Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Vayakti Aur Raaj

Sampurnanand · 2010/12

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व्यक्ति और राज लेख- मम्पूर्णानन्द हिन्दी पुस्तक एजेन्सी ज्ञानवापी, बनारस [मूल्य २५) द्वितीय पार] प्रकाशक- धापैजनाथ केडिया हिन्दी पुस्तक एजेन्मो शामापी, बनारस । शपाएँ २. हरिसन रोड, कलकत्ता दरीया कर्जा, दिती शीपर पटना मुद्रक हष्णगोपाल केडिया वणिक प्रेस, सासीविनायक, पनारस ।

ॐ
सहस्रशीपा पुरुपा, माहसान महस्रपात् ।
एकोऽप्योरमद्भाति, तस्मै मूत्रात्मन नम ।।
लोकानाम् लोकपालानाम् , मयादाः सप्रवर्तिताः ।
मुत्य मुनय च यनाटी, तस्मै श्री मनवे नमः ।।
भारतक व्यथित हृदयको समर्पित

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विपय सूची
?
८०
७
.
जिपय
भूमिश
7 विषयमुप
अध्यामवाद
द्वदामा प्रधाननाद
र फासिम्मान और नात्सीमा
अफगामा मत
कुकुर मत
७ मी गोल
- स्वाधीनता (क)
(प)
(ग)
" तपाताको सीमा
गज और आमनान
७६
,
ह
.
Su
१२७

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१
३
३
७०
७
विपय सूची
विषय
भूमिका
। विषयमुप
अयात्मवाद
हमा प्रधाननाद
३ फासिस्टगार और नात्सोवाद
अफलानूना मत
पुटम्मुर मत
७ सपसी योज
- न्वाधीनता (क)
(स)
(ग)
" तत्परताको सीमा
गज और श्रात्मशान
उह
ह
१०
0
३०७
२५

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भूमिका
श्राज पृथ्वी में भयावह उथल पुथल मच रहा है। इतना
ही नहीं है कि मान राष्ट्र एक इमरसे रह रहे हैं और
शेष भी सम्भवत युद्धकी परिधिमै श्रानेवाले हैं परन्तु जहा
रडार नहीं है वहा भी भीतर भीतर ज्यालामुखी दहक रहा
है । पूँजीवादने साम्रास्यवादका प्रसय किया। अपने दशमें
और अपने दशक बाहर जो दृसगका जीतना ही शायण कर
सकता है वह उतनी ही प्रतिष्ठा पाता है। धर्म, विमान
दर्शन घाटमय, कला-वह सब बातें जो मानन सम्मतिकी
अमूरय सन्तति है जि होने अपने तजस सभ्यताके इतिहासक
काले धोको ढक दिया है न्योपुनोंक दरयागेका शामा
चढानेके उपकरण हैं। जिनक हाथों में राजसचालनका पविन
दायिय है वह वासनाक दास हो रहे हैं। एक बार लोक्त
देशोमें यह अधेर मच रहा है मर्ग श्रोर अधिनायक तन
कायम हो रहे हैं। लोगोंकी स्सत प्रता दिन गयी और कार
सिर उठानेका साहस नहीं भरता। प्रचारक साधनम
जनताको यही समभाते हैं कि स्वतत्रता छिन जानेमें ही
उसका कल्याण है।।
इसके दो तीन परिणाम देर पडते हैं। एक ओर तो उन
-

रोगों, जो नेतृय ल सात " उदासीनता, प्राममंगपता
यहतो जाता
| पद ऐमा भामय करते हैं शिहाथ पैर
आयना ध्यय है। सत प्रमा म्याधीता प्रमाणे अधिार
लोकमत आदिशनिश्था है, इन उपारण परक अपना
जो दुपाना पागलपन है। पाना पीना मनोपिनादाना
पार चुपास मर जाना-यस नायन यदा मन्यामरा
पार सामान्य मनता पायत प्रतिशिर हो रही
है। उसका भाति प्रायश्यता मादे पूरी माना जातीक्षा
पर उसके पित्तमें रिसी पाजो मन यनी रहती है। यह
चीज क्या है इस यह म्यय नहीं ममझ पाती। यह अत तुष्ट
है पर क्या चाहता है यह यतला नहीं साता। इस इमा
पता नहीं है किस्मत ताक अपाय मनुष्यता प्रात्मा अनुप्त
रहता है, क्या स्वाधीनता उसका स्वमाय, उसास्करह।
अाज भारत पायक प्रश्नपर रिचार कर रहा है।
उसने राजनीतिर म्यात प्राप्त करनेगा सालार रिया
है प्रो एसो पाf अने मियाधामा हाते दुर
भा उar अपने स्वातिमें शायद मकरना होगा।
यहाँमा मिसीसिा प्रकार अपना राज्य स्थापितहोगा।
उस राजमें शासनग्यस्था ता घाह जैसा हा पर यह तो
पाशा करनी हा वादिये रि उस पर लाकन प्रामा
होगा। पान्तु उन भूगमता पवना हा नाहिये जो पायात्य
भार उनके अनुपायो प्राव्य दशाक जोवन का दूभर फिरे

हैं राज क्या है, राजा उद्देश्य क्या है, व्यक्तिका गजमें न्यान क्या है, उसके अधिकार क्या है, इन बातोको जाननेसे ही न भूगमे रचना हो सकता है। यह समस्या के व्यरवारिक ढग में नहीं सुना साती। स तदमें कई प्राध्यात्मिा हैं। उनके समझे बिना इस पियकी पूरी मिना नहीं हो सकी। बा लोग दर्शन' के नामसे मागने हैं उनको भी अपना वुद्धिपर थोडासा जोर देनाचाहिये। मने इस पुस्तम समी मुरय प्रवरित निधारीका दिन गया है पार फिर यह दिग्वलानेश प्रयत्न किया है कि कौनमा सिद्धात समीचीन है। यह समीधान लिद्धात मेरी सम्मतिमें उन दानि विवारॉपर रहा है, जिनसे मानर समानके सामने पहिले पहल गपनेका अय भारतक पिमुनियों और उनका परमरापर चलनेवाले तातो शिवानको प्राप्त है। सम्मर है कि पहिले मा मिसाने इस विषयपर उस प्रकार निवार नहीं दिया जैम मैंने लिया है। स्यात् इससे पारश्परता न पा होगी। मुभा तो अपने सामने यह सैक्टो वपया इतिहास-रह लावो मनुष्याची या ओर अतवेदना, सनताका कुल्ने प्रयत्न म्वाधीनताके नामपर वह अपना भातियाँ, जनताको -सताने के लिये धर्म और शनका यह तोडमरोड- "था जो प्रावानल घिद्वाना समयमे अयता याता है। इसलिये जो यात होने सूप्रापसे प६ दी थी उसकी :--रखना AP

wrपी वाला पती पदता है। पापा भी एमी होती
माहियास समय यतियाशी में सरकी
गयादा या उसम मापक समाज को जाम
में दागा।
में दीयर सरना किम याममें मुरादातर
मत मिरी है। यदि में RAIN या सायच्या
विषयी भार riir साना मा अपनेश एतय मागा।
मग पमा एट निश्याम याताय यायामिति
तभार समाजवादक यताधार विगार सम्पपमें
ही जगता परयाण है भो यद समय पूर्णतया मम्भर
है। मारतन पहिन भी सम्पतिके क्षेत्रा गुरुपदका सुशाभित
किया है। ऐमी पाशा क्यों नयी शायमि यह श्रागे भी
पसारमा?
প্রথম বার চাই 7 aী সব গান
बार शामित अपन अपने धर्मको पहिचान उसका पालन
नहीं करते तबतक सथा सातिक विकास नहीं हा
समता। मुचार पस पग्निारित राज हा यह पातावरण
प्रदान करता है जिसमें व्यक्ति पने य धनौग छुटकारा
पाकर श्राममिता कर सकता है। इसीलिये ति साधुओं
का भी राजयघस्थाका ओर ध्यान दना पड़ता है। सामा य
गृहस्थ तो जिनको नागरिक रूपस गजके समारनो भाल
बुरे परिणाम भाग हैं, इस ओर उपेक्षा नहीं हो पा सात

.
अाज तो ऐसा प्रतीत होरहा है कि स्वाधीनताका सूर्य्य अन्त
हो जायगा ! या दशोमें उसको पिरणे देश ही नहीं पहती
दूसरोंमें भी उसका प्रकाश क्षीण पडता जा रहा है। ऐसे
समय उन मर रोगों, जो मनुष्यको मनुप्यके रूपमें देखना
पाहते हैं, यह तय हो जाता है कि राम ओर तवाल ध्यान
दें और सभ्यता और सम्मातियो लुन हानेसे यचा लें।
जालिपादेवी, माशी
२० चैन (सोर ) १९९१
-मम्पूर्णानन्द
कृतनता प्रकाश
इस पुस्तकमे मेरी रिखी 'ममानवाद' मे - अपतरण
लिये गये हैं। ऐसा करनेकी अनुमति दनेके लिये में उसके
प्रकाशक श्री काशी विद्यापीठका प्राणी हैं।
-ग्रन्थमार
H

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व्यक्ति और राज
विपयमुख
यति थोर राजा सम्बघ उतना हो पुराना है जितना
कि व्यक्ति और राका अस्तित्व। सम्बधका स्वरूप कैसा
हो इस विषयमें समय समयपर सिद्धात और सम्मतिमें
उलट फेर होता रहा है। व्यवहार और उस समयके प्रचलित
सिद्धातमें बहुधा असर देखा गया है। परतु ऐसा कोई भी
ऐतिहासिक समय नहीं मिलता जब प्रत्येक व्यक्ति किसी न
किसी राजफे अर्गत न रहा हो अर्थात् किसी न किसी राज
से किसी न किसी प्रकार सम्मत न रहा हो। इस व्यापक
क्थनके कुछ अपवाद भी रहे हैं और हैं। जो लोग अपनी
इच्छासे दूसरे मनुप्योको छोर पर जगल पहाडमें तपश्चर्या या
पिसी अन्य उद्देश्यस चले जाते हैं उनको उस राजसे सम्बद्ध
गिनना जिसकी भौगोलिक सीमाके भीतर उनका निवास
स्थान है निरर्थक है। परतु हम ऐसे लोगोशे मसाधारण
मानते हैं, उनकी सत्या कभी भी अधिक नहीं हुई । सामान्यत
तो जो मनुष्य किसी विवशताके कारण दूसरे मनुष्योंसे अलग
पजाता है पह फिर समाजका रङ्ग धनना चाहता है,

२
व्यक्तिमोर राश
।
तक रसपी यह इच्छा पूरी नहीं होती तपता व्याकुल रहता
है। यह जानता है कि पप जिस समाज में जा मिलेगा पद
किसी न पिसी राजश अयपय दागा, अत अप्रत्यक्षरूपसे
पद रिसीम किसी राजापारिय', रिसीमहिती राजसे
सम्बद्ध पनिा, पनना माहता है। जो पागल है, मिला
मस्तिष काम नहीं रता, या जिसकी युद्धि अमी उद्युर
नहीं गुर, उसका डाबर ममी, यहाँता दिघोर और एनी
भी, अपने किसी राजम बैंधा पाते हैं आर सपाँधनेपाली
डालो पाटनेचा प्रयत्न नहीं करते पाय जाते । जो लोग
याान तोहार जेलोंमें पददाते हैं यह कुछ सपनोंको मले
हो मापसद परते दो, पिसी तात्कालिक आयेशम थावर
वोर उहएछता कर येठे हो, पर यक्ष भी यह नहीं चाहते कि
जिन स्वत्योंको यह अपना समझते हैं उनका अपहरण हो।
यह क्या माहते हैं इसको ठोकठोस न कह सकते हो पर
उनकी भी हार्दिक इच्छा यही रहती है कि यह सुधरे हुए राज
के अग हो कर रह सफे। प्रत जो लोग देने में अपयाद जान
पडते हैं यह भी घस्तुतः इस व्यापक नियमरे याहर नहीं हैं
कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छास राजसे सम्बद्ध है। यह पात
पर और सभ्य, सभी प्रकार मनुष्यों में पायी जाती है।
जो नियम इतना व्यापर है इसका कोई न कोई व्यापक
थाधार भी होगा जिसकी जर मनुष्यकी प्रति और उसके
जीवनकी पारश्या परिस्थितियों में हागा। मनुष्य के सम्म
-

विषयमुख
ऐसा कहा जाता है कि वह एकाकी रह नहीं सकता। इसका
अर्थ यह है कि एकाकी रहनेसे मनुष्यका जोवन अपूर्ण रहता
है। उसकी घुद्धिका, उसकी छिपी मानस शक्तियाका, विकास
अकेले में नहीं हो सकता। राग, द्वेप,दया, ईर्ष्या, स्पर्धा, क्रोध,
त्याग, ममता, अपना पराया, यह सब भाव एका तमें उदय
नहीं हो मस्ते ओर इसके उदय हुपरिना चरित खिलता नहीं।
भावो सघर्षसे ही मनुष्य उन्नति करता है। जहाँ कर मनुष्य
होंगे वहीं समाज होगा और जहाँ समाज हागा वहीं नियत्रण
होगा। नियत्रण ही राजका मूल है। जो निपथगामी होगा,
अर्थात जो समाजमें प्रचलित दस्तूरों के विरुद्ध प्राचरण करेगा
या करना चाहेगा, उसको दण्ड दना होगा, रोकना होगा।
दो झगडनेवालोंमें कभी भी निर्णय भी करना होगा। यदि
सय लोग पूर्णतया मनमाने रहने लगे तो मात्स्यन्यायसे समाज
नष्ट हो जाय और सबकी उनति, जो साथ रह कर हो हो
सकती है यद हो जाय । इसी प्रकार कभी कभी दो समाजो,
मनुप्योकी दो टुपहियोंमें मछली मारनेकी जगह, गाय, भेड,
बकरी, चरानेकी जगह, उयरा भूमि इयादिके लिये निराद
हो सकता है। यह विवाद या तावात-चीतस तय होगा या
स्टार । दोनों अवस्थाश्रोमें सपनो, किसी न किसी प्रकार
को राजसत्ताको आवश्यक्ता होगी। तात्पर्य यह है कि राज
की सत्ताके बिना मनुष्य अपूर्ण श्रार अविकसित रहता और
अपनी रक्षामें असमर्थ होता। इसका परिणाम यह होता कि

४
परिमौर राज
या तो मनुष्य जाति नर हो जाती या मनुष्य मगुप्य 147पाता
घोर शेर मालकी भाति जगरी पशुमान रह जाता। राज भोर
प्पतिर सम्य घी हमें यही यात है। इस प्रतिक्षा यद
परिणाम होगा कि सहाँ वहीं माप्य होंगे, पादे पातम माप
पर नये टापपर छोड़ दिये जायें, यहां रान मी दागा।
भारम्भमें राजया जो रूप हागा उसे 'पुरिसराज' पर
सकते हैं। केपल जगली देशों में परन सभ्य देशोमै भी यात
दिनोतर राजका म्यूधिर यदी स्यम्प था। शासनपद्धतियों
थिमि न प्रकारकी थी, परराज जो धर्मधा, पहजो वर्तव्य
पालन करता था, यह यही था जो सक्षपमें पुलिसका काम
है। रोगांवो आपसमें प्लर पटनेसे रोषना, यदि लड़की
पर्दे तो खुट्टा देना, जो समाज प्रचलित दस्तूरोको ताग्नेश
विचार रपता हो उस रोकना, जोन रोका जा सके उसे
पक्सर दण्ड देना तार पद्द भो सँभल जाय पार पेसा काम
न कर सके और दूसरे भी डरपर रुक जाय। यह राजका
मुख्य काम था। एक और काम था। यदि पुछ लोग लदना
म चाहे और उनमें किसी पातपर विवाद हो जाय तो पक्ष
पात किये बिना उनका झगड़ा चुका दना । यह ता भोतरी
पात हुई। अपनी सीमाके बाहर भी राजका काम पुलिसका
ही था। उम इसलिये सतर्क रहना पड़ता था कि कोई दूसरा
रान यात्रमण न कर ६ । राजकी सारी शक्तिपदी कामों में
रगती थी । यह जो कुछ करता था यह पृम फिरपर रहीं

५ -- विषयमुख उद्देश्योंकी सिद्धि के लिये होता था। उसके गुण दोपही उद्देश्यों के कारण उत्पन होते थे। उसकी सफलता असफल. तारी नाप इन उद्देश्योंकी पूर्तिसे ही होती थी। ऐसी पर- स्थामें व्यक्तिकी परिस्थिति भी सीधी थी। राज उसके लिये थोडा काम करता था और उससे थोडा काम लेता था। एक सकुचित क्षेत्रके बाहर राज उससे न तो यह पूछता था कि तुम क्या करते हो, न उसके काममै साधन या वाघा बनने का प्रयत्न करता था। दोनों ओरसे एक सीधा समझीता सा था। इस दशा में अपना क्तव्य और अधिकार समझना सुगम था। पर अब यह अवस्था नहीं रही। आज राजके कार्यक्षेत्र का विस्तार यहुत बढ़ गया है। राज अपने पुराने त योको भूला नहीं है । आज मी वह लडाइ दगेको रोकता है, कानून -तोडनेगलोंको सजा देता है, लोगोंके दोगनी फौजदारी झगडो को निपटाता है। इतना ही नहीं, उसरा न्यायविमाग स्वय उसके विरुद्ध निर्णय देता है। राज मुदइ ही नहीं, मुदाइलह भी यनाया जाता है। न्यायालयोंको किसी किसी श्रयस्थामें यह भी निर्णय करनेका अवसर मिलता है कि जिस कानूनके अनुसार मुक्दमा चल रहा है उसे बनानेका राज अधिकार थामी या नहीं। भाजसे सौ वर्ष पहिले यह यात प्राय अस म्भय थी। उस समय यदि राजपर कोई रोक थी तो वह धर्म शासकी। कानुनके वैध अवैध या यो पहिये कि उचित अनु

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विषयमुख
रित होता है जो उसके पूर्व प्रेम थे। पर मर जीवन
उतना सरल नहीं रह गया। वह अब भी अपने पड़ोसिया
और विदेशियों के प्रारमणाम पचना चाहता है, उसे अब मी
अपने बाल यच्चे प्यारे हैं, पर आज उसके गले में कई प्रकारकी
होर बँध गयी हैं। यह सम्मरत हिन्दू, मुस्लिम, 'साई
पाधि किसी मम्प्रदायका अङ्ग है। बद या तो मजदूर है या
किसी मिलका मालिक या मनेर या रिसी घर या श्रय
प्रकारकी कम्पनी सचालक, वह या ता किसान है या
जमीनदार, यह किसी दफ्तर में नौकर है या अध्यापक है।
बसकी यह विमिन हैसियतें एक दूसरेम टकराती हैं। हिन्दु
हानेके नाते उसे श्रय मतावर पियोगी अपेक्षा हि मात्रा
अपना माइ समझना चाहिये पर जमीनदार हानेसे वह अपने
विदसानोरे हितोश विरोधी है। व्यापार व्यरसायके
क्षेत्रमै पर विदेशियोस रहता है पर विद्या या इलाके क्षेत्रमें
उनो सहयोगका इन्दुक रहता है। जहाँ हैसियतो और उनसे
उत्पन्न परिस्थितियोका पेसा सघर्ष हो यहाँ अपने वर्त या
निधित करना यहा दिन होता है। राजपरिक जीपनको
भने भवसरपर अनेक पर्पोम, ये कपोंमें जो भी कभी
एक दुसरेक विरोधी प्रतीत हात , प्रमारित करता है और
व्यक्केि अपन जीवन पदेपदे राजका में तापना परता
है और उसके रुसके अनुसार आचरण करना पड़ता है।
ऐसी अवस्थामे गा और यत्ति सम्य धके क्या आधार
-

