Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sawakachar
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मुनि श्रीभनमाकोनि दि.जैन प्रन्य-मालाका द्वितीय मन्ध ।
धीपरमात्मने नमः।
श्रीमदमितगति आचार्यविरचित
श्रावकाचार।
पं. भागचंद्रजीकृत वचनिका सहित ।
धारण, वि० सं० १९७९ ।
ग्रंथकर्ता। इस ग्रंयके भूल का माथुरमंधके आचार्य अमिनगति हैं। उन नामके दो आचार्य हुये हैं। जिनमेमे एक नो मुंभराजाके गामनकाल विक्रमर्मवन्की " वीं शताब्दीमें । जिन्होंने धर्मपरीक्षा, मुभाषितरत्नमंदोह, पंचममह नया इस श्रावकाचार आदि ग्रंथोंकी रचना की है। ये अमिनगति माथुरम- धके भाचार्य माधवसेनके शिष्य थे इमवातका उल्लेग्व उन आचार्यप्रवरने प्रायः अपने सभी प्रों में किया है। इनकी विीप प्रशस्निका वर्णन मुभाषिनरत्नम- दोह, आदि प्रायः सभी ग्रंथों में है। इसलिए जिजामु महोदयोंको वहांमे जानना चाहिये यहाँ विग्नारके भयसे और मुभाषितरत्नपदोहमें प्रशस्निके मुद्रित होजाने विशेष वर्णन नहीं किया गया है। दूसरे अमिनपति आचार्य इन्हीं आमतगतिके गुरुके गुरु आचार्य नैमिषेणके गुरु तया देवमेनके शिष्य हुपे हैं। योगमार नामक जो अमितगति कृत अध्यात्मविषयक मंथ है उसके को शायद ये ही अमितगति है। क्योंकि योग- मारकी सदार्यरचना तथा धर्मपरीक्षादि प्रयों की रचनामें विभिन्नताके अति- रिक. एक पुष्ट प्रमाण यह भी है कि धर्मपरीक्षादि मयों में माधवपेनके शिष्य ममितानिने अपने नामका उल्लेख प्रायः सभी अध्यायों पारण्ठोंके अम्नम भन्य शारदांके विशेषणरूपमें किया है। पान्नु योगमारके किसी अधिकारमें रोमा मही, सिगक अनिम भोकमें अपना नाम सट प्रकट किया, जैमे:- या सर्व गगननगरस्यानमायोपमान निःमंगात्मामितगनिरिदमाभृतं योगसारम् । मसमात्या परमन म्यषु चाम्मप्रतिष्ठं नित्यानंदं गठितकालिदं सूश्ममत्यक्षलक्ष्यम् ॥ भनिरिक धर्मपरीक्षादि मभी मयों में अमिनगनिने अपने गुरुका म्मरण किया है परन्तु योगमारमें नहीं । इमलिये पोगमारके कर्ता देव. शिल मिननिही होने चाहिये।
1 २ . मापाटीकाकार। इस पंपसी हिन्दीभाषाटीकाके का पति भी भागचन्दजी है। भाप मागद जिला ग्वालियर के रहनेवाले भीमशाल जैन थे। परन्तु भाप दिगम्बर जैनधर्मी ही सार भनुयायी थे। भाप बीती राताम्दीके भले गण्यमान्य जनविदामों ममे हैं। भारत एवं हिन्दीभाषाके प्रतिभाशाली विद्वान् एवं कवि थे। मंगनमें भापका पनाया हुआ महावीराष्टक स्तोत्र है। जो सर्वत्र प्रध- लित है। भापनं भमिनगनिभावकाचार, उपदेशमित्तानमाला, प्रमाणपरीक्षा, मेमिनापपुराण भार ज्ञानमूर्योदयनाटक इन मंधोयो भागा वयनिका की है। और उनमोसम भने भावासपूर्ण पद भजन बनाये हैं। जिनका संग्रह कर भी चुका है। भाप प्रतिभाशाली, मौत, धर्मिय पूर्व अनुभवी विद्वान थे। हिन्दीमापा। एम प्रपको हिन्दी भाषा जैसी थी मी दी रम्दी गई है। नवीन योलचालकी हिन्दी में परिवर्मित नहीं की गई है क्योंकि भाषा परिवर्तन करदेनेमे भाषाटी- काकारती कृतिका ज्यों का स्यों भास्शदन नहीं होता और स्वाध्यायप्रेमी मानों को यथापूर्व भागामे ही विशेष लानन्द होताहै। निवेदक, राजमल पड़जात्या, मंत्री पापादत्राभरमी वि. संवत् १९७९ मुनि श्रीअनंतकीर्ति दिन पंथ माला।
२ अपन गगन गदादिपिन जिनप्रतिमा अभिगम। मीन होममई नित कर प्रनाम ॥४॥ माना मागगमा निल निगपावनद्वारा थी मितगतिश्रावकाचार। जे पंचविध आचार निर्मल पंच अग्नि सु साधने, पुनि द्वादशांग समुद्र अवगाहत सफल भ्रम बाधते । वर मूरि संत महंत विधिगण हरणको अतिदक्ष है, ते मोक्षलक्ष्मी देहु हमकों जहां नांहि विपक्ष हैं ॥३॥ जो घोर भय कानन कुअटवी पापपंचानन जहां, तीक्षण सकलजन दुःखकारी जासको नसगण महा । तहं भ्रमत भूले जीवको शिवमग यता जे सदा, तिन उपाध्याय मुनींद्रके चरणारविंद नमू सदा ॥ ४ ॥ विन संग उग्न अभंग तपत अंगमें अति सीन है, नहिं हीन ज्ञानानंद ध्यावत धर्मगुरू प्रवीन हैं। अतितपोकमलाकलित भासुर सिद्धपद साधन करें ते साधु जयवंतो सदा जे जगतके पाविक हरे ॥५॥ जिनवर मिद्धाचार्य पुन उपाध्याय मुनिराप । नमस्कार गुरु पंचों होउ सदा मुरादाय ॥१॥ जयवंतो जिनधर्म मो वीतरागपरिनाम । इगनिपातनं जीरकी काटि घर शिश्याम ॥ २॥ मंद पन जिनवयनको जाकै मापद रेनु । मा प्रकार प्रमको मुख हेतु ॥३॥ दोहा। पमा म iमाता प्रथम परिसर m इम नय देव प्रणाम फरि निजमतके अनुसार । ग्रंथ श्रावकाचारकी र५ यरनिका सार ॥ ६ ॥ में मंगल फरि श्री अमितगत्याचार्यरत श्रावकाचारकी धनिका कारपे है। सही जोमानकी मंदतात होनाधिक भय होय साकौं विशे. पज्ञानी मुधार लायो, मोको मेदयुसी जानि हाम्य मति कीयो यह विशेषज्ञानानसे मेरी परोक्ष प्रार्थना है ॥ उपजातिएं। नागहतानि प्रमति भूयस्तमामि यदृष्टिहराणि मद्यः । से शायतीमस्तमयानमिज्ञा जिनेंदयो वो वितरंतु लक्ष्मीम् ॥१॥ अर्थ से धानिनरूप चंद्रमा तुम्हारे शाम्पती जो मोक्षलक्ष्मी साहि विस्तारह । कैसे है जिनचंद्र अस्तकिये है अज्ञानी परषादी जिननें । यहारे जिनकरि शीघ्र ही दूरि किये सम्यक्ष्टि हरणेषाले मोह अंध- कार से फेर न होय ॥१॥ विभिध कर्माप्टकशंसलं ये गुणाष्टकैचर्यमुपेत्य पूतम् । प्रासाखिलोकानशिसामणित्वं भयंतु सिद्धा मम सिद्धये ते॥२॥ मर्थ से श्री भगवान मेरे सिद्धिके भय होऊ । जे सिद्ध भगवान झानायरणादि अष्टकर्ममप सांकल छेदि फरि अर सम्परतादि अर गुणकए पवित्र ऐश्वर्यको प्राप्त होप तीन लोकके जमणिपर्नेकों प्राप्त भये हैं ॥२॥ ये चारयंते चरितं विचित्र संयं परंतो जनमर्चनीयाः । आचार्यवर्या विचरंतु ते मे प्रमोदमाने हृदयारविंदे ॥३॥ भोभाचार्यषर्य पहिये आचार्यनिविष प्रधान आचार्य आने- का देनेवाला जो मेरा हृदयफमल ता विष विघरह। कैसे है भाचार्य , श्री अमितगतिश्रावकाचार । जे नानाप्रकार चारित्रकौं आचरन करते संत लोकौं आचरन करावं हैं याहीत पूजनीक हैं | भावार्थ-वीतरागरूप धर्मको आचरण करहै अर दयाल होय औरनिकों आचरन करा है तेही धोतराग भावनिक वाचकनि करि पूजनीक हैं और ते ही ज्ञानानंदके कारन हैं। बहुरि इन विपरीत अन्यरागद्वेषभावसहित, ते आचार्य नाही ॥ ३ ॥ येपां तप:श्रीरनघा शरीरे विवेचका चेतसि तवुद्धिः । सरस्वती तिष्ठति यात्रपने पुनंतु तेऽध्यापकपुंगवा वः ॥ ४ ॥ अर्थ-ते उपाध्यायनिविय प्रधान उपाध्यायभगवान तुमर्को पवित्र करहु । कैसे हैं उपाध्याय, जिनके शरीरविर्षे पापरहित तपो- लक्ष्मी तिष्ट है, अर जिनके चित्तविय भेदविज्ञान करनेवाली तत्वबुद्धि तिहे है, पर मुखकमलविय सरस्वती कहिये जिनवाणी तिष्ठ है। भावार्थ--मन वचन कायरूप तीनों योग जिनमें निर्मल भये हैं ॥४॥ कपायसेनां प्रतिबंधिनी ये निहत्य धीरा. ममशीलशस्त्रैः । सिद्धि विवाधां लघु साधयंते ते साधयो मे वितरंतु मिद्धिम् ५ अर्थ-ते साधु हमारे भर्थि सिद्धि जो मोक्ष ताहि देहु । कैसे हैं ते साधु, जे धीर समशीलरूप शखनिकार सिद्धिकी रोकनेवाली क्रोधा- दिक.पायनकी सेनाको शननित नाशकार अपनी सिद्धिकी सा है तैसे साधु फायनिको क्षमादिभावनित नाशकार परमनिराकुल अवस्थाको सा॥५॥ विभूपिनोमाय यया शरीरे विमुक्तिकांतां विदधाति वश्याम् । मा दर्शननानचरित्रभूपा चिने मदीये स्थिरतामुपंत ॥ ६ ॥ अर्थ-मी दर्शन शान चारित्रमप भूपण मेरे चित्तयि सदा स्थिरताको मान हो। जिस भाभूषणकार भूषित जो जीव है सो पर ही मुक्तिनको वश कर है।
प्रथम परिच्छद। m- . भावार्थ-जैसे मुंदर गारमहित पुरुपक श्री यती होय है सेमें दर्शन शानसहित आमा ज्ञानानंदस्यमय अवस्था प्राप्त होय ॥६॥ मानेय या शान्ति हितानि पुंमो रजः क्षिपंती दधनी सुगानि । समस्तगासायविचारदक्षा मरम्पनी मा तनुतां मति मे ॥७॥ अर्प-सो सरस्वती मरी पुद्धिको विस्तार । फैगी है, सरस्वती, जो पुरुषको माताकी ग्यों हित जे पल्याण कारण तिनहि मिपाय है, अर रज जो अमान ताहि हरा है, अर मुग्पनिको पुर पो है, भर समस्त शासनिक के विचारविर्ष प्राण है। भाषा-अनेकांतमपी जो जिनवाणी साया माती। सो जैसे चतुर माता पुत्रको लौकिक हिताहित कारण मिपाव भर अंगको भूलि हार है भर मुख पढाये है। जिनवाणी मोक्षमार्ग- विहिताहित सिम्बादै । भर अज्ञान दारे पर है रामानंद पर कर है ऐसा जानना ॥ ७ ॥ शायायुधेः पारमियनि येषां नियमाणः पदपमयुग्मं । गुणः पवित्रंर्गुरयो गरिष्ठाः कुर्वतु निष्ठां मम से परिधाम्।।८।। अर्थ-जिन घरनकगारको साता म पु समुदके पारपा प्राप होप है, पवित्र गुणनि करि गुरव से श्री गुरु मेरे ग्रेष्ठ क्रिया कर॥८॥ उपागकागारपिगारगार संक्षपनः शाममहं करिष्ये । मोति फरिवरिभ्योनप्पामतोयोहि कदापनापि ई-ओर सोभारकाधारक विचारमा सरभूत साको सपने या सोन पर पुष विस्तार करने वापि मममी है।
थी अमितगतिमायकाचार भावार्थ----विस्तारसहिततौ श्रुतकेवीके सिवाय दूजा कौन कहै; मैं सो संक्षेपरूप श्रावकाचार कहूंगा ॥९॥ क्षुद्रस्वभावाः कृतिमस्तदोषां निसर्गतो यद्यपि दुपयते । तथापि कुर्वति महानुभावास्त्याज्या न यूकामयतो हि शाटी।१०। अर्थ-जो पुनः नीचपुरुष निर्दोष कार्यको स्वभावही दूपन लगा है तो भी महान पुरुष कार्यों करें हैं, जाते यूकानक भयतें साही त्यागने योग्य नाही। भावार्थ-दुष्टनिकै मयतें सजन उत्तम कार्यको न त्यागें जैसे लोक यूकानके भयतें वस्त्र न त्यागें ऐसा जानना ॥ १०॥ संसारकांतारमपास्तसारं बंभ्रम्यमाणो लमते शरीरी। कृच्छ्रेण नृत्वं सुखशस्वीजं प्ररूढदुःकर्मशमेन मूतं ॥११॥ अर्थ---साररहित संसारवनविपै अतिशयकरि भ्रमता यह जीव है सो कष्टकरि मनुष्यपना पावै है । कैसा है मनुष्यपना, नित्यही सुखरूप धान्यका बीजसमान, अर फैल रहा जो पापकर्म ताके उपशम करि उपज्या ऐसा है। भावार्थ-~~-इस असारसंसारविर्षे मनुष्यपना दुर्लभ है बड़े पापके उपशम करि होय है, जाते इस ही करि मोक्षका कारन तपधरणादि होय सके है ॥ १२ ॥ नरेषु चक्री त्रिदशेपु पनी मृगेपु सिंहः प्रशमो व्रतेषु । मतो महीभृत्सु मुवर्णशैलो भवेषु मानुष्यभवः प्रधानम् ॥ १२ ॥ अर्थ-जैसे मनुष्यनिविय चक्रवती प्रधान है, अर देवनिविर्षे इंद्र प्रधान है, अर मृगनिधि सिंह प्रधान है, अर व्रतनिधि प्रशमभाव प्रधान है, भर पर्वतनिवि मेह प्रधान है, तेसै भवनिवि मनुष्यमक प्रधान है।॥ १२॥ ।
प्रथम परि। निवर्गसारः मुसरससानिधर्मः प्रधानो भवतीह येन । सम्यम्यशुद्धाविय धर्मलाभः प्रधानता सेन मताम्य मभिः॥१३॥ अर्य-जैसे सम्पत्षको शुदिता होतमत का लाभ होय? से इस नरभवति प्रिजे धर्म अर्थ काम तिनयिय सार भर पुष. रानफी हानि ऐसा प्रधान धर्म होय है। ता कारण पार गम्भषकी प्रधानता तनि परि मानी है। भावार्थ-साक्षात् मोक्षका कारण धर्म नरभवविध शेयर ताते नरभष उत्तम कसा है ॥१३॥ यथा मणिर्भापगणेप्यनयों यथा भूनको गुणयागु लभ्यः । न सारवायेन तयागियर्गः गुरोन मानुष्यभयो भये ॥ १४ ॥ अर्थ पपरनिके समरणि अमोलक रन गुलभ न सा जमे गुणवाननवि तज्ञ गुलभ नाही, तेसै सारवानपने कार गुगल. करि सहित भवनिषि मनुष्यभष गुरुम माही। भावार्ष- संसारविष पसरणाशिवराधनपने AR सार- भूत मनुष्यभव पाषमा अति पटिन है ॥ १५ ॥ शमेन नीतिनियेन विधानपिन फीसिंरतपमा मपर्या। पिना नात्येन न धर्ममिद्भिः प्रजायते जातु जनम्य पा॥१५॥ भई-से रामभारिना मोति मोष, भर बिनसीना मित महोप, हर शौच करिये निपमा तानि नदभर तपरिना पूजा गले से मनुष्यपने मि . AARTrim सिरिचित न हो। १५॥ अपेन गा नयनेन सा नयेन गहन भोसर । भनीनं रतजीवितानो दममा नि६॥
८ श्री अमितगति यायकाचार। अर्थ-जैसे अन्न कार हीन शरीर, अर नेत्रनि करि हीन मुख, अ. नीतिकरि हीन राज्य, अर लवण करि हीन भोजन, अर चंद्रमा करि हीन रात्रि न सोहै; से धर्मकार हीन जीवितव्य नहीं सौहे है ॥१६) शस्येन देशः पयसाजखंड शौर्यण गन्त्री विटपी फलेन । धर्मेण शोमामुपयाति मा मदन दंती तुरगो जवेन ।। १७ । अर्थ-जैसे धान्यकरि देश, अर जलकार कमलनिका वन, अ शूरवीरपनें करि शस्त्रधारी, अर फलकरि वृक्ष, अर मद करि हस्ती, भा वेगकीर घोडा शोमाको प्राप्त होय है तैसे मनुष्य धर्मकरि शोमा प्राप्त होय है ॥ १७॥ मानुप्यमासाद्य मुकच्छूलभ्यं न यो विशुद्धिर्विदधाति धर्मम् । अनन्यलभ्यं स सुवर्णराशिं दारिद्रयदग्धो विजहाति लब्या १८ अर्थ-जो बुद्धिरहित पुरुष कष्टक्रार पावने योग्य जो मनुष्यपना ताहि पाय करि धर्मकों न धौरहै सो दारिद्रय करि पीडित नर अन्य करि न पावने योग्य ऐसी पाई जी सुवर्णकी राशि ताहि त है । भावार्थ-न ग्रहहै ॥ १८ ॥ अनादरं यो वितनोति धर्म कल्याणमालाफलकन्पवृक्षे । चितामणि हस्तगतं दुरापं मन्ये स मुग्धस्तृणवजहाति ॥ १९॥ अर्थ---जी पुरुष कल्याननिकी माला जो पंगति सोही भये फल ताके देनेकौं कल्पवृक्षसमान जो धर्म ता A अनादरको विस्तारैहै, सो मुढ दुःयकारी पावने योग्य हस्तवि आया जो चिंतामणि ताहि तृणकी ज्यों हजैहै, ऐसी मान हूँ ॥ १९ ॥ दुःखानि सर्वाणि निहंतुकामनिःपीडितमाणिगणानि धर्मः । उपासनीयो विधिना विधिरमिहिमानीय दुरुत्तराणि ।। २० ।
प्रथम परिच्छेद।
अर्थ---पीडित किये है जीवनिक
समूह
जिनने ऐसे जे समस्त
दुःख तिनहि नाश करने की है इच्छा जाय ऐसे पुरुपनि करि विधिस-
•हित विधिक जाननेवालेनि करि धर्म सेवना योग्य है; जैसे दुःख फरि
उतरे जाय ऐमे जाडेनको नाश करनेके पांछकनि करि भमि सेवन
योग्य है ।
भावार्थ-जैमें शीत मेटे चाहत हैं तिनकरि अनि सेवना योग्य
है, तेसै मिथ्याज्ञान जानित परद्रव्यनिकी तृष्णारूप दुःखकों दूर करे
चाहै है तिन करि धर्म सेवना योग्य है ।॥ २० ॥
शस्यानि पीजं सलिलानि मेयं धृतानि दुग्धं कुसुमानि पृक्षं ।
काक्षत्यहान्येप विना दिनेशं धर्म विना कांक्षति यः मुसानि २१
अर्थ-जो पुरुष धर्म विना मुखनिकों चाहै है सो यह जि बिना
धान्यनिकर्को चाहै है, भर मेघपिना जलनिकौं चाहे है, भर दुग्धविना
घृतनिकों चाहै है, अर वृक्ष विना फलनिकों चाहै है, अर सूर्य विना
दिनको चाह है।
भावार्थ-जैसे बीजादिफ है ते धान्यादिकनिके कारण है से
धर्म सुखनिका कारण है, अर फारण विना कार्यकी उत्पत्ति पाई
है सो होय नही सात पुरुषार्थानिकरि धर्मका संग्रह करना
योग्य है ।। २१
आयोति लक्ष्म्यः स्वयमेव भन्यं धर्म दधानं पुरुषं पवित्राः ।
प्रसूनगंधस्थगिताखिलाशं मरोजिनीसंडमिवालिमाला ॥ २२ ॥
अर्थ-निको मुगंध करि व्याप्त परी है समस्त दिशा जाने
ऐसा जो कमलमोनिका वन ता प्रति जैने भौरानिकी पनि स्वयमेव
आय प्राश होय है तेसै धर्मको धारन करता जो भन्मगुर ता प्रति
पवित्र लक्ष्मी स्वयमेव भाय प्रास होय है ॥ २२ ॥
श्री अमितगतिमायकाचार।
निपेवते यो विपयं निहीनो धर्म निराकृत्य सुखामिलापी।
पीयूपमत्यस्य स कालकूटं सुदुर्जर सादति जीवितायीं ॥ २३ ॥
अर्थ--जो नीच पुरुष धर्मका निराकरण कर सुखका अभिवापी
विषयनिकों से है सो अमृतकों त्यागि की जीवनेका अर्थी प्रबल
कालकूट विपक् खाय है ॥ २३ ॥
भोगोपभोगाय करोति दीनो दिवानिशं कर्म यथा सयत्नः ।
तथा विधत्ते यदि धर्ममेकं क्षणं तदानी किमु नैति सौख्यम् २४
अर्थ-जैसे यह दीन भया संता यत्नसहित रातदिन भौगोपभो.
गके अर्थ कर्म करै तैसे जो क्षणमात्र भी धर्मको धार तो कहा सुखको
प्राप्त नहीं होय, होय ही होय ॥ २४ ॥
ये योजयंते विपयोपभोगे मानुप्यमासाद्य दुरापमज्ञाः ।
निकृत्य कर्पूवनं स्फुटं ते कुर्वति वाटी विपपादपानां ॥२५॥
अर्थ-जो अज्ञानी दु.ख करि पावने योग्य जो मनुष्यपना ताहि
पाय करि विषयभोगनि विय लगारे हैं, ते प्रगट करके बनवं काटि
करि विपक्षनिकी बाडी करें हैं ॥ २५॥
गृहति धर्म विषयाकुला ये न भंगुरे मंच मनुष्यभावे ।
प्रदह्यमाने भवनेऽमिना ते निःसारयंते न धनानि नूनं ॥ २६ ॥
अर्थ-जै विषयनि वि आकुरित जन क्षणभगुर जो मनुष्यभव
ता विर्षे शीघ्र धर्मका ग्रहण न करें हैं, ते निश्चयते अग्नि करि घर
जलते संत धननिको न निकासे हैं ॥ २६ ॥
सर्वेऽपि भावाः सुसकारिणोऽमी भवंति धर्मेण विना न पुंसः।
तिष्ठति वृक्षाः फलपुप्पयुक्ताः कालं कियंत खलु मूलहीनाः ॥२७॥
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এয়ম বাডৈ।
अर्थ----पुरषके ये मुखफारी सब ही पदार्थ धर्म बिना न होय है,
में फल पूलनि कर सहित वृक्ष जहरहित निश्यकरि कितने काल
ति! किर भी रहे माहा ॥ २७ ॥
मोक्षायगानस्य मुरास पात्रं मांति मन्या भवभीरयो ये। .
भनि भन्या जिननायपष्टं धर्म निरास्वादमदपणं ते ॥ २८॥
अर्थ-जे समारत भयभीत भम्पजीव जिननाय फरि उपदेश्या
जो धर्म ताहि भक्तिसहित मेरै है, से मोक्षपर्यंत मुसके भाजन होय
हैं। कैसा है धर्म, नाही है दिपजनित पिपनिका स्वाद जाविणे,
अर रागादि दूपन करि रहित देमे ।
भावार्थ-जे पुरुष विषयरहित निर्दोष धर्म सबै १ ते चकारी
ई महमिंद्र मोक्षपर्यंत मुख पात्र हैं ॥२८॥
लक्ष्मी विधातु सकलां समर्थ मुदुर्लभं विधजनीनमेनं ।
परीक्ष्य गृहंति विचारदक्षाः सुवर्णवढंचनभीतचिंताः ।। २९ ॥
अर्थ-समस्त सक्षमीके रचने में समर्थ, अर महादुर्लभ, भर सम-
स्तका हित उपजायने वाला ऐसा जो धर्म ताहि विचार विर्षे प्रवीन
अर टिगायों करि भयभीत है चित्त जिनके ऐसे पुरुष हैं ते मुवर्णकी
ज्या परीक्षा फार प्रहण करें है।
भावार्थ-धर्म धर्म सय ही कहैं हैं परंतु परीक्षाप्रधान है ते
असाधारण लक्षणते परखि प्रहण करें है ॥ २९॥
सर्गापवर्गामलसारख्यसानि धर्म ग्रहीतुं परमो विवेकः ।
मदा विधेयो हृदये प्रविष्टयुधस्तु तं रत्नमिवापदोपं ॥ ३० ॥
अर्थ----स्वर्ग मोक्षके निर्मल मुखनिकी खानि जो धर्म ताहि महण
करनेको पंडित जन करि हृदयवि परम विवेक सदा करने योग है।
परि ज्ञानवान तिस धर्मको निर्दोष रत्नकी ज्यों प्रहण करें हैं ॥३०॥
-- . श्री अमितगतिश्रावकाचार । तं शब्दमात्रेण वदंति धर्म विश्वेपि लोका न विचारयंते । स शब्दमाम्येऽपि विचित्रभेदविभिद्यते शारमिवार्चनीय ॥३१॥ अर्थ-तिस धर्मको शन्दमात्र करि सब ही लोक कहैं हैं, और विचार न करै हैं । बहुरि सो पूजनीक धर्म शब्दकी समानता होते भी नानाप्रकार के भेदनि करि भेदरूप कीजिये है। भावार्य में आपका दूध गायका दूध नाममात्र ती समान है, परंतु गुणनि करि बड़ा भेद है, तैसे धर्म धर्म तो सब कहैं है, परंतु वीतरागभायप जिनधर्मप्रिय भर अन्य धर्म वि बड़ा अंतर है ॥३१॥ हिमानृतम्नेयवरांगसंगग्रंथग्रहा दत्तदुरंतदुःखाः । धर्मेषु येवन भवंति निंद्याम्ते दरतो पुद्धिमता विवाः ।।३।। अर्थ-- जिन धर्मनिधि निदनीक पर दिये हैं महादुःस जिनने में हिमाङ्कट चौरी भैयुन परिमहमप पिशाच है ते धर्म युद्धि- पान करिशीत स्यागने योग्य है ॥ ३२ ॥ निहन्मने या शरीरवा निपीयते मयमुपास्यते थी। मुम्पने माममनयमूलं धर्मस्य मायापि न न नूनं ।। ३३ ॥ भर-विमणि जीवनिक मा हनिर है, भर मदिरा पोइये है, मी भोलिए है, मर मनका मूल माग भलिये है, तो निभरकी धर्मका नाही ॥ ३३ ॥ पादय कन्माइनरी येन सविनाम्नं तिरति धर्मम् । न कोटा कापि गुंधगयां निर्धापमाना जननि शालीन ३४ Kh-नागमादिक सेरेमनी 21 की मी कभी धान्य न पत्र
मपम परि।
हिंगापरचीमधुमागीयां फुपनि धर्माय पियुद्धयो ये ।
पीपलामाय विययते विपट्टमास्तं विविधरुपार्यः ॥ ३५ ॥
अर्थ- दुरि धर्म अर्थ हिंसा परस्त्री मधु मामका सेवन
पार र अमृतम, भाई नाना उपापनि करि विपक्षनिको बहार
पर्मपामागिरधादयोपनिर्माणयुक्ता पुसलाय गारः ।
आवर्णनीयानि न मानि दधः शदिवानीय वासि जातु ।।३६॥
अर्थ-जिन मानि कर पहु मघ मांस जीवहिंसादिक फरि
चिमये मगल के भर्य कहे, ते शास्त्र के वचननिको यो पडितनि
करि कदाचित् गुनना पोग्य नाही ।। ३६ ॥
पटंनि गृति यति भच्या स्तुति रक्षति नयंति पृद्धि ।
ये नानि शास्त्राप्यनुमन्यमानास्ते यांति मर्वेऽपि कुयोनिमज्ञाः ३७.
मर्प-जे पुरुष तिन पापरूप शास्त्रनिको नमते संते भक्ति करि
पर्दै है मु. है कहै है स्तुति करें है रक्षा करें हैं द्धिको प्राप्त करें हैं,
से सर्व ही भज्ञानी कुगति को प्राप्त होय है, नरफ तिर्यंचादि गतिनमें
अनंतकाल भ्रमे ॥ १७ ॥
धर्म ददंतेऽगियधादयोऽमी विधीयमाना यदि नाम तव्यं ।
सांसारिकाचारविधी प्रवृत्ता न पापिनः केपि तदा भवंति ३८
अर्थ---ये जीवहिंसा आदि करि भये जो प्रगटपने सत्यार्थधर्मकों
देय है तो टौकिक आचारकी विधि विष प्रश्र्तते कोई भी पापी न
होय।
भावार्थ---जो हिसादिक हो धर्म होप तो कराई भील धीवर
इत्यदिक सर्व ही धर्मात्मा ठहरें । सातै हिंसादिक है ते धर्म नहीं
ऐमा जानना ॥ ३८॥
श्री अमितगतिश्रावकाचार। --Vvvv महाभयानक है नक्रादिकके सम्ह जा विरें ऐसे समुद्रकू नाय विना तैरना चाहै हैं ॥ १५ । येषां प्रसादेन मनःकरींद्रः क्षणेन पश्यो भवतीह दुष्टः । भजति ये तान् गुणिनो न भक्त्या तेभ्यः कृतवान परे भवंति ४६ अर्थ-इहा लोकवि जिनके प्रसादकार मनरूप गजेंद्र क्षणमात्र करि घश होय है, तिन गुणवान गुरूनिकों जे भक्तिसहित न सेवेहे तिनते सिवाय और कृतनी कौन है ! ।। ४६ ॥ कृतोपकारो गुरुणा मनुष्यः प्रपद्यते धर्मपरायणत्वम् । चामीकरस्येव सुवर्णभावं सुवर्णकारेण विशारदेन ॥ ४७ ॥ अर्थ- करया है उपकार जापै ऐसा जो मनुष्य है सो धर्म- वि परायणपना प्राप्त होय है। जैसे चतुर मुनार करि मुवर्णक भले वर्णका भाव होय । भावार्थ-जैसे मुनारकी संगति फार मोना सोलहयानीका होय है में श्रीगुरुके प्रमादकर जीय धर्मको प्राप्त होय है ऐसा जानना ।। ४७॥ विवनमानो प्रनतो गुरुभ्यो न शम्पते यारयितुं परेण । प्पलीकवादी व्यवहारका मानव नियम्यते हि ॥४८॥ अर्थ-तन पराङ्मुख होना जो पुरुष सो गुमः बिना और कार रोकने ममयं न इनिये है । जै म्याहारकापकिय एंट बोलने बाला पुरुष माडी कर तिन कर ही निधय कर रोकिए है में ॥ १८॥ दुग्धन धनुः कृमुमन वही शीलेन मापा गरसी जलेन । नम्भिमा माति विना प्रनाम्या नमन विधा नगरी जनेन ।।४।।
प्रथम परिच्छेद। अर्थ-दुग्धर्स गाय सोहै है, अर फूटनिस येलि सौहै है, भर शीटसे खी सोहे है भर जलसे तलाई सोहै है, भाचार्यकै विना प्रतफी स्थिति नहीं होय है, शांतभावसे विद्या सौह है, मनुष्यनित नगरी सौह है। १९॥ विधीयते शरिवरेण मारो धर्मो मनुप्ये वचनरदारः । मेपेन देशे सलिलः फलाइच निरस्ततापरिव सरसवर्गः॥५०॥ अर्थ-जैसे दूर किया है ताप जिननें ऐसे जलनि करि फटसहित देशमें मेघफरि धान्यका समूह उपनाइए है सैसे उदार यवननि द्वारा भाचार्यफरि मनुष्यवियें सारभूत धर्म उपजाइर है ।। ५० ।। लन्थ्योपदेशं महनीयवृत्तेर्नुरोरनुष्ठाय पिनीतचेताः । पापस भन्यो विदधाति नाशं प्याथेवि प्याधिनिपूदनस्सा॥५१॥ अर्थ-जैसे रोगी धका उपदेश प्रहण फरि पायी बताई औप- चिको सेफरि म्याधिका नाश करह से विनपयुक्त है चिस माका ऐसा भन्य, पूग्य है आचरण जाफा ऐसे गुरुके उपदेशको प्राप्त करि भरपाई अनुष्धान फरि पापका नाश पर है। भावार्थ-जैसे रोगी धेयके उपदेशः रोगई माह तेसै भन्म गुरफे उपदेशते पापको मारी है ।। ५१ ॥ सर्वोपकारं निरपेक्षरितः फरोति यो धर्मपिया यतीशः। सकार्यनिरुपमीयतेनी कथं महात्मा रालु पंधुलोकः ॥५२ ।। अर्थ-जो भाचार्य निस्वार्थ के धर्मयुस्किार सर्वपा उपकार कर है सो यह महामा अपने अपने कार्यसायने पि तपर ऐसे यधुलोकनि कार कैसे परावर इंदिर है ।। ५२ ।। निषेप्यमाणानि पासि येतो जीवस्य एवंलजरामरत्वम् । नाराधनीया गुरवः कथं ते विमीरमा संसतिराक्षसावः ।।५।। .
श्री अमितगतिमायकाचार। अर्ध-जिन आचार्यनके वचन सेवन किये मए जीव अजरामर- पना करिए है वे गुरु संसाररूप राक्षसीत डर भए पुरुष करि कैसे आराधना न किये जाय है, अपि तु आराधना किये ही जाय हैं ||५|| माता पिता ज्ञातिनराधिपाद्या जीवस कुर्वत्युपकारजातम् । यसरिदत्तामलधर्मनुन्नास्तेनैप तेभ्योतिशयेन पूज्यः ॥ ५४ ॥ अर्थ-माता पिता जाति राजा आदिक जे है ते आचार्य कारे दिये हुए निर्मल धर्मसे प्रेरित हुए थके जीवके उपकारनिके समूहकों करै हैं अर आचार्य विना प्रेरे हुए ही करै है ताते या अतिशय करि गुरु जो है सो माता पिता जाति राजादिक करि भी पूज्य है ॥५४॥ निपेवमाणो गुरुपादपमं त्यक्तान्यकर्मा न करोति धर्मम् । प्ररूढसंमारवनक्षयाग्नि निरर्थकं जन्म नरस्य तस्य ॥ ५५ ॥ अर्थ-छोडे है अन्य कार्य जाने ऐसा गुरुके चरणकमल कोही सेवन करे ऐसा जो पुरुष, अंकुरित ऐसा जो संमार धन ताके नाश करनेमें अग्निसमान ऐसे धर्मको न करे है वा पुरुषका जन्म निरर्थक है ॥५५॥ यं मूरयो धर्मधिया ददंति यं बांधयः साधिया जनानाम् ॥ अर्थ तयोरंतरमन वैद्य मताणुमेयोंरित्र जायमानम् ॥ ५६ ॥ अर्थ-जा अर्थको आचार्य तो धर्मयुद्धिकी मनुष्यनिकों देखें है अर भाई बंधु जन स्वार्थयुद्धि करि देय है सो यहां सत्पुरुषनिकरि इन दोनि में परमाणु भर मेर में होय ऐमे अंगर ममान भतर जानना योग्य है। भावार्थ-आवार्य अर भाई धुनिमें इतना अंतर है जितना गुभेन था परमाणु है ।। ५६ ॥
प्रथम परिच्छर mmar- J लक्ष्मी करींद्रश्रवण स्थिरत्वां तृणाग्रतायस्थिति जीवितन्यम् । वियत्वरी यौवनिका घना धर्म न बुवंति कर्थ महातः ।। ५७ ।। अर्थ-लक्ष्मी हाधीक कानसमान चचल दवि करि र तृण. निकी अनीपर टग्या जलको स्थिति ममान माषितम्य देखकर बा पौवन अतिशयकरि जानेवाला देखि करि महत पुरुष धम ये, नको हैं!.फरही हैं ॥ ५७ ॥ अनथरी यो विदधाति लक्ष्मी विषय मा विपदं क्षणेन । कथं स धर्मः क्रियने न मशि- म्याग्येन देहेन मलालयेन ।। ५८ अर्थ-जो धर्म क्षणमात्र सय विपदानिकोदर कार अधिमका लक्ष्मीकू करहै सो धर्म सत्पुरुपनिकरि मलका घरमा पाने कोय ऐसे.देकर कैसे न कीये है ॥५८॥ हिंददाना न नियोजयंते फलेवर भृत्वमिवात्मनीने। कार्य सदा ये रथिदोपकार तेपर्यते परमेव मृदाः ॥ ५९॥ पुरष भोजन मते र तरको चाकरको यो सदाकाल करपा पार जान दे अपने हितसपस में गाते र सोपहिगा। भाई पास भोजनास मामंदी तो कर अपने काम मेrds मालिक
२०
श्री अमिनगनिमायकानार।
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ठिगाया जाय है में शरीर भोजनादि मामीने तो परिसर
हितरूप तपमरणादि कार्यमें न लगाते ठिगाये जाय प्रेम
जानना।। ५९॥
गृहांगजापुत्रकलयमित्र-
मसामिभृत्यादिपदार्थयतें।
विहाय धर्म न गरी/भाजा-
मिहास्ति किंचित्सहगामि पथ्यम् ॥६०
अर्थ-~-इस लोकमें गृह पुत्री पुत्र श्री मित्र धन स्वामी चाकर
आदि पदार्थनिके समूहविर्षे धर्मको छोड और किछू जावनिक साय
जानेवाला हितकारी नाही।
भावार्थ-इस जीवका साथी धर्मही है और पदार्थ साथी
नाहीं ।। ६० ।।
पातिक्षयोद्धृतविशुद्धबोध-
प्रकाशविद्योतितसर्वतत्वाः।
भवति धर्मेण जिनेन्द्रचन्द्रा-
खिलोकनाथाचितपादपद्माः ॥१॥
अर्थ-धातिया कमीनेक क्षयतै उपन्या जो निर्मल केवलज्ञान
ताके प्रकाश करि प्रकाशे हैं सर्व पदार्थ जिनने अर तीनलोकके नाथ
जे इंद्र धरणेंद्र चक्रवती तिन करि पूजित है चरणकमल जिनके ऐसे
जे जिनेंद्रचंद्र तीर्थकर भगवान हैं ते धर्मकार होय है ॥ ६१ ॥
आराध्यमानखिदर्शरनेकै-
विराजते स्वः प्रतिक्विकर्वा ।
धर्मप्रसादन निलिंपराजः
सुरांगनावक्त्रसरोजभृङ्गः ॥ २ ॥
मपम परिप्पा
२१
मर्य-धर्मफे प्रमादकर अपने प्रातेविष समान भनेफ देवनि
परि सेप्यमान देपनिका राजेंद्र मोह है, कैसा है देवांगनानिके
मुग कमर निविष भेगसमान है।
भावार्थ-पद धर्म करि मिले है ऐसा जानना ।। ६२॥
द्वात्रिंशदुगिसहस्रमूर्द्ध-
प्रसूनमालापिहिताधिपः।
धर्मेण राज्यं विदधाति पक्री
विलंयमानखिदशेशलीलाम् ॥ ६३ ।।
अर्थ-धर्मकरि चकारी राज्यों धारे है, फेसा है चक्रवत्ता
यतीम हजार राजानिके मनकनिकी जे पुष्पनिकी माला तिनकर
मिन्टे हैं चरणकमल जाफे भर की सीलाफी धरै ऐसा धमावर्ती धर्म
परि होय है ।। ६३ ॥
मनोमवाळांतविदग्धरामा-
फटाक्षलक्षीकृतकांतकायः।
दिगंगनाव्यापिविशुद्धकीर्ति
धर्मेण राजा भवति प्रतापी ॥ ६४ ॥
अर्थ-कामफार भरी सर चतुर जे स्त्री तिनके फटाक्षनि करि
निसानाम्प किया है देदीप्यमान शरीर नाका भर दिशारूप स्त्रीनि
वि च्यापी है निर्मल कीर्ति जाकी ऐसा प्रतापी राजा धर्म कर
होय है ॥ ६॥
मतंगजा जंगमशैललीला.
स्तुरंगमा निर्मितवायुवेगाः ।
पदातयः शमपदानिकलाः
स्था विवपद्रथसनिकाशाः॥६५॥
२२ श्री अमितगतिधारकावार। योपाः म्यगोमाजितदेवयोपाः निलिंपयामप्रतिमा निवामाः । अनन्यलभ्या धनधान्यकोशाः ॥ भवंति धर्मण पुरार्जितेन ।। ६६ ।। अर्थ-चालते पर्वतनिकी लीला धरें ऐमै हस्ती, अर जीत्या पवनका बैग जिननें ऐसे घोडे, अर इंद्रके पयादेसमान पयादे, अर सूर्यके रथके तुल्य रथ ॥ ६५ ।। बहुरि अपनी शोभाकर जीती है देवांगना जिन. ऐसी स्त्री, अर इंद्रके मंदिरसमान महल, अर औरनिकरि न पावने योग्य ऐसे धनः धान्यनिके भंडार पूर्वोपार्जित धर्मकरि होयहैं ।। ६६ ॥ परेऽपि मावा भुवने पवित्रा भवंति पुण्यन विना जनस्य । विना:भृणाल कचनापि दृष्टाः संपद्यमाना न पयोजखंडाः ।। ६७ ।। अर्थ-लोकवि और भी जे पदार्थहे ते पुण्यविना जीव न होय, जैसे मृणाल जो कमलकी जड तिनविना कमलनिक वन कमी प्राप्त भए न देखे ॥ ६७ ॥ सपूर्वलोकानुचितोऽपि धर्मों ग्राह्यः सतां चिंतितवस्तुदायी। पप्रार्थयते न किमीधरत्वं खनात्ययोग्यं जनता सदापि ॥ ६८ ॥ अर्थ-अपने लोक जे पितादिक तिनके अनुचित मी धर्म को वाछित वस्तुका देनेवाला ग्रहण करना योग्य है, जैसे प्रथम परिषद २३ my- अपनी जातिको अयोग्य जो ईश्वरपना ताहि सोफ पहा अतिशयफरि पदा न पाहै ! अपितु चाहही है। भावार्थ-कोर पहै. हमारे कुलमें जिनधर्म नाही हम फैसै प्रहण कर ताई फो। जो अपने कुलमें जिनधर्म नाही सो भी नपान ग्रहण करना पोग्य में कोऊो नवीन राग्य मिलतो कहा ग्रहण न करे॥६८॥ त्यति वंशागतमप्यवधं संप्राप्य पुण्यं जनवार्चनीयम् । पुष्टं घुलायातमपि प्रवीणः कल्पत्यमासाद्य परित्यजति ॥ ६९॥ भर्य-जैसे मुंदरदारीर निरोगपना पायफरि प्रयोण पुरुष कुल. विष घल्या माया भी जो कुष्ठ रोग ताहि त हैं तैसें लोकपूज्य धर्मकों पापफरि कुटमें चल्या आया भी जो पाप ताहि त ।। ६९॥ मर्यापवादप्रसनेन धर्म मुंचंति संतो न पुधार्चनीयम् । ततो हि दोपः परमाणुमात्रो धर्मव्युदासे गिरिराजतुल्यः ॥ ७० ॥ अर्थ-पूर्वनके अपयादक भयकरि पंडितनिकरि पूज्य जो धर्म ताहि सत्पुरुष न स्यागैहै, जात निस मूर्खापयादतै तौ दोष परमाणु- मात्र है भर धर्मनाश भए मुमेरुतुल्य दोष है ऐसा जानना ॥ ७० ॥ मालिनी निखिलमुसफलानां फल्पने कल्पवृक्षं कुमतिमनविभीना ये विमुंचंति धर्मम् । - ४ श्री अमितगति यायकावार। विमलमणिनिधानं पावनं दुष्टतुष्टय स्फुटमपगतबोधाः प्राप्य ते वर्जयंति ७१ अर्थ-जे कुबुद्धिनिके मतते भयभीत भए सैते समस्तसुखरूप फलनिक देनेवि कल्पक्ष तुल्प जो धर्म ताहि तह ते अज्ञानी पवित्र निर्मल रत्नका भंडारकों प्रगट पायरि दुष्टनिकी प्रसन्नता के अर्थ पाहे ॥१॥ अमरनरविभूति यो विधायार्थनीयां नयति निरपवादों लीलया मुक्तिलक्ष्मीम्। अमितगतिजिनोक्तः सेन्यतामेप धर्मः शिवपदमनस्य लब्धकामरकामः ।। ७२॥ भई-जो धर्म, प्रार्थना योग्य जो देवमनुष्यनिकी विभूति साहि रथि, भर लोटामात्र करि निदोर लक्षमीको प्रास रहे सो समितगति- बिनीक काहिर अनंत मान जाका ऐसे जिनदेव कार का प्रया अमिनपाचार्य कीर काला यहु धर्म पापरहित शिवपन देनेके योछ साहित काम नीव तिनकार मेपना योग्य है ॥ ७२ ।। उपय दुर्लमनाम पाप अन्य कारज वनदीज, होप विषय विभुग गुगुबगनामृत पीजे । मिथ्यामा निमार गार जिनधर्म धार उर द्रादिक पर पाय धर्म होय जगनगुर।। कल्याणकार कलिमलहान धर्म पाम उनम गान। निगत अमितमति करित नग मागदपंदित परन। মা এমসি পাস মাখা पटल परिसरममान मया।
अथ द्वितीय परिच्छेद । मिथ्यात्वं मर्पया हयं धर्म बर्द्धयता सता । विरोधो हि योढि मृत्युजीवितयोरिव ॥१॥ अर्थ---धर्मको पढावता जो स.पुरुर ताकार मिथ्यात सर्व प्रकार स्पागना योग्य है, जाते मिथ्यान्य अर धर्म इन दोउनिका मरन अर जीवनको ज्यों अतिशय फरि यहा विरोध है ॥१॥ संयमा नियमाः मनाश्यते तेन पावनाः । क्षयकालानलेनेय पादपाः फलगालिनः ॥ २॥ अर्थ-जैसे प्रख्याति करि फलनि फरि शोभित जे वृक्ष है से नाशक प्राप्त होय है तेस तिस मिष्याष करि पवित्र संयम नियम सर्व नाशकौं प्राप्त होय हैं ॥ २॥ अतत्वमपि पश्यति तत्वं मिथ्यात्वमोहिताः। मन्यते पितास्तोयं मृगा हिमृगतृप्णिकां ॥३॥ अर्थ-मिष्या व फरि मोहित जीव हैं ते अतावी सत्य मान है, गैस तिसारा मृग हैं ते मृगतृष्णा निश्चय फरि जल माने हैं ॥ ३॥ विभ्रांता क्रियते पुद्धिर्मनोमोहनकारिणा । मिध्यात्वेनोपयुत्तेन मधेनेव शरीरिणः ॥ ४ ॥ भर्थ-मानकों अचेत करनेवाला उपयुक्त भया जो मिथ्यात्य ता करि मदिराफी ज्यौ जीवको बुदि विशेष भांतिरूप फरिये है ॥ ४ ॥ पदार्थानां जिनोक्तानां तदश्रद्धानलक्षणम् । ऐकांतिकादिभेदन सप्तभेदमुदाहृतम् ॥ ५॥ --
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
.
अर्थ-जिन मापित जीवादिक पदार्शनिका अश्रद्धान है लक्षग
जाका ऐमा, सी मिथ्याव ऐकातिक आदि मंद करि मात प्रकार
कह्या है ॥ ५॥
अब एकांत, संशय, विनय, गृहीत, विपरीत, निसर्ग, मूढटि,
ऐसे सात प्रकार मिध्यात्यका स्वरूप कहें हैं,-
क्षणिकोऽक्षणिको जीवः सर्वथा सगुणोऽगुणः ।
इत्यादि भापमाणस तदैकांतिकामिप्यते ॥६॥
अर्थ-जीव एकांत करि सर्व प्रकार क्षणिकही है, वा नित्यही है,
या निर्गुण ही है, या सगुणही है, इत्यादिक कहनेवाले के एकांत
मिथ्यात्व कहिए ॥६॥
सर्वक्षेन चिरागेण जीवाजीवादि भापितम् ।
तथ्यं न वेति संकल्पे दृष्टिः सांशयिकी मता ॥७॥
अर्थ-सर्वज्ञ वीतरागकरि कहा जो जीव अजीव आदि तत्व से।
सत्य हैं अथवा असत्य हैं ऐसे विकल्प होतेसते संशयजनित दृष्टि
कही है।
भावार्थ-सो संशयमिध्यात्व कहा है ॥ ७ ॥
आगमा लिंगिनो देवाः धर्माः सर्वे सदासमाः।
इत्येपा कथ्यते युद्धिः पुंसो बैनयिकी जिनः॥८॥
अर्ध-सर्व भागम, मर सर्वभेषी, अर सर्व देव अर सर्व धर्म
सदा समान हैं ऐसी यह पुरुपकी बुद्धि,' जिनदेवनिकरि विनय-
मिथ्याष्टि कहिए है ॥ ८॥
पूर्णः कुहेतु दृष्टतिर्न तत्व प्रतिपद्यते ।।
मंडलथर्मकारस भोज्य चर्मलवैरिव ॥९॥
पिपnिcirl अर्थ-peria a माया PRED AN नहर में धर्म पनि कर पू नगारवा पता भोजनको प्रासन राप। भाग-2 मारकगुगला पर्मय दर गाय है ताफो भोजन म त बोटे यानि करि महित या तत्वको न पाये है मोहात मिent ||९॥ अनुभ्यं मन्यने तथ्यं विपरीतगिर्जनः । दोपातुरमनाम्नितं ज्वरीर मधुरं रमम् ॥ १० ॥ अर्थ-जैसे वातपित्तादिदोरनि फरि भातुर जो परसहित पुरुर सो मिटरमको फटफ माने है तेसै विपरीत है रवि जा ऐसा जीव सत्यार्थको सम्यार्थ गाने है, या विपरीत मिष्याची जानना ॥१०॥ दीनो निमर्गमिध्यान्यानत्यातत्वं न पुध्यते । मुंदरागुंदरं रूपं जात्यंध इस मर्यथा ॥ ११ ॥ अर्थ- जनमका अधा पुरुष सर्वथा मदर या असुंदर रूपकों म जान है तेसै दीन एकेन्द्रियादि भज्ञानी जाय स्वभाय जनित मिथ्या- स्वत सत्वको न जानहै, ऐसा निसर्ग मिप्यायका स्वरूप फदा ॥११॥ देवो रागी यतिः संगी धर्मः प्राणिनिमनम् । मृटरपिरिति मूने युक्तायुक्तावियरकः ॥ १२ ॥ अर्थ-योग्य अयोग्य विवेकरहिस मूह है दि जाफी ऐसा पुरुष सो रानी देव पर परिप्रहधारी गुरु, धनिया हिंगाए धर्म ऐसे यहै है पर विपरीतमिष्यारिलक्षण पादा ॥ १२ ॥ सप्तप्रकारमिथ्यात्वमोहितेनेति जंतुना । सर्प विपाकुलेनेय विपरीतं विलोक्यते ॥ १३ ॥ --
२८
श्री अमिनगतिश्रावकाचार।
अर्थ---ऐसे सातप्रकार मिथ्यात्वकार मोहित जो जीव ताकरि विषा-
कुलकी व्यौ सर्व विपरीत देखिए है ॥ १३ ॥
न तत्वं रोचते जीवः कथ्यमानमपि स्फुटम् ।
कुधीरुक्तमनुक्तं वा निसर्गेण पुनः परम् ॥ १४ ॥
अर्थ-कुबुद्धी जीव प्रगट उपदेश्या तत्वको भी नहीं प्रदान
करहै । बहुरि करा या विना का जो अतस्य ताहि स्त्रमावक्ररिही
श्रद्धान करहै ॥ १४ ॥
पठन्नपि वचो जनं मिथ्यात्वं नैव मुंचति ।
कुदृष्टिः पन्नगो दुग्धं पिवनपि महाविपम् ॥ १५ ॥
अर्थ-जैसे दुग्धको पीवता मी सर्प महाविपकौं न त्यागैहै तैसे
मिध्याष्टि जीव जिनवचनकौं पढ़ता भी मिथ्यात्वको न त्यागैहै ॥१५॥
उदये दृष्टिमोहस्य मिथ्यात्वं दुःखकारणं ।
पोरस सनिपातस्य पंचत्वमिव जायते ॥ १६ ॥
अर्थ-जैसे धार सन्निपातके उदय होतसते मरण होय है तैसे
दर्शनमोहका उदय होतसतै दुःखका कारण मिथ्यात्व होयहै ॥ १६ ॥
• बहु बभाति यःकर्म स्तोकं भुक्ते कुदर्शनः ।
स भवारण्यदुःखेभ्यो विमोक्षं लक्ष्यते कथं ॥ १७॥
अंजलिं वल्ममानस्य पुरुषस दिने दिने ।
धान्यस्य गृह्णतः सारी कदा धान्यविमुक्तता ॥ १८ ॥
न वक्तव्यमिति प्राज्ञः कदाचन यतो भवी ।
कर्म भुंक्त बहु स्तोकं स्वीकरोति विसंशयं ॥ १९ ॥
अन्यथकेन जीवन मर्वेषां कर्मणां ग्रहे ।
सर्वेषां जायतेन्येषां न कथं मुक्तिसंगतिः ॥ २० ॥
द्वितीय परिच्छेद। समस्तानां तथैकन पुद्गलानां ग्रहेंगिना । अनंतानंतकालेन न पंधः सांतरः कथम् ॥ २१ ॥ अर्थ-जो मिथ्यादृष्टी बहुत कर्म बाधहै अर थोडा कर्म भोगैहै सो संसारबनके दुःखनितें मोक्ष कैसे पागा ॥ १७ ॥ अर्थ-जैसे दिनदिन वि धान्यकी अंजली पाते भर खारी महण करने के धान्यका पीतना कदे हूनौ होय ॥ १८ ॥ ऐसे कोऊ का तास आधार्य फहै है, बुद्धिवाननि करि " न वक्तस्य " कहिए ऐसा फहना कदाचित् योग्य नाही, जाते संसारी जीव निश्चयतें बहुत फर्म भोगे है अर थोड़ा अंगीकार कर है ॥ १९॥ जो ऐसे नहीं होय तो एक जीव करि सर्व कर्मनिका प्रहण होत. सते वाकी और सर्व जीवनिकै मुक्तिकी प्राप्ति कैसे न होय ॥ २०॥ महरि तसही एक जीवकरि सर्व पुद्गलनिका प्रहण न होते जीव- निय अनंतानंत कालकरि अंतरसहित बंध कसे न होय ऐसा उत्तर है॥ २१॥ सस्थानीयोपरे क्षेत्रे निक्षिप्तानि कदाचन । न प्रतानि प्ररोहंति जीये मिथ्यात्वयासिते ॥ २२ ॥ अर्थ-जै) ऊपर भूमिविर्षे बोए भए धान्य कदाचित न उपनें हैं तैसें मिथ्यात्य करि बासित जो जीय सावि प्रत नाही होय है॥२२॥ मिथ्यात्वेनानुपिद्धस्य शल्येनेव महीयमा । समस्तापनिधानेन जायते निवृतिः कुतः ॥ २३ ॥ अर्ध-जैसे महाशल्यसरि अनुविद्ध पुरुषकै मुख फहात होय ! तैसें समस्त आपदानिका निधान जो मिथ्याय ताकरि अनुबिद्ध पुरुष मुख काहे होय है ! नाही होय है ।। २३ ।।
३० श्री अमितगतिश्रावकावार । पोढानायतनं अंतोः सेवमानस्य दुःखदं । अपथ्यमिव रोगित्वं मिथ्यात्वं परिवर्द्धते ॥ २४ ॥ अर्थ-जैसे अपध्यकी सेवन करते के रोगीपना रहे है तैसे दुःरादायक जो छह प्रकार अनापतन ता सेयता जो पुरुष ताक मिथ्याव बंटे है ।। २४ ॥ मिथ्यादर्शनविज्ञानचारित्रः मह भापिताः । तदाधारजनाः पापाः पोडानायननं जिनः ॥२५॥ अर्थ---मियादर्शन, मियाज्ञान, मियाचारित्र इन तीननि करि सहित पापमप लिन मियादर्शनादिकके आधार मनुश्य से छह प्रकार अनायतन निनदेशनि करि कहे। भावार्म-मियाददर्शन, मिथ्याज्ञान मिपाचारिर ये तीन; भर जिनके धारक पुरुष तीन, ऐमें घर अनायतन जानना | आयतन नाम हिकाने का है मो ये धर्मके टिकाने नाही नाते नायतन कोई हैं॥२५॥ एक न प्रयोगचंने न परे प्रयः। एकीगीनि जाने ममाप्यने कुदर्शनाः ॥ २६ ॥ अजान नी मम्पादन जान चारित्रवि को न मानहै । भर और दोन पियो दोयको न माने । महर एक तीननको न जायमान मियादी होय ॥ २६ ॥ दीया कुम्न म्यानं मिथ्याटिरमीमिनम् । अन्याय गमागा घोरेयुनो ननरपि ॥ २० ॥ अ.रान की मरिन भी मिमा धित स्थानों समान गनेरी यो अनिदूर को है। ।
द्वितीय परिच्छेद। भावार्थ-जैसे मारगते अन्यत्र चलनेवारा बहुत घालता भी धोहित स्थानको उल्टा दूर फरहै न मिष्याष्टी घोर तप करता भी पारित मोक्षपदको उटटा दीर है फर्म बांध है, ऐमा जानना ।। २७ ।। न मिथ्यात्वममः शगुन मिथ्यान्वमर्म विपम् न मिथ्याचममो रोगो न मिथ्यात्वगमं तमः ॥ २८॥ अर्थ-मिथ्या रसमान वैरी नाही, भर मिष्यायाममान विप नाही, भर मिथ्यात्यममान रोग नाही, भर मिथ्यायममान धकार ना१२८ द्विपद्विपतमोगेगमर्मकत्र दीयते । मिथ्यान्वेन दुरंतन जनोन्मनि जन्मनि ॥ २९ ॥ अर्थ-ग, विष, अंधकार रोग इन कर देगा एक जन्मान दीजिए है। भर दूर है अंत जाका ऐसा जो मिपावसापारि जीब- को जन्म जन्मदिप दीजिए है ॥ २९॥ पर ज्वालाले क्षिप्तो देदिनात्मा हुताशने । न तु मिथ्यात्यसंयुनं जीवितव्यं कथंचन ॥३०॥ अर्थ-वानि परि आकुल जो अति सारिप तोशामा दिया भला परंतु मिपावसहित जोना कोई प्रकार भाग नाही ॥३०॥ पापे प्रार्यते पेन येन धर्मालियर्यते । दुःणे निक्षिप्यते येन सन्मिध्यान्वं न शांतये ॥३१॥ अर्थ-जिस किया पर पावित प्राति पराइये, कर पा पराम्गुग परिए है, अदुवरिये परपि.ये है मो लिया कि अर्थ नही। भाषा-मिप्यापसेवन परिका मा सो CTER तिनो उत्पाद होगा बननः । १॥
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श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
क्षेत्रसभावतो घोरा निरंता दुःसहाश्विरम् ।
विविधा दुर्वचाः श्वने कायमानससंभवाः ॥ ३२॥
दाहयाहांकनच्छेदशीतवातादिगोवराः।
परायत्तेपु तिर्यक्षु विवेकरहितात्ममु ॥ ३३ ।।
देनदारिद्रयदौर्भाग्यरोगगोकपुरःसराः।
आर्यम्लेच्छप्रकारेषु मानुपेषु निरंतराः ॥ ३४
स्वस हानि परस्पर्द्धिमीक्षमाणेषु मानिषु ।
योग्यमानेषु देवेषु हटतः प्रेन्यकर्मणि ॥ ३५ ॥
मिथ्यात्यैन दुरंतेन विधीयते शरीरिणाम् ।
पेदना दरमहा मीमा चरिणय दुरात्मना ॥ ३६ ॥
बर्ष-क्षेत्र समाय फरि भयानक भर अतरित दुग करि
सहे जाय ऐसे नानाप्रकार दुर्वचनने उपनी या शरीर मनते उपजी
धरन काल त कपि में दुगवेदना होते, बरि लियंकरहित
पायीन नियंचयोनि में दादिना साधना चिद्ध करना शीन पात त्यादि.
