृतमनुवचनम् ||३|| पितृव्यम्रातृपुत्रसीदासशिष्यानुजीविलिः | यद्गृहीतं कुटुम्बाथै तग्रही दातुमर्हति ॥ इति तत्तद्ग्रन्यधृतः बृहस्पतिवचनम् ॥४॥ कुटुम्बार्थमशक्त'तु गृहीतं व्याधितेऽथवा । उपलवनिमित्तश्च विद्यादापत्कृतं तु यत् ॥ कन्यावेवाहिकञ्चैव प्रेतकार्यषु' यस्तम् । एतत्सर्व प्रदातव्यं कुटुम्बेन कृतं प्रभोः ।।-इत्युपरिलिखितमन्थ- घृतकात्यायनवचनम् ॥५॥ पितर्थपरते पुत्रा ऋणं दयुर्यांशतः। विभक्ता अविभक्ता वा यो पातामुद्दहेधुरम् ॥ इति विवादभनार्य- वादिग्रन्धधृतनारदवचनम् ||६|| १. कुटुम्बार्थमशतेन गृहीते व्याधिवेऽया। सप्लवनिमित्ते च विद्याक्षपत्कृते तु तत् ।। कास्मृ. २. प्रेतकाय च-कास्मृ०॥ .

- व्यवस्था-पत्र संख्या-८-१२६ अत्रेदमवधेयम् । कुटुम्बमरणादिरूपयादशयाइशकायें उपस्थिते दासतमृण प्रभुणा शोधनायमिति प्रतीयते तादृशतादृशकार्यनिषत्यर्थ प्रभुधनविक्रयोऽपि सिद्ध्यति । तदतिरिक्तविषय एव स्वाम्यनुमतपदेन बाध्यते इति विवादभङ्गाणंवग्रन्यालखनम् 11७.। पितेव पालयेत् पुत्रान् ज्येष्ठो मातृन् यवीयसः । पुत्रश्चापि वरन् ज्येष्ठे म्रातरि धर्मतः॥ इति मनुवचनम् ।। एकोऽपि स्थावरे कुर्यादानाघमनविक्रयम् । श्रापरकाले कुटुम्बार्थे धर्मार्थं च विशेषतः ।।दायतत्त्वादिमन्थ धृतमुनवचनञ्चेति ।। एतदन्दीयफेवरपरीमासीयैकविशतिदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मयेयं न्य- वस्था इत्तेति ॥ श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण . १२६-रोवकारी मिछिल सदर देओयानि प्रादालत ओयाके तारिख २। माह जानोयारि ई सन १८३२ माल मोनावक' १३ माघ बागला सन २२३: साल गेज बुधवार श्रीयुत हेनरि सिकिमपीयर साहेवे आदालत् मजकुरेर हाकिमेर बैठके ।। विश्वेश्वरीदेवी वनामे ताराचन्द्रचार्या छाएलार मोक्तार रामकानाइयोप हाजीर हइल । छाएलार सोयाल ई सन १८३१ सालेर माह शेनम्बरतारिखेर । एलाका मुरशीदायादेर प्रीविणसीयार क्रोटेर हाकिम फिलिप इरनिप पाटल साहेवेर फयसला, जाहाते मुद्दाइ ताराचन्द्र चाटुर्यार हक्के डिगरि हइयाछे, ताहार नाराजीते एइमोकईमाय माफनिशी श्रापील मञ्जुरि प्रार्थनाय मोजाहाय मुलुदी ओगयरह रकम दुई आना १. मोतारक-यप।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१२९ दुइ कडार दखल पाोयार वायते २७०१८६१२ टाकार ताइने । मोक्तार मजकुरेर नामे मोक्तारनामा सम्बलित श्रोई मन १-३१ सालेर सेतम्बरेर लिखित एलाका मुरशीदाबादेर कोटेर फयस- लार नकल अनस्यता जे एइ माह जानओयारिर १६ तारिखे दाखिल हइया छज, पडागेल । यद्यपि स्यात्, एइ मोकर्डमार मोफ- निशा सुरत् आपील नामजुरि कि मगिर हुकुम छादेर होनेर 'मूर्व एइ आदालतेर पण्डितेर द्वाराय निचेर लिखित विशय दरि- प्राप्त करा उचित हइल | ए जन्य हुकुम हइल ये तत्स महवारि कागजात सोयाल प्रोगयरह एइ गेवकारिर नकल सम्वलित एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान जाय-ये पण्डित मोछप काटेर फयलार लिखित सववसकलेर एवं साहार लिखित कैफियत् अनुमादने एइ विशयेर जोयाव तत्क्षणात् लिखेन ये लिखित फयमलार लिखित पण्डितेर व्यवस्था दोरम्त वटे किम्वा मोकमार हालत् अनुमोदने ताहार सत्यताय किछु सन्देह प्रकाश इइते पारे कि ना इति ॥ एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरी सक्सिपीयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखितैतदन्दीय जानवरीमासीयपञ्चविंशतदियमीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्र- तिरूपपत्रमेव तत्समर्पितैतद्वियादविषयनिविष्टनिवेदनपत्रादिकश्च यत्तदन्दीय- फेवरचीमामीयदशमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकात्रपाधिक्यामद्वयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य याशयोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते ।। प्रभुसमर्पितजयपत्रलिखितप्रश्नत्रयस्योचरे तजयपनलिखितपण्डितदत्ता व्यवस्था शास्त्रमम्मता भवति । किन्तु देवचन्द्ररायेण स्वजीवनदशायां स्व. - स्वत्व'स्पदीभूतधनमविवाहितायै स्वकन्याये दासमन्यै दमित्रथिन्या निवे- दनपत्रे लिखतमस्ति-तत्सत्यं चेत्तदा दासमन्या मरणोत्तरं तदानानुसारेण -तत्वत्यास्पदीभूतमौदायिकस्त्रीधने तदुहियमावे तत्पुत्रस्य सर्वचन्द्रस्य स्वत्वे बाते संत तन्मरणोत्तरं तन्मातामह्यां वेदवत्या पूर्वधनस्वामिनी देव चन्द्ररा- यस्य पल्यां विद्यमानायामपि तस्य सर्वचन्द्रस्य पुत्रपौत्रपौत्रामावे तत्पल्या 'विश्वेश्वरीदेव्या एकाधिकारो यतस्तजयपत्रे लिखितमलि। प्रत्यर्थिनीविश्वे. .

व्यवस्था-पत्र संख्या १२६ श्वरीदेवी निर्दिष्टसाक्ष्युपस्थापितवृत्तान्तेन देवचन्द्ररायस्य मरणोत्तरं तत्कन्या- या दासमन्या प्रायचं तत्स्वत्वास्पदीभूतं धनं यद्यपि बातम् , किन्तु दासनन्या मरणोत्तर देवचन्द्ररायस्य पल्या वेदवत्या श्रायत्तमपि जातमिति । एतादृश- लिखनेन देवचन्द्रस्य मरणोपरं तस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्रामावे तत्स्वत्वास्पदीभून- घने शास्त्रानुमारेण प्रथमतस्तत्पल्या वेदवत्या एवाधिकारित्वेन विद्यमानां तां विहाय तत्कन्याया दासमन्या श्रायत्त तदनं कमप्येक हेतुं विना भवितुं न शकोतीति । अतएवास्त्येव कश्चिद्धेनुरित्यवगमात् । एवञ्च सति तज्जयपत्र- लिखितपण्डितदत्तव्यवस्थेतद्विवादसम्पर्कशून्यैव'- इतिवदेशचलितमा नुदायभागीकृष्णतालङ्कारकृतदायमागटोकादायतत्त्वदायक्रमसंमहविवा. दार्णवमनुविवादभङ्गापवादिग्रन्थानुशारिणो व्यवस्था । पत्रप्रमाणम्- प्रदान स्वाम्यकारगम्-इति मनुवचनम् ॥१॥ ऊढया कन्यया वाप पत्युः पितृहेऽथवा ! भर्तुः सकाशात् पोर्खा लब्धं सोदायिकं स्मृतम् ।। इति दायभा- गादिमन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥ २॥ विवाहकाले तापरफाले वा खिये यद्धनं पित्रा दत्तं तत्र तु धने प्रथमं कुमार्यास्तदनन्तरमूदायाः पुत्रवतीसम्भा वतपुत्रयोस्तदनन्तरं कभ्याविश्वयोश्चाधिश्वरः । सर्वदुहित्रभारे पुत्रादेयौतुकधनवत् कमे. णाधिकातिदायक्रमसमग्रन्थलिखनम् ॥ ३॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा-इत्यादि दायभागादिग्रन्थ धृतयाशवलायवचनम्वेति ॥ ४ ॥ एतदन्दीयमार्चमासीयनवमदिन सम्बन्धिशुक्रवासरे मयेयं व्यवस्था रति॥ श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्था-पत्र संख्या-१३० २७६४लं- १३०-रोवकारि मिच्छिल सदर 'देोयानि प्रादालत ओयाके तारिख ७ माह फिवरेल इंसन १८३२ साल मोतावक २६ माह माघ वाला शन १८३८ साल गेज मङ्गलवार श्रीयुत' हेनरि सिकिशपीयेर साहेव आदालत मजकुरेर हाकिमेर बैठके- दुर्गादत्त थापिलाएट बुनियादसिंह रेप्पाडण्ट पापिलाएटेर उकिल मुनशी होशन आलि ओ सदासुद पण्डित, श्रो रेष्पाडण्टेर उकिल मुनशी दादारवक्स हाजिर श्राइल । इत पूर्व सन हालेर ३०१३१ माह जानोपारिते एह मोकर्दमा प्रामार वैठके रोक्कार ओ प्रथम प्रादालतेर वावत् प्रविनशीयान क्रोटेर साक्ष्यक कागजात तथाकार फयछला पर्यन्त ओ एइ आदालतेर दाखिल होया कागजात गतो. शनेर ४ श्रापरेलेर लिखित रोवकारि पय्येन्त पडा हइया, दिवा अवसान प्रयुक्त मुलतवि छिल । अद्य पुनराय वरपेष एइ मोकदमार वावत् एइ आदालतेर सकल कागजात ओ एइ आदालतेर तलव करा त्रिपुरसुन्दरिदतर स्त्री गङ्गाजलिर मोकईमाय पाजे कागजात पडागेल । तत्परे रेपाडण्टेर तरफ हइते मिराकघर पालि एक फेता मोक्कारनामा दाखिल करिलेक अनुमोदने प्राइल | जेलार जजसाहेवेर प्रेरित कागजातेर किरण इहाइ मालुम हय-जे जे समय जयदल श्री त्रिपुरसुन्दरिदत्तर खि. गणेर दखिलकारिर तहकीकातेर. कर्मजेर तजविजे छिल, रेषा. खण्ट आदालतेर तलव मते चारि केता नकल छोनेनामा, जाहा कालेकटरिते दाखिल हयाछिल, दरपेप करे। एवं वाहार परे जजसाहेव ताहा भो तहकीकातेर कागजात सम्वलित प्रीविण- शीयान कोटे पाठान इति । यद्यपि स्यात् सत्यतार तहकीकातेर पूर्व एइ विपयेर दरियाप्त करा उचित हइल ये यद्यपि स्यात् पूर्व उक्त छोनेनामासकल सम्लेर सम्मति मते लेखाहइयाथाके व्यवस्था-पत्र-संख्या-१३० -तवे ताहार लिखित शरतसकल शाखेर श्रा"रामते सत्य, ओ श्रामले आना उचित वटे कि ना। ए जन्य हुकुम हाल ये चारि केता नकल छोनेनामा एइ हुकुमे ये अदालतेर पण्डित ताहार मनमुन अनुमोदने उपरेर विशयेर जोयाब दुइ सप्ताह मध्ये लिखेन-एइ आदालतेर परिडतेर निकट पाठान जाय-एवं ताहार जोयाव अाशा पर्यन्त मोकदमा मुलतवि थाके इति ॥ श्रीजयतितराम एतद्धार्माधिकरणाधिपत युतहेनरीसिकिस रोयरसाहेबधम्माधिकरण ‘लिखितदन्दीयफेवरवरीमासीथमप्तमदिवपीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूप. पत्रमेव तत्ममर्पितसविसनप्रतिरूपन चतुष्टयं च यत्तददायतन्मासोरद्वा- विशतिदिनसम्बन्धब्ध वामरे घटिकादयाधिकरामदयानन्तरं मया प्रातम् तदवलाक्य यादृशबाधो जातस्तदनुमारेणात्तर लिख्यते ।। उपरिलिखितस यसत्राणि यदि सर्वेषां समस्या लिखितानि स्युस्तदा तत्तलिखितनियमाः शस्त्र ज्ञानु परेण यथायी भवन्ति, एवं तत्तपमाना स्वोकरणमुचितं भवति । यतलत्तत्मविला तत्स.येकभिः सव लिखित पूर्वकृतविभ गोऽतोवासिद्ध इति । अतएव तत्तसं वेसत्र लेखित. नियमैर्वास्तव शाम्बानुमारेण पाश्चिदपि काचिदप स्वमहानिर्भवतीत्यन चगमात्-इति मिथिलादेशचलितमनु विवादचिन्तामणिविवादरत्नाकर विवादचन्द्रवीर मित्रोदयप्रभृतग्रन्धानुसारिणी व्यवस्था ।। .॥ अत्र प्रमाणम्- मातरस्त्वविभक्ता ये स्वरुच्या तु परस्परम् । विभागपत्र कुर्वन्ति भागलेख्यं तदुच्यते॥ इति वीरमित्रोदयादि अन्यधृतबृहस्पतिवचनम् ॥ ॥ : पतितस्तत्सुतः स्लोवः पड़ गुरुन्मत्तको जडः। : अन्धोऽचिकित्स्यरोगा भर्तव्यास्ते निरंशकाः।-इत्युपरिलिखित अन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥ .

व्यवस्था-पत्र-संख्या-२३०-१३१ ३६७. पश्चादप्योपधादिना दोपनिहरणे अस्त्येवाशभागिता-इति वीर- मित्रोदयग्रन्थलिखनम् ॥३॥ मृते पितरि न लीवकुष्ठ्युन्मत्त जडान्धकाः । पतितः पतितापत्यं लिङ्गी दायांशभागनः॥ तत्सुत्राः पितृदायांशं लभेरन् दोषन्जिताः इति विवादचिन्ता - मरिण विवादरक्षाकरादिग्रन्थधृतदेवलवचनम् ||४|| औरसाः क्षेत्रवाश्चैपां निर्दोषा भागहारिणः । सुताश्चेषां च भव्या यावनो मर्तृ सास्कृताः ॥ अपुत्रा योपितश्चैपां भर्तव्याः साधुवृत्तयः ।।-इति तत्तद्ग्रन्थधृत याज्ञवल्क्पवचनम् ॥५॥ भरणं चास्य कुरिन् स्त्रीणामाजीवनक्षयात्--इति तत्तद्ग्रन्यधृत- शसवचनञ्चेति ॥६॥ एतदन्दीयमार्चमासीयद्वाविशतिदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे घटिकाद- याधिकयामदयानन्तरं मयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १३१-रोक्कारी मिछिल सदर देओयानी आदालत ओयाक. तारिख १६ माह फिवरेल ई सन १८६२ साल मोतावक ५ फाल्गुण व जलाशन १२३८ साल रोज वृहस्पतिवार श्रीयुत हेनरि सिकिसपीयर साहेब आदालत मजकुरेर बैठके ।। भैरवीदासी चनामे नवकृष्णावसु सायेलार उकिल मुनशी गुलाम आहाम्मद यो तरपछानिर तरफ हइते सदासुखण्डित एक केता कालातनामा दाखिल करिया हाजीर श्राइल । इत पूर्व गत सनेर १ दिसम्बर तारिखे छापलार सोयाल दरपेप हइया फयछला अनुमोदनेर जन्य मुलतवि छिल । तदनुजाइ छापलार दोपरा छओयाल फयछला व्यवस्था-पत्र संख्या-१३१ सम्वलित अनुमोदने सन हालेर५जानेओयारितारिखे एइ विशयेर जोयाव तलव-ये यद्यपि स्यात् फयछला मजकुरेर लिखित विश• यसकल सत्य तवे फयछलार लिखित व्यवस्था अथवा छायेलार उकिरदाखिल कराव्यवस्था दोरस्त वटे। एइआदालतेर पण्डितेर -स्थाने ( जिज्ञासा) हय । तदनुजाइ पण्डितेर जोयाव दाखिल होयाते अद्य छायेलार खाप पापोलेर छोयाल तत्समभिन्या'- हारि कागजात सम्वलित श्रामार बैठके रोवकार हइया छायेलार उकिलेरस्थाने जिज्ञाशा करागेल-ये आसल दस्तावेज नेमपत्र जाहा श्रोछियत नामा छोयाले लिखियाछ, कोन मोकईमाय कोन श्रादालते दाखिल हइयाछिल । जोयाव जेला:--२४ परगणार देशोयाणि श्रादालते मवलग १४८८॥ टाका तालुकातेर हिस्या वावत् ८५६ लम्वरेर मोकमाय, जाहाते नवकृष्णवसु मुद्दाइ श्रो भैरवीदासी मुलेहेम् हिल, दाखिल लिल इति । यद्यपि -स्यात् एइ आदालतेर जोयावे एइ विषय लिखित ये यद्यपि स्यात् फयछलार लिखित छायेलार जोयावर विपयसकल सत्य- हय, तदनुसारे छाएलार दाखिल फरा व्यवस्था शास्त्रानुजाइ दोरस्त घटे। याहाहरक, परे एइ विषय दरियाप्त हयना ये 'फयरलार लिखित छाएलार जोयावर लिसित कोन विषय दोस्त यो सत्य होन सव' छाएलार दाखिल करा व्यवस्था घोरस्त । ताहार प्रति दृप्टे हुकुम हाल ये नेमपत्र दस्तावेज मजकुर एड हुकुमे एइ आदालतेर पण्डित वाहार अनुमोदने उपरेर लिखित विपयेर पष्ट ओसारपोयार एक सप्ताह मध्ये लिखेन, एवं ताहा पाशा पर्यन्त मोकदमा मुलत वि थाके इति ।। श्रीजयतितराम् एतदम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिक्सि गीयरसादेवधर्माधिकरण- लिपि तदन्दीयफेवरवरीमाोयपोडशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूप- है समझारे-या। २. स्प-1 व्यवस्था-पत्र-संख्या-१३१ ३६६ 'पत्रमेयं तन्मम पितनियमपत्रञ्च यत्तददीयमार्चमासीयतप्तमदिनसम्बन्धिबुध. वासरे घटकाचतध्याधिकयामदयानन्तरं मया प्राप्त तदवलोक्य यादश- योधो जातस्तदनमारेगोत्तरं लिख्यते ॥ जयंपनलि ग्वता चिन्या उत्तरपत्र लिग्नितप्रकरणानान्मध्येऽथिन्याः पति- यदि द्वे पल्यौ भैरवोदासीरतमणी दास्यावेवं रजमणीटासीगर्भजाता- नमाचिकित्स्यरोगार्तमेकं पुत्रं क्षेत्रचन्द्रनामानं संरक्ष्य मृतः स्यात् , क्षेमचन्द्रोपि तादृशरोगग्रस्त एव मृत इत्यस्य याजन्माचिकित्म्यरोगात्ते पुत्रे विद्यमाने सत्यथिन्या उत्तरपत्रलिखितस्य तत्सतिकृतस्योसीयच्छन्द- वाचस्य कार्यस्य या एतयोईयोर्चा सत्यत्वे सत्येतद्धम्माधिकरणार्थिनी- नियुक्तोकीनशब्दवाच्यनिविटव्यवस्था शास्त्रसम्मता भवति, शास्त्रानुसारेणा- जन्माचिकित्स्यरोगातपुत्रस्य पितृधनाधिकारिताभावेन तादृशपुत्रे विद्य- माने सत्यप्यनशिस्त्यायोजकदोघशून्यपौत्रप्रपौत्राभावे अर्थिनीतिपल्योर- र्थाभैरवीदासोरतमणीदास्योरेवाधिकारस्तयोयोमध्ये रत्नमणीदास्या मरणे तसक्रान्ततदीयपतिधनांशेऽपि भैरवीदास्या अर्थिन्या एवाधिक रः । श्यथिन्यां विद्यमानायामन्येषां नाधिकारः । पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहि- तत्य द्विपक्षीकस्य मृतस्य धने तत्पन्योः प्रधानाधिकारित्वेन तयोर्मध्ये एकस्याः पत्न्या मरणोत्तरं तत्संक्रान्ततत्पतिधनांशे तत्पत्यु? व्य उत्तरा- धिकारिणस्ते एवाधिकारिणो मवन्ति, तत्पत्यु ? उत्तराधिकारिणां मध्ये पुत्र- पौत्रप्रपौत्राभावे जीवन्त्यास्तापल्याः प्रधानाधिकारित्यात्-इति वङ्गदेश- चलितदायभागश्रीकृष्णतालद्वारकृतदायभागटीकादायतत्त्वदायक्रमसंग्रहवि- यादार्णवसेतुविवादभनार्णवादिग्रन्धानुसारिणो व्यवस्था । अन्न प्रमागम- पतितस्तत्पुनः क्लोकः पङ्गुरुन्मतको जडः ॥ अन्धोऽचिकित्स्यरोगा भर्तव्यास्ते निरंशमाः॥ इत्युपरिलिखित.. 'मन्यवृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥१॥ स्वभागान् यदि दास्ते विकीणीयुरथापि वा। , १. पति याददै पत्यौ-न्यप०।

" व्यवस्था पत्र संख्या-१३१-१३२ कुर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते संपनस्य वै ॥ इति तत्तद्ग्रन्थ धृतनार'वचनम् ॥२॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तया इत्यादि तत्तद्ग्रन्थ तयाश- बल्स्यवचनम् ॥ ३॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । मुजीतामरणारक्षान्ता दायादा ऊर्ध्वमाप्नुयुः ॥ इति तत्तद्ग्रन्थ- भृतकात्यायनवचनम् ॥४॥ अतः पली दुहितरश्चैत्र इत्यादिना ये पूर्व स्याभारे परभूताधि कारिणो निर्दिष्टास्ते यथा पल्यधिकारप्रागभावे गृह्णयुस्तथा आताघि-- कारायाः पल्या अधिकारप्रध्यसेऽपि भोगावशिष्टं धनं गृहीयुः-इति दायभागग्रन्थ लिखनश्चेति ॥५॥ एतदन्दीयापरेलमासोयाष्टादशदिनसम्बन्धिबुधवासरे भयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण लं०२- ६.१३२ सहर ढाकार देओयानि आदालतेर पण्डित श्रीयुत दिगम्वर तर्कवागीशभट्टाचार्य स्थाने प्रश्न एइ भोलानाथराय- फैगदी- मृत रामस्मरण रायेर खी श्रीमतिसायित्रा श्री गोपालकृष्ण श्रो मदनमोहनसिंह ओ मृत काशीचन्द्रसिंहेर स्त्री- श्रासामीयान् ।। सावित्रार विक्रि १४॥-) क्रान्ति हिस्या जमिदारिर को- याला असिर्द्ध फरिया ताहा दखलं पाओयार मकर्दमा-- हिन्दु एक व्यक्ति वैद्य जाति प्रापन वी श्री ततगर्भजात नावालग प्रश्रो द्वितीय स्त्रीर पुष्यपुत्र राखिया मृत्यु हय, ओ ऐ .

+ व्ययस्था-पत्र-संख्या-१३२. ४०१ स्त्री यो पुष्यपुत्र दुइ पुत्र छोलानामा अर्थात विरोध मञ्जनीय पत्र द्वाराय ॥-३१ क्रान्ति हिस्या ऐ अप्राप्तव्यवहार पुत्रेर सत्त ओ। हा- क्रान्ति हित्या ऐ पुष्यपुत्रेर सत्त हझ्या ऐ अप्राप्त- व्यवहार पुत्रेर सत्त ताहार मान एक्तारे छिलो, ऐ नावालग पुत्रेर मृत्युर पर ऐ अविरा स्त्री सावित्रा अर्थात् नावालगैर माता सेइ- दरवस्त ।।१३। दस पाना सोया तेरगण्डा एक कान्ति हिस्या ऐ पुष्यपुनेर अनुमति व्यतित विशेषकरण विना अन्येर निकट विक्रि करिते पारे कि ना। ओ यदि सेइ दरवस्त मिलकियत विक्रि करिये काशीते थाकिये दिनपाव करे, 'ओ पुष्यपुत्र' विक्रि श्रसिद्धर जन्ये ऐ मिलकियत दखल पाओयार प्रार्थनाय श्रादालते यादि हय-एमत विशयेते विक्रि असिद्धेर हुकुम श्रादालत हइते इइले पर ऐ पुष्यपुत्र विमातार जिवमाने विरोधि मिलकियतेर उपर दखल पाइते पारे कि ना ।। द्वितीय- यदि ऐ हिस्या विकिर पर पुष्यपुन ऐ विमातार असङ्गत प्रकरण अर्थात छेनाला कम्म हाकिमेर निकट प्रकाश करिया वादि हए ओ ताहा सावुद ना हइया डिपमिप हइले सेइ दत्तकपुत्र पितृमातृवस्तु पाइते पारे कि ना, अर्थात् विमातार प्रति एमत '. अत्युक्ति दर्तक सत्ते हक पाओयार निषेध य कि ना । ए सकल विपयेर उत्तर एतद्देशीय चलित दायभाग प्रभृति शास्त्र सम्मत सप्ताहेर मद्ये लिखेन । इति सन १२३८ साल, तारिख २८ श्रावण मौं० शन १८३१-१२ श्रागस्त । समागतपारष्यस्वकारिसंवलितप्रश्नपत्रावलोकनात् याशयोपोजात- • स्तदनुसारेण भाषया सुखबोधार्थमुत्तर लिख्यते ।। प्रथम प्रश्नेर उत्तर- अप्राप्तव्यवहार ईशानचन्द्रेर जननी सावित्रा आपन पति' रामशरणरायेर मृत्युर पर पतिर स्थावर वस्तु दत्तकरूप सपत्नीपुत्र १.पुच पुत्र-व्यप। २. भाशया-व्यप०।

४०२ व्यवस्था-पन्न-संख्या-१३२ भोलानाथगयेर सहित उभयतो यथाशाख लिपि द्वारा तृतीयांशेर एकांश । ६॥ दत्तकपुत्रके दिया आपन अप्राप्तव्यवहार पुत्रेर स्वत्वास्पदीभूत दुइ अंश -१३- निजाधिकारे अर्थात प्रापन एक्कारे राखिया ऐ अप्राप्तव्यवहार पुत्रेर मरणानन्तर अवीरा सावित्रा यथाशास्त्र स्वपुत्रघने अधिकारिणी हया ऐ विभक्त समात स्थावर वस्तु विसिष्ट कारण बिना ऐ दत्तकपुनेर अनुमति व्यतिरेक विक्रय करिते पारे ना। यदि ऐ तावत वस्तु विक्रय करिया सावित्रा काशीते थाकिया काल यापन करिते थाके, ऐ दत्तकपुत्र ऐ विरोधि विक्रीत वस्तु विक्रय असिद्ध हइया अापन अधिकार अर्थात दखल पाओयार प्रार्थनाय प्रतिधादि हय, राजाता द्वारा अर्थात् आदालतेर हुकुम मते विक्रय असिद्ध हय, तवे विमाता सावित्रा वर्तमान पर्यन्त ऐ विरोधि विभक्त वस्तुते सावित्रा विना दत्तकपुत्र अधिकारि अर्थात दखल पाइने पारे कि ना इति ।। शत्र प्रमाणम्- अपना शयनं मनः पालयन्ती व्रते स्थिता । मुभीतामरणात् क्षान्ता दायादा ऊर्ध्वमाप्नुयुः ॥ इति कात्यायन- चनात् ॥ स्वीपो स्वपतिदायस्तु उपभोगफलः स्मृतः । नापहारं त्रियः कुर्यः पतिदायात कथञ्चन ।।-इत्यादि वचनम् ।। द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- ऐ अंश विक्रय करणेर परे दत्तकपुत्र विमातार उपपति व्यभिचारादि दोप. राजधानीते प्रकाश करिया प्रतिवादि हय, ताहार प्रमाण ना होयाते राजविचारे ऐ दोष मिथ्या हइया मकईमा डिमिप हय । एमत मातृद्वेष्टा दत्तकपुत्र कोनो मते विमातार धने अधिकारी हइते पारे ना । यद्यपि औरस पुत्र द्वेष्टा इइया मातर यथार्थ व्यभिचारादि दोप कोनो स्थाने प्रकाश करे 'तवे सेइ पुग्न मातृधनेर अधिकारी हय ना । दत्तकादिर पाओनेर .

व्यवस्था पत्र-संख्या-१३२-१३३ ४०३ विषय कि। केन ना तावत शास्त्रे लिखित आछे-ये पितृ-मातर यथार्थ दोप पुने सर्वतो भावे गोपन फरिवेक । इहाते विद्रुप करिया यदि पित-मातर मिथ्या दोप, याहाते अत्यन्त अपमान अव्यवहाय्य॑त्वादि दोष हय, इहा राजद्वारे प्रकाश करिले, सेइ पुत्र पितृमातृधनेर अधिकारि कोनो मते नहे, विशेषत दायभागेर लिखित धनप्रहण धनस्वामिर ऐहिक पारनिक उपकार कम्मर वेतन स्वरूप ताहा, ना करिया, तद्विपरीत विद्वेपादि करिने सुतरा अनधिकारी य-इति दायभागादिशास्त्रसम्मता व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- पितृद्विट पतितः परडो यश्च स्यादीपपातिकः । औरसा अपि नेतेशं लभेरन् क्षेत्रजाः कुतः।। इति व्यासवचनम् ।। गोपयेज्जन्म नक्षप्नं धनसारं गृहे मलम् । प्रभोरप्यवमानञ्च तस्य दुश्चरितञ्च यत् ।। कोऽर्थः पुत्रेण जानेन यो न विद्वान पार्मिकः । इत्यादिवचनम् ।। पुनाम्नो नरफाद् यस्मात् त्रायते इत्यादि (वचनेन ) पुत्रकर्तृ फतया महाफलश्रुतेः । तत्कर्मवेतनं घनसम्बन्धित्वम् । अतस्तदकुळतः कुतो वेतनम्-इति दायभागः। शन १८३१ साल २५ श्रागष्ट ।। श्रीईश्वरो जयति श्रीदिगम्बरशमण: १३३-सहर ढाकार देयानि आदालतेर पण्डित श्रीयुत दिगम्वर तर्फवागीश भट्टाचार्य स्थाने प्रश्न एइ ये- लं० ४६२ भोलानाथराय फैरादरी शावित्रा श्री गोपालकृष्णसिंह ओ गयरह आसामीयान- प्रथम प्रश्न- पूर्व प्रश्न व्यवस्थापत्रे एमत वोघ हय ना ये मातार व्यभिचा-' . ४०४ . व्यवस्था पत्र-संख्या-१३३ . रादि दोप प्रकाशे पितृधन पाइते पारे ना । श्रतएव लिसा जाइते- छे ये मात्र असद्गत प्रकरण प्रकाशे पितृवन्तु पात्रोयार निषेध कि ना-एहार व्यवस्था शास्त्रानुसारे परस्यु दिवस मिटिलेर शमय लिखिया पाठाएन । द्वितीय- पितृमातृदोप प्रकाशे ये पितृमातृधनेर अधिकारि नहे, एम- त व्यवस्था लिखिया ताहार निचे व्यासवचन प्रो दायभागवचन ये लिखा गीयाछे ताहार अर्थ जथार्थ वाङ्गलाभापाते लिखिया परस्यु दिवस मिछिलेर समय दाखिल करेण, गौन ना हय । इति शन १२३८ तारिख १२ भाद्र वागलार आगरेजी शन १८३१- २७थागस्त। समागतपारुष्यरूवकारिसंवलितप्रश्नपत्रावलोकनात् यादृशनोधो बात- स्तदनुसारेण भापया मुसबोधार्थमुत्तरं लिख्यते ॥ प्रथम प्ररनेर उत्तर- मातृव्यभिचारादि दोप प्रकाश करिले पितृधन पुग्ने पाओनेर वाघा नाइ। पूर्व पश्ने लिखित मातृधन पाइते पारे ना-इति । द्वितीयप्रश्नेर उत्तर- पितृमातृदोपप्रकाशे पितृमातृधने अधिकारी नहे । ताहार प्रमाण ये व्यासवचन पितृद्विट् इत्यादि । ताहार अर्थ-एइ पितृद्वेष्टा जीवद्दशाते वाक्य द्वारा किम्वा आघात द्वारा अपमान करे एवं मृत्यु हइले श्राद्धादिते वैमुख हय, पतित, अव्यवहार्य, श्रो पण्ड, नपुंसक, प्रोपपातिकः उपपातकयुक्ता-एरूप श्रीरस पुन पितृधने अधिकारी हइते पारे ना, मुनरो क्षेत्रज दत्तकादि अधि- कारी नहे ॥ द्वितीय विष्णुधर्मोत्तरवचन--गोपयेजन्म नक्षत्र- इत्यादिर अर्थ-जन्मनक्षत्र, धनसार श्रेष्ठवन, गृहमल गृह- छिद्र, प्रमु-पितृ-मातृर अपमान, भारताहारदिगेर दुष्कर्म गोपन करिवेक । मिहशदे ओ प्रमुशन्दे पिता माता दुइ। इहार प्रमाण दायभागादि अनेक शास्त्रे पाछे। कोऽर्थः पुत्रेण इत्यादि वचनेर , व्यवस्था-पत्र संख्या-१३३-१३४ ४०५ अर्थः ये पुत्र धार्मिक प्रो विद्वान् ना हय, से पुत्रे कि प्रयोजन पाछे, अर्थात् धनि व्यक्तिर उत्तराधिकारीधनिर द्वेष्टा हइले ताहार धन पाइते पारे ना । इहार प्रमाणः एकत्र निर्णीतः शाबार्थः याधकं विना अन्यत्रापि कल्प्यते इति दायभागादिशास्त्रसम्मता व्यवस्था । इति सन १८३१ साल तारिख २६ श्रागष्ट । श्रीईश्वरो जयति श्रीदिगम्बरशर्मणः . नं०४६२- १३४-मृत रामस्मरणरायेर पुष्यपुत्र भोलानाथराय-फरादी ऐ मृतव्यक्तिर स्त्री सावित्रा ओ गोपालकृष्ण सिंह ओगयरह- आसामीयान्। सदर देशोयानि पादालतेर पण्डितदिगेर स्थाने प्रश्न एइ । एइ आदालतेर प्रश्न जाहा सहर आदालतेर पण्डित श्रीयुत दिगम्वरतर्फवागीशभट्टाचार्य निकट पाठान गियाछिल, ओ भट्टाचार्य ये उत्तर श्री वचनेर अर्थ लिखियाछेन, ताहा पाठान जाये । यथाशास्त्र कि ना, एवं वचनेर अर्थ ये पण्डित लिखियालेन ताहा यथार्थ कि ना, एवं यदि व्यवस्था यथाथे, श्रो बचनेर अर्थ पागडतेर व्यवस्थार अक्य ना हय. तवे ऐ प्रश्नेर यथाशास्त्र व्यव- स्था श्रो वचनेर यथार्थ अर्थ लिखिया पाठाएन । यदि एक व्यक्ति वैद्यजाति, आपन वित्त राखिया मृत्यु हय, आ सेइ वित्त प्रथम श्रीर पुष्पपुत्र ो वर्तमाना द्वितीय स्त्रिर गर्भजात पुत्र मध्ये दुः अंश, एक अशमते अंशजात हइया, औरस पुत्रेर दुइ अंश ताहार अप्राप्तव्यवहार निमित्तक श्रो पश्चात् ताहार मृत्यु होते आपन मातृ एतारे छिलो, एमत वित्त शास्त्रानुसारे ऐ पुष्यपुनेर मातृवित्त, कि पितृवित्त हय, इदार उत्तर लिखिया पाठाएन इति । सन १८३१ तारिख २६ आगस्त मो० वी० शन १२३८ तारिख १४ भाद्र ।

. ४०६ व्यवस्था पसंख्या-१३४ श्रीजयतितराम 'प्रमुसमर्पितप्रश्नपन व्यवस्थापनद्वयञ्च यदङ्गरेजीशब्दप्रतिपाद्यक- विशदधिकाष्टादशशताब्दीयसितम्बरमासीयोनविंशतिदिनसम्बन्धिसोमवास - रे घटिकाद्वयाधिकयामदयानन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य याशयोघो- जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते ॥ प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- जाहाङ्गोरनगरसम्बन्धिको पीलाख्यधर्माधिकरणीयप्रश्नयोरुत्तरे सहर जिलाख्यावान्तरधर्माधिकरणनियुक्तपण्डितेन दिगम्बरतागोशभटाचा- येण लिखिते यथाशास्त्रे एव । एवं तत्प्रमाणीभूतवचनानामी अपि तत्पण्डितलिखिता यथार्थ एव । किन्तु अहरेजीशन्दप्रतिपाद्यक- त्रिशदधिकाष्टादशशताब्दीयागस्तमासीयोनत्रिंश दिनलिखितप्रथमप्रश्नोत्तरे व्यभिचारादिदोषप्रकाशकरणे सति पितृत्वत्यास्पदीभूतधनमाप्तेबाधो न भवति पुनस्येति यल्लिखित तत्राय विशेषो मिथ्याभूतमातृव्यभिचारादि- दोपप्रकाशकत्तुं पुत्रस्यातीव निन्दितरवेन मातश्च पित्रपेक्षया सहसगुणाधिक मान्यत्वेन च पितृदोषप्रकाश विनैव मातृव्यभिचारादिदोषप्रकाशेनैव- पितृदोषप्रकाशकर्त्तः पुत्रस्याकृतयथाशास्त्रप्रायश्चित्तस्योत्तराधिकारित्वेन कस्यापि धनग्रहणाधिकारित्वस्य योग्यता न भवतीति ॥ अत्र प्रमाणम्- उपाध्यायादशाचार्य प्राचार्याणां शतं पिता । सहस्रन्तु पितुर्माता गौरवेणतिरिच्यते ॥ गर्भधारणपोषाभ्यां तेन माता गरीयसी। हत्यादि श्रीकृष्णतकोल- द्वारकृतदायभागटीकादिग्रन्थलिखितमनुवचनम् ॥१॥ पितृपल्य. सळ मातरस्तमातरो मातुलास्तद्भगिन्यो मातृत्वसार- 'स्तदुहितरश्च भगिन्यस्तदपत्यानि भागिनेयान्यन्यथासङ्करकारिणः स्यु- रिति प्रयोगतरवादि उद्वाहतत्त्व पृ० ११८ ग्रन्थधृतसुमन्तु(वचनम् ।।२।। १. मुषित-व्यप।

" ... व्यवस्था पत्र संख्या-१३४-१३५ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- यद्येकः कश्चिद् वैद्यजातीयो व्यक्तिविशेषः स्वस्पत्यास्पदीभृतधनं संरक्ष्य मृतः स्यादय च तदेव धनं तस्य प्रथमपदीपोष्यपुत्रवतमानद्वितीयपनीगर्भज- पुत्रयोर्मध्ये विभागेन अंशद्वयमौरसपुत्रस्यैकोऽशः पोष्यपुत्रस्येति । तत्रौरस- पुत्रस्यांशद्वयं तस्याप्रासन्यवहारत्वेन पश्चात्तन्मरणेन च स्वमातुरायत्तं भवति । 'एतादृशं धनं यद्यपि पोष्यपुत्रस्य पितृधनमभूत्, किन्तु पश्चाद् भ्रातृस्वत्वारप- दीभूतत्वेन भ्रातृधनं तन्मरणात्तन्मातृसंक्रान्तत्वेन च तन्मातृमरणानन्तरं मातृसंक्रान्त भ्रातृधनं भविष्यतीति ॥ अगरेजीशब्दपतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयफेवरवरीमासीय. प्रथमदिनसम्बन्धित्रुधवासरे मयेदमुरारं दत्तमिति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण १३५-यद्यपि पितृव्य श्रो भ्रातुष्पुत्र पैतृक साधारण स्थावर एवं अस्थावर वस्तु वण्टकेर विवाद उपस्थित हइया सालिपेर निकट तावत वस्तु उत्तरकाल अश करिया लोनेर लिखित पठित हइया थाके, फिन्तु तदनुसारे कोन वस्तु चिह्नित एवं नाम पृथक, अर्थात् जमिदारि आदिर नाम खारिज, ना हइया सकर भूम्यादीर कर प्रदानेर निमित्त महाल खण्ड विलिमते उभये ओसुल तहसील करिया उभये साधारणे राजकर प्रदान करिया थाके, ठाकुरसेवा ओ वागान ओ चाटीदिगर तावत वस्तु साधा- रणे राखिया ऐ भ्रातुप्पुत्र आपन पितृव्य एवं खी वत्तेमाने . लोकान्तर हइया थाके, तवे मिताक्षराप्रन्थ मते ऐ मृत व्यक्तिर ऐ सकल वस्तुर उत्तराधिकारि ऐ स्त्री किम्वाऐ पितृव्य हइवेक इति ॥ श्रीजयतितराम प्रमुसमर्पितप्रश्नप्रतिरूपपत्रं तत्सम्पीयायशिष्टपत्रचतुष्टयं च यदेत. दन्दीयजानवरोमासीयोनविंशतिदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे घटिकाद्वयाधिक .. . व्यवस्था पत्र-संरया-१३५ यामद्वयानन्तर मया प्राप्त तदलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेगोचर लिख्यते ॥ यदि कश्चित् पितृव्ये विद्यमाने स्वपल्ल्याञ्च विद्यमानाया मृतः स्याचदा प्रश्नपत्र लखितप्रकारक्वृतान्द सति मितादरादिग्रन्थमते तस्यैव मृतस्य त्याधने तस्य पुत्रपौत्रप्रपौत्रामा तत्सल्येवाधिकारिणी भवति । पल्याश विद्यमानाया तत्पतृव्योऽधिकारी भवितुं न शक्नोति । प्रश्नपत्रलिसितेन घराजकरस्थावरादेः करप्रदानार्थ पृथक् पृथक् सराजकरस्थावरखएहस्य निर्देशन द्वाभ्या करमहणं कृत्वा ताम्या दाम्या साधारण्येन राजकरो दत्तः स्यादित्यनेन विवादास्पदीभूतधनविभागस्य शास्त्रानुसारेण निम्पत्यूहत्वात् । मिताक्षरादिग्रन्यलि सतस्य विभागशब्दार्मस्यैतद् व्यवस्थाया अधोलिखित तृतीयप्रमाणे स्पष्टीकृतत्वाच्चेति मिताक्षरादिप्रन्यानुसारिणी व्यवस्था ।। अत्र प्रमाणम्- पली दुहितरश्चैव पितरौ भातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः-इत्यादिमिताक्षरादिप्रन्यधृतयाशवल्क्य वचनम् ॥२॥ पली गृहीयात्-इत्येतद्वचनजात विभक्तमातृतीविषयम् इति मिता पग्रन्थलिखनम् ॥२॥ विभागो नाम द्रव्यसमुदायविषयाणामनेकस्वाम्यानान्तदेकदेशेषु व्य- वस्थापनम् इति मिताक्षरामन्यलिखनम् ॥३॥ दानग्रहणपश्यनगृहक्षेत्रपरिमहाः। विभक्तानां पृथगज्ञेयाः पाकधर्मागमव्ययाः ॥ इति वीरमित्रोद- यादिग्रन्थधृतनारदवचनम् ॥४॥ साक्षित् प्रातिभाव्यं च दान ग्रहणमेव च । विभक्ता मातरः कुर्यु विभक्ताः कथञ्चन ॥ इति तचद्मन्यधृत, नारदवचनम् ॥५॥ येपामेताः किया लोके प्रवर्द्धन्ते स्वरिस्थतः । विभक्तानवगच्छेयुर्लेख्यमप्यन्तरेण तान् ।। इति तत्तद्गन्यधृत- नारदवचनञ्चति ॥ ६॥ + व्यवस्था पन-संख्या-१३५-१३७ - ४०६ एतदन्दीयापरेलमासीयद्वादश दिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मयेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण " . For १३६ इ सन १८३२ साल तो २५ फेपरेल- कोटेर पण्डितेर द्वाराय अवगतो हइवेन ये पागचे ब्राह्मण गगाजलले सगुण करिते मुक्त हइते पारे किना, श्रार यदि स्यात् सगुण करे तवे ताहार धर्मे हाइन हइते पारे किना ।।- श्रीजयतितराम प्रमुसमर्पितप्रश्नप्रतिरूपपत्रमवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- वागचीयापनामकब्राह्मणजातीयो गङ्गाजलेन शपथकरणस्य योग्यो न भवति । यदि च तेन गङ्गाजलेन शपथ क्रियते तदा तस्य धर्महानि भवत्येवेति शास्त्रानुसारिणी व्यवस्थेति- अन प्रमाणम्- यथा गणोदक तोय गोमय गा तथा द्विजम् । असत्य वापि सत्य वा स्पृष्ट्वा दिव्य करोति य ।। निकोटिकुलसयुक्ता रोरव नरक व्रजेत् । कर्ता कारयिता भद्रे तथैव नरक प्रजेत् ॥ इति गायनीतन्त्रधृत (पृ. ४४)महादेववचनम् ॥ १॥ श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण १३७ सदर देओयानी आदालतेर पण्डितेर उपर सोयाल- सोल- यद्यपि मृत राजा चित्रसेनेर खी राणी इन्द्रकुमारी अधीरा व्यवस्था पत्र संख्या-१३७ ४१० आपन ओयारिप अर्थात् आपन स्वामीर भ्रातार पौत्र महाराजा तेजचन्द्र वाहादुरेर वर्तमाने सुपरेम कोटेर श्रादालतेर सरचार देना दान अर्थात् दाइक हइया सुपरेम कोटेर देना खरचा प्रादाय- कारण आपन दखली चित्रसेनेर स्यज्य फोन वागान विक्रय करिया थाके तवे शास्त्रानुसारे ताहा सिद्ध हय किना। एवं यद्यपि मुद्दइ • महाराजा तेजचन्द्र याहादुरेर महर करा लिपिद्वाराय राज्ञा चित्र.. सेनेर स्त्री इन्द्रकुमारीर प्रति उपरेर लिखित वाग्गन विक्रयेर ओ हस्तान्तरकरणेर क्षमता वोध हय, सेमते ओ वागान मजकुरान् विक्री सिद्ध हय किना इति ।- श्रीजयतितराम् प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदरेजोशब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशता- 'दीयमार्चमासीयद्वितीयदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकाद्वयाधिकयामद्या- नन्तरं मया प्राप्तं तदरलोय यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते ॥ यद्यपि मृतस्य राशश्चित्रसेनस्यावोरया पल्या राश्या इन्द्रकुमा- स्वपतिभ्रातृगोत्रे महाराजलेजश्चन्द्ररायबहादुराख्ने स्थानन्तरोत्तराधिकारिणि विद्यमाने सति सुप्रीमकोटपिघम्माधिकरणव्ययग्रस्तया तया तदर्माधि- करणज्ययपरिशोधनाथ राजश्चित्रसेनस्य त्यतः स्वायत्तीभूतः कश्चिदा. रामो विक्रीतः स्यात्तदा शास्त्रानुसारेण तादृशविक्रयः सिद्ध्यति, पुत्र-पौत्र- प्ररोवरहितस्य मृतस्य धने उतराधिकारित्वेनाधिकारियाः पल्या अापन्नि- वारणार्थम् श्रावश्यककार्यान्जराथं च तत्तत्कायोंरयुक्तस्य तदनेविक- यस शास्त्रानुसारेणाधिकारित्वात् । एवं ययार्थिनो महारावतेजश्चन्द्र- वहादुपस्यस्य मुद्रातिलिरिद्वारेण राजश्चित्रसेनस्य पल्या इन्द्रकुमार्ण उपरलिखितारामाणां विक्रयप्रकारेण प्रकारान्तरेण वा हस्तान्तरकरण- क्षमताया बोधो भवति, तथापि तेशामायमायां विक्रयः सिद्ध्यति, उत्तराधि: कारित्वेन पातानपत्यातिवनया पल्या कृतसोत्तराधिकारिसम्मत्या प्रश्न: पत्रलिखितप्रकारकापनिवारकावश्यकव्यसारिशोधनाय तदुरयुकप्रतिबनविः कायस्थ सिद्धेनिपासूदवात्-इति वदेश वलितदायभागोकृष्णतील. - व्यवस्था पत्र-संख्या-१३७-२३८ द्वारकृतदायभागटीका-दायक्रमसंग्रह-व्यवहारतत्त्व-भारदस्मृति-विवादार्णव सेतुविवादमार्णवादिनन्थानुसारिणी व्यवस्था ।। अत्र प्रमाणम्- पली दुहितरश्चैव पितरो' मातरस्तथा। तत्सुतो गोजो बन्धुः- इत्याद्युपरिलिखितमन्यतयाज्ञवल्क्य- . वचनम् ॥ १॥ कुटुम्बार्थमशक्ते तु गृहीतं व्याधितेऽथवा । उपमवनिमित्तं च विद्यादापत्कृतञ्च तत्-इति व्यवहारतत्त्वादि- ग्रन्थधृतकात्यायनवचनम् ॥२॥ स्त्रीकृतान्यप्रमाणानि कार्योण्याहुरनापदि । विशेपतो गृहक्षेत्रदानाघमनविक्रयाः ॥ इति एतान्यपि प्रमाणानि मर्ता यद्यनुमन्येत इति च नारदस्मृत्यादि- अन्यधृतनारदवचनम् ॥ ३॥ तया च भर्ता जीवन् यथा यस्य पोपणादिकं यधना कर्म करोति मृतभर्तृकापि स्वशक्त्यनुसारेण तथैव तस्य पोपणं तय कर्म कुर्वीत । इति विवादमझार्यवान्यलिखनश्चेति ॥ ४॥ अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयमेइमासीयसप्तदशदि - नसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मयेयं व्यवस्था दचेति । श्रीडर्नयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १३८-अशेपः शास्त्राध्यापक भील श्रीयुक्त सदर देशोयानि आदालतेर पण्डितजन सफल सोल- एक व्यक्ति रामकान्त भट्टाचार्य नामे छिल । ऐ रामकान्तेर तिन पुत्र रामजय ओ कालीप्रसाद श्री रामसुन्दरभट्टाचार्य हइयाछिल । ताहार मध्ये कालीप्रसाद निःसन्तान, भार रामजय . ।

४१२ व्यवस्था-पन्न-संख्या-१३८ एक कन्या लो एक खीऐ वीर गर्भे एक पुत्र राखिया आपन पिता ऐ रामकान्तभट्टाचार्येर वर्तमाने फौत् करे। तदपरे रामजय भट्टाचार्येर पुत्र भूमिष्ट हइले किछु काल गते रामकान्तभट्टाचार्य एक पुत्र, अर्थात् ऐ राममुन्दरभट्टाचार्य ओ एक पौत्र अर्थात् ऐ रामजयेर पुत्रके ओयारिप एवं किछु भूम्यामि राखिया फोत् करे, पार ऐ सकल भूम्यादि रामसुन्दरभट्टाचार्य आर ऐ रामजयेर पुत्रेर एजमालि दस्यले थाके । तस्य परेरामजयेरपुत्र प्रापन माता ओ भग्नीर सन्मुखेते अष्ट वत्सर वयः क्रमे फौत् करे । उहार फौतेर पर ताहार माता, अर्थात् रामजयेर स्त्री, प्रापन ऐ एक कन्याके राखिया फीत् करे। ताहार पर रामजयेर कन्यार तिन पुत्र सन्तान हय । ऐ तिन पुत्रर मध्ये एक पुत्रेर प्राप्त हइयाछे, एक्ष्यने दुइ पुत्र वर्तमान आछे। तदसेत्ताय रामसुन्दरभट्टाचार्य आपन• पिता, रागकान्तभट्टाचार्य, श्रो पापन मातार श्राद्धादि करिया एवं स्थावर वस्तुते दखिलकार थाकिया आपन नावालग दुइ पुत्र भार एक स्त्री अर्थात् ऐ नावालगेरदिगेर माताके राखिया फोन करे। एक्ष्यने रामसुन्दरभट्टाचाय्यर ऐ श्री श्री नावालग दुइ- पुत्र वर्तमान पाछे एमते रामजयभट्टाचार्येर ऐ कन्यार दावि रामजयेर हिस्यार भूम्यादिर प्रति अशें किना। यदि स्यात् अर्शाय, तये ताहार दावि ऐ रामकान्तभट्टाचार्येर भूम्यादि वस्तुर प्रति कि आन्दाज अर्शाइते पारे इति । शन १८३२ साल तारिख १६ जानेओरि मतावक सन १२३८ साल तारिख .७ माघ-10 प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदगारेजीशब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशता. न्दीयमार्चमासोयदितीपदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे घटिकादयाधिकयामदया- .: । नन्तरं मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृराबोधो जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते । प्रश्नपत्रलिखितप्रकारकचान्ते सति रामजयभट्टाचार्यस्य दुहितुरयोगो रामजयभट्टाचार्ययोग्याशभूम्यादिकं प्रति भवत्येव १, समामि-यप.1 यतएव रामजय- व्यवस्था पत्र-संख्या-१३८ ४१३ भट्टाचार्यस्य पिन् रामकान्तभट्टाचार्यस्य स्वत्वास्पदीभूतभूम्यादिधनादाश- परिमितमम्यादिधनं प्रति तादृशाभियोगोऽयुक्तः, यतो रामकान्तभट्टाचार्यों रामसुन्दरभट्टाचार्यनामानमेकं पुत्रमेकच पौत्रमबीवति पितरि मृतत्य रामजयमट्टाचार्यस्य स्वकीयज्येष्ठपुत्रस्य पुत्रश्च संरक्ष्य मृतः । श्रतएव राम- कान्तभट्टाचार्यस्य मरणानन्तरं तत्यक्तघने शास्त्रानुसारेण तदानी विद्य- मानयोः पुत्रपौत्रयोरेव तुल्याधिकारः, रामकान्तभट्टाचार्याख्ये पितरि जीवति सति अनपत्यस्य मृतस्य कालोपसाभट्टाचार्यस्य तद् द्वितीयपुत्रस्य पैतृका- दिधने स्वत्वानुत्सादात् । एवञ्च सति रामकान्तभट्टाचार्यस्य पौत्रो यदि स्व- जननी स्वभगिनीं चैको संरक्ष्यानपत्य एव मृतः स्यात्तदा तत्त्यधने अर्थान्मूल पुरुषस्य रामकान्तभट्टाचार्यस्य त्यक्तधनाद्धाशे तन्मातूरर्थात् राम- जयभट्टाचार्यस्य पन्या एवाधिकारः तस्याञ्च मृतायां तत्संक्रान्तस्वपुनधने तत्सुत्रस्य ये उत्तराधिकारिणस्त एपाधिकारिणो भवन्ति । तत्र रामकान्त- भट्टाचार्यपौत्रस्य स्वपुत्रमारम्य स्वपितुःप्रपोत्रपर्यन्तरहितस्य मृतस्य भगिन्याः कश्चिदेकोऽपि पुत्रस्तन्मात्मरणसमये गर्भे व्यवस्थितो भूमिठो या यद्यासीत दा तस्याधिकारः जाते' च तस्याधिकारे पुनरुत्पत्त्यमानानां तद्भावन्तराणा मर्यादामकान्तभट्टाचार्यपोत्रस्य पितृदोहित्रान्तराणामप्यधिकारः समान एवं भविष्यति । सति च रामकान्तभट्टाचार्यपौत्रस्य पितृदौहित्रे तपितृव्यपुत्रा- यामर्थात् राममुन्दरभट्टाचार्यस्य पुत्राणां प्रश्नपत्रलिखितानां नाधिन कारः । यदि च रामकान्तभट्टाचारपौत्रस्य स्वपुत्रमारभ्य स्वपिनुः प्रपौत्र• पर्यन्तरहितस्य मृतस्य भगिन्याः कश्चिदेकोऽपि पुत्रस्तन्मातृमरणसमये गर्ने व्यवस्थितो भूमिष्ठो वा नासीत्तदा तसितुदौहित्राणा स्वस्वान्यथानुपपल्या तद्- भगिन्यास्तपितृदौहित्रोत्पत्तिमूली'भूतायास्तत्सम्बन्धमूलीभूतायाश्च स्वपुत्री- सत्तेः प्राक्कालपर्यन्तं यया पुत्रादिपनीपर्यन्तरहितस्य मृतस्य पितुर्द्धने दुहितु. रधिकारस्तथा भ्रातृधनेऽप्यधिकारः। सति च रामकान्तभट्टाचार्यपौत्रस्य पितृ- दौहित्रे स्वतः तत्पितुः पार्जशाद्धपिण्डदातरि स्वतस्तपितुः पार्वणश्राद्ध- पिण्डदानानशिकारिण्यास्तद्भगिन्या नाधिकारः। किन्तु तस्याः पुत्रस्यैव, पुत्रा- १.तर-ज्यप०। २. याते-ज्यप। ३.०मूलि०-व्यप व्यवस्था-पत्र संख्या-१३८ णां वोपरिलिखितमकारेणाधिकार-इति यशदेशचलितदायमागश्रीकृष्ण- वर्कालकारकृतदायभागटीका-दायतत्त्वदायक्रमसंग्रह विवादमगार्यवादिन- म्यानुसारिणी व्यवस्था . अनप्रमाणम् अविमक्ते मृते पुत्रै तत्सुतमुक्यमागिनम् । कुव्वीत जीवनं येन लब्धं नैव पितामहात् ॥ लभेतोशं स्वपित्र्यन्तु पितृव्याचस्य वा सुताव-इवि दायतत्व- विवादमार्णवादिग्रन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥१॥ यथा पैतामहे धने पितुः स्वाम्यं तथैव तस्मिन्मते तसूत्राणामपि,न तत्र सविकर्षविप्रकर्षाभ्यां कोऽपि विशेषः । पार्वणविधिनापि पिण्डदानेन दयोरपि तदुपकारकत्वाविशेषात्-इति दायभागग्रन्थलिखनम् ॥२॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः।-इत्यादितत्तद्मन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम्॥३॥ पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्ताभावे पितृदौहित्रस्याधिकारो बोदव्यो घनिदौहि- त्रस्येव-इति दायभागग्रन्थलिखनम् ॥ दृश्यादा तद्विभागः स्यादायव्ययविशोधितात्-इति वचद्ग्रन्य- घृतयाज्ञवल्क्यवचनम् । तदभावे पुनः पितृदौहित्रः इति । तदभावे पितामहस्तदभावे पितामही सदभावे पितुस्सोदरस्तभावे पितुबैमात्रेयस्तदभावे पितृसोदरपुत्रपितृवेमा- प्रेयपुत्रः- इत्यादि च श्रीकृष्णतालझारक्तदायभागटीकालिखनम् ॥६॥ यद्यपि दुहित्रमावे दौहित्रस्येव भगिन्या एव प्रागधिकारो युक्तस्तथापि तस्याः खीत्वेन पार्वणपिण्डदत्वामावानाधिकारः। दुहितुस्तु दौहित्राद पूर्वमहादशात् सम्भवति इत्यादिविशेषवचनादेवाधिकारः इति भावः इति श्रीकृष्णतालङ्कारकृतदायभागटीकालिखनञ्चेति ॥७॥ १. अविनोनुबे प्रेते-कास्मृ । ।

व्यवस्थापन संख्या-१३८-१३६ ४१५ अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयमैमासीयचतुर्दियश- तिदिनसम्वन्धिबृहस्पतियामरे मयेयं व्यवस्था दतेति ।। श्रीजयतितराम् , श्रीवैद्यनाथमिश्रेण. - १ सदर देयोयानि श्रादालतेर रुवकारि इङ्गारेजी सन १८३२ साल तारिक २३ माह फेवेओयारि मोतावक वागला १२३८ साल १२ माह फाल्गुन रोज बृहस्पतिवार ए आदालतेर हाकिम विचा- रड प्रोग्रालपोल साहेवेर बैठके- महाराजा गोविन्दनाथराय- पापीलाण्ट- गुलालचन्द्र ओरफे नानका वावु प्रभृति रेप्पाडएटान- आपिलेश्टेर उकिल मुनशी हसन आलि भो रेयानडेण्टा- नेर उकिल मुनशी गोलाम वतुल श्री सदासुख पण्डित हाजिर आइलेन । ए मकईमा पूर्वे कयेक नारिके कथवर्ट थरनेल सिली साहेव हाकिमेर समने रुवकार ओ लालिसेर श्रारजि इत्यादि प्रावनसिएल कोटेर कागजात फयसाला पर्यन्त ओ ए पादालतेर सोयाल श्री जोवाव पडागिया १८३१ साल १८ माह मे सारि- खे कयेक प्रश्नेर प्रत्युत्तर ए आदालतेर पण्डित हइते तलव हइया श्रोहा दाखिल होन वादे स्थकित छिल । गतो दिवस अामार बैठके रुवकार ो नालिपेर श्रारजि इत्यादि कोटेर कागजात फय., साला पर्यन्त ओए भागालते दाखिल हो गुजिवात ओ ओहार जवाब पडा गिया दियावसान प्रयुक्त मुलतवि छिल । अद्य पुनराय ऐ रुखकार हइया ए श्रादालतेर परिडतेर व्यवस्था श्रो मुशम्मात माया कोडरेर सोयाल गोहार उकिल मुनशी दादार १. रिचार्ड वालपोल-ति साधीयान् पाठः ।

व्यवस्थापन, स्या-१२६ धकेसर साक्षाते दृष्टी हइया बोध हइल ये वियादीय स्थानेर प्रकृत- कर्ता माया कोडरेर स्वामीर उत्तमचन्द्रलाहार' मुनिचन्द्र के आपन पोष्य एक पुत्र विवेचना करिया देश्रोन, श्रो कोटेर व्या- पार, प्रो जमिदारीर कर्म सकल निर्यहन, ओ ऐ जमिदारि यहा- लि, ओ ताहार दान विक्रय हइते स्त्री के विमुख राखन कारण, ओसि नियुक्त करिया, ताहार नामे प्रोसियतनामा लिखिया दिया मृत्यु ह्य। कियत् कालानन्तर मुतिचन्द्र श्रो पुप्यपुत्र विवेचना विना मरे ओ मायाकोडर उत्तमचन्द्रलाहार घी गोलाल चन्द्र रेप्पाडएट के आपन पोप्यपुत्रता ग्रहण करे। प्रापिलाएट ताहार पिता मृत उत्तमचन्द्रेर पिता खडर्गसिंहेर विनामे लाट इयानव- पुरदिगर छय लाट खरिद करा उल्लेखे ऐ लाटसकल दखल पाओन दाविते मायाकोडरेर नामे नालिस करिया, डायरादिगर दुइ लाट मुर्दायालेहार स्थाने लइया, मकईमा सोलहनामानुजाय निप्पत्य कराइलेक, ओ फयशला जारिते दुइ लाटेर उपर दखल ओ कावेज हइल । तत्पर गोलालचन्द्र रेपानडएट उत्तमचन्द्रेर पोय पुत्रता यो पापनि उत्तमचन्द्रेर पोष्यपुत्र प्रो ताहार स्था. नापन्न थाकने सोलह ओ विक्रय विपये मायाकोडरेर अक्षेमता ऐ जाहाजे इयाकुबपुरदिगर चतुर्दश लाट दखल पानोन दाविते आपिलण्ट ओ लाट नारायणपुरमामेर खरिददार गोपीचरण- घडाल मुईइर कवुल दायि श्रो उभयेर सोलह सम्बलित दरखास्त गुजराइलेन ये प्रविनसियान क्रोटेर हाकिमेर हजुर हइते ताहादिगेर कवुल दावि ओ सोलहनामा, जाहा आपिलाएट श्रो मुशम्मात मायाकोडरेर मध्ये हइल, ताहा नामजूर ओ अन्यथा ह्या मुद्दयेर हक्के डिगरिओप्रापिलाण्टके ताहार सावेक नालिश जारिकरण कारण अनुमति हइल इति । यथा कागजात् अनुमो- दन यो मकईमार समस्त वृर्तन्त दृष्टे रेप्पानडेएटेर पोप्यपुत्रता साक्षीगणेर द्वाराय सावस्थ, श्री ए श्रादालतेर पण्डितेर व्यव- "सालादार-व्यप-1 14 . श्राइसे ना, व्यवस्थापन संख्या-१३९ स्था हइते यो अनुभव हइन्छे-ये उत्तमचन्द्रेर स्त्री गायाकोडर स्वामिर अनुमति थाकुक या नाथाकुक उत्तमचन्द्रेर घसेर व्यव- हाय्य जयनि शास्त्रानुजाय पोप्यपुत्र राखन ओ तत्परिवर्तन क्षेमता राखे। ए कारण आमार समीपे गोलालचन्द रेप्पानडे- एटेर पोप्यपुत्रता ओ जयनि शास्त्रप्रमाण । ताहार सिर्द्धताते कोन सन्देह नाद । किवल एइ सन्देह हइतेछे ये पोप्यपुत्र थाकिते मुस- म्मात मायाकोडर स्वामीर त्यक्त धन स्वामीर असियतनामा लिखित नियमेर अन्यथाय जयनि शास्त्रानुसार हस्तान्तरेर चामता राखे किना; यो ए श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्थार लिखित एवा. रते-ये जयनि शाखानुसारे स्वामीर मृत्युरपर, यदि मृतव्यक्तिर स्त्री पुत्रवति थाके, तथा च ये प्रकार साहार स्वामीर क्षमता छिल, तदनुरूप स्त्रीर प्रत्येक विषये क्षमता याछे-अपष्टता भो वोधे सिद्ध ये ताहार अभिप्राय कि कि स्वामी आपन जीवताव- स्थाय ये प्रकार स्थावर विपय सोले किम्बा विक्री प्रथया दाने हस्तान्तर कारण क्षमता राखित सेइमन उहार स्त्री स्वामी मर- गान्ते पुत्र सन्तान थाकिते क्षमता राखे । अतएव ए विपय ए श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने जयनि शाखेर प्रकृतानुगति बोधकरण मनासिव वोध हैया हुकुम हइल ये एइ रुव कारिर नकल व्यवस्था सहित एइ हुकुमे ये व्यवस्थार लिखित एवारतेर अर्थ यो तात- पर्येर वित्तारित, ओ एइ प्ररनेर प्रत्युत्तर ये मायाकोङर उत्तम चन्द्रेर कायेम मोकाम ओ पोषपुत्र गोपालचन्द्र थाकने. प्रो उक्त मजमुने उत्तमचन्द्र असियतनामा लिखिया देओने यो जयनि शास्त्रानुसारे सोलह रुपे दोविर वस्तुर मध्ये घोडा मान्दा ओ डावरा दुइ लाट आपीलाएट सावेक मुद्दइके छाडियादेओन क्षमता राखित किता-एक मासेर मध्ये लेखन-एइ अादालतेर पण्डितेर हाअोला करा जाय, ओ ए रुबकारिर द्वितीय नकल व्यवस्थार नकल सहित सहर मुरसिदाबादेर जज साहेवेर निकट एक मास १. करण ति सामीशन् पाठः । २. वारनेर-दांत सायान् पाठः।

व्यवस्था पत्र-संख्या-१३६ मेयादे पृसेप्ट सम्वलित एइ हुकुमे पाठान जाय येथे एवारतेर अर्थ ओ ऐ प्रस्तेर प्रत्युत्तर जति अर्थात् जयनि शाखेर पण्डितेर स्थाने, ये उभयेर सहित सम्पर्क श्रो प्रयोजन नाराखे, लेखाइया श्रादालते प्रेरण करेण इति ।- श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिवार्डश्रोयालपोलसाहेवधर्माधिकर- पलिखितैतदब्दीयफेवरवरीमासीयप्रयोविंशतिदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्न-- प्रतिरूपरत्रं तत्समर्पितैतद्धर्माधिकरणोयव्यवस्थापत्रं च यदेतदब्दीयापरेल- मासीयतृतीयदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे एवं तत्समर्षितमसीयन्नामाख्यपत्र प्रतिरूपपत्रं यत्तन्मासीयचतुर्दशदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदव लोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ॥- प्रभुसमर्पितव्यवस्था लिखितस्य जैनशास्त्रानुसारेण पतिमरणानन्तरं पुत्रवत्या अपि पल्याः पतिवत्कार्य्यमात्रकरणे स्वाच्छन्नेति अस्यायमर्थः- पुत्रे विद्यमाने पितुर्यादशयाहशकायंकरणे, अर्थात् स्थावरस्य दानविक्रय सन्धिप्रभृतिकार्यकरणे, जैनशास्त्रानुसारेणाधिकार तया पतिमरणानन्तरं स्वेच्छाकृतपोष्यपुत्रे विद्यमाने मातुरपि तादृशतादृशकार्यकरणे अधिकारः। एवं च सति मायाकोमराख्या प्रत्यर्थिनो गुलालचन्द्रस्य प्रमुसमर्पितप्रश्न- पत्रे उत्तमचन्द्रस्य पोप्यपुत्रत्वेन प्रतिनिधित्वेन च मन्यमानस्य विद्यमान- सायामपि उत्तमचन्द्रलिखिते प्रभुसमर्पितविचारपत्रलिखितार्थप्रतिपादके चासीयन्नामाख्ये पत्रे सत्यपि नशास्त्रानुसारेण सन्धिरूपेणाभियोग- विषयीभूतानां स्थावरद्रव्याणां मध्ये घोडामान्दा डावरेति च भाषायां दिलाटशन्दप्रतिपाद्यस्थावरस्यैतद्धम्माधिकरणस्यावान्तरघाधिकरणस्य चाथिने त्यागपूर्वकसमर्पणस्य धमतामरददेव । यतः प्रभुसमर्पितासी. यन्नामाख्ये पत्रे मतिचन्द्रं प्रत्युत्तमचन्द्रेण लिखितमस्ति-मम नाम रक्ष. यार्थमेक पालक समतसिद्ध पोष्यपुत्रं रक्षिला ते शिक्षित कृत्वा १५ प्रश्न इति सापीयान् पाठः। १. सेच्छ०-व्यप०॥

व्यवस्था-पत्र संख्या-१३९ ४१६ शानापन्नं तं वाणिज्ये सराजकरस्थावरे चाभिषिक्तं त्वं करिष्यसीति । अनेनोत्तमचन्द्रस्य पल्या मायाकोमराख्यायाः पोष्यपुत्रग्रहणानुमते स्तत्पत्युरनवगमात् पुनरप्युत्तमचन्द्रेण मतिचन्द्रं प्रति तस्मिन्नेवासीया. माख्ये पत्रे लिखितमस्ति मम स्त्री यदि वाणिज्ये व्यापारमुत्यापयितुमिच्छति। अथ च सरानकरस्थावरमस्मरस्वत्यास्पदीभूतं भवदभिप्राय विना कस्मैचि. ददाति विकोणीते या तन्नास्मसम्मतम्, त्वं तत्र प्रतिबन्धकतामास्थाय दानं विक्रयं या मा कारयेति । अनेन मतिचन्द्रस्यासीशब्दप्रतिपाद्यस्य जीवनावस्थायां तदनुमतिमन्तरेणोत्तमचन्द्रस्य पन्या मायाकोगराख्या(या) स्तद्धने दानयिकयादिक्षमता नास्ति । फिन्तमचन्द्ररयाज्ञानुसारेण मतिचन्द्रकृतस्योत्तमचन्द्रस्य पोष्यपुत्रस्य विद्यमानतायामपि असी(यत्) प्रतिपाद्यस्य मतिचन्द्रस्यानुमतो सत्यां मायाकोमराख्यायास्तद्धने दानविक्र- यादिक्षमता असीयन्नमाज्यपत्रानुसारेणाप्यत्येव । शसीशब्दप्रतिपाद्यस्य मतिचन्द्रत्यासीयन्नामाख्यपत्रलिखितनियमसहितस्य मरणानन्तरं तदनुम- तेरसम्भावितत्वेन मायाकोमराख्यायास्वद्धने दानविक्रयादिक्षमतायामपि चायकामावः, असीयनामाख्ये पत्रे उत्तमचन्द्रस्याज्ञानातस्यासीशन्दप्रति- पायमतिचन्द्रं प्रत्येव लिखितत्वेनान्यं प्रति अलिखितत्वात् । एवं च सत्ये- तद्विवादे जैनशास्त्रानुसारेण पविमरणानन्तरं पत्यनुमतिमन्तरेणापि पोष्य- पुत्रगहणाधिकारिएयास्तस्यागफरणक्षमतापनायाः पतिमरणानन्तरं पति- वत् स्वाच्छन्दयेन कार्यमानाधिकारिएयाः पतिमरणानन्तरं पतिकृतासीय- मामाख्यपत्रलिखितागानुसारेणाकृतपोष्यपुत्रस्य पतिकृतस्यासीशब्दप्रति- पाद्यस्य मरणेन निस्सन्देहेन पतित्यसमुदायधनस्वामिन्याश्चोराम चन्द्रनाहारस्य पल्या मायाकोमराख्यायाः अपिनोऽभियोगविषयीभूतधन- विषयकाभियोगेनाभियुक्ताया माषायां षडलारशन्दप्रतिपाद्यान्तर्गतद्विलाट- शब्दप्रतिपाद्यस्य पतित्यधिनानां मध्ये अत्यल्पस्य त्यागपूर्वकसमर्पण- स्यार्थिना सह विवादनियारणफलकस्यावशिष्टलाटचतुष्टयशब्दप्रतिपाद्य- संरक्षणफलकस्य च नमताया निष्प्रत्यूहत्वात् इति गौतममश्नीयादिन- नशास्त्रानुनारिणी व्यवस्था । श्रत्र प्रमाणानि अस्मद्दत्तप्राचीनव्यवस्था- लिखितानि साएयेवेति ।

४२० व्यवस्था-पत्र-संख्या-१३६-१४ एतदन्दीयजूनमासीयपइविंशतिदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे भयेयं व्यक- स्था दति। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण २-रोवकारि मिछिल शदर देओयानि आदालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिस पीयेर शाइवेर वैठके श्रोयाक्कै तारिख १६ माह भापरेल इंशन १८३२ साल मोवावक ८ वैशाख वाङ्गला सन १२३६ साल रोज घृहस्पतिवार ।- राधाचरणवर्णिक छाएल .. घाएल हाजीर आइल । छाएलेर सोयाल इसन १८३१ सालेर ५ शेतम्बर तारिखेर लिखित । एलाका जाहागिर नगरेर फोर्ट श्रापोलेर हाकिम फेरिकेरापट साहेवेर हुकुम । जाहाते छाए- लेर दावि डिसमिश हझ्याछे। ओ ऐ सनेर ७ दिजेम्बर तारिखेर एइ श्रादालतेर हुकुम जाहामोफशीश्तरत् सदर पापीलेर दरखास्त नामञ्जूर हय, ताहार एवं अन्य अन्य मरातवेर नाराजीते छाएलेर सोयालेर सामील व्यवस्थाजातेर थनुमोदने यो प्राविश्वक मते एइ श्रादालतेर पण्डीतेर व्यवस्था तलवे सावेक नामञ्जूर होया सोयालेर छानि वविजेर प्रार्थनाय एलाका जाहागिर नगरेर कोर्ट आपिलेर दस्तखत ओ मोहरे वाङ्गला एवारतेर चारि फेता नकल व्यवस्था ओ सन १८३१ साल ५ शेतम्बर तारिकर लिखित फोर्ट मजकुरेर एक घेता फयदला सम्वलित, जाहा एइ मासेर १२ तारिखे दखिल हइयादिल, अनुमोदने श्राइल । हुकुम हइल ये सन १८३१ सालेर ५शेतम्बर तारिखेर लिखित फोर्ट मजकुरेर फयपला माय नकल व्यवस्था, ये कोर्टर फयछला ताहार धुनि-

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व्यवस्थापन-संख्या-१४०
यादे हइयाछे, एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान
जाय-जे पण्डित मोसुक एइ विशयेर जवाव एक सप्ताह मध्ये
लिखेन-ये व्यवस्था मजकुर दोरस्त वटे कि ना इति ।-
श्रीजयतितराम
एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिस्पीयरसाहेवधर्माधिकरण-
लिखितैतदन्दीयापरेलमारीयोनविंशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नम
तिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितजाहाशीरनगरसम्बन्धिकोटापीलाख्यधर्माधिकरणीय.
जयपत्र व्यवस्थाप्रतिरूपपत्रसहितञ्च यदेतदब्दीयनैमासीयपश्चमदिनसम्ब-
धिरानिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं
लिख्यते॥
श्रथिनो मातामही यदि स्वसंक्रान्तपतिस्थावरादिधनस्य स्वभरणपोष-
णार्थ पतिकृतर्णापाकरणार्य या पत्युरौवंदैहिकक्रियाद्यावश्यककार्यार्थ या
हस्तान्तरं कृतवती स्यात्तदा प्रभुसमर्पितव्यवस्था शास्त्रसम्मता भवति नोचे
दथिनोऽप्राप्तव्यवहारतायां हस्तान्तरपत्रे साक्षित्वेन पितृकर्तृकतन्नामलिखनेन
प्रतिनिधित्वेन पितृकर्तकस्वनामलिखनमात्रेण च शास्त्रसम्मता न भवति,
पुत्रपौत्रपौत्ररहितस्य मृतस्य धने पल्या उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जाते
सति तस्याश्च वर्तनावशक्तादुपरिलिखितावश्यककार्यार्थ तत्तत्कार्यो
पयुक्तस्य पतिधनत्य हस्तान्तरकरणक्षमतायाः शास्त्रीयत्वात् तद्व्यतिरेकेण
हस्तान्तरफरणक्षमताया अशास्त्रीयत्वाच्च-इति पङ्गदेशचलितशयभाग-
दायतत्त्व दायमागटोका-दायक्रमसंग्रह-विवादार्णवसेतुविवादभगार्णवादिग्रन्या-
नुसारिणी व्यवस्था -
अन्न प्रमाणम्-
पली दुहितरश्चैव-इत्यादि दायभागादिग्रन्थकृतयाज्ञवल्क्य.
पचनम् ॥शा
पर्तनाशक्तावाधानमप्यनुमतं तत्राप्यशक्ती विक्रयणमपि-इति दाय.
भागग्रन्थलिखनम् ॥२॥

१२२ न्यवस्था-पत्र-संख्य-१४०-४१ म कामेन वा मा उक्ला देयमृणं त्वया । भप्रपत्रापि सा दाप्या घनं यद्याश्रितं सियाः॥ इति विवादाएंव- सेतुविवादभङ्गार्णवादिनन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥३॥ रिक्थमाही ऋणे दाप्यः-इति तत्तद्मन्यधृतयाशवल्ल्यवचनम् ॥४॥ 'एपञ्च भरीष्ट्चदैहिकक्रियाद्यर्थ दानादिकमप्यनुमतम्-इति दायभाग(पृ० १७३ )ग्रन्थलिखनम् || अपुत्रा शयनं मर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । मुजीतामरणात् क्षान्ता दायादा उर्ध्वमाप्नुयुः ।।--इति दायभाग- दिनन्यकृतकात्यायनवचनश्चेति ॥६॥ एतदन्दोयजूनमासोयाशाविंशतितमदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति ।।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ३-रोधकारि मिथिल सदर देशोयानि श्रादालत मो० फलिकाता श्रादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिस पीयर साहेवेर बैठके प्रोयाके वारिफमा माइ ई सन १८३२ साल मोतावक २८ वैशास पागला सन १२३६ साल रोज बुधवार ॥ आनन्दमोहनघोप- श्रापीलाएट मोशम्माद हरिप्रिया- रप्पाडण्ट प्रापिलाण्टेर सफित' सदासुख पण्डित हाजिर आइल । ई सन १८२६ सालेर शेतम्बर तारिखेर लिखित एलाका मुरसि- दायादेर प्राविणसियान कोर्टेर फयशलार नाराजी ओजुहात सम्बलित पापीलाण्टेर सोयाल सन हालेर १६ श्रापरेन - ध्यवस्था-पत्र-संख्या-१४१ ४२३ तारिखेर एइ आदालतेर हुकुम मतावक जाहा कोर्ट मजकुरेर सारटफिकिट माय अापीलाण्टेर सदर प्रापिलेर सोयाल अनु- मोदनानुसारे पापीलाएटेर खोद किम्वा उकिलेर द्वाराय हाजिर आइशन, ओ ओजुहात दाखिलकरण जन्य आपीलारटेर नामे एतलानामा जारिर हुकुम छादेर हइयाछिल । उकिल मजकुरेर नामेर एक केता ओकालतनामा श्रो एइ आदालतेर तहविलदारेर दस्तखति उकिल मजकुरेर मेहन्यतानार वावत मवलगे ३२५९ टाकार एक केता रशीद सम्बलित, जाहा ऐ माइ माहार २ तारिखे दाखिल हइयाछिल, सन हालेर १६ आपरेलेर अनु- मोदन होया माय शारटफिकिट ओ गयरह दरपेय हइल । तत्परे पापोलाण्टेर उकिल एक केता हेवानामा वाङ्गला एवारतेर • दुइ टाका किम्मतेर फिरिस्ती सम्वलित दाखिल करिल । दरियाप्त हइल ये आपीलाण्ट एइ मोकईमार जामिनि खरचा कालीकान्तराय जमिनदारेर नामे कोटें दाखिल करियाछे। एवं ताहा तथाकार नाजीरेर तहकीकाते मातवर आसियाछे । ए प्रयुक्त प्रकाप ये पापीलाण्ट आपीलेर सामुदाइक सरापत आनियाछे, एवं एइ मोकदमा श्रीविणसीयान कोटेर प्रथम तज. विज होया सदर पापीलेर जोग्य। एजन्य हुकुम हइल ये एइ मोकदमार शदर पापील मजूर एवं लम्वले दाखिल हय । तत् 'परे कोटेर फयछला श्रो मौजेवाल ओ श्राशल हेवानामा पडा. गेल । हुकुम हइल ये नकल फयछला ओजुहात सम्बलित ओ हे- चानामा एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान जाय ये पण्डित मौरफ फयछलार लिखित हेवानामा मजकुरेर विपय सकलेर अनुमोदने एइ विशयेर जोयाव लिखेन जे हेवा- नामा मजकुरेर मोतावक मुदंड या रेप्पाडएट आपन स्वामीर हित्यार हकदार हय कि, किम्वा नावालगी हालते उहार स्वामीर मातार साक्षातकार उहार स्वामीर मृतु हमओत सरवे आपी- लाएटेर मोजुहातेर लिखित ओजरातेर अनुमोदने लोप हइयाचे . वजाय ४२५३ . * व्यवस्था-पत्र संख्या-१४१. किना इति । पण्डितेर सोयाव पौधार पर इङ्गरेजी सन १८३१ सालेर ६ पाइनेर २ दोशरा दफार मोतावक मोनछेय हुकुम छादेर हइवेक इति ||- श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिस्पीयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखितैतदब्दोयमैमासीयनवमदिवसीयविचारपत्रान्वर्गतमश्नप्रतिरूपपत्रमेयं वत्समर्पितं मुरशीदावादास्यनगरसम्बन्धिकोटोपोलाख्यधर्माधिकरणीयज- यपत्रप्रतिरूपपत्रमुजुहातसशनिवेदनपत्रसहित दानपत्रञ्च यत्तमासीकविंश- तितमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तद- नुसारेणोत्तर लिख्यते ॥- प्रभुसमर्पितदानपत्रानुसारेणार्थिनी अर्थादेतद्धर्माधिकरणमत्यधिनी स्वपतियोग्याशस्याधिकारिणी भवति । मातरि जीवन्त्यामप्राप्तव्यवहारता. वस्थायां चैतद्धम्माधिकरणप्रत्यर्थिनी पतिमरणेनैतद्धर्माधिकरणायुंजुहात- सशकनिवेदनपत्रलिखिवृत्तान्तदृष्टया चाधिन्याः स्वत्वलोपो भवितु न. शक्नोति, यतो दानपत्रे दात्रा स्वपुत्री प्रति लिखितमस्ति स्वस्वत्वासदीभूत- समुदायधनं पनजातसहित स्वेच्छया स्वाभिप्रायेण प्रसन्नतया साभाषिक बुद्ध्या रोगरहितेन सस्वत्वस्यागपूर्वकं दानं कृत्वा दानपत्र लिखित्वा युवाभ्यां मया दत्तम्, युवां सराजकरस्थावरास्थावरात्मकमत्स्वोपराजित- समुदायधनमायत्तीकृत्य नुल्याशित्वेन भोगं कुस्ताम्, तत्र मया सह ममान्यै- श्योत्तराधिकारिभिः सह या विचित् सम्बन्धो नास्तीति । अनेनैव दानस्य सर्वतोभावेन शास्त्रानुसारेण निष्पन्नत्वेनैतादृशदानोचरक्षणमेव दानाही. मोरानन्दमोहनघोपश्याममोहनघोपाख्ययोर्दानृपुत्रयोदनिकृतघने समस्या- मित्वत्योतादेन तयोदांनाहीत्रोर्मध्ये श्याममोहनघोपस्य मरणेन तद्यो- ग्यांशे तदुत्तराधिकारिणामेवाधिकारः । तदुत्तराधिकारिणां मध्ये तस्य पुषपौत्रप्रपौत्राभावे तसल्या अर्थादेतदधिकरणप्रत्यर्थिन्याः प्रधाना, धिकारित्वात् । मृते पितरि जीवन्त्यां च मावर्यप्राप्तव्यवहारतावस्थायाञ्च करशचिन्मरणेन तदुचाधिकारियां तस्यतयने स्वत्वलोगो मवति इत्येत- . व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४१ द्विघायकशास्त्राभावाच । यद्यपि दानपत्रे स्वपुत्री प्रति लिखितमति दाना । युवामप्राप्तव्यवहारी इदानी सराजकरस्थावरास्थावरधने आयेतत्वं सम्पाव रक्षणावेक्षणकरणस्य योग्यौ न जातो, अतः कारणान्मम पनी युवयो. माता श्रीमतीसरस्वतीदासी सराजकरस्थावरास्थावरादिधनस्य रक्षणावे-- क्षणादिफरणपूर्वकं युवयोः प्रतिपालनार्य मोक्त्यारीशब्दप्रतिपायकार्ये नि- युक्ता मया । युवयोः प्रासव्यवहारतापर्यन्तं सराजकरस्थावरे मोक्तारीशब्द- प्रतिपाद्यत्वेन सा मम पत्नी स्वनाम निवेश्य राजकरं दत्वा तदुपस्वत्वे जङ्गम- घने च मोक्त्यारीशब्दप्रतिपायं कार्य कृत्वा युवयोः प्रतिपालनं रक्षणावे. क्षणादितरवीयतशब्दप्रतिपाचं कार्य करिष्यति। युवां प्राप्तव्यबहारत्वेन निष्पनी सराजकरस्थावरसमुदाये स्वस्वनाम निवेश्यैवं जन्मघने चायत्तत्वं संपाद्य पुत्रपौत्रादिक्रमेण परमसुखेन भोगं कुरुताम् , दानधिक्रययोः स्वत्वा- धिकारो युवयो । मया सह तत्र कश्चित् सम्बन्धो नास्तीति लिखनेन मोक्त्या- रीशब्दप्रतिपाद्यकार्यनियुक्तत्वेन ज्ञातायामेतद्धर्माधिकरणार्यजुहातसं- शकनिवेदनपत्रेण प्रभुसमर्पितजयपत्रलिखितैतदम्माधिकरणार्युत्तरपत्रेए चासीशब्दप्रतिपाद्यकार्यनियुक्तत्वेन च ज्ञातायां मातरि जीवन्त्या मृतस्या- प्राप्तव्यवहारपुत्रस्य तादृशोपरिलिखितप्रकारकदानानुसारेण मृते पितरि जीवतः पुत्रत्वेन चोत्पन्नस्वत्वस्योत्तराधिकारिणां स्वत्वोत्पत्तेर प्रतिबन्ध कन्या- तल्लिखनस्य इति वङ्गदेशचलितमनुदायभागशुद्धितत्यदायतत्त्वदायभाग- टोकाविवादावसेतुविवादमार्णवादिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतः-इत्यादि दायभागादिप्रत्यधृतयाश-ल्क्यवचनम् ॥१॥ प्रदान स्वाम्यकारणम्-इति मगुवचनम् ॥२॥ वस्तुतस्तु प्रदानं स्वाम्यकारणमिति मनूक्तेर्दानमात्रात् सम्प्रदानरच तद्विपयकज्ञानाभावदशायामपि सत्तमुत्पद्यते पितुः स्वलोपरमात्तद्धने गर्भस्थरयेव-इति शुद्धितत्वग्रन्थलिखनम् ||३|| दाने हि चेतनोदशविशिष्टात् त्यागादेव दातृव्यापाराव सम्प्रदानस्य द्रव्ये स्वामित्वम्-इति दायभागबन्ध लिखनम् ||४|| ४२६ व्यवस्था-पत्र संख्या-१४१-१४२ पूर्वमामिस्सत्यनिवृत्तिारस्वामिसलोत्तत्तिकलकत्यागसेन रूपेण त्यागशक्तस्य दाधातो:- इत्यादि दायभागटीकालिखनम् ||५|| प्रथम पुत्रस्तदभावे पोत्रस्तदमारे प्रपोत्र:-इति दायभागटोका- लिखनञ्चेति ॥६॥ एतदन्दीयजुलाइमासीयपञ्चमदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मयेयं व्यः वस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ३११८ लं- ४-रोवकारि मिसिल थादालते देओयानि सदर मोकाम कलिकाता तारिख २१ जुन सन १८३२ साल मोवावके वाला ६ आषाढ सन १२३६ साल दिवस वृहस्पतिवार श्रीयुत रिचार्ड ओयालपोल साहेवेर वैठके ॥ पञ्चमलालसिंह योगयरह श्रापीलाण्टान शिवरामसिंह रेप्पाडेएट आपोलाएटानेर उकिल मुनसि होसन प्रालि यो रेप्पाडेण्टर उकिल मुनसि गोजाम वतुल प्रो सदासुख पण्डित श्रओ इन्द्र- कुमारिर उकिल मुनशि यु प्रालि हाजिर हइल । तव तिव मते एइ मकईमा गतो माइ मासेर ३१ तारिखे ओ गतो दिवसे श्रामार बैठके उपस्थित हइया नालिसेर पारजि प्रभृति प्रविन्- सोयान कोदेर कागच पत्रादि एवं तथाकार फयेसला पर्य्यन्त पडा हइया दिवसावसान प्रयुक्त स्थकित छिल, अद्य पुनराय उपस्थित हइया ए बादालचेर दाखिल होया अजुहात ओ जोयाव पार इन्द्रकुमारिर दरखास्त प्रभृति कागज, पत्र पडागेल । तसरे रेप्पाडेण्टर उकिलगरण सन १८१४ सालेर दिसम्बर मासेर १६ तारिखेर लिखित ए श्रादालतेर डिगरि व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४२ . एक केता श्रो सन १८१३ सालेर आगष्ट मासेर १४ तारिखेर कालेकट्टरिर परोयानार नकल २ टाका दामेर फिरिस्तिर द्वाराय दाखिल करिलेक, पडागेल । ताहार पर उभयेर उकिल दिगके जिज्ञासा गेल ये सन १२१८ साले जयारामसिंहेर मृत्यु हय, तखन ताहार कि वयेस छिल । रेप्पाडेण्टर उकिलगण जोयाय दिल ये उक्त जयरामेर वयेस २५ वत्सर, श्रार प्रापिलाएटगणेर उकिल आर प्रापिलाएट पञ्चमलालसिंह, (ये) हजुरे हाजिर छिल, जो- याव दिलेक ये ४०/४५ वत्सर वयक्रमे मृत्यु हय । पुनुराय उभयेर किलदिगके जिज्ञासा गेल जे एक्षणे रेप्पाडेएटर वयेस को वतसर । रेप्पाडेएटर किलगण जोयाव दिलेक ये रेप्पाडेएटर वयेस एक्ष्यने आन्दाजि ४२ यत्सर शो आपीलाण्ट लोयाव दिल ये प्राय ५० वत्सर हइवेक । पुनराय आपिलाण्ट के जिज्ञासा गेल ये जयरामसिंह हइते रेणाडेण्ट कत्तो वत्सरेर छोट हइवेक । जोयाव दिल ये ५६ वत्सरेर इति । कागज पत्रेर द्वाराय वोध हइल ये रेप्पाडेण्ट विरधीय वस्तु दखल पाओनेर दुइ प्रकार दावि राखे :-प्रथम एइये खोसालसिंहेर सूपार्जित विरधीय वस्तु जयरामसिंहेर नामे लेखाजाय । खोसालसिंह ताहार का ओ दखलिकार छिन । खोसाल- सिंहर मृत्युर पर जयरामसिंहेर सहदर भाइ शिवरामसिंह रेप्पाडेण्टर दुखले पाछे, द्वितीय एइये यद्यपि विरधीय वस्तु जयरामसिंहेर त्यक्त हय, तवे जयरामसिंहेर मृत्युर पर पार ताहार वनिता मानकुडारि, ये ताहार एक कन्या, कुडारिर यो खोसालसिंहेर सक्ष्याते, ओ जयरामसिंहेर द्वितीय कन्या खोसालसिंहेर साक्ष्याते पुत्र सन्तान ना राखिया मृत्यु हय, शिवरामसिंहके अशें । एगते ए मकर्दमाय खोसाल- सिंहेर जयरामसिंह श्रो रेप्पाडेण्डके हेवानामा लिखिया देोयार प्रति दृष्टि ना करिया एइ कथा जिज्ञासा करा ए आदालतेर पण्डितेर निकट उचित हइल-ये जयरामसिंहेर त्यक्त ऐ मान- ४२८ व्यवस्थापन संख्या-१४२ वस्तु मानकुडारिर मृत्युर पर रेप्याडेण्डर पिता खोसालसिंह श्रो रेप्पाडेण्टके अथवा दयामयीर फन्या इन्द्रकुहारिके, ये आपन माता मानकुडारिर साक्ष्याते मृत्यु हय, ताहाके अशियेक । श्रार यदि स्यात् मसम्मात मानफुहारिर लिखिया देनोया हेवानामा श्रादालतेर प्रासस्नानुसारे ताहा प्रमाण ना होन प्रयुक्त ग्राह्य हय ना, किन्तु मृत दयामयीर स्वामी आपीलाण्ट पञ्चमलालसिंहेर ओजर मिटाइवार कारण, मव देवानामा यथार्थर विशये शाखेर श्राक्षा मते जिज्ञासा फरा आविश्यक हइया हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एह हुकुमे ये निचेर लिखित सोयालसकलेर जोयाब रोवकारि सोपई होनेर तारिख हइते दुइ दिवसेर मध्ये लेखेन-ए श्रादा- लतेर पण्डितेर हाम्रोला कराजाय । प्रथम सोयाल-एइये विवादि श्री जमिदारिर का जयरामसिंह एक वनिता मानकुमारी ओ दुइ कन्या दयामयी यो पार्वती ओ पिता खोसालसिंह प्रो एक भाइ रेप्पाडेण्ट शिवरामसिंह (के)राखिया मृत्यु दय। तत्परे दयामयी एक कन्या इन्द्रकुहारि नामे राखिया मृत्यु हय । ओ दयामयीर मृत्युर पर मानकुडारि पार मानकुडारिर मृत्युर पर पार्वती निःसन्ताना मृत्यु हय, ओ पाठवतीर पर खोसालसिंहेर मृत्यु हय । श्रतएव उक्त जमिदारि वाङ्गला मुलकेर चलित शास्त्रानुसार शिवराम- सिंहके अथवा दयामयीर कन्या इन्द्रकुमारि, ये मानकुडारिर- साक्ष्याते मरियाछे, ताहार कन्या इन्द्रकुमारिके पारे । भार यदि स्यात् मसुम्मात पार्यती एक कन्या राखिया मरिया थाके, से कन्यार ओ नोसालसिंहेर मृत्युर पर मृत्यु हय, इहाते विशेषत किछु प्रभेद भाछे कि ना। २-सोयाल-एइये खोसालसिंहेर ओ शिवरामसिंहेर वर्तमाने जयरामसिंहेर त्यक्त वस्तुर दान नो हेवार अधिकार गुसम्मात मानकुडारिके श्रावे कि ना इति ।

. च्यवस्था पत्र-संख्या-१४२ ४२१ श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिचार्डयोवालपोलसाहेवधर्माधिकर • पलिखितैतदब्दीयजूनमासीयैकविंशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपति- -रूपपत्रं यदेतदन्दीयजुलाइमाखीयनवमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- विवादास्पदीभूतसराजकरस्थावरस्य स्वामी जयरामसिंहो यदि मानकुमा. रीनाम्नी पनीमेकां दयामयोपार्वतीनाम्न्यौ द्वे कन्ये खोसालसिंहनामानं पितरं भ्रातरं चैक शिवराममिहनामानमेवधर्माधिकरण प्रत्यर्थिन संरक्ष्य मृतः पात्, तदनन्तरं दयामयीनानी जयरामसिंहस्य कन्यापीन्द्रकुमारी नानी कन्यामेका संरक्ष्य मृता स्यात्, एवं दयामयीमरणानन्तरं मानकुमारी मान- कुम()रीमरणानन्तरं निःसन्ताना पार्वती मृता स्यात्, एवं पार्वतीमरणा: नन्तरं खोसालसिहोऽपि मृतः स्यात् तदा जयरामसिहत्यत्तसराजकरस्थावरे तद्भातुः शिवरामसिंहस्याधिकारः, एवं यदि पार्वती एका पन्यां संरक्ष्य मृता स्यात् सापि कन्या खोसालसिहस्य मरणानन्तरं मृता स्पात्तदान शास्त्रानुशायाः कश्चिद् विशेषो नास्ती(ति)। अत्र प्रमानाम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजोवन्धुः-इत्यादि दायभागादिग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ।। द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् - खोगालसिंहस्य शिवरामसिहस्य च विद्यमानतायां जयरामसिहस्य पल्या मानकुमार्याः स्वसंक्रान्तपतित्यक्तधनानाम्मध्ये पत्युः स्वगाथं किञ्चिद्धन स्यापन्निवारणार्थ तदुपयुक्तस्य च दानाधिकारितारित, तद्व्यतिरेकेण स्वेच्छया स्वाभिप्रायेण च दानाधिकारिता नास्ति-इति वङ्गदेशचलितदाय- मागदायतत्त्वदायभागटीकादायनिर्णयदायरहस्यनारदस्मृतिव्यवहारतत्त्वव्यय :- स्थावविवादार्शवसेतुविवादमहार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था ॥

४३०. व्यवस्था पत्र-संख्या-१४२-१४३ अत्र प्रमाणम्-- अपुत्रधने पौत्रप्रपौत्राभाये साध्व्याः पल्या अधिकारस्तनापि भत्त- स्वर्गमुद्दिश्य दाने यथाकथञ्चिच्छरीररक्षार्थ भक्षणे चाधिकारः । एतदति- रिक्तयथेष्टाचरणे स्थावरविक्रयादौ च नाधिकारः-इति व्यवस्थाएंव- ग्रन्थलिखनम् ॥१॥ स्वीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुरनापदि । विशेपतो गृहक्षेनदानाधमनविक्रयाः ।। इति दायरहस्यनारदस्मृत्या- दिग्रन्यधृतनारदवचनम् ॥२॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा ऊद्धमाप्नुयुः ॥ इति दायभागादि- . ग्रन्यधृतकात्यायनवचनञ्चेति ॥३॥ एतदन्दीयजुलाइमासीयसप्तदशदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरेमयेय व्यवस्था दत्तेति ।- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण : ५-रोवकारि मिसिल आदालते देोयानि सदर मोकाम कलिकाता तारिख १६ जुन सन १८३२ साल मोतावके वाडला तारिख ७ आषाढ १२३६ साल दिवस मङ्गलवार श्रीयुत रिचार्ड ओयालपोल साहेवेर वैठके-- मृत दुर्गादासेर नी मसम्मात ब्रह्ममयिदेव्या सापला- गतो माइ मासेर १७ तारिखेर लिखित सहर कलिकातार हायोयालि जेलार एक केता रिटरनेर सम्वलित तथाकार रोयकारि एक फेता ओ असियतनामा पोछिवाय । अद्य साएलेर दरखास्त ओ ईशानचन्द्र श्रओ गयरहर दरखास्त ओ हरिप्रियार उकिल सदासुखपण्डित श्री राजचन्द्रर उकिल मुनसि होसन आलिर हाजिरिते पडागेल । तत्परे राजचन्द्रेर उफिल सादा . व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४३ ४३१ कागजे बाजे पण्डितेर एक केता व्यवस्था गोजराइल, पडागेल । वोध हइलो ये त्यक्त वस्तुर कर्ता गकुलचन्द्रघोसालेर दुइ वनिता छिल । ताहार वड तारिणी, छोट राजेश्वरी। तारिणीर गर्भे दुइ पुत्र, हरिनारायण श्री लक्ष्मीनारायण, ओ एक कन्या आनन्दमयी, बार राजेश्वरीर गर्भे दुइ पुत्र रामनारायण श्रो गङ्गानारायण, ओ तीनि कन्या कुङारिदेव्या ो गङ्गादेव्या श्रो दयामयि । मसम्मात तारिणी सन ११८० साले, आर हरि- नारायण सन १९९७ साले आपन स्त्री मसम्मात पार्वतीके राखिया, ओ लक्ष्मीनारायण सन १२०४ साले आपन स्त्री मसम्मात हेमलताके राखिया, ओ रामनारायण सन १२०१ साले आपन स्त्री मसम्मात हरिप्रियाके राखिया, भो गङ्गा- नारायण अप्राप्त वयेसे, ओ अविभाहे, ओ दयामयि नि:- सन्ताना मृत्यु हइल । हेमलतार दौहित्र नवचन्द्रचाटुयें लक्ष्मीनारायणेर हिस्यार पर श्री हरिनारायणेर स्त्री पार्वतीर मृत्युर पर गोकुलचन्द्रेर दौहित्रगण आनन्दमयीर पुत्र ईशान- चन्द्र प्रभृति, ओ गङ्गादेव्यार पुत्र दुर्गादास हरिनारायणेर हिस्यार पर, यो हरिप्रिया रामनारायणेर हिस्यार पर दखलि- कार आछेन | पार गङ्गानारायणेर हिस्या ऊद्ध्वगामि हइया राजेश्वरीर दखले हइल | एक्ष्यने राजेश्वरी ओ कन्या कुङारि- देव्यार साक्ष्याते रामनारायणेर स्त्री हरिप्रियार साच्याते, श्रो गङ्गादेव्यार पुत्र मृत दुर्गादासेर स्त्रो ब्रह्ममयी, ये सन्दानादी किछु राखे ना, चाहार साच्याते, भो भानन्दमयीर पुनगण ईशानचन्द्रदिगरेर साक्ष्याते मृत्यु हइयाछे। ये हेनु चूडान्त हुकुम होनेर पूर्वे उत्तराधिकारि प्रकारे उक्त व्यक्तिगणेर सत्वे शाखेर आज्ञा ज्ञातो हओन उचित हइल, ए कारण हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे ये एइ विपयेर जओयाय, ये उक्त व्यक्तिगणेर मध्ये गङ्गानारायणेर त्यक्त वस्तु, याहा उद्ध्वगामि हइया ताहार माता मसम्मात राजेश्व- ४३२ व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४३ रोते अशियाछे, उत्तराधिकारि श्री सत्याधिकारि के वटे, आर गोकुलचन्द्ररे ओ मसम्मात राजेसरिर पार्वणेर श्राद्ध ओ पिण्डदान करणे काहार क्षमता पाछे, सप्ताहेर मध्ये लेखेन-ए आदालतेर परिडतेर हाश्रोला करा जाय- श्रीज्जयतितराम एतदम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिचार्डयोग्रालपोलसाहेवघाधिकर- रणलिखितैतदन्दीयजूनमासीयोनविंशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नम तिरूपपत्रं यदेतदन्दीयजुलाइमासोयनवमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रभुसमर्पितविचारपत्रलिखितवृत्तान्ते सति मृतस्य गगानारायणत्यक्त- धनस्योत्तराधिकारिवेन बन्मातृराजेश्वरीसकान्तस्याधिकारिणस्तद्विचारपत्र- लिखिताना मध्ये ईशानचन्द्रप्रभृतयस्तलितृदौहित्रा एव भवन्ति । एवं विवादासदीभूतधनाधिकारप्रयोजकगोकुलचन्द्रसम्प्रदानकार्बणथापिण्ड. दानाधिकारितापोशानचन्द्रप्रभृतीनां वद्दौहित्राणामेवास्ति | राजे- श्वर्याः पृथक्पार्वणश्रापिण्डदानाधिकारिता तद्विचारपत्रलिखितानां मध्ये करयापि नास्ति, उत्तराधिकारित्वेन माप्तधनायाः जिया मरणानन्तरं तनोनराधिकार्यधिकारमयोजकत्रीसम्प्रदानकपृथपागभादपिण्डदान- स्याभावात्- इति पादेशचलितमनुदायभागदायभागटीकादायतत्वदाय- क्रमसग्रहदायनिर्णयदायरहस्यशुद्धितत्ववादतत्वव्यवस्यावविवादार्णवसेतु • विवादभगार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था - श्रत्र प्रमाणम्- पितुरपि प्रपोषपर्यन्ताभावे पितृदोहित्रत्याधिकारो बोद्धव्यो घनिदोहि त्रस्येव--इति दायमागप्रन्थलिखनम् ॥ १॥ त्रयाणामुदके कार्य त्रिपु पिण्डः प्रवर्तते-इति मनुवचनम् ॥ २॥ न योपिझ्यः पृथगदद्यादवसानदिनाहते इति श्रादतखादिग्रन्थ- धृतमुनिवचन चेति ॥ ३॥ १-वरप-या। -- -व्यवस्था-पत्र संख्या-२४३-१४४ ४३३ एतदन्दीपजुलाईमासोबैकविंशतितमदिनसम्बन्धिशनिवारे मयेयं “यवस्था दत्तेति ।- श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण प्रश्नपत्र- ६-यद्यपि कोनो व्यक्तिर सन्तान सन्तति ना थाकाय आपन परकालेर निमिर्तक अन्तिमकाले दुइ भग्नि ओ भागिना थाकिते ओ आपन पैतृक समुदय वस्तु प्रापन गुरुके वाचनिक दान करे, श्रार ऐ व्यक्तिर मृत्युर परे ताहार अविरा स्रो स्वामीर अनुमतिक्रमे ऐ स्वामीर मृत्युर ११ एगार वत्सर गते दानपन लिखिया देय-ए प्रकार दान शास्त्र सम्मत सिद्ध; घटे कि ना, आर ऐ मृत व्यक्तिर वस्तुते भग्निरा उत्तराधिकारिणों ओ हकदार हइते पारे कि ना, एइ प्रश्नेर प्रत्युत्तर यथाशाख दानपत्र दृष्ट करिया लिखिवेन- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं दानपत्रञ्च यदङ्गारेजीराब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधि- काष्टादशशताब्दीयापरेलमासीयतनोयदिनसन्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त • तदवलोक्य याहशधोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।।- यदि फेनचिद् व्यक्तिविशेषण सन्तानाभायन स्वकीयपरकालार्थ स्वाव- -यनसमये विद्यमानयोईयोर्भगिन्योर्विद्यमाने च भागिनेये स्वपैतृकसमुदायधनं स्वगुरधे वाचा दत्तं स्यादेवं तस्यैव निःसन्तानव्यक्ति विशेषस्य मरणानन्तरं तस्यावीरया पल्या स्वपत्यनुमत्यनुसारेण स्वपतिमरणदिवसादारभ्य कादश- -संवत्सरे गते राति दानपत्रं लिखित्या दत्त स्यात्तदैताहशदानं शास्त्रानुसारेण सिद्धयति, स्वाम्यनुसत्या अस्वामिकृतस्यापि दानादेः सम्प्रदानादिखत्वोत्पत्ति- हेतुभूतस्य सिद्धेः शास्त्रीयत्वेन धनस्वामिपत्यनुमत्यानपत्यपतिमरणानन्तरं २९ व्यवस्था-पत्र संख्य-१४४ . प्रधानोत्तयधिकार्यवीरापनी लिखितदानपत्रप्रमाणस्य पतिकृतधर्मार्थदानस्य सिद्धौ वाधकसामान्याभावात्, धर्मार्थदानं यदि केनचित् स्वस्पेनातन' वा कृतं श्रावितं वा, श्रदत्त्वैव मृतश्चेत्तथापि तद्धनं तदुत्तराधिकारियो राज्ञा- दापनीया इति विशेषतो लिखितवाच । एवं दानसिद्धौ सत्यां तस्यैव मृतव्यक्तिविशेषस्य भगिन्यस्तद्धने उत्तराधिकारिण्यो मवितुं न शक्नुवन्ति, तद्दानोत्तरदणमेव धनिनो दानुस्तदने स्वत्वविच्छेदेन सम्प्रदानस्य स्वत्वो- त्पादेन च धनिन उत्तराधिकारिणां स्वत्वोत्सत्तेरसम्भवात् इति बङ्गदेशच. लितमनुस्मृतियाज्ञवल्क्यस्मृतिदायमागदायभागटोकादायतत्त्वशुद्धितत्त्वदाय - क्रमसंग्रहविवादार्णवसेतुविवादमद्गार्यवादिनन्यानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणमू- स्वभागान् यदि दद्युस्ते विक्रीणीयुरयापि वा । कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वघनस्य वै ।। इति दायभागादिग्रन्थ-- धृतनारदवचनम् ॥१॥ प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनुवचनम् ॥२॥ स्वस्थेनार्तेन वा दत्तं श्रावितं धर्मकारणात् । अदत्त्वा तु मृते दाप्यस्तरसुतो नात्र संशयः ॥ इनि विवादभगार्ण- वादिग्रन्थधृतकात्यायनवचनम् ॥३॥ तथा च स्वामिनोऽनुमतिसत्त्वे तु प्रस्थामिकृतविक्रयोपि सिद्धयति व्यवहारस्तथा-इति विवादभङ्गाएंवग्रन्थलिखनम् ||४|| प्रमाणं लिखितं मुक्तिः साक्षिणश्चेति कीर्तितम्-इति याज्ञवल्क्य स्मृत्यादिग्रन्थधृतयाजवल्क्यवचनम् ।।५।। पत्नी दुहितरश्चैव-इत्यादि दायभागादिग्रन्यधृतयाचवल्क्य- वचनम् ॥६॥ वस्तुतस्तु प्रदानं स्वाम्यकारणमितिमनूक्तेनमात्रात् सम्प्रदा- नस्य तद्विषयकवानाभावदशायामपि स्वत्वमूत्पद्यते पितुः स्वत्वोपरमा- तचने गर्भस्यस्येव-इति शुद्धितत्त्वग्रन्थलिखनम् ||७|| दाने हि चेतनोद्देशविशिष्टात् त्यागादेव दातृव्यापारात् सम्प्रदानस्यः द्रव्ये स्वामित्वम्-इति दायभागग्रन्थलिखनम् ||८|| व्यवस्था पत्र-संख्या-१४४-१४५ ४३५ पूर्वस्वामिस्वत्वनिवृत्तिपरस्वामिस्वत्तोत्पत्तिफलकत्यागलेन रूपेण त्यागशकस्य दाधातोः--इत्यादि दायभागटीकालिखनञ्चेति ॥ll एतदब्दीयजुलाइमासीयत्रिंशत्तमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति ||-- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण . ७-सदर देोयानी आदालतेर पण्डितेर निकट समोयाल । ३ श्रागस्त १८३२ साल। १-यद्यपि स्यात् कोन ब्राह्मण जाति उदासीन अर्थात् वैरागी संसारत्यागी हय, बिमहठाकुर स्थापन करिया थाके, ओ आपन उदासीन अर्थात् संसारत्यागी वैरागी शिष्यगण वर्तमान थाकिते,. ओ प्रापन समुदय वस्तु रजपुत जाति एक व्यक्ति, ये स्त्री पुत्र राखे, ओ संसारि हय, ओ ऐ उदासीनेर शिष्य हय, ताहाके हेवा अर्थात् दानकरे । एमत दान शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि ना।- २--स्थावरास्थावर वस्तुर विपये खयरात् अर्थात् उदासीन व्यक्तिर दान संसारि कोन नोच जातीर हस्ते शास्त्रानुसारे सिद्ध- वेटे कि ना?- ३-कोन उदासीन वैरागी, अर्थात् मंसारत्यागी हइया विग्रह स्थापन करिया आखाडाधारी हइया थाके, ओ उदासीन संसारत्यागी चेला, अर्थात् शिष्यगण थाकनेओ यदि अापन स्थावरास्थावर समस्त विषय रजपूत जाति व्यक्तिके, ये से संसारि श्रोत्री पुत्र राखे, एवं ऐ उदाशीनेर शिष्य हय, एमते ताहाके हेवा अर्थात् दानकरे, ठवे ताहा शाखानुसारे सिद्ध वटे किना।- ४-यदि कोन व्यक्ति सक्त पीडित हइया सुन्दर ज्ञान चैतन्य

४३६
व्यवस्था पत्र संख्या-१४५
ना थाके एमत समये आपन सम्यक स्थायरास्थावर वस्तु अन्य-
कोन व्यक्तिके हेवाअर्थात दान करे ताहा शास्त्र सिद्ध वटे कि ना?-
५-वैरागी उदासीन अर्थात् संसारत्यागी ओ ब्रजभूमि
निवाशी ओ अवश्य ब्राह्मण जाति हइवेक । ओ आखाडाते
विग्रह स्थापन थाके कोन रजपून, जाति ये से स्त्री पुत्र राखे, एवं
संसारि हय, से व्यक्ति हइते शास्त्रानुसारे विग्रहठाकुरेर पूजा
सेवा हइते पारे कि ना ?-
६-रजपूत जाति विप्रहठाकुर स्पर्श ओ पूजा करिते पारे
कि ना?-
श्रीजयतितराम
प्रभुममर्पितागरेजीशब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाप्टादशशताब्दीयागस्ति-
मासीयतृतीयदिनलिखितप्रश्नपतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयचतुर्थदिन-
सम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो मातस्तदनुसारे-
होत्तरं लिख्यते ॥
प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्-
यदि केनचिद् ब्राह्मणजातीयेनोदासीनेनार्थाद्वैराग्यधर्माचरणेन संसा.
रत्यागिना देवप्रतिमा सत्याप्योदासीनेष्वर्थात् ससारत्यागिषु वैरागिषु स्वकी-
यशिष्येषु विद्यमानेष्वपि स्वस्वत्वासदीभूतसमुदायधनं रजपूतभातीयाये-
फरमै करमैचित् स्त्रीपुत्रवते संसारिणे स्वकीयशिष्याय च दत्त स्यात्तदैतादृश.
दान शास्त्रानुसारेण सियतीति-
अत्र प्रमाणम्-
प्रदानं स्वाम्यकारणम् इति मनुवचनम् ॥१॥
स्वभागान् यदि दद्युस्ते विक्रीणीयुरथापि वा।
कुर्युर्य्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य वै-इति दायभागादिप्रन्य-
धृतनारदवचनम् ॥२॥
दाने हि चेतनोदेशविशिष्टात् त्यागादेव दातृव्यापारात् सम्प्रदानस्य
द्रव्ये सामित्वम् इति दायमागग्रन्थलिखनम् ॥३॥

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४५
४३७
द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् --
स्थावरास्थावरधनस्वाम्युदासोनव्यक्तिविशेषफत कसंधारिनीच नातिसम्प्र-
दानकदानं शास्त्रानुसारेण सिद्धयति शास्त्रे नोचजातिसम्प्रदानकदानस्य
निषेधाभावात् - इति तृतीयप्रश्नस्योत्तरमपि प्रथमप्रश्नोत्तरेरोव पर्यवसन्न-
मिति पृषट् न लिखितमिति-
प्रत्र प्रमाणानि प्रथमप्रश्नोत्तरप्रमाणानि त्रीरयेवेति-
चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्--
यदि केनचिदतिपीडितेन सम्यग्शानचैतन्याभावदशायां स्वस्वत्वासदी-
भूतसमस्तस्थावरास्थावरघनमन्यस्मै कस्मैचिदत्तं स्यात्तत्र तहान यदि धर्मार्थ
कृतं स्यात्तदा सिद्ध्यति, तद्व्यतिरेकेण शास्त्रानुसारेण न सिद्ध्यति ।
अन्न प्रमाणम्-
स्वस्थेनातेन वा दत्तं श्रावितं धर्मकारणात् ॥
अदत्वा तु मृते दाप्यस्तत्सुतो गान संशयः ।।-इति विवादभङ्गा- .
ख्वादिग्रन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥१॥
श्रदत्तं तु भयकोधकामशोकरुगन्धितैः-इत्यादि विवादार्णवसेतुविवा-
दभगाएंवा टान्यधृतनास्दवचनम् ||२||
अदतन्तु भयकोषकामशोकरुगन्वितैः इत्यत्र भयाद्याः पञ्च प्रकृति-
स्थितिविरोधिनो द्रष्टव्याः-इति विवादभनार्यावादिग्रन्थलिखनम् ॥३॥
पञ्चमप्रश्नस्योचरम्-
कश्चिद्ब्रजभूमिनिवासो ब्राह्मण जातीयो वैराग्यधर्माचरणेनोदासनो
भवति अर्थात् संसारत्यागी भवति । तस्याखाडासंमकस्थाने देवप्रतिमायाः
स्थापनं भवति । केनचित्संसारिणा स्त्रीपुत्रमता रजपूतनातीयेन शास्त्रानु-
सारेण देवप्रतिमायाः (सेवा पूजा च भवितुं न शनोति), ब्राह्मणद्वारा
देवप्रतिमायाः पूजा सेवा च भवितुं शक्कोतीति ।।
प्रत्र प्रमाणम्-
बाहाणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्च पृथिवीपते ।
स्वधर्मतत्परो विष्णुमाराधयति नान्यथा }}-इति विष्णुपुराण-
।
वचनम् ॥११॥

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४५-१४६ सर्ववर्णैस्तु संपूज्याः प्रतिमाः सर्वदेवताः इति ययपुराण- वचनम् ॥२॥ स्त्रीणामनुपनीतानां शूद्राणां च पनेश्वर । स्पर्शने नाधिकारोऽस्ति विप्णोर्वा शङ्करस्य १-इति स्कन्दपुराण वचनम् ॥३॥ पष्टप्रश्नस्योत्तरम्- रजपूतजातीयेन देवप्रतिमारपर्शः कत्तु न शक्यते । देवप्रतिमापूजा नु स्वयं कत्तु न शक्यते । किन्तु ब्राह्मणद्वारा पूजां फारयितु शक्यते- इति मन्वादिधर्मशास्त्रानुसारिणी व्यवस्था । नत्र प्रमाणानि पञ्चमप्रश्नोचरप्रमाणानि त्रीरयेवेति । एतदब्दीयागस्तिमासीयषोडशदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मयेयं यव- स्था दत्तेति- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ३२१८ ल० ८-रोवकारि मिडिल सदर देओयाणि श्रादालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिस- पीयेर साहेवेर बैठके । ओयाक्कै तारिव ३० जुलाइ इगरेजी सन १८३२ साल मोतावक वागला सन १२३६ साल १६ श्नावण रोज सोमवार 1- पञ्चमलालसिंह ओ गन्धलाश पापीलाण्टान शिवरामसिंह रेप्पाडण्ट प्रापीलाण्टानेर उकिल मुनशी होसेन प्रालि ओ रेप्पाडण्टेर उकितान मदासुख पण्डिन ओ मुनशी गोलाम चतुल, इन्दर- १ पूजा वर्तुम्-न्यप.