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विषयमुख है। प्रजासी सख्या अधिक है, सरकारको थोडी | राज अनेक प्रकारके काम देशके भीतर और थाहर करता रहता है। इसके - लिये उसके जो अधिकार होते हैं उन सरको समष्टिका नाम 'प्रभुत्व है। जिस राजकी शक्ति पूर्णतया अकुण्ठित है, वह पूरा प्रभु अथवा स्वतत्र, स्वाधीन राज है। जिसरी शक्ति विदेशी-दवाव या किसी अय कारणसे सधित है वह अल्पप्रमु, पराधीन राज है। यह तो स्पष्ट ही है कि मरकारके बिना प्रजा और प्रजाके पिना सरकार नहीं रह सकता। इन दोनामें अयोन्याश्रय है और दोनोंकी समष्टि राज है अत नियमत राजका किया हुआ प्रत्येक काम सरकार और प्रजा दोनोका दिया हुआ है, उसके लिये दोनोंका दायित्व है। परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि राजके नामपर जो काम होता है उसे सरकार ही करती है। यह राज्य, अर्थात् अपने अधिकार क्षेत्रके भीतर रानके नाम- पर प्रजाको विधि निषेधात्मक श्राशाएँ देता है और राज्यके पाहर राजकी प्रतिनिधिक रूपमें दूसरे राजोसे ययामिमत व्यवहार करती है। इसरियेव्यवहारमें सरकार शब्द पाप्रकार से राजा पर्यायवानी हा जाता है। वस्तुत दोनों एक हो पदार्थ नहीं है। अनेक प्रकारफे उथल पुयल हाते रहते हैं फिर मीराजको सत्ता बनी रहती है पर सरकार तो आये दिन बदला करती है। आज जहाँ नरेशकासिका चलता है क्ल वहाँ लोक्ता स्थापित हो सकता है पर इससे राजके अस्तित्व में

-
व्यक्ति और राज
कोई अन्तर नहीं पडता । यह भेद ध्यान रखना चाहिये फिर
भी यह सच है रि साधारणतः ध्ययहारमें राजका अर्थ
सरकार ही होता है।
जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है सरकार राजका पफ अग है
फिर भी उसके वामौका दायित्व पूरे अगो अर्थात् सारे राज
पर पाता है। दूसरे शामें सरकारके पिये कामोंकी जयाय
देही प्रजापर भी आती है। इसलिये यह भी आवश्यक हो
जाता है कि यह यात निश्चित होजाय मिनायर्ग दूसरे शवों
में जमता या नागरिक समुदाय, शासितोकी समटिका कोई
अवस्य अर्थात् कोई व्यक्ति कहातकार किस अवस्था राज
सरकार कामोका उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले। यह
पात तय हानो चाहिये कि यह कय और किस प्रकार ऐस
दायित्यको ओढा अस्वीकार कर सकता है। इसी यातको
दूसरे शब्दो में यों कहेंगे कि उसकनार राजफे यीचमें जो सम्म ध
है उसका स्वरूप निश्चित हो जाना चाहिये।
यह समस्या कवल ग्यारहारिक उपादेयता प्राधारपर
मही सुलझ सकती। व्यावहारकी यात ता यह है कि सरकार
की सदैव यहा रहगो कि प्रजा यिना कान छ दिलाये
उसको यात मानती जाय और उसफ किये हुए ममी कार्माश
भार अपने ऊपर लादता आय । व्यवहारमें प्रना प्राय पेसा
हो परती भी है पर कभी-कभी सरकार की कोई यात
थोडे या यहुत व्यक्कियोकामही भाती और यदि वह पलशाली

विषयमुख
हुए तो उनकी इच्छा पूरी होकर रहती है। पर इससे केवल
वक विशेष बला टल जाती है, मेघ घिरे ही रहते हैं। यदि प्रश्नको
सुलझाना है तो उसपर सैद्धान्तिक रूपसे विचार करना
होगा । किसी एक राज किसी एक व्यक्तिका प्रश्न नहीं है,
मेक्सिो अवसर विशेषके वतन्या कर्तव्यका निर्णय करना है।
यथासम्पय देशकालसे ऊपर उठकर यह देखना है शिराज
और व्यक्तिमें कैसा सम्बन्ध होना चाहिये जो उभयके लिये
श्रेयस्कर हो।
मैं पहिले भी कह चुका हूँ कि श्राज इस प्रश्नकी ओर
ध्यान देना पहिली अपेक्षा अधिक श्रावश्यर हो गया है
क्योंकि समस्या पहिसे जटिल हो गयी है। नाजसे दो सो
वर्ष पहिले, भारतफे दशी रजवाहो सकमें भी, बात बहुत
सीधी थी। प्राचीनकालके विद्वानोंने राजके सम्बन्ध जो
पुछ छानबीन की थी यह विस्मृत हा गयी थी। राजका
विसीकोपयाल भी नहीं था। जा कुछ था वह राजा था।
मासके बादशाह चौदहवै लुईने जिस यातका स्पष्ट शशेमें
कहा था (ल पता से ग्राम में राज है) उसे सही
मानते थे। राजकीयात भली लगे या घरी पर उसफ दायम
शक्ति थी अत उसका भाम्रा मा य थी। यदि उसस बुद्धार
यल्या हुआ ओर दुमरा राजा या राजवश ठाया गया ता
यह भी उतना ही माय हो गया। देश और विदेश में सारी
जिम्मेदारी राजाकी थी। प्रजा यश अपयशी मागा नहीं
धी, उसका कोई दायित्व नहीं था।

घ्यक्ति और राज
श्राज अयस्था दूसरी हो गयी है । जो कुछ कदा या दिया
जाता है यह राजके नामपर और राजका मुख्य भङ्ग प्रजा
- है, अत प्रत्येक कामके लिये देशमें और विदशमें उसकी मी
जिम्मेदारी हो जाती है। शासोफे सिरपर दोष महनेसे छुट
कारा नहीं हो सकता। फिनलैएडमें फुल पंतीस लाख प्राणी
पसते हैं। शासम जिन लोगोंके हाथमे है यह यहाकी यहुमूल्य
खानों और जगलोके स्वामी हैं। पर जप छोटासा फिनलैण्ड
दस करोड़ जनसख्या पाले रूससे लाया गया तो इन शास
कोके निजी क्षति लामका नाम नहीं लिया गया। जनताकी
स्वाधीनता और राजके हितकी ही दुहाई दी गयी । अमेरिका
के संयुक्त राजमें समाजवादियों, विशेषत समष्टियासियोको
पोट देना यायालयों में उनको सफाईका ठीक-ठीक अवसर
न दना, देशसे निकाल देना, फांसीपर लटका देना-यह सय
राजके हितक लिये किया जाता है। प्रशात महासागरफे
दूसरे किनारेपर रूसमें पूंजीवालोंके साथ ठीक ऐसा ही वर्तान
करनेसे राजका हित होता है। भारतमें राजा हिव आज इस
यातमें माना जा रहा है कि यहुतसे नवयुवक शिक्षित भारत
घासीजेलोमें डाल दिये जाय, नजर दकर दिये जाय, देश छोड़
कर चले जायं। न निटेनको मजा अपने राजा या मत्रियोंके लिये
लड़ती है, न जर्मनीषी प्रजा हिटलरके लिये, न परतन
भारतकी प्रजा अपनी विदेशी सरकारके लिये । कहा जाता है
कि यह सय राजके हितके लिय लड रहे हैं। इस कार में

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२४
व्यक्ति और राज
सहा मत्ति समुदायके राजनीतिकजीयनकी रक्षा करती है।
भैसों आरगायोंके मुरडपर जय किसी बनैले दिन पशुफे भाम
मणी श्राशङ्का होती है तो यछटो और गायोको बीचमै कर
सय नर घेरा गाँधकर बडे हो जाते हैं ताकि शत्रु जिधरसे
आये उस सागौंका सामना करा पहा घोडे ओर गधे पिछली
टॉगीको यादर करके राडे होते हैं ताकि शत्रुको लात मार सके।
प्रारम्भमें मनुष्य के जीयनमें इससे अधिक राजनीतिका समा
घेश नहीं था। सार्वजनिक शत्रुओका सामना करनेके लिये
सहज प्रवृत्ति सयको खडा कर दती थी। कोई न कोई नेता
भी रहता होगा। मेटियोंके गोल्में भी जो भेडिया अधिक चल
वान् और चतुर होता है यह स्वत नेता बन जाता है और
दूसरे उसके पीछे पीछे चलते हैं। पर इसमें न कोइ सघटन है
न नेता देवी आधिपत्य मामनेकी पात है, न उसकी आशाको
अनिवार्यतया मानना है। प्राचीन मनुष्य समाजमें भी ऐसा
ही रहा होगा। पशु पक्षियोंमें भी आपसमें बरतने के नियम
होते हैं और जो उन नियमोंको वोरता है उसे सर मिलकर
दण्ड देते हैं। यों कह सकते है कि उस पशु या पक्षिसमुदाय
का लोकमत नियमके उल्लंघन करनेवालेको दण्ड देता है। वह
नियम समुदायके अनुभवके आधारपर आप ही बन गये हैं
अर्थात् हारे पालनसे समुदाय सुव्यवस्थित और चिरजीची
रह सकता है अतः यह समुदायके प्राय: प्रत्येक प्राणीको मन
प्रवृत्तिके अविच्छेद्य अग है। परन्तु कानूनमें यह बात नहीं

१५
चित्रयमुख
होती। कानूनको परिभाषा यह है कि यह पेसी आशा होती
है जिसके साथ दण्ड लगाहोता है। 'चोरीमत करो, अयथा
प्रमुक अमुक दरड पाओगे यह कानुनका रूप है । पशु ममाज
में ऐसे कानून नहीं होते, प्राचीन मनुष्य समाजमें भी न होंगे,
क्योंकि कानूनके लिए कोई बनानेवाला नियामक, शाशा देने
वाला चाहिये। ऐसा नियामक न पशु-समाजमें है, न पुराने
मनुप्प समानमें था। यह नहीं कह सक्त कि कानून उन
प्रारतिय नियमोंक समान है निनस ममुहापकी रक्षा होती
है, इसलिए. घसरके सुदयमें भाप ही उत्पन्न हो जाते हैं।
'चोरी न करो' तो स्यात् ऐसा नियम माना जाता पर 'सडक
पर अपने यार्य हाय लो' मनुष्य समुदाय के लिए प्राकृतिक
नियम नहीं है। यह तो किसी नियामकाही धनाया हुथा है।
यह अवस्था क्यवक चली गयो यह नहीं कहा जा सकता
पर पुजिप्रधान मनुष्य पशुपक्षियोंकी भाँति सदा एक ही श्रय
स्थामें तो रह नहीं सकता था। उसने कच्चे मासकी जगह
पका भोजन खाना सीखा, खेती करना सीमा, पशु पाले,
मकान बनाये, पृथ्वी के गर्भसे खनिनोको निकालना और उनकी
पलाना तथा ढालनासोप्पा । मनुष्य समुदायका स्वरूप जटिर
और जटिलतर होता गया। श्रविमाग हुा । कुछ लाग एक
श्राम, कुछ दूसरे काममें लग सस परिणाम यह हुआ कि
जहाँ पहिले सय घरावर ये, यहाँ श्रय सम्पत्ति-चपम्य हो गया।
शिसोक पास अधिक सम्पत्तिी, विसीके पास क्मा स्मा

व्यक्ति और राज
धत घोग अधिक सम्पन्न थे जिपपास भूमि थी। उनकी
यरायरी यदि कर सकते थे तो यही लोग कर सकते थे जो
भूलोका स्वलोक्से सपन्ध जोड सक्ते थे। यह पुरोहित
सधये। कहनेका तात्पर्य यह है कि समुदायमें वार्षिक
घेपन्य उत्पन्न हुआ। इसके साथ हैसियत, दर्जे में भी वैषम्य
हुश्रा । यह ऊँचा है, यह नीचा है पेसा भाय हद होने लगा।
जहाँ पहिले कोइ परधान व्यक्ति कभी भी अपनेसे दुर्घलोको
बुच तग पर लेता होगा यहाँ अघ एल्वानोंका वर्ग बन गया
ओर इस पर्सने दूसगैको उत्पीडित करना भारम्भ किया। अय
नेहन मड़ियों या प्राचीन मनुप्योकी भाति अपनी आतुरता या
अपने यात्रुबर थाधारपर नहीं मिलता था परन् अपने वर्ग
के आधारपर। यही सस्थत प्रयोग प्रशस्त 'अभिजन बल'
है। घर उत्पीटोंसे अपनी रक्षा करनेके लिए दूसरोको भी
पिफ दुई। यदि यह धर्मयुस यों ही अव्यवस्थित रूपसे चला
जाता तो पीरितोका तो सहार हो ही जाता, इसके बाद
उत्पीक मी यत्म हो जाते और समुदाय ही न रह जाता।
ऐसी परिस्थिति में राम हुआ है।
पुराणोंमें राजकी उत्पत्ति सम्ब धर्म जो क्या दी है यह
भी रसी यातका समयन रता है। ऐसा लिखा है कि पहिले
कोइ राजा न था। लोग आपसमें मिलयर रहते थे। परन्तु
कुछ दिनों बाद यह अवस्था यमली। पल्वार लोग दुर्घलोको
'मात्स्यन्यायेम' खाने लगे अर्थात् उसी प्रकार खाने लगे जिस

विषयमुख प्रकार यही मलियाँ छोटी माल्योको खा जाती है। यह स्पर ध्यान देने योग्य है। शोषक और शोषित, यही मात्स्य याय धरता जाता है। युक्तमातके कई बडे जमीनदार कृषकों- को अपना 'माहार' पहते सुने गये हैं। श्रस्तु, इस परिस्थिति से पस्त होकर सबने मनुसे प्रार्थना की कि आप हमारे राजा मनिये । इस प्रकार प्रथम राजकी सृष्टि हुई।

अध्यात्मवाद
इस विषयमे जितने सिद्धात प्रचलित हैं उनमें सबसे
पहिला स्थान अध्यात्मवादका है। इसका कारण यह नहीं है
कि यह सबसे पुराना हे घरन् यह कि इसके सपर्धन और
प्रचारमें पडे घड़े विद्वानोंने भाग लिया है और रिसी न किसी
रूपमें इसका दूसरे पादपर भी प्रभाव पहा है। अधिकाश
सरकारोको भी यह अभिमत है। अब यह काल तो है नहीं जय
स्मृतिके शब्दों में, सरकार अपने लिए 'नायिप्णु वृथिवीपति'
(प्रत्येक राजा-सरकार-विष्णुका स्यरूप है जैसे किसी
वाक्यका पेश कर सकें। हमको इश्वरसे अधिकार मिला है,
हमसे केवल यही अगाय तरय कर सकता है, ऐसा कहनेसे
आशकर काम नहीं चलता। इसलिये पिसी दूसरे शास्त्रीय
प्रा.यकी आवश्यकता पडती है। श्राश्रय ऐसा चाहिये
जो पिसी सम्प्रदाय विशेषका अङ्ग न हो, जिसको शास्तिक
नास्तिक समी स्वीकाररस, जिससे सरकारी स्वच्छन्दता
को सहारा मिल जाय,परतु साय हा उसपर पर्दा भी पड सके,
जो उसको प्ररताको मधुरतामै परिणत र सरे, कमसे कम

अध्यात्मवाद
विरूपको सुन्दर बनाकर दिखला सके। यह स्मरण रखना
चाहिये कि जिन लोगोंने इसको वर्तमान रूप दिया है वह
राजपुरुष या सरकारी अहलकार न थे। उनका रासकी निर
पुशताके समर्थनमें कोई अपना स्वार्थ न था। यह तो दार्श
नि निद्वान थे। हाँ, यह ठीक हे कि उनपर विशेषत इस
मतके प्रवर्तक हेगेलपर, त कालीन परिस्थितियोंका प्रभाव
पडा था । हेगेल जर्मन थे। उन्होंने नेपोलियन के समयके दुनो,
दुर्चल, दिनमिन और आभ्य तर क्लहसे जर्जर जर्मनीको
देगा। यह चाहते थे कि वह पुन उनत, यलपान पार
प्रजाहित-साधनमें समर्थ हो । इस भावनाका उनको विचार
धारापर नि स देह प्रभाव पडा। अपने विचारोंके निष्कर्ष
स्वरूप उहोंने जो सिद्धात स्थिर क्यिा यह जर्मनीके
तत्कालीन शासकोकोभी अभिप्रेतथा। उन्होंने उसको अपनी
राजनीतिका आधार बनाया। यह अध्यात्मपादके जमकी
क्या है। पर यह जर्मनीके सकुचित घेरेमें देरतक न रहा।
थोडे ही दिनों में उसने मोगालिक सामाओंमा उरलघन कर
दिया थोर सार्वभौम बन गया।
चाणक्यसी भाँति हेगेल मुख्यत राजशास्त्री न थे। उनका
राज विषयक सिद्धात एक ताण यस्तु था। उनकी प्रधानाति
तो उनका दार्शनिर या आध्यात्मिक प्रादशगद, सक्षेपत
अध्यात्मवाद या । यह इस पुस्तकका प्रत्यक्ष विषय नहीं है,
फिर भी इमा सक्षेपत उल्लेख करना लामप्रद होगा।

1
व्यक्ति और राज
हेगेलने अपने पारिभाषिक शब्द यूनानके तर्कशास्त्रसे लिये
हैं। उनका कहना है कि जगत्या विकास पर विशेष प्रणाली
के अनुसार हुश्रा है जिसको द्वन्द्वपाद कहते हैं। इस प्रणाली
को किसी पुरुष विशेष, किसी ईश्वरने अपने सपरपसे नहीं
स्थिर किया, प्रत्युत्त यह जगत्का, जगत्के उपादान कारणका,
उस पदार्थका जिससे जगत्का विकास हुआ है, धर्म है,
स्वभाव है जो यथा हो ही नहीं सकता। इस प्रणालीका
परिवर्तित होना सा ही असम्भव है जैस अग्निसे दाहक्ता
धर्मका पृथक होना । पिसी घस्तु विशेषको किसी क्षण विशेष
में लीजिय। उस समय उसकी जो अवस्था होगी पद हेगेली
परिमापा 'बाद' कहलायेगी । दुसरे ही क्षपामे, या यो कहिये
कि आपके निरीक्षण क्षणमैं ही, धाद अपनेस विपरीत अव
स्थाको अभिव्यक्त करता है। इस विपरीत अवस्थाको प्रति
पाद' कहत हैं। तीसरे क्षणमें बाद और प्रतिवादक सयोगसे
एक भयी अवस्था उत्पन हाती है जिस 'युक्तया' कहत हैं।
अय यह युक्त्याद स्वय उस वस्तुका नया स्परूप अर्थात् नया
पाद हो गया। यह अपना प्रतिवाद भार यादवाल क्षणमें
भया युत्याद उत्प न करेगा। यों ही विकास होता है। प्रत्येक
अवस्थाके भीतर पहिलकी सय अवस्था निहित है क्योंकि
यह अवस्था पहिलेके सभी चाभे, पहिलेकी सभी अवस्थाश्रो
की सतांत प्रत्येक अवस्थाके गर्भमें थानेवाली सभी अव
स्थाए हैं क्योंकि वर्तमान अवस्था ही पाद प्रतियादादि क्रम
से भषिध्यत् अघस्थायों में परिणत होवाली है।
।