कने उनी पीडा, यहरि आर्य छ है भेद जिन ऐमे मनुष्यनि-
निनादीनाना दारिद्रयाना दुभाग्यपना गेग शोक आदि भनेक
वदना, वह पार कर्मविग युक भये मा भानी हानि अर
दमोन यानी मे मानी निविदाकार मुनी जाप
ऐमी भयानक पंदना दु? 2 vषों का 1 नाका ऐगा जो
नियामक माना की।
मनिममनि काम: पाणपक मिला
म जनम ॥३६॥
पायला पानि मोविनिनाम् ।
न जानु माना नानि मिध्यावन गिम्यते ॥ ३७॥
द्वितीय परिच्छेद। अर्थ संसारसमुद्रपती प्राणीनिफौं और भी जे दुःख हैं। तिनर्हि देता जो मिष्यान्य ताफार अंतको प्राप्त न हूजिये है। भावार्थ और भी अनेक दुःखनिकों देता मिथ्यात्व गमन न पाय है, निरंतर दुःख देय है ॥ ३७॥ विवेको हन्यते येन मूढता येन जन्यते । मिथ्यात्वतः परं तस्मात् दुःखदं किमु विद्यते ।। ३८ ॥ अर्थ-जिस करि विवेक हनिये है अर अचेतपना उपनाइयेहै, ता मिथ्यात्वसिवाय कहा और दुःख देनेवाला है ! अपि तु नाहीहै ॥ ३८॥ लन्धं जन्मफलं तेन सार्थक तस्य जीवितम् । मिथ्यात्वविषमुत्सृज्य सम्यक्त्वं येन गृह्यते ॥ ३९ ॥ अर्थ-जिस जीव करि मिथ्यात्वविषको त्यागि सम्यक्त्वको प्रहण करिये है, तिस जीव करि जन्मका फल पाया, अर ताका जीवना सार्धक है प्रयोजन सहित है ॥ ३९॥ मन्यः पंचेंद्रियः पूर्णो लन्धकालादिलन्धिकः । पुद्गलार्द्धपरावर्ते काले शेपे स्थिते सति ॥ ४० ॥ अंतर्मुहूर्नकालेन निर्मलीकृतमानसः । आयं गृह्णाति सम्यत्वं कर्मणां प्रशमे सति ॥४१॥ अर्थ-भव्यजीव पंचेंद्रिय पर्याप्तक अर पाई है कालादिन्धि जाने भर्द्धपुगल परिवर्तनकाल पाकी रहे संत संतमुहर्त काल फरि निर्मल किया है मन जाने ऐसो जीप फर्मनिका उपशम होनेसते प्रथमोपशमसम्यकपको ग्रहण करहै ॥४०॥ ११॥ निशीथं यासरस्येव निर्मलस्य मलीममम् । पधादायाति मिथ्यात्वं सम्पपसास निधितम् ॥४२॥ ममि. mur
C
भी ममिनानिमामागार।
मर्म-निर्म इनके पास मा मनि गी आग
इम प्रथमोपशमस्या के अंग आस मिया-मा? ॥१२॥
तस प्रपयने पभान्महात्मा कोपि वेदकम् ।
तसापि शागि कमिदामनीभूननितिः ॥ ४३ ॥
अर्थ-गाके पास कोई महामा पुल दकमपETी प्राप्त होय
है, पर कोई महामा पुरुष जाके मुकि आमन्न है सो क्षादिक-
सम्पायको प्राप्त होय है।॥ १३ ॥
आमें सम्याच होनेका विशेष स्वरूप कहे है-
लब्धशुद्धपरीणामः करमपस्थितिहानिकृत् ।
अनंतगुणया शुद्धया वर्द्धमानः क्षणे क्षणे ।। ४४ ॥
प्रकृतीनामस्तानामनुभागस सर्वकः ।
वर्द्धकः पुनरन्यामा युक्तापुक्तविवेचकः ॥ ४५ ॥
स्थितेंतःकोटिकोटीकस्थितिक मति कर्मणि ।
अथाप्रवृत्तिकं नाम करणं कुरुते पुरा ॥ ४६॥
अपूर्व करणं तसातम्मादप्पनिवृत्तिकम् ।
विदधाति परीणामः शुद्धकारी क्षणे क्षणे ॥४७॥
अर्थ-पायाहै विशुद्ध परिणाम जानें, बहुरि पापप्रकृतिभिकी स्थि.
तिकी हानि करनेवाला समय समय अनंतगुणगुद्धि करि वर्द्धमान
होता संता ॥ ४४ ॥
अप्रशस्त प्रकातेनिक अनुभागका घटावनेवाला बहुरि अन्य प्रशस्त
प्रकृतिनिके अनुभागों बढावनेवाला योग्य अयोग्यका विवेक
वान॥४५॥
ऐसा जीव अंत:कोटाकोटी सागर प्रमाणहै स्थिति जाकी ऐसे
कर्मको स्थिति होतेसत प्रथम अधःप्रवृत्तिनाम करणको करहै ॥ ४६॥
द्वितीय परिच्छेद । । बहुरि सा पीछे समय समय परिणामनिकी गुद्धि करता सर्व फरण करहै तापी अनिवृत्ति करणफों करहै ॥ १७ ॥ भावार्थ--उपशमसम्यक्त्वके अंतर्मुहूर्त पहले अध:करण अपूर्व- करण भनितिकरण ऐसे तीन करण होयहैं । इनका रिशेपस्वरूप श्रीमद्भगोमहसारविप काया तहात जानना ॥ बाधकरणे नास्ति छेदः स्थित्यनुभागयोः। अनंतगुणया शुद्धया फर्म बध्नाति केवलम् ॥४८॥ अर्थ सहा भादिके अधःकरणविर्षे स्थिति अनुभागका संद नाही अनंतगुणविशुद्धिताकरि केवल पुष्पकर्मयों बोधहै ।। ४८ ॥ द्वितीयं कुरते तत्र किंचित्स्थितिरसक्षयम् । शुभानामशुभानां च वर्द्धन दासयन रसम् ।। ४९ ॥ अर्थ-बहरि सहो जा जो अपूर्व फरण है सो किछ स्थितिकोर- कपात पा अनुभागकोडफ घातौं फरहै । फैसा है सो अपूर्वकरण अतिशयकरि समय समय प्रति शुभप्रशतिनको बढाये है भर अशुभ प्रकृतिनक घटाहै ॥ १९॥ अंतर्महर्तकः कालस्तेषां प्रत्येकमिप्यते । आदिमे कुरुते तस्मियांतरं करणं परम् ॥ ५० ।। अर्थ-उनमें प्रत्येकका अतर्मुहूर्तकाल जानना, आ आदिके मय- ममें भांतर करणी कोहे ॥५०॥ आंतरे करणे तत्र सहानंतानुरंधिभिः। अंतर्मुहर्सकालेन मिथ्यात्वमपवर्तते ॥५१॥ अर्थ-तिस अंतर करणविष अतर्मुहकारकरि तानुबंधी- सहित मिपावका अपवर्तन फरहै ।। ५१॥
धीममितानिनामगा। मिप्वाल मिगते भेदः गुदागदनिमिमीः । तनः मम्मचमिथ्यात्वगम्गम्मियातनाममिः ॥५२॥ अर्प-साके अंतर शुद मास की मिसे माय मिण्यात सम्यग्मिध्यात्य है नाम जिनके ऐसे भेदनि करि मियान भेदरूप कीजिए। भावार्थ-प्रथमोपशम सम्पात करि मिथ्यात्वका दन्य, मिथ्यान, मिश्र, सम्पास्वप्रतिरूप परिणम ॥ ५२ ।। प्रशमय्य ततो भव्यः कर्मप्रकनिमताम् । आंतहिर्तिकं पूर्व मम्ययं प्रतिपद्यते ।। ५३ ।। पर्य–ताके अनंतर भन्यजीव मात कर्मप्रतिनिकों उपशमाय- फरि अंतर्मुहूर्त स्थिति जाकी ऐसा प्रथमसम्यक्त्वको प्राप्त होयहै। भावार्थ अनादि मिष्याटितौ मिथ्यान्य अर अनंतानुबंधी चतुक ऐसें पांच प्रकृतिनिकों अर सादि मियादृष्टि अनंतानुबंधीसहित तीनप्रकृतिनको उपशमाय सम्यक्त्वी होयहै यह विशेषहै ॥ ५३ ।। मार्ग क्षायिकसम्यक्त्वको कहैहैं, क्षपयित्वा परः कश्चित्कर्मप्रकृतिसप्तकम् । आदत्ते क्षायिकं पूर्व सम्यक्त्वं मुक्तिकारणम् ॥ ५४ ॥ अर्थ-बहरि दूजो कोई जीव कर्मप्रकृतिनिका सप्तक जो अनंता- नुर्वधी च्यार कपाय भर मिथ्यात्व मिश्र, सम्यक्त्वप्रकृति इन सात प्रकृति- निकों खिपाय करि प्रथम मुक्तिका कारण जो क्षायिकसम्यक्तव- ताहिग्रहण करहै ॥ ५४॥ प्रशमे कर्मणां पण्णामुदयस्य क्षये सति । आदत्ते वेदकं बंद्यं सम्यक्त्वस्योदये सति ॥ ५५ ॥ अर्थ-अनंतानुबंधी कपाय च्यारि अर मिथ्याव, मिधमिध्यान्व इन छह कर्मनिका उपशम होतसंते भर उदयका क्षय होतसत अर सम्यक्त्व द्वितीय परिच्छेद । प्रकृतिका उदय होतसते बंदनेयोग्य जो वेदफसम्यक्त्व ताहि ग्रहण फरहै। भाषार्थ-वर्तमानमें उदय आवनेयोग्य निषेकनिका उदयका अभाव है लक्षण जाका ऐसा तो क्षयहो, ते संत भर ता पीछे उदय भावने योग्य निपेक ते उदीरणारूप होय वर्तमानमें उदय न आवे ऐसे तिनकी सत्ता है लक्षण जाका ऐसा उपशम अर सम्यक्त्वप्रकृति देशघातीहै ताका उदय होते घेदकसम्यक्त्व होयह जाते जाके उदयसे मल उपजै अर गुणका भंश भी यन्या रहै ऐसा देशघातीका लक्षण सर्वत्र कदाहै ॥ ५५॥ आदिमं प्रितयं हित्वा गुणेषु सकलेप्वपि । सम्परत्वं क्षायिकं ज्ञेयं मोक्षलक्ष्मीसमर्पकम् ॥ ५६ ।। भर्य-आदिके मिथ्यात्व सासादन मिन ए तीन गुणस्थाननिकों छोडकरि सर्वही गुणस्थाननिवि मोक्षलक्ष्मीका देनेवाला क्षायिक सम्यत्क्व जानना ।। ५६॥ तुर्यादारभ्य विज्ञेयमुपशांतांतमादिमम् । चतुर्थे पंचमे पठे सप्तमे घेदकं पुनः ॥ ५७ ।। अर्थ-चौथे गुणस्थानते गाय उपशातकपाय पर्यंत आदिका उपशमसम्यक्त्व जानना । यहुरि चौथे पांचवें छठे सातवें गुणस्थान वि घेदकसम्यक्त्व जानना ॥ ५७।। साध्यसाधनभेदन द्विधा सम्परत्वमिप्यते । कथ्यते क्षायिकं साध्यं साधनं द्वितयं परम् ॥ ५८॥ प्रथमार्या प्रयं पृथ्व्यामन्यासु क्षापिकं विना । सम्यक्त्वमुच्यते सद्भिर्भवभ्रमणम्दनम् ॥ ५९ ।। -am १८ भी भमितगतिमायकाचार। भईसाप मापन भेद की दो प्रकार सम्पाय कहिये है, क्षारक सापने योग्य है अर उपशम वेदक ये दोष साधन है ।।५८॥ FA जीवित संसार भ्रमण के नाशक तीनों मम्यावर भर प्रवीन मालिक ना दोर सम्पन पनिनि करि कहिर ५५ निर्गमानदेगनां मम्पावं विनयं मतम् । सनिलिंपीनिरभीनां क्षायिक विद्यते परम् ॥ ६ ॥ - मायदेशनि तीनों ही मम्पका को है, मर मा निमोनिः एक शापिक सस्पाय नाही है ॥ ६०॥ शायोमिझम्पोकाः पदाधिलगायः । प्रोगमाहा की या प्रामण पर स्थितिः ॥६॥ r-rifাম শশী বু” সিন খান সব ... माराम सापकी इनकी माननी ॥११॥ পািিাসাদাসিধানি। नाबिनिया धापितोगमा पः ॥ ६२ ॥ w-को मागको विक wnlनि की माननी प॥१२॥ प्रामात गपादोगी अादाने । निशानां आगते र गुणनः ॥1॥ पंरम। इत्यानं नागारमा ६४ ॥
द्वितीय परिच्छेद। अर्थ-पंचेंद्रिय संज्ञो पर्याप्त अपर्याप्त, इनि दोय जीवसमासनिकों वर्जिकरि और मिथ्यात्यके पलकरि उपजनेगले जे वादर एफेंद्रिय सूक्ष्म एकैदिय ये इंदिय त्रीद्रिय चतुरिदिय भर असंही पंचेंद्रिय तिनके पर्याप्त भर अपर्याप्त ऐसे बारह जावसमासनि विर्षे सम्यामधी न उपजै है ॥ ६४ ॥ वीतराग मरागं च सम्यक्त्वं कथितं द्विधा । विरागं क्षायिकं तत्र सरागमपरं यम् ॥६५॥ अर्थ-धीतराग भर सराग ऐसे सम्यान दोय प्रकार कहा है। सहाँ क्षायिक सम्पत्य वीतराग है, अर क्षयोपशम, उपशम ए दोय सम्परत्व सरागहें: ६५॥ संवेगप्रशमास्तिस्यकारुण्यव्यक्तलक्षणम् । सराग पटुमिर्जेयमुपेक्षालक्षणं परम् ।। ६६ ॥ अर्थ-संवेग कहिये धर्मत अनुराग, प्रशम कहिये कपायनिकी मेदता, भास्तिस्य कहिये आत आगम पदार्थनिविर्षे है ऐसेहीहै। ऐसा भाव, कारण्य कहिये दयाभाव, ए है प्रगट लक्षण जाका सो सराग- सम्यक्त्व पंडितनिकरि जानना । बहुरि उपेक्षा जो पोतरागता, सो है लक्षण जरका ऐसा दूसरा बांतराग सम्याच जानना ।। ६६॥ निसर्गाधिगमौ हेतू तस्स पापायुदाहता। लन्धिः कर्मशमादीनामंतरंगो विधीयते ॥६॥ अर्थ-सा सम्यक्त्वके निसर्ग कहिए सभाव, सपिगम कहिए उप- देश पावना में दो मास कारण कहेहै, भर कर्मनिकै उपशमादिक. निकी जो प्राप्ति सो अंतरंग कारण कहियेहै ॥६७ ।। सम्यक्त्त्वाध्युपिने जीवे नाझानं व्यरतिष्ठने । भास्वता भामिते देशे तमसः कीशी स्थितिः ॥ ६८॥.
श्री अमितगतिथानकाचार। अर्थ-सम्यक्त्वकरि सहित जीवविर्षे अज्ञान न तिष्ठहै, जैसे सूर्य- करि प्रकाशित क्षेत्रविय अंधकारको स्थिति कैसी। भावार्थ-जैसे सूर्य के प्रकाश होते अंधकार न होय तैसें सम्यक्त होते अज्ञान न होय है ।। ६८ ॥ न दुःखपीजं शुमदर्शनक्षिती कदाचन क्षिप्तमपि प्ररोहति । सदाप्यनुप्तं मुखबीजमुत्तम कुदर्शने तद्विपरीतमीक्ष्यते ॥ ६९ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनरूप पृथ्वीवि दुःखका बीज बोयाभी कदाचित न उगेहे बहरि विना योयामी उत्तम मुखका वीजसदा टगैहै । बहरि मिथ्यादर्शनविय सो विपरीत देखियहै । भावार्य-सम्यादृष्टीक कोई दुःवका कारण पाप कर्म यच्या होय तो सोमी सुरपका कारण होय परिण है ऐसा जानना ॥ ६९ ॥ मम्यक्त्वमेयः कुशलांबुवंदितं निरंतरं वर्षति पातफल्मपः। मिथ्यात्वमेघो व्यमनांचुनिंदितं जनावनों क्षालितपुण्यसंचयः ॥ ७० ॥ अर्थ-~-धीयर, पाप मल जाने ऐमा सम्पत्याए मेघई सो निरंतर जनम्प भूमि पूजनीक कल्याण जसको मरमैहै । वर मिथ्यावसा मेघ, पीयाहै दीकियाई पुण्यका मंचय जाने सो अनप भूमिति निदनीक क.टमा जलको कामरे ।। ७०॥ न मीरगी दोरगणः गुदर्शने विगहगीयः स्थिरता प्रायने ।
द्वितीय परिच्छेद। भुजंगमानां निवहोवतिष्ठते कदा निवासेऽभ्युपिने गरुत्मता ।। ७१ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनके होतसत भयानक निंदने योग्य जो दोष. निका समूह सो स्थिरताको न प्राप्त होयहै । जैसे गरकार सहित जो स्थान सावि सर्पनका समूह कब तिष् । भाषार्थ-सम्यग्दर्शन होते मिथ्यात्वादिदोष न रहे, देसा जानना ॥ ७१॥ विवर्द्धमाना यमसंयमादयः पवित्रसम्यक्त्वगुणेन मर्वदा। फलंति हृद्यानि फलानि पादपाः पनोदकेनेव मलापहारिणा ॥ ७२ ।। अर्थ-जैसे मटका हरणे पाला जो मेघफा जल ताकरि वृक्ष ते मनोहर फलनिको फठे हैं, स विशेषपने यर्द्धमान जे यमसपमादिक से पवित्र सम्यक्त्वगुण करि सदा फले ३ ॥ २ ॥ निपेवते यो विपयामिलाएको निरस्य सम्यस्यमधीः फुदर्शनम् । म राज्यमत्यस भुजिप्यता स्फुट हवाकांक्षी पृणुते दुराशयः ।। ७३ ॥ अर्थ-जी विषयामिलानी ज्ञानी सम्पब यानि करि मिप्या- दर्शनको सेये है सो दुरचित्त यापनका बाधक प्रगट सम्पको छोडि कर धारीको अंगीकार कर है।।७३ ॥ भागै संगादिक सभ्यपके आठ गुण है है- सध्ये धर्मे ध्वस्लाहिंसाप्रपंचे देवे रागदेपमोहादिमुते ।
मी मभितगतिमापकाचार। IA wwaruwarram- माधी मर्वग्रंथसंदर्भहीने संवेगोगी निभलो योऽनुरागः ॥ ७४॥ भर्थ-- भाग है हिंमा REAार जा ऐसा जो सांगा- भम मोहारिकरि रहित देगी तथा सा परि. महमा कार रहित माल जो निमा भनुराग सो संग का देहे मागे निहित जन्मरासे करणाशितणाम्यिरत्ये। पांगार्य गायने निःप्राप निदिमी कम्पने मुक्तित: ।। ७५ ॥ wi-MER OF AII भाग बी शीय पाला जो mममान ! भीमना जागे शासगारपारि Aam मे मो पद मुनिका कारण नि करिक कतानामियादिनी fal निर्मित काग जाने। पानाला या पिरतण गुंगो निशा मानाजायणाधी॥ ७६ ॥ - HinKTीर है 12 Aur Tani TITTER पाnि ETना या गुलाम ।
तिीय परिऐ।
-~
पंचाचारापारकाणामदोपा
मोक्ता गर्दा गहणीयस्य हंग्री ।। ७७ ॥
अर्थ-देष रागादिदोनिकार दोप उपनते सत पंचाचारक
बाधरण करावणेवाले ने गुरु तिनफे भागे भक्ति सहित जो आलोचना
करिये अपने दोपहिये की निदनीक पापके हरनेवाली दोर रहित
गर्म कही है।॥ ७७॥
रागडेपक्रोधलोमप्रपंचाः
सनिर्यावामभूता दुरंताः।
यस पति पुर्यते न स्थिरत्वं
शांवात्मासी शस्यते भव्यसिंहः ॥ ७८ ।।
अर्थ-सर्फ अनर्धनिका घरममान, दूर है और जिनका ऐसे जे
रागदेष क्रोध लोभादिकनिके प्रपच से जाके चित्तविक स्थिरताकी
न कर है सो यह भम्प प्रधान, शांतदै भात्मा जाका ऐमा प्रशंसा
रूप कीजिए है।
भावार्थ-तीय रागरेप जाके मनमें न होय सो उपशम गुण
कहिये।॥ ७८॥
लोकाधीशाभ्यर्चनीयांनिपधे
तीर्थाधीशे माधुवर्गे सपर्या ।
या निर्व्याजाऽभ्यते भव्यलोक-
भक्तिः सेटा जन्मकांतारशस्वी ॥ ७९ ॥
अर्थ-लोकनिके अधीश जे नरेंद्र नागेंद्र देवेंद्र तिन कर पूजनीक
हैं चरन कमल जाके, ऐसे सार्थनाथ भए भगवान तिन विर्षे तथा
सापूनिके समूहवि भव्य जीवनि करि जो कपटरहित पूजा भारमिये
है सो संसारवन के छेदनेवाली भाक्ति इररूप कहीहै ॥ ७९ ॥
मी भमितगतिमायकायार।
कारग्यं छत्तुकामेरकामे
धर्माधारे म्यारतिः प्राणिवर्गे।
भाज्यायः प्रागुपदर्पते या
समात्मत्यं कथ्यते तथ्यबोधः ॥ ८॥
म --करन के संदन के पाठक, बोधारहित ऐसे पुरपनि को
म भारभूत जाननिके सम्हविश जो प्रामुफ भारि मादिनि
की या बागे, करिए सो सयाज्ञानानि कार पारायण
गन्मामोपी कर्मणा भ्रम्यमाणे
गीग्रामे रमिते कमेरे।
गिलाद पश्यिते महात्मा
नाम दर्पी दर्शनीयः ॥ ८१ ॥
siriturn कमर भाता मा दलित ऐमा भनेक
ARE IFE AM नी महापुण दाभापकी पार
RIMARiन का यो भाषादिक निकी -
HTrimumaniनाणा सोमना.
4k मा गुनिता The from 4 ME 1
नाशिः
मी मनापानी।
मारित पाने
RRA सिता॥ ८२ ॥
मपम परिन। ४५ धर्म-निता स्यविक रपेभरे ने श्रीगुरुनके उपदेश लिन- कर धर्मशा मानपणा पोरी में जी रणरहित पे संपेगादि पाठ गुण निगरि सम्पदर्शन पर ॥ ८२ ।। अपारसंगारममुद्रतार पशीहतं येन गुदर्शनं परम् पनीयताम्नेन अनेन संपदा पररलभ्या पिदामनास्पदम् ॥ ८३ ।। अर्थ-अपार मेसारसमुदका तारनेवाला पर विपदानिका भना- एपद कहिये ठिकाना माही ऐमा एक सम्पादन जाने वश किया, भगीपार किया ता पुरस्कार सोरनि फरि न पारने योग्य ऐसी संपदा बश परी॥८३ ।। मुदर्शने लम्यमहोदये गुणाः धिपो निवासा विफसंति देहिनि । निरस्तदोपोएचये मरोपरे हिमेतरांशापिय पंकजाफराः॥८४ ॥ अर्थ-पायाह महाउदप जाने ऐसे सम्पादर्शनके होतमत जीय- विषयमीक निवास जे गुण ते विकासमान होयहैं, कैसा है सम्प- ग्दर्शन, निरस्तदोषोपय कहिये दरि किया है शोकादि दोपनिका समूह जाने । जैसे सरोयाविनदर कियाह दोपा जो राति ताका समूह जाने भर पाया महा उदय जाने भर भलाहे दर्शन जाका ऐसा सूर्यके दोतमत कमलनिके बन एमाले निवास है से विफस है। भावार्थ-सोफ को छाभी कमटनिवि बस ऐसा अलंकार पाम्पहै । इह एफ एक सर्वपक्षविप भर दर्शनपक्षविष समान अर्थ होय ॥८॥ दर्शनधोर्नपरो पंधुदर्शनलामान परो लाभः । दर्शनमिधाम पर मिश्र दर्शनसौख्यान परं सौख्यं।।८५॥..
४६
श्री अमितगतियायकाचार।
अर्ध-सम्यग्दर्शनरूप बांधवते सिवाय और दूसरा बधिर नाई
भर दर्शनके लाभते सियाय और दूसरा लाम नाही, अर दर्शन
सिवाय दूसरा मित्र नाही, अर दर्शनके मुखते सिवाय और दूसरा
सुख नाहीं ।। ८५
लन्या मुहूर्तमपि ये परिवर्जयंते
सम्यक्त्वरसमनवयपदप्रदायि ।
भ्राम्यति तेऽपि न चिरं भयवारिराशी
तद्विभ्रतां चिरतरं किमिहास्ति वाच्यम् ।। ८६ ॥
अर्थ-पापरहित पदका- देनेवाला जो सभ्यस्वरत्न ताहि एक
मुहर्तमी पायकरि जो त्याग है ते पुरुषभी ससारसमुद्रविर्षे बहुतकाळ
नहीं भ्रमै है तो इहातौ सम्यग्दर्शनको धारते पुरुषनिके कहा अति-
शयकरि बहुत भ्रमण कहना योग्य है ।
भावार्थ--एक मुहर्त भी सम्यग्दर्शन ग्रहण हो जाय तो संसार
उत्कृष्ट किंचिदून अर्द्धपुद्गलपरिवर्तनमात्र रहि जाय सो अनंतानंतकाल
अपेक्षा थोडा ही कहिये । बहुरि जो सम्यग्दर्शनते नहीं छुटै क्षायिक
सम्यग्दृष्टी होय सो बहुत कैसे भ्रमै । या तो मतिनिकट संसार है
ऐसा इहां आशय जानना ॥ ८६ ।।
पापं यदर्जितमनेकमवैरतैः
सम्यक्त्वमेतदखिलं सहसा हिनस्ति ।
भस्मीकरोति सहसा दणकाठराशि
कि नोर्जितोयलशिसो दहनः समृद्धम् ।।८७||
अर्ध-जो पाप दूर है अंत जिनका ऐसे अनेक भवनिकिर
उपाो सो इस समस्त पापको सम्यक्त्व शीघ्र ही नाश करे है । इहां
दृष्टांत कहैं है-बड़ी उज्ज्वल है शिखा जाकी ऐसा जो भनि सो
।
भ
४७ दितीय परिच्छेद। हरिको मास होता मी तण भर काटनका सम्ह साहि शामही कहा भरमन मार है ! यही है।। ८७॥ नेव भपस्थितिवेदिनि जीवे दर्शनशालिनि तिष्ठति गम् । पुष हिमस्थितिरस्ति हि देशे प्राप्मदिवासरदीधितिदासे ।। ८८॥ -संसारको स्थितिका जाननेवाला भर सम्यग्दर्शनकरि सोभित ऐमा जो जीव ताकि दुःख नहीं तिष्ठ है । जैसे प्रीष्मके सूर्यको किरणरि तप्त जो क्षेत्र ता विशीतकी स्थिति कहात होर ! अपितु मादी होय है ।। ८८॥ भुवनजननाजेन्मोत्पनिप्ररंपनिपुदनी जिनमतरविधिनामण्या यकैदपमीयते । बिदामरणिं ने भापंने समां परमाणुना प्रमाति मतिमिथ्या मिथ्याशामय वा सदा1८९) अर्थ-लोकके जीवनिक संसारको उत्पत्ति के प्रबंधकी नाशक- रनेवाली ऐमी जो जिनमनकी रचि श्रद्धा सो निनिकरि चिंतामणि- कर उपमा दीजिये ( जिनमतको अदाको पितामगिकी उपमा देयो) से भाकाराको परमाणु के समान कहैहै । अथवा मिष्याष्टिको सुद्धि सदा मिथ्यारूप होयही साका कहा आश्चर्य है ! ॥ ८९ ॥ अपहितनाः मोत्संग निधानमिवोनम नयति हृदयं यः सम्यक्त्वं शशांककरोअलम् । अमितगयः क्षिप्रं लक्ष्म्यः अयंति तमाहता निम्पमगुणाः कान कांतं म्वयं प्रमदा इव ॥ ९ ॥ 'बमोस्पति के स्थान पर नोत्पत्ति, पाठीक है। म
४८
श्री अमितगतिधायकावार ।
मर्य-से एकामहै मन जाका ऐसा पुरण घरकै मध्यभागी
निधानको प्राप्त करे तैसे जो हृदय प्रति चंदमाकी किरणहमान
उम्मउ सम्पायको प्राप्त करहै, ता पुरुषको जैसे संदरपतिको आदर
सहित सी है ते सयमेव शोपही सेवह तैसे उपमारहित पुन
मिनके भर प्रमागहे ज्ञानदर्शन जिनयि ऐसी आदरसहित ददादि.
परफी सामी लयमेव सेवेहै ।। ९०॥
दोहा।
रिपरीवामिनिवेश सजि मजि निर्मल प्रदान ।
पारे धारक अमितगति लहत माल कल्पान।।
भी अमितगतिमाचार्यरत मापकासारथि
दिनीय परिषद समाप्त भया।
तीसरा परिच्छेद ।
आगे सम्यग्दर्शनके विषय जे जीवादिक पदार्थ तिनिका वर्णन
जीवाजीवादितत्वानि ज्ञातव्यानि मनीपिणा ।
श्रद्धानं कुर्वता तेषु सम्पन्दर्शनधारिणा ॥१॥
अर्थ-सम्यग्दर्शनका धारणेवाला अर तिन जीवादिकनिवि श्रमा-
नकों करता ऐसा जो पंडितपुरुष साकार जीव अजीव भादि तत्वहै ते
जानने योग्य है।
भावार्थ-सम्यग्दर्शनकी निर्मलताके अर्थ जीवादिपदार्थ विस्तार-
सहित जानने योग्य हैं ॥१॥
तत्र जीवा द्विधा शेया मुक्तसंसारिमेदतः।
अनादिनिधनाः सर्वे शानदर्शनलक्षणाः ॥२॥
अर्थ-तहाँ जीव है ते मुक्त अर संसारी भेदकार दोप प्रफार
जानना । जैसे है जव आदि, अंतररहित है भर सर्वही ज्ञानदर्शन है
लक्षण जिनके ऐसहै।
भावार्थ-दम्यार्थिक नय कर जीव अनादिनिधन है भर दियते
गाय मिद भगवानपर्यंत सामान्य ज्ञानदर्शनपिना कोई भी जीप नाही।
ऐसा जानना ॥२॥
सत्र क्षताएकर्माणः प्रामाष्टगुणसंपदः ।
दिलोकवेदिनो मुत्ताखिलोकाग्रनिवामिनः ॥३॥
५० श्री अमितगतिश्रावकाचार। अनंतरेपदूनांगसमानाकृतयः स्थिराः । आत्मनीनजनाभ्या भाविन कालमासते ॥ ४ ॥ अर्थ-तहां नष्ट भएहैं अष्ट कर्म जिनके अर प्राप्त भई है अपुग रूप संपदा जिनके, बहुरि तीन लोकके जाननेवाले अर द्रव्यभावक- निते मुक्त भए, बहुरि तीन लोकके ऊपरि बसनेवाले ॥३॥ बहुरि अंतका किंचित् जन अंग प्रमाण है प्रदेशनिकी आकृति जिनकी, अर स्थिर है कंपरहित हैं, बहुरि आत्मज्ञानी जननि करि पूज- नीक, ऐसे श्री सिद्धभगवान आगामी अनंतकाट तिष्ठें हैं ॥४॥ संमारिणो द्विधा जीयाः स्थावराः कथिताखसाः । द्वितीयेऽपि प्रजायते पूर्णापूर्णतया द्विधा ॥ ५॥ अर्थ-ससारी जीव स्थावर अर उस ऐसे दोय प्रकार कहेहैं, तिन स्थावर भर असनि बिभी पर्याप्त अपर्याप्तपने परि दोय प्रकार है ।।३। आहारविग्रहाक्षाऽऽनवचोमानसलक्षणम् । पर्याप्तीनां मतं पदं पूर्णापूर्णत्वकारणम् ॥ ६ ॥ अर्थ-आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छास, यचन और भन ये है साग जाऊं ऐसा जो पर्याप्तिनिका पद सो पर्याप्त अपर्याप्तपनका कारण भावार्थ-अपने योग्य पर्यानिकी जाकै पूर्णता है मो पर्योग नीर करिये, नाता नाही सो अपर्याप्त कहिये ॥६॥ पतयः पंच पद मेयाम्तेषां पर्याप्तयोगिनाम् । एकापिकाक्षाणां पंचाक्षाणां यथाक्रमम् ॥ ७॥ ई-लिन पारहित एप्रिय विकायि चंद्रिय गीनि चार, पांच, छ, पागे पदाम जाननी ।
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IMARRIA का पर पति.किर
writerprint.ruit. नमन.in
Gmat|॥ ७॥
एगाया पायगायः या परिकीनिंगाः ।
प्रचिती गलियो मारनपनापतिः ॥ ८॥
ww antraft पाम १ मा बसत ५२
चराको ॥८॥
भदाता प्रयः पप्पा पायपायिकतलयाः ।
निगमनागामिरूपा एप परेप्पपि ॥१॥
Pari Tohs. भ.in? पाप, पीकापिया, पृप्पा-
} chatantr पानि लिया तो कापी, भर
AM विया गोलाकाधिक भरोग पृथ्वी
पाया गया में पृथ्वीमा पाही प्रकार साविक
भी गनना ॥९॥
मना हिपितुःपंपदाकारागकायिकाः ।
पंगामा द्विविधातन संध्यमशिविफल्पतः ॥१०॥
अर्थयिनीय चनुमतिय पलिय जाबो में प्रमयापिक
-यो । मत परिसंही अशी भेद पारि दोय प्रकार ॥१०॥
शिक्षापदेशनालापग्राहिणः संजिनो मताः ।
प्राममानमराणा विपरीतास्वसंशिनः ॥११॥
अर्थक्षा उपदेश आगमन. माण यरनेवाले, पायर्या है
मन जिनसे जीव है या रियनित विपरीत है से
अमही ऐसा जानना ॥ ११॥
१२ भी मभितगतिप्रायकाचार। पर्गनं रसनं प्राणं चक्षुः श्रोत्रमितींद्रियम् । सस्य म्पनों रमो गंधो रूपं शब्दश गोचरः ॥१२॥ अर्म-पर्शन, मन, प्राण, मे, पोर, देखें पांच दिया है। गरि तिनिहारा, रग, मे, वर्ग, शन्द, पिप है ॥१२॥ गंडपाजनकाशमिगंगद्रगोपमाः । गदिता विविधाकारा दिपीकाः शरीरिणः ॥ १३ ॥ - जो कोही मि शेग गोप में माना! II किलोदिप जी कहे हैं ॥ १३ ॥ Tmरिणीलिकालियापुमगणाधिकम् । रिली मां प्रातर्विनियाकारायणम् ।। १५ ।। wt---int at र शुगा पामरत ए में अभियाना भानागको १॥ १५ ॥ गमविकादेशमनाप्रमगदयः । नग्या दिशा रिगजिनमागनेः ॥ १५ ॥ प्रो - नामानि शामन जिनामे पुनिया Nirman STRA मा प्राय जानने ॥१५॥ नियनानिमा मामानानाकिनः । मिश्रा fifrik हिना || १५॥ w , तीसरा परिच्छेद। . . हपीकपंचकं भाषा कायखांतरलत्रिकम् । आपुरुरुधामनिधासददं प्राणा दशोदिताः ॥१७॥ अर्थ-प्रियप्राण पंच अर भाश मन काय ऐसे बल प्राण तीन महरि आयु अर उद्यामनिश्वाम ये दोप ऐसे माण दश पड़े हैं ॥१७॥ शरीराक्षायुरुच्यासा भापिता निसिलेवपि । विकलासंजिनां वाणी पूर्णानां संजिनां मनः ॥ १८ ॥ अर्ध-शरीर इद्रिय आयु उपास ये प्यार प्राण सर्वही पर्याप्तनि- वि कहे है. अर रिफलेंद्रिय आ अमज्ञी पद्रिय पर्याप्तनिक भाषा प्राण है, अर मेझीपर्यामनिविणे मनप्राण है ॥ १८॥ एकद्विधिचतुःपंचहपीकाणां विभाजिताः। तेऽन्येषां विचतुष्कं च पहसप्तांगायुरिदियः ॥ १९ ॥ अर्थ-एकेद्रिय द्वीतिय त्रीदिप चतुरिद्रिय पंचेंद्रिय जीवनिके भेद- रूप प्राणहैं । एकेद्रिय स्पर्शनइंद्रिय शरीर आयु उच्छाम ऐसे प्यार, दीन्द्रियकै रमनाइंद्रिय अर वचन मिले छह, प्रीद्रियकै प्राण अधिक सात, चतुरिंटियर्क नेत्रअधिक आठ, असैनी पंचेंद्रिय श्रवण अधिक नौ, सही पंचेंद्रियाँ मन अधिक दा; ऐसे पर्याप्तनिफे कहे । यहरि ते प्राण अपर्याप्त निविर्षे एफेंद्रिय पर्शनइद्रिय फाय आयु ऐमें तीन है, दीदियकै रमनासहित ग्यार हैं, वीडियक प्राणसहित पाचहैं, चतुरिद्रि- यफ चक्षुसहित छह हैं, पंचेंद्रिय श्रोत्रसहित मातहैं ऐसा जानना ॥१९॥ जरापुजांडजाः पोता गर्भजा देवनारकाः । उपपादभवाः शेपाः सर्वे सम्मूर्च्छना मताः ॥ २० ॥ अर्थ-जगयुज फहिए. जालपत् प्राणीनिफै शरीर ऊपरि आवरण मांस लोहू जामें विस्ताररूप पाइए ता सहित उपमैं ते जगयुज, भर धीममितगतिमायकाचार। भी रोते भरन, अर योनिन निकलताही मारना भादिसा- पाक ने रो पोन ये तीन प्रकार ती गर्भजी, अर देव नारकी से STRENT मो है जन्म जिनका ऐगे, यहरि इनिमित्राय सो और मनो जन्म दिनका ऐसे करें ॥२०॥ भाममम्मूझिनो जीरा भूरिपापा नघुमकाः । गीता मता देवाः मवेदप्रितपाः परे ॥ २१ ॥ wr ऐसे मारकी अर सम्मान और । मोगा मा Rak iii. भा पुदी; मायाकी और और स, पेमा जानना ।। २१॥ गपिन पतः शीतः गगग या विमिभकः । विभिन्नो नाया योनिगिनाम् ।। २२॥ wwt if rन पाल मा जी, निजी धिन Arr. Anu मनिमाविमल irit. for ki hirman | अनानि पर artant 21 hr an adin gavt.rfast antaritrime timuft मग, Mmm Manfm.m, Prammafना ॥२॥ वाम गा नियागार। नमानस नांगा ॥२॥ रानमा गीनगा Affeat wiमामीदिनुगमः ॥ २५ ॥ ।
तीसरा परिच्छेद। पारिऐमैं यह स्थाननिधि मातलक्ष योनि जाननी, अर नारकी देव तिच नि विष प्यारि ग्यारि सक्ष योनि आननी, विकरायवि छह- रूक्ष योनि है, आ मनुष्पनि वि चौदह लक्ष योनिहै । ऐसें सर्व एफठी करी भई चौगसी लक्ष योनिहैं ये पूर्वोक्त सचित्तादियोनिनके विशेष भेद जानने ॥ २५॥ गतींद्रिययपुर्योगज्ञानवेदधादयः । संपमाहारभव्येक्षालेश्यासम्यक्त्वसंजिनः ।। २५ ॥ अर्य-गति प्यारि, इंद्रिय पाच, काय छह, योग पदह, ज्ञान आठ, घेद सीन, मोधादिक कराय प्यार, संयम सात, आहारक दोय, भव्य दोय, दर्शन प्यार, लेक्ष्या छह, सम्यक्स्य छह, संज्ञी दोय, ऐसे चौदह मार्गणा कहाँहैं ॥ २५॥ मायते मर्वदा जीवा यासु मार्गणकोविदः । सम्यक्त्वशुद्धये मार्गारवाचतुर्दश मार्गणाः ॥२६॥ अर्थ-विचारविर्षे प्रवीण जे पुरए तिन फरि जिनविर्षे जीव हैं ते सदा विचारियह ते चतुर्दशा मार्गणा सम्यक्त्वकी शुद्धिके अर्थ सदा विचारनी योग्य ॥२६॥ मिथ्याष्टिः सामनो मिश्रष्टिः सम्यग्दृष्टिः संयतासंयताख्यः । क्षेयावन्यो झौ प्रमत्ताप्रमत्ती सत्रापूर्वेणानिपत्यल्पलोभी ॥ २७ ॥ शांततीणी योग्ययोग्यी जिनेन्द्री द्विः समवं ते गुणस्थानभेदाः । प्रैलोक्यापारूढिमोपानमार्गा- स्तभ्यं येषु ज्ञायते जीवतत्वम् ॥२८॥ -
धी अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-मिष्याष्टि, सासादन, मिश्राष्टि, सम्यग्दृष्टि बहुरि संपता संपतहै
नाम जाका, प्रमत्त, अप्रमत्त दोय ये जानने योग्य है; अर अपूर्वकरणसहित
अनितिकरण अर सूक्ष्मलोभ अर उपशांतमोह, क्षीणमोह, सभोगीजिन,
अयोगीजिन ऐसे गुणस्थाननिके चौदह भेदहैं, ते त्रैलोक्यका अप
जो सिद्धपद ताके चढ़ने सोपानमार्गह। जिनयि सोचा जीवा
।
जानियेहै।
भाार्य-~-मोहनीय आदि फर्मनिका उदय उपशम क्षय क्षयोपशम
परिणाम जे अपस्थारिशेप तिनको होस उत्पन्न भये जे मार
फलिए जी मिथ्यागादिक परिणाम तिनकार जीय है " गुण्यते "
करिए पिए या देगिए य लशित फहिए; से जीसके परिणाम गुणस्था
नसंज्ञा के धारक है । सहा मिण्या कहिये असत्यम टि फहिए सदान
माय मो मिथ्याष्टि, महरि आगादन जोगिन सा सहित वा
सो मागादन गम्यादि नाक, गो मासादनराम्याधि अपना
मामादन करिए गम्गाका यिन सा सहित जीयर्तमान सो सागा.
दनमा, बहरिनामयाशा गम्याय लिग ग्याप फार का
समाना जानना । यद्दरि गम्पाय अरमिण्यापया भिटाभारमो
निश्री हरि करिये ममीन हि कहिए. सामान
1. मोई मदद, मा गोही जति यदि अमी सी अनित.
मम्मी है।
वन करित गात करिए गंपनी
मोनियम अमंगमा मारियां
गाना , मी प्रमाद को को
प्रयोगमा २ को गा मन है, महरि मा काण
करिनाम मी माunt, म निति
बो.... namaATHAमी भनिनिवारण
१ मा, मी prunima
तीमरापरिच्छेद। ५७ - है। परि उin भया मोह जाया सो उपातिमाह हैमरि क्षण भया? मो. जागा मोक्षीणमोह परि घानिकर्मनिको जीतता भया मी जिन, पररि फेशन शान जाये मो फेयी, मोई फेवली माही जिन, परि योग फरि सहित मो गयोग सोही सपोगकेवली जिनपर योग जा, नोय मो योगी नाही मो अयोगी मोही येवगजिन गो अयोगकामानिनिन । मिण्याटि आदि अयोगि- फायगिनिन पर्यंत पोदा गुणस्थान जानना । हा ग्रंथ पढनेके भयते नामका अर्थमार म्याप या विशेष अन्य आगमत जानना॥ ऐमें जीरनायका वर्णन किया, आगे अजीयसत्यका वर्णन करें हैं; धर्माधर्मनमःकालपुद्गलाः परिकीर्गिताः । अजीयाः पंच रमहरुपयोगविवर्जिताः ॥ २९ ॥ अर्थ-गपक जाननेवाले मर धर्मद्रव्य अधर्मदव्य आकाशदम्म कालदम्य पुदर द्रव्य ये पांच, उपयोग जो दर्शन ज्ञान ताकरि रहित अजीव को। ॥ २९॥ अमृा निष्क्रिया नित्यानन्यारो गदिता जिनः । रूपगंधरमम्पशन्दवंतोष पुद्गलाः ।। ३०॥ अर्थ-धर्म अधर्म फाल आकाश में प्यार इम्प अमूर्त फाहिये वर्ण गंध रस स्पर्श रहित अर नि:निय काहिए प्रदेशानिके पलियेकर रहित जिनदेवनि फरि फोरें । यहुरि हा सप गंध रग स्पर्स शब्दयान है ते पुद्रे, मप गंध रग स्पर्श है जाते सदा अनुपायी है अर शब्द है सो पर्याय है जाते पुद्गलाकंधानित पदाचित उपजैहै । इहा शब्द कहने फार पंध, सूक्ष्म स्थूल संस्थान भेद सम छाया आतप उद्योत र सर्य पुगएको पर्याय जान सेना ॥ ३०॥ - श्री अमितगतिधारकाचार। लोकालोको स्थितं व्याप्य व्योमानंतप्रदेशम् । लोकाका स्थिती व्याप्य धर्माधर्मों समं ततः॥३१॥ अर्थ-लोक अलोक दोउनिौं व्यान करि अनंत है प्रदेश जार मा आमाश आस्थित है। वहरि लोकाकाको सन् तरसते पात्र करि धर्मस्य अर आमद्रव्य ति ॥ ३२ ॥ धर्माधर्मकजीगनामसंख्येयाः प्रदेशकाः । अनंतानंतमानाम्ने पुद्गलानामुदाहुताः ।। ३२॥ अ-अनन्य, अधर्मद्रव्य मा एकजीराव्य इनके अगम्याने ग। पर पुन:नि प्रदेश अमेतानप्रमाण को हैं ॥३२॥ गीमा पुद्गलाना र गतिथितिविधायिनी । धर्माधमी मती प्राराकाशमाकागान् ॥२३॥ अ - निको ना पनि गति मा गिनिके गाने गर्म RT युभिशाननि म को, आ आकाश गो माता. ना कमाना। भयो मनको र गमनमह, भर Print Hom. नितिने मारी से गाय सानिकी म मर्म मला प्रेमी न । आमाले within anा की देन में wrritut-1|| ३३ ॥ अगंगा रानामा कामपामाणाः | पंचनामाया माणाजिताः ॥२४॥ Raman frontlin it * :- 14 भो। २ सागरापरि। -- । भावार्थ--- जिगर ऐसे असरलो पागण भिन्न गोपविध निधीत निरअर अन्यसम्पनि पर्यापनिकरि गमपातिभेद करिए मो म्पपरवाहमा जानना ॥ ३४ ।। जीवितं मरणं माग्यं दुःयं कुर्वति पुगलाः । अस्पंधविभेदेन विकल्पापभागिनः ।। ३५ ॥ अर्थ- १ त माना मग्ण मुरादुराको यरै. फैसेहै पुमान अणु स्पेभापरिदीप भेद भगनेवा। समागनिक प्राण- मका मेयोग मोजापन लिनया रिपोग सो मरण अर इप्रियजनित मुगर इनके कारण पुर ताते पुदा को ऐमा जानना ॥३५॥ पियंभरा जलं छाया पतुरिंद्रियगोचराः । फर्माणि परमाणुष पड्डिधः पुद्गलो मतः ।। ३६ ॥ म्भूलस्थलमिदं स्थूलं स्थूलगक्ष्मं जिनधरैः । प्रक्ष्मम्धलं मनं मूक्ष्मं गमगक्ष्मं यथाक्रमम् ॥ ३७ ॥ अर्ध-पृथ्वी, जर. साया. प्यार इटियनिके विषय अर फर्म, अर परमाणू मै उत्प्रकार पुदम्य यामाह ॥ ३६॥ परिजिनमरनिकरि पयामाम पहिए यी सो स्थूलस्थल, अर जल स्थल, भर साया स्थूलसूक्ष्म, अर नेर पिना चतुरिमियके रिपय सूक्ष्म- रगल, अर यार्माण पर्गणा सूक्ष्म, अर परमाणू राममूक्ष्म कन्याह॥३७॥ ऐमें अजीररायका वर्णन किया; आगें आस्वतन्यो पहिहैं;- यहापायमनःफर्म योगोसावासवः स्मृतः । फर्मासपत्यनेनेति शदशासविशारदः ॥ ३८॥ अर्थ-जो बचन काय मन इनका फर्म कहिये पन्ना सो योग है यह आसव है। शनशास्त्रवि निपुण पुरुपनिकरि जागरि कर्म भास्त्री सो भाग्यह ऐसा करपा ।। ३८॥
श्री अमितगतिश्रावकाचार । शुमोशुभस्य विजेयस्तत्रान्योन्यस्य कर्मणः । कारणसानुरूपं हि कार्य जगति जायते ॥ ३९ ॥ अर्थ-तहा शुभयोग शुभकर्मका कारण जानना अर अशुभयोग अशुभकर्मका; जात लोकवि कारणके अनुरूप कार्य होय है ॥ ३९॥ संसारकारणं कर्म सकपायेण गृह्यते । येनान्यथा कपायेण कपायस्तेन चर्यते ॥ ४० ॥ अर्थ-जा कारणकरि कपायसहित जो जीव ताकरि संसारका कारण कर्म प्रहण करियेहै अर कपायरहितकरि संसारका कारण कर्म प्रहण न करिये है ता कारण कपाय त्यागिए है । भावार्थ-सापरायिक आसव तौ सकपाय जीवकै होय? अर ईर्या- पथिक आलब कपायरहित एकादशमादि गुणस्थाननिविर्षे होय मो फेवल योगत है ताते ससारका कारण नाहीं ऐसा जानना ॥ ४० ॥ ज्ञाताज्ञातामंदमंदादिमायश्चित्रचित्रं जन्यते कर्मजालं । नाचित्रत्वे कारणस्येह कार्य किंचिचित्रं दृश्यते जायमानं ॥४१॥ अर्थ-ज्ञानभाय अज्ञातभार तीत्रभार मंदभार आदिशन्दकरि अधिकरण अर वीर्य इन प्रकारनि करि नानाप्रकारकर्मजाल उपजाइएहै लोकवि कारणके नानाप्रकारपना न होते नानाप्रकार कार्य किए उपल्या न देखिरहे। मावार्थ---यह प्राणी हिंसनायोग्य है ऐमा जानकारी हिंमा प्रय- तैना इत्यादिक ज्ञानभावहै, वहरि प्रमादने या मदते बिना गाने हिंमा- दिकमें प्रवनना सो अज्ञानभात्रो, तीनोगदिकके उदयतें होय मो तीनभावहै, मेटमोगादिको उदयनै होय सो मेदभावहै, यहरि जाके वि हिमादिक आगारमय कांत्रिए मो अधिकतण काहिए, बरि दम्पफी -- तीसरा परिन्दा ११ ज्यो निजसामर्प सोपी कहिए, निके नानासकार तीजमंदादि भेद- करि भामरवि भी भेद है ऐसा मानना ॥ ११ ॥ तिरसारमात्सर्पशून्यविस प्रपावलापादिदोपरनेका विपोषावरोषस्तपेक्षापरोपो दुरंतः कृतैर्गमते गईणीयः ॥ ४२ ॥ मर्थन दर्शनके धारकनिका वाहानदर्शनका तिरस्कार करणा पा मात्सर्व मद करणा व पंप घुगली खाना, या अतराय करणाषा पात सणा पाटे दोष कहना इत्यादि भनेक रहे अत जिनका ऐसे करे भये दोपनि परि निदने योग्य हानावरण तया दर्शनावरण महण कोमिएहै ॥१२॥ पधाकन्ददैन्यमलापप्रपंच. निकष्टेन तापेन घोऊन सपः । परात्मोमयस्पेन कमांगिवर्ग- रसात सदा मते दुःखपाकम् ॥४३॥ भई-प्राणनिका वियोग फरणा सो बध, भर भभुपातसहित राडा विलाप करणा सो आमदन, अर दोनपना कहिए जादि देखें दया उपजे, तथा प्रलाप कहिये वकवाद इनिफे विस्तारनिफरि, सपा परफे पचन मुनि मनमें फहरता सो ताप ताफार, तथा ताकी चिता परता इनि- योग भये सते नि दुःस जो पीशरूप परिणाम ताफरि, तथा सैद- गप परिणाम जो निकर सोक ता फरि दुखरूप है उदय जाका ऐसा जो भसाता बेदीय कर्म साई जीवनके समूहनि फरि सम शीम प्राण कहिए है । पैसेक है पूर्वोक्त कारण, परवि षा भापविष वा पर भाप दोउनिवि स्थित कहिए बसे है।
श्री अमित गतिश्रावकाचार। भावार्थ-आपविणे वा परविन था पर आप दोदनिविय करे भय बंधादिक कारण करि अमाता येदीयका आमय होय है ।। ४३॥ साधुपास्था प्राणिरक्षा तितिक्षा सर्वज्ञार्चा दानाचादियोगः। सातं कर्मोत्रायते शर्मपार्क शिष्टामिष्टः पोपितः सजनी ॥४४॥ अर्थ-साधूनकी सेवा अर जीवनको रक्षा अर क्षमा अर सड़की पूजा पर दान अर निटोमपरिणामादिक अर शुभध्यान इन पार्षहित क्रियाका आचरण करि मानावेदनीय कर्म उपजे है, जैसे उनमई मनो- स्य जिनके ऐसे पोपे भए सजननि करि मुग्वका परिपाक उदय हो है तैसें, यह दृष्ट्यंत है ॥ ४४ ॥ मोक्तव्येनावर्णवादेन देवे घर्म संघ वीतरागे श्रने च । मद्येनेाऽऽस्वाधमानेन मद्यो पोराकारो जन्यते दृष्टिमोहः ॥ ४५ ॥ अर्थ-देववि तथा धर्मविय तथा मंधविर्ष तथा यातगग केवटी वि तथा शाम्नविय त्यागनेयोग्य जो अवर्णवाद ताकार स्वाचा मया जो मदिरा ताकरि जमे धोरहै आकार जाका ऐमा देखनेमें गहटमात्र उपनाइरहे तने दर्शनमोह कर्म उपना है । मावार्थ- अंतरगकद्धपताक दोन महोते दोपनिमा प्रकट करणा सो अवर्णवाद, तहा प्यार प्रकार देवी तिनमें व्यंतर मासका सेवन कोहै यादिक कहना मो देवावयाद है, यही निनभादिन दश प्रकार धर्म गुणर्गहनंद ताक मेवनेवाले अमुर होप है इ. यादिक कहना सो धर्मका वर्णवादह, बहुरि जे मुनि ते म्नानाहित मटकार लिपच्या कीमत परिदद। १ग भिनपा ने अपरित पू है यारिफ फाना गो संघका अपर्णा पर 71 फाल जी पा समर ज्ञानदर्शन महिना पाटिमा सो कोषका अवर्णवायरि माम मालीका गाना मगि पान गयना को भोगना गरिभोजन इत्यादि पापरहित है ऐसा का मा गो भूलकर अपर्णया ने देशारिफके अपर्णयादत दर्शनमाया होय है, जाफर ममारविणे अनत परिभ्रमण होय है देगा भागना ॥१५॥ गांग्यधमी जन्यते निंदनीयो रद्रो मावो यः फपायोदयेन । दो अंतोरेप पारियमोई विपी पा राध्यमानो निकृष्टः ॥४६॥ अर्थ-जो काय रदपकरि निदनेयोग्य अर मुग्पका नाश करने- पाया गमाव उपजाईयो, सो जीवयों चारित्रमोह देयहै, जैसे द्वेषभाव- सहित आगध्या भया नीचपुग्ण आचरणमें प्रचेतपना उपना तैसे । भार्थ-योगादिक फायनक उदयतें जो सालपरिणाम होय साकरि जी चारित्रमोहया आवर होयह ऐसे जानना ॥ १६ ॥ पदारंभग्रंथसंदर्मदः गंद्राकारस्तीयकोपादिजन्यः । अधापासे प्राप्यते जीवितव्यं किंवा दुग दीयते नापचेष्टः ॥ ४७ ॥ अर्थ-यम आरंभ कहिये हिंसाकर्म, अर यह मेरी बातु, मैं याका स्वामी मा आमाप भाय सो परिग्रह, इनकी ऐमा रचनाफे मदनि कार सधा भयानका है, आपार जिन से सीमोगादिक उपजायनेयाले भायनि परि नग्यानिवासवि जीविसपना पाइयेहै, अथवा पापाप चेष्टानिकारि काही दु.ख न दीजिए है ! दीजिये ही है।
६ कहिए। ऐसे यह पोडशकारण सम्यग्दर्शनसहित तीर्थकरनामकर्मक धीमभिनगनिमाराकाना। पिनयमग्नना काहिए, यहरि माहित ग मागिनो पर जे जे मोगादिक कानन्यागार निरिनिरनि शीटनेचनीनार करिये, यहरि ज्ञानभाना नियमापन सो अभीषण ज्ञानोपयोग कहिये, यहरि मंमाग दुगनिने मयतान सो संवेग काहिए, बटुरि आपके या परके अर्थ देना सो त्याग बहरि नाही लिया है. वार्य जाने देम पुरपके मार्गी अपिग्द कार क्लेश करणा सो नप है, यहरि जमै भाडागारमें अग्नि उठो सने हार शमन करिए तैमें अनेक तशील करि महिन मुनिनके ममूर के दाम कहूते विन उटने मत ताका उपशम करि ताकी स्थिरता करिये। साधुसमाधि कहिए, बहुरि गुणवानकै दुःम आए मर्ने निर्दोषति करि दुःख दूर करणा मो यात्य कहिए, वहरि अरस्तनिविय तर आचार्यनिवि तथा बद्दश्रुतनिविय तथा प्रवचन जो जिनवाणी ताति भावकी शुद्धतासहित जो अनुराग सो अद्भक्ति आचार्यभक्ति बहुत भक्ति प्रवचनभक्ति कहिये, बहुरि मामायिकादि छह आवश्यक क्रिया निका यथाकाल करणा सो आवश्यकापरिहाणि कहिए, बहुरि ज्ञान तर जिनपूजाकी विधि इनकरि धर्मका प्रकाशना सो मार्गप्रभावना कहिर, बहुरि वच्छावि गौकी ज्यों साधी वि जो प्रीति सो प्रवचनवासन आसवके कारण जानना ॥ ५१ ॥ नीचर्गोत्रं स्वप्रशंसान्यनिंद कुर्वाणोऽसत्सद्गुणोच्छादने । प्रामोत्यंगी प्रार्थनीयं महिष्ट- रुञ्चोत्रं मंच सद्वैपरीत्ये ।। ५२ ॥ अर्थ-आपकी प्रशंसा वा अन्यकी निंदा अर आपके न होते गुण प्रगट करणा अर दूसरेके होते गुण ढांकना इनकौं करता संत -
मोगरा परिर।
गोप गोत्रयो गरि लिनरे विपरीतना होगमते पडे
पुरनियापन पाग्य र गोगशीही पा॥५२॥
दान लाभो पीपमोगोपभोगा
नो लभ्यते प्राणिना विममाजा।
पिशपत्य विपीतेन किलो
नो कर्तव्यः पंडिनेन विधाऽपि ॥५३ ।।
अर्थ-विजो अंतगय ताफा फरने गाला जो जीव टाकर दान
राम भोग उपभोग या न पाइए ऐसा जानि सिने भयभीत पहि-
राजनफरि मनापनकापर्ने सि पटना योग्य नाही।
भावार्थ-परफे दानादिकमें विन करनेते अतरायका आस्त्रय
होय? ॥ ५३॥
राकोऊ कर ये मानायरणादिको नियमरूप कारण फहे से
सवही फर्मनके आग्य कारण होय। जाया जाते आगमनविय शना-
परणका बंध होता युगपत औरनका भी बंध पाहिएहै सात आसबके
नियमका अभाव आया साकौं कहिएहै-पपि पूर्वोक्त कारणनकरि
मानावग्णादिक सर्व धर्मनिफा प्रदेशादिबंधका नियम नाही सथापि
अनुभागविशेषक नियमके हेतुपने करि न्यारे न्यारे कारण कहिएहैं ऐसा
जानना।
आगे बंधतत्वका वर्णन करें,-
ये गृसंत पुद्गलाः कर्मयोग्याः
प्रोधाचादयतनैरेप पंधः।
मिध्याहृष्टिनियतत्वं कपायो
योगो शेयस्तस्य पंधस्य हेतुः ॥ ५४ ॥
के ऐसे ज्ञानावरणादिकनिका ज्ञानधातनादि श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-कोषादिक कपायनिकार सहित जीवनिकरि कर्म थे पुद्गल ग्रहण करियेहै सो यह बंधहै, बहरि ता बंधक बीजभूत का मिथ्यादर्शन, अविरत, काय, योग जानना योग्य है । भावार्थ-जैसे भूखसहित जीव मुग्वद्वार फार आहार ग्रहण तैसे मोहसहित जीव योगद्वारते कार्माण वर्गणा ग्रहण कर सौ । करा ॥ ५४॥ बंधः स मतः प्रकृतिस्थित्यनुमागप्रदेशमेदैन । पटुमिचतुःप्रकारो येन मवे प्रम्यते जीवः ।। ५५ ।। अर्थ-प्रकृति स्थिति अनुभाग प्रदेश इन भेदनिकरि सो प्रवीण पुरुषनि. च्यार प्रकार कयाहै, जिस बंध करि जीव संसार भमाइए है।॥ ५५॥ खभावः प्रकृतिः प्रोक्ता स्थितिः कालावधारणम् । अनुभागो विपाकस्तु प्रदेशोऽशप्रकल्पनम् ॥ ५६ ॥ अर्थ-स्वभाव तो प्रकृति कहीहै जैसे नियका कटुक स्वभा स्वभावहै सो तो प्रकृतिबंध जानना, बहुरि काल जो अवधारण मर्या सौ स्थिति वध है, भावार्य-तिस स्वभावका न छूटना सो स्थिति है, बहुरि विष जो रस सो अनुभागबध है, भावार्थ-तिस प्रकृतिक रसविशेषका नाम अनुभवहै जैसे अ गौ महिषी आदिके दुग्धनिके तीन मंदादि भावकरि विशेषताहै त यह मेश जे परमाणु तिनकी सख्याका कल्पना सो प्रदेशबंध है, सामरा परिच्छेद। भाषा-अन्य की अभम्पनि अनंतगुणा उमर सिद्धनके अने. सवें भाग जो समयप्रयस ताका ज्ञानावरणादिरूप यथायोग्य होनाधिक परमाना पटवारा हो जाप सो प्रदेशाध है ऐसा जानना ॥५६॥ फगेति योगात्प्रकृतिप्रदेशी पायवः स्थित्यनुभागसंज्ञो । स्थिति न पंधः पुरुते कपाये क्षीणे प्रशांते स ततोऽस्ति हेयः। ५७। अर्थ-योगते प्रकृति र प्रदेशबंधो कोहे, बहुरि स्थिति अर अनु- भागनामा पधों फपाय करें, बहुरि करापर्यो क्षय होतसत पा उपशम ोतस बंध स्थितियों न फरहे सातै सो कपाय त्यागना । योग्यह। भावार्थ-फायपिना केपट योगनते बंध होयह सो एक साता- वेदनीयका स्थितिबंधहै सो अनतर समयमें रिपर जायह सो ससारका कारण नाही, यहुरि फरायसहितके पंध होयह सो स्थिति अनुभाग सहित रोयह सो संसारका कारण है। साल फराय स्यागना योग्यह ऐसा जानना ॥ ५७॥ 'स्वीकरोति स कपायमानसो मुंचने च विकषायमानसः । • फर्म जंतुरिति सूचितो विधिधमोक्षविपयो विपनैः ॥५८॥ मर्थ-कायसहितह मन जाका ऐसा पुरुष है सो कर्मी अंगी- । कार फर, बहुरि फायरहित मन जाफा ऐसा जीवहै सो पर्मयों स्यागे है ऐसे धमोक्षकी विधि निरहित जे सर्वहदेव तिनकार कहाँहै। भावार्ध-गगभावते तो यह अर चौतराग भावते मोक्षहै ऐसा सर्वज्ञका उपदेशह तात राग स्यागि वीतराग होना योग्य? ॥ ५८॥ ऐसे पधतत्यका वर्णन किया; आगे संवरतवका वर्णन कोहैं:- आसवस्य निरोधो यः संपरः स निगपते । भाषद्रम्पविकल्पेन द्विविधः कृतसंवरैः ॥ ५९॥ . ।
७० मोह इनिका जो रोकना ताहि भाव संवर कहे हैं, बहरि आगामी की निका निष्पनीन गुमि, भर मार्गले नछटनेक अपि तथा लि. श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ~-करया है संघर जिननैं ऐसे मुनीश्वरनिकार आना रोकना सो संवर द्रव्य भावके भेदकार दोयप्रकार कहिएहै |॥ ५९॥ क्रोधलोमभयमोहरोधनं मावसंवरमुशंति देहिनाम् । माविकल्मपनिवेशरोधनं द्रव्यसंवरमपास्तकल्मपाकी अर्थ नाश कियेहैं पाप जिन. ऐसे आचार्य है ते फोघटोम मा प्रवेशका रोकना ताहि दव्यसंबर की हैं। भावार्थ-गगादिभाव गेकना सो द्रव्यमवर कहिए ऐसा जानन अर ताके निमित्त करि यद् जे कर्मपदल तिनका रोकना सो द्रव्यमान फहिए । ऐसा जानना ।। ६० ।। धार्मिकः समितो गुप्तो विनिर्जितपरीपहः । अनुप्रेक्षापरः कर्म संशृणोनि ससंयमः॥६१॥ अर्थ-धर्ममहिन आ ममितिमहित अर गुमिसहित अर* हैं पापड़ जाने, प्रेमा यहरि अनुशामें नपा अर सयमसहित दे जा सो कर्मको मनोक। भावार्थ-कापायनिक अभावाप उत्तमशमादिदा धर्म अर प्रमा रक्षित प्रनिम्प पर ममिनि आमने प्रकार अनयचन कापरे ग. पाच महने योग्य शुगदि माईग पर्गपह, वहरि मभावका करा चितवनम्प अनि यादि दानपेक्षा, वहरि प्राणीनिको हिमा मिनिक विपर इनि, न्याय मानायिका पंचाकार मेयर मात्र मा वि इनिरि गादि भाग्य उदा॥ ६॥ -
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थी अमितगतिश्रावकाचार । भावार्थ- सविपाक निर्जरा तो अपनी स्थिति पूरी करि समयमर मात्र कर्म सनहीके सिंह तात साधारणहै अर ताके उदयते जीव राग द्वेप होयहै ताकरि आगामी कर्मबंध होयहै । अर जो सम्यग्दर्शन: दिकके प्रयोग करि विना सिनि पूरी भए ही अनेक समयबद्ध काल खिरै सो अविपाकनिर्जरा है, इहां जाव रागादिकके अभा आगामी कर्म न बंधेहै तातें मोक्षहीकी करनेवाली है ऐसा जानना ॥६॥ वितप्यमानस्तपसा शरीरी पुराकृतानामुपयाति शुद्धिम् । न मायमानः कनकोपलः कि सप्तार्चिपा शुद्धयवि कश्मलेभ्यः ।। ६६ ।। अर्थ-सप की तमायमान जीबई मा पूर्वकृत फर्मनकी शुद्धि ताको प्रान होयहै, जैमें अग्नि करि धम्या भया सुवर्णका पाषाण मो मसनित कहा शुद्ध न होय ! होय हीहै ॥६६॥ पातिकम विनिहत्य केवलं स्वीकरोति भुवनावमामकम् । पतनः माललोरुमम्मत ध्यांतराशिमिर मास्कगे दिनम् ।। ६७ ॥ अर्थ-चेतन आमा सो घानिकर्मनियों नाशकार सोकका एक मर ममान लीक करि माया ऐगा जो मेवटज्ञान, सादिया को, मैं कार के समूहको नाराकरि सूर्य दिनको अंगीकार निमूलका मनिप्य करमपं प्रयानि मिनिस्मनिरः।
तीसरा परिच्छेद। विनिर्मलध्यानसमृद्धपावके निवेश्य दग्ध्वासिलबंधकारणम् ॥ ६८॥ अर्ध-विशेषकरि निर्मल ध्यान जो शुभयान सो ही भया वृद्धिको प्राप्त अनि, तावियें प्रवेश कराय समस्त पंधके कारणनिकों जलायकरि फरीह फर्मका निर्जरा जाने ऐसा जो आत्मा सो फन्माप ज्यो समस्त कर्म ताहि निर्मूल जैसे होयतैसे उखाडकरि मोक्ष अवस्थाको प्राप्त होयह ॥ ६८॥ निसर्गतो गच्छति लोकमस्तकं फर्मक्षयानन्तरमेव चेतनः। धर्मास्तिकायेन समीरितोऽनघं समीरणेनेव रजथयः क्षणात् ॥ ६९ ॥ अर्थ-यमक्षयके अनंतरही धर्मास्तिकाय करि प्रेरथा आत्मा क्षण- मात्रमें निर्मल होय टोकके मस्तक परि गमन करहै, जैसे पवन फरि उडाया रजका समूह उपरकों जाय तैसें । भावार्थ-आत्माका उगमनस्वभावह, फर्म नष्ट भये निजस्वभाव प्रगटहै ता करि धर्मास्तिफायके सहायतै लोकके शिखर ताई धर्मास्ति- काय है तहाँ साई जाय निष्टेह साके प्रभावत न जाय । इहा धर्मा- स्तिकाय कर प्रेरणा गमनका सहकारीपना ही जानना जाते धर्मद्रव्य किछु जचरीसी न चलावहै स्वयमेव घटतेनको सहकारी कारण है ऐसा जानना ।। ६९॥ निरस्तदेहो गुरुदुःसपीडितां विलोकमानो निसिलां जगत्वपीम् । स माविन तिष्ठति कालमुज्ज्वलो निराकुलानंतसुखान्धिमध्यगः।। ७०॥ ।
७१ श्री अमितगनियावसाचार। --- -m अर्यf-स्याग किया मगर जाने देशा मो मिदामा मादुर करि पीडित जो जगतकी प्रगी काहिये तीन लोक ताहि किलोकता संता आगामी काल ति है, कैमा है मो आमा, द्रव्य भाषक रहित उरञ्चलहै अर निगकुल अनंत मुगसमकं भव्य प्रान है ॥ ७० ॥ यदस्ति माख्यं भुवनत्रये पर मुरेन्द्रनागेंद्रनरेंद्रमोगिनाम् । अनंतमागोऽपि न तन्निगाने निरेनमः मिदिमुगस्य मुरिमिः ॥ ७१ ॥ अर्थ-तीन लोकवि मुरेंद्र नागेंद्र रेंट अर अन्य जे विषयभो- गसहित हैं तिनका जो उत्तर मुपदै सो मुग्व कर्मरहित जो सिद्धात्मा ताके मुक्तिमुखके अनंत भाग भी आचार्यनिकर नहीं कहियेहै । भावार्थ--तीन लोकके भोगनिका मुख एकटा करिये सो सिद्ध- मुखके अनंत भाग नाही ऐसा जानना, भागनिका मुख आकुल- तामयहै अर सिद्धमुखहै सो निराकुलहै तातै इन मुखनिकी एकजाति नाही, परंतु निराकुल मुख तौ संसारकी दृष्टिमें आवे नाही अर ताके सिद्धपद उत्कृष्ट बताया जाइए ताते उपचारतै भौगनका मुख सिद्धनका- मुखते अनंतनैं भागभी नाहीं ऐसा जानना ।। ७१ ॥ ऐसे मोक्षतत्वका वर्णन किया । इहा प्रयोजन ऐसा कि चैतन्य- लक्षण आपकौं जानि चेतनारहित ममस्त देहादि परद्रव्यनिमें अहंकार ममकार त्यागना योग्यहै, अर रागादिक आस्त्रवहैं तिनतें दुःख अवस्था- स्वरूप बंध होयह सो तिनकौं अहित जानि जैसे आस्रव बंधन होय तैसे प्रवर्त्तना योग्यहै, अर वैराग्यभावरूप संबाहै तापूर्वक कर्मनका एक्देश नाश होना सो निर्जरा है इनको हितरूप जानि सवर निर्ज- राके कारणनिमें प्रवृत्ति करना योग्यहै, अर सकल कर्मनिते रहित भोपmire मादाय मी आमाका परमरितह सास भय mein 7 फरमा पाही सस सपना प्रपोजनामा निधन धना ॥ इम पदापीः कविता महर्पिमि. पंचायगत निवेगिनाः इति । शिनिमन मन्दावि विनन्दने जिनोपदेशा इस पापहारिणी ।। ७२ ।। अर्प-नफरि कर पाने पक्षापोग्य स्यविष प्रमप विप सीनिमा पारकी नेवारी रवि-प्रतीतिको विस्ता- ११ ने जिने सपोशन विस्तार नगे। भावार्थ-वाप्रदान सम्पदर्शनको शुद्धिता इन मन्यनिक विशेष जाने अधिक अधिक पह मा जानना ।। ७२ ॥ मागे सम्पाम निःसमितादि भष्ट अंगनिफा वर्णन करेहैं;- विरागिणा मर्यपदार्थवेदिना जिनेशिनते कथिता न पनि यः। करोति का न कदापि मानसे निःशंकितोसी गदितो महामनाः ॥ ७३ ॥ मर्थ-वानराग पर सर्वपदार्थनिफा हाता जिनेंद्रदेवता फरि ये मई पदार्थ कहे तेपानाही ! ऐसी शकाकों जो कदाचित् मनसि नहीं कर सो यह महामुनि ( महामना ) निकित कहा है। भावार्थ-जिनश्यनमें वा आग्मस्वरूपमें मैदे मोना सो निः- कित अगह ऐसा जानना ।। ७३ ॥ विधीयमानाः शमशीलसंयमाः श्रियं ममेमे वितरंतु चिंतिताम् ।
७८
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
करोति संघे बहुधोपसर्ग-
रुपद्रुते धर्मधियाऽनपेक्षः।
चतुर्विधे च्यातिमुज्ज्वला यो
वात्सल्यकारी स मतः सुदृष्टिः॥ ७९ ॥
अर्थ--मुनि आर्पिका धायक श्राविका ऐसे प्यार प्रकार संघकों
बहुत प्रकार उपसर्गकरि पीडित भए संते जो वांछारहित धर्मबुद्धि फरि
निर्मल वैयावृत्याचार फरहै सो सम्पादृष्टी यात्सल्य फरणेवाला फयाहै।
भावार्थ-जिनधर्मानविय या आत्मस्वरूपवि अति प्रीति करणा
सो यात्सल्य अंग जानना ॥ ७९ ॥
निरस्तदोपे जिननाथशासने
प्रभावना यो विदधाति शक्तितः ।
तपोदयाज्ञानमहोत्सवादिमिः
प्रभावकोऽसी गदितः गुदर्शनः ॥ ८॥
अर्थपूरि भयेहै गगादिक दोष जाके ऐसा जो जिननायका
शामन ताधि जो गतिमा तप दया मान महोत्सय इस्पारिफनि
करि ममापनाको काहे उद्यान रहे मी यदु सम्यादी प्रभागना फर•
नैरास काह। मर्य जीप माने कि जिनमत धन्यहै तामे ऐसे तपप.