व्यवस्था पत्र-संख्या-१४६ कोडारिर उकिल मुनशी वु आलि हाजिर प्राइल । एइ मोकई मा एइ मासेर २२४ तारिखे आमार बैठके दरपेप, श्रार तारिख मजकुराणेर रोवकारिर लिखित मत प्रथम प्रादालतेर कागजात पड़ा हइया, मुलतवि लिल, अद्य पुनराय रोवकार आपोलेर मौजेवात ओ ताहार जोयाव एवं तत् समिभ्यारि अन्य २ कागजात एइ अदालतेर दाखिल होया दुइ मोकदमार वावत अर्थात् एइ लम्पर ओ ३२२४ लम्बर, जाहाते एइ मोकई मा रेप्पाडण्ट आपीलाएट प्रो एइ मोकद्दमार आपीलाएटान रेषा. इण्टान् पाछे, एइ मासेर १८ तारिखेर रोवकारिर लिखित एइ आदालतेर हाकिम श्रीयुत रिचार्ड श्रोयालपुल साहेबर राय सम्बलित अनुमोदने प्राइल | ये हेतुक एइ मोफदैमार प्रापी- लाण्टानेर ओजरात् निप्पत्येर जन्य आमार निकट एइ आदा- लतेर पण्डितेर पर छोयाल करा उचित हइल, एजन्य हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल निचेर तफशोलेर लिखित छोयाल सम्बलित एइ हुकुमे एइ आदालतेर पण्डितेर निकट पाठान जाय ये ऐ पण्डित ताहार विस्तारित जोयाव लिखेन । यद्यपि स्यात् खोसालसिह परिवर्तीय दान, ये मत प्रापीलागटान् जाहेर करितछे, ताहा वाङ्गला सन १२१० साले श्रापन पुत्रगण जयराम श्री शिवराम दिगेर नामे लिखिया दिया थाके, पार तदनुजाइ जयराम आपन मृत्यु समय वाङ्गला सन १२१८ साल पर्यन्त हेवार यस्तुर पर दखिलकार थाके, एवं तस्य त्रो मानकोङारि ताहार मृत्युर पर ऐ वस्तुते उत्तराधिकारि सुरते दखिलकार हय । एमते मानकोडारिर क्षेमता स्वामीर वस्तु हस्तान्तर करणेर विशये पूर्व व्यवस्थाते ये प्रकार लेखा गियाचे ताहार किछु परिवर्त प्रो मुधरण हइते पारे कि ना इति । श्रीज्जयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिसपीयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखितेतदब्दीयजुलाइमाप्तीयरिंशत्तमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूप- व्यवस्था-पत्र संख्या-१४६-१४७. पत्रं यदेतदन्दीयागस्तिमासे यत्रयोदशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेगोचरं लिख्यते ||- यद्यपि खोसालसिंहेन वगालाख्यदशाधिकद्वादशशतान्द जयराम- शिवरामाख्यस्वपुत्रदयसम्प्रदानकमेतद्धम्माधिकरणार्थिमिनिदिष्टं विनिमय- दानं कृतं स्यात्तदनुसारेण जयरामः स्वजीवनपर्यन्तमर्यादालाख्याशादशा- धिकद्वादशशताब्दपर्यन्तं दानकृतघने श्रायचत्वं सम्मादितवान् स्यादेवं तस्य पती मानकुमारी स्वरतिमरणानन्तरं पतित्यक्तघने उत्तराधिकारित्वेना. यत्तल सम्पादितवती स्यात्तदा मानकुमार्याः पतित्यक्तधनस्य हस्तान्तर. करणक्षमताविषये पूर्वव्यवस्थायां यया लिखितमस्ति, तस्य किञ्चिदपि परावर्तनमन्यथा च न भविष्यति, यतो मानकुमााः पतित्यक्तधनस्य हस्ता- न्तरकरणक्षमताविषये पूर्वव्यवस्थायां यथा लिखितं तत्रैतत्पश्नलिखितचा- न्ते सत्यपि शास्त्रानुसारेण कश्चिद्विशेषो नास्ति इति वद्देशचलितदाय- भागदायतत्त्वदायमागटोकादायनिर्णयदायरहस्यनारदस्मृतिव्यवहारतत्वव्या. स्थार्णवविवादार्णवसेतुविवादमशार्णवादिग्रन्यानुसारिणीव्यवस्था । अत्र प्र. माणान्येतद्विवादविषयनिविष्टास्महत्वपूर्वव्यवस्थालिखितानि सर्वाण्येवेति- एतदन्दीयागस्तिमासीयसप्तविंशतितमदिनसम्बन्धि सोमवासरे मयेयं. व्यवस्था दचेति ।- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ह-गेवकारि मिछिल सदर देनोयानि श्रादालत मो० कलिकाना श्रादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुन हेनरि सिकिस पीयेर साहेदेर बैठके, ओयाक्कै तारिस २७ माह जून इ० सन १८३२ साल, मोवावक वागला १५ श्रापाढ सन १२३६ साल रोज बुधवार - व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४७ दुर्जनसिंह ओ अर्जुनसिंह- पापीलाण्टान राउत गिरिधरसिंह प्रो घनस्यामसिंह- ओ वन्दरसिंह- रेवाडण्टान 'आपीलाण्टानेर उफिलान मुनशी होसन प्रालि ओ सदासुख पण्डित हाजिर थाइल । जेला कानपुरेर मोतालक उभयेर मोरशी वाइय देहार मध्ये भौजे वाउतपुर ओ गयरह एगारो मौजे हिस्या करिया पाओनेर मोकमार पावते अन्य २ विपय सम्वलित ३५० टाका किमतेर दुइ वन्ध कागजे आपीलाण्टानेर सदर प्रापीलेर छोयाल तत् समिभ्यारि कागजात ओ शारटफिकिट सम्वलित अनुमोधन मते इ. सन १८६२ सालेर ५ जानेर तारिखे आपीलाण्टानेर नामे एतला- नामा जारिर हुकुम ये एइ मोकदमार तजविज एलाहवादेर सदर आदालते, चाहे आर यद्यपि स्यात् आदालत मजकुरे तजविज ना चाहे, तिन मास मध्ये मौजेवात दाखिल करण जन्य वेरेलिर क्रोटेर हाकिमानेर नामे लादेर हय । ताहार जो. यावे कोट मजकुरेर ऐ सनेर ५ आपरेलेर लिखित रिटरण श्रो रोवकारि एतलानामा जारि होन को ताहा पापीलापटानेर ज्ञातोर रशीद लिखिया देयोन ओ हाजिर इइया नाराजीर मौजेवात दाखिल करणेर ओयादा सम्बलित माह आपरेल मजकुरेर २६ तारिखे अनुमोधन हइया, तारिख मजकुरेर रोव- कारिर लिखित मत अन्य २ विपय सम्वलित शारटफिकिट ओ गयरह सेरेस्थाय राखनेर हुकुम छादेर हइया, तत्परे एइ मोकई मार तजविज एइ आदालते चाहनेर दुर्जनसिंहेर छनोयाल दरसेस मते दुर्जन सिंह मजकुरेर गयेरहाजिरि सरवे उक्त सनेर ३० माइ तारिखे हुकुम हय ये मुलतवि थाके। इ० सन १८३१ सालेर २७ जुनेर लिखित एलाका रेजिर प्रोविनसीयान क्रोटेर फयरला आपीलाएटानेर नाराजिर मोजेवात भो उकीलान् मजकुरेर नामेर ओकालतनामा ओ ४४२ -- व्यवस्था-पत्र संख्या-१४७ उकीलान् मजकुरानेर मेहन्यत्यानार वावत मवलगे ४०७०) टाकार एइ श्रादालतेर तहविलदारेर दस्तखवि उकिल सरचार रशीद ओ कुडि टाका किमतेर फिरिस्ति, फिरिस्तोर लिखित दश केता दस्तावेज सम्बलिव यावा' एइ माह जुनेर २१ तारिखे दाखिल हइयाहिल, अद्य अनुमोधने आइल । तव परे पापी- लाण्टानेर सकिलानेर मध्ये सदासुखपण्डित एइ मोकमार यावर क्रोटेर फयछला दुइ टाका किमतेर फिरिस्ति सम्मलित अद्य दाखिल करिलेक। ज्ञातो हइया वोघ हइल ये एह मोकदमा प्रीविनसीयान् क्रोटेर प्रथम तजविज होया सदर आपीलेर योग्य, एवं खरचार जामिनदारेर दस्तखतेर एफरार श्रो ताहार मातवरिर तहकीकात जेला कानपुरेर जज साहेवेर द्वाराय जेला मनकुरेर नाजोरेर मारफत आमले आसियाछे, एवं उकिलेर मेहन्यतयाना एइ आदालतेर वइविले दाखिल हइयाछे । एजन्य प्रकाश ये पापीलाएटान् सदर श्रापोलेर शाम्यम् शराएत वजाय आनियाछ । ए प्रयुक्त हुकुम हइल ये आपीलाण्टानेर सदर प्रापील मञ्जर एवं लम्बरे दाखिल हय । प्रविनशीयान क्रोटेर फयछलाते प्रकाश, ये जेला प्रो कोटेर पण्डितगण ये उहारदिगेर स्थाने व्यवस्था तलव हइया पितार जीवशाय पितामहेर स्थावर वस्तुर दाविर पुनेर क्षेमतार विशय विभिन्नता वाक्यसफल पाछे। एजन्य हुकुम हइल ये क्रोटेर फयखला मोजेवात सम्वलित एइ श्रादालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान जाय ये ऐ पण्डित जेला कानपुरेर प्रचलित शाखेर आज्ञासकलेर अनुमोदने एइ विश- येर जोयाव व्यवस्था ये पितार जीवशाय पितामहेर स्थावर यस्तुर अंश करिया लओनेर हकदार पुत्र हइते पारे कि ना- एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण इति ॥ १. याहा-इति सारीयान् पाठः।

च्यवस्था पत्र-संख्या-१४७ ४४३ श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपविश्रीयुतहेनरीसिकिस्पीयरसाहेवधर्माधिकरणलि. 'खितैतदन्दीयजुनमासीयसप्तविंशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नपतिरू- 'पपत्र तत्समर्पितेतद्विवादविषयनिविष्ट-भोजुहातसंज्ञकनिवेदनपत्रं फोटी- पोलाल्यपर्माधिकरणीयजयपत्रञ्च यदेतदन्दीयजुलाइमासीयसप्तदशदिनस- म्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो बातस्तदनुसारे णोत्तरं लिख्यते ||-- जीवति पितरि पैतामहस्थायरधनस्यांश कृत्वा ग्रहणस्याधिकारी पुत्रो भनितुं न शक्रोति, जीवति पितरि पुत्राणां विभागकर्तृवाभावात् । यदि पिता स्वपैतृकधनस्य विभाग कृत्वा पुत्रेभ्यो ददाति तदा तद्ग्रहणस्याधिकारी पुत्रो भवितुं शक्नोति, जीवति पितरि पितुरेव विभागकर्तृवात्-इति कान. पुरप्रदेशप्रचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदय व्यवहारमाधयव्यवहारकोलुमव्य- यहारमयूखमिताक्षराटीकादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्- उधं पितुश्च मातुश्न समेत्य मातरः समम् । भजेरन् पैतृकमृधमनीशास्ते हि जीवतोः ।।-इति मनुवच- नम् ॥१॥ विभजेरन् सुताः पित्रोरुमृक्थमृणं समम्-इति मिताक्षरा. वीरमित्रोदयादिग्रन्यधृतयाशवल्क्यवचनम् ।।२।। स्वातन्त्र्याहे पितरि जीवति तदिच्छ योव विभागमिति तु पातित्यपारिन. ज्यादिभिस्तदनन्हें पुत्रेच्छा(यापि । तदुपरमे तुस्वेच्छाया निमित्तत्वमर्थसिद्ध- मिति कालत्रयमेवानेन प्रकारेण-इति वीरमित्रोदयादिग्रन्यलिखनम् ।।३।। मातृणां जीवतोः पित्रोः सहवासो विधीयते-दति वीरमित्रोदयादि. मन्यधृतव्यासवचनम् ॥४॥ जीवति पितरि पुत्राणामर्यादानविसर्गातेपेषु न स्वातन्त्र्यम्-इति वीरमित्रोदयादिमन्यकृतहारीतवचनम् ॥५॥ १. सम्बलि-व्यात २.तु-या।

४४४ व्यवस्था-पत्र संख्या-१४७-१४८ जीवविभागे पितुः स्वातन्त्र्याद् अजीवविभागे पुप्राणी स्वात- न्यात्-इति वीरमित्रोदयमन्यलिखनञ्चेति ॥६॥ एतदन्दोयागस्तिमासंयोनशिचमदिनसम्बन्धित्रुधवासरे मयेयं व्यव- स्था दत्तेति ।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिथेण १०---रोवकारि मिछिल मोकाम कलिकातार सदर देओयानि आदालतेर हाकिम श्रीयुत अालकसुन्दरराछसाहेवेर वैठके होर तारिख सन १८३२ सालेर ३ सेतम्बर मोतावेक सन १२३६ सालेर ०० भाद्र सोमवार । महाराजा गोविन्दचन्द्रराय श्रापीलाएट महाराणी कृष्णमणिदेव्या रेप्पाडेएट आपीलाएटेर उकिल सदासुकपण्डित हाजिर श्राइल । पापी- लाएटेर छोल एक हाजार टाका मूल्ल्येर कागजेर पर सदर आपील मझुरिर प्रार्थनाय डिहिंगञ्ज नाटोर ओ गायरह दखल पाइवार मोकद्दमाय मुवलगे आटानम्वै हाजार पाच शत एक टाका आटाना पाँच कडा टाकार तायदादे उकिल मज- कुर नो मुनशी होछेन थालीर नामेर एक केता ओकालतनामा सहित ओए श्रादालतेर तहविलदारेर दस्तखते उकिलेर मेह- नतधानार वावत एक हाजार टाकार रशीद एक केता ओ ए आदालतेर खरचार जेता हाली सहर कलिकातार मोतालक एक्ष्यने काशीपुर निवाशी जगमोहनमल्लिक ओ रामकुमार पालेर नामेर जामिनि एक केता ओ सन हालेर २७ जुलाइ तारिखेर प्रविनशील मोट मुरशीदावादेर फयसलार नकल व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४८ एक केता सन हालेर २६ श्रागष्ट तारिखे दुइ टाका मूल्ल्येर कागजेर फिरिस्तिर द्वाराय दाखिल हइयाछिल, अद्य दरपेप हइया पाठ करागेल । ताहार पर गोविन्दचन्द्ररायेर उकिल सन १२२० सालेर १६ अग्रहायनेर राणी कृष्णमणि रेप्पाउण्टेर नामेर महाराजा विश्वनाथराय मोतप्रोफ्फार लिखिया देओ अनुमतिपत्रेर नकल एक केता ये ताहार निचे राणि कृष्णमणिर जव जोडा दे आछे लम्बरे दाखिल करिलेक 1 दृष्टे आइल । यद्यपि प्रापीलाएटेर सदर श्रापीलेर दरखास्ते हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व ए आदालतेर पण्डेितेर स्थाने व्यवस्था लो उचित वोध हइल, ए कारण हुकुम हइल ये एइ मोकईमा नम्वर दाखिल हइया एइ रोवकारिर नकल ए आदा- 'लतेर फयछला हो। १७४८ लम्परेर मोकमाय दाखिल हो अनुमतिपत्र सहित ए श्रादालतेर पण्डितेर हाम्रो ला करा जाय एइ हुकुमे ये एइ रोवकारि पार दिवस हइते तिन दिवसेर मध्ये अनुमतिपत्रेर लिखित सरतसकल ओ मजमुन दृष्टे निचेर लिखित छोलिसकलेर जव दाखिल करे इति । प्रथम-एइ ये राणि कृष्णमणि आपन स्वामी महाराजा विश्वनाथराय मोतओफ्फार लिखिया देया अनुमतिपत्रानुसारे गोविन्दचन्द्ररायके आपन पुष्यपुत्रत्तते आनिया गोविन्दचन्द्र- राय प्राप्तव्यवहारे पहुछाते ओ ताहार राजि व्यतित आपन - जीवदशा पय॑न्त स्वामीर तेज्य विपयेर पर दखिलकार थाकिते: •पारे कि ना। द्वितीय-एइ ये ऐ अनुमतिपन्नानुसारे महाराजा गोविन्द पन्द्ररायके पुप्पपुत्र लभोर पर राणि कृष्णमणिके एक्ष्यणे एइ विपयेर ये फोन हेतु द्वाराय गोविन्दचन्द्ररायके त्याग करिया दोशरा व्यक्तिके पुष्यपुत्र करणेर क्षमता आछे कित्ता इति ।

व्यवस्था-पत्र संख्या-१४- श्रीजयतितराम एनद्धम्माधिकरणाधिपति श्रीयुतप्रलकमुन्दररामसाहेवघम्माधिकरणल- तत्सम खितैतदन्दीयतृवीयदिवसोयविचारपत्रान्तार्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेय स्वितद्धम्माधिकरणनिष्पन्नाष्टचत्वारिंशदधिकसप्तदशशतावाहितविवादविप. यनिविष्टानुमतिपनश्च यत्तदन्दीयतन्मासीय चतुर्यदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशनोघो जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- राजी कृष्णमणो मृतमहाराजविश्वनायरायाभिषेयस्वातिलिखितानुम- तिपत्रानुसारेण गोविन्दचन्द्ररायामिधेयं स्वकीयदत्तकपुत्रवामानीय गोविन्द- चन्द्ररायस्य प्राप्तव्यवहारतायामपि तदनुमतिमन्तरेण स्वबोवनपर्यन्त स्वपतित्यक्तधने वायत्तत्वं शास्त्रानुसारेण स्वामित्वेन समादयितु'नशक्नोति पतिकृतदत्तकपुत्रग्रहणानुमत्या पतिमरणानन्तरं गृहीत दत्तकपुत्रस्यैव तत्- पतित्यक्तस मुदायधने शास्त्रानुसारेण पुत्रत्वेन स्वत्वोलादेन राश्याः कृष्ण मण्यभिधानायाः पतित्यक्तधने पत्नीत्वेन स्वत्वोसत्तेः प्रतिरुद्धत्वात् । यद्य- . प्यनुमतिपत्रे महाराजविश्वनायरायेण स्वपत्नी राज्ञों कृष्णमणी प्रति लिखितमस्ति "श्रस्मन्मरणानन्तरं त्वं दत्तकपुत्रं रक्षित्वा सकलविषयस्य की भूत्वारमकृते ईश्वरविग्रहाणां सेवां कृत्वावशिष्टे ये द्वे मम पल्यौ तयोर्जीवनावधि प्रासाच्छादनं त्वया देयमिति" तथाप्यनेन पत्यनुमस्या पतिमरणानन्तरं गृहीतदत्तकपुत्रस्य शास्त्रानुसारेण पितृत्यक्तसमुदायधनस्वा- मिनः प्राप्तव्यवहारतायामपि तद्धिमत्यापि स्वामित्वेन राशो कृष्णमणी स्वजो. वनपर्यन्तं पत्तित्यक्तधने भोगपती स्थारपतीत्यनवगमादिति ।- अत्र प्रमाणम् अनपत्यस्य धनं पल्यभिगामि, तदमावे दुहितगामि-हत्यादि दायर भागादिप्रन्यधृतविष्णुवचनम् ॥ १ ॥ तत्र प्रथम पुत्रस्तदभावे पौत्रस्तदभावे प्रपौत्रः इति प्रपौत्रपर्यन्तामारे पत्नीति च तदभावे दुहिता-इति च दायभागटोकादायकमसंग्रहादिग्रन्थः लिखनम् ॥२॥ १. सम्पादितु-व्यप० २.पत्नी-ब्यप.. ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१४८-१४६ ४४७ सवें धनौरसस्यैते पुत्रा दायहराः स्मृताः-इति दायभागादिग्रन्थ- धृवदेवलवचनञ्चेति ॥ ३ ॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- प्रभुसमर्पितानुमतिपत्रानुसारेस महाराजगोविन्दचन्द्ररायस्य दत्तक- पुत्रत्वेन ग्रहणानन्तरं राश्याः कृष्णामण्यभिधानाया इदानी केनचिद्धना गोविन्दचन्द्ररायस्य त्यागं कृत्वा द्वितीयस्य दत्तकपुत्रवेन ग्रहणस्य क्षमता नास्ति, शास्त्रानुसारेण गृहीतैकदत्तकपुत्रस्य पितृत्यकसमुदायधने पुत्रत्वेन स्वत्वोत्पादात् । यद्यप्यनुमतिपत्रे महाराजविश्वनायरायेण स्वपत्नी राशी कृष्णमी प्रति लिखितमस्ति “अस्मन्मरणानन्तरं त्वमेकस्याधिकस्य वा सरसन्तानस्य दत्तकपुनत्वेन महणं करिष्यसीति"-अनेन राश्या कृष्णगण्य- भिधानायाः दत्तकपुत्रैककरणानन्तरं तस्मिन् विद्यमाने सति तच्या कृत्या द्वितीयदत्तकपुत्रग्रहणक्षमताया अनवगमात्-इति यद्गदेशचलितदाय- मागदायतत्त्वदायभागटीकादायक्रमसंप्रदविवादाएंवसेतुविवादभनार्णवादिन- स्थानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणानि- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितानि श्रीरयेयेति ॥ ३ ॥ एतदब्दीयसितम्बरमागीयदशमदिनसम्बन्धिसोमयासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवद्यनाथमिश्रण . ११-सर्वगुण उपमायोग्य श्रीयुत राजनारायण विद्याभूपण पण्डित श्रादालते देश्रोनिजेला हुगलि अवगतेषु ।।- सन १८३२ साल तारिख ७ आपरेल ।- १३ लम्बरेर कैः कालिदासगगोपाध्याय दी:-- छानि तजविज श्राः प्रेमचन्द्रचौघारी दी:- व्यवस्था पत्र-संख्या-१४६ सोयाल धर्मदासचौधुरि ओ गुरुदासचौधुरि-दुइ सहो- दर एकान्न वचिते थाकिया, पैतृक स्थावर वस्तु प्रभृति भोग करिया, ताहार मध्ये ज्येष्ठ, ऐ धर्मदास आफ्नार दुइ पुन, वदन चन्द्र श्री प्रेमचन्द्रचौधुरि, पार भ्राता ऐ गुरुदासचौधरि ओ आपन माता सुन्दरिदेव्यार समिक्षे लोकान्त हय। तदन्तरे ऐ गुरुदास मजकुर आफ्नार ऐ भावप्पुत्रदिर्गेर सहित ऐ व दस्तुरे एकानवत्ति थाकिया किछु काल परे आफ्नार माता आर ऐ दुइ भ्रातप्पुत्र श्री आपन प्रथम संसारेर पनितार गर्भजात वैकुण्ठनाथ नामे एक पुत्र ओ अदत्ता तिन कन्याओ द्वितीय संसारेर सन्तान सन्तति विहिन वनिता गोविन्दमणिदेवीके राखिया लोकान्त इइले । ऐ गुरुदासेर पुत्र वैकुण्ठनाथ श्राफ्नार ज्येष्ठतात-पुत्र ऐ वदनचन्द्र ओ प्रेमचन्द्रचौधरिर सहित एकानवर्सि एजमाले थाकिया अान्दाज ७ वत्सर वयक्रमे आपनार पितामहि ऐ सुन्दर देव्या बार अदत्ता तिन भनि ओ अवीरा विमातार समिक्षे मृत्यु- हय । परे ऐ वैकुण्ठनाथेर अविरा विमाताओ तिन अदत्ता भग्नि ओ पितमही सन्दरीदेव्या ओ ज्येष्ठतातेर पुत्र वदनचन्द्र ओ प्रेमचन्द्र सहित एकान्नमुक्त थाकिया वैकुण्ठनाथेर तिन भग्निर विवाह इइया, दुइ भग्निर पुत्र हइले ओ एक भग्नि पुत्रसम्भा. विता राखिया, वैकुण्ठनाथेर पितामहीर मृत्यु हय । तदन्तरे किछु काल वादे वैकुण्ठनाथेर विमाता गोविन्दमणीर मृत्यु हय । ऐ वैकुष्ठनापेर दुइ भग्नि, ओत्ताहार पुत्रगण प्रो एक भग्नि पुत्र- सम्भाषिता ो चैकुण्ठनाधेर ज्येष्ठतातेर पुत्र वदनचन्द्र श्रो प्रेमचन्द्र चौधुरि वर्तमान पाछे । अतएव वदेश चलित शाखा- नुसारे ऐगुरदासेर वस्तुर योग्य अंश गुरुदास मृत्यु परे ताहार पुन वैकुण्ठनाथके पौडशियर दिल कि ना। यदि पौडछिया थाके तवे वैकुण्ठनाथेर मृत्यु हइने ऐ वस्तु वैकुण्ठनाथेर पितामहीके पोङ- छिया छिल कि ना। यदि पोइछिया थाके तवे पितामही सुन्दरी देवी मृत्यु हइले उपरेर लिखित व्यक्तिदिगेर मध्ये के पाइते पारे- ज्यवस्था-पन-संख्या-१४६ ४४९ इहार व्यवस्था एइ सोलेर पासे लिखिया ५ रोज मध्ये पाठाइवेन ।।- एतत्पश्नानुसारेण मृतस्य गुरुदासस्य योग्यांशप्राप्तधने वैकुण्ठनायो:- "धिकार्य्यभूत् । पितामहपर्यन्तरहित तस्मिन् मृते पितामही सुन्दरीदेव्यधि- कारिण्यभूत् । तस्यां मृतायां वैकुण्ठनाथस्य पितृभातृपुत्रौ वदनचन्द्रप्रेम- चन्द्रौ लब्धंन शक्नुयाताम्, किन्तु वैकुण्ठनाथस्य पितृदौहित्राः प्राप्तुं शस्नुयुरिति विदुषां परामर्शः।- एइ सोयाल अनुसारेते गुरुदास मरिले नाहार योग्यांश घस्तुते चैकुण्ठनाथ अधिकारी हइया छिलो। पितामह पर्यन्त रहित सेइ वैकुण्ठनाथ मरिले पितामही सुन्दरीदेवी अधिका- रिणी हइयाछिलो । सुन्दरीदेवी मरिले पर वैकुण्ठनाथेर पुत्र वदन- चन्द्र ओ प्रेमचन्द्र पाइते पारे ना, किन्तु चैकुण्ठनाथेर पितृदौहि- नेरा पाइते पारे-एइ पण्डितदेर युक्ति ।।- धर्मरत्नदायभागादिषु ग्रन्थेष्वत्र प्रमाणम् यथा गौतमः-स्वामी श्यक्रयविक्रयसंविभागपरिग्रहाधिगमपु-- इत्यादि । यथा मनुः-अचं पितुश्च मातुश्च समेत्य भातरः समम् । भजेरन् पैतृकमृक्थमनीशास्ते हि जीवतो:-इत्यादि ।। यथा मनुः-अनपत्यस्य पुत्रस्य माता दायमवाप्नुयात् । मातयेपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेधनम् ।। यया याज्ञवल्क्या-पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा । तरसुता गोत्रजा-इत्यादि ।। धर्मरत्ने यथा -दौहित्रोऽपि ह्यमुत्रनं सन्तारयति पौत्रवत्-इत्यादि । सन १८३२ साल ता०२० आपरेल। श्रीराजनारायणविद्याभूपणपण्डित ॥ ૨.

व्यवस्था पत्र-संख्या-१४९-१५०. श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र व्यवस्थापत्रं विचारपत्रच यदेतदन्दीयसित. म्वरमासीयत्रयोदशदिनसम्बन्धिबृहसविवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य याह. शबोधो जातस्तदनुसारेण निवेदन क्रियते ।।- प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्र लिखितवृत्तान्ते सति तत्पश्नोत्तरव्यवस्थायां मृत- स्य गुरुदासस्य योग्यांशे तत्पुत्रो वैकुण्ठनाथोऽधिकार्यभूदिति हुगली जिला- ख्यधर्माधिकरण नियुक्तविद्यमानपरिडतेन यल्लिखितं तरसत्यमेव, किन्तु रितामहपर्यन्तरहिते तस्मिन् मृते तत्रितामही सुन्दरीदेव्यधिकारिएयभूदिति यल्लिखितं तद्व्यवस्था तन्न सत्यम्, वैकुण्ठनाथस्य भगिनी विद्यमानासु तासां पुत्रसम्भावनायां सत्यां यैकुण्ठनाथस्य पितामहाः सुन्दरीदेव्यास्तत्ति तृतौहित्रानन्तरमधिकारिणस्तसितामहादप्यनन्तरमधिकारिण्या धिकारस्य अशास्त्रीयत्वात् , एवं वैकुण्ठनाथस्य पितृप्रातृपुत्रौ पदन- चन्द्रप्रेमचन्द्रौ लब्धुं न शक्नुयाताम्, किन्तु वैकुण्ठनाथस्य पितृदोहित्राः प्राप्तु शक्नुयुरिति यल्लिखितं तद्व्यवस्थाया तत् सत्यमेव । गुरुदासस्य मरणानन्तर तयोग्यांशे तत्पुत्रस्य वैकुण्ठनाथस्याधिकारे जावे सति तद्धन वैकुण्ठनाथस्यैव मातम् । अतस्तस्मिन् पुत्रप्रोत्रप्रपौत्रपदीदुहितृदोहिन- पितृमातृभ्रातृभ्रातृपुत्रभ्रातृपौत्रपयंन्तरहिते मृते सति तत्त्यक्तधने विद्य- मानेषु वैकुण्ठनाथस्य पितृदौहित्रेषु तपितृभ्यपुत्राणामधिकारस्याशास्त्रीय- तात्-इति वङ्गदेशचलितदायमागदायतत्त्वदायभागरीकादायक्रमसंग्रहविवा- दार्णवसेतुविवादभनार्णवादिग्रन्यानुसारेण निवेदनमिति 11- एतदन्दोयनवम्बरमासीय चतुर्दशदिनसम्बन्धिबुधवासरे मयेदं निवेदनं कृतमिति ॥ वास्तवः-- १ श्री यतिराम् श्रीवैद्यनाथमिण १२-रोवकारि मिशिल सदर देओयानि आदालत मो० कलिकाता ई० सन० १८३२ साल तारिख १३ शेतम्बर मोतावेक १. भगिनीमु-या १२, धास्तवमधिकारस्य-व्यर।

व्यवस्था-पत्र संख्या-१५० ३० भाद्र सन १२३६ साल रोज वृहस्पतिवार से श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत नाशानाएल जान हालहेड साहेवेर बैठके ।।-- आपीलाएट फकिरचन्द्रसरकार- रेपाडण्ट एइमोकद्दमावर्तमानमासेर १० तारिसे उभयेर उकिलेर मोका- विलाय रोवकार हइया वाजे २ कागजात सुनानिहइया दिवावसान प्रयुक्त स्थकित छिल, ध्यद्य पुनराय पापीलएटेर उकिल मुनशीदादार वक्स ओ रेप्पाडण्टेर एफिल सदासुखपण्डितेर मोकाविलाय दरपेष हझ्या जिला आदालतेर ओ एइ आदालतेर कागजात मोनाइजाय प्राशील । हुकुम हइल-ये एइ आदालतेर पण्डितेर स्थाने एइ विपयेर व्यवस्था तलव करा जाय-ये यदि कोनो व्यक्ति पोध्यपुत्र लय तवे ऐ पोप्यपुत्र रासन विषये शाम्रानुसारे आपन स्त्रीर स्वीकार आवश्यक वटे कि ना, ओ पोप्यपुत्र लोनेर विषय तिन नियम आचरण पावश्यक । प्रथम-एइ ये सपिण्डक अर्थात् ज्ञातिवर्गके समाचार दिया एकत्र करा आवश्यक । द्वितीय-- राजाके ज्ञात करा ।। तृतीय-यज्ञ करा ।। ए मकई मार भावे वोध हइल ये पोष्यपुत्र लोन कालिन किचल यज्ञ हइयाछे । प्रथम ओ द्वितीय नियम श्रामले श्राइ नाइ । अतएव एइ विशये एइ मत पोथ्यपुत्रता सिद्ध हय कि ना इति ।- एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतनासानाएलमानहालदेडसादेवधर्मा- धिकरणलिखितैतदन्दीयसितम्बरमासीयत्रयोदशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतम. श्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दोयतमासीयपञ्चदरादिनसम्बन्पिशनिवारे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहरायोघो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ॥- यदि फश्चिद् व्यक्तिविशेषः पोध्यपुत्रं गृहाति तदा तसोध्यपुत्र- महाविषये स्वपल्याः स्वीकारः शास्त्रानुसारेण वास्तबमावश्यको न भवति, मायापत्योर्मध्ये प्रयानीभूतेन पत्या पोध्यपुत्रमहणेनैव पतिपरस- न्त्राया जायाया अपि तस्मिन् पोष्यपुत्रलोसत्तेः शास्त्रीयत्वात् , पतीस्वीकार बिना पत्युः पोष्मपुत्रग्रहणस्य शास्त्रनिधिदवाभावाच्च । एवं पोषपुत्रमाण- व्यवस्था-पत्र-संख्या-१५० विपये ये त्रयो नियमाः प्रश्नपत्रे श्रावश्यकत्वेन लिखिताः अर्यात् सपिएडा. हानराजनिवेदन-यज्ञास्तेपारमध्ये एतद्विवादे यदि पोप्यपुत्रमयसमये केवल यज्ञमवनमेवावगम्यमानं स्यात्तदा प्रथमद्वितोयनियमयोरर्थात् सपि- एडाहान राजनिवेदनयोरनिष्पन्नत्वेऽप्येतादृशं पोष्यपुत्रत्वं सिद्ध्यति, पोग्य पुत्रग्रहणविपये सपिण्डाहान राजनिवेदनयोः केवल दृढतरसाक्षित्वेनोपयो. गित्वेन मभुसमर्पितप्रश्नपत्रलिखितेनैतद्विवादे पोप्यपुत्रग्रहणसमये' केवलं यश एव जात इत्यनेन यज्ञकरणपूर्वकपोप्यपुत्रग्रहणस्य निश्चितत्वेन सपिण्डाहानराजनिवेदनयोः प्रयोजनस्यार्थसिद्धत्वात्-इति दत्तकमीमांसा.. दसकचन्द्रिकादत्तकदीधितिदत्तकनिर्णयदत्तकदपणविवादाणवसेतुविवादमडा. -वादिप्रन्थानुसारिणो व्यवस्था-॥ अत्र प्रमाणम्- अपुत्रेण सुतः कार्यो याहक ताहक प्रयलतः। पिण्डोदककियाहेतोर्नामसंकीर्तनस्य च ।। इति दत्तकमीमांसा दत्तकचन्द्रिकादिग्रन्यधृतमनुवचनम् ॥१॥ मत्तुंः प्राधान्यात्तत्परिग्रहेणैव खिया अपि तस्मिन् पुत्रत्वसिद्धिः भर्तृ परिगृहीतवस्त्वन्तरस्वत्ववत्-दति दचकमीमांसामन्यलिखनम् ॥२॥ मधुपर्केण सपूज्य राजानच द्विजान् शुचीन् । राजात्र मामस्वामी । वन्धूनाहूय सवास्तु ग्रामस्वामिनमेव चेति वृद'- गोतमस्मरणात् इति दत्तकमोमासादि (दमी०५०६६) ग्रन्पलिखनम्॥३॥ बान्धवाचाहानं दृष्टार्थ राजाहानवत्-इति दत्तकमीमासादि (दमी. पृ०६७) ग्रन्थलिखनम् ॥४॥ पुत्रं प्रतियहीप्यन् इत्यादेः स्वबन्धूनाहूय इत्यर्थः । एतेन स्ववन्धु- भितिः पुत्रो दार्य ग्रहीप्यति, श्राद्धादिकञ्च करिष्यति, बान्धवाश्च तं न विवारयिष्यन्तीति सूचनार्थम् । राजनिवेदनं चाप्येतदर्थमेर-इति विवाद- भङ्गाणव( २ विवा० १७३ ख ग्रन्थलिखनञ्चेति ॥५॥ १.पो०-त्यप० । २. ताहक-व्यापक ३. वृहदगौतम इति दमौ० पुम्नके पाठः ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१५०-१५१ ४५३ एतब्दीयनवम्बरमासीयसप्तदशदिनसम्बन्धिशनिवासरे मयेयं व्यव- स्था दनेति ।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १३--रोवकारि मिछिन सदर देओयानी आदालत मोकाम कलिकाता धादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिस्. पीयेर साहेवेर वैठक ओयाक्कै तारिख ५ सेतम्बर इ० सन १८३२ साल मोतावक वाङ्गला सन १२३६ साल तारिख २२ भाद्र रोज बुधवार - मोछम्मात वेचुधामन- छाएला- छाएलार उकिल मुनशी अलि उल्ला हाजिर प्राइल । छाये- लार छोयाल सन हालेर २१ जुलाइ तारिखेर जेला वेहारेर जज साहेवेर हुकुमेर नाराजीते ये श्रापन मातार धर्तमाने उहार स्वामीर पुनक मृत्यु होन सरवे मोछर्मात मुद्दा मोतओर्कार दौहित्रगण राधा ओ गोवर्द्धनेर मोतभोर्फा मजकुरार सहित प्रोयारिप सावुद होया ओ छायेलार ओयारिप सालद ना होयार विशये छादेर हइयाछे । शास्त्रानुजाइ मोतनोफी मज- कुरार सहित आपन ओयारिप शाछादर हुयुम छादेर होनेर प्रार्थनाय उकिल मजकुरेर नामेर ओकालतनामा श्री लाला सुवंश- लाल मोक्तारकारेर नामेर मोक्तारनामा श्रो तारिख मजकुरेर जेला मजकुरेर आदालतेर रोवकारिर नकल एक केता ओ इ० सन १८०३ साले १६ अक्तुबरेर लिखित एलाका आजिमाचादेर आपीलेर रोवकारिर नकल एक केता, ओ इ. सन १८१६ सालेर १५ अक्तुबर तारिखेर जेला मजकुरेर डिगरिर नकल सम्वलित जाहा सन हालेर २७ अगष्ट तारिख दाखिल हयाछिल, अद्य व्यवस्था-पत्र संख्या-१५१ अनुमोधने श्राइल । हुकुम हइल ये एइरोवकारिर नकल एवं -छोयाल यो तत्समिभ्यारि कागजात सम्वलित एइ हुकुमे एइ आदालतेर पण्डितेर निकट पाठान जाय ये कागजात अनुमोदन परे एइ विपयेर जोयाब ये जेला हारेर जज साहेवेर हुकुम तद्देशीय प्रचलित शास्त्रानुजाइ वटे कि ना लिखेन इति ॥- श्रीजयतितराम् एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिस्पीयरसाहेवधम्माधिकरण- लिखितैतदन्दीयसितम्बरमासीयपञ्चमदिवसोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूप- पत्रमेवं तत्समर्पितै तद्विवादविषयनिविष्टपत्रजातं च यत्तदन्दीयतन्मासीयोन- विंशतितमदिनसम्बन्धि मुधवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशयोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते - वेहारदेशीयजिलाख्यावान्तरघाधिकरणाधिपविकृताशा तद्देशप्रच- लिलशास्त्रानुसारिणी न जातास्ति । प्रभुसमर्पितपत्र जातैविशेषतोऽङ्ग्रेजी शब्दप्रतिपाद्यपोडशाधिकाष्टा दशशतान्दीयाकत्वरमासोयरञ्चदशदिवसीयवे. हारदेशीयजिलाख्यावान्तरघम्माधिकरणीयजयपत्रप्रतिरूपपत्रेण तल्लिखितध. म्माधिकरणनियुक्तपण्डितसम्बन्धिप्रश्नोत्तराम्या विवादास्पदोभूनधनमेवद्ध म्माधिकरणार्थिन्या घेचूधामिन्याः श्वशुरस्य फतेहयामिन श्रासीत् , तन्म- रणानन्तरं तत्पुत्रेण फेयामिना अर्थादर्थिन्या वेचूषामिन्याः पत्या पुत्रत्वेन प्रातमिति ज्ञातम् । अतस्तद्धनं फतेइघामिनः पुत्रस्य फेघामिन एव जातम् प्रतस्तन्मरणोत्तर प्रदुत्तराधिकारिगामेव तनाधिकारः। तदुत्तराधिका रिणामध्ये तस्य पुत्रौत्रप्रपौत्रामाये तसल्या अर्थिन्या वेचूघामिन्या एव मपानाधिकारित्वात् , वेचूनामिन्यामयिन्या विद्यमानायामन्येषानाधिकारः, मातरि विद्यमानायामनपत्यस्य कस्यचिन्मरणेन तत्सल्याः पुत्रपौत्रप्रपौत्रा- भावे मति प्रधानाधिकारिण्या अधिकारो न भवतीत्येतद्विधायकशास्त्रामा. चान्-इति वेहारदेशप्रचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमयूखन्यवहार- माधवव्यवहार कौस्तुमा दिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्था ।

व्यवस्था पत्र-संख्या-१५१-१५२ अत्र प्रमागम- पली दुहितरश्चैव पितरो प्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः-इत्यादि मिताक्षरावीरमित्रोदयादिमन्य:- 'धृतयाज्ञवल्ल्यवचनम् ॥ १ ॥ पुत्राः पोत्राश्च दायं गृहन्ति तदभावे पल्यादयः-इति मिताक्षरा. ग्रिन्थलिखनश्चेति ॥ २॥ एतदन्दीयनवम्बरमासीयैकविंशतितमदिनसम्बन्धिबुधवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण . ३३२५ लं- १४-रोवकारि मिछिल सदर देओयानि आदालत मोकाम कोलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिश- पियेर साहेवेर बैठके ओयार्के तारिख १० शेतम्वर इ० सन १८३२ साल मोतारक २७ भाद्र सन १२३६ साल वाङ्गला रोज सोमवार ।। गोसावीचन्द्रकविराज आपीलाण्ट मोलात जयमनि ओ कृष्णमणि मोतओर्फा-रेपाडण्टान आपीलाएटेर उकिल मुनसि हयदर आलि यो रेप्पाडण्टानेर मध्ये जयमनीर उकिल मुनसि गोलाम यतुल हाजिर पाइल, एवं इस्तहारनामा जारि होयाते ओ कृष्णमनीर मोतोफार तरफेर कोन ओयारिप ए आदालते हाजिर आइल ना। एइ मोकदमा सेरेस्तादारेर कैफियत मते आमार बैठके दरपेप हइया प्रथम पादालत जेला विरभूमेर कागजार ओ द्वितीय आदालत मुर- शिदाबादेर क्रोटेर कागजात एवं ए आदालते दाखिल होया -सार आपीलेर छोयाल जाहा, आपिलाएट मौजेवात करार देय, ४५६ व्यवस्था पत्र-संख्या-१५२ ओ ताहार जोयाव सेश्रो याय साक्षिदिगेर जोवानवन्दि अनु- मोधने प्राइल । जयमनीर उकील मुनसि गोलाम वतुलेर प्रति छोयाल-ये तुमि एइ आदालतेर दाखिल करा आपन जो. यावे लिखियाल-ये कृष्णमनी पापन मृत्तकालिन मातघर, मनिष्यदिगेर साक्षाते आपन हिस्यार वस्तुते उहाके हकदार फरि- श्राछे, ए प्रयुक्त जिज्ञासा करा जाइतेछे-ये लिखित पठितेर द्वाराय कि अन्य कोन प्रकारे। श्रारज फरिलेक-ये प्रामार मोलेर जोयावेते ए विपय पष्ट प्रकाश नाइ। ये हेतुक एइ मोकईमार आपील शास्नेर विशयसकल अधिक तहकिकातेर दृष्टे मसुर हइयाछे ताहार दृष्टे हुकुम हइल जे एइ मोकदमार कागजसकल एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हेतुते पाठान जाय ये उभयेर दाखिल करा कुरशीनामासकल ओ जेलार आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था ओ एइ श्रादालतेर पण्डितगणेर खाप प्रापोल मजुर कालिन दाखिलकरा व्यवस्था अनुमोधने निचेर लिखित छयो- यालसकलेर जोयाय लिखेन ॥ १-प्रथम-एइ ये १८०६ मास वयक्रमेर समय मृत्तुर एक- दिवस पूर्व भैरवेर जोवानि क्रत हेवा प्रामाण्य हय कि ना ॥. २-द्वितीय-यद्यपि स्यात् ताहार प्रामाण ना हय, तवे', उभय विवादिर मध्ये फोन व्यक्ति भैरवेर उत्तराधिकारि मते राखे। ३-तृतीय-यद्यपि स्यात् खास पापील मञ्जरिर समये एइ आदालतेर दाखिल हुओया व्यवस्थार द्वाराय प्रकाश ये साधेक मुईइआनेर मध्ये एक जन कृष्णमनी पुत्रवती होनेर उद्द खेर पीवार हिस्याय हकदार छिल । एइ घने प्रकाश ये कृष्णमनि थो ताहार स्वामि दुयेरि मृत्यु हइयाछे । ए प्रयुक्त कृष्णमनी मजकुरार क्षेमता छिल किना-ये आपन हिस्या जयमनीके ये प्रकार एइमादा. लतेर जोयावे लेखे समर्पन करे, आर ताहार अन्यथाय मोछ- मात मजकुरार पोयारिप कोन व्यक्ति हइवेक, एवं सेरेस्तादार " . ..

व्यवस्था पत्र संख्या १५२ एइ विशयेर कैफियत ये एइ मोकदमा इ० सन १८२२ साले मञ्जुर हय, परे कि जन्य मुईत दश वत्सर पर्यन्त मुलतवि थाकिल-दाखिल कारण इति ||- श्रीजयतितराम एतदर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुक्तहेनरीसिकिस्पोयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखितैतदब्दीयसितम्बरमासीयदरामदिवसीय विचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूप- पत्रमेवं तत्समपितेतद्विवादविषयनिविष्टपत्र जातमाथिनिविष्टानि प्रत्यर्थिनिवि. शानिःच वंशावलीपत्राएयेवं जिलाख्यावान्तरघम्माधिकरणनियुक्तपण्डितः । लिखितव्यवस्थापत्रमेतद्धर्माधिकरणनियुक्तपण्डिताभ्यां लिखितमेतद्विवा दस्यैतद्धर्माधिकरणविवेचनायोग्यत्वनिश्चयकालिकमर्थाभापायां खारा- अपीलमजूरशब्दप्रतिपाद्यकालिकव्यवस्थापत्रं च यदेतदन्दीयाकतवरमा- सीयरिंशत्तमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्तं तदवलोम याशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।। प्रयमप्रश्नस्योत्तरम- पण्मासाधिकाष्टादशवर्षवयस्केन भैरवेण स्त्रमृत्योरेकदिवसपूर्व यद्दानं चाचा कृतं तत् सिद्धयति प्रभुसमर्पितपत्रवातैविशेषतो वीरभूमिप्रदेशीयजिला- ख्यावान्तरघम्माधिकरणनियुक्तपण्डितसम्बन्धिप्रश्नोतराभ्यां प्राप्तव्यवहारेण • प्रकृतिरथेन च भैरवेण स्वस्वत्वासदीभूतधनस्य दानं कृतमित्ययगमेनै 'तादृशदानसिद्धो बाधकसामान्याभावादिति । द्वितीयप्रश्नोत्तरमप्यर्थादत्रैव पर्ययंपन्नमिति पृथड्न लिखितमिति । अत्र प्रमाणम्- प्रदानं स्वाग्यकारणम् इति मनुवचनम् ।।१।। दाने हि चेतनोदेशविशिष्टात् त्यागादेव दातृव्यापारात् सम्प्रदानस्य द्रव्ये स्वामित्वम् - इति दायभागग्रन्थलिखनम् ।। २ ॥ अदगंतुमयकोधकामशोकरुगन्वितैः-इत्यादि विवादाणवसेतुविवाद भनार्णवादिग्रन्यधृतनारदवचनम् ॥ ३ ॥ १. पामासायिकासारापन्ययरज्य-व्या व्यवस्था पत्र संख्या-१५२ भयादिरुगन्ताः पञ्च प्रकृतिस्थितिविरोधिनो द्रष्टय्याः- इति विवाद- महार्णवादिग्रन्थलिखनम् ॥ ४ ॥ तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्- यद्यप्यधिनीनामर्यादेतद्धर्माधिकरणप्रत्यर्थिनीनां मध्ये कृष्णमण्या: पुत्रसम्मायनायो सत्या पितृत्वधनस्योत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जाते सति कृष्णमण्याः स्वसंक्रान्तपितृत्यकधनस्य जयमणीमुद्दिश्य यथैतदर्माधिकरपो. तरपत्रे जयमण्या लिखित तादृशसमर्पणस्य क्षमता पितृकृतीपाकरणाद्या- वश्यककार्याय तत्तकाम्ये प्रयुक्त स्यासीत्, तद्व्यतिरेकेण स्वेच्छया स्वाभिप्रायेण च नासीत् । यदि च कृष्णमण्या तद्धनं दानानुसारेण प्राप्त यद् वीरभूमिप्रदेशीयजिलाख्यावान्तरधर्माधिकरणनियुक्तपण्डितसंबन्धितृती. यप्रश्नोत्तराभ्यां कृष्णमणीजयमण्युभयोपस्थापितयवाव-उल-यवावसंश कपत्रेण चावगम्यते तदा तद्धनस्य कृष्णमण्याः सौदायिकस्त्रीधनखेन तत्रोपरिलिखित पितृकृतकपाकरणार्य तद्विनापि च स्वाच्छन्येन समर्पणस्य क्षमता श्रासीत् । एवञ्च सति कृष्णमण्याः वयमणीमुद्दिश्य तदनसमर्पण- क्षमताया असत्त्वपक्षे कृष्णमयीमरणानन्तरं तत्संक्रान्ततलिव्रत्यकधनस्य यदि कृष्णमणीमरणोत्तरमेतद्धर्माधिकरणार्थिनी गोसाइचन्द्रकविराजस्य पिता वैद्यनाथकविराजो विद्यमान श्रासीत् , तदा तस्य कृष्णमण्याः पितुर्ग- हानारायणस्य पितामहदौहित्रत्वेनाधिकारे जाते सति तन्मरणोत्तरं तत्पुत्रो गोसाइचन्द्रकविराजोऽधिकारी भवितुमईति, यदि च कृष्णमणीमरणात् पूर्वमेव गोसादचन्द्रकविराजस्य पिता वैद्यनाथकविरानो मृतः स्याचदा गोसाइचन्द्रकविराजस्य कृष्णमणीमरणानन्तरं तत्संक्रान्ततस्तृित्यक्त- घने अधिकारी भवितुं न शक्रोति, पितामहदौहित्रपुत्रत्य शास्त्रानुसारे यानधिकारात् , वैद्यनाथकविराजकृष्णमएयोर्मध्ये पूर्व वैद्यनाथकविराजस्य मरणं कृष्णमाया या मरणं जातमित्यस्य प्रभुसमर्पितपत्र जातैातुमश- क्यत्वात् । एवं प्रभुसमर्पितार्थिप्रत्यधिसमुपस्थापितवंशावलीपत्रलिखिताना' मध्ये केवलं अयमएवा एव विद्यमानत्वेन, तस्याश्च कृष्णमणीमरणा• नन्तरं तसंक्रान्ततपितृत्यक्तधने अधिकारो भवितुं न शक्नोति, भ्रातृदुहितुः १. प्रधादीतिपाठः विभः । २. सनुस्थायित-व्यस० ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१५२ पितृव्यधने शास्त्रानुसारेणाधिकारित्वात् । किन्तु कृष्णमणीमरणोत्तरं तत्- संकान्ततत्रितत्यक्तधने शास्त्रानुसारेण ये अधिकारिणोऽधिकारिखलायां निविष्टाः तेषां मध्ये. कश्चिच्चेद्विद्यमानस्तदा स एषाधिकारी भवितुं रानोति । परन्तु स च क इति प्रभुसमर्पितपत्रजातैातमशक्य एव इति वङ्गदेशचलितमनुदायभागदायमागटीकादायतत्त्वदायक्रमसंग्रहशुद्धितत्त्वदा- यरहस्यविवादार्णवसेतुविवादभङ्गार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरौ स्थिता । भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा जई ध्वमाप्नुयुः ॥ इति दायभा. गादिनन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥१॥ यद्वा पत्नीत्युपलक्षणम्, स्त्रीमात्राधिकारे अयमों घोद्धव्यः--इति दायभागग्रन्थलिखनम् ॥२॥ स्त्रीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुरनापदि ॥ विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविकयाः ।।-इति नारदस्मृत्यादिनन्यधृत- नारदवचनम् ॥३॥ ऋकूथपाही ऋणं दाप्यः--इत्यादि विवादमहार्णवादिनन्यधृत. याशवल्क्यवचनम् ||४|| उदया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहेऽथवा । भर्तुः सकाशात् पित्रो; लब्धं सोदायिकं स्मृतम् ।}-इति दायभा. गादिग्रन्यधृतकात्यायनवचनम् ।।५।। सौदायिक सदा स्त्रीणां स्वातन्त्र्यं परिकीर्तितम् । विक्रये चैव दाने च यथेष्टं स्थावरेवपि ।।-इति दायभागादिग्रन्य. धृतकात्यायनवचनम् ॥६॥ एवं पितामह प्रपितामहसन्ततेरपि दोहित्रान्तायाः पिण्डप्रत्यासति- कमेणाधिकारो योद्धव्यः इति दायमागग्रन्थलिखनम् ॥७॥ दोहिप्रश्न पिण्डदाता न च तत्पुत्रः-इति दायभागबन्य- लिखनम् ।

व्यवस्था-पत्र-संख्या-१५२-२५३ न दार्य निरिन्द्रिया श्रदायारच स्त्रियो मताः-इति श्रुतेः न दायमर्हति स्त्रीत्यन्वयः, पल्यादीनाम् त्वधिकारो विशेपवचनादविरुदः- इति.दाय- भागअन्य लिखनश्चेति ॥ एतदन्दीयदिशम्वरमामोयदशमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण १५-मोकाम कलिकातार सदर देओयानि पण्डित मिति सोयाल। यद्यपि मोछलमान जातीय कोना वेक्ति हिन्दु जातीय कोनो वेक्तिर वीके चुझाइया ताहार पतिर असन्मतिते मोछलमान धम्म श्रानिवार मानस करे, अथवा हिन्दुजातीय कोन वेतिर स्खी पापनार जातीय धर्मत्याग फरिया मोछलमानेर धर्म स्वीकार फरिते इत्सा करे, तवे पविर नालिस मते हाकिम वेक्तिके मोछ- मात मजकुरा ओ मोछलमान वेफिदिगेर प्रार्थना हइते वारण राखा पौछे कि ना। यद्यपि पौछ, तवे कि प्रकार, ओ यदि स्यात् ऐ श्री मोछलमान हइया थाके, तवे ताहार पतीर जातीर किछु. हानि हय कि ना। इति सन १८३२ साल तारिख १० दिसम्बर।। श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यदेतदन्दीयदिशम्वरमासीयत्रयोदशदिन सम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो सातस्तदनुसा. रेगोत्तरं लिख्यते ||- यदि यवनजातीयः कश्चिद्वयक्तिविशेषो हिन्दुजातीयस्य कस्यचिद् व्य. क्तिविशेषस्य स्त्रियं बोधयित्वा वस्या स्त्रियाः पत्युरननुमत्या च यवनजातीय. धम्मेवानेतुमिच्छति, अथवा हिन्दूजातीयस्य कस्यचिद् व्यक्तिविशेषस्य स्त्री स्वजानीयधर्मस्य रयाग कृत्वा यवनजातीयधर्मस्य वोकारं कर्तुमिच्छति व्यवस्था-पत्र-संख्या-२५३ तदा तस्याः स्त्रियाः पत्युस्तद्विषयकाभियोगे सति राशस्तस्याः स्त्रियाः यवन- नातीयस्य तद्व्यक्तिविशेषस्य च तत्तदिच्छाविषयीभूताद्वारणकरगामुचित भवति । एवं च सति गस्तयोरुपयुक्तदण्डादिकरणक्षमताप्यस्त्येव । यदि च सा स्त्री यवनजाती प्रविष्टाऽभूत्तदा तस्याः पतियदि तस्या यवनजातिभव- नानन्तरमपि तया यह स्त्रीपुंधर्माचरणादिकास्य कृतवान् स्यात्तदा तत्संसर्ग- जन्यपातकापनोदकयथाशास्त्रप्रायश्चित्ताचरणं विना स्वजातावाचरणीयो व्यवहार्यच भवितुं शास्त्रानुसारेण न शन्नोतीति, एवं तस्याः स्त्रियाः पत्युः स्वजातेहानिर्जाता । यदि च तस्याः स्त्रियाः यवनजातिभवनानन्तरं तत्पति- स्तया सह स्त्रीपुंधर्माचरणादिकार्य न कृतवान् स्यात्तदा तसत्युस्तत्- संसर्गाभावेन संसर्गजन्यप्रत्यवायापनोदकप्रायश्चित्तं विनापि स्वजातेः कापि हानिर्भवितु' न शक्नोतीति मनुमिताक्षराप्रभूतिधर्मशास्त्रानुसारिणी व्यवस्था ।- अत्र प्रमाणम्- अस्थतन्त्राः स्त्रियः कार्याः पुरुषे स्वैदिवानिशम् । विषयेषु च संजन्त्यः संस्थाप्या ह्यात्मनो वशे ।। इति मनु(६२) वचनम् ||१|| दम्पत्योः परस्परधर्मव्यतिकमे सति अन्यतरज्ञाने दण्डेनापि स्व. धर्मव्यवस्थापनं राजा कर्तव्यम्--इति मन्वर्थमुक्तावल्या(पृ० ३४५.३४६) कुल्लूकमव्याख्यानम् ॥२॥ यद्यपि सीपुरुषयोः परसरमर्थिप्रत्यर्थितया नृपसमक्ष व्यवहारो नि- पिद्धस्तथापि प्रत्यक्षेण कर्णपरम्परया विदिते तयोः परस्पराभिचारे दण्डादिना दम्पती निजधर्ममार्गे राज्ञा स्थापनीयो-इति मिताक्षरा- (पृ० २८८)ग्रन्पलिखनश्चेति ||३|| एतदन्दीयदिशम्वरमासोपाष्टादशदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मयेयं ब्य- वस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण .. व्यवस्था-पत्र-संख्या-१५४ श्रीदुर्गा १६--रोवकारी मिछिल सदर देोयानी श्रादालत मोकाम- कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिक्सिपीएर साहेवेर बैठके ओयार्क तारिख १६ माह शेतम्बर इ. सन १८३२ साल मोतावक ५ आश्विन वाङ्गला सन १२३६ रोज बुधवार- दुर्जनसिंह प्रो अर्जनसिंह श्रापीलापटान वाउत गिरिधरसिंह ओ गयरह रेपाडण्टान आपोलाएटानेर उकिलान् मुनशी होशेन श्रालि ओ सदा. ' सुखपण्डित हाजिर प्राइल । आपीलाएटानेर छोयाल एई मासेर ६ तारिखेर अनुमोदन होया एइ आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थार प्रति ओजरात एवं अन्य अन्य विशय सम्वलित सादा कागजेर पर एक केता व्यवस्थार नकल दुइ टाका फिर्मातेर एक केता फेरस्त समेत, जाहा एइ मासेर ८ तारिखे दाखिल हइया छिल, अनुमोदने श्राइल । हुकुम हइल ये आपीलाप्टानेर छयोयाल एइ रोक्कारिर नकल ओ एइ मासेर ६ तारिखेर रोवकारिर नकल सम्वलित श्रो एइ मोकई मार मोतालक साम्यक कागजात एइ हुकुमे ये पण्डित सावेक व्यवस्था ओयापीलाण्टा- नेर भोजरात ओ एइ मासेर ६ तारिखेर होया एइ आदालतेर रोधकारिर प्रति अनुमोदन करिया जोयाय लिखेन-ये तत् दृष्टे सावेक व्यवस्थार किछु तदिल जरुर पाछे किना, पार यद्यपि स्यात् ताहा थाके, ताहार सरेोयार कैफियत लिखेन-एइ श्रादालतेर पण्डितेर अग्रे पाठान जाय इति । श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरोसिकिसपीयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखितदन्दीयसितम्बरमासीयोनविंशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्न - व्यवस्था-पत्र संख्या-१५४ ४६३ प्रतिरूपपत्रमेवं तत्समपिततद्विवादविषयनिविष्टपत्रमातमेतद्धम्माधिकरणा- मिना निवेदनपत्रमेतदन्दीयसितम्बरमासीयपष्ठदिवसीयैतद्धर्माधिकरणीयवि. चारपत्रं च यदेतदब्दीयनवम्बरमासीयपष्ठदिनसम्बन्धिसोमबासरे मया प्राप्त तदयलोक्य यादृशयोधो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।- प्रभुसमर्पितोपरिलिखितपत्रजातदृष्टया अस्मद्दौतद्विवादविषयनिविष्टपूर्व व्यवस्थायाः किञ्चिदपि परावर्चनस्यावश्यकता नास्ति, धर्मशास्त्र केनापि मु- निना मन्थकारेण वा जीवति धनस्यामिनि पितरि तत्स्वत्वास्पदोभूतं धनं यत् खपिनादिमरणानन्तरं उत्तराधिकारित्वेन पित्रा प्रास तदनं तत्पुवैविभज्य ग्रहीतव्यमित्यत्यालिखितत्वात् , कस्मिंश्चिदपि देशे वाहशव्यवहाराभावाच । • यच एतद्धर्माधिकरणादिभिः स्वकीयनिवेदनपत्रे अरमद्दत्तपूर्वव्यवस्थायां पैतामहधनं लिखितं तत्प्रमाणेषु पैतृक धन लिखितमिति विरोधो लिखित स्सन् (?) सम्यक्तद्वयवस्यालिखितानां पराणां प्रमाणानां मध्ये केवलं प्रथमप्रमाणे मनुवचने एव पैतृकं घनमिति लिखितमस्ति । तत्र पैतृकं धन- मित्यस्य पितृस्वत्वास्पदीभूतं धनमित्याशयः । तत्र पितृस्वत्लास्पदीभूतं धनं यद्धनं पित्रा स्वेनैवोपार्जितं तदापि भवति । यद्धनं पित्रास्वपित्रादिमरणानन्तरं स्वमात्रादिमरणानन्तरं योत्तराधिकारित्वेन प्राप्त तदपि भवत्येव, पितृस्वत्व. स्य तत्राप्यक्षतत्वात् । यथैतद्धर्माधिकरणाथिभिर्विवादास्पदीभृतं धनं स्वपैतामहमिति लिखितं तत्रापि तद्धनमर्थिनां पितामहस्य स्वोपार्जितं न भवति, किन्त्वयिनामेतद्धर्माधिकरणीयनिवेदनपत्रेणेव विवादास्पदीभूतं धनं तत्पितामहेनाप्युत्तराधिकारित्वेनैव प्राप्तभित्यस्य स्पष्टीकृतत्वेन, अतएव यदनमर्थिनां पितामहेनार्थात् फीचिसिंहेन मूलभूतधनस्वामिनो विक्रमादित्य रायात् सप्तमपुरुषेणोत्तराधिकारित्वेन प्रातं तदनं यद्यर्थिना पतामह भवति तदा तद्धनमर्थिनां पित्रा अर्याद्गरिधनसिंहेन मूलभूतधनस्वामिनो विक्रमादित्यरायादरमपुरुषेयोत्तराधिकारित्वेन प्राप्तं तद्धनमप्यर्थिनां पैतृक मपि भवितुं शक्नोत्येव । इतरेषु तव्यपत्यालिखितेपु पश्चतु प्रमाणेषु सामा. न्यतो धनमित्यस्य लिखितत्वेन पितुः स्वोपार्जिते क्रमागते च घनशब्दस्या- विशेषात्-इति कानपुरप्रदेशचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमाधव. न्यवहारकौस्तुभव्यवहारमयूखमिताक्षराटीकादिनन्यानुसारेणोत्तरमिति ।।

.४५४
व्यवस्था-पत्र-संख्या-१५४
एतदन्दीयदिशम्बरमासीयोनविंशतितमदिनसम्पन्यित्रुधवासरे मयेदमुत्
रं दत्तमिति ।
श्रीजयतितराम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रण

व्यवस्थापनसंख्या-१५५ श्रीदुर्गा १७-रोवकारी मिटिल मोकाम कलिकांतार सदर देशोयानि प्रादाजतेर हाकिम श्रीयुत बालकसुन्दर रास साहेवेर बैठके होयार तारिख इगरेजी सन १८३२ सालेर ४ द्विजम्बर मोता- वेक सन १२३६ वाइलार २० अग्रहायन मङ्गलवार--- श्रानन्दकिशोर गुप्त बनाम श्रीमती क्षेमकरीदासो छायलेर उकिल मुनशी गोलाम यतुल हाजीर आइल। छायलेर छोयाल ३२ टाका मूल्ल्येर इष्टाम्प कागजेर पर प्रासाच्छादन प्रभृति विशये मुः ५२० पाच शत कुडी टाकार मोकर्दे मार खास आपील मजुरेर प्रार्थनाय उकिल गजकुरेर नामेर एक फेता प्रोफाजतनामा प्रो इं० सन १८३० सालेर २१ अक्तुबर तारिखर होया नदिया जेलार आदालतेर एक केता फयसलार नकल ओ इं. सन १८३२ सालेर १५ फिवरेल ओ सन १८२७ सागर १८ श्रापरेल तारिखेर होया कलिकातार मोट आपीलेर दुइ केता फयसलार नकल ओ एक केता वेस्था सहित, ये सन हालेर ८ शेतम्बर तारिखे दाखिल हइयाछिल, अच दृष्टे आइत । येहेतु हुकुम होनेर पूच शास्त्रेर विवरण ज्ञात होया उचित चोध हइल, एजन्य हुकुम हइल ये एइ रोयकारिर नस्ल एइ हुकुमे ए आदालतेर पण्डितके अर्पन कराजाय ये निचेर लिखित प्रश्नोत्तर ताहार पाइनार दिवसावधि एक सप्ताह मध्ये दासिल करेण इति । प्रश्न -खोशालचन्द्रराय तालुकात प्रभृति यो करुणामयी वनिता यो करुणामयीर गर्भजाव दुहिता श्रीमति चिनादासीके उत्तराधिकारिगएफे राखिया लोकान्तर्गामी हय, तत्परे लिखित श्रीमती करणामयी स्वामीर तेज्य बस्तुर पर श्रोताहार मृत्युर पर तस्य कन्या श्रीमती चिनादासी उक्त सोशालचन्द्रर तेज्य वस्तुर उपर दखिलकार हइलेन । तदपरे उक्त श्रीमतोचिनादासीर दुइ पुत्र अर्थात् भैरवचन्द्रगुप्त श्री मानन्दकिशोरगुप्तेर मध्ये व्यवस्थापनसंख्या-१५५ ४६६ ज्येष्ठ भैरवचन्द्र गुप्त श्रीमती क्षेमकरीदासी वनिता ओ हरसुन्दरी ओ दयामयीप्रभृति चारि कन्याके राखिया आपन माता श्रीमती : चिन्नादासीर समक्षे लोकान्तर हय, एवं उक्त श्रीमती चित्रादासीर द्वितीय पुत्र आनन्दकिशोर गुप्र उस खोशालचन्द्रेर सावत तेज्य वस्तुर उपर दखिलकार ह्य । अतः पर जिज्ञाशा करा जाइतेछे ये यदि उक्त आनन्दकिशोर आपन ज्येष्ठ भ्राता भैरवचन्द्रर स्त्री श्रीमती क्षेमकरी दासीके, ओ ऐ श्रीमती क्षेमकरीदासीर मृत्युर पर साहार कन्यागए हरसुन्दरी ओ दयामयी प्रभृतिले ताहार दिगेर पाविश्वक अनुसारे प्रासाच्छादन ना देय, तवे पगदेशीय चलित शास्त्रानुसारे लिखित श्रीमती क्षेमहरीदासो पो तत् पर- लोकान्तर तस्य कन्यागण श्रीमती हरसुन्दरी पो दयामयी प्रभृति घाएल प्रानन्दकीशोर गुप्तेर स्थाने प्रासाच्छादन पाइवार क्षेमता राखे कि ना- श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुत अलक सुन्दरराससाहेवधर्माधिकरणलिखि- तारेजी शब्दप्रतिगाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयदिशम्यरमासीयचतु- थदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रभप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयस्वदशदिन. सम्बन्धिशविवासरे मया प्राप्तं तदरलोस्य यादृशयोघो जातस्तदनुसारेणो- चरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितमश्नपनलिसितवृत्तान्ते सत्यानन्दकिशोरगुप्तो यद्युत्तरा- धिकारित्वेन मासरितृधनायां स्वमातरि बीवन्त्यां मातामहधने अनुसन- स्वत्वस्य मृतस्य भैरव चन्द्रस्य स्वकीयन्येऽभ्रानुः पल्याः श्रीमत्याः क्षेमहरी. दास्या, तन्मरणोचरं तत्कन्याना रसुन्दरीदयामयीमभृतीनामावश्यक आमाधादन न ददाति तदा सा एव श्रीमतीक्षेमहरीदासो मासाच्छादनो. पयुक्तरसविस्यक्तघनामावे स्वजीवनपर्यन्तमानन्दकिशोरगुमस्य स्वकीय. देवरस्य स्थाने ग्रासाच्छादनप्रदणस्य क्षमता रखत्येव, एव तन्मरणोचर तत्कन्यकानां यदि विवाहो नाभूत्तदा तासां मध्ये अविवाहितास्सा एवं व्यवस्थापनसंख्या-१५५ ४६७ विवाहपर्यन्तं ग्रासाच्छादनोपयुक्तस्वपितृत्यतघनाभावे सति विवाहपर्यन्तं . पासाच्छादनाहरणस्य क्षमतामानन्दकिशोरगुप्तस्य स्थाने रक्षन्त्येय । यदि च भैरवचन्द्रस्य कन्यानां सांसामेव विवाहो जातः स्यात् तदा तामां विवा. हितानां कन्यकानां मध्ये यासां ग्रासाच्छादनं स्वभकुलात् स्यभर्तृकुल सम्बन्धिधनाद् वा स्वपितृत्यक्तधनाद्वा भवितुं न शक्रोति तदा ता अपि याव- जोवं स्वकुलोचितपासाच्छादनग्रहणस्य क्षमतामानन्दकिशोरगुप्तस्य खपितृ. न्यस्य स्थाने रक्षन्त्येव । याणञ्च विवाहितानां प्रासाच्छादनं स्वम कुलात स्वभत्र्तृकुलसम्बन्धिधनाद् वा स्वपितृत्यवधनाद् या भवितुं शक्नोति ताश्च ग्रासाच्छादनग्रहणस्य क्षमतामानन्दकिशोरगुप्तस्य स्याने न रक्षन्ति, तासामावश्यकमासाच्छादनस्य स्वभकुलादेरुपपत्तेः इति वनदेशचलित- दायमाग-दायतत्वदायभागटीका-दायक्रमसग्रह विवादार्णवसेतु-विवादमगार्ण- पादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- अत्राप्रमाणम्- सुताश्चेपाञ्च भव्या यावदे भर्तृ सास्कृताः। अपुत्रा योपितश्चैपां मर्तव्याः साधुवृत्तयः ।। इति दायभागादि( दाभा० पृ० १०४ )अन्यधृतयाज्ञवल्क्य( पृ० २२७ २।१४१ )वचनम् ॥१॥ मृते भर्त्तर्यपुत्रायाः पतिपक्षः प्रमुः स्त्रियाः । विनियोगार्थरक्षासु भरणे च स ईश्वरः ।। परिक्षीणे पतिकुले निर्मनुष्ये निराश्रये । तव सपिरदेषु चासत्सु पितृपक्षः प्रमुः खियाः ।। इति दायभागादि- (दाभा० पृ० १७३)अन्धधृतनारद(नास्मृ० १३।२८-२६वचनञ्चेति ||२|| अगरेजीशन्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयजानवरीमासीया. एमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ४६८ व्यवस्थापनसंख्या-१५६ ४७०२ल०। १८ फैरादि-गोलकमणीदासीसा वेहाला परगणे वलिया आसामी-पीताम्वरहालदार १स्वय्य वेोया १सार वेहाला परगणे वलिया, निमचाँद राय, श्सा मोदि परगणे मागुरा । मालिके जमीन सावेक "रामचन्द्रहालदारेर भोयारिस श्रीनाथहालदारभट्टाचार्य । इहार हाल खरिदार हरचन्द्र हालदार सा० वेहाला परगणे वालिया १, दोसरा मालिके जमिन महारामा नवकृष्णवाहादुरेर ओयारिस लायेक शिव- कृष्णवाहादुर ओ फाजीकृष्णबाहादुर सा० सहर कलिकातार सवावाजार २। ... दावि मोरसि जमिर लाखेराजी जमीर श्रोयारिसिते दखल कायेम हइवार प्रार्थनाय किमत सायदाद १५० टाका । एक वेक्ति गङ्गारामराय जाति पत्रि आपन मजातीते विवाह करे । विवाहिता खीर पक्षे एक पुत्र मदनराय । ऐ गङ्गारामराय एक- कपालिर कन्याके पासना करे। ताहार उदरे एक कन्या हय । ताहार नाम गोलकमणि । ताहाके छनिर संगे विवाह देय । गङ्गारामराय लोकान्त हइवाते ऐ मदनराय नापन पितार स्थावर ओ थरथावर विपय दखलिकार थाफिया सजातिते विवाह करे, एफ कन्या हय । तस्य नाम वरदामणि । ऐ मदन- राय श्रापन पैक जे किछु तावत आपन कन्या वरदामणिके दान करे, सरत् एइ जे पर्यन्त परदामगिर विमाता जीवितमान थाकिवेक ऐ विपयेर) श्राना रकम उपस्वत्व हइते सोरपोप करिवेक, वरदार।) थाना थाकिवेक, घरदार विमातार लोकान्त इइले सोलो आना उपवर्त घरदार थाझियेका ऐ वरदार विमाता ऐ प्रकार दखलिकारि थाकिया आपन सपतिनि-पुत्री घरदामनिके सजातीते विवाह दिया फोत करे। वरदामनि आपन विमातार श्राद्ध आदि करिया ऐ दानेर विशयेते दखलिफारि थाकिया किछु काल परे वरदामनि यापन स्वामिफे राखिया लोकान्त . व्यवस्थापनसंख्या-१५६ ४६६ हइयाछे। एलन ऐ गोलकमनि श्रापन पितार गङ्गारामरायेर ओयारिस जानाइया नालिस करे। अतएव धर्मशान अनुसारे ए विषय काहारे घटीवेक इति- ओजयतितराम् पमुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदभरेजीशब्दप्रतिपाद्यद्वात्रिंशदधिकाष्टादशशता- ब्दीयागस्तिमासीयत्रयोविंशतितमदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्त सदवलोक्य यादशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- अत्र यद्यपि प्रश्नपत्रे लिखितमस्ति मदनरायत्य कन्या परदामणी स्वविमातुः श्राद्धादिक कृत्वा तदानकृतधने प्रायत्तत्वं समाद्य किञ्चित् । कालानन्तरं स्वपति रक्षित्वा मृतेति, परन्तु वरदामण्या विमाता प्रश्नपत्र- लिखितानां स्त्रोण मध्ये का भवतीति प्रश्नपत्रेण ज्ञातुं न शक्यते; तथापि प्रश्नपत्र लिखितवृत्त न्तस्य सत्यत्वञ्चेत् तदा वरदामण्याः यदि कन्यापुत्र- दौहित्रपौत्रप्रपौत्रसस्नोपुत्रपौत्रप्रपौत्रभातृमातृपितृपय॑न्तानां मध्ये कश्चिन्ना- स्ति चेत्तदा तलत्युरेवाधिकारः। प्रश्नपत्रलिखितवृत्तान्ते सति विवादास्प- दीभूतघनस्य परदामण्याः पन्यावस्थायां पितृदत्तत्वेन सौदायिकस्रोधनवात् कन्यावस्थायां पितृदत्तसोदायिकन्त्रीधने च कन्यामारम्य पितृपय॑न्तानामुपरि- लिखितानाममाघे पत्युरधिकारस्यार्यसिद्धत्वात्--इति वङ्गदेशचलितदाय- मागदायतत्त्व-दायमागटीका-दायकमसंग्रह विवादाविसेतु-विवादमलाएंवादि- अन्धानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाण- जदया कन्यया वापि पत्युः पितृगृहेऽथवा । भर्तः सकाशात् पित्रो लब्धं सौदायिक स्मृतम् ॥ इति दायमा- गादि( दाभा० पृ०७६ )यन्यधृतकात्यायन कास्मृ० १०१। पृ० १०६) यचनम् ॥२॥ विवाहकाले तत्पूर्वापरकाले वा स्त्रिये यदनं पित्रा दत्तं तत्र तु धने प्रथमं कुमार्यास्तदनन्तरमूढायाः पुषयतीसम्मावितपुत्रयोस्तदनन्तरं च बध्याविधवयोश्वाधिकारः । सर्वदुहित्रभावे पुत्रादेयौतुकधनवत् क्रमेणा- . . व्यवस्थापनसंस्था-१५६ धिकारः-इति दायक्रमसंग्रह पृ० २३ )विवादाणंयसेत्यादि(पृ० ५७) ग्रन्थलिखनम् ॥२॥ तत्र यौतुकघने इति प्रस्तुत्य सर्वदुहित्रभावे पुत्रस्याधिकार इति । पुत्राभावे दोहित्रोऽधिकारीति । दौहित्राभावे पोनस्तदभावे प्रपौत्र इति । तदभावे सपतीपुत्र इति । तदभावे सपत्नीपोत्रस्तदभावे सपलीप्रपौत्र इति । एतत्पर्य्यन्ताभावे मासदेवागान्धर्वप्राजापत्यास्यविवाहपञ्चकलन्धयोतुक- धने भरधिकारः-इति दायक्रमसंग्रह(पृ० १६।२० ग्रन्थलिखनम् ॥३॥ वन्धुदत्तं तथा शुल्कमन्याधेयकमेव च। अप्रजायामतीतायां बान्धवास्तदयाप्नुयुः ।।-इति दायभाग- (पृ०६२)दायक्रमसंप्रदा-पृ०२०)विवादार्णवसेतु( पृ०६०)विवादमझा- सुवादि( २ विवा० ४१५ क )अन्यतयाज्ञवलाय(२।१४५ वचनम् ॥४॥ वन्धुदत्तमिति मातापितृभ्यां यद्दत्तम्, श्रतएव तत्पुत्राश्च भातर' एवं चान्धवाः तदाह वृद्धकात्यायन:- पितृभ्याञ्चैव यद्दत्तं दुहितुः स्थावरं धनम् । अप्रजायामतीताया मातृगामि तु सर्वदा ॥ इति सर्वदापदेन ब्राह्मादिपेशाचान्तविवाहिताया अप्रजाया' धनं मातृ- गाम्येव भवतीति । स्थावरपदाद् दण्डापूपन्यायादेवापरस्य धनस्य सिद्धिः । बन्धुदत्तपदेन कन्यादशायां यत् पितृभ्यां दत्तं तदुच्यते--इति दायभाग- (पृ०६२)अन्धलिखनम् ॥५॥ प्रथमं सोदाणा तदभावे मातुः मातुरभावे पितुः एपो पुनरभावे तमन भर्नुः इति दायभाग(पृ. ६५ मन्थलिखनञ्चेति ॥६॥ श्रद्भरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रियदपिकाष्टादशशताब्दीयजानवरीयमासी- यचतुर्दशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति-- श्रीजयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण १. भ्रातरो मान्धवा--दामा। २. प्रजसो धन-दामा०॥

व्यवस्थापनसंख्या-१५७ ५०१ . ३६४१ लं १६-रोक्कारी मिबिल शदर देओयानि श्रादालत सो कलिकाता आदालत मजकुरेर हाफिम श्रीयुत रिचार्ड प्रोयालपोल साहेवेर बैठके 1 तारिक माह जानेर इंसन १८३३ साल मोता- वके वाङ्गला २७ माह पौप १२३६ साल दिवस बुधवार- मोछवि लक्ष्मीप्रिया आपीलाएट भैग्वचन्द्रचौधुरि ओ जयचन्द्रचौधुरि, रेवाडेपटान आपिलण्टेर उकिल मनसि होसन आलि श्रो हाजिर रेप्या- डेण्टर उकिल सदासुफपण्डित हाजिर आइल, पार द्वितीय रेप्पाडेण्ट जयचन्द्रगय इयानामनामा श्रो इस्ताहारनामा जारिते ओ खोद किम्बा उकिलेर द्वाराय हाजिर नाइ । एइ मकर्दमा गतो नवम्बर मासेर २६ तारिखे त्रामार बैठके रोयकार हइया नातिसि आरजि प्रभृति कागजात ना प्रिविन्सियाल क्रोटेर फयछला पर्यन्त यो ए श्रादालतेर कागज-पत्र पड़ा हइया आपीलण्टेर उकिलेर उक्त उदाहरण सेरेस्ता हइते वाहिर करनेर हुकुम छादेर हइया मुलतथि छिल, अद्य करुणामयी प्रो गएरह आपीताएटान श्रो जयचन्द्रचोप ओ गएरह रेप्याडेश्टान ३०२६ लम्वरेर मोकद- मार कागजपन्न भार कमलाकान्त राय ओ गएरह वनाम गङ्गा. चरणसेन खास पापीलेर दरखास्त श्रोताहार सम्पीय कागज- पनेर सहित प्रागार बैठके दरपेष इइया एइ दुइ मकद मार कोन-कोन कागज विशेपत एइ प्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था सकल प्रगाड इष्टे दृष्टी करा ओ पडा गेल। एवं एइ प्रादालतेर सन १८२७ सालेर २० ओ २८ नवम्बर तारिखेर लिखित दुइ केला रोवकारि ओव्यवस्था एइ श्रादालतेर पण्डितेर कालीप्रसाद राय छापलेर मोकदमार प्रोजे रेप्पाडेण्टर उकिल दुइ २ टाका किम्मतेर फेरस्त तिन केतार द्वाराय दाखिल करिलेक, ताहा पडा. गेल । तत्परे श्रापिलरटेर उकिलके जिज्ञाशा गेल ये पूर्णिमार पुत्र व्रजनाथ कोन यतसरे, कि जयदुर्गार वर्तमाने, कि नाहार - व्यवस्थापनसंख्या-१५७ मृत्युर पर जन्म हय । जयोयाव दिलेऊ ये सन १२२६ साले जय- दुर्गार मृत्यु हय । ताहार मृत्युर पर सन १२३० माल पूर्णिमार पुत्र बननाघेर जन्म हय । योष हाल ये पापीलाएट जला रङ्गपुर श्रो दिनाजपुरर संक्रान्तेर परगणे चयनपुर श्रो गएरहर प्राममकल दायिर वस्तुर दिस्या चारि नाना पाच गराडार दसाल पाश्रोनेर दायिते एइ एजेदारे नालिस करे ये मुद्दाइयार स्वामि कृष्णचन्द्र- चौधुरिर पितामह सदाशिवचौधुरिर दुइ पुत्र, प्रथम गुद्दाइयार स्वाभिर पिता रामचन्द, द्वितीय रामानन्द, मदाशिवर मृत्युर पर ताहार जमिदारि यो गएरह ताहार दुइ पुत्र उभये विभाग पाइया रामचन्द्र ज्येष्ठप्रयुक्त रकम नय श्राना, श्रार रकम मात श्राना रामानन्देर हिस्या निर्धारित हय । रामचन्द्र निन पुत्र कृष्णचन्द्र श्रो हरिश्चन्द्र 'नो कृष्णानन्दके ओयारिप बार ऐ नय पानार कम त्यक्त यस्तु राखिया मृत्यु हय । श्रार उभयेर विभागानुसारे मुइयार स्वामी कृष्णचन्द्र के रकम पारि थाना पाच गएडा आर कम्यानन्द ओ हरिश्चन्द्र के रकम चारि थाना पनरोगएडा पीछिल । एवं प्रत्येक प्रापन २ हिस्यार पर दखितकार हइल | मुद्दीइयार स्वामि कृष्णचन्द्र दुइ यि, मुइया श्री जयदुर्गा एवं मुइयार गर्भजात कन्या पूर्णिमा पार जयदुर्गार गर्भजात नापा- लक पुत्र कीर्तिचन्द्र के राखिया सन १२१२ साले मृत्यु हइते कीर्चिचन्द्रर नाम जारि हदले सन १२२० साले कीर्तिचन्द्रेर मृत्यु हय । ताहार पर जयदुर्गार नाम जमिदारिर नाहुते लेखा जाय। किन्तु मुद्दीइया भो जयदुर्गा दुइ जनेइ एक अक्के जमिदारिर पर दखिलकार एवं उसुल तहसिलेर कर्मकता छिल। परेसन १२२९ सालेर पौष माहाते जयदुर्गारो मृत्यु हय । श्रार शास्त्रा- नुसारे विरधीय जमिदारी मुईयार एवं ताहार दौहित्रेर सत्त पाछे। भैरवचन्द्र मुहालेहे. जबोयाय देय ये शास्त्रानुसारे जयदुर्गार श्रोफित्तिचन्द्रेर पिण्डाधिकारि एवं बलवतोयारिस आमि इति ।

व्यवस्थापनसंख्या-१५७ ৮৬৪ व्रजनाथ राखे, कि किप्णचन्द्रेर वैमात्रेय भ्राता हरिश्चन्द्रर पुत्र भैरवचन्द्र राखे । धार कृष्णचन्द्रेर त्याय्य वस्तु इहारदिगेर मद्धे फोन व्यक्तिके पीछे-जोयाव दुइ समाह मद्धे लेखेन-एइ आदालतेर पण्डितके हाअोला करा जाय-इति । श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिचार्ड प्रोग्रालपोलसाहेबघाधिकर- णलिखितेतदब्दोयजानवरीमासीयनवमदिवमीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नमतिरू- पपत्रं यत्तदब्दीयतन्मासीयत्रिंशत्तमदिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्राप्तं तदव- लोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रश्नपत्रलिखितवृत्तान्ते सति मृतस्य कृष्णचन्द्रस्य पार्वण श्राद्धरिएड. दानादिक्रियाकरणक्षमतां मृतस्य कृष्ण चन्द्रस्य दौहित्रोऽर्थात् पूर्णिमापुत्रो व्रजनाथ एव रक्षति, न तु कृष्णचन्द्रस्य वैमात्रेयभ्रातुईरिश्चन्द्रस्य पुत्रो भैरवचन्द्रः, एवं कृष्णचन्द्रस्य त्यक्तधनम्, यत्तन्मरणानन्तरं तत्पुत्रेण कोति.. चन्द्रेण कीर्तिचन्द्रस्य मरणानन्तर तन्मात्रा भयदुर्गया च प्राप्तम्, तद्धने यदि कीर्तिचन्द्रस्य मातुर्जयदुर्गाया मरणसमये कीर्तिचन्द्रस्य भगिन्याः पूर्णिमायाः कश्चिदेकोऽपि पुत्रोऽर्थाद् ब्रजनायोऽन्यः कश्चिद् वा गर्भे व्यवस्थितो भूमिष्ठो वा श्रासीत् तदा तस्याधिकारः । जाते च तस्याधिकारे पुनरूत्यत्स्य मानानां तद्भावन्तराणामर्थात् कात्तिचन्द्रस्य पितृदौहित्रान्तराणामप्यधि- कारः समान एव भविष्यति । कृष्णचन्द्रस्य मरणानन्तर तत्यक्तधनमुत्तरा- धिकारित्वेन तत्पुत्रेण कीर्तिचन्द्रेण प्राप्तम् अतस्तद्धन कीर्ति चन्द्रस्यैव जातम् । श्रतस्तस्मिन्नमाप्तव्यवहारे अकृतविवाहे च मृते सति तस्य पुत्रमारभ्य पितृपय॑न्ताभावेन तत्यक्तधने तन्मात्रा जयदुर्गया उत्तराधिकारित्वेन प्राप्त- मपि जयदुर्गामरणोत्तरं कीर्तिचन्द्रत्यक्तघनं कार्तिचन्द्रस्य मरणानन्तर' ये फोतिचन्द्रस्योत्तराधिकारिगरतेषामेव भवति, यथा पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य मृत. स्य धने पल्या उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जाते सत्यपि पल्या मरणोत्तरं पल्यनन्तरं पत्युयें उत्तराधिकारिणस्तेपामेव तदनं भवति, तथा पुत्रमारभ्य १.मापनन्तर-न्यप।

व्यवस्थापनसंख्या-१५७ ४७५ पितृपय॑न्तरहितस्य मृतस्य घने मातुरुत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जाते सत्यपि मातुमरणोत्तरं माननन्तरं पुत्रस्य ये उत्तराधिकारिणस्तेषामेव तद्धनं भवति । प्रकृते तु कौतिचन्द्रस्योत्तराधिकारिणांमध्ये कीर्तिचन्द्रस्य पुत्रमारभ्य वपितुः कृष्णचन्द्रस्य प्रपोनपर्यन्तानां कीर्तिचन्द्रस्य पितृदोहिनादर्थाद् प्रजनाथात् पूर्व कीर्तिचन्द्रस्य त्यक्तधनाधिकारिणां मध्ये इदानी कश्चिन्ना- स्तोति प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रेण सष्टतरतयाऽवगमेन कोर्तिचन्द्रपितृदौहित्रा- धिकारस्य निष्प्रत्यूहत्यात्, सति च कीर्तिचन्द्रपितृदौहित्रे कीर्तिनन्द्रपितृव्य. पुत्रस्य भैरवचन्द्रस्य नाधिकारः। यदि च कोक्तिचन्द्रस्य मातुर्जयदुर्गाया मरणसमये कीर्तिचन्द्रस्यैकोऽपि पितृदौहित्रो गर्ने व्यवस्थितो भूमिष्ठो वा नासीत्तदा कीर्तिचन्द्रस्य पितृदौहित्राणां स्वत्वान्यथानुपपत्त्या कोर्निचन्द्रस्य भगिन्याः पूर्णिमायारतपितृदौहित्रोत्पत्तिमूलीभूतायारतत्सम्बन्धमूलीभूतायाश्च स्यपुत्रोत्पत्तेः प्राकालपर्यन्तं यथा पुत्रादिपतीपर्य्यन्तरहितस्य मृतस्य पितृर्द्धने दुहितुरधिकारस्तथा भ्रातृधनेऽप्यधिकारः । सति च कीर्तिचन्द्रस्य पितृदौहित्रे स्यतः कीत्तिचन्द्रस्य पितुः पार्वणश्राद्धपिण्डदातरि स्वतः कीर्तिचन्द्रस्य पितुः पार्वणश्राद्धपिण्डदानानधिकारिण्याः कोत्तिचन्द्रस्य भगिन्याः पूर्णि- माया नाधिकारः, किन्तु तस्याः पुत्रस्यैव, पुत्राणां वोपरिलिखितप्रकारेणा- धिकारः- इति वनदेशचलितमनु-दायभाग-दायतत्व दायभागटीका-दायक- मसंग्रह श्राद्धतत्व-शुद्धितत्त्वविवादार्णवसेतु-विवादभगार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- प्रयाणामुदकं कायं विपु पिण्डः प्रवर्तते-इति मनुवचनम् ॥१॥ पितृभ्यः पितामहेभ्यः प्रपितामहेभ्यः मातामहेभ्यः प्रमातामहेभ्यः वृद्धप्रमातामहेभ्यः सघोच्यताम् इति थाक्तत्त्वादिग्रन्थ( श्रात° पृ० २४३ धृतगोमिलवचनम् ॥२॥ पितुरपि प्रपौत्रपय॑न्तामावे पितृदोहित्रस्याधिकारो बोद्धव्यो धनि- दौहित्रस्येव-इति दायभागप्रन्थलिखनम् ।।३।।

व्यवस्थापनसंख्या-१५७-१५८ दृश्यादा तद्विभागः स्यादायव्ययविशोधितात--इति दायभागादिः अन्यधृतयाज्ञवलायवचनम् ॥४|| पत्नी दुहितरश्चेव पितरौ भ्रातरस्तथा । तरसुतो गोत्रजो वन्धु :- इत्यादिदायभागादिग्रन्थधृतयाशवलाय. वचनम् ॥५॥ अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा उर्ध्वमाप्नुयुः।--इति दायभागादि- अन्धवृतकात्यायनवचनम् ।।६।। यदा पत्नीत्युपलक्षणम्, स्त्रीमात्राधिकारे अयमों योद्धव्यः-इति दायभागग्रन्थलिखनम् ॥७॥ तदभावे पुन. पितृदौहित्र इति। तदभाये पितामहस्तभावे पितामही तदभावे पितु. सोदरस्तदभावे पितुमात्रेयस्तदभावे पितृसोदरपुत्र (स्तदभावे) पितृवैमात्रेयपुत्रः-इत्यादिश्रीकृष्णतालङ्कार कृतदायभागटीकालिखनम् ।। यद्यपि दुहिनभावे दोहिनस्येव भगिन्या एव नागधिकारो युक्तस्त- थापि तस्याः सीत्वेन पारीणापण्डदानृवाभावानाधिकारः, दुहितुस्तु दौहित्रात् पूर्वमहादगात् सम्भवतीत्यादिविशेषवचनादेवाधिकार इति- भावः--इति श्रीकृष्णतलिङ्कारकृतदायमापटीकालिखनञ्चेति ॥६ । एतदन्दीयफेवरवरीमासीयपोडशदिनसम्बन्धिशनिवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण २०-रोवकारि मिछील शदर देशोयानी आदालत मो० फलि- काता आदालत मजकुरेर हाकीम श्रीयुत हेनरी सिकिसपीयेर साहेवेर बैठके । तारिस ३० जानेर इंसन १८३३ साल मोतावेक वाङ्गला सन १२३६साल १६ माघ दिवस वुधवार- व्यवस्थापनसंख्या-१५८ ४७७. शामरामदासवनाम वेहालचन्द्र मोतभोर्फार घि, राधा- चरण नावालगेर माता सुन्दरीदासी- मोफत्तेप- छाएल हाजीर आइल । छाएलेर छोयाल इं० सन १८३१ सालेर २० दिजम्बरेर लिखित, जेला छिलहटेर एकटी जज- साहेवेर फयछलार नाराजीर मोजेवातेर न्याय एइ गासेर १७ तारिखेर एइ आदालतेर हुकुम मोतावक जेला मजकुरेर तारिख मजकुरेर फयछला पार सादा कागजेर उपर एक केता व्यवस्था सम्बलित, जाहा एइ मासेर २३ तारिखे दाखिल हइया हिल, अनु- मोधने आइल । यद्यपि स्यात् तारिख मजकुरैर जजसाहेव मोछा- फर फयछलार लेखा पाछे जे काजीयार वस्तु दोकान मजकुर गुर्दापालेहेर स्वामीर स्वकृत थाकाते मुर्दाइ अर्थात् छाएल चाहार हकदार शाखाणुजाइ हइते पारे ना। ए प्रयुक मोफनेशी अापील मजुरि अथवा नामरिर विपये चुडान्त हुकुम छादेर होनेर पूर्व हुकुम हईल जे छाएलेर छोयाल एइ मोकई मार फयलला सम्वलित एइ आदालतेर पण्डितेर निकट पाठान जाय एइ हुकुमे जे जदि स्यात् दुइ भ्राता, एक जन प्राप्तव्यवहार, द्वितीय, अप्राप्तव्यवहार, एशन थाके, भार भ्राता प्रामव्यवहार श्रापन सोपाजित हइते दोकान कारवार जारि करे । ए प्रकारे छोट भ्राता एमत दोकानेर किछु हित्यार हकदार, एवं कि आन्दाज हइते पारे कि ना-ताहार व्यवस्था एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण- इति व्यवस्था दाखिल होनेर परे कागजेर सामिल दरपेप हय- श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिसपोयरसाहेवपम्माधिकरद- लिखितवदन्दीयजानवरीमासीयरिंशत्तमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतपरनपति- रूपपत्रमेव तत्समर्थिततद्धर्माधिकरणार्थिनिवेदनपत्रमेतद्विका दविपर- , व्यवस्थापनसंख्या-१५८ निविष्टजयपत्रश्च यत्तदन्दीयफेवरखरीमासीयचतुर्दशदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवा- सरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोघो बातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- यदि द्वयोर्धात्रोरेकत्रवासिनोमध्ये एकः प्राप्तव्यवहारो द्वितीयश्वाप्राप्त- व्यवहारो भवति, एवञ्च प्रासन्यवहारो भ्रावा स्त्रोपाजितधनात् इह वाणिज्यव्यापारं करोति, तत्र यदि प्राप्तव्यवहारेण भ्रात्रा तद्वाणिज्य- व्यापारमूलीभूतस्वोपाजितघनं पैतृकादिसाधारणधनादुरधानोपाजित स्यात् , तद्धनेन कृतो यो धाणिज्यव्यापारस्तत्र व्यापारे कनिष्ठनातुरपि शरो- रायासश्चेद्यदेतत्तद्धर्माधिकरणार्थिनिवेदनपत्रेणैवं प्रभुधमर्पितजयपत्रलि. 'खितेन यद्यप्यर्थी कदाचिद् विवादास्पदीभूतवाणिज्यविषये कर्म कृतवान् इत्यर्थिप्रत्यर्थिनोईयोरेव सायुपस्थापितवृत्तान्तेन शातमित्यनेन वावगम्यते तदा तद्वाणिज्यव्यापारोत्पन्नद्रव्यं पञ्चधा विभज्य तत्र भागद्वयं कनिष्ठ. भ्रातुभवितुमर्हति, साधारणपैतृकादिधनायुग्घातेन स्वशरोरायासेन च प्राप्तव्यवहारस्य ज्येष्ठभ्रानुस्तद्वाणिज्यव्यापारमूलीभूतस्वोमानितधने अंश- द्वयाधिकारिग्वेन कनिष्ठभ्रातुरेकांशाधिकारित्वात् । श्रतएवैतादृशसाधारण- धनेन तो यो वाणिज्यव्यापारस्लवयापारे द्वयोर्धात्रोः शरीरायाससत्त्वेन पञ्चधा विभक्तद्वयापारोपनधने कनिष्ठभ्रातुरंशद्वयाधिकारित्वस्य शास्त्री यत्वात् । यदि च प्राप्तव्यवहारेण भ्रात्रा तद्वाणिज्यव्यापारमूलीभूतस्योपा- जिंजतधनं साधारणपैतृकादिधनागुपघातेन नाजितं स्यात् तदा साधा- रणपैतृकादिघनाद्यनुपघाताजितं धनं ज्येष्ठभानुरेवासाधारणं जातम् । अतस्तद्धनेन कृतो यो वाणिज्यव्यापारस्तत्र व्यापारे यदि भ्रातृत्वेनाधि- लेनार्थात साधारणयप्रतियोगित्वेन कनिष्ठभानुः शरीरायासस्तदा तद्वाणिज्यव्यापारोमन्नद्रव्ये कनिष्ठभ्रानुस्तृतीयांशाधिकारः, ज्येष्ठधातुरसा. धारणधनशरोरायासाभ्यां तदनोपार्जकत्वेनांशद्वयाधिकारित्वेनशरीराया- समानकर्तुः कनिष्ठभ्रानुस्तृतीयायाधिकारित्वस्य शास्त्रीयत्वात् । यदि च प्राप्तव्यवहारेण प्राधा तदाणिज्यव्यापारमूनीभूतस्वोपार्जित- धनं साधारणपैतृकादिधनाद्युम्घातेन नाजितं स्वादेव तद्धनेन कृतो यो घाणिज्यव्यापारस्तत्र व्यापारेऽपि भ्रातृत्वेनांशित्वेनार्थात् साधारण्यप्रति- योगित्वेन कनिष्ठधातुः शरीरायासोऽपि नासीत्, यदि चेत् शरीरायासस्तदा व्यवस्थापनसंख्या-१५८ सोऽपि भूत्यत्वेनार्याद वेतनमाहित्येन, यत्प्रभुसमर्पिततजयपत्रलिखित 'सिद्धीदासोमत्ययिनीनिदिष्टोत्तरपत्र लिखिततात्पर्यापनार्थाद् अर्थी तद्वा- णिज्यव्यापारे भृत्यत्वेनातिनं गृहोत्वा गुमास्ताराब्दप्रतिपाद्यत्वेन स्थित इत्यनेनावगम्यते तदा तद्वाणिज्यव्यापारोत्पन्नद्रव्ये कनिष्ठनातुरंशिस्वेन किञ्चिदपि ग्रहणाधिकारिता नास्ति, साधारणपैतृकादिधनाउनुपघातेन स्वोपार्जिलधनस्य ज्येष्ठभ्रातुरसाधारणधनत्वेनासाधारणस्वत्यास्पदीभूनेन तेन घनेन फनिउभानुभ्रातृत्वेनांशित्वेनार्थात् साधारणयप्रतियोगित्वेन शरीरायासमन्तरेण ज्येउमाकृततद्वाणिज्यव्यापारोसनद्रव्ये जोनातु- रेवासाधारणसत्येन, तत्र कनिष्ठभानुस्साधारण्याप्रतियोगिनः किञ्चिदपि स्व- स्वाभावात् - इति वद्गदेशान्तर्गतश्रीदप्रदेशप्रचलितदायभागदायतत्त्व- दायभागटोकादायक्रमसंग्रहविवादाण्वसेतुविवादमाहार्यवादिन्यानुसारिणो व्यवस्था पत्र प्रमाणम्- साधारण समाश्रित्य यत्किञ्चिद्वाहनायुधम् । शोर्यादिनाप्नोति धनं भ्रातरस्तत्र भागिनः ।। तस्य भागद्वयं देयं शंपास्तु सममागिनः इति दायमागादिग्रन्थ- धृत( दामापृ० १०७ व्यासवचनम् ॥ १ ॥ यत्र पुनः साधारणधनमात्रेणेकस्य व्यापारोऽपरस्य धनशरीरायासा- भ्यां तत्रैकाये को भागोऽअरस्य भागद्वयं न्यायावगतमेस निवदम् । एतेन चैतदपि सिद्धचति यत् साधारण वनोपचाते सति यस्य यावतोऽशस्य स्वल्पस्य महतो वोपघातस्तस्य तदनुसारेण भागकल्पना कार्या-इति दायमाग(पृ० १०६।११० ग्रन्थलिखनम् ॥ २॥ तस्मात्साधारणधनोपयातानितं धनं विभजेदिति विधिः-इति दाय- भाग(पृ० ११५ )ग्रन्थलिखनम् ॥ ३ ॥ तस्मादनुपघातान्तिम कस्यैव, नेतरेपामिति सिद्धम्-इति दाय- भागप्रन्पलिसनम् (पृ. ११२ )[ ४ ॥ एवं यत्रन शरीरल्यापारमानेशापरेण च सधनशरीरायासाभ्याम- .

४८० व्यवस्थापनसंख्या-१५-१५६ जितं तत्र शरीरायासमात्रेणार्जकत्येकांशित्वं धनशरीरायासाभ्यामजः. कस्य द्वय शित्वं न्यायसाम्यात्--इति दायक्रमसमह( पृ० २८ ग्रन्थ-- , लिखनम् ॥५॥ विभक्तेनाविभक्तेन या साधारणधनानुपधातेनापरल्यापारगैरपेक्ष्येण च यदजित तदकस्यैव तदविभाज्यमितरेः-इति दायक्रमसमग्रन्थ- (पृ. २२)लिखनम् ॥६॥ एतदन्दीयमार्चमासीयचतुर्दशदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मयेयं व्य. वस्था दत्तेति-- श्रीजयतितराम्- श्रीवैद्यनाथमिश्रेण - ३३२५ लं- २१-रोधकारी मिछिल सदर देशोयानि श्रादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेमरि सिकिसपीएर साहेचेर बैठके, तारिस ५ फिररेल ई सन १८३३ साल मोतावेक पाइला सन १२३६ साल तारिख २५ माघ दिवस मङ्गलवार- गोशात्रीचन्द्रकविराज आपोलाएट मोहम्मात जयमनी जीवतमान ओ ऋष्णमणि मोतोफात रेप्पाउण्टान आपोलाएटेर उकिल मुनशी हयदर श्रालि प्रो रेप्पाउण्टानेर मध्ये जीयतमान एक जन मोहम्मति जयमणिर रफिल मुनशी गोलाम धतुल हाजिर आइल । एवं इस्तहारनामा जारि होपाते श्री कृष्णमणी मोनयोफीत रेप्पाडण्डेर कोनो श्रोयारिश ए भादालते हाजीर आइल ना। एइ मोकदमा इन पूर्व ई० सन २८३२ सालेर शेतम्बर माहार • तारिसे भामार बैठके रोव- कार एवं साम्यक कागजात पडा हइया सारिस मजकुरेर रोवकारि लिखित मते एइ आदालतेर पण्डितेर स्थाने व्यवस्था सम्मलित-दति साथीयान् पाठ.।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१५४ ४८१ तलव हइया आर व्यवस्था पोछिले पर गतो कल्य दरपेप हइया वाहार अनुमोधनान्ते दिवारसान प्रयुक्त मुलतवि छिल, अद्य पुन- राय दरपेप हइल । एइ श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्थार लिखित यओयावर द्वाराय एइ मोकमार श्राशल मुर्दाइयान मोछात कृष्णमणी ओ जयमनीके भैरवकविराजेर तरफेर जोवानि हेवार सत्वतार विपये जेलार श्रादालतेर व्यवस्था वहाल हइते छ। किन्तु जेलार फयछलार द्वाराते, याहा प्रविनशीयान कोटेर तजविज कालिन यहाल हइयाछे, प्रकाश हय ना ये कृष्णमणीर हक भैरवेर हेवार बुनियादे फिम्या आपन पिता गङ्गानारायणेर उत्राधिकारिर हकेर बुनियादे डिगरि हइयाछे । ये कारण फयछला मजकुरेते उदार हक दुइ प्रकारेइ जप्त' (१) हइयाछे, भार एइ जणे एइ विशय मोकदमार तजविजे मातवर हइयाछे ये हेतुक मोछ- मांत कृपामणीर प्रविनशीयान क्रोटेर फयछलार पर मृत्यु हइ- याछे, परे एइ विशयेर तलास पार तजविज उचित चे कृष्णमनीर हिस्यार पर उभय विवादिर मध्ये कोन व्यक्ति हकदार हइते पारे। आर पण्डितेर व्यवस्थार द्वाराते प्रकाश ये यद्यपिस्यात् मोछति कृष्णमणी विवादोय वस्तु हेवार द्वाराय पाइया थाके, वस्तु मज- कुरा ताहार स्त्रीधन हइवेक, आर उहाके क्षेमता पाछे ये श्रापन इतसा मते हस्तान्तर करिते पारे, ये प्रकार जयमनी रेप्पाडएट एइ श्रादालतेर आपीलेर मौजेवातेर जोयावे ताहा उहाके हेवाकरण प्रकाश करियाछे । श्रार यदि स्यात् विषादीय घस्तु मोलात मजकुराके पितृ सत्राधिकारिर सुरते पौछियाछे, श्रार आपोलाण्टेर पिता वैद्यनाथेर परे, ये प्रकारमोकमार कागजातेले प्रकाश, मोटात मजकुरार मृत्यु हइयाछे, तवे ए प्रकारे पण्डि- तेर व्यवस्था मते मोबात कृष्णमणीर हकीयतेर हकदार ना आपीलाण्ट ना रेप्पाडण्ट हइते पारे । यदि गङ्गानारायणेर ओया. रिप, ये केहो थाके, उहार हक राखिवेक ! एइ सफल विशयेर प्रति १.जड-व्यप1 .. ४६२ व्यवस्था पत्रसंख्या-१५६ दृष्टि हुकुम हइल, ये जयमणीर प्रकाश करा मोधम्मात कृष्णमणोर हेवार विपये ये प्रकार एइ आदालतेर आपोलेर मौजेवातेर 'योयावे लिखियाछे, रेष्पाइएदेर स्याने सावुद तजवेर पूर्व एइ श्रादालर' पण्डितेर स्थाने जिज्ञाशा पराजाय ये यदि स्यात् फोन व्यक्ति मिलकियतेर दावि उत्तराधिकारिर एवं दानेर दुइ 'बुनियादे दरपेप करे, पार दुइ मतेइ डिगरि हासिल करे, पार तसरे पापन हकीयत दोशराके हेवा करिया मृत्यु करे-र प्रकारे एमत हेवा सिद्ध हइते पारे कि ना इति- श्रीजयतितसम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिसपीयरसाहेवघम्माधिकर- पलिखितैतदन्दीयफेवरवरीमासीयपञ्चमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गत प्रश्नपतिरू- पपत्रं यत्तदन्दोयसन्मासीयपड्विंशतितमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त सदवलोक्य याशिवोधो मातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते-- यदि काचित् स्त्री घनस्य प्राप्तीच्छापूर्वकाभियोगमुत्तराधिकारित्वदाना. शं करोति, एवमुत्तराधिकारित्वदानाम्मा द्वाम्यामेव हेनुभ्यां धर्माधिकर- पतो जयपत्रं प्राप्नोति, तदनन्तरं धर्माधिकरणीयजयात्रानुसारेण स्वस्व- स्वास्पदीभूतधनमन्यस्मै दत्वा मृता स्यात्तदैतादृशदानं सिद्ध्यत्येर, उत्तरा- धिकारियदानाम्यांद्वाभ्यामेव तस्याःस्ववस तद्धने निश्चितत्वेन द्वयोर्मध्ये दानस्यापि तत्स्वत्वोत्पादकस्य सत्वात् । एतद्विवादविषयनिविशस्मदत्त- प्राचीनव्यवस्था लिखितप्रकारकतदानानुसारेण तस्यास्तस्मिन् सौदायिकत्री. घने खेच्छया दानाधिकारस्य निष्प्रत्यूहत्वात्-इति वनदेशचलितोरि. लिखितव्यवस्पालिखितग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- छात्र प्रमाणम्- तयवस्था लिखिवाक्षमप्रमाणे पठप्रमाणञ्चेति । एतदन्दीयमार्च- मासीयाष्टादश दिनसम्बन्धिसोमासरे मयेयं व्यवस्था दत्तैति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण

व्यवस्थापनसंख्या-१६०
२२-रोवकारि मिसिल सदर देशोयानी आपालत मोकाम
कलिकाता श्रादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत रिचार्ड ओयालपोल
साहेवेर वैठके । तारिख २० फिवरेल इं सन १८३३ साल मों
: वाङ्गला सन १२३६ साल तारिख १० फाल्गुन दिवस युधवार--
मोछमात लक्ष्मीप्रिया
आपीलाण्ट
भैरवचन्द्रचौधुरि पो गयरह रेप्पाडेपटान्
आपीलएटेर उफिल मुनसि होसन प्रालि ओ हाजिर
रेप्पाडेण्टर उफिल सदासुखपण्डित हाजिर बाइल। 'आर
द्वितीय रेप्पाडेण्ट जयचन्द्रचौधुरि इयानामा भो इस्ताहारनामा
जारि होयातेओ सयं किम्या उकिलेर द्वाराय हाजिर
नाइ। एइ मकईमा गतो जानेर माहार ६ तारिखे आमार
वैठके रोवकार एवं एह मकद्द मार साम्यक कागजात पार
३०२६ लम्बरेर मकईमार कागजात पार कमलाकान्तराय
ओ गयरह बनाम गङ्गाधरणसेनेर खास आपिलेर छोयाल
ओ तत्समिभ्यारि कागजात पडा हइया तारिख मजकुरेर
रोवकारिर लिखित छोयालेर जोयाब एइ पण्डितेर स्थाने
तलव हइया मुलतवि छिल, अद्य एइ आदालतेर पण्डितेर
जोयाव दाखिल होने पुनुराय रोवकार आर गतो जानेन
माहार २६ तारिखे अनुमोधन होया भैरवचन्द्र रेपाडेण्टर
छोयाल अनुमोधने श्राइल । तत्परे हाजिर रेप्पाडेएटर उकिल
सदासुखपण्डित क्रोट श्रापीलेर दाखिल करा रेप्पाडेण्टर
छोयालेर नकल एक केता दुइ टाकार किम्मतेर एक केता
फिरिस्तिर द्वाराय दाखिल करे, पडागेल । यदि स्यात् एइ थादा-
लतेर पण्डितेर जोयाय हइते प्रकाश आछे ये कृष्णचन्द्रेर पुत्र
कित्तिचन्द्रर त्यार्य घस्तु, ये ताहार माता जयदुर्गाते श्रासिया,
जयदुर्गार मृत्युते किर्तिचन्द्रर भग्नी पूर्णिमार पुत्र ब्रजनाथके
अर्श । किन्तु रेप्पाडेण्टर अकिल जाहेर फरे जे बियादीय जायेगा
जयदुर्गार मृत्यु होने भैरवचन्द्रर दखले आइसे । एवं एखन

- व्यवस्था पत्रसंख्या-१५६ दृष्टि हुकुम हइल, ये जयमणीर प्रकाश करा मोचम्मीत कृष्णमणीर हेवार विपये ये प्रकार एइ श्रादालतेर आपोलेर मोजेवावर 'यशोयावे लिसियाछे, रेप्पाडरटेर स्याने सावुद तलवेर पूर्व एइ श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने जिज्ञाशा पराजाय ये यदि स्यात् फोन व्यक्ति मिलकियतेर दावि उत्तराधिकारिर एवं दानेर दुइ ''बुनियादे दरपेप करे, आर दुइ मतेइ डिगरि हासिल करे, पार तत्परे आपन हकीयत दोशराके हेवा करिया मृत्यु करे-६ प्रकारे एमत हेवा सिद्ध हइते पारे कि ना इति- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिसीयरसाहेवधर्माधिकर. णलिखितैतदन्दीयफेवरवरीमासीयपञ्चमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नप्रतिरू- पपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयपड्विंशतितमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदयालोक्य यादृशबोधो मातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते- 'यदि काचित् स्त्री धनस्य प्राप्तीच्छापूर्यकाभियोगमुत्तराधिकारित्वदाना. भ्यां करोति, एवमुताधिकारित्वदानाभ्या द्वाभ्यामेव हेतुभ्यां धम्माधिकर- एतो जयानं प्राप्नोति, तदनन्तरं धर्माधिकरणीयजयरत्रानुसारेण स्वस्व- सासदीभूतघनमन्यस्मै दत्त्वा मृता स्वात्तदैतादृशदानं सिद्ध्यत्येव, उत्तरा- धिकारिसदाना-पां द्वाभ्यामेव तस्यास्ववस तद्धने निश्चितत्वेन द्वयोमध्ये दानस्यापि तस्वस्योत्पादकस्य सत्त्वात् । एतद्विवादविषयनिविटामदत्त- प्राचीन व्यवस्थालिखितमकारकतहानानुसारेण तस्यास्सस्मिन् सोदायिकत्री- धने स्वेच्छया दानाधिकारस्य निष्प्रत्यूहत्यत्-इति वङ्गदेशचलितोपरि- लिखितव्यवस्थालिखितग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अन प्रमाणम्- तद्वरसस्था लिखिवपञ्चमप्रमाणं पठनमाणञ्चेति । एतददीयमान्च- मासीयाटादशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तति- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ४८३ व्यवस्थापनसंख्या-२६० २२--रोवकारि मिसिल सदर देोयानी पादालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत रिचार्ड प्रोयालपोल साहेवेर वैठके। तारिख २० फिवरेल ई सन १८३३ साल मों 'वाङ्गला सन १२३६ साल तारिख १० फाल्गुन दिवस बुधवार- मोछति लक्ष्मीप्रिया आपीलापट भैरवचन्द्रचौधुरि ो गयरह रेप्पाडेण्टार प्रापीलएटेर उकिल मुनसि होसन प्रालि ो हाजिर रेष्पाडेगटर उकिल सदासुखपण्डित हाजिर श्राइल । धार द्वितीय रेप्पाडेण्ट जयचन्द्रचोधुरि इयानामा मो इस्ताहारनामा जारि होयातेश्रो सयं किम्वा उकिलेर द्वाराय हाजिर नाइ। एइ मफईमा गतो जानेर माहार ६ तारिखे आमार चैठके रोवकार एवं एइ मकई मार साम्यक कागजात पार ३०२६ लम्वरेर मकई मार कागजात पार कमलाकान्तराय ओ गयरह बनाम गङ्गाचरणसेनेर खास प्रापिलेर छोयाल ओ तत्समिभ्यारि कागजात पडा हइया तारिख मजकुरेर रोचकारिर लिखित छोयालेर जोयार एइ पण्डितेर स्थाने तलव हइया मुलतचि छिल, अद्य एइ आदालतेर पण्डितेर जोयाव दाखिल होने पुनुराय रोवफार आर गतो जानेन माहार २६ तारिखे अनुमोधन होया भैरवचन्द्र रेपाडेएटर छोयाल अनुमोधने आइल । तत्परे हाजिर रेप्पाडेण्टर उकिल सदासुखपण्डित क्रोट पापीलेर दाखिल करा रेपाडेएटर छोयालेर नकल एक केता दुइ टाकार किम्मतेर एक केवा फिरिस्तिर द्वाराय दाखिल करे, पडागेल | यदि स्यात् एइ आदा- लतेर पण्डितेर जोयाब हइते प्रकाश पाछे ये किर्तिचन्द्रेर त्यार्य घन्तु, ये ताहार माता जयदुर्गाते श्रासिया, जयदुर्गार मृत्युते कित्तिचन्द्रर भग्नी पूर्णिमार पुत्र प्रजनाथके अशे । किन्तु रेप्पाडेएटर अकिल जाहेर करे जे विवादीय जायेगा जयदुर्गार मृत्यु होने भैरवचन्द्रेर दखले श्राइसे । एवं एखान चन्द्रर पुत्र -- व्यवस्थापनसंख्या-१६० पर्यन्त वाहार दखले पाछे, श्रार पूर्णिमार पुत्र ब्रजनाधेर मृत्यु हइयाछ । आर मोहम्मति, पूर्णिमार सेत्री रोगि आछे, शाम्रा- नुसारे पैमानेय भ्रातार किंम्या ताहार, पुत्रेर त्याय्य वस्तुर । 'अधिकारित्व राखे ना। एतदभिन्न मोछम्मात पूर्णिमार विवाह, जाहार सहित निःधाय्य हइयादिल परे वाहार सहित ना हइया अन्य व्यक्तिर सहित विवाह हइया पुत्र उत्पत्ति हय, पार ए प्रकार स्त्री एवं पुत्र पार्वणेर 'श्राद्धेर ओ पूर्व पुरुपेर त्याय्य वस्तुर अधिकारि हय ना, आर जखन मुद्दाइभानेर दायि कोटेर पण्डितेर व्यवस्थार लिखित, ये लक्ष्मीप्रियार विवादीय जायगार अधिकारित्य नाइ, दृष्टे डिसमिस हय तखन रेप्पाडेण्टर ओज. रेर तत्त यो तदान्त करणेर प्राविश्वक थाकिल ना । जे प्रकार प्रिविनसियान कोटेर फयछला ताहार दृष्टान्त आछे । धार आपीलाण्टेर उफिल जिज्ञासा मते जाहेर करे ये पूर्णिमार पुत्र घ्रजनाधेर एइ क्ष्यणे मृत्यु हझ्याछे, आर एखन पर्यन्त ताहार पुत्र होनेर सम्भावना पाछे, आर मोछमात मजकुरार विवाह दुइ वार हय नाइ, एवं ताहार सेन्नि रोग नाइ इति । यद्यपि स्यात् मोफईमा निप्पत्त्य होनेर पूचे विचार अनुसारे उभय विवा- दीर ओजर निप्पत्त्य फरा उचित । ए फारण हुकुम ह्इल ये पइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे जे निचेर लिखित छोयालेर जोयाव आगतो मिछिले लेखेन एइ आदालतेर पण्डित समापन फरा जाय। १ प्रथम-एइये यदि स्यात् पूर्णिमार पुत्र व्रजनाथेर जन्म हइया मृत्यु हइया थाके, तवे कित्तिचन्द्रर त्याय्य वस्तु, याहा प्रजनाथफे आसियादिल, ताहा ताहार माताके अर्श किना। २ द्वितीय-एइ ये पूर्वपुरुपेर वस्तुते उत्तराधिकारि वेक्ति सेनि रोग जन्य ताहार अधिकारित्वते प्रतिवन्धक हय कि ना। यद्यपि स्यात् उक्त सेनिरोग अधिकारित्वर प्रतिवन्धक हय, सवे . व्यवस्थापनसंख्या-१६० ४८५ प्रजनाथेन त्याज्य वस्तु ताहार मातामहि मोछम्मात लक्ष्मी- प्रियाके अशिवेक किना। .३ तृतीय--एइ ये मोछति पूर्णिमार विवाह कोन व्यक्तिर सहित निधार्य हइया पूर्व कथवकथनेर पहिर्भूत हइया अन्य। कोन व्यक्तिर सहित विवाह हय श्रार नाहा हैते ताहार पुन सन्तान जन्मिया थाफे । ए मते मोछर्मात पूर्णिमा किन्या ताहार पुत्र कीर्तिचन्द्रेर त्याय्य वस्तुर अधिकारि हइवेक कि, पूर्णिमार माता लक्ष्मीनिया इति। श्रीजयतितराम एतराधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिचार्डयोमालपोलसाहेवधर्माधिकर- रणलिखितैतदब्दीयफेयरवरीमासीयविंशतितमदिवसीयविनारपत्रान्तर्गतमश्न- प्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयमार्चमासीयषोडशदिनसम्बन्धिश निवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यदि पूर्णिमापुत्रो व्रजनाथ उत्पन्नो भूत्वा मृतः स्यात् तदा कीर्तिचन्द्र स्य त्यक्तघने यदुत्तराधिकारित्वेन ब्रजनायेन माप्तम् , तद्धने यदि ब्रजनाथस्य पुत्रमारभ्य पितृपय॑न्तानां मध्ये कश्चिनास्ति तदा तन्मातुरेवाधिकारहति । अत्र प्रमाणम्- पली दुहितरश्चैव पितरी भ्रातरस्तथा । तत्सुतः-इत्यादि दायभागादिनन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥१॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- यद्युत्तराधि(कारि व्यक्तेः श्वेतरोगस्तदा यथाशास्त्रप्रायश्चित्ताचरणं विना पूाधिकारित्यक्तधने अधिकारस्य मतिरोधो भवत्येव, यथाशास्त्र- भायश्चित्ताचरणे सत्यधिकारस्य प्रतिरोधो न भवतीनि । १.अजनाथर- इति सापीयान् पाठः।

४८६ व्यवस्थापनसंख्या-१६०-२६१ 'अत्र प्रमाणम्- मृते पितरि न क्लीवा कुष्ठयुन्मत्तजबान्धकाः । पतितः पतितापत्य लिङ्गी दायांशभागिनः॥-इति दायभागादि अन्यधृतदेवलवचनम् ॥१॥ कुष्ठी नकृतप्रायश्चित्तः । कृतप्रायश्चित्तस्य पापामावादंशित्तम्, पापस्यैवानंशितामूलत्वादिति साम्प्रतम्-इति विवादमगार्णवगन्ध- (० २१२ क)लिखनम् ।।२।। तृतीयप्रश्नत्योत्तरम्- यदि पूर्णिमाया विवाहः केनचिद् व्यक्तिविशेपेण सह निर्धारितोऽपि पूर्वकथावहिमावणान्येन केनचित् सह विवाहो जातः स्यादेवं तेन पुरुषेण पूर्णिमायाः पुत्रो जनितश्चेत्तदा तस्याः पूर्णिमायाः किंवा तत्पुत्रस्य कोति- चन्द्रत्यक्तधने एतद्विपादविषयनिविष्टारमहत्तव्यंव्यवस्थालिखितप्रकारेगा: धिकारी भवत्येव-इनि वनदेशचलितोपरिलिखितव्यवस्थालिखितग्रन्था- नुसारिणी व्यवस्या--- एतदन्दीयमार्चमासीयपड्विंशतिवमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मयेयं- व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण २३-रोवकारि मिछिल सदर देशोयानि श्रादालत मोकाम। फलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत रिचार्ड प्रोयालपूल साहेवेर बैठके, तारिक २० फिवरेल इं सन १८३३ साल मोतावेक वाङ्गला सन १२३६ साल तारिख १० फाल्गुन दिवस बुधवार- दुलारसिंह ो गयरह आपीलाएडान् राणी पद्मावती बो गयरह रेपाडएटान् - १.किम्बा-व्यर !

व्यवस्थापनसंख्या-२६१ आपीलाएटानेर उकिलान मुनशी होशन आलि प्रो मुनशी आवाव आलि बार राणी पद्मावती रेप्पाडएटेर उकिलाग् 'सदासुखपण्डित लाला वस्तिलाल हाजिर श्राइल ओ आपी- लाएटानेर उकिल मुनशी दादार बक्स ओ रेप्पाडण्टेर, उकिल मुनसी गोलाम वतुल यारामी अोजरे हाजिर नाइ । एइ मोफत ईमा एइ मासेर १४ तारिख थामार बैठके रोवकार हइया प्रीविनशीयान कोटेर नालिसि भारजि भो गयरह कागजात लम्वर पर्यन्त पडा हइया मुलतवि छिल, अध पुनराय रोवकार हइया प्रीविनशीयान क्रोटेर वाकि कागजात फयछला पर्यन्त एवं एइ आदालतेर फागजात अनुमोधने श्राइल । बोध हइल ये आपी- लाण्टान् सायेक मुइयान परगणे पोयाखालि यो गयरह महा- लते खेराजी श्री नाराजी दखल पायोनेर दाविते एइ एजहारे नालिस करे ये परगणे पायाखालि पो गयरह मुर्दाबानेर पिता- मह गरिवदासेर हासिल करा, उक्त गरिवदाप ताहाते जिचद्देशा पर्यन्त दखलिकार थाकिया पाच पुत्र हरिसिंह ओ जयसिंह श्रो रनसिंह ओ भातुसिंह श्री अचल सिंह मुद्दाइसानेर पिताके राखिया मृत्यु हय । हरिसिंह ओ ताहार मृत्युर पर शुभकरण- सिंह तस्य पुत्र पार शुभकरणसिंहेर मृत्यु, ये सन १२१६ सालेर फाल्गुन माहाते हइयाछे, ताहार पर पहुपतसिंह पार पहुपतसिंहेर मृत्युर पर रङ्गलालसिंह भ्रागण ओ पितृव्य दिगेर अनुमति यो एतीकै पितृ-पितामह त्याऱ्या वस्तुर पर एवं चकदैनामोरि श्रो गयरहर उपर, याहा ताहार मुनाफा हइते खरिद हय, कावेज ओ दखलिकार एवं उसुल राहशीलेर कम्मकती थाकिया, भ्रातृगण ओ पितृव्यदिगेर एवं मुद्दाइभानेर प्रतिपालन करिते- छिल । रङ्गलानसिंहेरओ सन १२३२ साले निःसन्तान ओ अविवाहित विणा श्रोछी मोकरार मृत्यु हइल, श्रार मुइभान व्यतिरेक उहारदिगेर उत्तराधिकारियो पिएडाधिकारि द्वितीय केह नाइ, एवं शास्त्रानुसार मृत रङ्गलालसिहेर भाद्धं ओ क्रिया- .