अध्यात्मवाद
इस सिद्धातकाद्वद्वपाद नाम सार्थक है क्योंकि इसमें
जो यात प्रतिपादित की गयी है वह यह है कि यह विश्व
द्वद्वात्मक है। जो कुछ भी है यह अपने साथ ही अपने विप
रीतको लिये फिरता है। विपरीतके अस्ति के बिना यस्तुको
प्रतीति हमको हो हो नहा सकती । स्थूल रूपमे यह ऐसा ही
कहना है कि रातके अस्तित्वसे ही हमको दिनकी अनुभूति
होती है, जीवनका मान साथ लगी हुई मृत्यु कराती है। पर
यह यहुत ही म्यूल ढग हुा । हेगेल जो कहते हैं उसको मम
झने के लिये और सूक्ष्म विचार करना चाहिये । साधारणत'
जब हम किसी वस्तु की क्सिी अवस्थाको देखते हैं तो उसकी
उल्टी अवस्था हमारे सामने नहीं होती। परन्तु हेगेलका
कहना है कि यह उस समय भी रहती है। प्रतिवादके पिना
बादको अनुभूति वैसा ही असम्भर होगी जैसे परके पिना
चित्रकी । यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यह हद्वात्मक
विकास फेल स्फुट यस्तु प्रोमें नहीं होता। सारा जगत् इसी
नियमके भीतर चलता है। यह भी स्मरण रखना होगा कि
इसका क्षेत्र केवल मोतिक जगत् नहीं है। मानस जगत्-
हमारे विचारों, माघों और सङ्कल्पोश जगत-भी इसी डोर
में बँधा है।
देगेल आत्मवादी थे। उनका मत है कि जगत्का मूल
तव अहम् (मे) शुद्ध प्रत्यगात्मतत्ता है। यह एक है
अनेक नहीं । परन्तु उसको अनुभूति (के साथ साथ ही उसके

२२
ध्यति धीर राज
विपरीत अनहम् (न में की अनुभूति ) होतो है। थनहम्
अहम्से भिन पदार्थ नहीं है, पर बिना उसकी प्रतीतिके अहम्
को प्रतीति नहीं हो सकती। मेक अनुभव के साथ साथ यह भी
अनुभय रहता है कि ऐसा भी कुछ है जो में नहीं है, जो
मेरे मैं से मिन है । मैं के अनुभवश अर्थ है इस ' में' से 'मैं'
की पृथताका अनुभव । यस इ ही दोनों में और न-मैं से इस
विशाल जगतसरी उत्पत्ति हुई है।
पाश्चात्य जगत्के लिये यह सिद्धा तमातिकारीथा, परतु
भारतमें इसका प्रतिपादन बहुत पहिले हो चुका था। हा, यहाँ
इमे द्ववाद जैसा कोई नाम नहा दिया गया। अन घेदात
और सारयने इसी प्रणालीअनुसरण दिया है । शाकर घेदात
के अनुसार फेवल एक पदार्थका अस्तित्व है। वह सत् पदार्थ
ब्रह्म है। तत्वमसि श्रादि महावाक्योंके द्वारा यह पतलाया
गया है कि यह हमारे ग्रहमसे अभिन है। यह पदार्थ एक है,
अदय है, अपएड हे, एकरस है। पर इसके साथ ही इसस
सर्वथा अभि न पर तु स्वरूपमें विपरीत असत् मायाकी
प्रतीति होती है। यदि ग्रह्म वाद हे तो माया प्रतिवाद है।
इन दोनोंका युस्वाद ईश्वर हे। ईश्वर भी पाद होता है।
उसका प्रतिवाद याद्या, विच्छति होती है। इन दोनोंका
युक्तवाद प्रत्यगात्मा, पुरुष, जीवात्मा हे । माया असत् है, इसी
लिये घेदाती मायाकी सतति, इस जगत्को मिथ्या यतलाता
है। मिथ्या होते हुए भी अनुभवकालमें तो पद सत्य है ही,ठीक
।

--
अध्यात्मवाद
पैसे ही जैसे कि रस्सी होते हुए भी दमको अँधेरे में सर्पको
अनुभूति होती जो अनुभूतिकाल के लिये हमारे लिये सत्र
यहाँतक तो वेदानकी बात हुई। इसके आगेश क्रम
सायदर्शन यतलाता है। पुरुषमा प्रतिपाद प्रधान, मूल
प्रकृति, अविद्या हे। इन दोनोग युनाद घुद्धितत्व महत् है।
उससे चलकर इम क्रमश अहङ्कार, मन श्रादिसे होते हुए इस
विस्तृत चराचरात्मक विश्व, भातिक और मानस जगत् तक
पहुँचते हैं। यह एक ब्रह्मतत्व अपने प्रतियाद मायामे मिलकर
नानायको प्राप्त हुआ है।
मेरे कहनेगा यह तात्पर्य नहीं है कि वेदात ओर साग्य
के सिद्धात पूर्णतया मिलते जुलते हैं। वस्तुस्थिति यह है कि
दोनों में बहुत मेद है। में यह भी नहीं कह रहा है कि जिस
यातको व्यास, शराचार्य श्रोर कपिल कहते हैं उसी पात
यो हेगेर और उनके अनुयायी दूसरे शब्दों में दुहरा रहे हैं।
पात इतनी मीधी नहीं है। ऐसा मान लेना इन तानों
বাঘাঁ আঁ হুনী হিথ থকথা নাথ যায় না
ओर इनके सिद्धा तोकोगरत तरहपर रचना होगा। हाँ,
इतना मैं नि स दह कहना चाहता है कि दोनों ओर को
विचार धारायाम कुछ कुछ साम्य है। यदि जाट और चतन,
शरीर, अत करण थोर भारमाशे पृथक पृथक् न मानक
अगत्को किसी एक अदय सत्पदाका विकसित रूप मानना
हो तो किसी न किसी प्रकारसे यादकोही मानना पड़ेगा।

.
-
व्यक्ति और राज
इससे दृश्य प्रत्यक्ष अनुभूत, नाराशे साथ वास्तविक
गम्भीर मनन विषय, पा सामअस्प और समय
हो जाता है।
यह हगेलक आध्यात्मिक सिद्धा पहुत हो अपूर्ण
दिग्दर्शन है। अब में उनके राज विषयक सिद्धातको समझा
का प्रयत्न करूँगा। इतना तो स्पष्ट हा ही गया होगा
हेगेलका जो भी यतय होगा यह गम्भीर दार्शनिक रस्में
गा होगा।
पहिली बात तो यह है कि राजमा निकास भो द्वन्द्वन्याय
के हा अनुसार होता है। यह भी प्रतिक्षण सस्कारको प्राप्त
होता रहता है।
राजके अतर्गत हजारो-लाखों व्यक्ति होत हैं। इन सयके
सयोगसे ही राज बनता है। परतु संयोग दो प्रकारका हाता
है। बहुत सी ई रोका एक ढेर भी इ टोका संयोग है इसका
पना हुशा घर भी इ टोका सयोग है । लडाइके मैदानमें पडे
हुए सिर, पर हाए श्रादिके ढेरमें मो सयोग है, मनुष्यक
शरीरमें भी सिर, पैर आदि श्रगाका सयोग है। यह दोनों
सयोग सही प्रकारके नहीं हैं। एक सयोगमें प्रत्येक टुकडेवा
पृथक् व्यक्ति व बना रहता है। सर एक दूसरेके पास
पास रख भर दिये जाते हैं, हमरे प्रकारके सयोगमै टुकहीं।
पार्यप जाता रहता है यह सय एक दूसरेके प्रपूरक यसवर
पक अगी मनाते हैं। हमारे शरीरमा पा पाँच अपने लिये

अध्यात्मवाद
नहीं, वरन् शरीरके लिये हैं, उसके जीवनका महत्व इस बात में
है कि वह शरीरके जीवनका साधक है। यदि कोई अग शरीर
की उन्नतिसे स्वतत्र रहकर पनपना चाहे तो यह भद्दा लगेगा
और नश्तर लगाकर फार दिया जायगा। जितना हो अङ्ग
अपनी पृथक् सत्ताको अङ्गीकी सत्ता खो देते हैं उतना ही
सयोग सफल होता है और उनका जीवन सार्थक होता है।
पान, कत्था, चूना, सुपारी, सरका अपना अलग अलग
स्वाद है। इन पृथक् स्वादोका अनुभव हो सकता है और
इनको पास पास रखनेसे एक ही पानदानमें बद करने पर भी
“ज्योंका त्यों बना रहता है। पर पीडा लगाया जाता है तो
उसमें एक नये स्वादका अनुभव होता है। यह स्माद निस
देह हो पान, कत्ये, चूने और सुपारीके मेलसे उत्पन्न हुश्रा है
पर अपूर्व है, पृथम् पृथक् इनमें से किसी न था।
इन दोनों प्रकारफे सयोगों में क्या अंतर है ? एकमें केवल
सानिध्य-निष्टता, पास रहना, दुसरेमें सघटन-किसी
नियमके अनुसार किसी प्रयोजनको सामने रपकर, मिलाया
जाना। संघटनसे जो अवयवी बनता है वह अपने अवयवोंका
समूह मात्र नहीं होता, उनस एक पृथर सत्ता रखता है। पेष्ठ
अपनी हाल, पात, श्रादिका समूह मात्र नहीं है शरीर हाथ
पाँव नाक कानमा समूह मात्र नहीं है ! पीडा कत्था, चूना,
- सुपारीका समूह मात्र नहीं है । ऐसा प्रतीत होता है कि इस
प्रकारके सयोगसे जो अगो यनता है उसको एक पृथक् आत्मा
।

व्यक्ति और राज
ही होती है। वह ऐसे काम करता है जो उसके पृथक् अगोंके
कामोसे नितात भिन्न होते हैं। अत सघटा मूलक सयोगसे
एक नयी आत्मा,
धर्मीकी सृष्टि होती है।
मनुष्योंका भी कई प्रकारका सयोग होता है। सहकपा
सेकडों श्रादमी चलते रहते हैं पर उनमेंमे हर एक हर दूसरे
श्रादमीस स्वतन है। सयवा अपना अलग काम है, अलग
प्रयोजन हे। श्रापसमें को सम्म नहीं है। पर जर कभी
लाख पचास हजार भादमी कुम्भ मेलेक लिए एकत्र हो जाते
हैं तो दूसरी बात हो जाती है। सपा एक ही प्रयोजन
रहता है। सब अपनेको यात्री मानते हैं कुछ दरके लिए सर
का हित पकहा जाता हे सत्र एक स्वरसे थोरते हैं। याही
देरक लिप पेसी बातोंक एि तैयार हो जाते हैं जैसे खुले
मैदान में पड़े रहना, पास पास झापडी बनाकर रहना सकुचित
म्थानमें या पीना जरदीने अल में एक डुबकी लगाएर
निकल आना इत्यादि, जो इनमेस किसीका भी अलग अलग
पसद नहीं है । यह मर इसलिये दाता है कि मेला थाडी
देरक लिये सघटित समूह होता है। पाठशाला उससे अधिर
देरफे लिए सरित रहता है और सघटनसे उत्पन्न अात्माका
यहा अच्छा उदाहरण है । लोग अपने स्कूल या कालिजरी
इज्जतके लिये खेलते ई स्पया जमा करते हैं दूसरोस ह
जाते हैं। दूसरा उदाहरण सेनाका है। ऐसा प्रतात होता हे
किसेना सिपाहियाकी भाडमात्र नहीं है उसकी भी अपनी
एक पृथर स्थत व प्रात्मा होती है।

२७
अध्यात्मवाद
मेला अत्यल्पकालीन सघटन है, पाठशाला या सना
उसकी अपेक्षा दीर्ण कालीन हैं। परतु राज तो इन सरकी
अपेक्षा चिरजीती है। राजके विनातीव्यक्ति पाया नहीं जाता।
हम पिपयमुपमें देख चुके हैं कि गजके द्वारा मनुष्य के जीवन
की मीठिक श्रावश्यक्ताओं की पूर्ति होती है। यदि राज न हो
तो मानव जीवनराया तोश्रत ही हो जाय या कमसे कम
यद मानव जीवन न रह जाय। श्रत राज एक ऐसा सघटन
है जो मानव समाजके साथ उत्पन्न हुआ और उसके साथ हा
समाप्त होगा। मनुष्योंके मटित समूह होने के कारण राजमें
भी यह यमं पाया जाता है जो सभी सघटित समूदाका लिंग
है, उसकी भी अपनी पर आत्मा है। राज श्रायस्मिक भीड
नहीं है, उसकी सत्ता अपने अवयवभूत व्यक्यिोंकी सत्तामे
अवश्य ही पारित हुई है या वह उनको अतिनामण करती
> है, उनसे पृथक, स्वतन्त्र है।
जर यह बात स्पष्ट हो गयी तो यह भी स्पष्ट ही है कि
व्यक्ति और रामा सम्बन्ध श्रद्ग श्रार अझोका है। व्यक्तिके
जीवनकी सार्थकता नहींतर है जहाँत उससे राजके जीवन
का पोपण होता है। उसरा अपना कोई महत्व नहीं है। यह
रानके सामने उतना हो महार रखता है जितना शरीरके
सामने उसफ पिसी अंगका एक मूलपोप । उसकी अपनी
उमतिका कोई अर्थ नहीं है। राजपी उप्रति में उसकी उन्नति
है, राजकी अनितिमें उसकी अवनति है। राज हितके विणे

व्यचि और राज
उसको यलि उसी प्रकार होगी जिस प्रकार शरीरके हितक
लिये किसा अगशी होता है। जबतक व्यक्ति अपने पार्थक्या
अभिमानी रहेगा, जवता वह अपनेका राजसे पृथक्,
अपने
हितका राज हितसे पृथक् समझता रहेगा तपतक घह दुखी
रहेगा, उसका जीवन अपूर्ण रहेगा, जय वह राजस अपनेको
पूर्णतया अभिन्न जान लेगा उसी समय उसका जीवन पूर्ण हो
जायगा, यह सुखी होगा।
यदि यह गत ठीक है तो व्यक्ति कोई भी काम ऐसा नहीं
करेगा जो राजके हितक विरुद्ध हो, क्योंकि जो गजके हितके
विरुद्ध है यह उसके निजी हितके विरुद्ध है और अपने निजी
हितका हनन तो कोई पागल हो कर सकता है। काम, पाच
रणके मूलमें इच्छा सकल्प होता है। इसलिये यह मानना
चाहिए कि प्रत्येक समझदार व्यक्तिकी यही इच्छा होगो,
प्रत्यक ऐस व्यक्तिका यहो सकरप होगा जा उस समय राज
की इच्छा होगी,राजका सकल्प होगा। राज अपनी इच्छाओं
ओर सकरपोको अपने कानूनों, अपनी विधिनिषेधात्मक
पाशानोंके द्वारा प्रकट शिया करते हैं। अत प्रत्येक समझ
दार व्यक्ति की इन्छा और सकरप राजके कानून और श्राशायी
के अनुकूल होंगे। इसका अर्थ यह हुश्रा शिव्यक्तिको राजके
कानूनोमें अपने मनोभावोंकी झलक देख पढेगी, उसको प्रत्येक
राजाशाफे विषयमें यह प्रतीत होगा कि ऐसा ही होना चाहिये
था, में भी यही चाहता था। चाहे पहिले पद पात न भी

अध्यात्मवाद
सूझी हो, पर एक बार राजकी ओरसे घोषित हो
उसमें अपना पूरा पूरा स्वारस्य, पूरी पूरी सहदि इंग
चाहिये।

व्यक्ति और राज
नित लोभ, मोह, काम धादि विधारोंके कारण क्लुषित
रहता है। साधारणत हम इसीसे काम लेते हैं। इसलिये
अपने हिताहितको ठीक-ठीक पहिचान नहीं पाते । ज्यो-व्यों
हमारा शान बढ़ता है और अनुमय परिपश्य होता है, त्यो
त्यो दृश्य सक्रप परिमार्जित होता है। परिमार्जनका अर्थ
है धुद्धिसे अधिद्याया थाधरण उटना । जर आपरण उ
जायगा तो दो वुद्धियोका भेद मिट जायगा। अधम स्थ
उत्तम स्य दो जायगा, दृश्य सकरपा तिरोभाव हा जागा
और विशुद्ध बाम्तविक मप रह जायगा।
যঃ গুম যানষিদ্ধ বা বাঘ গল্প
है। विशुद्ध घुद्धि सच्चे हिवाहितको पहिचानकर वास्तविक
सकल्प द्वारा, जो राजहित साधक सकरपसे पूर्णतया मिलता
होगा, हितको सिद्धिका उपाय करेगा पर अधिकाश लोगों में
यह पास्तविक सकरप दवा रहता है। यदि यह उयुद्ध
होता तो यह राजसकल्पसे मिलता। इस मतके अनुसार
चोर, डाकू तकका पास्तविक सरप उन कानूनीया समर्थन
करता है जिसका प्रत्यक्ष पद अपने दृश्य सम्ल्पपे पारण
निरोध करते हैं । धुद्धिका सस्कार शिक्षामे और अनुमपसे,
यह दवर कि राजामा द्वितकारी और श्रेयस्करीदी होती है,
होता । अत समाजापर्तव्य है कि सच्चिक्षामा प्रपन्ध कर
ताशि व्यक्ति, रालसे अपने श्रभेदको समझे। पक्षिका मी
যাবে যারথ গলন , স্বর্ণা মুন্ধিা বিকা

अध्यात्मवाद
परना चाहिये। योजटि पहते हैं 'अपनी वास्तविक इच्छा
को ठीक-ठी जानने के लिये यह आवश्यक है कि हम अपनी
क्षण विशेषको इच्छाका सशोधन अपने अय क्षणोकी
इन्धाोंके द्वारा करें। पर हमारी इच्छा अन्य लोगोंकी
इच्छासे टकराती है। श्रत हमको अपनी इच्छा सशोधित
रूप तभी प्राप्त हो सकता है जर हम उसका पाट दूसरोंकी
इच्छाओं के साथ बैठा सकें। यह तभी सम्मर है जब हम
दूसरोकी क्षणिक इच्छानोका साधन उनकी अन्य क्षणोंकी
इच्छाओं द्वारा कर लें।
परन्तु इस क्रिया समय लगता है और सम्मवत किसी
एक व्यक्तिके जीवन में यह काम पूरा होता भी नहीं। ऐसा
स्यात् ही कोई व्यक्ति हागा जिसको राजफे साथ पेसी तन्म
यता मात्र हो गयी हो कि यह राजके हर कामको अपना काम
समझे, रामके प्रत्येक कानून, उसकी प्रत्यक साहा, अपनी
इच्छा, अपनी धुद्धि, अपने सपको छाया देने, राजकी
फिली पातस रुष्ट न हो। साधारण मनुष्य ऐसा नहीं कर
सकता । उसकी बुद्धि बहुत सी यातोंमें राजी बुद्धिसे उल
माती है। यह क्या परे? आदर्शगादा इस प्रश्लश सीधा
उत्तर देता है। यदि व्यक्तिकी बुद्धि राजी याताको ठाफ टीम
ग्रहण नहीं कर पाती तो यह उसरा दोष है। ऐसी दशा
व्यक्तिको अपनी बुद्धि सुरमानेका प्रयल करना चाहिये और
যুৎ সকা গ্লামাক্ষা ঘিাম ধলা আছি। ভুবন্ধী

३४
व्यक्ति और राज
हो रहा था, प्रज्ञापा पल रखता जाता था। परन्तु जर्मनी में
एक पार्लिमेपटके होते हुए भी गजली शक्ति अनुण्य रहो,
क्योंकि शिक्षालयाने जमन जनताको मनोवृत्तिको ठीक रखने में
राजका पूरा पूरा हाथ बटाया था।
श्रय हमको इस सिद्धातपर थाहा विचार करना है।
यह तो प्रत्यक्ष हे कि यह हमारे साधारण अनुभवक विरुख
जाती है। जैसा कि मैं पहिले बह चुका है हममेंसे ऐसा कोई
नहीं है जो अपनी इच्छाका हर रातमें राजकी इच्छाके साथ
पूरे तादात्म्य, पूरी एफ्तामा यनुमय करता ६।। तर इस
साघमोम अनुभवको निराधार मानने का क्या कारण है ? इस
यातको पर्या माना जाय कि हमारे भीतर हमारे दृश्य सकल्प
के सिपाय पक पास्तविक सरप, उत्तमस्थ, शुद्ध पुद्धि है
यह बुधि प्रत्येक व्यक्तिमें पायी जाती है और राजकी बुद्धिसे
सर्वधा मिलती है ? यह ठीक है कि हम सब अपना हित चाहते
है, यह भी समझते हैं कि हमारा हित उस समयता नहीं
हो सस्ता, जस्तक मि हमारा समाज, हमारा राज सुखी
और समृद्ध न हो, इसलिए हम सब यथाशक्ति राजके लिए
अपने निजी सुपोंकी बलि परनेको तैयार रहते हैं। पर यह
इसलिये होता है कि मोराजके अस्तित्वस और उसके शक्ति
सम्पन्न होनेसे प्रत्यक्ष लाम देख पटते हैं। हम राजकी पात
इसलिए मानते हैं कि विचार करनेम वह हम ठीक जवती
है। यह फोइ दार्शनिक सिद्धात या आध्यात्मिक अनुभव नहीं,
-