ग्णादि पाइप है, पंगणादिक कार जिनमतका टपोत फरणा
मया निययनै आमा, नियों आभूषित करणा सो प्रमायना भग
जानना ॥ ८॥
गुगरमीमिः शुमष्टिकटिका
दधानि पर्दा हदि योऽयमिः सदा।
कंगनि भ्याः गमला गपदो
परिवेटा सुमगा पाय॥ ८१ ॥
MINA सामरा परिपत्। अर्थ-को पुष इन निवितादि अगुण कहिए सूननि फरि यी सम्पEिE माताको दयविष सदा बार है सो समस्त संपदा- नौ या अभः पचननिया पोरनेवाला मुंदर पुरष यांछित पनिने या पोस। भावार्थ- माग परे मुंदर पुरए भरे वचननिका बोलनेवाला खानिकों पशि कह समे निहाकिनादि सूननि करि पंधी सम्पटि- रूप माला पहरनेवाला जीय सादिसंपदाको पशि करहै ऐमा जानना ॥८॥ गुदर्शनं यस्य स ना मुभाजनः गुदर्शन यस्य म मिद्विभाजनः । गुदर्शनं यस्य म धीविभूपितः गुदर्शनं यस्य स शीलभूपितः ॥८२ ॥ अर्थ-जा मन्यादर्शन है सो पुरष भला पात्र है, अर जाके मम्पग्दर्शन है सो सिद्धिका भजनेवाह, अर जाके सम्यग्दर्शन है सो शीलपारि भूपिन है ॥ ८२॥ नो जायते पायने जानते गम्यत्वन प्राणिनो वर्जितस्य । शर्माधारे कोपराज्ये न हो नूनं कापि न्यापहीनस्य राज्ञः ॥८३॥ अर्थ-जैसे मुराके आधार जे भंडार अर राज्य से न्यायरहित राजाकै निधपकरि पहुं भी न देखिए सैसे सम्यक्त्व करि वर्जित जीवर्य पवित्र ज्ञान अर चारित्र न होय । भायार्थ–राम्यात्व पिना शान चारित सम्यरुपनेकौं न पारे ताते सम्यक्त्व सपनिमें प्रधान है ऐसा जानना ॥ ८३ ॥ E ८० श्री अमितगतिधारकाचार । ' मुदर्शनेनेह बिना तपस्या- मिच्छंति ये सिद्धिकरी विमूढाः । कांक्षति चीजेन विनापि मन्ये कृषि समृद्धां फलशालिनी ते ।। ८४॥ अर्थ-जो लोग इहां सम्यग्दर्शनबिना सिद्धि करनेवाली तपस्याएं यांछे हैं सौ मैं मायूँ हूं कि ते पुरुष वीजविना फल करि शोभित वृद्धिको प्राप्त ऐसी खेतीक् चाहै हैं। भावार्थ-सम्यरुदनविना अनशनादिनिया राका विना शून्यात्, शून्यही है ताते सम्यग्दर्शनसहित क्रिया करणी योग्यहै ।। ८१ ॥ लोकालोकविलोकिनीमकलिलां गीर्वाणवार्चितां दत्ते केवलसंपदं शमवतामानीय या लीलया । सम्यग्दृष्टिरपास्तदोपनियहा यस्यास्ति सा निश्चला, तेन प्रापि न किं मुखं घुधजनरभ्यर्थ्यमानं चिरम्।।८५) अर्थ--नाश भये हैं शंकादिक दोपनिके सम्ह जाके ऐसी निर्दोर निश्चल सम्यादृष्टी जाकै है ता पुरुष करि पंडित जननि करि बहुत काल साई प्रार्थना किया गया ऐसा जो मुख सो कहा न पाया ! अपि तु पायाही, कसी है सम्पादृष्टी जो खोटामात्र फरि मुनिराजनिकी केवल ज्ञानकी जो मैपदा ताहि ल्याप फरि देय है, कसी है विज्ञान संपदा लोकाठोका देखनेवाली भर पापमल रहित अर देवनिके सम्: हनि करि प्राजित सी हैं। भावार्थ-सम्याच भए केवटजानकी प्रानिशीमही दोष है ऐसा बनाया है।॥ ८५॥ मम्यक्योममममोमिनगतिईने प्रनं यखिया मुक्या मोगपरंपरामनुपमा गछत्यमा नितिम् ।
. 1 + तीसरा परिच्छेद। ८१ सर्वापापनिदूपिणीमपमलां चिंतामणि सेवते यः पुण्याभरणार्चितः स लभते पूर्तान का संपदम्।८६॥ अर्थ-सम्परत्व है उत्तम आभूपण जाकै अर अमितगति कहिए न जानी जाय है महिमा जाकी ऐसा जो जीय मन पचन काम करि मतको धारण करहै सो उपमारहित भोगनिकी परंपराको भोग परि मोक्षों प्राप्त होय है, जो पुण्य आभरण करि अर्चित पुण्योदयसहित पुरुष सर्व दरिदका नाश करनेवाली चिंतामगिफी सेवे? सो पौन पवित्र संपदाको न पविहै ! पविहींहै ।। ८६ ॥ ऐसे सम्यग्दर्शन विषय सप्ततत्व सम्यारो अंगका l साई निरूपण किपा - -. । छप्पय। . पीतराग सर्वज्ञ फहे जीयादि तत्व इम फरि प्रतीति यमु अंगसहित अनि होय अचल निम। पह फारण प्यवहार कार्य आतम रसिसीजे पट द्रव्यनित भिम नियति गम्यक रम पीजे ।। इस विना विफल अवगम चरण उकाविना विदी यथा । ता सहित सार सुख भोग फिर होय अमितगति सर्वधा ।। . इत्युपाराकागारे हतीयः परिमोदः। ऐसे ममितिभागात भावि तृतीय परिटरसमस भरा। बन.-1 अथ चतुर्थः परिच्छेदः । । माग अन्यमतिनके एकानपक्षमा निगकरण करि जावादिका वर्णन हेतुवादसहित करेंगे। नहां हेतुके स्वरूप जानने प्रथम प्रमागका वर्णन संक्षेपमात्र करिएहै। तहां आप वा अर्व अर्थ कहिए अंनि- श्चित पदार्थ इनिका निश्चयम्यम्प जो सम्यक् बान सो प्रमागहै, सो प्रत्यक्ष परोक्षके भेदकार दोय प्रकार है। सामान्य विशेषनि सहित वस्तुका स्पष्ट जानना तो प्रत्यक्षका लक्षणहै, अर सामान्य विशेषसहित वस्तुओं अस्पष्ट व्यवधानसहित जानना परोक्षका लक्षणहै। तहां सांत्र्य- वहारिक प्रत्यक्ष अर पारमाधिक प्रत्यक्ष ऐसे प्रत्यक्ष दोय प्रकार है, तहां इंद्रिय मनसैं उत्पन्न भए तीनसै छत्तीस भेदरूप मतिज्ञान साव्य- वहारिक प्रत्यक्ष जाते इनिमें दोय प्रकार विशदता पाइएहै, अर पर. मार्यप्रत्यक्ष अवधि, मनः पर्यय देशप्रत्यक्ष जाते इनमें एकदेश विदा- दता पाइएहै अर केवलज्ञान सकल प्रत्यक्षहै जाते सर्वको विशद जानहै। बहुरि परोक्षप्रमाणके भेद पांचंह स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान, आगम । सहा पूर्व अनुभवमें आया वस्तुका स्मरण यदि आवना सो स्मृति है; अर दोनित एकपना अर सापना आदि कोऊ रूपज्ञान होना सो प्रत्यभिज्ञानहै; यहरि साध्य साधनकी व्याप्ति जो अविनाभाव ताको जान सो तर्क है; वारे साधन साध्यपदार्थका ज्ञानहाना सो अनुमानहै, ताके भेद स्वार्थानुमान, परार्थानुमान; तहाँ साधनते साध्यकों आपही निश्चयकरि जानै सो स्वार्थानुमान है, बहुरि परक उपदेशते निश्चयकार जाने सो परार्यानुमानहै । ताक पांच अवय- ।
पतुर्थ परिषद
"
च; प्रनिश हैदर निमन."
सामना आश्रय दोरा र २. ननदी न
वाहि हा बाप्पा मा. "
है। पर साध्या आश्रय : २ . स . . . . पर्ने
अग्निानार मानि जाप.........का सचनको
हेतु प.ए, पर प. ........) . . गातार
सत पहिलाका बचना ::.५" पाप: ... कधयी
करि विपरीत पनिक १ . , .
पक्षको समान यार ६.४ मो इन... पा नियम
करि करना निगमन । नया Emein - २१ २२ । अनितान्
है यह सो प्रतिगई
जान पर कामपान
नाही गो अभिमान नाही मने नियम. निरंक तिरे,
ऐमा पचन यह उदाहर पीर की पनाही मचान पर
उपनयर वीर ताने या अहम य निमन । नेपाल प्रपो-
गका परीनुमानह मो अन्यपन fur 3र गुपनके अधिप्रतिज्ञा
पर हेतु पेसे दोय अश्यपस्यम्प हैं । वरि आम जो मत ताके
बचनने
परनुका
निमय करना मो आमप्रमाणहै। मैं प्रमाणकी
संख्या कही । यहरि प्रमाणका विषय सामान्य विशेषम्वरूप पदार्थहै ।
परि वीतरागता वा म्हणल्याग बुधि वा अपने विषयमें अज्ञानका
नाश यदु फयचित् अभिन्न कचित् भिन्न प्रमाणफलहै ।
ऐमें प्रमाणका संप सरप करा, विशेष आक्षेप समाधान खडन
मंडनादि प्रमाणनिर्णय परीक्षामुसादि प्रथनितें जानना, यहां हेतु आदि
आगे तिनिको यथार्थ जान देना।
आगे चार्वाफ मत पाउ अपना पक्ष सापैहै-
-
Pun भी अभिगधाकागार। निति नान्यामा परलोजगमोपाः । गनाभागागे नाना पाने कमः॥१॥ लियो पालोकोशिनामा पोतिनः। पमाोपालोक मर्मकिपा पा ॥ २ ॥ arriferा ये गति र्षियः । " पार्ग मे दिति पदामि ॥ ३॥ HTTको गोरी जनः ।। anfrary Trः ॥४॥ ना. मति: कापाया जागि " (in mat गुणाः ॥ ५ ॥ arthiilam.गो नापने TIRTI friement: नागामि ॥ ५ ॥ २.infarmiगा। म मावागानिमः || || 1 2 . ३ at . te , .
चतुर्थ परिच्छेद। इस खोकके सुखकी छोडि अन्य लोकविर्षे युमि फरणी योग्य नाही जाते पंडित हैं ते प्रत्यक्षको छोडकरि अप्रत्यक्ष नि बुद्धि न फरहे ॥५॥ जैसे पीटी जत गुड इत्यादिकतै प्रगटपने मदशक्ति उपजे नेमे पृथ्वी जल अमि पवन इनित चतन्य जीव उपजैहै ॥ ६ ॥ जन्मके अर मरणके पहले अर पी. जीव सदा नहींहै, जाते विचारते भए जीवको सर्वथा अनुपपति है ॥ ७ ॥ नास्निफ यह है कि जैसे चून गुड आदित मदशक्ति उपजेह तसे पृथ्वी आदितै चेतना उपजैहै । अनादिनिधन जीव नाही ताका पर- सोक नाही तात पापकी का छोडि यथेट विषयनिमे प्रवत्ती। ऐमी स्वछंद प्रवृत्ति पोरी । अर आचार्य साके वचनका बडन फोहै, परात्मचरिणां नैवमास्निकानां कदाचन । जायते यचनं तथ्य विचारानुपपत्तितः ॥८॥ अर्थ-पर परके या आपके बैरी जे नानिक तिनफा किया जो यह वचन सो कदाचित् सोचा न होपह, जाते विचारविय अनुपपत्ति है ॥८॥ भावार्थ- कक्षा नास्तिकपर वचन विचार किये घटा भावें। आगे जोषका अम्तिय साह,- विधते सर्वथा जीरः संवेदनगोचरः। सर्वेषां प्राणिनां तत्र पाथकानुपपशितः ॥९॥ अर्थ-संदन गोचर कहिए जानन गरे ऐसा ही सो सपा विधमान, जाते तहां सर्मा जीनियों प्रभाग अनुपपनि । -
स
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
केचिदंति नास्त्यात्मा परलोकगमोद्यतः।
तस्याभावे विचारोऽयं तत्वानां घटते कुतः ॥ १॥
विद्यते परलोकोऽपि नामावे परलोकिनः ।
अमावे परलोकस्य धर्माधर्मक्रिया वृथा ॥२॥
इह लोकसुखं हित्वा ये तपस्यंति दुर्धियः ।
हित्वा हस्तगतं ग्रास ते लिहंति पदोगुंलिम् ॥ ३॥
विहाय कलिलां शंकां यथेष्टं चेष्टतां जनः ॥
चेतनस्य हि नष्टस्य विद्यते न पुनर्भवः ॥ ४ ॥
नान्यलोके मतिः कार्या मुक्त्वा शम्भैहलौकिकम् ।
दृष्टं विहाय नादृष्टे कुर्वते धिपणां युधाः॥५॥
पृथिव्यंभोमिवातेभ्यो जायते यंत्रवाहकः ।
पिष्टोदकगुडादिभ्यो मदशक्तिरिव स्फुटम् ॥ ६॥
जन्मपंचत्ययोरस्ति पूर्वापरयोरियम् ।
सदा विचार्यमाणस्य सर्वथानुपपत्तितः ॥७॥
अर्थ-कोई कहहै परलोकका आगम जो जाना ताविर्षे र
ऐसा जो आत्मा सो नाहीहै, अर ता आत्माके अभाव होतसत
कपा जो तत्वनिका विचार सो काहेते वने ॥१॥
यहरि परलोकवाले आत्माके अभाव होतसत परलोकभी ना
भर परलोकके अभाव होतसत धर्म अधर्मकी क्रिया वृथा है ॥२
अब इस लोकके मुम्पको न्याग करि जे दुर्युद्धी तपस्या कर
हस्तमै आए प्रासको छोटि अंगुलीको चाटेंहै ।। ३ ॥
ताने पापकी दोका छोडकरि मनुष्य ते जैसे होय तरों
करी, नष्ट भया जो चेतन साका फेर जन्म नाही ॥४॥
चतुर्थ परिच्छेद। इस लोकके मुखको छोडि अन्य लोकविर्यै बुद्धि करणी योग्य नाही जाते पडित है ते प्रत्यक्षकों छोडफरि अप्रत्यक्ष विर्षे बुद्धि न कहें ॥५॥ जैसे पाटी जल गुड इत्यादिकतै प्रगटपर्ने मदशक्ति उपजे है नैसैं पृथ्वी जल अग्नि पवन इनित चतन्य जीव उपजैहै ॥ ६ ॥ जन्मके अर मरणके पहले अर पीछे जीव सदा नहीं है, जाते विचारते भए जीवकी सर्वथा अनुपपत्ति है ।। ७ ॥ नास्तिक फहेहै कि जैसे नून गुड आदितै मदशक्ति उपञहै तसे पृथ्वी आदितै चेतना उपजैहै । अनादिनिधन जीव नाहीं ताका पर- लोक नाही तात पापकी शंका छोडि यथेष्ट विषयनिमें प्रवत्तौं । ऐसी स्वच्छद प्रवृति पोपी । अब आचार्य ताके वचनका यडन करहैं,- परात्मचरिणां नैतमास्तिकानां कदाचन । जायते वचनं तथ्यं विचारानुपपत्तिवः ॥८॥ अर्थ-यह परके वा आपके वेग जे नास्तिक तिनका पूर्व पाया जो यदु पचन सो कदाचित् साचा न होयह, जात विचारवि अनुपपत्ति है ॥ ८॥ भावार्थ--पूर्वे का नास्तिकका वचन विचार किये छूटा भासैहै । आगै जीवका अस्तित्व साह,- विद्यते सर्वथा जीवः स्वसंवेदनगोचरः । सर्वेषां प्राणिनां तत्र यायकानुपपत्तितः ॥९॥ अर्थ- स्वसंवेदनके गोचर फहिए जाननमें आये ऐसा जीयह सो सर्वथा विद्यमानहै, जाते सहा सर्व जीवनिको बाधक प्रमाणकी अनुपपत्ति है। M
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
~
मावार्थ-वसंवेदन वि कोई प्रकार वाधा नहीं आहे ।
आगें ताही अर्थों पुष्ट करैहैं,-
शक्यते न निराकत्तुं केनाप्यात्मा कथंचन ।
स्वसंवेदनवेद्यत्वात्सुखदुःखमिव स्फुटम् ॥ १० ॥
अर्थ-कोड करि भी आत्माह सो निराकरण करने कोई प्रकार
समर्थ न हूजिये है, जात आत्माकौं स्वमवेदनकरि प्रगट जाननेकों
योग्यपनाह, मुपदुःखको ज्यों।
भावार्थ-जैसे मुखदुःस आपकरि जानने में आयेह तमें आपभी
आपकरि जाननेमें आयह सातै अभावरूप नाही ॥१०॥
आगे ताही अर्थको पुष्ट करहे,-
अहं दुःखी मुखी नाहमित्येपः प्रत्ययः स्फुटम् ।
प्राणिनो जायतेश्यक्षो नियांधो नात्मना विना ॥११॥
अर्थ-मैं मुग्णाई में दु.पीई ऐमी यह जीवानिय प्रगट बाधा.
रहित प्रत्यक्ष प्रतान है सो आमा मिना न होय ॥११॥
आगे जैसे आप अगर आमाह से परशरीरमें पाके आमाको
मिद करें-
मवेदनतः मिदे निने यषि पेतने ।
मग पायपि मंमिदत्यनुमाननः ॥ १२ ॥
अर्थ-मदन- अपने नाम तनकी निवि होनागने परके
नगरमें अनुमानने त्यादि होय ॥ १२ ॥
अता मानको दिगो-
परस्य जायने दंपकीय समया।
गतनी पद्धिारस्य पायोलस्थितः ॥ १३॥
८७ -- M-M. चतुर्प परिच्छेद। अर्थ-परके देहविर्षे चैतन्य निश्चयतै बुद्ध होयहै, जाते युद्धि- पूर्वक व्यापारफी उपलब्धिह; मैं अपने देहविर्षे बुद्धिपूर्वक व्यापार होय तेसै, पर इयांतहै ।। १३ ।। जन्मपंचत्वयोगस्ति न पूर्वपरयोरयम् । नपा गीपुज्यते तत्र सिद्धन्वादनुमानतः ॥ १४ ॥ अर्थ-बहरि जन्ममरणके पहले अपीछे यह आत्मा नहींहै ऐसी पाणी युक्त नाही जाते सहा अनुमानतै सिद्धिपना है । भावार्य-जन्म मरणके पहले पीछे आमा सिद्धहै ।॥ १४ ॥ सोही कहेहैं,- चंतन्यमादिम नूनमन्यचंतन्यपूर्वकम् । पैतन्यत्वाद्यथा मध्यमत्यमन्यस्य कारणम् ॥ १५ ॥ अर्थ-आदिका चैतन्यहै सो निधयफरि अन्यचैतन्यपूर्वकहै, जाते चैतन्यपना जैसे अन्यका कारण मध्यका चैतन्य अर अंतका चैतन्यह तेसैं । भावार्थ-जीयकी मनुष्यादि नवीन पर्याय उपजैहै सो जीवद्रव्य अगली पर्याप छोडकरि नवीन धारण करहै सर्वथा असत् न उपजैहै, जा चेतनपना है यहु हेतु; जैसे मप्यका चैतन्य या अंतका चैतन्य प्रत्यक्ष अन्य चैतन्यपूर्वकहै तेसे यह इयतह । इहाँ प्रयोजन ऐसाहै जो अगले पर्याय अपेक्षा पहला पर्याय कारण अर पले पर्याय अपेक्षा सोही कार्यरूपह, अर द्रव्यदृष्टि परि सर्व एफही वस्तुहै न्यारा नाहीं । ऐसे स्याद्वाद समझे यथार्थ ज्ञान होयहै ॥ १५ ॥ आगै इसही अर्थकों पुष्ट करहैं;- सत्रैव वासरे जातः पूर्वरेणात्मना विना । अशिक्षितः कथं पालो मुसमर्पयति स्तने ॥१६॥ - -Rana श्री अमितगतिश्रावकाचार। संताही वाटक दूध अर्थ--पूर्व आमा गिना नवीनही आत्मा होय तो निमही दिन विर्षे भयो जो बालक सो विना मिसाया स्तन मुग में लगाई। भावार्थ-~~-जो प्रथम आमा न होय आ नान ही उपन्या होर ती उपन्या कैमें चुगने लगि जायहै ताने मनु- प्यादिपर्याय नवीन उप? जीवद्रव्य ती अनादिनिधनही ऐसा निश्चय करना ॥ १६॥ भूतेभ्योऽननेभ्योज्यं चेतनो जायते कथम् । विभिन्नजातितः कायं जायमानं न दृश्यते ॥ १७ ॥ अर्थ---अचेतन जे पृथ्वी आदि भून तिनते चेतन कैसे उपजैहै, जाते भिन्न जातित कार्य उपग्या न देखिएहै। भावार्थ-जैसे माटीते स्वजातीय घटती उपजैहै परंतु विजातीय जो पट सो उपन्या न देखिएहै तैमैं अचेतन पृथ्वी आदितै अचेतन शरीरादितौ उपजै परंतु चैतन जीव कैसे उपजे तार्ने जीवौं भूत जनित कहना मिय्याहै ॥ १७॥ आमैं दोय पक्ष पूछकरि जीव भूतजनितपनकों निगकरण प्रत्येकं युगपदभ्यो भूतेभ्यो जायते भवी । विकल्प प्रथमे तस्य तावचं केन वार्यते ॥ १८॥ चिकल्पे सद्वितीयेऽपि कथमेकस्वभावकः । भिन्नस्वभावकरेभिर्जन्यते यद चेतनः ।।१९।। अर्थ-आचार्य पूठे हैं जीवहै सो पृथ्वी आदि भूतनित प्रत्येक न्यारे न्यारे उपजैहै कि युगपत् एकटाही उपजैहै; सो न्यारा न्यारा उपजैहै ऐसा प्रथम विकल्प कहेगा तो तिस जायके तावन्मात्रपना फोन कर निगारिएहै।
" entiatemarthi wring | Am .ciomamten urre kumriti irani nail at in. Prathmir ?" । HTRAait: KHERA (MHI... 4th Manam amana- पानापने कापि भनी न पियो । मिपानी गानि.कादाना नोपादिभ्योऽपि दर्शनात॥२०॥ SANTrth aafan नि तना feixit Ent, wifAR गुमा भादि लिया RE- मामा-नयो : मिन तनक रपमा फिर in या जातिमिले भी दी म्यारे आति Twitt२०॥ मानाचा प..- पना मुना मायादीनां पिलोपयते। एका पाइलिपी जातिभिपताप्नः सुतम्ननी ॥ २१ ॥ -मन काफि मुतापलादिक अर जन्दादिक इनिकी भिन्न मानिसको भयुनाद, जाने मुताफर अर जर इत्यादिफनिकी एका पुरानी जाति देशि मकारणले तिनत भिन्नता काहेको । गदसनः श्री अमिनगनियायकाचार। मावार्थ- मुक्ताफल जगदिक इत्यादिकनिकी एक जाति, वाटे पुग़लते पुन्टकाही पर्याय भया किड जीती न उपन्या तात तेरा दृष्ट विषम है ऐमा जानना ॥ २१ ॥ यतः पिष्टोदकादिभ्यो मदशक्तिरचैतमा । संभूताऽचेतनेभ्योनो दृष्टांतस्ते न चेतने ॥ २२ ॥ अर्थ-~जानें अचेतन चून गुड आदितै अचेतन ही मदशकि प्रगट होयह ताने तेग यह दृष्टांत घेतन वि नहीं लगि सकै ॥२२॥ न शरीरात्मनोगक्यं वक्तव्यं तत्ववेदिभिः शरीरे तदवस्थेऽपि जीवस्यानुपलब्धितः ॥ २३ ॥ अर्थ-तत्वको जाननेवार पुस्पनिकरि शरीर आत्माकू एक कहना योग्य नाही, जाते शरीरकों तहां अवस्थित होते भी वाकी अनुपलब्धिहै अप्राप्तिहे। भावार्थ-जीव परलोका जायहै तब शरीर इहां रहि जायह अर जीव न देखिएहै तातै शरीर जीव एक नाही ऐसा निश्चय करना ॥ २३ ॥ आगें विज्ञानाद्वैतका निषेध करहै;- ज्ञानं विहाय नात्मास्ति नेदं वचनमंचितम् । ज्ञानस्य क्षणिकत्वेन स्मरणानुपपत्तितः ॥ २४ ॥ अर्थ-ज्ञान विना और आत्मा नाही ऐसा कहना सत्यार्थ नाही, जाते ज्ञान के क्षणिकपने करि स्मरणकी अनुपपत्तिहै । भावार्थ-पर्यायका एकांत पकडि करि विज्ञानाद्वैतवादी हैं;- निरंश अर क्षणिक एक ज्ञानहीहै या सिवाय और आत्मस्तु नाही ताकौं आचार्यने कपा जो ऐसाद तो " पूर्व मैंने जान्याथा सो अब पार्षद Tott हंगा कांगा, साले अनर्मका गापगए नादिनि मापाने माग मानना योग्य ॥ २४ ॥ मानव नि नामा मगनो पाप्यानरम्पपरिचारिभिः । शरीरयतिरेण पनामा स्यने न हि ॥ २५ ॥ w-m मा माफ रिचारने का पुणनि कार गम्यापी भामा याना दौर नाही का कारण करि यर आमा भगत न्यारा नरी भावार्थ-मापी आमा गानो मी मिथ्या, जान शरीरके पाहिर आमा न दोगह ॥ २५॥ आगे दोय पक्ष फरि निय क;- भरग्नो पहिम्नम्य किसान विद्यते न था। विघने पेन्पायं नय कृत्यान्यं नु पुध्यते ॥ २६ ॥ यदि नाम्नि पुनम्नम्प तर मनावगम्यते । लक्षणेन विना लक्ष्यं न पापि व्यवतिष्ठते ।। २७ ।। अर्थ-शरथे माहिर निम आरमाका शान कि नाहींह, जो सागर पाहिम शानह तो सा फरने योग्य न करने योग्य क्यान जानिए है ॥ २६ ॥ अर जो शारीरके याहिर झान नहीं है ती सहा शरीरके याहिर निस आन्मापी सना फारसे यहिप जाने लक्षण विना एश्य भी न नि। भावार्थ-ज्ञान लक्षणहै आत्मा एक्ष्प सो जहाँ लक्षण नाही art लश्यमी नाही, सातै सर्वव्यापी आरमा करना मिथ्यहि ॥ २७॥ -
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-बडीर सबीनका एकही आत्माहै ऐसे कहना युक्त नाही,
जातै जन्म मरण मुख दुःख इनि न्यारे न्यारेनिका उपलंभहै ।
मर्वेपामेक एवात्मा युज्यते नेति जल्पितम् ।
जन्ममृत्युसुखादीनां भिन्नानामुपलब्धितः ॥२८॥
अर्थ-बटुरिसबनिका एकही आत्माहै ऐसे कहना युक्त नाही,
जातै जन्म मरण मुख दुःख इनि न्यारे न्यारेनिका उपलभहै ।
भावार्थ-
F~~-जन्म मरण मुख दुःख इत्यादि सबनिकै न्यारे न्यारे
देखिएहै तातें सबनिका एक आत्मा कहना मिथ्याहै ॥ २८ ॥
न वक्तव्योऽणुमायोज्यं सवर्येनानुभूयते ।
अभीएकामिनीस्पर्शे सांगीणः मुखोदयः ॥ २९ ॥
अर्थ-बहरि यह आत्मा अणुमात्रहै ऐसा कहना योग्य नाही, जा
कारण करि वाछित स्त्रीके स्वर्श विर्षे मर्यागते उपन्या सुखका उदय
सनिकरि अनुभव कीजिण्है ।
भावार्थ-स्त्रीक स्पर्शविर्षे मुखका उपजना सर्व अंगविर्षे प्रत्यक्ष
देखिएहै ताते अणुमात्र आत्मा कहनाई सो मिथ्याहै ॥ २०॥
समीरणस्वभावोऽयं सुंदरा नेति भारती ।
मुखज्ञानादयो भावाः संनि नाचेतने यतः
अर्थ-बहरि यह कहहै, जो यह सींग मुस होनाहै सो पवनका
स्वभावहे तार आचार्य का हैं ऐसी वाणी मुदर नहीं, जारौं मुग्प ज्ञान
इत्यादि चतन भाव ने अचेतन पवनविय नाहींहैं ॥ ३०॥
न मानविकलो वाच्यः मर्वयारमा मनीषिभिः ।
क्रियाणां नानजन्यानो तामाप्रसंगतः ॥ ३१ ॥
--ANN पता ritrrifierrernmenाप 1 दिसानिया या Part-tason विचारा भार Pritam nा Arnsr frerit तारित " प्रधानतामा जानी न पापी मानहालिभिः । अन्यशानन मन्यो नानी पापि फ्लिोरपने ॥ ३२ ॥ - पाप मामलेगा तनि करि परना वोर मी गार कमान पर और पानी पर्मी न ॥३२॥ परिकार- नशुदः गया जीग पंधाभाषप्रसंगतः । नदिएसम्य मुनाम्प पनं फर्मरंधनम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-पास नाही जाय अभावमा प्रमंग है, शुभ मुन जर कर्मन ना दे। भा-राधा जी मी पेशा अभार रही, पुष्प पापलप पकानप: गादिक भाव कान होय। सात गरपापिस पाना मिनी ॥ ३३ ॥ प्रधानेन मने धर्म मोक्षमागीन पेवनः । परेण विहिन भोग दतिमागी कुत्तः परः ॥ ३४॥ अर्थ-मालियर है धर्म प्रधान है भामाता शुभ अफर्ता- th a आचार्य पाह-प्रगरि धर्मयों करते सते तन मोक्ष- श्री अमितगतिधारकावार। गामी न होय ना औरकरि भोग किए संते और तृप्ति भजनेगम में होय।। भागार्थ-जैसे भोग और भोगे आ मुखी और होय ऐसी बन नाही समें प्रधान तो धर्मको अर चेतनकी मोक्ष होय ऐसी व. नाही ॥३॥ प्रधानं यदि कर्माणि विधने मुंगते यदि । किमान्माऽनर्थकः माग्यः कल्पने मम कथ्यताम् ॥३५॥ अ -को प्रगान कर्मनिकी काहे. अर त्यागहै, वे मौज प्रान कोयो, नो माग्यमानि गरि निःप्रयोजन आमा क्यों फापरहे। मो मोर करिए ॥ ३५॥ नानमारतो मोशम्नम्य जानूपपद्यते। भाग्यमानमायणन प्याधिः कापि नत्यति ॥ ३६ ।। मीनी कायम की भया जो कागो मो. भान AIR नाग नागर को पाप की है-- Pानमा म किन माग गयी औषति गी। का मानना र आगाण Monitी, आ पं.१४ जानना मागमा का भागात पारे भाव -- गाना T 111 Hinाना ॥१६॥ in मनोन:- नागना प्राण प्रान। मनमा रिजानोगतः ॥२७॥ , चतुर्थ परिच्छेद । अर्थ--अचेतन प्रधान झान नाही प्रवत्र्त है, जातै स्तंभ घट इत्यादि अचेतन पदार्थहै ते ज्ञानसहित कहूंभी न देरो ॥ ३७ ।। फेर फहे हैं;- उक्त्वा स्वयमकर्तारं भोक्तारं घेतनं पुनः । भापमाणस्य सांख्यस्य न ज्ञान विद्यते स्फुटम् ॥ ३८ ॥ अर्थ-आपही अचेतनको अकर्ता फहकरि यहुरि चेतनको भोक्ता- कहता जो सांत्य साईं शान प्रगट नाहींहै, अज्ञानी है । भावार्थ-साख्य आ.माझं आपही अकर्ता कहे बहुरि ताहीक भोक्ता यता सो यह प्रगट अज्ञानहै ताते अन्य परै अन्य भौगै यह • पात असंभवहै ॥ ३८॥ आगे सर्वगुणरहित होय सो मोक्षहे ऐसे अमानक निध- । सकलन गुणमुक्तः सर्वथात्मोपपद्यते । न जातु दृश्यते वस्तु शमशृंगमिवागुणम् ॥ ३९ ॥ अर्थ-समस्त गुणनिकरि रहित सर्वथा आ मा न होयह जाने शशाफे शृंगयी ज्यो निर्गुण यस्तु कदापि न देखिए है। भावार्थ-गुणका समूहही गुणहि अर सर्वथा गुणका अभार होते गुणीका भी अभावह साने गुणरहित मोक्ष फहना मिथ्या है ॥ ३९ ॥ आगै शानका अर ज्ञानीका सर्वथा भेद मानहै ताका निषेध करैहै,- न मानतानिनोभेंदः सर्वथा पटने स्फुटम् । संधाभारतो नित्यं मेरकैलाशयोरिव ॥४०॥ अर्थ-सबको अभारतें सर्वथा मुमेर अर पारासरी व्यों प्रगट- पर्ने ज्ञान और हानीका सर्वथा भेद बने । भाषा-1 मेर अर फंगस भवरूप तिनका सेधका अभाव है 10 ज्ञानका अर दानीका भरमाने संबंका अभाव आ॥१० - ६ श्री अमितगतिधारकाचार। बहुरि यहैं, जो समरायफरि संच होय? ताका निषेध को, ममरायेन संबंधः क्रियमाणो न युज्यते । नित्यम्य च्याधिनम्नस्य मर्यवाप्यविशेषतः ॥४१॥ अर्थ-ममगायकोर कम्या भया संबंध नाही युक्त होप है, जो नि अर व्यापक जो ममाय सामा सर्वर औशेष है। मा-गारिक ममम पदार्थको निय अर व्यापफ माने माको आगार्य है:- जो ममापी आमा भर ज्ञानका ग होय? तो पापी भो. शानका मेयेर ग्यों न भया ! रामपारसी निर अर याक भगा भदरित मानेर आ घरमा ममार मनमानी नियमापफ. समसार कहना न बनेगा साने समय 411 मानना farmik ॥१॥ प्रो , मग निमसानियाना या अभियाना नियता नित्यता नाप मांथान प्राप्यते। अमानिनः मतांप्रमाणीया।। ५२ ।। ५. Remi म पनी या अनि गाना wani ..) UP है। विका शिगनापतिः । नाममा मतदान || ४३ ॥
चतुर्थ परिच्छेद ।
अर्थ-नियह सो कार्यको न रह जाते नित्यकै अवस्था जो
विकारविशेष ताकी अनुपपत्तिह, बहुरि अनित्य सर्वथा विनाशरूप सो
भी कार्यको न है जैसे मृत वैध नीरोगपर्नेकौं न करे तैसें, जो
आपही नसि गया सो कार्य फेसै फरें, ताते नित्य वा अनित्य टोउ
एकांत मिथ्या है ॥ १३ ॥
आगै अमूर्तीकपर्नेको एकांतको निषेध यरहै;-
नामृर्चः सर्वथा युक्तः कर्मबंधप्रसंगतः ।
नमसो न घमूर्तस कर्मलेपो विलोक्यते ॥ ४४ ॥
अर्थ--सर्वथा आत्मा अमूर्तीक फहना युक्त नाही, जानै फर्मरधका
प्रसंग आवहै । बहुरि अमूर्तीक आकाशकै फर्मनिका लेप न है
विलोकिएहै।
भावार्थ-आकाशयत् सर्वया संसारी जोर मुक्त होयती जैसे
आकाशक कर्मलेप नाही तैसे आमाके भी कर्मबंध न ठहरे तात
सर्वथा अमर्त मानना भिप्याह ॥ ४४ ।।
स पतो पंधतो मियो मिनो लक्षणतः पुनः।
अमूर्तता ततस्तम्य सर्वथा नोपपद्यते ॥ ४५ ॥
अर्थ-जाते सा आमा फ्धत कवित् अभिन्न है बहिर भग
फरि भिन्न है ताते तिस आन्मांक सर्वथा अमूर्तपना नाही सिद्ध होयहै ।
भावार्थ-वैधका लक्षण जस्ताहै आमाका क्षण चतरह से
लक्षणभेद फरि आत्मा अर और भिन्न तयारि परि परि अमिन
जात पंचका निमित्त पाय आमा निया रोपटे थर आमाका निमित्त
पाप का परिणमन यह, देगा निमित्तनैमित्तिक मपिर,
सात सर्वथा संसारी जीवको अमूर्त मानना योग्य नाही ॥१५॥
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
भावार्थ-निषेधने योग्य अर न निषेधने योग्य वस्तुका आधार
इन दोउनिका जाकै ज्ञान होय सो आधारविर्षे आधेयकों न देखि
आधेयकों निषेध अभावप्रमाणकरि करैहै, जैसे कोऊ पृथ्वी अर घट
दोऊनिको जानहै सो पृथ्वीविय घटकों न देसि अभार प्रमाण कीर
घटका निषेध करै जो इहां पृथ्वीविर्षे घट नाही, सो सर्वज्ञ अतीदिपरे
ताविर्षे ऐसे अभावप्रमाणकी प्रवृत्ति नाही, ऐमे अमात्र प्रमाण करि
सर्वज्ञका निषेध करना मिथ्याहै ॥ ५१ ।।
प्रमाणाभावतस्तस्य न च युक्तं निपेधनम् ।
अनुमानप्रमाणं हि सापकं नस्स विद्यते ॥ ५२ ।।
अर्थ-यहरि प्रमाणके अभाते तिम सर्वज्ञका निषेप योग्य नाही,
जाते तिग ससिका माधनेवाय अनुमान प्रमाणहूँ ।
भावार्थ सर्वज्ञाभारयादी को यशप्रमाणका विषय सर्राष्ट्र
नाही नाले दियकी सी मान्या जाय नाही । बहुरि अनुमानका
यि नाहीं जाने सर्पक्षका टिग किनु दोगे नाही । यहरि आगमी
तारा मदार ग सांय जाने आगम है सो ती कर्मकांडहीका करान
कर सारे मर जाननेका अयोगी अा अनादि आगम सादिपुर.
पका कानेवाला यनै नारी, महरि अनिय आगम गो गाहे मो
निगमकी को भागम के मांग निभाना मागताको अनि
सर, आगमको प्रमाणना होने सही मागतोय
संदेश IIT आगमकी Enti mar
दुषण र बमलान REETITH : भाम तक
मायामा प्रसार मा ममान Armst
मर्म TREAMIRAL
-an-
पार्थ परिर
माया अभाव यो भाषार्थ यो हो कि करणा
शुन मामा अनुमान विधमान ।। ५२ ॥
मो अनुमान
पीनगाग्नि पर्वतः प्रमाणाराधितन्यतः ।
मरंदा विदितः गति मुगादिमिर धुरम् ॥ ५३ ।।
भ-नि पर जान्या देगा दोगमका जाननेया-
Pirजाने FIR अशादिनाना निमकी मुगादिकफी ज्यौ ।
भावार्थ- मुगारिक स्पर्म पदनगोपर नियोध सिरह से सर्वज्ञ
पानगर भीप्रमाणमि ॥ ५३॥
मोरा की है।
शीयते मर्यथा गगः पि कारणहानितः ।।
ज्यलनी हीयते शिपः काष्टादीनां वियोगतः ।। ५४ ।।
अर्थ-पोई आमावि कारणफी शानिने सर्वप्रकारभी राग क्षीण
होय में कादिया ये रियोगत देशरुप अनि क्षीण होयहै।
भावार्थ-जने काहादिप.पे. अभापर्ने अनि अभाव होयह सर्स
कर्ममिरे, अभारने गगका अभार होयह । अतिशायक हेतु दियाह
कि फोय किंचित् फर्मक अभावत रिछू गगादिकफा अभार देगिए है
सोकोऽयं मई पर्म अभावते मर्व रागफाभी अभार होयगा, ऐसे
निभय पियां ॥ ५ ॥
आगे मापनेका निभय करा-
प्रकर्षम्य प्रतिष्ठान शान कापि प्रपद्यते ।
परिमाणमियाकाशे तारतम्योपलब्धितः ॥ ५५॥
मी मभितिभावकामार। .. AN न सो कोई आमा जोतिको प्रति को हो जाये तो उससे भामाशी. Hो हो । जो गाम्य गोदित सीमामा भपा भी or ni moयानका सोती है HTTART A wी होगमा एक. rint arti ma TITLE Ti आकाशी, maint पmmifinाग गीगने । ri fuTI पितामः ॥ ५ ॥ rt - Hinा नाननेवाला मा माग बागमति गमानगन भगः । irreni.f॥५०॥ • १३ kitng mamta ER amami मायामा मनमा निगमोम ||५." *: - A +at १०२ श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-ज्ञानह सो कोई आत्मा विर्षे प्रकर्म जा रद्रि ताका प्रतिष्ठा- को प्राप्त होयहै जाते तारतम्यकी उपटन्धि जर्ने आकाशविर्षे परिना- णकी वृद्धिकी हद्दको प्राप्त होयह तैसें । भावार्थ-जो तारतम्य पाइएहै सो वृद्धिको सीमाकौं प्राप्त भया भी पाइए नातं अनुमान किया कि ज्ञानका अग वधती वधती है तो ज्ञान अपनी वृद्धिकी हदको प्राप्त भया भी होयगा जैसे परमाणु एक प्रदेश- मात्रते वधतीह ताका उत्कृष्टपना सर्व आकाशविर्षहै, यह दृष्ट्यंत दिया है ऐसा जानना ॥ ५५॥ प्रकर्षावस्थितियंत्र विश्वश्वा म गीयते । प्रणेता विश्वतत्त्वानां कपिताशेपकल्मपः ।। ५६ ॥ अर्थ-~बहुरि जाविप ज्ञानके वधनी अवस्थिति है हद्दहै सो विश्वं- दर्शी कहिये कैसाहे सो समस्त तत्वनिका जाननेवालाहै अर नाश कियेहै समस्त रागादिक जान ऐसाहै ।। ५६ ॥ योध्यमप्रतिबंधस्य बुध्यमानस्य न श्रमः। वोधस्य दहतो दह्यं पायकस्येव विद्यते ॥ ५७ ॥ अर्थ-जैसे दहने योग्य जो काष्टादिक ताहि दहता जो अग्नि ताकै श्रम नाहीं है तैसे शेयको जानता जो आवरणरहित ज्ञान ताकै श्रम नाही है ।। ५७ ॥ अनुपदेशसंवादि लाभालाभादिवेदनम् । समस्तज्ञमृतेऽज्यस्य मिलिंगे शोभते कथम् ॥ ५८ ॥ अर्थ-अंतरिक्ष दूरवर्ती पदार्थ अर लाभ अलाभ इत्यादिक का बानना सर्वज्ञविना आरकै उपदेशविर्षे कैसे सोहै, न सोहहै ॥ ५८ ॥ आगै वादी कहहै अपरिपेयवेदते सर्वका उपदेशहै । ताका निषेध १०४ श्री अमितगतिधायकाचार। अर्थ-तीन लोकवि व्यापक जे अक्षर, ते व्यंजक जे प्रगट कर- नेवाले वायु तिनकरि प्रगट करिएहै ऐसी बानी यथार्थकहनेवाली नाही, जाते सर्व अक्षरनिकी व्यक्तिका प्रसंग आयेहै । भावार्थ-त्रिलोकव्यापक जे मर्व वर्ण तिनकी अभिव्यजक वायु प्रगट करहै तो जब वायु प्रगटै तब सर्वही अक्षर मुनिवेमें आए चाहि- ए सो वन नाहीं, ताते तू कहैहै मो मिथ्याहै ।। ६३ ।। एकत्र भाविनः केचित् व्यज्यंते नापर कथम् । नदीपन्यज्यमानानां घटादीनामयं क्रमः ॥ ६३ ।। अर्थ-बहुरि एक ठिकाने वर्तते में वर्ण ते कई प्रगट करिएहै आर प्रगट क्यों न करिएहै, जातें दीपक करि प्रगट होते जे घटादिक तिनकै यह क्रम नाहीहै। भावार्थ-दापक है सो एकस्थानवी घट पट आदि सर्वहींकों प्रकासहै, ऐसा नाहीं जो घटकों प्रकासै पटकौं न प्रकासै तैसें वायु अक्षरनिको प्रकासहै तो सर्वही कौं प्रकास, इहा तो कोई अक्षर मुनि- एहै कोई न मुनिएहै । तातै वायु अक्षरनिकौं प्रकासहै ऐसा कहना बनै नाही ॥ ६३ ॥ फेर कहहै,- व्यंजकव्यतिरेकेण निधीयंते घटादयः । स्पशममृतिमिर्जातु न वर्णाच कथंचन ॥ ६४ ॥ अर्थ-घटादि पदार्थ हैं ते स्पर्शादिकनि करि व्यजक बिना निमय करें बहुरि वर्णहे ते कदाचिन् कोई प्रकार नाही निश्चय कीजिएहैं । भावार्थ-घटादि पदार्थ ते प्रगट करनेवाले विनाही सादि करि निधय गरिएहै, अर सर्वध्यारी वर्ण नित्य निनका निश्चय कदा- पा परिषद Imनि भी मानना निर६४॥ प्पा पानी न उन्यने पुन पम् । पर रिने पापिम मा पदयादिनः ॥६५॥ wi-t..२ पनि वा निफरि वर्ण है ने भापनिय की उस नाtr गीदवासको प्रमा- पनाको मारिदमान॥६५॥ पर- रिना मर्यादेयन पदार्थः केन फम्यने । म्पयमेवेति नी वायं मयादित्याप्रसंगतः ।। ६६ ।। भई-आधा मवि नाफा अर्थ कौनकरि फहि- से, ममेर परिगा पाना मुक्त नारी जाने भो वक्तापनाफा समग्मा आरा भावार्थ-करना या अर्थ पाना यन नाही जात सर्वज्ञ दिना औरका न प्रमाण नहीं और पो और यहि देय, अर वेद भी अर्थ का साया मोई यता न टाग, तर या अर्थ यह अर्ध नहोसी कोन को जात वेदनी नई तात घेदको स्वय- मेर अर्भकाना मिथ्या ।। ६६ ।। न पारंपर्यनो तानं गर्यशानां प्रवर्तते । ममम्नानामियांधाना मृलज्ञानं विना कृतम् ।। ६७ ।। अर्थ-यारि वह को जो असर्वज्ञनिका बान परंपरायते सत्यार्थ 1 साई आचार्य पह-जो सर्व असर्वहनिका ज्ञान परंपरा ने न माने में समान अनिका मूरज्ञान कसा विना कार्य न प्रसन मन श्री भमिनगनिमाकागार । L4. अर्थमीन लोजी प्यार पाने प्रगट कर. भवाले घायु निनी प्रगट कारमा पानी यगामगाटी नाही, जात मर्म अनिकी व्यानिका प्रमंग आ। भावार्थ-मिन्टोन्यापक जे गई वर्ण निनी अभिजिक या प्रगट करहै तो जय यागु प्रगदै तब मी र मुनिमें आर. चाहि- एमी यन नाही, नाने तू को मी मियां ॥१३॥ एकत्र भाविनः केचिन् व्यज्यने नापरे कथम् । न दीपव्यज्यमानानां घटादीनामयं क्रमः॥ ६३ ।। अर्थ-वहरि एक ठिकाने वर्तते में वर्ण ते कई प्रगट करिण्हे आर प्रगट क्यों न करिएहै, जाने दीपक करि प्रगट होते जे घटादिक तिनकै यहु क्रम नाहीहै। भावार्थ-दापक है सो एकम्यानयत्ती घट पट आदि सर्वहीको प्रकासैहै, ऐसा नाही जो घटकों प्रकास पटकों न प्रकामै तैसें वायु अक्षरनिको प्रकासहै तो सर्वही कौं प्रकास, इहा तो कोई अक्षर मुनि- एहै कोई न मुनिएहै । तातें वायु अक्षरनिकों प्रकामहै ऐसा कहना बनै नाहीं ॥१३॥ फेर कहहै,- व्यंजकन्यतिरकण निश्चीयंते घटादयः । स्पराप्रभृतिभिर्जातु न वर्णाश्च कथंचन ॥ ६४ ॥ अर्थ-घटादि पदार्थ हैं ते स्पर्शादिकनि करि व्यजक बिना निश्चय करहै बहुरि वर्णहे ते कदाचित् कोई प्रकार नाही निश्चय कीजिएहैं । भावार्थ-घटादि पदार्थहे ते प्रगट करनेवाले विनाही स्पर्शादि करि निश्चय करिएहै, अर सर्वव्यापी वर्ण नित्यहैं तिनका निश्चय कदा- ।
. चतुर्थ परिच्छेद। कोई प्रकारमा न होयह । सात सर्वम्यापक नित्य अक्षरनको मानना मिप्याई ।। ६१॥ प्पश्यते प्पंजर्वर्णा न जन्यते पुनर्भुवम् । इत्पत्र विपने काचिन प्रमा घेदवादिनः ॥६५॥ अर्थ-पंजक कहिये प्रगट पानेवाले ने वायु तिनफरि वर्ण है ते प्रगटपरिप बहरि निभय परि उपजाइए नाहीहैं ऐसी वेदवादीको प्रमा- गता कोई इहानाही विद्यमान होयह ॥ ६५ ।। मागें फेर कहेहै- विना सर्वजदेवेन दार्थः केन कथ्यते । स्वयमेवेति नो वाच्यं संवादित्वाप्रसंगतः ।। ६६ ॥ भर्प--आचार्य को सर्वशदेव विना वेदका अर्थ कौनकरि कहि- स्वयमेव फहिएहै ऐसा कहना युक्त नाही जात भले वक्तापनाका अप्रसंग थाह। भावार्थ-सर्वज्ञ विना बेदका अर्थ कहना धने नाही जाते सर्वज्ञ वेना औरका ज्ञान प्रमाण माही और को और कहि देय, अर पेद भापही अर्थ कई ती साका कोई वक्ता न टहरा, तर यह अर्थहै यह प्रर्प नहींह ऐसी फोन कह जाते वेदती जडहै सात वेदकों स्वय- पेव अर्थकहना मिथ्याहे ॥६६॥ न पारंपर्यतो ज्ञानं सर्वज्ञानां प्रपर्चते । समस्तानामियांधानां मूलज्ञानं विना कृतम् ॥ ६७॥ अर्थ-बदुरि वह कहैहै जो असर्वझनिका ज्ञान परंपरायते सत्यार्थ पवते है । ता भाचार्य क है, जो सर्व असर्वशनिका ज्ञान परंपरा पते न प्रय है, जैसे समस्त अंधेनिका भूलझान कहा विना कार्य न । प्रयते तैसें।
१०६
थी अमितगतिश्रावकाचार ।
।
भावार्थ-बहुत भी अंधे पुरुष परंपरायते चलें तो भी मूलज्ञान-
विना वाछित स्थान पात्र नाही तैसें परंपरायतें भी अल्पज्ञानीनिका
वचन प्रमाण नाहीं ॥ ६७ ।।
आण फेर कहैहै;-
कृत्रिमप्यप्यनेकेषु न कर्ता सर्यते यतः ।
कर्तृस्मरणतो वेदो युक्तो नाकृत्रिमस्ततः॥६८॥
अर्थ-वहरि वह कहेहै जो वेदको कर्ता काहूकै स्मरण नाहीं
ताते वेद अकृत्रिम है । ताकू आचार्य कहेहै;--जो ऐसा नाही जाते
अनेक करे पदार्थनिवि भी कर्ता स्मरन न कीजिए है, अथवा ताके
क के स्मरन वेद कृत्रिम युक्त है ।
भारार्थ-कोई कह वेदके कर्त्ताको याद नाही तात अकृत्रिमहै,
ताक् कयाहै जो ऐमे तो पुराने मदिर वा करे भए मोती इत्यादिकका
भी कर्ताकी याद नाही ते भी अकृत्रिम ठहरे । बहुरि वेदके तो कर्ता
भी प्रसादिक कहहै ताते भी कृत्रिमही वेद ठहरै । तात अकृत्रिम वेद
कहना मिथ्याहे ॥ ६८॥
हिंसादिवादकत्वेन न वेठो धर्मकांक्षिभिः ।
कोपदेशयन्नूनं प्रमाणीक्रियते पुधः ॥ ६९ ॥
अर्थ-चर्मके वारक पंडितनि करि हिंसादिको उपदेशपर्ने करि
जो पारपट ताके उपदेशकी ज्यों येह मो प्रमाण फरना योग्य
नाहीं ॥ ६९॥
वीतरागय मनो जिन एयायशिष्यते ।
अपरेपामपाणां रागडेपादिशटिनः ॥ ७ ॥
अर्थ-वांतगग र म ऐमा मिनेटही एक न्याग कौनिए
जाने और मनिरागपादिदीमहे ॥ ७० ॥
- गदर्य पcिeti नविगगा न मर्पज्ञा प्रविष्णमांग गग:पमदमोपलोभमाहादियोगतः ।। ७ ।। -~- विष्णु म ..." देर म मर मा : यादव ।। गगवंतान मर्या यथा पानिमानया । गगन त म न मर्यज्ञाम्नन, स्पटम ।। ७२ ।। अर्थवागतान . मी जे काटियो । - ... आशिष्टाम्नगिलटोगः कामकापभयादिमि । आयुधप्रमढापाकमंडल्यादियोगन. ।।।। अर्थ-प्रमादियो नाममय याटिक, महानि का। युक्तह, आन आयुध व आभूपण कमट' ! यानि मरिन ॥ ॥ ममदा मापने काम पमायुधसंग्रहः । अक्षम्याटिक मोहंशांचामा कमंडलुः ॥ ७४ ।। अर्थ-दीना कामों को आ आयुधका याण दुपमा जनावरे अरमाला यज्ञोपवाट्रिक मादको दिपाय है और पवित्रपनक कमल दिग्वाह भारार्थ--जी कामादिक विकार न होय | नी आदि काहेको गरी, तान दी आदि ने कामादितिकानिको ब्रह्मादिकनिमें प्रगट दिबांचा ऐमा जानना ।। ७४ ।। आगे पुश्पादतवादी करहै ताका निषेध कांहे.-- परमः पुरुषो नित्यः मर्षदोपरपाकृतः । नस्यनेञ्चयवाः सर्वे रागद्वपादिभाजिनः ॥ ७५ ॥ भभावको ।
firit पुदिनांगमाहित। पदिमागण्य य: कमां कीमोथरः ॥ ७ ॥ नगिना भूना नमनगादयः । मनार नापी गिनिया: कलमात्यः || गतान जगनः कनी पिया महंगाः। बग्न पुग्मने न विन्यमान गिणः ॥ ७ ॥ अ- मो बुद्धिमान । प्राय । नाम मा । भावार्थ-युद्धिमान निमिन पदजन लोक कामनी, जो जो कार्यहै मो मो युभिमानक निमिनले उप में पटादिक । वहरि ता लोरया जो बुद्धिमान कना मो मंचर करि ॥ ७७॥ जैसे कुम्हार बिना पिचिर घटिकन पत्र में भर बिना शरीर वृक्ष पर्वन इत्यादिपई ने निभयकारे न प ।। ७८ ॥ ताते जगतका कर्ता सर्वदर्शी महेश्वर है। अब नार आचार्य की है-- यह वचन पंडितनिकरि विवाग्या भया युक्त न होय? ॥ ७९ ॥ सोही कहेहैं;- -------- पतु परिवर कार्यत्वादिम्पर्य हेतुस्तस्प सापयते यया । इदिम सपा रुस दहपत्वमपि भूपम् ।। ८० ॥ नाशरीरी मया एमफारः पित् यतः। इलासम्तस्स रास्तो त महताम् ॥ ८१ ।। मददस्य च कर्तुत्वे मोम्सदादिरामो पक्षः । पता प्रतिपर्यंत दुमकारादिवगतः ।। ८२ ॥ सवनं क्रियते न विनोपकरणः कपम् । हन्वा निदेश्यने कुछ निरालंधे रिहायसि ॥ ८३ ॥ विचतनानि भूतानि सिमक्षावशतः कथम् । विनिर्माणाय विश्वस्य पर्सते तस्य फथ्यताम् ।। ८४ ॥ मर्थ-आचार्य को जो ऐसा पह कार्यहेतु सो ता ईश्वरके से बुद्धिमानपना साधे सेस देहवानपना भी निधपकरि साधे ।८०१ जाते कुंभकार मैंने कह शरीररहित न देल्या सात कुलाल दृष्टांत तोता ईश्वरक सदेहपर्नेकों बाहहै ॥ ८१॥ महरि देरसहित फापना होतमत हम आदि सरीसा भया जात ईश्वर कुंभकारादिको ग्यों देखने योग्य पर्नेको पाम भया ते॥८२॥ बहरि उपकरणविना ताकरि छोफ फैसे करिए, मरि फरिक नि- गर आकाशविर्ष कहाँ धरिएह ॥ ८ ॥ पटरि यह कह-जो ताकी उपनावेकी इछा होसे पृथ्वी आदि है लोककी रह, ता कहिएजो साफी उपनापको इग्छाके तते पृथ्वी भादि भूत अधेवन से लोकके पनायके आ कैसे सो कहि । सात टोयका फर्मा ईश्वर मानना मिष्याहै ।। ८५ ॥ में मौसका निषेध कर- ।
श्री अमितगतिमापकाचार।
युद्धोऽपि न समस्तनः कथ्यते तथ्यबादिमिः।
प्रमाणादिविरुद्धस्य शून्यत्वादनिवेदनान् ।। ८५ ॥
अर्थ-बहुरि तथ्यवादीनि करि बुद्ध भी सर्वज्ञ न कहिएहै, जाते
प्रमाणाढि करि विरुद्ध ऐसा शून्यपना आदि जनावहै तातें ॥८५॥
प्रमाणेनाप्रमाणेन भर्वशून्यत्तमायने ।
सर्वस्यानिश्चितं सिद्धयेत्तत्वं केन निपिध्यते ।। ८६ ।।
अर्थ-सर्वक शून्यपना साधनेमें प्रमाणकरि या अप्रमाणकार
सर्वक अनिश्चित तत्त्व सिद्ध होय निपेश कौनकरि करिए ।
भावार्थ-सर्व शून्य मानें तब प्रमाण अप्रमाण भी न ठहरे, तब
सर्वकै अनिधित ही तत्त्वमिति होय प्रमाण दिना संशयका निषेध काहे
करि करें तात मर्य शून्य मानना मिथ्याहै ॥ ८६ ॥
सर्वत्र सर्वथा तत्वे क्षणिक स्वीकृते सति ।
फलेन सह संबंधो धार्मिकस्य कुतस्तनः ॥ ८७॥
अर्थ-मई जायगा। सर्व प्रकार वन्यको क्षणिक अंगीकार करे सते
धर्मामा जीवक फटकरि महित मबंध कराते होय ।
भावार्य-मर्व प्रकार मन्त्रको क्षणिक अगीकार करे सन धर्मात्मा
जीवक फलकार संवध कहानै होय !