व्यवस्थापत्रसंख्या-२६१ कम्मे दुलारसिंह मुइर हस्तेते हइयाछे, इति । राणी पद्मावती मुर्दाआलेहे जोयाव देय ये परगणे पौयाखालि हरिसिंहेर हासील करा, पार चकदेनाओरि पो गयरह मुहालेहेर स्वामी पहुपतसिंहेर पिता शुभकरणसिंहेर खरिदा। मुर्दाबालेहेर स्वामी पुण्यपुत्र राखनेर विपये उहाके अनुमति देय आर रङ्ग- लालसिंह कर्त्तापुत्र राखनेर भार उहार प्रति अर्पन करिया एक केता पोछीयतनामा ऐ विपयेर लिखिया मृत्यु हय । श्रार पूर्व पुरुपेर श्राद्ध ओ क्रियाकर्मते पापनि अशक्त थाकन प्रयुक्त स्यार्य वस्तुर कार उत्तराधिकारि वाहार त्यार्य वस्तु हइते नैरास हइते पारे ना। आर अमृतलाल श्रो चरखोलाल यो काली. प्रसाद श्रो विशनलाल मुर्दाबालेहेर सोयावेर मजमुन कछल करिया जोयाय गुजराय। श्रार प्रीविनसियान क्रोटेर तज- विज कालिन मुइमानेर दावि डिसमिस हय । यदि स्यात् कागजात इइते प्रकाश ये मुद्दीइभानेर घाशल दावि रगलालेर त्यायं प्रस्तुर वावत, पार गरिवदास ओ गयरहेर त्याऱ्या वस्तुर उल्लिक करार कारण किरल ( ? ) पूर्व पुरुपेर परसर मृत्युर विवरण प्रकाश जन्य लेखा गिया छे। आर पापीलाण्टानेर एजहार एइ ये उहारदिगेर वंशे मैथिलि शाख चलन आछे-उचित बोध हय। एवं रेप्पाडएटो ताहाते अस्वीकार नहे। ए प्रयुक्त एइ मोकमार एइ तजविज ओरोधकरण ये रङ्गलालसिंह, ये अविवाहित प्रो निःसन्तान मृत्यु हइयाछे, ताहार त्याऱ्या वस्तुर उत्तराधिकारित्व उभय विवादि ओ तृतीय व्यक्किर मध्ये कोन व्यक्ति मैथिलि देशेर प्रचलित शाखानुजाइक राखे । परे हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे ये छोपालेर योयाव ये विवादीय जमीदारी हरिसिंह हइते हरिसिंहेर पुत्र शुभकरण- सिंहे भार शुभकरणसिंहेर मृत्युर पर शुभकरणसिंहेर ज्येष्ठ पुत्र पहुपतसिंहे, भार पहुपतसिंहे मृत्युर पर शुभकरणसिंहेर फनिष्ठ पुत्र रङ्गालालसिंहे विणा विभागे अशिल । तत्परे व्यवस्थापनसंख्या-१६१ रङ्गलाल निःसन्तान ओ अविवाहित मृत्यु हय, राखिल मुद्दाइयान अचलसिहेर पुत्रगण आर अजनसिंह रणसिंहेर पुत्र प्रार तुलसीसिंह भातुसिंहेर पुत्र गरिवदासेर पुत्रगण हरिसिंहेर भ्रात. वर्ग पार मोसमात पद्मावती मुर्दाबालेहे पहुपतसिंहेर स्त्री भार शुभकरणसिंहेर दौहित्र उपेन्द्रलाल ओ दयालाल श्रो गिरिधारि- लाल ओ प्रेमलाल ओ जनकलालके परे। मैथिलि देशेर प्रचलित- शास्त्र अनुजाइक रङ्गालाल मजकुरेर त्याऱ्या वस्तु इहारदिगेर कोन व्यक्तिके अर्शिवेक-एक सप्ताह मध्ये वचन दृष्टान्त सम्वलित लिखेन पइ आदालतेर पण्डितके समर्पन कराजाय-इति ।- श्रीजयतितराम् एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिचार्डोवालपोलसाहेवघाधिकर- एलिखितैतदब्दीयफेवरवरीमासीयविशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्र- तिरूपनं यत्तदन्दीयमाञ्चमामीयपोडशदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्त त दयालोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं निख्यते- यदि विवादास्पदोभूतसराजकरस्थावरं (धनं ) हरिसिंहस्य मरणान- न्तरं तत्पुत्रेण शुभकरणसिहेन प्राप्तम, शुभकरणसिहस्य मरणानन्तरं तज्ज्येष्ठपुत्रेण पुहपतिसि हेन प्रासम्, तन्मरणानन्तर तद्भाधा रङ्गलाल- सिंहेनार्थात् शुभकरणसिहस्य कनिष्ठपुत्रेणाधिभक्तत्वेन प्रातम्, तदनन्तरं रङ्गालालगिहोऽपिवाहितो निस्सन्तान एकाचलसिंहस्य पुनानपिना एवं रण- सिंहस्य पुत्रम नसिहं भातुसिहस्य पुत्रं तुलसीसिंह चैवं युहपतिसिंहस्य पत्नी पद्मावतीनाम्नी प्रत्यर्थिनी चैवं शुभकरणसिहस्य दौहित्रानुपेन्द्रलाल- दयालालगिरिधारीलालप्रेमलालजनकलालान्' सरदय मृतः स्यात्तदा रङ्गलालत्यक्तधने रङ्गलालस्य पुत्रमारभ्य तत्प्रपितामहपुत्रपर्यंन्तानामर्थात् गरीबदासस्य पुत्रपय॑न्तानाम्मध्ये यदि कश्चिन्नास्ति तदा रङ्गलालप्रपितामह- गरीवदासपौत्राणामर्यादथिप्रभृतीनां प्रभुकृतप्रश्नलिखितानामधिकारो रङ्ग- लालभ्रातृपली पद्मावती यावजी स्वभत्तुं कुलोपयुक्तपासाबादनस्यावश्यक- २.केज्येष्ठ-न्यप०। २.जनालानान-व्यप०1 व्यवस्थापनसंख्या-१६१ विधवाघमांद्याचरणोपयुक्तस्य चाधिकारिणी भवति-इति मिथिलादेश चलितमनुविवादचिन्तामणिविवादरलाकरविवादचन्द्रकल्पतरुप्रभृतिग्रन्थानु- सारिणी व्यवस्था-- अत्र प्रमाणम्- पली दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो वन्धुः इत्यादिविवादचिन्तामण्यादिग्रन्थधृतयाश- बल्क्य वचनम् ॥१॥ बयो ज्ञातयो यत्र सकुल्या बान्धवास्तथा । यस्त्वासनतरस्तेषां सोऽनपत्यधनं हरेत् ।। इति विवादचन्द्रविवाद- रत्नाकरादि (वि. पृ. ५६६) ग्रन्ययावृहस्पति(पृ. २१६ वचनम् ॥२॥ अनन्तरः सपिण्डायस्तस्य तस्य धनं भवेत् । इति मनु- वचनम् ॥३॥ अनरत्यस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामि तदभावे मातृ गामि तदभावे पितृगामि तदभावे भ्रातृगामि तदभावे भ्रातृपुत्रगामि तदभावे पन्धुगामि तदभावे सकुल्यगामि-इत्यादि विवादचिन्तामण्यादि. अन्यधृतविष्णुवचनम् ॥४॥ वन्धुरत्र सपिण्डः सकुल्यः सगोत्रः इति विवादचिन्तामणि(०. २३६ )मन्थलिखनम् || सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते-इत्यादि विवादचिन्तामण्या- दिप्रन्यधृतवृहस्पतिवचनम् ॥६॥ भरणं चास्य कुवीरन् सीणामाजीवनक्षयात्-इति विवादचिन्ता मण्यादि(पृ. २५०)मन्यधृतशसवचनञ्चेति !!७|| एतब्दीयापरेलमासीयतृतीयदिनसम्बन्धिबुधवासरे मयेयं व्यवस्था दोति- श्रीर्जयतितराम् । श्रीवैद्यनाथमिश्रेण . १. हम्मनु-इनि, को।

व्यवस्थापनसंख्या-१६२ ४६१ २४-रोवकारि मिसिल सदर देओयानि प्रादालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत रिचार्ड प्रोयान- पोल साहेवेर बैठके। तारिख २५ श्रापरेल ई सन १८३३ साल मोतावके वाला सन १९४० साल तारिख १४ बैशाख दिवस वृहसतियार-- मसात लक्ष्मीप्रिया आपीलाएट भैरवचन्द्र चौधुरि ओ गयरह रेप्पाडेण्डान आपीलाण्टेर उकिल मुनसि होसन प्रालि यो हाजिर रेप्पा- डेण्ड भैरवचन्द्रचौधुरिर उकिल सदासुखपण्डित हाजिर श्राइ- लेन, श्रार द्वितीय रेप्पाडेण्ड जयचन्द्रचौधुरि इयानामनामा ओ इस्ताहारनामा जारि हेतु आपनि किम्बा उमिलेर द्वाराय ए श्रादालते हाजिर नाइ । एइमोकदमा भिन्न २ दिवसे आमार बैठके रोवकार हइया एइ श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था श्रो कागजात धार उभयेर दाखिल करा दरखास्तादी पडा हइया प्रजनाथेर पिताके दरखास्त दाखिल करण हुकुम हइया मुलतवि छिल, अद्य पुनुराय रोवकार पार ब्रजनाथेर पिता गौरमोहनचट्टोपाध्यार दरखास्त ओ ब्रजनाथेर माता मोसमात पूर्णिमार दरखास्त पडा गेल । यदि स्यात् प्रादालतेर पण्डितेर पूर्वर ओ एइ क्षनेर व्यवस्थासमलेर द्वाराय प्रकाश पाछे ये कीर्तिचन्द्रेर त्यार्य वस्तु प्रजनाथके, आर यदि स्यात् पूर्णिमार पुत्र नजनाथेर जन्म हइया मृत्यु हइयाथाके, तवे कीर्तिचन्द्रेर त्याप्यं वस्तु, याहा उत्तराधि. कारि हेतुते व्रजनाथके अशियाछिल, यदि ब्रजनाथेर इस्तक पुत्र ना()पिता केह ना थाके, तवे वाहार माताके अर्श, आर शेत्रि- रोगेर प्रायश्चिच करणेते सेतो रोगी व्यक्ति उत्तराधिकारिर वाधि- त्या?)पूर्वपुरुसेर विशयेते हय ना। किन्तु ब्रजनाथेर पिता गौर. मोहनचट्टोपाध्याय वर्तमान प्राछे। आर मोहात पूर्णिमा जाहेर करे ये विवादीय वस्तु प्रामार पितार त्यार्य वस्तु, श्रो ताहार विज पुरुसेर, एवं उक्त मोसम्मांत सन्तान होनेर था- ४६४ व्यवस्थापनसख्या-२६३ २५ भापरेल ई सन १८३३ साल मोतावक याङ्गला सन १२४० साल तारिख १४ वैशाख दिवस वृहसतिवार- गोपालस्यहायेर अलि नोयावराय यापीलाण्ट मोछति भगवती कोडर यो गयरह रेप्पाडण्टान् श्रापिलाएटेर उकिल सदासुखपण्डित ओ निलवेश्चमेन एडमेनटोन वेलि साहेव, मोटात भगवतीकोडर रेप्पाडण्टेर तरफ इइते आपन नामेर एक केता श्रोकालतनामा श्रो मेहनत- श्रानार वावत एक केसा रसिद २५० टाकार एइ आदालतेर तहविलदारेर दस्तखति सम्वलित दाखिल फरिया, ओ जितु- लाल रेप्पाडएटेर उकिल मुनशी फकिर महम्मद हाजिर . पाइलेन । एइ मासेर १० तारिखे एइ मोकई मा आमार बैठके रोक्कार हइया नालिसि प्रारजि यो गयरह प्रविनशीयान क्रोटेर कागजात १७४ लम्बर पर्य्यन्त पडा हइया दिवावसान प्रयुक्त मुलतवि छिल । अब पुनुराय रोवकार एवं प्रविनशीयान क्रोटेर वाकी कागजात फयछला पर्यन्त ओ एइ जादालतेर कागजात दृष्दे प्राइल बोध हइल ये पापीलाएट सावेक मुद्दीइ विवादीय ग्रामसकलेर दखल पानोनेर दाविते एइ एजहारे नालिश करे ये वायवायान फलतुण्डसिंह, ये सन्तानादि राखितो ना, आपन सहोदर भ्राता पाय छलतुण्डसिंहेर कन्या मोहमति राधामोहनकोङरके छलतुण्डसिंहेर अनुमतिमते यापन सन्ताने पानिया प्रतिपालन करिया, छातुण्डसिंह मजकुरफे कहिलेक ये श्रामि राधामोहनकोडरेर विवाह श्रो कन्यादान करिवो, कन्या मजकुरेर गर्भ प्रथम ये पुत्र सन्तान हइयेक प्रामार विपयेर मालिक ओ पिण्डाधिकारि हइवेक । ताहार जोयावे चलतुण्डसिंह एफरार करिल आर उहाके अनुमति दिल ये कन्या मजकुरेर विवाह ओ कन्यादान करे; कन्या मजकुरेर प्रथम सन्तान प्रामार ओ तोमार विपयेर ओ मालामालेर मालिक प्रो पिण्डाधिकारि हइवेक । तदनुसारे व्यवस्थापत्र संख्या-१६३ पन्यादान करिल । नोयावरायेर पिता पेयारिलालेर अनुमति श्रो अभिप्राय मते उपरेर लिखित विपये कन्यार विवाह नोयाय- रायेर सहित देओ याश्या पुरोहित ओ गयरहर मन्मुखे कुशो पार गङ्गाजलेर सहित कन्यादान एवं पुत्रिकापुनेर वचने संकल्प करिश। ये प्रकार राधामोहनकोडरेर पुत्र गोपालस्यहा. येर जन्म होनेर पर चूडाकरण यो फर्गाभेद ो गयरह दाँडा- सकल पामले श्रानिया मृत्यु हइल | मोटात भगवतीकोडर प्रामामी फेरादिर दाधि प्रो एजहार अस्वीकार एवं कलतुण्ड- सिंहेर रायत्रजराजसिंह के पुष्यपुत्र प्रो कर्त्तापुत्र करण एवं '. ताहार दस्तावेज लहाके लिग्विया देश्रोन भार व्रजराजसिंह मजकुरेर शास्त्रानुसारे कलतुण्ड मिह मोतप्रोफार क्रिया श्रो कम्मं करण सम्बलित जोयाय देय । विचारकालिग मुर्दाइर दावि डिशगिप हय इति !! यदि स्यात् चूटान्त हुकुम होनेर पूर्व शाखेर प्राज्ञा कलतुण्डसिंदर गोपालस्यहार पुनिकापुत्र श्रो नजराजसिंह पुप्यपुत्र प्रो कर्त्तापुत्र होनेर विपये वोध करण उचित हइत । पजन्य हुकुम हइल ये एइ रोयकारिर नकल ओ पापीलाण्टेर साक्षीगणेर एजहार प्रोग्रजराजसिंहेर फतीपुत्रेर भो सन्तानेर दस्तावेज सम्बलित एइ हुकुमे एइ मादालतेर पण्डितके समापन करा जाय ये निचेर लिखित छोयाल सफलेर ज ओयाव पश्चिम देश प्रचलित शास्त्रानुसारे एक सप्ताह मध्ये, यतो शीन हइते पारे, लिखेन । १-प्रथम-एइ ये एइ क्षणकार समय अर्थात् कलियुगे निःसन्तान व्यक्तिर आपन सहोदर भ्रातार कन्याके सन्तानवते लयोन यथार्थ हय कि ना। ..२-द्वितीय-एइ ये यदि स्यात् धापीलाएट प्रो उद्दार साक्षीणेर एजहार चलतुएइसिंहेर कन्या राधामोहनकोकरके फजतुएडसिंह प्रापन सन्तानलते लोनेर विपये ो कन्यादान श्रो पुत्रिकापुर कया, उभयत कलनुरडसिंह प्रो. छजतुएइसिंह व्यवस्थापनसंख्या-१६३ श्रो नोयावरायेर पिता पेयारिलालेर सहित स्थिर होने ताहार ,दाँडासकले आमले पाना, याहा मुआलेहेर अन्य २ साक्षीगण हइते श्रो मुइर साक्षीगणेर एजहारे ऐ विपये सत्यता करे, कलंतुण्डसिंहेर पुत्रिकापुत्र गोपालस्यहाय हइल किना। ३-तृतीय-एइ ये यदि स्यात् गोपालस्यहाय पुत्रिकापुत्र होने उक्त व्यक्ति फलतुण्डसिंहेर त्याज्य यस्तुर मालिक श्रो पिण्डाधिकारि हइवेक कि उहार श्री भगवतीकोडर। ४-चतुर्थ-एइ ये ब्रजराजसिंह के कर्ता पुत्र करण श्रो सन्ताने लोन, ये से आपन पितार ज्येष्ठ पुत्र श्रोताहार वयक्रम ३० वत्सरेर अधिक एव कयेक सन्तान आछे, उचित किम्वा ताहार सत्वेताते उक्त व्यक्तिर पिता मातार अनुमति ओ वयक्रमेर निर्धार्य एवं आत्मवर्गेर ओ हाकिमेर गोचरेर : नियम पाछे। ५-पञ्चम-एइ ये यद्यपि प्रजराजसिंह फापुत्रेर पर आपन पासल पिता ओ मातार श्राद्ध यो क्रियाकर्म फरिया ताहारदिगेर त्यार्य यस्तुर दखलिकार हइया थाके, तवे ताहार फ पुत्रता यथार्थ ओ वहाल थाकिवेक कि ना। श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरिचाई श्रोग्रालपोलसाहेवधर्माधिकर. एलिखितैतन्झीयापरेलमासीयपञ्चशितितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्न- प्रतिरूपपत्रमे तत्समरितार्थिसदियुपरपारितवृत्तान्तपत्राणि ब्रजराजसिंदस्य कृत्रिमपुत्रविषयकपपश्चः यदेतदन्दीयमैमासीकादशदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- फलियुगे निस्सन्तानेन व्यक्तिविशेषेण स्वकीयसहोदरभातृक्न्यायाः सन्तानत्वेनार्यात् कन्यात्वेन ग्रहणं धर्मशास्त्रानुसारेण न सिद्ध्यति, धर्माः 4 . व्यवस्थापत्रसंख्या-१६३ ४९७ शास्त्रे ताराविध्यभावात्, अपुत्रेण सुतः कार्यो यादृक् तादृक् प्रयत्नतः इति विधेरेव धर्मशास्त्रीयत्वादिति-- तत्र प्रमाणम् । अपुत्रेण सुतः कार्यो याहक ताहक प्रयत्नतः। पिण्डोदकन्क्रियाहेतो मसकीर्तनाय च ॥ इति दत्तकमीमासादत्तक- चन्द्रिकादिनन्यधृतमनुवचनम् ॥१|| द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्-- यद्यप्यर्थिनस्तनिर्दिष्टवायुपस्थापितवृत्तान्तेन च सिलमन्तसिंहस्थ कन्याया राधामोइनकोमाख्याया' कुलमन्तसिंहेन स्वसन्तानत्यानयन- 'विषये कन्यादानपुरिमापुत्रविषये चोभयोः कुलमन्तसिंहसिलमन्तसिंहयों नपावरायपिना प्यारीलालेन सह स्पिरीकरण तस्य रीतिसमुदायस्य भवन । यत्प्रत्यर्थिनोऽन्यमानिगौरविवाक्षिसाक्ष्येण च सत्यत्वमामोति तथापि गोपालसहायः वुलमन्तसिंहस्य पुषिकापुनो न जात एतादृशपुनिकापुनस्स शास्त्रालिखितत्वात्, औरसदत्तकृनिमपुनातिरिक्तपुनाणा कलियुगे विशे. पतः शास्त्रनिषिद्धत्याच । एवञ्च सवि कुलमन्तसिंहत्य पक्षी भगवती कोमराख्या एव तत्प्रक्तधने अधिकारिणी भवतीति तृतीयप्रश्नस्योत्तर मप्पांदनव पर्यवसन्नमिति पृथड न लिखितमिति ।- अत्र प्रमाणम्- अनेकवारताः पुना ऋपिभिय्यः पुरातनैः। नशक्यास्तेऽधुना कत्तुं शक्तिहीनतया नरे. ॥ इति दत्तकमीमासादन- कचन्द्रिकादिगन्यवृतगृहस्पति(पृ०२०७ वचनम् ॥१॥ दतीरमतरेषान्तु पुत्रत्वेन परिग्रहः । इमान् धर्मान् कलियुगे वळनाहुर्मनीषिणः ।। इति दरकमीमासा दत्तकचन्द्रकाव्यवहारमयूम्बमिनाक्षराटोका दिग्रन्यधृतशौनक्वचनम् ॥ दत्तोरसेतरेपान्तु पुत्रसेन परिग्रह इति च शौनकेन पुत्रान्तरनिपे- १ पचनमिद मनुस्मृती नोएनम्यते । २ शक्तिहीनचिरन्तनैरिति वृस्मु० पाठ । ३२ ४६८ व्यवस्थापनसंख्या-१६३ धाद् दचौरसावेवाम्यनुलायेते । दत्तरदं कृत्रिमस्याप्युपलक्षएम्-इति दन- कमीमांसा(पृ. ३०'अन्धलिखनम् ||३|| पती दुहितरश्चैव-इत्यादि मिताक्षरादिमन्यतयाशवल्क्यवचनम् ।।४।। चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- यदि ब्रजराजसिंहस्य कृत्रिमपुत्रोकरणमेवं सन्तानत्वे श्रानयनं यो ना- राजसिहा स्वरिनुज्येष्ठपुर एवं विशद्वाधिकवयस्कः, कतिपयसन्ताना अपि तस्य सन्ति, तदा मिताक्षरावोरमित्रोदयव्यवहारमाधवव्यवहारकौस्तुभाधमेक- ग्रन्थमते तस्य कृत्रिमपुत्रत्वं न सिद्ध्यति । दत्तकपुत्रग्रहणविषये ये ये नियमाः मिताक्षरादिग्रन्थेषु लिखितास्ते सवें नियमाः कृत्रिमपुत्रविषयेऽपि मिताक्षरादिग्रन्थेषु लिखिताच । एवमात्मीयवर्गस्य गज्ञश्च विज्ञापनमन्तरा.. प्रकारान्तरेण तस्य कृत्रिमपुत्रतायाः सत्यत्वनिश्चये सति मनुमते तस्य कृत्रि- मपुत्रत्वं सिद्धयति । मनुवचने केवलं सजातीयत्वकृत्रिमपुत्रीकरणयोयोरेखें कृत्रिमपुत्रकरणे प्रयोजकत्वमिति- अत्र प्रमाणम्- एव क्रीतस्वयंदत्तकृत्रिमेषपि योज्यं समानन्यायत्तात्---इति मिता. दरा(पृ. २२४ )ग्रन्थलिखनम् ।।२।। कोतस्वयंदत्तकृत्रिमेष्वपि समानन्यायत्वादेकपुनज्येष्ठपुत्रयोनिषेधः- इति वीरमित्रोदय(पृ. ६१० ग्रन्थलिखनम् ॥२॥ सदृशं यं प्रकुर्वीत गुणदोपविचक्षणम् । पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्त स विज्ञेयस्तु कृत्रिमः ॥ इति मनु( ६।१६६) वचनम् ॥३॥ पञ्चमप्रश्नस्योत्तरम्- यद्यपि प्रजराजसिंहः कृत्रिमपुत्रभवनानन्तरं स्वकीयजनकपितुः स्वज- नन्या मानुध पादादिक्रियाः कृत्वा तयोस्त्यक्तधने श्रायत्तत्व संपादितवान् स्यात्तदा तस्य कृत्रिमपुत्रत्वं मिताक्षरायुपरिलिखितग्रन्थानुसारेण न दिदापति, मनुशुद्धिविवेकप्रन्यानुसारेण सिमपरावयं च भवितुं शक्नोति- इति पश्चिमदेशचलितमनुमितादरावीर मित्रोदयव्यवहारमयूखव्यवहारमा व्यवस्थापनसंख्या-१६३-१६४ ४६ धन्यवहारकोस्नुभदत्तकमीमांसादचकचन्द्रिकाशुद्धिविका दिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- गोत्रऋक्थे जनयितुर्न मजेद्दत्रिमः सुतः । गोत्रऋक्थानुगः पिण्डो व्यपैति ददतः स्वधा । इत्यत्र दत्रिमग्रह- एस्स पुत्रप्रतिनिधिप्रदर्शनार्थत्वात-इति मिताक्षरा(पृ. २१५ )ग्रन्थ- लिखनम् ॥१॥ स च पुत्ररवकरस्य पिण्डप्रदः । निजपित्रादीनां पिण्डप्रदत्वं तस्य तिष्ठत्येय-इति शुद्धिविवेकग्रन्य (पृ० ३१ ख पं० ६)लिखनञ्चेति ॥२॥ एतदब्दीय जुनमासीयत्रयोदशदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् थीवैधनाथमिश्रण समोल- २६- एक स्त्रीलोक पतिर मरणान्तर आपन पिता मातार स्थावर अस्थावर किञ्चित् विपय पाइया पित्रालय वास करिया भोगवाना थाकिया लोकान्तर हइले ऐ स्त्रीलोकेर पतिर सहोदर भ्रातार पौत्र ओ भर्तार भग्नीर पुत्र वर्तमान थाकाते ऐ अविरा स्वीलोकेर मातृ पितृ संक्रान्त प्राप्त स्थावर अस्थावर विपय ऐ दुइ जनार मध्ये काहाके अशिते पारे, यथाशास्त्र सोलेर पाशे शाखेर निदर्शने उत्तर लिखिया पाठाइवा इति- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदेतदब्दीयजुनमासीयरष्ठदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- यदि काचित् स्त्रीपतिमरणानन्तरं स्वपैतृकं मातृकन्चस्थावरात्यावर किञ्चिद्धनं व्यवस्थापत्रसंख्या-१६४ प्राप्य स्वपित्रालये वासं कृत्वा तद्दने भोगवती भूत्वा मृता स्यादन विवादा-- स्पदीभूतं धनं तया उत्तराधिकारित्वेन प्राप्तमिति प्रश्नपत्रेण स्पष्टतरतया अवगमात्तन्मरणोत्तरं तस्याः स्त्रियाः पत्युः सहोदरभ्रातुः पौत्रस्य वङ्गदेशी- यावरलिखितप्रश्नलिखितस्य तस्याः पत्युः सहोदरभ्रातुदौहित्रस्य या पारसी- कलिपिलिखितप्रश्नलिखितस्य तस्याः पत्युभांगिनेयस्य च तत्संक्रान्ततर- तृत्यक्तधने तत्संक्रान्ततन्मातृत्यक्तघने च नाधिकारः। यथा पुत्रपौत्रप्रपौत्र- रहितस्य मृतस्य धने पल्या उत्तराधिकारित्वेनाधिकारे जाते सत्यपि पन्या मरणोत्तरं तद्धनं तत्रत्युत्तराधिकारिणामेव भवति तथा पुत्रादिपनोपर्यन्त- रहितस्य मृतस्य धने दुहितुरुत्तराधिकारित्वेनाधिकारे बाते सत्यपि दुहितु- मरणोत्तर तत्पितुयें उत्तराधिकारिणस्तेपामेव तद्धन भवति, प्रकृते तु, तस्याः स्त्रियाः पत्युः सहोदरभातुः पौत्रस्य तस्याः पत्युः सहोदरभानुदी. हित्रस्य वा तस्याः पत्यु गिनेयस्य वा तस्याः पितुर्मातुश्चोत्तराधिकारित्या भावात्-इति वगदेशचलित-दायभागदायतस्व-दायभागटोकादायक्रमसग्रह- विवादार्णवसेतु-विवादमाएंवादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था । अत्र प्रमाणम्-- पली दुहितरश्चैव-इत्यादि दायभागादिनन्धधृतयाज्ञवल्क्यवचनम्।।१।। अपुत्रा शयनं मर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । भुञ्जीतामरणात् शान्ता दायादा उर्ध्वमाप्नुयुः।। इति दायभागादि- मन्थधृतकात्यायनवचनम् ||२|| यदा पतीत्युपलक्षणं स्त्रीमानाधिकारे अयमों बौद्धयः-इति दायमागमय लखनञ्चेति । ३।। इगरेजोशम्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदविकाष्टादशशतान्दोयजुलाइमासीयम- थादिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेय व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रया.

व्यवस्थापत्रसंख्या-१६५ १०१ छोल- २७-रामचन्द्रसरकार नामे एक व्यक्ति प्रापन एक जोत. जमा श्रो वैद्यनाथ नामक एक पुत्र राखिया लोकान्तर हय । परे वैद्यनाथ ऐ जमाय दखिलकार थाके। वैद्यनाथ मजकुरेर दुइ स्त्री, तारामारण प्रो राधामणि । तारामणि मजकुरार गर्भजात दुइ पुत्र गङ्गाधर ओ राजकुमार । राधामणि मजकुरार गर्भजात एक पुत्र, आनन्दकुमार एवं एक कन्या यादरमणि । साहार मध्ये आनन्दकुमारेर मृत्यु श्रापन पिता वैद्यनाथेर समक्षे हय । परे दुइ पुत्र, अर्थात् गङ्गाधर ओ राजकुमार ओ अदत्ता कन्या अर्थात् प्रादरमणी पो श्रापन दुइ स्त्रीके वर्तमान राखिया वैद्यनाथ मजकुर परलोक प्राप्त हय । क्रियत्कालान्तर गङ्गाधर ओ राजकुमार आपन पैमात्रीय अदत्ता भनी आदर- मणी श्री माता प्रो विमाताके वर्तमान राखिया लोकान्तर हय। परे तारामणी मजकुरार मृत्यु हइले राधामणी मजकुरा साहार वार्द्ध आदि करिया प्रापन गर्भजात ऐ अदत्ता कन्या श्रादरमणीर विवाह दिया लोकान्तर हय । एइ क्षण ऐ वैगनाथ सरकारेर पुत्रसम्भाविता कन्या श्रादरमणी ओ वैद्यनाथ मजकुरेर पितृदौहित्र, अर्थात् रामचन्द्रसरकारेर कन्यार पुत्र, श्री ईश्वरचन्द्रवसु वर्तमान । अतएव शास्त्र सम्मत वैद्यनाथ मजकुरेर पैतृक स्थावरादि धनेर, अर्थात् जोतजमा मजकुरार, सत्ताधिकारिणी वैद्यनाथेर पुत्रसम्भाविता कन्या श्रीमती श्रादरमणो किम्वा ताहार पितृदोहित्र ईश्वरचन्द्रवसु अधिकारि हइवेक-इहार यथाशाब ये व्यवस्था हय लिखिवेन इति- श्रीजयतितराम प्रभुसमपिंतप्रश्नपत्रं यदेतदन्दीयजुनमासीयपष्टदिनसम्बन्धिबृहस्पति- वासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते-- १.आदन्द-ज्यप०1 ॥ ५०२ व्यवस्थापनसंख्या-१६५ प्रश्नपत्रलिखितवृत्तान्ते सति मूनभूतधनस्वामिनी रामचन्द्रसरकारस्य मरणानन्तरं तत्यक्तधने तत्पुत्रस्य वैद्यनाथस्याधिकारे जाते सति तदन वैद्यनाथस्यैव भातम् । अवास्तस्मिन् मृते तत्त्यतघने तन्मरणोत्तरं विद्यमान- योगङ्गाधरराजकुमारयोर्वेद्यनायपुत्रयोरधिकारे जावे सति तद्धनं तयोरेव बातम् । अतस्तयोमरणोपरं तयोः पुनमारभ्य पितृपय॑न्तरहितयोस्त्यक्तधने तयोर्मातुस्तारामण्या अधिकारे जाते सति तारामण्या मरणोत्तर तरसंक्रान्त- स्वपुत्रघनं तत्पुत्रयोयें उत्तराधिकारिणस्तेषामेव भवति । तत्र च तत्पुत्रयो- उत्तराधिकारिणां मध्ये तयोः पुत्रमारभ्य पितृप्रपौत्रपय॑न्तानाम्मध्ये कधि- घास्तीति प्रश्नपत्रेण स्पष्टतरतयावगमेनेदानी गङ्गाधरराजकुमारयोः पितृ- दौहित्राधिकारस्य शास्त्रीयत्वेन गङ्गाधरराजकुमारयोः पितृदोहित्रोत्सत्ति- सम्भावनायां सत्यां तत्स्वत्वान्यथानुपपत्त्या तयोगिन्या श्रादरमएवास्तयोः पितृदौहित्रोत्पत्तिमूलीभूतयोस्तयोरसम्बन्धमूलीभूतायाश्च स्वपुत्रोत्पत्तेः प्राक्: कालपर्यन्तम् (अधिकारः)। यथा पुत्रादिपनीपर्य्यन्तरहितस्य मृतस्य पितुर्द्धने दुहितुरधिकारस्तथा भ्रातृधनेऽपि (भगिन्या) अधिकारः। गङ्गाधर- राजकुमारयोः पितृदोहित्रोत्रत्तिसम्मावनायां सत्यां तयोः पितामहदौहित्रस्ये- श्वरचन्द्रस्य नाधिकारः। सति च गङ्गाधरराजकुमारयोः पितृदौहित्रे स्वतस्तयोः रितुः पार्वणभादपिण्डदातरि स्वतस्तयोः पितुः पावणाद्ध- पिण्डदानानधिकारिण्यास्तयोभंगिन्या श्रादरमण्या नाधिकारः, किन्तु तस्याः पुत्रस्यैव पुत्राणां या अधिकारः-इति वङ्गदेशचलितदायभाग दायतत्त्व- दायभागटोका दायक्रमसंग्रह विवादार्णवसेतुविवादभगार्णवादिअन्धानुसारि - पीव्यवस्था- अत्र प्रमाएम- पत्नी दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा इत्यादि दायभागादिग्रन्थकृत- याज्ञवल्क्यवचनम् ॥१॥ पितुरपि प्रपौत्रपर्यन्ताभावे पितृदौहित्रस्याधिकारो चोद्धव्यो, धनिदोहित्रस्येव-इति दायभागग्रन्थलिखनम् ॥२॥ यद्यपि दुहिप्रभावे दोहित्रस्येव भगिन्या एव प्रागधिकारो युक्तस्तथापि तस्याः स्त्रीत्वेन पाळयापिण्डदवाभावादाधिकारः, दुहितुस्त दौहिनात व्यवस्थापनसंख्या-१६५-१६६ पूर्वमङ्गादान सम्भवतीत्यादिविशेषवचनादेवाधिकार इति भावः-इति- श्रीकृष्णतालकारकृतदायभागटोकालिखनम् ॥३॥ तदभावे पुनः पितृदौहित्र इति । तदभावे पितामहस्तभावे पितामही तदभाये पितुः सोदरस्तदमाये पितुर्वेमात्रेयः तदभावे पितृशोदरपुत्रपितृ- वैमात्रयपुत्रपितृसोदरपोत्राणां पितृवैमात्रेयपोगाणां क्रमेणाधिकार तदमारे पितामहदोहित्र-इत्यादि श्रीकृष्एतकालङ्कारकृतदायभाग- टीकालिखनञ्चेति ॥४॥ इगरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयजुलाइमासीयप्र- थमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीजयतितराम् २८ प्रथम प्रश्न :- यद्यपि कोन व्यक्तिरा दुइ सहोदर, अर्थात् मध्यम श्रो कनिष्ठ भ्राता, आपनार ज्येष्ठ ओ तृतीय भ्रातार सहित प्रार्थक्य हइया, आफ्नारा दुइ सहोदरे एकान्यत्तिते स्थावर अस्थावर वस्तु उपार्जन करिश्रा, मध्यम भ्राता एक पुत्र राखिया लोकान्त हय । ताहार पर क्रमे एकामबत्तिवे थाकिया ऐ मध्यमेर पुत्र एक स्त्री, प्रो कनिष्ठ भ्राता एक पुत्र ओ एक कन्या राखिया मृत्यु हय । एमत् स्थले ऐ कनिष्टेर पुन्न पीडित जीवनासंशय हइया ऐ समुदय साधारणेर स्थायर अस्थायर वस्तु आपन सम्भाविता पुत्रिनी भग्नीके दान करिते पारे किना-यथाशाख एइ प्ररनेर प्रत्युत्तर लिखिवेन इति- । व्यस्थापत्र संख्या-२६७ द्वितीय प्रश्न- यद्यपि कोन व्यक्ति जीवनासंशय हइया माधारणेर कोन स्थावर अग्थावर वस्तु आपन भनिके दान करिया ऐ दानपत्रे एमत्त नियम राखे ये यदि स्यात् श्रामि ए यात्रा रक्षा पाइ, एइ दानपत्र अकर्मण्य हइवेक; अतएव शाघाणुमारे एमत नियमित दान सिद्ध वटे कि ना- मभुभमर्पितप्रश्नपत्रं दानपत्रञ्च यदेतदन्दीयमैमासीयपोडशदिनमम्बा न्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदेवलोक्य याशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथममश्नस्योत्तरम्-- यद्यपि चतुर्णा सोदरभ्रातृणां मध्ये दो भ्रातरावांमध्यमकनिष्ठी स्वकीयज्येतृतीयभ्रातृभ्यां सह पृथगनौ', सावेव द्वावेकानौ स्थावरस्थायर- धनमुपार्जयतः तयोर्मध्ये मध्यमो भ्राता एकं पुत्रं सरदर मृतः स्यात् , तद- नन्तरं क्रमेणैकान्ने स्थित्या तस्यैव मध्यमस्य पुत्र एका पत्नी संरक्ष्य मृतः, एव कनियो भ्राता एक पुत्रं कन्याञ्चैको रक्षित्वा मृतः स्यात् एकच सति तस्यैव कनिष्ठस्य पुत्रः पीडितो जीवनसंशयमापनः सन् तदेव साधारण- स्थापगत्यावरसमुदायधने सम्भावितपुत्रायै स्वमगिन्यै दत्तवान् स्यात्तदा तद्दानं दातुः स्वांगयोग्ये सिद्धं भवितुं शक्नोति, तद्व्यतिरिक्त सिद्धं भवितुं न शक्नोतीति- अत्र प्रमाणम्- प्रदानं स्वाभ्यारणम्-इति मनुवचनम् ॥2॥ स्वभागान् यदि दद्युस्ते विक्रीणीयरथापि वा। कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्यमीशास्ते स्वघनस्य वे!) इत दायरागादि- अन्यधृतनारदवचनम् ।।२।। विभक्तस्येाविभक्तस्थावरस्यापि स्वामिकृतदानादि सिद्ध्यत्येव अक्ष- पातादिना पश्चादेशपरिचयसम्भवादिति भावः-इति श्रीकृष्णतर्कालङ्कार- दायभागटीकालिखनम् ॥३॥ १. पृथक त्री-व्यप- 1 - व्यवस्थापनसंख्या-२६८-१६६ अत्र साधारणद्रव्यस्थ समुदायस्यैकेन विक्रये परांरायोग्येऽसिद्धिः खांशयोग्ये तु सिद्धिः-इत्यादि विवादभगार्णवग्रन्य( १. विवा० ३०५ क) लिखनम् ॥४॥ द्वितीयप्रश्नस्योचरम्- यद्यपि कधिद्वयक्तिविशेपो जीवनसंशयमापनस्सन्नसाधारणस्थावरा- स्थावरवस्तु स्वभगिन्यै दत्वा तद्दानपत्रे एवं (तेन नियमो लिखितः यद्यहमेत- द्रोगान्मुक्तो भूत्वा जीवामि तदैतद्दानपत्रमकर्मण्यं भविष्यति । अत एवैतागं सोपाधिदानं तद्दानकर्तृयोग्यांशेऽपि तद्दानक स्तद्रोगविमुक्तत्वेन वर्तमान तायां सिद्धू भवितुं न शक्नोति, यतस्तदानपत्रे दात्रा लिखितमस्ति यद्यहमे तद्रोगान्मुक्तो भूत्वा जोवामि तदा श्रस्तद्वर्तमानतायामेतद्दानपत्रमकाम- गयं भविष्यति, न तु वा सच तवैव नातमिति । एवञ्च सति दानुस्तद्रापा- न्मरणे सति तदानं दातुः स्वांशयोग्य सिद्ध भवितुमर्हति । सोराधियानमुरा- घिसिद्धी सिद्ध भवति उपाध्यासिद्धावसिद्ध भवति-इति वणदेशचलितमनुदा- यभागदायतत्वदायक्रमसंग्रहविवादभङ्गार्णवादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था- अन मारणम्- प्रयमप्रश्नोत्तरप्रमाणानि चत्वारि ॥४॥ सांपाधिदानमुपाध्यसिद्धावसिद्धम्-इति विवादभङ्ग गवग्रन्थलिखन- चेति ॥५॥ हारेजीशब्दप्रतिपायत्रयस्त्रिशदधिकाघादशशताब्दीयतुलाइमासोया- श्वगदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे गयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण २६-०३१ खास आपील- ई १९२४ साल- सदर देओयानि आदालतेर पण्डितेर प्रति प्रश्न - यद्यपि स्यात् कोन व्यक्किर दुइ पुनेर मध्ये ज्येष्ठ पुत्र एक - व्यवस्थापनसंख्या-१६६ कन्या राखिया पिता वर्तमाने मरे, आर कनिष्ठ पुत्र पितार मरणोत्तर एक पुत्र राखिया लोकान्तर करे- एमत स्थले ऐ कन्या यो पुनर मध्ये के धनाधिकारी हवेक-यथाशाख प्रश्नेर उत्तर लिखिवा इति- श्री यतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रमेतद्वियादविषयनिविष्टपत्रजातच यदङ्गरेजीशब्द- प्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाटादशशताब्दीयजुलाइमासोयप्रथमदिनसम्बन्धिसो - मवासरे मया प्राप्त , तदवलोक्य यादृशमोधो नातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- यदि कस्पचिवयोः पुत्रयोर्मध्ये ज्येष्ठपुत्रः कन्यामका रदित्वा' जीवति स्वपितरि मृतः स्यादेवं कनिष्ठपुत्रः स्वपिनुम्मरणोत्तरमेकं पुत्र रक्षित्वा मृतः स्यात्तत्र यदि पित्रा स्वस्वत्वास्पदीभूतं धनं विभज्य स्वपुत्राभ्यां दत्तं स्याद् यत् प्रभुसमर्पितपत्रान्तर्गतद्वादशाङ्कातिववङ्गालाख्याष्टादशाधि. कद्वादशशतान्दोयफाल्गुनमासीयपञ्चदशदिनलिखितएकरारनामामंज्ञकपत्रे • णावगम्यते तदा तदानानुसारेण तद्धने द्वयोः पुत्रयोः स्वत्वे जाते सति द्वयोः पुत्रयोमरणानन्तरं तयोर्ये उसराधिकारिणस्तेषामेव तद्धनं भवति । तत्र द्वयोर्मध्ये ज्येष्ठपुत्र. पनीमेकां कन्यां चै कामेके पुत्र च विश्वनाथ नामानं साक्ष्य चीवति पितरि मृत इति प्रभुसमर्पितपत्रजातैख़तम् । एवं च सति तद्दानानुसारेण ज्येष्ठपुत्रयोग्यांशे तत्पुत्रस्य विश्वनाथस्याधिकारे नाते सति तद्धनं विश्वनाथस्यैव जातमतस्तन्मरणानन्तरं तत्यक्तधने तदुत्तराधिकारिणमेवाधिकारस्तदुत्तराधिकारिणामध्ये तस्य पुत्रमारभ्य पितृपय॑न्ताभावेन तन्मातुः करुणाया अधिकारे जाते सति करुणामरणो. सरं विश्वनाथस्य पिन् रामलोचननस्करस्य प्रपौत्राय॑न्ताभावेन तसिनु. दौहित्रस्य भागवतमण्डलस्याधिकारः। पितरि मृते पुत्रं रक्षित्वा मृतस्य कनिष्ठपुषस्याशे तत्पुत्रस्याधिकारः । यदि च पित्रा स्वस्वत्वासदीभूतधन विभव्य स्वपुत्राभ्यां न द स्यात्तदा तद्धने पितुरेव स्वयमस्ति । अत एव श्रीपति पितरि मृतस्य ज्येष्ठ पुत्रस्य पैतृकधने स्वत्वानुसादा जीवति पिता- व्यवस्थापनसख्या-१६६-१७७ महे मृतस्य पौरस्य च विश्वनाथस्यानपत्यस्य पैतामहधने सत्वानुसादाच तत्तदुचराधिकारिणां तद्धने नाधिकारः। किन्तु पितृमरणोत्तरं मृतस्य कनिष्ठपुत्रस्य पैतृकसमुदायधने स्वखोलादेन पैतृकसमुदायधनं तस्यैव जातम् । अतस्तन्मरणोत्तरं तदुत्तराधिकारिणामेव तत्राधिकारः । तदुत्तराधि- कारिणामध्ये तत्पुत्रस्यैव प्राधान्येनाधिकारः-इति वङ्गदेशचलितमनुदा- यभागदायतत्त्वदायमागटोकादायकमसंग्रहरियादाराव पेतु विवादभवार्णवादि- अन्यानुसारिणी व्यवस्था- अन प्रमागम- प्रदानं स्वाभ्यकारणम् -इति मनुवचनम् ||२|| पली दुहितरश्चैव पितरी प्रातरस्तथा-इत्यादि दायभागादि- अत्यधृतयाशवल्क्यवचनम् ||२|| पितुरपि प्रपोत्रपर्यन्तामा पितृदौहित्रस्याधिकारो बोदव्यो धनिदी- हिमस्येव-इति दायमागप्रन्धलिखनम् ||३॥ पित[परते पुत्रा विभजेयुईनं पितुः। अस्वाम्यं हि भवेदेषां निदोघे पितरि स्थिते ॥ इति दायभागादि- अन्यधृतदेवलवचनम् ॥४॥ तत्र प्रथम पुत्र स्तदभावे पौत्रस्तदभावे प्रपीत्रः- इति श्रीकृष्णता लङ्कारकृतदायभागटीकालिखनञ्चेति ॥५॥ अगरेजीशब्दप्रतिराद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयागरितमासीयप. श्चमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेय व्यवस्था दति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेग ३०-मोकाम कलिकातार सदर देओयानी आदालतेर पण्डित हइते सदर बडेर प्रश्न :- यदि स्यात् जेला सारङ्गनाशो छेत्रीय जातो राजा हरकुमारदत्त मीरशी जमिदारिर पर दखिल काविज थाकिया दुइ विवाहिता खीरगर्भजातक दुइ पुत्र के उत्तराधिकारि राखियालोकान्तर हइल।

व्यवस्थापनसंख्या-१७० परे ताहार ज्येष्ठ पुत्र राजा तेजप्रताव नामिक कुजाचार मते समुदय अवण्टक जमिदारिर पर सम्भोगी थाकिया अापन मृत्युर पूर्व वैमात्रेय भ्राता थाकितेश्रो अवण्टक अमिदारि मजकुर हइते २१ मोजा तिन वीर मध्ये एक खी महाराणी तिलतमादेव्यार नामे दान करिया दानपत्रेर निचे एइ विवरण लेखे ये थामार परे महाराणी मौछुफ समुदय देहात जमिदारि मजकुर दान करा ग्रामसकल सम्बलित आपण एकत्तारे राखिया आपन कवज तकरूपे आणीवेक, पार समयेर हाकिमेर सरकारे मालगुजारि आदाय करिते थाकिवेन इति । ताहार दुइ वत्सर परे उक्त राजा निःसन्तान ऐ वैमात्रेय भ्राता राजा अमरप्रतायसेन श्रो तिन खीके उत्तराधिकारि राखिया मरिल । ऐतिन खीर मध्ये दानप्रहिता महाराणी उत्तराधिकारित्व एवं दानपत्र मजकुरेर द्वाराय समुदय जमिदारिर पर दावि करितेछे । ओ मृत राजार वैमात्रेय भ्राता राजा अमरप्रतापसेन ताहार प्रापनार एकानवर्ती एवं अंशी थाकार दाविते एइ विवरणे ये पैतृक जमीदारी होन कारण एवं अवएटक श्रो मृत राजार कुष्ठम्यामकालिन दानपत्र लेखा होने दान असिद्ध, ओ महाराणीर खोरपोप भिन्न अन्य कोन स्वत्व ना थाकीवाते उत्तराधिकारिर दायि करिया मापनाके समुदय जमिदारीर सत्याधिकारि ओ का करार दिन्छे । अतएव शास्त्रानुसारे ऐ दुइ दाविदार मजकुरानेर मध्ये कोन व्यक्ति सकल जमीदारी मजकुरेर पर दखल पाइवार स्वत्व राखे ताहार व्यवस्था चलित शास्त्रसम्बलित रितमते लेखेन इति- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदद्गारेजीशन्दप्रतिशत्रयस्त्रिंशदधिकाटादशश- तान्दीयसितम्बरपासोयाष्टाविंशतितमदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- -

व्यवस्थापनसंख्या-१७०
५०६
यद्यपि सारनदेशीयः क्षत्रिय जातीयः कश्चिद्राजा हरकुमारदत्तनामा
व्यक्तिविशेषः कमागतसरासरस्थावरादिधने यायव संगाध द्वयोः पल्यो-
गर्भगातौ द्वौ पुनायुत्तराधिकारिणी संरक्ष्य मृतः स्यात् , तदनन्तरं तस्य
ध्येयपुत्रो राजा तेजःप्रतारसेनः स्वकुलोचिताचारानुसारेण समुदायसाधारण-
सराजकरस्थावरादिघने वायत्तत्वं संपादितवान् स्याचदा तन्मरणानन्तरं तस्य
पुत्रपौत्रप्रपौत्रामायेन तस्यताविमत्तसाधारणसराजकरस्थावरादिरामुदायधने
तद्वैमात्रेयभ्रात् राशोऽमरप्रतापस्यैवाधिकारः, साधारणसराजकरस्थायरादि-
घने धेश्यन्तरानुमतिमन्तरेणैकस्य त्यांरायोग्येऽपि दानाद्यनधिकारिलेन
साधारणसराजकरस्थावरादिममुदायधने दानाद्यनधिकारित्यत्यार्थसिद्धत्यात्
पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसारेण साधारण्यप्रतियोगिनि धमानपभ्रातरि
विद्यमाने सत्यप्पविभक्तधने पल्या अनधिकाराय । एवं राशस्तेजप्रताप-
सेनस्य पत्नीनां यावजीवं स्वमत्त कुलोचितमासाच्छादनोपयुक्तधने श्रावश्यक-
विधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तपने चाधिकारस-इति सारनदेशचलितमनुमि-
ताक्षरावीरमित्रोदयव्यवहारमाधवव्यवहारमयूखव्यवहारपौस्तुभादिमन्यानुसा-
रिणी व्यवस्या-
अत्र प्रमाणम्-
पली दुहितरश्चैव पितरी भातरस्तथा।
तत्सुतो गोरो बन्धुः इत्यादि मिताक्षरादिनन्यधृतयाशवल्ल्य-
वचनम् ॥१॥
पत्नी गृह्णीयादित्येतद्वचनजातं विभक्तमातृस्रीपिपयम्-इति मिताक्षग-
ग्रन्थलिखनम् ॥२॥
सोदराणाममावे मिनोदरा धनमाजा-इति मिताक्षरानन्दलिखनम् ॥३॥
तस्मादपुत्रस्य स्वातस्य विभक्तस्यासंसृष्टिनो धनं परिणीता सी
संयता सकलमेव गृहातीति स्थितम् इति मिताक्षगग्रन्थ, पृ० २२१ )
लिखनम् ॥
अविभक्तेषु द्रव्यस्य मध्यगत्वादेकस्यानीश्वरत्वान् सर्वाभ्यनुज्ञाऽव-
श्व कार्या। विभयतेषु तु विभक्तानुमतिमन्तरेणापि व्यवहारः सिद्धय.
येव-इति मिताक्षरामन्याललनम् ॥५॥

व्यवस्थापत्रसंख्या-१७०-२७१ स्थावरस्य समम्तस्य गोत्रसाधारणस्य । नैकः कुर्यात क्रयं दानं परस्परमतं विना !-इति वीरमित्रोदयग्रन्या धृतव्यासवचनम् ॥६॥ स्वाते स्वामिनि स्त्री तु ग्रासाच्छादनभागिनी । अविभक्ते धनांशे तु प्रामोत्यामरणान्तिकम् ॥ इति वीरमित्रोदय- ग्रन्थधृतकात्यायनवचनम् ।।७।। श्रङ्गरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयाक्तूबरमासीय. नवमदिनसम्बन्धिबुधवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिण ३१-रोवकारि मिछिन सदर देशोयानि आदालत मो० कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुन हेनरी सिकिस- पीयेर साहेवेर वैठके । तारिख २४ जुलाइ ई सन १८३३ मोतारके वाङ्गला १० श्रावण सन १२४० साल दिवस बुधवार- कृष्णकान्त पोहोर-छाएल सम हालेर १७ जुन तारिखेर होया एइ आदालतेर हाकिम रिचार्ड ओयालपुल साहेवेर हुकुम मोतायक जेला जङ्गल महालेर जज साहेवेर रिटरण' सम्वलित यो ऐ सनेर २१ मार्चर लिखित तथाकार रोक्कारिर सहित एवं छाएलेर छोयालेर नकल, जादा जज साहेवेर मौछाफर रिटरणेर सामील एइ श्रादालते पौछियाछिल, हाकिम रोक्कारि ओ गजचन्द्रराय छायेलेर मोकई मार कागजात सम्वलित अद्य आमार वैठके दरपेप हइल, अनुमोदने आइल । हुकुम हइल ये साचेक व्यवस्था श्रो सन हालेर २१ मार्च तारिखेर होया जेला जगल महालेर जज साहेवेर हालेर रोयकारि एइ आदालते परिडतेर निकट १विटरए-न्यप।

व्यवस्थापत्रसंख्या-२७१ ५११ 'एइ हुकुमे पाठान जाय ये पण्डित मजकुर ऐ सकल अनुमोदन परे ५३ विषयेर व्यवस्था ये उपरेर लिखित जेलार जजसाहेवेर रोवकारिर लिखित सुरत देवसेवार खरच ओ सेवाइतेर ोयाजिवि खरच मिनाह वादे चाकी उपसत्य डिकरिर टाका दायेर जन्य जाहा सेवाइतेर नामे हइयाछे खरच इते पारे कि ना-एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण इति ॥ श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिमपीयासा हेवधर्माधिकरण- लिखितामरेजीशब्दप्रतिरायत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशराताब्दीयनुनाइमासीय- चतुविशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितपूर्व व्यवस्थापत्रमेतदन्दीयमानमासीय कविरा तितमदिवसीयजङ्गलमहालजिला - ख्यावान्तरधर्माधिकरणाधिपतिकृतविचारसत्रञ्च यदेतदन्दीयागस्तिमासीय- द्वादशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादशमोधो मातस्त- दनुसारेणोत्तरं लिख्यते- जङ्गलमहालजिलाख्यानान्तरधम्माधिकरणाधिपतिकृतविचारपत्रलिखि- रावृत्तान्ते सत्यपि देवसेवार्थ व्ययातिरिकस्य सेवाइतशब्दवाच्यस्यावश्यकव्य- यातिरिकस्य देवनभूम्युपत्यत्तस्य व्ययो जयपत्रलिखितरानतमुद्रापरिशोधना- थम्, यजयपत्रं सेवाइतशब्दवाच्यस्य नाम्ना जाचम्, भवितुं न शनोति, देवमभूमौ तदुपसत्त्वे च देवमात्र स्वत्वेन सदितरस्यत्वाभावात् । यश्च देवत्र भूम्युरस्वत्वादावश्यकदेवसेवार्थ किञ्चिनियोज्यावशिष्टस्य समक्षणार्थ व्यवहारो देवनिवेदनं विनापि पाठिानाम् स च शास्त्रनिपिद्धत्वेन शास्त्रा- नुमारेण यथार्थो मवितुं न शक्रोति, शास्त्रनिषिद्धव्यवहारस्य शास्त्रानुमारे- गाप्रामाणिकत्वात्, विशेषतश्चालितशास्त्रानुज्ञायामसत्यामेव लोकव्यवहा- रस्य शाने प्रमाणलेनोमन्यासाच, देवत्रविषये विशेषतवलितशास्त्रानुशायाः प्राचीनव्यवस्थाया एतयवस्थायाश्च प्रथमप्रमाणे मनुवननेन एव स्पष्टी- ऋतत्वाच्च-इति वनदेशचलितमनुदायभागदायतत्वदायभागटोकादाय- क्रमसाइविवादासेतुविवादभङ्गारवादग्रन्धानुमारिणी व्यवस्था-- ५१२ व्यवस्थापनसंख्या-१७१-१७२ अत्र प्रमाणम्- देवस्वं ब्राह्मणस्वं या लोभेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिप्टेन जीवति ।। इति मनुवचनम् ॥१॥ प्रतिमादिदेवतार्थमुत्सृष्टं धनं देवस्वम्-इति मन्यर्थमुक्तावल्यां कुल्लूकमव्याख्यानम् ॥२॥ तस्माच्छास्त्रानुसारेण राजा कार्याणि साधयेत् । वाक्याभावे तु सर्वपां देशदृष्टमतंनयेत. इति सवर्चवचनञ्चेति ।।३।१०।। इगरेजीशन्दप्रतिपादत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयनवम्बरमासीयर- ञ्चविंशतितमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति-- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ३२-रोवकारि मिशिल सदर देशोयानि आदालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिस- पीएर साहेवेर बैठके । तारिख २ अक्तुबर ई सन १८३३साल मातावक वागला १७आश्विन सन १२४०साल दिवस वुधवार- कालीकिशोररायचौधुरि দ্বাৰা छाएलेर उकिलान मुनशी हुसुन प्रालि ओ मुनशा युप्रालि भार सदासुखपण्डित द्वितीय पक्ष रामवकसेर पक्ष हइते श्रापन नानेर एकता भोकालतनामा भैरवचन्द्रचक्रवतिर नामेर एक फेटा मोक्तारनामा सम्बलित दाखिल करिया हाजिर भाइले । छाएलेर छमओयाल क्रोट मुरशीदाबादेर हाफिम पारण उलिएम इष्टीएर साइव ओ कोट जाँहगीरनगरेर हाकिम केरिकेरापट साहेवेर सन हालेर -६ जुन प्रो २२ मार्च वारिखेर लिखिन हुकुमेर नाराजिते जादा देनदार जगदीश्वरीर हिस्यार निलामेर विशये १.मुरगोदावर-व्यप।

व्यवस्थापनसंख्या-१७२
५१३
छादेर हय । छाएलेरमाता मोबात मजकुरार जीवदशा पर्यन्त
दखलि काजी जमिदारि निलाम नाहओयार प्रार्थनाय छाएलेर
उकिलानेर नामेर ओकालतनामा ओ रामजयसाण्डयालेर नामेर
मोक्तारनामा श्रो कोट मुरशीदायाद प्रो फ्रोट जाहागेरनगरेर
सन हालेर २६ जुन ओ २२ मार्च प्रो इङ्गराजी सन १८३१
सालेर १६ मार्च तारिखेर लिखित तिन केता रोवकारी यो
इं सन १८२८ सालेर ह एपरेलेर लिखित जेला मयमनसिंहेर
देखोयानि श्रादालतेर फयझलार नकल तिन केता भो वाइला
ए वारतेर च्छोलेनामार नकल एक केता आर जेलार गुजाराण
जगदीश्वरीर दरखास्तेर नकल एक केता ओ ई सन १८३२
सालेर २५ एपरेल ओई सन १८२६ सालेर ५ जुलाइ भो २६
एपरेलेर लिखित एइ श्रादालतेर नकल तिन केता ओ ई सन
१८२६ सालेर ३ दिजेम्बरेर लिखित जेला मजकुरेर देओयानि
प्रादालतेर एक केता रोवकारिर नकल सम्वलित, जाहा अद्य
मुनशी होशन आलि उकिल पार द्वितीय पक्ष रामवकसेर पजेर
एक केता छोयाल, जाहा सदासुखपण्डित दाखिल करिलेक, विन
फेता सेोयाय तिन केता नकल फयछला पडागेल | यदि
स्यात्' मजुद कागजातेर द्वाराय प्रकाश हइतेछे-ये छाएल
ओ मोछति नारायणीदेव्या ओ जगदीश्वरीदेव्यार हकुक
लोलेनामार द्वाराय रफा हइयाछे, आर ऐ छोलेनामा जेलार
श्रादालते मञ्जर श्रो मातवर हइयाछे पार ताहार द्वाराप
प्रकाश ये मोछति जगदीश्वरीर मुत्युर पर ताहार हिस्या
छाएलके आर्शीवेक । एप्रकारे मोलम्मात मजकुरार देना आदायेर
जन्ये ताहार हिस्या विक्रएर उपयुक्त हइते पारे कि ना-आमार
निकट ए विषय शाखेर एलाका राखे । ए जन्ये चूडान्त हुकुम
छादेर होयार पूर्व हुकुम हइल ये छाएलेर छोयाल एवं उहार
दाखिल करा कागजात ओ द्वितीय पत्तेर छोयाल सम्बलित एइ
आदालतेर पण्डितेर अग्रे पाठान जाय-ये पण्डित मजकुर

५१४ व्यवस्थापनसंख्या-२७२ छोलेनामार लिखित सरतसकलेर अनुबोधने उपरेर लिखित छोयालेर जोयाव एक सप्ताह मध्ये दाखिल फरेण इति- श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरी सिक्सिपीयरसाहेवघाधिकरण- लिखितागरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयाकत्वरमासीय- द्वितीयदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितैतद्विवाद- विषयनिविष्टपनजातच यदेतदब्दीयदिशम्बरमासीयद्वितीयदिनसम्बन्धिसोम- चासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृयबोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- यदि मूलनिनो रामकिशोररायाभिधेयस्यैतद्धर्माधिकरणार्थिनः पितु- स्त्यधने सन्धिपत्रानुसारेणैतधर्माधिकरणार्थिनो नारायणोदेव्याश्च जग- दीश्वरीदेव्याश्च स्वय निश्चित स्याद्, एवं तदेव सन्धिपत्रं जिलाख्यावान्तर- धर्माधिकरणे सत्य जातं स्याद्, एवं तेनैव सन्धिपत्रेण जगदीश्वरोदेवी- मरणोत्तरं तदायत्तीभूतोऽश एतद्धम्माधिकरणार्थिनो भविष्यतीत्यवगम्यमानं स्वात्, तदा जगदीश्वरीदेवीदेय ऋणपरिशोधनार्थ राजीवनपर्यन्तमुपस्वत्व- भोगायं तत्पुत्रस्वत्वास्पदोभूनतदायत्तीभूतोऽशो' विक्रययोग्यो भवितुं न शनोति सन्धिपत्रतात्यार्थधर्मशास्त्राभ्या तथैव पर्यवसानात्-इति वन- देशचलितदायभागदायतत्त्वदायक्रमसमहविवादाएंवसेतुविवादमार्णवादि- प्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- सबै हयनीरसस्यैते पुत्रा दायहराः स्मृताः-इति दायमागादि- ग्रन्धधृतदेवलवचनम् ॥१॥ न स्री पतिपुत्रकृतंन स्वीकृतं पतिपुत्रौ इति विवादाणवसेतु(पृ. २६) विवादमगार्णवादिनन्य( १ विवा. २०६ ख धृतविष्णुवचनञ्चेति स11011011 १.तदारचो०-न्यप।

व्यवस्थापनसंख्या-१७२-१७३ इगरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयदिशम्वरमासीयो. भविंशतितमदिनसम्बन्धिवृहसतिवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण - ३३-रोयकारि मिछिले सदर देओयानि श्रादालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुतहेनरीसिकिसपीयेर साहेवेर बैठके । ८ तारिख अक्तुबर इं० १८३३ साल मोतावेक वागला २३ आश्विन सन १२४० साल दिवस मङ्गलवार-- मोहम्मात भवानीदेव्या- छाएला- छाएलार उकिल मुनशी माहाम्मद हानीफ ओ सदासुक- पण्डित श्री द्वितीय पक्षेर उकिल मौलुवि करम होशेन हाजीर आइल । गतो कल्य छाएलेर छोयाल दरपेप हुइया गौरेर प्रति मुलतचि छिल, अद्य पुनराय रोवकार हइल । यदि स्यात् एइ मोकद्द मार हुकुम छादेर होनेर पूर्व एइ विपयेर तहफिक आविश्यक ये मोछति ब्रह्ममयी ताहार स्वामी गोपीनाथ चन्द्योपाध्याय श्रोछीनामा मोतावक आपनी ओछी सरवराहकार मकरर करोर क्षमता राखे कि ना। ए जन्य हुकुम हइल ये एइ मोकदमार कागजात एइ विशयेर जोयाब तलवेर जन्ये पइ आदालतेर पण्डितेर अग्रे पाठान जाय इति-- श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिक्सिपीयरसाद्देवधर्माधिकरण- लिखिताइरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयाकतूवरमासीया. एमदिवसीय विचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पिततद्विवादविषय- निविष्पत्रजातच यदेतदब्दीयदिशम्वरमासीयद्वितीयदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशमोधो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- व्यवस्थापनसंख्या-१७३-१७४ ब्रह्ममयो स्वपतिगोपीनाथवन्द्योपाध्यायकृतासोयनामाख्यपत्रानुसारेण स्वयं धनरक्षकस्याांदसीशब्दप्रतिपाद्यस्य सरवराहकारशब्दवाच्यस्य च नियोगक- रणक्षमतां रक्षत्येव, मृते पितरि जीवस्यां च मातर्यप्रासव्यवहाराणां पुत्राणां धनरक्षणोपायकरणे मात्रपेक्षया अन्येषां मुहत्तरत्वामावात्-इति वशदेश- चलितदायभागदायतत्त्वव्यवहारतत्वविवादार्णवसेतुविदिभगार्णवादिगन्या- नुसारिणी व्यवस्था- अन प्रमाणम्- अप्राप्तव्यवहाराणां धनं व्ययविवर्जितम् । न्यसेयुर्वन्धुमित्रपु-इत्याद्युपरिलिखितग्रन्थ( दात• पृ० १८) (दाभा- पृ० ६२ )धृतकात्यायन( कास्मृ०८४५, पृ० १०२ वचनम् ॥१॥ रक्ष्यं बालधनमाव्यवहारप्राप्तेः-इत्युपरिलिखितग्रन्ध( दाभा० पृ. ६३)धृतमुनिवचनम् ॥२॥ तयोरपि पिता श्रेयान् बीजप्राधान्यदर्शनात् । अभावे बीजिनो माता तदभावे च पूर्वजः ॥--इति व्यवहारतत्त्वादि- (व्यत० पृ० ६४/६५ ) अन्यधृतनारद( नास्मृ पृ० ५८ वचनञ्चेति ॥ अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशतान्दीयजानवरोमासी यपोडशदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्री यतितराम् श्रीधनाथमिश्रण ३४-रोवकारि मिडिल सदर देषोनि श्रादालत मोकाम फलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम हेनरि सिक्सिपीयेर साहेवेर वैठके। ई. १८३३ साल भोके तारिख २१ नवम्बर मोतावक वागला १२४० साल ७ अग्रहायन रोज वृहस्पतिवार लोकनाथदत्त- श्रो जगन्नाथदत्त घनाम कुविर भाण्डारि व्यवस्थापनसंख्या-१७४ ५१७ साएलानेर उकिल मुनशी हयदर पाली हाजिर नाइल । सन हालेर ३० जुलाएर हो जेला मेमनसिंहेर जज साहेवेर फयशला, जाहा सन १८३२ सालेर २७ आगष्ट तारिखे सदर आमिन बालार फयशलार तरदिदे सादेर हय, ताहार असम्मतिर सायलानेर सोलि एक टाका मूल्येर फागजे उपरेर तारिखेर लिखित' जेला मजकुरेर जज साहेवेर ओ सदर आमिन पालार दुइ केता फयसला भो उकिल मजकुरेर नामेर ओकालतनामा सम्वलित, जाहा सन हालेर प्रास्तोवर तारिखे दाखिल हझ्याछिल, पडागेल । साएलानेर सोलेर खास आपिल ग्राह्य अथवा अग्राहा विशय हुकुम छादेर होर पूर्वे हुकुम हइल ये सोयाल ओ गयरह काग- जात एइ श्रादालतेर पण्डितेर निकट पाठाइया हुकुमे देओ जाय-ये कागजात दृष्टे ए विशयेर व्यवस्था यद्यपि ये सदर प्रामिन आलार फयशलाय मुद्दइ साएलानेर तरफ हइते प्रमाण हेतु लेखा पाछे गुजरिया थाके, दासत्त साव्यस्थ निमिधे एमत प्रमाण हेतु जथार्थ गणा जाइवेक कि ना इति । श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुलहेनरीसिकिसपीयरसाहेवधर्माधिकरण लिखितागरेनीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादराशतान्दीयनवम्वरमासीये. कविंशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितेतद्विवा- दविषयनिविष्टपत्रजातश्च यत्तदन्दीयदिशम्बरमागीयैकविंशतितमदिनसम्बन्धि- रानिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहराबोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । सदर धामीन-पालासंशकस्य जयपने अर्थिनां पक्षतो यथा हेतुदी. सत्यस्थिरीकरणाय लिखितःस च दासत्वस्थिरीकरणार्थ याथातथ्येन प्रमाणं १ कागबेर उपर"तारिख लिखित" इति साधीयान् पाठः ।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१७४-१७५ भवत्येव, तज्जयपत्ररेतेषां 'दासादीनां शास्त्रोक्तपञ्चदशदासान्तर्गतदाया. द्युपागतत्वेनावगमात्-इति वङ्गदेशचलितमनुदायभागदायतत्त्वदायाम- सग्रहविवादार्णवसेतुविवादभनार्णवादिनन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- गृहमातस्तथा क्रीतो लब्धो दायादुपागतः--इत्यादि दायक्रमसंग्रह- विवादार्णवसेतु विवादमार्णवादिग्रन्यधृतनारदवचनम् ॥१॥ अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयजानवरीमासी- यपोडशदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मयेय व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण तरजमा प्रथम ओल ५-यदि स्यात् हिन्दुवर्गेर मध्ये कोनो ब्राह्मण व्यक्ति आपन निकातन हइते निर्गत हुइया अनुद्विप हय ओ ताहार निदर्शन ना पाओ जाय, तवे ताहार मृत्युर अवधारित कोन पय्यंन्त गणना हइवेक, एवं ताहार मृत्युर अपधारित गणनार समय कि प्रकार व्ययहार तस्य मृते उचित हइवेक, एवं ताहार निज विशय फोन अवधि मृत व्यक्तिर धन वला जाइवेक, आर ए विशये कत दिवस नियम अयधारित आछे-दाहार व्यवस्था एतद्देशीय चलित शास्त्रानुजाइ श्लोक एवं वाहार तरजमार सहित वाङ्गला भाशाय। द्वितीय छोल यदि स्यात् हिन्दु वर्णेर मध्ये कोनो ब्राह्मण व्यक्ति आपन निकातन हइते निर्गत हइया अनुद्वीस य ओ साहार निदर्शन ना पायो जाय, एवं ताहार निज विशय अन्य कोन व्यक्ति अतिक्रम अाक्रम फरिया ग्रहण करे, सवे १२ वत्सर मध्ये . च्यवस्थापनसंख्या-१७५ केह उत्राधिकारित्वभावे ऐ व्यक्तिर निज विशये दाविदार हइने पारे कि ना-ताहार व्यवस्था एतद्देशीय चलित शास्त्रानुसारे श्लोक एवं ताहार तरजमार सहित वागला भाशाय इति । , तृतीय छोल उपरेर लिखितव्य विशये ऐ अनुदेशी व्यक्तिर स्त्री वर्तमान याफिते ताहार अन्य कोन सरिक व्यक्ति ऐ अनुद्देश व्यतिर स्त्रीके अविरा स्त्रीलोक एवं एक-अन्न-मुक्त भो गृहवाशी प्रो निज प्रतिपाल्य कहिया उत्राधिकारित मावे ताहार विशयर पर दावि- दार हइते पारे कि ना-ताहार व्यवस्था श्लोक वचन द्वाराय तरजमा सम्वलित वाङ्गला भाशाय- श्रीजयतितराम प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदगरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादश- शताब्दीयनयम्बरमासीयोनत्रिशत्तमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्राप्तं तदव. लोक्य यादृशवोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- यदि हिन्दुजातीयानाम्मध्ये कश्चिद् ब्राह्मणः स्वकीयनिकेतनानिर्गत्यानु- द्दिष्टः स्यात्, तायव निर्गतस्य वार्ता न प्राप्यते चेत् तदा तस्य मरणावधारणं प्रस्थानदिनमारभ्य द्वादशसंवत्सरानन्तरं भविष्यति, एवं तस्य मृत्योरपधार- एसमये चायं व्यवहारः कत्तु मुचितो भविष्यति-शास्त्रानुसारेणाधिकारिणा पर्यानरं दम्वा व्यहाशौचं विधाय याद्यश्राद्धादिक कर्तव्यम् । एवं सत्स्वत्वा. स्पदीभुतधने तन्मरणावधारणानन्तरक्षणमारभ्यैव तत्यक्त धनमिदमिति न्यवहत्तध्यामिति । एवमेतद्विषये गमनदिनमारम्य दशवर्षसमासिसमय एवावधारित इति । अत्र प्रमाणम्- गतस्य न भवेद्वारी यावद् द्वादशवापिकी । प्रेतावधारणं तस्य कर्तव्यं सुतवान्धवैः ।। इति शुद्धितत्त्वादि- (शुत पृ० २५६ )ग्रन्यभृतनारदवंचनम् ॥शा एवं पर्णनरं दग्ध्वा त्रिरात्रमशुचिर्भवेत् इति ततद्ग्रन्यधृतादिपुराण- (शुत पृ० ३१० वचनञ्चेति ।।२।।

५२० व्यवस्थापनसंख्या-१७५ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि कश्रिाझणजातीयो व्यक्तिविशेषः स्वनिकेतनानिमत्यानुद्दिष्टः स्यात्तस्य वार्ता न प्राप्यते चेत्, एवं तत्स्वत्वासदीभूतधने उदासीनैवलाद् गृह्यमाणे सति शान्त्रानुसारेणोत्तराधिकारिणः पन्यादयः मुहृत्तमत्वेन प्रोषितधनरक्षाकरणाय' एव तत्र विषये तन्मरणावधारणानन्तरं स्वत्वमूल- को(धिकारोऽ)व्याहतो न भविष्यति' इति खाधिकाराय च द्वादशवर्षमध्ये प तत्राधिकर्तुमभियोक्तुमर्हन्तीति । अत्र प्रमाणम्- अप्राप्तव्यवहाराणां घनं व्ययविवर्जितम् । न्यसेयुर्वन्धुमित्रेषु प्रोपितानां तथैव च ॥ इति दायमागादिपन्य- धृतकात्यायनवचनम् ॥१॥ पत्नी दुहितरश्चैव-इत्यादि तत्तद्ग्रन्यधृतयागवल्क्यवचनञ्चेति ।।२।। तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्-- प्रपौत्रपर्य्यन्तरहितस्यानुद्दिष्टस्य पल्या वर्तमानायामश्यन्तरेण केन- चित् कथञ्चिदप्यनुद्दिष्टधनेऽधिकत्तु न शक्यते-इति च यद्भदेशचलित- दायभागादिग्रन्थसम्मता व्यवस्थेति । अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चर पितरो भ्रातरस्तथा-इत्यादि दायभागादिनन्यधृत- याज्ञवल्क्यवचनञ्चेति ॥२॥ अगरेजीशन्दमतिपाद्यचनुत्रिंशदधिकाटादशशताब्दीयजानवरीमासीय- सप्तविंशतितमदिनसम्बन्धोयसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति । श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण १. गृह्यमाने-व्यप। २. प्रोपितधनरक्षाकारा०-न्यप० । ३. रवत्वगून न्याइव भविष्यति-व्यप० ।

व्यवस्थापनसंख्या-१७५ प्रथम लेखार भापा- हुजुरेर सुपुर्द करा सोयाल, जाहा इंरेजी सन १८३३ साले २६ नवम्बर मासे शुक्रवारे श्रामि पाइयाछिलाम, ताहार दृप्टे येमत बोध हइल तदनुसारे उत्तर लिखितेछि । प्रथम प्रश्नोत्तरेर भाषा- यदि हिन्दु जातिर मध्ये कोनो ब्राह्मण पाटी हइते प्रस्थान करिया अनुद्देश हइया थाकेन, ताहार कोनो समाचार ना पाओया जाय, त तवे ताहार मरण निश्चय १२ वत्सरेर पर हइवेक, श्रार ताहार मरण निश्चय हइले एइ प्रकार व्यवहार उचित हइवेक ये शास्त्रानुसारे ये अधिकारी हइवेक से पर्णनर अर्थात पर निम्मित नराकार दाह करिया ३ दिवस अशीच ग्रहण करिया श्राद्य श्राद्ध प्रभृति कर्म करिवेक, पार ऐ अनुदेश व्यक्तिर धन ताहार मरण निश्चय यखन हइवेक, ताहार पर क्षण अवधि ऐ धनके मृत व्यक्तिर त्यक्त धन वलिया व्यवहार हइवेक, आर ए विपये गमन दिन अवधि १२ वत्सर पर्यन्त नियम पाछे। इहार प्रथम प्रमाण- शुद्धितत्वप्रभृति ग्रन्थ धृतनारदमुनिवचनेर भाषा- पाटी हइते प्रस्थान करिले ऐ व्यक्तिर १२ वतसर पर्यन्त यदि कोन समाचार ना पाओया जाय तवे ताहार पुत्र प्रो ज्ञातिरा -मरण निश्चय बोध करिवेक इति-- श्रो द्वितीय प्रमाण- शुद्धितत्यादि अन्य धृतश्रादिपुराणवचनेर भाषा- ऐ प्रकार पर्णनर अर्थात् पत्रेर निम्मित नराकार दाह करिया "त्रिरात्र अशीच व्यवहार करिवेक इति- द्वितीय प्रश्नोत्तरेर भाषा- यदि कोन ब्राह्मण व्यक्ति प्रापन वाटी हइते गमन करिया 'अनुदेश हइया थाकेन, ताहार कोन समाचार ना पाओया जाय, व्यवस्थापनसंख्या-२७४ ५२२ बार तादार धन अन्य कोन व्यक्ति आक्रमन करिया ग्रहण. करे, नवे शास्त्रानुसारे ताहार ओयारिश, ये पत्नी प्रभृति ताहाग ऐ प्रवासि व्यक्तिर अति अन्तरङ्ग-ए प्रयुक्त ऐ प्रवासि व्यक्तिर धनरक्षार एक्तियार करण जन्य थार ऐ विपये प्रवासि व्यकिर मरण निश्चय हइले, ऐ पत्नी प्रभृतिर भावि हकीयतेर को.. लोकसान ना हश्यार कारन १२ वत्सरेर मध्ये ऐ पत्नी प्रभृति ओयारिश लोक ऐ वस्तु ते आपन अधिकार करिवार निमित्त दापी करिते पारे इति- इहार प्रथम प्रमाण- दायभागादि ग्रन्थ धृत कात्यायनमुनि वचनेर भाषा- नावालगेर धन अयथार्थे व्यय ना करिया नावालगेर अन्तरङ्ग लोकेर स्थाने गच्छित रखिवेक, आर प्रवासि व्यक्तिर धनओ ऐ प्रकारे रक्षा करिवेक-इति ॥ द्वितीय प्रमाण- दायभागादि प्रन्थ धृत याज्ञवल्क्यमुनि वचनेर भापा- पुत्र ओ पौत्र यो प्रपौत्र ना थाकिले मृत व्यक्तिर धन प्रथमे पत्नी पाय, परे दुहिता पाय, तत्परे दौहित्र पाय इत्यादि । तृतीय प्रश्नोत्तरेरभाषा- अनुद्देश व्यक्तिर पुत्र पौत्र प्रपौत्र ना थाकिले पत्नी थाकिते अन्य शरीके कोन क्रमे अनुद्दे श व्यक्तिर धने अधिकार करिते पारे ना। एइ सकल व्यवस्था यागलार चलित दायभागादि- प्रन्थानुसारिणी। इहार प्रमाण- दायभागादि ग्रन्थ धृत याज्ञवल्क्यमुनि वचनेर भाषा- पुत्र ओ पोन ओ प्रपौत्र ना थाकिले मृत व्यक्तिर धन प्रथमे पत्नी पाय, परे दुहिता पाय, तत्सरे दीदिन्न पाय, तत्परे पिता, तरपरे माता, तत्परे भ्राता पाय-इत्यादि।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१७८-१७६ ५२३. अगरेजी सन् १९३४ साल तारिख सातइसा माह जानवरी रोज सोमवार एइ व्यवस्था आमी दाखिल करिलाम इति । ३६--रामदास शर्मा मुफलेछ मुद्दा राधाचरण शर्मा ओगयरह मुद्दामालेहे सयोलेर फई शदर देओनी आदालतेर पण्डितेर निकट- सोलेर तपसि- प्रथम सत्रोल- यदि नान्दिमुखेर श्राद्ध स्वामी ओ स्रोर पक्षे हइते ना हइया थाके तचे एइ प्रकार विवाह सत्य हइते पारे कि ना -इति। द्वितीय सत्रोल- भ्राता ना थाकाते ओ शाति सपिएड थाकिते यदि नान्दिमुख ना हइयाथाके तवे विवाह सत्य हइते पारे कि ना--इति । तृतीय सोल- एइ सरते-ये एक व्यक्ति, श्रात्रिजाति ब्राह्मण, पापन कन्यार विवाह कोन व्यक्तिर सहित स्थिर करिया, बाकदान फरिया ताहार मृत्यु हय । परे ऐ कन्यार वियाइ अन्य व्यक्तिर सहित हइते पारे कि ना। श्रार यदि एक व्यक्ति, ये ताहार सहित विवाहेर कथोपकथन छिलो ना, विवाह करे-ताहा. सत्य हइते पार कि ना-इति । चतुर्थ सोल- ऐ कन्यार विवाहेर समय ऐ कन्यार सपिण्डन ज्ञाति थाकिते सम्प्रदानेर क्रिया पुरोहित करिते पारे कि ना-यदि करिया थाके प्रामाएय हइने पारे कि ना इति । सञ्चम' सोल- यदि एक व्यक्ति एक जन खोलोकके, ये ऐ स्त्रीलोक ताहार खुडार भग्नीर कन्या हय, एवं ऐ दुइ जने ज्ञातत्त खुडततो भ्राता • पन्चा--ति कापीयान् पाठः।

५२४ व्यवस्थापनसंख्या-१७६ ७- पुरुस तफात हइया थाके, विवाहेर कथा कहे, एवं कन्यार मातार सपिण्ड करणेर दिवस विवाह हइया थाके, तवे ए प्रकार विवाह सत्य वटे कि ना इति । पष्ठ सोल- यदि एक व्यक्ति एक स्त्री जयकाली नामक ओ एक पुत्र, द्वितीय स्वोर गर्भात राखिया फौत करे; परे ऐ पुत्र प्रापन पितार त्येज्य वस्तुर पर दखिलकार हइया एक अविवाहिता कन्या राखिया फौत करे, परेऐ कन्या आपन पितार तेज्य वस्तुर पर दखिलकार हय; परे एक व्यक्ति कहे-ये आमी सन १२२७ साले ऐकन्याके विवाह करिया छि, ओ द्वितीय व्यक्ति कहे- जे आमी ऐ कन्याके सन १२२९ साले ओहार पितार वाक- दानानुसारे विवाह करियाछि, एवं प्रामार एक पुत्र ऐ कन्यार गर्भ जन्मियाछिल, ताहाते ए कन्यार मृत्यु हय, एवं ताहार श्राद्धेर दिवस ऐ पुत्र आपन पिता अर्थात् ऐ द्वितीय व्यक्तीर समीक्षे मृत्यु हय, ए विषये यदि मोतोफफात मजकुरार विवाह करा सत्य हय तवे जयकाली मजकुरा उत्राधिकारिणो हय, कि ना। यदि विवाद सत्य ना हय । तवे कि आन्दाज उहाके अर्श इति । सप्तम समोल- यदि एकजन स्त्री आपन स्वामी ओ नावालग पुत्र राखिया मृत्यु हय, ओ मोतओफफा मजकुरेर पितामहेर एक स्त्री मर्तमान थाके, परे ऐ नावालग पुत्रेर आपन पिता मोछम्मात मजकुरार स्वामीर समीक्षे मृत्यु हय, तवे एइ दुइ जना, अर्थात मेत- ओफफात मजकुरार स्वामी ओ पितामहेर थाकेन, इहार फोन व्यक्ति ओयारिश हइवेक इति । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदगरेजीशन्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशश- व्यवस्थापनसंख्या-१७६ ५२५ ताब्दीयजुलाहमासीयपञ्चदशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मया मास तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- घरस्य कन्यायाश्च पक्षतो विवाहकर्माशीभूतनान्दोमुखश्राद्ध यदि न जातं स्यात्तथापि विवाहः सिद्धो भवितुं शक्नोति, अङ्गभूतकर्मणोऽकरणेऽपि प्रघानसिद्धः शास्त्रीयत्वादिति । अत्र प्रमाणम्- प्रधानस्याक्रिया या साङ्ग तत्कियते पुनः। तदनस्याक्रियायान्तु नावृत्तिर्न च तलिया ||-इति तिथितत्वादि- (तित पृ० ११ अन्यधृतछन्दोगपरिशिष्टवचनम् । द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्- यदि भ्रानसत्त्वे सपिण्डसत्त्वेऽपि नान्दोमुखश्राद्धन जातं स्यात् तथापि विवाह: सिद्धो भवितुं शकोतीति । अन्न प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरप्रमाणमेवेति । तृतीयप्रश्नस्योत्तरम्-- यदि कश्चित् श्रोत्रियत्राहाणजातीयो व्यक्तिविशेषः स्वकीयकन्याविवाह- कथोपकथन केनचित्सह स्थिरीकृत्य वाग्दानं कृत्वा मृतः स्यात्, पश्चात्तस्याः कन्याया विवाहोऽन्येन केनचित्सह कलौ भावितुं न शक्नोति, एवं येन सह विवाहकथोपकथनं न स्थितं स यस्मै वाग्दत्ता कन्या तस्मिन् विद्यमाने सति यदि विवाहं करोति तदा स विवाहः शास्त्रानुसारेण कलौ न सिद्ध्यतीति । अन प्रमाणम्- दत्तायाश्चैव कन्यायाः पुनर्दानं परस्य च-इति कलिवयंप्रकरणे उदाहतत्वादि पृ० ११२ )अन्यतमुनिवचनम् ।। चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- यदि तस्याः कन्याया विवाहसमये तस्याः सपिएटसत्वे सम्प्रदान- क्रियाकरणे कन्यादानाधिकारिणोऽनुमतिस्तदा पुरोहितेनापि सम्प्रदान किया "५२६ व्यवस्थापत्रसंख्या-१७६ कर्तुं शक्यते, नान्यथा । यदि च पुरोहितेन कन्यासम्प्रदानं कृतं स्यात्तत्र कन्यादानाधिकारिणोऽनुमतिश्चेत्तदा प्रमाण भवति नोचेन्न भरतीति ! अत्र प्रमाणम्- पिता पिलामहो माता सकुल्यो जननी तथा । कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थ परः परः ॥--इत्युदाहतत्त्व(पृ०१२६) धृतमुनिवचनम् ॥१॥ स्वामिनोऽनुमतिसत्वे तु अस्वामिकृतविक्रयोऽपि सिद्ध्यति, व्यव- हारोऽपि तथा-इति विवादमझाएं वादि पन्ध(१ विवा ३०३)लिखनम् । पञ्चमप्रश्नस्योत्तरम् - यदि सप्तमपुरुपवदिभूतपितृव्यसम्बन्धपिण्डभगिनीकन्यया सह विवाह कथोपकथन कृतम्, एवं कन्यामातृसपिण्डीकरणदिने विवाहो जातः स्यात्तदातादृशविवाहः सिद्ध्यति। तत्र तस्याः कन्यायाः मातुः पति विहीनायाः सपिण्डीकरणं वस्तुतः शास्त्रतो यद्यपि नायाति, तथापि प्रश्नपत्रे लिखित मस्तीति कृत्वा मयोत्तरं लिखितमिति । अनप्रमाणम्- मातृतः पञ्चमी त्यक्ता पितृतः सप्तमी त्यजेत्-इत्युद्वाहतत्त्वादि- (पृ. १०६)तमुनिवचनम् ॥१॥ पतिपुत्रविहीनायाः स्त्रिया नास्ति सपिण्डनम् - इति वत्तग्रन्थधृत- मुनिवचनम् ।।२।। पष्ठप्रश्नस्योत्तरम- यद्येकः फश्चिद् व्यक्तिविशेषो अयक लीनाम्नीपलीमेका पल्यन्तरगर्भ- जातमेक पुत्रश्च सरक्ष्य मृतः स्यात्तदनन्तरं स एव पुत्रः स्वपितृव्य (1) त्यधने श्रायत्तवं सम्माद्या विवाहिता कन्यामेका विहाय मृतः स्यात्तदनन्तरं सा कन्यापि सपितृस्यक्तधने प्रायत्तत्वं सादिततो स्यात्, तदनन्तरं कश्चिद् वदति “वनालाख्यसप्तविंशत्यधिकद्वादशशतान्दे मयेयं विवाहिता" दति, द्वितीयः कधिद् वदति बङ्गालाख्योनत्रिंशदधिकद्वादशशतान्दे तत्कन्या- पितृकृतवाग्दानानुसारेण मयेयं विवाहितेति, एव तस्याः गर्भ मया एका व्यवस्थापनसंख्या-१७६ ५२७ पुत्रः जनित इति च, ततः सा मृता, एवं तस्याः श्राद्धदिने सोपि पुनः स्वपितुः समदं मृतः स्यादेवविध विषये मृतायास्तस्याः विवाहस्य सत्यता- यामसत्यतायां वोमयथैव जयकाली उत्तराधिकारिणी भवितुं न शनोति, सपत्नी पुत्रदोदिनत्यतयने मातामहविमातुः, सपत्नीपुत्रत्यक्तधने विमातु- श्चेदानी बगदेशचलित शास्त्रागुणरेणाधिकाराभावात् । किन्तु मूलभूत- धनस्वामिपत्नीत्वेन यावज्जीवं त्यभर्तृकुलोचितग्रासाच्छादनस्यावश्यक- विधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तघनस्य चाधिकारिणी भवतीति । अत्र प्रमाणम्- सर्वेषामपि तु न्याय्यं दातुं शक्त्या मनीपिणा । ग्रामाच्छादनमत्यन्तं पतितो ह्यददद्भवेत् ॥ इति मनु(६/२०२) वचनम् ॥१॥ सप्तमप्रश्नस्योत्तरम् - यथेका काचित् स्त्री स्वपतिमप्रासव्यवहारं पुत्रश्च संरक्ष्य मृता स्यादेवं तस्याः स्त्रियाः पितामहस्यैका पत्नी च वर्तमाना स्यात्, पश्चात्सोपि श्रप्राप्त- व्यवहारः पुत्रः स्वपितुः समक्षं मृतः स्यात्, तदा पतिपितामहपल्योर्वर्तमा- नयोर्मध्ये पतिरेयाधिकारी भवति । तस्याः स्त्रिया' मरणानन्तरं विवादास्प- दोभूततद्धनेमाप्तव्यवहारपुत्रस्वावस्योत्तराधिकारित्वेन जातत्वेन तदनं तस्यै- वाप्राप्तव्यवदारस्य जातम् । अतस्तन्मरणोचरं तस्यैवा(पासव्यवहारस्य ये उत्तराधिकारिणरतेषामेव भवति, तस्यामाप्तव्यवहारस्योत्तराधिकारिणां मध्ये तत्पुत्रमारभ्य दौहित्रपर्यन्ताभावेन तस्पिनुरेवाधिकारस्य शास्त्रसिद्धत्वात् । लयकाल्याश्च घनिनोऽमासव्यवहारस्य मातामहविमातुः सपत्नीपुत्र- दहित्रस्य तस्येवापासव्यवहारस्य त्यक्तधनेऽधिकाराभावात्-इति वन- देशचलितमनुदायमागदायतत्त्वदायभागटीका-उद्वाहतत्वादिग्रन्यानुसारिणी- व्यवस्था। अत्र प्रमाणम्- पत्री दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा-इत्यादि तत्तद्ग्रन्यधृत- याज्ञवल्ल्यवचनम् ||१|| १. स्त्रीया म०प० ।

५२८ व्यवस्थापत्रसंख्या-२७६-१७७० अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्तिशदधिकाष्टादशशताब्दीयफेवरवरीमा सोयदशमदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति ।. श्रीजयतिराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण 1 2 6. चाएलान ३७-रुषकारि मेछेल सदर देशोनी आदालते मोकाम कलिकाता आदालते मजकुरेर हाकिम हेनरि सिकिसपीयेर छाहे. वेर बैठके । सन १८३३ ई-माहे नवम्बर मोतावेक सन १२४० वाङ्गला १४ माहे अग्रहायन दिवस वृहस्पतिवार- रतनचन्द्र लो किरतचन्द्र छायेलानेर उकिल लालावस्तिलाल हाजिर वासिलेक । छाएलानेर छोल सन हालेर २४ जुलाइर हओ नोट आजि- मावादेर हाकिम जमछ हारिगटीन छाहेवेर हुकुमेर नाराजिते जाहा तामद कटवरद छाहेवेर अभिप्रायेर ऐक्यताय कोन व्यक्तिर शेर विना नामकरणे जायदाद निलामेर वावत छादर हय । हुकुम मजकुरेर तर दिद ओ० छाएलानेर दाखिल करा आमानत टाका । फेरत होनेर प्रार्थनाय सन २८२६ ई० ११ शेतम्बरेर लिखित हुकुम गोपालचन्द्र श्रो प्यारिलालेर एक किता छयोोल पार २६ जुलाइर मस्तवार लिखित क्रोट मजकुरेर हाकिमेर रयकारिर नकल एक किता सम्वलित, जाहा एइ मासेर १५ तारिखे दाखिल इझ्या छिल, पडागेल! प्रकाश हइते छे ये आदालतेर कायदा मोजावेता ओ प्रकार नहे ये एजमालिर डिग. रिर हालते रशदि अंश सुरतेर एक व्यक्ति मुद्दामालेहेमेर पर डिगरि जारी श्रामले पाइशे। अतएव ए विपय उपरेर लिखित प्रेवनशीयान क्रोटेर हुकुम जावेता ओ दस्तुरेर अन्यथा नविक। ~ किन्तु जखन एजमालि डिगरि जारि जन्ये हुकुम हइल, सचित . व्यवस्थापनसंख्या-१७५ ५२९ छिल जे डिगरिर टाका जे अन्दाज अंश किरतनचन्द्र अथवा गोपालचन्द्र, अथवा फिरतचन्द्र हइते दाखिल हइया थाके ताहा 'फेरत दिया अंशेर विना निर्दिष्टे ते सुमुदय पैतृक विपयेर निला मेर हुकुम छादर करेण । किन्तु चुडन्त हुकुमे छादरेर पूर्चे हुकुम हइल जे एइ विशयेर व्यवस्था एइ आदालतेर पण्डित हइते , तलव हय ये पैतृक कोर वावत डिगरिर जारि हालते यद्यपि सन्तानेरा पितार लोकान्तरे पैतृक त्यज्य वस्तुर पर अंश स्तरते दखिलकार हइया थाकेन तवे डिारिर टाका सन्तानदिगेर अंश हइते लो जाइवेक, कि अंशेर विना निर्णय पितार त्यज्य वस्तु हइते उसुल हइवेक । पार छरेस्तादार, यदि स्यात्, एइ मकईमार प्रमान एइ आदालतेर सेरेस्ताय थाके गुजरायेन । इति , श्री यतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिकिसपीयरसाहेबधम्माधिकरण- लिखिताबरेजीशब्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाप्टादशशताब्दीयनवम्बरमागीया- याविशतितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रतिरूपपन्नं यत्तदब्दोयदिशम्वरमा. सोयाप्टाविशतितमदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृश- बोघो बातस्तद्नुसारेणोत्तरं लिख्यते । यदि पैतृकर्णपरिशोधनायं धर्माधिकरणतो जयपत्रे प्रकाशिते सति पुत्राः स्वपितुर्मरणोत्तरं तत्यक्तधने अंशित्वेन प्रायत्तत्वं समादितवन्तः स्यु- स्तदा जयपत्रविषयीभूतपैतृकमृणं पुत्राः स्वस्वांशानुसारेण स्वस्तांशत एव दयुः, यतः पित्रुपरमानन्तरं तत्यक्तधने पुत्राणां यया अधिकारस्तथैव पैतृ. कर्णपरिशोघनेप्यधिकारः । अतएव पितृमरणोत्तरमंशानुसारेण गृहीत. पैतृकपनानां पुत्राणामंशानुसारेणैव पैतृकर्ण परिशोधनाधिकारस्य शास्त्रानुसारेण न्याय्यत्वात्-इति पाटलिपुत्रप्रभृत्तिदेशचलितमितात- रावीरमित्रोदयव्यवहारमयूखन्यवहारमाधयव्यवहारकौस्तुभादिग्रन्थानुमारिणी व्यवस्था।

५३० व्ययस्थापत्रसंख्या-१७५-१७६ अत्र प्रमाणम्- रिक्थयाह' ऋणं दाप्यः इति उपरिलिखितमन्यतयाज्ञवलायत वचनम् ॥१॥ पितय्युपरते पुत्रा ऋणं दद्य यथांशतः। विभक्ता अविभक्ता वा यो वा तामुद्दहेधुरम् ।।-इत्युपरिलिखित- ग्रन्यधृतनारदवचनम् ||२|| विभजेरन्सुताः पित्रोरुद्ध रिक्थमृणं समम्-इति तत्तद्ग्रन्यतया- ज्ञवल्क्यवचनमिति ॥३॥ अगरेजीराब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिशदधिकाष्टादशशताब्दीयफिवरवरीमासी- याष्टाविंशतितमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्री यतितराम् श्रीवधनाथमिश्रण ल०३४५५ २८-रूवकारि मिछिल आदालते सदर देशोनि मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरार हाकिम हेनरि सिक्सिपीयर छाहेर बैठके। सन १८३३ ई हो। तारिख २६ नवम्बर मोतावेक सन १२४० वाङ्गला १२ अग्रहायन दिवस मङ्गलवार- राजा पटनीमन ओराय वनशीधन थापिलाण्टान्। राय मनोहरलाल स्वयं प्रो अलि स्वरूप जानिये आनन्दिलाल ओ हरजयलाल ओ मुकुन्दलाल ओ हरवनशीलाल नावालगान रेछपाडण्टान् । श्रापिलाएटानेर उकिलान मुनशी होछन श्रालि ओ मुनशी दादार वखश ओ रेछपाडण्टानेर उकिलान् मुनशी अलिउल्ला श्रो मुनशी गोलाम आहमद हाजिर आसिलेक ओ रेछपाड- एटानेर तृतीय उकिल सदासुखपण्डित पिडित विधाय हाजिर १. काकथयाइ-व्यप० ।

व्यवस्थापनसंख्या-१७६ नाइ । एइ मकद्दमा गत कल्य आमार बैठके उपस्थित पार गत कल्येर रुवकारिर लिखित उजुहाते अनेक कागजात पडा हइया दिया अवसान जन्ये मलतवि रहिल । अद्य पुनराय उपस्थित । श्री उभय विवादिर विवाद वायत एइ आदालतेर मतफरकार रूवकारिसकल ओ एइ श्रादालत श्री क्रोटेर मिछिलेर गाँथा उभयेर दस्तावेज पडा गेल । यद्यपि चुडन्त हुकुम हओर पूर्व कयेक विपयेर जिज्ञाशा एइ आदालतेर पण्डित हइते आवश्यक वोध हइल, अतएव हुकुम हइल ये ऐ स्वकारिर नकल सम्वलित एइ आदालतेर ओ क्रोटेर सफल कागजात एक सप्ताह मियादे ऐ पण्डितेर निकट पाठान जाय ये वारानशेर पाठशालार व्यवस्था श्रो सुप्रीम कोट शो अन्य अन्य पण्डितेर दस्तखति व्यवस्था दृष्टान्तरे एइ विशयेर नोव लेखेन । जे ओलएम वेवाडिन छाहेब हाकिमेर हुजुरेर वावत ऐ पण्डितेर जोवानि जशोव- सकलेर सुधरान अथवा वदलानु हेतु, जहार जेकेर ऐ हाकिमेर स्वकारिते लिखित आछे, किछु आवश्यक हय कि ना। पार यद्यपि ऐ पण्डितेर पूयर राय वर्तमान थाके, तवे लेखेन ये उपरेर व्यवस्थाहाय मजकुरेर लिखित वचनसाल कोन विचारे अशुद्ध गणा जाइतेछे, आर आपन व्यवस्थार वुनयाद ओ फोन पचनसकलेर पर भवतनी आछे, सरेर लेखेन । ओ यद्यपि आपिलाएटानेर उकिल रेछपाडण्टानेर दाखिल करा व्यवस्था यावते मफईमा नेहालसिंह आपिलाण्ट श्रो चेत्त् रेछपाडएटेर पक्षे विशेषत एइ विशयेर पर भोजरदार बाछे ये ऐ मकद्दमार उभय विवादीय ब्राह्मण जाति छिलेन, पार ऐ मकद्दमार उभय श्रागरोला वैश्य जाति हयेन । अवएव चित्त ये ऐ पण्डित ताहार पर दृष्ट करिया ऐ घिशयेर लोध, जे आगरोला जातिर मर्यादा निमित्त व्यवस्था मककुरेर किछु तफात श्राविश्यक प्राइसे, कि ना लेखेन । पार क्रोटेर मिटिलेर ६४ लम्बरेर दाखिल कराएइ आदालतेर सावेक पण्डित- ५३२ व्यवस्थापत्र संख्या-१७६ सकलेर व्यवस्था, जाहा मतफरकार मुकद्दमार विचारे एइ श्रादा- लते लो गीयाछे, ऐ पण्डित ताहार पर श्रो गौर भो ताम्वुल करिया जोय लेखेन-ये तदनुसारे ओ तदान्तर ये सकल तहकीकात श्रामले प्राशीयाछे, तद्दष्टे व्यवहार किछु तवदिल हेतु आवश्यक हइवेक, कि ना। प्रो यदि स्यात् आवश्यक हय ताहार जेकेर लेखेन इति ।। श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिसिपीयरसा हेवधर्माधिकरण- लिखिताइरेजीशन्दप्रतिपाद्यत्रयस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयनवम्बरमासीय- पड्विंशतितमदिवसोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपतिरूपपत्रमेवं तत्समर्पितेतद्धि- वादविपयनिविष्टपत्रमातञ्च यत्तदन्दीयदिशम्वरमासोयाटाविंशतितमदिनसम्ब धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य या शबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते। वाराणस्यधिकरणकपाठशालास्थपण्डितलिखितव्यवस्थापत्रस्य मुप्रीम- कोर्टाख्यधर्माधिकरणनियुक्तपण्डिततदितरपण्डितसम्मतव्यवस्थापत्रस्य चा. बलोकनेन श्रीयुक्तोलियमवेराडोनसाहेबामियानैतद्धर्माधिकरणाधिपति- कृतास्मत्सबन्धिप्रश्नस्यास्मद्दत्त वाचनिकोत्तरस्य परावर्तनस्य शुद्ध करणस्य चावश्यकता काचिदपि नास्ति । तथाहि श्रीयुक्तोलियमवेराडोना हेवा- भिधानस्तद्धर्माधिकरणाधिपतिकृतास्मसंवन्धिप्रश्नचायमेव । यद्यपि हिन्दू जातीय कश्चित् पत्नोमेका पञ्च दौहित्रान्, येषा दोहित्राणा माता विद्यमाने स्वपितरि मृता स्यात्, दो भ्रातुपुत्रौ च सरदय मृतः स्याद् एव क्रमागतधनं भ्रातुर्दयोर्मध्ये विभक्तं स्यात्तदा तस्य मृतस्य त्यागः कस्य भवतीत्येकः । तदुत्तरं मया दच 'तत्पनी प्राप्नुयात् ।' पुनः प्रश्नान्तरम्-तत्पलोमरणोत्तरं कस्य भवतीति । तदुचरं मया दत्तम् -'दुहिता यदि नास्ति तदा दौहित्राः प्राप्नुयुः इति । अत एवैतयोईयोः मश्नयोर्मध्ये प्रथमप्रश्नस्य यदुत्तरं मया दत्त तदेवोत्तर तत्पश्नविषये वाराणस्यधिकरणकपाठ सालास्थ. परोहतैः सुप्रीमकोर्टापयामधिकरणनियुक्तपण्डितैरन्यैरपि पण्डितैल्लिं.

व्यवस्थापनसंख्या-१७६ खितम् । तत्र कश्चिद्विशेषो नास्ति, तद्यवस्थाद्वयोम्मध्ये विभककृस्न पतिधने तु पृच्च पन्या एवाधिकार, इत्यस्य लिखितवात् । द्वितीयः प्रश्नो यस्तदधिपतिना मां प्रति कृतस्म च प्रश्नो वाराणरय- धिकरणकपाठशालास्थपरिडतान् प्रति सुप्रीमकोटांख्यधार्माधिकरणनि- युक्तपण्डितान प्रति तदितरपण्डितान प्रति वा तत्प्रश्नकर्तृभिर्यद्यपि न कृतस्तथापि तैः पण्डितरेकानुपूर्वी कसंस्कृतम्यवस्थाद्वयोरधोभागे कात्यायन- मुनिवचनं वीरमित्रोदयग्रन्यलिखिततकंचनव्याख्यानच प्रमाणं लिखित्वा यलिखितं यत्तस्पारसौकतत्प्रतिरूपेणैक्यं नालम्बते । वस्यायं पर्यावसितार्थः । यद्विभक्तं पतिधनं पतिमरणोतरं पुत्रपौत्रप्रपौत्रामावे सत्युत्तराधिका- रित्वेन पन्या प्राप्त स्यात्, पत्नीमरणोत्तरं तदनं पतिभ्रातृपुनदौहित्रयोः समवाये पतिभ्रातृपुत्रा एव प्राप्नुयुन दौदित्रा इति । तत्र वीरमित्रोदय- अन्धलिखितस्य कात्यायनवचनस्य तद्वचनव्याख्यानस्य चायमेवाभिप्रायः । यदि विभरत पतिधनं पुत्रपौत्रप्रपौत्रामाये सत्युत्तराधिकारित्वेन पन्त्या प्राप्त स्शतदा पत्नीमरणोत्तरं तत्संक्रान्तपतिधनं पत्युर्ये उचराधिकारिणस्त एव गृहीयुः, न तु एल्युत्तराधिकारिण इति । तत्र च पत्युत्तराधिकारिणां मध्ये "पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा तत्सुतः"-त्यादि याशवल्पयादि- वचनोक्तरत्युत्तराधिकारिणां दुहित्रादीनामेवाधिकारः । तत्रापि प्रथमं दुहि- तुस्तदभावे दौहिनाणा तदभावे मातुस्तदभावे पितुस्तदभावे भ्रातॄणां तद्भावे भ्रातपुत्राणां तदभावे गोत्रजादीनां पाठक्रमेणाधिकारः। तत्र च पत्नी- मरणोत्तरं विद्यमानायां दुहितरि विद्यमानेषु दौहित्रेषु विद्यमानायां मातरि विद्यमाने च पितर विद्यमानेषु च भ्रातृयु पतिभ्रातृपुत्रात् पूर्व पत्युत्तरा- धिकारिपु एतान् विहाय पतिभ्रातृपुत्राणामधिकारो भवति - एतद्विघायका पधिमदेशचलितधर्मशास्त्रान्तर्गतस्य कस्यापि अन्यत्याभिप्रायो नास्ति । श्रतएव तत्तद्वयवस्था लिखितपरिडतानां मतं पश्चिमदेशनलितशास्त्र यहि तमेव, तत्तत्पण्डितैः स्वस्यव्ययस्थालिखितवचनानां चौरमिनोदयादिप्रन्यानां चाशयानबुध्दैव लिखितसात् । श्रतएव पोरमिनोदयादिप्रन्पलिखित- १.तरन-व्यप.1

व्यवस्थापनसंख्या-१७६
कात्यायनवचन तयाख्यानञ्च यत्तत्तत्सविडतलिखितव्यवस्थामूलभूतप्रमा.
एमस्ति तदेतद्यवस्थाया अधोभागे प्रमाणत्वेन, एवं सर्वत्रैव वीरमित्रो-
दयादिग्रन्ये यतिधन पुत्रपौत्रप्रौत्रामा सत्युत्तराधिकारित्वेन पल्या
प्राप्त तद्धने पत्नीमरणोत्तरं प्रथमं दुहिनुस्तदभावे दौहित्राणामधिकारस्य
बहुशो लिखितत्वात्, तद्विषयकवोरमित्रोदयादिमन्यलिखितममाणान्यप्येत-
यवस्थाया अधोभागे प्रमाणत्वेन मया लिखितानि सन्ति । तैरेवैतत्सर्च
स्पष्टमिति ।
एवञ्च सति अस्मद्दत्तश्रीयुक्तोलियमवेराडोन साहेवाभिधानतदर्मा-
धिकरणाधिपतिसमीपे वाचनिकोत्तरस्य प्रमाणान्यप्येतद्वयवस्थाया अघो-
भागे लिखितानि सन्त्येवेति । एवं थानसिहनाम्नोऽर्थिनः जिनुनाम्न्याः
प्रत्यर्थिन्या विवादसम्बन्धिन्या व्यवस्थाया अगरवालापवैश्य जातीयस्य
मोदार्थमेतद्विपये कस्यचिदिशेषस्यावश्यकता नास्ति । याज्ञवल्कीयापुत्र-
धनाधिकारप्रकरणीयवचने सर्ववणेष्वयं विधिः' इति । अस्य विशेषतो लिखि•
तत्वात् । एवं कोटांपोलाख्यधर्माधिकरणनिविष्टपत्र जातान्तर्गतचतुःषष्टय-
काङ्कितव्यवस्था चैतद्धर्माधिकरणे विवादास्पदीभूतधनजाते श्रायत्तत्व-
सम्पादकाशाभवनकाले गृहीता, तदनुसारेण तदनन्तर यद्यदनुसन्धानं धर्मा-
धिकरणतो जातं तदृष्टयापि श्रीयुक्तोलियमवेराडोन साहेवाभिधानस्तद्धा-
धिकरणाधिपतिकृतास्मत्सम्बन्धिप्रश्नस्यास्मद्दत्तवाचनिकोत्तरव्यवस्थायाः का-
चिदपि परावर्तनस्यावश्यकता नास्ति, तद्द्यवस्थायामपि पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य
मृतस्य विभक्तधने प्रथम पत्न्यास्तदभावे दुहितुस्तदभावे दौहित्राणा-
मधिकारस्य स्पष्टीकृतत्वात्-इति पश्चिमदेशान्तर्गतागराप्रदेशचलितमिताक्ष-
गवीरमित्रोदयव्यवहारमाधवव्यवहारमयूखव्यवहारकौस्तुभादिग्रन्थानुसारिणी
व्यवस्था-
तत्र प्रमाणम्-
अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता ।
भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा अर्ध्वमाप्नुयुः ।। इति वीर
मित्रोदयादिनन्यधृतकात्यायनश्चनम् ॥१॥

व्यवस्थापत्रसंख्या-१७६ ५३५ भयञ्च वरनार्थः-दायादा इत्यत्र कस्येत्यपेक्षायां शयनान्वितभर्तुः रित्येवोपस्थितत्वादनुपज्यते-इति वीरमित्रोदयमन्थलिखनम् ||२|| पली दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः ॥ एषामभावे पूर्वस्य धनभागुत्तरोत्तरः । स्वातस्य ह्यपुत्रस्य सर्ववर्णेष्वयं विधिः ॥ इति मिताक्षराचीर- मित्रोदयव्यवहारमाधवव्यवहारमयूखन्यवहारकौस्तुभादिग्रन्यतयाज्ञवल्क्य- चनम् ॥३॥ पत्नी गृहीयादित्येतद्वचनजातं विभक्तमातृतीविषयम्-इति मिता- रामन्लिखनम् ॥४॥ तस्माद्विभक्ता संसृष्ट्यन्यपुत्र स्वर्याते पत्नी धनं प्रथगं गृह्णात्ययमर्थः सिद्धो भवति-इति मिताक्षराग्रन्थलिखनम् ||५|| तस्मादपुत्रस्य स्वर्यातस्य विभक्तस्यासं सृष्टिनो धनं परिणीता स्त्री संयता सकलमेव गृह्णातीति स्थितं, तदभाये दुहितरः-- इति मिताक्षरा- ग्रन्थलिखनम् ।।६।। दुहित्रभावे दोहित्रो धनभाक्--इति मिताक्षरावीरमित्रोदयादि- ग्रन्थलिखनम् || पत्न्यभावे दुहितरोऽपुत्रविभक्तासंसृष्टधनभाजः--इति वीरमित्रोदय- ग्रन्थलिखनम् ॥ यथा पितृपने साम्यं तस्याः सत्स्वपि बन्धुषु । तथैव तत्सुतोऽपीप्टे मातृमातामहे धने ।। इति वीरमित्रोदयमन्यधृत. बृहस्पतिवचनञ्चेति ॥EL अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयफिवरवरीमासी- याष्टाविंशतितमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मयेयं व्यवस्या दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थापत्र संख्या-१७६-१७० १३४ लम्बर आपील-- इ० १८३१ साल ३६-सदर देओयानि श्रादालतेर पण्डितेर प्रति प्रश्न:- यद्यपि स्यात् एक व्यक्ति अपुत्रक एक विधवा कन्या भार ऐ कन्यार एक पुत्र एवं एक कन्या ऐ व्यक्तिर वर्तमाने मरे । ताहार एक पुत्र भार सहोदर भ्रातार एक पुत्र राखिया लोकान्तर करे। पार ऐ व्यक्तिर मरणान्ते ऐ वर्तमाना कन्यार पुत्रेर मृत्यु हय- एमत स्थले ऐ व्यक्तिर स्थावरादिधने काहार अधिकार हय । आर पूर्वोक्त कन्या ओ दौहित्रगण वर्त्तमान थाकिते ऐ व्यक्ति उदरामय ओ बररोगावस्थाय आपन स्थावरादि धन सहोदर भ्रातार पुत्रके दान फरिया ऐ दानपत्रे दौहित्रागणेर मोशाहेरा निर्णय फरिया ऐ दानेर वस्तुर उपस्वत्व हइते दिवार विपये दानगृहीता व्यक्तिर प्रति अनुमति लिखिया देय, ववे एमत दान. शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे, कि ना--इहार यथाशास्त्र प्रत्युत्तर लिखिवा-इति । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितपश्नपत्रमेतद्विवादविषयनिविष्टपत्र जाता यदङ्गरेजोशब्दप्र- तिपायत्रयस्त्रिंशदधिकाप्टादशशताब्दीयनवम्बरमासीयोनत्रिंशत्तमदिनसम्ब- घिशुकवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशचोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- यदि पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहित कश्चियक्तिविशेष एका विषयां दुहितरं तत्पुत्रश्चैकं वजीवनावस्यायां मृताया एक्स्था दुहितुरेक पुत्र सहोदर- भ्रातृपुत्रञ्चैक संरक्ष्य मृतः स्यात् तन्मरणानन्तरच विद्यमानायास्तक- न्यायाः पुत्रस्य मरण जातं चेदपि घनिनो मृतस्य त्यक्तधने तन्मरणका- लोनविद्यमानपुत्रयोः सम्प्रति च वर्तमानाया दुहितुरेवाधिकारः । यतः पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितस्य मृतस्य त्यतधने प्रधर्म पल्यास्तदभावे दुहितुरधि- कारः, दुहितश्चापि प्रपम कुमार्यास्तदभावे चोदायाः पुत्रवत्याः सम्भावित-- व्यवस्थापत्र संख्या-१७७ पुत्रायाथाधिकारः अत एव पितृमरणोत्तरं मा कन्या पुत्रवती स्थिता तस्या अधिकारस्य घनिनो मृतस्य पुत्रमारम्य कुमारीपर्यन्तरहितस्य त्यक्तधने निष्प्रत्यूहतया जातत्वेन जाताधिकारायां तस्यां विद्यमानायां तत्पुत्रस्य मरणेऽपि धनिनो मृतस्य त्यक्तधने तस्य श्रधिकारो नैव विनश्यति । अतस्तस्यां विद्यमानायां सत्संक्रान्तपितृधने तपितृदौहित्रस्यात्तद्भगिनी- पुत्रस्य विद्यमानस्य तपितृनातृपुत्रस्य च नाधिकारः । एवं पूर्वोक्तकन्या- दौहित्राणां विद्यमानतायामुदरामयज्वररोगावस्थायां स्वस्थत्वास्पदीभूतस्थाव- रादिधनत्य मातृपुत्रसम्प्रदानकं यद्दानं तेन कृतं तदानपत्रे दानविषयीभूत- स्थावरादिधनोपस्वत्वात् स्वदौहित्राणां मासाच्छादनदानार्थमनुमतिर्दानग्रहो- तारं स्वभ्रातृपुत्रं प्रति लिखितात्यातदान())मेतद्विवादविषयनिविष्टप्रभुसमर्पित- पप्रजाततात्पार्थविवेचनया धर्मशास्त्रानुसारेण न सिद्धयति । कञ्चिदानं जातं चेदपि दातुत्वेन मन्यमानस्य रोगार्ततावस्थायामेतदानस्य जातत्वेनै- तादृशदान सिद्धःशास्त्रीयत्वाभावात्-इति घनदेशचलि तमनुदायभागदाय- तत्त्वदायमागटोकादायक्रमसंग्रहविवादावसेतुविवादभनार्णवादिग्रन्यानुसा. रिणी व्यवस्था-- अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरी मातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो बन्धुः--इत्यादि दायभागादिपन्यधृतयाज्ञवल्क्य- वचनम् ॥ अपुत्रस्य मृतस्प कुमारी रिक्थं गृह्णीयातदभावे चोढा-दति दायभागादिअन्यधृतपराशरवचनम् ।। पुत्रवती सम्भावितपुत्रा चाधिकारिणी-दति दायभागग्रन्थ- लिखनम् ।।३॥ कुमार्यभावे चोढाया पुत्रवत्याः सम्भावितपुत्रायाश्च तुमोऽधिका- रस्तयोरेकतरामाचे एकतराधिकार:-इति दायक्रमसग्रहप्रत्यलिप्सनम् !! ४ ।। १.कथ-व्यप०1 व्यवस्थापनसंख्या-१७७-१८ अदत्तन्तु भयकोषकामशोकरुगन्वितैः- इत्यादि विवादार्णवसेतु विवादभनार्णवादिनन्यधृतनारदवचनम् ॥ ५ ॥ तत्र भयादिरुगन्वितान्ताः पञ्चप्रकृतिस्थितिविरोधिनो द्रष्टव्याः- इति विवादार्णवसेतु(पृ० १५३)विवादमझायग्रन्थ १ विचा०४८६ख) लिखनश्चेति ॥६॥ अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिशदधिकाष्टादशशताब्दीयमैमासीयनवम- दिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण ४० रोवकारि मिडिल आदालते देआयानि सदर मोकाम कलिकाचा इगरेजी सन १८३४साल तारिख ६ माह माइ मोता. यक पागला सन १२४१साल तारिख २५ माह वैशाख रोज मगलवार आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत रावट हालडन राटरि साहेवेर वैठके- रामगोपालदेवो बनाम गकुलचन्द्रत विलदार श्री कृष्णगोविन्दतन्तर श्रो जुगलकिशोरतन्तर श्रो हरेकृपणतन्तर ओ राजकिशोरतन्तर छाएल हाजीर हइल | छाएलेर सोल एक टाका मुल्येर इटाम्प फागजेर पर दासत्वेर मकईमाय दासत्व यो कायर खेसारतलावत मवलगे १५ टाकार परिमाणे खास आपिल माहा होनेर प्रार्थनाय एक फेता जेला मयमनसिंहेर काजी १. कोषादिगा इति विवादावसेनुपाठ ।

व्यवस्थापनसंख्या-१७ ५३६ -सदर आमिनेर फयसलार नकल ई सन १८२८ सालेर ३०माह दिजम्बरेर लिखित प्रो एक केता जेला मजकुरेर जजसाहेवेर 'फयसलार नकल इंसन १८३३ सालेर १७ दिजम्वरेर लिखित सम्वलित, जाहा सन हालेर १३माह मार्च तारिखे दाखिल हइयाछिल, अद्य उपस्थित श्रो दृष्ट हइल । जे हेतुक ए मकईमार उभये हिन्दुजाति हयेन, अतएव ए माईमार फयसलासकलेर यथार्थ श्री अयथार्थर प्रति व्यवस्था लओन उचित बोध हइया हुकुम हइल जे समुदय कागजाते ए श्रादालतेर पण्डितके ममर्पण करा जाय। उचित ये पण्डित कागजात अनुमोदन थो दृष्ट पूर्वक ए विशयेर व्यवस्था ये ए मकद्दे मार फयसना- सकल वागला देश चलित शास्त्रमते यथार्थ वटे, कि ना-लिखिया महरमेर वन्देर पूर्व दाखिल करेण इति- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरावटहालडनराटरीसाहेवधम्माधिकर- णलिखितैतदन्दीयमेइमासीयपठदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्न प्रतिरूपपत्रमेचं तत्समर्पिततद्विवादविपयनिविष्टपत्र जान च यदेतदन्दीयमेइमापोयसप्तम- दिनसम्बन्धित्रुधवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो मातस्तदनुसारे- योत्तरं लिख्यते-- एतद्विवादविषयनिविएमयमनसिंह जिजाख्यावान्तरधम्माधिकरणनियुक्त सदरयामीनपदाभिषिक्तकाजीशब्दप्रतिपाद्यक्ताङ्गरेजीशब्दप्रतिगद्याष्टाविंश- त्यधिकाष्टादशशताब्दीयदिशम्बरमासीयत्रिंशत्तमदिवसीय जयपत्रं वङ्गदेश- चलितशास्त्रानुसारेण यथार्थमेव भवति-दति बङ्गदेशचलितदायभागादि- ग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- यत्रापि चैक दासीगादिकं वसाधारणं तत्रापि ततकालविशेपे पहनदोहनफलेन स्वत्वं व्यज्यते । तदाह बृहस्पतिः- -

व्यवस्थापनसंख्या-१५८-१७६
"एको स्त्री कारयेत् कर्म यथांशेन गृहे गृहे" इति युक्त्या
विभजनीयम् , तदन्यथानर्थकं भवेत् -इति च दायभाग पृ०६)ग्रन्थ.
लिखनम्
अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशतान्दोयमेहमासीयसप्त
विशतितमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति-
श्री यतितराम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रेण
(४१)-मोकाम कलिकातार सदर देयोनि श्रादालतेर इंरेजि
सन १८३४ सालेर १८ जानेर मोतावक वागला सन १२००
सालेर ६ माघ शनिवार तारिखेर श्रीयुत ओलीयमनाडिन साहेक
ऐ आदालतेर हाकिमेर बैठकर रोवकारि-
७५ लं:-
सन १८३२ साल
राधानायचौधुरि
आपीलाएट
श्रीमति कृप्परमनिदास्या, कृष्णनाथ मोतयोफार कन्या श्रो
परानचन्द्रनेउगी प्रो राधाचन्द्रनेडमी नावालगदिगेर माता-
रेप्पाडएट
पापीलाण्टेर उकिल सदासुखपण्डित हाजिर श्राइल । एक
मोकदमा फल्य यो पद्य श्रामार बैठके रोक्कार हया जेलार
तावत कागज ओ कोट भापिलेर कागजसकल ओ ए आदालतेर
कागजसकल पाठ करा गेल। चुडन्त हुकुम प्रकाश होनेर
पूर्व मिचेर लिखित प्रश्नसकलेर प्रत्युत्तर ए आदालतेर पण्डितेर
स्थाने सो उचित घोष हइया हुकुम इहल जे एरोवकारिर
नकल मोकरमार फागज समेत ए आदालतेर पण्डितफे एड़
हुकुमे समर्पन करा जाय ये निचेर लिखित प्रश्नसकलेर प्रत्युत्तर
पइ हुकुम प्राप्तेर दिवसावधि निन सप्ताह मध्ये दाखिल फरेन ।

व्यवस्थापनसंख्या-२७४ प्रथम प्रश्न-कोन व्यक्ति हिन्दुर एक पुत्र तिन कन्या श्रो एक सहोदर भ्राता ओ पैतृक वस्तु राखिया मृत्यु ह्य । ताहार पर ऐ मृत व्यक्तिर पुत्र अविवाहित समय उहार तिन सहोदरा भग्नी, ताहार मध्ये एक जनार दुइ पुत्र, भो स्वामि पाछे, आर दुइ जना पुत्रसन्तान राखे ना, वर्तमान थाकितेश्रो पैतृक विषय आपन पितृसहोदरके हेवा करे। तवे ए प्रकार पैतृक विपयेर हेवादातार पितार दोहित्रगण थाकितेश्रो वाङ्गलादेशीय चलितशाम्रानुसारे सिद्ध भो यथार्थ वटे कि ना इति- द्वितीय प्रश्न यद्यपि स्यात् वाङ्गलादेशीय चलितशास्त्रा- नुसारे एइ हेवानामा सिद्ध वोध हय, तवेसातीदिगेर जवानवन्दि प्रभृति मोकदमार कागजसकलेर द्वाराय कोन एक द्वितीय हेतु ऐ हेवानामा अयथार्थर विपये पाओ। जाय-वाहा विस्तारित लेखेन इति- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतयोलियमवेराडिन साहेयधर्माधिकरणलि- खितैतदब्दीयजानवरीमासीयाष्टादशदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपप- त्रमेवं तत्समपितेतद्विवादविषयनिविष्टपत्र जातं च यदेतदन्दीय जानवरी- मासीयद्वाविंशतितमदिनसम्बन्धित्रुधवासरे मया माप्त तदवलोक्य यारा- बोधो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते--- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यदि हिन्दुजातीयः कश्चिद्यक्तिविशेषः पुत्रमेकं कन्याश्रय सहोदर- भ्रातर चैक पैतृक धनं च संरक्ष्य मृतः स्यात्तदनन्तरं तस्य पुत्रोऽप्यविवा- हित एव पुत्रस्यवत्या एक स्याः सघयाया भगिन्या अपरयोः पुत्ररहितयो. योगिन्योश्च विद्यमानतायामपि स्वपैतृकघनस्य दानं स्वपितृव्यमुद्दिश्य कृतवान् स्याचदोपरि लिखिताना भगिन्यादीनां मध्ये ये केचित्तद्धनमात्रो. पजीविनस्तेषां यावनीवं स्वपितृकुलोचितपासाच्छादनोपयुक्तादावश्यकघर्मा- याचरणोपयुक्काच धनाद्यदवशिष्टं धन तद्विषये तद्दानं सिद्धं भवतीति- ५४२ व्यवस्थापनसंख्या-२७E अत्र प्रमाणम्- प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनुवचनम् ॥२॥ कुटुम्बमन्तवसनादेयं यदतिरिच्यते इति विवादार्णवसेतुविवादभङ्गा- रणवादिग्रन्यधृतवृहस्पतिवचनम् ||२|| स्वभागान् यदि दद्यु स्ते विक्रीणीयुरयापि वा । कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वघन(स्य)वै ॥ इति दायमागा दिअन्यधृतनारदवचनञ्चेति- द्वितीयमश्नस्योत्तरम् - (एतद्विवादविपर्यानविष्टपत्रजातरेतद्दानस्यायथार्थताबोधकः कश्चिद्धे. तुरद्यापि न प्रातः । यद्यप्यर्थिप्रत्यार्थिनोः प्रश्नोत्तराभ्यां दानसमये दातू राजयक्ष्मरोगग्रस्तताऽवगम्यते, परन्तु तत्रजातापित्रुपरमसमये दातु रतद्रोगप्रस्तताया अनवगमेन दानुः स्वपित्रुपरमानन्तरं तत्यतयने स्वत्वो. त्यत्तेनिश्चितत्वेन कैश्चित् तत्पत्रजातैर्दानसमयात् पूर्व प्रायश्चित्तकरय स्याप्यवगमेन वदानसमयात्पूर्व कृतप्रायश्चित्तस्य स्वपित्रुपरमसमये आजा- ततद्रोगस्य पितृत्यघने जातस्वत्वस्य तद्रोगप्रस्ततायास्तत्कृतदानस्याशास्त्री- यत्वसम्पादक्त्वाभावात्-इति बङ्गदेराचलितमनुदायभागदायतत्त्वदायभाग- टोकादायक्रमसंग्रह विवादाणवसेतुविवादमार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था- अत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणत्रयम् ॥३॥ पतितानामपि खधनसाध्यप्रायश्चित्तपतेः पातित्वेन सत्वनाशः प्रायधि- चौमुख्य योभ्यः-इति दायतत्त्व(पृ० १६२)दायमागटोका(पृ. १६)विवाद- भगार्णवादि(२ विवा १४ ख १५ क ग्रन्थलिखनञ्चेति अगरेजीशन्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशतान्दीयजूनमान)मा- सीयदादरादिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मयेय व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवंद्यनार्थामश्रेण . व्यवस्थापनसंख्या-१८० प्रकार' अक्यता राखे। एइ जे शास्त्रानुसारे जे हेतुते हिस्यादार . श्रापन हिस्या ना पाय ! यद्यपि हिस्यादारसे हेतु हइते सुध्य थाके, ओ द्वितीय अंशीयरा ताहार अंश जबरदस्ती मते ना देय । हाकिम विचार कालिन ताहार हिस्या ,देओनि, श्री यदि ऐं व्यक्ति आपन हिस्या अन्य काहार नामे लिखिया दिया मृत्यु हइया थाके, हाकिम सेस विरोध निवारण कारण दस्तावेज मत आमले मानेन, श्रो आपन हिया ऐ व्यक्ति जाहाके दियाछे, ताहाके देन। कारण एइ-यद्यपि केह कोन दस्तावेज लिखे पार दस्तावेज मत आमले ना श्रानिया थाके, किम्वा अन्य केह दस्तावेजेर मजमुने विरोधीय हय, हाशिम अोहार दास्तावेज मत श्रामले आनान, श्री विरोधीय व्यक्ति हइते जरिमाना लएन । यदि स्यात् स्वयं हाकिम अोहार दस्तावेज मत अवलम्बन ना करेण, तवे हाकिम आपन खाजना हइते दस्तावेजेर लिखित मत श्रामले आनेन । श्री ए आदालते जे एइ आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था ए आदालतेर छोलेर जावे दाखिल हइल ताहार खोलासा । एइ जे ए प्रकार अवएटक विशयेर तमलिक ओ हेवा ए मलुकेर दस्तुर मत मिताक्षरा ो गयरह पुस्तक अनुसारे सिद्ध हइते पारे ना। ए प्रयुक्त जे पाटसालार पण्डितदिगेर दुइ व्यवस्था ओ ए आदालतेर पण्डिवेर व्यवस्था अनक्य होने सर्व प्रकारे प्रत्यय हय ना । ए विशयेर सन्देह दुर करणार्थे कोलकातार सदर देओनि आदालतेर पण्डितेर निकट हइते ज्ञात हो प्राविश्यक आछे जे एइ मोकदमार प्रासल दाविदार माघोजी, जेसफल तदविर हिस्या तकसिमेर कारण श्रो हक अोसुलेर कारण, जाहा चाइ ताहा अामले आनियाछे, अर्थात् आपन वर्तमाने ए नालिस आदालते उत्थापन करियाछिल, ए कारण ए मोकदमा उत्थापन होनेते माधोजि आसल दाविदार तरफ हइते जे श्रापन हिस्या पापोनेर कारण यो ताहार हिध्यार, जाहा हस्तान्तर हइया थाके, वाहा यथार्थ आछे-कि ना। ए कारण हुकुम हइल जे मोड ३५ व्यवस्थापनस्या-१८० द्दमा मलववि रहे, भार आसल दिन किता व्यवस्था पार तम- लिकनामार नकल राखिया प्रासल वमलिफनामा एड कवकारिर नकलेर सम्बलिद पइ प्रादालनेर रेजेष्टर साहेवेर इराजि चिठी द्वाराय कलिकातार सदर देोनि आदालतेर रेजेष्टर साहेवेर नामे सेखानकार पण्डितेर निकट व्यवस्था लोनेर कारण उक्त आदालते पाठानो जाय । एइ प्रार्थनाजे रेजेष्टर साहेव से प्रादा- लतेर हाकिमदिगेर ज्ञातसारे तिन केता व्यवस्था पार तमलिक- नामा पार एइ रुवकार सेखानकार पण्डितके समापन करिया वानारस देसेर प्रचलित पुस्तकसफल अनुसार इहार जवाब सप्ताहेर मध्ये उक्त पण्डितेर निकट हइवे लइया, बार एइ मक- ईमार तत तुल्य दृष्टान्त वानारस देशेर इहार पूर्वे यदि कोन मकर्दमा सेखाने निप्पत्य हइयाथाके, तवे ऐ मईमार फयसलार नकल ए आदालते पाठान पार उपरेर लिखित विपपेर तत-तदन्त होनेर परे ओछितेर विपये किम्चा रघुनाथरायो मोतीफा रेपाटेर फेराइतेर विपये उचित हुकुम प्रकाश हइवेक इति- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितविचारपन तमलिकनामाख्य पत्र व्यवस्थापत्रयं च यद- नरेजीशब्दप्रतिपाद्यचतुस्त्रिशदधिकागदशशवान्दीयजानवरीमासीयचतुर्वि- शतितमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्राप्त तदवनोक्य यादृशबोधा जात स्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- मूलभूतैतदिवादाभियोजा माधवजीनामक कश्चित्पुरुषविशेषो यद्य- दनुसन्धान स्वकीयभागस्य विभज्य महणाय कोयासाधारणस्वत्वसमाद नार्यमुचित भवति तथा कृववानर्थात् स्वस्य वर्तमानताया धम्माधिकरणे श्रयमभियोगरतेनैवोत्यापित स्यात्, अतएवेतद्विवादस्योत्थाप्ने सति अकृ- तैतद्विवादनिर्णयस्वार्थाधिकरणतोऽदृष्टैतद्विवादपरिच्छेदस्य मूलभू तैतद्विवाभियोक्तुमाधवजीनाम्न सकाथात् स्त्रीयाशस्य धर्माधिकरणतो विभकम मापणायं तदीयायो यो इमान्तर ग३ स्थाचदा-उरकरण ५४८ व्यवस्थापत्रसंख्या-१० तत्वात् विभक्तधनदानसिद्धर्मिताक्षरादिग्रन्थानुसारेण निष्पत्यूहत्वाच । एवं स्वस्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापादन' च दानं च परो यदि स्वीकरोति' तदा सम्पद्यते, नान्यथा इत्यादि मिताक्षपग्रन्धे पृ० १४१ )वीरमित्रोदय- ग्रन्थे च भोगप्रकरणे सतरतया लिखितमस्ति। तदानस्योभयदलयो। स्वस्वत्वनिवृत्तिरूपप्रथमदलस्यैतावता दातृव्यापारेण निष्पन्नत्वेऽपि सप्रदान स्वत्वोत्पत्तिरूपस्य हितायदलस्य धर्माधिकरणतो विभक्के दानुरशे सप्रदान भूतव्यक्ति विशेषम्यायत्तत्व विना अनिष्पाद्ययन धर्माधिकरणतो विभक्त स्वाशे सप्रदानायत्तीभवनात्मकस्य सप्रदानस्वत्योत्पत्तिरूपद्वितीयदल हेतुभूतस्य बहुकालसाध्यस्य रामाधीनतया दुष्करत्वेन मन्यमानस्य च कस्यचिद् व्यक्तिविशेषस्यासीशन्दप्रतिपाद्यत्वेन नियोगकरण विना अनिशान मन्यमानस्य च दात्रा स्वकर्तव्यस्य स्वदत्तस्वाशे सप्रदानायत्तीभवनरूपस्य सप्रदानस्वत्वोत्पत्तिहेतुभूतस्य सम्पादनाथ सम्प्रदानभूतव्यक्तिविशेषस्यासी शब्दप्रतिपायत्वेन नियोगकरणस्यापि शास्त्रीयत्वात्, यतोऽवभक्त ऽपि स्वारी असीशब्दप्रतिपाद्यस्य नियोगकरणे शास्त्रविरोधी नास्ति । अथ च वीर- मित्रोदय ग्रन्ये यदि केनचित् स्वस्वत्वास्पदीभूतधनस्य दान कृत्वा सम्प्रदान- स्वायत्तत्वमसपायेव मृत. स्याचथापि राज्ञा प्रतिग्रहीतुरायत्तत्व दानसम्पादक सम्पाद्यमित्यस्यापि विशेषतो लिखितत्वाच । एव लक्ष्मीकान्तस्य कृतिम पुत्रत्वपक्षे दानादिक विनापि विवादास्पदीभूतधने तस्य स्वामित्वमव्याइतमेव पुत्रत्वात् इति वाराणसीमभृतिदेशच लतमनुमिताक्षरावी।मत्रोदयव्यय- हारमाधवन्यवहारमयूखव्यवहारकोल्नुभयवहारचिन्तामाणाविवादचिन्ताम- विविवादरवाकराववादचन्द्रकल्पतरूपारिजातादिनन्यानुसारिणी व्यवस्थेति- अर प्रमाणम्- कुटुम्बभत.यसनाद्देय यदतिरिच्यते-दात व मित्रोदया 'दमन्यकृत- बृहस्पतिवचनम् ॥१ कन्याभ्यश्च पितृद्रव्यादेयं वैवाहिक वसु-इति तत्तद्मन्यधृतदेवल वचनम् ॥२॥ १.५वत्वादानच पास्वत्वापान च-व्यप० ।