अध्यात्मवाद
व्यावहारिक प्रत्यक्ष है। जो घात हमको ठीक नहीं चतो
उसके विषय में यह मान लेना यदि हमारी छिपी हुई शुद्ध
बुद्धि काम करती तो वह उसे समझ पाती निराधार कल्पना
प्रतीत होती है। यह भी केस मान लें कि सबकी शुद्ध बुद्धि
एक ही बातको टोक मानेगी ? एक गनमें पूंजीपति भी रहते
हैं और समणिचादी भी। दोनों ही अपना हित चाहत है और
इसके साथ ही, समानका, मनुष्यमात्रका कल्याण चाहते
हैं। पर जिसमें एक करपाण देखता है, उसोका दूसरा क्लेश
कारी समझता है । यह कैसे मान लें कि इन दोनों समुक्षयों
की शुद्ध बुद्धियाँ किसी पर जगह मिल जायेंगी? किसी
पुराने हिन्दुराजमें मंगी, डोम प्रादि अन्त्यन मानी जानेवाली
जातियाँको सय राजनीतिक अधिकारास ही नहीं, वरन् अच्छे
घरो, साफ सुथरे कपओं, पालीका सवारी आदिसे तथा
दर्शनस पवित रखना द्विजोंकी दृष्टि में ठीक था। पर यह
कैसे माना जाय कि अत्यजौको पतरात्मा भी इन यातोको
उचित स्वीकार करती थी ? श्रारगजे उन हिन्दु मदिरहमा दिय
और हि दुोस जजिपा लेता था। क्या ऐसा माननेका कोई
भी प्राधार है कि हिदुओंकी शुद्ध पुद्धि राजा इस हिन्दू
धर्मविरोधिनी नीतिका श्रेयस्कर मान लेती ' यह कैस मान
ले कि भारतीय जनताका उत्तम स निरिश राजकी भारतीय
मोनिको हृदयङ्गम कर लेगा?
फिर, दानिक शाडम्पर छोडकर देखिये तो 'राजकी

३१
व्यप्ति और राज
इन्छा', 'राजका सकल्प' इत्यादिका तात्पर्य क्या है। इन शग्दों
का उतना ही अर्थ है जितना कि समयका पुकार', 'पुल्पी
इजत' आदि लाक्षणिक शब्दोग धाता है। एक लम्बी यात
थोडेमें कह दी गयी, पर इससे कुल या समय या राज नामका
कोई प्राणी उत्पन नहीं गया। राजका संकल्प गजमें शासन
करनेवालोश रानपी सरकारका साल्प है । राजदीपच्छा
शासपोषी रच्छा है। शासा लोग अमूर्त, अव्यश, देवता नहीं
हमारे जैस मनुप्य हाने हैं। वह भी रागद्वेषादिस अभिभूत
होते हैं। उनका भी सर्वशता प्राप्त नहीं है, अथात् उसकी
घुद्धियाँ भी पूर्णतया परिपक्व नहीं होती। अत उनस भी
भूलें होगी। जितना हा उनपर निय प्रण कम होगा जितने ही
उनको निरपुश अधिकार दिये जायेंग उतना ही उनसे धीर
गलतियाँ होगी। अधिकारका मन बुरा होगा। मनुष्य होनेके
कारण यह भी ऐसा प्रयत्न करेंगे, ऐसी आशाएँ निकालेंगे,
पेमे कानून बनायेंगे, जिसस उनके और उनक उत्साधका
रियों के स्थान सुरक्षित रहें, शासाको लगाम दृढताफ साथ
सदाफे लिए उनके हा हाथोंमें रह जाय । प्रनावगक विभिन्न
ध्यात्रियों में वह भले ही निष्पक्ष हो, पर थपन साथ उनका
पक्षपात स्वाभाविक मानवता होगी।
और फिर जो दिस' का ही क्या अर्थ है ? राजका
ऐसा कानसा हित है जो राजके सदस्या, रामा तर्गत व्यतियां
व हितोसे शिमिरा और अपर है। यह तो टी है कि कभी-

श्रध्यात्मवाद
सभी घसरप लोगोंका हित थरमस्य लोगोंके हितके
विरुद्ध हाता है। उस समय सामा यत बहुसख्यकों के हित
का सारन करना पडता है, चाहे अल्पसरयोंकी क्षति भी हो
जाय । यदि अरसरयकाक हाथमे शासनको धागडोर है तो
बहुसरयकाके हितका भी ठुकराया जा सप्ताहै। नाम राजका
भले ही लिया जाय, पर सब जानते-चूमने हैं किएक विशेष वर्गके
हितको यात मोची जा रहा है । पेस काम भी राज करता है
जिनसे सभी या प्राय समीका लाभ होता है। उस स्थाने
यह कहेंगे कि राजका हित व्यक्तिका हित है। पर यदि राज
कोई ऐसा काम करता है, अर्थात् रामक नामपर सरकार कोई
ऐसा काम करती है जापिसीको या पफ अडे समुदायको
थनिएर प्रतीत होता है उस समय शासफोका रिरोध क्यों
न किया जाय १ राजा वह कोनसा कपालकल्पित हित है जो
राजरे अतर्गत व्यक्तियोंका हित नहीं है ? सरकारके ऋगभूत
मनुष्योंकी बुद्धिके श्रागे अपनी पद्धिका सिर क्यों अशा दिया
जाय इससे तो उनकी निरकुशता पार अधिकार लिप्सा
पीर बढ़ेगी भार ग्नक हाथों लोगाका ओर भी शनिष्ट होगा।
सायनिक कामोंकी कसौटी यह नहीं हो सस्ती कि
उनाक्तत्व राजके जिम्मे है परन् यह कि उनके साचित्यको
हमारी बुद्धि प्रहण करती है। इसलिये केरल दार्शनिक परि
मापाके जोरपर राज अथात् शासक अपने कामौका दायर
जनतापर प्रधान राजके व्यक्तियापर नहीं डाल सकते । शकि

-- व्यक्ति और राज राजफे उही कामों के लिये दायी है जिनको उसकी चुद्धिकी सत्रिय स्वीकृति प्राप्त हो। इन याक्षेपोका उत्तर यह दिया जाता है कि अभीतक विकाससी कमीके कारण जितने भी राज हुए है उनमेंस कोई भो आदर्शतक नहीं पहुँचा। सबमें कमिया रही हैं। उनके शासकों में अनेक प्रकारको कमजोरिया रही हैं, उ होने यहुत सी भयार भूरे की है एस काम पर बैठे हैं जो साहितके विरुद्ध रहे हैं। यह उत्तर कोड उत्तर नहीं है। हो सकता है कि प्रादर्श राजमें शामक भी श्रादर्श शायक होगे। उस समय प्रजा भी प्रादर्श प्रजा होगी। व्यक्ति सहर्ष अपने व्यक्तित्वको दयावर रान प्रत्येक कामको अपने वास्तविक सरप द्वारा प्रेरित मानकर उसको शिरोधाय्य कर लेगा। पर आज न धैसा गज भाट-उपर हमन की यावहारिक न्यारय्याका लेकर हा विचार किया है पर इसका बहुत व्यापक अध भी लगाया जाता है । मोजाट कहते हैं राज केवल राजनीतिक सस्था नहीं है परन् वह उन सब छोटी यदा सस्थाओंकी समष्टिनिनके द्वारा जीरन निर्धा रित होता है। उसमें परिवार व्यापार, सम्प्रदाय, विश्वविद्यालय सभी अतत है। राज ही वह वस्तु है तो इन सबको समीर और सार्थक पनाता है।" हेगेल तो राजकी प्रशसार्म गद्य काम्यकी रचना करने लग जाते हैं। उनके कथनानुसार राज ही मनुष्य के जीवनको श्राध्यामिक सत्यता देता है। रापकी सत्ता अगतम परमात्माको गति है। 'विरवारमा पृथ्वीपर अपने स्वरूपका ज्ञानपूर्वक अनुभव राजके रूपमें अध्यात्मवाद है, न वैसे शासक, इसलिये वैसे शासित व्यक्ति भी नहीं हो सकते। राज एक व्यावहारिक सगठन है, उसमें एक अति- दूरस्थ भादर्शके सहारे काम नहीं चल सकता। करता है।" यह सब गुद वर्णन रानको सत्ताको ऐसी सर्वव्यापक, साधारस्परपा, बना देता है कि वह ईश्वरका विराट सप सहस्र- शीर्षा पुगा , सहस्राव सहसपात्' हो जा है। इस विराट्में अपने ठीक रबानको समझना समाधिके द्वारा ईश्वर साक्षात्कारके तुल्य प्रतीत होता है। राजसी ऐसी व्यापक ब्यारया करनेसे उम शन्दकी महत्ता भले ही बढ जाती हो पर कोई दूसरा लाभ नहीं होगा। यदि राज शासक और शामितका संघटन है, तब नो रागाला राजसकल्प पादि शन्दोंका कुछ अर्थ भी निकल सकता है और राज्यके प्रति अपना कर्तव्य भी स्थिर किया जा सकता है पर यदि रात ममानके सम्पूर्ण जीवन पर फैला हुआ है तब तो दियो अवसर विशेष पर उसकी इछाका जानना प्राय असम्भव और अपना कर्तव्य स्थिर करना भी उतना ही असम्भव हो पाया। व्यवहार में बही सरकार और प्रमाका मेद काम देगा। --

।
-
द्वन्द्वात्मक प्रधानवाद
याज कर पृथ्वोपर समाजयादका महत्व बढता जाता है।
रूसमें तो समाजगदी सरकार हो । दूसरे दोंमें भी यहुतसे
समाजवादी रहत हैं। पढारखे लागोके विचारोंपर समाज
चादकी छाप पड बिना नहीं रहती। जो लोग समाजवादके
विरोधी हैं उनको भी इसको ध्यानमें रखना पड़ता
याधुनिक समाजवादक प्रवर्तक मार्स और गेल्स ।
इन विचारोंका लेनिनने विकास दिया और व्यवहारके
क्षेत्रमें उतारा।
बहुधा लोगाका ध्यान समाजवादके व्यावहारिफ रूपोको
ओर अधिक जाता है। समाचादका पर्याय पूजीवाद
नाश समझा जाता है। पूँजीवादशा नाश समाजवादका
अपश्यम्भावी परिणाम अवश्य है पर उसका सर्वस्व नहीं
है । उसमा भी अपना एक दार्शनिक मत है। यह मत हेगेलके
द्वद्ववादसे हो निग्ला है। मार्स र एगेल्स भी ऐसा
मानते हैं कि जगत्का विकास दद्व यायसे हुआ है पर उनके
और आदर्शवादियोंके घीनमें पक यही दीवार है। अध्यात्म
-

द्वद्वात्मक प्रधानवाद
४१
चाक्षी रहता है कि जातका मूल पदार्थ चतन था, उसका
स्वरूप अहम् अहम् (में मैं) था: समाजगदी पावापाका
कहना है कि मूल पदार्थ अवतन, जड था। यह अपने स्यभार
के कारण दद्वन्यायके अनुमार परिकामसे इस विस्तृत
जगत के रूपको प्राप्त हुशा। चतनता उसका आदिका धर्म
नहीं हे, जीवमें उत्पन्न हुई। जगत्क उम मूल तत्य उस जह
पदार्थको जो मयका उपादान कारण है, जिसस सब कुछ
पना है, प्रधान पहने हैं और समाजवादियों के इस दार्शनिक
विचारधाराको दधात्मक प्रधानवाद कहने हैं। इस सिद्धान्त
को समझना बहुत जरी है। नीचे में अपनी 'समाजवाद'
नामक पुस्तक वह श्मश उद्धृत करता हूँ जिनमें इसका
दिग्दर्शन कराया गया है
यह बात् सत्य है। पुर लोग इसका सारत मिथ्या
*दर्शन अध्ययन पाश्चात्य देशोंमें केरल सत्यका ज्ञान प्रास
करनेके लिए होता है। लोग यथासम्भव जगत्काररूप, उसका कारण
उसका विकास, जोर धजीवका रहस्य श्रादि समझना चाहते हैं।
भारतम दर्शनके अध्ययनका उद्देश्य माप है। समाजवादीका श्य
इन दोनोंस निर है। यह गन्ता रहस्य इमलिए जानना चाहता है
फि उसको समझार जगत्को परिवतित कर सके। यह जाल्की घर्तमान
प्रभारा मुधार ईश्वर पारध या नियविपर नहीं छोडना चाहता।
जैसा कि मार्सने कहा है दार्शनिकोंन जगत्को अनेक प्रकारय समझने
की चेष्टा की है, मान यह है कि उसका परिवतित कैसे किया जाय।
-
-

।
४२
व्यक्ति धीर राज
मानते हैं पर यह उनकी भूल है। इसके मिथ्यात्यका कोई
प्रमाण नहीं है। उस पदार्थको सत्य कहते हैं जिसकी सत्ता
प्रासापेक्ष न हो अर्थात् जिसको सत्ताक्सिी साक्षीपर निर्भर
न हो । मैं अपने कमरेग चैटा।। मेरे सामने एक पुस्तक है।।
यह कहा जा सकता है कि यह पुस्तकरूपी दृश्य मेरे अत
परपारूपी द्रष्टाको अपेक्षा करता है भर्यात् यदि में इसका
अनुभव करनेाला नहाता ता इस पुस्तकका अस्तित्व लुस
हा जाता। इसपर यह श्रापत्ति की जा सकती है कि मैं हूँ
या न हूँ पुस्तक रहेगा। इस जगायमें यह कहा जाता है कि
में न सहा काह न पाइ अ त रण तो उसका अनुभव करने
चाला हागा यदि यह वात टोक हो कि प्रत्येक वस्तु सत्ता
किसी न किसी अनुमय रनेवालेभात करणकी अपेक्षा करती
है तो क्या उस जगह जहाँ अनुभध करने पशु-पक्षी मनुष्य
शिसीका अति करण नहीं है यहाँ जगत् नहीं है? या जिस
ও মনুবাদি মাখা , বৰ সময গবুধা গলায়
था? यदि रिसा समय प्रेस सरत करण कही प्रसुप्त या
मरा यह दावा नहीं है कि मार्स और एल्स दार्शनिक विचार
की जो व्याख्या मैं कर रहा हूँ यह उनके समी अनुयायियोंको अभिमत
है पर इसके साथ हा मरा यह विश्वास है कि मैंने उसको कहीं वित्त
नहीं दिया है। भारताय पारिमापिक श दौका प्रयोग मेरो सम्मतिम
सर्वथा उचित है और भारतीय विचारधारासे तुलना करनेमें सहायता
देता है।

द्वन्द्वात्मक प्रधानवाद
चिलीन हो जाये तो क्या जगत् न रहेगा? क्या सनमुष
जगत् मनोराज्य है? जहाँ कोई अतरण नहीं है वहाँ
मनोराज्य कैसे होगा ? यहाँ तो घर शून्यदिक और शुय
काल रहेगा। पर दिक् और काल भी तोथत करण द्वारा
अनुभूत या अनुमित होते हैं या पुष लोगोंक विचारफे अनु
सारत करणके ही धर्म हैं, फिर जहाँ मात करण न होगा
बदा दिक ओर कालको सत्ता से रह सकती है ? इन सर
प्रश्नों के तीन प्रकार उत्तर हो सकते हैं। एक तो यह कि
वस्तुत जगत् मिथ्या है । उसका अस्तित्य है ही नहीं। दूसरा
उत्तर यह है कि घर निकाला साक्षी है। उसके अतकरए
में जो सकरप विकल्प उठते रहते हैं यह जगत्म्पसे प्रतीत
होते हैं। जहाँ श्रीर जिस समय पोर शाह साती नहीं दाता
उस समय भीश्वर रहना है, इसलिए उसके मनोराज्यस्वरूप
जगत् रहता है । जय मनुष्यादि को प्राणी नहीं था, तब भी
इश्वर था, इमरिप जगत् था। यही यात भविष्यकालके लिए
लागू है । मार्स इन दोनों सिद्धान्तोंको नहीं मानते। उनका
कहना है कि जगत् सत्य अर्थात् जय कोई अनुभव करनेवाला
श्रत करण नहीं था, तय भी था और जय कोइ अनुमय करने
घाला अत करएन होगा तय भी रहेगा।
जगत्के सत्य होनेका अर्थ यह है कि जगत् प्रवाह अनादि
और अन त है। साझो रूप पाज है पह पहले न रr
होगा, भागे भी न रहेगा ! उसमें तो निर तर परिवर्तन होता

। व्यक्ति और राज रहता है। परिवर्तन शीलता उसका मुख्य लिङ्ग है। यह प्रश्न हो निरर्थक है कि जगत्की उत्पत्ति सिम हुइ । इस प्रश्न करनका तात्पर्य यह "गा कि एक दूसरा प्रश्न जगत्को उत्पति फे हेतुपे विषयमें पूछा जाय । यदि कोई स्रष्टा माना जाय तो यह प्रक्ष होगा कि उसने सृष्टि क्यों की इस सम्य धमें सभी देशोंके दार्शनिकोंने यहुत चिमार किया है जिसको यहाँ दुहराने पी पावश्यकता नहीं है। यहाँ इतना ही पतला देना पर्याप्त है कि मार्स जगतका काइ प्रारम्मक या स्रष्टा नहीं मानत । जगत्का विकास अर्थात् उसके स्वरूपमें परिवर्तन चिसो पारो शक्ति के अधीन नहीं है। उसकी मीतरी शशि उसका स्रभाव हो, उसक लिए प्रेरक है। इसलिए जगत्शी प्रगति विसी विशेष दिशामें नहीं है। उसका को निशेप, निश्चित, उद्देश्य नहीं है। जगत्के विषयमें पूर्ण ज्ञान प्राप्त करनेका हमारे पास कोई साधा नहीं है। यदि जगत् क्सिोलोकिक या अलौकिक व्यक्ति का मनोराज्य या उद्देश्यप्रसूति होता तो हम उस व्यक्तिके थत करणके साथ तादात्म्य प्राप्त करके उसको यथावत् जान लेते । घेदातके शब्दों में हमारा ज्ञान हस्तामलक शान होता पर जो पदार्थ खत र सत्ता रखता है और प्रतिक्षण परिवर्तन शील है उसको पुद्धिमें बाधा नहीं जा सकता। पर क्यों ज्यों हमारे शानके करण में पति होती जाती है त्या त्यों हमाग शान यथार्यशामके सन्निकट ग्राता जाता है।