भावार्थ-मकार तयी शशिक माने धर्मामा जीय धर्मरा
पाल न पार जाने यहनी शाम ही पिनसि गया । यही ऐगे होते!
धर्मका मापन निरर्थक राया । ताने मईया क्षगिक मानना योग्य
नाही॥८॥
यधम्य क्यको इंतुः धगिरे सामने कयम् ।
प्रत्यमिता कलोरव्यरदारप्रवर्तनी ॥८॥
पर्प परिसर ई-परि धगिकी कार परे सने रिमफ जीवहे सो हिं- मारा कारण दम रोप परि लोक पार पापनेपाली प्रयभिदा में रोप। भावार्थ-गिक माने हिंसा परमेगा हिमफ न टाहर जाते यह तो काही पण विनसि गया, यहरि यारय था जो जवान भया; इस पर मेरा नाह मोटे देना है. सौदे इत्यादिक टोफव्यवहार घमारनेवारी प्रत्यभिटाया भी अभाप टहर, जाने यह तो वाही क्षण परहार पारया च? सात क्षणिक मानना दिननि गया निप्पा ।। ८८॥ प्पाम्याः प्रयच्छनो देहं निगध कृमिमंदिरम् ।। दादपिम्टस्य करणा पन कीदृशी ॥ ८९ ॥ अर्थ---पर दागेर एटनिका घरहे ऐसा कहके शरीरको मधेरीके मार्थ देय ऐसे दाता थर देहमें पूर्ण ऐसे के फरणा फैमीहै ! यदु बड़े पेदकी यातह ॥ ८॥ - वहरि पर है- जननी जगतः पूज्या हिंमिता येन जन्मनि । मांसोपदेशिनस्तस्य दया शाद्धोदनः कथम् ॥ ९० ॥ अर्थ-जगतके पूजने योग्य जो माता सो जाने जन्मविर्षे मारी सा मामक उपदेश करनेवाले बुद्धकै दया फैसे होप । भावार्थ-बौद्धमतमै काया फि बुद्ध मानाया उदर फाडकर निक- स्याहै अर मास भक्षणमैं दोष नाही ता आचार्य ने कहा ऐसे बुद्धके दया कारकी ॥२०॥ ऐरी युद्धका निराकरन फिया, आगें कपिल्या निराकरण. --
११२
श्री मिनगनियायकाचार ।
यो नानं प्राकृतं धर्म मापतेमा निरर्थकः ।
निर्गुणो निष्क्रियो मूडः मर्यतः कपिलः कथम् ॥११॥
अर्थ-जो ज्ञानकी प्रातिका धर्म कहै । यो नि प्रयोजन निर्गुण
क्रियाहित मूर्व कपिट सर्वज्ञ कसे होय ।
भावार्थ-कपिल डानको तो प्रकृतिका धर्म कहै। अर आमाको
निर्गुण क्रिया रहित प्रयोजनरहित अजान कहेहै. ताफ आचार्यने कदा
जो ऐमा सर्वज्ञ कपिल कैसे होय । तार्ने कपिलका मन
मिथ्याहै ॥ ९१॥
आगे और भी कुदवादिक. तिनका निषेध करहै;-
आर्यास्कंदानलादित्यसमीरणपुरःसगः ।
निगद्यंते कथं देवाः सर्वदोपपयोधयः ।। ९२ ॥
अर्थ-सर्वदोपनिके समुद्र ऐसे जे देवी म्कद कहिए स्वामिकाति-
केय अग्नि सूर्य वायु इत्यादिकहैं ते देव कैसे काहिएहै।
भावार्थ--राग द्वेषादि दोष जिनमें पाइये ऐसे कुदवनिकौं देव कैसे
कहिए ॥ ९२ ॥
आगैं फेर कहैहै;--
ग्थमश्नाति या हंति खुरशृंगैः शरीरिणः ।
सा पशुगौः कथं वंद्या वृपस्यंती खदहजम् ।। ९३ ।।
अर्थ-जी गौ भ्रष्टा खायहे अर प्राणीनिकों खुरसींगनिकरि हनहै
अर अपने पुतसैं काम सबैहै, सो ऐसी पशु अज्ञान गी कैसे वंदनेयोग्य
होय ।। ९३ ॥
चैदुग्धदानतो बंद्या महिषी किं न वंद्यते ।
विशेपो दृश्यते नास्यां महिपीती मयाधिकः ॥ ९४ ॥
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११४ श्री अमितगतिश्रावकाचार। कहैहै-जो बुद्धिमान काचकौं छोडकरि चिंतामणिरत्नको प्रहण करहै सो कहा निश्चयकरि सुखकौं न पावहै, पावैहीहै ॥ ९७ ॥ मिध्यात्वदपणमापस्य विचित्रदोष संख्ढसंसृतिवधूपरिवोपकारि । सम्यक्तरत्नममलं हृदि यो विधत्ते दुग्धंगनामितगतिस्तमुपैति सद्यः ॥ ९ ॥ अर्थ-वृद्धिकौं प्राप्त जो संसारवधू ताका परितोष करनेवाला प्रसन्न करनेवाला अर अनेक दोपास्वरूप ऐसा मिथ्यात्य रूपं दूपणकों त्यागिकरि जो पुरुष निर्मल सम्यक्तरनको हृदय विर्षे धारहै, ता पुरय प्रति अनंत ज्ञान जाकै ऐसी मुक्तिस्त्री है सो शीघ्रही प्राप्त होयहै। भावार्थ-मिथ्यावको त्यागकर जो सम्यक्त धारहै ताई मुक्तिकी प्राप्ति शीघ्र होयह ॥ ९८॥ छप्पय । पोपत विपयफपाय पक्ष एकांत चिन रसि, नास्तिकादि मत एम मकल मिथ्यास्वरूप तसि । हरिहरादि सही कुदेव रागादिचिन्हयुत, त्यागि, मजहु सर्वज्ञदेव रागादिदोपतुत ।। संमारहेतु मिथ्यात्व इम त्यागि गुदर्शन जे धरें। ते जीव अमितगति शीग्रही मागनंद शिवतिय बरं ॥ इन्युपामकाचार पतुः परिच्छेदः । इस प्रकार अमितानि मायार्यरत भारताचा चतुर्थ परिद गमात मा।
अथ पंचमः परिच्छेदः। भागे प्रतनिका वर्णन करैहै,- मधमांसमधुरात्रिभोजन " क्षीरपक्षफलवर्जन विधा। कुर्यते प्रतजिक्षया पुधा- स्तत्र पुष्यति निविते नवम् ॥१॥ अर्थ-पंडित से मंतमहणयो इग्छा फरि मदिरा मांस अर मधु भर रात्रिविर भोजन अर क्षीरवृक्ष फहिए जिनमें दूध निफसे ऐसे पर पीपर ऊमर इत्यादिकनिकै फर इनका त्याग मन वचन कायकरि करहे, जाते तिन त्यागवा सेवन करे सतें मत पुष्ट होयहै । भावार्थ-जाफै व्रतकी चारहै सो प्रथम मदिरादिकनिका त्याग अवश्य करे इनके त्यागे प्रत पुष्ट होयह ॥ १॥ आर्गे प्रथमही मदिराफा निषेध कर है,- मद्यपस्य धिपणा पलायते दुर्भगस्य पनितेव दूरतः। निघता च लभते महोदयं लेशितेव गुरुवाश्यमोचिनः ॥२॥ अर्थ-जैसे दरिदी पुरषको स्त्री भाग जाय? तेसै मदिरा पीनेवा- टेपी पुलि भाग जाय है, बहुरि निंदा वृद्धिको प्राप्त हो जायहै जैसे गुरु के पचन न माननेवालेयो दुःख वृद्धिको प्राप्त हो जाय हैं तैनें ।
११६ श्री अमितगतियावकाचार। भावार्य-मदिरा पीनेवादीकी बुद्धि बिगड़ जायहै और निंदा होय है।॥ २॥ विहलः स जननीयति नियां मानसेन जननी निधीयति । किंकरीयति निरीक्ष्य पार्थित्रं पार्थिवीयति कुधीः स किंकरम् ॥३॥ अर्थ-सो मदिगपानी मन करि विव्हल मया संता स्त्रीको माता- वत् आचरैहै अर माताओं वीवत् आचरन करे है । बहुरि सो कुवुदी राजाकौं देखकरि चाकरवत् आचरे है अर चाकरको राजावत् आचरहै । भावार्थ-मदिरापानी सर्व पदार्थनिको विपरीत देखैहै ॥ ३ ॥ सर्वतोऽप्युपहसंति मानवा वासमी व्यपहरंति तस्कराः भूत्रयंति पतितस्य मंडला विस्तृत विवरकांक्षया मुखे ॥४॥ अर्थ-बहुरि मद्यपानीकी सर्वही तरफत मनुष्य हास्य करहै आ चौर वस्त्र हरैहै, बहुरि स्वान, ते पड़के विस्ताररूप मुखत्रि छिद्रको बांछा करि मूतहै ॥ ४॥ भक्षु मूर्च्छति विमति कंपते पृत्करोति रुदति प्रर्दति । खिद्यते स्खलति वीक्षते दिशो रोदिति स्वपिति जक्षितीयेति ॥५॥ अर्थ-बहुरि मदिरापानी शाग्रही महित होय है, डरपैहै, कांपैहै, पूत्कार करहे, रोवे है, वमन करहै खेदरूप होपह, मिरप है, दिशानई देखे है, दन करहै, सोहै, जकड़ी लगिनाय है, ईप करहै । .
११७
पंचम परिसर
भाग-दिगशारे नाना पुरे रमे ॥५॥
ये भनि विविधाः शरीरिण-
मर प्रक्ष्मरपुमो गांगिकाः ।
नेखिला झटिमि योति पंचा
निंदितम्य सरकस्य पानतः ॥ ६ ॥
कार्य-निस मदिरासि सूरमा गर जिनक मे जे रसकरि
व नानाप्रशार जीत ममन्त निनाक मंदिगो पानते शीघ्र मर-
प्राप्त हो।
भावार्थ-पदिरापानीयपहिसा भी साम होपं ॥ ६ ॥
पारणी निहितचेतसोसिलाः
यांति कांतिमतिकीर्तिसंपदः ।
वेगतः परिहरंनि योपितो
वीक्ष्य कांतमपरांगनागतम् ॥ ७॥
अर्थ-जैसेह से परखी प्रति गए पतिको देख करि शीग्रही
परिही है तैमें मदिराविप टग्या चित्त जाका ऐसा जो पुरुष ताकी
समस पानि बुद्धि कीर्ति संपदा जाती रहेहै ।
भावार्थ-मदिरापानीकी कांति युद्धि कात्ति संपदा सर्व दिगदि
जापह॥७॥
गायति भ्रमति पत्तिः गद्गदं
रोति धापति विगाहते लमम् ।
इंति हप्यति पुध्यते हितं
मधमोहितमतिविपीदति ॥ ८॥
मी अमिनगतिमायकाचार। ये जिनेंद्रवचनानुमारिणो घोरजन्मसनपातमीरवः । तपतुष्टयमिदं विनिंदितं जीवितावधि विमुन्यते विधा ॥ ३७ अ- जोर समारपन पाती भयभीतह अर निनदफे वय- नके अनुभाग: विनफरि निदनांक मा मांस मधु रोगी ये चार, ते नीरनामा मनापनकायमेरे मागिरहे ॥ ३७॥ मपमांगनानीनमा भास्फामिदमद्यते महा मृद्विगगाधसंगह नधनुगतिमो विगापते ॥ ३८॥ अर्थ-जिन की आग आमनाता राग हिमाफ रोग यमाने. परे FT म मालाणी प्यार मदा गाइएहै तिनकार भतुति मगार मामा (भा)|॥३८॥ प: गुगति नियमी नियमेकमपिलोलमानमः। मोमि जन्मजलयाताने कपने शिमिह गमशिनः ॥ ३॥ *- 41 मादिकानि किन पच गं भी गम भरणका है. मी Firritam sri || Pritin निvिiaf पंचम परिद। HA यत्र राक्षसपिशाचसंचरो यत्र जंतुनिवहो न दृश्यते। यत्र मुक्तमपि वस्तु मक्ष्यते यत्र पोरतिमिरं विजृभते ॥ ४० ॥ यत्र नास्ति यतिवर्गसंगमो यत्र नास्ति गुरुदेवपूजनम् । यत्र संयमविनाशि भोजनं यत्र संमजति जीरभक्षणम् ॥४१॥ यत्र सर्वभुमकर्मवर्जन यत्र सास्ति गमनागमत्रिया। तत्र दोपनिलये दिनात्यये धर्मकर्मकुशला न भुंजते ॥४२॥ अर्थ-जा विर्य राक्षस पिशाचनिका संचार होयहै, अर जा विर्षे जीवनिका सम्ह न देखिएहै, अर जा विर्षे छोड्याभी वस्तु भक्षण करिएहै अर जा विर्षे घोर अंधकार फैलहै ॥ १०॥ अर जाविर्षे यांनके समूहया संगम नाही, अर जाविर्षे गुरु देवका पूजन नाही, अर जा विर्षे संयमका विनाश करनेवाला भोजन होयहै, अर जा विर्षे जीवनका भक्षण उपजैहै ॥ ११॥ अर जा वि स शुभकर्मका वर्जन होयहै, भर जावि गमनाग- मन क्रिया नाहीहै; ऐसा दोनिका ठिकाना दिनका अभावरूप रात्रि तावि धर्म कर्ममें प्राण पुरा से भोजन न करैहै ॥ १२ ॥ मुंजते निशि दुराशया यो गृद्धिदोपपरावर्तिनो जनाः। ममि.-१ धी ममितगतिमायकाचार। भूनराधसपिशाच शाकिनी- संगतिः कयममीभिरस्य ॥४३॥ अर्य-जे दुधचिन सोडपतारप दोके यशंभूत जन राति भोजन कर लिन करि भूत राक्षस पिशान शाकिनीसी मंगति के भा-विभोजन करेंतिनक भूतादिककी संगति पर होपी ॥१३॥ पल्मने दिननिशीथयोः गदा यो निरम्नयमसंयमकियः । गंगासरांगार्निगो मण्योपयुम्यं मनीषिभिः ॥४४॥ मी पुनर की पम पम किया जाने ऐगा रागिदिन गाय गो पह पदिशनि कर भीग दिन पशु कार. भामर्ननि दिवा मांगन यामिनी शगन मनीषिणः। मानिनामा मान प्रतिय गुमान कम् ॥ ४५ ॥ shairaula to aai agii. ", मा प्रक?, Eat art. 47. Timi सपनं मुगाना गत मंत्र।
पंचम परिच्छेद । येन रात्रिदिवयोरनारतं भुज्यते म कथितो नरोऽधमः ॥ ४६॥ अर्थ- गुणपान उत्तमपुरुष फरि सदा एकरार भोजन फरिएहे, पर मध्यम पुरुषकरि टयलदिनविय दोययार भोजन फरिये है अर जायरि दिनरात निरंतर भोजन करिए। सो मनुष्य अधम नीय माह ।। १६॥ ये विवर्य यदनायमानयो- मरस्य पटिकाइयं सदा । झुंजते जितहपीकवाजिन- स्ते भवंति भवमारवर्जिताः ॥४७॥ अर्थ-जे पुरष दिनके आदि अर अंतचिौं सदा दोय घडीक वर्ज- फरि भोजन करते में जान, प्रियम्प घोई जिगने ऐसे संसारफे भार- करि रहित होय मुक्त होय. ॥४७॥ ये विधाय गुरुदेवपूजन झुंजनेऽकि विमले निगलाः। ते विधृय ला मोहनामसं संमति सहमा महोदयाः ॥४८॥ निधन्य गुरुका परफै निर्मल दियरावि निराकुल भए संन भोजन ते शीघ्र मोह अधकारको नाशकार सहमा महान् उदयम्प यह, केवलज्ञानको पहि ॥ १८ ॥ यो विमुच्य निशि भोजनं विधा सर्वदापि विदधाति यासरे। तस्य याति जननाईमंचित भुक्तियार्जिनमपास्तरेपमः ॥ ४९ ॥ अर्थ-जे पुरुष अहन देवका पूजन धीममितगतिधायफावार। भूतराक्षसपिशार शाकिनी संगतिः कयममीभिरस्य ॥४३॥ मर्थ-जे दुरचित्त योपनारप दोरके यीभूत जन वित भोजन कहे तिन करि भूत राक्षस पिशाय शाकिनीकी संगति के भापरिभोजन करे? तिनके भूतादिफसी संगति मगर हो।। १३॥ पन्मने दिननिशीयपोः गदा यो निरस्नयम पमक्रियः। गंगागप्रशसंगार्जिनी मण्यतेपरयं मनीषिमिः ॥ ४४ ॥ मी पुगदर करीहे. यम पम निगा गान ऐगा राबिदिन- गदा ना सोपा पहिलनि करि साग रहित गा कमि. प्रामनंनि दिवा मोहन यामिनी अपने मनीषिणः। मानिनामामांग जल्पने गानय गुप जन कुतम् ।। ४५ ॥ लिन मानी गई 401, Writti 1, 4, HEAL #silk. Tt fo, रयत गुमाला महा मयत मिली
पंचम परिच्छंद ।
येन रागिदिश्योरनार
मुग्यने म कथितो नरोधमः ॥ ४६॥
अर्थ-गुणवान टनमागप करि सदा एकवार भोजन गरिएं,
अर मध्यम पुरुषकरि उभ्य दिनविय दीयबार भोजन फरिय. हार
जाकरि दिनरात निरंतर भोजन करि मी मनुष्य अवग नाच
फलाहै ॥ ४६॥
ये विवर्य यदनावमानयो-
घागरम्य पटिफादयं मदा।
झुंजते जिनपीकयाजिन-
म्ने भवंति भयभारवर्जिताः ॥ ४७ ।।
अर्थ-जे पुग्प दिन आदि र अमसिदा दोय पीक. य.
परि भोजन करने जातो. लिपगप घौदे गिनने ऐसे संसारका भार.
करि रहिम यहे. मुन, होयौ ॥ ४७ ॥
ये विधाय गुम्देयपूजन
भजन रिमले निगालाः ।
में विभय लघु मोहनामर्स
समर्वनिगमा महोदयाः ॥४८॥
अर्थ- पुल निबन्ध गुफा मत देवका पूजन कर नि:
दियाधि निराश भए त भोजन 7 मोर औरकारी
नासकार सहमा महान् उपायो, सानो पार ॥४॥
यो विमुच्य निशि भोजन प्रिया
पदापि विदयाति पामरे।
सम्म पाति जननामपि
भुकिनिमपातपणः ॥ १९ ॥
१३२ श्री अमितगतिमायकाचार। अर्थ-जो पुण्य मन वचन कायकरि सदा रात्रिवि, भोजन त्याग- करि दिनविर्षे भोजन कहै तिस पापरहित पुग्य का मुक्तिहित उप- वासरूप आधा जन्म व्यतीत होयहे ।। ५०॥ यो निवृत्तिमविधाय पल्मनं वासरेषु वितनोति मूढधीः। तस्य किंचन न विद्यते फलं मापिन न विना फलंतराम् ॥ ५० ॥ अर्थ-जो मूढबुद्धी पुरुष दिननिविर्षे निवृत्ति जो व्रत ताहि करि रात्रिवि भोजन करैहै ताकै किळू फल न होयहै, जाते जिन पितविना अतिशयकरि फल न होयहै । भावार्थ-कोऊ कहै कि दिनविर्षे भोजन न करना अर रात्रि करना यह भी व्रतहै ताळू कह्याहै कि ऐसा मार्ग नाही, जात रा भोजन विर्षे द्रव्यभावहिंसाकी विशेपता ऐसे व्रतते किछू फल नां पापही होयहै । जैसे कौऊ अन्न छोडकरि मांसभक्षण करे तैसें ऐ व्रत पापहीके अर्थ जानना ।। ५०॥ ये व्यवस्थितमहासु सर्वदा शर्वरीषु रचयंति मोजनम् । निम्नगामि सलिलं निसर्गत- स्तेनयंति शिखरेषु शाखिनाम् ॥ ५१ ॥ अर्थ जे पुरुष स्थाप्याहै दीपकादि प्रकाश जिनविय ऐसी रात्रनि विर्षे भोजनकौं रचैह ते स्वभाव नीचेको चलनेवाला जो जल ताl शिखरनिविर्षे वृक्षनको प्राप्त करहै । भावार्थ-इहां ऐसाहै कि कोऊ कह हम गत्रिवि दीपकादि की हिंसा निवारि लेइगे ताकू कयाहै रात्रि विष हिंसा अनिवार्य होयह पंप reiri मासीमन मारय नारा पतिकी और जीर भाव पात- भाit, afteनामिविया भी निमाया पारिजरका भार नारी समेत पगार यसरमा जानना ॥५१॥ प्रपंति गुग्यदापि गिना गधिभोजनमपामपेतनाः । पापकोसनभिागलितं में पदंति फलदापि फाननम् ॥ ५२ ।। अय- भान विभाजन गौवनको गुगतापक, कहीं में कि उसकार जन्या मोबन त फलदायक है , मी अपना॥२॥ ये प्रति दिनगप्रिमोगयो म्तुपता रितपुण्यपापयोः । में प्रकाशनममोः ममानना दर्शनि गुगदुःयकारिणोः ॥५३॥ अर्थ-पुण्य अर पाप जिन मे जे दिनगि भोजन पर गतिीि भोजन दोऊनको ममान की हैं, ते मुग अर दुःउके फरने बारे में प्रकाश अा अधकार दोनिको समान दिपपिह । भावार्य-निमें भोजन धर्मपर भर गयीभाजन पापम्पहै जैसे प्रकाश अर अश्कार ममान कढाच नाह।।। ५३ ।। गनिमोजनमधिययति ये धर्मपुद्धिमधिकृत्य दुधियः । ने क्षिपति पविशहिमंडल वृक्षपतिविद्धये ध्वम् ।। ५४ ॥
श्री अमितगतिश्रावकाचार।. अर्थ-जे धर्मबुद्धीकरि रात्रि भोजनका सेवन करै ते निश्वयकरि वृक्षनिकी पद्धतिकी वृद्धिके अर्थ वनाग्निके समूहकी खेपहें । भावार्थ-कोई मिथ्यादृष्टि दिनमैं व्रत कर है रात्रिविय मोजन कहै ता• कयाहै-जैसें अग्नित कोई प्रकार वृक्षनिकी वृद्धि न होय तैसैं रात्रिभोजनविर्षे कोई प्रकार धर्म नाही, अधर्म ही ऐसा जानना ।। ४५॥ ये विधृत्य सकलं दिनं क्षुधां भुंजते सुकृतकांक्षया निशि। ते विवृथ्य फलशालिनी लतां भस्मयंति फलकांक्षया पुनः ॥ ५५ ॥ अर्थ--जे जीव पुण्यकी वांछा करि सर्व दिन क्षुधाकौं धारि रात्रि- विषै भोजन करहै ते फलकरि सोभित लताकी वढाय फेर फटकी वांछाकरि भस्म करेंहैं ॥ ५५ ॥ ये सदापि घटिकाद्वयं विधा कुर्वते दिनमुखांतयोउधाः । भोजनस्य नियमं विघीयते मासि तैः स्फुटमुपोषितद्वयम् ।। ५६ ॥ अर्थ--जे पंडित पुरुष सदाही दिनके आदि अर अंतवि दोय घडी भोजनका नियम कह तिनकरि प्रगटपर्ने एक मासमै दोय उप- वास करिएह । भावार्थ-दिनविय दोय दोय मुहूर्त भोजनका त्याग भये मासमें माटि मुहूर्त्तका त्याग होते दोय उपवासका फल होयहै ॥ ५६ ॥ रोग शोककलिगटिकारिणी राक्षसीय मयदायिनी प्रिया ।
पंचम पद। + पाएका गिराकमा गगिता र निरापदाः ।। ५७ ।। दोजा पसनकर्मपरिना पमगार चिनी भीनमः । निधनयमनपायि पदा पापदानमिर नदिकम् ।। ५८ ।। संकट गतिमिरे दूसरपं नीपविणमिव गागंबुलम् । नीपजातिबुनकर्मसंगमः शीलापसमपर्मनिर्गमः ॥ ५९ ॥ प्पापयो विविधतागदापिनो दुर्जना इस परापकारिणः। मर्षदोपगणपीप्यमानता गविभाजनपरम्प जायनं ।। ६० ।। अर्थ-विभाजन लिपर जो पुरष नाफा सामग्री होय? मोकग भर दर्शक भर का आ गद इनकी फरनेवाली अर राक्षसायी या भय देने वारी बी मि., अमहापापने उपना अगसमाहित सादर देने वाली ऐसी पन्या यह पहरि दिपाह भपजिनमें से पाप फर्मविणे प्रयाण सर्पी ग्यौ पुर होय, बहुरि दारि जाने ऐमा अपादानी व्यो निर्णनपना विनाशगीत सदा होपर। भाषार्य-जैग अपारटान नितर वृद्धि पी से रात्रिभोजन निर्ध- नपना नित्य घटा ऐमा धान दियाहै। यहरि विनि करि च्याप्त नीच गुपये. रित्तयो यो मंकटरूप अंधकार सहित घर मिटेह, अर श्री अमितगतिश्रावकाचार। नीच जाति कुलकर्म इनकी संगम होयहै, अर शील निर्लोमता समभाव धर्म इनका निर्गम होयहै अमाव होयह, अर परके पुरे करनेवाले दुर्ज- नकी ज्यों अनेक दुःख देनेवाली व्याधि होयह, अर सर्व दीपनके समूहकरि पीड्यमानपना दुखीपना होयहै । ऐसें रात्रिभोजन करनेवालेकै दोपनिकी उत्पत्ति होय ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ ५९ ॥ ६० ॥ आज रात्रिभोजन त्यागनेवालेके गुण कहेहै;- पद्मपत्रनयनाः प्रियंवदाः श्रीसमः नियतमा मनोरमाः। सुंदरा दुहितरः कलालयाः पुण्यपंक्तय इवात्तविग्रहाः ॥ ६१ ॥ भ्रंशितव्यसनवृत्तयोऽमलाः पावना हिमकरा इवांगजाः। शक्रमंदिरमिवास्ततामसं मंदिरं प्रचुररत्नराजितम् ।। ६२ ।। लब्धचिंतितपदार्थमुज्ज्वलं भूरिपुण्यमिव वैभवं स्थिरम् । सर्वरोगगणमुक्तदेहता सर्वशर्मनिवहारिवामिवा ।। ६३ ।। शानदर्शनचरित्रभूतयः सर्वयाचित विधानपंडिताः। मर्वलोकपतिपूजनीयता रात्रिमुक्तिविमुखस्य जायते ॥ ६४ ॥ अर्थ-कमटक परसमान है नयन जिनके पर प्रिय यचन बोट- नेवाली माके समान रमारने वाली ऐसी स्त्री होपहै, अरपटा - पंचम परिषद विधानिक दान भरपुष्पी फिनिगमान प्रहण किया दारीर जिनने मी पर कन्या होय॥६॥ भर दरबार पानी प्रति मिनने परित्र निर्मदमा समान पुररोपी, अरफ महिममान भयरहित प्रचुररानिपरि शोभित देगा मंदिर मिटे ॥ १२॥ भर पाप बाहित पार्थ जाने मी उम्मट महायुम्पसमान स्थिर वैभर होपंह, अर मगर समाकरि रहित देोपना अर सर्व मुग. नरे समाका आधारपना ॥ ६ ॥ भर सई पाटिन बम प्रवीण ऐमी ज्ञान दर्शन चारित्र की सेपरि अर माकपनिनकरि पूज कपना ये गरिभोजनने जो विमुग्यो साकै रोय। भाग-रोन गुण गविभोजन के त्यागीफ मर्ष होयह रोमा- जानना॥६५॥ शुकरी शंवरी यानरी धीवरी रोहिणी मंडली शोफिनी हेशिनी । दुर्भगा निःसुता निर्धया निर्धना शरीभोजिनी जायते मामिनी ॥६५॥ अर्थ-विधिय भोजन करनेवाली स्त्री सो सूकरी भीटनी वानरी धीवरी गेहिणी कुत्ती गोकमहिम शसहित दुर्भग पुत्ररहित पतिरहित धनरहित ऐसी होयह ॥६५॥ पापांचिता दहजैवदिता भूपणभूपिता प्याधिमिर्जिता । श्रीमती हीमती धीमती धर्मिणी वामरे जायते भक्तितः शर्मणी ।। ६६ ।। न श्री अमितगतिप्रायशागार। अर्थ-बांधरनिफार गुरु अर पुनिकरि दिन आ आमूषणनि- करि भूषित अर रोगनिरि पनि लामीवान जापान बुद्धिवान धर्मामा ऐमी मुग्नापोह मोहिनविय भोजन- होयह । भावार्थ-जो गरिवि भोजन न्यागेह, मो पूर्वोक्त गुणमहित होयह ॥६६॥ रात्रिभोजनविमोचिनो गुणा ये भवंति भवमागिनां परे। तानपास जिननायमीयते वक्तुमत्र न परे जगत्रये ॥ ६७ ॥ अर्थ-जीवनिकै गत्रिभोजन त्यागक उत्कृष्ट गुण तिनहि तीन- लोकविर्षे जिनराज सिवाय और कोई कहनेकों ममर्थ नाहीहै ।। ६७॥ ऐसे रात्रिभोजनका निषेध किया, आर्गे पच उदबर फटनिका नि- निषेध करहै;- यत्र मूक्ष्मतनवस्तनूभृतः संभवंति विविधाः सहस्रशः । पंचधा फलमुदुंबरोद्भवं सन्न भक्षयति शुद्धमानसः ॥ ६८॥ अर्थ-जावि सूक्ष्महै शरीर जिनके ऐसे जीव नानाप्रकार हजारां उपजैहै तिस पाच प्रकार उदंवरजनित फलकों शुद्धहै मन जाया ऐसा पुष्प है सो न खायहै। भावार्थ-ऊमर कठऊमर, पाकरफल, बड, पीपर ये पांच उदंबर फलहैं ते प्रसजीवनिक उपजनेक टिकाने, तातै बुद्धिवान इनका सर्वथा । करहै ।। ६८॥
AR पंचम परिष्छ। शीरभूरुहफलानि भुंजते चित्रजीवनिचितानि येऽधमाः । जन्मसागरनिपातकारणं पातकं किमिह ते न कुर्वते ॥ ६९॥ अर्थ-जे पापीपुरुष असंख्यात जीयनिकरि भरे हुए क्षीरीक्षानिके फलनिको रसायहे से संसारमागरमै इवनेको कारण फौनसा पापकौं इहां न करें, अपितु सर्वही पाप फरहें ॥ ६९ ॥ असंख्यजीवन्यपघातत्तिमि- न धीवरैरस्ति समं समानता । अनंतजीवव्यपरोपकारिणा- मुदुंबराहारविलोलवेनसाम् ॥ ७० ॥ अर्थ-अनत जीवनके नाशकरनेवाले पच उदवरके आहारविप है लोदर चित्त जिनका तिनकी असंग्य जीवनके घातम्पहै आजीविका जिनकी ऐसे ढीमरनिकरि साथ समानता नाही है। भावार्य-उदयरके खानेवाले के दीमानने भी अधिक पापीपना यहाँ दिखाया ऐसा जानना ॥७०॥ ये सादंति प्राणिवर्ग विचित्रं दृष्ट्या पंचोदूंपराणा फलानाम् । श्वभ्रारासं यांति ते पोरदुःसं कि निशिः प्राप्यते वा न दुःखम् ।। ७१।। अर्थ-जे नानाप्रकार जीवनिक समूहगो देसकरि पंच उदेघर फाट- निको सायह से घोरदुःराम्प नरफलामको प्राम होयह, अथवा निर्दय जीवनिकरि कहा दुःरा न पाइप, सर्वही पाइरहै ॥ ७१ ॥ Ph -१४० श्री अमितगतिश्रावकाचार। RAN... Anmnment- अघप्रदायीनि विचिंत्य धर्मधी. रुदुंबराणां न फलानि वल्मते । विधातुमिष्टे सुखद प्रयोजने करोति कस्तविपरीतमुत्तमः ।। ७२ ॥ अर्थ-धर्मवुद्धी पुम्प है मो उदवरनिके फलनिकों पापके देनेवाले जानि नहीं खायहै, जाते मुखदायक कार्य करनेकी इट होतसत कौन उत्तम पुरुप है सो तान विपरीत करहै, अपि तु नाही कोहै ।। ७२॥ आदावंते स्फुटमिह गुणा निर्मला धारणीयाः पापव्यंसि व्रतमपमलं कुर्वता श्रावकीयम् । कतुं शक्यं स्थिरगुरुतरं मंदिरं गर्तपूरं नस्थयोभिदृढतरमृत निर्मितं प्रावजालैः॥७३॥ अर्थ-पापका नाश करनेवाला श्रावकसंबधी निर्मलत्रतको करता जो पुरष ता करि आदि अन विर्षे प्रगटपने इहा निर्मल गुण धारणा योग्यहै । इहा दृष्टात कहेहै-जैसे अन्यत थि जे पत्थरनके मम्ह तिनकरि हट किया जो गर्तपुर कहिप नींव नाविना स्थिर अर अतिभारी मंदिर करनेकी ममर्थ नाही तेर्स । भावार्थ-जैसे दृढमूट बिना निश्चल मंदिर न होयह तेस पंच उदयर तीन मकारक त्यागम्प मूलगुण विना निर्मल प्रत न हो? तात आदितै टगाय अनपर्यंत प्रथम मूलगुण धारणा योग्य है ।। ७३ ।। दातुं दक्षः मुग्तारिख प्रार्थनीयं जनानां चिने यामिनि गुणगणो निचललं विमणि । मुक्या मोग्ग्यं भुवनमहितं चिंनिताराप्तमोगं ने निर्वाधाममिनगतपः श्रेयमी यांनि लक्ष्मीम् Ivel पंचम परिष्द। अर्थ-जापनिको पाहिदनेको कपममान प्रयीन पंगा पा. गुणनिया ममह जिनके चिगविष निथलपगेको धांगने पुरष चितर- प्रातः, भोग जाविध देगे सोयाजित मुग्व की भागफरि अनसन जिन से भये मत निर्वाध मोक्षलामीको प्राम हराया ॥ ७४ ।। मप मांग मधु पंच उदवर फल प्रमजीवनिक आधार लाणी निशिमोजन इत्यादिफ तीम पाप त्याग दुपका । विमल मूलगुण प्रथम धरत हम मम मन गोमा पार्व मार मात भोगि मार मुरा क्रमत होय अमिनगति जगगिरदार ।। इत्युपायकापारे पंचमः परिगडेदः । रति धीमभितगतिमाचार्यश्त थापाचारविन पंचम परिरममा भपा
अथ पठः परिच्छेदः।
आगें द्वादश अणुवतका वर्णन करहैं;-
मद्यादिभ्यो पिरतत्रतानि कार्याणि शक्तितो मव्यः।
द्वादश तरसा छेत्तुं शस्त्राणि शितानि मवयम् ॥ १ ॥
अर्थ-मद्यादिकनित विरक्त जे भव्यपुण्य तिनकरि शक्ति साफ
द्वादश व्रत करणा योग्यहे । ते व्रत ससारवृक्षकों येगकरि छेदनेकौं तीक्ष्ण-
शस्त्रकी ज्यौहै ॥ १॥
अणुगुणशिक्षाद्यानि व्रतानि गृहमेधिनां निगद्यते ।
पंचत्रिचतुः संख्यासहितानि द्वादश प्रातः ॥२॥
अर्थ-पंडितनि करि श्रावकनिके अगुव्रत गुणवत शिक्षाप्रत क्रमसैं
'पांच तीन च्यार संख्या सहित द्वादश कहेहैं ।
भावार्थ-पाच अणुव्रत तीन गुणत्रत च्यार शिक्षावन ऐसे वारह
व्रत श्रावकनिके कहहैं ॥२॥
आगे अणुव्रतनिकों क हैं।
हिंसासत्यस्तैयाब्रह्मपरिग्रहनिवृत्तिरूपाणि ।
नेयान्यणुव्रतानि स्थूलानि भवंति पंचात्र ॥ ३ ॥
अर्थ--इहां स्थूल हिंसा झूठ चौरी अब्रह्म परिमह इनिने निवृत्तिरूप
'पांच अणुव्रत जानना योग्य है ।। ३ ॥
तहां स्थूल हिंसात्याग व्रतकों क है-
द्वेधा जीवा जैनैर्मतास सस्थावरप्रभेदेन ।
तत्र सरक्षायां तदुच्यतेऽणुवतं प्रथमम् ॥ ४ ॥
- पछः परिप्पा २४३ अर्थ-नानिने श्रम स्थायर के भेद करि दोपप्रफार जीव कह। ना मनीपनको रक्षा होतर्गत मो प्रथम अणुव्रत कहिए ॥ ५ ॥ स्थावरपाती जीपसमसंरक्षी विशुदपरिणामः । योऽक्षविपयामितःमः संपतासंयतो शेयः ॥५॥ अर्थ-ओ जीव शायरघाती' स्थायरकी हिंसा स्यागनेको आगम:, अर श्रम जीवनिका भने प्रकार रक्षासहित आ विशुद्ध? परिणाम जाके अर इंडियफे विषयनिने पित्तई सो मंपनामयत पारिए देशातका धारक थापक जानना ॥५॥ हिंमा या प्रोत्तामानारंमजत्यनोदः । गृहवामतो निवृत्ती धापि प्रायते तां च ॥६॥ गृहवामसेग्नरतो मंदकपायः प्रनितारंभाः । आरंभजां म हिंसां शग्नोति न रक्षितुं नियतम् ॥ ७॥ अर्थ-पंडितनिफरि आरंभ अर अनाम्भत उपनो पने करि हिमा गो फाही. दोय प्रकार गृहवामते निवृत्त जो मुनि सो तौ दोय प्रकार हिंसाको चाहे ॥ ६ ॥ अर जो गृहयामक सेबनेमें रत प्रावफ मैदकपायस्वरूप वतीयाई आरभ जाने सो निभयकर आरभ जनित हिंसाके त्यागनेकौं समर्थ नरोप है। भावार्थ-~पदयागयरूप चारित्रमोहके उदयतें अबशपर्ने व्यापार आरभविष उपजै सो ती आरभजनित हिंसा कहिए, अर विना ही प्रयो- जन घनकार आपही तीन करायम्प हिंसा करना सो अनारंभन- मिन हिंसा काहिए सो इनि दो प्रकार हिंसानिका स्याग सो मुनीसर- निकै होय है, अर गृहस्थके शक्तिहीनपनाते निर्दोष व्यापारादि जनित श्री अमितगतिश्रावकाचार। हिंसाका त्याग न होय सके है परंतु परिणामनिविय सहिमाते महा अरुचि है, निंदा गर्दा आपकी करै है ऐमा जानना ॥ ७ ॥ शमिताद्यष्टकपायः प्रवर्तते यः परत्र सर्वत्र । निंदागाविष्टः सः संयमासंयम पत्ते ॥ ८॥ अर्थ--उपसमाए हैं आदिके अनंतानुवधी अप्रत्याख्यान रूप क्रोधादि अष्ट कपाय जानें अर सर्व ठिकाने निंदा गहरे युक्त जो प्रवर्त है सो संयमासयम जो देशव्रत ताहि धारै है ॥ ८॥ कामास्यामायामत्सरपशून्यदन्यमदहीनः । धीरः प्रसन्नचित्ताः प्रियंवदो वत्सलः कुशलः ॥९॥ हेयादेयपटिष्टो गुरुचरणाराधनोद्यतमनीपः । जिनवचनतोयधौतवांतकलंको मवविमीरुः ॥१०॥ सम्यक्तरत्नभूपो मंदीकृतमकलविषयकृतगृद्धिः। एकादशगुणवर्ती निगद्यते श्रावकः परमः ॥ ११ ॥ अर्थ-विषयनिकी वाछा अदेखसका भार मायाचार मत्सरता चुग- लीखाना दीनपना जात्यादिमद इनकरि रहित होय अर प्रसन्नचित्त होय अर प्रियवचन कहनेवाला होय धीर होय प्रीतियुक्त अर प्रवीण होय ॥९॥ वहीर त्यागने योग्य ग्रहण करने योग्य वि. पडित होय अर गुरु- चरणानके आराधने विर्षे उद्यमरूपयुद्धियुक्त होय, अर जिनवचनरूपज. लकरि धोया है मनका कटक जानें ऐसा होय, अर संसारतें मयभीत होय ॥१०॥ बहुरि सम्यक्तरूप रत्नके आभूषण करि सहित होय, अर मंद करी है समस्त विषयनि करि लोलुपता जानें ऐसा होय, पहा परिष्छे। पर पास गुण जे ग्यारह प्रतिमा तिनगि प्रवर्तने पाला रोप सो परम भारफ काहिए ॥११॥ सरंभसमारंमारंभोगानकारितानुमतः । सकपायरभ्यस्तम्तरमा संपद्यते हिंमा ॥ १२ ॥ पिपित्रिचतुःसंग्व्यः सरमायः परम्परं गुणितः । अष्टोत्तरशतभेदा हिंमा संपधने नियतम् ॥ १३ ॥ अर्थ-रंभ समारंभ आरंभ अर मन पचनकाय अर कृत पारित अनुमोदना अर मोध मान माया रोभसहित गुणे भए निफरि चेगकार हिमा उपजेहे ॥१३॥ संरभादिक तीन अर योग तीन अर कृत फारिस अनुमन ये सीन अर फसाय प्यार इन परस्पर गुणो भएनि परि एकमी आट भेदम्प हिंसा निक्ष्य ते उपजैहै । भाषाध-सरंभ फाहिए हिमा फरनेका प्रदानपिचार अर समारंभ फरिये हिमाके टपकरण मियवना अर आरंभ कहिए जीवनिका मारना ये सीनों मन वचन काय फरि गुणे भए नव भए; तिनकौं कृत कारित अनुमोदना करि गुणे सत्ताईस भए तिनकौं मोधादि प्यार फायनित गुणे एफसी आट भए । इनमें एकरी आठ भगनिकी पटटन कैसे होय है सो पाहिए है प्रथम सरंभ मन करि करया प्रोधसहित ऐसा प्रथम भंग भया, बहुरि समारंभ मन करि फरया शोध सहित ऐसा दूसग भंग भया, यहुरि समारभ मन फरि फया मोधसहित ऐसा तामरा भंग भया, ऐमें प्रथमभंद ममात भए योगरूप दूसरा भेद पलटै जैसें मन काया तहाँ पचन कहना, पारि ताकू भी पूर्ण होतें सीसरा भेद पलटै, जैसे कृत कहा था तहां पारित कहना ता भी पूर्ण होते चौथा भेद पलटे जैसे शोध फाह्या तहां मान फहना । जैसे भंग पलट- नेते एकनी आठ भेद हिमाफ होयऐसा जानना ॥ १३ ॥ भमि.-. MAN ।
मी ममिनगनिमायागार। जीपत्राणेन विना ग्रतानि कर्माणि नो निगम्यनि । गंद्रेण विना न हन्यने निमिरजातानि ॥ १४ ॥ अर्ग-जीनिकी दया मिना मनी से कर्मनिका नाग नही करे है जैसे चढमा विना नानि करि अंगकारमा मह नही हनिरहे भावार्थ-मय बनने जीवदया प्रधान ऐसा जानना ॥ १४ ॥ तिष्ठंति पतनियमा नाहिमामंतरेण मुम्बजनकाः । पृथिवीं न विना दृष्टाम्निष्टनः पर्वताः शापि ॥ १५ ॥ अर्थ-मुसके उपजायने हार त अर नियमहे ते टया विना नाही ति है, जैमें पृथ्वी विना निष्टने पर्यन कडूमी न देसे तैने । भावार्थ-सब बत नियमनिका आधार दयाहै ऐमा जानना ॥१५॥ निमानेनाहिमामात्माधारां निपात्यते नरके। खाधारां न हि शाखां छिंदानः के पतति भूमी ॥१६॥ अर्थ-आत्माका आधारम्प जो अहिंसा दया ताहि विनासता जो पुरुष ता करि आत्मा नरकवि पटकिरहै, इहां दृष्टांत कहिएहै अपने अधाररूप जाय वैट्या ऐसी जो शाखा डाली ताहि छेदता संता पुरुषहै सो पृथ्वीवि कहा नाही पंडहै, पटैहीहै ॥ १६ ॥ समतो विरताविरतः स्वल्पकपायो विवेकपरमनिधिः । रक्षति यत्रसदशकं प्राणिहितं स्थावरचतुष्कम् ॥ १७ ॥ अर्थ-जो इंद्रिय त्रीद्रिय चनुरिंद्रिय पंचेंदियसैनी असैनी इनके पर्याप्त अपर्याप्त भेदकरि दा भेद भए यह जो उस दशक ताकी रक्षा फरैहै, अर एकेंद्रिय वादर सूक्ष्म ताके पर्याप्त अपर्याप्त भेद करि च्यार भेद ऐसा स्थावर चतुष्क ताका हित वांछ है अवशते तिनको हिंसा
पछ परिच्छेद।
१४७
a.