५५० व्यवस्थापनसख्या-१८० यत्र नो । बलपूर्णता । नारदः । "विद्यमानेऽपि लिखिते जीवस्तपिहि साक्षिपु । विशेषतः स्थावराणां यत्र मुक्तं न तस्थिरम्'। दानस्क्रियादेर पभोगनिरपेक्षस्येव सलोत्पादकत्वात् । किमिति । भोगलयोप्याश्य तत्रा- पेदयत इत्याशङ्कायामुपपत्तिरुक्ता विज्ञानेश्वराचार्यः । दानादेः परस्वत्वा. पादनलात्' परकर्तृ कस्वीकारापेक्षाऽपश्यं भावनीया। स्वीकारश्न त्रिविधो मानतो याचिका कायिकः। ममेदमित्यव्यवसायो मानसः । ममेदमित्याद्यभिलापो वाचिकः । उपादानाभिमर्शनादिरूपेणानेकप्रकारका कायिकः । तत्र मानसं विना स्वत्वासम्भवात्स तावदावश्यक एव। दानविशेपपुरस्कारेण शब्दप्रयोगविशेषनियमपाददर्शनादिचेष्टाविशेपनिय- माच्च वाचिकायिकावप्यावश्यकावित्यवसीयते। तत्र हिरण्यरवादी दातृकर्ड कजलत्यागादनन्तरमेव प्रतियहीनुरुपादानादिसम्भवात् त्रिविधो- ऽपि व्यापारः सम्पद्यते । क्षेत्रादौ तु फलोपभोग विना कायिकस्वीकारा- सम्भवादल्पेनाप्युपभोगेनावश्यं मवितव्यमन्यथा दानन्यादेः सपूर्णता न भवत्युत्तरकालिकव्यापाराभावात् । तेन तत्सहितादागमान्तराद्विकल भागमो दुर्चलो भवति । एतच द्वयोरागमयोः पूर्वापरभावानवगमे । तदवगमे तु स्वल्पभोगविकलोऽपि प्राक्तन एवागमो बलवान्, पूर्वेण दानादिना स्वत्वापगमे दानाद्यनन्तरासम्भवात् । न चैवं तस्य क्षेत्रादेमध्य- गतलापत्तिः । पूर्वस्वाम्यापगमादुत्तरस्वाम्यानुत्पत्तेश्चेति वाच्यम्, प्रति. श्रुतन्यायेनावेक्षणीयस्वत्वस्यसत्वात् पूर्वस्वाम्यसत्त्वेऽपि राज्ञैव प्रतिग्रही- प्रादेो कायिकस्वीकारस्यानिःप्रतिपक्षस्य सम्पादनीयत्वात्-इति वोर- मित्रोदय(पृ. २०७।२०८ प्राथलिखनम् || याज्ञवल्क्यः । 'आगमेऽपि बलं नैव भुक्तिः स्तोकापि यत्र नो। भागमे विद्यमानेऽपि भोगविरहात् तावत्काल सत्तारतिधोन भक्तीत्यर्थः - इति व्यवहारचिन्तामणिग्रन्थलिखनम् ॥ell १.०पादान०-व्यप०1 ३. सदसदिनिमशन--ए। ५. पूर्वस्याम्यागभाद्-वीमि। २. भावनीय-ज्यप। १.सखावश्यक ख०-विमि।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१० याज्ञवल्क्यः । 'प्रागमेऽपि वलं नव मुक्तिः स्तोकापि यत्र ना। आगमे विद्यमानेऽपि मुक्तिविरहात् तावत्कालं स्वत्वं न सिद्ध्यतीत्यर्थः । अत्र यत्रान्यमुद्दिश्य केनचित किश्चिद्दत्तं तत्रोदेश्यस्य स्वीकारल्याकमोगा- भावात् सत्वं न निश्चीयत इति न्याय एवं मूलम्-इति च व्यवहार- चिन्तामणि ग्रन्पलिखनम् ॥१०॥ अतस्तत्र जलप्रक्षेपरूपः पानोदेश्यक उत्सर्ग एवं ददाति नाविष- क्षितः। दानत्वनिष्पत्तिस्तु तस्य सम्प्रदानकर्तृकस्वीकारे सत्येवेति परमार्थः-इति वीरभित्रोदया पृ० २४३ )बन्ध लिखनम् ॥११॥ न्यायाधिगमे तर्कोऽन्युपायस्तेनाभ्यूह्य यथास्थानं गमयेत् । तस्मा- द्राजाचार्यावनिन्यो-इति मिताक्षरा(पृ. १३०।१३१)अन्यधृतगोतम. वचनम् ॥१२॥ यथा नयत्यसमाते गस्य मृगयुः पदम् । नयेत्तथानुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम् ॥ इति मनु(६।४४) धचनम् ॥३॥ यः स्वामिना नियुक्तस्तु दानायव्ययपालने । कुसीदकृषिवाणिज्ये निसृष्टार्थस्तु सः स्मृतः ।। प्रमाणं तत्कृतं सर्व लाभालाभव्ययोदयम् । स्वदेशे वा विदेशे या मामी तन विसंवदेत् ॥ इति घीमित्रोदय- व्यवहारचिन्तामणिविवादचन्द्र( पृ० १५० )विवादरताकरकल्यतममभूति- अन्यधृतवृहस्पति( वृस्मृ०६।२०६८)वचनम् ||१४|| निसपार्थस्तु यो यस्मिस्तस्मिन्नर्थे प्रमुस्तमः। तद्भत्र्ता तत्कृतं कायं नान्यथा कर्तुमर्हति ।। इति चीरमित्रोदयः न्यवहारचिन्तामणिकतातरूप्रभृतिमन्या कात्यायन(कास्मृ० ४७०।०५६) वचनम् ॥१५॥ पितृधनहारितं तु पूर्वस्य पूर्वस्याभावे सर्वपामविशिष्टम् । न प्रातरो न पितरः पुत्रा रिस्थहराः पितुः । इत्योरसव्यतिरिक्तानी' 1.स्परयौनान्यक्तिरिताना-प० ।

५५२ व्यवस्थास्त्रसंख्या-१:०-२८१ पुत्रप्रतिनिधीनां सर्वेषां विवहारित्ताप्रतिपादनपरसात-बोरसस्य तु, एक एवीरसः पुत्रः पित्र्यस वसुनः प्रभुः इत्यनेनर रिक्थभाक्त- स्योक्तत्वात्-इति मिताद पृ. २१५ दिनपलिखनश्चेति ॥१६॥ अगरेजीशन्दप्रतिपाद्यचत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयजुलाइमासीय- द्वादशदिनसम्बन्विशनिवासरे मयेय गवस्था दत्तति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (४३)-रोवकारि मिछिल श्रादालत देओयाणि सदर मोकाम कलिकाता सारिख ३ माह जुन सन १:३४ इरेजी मतावक २२ माह ज्येष्ठ सन १२४१ वाङ्गला रोज मगलवार श्रादालत मजकुरार हाकिम श्रीयुत रावरट हालडन राटरि साहेवेर वैठके- रामगोपालदेो बनाम गोकुलचन्द्र तहविलदार ओ गैरह । छाएल हाजिर हइल । गत मासेर ६ तारिखर हुकुम मते ऐ आदाल- तेर पण्डित ये व्यवस्था दाखिल करिलेन ताहा तारिख मजकुरेर दृष्टी होछाएलेर खास आपोलेर सोयाल एवं तत्सम्पर्कीय अन्य कागजार सहित पडागिया बोध हइल ये पण्डितेर लिखित व्यवस्था तारीख मजकुरेर रायफारिर लिखत मोयाल मतावक नहे। कारण एइ ये सोलेर मम्मे एड्- मद्दइयान अर्थात् तरफछानी ये गोपालभाण्डारिओ गयरह उहार- दिगेर पूर्वपुरुषेर दास-दासी छिल, श्राद्य पर्य्य,न्त हइते सेवा यो कार्य नियुक्त ओ प्रवत्त छिल । ५ क्ष्यने उहारा सेवा ओ कार्य हइते गरहाजीर हइयाछे-नालिस करे। सदर आमीन श्रो जज साहेव भापनारदिगेर फयसलार विस्तारित विवरणसकलेर व्यवस्थापनसंख्या-१८१ द्वाराय छाएल ओ गयर हेर पूर्व पुरुस मसा हाडो फारिक छानिर खरिदा गोलाम, साव्यस्थानुसारे उहारदिगेर दावि, एइ हुकुमे ये छाएल ओ गयरह दास्यत्वेर सेवा प्रो कार्य करे डिगरि करिलेन । ये हेतुक प्रकाश्य वोध हइन्छे ये किवल हाडो मजकुर दासत्वताय खरिद हइयाछिल ना, ताहार पुत्र-पौत्रादी इहाते छाएल ओ गयरहेर दासत्व सिद्ध होन विपये ये ऐ "फयसलासकल हइयाछे, एमत फयसलासफल शास्त्र-सम्मत यथार्थ वटे कि ना। अतएव हुकुम हइल ये पुनराय कागज- सकल पण्डितेर हाला करा जाय | उचित में पण्डित उपरेर लिखित विवरणे ज्ञात होनान्तर ताहार जीव दुइ रोजेर मध्ये दाखिल करेण इति । श्रीज्जयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरावर्टहालडनराटरीसाहेवधम्माधिकर- णलिखितैतदव्दीयजुगमासीयतृतीयदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपप- प्रमेयं तत्समर्पिततद्विवादविषयनिविष्टपत्र जातं च यदेतदब्दीयजुनमासीय. द्वादशदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं वदवलोक्य यादृशमोधो नात- स्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते ।। एतत्पश्नपत्रलिखितवृत्तान्ते सति हाडोनाम्नः क्रयपत्रे केवलहाडोसंज्ञको दासत्वेन कोतो न तु तस्य पुत्रपौत्रादिरिति नियमो यदि लिखितः स्यात्तदा दासत्वेन हाडोमात्रस्य ऋयेण तत्पुत्रपौत्रादीना शास्त्रोक्तपञ्चदशदासानन्त- गंतत्वेनाशास्त्रीयबलात्कारकृतदासभावान्तर्गतत्वेन च तेषा दास्यविषये जातं यजयपत्रमातं तच्छास्त्रसिद्ध न भविष्यति, अशास्त्रीयबलात्कारकृतदास- मोचनस्य शास्त्रानुसारेण कत्तुमुचितत्वात् । यदि च तरिमन् क्रयपत्रे केवल -हाडोसज्ञको दासत्वेन कोतो न तु तस्य पुत्रपौत्रादेरित नियमो न लिखितः स्यात्तदा दासत्वेन हाडोसंशकस्य क्रयेण तत्पुत्रपौत्रादीनामपि शास्त्रोक्तपञ्च- दशदासान्तर्गतत्वेन तेषां दास्यविषये जातं यजयपत्रमात तच्छ स्त्रसम्मत भविष्यत्येव, क्रीतद्रव्यमात्रोत्पन्नद्रव्यजातमात्र एव ऋयकः स्वत्वस्य शास्त्र- व्यवस्थापनसंख्या-१८१-१८२ व्यवहारोभयसिद्धत्वात्-इति वङ्गदेशचालतमनुदायतत्त्वदायभागटीकादार क्रमसग्रहविवादार्णवसेतुविवादभगार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था || प्रत्र प्रमाणम्- गृहजातस्तथा नीतो लब्धो दायादुपागतः । अनाकालभृतस्तद्वदाहितः स्वामिना च यः॥ मोक्षितो महतश्चर्णाद् युद्ध प्राप्तः पणे जितः। तवाहमित्युपगतः प्रवज्यावसितः कृतः ।। भक्तादासश्च विज्ञेयस्तथैव वडवाभृतः। विक्रेता चात्मन. शास्त्रे दासाः पञ्चदश स्मृताः ।।-इति दायनम सग्रहविवादार्णवसेतुविवादमार्णवादिग्रन्धधृतनारदयचनम् ॥१॥ चौरापहृतविक्रीता ये च दासीकृता बलात् । राज्ञा मोचयितव्यास्ते दासत्वं तेषु नेप्यते ।। इति विवादार्णवसेतु(पुर १६३)विवादभङ्गार्णवादिग्रन्थधृतनारद नासपृ०६८ वचनञ्चेति ||२|| अगरेजोशब्दप्रतिपायचतुनिशदधिकाष्टादशशतान्दीयजुलाइमासीर- पञ्चविशतितमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मयेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण . (४४)-रोवकारि मिछिल आदालत देओनि सदर मोकाम कलिकाता अदालत मजकुरार फाएम मोकाम हाकिम श्रीयुत तामस फिमल रावटसा साहेवेर बैठके। ओके तारिख ४ माहे जुन सन १९३४ साल ई मोतवेक २३ ज्येष्ठ सन १२४१ वाङ्गला दिवस वुधवार- मुहम्मात विश्वेश्वरिदेव्या मफलछा श्रापिलाएट ताराचान्दघट्टोपाध्याय ओ गयरह रेप्पाडण्टान श्रापीलाण्टेर उकिल मुनसो ह्यदर आली ओ रेपाडएटानेर मध्ये ताराचान्दचट्टोपाध्याय हाजिर आइल । ए मोकई मा व्यवस्थापनसंख्या-१८२ सिरस्तादारेर कैफियत सम्मलित गत मेइ मासेर ३० तारिखे आमार वैठके रोक्कार हइया आपीलाण्टेर उकिलेर स्थाने श्रापीलेर सोलेर नकल तलव इझ्या स्थकित छिल, अद्य पापीलेर सखोलेर नकल दाखिल कराते पुनराय रोक्कार हइज, ओ फयसला ओ पापीलेर छाल भो ए श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था ओ सदर पापीलेर मञ्जरिर सरव सम्वलित रोवकारि दय्टे पाइल। जे हेतुक चुडन्त हुकुम सादर हार पूर्वे पादालतेर पण्डितेर निकट व्यवस्था तलव करा. मोकदमार विस्तारित' सहित उवित वोध हइल, अतएव हुकुम हाल ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे जे निचेर लिखित समुदाय छोलेर जोवि वागला मुलुकेर चलित शास्त्रानुसारे ओहार वचन प्रमाण सहित आगत बुधवार दिवसे दाखिल करेण-ए आदालतेर पण्डितेर हाओला कराजाय । प्रथम सोल- सरूपचन्द्र वित्तत्वे गागी वेक्ति एक पुत्र दिपचन्द्र ओ पद्ममणी ओ दुर्गामणी दुइ कन्या राखिया मृत्यु हय । ओहार समुदाय तेयं वस्तु मोहार पुत्र दिपचन्द्रके पौछिल । ओ दिपचन्द्र आपन जीवद्दशा पर्वन्त अन्येर अंश वेतेरेक दखिजकार थाकिया सन १२०४ साले तस्य स्त्री वेदवति प्रो वस्य कन्या दासमनीके राखिया मृत्यु हय। वेदववि वाहार तेर्य विषये दखिलकार हइया मुछति दासमनिर विवाह देय, जे. दासमनीर पुत्र सर्वचन्द्र जन्मे। १२०६ साले दासमनी पापन मातामही वेवति ओ सर्वचन्द्र पुत्र, ओ सन १२२४ साले सर्वचन्द्र आपन मातामही वेदवति ओ आपन श्री विश्वेश्वरिर सनमुखे मृत्यु हय । तत्परे सन १२२८ साले मुबर्मात वेदवति मृत्यु हय । अतएव दिपचन्देर तेर्य वस्तु दिपचन्द्रेर दौहित्र १ विस्तावित-व्या।

५५६ व्यवस्थापनसंख्या-१८२ सत्वेचन्द्रर स्त्रीके असिवेक, कि दीपचन्द्रेर भग्निर सन्तान- दिगेके इति- द्वितीय सोल- यद्यपि दासमनि दिपचन्द्रेर वर्तमाने किम्वा वाहार मृत्युर पर दिपचन्द्रर स्त्री वेदवति वत्तेमाने जमिदारिर मजकुरार उपर दखल पाइया थाके, ऐ प्रयुक्त ओ दसल ना पाओ प्रयुक्त ये प्रकार प्रथम सोल लेखा गेल ओहार तेर्य वस्तुते दिपचन्द्रर दौहित्रेर स्त्री विश्वेश्वरि सत्याधिकारि होने ो ना होने किया दिपचन्द्रेर भग्निर सन्तानेरा सत्वाधिकारि होने ओ ना होने शास्त्र अनुसारे व्यतिक्रम अाछे कि ना इति ।।-- श्रीजयतितराम् एतद्धम्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्ष श्रीयुततामकिमिलरावटसन्- साहेवधर्माधिकरणलिखितदन्दीयजुनमासोयचतुर्षदिवसीयविचारपनान्तर्ग- तप्रश्नपत्रप्रतिरूपपत्र यदेतदन्दीयजुनमासीयवादशदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशोपी जातस्तदनुमारेणोत्तर लिख्यते ॥- प्रथमप्रश्नस्याचरम्- प्रथमपश्नलिखितवृत्तान्ते सति दोपचन्द्ररतधने यदि तस्य पुनमारभ्य तल्लिनु स्वरूपचन्द्रस्य प्रपौत्रपर्य्य-नाना -ये कश्चन्नास्ति तदा दीपचन्द्र- स्य पितु' स्वरूपचन्द्रस्य दौहित्राणामर्थात् दोपचन्द्रभगिनीपुत्राणामेवा- धिकार इति ।- भत्र प्रमाणम्- पितुरपि प्रपौत्रपय॑न्ताभावे पितृदोहित्रस्याधिकारी योदव्यो धनि- दौहित्रस्यव-इति दायभागमायालखनम् ११३००11०11 द्वितायप्रश्नस्योत्तरम्- यदि दासमनी दापचन्द्र स्वपितरि विद्यमाने मृते वा दीपचन्द्रपल्या वेदवत्या विद्यमानापा जरस्थावरात्मकतदने श्रायत्तत्व सम्पादितपती

व्यवस्थापत्रसंख्या-२८२
स्यात्तत्र तस्या अायत्तत्त्वं यदि तपितृक्तदानानुसारेणा भुत्तदा तद्धनस्य
दासमन्याः पितृदत्तसौदायिकस्त्रीधनत्वेन दासमन्याः मरणोत्तरं तत्त्यक्तपितृ
दत्तसौदायि स्रोधने तदुहियभावे तत्पुत्रस्य सर्वचन्द्रस्य अधिकारे जावे
सति तन्मरणोत्तरं तत्यतयने सर्वचन्द्रस्य पुत्रपौवप्रपौत्ररहितस्य पल्या
विश्वेश्वरीदेव्या एवाधिकारः । सयंचन्द्रपन्यां विश्वेश्वरीदेव्यां विद्यमा
नायां सर्वचन्द्रप्रमातामहस्वरूपचन्द्रयोहित्राणां नाधिकारः। एवञ्च सति
विश्वेश्वरीदेव्या दीपचन्द्रदौहित्रपन्यास्तदनाधिकारत्वे दीपचन्द्रभागिनी.
पुत्राणां चानधिकारित्वे दीपचन्द्रत्यक्तधने अयमेव व्यतिक्रमो जातः । दीप.
चन्द्रस्य धनं तत्कृतस्वफुल्योद्देश्यफदानानुसारेण तत्कन्यास्त्रत्यास्पदञ्चे-
चन्मरणोत्तरं तस्यास्त्यात धनमिति । तत्र च धने तत्पुत्रस्य सर्वचन्द्र-
स्याधिकारित्वेन तम्मरणोत्तर तदेव धनं सर्चचन्द्रत्यक्तमि ते च । यदि च
मराजकरस्थावरामकतद्धने दासमन्या अायतलमुपरिलिखिततपितृकृत.
दानानुसारेण नाभूदथवा प्रथमप्रश्नलिखितरीत्या अायत्तत्वमेव नाभूत्ता
प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रकारेण दोपचन्द्रभागिनीपुत्राणामधिकारित्वे दोप-
चन्द्रदौहित्रपन्या विश्वेश्वरीदेव्या अनधिकारित्वे च दीपचन्द्रत्यक्तधने
कश्चिद् व्यतिक्रमो नास्ति-इति वनदेशचलितमनुदायभागायतत्त्वव्यवहार-
तत्त्वव्यवहारमातृकादायभागटोकादायक्रमसंग्रहविधादार्णवसेतुविवादमगाण-
यादिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्था ।।-
अत्र प्रमाणम्
प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनुवचनम् ||२||
उदया कन्यया वापि पत्युः पितृहेऽथका ।
भर्तुः सकाशात पित्रोर्वा लब्धं सौदायिक स्मृतम् ॥ इति दायभाग:--
दिनत्यधूतकात्यायनवचनम् ॥२॥
विवाहकाले तत्पूर्वापरकाले वा स्त्रिये यद्धनं पित्रा दत्तं तत्र तु धनं
प्रथमंकुमार्यास्तदनन्तरमूढायाः पुत्रवतीसम्भावित स्त्रयोस्तदनन्तरं बन्ध्या-
विधपयोश्चाधिकारः। सर्वदुहित्रभावे पुत्रादेर्योतुकधनवत् कमेणा-
धिकार:- इति दायकमान्यजिवनम् ॥३॥

व्यवस्थापत्रसंख्या-१८२-१८३ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तधा-इत्यादि दायभागादिप्रन्थ- धृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥४॥ प्रथमप्रश्नोचरलिखितप्रमाणञ्चेति ॥५०००|| अगरेजीशब्दप्रतिपाद्यचत्रिंशदधिकाष्टादशशतान्दीयअगस्यमासो- कादशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दचेति ।। श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण T (४५) इ सन १८३४ सालेर ७ एपरेल दिवस सोमवार एइ आदालत अर्थात जेला सिरहतेर देयोनि श्रादालतेर रोवकारि द्वाराय मोकाम कलिकातार सदर देशोनि भादालते पण्डितेर पर सोल- हनुमानदत्तराय ओ भोलादत्तराय यो गणेशदत्तराय मुईइयान मृत चण्डीदत्तेर वनीता मुलम्मान बोलछनचौधुरायन ओ परमेश्वरिदत्त मुद्दाहालेहेम मोकदमा कालेटरि सेरेस्ताय नाम लिसा ओ जेला तिहोतेर आदालतेर मोताल के देहा निजामत हादि परगनार मौजे वळुल- पुर ओ गयरहते दखल पाओर प्रार्थनाय मवलगे ८७३५ तृगुन मालगुजारि देहा निजामतेर तायदादे ।। प्रथम प्रश्न:- चौधुरि देवदत्तराय जाति ब्रह्मण। एहार चारि पुत्र । प्रथम विरसिंहराय, ताहार पुत्र चण्डीदत्तरायनामे छिल। ताहार वनिता महम्मात छोलछन, यो चिरसिंहेर कन्या मुछम्मात चान्द्रावति चण्डीवत्र सहोदरा भनि छिल, ओ चन्द्रावति मजकुरार पुत्र व्यवस्थापत्रसंख्या-२८३ ५५३ 'परमेश्वरिदत्त अाले, श्रो देवदत्त मजकुरेर द्वितीय पुत्र सिवसिंह, तस्य पुत्र प्रानकट्टीराय तस्य पुत्र सदाशिवराय तस्य पुत्र कृष्ण; दत्तराय मुद्दइ वर्तमान, ओ देवदत्तराय मजकुरेर तृतीय पुत्र हरदिसिंहराय, तस्य दुइ पुत्र भैरवदत्त श्री हनुमानदत्तराय मुद्दइ वर्तमान पाये, यो भैरवदत्तेर एक पुत्र सम्मुदत्तराय, तस्य पुत्र भोलानाथराय मुद्दइ वर्तमान आछे पो देवदत्त मजकुरेर चतुर्थ पुत्र जयकृष्णराय निसन्तान मृत्यु हय । श्रतएव विज्ञाशा कराजाय ये चएडीदत्त मजकुर ब्राह्मन जाति आपन भग्निर सन्तान परमेश्वरिदत्तके कर्तापुत्र करियाछे, शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि ना॥ द्वितीय प्रश्न :- यद्यपि कर्तीपुत्र असिद्ध हय, तवे हेवानामार लिखित धन ओ परमेश्वरिदत्तेर नामे एकरारनामा शास्त्र मत सिद्ध हइवेक कि, ना, ओ एइ सोलेिर सम्बलीत हेवानामा श्रो एकरार- नामा ओ कुरशीनामा दृष्टि करिया मैथिलि शास्त्रानुसारे प्रति उत्तर लिखेन इति ।। श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं तत्संवलितं दानपत्रं संवित्तत्रं वंशावलोपत्रं च यदरेजीशब्दप्रतिपाद्य चतुस्त्रिंशदधिकाष्टादश शताब्दीयापरेलमासीयद्वाविंश- तितमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याराबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते || प्रथमप्रश्नस्योत्तरम् - प्रथमप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति अर्थात् पितामहौत्रादौ विद्यनाने सति पुत्रोत्रप्रपोनरहितलाक्षागजातोपचरडोदत्तमैथिजेन सोदरभगिनीपुत्रः पर- मेश्वरीदत्तः कृत्रिमपुत्रः कृतश्चेत् स कृत्रिमपुत्रो मिथिलादेशोयशास्त्रानु- सारेण सिद्ध्यति । यद्यपि दत्तकमीमांसामन्ये ब्राह्मणाना मागिनेयास पुत्रता- - व्यवस्थापत्रसंख्या-१८२-१८३ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा-इत्यादि दायभागादिग्रन्य- धृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ||rtl प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणञ्चेति 10101100011 अङ्गरेबीशन्दप्रतिपाद्यचत्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयअगत्यमासोरे- कादशदिनसम्बन्धिसोमवासरे मयेयं व्यवस्था दचेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (४५)-इ सन १८३४ सालेर ७ एपरेल दिवस सोमवार एइ आदालत अर्थात जेला विरहतेर देओनि आदालतेर रोवकारि द्वाराय मोकाम कलिकावार सदर देओनि आदालते पण्डितेर पर सोल- हनुमानदत्तराय ओ भोलादत्तराय श्री गणेशदत्तराय मुईइयान मृत चण्डीदत्तेर वनीता मुछम्मात छोलछनचौधुरायन ओ परमेश्वरिदच मुद्दाहालेहेम मोकईमा कालेदृरि सेरेस्ताय नाम लिखा ओ जेला तिहोतेर श्रादालतेर मोतालके देहा निजामत हादि परगनार मौजे वछुल. पुर ो गयरहते दसल पाओओर प्रार्थनाय मवलगे ८७३५ तृगुन मालगुजारि देदा निजामतेर तायदादे ।। प्रथम प्रश्न:- चौधुरि देवदत्तराय जाति ब्राह्मण । एदार पारि पुत्र । प्रथम विरसिंहराय, ताहार पुत्र चण्डीदत्तरायनाने छिल। ताहार वनिता नहम्मात छोलछन, श्रो शिरसिंहेर कन्या मुछम्मात चान्दापति चण्डीदत्तर सहोदरा ममि छिल, ओ चन्द्रावति मजकुरार पुत्र व्यवस्थापनसंख्या-१८३ ५५९ 'परमेश्वरिदत्त पाछे, पो देवदत्त मजकुरेर द्वितीय पुत्र सिसिंह, तस्य पुत्र श्रानकट्टीराय तस्य पुत्र सदाशिवराय तस्य पुत्र कृष्ण: उत्तराय मुदइ वर्तमान, ओ देवदत्तराय मजकुरेर तृतीय पुत्र हरदिसिंहराय, तस्य दुइ पुत्र भैरवदत्त पो हनुमानदत्तराय मुद्दइ वर्तमान आछे; ओ भैरवदत्तेर एक पुत्र सम्भुदत्तराय, तस्य पुत्र भोलानाथराय मुदइ वर्तमान पाछे; पो देवदत्त मजकुरेर चतुर्थ पुत्र जयकृष्णराय निसन्तान मृत्यु हय । अतएव जिज्ञाशा कराजाय ये चण्डीदत्त मजकुर ब्राह्मन जाति आपन भग्निर सन्तान परमेश्वरिदत्त के कर्त्तापुत्र करियाछे, शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि ना॥ द्वितीय प्रश्न :- यद्यपि कर्तीपुत्र असिद्ध हय, तवे हेवानामार लिखित धन ओ परमेश्वरिदत्तर नाने एकरारनामा शास्त्र मत सिद्ध हइवेक कि, ना, प्रो एइ सोलेर सम्बलीत हेवानामा प्रो एकरार- नामा श्रो कुरशीनामा दृष्टि करिया मैथिलि शास्त्रानुसारे प्रति उत्तर लिखेन इति ।। श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं तत्सवलितं दानपत्रं संवित बंशावलोपत्रं च यदक्षरेजीशब्दप्रतिपाद्य चतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयापरेलमासीयद्वाविंश- तितमदिनसम्बन्धिमङ्गज्ञवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहराबोधो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।। प्रथमप्रश्नस्योत्तरम् - प्रथमप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति अर्थात् पितामहौवादी विद्यमाने सति पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहितवाह्मण जातोयचण्डोदत्तमथिलेन सादरभगिनीपुत्रः पर- मेश्वरीदत्तः कृत्रिमपुत्रः कृतश्चेत् स कृत्रिमपुत्रो मिथिलादेशोयशास्त्रानु- सारेण सिद्ध्यति । यद्यपि दत्तकमीमांसाग्रन्ये ब्राह्मणानां भागिनेयस्य पुत्रता- व्यवस्थापनसंख्या-१८३ निषेधक वचन लिखितमस्ति, परन्तु तद्वचन वास्तव दत्तकपुनविषयकमेव, न तु कृत्रिमपुनविषयम्, अथ च सर्चस्मृतिप्रधानमनुस्मृती कृत्रिमपुरता- विषये मनुवचनोक्तसजातीयत्वादेरेवाप्रयोजकता दृष्टवा सर्वस प्राचीना- र्वाचनमाथि ननिबन्धकारैः स्वस्वग्रन्थेषु स्वस जातीयः कश्चित् कृत्रिमपुत्रः करच इत्येव लिखितः, भागिनेयः कृत्रिमपुत्रो न कर्तव्य इति निषेधक: केनारिन लिखित', वर मैथिलमहामहोपाध्यायधर्मशास्त्रभ्यवस्थापककेशव मित्रैर्यत्र पिता भ्रानादिर्वा कृत्रिमपुत्रः कृतस्तत्रावि पितृलेनैर निर्देशो न पुत्रलेन भ्रातृत्तेन-इति द्वैतपरिशिष्टम-ये लिखि मत । एवञ्च सति पित्र- पेक्ष्या भ्रात्रपेक्षया च भागिनेयस्य दत्तकमोमासाग्रन्थलिखितपुरतानिषेध- प्रयोजकवरुद्धसम्बन्धस्याधिक्य नास्ति । एव दत्तकपुत्रस्य स्वजनकपित्रादीना पिण्डदातृत्व निषिद्धमिति सर्वेषां निबन्धकाराणा सम्मतम् । मैथिलग्रन्थ- काराणांमते कृत्रिमपुत्रस्य स्वजनकपित्रादीनां पिण्डदातृत्वमप्यस्त्येव-इति शुदिविवेके रुद्रधरोपाध्यायैमथिलैलिखितमस्ति । अतो मैथिलग्रन्थकारा ग्गा मते दत्तकपुत्रवृत्रिमपुत्रयोविषयमात्र एव महान् भेदोऽस्ति । श्रतएव मि- थिलादेशे सजातीयः कश्चित्' कृत्रिमपुरः रिपते, तत्रामि पितामह पौवाद्यपेक्षया स्नेहातिशात् पुत्रगुणाधिस्यदर्शनाच प्रायशो मैथिल- प्राशे झणविशेषतो भागिनेय. कृत्रिमपुत्रः क्रियते इति सर्वदैव तद्देश- व्यवहारः। एवञ्च सति मनुस्मृतिसम्मताया मिथिलादेशीयप्रन्यानुसारेण वद्देशव्यवहताया ब्राह्मणाना मागिनेयस्य मृत्रिमपुरताया मैथिलनिबन्ध कारप्रणीतदत्तकमीमासामन्थलिखितवचनबाध्यता नास्ति, यतस्तद्देशाचार- जात्याचारकुलाचारादिसिदस्य कस्यचिदपि कर्मणो बाघस्तदन्यदेशीय- प्रन्यानुसारेण तदितरजातिप्रचलितग्रन्यानुसारेण तदन्यकुलपचलितग्रन्था- नुसारेण वा भवितु न शक्रोति, देशाचार जात्याचारकुलाचारादिरमि मन्वादिधर्मशास्त्रे प्रचलप्रम णत्वेनोपन्यासात् । यत्र विषयविशेषे स्वदेशीर. परदेशीयमन् पयोविशेषस्तत्र विषये स्वदेशीयग्र पस्यैव प्रारल्पेण प्रच रस्य भवितुं युपत्ताच्चेति ।- १. कश्चित-ज्यपा २.निबन्धकाराप्र०-न्या।

व्यवस्थापनसंख्या-१३ ५६१ . अत्र प्रमाणम्- सदृशं यं प्रकुर्वीत गुणदोपविचक्षणम् । पुत्रं पुत्रगुणैर्युक्त स विज्ञेयस्तु कृत्रिमः ।। इति मनुवचनम् ||१|| अपुत्रेण सुतः कार्यो याहक् ताहक प्रयत्नतः । पिण्डोदकक्रियाहेतो मसंकीर्तनस्य च ॥ इति कल्पतरुविवादरत्ना- करप्रभृतिग्रन्थधृतवृहस्पतिवचनम् ||२|| सद्भिराचरितं यत् स्याद्धाम्मिकैश्च द्विजातिभिः । तद्देशकुल जातीनामविरुद्धं प्रकल्पयेत् ॥ इति मनु(८/४६ )- वचनम् ॥३॥ जातिजानपदान्' धर्मान् श्रेणीधमीश्न धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधीश्च स्वधम्म प्रतिपालयेत् ॥ इति मनु वचनम् ॥४॥ देशजातिकुलानाश्य ये धर्माः प्राक् प्रतिताः । तथैव ते पालनीयाः प्रजाः प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा ।। इति बृहस्पति- वचनम् ॥५॥ यस्मिन् देशे य प्राचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशमुपागतः ॥ इति याज्ञवल्क्य- वचनम् ॥६॥ मन्वर्थविपरीता या सा स्मृतिर्न प्रशस्यते । वेदार्थोपनिवन्धृत्वात् प्राधान्यं हि मनोः स्मृतम् ।। इति वृहस्पति- (पृ. २३३ )वचनम् ॥७॥ यत्र पितेत्र मानादिर्वा कृत्रिमपुत्रः कृतस्तत्रापि पितृलेनैव निर्देशो न तु पुत्रत्वेन भातृत्वेन । इति द्वैतपरिशिष्टप्रन्थलिखनम् ॥८॥ स च पुत्रखकरणस्य पिण्डप्रदः निजपित्रादीनां पिरडप्रदत्वं तस्य तिष्ठत्येव- इति शुद्धिविवेकग्रन्थलिखनम् ॥६॥ १. जातिजानुपदान-ध्यप० ।

व्यवस्थापनसंख्या-१८३
५६२
केवल शास्त्रमाश्रित्य न कतव्यो विनिर्णयः।
विवादचिन्ता-
युक्तिहीनविचारेण धर्महानिः प्रजायते ॥ इति ।
मण्यादिग्रन्थधृतवृहस्पतिवचनम् ॥१०ll,
स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान् व्यवहारतः।-इति याज्ञवल्स्य-
वचनम् ॥१२॥
द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्-
प्रथमप्रश्नोत्तलिखितरीत्या मिथिलादेशीयशास्त्रानुसारेण कृत्रिमपुत्र-
तायाः सिद्धी सत्या द्वितीयप्रश्नलिखिवरील्या कृत्रिमपुत्रतापामसिद्धत्वेनाव-
गम्यमानायामप्युभयथैव परमेश्वरीदत्तोद्देश्यकदानपत्र सवित्पत्रं च चण्डी.
दत्तस्य गृहावशिष्टे तपल्याश्च यावजीव स्वपतिलोचितग्रामाच्छादनोप-
युक्तादावश्यकविधवाघांद्याचरणोपयुक्ताच धनादवशिष्टे चण्डीदत्त-
नाम्नः कन्यकारपेत् कुमार्य्यस्तामा विवाहोपयुक्तात्तामा च स्वपिशकुलोचि-
तपासाच्छादनोपयुक्ताच्च घनादवशिष्टे अन्येषा तदनमात्रीपजीविनामपि
यावज्जोय चण्डीदत्तनाम्नो जीवनावस्थासदृशपासाच्छादनोपयुक्तादावश्यक-
धर्माद्याचरणोपयुक्ताच धनादवशिष्टे च सवित्पत्रलिखितत्रिमुखाख्यघट्ट-
सम्बन्धिशिवालयबन्धयोर्टटीकरणपरिवारोपयुक्ताच धनादवशिष्टे मदि-
मिनामान्तर्गततडागोत्सर्गोपयुत्ताच धनादवशिष्टे च धने सिद्धयति ।
दानपत्रसवित्रत्राभ्या विवादास्पदीभूतधने चण्डीदत्तनाम्नः पुनपौत्रप्रपौत्र-
रहितस्य केचित् सह साधारण्यस्यानवगमेन तयोः पत्रयोर्विवचनया
शास्त्रानुसारेण देयद्रव्यस्य तस्मै कृत्रिमपुत्रय स्वशिष्यत्वेन भागिनेयत्वेन च
प्रोतिपूलकदानस्यावगमेन नैताटशदानसिदो बाधकसामान्याभावात्-इति
मिथिलादेशचलितमनुस्मृतियाचवल्क्यस्मृतिबहसतिस्मृतिविवादचिन्तामणि-
विवादरत्नाकरविवादचन्द्रकातरूपारिजातद्वैतनिर्णयद्वैतपरिशिष्टशुदिविवेक-
शुद्धिचिन्तामविस्मृतसारमभूतिग्रन्यानुसारियो व्यवस्था ||
अत्र प्रमाणम्-
प्रदानं खाम्यकारणम् - इति मनुवचनम् ॥१॥
कुटुम्बमक्लयसनादेयं यदतिरिच्यते-इति विवादचिन्तामण्यादि-
मन्यकृतहरपतिवचनम् ॥२॥

व्यवस्थापत्रसंख्या-१८३-१८४ ५६३ सर्वस्वं गृहवर्जन्तु कुटुम्बभरणाधिकम् । यद्न्यं तत् स्वकं देयमदेयं स्यादतोऽन्यथा-इति तत्तद्ग्रन्यधृतका- त्यायन(६४०१ पृ७६ )वचनम् ॥३॥ भृतिस्तुष्टया परायमूल्यं स्त्रीशुल्कमुपकारिणे । श्रद्धानुग्रहसंप्रीत्या दत्तमष्टविध स्मृतम् ॥ इति तत्तद्गन्थधृतबृद्द- स्पति(पृ० १३८)वचनम् ||४|| कन्याभ्यश्च पितृद्रव्यादेयं वैवाहिकं वसु । इति तत्चद्ग्रन्थधृतदेवल- .. वचनम् ॥५॥ अनूढानान्तु कन्यानां वित्तानुरूपेण संस्कारं कुर्यु:-इति तत्तद्ग्रन्ध- (विचि. पृ० २१० धृतविष्णुवचनञ्चेति ॥६॥ इशवीराब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दोयसितम्बरमासीयप्रथमदि. नसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया विचारपत्रप्रश्नपत्रदानपत्रसवित्पत्रवंशावलोपत्रैः सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिण प्रश्न:- (४६)--यद्यपि कोन व्यक्तिर दुइ सन्तान थाके, आर ज्येष्ठ सन्तान प्रापन पिता वर्तमाने ऐ पिता यो भ्रातार एकात्रवर्तिते. कोन स्थावर वस्तु आपन परिश्रम ओ क्षमतार द्वाराय उपार्जन करे, आर पितार जीवदशा पय्यन्त ऐ वस्तुर उपस्वर्त साधारणेर खरवे आसियाथाके, एमत स्थले पितार लोकन्तपरे ऐ वस्तु उभये दुइ भ्राताय अंश हइते पारे कि सोपार्जित सरवे ऐ ज्येष्ठ भ्राता समुदय ऐ वस्तु पाइवेक, आर यद्यपि कनिष्ठ भ्राता ऐ वस्तुर अंशेर हकदार हय, वचे कि आन्दाज पाइवेक-पइ प्रश्नेर प्रत्युत्तर यथाशाने लिखिवेन इति ।

५६४ व्यवस्थापनसख्या-१८४-१८५ श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र यदीशवीशब्दप्रतिपाचनिगमगुणगजेन्दुमितान्दीप जानवरोमासाससप्तमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो पातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते ।। कस्यचिद् व्यक्तिविशेषस्य द्वयो पुत्रयोर्मध्ये ज्येष्ठपुत्रेण जीवति पितरि तेन सह भ्रात्रा च सहाविभक्कवादशायामव किश्चित् स्थावर धन स्वशक्त्या स्वायासेन चोपार्जित स्यात् अप च पितुर्जीवनदशापर्यन्त तदुपस्वत्व साभारण्येन व्यायत स्यात्तत्र साधारणद्रव्यापघातेन तद्धनमति चेत्तदा पितुन्निधनानन्तर तव्य विधा विगज्य भागद्वयमुपाज्जक्स्य ज्येऽस्वैका भाग कनिधस्य, ज्येष्ठस्य तद्धन विद्याधन चेत्, अथ च कनिष्ठोकि तत्समविद्यलदायकविद्या या भवत्, तदापि ज्येष्ठोपार्जितविद्यापो तादृशस्य कनिष्ठस्यापालिाखतप्रकारण तवायाथधकार, यदि च तरन साधारण द्रव्यानुपघातेन ज्येष्ठेन अर्जितमभूतदा तत्र धने स्वोपार्जितत्वमात्रेयो पार्जकस्य ज्येष्ठमात्रस्यैवाधिकारो न स्वेकानवचितया कनिष्ठभातु स्वामित्वे नाधिकार । किन्तु भ्रातृस्लेहेन पौरुषबुद्ध्या वा यदि ज्येष्ठो भ्राता कनिष्ठ भ्रात्रे किञ्चिद्ददाति तदा तदनुसारेणोपार्जकज्येष्ठदत्तपरिमितधने कनिष्ठस्या धिकार -इति वनदेशचलितमनुदायभागदायतत्वदायभागटीकादायक्रम सग्रहविवादावसेतुविवादभनार्णवादिनथानुसारिणी व्यवस्था । इशवोशन्दप्रतिपायनिगमगुणगजे दुर्मिवान्दीयसितम्बरमासोयगजे दु मितादनसम्बधिगुरुवासरे मयेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्राद्यनाथमिश्रेण (४७)--प्रश्न शुद्रादिर दत्तकपुत्रप्रहएकालीन तन्निमित्त शाखसम्मत कि कि कर्म कर्तव्य चित, पार यदि स्यात् ग्रहणकालीन ताहार

.
व्यवस्थापनसंख्या-१८५
फर्तव्य कम्म सकल हइयाधाके, एवं तस्य पर दत्तक पुत्र ग्रहीतार
मृत्यु हइले कोनो ज्ञाति द्वारा ऐ दत्तक पुनेर चूडाकरण इत्यादि
हइले ऐ दत्तक पुत्र सिद्ध हइया ऐ ग्रहीतार स्वत्वे स्वत्वाधिकारि
हइते पारे कि ना इति ॥
श्रीजयतितराम
प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं यदगरेजीयब्दप्रतिपाद्यचस्त्रिंशदधिकाष्टादश-
शताब्दीयापरेलमासीयपञ्चदशदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्तं वदव-
लोक्य यादृशमोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते-
शूद्रादीनां दत्तकपुत्रग्रहणसमये एतानि कर्माणि शास्त्रतः कर्तुमुचि-
तानि भवन्ति । प्रथमतः पुत्रदानं तसितृकृतम्, तत्सित्रनुज्ञया तन्मातृकृतं वा,
तदनन्तरं पाहतहोमादिकं विधाय ग्रहण ग्रहीतृकर्तृ कम्, तदनुराया तार-
लोक के वेति। यद्यपि दत्तकपुत्रग्रहणसमये पुत्रग्रहणाजभूतानि सवाण्येव
कर्माणि जातानि स्युः, तस्मात् परं दत्तकपुत्रग्रहीतुमरणं जातं चेद्, अपि
केनचित् तज्ज्ञातिना तस्यैव दत्तकपुत्रस्य चूडाकरणादिसंस्कारा ग्रहीतृगो।
णार्थात्प्रहीतृपुरुषस्य नामगोत्रे समुच्चार्य जाताश्चेत्, तदा स एव दत्तका
पुत्रो ग्रहीतुः पुत्रो भूत्वा ग्रहीतृत्यक्तधने स्वत्वाधिकारी भवत्येव-इति वङ्ग-
देशचलितमनुदायभागदायतत्त्वदायभागटोकादायकमसंग्रहविवादार्णवसेतु-
विवादमङ्गार्णवदत्तकमीमांसादत्तकचन्द्रिकादत्तकदीधितिदत्तकनिर्णयादिग्रन्या-
नुसारिणी व्यवस्थेति ।।---
अत्र प्रमाणम्-
माता पिता वा दद्याता यमद्भिः पुत्रमापदि ।
सदृशं प्रीतिसंयुक्त स ज्ञेयो दत्रिमः सुतः - इति मनुवचनम् ॥१॥
नलेबैकं पुत्रं दद्यात् प्रतिगृहीयाद्वान्यत्रानुज्ञानाद्भर्तुः। पुत्र प्रतिग्रही.
प्यन् वन्धूनाहूय राजनि चावेद्य निवेशनस्य मध्ये व्याहृतिभिर्तुला
अदूरखान्धवं बन्धुसनिकृष्टमेव प्रतिगृहीयाद्-इति दत्तकमीमांसादि-
(पृ० १०१११०२ )ग्रन्थधृतवशिष्ठवचनानि ॥२॥

व्यवस्थापनसंख्या-५ राजान ग्रामस्वामी । बन्धूनाहूय सर्वास्तु ग्रामस्वामिनमेवेति वृद्ध- गोतमस्मरणातइति दत्तकमामासा( पृ० ६६ अन्य लखनम् ।।३।। वन्धनात्मपितृमातृबन्धून ज्ञातीन् सपिण्डान् । वान्धवाघावानं दृष्टार्थ राजाह्वानरत्-इति दचकमीमासा(पृ०६)प्रन्थलिखनम् ॥४॥ चूडाद्या यदि सस्कारा निजगोत्रेण वे कृताः । दत्ताधास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते।।-इति दचकमीमासादि- (पृ.७४ अन्रधृतकालिकापुराणवचनम् ॥५॥ दत्चाद्या अपि तनया निजगोत्रेण सस्कृताः। आयान्ति पुत्रर्ता सम्यगन्यबीजसमुद्भवा ।।- इति दचक्मन्यधृव- (पृ० ७४) कालिकापुराणवचनम् ॥६॥ तस्मादेषां पञ्चाना पुत्राणा शौनकवशिष्टान्यतमविधिपरिग्रहेणैव पुत्रत्व नान्यथा-इति दत्तकमीमामा पृ १०६ ) ग्रन्थलिएनम् तस्मादत्तकादिपु सस्कारनिमित्तमेव पुत्रत्वगिति सिद्धम् । दानग्रहणहो- माद्यन्यतमाभावे पुत्रत्वाभाव एव-इति दत्तकमीमासा(पृ. १११ प्रन्थ- लिखनम् ॥८॥ सर्वे ह्यनीरसस्यैते पुत्रा दायहराः स्मृताः-इति दायभागदिमन्य धृतदेवलवचनम्वेति ॥ ९॥ इरावीशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितमरमामायगजेन्दु मितदिनसम्बन्धिगुरुवासरे मयेय व्यवस्था दचेति ॥ श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थार तरजमावागजाभापाय-- हजुरेर समर्पित करा सवाल, जाहा अगरेजी सन २८३४ साले अपरेल मासेर १५ तारिखे दिवस मङ्गलवारे आमि पाइ. यालिलाम, ताहार दृष्टे मत बोध हइल तदनुसारे उत्तर लिखितेक्षि-

व्यवस्थापनसंख्या-१८५
प्रश्नोत्तरेर भाषा-
शूद्रादिर दत्तक पुत्र ग्रहणकालीन शाखानुसारे एइ सकल
फर्म कर्तव्य उचित । प्रथमतः जनक पिता किम्या तदनुमतिक्रमे
जननी माता पुत्र दान करिवेक । ताहार पर ग्रहोता व्यक्ति किम्वा
तदनुमतिक्रमे ताहार पत्नी व्याहृति होम प्रभूति शास्त्रानुसारे करिया
पुत्र ग्रहण करिवेक । आर यद्यपि दत्तक पुत्र ग्रहणकालीन पुत्र.
ग्रहणेर अङ्ग ये सकल कर्म ताहा हइया थाके, ताहार पर दत्तक
पुत्र प्रहीता व्यक्तिर मृत्यु हयोयाते ताहार कोन ज्ञातिर द्वाराय
ऐ दत्तक पुत्रेर चूडाकरण प्रभृति संस्कार ग्रहीता पितार नाम
गोत्र उल्लेख करिया हइयाथाके, तवे ऐ दत्तक पुत्र सिद्ध हइया
ग्रहीतार त्यक धने स्वत्वाधिकारी हइवेक । एइ व्यवस्था वनदेश
चलित मनु ओ दायभाग ओ दायतत्व भो दायभागढीका ओ
दायक्रमसंग्रह ओ विवादार्णवसेतु ओ विवादभङ्गार्णव ओ दत्तक-
मीमांसा ओ दत्तकचन्द्रिका ओ दत्तकदीधिति ओ दत्तकनिर्णय
ओ गयरह ग्रन्थ सम्मत वटै इति ।
प्रथम प्रमाण मनुवचन। ताहार भाषा-माता किम्वा पिता
किम्वा उभये ग्रहीता व्यक्तिर पुत्र ना थाना प्रयुक्त प्रीति पूर्वक
आपन पुत्रके सजातीय ग्रहीता व्यक्तिके दान करे, पे पुत्र ग्रहीता
व्यकिर दत्तक पुत्र जाना जाइवेक । इति ॥ १ ॥
द्वितीय प्रमाण वशिष्ठ मुनिर वचन सकल, दत्तकमीमांसा
प्रभृति ग्रन्थेर लिखित । ताहार भाषा-ये व्यक्तिर केवल एक
पुत्र थाकिवेक से व्यक्ति ऐ पुत्रके काहाकेो दिवेक ना । एवं
ग्रहीता व्यक्ति भो ग्रहण करिवेक ना। कारण एइ ये ऐ पुत्र ऐ
जनकेर पूर्व पुरुपेर सन्तानेर निमित्त थाकिवेक । एवं खीलोक
पतिर अनुमति व्यतिरेक पुत्र दिवेक ना, ओ लइवेक नार
एवं पुत्रग्रहण ये करिवेक से बन्धुलोकेर आह्वान एवं राजार
निकट निवेदन ओ व्याहृति होम प्रभृति करिया वन्धुलोकेर
साक्षात् ग्रहण करिवेक इति ॥२॥

. ५६८ व्यवस्थापनसंख्या-१८५ तृतीय प्रमाण दचकमीमांसा प्रन्थ लिखित । ताहार भाषा-द्वितीय प्रमाण वशिष्ठ मुनिर वचन। ताहाते लेखा थाछे ये राजार निकट निवेदन करिया पुत्र ग्रहण करिवेक । ए स्थले राजा शब्दे ग्रामस्वामी, अर्थात् जमिदार, जाना जाइका कारण एइ ये युद्ध गौतम मुनि कहियाछेन ये वन्धुसकर एवं प्रामस्वामी अर्थात् जमिदारेर अाह्वान करिवेक । अर्थात् सहार- दिगफे शातो कराइवेक इति ॥ ३॥ चतुर्थ प्रमाण दत्तकमीमांसा अन्यलिपित । ताहार भाषा- वन्धुलोक ओ ज्ञातिलोवेर अाह्वान यत्नपूर्वक करिवेक । ए स्थले वन्धु शब्दे आत्मवन्धु पो पितृवन्धु श्री मातबन्धु श्री- ज्ञातिशब्दे सपिण्ड जाना जाइवेक; ओ पन्धु पो सपिण्डेर श्राह्वानर प्रयोजन एइ ये इहारदिगेर ज्ञातसारे ये दत्तक पुत्र ग्रहण करिवेक से दत्तक पुत्र लोकेते प्रकाश हइवेक । येमन राज निवेदनेर प्रयोजन अर्थात् इहारदिगेर ज्ञातसारे ग्रहीत दत्तक पुत्रके फेह मिथ्या करिते पारिवेक ना ॥४॥ पश्चम प्रमाण-दत्तकमीमांसा प्रभृति अन्य धृत कालिकापुराण. वचन । ताहार भाषा-चाल केर चूडाकरण प्रभृति संस्कार यदि प्रहीतार नाम गोत्र उल्लेख करिया हइया थाके तवे दत्तक प्रभूति पुनेरा ग्रहीतार पुत्र हयेन । न तु वा दास बला जाइवेक इति ॥५॥ पष्ठ प्रमाण-ऐ सकल प्रन्थ धृत कालिकापुराणवचन । ताहार मापा-दत्तक प्रभूति पुन यदि ग्रहीतार नाम गोत्र उल्लेख फरिया सस्कृत हया थाकेन तवे ऐ पुरा अन्येर औरस जात हइतेश्रो प्रहीता व्यक्तिर पुत्रता सम्यक् प्रकारे प्राप्त हयेन इति ॥ ६॥ सप्तम प्रमाण-दत्तकमीमांसा ग्रन्थ लिखित । ताहारभाषा- दत्तक प्रभृति पाच प्रकार पुत्रेर प्रति शौनकमुनिर कथिव किम्वा .

. व्यवस्थापनसंख्या-१८५-१८६ ५६६ वशिष्ठमुनिर कथित ये प्रकार पुत्र ग्रहणेर विधान आछे ताहार 'मध्ये कोनो एक प्रकार विधान करिले ग्रहीतार पुत्रता सिद्ध , 'हय । न तु वा हय ना इति ॥ ७॥ अष्टम प्रमाण-दत्तकमीमांसा अन्य लिखित । ताहार भाषा- ये हेतुक दत्तक प्रभृति पुत्रेर संस्कार करातेइ पुत्रता हय-एइ कथा स्थिर । अतएव दान किम्वा ग्रहण किम्बा व्याहृति होम प्रभृति, ये विधान नियमित आहे, ताहार मध्ये यदि कोनो एक 'कम्म ना हय तवे उहार पुत्रता सिद्ध हय ना इति ॥८॥ नवम प्रमाण-दायभाग प्रभृति प्रन्थ धृत देवलमुनिवचन । -ताहार भाषा-ये व्यक्तिर औरस पुत्र ना थाके, ताहार दत्तक प्रमृति पुत्रेरा धनाधिकारि हयेन इति ॥ ६॥ अगरेजी सन १८३४ साले। सेतम्बरमासेर १८ तारिके दिवस वृहस्पतिवारे एइ व्यवस्था दाखिल करा गेल ||-- (४८;-लं०६ श्रापिल सन १८३४ साल- रुवकारि आदालते देोनि मो० ताजपुर परगने खोरद नागपुरेर एजेण्ट गवरनर' जानेरेल शाहेब वाहादुरेर मोहकमा कापतान तामश डिनगेप एजेण्ट साहेवेर बैठके सन १८३४ शालेर २६ मार्च मोतावक सन १२४० साल १७ चैत्र मोफके सन १२४१ सालेर ५ चैत्र दिवस शनिवार- चेतरामतेओरि- श्रापिलाएट सावेक मुद्दर-- आशानाथतेोरि- रेप्पाडएट सावेक मुद्दामालेहे मोकदमा मोजे खटका ओ मौजे देशउत परगने खोफरा: माद्यने परगने खोरदनागपुरेर मोछम्मात सुमित्रातेरिनेर १. गववरजानेरेन-व्य. 3 ५७० व्यवस्थापनसख्या-१८६ अक हिस्याय दखल पाइवार वावद एशिष्टएट कमिशनर साहेवेर फयशलार नाराजी।।- इहार पूर्वेशन हालेर २८ फिवरेल श्री पद मासेर १४ श्रो २१ ओ २५ तारिखे एइ मोकद्दमा हजुरे स्वकार हइया मुलतपि छिल । अद्य पद मोकदमा पुनराय उभयेर मोकाविलाय रुक्कार हइल । गोविन्दनारायणतेोरि उभये सरिकानेर १ जना हजुरे हाजीर हइल | मिछिलेर समुदय कागपात श्री नभयेर कुरशि- नामा मोताहेना हइया एइ वोध हय जे वासुदेवतेओरि उभयेर मुरस छिलेन । ताहार दुइ पुत्र । ज्येष्ठ जगतमन तेश्रोरि, कनिष्ठ कृष्एमन तेरि । वासुदेवतेोरिर सन्तान हइते प्रापिलाएट चेतरामतेओरि अष्टम पुरुष भो रेष्पाडण्ट आशानायतेोरि यो गोविन्दनारायणतेश्रोरि सष्ठ पुरुष छिल, भार कृष्ण मनतेश्रोरि सन्तान हइते गोदलरामतेरि पश्चम पुरुस' थाकिया, एक कन्या भो सुमित्रातेओरिनि प्रापन बीके राखिया अपुत्रक मृत्यु हय । ओ ताहार कन्या सुमित्रा वर्तमाने आपन एक पुत्र सन्तान राखिया मृत्यु इय । श्रोताहार कन्यार सन्तान आपन बनिताके राखिया मृत्यु हय । भार जगतमनतेश्रोरि श्रो कृष्णमनतेश्रोरि उभये पितार स्थावर अस्थावर सकल विसय अर्धाद्ध अश करिया लइया दखिलकार थाफिया मृत्यु हइले । ताहारदिगेर उत्तराधिकारिरा पैतृक त्यक धने आपन २ हिश्या मतो दखिलकार थाफिया,इहारमध्ये पापिलाएट चेतरामतोरि रेष्पाडएट पाशानाथओरि पो गयरह गोदलरामतेोरि मजकुरेर वनिता सुमित्राके ताहार स्वामिर श्री स्वामिर भ्रातार हिश्यार विषय मौजे खटगाओ मौजे देसउतेर अर्द्धक हइते वेदखल करिले । मोहम्मात मजकुरार नालिस मते सन १८१८ सालेर ६ जुन तारिखे नेला रामगडा हइते मोजे खटगा प्रो मौजे देशउत ग्रामेर चारि थाना रकम अर्थात अर्द्धक र मोधम्मात . १ पुरुम-व्यए।

- व्यवस्था पत्र-संख्या-१८६ सुमित्रार स्वामिर, अर्द्धक, श्री स्वामिर भ्रातार अर्द्धक विपये दखल पाइया दखिलकार छिल! परे सुमित्रा मजकुरा आपन दखलि ऐ दुइ मौजार समुदय हिस्या मोवलगे।७५१ टाका पने. रेपाडएट पाशानाथोरिर निकट विक्रय करिया कोवाला ओ पनेर टाकार रशीद सन १८२२ सालेर आपरेल मोतावक फशलि सन १२२८ सालेर वैशाख तारिखे लिखिया दिया सन १८२१ सालेर २८ प्रापरेल तारिखे आपन स्वेच्छापूर्वक मों शहरघाटीर काजिर मोहर श्री सन १८३१ सालेर ३० आपरेल तारिखे रेजष्टरि कराइया देय । तद्वधि प्राशानाथ- तेओरि विक्रीत विपयेर पर दखलिकार पाछे । सुमित्रातेओरिनि फसलि सन १२४० सालेर भाद्र माहाते फीत करे। ताहाते चेतरामतेोरि सुमित्रार स्वामिर सगोत्र प्रयुक्त ओ अपुत्रक फौत करणे आपनाके ताहार हिस्यार हियादार करार दिया एइ नालिप करिवार खोरद नागपुरेर परगना हरेर एशिष्टएट कमिसनर साहेवेर सुमित्रार दखलि विषय आशा- नाथतेमोरिर निकट विक्रय एव वाहाते ताहार दखिलकार थाकार शाछदेते सन १८३३ सालेर २८ मे तारिखे मोकदमा डिपमिप करियाछन । प्रापिलाएट ए फयसलाय नाराज हइया सन १८३३ सालेर ११ सेतम्बर तारिखे परगना हावेर, खोरदं नागपुर ओ गयरहेर कमिसनरि मोहकमाय प्रापिलेर दरखास्त करे | परे कमिसनरि वरखास्त हइया आमार मोता- लुक होर उभयेर मोकद्दमा एइ श्रादालते मोन्तजम हय इति । रेप्पाडण्ट आशानाथतेरि जाहेर करे ये सुमित्रार स्वामिर हिस्या छिल श्री से विना श्राखेज ओ भापत्य आपन स्वामिर विशयेर पर दखिलकार थाकिया आपन सेच्छा पूर्वक मौजे, खटगा ओ मौजे देशोत ग्रामेर अर्द्धक मोवलागे ७५१ टाका पने प्रामार- निकट विक्रय करिया, कोबालाय काजिर मोहर ओ. रेजष्ट साहेवेर रेजष्टरि कराइया लिखियादेय । तद्बाध आमि ..

व्यवस्थापनसख्या-१८६ रेप्पाडण्ट आमार दखले आछे। आर मुमिना प्रापन दरालि 'जमिर मध्ये एक नहरि जमि सारिटाम्भ मओ पावि दुइ गाध, काठाल १ ओ कदम्ब १ कयाल धरके दान करे। प्रापिलाएट ताहाते मोजाइम हय ना इदि । यदि स्यात् रेप्पाडण्ट आशा- नाथतेश्रोरि जाहेर करितेछे जे मुमिनावेथोरिनेर विक्रयानुसारे विक्रित विशयेर पर दखिलकार पाछे। श्रापिलाएट चेतरामेर सहित ताहार एलाका नाइ, ओ ताहार खरिद सारदेव करिया कोवाला ओ पनेर टाकार रशीद पेप करे। किन्तु प्रकाश हइते छे ने सुमिना वे भो अविराथाकिया स्वामिर पैतृक विषय आशानाथ तेरिर निकटे विक्रय करे। मिताक्षरा ओ दाय भागेर तरजमार फेलाव मोलाहेजाय प्रकाश हइतेछे जे वेश्रो भो अविरा स्विके स्वामिर पैतृक विषय दान विक्रयेर क्षमता कदापि नाइ । ए फारण हिन्दुदिगेर शास्त्रानुसारे ओ देशाचार मते मुमित्रा वेओ अविरा रेप्पाडण्ट आशानाय तेओरिर निकटे स्वामिर पेतृक विपय विक्रय करा ओ आशानाथ मज- कुरेर ताहा खरिद करा ओ कोवाला माफिक एसिष्टएट कमि- सनर साहेवेर हुकुमानुसारे ताहाते दखिलकार थाका सम्य(क) प्रकारे अयोग्य ओ श्रादालतेर माटेर योग्य नहे। एय शाख द्वारा श्री देशाचार मते वोध हय ये मृत गोदलरामेर त्यज्य वस्तुर पर वाहार सगोत्र दखल पाइवार सत्व राखे किन्तु वरजमाय वहि दृष्टे अवगति हय जे पितार सप्तम पुरुप पय्यन्त सपिएड ओ हिस्याय हकदार। भार उभयेर कुरछिनामा इइते प्रकाश आळे जे वासुदेवतेोरि उभयेर मुवा। ताहार दुइ सन्तान । ज्येष्ठ जगतमनतेयारि उभयेर घरना ओ कनिष्ठ कृष्णमनतेमोरि । मुमित्रानेोरिनेर स्वामि गोदलरामतेलोरिर घरना छिल । दुइ भ्रातार आपन पितार विषय अर्द्धक अर्द्वक रकम अंश करिया लइया दखिलकार थाक्यिा मृत्यु हय, ताहार- दिगेर ओयारिशान' प्रापनारदिगेर पैतृक हिस्या माफिक १. मोयानिशान-यप-1 . व्यवस्थापनसंख्या-१८६ ५७३. दखिलकार पाछे, आर आपिलाएट चेतराम वासुदेवतेनोरि हइते अष्टम पुरुष :ओ जगतमनतेओरि हइते सप्तम पुरुपेर' वफात, एवं वासुदेव इइते आशानाथ पष्टम पुरुष, श्री जगतमन हइते पञ्चमं पुरुपेर तफांत, आर सुमित्रार स्वामि गोंदलराम वासुदेव हइते पञ्चम पुंरुप श्री कृष्णमनतेमोरि हइते चतुर्थ पुरुष तफात आछे, ओ गोविन्द नारायणतेओरि आशानाथते- : ओरिर न्याय यासुदेव मजकुर इइते पष्टम पुरुष एवं जगतमन हइते पञ्चम पुरुपेर तफात । अतएव तरजमार केताप दृप्टे. .सपिण्डक अर्थात सप्तम पुरुप अष्टम पुरुपेर नाोयारिशी विप. येर हिस्याय कोनो स्वत्व राखे कि ना-सन्देह जन्मिल । एवं एतद्देशे एइ मोकईमार न्याय जे अष्टम पुरुपेर केह सगोत्र नाओरिशि विशये दखल पाइयाछे कि ना तर्त करा गेल । ताहाते केह कहिते ओ कोनो लिखित पठित पेप करिते पारिवेक ना। अतएव ए विशयेर व्यवस्था ज्ञातो हो प्रावित्यक मते हुकुम हइल एइ रोवकारिर नकल ओ उभयेर कुरछिनामा इङ्गरेजी ओ फारशी ए वातरे इगरेजी चिठी द्वारा सदर दोनि आदाल- तेर हाकिमानेर निकट एइ प्रार्थनाय प्रेरित हय जे साहेवान मौसुफिल मिताक्षरा हइते एइ विशयेर व्यवस्था जे गोदलराम. तेरि अपुनकेर विपये के २ हिस्यार हक राखे-पादालतेर पण्डितेर स्थाने तलब करिया अनुग्रह पूर्वक प्रासल व्यवस्था मोलाहेजार कारण पाठान जे मोकद्दमा फयसल हय, भार व्यवस्था पौछ पय्येन्त ए मोकदमा मुलतवि थाके इति- प्रभुसमर्पितविचारपत्रं वंशावलीपत्रं च यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यनिगम- गुणगजेन्दुमिताब्दीयापरेलमासीयपञ्चदशदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदपलोश्य पाटश बोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- गोदलरामविवेदित्यकधनं यत् पुत्रपौत्रप्रपौत्रामावे सति तत्पल्या सुमित्रा देव्या उत्तराधिकारित्वेन प्राप्तं तत्र धने यदि गोदलरामनिवेदिदौहित्रस्त पत्नी- मुमित्रादेवीमरणोत्तरं विद्यमान श्रासीत्तदा तस्याधिकारस्तस्मिन् पुत्रपौन- . - ५७४ यवस्थापनसख्या-१८६-२८७ प्रपौत्ररहिते मृते सति तत्पल्या एव तदनाधिकार । यदि च गोदलगम त्रिवदिदौहिन स्वमातामह्या विद्यमानायामेव मृत स्यात्तदा तदोहितस्य तद्धने व वानुत्पादेन तरल्या थपि तदने नाघिकार, किन्नु प्रभुसमर्पित विचारपत्रवशावलीपत्रोभयलिखितवृत्तान्ते सति गोदलरामत्रिषदिवृद्ध प्रापतामहवासुदेवत्रिवे दिनोऽतिवृद्धप्रपौत्रयोराशानायनिवेदिगोविन्दनारायण विवेन्टिनोरेव सनिकृष्टसपिण्डत्वेन समानाधिकार , श्राशानायनिवेदि गोवदनारायणत्रिवेदिनो पूर्व गोदलगमनिवेदित्यक्त धने ये उत्तराधिका रिणस्नेपा मध्ये कश्चिदिदानी विद्यमानोऽस्ति न वत्यस्य प्रभुसमर्पितविचार पत्रवशावलापत्राम्या सष्टतरतयाऽनवगमाद्, प्राधानाथात्रवेदिगोविन्द मागयणविवेदिनोविद्यमानयोवासुदेवत्रिवेदिवृद्धातिवृद्धप्रपत्रस्य कमलनाथ त्रिवदिनो वासुदेवरिवदिवृद्धातिवृद्धप्रपोगाणा कलहारामत्रिवेदिहोयरामान यादभवनरामत्रिवेदिचेतरामत्रिवेदिना वासुदेवत्रिवदिवृदादिवृद्धप्रपोनप्रपी अस्य वचूरामत्रिवदिनश्च नाधिकार , सनिकृष्टासनिकृष्टसपिएडयोस्समानो दवाना च विद्यमानताया सनिकृष्टसपिण्डस्यैवाधिकारस्य मनुमिताक्षरादि अयसम्मतत्वात्-इति मनुमिताक्षरादिग्रथानुसारिंगी व्यवस्था । दशवीशन्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगोदुमितान्दीयसितम्वरमासीयमुनि नेत्रमितदिनसम्बघिशनिवासरे मया विचारपत्रवशावलोपत्राम्या साइतेय व्यवस्था दत्तति॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (४६)-मो० कलिकातार सदरदेओनि आदालतेर श्रीयुत स्रोलियमवाडिन साहेब ऐ आदालतेर हाकिमेर बैठकेर सन १८३४ सालेर तारिप १२ माह जुन मोतावेक सन १२४१ सालेर ३१ ज्येष्ठ वृहस्पतिवारेर दिवसेर रोक्कारि- काशीच द्रमुस्नोफि छापल छाएलेर उकिन मुनशी शिवनारायण चट्टोपाध्याय हानिर M - • . व्यवस्थापनसंख्या-१८७. श्राइल | छाएजेर छयाल एइ. जे श्रीमति कमलकुमारी छाएलेर अप्राप्तावय कन्यार स्वामिर वाटीते ताहार सामुडि पदुकमल.. दासीर निकटे जाइवार विपयेर सन १२३४ सालेर ३ मे तारिखेर जेला हुगलिर जज साहेवेर हुकुमेर नाराजिते एवं श्रीमतीकमल कुमारी मजकुरार ऐ पदुमलदासीर वाटोते जश्नोर हित होनेर प्रार्थनाय ओ अन्य २ विशयसकलेर सहित - उकिल मजकुरेर नामेर एक केता भोकालतनामा नो सन १८३४ सालेर' ३मे तारिखेर जेला हुगलिर आदालतेर रोक्कारिर • नकल: '.१ केता ओ सन १२३२ सालेर १७ मे तारिखेर लिखित जेला. मजकुरेर केलकट्टरि काचारिर रोवकारिर नकल १ केता एंइ मासेर ५ तारिखे दाखिल हइयाछिल, अद्य दृष्टे आइल । योध हइल जे लाट कृष्णराम वाटी ओ गयरहेर तालुकदार रमेशचन्द्रदत्त छाएलेर अप्राप्तावय कन्या श्रीमतीकमलकुमारिक विवाह करिया आठ मास जीवदशाय थाकिया श्रीमतिमज- कुराके पुष्य पुत्र लओनेर अनुमति दिया उहाके उत्तराधिकारिणी 'यो केशमत लाट कृष्णराम वाटी ओ गयरह अनेक तालुक श्रो ज़मीसकल श्रो स्थावर श्रो अस्थावर स्वनामी विनामी विशय- सकल राखियो मृत्यु हय, ओ उहार मृत्युर पर श्रीमतीपदुकमलदास मृत रमेशचन्द्रेर माता मृत मजकुरेर त्यक्त अनेक जायदाद हस्तान्तर एवं कोनो जायदादे आपन नाम जारि करिया छाएलेर कन्याके आपन आयत्तते आनिवार मानसे हुगली जेलार प्रादा- लतेर एक केता दरखास्त गुजराय, प्रो जेलार जज साहेव व्य- 'वस्था लइया छाएलेर अप्राप्तावय कन्या श्रीमतीकम री.. दासीके उहार सासुहिर बाटोते पाठाइवार हुकुम प्रकाश करेण चाएल वाहार असन्मतिते ए आदालते रुजुहय इति । जखन छाएलेर उकिल प्रकाश करे जे श्रीमती पदकमलदासी अप्राप्तां-. वय श्रीमतीकमलकुमारीर ओछिर हेतुते मृतः रमेशचन्द्रर तायत स्यक्तविशये दुस्खलिकार आले एवं छायलेर छोले प्रकाश आले .

व्यवस्थापनसख्या-१८७ ये मृत रमेशचन्द्रदत्तेर अप्रातारय स्त्री श्रीमतीकमलकुमारी उहार सासुडिर सहित शत्रुता थाकार दृप्टे श्रापन स्वामीर वाटीते जाइते असन्मत पाछे। ए जन्य ए श्रादालतेर पएिडवेर प्रति नीचेर लिखित प्रश्न करा उचित वोध हइया हुकुम हइल' जे एइ रोक्कारिर नकल एइ हुकुमे जे रोवफारिर नकल पार वारिष हइते एक सप्ताह मध्ये निचेर लिखित प्रश्नेर उत्तर लेखेन, ए आदालदेर पण्डितके अर्पन करा जाय इति । . यद्यपि स्यात् एक व्यक्तिर अप्राप्तायय विधवा कन्या से ताहार स्वामी वर्तमान थाकिते कखन यापन स्वामीर वाटीते नागिया थाके भो उहार स्वामी उहाके पुष्यपुत्र लइवार अनुमति प्राप्तावय हइले पर थाके ो आपन स्वामीर वाटीते नाोने श्रो श्रापन सासुडि उहार जानत उहार शत्रु हय ताहार निकट वास करणे सम्मत ना हय, तवे वागलादेशीय चलित शास्त्रा- नुसारे श्रीमती मजकुरार प्रापन स्वामीर वाटीते जाम उचित वटे कि ना इति- एतदम्माधिकरणाधिपतिशोयुतश्रोलियमवेराडीनसाहेवधर्माधिकरण- लिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासायद्वादशदिव- सीविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र यदेतदन्दीयजुलाइमासीयकविंशतित मदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्त तदवलोश्य पाहशवोधो जातस्तदनु सारेणोचरं लिख्यते ।।- प्रश्नलिखितवृत्तान्ने सत्यप्राप्तव्यवदारया प्रवीरायाः पतिलानुसा'- >वारानोमय्योदाधर्मादीना सरक्षण पतिपदीयेण देवरादिना भवितु शक्यते चेता तथा. पतिग्रहगमनमेवोचित भवति, पतिपुत्र वहानाया- त्रियाः सरक्षणादौ शास्त्रानुसारेण पतिपक्षीयपुरुषस्यैव प्रभुत्वात् ! यदि च तस्याः पतिकुले उद्देवरादिः कश्चित् पुरुषस्तत्सरक्षणादिकर्ता न विद्यत विद्यते वा तन तत्सरक्षणाद भवितु न शक्यते चेत्तदा तस्याश्चावीगया १ पातकुनानुमबोरा--01 व्यवस्थापनसंख्या-१८७-१८६ मर्यादाधर्मादीनां स्वपतिकुलोचितं संरक्षणं पितृपक्षोयेणार्थात् पित्रा भ्रातादिना या भवितुं शक्यते । तदैतादृशं पित्रादिकमपहाय स्वपतिगृहगमनं नावश्यकं भवति, पतिपुत्रविहीनायाः स्त्रियाः संरक्षणादौ पतिपक्षीय पुरुषाभावे पितृपक्षीयपुरुषस्यैव प्रभुत्वात्-इति वङ्गदेशचलितमनुदाय- भागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति । ईशवीशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयनवम्बरमासीयैकादश- दिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण (५०)-कलिकातार सदर देओयानि श्रादालतेर पण्डितेर प्रति प्रश्न :- स्वरूपरामसेन जाति कायस्थ मृत्यु हइयाछे । श्रापन भगिनीर कन्या सोयाय अन्य केह ओयारिप नाइ, एवं ऐ भगिनीर कन्यार एक पुत्र आछे । ए प्रकारे मृत स्वरूपरामसेनेर व्यक्त धन ताहार भगिनीर कन्या पाइते पारे कि ना इति ॥- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितविचारपत्रं प्रश्नपत्रञ्च यदीशवोशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुण- गजेन्दुमिताब्दीयजुलाइमासीयवेदेन्दुमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।- यदि मृतस्य कायस्थजातोयस्य स्वरूपरामसेनस्य भगिनी पुन्यायिनी पुत्रवती स्यात्तदन्यः कश्चिदुत्तराधिकारी नास्ति तदा मृतस्य स्वरूपराम- सेनस्य त्यक्तधने तस्या अर्थिन्या यद्यप्यधिकारो न भवति, किन्तु प्रश्नलि- खितवृत्तान्ते सति धर्मशास्त्रार्थविवेचनया फलतस्तत्सुत्रस्याधिकारो भवितुं शक्नोति-इति मनुदायभागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्येति ।- ईरावीशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयदिशम्बरमासोयद्वितीय .

व्यवस्थापनसंख्या-१८-१८६ दिनसम्बन्धिमनलवासरे मया विचारपत्रप्रश्नपनाम्यां सहितेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण सवाल- . (५१) यद्यपि कोनो व्यक्ति कोनो नीके विवाह करिया ऐ स्त्रीलोकेर सन्तान हुइवार बासा व्यतीत हइले अन्य बीके सन्तान हइवार प्रार्थनाय विवाह करे, आर ऐ बीलोकेर वयस पन्द्रह वतसरहय, सेइ समय भासल स्थावरास्थावर समस्त धन, कि स्वोपार्जित हय किम्वा वाहार पैतृक हय, आपनार भगिनीर पुत्रदिगेके दान करे, आर ऐ दानेर तीनि चारि वतसर पर सेइ द्वितीय स्रोर पुन सन्तान उत्पन्न हइया थाके, ए प्रकारे दानेर पर पुत्र होयावे ऐ दान असिद्ध हइते पारे कि ना । आगत सोमवार दिवस पर्यन्त एहार जवाब लिखेन, ओ श्रासल हेवा- नामा ए श्रादालतेर पण्डितेर निकट देवाजाय । इति सन १८३४ माल तारिख ११ दिसम्बर इति ।- श्रीजयतितराम प्रभुकृतप्रश्नस्योत्तरम् - प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति दानवविवेचनया धर्मशास्त्रानुसारेणेता- दशदान न सिद्धपति-इति वनदेशचलितननुदायभागामिन्यानुसारिणी व्यवस्येति ।- ईशवोशन्दप्रतिपाद्यनिगमगुपगजेन्दुमिताब्दीयदिशम्बरमासोयपञ्चदश- दिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया दानापप्रश्नात्रापासहितेय सत्या दत्तेते ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण .

व्यवस्थापनसंख्या-१६०
५७६
.
(५२) सवाल पहिला-
कलकतेके सदर दीमानी अदालतके पण्डितसे सवालोका बन्द लिखा,
६ दिसम्बर सन १८३४ ईशवी ।
अगर कोइ करजके रूपोसे इथा दुसरे तोरसे देन्दार किसिका
होवे, अशोर सुदके वावद कुछ कओल करार नहि हुआ होवये - इस
मुरतमे शास्त्रके मताविक किस तयोरसे अभोर किस अन्दाजसे उसका मुद
मोकरर होय ।।-
सवाल दुसरा-
सुदके सुदके मदमेमे शानके मताविक किस अन्दाजसे मकरर हृये,
इयाने जो रुपयाके सुदके वावत थसल देनके सेश्रोधाय देन्दारके ते
लाजिम होता हय, तो शास्रने कुछ हद उसका मकरर हये इया नहि ।
अगर हय तो अन्दाज उसका केतना हये ।
प्रथम सोयालेर वाङ्गला भापा-
कलिकातार सदर देशोमानि आदालतेर पण्डितेर प्रति
सओयाल सकल लेखा गेल। ६ दिशम्बर सन १८३४ ईशची।
यदि कोनो व्यक्ति काहारो टाका कर्जरूपे किम्वा अन्य
प्रकारे धारे, पार सुदेर विषय कोनो करार किम्बा निद्धार्थं ना
हइया थाके । ए प्रकारे शास्त्रानुसारे कि प्रकारे भो कि परिमान
सुद ऐ टाकार मकरर करा जाइवेक इति ।-
द्वितीय सोयालेर वाङ्गला भाषा-
सुदेर सुदेर विषये-शास्त्रानुसारे कि परिमाण नियम
आछे, अर्थात् ये टाका सुदेर वावत श्राशल टाका आदायर
सेनीयाय देन्दारके दिते हय, शाने ओहार अवधि किछु
नियमित आछे कि ना। यदि थाके, तवे कि परिमाण इति--
श्रीजयतितराम
श्रीमत्प्रभुसमर्पित प्रश्नपत्रमवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोतरं
लिख्यते-

व्यवस्थापनसख्या-१९० प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- यदि कश्चिरणरूपेण प्रकारान्तरेण वा कप्पचिद्रजतसुवर्णादिधनं धारयति, एवं द्वयोरुत्तमाधमर्णयोवृद्धिसख्याया काचित् सचिन्नैव जाता स्यात्, तत्र यद्यधमादुत्तम]न्धकद्रव्यं लग्नक वा अगृहीत्वैव तस्मै स्वधन दत्त स्यात्तदा ब्राह्मणादधमर्णात् द्विकशवपर्यन्त क्षत्रियादघमात् त्रिकशतपर्यन्त वैश्यादधमाच्चतुष्कशतपर्यन्त शूद्रादघमात् पञ्चकशतपर्य्यन्त मासि मासि वृद्धिाहा । किन्त्वेतावान् विशेषः यद्धन वृद्धिसविदूपतिरेकेण गृहोला अधमर्णो देशान्तर गतः तद्धनस्य सवत्सरा- दुवमुपरिलिखिता वर्णक्रमेण वृद्धिर्भवति ! यत्राघमर्रा उद्धार गृहीत्वा उत्तमणेन याचितोऽपि याचितकमदत्वा देशान्तर गतस्तत्र मामत्रयानन्धर सैवोपरिलिखिता वर्णक्रमेण वृद्धिर्भवति । यत्राधमणों या चतकमादाय स्वदेशस्थित एव, याचिवोनि याचिवक न ददाति, तत्र याचनकाल. मारभ्य शैवोपरिलिखिता वर्णक्रमेण वृद्धिर्भवति । यत्राधमणों प्रोत्या धन राति तन परमासानन्तरं सैवोपरिनिखिता वर्णक्रमेण वृदिर्भ वति । तमाय तात्पर्यार्थ:-बन्धकलग्नकरहितेऽपि यत्र वर्णाना ब्राह्मणा- दीना द्विक निक चतुष्क पञ्चक वा शत प्रति मासि मासि वृद्धिस्तत्रापि देशाचारममयाचारयोदनिकाधमणि कयो- शिष्टतादुएतासधनतानिर्धनताना नृषि विवेचनया यथासम्भवं न्यूनतरा वृद्धिश्चेत् सापि शास्त्रीया भवति । किन्तु ब्राह्मणादधमत् मासि मासि द्विकरातात् चत्रियाध. मात् मासि मासि विकरातात् वैश्याधमात् मासि मासि चतुष्क शतात् शहादधमर्यात् मासि माशि पञ्चकरातादधिमा वृद्धिः कदाचिदपि शास्त्रानुसारेण भरितु नैव शनातीति ॥ दिवीपप्रश्नस्योतरम्-- मूलधनप या गृद्धिस्तरमा वृदिरुत्तमविमर्षयोः पविद विना नैव भवतीति शास्त्रे निषेधः। परन्तु यनाधमणों वृदिरूपं धन दातुमशक्ती भूत्वा वृदिरूपधनस्य वृदि दाउमनोकरोति तदा वृद्धरनि वृद्धिः शास्त्रा. नुसारेण भविनु शस्नोति । तर यथा धनिकायमाणिकयोः प्रतिशा वृद्धि सत्याग सैव प्रतिज्ञा दिसल्यानिशामका सख्यायामप्रतिशताया प्रथम

व्यवस्थापनसंख्या-१६०-२६१
५८१
प्रश्नोत्तरलिखिता वर्णक्रमेण वृद्धिर्भवति इति मन्यादिधर्मशास्त्रानु-
सारिणी व्यवस्थेति-
ईशवोशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमितान्दीयदिशम्बरमासीयत्रयो.
विंशतितमदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्रश्नपत्रसहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।।
श्रीजयतितराम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रेण
(५३)-रोवकारि मिछिल सदर देओयानि आदालत मोकाम
कलिकाता प्रादालत मजकुरेर कायेम मेकाम हाकिम कृष्णाफर
ओएव इसमित साहेवेर बैठके । इं सन १८१५ सालेर ५जानेर
मोतावेक वाङ्गला सन १२४१ सालेर २२पौप दिवस सोमवार ||--
राधाचरणवर्णिक
आपीलाण्ट
लक्ष्मीसद्दार ओ गयेरह
रेपाडण्टान
आपीलाएटेर उकिल सदासुखपण्डित ओ रेप्पाडण्टानेर
उकिल मुनशी हयदर आलि एनिएन वेञ्चमेन एडमेनेष्टीन वेली
हाजीर भाइलेन । इहार पूर्वे गतो २६ श्रो०दिशम्पर तारिख
सकले एइ मकर्दमा उत्थापन हइया तारिखसकलेर रोवकारिर
लिखित हेतु मते मुलतवि अर्थात् स्थापित रहियाछिल । अद्य
पुनराय उत्थापन हइया मुदइ अर्थात् वादीर इसादीर जवानवन्दि
श्रो प्रतिवादिदिगेर इसादीसकलेर एजाहार पडा हइल ! मोकह
मार सामुदाइक हेतुसकले वोध हइया ए श्रादालतेर परिडतेर
स्थाने कयेक विपय जिज्ञाश्य आविश्यक मते हुकुम हइल ये
रोवकारिर नकल एइ हुकुमे ये निचेर लिखित प्रश्नसकलेर प्रति-
उत्तर शीघ्र लिखेन-एइ आदालतेर पण्डितेर निकट पाठान
जाय इति ।।-
पूर्व पुरुष लक्ष्मणवणिक राजुवनिक ओ जगमोहनवनिक

गतो हय, ५८२ व्यवस्थापनसंख्या-१९१ यो रामकृष्णवनिक तिन पुत्र रासिया मृत्यु हय । परन्तु राजु- वनिक प्रापन वनिता श्रीमतीजगमोहिणोफे राखिया अपुत्रक मृत्यु हय । वाङ्गला सन १९२६ साले जगमोहिणी मजकुर परलोक एवं जगमोहन अपुत्रक यापन स्त्री गङ्गामणी राखिया सन १२२६ सालेर पूर्वे मृत्यु हय । वाङ्गजा सन १२२६ साले ओ रामकृष्ण एक पुत्र गोपीकृष्ण श्रो तारामणो खोके राखिया मृत्यु हय । श्रो तारामणिो सन १२२६ सालेर पूर्वे परलोक गत हय, ओ श्रीमतीमाङ्गलीर सहित गोपीकृष्णेर विवाह हय । चाहावे राममनी नानी एक कन्या उत्पत्ति हय । ए वाहार एक पुत्र अर्थात् मुद्दइ ओ रामकृष्णेर पुत्र गोपीकृष्ण वाङ्गला १२२८ साले परलोक गत इय। ए ताहार वनिता श्रीमतीमाङ्गलोर सन १२३७ साले मृत्यु हय, ओ ताहार कन्या राममनीर सन १२२६ सालेर पूवें मृत्यु हय । एवम्भूत व्यापारे वाङ्गला-देशेर चलित शास्त्रानुसारे राधाचरण वनिकर मातामह गोपीकृष्णावनिक ओ गोपीकृष्णेर पिए-य रामकृष्ण भ्राताराजुवनिकेर स्त्री जगमोहिनीर त्यक्त विषये के हकदार हइते पारे, ओ सन्तति मजकुरार कोन नेकट्य कि भिन्न ओयारिस ना थाके विधाये ताहार त्यक्त वस्तु राधाचरण वनिकके अर्श कि ना इति । श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतकृष्टफिरोएवइसमिटमा- हेवघम्माधिकरणलिखितेशयोगन्दपतिपायेषुगुणगजेन्दुमितान्दोयबानवरी- मासीयपञ्चमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपन यत्तदन्दीयतन्मासीय- नवमदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्राप्त उदवलोक्य यादृशबोधो जातस्त. दनुसारेणोत्तर लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति राजूवणिक्त्यक्तधने यत् पुत्रपौत्रप्रपौवाभावे सति तत्पल्या जगमोहिन्या उतराधिकारित्वेन प्राप्त वन्मरणोत्तर चर घने राजूवणि भातपुत्रदोहित्रस्य राधाचरणवमिजो धर्मशास्त्रानुसारे ( ८३ व्यवस्थापनसंख्या-२६१ णधिकारो भवितुमर्हति । अत्र यद्यपि दायभागटोकादिग्रन्थलिखितापुत्रधना- धिकारिखलायां भ्रातृपुत्रदौहित्रस्य नामोल्लेखो विशेषतो नास्ति, किन्त्वे- तत्प्रश्नलिखितावस्थायां मनुस्मृतिसम्मतो भ्रातृपुत्रदौहित्राधिकारी दायमा गादिग्रन्याभिप्रेतो भवत्येव, धनिभ्रातृपुत्रदौहित्रस्यापि धनिभोग्यघनिदेयधनि- पितृपावणभादपिण्डदातृत्वेन धनिपारलोकिकोपकारकत्वात्, परम्परया मनिसपिण्डत्वाच-इति वनदेशचलितमनुदायभागादिमन्थानुसारिणी व्यवस्था। अत्र प्रमाणम् त्रयाणामुदकं कायं त्रिपु पिरडः प्रवर्तते । चतुर्थः सम्प्रदातैपाम्-इत्यादि मनु( ६।१८६ )वचनम् ॥१॥ अनन्तरः सपिण्डाद्यास्तस्य तस्य धनं भवेद्- इति च मनु- वचनम् ।।२।। तरमाद् यथा यथा मृतधनस्य तदुपयुक्तत्वं भवति तथा तथाधिकार- क्रमोऽनुसरणीयः इति दायभाग(पृ. २१५ )ग्रन्थलिखनम् ।।३।। एवञ्च सर्वत्रोक्तरीत्या मृतधनस्य मृतार्थत्वमनुसन्धेय मुक्तकमेण- इति दायभाग(पृ० २१५ ग्रन्थलिखनम् ।।४।। प्रतिसम्बन्धिनां चाधिकारार्थं वचनकल्पनागौरवात् तदर्जित- धनस्य च तदुपकारतारतम्येन तादर्थ्यसम्पादनस्य न्याय्यत्वात्, उप- कारकत्वेनैव धनसम्बन्धो न्यायप्रासो मन्वादीनामभिमत इति निरवद्यविद्या- द्योतेन द्योतितोऽयमों विद्वद्भिरादरणीयः-इति दायभाग पृ० २१५ २१६) ग्रन्थलिखनश्चेति ॥५/- ईशवीशब्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमिताब्दीय बानवरीमासीयरसेन्दुमितदि. नसम्बन्धिशुक्रवासरे मयेयं व्यवस्था इत्तेति ।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण , ५८६ व्यवस्थापनसख्या-१६२ यदि पञ्चवर्पाभ्यन्तरे पुत्रं गृहीत्वानन्तरं पिता मृतः चूडादिकन्तु न कृत तत्र तस्य पुत्रत्व सिद्धय ति, तया न चाङ्गराधे प्रधानस्य बाध:- इति विवादभनार्णव (२ विया पृ० १७६ ख)||३|| कात्यायन.'- स्वस्थेनान वा दत्तम्-इत्यादि (कास्मृ. ५६६) ।।४।। पुत्रेष्टिमिति वर्णत्रयस्याधिकारापत्तन पुत्रेष्टिपूर्वकचूडादिभिः पुत्रत्वं सम्पाद्यम् । शूद्रेण तदपि सस्कारमात्रादेवेति' सव्वमनवद्यम् । ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्य विप्रस्य पञ्चमे, इति वचनेन तत्कामस्य पञ्चवर्षस्यैव उपनयनमुख्यकालत्वेन मूलत्वात् तथा । शूद्रस्य तु विवाहा- दिलाम. - इति दत्तकचन्द्रिका( पृ० २१॥२२)शा अत्रि ---अपुरण सुतः कार्यो याहा ताइक् प्रयत्नतः। पिण्डोदकक्रियाहेतो मसकीर्तनाय च ।।इति ।।६।। मनु-न भ्रातरो न पितरः पुत्रा दायहराः पितुः। तथा पिण्डदोऽशहरश्चेपा पूर्वांभारे परः परः ।। इति ।।७।) देवल -सा ह्यनीरसस्यैते पुत्रा दायहराः स्मृताः॥ दायहराः पूर्णाशहरा ---इति दायतत्त्वम् ।।८।। मनु'--उपपनो गुणैः सर्वैः पुत्रो यस्य तु दत्रिमः । स हरेतैव तद्रिरथ सम्प्राप्तोऽप्यन्यगात्रतः॥-इति(६।१४१) ओरसाभावे सबरिक्यग्रहणमुक्तवान्, तयुक्तमोरसे सत्यर्दा शहर त्वम्-इात दत्तकमामा (पृ. १०६)चेति ॥९॥ शकाब्दा १७५४ ॥ सवत् १८ सोरचैत्रस्य नवमदिवसीय- व्यवस्था 111011011- श्रीलक्ष्मीनारायणपण्डितस्य मोकाम कलिकातार सदर देओनी आदालतेर इङ्ग रेजी सन १८३४ सालेर २ दिसम्बर मोतावेक वाङ्गला सन १ नारद-व्यप०१२. सहरमात्रादेव-न्यप०1 व्यवस्थापनसंख्या-१९२ ५८७ १२५१ सालेर १८ अग्रहायण मङ्गलवार दिवसेर ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुतउलियमवेराडिन साहेवेर येठकेर रोवकारि- वल्लवीकान्तचौधुरी वनाम कृष्णप्रियाचौधुराणी ओ नवकान्त चौधुरी। छाएलेर उकिल मुनशी आन्याच आलि हाजिर आइल । ३२ टाका दामेर इष्टम्प कागजे छाएलेर छोलि गगरा परगनार तरफ मधुरापुरेर २॥ श्राडाइ मौजार दखल पाइवार, मोकदमार मः ३१७ टाकार दायिते खास आपिल मसुरिर प्रार्थनाय उकित मजकुरार नामेर एक केता ओकालतनामा ओ गौरनारायण- शम्मार नामेर एक केता मोक्कारनामा ओ सन हालेर ३० जुलाई सारिखेर जेला पूरनिया जज साहेवेर एक केता फपछलार नकल श्री सन १८२३ सालेर ६ अापरेल तारिखर जेला मजकुरेर सदर आमिन बालार एक केता फयछलार नकल श्री सन १८३३ सालर २२ माच्च तारिखेर व्यवस्थार नकल एक केता ओ दोशरा तिन केवा व्यवस्थार सहित गतो ५ नवम्बर गुजराइयाछिल, अद्य दृष्टे आइल । कोन हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व शालेर प्रकरण ज्ञात हो उचित वोर हइल । ए कारण हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल ओ छापलेर दाखिल करा सन १८३३ सालेर २२ मार्च तारिखर नकल व्यवस्था एइ हुकुमे ये व्यवस्था मजकुर दिष्ट करिया लेखेन ये व्यवस्था मजकुर वाङ्गलादेशीय चलित शास्त्रानुसारे हइयाछे कि ना, यदि ना हइयाथाके, ऐ व्यवस्था मजकुरेर लिखित प्रश्नेर जवाब वाङ्गलादेशीय चलित शाखानुसारे एइ रोवफारिर प्राप्तर दिवस हइते एक सप्ताह मध्ये दाखिल करेण-एइ आदालतेर पण्डितेर हाला करा जाय इति- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतप्रोलियमवेराडिनसाहेवधम्माधिकरण- व्यवस्थापनसंख्या-१९२-१६३ लिखितेशवीशन्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयदिशम्वरमासोद्विती- यदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र यदीरावीशब्दप्रतिपाद्यपुगुण- गजेन्दुमितान्दीयजानवरीमासीयपञ्चमदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशमोधो पातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते-- प्रभुसमर्पितव्यवस्था बङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण आतास्ति । तद् व्यवस्थोपरिलिखितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येवादशी व्यवस्था वङ्गदेशचलित- शास्त्रवहितास्ति इत्यस्यानवगमादिति ||-- ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयफिवरवरीमासीयसतमदिनस- म्बन्धिशनिवासरे मयेदमुत्तर दत्तमिति - श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (५५)-रुवकारि मिधिल आदालते देओनि सदर मोकाम फलिकाता वनेसस्त रावरट' हालडन राटरि साहेव हाकिम श्रादालत मजकुरा सन १८३५ साल तारिख १६ जानवरि मो० सन ११४१ साल ७ माघ सोमवार- कमलाकान्तरायेर 'स्त्री रामदुर्गा ओ सम्भुचन्द्र वनाम गगाचरणसेन। सायलानेर उकिल मुनशी होसन प्रालि ओ में मारङ्ग आगरवरकुलाल साहेव ओ फरिकसानिर उकित श्रीरामराय ओ तारकचन्द्रराय हाजिर हइल । एइ माहार १४ तारिखेर हुकुमानुसारे साएलानेर उक्लि श्रीमतीर पुत्र नृसिंहसेन अन्ध थाकनेर ओजर उहादेर तरफ हइते पूर्व उपस्थित होनेर विशये एइ पादालतेर सावेफ हाकिम मे कटवरट थरनेल सिलि साहे. वेर वैठकर मवकारि निसान देो दृष्टी करा गेल ! तत् द्वाराय वोध हइल जे प्रकृत साएलानेर तरफ हइते श्रीमतीर पुत्र अन्ध १.रावट-व्यप०॥

, व्यवस्थापनसंख्या-१९३ थाळनेर भोजर पूर्व उपस्थित हइयाछिल । प्रकाश हइल जे कृष्णकिङ्कररायेर चारि पुत्र । ज्येष्ठ लक्ष्मीकान्तराय, द्वितीय कमलाकान्तराय, तृतीय जगमोहनराय, चतुर्थ सम्भुचन्द्रराय । पितार मरणेर पर चारि पुत्र पितार त्यज्य वस्तुते भोगि श्रो अधिकारि छिल ताहाईर मध्ये प्रथम लक्ष्मीकान्तरायेर नि:- सन्तान मृत्यु हय, परे जगमोहनराय महेशचन्द्रराय नामे एक पुत्र ओ श्रीमती नामे एक कन्या राखिया फौच करे। ऐ महेशचन्द्ररायेर फोतेर पर ताहार भग्नि श्रीमतीर गर्भ हइते एक अन्ध पुत्र हय, आर सायलानेर तरफ हइते श्रीमतीर पुत्र अन्ध थाकनेर प्रोजर इहार पूर्व उपस्थित हइयाछिल, तथा च पण्डितेर पर ए विशयेर कोन प्रश्न हय नाइ-जे साखानुसारे जन्मअन्ध व्यक्ति पैतृक धनाधिकारि हइते पारे कि ना। ए प्रयुक्त ओ जे हेतुक वोध हइल जे एइ आदालतेर पण्डितेर तरफ हइते एइ मकईमार पूर्व जे व्यवस्था दाखिल हइयाछिल ताहाते पइ प्रश्न करा जायजे महेशचन्द्रराय अापन पितृ- अंशे अंशभोगि थाकिया आपन भग्नि श्रीमती ओ कमला- कान्तराय ओ सम्मुचन्द्रराय पितृव्यदिर्गे राखिया नि:सन्तान मृत्यु हइयाछे, पार ताहार खी ताहार मृत कायार सहित सति हइयाछ । एमते महेश चन्द्ररायेर त्यज्य वस्तु ताहार भग्नि श्रीमती, जाहार एक्ष्यणे पुत्र नावालग आछे वाहाके अर्श, कि साहार पितृव्य कमलाकान्तराय ओ सम्भुचन्द्ररायके अर्श । एइ प्रश्नेर उत्तर एइ चुम्बके लेखा जाय जे महेशचन्देर भग्नि श्रीमती श्रोताहार सन्तानके अश, कमलाकान्तराय श्रो यो शम्मुचन्द्ररायपितृव्यरा अधिकारी हइवेक ना इति । आर काशीनाधेर खी करुणामयी दिगर श्रापिलाण्टियान ओ चन्द्र- मालार स्वामी जयचन्द्रघोर रेप्याडण्टेर ३२६ लम्बरेर मकईमार व्यवस्थाय इहार विपरीत लेखा जाय जे विरोधीय वस्तुर कार अर्थात् कीतिनारायनेर अप्राप्तव्यवहार पुत्रेर मरणर ५६० व्यवस्थापनसंख्या-१६३ समय यदि ताहार पुत्र ना थाके, तवे ताहार पीतार दौहित्र यदि पितामह वर्तमान थाके, नवे पितामह, तदभावे पितामही, तभावे पितृव्य, वदभावे पितृव्यपुत्र, वदभावे भ्रातृपौत्रगणक अर्श। एकारण हुकुम हाल ये पद रुवकारिर नाल पण्डित के अर्पन करा जाय जे पण्डित वागलादेशेर चलित शायानुसारे एद विशयेर व्यवस्था जे यदि श्रीमतीर गर्भजाव सन्तान मातृगर्भ हइते अन्ध ओ चधुरहिव एवं ए पर्य्यन्त ऐ श्रन्धावस्थाते थाके, एमते" महेशचन्द्रेर त्यज्य धनेर धनाधिकारि ऐ पुत्र हय कि ना। यदि ना हय, तवे कोन व्यक्ति ताहार अधिकारि हवेक, श्रो इहार जोव जे एइ मकईमा, ओ उपरेर लिखित लम्बरेर मकईमा एक प्रकार भो ऐक्यभाप तथा च चौंदेशेर पलित एकशास्त्रा- गुजाइ, एकेर व्यवस्था अन्येर विपरीत कि कारण दाखिल हइल; एइ रुवकारिर प्राप्तेर पर पांच दिवस मध्ये दाखिल करेण; ताहा दाखिल, ओ मोलाह जा हदले जे उचित हय हुकुम सादेर इह- वेक इति। श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतरावरटहालडनपटरीसाहेवधर्माधिकर- णलिखितेशवीशन्दप्रतिपाद्येषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयजानवरीमासीयामेन्दुमि- तदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपत्र यत्तदन्दीयफेयरवरीमासीयरसमि- तदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारे. पोचर लिख्यते-- यदि श्रीमतीगर्भजातः पुत्रो जन्मान्धोऽर्थाद् गर्भत एव चतुरहितः एतत्कालपर्यन्तमन्धावस्थायामेवास्ति तदा महेशचन्द्रत्यक्तधने स अन्धा- वस्थायामधिकारी न भवति । एवच सति श्रीमतीपुत्रान्तरस्य महेशचन्द्रः त्यक्तधनाधि कारिग उत्पत्तेः प्राक्कालपर्यन्त' पूर्व लसितैतदिवादविषय निविस्मदत्त स्वरयालिक्षितरीत्या श्रीमत्येवापिकारिणी भवति । तस्याश्च १.प्राप्तान०यर।

: व्यवस्थापनसख्या-२६३ ५६१ धनाधिकारिपुत्रस्य पुत्राणां वोलत्तौ तस्याः पुत्रस्य पुत्राणां वोपरिलिखित- च्यवस्थालिखितरीत्या अधिकारः। महेशचन्द्रत्यक्तधने सम्भावितपुत्रत्वेन पूर्वलिखितेतद्विवादविषयनिविष्टास्महत्तव्यवस्थानुसारेण जाताधिकारायाः श्रीमत्या जीवन्त्या स्वत्वध्वंसस्य तद्गर्भजातपुत्रस्य महेशचन्द्रत्यक्तधनाधिका- रिणः स्वत्वोत्पत्तेरेय जनकत्वाद्-इति वनदेशचलितमनुदायभागतट्टोकादाय- क्रमसंग्रहदायतत्वविवादार्णवसेतुविवादभङ्गार्णवादिग्रन्थानुमारिणी व्यवस्था। अत्राप्रमाणम्- अनंशी क्लीवपतितौ जात्यन्धवधिरौ तथा ॥ इत्यादि दायभागादि- (पृ० १०१ अन्यधृतमनु ।२०१ वचनम् ||१|| पतितस्तत्सुतः क्लीयः पङ्गुरुन्मत्तको जडः । अन्धोऽचिकित्स्यरोगाचों मर्त्तव्यास्ते निरंशकाः ।। इति दायभा. गादिग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥२॥ पूर्वलिखितैतन्तिवादविषयनिविष्टास्मद्दत्तव्यवस्थालिखितानि पञ्चप्रमा. पानीति ||५|| एवञ्च काशीनाथदत्तपलोकरुणामयीप्रमृत्यधिनीनां चन्द्रमालापतिजय- चन्द्रघोपमत्यधिनीरसाक्षाभ्रगुण मताङ्काविसविवादविषयनिविष्टास्महत्तव्य- वस्थया सहैतविवाद विषयनिविष्टास्मद्दत्तव्यवस्थाया विरोधशङ्कापरीहारः । इशवीशब्दप्रतिपाद्येन्दुगुणगजेन्दुमितान्दीयनवम्वरमासीयद्वाविंशतितमदि- वसीयश्रीयुतमान्तकोयूहेनरोटरम्बलसाहेवाभिधानवधर्माधिकरणप्राचीनाधि- पतिकृतोपरिलिखितासपक्षाभ्रगुणमिताङ्कातितवियादसम्बन्धिविचारपत्रतधो- लिखितारमदत्तन्यस्याम्पामेर सपृतम इति ज्ञात्वा पुनर्न लिखित इति निवेदनम् IIollollol- ईरात्रीशब्दप्रतिपाद्येषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासीयविंशवित - मदिनसम्बन्धिशुकवासरे मयेयं व्यवस्था दचेति ।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थापनसंख्या-१६४ ૧૨ (५६) ल ३१८५ सदर- रुवकारि श्रादालते देोयानि सदर मोकाम कलिकाचा वैण्टक श्रीयुत जारइष्टाकोएल साहेव कायेम मोकाम हाकिम एइ आदालतेर सन १८३५ साल सारिस १८ फिररेआयासि मोवावेक सन १२४१ साल ता०८ फाल्गुन बुधवार- कानाइलाल मफलछ पापीलापट गोरा ओ दन्खु यो गयरह रेप्पाडएटान् आपीलएटेर उकिलान् मुनशी दादार वक्स श्री सदामुक पण्डित हाजीर आशीलेन । रेष्पाडण्टान् एयालामनामा जारि होते पो ताहार रशीद लिखिया देयोते ए पर्यन्त खोद किम्वा उकिलेर द्वाराय हाजीर हइल नाइ । एइ मोकईमा श्रीयुत तामस केमल रावरटसेन साहेव कायेम मोकाम हाकीमेर सन १८३४ सालेर १६ माह जुलाइ तारिखेर हुकुमानुसारे श्रामार चैठके रुवकार ो प्रविनसन कोटेर नथीर सम्वलित प्रारजी प्रभृति कागजात ३५ लम्बर पर्य्यन्त पडागिया पापीलएटेर उकिलदिगेर सम्मति क्रमे एइ मोबईमार गतिक एड प्रकार स्थीर हइल, जे विरोधीय वस्तु जानकीरामेर स्वो पाजित वटे, श्री जानकीराम ओ शीताराम, दुइ सहोदर भ्राता नो जानकीरामेर स्त्री वदनेर गर्भजात सन्तराम प्रो साधुराम, दुइ सन्तान, ओ ऐ दुइ सन्तान प्रापन पिता अर्थात् जानकीरामेर सन्मुखे श्रीमत्या गोरा ओ श्रीमत्या दक्षु दुइ भार्या निःसन्तान वर्तमाना राखिया परलोक हय । यो शीतारामेर एक पुत्र अर्थात् कानाइलाल फरियादी ए नकार प्रापीलाण्ट वर्तमान पाछे । ओ जानकीराम मजकुर आपन तावत विपयेर तमलिकनामा श्रापन स्त्री श्रीमती बदनके लिखिया दिवाते श्रीमत्या मजकुराऐ प्राप्त वस्तुर उपर श्रापन जीवद्दशा पय्येन्त भोगवाना थाकिया मृत्यु हइयाछे । ए च्यने एइ मोकमा चूडन्त हुकुम देओनेर पूज्य ए विषय ए भादालतेर . 1 व्यवस्थापत्रसंख्या-१९४-१९५ .. पण्डितेर निकट जाना आविश्यक जे श्रीमत्यावदन मजकुरार मृत्युर पर शास्त्र प्रमाण उहार त्याज्यं वस्तुर ओयारिस ओ स्वत्वाधिकारि श्रीमत्या गोरा ओ दुर्घ उहार पुत्रवधूगण हइवेक, कि शीतारामेर पुत्र कानाइलाल हइवेक । अतएव हुकुम हइल जे एइ रुवकारिर नकल एइ हुकुमे जे उपरकार लिखित सोयालेर जओच पश्चिम देशीय चलित शास्त्र प्रमाण एइ रुवकारिर नकल पाइधार पर एक दीवसेर मध्ये लिखिया पाठान एइ प्रादालतेर पण्डितेर निकट देखोया जाय इति ।।- श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतजार्जइष्टाकोएलसाहेव- धम्माधिकरणलिखिते थवीशब्दप्रतिपाद्येषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासी- याप्टेन्दुमितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतामासीया- केन्दुमितदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राराम्, तदवलोक्य यादृशचोचो जातस्वदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रश्नलिखित वृत्तान्ते सति विवादास्पदीभूतधनात् श्रीमत्या वदननाम्न्याः पुत्रवध्वो-वनीवं पतिकुलोचितग्रामाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधम्मांद्या- चरणोपयुक्तधन विहायावशिष्टयने तत्पतिभ्रातृपुत्रत्याधिकारः-इति पश्चिम- देशचलितमनुमितादरावीरमित्रोदयादिप्रन्यानुसारिणी व्यवस्था ।। ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासीयेन्दुपक्षमित- दिनसम्बन्धिशनिवासरे मयेयं व्यवस्था दत्तेति श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (५७)-तं० २७१ सन १८३३ साल- मो. कलिकातार सदर देशोनि आदालतेर हाकिम श्रीयुत ओलियम बाडिन साहेवेर बैठकेर सन १-३५ सालेर १७ फिव- ५६४ व्यवस्थापनमख्या-१६५ रेल मोतावेक वाङ्गला सन १२४१ साजेर ७ फाल्गुन मस्तवार दिवसेर रोवकारि- विमलामयीदेव्या थापिलाण्ट श्रीमती अन्नपूर्णा ओ दिनाजपुरेर फालफटर साहेव रेप्पा. ढण्टान् श्रापालाएटेर उफिल मोलयि फरम होरेन हाजीर प्राइल : सन १८३४ सालेर २६ दिनपरेर लिसिव सदर पोर- डेर साहेवलोकेर एक केता चिठी प्रेरित पर ओ पानार नम्न सम्बलित नः प्राप्त भो अद्य हजुरे दरपेस हाया मोमईमार अनेक कागजसकनेर महित दृष्टे पाइल। स्थित कागजसरून ६इते बोध हइन्छे जे गौरीशङ्करराय ओ शम्मुचन्द्रराय श्रो ईशानचन्द्रराय तिन जन सहोदर भ्राता चिलेन । ओ मरकारेर दानानुसारे मोशाहेरा एक व्यक्तिर मुवलगे २-३ टाका हि. मोट मुः टाका शालीयाना सरकार हइते माकरर दिल, ओ ए दयने शम्मुचन्देर मोसाहेरार जन्य विरोध उपस्थित पाछे । ए जन्य हुकुम प्रकाश होनेर पूर्य शाखेर वे प्रोरा शम्मुचन्द्रर मोसाहेरार पक्षे ज्ञात हओन उचिन बोध हइया हुकुम हइल जे एइ रावकारिर नकल एइ हुकुमे जे निचेर लिसिव प्रश्नोत्तर नकल रोवकारि प्राप्तेर दिवसावधि पॉच दिवसेर मध्ये लेखेन-ए श्रादालतेर पण्डित के अर्पन करा जाय । प्रश्न :-गौरीशङ्करराय ओ शम्भुचन्द्रराय ओ ईशानचन्द्र- राय तिन सहोदर भ्राता हिलेन। उहारदिगेर मध्ये गौरीशङ्कर आपन पन्नो रुद्रापीके राखिया ओ ईशानचन्द्र आपन खो गौर- मनिके राखिया श्रो शम्भुचन्द्र प्रापन वनिता मन्दोदरिओ आनन्दचन्द्र श्री नारायणचन्द्र ओ रामधन पुत्रगण ओ विम- लामयीदेव्या ो अन्नपूर्णादेव्या कन्यागण रासिया. ताहार पर रुदानी गौरीशङ्करेर त्रो श्रो तत्पश्चात् उक्त भानन्दचन्द्र श्रो नारायणचन्द्र निःसन्तान, यो ताहार पर उक्त मन्दोदरी एक च्यवस्थापनसंख्या-२६५ व्यक्तिर पर अन्य व्यक्तिर मृत्यु हय, ओ ए भने उक्त शम्मु- चन्द्रेर पुत्र रामधन ओ कन्यागण अन्नपूर्णा अविरा श्रो विम- लामयीदेव्या जीवद्दशाय पाछेन । एजन्य जिज्ञाशा करा जाइतेछे जे उक्त शम्मुचन्द्रर मोसाहेरा कि प्रकार उहार जीवित उत्राधि- कारिगणेर मध्ये वाङ्गलादेशीय चलित शास्त्रानुसारे विभाग इइवेक इति ।- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुत-श्रोलियमवेराडोनसाहेवघम्माधिकरण- लिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दीयफेवरवरीमासीयाद्रीन्दु१७- मितदिवसीय विचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयगजेन्दु- २८मितदिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशवोधो पात. स्तदनुसारेगोचरं लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति शम्भुचन्द्रस्य मासिकं यत्तन्मरणानन्तरं रात्पुनिभिरर्थाद् अानन्दचन्द्रनारायण चन्द्ररामधनैरत्तराधिकारित्वेन प्राप्त तर मासिके यदि अानन्दचन्द्रनारायणचन्द्रयोः पुत्रादिमातृपय॑न्तानां मध्ये कश्चिन्नास्ति, तदा शम्भुचन्द्रपुत्रस्य रामघनस्याधिकारः, शम्भुचन्द्र- कन्ययोरन्नपूर्णादेवीविमलमयीदेव्यो-वजीवं स्वपतिकुलोचितपासान्छा. दनोपयुक्तावश्यकधर्माद्याचरणोपयुक्तस्वस्वपतिपक्षीयधनाभावे पितृत्यक्त- मासिकाद्यनुसारेण यावजीवं पितृकुलोचितप्रासाच्छादनोपयुक्तावश्यकधमा चाचरणोपयुकधने चाधिकार:-इति बङ्गदेशचलितमनुदायभागादिग्रन्था- नुसारिणो व्यवस्था ॥ अत्र प्रमाणम् पली दुहितरश्चैव पितरो भातरस्तथा । तत्सुतः-इत्यादि दायमागादिग्रन्यतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥१॥ मृते मर्यपुत्रायाः पतिपक्षः प्रभुः खियाः । विनियोगात्मरक्षासु भरणे च स ईश्वरः ।।

व्यवस्थापन संख्या-१९५-१६६ परिक्षीणे पतिकुले निर्मनुष्ये निराश्रये । तत्सपिण्डेषु चासत्सु पितृपक्षः प्रभुः स्त्रियाः ।।-इवि दायभागादि- ग्रन्थधृतनारदवचनञ्चेति ।।२०।। ईशवीशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दीयफेवरवरीमासोयवेदपक्ष२४ मितदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे प्रश्नपनसहितेय व्यवस्था मया दति ॥ श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (५८-सयोल वरावर श्रीयुत पण्डित आदालत जेले जालालपुरः प्रथमत:- चलित शास्त्र मैथिली श्रो दायभाग जातिर प्रति कि देशेर प्रति । यदि जातीर प्रति हय तवे कोन कोन जातीर प्रति मैथिली शाख श्रओ कोन कोन जातीर प्रति दायभाग शास्त्र, ओ यदि देशेर प्रति हय तवे कोन दशेर प्रति मैथिली शास्त्र, ओ कोन देशेर प्रति दायभाग शास्त्र चलित हइवेक । श्रो यदि कोन एक व्यक्ति ये देशे मैथिली शास्त्र चलित सेइ देशी आपन स्थान परित्याग करिया एइ वङ्गदेशे ये दायभाग शास्त्र चलित आछे वसति करिया मृत्यु हइयाछे , ताहार सन्तानादि चतुर्ध पुरुष पर्यन्त एइ देशे पाछे। ताहारदिगेर मध्ये उत्तराधिकारित्व, ये शाखेर विषय राखे, विवाद उपस्थित हइले, ताहार विचार कोन शास्त्र मते हय, ओ यदि ताहारदिगेर वर्तमान सम्तानादिर मध्ये विवाहादि ओ श्राद्धादि क्रिया मैथिली शाख मत चलित थाके, तवे कोन शाख मते, ओ यदि ताहारदिगेर ऐ सकल क्रिय दायभाग सम्मत चलित थाके, तवे ताहारदिगेर विवाहादि वस्तुर विचार कोन शास्त्र मत हइवेरु इति- च्यवस्थापनसंख्या-१६६ द्वितीय- गङ्गा नामे एक अविरा स्त्री। ताहार स्वामीर भ्रातप्पुत्र हेमञ्चल सिंह । ओ ताहार स्वामीर भ्रातष्पौत्र नारायणसिंहके राखिया मृत्यु हय । इहाते ताहार त्ययं धनाधिकारि के हय- दुइ शास्त्रेर मत व्यवस्था प्रथक प्रथक लिखिवेन इति । तृतीय- हेमञ्चलसिंहेर एक नावालग पुत्र जोहेरसिंह नामे आपन विमाता चौराशी नाम, तत् गर्भजातक अविवाहिता एक कन्या ओ वेलकुमारि नामे जोयार सिंहेर एक सहोदरा भग्नी ओ नारायणसिंह नामे आपन पिनार भ्रातःपुन राखिया मृत्यु हय । इहाते जाहेर सिंहेर तेय्य धनादि मेथलि शाख मते काहाके यो दायभागशास्त्र मते काहाके यत्त । ओ यदि जोहेरसिंह नारायणसिंहेर सहित एकान्नभुक्त थाकिया मृत्यु हइयाथाके, किम्वा ऐ नारायणसिंहेर प्रथक भन्ने मृत्यु हइयाथाके, एइ दुइ प्रकारे ऐ दुइ शास्त्र मते जाहेरसिंहेर धनाधिकारि के हय । एवं आपनाके इहाओ ज्ञातो करा जाइतेछ ये ऐ घनाधि' ताहारदिगेर सकलेर पैतृक । इहार यथाशास्त्र ये व्यवस्था हय प्रति छहोलेर निचे लिखिया ३ तिन दिवसेर मध्ये अथवा इहार पूर्व एइ अदालते पाठाइवेन इति ।। श्रीदुर्गाशरणम् समुदयप्रश्नेर सप्रमान उत्तर प्रश्नेर नीचे लिखन स्थानाभाव प्रयुक्त पृष्ठे उत्तर लिखितेछि- प्रथम प्रश्नस्योत्तरम्- अर्थात् प्रथम सोलेर उत्तरं लिख्यते | चलित मैथिलि शास्त्र एवं वङ्गदेशीय दायभाग शास्त्र मुख्य देशेर प्रति नहे । पारिभापिक १. पनादि०-ति साथियान् पा) २. अर्थात्-न्यप०1

५६६
व्यवस्थापनसंरया-१९५-२६६
परिक्षीणे पतिकुने निर्मनुष्ये निराश्रये ।
तत्सपिण्डेपु चासत्सु पितृपत्तः प्रभुः स्त्रियाः ॥ इति दायभागादि-
मन्यधृतनारदवचनञ्चेति ।। २।।०॥
ईशवीशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासीयवेदपक्ष२४
मितदिन सम्बन्धिमङ्गलपासरे प्रश्नपत्रसहितेय व्यवस्था मया दचेति ।।
श्रीजयतितराम्
श्रीवैद्यनाथमिश्रेण
(५८,-सोल वरावर श्रीयुत पण्डित आदालत जेले
जालालपुर:
प्रथमत:-
चलित शास्त्र मैथिली भो दायभाग जाविर प्रति कि देशेर
प्रति । यदि जातीर प्रति हय ववे कोन कोन जातीर प्रति मैथिली
शास्त्र ओ कोन कोन जातीर प्रति दायभाग शार; भो यदि
देशेर प्रति हय तवे कोन दशेर प्रति मैथिली शास्त्र, ओ कोन
देशेर प्रति दायभाग शास्त्र चलित हइवेक । श्री यदि कोन एक
व्यक्ति ये देशे मैथिली शास्त्र चलित सेइ देशी श्रापन स्थान
परित्याग करिया एइ बगदेशे ये दायभाग शास्त्र चलित आछे
वसति करिया मृत्यु हइयावे, ताहार सन्तानादि चतुर्थ पुरुप
पर्यन्त एइ देशे पाछे। ताहारदिगेर मध्ये उत्तराधिकारित्व, ये
शाखेर विषय राखे, विवाद उपस्थित हइले, ताहार विचार
कोन शास्त्र मते हय, ओ यदि ताहारदिगेर वर्तमान सम्तानादिर
मध्ये विवाहादि यो श्राद्वादि क्रिया मैथिली शाख मत चलित
थाके, तवे कोन शान मते, ओ यदि ताहारदिगेर ऐ सकल क्रिया
दायभाग सम्मत चलित थाके, तवे ताहारदिगेर विवाहादि
वस्तुर पिचार कोन शाख मत हइयेऊ इति--