द्वन्द्वात्मक प्रधानवाद
जगतमा मूल स्वरूप क्या था ! इसके सम्बधमे दो प्रकार
के उत्तर हो सकते हैं। एक प्रकारका उत्तर तो यह है कि मूल
पदार्थ एक ही था। दूसरा यह है कि जीप और धनीर चेतन
और जह, दो पदाथ ये सीसे मिलता जुलता योग दर्शनमा
यह सिद्धात है कि मूलमें पुरुष, ईश्वर और प्रति वीन
पदार्थ थे। एक पदार्थ माननेवाला अर्थात् ईतवादी
सिद्धा त मोदा प्रकारका हो सकता है। एक तो यह कि
मूल पदार्थ अतन था। यह शराचार्य द्वारा प्रतिपादित
वेदान्तका रिशुद्धादतवाद है। इसीके अतर्गत यह सब
सिद्धात है जो ब्रह्म या सम किसी पदार्थकी विकृतिम
जगत्का विकास मानता है। माक्स और एंगेल्स इनमेंन
किसी भा सिद्धाता नहीं मानत । वह अह तगादी पर
उनका अगल श्रद्वय पदार्थ चतन नहीं है । उना अनुसार
इस जगत्का मूल स्वरूप 'मैर' था। इस पाश्चात्य 'मॅटर'
चन्दशा पर्याय पुछ लाग मूत या तत्व करते हैं। मैटर पर
महामृतक लिए भी प्रयुक्त हा सस्ता है पर दाशीन परि
मापामे यह पद पदार्थ है निमम गत्का विकास हुया है
ओर जा स्वत उ है भारतीय दर्शनमें उस पदार्थका बसस
अन्य पदार्थ निकलते हैं प्रति दिन हैं। जापाप किसी
अप पक्षासे निश्ता है उस विधति कहते हैं। पाश
पार्थ प्रतिरिति हैं अर्थात् मह पिसी पदार्थस निबने है
भार एनसे कोइ पदार्थ निष्लता है। परन्तु जगक्षा मल श्वल
,

1
४६
ध्यक्ति और राज
प्रकृति है । इमीसे उसे मूल प्रति कहत है। उसका दूसरा
नाम प्रधान भी है । प्रधान जह है। उसकी सत्ता है पर उसमें
चेतना नहीं है। उसका स्वरूप चित् नहीं फेवल सत् है। यह
प्रधान हो उन्य गोटिक यूरोपियन दर्शनका 'मेटर' है।
इस प्रधानसे, जो मूला अव्यक है. सारे जगत्का विकास
होता है। सारा जगत-सारा चराचर विश्व-एफ साथ
हा ही शिफल याता। मशः एक पदार्थके पीछे दूसरा पदार्थ,
एक श्रयस्थाफे पीछे दूसरी अवस्था प्रकट होती है । सूक्ष्मसे
सूक्ष्म और स्थूलसे स्थूल वस्तुए, कोटाणुसे लेकर मनुष्यतक,
परमाणुफे अगभूत विधु कणसे रोकर आकाशस्थ महासूर्यतक,
रासायनिक तासे लेकर पुद्धिसत्त्व और चेतनातक, सभी
इसीमस थभिव्यक्त हुए हैं।
अय प्रश्न यह हाता है कि प्रधानका रूप विरत कैस होता
है, उसमें परिवर्तन से होता है?
प्रधानकी कोई भी अवस्था ले ली गाय, यह फह परस्पर
विरोधी प्रवृत्तियोंको साम्यायस्था होती है। यह विरोधी
प्रवृत्तियाँ प्रसुप्त हो या उदार, पर जवतक यह एक दूसरीका
सँभाले रहती है तबतक अवस्था एकसी रहती है। सारया
अनुसार भी सत्य, रज, तम अर्थात् तीनों परस्पर विरोधी गुणों
पो साम्यावस्थाही प्रधान है। प्रत्येक अवस्थामै विपरीत धर्म
एक दुसरेसे समवेत रहते हैं । इस विपरोत समघायके द्वाराही
धागे चलकर विकास या परिवर्तन होता है। पर यह साम्या

हद्वात्मक प्रधानयाद
चस्था बहुत दिनोंतक नहीं रह सकता। जिन विपरीत तत्वोंका
समावेश उस अनस्थामें होता है उनमें स्मारत क्षोभ उत्पन्न
होता है । धीरे धीरेपक कुप्रबल होने लगता है। उसकी मात्रा
बढती जाती है । पढते पढते एक ऐसी सीमाता पहुँच जाती
है जय कि प्रधानकी यह पूर्वावस्था यदलकर नयो ही अपस्था,
नया ही पम्प उप न हाता है। इस प्रनियारो 'मानाभेदसे
गुणभेद' कहते हैं। उदाहरण के लिए जलको ले लीजिये। एक
शक्ति हे जो जके परमाणुओंको पफ दूसरंका ओर आकृष्ट
किये हुए है। दूसरी शक्ति उनको एक दूसरसे पृथक करती
है। दोनोंकी साम्यावस्थामें जलका रूप रहता है । जर नियो
जा शतिकी मात्रा बढ़ने लगती है तो वह बढते-बढते एक
ऐसी सीमाता पहुँच जाती है जर जलके गुणके स्थानमें
दूसरे गुण प्रतीत होने लगते हैं और जलके स्थानमें भाप
श्रा जाती है। यदि सयोजर शक्तिकी माना यढती तो गुणा
न्तरकी प्रतीति होती और जल्के स्थानमें वर्फ देव पडती ।
यह नयी अरस्था प्रथम अपस्थासे विपरीत होती है अत
इसे उसका विपरिणाम कहते हैं। परतु कुछ काल में जिस
प्रकार पहली अवस्थासे दूसरी अवस्था बनी थी उसी प्रकार
इस दूसरी अगस्थामें भी साम्यावस्थाका प्रणाश अर्थात् क्षोम
नत्पन होता है। अर्थात् यह भी बदलती है। इसका भी
विरिणाम रस्पन होता है। यह तृतीय अवस्था पहली
'अयस्था विपरिणामका विपरिणाम होता है। जिस प्रकार

व्यक्ति और राज
४
।
द्वितीय अवस्था प्रथम श्रउम्यामें घीजम्पसे धर्तमान है उसा
प्रकार तृतीय श्रमस्था द्वितीय अवस्थामै यीजसपसे पतमान
है। प्रत्येक अवस्था अपनी पृववर्ती विपरीत होती है पर
अपने गर्भ में उसका कुछ अंश त भाती है। इस प्रकार प्रत्येक
उत्तरवर्ती अवस्थामें प्रत्येक पूर्ववर्ती अवस्थाका कुछ अश विद्य
मान रहता है । जो विपरिणामका विपरिणाम होता है उसमें
मल और घिपरिणाम दोनोंका समयय होता है अर्थात् वह
दोनोंके मुख्याशोको साम्यावस्था होता है । इसके बाद उसकी
दशा स्यय मूल अयस्थाजेसी होती है। प्रमात् उसका रिपरि
जाम भार फिर विपरिणामका विपरिणाम उत्पन्न होता है।
यो ही परम्परा चलती रहती है और तत्त्वस तस्या तर,
श्रयस्थासे अवस्था तर यनता रहता है। यही उस जगत्के
विकासका कम है।
मार्स भार पगेरसने हीगेलसे इस विकासक्रमको तो ले
लिया है पर गत्का मर
उनके
धनुसार
पदाथे नहीं वरन् श्रचेताप्रधाथा । इसलिए इनका सिखात
प्रधानवाद कहलाता है। ऊपर बतलाये हुए कारणमे उसके
मामक साथ द्वात्मक विशेषण लगा हुआ है।
जय जगत्का मल अचेतनथा तो फिर पिसी नित्य पात्मा
के लिए स्थान ही नहा रह जाता। इसलिए इसे द्वद्वात्मक
अनात्मघाद भी कह सकते हैं। 'दद्वात्मक' जोड रहना अच्छा
ह, अयथा योद्ध जैस अनात्मवादी दर्शनोस भ्राति होनेका डर
कोइ चेतन अदम्

ढहात्मप्रधानवाद
है। क्षणिक रिशानवादी योद्ध दर्शन पुनर्जन्मको मानता है पर
श्रयतम मार्स और एरोत्सके अनुयायी पेसा नहीं मानते।
नित्य धात्मा हो या न हो पर जगदमें चतना अनुभव
तो होता ही है। चेतना दो रक्षण है, शान और इच्छा---
स्थय प्रमाधित होना शोर प्रभावित करना। जहाँ चेतना है
यहाँ किसी न किसी प्रकारका श्रत करण है। निसी न किसी
प्रकार मन असार भार वृद्धिका क्षेत्र है। अत करणकी
विसितश्रयस्था इस गुण, राग द्वेष,इर्या, मत्सर, काम,
प्रोध, औदार्य, दया, त्याग प्रेम इत्यादि भी यूनाधिक पार्य
जाते है। धामयाबीनस विसीकी भी सत्ताका अस्वीकार
नहीं करता। यह वर दो या कहता है। पहिला तो यह
कि इनमें से कोई भी किसी नित्य श्रात्मागुण नहीं है । दूसरी
यह कि जैसे प्रधान वास द्वारा अनेक पक्षयों, जैसे सोना,
तापर, कोपराकी उत्पत्ति हुई है चमे ही मत करण और उसक
गुणोकी भी उत्पत्ति हुआ है। पृथ्यो करोड़ों वर्षांतक प्रत्यास्त
पाप्पोका पिएड थी । इस मी कराहों वर्ष पीछे वह इस योग्य
हुई कि उसपर का प्राणा नहस । जब पेसो परिस्थिति
उत्पन्न हुन तय प्रधानस सतरणकी मी अभिव्यक्ति हुइ ।
ज्यो त्यो परिस्थिति अटकल होती गयी त्यो न्यों अत करणको
अमिद्धि हाती गयी। विसीमा सभ्य दशका शिक्षित व्यक्तिः
फरोमो चपोशी उन्नतिका दायाद है।
परिस्थितिक अनुसार ही प्रत करके गुणोंका अमि-
४

व्यकि प्रोरराज य्यजन होता है। जैसे परिस्थिति के अनुसार प्रधानसे कहीं हिमालय पछाड़ निम्ला है, वहीं प्रशात महासागर, कहीं आकाशगङ्गा और यही ऋण विद्युत्कण, उसी प्रकार परिस्थिति के अनुसार कहीं करता व्यक्त होती है, कहा उदारता, कहाँ क्षमा और कहीं क्रोध । मनुष्य ऐसा समझता है कि मैं स्वतत्र ह, अपने सकरपके अनुसार काम करता हूँ। यदि मेरी इच्छा होती है तो खड़ा होता है नहीं ता येठा रहता है। यहाँ तक तो ठाक हो सकता है। पर तु प्रश्न यह है कि संप करनेका स्मात व्य कहाँ तक है ? मेरा पसा सक्रप हुया इसलिए मैं खडा हुआ पर क्या मैं दूसरे प्रकारका सकरप कर सकता था? क्या मेरे प्रत करणमें सिवाय पड़े होनेके कोई दूसरा सकरप उठ भी सकता था? जो लोग नित्य श्रात्मा मानते हैं उनके लिए ऐसा मानना सम्भर है, यद्यपि उनमें से भी यहुत स सकरप स्वातज्यको भगवदिच्छा या अहए या किस्मतस बँधा मानते हैं। प्रधानवादी कहता है कि प्रधानको समस्त सतति पर ही सूत्र में यँधी है। जो द्वद्वात्मक विकास मम परमाणुप्रो भार पहाड़ोकी गतिविधिका नियंत्रण करता यही फीटस लेकर मनुष्यतरफ अत करणका नियमन करता है। किसी समय विशेषकी अवस्था जिन तत्वोकी साम्यावस्था है उनमें मनुष्यो अत करण भी हैं। परिस्थितिक अनुसार इस साम्यावस्थामें शाम होगा अर्थात् सके मासिक और मानस दोनों प्रकारके अवयव सुग्ध हागे। अतमें जो विपरि

द्वद्वात्मक प्रधानवाद
रणाम उत्पन्न होगा, उसमें भोतिक श्रोर मानस दोनों प्रकारके
सचोकी नयी अवस्था होगी। पानीका विपरिणाम भाप धोर
धर्फ दोनो हो सकता है। यह याहरको परिस्थितिपर निर्भर
है कि सा काल भोर म्यान विशेषमें पाना मिसमै परिणत
होगा। ठीक इसी प्रकार परिस्थिति इसका निश्चय करती है
৮ি র ব্য খাতন নিধ্য ও ব্যায় ক ঋথাপ
किस धर्मविशेषसे प्रान्छादित देन पडेगा। यदि म्यान्न
श्रात्माकी सत्ता होता तो उसके अपने स्वतन्त्र नियम हाते
परतु प्रधानके लिए तो एक हो नियम है।
जा नियम व्यटिके लिए है यही समष्टि के लिए लागू है।
जोदमान विकृतिप्रणाली भौतिक भार व्यक्तियोंक मानस
जगत्को परिचालित करती है, उसीक अनुमार व्यक्तियों के
समूहोंमें भी परिवर्तन होता है। आर्थिक, राजनीतिक, साम्न
दायिक, सभी अपस्याएँ इसी प्रणालीक अनुसार बदलती
रहता हैं । लोग समझत है कि इतिहासका माङ्गण थाइस बडे
धामियोरी मनोवृत्तियाका पीडाक्षेत्र है। ऋषि मुनि, धर्म
प्रवर्तक, राजा, बादशाह, सनापति, निठान , नेता, यस इन
मनमें तरगं ठती और लापा मनुष्योक सुपदु ना धारा
न्यारा हो जाता है। इसलिए इतिहासको पोधियों में इन्हीं
लोगों जीवन भीर बल्योंका विस्तृत वर्णन रहता है, साधा
रण लोगोका जिक यो ही गोण रूपसे भा जाता है।
प्रधानधादी ऐसा नहीं मानता। यह कहता है कि यहे

व्यक्ति और राज
श्रादमी और श्रादमियोंक समूह हनुमानप्रणाली यादर नहीं
जा सकते । परिस्थितिका अनुसार में भी परिवर्तन होता
है। पर डॉ, जो पार्थ जितना ही उन्नत हागा, रस विकास
को समझना भी उतना ही यठिन होता है।
मानव समुदायों के इतिहासपर पिस परिस्थितिक प्रभाष
पता है? ऋतु, देशकी भोगोलिक बनावट, समापस्थ वृत
और पशुपक्षी, इन सबका प्रभाव पडता है पर यह यूनाधिक
स्थापी हैं। इनमें परिवर्तन होता भी है तो दरम, अत इनसे
प्रभावस समूहमा ऐतिहासिक थोर साति परिवर्तन
प्राय नहीं ता । मार्स और गेरसका पाना है कि समु
दायका सास्कृतिक साधन श्राथिक व्यवस्थापरभर है और
यह थाथिय व्यवस्था उत्पादन विधिपर निर्भर है। यह प्रति
हाससिद्धात इन लोगोशा विशेष आविष्कार है। हटधमाके
कारण बहुत राग थभी इसे स्वीकार नहीं करते पर इसके
सिवाय को दुसरा सिक्षा त है भी नहीं जा इतिहास परि
धर्तनका वैज्ञानिक ढगसे समझा सके।
प्रधानवादी यह नहीं कहता कि लोग प्रतिक्षण प्राधिक
धातोश सोनकर उनके अनुसार काम करते हैं। देश या मज
हय या जता लिए मर मिटनेवाले, पीडितोको सहायता
रिए अपने सखको प्राहुति दनेवाले, रुपयों या गेरियोंके
रिए य६ सय नहीं करते। प्रत्यक्षतया ता यह ऊँचे तिक
मायोस प्रेरित होते हैं बार मानवामी प्रेसमा

द्वद्वात्मक प्रधानयाद
करता है। वह चाहता है कि लोगोंमें ऐसे भाव रहे। पर यह
यह जानता है कि इन भायोका उदय होना विशेष परिस्थितियों
पर ही निमर है। प्राज्ञ भारतमें जसे देशसेवा, त्याग,
श्रात्मयटिक भार फेल रहे हैं वह कुछ समय पहिले नहीं फैट
सकते थे। जो लोग इन भावोसे प्रभावित हो रहे हैं उनके
सामने तो ऊँचे उद्देश्य और श्रादर्श हैं पर उद्देश्यो पार
श्रादर्शीको विशेष आर्थिक परिस्थियाने ही सम्भव पाया
है। श्रत करणपर इन परिस्थितियाका जो प्रभार पड रहा हे
वही प्रशस्त उदार भाराको जगा रहा है। यह प्रभार ज्ञात
नहीं है पर सत्य है।
ऊपर जा कुछ समासेन रहा गया हे उसे इतिहासका
आर्थिक व्याख्या कहते हैं। इसमें इतिहासका यदलनेका श्रय
क्सिी अलोकिक व्यक्तिको इच्छाको नहीं दिया गया है। यह
भी नहीं कहा गया है कि ऐतिहासिक परिवतेनाकी प्ररणा
आर्थिक हेतु से मिलती है।
यहाँपर एक प्रश्न यह उठता है कि जन ऐतिहासिक परि
वतन इस प्रकार हात हैं तो क्या हमशे पहलेसे उनका ज्ञान
हो सकता है ? इसका उत्तर हा भो है और नहीं भी। किसी
समय निशपमें जो अरस्था होती है उसके अगीभूत भौतिक
पदार्य-धातु, एकडा, परमाणु-या भोतिष शक्तिया-ताप,
विद्युत, प्रकाश इत्यादि-मी होते हैं और अन्त करण भो।
मौतिक पदार्थों और शक्तियों में सजातीय समता होती है।

व्यक्ति प्रोर राज
१क टुकडे सोनेका व्यवहार दूसरेसे भिन नहीं होता, प्रकाश
के नियम सर्वत्र १५स होते हैं। अत किसी एक अवस्थाफे
पीछे इनकी क्या अवस्था होगी, यह कहा जा सकता है।
पर तु श्रत करणों में घिषमता होती है। दायक साथ यह नहीं
कहा जा सकता कि अमुक विशेष अतावरण ठीक अमुक
प्रकारसे व्यवहार करेगा। अत करण याहरी परिस्थितिसे
प्रभावित होता है पर उसका प्रभावित करता भी है। फिर
अत करण ता लाखों हैं । इसाल्य वादको दपकर प्रतिवादके
विषयमें यथार्थ भविष्यवाणी नहीं की जा सकती।
इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि व्योरेवार भविष्यवाणी
चाहे न की जा सक पर जो द्वद्वमान विकासक्रमको समझता
है वह किसी अवस्था विशेषका विश्लेषण करके यह समझ
सकता है कि इसकी साम्यावस्था किस दिशामें भग्न हाने-
घाली है। यह उसके भीतरकी शक्षियोंकी गतिधि और
परिस्थितिस यह अनुमान कर सकता है कि अब इनमस
कौनसी शतयाँ जागरित और उग्र होने जा रही है। इसका
तात्पर्य यह है कि यह प्रतिवादके स्यरूपमा चित्र खींच सकता।
इस सिद्धा तकी यही सबसे बड़ी विशेषता है। अन्य
सिखातोंके सत्यासत्यका निर्णय तसे ही हो सकता है।
घेदात तर्षको तो नहीं मानता, 'तप्रतिष्ठानात् ' पर अपनो
सत्यताकी सौटी स्वस घेद्य अनुभवको ठहराता है। परतु
यह मधानयाद अपनी सत्यताकी परीक्षा व्यवहारसे करता
।