होपह तो भी अनुमोदना नाही करहै, मैदहै फाप जाकै भर विवेक
या परमनिधान सो विरतापिरत धारक पासहि ॥१७॥
सर्यविनाशी जीरसमहननं त्याज्यते यतो जनः ।
स्थावरहननानुमतिस्ततः कृता नैः कथं भवति ॥ १८ ॥
अर्थ-याने जीवह सो सरका हिंसकहै तात जैनानिफरि प्रसाहि-
साफा त्याग फरिएहे तिनकरि स्थावरका हिंसाविर्षे अनुमोदना कैसे
करिए।
भावार्थ-गोड यह पायक प्रसहिंसाका त्यागकै ऐसे उपदेशमैं
स्थाररहिमाम अनुमोदना आई नारे फलाहै जीर सहीका हिंसक
ताकै सर्व हिंमा एटसी न जानि असहिंसा छुडाइए है किछु स्थावरफी
हिमा करनेका उपदेदा नाही तात स्थावरहिंसान अनुमोदना नाहीं ऐसा
जानना ।। १८॥
विविधा द्विविधन मवा विरतिहिंसादितो गृहस्थानां ।
विविधा विविधन मता गृहचारकतो नितानाम्॥१९॥
अर्थ-गृहस्थनिक हिंसादिफानित रिति कहिए त्यागभाव सो दोप
प्रकारसहित तीन प्रकारहै बहुरि गृह यागीनिकै तीनप्रकार सहित तीन-
प्रकार है।
भायार्थ–फर नाही करावे नाही मनवचन काय करि ऐसे छह
प्रकार त्यागह अनुमोदनासहित नको त्याग नाही जाते हिंसादिकमें
अनुमोदनफा प्रसग बन रहा है, ऐसा गृहस्थनिकै जानना । बरि जे
गृहाचारके त्यागी, तिनकै कृत कारित अनुमोदनासहित मनाचन का-
यफरि नरकोहीका त्यागहै, ऐसा जानना ॥ १९॥
जीववपुपोरभेदो येषामेकांतिको मतः शाखे।
कायविनाशे तेषां जीवविनाशः कथं वापः॥२०॥
श्री अमितगतिधायकाचार। अर्थ-जिनके शास्त्रविर्षे जीवका अर शरीरका एकांतिकरूप अभेद कयाहै तिनके शरीरके विनाश होतसतै जीवका विनाश कैंसें न भया ॥ २० ॥ आत्मशरीरविमेदं वदंति ये सर्वथा गतविवेकाः । कायवधे हंत कयं तेषां संजायते हिंसा ॥ २१ ॥ अर्थ—जो विवेकरहित आत्माका अर शरीरका सर्वथा भेद कहैहैं तिनके शरीरके वध होतसते हिंसा कैसे होय यह बडे आश्चर्यकी वातहै। इहां भावार्थ ऐसाहै;--जो पहिले श्लोकरें तो सर्वथा जीवकै अर शरी- र अमेद माने तिनके शरीर विनाश होते अवश्य जीवका नाश आया तर स्वयमेव हिंसा आई, अर जे सर्वथा जीयको अर शरीरकों भेद मानहे तिनके शरीरके नागमैं हिंसा न ठहरी तर तेभी स्वछंद होने हिंसकही भपे । तातै दोऊ ही एकांती है ते हिंसकहें, ऐसा जानना ॥२१॥ मिनामिनस पुनः पीडा संपद्यतेतरां पोरा । देहपियोगे यसातस्मादनिवारिता हिंसा ।। २२ ॥ अर्थ-जाते देहत कोईप्रकार भिन्न कोई प्रकार अभिन्न ऐसा जो जीव ताक शरीरका वियोग होनसने अतिशय फार धोर पीटा उपजह ताने अनिवरित हिंमा होयहै । भावार्य-सक्षम भेदकार जीव शरीर भिन्न है तथापि धाष्टि करि अनेदह ताने जीरके शारीरफ वियोग करने में अवश्य सा हो है देमा जानना ॥२२॥ तत्पर्यायपिनाये दासोपगिः परथ संलगः । यःमा हिंसा मदियितव्या प्रयत्नेन ॥ २३ ॥ How र परिच्छेद। १४९ - -सिम पर्यापके रिनास होतसत दुःपकी उत्पीत होय है भर जो मासंदाही मोसा सेतनि फरि पानसहित पर्जनकरना योग्य ॥ २३ ॥ - प्राणी प्रमादकलिनः प्राणव्यपरोपणं यदा धत्ते । मा विमा कधि दर्भिवपक्षनिपेकजलधारा ॥ २४ ॥ अर्थ-जो प्राणी प्रमाः परि म्यान भया सना शरीरादि प्राण- निका व्यपगेपणा पर घात कहे सो पडितनि करि हिंसा कही है, फैमोरिया समार पृश्के सचिनेको जलधाराममानहै । भावार्थ-पारायसहित आपके या परके प्राणनिका नाशकरणा सो माका लक्षण कमाई ॥२५॥ प्रियतां मा मृत जीवः प्रमादरकुलस्य निविता हिंसा । प्राणप्यपगेपेऽपि प्रमादहीनस्य मा नास्ति ॥ २५ ॥ अर्थ-जीव मरो चाह. न भगे सीप्रमादसहित जीव निधयबप हिमाह, यरि प्राणनिका नाश ने भी प्रमादरहित के सो हिंसा नाही। भारार्थ-हिमाका मूलकारण प्रमाद है ताके होते बाब प्राणन्यप- रोपण होने या न होने हिसा अवश्य होयह, अर ता गिना अप्रमत्त मुनिराज अवश्य प्राणव्यपरोपण होने भी हिंमा नाही कहीहै ॥२५॥ यो नित्योपरिणामी तस्य न जीवस्य जायते हिंसा। न हि शरयने निरंतु फेनापि कदाचनाकाशम् ॥ २६ ॥ अर्थ-जो नित्य परिणामरहित कूटश्य है ताके जीयको हिंसा न होयह, जाते, को करि कदाचित् आकाश हनिवे. . ।
१५०
श्री अमिनगनिमायकाचार ।
भावार्थ-जो मर्वथा निन्य कुटम्य यामाकी मानेह नाके हिमाका
जानना न होय तर ताका त्यागी न होयह ताने निन्यानका एकांत
मिथ्या दिखाया ।। २६ ।।
क्षणिको यो व्ययमानः क्रियमाणा तस निष्फला हिमा।
चलमानाः परमानो न चाल्यमानः फलं कुरुले ।। २७॥
अर्थ-~जो क्षणिक नाटा होता मता जीव ताकी करी भई, हिंमा
निष्फलहै जैमें चालना जो पयन मा चलना मना फलकी न करहै
भावार्थ-जे जीवौं क्षणिक मानेह निनक क्षण क्षण आपहीका
नाश भया ताकी हिंमा निष्फल भई, जैसैं परन आपही चाले सौ
चलाया संता फल कहा कर ताते क्षणिक मानना भी मिथ्या ॥२७॥
यस्मानित्यानित्यः कायवियोग निपीड्यते जीवः ।
तस्माद्युक्ता हिंसा प्रसुग्कलिलबंधवृद्धिकरी ॥ २७ ॥
अर्थ-जाते कथचित् निन्य कथचिन् अनित्य स्वरूप जीवहै सो
शरीरके वियोग होतमतै पाटिएह दुखी होयहै, तातै प्रचुर पापकी बंध
करनेवाली हिंसायुक्त है।
भावार्थ-स्याहाद करि निन्य वा अनित्य स्वरूप जीव मानहे तिन-
हाँकै हिंसाका ज्ञान होयहै, तब तिनहीकै त्याग होयहै, एकातीक हिंसा-
का जाने विना त्याग नाहीं । ऐसा इहां आशय आनना ।। २८ ।।
देवातिथिमंत्रोपवपित्रादिनिमित्ततोऽपि संपन्ना ।
हिसा धत्ते नरके किं पुनरिह नान्यथा विहिता ॥२९॥
अर्थ-देव गुरु मंत्र औषध पितर इत्यादिकनिके निमित्तते भी
प्राप्त भई हिंसाहै सो नरकमें धरहै तो इहां फेर और प्रकार करी भई
हिंसा नरकवि न धेरैहै, धेरैहीहै ॥ २९ ॥
पए परिजन आत्मवधो जीवधनस्य प रक्षात्मनो मपति रक्षा। मामा न हि तव्यस्तस्य यपस्नेन मोनम्यः ॥ ३०॥ अर्थ-जावया पी, सो आमा : अर जीवको रक्षा सो ST मा गगः, पर आमा निवे योग्य नाही ता फारण तिस जापका धयागना योग्यह। भाशय-जीवनय पातरि कपापभाव होयह निन फायभावनि फरि म्पभाषपान आमाहीका पात भया, अर जीवनिफी रक्षा पटनेने काप घट राम आयुरीकी रक्षा भई, परि आत्मघात करना योग्य नाही तसा त्यागना योग्य ॥३०॥ मांविरनिः फायर्या विशेषयित्यानिचार भीतेन । पार्यापयं या ग्याथ तपनो मुद्धा ॥ ३१ ॥ अर्थ-अतींचार फरि भयभीत पुरष गरि गर्वा विरति फहिए मर्यप्रकार स्याग पूर्गापर देराकरि भारित सत्रके, अर्थको निधयत जान फरि सो विशेषताकर फरणा योग्यहै । भावार्थ-.-स्याग फरणा सो या प्रकार मेरे स्यागह ऐसे विशेषणस- हित र्यापर विचारफे अर सूत्रके अर्थको जानकरि, बारि मत कदाच प्रतिशग होय ऐसे मनमें भय स्गकरि करणा । विना विचारे फरणा योग्य नाहीं ॥३१॥ शक्यनुगारण युधविरतिः मर्यापि युज्यने कतुं । सामन्यथा दधानो भंग यानि प्रतिज्ञायाः ॥ ३२॥ अर्ध-पडितनि फरि शक्ति अनुसार सर्पही त्याग फरणा योग्यहै, यहरि सा त्यागा अन्यथा करिए शक्ति विनाही फरता जो पुरुष सो प्रतिज्ञाय भगको माप्त होयह ।
धी अमितगतिश्रावकाचार । भावार्थ-व्रतधारणमैं शक्ति छिपावनी नाही अर शक्तिसिवाय भी न करणा ऐसा इहां कयाहै ॥ ३२ ॥ आगे मिथ्यादृष्टी जीव केई प्रकार हिंसा यापहे तिनका निराकरण करिएहै:- केचिद्वदंति मूढा हंतव्या जीवधातिनो जीवाः । परजीवरक्षणाथ धर्मार्थ पापनाशार्थम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-केई मूढ मिथ्यादृष्टी कह है कि परजीयनको रक्षा अर्थ या धर्मके अर्थ वा पाप नाशके अर्थ जीवनके मारनेवाले जे हिंसक जीन ते मारनेयोग्यहैं ।। ३३ ॥ तिनसे आचार्य कहे हैं;- युक्तं तन्नैवं सति हिंस्रत्वात्प्राणिनामशेषाणाम् । हिंमायाः कः शक्ती निपंधने जायमानायाः ॥ ३४ ॥ अर्थ-ऐमा कहना युक्त नाही जाते या प्रकार माने संत हिमा- पर्ने समम्मजीवनिकी उपजी जो हिंसा ताकै निषेध करने विर्ष फोन समर्थ है। भावार्थ-हंसक जीवनिकी हिंमा योग्य होय तो सिकार ही सवहीं, सहीकी हिंगा टारे साने हिंमा जीरनिकी भी हिंसा करना योग्य नाही॥ ३४॥ था, बान कमाया जो धर्म अर्थ हिंसा करणी साया गिर धमोहिमादतुहिंगाती जायने क्यं नभ्यः । न हि शालिः शालिमरः कोदवनोपन जातः॥३५॥ Nepa पष्ट परिप्रेद। १५३ अर्थ-धर्म है सो अमिाहेतु है अहिंसाने उपजेह सोतमा सत्यार्थ धर्म हिमा फैमे उपजे। हां न करे:-धाननै उपल्या जो पापल सो फोन उपग्या न देगिरहे। भावार्थ-दयाह कारण जाका ऐसा धर्म हिसान कदाच न होयह, जाते कारणानुरप फार्य होयरः साते धर्मके अर्थ भी हिंसा फरणा योग्य नाही ।। ३५॥ आगे पहले याने कामाचा जो पाप नाशके अर्थ हिंसकनकी हिंमा करणी सापा निषेध करें - पापनिमित्तं हि यथः पापस्य विनाशने न भवति शक्तः। छेदनिमि परशुः शग्नोति लता न पर्द्धयितुम् ॥३६॥ अर्थ-पारफा कारण जो जीवनिका घात तो पापके विनाशने वि समर्थ न होय है जैसे ऐदनका कारण फरसी सो सताके पढाय- नेको समर्थन होय तसे ॥ ३६॥ आगे सफजीयनिकी हिंमा धर्मके अर्थ माने ताका निशेष फरहै;- हिसाणां यदि पाते धर्मः संभवति विपुलफलदापी । मुराविसस्तहिं गतः परजीयविपातिनां पाते ॥ ३७॥ अर्थ-जो सिफजीयनिक पातयि यडा फलफा देने याला धर्म सभह तो पर जीवनिका हिसाफरनेवालेनिकै घात मैं मुसवि विन आया। भावार्थ-हिंसफ जीवनकी हिंसा करनेपाले में उनके मुसमै किर फरपा सोई दिसा भई, धर्मकाहेका ऐसा जानना ॥२७॥ यस्माद्गति गति निहता गुरुदुःससंकटां हिंसाः । तस्माःसं ददतः पापं न भवति कथं पोरम् ॥ ३८ ॥ अर्थ-जात हिंसक हैं से मारे भए महादुःखका है संकट जा वि ऐसी गतियों जाप है ताते दु.ख देनेवाटेकै घोर पाप कैसे न भया॥३८॥ -
श्री अमितगतिमायकाचार।
।
आर्गे दुःखी जीवनिकी हिंसाका निषेध कर है:-
दुःखयतां मप्रति यये धर्मो नेदमपि युज्यते यतुम् ।
मरणे नरके दुःखं धोग्तरं वार्यते केन ।। ३९ ।।
अर्थ-दुःखी जीवनिके घातविष धर्म होय है ऐसा मी कहना
योग्य नाही, जाते तरण होनसते नरकविणे अत्यंत घोर दुःस कान
करि निवारिण है । भावार्थ-कोर्ट कहै कि दुःखी जीवनिकी हिंसाने
धर्म होय है जात वो वाका दुःख दूर भया ता• कया है-वह जीव
मरक नस्क गया तहा महा दुःख कैसे निवारेगा ताने अधिक दुःख
देनेत पापही है धर्म नाहीं ॥ ३९॥
सुसितानामपि घाते पापप्रतिपेधने परो धर्मः।
जीवस्य जायमाने निपेधितुं शक्यते केन ॥४०॥
अर्थ-कोऊ कहै कि, मुम्बी जीवनके घात विघं भी विषय
मुखरूप पापका निषेध होते बड़ा धर्म है, ताईं कया है-ऐसा नाही,
जातें जीवनिके उपजते सते पाप निषेधनेकौं कौन करे समर्थ
इजिए है।
भावार्थ-यह
यह जीव अन्यत्र उपजेगा तहां पाप करेगा ताते उल्टा
मिवाय पाप करावनेमे धर्म नाही, पापही है ॥ ४० ॥
पौर्वापर्यविरुद्ध सम्यक्तमहीधपाटने वजम् ।
इत्थं विचार्य सद्भिः परवचनं सर्वथा हेयम् ॥ ४१ ॥
अर्थ--पडितनि करि या प्रकार विचारकै पूर्वापर विरुद्ध मर
मम्यक्त पर्वतके तोडनेकों वन समान जो मिथ्या दयनिका वचन सो
सर्वथा त्यागना योग्य है ॥४१॥
अनानतो यदेनो जीरानां जायते परमधोरम् ।
तच्छक्यते निहंत ज्ञानव्यतिरेकनः केन ।॥ ४२ ॥
भए पनि ri-यनिक ने गहा पोर पार ? मो पाप गरिजा कीर पीजिए। भाषा--जनित पा rathi fat आगनिन न मि, गा मानना ॥ १२ ॥ पीपा लिग हिमादिंगमुगामिनो भविनः । पीयपं नीफ गति पिपविटपिनो ननम् ॥ ४३ ।। -सीजर धर्म अयं सप. या अहिमक मुली या दुर्गा वनको मांगीनियरि अमृग अगार पानेका विपास- निय भभूत काका ॥ १३ ॥ मनगा यषमा या हिंमां विदधाति यो जनो मृहः । जन्मपनगादीपें दीप पर्पने दामी ।। ४४ ॥ अर्थ-ओम जन मन कार पचनपरेि पापकार मा कमी ITी भया मेना दी मंगार कवि यरन फार नाई अतिशय गरि पूर्ण पानि ॥ ४५ ॥ होम भरिसा अवतका वर्णन किया आगै माय अणुरतका पर्णन करें:- पग्लेर पपि गई यदनादयं जिघृक्षतां धर्मम् । यदनिष्ट माधुजनम्नहरनं नोच्यते मतिः ॥ ४५ ॥ अर्थ-जी पचन सनिधि भी निम्नीक आ धर्मको प्रहण पाने के बारक जे पुग्पनिक अनादाने योग्य पर साधुजननि करि एनाहीगा जो अमत्यययन गो सेतजननि करि नाही बोन्टिए - फाममोधरीडाप्रमादमदलोममोहरिपः। यमनममन्यं संतो निगदंति न धर्मरतचिनाः ॥ ४६॥ -
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-प्रिय बोलनेमैं चतुर है वाणी जिनकी ऐसे पुरुषनि करि
कर्कश कहिए कठोरवचन बहर निठुरवचन बहुरि औरनमैं भेद की
देय ऐसा वचन बहुरि परस्पर विरोध उपजाय देय ऐसा वचन इत्यादि
अनेक भेदन कर संयुक्त अप्रिय वचन कया है ।। ५४ ॥
आगें गई यचनकों कहें हैं;-
हिंसनताडनमीपणसर्वस्वहरणपुरः सरविशेपम् ।
गर्हायचो मापते गोज्झितवचनमार्गज्ञाः ॥ ५५ ॥
अर्थ-~~हिंसाम्प ताडनारप भयानक सर्पदन्यहरण सहर
इत्यादिक । भेद जाके ऐमा जो निद्यवचन ताहि नियपना करि रहित
पचनके मार्ग जाननेवाले हैं ते गर्दा वचन कहें है ॥ ५५ ॥
अध्यं पथ्यं तथ्यं श्रव्यं मधुरं हितं ययो वाच्यम् ।
विपरीतं मोक्तव्यं जिनवचनविचारकैनित्यम् ॥ ५६॥
अर्थ-जिनेंद्रके वचनके विचार करनेवाले गुण ? तिन कर
नित्यही प्रयोजनम्य मुपकारी जैसाका तैसा मुना योग्य मार
हितरूप ऐमा यचन करना योग्य है, अर इन विपरीत उम्दा
पचन है मोत्यागने योग्य है ॥५६॥
बैगयामाप्रत्ययसिाहकोपादयो महादोषाः ।
जन्यनेन्तवमा कुमोजनेनर रोगगणाः ।। ५७ ॥
भ-अमें गोरे भोजन परि निधो गर उसने
थमा वचन की भार भ्रम अतीनि पाद प्रचार
भने उपने ॥५॥
घनमापन नोयनानि गगि टिनि नाम्यते ।
रिलालनि महता दयाननर शिपिनानि ॥ ५८ ॥
पा परि।
१५९
पर्ध-जगमान दावान र परि परे पनि परि सहित नेपन
१ मा भर न अपत्य पन परि मर गई मत है से
मगारा पालिए? ॥ ५८ ।।
तयाग अणमतका वर्णन पिसा सागै अचार्य
माया वर्णन :-
क्षेत्र मामेरप्ये रप्पायां पपि गृहे गले पोपे ।
प्रायन परदन्यं नएं भ्रष्ट धितं याऽपि ॥ ५९ ॥
धर्म-inार नविगवि मागनि परवि
दिरे गायनये. समासिका दम्य पहा होय का भूला होय
या धपाय मोमीण पाना योग्य नाही॥५९ ।।
हणमायमपि द्रव्य परकीयं धर्मकांक्षिणा घूमा।
अविनीण नादयं पहिममं मन्यमानेन ।। ६०
ई-धर्मका बांउफ. जो पुरए ता परि दिना दिया पराया दन्य
अलि समान मान त: पारे तृणमात्र भी बहण फरणा योग्य
नाही ॥६०॥
पो यम्य हरति वित्तं म तस्य जीवस्य जीरितं हरति ।
आधासकर पासं जीवानां जीवितं वित्तम् ।। ६१ ।।
अर्थ-जी जाका धन हो मो ताका प्राण है जाते जीवनके
रिता भावनेवाला धन है मो माझ प्राग है॥६॥
मशं पश्यंति पुधाः परकीयं कांचनं तृणं वापि ।
संता निजविनः परतापविमीयो नित्यम् ॥ ६२ ॥
अर्ध-पहित है ते पराये मुवर्णको वा तृणकौं समान देते है,
कम से अपने धननि फी मंतुष्ट भर परको संताप उपजावन में
भयभीत है॥६२॥
-- मितिमा अनिल गोजी ना नि करे कमा गरिएको पनि यही मानने में की देग मा गगन यह Ti देगा मन करे अनेक भान की सम भनिगम का || ५५ ॥ आगे मनी - हिंमननाउनमीपणगर्वमहम्णपुर: मीशाम् । गानो मापने गाजितानमार्गशाः ॥ ५५ ॥ अर्थ-हिगाग्रप साहनारण থানমশাল দাম इत्यादिक है भेद गार ऐसा तो नन माहि निपना करि रहित पचन मार्ग जानने गर्थ वचन फो॥ ५५॥ अध्यं पथ्यं नभ्यं अव्यं मधुरं दितं यचो वान्यम् । विपरीतं मोक्तव्यं जिनवचनविचारकनित्यम् ॥ ५६॥ अर्थ-जिनके वचन के विचार करने वाले पुरुष है तिन कर नित्यही प्रयोजनाएप मुखकारी जैसाका तैसा मुनने योग्य मधुर हितरूप ऐसा वचन कहना योग्य है, अर इनते विपरीत उल्टा वचन है सो त्यागने योग्य है ॥ ५६ ॥ वैरायासाप्रत्ययविपाटकोपादयो महादोषाः । जन्यंतेऽनृतवनमा कुभोजनेनैव रोगगणाः ॥ ५७ ॥ अर्थ-जैसे सोटे भोजन कर निसयत रोग उपजै असत्य वचन करि वैरभाष भ्रम अप्रतीति विपाद क्रोध इत्यादि महादोष है ते उपजे हैं ॥ ५७ ॥ वचसावृतेन जंतोत्रतानि सर्वागि झटिति नाश्यते । विपुलफलवंति महता दवानलेनेव विपिनानि ।। ५८ ॥
या परिछ।
-
अर्थ-महान दागना परि यो पटनि फरि सहित जे पन
है से गायनिए है में अगस्य पन करि जीयके सर्व मत है ते
म नारा कीजिए? ॥ ५८ ।।
पद सई असाय त्याग अणुस्तका वर्णन किया था अचार्य
मतफा वर्णन पर है-
क्षेत्रे ग्रामेऽरण्ये रध्यायां पथि गृहे सले पोपे ।
ग्राहं न परद्रव्यं नष्टं भ्रष्टं स्थितं पाऽपि ॥ ५९ ।।
अर्थ-तविध मामविस पनविय गलीधि मार्गरि घरविर्षे
रेवि गायनके समामि दूसरेया दन्य पड़ा होय या भूला होय
पा धरया होय मो भी जाण परना योग्य नाही।। ५९ ।।
वणमात्रमपि द्रव्य परकीयं धर्मकांक्षिणा घुमा ।
अवितीर्ण नाऽऽदेयं वहिममं मन्यमानेन ॥ ६० ।।
अर्थ-धर्मका पांरप जो पुरुष ता फरि विना दिया पराया द्रव्य
पनि समान मान ता कार तृणमात्र भी ग्रहण करणा योग्य
नाही ॥६०॥
यो यस्य हरति वित्तं म तस्य जीवस्य जीवितं हरति ।
आधासकरं पार्थ जीवानां जीवितं वित्तम् ।। ६१ ॥
अर्थ--जो नाफा धन हरै सो ताका प्राण हरे है जाते जीवनके
पिरता यधावनेवाला धन है सो या प्राण है ॥ ६१॥
सहयं पश्यंति युधाः परकीयं कांचनं तृणं वाऽपि ।
संतुष्टा निजवित्तः परतापविमीसो नित्यम् ॥ १२ ॥
अर्ध-पंडित ? ते पराये सुवर्णको या तृणकौं समान देरो है,
कैसे है से अपने धननि फरि संतुष्ट भर परको सेताप उपजायने में
भयभीत है ॥२॥
१६० श्री अमितगतिश्रावकाचार। तैलिकलुन्धकसहिकमार्जारव्याधीवरादिभ्यः । स्तेनः कथितः पापी संततपरतापदानरतः ।। ६३ ।। अर्थ-तेली बहेलिया खटीक विलाव वाघ ढीमर इन ते चौर है सो अधिक पापी कह्या है, चार निरंतर परजीवनको दुःख देने तत्पर है ॥ ६३ ॥ एसैं अचौर्य अणुव्रतका वर्णन किया । आर्गे परदारा त्याग अणुव्रतकों कहै हैं; खसमातृदुहितसदृशीः दृष्ट्वा परकामिनीः पटीयांसः । दूरं विवर्जयते भुजगीमिव घोरदृष्टिविपाम् ॥ ६४ ।। अर्थ-पडित हैं ते परकी श्रीकौं यहनिसमान अर वडीको माता समान अर छोटीकी बेटी समान देख करि भयानक दृष्टिविौ मर्वणीकी ज्यों दूर त्यागें हैं ॥ ६४ ॥ न निपेच्या परनारी मदनानलतापितैरपि त्रेधा। क्षुत्क्षामैरपि पुरुषर्न भक्षणीयं परोत्सृष्टम् ।। ६५ ॥ अर्थ-काम आग्ने करि तप्तायमान जीवनि करि भी मन वचन काय करि परस्त्री सेवना योग्य नाही, जैसे क्षुधाकरि दुर्घल चतुर पुर- पनिकरि भी पराई और खाना योग्य नाहीं तैसें ॥ ६५ ।। विपवहीमिय हिन्वा पररामां सर्वथा त्रिधा दूरम् । संतोपः कर्तव्यः म्यकलत्रेणैव पुद्धिमता ॥ ६६ ॥ अर्थ-पास्त्रोको विषवेलकी ज्यों सर्वथा मन वचनकायफार दूर त्यागकै बुद्धिमान पुरुषकार अपनी बीमार ही संतोष फरणा योयह ॥६६॥ नाशक्या सेवंते माया ममपि मनोमयालिताः । यन्हिशिसाप्याशम्या गीतान: सेविता दहति ।। ६७ ॥
पा परिश। अर्थ-पामसी म्याधुट भए सत आसक्ति जो गृ सा फार अपनी भार्याय) भी न सेवेह में शीतकरि पीडित पुरुपनि फरि भी आगति फर सेई भई अरिकी शिगह सो कहा न देहेहै, दहीहै - -- रसा स्टा भिष्टा रष्टिविपा याहितिरिव हति । सो परगमा भन्यो मनसापि न सेवते जातु ॥ ६८।। मर्थ-ग्यों परन्त्री देवी वा सी या आलिंगी संती रिविष सर्पको मतियो ग्यों नेह निम पानीको भन्यजीव हैं सो मनकरि भी कदाच न सेय॥६८॥ दीप्ताकारा सप्ला स्पृष्टा दहति पारशिव । मारपति योपमुत्ता प्ररूढविपपिटपिशासव ॥ ६९ ॥ अर्थ-जो परखा दत है आकार जाफा अर सप्तायमान सो स्पी भई भरिका शिपाय यो दौ, अर जो भोगी भई फैटरही विप- वृक्षको शाम्पाकी ज्यों मारेहे ॥ ६९॥ मोहपति झटिति चिनं निपेव्यमाना सुरव या नितरां । या गलमालिगंती निपीडयति गंडमालेच ॥ ७० ॥ अर्थ-जो परस्त्री सेई भई मदिगको व्या अतिशयकरि जलदी चित्तको मोहहै । पर जो गरेपी आलिंगन फरती लिपटी गंडमाला नाम गंगकी ज्यो पीडा उपनाह ॥ ७० ॥ घ्याधीव याऽऽमिपाशा विलोपपरभयाजन विनाशयति । पुरुषार्धपरैः सनिः परयोपा मा त्रिधा त्याज्या ॥१॥ अर्थ-जो परती मांसभगनी व्याघ्रीकी ज्यों पुरुषकों देव फरि जबरदस्ती विनाश करहै सो परस्त्री पुरुषार्थ तत्पर जे संत पुरुष तिनकार मन बचन कार्यते त्यागनी योग्यहै ॥ ७१ ॥ भनि.-" श्री अमितगतिश्रावकाचार। मलिनयति कुलद्वितयं दीपशिखेवोज्ज्वलापि मलजननी । पापोपयुज्यमाना परवनिता तापने निपुणा ।। ७२ ॥ अर्थ-जो परस्त्री दीपकी लोयसमान उरम्बलभी मैलकी उपनार• नेवाली है, वह कजल उपजावहै यह रागद्वेश उपजावेहै बहुरि पापिनी उपयुग्यमाना कहिए संयोगको प्राप्त करी संनी संताप करनेपित प्रवीणहै ॥७२॥ ऐसे परस्त्रीत्याग अणुनतका वर्णन किया । आगै परिमहप्रमाण नामा अणुनतको फ हैं,---- यास्तु क्षेत्रं धनं धान्यं दासीदासंचतुष्पदं मांडे । परिमेयं कर्तव्यं सर्व संतोपाशलेन ॥ ७३ ॥ अर्थ-संतोपविष प्रवीण जो पुरुष माकर वास्तु कहिए हार होली क्षेत्र काहेए खेतीका क्षेत्र धन कहिए मुवर्ण संपादिक धान्य कदिए. चावट गई आदिक यहरि दामी दाम आदि द्विपद भर पर कहिये धौदा गो इत्यादिक मांड काहिए मामन यत्रादिक इन सारा परिमाण करना योग्य। भावार्थ-जीयक सीन लोक पटानकी गृणा हैमो सय एटमी न जानि तृष्णा घटनेको पदानिका परिमाण फगयाहै ।। ७३ ।। रिध्यापयनि महात्मा लोमं दारामिपनि मलिनम् । मुग्नं नापयमानं गतोपादाटमलिलेन ॥ ४ ॥ वर्ष-महाभमा दाबान सामान पता होनादि नो- RTE मा फैमा योगगरिमाको ना समी ॥४॥ मामा लोपर्यत पग्निानिमिणाः । मनाने यमंग पत्रापनि गः ममार्गमम् ।।
पारि -प्रकाशित गरिय. भारंभह से परिममे निमित होती RAI AAP की जो पनिको पटामो गई Anteयो पटक ७५॥ परिमाण मनका वर्णन किया। आगे पानिनाम गुण :- कपटक पि कन्या मर्यादा यो न लंपपति धन्यः । दिग्निनिम्नाय जिनर्गुणयनं कथ्यते प्रथमम् ॥ ७६ ॥ अर्थ-धन्य पुरन हिमानरे, भएपनि मादानी फरिक नाही . जिननि कर तिपतिनामा गुणारत फारिए दि भाटी दिशा तथा उपक्षणने नीचे ऊपर ऐसे दनौं नि. प्रमिस नदी पर्वतादिफनते जो मर्यादा फरनाके इसते में गमनानी पगंगा सो प्रथम शिविरतिनामा गुणस्त जगनना ॥ ७६ ॥ गरिमनिम्तनः परं तस्य जापते पूनम् । पापापायपीयः मुगकारि महायतं पूर्णम् ।। ७७ ।। अर्थ-तिम दिग्विनिधारी पुर. तिम मर्यादित पर मर्व आरंभया निमि कहिए स्याग सार्ने मुराकारी अर पारफे नाश करणे प्रयाण ऐसा पूर्ण महायतोय।। ७७ ॥ आगे देशारिरमिकों को है। देशारधिमपि कृत्वा यो नाफामति गदा पुनरोपा। दशरितिद्धितीपं गुणग्रतं तस्य जायेन ॥ ७८ ॥ अर्थ-परि देशकी मर्यादा को भी काके जो फेर मन पचन फाप पारि ना। उलंधे १ सा देशविरतिनामा दूसग गुणवत ोय?
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कापसा
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ArAmeinो भगविगी जानना
ri. fair oi:-
मंटन विमानमारमयानुकमारिकादयो जीराः ।
निकाम प्राधाः ग पापापकारपराः ।। ८२ ॥
.r-f, 17 पुरम
पिनयरि 1ि मुगां और
Bar RM:प. र पार करने
निमाण
कानपीपनारी ॥ ८२।।
नोई लाक्षा नाली पुगुम मदनं विपणः भागम् ।
गांधानकर पुष्पं गर्व करणापरयम् ।। ८३ ।।
अ५-यामेन Y लिन सोम नील कुमुम
Iru ma गाना उपस म्यागना योग्य ॥८॥
नाली रणकंदो दिवमादिनयोपिन पदधिमधिने ।
पिदं पुप्पिनमचं कालिंग द्रोणप्पिका त्याग्या ॥८॥
अमीर अगरण आ पर भर दोष दिनम पागे दही अर
सा. पनी सहिन रपी लाया अन भर पालीका भर
त्यागना योग्य ॥ ८ ॥
मे अनर्गतका वर्णन किया। आगे सामायिक प्रतको
आहागे निशेपी निजामभावादन्यभावमुपयातः ।
योजनकायिकोमा परिहयो दयालीः ॥ ८५ ।।
भर्य-जो समान आहार अपने मायने अन्यभावको प्राप्त भया
मदिनाम भया यहरि जो अनतापमहित है सो पर दयासहित
गुग्गनिकरित्यागना योग्य ॥ ८५ ॥
धीममितानिमाकागार स्यतारीद्रयोगी मन्या विदयानि निर्मलध्यानः। सामायिकं महात्मा मायायिक संयनो जीवः ।। ८६ ।। अर्थ-त्यागे आतं गा प्यान जाने र निर्मल है ज्यान जाक ऐमा महामा गगर त्याग से भले प्रकार यनमहिनी सो सामायिको धार। भावार्थ-~-गद्वपके त्यागर्ने आत्मवि " में " काहिए एकर होय करि " अयनं काहिए परिणामना मो ममय है, अर समपर- जो भाव मामायिक काहिए मो ऐमे सामायिक काट समस्त सावर योगके त्याग ते श्रावकको भी उपचारने महाननी कया है इतना यह विशेष जानना ।। ८६ ॥ कालत्रितये त्रेधा कर्तव्या देववंदना सद्भिः । त्यता सर्वारंमं मवमरणविमीतचेतस्कः ॥ ८७ ॥ अर्थ:-जन्ममरणत भय भीत है चित्त जिनके म मन्पुरुपनि करि प्रभात अर मध्याइ अर अपरान इन तीनों काल विर्षे मन वचन काय फरि अरहंतादि देवनिकी वदना करनी योग्य है ।। ८७ ॥ आर्गे प्रोषधोपवासकौं कहैं हैं;- सदनारंभनिवृत्तराहारचतुष्टयं सदा हित्वा । पर्वचतुके स्थेयं संयमयमसाधनोद्युक्तः ॥ ८८ ॥ अर्य-गृहके आरभते रहित अर यावजीव त्यागरूप संयम अर थोड़ेकाल त्यागरूप यम इनविपे उद्यमी पुरुपनि करि पर्वचतुष्क करिए. एक मास में दोय अष्टमी दोय चतुर्दशी इनविय आहारचतुष्टय कहिए खाद्य स्वाय असन ( लेह्य ) पेय इनको त्यागकरि सदा तिटना योग्य है।
- परिपद। मा--y ram. R HIT याग, संयमाए पी. 27 mins जानना ॥८॥ गालगंधमान्याग्नामाभ्यंगादिमसंगकारम् । प्रगति प्यानल्यापापिनम्न्यका ।। ८९ ॥ ar-लमानान अपनाया गम्पारको पाग- पार NR पित भिनगा में पासहित पुगपनि बमा पोय ॥ ८॥ उपयागानुपयामकम्पानेप्रेकमपि विधणे यः । रुपनुगारपगंगा प्रोपधकारी जिनंग्नः ।। ९० ॥ भयं-उपवारा भार अनुएवाम अर (कम्यान वि क.को भी जाति, अनुगार धारी मो पर पीमा करनेवा। जिनदेवनि करि बना॥९॥ उपसं जिननाया निगदनि पतुर्विधान त्यागम् । मजलमनुपयामममी एफस्थानं मा निम् ॥ ९१ ।। अर्थ-पार प्रकार भारफा जो स्पागाह पे मिननाथ उपवास र जसमहिनको अनुपवाग को है अर एफपार भोजनको परवान को।। भावा- जलमार पिताको अनुपचास फमा सो उप- पासका अभाव नप अर्ध न देना किंचित् उपायास है ऐसा अर्थ माण परना ॥ ९१ ।। मागे भोगापभोगपरिमाण प्रतको यो है:-- भोगोपमोगसंग्व्या विधीयते येन शत्तितो भन्या । भोगीपभोगसंख्या शिक्षायतमुच्यते सद्भिः ९२ ॥ TH श्री भमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-जा करि शक्तिमा भोग अर उपमोगकी संख्या करित है सो भौगोपभोगसंख्या नामा शिक्षाबत संतन करि कहिए है ॥ १२ ॥ आगें भोगोपभोगका स्वम्प कहै है.- तांबूलगंधलेपनमन्जनमोजनपुरोगमो मोगः । उपभोगो भूपा सीशयनासनवखबाहाद्याः ॥ ९३ ॥ अर्थ-तांबूल मुगंधलेपन स्नान भोजन इत्यादिकतो भोग हैं अर भूषण स्त्री शयन आमन बस वाहन उन्मादिक उपभोग हैं। एकवार भोजनमें आत्रै सो भोग अर वार वार भोगनेमें आवे सो टपभोग ऐसें जानना ॥ २३ ॥ आगें अतिधिसंविभाग व्रती हैं;- परिकल्प्य संविभागं स्वनिमित्तकृताशपघादीनाम् । भोक्तव्यं सागारैरतियिव्रतपालिमिनित्यम् ॥ ९४ ॥ अर्थ--अतिथि व्रतके पालनेवाले श्रावकनि करि अपने अर्थ करे जे भोजन औपधादिक तिनका भले प्रकार विभाग कारकै पात्रकी देके भोजन करना योग्य है ।। ९४ ॥ अतति स्वयमेव गृहं संयममविराधयन्ननाहूतः । यासोतिविरुदिष्टः शब्दार्थविचक्षणः पुरुषः ।। ९५ ॥ अर्थ-शब्दार्थ विर्षे विचक्षण जे पुरुष लिन करि सो साधु अतिथि कया है, सो कौन ! जो समयकों नाही विराधता संता विना युलाया स्वयमेव गृहिप्रति अति कहिए गमन कर है, आये है ।।९५!! अशनं पेयं म्यायं सायमिति निगद्यते चतुर्भेदम् । अशनमनिर्विधेयो निजल्या संविभागोऽस्य ॥९६ ।।
पष्ट परिषर। HA पर्ध-असन पेय गाय ऐमे 'पार प्रकार आहार फाहिए ताका विभाग शारिप बांटा अपनी शनि मार इस अतियि पात्र फरणा पोय । भावार्थ-अपने अप किया आहार तामस पात्रके आई शक्ति- माफिक ना योग्य है ॥ ९६ ।। महादनापमशनं क्षीरजलाधं जिनः पेयम् । तपिलदाडिमा म्याचं साधं च पूपापम् ॥ ९७ ।। अर्थ-मंग भात श्यादि अगन कहिए अर दूध जल आदिककी जिनदेवने पेय फसा है अर तापूल दाडिमादिकों बार कहा है अर पूषा आदिको गाय का है ऐसा जानना ॥ १७ ॥ आगे सडेगानाका वर्णन कर है- मात्या मरणागमनं तवमनिर्दनिवारमति गहनम् । पृष्ट्वा पांधव वर्ग फरोनि सल्लेराना धीरः ॥ ९८ ॥ अर्थ-दुर्निवार अर अतिगहन फहिए. भयानक ऐसा जो मरनका आगमन ताहि जाति करि निभयरूप है मति जाकी ऐसा धीर पुरुष है. सी माधवनकै समूहको पूठ के मोह छुदाय आगम प्रमाण सले सनाविधिको धायक मांडै है, ऐसा जानना ॥ ९८ । आराधनां भगवती हृदये विघने मनानदर्शननरित्रतपोमपी यः । निर्धतकर्ममलपंकममी महात्मा गर्मोदकं शिवमरोवरमेति हेमः ॥ ९९ ।। अर्थ-जो मस्यादर्शन झान चारित सरमयी जो आराधना भगवती ताहि हृदयगिरी धारै है सो पर महारमा हंस मोक्षसरोवरफी थ्री अमितगतिश्रावकाचार । प्राम होय है, कैसा है मोक्षसरोवर नाश भया है कर्ममल रूप कीच जाका अर मुखरूप है जल जा वि ऐसा है। भावार्थ-जो सन्यास मग्न कर है सौ थोडेही कालमें मोक्षकों प्राप्त होय है, ऐसा नियम जानना ॥ ९९ ॥ आ» अधिकारको संकोचे है;- जिनेश्वरनिवेदितं मननदर्शनालंकृतं द्विपड्विधमिद व्रतं विपुलवुद्धिमिर्धारितम् । विधाय नरखेचरत्रिदशसंपदं पावनी ददाति मुनिपुंगवामितगतिस्तुतां नितिम्॥१०० ।। अर्थ-जिनेश्वर देवने कह्या अर ज्ञानदर्शन कर शोभित अर महाबुद्धानकरि धरया ऐसा यह द्वादश प्रकार व्रतहै सो मनुष्य विद्या- घर देव इनकी पवित्र सपदाकों प्राप्त कराकै निर्वाण अवस्थामै देय है कैसीहै निर्वाण अवस्था अप्रमाणहै महिमा जिनकी ऐसे मुनिनविय श्रेष्ठ मुनि तिनकरि स्तुतिगोचर करीहै । भावार्थ-मुनीन्द्र जाकी स्तुति करहै ऐसी मुक्तिको प्राप्त करैहैं ॥१०॥ सवैया तेईसा। पांच अणुव्रत तीन गुणवत शिक्षाप्रत पुनि निर्मल च्यार । सम्यग्दर्शन ज्ञानसहित जो धारै तीन प्रमाद निवार ॥ नर विद्याधर अमर संपदा अद्भुत मोगि मोग जगसार । लह अमितगति सुखमय शिवपद वंदं चरण तास अविकार ।। इति श्रीमदमितगत्याचार्यकृते श्रावकाचारे पष्ठ परिच्छेदः। ऐसें थी अमितगति आचार्यविरचित थायफाचारविर्षे पष्ठ (छठा) परिच्छेद समाप्त भया ।
अथ सप्तम परिच्छेदः।
आम व्रतनिकी महिमा दिपाह-
मतानि पुण्याप भवंति जतो-
ने माति चाराणि निवितानि ।
मम्यानि किंवापि फलंति लोके
मलोपलीढानि कदाचनापि ॥ १॥
अर्थ-जीयकं अतीचारमहित सेये भए वतह ते पुण्यके अर्थ होय
है, हा दृयत यह हैं जैसे बिना नीदे कूडासहित मलसहित लोकविर्षे
सस्प हैंसे की कई भी कदाचित भी फलैहे ! अपि तु नाही
मत्वैति सद्धिः परिवर्जनीयाः
ग्रते प्रते ते सलु पंच पंच।
उपेयनिष्पत्तिमपेक्षमाणा
भवंत्युपाये मुधियः सयलाः ॥२॥
अर्थ-ऐमी मान फरि पंडितनि करि व्रत व्रत विर्षे ते पांच पांच
अतीचार त्यागने योग्य है. जातै उपेय काहिए जाके अर्थ उपाय करिए.
ऐमा कार्य ताकी उत्पत्तीको बाउते पंटित है ते उपाय जो ताका
फारण ताविप पन सहित होपहैं ।
भावार्थ-तती उपेय है अर अताचार त्याग उपाय है जो प्रत-
नकी बार है तो अतीचारत्याग फरह, ऐसा उपदेश जानना ॥२॥
૨૭૨ श्री अमितगतिश्रावकाचार। आगें अहिंमावतके अतीचार कहहै; भारातिमात्रव्यपरोपधात- छेदानपानप्रतिषेधधाः। अणुव्रतस प्रथमस्स दक्षैः पंचापराधाः प्रतिपेनीयाः ॥३॥ अर्थ-भारका प्रमाणते उलंघकरि धरना, अर घात कहिए पीडा का कारण लाठी वैत आदितै मारना इहां प्राणके नाशम्प धानका अर्थ नहीं ग्रहण करणा जाते यह तो अनाचारस्वरूपही है, बहुरि छेद कहिए कान नासिकादिक अंगनिका छेदना, बहुरि अन्नजलका रोकना, अर बंध कहिए वांछित स्थानको न जाने देना रस्सादिक ते बांधना सो धध कहिए । ये प्रथम अणुव्रतके पांच अर्ताचार पडितनि करि त्यागना योग्यहै ॥ ३ ॥ आर्गे सत्य अणुव्रत अतीचार कहै है-- भ्यासापहारः परमंत्रभेदो मिथ्योपदेशः परकूटलेखः। प्रकाशना गुह्यविचेष्टितानां पंचातिचाराः कथिता द्वितीये ॥ ४ ॥ अर्थ-व्यासापहार कहिए कोऊनै द्रव्य सौया था ताक् वह भूटके थोडा मागे तर कहै इतनाही है, अहरि पर मत्रभेद कहिए अंगविका- रादिकने परके अभिप्रायकों जानिईपनि ताका प्रकाशना, बहुरि स्वर्ग मोक्षक कारण क्रियाविशेषनिमें अन्यथा प्रयीवना तो मिथ्यापदेश कहिए, बहरि इसरेके कहनेन टगनेक अर्थ झूट लिग्पना सो कूटदेग- किया है, वहरि स्त्रीपुरुषादिकके गुप्त चरित्रका प्रसार करना सो . न सप्तम परिच्छेद। रहोम्याख्यान कहिए । ये पांच अाचार दूसरे सत्य अणुनतविर्षे कहेहै ॥ ४॥ आगे अचार्य अणुवतके अतीचार कहे हैं;- व्यवहारः कृत्रिमकः स्तेननियोगस्तदातादानम् । ते मानवपरीत्यं विरुद्धराज्यव्यतिक्रमणम् ॥ ५ ॥ अर्थ-झूठे मुवर्णादि यनावना सो कृत्रिमव्यवहार फहिए, बरि चौरको चौरीमें लगावना सो स्तेन प्रयोग कहिए, बरि चोर करि ल्याए द्रव्यका प्रहण करना सो नदास्तादान कहिए बहुरि बढे मानते लेना छोटे मानत देना सो मानवपरीत्य पाहिए, बाहरि गजनियमका उदघन फरना महमूल आदि चोरना सो विरुद्ध राज्यातिप्रामण पाहिए। ये तीसरे अणुव्रतके पांच अाचार कहे ॥५॥ आगें परस्त्रीत्याग अणुव्रतके अतीचार पहेहै-- आत्तानुपातत्वरिकांग संगा- वनंगसंगो मदनातिसंगः। परोपयामस्य विधानमेते पंचातिचारा गदिताधतुर्थे ॥ ६ ॥ अर्थ--परफरि महण फरी महरि नाही म्हण परी ऐना व्याभि- चारिणी बीके अंगका संग करणा लिनप्रति गमन परना, मारि अनंग- सेग यहिए हस्तादिषने पीडा फरणा, पारि कामका तीर परिणाम, अर दूसरेका विवाह करायना । ये पनि अर्माचार अप इतके को ॥६॥ भागै परिम परिणाम अणुमतको अनाचार का है। क्षेत्रवास्तुधनधान्यहिरण्य- मर्णकर्मकरकुप्पकसंग्ख्याः।
२७४
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
.
मो
योतिलंघति परिग्रहलोम-
स्तस्य पंचकमवाचि मलानाम् ॥ ७॥
अर्थ-क्षेत्र कहिए खेतीका स्थान वास्तु कहिए घर इन दोजनका
एकस्थान, अर हिरण्य कहिए सोना इनका एकस्थान, अर धन
आदि अर धान्य गेहूं आदि इनका एकस्थान अर, कर्मकर दासीदान,
अर कुप्प कहिए यत्रादि इन पांचनकी संख्याकी जो परिग्रहके टोम-
सहित उलंघहै ताके आतीचारनिका पंचक कया ७
आगें दिग्विरतिके पांच अतीचार कहे हैं,-
स्मृत्यंतरपरिकल्पनमूर्धाघस्तिर्यग्व्यतिक्रमाः प्रोक्तः ।
क्षेत्रविद्धिः प्रातरतिचाराः पंच दिग्विरतेः ॥ ८॥
अर्थ-जो योजनादिकका परिमाण करया था ताई भूल
और
मुरन करना, अर ऊपर नीचे तिरछा इन तीननिका उलंघना कहिट
पर्वताहिप बढना कपादिमें उतरना विलादिमें घुमना ऐमें तीन भए,
बहरि टोमके वशने क्षेत्रकी वृद्धि वाहना। ये दिग्निरनिके पांच
अतिचार पंडितनिनें कहे । ॥९॥
मार्ग देगविरतिके अतीचार करें -
आनयनयोग्ययोजनपुगलजल्पनगरीरसंज्ञायाः ।
अपराधाः पंच मता देशवने गोचगः मतिः ॥९॥
अ-मर्यादा वाहिर आनयन काहिए बुटाना, यहरि मर्यादा
वहिर योग योजन कति प्रयोग, यही मर्यादा र लोटारिका
कार्य करावना सो पुरर .in, आमयांदा याति पुराने वपन
बोरना, अर मांटा वा की गमण्याने कार्य कराया।
व अनवर मरनने को ॥९॥
मसम परिच्छेद। आगें अनर्थ दंडविरतिके अतीचार को है;- असमीक्षितकारित्व प्राइ गोपभोगनरभ्य॑म् । फंदपं कारकुच्य मासर्यमनर्थदंडम्य ॥ १० ॥ अर्थ-रिना विचार प्रयोजनत अधिक करना, बरि भोग उप- भोगनिका निःप्रयोजन संचय करना, यहरि साररागफे उत्यने हास्य मिल्या अयोग्य पचन फहना सो कंदर्प पाहिलबहुरि ते सीरगग अर अयोग्य वचन दोऊ पर विर्षे शसरके फर्म फर युक्त होय मी कौकुछ फहिए, बहुरि दीटपणां सहिल असमीचीन यात प्राप करना सो मोपर्य कहिए । ये पांच अनर्थ देरवितिके अनाचार हैं॥१०॥ आगे सामायिक अनीचार कहें - योगा दुःप्रणिधाना स्मृत्यनुपस्थान मादराभावः । मामायिकस्य जनरतिवारा पंच विज्ञयाः ॥११॥ अर्थ-दुःप्रणिधान करिए पापम्प अवा अन्यथा योगगरज मन वचनकाय मीन सी ये भये, पर मुरत भूल जाना अर आदरया अभाष, ये पाच अतीचार सामायिकके जैनीन पर जानने योग्य आगें पोसाक अनीधार पर- सोया गोपयोगा उत्मादानसंसारकविधाः । उपगस मुनिमुपरनादः स्मृन्यममस्या ॥ १२ ॥ अर्ध-तोपयोग पहिरिना दो पारिना प्रविन को भूमि म तनना था तादिवनिकी पूजा के उपरणा- दिक वा भापक औटना भाटिया सादिक बना वारि साधा निशाना, तन तो ये भी मगर श्री अमितंगतियायकाधार । आवश्यकनिमें उत्साहका अभार अर पोसहफी मुरत भूल जाना, पान अतीवार मुम्य आधानिने पोमह कि कहे है ॥ १२ ॥ आगे भोगोपभोग विरतिके पांच अतीपार कहे है- महविगं संबद्धं मिश्रं दुरापामभिपनाहारः। भोगोपभोगविरतरतिचाराः पंच परिवाः ॥१३॥ -~-मनिरागस्तु तथा सचित्तवस्तु करि सर्शित. बतुत सविन करि मिन्या या यहरि दुःमों पर ऐसा मस्तु ग्रहरि काम मारनेगा पसुमा आहार, ये भोगौरभोगरिगतिक पान पर स्थागने योग्य है ॥ १३ ॥ आगे दानके अतीचार पहै :- मन्मकालानिक्रमगचित्तनिशेपणा विधानानि ।। दानेव्ययपदेशः परिहतव्या मला: पंच ॥ १५ ॥ अय-दानादि अनादर भार मा मार्य करित गरयोग कान काना, परि गपिन कमलादी भवन साना, मचिनीदारना, बहीर अपने माता की पिना, पहनने चार स्पागना योग॥१५॥ amit माना - जीरितमगणागनिदानमियानुरागगुमगा। मन्या मनमामिदमादिननिमाः ॥ १५ ॥ thanket R RITERaftatti ON --- माम परिषद १७७ निरा नि पारणा योगा काटिए । पा, न्याग किय अता- पनिका श्रीमाया जाना योग्य जिनन देने अर्हता- आने पनि मलाचार है.-- संकायाधा निंदा परमासंम्नया मला पंच। पग्निप्याः मरिगम्यतापिशोधिमिः मततम् ।। १६॥ अर्थ-भिनयपन या परणी, या भोगनिको पाठा करणी, या धर्मा माननिदा करणी नि फरणी, मिप्याथीनको प्रशंसा करणी, पुति परणी, ये पार अनाचार सम्पत. पिशोपन करनेवाले जे सपुगर लिनपरि नितर त्यागना योग्य ॥१६॥ आो असाधारन कयनी मंकोचरे:- सप्तति परिहनि मलानामेरमुत्तमधियो मतशुद्धप । भावका जगति ये शुभचिनाम्ने भवंति भुवनोचमनाया अर्ध-या प्रकार लोक उत्तमयुनी प्रावकह ने अतिचारनिकी मताते यदिए सतरका समूह ताहि त्यागैहे ते सुर्भाचत्त टोकके उत्तम नाथ होयह ॥ १७॥ आगे शल्पनिका निषेध करहै,- निदानमायाविपरीतदृष्टी- रायपत्तीरिव दुभएकी। ये वर्जयंतेमुसभागिनस्ते निःशल्यता शर्मकरी हि लोके ॥ १८ ॥ अर्थ-जे पुरुष याननकी पक्तिममान दुःरा करनेवाली जो भोग- नियो बाजार निदान अर वुटिल भावरूप माया अर विपरीत दृष्टि अमि.-११ श्री अमितंगतिभायकाचार। आवश्यकनिमें उत्साहका अभाव अर पोसहफी मुरत भूल जाना, ए पांच अतीनार मुख्य आचार्यनि- पोसह सि कहे ॥ १२ ॥ आगे भौगोपभोग पिरतिके पांच अतीचार कहे हैं- सहचित्तं संबद्धं मिश्रं दुःसपकमभिपराहारः। भोगोपभोगविरतेरतिचाराः पंच परिवाः ॥१३॥ अर्ग-माभिरारस्तु तथा सनितपस्तु करि सर्शित. पशु तथा सचित फरि मिन्या गस्तु बहरि दुःसने पंच ऐमा पर बहुरि काम महानिरास वस्तुका आहार, पे भौगोपभोगविगी पार भतीधार स्पागने योग्य है ॥ १३ ॥ आगे दानके अनाचार करें :- मगरकालानिमगविणनिशेपणा विधानानि । दानव्यव्यपदेशः परिहर्तव्या मलाः पंच॥१४॥ अर्थ-दानादि में अनादा माय सी मारा काहिए, पर योग यादा न करना, यहरि राचिन फगामापारि भोजन घाना, यह मचिना दालना, बहार अन्य आमा कर दिया, गटान अनाचार स्यागना योग्य है।॥१५॥ माना अनार 4.3.1.- जीवितमाणामानिदानमित्रानुगगगुरागा। गन्याम मलपंगामिदमापिदिनसियाः॥१५॥ अपर प्राय अनियमी को at Artistint afr7, Aii. ARE Time को क मा मग म. म..! ar, at infant to ifR: HTTLEnation Sun RL formertime to सम्म परिच्छेद। - निका पिनयन पारणा सो गुपर्शमा फरिए । यह संन्याम विर्ष अती- धागनिया जो पंचय ताहि जान्या जानिने योग्य जिनने ऐसे अर्हता- दिच ते प.हे है ॥ १६ ॥ आग सम्बनिक सतीचार यो:- काकांक्षा निंदा परशमासंस्तवा मला पंच। परिदर्सयाः मभिः सम्यत्तविशोधिमिः सततम् ॥१६॥ अर्थ-जिनयघनमें दोका फरणी, या भोगनिकी पाठा करणी, या धर्मामान निंदा करणी गनि फरणी, मिथ्यादृष्टीनकी प्रशंसा करणी, स्तुति करणा; ये पांच अतीचारह से सम्यक्त पिशोधन करनेवाले जे सत्पुरष विनकरि निरंतर त्यागना योग्यह ॥१६॥ आगे अतीचारनके कथनकी संकोचेहै- सप्तति परिहरति मलानामेवमुनमधियो प्रतशुद्ध । थापका जगनि ये शुभचित्तास्ते भवंति भुवनोत्तमनाया ॥ १७ ॥ अर्थ-या प्रकार लोकमै उत्तमयुद्धी भावकह जे अतिचारनिकी सप्तति कहिए सत्तरका समूह ताहि त्यागैहे ते शुभचित्त लोकके उत्तम नाथ होयह ॥ १७॥ आगै शल्पनिका निषेध को है- निदानमायाविपरीतसृष्टी- नाराचपतीखि दुःसफीः। ये वर्जयंतेमुराभागिनस्ते निःशल्यता शर्मकरी हि लोके ॥ १८ ॥ अर्थ- पुरुष याननकी पंक्तिसमान दुःरा करनेवाली जो भोग- निकी पांगरूप निदान अर कुटिल भावरूप माया अर विपरीत दृष्टि भनि.-१९ भी भमितिभागार rat Hभा को भू". EATERTAIT गोगको॥११॥ पोरी HER:- मिमा भोगोभोगणीगीगारा॥१३॥ " ॥ | Rat 4 V . है मानना Faman HTT: hti.17|| १५ ॥ 14. i anti 10 matamarME . ... , . . . .. # + , .
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भी MAITHITATI
In Hindi, मो,'
चोरी निगाग गाना ॥१८॥
मम्मानिगम रगति
यतानि नागदागिनानि गण।
ग्यिो गरी परगाय का?
जनम मोम्यानि इनम्नानि ॥१०॥
मी-गिनीन प्रकार या मारे गमन
नागो मार, जाने मनुमोमगारो प्याक पागलो नि
मोकारने मुगाप! नाही हो॥१०॥
प्रगम्तमन्यग निदानमुत
निदानमुक्तयतिनापीन्द्रः।
विमुक्तिःसंमारनिमिनमेदा.
द्विधा प्रशस्तं पुनरभ्यधायि ॥२०॥
अर्थ-निदानरहित ने मुनीता तिनकार व्रतीनो निदानह से
प्रशस्त अर अप्रशस्त में दीप प्रकार कमाई, बहीर प्रशस्त निदान
मुक्तिका समारका निमित्त इन भेदनि दोय प्रकार कसा ।
भावार्थ-निदानके भेद दोप, एक प्रगम्त निदान दूना अपराम
निदान; तहा प्रशस्त निदानके भेद दोय, एक मुनिानिमित्त, र
संसारनिमित्त, ऐसा जानना ।। २० ।।
आर्गे मुक्तिनिमित्त निदान को कह है;-
कर्मव्यपायं भवदुःखहानि
वोधि समाधि जिनबोधसिद्धिम् ।
आकांक्षतः क्षीणकपायवृत्ते-
विमुक्तिहेतुः कथितं निदानम् ॥ २१ ॥
मसम परिषद अर्थ-कर्मनिका अभाव अर संसारके दुःखकी हानि अर दर्शन ज्ञान तपस्वरूप पोधि अर समाधि काहिए शानसहित मरण अर जीवन ज्ञानकी सिद्धि इनको वाउता क्षीण काहिए मदह फायनिकी प्रनि जाकै ऐसा जो पुरुष साकै मुक्तिका हेतु निदान फाह । भावार्थ-निदान नाम बांधाका है मो मुनिहीकी याठा १ जाने मुक्तिपिना फर्मादिकका अभाव होय नाही सात सो निदान मुक्ति कया, ऐसा जानना ।। २१॥ आगै संसारनिमित्त प्रशस्तनिदानको कद है,- जाति कुल पांधपवर्जितत्वं दरिद्रतां या जिनधर्ममिद्धप । प्रयाचमानस्य विशुद्धपतेः संसारहेतुर्गदितं जिनद्रः ।। २२ ।। अर्थ-जिन धर्मको सिदिके अर्थ जातिको या कुटयो का बध. वनिकरि रहिरुपनेकौं वा दारिदपर्नेको पासता जो निर्मट मानि जाकी ऐसा पुरुष ताफे जिनेने मंमारके निमित म निदान फाया है। भावार्थ-फोऊ पाह कि जानि कुल भामिता जिनधर्म मो तथा पारवादि मातारे है। इन पारि रहित हो जाने धर्म संवा धन पापका कारण सा धनरहित ऊ जारी धर्म सधै सो ऐमी वाडा धर्म के आरा कविर भी है तथा आदि संसाराना होय नाही. तो सार है। निदान पारा॥२२॥ उत्पनिटीनम जनस्य ननं लाभो न जातिप्रभा कदाचित ।
श्री अमितगनिश्रावकाचार । उत्पत्तिमाहुर्भवमुद्धबोधा मयं च संसारमनेककष्टम् ।। २३ ॥ अर्थ-उपविरहित जो जीव ता निधी जाति आदिका लाभ कटान होय नाही, बडी उदत है ज्ञान जिनका ऐमे झानी पुर से र पतिको भा .. है, पहरि भर है सो अनेक दुर मगार । भागार्ग-जाति आदि ममारिना नाही साने आमारिकरी गा, देगा जानना ॥ २३ ॥ मंमाग्लामो विदधानि गं शरीरिणां मानगागिरंग। यतम्नतः मंगनिदुगमन- गिषा निदान न नमिष्टम् ॥ २४ ॥ भर्या गगारका दान मोनिको पारी मनको नाममारे पनी मममी पुन कार म अनिसान मो मन बनन फाप कर नायर दम जानना ॥२४॥ 4. Aarनामा, मोगाय मानाय निदानी त्यानतिनिश्टिम् । विनि लाम प्रतिापता: मंगरतानिशाना॥२५ ।। मई -17 :- 81fit,81, समय परिसर ----- निति गरको भाग मंगामि पटक्ने गाय . मामा-भाजनिषि निगो भोगाय निकान पानीममा सर्वामी मानार्थ निदान करितो मनिटान मेगा पारा जानना ॥२५॥ गति दोपा भवनानगरे मानंगमाजा चितनोति मोगः । . ते पगधा जननिन्दनीया न दुनो पान ग्ममा फरोति ॥ २६ ॥ १६-पिप भीग मो जीवनिक लोकषि जो दोर निना FARMitra -जननि कार निंदनीक से कौन अपराध 7 जिनदि राजन जमादानी न कर १, मर्य ही फर है ॥ २६ ॥ ये पीटयंत परिचर्यमाणाः पे मारयंने पन पोप्यमाणाः । में फस्स माग्याय मति भोगा जनम्ा गेगा इव दुर्निवाराः ॥ २७ ॥ अर्थ-आचार्य र योगदकी बात है जे भोग आचरन फरे मैले गैप मने पाटा सपना ? अर पुरा कर मैने मारे है से भोग गंगनि ममान दनिवार कीन मनुष्यफ मुग्गरे. अर्थ होय है, अपितु नाही तोपमा जानना ॥ २७ ॥ विनश्वरान्मा गुरुपंककारी मेपो जलानीव विवर्द्धमानः । ददानि यो दुःसशनानि कृष्णः म फस्स भोगो विदुपा निषेव्यः ।। २८ ॥ . .
श्री अमितगतिश्रावकाचार। ॥ अर्थ-सो विषय भोग कौनकै पंडितजन करि सेयये योग्य होय अपि तु नाही होय । कैमा है विषय भोग जो यर्द्धमान भया संता जैसे मेघ जलनिकों देय है तैमैं दुःसनिकै सैकडानिकौं देय है, कैमा है मेघविनशनशील है स्वम्प जाका सो यह भोगभी बिनसनशीलहै. बहुरि मेघ महाकीचका करनेयाला है बरि मंत्र काला है, सो यह भोग भी मलीन है ऐमा जानना ॥ २८ ॥ यो याधते शक्रममेय शक्ति स कस्य वाधा कुरुते न कामः । यः प्लोपते पर्वतवर्गममिः सहंचते किं तृणकाष्ठगशिम् ॥ २९ ॥ अर्थ-जो काम अप्रमाण है शक्ति जाकै ऐमा जो ताहि पी? ४. मी काम कान र यात्रा न फर है ! महाक कर है । इहाँ दृष्टांत फो. जो अग्नि पर्वतनके सहयों जला है मो अशि कहा मृगकाष्टके समूहकों छोर है, अपि तु नाही छोर है, ऐगा जानना॥२९॥ ममीरणाशीय विमीमरूपः कोपममावः परधरतीं। अनान्मनीनं परिह काम- नं याचनीयः काटिलः ग मोगः ॥ ३०॥ अ-आगो अर्थ अनि onा नोगत गागरेको । व। जिन मे पुरपनि कार सो वियोग मारना योगना, काभंग, गर्ग समान भयानयम मारा मार्ग मामला प्रसासो या भोगी बीमाभिमा पण तिमी Ram ht, at rintamanirmiri Hetanki Ram। पापमामा Helli॥ erior-stretart a n kun warm Poran Ban 04 मा. on twishesi prrna.10 को भी mat rai-alth a great यिन कर HTRA Antim me ॥ वामनः पापन: पोपनी इंपन: प.511: शिमल पमनः । फोरिकी मालिः शाशिस्तिपः विगे एप्पको धरः दिशः ॥ ३२ ॥ पिराशिको मृपिता नाइको पंगुली मंजुलः पिपलपमगः । वाणिनि राममो पापगः एगी महंटी मानतो जायते ॥ ३३ ॥ माननायएपीय पासा पह-वामन होप १, र होप है, Erintinut, पटोर होय है, रोगरा श्री अमितगतिश्रावकाचार। -~~ कहिए बडे रोमका धारी होय है, सिमल कहिये भूरा होय है, पापी होय है, कोली होय है, माटी होय है, मिलावट होय है छौंपा होय है, चाकर होय है, पगधीन लोभी होय है, मूढ होय है, कोढी होय है ॥३२॥ चीता होय है, बुबु होय है, मुसा होय है जाहक होय है, बहुरि यंजुल मंजुल पिप्पट कोईनीच नियंचविशेष है सो होय है, बहुरि सर्प अर कुत्ता अर तीतर अर गधा अर कागला अर मुर्गा अर बन्दर इत्यादि नीच मनुष्य निर्यचन पर्याय जीव मानतें पांव है तातें मान त्यागना योग्य है, यहु तात्पर्य है ॥ ३३ ॥ लक्ष्मीक्षमाकीर्तिकृपासपी निहत्य सत्या जनपूजनीयाः । निषेव्यमाणो रमसेन मानः श्वभ्रालये निक्षिपतीति घोरे ॥ ३४ ॥ अर्थ-सया भया मान है मी मन्या म्प अर लोकनि करि पूजनीक ऐमी जो लक्ष्मी अर क्षमा अर कीर्ति अर दया अर पूजा इनौं नासकै अर जबरदस्ती घोर नरकवासविर्षे पटकै है ॥ ३४ ॥ अनंतकाल ममवाप्य नीचां यद्येकदा याति जनोऽयमुनाम् । तथाप्यनंता यत याति जाती. हयो गुणः कोऽपि न चात्र तस्य ॥ ३५ ॥ अर्थ-जीव है सो अनंतकाल ताई भीच नानिकों पाय करि एक- काल उच्चजातिको प्राप्त होय है, आचार्य के ?, यडे खेदकी बात है तो भी जीव अनेन जातिनकों प्रान होय । यहीर सानी र इहा ऊंचा गुण कोई भी न दैपिए है।
4- . A mirmirit.in रdianrail imalayanti shiATHE Permance ॥१६॥ ....... futomatya F, arit in Navin writi Am २y Mothes in है राम गाणी मापाप न किमनि पाम् । मापान पायनि प पगार यापन प्रियानि ॥२७॥ उपायनापापविक्षन्प ! विमलयमानः गुणकारी। स्वपनापश्मीन यानि- दानि दुःयानि गुगानि जातु ॥२८॥ १६-il inbf की नौका देगा मा पानीचर agni antrit | भीगा गोभी ratnा मना पाहा 3ा पुग्यो गुपयों न परिस, BE.या चपना नाचरनाका विका? मी काया
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
।
।
भया संता दुःख करनेवाला है। बहरि ऊंचपना नीचपना मयी जा
है मो मुखनिकों वा दुःसनिकौं कदाचित् न देय है ॥ ३८॥
भावार्थ-कोऊ पुरुष औरनते आप बडा है सो आप वडेवं
दोख आपको दुखी माने है । बहुरि कोई पुरुष औरनित छोटा है से
भी आप तैं छोटेनिकों दग्वि आपको बडा मान मुख मान है। ता
मोही जीवकी मिथ्या माननेमैं मुख दुःख है किळू वाह्य जाति आःि
मुख दुःखका कारन नाहीं । ऐसा जानि जान्यादिकका गर्व न करन
ऐसा इहा प्रयोजन जानना ॥ ३७-३८
हिनस्ति धर्म लमते न सौख्यं
कुबुद्धिरुचत्वनिदानकारी।
उपति कष्ट सिकतानिपीडी
फलं न किंचिजननिन्दनीयः ॥ ३९ ।।
अर्थ-ऊंचपनेका निदान करनेयाला कुबुद्धि पुरुष है सो धर्मक
नाश कर है अर मुखकों न पाये है, इहां दृांत कहे हैं, जैसे
टोकवि निंदनीक मूर्ख पुरुष याद रेतका पेटनेवाला कटको प्राप्त
होय है अर किछ फटको नहीं प्राप्त होय है तैसें ।
भावार्थ-निदान करे मुस न मिले है, जाने मुग तो पुण्योदयके
आधीन है, अ पुण्यके आशयते पुण्य होय नाहीं तातें जैसे शर
रैन पेले किळू तेल न करें उलटा कष्ट होय है तैसा निदान भी
जानना।। ३९॥
यशांमि नभ्यंति ममानवृत.