व्यवस्थापनसंख्या-१६६ ५६७ द्वितीय- गङ्गा नामे एक अविरा खी। ताहार स्वामीर भ्रातःपुत्र हेमञ्चलसिंह । श्रो ताहार स्वामीर भ्रातप्पीन नारायणसिंह के राखिया मृत्यु हय । इहाते ताहार त्ययं धनाधिकारि के हय- दुइ शाखेर मत व्यवस्था प्रथक प्रथक लिखिवेन इति । तृतीय-- हेमञ्चलसिंहेर एक नावालग पुत्र सोहेरसिंह नामे आपन विमाता चौराशी नाम, तत् गर्भजातक अविवाहिता एक कन्या ओ वेलकुमारि नामे जोयार सिंहेर एक सहोदरा भग्नी श्री नारायणसिंह नामे प्रापन पितार भ्रातप्पुत्र राखिया मृत्यु हय । इहाते जोहेरसिंहर तेथ्य धनादि मैथलि शास्त्र मते काहा ओ दायभागशास्त्र मते काहाफे वः । ओ यदि उहेरसिंह नारायणसिंहेर सहित एकानमुक्त थाकिया मृत्यु हइयाथाके, किम्वा ऐ नारायणसिंहेर प्रथक अन्न मृत्यु हइयाथाके, एइ दुइ प्रकारे ऐ दुइ शास्त्र मते जाहेरसिहेर धनाधिकारि के हय । एवं आपनाकै इहायो ज्ञातो करा जाइतेछे ये ऐ घनाधि' ताहारदिगेर सकलेर पैतृक । इहार यथाशास्त्र ये व्यवस्था हय प्रति बहोलेर निचे लिखिया ३ तिन दिवसेर मध्ये अथवा इहार पूर्वं एइ अदालते पाठाइवेन इति । श्रीदुर्गाशरणम् समुदयप्रश्नेर सप्रमान उत्तर प्रश्नेर नीचे लिखन स्थानाभाव प्रयुक्त पृष्ठे उत्तर लिखितेछि- प्रथम प्रश्नस्योत्तरम्- अर्थात् प्रथम सोलेर उत्तरं लिख्यते । चलित मैथिलि शास्त्र एवं वङ्गदेशीय दायभाग शाख मुख्य देशेर प्रति नहे । पारिभापिक १. धनादि०-ति साधियान् पाठः । २. अर्थाद-ज्यप01 व्यवस्थापनसंख्या-१६६ देशेर प्रति, अर्थात देशस्थ लोकेर प्रति । मुख्य देश इहाके कहे। देशो नदी भूधरः कन्दरादिः। अतएव मुख्य देशेर प्रति नहे 1 शास्त्र जातिर प्रति वटे। किन्तु वङ्गदेशीय जीमूतवा- हुन कृत दायभाग शाल वनदेशीय सकल हिन्दुजातिर प्रति । मैथिलि शास्त्र मिताक्षरा मिथिलादेशवासिसफल हिन्दुजातिर प्रति । मिथिलादेशस्थ कोनो व्यक्ति स्वदेश त्याग करिया वङ्गदेशे क्रमे चतुःपुरुप वास करिया मृत्यु हइले, ताहार सन्तानादि यदि मिथिलार शाखानुसारे विवाहादि क्रिया करे, तवे मिताक्षराशा- खानुसारे, यदि वगदेशीय शाखानुसारे विवाहादि क्रिया करे, खवे जीमूतवाहन कृत दायभाग शास्त्रानुसारे विरोधि वस्तुर विवाद भजन अर्थात उत्तराधिकारिर निर्णय हइवेक। इहा सर्व- देशीय शास्त्रानुसारे यथाशाख व्यवस्था इति- श्रीश्रीनाथविद्यावागीशपण्डितस्य द्वितीय प्रश्नस्योत्तरं लिख्यते- गङ्गानानी एक अविरा स्त्री। ताहार स्वामीर भ्रातुप्पुत्र हेमचलसिंह एवं स्वामिर भ्रातपौत्र' नारायणसिंह के ओरिश राखिया मृत्यु हइले, ताहार धने अर्थात ताहार दाये ताहार स्वामिर भ्रातप्पुत्र हेमचलसिंह अधिकारि हइवेक । ताहार स्वामिर भ्रातप्पुत्र' थाकिते भ्रातष्पोत्र अधिकारि हइवेक ना । इहा वन- देश चलित जीमूतवाहन कृत दायभाग एवं मिथिलादेश प्रचलित मिताक्षरा शास्त्र सम्मत । यथाशास्त्र व्यवस्था उभय देशीय शास्त्र मते एक व्यवस्था प्रयुक्त पृथक लिखिलाम ना इति ॥ श्रीश्रीनाथविद्यावागीशपण्डितस्य तृतीयप्रश्नस्य उत्तर लिख्यते- हेमञ्चनसिंहेर एक नावालग पुत्र जोहेरसिंह आपन विमाता चौराशी नाम्नी एवं तत्तगर्भजा एक वैमात्रेया अविवाहिता १. भ्रातुष्पौत्र-पति साधीयान् पाठ-1 २. भानुपुत्र-ति साधीयान् पाठ ।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१६६ ५९ भगिनी एवं वेलकुमारी नाम्नी एक सहोदरा भगिनी एवं पितार भ्रातस्पुत्र नारायणसिंह-एइ चारिके राखिया कि एकान्ने कि पृथगने थाकिया मृत्यु हइले । ताहार पैटक धने एवं स्वकृत धने सकल धनेइ अर्थात् ताहार सकल दाये ताहार पितार भ्रातस्पुत्र अर्थात पितामह सन्तान नारायणसिंह अधिकारि इइवेक । ताहार विमाता एवं वैमानेया भगिनी एवं सहोदरा भगिनी अधिकारिणी हइवेक ना। किन्तु विमाता चौराशो उभयदेशीय शास्त्र मते ग्रासाच्छादन पाइवेक । इहा एतद्देश प्रचलित जीमूतवाहन कृत दायभाग एवं मिथिलादेश प्रचलित मिताक्षरा- शास्त्र सम्मत ! यथाशास्त्र व्यवस्था उभयदेशीय शाले एक व्यवस्था प्रयुक्त पृथक लिखिलाम ना। विशेप एइ-तत्तद्देशीय दायभाग मते अविवाहिता वैमात्रेया भागिनीर विवाहेर ये धन व्यय ताहा नारायण सिंह जोहेरसिंहेर स्थावरास्थावर वस्तुर अष्टमर्शिकांश अर्थात जोहेरसिंहेर धन अष्ट भाग करिया एक भाग दुइ अाना दिवेक इति ।। श्रीश्रीनाथविद्यावागीशपण्डितस्य । अत्र मैथिलशास्त्रमिताक्षरामते' प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो वन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः । एषामभावे पूर्वस्य धनभागुत्तरोत्तरः ॥ इत्यादि मिताक्षराधृतयाश- वल्क्यवचनम् । अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धनं भवेत् इति वचनश्च पिनादिपितामहपर्य्यन्ताभावमुपक्रम्य पितृव्यस्तत्पुत्राश्च क्रमेण धन- भाजः। पितामहसन्तानाभाचे प्रपितामही प्रपितामहस्तत्पुत्रास्तरसून- वश्चेत्येवमासप्तमात् समानगोत्राणां सपिण्डानां धनग्रहणं चेदितव्यम्- इति मिताक्षग(पृ० २२३ लिखनश्च । १. मैथिलि.-व्यप० ।

६०० व्यवस्थापत्रसंरया-२६६ भगिन्यश्चासंस्कृताः। सस्कर्तव्याः इत्यादि मिताक्षरा(पृ० २०८) लिखनम् । भ्रातृभगिन्याः समविभागं कृला तयोरेकाशं चतुर्दा भिज्य चतुषांशस्य एकाश दत्वा शेपं गृहीयात् इति मिताक्षराटीका(या)ञ्च (पृ. २०६)। दायभागमते प्रमाणम्-पली दुहितरश्चैव-इत्यादि याश्वल्स्य वचनम्। अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धन भवेत् इति च वचनम् | असस्कृतास्तु सस्कार्या भ्रातृभिः पूर्वसस्कृतेः-इति याज्ञवलय. वचनम् । भगिनीना सस्कार्यतामाह, नाधिकारिताम्--इत्यादि दायभाग- (पृ०६६)लिखनञ्च । बुधनाधिकारे भगिन्यधिकारस्यालिरसनात् नाधिकारः, न दायमहति स्त्री-इत्यादि निषेधवचनञ्च । भरण पोप्यवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनम् । नरकं पीडने चास्य तस्मायलेन त भरेत् ॥ इति (दायभागमन्यवः- वचनम्। मात्रधिकारे गर्भधारणपोषणहेतु निर्देशादिमानुनाधिकारः इति ।। श्रीश्रीनाथविद्यावागीशपण्डितस्य ल०६३५७ मृत हेमञ्चल सिंहेर स्त्री चौराशी वादी मृत दयालसिंहेर पुत्र नारायणसिंह पतिवादी कलिकातार सदर देमानि श्रादालतेर पण्डित स्थाने प्रश्नः एइये- मजफरपुरजिलार अन्तःपाति पश्चिमदेशीय छत्रिवंशी हेमचलसिंह चतुर्थ पश्चम पुरुप जायत एतद्दे शनिवासि हइया ए १०सस्कृता-व्यप.।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१९६ देशस्थ पैतृक वित्त ओ अवर्तमान स्वीर गर्भजात अप्राप्तवयसीय पुत्र जओहेरसिंह ओ अविरा कन्या ओ द्वितीया स्त्री चौराशी वादि ओ ताहार गर्भजात हरकुमारी नामे एक अदत्ता कन्या वर्त- मान राखिया मृत्यु हय । तोहार चतुर्थ वान्तरे ऐ जोहरसिंह अप्राप्त वयसे मृत्यु हय । एतादृश स्थले ऐ वादि चौराशी ये एक अदत्ता कन्या राखे उक्त वित्त प्राप्ती हइवेक, कि नारायणसिंह जमोहेर सिंहेर पितृव्य पुत्रसत्वे ऐ वित्ताधिकारि हइवेक । यथा शास्त्र व्यवस्था लिखिवेन । इति सन १८३४ साल तारिख ४ जुन, मोतावक सन १२४१ साल तेरिख २३ ज्येष्ठ ।।-- थीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रव्यवस्थापत्रविचारपत्राणि यानीरावीशब्दप्रतिपाच- निगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासीयगुथनेत्र-२३-मितदिनसम्बन्धिचन्द्र- वासरे मया प्राप्तमयचेशवीशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दुमिताब्दीयदिशम्बर मासीयद्वितीयदिवसीयमत्कृतनिवेदनपत्रानुसारेण प्रभुसमर्पिततनिवेदनपत्र- सहितविचारपत्रं यदीशयोशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरोमा- सीयतृतीयदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्रासम्, तेन ज्ञातमयं विवादो वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण निष्पन्न (इति)। तत्र कधिद्देराविषय कविरोधी वादिप्रतिवादिनोर्मध्ये नोपस्थितः । अत एवैतद्विवादविपये वङ्गदेशचलित. शास्त्रानुसारेण व्यवस्थालिखने सन्देहो नास्ति । अतस्तपत्र जातमालोक्य यादृशबोधो जावस्तदनुसारेण वगदेशचलितशास्त्रानुसागुंतर लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति हेमञ्चलसिंहो यद्यविद्यमानश्लीगर्मजातम- प्रासव्यवहारं पुत्रं यमाहिरसिंहनामानमेकामवीरां दुहितरं द्वितीयपत्नी चौरासीनाम्नीमार्थिनी तद्गर्भजातामेका हरकुमारीनाम्नीमदचा कन्यां विहाय मृतः स्यात्तदा हेमञ्चलम्हित्य कयने तत्पुत्रस्य यमाहिरमिंदरम अप्रासव्यवहारस्याधिकारः । तस्मिन् पुत्रादिपितृप्रपौत्रपर्यन्तरहिते' मृते सति तस्यतधने प्रथमतस्तसितृदौहित्रस्याधिकारः। किन्तु यमाहिरसिह- १. प्रौन- ०व्याप० ।

६०२ व्यवस्थापनसंख्या-१६६ पितृदौहित्रस्यैदानीमजातत्वेन तदुत्सचेः प्राक्कालपर्यन्त यमाहिरसिंहवैमा त्यभगिन्या हरकुमारीनाम्न्या अविवाहिताया एष अधिकारः। तस्याः पुत्रषु जातेपु वेषामेवाधिकारः। हेमञ्चल सिहस्य मृतपत्नीगर्भजाताया अवीराया दुहितुर्यावजीव स्वपतिकुलोचिवपासाच्छादनोपयुवावश्यकवि-- घवाधमांद्याचरणोपयुकाविपक्षीयधनामावे हेमचलसिंहत्यधनान्तर्गत- तत्कुलोचितपासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधर्मादाचरणोपयुक्तधने चा धिकारस। अथिन्याश्चोरासोनाम्न्या हेमञ्चलसिहस्य द्वितीयपल्या अपि यावजीव स्वपतिकुलोचितप्रामाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधर्माद्याचरणो. पयुक्तधने तत्कन्याया हरकुमारीनाम्न्याश्चामाक्षम्यवहारकालपर्यन्त तद्धन- रक्षणादौ चाधिकार' । सरस्वेर हेमञ्चलसिंहस्य दौहित्रेषु स्वतो हेमञ्चल- तपितृपितामहयश्च पार्वणश्रापिण्डदातृषु तेषा हेमश्चलसिंह- दौहित्राणामुत्पत्तिसम्भावनायामपि हेमञ्चलसिंहभ्रातृपुत्रस्य अर्थाद् यमा हिरसिहपितृव्यपुत्रस्य नारायणसिंहस्य नाधिकारस-इति वङ्गदेशचलितम- नुदायभागदायतत्वदायभागटोकादायक्रमसग्रहविशदार्णवसेतुविवादभङ्गार्ण वादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्था || अन प्रमाणम्- प्रयाणामुदक क.ग्यं त्रिषु पिर डः प्रवर्तते-इत्यादि मनुवचनम् ।।१।। अनन्तरः सपिण्डायस्तस्य तस्य धन भवेत् इति च मनुवचनम् । २ । पितुरपि प्रपोत्रपर्य्यन्ताभावे पितृदोहित्रस्याधिकारी बोद्धव्यो धनिदोहि- प्रस्येव-इति दायभागग्रन्थलिखनम् ।।३।। यद्यपि दुहिप्रभावे दोहिमस्येव भगिन्या एवं प्रागधिकारो युक्तस्त थापि तस्याः सीत्वेन पावणपिण्डदताभावात्राधिकारः । दुहितुस्तु दौहि- त्रात् पूर्वमहादङ्गात् सम्भवति इत्यादिविशेषवचनादेवाधिकार इति भावः-इति श्रीपतर्कालङ्कारकृतदायभागटोकालिसनम् ॥४॥ पली दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा । तत्सुता गोत्रजो पन्धुः--इत्यादि दायभागादिप्रन्यधृतयावलय- वचनम् ॥१॥ १ सतस्तिदा।

व्यवस्थापत्रसंख्या-१९६-१९७ ६०३. अभावे चीजिनो माता तदभावे च पूर्वजः -इति व्यवहारतत्वा- दिग्रन्थधूतनारदवचनम् ||६|| तदभावे पुनः पितृदोहित्र इति । तदभापे पितामहस्तभावे पितामही तदभावे पितुः सोदरस्तदभावे पितुर्वैमात्रेयस्तदभावे पितृसोदरपुत्रपितृवै" मात्रेयपुत्रपितृसोदरपौत्रपितृवैमात्रेयपोत्राणां क्रमेणाधिकारः-इति च श्रीकृष्णतकालङ्कारकृतदायभागटीकालिखनश्चेति ॥७॥- ईशवोशब्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासोयदशमदिनसम्ब- धिमालवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रव्यवस्थापत्रमत्कृतनिवेदनपत्रैर्वि- चारपत्रैश्च सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीदुर्गा (१६)-अशेपगुणालंकृत नानाशाखाध्यापक श्रीयुत पीता. म्बरतकंवागीशभट्टाचार्य पण्डित श्रादालते देओनि जेला. विरभूम सदन्तःकरणेषु- यदि कोन विधवा बीलोक आपन तिन पुनर सहित एक अन्ने थाकिते दुइ पुत्र मरे, आर ऐ एक पुत्र 'आपन मातार सहित एक अन्न थाके, किम्वा प्रथक अर्ने थाके एमत स्थले पे मृत दुइ पुत्रेर धनाधिकारि वाहारदैर माता कि भ्राता के हाइवेक ? पण्डितके उचित ये एइ सोलेिर जोव संस्कृत भाषा शब्दे एइ सोलेर पार्श प्रापन दस्तखत महुरे लिखिया रोज मध्ये हजुरे पाठान इति-

६०४
व्ययत्वापत्रसंख्या-१९७
श्रीदुर्गा शरणम्
प्रभुप्रेषितप्रश्नपत्रावलोकनेन यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणात्र प्रत्युत्तर
लिख्यते-
दौहित्रपर्यन्तरहितयोमृतघनिनोः स्थावरादिधने मातुरेवाधिका-
रित्वम्-इति वङ्गदेशप्रचलितदायभागादिग्रन्थसम्मतेति ।।
श्रीकाली जयति
श्रीपीताम्वरतर्फवागीशभट्टाचार्येण ।
भापा-
दोहित्रपर्यन्त विहिन मृत ये दुइ व्यक्ति, ताहारदेर स्थावरादि
धने ताहारदेर मावार अधिकार हय, भ्रातार हय ना-इति
वगदेश चलित दायभाग प्रभृति ग्रन्थ सम्मता व्यवस्था इति ।
समाप्तिकेयं व्यवस्थेति ॥
श्रीदुर्गा शरणम्
पितरि मृते ये भ्रातरोऽविभक्तास्तयोः पितृपर्यन्तोचराधिकारिरहितयो-
मध्यमकनिष्ठयोरुपरमे तद्धने माता अधिकारिणी। किन्तु तदानी पैतृके-
श्वरसेवारक्षणार्थमवश्यपोष्यवर्गपोपणार्थच ज्येष्ठपुत्रेण यहणादिकं कृतं
तन्मात्रा पुत्रेण च परिशोध्य यदवशिष्ट धन पश्चात् ताभ्यां विभजनीयम् ।
ऋणपरिशोधनानन्तरमेव विभागविधानात्-इति विदुपाम्परामर्शः ।
तस्य भाषा-
पितार मृत्युर पर तिन भ्राता वर्तमान, पितृ पर्यन्त उत्तराधि
कारि रहित मध्यम एवं कनिष्ठेर परलोक हइले पर सेइ दुइ
जनेर अंशे मातार रक्षणावेक्षणेर अधिकार ह्य। किन्तु ताहार
पर पैतृकेश्वरसेवा रक्षार निमित्ते एवं अवश्यपोप्य कुटुम्बादि
परिपालनेर कारण ये ऋणादि य ताहा ज्येष्ठ भ्राता ओ माता
दुइ जनके परिशोधन करिते हय । परिशोधनेर पर अवशिष्ट
स्पेति-देवनागराक्षरेण लिखितम् ।
१.सना

- व्यवस्थापनसंख्या-१६७ ६०५ धन ये थाके, ताहा दुइ जने यथा योग्य वण्टन करिया लइवेफ । किन्तु माता दानादि करिते पारेना। स्मृतिशास्त्र मते ऋणादि परिशोधनेर पर विभाग विधान करियाछेन इति- श्रीगोपाल(1) जयति- श्रीनन्दगोपालः शरणम्- श्रीहरिरामशर्मणाम् । श्रीहरगोविन्दन्यायालङ्कारस्य । श्रीराम शरणम् श्रीराम शरणमू- श्रीगुरुचरणशर्मणाम् । श्रीत्रिलोचनशर्मणाम् । श्रीराम : शरणम्- श्रीराम शरणम्- श्रीकालीप्रसादशर्मणाम् । श्रीरामधनशर्मणाम् । लं० २४ शराशरि श्रापिल सन १८३१ मच्छिया- रोवकारि प्रादालते देोयानि जेला विरभुम मेंहार दुइक पाटल साहेव एफटिन जज सन १८३४ मछिहा तारिख २६ सेतम्बर मोतावक सन १२४१ साल तारिख ११ आश्विन । विलाशमनिदेव्या केलेमदार-मथुरानाथसिंह मोतार- एइ मकई मा शाक जजसाहेवेर हुकुम अनुसारे एइ श्रादा. लतेर पण्डित पीताम्बरतकवागोश ये व्यवस्था दियाछेन प्रतिवादि मजकुर ताहाते एइ ओजारे राखे ये ऐ व्यवस्था शास्त्र मत नहे। शाखेर अतिक्रम दोपरा पण्डितवर्गर व्यवस्था, जाहा आमि लइ. यालि, ताहा दोरस्त पाछे। ताहाते मतानेर मजकुर कएक जन पण्डितेर दस्तखति एक खान व्यवस्था दरपेय करिलेक । इहाते मोतार मजकुरेर ओजोर निवारनेर निमित्त आर एइ दुइ व्यवस्थार दरस्ति,नदरोस्ति जानिवार निमित्त सदर देओयानिर परिउतवर्गर स्थाने सत्य व्यवस्था तलव करोन प्राविश्यक हइल । ए कारण हुकुम हइल ये एइ आदालतेर पण्डित पीता- म्वरतर्फवागीशेर व्यवस्था पार मोतर्जर मजकुरेर दाखिल करा व्यवस्था एइ रोक्कारिर नकलेर सम्बलित पार पद रकम इंरोज ६०६ व्यवस्थापत्र संख्या-१९७ चीटी सदर देशोयानिर श्रादालतेर हाकीमानेर हुजुरे पाठान जाय ये हाकिमान एइ पाठान दुइ व्यवस्था सदर पण्डितेर आगे एइ निमित्तक जानिवार अनुमति ये एइ दुइ व्यवस्थार मध्ये कोन सत्य श्रो शास्त्र अनुसार, भार इहार एक कोन खेलाफ शान इय पाठाइया एवं पण्डितदिगेर स्थान हइते इहार सत्य व्यवस्था तलव करिया परे पण्डितमहाशयेरदिगेर सत्य व्यवस्था प्रोफे इफि, एइ पौछिले ताहा एइ पादालते पाठाइवेन इति ।। श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितविचारपर वीरभूमिप्रदेशीयजिलाख्यावान्तरधर्माधिकरणा- नियुक्तपण्डितसम्बन्धितद्धर्माधिकरणाधिपविकृतप्रश्नपत्र व्यवस्थापत्रद्वयव यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यनिगमगुणगजेन्दु २८३४ मिताब्दीयदिशम्वरमासीय- प्रथमदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तद. नुसारेणोत्तर लिख्यते- वीरभूमिप्रदेशीयजिलाख्यावान्तरधर्माधिकरणाधिपति कृतप्रश्नश्चाय- मेव । यदि काचिद् विधवा स्रो खकीयैत्रिभिः पुत्रैः सहकान्ने स्थिता, तदानीमेव दो पुत्रो मृतौ स्यातामेक पुत्रः स्वमात्रा सबैकान्ने पृथगन्ने वा स्थितस्तदा मृतयोर्द्वयोः पुत्रयोद्धनाधिकारिणी माता भवति, किवा माता भवतीति । तत्र तद्धर्माधिकरणनियुक्तपारडतेन माता धनाधिकारिणी भवति, भ्राता न भवतीत्युत्तर लिखितं तच्छास्त्रानुसारेण शुद्धमस्ति । अन्यैरनियुक्तपण्डितैश्च माता धनाधिकारिणी भवतीत्येवोत्तर लिखितम् । प्रतएवैतद्विषये योव्यवस्थयारेक्यमेवेति तद्विषये विचारस्यावश्यकता नास्ति, दयौरेव व्यवस्थयोरेतदिपये वनदेशचलितशास्त्रीयत्वात् । किन्त्व नियुक्तैरन्यैः पएिडवैः स्वकीयव्यवस्थायामित्येवाधिक प्रभुकृतप्रश्नात् लिखितम् । किन्नु नदानी पैतृकेश्वरसेवारणार्थमवश्यपोग्यवर्गपोपणाय च ज्येष्टपुत्रेण यहणादिकं कृवं तन्मात्रा पुत्रेण च परिशोध्य यदवशिष्ट धन पश्चात्ताभ्यां विभजनीयमृणपरिशोधनानन्तरमेव विभागविधानादिति १.विम्वा-यप 1 व्यवस्थापनसंख्या-१९७-२६८ विदुपां परामर्श इति । तत्रच प्रभुकृतप्रश्नाशयहि तत्वेन विचारानहत्व. मेवेति । विचाराहत्वेऽपि वा दायमागादिग्रन्थे चायमेव विचारस्तद्विपये कृतः । पूर्वस्वामिकृततादृशनैयायिकमृणमुत्तराधिकारिभिः स्वस्वोपयुक्तां- शानुसारेणावश्यमेव परिशोध्यम् । तत्रापि विभागकत मिरुत्तराधिकारिभिस्ता- दृशऋणपरिशोधनं विना विभागो न कर्त्तव्य इति न नियमः। किन्तु ‘विभागकर्तृणां धनिकस्य चेच्छा चेत्तदा ऋणपरिशोधनानन्तरमेव विभागः । वेषामिच्छा चेद्विभागानन्तरमेव ऋणपरिशोधन भवितुं शुनोतीति ।।- अन्न प्रमाणम्- पली दुहितरश्चेव पितरो भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो वन्धु :--इत्यादि दायभागादिग्रन्यवृतयाशवल्क्य- वचनम् ॥२॥ यच्छिष्ट पितृदायेभ्यो दत्त्वणं पैतृकं ततः। भ्रातृभिस्तद्विभक्तव्यमृणी न स्याद् यथा पिता ।। इदं नारदवचनम् पित्रर्णशोधनावश्यम्भावार्थं न विभागकालार्थम् । अस्माच नारदवचना- दयमर्थः सिद्ध्यति-यद् विभागकत्तृभिरुत्तमर्णानुमत्येव पित्राय॒णं विभजनीयं परिशोध्या वा--इति दायभाग( पृ० २५ ) ग्रन्थलिखन- ञ्चेति ॥२॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासीयत्रयोदशदिन- सम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रप्रश्नपत्राम्यां व्यवस्थापना- भ्याञ्च सहितमिदमुत्तरं दत्तमिति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (६०) श्रीसुब्रमण्यगुरुःशरणम् चतुस्त्रिंशदधिकाष्टादशशताब्दीयचोतम्बरमागीयपञ्चदशदिवसे प्रत्यर्थि- १.परिशोध्य वेति-व्यर।

६०८ व्यवस्थापनसंख्या-१६८ न्योविवादविषये प्रधानसदनमौनाख्यधर्माधिकारिप्रेपितप्रश्नस्वजिवप्रति- रूरकपत्रमवलोक्य' यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते-- मृतशटकोपदासत्यतधनप्राप्त्यर्थ विपदमानयो. अमुकदासाख्यार्थ्य- मुकप्रत्यर्थिन्योर्मध्ये यद्यपि अमुफाख्या शटकोपदासकन्या, तथाप्येतत्। प्रतिरूपकपनलिखनानुसारेण सा पतिपुत्रविहीना' विधवेति प्रतिभातीवि कृत्वैतादृशमृतशटकोपदासत्यक्तधने' वर्मभ्रानमुकदासस्याधिकारी न तु अमुकाख्यविधवाया.'। वैष्णवाना मध्ये केचन वानप्रस्था, केचन ब्रह्म- चारिणो भवन्तीति कृत्वैतादृशमृतशटकोपदासाख्यः स योगी चेदपि" यान- प्रस्थान्तभूति एवेति कृत्वा तत्यकधन तद्धर्मभ्रात्रमुकदास एवं प्राप्नुम-- हेति, न तु श्रमुख्यविधवा-इति शास्त्रसम्मता व्यवस्था अत्र प्रमाणम्- वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणा धनहारिणः । कमेणाचार्य्यसच्छिप्यधर्मभ्रात्रेकतीर्थिनः ॥ इति मितादराप्रभृति- अन्यतयाज्ञल्स्य! २११३७ वचनम् ॥१॥ एव वानप्रस्थधनं धर्मभ्रातृत्वेनानुमतोऽपरो वानप्रस्थ एकतीर्थनि- वासी एकाभमनिवासी" वा गृह्णीयाद्-इति दायभाग( पृ. २१७ ) लिखनञ्चेति ॥२०॥ श्रीसुब्रह्मण्यगुरुः शरणम् श्रीसखारामशास्त्रियः मोहर पण्डित श्रादालत देमानि- मुकाबिले बालाजीपत मोदीर मरमहाष्टनवीस ॥ १. धर्माधिकारोशितप्रतीरूप०-व्या० । २. पीवदमानयो मनुकदासाख्यार्थीममुम्पयर्थिन्यो०-व्यप० । ३ पती-यप। ४. पोपवेनि-न्यप ५०-व्यर.1 ६.वोधायप ७ सयोगिश्चेपी-व्यर ! प वोपत्रेती-व्यप। ६. मोता०-यप। १०.नवासी-कामननोवामान्यप।

व्यवस्थापनसंख्या-१६८-२६८ ६०४ श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितविचारपत्रं व्यवस्थापत्रञ्च यदीयवोशब्दप्रतिपाद्यनिगम- गुणगजेन्दु १८३४ मिताब्दीयदीसम्परमासोयमुनीन्दुमितदिनसम्बन्धिबुध- वासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादशयोघो जातस्तदनुसारेयोत्तरं लिख्यते । प्रभुसमर्पितव्यवस्था धर्मशास्त्रसम्मता न भवति, कलौ वानप्रस्थाश्र. मस्य निषेधादिति । ईशवीशब्दप्रविधेिपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासीयत्रयोदशदिनस- म्बन्धिशुकवासरे मया प्रभुकमपितविचारपत्रव्यवस्थापत्राभ्यां सहितमिद- मुत्तर दत्तमिति ।। श्रीजपतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (६१) श्रीहरिशरणम् महामहिमश्रीयुतधर्माधिकरणाध्यदजजसाहेवमहाशयसमीपेषु उपरि. लिखित प्रश्नपत्रस्योत्तरं लिख्यते- अपुत्रस्य मृतजयकान्तरायस्य समस्तपने पञ्चमपुरुपीयशातिसकुल्यद- यानाथरायरामनाथरायमातृध्वस्त्रीयमथुरानायपोषाणां मध्ये धनिदेयमाता- महपिण्डदातृत्वात् मातृष्वतीयमथुरानायस्याधिकारो भवति-इति वङ्ग- देशीयमचलितदायभागदायतत्वदायक्रमसंग्रहविवादमद्भावप्रभृतिमन्धवि- दां विदां सम्मता व्यवस्था साधोयसीति ॥ अत्र प्रमाणानि- वहयो ज्ञातयो यत्र सकुल्या बान्धवास्तथा । यो ह्यासन्नतरस्तेषां सोऽनपत्यधनं हरेत् ॥१॥ अनन्तरः सपिण्डाद्यस्तस्य तस्य धनं भवेत् । श्रत उद्ध्वंसकुल्या त्यादाचार्यः शिप्य एव वा ||२|| १. पुरसीयशातीसगुल्पदयानायरायरामनाथरायमातृसत्रीयमथुरानाथयोपाना-८५० । ३३ व्यवस्थापनसंख्या-१६६ त्रयाणामुदकं काय्यं त्रिषु पिण्डः प्रवर्तते । चतुर्थः सम्प्रदातेषां पञ्चमो नोपपद्यते ॥३॥ सपिण्डाभावे सकुल्यः - इति वृहस्पतिमनुबौधायनवचनानि ।। तस्मात् तद्भाग्यपिण्डदातुरभावे तद्देयपिण्डदातुर्मातुलादेरधिकारो न्याय्य एव-दति दा० भा०(पृ. २१०)। एतेन वृद्धप्रपितामहात् प्रभृतयः पूर्खपुरुषा प्रतिनप्तुः प्रभृतयोऽधस्तनास्त्रयः पुरुषाः एकपिण्ड- भोक्तृत्वाभावाद् विभक्तदायादाः सकुल्या इति पाचक्ष्यते दा. भा. (पृ० ११)। तस्माद् यो यस्तत्कुलोत्पनोऽतद्गोत्रोऽपि स्वदौहिनपितृ- दोहित्रादिः अतत्कुलोत्पनो वा मातुलादिर्धनिनो मृतस्य मातृकुलगत- पुरुषिकपिण्डदातृतया एकपिण्डसम्बन्धेन सपिण्डस्तस्य तस्याप्यधि- कारार्ध त्रयाणामितिवचनम् । प्रानन्तर्येण च विशेपार्थम् अनन्तर इति वचनं वर्णनीयम् । तेन मृतभोग्यमृतदेयपित्रादित्रयपिण्डदातुः पितृदो. हिनादेरभावे मृतदेय मातामहादिपिण्डदातृणा भातुलादीनामानन्तर्यकमे णाधिकारिक्रमो बोद्धव्यः । एतत्पर्य ताभावे सकुल्यः--इति दायभाग (पृ. २१२२२१३ )लिखनानि । मृतभोग्यपिण्डदात्रभावे वन्धुरिति मातामहमातुलादिः--इति दाय- तव पृ० १६६ ) लिखनानि । ततः पितामहभ्रातृदोहित्रोऽधिकारी धनिभोग्यप्रपितामह पिण्डदातृ वात् । तदभावे मातामहः तदभावे मातुलः तदभावे मातुलपुत्रः तद- भावे मातुलपोत्रः तथा तदभावे मातामहदौहित्रोऽधिकारी-इति दाय- क्रमसमह पृ०६)लिखनानि च । दौहित्रान्तप्रपितामहसन्तानाभावे मृतदेयमातामहादिपिण्डभोक्त रणां तदातॄणां चासत्तिकमेण मातामहमातुलतत्पुत्रतत्पौत्रप्रमातामह- तत्पुत्रपौत्राणा पूर्वपू भावे परपरो अधिक।। एवं तेपा दोहिताणामपि १.प्रभृत्यवस्तनात्यप २ तदान-पर.. ३ मापिण्ड-व्यर० । ४.दौ-13०-या। ५ पु पूर्वाम -न्यप।

व्यवस्थापनसंख्या-१६ मातामहवत् पितृतपितृपिण्डदानामधिकारः-इति विवादभङ्गार्णव (३६३ क )लिखनानि च इति । शकाब्दाः १७५६ इं० १८३४ साल १८ जुन । श्रीलक्ष्मीनारायणन्यायालङ्कारस्य सम्मता श्रीलक्ष्मीनारायणपण्डितस्य लं० २११ इ० सन १८३४ साल- रोवकारि मिछिल सदर देओयानि आदालत मो० कलिकाता श्रीयुत मेष्टर हेनरि सिकिसपीएर साहेवेर चैठके। तारिख ३ मार्च इ. १८३५ साल मोतावके २१ फाल्गुन सन १२४१ साल वाङ्गला दिवस मङ्गलवार- रामनाथराय ओ गयरह आपीलाण्टगन मथुरानाथ ओरफे श्रीकान्तराय रेपाडण्ट पापीलाण्टगोर उकिल मेष्टर निलवेश्चमेन एडमेनष्टीन वेलि ओ रेप्पाडण्डेर उकिल मेष्टर जीमिप कोलवरुक सदरलेण्ड साहेव हाजीर आइल। इतः पूर्व गतो सनेर २३ शेतम्बर तारिखे आपीलाएटगणेर सदर आपोलेर छोयाल ओ तत्समिभ्यारि कागजात अनुवोधन अनुसार उक्त तारिखेर रोक्कारिर लिखित प्रमाण एइ मोकदमा लम्बरे दाखिल हायार हुकुम हय। एवं अपीलाण्टगण जेलार आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था दाखिल नाकरण प्रयुक्त एइ मोकदमार कागजात उलय हइयाछिल । तत्परे श्रापीलाण्टगणेर मध्ये रामनाथराय पापीलाण्टेर दरखास्त उहार पूर्वेर मोफरर करा उकिलगणेर परिवर्ते हालेर उकिल निलवेश्चमेन एडमेनष्टोन वेलि साहेवेर नामे ओकालतनामा दाखिल करण विषये दाखिल होया विधाय गतो सनेर १८ ओ २२ दिजम्बर तारिखे उपस्थित हइया मिछिलेर समिभ्यार ६१२ व्यवस्थापत्रसंख्या-१६९ राखनेर हुकुम हय । जेला पुरनियार जज साहेवेर रिटरण श्रो १ दिजम्वर मजकुरेर लिखित तथाकार रोवकारि सम्वलित पौहुच्छान मते अद्य आपीलाण्टगणेर सदर आपोलेर छोयाल ओ कागजात सम्बलित थामार वैठके दरपेस हइया अनुवोधने श्राइल । एइ मोफईमार विपये अन्य २ तदन्तर पूर्व एइ विषय बोध करा आविश्यक ये जेलार आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था जादार दृष्टे जेलार जजसाहेव एइ मोकद्देमार इनफछालेर हुकुम दियाछेन यथार्थ ओ सत्र वटे कि ना-ए प्रयुक्त उक्त विपयेर वोध जन्य हुकुम हइल ये जेलार श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था एइ हुकुमे एइ प्रादालतेर पण्डितेर निकट पाठान जाय ये पण्डित मजकुर उक्त विषयेर जोयाव दुइ सप्ताह मध्ये दाखिल करेण । ताहा पोहुछनेर पर उचित ये हुकुम ताहा छादेर हइवेक इति ।- श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणापिरतिश्रीयुतहेनरोसिकिस्पीयरसाहेवधर्माधिकरण- लिखितेशन्दप्रतिपाद्येषुगुणगजेन्दुमितान्दीयमार्चमासीयतृतीयदिवसीयवि- चारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र तत्समर्पितव्यवस्थापत्रञ्च यत्तदन्दीयतन्मा- सोयाप्टेन्दुमितदिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधी जातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते- प्रभुसमर्पितव्यवस्था वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेण जातास्तीति । ईशवीशब्दमतिपाद्ययुगुणगजेन्दुमितान्दीयापरेलमासोयतृतीयदिनसम्ब. विशुक्रवासरे मया प्रभुसमर्पित विचारपत्रव्यवस्थापनाच्या सहितमिदमुत्तर दत्तमिति- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेए - व्यवस्थापनसंख्या- ००-२०१ (६२)-महामहिम श्रीयुत खोदावन्दान न्यामत वरावरेपु-- व्यवस्थासक्लेर तरजमा पारशी एवारते' ओ भापाय तैयार हइया हजुरे दाखिल हइतेछ । ए प्रकार दस्तुर ए आदालते आछे। किन्तु सम्प्रति केइ पारशीनचीश मुनशी प्रामार काछे नाइ, ये जाहार द्वाराय व्यवस्थासकल पारशी तरजमा कराइया हजुरे दाखिल करि, ओ इहार पूर्व ए विपयेर वारम्वार हजुरे निवेदन कारियाछि। किन्तु ए कम फेह मुनशी नियुक्त हये नाइ। अतएव निवेदन करितेछि ये कोन एक जन मुनशीके एमत हुकुम हय व्यवस्थासकल तरजमा करेण, किम्वा यदि वाङ्गला एवारते श्रो भापाय व्यवस्थासकल तरजमा करिया दाखिल करिते हुकुम हय, तवे प्रस्तुत मते वाङ्गला भापाय ओ एवारते' एक प्रकार वरजमा हइते पारे । ओ दुइ किता व्यवस्थार तरजमा वागला भापाय ओ एवारते श्रामार काछे प्रस्तुत पाछे । किन्तु हजुरेर हुकुम व्यतिरेके दाखिल करिते पारि ना। अतएव आरज करिलाम, जेमत हुकुम हय, खोदावन्दान मालिक, इहा रज करिलाम इति । तारिख २३ श्रापरेल सन् १८३५ साल ईशवी। प्रतिपाल्यतम श्रीवैद्यनाथमिश्रस्य निवेदनमेतदिति (३)-सोल- धनि विजि पुरूप काशीरामदासेर, कालीचरण प्रो कीति- नारायण ओ रघुनाथ ओ कान्तनारायण, चारि पुत्र वर्तमाने मृत्यु हय । तत् पर कालीचरणेर हरिनारायण श्री रामनारायण या राधागोविन्द तिन पुत्र पो तिन सहोदरं वर्तमाने मृत्यु हय । तदन- न्तर कान्तनारायण अविवाहित समय प्रो कीर्तिनारायणेर विवा- १. परारते-न्य।

६१४ व्यवस्थापनसंख्या-२०१ हेर पर निःसन्तति ऐ रघुनाथ भ्राता श्री कालीचरणेर पुत्र हरि- नारायण श्रो रामनारायण ओ राधागोविन्द भ्रातप्पुत्र वत्तमाने मृत्यु हय। एवं कीर्तिनारायणेर खीरह मृत्यु हय । ओपरऐ रघुनाथ हरिनारायण ओ रामनारायण ओराधागोविन्द प्रापन भ्रातपुत्र सहित कीर्तिनारायण श्रओ कान्तनारायणेर पैतृक ो सकृत धने प्रापन निज अश सहित अविभक्त क्रमे भोग करिया श्रीमती भैर- वोदास्या नामक एक अदत्वा कन्या राखिया मृत्यु हन । से मते निवेदन कीर्तिनारायण ओ कान्त नारायण रघुनाथेर सहोदर ओ रामनारायण इत्यादिर खुल्लता छिलेन, भ्राता ओ भ्रातप्पुत्र वर्तमाने निःसन्तान मरण होते रघुनाथ मजकुरेर कि पर्यन्त धेश पहुछिया हरिनारायण ओ रामनारायण श्रो राधागोविन्देर सहित भैरवीदास्यार कि प्रकारे कि पर्यन्त अंश- वाहार यथाशास्त्र व्यवस्था चाहि इति ।।- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितविचारपत्र प्रश्नपत्रञ्च यदोशवोशब्दप्रतिपाद्येपुगुणगजेन्दु- मिताब्दीय जानवरीमासीयखगुणमितदिनसम्वन्धिभृगुवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति कान्तनारायणस्याकृतोदाइस्य पुत्रमारभ्य पितृपय॑न्तरहितस्य मृतस्य माता यदि तन्मरणसमये विद्यमाना स्यात् , तदा तत्यत्तसमुदायधने तन्मानुरेवाधिकारस, तस्याश्च मृताया रघुनाथाख्यस्तत् सहोदरभ्राता विद्यमानश्चेचा तत्यक्तसमुदायधने रघुनाथाख्यस्य तद्भातु- रेवाधिकारः । कीचिनारायणस्यापि निःसन्तानस्य मूतस्य पनो यदि विद्य- मानाया कीर्तिनारायणस्य मातरि मृता स्याचदा कीर्तिनारायणत्यचतत्पनी- स्वान्तसमुदायधने तन्मातुरेवाधिकारः । तस्याश्च मृताया यदि रघुनायाख्या स्वाता विद्यमान अासीचदा तस्याधिकारः । एवञ्च सत्येतसक्षे रघुनाथ वक्तसमुदायधन यचत्य स्वाशरूप यच्च वा तेनोपरिलिखितप्रकारेणोत्तरा- धिकारित्वेन भ्रातृदयत्यधन प्राप्तम्, तस्मिन् समुदायधने तस्य पुत्रमारभ्य ६१५ यवस्थापत्रसंख्या-२०१ पक्षीपर्यन्तरहितस्य मृतस्यादचकन्याया भैरवोदास्या एवाधिकारः। हरि नारायणरामनारायणगोविन्दनारायणानां तु त्रयाणां सोदरभ्रातणां स्वरितः त्यक्तसमुदायधने समानाधिकारः । यदि चोपरि लिखितप्रकारेणोत्तराधिका- रित्वेन प्रासपुत्रद्वयधना माता रघुनाथस्य मरणोत्तरमपि विद्यमाना श्रासीत्, तदा तस्या मातुमरणोत्तरं तत्संक्रान्तपुत्रद्वयधने मूलधनिनोः कान्तनारायण- कीर्तिनारायणयोय्ये उत्तराधिकारिणस्नेपामेवाधिकारः । तत्र च तयोरुचरा- धिकारिणां मध्ये तयोः पुत्रमारभ्य भ्रातृपय॑न्ताभावेन तपोभ्रातृपुत्राणा- मद्धिरिनारायणरामनारायणगोविन्दनारायणानामेव समानाधिकारः । एव- ञ्च सत्येतत्पक्षे रघुनायकन्याया भैरवीदास्याः केवलं रघुनाथयोग्यांशे रघुनाथत्यकथने अधिकारः । इरिनारायणरामनारायणगोविन्दनारा. यणानान्तु स्वपितृयोग्यांशे कान्तनारायण कोर्तिनारायणयोः स्वपितृव्य योर्योग्यांशे च समानाधिकारः। अत्र प्रश्नपत्रे कान्तनारायणकीर्तिनारा- यणयोम्माता तयोर्मरणसमये रघुनाथस्य मरणसमये या विद्यमाना श्रासीन वेति लिखितं नास्ति । अतएव प्रकारद्वयेन व्यवस्था लिखितेति निवेदनमू-इति वगदेशचलितमनुदायभागतट्टीकादायतत्त्वदायक्रमसंग्रहवि. वादार्णवसेतुविवादमगार्णवादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्था । अन्न प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरी भ्रातरस्तथा । तत्सुतः--इत्यादि दायभागादिग्रन्थधृतयाज्ञवल्स्यवचनम् ।।१।। अपुत्रस्य मृतस्य कुमारी रिक्थं गृहीयात्, तदभावे चोदा--इति दाय- भागादिग्रन्थधृतपराशरवचनम् ||२|| अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । भुजीतामरणात शान्ता दायादा अवमाप्नुयुः ।। इति दायभा- गादिनयतकात्यायनवचनम् ||३|| यद्वा पत्नील्युपलक्षणम्, स्त्रीमात्राधिकारेऽयमों बोद्धव्यः-इति दायमागप्रन्थलिखनञ्चेति ॥४॥ इंशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयापरेलमासीयवमुपदमितदिन व्यवस्थापनसख्या-२०१ सम्बन्धिमङ्गल वासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रमश्नपनाना सहितेय व्यव- स्था दचेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थार तरजमा वाङ्गला भापाय- हुजुरेर सोपरद्द करा रोवकारि ओ सायाल जाहा इङ्गरेजी सन १८३५ सालेर ज्ञानवरि मासेर ३० तारिखे दिवस शुक्रवारे आमि पाइया छिलाम ताहार विवेचना करिया ये मत योध हुइलो तद्नुसारे जवाव लिसितेछि इति- सओयालेर लिखित वृत्तान्त कमे अविवाहित कान्तनारायणेर पुत्र अवधि पितृपय॑न्त रहित हझ्या मृत्यु हुइले ताहार मरण समये यदि वाहार माता वर्तमाना छिल, तवे ताहार त्यक्त सकल वस्तुते ताहार मातार अधिकार हइयाछिलो। आर ऐ मातार मृत्यु हइले ताहार मरण समये रघुनाधनामे कान्त- नारायणेर सहोदर भ्राता यदि विद्यमान छिल, तवे ऐ मातृ- संक्रान्त कान्तनारायणेर त्यक्त धने ताहार भ्राता रघुनाथेर अधिकार हइया छिलो। एवं कीर्तिनारायण निःसन्तान मृत्यु हइले ताहार पनीर यदि उहार माता वर्तमाना थाकिते मृत्यु हइया थाके तवे कीर्तिनारायणेर त्यत ताहार पनीसंक्रान्त समुदाय धने कीर्तिनारायणेर मातार अधिकार हइयाछिलो। ओ कोर्तिनारायणेर मातार मरण समये यदि रधुनाथ नामे कीर्तिनारायसेर भ्राता वर्तमाने छिल, तवे ऐ वस्तुते ताहार अधिकार हइयादिलो। ए प्रकार हइले रघुनाथेर त्यक्त समुदाय धन, याहा वादार अश योग्य छिल, यो ऐ व्यक्ति उपरेर लिखित प्रकारे दुइ भ्रातार त्यक्त धन उत्तराधिकारित्व प्रकारे पाइयाछिल, व्यवस्थापनसंख्या-२०१ ६१७ ताहाते ताहार पुत्र-अवधि पत्नी पर्यन्त फेह नाथाका प्रयुक्त ताहार अदत्ता कन्या भैरवीदासीर अधिकार हइवेक, श्रो हरिनारायण श्री रामनारायण ओ गोविन्दनारायण एइ तिन जनेर केवल आपन पितृ योग्य अंशे समान अधिकार हइवेक। यदि स्यात् कान्तनारायण प्रो कीर्तिनारायणेर माता ऐ दुइ पुनेर धन पाइया रघुनाथेर मृत्युर पर वर्तमाना बिल, एमत हय तवे ऐ माता मरिले वाहाते संक्रान्त ये ऐ दुइ पुरेर धन ताहाते कान्तनारायणेर पो कीर्तिनारायणेर ये ओयारिश ताहार- दिगेर अधिकार हय । ताहाते थे दुइ जनेर अोयारिशेर मध्ये पुत्र अवधि भ्राट पर्यन्त ना थाकाते भ्रातृपुत्र ये हरिनारायण श्रो रामनारायण श्री गोविन्दनारायण तिन जन ताहारदिगेर समान अधिकार हुइवेक । ए प्रकार हइले ए पक्षेर रघुनाथेर फन्या ये भैग्वीदासी ताहार केवल रघुनाथेर हिस्याते अधिकार य, ओ हरिनारायण प्रो रामनारायण श्री गोविन्दनारायणेर आपन पितार हिस्याते, ओ कान्तनारायण ओ कीर्तिनारायण ये दुइ पितृव्य नाहारदिगेर हिस्यातेश्रो समान अधिकार हइवेक इति । यो सोयालेते कान्तनारायण ओ कीर्तिनागयणेर माता ऐ दुइ पुत्रेर मृत्यु समये श्री रघुनाथेर मृत्यु ममये वर्तमाना छिल कि ना-इहा किछु लेखा नाहि । एजन्ये दुइप्रकार लिखागेल इति । ए व्यवस्था वाङ्गलार चलित मनु ओ दायभाग ओ ताहार टीका ओ दायतत्व ओ दायक्रमसंग्रह ओ विवादार्णवमेतु श्रो विवादभङ्गाणव-प्रभृति मन्थानुसारिणीति ||-- इहार प्रथम प्रमाण दायभाग प्रभृति ग्रन्थेर धृत याज्ञवल्क्य मुनिवचन । ताहार भापा-पुत्र-पौत्र-प्रपौत्र-रहित मृत व्यक्तिर धन प्रथमे पत्नी पाय, पत्नी ना थाकिले कन्या पाय, कन्या ना थाकिले दौहिन पाय, दौहिन ना थाकिले पिता पान, थाकिले मावा पान, माता ना थाकिले भ्राता पान, भ्राता ना थाकिले भ्रातुप्पुत्र प्रभृति पाय इति ॥१॥ पिता ना व्यवस्थापनसख्या-२०१-२०२ द्वितीय प्रमाण दायभाग प्रभृति ग्रन्थेर धृत पराशरमुनिर वचन । ताहार भाषा-पुत्र पौत्र प्रपौत्र पन्नो पय॑न्त-रहित मृत व्यकिर धन प्रथमे अविवाहिता कन्या पाय, अविवाहिताः कन्या ना थाकिले विवाहिता कन्या पाय इति ।।२।। तृतीय प्रमाण दायभाग प्रभृति ग्रन्थेर धृत कात्यायनमुनिर वचन 1 ताहार भाषा-पुत्र पौत्र प्रपौत्र ना थाकिले पनी यदि भार शय्या प्रतिपालन करेन अर्थात् व्यभिचारिणी ना हयेन तवे पतित्यक्त धन यावज्जीवन भोग करिवेन, अयथा व्यय करि- वेन ना। पत्नी मरिले ऐ धन पतिर अन्य ये प्रोयारिप थाकिवेक वाहारा पाइवेक इति ॥३॥ चतुर्थ प्रमाण दायभागप्रन्थेर लिखित । वाहार भाषा- पत्नी पतिर त्यक्त धन यावज्जीवन अयथा व्यय ना करिया भोग करिवेन । ताहार पर पतिर अन्य ओयारिप पाइवेक । एइ नियम । याहा तृतीय प्रमाणे कात्यायनमुनिर वचने लिखा गेल ताहा केवल पत्नोर प्रति नहे, किन्तु स्त्रीमात्रेर प्रति । अर्थात् स्त्रीलोक येखाने अधिकारिणी हइवेक से सकल स्थाने ऐ नियम जाना जाइवेक इति ॥४॥ इगरेजी सन १८३५ सालेर आपरेल मासेर २८ तारिखे दिवस मङ्गलवारे श्रामि हजुरेर सोपरद्द करा रोवकारि यो सोयालेर सहित एइ व्यवस्था दाखिल करिलाम इति ।- (६४) समोल- यद्यपि कोनो अवीरा खीलोक बापन पतियोग्य अंश स्था- वर अस्थावर वस्तुते अप्राप्त ओ योत्राहिन थाकिया तदवस्तु- प्राप्तार्थे आपन स्वामीर वह ज्ञाति थाक्तेिश्रो जनेक ज्ञातिक एमव एकरार लिखिया दिया थाफे ये ऐ जन नालिपेर द्वारा फिम्वा अन्य कोनो रूपे ऐ अप्राप्त वस्तुते प्राप्त कराइते पारे, तवे ऐ वस्तुर अर्द्धक अथवा ताहार किञ्चित् ऐ प्राप्तकारक जन व्यवस्थापनसंख्या-२०२ अापन श्रम ओ खरचार्थे पाइवेक, एमत अबीरा स्त्रीलोकेर एरुप एफरार शास्त्र मत माह्य कि ना, एवं अवीरा खीलोक आपन पति योग्य अंश वस्तु एरुप एकरारेर द्वारा अन्यके दिवार- क्षमता राखे कि ना । यदि राखे तवे तादार वर्तमान पर्यन्त कि ताहार प्रवर्तमानेश्रो इति ।- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रादिश्यश्च यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुण- गजेन्दुमिताब्दीयफेवरखरीमासीयतृतीयदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशमोधी जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते-- यदि काचिदवीरा श्री स्वपतियोम्यांशस्थावरास्थावरात्मकवस्तुनि धन- हीनतया अायत्तत्वसम्पादनाथका सती तद्वस्तुप्राप्त्यर्थ स्वपतिज्ञात्यन्तर्गता. बैकस्मै कस्मैचिज शातये एतनियमेन संविसत्रं लिखित्वा दत्तवतो स्यात्तथा दि भवान् धर्माधिकरणाभियोगद्वारेण प्रकारान्तरेण वोपरिलिखिताप्राप्तवस्तुनः प्राति फारयितुं शक्रोति चेचदोपरि लिखितविरादास्पदीभूतस्थावरास्थावर- स्याद्ध यत्किञ्चिद्वा स्वीयपरिश्रमस्य व्ययस्य वा विनिमये प्राप्स्यति इति । तत्र यदि सवित्पत्रसम्प्रदानभूतजातिविशेषेण धर्माधिकरणाभियोगद्वारेण प्रकारान्तरेण वा ताशापासवस्तुनः प्राप्ति तस्याः कारितवान् स्यात् तदेता. दृश्या अवीरायाः खियास्ताशनियमेन सक्तिनं प्राचं भवितुमईति, नो चेन्न भवति । एवमवीरा स्त्री स्वपतियोग्यां शवस्तुन एतादृशसवित्पत्रद्वारा अन्यस्मै दान क्षमतामप्युरिलिखितताहरा नियमपूर्ती रक्षति, नो चेन्न रक्षति | रक्षणपक्षे तस्या अबोराया मरणानन्तरमपि तद्रक्षणस्य समान कार्यकारित्वाद् इति वद्भदेशचलितमनुदायभागतट्टोकादायतत्त्वदायक्रम- संग्रहविवादार्णवसेतुविवादमङ्गणवादिग्रन्धानुसारिणी व्यवस्था | अत्र प्रमाणम् अत एव वर्त्तनाशक्ती प्राधानमप्यनुमतम् । तत्राप्यशक्ती विक्रय- रएमपि-इति दायभागप्रबलिखाम् ।।१।।

'६२० व्यवस्थापन संध्या-२०२ सीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुरनापदि । विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविक्रयाः।। इति विवादमनाएंवादिनन्ध- धृतनारदवचनम् ॥शा सोपाधिदानमुपाध्यसिद्धावसिद्धम्-इति विवादभावग्रन्थ लिख- नञ्चेति । ईशवीशन्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमितान्दीयापरेलमासीयवमुपददिनस. म्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रतदतिरिक्तपिचारपत्रादित्रय- सहितेय व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थार तरजमा वाङ्कलाभापाय- हजुरेर सोपरद्द करा सोयाल भो ताहार सेोयाय रोवकारि प्रभृति तिन वेता कागच याहा इङ्गेरेजी सन १८३५ सालेर फेवरवरी मासेर ३ तारिखे दिवस मगलवारे आमि पाइया- छिलाम ताहा विवेचना करिया येमत वोध हइलो तदनुसारे जवाव लिखितेछि इति- यदि कोन अवीरा स्त्रीलोक अापन पतिर योग्यांश स्थाव. रास्थावर वस्तु ताहाते श्रापन अर्थ सामर्थ्य ना थाकाते दखल करिते अक्षम हइया ऐ वस्तु दखल पाइवार कारण आपन स्वामीर ज्ञातिर मध्ये एक जनके ए प्रकार नियमे एकरार लिखिया देय ये तुमि श्रादालते नालिपेर द्वाराय कि अन्य कोन प्रकारे उपरेर लिखित वेदखलि वस्तुते आमार दखल कराइते पारह तवे पपरेर लिखित स्थावर यो अस्थावर-प्रभृति विरो- धीय वस्तुर अर्धक किम्वा किश्चित् आपन परिश्रमेर ओ अर्थव्ययेर परीवचे पाइवा इति । दाहाते ऐ व्यक्ति यदि श्रादालते नालिशेर द्वाराय किम्वा अन्य कोनो प्रकारे ऐ वेदखलि वस्तुते ऐ अवीरा नीलोकेर दखलसम्पादन करिया थाकेतचे ऐ प्रकार अवीरा , व्यवस्थापन संख्या-२०२ ६२१ स्त्रीलोकेर ए प्रकार एकरार ग्राह्य हइते पारे, श्री यदि ऐ प्रकारे कोनो तफात् हइया थाके तवे ग्राह्य हइते पारे ना। बार एइ रूप अवीरा स्त्रीलोक आपन स्वामीर योग्यांश वस्तुर ए प्रकार एक- रारेर द्वाराय अन्य व्यक्तिके दिवार क्षमता उपरेर लिखित ऐ. प्रकार नियम समापन हुइले राखे, ओ ऐ नियम समापन ना हइले राखे ना, ओ ए पक्षे क्षमता राखनेर प्रति कोनो काल नियम नहे, अर्थात् ऐ अवीरा स्रोलोक ये पर्यन्त जीवशाय थाकिचेक से पय्यन्त ऐ क्षमता राखनेर ये फल ताहा उहार मृत्यु हइले ओ समान इति । एइ व्यवस्था बङ्गदेशेर चलित मनु ओ दायभाग श्रोताहार टीका ओ दायतत्व ओ दायक्रमसंग्रह ओ विचादार्णवसेतु ओ विवादभङ्गार्णव-प्रभृति ग्रन्थानुसारिणीति ।। इहार प्रथम प्रमाण दायभागग्रन्थेर लिखित । ताहार भापा- स्त्रीलोकेर खोरपोप प्रभृति अचल हइले आपन पतिर त्यक्त. संक्रान्त वस्तुर वन्धक सिद्ध हइते पारे । ताहातेओ अचल हइले ऐ पतिर त्यक्त वस्तुर विक्रय सिद्ध हइते पारे इति ।।२।। द्वितीय प्रमाण विवादभङ्गाणेव प्रभृत्ति ग्रन्थ धृत नारदमुनिर वचन । ताहार भापा-आपत्काल व्यतिरेके खोलोकेर करा सकल कर्म असिद्ध,विशेषतःघर,द्वरोजाओ भूमि, इहार दान प्रोवन्धक श्रो विक्रय आपत्काल व्यतिरेके सिद्ध हइवे पारे ना इति ||२|| तृतीय प्रमाण विवादभङ्गार्णव ग्रन्थ लिखित । ताहार भाषा- कोनो प्रयोजन सिद्ध हायार निमित्चे कोनो नियमे ये किछु देय से प्रयोजन नियमे यदि सिद्ध ना हय नवे से देओया सिद्ध हइते पारे ना इति ||२|| इङ्गरेजी सन १८३५ सालेर आपरेल मासेर २८ तारिखे दिवस मङ्गलवारे आमि हजुरे र सोपरद्द करा सवाल ओ ताहार संमो-- याय रोवकारि प्रभृति तिन केला कागच सहित एइ व्यवस्था. दाखिल करिलाम इति ||- ६२२ व्यवस्थापनसंख्या-२०३ (६५) लं० २५८ सन १८३२ साल ईशवी रोवकारि मिछिल आदालत देखोयानि सदर मोकाम कलि- काता प्रादालत मजकुरार हाकिम श्रीयुत तामस किमिल रावटसेन साहेवेर बैठके तारिख २१ श्रापरेल सन १८३५ साल ईशवी मोतावेक तारिख माह वैशास सन १२५२ साल वाङ्गला रोज मङ्गलवार- राजीवलोचनसतपति श्रापिलाएट- वेचारामराय रप्पाडण्ट- जेला मेदिनीपुरेर श्रादालत देमानीर एक केता रिटरण ताहार तारिख २७ माह मार्च सन १८३५ साल ईशवी श्रो एक केता रोवकारि सहित ओ गयरह कागजात रप्पाडण्टेर असाक्षाते एखाने पहुचिया अद्य मोक ईमार कागजात समभि. व्याहारे पापिलाण्टेर सकिल मुनशी हसन आलि ओ खोद रप्पाडण्टेर साक्षाते रोवकार हइलो ओजिला मेदिनीपुरेर श्रादालतेर कागजात प्रो तथाकार फयसला पर्यन्त पाठ करा- गेल । ओ उचित हइलो ये चूडान्त हुकुम सादर होनेर पूर्व ए विपय दरियाप्त कराये जिला मेदिनीपुरेर श्रादालतेर पण्डितेर दाखिल करा व्यवस्थासकल मोतावेक शास्त्र मरओजे मुलुक वाङ्गला किम्वा उडिस्यार दोरस्त वटे कि ना, आवश्यक बोध हइया हुकुम हइलो ये दुइ केता व्यवस्था एइ हुकुमे ए आदालतेर पण्डितेर निकट पाठान जाय ये व्यवस्थाजात मजकुर वगदेश- चलित शाखानुसारे किम्वा उडिस्या देशेर चलित शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि ना । ओ सिरिस्तादार ए विपयेर कैफियत् दाखिल करेण ये मुद्दइर दावी डिसमिस इइया दसल रप्पाडण्टेर थाके ओ डिगरिर टाका वैविलरफार फिरिया पाइयाछे कि ना। यद्यपि पाइया थाके तचे सेह मकद्दमार लम्बर श्रो फयसलार तारिख निशान दिया कैफियत दाखिल करे। श्रार रप्पाडण्ट के व्यवस्थापनसंख्या-२०३ ६२३ बुझिया देया जाय ये तुमि आइन्दा मङ्गलवारे हाजिर ना थाकिवा तवे तोमार अपेक्षा मुलतवी ना राखिया मकद्दमा फयशला करा जाइवेक । अतएव तोमाके ज्ञात करा गेल इति ।। श्रीश्रीदुर्गा नं० ३६- अस्योचरम्- भरणार्थदत्तगूमेर्भरणमात्रफलकत्वाद् दानोद्देश्येन तरतुतेन या प्राप्त- व्यवहारपुत्रवता विक्रतुं न शक्यत इति विद्वद्भिनिरणायि । पैतृकस्थावर- भूमेरप्यप्रासव्यवहारपुत्रवता विक्रेतुं न शक्यत इत्यपि मिताक्षरामतम् ।। अत्र प्रमाणम्- स्थावरे तु स्वार्जिते पित्रादिप्राप्ते च पुत्रादिपारतन्त्र्यमेव । स्थावरं द्विपदञ्चैव यद्यपि स्वयमजितं ।। असम्भूय सुतान् सर्वान् न दानं न च विकयः ।।-इत्यादि मिता- क्षगलिखनम् ॥ श्रीकमलाकान्त विद्यालङ्कारपण्डितैः श्रस्य भापा-- पुत्र-पौत्रादि-क्रमे भरणार्थ दत्त भूमि पाइया भोग मात्र करिते पारे । ग्रहोता किम्बा ताहार पुत्र अप्राप्तव्यबहार पुत्र सत्वे 'विक्रय करिते पारे ना । श्रार मिताक्षरा मते पैतृ भूमि पुत्रादि थाकिते विक्रय करिते पारे ना इति । सन १८३२ साल ५ श्रापरेल ।।-- श्रीकमलाकान्तविद्यालङ्कारपण्डिवः न०३८ अस्योचरम्- भरणार्थदत्तभूमेभरणमात्रफलम्बादानोदेशेन तत्सुतेन वा विशेर्नु * व्यवस्थापनसख्या-२०३ न शक्यते इति व्यवस्था न मिताक्षरादायभागदायतत्त्वप्रभृतिसर्वशास्त्र- सम्मता सर्वदेशसाधारणीति विद्वद्भिनिरणायि । श्रीकमलाकान्तविद्यालङ्कारपण्डितः पैतृकतादृशनियूदस्वत्ववभूमिमपि अमाप्तव्यवहारपुत्रवान विक्रेतुन शक्नोति-इति तु व्यवस्था मिताक्षरामात्रसम्मता इति विद्वद्भिनिरणायि । दायभागजीमूतवाहनमते तु पितृपितामहादिसम्बधमाता भूमिमपि अमाप्तव्यवहारपुत्रवानाप विक्रेतु शक्नोति, किन्तु विक्रेता प्रत्यवायी -इति च विद्भिनिरणापि । श्रीकमलाकान्तविद्यालङ्कारपण्डितः तत्र प्रमाणनि- दात्रभिसधिनिमित्तान् स्वत्वस्य २४।१।४ यथा याज्ञवल्क्य मणिमुक्तावालाना सव्वस्यैव पिता प्रभु । स्थावरस्य च सर्वस्य न पिता न पितामह ।। पितामहश्रुतेस्तदनविषय वचनम् । तत्रापि सव्वस्येत्युपादानात् सर्व- स्य कुटुम्बचतनहे तोर्दानादानपघ ८।२।६ जीमूतवाहनदायभागमयकार । श्रीकमलाकान्तविद्यालझारपण्डितः भवात- - अस्य भाषा- . पुन पौत्रादिक्रमे भराणार्थ दत्त भूमि पाइया भागमान करिते पारे। ग्रहोचा किम्बा ताहार पुन अप्राप्तव्यवहारपुन सत्वे विनय करिते पारे ना। ए सव्वशास्त्रवित् पण्डितदेर निर्णय । इति जीमूतवाहनमतः। अप्राप्तव्यवहार पुत्र सत्त्वे पिता पैतृक कोन भूमि विक्रय करिते पारे ना--ए कवल मिताक्षरामत । दायभागमते पित. पितामहादि सम्बन्ध प्रयुक्त अश रूपे प्राप्त भूमि अप्राप्तव्यवहार पुत्र सत्वेश्रो विक्रय करिते पारे, विन्तु विक्रयक र पाप हय इति । जामूतवाहन दायभागप्रत्यकर्ता इति ।

व्यवस्थापत्रसंख्या-२०३ ६२५ ए देशेर मध्ये उत्कलमतावलम्बि उत्कल ब्राह्मण पार ताहार-- दिगेर यजमान शिष्य उडिया सृष्टिकरण ओ क्षत्रिय, वैश्य ओ कान्यकुब्ज ब्राह्मण । इहारदिगेर मिताक्षरा मते व्यवस्था । राढीय, ब्राह्मण वो दक्षिण राढीय कायस्थ प्रभृतिर दायभांग मते व्य- वस्था। ए विवादे विक्रय कत्ती कोन जाति ताहा लइया विचार करिते हय इति-- इति श्रीकमलाकान्तविद्यालङ्कारपण्डितैर्निरणायि- श्रीकमलाकान्तविद्यालङ्कारपण्डितः - .. श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुततामस किमिलरावटरोनसा देवधर्माधि- करणलिखितेरावीशब्दप्रतिपादोपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयापरेलमासोकविंश- तितमदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपत्रमेव तत्समर्पितरसगुणारितव्यवस्था पत्रं वसुगुणातिव्यवस्थापत्रच यत्तदब्दीयतन्मासीयगुणपक्षमितदिनसम्म न्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोय यादृशवोघो जातस्तदनुमारेयोत्तरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितरसगुणादितव्यवस्थायां वसुगुणादितव्यवस्थायाच प्रथमतो लिखितमस्ति भरणार्यदत्तभूमेर्भरणमात्रफलकत्याद्दानोद्देश्येन तत्सुतेन का अप्राप्तव्यवहार पुत्रवता विक्रतुं न शक्यत इतीति । तब यदि दात्रा दानोहेश्या- येयं भूरत्वया पुत्रपौत्रादिक्रमेण भोक्तव्या, किन्त्वस्या भूमौ मदीयं स्वत्वम- स्त्येवेति नियमेन भरणार्य तद्भमिर्दत्ता स्यात्तदा तद्वयवस्थालिखितं तन्मतं वगदेशचलित शास्त्रानुसारेणोकलदेशचलितशास्त्रानुसारेण या शुद्धं भवतीति । एवं तत्तद्वयरस्थायां पुनरपि लिखितमस्ति पैतृकभूमि- मप्राप्तव्यवहारघुत्रवान् विकतुं शक्नोतीति । तत्रापि यद्यपातव्यबहारपुत्रयता पैतृकभूमिविक्रयसिद्धिसम्पादकग्रास्त्रीयावश्यकहेतुं बिना स्वेचौर तद्भमि विक्रीता स्यात्तदा तत्तद्वयवत्यालिखितं तन्मत वङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारे पोत्कल देशचलितशास्त्रानुसारेण पाशुई भवतीति । एवं वमुगुणादित- व्यवस्थापनसख्या-२०३-२०४ व्यवस्थाया पुनरपि लिखितमस्ति दायभागजीमूतवाहनमते नु पितृपिता- महादिसम्बन्धप्राप्ता भूमिमप्राप्तव्यवहारपुत्रवानपि विनतु शक्नोति, किन्तु विता प्रत्यवायी भवतीति चति । तापि परमातव्यवहारपुरवा पितृ पितामहादिसम्बन्धप्राप्तभूमिविक्रयसिद्धिसम्पादकशास्त्रीयावश्यहेतुभि वैश्चित पितृपितामहादिसम्ब-यप्राप्ता भूमिचित्रीता स्यात्तदा तद्व्यवस्था लिखित तन्मत बङ्गदेशचलितशास्त्रानुसारेगोललदेराचलितशास्त्रानुसारेण या शुद्ध भरतीति ।।- ईशवीशब्दप्रतिपाद्येषुगुणगजेन्दुमिता दीयापरेलमासीयाङ्कपद्धमित- दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितपिचारपत्रेण व्यवस्थापनाम्यान सहितमिदमुत्तर दत्तमिति ।।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण (६६)-ल० ३५० सदर- रुवकारि मिडिल श्रादालते देयोयानि सदर मोकाम कलि- काना बैठक श्रीयुत जावळ इष्टामोएल साहेव कायेम मोकाम हाकिम वादालत मजकुरा सन १८३५ साल तारिख १८ मे, मो. सन १२४२ साल तारिख ५ ज्येष्ठ। मतिलाल कल्याणसिंह श्रापीलएटान" व्रजलाल ओ शीताराम ओ गयरह रेपाडएटान आपीलस्टेनेर उकिल मुनशी गोलाम आहमद ओरष्पा- डएटानेर उकिल जिमिश कोउलवोरक सदरलेण्ड साहेव ओ मुनशी दादारवस्क खाँ हाजीर प्राशीलेन । एइ मोकईमा २६ श्रापरेल तारिखे प्रामार निकट स्वकार हइया ४६ नम्बर पर्यन्त कागजात पडागिया दिवावशान प्रयुक्त ओ ऐ माहार २८ खारिखे रेप्पा(डाएटानेर उकिलेर हाजीर ना होर जन्ये मुलतथि छिल. पुनराय अद्य स्वकार हइया वाकी कागजात पडागेल । जे हेतुक नवस्थापनसंख्या-२०४ ६२.७ मिछिलेर कागजात विवेचनार द्वाराय श्री मोकईमार गतिकर दीष्टे एइ मोकईमार चूडन्त हुकुम होनेर पूर्वे एइ श्रादालतेर परिडतेर निकट हइते एइ विशय जिज्ञाशा करा आविश्यक श्री जरूर जे बहार देशेर चलित शाखेर द्वाराय पिता श्री पितामहेर एमत सार्द्ध क्ष्यमता आछे कि ना-ये आपन पुत्र श्रो पौत्रेर विने अनु- मतिते पैतृक स्थावर वस्तु हस्तान्तर करे, श्री यद्यपि पुनेर परलोक हय, तवे पौत्रेर अनुमति आविश्यक राखे कि ना। ओ यद्यपि स्यात् तथाकार चलित शालेर द्वाराय ए प्रकार वस्तु हस्तान्तरे निषेध थाफे, तवे एमव स्थले ऐ विक्री अशीर्द्ध करणेर हाकीमके कर्तव्य श्रो आविश्यक वटे कि ना, एवं पैतृक वस्तु समुदय किम्वा ताहार मध्ये किश्चित हस्तान्तर करणेर विपये शारे मध्ये किछु विशेष पाोया जाय कि ना। आर एइ श्रादालतेर सेरेस्ता हइते एइ विशय ये इहार पूर्व एइ आदालते शुभे वेहारेर मोतालकेर फोन मोकदम्मात एमरा कोन फयछला ये पैतृक विशय हस्तान्तर करणे सिद्ध अथवा असिद्ध हइआ थाके जाना आविश्यक । अतएव हुकुम हइल के निचेर लिखित मत प्रश्न एइ रुवकारिर नकलेर सम्वलित एइ रुवकारि पौछिवार तारिख हइते सप्ताह मेयाद मध्ये प्रत्युत्तर लिखिवार हुकुमे एइ पादा- लतेर पण्डितेर निकट पाठान जाय ओ ए३ श्रादालतेर सेरेस्ता दारेर कर्त्तव्य ये तलवि कैफियत सेरेस्ता तल्लास प्रो तहकीकात करिया गुजरान इति । प्रथम प्रश्न:- शुभे वेहारेर चलित शास्त्र द्वाराय पिता ओ पितामहेर एमत साध ओक्ष्य(म)ता पाछे कि ना। ये आपन पुत्र श्रो पौत्रेर विने अनुमतिते पैतृक स्थावर वस्तु हस्तान्तर करे । द्वितीय प्रश्न :-- पुत्रेर परलोक इइले पौत्रेर अनुमति प्राविश्यक राखे किना- व्यवस्थापनसरया-२०४ ६२८ - - तृतीयप्रश्न यद्यपि तथाकार चलित शास्त्रर द्वाराय एमद वस्तु हस्तान्तरेर विशये निषेध थाक, तवे एमत स्थले ए विक्री प्रसिद्ध करिवार हाकिमक कर्तव्य ओ श्राविश्यक वटे कि नाइवि। चतुर्थप्रश्न पतृक वस्तु समुदाय अथवा ताहार किश्चित् हस्तान्तर करि वार विशये शास्त्रे किछु विशेष पात्रोया जाय कि ना इति । श्रीजयतितराम् एतद्धम्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुत जाज्जहष्टाक एलसाहेब धर्माधिकरणलिखितेशचीशब्दप्रतिपायेधुगुणगो दुमितान्दीयमासीयाष्टर दशदिवसीयावचारपवान्तगतप्रश्नप्रतिरूपपत्र यचदब्दीयत मासीयत्रयाविश तितमदिनसम्बधिश नवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य याशबोधो पातस्त दनुसारेणोत्तर लिख्यते। प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- वहारदेशव लतशास्त्रानुसारेण पुत्रस्य पौत्रस्य वा अनुमति विना पैतृकस्थावरस्य हस्तान्तरकरणे पितु पितामहस्य वा स्वच्छया क्षमता नास्तीत । द्वितीयप्रश्नस्योचरमप्यर्थादत्रैव पय्यवसितामति पृथड्न लिखितमिति ||-- अन प्रमाणम्- मणिमुक्तावालाना सर्वस्यैव पिता प्रभु । स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामह ||-इति मिताक्षरादि प्रयतयानवल्क्यवचनम् ॥११॥ तृतीयप्रश्नस्य चरम्- वहारदेशचलितशास्त्रानुसारेणेताह शवस्तुनो हस्तान्तरविषये पितु पितामहल या स्वच्या निपेचे सति शास्त्रनिषिदविक्रयासिखरए धम्माधिकरणाधिपते पत्तव्यमवश्यकच भवतीति- व्यवस्थापनसंख्या-२०४-२०५ १२ अत्र प्रमाणम्- व्यवहारान् नृपः पश्यविवद्भिर्माणः सह । धर्मशागानुसारेण इत्यादि मिनावरादिग्रन्यतयाज्ञवलायाचनम् ॥१॥ चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- पतृकवानुसमुदायस्य यतिकविद्वस्तुनो या हस्तान्तरफरणविषये शास्त्रे कधिदिरोपोऽस्ति । स च विशेषः प्रथमप्रश्नोत्तरप्रमाणे लिखितः- इति वेहारदेयचलितमनुमितादरावामित्रोदयादिअन्धानुसारिणी व्यवस्था ।। अंत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमायमेवेति ॥ रायोरान्दप्रतिपादोपुगुणगजेन्दुमिताब्दीय गुनमासीयनगमदिनसम्बन्धि मालयासरे मया प्रश्नपत्रसदितेयं व्यवस्था दत्तेत । थीर्जयतितराम् श्रीयनाथमिश्रेण (६७,-लं २२२ सन २८३३ साल- मोकाम कलिकाता सदर देश्रोमानि प्रादालतेर श्रीयुत ओलीयम बाडिन साहेब ऐ श्रादालतेर हाकिमेर बैठकर ३० सन २०३५ सालेर २८ मे मोतावक याङ्गला सन १२४२ सालेर १५ ज्येष्ठ वृहस्पतिवारेर रोवकारि ।- भोलानाथदास पापीलाण्ट श्रीमतीसवित्रा श्री गोपालकृष्ण श्री गायरह रेप्पाउण्टान पापीलारदेर उफिलमुनशी होछेन आलि थो हाजिरा रेप्पाडएट श्रीमतीसावित्रार उकिल राधाकृष्ण श्री गोपालकृष्ण सिंहेर उचित सदामुखपण्डित हाजिर प्राइल । एइ मोसमा १.किरियर-4101 व्यवस्थापत्रसंख्या-२०५ पइ मासेर १६ तारिखेर हुकुमानुसारे अद्य पुनराय दरपेस हइया ए श्रादालतेर पण्डितके हजुरे तलव करिया ये व्यवस्था क्रोटेर हाकिमेर बलवानुसारे पण्डित लिखियाछिलेन ताँहाके अर्पन करिया जिज्ञाशा करागेल ये एइ व्यवस्था दृष्ट करिया ताहार ये अर्थ यथार्थ हय वलेन । पण्डित दृष्ट श्रो गोर करार पर कहिलेन ये प्रथम प्रश्नेर शेपेर प्रत्युचरेर विशयेर अर्थ एइ ये ये पुत्र प्रापन माताके मन्द कहे से पुत्र, ये पय्येन्त प्रायश्चित्त ना करे, उत्तराधिकारिहेतुते कोन एक सत्वे स्वत्वाधिकारि हइते पारे । ना जखन भोलानाथदास हलफ करिया कहिया ये ताहार विमाता व्यभिचारिणीर कर्मे इच्छुक हइया मानेर लाघव करियाछे, ओ व्यभिचारिणीर कर्मकरार हेतुते शास्त्रानुशारे जातीर व्यवहार हइते वाहिर हइयाछे, उपरेर लिखित विशय हाकीमेर तजविजे सावुद हय नाइ। एवं उक्त व्यवस्थार मध्ये ए विशयेर कोन विस्तारित ये एमत मन्द कहने कि प्रकार प्राय- श्चित्त करिते हइवेक लेखा नाइ। ए कारण हुकुम इइल ये एइ रोवकारिर नकल एइ ये ए विशयेर जोय, ये विमातार पक्षे उपरेर लिखित विशय सम्बन्ध करणे यो ताहा साव्यस्त नो होने उहा वक्ता पुत्रेर पते वङ्गदेशीय चलित शास्त्रानुसारे कि प्रकार प्रायश्चित्त उचित, ओ ये प्रकार पापेर प्रायश्चित्तर जन्य शाखेर मध्ये किंछु मेयाद निधाय्य पाछे कि ना । यदि थाके, तवे वाहार प्रकाश होनेर दिवस हइते कत दिवस मध्ये प्रायश्चित्त करिवेक-एइ रोवकारिर पार तारिख हइते दिन दिवस मध्ये लेखेन-ए पादालतेर पण्डितके अर्पन करा जाय इति ।- श्री यतितराम् एतदर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतप्रोलियमवेराडीनमाहेवधर्माधिकरण लिखितेशवीग्रन्दप्रतिपाद्ययुगुणगजेन्दुमितान्दीयमेहमासीयाटाविंशतितम- व्यवस्थापनसंख्या-२०५ दिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपस्त्रं यत्तदन्दोयजुनमासीयाप्टमदिनसम्ब- न्धिसोमवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातत्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- व्यभिचारदोषरहिताया विमातू राजसनिधी ज्ञानपूर्वकन्यभिचारदोप- ख्यापनात्यन्ताम्याराजनितपापप्रशमनार्थ द्वादशवार्षिक महाव्रतं कर्तव्यम् । तत्राशक्ती साशीतिशतसंख्यकधेनुदान तन्मूल्यस्य वा चत्वारिशदधिकपञ्च- शतकापणस्य तत्तुल्यस्य सुवर्णस्य रजतत्य या दान कर्तव्यम्, दक्षिणा च गोशतं वन्मूल्यं वा कापिणशतं देयम् । एतत् प्रायश्चित्तं संवत्सरमध्य एव कर्त्तव्यम् । संवत्सरानन्तरमुपरिलिखितैतत्प्रायश्चित्तस्य द्विगुणं प्रायश्चित्तं कर्शज्यम्-इति मनुप्रायश्चित्तविवेकप्रायश्चित्ततत्त्वादिग्रन्धानुसारिणो व्यवस्था ।। पत्र प्रमाणम् अनुतन्तु समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् । गुरोश्चालीकनिर्बन्धः समानि माहत्यया ॥ इति मनु(१११५५)- वचनम् ॥१॥ अकामतो द्वादशवार्पिक कर्त्तव्यम्, तदशक्तावशीत्युत्तरपयस्विधेनु- शतं देयम्, तदशक्तो चत्वारिंशत्पुराणोत्तरचूणीपञ्चशतमूल्यं हिरण्या- दिकं देयम्, दक्षिणायां गोशतदानाशक्तो चूणींशतमेकं देयम्-इति प्रायश्चित्तविवेक( पृ०८८ ग्रन्थलिखनम् ॥ २॥ स्मुतिसागरे देवलःकालातिरेके द्विगुणं प्रायश्चित्तं समाचरेदिति । कालातिरेके संवत्सरातिरेके संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः इति मनुवचनेन-इति प्रायश्चित्ततत्व(पृ० ४७४ अन्धलिखनञ्चेति ॥३॥ |10|10|1011 ईशवीशब्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासीयत्रयोविंशतितमदि नसम्बन्धिमङ्गलवासरेमया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थापनसंख्या-२०६ ६३२ (६८)-लं १४ सन १८३४ साल सास श्रापिल- स्वकारि मिछिल सदर देयोनि श्रादालत मोकाम फलि- काता थादालत मजकुरेर कायेम मोकाम हाकिम एडयोयार्ड जान हारिण्टिन साहेवेर बैठके इ० सन १८२५ साल तारिख २६ मे मोतावक पागला सन (२४२ साल तारिस १६ ज्येष्ठ दिवस शुक्रवस ?॥- रत्नाकरविपुइ ओ पुरिविपुइ आपिलाएटान साधुचरणाविविगञ्जन पो गयरह रप्पाडएटान आपिलाएटानेर उकिल मुनशी दादारवक्स खाँ हाजिर आइल । रेप्पाडएटान तालपत्रे उडिया अक्षर ओ मजमुने एत्तैला नामार रशीद लिखिया दियाओ हाजीर हय नाइ। अद्य एड मोकद्दमा एकतरफा सुरत आमार बैठके उपस्थित हइया मोक- इमार कागजात मोनाजाय बोध हइल ये वादि अर्थात आपीलाएटान नेहालपुर जमिदारिर मध्ये रकम १५०) आना आपनारदिगेर पेतृक एनहारे दखल देलाइया पाइवार दाविते जेला कट केर देशोनि श्रादालते नालिस करे। प्रतिवादिगण आप- नारदिगेर जव वादिदिगेर एजहार श्रो दावि हइते अस्वीकार हश्या गुजराइलेक । जेलार जजसाहेवेर तजविजे मुद्दझ्यानेर हवेक डिकरिर हुकुम सादेर हय, एवं सेइ डिकरि प्रापिलेर आदालते रद हय, ताहार पर खास आपील मुरत ए आदालते उपस्थित हय । पइ मोकदमार कागजात द्वारा प्रकाश ये जमिदारि मजकुरार मालिक मुद्दइयानेर प्रपितामह पद्मनाभ विविगलनेर मृत्युर पर तिन पुरुश पर्य्यन्त मतोफा मजकुरेर हासील करा वस्तु प्रधान पुत्रेर नाने काले कटरि ो गयरहते नामाङ्कित इय, मो श्रामलि सन ११६५ साले पूर्व पुरुप मजकुरेर प्रासल ओयारिसानदिगेर मध्ये प्रथकान हया स्थावर वस्तु हिस्या फरिया नय। ए दयने उभय विवादिर मध्ये पर विवाद प्रकाश चे पापिनण्टान प्रकाश करे ये आसल पूर्व पुरुष व्यवस्थापनसंख्या-२०६ ६३३ मजकुरेर सफल योयारिसान जमिदार यो हकदारेर न्याय विवादर वस्तुते दरिस्त कार स्थित । प्रधान पुत्रेर नाम जारि भाकिते वैयार जमिदारिर हकदार ओ गालिक से नहे इति । उभयेर प्रपितामह पद्मनाभ विविगलनेर सोपार्जित यो स्यक्त सफल जमिदारि फरार दिया रेनाडएट जाहेर करे ये मुद्दझ्यान पापिलाएटान ऐ जमिदारिर हीयत श्री कर्नुल ओ दसिल कारिर पक्षे किछु एनाफा रासे ना, वरं पापीलाएट- दिगेर पिता मालगुजारिर उमुल तहशील कागज पत्र लिखित पडित फरा एवं ऐ जमिदारिर पयरवि प्रो मददगार में नियुक्त थाकिया रेप्पाइएटदिगर स्याने मांशाहरा लइयाछ । अतर प्रथम एइ चिराय बोध करा आविश्यक हाल ये एन कान गतोहार परे ए चरने ऐ जमिदारिर परस्पर उत्तराधिकारि- दिगेर मध्ये विभाग ने पारे किना। झारण तुकुम हाल ने एइ मयकारिर नकल कागजात सम्बनिनएइ हुने एइ प्रादाजतेर पण्डितेर हामीला करा जाय मोकरमार कागज्ञान दृष्टे फटफेर चलित शास्त्रानुसार एइ विशपेर व्यवस्था ये एती काल गटो परे विरोधि शामिदारि पूर्वोक्त पूर्व पुरुऔर उत्तराधिकारिदिगेर महित एन पटक हइते पारे कि ना-एक समाह मध्ये लिखेन इति 10 श्रीजयतितराम एनसम्मांध करमाथितिस्थानामिरिक्तश्रीयुनए इनोगाईजानहारिस्टोन. सावधम्माविरलिमिनेसकोरान्दप्रति गुनगजेन्दमितान्दीयमासी- पेनराित्तमदिवसोनारसत्रान्तर्गतमरनप्रतिरूवादितस्विादवि. पनि विगरसोलमिलव यत्तस्यायनमागीयननुदिनमामिास्य. तिवारे मरा प्राप्तं तदवलोय या रामोधी बातन्तदनुसारेगोचरं लिपटे- गते चैताववि काले इदानीमपि विवादासनवमकरस्थावरत्य . ६३४ व्यवस्थापनसंख्या-२०६-२०० विभागस्तद्धनस्वाम्युत्तराधिकारिणां मध्ये भनिन योग्यो भवति-इति कटक' देशचलितमनुमिताक्षरावीरभिप्रोदयादिनन्यानुसारिणी व्यवस्पेति 11- अत्र प्रमाणम्- अविभक्त निजे प्रेते तत्सुतमृस्थभागिनम् । कुर्वीत जीवन येन लब्धं नैर पितामहात् ।। लभेताशं स पित्र्यन्तु पितृव्याद्वारि तत्सुतात् । स एषांशस्तु सपा भ्रातृणां न्या यतो भवेत् ।। लभते तत्सुतो वापि-इति वीरमित्रोदयादिमन्यवृत कात्यायन वचनम् ॥१॥1 ईशवीशब्दप्रतिपायेधुगुणगजेन्दुमिताब्दीयजूनमासीयाद्रिपक्षमितदिन- सम्बन्धिनिवासरे मया प्रभुसमर्पितद्विवादनिविष्परबातविचारपत्राभ्यां सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुत अलकसिन्दर जानकाल विनसाहेवधर्मा धिकरणकवेदान्यप्टेंन्दुमिताब्दीयदिसम्बरमासीयप्रथमदिनसम्बन्धिरिचारपत्र। संवलितेतन्मधुरादेव्यर्थिनीप्राणकृष्णकृष्णलालप्रत्यथि विवाद निविष्टपनजात' यदेतदन्दीदैतन्मासीयपष्ठदिवसोयशनौ घटिकैकोत्तरयामदये मया प्राप्तं तद- वलोक्य याशयोधो बावस्तदनुसारेणोत्तर दीयते- एतद्विवादनिविष्टपत्रातमवलोक्य कविदर्मचन्द्रनामा पुरुषः सत्येरेव स्वपलीपुत्रपल्योः स्वविभत्तासमान्तस्थावरास्थावरसकलधनस्य स्वदौहित्र- विहारीलाल सम्प्रदानके दानपत्र विलिख्य स्वपत्नीपुत्रपत्नीदौहिनॉस्त्यक्त्वा' ममार । पुनस्तरत्नो देवारि स्वपतिदचधनस्य दानपत्रं तस्मा एव दौहित्राय १.०दायान-यप०।२..पुत्रन्त०-यप० ।

। व्यवस्थापनसंख्या-२८७ ६३५ • दत्त्वा पुत्रवधू दौहिनं च विहाय स्वर्लोकमगमदिति निश्चितम्मया । तत्थं- प्रकारके वृचे सा स्नुषा प्राप्तदानपत्रविहारीलालपुत्राभ्यां प्राणकृष्णकृष्ण- लालाभ्यां स्वश्वशुरधनं लन्धुमोहमाना विश्दते । तत्रैवं विपये धर्मचन्द्र- तत्पलीदत्तदानपत्रमनुसृत्य तद्धनादयिनीमदत्त्वा प्रत्यर्थिनोः पितुः किञ्चित् प्राप्नोति न वा । श्रथ तदानपत्रमगुसृत्य नाप्नोति चेत्तदा धर्मचन्द्रस्य मातामहस्य धने विहारीलालस्य दौहित्रत्वेन किञ्चित् स्वत्वमंशो वा प्राप्तुमहति न वा । प्राप्नोति चेत्तत्सितुः कथ तत्स्नुपायाश्च श्रीगोपाल- पुत्रपल्याः कीदृग् ( अशः) इति प्रश्नः । तत्र तेन धर्मचन्द्रेण तहाना- वसरे तस्माद्धनात् स्वात्यै पुत्रपल्यै च पृथक्त्वेन किश्चिदत्त्वा तदानपत्रं दत्तमिति दानपत्रादिभ्यो प्रतीतेस्तदानमसिद्ध भवितुमर्हति, सर्वस्वदानादु- तराधिकारिसत्वे सर्वस्वदान निषेधःप सकल निबन्धसिद्धत्वात् । तथा च तद्धनं धर्मचन्द्रस्यासीत् । अथ धर्मचन्द्रमरणात् तद्धनं तत्पल्या देवाया श्रासीत्, दौहित्रादिसत्वे विभक्तापुत्रमृतधने पल्यधिकारस्य सर्वपि- सम्मतत्वेन प्रसिद्धत्वात् । अथ धर्मचन्द्रमरणादेवाप्राप्त तद्धन देवाया 'अपि दातुं न शक्यते पूर्वोक्तहेतोरत्रापि तुल्यत्वात्, विशिष्योत्तराधिकारि- सत्त्वे स्त्रियाः स्वापतेयस्थावरादिदाननिषेधाच । तथा च यद्यपि मिताक्षरादि- ग्रन्थेषु स्नुपाधिकारो न गणितो गणितश्च दौहित्राधिकारस्तथापि श्वश्या देवाया मरणाचद्धनं मथुगदेवी नस्तुपा प्राप्तुमर्हति', पल्योत्तराधिकारि- शून्यविभक्कमृतधने सत्स्वपि दुहित्रादियूत्तराधिकारिषु स्नुपाधिकारस्य सर्वदे- शीयानादिसिद्धलोकव्यवहारसिद्धत्वात् । लोकव्यवहारस्यापि शास्त्रसम्मतत्वात् , लोकव्यवहारविरोधे प्रजाप्रक्षोमादिदोषाणां कीर्तनाच्च । परन्तु तया मथुरा- देव्या विवादास्पदीभूतं गृहत्रयं भाटकादिरूपेण भोगेन भोक्तव्यमेव, परं न तद्दानव्ययादिकं कुर्याद् अावश्यक विना, उत्तराधिकारिसत्त्वे तन्निषेधात् । अथ यदि पूर्वोक्तदोपसद्भावेऽपि प्रभुणा अनादिसिद्वलोकव्यवहारो नाद्रि- यते' तदा देवाया मरणात् तद्विहारिण एव आसीत्, तस्य दौहित्रत्वेन प्रब. २. मथुरादेवा तत्स्नुश प्राप्तमईति-व्यप। १. देवायापि--व्यप०। ३. नायते-न्यवः ।

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व्यवस्थापत्र संख्या-२०७
लोतराधिकारित्वात् । तन्मरणात्तसुनयाः पापमयकृष्णलालयोरासीत्,
पितृधने पुत्राधिकारस्य निर्विवादसिदत्वात् । परश्चास्मिन् पचे विहारीलाल-
पुनाभ्या मथुराया भरणमवश्यमेव काव्यम्, तत्या मूलधनिनः पुत्रवधूः
त्वात्, पिहारीलालस्य च धर्मचन्द्रस्थानीयत्वादेतादृश्या भरणस्य लोक
प्रसिद्धत्वात् । श्रथाथिपिनोविभागस्तु न सम्भाति मातुलेन तदा पुनयोर्वि.
भागस्य शास्त्रलोकोभयविरुद्धत्वाद् इत्येतद्देशप्रचलितमनुमिताक्षरावीरमिनो
दयधिवादचिन्तामणिप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्येयमिति ।।-
पत्र प्रमाणम्-
स्वकुटुम्पाविरोधेन देयं दारसुताहते।
नान्वये सति सर्वस्व यचान्यरमे प्रतिश्रुतम् ।। इति मिताक्षरादि-
सालनिबन्धधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ||११)
गृह्वात्यदत्तं यो मोहाद् यश्चादेयं प्रयच्छति ।
दण्डनीयावुभावेतो धर्मज्ञेन महीक्षिता ।।- इति विवादरत्नाकरे
नारदवचः ||
पत्नी दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा-इत्यादि चकलनिवन्धधृत-
याज्ञवल्पववचनम् ।।३।।
भी प्रीतेन यदत्तं स्त्रिये तस्मिन्मृतेऽपि तत् ।
सा यथाकाममश्नीयाद्दद्यादा स्थावराहते ॥ इति मिताक्षराधृत-
वचनम् 11४10
देशजातिकुनानाञ्च ये धर्माः प्रामवत्तिताः ।
तथैव ते पालनीयाः प्रभा प्रतुभ्यतेऽन्यथा ।।
जनापरक्तिभवति रल कोशश्च नश्यति । इत्यादीनि वीरमि
चोदयादिधृतानि बृहस्पत्यादिवचासि ॥५॥
अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती व्रते स्थिता ।
भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा उध्वमाप्नुयुः ॥ इति तव
कात्यायनवचनश्चेति ॥६॥

व्यवस्थापनसंख्या-२०७ यावत्यो विधवा नाप्यों ज्येप्टेन श्वशुरेण का। गोत्रजेनापि चान्येन भव्याच्छादनाशनः ।।-इत्यपि तत्रैव नारद- वचनञ्च |॥७॥ एतदन्दोयदिशम्बरमासीविशतिदिवसीयशनी दत्तय व्यवस्था मयेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीहीरानन्दमिश्रण संशोधितमिदं व्यवस्थापन पण्डितहरदयाल मिश्रनागरीनवीसेनेति ॥ - मथुरा दलोइ श्रीदुर्गा शरणम् रोवकारि मिडिल आदालते देोयानि सदर मोकाम एलाहावाद मानण्टुकु हुनरि टरम्बर साहेव आदालत मजकुरेर हाकिमेर वेठके तारिख २० जानेर सन १८३५ साल इ. मोतायके तारिख ६ माघ सन १२४२ फछलि रोज मङ्गलवार । आपीलाण्ट- प्राणकृष्ण ओ कप्पलाल, वेहारीलालेर पुत्र-रेप्पाडण्टान्- आपीलएटेर उकिल लाला लछमनसिह ओ रेपाडएटेर उकिल मिरजारङ्गीनवेग हाजीर हइल ( एइ मकई मा सन १८३४ सालेर २३ दिजम्बर तारिखैर हुकुम अनुसारे प्रथक प्रथक तारिखेपामार वैठके रोवकार भार ऐ सकल तारिखेर रोक्कारिसकलेर लिखित कागजात पडा जाइया मुलतवि छिल । अद्य पुनराय रोवकार हइया वोध हइल ये आपीलाण्ट सावेक मुद्दश्या प्राप- नार स्वामीर पिता धरमचदिर विषय तिन खान चाटीर दखल पाओनेर दावीते मुद्दामालेहेमार नामे नालिस करे। मुर्दाबाले- हेमार जयावर खोलसा एइ ये मुद्दामालेहेमार पिता वेहारि- लालके ऐ वेहारिलालेर मावार पिता धरमचाँद पापनि पत्तेमाने व्यवस्थापनसख्या-२०७ हइते प्रति पालन करिया आपनार काइम मोकाम करिया। पुष्य पुत्र करिया फरजन्दीनामा लिखाइयादेन, आर श्रापन नामेर खालीसा सरिफारनाम वादसाहेर हुजुर हइते मुहा- अालेहमार पिता वेहारिलानेर नामे लिसियादेय । ओ ताहार पौत परे मोछम्मात देोयानविवि धरमचदिर स्त्री श्रादालतेर साहेवेर दस्तखति दस्तावेज लिखिया उहार हाओयाले फरे, श्रार आपन विशय सावुत करणेर निमित्ते सन १८१२ सालेर १२ सेवम्बर तारिखेर लिखित धरमचॉदेर मोहरि परउन्दीनामा दस्तावेज यो सन १८१५ सालेर २३ नवम्बर तारिखेर लिखित धरमचाँदेर स्त्रीर लिखिया देओया दस्तावेज दरपेस करिलेक, आर एइ आदालतेर पण्डित सन १८:४ सालेर १ दिसम्बर तारिखेर हुकुम अनुसारे एक केता व्यवस्था एइ सोलासाय जे मिशिलेर कागजात हइते प्रकाश हय ना-ये धरमचाँद हेवानामा लिखन कालिन प्रापनार स्त्रीके फिम्या आपनार पुत्रवधूके किछु दिया थारे, तवे से हेवानामा ग्राह्य हद्वते पारे ना। श्रार हेवा अग्राह्य करण ऐ मालेर मालिक धरम- चॉद् हय । ओ धरमचादेर पौत परे उहार स्त्री मालिक हय । बारऐ मालेर हेवा उहार स्वीर करणेर क्षमता नाइ। पार यद्यपि मिताक्षरा पुथिते पुत्रवधूर इकियतेर शुमार लेखे नाइ, पार दौहिनेर हकीयतेर शुमार लिखियाछ, तथापि मोहम्मात देओ. यानेर फोत परे ऐ मालेर अधिकार यापीलएटेर हइवेक । यदि ये ह विशय विना सरिकि रासिया फौत करे, धार ताहार पुत्र यो पौत्र ओखी ना थाके, पार पन्या ो दौहित्र यो गयरह 'प्रोयारिप थाके, स्थापि एं माल पुत्रवधुर हदियते पोछन चीर काल हइते देशेर रछम धार रेश्रोयाज सकल मुलुके न्याय्य पाछे । पार तादा शाखेते श्रोन्याय्य आछे, थार पापीलएटेर दान विक्रि फरणेर क्षमता नाइ। भार यदि रेनोयाज अग्राह्य 'य तवे देओयानेर फीत परे वेहारिलाल, जे दौहित ओयारिस व्यवस्थापनसंख्या-२०७ पाछे, उहाके पोछिवेक दाखिल करिलेक इति । ए कारण एइ आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था लिखनेर धाराय प्रकाश आछे ये सिताक्षरा पुथिते पुत्रेर वीर हकिएतेर शुमार किल्लु लेखा नाइ, दीहिनेर हकिएतेर शुमार लेखा पाछे; ताहाते ओ ऐ रछम श्रो रेओयाज चिरकालेर यो शाखेर पछिन्दो लिखीयाचे, धार मेघनाटनसाहेवेर तैयारि दायभागेर तरजमा केतावेते प्रकाश चे यदि कोन व्यक्तिर पुत्र पोन ना थाके ताहार विषयेर ' मालिक ताहार दौहित्र इइवेक, पुत्रवधु हइवेक ना, जाहार स्वामी आपन पितार सुमुखे मरे-ए निमित्त चुडन्त हुकुम धादेर करणेर पूर्व कलिकाता सदरेर पण्डितेर स्थाने व्यवस्था तलय करा थार एइ विषय जानियार निमित्त ये एइ धारार मकर्दमाते रछम रोयाज अपेक्षा शास्त्र बलवान कि चिरो- कालेर देशेर रछम रोयाज ये प्रकार एइ प्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्थाते लिखा पाछे, श्री ताहा यदि शास्त्रेर वहिर्भूत हय तवे रेोयाज होयार योग्य हइते पारे कि ना । मोनाछव बोध हइया हुकुम हइल ये मकदंमा अद्य मुलतवि थाके, आर एड रोवकारिर नकल एइ प्रादालते पण्डितेर व्यवस्था नकलेर सहित एइ आविश्यके ये एइ श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था मोलाहेजार परे तलव करा व्यवस्था दाखिल करेण-एइ श्रादालतेर रेजष्टर साहेवेर चिठीर द्वाराय मोकाम फलिकातार सदरेर रेजष्टर साहेवेर निकट पाठान जाय इति ।- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितविचारपत्र स्थापरच यदीशवीशब्दप्रतिपायेषुगुण- गजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासीयाष्टाविंशतितमदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते- धर्मचन्द्रनामा कश्चित् पल्यां पुत्रपल्याञ्च विद्यमानायां स्वस्वत्वा- सदीभूतस्यावरास्थायरसमुदायधा विहारीलालनाम्ने स्वदौहित्राय दत्त- व्यपस्थापनसख्या-२०० ६४० वान-इात प्रमुसमर्पितव्य स्थापण शवम् । एवञ्च सति धर्मचन्द्रस्य धन तत्पन्न्यास्तत्पुत्रपल्याश्च यावत्रीय स्वस्पतिज्ञोचितप्रामाच्छादनोप- युवावश्यक विधवाघम्मांद्याचरणोपयुवातिरिक्त चेत्तदा तादृशधने तदानं सिद्धयति । धर्मचन्द्रस्य धन यदि तरल्यास्तत्वपल्याश्च यात्री स्वत्वपतिकुलोचितप्रासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधर्माद्याचरणोपयुधाति- रिक्त न भवति तदा तद्दान न सिद्धयति । एवञ्च सति तदानस्या सिद्धत्व पक्षे धर्मचन्द्रत्यक्तधने तन्मरणानन्तरं तस्य पुत्रपौनप्रपौवाभावे तत्- पल्या देवानाम् या एकाधिकार श्रासीत् । तत्याच मृताया वस्य धर्म- चन्द्रस्य काचिदुहिता चेद्विद्यमाना तदा तस्या अधिकार पासीत् । तद भावे धर्मचन्द्रस्य दौदित्राणामेवाधिकार । किन्वेवञ्चेदपि धर्मचन्द्र पुत्रवधा जीवति धर्मचन्द्राख्ये स्वपतिपितरि मृतपतिकाया यावज स्वपतिकुलोचितमासाच्छादनोपयुचावश्यकविधवाधर्माद्याचरणोपयुक्ते धर्म चन्द्रत्यक्तधनान्तर्गतधने अधिकार. । तन च धर्मचन्द्रपुरवध्वाः पतिपुत्रादि- विहीनत्वेनानन्यगतिकाया धर्मचन्द्रत्यक्तधनमानोपजीविया धर्मचन्द्र- दौहितः सह विरोधे सति पृथक्त्वेन यायजीव स्वपति कुलोचित मासाच्छाद भोपयुत्तावश्यकविधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तधन ग्रहणस्य श्रावश्यकतैय । तदतिरिक्तधन एव धर्मचन्द्रदौहित्राणामधिकार. । एव च सति पश्चिमदे शीयैर्धर्मशास्त्रार्थविशारदैरन्यैर्वा धर्मशास्त्रार्थानुष्ठातृभिः शिष्टः प्राची- नर्जीवति पितरि मृतस्य पुनस्य पल्या विद्यमानाया स्वदीदिनेषु विद्यमाने ध्वपि पुत्रवधवा यावजीव स्वपति कुलोचितपासान्छादनोपयुवावश्यकविधवा- धर्माद्याचरणोपयुक्तमानमेवधनमस्तीति ज्ञात्वा यावजीव पुनवध्या एवाधि- कारो न्याय्य । दौहिवाश्चेत्तद्धनाधिकारिणस्तदा वेपा पुत्रवध्या सह विरो• धोऽस्तीत्यतस्तस्या यावजीवं ग्रासाच्छादनाद्यावश्यकविधवाधर्माद्याचरण- मपि न निर्वहतीति विविच्य यावजीव पुत्रवधा एव तदने अधिकारोऽस्त्वि- ति व्यवहतस्तन्मूलश्चेत् पुरवधा याव व स्वपतिकुनोचितप्रासा छाद नोपयुक्तावश्यकविधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तश्वशुरायवधने तस्या अधिकार स्तदा धार्मशास्त्रीययुचिसिद्धस्तादृशम्यवहारस्य धर्मशास्त्राविरुद्धस्य १ दत्तमिति-प।

व्यवस्थापत्र संख्या-२०७ ६४१ . . 1. ‘धर्मशास्त्रानुसारेण प्रचारयोग्यताया बलवत्त्वं भवितुं शक्रोति, अन्यथा प्रचारयोग्यवाया बलवत्वं भवितुं न शकोतीति पश्चिमदेशचलितमनुमिता. क्षरावीरमित्रोदयादिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्थेति ।।-- अत्र प्रमाणम्- कुटुम्बमक्तरसनादेयं यदतिरिच्यते इति वीर मित्रोदयादिग्रन्थधृत- बृहस्पतिवचनम् ॥शा प्रदान स्वाम्य कारणम्-इति मनुवचनम् ||२|| पली दुहितरश्चैर पितरो भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो वन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः।। एपामभावे पूर्वस्य धनभागुत्तरोत्तरः ।। स्वर्यातस्य पुत्रस्य सवर्णेप्वयं विधिः-इति मिताक्षरादिग्रन्ध- घृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥३॥ यावत्यो विधयाः साध्व्यो ज्येप्ठेन श्वशुरण वा । गोत्रजेनापि चान्येन भर्तव्याश्चादनाशनः ।। इति वीरमित्रोदयादि- अन्यधृतनारदवचनम् ॥४॥ केवलं शास्त्रमाश्रित्य न कर्तव्यो विनिर्णयः । युक्तिहीनविचारेण धर्महानिः प्रजायते ॥ इति तत्तद्ग्रन्यधृत- बृहस्पतिवचनञ्चेति ॥५॥ ईशवीशब्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमिवान्दोयजुलाइमासीयद्वितीयदिन- सम्बन्धिबृहस्पतिवासरेमया प्रभुतमपितविचारपत्र व्यवस्थापत्रं च यत्तदन्दी- यफेवरवरीमासीयपसुपक्षमितदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं ताभ्यां सहिता प्रभुसमर्पितविचारपत्रान्तरमंगरेजोलिखनञ्च यत्तदब्दीयमैमासीयशरे. न्दुमितदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्राप्त ताभ्यां च सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।- श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण । " . । व्यवस्थापत्रसंख्या-२०८ ६४२ (७०) रोक्कारि मिछिल सदर देओयानी श्रादालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिकिस- पिएरसाहेवेर पेठके। तारिस १६ माइ इ० १८३५ साल मोतावके ६ ज्येष्ठ १२४२ साल वागला दिवस मङ्गलवार ।।- छायेल रामकृष्णराय छायेलेर उकिल सदासुखपण्डित श्रो द्वितीय पक्ष काली- किशोररायेंर उकिल मुनशी होसन आलि हाजिर आइल । सन हालेर २३ श्रापरेल तारिखैर हुकुमानुसारे जेला मयमनसिंहेर देओयानी श्रादालतेर जजसाहेवेर रिटरण ओ इं० १८३५ सालेर ५ आपरेलेर, लिखित तथाकार रोवकारि पो साक्षीगणेर एज- हार सम्बलिष्ट ई १८३४ सालेर २८ जानेोयारिर छादेर होया एइ आदालतेर हुकुमेर प्रत्युत्तरे छोयालादि कागज- सकलेर सहित अद्य दर पेप हइया पडागेल। रिटरणेर सम्बलित जजसाहेवेर प्रेरित साक्षीगणेर एजहारेर द्वाराय प्रकाश ये नारायणीदेव्या श्री जगदीश्वरीदेव्यार स्थाने रामनृसिंहाय डिगरिदारेर पामोना कर्ज टाका वाहार किछु जमीदारिर कम्मे निर्वाह अर्थात् सरकारि मालगुजारि श्रादायते आ फिश्चित गोलकमनिर सावेक देना परिशोधे खरच हइयाले । ओ कोन सन्देह प्राश हय ना ये कार टाका मजकुर उक्त देव्यादिगेर सेच्छाओ वाला सिद्धिते निज तकरुपे सरच हइयाछे। ए जन्य उचित ये एइ श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने एइ विशयेर प्रत्युत्तर दुइ सप्ताह मेयादे तलव हय, ये उपरेर लिसनानुसारे उक्त देव्यादिगेर हिस्यार वस्तु, याहा ई १८३३ सालेर १२ जाने- ओरिर जेलार जजसाहेवेर रोवकारिर लिखित रफानामा श्रो छोलेनामार द्वाराय उक्त देव्यादिगेर जीवदशापय॑न्त स्थैर्यता पाइयाये, डिगरिदारेर हासील करा डिगरि परिशोध विक्रय हइते पारे मिना। एवं ९६ श्रादालतेर पण्डितेर उचित ये उपरेर लिखित छोयालेर प्रत्युत्तर लिखने गोरिप्रसादचौधुरि - व्यवस्थापनसंख्या-२०० वनाम जयमालाचौधुराणीर ८३५ लम्बरेर मोकदमार इ १८२७ सालेर ७ फिवरोयारिर लिखित एइ प्रादालतेर व्यवस्था एवं खजे धावेटेकटोएर एस्तफानुछ छाएलेर मोर्द मार दरून ई, १-३३ सालेर १६ दिजम्बरेर लिखित आपन दाखिल कराव्य: वस्थार प्रति, जाहार प्रसङ्ग ६१८३४ सालेर १० फियरओया. रिर आमार रोवकारिते लेखा आछे, अनुवोधन करेण । 'पार. चदि स्यात् पूर ओ एइ क्षनकार व्यवस्था-सकलेते किछु अन- अक्य हय, उचित ये उक्त पण्डित ताहार विस्तारित हेतु लिसेन, एवं एइ विशयेरो प्रत्युत्तर लिखेन-ये यद्यपि स्यात् दे दिगेर हिस्या उद्दारदिगेर उभय प्रो कालीकिशोररायेर छोलनामार । दृष्टे, जाहार द्वाराय देव्यादिगेर हकीयत जीवदशा पर्यन्त स्थैर्यता पाइयाछे, विक्रय हइते ना पारे, श्री प्रकार देनादार- दिगेर अर्थात् उक्त देव्यागणेर देनार सामुदाइक टाका, जाहा जमीदारिर मुनाफार जन्य खरच हइयाछे, निज खरचे व्यय हय नाइ, उक्त काली किशोरेर स्थाने सलब हइते पारे कि ना, पार से तलव पइ क्षने हइते पारे कि, उक्त देव्यादिगेर मृत्युर पर इति।। श्री यतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिधीयुतहेनरोसिक्रिसपीयरसाहेवधम्माधिकरण- लिखितेशवोशब्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयमैमासीयोनविशतितमदिव- सोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयजुनमासीयाष्टमदिनसम्ब- धिचन्द्रवासरे मया. प्राप्तं तदवलोक्य याहशबोधो जातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते ।। प्रभुहतविचारपत्रलिखितानुसारेण नारायणोदेवोजगदीश्वरीदेव्योरंगो यौतयोजीवनपर्यन्तमोरागेश प्रतिमायरामगुणगजेन्दुमितान्दीयजानवरी- १. खाना भक्याठ कोपर इसकानु:-ति प्रश्नोत्तांमागे पाठः।

६४४ व्यवस्थापनसंख्या-२०८ मासीयार्कमितदिवसीयर्याजलाख्यावान्तरधम्माधिकरणाधिपतिकृतविचारपत्र- लिखितनिष्पतिपत्रसन्धिपनाभ्या स्थिरता प्राप्तो, जयपत्रकारयितृणा व्यक्ति विशेषाणा बयपत्र लिखितमुणपरिशोधनाथ विक्रययोग्यौ भवितु न शक्नुतः, राजस्वीकृतसन्धिपत्रे तद्विक्रयस्थ निषेधात् । शास्त्रानुसारेण कालीकिशोररा- याभिधेयस्य दत्तकपुत्रस्याप्राप्तव्यवहारताया वस्वस्वास्पदीभूतसमुदायधनस्य राजस्सर्वतोभावेन रक्षकत्वेन राजकरदानार्थमप्राप्तव्यवहारापाकरणीयमृण शास्त्रानुसारेण नचित् कर्तुमावश्यक न भवति । एवमप्राप्तव्यवहारापाकर• रणीयमृणपरिशोधनमपि तस्याप्राप्तव्यवहारताया केनचिच्छास्त्रानुसारेण कमावश्यक न भवति, शान्ने अप्राप्तव्यवहारतायामृणपरिशोधनस्य विशे पतो निषेधात्, कालीकिशोररायाभिधेयस्य प्रासव्यवहारतायाञ्च तद्देयऋण परिशोधनस्य राजकरदानस्य च तन्मात्रकर्तव्यत्वेन तदितरेपा तद्ग्रहीतृमा- तृपितामहीप्रभृतीना कर्त्तव्यत्वाभावात् । एव गौरीप्रसादचतुर्द्धरीणस्यार्थिनो जयमालाचतुर्द्धरीएया 'प्रत्यथि-या पञ्चत्रिशदधिकवसु शतपरिमिताङ्कितवि. वादनिविष्टे तद्धम्माधिकरणीयेशवीशब्दप्रतिपाद्याद्रिपद गजेन्दुमिताब्दीय फेवरवरीमासीयसप्तमदिनलिखितव्यवस्थायाः खाजाअवयटकटीयरइष्टपानु- सस्यार्थिनो विवादसम्बन्धिन्या ईशवीशब्दप्रतिपाद्यानिगुणगजेन्दुमिताब्दीय. दिशम्वरमासीयाङ्कन्दुमितदिनलिखितास्मद्दत्तव्यवस्थया भिन्नविषयकत्वेना- नैक्यशकैव नावतरति । तथाहि गौरीप्रसादचतुर्द्धरीणस्यार्थिनो विवाद- सम्बन्ध्युपरिलिखितव्यवस्थायामित्येव लिखितमस्ति-मृत्युञ्जयशर्मय: प्राप्तजयपत्रलिखितमृणं यदि शिवप्रसादस्यावश्यकश्राद्धाचौवदैहिकक्रि यार्थ स्वभरणपोपणार्थ वा तन्मात्रा अयमालया वृत स्यात्तत्परिशोधन यदि स्वसंधान्ततदीयाशविक्रय विना न भवति, तदा जयमालोपस्थापितवृत्ता- न्तस्य सत्यत्वे असत्यत्वे वा तदर्थमुपरिलिखितऋणपरिशोधनोपयुक्तस्या तदीयाशान्तर्गतस्य विक्रयो भवितुर्मइति, न तु स्वेच्छया खाभिप्रायेण वा, जयमालया कृतस्य ऋणस्य परिशोधनार्यमिति । एतसनस्येद् बोजम्- शिवप्रसादचतुर्द्धरीणस्य त्यधन तस्य पुत्रमारभ्य पितृपय॑न्वाभावे तद्- महीतमात्रा जयमालयेत्तराधिकारित्वेन प्राप्तम्, अतएव जयमालानीवनप १.जलमाला-ज्यप० ।

व्यवस्थापनसंख्या-२०८ य॑न्तमन्येन फेनचिदुत्तराधिकारित्वेन धनिनः शिवप्रसादस्यावश्यकश्राद्धाद्यौ. वदैहिकक्रियाजातं जयमालाया भरणपोषणय शास्त्रानुसारेण क न शक्यते, केवलं जयमालयैव कर्तुं शक्यत इति स्वाजा अवयट कटीयर इष्ट- फानुसत्यापिनो विवादसम्बन्धियां व्यवस्थायामित्येव लिखितमस्ति । यदि मूलनिनो रामकिशोरगयामिधेयस्य एतद्धर्माधिकरणार्थिनः पितुस्त्यक्तघने सन्धिपत्रानुमारेणेतद्धम्माधिकरणार्थिनो नागमणीदेव्याश्च जगदीश्वरी दे- व्याश्च स्वत्वं निश्चित स्यात्, एवं तदेव सन्धिपत्र जिलाख्यावान्तरधर्मा- धकरणे सत्यं जात स्यात्, एव तेनैव सन्धिपत्रेण जगदीश्वरीदेवोमरणोत्तरं सदायनीभूतोऽश एतद्धर्माधिकरणापिनो भविष्यतीत्यवगम्यमानस्यात्, तदा जगदीश्वरीदेवीदेयऋणपरिशोधनाय तजीवनपर्यन्तमुपस्वत्वभोगाय वत्- पुत्रस्यावासदीभूक्तदायत्तीभूतोगो विक्रययोग्यो भवितुं न शक्रोति, सन्धिप- तात्यार्थधर्मशास्त्राभ्यां तथैव पर्यवसानादिति । एतल्लिखनस्येदं बीजम्-- मूलनिनो रामकिशोररायाभिधेयस्य त्यक्तसमुदायधने उत्तराधिकारित्वेन, कालीकिशोररायाभिधेयस्य तदोयदत्तकपुत्रस्य स्वत्वं शास्त्रानुसारेण जातम्। न तु जगदीश्वरीदेव्यास्तपल्या नारायणीदेव्यास्तन्मातुइँति । अथ च मूलनिनो रामकिशाररायामिधेयस्यावश्यकश्राद्धाद्यौवदैहिकक्रियाजात तत्यक्षीमातृप्रभृतोनां भरणपोषणञ्च तदीयमुणपरिशोधनं तद्देयराजकर- दान च तदीयदत्तकपुत्रेण कालौकिशोररायाभिधेयेनैव कमावश्यकं भवति, न तु तत्सल्या जगदीश्वरीदेव्या, तन्मात्रा नारायणोदेव्या वेति । यदि नारा- यणीदेवीजगदीश्वरीदेव्योरशयोनगियणीदेवाजगदीश्वरीदेव्योः कालोकिशो- ररायाभिधेयस्य सन्धिपत्रानुसारेण नारायणीदेवीजगदीश्वरीदेव्योजीवनप- य॑न्तमुपस्वत्वभौगोपयुक्तमात्रस्वत्वयोरुपरिलिखितानुसारेण विक्रययोग्ययोर्भ- विनुमशक्ययोरधमयोनारायणोदेवीजगदीश्वरीदेव्योयमृणमुद्राजातं का लौकिशोररायाभिधेयमूलधनिदत्तकपुत्रस्वत्यास्पदीभूतसराजकरस्थावरस्थ वृ. ध्यर्यमेव व्यक्तिम्, ननु स्वस्वीयव्ययायन्यायमित्यवगम्यमानं भवति, तथाप्युपििलखितोचरदृष्या सन्धिपत्रलिखितनियमनातविवेचनया च समु. दायमण्याचनं कालीकिशोररायाभिधेयस्यान्तिके इदानी जगदीश्वरीदेवी नारायणीदेव्याम्मरणानन्तरं वा कदाचिदपिभवितुं न शक्नोति, सन्धिपत्रता.