द्वद्वात्मक प्रधानयाद
है। इसमें सिद्धात और व्यवहारकी एक्ता' पर विशेष प्रकार
से जोर दिया जाता है। अपनी बुद्धिसे केवल तर्क आधार
पर सिद्धातका श्राधिधार करनेके बदले जगत्के व्यवहारका
वैज्ञानिक अनुशीलन करके सिद्धात स्थिर करना चाहिये और
फिर इस सिद्धा तसे जगद्यापार चलाना चाहिये। साधारण
सुधारक उचित अनुचित, याय श्रयायकी कसौटीपर क्सकर
जो यात ठीक ऊँचती है उसे कार्यमें परिणत करना चाहता
है। प्रधानवादी ऐसा नहीं करता। यह वैज्ञानिक शैलीसे
चलता है। जिस प्रकार विज्ञानवेत्ता प्राकृतिक नियमोको
समझकर उनके अनुसार काम करता है और लाम उठाता है,
उसी प्रकार द्वद्वमान प्रधानवादका विद्यार्थी परिस्थितिका
अध्ययन करके देखता है कि परिस्थिति स्य किधर मुक्ने-
वाली है। उसी दिशामें प्रयत्न करता है । जो शक्तियों दधने
घाली हैं उनको दवार जो प्रदीत हानेवाली है उनक जागरण
में सहायता करता है । श्रत आविषाद प्रकृत्या देर में माता
उस जल्द ही स्थापित करा देता है। यही उद्योगकी उपयुक्तता
सिद्ध होती है अन्यथा द्वामान विकास तो स्वत हाताही
रहेगा।
इसी सिद्धान्तके श्राधारपर समाजवादका राजसमधी
सिद्धात स्थिर है। समाजवादी रहता है कि दार्शनिक शब्दा
उम्परको छोहार देखनेस प्रतीत होता है कि प्रत्येक समाजमें
शासनशा पुत्र उस घरे हाथमें होता है जिसको उत्पादन के

व्यत्ति योग राज
साधनोपर स्वाम्य प्राप्त हाता है। जिस समय उत्पादनका
मुरप साधन भूमि भी उस समय शासन भूमिपतियों के हाथों
था। श्राज उत्पादन मुण्य साधन व्यवसाय है, इसलिये
शासनकी नकल पूजापतियोंके हाथमें है। जिस समय किसी
पर्गक हाथमें हुकूमतकी यागहार होता है उस समय यह
ऐसा प्रयत्न करता है वि उस हाथस अधिकार निकलन
जाय । इसलिए वह दूसरे वर्गों में घगया दराता है। उसके
बनाये कानूनौका यही उद्देश्य हाता है। समागदोपर यह
आरोप किया जाता ह कि वह घविद्वेषको बढाता है। जमीन
दारको निसानसे, मनदूरका मिल मालिक्स लडाता है। यह
भाराप गलत है। समाजवादी चाहता है कि वर्गकह मिट
जाय,
समाजमें परस्पर विरोधी हितोयाले घगीका अस्तित्व
हान रह जाय, समाज वगहोन हा जाय । उसक सारे प्रयास
इसी लक्ष्यका सिद्धिके लिए होत हैं। रामके प्रति अपने व्यर
हारको निश्चित करने में भी यह इसी लक्ष्यका सामने रखता हे।
समाजवादका राजक प्रति तोति हे यह नोचफे अध
तरणसे जो मेरे साम्राजवाद सल्यागया हे स्पष्ट हो जायगी-
जैसा कि हम दव चुके हैं गा यह सस्था है जिसके द्वारा
अधिकार प्रात घग दूसर वर्गापर श्रग्ना अधिकार कायम
रपता है। सना ओर पुलिसफे द्वारा यह सस्था राम करती
है। यदि कोई विराधी सिर उठाता है तो वह इसके पलसे
दगा दिया जाता है। अधिकारयुक्त वर्गका तीसरा मन
1

द्वद्वात्मक प्रधाननाद
कानून वर्गसंघर्षको यीभत्सताको यथासम्मर छिपाता है।
उसका काम यह है कि शोषित वर्गक जीवनको नित्यति ऐसे
बधनोसे जकड रखे कि सेनासे काम न लेना पड़े। हर सरकार
कानून और श्रमनकी दुहाइ देनी है। इसका तात्पर्य यह है कि
वस्तुस्थिति में कोई गहरा परिवर्तन न हो । जो हुकूमत
करता है यह हुकूमत करता रहे, जादास है यह दास बना
रहे। इसके गिना थाटस मनुष्य यदुनम मनुष्योको दधाकर
रजनहीं माना
रामका यह स्वरूर ऐलश दाडम्यरसे छिपाया जाता है
कि साधारण मनुष्य सचमुच उसका एक निस्पक्ष सस्थासम
मता है और उससे निरपेक्ष न्यायत्री प्राशा रखता है। पर
जय उत्पादन साधनौका रूप बदलता है और उन साधनोल
काम लेनेवाला दूसरा वर्ग अपर उठना चाहता है तो उसे
राज सन्चे स्वरुपका बहुत ही शीध बोध हो जाता है।
उसको यह विदित हो जाता है कि राज वस्तुत उस वर्गको
एक प्रकारको कान्यकारिणी ममिति है जिससे हाधम भर
तक आर्थिक और राजनीति अधिकार रहा है। नया धर्ग
अपन लिए सुरिधाएँ चाहता है पर पुराना धग शपनी अर्थात्
राजी नारी शक्तिसन विधाओंको गेषता है क्योति
यह समझता है कि यदि नया वर्ग सम्पन हुआ तो यह मार
'अधिकार अपने हाथ में ल लगा। इस प्रकार धर्गस, जो
अबतक मन्द और मालीन था, तीन ओर प्रकट हो sarहै।

व्यक्ति और राज
नये उठनेवाले वर्गको यह यात साफ देख पडती है कि यदि
उसे आगे बढ़ना है तो फिर राजपर कब्जा करना चाहिये,
विदशियोसे लहनेके लिए नहीं अपने घरेलू प्रतियोगियोसे
लडनेके लिए। जसको राम उसकी भैस। राजपर कब्जा
करनेका अर्थ है सेना श्रार पुलिसपर कब्जा करना अर्थात
इनस काम ले साना । इसका दूसरा अर्थ है कानून बनानेवी
शक्ति प्राप्त करना । आर्थिक और सामाजिक अभ्युदयकी लाल
साने ही मध्यमवर्गका साम त सरोके हाथसे राजयन
छाननेपर विवश किया था। राजशक्तिको हाथमें लेते ही
मध्यम वर्ग साम तोकी कुर्सीपर जा बैठा था। जो अयतक
शोपित था यह शोपा घन गया। जिस प्रकार पहले थोडेसे
क्षत्रियवर्गीय अपनेसे अधिक सायाघालोपर हुकूमत करते
थे उसी प्रकार पूँजीशाही ओर साम्राज्यशाहीके द्वारा थोडेसे
मध्यवर्गीय करोड़ो मनुष्योंपर हुकमत कर रहे हैं अर्थात् कराडो
मनुप्योका शोपण कर रह हैं।
ऐसी दशामें राज्यके प्रति समाजवादीका क्या रस हो
सकता है ? यह तो हम देख चुर हैं कि वह वर्ग सघर्षको
बहुत बुरी चीज समझता है। हम यह भी देख चुके हैं कि वह
उत्पादन साधनोंपर व्यनियोक निजी स्सवको धुरी जीज
मानता है और पृथ्वीपर फैली हुइ अशात्तिका प्रधान कारण
सममता है। उसकी रायमें जयतक यह चैयक्तिक स्वत्व रहेगा
तयतक पृथ्वीपर पूँजीशाही, साम्राज्यशाही घर्गसंघर्ष और
-

द्वन्द्वात्मक प्रधानवाद
अतर्राष्ट्रीय युद्ध प्राजकी भाँति यने रहेंगे और श्राकाश
पुष्पकी माँति शातिका अमाघ रहेगा। वह यह भी देखता है
कि सम्प्रति राज पूंजीपतियोंके हाथमें है और उस वर्गको
दयानेमें अपनी सारी शशि लगा रहा है जो पूँजीपतियों के
हायसे ऊपीडित और शोषित होनसे उबर अन सिर उठाना
चाहता है। यह वर्ग थमिको भोर पोका वर्ग है। यह बाते
एक और ही पाठ पढाती हैं। यदि समाजवादी सचमुच पूंजी
शाहीको मिटाना चाहता है तो उसको यही काम करना होगा
जा इसक पहले पूजापत्तियोंने किया था। उसको राजपर
कम्जा करना होगा। राजकी लगाम उसक हाथमें भाते हो
सरकार उसको होगी, सना और पुलिस उसकी आशाओका
पालन करेंगी, अपनी इच्छा अनुकूल कानून यह बनवा सकेगा।
ऊपर मेने लिखा है कि समाजवादीको राजपर बना
करना होगा। वस्तुत यह निरर्य सा वास्य है। समाजवाद
पफ सिद्धात है । उसको माननेशलोंका कोई विशेष प्राधिक
धर्म नहीं होता। मेरा असली तात्पर्य यह था कि जो भाज
पलका प्रतारित वर्ग है, अर्थात् शरीर और मस्तिष्कस काम
करनेवाले श्रमिश और कृपकोका वर्ग, उसशे राजकी पाण
संभालनी होगी। जयत राजशक्ति अपनी नहीं होती तयतक
जोशाहीका पाल घाँका नहीं हो सकता, समाजवाद केवल
पुस्तकों में हो धरा रह जायगा । नायिक और सामा
जिन अभ्युदयकी इच्छाने ही शोपितोंको सिखलाया है कि

६०
व्यक्ति और राज
उ हे हुकूमत करनी होगी। मूसाकी यायत कहा जाता है कि
यह आग हूँढने गये थ, पेगम्बर हो गये । इसी प्रकार घगों
का श्रभ्युत्थान होता है।
मान दिया जाय कि सफर प्राति द्वारा अद्यावधि
शोपित अमित और कृपक्चगनेराजपर क जा प्राप्त कर लिया।
फिर क्या होगा ? जो उत्तर पहले मुंहको पाता है यह तो यही
है कि इस बार भी वही होगा जो परतफ होता आया है
अर्थात् अपने क्रातिकालीन नारीको भूलकर यह वर्ग भी गजसे
अपने सकुचित घगहिताके साधनका काम लेगा। भेद इतना
है कि अबतक यह शोपित था, श्रय यह शापक हागा शोर
दूसर वग शोपित होंगे।
पर यह उत्तर ठीक नहीं है। पहले तो इस घर्गके कोई
सकुचित वर्गहित है ही नहीं। यह तो शोपणस व्यधित होकर
उठा था अत इसका एक ही उद्देश्य है और यह है शापणका
मिटा देना। जिन समाजवादी सिद्धातोकी प्रेरणाने इसको
प्राणित रिया है उनका भी यही परिणाम हो सकता है। दूसरी
पात गह है कि यह धर्ग इस समय सबसे नीचा है। इसमें यह
लोग है जो उत्पादनकी किसीसामग्री स्वामी नहीं हैं। इनकी
जीविका दूसरोंको कृपापर निर्भर है। अत अब यह किसका
सतायेगा इसके उत्तरमै स्यात् यह कहा जायगा कि जा आज
बल शोषक हैं यही भविष्यमें शोपित हो जायेंगे। पर एसा
नहीं हो सकता । इस समय शोपकोंकी सख्या थोडी है परन्तु

द्वद्वात्मक प्रधानवाद
शापितों को सस्या यहुत रही है । मुट्ठीमर पूँजोपतिप्राय सारी
जनताको कामनु यनावर दूह रहे हैं। कातिके बाद तो यही
जनता अधिकारमें होगा पर यह धाज नीपतियोंका शोषण
नहीं पर सती । धोनेस श्रादमीयतीशशोषपा कर सस्ते हैं,
रहतमे श्रादमी थोडीका शोषण नहीं कर सकते।दा चार शेर
मिटर अगलके और पशुधोका शोषण कर सकते हैं पर यति
सारे पशु मिल जाये शोर शेरोशा वश करके उनका शोषण
करना चाहे तो नहीं कर सकते। हो दिनमें शेर खत्म हा
जागेंगे। थोटाके आहार बहुत हा सक्त हैं वहतोंके लिए यह
सम्भव नहीं कि थोडाको माहार बनारर पुद दिनतक अपना
पेट मरे। अत मनदर ओर कृषक यग हायमें राजगतिमा
जाने पर शोषण याद हो जायगा । इसका अर्थ यह है कि राज
शोपएका साधन न रह जायगा। पर या तो यही उसका
प्रधान लक्षण है कि वर्गसघषमय इस जगमें राज एक वर्गको
दूसरेका शोषण करनेमें सहायता देता है। अब यह पहली
यात न होगी। सना पुलिस और कानून बनाने अधिकार
होते हुए भी इनका उपयोग पुराने ढगपर न हागा । पुराने
গঙ্গা গন । স্রষn্য।
বৰ মাৰ গুমিকা বা স্থায় ঘিাৰ স্বাৰ
पर यह सस्था जो शाजस हजारों वर्ष पहल शापणका मुव्यव
स्थित, चिरायु ओर सफल बनाने के लिए स्थापित हुइ था
धीर सो पाजत इस कामादरती आयी है स्थानन्युन हा

व्यक्ति और राज
जायगी। अपने असली स्वरूपको सोकर राज राज न रह
जायगा । पर उसका ढाँचा बहुत दिनो तक रहेगा। समाज
धादी न तो फौज या पुलिसजा बर्खास्त कर देंगे, न कानून
बनवाना छोड़ देंगे। उनके सामने अभी तो बहुत काम पड़ा
दागा जिसमे इन साध से सहायता मिलेगी।
समाजवादियोंका उद्देश्य वगसघर्षो मिटाकर घर्गहान
समाजसे जम देना है। वह यह भी चाहते हैं कि मनुष्य
द्वारा मनुष्यका शोपण न हो। पर यह बातें सकल्पमात्रस न
होगी । कृपका ओर श्रमिकोंके हाथमें शासन आ जाने मात्रसे
भी न होगी। जो लोग अबतक शोपणकी वालत पलते रहे
हैं वह पक्दम चुप नहीं बैठ सकते। यदि सम्भव हुआ तो
वह विदेशियोको अपनी सहायताके लिए ले थायेंगे। केंच
नातिके याद फ्रासक राजवश और सरोको श्रोरसे ब्रिटेन
जर्मनी, रूस और आस्ट्रिया शनु हो गये थे। हालमें रूसी
मोतिक याद रूसको चार धर्पतक रूसी विद्राहियों और उनके
विदेशी हिमायतियोंका मुकारिला करना पड़ा था। इसक
अतिरिक्त देशके भीतर भी नये अधिकारियोका पद पद पुराने
स्थासिलना होगा। उनके हर काम अडचन डाली जायगो।
हर प्रकारके ऐसे प्रयत्न किये जायँगे जिनसे उनके शासनको
व्यवस्था विगह जाय, उनक प्रयोग असफल हो, मजा उनस
अस तुष्ट हा। उनके साथ बात यातमें असहयोग किया
जायगा । उनकी अनुभव-हीनतास हर प्रकारका अनुवित लाभ

द्वद्वात्मक प्रधानवाद
।
ठानेकी चेष्टा की जायगी । विना इस प्रकारके पुयानोंको
असफल बनाये प्राति विफल हो जायगी। कसरी क्रान्तिकारी
सरकारको यह सब दिखते भुगतनी पड़ी हैं। यदि नये शासक
दृढ़प्रतिश हैं तो यह इस विपत्तिसागरको भी पार कर जायगे
ओर छुद्र स्वाथिर्याको मुंहकी खानी पडेगी। उनकी सारी
कोशिशें विफल होगी और वर्गभेद मिटर रहेगा। इस काम
नये शासकाको राजके ढाँचले अर्थान् सेना, पुलिस मोर
कानूनले वढी सहायता मिलेगी। जो शस्त्र शोषणको कायम
रखने के लिए निकाला गया था यह यदि अच्छे हाथोंमें पढ
जाय तो उससे शोषणका श्रत करनेका काम लिया जा
सकता है । इसलिए समाजवादी श्रमिक और पक राजये
ढाँचको एकदम विगाहन देंगे।
इस ढॉचंकी सहायतासे उनको अपना मूल उद्देश्य, श्रयान्
समाजवादी व्यवस्था और वर्गहीन समाजका सम्यान,
सिद्ध परमा होगा। पुराने शोपकवर्गके विरोधको प्रमा
जाने पर जो लोग उस वर्गम थ या उसम सम्यदे
यह भी धमकी महत्ताको स्योंकार कर लेंगे और
तथा योग्यता अनुसार काममें लग जायंगे। न
समाजमे वर्गभेद, अथवा वर्गसंघर्ष, मिट गया और
उत्पादनके साधनोपर समुदायका अधिकार Erers
युवक और युवती इस नये युगमे 7
क्दम रणगे, उनके लिए रुपया जोमा

यति ओर राज
स्यामायिक सी वात प्रतीत होगी। यह लोकहित
को सामने रखकर काम करेंगे शोर ममाजको समृद्धिमें शरीर
होना अपना सयस या पुरस्कार समझेगे। इस परिस्थितिमें
समाजवादी प्यरस्था श्राप ही स्थापित हो चलेगी। पर यह
समझ रखना चाहिये पि फेला कोई एक देश पूर्णरूपेण
समाजवादी पद्धति नहीं चला मक्ता । अस्तु, जिस दिन यह
व्यवस्था पूरी तरह स्थापित हो जायगी उस दिन राज अना
वश्यक हो जायगा। म कानून कशानेकी आवश्यक्ता रह
जापगी, न सेनापी, न पुलिसकी। राजका डाँचा व्यर्थका
भार होगा और थाप ही टूट जायगा एगेरसके शब्दों में राज
मुरझापर अदायगा । यह दिन श्राज नहीं है, पर श्रा साता
है और प्रत्येक समाजवादी ऐसी आशा करता है कि आयगा।
उस समय भी कोई पेसा व्यक्ति हो सकता है जो सामूहिक
जीरनको पराय करना चाह । लाकमत उसको सुधारने और
यदि जरुरत हो तो भएड दनेके लिए काफी होगा। समुदायकी
मात्मरक्षायत्ति पतनमागी सनाओंधी अपेक्षा रक्षाका श्रच्या
श्रायाजन कर सकती है पयोकि यह रक्षा किसी एक वर्गके
हितोत्री रक्षा नहीं वरन् सयका रक्षा होगा।
इस सम्य धमे एगेल्सक नीचे लिखे याश्य इस सारे कथन
कामोदते हैं-'सहाराजशक्तिपर पाकरता
है भार उत्पादनक सायमोको राजसम्पत्ति में बदल देता है पर
ऐसा कर लेने पर यह पद सहारा नहीं रह जाता, सारे धर्ग

इद्वात्मा प्रधाननाद
मेव भार वर्गविरोध यत्म हो जाते हैं और राजरूपमे राजका
भी अस्तित्व खत्म हो जाता है। पुराने समाजको, जिसका
जीयन वर्गलघर्ष बीतताथा, राजकी अर्थात् शोषकवर्गके सघ
टनरीश्रावश्यक्ता थी ताकि उत्पादनकी तत्कालीन अरस्था
कायम रहे, अत उसको राजकी विशेष जरूरत इसलिए थी कि
शोपितवर्ग (जो समय समयपर गुलाम, जमीन साथ धा
किसान या मजदूरका स्प धारण करता रहता है ) लात्
दपाया जा सफ। ऊपरम तराज सारे समाजका प्रतिनिधि
था। जब राज सचमुच सारे समाजका प्रतिनिधि हो जायगा
तो वह अनावश्यक हो जायगा! जर कोई ऐसा वर्ग नहीं रह
जाता जिसको दयाना हो, जर वर्ग आधिपत्य और पहिलेकी
उत्पादन सबन्धी पुण्यवस्थासे उत्पन्न पक्तिक जीवनरे लिए
सघर्षके साथ साथ आपके माहे और अत्याचार पत्म हो
जायेंगे तो ऐसी कोई चीज दोन रह जायगी जिसका दमन
না ? খাই যিয় ঘুমাৰ আজি গাৰু লঙ্গ এক
न रहेगी। जो पहिला काम सारे ममाजफे प्रतिनिधि रुपमै
राल परता है अर्थात् सारे समाजके नामपर उत्पादनके
साधनोंपर कब्जा करना यही गयी हैसियतसे उसका
अतिम स्वतन्त्र पाम है | प्रमश सामाजिक सम्यधफे विभिन्न
क्षेत्रों में राजका हस्तक्षेप अनावश्यक हो जाता है और फिर
भापही श्रालीन हो जाता है। व्यक्तियोंपर शासन करनेके
स्थानमें वस्तुओकी व्यवस्था और उत्पादनकी प्रियाओंका