गंदातरम्येव मुमानि मद्यः।
विपद्धते तस्य जनापवादो
विवाहलम्येव मनोविमोहः॥४०॥
. ...int the om rit panthi rehn: 21 Form -htorinthi grammarin romana sila Arthatी मन । Heignment मग ।।४।। aar-haricelleni le femalama FIRITER fare markm निसरीन PARANTERame need पता गुणा गयाः पमन्ना भानिध्या पमयमापाः । मगप्यमाणा विधिना विविवामिपा भूमिगहापानति॥४२॥ writayni. narrow मर्याद्वारा नियम mofortanारगाव स्याग प्यादि पविध गुण PM: Eniitte, भूमिरिक kinnr माRE TH , अपितु न जानु मानन निदानमिय कंगति दो परिपित्य चित्रं । प्रापrent न किमानी विपण साति वितनोति कोपि। ४३ श्री भामितगतिधारकाचार । अर्थ-या प्रकार मानके नानाप्रकार दोरमी विचारिक मानमहिन निदानको कटाव भी न कोहै। जैसे प्राण नाशकौं देगता पुन कोई भी शिकार तृमिकी न विस्तार से ॥ १३ ॥ यो पानालादि निदानमनः कगेनि कृत्वा परणं पिनि । हि पद्धपिला फलदानदा म नंदनं मम्मयते यराकः ॥ ४४ ॥ अर्थ-जो नाना प्रकार पारिसको फरफ भर अज्ञानी पागमाना आदिका निदान को गो याग गुल फलदेने में प्रयोग देमा मे माननन माह यदाय करि भरम है। भाग-जो पारिवारीपागनी ज्यो माग्ने आदिका निान पर सो परिचया नासा करे? अनलगंगारी हाय ऐमा जानना ॥४२॥ पर गंयम दुपरमादगानो मोगादिकांक्षा तिनोति मदः। कंटे गिलामा निधाय गुती रिमानं तीग मलय मध्यम् ॥ ४५ ॥ wri-it म! म ना ना भrmfes: 4 fi/ो दाब पति, माया awan RERAL HA५॥ प्रिया धन निदानमिर्ग famM गाणी गातिः। प्राध्यामिनी farrialTIPAL || ४६ ॥ * irar Tara Hata singeroxii frientifitीमत 14 परम पारम्। परणा योग्य नाही, असे पगह आधी हा जिनने अर जान्या अपायका दौर जिनने मे सम्जनौ से अपध्यका सेग्न न करें। भाषा-संगारगेगको औन्ध पानि अर निदान मसागरांग पहायपाटा दुप। जे चारित्रवार है अर निदानकौं पुरा जाने ते निदान न पोहे, एंगा जानना ॥ ४६॥ देगा निदानशल्पया वर्णन किया । आगे मायाशल्यका वर्णन आयामविधामनिरागशोक- पायशादधमरमेदाः। भवति यस्यामवनारिवागाः सा फस्य माया न करोति कष्टम् ॥४७॥ अर्थ-जैसे भूमिमें दक्ष होय तसे प्रयास अर विश्वासफा अभाव' अशोक अर देप अर फष्ट अर श्रम अर घर इत्यादि भेद हैं ने जिम मायाविय होयह सो कौनक फट न करे, सर्वही करै ।। ४७ ॥ स्वल्पापि सर्वाणि निपेच्यमाणा सत्यानि माया क्षणतः क्षिणोति । नाल्पा शिखा कि दहतींधनानि प्रवेगिता चिनधितानि ।। ४८ ॥ अर्थ-धोडी भी सेई भई माया क्षणमात्र में सर्व सत्यका नाश को है। इहां दृष्यत फोहै;-अमिकी अल्पमाला प्रवेश करी भई यहा संचय रूप धनना नाही दहहै ! दहीह ॥ १८ ॥ निकरितुं वृत्तवनं कुठारी संमारपृक्षं सवितुं धरित्री ।
1 श्री अमितगतियायकाचार । योधप्रमाध्यमपित त्रियामा मापा विवा कुशलेन दूरम् ।। ४९ ॥ अर्थ--प्रवीण पुरुष करि माया दूर स्यागनी योग्यहै, कैसीहे माया चारित्रबनके काटनेकौं कुल्हाडीसमानहै, अर संसार मप यक्षके उपना- बनेकौं पृथ्वीसमानहै, अर ज्ञानरप प्रभाप्रकाश के नाशनेको राशिसभा- नहै । ऐसा गानना ॥ ५९॥ हिनस्ति मैत्री वितनोत्यमैत्री तनोति पापं वितनोति धर्मम् । पुष्णाति दुःरां विधुनोति रोग्य न यंचना किं फुरुते विनियम् ॥ ५० ॥ अर्थ -माया है सो मैगी फहिए प्रीनि साका नाश पर है भर निको पिस्तार है, पापको विस्तार है भर धर्मका शिस करे, गयो पुष्ट यो है अर गुगका अभार कर है। यहीर शो माया फोन निदने योग है ताहिन को सही कर है ॥ ५० ॥ मायाका वर्णन किया । आगे मिग्याप शयका वर्णन को न पृथ्पने सामनयमगी शिमोधमानी ग्मन येन । सनि मिष्याम्पिटिष्ठाः गदा मिदं यागदापि ॥ ५ ॥ भर्ग-बिग मिथ्या जिदानी गरेmahi गेम न बन ग : मिया 1 जन? न , मामिया याद बम बना ५॥ ! ।
पनि rig नववर माजाम् । माना friefraiने. मानापमपाणि मितिः ।। ५२ ॥ ori-11-2 चाल पर्म मा १. मालिश Manmantri न प्रमाण मा-कोर ब. क. गाता में गोधरा रोग नाही. बार कर्म- समान in र बम विना नो पापी santhruitmग मी मा अभार पागे सर्व प्रमाण प्रमाण रे मो पस्तु नारी, मर्म मा॥५२॥ 1 - गये पि पातुं न गुरादिकार्य मायाग्नि शानिर्गनतनवान् । प्ररममानाः वयमेव प्या: गिननाः बापि मया न कापै ॥ ५३ ॥ धर्म-जाति मुगातिका पूर करनेकी ता फर्म फे शाक्ति नाही, जाने पर अपना भने कोई कार्ययि अचेतनपदार्थको सय- मेष प्रयी नदेगे। भावाप-जावक गुर नादि घात करनेकौं कर्म समर्थ नाही जाने माप पतन है । कमें अचेतन पदार्थ कार्य करने न देखें , रासाने का अभाय माया ॥ ५३॥ ।
frm . ... महामान नं गुमो गीमिया प्रमागमम्मामापमान मग मिरमानजि ।। ५५ ॥ wi-krtient aff नीर *दी पर सनी, नाhindATTRATE:- fre मनमानमा in अनुमान गगषमाममा गोर मोपलीमभयमन्मय मोहाः । मांजतुनिग्नुभूनाः कर्मणा किमु मांति बिनने ॥ ५५॥ अर्थसनिक सम् नि कीर अनुमा किट मे जे गगन मद ममर शोक मोपलो भय कान मह इयदि विकारभाव ते कर्म पिना ये कमें होय। भावार्थ-ससाग जीवनिक कर्म वह जाने कर्मनिक उदयका कार्य जो रागादिभाव ते सर्व जीवनि करि स्वनवेदन प्रत्यक्षमरि जानि है, कर्मोदयविना रागादिक में मैं होय; जाम कर्म वैध नाही सो रागादि सहित नाही में मुकजीव । इहां कार्यलिंगत अनुमान किया है ॥ ५५॥ आर्गे फेर आशकाका उत्तर कोहै,- ते जीवजन्याः प्रभाति ननं नेपापि भाषा खलु युक्तियुक्ता।
ससम परिच्छेद। नित्यमसक्तिः कथमन्यथैरों संपधमाना प्रतिषेधनीया ।। ५६ ॥ अर्थ-वादी कह है कि ते रागादिभाव जीवहीत उप है; सा आधार्य करें?--कि ऐसी पाणी नियमकरि युक्त नाही, जातै । रागादि जांबहीत उपजे होय तो इन रागादिकनिकी नित्यसंमेधता आ- सो कैसे निषेध करने योग्य होय । भावार्थ-~-रागादि भाव आत्माके स्वभाव होय तौ स्वभावका अभा होने सरै अवस्थामै रहे चाहिए तय जीयकै मोक्ष फैसैं होय, ताते रागादिक से फर्मोदय के निमित्त विना न होयहै, ऐसा जानना ॥ ५६ ॥ भागै फेर करैहै;- नित्येनीवे सदा विद्यमाने कादाचित्का हेतुना फेन संति । निर्मुक्तानां जायमाना निर्दु ते शवयंते केन मुक्तिय तेभ्यः ॥ ५७ ॥ अर्थ -सदाकाल विधमान जी निय जीव ता वि कहाँ होय कही न होय ऐसे काच होनेवाले जे रागादिक ते कौन कारणफरि होयहे, अर मुक्त जीवनिकै उत्पन्न भए जे रागादिक से काहे फार निषेधनेको समर्थ छजिए र तिन मुक्ति काहेपरि होप । भावार्थ- फटिकमणि निर्मल तो सदा है ताने फाला पीला आदिजैसा डांफ रग तसा परिणमैं सो परिणरन कदाचित होपहै ताते ताको कदाचिरक फाहिए सैसे आत्मा तो नित्यो ता मोहादि फर्मको निमित्त मिले रागादिरूप परिणमन होयह सो फाइरिफर, भरत रागादि कर्म निमित्तविना होय तो रामदिक नियसभार हरै तब -- श्री अमितगतियायकाचार । तिनका मुक्तजीवकभी अभाव कैसे होय मर तिननें कैसे छूटे, ताते कर्मका अस्तित्व मानना योग्यहै ।। ५७ ॥ आगें फेर कहेहैं;- तुल्यप्रतापोद्य मसाहसानां केचित्रमते निजकार्य सिद्धिम् । परे न तामत्र निगद्यतां मे कर्मास्ति हित्वा यदि कोऽपि हेतुः ॥ ५८ ॥ अर्थ-समान है प्रताप अर उद्यम जिनके ऐसे पुरुपनिकै मप्प केई पुरुष अपने कार्यकी सिद्धिकी पात्र हैं, बहुरि और कई ता कार्य- की सिद्धिकौं न पात्र हैं; सो इहां कर्मसिवाय और कोई भी कारण होय तो मोसैं कहि । भावार्थ-समान पुरुष समान उद्यम करै तहां कोईकै सिद्धि होय फोई के न होय सो इहा कर्मसिवाय और कारण नाही, ऐसा जानना ।। ५८॥ आगै फेर कहै हैं- विचित्रदेहाकृति वर्णगंध- प्रभावजातिप्रभवस्वभावाः । फेन क्रियतेभुवनगिया- थिरंतनं कर्म निरस्य चित्राः॥ ५९ ।। अर्थ-लोकविय नानाप्रकार शरीर वर्ण गंध वीर्य जाति इनके उपजाबने रूप है स्वभाव जिनके ऐसे जे अनेकजीयनिके समूह पहला पुरातन कर्मविना कौन करि करिए है। भावार्थ-पहला कर्म न होय तो आगामी नाना शरीर काद। टपन, ता प्राचीन फर्म मानना योग्य है ॥ ५९ ।। .
- सप्तम परिच्छेद । १९५ विवद्धर्ष मासाभर गर्भमध्ये पहुभकारैः कलिलादिभावः। उद्वर्य निष्कासयने सविण्या को गर्भतः कर्म विहाय पूर्वम् ॥ ६॥ अर्थ-गर्भविष नव मास ताई नानाप्रकार रविरादि भावनि करि बढायकै अर पलटके माताके गर्भ से पूर्व कर्मविना कौन निकासै है भावार्थ-पहला फर्म न होय मो गर्भ में वृद्धि होना अर मुख पलटके गर्भ से निकासना इत्यादि कार्य फैसैं होय, तात र्श कर्म अवश्य मानना ।। ६० ॥ आगें यादीन कही थी कि कर्म अचेतन है सो कार्य कैसे करे साका उत्तर कर है:- विलोकमानाः स्वयमेव भक्ति विकारहेतुं विषमयनाताम् । अचेतनं कर्म करोति कार्य कथं चदंतीति कथं विदग्धाः।। ६१ ।। अर्थ-शिष वा मदिरा इन अचेतननः उपजी जो विकारकी कारण शक्ति साहि आपही देरते सते चतुर पुरप है ते “अचेतन जो फर्म सो कार्यकों में की है " ऐसी कैसे करें है। भाग--मदिरादि अचेतन वस्तु है सो जैसे गहरपना टपजायें है सैसे फर्म भी अचेतन है सो अपना कार्य कर है, या शेफा फहा, प्रत्यक्ष अवेतनका कार्य देगिए है ॥ ११ ॥ आगै फेर कहे हैं- नानाप्रकारा भुपि पक्षजाती- पिंधूय पत्रागि पुरावनानि ।
श्री अमितगतिश्रावकाचार। अचेतनः किं न करोति काल: प्रत्यग्रपुप्पप्रसवादिरम्याः ॥ ६२ ॥ अर्थ-पृथ्वीविय अचेतन जो काल है सो नानाप्रकार वृक्षकी जो जाति ताहि पुराने पत्रनकौं झड़ाय करि नवीन पुष्प पत्रादिकनि करि मनोहर कहा न कर है ! कर ही है। भावार्थ-जैसैं अचेतनकाल है सो वृक्षनिके पहले पत्र झडाय नवीन पत्रादि करै है तैसे अचेतन कर्म भी अपना कार्य कर है, ऐसा जानना ॥६२ ॥ आर्गे फेर कहैं हैं;- यनिःशेष चेतनामुक्तमुक्तं कार्याकारि ध्वस्तकार्यावबोधेः ।। धर्माधर्माकाशकालादि सर्व द्रव्यं तेषां निष्फलत्वं प्रयाति ॥ ६३ ॥ अर्थ-जिन पुरुपनि करि चेतनारहित अचेतन द्रव्य है सो सर्वथा कार्यका करनेवाला नाही ऐमा कह्या तिनकै धर्म अधर्म आकाश काल आदि सर्य द्रव्य निष्फटपनेर्को प्राप्त होय हैं, कैसे हैं तै पुरुष नष्ट भपा है कार्यका ज्ञान जिनकै । भावार्थ-जे सर्वथा अचेतनको कार्यका करनेवाला न माने है तिनकै धर्मादि द्रव्य अचेतन है ते निकल टहरै तातै तिनके कार्य कारणपने का ज्ञान नाहीं। यपि धर्मादि द्रव्य प्रेरक कर्त्ता नाही तथापि निमित्त नैमित्तिक भार मात्र परस्पर कार्य कारगरना है, सो म्यादाद ते अविरोध सधै है ॥ ३ ॥ आगे कोऊ कहकि अमूर्त विक मृतक कर्म नहीं बंध है, ताका समाधान करे हैं- - मसम परिच्छेद। जीवरमूर्तः मह कर्म मूर्त संवध्यने नेति वचो न वाच्यम् । अनादिभूतं हि जिनेन्द्रचन्द्राः फांगिसंबंध मुदाहरति ।। ६४॥ अर्थ-अम्तीक जीवनि सहित मृतक कर्म न बंधहे ऐसा कहना योग्य नाही: जाते जिनेंद्रचंद्र ते पर्म अर जीवनिझा अनादित संबंध यह है । भावार्थ-जीय फर्मका अनादि संबंधहे मो अनादिस्वभावमें सर्क नाही, ऐमा जानना !! ६४॥ आगें इस कथनको मैको है ! इत्यादि मिथ्यात्वमनेको यथार्थवत्वप्रतिपत्तिादि। विवर्जनीयं विविधेन गद्धि- जनं प्रतं रत्नमियाथपद्भिः ॥६५॥ अर्थ-सन कार इत्यादिफ मिथ्यात्य नानाप्रकार यथार्थ तत्यक्षा- नका नाश करनेवालाई सो मन ययनकापफरि त्यागना योग्य है फैसे? सत्पुर जिन भगवानकै मतको पनकी ज्यों मेबैहै ।। ६५ ।। भागै एकादश प्रतिमानफा वर्णन फरें है। एकादशोक्ता विदितार्थतन्व- स्पामकाचार विधैर्विमेदाः । पवित्रमारोहमनन्यलभ्यं सोपानमा इव मिदिमाघम् ।। ६६ ।। भई----जाने पदार्थनिके स्वरूप जिनमें ऐसे बहतादिकनि फरि भाषफफे आधारकी विधिके भेद पारद को, भेद परित्र मोक्ष -... ve श्री अमितगतिश्रावकाचार। महलके बढनेकौं सिवाणके मार्ग समानहें, कैमाहै मोदमहल अन्य सामान्य जनकरि नाही पावने योग्यहै, ऐसा जानना ॥६६॥ आगें ग्यारह प्रतिमानमैं प्रथम दर्शनप्रतिमाकों कहे हैं;- यो निर्मला दृष्टिमनन्यचित्तः पवित्रवृत्तामिव हारयष्टिम् । गुणावनद्धां हृदये निधत्ते स दर्शनी धन्यतमोऽभ्यधायि ।। ६७ ॥ अर्थ-नाहीहै और ठिकाने चित्त जाका ऐसा जो पुरुष पवित्र अर गोल हारकी लडीसमान निर्मलदृष्टिकौं हृदयमै धारैहै सो दर्शनसहित पुरुप अतिशयकरि धन्य कह्याहै, कैसी है हारकी लड़ी गुण जे डोर तिनकरि बंधीहै, अर निर्मल दृष्टि वात्सल्य आदि गुण कर बंधी ऐसा जानना ॥ ६७ ॥ आगै व्रतप्रतिमाकों कहेहैं;- विभूपणानीव दधाति धीरो प्रतानि यः सर्वमुखाकराणि । आक्रष्टुमीशानि पवित्रलक्ष्मी ते वर्णयंते व्रतिनं वरिष्टाः ॥ ६८॥ अर्थ सर्व मुखनिके स्थान जे बारह व्रत तिनहि जो आभूषण- 'निकी ज्यों धारहै ता पुरुषकौं आचार्य व्रती कहैहैं, कैसे, बारह प्रत पवित्रलक्ष्मी जो स्वर्गमीक्षकी लक्ष्मी ताकं प्राप्तकरनेको ममर्थहै, ऐसा जानना ॥ ६८ ॥ आगै सामायिक्यतिमाको कहहैं,- रांद्रातमुक्तो मवदुःसमोची निरम्ननिः शेषरुपायदोपः। 14
Trmire
पापारिक प्रकार
गागादिविनः गप्पम् ।। ६९ ॥
mitti Maa AAR पनि
Arra Amit नामो पुल
Frer Revingner गारिक. 10 लि
anit.॥
भागमोmal-
EMEDIT गुगामिलापः
गति यः पपंगतुए.पि ।
पदोपदार्ग परफर्म का
प्रापन घडपिपाममीएः ॥७॥
art-- जनित गुरवी अभिगा जाने
on मो पुल पर परीय मागको दोय अएमी दोय चतुर्दशी
इन पारनियमापरि निधपकोरे सर उपकाम कर सो
प्रांरपतिगापा समुदानके firi तिमद ॥ ७० ॥
भागे परिणयामप्रतिमा का?।-
दपाई पिता जिनवारपदी
नयन्मने किंपन यः मचितम् ।
अनन्यसाधारण धर्मपोपी
गनितमोपी म कपापमोपी ॥७॥
भदायर भीग्यापित जाका जिनेदक पचननिका
जाननेवाला ऐगा जो पुरष कामी गचित्तको न छाप सो और के
समान मारा ऐमे अमाधारण धर्मका पुष्ट करनेवाला फायरहित सचि-
सम्यागी कमाई ॥१॥
२०० श्री अमिनगतिश्रावकाचार। आंग रात्रिभोजनका त्याग या दिनमै अनमःयाग प्रतिनाको कहैं। निपेवते यो दिवसे न नारी- मुद्दामकंदर्पमदापसारी। कटाक्षविक्षेपशरीरविद्धो युर्दिन ब्रह्मचरः स बुद्धः ॥ ७२ ॥ अर्थ-~-जो पुरुष तीत्र कामके मदका दूर करनेवाला दिवसविणे नारीकी न सेयैहै, सो पंडितनि करि स्त्रीकठाक्षका चढावनारूप वाणनि करि नाहीं वींध्या दिनविय ब्रह्मचारी काहै । दिनविय तो स्त्रीका न सेवना सो दिनब्रह्मचारीहै या यहु रात्रिभोजनकाभी त्यागीहै, ताते याहीका नाम रात्रिभोजन त्यागी मी कयाहै; ऐसा जानना ।। ७२ ॥ आरौं ब्रह्मचर्यप्रतिमाकों कहेहैं.- यो मन्यमानो गुणरत्नचौरी विरक्तचित्तस्त्रिविधेन नारीम् । पवित्र चारित्रपदानुमारी स ब्रम्हचारी विपयापहारी ॥ ७३ ॥ अर्थ- विरक्त पुरुष स्त्री को मन वचन काय करि गुणरत्नको चोरनेवाली मानता सता पवित्र चारित्रके पदका अनुसारी विपपनका न्यागी सो ब्रह्मचारी कया है ।। ७३ ॥ आगे आरंभ त्याग प्रतिमाफौं कहै है-- विलोक्य पङ्गीवविधातमुथै- रारंभमत्यस्यति यो विवेकी । आरंममुक्तः स मतो मुनीन्द्र विरागिका संपमवृक्षसेकी॥७४॥ - --- - समम परिच्छेद। २०१ अर्थ-अतिशयकार पट्कायिक जीवनिका घात देख जो विवेकी आरंभको त्याग है सो मुनींद्रनिगरि आरभ रहित फसा है, कैसा है सो विरागी सपमक्षका सौचनेगला है ॥ ७१ ॥ आगें परिबह रयाग प्रतिमाको कहै हैं;- यो रक्षणोपार्जननश्वरत्व. दंदाति दुःखानि दुरुत्तराणि । विमुच्यते येनपरिग्रहोऽसौ गीतोऽपसंगरपरिग्रहोऽसौ ॥ ७५ ।। अर्थ-जो परिमह रक्षा फरणा उपार्जन करणा विनसना दुःखते उत्तरे जाय ऐमे दुःखनिकों देय है, ऐसा यहु परिग्रह जाकरि त्यागिए मो यह परिग्रह रहिस जे मुनींद्र तिन फरि अपरिग्रह काया है ॥७॥ मार्ग अनुमति त्याग प्रतिमाओं कहें हैं, आरंभसंदर्भ विहीनचित्तः कार्येषु मारीमिव हिंस्ररूपाम् । यो धर्ममतानुमति न दत्ते निगवते मोऽननु महमुख्यः ।। ७६ ॥ अर्थ-आरंभकी रचना करि हीन है चित जाका भर धर्मका भनुमोदन करनेवाला ऐसा जो पुरुष पापकार्यनिवि हिंसकरूप मारी समान जो अनुमति कहिए सलाह ताहि न दे सो नाही अनुमति करनेवाडेनि मैं प्रधान कहिए है। भावार्थ-~-पापकर्मकी अनुमोदनाफा स्यागकर सो अनुमतिस्यागी दशमप्रतिमा धारी कहिए, ऐमा जानना ॥ ७६ ॥ मागें उरित्याग प्रतिमाओं कई है, २०२ श्री अमितगतियायकाचार । यो वंधुराबंधुरतुल्यचित्तो गृह्णाति मोज्यं नवकोटिशुद्धम् । उद्दिष्टवर्जी गुणिभिः स गीतो विमीलकः संसृति मातुधान्याः ।। ७७ ॥ अर्थ-जो पुरुष भले बुरे आहारमै समानह चित्त जाका ऐसा जो पुरुष नवकोटिशुद्ध कहिए मन वचनकाय करि करया नाहीं कराया नाहीं करे हुएको अनुमोद्या नाहीं ऐसे आहारकों ग्रहण कहै सो उदि- एत्यागी गुणवंतनिनें क्या है, कैसाहै सो संसारम्प राक्षसीसे विशेषमय- भीत है ।। ७७॥ ऐसे ग्यारह प्रतिमाका वर्णन किया । इहां सक्षेप देसाहै, जो. मिथ्यात्व अर अनंतानुबंधी कपाय इनके उदयका अभाव ती सम्यग्दर्शन होतही भया, यहुरि अप्रत्याख्यानावग्णके उदयके अभावतें देशविरत- नामा पंचम गुणस्थान होयह तार्क दर्शन प्रतिमाम लगाय पर उपर विशुद्धताकी अधिकतात ग्यारह भेद कहेहैं सम्यक्सहित चारह व्रतनि- होकी ऊपर ऊपर निर्मलता होती जायहै, ऐमा जानना । इहा कोऊ कहकि देशवतका घातक जो अप्रन्यारव्यानावरण कपाय ताके उदयका तो अभाव भया अव होनअधिक विशुद्धिता किस कर्मके उदयत होयह -ताका ऊत्ता, यद्यपि इहां अप्रत्यारव्यानावरण फपायका उदय नाही तथापि प्रत्यारण्यानावरणकपायके मंद तीत्र उदपर्ने होन अधिक विशुदिना होयहै, जैसे प्रत्याल्यान करायका अभाव होने पर- मादि गुणस्यानमैं होनाधिक विशुद्धता मंचलन तीवमंद टदपत होयह तैसे, ऐमा जानना !॥ ७७ ॥ क्रमणामूथिने नियति मुदकादश गुणा. नलं निंदा गर्दा निहितमनमो येस्ततममः। -- सप्तम परिच्छेद। २०३ भवान् द्विवान् प्रांत्वाऽमरमनुजयो रिमहसो. धूिर्तनोपंघाः परमपदवीं यांति सुखदाम् ।।७८॥ अर्थ--दूर स्याह अज्ञान अधकार जिनका, पहुरि निदा गर्दा वि लगाया है मन जिननें ऐसे पुरुप अतिशय फरि हर्पसहित इन पूर्वोक्त ग्यारह गुणनको चित्तवि धार से पुरष बड़े हैं तेन जिनके ऐसे देव मनुष्यनिविष दोय तीन भव भ्रमण करि बहुरि नाश किये है पापध जिननें ऐसे ते मुखकी देने वाली परमपदवी जो मुक्ति ताहि प्राप्त होयहैं। भावार्थ-जे सम्याटी ग्यारह प्रतिमाको धारैहैं। आपकी निदा गर्दा करे ते दो तीन भव देवादिकके मुख भोगकै सिद्ध होयहै, ऐसा जानना ॥ ७८॥ इदं धत्ते भल्या गृहिजनहितं योन चरितं मदकोधायासप्रमदमदनारंभमकरम् । भवांभोधि ती.जननमरणावर्त्तनिचितं प्रजत्येपोध्यात्मामिवगतिमतं निर्धतिपदम्।।७।। अर्थ---जोपुरुष इहां भक्तिसहित ये गृहस्थ जनका हितरप चारि- प्रकौ धौरहे सो यह आत्मा ज्ञानी संसार ममुद्रको तिरके मर्वज्ञदेवकार कहा जो शिवपद साहि प्रान होयह, कैसाई संसार समुद्र मोध स्वेद हर्ष काम आरंभ येहीहै मगर जाविष, बरिजन्म मरणमप भौरनिफार म्याप्तहै ॥७९॥ काविस छ। दर्शन प्रत सामायिक प्रोपथ मचिन रात्रिभोजन परिवार । प्रवचर्य आरंभ परिग्रह अनुमतिविरति दसम गुराकार ॥
श्री अमितगतिथावकाचार ।
पुनि उदिएत्याग पडिमा इम धारत जो श्रावक दुसहार।
-सो स्वर्गादि संपदा लहिक होय अमितगति पद अविकार
इत्युपासकाचारे सप्तम परिच्छेदः।
ऐसे श्री अमितगति आचार्यविरचित धायकांचारविर्ष
सप्तम परिच्छेद समाप्त भया ।
अप आम परिच्छेदः।
.
ent. थायो-
यी सपम् ।
राण निगपने ॥१॥
- Har Ba Mat
भास्य . fairns TEART
लियाmarrit, rinianit. रिम
Mr.
Trainit,
भाms-Mant ||१॥
आगमाननपर्यापी पती जनी पग्धितः ।
अभिधातुं नरः पन विनरेण गायने ॥२॥
- भिनगालि भाग मा पनि ताने
FURTHER बायोमर्थ नि॥२॥
मनोविनि पानाधिमाकार जंतुषु ।
अयोधतानेपागुपकारी भरिप्पनि ॥ ३॥
अनाना HEN निकोसने भी जमशन तिनमा
इमान उपचार पगा।
भावार्ष-आगमी अन मी सर्व कोन फरिमयों पातु सक्षे-
पमात्र आपकथा व परिह, जाफे जाने माने भी जे मंदशानी
लनका टपकार रोयगा, ऐगा जानना ॥३॥
थी अमितगतिश्रावकाचार। संसारसागरे मीमे दुःखकल्लोलसंकुले । रागद्वेपमहानके राद्रव्याधिझपाकुले ॥ १२ ॥ चिरं वंभ्रम्यमाणानां जिनेंद्रपद वंदना । दुराया जायतेऽत्यर्थमिति यो हदि मन्यते ॥ १३ ॥ अर्थ-अनेक जोनि है पाताल जा विर्षे, यहरि नानाप्रकार गति ही है पतन कहिए पुर जा विष, अर जन्म मृत्यु जरा ही है आरत फहिए भोरे जामैं अर महापापही है जल जा विौं अर दुःख रूप लहरन करि व्याप्त अर रागद्वेष ही हैं पडे नक जा थि अर भयानक रोगरूप मच्छनि करि भरथा ऐसा जो भयानक संसारसमुद्र तानि बहुत कालते अतिशय करि भ्रमते जे जीप तिनको जिनेंद्रफे परण- निकी जो यदना सो अतिशय कोरे दुर्लभ है ऐसा जो पुरुष पिणे माने है ।। ११-१२-१३ ॥ पहरि करे - अनर्थकारिणः कांताजननी जनकादयः । म्यस्योपकारिणो योऽसं पुध्यते परमेष्ठिनः ॥ १४ ॥ अर्थ--श्री माता पितादिकनिका अनर्थक करनेगर मान है भर आपके उपकार करने वाले पंच परमेष्टीनको माने है॥१४॥ वहार कैसे हैं- मर्वाणि गृहकार्याणि परकार्यागि पश्यनि । शुधिर्म कार्याणि निजकार्याणि यागदा ॥ १५ ॥ यौवनं जीपित धिण्यमंधपं जनपूजितम् । नया वायने मां शादभ्रमिनिमम् ।। १६ ॥ दानयानधारिययितयं मनाया। बानीने दुलंमं भूयो प्रष्ट रग्नमितापी ॥१७॥ - मएम परिच्छेद मयूरस्येव मेपधेि वियुक्तस्येव वांधवे । स्पातस्येव पानीये विवद्धस्पेव मोक्षणे ॥१८॥ सव्याधेरिव कल्पत्वे विदृष्टेरिव लोचने । जायते यस्य संतोपो जिनवकविलोकने ॥ १९ परीपहमहः शांतो जिनयत्रविशारदः। सम्यग्दृष्टिरनाविष्टो गुरुभक्तः प्रियंवदः ॥ २० ॥ आवश्यकमिदं धीरः सर्वकर्मनिपूदनम् । सम्पपर्नुमसी योग्यो नापरस्यास्ति योग्यता ॥ २१ ॥ अर्प-पटुरि जो सर्थ गृहसंबंधी कार्यनको परक कार्य मानहै, अर मुयुद्धी धर्मकार्यनकों सदा अपने कार्य मानहै ॥ १५ ॥ यहरि जो योवनको जीवनको घरको अर लोकमान्य ऐश्वर्यको सयको शरदके मेघसमान निता बिनासीक देखे ॥ १६ ॥ पटुरि संसारवनमें दर्शज्ञानचारित्रके त्रितयों जैसे समुदवि पड़या रन फेर दुर्लभहै तैसे मानहै ॥ १७ ॥ परि मेघनके समूह विर्षे मयूरनके हर्ष होय तथा विधुरे पुरुषकै बांधवविय हर्प होय तथा प्यासकर पीडित पुरुष फै जलवि हर्ष होय वा वैर छूटने वि हर्ष होय ॥ १८ ॥ या रोगसहितकै नारोगपने हर्ष होय अंधेकै नेत्र वि* हर्ष होय सें जाकै जिनेंद्रफे मुख देखने कि हर्ष होयहै ॥ १९ ॥ महरि क्षुधादि परीपहनिया सहनेवाला होय शात होप जिनसूत्र- विर्षे प्रयीण होय सम्यग्दृष्टि होय मानरहित होय गुरुभक्त होय प्रिय. बोटनेवाला होय॥२०॥ भमि.-१४ श्री अमितगतिनावकाचार । सो यहुधीर पुम्प सर्व कर्मका नाश करनेवाला जो यह आवश्यक ताहि करने योग्य है, और पुरुपकै आवश्यक करनेकी योग्यता नाही; ऐसा जानना ।। २१॥ आगै फेर कहैं हैं;- औचित्यवेदकः श्राद्धो विधान करणोद्यतः । कर्मनिर्जरणाकांक्षी स्ववशीकृतमानसः ॥ २२ ॥ भक्तिको बुद्धिमानर्थी बहुमान परायणः । पठने श्रवणे योग्यो विनयोद्यमभूपितः ॥ २३ ॥ अर्थ-उचितपनेका जाननेवाला होय । भावार्थ ---यह कालादिक आवश्यकके उचितहै ऐसा जाकै ज्ञान होय, बहुरि श्रद्धावान होय, अर आवश्यकके विधान करनेमैं उद्यमी होय, अर कर्मकी निर्जराका वाछक होय, अर अपने वश कियाहै मन जानें ऐसा होय ॥ २२॥ वहीर भक्तिमान् होय, बुद्धिमान होय धर्मार्थी होय महाविनय, तत्पर होय, अर पढनेवि मुननेविर्षे योग्य होय, अर विनयसहित आवश्यकके उद्यम करि भूपित होय ॥ २३ ॥ आगै फेर कह है- गुणाय जायते शांते जिनेंद्रवचनामृतम् । उपशांतज्वरे पूतं भैपज्यमिव योजितम् ॥ २४ ॥ अर्थ---रागद्वेषकी मंदताते शातभया जो पुरुष ताविय जिनेंद्रका वचनामृत गुणके अर्थ होयहै, जैसे उपशात भयाहै स्वर जाका ऐसा पुरुषविय योजित किया औषर जैसे गुणकै अर्थ होय तैसें ॥ २४ ॥ अयोग्यस्य वचो अन जायतेऽनहेतवे । यतस्ततः प्रयत्नेन मृग्यो योग्यो मनीपिमिः॥२५॥ -
Prometer rimini
....traitrrrrrrrrrfaran
Tetterferred integree
-
PR मा मिसायनम् ।
frerandit समिर ॥ १९ ॥
4. Aramen FIR for int,
marringirineerint
PanditeratRRARAM॥२५॥
with enrnak faral:-
या धरणानेही विदापरणनम् ।
अनुपम नाला निवामप्रपादनम् ॥ २७ ॥
বামে ঘুৰিখতাম।
विपानी पिलानि पहायकारिणः ॥ २८॥
ar-14. गुमने तो भार मा नि गुना
i, ना, म आमातिना, मा निर्मा
1. पनेक पानीपना, भा मानगीनाना, स्यादिक
Ter पर मायकवा पाने ओ पुर ताशे आनो
योगदर ॥२८॥
भार के नाम की-
मामायिक नवः प्राज्ञपन्दना मप्रतिकमा ।
प्रन्यायानं नगर्गः पोटारम्यकीरितम् ॥ २९ ॥
२१०
श्री अमितगतिप्रावकाचार।
सो यहुधीर पुरुष सर्व कर्मका नाश करनेवाला जो यह आवश्यक
ताहि करने योग्य है, और पुरुषकै आवश्यक करनेकी योग्यता नाही;
ऐसा जानना ॥ २१ ॥
आगे फेर कहैं हैं,
औचित्यवेदकः श्राद्धो विधान करणोद्यतः ।
कर्मनिर्जरणाकांशी स्वपशीकृतमानसः ॥ २२ ॥
भक्तिको बुद्धिमानर्थी बहुमान परायणः ।
पठन श्रवणे योग्यो विनयोधमभूपितः ॥ २३ ॥
अर्थ-चितपनेका जाननेवाला होय ।
भावार्थ-यह कालादिक आवश्यकके उचितहै ऐसा जाके शान
होय, बहरि प्रदायान होय, अर आवश्यक विधान करनेमें टचमी
होय, अर फर्मकी निर्जराका यांछक होय, अर अपने यश किया मन
जाने पेमा होय ॥ २२ ॥
बही भक्तिमान होय, बुद्धिमान होप धर्माची होय महाभिनयमें
तत्पर होष, अर पढगेवि गुननेविर योग्य होय, अर नियसहित
आवश्यक उद्यम की भूपित होय ॥ २३ ।।
आग फेर कर है-
गुणाय जापने शांत जिनेंद्रवचनामृतम् ।
उपनगरे एतं भाग्यमा योजितम् ।। २५ ॥
अर्थक मदताने मानभयानो पुल निका
बन गम्त गुगर अर्यायी, यात पामा जाका देगा
पुरई जित किया थोर को गुण परो ।। २४॥
अाग्यम पो जन मापनेनीती।
। यतमतः प्रपन्नेन गायो योग्यो मनोतिमिः ॥ २५॥
HM- अर कान्टक उलयनेका त्यागीपना, या मानरहिननाहिप नहर ने पट आवश्यकता करनेदागग पुरुष के जनने प्रत्याग्यानं तनुत्सर्गः पोटावश्यक मएम सिद - निवारण - नग्ननगनिaran पति अपना fene if गाने territam ना पोय ॥२४॥ कराया प्पयं जाय जिनशासनम् । मपिपान गलीटेदन पामिरांपपम् ॥ २६ ॥ Am आनि पुररि निhिr. iit, अ .. 4 पुnिer ...+कापाको जिन पर जाना २९॥ नावश्यक परमेशा रेक. पिर परी:- मकथा श्रवणानंदी निदायवर्जनम् । अनुप्धन्वमनालम्यं निपफर्मप्पपोरनम् ।। २७ ॥ न्याग ।। २७॥ 43 आवश्यकके नाम के है;- मामायिक म्नवः प्रावन्दना मानिकमा । H कालयम पदामिन्दमुशानन्यमार्दवम् । विनयानीनि चिनि पापकारिणः ॥२८॥ आकया मुनने सो धानः, भर पनिारे गुननरा या, अर निभिपना, अर भारम्परिपना, भर निदधर्ममा --
श्री भामितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-अयोग्य जे नामादिक कहिए नामसापना द्रव्य क्षेत्र कार
भार उहीनको आगामी पापके निरोधके अर्थ मन पचन काय करि
साग करना सो प्रत्याख्यान कयाहै ।
भावार्थ-आगामी पापका त्याग करनेके अधि अयोग्य द्रश्यादिका
त्याग करना सो प्रायान्यान कहिए ॥ ३५॥
आगे कायोत्सर्गों फहे हैं;-
आरश्यकेए सर्वेषु यथाकालमनालः ।
कायोत्सर्गस्तत्सर्गः प्रशस्तभ्यानवर्द्धकः ॥ ३६ ॥
अर्थ-रार्य आवश्यक क्रियानविणे निराकाल गाहिल. तिगही काल
आकुलतारहित शरीरशी मायका ग्याग सो प्रशस्त ध्यानका पढाने
या कायोगर्ग।
भावार्थ-गामाविका क्रियानिसियामा शरीमै गमयमा.
गना मी कापी-सर्ग पहिए ॥ ३६॥
आगे आवश्यक्रियानि आमनादिकका शान क.-
याम्नयागर्न म्यान कालो पदामनगनिः ।
नामारमंप्रमा दोषा पास्यक कारिमिः ॥ ३७॥
x-या पर फापाले मानिनिहासन
१ मा कार्य गर्ग १ प्रणाम ! १ प्रमाण दर
नवम्का जानना मम्मी ॥३॥
भने बामना न को-
आपने यागने पर यन वा वंदनापनः ।
दहामनं विदर्य देशपमापनादिकम् ॥ ३८॥
अष्टम परिच्छेद।
अर्थ-वंदना करनेमें उद्यमी जे पुरुष तिनकरि जावि या जाकरि
आस्पते फहिये स्थिररूप इजिए सो देश कहिए क्षेत्र अर पमासनादिक
आसन जानने पोग्यहैं । ऐसें आसन शन्दकी निरुक्ति करी ॥ ३८ ॥
आगै आवश्यक करनेके अयोग्य क्षेत्रनिकों कहें हैं;-
संसक्तः अनुरच्छिद्रस्तुणपाश्वादिषितः ।
विक्षोमको हपीकाणं रूपगंधरसादिमिः ॥ ३९ ॥
परीपहकरो दंशशीतवातावपादिमिः ।
असंबद्धजनालाप: सावधारंभगर्हितः ।। ४० ॥
आद्रीभूतो मनोऽनिष्टः समाधाननिदकः ।
योऽशिष्ट जनसंचारः प्रदेशं तं विवर्जयेत् ।। ४१ ॥
अर्थ-समक्त पहिये स्त्रीपुरुष नपुंसकादिकनिकी भीड जहाँ होय
पहरि बहुत छिद्रनिकरि युक्त होय, अर राण भूलि आदिफरि पित
होय, पटुरि गप गंधरस इत्यादिकनि फरि इंद्रियनिको विशेष क्षोभ
फरनेवाला होय ॥ ३८॥ यहरि शीत षात देश आताप आदिकार
परीपहका पारनेवाला होय, घरि भर्मबद्ध फहिए संबंधरहित निःप्रयो-
जन मनुष्यनिफा जहा पचनालाप होप, बहुरि पापसहित आरंभ की
निदत होय ॥ १० ॥ पाली होप, मनको अनिष्ट होय, समाधानका
नाश करनेवाला होय, अर नीचोकका जहा संचार होय ऐमा होय
साक्षेत्रको त्यागें ॥११॥
भावार्य आवश्यक करनेवाला पूर्वोक्त क्षेत्रको चित्तकौं क्षोभकारी
जानि परित्याग कर ॥
आज आवश्यक योग्य स्थानों को हैं;-
विविक्तः प्रामुकः सेयः समाधानविकः ।
देवमुरसिंपानबिंदो देवदक्षिणः ॥ ४२ ॥
२१६ श्री अमितगतिमायकाचार । जनसंचारनिर्मुक्तो ग्रायो देशो निराकुलः । नामन्नो नातिदरस्थः सोपद्रव वर्जितः ।। ४३ ॥ मर्थ-एकांत होय, अर प्रामुक होय, सेव्य कहिए मतीन के सेग्ने- योग्य होय, अर समाधानका पदावनेयाला होय, अर देव फहिए जिन- चैयादिक तिनकी मूधी दृष्टिके पड़नेकरि रहित होय । भावार्य-प्रतिमादिककै सन्मुग न होप, अर जिनचेत्यादिको दाहना होय ॥ ४२ ॥ अर मनुश्यनिके आने जानेकरि रहित होप अर न अतिनिकट न अनिदूर होय, सर्व उपत्यकरि यनित होय, ऐमा निराशुट क्षेत्र प्राण फरना योग्य है । भागार्य-देसे क्षेत्रमै सामायिक करे ॥ १३ ॥ आगे जाने बेटे ताका साप को है- म्येपोलिदं गुणम्प विशब्दकमजतकम् । मुणकाष्ठादिक प्रापं विनयम्योपदकम् ।। ४४ ॥ अ- होय, शिक्षारित होग, गुरामाप स्पर्श जाका ऐगा कंप, दान होय, जीररहित होय, गप्प का हारनेा होय, देग गयापादिका माग प्रण करना योग॥१४॥ श्राने आगनरायण करे- पाया पयाग गमभागे प्रीनितम् । पशमनं मुशायापि गुमाश्यं गानः ॥ ४५ ॥ भ-मरा न यnिfirm. टाग मेगा मकर गोमायोप मनी॥24॥ विपशेमागे पयोषमयोगी। ममम्मी ने शासनमानम् ।। ४६ ।।
orr.nittim PTETRA. writa Ma थान पाय raiपिपादपोशित गनि। दोगगर्न जि का पान कारः ॥ ४७ भार मानला उपर जोर बाग- सन पावागमनकी बहन का पार पुरी पर गर्भ, raman: जाना ॥४॥ पुनपाणिमये पोग गमुगाफागनम् । गपागने जिनगन.मार्याणां यनिरंदने ।। ४८ ॥ -उल्टान योग समन जानना, यही आर्पिका जय मुनिनकाना निनभगवान परि गवामन नामका भासन ॥१८॥ पिनपामनानिमाना निसर्मविधायिनाम् । न कार्यष्यनिग्मण परमामनमिष्पते ॥ १९ ॥ अर्थ-विनीय आमनाचिन जिनका ऐसे जे कृतिगर्म करनेगले पुरष निनयो कार्यविना और भासन न कहिण्है । भावार्थ-पभागन आ कायोमर्ग इन आसननिरिना और आसन किट कार्यविगेर यती फी, पार्यविना दोपही आमन करना जोग्यह, ऐसा जानना ॥ १९॥ ऐगों आमनका वर्णन किया । अर्गे स्थानका स्वमय फ. हैं- स्थीयने येन नन् स्थान दिप्रकारमुदाहृतम् । चंदना क्रियते यम्मा भूयोपविश्य या ॥ ५० ॥ अर्थ--जा फरि स्थिर हजिए मो स्थान दोय प्रकार काहे जाते यदना है मो महापरि वा बैठकरि करिये है । .
श्री अमितगतिमायकाचार। भावार्थ-खडे रहना वा बैटना ऐसा दोय प्रकार स्थान जानना ॥ ५० ॥ अमैं काटका सरूप कहेहैं घटिकानां मतं पई, संध्यानां त्रितये जिनैः। कार्यस्यापेक्षया कालः पुनरन्यो निगद्यते ॥ ५१ ।। अर्थ-संध्यानिका कालत्रय कहिए प्रभात मध्याह सायंकाल इन तीनी संध्यानवियं छह घडी का जिनदेवनिर्ने आवश्यकका कहिएहै, बहुरि कार्यकी अपेक्षा करि और कहिएहै। भावार्थ-मुख्य काल तौ छहघडीही काल कयाहै बहुरि कार्यकी अपेक्षाकरि दोय घडी आदिभी कयाहै । ५१ ।। आर्गे मुद्राका स्वरूप कहै हैं;- जिनेंद्रवंदनायोगमुक्ताशुक्तिविभेदतः । चतुर्विघोदिता मुद्रा शुद्रामार्गविशारदः ॥५२॥ अर्थ-जिनेंद्रमुद्रा १ वंदना मुद्रा १ योगमुद्रा १ मुक्ताशुक्तिमुद्रा १ इन भेदनिकरि मुद्राके मार्गवि प्रवीण जे पुरुष तिनकरि च्यार प्रकार मुद्रा कहीहै ॥ ५२ ॥ आर्गे जिनमुद्राका स्वरूप कहैं, जिनमुद्रांसरं कृत्वा पादयोश्चतुरंगुलम् । ऊर्द्धजानोरवस्थानं प्रलंबितभुजद्वयम् ।। ५३ ॥ अर्थ-दोऊ पादनका चार अगुल अतर करिके घुटनेके ऊपर स्थित ऐसी टंबायमान दोऊ भुजा जामें सो जिनमुद्रा जानना ॥५३॥ आर्गे वंदनामुद्रका स्वरूप कहेहैं;- मुकुलीभूतमाधाय जठरोपरि कर्परम् । स्थितस्य वंदना मुद्रा करद्वन्द्वं निवेदितम् ॥ ५४ ॥ -- भटम परिच्छेद। अर्थ-मुकुटीभूत पाहिए, कमलपी सोहागमान आ पंटये. 3rt फुटनी जाविणे, को विनती करनेवाला मयुगको धारिये नि पुरुष साप पंदनागुमा यहि ।। ५५ ।। आमैं योग मुद्रामा गए पो है। जिनाः पनामनादीनामषमध्ये निषेशनम् । उपानकारयुग्मम्य योगमुद्रा यमापि ॥ ५५ ॥ पर्ध-पटीनया गुण आकाtm . नादिवानिकी आदीय मापति जी धारगामिन An योगगुना पो॥५५॥ भाग गुप्ताशुतिगुरु घng :- मुत्तानिर्गना मुद्रा गटोपरि परम् । उईजानोः कर लागुलि परिभिः ॥५६॥ ई-पेट, उप दुर्पर Tril माyिone JIRemग आगामो प्रयाtin mar गुणाप्रतिगुदा कामानि की कार ॥५॥ भावापासवाmot:- स्यागीदाममायापारिमारता। उपविजापविलादिविभेदेन परिधा ।। ५७ ॥ MORRENT 111५.॥ new refet- MERecानविपरी। Trisister:५४ ।'
२२० श्री अमितगतियायकावार । अर्थ-जाविणे आर्च रोडव्यान दोनों बैट करि चितिः मौ ८. टोपविष्टनामा कायोत्सर्ग कहिए है। भावार्थ-~~-शा जीवक परिणाम वा अगर दोनों पडते. हा :: 'वियोपविष्ट कयाहै ।। ५८ ॥ आगे उपविष्टोस्थित कार्योसर्गों कहेहैं:- धर्मशुदयं यस्यामुपविष्टेन चिंत्यते । उपविष्टोत्वितां संवस्तां वदति तनूत्मृतिम् ॥ ५९॥ अर्थ----जावि धर्म अर शुक्त दोनों ब्यान बैटकरि चितिए त संतजन उपविष्टोस्थित कापोत्सर्ग कहि । भावार्थ-~~~इसमें शरीर ती बैठाहै अ परिणाम चढ़ते हैं, तात उन विटोस्थित कयाहै ॥ ५९॥ ऑगै उत्थितापविष्ट कायोमर्ग कहें है; आर्नरीदद्वयं यम्यामुत्यितेन विधीयते । तामुस्थितोपविष्टाहां निगदंति महाधियः ॥ ६ ॥ अर्थ-जाधिरी आर्त रोड दांनी ध्यान ठाटे होयर विता महाबुद्धिपुष्प वन्वितोपविष्ट नाम कायोत्सर्ग को।। भावार्य-~-जा विय परिणाम नो पा शरीर गहा, हा यितापविष्ट कहा है ।। ६०॥ आगे रस्थितीस्थित कायोत्सर्ग करें:- धर्मशुजन्यं यम्यामुत्थिनेत विधीयते । उत्यितीयिननागानं तं मापने विधिनः ॥ ६॥ अर्थ-जाति धर्म र दोनों ध्यान मी पगा दिन बायोमर्ग दो।
भएम परिच्छेद। - भावार्थ-जा वि परिणाम चढत है अर शरीर भी ग्बा ताने उस्थितोस्थित फापराह, ऐसा जानना ।। ६१ ।। आगै प्रणामका स्यम्प को है;- एकद्वित्रिचतुः पंचदेहाशप्रनर्मतः । प्रणामः पंचधा देवः पादानतनगमरः ।। ६२ ।। अर्थ-एफ दोय तीन पार पांच जे शरीर अगनिन. गगन पांच प्रचार प्रणाम जिनदेयनिने काह, जिनदेष 4,गेहैं मिनो पागनको सर्वसरफ्नै देव अर मनुष्य नमैहै ।। ६२ ।। एकांगः शिरसो नाम रागः परयोयोः । प्रयाणां मूर्द्धहस्तानां मध्यंगो नमने मतः ।। ६३ ॥ चतुणां फरजानना नमने धतुरंगफः । फरमस्तफजानना पंचागा पक्ष नते ॥६॥ अर्थ-~-एक मरतकाहीये नगायने में पाग गगरकार पहिए ॥ दोऊ रापन नमायने दा कहिए दोप गानि की नमा पीए, पर मतभर दोपये नगायो sindia ekar ममरवार बावा ॥६॥ र दोया अरदोयम •m मगन पार अगनिफरि नमस्कार है, अर दोय . मरतमा भर दोय इन प.पगयो गमापे में पंचग नम है । ऐगा जानना ॥ ६॥ आगे आवतंय. पाय- कविता रादापता पपूर्वपन पेशगाम् । गरपामापिसातपरापन गक्षपाः ॥६५॥ - पन कि बानि बीमintaint.. 4
कायोसर्ग काह, बहरि और कायोत्सर्ग सत्ताईस उच्छासमात्र
मा- कौन कायोत्सर्ग कितने उच्छास ताई करणा ताका प्रमाण
अष्टोत्तरशतोलामः कायोत्सर्गः प्रतिक्रमे ।
अर्थ---एकमा माल दासमात्र कायोत्सर्ग संध्यासंबंधी प्रतिक्रमण,
द, अर प्रभातसबधी प्रतिक्रमणमें अर्द्व कहिए चौवन उष्ट्रासमान
२२२
भी भमितगनिधारकाधार।
भावार्य-मामयिकादियके आदि में मन यचन कारकै योग्य
हाय जोडिक तान पार भनि महित पलटना तर एकगार मनाना
बना, ऐम च्यार वार मम्नम नायन बारह आवर्त जानना ॥ ६५]
आर्ग कायोमर्गकी माया कहै;-
अष्टविंशतिसंख्यानाः कायोत्सर्गा मता जिनः ।
अहोरायगताः सर्वे पडावश्यककारिणाम् ॥ ६६ ॥
अर्थ- यह आवश्यक करनेवालेनकै रात्रिदिनवि सर्व मार्दन
कायोमर्ग जिनदेव ने कहेहैं ॥ ६६॥
आर्ग ते अहाईम कायोत्सर्ग कहां कहां होयह तिनका सा
स्वाध्याये द्वादश प्रान्नवदनायां पीरिताः।
अष्टौ प्रतिक्रमे योगमक्तो तौ द्वायुदाहृतौ ।। ६७ ॥
अर्थ-पंडितनि स्वाध्यायश् ियारह कायोत्सर्ग कहेहैं, अर बैं-
नार्मे छह कहेहैं अर प्रतिक्रममणविष आठ कहेहैं अर योगमक्तिविणे
दोय कायोत्सर्ग कहेहै । ऐसें मर्ष अट्ठाईस कायोत्सर्ग करनेका अवन
सांध्ये प्राभानिक वार्द्धमन्यस्तत्सप्तविंशतिः ॥ ६८ ॥
कहहै,
जानना ॥६७॥
अष्टम परिच्छेद। २२३३ सप्तविंशतिरुरवासाः संसारोन्मूलनक्षमे । संति पंचनमस्कारे नवधा चिंतिते सति ॥ ६९॥ अर्थ-संसारकेनाश नाश करनेमें समर्थ जो पंचनमस्कार मंत्र साका नव प्रकार चितवन परे सने सत्ताईस उपास होयहैं। भावार्थ-एक णमोकारमंत्रका जाप तीन उपवासमै करै ऐसें नय णमोकारके जाप सत्ताईस टास जानना ।। ६९।। प्रतिक्रमद्वयं प्राज्ञैः स्वाध्यायानां चतुष्टयम् । वंदना त्रितयं योगभक्तिद्वितयमिप्यते ॥ ७० ॥ अर्थ-प्रतिमामण दोय, स्वाध्याय प्यार, वेदना तीन, योगभक्ति दोप पंडितनि करि फहिपहै ॥ ७० ॥ उत्कृष्टयावणते विधातव्याः प्रयत्नतः। अन्यरेते यथाशक्ति संमारत पियासुमिः ॥७१ ॥ अर्थ-जे प्रतिवमणादि पूर्व कहे ते उत्कृष्ट श्रावककार भले प्रकार जनसे फरणा योग्यहै, मटार और जे समारके पार जानेके इएफहैं तिनकरि प्रतिग्रामणादिक जैसी शक्ति होय तेसै फरणा योग्य ७१॥ इछाकारं गमाचार संयमासंयमस्थितिः। शिशुभत्तिभिः सार्द्ध विदधाति प्रियंपदाः ॥ ७२ ।। अर्थ---मयमार्सपशि है स्थिति जाकी, भावार्ध-एकही समय प्रम- हिसाफा न्यागी र स्थायररिमाका श्यागी ऐगा देशमती, प्रिय पचन- का बोलनेवाला, सो निर्मल है प्रति जिनकी ऐसे में आचार्यानिक तिनकै साथ इण्डकारनामा समाचारको करहै । भावार्थ-भारपद सो मासादिकके उपदेग म करें, को है कि हे भगवन् ! आप कमा सो मैं ई है। सा जानना ।। ७२ 1 ૨૨ श्री अमितगतिश्रावकाचार । भावार्थ-सामयिकादिकके आदि अंतमैं मन वचन कायके योगर्को हाथ जोडिक तीन वार भक्ति सहित पलटना तब एकवार मस्तक नवा- पना, ऐसे च्यार पार मस्तस नवावनैमैं वारह आवर्त्त जानना ॥६५॥ आर्गे कायोत्सर्गकी संख्या कहहैं;- अष्टविंशतिसंख्यानाः कायोत्सर्गा मता जिनः । अहोरात्रगताः सर्वे पडावश्यककारिणाम् ॥ ६६ ॥ अर्थ-छह आवश्यक करनेवालेनके रात्रिदिनविय सर्व अडाईम कायोत्सर्ग जिनदेव कहेहैं ॥६६॥ आ» ते अट्ठाईस कायोत्सर्ग कहां कहां होयह तिनका स्वरूप फैहहैं,- स्वाध्याये द्वादश प्राज्ञवंदनायां पडीरिताः । अष्टौ प्रतिक्रमे योगमती तो द्वायुदाहृतौ ॥ ६७ ।। अर्थ-पंडितनि, स्वाध्यायवि वारह कायोत्सर्ग कहेहैं, अर पंद- नाम छह कहे हैं अर प्रतिक्रममणयि आठ कहेहै अर योगभक्तिविणे ते दोय कायोत्सर्ग कहेहैं । ऐसे सर्व माईस कायोत्सर्ग करनेका अपसर जानना ।। ६७ ॥ आगें कौन कायोत्सर्ग कितने टप्पास ताई करणा ताका प्रमाण अष्टोनरगतोरयामः कायोमर्गः प्रतिक्रमे । मांध्ये प्रामाति पाईमन्यस्तत्मसविंशतिः ।। ६८॥ अर्थ-एकमी आर इलाममात्र कायोमर्ग संध्यासवगी प्रतिकमणमें कादाद, प्रभानगवधी प्रतिक्रमणमें अई फदिए चौयन उपागमात्र कायोमर्ग कमाई, यहरि और कापोमा सताईम उपागमार भाग tria पानिregrगा गागमनधर्म । नि पंचनामा भरपा मिनिने मनि ॥ ६९ ॥ -- गोपनमा का TER FANTA पोत तोपरे । Mr. या जाप नानासमै पाला र पापाय आपाय माग जागना ॥६९॥ प्रतिशमा प्रायः स्याध्यापाना पतुष्टयम् । धंदना प्रिय पोगमनिनियमिप्यते ॥ ७० ॥ अर्ध-प्रतिममग दोप, थापाय प्यार, दाना तान, योगभक्फि दोष दिनि पारि ॥ ७० ॥ उलएधावगत विधातम्याः प्रयत्नतः । अन्यग्ने पथानति संमारांत पियागुमिः ।। ७१ ।। अर्थ- प्रतियामणादि कार से उपए थापफफरि भले प्रकार जानने फरणा योग्य, परि और जे संमारके पार जानेके इनुपाहे सिनपरिनियामणादिक जैसी शतिरोप से बरणा योग्य ७१॥ दराडाकार समाचार संयमासंयमस्थितिः । विशुद्धवृनिमिः सार्धं विदधाति प्रियंवदाः ॥ ७२ ॥ अर्दयमासंयमवि है स्पिनि जाफी, भाषार्थ-एफहीं समय प्रस- हिमाका त्यागी र स्थावरहिसाया स्यागी ऐसा देशवती, प्रिय पपन- पा पोवादा, मी निर्गल है प्रति मिनको ऐसे में आचार्यादिक तिनके साथ साकारनामा समाचार फरहै । भाषार्थ-धारपद सो आचार्यदिको उपदेशमैं इछा करहै, को है कि भगवन् ! आप का सो मैं इई है। ऐसा जानना ।। ७२
२२४
श्री अमितगतिधावकाचार।
.