ज्यवस्थापनसंख्या-२०८-२०६ त्पार्थशास्त्राभ्या तयैव पर्यवसानाद्-इति वदेशचलितमनुदायभागा दिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ॥- अत्र प्रमाणम्- अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजन प्रभुः ॥ इति मनु(७३)- वचनम् ॥१॥ वालदायादिकम्पथ तावदाजानुपालयेत् । यावत् स स्यात् समावृत्तो यावचातीतशैशवः ।। इति मनु( ८१२७) वचनम् ॥२॥ नापासव्यरहारेश्च पितर्युपरते कचित् । काले तु विधिना देय वसे युनरकेऽन्यथा ।। इति विवादार्णवसेतु (४० २८)विवादमार्णवादिग्रन्धधृतकात्यापन कास्मृ० ५५२।०६।६) वचनम् ॥३॥ सर्वे पनीरसस्यते पुत्रा दायहराः स्मृताः इति दायभागादिग्रन्थ- धृतदेवलवचनम् ॥४॥ पली दुहितरश्चैव पितरो भ्रातरस्तथा । तसुतः-इत्याद दायभागादिन यधृतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥५॥ न खी पतिपुत्रात न स्वीकृतं पतिपुत्री-इति विवादार्णवसेतुविवाद मझायादिनन्धतविष्णुवचनाचेति ॥६॥ ईशवीश प्रतिपादोपुगुणगानेन्दुमितान्दोयजुलाइमासीयेन्दुपक्षमितदि- नसम्बन्धिमङ्गलवासर मया प्रभुसमर्पितावचारपत्रसहितेय परस्पा. दसे ||- श्रीजयनितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण --- (७१)-मोकाम कलिकातार सदर दमानि श्रादालतेर सन (०३५ सालेर १६ जुन मोतारक वाङ्गला सन १२४ सालेर 3 ।

व्यवस्थापनसंख्या-२०६ ६४७ आपाढ मङ्गलवार दिवसेर ऐ आदालतेर हाकिम श्रीयुन ओली- यमवाडिनसाहेवेर बैठकर रोवकारि-- ल०२८६ सन १८३३ साल वीरेन्द्रनारायणचौधुरि श्रो गायरह पापीलाण्टान श्रीमती सत्यभामादेव्या रेपाडण्ट आपीलारटदिगेर उकिल सदासुफपण्डित प्रो रेष्पाइएटेर उकिले दिगेर मध्ये गुनशी पामिनद्दीन महम्मद हाजिर नाइन । अद्य ए मोकदमा उपस्थित हया जेलार ओए आदालतेर कागज- सकल पाठ करागेल । कोन हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व ए श्राहा. लतेर पण्डितेर स्थाने व्यवस्था तलव करा उचित वोध हइल। ए कारण हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे ये निचेर लिखित विशयसकर उत्तर पञ्चम दिवसेर मध्ये दाखिल करेण, ए श्रादालतेर पण्डितके अर्पन कराजाय । प्रश्न-एक व्यक्ति हिन्दुर पाँच पुत्र छिल । ताहारदिगेर मध्ये दुइ पुत्र श्रापन २ पितार समिक्षे निःसन्तान लोकान्तर हय, ओ ताहार पर ऐ हिन्दु व्यक्किर मृत्यु हय, ओ ताहार मृत्युर पर उहार वर्तमान तिन पुत्रगन आपन २ पितार तेज्य वस्तुर पर विभाग द्वाराय दखलीकार हयेन, श्रो तिन भ्रातार मध्ये दुइ भ्रातार उत्तराधिकारिंगण आपन २ पितार तेज्य विशयर पर दखलीकार आछेन, यो एक भ्राता एक स्त्री प्रो एक कन्या राखिया लोकान्तर हय, ओ मृत व्यक्तिर स्त्री स्वामीर तेज्य विशयेर पर दखलीकार हइया आपन कन्यार विवाह देओनेर पर ऐ विशयसकल आपन कन्या मो जामाताके हेवा करे, ओ ऐकन्या श्रो जामाता हेवार- द्वाराय ऐ विशयेर पर दखलीकार हयेन, श्रोताहारदिगेर नाम केलकटरि सेरेस्ताय दाखिल हय । ताहार पर उक्त कन्या आपन मातार समिचे एक पुत्र राखिया लोकान्तर हय, श्रो उक्त पुत्र उत्तराधिकारिद्वाराय श्रापन मातार तेज्य वस्तुर पर दखिल ओ उद्दार नाम ताहार पिवार अर्थात् उक्त कन्यार स्वामिर नाम . व्यवस्थापनसंख्या-२०६ सम्वलित कालेकट्टरि सेरेस्ताय जारि हय । वत्परे उक्त पुत्र आपन पिता ओ मातामहिर समिक्षे लोकान्तर हय । ओ ऐ पुत्रेर मृत्युर पर उक्त पुत्रेर पिता ऐ सकल विशयेर पर हेवार- द्वाराय ओ उत्तराधिकारिरूपे दसिल हइया ताहा पापन द्वितीय स्रोके हेवा करिया ऐ वीर नाम कालेकटरि सेरेस्वाय आरि फरिया दियाछे । अतएव मृत व्यक्तिर श्री श्रापन कन्या ओ जामाताके ये हेवा करियाछे ताहा वङ्गदेशीय चलित शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि ना, यो मृत व्यक्तिर गोष्टीर पञ्चम पुरुशीय खुडततो भ्रातप्पुत्रगणेर दाओ ये ऐ मृत व्यक्तिर श्रोताहार स्वीर उत्तराधिकारिद्वाराय पाछे, हेवार विशयेर संक्रान्ते ए हेतुते ओ ये उक्त भ्रातप्पुत्रगणैर पक्ष हइते हेवानामा लिखित पठित समये कोन एक श्रापत्य ना हइया थाके, तवे अर्श कि ना इति ।। श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुत श्रोलियमवेराडिनसादेवधर्माधिकरण ! लिखितेशवीशब्दप्रतिपायेषुगुणगजेन्दुमितान्दीयजुनमासीयरसेन्दुमितदिवसी-। यविचारपत्रान्तर्गत प्रश्नप्रतिरूपपत्र यत्तदन्दीयजुलाइमासीयमुनिमितदिन । सम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशोधो वातस्तदनुसारेणो त्तर लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति पुत्रपौत्रप्रपौत्ररहिवस्य मृतस्य स्थावरादिघने भाताधिकारया पल्या यदि स्वानन्तरोत्तराधिकारिण्यै सम्भावितपुत्रायै स कन्याये तत्पतये च स्वसमान्तपतिस्थावरादिधन दत्त स्यात् तदा तद्दान कङ्ग देशचलितशास्त्रानुसारेण सिद्ध्यति, पल्पनन्तरोत्तराधिकार्यनुमत्या पत्नी. कृतस्वसमान्तरतिस्थावरादिधनदानसिद्धो शास्त्रीयत्वेन, पत्नीकृतस्वानन्त- रोत्तराधिकायुद्देश्यकदानसिद्ध शास्त्रीयत्वस्पार्थसिद्धवाद्, जामानुद्देश्यक दानस्यापि कन्यासम्प्रदानतायाः दाच्या जामातु. पृथकस्वत्वेच्छायामपि व्यवस्थापनसंख्या-२०६ ब्राह्मण जातीयनामात्रुद्देश्यकदानस्यादृष्टार्थतायाश्च शास्त्रीयत्वात्, पल्याः -स्वसंक्रान्तपतिस्थावरादिघनस्यादृष्टार्थ दान क्षमताया अपि शास्त्रसिद्धत्वाच । एवं घनिनो मृतस्य पञ्चमपुरुषीयमाणेनभातृपुत्रैमतस्य धनिनलकन्याश्चो- त्तराधिकारित्वेनामियोगो दानविषयीभूतस्य वस्तुन रिलिखितोत्तरदृष्ट्या तेभ्यो भ्रातुष्पुत्रेभ्यः सकाशाचदानपत्रलिखनसमये तद्दानविषयकाविबन्ध- कताया असम्पादनदृष्ट्या च शास्त्रानुसारेण साकांक्षो भवितुं न शक्रोति, तहानसमये तेषां भ्रातृपुत्राणामप्रतिषेधरूपाया अनुमतेरपि तहानसिद्धि- सम्पादकहेत्वन्तर्गतायाः सत्त्वात् इति वङ्गदेशचलितमनुदायभागदायतत्त्वा- दिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ।।- अत्र प्रमाणम्- एतान्यपि प्रमाणानि भ" यद्यनुमन्यते । पुत्राः पत्युरमावे च राजा वा पतिपुत्रयोः ।। इति नारदरमृत्यादि. प्रत्यधृतनारदवचनम् ॥१॥ यदत्तं दुहितुः पत्ये खियमेव तदन्वियात् । मृते जीवति वा पत्यौ तदपत्यमृते स्त्रियाः ॥ इति दायभाग (पृ०७५)- अन्धधृतमुनिवचनम् ॥२॥ दात्रभिसन्धिनिमित्तत्वात्स्वत्वस्य---इति दायभागमन्यलिखनम् ॥२॥ विष्णु जामातरं मन्ये-इत्युदाहतत्वादिग्रन्थधृतमुनिवचनम् ॥४॥ मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । स्नाता प्रतिदिनं दद्याद स्वगर्ने सतिलाञ्जलीन् ।। कुर्याचानुदिनं भक्त्या देवतानाञ्च पूजनम् । विष्णोराराधनञ्चैव कुर्यानित्यमुपोषणम् ॥ दानानि विप्रमुख्येभ्यो दद्यात् पुण्यविक्ष्ये । उपवासांश्च विविधान् कुर्याच्छाबोदिताञ्छुभे ।। लोकान्तरस्थं भर्तारमात्मानच वरानने। १. वनामिद नोलनम्।

व्यवस्थापत्रसंख्या-२०९-२१० तारयत्युभयं नारी नित्यं धर्मपरायणा ॥ इति दायभागादि(दाभा० पृ० १६४।१६५ ग्रन्धधृतव्यासवचनम् ॥४॥ प्रार्थ्यमा नोऽथिना यत्र यो ह्यों नाभिधातितः। दानकालेऽथवा तूष्णी स्थितः सोऽर्थोऽनुमोदितः ॥ इति प्राय- श्चिचविवेकादिग्रन्यधृतकात्यायनवचनम् ॥६॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रजो वन्धुः--इत्यादि दायभागादिग्रन्यधृतयाज्ञवल्स्य- वचनञ्चेति ॥७॥ ईशवी शन्दप्रतिपारो गुण गजेन्दुमितान्दीयागस्त्यमासोपपञ्चमदिनसम्म निधबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेय व्यवस्था दत्तति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (७२) ल०२१६ रुवकारि मेछल श्रादालते देशोयानी सदर मोकाम कलि- कात्ता एजलाछे श्रीयुत जार्ज इष्टाकोएल साहेव हाकिम आदालत मजकुरा सन १८३५ साल ता०६ जुलाइ मोतारेक सन १२४२ साल तारिस २० आषाढ । गुरुप्रसादवमु आपिलाएट महेन्द्रनारायणवसु रेप्डएट श्रापिलाण्टेर उकिल मुनशी राधाकृष्ण प्रो रेप्पाडण्टेर उकिल वंशीवदनमित्र हाजिर आसिल श्री मिछिलेर कागजात मोलाहेजा हइल ।ये हेतुक एइ मोक ईमार चुडन्त हुकुम छादेर होनर पूर्व एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एह विशय ये कायस्थ जाति गद्गानारायणनामक एक व्यक्तिर तिन पुत्र छिल, ताहार मध्ये एक पुत्रेर विवाहकालिन किश्चित भूमि, ये पुत्रेर विवाह इइलो, ताहार शसुरेर स्थाने प्रान हइल, एवं तद्भमिर व्यवस्थापनसंख्या-२१० दानपत्र यत् द्वारा दान कृत हुइलो, गङ्गानारायणेर नामे लिखित इइल, ए स्थले गङ्गानारायणेर परलोकानन्तर ऐ भूमि पूर्वोक्त. व्यक्तिर तिन पुत्र समान अंश करिया लइवेक, किन्या ऐ. विवाहफी व्यक्तिर, जाहार विवाहोपलो ऐ भूमि प्राप्त हइल, सेइ व्यक्ति पाइवेक, जिज्ञाशा करा आविश्यक-ए प्रयुक्त हुकुम हइल ये एइ रुवकारिर नकल उपरेर लिखित प्रश्नसम्बलित एइ प्रादा- तातेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान जाय ये पूर्वोक्त प्रश्नेर प्रत्युत्तर याङ्गलादेशीय चलित शास्त्रानुमारे एइ हुकुम पौउछनेर तारिख अवधि पञ्चम दिवसेर मध्ये दाखिल करेण इति ।।- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतमार्जाकोएलसाहेवधर्माधिकरण लिखितेशवीगन्दप्रतिपादोपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुलाहमासीयरस मदिवसी यविचारपनान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र यत्तदन्दीयतन्मासीयशरेन्दुमितदिनसम्म न्धिबुधवासरे मया प्राप्त सदयलोय यादरायोधो जातस्तदनुसारेणोचर' लिख्यते।।- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सात गङ्गानारायण मरणानन्तरं विवादा- स्वदीभूतधने गङ्गानारायणस्य प्रयायामेव पुत्राणा समानाधिकारस--इति. वनदेशचलितमनुदायभागादिप्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ||-- अत्र प्रमाणम् - प्रदानं स्वाम्यकारणम् इति मनुवचनम् ॥१॥ पितhपरते पुत्रा विभजेयुईनं पितुः--इति दायभागादिनन्धधृतदेवल. पचनश्चेति ॥२to ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयागस्त्यमासीपरसमितदिनयम- धवृहस्पतिवासरे मरा प्रभुसमर्पितरिचारपत्रसहितेय व्यवस्था दत्तेति ।--- श्रीजयतिनराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेष -- ६५२ व्यवस्थापनसंज्या-२११ (७३-मोनफि डिगरि जारिर लम्बर १३४३३ रोवकारि श्रादालते देशोयानि जेला वर्द्धमान एजलास मे० जेमछ करटिछ साहेव काइम मोकाम जज सन १८३५ मलिया तारिख ४ अापरेल- गोकुलचन्द्रमिश्र डिगिरिदार मती- वादि- कार्तिकमोण्डल देयेनदार- प्रतियादि- दयाकुमारि प्रो सुन्दरकुमारि श्रोजोरदार- खन्दकार. नाछेरदिन माहम्मद श्री कृष्णधनमुखोपाध्याय दयाकुमारिर उकिल एर्जत होशेन, सुन्दरकुमारिर उकिलेर मध्ये एक उकिल मिछिले हाजिर हुइलो । परे मिछिलेर कागज मोला- हेजा हइया बोध हइलो जे एइ मकईमा ४)१ टाका पादाय कारण डिगरिदार मोतर्फार तरफ हइते फिस्तिवन्दि जारिर दर- खास्त गुजराण श्रो प्रतिवादिर जायदाद क्रोक हइले परे दया- कुमारि मजकुर सन १२११ सालेर १६ ज्येष्ठ तारिखे आपन मुकाविलाय एक केता दरपास्त एइ मजमुने एइ आदालते दाखिल करिलेक-ये उहार पुत्र गोकुलचन्द्रमिश्र फौत करियाछे, ओ उहार समस्त विशय ओ ठाकुरसेवा प्रभृति उहाके दान करियाछे, ओ मोतर्फी मजकुरेर विशय दखलिकार, ओ ओया. रिप आपनि पाछे,पार एइ मईमार तजविजेर निष्पत्येर प्रार्थना करिलेक, आर सन १८३४ मालेर १४ जुन तारिखेर श्रापनार दरखास्तेर उपरेर लिखित हुकुम अनुसारे दानपत्रेर निचेर लिखित तिन जोन साक्षी हाजिर आनिया तिन जोन साक्षीर एजाहार, ओ सन १२४१ सालेर २० वैशाख तारिखेर लिखित दानपत्र दाखिल हइले परे सुन्दरकुमारि एक पेता दरखास्त उहार स्वामि गोकुन चन्द्र मिश्रर फौत होया प्रो आपनि ऐ मोती मजकुरेर मालामालेर दखलिकार श्री श्रोयारिप ओ उहार स्वामी उहाके पुष्यपुत्र करणेर अनुमति देोया, एवं सकल विसय उहाके मालिक करानो ओ चावि छोडान प्रभृति आपन व्यवस्थापनसंख्या-२११ ६५३ जीवदपाय मातबर लोकेर साक्ष्याते अर्पन करा, ओ दया- कुमारिर एजाहारि दानपत्र नितान्त मिथ्या-एइ सकल विर्तान्ते सन १८३४ सालेर ३० जुलाइ तारिखे दाखिल करिलेक । एइ मकईमा पूर्वे सन हालेर १० फेवरवरि तारिखे रोवकार हया ऐ तारिखेर लिखित रोयकारि अनुसारे दोपरा विषयेर कैफियात पुरुषोत्तमदासमोहोन्तेर स्थाने तलव हइया सुन्दरकुमारिर उकिलेर पर जे सकल लोकेर साक्षीते सुन्दरकुमा- रिर स्वामी गोकुलचन्द्रमिश्र आपन समस्त विशयेर मालिक सुन्दरकुमारिके करा ओ उहाके पुप्यपुत्र करणेर अनुमति देोया सावुद हइवेक-ऐ सकल लोकेर नामे इशमनविसि दाखिल करिते हुकुम य । तदनुसारे सुन्दरकुमारिर अकिल सात जोन सातिर नामे इसमनविपि दाखिल करिले । साक्षिर पर सफिना जारि हइले परे परान आचार्य श्री रामचाँदराय ओ कार्तिकचोप ओ लक्ष्मी वेोया एइ चारि जन हाजिर हइले उहारदिगेर एजहार पाङ्गला अक्षर श्रो एवारते आलाहिदा २ फर्दै नोया जाय इति । अयं दयाकुमारि मजकुर एक केता दरखास्त एइ मजमुने जे मदन मजकुरेर वयेय' दश वारो वत्सर, ओ मदन मजकुर सुन्दरकुमारिर सहोदर भ्राता निमि- तक शास्त्रानुसारे जज्ञ उपवित हइले परे पुष्यपुत्र लओनेर विधान हए ना, ओ उहार पितार फौत परे उहार पितार गोते. विधान हइते पारे ना; ओ सुन्दरकुमारिर एक केता दरखास्त मृत समय कोनो दान सिद्धि हवे ना। पार स्वामिर अनुमति क्रमे आपन सहोदर मदनठाकुर के पुण्यपुत्र करियाछे-एइ सकल अन्य २ वित्तान्त दाखिल करिलेक इति । एइ मकईमाय एइ प्रकार व्यवस्था तलक आविस्वक जे यदि केहो आपन वर्तमान थाकिते मृत्यु समय ज्ञान पूर्वक परकालेर पुन्येर निमिर्त आपन गुरुर साक्षेते आपन माताके दान करोनेर १. वयेर-इति सारीयान् पाठः। एइ विन्ति ये

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च्यवस्थापनसंख्या-२२९
एकरार लिखित पडितेर द्वाराय होक किम्वा ताहार वाक्याव-
द्वाराय हक, दान करिया फोत करे। ए प्रकार दान साखर
विधान कि ना, ओ गुरुर एजहार कोन रिशयेते शिध्येर पत्ते
काफि ह्य कि ना, थार कोन एक पुत्र दश कि द्वादश वत्सर
वयक्रम होयाते श्रोताहार यज्ञोपवित हइलेरो पितार फीत
परे आपन पितार गोत्रेते ऐ पुनेर भग्मिपुत्र मजकुरके श्रापन
मातार अनुमतिते पुष्यपुन लइते पारे कि ना। ए कारण हुकुम
हइल ये एइ रोवकारिर नकल डिगरि जारिर नथिर सम्बलित
इगरेजी चोठीर द्वाराय सदर देओयानि प्रादालतेर हाश्मिर
हुजुरे एइ प्रार्थनाय पाठान जाय-ये उपरेर लिसित वृत्तान्तेर
सोयालेर जवाव शास्त्रानुसारे ऐ आदालतेर पण्डितेर स्थाने
लइया एइ पादाजते प्रेरण करिते श्राज्ञा हय इति ।।
श्रीजयतितराम
प्रतुसमर्पितविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपरमेतद्विशदविषयनिविष्टपनजात
मनरेजीलिखनञ्च यदीशवीशदप्रतिपायेगुणगजेन्दुमितान्दोयनैमासोय.
शरे-दुमितदिनसम्बन्धिशुक्वासरे मया प्रप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जात.
स्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते-
प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येताहशदान दातु' पल्या यापजीव दातृकुलो-
चितप्रासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधम्माद्याचरणापयुवातिरिक्त दातृस्त्र
स्वारसीभूतधने शास्त्रानुसारेण सिद्धति । एवं गुरूवाक्य शिम प्रति
विषय विशेष प्रबनप्रमाण भवत्येव । एवमेकमात्र पुनस्य कस्यचित् तमक
पुन दशवर्षवयस्क द्वादशवपवरक वा जनकगात्रेण जनकमरणानन्तर
• मुपवीत तद्भगिनो स्वमातुरनुमतिमाण दत्तकपुरत्वेन ग्रहीतु न
शक्नोति-इति वदेशचशितमनुदायभागादिग्रन्थानुमारिणी व्यवस्पेति-
अत्र प्रमाणम्-
प्रदान स्वाम्यकारणम् इति मनुवचनम् ||१||
कुटुम्मभक्तपसनाद्देय यदतिरिभ्यते-इति विवादभनार्णवादिनन्ध
मृतवृहस्पतिवचनम् ॥२॥

व्यवस्थापनसंख्या-२११-२१२ अदत्तन्तु भयकोधकामशोकरुगन्वितैः इत्याद्युपरिलिखितग्रन्थधृत- नारदवचनम् ॥३॥ अत्र भयादिरुगन्वितान्ताः पञ्च प्रकृतिस्थितिविरोधिनो द्रष्टव्या:- इति तत्तद्ग्रन्धलिखनम् ॥ ४॥ स्वस्थेनान वा दत्तं श्रावित धर्मकारणात् ।' अदत्त्वा तु मृते दाप्यस्तरसुतो नात्र संशयः ।। इति तत्तद्ग्रन्थ धृत कात्यायनवचनम् ॥५॥ न खी पुत्रं दद्यात् प्रतिगृहीयावा अन्यन्नानुज्ञानामतुः-इति दत्तक- मीमांसादिग्रन्यधृतवशिष्ठवचनम् ।।६।। चूडाद्या यदि संस्कारा निजगोत्रेण वै सताः । दत्ताद्यास्तनयास्ते स्यु:-इत्याद्युपरिजिस्त्रितपन्यवृतकालिकापुराणव. चगञ्चति ॥७॥ ईशवीशब्दप्रतिमापुगुणगजेन्दुमितान्दीयागस्त्यमासोयगुणेन्दुमितदि- नसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्रगुसमर्पितविचारपत्रैतद्धिवादविपयनिविष्ट- पत्र जातागरेनीलिखनः सहितेयं व्यवस्था दत्तेति । श्रीर्जपतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण (७.)-प्रश्न संन्यासीदासनाम्नः कस्यचिद्धनिनो द्वितीयस्त्रीजात एका पुत्रो वर्चते, एका द्वितीया स्त्री वर्तते, एका पुत्रवधूवर्त्तते । इदानी मृतसन्यासीदासस्य स्थावरादिधने एतेषां मध्य कस्याधिकारः-इति धर्मशास्त्रानुसारेण व्यवस्था लेखनीया।। अर्योत्तरम्-. उत्तप्रश्नानुसारेण- सन्यासीदासस्य द्वितीया त्री एवं द्वितीयास्त्रीजातनाकालकपुनः एवं प्रथमास्त्रीजातपयमपुत्रवधूपु सत्सु मृतसंन्यासीदासस्य स्थावरादिधने द्वितीय- १. मोगादि-ति मूले पारः २. भाषितम्-इति कारनृ पादः ।

व्यवस्थापनसख्या-२१२ स्त्रीजातनावालकपुनस्यैवाधिकार एव, न तु प्रयमास्त्रीजातपुनवचोरिति- विदुपा परामर्श |॥०॥ अत्र प्रमाणम्- पितद्धगते पुत्रा विभजेयुर्धन पितुः । अस्वाम्य हि भवेदेषा निर्दोपे पितरि स्थिते ।-इति दायभागधृत- नारदवचनम् ॥ अपरम् - उद्ध्वं पितुश्च मातुश्च समेत्य भ्रातर समम् । भजेरन् पैतृक रिक्वमनीशास्ते हि जीवतोः ॥ इति दायभागधृत मनुवचनम् ॥ श्री दुर्गा सन्यासीदासेर दुइ खी। प्रथमा स्त्रीते एक पुत्र हय, परे द्वितीया स्त्रीते एक पुन हय, ऐ पुन नावालक । प्रथमा स्वीते ये पुत्र हय ताहार विवाह हइयाछे। इतो मध्ये ऐ सन्यासी- दास नगर कलिकाता सिमुलिया मध्ये ४ काटा भूमि आपन नामे क्रम' करिया अापनि वत्तेमान थाकिते प्रथमा खीर पो प्रथम पुत्रेर काल हय । परे ऐ सन्यासीदासेर द्वितीय स्त्री एव ऐ नावालक पुनः एव मृतपुर वधू- एइ तिन व्यक्ति के राखिया सन्यासीदास परलोक प्राप्त हय । एइ क्षने उक्त भूमीर घाटो आछे । ताहाते ऐ दिन व्यक्ति वर्तमान आछेन । ऐ सन्यासी- दासेर विषय काहार प्राप्त हइवेक- यथाशास्त्र व्यवस्था दिते आज्ञा हय इति। उत्तर:- सन्यासोदासेर द्वितीया स्त्रीजात नावालक पुत्रः, एव द्वितीया स्त्री, प्रथमा छोजात मृतपुत्रवधू-इहादिगेर मध्ये सन्यासीदासेर स्थारादि धनेते द्वितीयखोजात नावालक पुनेर हदवेक इति, पहार प्रमाण- 'हायाखाने-न्यप० २ कप इति साधीयान् पाळ व्यवस्थापनसख्या-२१३ श्री श्रीदुर्गाशरणम् (७५)-रोपकारी मिछिल सदर देओयानि पादालत मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरेर हास्मि श्रीयुत हेनरि सिफिस पिएर साहेवेर बैठके । तारिख १३ जुलाइ इगरेती सन १८३५ साल मोतावके वाङ्गला सन १२४२ साल तारिस ३० आपाढ दिवस सोमवार - कुशाइचन्द्रकविराज आपीलाएट मोछति उयमनी ओ कृष्णमनि श्री कृष्णमनीर मृत्युर पर मोछम्मति जयमनी ओ जयमनीर मृत्युर पर नृसिंहराय-रेप्पा- डएट। प्रापीलाण्टेर उकिल मुनशी हयदर आलि श्रो रेप्पाडण्टेर उकिल मुनशी गोलाम वतुल हाजीर प्राइल | जेला विरभूमेर देोयाखो श्रादालवेर जजसाहेवेर रिटरण इ० सन १८३५ सालेर २३ माच्चेर लिसित तथाफार रोवकारी सम्वलित ओयारिप सावुदेर लयोयाजिमा कागतात सम्बलिष्ठ मोफईमार काग- जातेर सामिल अब दरपेस हइया, ऐ सनेर २ जुनेर रोकारि समिभ्यार पढागेल । हुकुम हइल जे एइ मोकमार रेप्पाडण्टीते नृसिंहरायेर नाम लेखा जाय । परे अन्य २ कागजात अनुवोधने वोध हइलो जे इ सन १८३१सालेर १०सेतम्बर तारिखे एइ मोकद्दमार कागजात व्यवस्था तलवेते एइ श्रादालतेर पण्डितेर निकट पाठान गियाछिल, पार ताहार उत्तरे तहकिक ह्य जे मोहम्मति जयमनी प्रो कृप्यमनीक भैरव कविराजेर जोधानि हेवा उचित वट, फिन्तु प्राविणसीयान कोटर डिगरिर पर, जाहार द्वाराय जेलार फयला उक्त मोछतिदिगेर हक्क वहाल धारे, उक्त मोछवि कृष्णमणीर मृत्यु हय, आर मो छम्मात जयमणी जोवाणी हेवार चुनियाद उहार हिस्याते दावि- दार हय, एव एड् आदालतेर पण्डित जिज्ञाशा मते ए प्रकार हेवा सस लिखेन । इ सन १८३३ सालर १३ माइ वाहार सत्व तावत व्यवस्थापनसंख्या-२१३ ६५९ हकिकेर हुकुम जेलार जजशाहेवेर नामे छादेर हय । ताहार उत्तरे जजसाहेब ऐ सनेर २६ दिशम्परेर लिखित रोवकारी तहकिकेर लोयाजिमा सम्बलिप्ट एइ आदालते पाठान । फिन्तु मोछति जयमणीर मृत्यु होया जन्य जे इति मध्ये हइयाछे, उक्त मोछम्र्मातेर ओयारिप हाजीरेर जन्य इस्तहार जारि होया प्रयुक्त मोकईमार तजविज स्थकिद लिल, अद्य तहकिकेर कागजात ओ गयरह ओ साक्षीगणेर एजहार अनुवोध- नेते जयमणीके मोछम्मति कृष्णमणीर जोवानि हेवा सत्वताय पीछिल । किन्तु एइ मोकद्दमार डिगरि हाशील करा श्रो एकान्न प्रयुक्त नितान्त अनुमान हय जे ए प्रकार हेवा यदि स्यात् हइया- थाके, तवे उक्त तहकिकेर द्वाराय सामुदाइक विवादीय वस्तु मोछति जयमणीर हक्कै पीछे । किन्तु उक्त मोछर्मातेर मृत्यु जन्य उक्त मोछम्र्मातेर ओयारिशेर जन्य एइ मोकदमार विवाद पुनराय हइल । एइ प्रकारे जे उभय विवादिर पूर्व पुरुप मोनहरकविराजेर दौहित्रेर पुत्र सुरते विवादोय वस्तुते पापीलाण्ट हक राखे, कि नृसिंहदेव, जे आपनाके मोछम्मति जयमनीर स्वामीर द्वितीय पक्षेर खीर पुत्र अर्थात् उक्त मोछम्मांतर स्वपनिपुत्र करार देय, ओयारिप हइवेक । ए प्रयुक्त ए विशयेर प्रकाश जन्य हुकुम हइल जे एइ आदालतेर पण्डितेर निकट कागज पाठान जाय एइ हुकुमे जे उपरेर लिखित विशयसकलेते अनुधापन करिया उहार उत्तर दुइ सप्ताह मध्ये लिखेन, पार से पर्यन्त हुकुम होया स्थकिद थाके इति ।- श्रीजयतितराम एतदम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिक्सिपीयरसाहेवधर्माधिकरण लिखितेरावीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दोयजुजाइमासीयगुणेन्दुमितदि- बसोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नपतिरूपपत्रमेतद्विवादनिविपरजातश्च यचदन्दो- यतन्मासीयाद्विपक्षमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य बाशयोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- व्यवस्थापत्रसंख्या-२१३-२१४ प्रभुसमर्पितविचारपत्रलिखितवृत्तान्ते सति जयमनीमरणोत्तर विवा- दासदीभूततत्त्यक्तसौदायिकत्रीधने तस्याः प्रपितामहदौहित्रपुरसपतीपु- त्रयोत्समवाये सपनीपुत्रस्याधिकार'-इति वदेशचनितमनुदायभागादि- मन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ।- अन्न प्रमाणम्- दौहित्रपय॑न्तानन्तरमेव सपत्नीपुत्रः--इत्यादि दायक्रमसग्रहमन्थ- लिखनम् ॥१॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितम्बरमासीयनवमदिन- सम्बन्धिनु रवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रेतद्विवादनिविष्टपनजातैः स इतेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ३५६ ल० सदर- (७६) रोवकारि मिछिल सदर देोयानि 'आदालत मोकाम कलिकाता श्रादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुन हेनरि सिकिस- पीयेरसाहेपेर बैठी। तारिख २२ जुलाइ इङ्गरेजी सन १८३५ साल मोसाय के ७ श्रावण वागला सन १९४२ सात दिवस बुधवार। शिटवरतसिंह आपीलाएट मोछाव कुडा ओ गयरह रेराडण्टान् प्रापीलाण्टेर उफिलगणेर मध्ये मुनशी गोजाम पाहम्मद श्रो मोहम्मान कुडा ओ मोहाएलसिंह दुइ जन रेप्पाडण्टानेर उकिल सदासुस परिडत हाजीर थाइल, धार रक्ष्यालाल रेष्पाडएट मोटेर इयालामनामा एवं एइ प्रादालतेर एतलानामा जारि होयातेओ हाजीर नाहि । पह श्रादालतेर काएम मोकाम हकीम एडोयार्ड जान हारण्टी साहेवेर इ सन १८३५ सालेर

व्यवस्थापनसंख्या-२१४
१७ मार्चर लिखित हुकुमानुसारे एइ मोकईमार कागजात
यामार वैठके दरपेप हइया उक्त तारिखैर हाकिम मौछफेर
लिखित रोवकारिर राय ओ प्रथम आदालत सदर आमिनेर
तजविजेर वाचतेर कागजात इस्तक नालिशी पारजि ओ वथा-
कार फयछला पर्यन्त श्रो द्वितीय आदालतेर वावत जज
आपीलेर कागजात इस्तक मौजेवात ओ तथाकार फयछला ओ
कोट आजिमावादे दाखिल होया मौजेवातेर न्याय खास
आपीलेर दरखास्त नो नोट मजकुरेर हाकिम जिमिस हारण्टी
साहेव ओ खास कमीसनर वावतो आलियाट साहेवेर इ०
१८२६ सालेर २२ प्रापरेल लो इ. १८३३ सालेर १५ अापरेल
तारिखेर लिनित खास पापील मजुरिर विशयेर राय प्रार
ताहार नामञ्जरिर विपये उक्त क्रोटेर हाकिम छेजलि वामप
कदवरट साहेवेर इ० सन १८३२ सालेर ६ जुलाइ तारिखेर
लिखित राय श्रो एइ आदालतेर दाखिल होया मौजेवातेर
जायाच सामुदाइक पडान गेल । यदि स्यात्-प्रकाश ये
मोकदमा जेलार आदालते तथाकार पण्डितेर व्यवस्था मते
फयछेल हय, आर मेष्टर वारडो आलियाट साहेव खास
बापालेर मरिर रोक्कारिते उक्त व्यवस्थार सत्यतार प्रति
सन्देह भानेन । ए जन्य चुडन्त हुकुम छादेर हानेर पूर्व एइ
श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने एइ विशयेर वोधकरण ये जेलार
पण्डितेर व्यवस्था शास्त्रानुसार उचित वदे कि ना। कर्त्तव्यत्व
दृष्ट हुकुम हइल ये ९३ रोक्कारिर नकल पण्डितेर नामेर
दुइ केता सायाल नो पण्डितेर पक्ष हइते वाहार उत्तरेर नकल
सम्वलित एइ आदालतेर पण्डितेर निकट पाठाइया हुकुम
देयोया जाय जे उक्त पण्डित उपरेर लिखित विशयर उत्तर
दुइ सप्ताह मध्ये लिखेन, एवं एइ विशय ये यदि स्यात् विवादीय
चस्तु साधारण थाकाय किम्वा साधारण ना थकाय व्यवस्थार
कोन तफात हइवेक कि ना-

६६२ व्यवस्थापनसख्या-२१४-२१५ श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिभीयुतहेनरीसिक्सिपीयर साहेवपम्माधिकरण लि. खितेशवीशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिता-दीयजुलाइमायोयद्वाविंशतितमदि- वसीय विचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र तत्समपिजिलाख्यावान्तरघम्माधि करणनियुक्तप रडतसम्बन्धिप्रश्नद्वय तत्सरिडनदत्ताचरदयञ्च यचद दोयाग स्तिमासीयपष्ठदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादशवो धो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- विवादास्पदीभूतघनमसाधारण चेचदा बिलाख्यावान्तरधर्माधिकरण नियुक्तपण्डितलिखितव्यवस्था पश्चिमदेशचलितशास्त्रानुसारिणी भवति । विवादास्पदीभूतधन साधारण चेत्तदोपरिलिखितव्यवस्था पश्चिमदशचलित शास्त्रानुसारिणी न भवति । ईशवीशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिता दीयसितम्बरमासीयनवमदिनसम्ब. न्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपजिलाख्यावान्तरधम्माधिकरणनि युक्तपाण्डतसम्बन्धिप्रश्नद्यतत्पण्डितदत्तोत्तरदयेन सहितेय व्यवस्था दत्तेति । श्रीउर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण यदि कश्चिदनपत्यः पनी विज्ञाय मुतस्तहि तदने तत्पल्य धिकारिणी, अपुत्रधन परन्यभिंगाभि-इति विष्णुवचनात्, अपुत्रा शयन भत्तुः पालयन्ती व्रते स्थिता, पल्येव दद्यात्तत्पिण्ड कृत्स्नमश लभेत च इति बृहन्मनुवचनाच ॥ मिताक्षरादायभागादिमहामन्यानुसारेणेय व्यवस्थेति- वदति त्रिपाठिश्रीवोधकृष्णशर्मा । (७७) सदर देमानि पादालतेर पण्डित मति प्रश्न:- छुथरे जातिर पावर नख काटीले प्रो विवाहेर समय ताहार- १व्यवस्थेय दिलिखिता। वदतिरनीर टिकोपरणशर्मा। .

व्यवस्थापनसंख्या-२१५-२१२ दिगेर माथाते सूत्र धरिले नापीतदिगेर जातिर पर किछु आघात हए कि ना ! उचित ये तुमि यथाशास्त्र प्रश्नेर निचे ताहार उत्तर लिखह । इति सन १८३५ तारिख २७ माइ मोतावेक सन १२४२ तारिख १४ ज्येष्ठ । प्रभुरामपितविचारपत्रं प्रश्नपत्रच यदीरावीशन्दप्रतिपायेपुगुणगजेन्दु. मिताब्दीयजुलाइमासीयतृतीयदिनसम्बन्धिशुकवासरे मया प्राप्तं तदयलोक्य यादृशयोधो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- अस्मदृष्टशास्त्र विशेषत एतद्विषयकविधिनिषेधाविदानों नोपलब्धौ, श्रतएव लुथर इति प्रसिद्ध जातीयपादनखवपने विवाहसमये तजातीय- शिरसि छत्रधारणे' च नापितजातीयानां जातिव्याघातस्तद्देशे व्यपहृतश्चे सदा तत्तत्कर्मकरणे नापितजातीयानां जातिव्याघातः शास्त्रतो भवत्येव । तद्देशे एवं व्यवहारो न चेत्तदेवं शास्त्र तो न भवति -इति वनदेशचलित- मन्यादिधर्मशास्त्रानुसारिणी व्यवस्थात ।। अन्न प्रमाणम्- जातिजानपदान धर्मान् श्रेणीधर्माश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपालयेत् ।। इति मनुवचनम्।। १।। ईशवीशब्दप्रतिरायेषुगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितम्बरमासीयवेदेन्दुमितदि- नसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रप्रश्नपत्राभ्यां सहित व्यवस्था दत्तेति ॥-- श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण त:२२५ सदर ल : ६४२३, क्रोट ढाका मो० कलिकातार सदर देयोनि श्रादालतेर इं: सन १८३५ २ .--इति साधीयान् पार' !

स्थापनसख्या-२६ सालेर ५ श्रागष्ट मोतायेक वाङ्गला मन १२/२ सातिर ०१ श्रावण बुधवार दिवसेर ऐ पादालतेर हाकिम युन भोलारम जाहीन साहेवेर पेठारगेवकारि-- ईशानचन्द्रदास ओ गायरह आपोलाण्टान रेपाडण्ट प्राकृण्णदाम श्रापालाण्टदिगेर उफिनगर मध्ये एक व्यक्ति तारकचन्द्र- राय श्री मदासुसपण्डित यो मुनशी राधारा, रेपाटण्टर उक्लिाण हानीर पाइन प्रो श्रीरामराय श्रापीलाएटदिगेर द्वितीय उरुिल श्रो मुनशो होनभानी रेगडएदेर नृतीय उकिल हजुरे हानीर नाइ । ए मोहमा ए श्रादालतेर सायेक काएग मोकाम हाकिम एक्ष्यने हाकिम जान इटारुश्राएल साहेर सन हालेर १५ श्रापरल तारिखर हुकुमानुसारे अद्य श्रामार पेठ उपस्थित हइया जेलार यादालतेर फयशला यो अन्न २ दोपरा कागजात हम मौसुफेर ऐ तारिसर रोवकारिर विस्तारित लिसित गयेर सम्वनित पाठ करागेल । फोन हुकुम देशोनर पूर्व निचेर गिसित विशयेर प्रत्युत्तर ए श्रादालतेर पाण्डवेर स्थान लो उचित वोध हइल । ए कारण हुकुम हइल ये एइरोव कारिर नकल एइ हकमे ये निचेर निसित विशयेर प्रत्युत्तर एइ रोक्का रिर नकल पार दिवसायधि पश्चम दिवसेर मध्ये लेखेन-ए आदालतेर पण्डितके अपन कराजाय । प्रश्न :-यद्यपि स्यात् एक व्यक्ति हिन्दु, ये ताहार माट विपय कान त लुझेर फवल एय पानाधिल, ताहार मध्ये चार आना प्रापन वर्तमान स्राक ओ दुइ पाना आपन द्वितीय मृत स्वीर गर्भनाता कन्याके हेवा करे, 'यो ऐ कन्या श्रापन स्वामीर मृत्युर पर दश यस्सर वयस्मे आपन विमातार समिते लोकान्त हय तवे वनदेशाय चलित शास्त्रानुमारे ऐ कन्यार तेज्य विशयेर उत्तराधिकारि ताहार विमाता किम्या वाहार स्वामीर पिता इइवेक इति - व्यवस्थापनसंख्या-२१६-२१७ ६६५ श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतप्रोलियमवेगहीनसाहेवधम्माधिकरण- लिखितेरावीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयागस्तिमासीयपश्चमदिवसीय विचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदब्दीयतन्मासीयपञ्चमदिवसोयषष्ठ- दिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशमोघो जातस्तदनु सारेयोत्तर लिख्यते ।।- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति तरकन्यायक्तधने श्वशुरोऽधिकारी भवति । इति वदेश चलितमनुदायभागादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति --- अत्र प्रसाणम् ततः श्वशुरः-इति दायभागटीका( पृ० २१८ लिखनम् ॥१॥ ईशयोशब्द प्रतिपा पुगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितम्बरमायवेदेन्दुमितदि- नसम्बन्धि चन्द्रवारे मया प्रभुममर्पितविचारपत्रसहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (GE) कोन व्यक्तिर द्वितीय श्रो तृतीय पुत्र आपन २ श्रमेर द्वारा कयेक ग्राम लाभ करिल । ताहार पर द्वितीय पुत्र निःसन्तान एक स्त्री राखिया नरिल । तृतीय पुनेर पुत्रो निःसन्तान एक खी राखिया मरिल, एवं ऐ बी एखन पय्यन्त निःसन्तान वर्तमान बाछे। इहाते जिज्ञासा करा जाय-१ प्रथम सोयाल-एइ ये ऐ द्वितीय पुत्रेर विधवा स्त्री एवं तृतीय पुत्रेर पुत्रवधूर पे कयेक ग्रामे अधिकार थाके कि ना, यदि थाफे तवे कि पय्यन्त थारे- २ द्वितीय सत्रोयाल-एइ ये द्वितीय श्रो तृतीय पुत्रेर भगिनीर पत्रिर ऐ कयेक मामे अधिकार थाके कि ना ।। एइ व्यवस्था चारानस देसेर चलित शास्त्रानुसारे देग्रोया बाय इति ।। -- ६६६ व्यवस्थापत्रमख्या-२१७ कुरचीनामा पुत्र न २ त्री पुन ३ सामी.४ कन्दान.४ निम्तान मृता मृत मृत निस्तान वत्तमान खोरासिया पुरेर पुन पन्यार पुत्र वर्तमान निसन्तान मूत्र मृत वन्यार पान वर्तमान श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितवङ्गदेशीयाक्षरप्रश्नपत्रं वसावलीपत्रं च यदीशवोशन्दप्रति- पायेषुगुणगजेन्दुमितान्दीयाकन्वरमासीयाङ्कपक्षमितदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवा- सरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशयोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते ॥ प्रथमप्रश्नस्योरत्तम्- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति द्वितीयपुत्रतृतीयपुत्राभ्यामुपार्जिता प्रामाः पितृव्यभ्रातूपुत्रयोर्मध्ये साधारणाः स्थिताः, पथदिनोयपुत्रो विद्यमाने च नातृपु मृतः स्याचदा मृतस्य पितृव्यम्य पल्या यावज व स्वपतिविभवो- चितपासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाघांद्याचरणोपयुक्तधने अधिकारः । यदि च द्वितीयपुत्रतृतीयपुत्राभ्यामुपाजिता ग्रामाः पितृन्यभ्रातृपुत्रयोर्मध्ये साधारणा न स्थिताः, श्रथवा साधारणा अपि विभका धासन, एव स एव द्वितीयः पुनो बीवति भ्रातृपुत्रे च मृतः स्यात्तदा मृतस्य व्यवस्थापनसंख्या-२१७ ६६७ पितृव्यस्यासाभारणस्वस्वासदीमतधने विभक्तधने वा तत्पल्या एव यावजीवमधिकारः। यदि च द्वितीयपुत्रतृतीयपुत्राभ्यामुपार्जिता ग्रामाः पितृव्यभ्रातृपुत्रयोर्मध्ये साधारणाः स्थिताः, अथ च स एव द्वितीयः पुत्रो मृते च भ्रातृपुत्रे मृतः स्याचदा द्वितीयपुत्रतृतीयपुत्राभ्यामुपार्जित- प्रामसमुदायेषु द्वितीयपुत्रस्यैव साधारण्यप्रतियोगिनोऽसाधारणस्वत्वोत्पत्ते. स्तत्पन्या एव विवादासदीभूवसमुदायग्रामेषु यावजीवमधिकारः एव | तृतीयपुत्रस्य पुत्रो यदि विद्यमाने पितरि मृतः स्यात्तदा तस्य पितृधने असाधारणस्वत्वानुत्पत्तेस्तत्सल्या अपि तद्धने नाधिकारः, किन्तु यावजीवं स्वपतिविमवोचितपासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधर्माद्याचरणोपयुक्तधने अधिकारः। तृतीयपुत्रस्य पुत्रो यदि मृते पितरि पितृव्ये च जीवति मृतः स्यादेवं द्वितीयपुत्रतृतीयपुत्राभ्याम् पार्जिता ग्रामा द्वितीयपुत्र- तृतीयपुत्र योर्मध्ये साधारणाः स्थितास्तदा मृतस्य तृतीयपुत्रपुत्रस्य पल्या यावज्जीवं स्वपतविभवोचितग्रासाच्छादनोपयुक्तावश्यकविधवाधर्माद्याचर• गोपयुक्तधनेऽधिकारः। तृतीयपुत्रस्य पुत्रो यदि भृते पितरि पितृव्ये च जीवति मृतः स्यादेवं द्वितीयपुत्रतृतीयपुवाभ्यासुपार्जिता ग्रामा द्विताय पुत्र तृतीयपुत्रयोर्मध्ये साधारणा न स्थिता, अयवा साधारणा अपि विभका जातास्तदा मृतस्य तृतीयपुत्रपुत्रस्यामाधारणस्वत्वात्पदीभूतपने विभक्तधने वा तत्पल्या एव यावजोधमधिकारः। यदि च द्वितीयपुत्रतृतीयपुत्रा- भ्यामुपार्जिता ग्रामाः पितृव्यभ्रातृपुत्रयोर्मध्ये साधारणाः स्थिताः, अथ च तृतीयपुत्रस्य पुत्रो मृते पितरि पितृन्ये च मृते मृतः स्याचदा द्वितीयपुत्र- तृतीयपुत्रायामुपाजितग्रामसमुदायेषु तृतीयपुत्रपुत्रस्यैव साधारएपप्रातयो- पिनोऽणधारपत्वपोलत्तेतल्या एवं विवादास्पदीभूतसमुदायमा मेषु' यावजीवमधिकार इति । अत्र प्रमाणम्- पली दुहितर स्तिरी भातरस्तथा । तत्सुतो गांजो बन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः ॥ एपामभावे पूर्वस्य धनभागुत्तरोचरः । १. समदाय-या।

. ६६८ व्यवस्थापनसंख्या-२१५-२१२ स्वर्यातस्य ह्यपुत्रस्य सर्ववर्णेप्वयं विधिः ॥ इति मिताक्षरावीरमित्रो- दवादिग्रन्यधृनयाज्ञवल्क्याचनम् ॥१॥ पत्नी गृहीयादित्येतद्वचनजातं विभक्तमातृतीविषयम्-इति मिता- क्षरामलिग्वनम् ॥२॥ तस्मादपुत्रस्य सव्तस्य विभक्तस्थासप्टिनो धनं परिणीता सी रायता सफलमेर गृह्णातीति स्थितम्-इति मिताक्षरा(पृ. २२१ )मन्थ. लिखनम् ॥३॥ स्वाते स्वामिनि स्त्री तु ग्रासाच्छादनमागिनी । अविभक्ते धनारी तु प्राप्नोत्यामरणान्तिकम् ।। इति वीरमियो- दयाटिग्रन्धधृतकात्यायनवचनम् ॥४॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् द्वितीय पुरतृतीयपुरयोस्त्यकथने तयोर्भगिनीपोनस्याधिकारप्रतिपादक शास्त्राभावादारप्रसाद विना नाधिकार.-इति वागणसीप्रदेशचलित. मनुमिताक्षरावीरमित्रोदयादिग्रस्थानुमारिणो व्यवस्थेति - ईशवीशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयदिशम्बरमासीयदशमदिन - सम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्रभुखमरितप्रश्नपत्रवशावनीपत्राभ्या सहि- तेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीज्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिथेण (८०) श्रीगणेशाय नमः । अवधूगयधूगेगय-सरनामगया भ्रातरः सहोदरा श्रासन् । तेपा मध्ये श्रवधूगयनाम्नान्यदायादापाजितग्रामः परइस्त. गता निवप्रयत्नन स्वभोग्ये धानीतः। स प्रामः पूर्वोपाजितादन्यः । यदा अवधूगयेण ग्रामार्थ वादिना सह विवाद प्रारब्धस्तदा धूर रायेण तद्भाना न साकृतः, उक्त च नाह विवाद करिष्यामोति, स्वाशोऽपि न गृहीतः । वदनन्तरं ग्रामविभागायसरे अवतारमयोऽवधूरायात्मजः हरिगोविन्दायो मया व्यवस्थापनसंख्या-२१८ ६६६ धूरीरायात्मजः सर्वजितरायसरनामरायात्मजः तेषां मध्ये इरिगोविन्द- रायेण भागो न स्वीकृतः, उक्तं मपित्रा भागो न गृहीतस्तस्मादहमपि न महीयामीति । ग्रामविभागावसरे रामजतनण्यप्रभृतय उत्तना आसन्, परमातीववालकाः हरिगोविन्दरायात्मजाः। साम्प्रतं हरिगोविन्दराय मजा रामजतनप्रभृतयो भागमर्थयन्ते । ते पितृतिरस्कारेण पूर्व पित्रा मागो न स्वीकृतः, अतो भागा न भवन्ति वा भवन्तीति प्रश्ने-- श्री यतितराम प्रभुसमर्पितसंस्कृतप्रश्नपत्र पारशीकप्रश्नपत्रञ्च यदीरावीशब्दप्रतिपाय- पुगुणगजेन्दुमिताब्दीयाग समामीयचतुर्थदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे प्राप्तं तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सप्त विवादास्पदीभूतग्रामस्येदानी विभागमर्थयन्तो हरिगोविन्दरायात्मजा रामजतनरायप्रभृतयो विभागाही न भवन्त्येव । श्रन्या दायादोपार्जितग्रामे यथा पितृपितामहाभ्यां द्वाभ्यां विक्रयेग तयोर्द्वयोः स्वत्व- नाशे न पोत्राणां स्वत्वनाशो भवति, तथा पितृपितामहमोः स्वांशग्रहणोपेक्षा- मूल कस्वत्वनाशेनाप्राप्तव्यवहाराणां पौत्राणां विभागमयतामपि स्वत्वनाशः शास्त्रविवेचनया भपितुं शक्नोत्ये इतिपश्चिमदेश चलितमनुमिताक्षरावोर- मित्रोदयादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ।- प्रत्र प्रमाणम्- संविभागक्रयप्राप्तं पित्र्यं लब्धं च राजतः। स्थावरं सिद्धिमाप्नोति भुक्त्या हानिमुपेक्षये ॥ इति वीरमित्रोदयादि- (पृ. २०३ )अन्धधृतवृहस्पति( पृ०७३ )वचनम् ॥१||- ईशबीराब्दप्रतिपाछपुगुणगजेन्दुमिताब्दोयदिसम्बरमामीयामिदिन- सम्बन्धिशनिवासरे मया प्रभुसमर्पितसंस्कृतप्रश्नपत्रधारशीप्रश्नपत्राभ्यां सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ||- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनार्थामश्रेण व्यवस्थापनसंख्या-२१६ (८१) प्रश्न:- यथाशाम्रानुसारे पण्डितेर प्रति जिज्ञाश्य हइयाछे- १दफा- यद्यपि एक व्यक्ति धमाकासी हइया वीर्थयात्रा करिया २० वत्सरेर मध्ये आपन वासस्थाने पुनराविचि ना हइया सव्यंदा प्रज्ञात थाके, ताहाते एक जिज्ञाश्य ये ऐ संवाद रहित व्यक्तिर जीवनावशेप विवेचित ह्य कि ना। थार ऐ व्यक्तिर समुदाय वस्तु दान ग्रहीता व्यक्सिक्ले ऐ अज्ञातसवादी अर्थात् अनुद्दिश्य व्यक्तिर तीर्थयात्रार पूर्व कृत उइल प्रमाण प्राप्त वस्तु ऐ लिपिर निर्धारित मते मापन २ अंश विभाग करिया लइते पारे कि मा, येमन एक मृत व्यक्तिर इप्टेटेर न्याय- २दफा- एवं ऐ व्यक्ति प्रापन वासस्थाने २० वतसरेर मध्ये किम्या परे पुनरावित्ति हइले उहार निज वस्तुसकलेर मालिकत्व रहित इश्या अनधिकारि हइवे कि ना-हाइ पण्डितेर व्यवस्थार अविश्यक हइयाछे, शाखानुसारे व्यवस्था प्राज्ञा हय इति । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्षितविचारपत्र प्रश्नपत्रञ्च यदीधावीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दु मिता दीयागस्तिमासीयद्वाविंशतितमदिनसम्बन्धिशनिवासरे प्रभुसमर्पित- विचारपनान्तरच यत्तदन्दीयसितम्बरमासोयदशमदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते ।।- प्रथमप्रश्नस्योचरम्- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति प्रस्थानदिनमारभ्य विंशतिवर्षपर्यन्त संवादरहितरण मरणावधारण शास्त्रतो भवति । एवञ्च सति तदीय' १ तत्पीयमनुदाय --५॥

व्यवस्थापनसंख्या-२१६ ६७१ समुदायधनं तत्कृत-उद्दल शब्दप्रतिपाद्यलिपिनि रितस्वस्वांशानुसारेण दान- ग्रहीतारो मृतस्य कस्यचित् त्यक्तधने तदुत्तराधिकारिल्यायेन विभज्य ग्रहीतु शास्त्रतः शक्नुवन्तीति । अन प्रमाणम्- गतस्य न भवेद् वार्ता यावद् द्वादशवार्षिकी । प्रतावधारणं तस्य कर्तव्यं सुतबान्धवः ॥ इति तिथितत्यादि पृ० २०) अन्धधृतपमवचनम् ।।१।। प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनुवचनम् ॥२॥ द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् - स एव प्रस्थितो व्यक्तिविशेषो यदि विंशतिसंवत्सरमध्ये तलरती या पुनरागच्छति तदा प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितानुमितपस्थितमरणावधारणमयुक्त- स्वत्वनारास्तस्य स्वकीयधने न भवति । प्रस्थानेन सम्भावितस्वत्वनाशस्य प्रस्थितागमनेन बाधितयात् । किन्तु प्रथमपश्ने दानोल्लेखो लिखितः । तत्र दाने यद्ययं नियमो दातुर्यग्रह जीवामि न बोवामि योभयथैव दान- ग्रहीतृणां तद्धनं भविष्यति तदैतादरादानेन दातुः स्वत्वत्यागेन सामित्व- राहित्य शास्त्रीयमेव । यदि तद्दाने अयं नियमो यद्य है जीवामि तदा तद्धनं ममैवास्ति, यदि न बीयामि तदा दानप्रीता भविष्यति, तदा दार्जीवन- दशायां दानुः स्वत्व त्यागेन स्वामितराहिलं न भवति-दति पङ्गदेश- चलितमनुदायभागादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति । अत्र श्रोइल-शब्दप्रतिगद्यालिपिमदृष्ट्वा प्रश्नयोराशयः सम्यान शातोऽत एवैवमुचरं लिखितमिति निघेपनम् ।।- थत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नीचरलिखितद्वितीप्रमाणम् ॥१॥ सोपाधिदानमुपाध्यसिद्धावसिद्धम् इति विवादभन्नावग्रन्यलिस- नञ्चेति ॥२॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दीयदिशम्बरमायोयमुनोन्दुमित- ६७२ व्यवस्थापनसंख्या-२१६-२२० दिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्रभुसमर्पितोपरिलि खितपिचासत्रय- प्रश्नपत्र सहितेय व्यवस्था दत्तेति ॥- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण (२) रोधकारि मिछिल सदर देओयानि आसलत मो० कलिकाता । श्रादालत मजकुरेर हाकिम श्रीयुत हेनरि सिक्सि- पियेर साहेवेर बैठके तारिख ६ आगष्ट इंसन १८३५ साल मोतावके २२ श्रावण सन १९४२ साल वाङ्गला दिवस वृहस्पतिवार ।- वैठल छाएल- बाएलेर पर एक केता पोकालतनामा मुनशी यायोछ श्रालि दाखिल करिया हाजीर श्राइन । इतः पूर्व इं सन १-३५ सालेर २० जुलाइ तारिखे योलिएम वेराडीन साहेवेर ऐ सनेर १६ जुनेर छादेर होया हुकुम मोतावक छापलेर छोयाल तत्समिभारि कागजात उपस्थित हइया बाएलेर गरहाजीरि प्रजुक्त मुलतवि छिल, अद्य पुनराय उपस्थित हइल । एइ नादाल- तेर हाकीमान भोलिएम वेराटीन साहेव श्री रविष्ठ इश्मीट साहेवेर २ जानेोयारिओ १६ जुनेर छादेर होया रायेर सहित पडागेल । यदि स्यात ऐइ छोयाल छरछरि पापील मजरिर प्रार्थनाय वटे, ई सन १८१४ सालेर २६ कानुनेर ३ दफार २ धारार लिसित प्रकरणसकल ताहार मचुरिर जन्य प्रकाश नाइ, ये तदृष्टे मचुरिर योग्य हय, पार जज साहेवैर फयछलार उपर, जाहा रेजष्टर साहेवैर फयछलार पर हय, ताहार खास पापील प्रचलित कानन मते मजुर हइते पारे ना। ए प्रजुक्त पामार राय श्रोलिएम राढीन साहेवेर १६ जुनेर लिखित राएर सहित एइ प्रकारे अक्य हय-ये ताहार मनुरिर हुकुम व्यवस्थापनसंख्या-२२० छादेर हइते पार ना। किन्तु यदि स्यात् एइ आदालतेर तापेर कोन श्रादालते नितान्त श्राइनेर वहिर्भूत कोन हुकुम छादेर हय, पार से मोकमा खास आपील मञ्जरिर योग्य ना हय, ताहार दोरस्त करा ए आदालत हइते उचित । तदृष्टे ए आदाल- तेर पण्डितेर स्थाने एइ विशय जिज्ञाशा उचित जे छाएन श्रो अन्य २ मुर्दाबालेहमेर गोलामीर विशयेर मोकदमा शाप मतो तहकिक हइया निप्पत्य हइयाछे, कि ना। परे हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल डेविड इमीट साहेव हाकीमेर तलव मते, ये कागज पोछियाछे, ताहा सम्वलित एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान जाय ये उक्त पण्डित उपरेर विशयेर जोयाय लिखेन । यदि स्यात् जजसाहेवेर फयछलाय तजविजेर कोन व्यतिक्रम प्रकाश हय तवे ताहार शोधन करार जन्य हुकुम छादेर हइते पारे, आर यदि पण्डितेर जोयावर द्वाराय व्यतिम प्रकाश ना हय, ए पादालतेर हस्तापनेर कोन कारण हइते पारिवेक ना इति ।- श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतहेनरीसिक्सिपीयरसाहेवधर्माधिकरणा- लिखितेरावीशब्दप्रतिपाद्ययुगुणगजेन्दुमितान्दीयागस्तिमासीयपष्ठदिवसीयवि. चारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं तत्समपितेतद्विवादविषयनिविष्टपत्र जातं च यचदन्दीयतन्मासोयरसपदमितदिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादशमोधो जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते- एतद्धर्माधिकरणायिनस्तदितरप्रत्यर्थिनां च दासत्वविषयकविवादः निष्पतिशास्त्रानुसारेण बातास्ति-इति मन्वादिशास्त्रानुसारिणो व्यवस्थेति अन्न प्रमाणम्- गृहज्ञातस्तथा क्रांतो लब्धो दायादुपागतः इत्यादि नारदवचनम् ॥१॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयजानवरीमासीयशिवमित. दिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्र तद्विवादविषयनिविष्ट- ६७४ व्यवस्थापनसरया-०२०-०१ परजात सहनेय व्यवस्था दयति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (८३) श्रीदुर्गा शरणम् सवालेर तरजमा- यद्यपि एक व्यक्ति हिन्दु आपन वृद्ध प्रपितामहेर सहोदर भ्रातार पीर घश श्री प्रापन वृद्ध प्रपितामहेर वैमात्रेय भ्रातार पौर यश एइ दुइ व्यक्ति ओयारिश रासिया मरिया, ए प्रकारे शास्त्रानुसारे ऐ मृन व्यक्तिर त्यक्त धन, प्रस्थावर हक, किम्वा स्थावर हक, विभक्त हउक, विम्या अविभक्त हम, उभयेर वशके अशिवेक, किन्या मृत व्यक्तिर वृद्धप्रपितामहेर सहोदर भ्रातार पोर वश, ये अव्यवहित सम्पर्की वटे, केवल सेइ पाइवेक इति । मूल पूरप नाहार दुइ पनी एक पन्नार दुई पुत्र द्वितीय पत्रो ताहार मध्ये एक पुत्र द्वितीय पुत्र ताहार पुत्र मस्य पुत्र तस्य पुत्र तस्य पुत्र तम्य पुत्र तस्य पुत्र नस्य पुत्र रस्य पुत्र तम्य पुत्र तस्य पुत्र 1 तस्य पुर तस्य पुत्र तस्य पुन १७५ व्यवस्थापनसंख्या-२२१-२२२ श्रीजयतितराम प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रद्वयं च पदोशवीशब्दप्रविगधेपु. गुणगजेन्दुमिताब्दीयागस्तिमासीयद्वाविंशतितमदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोय या राबोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ।। प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति मृतधनिवृद्धप्रपितामहसहोदरभ्रा. तृपौवनंशमृतधनिद्धपितामहवैमात्रेयभ्रातृपौत्रवंशयोर्मध्ये मृतधनिवृद्ध- प्रपितामहसहोदरभ्रातृपौत्रवंशस्यैव मृतधनित्यक्तविवादास्पदोभूतधने मृत. घनिसन्निकृष्टसपिएइत्वेनाधिकारः-इति पश्चिमदेशचलितमनुमिताक्षरादि- अन्धानुसारिणी व्यवस्थेति ॥ अत्र प्रमाणम्-. अनन्तरः सपिण्डावस्तस्य तस्य धनं भवेत् इति मिताक्षरादि. ग्रन्यधृतमनुवचनम् ॥१॥ ईशवीराब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयजानवरीमासीयरसेन्दुमित- दिनसम्बन्दिरा निवासरे मया प्रभुसमाप्तिप्रश्नपत्रविचारपत्र' सहितेयं व्यवस्था दति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (८४) रुवकारि मिछिल श्रादालते देओयानि सदर मोकाम कलिकाता आदालत मजकुरार हाकिम श्रीयुत जाज इष्टाकोवेल साहेवेर बैठके। सन १८३५ तारिख ११ डिसेम्बर मोतावके सन १२४२ वाङ्गला तारिख २७ अग्रहान रोज शनिवार । ४-४ लम्वर सदर-- जगन्नाथवसु रामकानाइवसु प्रापीलाएट रेप्पाडेएट व्यवस्थापत्र संख्या-२२२ श्रापीलाएटेर अकिल सिवनारायनचट्टोपाध्याय उपस्थित हइल। रेप्पाडेण्ट स्वततः वा उकिलतः उपस्थित माइ । मक- ईमा तरतिव नम्बर मते वत्तेमान वत्सरेर १ डिसेम्बर तारिखे प्रामार वैठके रुवकार हइया कतक कागजात दृष्टिर परे ऐ दिवसेर रुवकारिर लिखित हेतुते मोलतवि छिल, अद्य पुनराय स्वकार हइया हिसावेर विपये पापीलाण्टेर उकिलेर कथार आभाप विवेचनाय उचित हइल ये मिछिलेर सम्बलिष्ट २ दुई खाता एइ आदालवेर खाजानीर जिम्वा करा जाय । जे से रामकानाइवसुर खातार लिखित अङ्कसकल, जाहा तारिणी- चरणवसु ओ जगन्नाथदासेर नामे लिखित आछे, जगन्नाथ- दासेर खातार अङ्कसकलेर सहित, जाहा रामकानाइवसुर नामे लिखित आचे, मोकावेला अर्थात् ऐक्य करिया समान अथवा न्यूनातिरेक, जाहा प्रकाश हय, ताहार कैफियत दाखिल करे । एव जे हेतु प्रकाश आछे जे फरियादी रामकानाइवसु पिता ओ एई मकईमार एक जना पासामी तारिणीचरणवसु उहार पुत्र एवं फरियादिर निकट एइ मकद्दमार दाविर टाका कर्ज लोन आसामिर सहिन अर्थात पिता पुत्रेर एक स्थान यास ओ एकान्न- भूक्तर. समय प्रकाश पाछे । अतएव श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने ए विपवेर प्रश्न, जेमत प्रकार विपये पिता कत्रिक पुत्रेर प्रति कर्जा टाका प्राप्ति जन्य नालिश ए प्रदेशेर चलित शास्त्र मते वैध एवं जथार्थ वटे कि ना, प्राविश्यक! अतएव हुकुम हइल जे एइ रुवकारिर नकल पद विषयेर उत्तर लिसनेर इगिते जे यदि स्यात् पुत्र पितार स्थाने एकत्र वास श्रो एकान्नभूक्त अवस्थाय टाका कर्ज नय, वादा प्राप्ति वन्य पुत्रेर पितार नालिस वैध श्रो यथार्थ वटे कि ना-एइ प्रादालतेर पण्डितेर निकट प्रेरित हग, एवं मईमार मिछिलेर सम्बलिष्ट खाता आदालतेर खाजाश्वीर जिम्वा हय-जे से चपरेर लिखित मत कैफियत १ एक सप्ताहेर मध्ये गोजराय इति - व्यवस्थापनसंख्या-२२२-२२३ ६७७ श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतजार्जइटाकोएलसाहेवधर्माधिकरणलि- खितेरावीशब्दप्रतिपायपुगुणगजेन्दुमिवान्दीपदिसम्बरमासीयशिवमितदिव. सीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यचदन्दीयतन्मासोयमुनीन्दुमितदिन- सम्बन्धिगुरुवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते ।।- यदि पितापुत्रयोरेकाकेन वसतोर्मध्ये पुत्रः पितुः सकाशाद् शृणं गृह्णाति तदा तत्प्राप्त्यर्थ पुत्र प्रति पितुरभियोगः शास्त्रविहितो न भवति इति वङ्गदेशचलितमनुदायभागविवादमार्णवादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्येति ।- अत्र प्रमाणम्- श्रातृणामथ दम्पत्योः पितुः पुत्रस्य चैव हि । प्रातिभाव्यमृणं साक्ष्यमविभक्ते न तत्स्मृतम् - इति विवादभनाएं- वादि( १ विवा० १५२ क ,प्रन्यतयाज्ञवल्क्य पृ० २१५२ वचनम् ॥१॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयफिवरवरीमासीयदिमित दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेयं व्यवस्था दचेति | श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (८५) मोकाम कलिकातार सदर देओनि श्रादालतेर इं० सन १८३५ सालेर १६ दिजम्बर मोतावेक वाङ्गला सन १२४२ सालेर २ पीप बुधवार दिवशेर श्रीयुत्त बोलीयम ब्राडिन साहेवेर बैठकेर रोक्कारि- भिक्षनारायणसिंह वनामे तिलकधारिसिंह ओ भिक्षधारि- सिंह मो गायरह । छायेलेर उकिल मुनशी अोलीउल्ला हाजिर प्राइल । पञ्चाश ।

व्यवस्थापत्रसंख्या-२२३
६८
टाका मूल्येर इप्टाम्पेर पर छायेलेर दरखास्त मौजे भजापट्टीर
अर्द्धक ओ मौजे नोरङ्गाबादेर मोछल्लमेर चारि पाना ओ मौजे
नोमा श्रौ मौजे दिखि श्री गायरहर मोट सोल आनार वारो
आना हिश्यार दखल पाइवार ओ हकीयतेर तजविजेर श्रो
कालेकट्टरिर केतावे नाम लेखाइवार मोकदमाय जमा रुलेर
तिन गुण ओ वयमेवादिर टाका मुवलगे एक हाजार दुइ सत
शातशष्टी टाका साढे दश पानार संख्याय खास आपिल मञ्जुर
होनेर प्रार्थनाय उफिल मजकुरेर नामेर उकालतनामा यो सन
१८३३ सालेर ८ जुलाइ तारिखेर लिखित तेरहोत जेलार सदर
आमिनेर तजविज करा एक केता डिगरिर नकल ओ सन १८३५
सालेर २० श्रागष्ट तारिखर ऐ जेलार जजसाहेवेर एक केता
फयशलार नकल ओ सन १८१६ सालेर ३० जुलाएर लेखा जेला
मजकुरेर रेजष्टर साहेवेर एक केता फयसालार नकल प्रो सन
१-१६ सालेर २३ जुलाइयेर प्रकाश हो तेरहोत जेलार
श्रादालतेर पण्डितेर एक केता व्यवस्थार नकल सम्बलित, ये एइ
मासेर प्रथम दिवसे दाखिल हइयाछिल, अद्य दरपेप हइया दृष्टे
माइल । कोन हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व शाखेर विवरण ज्ञात
हो। उचित वोध इल। ए कारण हुकुम हइल ये एइ रोवकारिर
नकल एइ हुकुमे ये निचेर लिखित विशयेर प्रत्युत्तर नाल
रोवकारि प्रार दिवसावधि पञ्चम दिवसेर मध्ये लेखेन-ए
आदालतेर पण्डितके अर्पन करा जाय ।
प्रश्नः यद्यपि स्यात् तेरहोत जेला निवासीय दुइ व्यक्ति
हिन्दु पैतृक विशयेर पर साधारणे दखलीकार भो उहारा देनादार,
एवं उभयेर अप्राप्तव्यवहार पुत्रगण धाक, आर एमन कोन विशय
उदादिगेर ना थाके जे ताहा हइते उहादिगेर देनार टाना परि-
शोध हइते पारे ओ उहारा अनुपाये पैतृक विशय अप्राप्त-च्यव
हार पुत्रगण थाक्वेियो श्रापन • महाजनेर देना परिशोधाथे
१-परिसीवर-41०

व्यवस्थापत्रसंख्या-२२३-२२४ ६७६ विक्रय अथवा वमलीक करे, तवे ऐ विक्रय ओ तमलोक पश्चिम- देशीय चलित शास्त्रानुसारे सिद्ध वदे कि ना इति । श्रीजयतितराम एतदम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतश्रोलियमवेराडोनसादेवधम्माधिकरण- लिखितेशचोशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दीपदिशम्बरमासीयरमेन्दुमित - दिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयवेदपक्षमित- दिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशयोधो जातस्तदनु- सारेणोत्तर लिख्यते- प्रभुतमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येताशविक्रयत्तमलिकशब्दप्रति- पाय च शास्त्रानुसारेण सिद्धचति-इति पश्रिमदेशचलितमनुमिताक्षरा- प्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थति ।। - अन्न प्रमाणम्- अप्राप्तव्यबहारेषु पुत्रेषु पोत्रेषु चानुज्ञानादावसमर्थपु भातृपु पा तथाविधेषविमपि सर्वकुटुम्धव्यापिन्यामापदि तत्सोपणे चावश्य- कर्तव्येषु च पित्रादिश्रादादिपु स्थावरस्य दानाघमनविक्रयमे कोऽपि समर्थः कुर्याद्-इति मिताक्षरा( पृ० २०० ग्रन्थलिखनम् ॥१२॥ ईशबीराब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दोफिरवरोमासीयैकादश- दिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्रभुममर्पितविचारपत्रमहिनेयं व्यवस्था दत्तेति ।- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (८६) प्रथम प्रश्नः- यदि कोनो व्यक्ति दुइ स्त्री राखिया लोकान्तर हय, पार ताहार ज्येष्ठा स्त्री अयोरा, कनिष्ठा वीर गर्भजातक कन्यार एक पुत्र अर्थात् मृता व्यक्तिर दौहित्र सन्तान थाके, तवे एतद्देशीय चलित शास्त्रसम्मत उत्तराधिकारि के हइते पारे ?

व्यवस्थापत्रसंख्या-२२४ दितीय प्रश्न:- यद्यपि एतद्देशीय चलित शास्त्रानुसारे दोहिन सन्तान उत्तराधिकारि हय, तवे ऐ ज्येष्ठा अवीरा खोर जीवनावधि भरण- पोपणार्थर कि हइते पारे। सन १-३५ साल तारिख २७ जुलाइ मो. सन १२४२साल तारिख १२श्रावण । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रदयं च यदोशवोशब्दप्रतिपाद्येषुगुण- गजेन्दुमितान्दीयसितम्बरमासीयशिवनेत्रमितदिनसम्बन्धिगुरुवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहशबोधो जातस्तदनुसारेगोचरं लिख्यते । प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- प्रथमप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति मृतस्य धनिनो दे पल्यो जीवन्त्यौ चेत्तदा दयो पल्योरेव मृतस्य धनिनस्त्यक्तस्थावरास्थावरसमुदायधने यावनीवं समानाधिकारः । तयोर्द्धयोः पल्योर्मध्ये एका चेजीवन्ती, तदा केवलं तस्या जीवन्त्या एच यावजीवं मृतधनित्यत्तसमुदायधनेऽधिकार। जीवन्त्योदयोः पल्यो वन्त्यां वैकस्यां पल्यो मृतपनिदुदिनु त्रिस्य वा मृतधनित्यक धने नाधिकार' इति । दितायप्रश्नस्योचरमप्यादत्रैवपर्यवसन्नमिति पृथत न लिखितम्- इति वनदेशचलितमनुदायभागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ।। अत्र प्रमाणा- पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा-इत्यादि दायभागादिप्रन्यधृत- यशिवल्क्यवचनम् ॥२॥ ईशबीशन्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासीयगजेन्दुमित- दिनसम्बन्धि वृहस्पतिवासरे मया प्रभुसमातिप्रश्नपत्रविचारपत्रैः सहितेयं व्यवस्था दचेति । श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थापत्रसंख्या-२२५ ६८१ (८७)-मोकाम कलिकातार सदर देओयानि श्रादालतेर ३० सन १८३५ सालेर १४ जुलाइ मोतावक वाङ्गला सन १२४२ सालेर ३१आपाढ मङ्गलबार दिवसेर ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत ओलियम ब्राडीन साहेवेर बैठकर रोयकारि- गोलोकनारायणराय छाएल छारलेर उकिल सदासुखपण्डित हाजीर भाइल। छाएलेर छोलात ओ ताहार सम्वलित कागजात, जे ए आदालनेर सावेक हाकिम रिचार्ड प्रोआलपोल साहेवेर बैठकर मोतालक चित, अद्य प्रामार बैठके दरपेप हइया पाठ करा गेल । कोन हुकुम देओनेर पूर्व निचेर लिखित विषयेर प्रत्युतर ए श्रादालवेर पण्डितेर स्थाने लगे उचित वोध हइल, ए कारण हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे जे निचेर लिखित विशयेर प्रत्युत्तर रोवकारि प्रार दिवसावधि पश्च दिवसेर मध्ये लेखेन- ए पादालतेर परिडतके अर्पन करा जाय । एइ हेतु जे श्रीमती तारिणी किछु टाका मृत कालीप्रसादरायेर पुत्रगण श्यामसुन्दर देओ प्रभृतिर स्थाने कर्ज लय, ओ शेप ताहा परिशोध ना होने ऐ श्यामसुन्दर प्रभृति श्रादालतेर डिगरि ऐ श्रीमतीतारिणीदेव्यार नामे हाशील करिया चारि पाच वत्सर पय्यन्त, जे ऐ श्रीमती जीवशाय छिल, ताहा जारि ना करिया उहार मृत्युर पर डिगरि जारिर दरखास्त छाएलेर नामे जे उत्तराधिकार हेतुते मोट परगने भोलेर नय पानार मध्ये तिन थाना ऐ श्रीमतीर तेज्य अंशेर पर दखलीकार हइयाछिल, जेलार आदालते गुजराय, ओ छाएल प्रापत्य करे जे ऐ श्रीमतीर स्वकीय ऋनेर टाकार जमोवि देओन आमार पर नाई। एजन्य जिज्ञाशा करा जाइते- 'छे जे वङ्गदेशीय चलितशास्त्रानुसारे ऐ श्रीमतीर देना परिशोध कर छाएलके उचित हय कि ना-इति ।- श्रीजयतितराम प्रभुसमाप्तेिशवोशन्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दीयजुझाइमासीयवे - ६२ व्यवस्थापनसंख्या-२६५ देन्दुमितदिवसीयविचारपत्र तत्प्रतिरूपसहितं च तदन्दीयागस्तिमासीय- दिमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया व्यवस्था लिखनाथं प्रातम् । किनु तद्विचारपत्रान्मृततारिणीदेवीत्यक्त धन तस्याः स्त्रीधनमासीत् , ततति- पुत्रादिपरित्यक्त' वा तत्समान्तमासीदिति, किंवा तारिणीदेव्या एतदृय किमयं कृतमिति, तारिणोदेव्या सहैतर्माधिकरणार्थिनः कः सम्बन्धः इति च त्रितय ज्ञानु न शक्यते । तस्त्रितय जान विना प्रभाराशापितव्यवस्था भवितु न शमोतीति । श्रतो निवेदयामि । यथा पाशा तथा कर्तव्यमित निवेदनमिति । ईशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमितान्दोयदिशम्बरमासोयगुणपक्षमित- दिनसम्बन्धिबुधवासरे मयैतन्निवेदन कृतमिति ।। श्रीजयतितराम् प्रतिपाल्यतमश्रीवैद्यनाथमिश्रस्य निवेदनमिति । श्रीजयतितराम् एतद्धार्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतश्रोलियमवेराडोनसाहेव धर्माधिकरण लिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुलाइमासीयवेदेन्दुमितदि वसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र यत्तदन्दीयाग स्तमासीयदिमित दिनसम्बन्धचन्द्रवासरे तत्प्रभुधर्माधिकरणलिखितेशवोशब्दप्रतिपाद्यरस- गुणगजेन्दुमितान्दोयफेवरवरीमासोश्य सुमितदिवस यविचारपत्रान्तर यत्तद- ब्दीयतन्मासोपवेदपक्षमितदिनसम्बन्धिबुधवारी मा प्राप्त तवजोत्य यादशमोधो जातस्तदनुसारेणात्तर लिख्यते-- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सतोश्योयन्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दु- मिताब्दीयफेरवरीमासीयवमुमितदिवसोप्रमुझतविचारपत्रदृष्ट्या न तारि- पांदेवोहतपरिशोधनमविना शास्त्रानुसारेण कर्त्तनुचित न भरति-इति वद्गदेशचलितमनुदायभागादिअन्धानुसारिणी व्यवस्धेति ! -- व्यवस्थापत्रसंख्या-२२५ ईशवीशब्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयफेयरव मासोयाइसक्षमि. तदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रमुसमर्पितविचारपत्रसहितवं व्यवस्था दत्तेति । श्रीजयतितराम् श्रीवैधनाथमिश्रेण श्रीजयतितराम प्रभुकृताज्ञानुसारेण निवेद्यते-- प्रभुममपितेरावीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुलाइमासीयवे- देन्दुमितदिवसीय विचारपचं तदब्दीयागस्तिमासीयदिमितदिनसम्बन्धिचन्द्र- वासरे यद्यपि मया प्राप्तम्, किन्तु कर्मबाहुल्यवशात्तत्समये तदन्तर्गत- प्रश्नाशयो नावगतो यदैतस्योत्तरं लेखनीयं तदैवैतस्य प्रश्नत्यायोंऽपि सम्गगज्ञातव्य' इत्येव मनसि निधाय प्रभुसविधो निवेदनं न कृतम् । एत- स्मिन्नेवावसरे श्रीयुत हेनरीसिकिमपीयरसाहेवाभिधानतद्धम्माधिकरणप्राची- माधिपतिमिराशप्त निवेदनलिखनार्थमेकमागपत्रमोशयोशब्दप्रतिपायेगु- एगजेन्दुमितान्दीयागस्तिमासीयेन्दुगुणमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे प्राप्तम्, तदनन्तर तन्निवेदनलिखनमस्कर्तव्येतरेतरकार्यसमुदायव्यग्रेण प्रभुममपित. प्रश्नस्य प्रश्नान्तरजातस्य वा तत्पूर्वमपि प्रातस्योत्तरलिखने श्रीश्रीश्वरपूजाय- धर्माधिकरणावकाशात् पूर्वमवकाशलेशोऽपि न प्राप्तः । अनन्तरं चैगुः पमितदिनपरिमितो धम्माधिकरणस्यावकाशोधि श्रीश्रीश्वरपूजार्थमुरस्थितः । अत एव श्रीयुतदेनरोसिक्मिपोयरसाहेवामिधातद्धम्माधिकरणप्राचीना- धिपतिमिराशप्त तनिवेदनपत्र लिखित्वेशवीशब्दप्रति गये गुणगजेन्दुमिता- ब्दीयनवम्बरमासोयरसेन्दुमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे दचम् । तदनन्तरं च यद्यत्प्रश्नजातं प्रभुसमर्पितप्रश्नात् पूर्व परतो वा प्राप्त तस्य तस्योत्त- रलिखनप्रवृत्तेनापि यस्य व्यवस्थानातस्य मकर्तव्येतरेतरकार्य्यस्य या १. सम्यक मान्य:- व्यवस्थापनसंख्या-२२५-२२६ श्रीमतां प्रभूणामेतद्धम्माधिकरणाधिपतोनामवान्तरधर्माधिकरणपतीनां वा प्राशावशात् शीघ्रता पाता, तव्यवस्थामा प्रथमतो लिखित्वा दचम्, तत्तत् कर्म च कृतम् | अनन्तरं प्रभुसमतिप्रश्नत्योचालिखनप्रवृत्तेनापि यद्विपयत्रय प्रभुसन्निधौ निवेदितं तस्य विवयस्य शानं प्रभुसमर्पितप्रश्न- स्योत्तरलिखने अत्यावश्यकं जातम् । तस्य त्रितयस्य शान विना प्रभुसमपि. तप्रश्नस्योत्तरं दातुमशक्तेनागत्य प्रभुसनिधी निवेदितमिति निवेदनमिति ।। ईशवोशन्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमितान्दीयफेवरवरीमासोयाङ्कपक्षमि- तदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रमुसमर्पित विचारपत्रसहितमिदं निवेदनपत्रं दतमिति । श्रीजयतितराम् प्रतिपाल्यतमश्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीदुर्गा शरणम् ()-जिला कटकेर दिमानि श्रादालतेर सदर प्रामिन आलार बैठकेर सवाल । मोकाम कलिकातार सदर दिमानि श्रादालतेर पण्डितानेर प्रति । प्रथम सवाल एइये, क्रय ओ 'विक्रय प्रभृति मोकरिमार विपयेते शाखेर आज्ञासकल हिन्दु- जातीर मध्ये वाङ्गला ओ ओडिस्या यो वेहार ओ तेलङ्ग श्रो महाराष्ट्र देशेर एक प्रकार वटे, कि पृथक पृथक इति।- द्वितीय सवाल एइ ये, हिन्दुजातीर मध्ये क्रय श्रो विक्रयेर -स्थले क्रेता यो विक्रेतार स्वीकार कराते क्रय विक्रय सिद्ध हय, कि मूल्येर समस्त टाका दिले सिद्ध हय, कि किञ्चित मूल्य दिले ओ निलेमो सिद्ध य इति ।- तृतीय सोल एइ ये, यद्यपि कोनो व्यक्ति हिन्दु जाति प्रापन खीओ अप्राप्त व्यवहार पुत्र विद्यमान थाकिते पैतृक कोनो स्थावर किम्वा स्योपाजित कोनो स्थावर काहारो निकट विक्रय करे, तवे ५ प्रकार विक्रय शाखानुसारे सिद्ध वटे कि ना इति ।- व्यवस्थापत्रसंख्या-२२६ श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रद्रयञ्च यदीशवीशब्दप्रतिपाद्ययुगुण- गजेन्दुमितान्दीयाकतवरमासोयाङ्कपक्षमितदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोकर यायवोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रयमप्रश्नस्योत्तरम्- हिन्दुजातोयक्रयविक्रयप्रभृतिविवादविषयकशास्त्रामा पङ्गदेशे उत्कल- देशे वेदारदेशे लिङ्गदेशे महाराष्ट्रदेशे च कचित् कचित् स्थलविशेपे एकाप्यस्तीति ।। द्वितीयमश्नस्योत्तरम्-- क्रयविक्रयस्थले समस्तमूल्यग्रहणपूर्वकतृविक्रेत्रोः स्वीकारेण विक- यस्य सिद्धिर्भवति । किञ्चिन्मूल्यग्रहणेन विक्रयस्य सिद्धिर्न भवतीति । अत्र प्रमाणम्- मसोन्मतेन विक्रीत हीनमूलं भयेन का। अस्वतन्त्रेण मूढेन त्याज्यं तस्य पुनर्भवेत् ॥ इति वीरमित्रोदयादि- (पृ० ४४१ )ग्रन्धधृतवृहस्पति( पृ० १५५ )वचनम् ||६|| तृतीयप्रश्नस्योचरम् - यदि केनचित् पल्या विद्यमानायामप्रासन्यवहारेषु पुढेष्वपि विद्यमानेषु क्रमागतं स्त्रोपार्जितं वा स्थावरं शास्त्रीयावश्यककार्यार्थव्यतिरेकेण विकीत स्यात्तदा शास्त्रानुसारेण न सिस्थति, शात्रीयावश्यककार्यार्थाव्यतिरेकेए' विक्रीतं स्यात्तदा शास्रानुसारेण सिद्धयति-इति कटकप्रदेशचलितमनुः मिताक्षरावौरमित्रोदयादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति ॥- अन्न प्रमाणम्- मणिमुक्ताप्रवालानां सर्वस्यैव पिता प्रमुः। स्थावरस्य तु सर्वस्य न पिता न पितामहः ।।-इति मिताक्षरा प्रभृतिमन्यतयाशवल्फ्यवचनम् ||१|| १. कार्यायव्यतिरेकेण-व्यप० ।

व्यवस्थापनसंख्या-२२६-२२७ ये जाता येऽप्यजाताश्च ये च गर्ने व्यवस्थिताः। वृत्ति ते ऽप्यभिकांक्षन्ति न दानं न च विक्रयः ।।-इति मिताक्षरादि- (पृ. २०० ग्रन्धधृतमुनिवचनम् ॥२॥ अप्राप्तव्यवहारेषु पुत्रेषु पोत्रेषु चानुज्ञानादावसमर्थेषु भ्रातृषु वा तया- विधेप्पविभक्तपपि सबकुटुम्बव्यापिन्यामापदि तत्रोपणे चावश्यकर्तव्येषु पित्रादिश्राद्धादिषु स्थावरस्य दानाधमनविक्रयमेकोऽपि समर्थः कुर्याद्- इति मिताक्षरा पृ० २०० )अन्धलिखनञ्चेति ॥३॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिवाच्दीचमाचमासोयदिमितदिन- सम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्रभुममपितप्रश्नपत्रविचारपौः सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम्- श्रीवैद्यनाथमिशेग (६) मोकाम कलिकातार मदर देओनि आदालतेर इङ्गरेजी सन १८३६ सालेर ७ जानेर मोता(ब)के वाङ्गला सन १२४२ सालेर २४ पोप वृहस्पतिवार दिवशेर ऐ श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत पोलियम ग्राडीन साहेवेर रोयकारि ।- फाशीचन्द्रमुस्तोफि छायेल- छाएलेर उकिल शिवनारायणचट्टोपाध्याय हाजीर श्राइल । सन १८३५ सालेर १६ दिशम्बरेर लिखित हुगलि जेलार आदा- लतेर एक केता रिटरण तथाकार एक केता रोयकारि प्रो भोछि- नामार नरुल पो गयरह ऐ रिटरणेर सम्वलित सन मजकुरेर ३१ भागप्टेर प्रकाशित ए पादालतेर हुकुमेर जोधे प्राप्त ओ अद्य दरपेप हइया छायेलेर छोलि श्री गरह ऐ छनोलेर संक्रान्तेर कागजसकलेर सहित श्रोए आदालतेर पण्डितेर व्य. वस्था रहे प्राइल ! ए आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थार लिखित नाइयाछ जे यदि पफ व्यक्ति अधिरा कन्यार स्वामि कुनेर स्वामिर भ्रातार न्याय प्रभृति जे ताहा हइते ऐ अयोराखोर धम्म प्रो लज्जा ६.७ व्यवस्थापनसंख्या-२२७ मानेर रक्षणावेक्षण इइते पारे थाके, तवे आपन स्वामीर गृहे अवीरा खोर जाश्रोन कत्र्तव्य वटे, श्री यद्यपि ऐ प्रकार ना थाके, ओ ऐ कन्यार पितृकुजेर पिता ओ भ्राता प्रभृति थाके जे ताहा- देर हइते ऐ कन्यार धर्म प्रभृति लजा मानेर रक्षणावेक्षण हइते पारे, तवे ताहा त्याग करिया कन्या मजकुरार धापन स्वामिर गृहे जागोन प्राविश्यक गखे ना; वरं स्वामिबुलेर एक व्यक्ति पुरुस रक्षणावेक्षणेर उपयुक्त ना थाकार सम्भवे ऐ वीर रक्षणा- पेक्षण ऐ स्त्रीर पितृकुलेर मनुष्यदिगेर पर उचित वटे । किन्तु व्य- वस्था मजकुरा श्रीमती कमलकुमारिर स्वामि मृत रमेशचन्द्रर लिखिया देयोअोबिनामा दिष्ट व्यतिरेक लिखित दइयाछे। ए कारण हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल ओ प्राप्त छिनामा एइ हुकुमे जे नकल रोवकारि प्राप्तेर दिवसायधि पञ्चदिवसेर मध्ये वन्देशीय चलित शास्त्रानुसारे लेखेन जे ओछिनामा मज- कुरार दिष्टं अप्राप्ताव्यवहारा श्रीमतीकमलकुमारी स्वामीर ग्रहे आपन शाशुडिर निकट थाफन आविश्यक बटे, अथवा ताहार पितार निकट थाकिते पार -ए आदालतेर पण्डितके अपैन करा जाय इति । श्रीकृष्णः शरणम् परमपूजनीयश्रीमती पन्नाकुमारीदासी माता ठाकुराणी श्रीचर. णाम्तुजेषु। लिखितं श्रीरमेशचन्द्रदत्तकस्य ओछियतनामापत्रमिदम् । कार्यनचागे' आमि सारिरिक पीडाय अत्यन्त पीडित, एवं जीवन संशय बोध हइतेछे। अतएव एदयने आमार होप बाहाल अछि, आपन स्री श्रीमतीकमलकुमारीदासीक पुष्यपुत्र लओनेर अनुमति पत्र लिखिया दिया प्रामार पैतृक ओ सोपार्जित मनकुला ओ गएर मनकुला दोरोवस्त विपयेर ५.-~-काय च । मागे-इति सापीयान् पाठः।

व्यवस्थापत्रसंख्या-२२७ ६ष्ट एवं पामार ऐ खीर ओ ताहार लो ऐ पुष्यपुत्रेर रक्षणा श्रो हेफाजत कारण श्रापनाके ओछि मकरर करिया लिखिया दिछि-जे आपने मालिक निचेर तपसील सकल कर्म करिवेन! १ दफा। दोरवस्त एमलाक मनकुला ओ गयेर मनकुला, जे किछु आमार दखले आछे ओ जाहा थामार सरिकानेर निकट हइते बुझ समुझ करिया लइते वक्री आछे,-ताह। बुझ समुझ करिया लइया तावत विषये दखिलकार थाकिया हेफाजत करि- वेण, एवं देना ओ पाओना जाहा श्राचे ताहा वुझ समुझ करिया दिवेन यो लइवेन ।।- २ दफा। नित्य-नैमित्तिक क्रिया-कलाप प्रो संसारेर खरच- पत्र अर्थात परिवारेर भरण पोपणादि समय मत करिवेन ।।- ३ दफा। श्रामार खो श्रामार अनुमत्यानुसारे यथाशास्त्र. जे पुष्यपुत्र लइवेक, ऐ पुष्यपुत्रेर एवं प्रामार ऐ खीर रक्षणा- पक्षन आपने करिवेन। जावत ऐ पुष्यपुत्र वयेप-प्राप्त ना हय तावत समुदाय विशय ओछि सुरत मापनकार दखलकवजे धाफि- वैक। ऐ पुष्यपुत्र वयेप प्राप्त हइले आपने ताहाके समजाइया दिवेन । यद्यपि पुष्यपुत्रेर वयेस-प्राप्त होनेर मध्ये आपने कोन पीडाय अथवा अन्य कोन कारणे जीवन संशय बुझेन, तवे आपन परिवर्त अन्य काहाके यातिजमा मते श्रोछि मकरर कारिवार एक्वेयार पापनकार थाकिल ||-- दाफा । आमार पैतृक सोपार्जित फालेकट्टरि माल- गुजारि समपर्काय पो पनि ओ दरपत्तनि तालुकाव जे पाछे, वाहाते आमार एलागाएत खरच-पत्रेर वाहुल्यताय ओ अन्य देना परिशोघे सन हालेर सदर मालगुजारि आदायेर अनेक असंस्थान पाछे । आपने ऐ तालुमातेर मध्ये कोनी एक अथवा नवोधिक तालुक पत्तन करिया दरपत्तन दिया ताहार पन वाहाय ऐ असंस्थान मालगुजारिर सरघराह करिया विपय रक्षा करिवेन । इति सन १२३७ साल नारिख ६ कात्तिक- - सां० गटु। व्यवस्थापनसंख्या-२२७ ६८ इशादी श्रीरामदत श्रीवैद्यनाथमित्र सा० देवानन्दपुर। सां० हाजीपुर पं० चौमुह।। श्रीगोविन्दपाल श्रीपाँचकडिघोष सां० देवानन्दपुर। श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतप्रोलियमवेराडोनसाहेवधम्माधिकरण - लिखितेशवीशन्दयतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयानवरीमामीयमुनिमित- दिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र तत्समर्पितासीयनामाख्य पत्र च यत्तदब्दीयफेवरखरीमासीयशिवमितदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ॥- प्रभुसमपितासीयन्नामाख्यपत्रदृष्टया अप्रासन्यवहारायाः श्रीमत्याः कमलकुमार्याः पतिगृहे श्वभूसन्निधानस्थितेः शास्त्रानुसारेणावश्यकता नास्ति स्त्रीत्वेन स्वतोऽस्वतन्लायाः स्त्यन्तररक्षकत्वस्याशास्त्रीयत्वेन तस्य पितृसन्निधा)ने स्थितिर्भवितुमर्हति-इति पनदेशचलितमनुदायभागादि- प्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति । श्रत्र प्रमाणम्- पिता रक्षति कोमारे भा रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा न सी स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ इति मनु(६३)- वचनम् ॥२॥ भी रक्षति यौवन इत्यादि प्रायिकम्, भभर्तृपुत्रायाः सनिहितायाः पित्रादिभिरपि रक्षणात इति कुल्लूकभकृतमन्वर्यमुक्तावलीग्रन्थ( पृ. ३४६)लिखनम् ॥२॥ मृते भर्तर्यपुत्रायाः पतिपक्षः प्रमुः स्त्रियाः। विनियोगात्मरक्षासु भरणे च स ईश्वरः।। ४४ ६६० व्यवस्थापनसख्या-२२७-२२८ परिक्षीणे पतिकुले निर्मनुप्ये निराश्रये । तत्सपिण्डेषु चासत्सु पितृपक्षः प्रमुः स्त्रियाः ।। इति दायभागादि- (पृ० १७३६१७४ )गन्यधृतनारद( १३१२८-२६)वचनञ्चेति ॥३।। इंशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिवान्दीयापरेल मासोये मिवदिन- सम्बन्धिमङ्गलबासरे मया प्रभुममर्पितविचारपत्रासोयनामाख्यात्राभ्यां प्रहितेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण जगतचन्द्र अधिकारि- (६०)-रुवकारि मिछिल मोकाम कलिकाता सदर देशो- यानी पादालतेर सन १८३६ सालेर मार्च मासेर स्याष्टादस दिवस बुधवारे डिवड इसमिट साहेव-कायेम मोकाम हाकिमेर वैठके।।- साएल साएलेर उकिल निलमनिवन्द्योपाध्याय हाजीर हइल । सन १८३५ सालेर दिसम्बर दशम दिवसेर जिला वर्द्धमानेर जज साहेवेर ओ जिलार पण्डितेर व्यवस्थानुसारे सायेलेर एवं मधुसूदनवडाल प्रतिवादिर पूर्व पुरुपेर स्थापित ओ प्रकाश करा श्रीधीश्वरठाकुर-ठाकुराणोस्द्रजाति सेवकेर दिगेर वाटिते लइया जाहवार अनुमतिते मकमा निप्पत्य करियाछेन, ए कारण साएल ताहाते असम्मत हइया श्रीमन्दिर हइते ठाकुर-ठाकुराणी अन्यन्तरे लइया जाोया रहित हुकुम छादेर होनेर प्रार्थनाय आपनसोल भार उफिलेरनामेर श्रोकालतनामा यो सन १८३५ सालेर दिउम्परमासेर दशमदिवसेर ऐ जिला प्रादालतेर रुब- कारिर नकल ओ साएलेर सन १८३२ सालेर श्रागष्टमासेर सप्तदशदिवसेर हुकुम देशोया दरखास्तर नकल पार सन १८३५ सालेर जाने प्रोरि मासेर चतुर्दश दिवसेर हुकुम देलोया मधुसूदन . व्यवस्थापनसंख्या-२२८ वडाल प्रतिवादिर दरखास्तर नकल पार यो जिला आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थार नकल सम्वजित एइ मासेर पञ्चम दिवसे सेरेस्ताय दाखिल हइयाटिन, अद्य तारिखे दरपेस हइया पडा. गेल इति । जिला मजकुरेर जज साहेवेर गतो सनेर दिजम्बर मासेर दशम दिवसेर रुवकारि द्वाराय प्रकाश हइल जे जिलार पण्डित सदर श्रामिलेर काछारिते उमय विवादीर जे सकल साक्षी गुजरियाछे तदनुसारे उभय विवादीर पूर्व पुरुसेर रीति अनुसारै ठाकुर-ठाकुराणीजीउके वाहारदिगेर शूद्रजाति सेवकर वाटीते लइया जाओया प्रमाण हइयाछे। एवं श्री पण्डित सदर आमिनेर व्यवस्था द्वारातेश्रो ठाकुर-ठाकुराणोजिउर शूद्रसेवकर दिगेर वाटीते गमने देवत्त हानि होया किछु बोध हय ना । ये हेतु एक वार तथाय गमन करियाछिलेन, ९ कारण साएलेर प्रति किछु हुकुम छादेर करार पूर्वे ए आदालतेर पण्डितेर द्वाराय एइ व्यवस्था तलव करा उचित हइल जे यदि ब्राह्मणेर प्रकाशीत ठाकुर ओ ठाकुराणीजिउ एक वार शूदजाति सेवकर दिगेर वाटीते गमन करिया थाकेन, तवे पुनराय पूर्वेर रीति अनुसारे ठाकुर-ठाकुराणी शूद्रसेवकेरदिगेर वाटीते गमन कारिते पारेन कि ना। एवं यदि गमन करेन ताहाते ताँहार- दिगेर देवत्तर किछु हानि हय कि ना । एमते हुकुम हइल जे ए आदालतेर पण्डित वङ्गदेशेर चलित शास्त्रानुसारे उपरेर लिखित वित्तान्तेर व्यवस्था पञ्च दिवसेर मध्ये दाखिल करेण । व्यवस्था दाखिल करा पय्यन्त सोयाल स्थकिद थाकिल इति ।- श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतडिविडहशमिटसाहेव. धम्माधिकरणलिखितेशवीशन्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासो. यरसेन्दुमितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपात्रं यत्तदन्दोयतन्मासोप- . ६१२ ज्यवस्थापनसंख्या-२२८-२२६ द्विपक्षमितदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याशोधो नातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते ॥- वाक्षणजातिप्रकाशितदेवताविग्रहाभ्यामेकवारं केनचिन्निमित्तेन शूद्र- जातिसेवकस्य गृहे गतं चेत्तदनुसारेण पुनरपि तल्लिमित्तवशान्छूद्रजाति- सेवकस्य गृहे ताभ्यां विनाभ्यां गन्तुं शक्यते । तद्धेनुवशाच्छूद्रजाति- सेवकगृहगमनेन चैताहविग्रहयोदेवत्वदानि भवति-इति बगदेशचलित- मन्वादिधर्मशास्त्रानुसारिणी व्यवस्थेति । अत्र प्रमाणम्- जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्माश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधम्मांश्च स्वधम्म प्रतिपालयेत् ।। इति मनुवचनम् ॥११॥ देशजातिकुलानाञ्च ये धर्माः प्राक् प्रवचिताः । तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा ॥ इति बृहस्पति- वचनञ्चेति ॥२॥ ईशवीशन्दप्रतिपावरसगुण गजेन्दुमिताब्दीयापरेलमासीयाङ्गमितदिन- सम्बन्धिशनिवासरे मया प्रभुसमर्पित विचारपत्रसहितेय व्यवस्था दचेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (१)तरजमा सवालात- जिला तिरहुतेर कायेम मोकाम सदर आमीन श्राला सैयद अवदुल ओ आहिद खान वहादुरेर वैठकेर सवाल सदर दिमानी श्रादालतेर पण्डितानेर प्रति यो वाराणसेर पाठशालार परिडतानेर प्रति- मदारीलालेर उत्तराधिकारि रामभञ्जनसिंह थापीलाएट श्रो तालेवरसिंह रप्पाढएदेर मोकदिमाते मैथिल देशेर पलित व्यवस्थापत्रसंख्या-२२६ शास्त्रानुसारे श्रो वाराणस देशेर चलित शास्त्रानुसारेश्रो नदियार चलित शाखानुसार यवाव लिखेन- इति । प्रथम सवाल-एइ ये मैथिलदेशेर चलित शास्त्रानुसारे विमागेर अर्थ कि-इति । द्वितीय सवाल-एइ ये मैथिलदेशर चलिव शास्त्रानुसारे साधारण्य कय प्रकार वटे-इति । तृतीय सवाल-एइ ये ए प्रकार कोन साधारण्य पाछे, ये हिन्दुजातिर सन्तानहीन कन्यासकलेर अधिकार पितार मृत्युर पर पितामहेर सपिण्ड विद्यमान थाकिते पिपितामहेर त्यक्त धने हय कि ना इति । चतुर्थ सवाल-एइ ये यद्यपि कोनो व्यक्ति प्रापन पितामहेर पौत्रसकलेर सहित विवाद उपस्थित करिया श्रापन अंशेर डिगरि आदालत हइते पाइया ओइ डिगरी अनुसारे दखिलकार हइया आपन जीवन पर्यन्त पृथक् पृथक् असूल तहसील करिया मरियाथाके, तवे एमत विपयेर विभाग धला याइवेक कि ना इति । पञ्चम सवाल - एइ ये यद्यपि फोनो व्यक्ति हिन्दु आपन पितामहेरपौत्र सकलेर सहित पृथगन्य ओ कारोवार ओ दान ओ ग्रहण ओ श्राय ओव्यय पृथक् पृथक् करिया ओ पितामहेर त्यक्त किञ्चित भूमि अविभक्त राखितो, ओ ओइ भ्रातासकल प्रापन आपन अंशेर परिमित असूल तहसील पृथक् पृथक् करितेलिलेन- ए प्रकारे ओइ पितामहेर त्यक्त स्थावर विभक्त जाना जाइवेक कि, अविभक्त जाना जाइवेक । ओ ए प्रकार साधारण्य कन्यार अनधिकारेर कारण हइते पारे कि ना इति । पाठ सवाल-एइ ये यद्यपि पितामहेर पौत्रसकलेर मध्ये क्रमागत स्थावर विभक्त ना हइया थाके, ओ ओइ स्थावरेर उपस्वत्व अंशीसकल आपन आपन अंशेर अनुसारे पृथक पृथक असून भो तहसील करिते थाकेन-तचे ए प्रकारे अोइ स्थावर विभकेर मध्ये गणना हइवेक कि ना, ओ ओइ स्थावर विभक्त- ६६४ व्यवस्थापत्रसंख्या-२२६ पदेर अर्थ हइवेक कि ना, ओ ओइ स्थावर विभक पदेर अर्थर मध्ये गणित हइवेक कि, अविभक्त पदेर अर मध्ये गणित हदवेक इति॥ श्रीजयतितराम . प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रं च यदीरावीशब्दप्रतिपाये गुणगजेन्दु प्राप्त मताब्दीयसितम्बरमासीयगजेन्दुमितदिनसम्बन्धिभृगुवासरे मया तदवलोक्य यादराबोधो जातस्तदनुसारेगोचर लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्- द्रव्यसमुदायविषयाणामनेकस्वाम्यानां तत्तदेकदेशे प्रादेशिकत्वत्वव्य. वस्थापन मिथिलादेशचलितशास्त्रानुसारेण विभाग इति । अत्र प्रमाणम् - विभागो नाम द्रव्यसमुदायविपयाणाममेकस्वाम्यानां तत्तदेकदेशेषु व्यवस्थापनम् - इति मिताक्षगः पृ० १६७)ग्रन्थलिखनम् ॥१॥ विभागशन्दस्वनेकस्याम्यानां द्रव्यसमुदायविपयाणां तत्तदेकदेशे व्य- वस्थापने शक्तः-इति वोरमित्रोदयादि(वोम पृ० ५२२ अन्यजिवनम् ।।२।। एकदेशोपात्तस्यैव गोभूहिरण्यादावुत्पन्नस्य स्वत्स्य विनिगमना- प्रमाणाभावेन वैशपिकव्यवहारानहतया अव्यवस्थितस्य गुटिकापातादिना व्यञ्जन विभाग:--इति दायभाग(पृ.८ ग्रन्थलिखनम् ।।३।। द्वितीय प्रश्नस्योत्तरम्- मिथिलादेशचलितशास्त्रानुसारेण साधारण्यमनेकविधमस्ति । तत् पर्वमा तषचनजातेवेव स्पष्ट मिति ॥ अत्र प्रमाणम्- दानग्रहणपवनगृहक्षेत्रपरिग्रहाः। विभक्तानां पृथम् ज्ञेयाः पाकधर्मागमव्ययाः ॥ इति विवादरताकर- (पृ. ६०६ )विवादचिन्तामणि( पृ. २५३ )विवादचन्द्र( पृ० ८७) मितादरावार मित्रोदय( पृ. ७१६ ,दायभाग पृ. २३० दायतत्व(पृ.

व्यवस्थापत्रसंख्या-२२६ १७६)विवादार्णवसेतु( पृ० ८३)विवादभनाएंवादिनन्यधृतनारद नाम: सं० पृ० १५६) वचनम् ॥१॥ साक्षित्वं प्रातिभाव्यं च दानं ग्रहणमेव च । विभक्ता प्रातरः कुर्युनर्नाविभक्ताः कयइन ॥ इति तत्तद्ग्रन्यधृत- नारद(नामस० पृ० १५६ वचनम् ॥२॥ येपामेताः किया लोके प्रवर्तन्ते वक्तः। विभक्तानवगच्छेयुर्लेख्यमप्यन्तरेण तान् ।। इति तत्तद्ग्रन्यधृतनारद (नामस पृ० १५७ )वचनम् ॥३॥ तृतीयप्रश्नस्योचरम्- मृते पितरि विद्यमानेषु पितामहसपिण्डेषु पितृपितामहत्यकघने येन साधारण्येन सन्तानरहितदुहितणामधिकारो न भवति, तत्साधारएपञ्च भ्रातृणां पितृव्यभ्रातृपुत्रादीनां वा सपिण्डानां परस्परमविभकधनाना. मेकपावन वसवामेका पितृदेवद्विजार्चनमायव्ययादिकमपि कुर्वतां परस्पर- मृणप्रातिभाव्यसाक्ष्यादिकमप्य(पा)कुर्वता' तत्तत्कर्मजातमेवेति । अत्र प्रमाणम्- द्वितीयप्रश्नोचरनिखितप्रमात्रयमेवेति । चतुर्थप्रश्नस्योचम्- चतुर्थप्रश्नलिखितवान्ते सत्येतादृशं धनं विभक्तमध्ये गणितं भवितुं शनोतीति । अत्र प्रमाणम्- प्रपमप्रश्नोचरलिखितप्रमाणत्रयमेवेति । पञ्चमप्रश्नस्योचरम्- पञ्चमप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येतत्प्रश्नलिखितपितामहत्वक्त स्थावर धन विभक्तमध्ये गणितं मवितुं शक्नोति, एतादृशसाधारण्यञ्च कन्यान- पिकारमयोकं भवितुं न शकोतीति । अत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणत्रयमेवेति ॥ १. मध्ययुन्तान-या।

. ६६६ व्यवस्थापनसंख्या-२२६-२३० पाठप्रश्नस्योत्तरम् - पष्ठप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येतादृशं स्थावरं विभक्तमध्ये गणित मषि- पति, एतादृशं स्थावरं विभक्तरदवाच्य भविष्यत्येतादृशं स्थावर विभक्त- पदार्थान्तर्गतच भवति ॥ इति मिथिलादेशचलितमनुविवादरताकर- विवादचिन्तामणिकल्पतरूपारिजातविवादचन्द्रप्रभृतिग्रन्धानुसारिणी वारा- एसीप्रदेशचलितमिताक्षरावीरमित्रोदयन्यवहारमयूखव्यवहारमाधवव्यवहार कौस्तुमादिग्रन्थानुसारिणी नदियाप्रदेशचलितदायभागदायतत्वदायक्रम- संग्रहविवादार्णवसेनुविवादभङ्गार्णवादिग्रन्यानुसारिणी च व्यवस्थेति । अत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणत्रयमेवेति । ईशवीशब्दप्रतिपादरसगुणगजेन्दुमितान्दीयापरेलमासोयरसेन्दुमितदिन- सम्बन्धिशनिवासरे मया प्रभुसमपिंतप्रश्नपत्रविचारपत्राम्यां सहिवयं व्य- यस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाधमिश्रण १०१ लं जारि- (६२) जेला चविस परगनार मोतालक चौकि नवाव- गजेर मोनछफी काछारि हइते सदर देमानि श्रादालतेर श्रीयुत पण्डितेर निकट व्यवस्थाकारण सोलि पाठान जाय । श्रीमतीपार्वतीदासी साकिन नैहाटी ५० हाविलीसहर- डिगरिदार श्रीमतीठाकुराणीदासी ओ रामनारायणमित्र- देनदार कालीप्रसादमित्र ो वेनिमाधवमित्र यो मधुसूदनमित्र- नावालगदिगेर माता श्रीमतीकरुणामयीदासी-मोजाहेम । गोविन्दचन्द्रमित्र सा० गैहाटी ५० फलिकाता- दोपरा मोजाइम , व्यवस्थापनसंख्या-२३० - दा०२७२२|| टाका माय खरचा- यद्यपि कमललोचनदे आपन स्थावर यो अस्थावर विषये ओ मापन स्त्री श्रीमतीठाकुराणीदासी ओ दुइ कन्या श्रीमती- करुणामयीदासी ओ आनन्दमयीके राखिया परलोक हय प्रार करुणामयीदासीर गर्भजातक सन्तान श्रीयुतमधुसूदनभित्र ओ वेनिमाधव मित्र ओ कालीदासमित्र नावालग वर्तमान थाके-- एमत दशाय ऐ करुणामयीर माता श्रीमतीठाकुराणी कमललोचन- देर स्त्री ऐ करुणामयीर स्वामी रामनारायनमित्रेर सम्वलित कमललोचन मजकुरेर खरिदा ब्रह्मोत्तर ॥१ जमि वन्धकेर द्वाराय टाका कर्ज लइया थाके, श्रार डिगरि होनेर पर डिगरि जारिर द्वाराय अविनामार लिखित जमि ऐ कमललोचनेर त्यागी वस्तु फ्रोक हइया थाके, तवे कमललोचनदेर दौहित्र लोक थाकिते ताहार त्यागी वस्तु ऐ ठाकुराणीदासी ओ रामनारायण मजकुरेर देनाय विक्री हइते पारे कि ना। यदि ठाकुराणी मजकुरा ऐ टाका आपन निज खरच किग्या आपन स्वामीर गयातीर्थ पिण्डदान किम्या आपन द्वितीय कन्यार विवाहेर कारण लइया थाके-एमत तृतीय हेतुते कमललोचन मजकुरेर त्यागी वस्तु हइते ठाकुराणीदासीर देना परिशोध हइते पारे कि ना इति । श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्र च यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यपुगुणगजेन्दु. मितान्दीयदिशम्बरमासोयगुणपक्षमितदिन सम्बन्धिमुधवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति मृतस्य मूलधनिनः कमललोचनदेनाम्नो दौहित्रेषु विद्यमानेषु कमललोचनत्यक्तधने पत्नीत्वेन जाताधिकारया ठाकुराणीदास्या मृतधनिपल्या प्रश्नलिखिततहणं यदि शास्त्रीयावश्यक- - काार्थव्यतिरेकेणात् स्वेच्छया साभिप्रायेण वा कृतं स्यात्तदा तहण. • परिशोधनार्थ कमललोचनत्यक्तधनस्य विक्रयो भवितुं न शक्नोति; यदि व्यवस्थापनसंख्या-२३०-२३१ च ठाकुराणोदासी तदेव ऋणं शास्त्रीयावश्यककार्थमर्थात् स्वकीयभरण- पोपणाद्यर्थ स्वपत्युः श्रादाद्ययं द्वितीयकन्याविवाहाद्ययं वा कृतक्ती स्यात्तदा कमललोचनत्यक्तधनात् ठाकुरामोदासीकवर्णपरिशोधनं भवितुं शक्नोति-इति वदेशचलितमनुदायभागादिग्रन्यानुसारिणी व्यव- स्येति ।-- अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चेव-इत्यादि दायभागादिअन्यधृतयाशवल्क्स- वचनम् ॥१॥ अपुत्रा शयनं भर्तः पालयन्ती गुरी स्थिता । भुञ्जीतामरणात् क्षान्ता दायादा उद्धमाप्नुयुः।। इति दायभागादि- अन्यधृतकात्यायनवचनम् ।। भशेर्ध्वदेहिककियाद्यर्थ दानादिकमप्यनुमतमिति । वर्जनशता वाधानमप्यनुमतम् । तत्राप्यशक्ती विक्रयणमपोति च-दायभागग्रन्थ- लिखनम् ॥३॥ कन्या वैवाहिकञ्चैव प्रेतार्येषु यत् कृतम् । एतत् सर्व प्रदातव्यं कुटुम्बेन कृतं प्रभोः ।। इति व्यवहारतत्त्वादि. अन्यधृत कात्यायन कास्मृ० ५४३,पृ० ६८)वचनञ्चेति ॥४॥ ईशवीशन्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयमैमासीयशिवमिवदिनस. सन्धिबुधवासरे मया प्रमुखमर्पितप्रश्नपत्रविचारसत्राभ्यां सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण -- (६३)-लं० ६७० सदर- इ. सन १८३६ सालेर १६ मार्च मो० वा. सन १२४२ सालेर ८ चैत्र शनिवारेर श्रीयुत जार्ज इष्टाफोएल साहेव विचारा- र्धर श्राधिपत्येर मोकाम कलि कातार सदर देओयानी आदा- लर मिदिलेर स्वकारि- व्यवस्थापनसंख्या-२३१ राणीजयदुर्गा आपीलाण्ट-- राणीकृष्णमणी रेपाडएट- श्रापीलाण्टेर उकिल वर्ग सदासुखपण्डित ओ वंशीवदन मित्र ओ रामना(रा)यण उपस्थित हइल । रेप्पाडेण्ट एयानाम- नामा ओ एस्तहारनामा जारि होनेओ स्वततः वा उकिलतः उपस्थित हइल ना। अद्य पइ मफईमा संख्यार शृङ्खलामते श्रामार आधिपत्ये समग्र दया मिछिलेर कागजसकल पठित हइल | अवधारित हइल ये मोहाइया अर्थात् वादी उभयेर स्वीकृत विमलादास्यार स्वोपाजित सामुदाइक अर्द्धक मोजे राणी प्रामेर अर्द्धक अर्थात उक्त मौजेर ।) चारि आना अंश पाओनेर दावि उपस्थित करे। मोदीलेहा अर्थात् प्रतिवादी राणीजयदुर्गा विमलादास्या फत्रिक विक्रयेर अापत्य उत्थापन करिलेक । जेलार सदर आमीन सेइ विक्रयके अवीरा खीर पक्ष इइते अशीद्ध विवेचना करिया बादी के डिकी देन । ऐ डिक्री आपीले जेला रङ्गपुरेर जजसाहेवेर अने अङ्गिकार पत्र विक्रीर न्याय साध्यस्थ ना होनेर वोधे स्थिरतर रहिल, एवं विपय हस्तान्तर होन सिद्ध वाक्येर विशेष होनेर निमित्त प्रापील खास ग्राह्य हइल। अतएव उपरोक्त विक्रयपत्र साठ्यस्थ कि असाध्यस्थ-अनुसन्धाने साक्षिगणेर उक्तिसकल दृष्टी करणेर पूर्वेई उचित हइल जे श्रादालतेर पण्डितके जिज्ञाशा जाय जे । विधया स्त्री, जाहार सन्तान सन्तत्यादि जीवदपाय नाइ, एवं स्वहस्ते विषय उपार्जन करे, से विषय हस्तान्तर करणेर क्षमता राखे कि ना। हुकुम हइल जे एइ नवकारिर नकल एइ आझाय जे भादालतेर पण्डित लिखित प्रश्नेर उत्तर २ दुइ सप्ताहेर मध्ये दाखिल करेण आदाननेर पण्डितेर निकट प्रेरित हय-इति ॥ श्रीजयतितराम एतदर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतबार्बदष्टाकोएलसाहेवघाधिकरण- ७०० व्यवस्थापत्रसंख्या-२३१-२२२ लिखितेशवोशन्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासीयाकेन्दुमितदि- वसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं तत्तदन्दीयतन्मासीयगजपक्षमिवदिन- सम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृश बोधो जातस्तदनुसारेणो. तर लिख्यते ।- मृतसन्तानया विधवया स्त्रिया यदि स्वयमेव धनमुपाजित स्यात्तदा तस्या विधवायास्तद्धनहस्तान्तरकरणक्षमतास्येव-इति वनादेशचलितमनु- दायभागादिग्रन्धानुसारिणी व्यवस्थेति । अत्र प्रमाणम्- सौदायिक सदा स्त्रीणां स्वातन्त्र्यं परिकीर्तितम् । विक्रये चैव दाने च यथेष्टं स्थावरप्वपि ।।इति दायभागादि- (पृ.७६ ग्रन्धधृतकात्यायन( कास्मृ. ६०६1पृ० ११. वचनम् ||१|| पतिमरणोत्तरं च विधवाया न कश्चित् स्वामी, किन्तु भरणादि- कर्ता गुरुरेव श्वशुरादिः, अतस्तदानीमजिते स्वातन्त्र्यमेव-इति विवादभङ्गाव( २, पृ० ३६४ क 'अन्धलिखनश्चेति ।।२।। ईशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमितान्दीयमैमासीयरसेन्दुमितदिनस. म्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेय व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (६४) सर्वशास्त्राध्यापक पण्डित श्रादालत देखोनि सदर मोकाम फलिकाता सतवरिपु- प्रथम प्रश्नमिदम्- यद्यपि कोन नीलोक किछु दिव्यादि राखिया निःसन्तान मृत्यु हय । ततपरे ताहार त्यज्य॑ धनेर उपर ताहार स्वामीर पितामहेर सधवा एक कन्या एवं ऐ कन्यार एक दत्तक पुत्र एवं ऐ मृता स्त्रीर स्वामीर प्रपितामहेर भ्रातुपौत्र राधागोविन्दनामक एक जना आर ऐ मृता खीर स्वामीर प्रपितामहेर भ्रातुपुत्रवधु श्रीमती. लक्ष्मीप्रियानाम्नी एक जना एवं तस्य दत्तकपुत्र गोविन्दकीशोर व्यवस्थापनसंख्या-२३२ ७०१ नामक दाविदार हय; तवे यथाशास्त्र ऐ सकल दाविदारानेर मध्ये कोन व्यक्ति ऐ मृतार त्यज्य घनाधिकारि हइवेक, एवं दत्तक पुनेर माता वर्तमान थाकिले दत्तक पुत्रके धन पौछिते पारे कि ना- एहार यथाशास्त्र उत्तर लिखिवा। परन्तु दुइ किता वंशावली- पत्रिर नकल तोमार ज्ञातार्थे प्रश्नपत्र सम्वलित पाठान जाइतेछे इति । १ माहे मार्च सन १८३६ इङ्गरेजी मतावक सन १२४२ वा० तारिख १६ माहे फाल्गुन ॥ प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्र वंशावलीपत्रद्वयं च यदीशवीशब्द- प्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमितान्दीयमार्चमाठीयद्विपक्षमितदिनसम्बन्धिमङ्गल. वासरे मया प्राप्तं तवलोक्य याशयोघो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति हरिश्चन्द्ररायत्यक्ततत्पढीसंक्रान्त- धने मृतायाः स्त्रियाः पत्युः पितामहस्य सघवाकन्याया दत्तकपुत्रस्यार्था- न्मृतधनिहरिश्चन्द्ररायपितामहदौहित्रस्यैवाधिकारस-इति; एवं दचकपुत्रस्य मातरि विद्यमानायामपि दत्तकपुत्रत्येवाधिकार:-इति वङ्गदेशचलितमनु- दायभागादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति ॥ अन प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव-इत्यादि दायभागादिग्रन्थधृतयाशवल्क्य- यचनम् ॥१॥ पितामहप्रपितामहसन्ततेरपि दौहित्रान्तायाः पिएडप्रत्यासत्तिकमे- गाधिकारो बोन्या-इति दायभागप्रन्थलिखनम् ॥२॥ पितृव्यपौत्राभावे पितामहदौहित्रस्याधिकारः-इति दायमागटीका- (पृ० २१८)दायक्रमसंग्रह( पृ०८)प्रभृतिग्रन्थलिखनश्चेति ॥३॥ वीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयजूनमासीयाङ्कमितदिनसम्ब- न्धिबृहस्पतियासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रविचारवंशावलीपत्राभ्याञ्च सहितेयं व्यवस्था दति ।। - श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण ७०२ व्यवस्थापनसंख्या-२३३ (६५) यदि कश्चिन्निरपत्यो ब्राह्मणः सभायां समीपवर्चिनः सपिण्डाश्च त्यक्त्वा मृतस्वदा तत्समोपर्तिनि सपिएहे विद्यमाने लघ- पतिधना तसलो स्वभाः स्थावरधन पत्रकरणपूर्वक कस्मैचिद्दतातो चेत्, तत्त्रीकृतं दानमप्रामाणिकम् । स्वीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुरनापदि । विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविक्रयाः ।।-इति विवादचन्द्रग्रन्थस्थ. ऋतनिवृचिप्रकरणधृतार्पवचनादिति ।- सही-कल्याणमिश्रपण्डित श्रादालत दिमानी जिले तिरहुत वकलम रामनाथमिश्र पण्डित । शरीराद्ध स्मृता जाया पुण्यापुण्यफले समा । यस्य नोपरता भार्या देहाई तस्य जीवति । जीवत्यर्वशरीरेऽथं कथमन्यः समाप्नुयात् ॥ अपुत्रा शयनं भर्तः पालयन्ती व्रते स्थिता । खीकृतान्यप्रमाणानि कार्याण्याहुरनापदि ॥ विशेषतो गृहक्षेत्रदानाधमनविक्रयाः ।।इति दायभागविवादचन्द्र- स्थकात्यायनबरस्पति पृ० २११ ) वचनादिति ।।- सहोल्गएमिक्ष पण्डित श्रादालत दिवानी जिले तिरहुत वकलम रामनाथमिश्रपण्डित। ल०३५६ सदर- इ० सन १८३६ साजेर १७ मे मोवावक सन १२५३ सालेर ५ ज्येष्ठो मङ्गलवारेर प्रकाश्य मोकाम कलिकातार सदर देओयानि आदाजतेर मिछिलेर रोवकारि उक आदालतेर हाकिम श्रीयुत जार्ज इष्टाकोयेल साहेवेर नेसस्ते- गम्भिरराप, ताहार मृत्युर पर विजयराय प्रो गायरह- ज्यवस्थापनसंख्या-२३३ ७०३ आपीलाण्टान मोछमात धनेश्वरी ओ गयेरह रेपानडेएटान आपीलाण्टानेर उकिल बजरङ्गीलाल ओ रेष्पानडाएटानेर उकिल मुनशी दादारवक्स हाजीर हुइल । एइ मोकईमा अद्य तरतिव नम्बर मते आमार नेसस्ते रोवकार हइया मिचिलेर फागजात पठीत हइल । ताहार मध्ये ये जेला विरोहतेर बादाल- तेर पण्डितेर दुइ व्यवस्था मोलाहेजा हइल । यदि स्यात् उक्त दुइ व्यवस्थार मध्ये रेनेष्टर साहेवेर सोयाल ओ जजसाहेवेर सोयालेर मध्ये विभिन्नतार प्रति दृष्टोते आमार निकट कोनो प्रभेद प्रकाश नाइ! किन्तु जे हेतुक प्रकाश पाछे-जे पद मकर्दमार खाश श्रापोल लिखित व्यवस्थासकलेर लेहाजे मञ्जुर हइयाछे, •ए जन्य ए आदालतेर पण्डितके उक्त व्यवस्थासकलेर लिखित जमओयावर यथार्थता तिरहुतेर चलित शास्त्र अर्थात् मैथिल अनुसारे जिज्ञासा जन्य ताहा समर्पन उचित विवेचना हइया हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल मोद मार नथिर ग्रन्थितो आसल दुइ व्यवस्था समेत एइ प्रादालतेर पण्डिर निटक पाठान जाय । एइ हुकुम, ये उक्त पण्डित दुइ व्यवस्था दृष्ठेर पर एइ चिपयेर जोयाब जे लिखित व्यवस्थासकल तिरहुत जेलार चलित शास्त्र अनुसारे यथार्थ वदे कि ना-एक समाइ मेयाद मध्ये दाखिल करेन इति ॥ श्रीजयतितराम एतद्धम्माधिकरणाधिपतिश्रीयुत बार्बइष्टाकोएलसावधम्माधिकरण- 'लिखितेशवाशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमितान्दोयमैमासीयमुनीन्दुमितदिव- सोयविचारपत्रान्तर्गत प्रश्नप्रतिरूपत्रमेवं ताउमर्पिततोरभुकिमिशालायान्तर- धर्माधिकरणनियुकारिडतलिखितव्यवस्थादयं च यत्तदन्दीयतन्मासोय- गजपक्षमितदिनसम्बन्धियनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहराबोधा जातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते ।।- व्यवस्थापनसंख्या-२३३-२३४ प्रभुसमर्पितव्यवस्थाद्वयोस्तालार्थस्त्वयमेव-कस्यचिदनपत्यस्य मृतस्य ब्राह्मणस्य पल्याः स्वसकान्तातिस्थावरादिधनस्य पतिसपिण्डेषु विद्यमानेष्वन्यस्मै हस्तान्तरकरणे क्षमता नास्ति, किन्तु यावजीवं भोगाधि- कार इति । तत्प्रभुसमर्पितव्यवस्थाद्वयोपरि लिखितप्रश्नदयलिखितवृतान्ते सति मिथिलादेशचलितशास्त्रानुसारेण यथार्थमेव भवति, प्रभुसमर्पित. व्यवस्थाभ्या तयवस्थास्योपरिलिखितप्रश्नाम्यां चैतद्विवादे पल्याः स्वसंकान्तपतिस्थावरादिधनस्य हस्तान्तरकरणक्षमताबोधकशास्त्रीयावश्यक- हेखनवगमादिति ॥- ईशवीशन्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासीयद्वाविंशतितमः दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुममर्पितविचारपत्राभ्यां व्यवस्थापत्राभ्यां च निवेदनपत्रेण च सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ||- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (६६-६३ ल० सदर- इ. सन १८३६ साजेर ६ एफरेल मोतावक सन १२४२ सालेर २६ चैत्र तारिख बुधवारेर प्रकाश्य मोकाम कलिकातार सदर देखोयाणी आदालवेर रोवकारि उक्त पादालतेर हाकिम श्रीयुत जाज इष्टाकोयेल साहेवेर एजलागे- रामनाथसिंह- पापीलाएट- राजारूपसिंह ओ राधेकृष्णा रेपाडेण्टान- आपोलाएटेर उकिल मुनशी दादारवकस ओ रेप्पाडेपटानेर उकिल मुनशी अलीउल्ला उपस्थित हइलो। एइ मोसईमा अद्य तरविव नम्बर मते आमार नेसस्ते रोयकार हइया मिछिलेर कागजसकल विवेचनाय जाना गेजो जे मुईइबान अर्थात रेप्पा- एटान राजरूपसिंह श्री राधेकृष्ण नोयान परगनार दत्तेट ओगयरहे मौजाहायेर पर हक-सफा सुरते दखल करणेर दायिते

७०५
व्यवस्थापनसंख्या-२३४
विक्रेता धुरमनसिंह श्री खरिदार रामनाथसिहेर नामे मेला
साहावादेर देखोयाणी आदालते नालिस करिलेक। जेलार जज
साहेवेर तजविजे श्रादालतेर मौलविर स्थाने फनोया अर्थात्
व्यवस्था लइया सफा अनुसारे विरोधोय वस्तुर प्रति मुदाइआनेर
दावि यथार्थ होनेर विशय डिकी करिलेन श्रओ सेइ डिक्री
द्वितीय निष्पत्य स्थाने एलाका बाजिमावादेर प्रोविनशीयन कोटे
वहाल करिल, जे वर्तमान आपीलारट ताहाते नाराज हइया ए
श्रादालते पापील खास उपस्थित करिलेक । सन १८३३ सालेर
२३ जुलाइ तारिखेर रोवकारि मते एइ श्रादालतेर हाकिम रावट
हाल डन राटरि साहेवेर नेसस्त हइते मञ्जुर हइलो। जे हेतुक
प्रकाश जे पापील खास मजुरिर कारण -ये जाहार उभय
पक्ष हिन्दुजाति, से मार्दमा तर्जावज होया शरा अर्थात्
जवनीव धर्मशास्त्रेर अधिकारिके जिज्ञाश्यमते। अतएव
अन्य विषयसकल तजविजेर पूर्व आदालतेर पण्डितके
व्यापोरा जिज्ञाशा उचित । यथा उभय पक्षेर उकिल
प्रकाश करिलेक जे यदि जजसाहेवेर फयशालार लिखित सो.
यालसकलेर ओयाव वेहारदेशेर चलित शास्त्रानुसारे ए
आदालतेर परिडतेर स्थाने लोया जाय लभ्यजनक हइवेक ।
अतएव हुकुम इलो जे एइ आदालतेर पण्डित निचेर लिखित
सोयालसकर जोयाय दुइ सप्ताहेर मध्ये दाखिल
करेण, ओ रोवकारिर नकल वाङ्गला तरजमार सहित आदालतेर
परिडतेर निकट प्रेरित ह्य ।-
१ प्रथम सत्रोचाल--
देशोट तालुकेर हिस्यादार धूरमलसिंह विक्रेता, वावु
रामनाथसिंह खरिदार, राजरूपसिंह भो राधेकृष्णसिंह हक-सफा
तलविर ओजरदार, पार मौराशो वालुक मजकुरार हिस्थादारान,
एवं चतुथे पट्टी, जाहाते विक्रेता वेसरिक आछे, वाहारो हिस्या-
दार राजरूपसिंह श्री राधेकृष्ण ओजरदारेर दाभोट तालुकेर

७०६ व्यवस्थापनसंख्या-२३४ मध्ये अन्य एक मौजार स्वरिदार उक वावुरामनाथसिंह । यदि- स्यात् विक्रेता आपन अंश वावुरामनाथसिंहेर निकट विक्री करे, उपरेर लिम्बितेर प्रति विवेचनाय राजरूपसिंह श्री राधेकृष्णेर इक सफा अर्श किना- २ द्वितीय सोयाल- धूरमलसिंह विक्रेता यावु रामनाथसिंह खरिदारके सन १२३५ फलोर लेखा एक केता वयनामा मवलगे तिन सत टाकार कये दे(य), ओ वायनार तारिख हइते एक मासेर मध्ये कवाला लिखिया दिवार पो तत्कालीन पानेर वाकि मवलगे एक हाजार पश्चाश टाका लइवार एकरारे लिखिया देय । इति मध्ये राजरूप- सिंह श्री राधेकृष्ण एक मास गती होनेर पूचे अर्थात् सन १८२८ सालेर १६ मै तारिखे तिन सत टाका उपस्थित करिया मलवे लोया सुरत अर्थात् तत्परता चेष्टा करिलेक, फलितार्थ 'प्रादालते दाखिल करिलेक। ए प्रकार विषय एमत् पानामत हक-शका रक्षा करणार्थ फलदायक हय कि ना ।।- श्रीजयतितराम হনষিক্যাধিবিধান সাহgঙ্কীলেস্তাইৰসমাধ্যি- लिखिलेशवोशन्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमितान्दोयापरेलमासीयविचारपत्रा- সনবিনা মীযাধৗলিবলধনিয়তি मरे मया प्राप्त सवलोक्य या राबोधो जातसदनुसारेणोत्तर लिख्यते-- प्रथमप्रश्नस्योचरम्- प्रभुममतिप्रथममश्नलिखितविवेचनया धर्मशास्त्रानुसारेया राजरूप- सिहराधेकृष्णयोर्डकपकाशन्दपतिपाद्यं भवितुं न शन्नोतीति ।। प्रत्र प्रमाणम- व्यवहारान् नृपः पश्येद्विवद्भिः बामणैः सह । धर्मशासानुसारेण इत्यादि मितावादिमन्यतयाशाय २१) वचनम् ।।

च्यवस्थापत्रसंख्या-२३४-२३५ ७०७ यो कजाता बहवः पृथायाः पृथक्किया। पृथकर्मगुणोपेता न तत्कार्यपु सम्मताः ॥२॥ स्वभागान् यदि दास्ते विकीपीयुरथापि वा । कुर्युर्यथेष्टं तत्सर्वमीशास्ते स्वधनस्य वै ।। इति वीरमित्रोदयादि- पन्यधृतनारदवचनद्वयम् ।।३।।-- द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम् - प्रभुसमर्पितद्वितीयप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति एतारामूल्यस्थापनं हकम- फाशब्दप्रतिपाद्यस्य रक्षणार्थ धर्मशास्त्रानुसारेण फलदायकं न गवति-इति वेहारदेशचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदयादिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति । अत्र प्रमाणम्- प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणत्रयमेवेति ||३||- यद्यपि महानिन्वोणतन्त्रग्रन्थे हकसफाशब्दपतिपावविपये उपरि- लिखितव्यवस्थाया विरुद्धमपि लिखितमस्ति, किन्तु महानिर्वाणतन्त्रमन्यो धर्मशास्त्रान्तर्गतो न भवति। अत एव तद्ग्रन्थानुसारेण व्यवस्था न लिखिता इति निवेदनमिति ||--- ईशवीशब्दप्रतिपावरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासोयद्वाविंशतितम- दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेव दत्तेति ।।- श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्था (६७)-लम्बर-११६ मोकाम कलिकातार सदर देओयानि आदालतेर पण्डित समीपे प्रश्न एइ - कालीकान्तवल पीलाएट पार्वतीदास्या रेपाडएट यदि कोन व्यक्ति तिन पुत्र ओ एक स्त्री राखिया मृत्यु हय, ओ ताहार स्रो ओ पुत्र दिगेर अनेक्यताभाव अर्श, तवे एतद्देशीय 4

७०४
व्यवस्थापत्रसंख्या-२३५
चलित शास्त्रानुसारे ऐ मृत व्यक्तिर स्त्री पुत्रदिगेर समक्षे पतिर
वित्तर अंश पुत्रदिगेर समास मते पाइते पारे कि ना । यदि पुर-
दिगेर समासे वित्तासि ना हय, तवे कि परिमाणे वित्तासि इय-
एहार उत्तर लिखिवेन इति । १८३६ तार फेवरोरी मोतावेफ
बङ्गला सन १२४२ दारिख २७ माघ ||-
श्रीजयतितराम
प्रभुसमर्पितप्रश्न विचारपत्रं च यदीशवीशन्दप्रतिपायरसगुण-
गजेन्दुमितान्दीयमार्चमासोद्विपक्षमितदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त
तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते-
यदि कश्चिद्वयक्तिविशेषस्त्रोन पुत्रानेका पती च विहाय मृतः स्यात् ,
अथ च मृतस्य पल्या सह मृतस्य पुत्राणामान्मातृपुत्राणां मध्ये पुत्रकृत-
रितृपनविभागद्वारेणानैक्ये सति अर्थात् त्रिभिः पुत्रैर्मात्रे भागमदत्त्वा
पितधनं समांशेन विभज्यते, तदा मातापि पुरसमा प्रहीतुमईति,
पुत्रकृतपितृत्यकवनविभागोपक्रम विनैव मात्रा स्वेच्छयेव विभागं कृत्या
पतित्यक्तधनांशयाचनेन अनैक्ये सति मावा विद्यमाने पुत्रषु पतित्यक्त-
धनांशं पुत्रांशं समांगानुसारेण प्राप्तुं माहति, किन्तु यावीच
स्वपतिकुलोचितमासाच्छादनोपयुक्तधनावश्यकविधवाधाद्याचरणोपयुक्त-
धनस्य चाधिकारिणो माति-दति वङ्गदेशवलितमनुदायभागादिग्रन्यानु-
सारिणी व्यवस्थेति ॥
अत्र प्रमाणम्-
पितरि चोपरते सोदरभ्रातृभिविभागे क्रियमाणे मात्रे पुत्रसमांशो
दातभ्यः इतिदायमाग(पृ. ६७ )प्रन्यजिवनम् ॥१॥
भरणं पोप्यवर्गस्य प्रशस्त स्वर्गसाधनम्
नरकं पीडने चास्य तस्माद् यत्लेन ते मरेत् ॥ इति दायभागादि-
अन्धधृतमनुवचनम् ॥२॥

व्यवस्थापनसंख्या-२३५-२३६ ७०६ पिता माता गुरुर्भार्या प्रजा दीनाः समाश्रिताः । अभ्यागतोऽतिधिश्चैव पोप्यवर्ग उदाहृतः॥ इति दायमागटोका(पृ. ३४)धृतमनुवचनञ्चेति ॥३॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुलाइमासीयगुणेन्दुमितः दिनसम्बन्धिषुधवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रविचारपत्राभ्यां दङ्गरेजीपत्रा- भ्यां च सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।। श्रोर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (६) लं० २०२ सन १८३३ ।- मोकाम कलिकातार सदर देयोयानी प्रादालतेर मिछिलेर रुवकारि उक्त श्रादालतेर हाकिम श्रीयुत जार्ज इष्टाकोयेल साहे. वेर नेमस्ते इंराजी सन १८३६ सालेर १६ श्रापरेल मोतावक वाजला सन १२४३ सालेर ५ वैशाख शनिवार प्रकाश्य- शिवनारायणचौधुरि श्रापोलाएट राधाप्यारीदासी ओ गयरह रेडपाण्डेएटान राधामोहनमित्र जेलार मोजाहेम मधुसूदनदास एइ आदालतेर छायेल पापीलाण्टेर उकिल वर्ग मेप कोलोक सदरलेण्ड साहेव ओ सदासुखपण्डित ओ रेप्पाण्डेण्टानेर उकिल ताराचॉदवन्द्यो- पाध्याय ओ राधामोहन मित्रेर उकिल गौरहरिवन्द्योपाध्याय ओ मधुसूदनदासेर उकिल शिवनारायणचट्टोपाध्याय उपस्थित हइल । एइ मकई मा अपरिमित तारिखे आमार नेसस्ते रुवकार हइया मिछिलेर कागजसकल पठित हइल | बोध हइज जे मोई इ आपीलाण्ट लाद राधानगर प्रापन खरिदा पर्चनिर हकियते १. मनुस्मृतौ नोपलभ्यते।

७१०.. व्यवस्थापनसंख्या-२३६ दखल पाओनेर दाक्तेि वयनामार लिखित मूल्य श्रो वालुकेर उपस्वत मवलेग ७०५१ टाकार तायदादे राधाप्यारिदासी ओ कृष्णदासद ओ तिलकरामदत्त आसामीयानेर नामे हुगलि- जेलार देनोयानि श्रादालते एइ एजहारे नालिश करे जे राम- गोपालदर्त उहार भ्रातृगण तिलकरामदत ओ रघुनाथपत्तेर सहित अन्न प्रथक होनेर परे सन १२२१ साले आपन उपाजन हइते नाट राधानगर तालुक पतनी सुरते खरिद करिया दखिल ओ कावेज हइया लोकान्तर हय । ताहार मृत्युर पर वाहार. वनिता राधाप्यारीदासी आपन स्वामीर ज्येष्ठ भ्राता तिलकराम- दत्त ओ पोष्य पुत्र ओ दौहित्र कृष्णरामदतर सरवराहकारिर द्वारा दखिलकार हइया सदर जमिदारेर जमिदारि सेरेस्ताय आपन नामे दाखिल कराइया नाम जारिर लिपि हासिल करिया स्वामिर ऋण परिशोध ओ मालगुजारिर वाकि निमित, उक्त तालुकेर सामुदाइक हकुक सन १२३८ सालेर २३ फाल्गुण तारिखे मवलगे पॉच हाजार टाका पने फरियादिर हस्ते विक्रय करिया, ताहार वयनामा साक्षिगणेर साइदीते ओ रेजेष्टरी निशा नीते लिखिया दिया, खारिज प्रो दाखिल कराइया फरियादिके श्रो दखीलकार करार परे उक्ता राधाप्यारि अन्य प्रतिवादिगणेर कुपरामर्श फरियादिर हस्ते विक्रय करा अस्वीकार सम्वलित फौजदारिते दरखास्त गोजराय ओ एका राधाप्यारी श्री तिलक रामद ओ रघुनाथदर्तेर पर्तनी दावि सुरते ओ जगमोहन मिशेर ओयारिश राधामोहनमिशेर उक्त नाटेर चारि पाना रकमे दरपर्सनीदारि पदे दखल थाकनेर हुकुम ओ लम्वरि नालि- सेर अनुमति फरियादिर प्रति छादेर कराय। आसामीयान वाहार जोयावे पष्ट अस्वीकारी हइया विरोधीय चालुक जे राधाप्यारीर स्वामी रामगोपालदतर सोपार्जित प्रो वाहार भ्रात- वर सहित प्रथकान्ने थाका मुनकीर, वरं ए काल पर्यन्त ताहार- दिगेर तावत कारवार साधारणे ओ एजमालोते थाका प्रकाश, व्यवस्थापनसंख्या-२३६ ७११ करे, एवं फरियादिर दरपेश करा कवाला जाल ओ कित्रिम करार दिया शास्त्र मते उक्ता राधाप्यारिर कन्या ओ दौहित्र वत्तेमाने दान श्री विक्रय अशीध्य वयान करे। जेलार जज- साहेव जुरिरदिगेर राय, ए विपयेर विशेप तहकीकाते जे विरोधीय तालुक रामगोपाल दर्तेर स्योपार्जित कि तिन सरिकेर अंश आछे, लइया आपन रायेर ऐक्यताय तदानुसारे सन १२३४ सालेर ३ मार्च तारिखे लिखित फयसलार कारणमकले फरि- यादिर दावी डिपमिप करिलेन । एइ प्रकारे जे फरियादी, यदि राधाप्यारिदास्यार हिस्यार प्रति कोन दावि राखे, प्रथम नालिश उत्थापन करणेर क्षमता आछे । मोदइ ताहाते नाराज हइया एइ आदालते श्रापिल करियाछे-जे हेतुक पामार निकट राधामोहन मिशेर मोजाहेमो सोयालेर प्रति, जे आपनाके विरोधीय तालुकेर चतुर्थांशेर दरपर्तनीदार करार देय, एइ विवे- चनाय जे से ए मकईमार प्रासामियानेर मध्ये नहे । केवल दर पर्तनीदार मात्र, कोन हुकुम छादेर करा आविश्यक नाइ, श्रो मधुसूदनदासेर अर्पित दरखास्तेर प्रति प्रोजे से आपन खरिद करिया ए आदालते दाखिल करियाछे, कोन हुकुम उपयुक्त बोध हय ना। जखन ए मकईमा निप्पत्य हुइवेक एवं विराधीय वस्तु, आपीलाएद शिम्बा रेवाएडेण्ट, जाहार हक, हइये, नाहार पर दावि उपस्थित करा व्यतिरेके उहार दखलेर हुकुम हडते पारे ना । अतएव ताहा परित्याग करिया ए मकह मार पासल अब- स्थार प्रति मोहनलालखाँ आपीलाण्टेर मकई मार प्रसङ्ग जाहा राणी सिरोमणी रेपाण्डेएटेर नामे सन १८१२ सालेर ३१ आगष्ट तारिखे एइ प्रादालत हइते निष्पत्य पाइयाछे। एवं आमार अनुगाने ताहार लिखित हेतुसकल जावदीय उत्तराधिकारी साहारा हस्तान्तरेर समय लीवतमान थाके ताहारदिगेर सम्मति ओ अनुमति भिन्य स्वामीर त्यायं सामुदाइक विषय हस्तान्तर करोर विपये अशीद्ध बोध हय । अनुष्ठान करा गेल । ताहाते .