६
६
व्यक्ति और राज
सचालन रह जाता है। राजका कोई पत्म नहा करता, यह
सुद मुरझाकर मह जाता है।"
जहाँतक मार्स और पंगरसक श्राध्यात्मिक सिद्धाती
यात है यह इस पुस्तकमा विषय नहीं है। विकासको जो
निधि उ होने दिपलायी है यह मुझका ठीक प्रतीत होती है।
मैं यह नहीं मान सक्ता वि जगत्का मूल पदाथ जड़ था.
जिसमेस किसी अवस्थामें चतना प्रादुर्भूत हु। मे स्वय
शॉवर अर्द्धत मतको मानता है। इस मतके अनुसार एक
सवित् ब्रह्म पदार्थ मायाके दारा जगत् रूपमें प्रतीत होता
है। परन्तु प्रतीप्तिके क्षेत्रमें विकास न्यूनाधिक उसी प्रकार
हुआ होगा जैसे उहोंने पतलाया है। पर इस शास्त्रार्थी
पहनेका यहाँ आवश्यकता नहीं है। इतिहासका आर्थिक
व्याख्याफे सम्बन्धमें भी यही बात है। जो मनुष्य चेतनकी
सत्ताको नित्य मानता है यह यह भी मानेगा कि ऐतिहासिक
उथल पुथलमें आर्थिक परिस्थितियों साथ साथ चेतनाके
सतप्रधर्मभी काम करते हैं। धुद्धिपर पाहरी परिस्थितियोंका
गहरा प्रभाव पहता है पर यह मनुप्यकी वास्तविक सता-
उसक चेतन स्य, अहम् का धर्म है, इसलिए केवल आर्थिक
कारणोस व्यक्ति या धर्ग या समाजको प्रेरणा नहीं मिलती।
इतना कहते हुए भी यह बोध होता है कि इस समाजवादी
सिद्धा तके सिपाय किसी दूसर सिद्धा तने ऐतिहासिक
अग्यिपयोंकी व्यारया करने में मफलता नहीं पायी है। यदि

द्वद्वात्मक प्रधानवाद
६७
इसका थोडासा शोधन होकर इसमें चतन आत्मा धम्मौके
लिए भी स्थल निकल पाये तो यह अकाट्य हो जायगा।
समाजगादीका राजविषयक मत किसी काल्पनिक श्राध्या
मि तव्यपर नहीं वरन् मनुष्पा कटु अनुभवपर निर्धारित है।
पारिन कहते हैं और ठीक ही कहते हैं कि 'वर्गमूलक
समाजके श्रङ्ग एक दुसरेसे निरंतर, कभी कभी बहुत हा उग्र,
सघर्ष में लगे रहते है। ऐसे ही समाजमें गज ओर पानूनकी
उत्पति होती है। यह सर्प कभी तो समझ वृमार होता है,
कभी अस्फुट रहता है । जमीनदार और किसानका हित एक
नहीं हो साता। टोनोंके हित टकराते रहते हैं। पर माय
खुल कर झगडा नहीं होता। जब कभी सहनशीलताका प्याला
भर नाता है तो फिर खुला विद्रोह होता है। कहनेको तो
यह कहा जा सकता है कि धनिक लोग अपनेको निर्धनोंका
अभिमाक समझें धन एकत्र करें पर यह समझकर कि यह
मेरा नहीं समाजका है। सुननेमें यह गत मलो लगती
सम्मर है कोइ को व्यरसायी इस भावसे प्रेरित होकर
आचरण भी कर जाय पर ऐसा काइ भी समय नहीं देखा
गया जर सर या अधिकाश धनिकाने इसे अपनाया हा।
अत सधपं तपतक रहेगा जबतक आर्थिक वर्ग रहेंगे, आर्थिक
पर्ग तभी मिटेंगे जर उत्पादनके साधनाका स्थाम्य व्यक्तियों के
हायसे निकलकर समाज हाथोंमें या जाय । अयन ऐसा
नहीं होता तयता एफ वर्ग सम्पन्न रहेगा, यह शासनका
PRAT

-
।
६८
व्यक्ति और राज
सूत्र अपने हाथमे रखेगा, ऐस एसे कानन बनायेगा, ऐसी
आशाएँ निकालेगा, जिनस उसक स्वत्वोंकी रक्षा हो । जो
असम्पन हैं उनक सामने टुक्त के जायेंगे ताकि वह
अधीर न हो उठे। उनको यह समझाया जायगा कि इस
परिस्थिति बने रहने में उनका,समा क्रयाण है । पूँजीवादी
देशोंके लानी होनहार युधक साम्रा यशाही युद्धोमें अपने
प्राण दते हैं। परिणाम 'तना ही हाता है कि उनके पूजीपति
स्वामियोंक जब ओर गरम होते हैं।
समाजवादी इस अवस्थामा अनुचित मानता है। अत
वह आवश्यकता पडने ओर अवसर अनुकूल हानपर विद्रोह
करनेका पक्षपाती है। जब यह राजका अपने प्रपीकोका गुट
मानता है तो फिर वह उसके कामोंकी जिम्मेदारी अपने ऊपर
मोढनेको तैयार नहीं हो सकता। हा जो राज क्सिी वर्ग
विशेषका प्रतिनिधि न हो, कमसे कम जा क्सिी शोषकवर्गका
प्रतिनिधि न हा, उसका यह अपना राज मान सकता है
जरतक राज सत्ताका प्रत नहीं होता तरतक उसकीआज्ञाए
माननी होगी, इसलिये नहीं कि राजकी कोई आध्यात्मिक
सत्ता ह ार उसके कोई ऐस हित हैं जा यानक हितास
ऊपर और पृथक हें, घरन् इसलिये कि यह यक्ति हितो
साधनका प्रवल उपकरण है। बतक गा है तरतक उसका
यह
कर्तव्य ह कि ऐसी परिस्थितियाँपन को जिनमें यात
अपने नैसगिर गुणोंका पूरा पूरा विकास कर सक। इसका

1
द्वद्वात्मक प्रधानवाद
अर्थ यह हुआ कि राजका अस्तित्व व्यक्ति के लिये है, व्यक्तिका
"अस्तित्व राजके लिये नहीं है। राजाज्ञाका पारन करना
धाम्मिक कृत्य नहीं बुद्धिकी सीख है।
नोट-बुखारिनके जो वाक्य उद्त किये गये है वह उनकी पुस्तक
हिस्टॉरिकल मेटीरियलिज्ममे लिये गये हैं।
* बुम्मारिनके अनुसार टन लोगोंके समुदायको 'वर्ग' कहते है
पो उत्पादनकी क्रियार्म एकही प्रकारका काम करते हैं।
इस अवतरणमं रस शोषित वर्गके लिये जो भविम्यत्में
समानवादी व्यवस्था कायम करेगा 'सर्वहारा' शन्दका प्रयोग किया
गया है। यह शब्द सदमे पहिले बंगलामें प्रयुन हुआ। सर्वहारा
टसको कहते हैं जिसके पास शरीर और मस्तिक्के सिवाय उत्पारनका
और कोई साधन नहीं है।

४
फासिस्टवाद गौर नात्सीवाद
फासिस्वादका उदय इटली और नात्सीवादका जर्मनी में
हुधा । दोनौका इतिहास मिलता-जुलता है। पिछले महायुद्ध
कबाट पराजित जर्मनी तबाह हो रहा था। उसरी शक्ति
क्षीण हो गया थी, उपनिवेश छिन गये थ, श्रार्थिक सक्ट था,
लोगोंक या माभिमानको महिरी ठेस लगी थी। सरकार परि
स्थितिको सँभालनेमें असमर्थ थी। यूरोपके विजयी राजीने
जर्मनीका युद्धके लिये दायी ठहराकर उसे यूरोपका श्रछून-सा
धना दिया था। इसी परिस्थितिने हिटलरको अवसर दिया।
उहोंने जर्मनीको सम्भाला, यह धापित किया कि यह युद्धके
लिये दायी नहीं था, उस सैनिक बलका यढाया, जर्मन
जनताकपुन आत्मसम्मानको जगाया। प्राय यही अवस्था
इटली में थी। विजेताओंकी गणनामें होता हुआ भी इटली
अस तुष्ट था। उसने अपने मित्र जर्मनीके साथ विश्वासघात
करक ब्रिटन और प्रासका साथ दिया था पर इसकापुरस्कार
उसको बहुत कम मिला | लटका माल दूसरोंक हाथ लगा।
लोगोंकीमाथिक दशा गिर गयी, आत्मविश्वास उठ गया,

फासिस्टपाद औरनात्सीवाद
प्रशाति फर गयी। सरकार स्थिति न समाल सकी। ऐसी
दणमें मुसोलिनी राजनीतिक रण मचपर आये और इटली-
को महाशक्ति बनाने में समर्थ हुए।
उम प्रारम्भिक काल में इन दोनों नेताओं के पास कोई
'वाद' किसी प्रकारका दार्शनिक सिद्धात नहीं था। होंने
अपने अपन शकी राष्ट्रीय भावनाओले काम रिया। राष्ट्र
उठने के लिये तैयार था, उसे पर प्रदर्शकवी याज थी। आज
भी यह दोनों बाद दार्शनिक सिद्धात नहीं बने हैं। इनका
मूल मन्त्र है राष्ट्रीयता। चाहे जो हो, हमारे राष्ट्री उन्नति
होनी चाहिये । हमारा माल और पानार मिलने चानिये,
हमारी बढनी उन सप्यार लिए भूमि मिलनी चाहिय। हमारे
हाथमें जा शक्ति है की हमार पक्षका न्याय बनाती है।
न्यायका अन्तिम और सट प्रमाण यर है। जो शक्तिशाली
राष्ट्र है यह इमी आधारपर काम करता है।
जो लोग ऐसे माध रते हैं यह अतर्राष्ट्रीयताके रडे
पक्षपाती नहीं हा मातं । समाजमाद जमे मामीम सिद्धात
से तो उनका सहज विराध है। इमलिय यह दूसरे देशोंके
निवासियोको शिक्षा दवा प्रयन नहा करते । मपका अपनी
अपना शाह श्रार परिस्थिति अनुसार काम करना है । मुसो.
लिनीन पार हा शासिम ऐसा मार नहीं है जिस
दम दूसर दशी भनना चादन हा।'
जहाजा यह उद्देश्य हागा यहाँ व्यचिमे जिस भाव

व्यक्तिः श्रार राज
भी कुछ
रणकी आशाकी जायगा घह स्पष्ट ही है। उसको राज
चरणोपर अपना सवस्य श्रपण करना होगा। उसका जो कुछ
है यह राजका है । राजा सुखमें उसका सुप है, राजके दुप
में उसका दुख है, यह राजके लिए जीता है, राजके लिये
मरता है। इस बातमें फासिज्म और नासिज्म आदर्शवादके
दृष्टिकोणको स्वीकार करते हैं।
इतनी समता होते पातामै अतर है । जर्मनी
में दार्शनिकता पहिलेस ही थी आज भी है, पता नात्सीधाद
का रूप किंचित् अधिक दार्शनिक है। उसमें श्रादर्थवादस
काफी सहायता ली गयी है। जर्मन राष्ट्रका प्रधान नेता
'फ्यूपहरर' राष्ट्रको-राजकी-आत्माका प्रताव है, मूर्त राज
है। अत यह उस श्राशाकारिताका पात्र है जो व्यक्तिस राज
का मिलना चाहिये। उसका अनुशासन अवाध है । जर्मनी में
एक बात और बढा दो गयो है। यह है 'उपजातिवाद ।' यह
तारिद्वानोंने माना है कि मनुष्य का मुख्य उपजातियों में पैंटा
हुया था, जैस भार्य्य उपजाति समेटिक उपजाति, भगोल
उपजाति । उपजातियाा यह विभद कर हुअा ओर फेसे हुमा
इस विषयमें मतभेद है। यह भी ठीक है मभ्यता और
सस्थतिक इतिहास पाठ उपजातिका स्थान याहुत ऊँचा
रहा है। भारत, इरान, मिश्र, यूनान राम सभी प्रायॉक यशा
गान गा रहे हैं। श्राज भी जा दश पृथ्वोपर गण्यमाय हैं उनमें
प्रधानता उनमे ही है जिनो निवाग्नी मुख्यतया प्रार्य माने
।

फासिस्टपाद और नात्सोवाद
हैं। जर्मनी, प्रिटन, फ्रास, अमेरिका, सभी वार्य देश है। पर
सकरता भी इतनी हो गयी है कि निसी व्यनिती धावत यह
निश्चयरूपेण नहीं कहा जा सकता कि इसके शरीर शुद्ध
माय्यं या मगोल या सेमेटिक सून दार रहा है। परतु जर्मनी
को मात्र यह बताया जा रहा है कि वह लोग पाग्योंकी
श्रेष्टतम शाया नाहिकमें उत्पन्न हुए हैं, उनी सस्थति श्रीर
सभ्यता माऱ्या संस्थति और सभ्यताका उत्तम उदाहरण
ই, না ঋমিথিৱ গৰু ৰা তলা বিন রব
है।यत जमन राजमें जर्मनीकी भार्य्य उपजातिको श्रामा
अभिन्या हो रही है। यह 'उपजाति या जमनीकी अपनी
उपज है। इसमें राजके प्रति अधश्रद्धा और भी बढ़ जाती है
क्योंकि राजके अपमें अपनी उपजाति, अपना वृन, अपना
सदसों घश तिहास भूर्त हो रहा है। स मानमे शासको
को यही सहायता मिलती है परतु इस द्वारा मनायं पर
लानेवालोपर जा अत्यानार हाया गया है उसका साक्षी
याधुनिक कारानिटाम है। ऐसी निराधार मापनाको
जगाना अगदमें शातिमा उमूल्न करना है। राजशेरिसी
पारित उपजातिविशेष माय मिलादनाभयान नीति है।
एप पार रिचारधारा जा जर्मनी में काम कर रही है।
उत्तरा प्रभाव नामामा-पर भी हारद नेश अति
पुपपया मेरा कहना है कि धर्म समान सदाचार,
-नीति प्रादिके प्रधान माधारण मनुष्यों रिय हैं। जा उत्कृष्ट

७४
।
व्यक्ति और राज
कोटिक लोग हैं यह इनकी परवाह नहीं करते। यह
अपने
सहज गुणोंक जोरस इन दुर्घल रस्सियोंको तोडकर ऊपर उठते
हैं। जिसमें पसा -यनिय हा उसका कर्तव्य है कि उसको
विकास द । ऐसा मनुष्य अतिपुरुप है। छोटे मनुष्य भकमारेंगे,
उसकी शापर चरेंगे। वह जा रहेगा वही नीति होगी,
वही श्राचार होगा, यहो कानून होगा। भवभूतिक शब्दोमें-
'उदयति दिशि यस्याम् भानुमत् सैव पूर्वा,
नहि तरणि रुदीते दिम्पराधीनगृत्ति ।'
[सूर्य्य किसी दिशारा दास नहीं है। वह जिधर उदय
होगा लाग उसोको पूर्व क्गे]
सभ्यताको पराकाष्टा बहुसप्या लागोक साधारणतया
सुग्वी पार सम्पन रहने मे नहीं, वरन् इन थोडेसे अतिपुरुषोंके
असाधारण विभूति प्राप्त करनेस होती है।
जा राग किसी दशम फ्यूपहरर, अधिनायक, एकतत्रनेता
हानेको महत्वाकाक्षा रखत हैं उनकी इस घादमे सहायता
मिलती है। उनकी उन्च हलतापर दानिक गिलाफ चढ
जाता ह। पर समाजक लिये तासस जोस्थिति उत्पन हाती
यह भयावह है। इसका मान लनेस राजमें याघ्र बकरीके
सगठन जैसी व्यवस्था हा जायगी।

फू
1
यफलातूनका मत
प्राचीन यूनान दार्शनिकॉम अमलातूनका न्यान रहुत
ऊँचा है। टनके विचागेमें गम्भीरता है। ऐसा प्रतीत होता
है कि अफलातूनका भारत दार्शनिक उगत्मे मी सम्पर्क
था। अस्तु, टन यिनागेश पाश्चात्य र्शनपर यहा प्रमाव
पहा है।"मा घम्म घामागेन उसके यहुतमे अशची
अपने माना मिरिया।
अपरानुन पाते। यि दृश्य जगत् जिसा मान
हमको दिया नागदाता, जो प्रतिक्षा परिवर्तन,
पाम्य यह यातविष उगी पाउन
परछाया मात्र राधाशी धारति और गतिविदेश
কমে ৭ গন্ধ পাগবি স্ব সবান্ধা
मान वर Amनिमा ग्रह परदार है। यह
अपगेत वामही यगर्ग नहीं कर सम्मान्टि
चय। उहीवी परम्पर मारिये दर
जगन्ना प्रधान रक्षा यह है कि
निजी
है। सरियनहन्दी
-
CA
एकरम

व्यक्ति और राज
दशामें यह पाशा की जानी चाहिये कि इनकी जो आमाएँ
हॉगो यह शुर लोपहितके लिये होगी।
यह सिद्धात पुल बातों में अध्यात्मवादम मिलता है पर
दोनोरे नि दुनोमें यहा अतर है। अध्यात्मा की दृष्टिमें
ध्यतिका कोई महत्व नहीं है यह राजके महत्त्वका एक
হয় দগনমান ই, দলাপুন অনুদা সুফি
सब कुछ है राज सभी शिक्षाका एक श्रावश्य साधनमान
है। पूर्ण ज्ञान हानेपर उसे किसी निय प्रणकी पारश्यक्ता
न रह जायगी।
यह विवादका विषय हो सकता है कि राजका बाहरी
निय 70 कहाँतक लोगोंगे तपम्यो, सयमो, जितेन्द्रिय धना
सकता है, यह भी सदिग्ध है कि किसी भी गजमें धरायर
शासन चलानेके लिये नि सार्थ योगिकरप, विद्यातपोद्ध
विद्वान मिलते जायेंगे या नहीं। यह दोनो बहुत हे 'पदि
है, इसोमे अफलातूनका खींचा हुआ सुदर चित्र कभी भी
व्यवहारके क्षेत्रमें न उतारा जा सकता।

६
कुछ स्फुट मत
पिछले तीन अध्यायोंमें मैंने उन सिद्धातोंका समासेन
वर्णन किया है जिन्होंने गजनीतिक जगत्को विशेषरूपए
प्रभावित पिया है। परतु इनके अतिरिक्त और भी विचार हैं।
मनुप्यके लिये राज और व्यतिके सम्बन्धका प्रश्न इतना
महत्व रखता है शिउसपर विचार करना उसके लिये अनि
-वार्य था। हम नीचे कुछ अवतरण देते हैं जिनसे विभिन्न
दृष्टिकोखाका कुछ पता लगता है। उनपर अलग अलग टीका
करना श्रावश्यक है।
ईसाइ धम्मके श्रादिकालीन प्रमुप प्रचारक सेएट पॉल
कहते हैं- राज भवरकी पोरसे (जनता) धर्म फैलाता
है--कानून यह गुरु है जो हमको 'साके पास ले जाता है।'
स० १६५५ में स्टेट सोशलिस्ट दलको जो काग्रेस हुइ थी उसके
अनुसार, प्रोफेसरश्मालरफे शब्दोमे, 'राज मनुष्योको शिक्षाफे
लिये एक महती नैतिक सस्था है। उसकायत होऊँचा नैतिक
আয় ছানা মাছি বান্ধি সিদ্ধাষি মন্ত্রণ নাঃ
यसे यहे लामोंके भागी हो सकें इसके विरुद्ध राजक्ता