वैराग्यस्य परां भूमि संयमस्य निकेतनम् ।
उत्कृष्टः कारयत्येप मुंडनं तुंडमुंडयोः ।। ७३ ॥
अर्थ-उ.कृष्ट श्रावक है सो वैराग्यकी परम भूमिका अर संयमका
ठिकाना ऐसा, तुंड कहिये मुखडाढी मूंछका अर मुंड कहिए मुंडके
वालका मुंडन जो मडना ताहि करावेहीहै ।
भावार्थ-ग्यारह प्रतिमाका धारी उत्कृष्ट प्रावक डाढी मूछके बाल
कतराधैहै, ऐसा जानना ॥ ७३ ।।
केवलं या सवशं या कॉपीनं स्वीकरोत्यसा ।
एकस्थानामपानीयो निंदगर्दापरायणः ॥ ७४ ॥
अर्थ-यह उत्कृष्ट श्रायकहै सो फेवल कौपीन या यतसहित
कोपीन को अंगीकार कौहै, कैसाद यह एक म्यानविन हीहै अन्नपानीका
लेना जाय अर आपकी निंदा आ गह: पि तत्परते॥७४ ।।
स धर्मलामशब्दन प्रतिवेश्म गुधोपमम् ।
मपात्रो यानने मिक्षा जगमरणमूदनीम् ॥ ७५ ।।
मर्थ-सा श्रावक पात्रसहित घर पर प्रति अमृत समान धर्म
शम्द करि जरा मग्णको नाश करनेवा मिशाको याचेहै, ऐमा
जाना ॥ ७५॥
भागे बदनाके यत्तीम दोपनिका वर्णन कोर;---
ममन्नादरनिमुक्ती १ मदाष्टकवीहतः २ ।
प्रतीक्ष्य पीटनाकारी र वृधमदनचरः ४ ॥७॥
पलामगिलं कार्य होलान्ट शामितः ५।
अनः पाचनः पयादिपन मं वामिनः ६ ॥७॥
काटी हमारतः कुन मदननामती ७)
मिग्य वाग्य पापा निपतन पुरः ८॥७॥
अष्टम परिषद कुर्वन् वक्षोभुजद विज्ञप्ती द्राविडीमिव ९ । पूज्यात्मासादनाकारी १० गुर्वा दिवनर्म पितः११॥७९॥ मयसप्तकविवस्तः १२ परिवारगिर्वितः १३॥ समावतो वहिभूप किंचिलुनाकुलाशयः १४ ।। ८० ॥ प्रतिकूलो गुरोर्भूत्वा १५ कुर्वाणो बल्पनादिकम् १६ ॥ कस्यचिदुपरि बुद्धम्तस्याकृत्वा धमां विधा १७ ॥८॥ झास्पते वंदनां कृत्वा प्रमयस्वर्जनीमिति १८॥ हसनोदने कुर्वन् १९ मृकुटी कुटिलालकः २०॥२॥ निकटीभूय गुर्वाद २१ राचार्यादिमिरीचितः २२ । करदानं गत्वा २३ कृत्वा राष्टेपथं गुरोः२४॥८॥ तब्बोपकरपादनि २५ तेपो लामाशयापि च २६ । असंपूर्णविधानेन २७ सूत्रीदितपिधापकम् २८ ॥८४ ॥ कुर्वन कात्सर्य हुंकारादि पुरः मरः २९ । बंदारूणां ससम्देन परेषां छादयन् ध्वनिम् ३०॥८५ ॥ गुर्वादरमतो भूता ३१ मुझेपरिक्रमभ्रमी ३२॥ द्वाविंशदिति मोक्तम्या दोरा वंदनकारिगाम् ।। ८६ ॥ अर्थ--समस्त आदररहित विपाकर्म करना सों अनात दोषहै ? बहुरि जापानि मदके वात भया संदना कर सो स्तर दोपह २ बरि तीप काहिर देसकर अगनकी डे दार मोहित दोर है ३ बरि सदके वाहक सिरके पानी मौडे सो निदोहे बरि होमन टेक सों समा र पराने वेदना को सो दोलापित दोन ५ परि ते सगलत को दीख- फसे पेश कर ग संको विस्तारै सो काटनेत दो परि हापके अग्या मलनि कुराको को पार कर ATMARATHI ': Mrderin0.00 ri Time MAIT Part attit : H. Perfument 4, HTatta कागापाकीननगमगी। परम्पानामगानीमा निगरांगणः ॥ ७ ॥ ri-48" या मा क गीता मर amrita M4: 12 नका नाभा ना माim॥७॥ म धमलामगादन प्रतिरोन्म गुपोपमम् । मपानी यातं नि जगमाणगानीम् ॥ ७५ ।। अर्थ- श्रावक पायमदिन घरघानि अमन ममान धर्मम सद की जग मागका नाश करनेवा: निशाको यार, दमा जाना ॥ ७५।। आगे बदनाक वत्तीम दोनिका वर्णन करें- समम्नादरनिमुनो १ मदाष्टकवीकृतः २। प्रतीक्ष्य पीडताकारी र चमूदजकुंचकः ४ ॥ ७६ ॥ चलयनिसिलं कायं दोलारूद इवामितः ५। अग्रतः पार्वतः पापिन कम इवामितः ६ ॥ ७७ ॥ करटी वांकुशारूढः कुर्वन मूर्द्धनतोन्नती ७ । क्षिप्रं मत्स्य इवीरप्लुत्य परेषां निपतन् पुरः ८॥७८|| अश्म परिषद २२५ कुर्वन् वक्षोभुजददं विज्ञप्ती द्राविडीमिव ९। पूज्यात्मासादनाकारी १० गुर्वादिजनम पितः११॥७९॥ भयससकवित्रस्तः १२ परिवारर्द्धिगर्वितः १३ । समाजतो यहि भूप किंपिल्लजाकुलाशयः १४ ॥ ८ ॥ प्रतिकूलो गुरोर्भूत्वा १५ कुर्वाणो जल्पनादिकम् १६ ।। कस्यचिदुपरि दस्तस्याकृत्या क्षमा त्रिधा १७ ॥८॥ ज्ञास्पते वंदनां कृत्वा भ्रमयस्तर्जनीमिति १८ ॥ हसनोद्दने कुर्वन १९ भृकुटी कुटिलालकः २०१८२॥ निकटीभूय गुर्वादे २१ राचार्यादिमिरीक्षितः २२ । करदानं गणेत्या २३ कृत्या टिपथ गुरोः२४॥८॥ लम्वोपकरणादीनि २५ तेपो लाभाशयापि प २६ । असंपूर्णविधानेन २७ सूत्रीदितपिधायकम् २८ ॥४॥ कुर्वन् मूक इवात्यर्थ हुंकारादि पुरः सरः २९ । पंदारूणा सशम्देन परेषां छादयन् ध्वनिम् ३०॥८५ ।। गुर्वादेरमतो भूत्रा ३१ मुझेपरिक्रमभ्रमी ३२ । द्वाविंशदिति मोक्तच्या दोषा यंदनकारिणाम् ॥ ८६ ॥ अर्थ-समस्त भारहित शिपायर्म करना सों अनारत दोहे १ परि जात्यादि अमदके वशीभूत भगा बेदना पर सो स्तर दोपह २पी प्रतीक्ष्य पहिए देवकार अंगनशे दो दा सो दहित दोर है ३ परि साफे का एके सिरसे वाइनको मरोडे सो बुचित दोहे "महरि जोतराम भेटेको यो समस्त सर घरातामा देना परेको दोलापित दोहे ५ यदि आगते पसरातील बायको सोतर- फरें पेश करै अंग संकोच वा विस्तार सो कगित दोषी हापके अग्यको मलारिष कुराको गाय कर की 44.-१५ 1 भी मनिरागनिमारकापार मतको नीना गा पो सो मेशिन दोहे ७ बढी मायको ग्याँ दलकार औरन आगे पोया मामी यो रामहीमो मम्यो. दर्शदोपह ट यही प्रदेशके पुरकी निगीममान यशपमें दो हाय फरक पंदना को मोडापिडीविज्ञपि दोर तथा याहाँका नाम येदिकागद दोहे ९ अहरि आचार्याटिक प्रय पुनकी विरापना फरता यंदना करे मो आमादना दो, १० महरि गुरु आदिकके भयते पंदना को सो विभीन दोषी ११ महरि जी मरणादिक सात भयकर भयभीत भया बटना करे मो भय दोपह १२ परि परिवार अद्धि करि गर्षित भया मता यंदना करे सो ऋद्विगौरव दोपहै १३ बहुरि साधर्मानके समानत याहिर होय करि मानी सनाते किंचित् आकुल भया धंदना करे सो सन्नित दोपहै १४ वहरि गुरुकै प्रतिकूल होयकरि यंदना करे सो प्रतिकुलदोषी १५ बहुरि यचनालाप आदि करता सता यदना करै मो शन्ददोष है १६ बहुरि काहूके ऊपर क्रोध- रूप भया तामैं मन यचन कापकी क्षमा न करायकै वंदना कर सो प्रदुष्ट दोपहै १७ बहुरि कोई जाणेगा ऐसे वंदना करि अंगुलीकों भ्रमाचे सो मनो दुएदोपहै १८ बरि हंसना अर अंग घिसना इनकी करता संता वंदना करै सो हसनोद्दन दोपहै १९ बहुरि भौह टेडीकरि वेदना कर सो भृकुटीकुटिल दोपहै २० बहुरि गुरु आदिकनिके अति- निकट होय करि वंदना करै सो प्रविष्ट दोपहै २१ बटुरि आचार्यादि- कनि करि देख्या संता वंदना करे,- भावार्थ-आचार्यादिकनिकै आगें तौ भले प्रकार करै अन्यथा यहा तद्वा कर सो दृष्टदोपहै २२ संधाविय करदान मानकरि वंदना करे, भावार्थ-संघके खुशी रहनेके अर्थ वा संघः भक्त्यादिककी वांछा करि वंदना करे सो करमोचन दोपहै २३ बहुरि गुरुनकी ५ .
अष्टम परिच्छेद। सरका हिवार वंदना करे सो अदृष्ट दोन्है २१ बरि टपकरादि पाप की दना की मो काटन दोपहै २५ बरि तिन टपकार- पादिकनके मिलने पांडा करि चंदना कर मो अनाउम्भ दाम २६ बहुरि बम विधान करि कहिर फाटान अर्थ इत्यादिक करे हीन ना करे सो हीनदोहे २७ बरि सूत्रक अर्थको दाक की वंदना करे सो शिपिक दोहै २८ बरि गंगेरी यो अतिशप फी कारादि करता वंदना कर सो मूकदोहे २९ बढीरे और बदना पाने. वाटेनके मदन टाक बेटना , सो र्द्धर दोन्ह ३० परि गुरु सादिकनि के का, होय कार वेदना फौ सो अब दोहे ३१ वही क्षेत बदनाकी चूटिका क्रम भूटि उदी रै. भार्य-वर वेदना घोड़ासी राकी रहै नर बही उन्दी को अन डि जाय सो उत्तर पूटिक दोहे ३२ कर दत्तीम दोर यदना करनेदाडेनको स्पानने योग्य ॥ ६८॥ क्रियमाणा प्रपलेन क्षिप्रं कृषिरिवेग्मिवम् । निराकृतमला दते वंदना फलमुलमम् ॥ ८॥ सर्प-दूर करें मट जाके ऐसी पन्स कर भई जो वेदना को सहित महासको देखते, जैन दूर को है दन कटारिया बदली पन फर की मई मेती महारट देय तेने,रेमा आनन।।८ सानहापोसाक बत्तम दोरही:- स्तषीनिरुपादम्प स्थानमपरवरित । पलने वानवृताला सताता व मतः २॥ ८८ थप स्तमहटपा ३ कारिस्थितिः । उपरि मासमारंपरिमारस्थितिः सदा ५॥ ८९॥ ।
२२८ श्री अमितगतिधारकाचार निगडेनेव पद्धस विकटांघिसस्थितिः ६। कराभ्यां जघनाच्छादः किरानयुवनेरिव.७ ॥९॥ शिरसो नमनं कृत्वा ८ विधायोनमनस्थितिः ९। उन्नमय्य स्थितिर्वक्षः शिशोर्याच्या इव स्तनम् १०॥ ९॥ काकस्येव चलाक्षस्य मर्वतः पार्श्वचीवणम् ११ । उर्दाघः कंपनं मर्मः सलीनातहरेरित्र १२ ।। ९२ ।। स्कंधारूढगजस्यैव कृतग्रीयानतोन्नती १३ ॥ सकपित्यकरस्येव मुष्टिबंधनकारिणः १४ ॥ ९३ ॥ कुर्वतः शिरसः कंपं १५ मूकसंत्राविधायिनः १६ । अंगुलीगणनादीनि १७ भ्रूनृत्यादिककल्पनम् १८ ॥ ९४ ॥ मदिराकुलितस्येव घूर्णनं १९ दिगवेक्षणम् २० । ग्रीवोर्द्धनयनं भूरि २१ ग्रोवाघोनयनादिकम् २२ ।। ९५ ॥ निष्ठीवनं २३ बहुस्पर्शः २४ प्रपंचबहुला स्थितिः २५ । सूत्रोदितविधेनं २६ वयोपेक्षा विवर्जनम् २७ ॥ ९६ ॥ कालापेक्षव्यतिक्रांतिः २८ व्यापासक्तचिचवा २९ । लोभाकुलितचित्तत्वं ३० पापकार्योधमः परः ३१ ॥९७॥ कृत्याकृत्यविमूढत्वं ३२ द्वात्रिंशदिति सर्वथा। कायोत्सर्गविधैर्दोपास्न्याच्या निर्जरणार्थिमिः ।। ९८॥ अर्थ-घोडेकी ज्यौं एक पात्र उठाय करि खडे रहना सो घोटक- दोपहै १ वडार पवनकरि हनी जो सता वाकी यो सर्व तरफ चलना सो यतादोपह २ बरि थैम भीन आदिका आसरा लेना सो स्तंभकुड्य- दोपहै ३ वहरि पाट आदिक उपर तिट कार कायोत्सर्ग करै सो पट्टिकादोपहै ४ बरि सिरके ऊपर माताकौं अवलंबकै तिष्टना सो मालादोपहै ५ बहुरि वेड कार बंधे पुरुषको ज्यों टेढे चरण धारि तिष्टना अएम परिच्छेद। २२९ सो निगरदोपहै ६ बहुरि भालकी स्त्रीकी श्यों हाथनकरि जघान को ढांपना सो किरातयुवति दोपहै ७ बहीर शिरकी नमाय करि तिष्टना सो शिरोनमन दोपहै ८ बहुरि ऊंचा शिर करकै तिष्टना सो उन्नमन दोपहै ९ वहरि पालकको धापके स्तनकी श्यों छातीको उची करके तिष्टना सो धात्री दोपहै १० बहुरि कागलाकी स्यों चंचल नेरका सर्वतरफ पसवाडेनका देखना सो वायसदोपहै ११ बहुरि लगामकरि पीडित घोडेको ग्यों ऊपर नीचे मस्तकका नवावना सो खलीन दोपह १२ बहुरि कंधापर आरुढहै पुरुष जाकै ऐसे गजकी ज्यौं प्रीवाका नवायना ऊंचाकरना सो गजदोपहै या याहीका नाम युगदोपहै १३ चहरि कैंथसहित हस्तकी ज्यों मूठी बंधन करनेवालेके सो कपित्थदोप है १४ बहुरि सिरका कंपायना सो शिरः प्रकपित दोपहै १५ मरि गूंगेकी ज्यों मासिकादि अंगनिकी मैनानी फरनेवालेकै मूकदोपहै १६ महरि पायोत्सर्ग) अंगुली गिनना सो अंगुली दोपहै १७ बरि कायोत्सर्ग) भृकुटी नचायना आदि कर सो भूदोपहै १८ यहरि मदिराकरि आकुलित पुरुपकी ज्यों घूमै सो मदिरा पायी दोप है १९ बहुरि फायो- सर्गमै दशौं दिशान प्रति देखना मो दिगवेक्षणदोपहै २० बहरि मीनाको वहुत ऊपर करना सो ग्रीवोर्सनयन दोपहे २१ यहरि ग्रीवायौं नीची पारना इत्यादि ग्रीवाधोनयनादि दोपहँ २२ बटुरि गकारना सौ निधी- पनदोपहै २३ यहुरि अंगका स्पर्शना सो पपुस्पर्शन दोहे २१ महरि माया करि यान प्रपंचसहित तिना सो प्रपंचाल दौर है २५ यहुरि सूरभापितविधियी होनसा फरनी सो विधिन्यून दोष? २६ बदुरि तृदादि ययकी अपेक्षादिकमा स्यागना, भावार्थ---अपनी अवस्था विना देखे कायोत्सर्ग करना सो सपोरे- क्षादिवर्जन दोहै २७ बरि पालकी अपेक्षाका उपन करना २३० श्री अमितगतिमायकाचार। कायोत्सर्गके काल कायोत्सर्ग न करना मो कालापेक्ष व्यतिमात दोपह २८ बहुरि चित्तकी विक्षिप्तताके कारणमैं आसक्तचित्तपना सा आक्षेप सक्तचित्तता दोपहै २९ बहुरि लोमकरि आकुलित चित्तपना सो लोमाकुलित दोपहैं ३० बहुरि कायोत्सर्गविर्षे पाप कार्यमें परम उद्यम करना सो पापकार्योद्यम दोपहै ३१ वहुरि करने योग्य न करने योग्य- विर्षे मृढपना मो मूढ टोपहे ३२ । या प्रकार कायोत्सर्गकी विधिक बत्तीस दोपहैं, ते निर्जगके अर्थी जे पुष्पहें तिनकार सर्वथा त्यागना योग्यहै ।। ८७-९८॥ समाहितमनोवृत्तिः कृतद्रव्यादिशोधनः । विविक्तं स्थानमास्थाय कृतेर्यापथशोधनः ॥ ९९ ॥ गुर्वा दिवंदनां कृत्वा पर्यकासनमास्थितः । विधाय वंदनामुद्रां सामान्योक्तनमस्कृतिः ॥ १०॥ ऊर्द्धः सामायिकस्तोत्रं समुक्तामुक्तमुद्रकः । पठित्वा वर्जितावत्तौ विदधाति तनुत्सृतिम् ॥ १०१॥ कृत्वानेश्वरी मुद्रां ध्यात्वा पंचनमस्कृतिम् । उका तीर्थकरस्तोत्रमुपविश्य यथोचित्तम् ॥ १०२ ॥ चैत्यमाक्तिं समुच्चार्य भूयः कृत्वा तनूत्सतिम् । उक्का पंचगुरुस्तोत्रं कृत्वा ध्यानं यथावलम् ॥ १०३ ।। विधाय वंदनां मरैः कृतिकर्मपुरः सराम् । गृहीत्वा नियमं शच्या विधचे साधुवंदनाम् ॥ १०४ ॥ आवश्यकमिदं प्रोक्त नित्यं व्रतविधायिनाम् । नैमिचिकं पुनः कार्य यथागममतंद्रितः ॥ १०५॥ .
--- अएम परिणा २३१ -- अर्ध काम है मनको वृति जाफी अर करीहे इन्पादिक फी धना जाने सो एकांत स्थान तिष्टमार करया पियका शोधन जाने ॥ ९९॥ गुरु आदिकनिकी पेदना करके पकामनपरि तिष्पा वेदनामुद्राओं राधिक सामान्यपने मामा भमरकार जानें ॥ १० ॥ ता उपरात मामारिकस्तोप्रो भले प्रकार कहिये छोड़ीह मुद्रा जाने सो पार पढ जान्याहै आवत जानें ऐसा पुरुषहै सो कापी मर्गयों को ।। १०१॥ यद्दरि जैनपरी मुद्राको करिक अर पंच नमस्कार मंत्रका ध्यान फरकै भर ताधिकरनिया स्तोत्र कहिक यथायोग्य चैटफरि ॥ १०२ वैय भक्तिका उमारन करि फेर फापोत्सर्ग करिफ बहुरि पंच गुरनिके स्तोत्रयो कहिके यदुरि जैसा पर होय तैसा ध्यान करिकै ॥ २० ॥ यहरि हतिफमपूर्वक आचार्यकी वंदनाको करिफै फेर शक्ति माफिक नियमों महण करि साधुर्वदनाको फरै ।। १०४॥ पर आवश्यक व्रत करने यालेनको नित्य कहा । यहुरि आलस्स रहित पुरुपनि करि नैमित्तिक महिए आदिका निमित्त पाया सो जमा आगममैं माया तैसा करना योग्यह 11 १०५॥ भावार्थ-एकाग्र चित्त होयकै अर द्रव्यक्षेत्रादिक शोधनकरि एका- सस्थान, निकै प्रथम ईपिप दडक पदै, फेर गुरु आदिकनिकी पंदना फरकै पर्यकासन तिटिक पूर्वोक्त वेदनामुना रचि कायोत्सर्ग करे, फेर पूर्वोक्त जैनेश्वरी मुद्रा करिफ पचनमस्कारका प्यान पर फेर तफिरनिका स्तोत्र पढफै यथायोग्य छौ, फेर पंचपरमेष्टीनिका स्तोत्र पढकै शक्तिसारा ध्यान करे फेर नमस्कार शिरोनत्ति आवर्तक आचा•
२३२
धी अमितगतिश्रावकाचार।
र्यवंदना करै फेर शक्तिसारू नियमकी ग्रहण करि साघुवंदना करै या
प्रकार यहु आवश्यक तौ नित्य ही करै । बहुरि अष्टमी चतुर्दशी आदि
पर्वविय तथा औरभी निमित्त पाय जैसे आगममैं कया तैसें आवश्यक
करना योग्यहै ॥ ९९-१०५॥
येन केन च संपन्नं कालुष्यं दैवयोगतः ।
क्षमयित्वैव ते वेधा कर्तव्याऽऽवश्यकक्रिया ॥१०६ ॥
अर्थ-कर्मयोगते जिमकिसी पुरुप करि परिणामनिर्भ मलिनपना
कल्पपना उपन्या होय ता पुरुषमों मन वचन कायकर क्षमा कराय
आवश्यकक्रिया करणी योग्यहै ॥ १०६ ॥
क्रियां पक्षमवां मृदयतुर्मासभवां च यः ।
विधत्तेऽक्षमपित्वासा न तस्याः फलमश्नुते ।। १०७ ॥
अर्थ-जो मुढ विना क्षमा कराये पक्षजनितक्रियाको बहुरि
चतुर्मासजनितक्रियाको कोहै मो यह ता क्रिया के फटको न पाहे ।
भावार्थ-दरहदिनमैं प्रतिक्रमणादि करिए सो पक्षकी क्रिया
कहिए, चार महिना करिए सो चातुर्मासिक क्रिया कहिए सो इन
क्रियानको जासे कटुपता भई होय तामैं क्षमा कराये गिन करे तो
परिणामनिको दाम्यत क्रियाक फटको न पा ॥ १०७॥
देवनरायः कृतमुपमग
चंदनकारी महति समस्तम् ।।
कंपनमुक्ती गिरिखि धीरो
दुपनार्मपणमवेक्ष्य ॥ १०८॥
अर्थ--वंदना करनेवाला मनुष्य है मो पारकर्मी निर्जगको
रिचार के देव मनुष्यादिकानि की काया समान उपमर्गको सदै,
कैमोद पांकीमो काहित है धीर है।॥ १०८॥
मएम परिक्षा
२३३
Hindi
श्रा अधिकारको संकोचे है,-
इत्यमदो सततमन्नं
निर्मलपितो रचयति नूनम् ।
यः कृनिकामितगतिरष्ट
पाति म नित्यं पदमनाएम् ।। १०९ ॥
अर्प-जो निर्मरवित्त पुरुष या प्रकार निर्दोष न्यूनता रहित
निरंतर प्रतिकर्म कहिए आरश्यक किया ताहि फरहै सो नित्य अर
देखने में न आवे देगा जो मोक्षपद साहि प्राप्त होय है, कैसाई कृति-
मर्म अनितगति कहिए अननज्ञान जागा ऐसा जो सर्वज्ञ देवताफरि
फमा ऐमा जानना ।। १०९॥
भक्ति।
रागडेप तजि सामायिक मजि कीजे तीर्थकर गुणगान,
पंच परमगुरु घरण यदि नित पूर्वदोपको करि आसान ।
आगामी अपत्यागि देहसी ममतामाव निवारि सुजान,
पट आवश्यक साधि जीव इम लहै अमिगति पद निरवान।
इति श्रीमदमितगत्याचार्यकने श्रावकाचारे
अष्टमः परिच्छेदः ।
ऐसे थी अमितगति आचार्यविरवित पापफाचारविष
श्रावधां परिच्छेर समाप्त भया ।
अथ नवम परिच्छेद । दानं पूजा जिन शीलमुपवाश्चतुर्विधः । श्रावकाणां मतो धर्मः संसारारण्यपावकः ॥१॥ अर्थ -दान १ पूजा २ शील ३ उपवास ४ यदु संसारवनी अग्निसमान चार धर्म श्रावकनिका जिनदेवनि. कयाहै ।। तहां प्रथमही दानका स्वरूप कहहैं; दानं वितरता दाता देयं पात्रं विधिर्मतिः फलैपिणाऽवयोद्धव्यानि धीमता पंच तत्त्वतः ॥२॥ अर्थ— फलका वांछक अर बुद्धिसहित ऐसा जो दान देनेवाला पुरुष ताकरि दाता १ देने योग्य वस्तु २ पात्र ३ विधि १ मति ५ ये पाच स्वरूपसहित जानना योग्यहैं । भावार्य-दान देनेवालेकरि पूर्वोक्त पंच वस्तुका स्वरूप जानना योग्यहै ॥२॥ तहां दाताका स्वरूप कहहै;- भाक्तिकं ताष्टिकं श्राद्धं सविज्ञानमलोलपम् । सात्विकं क्षमकं संतो दातारं सप्तधा विदुः ।। ३ ।। अर्थ-सतजन, ते दानाकी सात प्रकार कहे हैं; सात कौन ! प्रथम तो भक्तिसहित १ अर प्रसन्नचित्त २ अर श्रद्धासहित ३ अर विज्ञानमहित ४ अर लोलुपतारहित ५ अर सात्विक कहिये शक्तिमान ६ अर क्षमावान ७ ऐमा जानना ॥ ३ ॥ आर्गे भाक्तिक आदिका स्वाप यहहै;- - नयम परिच्छेद। २३५ यो धर्मधारिणां धन सयं सेवापरायणः। निरालस्पोऽशतः शांतो भक्तिकः स मतो पुधः॥४॥ अर्थ-जो पुरुष धर्मफे धारनेवालेनकी संवा तत्पर भयासता सय फाहिये अपेक्षा रहिस आपही धार सो पडितनि करि आलम्परहित बुद्धिमान शांतचित्त ऐसा भाक्तिक फहिये भक्तिसहित कालाई । भावार्य-धर्मात्मानको मेवा योरै सो भाक्तिक कहिए ॥ ४ ॥ तुर्दिसयतो यस्य ददतथ प्रवर्तते । देयासक्तमतेः शुमालमाहुस्तौष्टिकं जिनाः ।।५।। अर्थ-जिसके आगे देता भया हा या धर्तमानम देसक हर्ष प्रवत्त । साहि फर्ममलरहित जे शुभ बिनदेव है से सौशिक पाहिए हर्षसहित पहेहै, माह सो देनेयोग्य परविण नाही है भाप युद्धिजाकी ।। ५॥ माधुभ्यो ददता दानं लभ्यते फलमीक्षितम् । यस्यैपा जायते यदा नित्यं भादं पदंति सम् ॥६॥ अर्धसाधूनके अर्थ दान देता जो पुरष ताकरि बल परस पाइए पर जाकै नियही थमा प्रनीतिहै ता पुलका आचार्य - द्रव्यं क्षेत्र सुधीः कालं भाव मम्पक रिविष्य यः। साधुभ्यो ददते दातं गरिशानमिमं विः ॥७॥ अर्धदम्प क्षेत्र फार भारको मई र रिचार सान. भई गुनी दान देयहे गरौ आर्य मशिन ॥७॥ विवापि यापते किंपियो न मांगारिकं फलम् । ददानो योगिनां दानं माने नमलोडपम् ।। ८ ॥
२३६ श्री अमितगतिमायकाचार। अर्थ-जो योगीनकों दान देता संता मन वचन काप फरिभी सांसारिक फटकौं न याचे है ताहि आचार्य अटोलुप कहे हैं ॥ ८॥ स्वल्पवित्तोऽपि यो दने भक्तिमारवशीकृतः । स्वाध्याचर्यकरं दान मात्विक तं प्रनसते ॥९॥ अर्थ-जो थोडा धनवान भी भक्ति भारफरि यश किया संता धनगनी आवर्य करनेवाला दानी देय साहि आचार्य साविक मागार्य-जो पनगहिन भी भक्तिकरि दान देव जामी देराके धनगन भी आभमाने जो धन्य है या मो ऐमा दान देपो ता पुरुषको साविक कहिप है ॥ २ ॥ कालुम्यकारणे जाने दुनियारे महीपमि । यो न कुप्पति के योपि क्षमा कययंनि नम् ॥१०॥ —হী নিলাম। বুধবার মান ব্যাগে রাম मी किमाने भी कोन को नाति आभार्यामागन को आगे नम मध्यम माप दानानि 407:--- मंग्लंडतो क्यों अपन्यो यर्विती गुणः । मध्यमानेकलावाशिदाता दानपिणः ॥११॥ यः- भाटियागुग पा आ AM निरनलिदगतो ?? Iftagli मोदय, form for wIR. नारा॥११॥ hint- मपम परिषद चिनीतो धार्मिक सेव्यस्तत्कालक्रमवेदकः । जिनेशमामनामिझो भोगनिस्पृहमानसः ॥ १२ ॥ दयानुः सर्वजीयानां रागदपादिवर्जितः । संसारासारतावेदी समदशी महोघमः ॥१३॥ परीपहमहो धीरो निर्जिताक्षो विमस्मरः । परात्मममयाभिशः प्रियवादी निरुत्सुका ।। १४ ।। यासितो मतिनां पूर्वः परासाधारणैर्गुणैः । लोकलोकोत्तराचारविचारी संघवत्सलः ।। १५ ।। आस्तिको निरहंकारो वैयाकृत्यपरायणः । सम्यचालंकृतो दाना जायते भुवनीतमः ॥ १६ ॥ अर्ध---विनयवान होय, धर्मात्मा होय, परतादिकके अभावतें औरन फरि सेवनेयोग्य होय, तकालयम का जाननेवाला होय । भावार्थ-जिस काटमैं जैसी यस्तु आदि चाहिये तैसा जानता होय; भर जिनेंद्र के उपदेशका ज्ञाता होय, बहुरि भौगनिधि यांछारहित चित्त जाका ऐमा होय ॥ १२ ॥ सर्व जीयनि पर दयासहित होय, रागपादिरहित होय समारो असारताका जाननेवाला होय, अर समान देखनेवाडा होप, भावार्थ-कोऊया इटानिष्टपने करि होनाधिक देराने वाला न होय, अर उद्यमी होप ।॥ १३ ॥ परीरहनिका सहन करनेवाला होय, धीर होय, अर जीती इंदिया जाने ऐसा होय, बहुरि मसरतारहित होय भर श्रेष्ठ अध्यात्मशास्त्रका जाननेशला होय, भियवचन बोटनेवाला होय, रिपपनि फी वाठारहिस होय ॥ १५ ॥ यहरि व्रतीनके और विर्षे न पाइए ऐसे असाधारण पवित्र गुणनिफरि वासित होय । .
२३८
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
भावार्थ-वतीनके गुणनिमें अनुरागी होय, बहुरि लौकिक आचार
या लोकोत्तर कहिए परमार्थ आचार ताका विचारसहित होय, अर
च्यार प्रकार संवपि यच्छासे गौकी ज्यों प्रीतिसहित होय ॥ १५॥
बहुरि अस्तिक कहिए परलोकादिकहैं ऐसी अस्तिबुद्धिसहित होय ।
भावार्थ-परलोक नाहीं पुण्य नाहीं पाप नाही इत्यादिक जो
नास्तिकबुद्धि ता करि रहित होय, अहंकाररहित होय, धर्मात्मानकी
टहल चाकरीमैं तत्पर होय अर सम्यक्त करि भूपित होय ऐसा दाता
लोकविर्षे उत्तम होयहै,
भावार्थ--पूर्वोक्त गुणनिसहित होय सो उत्तमदाता जानना ॥१६॥
आगें और भी कहेहैं-
आत्मीयं मन्यते द्रव्यं यो दत्तं व्रतवर्तिनाम् ।
शेपं पुत्रकलायैस्तस्क रिव लुंठितम् ।। १७ ॥
अर्थ-जो दाता व्रतीनकू दिया जो द्रव्य ताहि अपना मानेहै बहारे
बाकी रह्या जो द्रव्य ताहि पुत्र स्त्री चौरनकरि मानौ लूटलिया तैसा
मानहै।
भावार्थ-पात्रनिकं दानमैं जो धन लग्या सो तो पुण्यवंधके कारण
तें इस भव या पर भवमैं आपकी मुग्यदायी है तात अपना है अर
पुत्र स्त्री आदिकनिने सो पापबंधके कारणनै दोऊ भवमैं दुष्पदापी.
ताते अपना नाही चौरनकरि लूट लिए समानहै, ऐसा जानना ॥१७॥
ये लोकद्वितये सौख्यं कुर्वते मम साधवः ।
पांधा दारुणं दुःसमिति पश्यति चैतमा ॥१८॥
अर्थ-ये साधुजनहे ते मेर इम भवचित्र या परमाश मुसको करें
अर माधव ते भयानक दुःमों काहै, ऐसा दाता मनरि
विचार है ॥१८॥
नयम परिच्छेद। २. योऽत्रैव स्थावरं वेत्ति गृहकार्ये नियोजितम् । सहगामि परं विनं धर्मकार्य यथोचितम् ॥१९॥ अर्थ-जो पुरुष घरके कार्यमैं लगाया जो द्रन्य ताहि हाही गह. नेवासा मानह भर फेवल धर्मकार्यमै गाया योग्य इन्य ताहि मंग जानेवाला मानहै। भावार्थ-रिवाहादि कार्यभै दम्प लगाया मो सो इस सोफाम रक्षा याकी धर्मकार्यमें लगाया गोव्य पुण्यवैश्य कारण ते पारपं. साथ जायह ऐसा जानना !! १९॥ शरदभ्रममाकारं जीवितं यौवनं धनम् । यो जानाति विचारशो दने दाने स सर्वदा ।। २० ।। अर्थ-जो पुरुष शरदकाये थाइटे समान अधिर जीवनको भर जोपनों पर धनको जानेर सो विधारफा जाननेशाला सदाका दानकों देयम् ॥२०॥ योनसे नपस्विभ्यः प्रागुके दानमंजमा । न तस्याऽऽत्मभरेः कोऽपि विशेपो विपते पोः ॥२१॥ अर्ध--जो पुरष तपस्वीन के अधि प्रागुकहानको भरे प्रकार के देह लिग आपापोली अर पर किए विशेष नाही है। भार्थ-दान न देह मा पशुसमानी जाने अपना र " पशुभी भर सेयर मनुष्पानेयो विमानते है ॥२१॥ गृहं वनुष्यते तुंग सप्यते यत्र योगिनः । निगपने पर प्रातः शारदं पनमंडलम् ॥ २२ ॥ अर्थ-निसावी योगीपर ता रि योनीशनिको दान निए । मो मा पर पाए है भर दारी में दगिनि गररका निशा #T कर २२ ॥
na गा गानामगा गि गणना गोपग्मने । मा कमालिम मन्नाकपनम् ॥ २३ ॥ अ-IT भोगेपनि पर साहि गो कार है. माना जा मी या Prur मनुमा नागन? ॥२७॥ स गेही मायने मन्यो योदणे दानमंजमा। नपरी गराको पि पत्रीय कदाचन ।। २४ ॥ जो नई प्रकार दान देपट गो मध्य पशिनि की ही मानिया अर दानी गारिशमी पक ज्यों गहीन मानिरहे। भाई -सान देयगो गृहम है अर दानरहित केवल घर तो पक भी होयह, ताल दानविना गृहहीने गृहस्थ न कहिये पैसा जानना ॥२४॥ किंद्रप्यण कुवेरस्य किं ममद्रस्य यारिणा। किमंघसा गृहस्थस्य मुक्ति पत्र न योगिनाम् ॥ २५ ॥ अर्थ---जहा योगीश्वरनिका भोजन नाही सि कुवेरके द्रव्य करि कहा भर ममुद्रके जटवरि कहा अर गृहस्थ भोजन करि कहा। भावार्थ-जहां दान नाही मिन बहुत द्रव्यादिकानि करि कहा साध्य है किछू साध्य नाही, ऐसा जानना ।। २५!! ध्यानेन शोभते योगी संयमेन तपोधनः । सत्येन वचसा राजा गृही दानेन चारणा ॥ २६ ॥ अर्थ-योगी तो ध्यानकार सोहहै अर तपोधन जो तपस्वी है सो संयमकार सोहहै अर सत्यवचन करि राजा सोहैहै अर गृहाय सुंदर- दानकरि सोहहै ।। २६ ॥
।
मयम परिष्छेद।
२४१
तपोधनं गृहायातं यो न गृमति भक्तितः।
चिंतामणि करप्राप्तं स कुनीस्त्यजति स्फुटम् ।। २७ ।।
अर्थ-घर प्रति आया जो तपोधन साधु ताहि जो भक्ति न पड-
गाहै है सो पुबुदी हस्तविय आया जो चिंतामणी ताहि प्रकटपर्ने
तजैहैं ॥२७॥
विद्यमानं धनं धिष्ण्ये साधुभ्यो यो न परछति ।
स पंचयति मूढात्मा स्वयमात्मानमात्मना ॥ २८ ॥
अर्थ-घरविणे विद्यमान जो धन ताहि जो साधुनके अर्थ न देयहै
सो मूदामा आपही आपकरि आपकों ठग है। घरमें धन होते मुनी-
नको आहारादि दान न देयहै सो आपको टगैहै ॥ २९ ।।
स भण्यते गृहस्वामी यो भोजयति योगिनः ।
कुर्वाणो गृहकर्माणि परं कर्मकरं विदुः ॥ २९ ॥
अर्थ--जो योगीनों भोजन फराह सो घरका सामी कहिये है
भर दानविना केवल घरके कार्यों करहै ताहि पंडित है ते गुलाम
कोहे हैं, ऐसा जानना ॥ २८॥
यः सर्वदा क्षुधा धृत्वा साधुवेलां प्रतीक्षते ।
सः साधूनामलामेऽपि दानपुण्येन युज्यते ॥ ३०॥
अर्थ--जो सदा क्षुधा धारणकरि साधूनिक आहारकी वेलाकी
प्रतीक्षा परहै अर आहारवेलाटले पाउँ भोजन करहै सो पुरुष साधू-
नका अलाभ होते भी दानके पुण्यकरि युक्त होयह ।। ३० ।।
भरने नगरे ग्रामे कानने दिवसे निशि ।
यो धचे योगिनधित्ने दक्ष तेम्पोमुना वम् ॥ ३१ ॥
२४२
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
अर्थ जो पुरुष धरवि नगरविय ग्रामविय वनविय दिवस
रात्रिविर्षे योगीश्वरनिकों चित्तविय धारैहै, सो इन पुरुष करि निश्चयत
मुनिनके अर्थ दान दिया।
भावार्थ-जो सदा मुनीश्वरनिकी भक्तिका परिणाम राग्वैहे ताकै
मुनिनका मिटना न होते भी भावनाको शुद्रिताः दानका पुन
होयह ॥ ३१ ॥
यः सामान्येन साधूनां दानं दातुं प्रवर्तते ।
त्रिकालगोचरास्तेन योगिनो मोजिताः स्तुताः ॥३२॥
अर्ध-जो सामान्य पनेकारे साधूनके दान देनेकौं प्रवत है ता
पुरुषकरि भूत भविष्यत वर्तमानकालके सर्व योगीश्वर जिमाए अर
स्तुत्तिगोचर किये।
भावार्थ-जाके मुनिमात्रके दानमैं हर्षहै प्रकृतिहै ताकै मर्व
मुर्नानिकी भक्ति होनेते सर्वौं दान दिया अर सर्वहीकी स्तुति का
ऐसा जानना ॥ ३२॥
दत्ते ट्रेऽपि यो गत्वा विमृश्य व्रतशालिनः ।
सः स्वयं गृहमायाते कयं दत्ते न योगिनि ॥ ३३॥
अर्थ-जो दूर जायकरि भी व्रतीनौं हेर करि दान देयहै ।
आपही योगीश्वरनिको घर आये संते दान कैसे न देय? ' देयही
॥ ३३ ॥
सद्रव्याद्रव्ययोर्मध्ये यः पात्रं प्राप्य भक्तितः ।
ददानः कथ्यते दाता न दाता भक्तिवर्जितः ॥ ३४ ॥
अर्थ-एक तो द्रव्यसहित पुरुष अर एफ द्वन्यरहित पुरुष ।
दोरनिके मध्य जो पात्रको पायकै भक्तिन दान देयहै सौ दाता
यह थर भक्तिरहितहे सो दाना न कहिएहै, ऐमा जानना ॥ ३४ ॥
. मपय परिसछेद। २४३ पारं ददाति योऽकाले सस्य दानं निरर्थकम् । क्षेप्यु पिना कालं कुल पीनं प्ररोहति ॥ ३५ ॥ अर्प-यारि जो असारमै पानिवि दान देयह साफा दान निप्र- योजन से दिना काल क्षेत्रिय पोया भी बीज कई जगहै ! नाही ऊंगी, ऐमा जानना ॥ ३५॥ फाल ददाति योपात्रे वितीयं तस्य नम्यति । निक्षितपूपरे धीचं किं कदापिदवाप्यते ॥ ३६॥ अर्थ-पारि जो दान कालने भी अपारविष दान देयह साका दान नागयों प्राम होयह जैमें ऊपर भूमिरिन बोया वीज कहा कही पाइप अपि तु नाही पाइरह ॥ ३६॥ प्रक्रमेण विना वंध्यं पितीण पायालयोः । पलाय किमसंस्कारं निक्षित क्षेत्रकालयोः ॥ ३७॥ अर्थ-यारि पात्र अर फाल इन दोऊनविणे दिया दान भी दानकी किरि विना निकलहै जैसे मुंदर क्षेत्र अर योग्पकाल चियें भी धरतीक जोतना आदि संस्काररहित बोया योजहै सो कहा फलके अर्थ होयहै । अपि तु नाही होयह ॥ १७ ॥ कालं पात्रं विधि ज्ञात्वा दत्तं सत्पमपि स्फुटम् । उस वीजमिर शनैर्विधने विपुलं फलम् ॥ ३८॥ अर्थ-फालयी पानको अर विधिकों जानिकै थोडा भी दिया जो दानह सो चीये वीजको न्यों प्रकटपणे विस्तीर्ण पलकों धारन कोहै, ऐसा जानना ॥३८॥ देखें स्लोकादपि स्तोक च्यपेक्षो न हरछानुसारिणी शक्तिः कदा
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श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ---थोडेसे भी थोडा देना योग्यहै अर महा उदयकी अपेक्षा करनी योग्य नाहीं जाते इच्छानुसारिणी शक्ति कहीं कोईकै होयहै ! अपि तु नाही होयहै । भावार्थ-आपकै थोडा भी धन होयहै थोडेमसे थोडा धन दान, लगावना ऐसी न विचारना जो हमारे बहुत धन होयगा जव दान करेंगे, जाते जितनी इच्छाहै तितना धनतो कहीं कोईकै होय नाही; ऐसा जानना ॥ ३९ ॥ श्रुत्वा दानमतिर्यों भण्यते वीक्ष्य मध्यमः । श्रुत्वा दृष्ट्वा च यो दत्ते न दानं स जघन्यकः॥ ४० ॥ अर्थ-दान देतेकौं मुनकरि दान देनेमें जाकी बुद्धि होप सो उत्कृष्ट पुरुषहै अर दान देतेर देखकरि जाकी दान देनेकी बुद्धि होय सो मध्यम पुरुषहै भर मुनकरि देखकार भी जो दान न देयह सो जघन्य पुरुष कहिए अधमहे ।। ४० ॥ तोडन पीडन स्तेयं रोपणं दूपणं भयम् । यः कृत्वा ददते दानं स दाता न मतो जिनः ॥४१॥ अर्थ-जी और जीवनिक । ताइना करिके वा पीडना करिके वा चौग करिक वा रोप करिके वा तृष्णादि दूपग करिके या भय करिफ जो दानों देयह सो निन देयनि) - दाता नाही काहै || ४१॥ यहीपमा मदा दानं प्रदय नियवादिना । प्रियण रहिनं दर्ग परमं वकारगम् ।। ४२ ॥ अर्थ-निपाचनसहित युद्धिमान पुल करि सदा दान देना योग्य? जाते दिपचनविना दिया वहुत दानहै सो परका कारण है।
मपम परिषद २४५ भावार्थ-पान देना सो मोवपन सहित देना अर मोठे पचन- बिना दान भी ग्या कारणा, जाने फडकवचन माफी पुरा ॥१२॥ यः शमायाकृतं विसं विभागपति दुर्मतिः । कलिं गृभाति मृत्येन दुनिवारमसा ध्वम् ।। ४३ ॥ भर्य-जोलि पुर समभावरहित धनको देयह सो यह निध- पने मोलकर दुर्निगर पहिये दुग निवारण करिने योग्य पापकों प्राण पर। भायाध-त्रोपमाहित दान देनमै इटटा पापवध होपंह सात सम- मासहित दान देना योग्यह॥१३॥ आगे दान न देने योग्य बस्तुको सामान्यपने को है; जीरा येन निहन्यंने पेन पानं विनश्यते । गगो विवर्दते येन यस्मान् संपपते भयम् ।। ४४ ॥ आरंमा पेन जन्यंने दुग्मितं यच जायते । धर्मकामर्न तयं कदाचन निगधने ।। ४५ ।। अर्थ-जाकर जीर हनिये अर जाफर पात्रजनका नाश पीजिए भर जाफरि राग यहाईए मर जात भय उपजे ।। १५ अराफार आरंभ उपज अर जाते दुखी होप सौ यस्तु धर्मक पांडक पुरुषनिकार देने योग्य पदाच नाही कहियेहै ।। १५॥ आग तिन न देने योग्य वस्तुनि विषेश फहेहैं; इतपिंदार्यमाणायां गर्मिण्यामिव योपिति । प्रियंते प्राणिनो यस्यां सा भूः किं ददने फलम् ॥४६॥ अर्थ-लनिफरि विदारी भई गाभणी वाविप जैसे जाधिय प्राणी मोह, सो पृथ्वी कहा पट देय भपि तु नाही देय है ।
भी मिनि Hari-marathim Tr म TimilaritrATOnline लोमिदान जमी, मेगा ॥६॥ गांत्र समना पन माननादीनः । तिन गडोरगं कम्पापिननिये ॥१॥ wi-मानीमा भाग पान की गातीयों और गिनागिरमी मार दिया था कभी शनि नारी। भाग-यो xrtी नागनात मोरहान पुन्यके नाप ॥१७॥ पदयं हिम्यते पायं यन्मदा मयकारणम् । संपमा येन हीयते दुष्कालेनेर मानराः ।। ४८॥ रागडेपमदकोष लोममोहमनोमाः । जन्यंत तापका पन काप्टेनेव हुनागनाः ।। ४९ ॥ तधेनाप्टापदं यस्य दीयने हितकाम्यया । स तस्याप्टापदं मन्ये दत्ते जीवितांनये ॥ ५० ॥ अर्थ-जिसके अर्थ पारका हिमा कीजिए अर जो मदा भयका कारण अर दुर्भिक्ष करि मनुष्य जैमैं हीन होय तेमें जाकर सपन हीन होय || ४८॥ अर जैमें काट करि अग्नि उपजेहै तैमैं सतापकारी रागद्वेष मद क्रोध लोभ मोह काम जाकर उपजरें ॥४८॥ सो अथापर कहिये मुवर्ण जाकर जिसको हितकी वाठा कर दीजिए मो तिसकी जीवनेको शांतिके अर्थ अष्टापदनामा कर हिंसक जीव तार्ने दिया ऐसा में मानहूं। भावार्थ-जैसे कोऊ जीवनेके अर्थ काहूको अष्टापद नाम हिंसक जांवकौं देय ता ताका मरनही होय है तेसै धर्मक अर्थ मिथ्यादृष्टीनकों नयम परिच्छेद। २४७ दिया जो मुवर्ण सात हिंसादिक होने परके या आपके पापही होय, ऐसा जानना ॥ ५० ॥ मंसजत्यंगिनो येषु भूरिशससकायिकाः। फलं विधाणने तेषां तिलानां फल्म परम् ॥ ५१ ॥ अर्थ-जिनविर्षे धने प्रसकायिक जीव उपजैहै तिन तिटनके देने वि फल केवल पापहै। भार्थ-तिल देनेमैं प्रसकायिक जीवनिकी हिंसाने फेवल पापही है. पुण्य नाहीं ॥ ५१॥ प्रारंभा यत्र जायंते चित्राः संमारहेतवः । तन्मय ददतो पोरं केवलं कलिलं फलम् ॥ ५२ ।। अर्थ-जिसविर्षे संसारके कारण नाना प्रकार आरंभ होय है तिस घरके देनेयालेकै फल केवल घोर पाप होय है ।। ५२ ।। पीडा संपवते यस्ता वियोगे गोनिकायतः। पया जीया निहन्यते पुन्छभंगगुरादिभिः ॥ ५३ ।। यस्यां घ दुधमानायां तर्णकः पीध्यतेतराम् । तां गा वितरता श्रेयो लभ्यते न मनागपि ॥ ५४ ।। अर्ध-जिसयों गौनके समूहत वियोग होनेकी पीडा उपजेह अर जाफार पूंज गांग पुर आदिकनि करि जीव हनिएहैं अर जाका दुरे सौ षठा अतिशय करि पारित तिम गीफ देनेवाले पुरुषकरि किट भी पुण्य न पाइएहै। भावार्थ-गौ देने पुपका अंश भी नाही, पापही होय ॥५.५५ या सर्वतीर्थदेवानां निवासीभूतविग्रहा। दीयने गृपते सा गौः कथं दुर्गनिगामिभिः ॥ ५५॥.
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-जो गौ सर्व तीर्थ अर देवनिक बसनेका स्थानहै शरीर
जाका सो गौ दुर्गनिके जानवाटेन करि कैसे दीजिए है और कैसे
ग्रहण करियहै।
भावार्य-मिथ्यादृष्टी गौ के शरीरमै मर्व तीर्थ अर देव यसते
मानहै, ऐसी गी की पापी कैसे देय, अर कैसे लेयहैं; ऐसी तर्क
करीहे ॥ ५५॥
तिलधेनुं घृतधेनुं कांचनधेनुं च रुक्मधेनुं च ।
परिकल्प्य भक्षयंत थांडालेभ्यस्तरां पापाः ॥ ५६॥
अर्थ-तिलनिकी गौ घृतकी गौ मुवर्णकी गौ मपेकी गौ बनाय
बनाय करि जे भौंहे ते चाडालनें भी अधिक पापीहैं ।
भावार्थ-चांडाल मी तो न स्वायद अर इन मिथ्यादृष्टीनन तिटा.
दिककी बनाय करी गौ भी खाय लीनी ताने ते चाडालते भी मियाय
पापीहै, ऐसा जानना ॥ ५६ ॥
या धर्मवनकुटारी पातकवमतिम्तपोदया चौरी ।
वैरायासाच्या विपादशोकसमक्षोणी ।। ५७ ॥
पस्यां सत्ता जीरा दुःसतमाग्नोत्तरंति भाजलधैः ।
कः कन्यायां तम्यां दत्तायां विद्यते धर्मः ५८॥
अर्थ-जो कन्या धर्मवनके काटनेको कुल्हारीसमान अर पारकी
यसनी अर सरथग्ण दया की चौग्नेगली बार प्रयाग शर्मा शोक
पेद इनकी भूमिकाहे ॥ ५५ ॥ अर जा ति आसक्त जीवर ते
अनिशपकी दायमा जो मंमाग्ममुद्र साने न टनर निग कापायी
दिये संने पहा धर्म होय ! पारही हो।
भावार्य-कन्यादानने जोक. पापनिका मतान बनाने पर-
है धर्म ना, हेमा मानना ॥५॥
मपम परिष्रोदा सारभकर ये पीयाई फारपंति धर्माय । ते तांडविपद्धप क्षिपति यदि यलम्वालम् ।। ५९ ।। अर्थ--जो सर्व हिमादिक आरंभका पायानी शिक्षा साहि धर्मक अर्ध कराह ने वृक्षनके यनयी पदावन, भबि हार मानई माला जाकी ऐगा अतिको पहे। भावार्थ-- अति पनपद मारी उष्टयाज • आप पग धर्म नाही धर्मका नाही. ॥ ५॥ पः संक्रांती महणे यारे विनं ददानि मुटमनिः । गम्यकपन रिचा मिध्यात्वयन पपन्यपः ॥ ६ ॥ अर्थ-जो गरी पुरण मानिलिय गण of am: पानिको योगी गया परयो :. -1 यारे॥६० ॥ पे ददते मृतदमपं यद्धा दानानि मनमाधिपः । पश्ययितुं तर मे भरमीभूतं निर्पिपनि ॥ ११ ॥ अर्ध-synो मात्रकी महान कानिधययोर रिकरि भारी : भावार्य--1Mmm are माथे पेरास मा FARR मोनिकी अभदान देना , पुरीपाप ॥१॥ विग पति ने हरिः पापको पदापि सुभार । मान्यन ते दी। मशीनदाय: ॥६६॥ और तो बार 2 * गुम।। 3
ध्री अमितगमिप्रायकाचार
दाने दचे पुत्रर्मुन्यने पापनोय यदि पिनरः ।
विहित तदा गरिने परेण मुक्ति पगे यानि ॥ ६३ ॥
अर्थ-पुत्रनि करि दान दिये संने जो पितर पा सा और
फरि चारित्र को मैंने और मुकिको प्रान होय ॥ १३॥
गंगागतेस्थिजाले मपनि मुगी यदि मनोऽप्रचिरकाले।
मस्मीकनम्नदांमः मिक्तः पल्लवयते वृक्षः ।। ६४ ॥
अर्थ-हाइनकै समूहको गंगानदीवि गये मत जो यह प्राणी
यहत मुखी होयह तो भस्म कग्या वृक्ष सीन्या मया हग्या होय ।।६।।
उपयाचंते देवानष्टषियो ये धनानि ददमानाः ।
ते सर्वस्वं दत्त्वा नूनं क्रीणति दुःखानि ॥६५॥
अर्थ-~-जे नष्टयुद्धी दान देते संते देवनि प्रति धननिकों या
ते निश्चयकरि सर्व अपना धन देकरि दुःसनिकी खरीदें हैं ।। ६५ ।।
पूर्णेकाले देवने रक्ष्यते कोऽपि नूनमुपयातः ।
चित्रमिदं प्रतिविवरचेतन रक्ष्यते तेपाम् ॥ ६६ ।।
अर्थ-कालको पूर्ण भये सते निश्चयकार कोई भी पुरुष निकट
आपे जे देव तिन करि नाही रक्षिए है, बहुरि तिन देवनिक अचेतन
प्रतिविवनि करि रक्षा मानिये सो यहु वडा आश्चर्य है।
भावार्थ--कोई मिथ्यादृष्टी कुदेवनिकी प्रतिमा वनाय तिनकै मागे
अपना जीवना वांछ है तहा आचार्य कहैहैं कि आयु पूर्ण भये साक्षात् .
देवभी रक्षा न करिसकैहै तो तिनके अचेतन प्रतिबिंबनित जीवितव्य
वाछना यह बड़े आश्रर्यकी बात है ॥ ६६ ॥
मांसं यच्छति ये मूढा ये च गृहंति लोलुपाः ।
द्वये वसति ते श्वभ्रे हिंसामार्गप्रवर्त्तिनः ॥ ६७ ॥
नयम परिच्छेद।
अर्थ-जे मूढ मांसको देपहै अर जे लोलुपी मासका ग्रहण करें
ते टोऊ हिंसामा के प्रवपिनहारे नरकवि यास करहै ।। ६७ ॥
धर्मार्थ ददते मासं ये नूनं मृदयुद्धयः ।
जिजीविपति ते दीर्घ कालकूठविपाशने ।। ६८ ॥
अर्थ-जे मूढयुद्धी धर्मके अर्थ मासको देय? ते निश्चयकरि फाट-
कूट विषको पाय फार जिये चाहे हैं ॥ ६८ ॥
वादशं यच्छता नास्ति पापं दोपमजानताम् ।
यादशं गृहंतो मांसं जानता दोपमूर्जितम् ।। ६९ ।।
अर्थ-दोषक परम्पको न जानते ऐसे दान देनेवाले सिनी
तैसा पाप नही जैसा महापाप दोपको जानने जे गामको मरण करने
पारे तिनको है।
भावार्थ-कुटानका देनेवाला अज्ञानने धर्म जानि दान देव की
पापी सोहा परंतु जो जानकारि दोरमरित दान प्राण फी सोता
ते महापापीहे साते भोरे जावत जानिय प्रपंच करे ताक हराय
अधिकई, पेमा जानना ॥ ६ ॥
दाता दोपमजानानो दो धर्मधियाऽपिलम् ।
यः स्वीकरोति सहान पायं स्पेप न मर्पया ।। ७० ॥
अर्थ- दाता है गो तो दोपको न जानता मता धर्मपुखिकी मई
दान देय र जो ता पुदानको धार कमो सर्वथा पत्र
नाही ॥ ७० ॥
पानि वानि दानानि विधा न शेती।
विपद्यतन प्राणी भूरिमिभक्षितरिः ॥७॥
श्री अमितगतिमायकाचार। आत्मीकरोति यो दानं जीवमईन संभवम् । आकांक्षमात्मनः सोमयं पात्रता तस्स कीशी ।। ७८ ॥ अर्थ-जो आपके मुग वास्ता संता जोगनिके घासते सापाने दान साहि महण फोहै, साके पाला कैमी। भावार्य-अयोग्य न लेय सो पार काहेका, यह तो अपारसी १॥७८॥ न गुग्णादिकं देयं न दावा तम्म दायकः । मग पात्रं महीनाम्य जिनानामिनि भागनम् ॥ ७९ ॥ अर्ग-गुग्गादिक नो देने योग्य या नाही अर निम मु. करा देनाग दाना नाही आ इग दानफा प्रहण करने नारी या प्रकार जिनंदनिका शामन पाहिए भाजा. पात्र निशिन नेन नेनापः प्रानिः । पन मयादिदर्भ मानिधविधायकम् ॥ ८.!! मर्ग-पानी बिनाश किया आनिमा भा. नयामा भननिक गणकगा। - मकान नाn AM ETHI, दान नागोय.॥ An नकार गगी नियनं गन येन धमा पिया मंगनः पानं न न अन्गी ।। ८१॥ आमरम्मत यत यति परः। नर नानपारायने ।।८।।
नयम परिच्चंद।
अर जा कर आत्मा उपशांत होय अर जाकर परका उपकार होय अर
जाकर पारका रिगाइ न होय मो देने योग्य वस्तु सराहिए ।। ८२ ॥
आर्गे देने योग्य वस्तुके विशेष पर हैं-
अभयानीपधज्ञानभेदतस्तथतुर्विधम् ।
दानं निगयते सद्भिः प्राणिनामुपकारकम् ।। ८३ ॥
अर्थ-अभयदान १ अन्नदान २ औषधदान ३ निदान न
भेदनित प्राणीनिका उपकार करनेवाला दान संतन करि प्यार प्रयास
करिए ॥ ८ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितव्ये यनः स्थितिः ।
तहानतस्ततो दशास्तं सर्वे संति देहिनाम् ।। ८४ ॥
अर्ध--जा कारणते धर्म अर्थ पाम मोक्ष इन चिनि जातिय
होसमेत रोयह सात जीवनयो जीरितम्यक दानने धर्म अर्थ काम मात्र
सर्व दिये।
भावार्थ-जाने जीवनयाँ अभपानादि दिपा ताने धर्म काम
मोश सर्व येतात धर्मादिकका आधार जीरना ताने ॥ ८ ॥
देवरतो पणीप्य लोरयमाणितम्ययोः ।
प्रलोर पूणुने कोपि न परिषग्य जीवितम् ।। ८५॥
अर्थ-तीन क भर जारितम्य इन दोनों एक माण कर
लो देवनिकरि पता को पुरष आस्तिको करि पहातानी-
यो माणकर, अविनाही पर हैं।
भावार्थ- आसीन कोषको से कर नाही !