७१२ व्यवस्थापनसंख्या-२३६ पापीलएटेर उकिल कहिलेक जे आमि अनुमान करि से मक- ईमा दान विपयक, ताहाते पण्डितवर्गेर लिखित जे व्यवस्था वाहा एइ विक्री विषयक, मकईमार सहित कोन सम्पर्क नाइ । एजन्य ए विषय शात्रवेकि जिज्ञाशा करा उचित चोध हइल । अर्थात् पइ आदालतेर पण्डितके जिज्ञाशा करा जाय जे से उपरेर लिखित फयमला दृष्टी करणेर परे सकल उर्तराधिकारि, जाहारा विक्रयपत्र लेखा हावार समय जीवईशाय छिल, ताहार- दिगेर अनुमति भिन्न टाकार परिवर्त स्वामीर त्यार्य मामुदाइक भूम्यादि विक्रयेर प्रति विधवा स्त्रोर क्षमना विपये शास्त्रेर अाज्ञा वयान करे, ओए विपये स्वामिर ऋण थाकु का ना थाकुक कोन प्रभेद पाछे कि ना एवं यदि स्यात् स्वामोर त्यार्थ सामु. दाइक भूम्यादि विक्रय कारिते ना पारे, तवे तन्मधे कि परिमान विक्रय करिवार क्षमता राखे-पष्ट करे। अतएव हुकुम हइल जे मकईमा अद्य मोलतवी थाके, एवं उपरेर लिखित विषयमकलेर जिज्ञाशा करेण । एइ रुक्कारिर नकल एइ पादालतेर पण्डितेर निकट प्रेरित हय इति ॥ श्री यतितराम् एतरार्माधिकरणाधिपतिश्रीयुत जार्जष्टाकोएलसाहेवधम्माधिकरण- लिखितेयवीरादप्रतिवरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयापरेलमासायरसेन्दुमित • दिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपत्र यत्तदन्दीयमेइमासीयशिवमित- दिनसम्बन्धियुधवासरे तत्समर्पितरसगुणगजेन्दुमितान्दोय जुलाइमासीयमुनि मितदिवसीयविचारपत्रान्तरच यचदन्दीयतन्मासीयगुणेन्दुभितदिनसम्बन्धि बुधवासरे च मया प्राप्तं तदवलोक्य पाहण्योधो जातस्तदनुसारेण प्रभु समरितविचारपत्र लिखितव्यावलोकनेन,चोचर लिख्यते- विझयालिखनकाली विद्यमानोत्तराधिकारिसमुदायानुमतिमन्तरेण राजतमुद्रा विनिमये पल्या स्वसंकान्तसमस्तपतिस्शवरादिधनस्य विक्रयकरण व्यवस्थापत्रसंख्या-२३६ ७१३ क्षमता शास्त्रीयावश्यक कार्यार्थमर्थात् पतिकतर्णपरिशोधनाथं पत्यौद्ध्वदैहि. कक्रियाययं पतिकुटुम्पभरणार्थ स्वभरणपं.पणाद्ययं चारस्येव । पत्नी शास्त्री- यावश्य स्कार्या व्यतिरिक्तस्त्रेच्छया स्वमरणानन्तरं विद्यमानपत्युत्तराधि- कारिस्यत्वनाशकविक्रयकरणक्षमतां न रदतीत्येवान विशेषः । एवञ्च सति पतित्यक्तस्थायरादिधनान्तर्गतेन यावता धनेन पतिकतर्णपरिशोधनस्योपरि- लिखितावश्यक कार्यान्तरस्य वा निळहो भवति विधवायास्तत्सरिमितपति- त्यक्तस्थावरानिधनस्य विक्रयकरणक्षमतायाः शास्त्रीयस्वमेव । यदि च पतित्यत्तस्थायगदिममुदायधनम्य विक्रयमन्तरेण पलीकर्तव्यशास्त्रीयावश्यफ. कार्य्यजातस्य तदन्तर्गतस्य क्स्यचिदपि कार्यस्य वा निर्धाहो भवितुन शक्यते, तदा तत्तत्वार्य्यस्य निर्वाहाथं पल्याः पतित्यक्तस्थावरादिसमुदाय- धनस्य विक्रयकरण क्षमतायाः शास्त्रीयत्वमेव-इति चङ्गदेशनलितदाय- भागादिग्रन्थानुमारिणी व्यवस्थेति ।। प्रत्र प्रमाणम्-- ऋग्राही ऋणं दाप्या-इति विवादभन्नार्णवादिनन्यधृतयाश- वल्क्यवचनम् ॥१॥ मतकामैन वा भनी उक्ता देयमृणं त्वया । अग्रपत्रापि सादाप्या धन ययाश्रितं स्त्रिया ।। इति विवादार्णपसेतु. विवादभङ्गार्णवादिप्रन्यवृतकात्यायनवचनम् ॥२॥ भर्ना जीवन् यथा यस्य पोपणादिक ययदा कर्म करोति मृतभर्तृ. कापि स्वशक्त्यनुसारेण तथैव तस्य पोपण तच्च कर्म कुति-इति विवादभद्गारावग्रन्थ लिखनम् ||३|| भर्तुरी देहिकनियाथर्थ दानादिकमप्यनुमतमि ते । वर्तनाशका- -वाधानमप्यनुमतम् । तत्राप्यशक्तो विक्रयणमपि च-इवि दायभाग ग्रन्थलिखनञ्चेति || ईशवशब्दप्रतियरमगुणगजेन्दुभिताब्दीय जुलाइमा मोयइन्दुपनमित- व्यवस्थापनसंख्या-२३:-२३८ ७१५. दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रेण चतुभिब्यवस्थापन सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ थीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण अत्र प्रमाणम्- पश्यत्रन्यस्य ददतः क्षिति यो न निवारयेत् । स्वामी सतापि लेख्येन पुनस्तान्न समाप्नुयात् ।। इति वृहस्पति( पृ०. ७५)वचनादिति- सही - रामनाथमिश्र, पण्डित अदालत दिवानी जिले-तिरहुत ।। श्रीश्रीदुर्गा (१००)- लं०५६४-- मोतफरका सन १८३६ ३०- रोवकारि मिछिल आदालत देओनि सदर मोकाम कलि- काता श्रीयुत डेविड इशमितसाहेव कायेम-मोकाम हाकिम श्रादा- लय मजकुरार वैठके । तारिख १८ जून सन १८३६ ३० मोतावक ६ आपाढ सन १२४३ वाङ्गला रोज शनिवार- मोछमात रूकमन- शाएला- साएलार उकिल तारकचन्द्रराय हाजिर हइलो, गत रोजेर' हुकुमानुसारे जिला भागलपुरेर जजसाहेवेर गत २४ माइ माहार लिखित रोवकारि ओ रिटरण जाहा एइ आदालतेर हाल सनेर २४ मार्च माहार लिखित रोवकारिर जवावे एइ मकदमार' कागजात ओ ताहार इंजेरि तरजमा सम्वलित पौछियाछिल,. अध साएलार सोल प्रो गयरह कागजात सहित उपस्थित हइया विवेचना हइल । जे हेतुक साएलार सोल प्रति नातक- व्यवस्थापनसंख्या-२३९ ७१७. (१०१)-पण्डितेर पर सोल- श्रीरामराममुखोपाध्याय नामे एक जन छिल । ताहार चारि पुत्र । ज्येष्ठ श्रीरामलोचनमुखोपाध्याय, द्वितीय श्रीराममोहन मुखो- पाध्याय, तृतीय श्रीरामतनुमुखोपाध्याय, चतुर्थ श्रीताराचाँदमुखो- पाध्याय । ताहार मध्ये राममोहनमुखोपाध्याय निःसन्तान फौत करियाछे। आर वाकी तिन जनार नोयारिस वर्तमान आछे ।। ऐ रामराममुखोपाध्याय आपन ब्रह्मोत्तर देड विघा जमि वागान थापन एक कन्या करुणामयीदेवीके दान करे। ताहार दानपत्र एक केता सन १९७४ सालेर २५ वैशाख तारिखर लिखित दाखिल हुइयाछ । ऐ दानपत्रेर शाइद हय नाइ । अतएव जिज्ञाश्य एइ ऐ दानपत्रे दानदत्तार श्रोयारिसान अर्थात ताहार पुत्रसकल सत्ते यदि दान हइया थाके, श्रार ऐ दानदत्तार पुत्रेरा सेइ दान- पत्रे यदि साक्षि ना हइया थाके, पार दानदात्तार अयारिशानेर अनुमति व्यतिरेके ऐ दान यदि हइया थाके, तवे एमत दान सिद्ध हय कि ना-यथाशास्त्र इहार व्यवस्था, जाहा हये, लिखिवेन इति । सन १८३६ साल तारिख १२मे ॥- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रद्वयञ्च यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजे. न्दुमिताब्दीयजुनमासीयवेदेन्दुमितदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त सदवलोक्य यादृशत्रोघो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति दात्रुत्तराधिकारिणां विद्यमानतायां दानं यदि वास्तवं नातं स्याद्, एवं तद्दानपत्रे दातृपुत्राः साक्षियो नैव जाता: स्युः, दाजुत्तराधिकारिणामनुमतिमन्तरेण तद्दान जातं स्यात्, तत्र तद्दान-- विषयीभूत धनं दावश्यमर्तव्यकुटुम्बभरणोपयुक्तातिरिक्तश्चेत्तदा तदान शास्त्रानुसारेण सिद्धयति, तद्दानविषयीभूतं धनं दानवश्यभत्तव्यकुटुम्ब- भरणोपयुकातिरिक्तं न चेत्तहि तहानं न सिद्धयति इति वङ्गदेशचलित-- मनुदायभागादिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति ।।

व्यवस्थापनसंख्या-२३६-२४० अत्र प्रमाणम्- कुटुम्बभक्तवसनादेयं यदतिरिच्यते इति विवादमार्णवादिग्रन्थ- धृतवृहस्रतिवचनम् ॥१॥ पण्यमूल्यं मृतिस्तुष्ट्या स्नेहात्प्रत्युपकारतः । स्त्रीशुल्कानुग्रहाथं च दत्त दानविदो विदुः ।। इति तचद्ग्रन्यधृतनारद (नामस० पृ०६०)वचनञ्चेति ॥२॥ ईशवीशन्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमितान्दोसितम्बरमासोयमुनिमित- दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रविचारपयैः सहितेयं व्यवस्था उत्तेति ।- श्रीर्जयतितराम्- श्रीवैधनाथमिश्रेण (१०२)-महामहिम श्रीयुत अभ्यापक महाशय वरापरेपु- निवेदन। प्रथम प्रश्न :- एक व्यक्ति धनि प्रापन स्वोपार्जित तथा पिनुपार्जित स्थाव- गस्थावर माय इमारतादि भद्रासन वाटी बागान पुष्करणी तथा ब्रह्मोत्तर मि आपन भोग-दखने कायेम थाकिया श्रोयारिस चारि पुत्र । ताहार ज्येष्ठ प्राप्त वयस, मध्यमदीगर नावालगके ए सकल वस्तुते भोग दखले राखिया सन १९०२ साले लोकान्त हयेन । ताहाते ऐ ज्येष्ठ सहोदर ऐ साल वस्तुर उपस्वत्य तथा किञ्चिन २ प्रापन उपार्जन द्वारा ऐ संसार भरण पोपन आन्दाज २७ वतमर करियाछेन । वाहार मध्ये जमिदारलोक तथा इजारा- दारलोक कोन • जमि प्राटक करियाछिल, ताहाते ऐ एकान्न. वृत्ति ऐ ज्येष्ठ सहोदर ए जमिर दलिल' ओ भोग मप्रमाण देखा. इया बापन परिश्रमेर द्वाराऐ जमिर फमल छाड करिया खालाम १.सीयान् पार।

व्यवस्थापनसंख्या-२४० ७२३ -करियाछेन । अतएव ए क्यने ऐ जमिर किरूप अंश हइवेक , -शास्त्रानुसारे व्यवस्था आज्ञा हय ।।- द्वितीय प्रश्न:- ऐ चारि सहोदरेर मध्ये तृतीय भ्राता श्रापन वनिता प्रोया- रिप राखिया ऐ रूप एकानवृत्ति थाकिया लोकान्त हयेन । ऐ मृत व्यक्तिर पनिता श्री तिन सहोदर एकानवृत्ति थाकिया ताहार मध्ये मध्यम विदेशस्थ हइया आपन चाकुरि द्वारा प्रति- पालन नित्य नैमित्तिक क्रिया आन्दाज २० वत्मर करियाछेन, आर पैतृक भद्रासन वाटी भग्न हइयाबिल, ताहाते अनेक टाका खरच पत्र-पूर्वक उत्तम करियाछेन । ए यने ऐ वाटीर किरूप अंश हइते पारिवेक, शास्त्रानुमारे व्यवस्था प्राज्ञा हय ।।---- तृतीय प्रश्न :- एसकल ब्रह्मोत्तर जमिर मध्ये कोनो जमि जमिदार पाटक करियाछिल । साहाते मध्यम ओ कनिष्ठ सहोदर विदेसस्थ प्रजुक्त ज्येष्ठ सहोदर आदालते आपन नाम जारि करिया साधारणेर धन व्यय करिया ऐ जमिर नालिस करिया सालास करियालेन। ए दयने ऐ डिगरि जमिर फिरूप अंश हइवेक व्यवस्था लिखिते आज्ञा हइवेक ||-- चतुर्थ प्रश्न:- ऐसकल सहोदरेर मध्ये मध्यम सहोदर संसार प्रतिपालन करिया आसिते रिलेन । अकुत्लान मते किछु टाका कर्ज हइयाछे । अतएव ए क्ष्यने ऐ संसार भरण-पोपणेर देना ऐ व्यक्ति परिशोध करिवेक, कि ऋण परिशोद हइया अंश हइवेक, नाहार शास्त्रानु- सारे व्यवस्था आज्ञा हय, निवेदन मिति ।- श्रीजयतितराम प्रमुसमपिंतप्रश्नपत्रं विचारपत्रं च यदीशवीशब्दाविपावरसगुण- गजेन्दुमिताब्दीयागसिमासीयाभ्रामिवदिनसम्बन्धिशानिवासरे मया प्राप्त नदवलोक्य या शबोधी नातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते-

व्यवस्थापनसंख्या-२४०
प्रथमप्रश्नस्योत्तरम् -
प्रथमप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति विवादास्पदीभूतां भूमि सम चतुर्दा
विभाज्यकैको भागश्चतुर्णा भ्रातृणां भवतीति ।।--
अत्र प्रमाणम्--
विभजेरन् सुताः पित्रोरूमृक्थमृणं समम्-- इति दायभागादि-
अत्यधूतयाज्ञवलायवचनम् ॥१॥
पितेव पालयेत् पौत्रान् ज्येष्टी भातृन यवीयसः ।
पुत्रपचापि वरन् ज्येष्ठे भ्रातरि धर्मतः ॥ इति मनुवचनम् ॥२॥
द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्--
द्वितीयप्रश्नलिखितवृचान्ते सति विवादास्पदीभूतभद्रासनवाट्याः समं
भागचतुष्टय कृत्वा एको भागो ज्येष्ठस्य, एको भागो मध्यमस्यैको भागो.
मृतस्य भ्रातुः पल्याः, एको भागः कनिष्ठस्येति ।।
अत्र प्रमाणम्-
प्रथमप्रश्नोत्तरलिखितप्रमाणदयम् ॥२॥
विभ्याट्वेच्छतः सर्वान् ज्येप्टो भाता यथा पिता ।
भ्राता शक्तः कनिष्ठो वाशक्त्यपेक्षा कुले स्थितिः॥ इति दायभा-
गादि( पृ० ६२ )प्रन्यधृतनारद( नमसं० १३५ वचनम् ॥३॥
पत्नी दुहितरश्चैव--इत्यादि दायभागादिमन्यधृतयाज्ञवल्क्य-
वचनम् ॥४॥
तृतीयमश्नस्योत्तरम्---
वचनझत्रभूमोनाम्मध्ये काचिद्भूमिः सराजकरस्थावधिपतिप्रतिबद्धा
सती ज्येष्ठसहोदरेण साधारणधनव्ययेनाभियोगेन च स्वायत्तीकृता स्यात् .
तदा तस्यां भूमी द्वितीयप्रश्नोतलिखितानां चतुर्णा समानांश एवं
भवतीति
अन्न प्रमाणम्
द्वितीयप्रश्नोचरलिखितप्रमाचतुष्टयमेवेति ॥४॥

व्यवस्थापनसंख्या-२४० ७२१ चतुर्थप्रश्नस्योत्तरम्- चतुर्णा सोदरभ्रातृणा मध्ये मध्यमसहोदरेणाशक्त्या यहणं भ्रातृ- चतुष्टयसाधारणकुटुम्बमरणार्थ कृतं स्यात्, तहणं सम्परेवाशिमिः स्वः खांशानुसारेण परिशोधनीयम्-इति वद्गदेशचलितमनुदायभागादिग्रन्धानु: सारिणी व्यवस्थेति ॥ अन्न प्रमाणम्- पितृव्यम्रातृपुत्र स्त्रीदासशिष्यानुजीविमिः । यद् गृहीतं कुटुम्बार्थे तद्गृही दातुमर्हति-इति विवादभनार्णवादि- अन्य( १ विवा० १६५ ख )धृतवृहस्पति(पृ० ११८ वचनम् ॥१॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयाकतूवरमासोयतृतीयदिन- सम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रविचारपत्राभ्यां सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ।- श्रीजयनितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रण कलिकातार सदर देओनि भादालतेर पण्डितेर प्रति सओ- याल, एइ ये-यद्यपि ए-वी-नामे दुइ जन सहोदर भ्रावा छिलो। ताहार मध्ये एनामे एक पुत्र राखिया वीनामे द्वितीय भ्राता विद्यमान थाकिते मृत्यु हय । एवं वी-नामे द्वितीय भ्राता एक पत्नी एवं कयेक कन्याके राखिया एवं आपन स्वोपाम्जित श्रो असाधारण धन राखिया आपन भ्रातपुत्र अर्थात् ए नामक आपन भ्रातार पुत्र विद्यमान थाकिते मृत्यु हय । श्रतएव जिज्ञाशा करा जाइतेछे जे ओइ वी-त्यक्त धन ओइ वीर स्रोके किम्वा कन्या किम्वा धातुप्पुत्रके अशिवेक-इहार व्यवस्था वारानश- संरचलित शास्त्रानुसारे लिखेन इति ।- ७२२ व्यवस्थापनसंख्या-२४०-२४१ श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितअगरेजीशन्दप्रतिपाद्याक्षरप्रश्नपत्रं यदीशवीगन्दप्रतिपाद्य- मुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयजानवरीमासीयगजमक्षमितदिनसम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य प्रभुप्रेषितगुरुचरणवसुकिरानीशब्दप्रतिपद्यमुखोच. रितशब्दार्थविवेचनया च याहशबोधो जातस्तदनुसारेणोचर लिख्यते- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति वोनामक व्यक्तिविशेपत्यकपने तत्पल्या, पन्यभावे दुहितृणा चाधिकार-इति वाराणसोप्रदेशचलित- मिताक्षरावीरमित्रोदयादिग्रन्थानुसारिणो व्यवस्थेति ।।- अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चेव-इत्यादिमितादरादिनन्यधृत पाज्ञवल्क्य( २११३५). वचनम् ॥ अनपत्यस्य धनं पत्न्यभिगामि-इत्यादि तचद्मन्ध( मिता. पृ. २२७ )वृतविष्णुवचनञ्चेति ॥२॥ ईशयोशब्दप्रतिपाद्यमुनिगजेन्दुमितान्दीयफेररवरीमासोयरसमितदिन- सम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमरिता गरेजीशन्दप्रतिपाद्याचरप्रश्नपत्रसहि- तेयं व्यवस्था दत्तेति ||- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण (१०३)-२८ सन १८३४ ई- इंसन१८३६सालेर२४डिसम्बर मोतावेक वाङ्गला सन १२४३ सालेर ११पीप तारिखेर सदर देभोयानी श्रादालतेर मिछिलेर रोवकारि उक्त आदालतेर हाकिम श्रीयुत उइप्रममनी साहेवेर बैठके- मोहम्मावसूर्यकुर पापीलाएट कारसिंह ओ गयाह रेवाडेपटान आपीनाएटानेर तरफ एइ महेमार हामफाशेवई सन१-३५ व्यवस्थापनसंख्या-२४१ सालेर १४६लम्वरेर मकदमार उकिल चारलेस जेमेस कोलतोक सदरलेएड साहेव ओ मुनशी महम्मद हानिफ ओ एइ मकदमार रेप्पाडण्टानेर उकिल चारलेस फ्रेञ्च साहेव ओ बलवन्तसिंह मक्कार ओ नम्बर मजकुरेर मकद्देमार रेप्पाडएटानेर तरफ उकिलान तारकचन्द्र ओ श्रीरामराय उपस्थित हइल प्रो एइ मकईमार आपीलाण्टेर उकिलान सदासुखपण्डित श्रो मुनशी दादारवक्स पीडित ओजरे उपस्थित नाइ। एइ मकई मा वर्तमान मासेर २२ तारिखे तरतीय नम्बरमते श्रामार वैठके रोवकार हइया ३३ नम्वर-पर्यन्त कागजात दृष्टीपरे दिवा अवसान प्रयुक्त मोलतवि छिल, अद्य पुनराय रोवकार हइया मिछिलेर दाखिल होगा व्यवस्था सफल पठित हइल । जे-हेतुक आमार निकटे निवेर लिखितमते श्रादालतेर पण्डितके जिज्ञाशा आविश्यक-एजन्य हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे जे आदालतेर पण्डित निचेर लिखित सोयालेर जवाब २ दुइ दिवस मेयादे दाखिल करेण-श्रादालतेर परिडतेर निकद प्रेरित हय ओ श्रादालतेर पण्डितेर निकट हइते जबाव पासा पर्यन्त मकमा मोलतवि थाके |- यदि स्यात् त्रिहत-जेला निवासी हिन्दुजाति कोन एक व्यक्ति दुइ त्री राखिया लोकान्तर हय एवं उक्त व्यक्तिर मृत्युर परे ऐ दुइ स्त्री आपनार दिगेर स्वामीर त्यार्ज विपये अधिकारिणी थाकिया प्रत्येक स्त्री आपन आपन गर्भर एक एक कन्या राखिया मृता हय एवं ऐ उभय कन्यार मध्ये एक जन एक पुत्र राखिया मरे, अपरा एक पुत्र-प्रसूता हइया उक्त पुत्र र सहित जीवित । श्रो वर्तमाना थाके-ए विधाय मृत व्यक्तिर त्यज वस्तु जे कन्या मरियाछे ताहार पुत्रे कि जे कन्या एक पुत्रेर ( सहित) वर्तमाना पाछे ताहाते अर्शिवेक; किम्वा कि। एवं यद्यपि मा व्यक्तिर ज्ञातिगरण, जाहार दिगेर सम्पर्क ऐ मृतेर सहित तिन किम्वा चरि पुरुपेर दुर हय, वर्तमान थाके-ए मृत व्यक्तिर

७२४
व्यवस्थापनसंख्या-२४१
त्याज्य वस्तुते ताहार दिगेर प्राप्यता ओ यथार्थतार प्रवि शाखेर
आज्ञा कि आछे-ए विषयेर उत्तर मैथिलशाख जाहा त्रिहत
प्रदेशेर चलिव तदनुसारे लेखेन इति-
श्रीजयतितराम
एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतउइग्रममनीसाहेवधर्माधिकरणलिखि-
तेशवीगन्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमितान्दीयदिसम्बरमासीयवेदपक्षमितदिव-
सोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयरसपक्षमितदिन-
सम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्त सदवलोक्य यादृराबोधो जातस्तदनुसारे.
पोत्तर लिख्यते-
प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति प्रपौत्रपर्यन्तरहितस्य मृतस्य
स्थावरादिधने जाताधिकारिएयोनिपल्योपरमे विद्यमानपुत्राया दुहितुरे-
वाधिकार; दुत्रिभावे दौहित्राधिकारः इति कल्पतरुमदनपारिजातविवाद-
रत्नाकर स्मृतिसार अन्येषु लिखितः । किन्तु विवादचिन्तामणिविवादचन्द्र
अन्येषु न लिखितः इति तृतीयपुरुषीयसपिण्डानां चतुर्थपुरुषीयसपिपडानां
वा अधिकारप्रतिपादकमिथिलादेशचलितशास्त्राणामादधोलिखितग्रन्थ-
जातानां परस्पर विरुद्धमाशानातमधोलिखितप्रमाणजातेष्वेव स्पष्टीकृतं
विस्तरभयाद् व्यवस्थाया न लिखितम् इति निवेदनम् इति मिथिलादेशच-
लितमनुविवादचिन्तामणि-विवादरत्नाकर-विवादचन्द्र-कल्लतर-मदनपारि-
पातस्मृतिसारप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्येति ।।-
अत्र प्रमाणम्-
विष्णुः-अपुत्रस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामि तदभावे
दोहित्रगामि तदभावे मातृगामि तदभावे पितृगामि तदभावे भ्रातृगामि
तदभावे भ्रातृपुत्रगामि तदभावे बन्धुगामि तदभावे सकुल्यगामिइति ।
दुहितदौहित्रानन्तरं पुनः बृहस्पतिः-तदभावे आतरस्तु भ्रातृपुत्राः
सनामयः।
सकुल्याः वान्धवाः शिष्याः श्रोत्रियाश्च घनाहकाः ॥ इति कल्पतरु-
मन्थलिखनम् ॥१॥

व्यवस्थापनसंख्या-२४१ दुनिभावे दौहित्रो धनभाक् । यदाद विष्णुः- अपुत्रपौत्रसन्ताने दोहित्रा धनमाप्नुयुः । पूर्वेपान्तु स्वधाकारे पोत्रा दौहित्र'का मताः । अयमों याज्ञवल्क्येनापि दुहितरश्चैव इत्यत्रैवकारेण घोतितः । दौहित्रस्याप्यभावे पितरी धनभाजौ-इति मदनपारिजातग्रन्थलिखनम् ।।२।। दुहितदोहित्रानन्तरं वृहस्पतिः तदभावे प्रातरस्तु भातृ-पुत्राः सनामयः । सकुल्या बान्धवाः शिष्याः श्रोत्रियाश्च धनाहेकाः । इति विवाद- रलाकर( पृ ५१५)यन्यलिखनम् ।।३।। पली दुहितरश्चैव पितरी मातरस्तथा । तरसुतो गोत्रजो वन्धुः शिष्यः सब्रह्मचारिणः ॥ एषामभावे पूर्वस्य धनभागुत्तरोत्तरः - इत्यादि विवादचिन्तामणि- (पृ० २०० )विवादरत्नाकर पृ० ५६” विवादचन्द्र( पृ०८०)प्रभृति- ग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्य( २।१३५) वचनम् ॥४॥ अनपत्यस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामे तदभावे मातृ- गामि तदभावे पितृगामि तदभाचे प्रातृगामि तदमाचे प्रातृपुत्रगामि तदभावे बन्धुगामि तदभावे सकुल्यगामि-दत्यादि विवादचिन्तामणि- (पृ० २३५)विवाद चन्द्र( पृ०८ )विवादरत्नाकर( पृ० ५६५)प्रभृति- ग्रन्थधृतविष्णुवचनम् ||५॥ स्वपुत्रस्तभावे पौत्रस्तदभाते प्रपोत्रस्तदभावे साध्वी भार्या तदभावे दुहिता तदभावे माता तदभावे पिता तदभावे प्राता तदभावे तत्पुत्रस्तद. भावे प्रासनसपिण्डस्तदभावे यथाक्रमं व्यवहितसपिण्डस्तदभावे श्रासन- सकुल्यस्तदभावे यथाक्रम व्यवहितसकुल्यः--इत्यादि विवादनिन्तामणि- (पृ. २४३ ग्रन्थलिखनम् ॥६॥ वृहस्पति यथा पितृधने त्वाम्यं तस्याः सत्स्वपि बन्धुषु । तथैव तत्सुतीपीप्टे मातृमातामहे धने ।। १. पौत्रदौहित्रका.समा--दतिधर्म कोपरयामाः ।

व्यवस्थापनसंख्या-२४१-२४२ ७२६ मनु:- दौहित्रो ह्यखिलम् ऋक्थमपुत्रस्य पितुहरेत् ।। स एव दद्यात् द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ।। एतद्द्वयं मात्राद्यभावे पत्नीदुहितरः-इत्यादि कमानुरोधात-इति विवादचिन्तामणि( पृ० २३६)ग्रन्थलिखनञ्चेति ॥७॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुण गजेन्दुमिताब्दीयफेवरवरीमासीय गजमित- दिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेयं व्यवस्था दचेति ।। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण तरजमा सवाल-- ( १०४ )-अलिफ ो वे दुइ भ्राता छिलो। ताहार मध्ये कनिष्ठ भ्राता अर्थात वे पित्रादि-क्रमागत धनोपघातव्यतिरेके किछु धनोपार्जन करिलेक । ताहाते ज्येष्ठ भ्राता श्रर्धात अलिफेर किछुइ स्वत्य छिलोना। वरं आपन जीवदशा-पय्येन्त अलिफ किछुइ अंश ऐ धनेर पाय नाइ यो एक पुत्र राखिया मृत्यु हइलो । ताहार पर कनिष्ठ भ्राता श्रापन खो ओ कन्या सकलके राखिया मृत्यु हइलो, एवं उक्त व्यक्ति पुत्र किम्वा पौत्र किम्वा प्रपौत्र किछुइ राखे ना। अतएव प्रश्न करा जाइतेचे जे उपरे ये प्रकार लिखा गेलो ताहाते ए कनिष्ठ भ्रातार त्यक्त धने ताहार स्त्रीक अशिवेक किम्बा ताहार खोके ना अशिया ताहार ज्येष्ठ भ्रातार पुत्रके अर्शिते पारिवेक इति ।- श्रीजयतितराम् प्रभुसमरितपारशीशन्दप्रतिपायाचप्रश्नपत्रमंगरेजीशन्दप्रतिपाद्याक्षर पत्रं च यदोशवीगन्दप्रतिपायमुनिमुणगजेन्दुभिताब्दीयफेयरवरीमासीगज. मितदिनसम्बन्धिबुधवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य याहरामोधो जातस्तदनु- सारेगोचरं लिख्यते ।।- ७२७ व्यवस्थापनसंख्या-४२-२५३ प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते मति वे नामकन्यतिविशेषत्यक्तधने तत्पन्याः पल्यभावे दुइतृणां चाधिकारस-इति वाराणसीप्रदेशचलितमनु मिताक्षरावीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति ||--- अन प्रमाणम् - पत्नी दुहितरश्चैव-इत्यादि मिताक्षराप्रभृतिग्रन्धधृतयाशवस्क्य- (२।१३५ वचनम् ॥२॥ अनपत्यस्य धनं पल्यभिगामि तदभावे दुहितगामि-इत्यादि तत्तद्- अन्य(मिता पृ० २१७ )धृतविष्णुवचनञ्चेति ॥२॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयफेवरवरीमासीयगुणपक्ष- मितदिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्रभुसमर्षितपारशीशब्दप्रतिपाद्याक्षर- प्रश्नपत्रागरेजोशब्दप्रतिपाद्याक्षरपत्राभ्यां सहितयं व्यवस्था दत्तेति ।- श्रीजयतितराम श्रीवैद्यनाथमिश्रेण वनाम- (१८५)-मोकाम कलिकातार सदर देयोनि आदालतेर इंसन १८३६ सालेर १० मे मोतावेक वाङ्गता सन १२४२ सालेर ७ ज्येष्ठ वृहस्पतिवार दिवसेर श्रीयुत प्रोलियेम बाडिनसाहेवेर बैठकर गयकारि- भेक नारायणसिंह- तिलकधारिसिंह श्री भेकनायणसिंह ओ गयरह छापलेर उकिलादिगेर मध्ये एक व्यक्ति मुनशी दादारवक्स त्रो द्वितीय पक्ष सदाशिवसिंह ओ भनकसिंह ओ तिलकधारिसिंह खोद श्रो मृत रङ्गलालसिंह ओ अमृतलालसिंहेर अप्राप्त व्यवहार पुत्रगण ठाकुरसिह प्रो कालुसिंह यो भुवनसिंहेर श्रोतिर उफिल मुनशी होछेन प्रालि हाजिर प्राइलेन। द्वितीय पर छपील कयेक विश्वेर सम्मलित हारदिगेर इकिलर नामेर एकता भोकाल- व्यवस्थापनसंख्या-२४३ लतनामा यो लाला काशीप्रसादेर नामेर मोक्तारनामा सहित जे एइ मासेर १२ तारिखे दाखिल हइयाछिल अद्य दरपेस हझ्या छाएलेर खास आपीलेर छोल ओ गायरह ऐ छोलेर एला. कार कागजसकलेर सहिद ओ छाएल जे सकल कागज सन हालेर १४ आपरेलेर दरसेस हो आपन छोलेर सम्वलित गुजराइया छिल, दिष्टे आइल। परे द्वितीयपक्षेर उकिल गोपाल- चन्द्र ओ गायरह पापिलाएदान, वावु कुकरसिंह रेष्पाडएटेर २६०५ नः मोकदमार सन १८३० सालेर ३ वापरेल वारिखेर' एनफछाति रोक्कारिर नकल एक केता दाखिल करिलेक, पाठ करा गेल । सदपरे छाएलेर दाखिल करा मोतिलाल प्रो कल्यान- सिंह आपीलाएटान ब्रजलाल ओ गायरह रेप्पाडएटदिगेर मोक- मार सन १८३५ सालेर जुलाएर ए आदालतेर हाकिम श्रीयुत जाने इष्टाकोएल साहेवेर बैठकेर रोचकारिर नकल दिष्ट करिया ऐ मोकई मार मिछिल सेरैस्ता हइते तलब करिया मोक. ईमा मजकुरेर दालिख हो। ए श्रादालतेर पण्डितेर व्यवस्था दिष्ट फरिया वोध हइलो जे ए आदालतेर पण्डित वैद्यनाथमिश्र ये व्यवस्था प मिछिले दाखिल करियाछेन ताहा ऐ मोतिलाल ओ कल्याणसिंह दिगेर मोफई मार दाखिल हो रहार व्यवस्था विपरीत। आर यद्यपि स्यात ए मोहमार यो मोतिलाल ओ गायरहेर मई मार प्रश्नसकलेर लिखित शब्दसकल जाहेरा अन्यथा हइयाथाके । किन्तु ए दुइ मोकई मार प्रश्नसकलेर मम्म एका श्राकार राखे एजन्य प्रामार निकट ए मोकदमा द्वितीय वार विवेचनार जोग्य, ओ ए मोहमार प्रापिल खास मरिर जोग्यबोध हइया हुकुम हइल जे छाएल एक मास संख्यार मध्ये खास प्रापिलेर चक्री सरससकल आमले याने भार कागजात मोर प्रोब करिवार जन्य प प्रादालतेर कायेम मोकाम हाकिम श्रीयुत डेपोट इसमिट साहेवेर हजुरे पाठान जाय, आर रइ व्यवस्थापनसंख्या-२४३ ७२९ रोवकारिर नकल एइ हुकुमे जे ए मोकदमा ओ मोतिलाल श्रो गायरहेर मोकद्दमार प्रश्नसकलेर मर्म ओ अभिप्राय एक दुइ वाते श्रो दुइ मोकदमार परित्य व्यवस्थासकल देओनेर कारण कि, नकल-रोधकारि प्राप्नर दिवसावधि एक सप्ताहेर मध्ये लेखन-ए आदालतेर पण्डितके अर्पन करा जाय इति ।- श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुतग्रोलियमवेराडोनसादेवधर्माधिकरण- लिखितेशवीशब्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयमैमासीयाङ्कन्दुमितदिव- सोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्नदब्दीयजुनमासीयगजेन्दुमितदिन- सम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहशत्रोयो जातस्तदनुसारेणो. त्तर लिख्यते - प्रभुसमपितेतद्विवादविषयकप्रश्नस्त्वयमेव । यदि तोरभुक्तिजिज्ञा. ख्यावान्तरदेशनिवासिनी द्वौ हिन्दु नातीयो स्वस्वपित्रादिक्रमागतस्थावरधनं साधारण्येन भुञ्जानौ ऋणप्रस्तावनातव्यवहार पुत्रयन्तौ च स्वस्वपित्रादि- क्रमागतस्थावरभिन्नऋणपरिशोधनोपयुक्तधनरहितावशक्त्या ऋणपरिशोध- नार्थमप्राप्तव्यवहारस्य स्वस्वपुत्रस्य विद्यमानतायामपिस्वस्वपित्रादिक्रमागत. स्थावरधनस्य विक्रयण तमलिकराब्दप्रतिपाद्य च कृतवन्तौ स्याताम् , तदैताहशविनयस्तमाल शब्दप्रतिपाद्यं च पश्चिमदेश चलितशास्त्रानुसारेण्य सिद्धति न वेति । अनेन ऋणपरिशोधनस्योपायान्तररहिताभ्यां स्वस्वपित्रा- दिमागतस्थावरपनविक्रयतमलिकराब्दप्रतिपाद्यकभ्यां हिन्दूजातीयाभ्यां तहणपरिशोधनरूपस्यातीवावश्यकस्य कर्मणः सम्पत्यर्थमप्रासव्यवहारपुत्र- बझ्या मित्रादिक्रमागतस्थावरधन विक्रयण तमलिकराब्दप्रतिगयं च कृतमिति निश्चितम् इति । एतादृशावश्यककााय दासकृतस्यापि धनि- पित्रादिकमागतस्यावरधनविक्रयस्य तमलिकशब्दप्रतिपाद्यस्य च सिद्ध शास्त्रीयत्वेन ऋणपरिशोधनोपयुक्तधनान्तररहितेन ऋणग्रस्तेन पिया कृतस्य तहणपरिशोधनार्थमप्रातव्यवहारस्य पुत्रस्य विद्यमानतायां पित्रादिकमागत- - स्थावरधनविक्रयस्य तमलिकशब्दप्रतिपाद्यस्य च द्धिः शास्त्रीयत्वस्थ व्यवस्थापनसंख्या-२४३ निस्सन्दिग्धतया अर्थसिद्धत्वात् । सर्वत्रव शास्त्रे विशेषतो लिखितमस्ति' श्रावश्यककार्यायं पितृकृतं पित्रादिक्रमागतस्थावरधनविक्रयणं तमलिक शब्दप्रतिपाद्य च शास्त्रीयमेव भवति । अतएव प्रभुकृतेतद्विवादविषयको- परिलिखितार्थप्रतिपादप्रश्नस्योत्तरव्यवस्थायां प्रभुसमापिंतप्रश्नलिखित. वृत्तान्ते सत्येताहविक्रयतमलिकशन्दप्रतिपाद्यं च शास्त्रानुसारेण सिद्ध तीति मया लिखितमिवि । मतिलाल कल्याणसिहार्थिव जलाल सीताराम प्रभृतिमत्यधिकविवादविषयक श्रीयुतबा इष्टाकोएलसाहेबाभिधानतद्धर्मा- धिकरणाधिपतिकवविचारपशन्तर्गतप्रश्नानामध्ये प्रथमप्रश्नस्वयमेव । चहारदेयचलितशास्त्रानुसारेण रिनुः पितामहस्य वा पुत्रस्य पौत्रस्य वा अ. नुमति विना पित्रादिक्रमागतस्थावरधनस्य हस्तान्तरकरणक्षमतास्ति न वेति । पुत्रस्य मरणानन्तरं पौत्रानुमतेरावश्यकतास्ति न वेति द्वितीयः । यदि च पित्रादिक्रमागतस्यावरधनस्य तद्देशचलितशास्त्रानुसारेण विक्रयस्य निषेध- स्तदा धर्माधिकरणाधिपतिभिस्तद्विक्रयस्य परावर्तनं कर्तुमावश्यकं भवति. न वेति तृतीयः । मित्रादिक्रमागतवस्तुसमुदायस्य यत्किञ्चिदस्तुनो वा हस्ता. न्तरकरणविषये शास्त्रे किञ्चिदशेपः प्राप्तुं शक्यते न वेति चतुर्थः । एतेषां चतुणों श्रीयुतजार्जष्टाकोएलसाहेबाभिधानतद्धर्माधिकरणाधिपतिकत. विचारपत्रलिखिताना प्रश्नाना मध्ये कुत्राप्येतादृश पदं नास्ति येनैत- द्विक्रयस्यावश्यककार्थार्थताया बोधो भवितुं शक्रोति । अतएवैतेश्चतुर्भिः प्रश्नः पित्रादिकमागत स्थावस्थनमावश्यक कार्यार्थमन्तरेणार्यात् स्वेच्छयैव पित्रा हस्तान्तर कृतमित्येय निश्चितं भवति । अतएव मया तरोत्तरं लिखित पितुः पितामहस्य या पुत्रानुमति विना पौत्रानुमति विना या पित्रादिकमा. गतस्थावरघनधिमयस्य सेन्छया क्षमता वेहारदेशचलितगात्रानुसारेण नास्तीति। अनेनावश्यक काय पिनादिक्रमागतस्थानधनस्कियस्य क्षमता सामान्यतः पुत्रानुमतिमन्तरेण पोत्रानुमतिमन्तरेण या पितुः पिता- मास्य वास्त्येवेति । अस्स सटत्वेन शास्त्रानुसारेण अनुमतिदानानाप्रास व्यवहारपुत्रानुमतिमन्तरेण ऋणपरिशोधनरूपातीरावश्यक काय्याथै वर- परिशोधनोग्युक्तधनान्तरहितस्य पितुः कानागतस्थावरधन विक्रयस्य क्षमता शास्त्रानुसारेण सहचरैव । श्रीयुतबाइष्टापलसाहेवाभिधानतदर्मा- व्यवस्थापनसंख्या-२४३-२४४ ७३१ धिकरणाधिपतिकृतोपरिलिखितविवादविपयफविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नाशयानां प्रभुकृतैतद्विवादविषयका वश्यककार्यार्थविक्रयतमलिकरान्दमतिपायप्रतिपा- दकप्रश्नाशयस्य च भेदः स्पष्टतर एव | तयाख्यानस्यावश्यकता नास्ति । अमासन्यवदारस्य पुत्रस्य विद्यमानतायां तदनुमतिमन्तरेणावश्यककाम्याथ पित्रा कृतस्य क्रमागतस्थावरघनविषयक हस्तान्तरस्य सिदिविषयिणी पश्चिम- देशचलितशास्त्रानुसारिणी व्यवस्थाप्येतद्धर्माधिकरणे पूज्यं जाता। तदनुसारेण तद्विवादनिष्पत्तिरप्येतदम्माधिकरणे जातास्तीति निवेदन मिति । इशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासीयगणपक्षमित- दिनसम्वन्धिमंगलवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेदमुत्तरं दमिति । श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीकृष्णः सहाय (१०६)-पण्डितेर पर सोल- काशीनाथचौधुरिनामे एक व्यक्ति फौत करियाछे । ताहार सपिण्ड ज्ञाति अर्थात् तिन पुरुपीया ज्ञाति केह' श्रोयारिस नाइ । एइ स्थले ऐ काशीनाथेर मातुल रामजयसिमलाइ ओयारिस हइते पारे कि ना ऐ मोतप्रोफार पश्चम-पुरुपान्त ज्ञाति ऐ काशीनाथ मोतओर ओयारिस अथीत् उत्तराधिकारि हइते पारे चाङ्गलादेशेर चलन शायानुसारे इहार जे व्यवस्था ताहा ए सोयालेर दक्षिणपार्श लिखिवेन । इति सन१-३६तार आगष्ट मो० सन १२४३ त ५ भाद्र ।- श्रीजयतितराम मभुम्पपिंतप्रश्नपत्रं विचारपत्रद्वयमद्गरेजीशब्दप्रतिपाद्यपत्रच यदी- राधीशब्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमितान्दोयसितम्बरमासोयमुनीन्दुमितदिनस. १. विषयक बास्पा-या व्यवस्थापनसंख्या-२४४-२४५ चन्धिशनिधासरे मया प्राप्त नदवलोक्य यादृशबोधो बातस्तदनुसारेयोचरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति मृतस्य काशीनाथचतुर्द्धरणस्य त्यधने यदि तस्य पुत्रमारभ्य मातामहपर्यन्तानाम्मध्ये कश्चिन्नास्ति तदा तन्मातुलस्य रामजयथिमलाइनाम्न एवाधिकारः इति वनदेशचलित- मनुदायभागदायतत्वदायभागटीकादायकमसमहविवादार्णवसेतुविवादभङ्गा- विप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति ।- अत्र प्रमाणम्- पत्नी दुहितरश्चैव पितरी भ्रातरस्तथा । तत्सुतो गोत्रो बन्धुः-- इत्यादि उपरिलिखितग्रन्थभृतयाज्ञवल्क्य- (२२१३५ )वचनम् ॥१॥ प्रपितामहसन्तानस्य दोहित्रान्तस्य मृतभोग्यपिण्डदातुरभावे मृत. देयमातामहादिपिण्डदानेन पिण्डानन्तर्यान्मातुलादिग्रहणाचं 'बन्धु पदं प्रयुक्तवान् याज्ञवल्लयः । मनुना तु पिण्डदानानन्तर्यवचनेनैव दर्शितं मृतदेयमातामहादिपिण्डत्रयस्य मातुलादिभिर्दोयमानत्वान् मातुः लाद्यर्थत्वं धनस्य धनद्वारेण तस्यापि पिण्डदातृत्वात्--इति दायमाग (पृ. २०६ )मन्थलिखनश्चेति ॥२॥ तदभावे मातामहस्तदभावे मातुल-इत्यादि दायक्रम संग्रहान्य लिखनञ्चेति ॥३॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयापरेलमाछोयरसमितदिन सम्बन्धिगुरुवासरे मया प्रभुसमर्पितमश्नपत्राशरेजीशन्दशतिशयरत्राभ्या विचारपत्राभ्यां च सहितेय व्यवस्था दचेति ।- श्रीजयतितराम् श्रीवंद्यनाथमिश्रण (१०७)-नोकाम कलिकातार सदर देओनि आदालतेर 'पण्डितेर पर सोलः फरियादि श्रीरघुनाथराय श्री श्री राधा- नाथराय ओ श्रीगोपीनाथराय सा० कपिलेश्वर परगणे उखडा व्यवस्थापनसंख्या-२४५ ७३३. आसामी कुंदपाडा साफीनेर श्रीसमशेर खाँ वनामे जमि दखल पावित नालिस करे ऐ मोकदमार एक व्यवस्था लो श्राविश्वक हइल । विवरण एइ-फरियादियान जे जमिन्दखलेर प्रार्थनाय नालिस करे ऐ जमि पूर्व पष्ठीदास सिद्धान्तेर छिल । ऐ पाठीदास एक पुत्र जगन्नाथपश्चानन पार दौहित्र फरिया- दियानेर पिता भवानीशंकररायके राखिया लोकान्तर हयेन । भार ऐ जगन्नाथ आपन जीवतमान पय्यन्त आपन पितार विषयेते भोगवान थाकिया अपुवक आपन स्त्री यशोदादेव्या भो भवानीशंकररायके राखिया लोकान्तर हयेन | यदि ऐ श्रवीरा यशोदादेव्या सन १२१८ साले अापन स्वामिर ऋणपरिशोद अर्थे ऐ विरोधीय जमी प्रासामिके विक्रय करिया थाके भार सेइ विक्रयानुसारे ऐ जमिते आसामि भोगवान थाके भार ए काल पर्यन्त फरियादियानेर पिता ए विपयेर कोन श्रापत्तं ना करिया थाके, तवे शास्त्रानुसारे ऐ विपय सिद्ध हय कि ना। पार फरि- यादियानेर दावि ऐ विपयेर पर अर्श कि ना-इहार व्यवस्था वागलार चलन शास्त्रानुसार जे हय एइ सोलेर दक्षिण पार्शे लिखिवेन । इति सन १८३६ साल १६ शेतम्बर ॥ श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रद्वयमङ्गरेजी शब्दप्रतिपाद्याक्षरपत्रञ्च यदीशवीशन्दप्रतिपायरसगुणगजेन्दुमितान्दीयनवम्बरमासीयग्रहेन्दुमिवदिन- सम्बन्धिशनिवासरे मया प्राप्तन्तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारे. गोचरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति अवीरया यशोदादेव्या यदि स्वसंक्रान्तपतित्थावरधनस्य विक्रयास्वपतिकतर्णपरिशोधनार्यमेव वास्तवं. कृतः स्याचदैताहविक्रयश्शास्त्रानुसारेण सिध्यति एवं तद्विक्रयस्य. सिदो सत्यामथिनां चाभियोगस्तद्विषये शास्त्रीयो न भवतीत्यर्थसिद्धमेव. इति वङ्गदेशप्रचलितमनुदायमागादिग्रन्यानुसारिणो व्यवस्थेति- -७३४ व्यवस्थापनसंख्या-२४५-२४६ . अत्र प्रमाणम्- ऋथमाही ऋणं दाप्या-इतिविवादार्णवमेतुविवादमार्णवादि- (१ दिवा १७६ ख ) मन्यतयाशवल्क्य( २०५१ )चनम् ||१|| मर्तुकामेन वा मा उक्ता देयमणं त्वया । अप्रपनापि सा दाप्या धनंघद्याश्रितं स्त्रिया ।। इति तत्तद्ग्रन्ध(पृ०६०) (१ दिवा २०६ )धृतकात्यायन कारमृ ५४७१पृ• ६६)वचनञ्चेति ।।२।। ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दोयमैमासीयामितदिनम- बन्धिशुक्रवासरे मया प्राससमर्पितप्रश्नरण विचारपत्राभ्यामरेजोशम्द. प्रतिपाद्यादरपत्रेण च सहितेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिण (१०८)-लं १५७ सन १८३५ साल मो० कलिकातार सदर देओनि श्रादालतेर इं. सन १८३७ सालेर २ मार्च मोवावेक वाङ्गला सन १९४३ सालेर २० फाल्गुन वृहस्पतिवार दिवशेर श्रीयुतमोलीयमबाडीनसाहेव ऐ भादालतेर हाकिमेर बैठकर रोवकारि- श्रीमतितोपकलकुडर- आपीलाएट श्रीनिनन्दकुंडर मो गैरह-- रेक्याडण्टान पापोलाण्टेर उकिल लाला वस्ति ओ रेप्पाडएटानेर उफिल- गण मुनसि हुछन आलीश्रो जेमेव कुलवरूक छदरलपलाण्ड माहेव जे छदरलएलाएडसाहेवेर नामेर, श्रीकालतनामा अद्य गुजग्यिाछे हाजीर भाइलेन ए आदालतेर हाकिमश्नीयुतप्रोसरेममनिसाहेवेर गत २१ फिवरिपोयारिर हुकुमानुसारे ए मकद्दमा गतकल्प श्रामार बैठके रूवकार ो गत कल्येर स्वकारिर विस्तारित लिखिन फागजसकल पाठ हइया स्थकित छिल । अद्य पुनराय रुवफार हया सदर थामीन अलार ओ उजसाहेव मकद्दमार व्यवस्थापनसंख्या-२४६ ‘वक्री कागजसफल ओ ए आदालतेर फागजसकल प्रसंसीय हाकिमेर गत २१ फिवरिपोयारिर रोवकारिर लिखित राएर सम्बनित पाठ करा गेल! परे पापीलाण्टेर उकील सन १२०७ फसलिर ११ कार्तिक्षेर लिखित श्रीमति सुगन्धाकुरेर लिखिया देया हेवानामार नकल एक केता दुइ टाका मूल्येर फिरिस्तिर द्वाराय लम्बरे दाखिल करिलेक दृष्टे आइल वोध हइलो जे भोलामिहनामक श्रीमति सुगन्धानामक एक स्त्री श्रो श्रीमतिनन्दकुछर ओ बदनकुटर दुइ कन्या व्यतित द्वितीय उत्तरा- धिकारि राखितो ना, ओ उक्त भोलासिंह यापन निज दखील ओवरटकि पैत्रीक विशय श्रापन स्त्रीर सन्मतिते श्रापन कन्यार दिगेरके जवानि हेवा फरिया हेवा नामा लिखिया देओर जन्य आपन स्त्री श्रीमतिसुगन्धाके अनुमति फरियाले तदनुसारे श्रीमतीशुगन्धा उहार स्वामि भोलासिंहेर मृत्युर पर श्रापन स्वामिर अनुमत्यनुसारे पापन जामातागण अर्थात मित्रजित- सिंह ओरफे वुलाकिसिह उक्त नन्दकुङरेर स्वामि यो केनरसिंह उक्त बदनकुरेर स्वामिर नाने हेबानामा लिखिया दियाछ श्रो तदनुसारे मित्रजितसिंह भो केनरसिंह श्रीमतीसुगन्धार सम्मतिते कालेदृरि सेरस्ताय अापन-आपन नाम दाखिल करिया अनेक दिवस हेवा करा विपयेर पर दखिल ओ कावेज पाछे । ओ शास्त्रेर वृत्तान्त ज्ञात हो एइ विषय जे भोलासिहेर एमत क्षमता जे आपन निज दखलि मौरुशी विपयेर अंश जे अनेक दिवस वएटक हइयाछे आपन कन्यागन ो जामातागणके आपन वीर सन्मतिते हेवा करिते पारे कि ना, आर ए प्रकार हेवा मैथिल देशीय चलित शास्त्रानुसारे ग्राह्य पो सिद्ध वटे कि ना ! उचित वोध हइत एजन्य हुशुम हइल जे एन रोवकारिर नकल एइ हुकुमे जे उपरेर लिखित विषयेर प्रत्युचर एइ रोक्का- 'रिर नकल प्राप्तर दिवसावधि एक सप्ताहेर मध्ये लेखेन ओ आदा- लतेर पण्डितके अर्पन फरा जाय इति- व्यवस्थापनसंख्या-२४६-२४७. एतदर्माधिकरणाधिपविधीयुतप्रोलियमवेपडीनसाहेवधम्माधिकरण .. लिखितेशवोशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयमार्चमासीयद्वितीयदिव - सीयविचारपत्रान्तर्गतमश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मासीयमुनिपक्षमितदि- नसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याहशोषो बातस्तदनुसारे योत्तर लिख्यते-- प्रभुममपिनविचारपत्रलिखितवृत्तान्ते सति भोलासिंहनामा कश्चिद् व्यक्तिविशेषः पित्रादिकमागतस्वायत्तीयूतविभक्तविषयस्य स्वरत्नोसम्मत्या स्वकन्याम्यो जामातृभ्यो दानं कर्तुं शक्नोति । एताह सदानं च मिथिला- देशचलितशास्त्रानुसारेण सिध्यति इति मिपिलादेशचलितमनुविवाद- चिन्तामणिविवादचन्द्रविवादरत्नाकरकल्पतरूमदनपारिजातस्मृतिमारप्रभृति- अन्यानुसारियो व्यवस्पति- अन प्रमाणम्- प्रदानं स्वाम्यकारणम्-इति मनु( ५।१५२ )वचनम् ||१|| परयमूल्यं भृतिस्तुष्ट्या स्नेहात् प्रत्युपकारतः । स्त्रीशुल्कानुप्रहार्थं च दर्श' सप्तविधं विदुः ।। इति क्ल्पतरविवाद- रलाकर पृ० १३३ )प्रभृतिग्रन्थधृतनारद ना. स० पृ० ६०) वचनम् ॥ तान्येव तु प्रमाणानि भर्ता यद्यनुमन्यते-इति नारदस्मृत्यादिग्रन्यधृत. नारदवचनम् ॥३॥ ईशवीशन्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयमैमासीयनखमितदिनस- म्बन्धिशनिवासरे मया प्रभुसमक्तिपिचारपत्रसहितयं व्यवस्था दति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण (१०६) प्रश्न वनाम परिडत श्रादालते सदर देयोनि- १,ददानविझे विदुः-ति पाये, पारः।

व्यवस्थापनसंख्या-२४७ यद्यपि कोन वेतिर कुलाचारे एमत रित थाके ये अवीरा खो ओ कन्या ओ दौहित्रे नाम जमिदारिते जारि हइवेक नाइ, श्रार यद्यपि उभय विवादिर पूर्व पुरुपादगेर आपसे ऐमत एकरार लेखा पडा हझ्या, ऐ रित चलित थाके, तवे पुनराय शावानुसारे व्यवस्थार आविश्यक हय कि ना। यद्यपि प्राविश्यक य, तवे अवीरा खोर नाम ताहार स्वामीर त्यक्त वस्तुते जारि हइते पारेकि ना-हार व्यवस्था शास्त्रानुसारे एइ प्रश्नेर पार्श लिखिवेन इति- श्रीजयतितराम् प्रभुममर्षितप्रश्नपत्रं विचारपत्रदयं चाइरेजीशन्दप्रतिपाद्याक्षरपत्रमा- ज्ञापत्रञ्च यदीशवोशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयमार्चमासीयदि- हिमतदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादशबोधो जातस्तदनु- सारेणोत्तर लिख्यते- यद्यपि कस्यचिद् वंशे अवीरापन कन्यादौहित्राणां नामनिर्देश: सराजकारणावरविषये न भवतीति व्यवदागे वादिप्रतिवादिनोः पूर्वपुर- पाणां परस्परसविसत्रेण प्रचलितः स्यात् तदा कुलाचारविरुद्धव्यवस्थाया एतद्विपये अावश्यकता नास्ति-इति वद्गदेशचलितमनुदायभागप्रभृति- ग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति- अत्र प्रमाणम्- जातिजानादान् धर्मान् श्रेणीधमांश्च धर्मवित । समीक्ष्य कुलधम्मांश्च स्वधर्म परिपालयेत् ॥ इति मनु वचनम् ।। देशवीशब्दप्रतिपाद्य मुनिगुणगजेन्दु मताब्दीयमैमासीयवाणपक्षमित- दिनसम्बन्धिगुरुवासरे मया प्रभुसमपितपश्नपत्रागरेजीशन्दप्रतिपाद्याक्षर- पत्राभ्या विचारपत्राभ्याञ्च सहितेयं व्यवस्था दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण व्यवस्थापनसंख्या-२४८ (११०)-रोवकारि मिदिल सदर दे पायानी पादालत मोकाम कलिकाता। उक श्रादालतेर काएम मोकाम हाकिम श्रीयुत फ्राणशीप करण इसमीत साहेवेर बैठके। तारिख ४ मार्च इन- रेजी सन १९३७ साल मोवावक २२ फाल्गुन सन १२४३ साल बागला दिवस शनिवार- पत्रानन्ददास बनाम राधाचन्द्रवाल छाएलेर उफिल मुनशीमामीनदिनमहम्मद हाजीर पाइल। ३२ टाका फिर्मवेर कागजेर उपर छाएलेर सास भापोलेर छो. याल जेला मेदनिपुरेर आमोशशन जजसाहेवेर कृत सन १८३६ सालेर म शेतन्यरेर फयदलार टुकुमेर नाराजीत, जाहा तथाकार सदर श्रामोनमालार सन १८६४ साजेर ४ शेतम्बरेर लिखित फयालार यहालिते छादेर हइयाछे, मौजे गोशमदारदसल पायो. यार मोहमाय मयलगे ५५३६११ दाहार वाचंदादे साप मापील मरिर उमेदै उफिल मजकुरेर नामेर एक पेता श्रीमालतनामा मन्धलित श्री पोशाजपन्द्र सिंह प्रो दिनदकोशोर घोपेर नामेर एक केता मोकारनामा यो बेलार देोयानि श्रादालतेर उपरेर लिखित वारिगर दुइ केता पयालार नरुन श्राभिशशन जज साईब भी सदर यामीन मालार सजविजी, जाहा गतो फिवरेल मादार तारिख दाखिल याछिल, अरा उपस्थित दश्या पडा गंज । दिनीय हुकुम छादेर होनेर पूर्व एइ विपर मभोपाल फराजे एक व्यक्ति हिन्दुनाली वसतिर बाटो त्यार फरिया अस्य पददते तफाव या उदामिन पोतीयाशी हय, थार ताहार अत्य चन्नु दाते वफात हीया मुरव विप यत्सर गतो हया पार ममये बिटु मिलकियन परिद करिया भोगवान शाकिया दिपनदेह नामे जन मिजो मारिसरासिया मरे । ए सारे उदासिन व्यफिर योगारिम शाम्नानुबाद उफ मोसम्मान दावेक, किमहरम-धम्मभ प्रात्यवन्धु । श्रार यदि स्शन सामवे हासोनम्मतिर घोबारिस कमाइग्मांव दय, च्यवस्थापनसंख्या-२४८ 1७३६ श्रो प्रकारे उक्त मोछम्मातेर उदासीन व्यक्तिर त्याय॑ वस्तुर दखल करा श्रो विक्रयेर क्षेमता पाछे कि ना एइ प्रादालतेर पण्डितेर स्थाने उचित वोध हइया हुकुम इइल जे एइ रोवकारिर नकल छोयाल प्रभृति कागज सम्वलित एइ हुकुमे जे पण्डित मोछक उपरेर चाोया प्रश्नेर उत्तर एक सप्ताह मध्ये लिखेन- पाठान जाय, पार से पर्यन्त हुकुम छादेर होया मुलतवि थाके इति- श्रीजयतितराम एवद्धम्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतधानसीसकरुणइसमित साहेवधर्माधिकरणलिखितेशवीशदप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयमा- चर्चमासीयवेदमितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र तत्समर्पिततद्- विवादविषयनिविष्टलिखितादिकं च यत्तदन्दीयतन्मासोयनखमितदिनसम्ब. धिचन्द्रवायरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्वे सति पनिनो मृतस्य पुत्रपौत्रौत्रा- भावे सति मृतघनित्यक्तघने वत्सल्या दोपन देइनान्या एकाधिकारः, तस्याश्च मृतपतित्यक्तधनस्यायत्तीकरणक्षमता शास्त्रसिद्धव, एव हस्तान्तर करणक्षमता तु शास्त्रोपावश्यक कार्याधमन्तरेण नास्ति-इति धर्मशाना- नुसारिणी व्यवस्थेति- अत्र प्रमाएम्- अपुत्रा शयनं भर्तुः पालयन्ती गुरी स्थिता । मुजीतामरणात शान्ता दायादा अवमाप्नुयुः ।।--इति कात्यायन- चचनम् ॥२॥ ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दोयजुनमासोयप्रथमदिनसम्प.

व्यवस्थापनसंख्या-२४-२४६ ७४० न्धिगुरुवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्रेणैवविवादविषयनिविष्टलिसित- बावैध सहिवयं व्यवस्था ददि- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण (१११) तरजमारोवकारि- नकल रोवकारि श्रादालत दिमानि जिला पाटीमाम हेनरी- मोरसाहेब कायेम मोकाम जजेर बैठके तारिख ८माइ अकसूबर सन १८३६ पाठारह सय छतिस ईशवी- प्रतापनारायणचक्रवत्ती, साकिम दुर्गापुर डिगरिदार, परमानन्द पक्राी श्री रामधन श्री रामलोचन श्रो प्रतापनारायण यो उमाकान्त ओ लक्ष्मीनारायण श्री रामकीशोर प्रो रामशरण भो रामकान्त ओ शिवप्रसादठाकुर श्री राममोहन यो द्वितीय रामलोचन ओ रामप्रसाद श्रो द्वितीय परमानन्द मो फाशीनाथ ओ बेचन श्री रामदास श्री विजयनाथ प्रामणसफल साकिमान दुर्गापुर ओ उत्तरदुर्गापुर ओ मुरालीपुर नो गोपालपुर ओ मिठारा ओ मटमारिया तरफसानियान- मोहिमा इजराय ढिगरी समाज- हेजुरेर हुकुमानुसारे एह मोकदिमा मौलयो अबदुल मजीद वों याहादुर सदर धामीन थानार निकटे दरपेश हयादिलो। गत अगस्ति मासेर २०वारिसे ऐ सदर श्रामिन पाला डिगरी- दारेर सहित वरफसानीमरलके एघ पसिया आहार करिते प्रामा दिलेन, मोमीनारायणचक्रवतिं तरफसानी ए सदर आमिनमालार टुसुमेर नागजीते एक पता दरसारत अपिल मरसरीर वावति गत सितम्बर मासेर वारिसे गुजराइलेक, भो एजहार करिलेक ये बहार ये प मादालन पर मदर दिमानी व्यवस्थापनसंख्या-२४६ ७४१ आदालतेर परिडतेर स्थाने व्यवस्था लइवार कारण आज्ञा हइयाछिलो, तरफसानीसकल ऐ डिगरि जारि हओयाते खालास. पाइयाछे । ऐ आज्ञार पहिर्भूत ऐ सदर प्रामिन बाला ऐ डिगरि जारिर समये तरफसानीसकलके ऐ डिगरिदारेर वाटीते आहार करिते हुकुम दिया तरफसानीसकलेर जातिर प्रति शत्रुता करितेछे, ओ सन १८३६ सालेर २०सितम्बर तारिखे लक्ष्मीनारा- यणठाकुर ओ रामधन प्रो कमलाकान्त ओ प्रताप ओ भञ्जन श्रो रामलोचन श्री वैद्यनाथठाकुर-गणेर उकिल सेख अहमदुल्ला- हेर साक्षाते सरसरी प्रापीलेर सवाल ओ सदर आमीन बाला मौसुफेर सन १८३६ सालेर २० अगस्ति तारिखेर रोवकारिर नकल दृष्टे पाइलो। वोध हइलो ये उभय विवादिर एइ प्रकार विवाद वटे ये सदर दिमानी पादालतेर हुकुम एद प्रकार आसियाछे। ये आदालतेर पण्डितेर स्थान हइते व्यवस्था लइया एइ डिगरि एजराय करा जाइयेक । अतएव आदालतेर पण्डित व्यवस्था दाखिल करियाछे-ये शास्त्रानुसारे एइ डिगरी यथार्थ वटे । ताहाते मुद्दामालेगण विरोध करिया एइ प्रकार आपत्ति करे ये एक आदालतेर पण्डित ये व्यवस्था दियाछे से व्यवस्था चाटयामेर व्यहेरालोकेर प्रति वटे। ऐ प्रकार रसम रवान व्यहेरालोकेर रवाजेर वरखेलाफ वटे, ओ तरफसानीगण निजामपूरेर घंटे, श्रो तरफसानीदिगेर उकिन प्रकाश करिलेक ये चाटयामेर लोक निजामपुरेर व्यहेरासकलेर सङ्गे सकल कम्र्मे आहार व्यवहार करे नाइ इति । ओ ऐ सदर आमीन आलार स्थान हइते पादा- लतेर पण्डितेर व्यवस्थार नकल तलय करार अाना ओ ऐ व्यवस्थार नकल सदर दिमानी आदालतेर प्रवल प्रताप हाकिमा- नेर हजुरे पाठाइवार हुकुम ओ सदर दिमानी श्रादालतेर पण्डि- तेर स्थाने व्यवस्था तलब करा एइ प्रकार जे एइ डिगरी निजाम- पुरेर दस्तुर माताविक किम्वा चाटपामेर दस्तुर मोताविक जारि हाइवेक-हुकुम दिवा गेलो, प्रो उभय विवादि निजामपुरेर ७४२ व्यवस्थापनसख्या-२४९ सामाजेर वटेन, ओ सदर दिमानी पादालत हइते जबाव श्रासा पर्यन्त एइ डिगरी जारि मकुफेर हुकुम सादर हइलो इति । ओ अद्य आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थार नकल सदर थामीन बालार स्थान हइते ए श्रादालते पौछिलो। अतएव हुकुम हइलो आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थार नकल याहा ऐ सदर आमीन बालार स्थान हइते आसियाछे एइ रोक्कारि सहित श्रो अगरेजी चिठीर सम्बलित सदर दिमानी पादालतर प्रवलप्रताप हाकिमानेर हजुरे पाठान जाय । सवाल ये, उभय विवादि निजामपुरेर वासिन्दा वटेन, श्रो जाति ब्राह्मण वटेन, श्रो व्यहेरासकलेर पुरोहित बटेन, ओ नेजामपुरेर व्य- हेरार यजन-पूजन कराते मुद्दइके मुद्दामालेह ब्राह्मणसकल, जाति हइते बहिर्भूत करियाछिल्लो । वाहाते मुदै पण्डित सदर आमीनेर पादालते नालिस करिया आपन हक के डिगरी हासिल फरियादिलो। ओ ऐ डिगरी प्रापिल श्रादालते अर्थात जलसाहेवेर निकट बहाल थाकिलो। ऐ डिगरी जारो हओयार समये रसम-रवाजेर तकरार दरपेश दइया सवाल सदर दिमानी आदालत पर्यन्त गुजरियाछिलो। ओ ऐ सदर दिमानी श्रादा. लते हाकिमान हुकुम दियाछेन-ये एइ डिगरी पण्डितेर व्यवस्था- नुसारे जारी करो। ओ पण्डित मादालति एइ प्रकार व्यवस्था दाखिल करिलेक-ये एइ डिगरी याथाथै, यो मुद्दालालेहसकल के मुहैर सहित एकत्र आहार व्यवहार करा आवश्यक, प्रो एजराय डिगरी श्रामले थाइलो । ओ ऐ हुकुम श्री ऐ व्यवस्थाते मुद्दा- आलेह तकरार करे। श्री मुद्दाथानेहसकलेर उजुर एइ प्रकार वटे-ये ऐ मुहाभालेहदिगेर सहित निजामपुरेर वेहारा दिगेर उपन-पूजनेर विषये निजामपुरेर वेहारादिगेर सङ्गे एइ मोकहिमा उपस्थित हइया निजामपुरेर वेहारारा एइ एजहार करे ये प्रामरा निजामपुरेर बेहारा वटी, पामार- दिगेर रसम रचाज चाटियामेर वेहारादिगेर ओ ब्राझएसकलेर व्यवस्थापनसंख्या-२४९ ७४३ प्राचीन रसम-रवाज हइते भिन्न प्रकार वदे, ओ ऐ आदालतेर परिडोर व्यवस्था चाटयामेर हारादिगेर रसम-रवाजेर विपये वटे इति । ए कारण मवाल करा जाइन्छे कि यद्यपि नेजामपुरेर वासिन्दा लोकेर रसम-रवाज हइते भिन्न प्रकार रसम-रवाज ये साल लोकेर रसम-रवाजेर विषयेर एइ व्यवस्था अाछे, ह्य एइ व्यवस्था शास्त्रानुमारे यथार्थ वटे कि ना। वास्तव सवाल एइ पाछे-ये यद्यपि एइ आदालतेर पण्डितेर व्यवस्था शास्त्रानुसारे यथार्थ हय, तवे यदि नेजामपुरेर वासिन्दा ब्राह्मणसक श्रो वेहारासकलेर ग्सम-रवाजेर विपरीत हय, तवे नेजामपुरे जारी हइते पारिवेक कि ना। आर यद्यपि कोनो देशे पुरोहित-यजमानेर मध्ये पूर्व हइते पुरुषानुकमे ये रमम-वाज जारी थाके, यद्यपि ऐ रसम-रवाज जारी होर तारिखेर निभय ना धाके, एइ प्रकार रसम-रचाज नितान्त चलित नाइ, वरं चलनेर विरुद्ध वटे। तथापि प्राचीन रसम-रवाज, जाहा ओहादिगेर शाखेर न्याय चलित बटे, ऐ रसम-रवाज ऐ नेजामपुरेर वासिन्दालोकर वटे कि ना। ऐ सदर दिमानी पादालतेर प्रवलप्रताप हाफिमान अनुग्रह पूर्वक एइ विपयेर व्यवस्था सदर दिमानी श्रादालतेर पण्डितेर स्थाने लइया ए श्रादालते प्रेरण करण इति । अद्य सन १८२६ साल ईशयी तारिख २८ माह लवम्बर डिगरीदारेर उकिल रामसुन्दरदत्त प्रारज करिलेक ये डिगरीदारेर मोक्तार रामकुमार हजुरे ए विषय प्रारज करिवार कारण हाजीर छिलो ये मुद्दापालेहसकल वेहारा जाति वंदे, प्रो गुलाम ओ लौडी आपने श्रापन घरे मेत्तइसकल यजन-पूजन जलाञ्जलि करितेछ। नथोर सामिल साक्षिदिगेर एजहारेर द्वाराय ए विपय निश्चित ओ ए कथा रोक्कारिते लिखा जाय इति । उक्लेिर प्रार्थना मते रोवकारि लेखा गेलो, किन्तु ए विपय सबालेर सहित सम्पर्क १. पण्टिनर परिष्टोर-प।

व्यवस्थापत्रसंख्या-२४६ राखे ना।ए विषय एक तजविजेर स्थान दे। सवाल ये प्रकार लेसा गेलो सेइ यथाधे वटे-ए घिपयेर यवाय श्रासिवार परे दुइ व्यवस्था दृष्टि करिया ओ कागजात भो उभय विवादीर सवाल ओ ययाव मोलाहिजा करिया डिगरी जारी विषयेर चित्त हुकुम देया जाइदेऊ इति ॥- श्रीदुर्गा शरणम् - श्रीयुक्तजानलुइपजजसाहेवमहाशयप्रेरितान्येतानि विवादपत्रादीन्यवलो- क्याय व्यवस्था लिख्यते-अत्रार्थी एतद्देशीयवेदारानामशुद्रविशेषगृहकृत. यमनपूजनादिव्यापारः प्रत्याधिभिरव्यवहार्यो नैव भवेदिति विदुषां परामर्शः। एतद्देशीयवहारानामशूदविशेषानीतजलगनस्य एतद्देशीयप्रधानबाह्मणश- दादिभिः क्रियमाणत्वाद् विशेषतोऽत्रार्थिवत् प्रत्यथिनामपि के पाश्चिन् ताह- रावेदारानामशूद्रविशेषाणां यमनपूजनादिव्यापारकरणेऽपि अव्यवहार्यत्वा- भावस्य साक्षिभिनिष्क्तत्वाद्, “येषु स्थानेषु यच्छौच घर्माचारश्च याहया, तत्र तनावमन्येत धर्मस्तच नाहशः" इति शुद्धितत्तधृतवचने देशविशे- पीयपारम्पर्यकमागतयादृशधम्माचारस्तादृशस्यामिमतत्वज्ञापनाचेति । अस्थार्थ:-- श्रीयुत जान लुइप जज साहेव महाशय कर्तृक प्रेरित एमकल कागज पत्र अवजोकन करिया ए विपये व्यवस्था लेखा याइनेछ। ये ए डिपोदार एतद्देशीय वेहाग शूद्रेर गृहे यजन-पूजनादि व्यापार कराते प्रासामि-कनुक अव्यवहार्य हइते पारे ना। कारण एरदेशीय वेहारा शूद्रेदर' जलाचरणादि व्यवहार एनद्दे- शीय प्रधान ब्राह्मण ओ शूद्रादिसकले फरिया यासितेछ, एवं विशेपन एइ फेरादिर मत कोन आसामि हारा शूर यजन पूजन करातेश्रो ताहार व्यवहाय्यत्व साक्षि कर्तृक कथित प्राथे, एवं ये स्थाने यादृश शौच ओ यादृश धर्माचार, से स्थाने ताहा अपमत हइवे ना, ताहाइ प्रचलित हइवे-एइ शुद्धितत्व धृत वचनेते १. परदेर-भ्यय। .

व्यवस्थापनसंख्या-२४६
पूर्वापर यादश धर्माचार रूप व्यवहार ये देशेर येमन चलिया
आसितेछ, ताहार अभिमतत्त्व ज्ञापन करियाछेन-वोध हाइल
इयादि । ई सन १८३५ तारिख १ अाफेल-
श्रीअखिलचन्द्रन्यायरत्नशमणाम्
श्रीजयतितराम
ममुसमपितविचारपत्रं व्यवस्थापत्रमगरेजीशन्दप्रतिपाद्याक्षरपत्रं च
यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यरसगुणगजेन्दुमिताब्दीयदिशम्वरमासीयगुणेन्दुमित-
दिनसम्बन्धमङ्गलबासरे मया प्राप्त तदवलाक्य यादृशबोधो जातस्तदनु-
सारेणोत्तर लिख्यते । -
प्रभुसमपितविचारपत्रनिवितवृत्तान्ते सति चट्टग्राम प्रदेशोजिलाख्या-
वान्तरधम्मधिकरण नियुक्तपण्डितन्निवितव्यवस्था नेजामपुरप्रदेशवासिना-
मप्रिया प्राहाणाना प्रचलितव्यवहारानुसारिणी चेत्तदैव नेजामपुर-
प्रदेशवासनावधिप्रत्यायनो ब्राह्मणों प्रति शास्त्रसिद्धा भावतुमर्हति,
नेजामपुरप्रदेशवासिनामर्थिप्रत्यर्थिनां ब्रामणानां कथञ्चिदरि प्रचलित
व्यवहारविरुद्धतया ज्ञातुं शक्यते चेत्तदा नेजामपुरप्रदेशवासिनावयिप्रत्य
थिनी ब्राह्मणी प्रति शास्रतः प्रचनितुं नाहंति ; एव करिमश्चिद्देशे पुगेहित.
यजमानयोयोः पूर्वपुरुपपारम्पर्यक्रमेण कनिद्वयवहारोऽनिश्चितप्रचारदि-
वसोऽपि यदि तेषा ताशप्राचीनन्यवहारः शास्त्रसाम्येन प्रचलितः स्यात्चदा
ताशव्यवहागे नेजामपुरप्रदेशवामिनामप्रित्यर्थिनां ब्राह्मणानां शास्त्रतः
समोचीनो भवत्येव-इति नेनामपुरप्रदेश चलितमनुस्मृवियाज्ञवल्क्यस्मृति-
वृहस्पतिस्मृतिशुद्धितत्वव्यवहारतस्यव्यवहारमातृकामभृतिप्रन्यानुमारिणी न्य-
वस्थेति ॥
अत्र प्रमाणम्-
जातिजानपदान् धर्मा श्रेणोघमांश्च धर्मवित् ।
समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म परिपालयेत् ॥ इति मनु
वचनम् ॥११॥

व्यवस्थापनसंख्या-२४६ यस्मिन्देशे य प्राचारो व्यवहारः कुलस्थितिः । तथैव परिपाल्योऽसौ यदा वशमुपागतः।-इति याज्ञवल्क्यस्मृति- प्रभृतिग्रन्थधृतयाज्ञवलायवचनम् ॥२॥ देशजातिफुलानां च ये धर्माः प्राक् प्रवर्तिताः तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रनुभ्यतेऽन्यथा !/-इति वृहस्पतिस्मृति- प्रभृतिग्रन्थधृतवृहस्पतिवचनम् ॥३॥ केवल शास्त्रमाश्रित्य न कर्त्तव्यो विनिर्णयः । युक्तिहीनविचारेण धर्महानिः प्रजायते ॥ इति वृहस्पतिस्मृति- व्यवहारतत्वव्यवहारमातृकाप्रभृतिग्रन्धधृतरस्पतिवचनम् ||४|| यपु स्थानेषु यच्छौच धर्माचारश्च याहशः । तर तबावमन्येतधर्मस्तत्रैरतादृशः ।। इति शुद्धितत्व ४०२७५). अभृतिग्रन्यधृतमरीचिवचनम् ||५|| देशानुशिष्टं कुलधर्ममप्रर' सगोत्रधम्म नहि संत्यजेच इति शुद्धितत्व पृ. २७६ प्रभृतिमन्यधृतवामनपुराणवचनञ्चेति ॥६॥ व्यवस्थान्तर लिखनन्यग्रतया स्वकर्तव्धकार्यान्तरव्यग्रतया चैतर- वस्थायाः फाठिन्यतरत्वेन चैतद्वयवस्थादाने एतावान् विलम्बो जात इति निवेदन मिति !! शवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयजुनमासीयमुनीन्दुमित दिनसम्बन्धियनिवासरे मया प्रभुसमषितव्यवस्थापत्रविचारामागरेजीशन्द प्रतिपायाक्षरपत्र सहितेयं व्यवस्था दत्तेति ॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण व्यवस्थापनसंख्या-२५० थीदुर्गा (११२:-मो० कलिकातार सदर देोनि श्रादालतेर इ. सन १८३७ सालेर १५ फिवरेल मोतावेक पागला सन १२४३ सालेर ५ फाल्गुन वुधवार दिवसेर श्रीयुत श्रोलियम बाडिन साहेव ऐ श्रादालतेर हाकिमेर रुखकारि- सिउछहाय प्रो कुञ्ज वेहारीलाल- वनाम C मोछम्मातान मक्षणविवि श्री गैरह- छाएलानेर उफिल तारकचन्द्रराय, फरिकलानिर उकिल गण मुनशी दादारवक्स ओ श्रीरामराय हाजीर आइलेन । छापलानेर खास श्रापीलेर छाल ओ ऐ छोलेर सम्पीय कागजसकल, जे सन १८३६ सालेर २१ दिजम्बर तारिखे दर- पेप एवं छाएलान दरवारिलार पुत्रगण हऔर विपये दरवा- रिलालेर एकरारेर निदर्शन दाखिल करणेर हुकुम छाएलानेर उकिलेर प्रति प्रकाश हइया स्थकित छिल, अद्य पुनराय दरपेस हइया सन १८२१ सालेर जानेर तारिफेर हुकुम हा वैज- नाथ छहायेर दरखास्तेर नकल ओ सन १८२० सालेर ६ श्राप रेल तारिखेर लिखित जेला भागलपुरेर देनि श्रादालतेर नकाल रुवकारि ओ सन १८१३ सालेर १४ शेतम्बर तारिखर लखित ऐ जेलार श्रादालतेर फयछनार नकल सम्पलित, जे सन १८३६ सालेर २१ दिजम्बर तारिखेर हुकुमानुसारे छारला- नेर उफिल दाखिल करियादिल, इप्टे प्राइल । काएलान कहेन जे उदारा दरवारिलालेर पुत्रगण एवं उत्तराधिकारिगण घटेन, श्रो फरिकलानिऐ दरवारिलालेरापन भ्रातप्पुन । वैजनाधकहा- येर त्राधिकारिगण जे कहेन छायेलान दरवारिलालेर ढेमनि- तायफादार स्रोर गर्भ जन्मियाछे, ओ एइ दयने उक दरवारि- लालेर विवाहिता चीर गर्भजात कन्या श्रीमती मल्लार ज्य व्यवस्थापनसंख्या-२५० विपयेर जन्य उभय विधादिर विवाद उपस्थित पाछे । एजन्य कोन हुकुम प्रकाश होनेर पूर्व ए मोकई मार शाखेर वृत्तान्त ज्ञात हो उचित वोध हइया हुकुम हइल जे एइ रोवकारिर नकल ए३ हुकुमे जे निचेर लिखित प्रश्नोत्तर नकल रुवकारि प्राप्तर दिवसावधि एक सप्ताह मध्ये लेखेन ए आदालतेर पण्डितके अर्पन करा जाय इति- प्रश्न:- यद्यपि स्यात् एक व्यक्ति हिन्दुर अविवाहिता स्त्री अर्थात् उहार ढेमान हइते सन्तान उत्पत्ति हइयाथाके, बार ऐ व्यक्ति कोन एक आदालते श्रापनाके ऐ पुबेर पिता एवं आली दर्शाइया नालिस करे, तवे उक्त पुन ऐ व्यक्तिर मृत्युर पर ऐ व्यक्तिर उपरेर प्रसङ्ग करा एकरारेर दृष्दे ऐ व्यक्तिर श्रापन भ्रातपुत्र उत्तरा- धिकारिगण धाकितेओ ऐ व्यक्तिर विपयेर हकदार पश्चिम रे बङ्गदेशीय धलित शास्त्रानुसारे हइते पारे कि ना इति - श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिश्रीयुन ग्रोलियमवेराडोनसाहेवधम्माधिकरण- लिखितेशवोराब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयफेवरवरामासायबाणेन्दु - मितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नमतिलपत्र यतरदायमामावासिय- नेवेन्दुमितदिनसम्बन्धिचन्द्रयासरे मया प्राप्त तदवज्ञाक्य याहराबोधो बातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते-- प्रभुममर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति मृतधनिब्यक्तिविशेगो यदि ब्राह्मणः चात्रयो वैश्यो वा स्यात्तदा तस्यैव व्यक्ति,वशेष त्यधने अविवाहितस्त्रीगर्भजातस्य पुत्रस्य नाधिकार, किन्तु धनिना मृतस्योत्तराधि। कारिणामनुकूलत्वे यावनीवं ग्रासान्छादनभागिता पयति । यदि च मृत धनि व्यक्तिविशेषः शुदजातोयस्त सपि यदि धनिनो मृस विवाहितस्त्रीगर्भ जातकन्यादौहित्राणां मध्ये कश्चिन्नास्ति, तदा तस्यैव व्यक्तिविशेषस्य व्यक्त धने अविवाहितस्त्रीगर्भशातस्य पुत्रस्य मुनिभ्रातपुत्रस्य विद्यमानवाया- व्यवस्थापनसख्या-२५० ७४६ - . मधिकारः-दति पश्चिमदेशचलितमनुमितादरावीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्थानु- सारिणी बद्देशचलिददायभागदायतत्त्वदायक्रमसग्रहमतिग्रन्थानुसारिणी च व्यवस्थेति ।।- अत्र प्रमाणम्- जातोऽपि दास्यां शूद्रण कामतोऽशहरो भवेत् । मृते पितरि कुर्युस्तं मातरस्त्वभागिकम् ॥ अभ्रातृको हरेत् सव्वं दुहितॄणां सुताहते ।-इति मिताक्षरा- दायभागप्रभृतिग्रन्यधृतयाज्ञवल्क्य वचनम् ||१|| शूद्रेण दास्यां समुत्पन्नः पुत्रः कामतः पितुरिच्छया भागे लभते । पितुरूद्ध्यन्तु यदि परिणीता पुत्राः सन्ति, तदा ते मातरस्तं दासीपुत्रमई- भागिकं स्वभागादड़ दधु रित्यर्थः । अथ परिणीतापुत्रा न सन्ति तदा कृत्स्नं धनं दासीपुत्रो गृह्णीयात् । यदि परिणीतादुहितरस्तत्पुत्रा वा न सन्ति तत्सद्भावे त्वभागिक एव दासीपुत्रः । अत्र च शूद्रग्रह- गाद् द्विजातिना दास्यामुत्पनः पितुरिच्च्याप्यंशं न लभते, नाप्यर्द्ध दूरत एव कृत्स्नं किन्त्वनुकूलश्चेनीवनमानं लभते-इति मिताक्षरा( पृ. २१६ मन्थलिखनम् ।।२।। शूद्रस्य पुनरपरिणीतदास्यादिशूद्रापुत्रः पितुरनुमत्या पुत्रान्तर- तुल्यांशहर:---इति दायभाग पृ० १४३ )प्रत्यलिखनञ्चेति ॥३॥ व्यवस्थान्तरलिखनव्यग्रतया स्वकर्तव्यकाऱ्यांन्तरव्यग्रतया चैतद्वयवस्था- दाने एतावान् विलम्बो जातः इति निवेदनमिति ||- ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासीय द्विपक्षमितदिन- सम्बन्धिबृहस्पतिवासरे मया प्रभुसमातिविचारपत्र निवेदनपत्राभ्यां सहितेय. व्यवस्था दत्तति॥ श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण

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है
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व्यवस्थापनसंख्या-२५१
श्रीदुर्गा
तरजमा सोल-
( ११३)-जिला साहावादेर सदर प्रामिन श्राला सैयद
मनीअर अलि मोकाम गाटर मुनिसिफेर आपिल लम्बर ३:५-
नरकुसिंह मुद्दामालेह आपीलाएट वनाम मेघसिंह ओ
अक्षरसिंह
रप्राडण्टान्-
मोकाम कलिकातार सदर देओयानि श्रादालतेर पण्डितेर
प्रति सपाल । एइ ये, यद्यपि एक व्यक्ति हिन्दुजाति प्रापन मोरु-
शी धन हइते किचित आपन पुत्र ओ भ्रातप्पुत्र विद्यमान
थाकिते भगिनीपुत्र ओ पितृष्वसृपुत्रेर प्रतिपालनेर हप्टे ऐ व्यक्ति
के दान फरिया एवं अशी करिया ताहार दस्तावेज, जाहार
नकल एइ सवालसकलेर सङ्गे पाछे लिखिया दिया था। तवे
ए प्रकार दस्तावेज शाखानुसारे सिद्ध ओ यथार्थ ओ दानप्रहोता-
सकलेर स्वत्वेर प्रति गुणदायक हइवेक कि ना, एवं दानकर्ता
अर्थात् अंशोकारकसकलेर जीवशाय दानकर्तासम्लेर पुत्र-
पौत्रादिर प्रतिवन्धकता ताहाते अर्शिते पारिवेक कि ना इति ॥--
प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रमशरेजीशब्दप्रतिराद्याक्षरपत्र दस्तावेज
शब्दप्रतिपाद्यरत्रमाशारत्र च यदोशवोशन्मप्रतिपाय नुनिगुणगजेन्दुभिता-
न्दोय जानवरीमानीयगुणेन्दुमितदिनसम्बन्धिशुक्रवासरे मरा प्राप्तं तदव
लोक्य यादृशोधो नातस्तदनुसारेणोचरं लिख्यते-
प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येतादृशदस्तावेजशन्दप्रतिपाद्यपत्रं
तलत्रलिखितनियमनातदृष्टिविवेचनाभ्या शास्त्रानुसारेण सिद्धचति, एवं
दानग्रहीतृणां खत्वे प्रमाण भवति । दानकर्तृणा विद्यमानतायां नेपा
पुत्रौत्रादीनां तदिपये प्रतिबन्धकता न सम्भवति-इति पश्चिमदेशचलित-
मनुमिताक्षराचीरमित्रोदयमभूमिग्रन्थानुमारिणो व्यवस्याते ॥-
अत्र प्रमाणम्-
प्रदानं साम्यकारणम्-इति मनुवचनम् ॥१॥

यवस्थापत्रसंख्या-२५१-२५२ ७५१ पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्या स्नेहात् प्रत्युपकारतः। स्त्रीशुल्कानुग्रहार्थञ्च दच दानविदो विदुः ।।--इति मिताक्षरा(पृ० २४५)वीरमित्रोदय पु० ३६७)प्रभृतिग्रन्यभृतनारद( नमसं० पृ०६०) पचनम् ॥२॥ व्यवस्थान्तरलिखनव्यग्रतया स्वकर्तव्यकार्यान्तरव्यग्रतया रोगग्रस्त- तया चैतद्धयवस्थादाने एतावान् विज्ञम्बो बात इति निवेदनमिति- ईसवीशब्दप्रतिराद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयजुनमासीयमुनिपक्षमित- दिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रागरेजीराब्द- प्रतिपाद्याक्षरपत्रदस्तावेनगन्दप्रतिपाद्यपत्रैः प्रभुयाचितनिवेदनेन च सहित “व्यवस्था दत्तेति - श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्री श्रीदुर्गा (११४)-ल० २३६ ई सन १८३५ साल- रोकारि मिछिल मोकाम कलिकातार सदर देओयानि आदालत उक्त आदालतेर कायेम मोकाम हाकिम श्रीयुत प्रापशोप करुण इपमित साहेवेर वैठके-तारिख २२ माह जुन इशारेजी सन १८३७ साल मोतारक याङ्गला सन १२४४ साल तारिख १० आपाढ दिवस वृहस्पतिवार । दुर्गादासधरेर पिता ओ अलि ओ अछि आलम चन्द्रधर- आपीलाएट- विजयगोविन्दवडाल ओ गयरह रेप्पाडएटान- पापीलाण्टेर उकिल मुनशो होसेन आलि प्रो हानोर रेपाडएट विजयगोविन्दवडालेर उकिल जिमिप कोलवरूक

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व्यवस्थापनसंख्या-२५१
श्रीदुर्गा ।
तरजमा सोल-
( ११३)-जिला साहावादेर सदर प्रामिन पाला सैयद
मनीअर अलि मोकाम गाटर मुनिसिफेर आपिल लम्बर ३:५-
नरकुसिंह मुद्दामालेह पापीलाएट वनाम मेघसिंह ओ
अक्षरसिंह
रपाडण्टान्-
मोकाम कलिकातार सदर देशोयानि श्रादालतेर पण्डितेर
प्रति सवाल ! एइ ये, यद्यपि एक व्यक्ति हिंन्दुजाति आपन मौर-
शी धन हइते किञ्चित आपन पुत्र श्रो भ्रातप्पुत्र विद्यमान
थाकिते भगिनीपुत्र प्रो पितृप्यमपुत्रेर प्रतिपालनेर हष्टे ऐ व्यक्ति
के दान करिया एवं अशी करिया ताहार दस्तावेज, जाहार
नकल एइ सवालसकलेर मङ्गे पाछे लिखिया दिया थाके। तवे
ए प्रकार दस्तावेज शाखानुसारे सिद्ध ओ यथार्थ पो दानाहीता-
सकलेर स्वत्वेर प्रति गुणदायक हइवेक कि ना, एवं दानकर्ता
अर्थात् अंशोकारकसकलेर जीवद्दशाय दानकामकलेर पुत्र-
पौत्रादिर प्रतिवन्धकता ताहाते अर्शिते पारिवेक कि ना इति ।।-
प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रमगरेजीशब्दप्रतिपाद्याक्षरपत्र दस्तावेज
शब्दप्रतिपाद्यपत्रमाजापत्र च यदोशवोशन्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुभिता-
ब्दीय जानवरीमासीयगुणेन्दुमितदिनसम्बन्धिशुक्रबासरे मरा प्राप्तं तदव
लोक्य यादशबोधो जातस्तदनुसारेयोत्तरं लिख्यते-
प्रभुसमर्पितप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सत्येताहशदस्तावेजशन्दप्रतिराधरात्रं
ततलिखितनियमजातदृष्टि वेवेचनाभ्या शास्त्रानुसारेण सिद्धपति, एव
दानग्रहीतणां खत्वे प्रमाण भवति । दानकर्तृणां विद्यमानतायां तेषा
पुत्रपौत्रादीनां तद्विषये प्रतिबन्धकता न सम्भवति-इति पश्चिमदेशचलित-
मनुमितादरावीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्धानुसारिणो व्यवस्वेति ।।-
अत्र प्रमाणम्-
प्रदानं स्वाम्यकारणम् इति मनुवचनम् ॥१॥

व्यवस्थापनसंख्या-२५१-२५२ , ७५२ पण्यमूल्यं भृतिस्तुष्ट्या स्नेहात् प्रत्युपकारतः। स्रोशुल्कानुग्रहार्थञ्च दत्त दानविदो विदुः ||--हति मिताक्षण(पृ. २४५ )वोरमित्रोदय(पृ. ३६७ प्रभृतिग्रन्यधृतनारद(नमसं० पृ०६०) 'वचनम् ।।२।। व्यवस्थान्तरलिखनव्यग्रतया स्वकर्तव्य कार्यान्तरव्यप्रतया रोगग्रस्त- तथा चेतयवस्थादाने एतावान् विलम्बो जात इति निवेदनमिति- ईशवोशब्दप्रतिगद्यमुनिगुण गजेन्दुमिताब्दीयजुनमासीयमुनिपक्षमित- दिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रविचारपत्राशरेजीशब्द प्रतिपाद्याक्षरपत्रदस्तावेनरान्दप्रतिपाद्यपत्रैः प्रभुयाचितनिवेदनेन च सहित्य व्यवस्था दतेति - श्री यतितराम् श्रीवैद्यनाथमिण श्री श्रीदुर्गा (११४)-त० २३६ ई सन १८३५ साल- रोक्कारि मिछिल मोकाम कलिकातार सदर देोयानि आदालत रक्त आदालतेर कायेम मोकाम हाकिम श्रीयुत माणशोप करुण इपमित साहेवेर बैठके-तारिख २२ माह जुन इझरेजी सन १८३० साल मोतावक वाङ्गला सन १२४४ साल तारिख १० आपाढ दिवस वृहस्पतिवार । दुर्गादासधरैर पिता ओ अलि ओ अछि आलमचन्द्रधर.. पापीलाण्ट- विजयगोविन्दवडाल ओ गयरह रेपाडण्टान- आपोलाएटेर उफिल मुनशो होसेन आलि ओ हाजोर रेपाडएट विजयगोविन्दवडालेर उफिल जिमिप कोलबरूक व्यवस्थापनसंख्या-२५२ सदरनेण्ड माहेव हाजीर प्राइल । गतो कल्य एइ मोकईमा आमार चैठके उपस्थित । प्रथम पादालन सहर मुरशीदावादेर कागज सकल पार एइ आदालठेर दाखिल होया मौजेवाव ओ जोयाव प्रभृति साम्यक कागज एवं अन्य २ दलिलसफल जाहा गतो कल्य उभये दाग्विल करियाछिल, पडा हल्या दिवा. वसान प्रजुक्त मुलतवि छिल, अद्य पुनराय उपस्थित हइल । रेष्पाडण्टेर उकिल भैरवचन्द्रन्यायवागीशेर एककेता व्यवस्था ओगमतनुशम्मान्यायवागीशेर एक केता व्यवस्था ओ वेदकण्ठ- शर्मा एक केता व्यवस्था भो शिवनाथशिरोमणिर एक केता व्यवस्था, एकुने चारि केता, ताहार चारि केता तरजमा सम्बजित आर दुइ फर्ड फिरिस्ति पाठ तवा किमतेर दाखिल करिलेक । बोध कइल जे प्रापीलाएट मुईइ एक थाना प्रष्ट गोण्डा दुइ कडा दुई क्रान्ती जमिदारि प्रभृतिर दखल पाओनेर दाविते मवलगे ६५७० ॥६॥ टाकार तायदादे विजयगोविन्दवडाल प्रभृती मोहीमालेहेर नामे सहर मुरशीदावादेर आदालते नालिस करे । तथाकार जज साहेब आपन तजविज कालिन ताहार आपन फयशलार लिखित हेतुले एइ मोकईमार व्यवस्था तलवे दिन फई सोयाल सहर मुरशीदाबाद थो जेल नदिया भो जेला विग्भूमेर देओयानी धादालसेर पण्डिसदिगेर नामे पाठान दिन जेलार पण्डितदिगेर व्यवस्थासकल सानन्दमर्यादासीर नृतीय पुत्र, जे उक्त सानन्दमयोर भ्राता महानन्ददत्त ओतस्य वनितार मृत्युर पर अन्मियाछे, सत्व नाराखा विवाणे पोधिले पर उक्त व्यवस्थासकल एवं जजसाहेव मोछफेर फयसलार लिखित अन्य २ व्यवस्था अनुजाइ गरेजी सन १८६५ सालेर २१ जुलाइ तारिखे मुईइ आपोलाएटेर दावि डिसमिस हय । मुद्देई पापीलाएट साहार असम्मतिते श्रापालेर द्वागय एइ आदालते उपस्थित पाने, पार नाहा इङ्गारेजी सन २०२६ सालेर ३१ मार्चेर होया एइ श्रादालतेर रोयकारिर लिखित हेतुते व्यवस्थापनसंख्या-२१२ હરે श्रीयुत राबरट हाल उन राटरि साहेव हाकिमेर बैठके द्वितीय विवेचना ओ गोरेर जोन्य बोध हय इति- जे हेतुक कोन हुकुम प्रकाश करणेर पूर्व निचेर लिखित मतो विन सोपाल पद प्रादालवेर पण्डितेर स्थाने जिज्ञीश्य उचित । प्रथमत, एइ जे मुरशीदावाद मोतालगेर जङ्गोपुर साकि- नेर छत्तीचन्द्रदत्त प्रापन पुत्रगए महानन्ददत्त श्री परमानन्द- दत्त यो कन्यागया आनन्दमयीदासी यो सानन्दमयीदासी श्रो पुरणानन्दमयीदासी श्री जमीदारि डिहिंगणकर प्रभृति विषय राखिया देह त्याग करे। ताहार मृत्यर पर महानन्ददत्त श्रो परमानन्ददत्त दुइ पुत्र प्रापन २ पितृ-वस्तुर पर दखलीकार थाकिया उक्त परमानन्ददत्तेर विवाह ना फरिया मृत्यु हय । ताहार मृत्युर पर महानन्ददत्त आपन पितार तापत वस्तुर पर दखलिकार हइया आपन वनिता द्रवमयीदासीके प्रोयारिस राखिया निःसन्तान परलोक प्राप्त हय । ताहार मृत्युर पर द्रवमयी उहार आपन स्वामीर स्थावरादि विपयेर पर देखशि- कार हइया स्वामीर भग्नीगण अानन्दमयी श्रो सानन्दमयी ओ आनन्दमयीर गर्भजात पाँच पुत्र श्रो सानन्दमयीर गर्भजात दुइ पुत्र पो उक्त मृत महानन्ददत्तेर अवीरा भग्नी पूरणानन्द- मयीर सन्मुखे मृत्यु हय । ततपरे आनन्दमयीर स्वामी देह त्याग करे, आर सानन्दमयीदासीर गर्भ तृतीय आर एक पुत्र जन्मे। परे जे पुत्र महानन्ददत्त भो तस्य वनिता द्रवमयीदासीर मृत्युर पर मृत महानन्ददत्तेर भग्नी सानन्दमयीदासीर गर्भ जन्मियाछे, से पुत्र शास्त्रानुजाइ महानन्ददत्त ओ तस्य वनिना यमयीर स्थावरादि धन हइते द्वितीय भ्रातागणेर तुल्यारा पाइने पारे कि ना। पार यदि इहार पर सानन्दमयीदासोर गर्भ पुनार पुत्र जन्मे, से पुत्र महानन्ददत्त भो तस्य बनितार स्थावरादि वस्तु हइते उहारदिगेर तुल्यांश पाओनेर सवाधिकारि हइते पारे कि ना। द्वितीय, सुवे नडिस्या ओ वाङ्गलार शात्र श्रो व्यवहार प्रथम ७५४ व्यवस्थापनसंख्या-२५२ सोयालेर लिखित विपये अक्य पाछे, किम्वा किछु अनैक्य । तृतीय, ये हेतुक आनन्दमयोर पाच पुत्र ओ सानन्दमयीर दुइ पुत्र, सास्यक सात जत, आनप २ मातुल मृत महानन्ददत्तेर मृत्युर पर रित मते श्रादालते नालिस करिया आपन २ सत्त्वे डिगरि हासिल करिया तदानुजाइ सात जना प्रापन २ अंशेर पर आदालतेर हुकुमेर द्वाराय सरकारेर ताहुते नाम जारिते भोग- वान हया थाके । ए विषय अष्टम पुत्रेर, जे महानन्ददत्त प्रो तस्य वनिता द्रवमयीदासीर मृत्युर पर जन्मियाछे, ताहार सत्वेर अन्यधार कोन हेतु हइते पारे, कि ना। ए प्रयुक्त हुकुम हइल जे एइ रोक्कारिर नकल एइ मोकईमार फयसलार सम्वलित एइ आदालतेर पण्डितेर निकट एइ हुकुमे पाठान जाय जे उपरेर लिखित तिन सोयालेर उत्तर एइ हुकुम पोछार दिवस हइते तिन दिवसेर मध्ये लिखिया दाखिल करेण, आर अद्य एइ मोकईमा स्थकित थाके इति- श्रीजयतितराम् एतद्धर्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतफ्रानशीटकरण दशमित- साहेवधम्माधिकरणजिसितेशवोशन्दप्रतिपायमुनिगुणगजेन्दुमितान्दोयजुन- मासीयद्विपक्षमितदिवसोयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र तत्समर्पितजयपत्रं च यत्तदन्दोयतन्मासीयमुनिपदमितदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तर लिख्यते- प्रथमप्रश्नस्योत्तम्- प्रथमप्रश्नलिखितवृत्तान्ते सति मृतमहानन्दचस्य भगिन्याः सानन्द मयोदास्या गर्भतो महानन्ददचस्य तसल्या द्रवमयोदास्याच मरणानन्तर बनितो जनिष्यमाणपत्रश्च महानन्ददत्तस्य कसल्या द्रवमयोदास्यास त्यक्ता स्थावरप्रभृतिधनतोऽधोलिखितप्रथमप्रमाणेन भ्रात्रन्तरतुल्यांशभागी भवितुं शक्नोति । किन्तु अधोलिखितदितोयतृतीयप्रमाणाम्यां भ्रात्रन्तखल्पांयभागी भवितुं न शमोतीति-

व्यवस्थापनसंख्या-२५२
७५५
अत्र प्रमाणम्-
ये जाता येप्य जाताश्च ये न गर्ने व्यवस्थिताः ।
वृत्तिञ्च तेऽभिकांक्षन्ति वृत्तिलोपो विगहिंतः ॥ इति दायमा-
गादिग्रन्यधृतमनुवचनम् ||१||
वृत्तिलोपः पितामहधने निरंशकतम्-इति श्रीकृष्णतालकार-
कृतदायभागटोकालिखनम् ||२||
क्रमागतजीवनोपाय एव वृत्तिशब्देनोच्यते-दति विवादभाव-
ग्रन्थलिखनम् ॥३॥
द्वितीयप्रश्नस्योत्तरम्-
यद्यपि उक्तलदेशे प्राधान्येन प्रचलितमन्यः शम्भुकरवाजपेयी विद्या-
करवाजपेयो च । तयोवारंवारमन्वेषणेऽप्यद्यापि सो ग्रन्थी न पाती।
तावदृष्ट्वा ताभ्यां वनदेशचलितयात्रस्यैक्यमनेस्यं वेति निश्चयो न जातः ।
किन्तु उत्कलदेश मिताक्षराममृतिग्रन्थानुसारेणापि व्यवस्था भवति । अत-
एवोत्कल देथे चलितशास्त्रव्यवहाराभ्या वनदेश नलितशास्त्रव्यवहारयोः
प्रथमप्रश्नलिखितविषयभेदोऽस्त्येवेति-
तृतीयप्रश्नस्योत्तरम् -
तृतीयप्रश्नलिखितविषयो महानन्ददत्तस्य वत्सल्या द्रवमयीदास्याची
परमानन्तरं जनितस्याष्टमपुत्रस्य स्वत्वस्यान्यथाकारको भवितुमईति, यतः
शास्त्रानुसारेण राजाच्या च व्यक्तीभूतप्रादेशिकस्वत्वास्पदीभूततत्तद्भाशे
महानन्ददत्तस्य तसल्या द्रवमयोदात्याश्चोपरमानन्तरं जनितत्य पूर्वधन.
स्वामिमृतमहानन्ददत्तपितृदौहित्रस्य स्वत्वं भवितुं नाहति-इति वनदेश-
चलितमनुदायमागप्रभृतिप्रन्यानुसारिणी व्यवस्येति -
अत्र प्रमाणम्-
सकृदंशो निपतति सझन् कन्या प्रदीयते ।
सहदाह ददानीति प्रीएयेतानि सतां सत् ॥ इति मनु.
वचनम् ॥२॥

व्यवस्थापनसंख्या-२५२-२५३ अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः स्वतन्त्रः पृथिवीपतिः--दति व्यवहार- तत्त्व(पृ. ६४ विवादावतेनुविवादमङ्गार्णवप्रभृतिग्रन्यभृतनारद( ना- सं० २६ पृ०२६ वचनञ्चेति ||२|| ईशवीशन्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयागस्त्यमासीयद्विपक्षमिद- दिनसम्बधिशनिवासरे मया प्रभुसमपितविचारपत्रादिसहितेयं व्यवस्था दचेति- श्रीजयतितराम्- श्रीवैद्यनाथमिश्रेण श्री यतितराम (११५)-तरजमा सवाल- यद्यपि रामगोपालमित्र नामे एक व्यक्ति कायस्थ जाति गुडवा तालुका जमोदारी खरिद करिया ताहाते दखिलकार दिलो। उहार पनीर गर्भे चीनि पुत्र । प्रथम महतापराम, द्वितीय गुलावराम, मृतीय मानिकराम जन्मियादिलो। ताहार मध्ये ऐ महापराम श्रो मानिकराम केवल श्रापन यापन स्त्रीके उत्तराधि. कारिणी रासिया आपन पिता रामगोपालमित्रेर साक्षाते निस्स. स्वान मरियाछे। ओ ऐ मृत दुइ भ्रातार श्रीगण ए यण पर्यन्त विद्यमाना आछेन । इहार पर गुलावराम द्वितीय पुत्र ओ आपन पितार साक्षाते आपन चारि जन पुत्र अर्थात अनूपराम ओ दुर्लभराम यो मुकुन्दराम श्री माधवरामके राखिया मृत्यु हय । भो रामगोपालेर मृत्युर पर ऐ गुलाबरामेर पुत्रगणेर नाम समस्त जमिदारीते दाखिल हइया लेसा गेलो। ताहार पर गुलावरामेर प्रथम पुत्र अनूपराम ओ तृतीय पुन मुकुन्दराम केवल आपन आपन खोफे रासिया क्रमे परलोक प्राप्त हलेन, मो द्वितीय पुन ऐ दुर्लभराम भापन कनिष्ठ भ्राता माधवराम भो भनूप- स्यवस्थापनसंख्या-२५३ रामेर स्त्री श्री मुकुन्दरामेर नीर सहित साधारणे ओ एकान्ते ऐ जमीदारीते दखिलकार थाकिया एक स्त्री श्री अविवाहिता एक कन्या ओ आपन फनिष्ठ भ्राता माधवरामके राखिया परलोक गमन करिलेक । ताहार पर ऐ अविवाहिता कन्यार विवाह ऐ कन्यार पनेर टाका व्यय करिया किम्वा ऐ जमीदारीर उपस्वत्वेर द्वाराय माधवरामेर कर्तृत्व थाकिते हइलो। ताहार पर ऐ महता- परामर स्त्री ओ गानिकरामेर बी यो अनूपरामर स्त्री प्रो मुकुन्द- रामेर स्त्री ऐ जमीदारीर उपस्वत्व हइते आपन आपन खोरोपोसेर उपयुक्त धन लइवार नियम फरिया फलकटरीते ऐ जमीदारीर नादावी विपयेर दरखास्त गुजराइया ऐ जमीदारीर दावी हइते निरास हुइलेन । एक्ष्यणे अोइ मृत दुर्लभरामर स्त्री अोइ माधव- रामेर अंश आठ आना जमीदारी ओ चारि थाना जमीदारी ओइ चारि जना अधीरा स्त्रीगणेर खोरोपोपेर जन्ये मिनहा दिया वाकि चारि आना जमीदारीर हिस्या आपन स्वामीर अंश करार दिया, पापन स्वत्वेर एजहारे ओ आपन मृत्युर पर श्रापन कन्यार स्वत्वेर एजहारे आदालते नालिस करियाछे-ए प्रकारे वङ्गदेशेर चलित शास्त्रानुसारे मृत दुर्लभरामेर स्त्री ओइ जमीदारीर धारि आना शेर स्वत्वाधिकारिणी वदे कि ना इति- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रमगरेजीशन्दप्रतिपाद्यलिपिमाशापत्रच यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयापरेलमासीयवेदपक्षामितदि. नसम्बन्धिचन्द्रनासरे मया प्राप्तन्तदवलोक्य याहराबोधो जातस्तदनुसारे- योत्तरं लिख्यते- एतत्प्रश्नलिखितविषये मूलनिनो रामगोपालमित्रस्य मरणानन्तरं विद्यमानानान्तत्यौपाणामाद् गुलावरामस्य घनिद्विवीयपुत्रस्य पुत्राणाम नूपरामदुल्लभरामनुकुन्दराममाधवरामाणां मूलधनिनो रामगोगलमित्रस्य व्यवस्थापनसंख्या-२५३-२५४ त्यत्तस्थावगदिसमुदायधने पौत्रत्वेन समानाधिकार बाते सति तेषाम्मध्ये दुर्लभरामस्य पुत्रौत्रमरीत्ररहितस्योपरमे तद्योग्यांशे मद्रामगोपाल- मित्रस्य दुर्लभरामपितामहस्य त्यकचतुर्थाशे दुर्लभरामपल्या एवाधिक कार:-इति वनदेशचलितमनुदायभागप्रतिमन्यामुसारिणी व्यवस्थेति-- अत्र प्रमाण- पली दुहितरश्चैव पितरौ मातरस्तथा ॥ इत्यादि दायभागादि- अन्यतयाज्ञवल्क्यवचनम् ॥१॥ प्रथमं पुत्रस्तदभावे पौत्रस्तदभावे प्रपौत्र इति । प्रपौत्रपप्यन्ताभावे पत्री च ।-इति श्रीकृभ्यतालङ्कारकृतदायभागटोकालिखनञ्चेति ॥२॥ सदरदिमानौपम्माधिकरणसम्बन्धिस्वकन्यकार्यवतव्यप्रतया बहुदिना न्यात्यन्तिकरोगप्रस्ततया चैतद्यवस्थादाने एतावान् विलम्बो जात इति निवेदनमिति । ईशवीचन्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयसितम्बरमा- सीयेकादशदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रमुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्राग- रेजीशन्दप्रतिपायलिपिभिः सहितेयं व्यवस्था पारशीकलिपिनिम्मितउत्पति- रूरपत्रेण प्रभुयाचितनिवेदनपत्रेण च सदरदिमानीधर्माधिकरणे एतद्ध- वस्थाप्रतिरूपरक्षणार्धमेतद्वयवस्थामतिरूपपारशीकलिपितत्पश्नप्रतिरूपैश्च सहिता दलेते- श्रीजयतितराम् धीवैधनाथमिण मोकाविला श्रीवैद्यनाथमिश्र श्रीदुर्गा (११६)-प्रश्न वनाम पण्डित प्रादालते सदर देशोयानि- एए थे, रामपृयादेन्या थापन स्वामी ओ पुत्रेर लोकान्तरेर पर आपन पुत्रवधूर समिक्ष्याय आपन स्वामिर पूर्व पुरुपेर विषयेर मध्ये किद्धित भूमि अर्थात पे विरधीय वस्तु पापोलाएट व्यवस्थापनसंख्या-२५४ सावेक मुद्दइर पितार सहित आपन भग्नीर गर्भयात कन्या श्रीमतिदेव्यार विवाह देनोन कालिन कुलमर्यादा सरवे पापीलाएटेर पिताके दान करिते पारे किना। यद्यपि करिते पारे, तवे तन्निमित्त शाव सम्मत पुत्रवधूर सम्मतिर आविश्यक आछे कि ना-इहार उत्तर यथाशास्त्र पर प्रश्नेर पार्श लिखि- वेन इति- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रद्वयं निवेदनपत्रमनरेजोशब्दप्रतिपाद्य लिपिमाज्ञापत्रञ्च यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयापरेलमा- सीयवेदपक्षमितदिनसम्बन्धिनन्द्रवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य याशबोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- एतत्प्रश्नलिखितविपये श्रीमतीदेव्या विवाहसमये कौलिकमर्यादार्थ विवादास्पदीभूतकिञ्चिभूमिदानं रामप्रियादेव्याऽवश्यकर्तव्यं चेत्तदा राम- प्रियादेवीपुत्रवधूसम्मत्या रामप्रियादेवीकृतदानं शास्त्रानुसारेण सिद्ध भवितुमर्हति । तदानसिद्धौ रामप्रिया देव्याः पुत्रवध्वा अनुमतिरप्यावश्यकी । यदि च श्रीमतीदेव्या विवाहसमये कौलिकमव्दार्थ विवादास्पदीभूत. किञ्चिद्भूमिदान रामप्रियादेव्याऽवश्यकर्त्तव्यं नासीचदा रामप्रियादेव्याः पुत्रवध्वा अनुमतावपि रामप्रियादेवीकृतदान शास्त्रानुसारेण रिद्धं भवितु- नाईति-इति वङ्गदेशचजितमनुदायभागमभृतिमन्धानुसारिणो व्यवस्थेति- श्रत्र प्रमाणम्- भर्ता जीवन् यथा यस्य पोपणादिकं यद् यद् वा कर्म करोति मृतभत्ते कापि सशक्त्यनुसारेण तथैव तस्य पोषणं तच कर्म कुचीत- दति निवादमगावग्रन्धलिखनम् ||१|| स्वामिनोऽनुमतिसत्वे तु अस्वामितविक्रयोऽपि सिद्धयति, व्यवहा- रोऽपि तथा इति तद्ग्रन्पलिखनम् ॥२॥ मृते भर्तरि साध्वी सो ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । स्नाता प्रतिदिनं दद्यात् स्वभत्रे सलिलाञ्जलीन् ।

व्यवस्थापनमंख्या-२५४-२५५ कुर्याचानुदिनं मस्त्या देवतानाञ्च पूजनम् । विष्णोराराधनचैव कुानित्यमुपोषणम् ॥ दानानि विप्रमुल्येभ्यो दद्यात् पुण्यविवृदये। उपवासांश्च विविधान् कुर्याच्छावादिताञ्छुभे । इति दायभागादि- ग्रन्थधृतव्यासवचनम् ।।३।। अपुत्रा शयनं भर्तु : पालयन्ती गुरौ स्थिता । भुजीतामरणात् ज्ञान्ता दायादा अवमाप्नुयुः ।।इतिदाय- भागादिप्रत्यधृतकात्यायनवचनम् ॥४॥ सदरदिमानीधर्माधिकरणसम्बन्धिस्वकर्तव्यकार्य जातव्यमतया बहुदिना न्यायन्तिकरोगग्रस्ततया चैतद्वयवस्थादाने एतावान् विलम्बो जात इनि निवेदनम् इति । ईशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुपिताब्दीयसितम्बर मासोथैकादशदिनसम्बन्धिचन्द्रयासरे मया प्रभुममपिंतप्रश्नपत्राभरेजीशब्द- प्रतिपाद्य लिपिनिवेदनात्रैर्विचारपत्राम्याञ्च महितेयं व्यवस्था पारशीकलिपि निम्मिततत्प्रतिरूपपत्रेण प्रभुयाचितनिवेदनपत्रेण च सदरदिमानीधर्माधि. करणे एतस्यवस्थाप्रतिरूपरक्षयार्थमेतद्वयस्थाप्रतिरूपरङ्गदेशीयलिपि. निम्मितव्यवस्थाप्रतिरूपैश्च सदिता दचेति- श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाधमिश्रेण मोकाविला श्रीवैद्यनाथमिश्र श्रीश्रीदुर्गा (११७) प्रश्न:- यदि कोन अंशनामाय जीवतमान वेतोर अवतमान वेतोर १. गुरुयोरन्यो दवार पुरणिय-६५० !