८०
व्यक्ति और राज
यादी जीन ग्रेच कहते हैं-न वर, न काइ मालिक, हर
श्रादमी अपनी इन्दाक अनुसार चल ।' पीरम ब्रिटन ओर
दूसरे लोकसत्तात्मक राजों में प्रचलित लिपरल मत है। उसका
खियाल यह है कि राजका होना आवश्यक है पर व्यक्षिय
कामोमें उसको हस्तक्षेप करनेका यहुत ही सीमित अधिकार
होना चाहिये । इस मतमागर्थ चैथमके इन शब्दोंमें व्यक्त कर
सकते हैं। 'ग्लैण्डमें हर आदमीका घर उसका किला हे ।
इसलिये नहीं कि उसके चारों ओर ऊँची दोषार योर युजिया
होती है हो सकता है कि यह पुपालसे छाई हुई झोपडी हो
हो, उसमें चारों ओरसे हवा सन्नाटे भरती हो, श्राफाशका
हर तत्व-हया पानी बिजली-उसमें घुस सक्ता हो पर
राजा उसमें नहीं घुस सक्ता, घुमनेकी हिम्मत नहीं कर
सकता।' (यहाँ राजा राजका पय्याय है।)
सेएट पाल के धर्ममूल मत अनुसारतोजनताको स्यात्
विद्रोह करनेका अधिकार नहीं हे हा धर्माचाय्य शासकोंको
पृथक् कर सकते हैं पर दूसर मतो में तो शासकोंको बदलनेका
अधिकार अवश्य ही है । यूरोपक इतिहासमें क पार लोगोंने
थपने इस अधिकारस काम लिया है।
मन भारतके पुराने श्राबायाँका मत विस्तारसे नहीं
दिखलाया है। इसका मुग्य कारण यह है कि में अगल
अध्यायों में जो कुछ लिसनेवाला है वह मेरी सम्मतिमें भार
तीय श्रादर्शीश निप, भारतीय सिद्धा तोकी समयानुकल

कुछ स्फुट मत
व्याख्या है। फिर भी यहाँ सक्षेपमें उसका दिग्दर्शन कराना
अस्थानिधन होगा।
राजको उत्पत्तिको भारतीय क्या चोथे अध्यायमें दी जा
घुरी है। मात्म्यन्यायसे दुषी प्रजाने मनुको राना बनाया।
जयतक लोग शुद्धसात्विक बुद्धिके थे तरता गजान था।
उत्तरपुस्म जहाँ अय मो शुद्ध सावित मनुष्य वसते हैं
सर लोग घरायर है थोर शासक शासितका भेद, राजका
अस्तित्व नहीं है। राजा शन्द राजा पर्यायी है इसका
प्रमाण यह है कि प्रायों में गणतन्त्र मो थे। पोटिल्पने भोन्य,
ন্য ব্যস্ত গাছি র মা বালীকা শুতে গিয়া
है। उस समय राज न कर 'राज्य' कहते थे पर राज्यका
अर्थ गाविस्तार, शासनकाल नादि भी होता है. इसलिये
मेने सर्वत्र 'राज' शब्द प्रयोग किया है।
बोरिल्य कहते हैं 'राजा राज्यमिति प्रातिमक्षेप' अर्थात्
राजा, गव्य और प्रकृति यह समानार्थक है। प्रकृति पाड्
गुएय (गुणोंका समूह) होता है। यह गुण हैं, सधि,
विग्रह (प्रत्यत रूपसे हानिकारक उपायोंसे काम स्तेना),
आसन (तटस्थता), यान (धानमण), सश्रय (दूसरेका
सहारा लेना) और धीभाव (दुतरफी नाल )। यह पाइ
गुण्य दूसरे शोंमें यही यस्तु है जिसे आजकल प्रभुत्व कहते
हैं। राजकी सष्टि प्रजाकी अन्योय हन्यासे रक्षा करनेके लिये
हुई पर यह स्वतन्त्र नहीं है । उसको श्रुतिस्मृति के अनुसार है

व्यक्ति और राज
काम करना होगा। श्रुतिस्मृतिके व्यापाता ऋषिगण और
विद्वजन, तपस्नी, ब्राह्मण, हाते हैं। अत राजके शासकोंको
इनके अनुशासनमें पहना होगा। इसीलिये राजका कर्तव्य
धर्मको रक्षा करना, धर्मकी मर्यादाका बनाये रखना है।
जमता वह ऐसा करते हैं तयतक उनमें देवता निवास करते
हैं, यह जगत्की पालक पराशक्ति विष्णुके प्रतीक होते हैं।
उस अवस्थामें प्रजाका कर्तव्य है कि राजको प्राशा माने
पयोंकि यह प्राधा धर्मानुक्ल होगी और धर्मसे इहलोक
थोर परलायमें कल्याण होता है । परतु यदि शासक धर्मकी
मर्यादा छोड दे तो फिर वह भक्तिका पाम नहीं रह जाता।
ऋषियोंने राजा घेणको मारकर उसके पुत्रको गद्दीपर बैठाया
या। महामारतमें लिया है कि लोगोंको चाहिये कि दुष्ट
राजाको उसो माँति निकाल दें जिस प्रकार गॉरसे पागल
कुत्ता निकाल दिया जाता है

मुखकी खोज
गजनीति शास भी विज्ञान है । यह सच है कि वह रसा
यनको भाँति भौतिक योका विज्ञान नहीं है। इसलिये उसमें
भौतिक विशनोंकी भाँति नियतता नहीं है। पत्थरके सभी
टुकडे एक्से होते हैं। यदि एक टुक्हा कही पडा है तो हम
जानते कि यह अपनेस कभी न हिलेगा। वाह्य परिस्थि
तिया ही उसमें गति ला सकती है। अत उनकी जान लेनेसे
हम जान सकते है कि उस पथरकी क्सि ममय क्या
श्रयस्था होगी जार यह भी कह सकते है शिपीके सभी
टुम्दाकी वैसी परिस्थितिम येसो ही स्थिति होगी। परतु
जीवधारियों में ऐसी समता महीं हाता। एक ही परिस्थिति
में दा कोहे भो कभी भी विभिन्न पाचरण करते है ।
मनुप्योंमें तो और भी मेद देवा जाता है। मरफ सस्कार
-पक्स नहीं होते। इसलिये थाहरी याताश प्रमाव सयपर
एपसा नहीं पडता सिस्कारांश निषमताके अनेक मारण हा
सकते हैं जैसे पुल भेद, शिक्षा भेद, सम्पत्ति भेद। फिर
अष्ट अर्थात् पूर्वज मोमें श्यि हुए कमाके परिणामसे सपकी

४ व्यक्ति और राज बुद्धि एक्सी नहीं होती। जो लोग पूर्व जन्मका अस्तित्व और कर्मचादकी सत्यता नहीं मानते हैं यह भी यह तो देखते ही हैं कि सनकी बुद्धि एफ्सा नहीं होती। भद क्या हाता इसका ठार ठीक कारण वह नहीं बता सकते । श्रस्तु कारण कुछ भा हो, बुद्धिोंमें भेद होता है श्रत याह्य पार स्थिातयोगा प्रभाव सरपर एस्मा नहा पडता। इसलिये सर लोग पक्सा व्यापार नहीं करते। इसीलिए जीवसम्य धी विज्ञागमें बह नियतता नहीं होती जो भोतिक विज्ञान में होती है। इतना भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि एक हा व्यक्ति समान परिस्थितियों में हर समय एकमा श्राच रण करेगा । इतना ध्यानमें रग्यते हुए हमको राजनीति विज्ञान का अध्ययन करना है। उप यह शास्त्र विज्ञान हे तो इसके सिद्धात भी बैज्ञानिक ढगसे ही निर्धारित हाने चाहिए । चैतानिक ढग है कि पहिले उस जातिकी वस्तुओका आचरण देखा जाय, फिर उस शाचरण पोछे जा नियम काम करता दग्व पडे वह सिद्धा त रूपमें पाधा जाय । पहिले घस्तुयोका गिराा खा गया, फिर आफ्षण सिद्धात कायम किया गया। हजारो मनुष्यों को मरते देखकर यह सिद्धा त निकला कि मनुष्य मात्रकी मृयु होती है । कभी कभी लाग अपनी धुद्धिा यल्पर पहिले सिद्धा त बना लते हैं, फिर घस्तुओफ प्राचरणको उसफ अनुसार मिलानेवी बेष्टा करते हैं। यह तरीका गल्त, अ-

सुषकी पोज
शानिक है। श्रत हमको राजनीतिमें भी इसी तसे काम
करना चाहिये। पहिले मनुष्यों के आवरणशे देखें फिर
सिद्धात निश्चित करे।
हम देखते हैं जि लोग साया पैमा चाहते हैं, बाल बच्चा
चाहते हैं, समाजमें अच्छा स्थान चाहते हैं, स्वास्थ्य चाहते
है और यदि यह आस्तिा है, परलोक्में अच्छी गति चाहते
है । शास्त्रीय भाषा मनुष्य चार पुरुषाय है, अर्थ, काम,
'धम्मै श्रोर मोत। इन्हींकी प्रानिके लिये यह सारे जम
प्रयत्न करता ६ । पिसीको प्रति इनमेस एक पुरुषार्थको
और अधिक मुस्ती है किसी दूसरेको श्रोर, परन्तु प्राय
सभी मनुष्य यथासम्मर इन चारोंके सोजी होते है । जय
यह देव घरता है कि सर पार्ने युगपत् नहीं मिल सकती
तो फिर अपने ससारके अनुसार लोग एकको पकडते है
और शेषको छोड़ देते है । यह यात मी दरानेमें आती है कि
प्रायश मरका उद्याग यही होता है हि मेरा उद्देश्य सिर
हो, दूसरेका काम बिगड जाय ऐसा चाहनेवाला कोई रिला
ही हाता है। पर जय हितांश मघर्ष हाता यार यह प्रतीत
होने लगता है रि यिना मरेशम सिंगडे मरा नाम नहीं
যন না রং ঘাহে সৰু মে ঘি মা এবং g
जाता है। शिसोक्सिी में यह प्रवृत्ति बढते प्रदते यता
पहुँच जाता है कि इसके लिये दूसरेका काम गिगाहना मुग्य
और अपना काम पनाना गोण, रम्प रह जाता है।

4M
व्यक्ति और राज
परतु इन पुरुषार्थीपर ध्यान देनेसे यह साफ देख पrar
है कि इनकी तामें एक गैजे रिपी है। वह है सुपणा-
सुपको बाद । को भी मनुष्य को किसी भी अवस्था हो
यह सुख चाहता है, सुख पेचल दुपकी नितिका नाम नहीं
है, यह पद स्वतः अनुभति है। मनुष्य अपने प्रत्येक कामफे
द्वारा सा अनुभूतिको दृढता है। रुपण, सा, सन्तान,
पर यह सय सुपके साधन हैं इसीलिये इनका सग्रह किया
जाता है। स्वत इनमें उपादेयता नहीं है। यह बीजे किसी
अरस्थामें मुम्ब दती है , उस समय उनका सग्रह करनेको जी
चाहता है, अन्यथा उनकी ओर से जी इट आता है। ओ
लोग परलोककी ओर मुक्त है वह भी सुप ही चाहते
६। कोई उस सुमरका परममुप, ब्रह्मानन्द, कहता है,
कार इश्वर साक्षात्कार जनित मान ६ पहता है। इससे यह
যহিuাগ নিলা কি মা দু গান্ধী ৪
मिलती है।
इस घोलमें हमको सदा सफलता क्यो नहा मिलती, हम
सन्ध क्यों नहीं सुखी रह पाते ? इसके दो मुख्य कारण है।
एक कारण तो यह है कि हमको मुखकी पहचान नहीं है।
हम प्रशानसे अभिभूत ह । न नो हमको बाहरी जातका पूरी
पूरी जानकारी है, न हमको अपनी चित्तको वृत्तियोंकी पहि
एक ही साथ चित चारों ओर दौडता है पर हममें
इतनी सामथ्र्य नहीं है किसय यासनाघोंकी साथ aft

सुखकी पोज पर सफल यह होता है कि असातोप, प्रमुख, बना ही रहता है। अझानके कारण हम जिन घस्तुको सुखद समझ- पर करते है उससे घिarश दुखद ही निकलती हैं। किसीसे तो प्राप्त करते ही चिचको विराग हो जाता है, किसीसे भोगकाल में जी जय सता है, कोई मोगके पीछे विरस लगती है। फिर नये सुखकी पोज श्रारम्म होती है। इसी दौर धूपमै जीवनलीला समाप्त हो जाती है। वेदात के भाचाप्योका कहना है कि यह जगत् ब्रह्म है। ब्रह्म ही मिथ्या मायाके सयोगसे स्थावर जगम, चर अचर, जह चेतन विश्वके रूपमे प्रतीत होता है। माया मिथ्या हो सही पर जबतक उसका प्रावरण है तबतक तो जगतकी प्रतीति होगी इसकी व्यवहारिक सत्यता मानकरही चलना होगा। पानी में न गिरना ना होता पर अप गिर ही पडे तो यह बनेसे ता काम नहीं घरता कि मे पानीस पृथक , तेरकर निकरना होगा, सय ही पृण्मासिद्ध होगी। इस प्रकार जगत् मिप्या है कहना व्यथा प्रलाप है। इस मिथ्या घेरेस निक- र नेका प्रयास काना होगा, अविधाकाशावरण हराना होगा। विद्याका पर्दा त्यो यो दर होगा त्यो.यों अपने असली रूपी अनुभूति होगी। श्रपमा असली रूप सत् है, चित है, धानाद है। अविद्यापे कारण इस आन दमयताका अनुभव नहीं होता, इसीरिये सुखकी खोज मीतरसे उठती है। सुग्यकी खोज, अपने स्वरुपको खाज पतरि के शब्दों में स्वरूप में

व्यनि और राज
।
अवस्थान', अपने वास्तविक रूपको शुभूतिको खोज है। इस
खोजकी सफलताके लिए यह आवश्यक है शिअविद्याशे
विद्यासे यदला जाय श्रथात् समुचित शिक्षाका प्रयो
और ऐसी परिस्थिति उत्पन्नकी जाय जिसमें यह शिक्षा अबाध
पसे दी जा सके।
सुखकी प्राप्तिमें इस यातस यही बाधा पड़ती है कि सय
लोग सुग्यके लिये दौड़ते हैं और इस दौडमें प्रतिस्पर्धा होती
है। पंसा प्रतीत होता है कि भोक्ता यहुत हैं, भोग्य सामग्री
कम है । सयकी यह इच्छा होता है कि मैं स्वाधीन रहुँ अर्थात्
अपने सुखको सम्पन्न करनेमें मरा मार्ग निकाटक रहे पर
यह हो नहीं पाता। लोगा मार्ग एक दूसरेको काटते हैं
सस सघर्ष होता है। स्वाधीनताकी बाज भी उतनी ही
स्वाभाविक है जितनी किमुपर्श गाज । मनुष्य की पारमा
वस्तुत स्वत ६. अज्ञान उस भाव नहीं है पर प्रधान
ने उसको जाहसा रक्खा है। यह उसमे छूटना चाहता है।
पूर्ण स्वाधीनताको अवस्थामै सघर्षको काई सम्भावना नहीं है
योनि जब एक हो ब्रह्म पदार्थ मायाक द्वारा नाना होकर
प्रतीत हो रहा है तो पूर्ण स्वाधीनता अथात् पूर्ण ज्ञानकी
अरस्थानानाच रहेगा हा नहीं, फिर किसका रिससे सघर्ष
होगायोज्यो विद्या द्धि होतो आयगी त्या-त्यों सघपनी
सम्भावना कम होती जायगी। अभेद खुसि उदय होनेपर
कानक्सिसे लडेगा पर जयतक यह पुद्धि उदय नहीं होती-

मुखकी खोज
और इसका उदय होना कोई हँसी खेल नहीं है तबतक इस
चाटामदर करना होगा शिस्वाधीनताके प्राधेगमें लोग
टद मिडकर येसो दुरपया न उत्पन्न कर दें जिसमें समाज ही
नर हो जाय और क्सिीकी भी स्वाधीनता न बच । यह तभी
होगा जर स्वाधीनता तो हो पर उसके ऊपर नियत्रण रहे
प्रविश्य रहे। जो पूरे प्रात्मसयमी हैं यह तो अपने ऊपर
श्राप ही नियन्त्रण कर लेंगे पर इतर लोगोंपर याहरी रोष
थाम टगाना श्रावश्यक होगा।
कुछ लोग यह सोचते हैं कि साधारण जनता अज्ञानके
यशीभूत होनेसे स्वाधीनताकी पात्र नहीं है अत उसका
कल्याण इसी में है कि यह स्वाधीनतासे घचित रहे। कुछ
योडेसे अधिकारी ही इस योग्य हैं कि यह स्वाधीन रहें। यह
नैशेके अतिपुरुषवादका एक रूप हो गया। यह ठीक है कि
बय लोग पूर्ण स्वाधीनताके पात्र नहीं है पर यह भी अटल
सत्य है कि धिना पानोमें पॉर रपये तैरना नहीं पाता।
जिम्मेदारी, स्वाधीनतासे हो स्वाधीनताकी पात्रता देती है।
साधीन प्राणीसे भूलें होंगो पर भूरे ही उत्यानी सोगन
हैं। स्वाधीनता मनुष्यका स्वभाव है। प्रकृति ददायी नहीं
जा मक्ती। यदि राजनीतिक क्षेत्रमें लोगोंका पराघोन वनगर
रक्पा जायगा तो उनकी स्वाधीनताको प्रति इसरे प्रकार
च्यप्त होगी। यह दुराचार, व्यभिचारके पर निक
लेगी। इसके साथ ही जो लोग एसे पतित मनुष्यापर शासन

व्यक्ति और राज
विचार किया जा सकता है। जो अनुकूल परिस्थितियाँ हैं
उनके कायम होनेके लिए यह आवश्यक है कि प्रतिकूल परि
स्थितियों दूर कर दी जाये । इसी यातका लाम्बीने एक दुसरी
पुस्तक्में यो लिखा है, 'उन सामाजिक अवस्थाओपरसे,
जिनके पिना वर्तमान सभ्यताके युगमें व्यक्ति सुखो नहीं रह
साता, प्रतिवधके अभावको स्नाधीनता कहते हैं। यह
परिभाषा नमात्मक है, इसलिये अंशत अपूर्ण है पर इसके
-साथ हो सुकर भी हैं । यदि हम उन मुरय बातोंकी विवेचना
पर ल जो धैयक्तिक सुखके लिए आवश्यक हैं और फिर यह
दाले कि उनपर इस समय क्या प्रतियध है और उन्हें किस
प्रकार दूर किया जा सकता है तो स्वाधीनताका स्वरूप बहुत
कुछ समझमें था जायगा । यह बात भी स्पष्ट हो जायगी कि
उन प्रतिय धोको दूर करने में ही राजकी सार्थकता है।
ऊपर वैयक्तिक सुराको ही प्रधान माना है। यह ठीक है
कि सामूहिक मुप भी होते हैं, पर प्रकारके सुख अफ्ले भागे
ही नहीं जा सकते पर यहाँ भी प्रत्येक व्यक्तिको अपने ही
सुग्यपी अनुभूति होती है। यदि किसी विशेष प्रकारको अनु
भूति समूहमें ही हो सकती है तो व्यनि समूहमें जायगा । पर
उसको समूहके सुखकी नहीं, अपने सुसकी अनुभूति होगी
और यही अनुभूति प्रत्यक्ष अनुभूति होगी। दूसरोके सुपका
अनुमान मात्र हो सकता है। जो मनुष्य दूसरोक लिए अपने
का यलि कर देता है, सराफे सुपक लिए अपने सुसाश
-

Vayakti Aur Raaj

Author
Sampurnanand
Title
Vayakti Aur Raaj
File name
Vayakti Aur Raaj
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2010/12
Publisher
Banaras,hindi Pustak Ajensi
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
History
DLI number
515004
Barcode
4990010022666.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
DdMEfq2bcAg
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