व्यवस्थापत्रसंख्या-२५५ ८६१ सहित अंश होयार कथा लेखा थाके, से अंशनामा शाखानुसारे ग्राह्य हइते पार कि ना इति-- श्रीजयतितराम् प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रं विचारपत्रद्वयं विभागपत्रमगरेजीशब्दप्रतिपाद्य. लिपिमापरच यदीशवीशब्दप्रतिपाद्यगुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयमैमासो- याङ्कमितदिनसम्बन्धिमङ्गलवासरे मया प्राप्त तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनुसारेणोतरं लिख्यते-- यदि कस्मिंश्चिद्विभागपत्रे विद्यमानव्यक्तिविशेषस्या विद्यमानव्यक्तिविशेपेण सहितांशभवनं लिखितं स्याचदा तद्विभागपत्र स्वतोऽविद्यमानव्यक्तिविशेष. स्यांशप्राप्तितात्पर्येण ग्राह्यं भवितुन्नाईति, अविद्यमानव्यक्तिविशेषस्य स्वतोऽशग्राहकत्वाभावात्; किन्त्वविद्यमानन्यक्तिविशेषोत्तराधिकारिणामंश- मासितात्पर्येण ग्राह्य भवितुमर्हति - इति बनदेशचलितमनुदायभाग प्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति- सदरदिमानीधर्माधिकरणसम्बन्धित्वकर्तव्यकार्यजातन्यप्रतपा बहु- दिनान्यात्यन्तिकरोगग्रस्ततया चैतळ्यवस्थादाने विलम्बो जात इति निवेदन- मिति- ईशवीशब्दप्रतिशयमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितम्बरमासीयवाणपक्ष- मितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्रविमागपत्र विचार- पन्यारेजीशन्दप्रतिपाद्यलिपिभिः प्रभुयाचितनिवेदनपत्रपारशीकलिपिनि- मितव्यवस्थाप्रतिरूपपत्राभ्यां च सहितेयं व्यवस्था एतद्धर्माधिकरणे एतद्वत्थाप्रतिरूपरक्षणार्थमेतद्वयवस्थाप्रतिरूपानवङ्गदेशीयलिपिनिम्मि. तप्रश्नपत्रपारशीकलिपिनिम्मितव्यवस्थाप्रतिरूपपत्र सहिता दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण मोकाविला श्रीवैद्यनाथमिश्र ७६२ व्यवस्थापनसंख्या-२५६ (११८)-लं० ३२१ सन १८३५ सालेव~- रुवकारि मिधिल आदालते सदर देओयानि मोकाम कलि- काता। वैठक जान रास हेचिसन साहेव उक्त श्रादालसेर काएम मोकाम हाकिम सन १८३७ साल ता०६ सेतम्बर मोवावेक सन १२४४ साल तारिख २२ भाद्र दिवस बुधवार- सिउवहायसिंह ओ गयरह आपीलाण्टान- चेताकुकर ओ ओमेदकुङर रेनाडेण्डान्- पापीलाण्टेर उकिलगण मुनशो होसनश्रालि ओ जिमिस. चारलेस कोलवरक सदरलेण्डसाहेव श्री मिरकविध होसन ओ काजि पेगाम्बर क्स मोकारगण ओ हाजिर रेडिएडर उफिल मुनशी गोलाम श्राहम्मद हाजिर आसिन । गतो पागष्ट माहार १० तारिखे ए मशहमा प्रामार बैठके पेस हइया सकल कागज पत्र पडा जाइया मुलतवि छिल, अद्य पुनराय पेस हयाते धोध हइल जे एइ श्रादालतेर फयछला अनुसार केहरसिंहेर हिस्या ताहार कन्या ज्ञानकुकरेते अर्श, आर केहरसिंहेर द्वितीय कन्यार पुत्र सोतासिंह, जे ज्ञानकुरेर मृत्युर पर सत्य राखितो, ज्ञानकुरेर सायाते मृत हय, भार वाहार पर ज्ञानकुडर अापन कन्या उमेदकुकरके राखिया मरे। आर ए यने उक्त दोवासिंहेर पुत्र सिउस्वहायसिंह भार तोताकुरेर भ्राता नाथुः सिंहेर पुत्र नरेन्द्रनारायण भो गयरह, जे तोतासिंह आपन मातार सायाते फीत करियाछिल, भासल मालिक केहरसिंहेर वस्तुर उत्तराधिकारि सुरते ऐ हिस्यार दावि राखे। ए कारण चूडान्त हुकुम होनेर पूर्व एइ मकईमाते शास्त्र हुकुम ज्ञातो हओया एइ विषयेते, जे विवादीय हिस्यावे उभयेर मध्ये के स्वस्त राखे, उचित हइया हुकुम इइल जे एइ रुवकारिर नकल एइ हुकुमे जे विवादीय हिस्सार प्रति दृष्टी प्रार दाविदारानेरदिगेर प्रति दृष्टी जे ताहारदिगेर प्रसङ्ग उपरे लेखागेल (विचार) करिया- लेखेन ने पश्चिम प्रचलित शास्त्र अनुसारे केहरसिंहेर हिस्या,.

व्यवस्थापत्रसंख्या-२५६ जाहा ज्ञानकुङरेते पोछियाछिल, ज्ञानकुरेर मृत्युर पर ताहार कन्याके किम्वा केहरसिंहेर दौहित्रगण नाथुसिंहेर पुत्रगणके भो तोतासिंहेर पुनके पीछिवेक-एइ नादालतेर पण्डितके समापन करा जाय इति - श्रीज्जयतितराम् एतदम्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुत जानरासचिसनसाहेव- धर्माधिकरणलिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितम्बर - मासीयरसमितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदब्दोयतन्मासी. यगजेन्दुमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्तन्तदवलोक्य याहशमोधो जातस्तदनुसारेगोत्तरं लिख्यते- प्रभुसमर्पितविचारपत्रलिखितविषये ज्ञानकोमराख्यासंक्रान्तकेहरसिंह- व्यक्तांशे शानकोमराख्याया उपरमानन्तरं तत्कन्पायाः स्वत्वं मिताक्षरा- बालम्भदृविरचितमिताक्षराटीकाप्रभृतिग्रन्यानुसारेण भवितुमर्हति इति पश्चिमदेशचलितमिताक्षयबालम्भद्दविरचित मिताक्षराटीकामभूतिग्रन्थानुसा.. रिणी व्यवस्थेति- अत्र प्रमाणम्- पितृमातृपतिभ्रातृदत्तमध्यग्न्युपागतम् । आधिवेदनिकाय च स्त्रीधनं परिकीर्तितम्।।- इति मिताक्षरा- वीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्यधृतयाशवल्क्यवचनम् ।।२।। पित्रा मात्रा पत्या पात्रा च तदत्तं यच्च विवाहकाले अग्नावधि- ऋत्य मातुलादिभिर्दत्तम् । आधिवेदनिकमधिवेदननिमित्तमधिविश्वखिये दद्यादिति वक्ष्यमाणम् । आयशब्देन ऋक्यायसंविभागपरिग्रहाधिगम- प्राप्तमेतत्त्रीधनं मन्वादिभिरुक्तम् । स्त्रीधनशब्दश्च यौगिको न पारिभा. पिकः, योगसम्भवे परिमापाया अयुक्तवाद्-इति मितादरा- ग्रन्थलिखनम् ॥२॥ यथा मातृधनग्रहणे दुहितृदोहित्रीदौहिन्नपुत्रपौत्रादिक्रमातथा पितृ- धने पुत्रपौत्रप्रपौत्रपत्नीदुहितृदोहित्र दौहित्र्यादिक्रमस्य प्रत्यासत्तिार- ७६४ व्यवस्थापनसंख्या-२५६-२५७ तम्येन न्यायपासत्तात् सीधनं दुहितृणामप्रचानामप्रतिष्ठितानाचे ति गौतमवचनस्य पितृधनेऽपि समानलादित्यनुपदमेशोतरता विज्ञानेश्वरेण सूचितलाद तत्सम्मतमपीदमिति-इति बालम्भट्टविरचितमितादण्टीका- रूपग्रन्थलिखनश्चेति। श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण . - (११६) ल. २६३ सन १८३३ साल- रोक्कारि मिछिल आदालत सदर देओनी मोकाम कलि- काता तारिख -१ सेप्तम्बर सन १८३७ साल मोतावके ६ आश्विन सन १२४४ वागला श्रीयुत चारलिस हारिडिङ्ग साहेव काएम मोकाम हाकिमेर वैठके- वल्लभिकान्नचौधुरि স্বর্ণীলাঃ नवकान्तचीधुरि- रेप्पाडण्ड आपीलाण्डेर उकिल मुनशी आवास प्राति ओ रेपाडण्डेर उकिलान मुनशी वंशीवदनमित्र ओ रामप्राणराय हाजिर आशी- लेन । अद्य एइ मकद्दमा तरमिव मोतावेक यामार वैठके दरपेश हइया पादौ ओ द्वितीय श्रो एइ विचारस्थानेर लावत कागजात पडा गेलो। चदि स्यात एइ मकद्दमाय रेप्पाडण्डेर पुष्य-पुत्र राखनेर विशये जेला प्रो एइ आदालतेर पण्डितलोकेर निकट जिज्ञाशा गियाछिल, ताहाते परिडतान प्रापन २ सय पुष्य पुत्र सिद्धि होनेर विशये लिखियाछेन । विशेसत एइ मकद्दमार हुकुम होनेर पूर्व सन्देह भजनार्य एइ पादालतेर परिडतेर निकट कएक विशय जिज्ञाशा प्राधिश्यक हश्या हुकुम हाल जे एइ रोवकारिर नकल एद हुकुमे एइ थादालतेर पण्डितेर स्थाने समापन करा जाय जे निवेर लिखित प्रश्नसकलेर जोध चङ्गदेशीय चलित शाघानुसारे काहारि वन्देर पर एक सप्ताहेर . व्यवस्थापनसंख्या-२५७ ७६५ मध्ये दाखिल करेण । प्रथम, एइ जे, यदि कोन पीडित व्यक्ति पीडाते अज्ञान हझ्या रय, पार ततकालिन कोन एक व्यक्ति एक वालकके लइया ऐ पीडित व्यक्तिके कहे जे तुमि पुष्य पुत्र लइवा, आर से समय ऐ पीडित व्यक्तिर मुखे हइते हाँ शब्द निर्गतो हय, तवे शास्त्रानुसारे एइ प्रकार पुष्य पुत्र सिद्धि हइते पारे कि ना। द्वितीय एइ जे, पुष्य पुनेर विशये शाम्रानुसारे वयेशेर किछु निरपन पाछे कि ना। यदि निरपन थाके, तवे सेइ निरपन जावदीय हिन्दु जातीर निमिर्ते, कि हिन्दुर मध्ये सकल जातीर विभिन्न्य बटे-विस्तार करिया लिखेन इति- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतचालिसहारिडिगमाहेव- घम्माधिकरणलिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयसितम्बर मासीयेन्दुपक्षमितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्रं यत्तदन्दीयनव- म्बरमासोयेन्दुपक्षमितदिनसम्बन्धितृहस्पतिवासरे मया प्राप्तन्तदवलोक्य याबोधो जातस्तदनुसारेगोत्तर लिख्यते- प्रथमप्रश्नसोचरम्- रोगाभिभूतस्याशानावस्थायां केनचिदेक बालकमादाय तमेव रोगाभि- भूतव्यक्तिविशेषमुद्दिश्य लं दत्तकपुत्रं ग्रहीध्यतीत्युक्तौ रोगाभिभूतव्यक्ति विशेषमुखतो हाँ इति शब्दप्रयोगे सत्येवंभूतदत्तकपुत्रश्शास्त्रानुसारेण न सिद्धपति, दत्तकपुत्रतासिद्धिसम्मादकशास्त्रीयनियमजातनिष्पत्तेः प्रथम- प्रश्नलिखितविषयतो ज्ञातुमशक्यतया तनियमजातनिष्पचिमन्तरेण दसक- पुत्रतासिद्धेश्शास्त्रीयत्वस्य भवितुमशक्यत्वादिति- अत्र प्रमाणम्- पुत्र प्रतिग्रहीप्यन् वन्धूनाहूय राजनि निवेद्य निवेशनस्य मध्ये व्या- हृतिमिर्तुत्ला अदूरवान्धर्व वन्धुसनिकृष्टमेव प्रतिग्रहीयात-इति दत्तक मोमांस(पृ. १०२ )प्र(भतिग्रन्थधृतवरिष्ठवचनम् ||२|| व्यवस्थापनसंख्या-२५७-२५८ , द्वितीयमश्नस्योचरम् - ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यबातीयानामुपनयनप्राक्कालपर्यन्त शूद्रजातीया- नान्तु विवाहप्राक्कालपर्यन्तं दचकपुत्रता शास्त्रीया भवति-इति बङ्गदेश. चलितदत्तकमीमांसादत्तकचन्द्रिकाप्रभृतिग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेति- अत्र प्रमाणम्- चूडाद्या यदि संस्कारा निजगोत्रेण वै कृताः। दत्ताधास्तनयास्ते स्युरन्यथा दास उच्यते ।। इति दचकमीमामा- प्रभृतिप्रन्यधृतवचनम् ॥२॥ एवञ्च चूडाचा इत्येतद्गुणसविज्ञानबहुव्रीहिणा द्विजातीनामुप. नयनलाभः, शूद्रस्य तु विवाहलामः- इति दत्तकचन्द्रिकासन्य- लिखनञ्चेति ॥२॥ ईशवीशब्दप्रतिपायमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयनवम्बरमासीयगुणपक्षमि- तदिनसम्बन्धिबृहस्पतिवासरे प्रभुसमर्पितविचारपत्रसहितेयं व्यवस्था मया दत्तेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण (१२०)-तरजमा रोवकारि- लम्बर ६१३१ । रोवकारी मिसिल आदालत दिमानी सदर मोकाम इलाहावादे तारिख २५ माह अपरेल सन १८३७ ईशवी मोताविक ५ माह वैशाख सन १२४४ फसली, रोज मङ्गलवार श्रोलियम मनकटन् साहेव काएम मोकाम हाकिम श्रादालत मजकुरार बैठके इति- मोसम्मात लक्षुमना ओ ठाकुर- यापीलाएटान् वेचनलालेर मृत्युर पर ताहार पुत्र मुकुन्दलाल-रप्पाडण्ट श्रापीलास्टेर भोकीलगण शेख महम्मद सफी ओ लाला.

व्यवस्थापनसंख्या-२५८ ७६७ मथुरादास ओ रष्पाडण्टेर पोकीलगण मौलवी इनामुल्लाह ओ लाला रामचन्द्र हाजीर हइलेन । ओलियम फिनमेकडीक साहेब हाकिमेर सन हालेर फिवरवरी मासेर तेइसा तारिखेर हुकुमा- नुसारे ए मोकदिमा अद्य प्रामार बैठके रोवकार हइया जिलार दुइ पादालतेर कागजात श्रो वाराणसेर कोर्ट आपील श्रादाल- तेर कागजात ओए मोकदिमार तजविज-सानीर कागजात ओ ओइ हाकिमेर राय सम्वलित सन हालेर फेवरवरी मासेर तेइसा तारिखेर लिखित ओइ हाकिमेर रोक्कारिर लिखित विस्तीर्ण हेतुसकल ओ सन १८२३ ईशवीर अपरैल मासेर दशइ १० तारिखेर रजिस्तर साहेवेर फैसलार सम्पीय फौजदारी श्रादालतेर कागजात ओ भजनलाल मदे ओ मोसम्मात लक्षुमनामुदापालेहेर मोकद्दिमार कागजात ओ जज आपीलेर ओइ मोकद्दिमार सन १८२४ ईसवीर जुन मासेर १४ चौदही तारिखेर फैसलार सम्पर्कीय कागजात पढा गेलो। अतएव ए मोकदिमाते कलिका- तार सदर दिमानी आदालतेर पण्डितेर निकट हइते व्यवस्था तलव करा आविश्यक बोध हइया हुकुम हइलो ये नीचेर लिखित विस्तीर्ण सवाल ये प्रकार एइ रोवकारीते लिखा आछे सेइ प्रकारे लिखिया एइ रोवकारीर नकल सम्वलित ओ ऐ आदाल- तेर रजिस्तर साहेवेर चिठोर सहित कलिकातार सदर दिमानी श्रादालतेर रजिस्तर साहेवेर निकट पाठानो जाय ये कलिकातार सदर दिमानी आदालतेर रजिस्तर साहेव कलिकातार सदर दिमानी पादालतेर पण्डित हइते अोइ सवालेर जवाव लइया ए आदालते पठाएन इति । सवाल एइ ये, यद्यपि दुइ भ्राता ताम्बुलि जाति पैतृक स्थावर धन विभागेर पर प्रापन आपन अंशेते दखिलकार छिलेन, प्रो ओइ दुइ भ्रातार मध्ये एक जन एक स्त्री ओ एक अविवाहिता कन्या राखिया मृत्यु हइया थाके, ओ अोइ खी आपन कन्यार विवाह कराइया थाके । ताहार पर ओइ कन्यार मृत्यु हय । ताहार पर ओइ मृत भ्रातार खी मापन ।

व्यवस्थापनसंख्या-२५ पतिर विभक्त धने दखिलकार छिलो, द्वितीय पति करे। ए प्रकारे जिज्ञासा करा जाइतेछे ये मृत व्यक्तिर पनीर द्वितीय पति करण शाखानुसारे सिद्ध वटे कि ना। यद्यपि सिद्ध हय तथे श्रापन प्रथम पतिर स्थावर धन याहा ओइ स्त्रीर दखले पाछे. ताहा पाइवेक, किम्वा ओइ खीर दखली स्थावर धन श्रोइ खीर प्रथम पतिर भ्राताके अर्शिवेक । ओ यद्यपि ए विपर खुलासा शाने ना पाओया जाय तवे देशाचार ो जात्याचार प्रमाण जाना जाइवेक कि ना। ओ एइ सवालेर यवाव वाराणस देशोर चलित शास्त्रानुसारे लेखेन इति- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितविचारपत्रमगरेजोशब्दप्रतिगद्यलिपिमाणपत्रं च यदीशवी- शन्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दोयमैमासोयाङ्कपक्षमितदिनसम्बन्धिचन्द्र- वासरे मया मातन्तदवलोक्य यादशबोधो बातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते-- ताम्बुलिकजातीययोर्दयोभ्रांत्रोः पैतृकस्थावरधनस्य विभागानन्तरं स्वस्वाशे पायत्चत्वं सम्पादितवतोरेकस्य पत्नीमेकामविवाहितां कन्यामेको विदाय मृतस्य पत्नी स्वकन्याविवाई कारितवतो स्यात्, पश्चात् मा विवाहिता कन्या परलोक जगाम, तदनन्तरं च मृतस्य भ्रानुः पत्नी स्वपतित्यक्त- विभक्तपने वायत्तत्व सम्पाद्य पत्यन्तर कृतवती चेतत्सत्यन्तर करण यद्यपि साध्वीस्त्रीयां शास्त्रसिदं न भवति । किन्नु साधोभिनानामपि स्रीया कतिनित्प्रभेदाः शास्त्रे उताः । तेपाम्प्रभेदानां तृतीयस्यैरिगोत्रीलक्षण मितादराप्रभृतिग्रन्येषु स्पष्टतया लिखितम् । तदृष्ट्या वाराणसीप्रभृतिदेशे ताम्नुनिकनातीयत्रोणां पत्युपरमानन्तर पत्यन्तरकरण मवहत चेचदैतद्धि- वाट्सम्बन्धिन्या मृतस्य भानुः पल्पाः शास्त्रानुसारेण तृतीयस्वैरिएया: पत्यन्तरकरण तजातीयन्यवहारानुसारेण सिद्ध मविनु शमोति । एवमुपरिः लिम्मिनप्रकारेण तस्याः खियाः पत्यन्तस्करणस्य सिदी सत्यामुत्तमाधिका- रित्वन स्वायत्तीभूतप्रथमपतित्यकधने यावनीवं तस्या एवाधिकारस्तस्या- ओनन्त्यान्तप्रथमपतिभ्रातुनाधिकारस, उतराधिका रित्वेन स्वत्वोसत्यनन्तरं 1 व्यवस्थापत्र संख्या-२५८ ७६४ केनचिद्दोपेण तत्स्वत्वनाशस्य शास्त्रानुसारेण भवितुमशक्यत्वात्-इति वाराणसीप्रदेशचलितमनुमिताबरावीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यव- स्थेति- - अत्र प्रमाणम्- सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीएयेतानि सता सकृत् ।। इति मनु( ६।४७) वचनम् ॥१॥ न द्वितीयश्च साध्वीनां वचिद् भत्तोपदिश्यते ॥ इति मिताक्षरावीर- मित्रोदयप्रभृतिग्रन्यधृतमुनिवचनम् ॥२|| मृते भर्तरि तु प्राप्तान् देवरादीनपात्य या । उपगच्छेत् परं कामात सा नृतीया प्रकीचिंता ॥-दति उपरिलिखि- तग्रन्यधृतनारद( नास्मृ०५० । पृ० १७६)वचनम् ||३|| जातिजानपदान धर्मान् श्रेणीधीश्च धर्मवित् । सगीय कुलधर्माश्च स्वधम्म प्रतिपालयेत् ।। इति मनुवचनम् ॥४॥ पत्नी दुहितरश्चैव पितरौ भ्रातरस्तथा-इत्यादि मिताक्षरावीर मित्रो. दयप्रभृतिग्रन्यतयाज्ञवल्क्यवननम् ||५|| पत्नी गृहीयादित्येतद्वननजातं विभक्तमातृस्त्रीविषयम्-इति मिताक्ष- रामन्थलिखनम् ॥६॥ एतेषां विभागात प्रागेव दोपभाक्त्तनांशिवम्, न पुनर्विभागोत्तर- मपि दत्तविभागापहरणम्, प्रमाणामावाद-इति वोरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्थ- लिखनश्चेति ॥७॥ कलिकाताख्यमहानगरसम्बन्धिसदरदिमानीधर्माधिकरणसम्बन्धिस्व - कर्तव्य कार्यातव्यमतया बहुदिनान्यात्यन्तिकरोगग्रस्ततया पैदयवस्था- दाने एतावान् विलम्बो आत इति निवेदनम् । इति ईशवीशन्दप्रतिपाद्य- मुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयनवम्बरमासीयमुनिपक्षमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया मभुसमर्पितविचारपांगरेजीशब्दमविपायलिपिभ्यां सहितेयं व्यवस्था पारशीकलिपिनिम्मितव्यवस्थाप्रतिरूपपत्रेण प्रभुयाचितनिवेदनपत्रेस फलि. ४६ . ।

व्यवस्थापनसंख्या-२५८-२५६ काताख्यमहानगरसम्बन्धिसदरदिमानीधम्माधिकरणे एतद्यवस्थाप्रतिरूप रक्षणार्यमेतद्यवस्थाप्रतिरूपपत्रपारशीकलिपिनिम्मितव्यवस्थाप्रतिरूपपत्रवि- चारपत्रप्रतिरूपपत्रैश्च सहिता दवेति- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण मुकाविला श्रीवेद्यनाथमिश्र । (१२१)-तरजमा रोवकारी- रोवकारी प्रादालत दिमानी जिला फतेहपुर जाननेयावलि- सरेवाज साहेव जजेर बैठके। तारिख २ जुन सन १८३७ ईशवो। गङ्गापुत्रादिगेर श्री जमुनापुत्रदिगेर वृत्ति क्रमागत धन वदे कि यजमानेदिगेर एमत क्षमता पाछे ये आपन आपन इच्छा मते याहाके तुष्ट हइया दिते चाहेन ताहाके दिवे पारेन-ए विषय सदर दिमानी आदालतेर पण्डित हइते ज्ञात होया आवश्यक वोध हइया हुकुम हइलो ये एइ रोवकारीर नकल अङ्गरेजी चिठीर सहित मोकाम एलाहावादेर सदर दिमानी पादालतेर प्रवल. प्रताप हाकिमानेर हजुरे पाठान जाय, ये उपरेर लिखित ओइ पण्डितेर निकट हदते ए विपय ज्ञात हया ए श्रादालते अनुप्रह- पूर्वक प्रेरण करेण इति- श्रीजयतितराम् प्रभुसतिविचारपत्रएचीपत्रादरेषीशन्दप्रतिपालिपिमाणपत्रञ्च यदी. शवोधन्दमतिराद्यमुनिगुपगजेन्दुमितान्दीरजुलाइमासीवरसमितदिनसम्ब- निधगुरुवासरे ममा प्राप्तं तवलोक्य याहराबोधो मातस्तदनुसारेणोत्तर लिस्पते-.

व्यवस्थापत्रसंख्या-२५६-२६० ७११ . गनापुत्राणां यमुनापुत्राणां च वृत्तिः प्रानोनपुरोहिताना तेषां मागत भवितुमर्हति प्राचीनपुरोहितान्तान् पोरोहित्यकामनिधिमारप्रयोजशास्त्रीय दोघमन्तरेण यजमानाः परित्यज्य स्वस्वेच्छया पुरोहितान्तरं कर्नु न शस्नु वन्ति इति-पश्चिमदेशचलितमनुमिताक्षरावीरमित्रोदयमभृतग्रन्थानुसारिणी व्यवस्थेवि ।।- अत्र प्रमाणम्- ऋत्विज यस्त्यजेद्याज्यो याज्यं चर्विक् त्यजेद्यदि । शक्तं कर्मण्यदुष्टं च तयोर्दण्डः शतं शतम् ॥ इति वारभित्रो. दय( पृ० ३८६ )प्रभृतिग्रन्थधृतमनु( ८।३८८ वचनम् ||१|| कलिकाताख्यमहानगरसम्बन्धिसदरदिमानीधर्माधिकरणसाबन्धि- स्वकर्तव्यकार्य बातम्यमतया बहुदिनान्यात्यन्तिकरोगग्रस्ततया चैतद्व्यवस्था दाने एतावान् विलम्बो जात इति निवेदन मिति । ईशवीशन्दमतिपा- धमुनिगुणगजेन्दुमिताब्दीयनवम्बरमासीयमुनिपरमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्रभुसमर्पितविचारपत्राकोजीराब्दप्रतिपायलिपिसू वीपः सहितेय व्यवस्था पारशीकलिपिनिम्मित्तव्यवस्थाप्रतिरूपपत्रेण प्रभुयाचितनिवेदन- पत्रेण कलिकाताख्यमहानगरसम्र घिसदरदिमानीधर्माधिकरणे एतद्व्य. वस्थाप्रतिरूपरक्षणार्थमेतद्व्यवस्थाप्रतिरूपपत्रपत्र गरशीकलिनिम्मितव्य वस्थाप्रतिरूविचारपत्रप्रतिरूपत्रैश्च सहिता दत्ता इति ।। श्रीर्जयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रेण नोकाविला श्रीवैद्यनाथमिश्र-३ श्रीश्रीहरिः ( १२२)-न० २५२ सन १८३५ सालेर- ख्वकारि मिशिल प्रादालते देओयानि सदर मोकाम कलि- व्यवस्थापनसंख्या-२६. काता वैठक जान राम हेचिसन साइव, उक्त पादालतेर कारम मोशाम हाकिम सन १८३७ साल तारिख ६सेतम्बर मोदायके सन १२४४ साल तारिस २२ भाद्र बुधवार- सिउवहायशाहुर मृत्युर पर ताहार पुत्र गोपाललालेर ओयालि- बदामुकडर पापीलाएट बुनियादिसिंह रेयाडेण्ट गतो मार्च माहार २८ तारिखे एइ माईमा प्रामार वेटके पेस हइया सकल कागज-पत्र पडा जाइया रानी कृष्णमनी पापी- लाएट ओ गजा उदअन्तसिंह रेप्पाडेण्ड एइ मकई मार एइ श्रादालतेर फयछेला मोमाइजा करणेर कारण भार मृत अापी- लएटेर उत्तराधिकारिर हाजिरेर निमिषे इस्ताहार जारि करणेर कारण मुलतवि छिल । अद्य पेसकारेर ज्ञात करान मते जे मृत आपिलएटेर उत्तराधिकारिर सावुदेर वावत रिटरन फामेल पोछिया मृत श्रापिलाएटरजाएगाय गोपाललालेर अलि मोछम्मति वादामुकुडरेर नाम लेखा गियाछे; आर ताहार तरफ हइते मुनसि होसन प्रालिर नामे ओ जिमिस चारलेस कोलवरक सदरलेएट साहेवेर नामे मोकालतनामा दाखिल ह्याचे । उक्त उकिलगरेर हाजिरिते पार रेष्पाडेण्डर गरहाजिरिते जे एयालामनामा जारिते रसिद लिखिया देओयातेश्रो उकिलेद्वाराय फिम्बा खोद हाजिर नाइ । पुनराय पेस इइवाय वोध हइल जे काजियार ग्राम- सकल पूर्व हइते ७००० टाका आगामिते इस्तक सन १९२३ नागाद सन १२२८ फसलि सातवत सरमियादे श्रापीलएदेर पितार इजारा छिल, प्रार ऐ श्राशामिर टाका श्रादाएर ओ- यादा इजारार अन्यसनेर अन्ते छिल। यदि स्यात वाहा सोयादा मते श्रादाय ना हय, तये ऐ टाका श्रादाय पर्यन्त इजारा वाहाल थाकिवेक । इहार परे बुनियादिसिंह रेयाडेण्डर ो प्रताव सिंहेर पिता खडगनारायण ४३०० टाका तमसुकसकलेर द्वाराय उक्त इजारादारेर निकट हइते लइया १२२५ साले काजियार प्राम व्यवस्थापनसंख्या-२०० ७७३ सकल श्रार दोसरा ग्राममकल पार रेप्पाडेएट आर प्रतापसिंह नावालग पुत्रगणके उत्तराधिकारि राखिया फौत करे। ताहार पर तमसुकेर टाका तलब तागादाय खडगनारायणेर बनिता मत्ति- कुडर नावालगदिगेर माता काजियार ग्रामसकल १२००१ टाकावे वयवेल उफा राखिया निर्मातेर टाका हइते पाशामिर टाका पार तमसुकेर टाका मिनाह दिया चाकि टाका आपनि लय । यदि स्यात्, रेप्पाडेएट प्रकाश करितेछ जे मतिकुडर वय- वेल प्रोफार द्वाराय काजियार ग्रामसकल हस्तान्तर करणेर क्षेमता राखे ना, पार इजारार आगामि टाका श्रादाएर श्रीयादा इजारार अन्त सते, न चेत नाहा आदाय पर्यन्त इजारा वाहालेर शरत छिल। पार इजारा वाहालेते रेवाडेण्डर विपये स्थव्यं वैतितो कोन खेति छिल ना। किन्तु चुडान्त हुकुम होनेर पूर्व शास्त्रर हुकुम जाना एइ विपएते जे मतित्रुडरेर निकट हइते तम- सुकेर टाका तलब करा आर तमसुक ो गयरहेर टाका श्रादाय कारण काजियार ग्रामसकल हस्तान्तर करणेर मतिकुछरेर क्षेमता छिल कि ना उचित हइनेछे । ए कारण हुकुम हइल जे एइ रूवकारिर नकल एइ हुकुमे जे लिचेर लिखित प्रश्नेर उत्तर पश्चिम देशीय प्रचलित शास्त्र अनुसारे रूबकारि पोछिवार तारिख हइते एक सप्ताहेर मध्ये लेखेन, एइ आदालतेर पण्डितक समापन करा जाय। प्रथम, एइ जे, खडगनारायणेर लिखित तमसुक ो गय- रहेर टाका मतिकुडरेर निकट हइते तलव करा उचित छिल, कि ना। द्वितीय, एइ ये, यदि स्यात् नावालगगणेर अलि मतिकुङरेर निकद हइते तमसुक थो गरहेरय टाका तलव करा उचित हय, ववे उहार इनारार विपय परिवत् कारियार प्रामसकल वयवेल श्रोफा राखिया तमसुकेर टाका पार पाशामि टाका किमतेर दाका हइते मिनाह करणेर क्षेमता छिल कि ना इति- १० प्रोफा इति प्रतः परः पाठः ।।

व्यवस्थापनसंख्या-२६०-२६१ श्रीजयतितराम एतधर्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तभीयुत जानरासहेचिसनसाहेवध- मर्माधिकरण लिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिवान्दोसितम्बरमा सीयरसमितदिवसीय विचारपत्रान्तर्गतमश्नभातशविरूपपत्रं यत्तदन्दीयतन्मा. सोयगजेन्दुमितदिनसम्बन्धिचन्द्रवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशोधो जातस्तदनुसारेणोत्तरं लिख्यते- प्रथमपश्नस्योत्तरम् --- प्रभुसमर्पितविचारपत्रलिखतविषये खहगनारायणलिखितर्णलेल्यप्रभृति राजतमुद्रायाचनकरणं मतिकोमराख्यासन्निधौ शास्त्रानुसारेगोनितन्नासीत् । पुत्रेषु विद्यमानेषु पितृऋणांपाकरणस्य' प्रथमतः पुरैरैवकर्तुमुचितत्वात् । द्वितीयप्रश्नस्योचरमप्यर्थादत्रैव पर्यवसितमिति पृथड्न लिखितमिति निवे दनम्-इति पश्चिमदेशचलितमनुमिताक्षगवीरमित्रोदयप्रतिमन्या नुसारिणीव्यवस्थेवि- अत्र प्रमाणम् Jणमात्मीयवत् पित्र्यं पुत्रैर्दय विभाषितम्-ति मितावा( पृ. १५२ )प्रभूतिमन्यधृतवृहस्पति पृ० ११५ वचनम् ॥१॥ तत्र कमोऽप्ययमेव-पित्रमावे पुत्रा-इति मिताक्षणापृ० १५२ ग्रन्थ- लिखनञ्चति ॥ ईथवीशन्दप्रतिवाद्यमुनिगुणगजेन्दुमिवान्दीयदिसम्बरमासीयरसमितदि. नवम्बन्धिबुधवासरे मया प्रभुसमपितविचारपत्रसदिय व्यवस्था दति--- श्रीजयतितराम् श्रीवैद्यनाथमिश्रण श्रीदुर्गा (१२३)-१०० ल० जारि- जेला दिवस परगणार महालक पौकि नवावगम्जेर मोन- 1.रित्रशरण-भ्यर।

ज्यवस्थापनसंख्या-२६१ ७७५ छफी काचारि हइते सदर देओनि पादालतेर श्रीयुत पण्डितेर निकट व्यवस्थार कारण सोल एइ- गुरुप्रशादराय-१ डिगरिदारान् इन्द्रनारायणराय-१ सा. काठालिया- 'परगणे कलिकाता। श्रीमतीगुणमयोदासी देनादार- सा. सुकचर प० ऐ- दावि २१७१६ टाका- मा० जारिर स्वरचा- यद्यपि देनादार श्रीमत्या गुणमयीदासीर स्वामी रधुनाथ- वल्लभ स्थावर ओ अस्थावर दिव्यादि एवं श्रीराखालवल्लभ नामक अमाप्तवयेप एक नावालक पुत्र एवं स्त्री दासी मजकुराके राखिया लोकान्त हय । ऐ रघुनाथ मजकुरेर लोकान्तेर पर तस्य वनिता अर्थात दासी देनादार मजकुरा अप्रमोल जन्य ऐनावालग 'पुत्रर प्रतिपालनार्थे ऐ डीगरिदारानेर निकट सुखा तामाकु कर्ज लइया व्यवसा करिया ऐ नावालगेर प्रतिपालने खरच करे । ऐ तामाकुरेर किमंत परिशोद ना होते डिगरिदार मजकुरान नालिपेर द्वाराय डिगरि हासिल करिया ऐ डिगरि जारि करिया ऐ रघुनाथ, मतोओफार जायदाद ४ि दाफा जाहा ऐ नावालगेर हक ताहा क्रोक कराइयाछ । अतएव शास्त्रानुसारे नावालग राखाजवल्लभेर पिता श्री रघुनाथ वल्लभ मवनोफार जायदाद श्रीमतीगुणमयीदासीर देना परिशोधाथे विक्रय हइते पारे कि- इहार व्यवस्था इति- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपन विचारपत्रमतरेजोलिपिमाज्ञापत्र च यदीथवी- शब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दोयमैमासीयत्राणेन्दुमितदिनसम्बन्धिच - ७७9 व्यवस्थापनसंख्या-२६२ (१२४)--सोयाल- यद्यपि कोन एक व्यक्ति हिन्दु आपन जातीय धर्म हइते जात्यन्तर हुइया अन्य धर्मावलम्बीय हय, आर ताहार स्त्री आपन जातीय हिन्दु धर्म अवलम्बी थाकिया आपन ऐ स्वामीर निकट जाइते अशन्मतो हय, तवे हिन्दुदिगेर शास्त्रानुसारे ऐ स्त्री आपन जात्यन्तरीय स्वामी हइते विच्छेद हइया आपन पित कि भ्रात आलये थाकिते पारे, किम्वा विचारकर्ता हाकिम आपन क्षमताय ऐ स्त्रीके ताहार ऐ जात्यन्तरीय स्वामीके अर्पन करिते पारेन-इहार व्यवस्था शास्त्रानुसारे जाहा हय, एइ प्रश्तेर प्रति उतर लिखेन इति-- श्रीजयतितराम प्रभुसमर्पितप्रश्नपत्र विचारपत्रमगरेजीशब्दप्रतिपाद्यलिपिमाज्ञापत्रं च यदीपशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगजेन्दुमितान्दीयजुलाइमासीयरसमितदिनरा - म्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तं तदवलोक्य यादृशवोघोजातस्तदनुसारे- पोत्तर लिख्यते- प्रश्नलिखितविषये हिन्दूजातीया काचित् स्त्री स्वजातीयधर्मनिरता सती स्वजातीयधर्माच्युतपात्यन्तरधर्मानुष्टातृपतिसन्निधौ गन्तुमसम्मता चेत्तदा स्वजातीयधर्माच्युतजास्यन्तरधर्मानुष्ठातृपतिविरहिता एव पितुभ्रांतु- वां रहे स्थातुं शक्नोति, एवं राज्ञापि शास्त्रानुसारेण स्वजातीयधर्माच्युतजात्य- न्तरव्यवह पतिसन्निधौ स्थापयितुं योग्या न भवति-इति मनुदायभागविवा- दमार्णवमितक्षरावीरमित्रोदयप्रभृतिग्रन्यानुसारिणी व्यवस्थेति-- अत्र प्रमाणम्- नष्टः प्रजितः क्लीवः पतितो राजकिल्विपी। लोकान्तरगतो वापि परित्याज्यः पतिः स्त्रियाः।। इति विवाद- भङ्गार्यवप्रभृतिग्रन्थधृतदेवलवचनम् ॥१॥ दम्पत्योः परस्परधर्मव्यतिक्रमे सत्यन्यतरजाने दण्डेनापि स्वधर्मव्यव. १. व्यवद्वतन्य व्यवस्थापनसंख्या-२६३ ७७६ दरवारे हाजिर नाइ। एइ मकदमासन हालेर २१ सेप्तम्बर तारिखे आमार बैठके दरपेस हइया मिछिलेर कागजसकल दृष्ट करणेर पर तारिख मजकुरेर रोवकारीर लिखितानुसारे कएक प्रश्न एइ आदालतेर पण्डितेर स्थाने जिज्ञाश्य हइया स्थकित छिल । परे अद्य रोक्कार हइया पण्डितेर दाखिल करा एइ मासेर २३ तारि- खेर लिखित व्यवस्था दृष्टे आइल । ताहाते एइ मकद्दमार खास पापील मञ्जुरेर पूर्वे आदालतेर पण्डित एइ आदालतेर सोलेर जोगवे जेलार आदालतेर पण्डितेर व्यवस्थाय रेप्पा- डण्डेर पुष्य पुत्र सिद्धिर विपये जेलार पण्डितेर व्यवस्था जथार्थ लिखियाछेन । आर पण्डित मौछफेर हालेर दाखिल करा व्यव- स्थार द्वाराय जेलार आदालतेर व्यवस्थार अनक्वी बोध हइतेछ । अतएव हुकुम हइल जे पुनराय शावेक व्यवस्था ओ एइ पादालतेर पण्डितेर हालेर व्यवस्था प्रोजेला प्रादालतेर पण्डितेर व्य- वस्थार नकल एइ रोवकारिर नकल सम्बजित एक सप्ताह मेयादे परिडतेर स्थाने समापन करा जाय जे आपन सावेक व्यवस्था ओ हालेर व्यवस्था ओ जेला श्रादालतेर व्यवस्थार मजमुनेर प्रति विचक्षण विवेचना करिया रेप्पाडण्डेर पुष्य पुत्रेर विपये जाहा यथार्थ हय विवरण करिया लेखेन, एइ आदालतेर परिडतेर कैफियत दाखिल करा पय॑न्त एइ मकदमा स्थमित थाके इति- श्रीजयतितराम एतद्धर्माधिकरणाधिपतिस्थानाभिषिक्तश्रीयुतचारलिपहार डिगसाहेव- धम्माधिकरणलिखितेशवीशब्दप्रतिपाद्यमुनिगुणगनेन्दुमिताब्दीयनवम्बरमा- सोयगजपक्षमितदिवसीयविचारपत्रान्तर्गतप्रश्नप्रतिरूपपत्र तत्समर्पितमहत्त- प्राचीनावाचीनन्ययस्थाप्रतिरूपपत्र जिज्ञास्यावान्तरधर्माधिकर नियुक्त पण्डितलिखितव्यवस्थाप्रतिरूपपत्रं न यत्तदब्दीयदिशम्बरमासीयमुनिमित. दिनसम्बन्धिवृहस्पतिवासरे मया प्राप्तन्तदवलोक्य यादृशबोधो जातस्तदनु- सारेण निवेद्यते- व्यवस्थार सूची सन १८२४ साल ई १- वावु हरप्रकाशसिंह श्रापीलाएट मृत राजा देलगजनदेयो रप्याडरर पक्षी नो भ्राता यो भ्रातुपुत्र थाकिवे के अधिकारि हय, एहार व्यवस्था २--दुल्लीपाडे यो गयरह यापीलागटान काशीपाडे यो गयरह रमाडएटान एक पुत्र दत्तक करिते पारे किना श्रो महामाक्षणीय वृत्ति हस्तान्तर करिव पारे कि ना, एहार व्यवस्था ३-मृत व्यक्तिर भ्रातुप्पुत्र यो भ्रातृपोत्रेर उत्तराधिकार हनोयार व्यवस्था ४-मुथम्मात दिपु यापीताएर गौरीराकर रपाडएट उत्तराधिकारिर व्यवस्था ५-शेख गोलामवाली वनामे मिरजा एवराहिम वेग हिन्दूजातीय स्त्रीलोक यवनजाति प्राप्त हय, तादार उपार्जित द्रव्य के पाय एहार व्यवस्था १८-२० ६-रामसेवकसिह नापीलाएट मूत हाजारिदमनसिंह ो गयरह रणादण्टान उत्तराधिकारिर व्यवस्था २०-२२ ७--जगमोहनमुखोपाध्याय पारोलाएट पवाननचद्योगधाय प्रभूति रपाडएटान उत्तराधिकारिर व्यवस्था २६.३२ ५-स्वर्णकार जावीर मुजेर व्यवस्था इं. सन १८२५ साल ६--श्रीमति हेमलताचीधुराणी श्रापीलाएट श्रीमति पद्ममणि रपाडएट उत्तराधिकारिर व्यवस्था १०--श्याममुन्दरमहेन्द्र श्रापीलाएट कृष्णचन्द्रभ्रमरखरराय ( पापड) रमाडएट दासीर गन्भंजात पुत्र सम्पर्कीय व्यवस्था ११--मृत व्यक्तिर दत्तकपुत्र यो औरसपुर सहित विभागेर व्यवस्था ३६.३७ १२-योगिजातीर स्त्री सती दनोयार व्यवस्था १३--मृत व्यक्तिर स्वोपार्जित धन पिता श्री भ्राता यो पुत्रदिगेर सहित विभागेर वस्या ३०-४० १४--प्रियागसिह पापीलाएट अयोध्यासिद रपाडण्ट औरसपुर सहित दत्तकपुत्रेर विभागेर व्यवस्था १५-धर्मचन्द्र पो गयरह सायेलान देवालये सेवारत नियुक्त करणाधिकारेर व्यवस्था १६-धर्मचन्द्र प्रभृति शायेल ऐ उपरेर लिखित विपयेर व्यवस्था хче १७--जानकीनायराय प्रभृति श्रापोलाएटान गद्भागोविन्दवन्द्योपाध्याय धाडरट उत्तराधिकारिर व्यवस्था ५२६१ १८-मृत राजा अरिमनशादि श्रापीलाएट शिवदयाल उपाध्याय प्पाडएट मृत व्यक्तिर भ्राता यो भ्रातपुर मध्ये के उत्तराधिकारि हय, पहार ब्यवस्था १६-माझण सोदप दुइ भग्निके विवाह करिया ऐ दुर बनो एकत्र राखि पारेकि ना, ताहार व्यवस्था पू८६० जा २०- कुन्दनागिर श्रापीलाएट दुर्गागिर यो गयरह रप्याडएटान हिन्दूर औरस जात यवनीगर्भजातेर कोन जाति व्यवहार हय, हार व्यवस्था २१-ब्राह्मण जाति सरिकि मते मदिरार वोतल व्यापारेर व्यवस्था २२-मृत व्यक्तिर ज्येष्ठ पुत्रर स्त्री श्री कनिष्ठ पुत्रेर सहित विभागेर व्यवस्था ६४-६७ २३-दास दासीके विक्रय करिवार व्यवस्था ६७-७० २४-कृतदास मोर व्यवस्था ई०१८२६ साल २५-मृत भवाणीचरणचन्द्रेर उत्तराधिकारि राधावल्लभचन्द्र यो गयरह श्रापीलाएटान मृत गोविन्दचन्द्रचोधुरिर उत्तराधिकारि जगचन्द्रचौधुरि यो गयरद रप्पाडएटान देवर मोकररी पाटार व्यवस्था २६-राधावल्लभचन्द्र यो गयरह श्रापीलाएटान जगचन्द्रचौधुरि सो गयरह रेपाडएटान ऐ उपरेर लिखित विसयर व्यवस्था ७६-७E २७-मित्रजिसिहेर अली श्रीमती मनुविवि शाएला स्वामोर मातुलपुत्र उत्तराधिकारि हयोवार व्यवस्था ७६८२ २८-श्रमति सुलक्षणा 'पापीलाएट श्यामाप्रसादनन्दि पो गयरह रप्पाउण्टान उत्तराधिकारिर व्यवस्था २९-कमलाकान्तघोसाल यो गवरह वनामे रामहरिनन्दिग्रामि यो गयरह ब्रह्मोत्तर जमि दानेर व्यवस्था ८६ .

३०-भवाणीलाल बनामे हरीशविविर माईमा उत्तराधिकारीर व्यवस्था ८६६३. ३१-मृतगौरिममादचौधुरि यापीलाएट मुसम्मात जयमालाचौधुराणो राडएट मातृसंक्रान्त पुत्रपनेर विक्रयेर श्रो उत्तराधिकारिर व्यवस्था ६३६७ ३२-मृत व्यक्तीर सप्तम पुरुष शाति श्रो मातुलपुत्र, इहार मध्ये उत्तराधि- वारिर व्यस्था ६७ ३३---सप्त प्रकार प्रागमेर व्यवस्था ६७-६८ ३४-कुशलरायेर उत्तराधिकारिदिगेर विभागेर व्यवस्था ६८-१०१ ३५---मृत व्यवीर तिन स्रो, ताहारदीगेर सात पुत्र, ताहार विभागेर ज्यवस्था १०१-१०४ ३६-प्रसादसिंह राजपूत जातेर पोरस एवं धानुक जातेर स्त्रीर गर्ने उसज हइयाधिल, ताहार खोरपोपेर व्यवस्था १०४ ३७-धातुप्पुत्र थाकिते दौहित्रके कृत्रिमपुत्र करिते पारे किना, ताहार व्यवस्था १०५ ३८-स्वामीर अनुमतिते दत्तक राखियाछे, सेह दत्तक उत्तराधिकार इनोवार व्यवस्था १०५-१०६ ३६-धाजमीर देशेर सम्मकीय व्यवस्था, बगदेश दायभाग मते दत्तक- पुर सत्ये सिद्ध पटे कि ना, ताहार व्यवस्था १०६१०७ इ. १८२७ साल ४०-यमाप्तव्यवहार शिवनाथपेर पक्षे प्रति बलरामश्यु यनामे भानुमती दास्या । स्त्रीधनेते पुत्र नो मृतपुर स्त्रोर उत्ताराधिकारिर व्यवस्था १०७.११० ४१-नकिशोरदास ताहार देवा उत्तराधिकारि व्यवस्था ११०.११४ ४२-शहरदास सायेल खोपकर व्यास्था खावेश ४३-नहिराम श्रापीलाएट मुशम्मात अानन्दिवाइ पाडण्ट सत्ति देवार व्यवस्था ११८-१२० ४४- राममोहनघोष वनामे रामघोनराय पो गयरह हिन्दूर परवेर वन्दर दिने पत्युने तालुकेर निलेम होनेर व्यवस्था १२०-१२३ ४५-छन्दासिंह श्रापीलाएट मुशम्मात दुर्गाकुमार रप्याडएट स्त्री कन्या सखे हेवार व्यवस्था १२३-१२७ ४६-छन्दासिह श्रापीलाएट मुशम्मात दुर्गाकोटर रपाडएट उत्तराधिकारिर व्यवस्था १२७-१२६ ४७-रायबंशीधर बनामे मनोहरलाल उत्तराधिकारिर व्यवस्था १२६-१३१ ४८-आनन्दिलाल सायेल यो रायधुमनलाल सायेत उत्तराधिकारिर व्यवस्था ४६-अभिमानराय सायेल हकस्यपादारेर दाभोयार व्यवस्था -भवाणीचरणदत्त सायेल स्त्रीलोकर दस्तावेज देनोयार व्यवस्या १३६-१३८ ५१-गणेश अापीलाएट विनमिया शडएट देवरके साँगा करार व्यवस्था .१३८-१४१ ५२-गणेश अापोलाएट मुशम्मांत वेलसिया पाढण्ट साँगा करा स्नोर ग्रोथारीसेर व्यवस्था १४१-१४३ .

J ५३-सरकार मुद्दे योमरायोराय शतिर अोयारिश यो दण्डधारिचौवे श्रो झाम मुयालेहेम। अनुमरर व्यवस्था १४३-१४५ ५४-कालीप्रशादराय सायेल अप्राप्तव्यवहारेर धन जिम्बार व्यवस्था यो उचाधिकारिर व्यवस्था १४५.१४७ ५५-रामप्रशादवन्दोपाध्याय श्रापीलाएट श्रापन अप्राप्तव्यवहारा कन्या अन्नपूर्णादेव्यार पर हइते श्रीमति देव्या श्रो गयरह रपाडएटान सुवर्णादेव्या श्रोजरदार पितृधने दुइ कन्यार अधिकार हहया एक कन्या मरिले ऐ धने ऐ कन्यार पुत्र श्रो ऐ कन्यार भमि, इहार मध्ये काहार अधिकार- इहार व्यवस्था ई. सन १८२८ साल ५६-देविदयाल प्रभृति श्रापोलाएटान हरहोरसिंह रष्पाडएट राश वसिवार व्यवस्था १५१.१५३ ५७--जयरामगिर वनामे मायागोर यो देविगीर गुरुर त्यक्त धन पाया धापन चेलार असम्मति हस्तान्तर करे, ताहार व्यवस्था १५४-१५६ ५८-सपनो श्रोताहार कन्या श्रो ताहार पुत्र थाकिते स्वामीर विना अनुमतिते पुष्यपुत्र करिते पारे कि ना, ताहार व्यवस्था ५६-नफरमित्र यो राजोवमित्र प्रापीलाएटान रामकुमारचट्टोपाध्याय प्रभृति रष्पाडएटान स्वामीर त्यक्त धन पाइया तत्सरे श्रापन दौहित्रके हेवा लिखिया दिया परे विक्री करे, वाहार व्यवस्था १५८-१६२ . .

६०-मुशम्मात शानकोडर नोजयाकोडर श्रापोलाराटान दुःखवहनसिह श्रो दोवदत्त पाडण्टान कन्या पितृधनाधिकारिणी इहया पुत्रवधूने यदि ऐ धनेर हेवा करणेर समता ना राखे, तवे ऐ धनेर स्वत्वाधिकारी के हइवेक, ताक्षर व्यवस्था ६१-कोनो गृहस्थकन्यार मूल्य ना लइया कोनो लोकेर नफरेर मड़े विवाद देय, यो ऐ कन्यार सन्तान ऐ दासेर मनोवर दारादासो हइवेक कि ना, तादार व्यवस्था १६६.१६८ ६२-यपासव्यवहार राजा शशीभूषणदेवरायेर पक्षे-असि कमलाकान्त- चक्रवर्ति श्रापोलाएट गुरुगोविन्दचौधुरि रपाडएट मातार खोरपोसेर जमीर विक्रयेर व्यवस्था १६८-१७१ ६३--रत्रसिह सायेल कोनो स्त्री स्वामीर धने उत्तराधिकारिणी हत्या कन्या श्री दौहित्र ओ स्वामीर भ्रातपुत्र राखिया मरे, इहार मध्ये के उत्तराधिकारि दहवेक, ताहार व्यवस्था १७२-१७४ ६४-गङ्गाधरवाचस्पति सायेत एजमालि जमिदारि मध्ये दुइ भाइ बन्धक राखे, ताहार मध्ये पार दुइ भाइर अनुमति लयन प्राविश्यक राखे कि ना, ताहार व्यवस्था २७५१७६ ६५-जयरामधामि स्वयं यो मृत बखोरिधामिर स्त्री दिपुधामिनीर अप्राप्त- व्यवहार पुत्र रामचन्द्रधामिर पक्षे अलि प्रकारे पापीलाएट मुशनमामि रप्पाडण्ट स्वामीर विना अनुमतिते पुण्यपुत्र करिते पारे फिना, श्रोताहाके वृत्ति हेया करिते पारे कि ना, ताहार व्यवस्था १७७-१८० ६६-ग्रजा गिरीशचन्द्र राय नापोलाएट मृत राजा ईशानचन्द्रदेवरायेर अप्रासव्यवहार पुत्रगण राजकोडर गरहरिचन्द्रदेवराय प्रभृतिर उछि .

राजा उमेशचन्द्रराय राडएट अविभाज्य राज्येर प्रतिनिधि ये मसेहेरा, ताहा पुत्रपौत्रादि कमे होनेर व्यवस्था १८०-१८४ ६७-जयमणिदेव्या प्रभृति श्रापोलाएटान फकिरचन्द्रचक्रवर्ति रडिएट देवर श्री देवसेवाते मावा श्री पत्नी इहार मध्ये के अधिकारिणी, तादार व्यवस्था १८४-२८८ ६८-मृत चात्रु अभयनारायणसिंहेर स्त्री मुशरमात पुनित कोडर श्रो कन्या मुशम्मात अश्वमेधकोडर सोयल अविभक्त स्थावरेर पत्नी श्री कन्या श्रो सपिण्डेर सहित् उचरा- धिकारिर व्यवस्था १८८-२६२ ६६---अविभक्त स्थावरेर निजारा विक्रय कराते हकस्व गमारेर दाविर व्यवस्था २६२-२६३ इं० १८२६ साल ७०-राजचन्द्रग्य सायेल देवचरेर उपस्व विकोर व्यवस्था १६३-१६६ ७१-वावु गङ्गाप्रसादनारायण श्रारीलाएट वाबु लक्ष्मीनारायण रपडिएट स्त्रोकृत व्यवहारेर असिरे व्यवस्था २६६.२६६ ७२-मुधम्मात दुलालदेह मो सोनोसिंह श्रापीलाण्टान क्षेमाजितराय यो कोचिराय राउण्टान पतिर विभक वस्तुते पत्नीर दानेर क्षमता थाछ कि ना यो अवि. भक्त वस्तु पनीर व हर किना, तादार व्यवस्था १९९-२०२ ७३-गोवदनलाल पापोलाएट मोहनलाल प्रो मृत सोहनलालेर उत्तराधिकारि गमाप्रशाद पाडण्यान ग्रपद करिवार भो यहु पुत्र सत्ये एक पुत्रके दानेर व्यवस्था २०२-२०६ ७४-इलघरमुखोपाध्याय श्रापोलाएट अन्नपूर्णादेव्या प्रकृति रप्पाडएटान खोलोकेर हेवार व्यवस्था २०६-२०६ ७५--श्राकवरराय प्रभृति मफलेट पारोलाएटान यदुनाथसिंह ग्रो साहेवसिंह प्रभृति रप्पाडएटान अप्राप्तव्यवहारेर अंग विक्रयेर व्यवस्था २०-२१२ ७६-जयरामधामि स्वयं उच्छि प्रकारे मृत यखोरिधामिर स्त्री दिपु. धामिनीर अप्राप्तव्यवहार पुत्र रामचन्द्रधामिर पने यापोलाएट मुशनधामि रप्पाडएट तिर अनुमति व्यतिरेके दत्तक करिते पारे ना, ताहार व्यवस्था २१२-२३६ ७७-सिग्रोवकशमिश्र वनामे देवीप्रसादपाँडे प्रभृति ब्राह्मणेर दौहित्र पुण्यपुत्र करिवार व्यवस्या २१७-२१६ ७:--प्रानन्दनाथराय अमामव्यवहारेर अछिगण भवारणीप्रसादचौधुरि श्रो विश्वनाथचकदार श्रापोलास्ट राणी जगदम्बा २प्राडएट २१६-१२१ ७९-देवतर बमिदारिर भिकर व्यास्था २२१-२२३ ८०- २२३.२२४ २२४-२२६ ८२-कन्या पितृ-पने अधिकारियो हदया अापन नावालक पुत्रेर मरण पोषणादि कारण पितृवल विक्रय करिने पारे किना, श्री विद्या भो माता थाकिते अन्य व्यक्ति अछि हस्ते पारे कि ना, ताहार व्यवस्था २२६-२२८ " " " " ८३-कृष्एलोचनप्रभृति श्रापितारटान चारामणिदास्था प्रभृति रप्पाडण्टान नावालक पुत्रेर मृवमानुल हइते प्रात स्पावर वस्तुर छप पानार कम नावालकर माता विक्रय करे, वाहार अवस्या २२६-२३४ ८४-वदनचन्द्रसिंह प्रो अवाप्तव्यवहार रामनारायणघोपेर पिता जीवन- कृभ्यघोष थापिलाएटान राधानाथसिह रप्याडएट उत्तराधिकारिर व्यवस्था २३४.२३८ ८५-पुत्रवधूकृत स्वमुरेर स्थावर वलुर विक्रयेर व्यवस्था २३८-२३६ ८६-गङ्गागोविन्दसेन फैरादी रामलोचनसाहा श्राशामी पुत्र सत्ये ऐ पुत्ररे स्त्रीके दान करे, ताहार व्यवस्था २४०-२४६ ८७--नन्दकुमारगोस्वामी यो रामचन्द्रगोस्वामीदिगर फैरादी वैष्णवानन्दगोस्वामीदिगर याथामो गोत्वामीदिगेर भावक मदलेर व्यवस्था २४६.२४६ मर-माप्तब्यवहार भ्राता श्रमासन्यरहार भ्रातार अंश सहित विक्रय करेण ताहार व्यवस्था २५०.२५१ -विक्रय करिया दखल दिया पुनर वेदखल करे वाहार व्यवस्था २५१.२५३ १०-सरति देवार व्यवस्था २५४.२५५ ६१--विवाहकाले कन्याके कोन रथावर वस्तु देय, ताहार व्यवस्था २५५-२५७ इं० १८३० साल ६२-गोगलचन्द्र प्रभृति थापिलाएटान वायु कोडरखिद पाडएट दानेर व्यवस्था ६३-मासस्यवहार दरनाथसिहेर माता मुरम्मान स्वदो विवि यो दया नेजामदिनैर माता मुशम्मात फरिमन थ्रो अप्राप्तव्यधार प्रलोचरर मा मुरामांव पर मो मुशम्मात यादामु श्रो उदासी सालगपा उपरिकारित यो सपोपेरपरस्था २६१-२६५. मुशम्मान ६४ वायु माघोसहाय यो वेनिसहाय अप्राप्तव्यवहारगणेर मोकार वायु रामचरणलाल नापिलाएट मोशम्मात वदामो प्रभृति राडपटान पत्यनुमति व्यतिरेके दत्तक करा यो पतिर यस्तु हेवा करणेर व्यवस्था। २६५-२७० ६५-कन्दर्पसिंह मोफलेरा বিলায় मृत राजा मोइनलालखार स्त्रीगण राणी मुगन्धलता थो रागी घड़लता प्रभृति रपाडएटान श्रोयारिशेर व्यवस्था २७०-२७६ ६६-विष्णुराम मुदद पापत धीरचन्द्रवडुया जमिदार परगणे घूम्मा मुद्दापाले यो गयरह उत्तराधिकारिर व्यवस्था ६.७-परामानिकि लभ्येर व्यवस्था ६८-व्याविग्रस्थेर पोयारिपेर व्यवस्था २७६.२७८ २७८२९० २८०-२८१ १६-कालीप्रसादरायघोपाल श्रापिलाएट दुर्गाप्रसाद रप्पाडएट व्याधिमस्थर प्रोयारिपेर व्यवस्था २८१-२८४ १००-मुशम्मात चित्रादासी सायेज्ञा पुत्र याकिते पुत्रवधूके हेवा करे, ताहार व्यवस्था २८४-२६१ १०१-*पितार जीवशाय पैतृक अपका पैतामह सम्पचिर विभाजन पुत्र करित पारे कि ना, एहार व्यवस्था २६९-२६५ १०२-कोम्मानि याहादुर, अर्थात सबा, श्रोपारिप हइवे पारे फि ना, ताहार व्यवस्था २६५-२६८ १०३-स्त्रीधने हेवार व्यवस्था २६८.३०० *सूचीपत्र पान्नास्ति इं० १८३१ साल १०४-काशीनाथश्च मौतकार स्त्री करुणामयी सो गयरह पापीलाएट चन्द्रमाला मोतफार स्वामी जयचन्द्रघोप २गडएटान भविष्यत् पितृदौहित्रर उत्तराधिकारिर व्यवस्था ३००-३०६ १०५-शीउमलुमसिंह श्रापोलाएट रामप्रकाशसिंह रडण्ट हेवार व्यवस्था ३०७-३१३ १०६-राजा गोविन्दनाथराय श्रापीलाएट गोलालचन्द्र श्रोरफे लालकावावु दत्तकपुर जेहनशाखेर व्यवस्था ३१३.३२२ १०७-कमलाकान्तराय श्री शम्भुचन्द्रराय श्री गयरह खायेल भगिनीर श्रोयारिपेर व्यवस्था ३२२.३२५ २०२-मानन्दमयी देवी सायेला भगिनोर उचराधिकारिर व्यवस्था ३२५-३२७ १०६-मृत फाशोनापदत्तेर स्त्री करणामयी प्रभृति प्रापीलाएटान चन्द्रमालार पति जयचन्द्रघोप रपाडएट भविष्यत् पितौहित्रेर उत्तराधिकारि व्यवस्था ११०-दलमईनगाह नापीलाएट राजा पृविरतिमाहि वादार मृत्युर पर सङ्गवाहादुरेर अलि नो माता राजेश्वरकोपर श्री मोशम्मात मदन कोडर रमाइएटान दचकेर व्यवस्था १११-वदनचन्द्रदाजदार यी गयरद वनामे रामचांदमुखोपाध्याय साएल प्रयोग स्त्रीर किचित् दानेर व्यवस्था ११२-भरणार्य मातरितृधना कन्या मरोर पर ऐ धन के पाय, बहार व्यवस्था ३४२.३४३ ११३-कन्या प्रो धनि पर्चमाने मृत कन्यार पुत्र, इहार मध्ये के ऐ धन पाय हार व्यस्था ३४३-३४ ११४-पुत्र शो मृतपितृक पौत्र, इहार विभागेर व्यवस्था ११५--मथुरराय प्रो लक्षणराय यापीलाएटान राजु पादक रघ्याडएट सत्ति हेवार व्यवस्था ३४६३४८ ११६-स्वामीर श्राद्धरे जन्ये देवसेवा सहित देवर देधोवार व्यवस्था ११७-मृत राधाकृष्ण उकिलेर उतराधिकारिर व्यवस्था ३५१ ११८-उत्तराधिकारिर अनुमतिते अवीरास्त्रोकृत विक्रयेर व्यवस्था ३५१-३५३ ११६-कनज ब्राह्मण वाझालाय यास करे, ताहार उत्तराधिकारिर व्यवस्था १२०-रामप्रसादचक्रवत्ति आपीलाएट पेनका यो पाचि वेधोया रपाडण्ट दास-दासीर व्यवस्था ३५६३५८ १२१-कृतप्रायश्चित्तर पनी उत्तराधिकारिणी हइते पारे कि ना, इहार व्यवस्था ३५८-३५६ १२२--स्ट्रेश्वरीर माईमा, नोयारोसेर व्यवस्था ३५२-३६१ १२३-विधवा स्त्रीलोक अापन स्वामीर पैतृकपने अधिकारिणी हय कि ना, ताहार व्यवस्था ३६२ १२४--उत्तराधिकारिर अनुमतिकमे दानसिद्धिर व्यवस्था १२५-उपपक्षोर गर्भजातपुत्रके दान करे, इशार व्यवस्था २२६-पुत्रक कविभागे मातार भाग हय कि ना, प्रो अप्राप्ताशा माता मरिले ऐ मातृयोग्याशे कन्यार अधिकार किन्या पुत्रेर अधिकार एइ प्रकार सोयालेर व्यवस्था । काशीर पण्डितेरा ये लेखे, ताहार उपर व्यवस्था ३६६-३८६ इं० १८३२ साल- १९७-भैरविदासि वनामे नवकृष्णव उत्तराधिकारिर व्यवस्था ३८६-३८८ १२८--वदनचन्द्रसिंह श्री महेश चन्द्रसिंह वनामे मथुरमोहनपालित श्रप्राप्तव्यवहार भ्रातार अश विक्रयेर व्यवस्था ३५-३६२ १२६--विश्वेश्वरिदेवी वनामे ताराचन्द्रचट्टोपाध्याय उत्तराधिकारिर व्यवस्था ३६२-३६४ १३०-दुगादत्त यापीलाएट बुनियादसिंह याडएट शोलानामार व्यवस्था ३६५-३६७ ६० सन १८३२ साल ३१३१-भैरवीदासी वनामे नवकृष्णवमु उत्तराधिकारेर व्यवस्था ३६७-४०० १३२--भोलानाथराय फैरादी मृत रामस्मरणरायेर स्त्री श्रीमति सावित्रा यो गोपालकृष्ण श्रो मदनमोहनसिंह शो मृत काशोचन्द्रसिंहेर स्त्री श्रासामीयान सविवार १४- क्रान्ति हिस्सा जमिदारिर कन्नोयाला प्रसिद्ध करिया ताहा दखल पाोयार मकईमार व्यवस्था ४००.४०३ १३३-भोलानाथराप फैरादी सावित्रा श्री गोपालकृष्णसिद नो गयरह श्रासामोयान मातार दोष प्रकाश करिले पितृश्लु पानोपार निपेय कि ना, इहार व्यवस्था ४०३-४०५ १३४-मृत रामस्मरणरायेर पुष्यपुत्र भोलानायराय फैरादो ऐ मृत अतिर स्त्री सावित्रा यो गोपालकृष्णसिंह थो गयर श्रासामीयान् पुोंक व्यवस्था पुननिरीक्षण प्रकार तथा पुष्यपुरेर उत्तराधिकार ब्रस्था ४०५-४०७ १३५-उत्तराधिकारेर व्यवस्था ४०७-४०६ * त्रिशदधिकशततमन्यात्यामारभ्य ग्रन्थान्त यादल्यवरथामूली मूनकोपे नास्ति ।

इं० सन १८३२ साल १३६-वागचे ब्राह्मण गङ्गाजले सगुण करिते मुक हइवे पारे कि ना? श्रार यदि स्यात् छगुण करे तवे ताहार धमें हाइन हाते पारे कि ना, इहार व्यवस्था ४०६ १३७-लागान विक्रय सिद्धिर व्यवस्था ४०६.४११ १३८-उत्तराधिकारेर व्यवस्था १३६-महाराजा गोविन्दनाथराय श्रापीलाएट गुलालचन्द्र पोरफे नानकावाबु प्रभृति रेपाडस्टान पनि मरणानन्तर पोष्यपुत्र प्रदणाधिकारेर गौतममरनीय जैन शास्त्रानुसारिणी व्यवस्था ४१५-४२० १४०-राधाचरणवर्णिक छाएल पतिधने स्त्रीर उत्तराधिकार विषयक व्यवस्था ४२०-४२२ २४१-अानन्दमोहनघोप यापीलाएट मोशम्मात हरिप्रिया राडिएट दानपत्रानुसारिणी धनविभागव्यवस्था ४२२४२६ १४२ -पचमलालसिंह योगयरह श्रापोलारटान् शिवरामसिह रेवाडेण्ट दान शो हेवार अधिकार सम्बन्धि व्यवस्था ४२६-४३० १४३ -मूतदुर्गादासेर स्त्री मसम्मात प्रझमयीदेव्या सापला दौडिनर घनाधिकार विषयक व्यवस्था ४३०.४३३ १४४-अवीरा स्त्रोर दान सिद्ध्वसिद्धि निर्णय अवस्था ४३३-४३५ १४५-कोन उदासीन ब्राह्मण उदासीन वैयगी शिष्यगण वर्तमान थाकिते श्रो यदि मापन समुदाय पलुस्रोपुत्रवान् संधारी प्रदाहरण राजपूत जाति व्यक्ति उदासीनेर शिष्य हइले, ताहाके दान करे-एइ प्रकार दान शास्त्रानुसारे सिद्ध हय कि ना, ताहार व्यवस्था ४३५-४३८ १४६–पञ्चमलालसिंह शो गन्धर्वलाल धापीलाएट शिवरामसिंह रेनाइट उत्तराधिकार सूत्रे प्रात धन स्त्री हस्तान्तर करिते पारे कि ना हार व्यवस्था ४३९-४४० १४७-दुर्जनसिह श्री अर्जुनसिंह यापीलाएटान राउत गिरिघमिह यो घनश्यामसिंह यो वन्दरसिंह रेपाडएटान पितार जीवशाय पितामहेर स्थावर वस्तुर घश करिया लभोनेर हकदार पुत्र इश्वे पारे कि ना, इहार व्यवस्था ४४०-४४४ १४९-महाराजा गोविन्दचन्द्रराय पापीलाएट महाराणी कप्यमणिदेव्या रेडएट दचक पुत्र प्रहए विषयक व्यवस्था ४४४४४० २४६-पालिदास गोपाध्याय दी: छानि तजविज श्राः प्रेमचन्द्र चौधारी दो: उत्तराधिकारेर व्यवस्था ४४७.४५० १५०- अननमजरी श्रापीलाएट फकिरचन्द्रपवार रेखाउएट এবংগ ময্যে বিষয়ক সংস্থা ४५.४५ १५१----मोहम्मात येचुधामन छाएला उचाधिकारेर व्यवस्था १५२-गोगधीचन्द्रकविराज प्रापोलाएट मोहम्मात अयमणि पोकायमाय मोनोफी रेगउटान दानेर सिस-यदि पिपक तथा उचराधिकार पियक व्यवस्था १५३--मोदलमाननातीर कोन मकि हिन्दूजातीय कोनो और प्रोफे भादया सादार पतिर असम्मति मोरलमान धर्मे श्रानिवार मानस परे अथवा हिन्दूजापीय फोनो व्यक्तिरमा प्रापनार रातीय धर्म जाग फरिया मोडलमान धर्म स्वीकार हन्दा फरेतवे पतिर नालिस मते हाकिममात मोहम्मात मजरा घो मादलमान मचिदिगर प्रार्थना र वरप फारसा या युधिसिन कि ..

ना? यदि ऐ स्त्री मोछलमान हइया थाके, तवे वाहार पविर जातिर किछु हानि इय कि ना, एइ विषयेर व्यवस्था ४६०.४६१ १५४--दुर्जनसिंह ग्रो अर्जुनसिंह श्रापोलारटान् राउत गिरधरसिंह प्रो गयरह रस्पाडएटान् उत्तराधिकारिर व्यवस्था ४६२-४६४. १५५-सन् १८३३ साल इनरेजी- श्रानन्दकिशोरगुप्त वनाम श्रीमवीक्षेमङ्करीदासी भ्रातृस्त्री वर्तमाने भ्रातृकन्यारदिगेर अानन्दकिशोरगुप्तेर स्थाने घामाच्छादन पाइवार क्षमता गखे कि ना, इत्यादिर व्यवस्था॥ ४६५-४६७ गोलकमणिदासी फैरादि सा. वेहाला प० वालिया पीताम्बरहालदार ओ सूर्यवेनीया श्रो गाह-आसामी- र्धान व्यक्तिर पौत्रिर स्वामी एवं श्रासनार पक्षेर कन्या पाछे-- इहार मध्ये उत्तराधिकारि के हइवेक, ताहार व्यवस्था। ४६८-४७० १५७---मोछति लक्ष्मीप्रिया श्रापिलाएट भैरवचन्द्रनीधुरि श्री जयचन्द्रवौधुरि रेपाडण्टान मृत : कृष्णचन्द्रर श्रादाधिकारि एवं घनाधिकारि पितृदौहित्र वैमात्रय भ्रातार पुत्र हइवेक, इत्यादिर ४७१-४७६ हइवेक, कि व्यवस्था। . . १५८--सामरामदास वनाम हालचन्द्र मोतोफार स्त्री राधा- चरण नावालगेर माता सुन्दरीदासी .मोफलेश- यद्यपि दुइ भ्राता, एक भासव्यवहार एक अप्राप्तव्यवहार, एकान्ने थाकिया ज्येष्ठ भ्राता दोकान करे। ए प्रकारे कनिष्ठ भ्राता ऐ दोकानेर किछु हिस्सार हकदार इइते पारे कि ना, ताहार व्यवस्था। ४७६-४० १५६-मोथाभिचन्द्रमविराज श्रापिलाएट मोहम्मति अयमणि जोवतमान श्री कृष्णमणि मोतोपात रेडएटान कोन व्यक्ति मिलकियतेर दावि एवं दानेर दुइ बुनियादे दरपेश करे। दुरमतेइ डिगिरिहय। तवपरे दोशराफ हेवा करिया मृत्यु हय । एमत देवा सिद्ध रते पारे कि ना, ताहार व्यवस्था ॥ vo-४८२ १६०-लक्ष्मीप्रिया प्रापिलाएट भैरवचन्द्रचोरि ो गैरह रेषडपटान उचाधिकारिर एवं श्वेत कुछ पाकिने उचयधिकारित्व पर पारे कि ना, इत्यादिर व्यवस्था ।। ४८३-४८६ २६१-दुलारसिंह प्रोपर प्रापिलायटान गणी पद्मावती मोगैरह रेपरटान लालेर पुधावधि पत्तिामा पुत्र अर्थात गरिखदासेर पुत्र पर्यत ना था िरनमालेर प्रतिमा परिवार पोत्र दुनारसिंह ममवर उपधिकारिर व्यवस्था । ४८६-६० १६२-मसात लक्ष्मीरिया भैरवचन्द्र चौधरी यो गैरह उधपधिपरियारथा भापिलाएट যৈয়ন ४६१-४६३

MOH
१६३-गोपालस्यहायेर अलि ननोपावराय थापिलाएट
मोशम्मति भगवतीकोडर प्रो गैरह
रेपाडण्टान
कलियुगे निःसन्तान व्यक्तिर श्रापन सहोदर भ्रातार कन्याके
सन्तानत्वे लयोन यथार्थ हय कि ना-इत्यादि पाँच सोयालेर
जवाव व्यवस्था।
४९३-४६६
१६४---कोन अवीरा स्त्री पितामातार स्थावर अस्थावर पाइया
भोगवाना थाकिया मृत्यु
हय ताहार उत्तराधिकारिर
व्यवस्था॥
४६E-५००
१६५–वैद्यनाथेर उत्तराधिकारि पुरसम्भाविता कन्या इहवेक कि पितृदो-
हिन हइवेक-इार व्यवस्था ।
१६६-कोन व्यक्ति पुत्रसम्भाविता भनीके साधारण स्थावरास्थावर
वस्तु दान करे, ताहा सिद्ध
हय कि ना-इत्यादिर
व्यवस्था।
५.३-५०५
१६७--कोन व्यक्तिर दुइ पुत्र : ज्येष्ठ पुत्र एक कन्या राखिया पितृ
वर्तमाने मृत्यु इय, कनिष्ठ पुत्र पितार मरणोचर एक पुत्र
राखिया मृत्यु इय, इक्षर के धनाधिकारि हइवेक -ताहार
व्यवस्था ॥
५०५-५०७
१६८--राजाहरकुमारदत्त दुइ विवाहितार तोर गर्भजात दुरपुर:
ज्येष्ठ पुत्र राजातेजप्रताप समुदय अवएटक जमिदारि कुलाचार
मते वैमात्रेय भ्राता याक्तेि श्रापन तीनि नीर मध्ये महाराणी
तिलोचमाके दान करे, से दान सिद्ध हहते पारे कि ना-वाहार
व्यवस्था।

-) १६६-कृम्पाकान्तपोद्दार छायेल देवसेवार खरच श्रो सेवाहतेर खरच मिनाह वादे वाकि उपस्वत्व डिगरिर यका, पाहा सेवाहर नामे हइयाछे, वादा 'बादाय रहते पारे किना-ताक्षर व्यवस्था, ५१०-५१२ १७.-कालीकिशोररायचौधुरि छायेल दानपत्रानुसारे जगदीश्वरी अधिकारिणी हया ये ऋण करिया मरे, सइ ऋण परिशोधेर निमित्ते ताहार पुत्रेर स्वत्वास्पदीभूत अंश विमय हहते पारे किना-ताहार व्यवस्था ॥ ५१२-५१५ १७१-मोहम्मति भवानीदेव्या छायेला मोसम्र्मात ब्रह्ममयी भापन स्वामीके श्रोछोकरणेर क्षमता राखे किना-ताहार व्यवस्था। ५१५-५१६ २७२-सन १८३४ साल लोकनायदा ओ बगनायदत्त-धनाम कुविरभाण्डारि दासेर विषय सदर आमिन बाला बाहा करियाछेन ताहा यथार्थ वटे किना-ताहार व्यवस्था । ५१६-५१८ १७३-अनुद्दिश व्यक्तिर मृत्यु अवधारित फोन पर्यन्त गया बाहवेक-- इत्यादिर व्यवस्था। ५१८-५२३ १७४--रामदासशर्मा मफलेछ मुद्दा राधाचरणशर्मा प्रो गयरह मुद्दामालेहे नान्दिमुख भाद चामि भो खीर पक्षेना हड्या याके-ए प्रकार विवाद सत्य रहने पारे कि ना इत्यादि सप्तम सोयालेर व्यवस्था॥ ५२३-५२८ "

२७५--रतनचन्द्र श्रो किरतचन्द्र ,
छायेलान्
पैतृक कर्जेर डिगरिर टाका पितार मृत्युर पर पुत्ररदिगेर अंश
निएणय व्यतिरेक पितार त्यज्य वस्तु हहते उमुल हइवेक कि ना-
ताहार व्यवस्था ॥
५२८-५३०
२७६-राजापटनीमन श्वो रायवनशीधन प्रापिलाएटान
राय मनोहरलाल ओ गैरह
रेपाडेएटान
वारानशेर पाठशालार व्यवस्था प्रो सुप्रीमकोट अओ अन्य र
परिहतेर व्यवस्था श्रीयुत अलियम वेराडीन साहेवेर हुजुरे दाखिल
हयाछिल, सेइसकश व्यवस्था परस्पर विरोष श्राचे किना-
ताहार जवान व्यवस्था।
५३०-५३५
१७७-कन्या श्री दौहित्र पाकिते भ्रातपुत्र के रोगावस्थाय दान करे, से
दान सिद्ध हइवे पारे किना-ताहार व्यवस्था || ५३६-५३८
१७८-रामगोपालदेशो बनाम गकुलचन्द्र तहविलदार प्रो गैरह
दासत्व विषयेर जेला मयमनसिंहेर सदर श्रामीनेर फयसला
सकल वागला देश चलित शास्त्र मते यथार्थ कि अयथार्थ--
ताहार नवाव व्यवस्था
५३८-५४०
---
१७६--राधानाथचौधुरि
नापिलाएट
श्रीमतीकृष्णमनीदास्या कृष्णनाथ मोतप्रोफार कन्या श्रो परान.
चन्द्रने उगी यो राघाचन्द्रनेउगी नावालगदिगर
माता
रेपाडण्ट
पितृ दौहित्र थाकिते पैतृक विषय पितु-सहोदरके हेवा करे, से
हेवा सिद्ध हहते पारे कि ना-ताहार व्यवस्था॥ ५४०-५४२

२८०-लक्ष्मीकान्तकालिया
प्रापिलाएट
रघुनाथरायेर मृत्यु भो वानापनो लक्ष्मीरानो गैरह ।।
रेपाटण्टान
अवएटक विषयेर तमलिक यो हेवा वारानश देशेर चलित
शास्त्र म सिद्ध हहते पारे किना-ताहार बचाव व्यवस्था ॥
५४३-५५२
१८१-रामगोपाल देशो बनाम गोकुलचन्द्र तहविलदार को गैरह
दास खरिद करिले वाहार पुत्रपौत्रादिर दासत्व सिद्ध होन विषये
ये फयसला हायाचे, ताहा शास्त्र सम्मत यथार्य वटे किना-
वाहार पवाव व्यवस्था।।
५५२-५५४
१८२--मछात विश्वेश्वरीदेव्या मफलधा
तागचाँदचहोपाध्याय भो गैरह
उत्तराधिकारिर व्यवस्था ।
স্নাবিলা
रोपाइएटान
५५४-५५८
१८३-नुमानदचाय नो भोलादचराप मो गणेशदत्तगय मुख्यान
भूव चपटौदचेर पनिता मधर्मात छोलछन चौधुराण भो
परमेश्वरिदन
मुद्दामालेहे
चरोदर माझणमाति भापन भमीर सन्तान परमेश्वरीदतके.
फर्ता पुष फरियाछे, at सिर पटे कि ना-इत्यादिर
५५८-५६३
म्यवस्था ।
१८४-कोन व्यक्तिर दुइ सन्तान । ज्येष्ठ सन्तान पितृ पर्चमाने एकाय.
वचिंते कोन स्पावर वस्तु प्रापन घमाय उपार्जन करे। परे
रिवार मृत्युर पर ऐ वस्तुर यफनिष्ट भ्राता किवित पाइते पारे
किना-वार प्यारा॥

IIIM १८५--शूद्रादिर दत्तक पुत्र ग्रहण कालीन कि कि कर्म कर्तव्य उचित- इत्यादिर व्यवस्था । ५६४-५६६ १८६-चेतराम तेयोरि सावेक मुद्दाइ श्राशानाथ तेप्रोरि सावेक मुद्दामालेहे सापिण्डेर उत्तराधिकारिर व्यवस्था ।। प्रापिलाएट रेप्पाडण्ट ५६६-५७४ १८७-काशीचन्द्रमुस्तफि छायेल श्रप्राप्त व्यवहारा अवीरा विधवा कन्या शासुडी शत्रुतार निमिचे स्वामीर घाटोते जाहते सन्मत ना इय, तवे शास्त्र सम्मत मायोया उचित वटे कि नाताहार जवाव व्यवस्था । ५७४-५७७ १८८-पार केह ना थाके, अापन भग्नीर पुत्रवती कन्या उत्तराधिकारिणी इते पारे किना-ताहार व्यवस्था । ५७७-५७८ १८६---प्रथमा स्त्रीर सन्तान ना दोयाते सन्तान प्रार्थनाय अन्य स्खीके विवाह करिया आपन भग्नोर पुत्रदिगेके समुदय वस्तु दान करे, पुनराय द्वितीया स्त्रोर सन्तान हय, एमत दान असिद्ध इहते पारे किना-तादार व्यवस्था ।। ५७८ १६०-कोन व्यक्ति टाका कर्ज रूपे किम्वा अन्य प्रकारे घारे, सुदेर विषय निार्य ना हइया थाके, तवे कि प्रकारे, कि परिमान ऐ राकार सुद मकरर करा जाइवेक-इत्यादिर व्यवस्था । ५७६-५८१ १६१. सन १८३५ साल ६० राधाचरणवर्णिक प्रापिलाएट लक्ष्मीसदार श्री गयरह रेषाडपटान् भातृपुर दौहित्रेर उत्तराधिकारिर व्यवस्था । ५८१-५८३

१६२-वनविकान्तचौधुरि वनाम कृष्णप्रियाचौधुराणी अोनवकान्तचौधुरि
कोन व्यक्ति मुमुधु व्यक्तिले कहिले तुमि पोध्यपुत्र प्रहण करः ।
ऐ व्यक्ति हुँ वलि उत्तर दिलेको एमत पोध्यपुत्र सिद्ध इय-ये
पण्डित लिखियालेन, ग्राहा वटे, कि ना-~ताहार अवाव
व्यवस्था॥
५८४-५
१६३-एक व्यक्ति मग्नीर जन्मान्ध पुत्र एवं पितृन्यगय के राखिया
निःसन्तान मृत्यु इय-ताहार उत्तराधिकारिर व्यवस्था ।
१६४-नाइलालमफलेछ
श्रापिलाएट
गोग यो दुखं श्रो गैरह
रेमाडएटान
कोन व्यक्ति स्त्री दुर पुत्रवधू यो पतिर भ्रातपुत्रके राखिया
मृत्यु इय, ताहार पश्चिम देश चलित शास्त्र मते उत्तराधिकारिर
व्यवस्था
५६२-५६३
१६५-विमलामयी देव्या
प्रापिलापट
भीमतीअन्नपूर्णा श्रो दिनापुरेर कलेकटर साहेव रेपाटपटान
शम्भुनन्द्रर मोसाहेगप वाहार वानि पुर अधिकार हत्या दुर
पुप्रेर मृत्यु हय, ऐ दुर पुर मोसाहेगर अथ शम्भुचन्द्रेर पुत्र
पाइवेक, कि शम्भुनन्द्रर कन्यागय पारवेक-ताहार व्यवस्था ।
५६३५६६
१६६-मृत हेमबलसिहेर सो चोरी बादी
मृतपालसिहेर पुत्र नारायणहि प्रतिवादी
पश्निम देयीय छात्र पञ्चम पुरुष पर्यन्त एतद्दे यास करिया पुत्र
मो अवीय कन्या भो दितीया स्नी मोनाहार प्रदचा कन्या
बचमान गखिया मृतु इय, तव पोऐ पुर मृत्यु स्य-बार

. उत्तराधिकारि अदत्ता भग्नि इहवेक, कि पितृव्यपुत्र दहवेक- इत्यादिर व्यवस्था ॥ ५६६-१०३ २६७-विलासमणि देव्या केलेमदार, मथुरानापदि मोताजर कोन विषया और तीनि पुत्रेर मध्ये दुइ पुरेर मृत्यु हय । ताहार उत्तराधिकारि दुइ व्यवस्था ये परिश्तेरा दियाछैन, तादार मध्ये पोन पण्डितेर व्यवस्था सत्य-ताहार प्रत्युत्तर व्यवस्था । ६०३-६०७ १६८यानमस्थ व्यकिर उत्तराधिकारिर सखारामशास्त्री ये व्यवस्था दिया छेन ताहा धर्मशास्त्र सम्मत वटे कि ना-ताहार व्यवस्था । ६०७-६०६ १६.रामनाथरायी गयरह प्रापिलायटगन मथुरानाय थोरफे श्रीकान्तराय रेपाडएट सपिण्डाधिकारि विषयेर लक्ष्मीनारायणमण्डितर व्यवस्था यथार्थ वटे कि ना, तादार व्यवस्था ।। ६०६-६१२ २००--एक बन मुनशीर निमित्ते सदरे दरखास्तेर नकल २०१-इरिनारायण इत्यादिर सहित भैरवोदास्यार कि प्रकार अंश निर्णय इय-तादार व्यवस्था ६१३-६१८ २०२---अविरा स्त्रीलोक आपन पति योग्यांश स्थावर वस्तु प्राप्तायें कोन एक जन शातिके एकगर लिखिया देश, दादा माह्य किना--- ताहार व्यवस्था॥ ६१८-६२१ IP) २६२-वालविकान्यचौधुरि वनामकृष्णप्रियाचौधुराणी श्री नवान्नचौधुरि कोन व्यक्ति मुमू व्यक्ति के कदिले तुमि पोष्यपुत्र ग्रहण कर । ऐ व्यक्ति हुँ बलि उचर दिलेक । एमव पोष्यपुत्र सिद्ध हप-ये पण्डित लिखियाछेन, ताहा पटे, कि नावादार बवाव व्यवस्था॥ १६३-एक व्यक्ति भग्नीर जन्मान्ध पुत्र एवं पितृव्यगणके राखिया निःसन्तान मृत्यु इय-ताहार उत्तराधिकारिर व्यवस्था । ५०-६१ . १९४-फ्नाइलालमफलेछ श्रापिलाएट गोगो दुखु पो गैरह रेष्याडण्टान कोन व्यक्ति स्त्री दुद पुत्रवधू श्रो पतिर भातपुत्रके यखिया मृत्यु इय, ताहार पश्चिम देश चलित शास्त्र मते उत्तराधिकारिर व्यवस्था॥ ५६२-५६३ १६५-विमलामयी देव्या श्रापिलाएट श्रीमतीअन्नपूर्णा श्री दिनाजपुरेर कलेकटर साहेव रेाडएटान शम्भुनन्द्रर मोसाहेगय ताहार तोनि पुत्रर अधिकार इहया दुई पुत्ररे मृत्यु इय, ऐ दुह पुत्रेर मोसा हेगर अश शम्भुचन्द्रर पुत्र पाइवेक, कि शम्भुचन्द्रर कन्यागण पाहवेक-ताहार व्यवस्था ।। ५६३५६६ १६६-मृत हेमञ्चलसिहेर स्त्री चौराशी वादी मृत दयालसिंहेर पुत्र नारायणसिंह प्रतिवादी पश्चिमदेशीय छात्र पञ्चम पुरुष पर्यन्त एतद्देशे वास करिया पुत्र श्रो अवीय कन्या श्रो द्वितीया स्री श्रो ताहार, अदत्ता कन्या वर्तमान राखिया मृत्यु इय, तत परे ऐ पुत्ररे मृत्यु इय-दहार ..

. उत्तराधिकारि अदत्ता भन्नि हइवेक, कि पितृव्यपुत्र इहवेक- इत्यादिर व्यवस्था ॥ ५६६-६०३ । १६७-विलासमणिदेव्या केलेमदार, मथुरानाथसिंह मोताजर कोन विधवा स्त्रीर तीनि पुत्रेर मध्ये दुइ पुत्रेर मृत्यु इय । ताहार उत्तराधिकारिर दुइ व्यवस्था ये परिडतेरा दियाछेन, ताहार मध्ये कोन परिडतेर व्यवस्था सत्य-ताहार प्रत्युत्तर व्यवस्था ॥ ६०३-६०७ १९८-वानप्रस्थ व्यक्तिर उत्तराधिकारिर सखारामशास्त्री ये व्यवस्था दिया छेन ताहा धर्मशास्त्र सम्मत वटे कि ना-ताहार व्यवस्था ।। ६०७.६०६ १६६.-मनाथराय ो गयरह प्रापिलाएटगन मथुरानाथ योरफे श्रीकान्तराय रेवाडएट सपिण्डाधिकारि विषयेर लक्ष्मीनारायणरिडतेर व्यवस्था यथार्थ बटे कि ना, ताहार व्यवस्था । ६०६-६१२ २००-एक जन मुनशीर निमित्ते सदरे दरखास्तेर नकल २०१-हरिनारायण इत्यादिर सहित भैरवोदास्यार कि प्रकार अंश निर्णय इय-ताहार व्यवस्था । २०२-अविरा स्त्रीलोक प्रापन पति योग्यांश स्थावर वस्तु प्राप्ताथै कोन एक जन ज्ञातिके एकरार लिखिया देय, ताहा ग्राह्य कि ना--- ६१८-६२१ ताहार व्यवस्था॥

P २०३--राजीवलोचन सतपति प्रापिलाएट वेचानरामराय रपाडण्ट नावालक पुत्रसत्वे भरणार्थ दत्त भूमि विक्रय विषयेर कमला. कान्तविद्यालदार ये दुइ व्यवस्था दियाछेन, साहा रङ्गदेश प्रो उडिस्यादेशेर चलित शास्त्र मत सिद्ध वटे कि ना-ताहार व्यवस्था॥ ६२२-६२६ २०४-मतिलाल कल्याणसिंह प्रापिलाएट प्रमलाल भो थोताराम पो गयरह रेवाडएटान शुभे वेहारदेशेर चलित शास्त्र मते पिता श्रो पितामहेर पैतृक. स्थावर वस्ल पुष मो विना अनुमतिते हस्तान्तर करिते पारे कि ना-इत्यादि चारि सोयालेर प्रत्युत्तर व्यवस्था ॥ ६२६-६२६ २०५---भोलानाथदास थापिलाएट श्रीमती सवित्रा मो गोपालकृष्ण पो गयरह रगडएटान मापन विमाताके व्यभिचारिणी इत्यादि मिभ्या फहिले से पुर वनदेय चलित शास्त्र मते प्रायधिचकिप्रकार-इत्यादिर प्रत्युत्तर ६२६.६११ २०६-रतनाकरविर मो मुरिषिमुह मापिलायटान साधुचरणविविगञ्जन प्रोगपरह रेगहएटान पूर्व पुरुपेर बमिदारि तीन चारि पुरुष परे फटकेर चलित शारत्र मते वयटकहते पारे किनान्गाहार वाया॥ ६१२-६३४ २०७-मथुरादसोर प्रापिलायट प्रायकम्मा प्रो कम्पालाल देहारिलालेर पुत्र रेपाटण्यन पली मो धुप्रेर पनी विद्यमाने मान लि विहारिलाशके दान विषयेर हरानन्दमिभ ये यात्या दिया लेन-दयादिर ६१४-६४१ प्रत्युत्तर पर स्था।

. २०८-रामकृष्णराय छायेल 'नागयणोदेवी यो जगदीश्वरीदेवीर अंश जीवतमान पर्यन्त. भोगवान थाकिते विचार कगि जयपत्र दियाछैन । ऐ जयपत्र लिखित ऋण परिशोधेर निमित्ते विक्रय हहते पारे कि ना- इत्यादिर व्यवस्था । ६४२-६४६ २०६-वीरेन्द्रनारायणचौधुरी श्री गायरह यापिलाएटान श्रीमती सत्ययामादेव्या रेवाडएट कोन स्त्री स्वामीर विषये उत्तराधिकारित्व रूपे अधिकारिणी हहया पञ्चम पुरुषीय शाति सत्वे आपन कन्या श्री नामाताके हेवा करे-शास्त्रानुसारे सिद्ध वटे कि ना-इत्यादिर व्यवस्था । ६४६-६५० २१०-गुरुप्रसादव श्रापिलाएट महेन्द्रनारायणवसु रेवाडएट एक व्यक्तिर तीन पुर मध्ये एक पुर विवाह समय दानपत्र ऐ व्यक्तिर पितार नामे लिखित हहलो ऐ पितार मृत्यु पर ऐ दान. पत्र लब्ध भूमि तीनि पुत्र समान अंश करिया लइवेक कि ना- तादार व्यवस्था। ६५०-६५१ २११---गोकुलचन्द्रमिन हिगरिदार मतर्फी वादी काचिकमण्डल देयेनदार प्रतिवादो दयाकुमारी श्री मुन्दरकुमारी प्रोजोरदार कोन व्यक्ति वा वर्तमान आरन मावाके दान करिया मृत्यु इय ए प्रकार दान सिद्ध पटे किना, एवं यशोपवीत हइले दश वारो एक मात्र पुत्रके दत्तक ग्रहण करिते पारे किना- ताहार व्यवस्था॥ ६५२-६५५ २१२-कोन व्यक्ति प्रथमा स्त्री-जात मृत पुत्र-वधू एवं द्वितीया स्त्री जात ६५५-६५७ यतठरेर १ वतसरेर व्यप.

1 पीर विषय इहवे ऐ तारिपोर उत्तराधिकारिर परिशोध करा उचित इय किना-दहार कैफियतेर व्यवस्था ।। -श्रीमती तारिणोदेगार पुनार ऐ विश्येर भाव व्यवस्था -~श्रीमती तारिणोदेव्यार ऐ विपयेर कैफियत व्यवस्था ।। ६८.६८४ २२६-क्रय या विक्रय प्रभृति शास्त्र प्राशासकल वाङ्गला शो उडिस्या सो वार श्रो तैलङ्ग प्रो महाराष्ट्र देशेर एक प्रकार, कि पृथक पृषक । एवं केता श्री विक्रेतार स्वीकार करते क्रय-विक्रय सिद्ध हय किना-इत्यादि तीनि सोयालरे जवाव व्यवस्था ।। . ६८४-६५६ २२७---काशीचन्द्र मुस्तोफि छायेल अमामव्यवहारा श्रीमतोकमलकुमारी स्वामीर गृहे. आपन शाशुहिर निकट मा थाकिया ताहार पितार निकट पाकित पारे किना-ताहार व्यवस्था। ६८६-६६. २-बगतचन्द्र अधिकारि छायल मामबावीर ठाकुर-ठाकुराणो बिउर शद्र सेवर वारीते गमन फरिले पूर्वर रोस्यनुसारे पुनरागमने देवत्वेर किछु दानि हस कि नाहार व्यवस्था । ६६०-६६२ २२६-मिपिला देशेर चलित शाधानुसारे एवं नदियार नलित शाम्रा नुसारे विभागेर प्रर्थक एवं साधारण्य कयेक प्रकार इत्यादि स्य सोयालेर प्रत्युचर व्यवस्था ६६२-६६६ २३.--श्रीमतोपाटीदासो डिगरिदार श्रीमतोठारागोदासी प्रो यमनारायणमित्र देनदा(ग)न कालोमछादमिर प्रो गैरह योबाहेमान् कोन यति नो मोरया गखिया मृत्यु हस, परे ऐनोर दोधिसते ऐ दोहितो पिता मन धनिर पैतृमि बन्धक दिया थाके, वो दे देनार निमिचे विक्रय ते पारे किना-स्पादिर ध्यवरा॥ ६६६--६६८ २३१-राणीजयदुर्ग प्रापिलाएट राणोकृष्णमनी रेपाडण्ट कोन अवीरा स्त्री स्वहस्ते विषय उपार्जन करे। से विषय ऐ स्रोर हस्तान्तर करणेर क्षमता रासे कि ना-ताहार व्यवस्था ॥ ६६०-७०० २३२-कोन अवीरा स्त्री पितामहेर सधवा कन्या एवं ऐ कन्यार दत्तक पुत्र एवं स्वामीर प्रपितामहेर भ्रातार पौत्र एवं स्वामिर प्रपितामहर भ्रातार पुत्रवधू एवं ऐ पुत्रवधूर दत्तक पुत्र वर्चमान राखिया मृत्यु हय । शास्त्रानुसारे ऐ व्यक्तिर धनाधिकारि के हदवेक- ताहार व्यवस्था । ७००-७०१ २३३-गम्भिरराय, ताहार मृत्युर पर विनयराय श्रो गायरह आपिलाण्टान, मोछम्मात धनेश्वरी पो गयरह रेडएटान स्त्रो उत्तराधिकारिणो हइया सापिएट विद्यमाने इस्तान्तर करिते पारे कि ना-ऐ विषयेर परिडतेरा ये दुइ व्यवस्था दियाछेन, बिहुत जिलार चलित शास्त्र मते यथार्थ घटे कि ना–ताहार व्यवस्था । ७०२-७०४ २३४-रामनाथसिह प्रापिलाएट राजरूपसिंह श्री राधेकृष्ण ২াভবান इक सफा विषयेर व्यवस्था । २३५-कालीकान्तवल श्रापिलाएट पार्वतीदास्या रेषाढण्ट यदि कोन व्यक्तिरा पितृ अवर्चमाने मातार सहित अनैक्य हय, तवे माता पुत्रदिगेर समानांश पाइते पारे कि ना-ताहार व्यवस्था॥ ७०७-७.६ २३६-शिवनारायणचौधुरि प्रापिलाएट राधाप्यारीदासी नो गयरह रेष्याडएटान राधामोहनमित्र जेलार मोजाहेम ७०४-७०७ मधुसूदनदास यह आदालवेर छायेल, उच्चाधिकारिर अनुमति न्यतिरेक स्वामीर त्याज्यं वस्तु, स्वामीर' ऋण पाकुक वा ना याकुक, विक्रय करिव पारे किना- इत्यादिर व्यवस्था ॥ ७०६-७१४ २३७-स्त्रीर पतिर त्यफ स्थावयदि धन दान विपर ये यवस्था त्रिहुत'. जेलार परिडत दियाछेन, मिथिलादेशेर चलित शास्त्रानुसारिणो वटे कि ना-इत्यादिर व्यवस्था, ७१४-७१५ सायेला २२८-इस व्यक्तिर शगेर एव विषय रक्षा कायरे सत्व विमाताके हवेक कि पत्नी (के) हावेक-इशार व्यवस्था । ७१५-७१६ २३६---कोन व्यक्कि पुत्रगण वीना अनुमतिते आपन कन्याके एक वागान दान करिया थाके, एमत दान सिद्ध हय कि नाताहार व्यवस्था ७१७-७१८ मोहम्मति रूकमन . २४०-यदि कोन व्यचिराचार भ्रातार मध्ये एक प्राप्त व्यवहाराच्या एकामभुत पाकिया पैतृक विषय जमिदार लोक भाटक करे, दाहा आपन परिश्रमेर दाराय खालास करे, तवे ऐ अमिर कि रूप घराक-इत्यादि मारि सोयालेर स्वस्था । सन १८३७ साल- २४.2 की नामक द्वितीय भ्राता स्त्री मो फम्यागण यो भ्रातपुत्र विद्या मान लिया परलोक प्रासय, बहार वारानय देशेर चलित यानानुसारे उत्तराधिकारि के हावेक-हार व्यवस्था । ७२१-७२२ २४१-मोहम्मात सर्पहर বিধাঃ कारसिद्ध भो गयर रेपाडएटान बिहुत बिला निवासी एक व्यकि दुरस्त्री रासिया गागु इय, पे दुरको एक कन्या रासिया मृत्यु स्य, परे ऐ चार मध्ये एक कन्या एक पुष गसिपा मृत्युस्याएफ कन्या अपुग .

वर्तमान प्रांछे। एवं तिन किम्वा चारि पुरुपेर ज्ञाति पाई। इदार के उत्तराधिकारि इइवेक-ताहार व्यवस्या || "७२-१२६ २४२--कान व्यक्ति पितृधनोश्चात व्यतिरेक घनो राजन करिया स्त्री यो कन्यागण श्री भ्रातपुत्र राखिया मृत्यु इय, से धने वारानस देशेर चलित शास्त्र मते काहार अधिकार हदवेक--ताहार व्यवस्था । ७२६-७२७ २४३-भेकनारायण सिंह बनाम तिलकधारिसिंह श्रो भेकधारिसिह श्रो गयरह मोतिलाल भो गयर हेर मकईमार प्रश्नसकलेर मर्म श्रो अभिप्राय एक वैगरीत्य व्यवस्था देयोनेर कारण कि ताहार प्रत्युत्तर व्यवस्था ॥ ७२७-७३१ २४४ -एक व्यक्ति मानुन एवं पञ्चम पुरुषीय शाति राखिया मूत्यु हय । इहार उत्तराधिकारिमातुन इश्वक कि ना-ताहार व्यवस्था । ७३१-७३२ २४५-कोन अवीरा स्त्री यापन स्वामोर पितृदिन विद्यमाने स्वामोर ऋण परिशोधायें विक्रय करे । ताहा सिद्ध हय कि ना-ताहार व्यवस्था। ७३२-७३४ २४६ --श्रीमतितप्रोक्कल कुडर श्रापिलाएट श्रीमतिनन्दकुडर यो गैरह रेप्पाडएटान भोलासिंह नामक एक व्यक्ति प्रापन सोर सन्मति मे कन्यार दिगेर श्रो जामातादिगेर नामे हेवा करे। ताहा मैथिल देशेर चलित शास्त्रानुमारे (सिद्ध हइते) पारे कि ना-ताहार व्यवस्था । ७३४-७३६ २४७-कोन व्यक्किर कुलचारे एमत रित थाके ये अवोग स्नी श्री कन्या प्रो दौहिर नाम चमिदारिते जारि हदवेक ना | एमत एकरार थाके, तवे पुनराय शास्त्रानुज्ञा श्रावश्यक हय कि ना-ताहार व्यवस्था। ७३६-७३७ - २४८-१वाननदास बनाम राघाचन्द्र वाछ कोन व्यक्ति तीर्थवासि हदया किछु मिलकियत स्वरिद करिया भोमवान थारिया स्त्रोके गखिया मृत्यु हय । शास्त्रानुसारे उत्तम धिकारि ग्रहस्थधम्मर प्रात्मवन्धु हदवेक, कि ऐ स्त्रो दखलिकार हइया दान विको करित पारिवेक-ताहार व्यवस्था ।। ७३८-४० २४६-प्रतापनारायणचक्रवत्ति हिगरिदार परमानन्दचक्रवति प्रो गैरह तरफसानियान निजामपुरेर ब्राह्मण वहेगदिगेर जयन पूजन विषये बिलार पण्डित ये व्यवस्था दियाछेन तादा यथार्थ बटे कि ना-इत्यादिर व्यवस्था। १७४०-७४६ २५०-सिउनहाय श्रो कुअवेहारिलाल वनाम मोहम्मासान मक्षणविवि श्रो गैरह) कोन व्यक्ति अविवाहिता स्त्रीर सन्तान हस्याथाके । ऐ सन्तानेर पिता वलिया श्रादालते अलि दर्शाया नालिष करिया थाके, तबै उहार उत्तराधिकारि ऐ सन्तान इइवेक कि भ्रातप्पुत्र इहवेक-इहार उत्तराधिकारिर व्यवस्था ॥ ७७-७४६ २५१-नरकुसिह मुद्दामालेह आपिलाएट वनाम मेघासिंह शो अक्षरसिंह रवाडएटान पुत्र श्रो भ्रातपुत्र विद्यमाने मौरशी धन हइते किचित भगिनीर पुत्र के श्रो पितृश्वस-पुत्रके दान, एवं अशी करिया दियाथाके, ५ प्रकार दस्तावेज यथार्थ वटे कि ना-इत्यादिर न्यवस्था ७५०-७५१ २५२-दुर्गादासधरेर पिता श्रो अलि प्रो अछि पालम- चन्द्रधर श्रापिलाएट विषयगोविन्दवडाल ो गयरह रेष्पाइएटान पितृ-दौहिरा अधिकारि हाया विभाग करिया लइले पुनराय एक व्यक्ति 1).॥ पितृ-दौहित्र बन्माइले, से ऐ धनेर विभाग पाइते पारे कि ना- इत्यादिर व्यवस्था । ७५१-७५६ २५३-मृत दुर्लभरामेर स्त्री स्वामीर योग्यांशे चारि श्राना जमिदार अंश पायोनेर व्यवस्था । ७५६-७५८ २५४ कोन स्त्री स्वामी श्रो पुत्रेर मृत्युर पर स्वामीर विषय इइते किञ्चित भूमि प्रापन भगिनीर कन्यार विवाहेर समय कुलमर्यादार निमित्ते पुत्रवधूर असन्मतीते दान करिते पारे कि ना वाहार व्यवस्था ।। ७५८-७६० २५५ ---यदि कोन अशनामाय जीवतमान व्यक्तिर अवर्तमान व्यक्तिर सहित अंश होयार कथा लेखा थाके, से अंथनामा शास्त्रानुसारे ग्राह्य इइते पारे कि ना-ताहार व्यवस्था । ७६०-७६१ २५६-सिउसहायसिह पो गैरह श्रापीलाएटान जयाकुडर श्रो उमेदकुडर रेवाडएटान शानकोमरेर समान्त केहरसिद् त्वकांशे ज्ञानकोमरेर मृत्युर पर ताहार कन्यार स्वत्व हय किना-ताहार व्यवस्था || ७६२-७६४ २५७---वल्लभिकान्तचौधुरि श्रापिलाएट नवकान्तचौधुरि বন্যায়ঃ मुमुएं व्यक्तिर दत्तक पुत्र विषये मुख ददते हाँ इति शब्द निर्गत हइले दत्तक पुत्र सिद्ध इय कि ना-ताहार व्यवस्था ।। ७६४-७६६ २५८-मोमम्मति लनुमना श्री ठाकुर प्रापिलाएटान् वेचनलालेर मृत्युर पर ताहार पुत्र मुकुन्दलाल रपाडगर कोन पक्ति तामुलि जातिर स्त्री स्वामोर धने अधिकारिणी हाया द्वितीय पति करे, ताहा सिद्ध इइते परे किना-इत्यादिर व्यवस्था ७६६-७७० २५६-गापुत्र दिगेर यो यमुनापुत्रदिगेर वृत्ति क्रमागत घन वटे, कि यजमानदिगेर एमत क्षमता श्राछे, ये प्रापन २ इच्छा मते याहाके तुष्ट दइया दिते चाहेन ताहाके दिवे पारेण-दहार व्यवस्था ७७०-७७१

1
२६० --मित्तायसाहुर मृत्युर पर ताहार पुत्र गोपाल चालेर प्रोमालि
वदामुकुडा
श्रापिलाएट
बुनियादिसिंह
নৱব
सद्भनारायऐर लिखित तममुक प्रो गरेर टाका नावालक पुत्र
स्वत्वे उार खोर निकट ते बलन् फरा उनित छिन, कि
ना-पत्यादिर व्यवस्था ।
७७१-७४
२६१---गुरुममादमय घरेन्द्रनारायय डिमरिदारान
भीमतीगुणमयौदासी
देनादार
गुणमयोपासो अमाप्तम्यवहार पुत्र प्रतिपालनायें ए फरिया
याफे, साहार निमितऐ नाबालक पुति-निपर विक्रय करते
पारे किना-ताहार व्यवस्था ।
७७४-७७६
२६२-पादि कोन हिन्दु पक्ति स्वातीय धर्म याग र रिया अन्य धर्मार.
लम्बो त्य, नासर स्नो स्वयतीय धर्म त्या ना करिया पितृ-कि
भाव-भासये थाकिते परे किनारमादिर व्यवस्था ।
038-10
९६३---वनविकान्तचोपरि
मापिलागट
नवकावनोपुरि
शरएट
पोध
पुष
विपये गये प्रो हालेर प्री जलार म्पनस्पा । सार
मध्ये यथार्थ कोन मा हार-फियतेर पस्था !
७३-10

शुद्धिपत्रम् पृष्ठे पडतो १५ ५ ६ ६ ६ ६ २० ११ १५ अशुद्धम् शुद्धम् मनुवचनब्जेति मनुवचनञ्चेति दाखिल दखिल धन धनं देवोयानि देशोयानि अदालनेर प्रादालतेर दरखाश्त दरखास्त पटो शतरजी सतरञ्ची जो जे श्रापीलाएटेर श्रापीलाराडेर शास्त्रमते शास्त्र मत एतद्धन्मपि মনমাগি प्रभारोज्ञा. प्रभोराजा. राताम् ज्ञानम् निबन्धनुमु. निवन्धनमुन मुकावल्या मुक्तावल्या सस्काराणामभन्नतः संस्काराणामावत: मुत मुर्द्धत उद्घ भोजाक भोजोक भ्रातृपयर्यान्ता भ्रातृपर्यन्ता माहार गर्मचातित्वेन गर्भजातत्वेन रक्षेवचतन्तु १६ १६ ૨૨ ૨૨ २६ १५ जवं ४६ ६१ ६ माहार लिखित ६७ फूटनोट रक्ष तचद् पृष्ठे पतो ७१ ૭૨ ४ शुद्धम् राधावल्लभ १७३१२ सरवराह पाहा से व्यक्ति राखे किना भूम्युत्स० भूम्यादे दखिलभर व्यवस्था श्री ७२ १६ ७२ ७६ १६ ८० २१ ८ १०४ १०४ साहेवेर हुजुर देन १३ अशुद्धम् राधावन्धव १७२२ मुखवाह पाडा से राखे ना भूभ्युत्सर्ज देवस्वभुभ्यादे. दाखिलकार व्यवस्या श्रो साहेवेर द यदि मेक्नटन व्यवस्थार करायाय शास्त्रर वाप्युपछि ततत्कन्याया लिखित्वात् प्रतिष्ठितानां भातणां दाखिले घन रामकलिर दवसालि यः १४ मेकनाटन १०४ १०४ १२१ व्यवहार १४ २१ ૨૨ . १२२ २१ १२६ २२ ૨૨ १३० १३३ १४. कराराय शास्त्रेर आशा वाप्युपाधि तत्कन्याया लिखितत्वात् अप्रतिष्ठिताना भ्रातृणां दाखिल घन रहते रामकालोर इवसालि १४१ ૨૨ पृष्ठे पती शुदम् अशुद्धम् सउ टाकार कारिष्यामिती सो राकार १४ करिष्यामीति० राष० २ कुमाय्यभावे व्यक्त १५ ८ १६२ २६६ १२ १६ स्वस्था १८१८ श्रच्छादनेर यावञ्जीव अजिमायादेर त्यशाहरणे मार्च चौधरिरी कोट सराजका कारिया समानजातीययोः २० ६ १८६ २०३ कुमार्यभावे व्यक्ति १८२८ स्वत्व वाकी १८२८ प्राच्छादनेर यावज्जीव प्राजिमावादेर स्यांशधरणे मार्च चौधरि कोटे सराजकरा करिया समानजातीययोः करमहरा व्ययार्थ पितर्युपरते तालद्वार० प्रश्नेर व्यावहारिके. सम्मन्धे सर्व २२ ३ २२२ २२३ ૨૨૫ ૨૨૭ करग्रहरण ०व्ययाथ ३ २३८ २३८ १६ पिनु[परते तालद्धार प्रश्नेर व्यवहारिक समन्धे ३ २५२ २५५ ३ सब्व० ( ४ ) पडतो अशुदम् शुद्धम् पृष्ठे २५५ २६२ २७८ २६७ २६७ R ६ नेजामहिने व्यतिरिक्तोचरा एते याज्ञवल्क्यः प्रत्यय १८ ३०२ ५ मन्यकावा ३ २६ २ ३०४ ३०५ पितुरिच्छयैव कानन्ति ३०५ ३०६ E ४ ३२४ ३२६ ३२७ नेजामधिनेर व्यतिरिक्को उत्तरा एत्ते याज्ञवल्यः ०प्रत्याथ गन्यकारैर्वा पितुरच्छयैव काडक्षान्ति निरुदो मरणपातित्यादि लिखितेतदवीय विशत्सहस्त्रो. विकास प्रपौत्र पर्यन्त ददीय पायचि. यदेतब्दीय মন স্না सहादि खग्राहकाणां राइवचनस्पैक देवा वचनेम्यो निनादंदस्वांग देय विषययनस्य १६ निरूदो मरणपातीत्यादि लिखितैतदन्दीय त्रिशंसहलो. •धिकार: प्रपौत्रपर्यन्त. दीय आपत्ति यदेवदन्द्रीय भ्रात्रा भ्रातृ संग्रहादि० तदग्राहकाणां शरवचनस्पैक. ६ ३६५ ३६८ ६ ५ ३७६ ३७६ ३७७ ८ वचन्भ्यो निगदशाहत्यांशं वेरा विपश्वशक ३७६ १ पृष्ठे ३८१ पडतो २८२ ६ अशुद्धम् स्तिर्यपरते योग वर्षसहस्त्रै याम्ये एतद्धम्माधिकरणा० विवारयिष्यन्तीति ग्रिन्थ सदियुप० दानकयादेः तच्छनसम्मत दोपचन्द्रभागिनी ४५२ शुद्धम् पितhपरते योग वर्षसदस योग्ये एतद्धर्माधिकरणा० निवारयिष्यन्तीति अन्ध० सास्युप० दानक्रयादेः तन्छास्त्रसम्मतं दीपचन्द्रभगिनी ४५५ ६ २३ ४६६ ५४६ २१ २५ ७ " माहौ 10 ५६० ५६० ५६६ प्राबल्येन दायभागादि. लिखितेशवीगन्दा १५ १२ भर्नु ६६ ७१३ याहाणे. प्राबल्येण दायभागदिक लिखितेशन्द भर्त भर्चा मात्रा धनाहकाः भा ऋर्णा. प्रतिवाद्य. २६ ७२४ भर्चा मळ धनाईकाः भर्चा ग्णा प्रतिपाद्य. ७३४ ७७४ ८ ७७४

Dharmshastriya Vyavstha Sangrah

Author
Sharma,subhadra
Title
Dharmshastriya Vyavstha Sangrah
File name
Dharmshastriya Vyavstha Sangrah
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2012/08
Publisher
Uttar Pradesh.,shaskiya Mudranalaya
Language
Sanskrit
Pages
827
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311978
Barcode
99999990320812.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
DchJtNZ2nrd
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