जोरिता सोपरिवार भीतीन को न ॥८॥
अलोरर न पतो मूल्य जातिपस जयते।
तद्धता तनोद शामिना दिन ॥८६॥
भी निगनिकासार भान्मीमगति पो दान जीतमान माम् । आकासमात्मनः मांग पाना नाकीनी ॥ ४॥ अ-तो मा हानि पागले दो दान गादि कमी। भाषागान मेग गो कार काका, यह सो आ ॥८॥ न मुवादिकं देणं न दागा तय दायकः । नन पायं ग्रीनाम्य जिनानामिनि शासनम् ॥ ७९ ॥ अर्थमुपातिक मी देने योग्य यम्न नाही अर तिम मुगादि- फका देनेवाला दाता नादी र इम दानका प्रहण करनेगा पात्र नाही, या प्रकार जिनदेयनिका शामन कहिए आजाहै ॥ ७९ ॥ पानं विनाशिनं तेन तेनाधर्मः प्रयनितः । येन स्वर्णादिकं दत्तं सर्वानर्थविधायकम् ॥ ८०॥ अर्थ-निमर्ने पात्रका नी विनाश किया पर निसने अमर्म प्रर्व- तया जाकरि सर्व अनर्थनिका करनेवाला मुवर्णादिक द्रियातानें। भावार्थ-मुवर्णादिकने हिमादिक पाप उपजहै ताते टेनेवाटेका तो -नाशकिया अर अधर्म प्रवत्ताया, नाने कुदान देना योग्य नाहीं ॥८॥ आरौं देनेयोग्य वस्तुका वर्णन कौहै;- रागो नियूद्यते येन येन धर्मों विवर्यते । संयमः पोप्यते येन विवेको येन जन्यते ॥ ८१ ॥ आत्मोपशम्यते येन येनोपनियते परः। न येन नाश्यत पात्रं तद्दातव्यं प्रशस्यते ॥ ८२ अर्थ-जा करि राग नाशकौं प्रात होय अर :प्राप्त होय अर जाकरि संयम पुष्ट होय अर जाकर - नयम परिच्छेद। २५५ M पर जा करि आत्मा उपशान होय अर जाकरि परका उपकार होय अर जाकरि पात्रका विगाइ न होय मो देने योग्य वस्तु सराहिएहै ॥ ८२ ॥ आगे देने योग्य वस्तुके विशेष कहहैं,- अमयामीपयज्ञानभेदतस्तश्चतुर्विधम् । दानं निगद्यते सद्भिः प्राणिनामुपकारकम् ।। ८३ ॥ अर्थ-अभयदान १ अन्नदान २ औषधदान ३ ज्ञानदान १ इन भेदनित प्राणीनिका उपकार करनेवाला दान संतन करि प्यार प्रकार याहिएहै ॥ ८३ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितव्ये यतः स्थितिः । तदानतस्ततो दनास्त सर्वे संति देहिनाम् ।। ८४ ॥ अर्थ-जा कारणते धर्म अर्थ काम मोक्ष इनकी स्थिति जीवितव्य होतसत होयह तात जीवनको जीवितव्यके दानते धर्म अर्थ काम मोक्ष सर्व दिये। भावार्थ-जानै जीवनकों अभयदानादि दिया तार्ने धर्म अर्थ काम मोक्ष सर्व दिये ताने धर्मादिकका आधार जीवनाहीहै साते ।। ८४ ॥ देवरुत्तो घृणीष्वक लोक्यप्राणितव्ययोः । प्रलोक्यं पृणुते कोऽपि न परित्यज्य जीवितम् ॥ ८५॥ अर्थ-तीन लोक भर जीवितव्य इन दोऊनिममें एक प्रहण कर ऐसे देवनिकरि काया कोज पुरुष जीवितव्यको छोडकरि कहा सीनलो- कको ग्रहण करहै, अपि तु नाही का है । भावार्थ-जाक्तिन्यकै आगे सीन लोककी संपदा फछ् नाहीं जाने जीवितव्यकों छोडकरि फोऊ भी तीन लोगों न चाहहै ॥ ८५॥ लोक्यं न यतो मूल्यं जीवितव्यस्य जयते । तदक्षता नतो इन काक्षितम् ॥८६॥ T-
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नयम परिच्छेद।
अर जा फरि आत्मा उपशान होय अर जाकरि परका उपकार होय अर
जाकरि पात्रका विगाइन होय सो देने योग्य वस्तु मगहिप है ॥ ८२ ॥
आगे देने योग्य वस्तु विशेष यह हैं;-
अभयानीपधज्ञानभेदतस्तचतुर्विधम् ।
दानं निगद्यते सद्भिः प्राणिनामुपकारकम् ।। ८३ ॥
अर्थ-अभयदान १ अन्नदान २ औषधदान ज्ञानानन
भेदनित प्राणीनिका उपकार करनेवाला दान संतन करि प्यार प्रकार
पाहिए है ॥ ८३ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितव्ये यतः स्थिनिः ।
तदानतस्ततो दनास्त गर्ने संति देहिनाम् ।। ८४ ॥
अर्थ---जा कारणते धर्म अर्थ काम मोक्ष इनकी स्थिति जोषितन्य
होतगत होयह तात जीवनयी जीरितम्यक दान धर्म अर्ध काम मात्र
सर्व दिये।
भावार्थ-जाने जीवनको अभयदानादि दिया ताने धर्म काम
मोक्ष सर्व दिये साल धर्मादियाका आधार जीवनाहीसा ॥ ८ ॥
देवरत्तो षणीय लोग्यप्राणितन्ययोः ।
प्रलोक्यं पृणुते कोपि न परित्यग्य जीवितम् ॥८५॥
अर्थ-भान शंकर जातिय न दोऊनितम एक माण कर
ऐसे देवनिपरि पापा को पुरस आरितम्यको कोपरि पहातानी.
यफोमाण को, अपितु नारी की।
भाषा---जारिताप, भाग सीन कोष संता
जावितव्यका सारियां भी तीन रोका न पाहे ।। ८५॥
लोगयं न पतो मूल्य जीशिवपस्स जयते ।
नद्रधना तो दत्तं शामिना निक्षतम् ॥ ८६ ॥
-२५४ श्री अमितगतिश्रावकाचार। आत्मीकरोति यो दानं जीवमर्दन संभवम् । आकांक्षनात्मनः सौख्यं पात्रता तस्स कीदृशी॥ ७ ॥ अर्थ-जो आपकै मुख बांछता संता जायनिके घातते उपम्या' हो दान ताहि प्रहण करहै, ताकै पात्रता कैमी। भावार्थ-~-अयोग्य दान लेय सो पात्र काहेका, वह तो अपात्रकी है ॥ ७८॥ न मुवर्णादिकं देयं न दाता तस्य दायकः । न च पात्रं ग्रहीतास्य जिनानामिति शासनम् ।। ७९॥ अर्थ-मुवर्णादिक तौ देने योग्य वस्तु नाही अर तिस सुपर्णादि. फका देनवाला दाता नाही अर इस दानका ग्रहण करनेवाला पार नाही, या प्रकार जिनदेवनिका शामन कहिए आज्ञाहै ।। ७९॥ पानं विनाशितं तेन तेनाधर्मः प्रवर्तितः । येन म्वर्णादिकं दत्तं सर्वानर्थविधायकम् ।। ८०॥ अर्थ-तिम पात्रका ती विनाश किया अर सिसने अधर्म प्र. या जाकार मर्म अनर्थनिका करनेवाला मुवर्णादिक दिपाताने। भावार्थ-गुवर्णादिका हिमादिक पार उपजे सा लेनेवालेशतो -नाशकिया अर अधर्म प्रार्ताया, नाने कुदान देना योग्य नाही॥८॥ भाग देनयोग्य वानुमा वर्णन कोह- रागो निश्चन मेन येन धर्मो विवर्यते। संपमः पोप्यते पेन वियेको येन जन्यते ॥१॥ प्रान्मोपगम्यते येन येनोपरिपने परः। नयन नात्यने पात्रं नदातव्यं प्राप्यने ।। ८२ ।। धर्म-जा की गगनको HER पर जाकर धर्मों मन होय अर . मयम पुर हाव भावारि ॥८॥ .
मयम परिपछर। अर्थ-मेयमका आधार जो तपपीनका रार मो मुनिरा योजक जो पुरए तापरि पानने प्रामुगः और पनि फार क्षा करणी योग्य आगे शानदानका वर्णन कहै । विवेको जन्यते येन संयमो येन पाल्पते । धर्मः प्रकाश्यते येन मोदो येन विहन्यते ॥ १० ॥ मनो नियम्यते पेन रागो येन नित्यने । सईयं भव्यजीयाना शागं निर्णताल्मपम् ॥ १.४॥ अर्थ-जाफार विधक उपजाइए र जारि सपम पाmu" रि धर्म प्रकाशिए र जाकर मार सि ॥ १० ॥मा आवर न निपल जिए अर जाकरि गगन सा गा विमा ने ऐगा शान मारमीनिको देना पोय? ॥१०॥ वियको न विना सामने न तो यतः । सतस्नपोविधानाथ देयं शामनिंदितम् ।। १०५ ।। -जाने बिना विक, नाही अर विकशिमा ते तप करनेपि अनिदित पात्र देना पोयो। १०५ ॥ आ और भी दान देने योग्य नियो । परसापामयादीनि पराप्यपि पयोचितम् । दानमानि विधानेन रम्नशिपाये ॥१.६॥ पर्पमध्यजपन्यानो पाशणामुपकारकम् । दानं पसायद सावरियापिना ।। १.७॥ स- पार राविना देन .१.२ १
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मयम परिषद
ARMA
मर जा फरि आत्मा उपशान होय अर जाकर परका उपकर गय अर
जाकरि पात्रका विगार न होय मो देने योग्य यानुसगरि ॥ ८२॥
आर्ग देने पाय घस्तुक विशेष है-
अभयापीपधशानमेदतस्तचतुर्विधम् ।
दानं निगयते सनिः प्राणिनामुपकारकम् ।। ८३ ।।
अर्थ-अभयदान १ अनदान २ औषधान ३ दान म
भेनिने प्राणीनिका उपकार करनेवागद्वान संतम पी गया Ran
पहिए है ।। ८३॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितव्ये यतः रियतिः ।
तदानतस्ततो दगास्त गर्ने संति देहिनाम् ॥ ८४ ॥
अर्थ-जा कारण धर्म अर्थ काम गांव की ति माविताय
होतम होयह तात जीवनको जावितव्य दान धर्म में काम कर
सर्प दिये।
भावार्थ-जाने जीवनको अभयदान दिया ताप कम
मोक्षगई दिये जाने धमदिकका भाधार जीवना
देवरुतो धणीय लोग्यप्राणितप्पयोः ।
प्रसरोवर्य पूर्णने कोऽपि न परिलम्य जाषितम् ।। ८५॥
अर्थ-तीन का भर जरितस्य इन रानिय र. रणका
लो देवनियरि काका को गुरु मलितपको Rani.
को प्राणकर, अपितुना है।
भाई.---आगे dka
आरिताको कारोबारा ८५॥
प्रलोर न पो म जाविषयाय बने ।
मद्रयता को पिन नार॥८६॥
श्री अमितगतिश्रावकाचार। आत्मीकरोति यो दानं जीवमर्दन संमवम् । आकांक्षन्नात्मनः सौख्यं पात्रता तस्स कीदृशी ॥ ७८॥ अर्थ-जो आपकै मुख वाछता संता जीवनिके घातते टप-या जो दान ताहि ग्रहण करैहै, ताकै पात्रता कैमी । भावार्थ-अयोग्य दान लेय सो पात्र काहेका, वह तो अपानही है ॥ ७८॥ न मुवर्णादिकं देयं न दाता तस्य दायकः । न च पात्रं ग्रहीताऽस्य जिनानामिति शासनम् ॥ ७९ ॥ अर्थ-मुवर्णादिक तौ देने योग्य वस्तु नाही अर तिस मुवर्णादि- कका देनेवाला दाना नाही अर इस दानका ग्रहण करनेवाला पात्र नाही, या प्रकार जिनदेवनिका शासन कहिए आज्ञाहै ॥ ७९ ॥ पात्रं विनाशितं तेन तेनाधर्मः प्रवर्तितः। येन स्वर्णादिकं दत्तं सर्वानर्थविधायकम् ।। ८० ॥ अर्थ-तिसर्ने पात्रका तो विनाश किया अर तिसर्ने अधर्म प्रर्व- "या जाकार मर्य अनर्थनिका करनेवाला मुवर्णादिक दियातानें। भावार्थ-मुवर्णादिकनै हिंसादिक पाप उपजैहै ताते टनेबाटेका तो • नाशकिया अर अधर्म प्रवत्ताया, ताने कुटान देना योग्य नाहीं ।। ८०॥ आगें देनेयोग्य बस्तुका वर्णन करहै, रागो निपूछने येन येन धर्मो विवद्धर्यते । संयमः पोप्यते येन विवेको येन जन्यते ॥ ८१ ॥ आत्मोपशम्पते येन येनोपत्रियते परः । न येन नाश्यत पात्रं तदातव्यं प्रगम्यते ॥ ८२॥ अर्थ-जा करि गग नाशकों प्रात होय अर जाकरि धर्म वृद्धि प्राप्त होप अर जासरि मपम पुष्ट होय अर जाकरि विवेक उपजे ॥ ८ ॥ - नयम परिच्छेद। mannRM अरजा फरि आत्मा उपशांत होय अर जाकर परका उपकार होय अर जाकरि पात्रका रिगाह न होय मो देने योग्य पातु मगहिप ॥ ८२ ॥ आर्गे देने योग्य वस्तु विशेष फोहहैं- अभयापापधज्ञानभेदतस्तचतुर्विधम् । दानं निगघते सन्निः प्राणिनामुपकारकम् ।। ८३ ।। अर्थ-अभयदान १ अनदान २ औषधमान ३ानदान ५ भेदनित प्राणानिका उपकार करनेवाय दान संतन परि प्यार प्रफार फहिरहे ।। ८३ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितव्ये यतः स्थितिः । तदानतस्ततो दगास्त गर्ने संति देहिनाम् ॥ ८४ ॥ अर्थ-जा कारणते धर्म अर्थ याम मोशनी पिति तिप्प होतसत होयह ताने जीवनको जीवितव्य दाग धर्म अर्थ फाम मांश सर्व दिये। भावार्थ-जाने जीवनको अभयदानादिहिया ताने धर्म भई काम मोक्षस दियेतात धर्मादिकका आधार जीरनाई ताने।। ८४॥ देवगतो पूर्णायक प्रलोक्यमाणितम्ययोः । प्रलोक्यं कृणुने कोपि न परित्यग्य जीवितम् ॥ ८५॥ अर्थ-जीनगक भर जाषितम्य इन दोऊनि क ण कर ऐ देवनिफरि या कोऊ पुरुष आरितम्यको सोयाशि का सीन. कको प्राण बोर, अपितु नाही पाहै। भावार्थ-रितम्य भाग सीन कोषको क माह में आतिथ्यको परिवार भीतीनगरको ना ८५॥ चलोय न पनो मृत्य जीवितपास ले । सद्रक्षता तो दत्तं प्रागिनो किनक्षितम् ॥ ८६ ।।
२५४ श्री अमितगतियायकाचार। आत्मीकरोति यो दानं जीवमर्दन संभवम् । आकांक्षमात्मनः सांख्य पात्रता तस्स कीदृशी ॥ ७ ॥ अर्थ-~जो आपकै मुस वांछता सता जाधनिके घातते उपम्या दान ताहि प्रहण करहै, ताकै पात्रता फैमी । भावार्थ-अयोग्य दान लेय सो पात्र काहेका, यह तो अको न मुवर्णादिकं देयं न दाता तस्य दायकः । न च पायं ग्रहीतास्य जिनानामिति शासनम् ॥ ७९ ॥ अर्थ-मुनर्णादिक ती देने योग्य यस्तु नाही अर तिग मुर्गी फका देनेवाला दाना नाही आ इम दानका प्रहण करने गया नाही, या प्रकार निनदेवनिका शामन काहिए आहाहै ।। ७९॥ पात्रं विनाशितं तेन तेनाधर्मः प्रार्तितः। येन मादिकं दर्न मर्यानविपापकम् ॥ ८॥ अर्थ-निम पानी निाश किया और निगर्ने अधर्म - माया जालमा अननिका कानवाला मुग्णातिक दिपाताने । भावार्य-गुणातिको माटिक पार गाडेसने नाकिया अा अर्म सनाया, नान दान देना योग्य नारी ॥ ८॥ अनयोग यम्मा वर्णन करे- गगी नियने यन यन धर्मा सिदयने । मंयमः पाप्यते येन विवो न जन्मने ॥८॥ प्रान्मापायत पन यनोपरिपते परः। नयन नाम्यने पायं नहातम्यं प्रगम्यते ॥ ८ ॥ - शेष भर tent कर दम नयभार !!
नयम परिच्छेद।
२५५
man-4-
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अर जा करि आत्मा उपशान होय अर जाकरि परका उपकार होय अर
जाफरि पात्रका विगाइ न होय सो देने योग्य वस्तु सराहिएहै ॥ ८२॥
आर्गे देने योग्य यस्तुके विशेष फहेहैं;-
अभयानौपधज्ञानभेदतस्तश्चतुर्विधम् ।
दानं निगद्यते सद्भिः प्राणिनामुपकारकम् ॥ ८३ ।।
अर्थ-अभयदान १ अन्नदान २ औपधदान ३ ज्ञानदान ५ इन
भेदनित प्राणीनिका उपकार करनेवाला दान संतन करि प्यार प्रकार
फहिएहै ।। ८३ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितव्ये यतः स्थितिः ।
तदानतस्ततो दत्तास्तं सर्वे संति देहिनाम् ॥ ८४ ॥
अर्थ-जा कारणते धर्म अर्थ काम मोक्ष इनकी स्थिति जीवितव्य
होतसते होयह ताते जीवनकौं जीवितव्यके दानः धर्म अर्थ फाम मोक्ष
मर्व दिये।
भावार्थ-जाने जीवनकौं अभयदानादि दिया तार्ने धर्म अर्थ काम
मोक्ष सर्व दिये ताने धर्मादिकका आधार जीवनाहीहै तात ॥ ८ ॥
देवरत्तो वृणीष्वक प्रैलोक्यप्राणितव्ययोः ।
त्रैलोक्यं घृणुते कोपि न परित्यज्य जीवितम् ॥ ८५॥
अर्थसान लोक भर जावितन्य इन दोऊनिसें एक ग्रहण कर
ऐमैं देवनिकरि फया फोऊ पुरुष जीवितम्पकौं छोडकरि फहा सीनगे.
कौं प्रहण करहै, अपि तु नाही यरहै ।
भावार्थ--जीवितव्यकै आगै सीन कफी संपदा फछ् नाहीं जाने
जावितव्यको छोडकरि को भी तीन सोसको न चाहै ।। ८५॥
अलोक्यं न यतो मूल्यं जीवितव्यस्य ज.यने ।
तद्रक्षता ततो दत्तं प्राणिनो किं न कोक्षितम् ॥ ८६ ॥
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दशम परिच्छेद। २७१ सकलमत्वहितोद्यतचेतनो विवयकर्कशवाक्यपराअनुसः ॥ ३४ ॥ धनकलत्रपरिग्रहनिस्पृहो नियमसंयमशीलविभूपितः। कृनकायहपीकविनिर्जयः प्रणिगदंति कुपात्रमिमं युधाः ॥ ३५॥ अर्थ-जो परको कठिन है आचरण जाका ऐमे आचरणको आ. चैरहै, अर रिकट अर भयानक ऐसे मिध्यादर्शन करि वासित है, बहुरि सर्व जीवनिके हित, उद्यमी है मन जाका, अर झूठ अर कठोर ऐमे यचनत परामुख है ॥ ३४ ॥ बहुरि धन स्त्री परिप्रहते निस्पृही है, अर नियम संयम शीट इन करि भूपित है, बहुरि करपा है काय अर इंदिपनिका पराजय जाने ऐसा है, इस पुरुषको पडित जनहे ते कुपात्र भावार्थ-जो फायोशादि करे है अर वन धारै अर कपाय इंद्रिय- निफौं भी जीत है अर सम्पक्त रहित है सो कुपात्र है ऐसा जा- नना ॥३४.३५॥ आगे अपात्रका स्थगए पोहै- गतरूप:प्रणिहंति शरीरिणो वदति यो विवथं परुपं वचः। हरनि विचमदत्तमनेकधा तो भजनेऽगनाम् ।। ३६ ।। कि विपरिग्रहः नामयंत्रितमानमः .
श्री अमितगतिश्रावकाचार। भवति यो जिन शासनभासकः सततनिंदनगर्हणचंनुरः। वपरतत्वविचारण कोविदो व्रतविधाननिरुत्सुकमानसः ॥ ३२ ।। जिनपीरिततत्वविचक्षणो विपुलधर्मफलेक्षणतोपितः। मकलजंतुदयादितचेतन म्तमिह पात्रमुगंति जघन्यकम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-बदमाकी किरण समान निर्मल , सम्यग्दर्शन जाका यही जन्म जरा मरण पी पीडात भय है अर कराह प्यार प्रकार संरके दिसापिने दिन कहिये प्रतिमप मार जानै अर संसारके भोग शाशी वितो दि जाकी ॥ ३१ ॥ यहरि जो जिन शासनका प्रकाशक है, अर निरनर अपणी निंदा गहीं विर्ष प्रवीण है, यहरि आत्मा पातार इनके विचार पडित, महरि मानिके आचरणयिनि- रमुफ है मन जामा । भावार्थ बत न धार सके है ॥३२॥ यहरि मिना भापित हनिपिचक्षण , अर यहा नो धर्मका फल सा देखने मदर है। भावार्थ-मुग्यफल जी मोश सा गिाय अन्य पन घ, अर समान मानिकी दमा की भी मार गिना दमा अनि मम्या माल्यार करे ॥१३॥ mart.- मानि यमरणं पाही शिष्टयोगदानामितः। - नाम परिसदा मकलमन्यदिनापनपतनी विषयक रंगयात्रयपगतः ॥ २४ ॥ धनकलत्रपरिग्रहनिम्तो नियमगंयमशीलविभूपितः । हमपापहपीकविनिर्जयः मणिगर्दनि पाप्रमिमं पृपाः ॥३५॥ अर्थी को निभायण नाuti warm '. र मर विकर कार भयानक पान मा गई जापनि हो उपमा मना" ... सपना पराभान॥४॥ी uttin eurhit भर नियमसेयtan fortan 10701 यिनिया पाम आने पर -जी का ... नियो भी 11 m. aai aan नगा ।।२४३५॥ भाग भाप 403B- पता:णिनिरिणी पति पावित पाए। ही तिमामाता मदनरापातो भगनाए ॥१॥ विरिपरिभाषि: ri ERRIERRE AL २७२ श्री अमितगतिश्रावकाचार। कृमिकलाकुलित असते पलं कलिलकर्मविधानविशारदः ॥ ३७॥ दृढकुटुंबपरिग्रहपंजरः प्रशमशीलगुणवतवर्जितः । गुरुकपायभुजंगमसेवितं विषयलोलमपानमुशंति तम् ॥ ३८ ॥ अर्थ-जो दयारहित जीवनों हनहे बहुरि झूठ अर कठोर वन- नको बोलहै, अर विना दिये धनी अनेक प्रकार हरैहै, अर कामवा- णकरि पीडित भया संता स्त्रीकी सेवैहै ।। ३६ ॥ अर नाना दोप- निका करनेवाला जो परिग्रह ता सहितहे, अर नाहीहै वशीभूत मन जाका ऐसा भया संता मदिराकी पीयेहै, अर कीडाके समूहकारि भ्याप्त जो मांस ताहि खायहै अर पाप कर्म करणेवि प्रवीणहै ॥ ३७॥ अर दृढ कुटुंब परिग्रहके पी जरासहितहे, बद्दरि समता शील गुणवन इनकर यजितहे तिस विषयलोलुपीको आचार्य अपात्र कहेहै, कैसाह सो तोत्र कायम्प मर्पकार सेरितहै ॥ ३८ ॥ भावार्य -सम्यक अर प्रतादिक इन दोऊनि करि रहित है सो अपात्रहै ॥ विवृदय पायं पहुधेति पंडित पिशुद्धवृदया गुणदोपभाजनम् । विहाय गय परिगृह्य पारनं शिवाय दान निधिना वितीयते ॥ ३९॥ अर्थ-या प्रकार पटितनिकर निर्मम्युद्धिकार गुण भर दोपनिका मान जी बहनदार पात्र माहि जानके अरनिदानीको स्पामिक भर पवियको प्रहार का मोक्षक अर्थ मिनिमहिन दान दीरियो ।
पाम परिच्छेद। -- भाषा-पा प्रसार गुण टान पात्रा' : मोक्षक, अर्थ भावनिका त्याग. पात्रनिको कामना की। आगे रनम पात्रनिधी आ inal:- कृतीगगर्गगपवित्रविग्रहो निजालयहागनी निगाल । मग पीपुग्ने तपोधन गांगु तिमि हतप्पनिानतः ॥ ४ ॥ गुगंगाने ग्यममे गती पपपिन धापया रिचाननः । मनीपितानपालप्रदाय गल में परममिधामणम् ॥ ११ ॥ अनेकजन्माभिगमकर्मिन ग्नपीनिग्न पविषपारिता । पादरः शालपते पदा विसमा एनि.गुग्गमिमापिः ॥४॥ प्रागनपानदीपमानिमिः प्रपूज्य मायामपलिए। एदाहा: पदमा वदने मातापानमा मनोरः कारिरमा रिचार मिनीमपि। पारिभातमानित ARTI
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-फरयाहै उज्ज्वल धोवती दुपट्टा सहित पवित्र शरीर जान
बहुरि अपने घरके द्वारमै प्राप्त भया आकुलता रहित ऐसा भपा से-
मुनिराजको अंगीकार करहै, कैसाहै सो नमस्कार होउ, हे मुनीन्द्र इ.
तिष्टी ऐसे करयाहै शन्द जानें ॥ ४०॥ बहुरि ता पी भठे प्रर-
कियाहै मस्कार जाका,
भावार्थ-दयासहित टगाह चौका आदि जहाँ ऐसे अतिशय की
प्रशंसा योग्य घरके भीतर तपस्वीको विधानते त्यापित करे,
तपस्वी याछित अनेक फटका देनेवालाह, भर दूषण रहित रनकी म
भले प्रकार दुर्टमहै ॥ ११॥ अनेक जन्मकरि उपार्ने जे कर्म तिनयः
फाटनेवाला ऐसा जो सपोधन मुनि ताके तहां पवित्र जर यार से
आदरसहित चरण युगलको मुक्तिके अर्थ प्रशाटन करहै, कैसे मुनि
मुनिके मुण्पकोई अभिटापा जाके ॥ ४२ ॥ यहरि मनुष्य भर देग्न
ममूहकार मित जो मोक्षाभिटापी मुनिका चरणयुगल ताहि पुष
अशत दीपक इत्यादि द्रव्यनि करि हर्षसहित यंदे, भर मस्तरोग-
हैं हस्तकमट जाने ॥ १३ ॥ पहरि नाश कियाई फाममए
जाने ऐसे मुनिको मन वचन कापकी विशुदिता भले प्रकार का
आपके अर्थ किया जो चार प्रकार प्रागुक आहार सादि पहे, अंगाई
मी गुण नाही हाणे पोप निश्चय नाफा,
भावार्य है प्रदान जाका ऐमांह ॥ १४ ॥
अनेन दल विधिना तपस्विना
मा नोकमपि प्रजापते ।
वापरायां पटपादपम कि
नवमर्न पामेति शिस्तरम् ॥५॥
पराम परिष्छेद।
अर्थ-इस विधिसहित सपनी थोडा दिया जो दान सो महा-
है फल उपजा है जैसे पृथ्वीविरें पोपा जो पटाक्षका बीज सो कहा
उल विस्तारको प्राप्त न होय है, होपही है ।। ४५ ॥
निवेशित वीजमिलावलेऽनपे
विना विधानं न फलावहं यथा ।
तया न पात्राय वितीर्णमंजमा
ददाति दानं विधिना विना फलम् ॥ ४६॥
अर्थ-जैसे निर्दोष पृथ्वीतल वि गोया भपा पीज है सो विमान
जो जतन आदि क्रिया ता बिना परदाता न होय है सैसे पारके अर्थ
भले प्रकार दिया भया दान है सो विधि जो पडगाहन आदि सा दिना
सदातिषिभ्यो दिन वितम्यता
नि प्रदयं प्रियजस्पिना धनम् ।
प्रजापते कर्करामापिणः सर्ट
धनं वितीणं गुरुवरफारणम् ॥ ४७ ॥
अर्थ-विनय मितरता भर मिट पचन घोटना जो पुरस
साफरि शानिके अर्थ अपना धन कहिये यथायोग्य आदि वस्तु
देना पोप है जात पटोर वधन योउनेवालेफे दिया भया वस्तु है सो
प्रकटपने महारका कारण होई ॥१७॥
निगप यः शमानतनो
निप दत्ते द्रवि शठत्वतः।
सुखाय दुग्योदयका र
मन्येन गमति स दुर्मनाः कलिम् ॥ १८ ॥
1.-. m मीftITERTI wiजी नि jीली पो. मामा मग मी दुनिल गारो गरे ? जो पार कर गरम की। भागार्ग---तो गोरा गोदाम मंदार गम्यम्मानितः गंगनेभ्यो द्रव्यं मा कालमालोस्य दगम् । दातुर्दानं भूरि पुण्यं वियते । मामग्रीतः मर्यकार्यप्रमितिः॥ ४९ ।। अर्थ-भरे प्रकार भनिरों करना ओ दाता ताके दस मात्र फाट इनकी विचारकै दिया भया दान मी धने पुष्पको उपजावट, जाते सर्व कार्यकी प्रसिदि है सो मामग्रीन होय है। भावार्थ-भक्तिमहित दम्यादिक पूर्व कहे प्रमाण विचारकै पात्रनिके अर्थ थोडा भी दिपा दान हे सो बहुन पुण्यमयकों की है, इहां इन भाव काट तो कहे अर क्षेत्र पात्रनिकों जान देना। वलाहकादेकरसं विनिर्गतं यथा पयो भूरिरसं निसर्गतः विचित्रमाधारमवाप्य जायते तथा स्फुटं दानमपि प्रदात्तः ।।५।। अर्थ-जैसे मेधत निकस्या जो एक रसरूप जल सो स्वभावहीन नाना प्रकार आधारको पाय करि अनेक रसरूप होय है तैसे दाताते निकस्या दान भी प्रकटपने नाना प्रकार पात्रनिकौं पाय अनेक प्रकार- रूप परिणमै है।
2" दराम परिच्छेद। भावार्थ-जम पारी दान दीजिए तेमाही कमबर यमेवर है, ऐगा जानना ॥५०॥ घटे यथाश्मे सलिलं नियेमित पलायने क्षिप्रममा पमियते । नया वितीण विगुणाय निष्कलं प्रजायते दानमगा नापनि ।। ५१ ।। अर्थ- याचे पट वित धरघा जी म. सो घर नि: जाय है, अर घट भी फट जाय । तेरी गुणगी पुरपये. अर्थ या भया दान हगो निष्कलीय अरयोरेनवाल भी नाशयो प्राय है. पापर कर, ऐमा जानना !! ५१ ॥ विना विवरेन यथा तपस्विता यथा पटुत्वेन पिना गरमती । मथा विधानेन पिना पदान्पना न जायने शर्मफरी कदापन ।। ५२ ॥ अर्थ-विना भिकारीपना र चातुर्माना भी पराचिन गुगकारी न रोप है रोने ति विधान विजा दाना कदाप गुगका नाही ॥५२॥ पया पितीण भुजगाय पारने प्रज्ञापने प्राणारे शिष पयः। भरल्यपापाय पने गुणोपले तथा प्रदतं पादोपकारणम् ॥ ५५ ॥ m-1 दिया भया ! दूर TRE NिT. गुणनियम मोहिया भास है।५॥
श्री अमिनगनिनायकाचार। । वितीर्य यो दानमसंयनात्मने जनः फलं कांवनि पुण्यलसणम् । वितीर्य वीज ज्यलिने म पारक ममीहने मम्यमपासपणम् ।। ५४ ॥ जो मनुष्य अमयत मनुष्य के अर्थ दान देकर पुण्य है लक्षण जागा ऐमे फटकी चाह है मो जलनी अग्नियि योजकों बोय करि दूरगर हैन धान्यकी यांछ। भावार्थ-विषय कपायनि महित मदोन्मत्त मिथ्यादृष्टीनको दान देक पुण्य चाहै है सो नाही होय है । बहुरि इहां अमपीको दान निया सो दुःखित जीवनिको करणा दान नाहीं निपेथ्या है. ऐमा जानना ॥५४॥ विमुच्य यः पात्रमवद्यविच्छिदे कुधीरपात्राय ददाति भोजनम् । स कर्पित क्षेत्रमपोध मुन्दरं फलाय वीज क्षिपते तोपले ॥५५॥ अर्थ-जो पुरुप पापक नाशके अर्थ पात्रको छोड़के अपात्रकी भोजन देय है तहां आचार्य कहैं वदे खेदकी बात है जो मुंदर ओते भये खेतकौं छोडकरि पत्थर विय बीजको खेप है ॥ ५५ ॥ यथा रजोधारिणि पुष्टिकारणं विनश्यति क्षीरमलावुनि स्थितम् । प्ररूढमिध्यात्वमलाय देहिने तथा प्रदत्तं द्रविणं विनश्यति ॥ ५६ ॥ अर्थ-जैसे पुष्टिकारी जो दूध सो धूरकी धारने वाली जो तंबदी विर्षे घरमा भया नाशकौं प्राप्त होय है तेसै फैल रहा है मिथ्याव- प मल जाकै ऐसे प्राणीको दिया भया द्रव्य है सो नाशकौं प्राप्त होय है।
दशम परिच्छेद। भावार्थ-जैसे धूल भरी कदुक तुंबडी वि मरया र नापाको प्रार होय अर फटुफ परिण से मिष्याधीयों दिया धन नागको प्राम होय है अर पापवैध फोर है, ऐमा जानना ॥ ५६ ।। नो दातारं मन्मथानांतचित्तः संमारातः पाति पापावलीढः । अमोराशेर्दुतरा लोहमाया नावा लोहं सार्यमाणं न रएम् ॥ ५७ ।। अर्ध-कामपरि घ्याम , चित जाफा ऐसा पास Trit गी दाताको संसारको पागले न पह, जाने दुस्तर ममुरी मेरमा नावकर लोह निराया म देरया ॥ ५७ ॥ ग्रंथारंभप्रोपलोभादि पुरो पंथारंभग्रोपलोमादिपुटम् । जन्माराते रक्षितं तुल्पदोपो ननं शत्तो नो गृहरयो गृहग्यम् ।।५८॥ अर्थ-आचार्य तर्फ करि काहै है, मही: जो परिमा भारभ सोय सोम ग्यादिपनि करि पुह परिमाया गुई मो पनि आआभ मोध लोभ आदि पारि पुष्ट जो गृहस्थ ताहि समार पेश गदा का. का समर्थ माही, योगा को गुरु गृहसमान दोर आदि। भाषा-परिमादिशनि की तादातासासो दारसहित पापा को भला करगी मापाने तक.स जानना ॥ ५८॥ लोभमोहमदमम्मीना लोमभोरमदमामरह।
२८० श्री अमितगतिश्रावकाचार । पाति जन्मजलपरपरागो रागवंतमपहस्तितपापः ॥ ५९॥ अर्थ-दूर किया है पाप जाने ऐसा वीतराग लोम मौहमद भावकरि रहित पात्र है सो लोम मोह मद मन्सर भावनिका घर रागी पुरुष ताहि संसार समुद्रत रक्षा करहै । भावार्थ-रागी जविनको तारनेकौं वीनरागही समर्थ है अन्य नाही, ऐसा जानना ॥ ५९॥ सर्वदोपनिचिताय फलार्थी यो ददाति धनमस्तविचारः। तदधाति स भलिम्लुचहम्ने कानने पुनरपि ग्रहणाय ॥ ६०॥ अर्थ-~~जो विचाररहित पुरुष फटका अर्थी दोपनि करि म्यान पुरुषके अर्थ धनकी देय है सो वनवि चौग्नके हायमैं फेर पानी टेनेक अर्थ धन सौपेह ।। ६० ।। दानं यतिभ्यो ददता विधानतो मतिविधया भवदुःसशांतये । दुरवसंसारपयोधिपानिनी न मोगवृद्धिमनसापि धीमता ।। ६१ ॥ अर्थ-विरानमहित पनानके अर्थ दान देता जो पुरा ता पर मैमार दुःपकी शांतिके अर्थ बुद्धि फरणी योग्यह, मर रहे *1 जाका ऐमा नौ संसारममुद्र सागि पटकने वारी जो भागनिकी बुद्धि मा बुद्धिवानकरि मनकी भी फरणी योग्य नाहीं । भायाय-दान देकर परमाही युति करणी भोगनिको अभि. ॥ न करणी ।। ६१॥
दशम परिच्छेद। २८१ प्रदाय दानं प्रतिनां महात्मनां यो याचने भोगमनर्थकारणम् । मनीपितानेकमुसप्रदं मणिं प्रदाय गृमाति स दुर्जरं विपम् ।। ६२ ।। अर्थ--जो पुरप गहात्मा तीनकों दान देकरि अनर्ध का कारण जो भोग ताहि याठेहं सो वाछित अनेक मुखका देनेवाला जो रत्न साहि देकरि दुर्जर विषको प्रहण कर ॥ ६॥ पमागानामिव प्राणिवित्रासिना मर्जने रक्षणे पोपणे सेवने । याति पोराणि दुस्सानि येषां जनः संति भोगाः कथं ते मनः धीमताम् ॥ ६३॥ अर्ध-प्राणीनको दुग देनेवाले सर्पनके समान जो भोग तिनके उपजाबने विर्षे रक्षण विर्षे पोरणे विौं सेवने वि. भयानक दुःपनिको जीव प्राप्त होय? ते भोग बुद्धियाननि के मने भए कैसे होय। भावार्थ-भोगनिकों युद्धिमान मुखफारी फैसैं माने, अपि तु नाही माने ॥ ६३ ॥ श्रद्धीयमाणा अपि वंचर्यते निपेन्यमाणा अपि मारयते । ये पोप्यमाणा अपि पीडयंते ते संनि भोगाः कथमर्थनीयाः ॥ ६४ ॥ अर्थ-जे भोग प्रीति करे भएभौटिगैहे अर सेये भयेभी मारहै. भर पोपे भएभी पीडा उपजाव है ते भोग फैमै पाउन योग्य होय हैं, अपि तु नाही होय है ।। ६४ ।।
श्री अमितगतिश्रावकाचार। उत्पद्यमाना निलयं वकीयं ये हव्यवाहा इव घार्यमाणाः। प्रप्लोपयंते हृदयं ज्वलंत स्ते याचीयाः कथमिंद्रियार्थाः ॥ ६५ ॥ अर्थ---जैसे जाज्वल्यमान उपजी भई अग्नि हैं से अपने स्थानों जलाने से वे भोग इन्छाकरि धरेमए मनविय जलते संते दपर्श जला है ते इंद्रियनिके भोग कैसे वांछने योग्य होय ॥६५॥ दत्तप्रलापभ्रमशोकमूर्छाः संतापयंतः सकलं शरीरम् । ये दुनियारां जनयंति तृष्णां ज्यरा इंचते न मुसाय संति ॥ ६६ ॥ मर्थ-दिपाहै प्रलाप कहिए या यकवाद भर भ्रमफाहिये औरण और जानना अर शोक, अर अचेतनपना जिन बहुरि समस्त शर- को संताप उपनावते आ दुर्निवार तृष्णाकी उपमाह ऐसे अरनि के समान जे भोग त गुपके अर्थ नाही ॥६६॥ विश्राण्य दान कुधिपो पनिभ्यो से प्रार्थने विषयोपभोगम् । ने लांगलंगा गनु कांचनीय विलिण्य किंपावन पनि ॥ ६७ ॥ अर्थ-मि अर्थ दान देकर किसी को करें है में SR मवर्णी हलनि करि की मोत की निके दरको दशम परिच्छेद। भावार्थ-किपाकया फट स्वानेमें सी प्रिय टांगहै अर पार्ट प्राण होह तसे विषय भी भोगते ती नाके सागैहैं भर परिपाकम महादत देयहे, तातै पह यांत दियाहै ॥ ६७ ।। भिंदंति स्त्राय मणिं मयं काष्ठाय ते कल्पतरं लुनंति । नावंच लोहाय विपाठयंते भोगाय दानं ननु ये दर्दने ॥ ६८॥ अर्थ-आचार्य सर्व करैहैं जो जे पुरप भोगनके अर्थ दान देयो । डोराके अर्थ महामोड रनको फोहै, अर पाएके अई फयाको कांटे भर रोहके अर्थ जहाजको सहि ॥ ६८॥ पररशक्यं दमितेंद्रियाचा सरति धर्म विपयार्थिनी थे। पापाणमाधाय गले महोतं विशंति ते तीरमलभ्यपारम् ॥ ६९ ॥ अर्थ-दमें नियमप घोडे निनने ऐसे जे पुरर औरनि करि भय जो धर्म ताहि विषयाधी भए संत भाया है तेरे को पा. णको गले बिनधारक नाही लेनेयोग्य पार जाया ऐसा जो माता प्रति प्रवेश करें॥ ६९॥ दिने दिने ये परिपर्यमाणा विवर्दमानाः परिपीक्यते । से करोगा इस मंति भोगा शिनिंदनीया रिपोभनीners.॥
भी जमिगगतिमागार। आज भौगनिनिरि किये मा यमान मर मेने जैसे रोग पीडा उपनाम पी पर लिपोप फोन पंदिन जनकी गांठने योग्य होय, अपि तु नाही होयं ॥ २० ॥ प्रयन्छति माग्यं मुराधीघरेभ्यो न ये जात मोगाः कथं ते परभ्यः । निशुंभंति ये मनमत्र द्विपंद्र न कंठीग्यास्ते कुरंग त्यति ||७|| अर्थ-जे भोग मुरनिके नायक जो केंद्र तिनके अर्थ ही कदाचित मुख न देय ते औरनकं अर्थ मुख कैसे देय, इहाँ दृष्टांत क है- जे सिंह इहां लोकमै मतबारे गजेंद्रकी मारे हिरणकी नाही छो.ह ॥ ७१ ॥ न याचनीयाविदुति दोपं विज्ञाय रोगा इव जातु मोगाः । किं प्राणहारित्वमवेक्षमाणो जिजीविपुः खादति कालकूटम् ॥ ७२ ॥ अर्थ-या प्रकार दोपकौं जानिक पंडितजन करि रोग समान जे भोग ते कदाचित् वांछने योग्य नाही, इहा दृष्टांत कहेहैं.-प्राणहारीप- णेकौं देखता जीवनेका वांछक जो पुरुष है सो कहा कालकूटकौं खाप है, अपि तु नाहीं खाय है ।। ७२ ॥ भोगाः संपद्यमानाः सुरमनुनभवाचितितप्राप्तसौख्या याच्यंते लन्धुकामः कथमपविपदं धर्मतो मुक्तिकांताम् । :
--- साम परिच्छ। मस्यं स्वीकर्नुफामाः क्षुदुरुतरनमस्कांडविच्छेददक्षं स्वीकणु किं पलाल फलममलधियः कुर्वने कर्षणं हि ॥ अर्थ-धर्म मुक्तिरीय प्राप्त होनेको है इछा जिनके ऐसे पुरु- पनि करि यातित प्राप्त किये है मुग जिननें ऐसे प्राप्त भए जे देव मनुष्य जनित भोग ते पिदार कोई प्रकार याचिए है, अपि तु नाही पाचिए जाने धान्यको अगीकार करनेके वाटक जे निर्मलमुद्धि पुरष से पहा प्यार फटको अगीकार करनेको गेती की है, अपितु नाही परे है, कमा हे धान्य पीडाम्प जो बझ अधकारका समूह ताके रेदने विष प्रवीण है। भायार्य-जैसे खेतीमें मुख्य फल तो धान्य है अर पियार आदि स्वयमेव उपजै है तेसै धर्मका फल ती मोक्ष है द्रादिक पद तो विना चाहे शुभापयोग ते वयमेव उपने है, ता. इंद्रादिक पदके योग्य धर्मका पाउना योग्य नाही॥७३॥ त्यन्का भोगामिलापं भवमरणजरारण्यनिर्मूलनार्थ दचे दानं मुदायो नयविनयपरः संपतेभ्यो यतिभ्यः । भुका भोगानरोगानमरवरवधूलोचनांभोजभानु नित्यां निर्वाणलक्ष्मीममितगतियतिप्रार्थनीयां स याति अर्थ-नीति अर विनयवि तपर भया जो पुरुष जन्म जरा मर- णमप यन नाशके अर्थ भौगनिकी वाडाकी यागिकै हर्षसहित सम. मी मुनीश्वरनिके अर्थ दान देय है सो देवागनाके नयनकमलकों सूर्य- समान देव होय रोगरहित भोगनिको भोगि मोक्ष लक्ष्मीको प्राप्त होय है, वैसी है गोक्षलक्ष्मी अविनाशी है अर अप्रमाग है ज्ञान बिना ऐसे यतीन करि पाउने योग्य है ।।७४। y
श्री अमितगतिमायकायार।
दोहा
मोग चाह तजि साधुकी देत दान जो जीव ।
मुरमुख सर लहि अमितगति होय मोक्षतिय पी!!
इत्युपासमाचारे दामः परिच्छेदः
गप्रकार भमितगनि भाचार्यविरचित मापकाचारपि
पशयो परिमोद पूर्ण भया ।
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अय एकादश परिच्छेद । पलं नाभयदानस्य चतुं केनापि पार्यते । यम्पाकल्पं मुये जिहा ग्याप्रियंने सहसराः ॥१॥ अर्थ-अभयदानके पलको कहनेको पोऊ फीर भी समर्थ हूजिए अपि तु नाही इजिए। जिसके यानेको फल्पकाल पर्यंत हजारौं जीभ मुरादि म्यापार कीजिए है तो भी अभयदानके फल कहनेकौं योऊ फरि भी समर्थ न दूजिर है ॥ १ ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां जीवितं मूलमिप्यते । सद्रक्षता न कि दस हरता तम किं हतम् ॥ २॥ अर्थ-धर्म अर्ध काम मोक्ष इन प्यारीही पुरुषार्थनिफा मूल जीवना करिहै ताने तिम जोवनको रक्षा करता जो पुरुष ताफरि कहा न दिया अर ता जीवनेको रक्षा हाता जो पुरष साकरि कहा न नाश किपा, सर्वही नाश किया ॥ २ ॥ गोवालबागसीतः पुण्यमागी यदीप्यते । सर्वप्राणिगणनायी नितरां न सदा कथम् ॥ ३॥ अर्थ-जो गौ पालक माम्हण वी इनकी रक्षात पुन्यवान जीव मानिए है तो समस्त प्राणीनिकै समूहका रक्षा करनेवाला पुरुष है सो अधिक पुन्यवान कैमैं नाहीं ॥ ३॥ ययेकमेकदा जीवं प्रायमाणाः प्रपूज्यते । न तदा सर्वदा सर्व प्रापमाणः कयं पुधैः ॥४॥ ।
૨૮૮ अमितगतिश्रावकाचार। . अर्थ-जो एककाल एकजीवी रक्षा करता संता पुरुषहै मो पूजिएहै तो सदा काल सर्व जीवको रक्षा करना संता पुम्पहै सो पंडितनि करि कैमें नाहीं पूजिए है, पूजिए ही है ॥ ४ ॥ चामीकरमयीमुवी ददानः पर्वतः सह । एकजीवामयं नूनं ददानस्य समः कुतः ॥५॥ अर्थ--आचार्य तर्क करैहैं-पर्वतनि सहित मुवर्णमयी पृथ्वीको देता पुरुष है सो एकर्जावकी रक्षा करता जो पुरुष ताके समान कहांत होय, अपि तु नाहीं होय ॥ ५॥ गुणानां दुखापानामार्चितानां महात्ममिः । दयालुर्जीयते स्थानं मीनामिव सागरः॥६॥ अर्थ-बडे पुरुपनि करि पूजित ऐसे जे दुर्लभ गुण तिनका दयाल स्थानक होयहै, जैसे रत्ननिका स्थान समुद्र होयहै तैसें ॥६॥ संयमा नियमाः सर्वे दयालोः संति देहिनः । जायमाना न दृश्यंते भूरुहा घरणीमृते ॥७॥ अर्थ-दयावान जीव के संयम नियम सर्व होय है, जात पृथ्वी बिना वृक्षहैं ते उपजे न देखे ॥ ७॥ कारणं सर्ववैराणां प्राणिनां विनिपातनम् । तत्सदा त्यजतोधा कुतो वैरं प्रवर्तते ॥८॥ अर्थ-प्राणीनिकौं घातहै सो. सर्व वैर भावनिका कारण है, ताते प्राणीक घातकौं मन वचन काय करि त्यागता जो पुरुष ताकै वैरभाव कहां प्रवत्त ॥८॥ मनोभूरिख कांतांग सुवर्णाद्रिरिव स्थिरः । सरवानिव गंमीरो विवस्वानिव मास्वरः ॥९॥ .
Harnaitra it : increatifafe: । न पिजनम॥ 1.॥ en-Inst citery:: riminatat kirtun for iti meerut it . AREnre in tinkat Municiit. 7 treatment arti.! भयो, कार #ram.trint. RAH NR 01.॥ नाjrenा पडा पुदिनाः । पनामाननदानवापः॥ ११ ॥ or-मामे बार नयन. ormatiranit theatients at fnt मा नारा attementariet|१॥ मदग्निमो. न भूतं न भविष्यति । पप गपपते गधी तारमपदानतः ।। १२ ।। भ:- Ripम बनमान- मी मान भार न Hanipur the anानने न0 3 , सहा Pani॥ १२॥ भिपत पन राममेव महानवम् । पागम्याभयदानग्य फलं समाति भापितम् ॥ १३ ॥ भ-निस भयानक जीवनिका र पालि से सम. भारी मारिए तिमी, तिस अभयदान ५८ कहनेको कान मतंय ॥ १३ ॥ स अभपानका वर्णन किया। मागे माता दानका वर्णन को-
२२०
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
आहारेण विना कायो न तिष्ठति कथंचन ।
भास्करेण विना कुच्च वासरो व्यवतिष्ठते ।। १४ ।।
अर्थ-जैसे सूर्य विना दिन कहांत तिष्टै दिन न होय तैसें आहा-
रविना शरीर कोई प्रकार न तिटै है ॥ १४ ॥
शमस्तपो दया धर्मः संयमो नियमो दमः ।
सर्वे तेन वितीयते येनाऽऽहारो वितीर्यते ॥ १५ ॥
अर्थ-~~जा पुरुष करि आहार दीजिए है ताकारे शमभाव तप दफा
धर्म संयम नियम इद्रियनिका दमन ये सर्व दीजिए है ॥ १५॥
चिंतितं पूजितं भोज्यं क्षीयते तस्य नालये ।
आहारो भक्तितो येन दीयते प्रतवत्तिनाम् ॥ १६ ॥
अर्थ ---जा पुरुष करि भक्तितं वतीनको आहारदान दीजिए है ताके
घरवि वांछित अर प्रशंसा योग्य जोभोजन सोक्षीण नाहीं होप है ।। १६॥
कल्याणानामशेपाणां भाजनं स प्रजायते ।
सलिलानामि भोधिय॑नाहारो वितीर्यते ॥ १७ ॥
--जा पुरुष करि आहारदान दी नए है सो पुरूष जैसे जदनिका
भाजन समुद्र होय तसे समस्त फल्याणनिका भाजन होय है ॥१७॥
उपमेव त्रिपोधिप्प धन्यं दातारमंपा।
आयांति तरमा श्रेष्ठाः मुभगं यनिता ॥१८॥
अर्थ-आहाग्दान देनेवाले पुरुषकों बेगि करि लक्ष्मी है ते सयम
श्रेष्ट आप प्राप्त होय है जैसे श्रेष्ठ घी है ते मुंदर पुगपको आप प्रा
होय में ॥१८॥
मंपदम्नीकनगां सक्रिगामपरिगाम् ।
मत्याना मेगा: पयोधिमिानिनगाः ॥ १९ ॥
एकादश परिक
अर्थ-सीर्थकरनिकी पकवत्तीनिकी अर्द्धचमवानिकी सर्व संपदा
हैं ते आहार देनेवाले पुरपको से है जैसे नदी समुद्रकों से तैसे ॥१९॥
प्रक्षीयंते न तस्या ददानस्यापि भूरिशः।
ददाना जनतानंद चंद्रस्येव मरीचयः ॥ २०॥
अर्थ-जैसे सोचनको आनंद देती जे चद्रमाकी किरण ते क्षीण
न होयहे यहुतदान देतेकी भी सपदा क्षीण न होयहै ॥ २०॥
यस्फलं ददतः पृथ्वी प्रामुकं यच भोजनम् ।
अनयोरंतरं मन्ये तृणाधिजलयोरिव ॥ २१ ॥
अर्थ-पृथ्वीकौं देता जो पुरुष साका जो फल है बहरि प्रामुक
भोजनकों देते पुरुष ताका जो फलहै, इनि दोऊनिका अंतर तृणकी
अणीका जल भर समुदफा जर इनि दोऊनिका अंतर है तैसे मानूं
है।
भावार्थ-पृथ्वी दानका सौ सोक प्रशंसामान फट है अर पाप
पडाह, अर भोजनदान का दोऊ भवनिमें मुसकारी फट है; नाते
इनिका बड़ा अंतर पाहै, ऐसा जानना ॥ २१ ॥
अमदानप्रसादेन यत्र यत्र प्रजापते ।
तयोग्यते भोगर्नभासानिर रश्मिभिः ।। २२।।
अर्थ-जैसे सूर्य जहां जहां जाय तहां सहाँ फिरणनिकरि न
छोडिए है तैसें अनदानके प्रसाद करि जहाँ जहाँ जीर जाप तहां तहा
भोगनि कर नाही छोडिए है ॥२२॥
ददानोऽशनमा यतलं प्रामोति मानवः ।
दानात्सुवर्णकोटीनां न कदाचन तहमम् ।। २३ ।।
अर्थ-भोजनमात्र देता जो पुरर सो जिसपल पा पाहै सो पल
कोड मुवर्णको देता जो पुरुषसो निषयी कदाच न पाहै ॥ २३ ॥
२९२ अमितगतिश्रावकाचार। विना भोगोपभोगेभ्यविरं जीवति मानवः । न विनाऽऽहारमात्रेण तुष्टिपुष्टि प्रदायिना ॥ २४ ॥ अर्थ--भोग उपभोग विना तो मनुष्य बहुत काल जादै है ब सतोष अर पुष्टपनाको देनेवाला जो भोजन ताविना न जीवेहै ॥२॥ केवलज्ञानतो ज्ञानं निर्वाणसुखतः मुखम् । आहारदानतो दानं नोत्तमं विद्यते परम् ॥ २५ ॥ अर्थ- केवलज्ञानते और दूजा उत्तम ज्ञान नाही, अर मोक्ष मुम और दूजा मुख नाही, अर आहारदानते और दूजा उत्तम ६ नाहीं॥ २५॥ अंधसा क्रियते यावानुपकारः शरीरिणः । न तावान् रत्नकोटीमिः पुंजितामिरपि स्फुटम् ॥ २६॥ अर्थ-प्राणीका तिना उपकार भोजन करि करिये है तिनमा उपकार एकटे किये कोडयो रतनि करि भी प्रगटपने नहीं करिये है ॥२६॥ हीयंते निसिलाथेष्टा विना भोजनमात्रया । गुप्तयो व्यवतिष्ठंने बिना कुछ तितिक्षया ॥ २७ ॥ अर्थ भोजनम्प मात्रा रिना ममान चेष्टा नाशको प्राप हो । मैं क्षमा विना मन वचन काय की गुगि रे ने कहा लिए है, कई न नि॥२७॥ सीर्यते तरमा गाय जंतोनिमंधगा। बिना नीरंक मम्पस्य कोमलम्प प्याम्यितिः ॥ २८ ॥ मो भोजन ना dinat . I fiTAL Rोग, किमी
एकादश परिच्छेद।
२९३
AARA
HRAAAA
यथाऽऽहारः प्रियः पुंसां न तथा किंचनापरम् ।
विक्रीयंते प्रियाः पुत्रास्तदर्थ कथमन्यथा ॥ २९ ॥
अर्थ-पुरुषीनकी जैसा भोजन प्रिय है तैसा और किछ प्रिय
नाही, जो ऐसें न होय तो प्यारे पुत्र तिम आहारके अधि कैसे बेचिये
है, तात आहार सर्व से प्यारा है ॥ २९॥
यत्किचित्सुंदरं यस्तु दृश्यते भुवनत्रये ।
तदनदायिना क्षिप्रं लभ्यते लीलयासिलम् ॥ ३० ॥
अर्थ-जो किट पस्त तीन लोकविर्षे मुंदर देखिये है सौ सर्व
यस्त अन्न दान करना जो पुरुप ता करि लौटामात्र करि शीघ्र पाइये है।३०
बहुनाच किमुक्तेन विना सकलवेदिना ।
फलं नाऽऽहाग्दानस्य परः शमोति भापितुम् ॥ ३१ ॥
अर्थ-इहाँ बहुत कहने करि कहा है, आहारदानका फल मर्वज्ञ-
विना और दूजा कहनेकौं समर्थ नाहीं ॥ ३१॥
ऐसें आहारदानका फल वर्णन किया, आर्गे औपधिदानका वर्णन
करें:
रक्ष्यते व्रतिनां येन शरीरं धर्मसाधनम् ।
पार्यने न फलं वक्तुं तस्य भैषज्यदापिनः ॥ ३२ ॥
अर्थ-जिस औषधदान करनेवाले करि धर्मका साधन जो प्रती-
नका शरीर ताकी रक्षा कीजियेहै तिम ओपपदान के फल कहनेकों
समर्थ न हूजियेहै ॥ ३२ ॥
येनीपधपदस्यह वचनैः कथ्यते फलम् ।
नुरकर्मीयते तेन पयो नूनं पयोनिधेः ॥ ३३ ॥
२९२
अमितगतिश्रावकाचार।
विना भोगोपभोगेभ्यश्चिरं जीवति मानवः ।
न विनाऽऽहारमात्रेण तुष्टिपुष्टि प्रदायिना ॥ २४ ॥
अर्थ-भोग उपभोग विना तो मनुष्य बहुत काल जीव है :
संतोष अर पुष्टपनाकौं देनेवाला जो भोजन ताविना न जीवहै ॥२१
केवलज्ञानतो ज्ञानं निर्वाणसुखतः सुखम् ।
आहारदानतो दानं नोत्तमं विद्यते परम् ।। २५ ॥
अर्थ-केवटज्ञानते और दूजा उत्तम ज्ञान नाहीं, अर मोक्ष सुख
और दूजा मुख नाही, अर आहारदानते और दूजा उत्तम दा
नाहीं॥ २५॥
अंघसा क्रियते यावानुपकारः शरीरिणः ।
न तावान् रत्नकोटीभिः पुंजितामिरपि स्फुटम् ॥२६॥
अर्थ—प्राणीका जितना उपकार भोजन करि करिये है तितना
उपकार एकठे किये कोडयां रननि करि भी प्रगटपने नहीं करिये है ॥२६॥
हीयंते निखिलाश्चेष्टा विना भोजनमात्रया ।
गुप्तयो व्यवतिष्टते विना कुत्र तितिक्षया ॥ २७ ॥
अर्थ-भोजनरूप मात्रा विना समस्त चेष्टा नाशकौं प्राप्त होय है
जैसे क्षमा विना मन वचन कायकी गुप्ति हैं ते कहा तिष्ठै हैं, कई भी
न तिष्ठ है ॥ २७॥
सीर्यते तरसा गात्रं जंतोर्वर्जितमंधसा ।
विना नीरं क सस्सस्य कोमलस्य व्यवस्थितिः ॥ २८॥
अर्थ-प्राणीका शरीर है सो भोजन विना जलदी क्षीण होय है
जैसें जल विना कोमल धानकी स्थिरता कहां होय, अपि तु कई भी
न होय है, ऐसा जानना ॥ २८ ॥
एकादश परिच्छेद।
यथाऽऽहारः प्रियः पुंसां न नया किंचनापरम् ।
विक्रीयते प्रियाः पुवाम्नदर्थ फयमन्यथा ।। २९ ।।
अर्थ-शुरापनिकी जैमा भोजन दिया और विश
नाही, जो ऐसे न होय तो प्यारे पुत्र निम आनये. अवि कैग बकि
है, सात माहार सर्वस प्यारा है।॥ २९ ॥
यरिफचित्सुंदरं यस्तु स्यने भुवनयये ।
तदगदायिना क्षिप्रं लभ्यते लीलयागिलम् ॥ ३० ॥
अर्ध-~जो शिर वस्तु तीन कवि गुदर देखिये कम
पस्त अन दान करता जो पुरता फरिलीलामात्र करि पाये।
बहुनाध्य फिमुन विना मकालवे दिना ।
फलं नाऽऽहारदानस्य परः शमोति भापितुम् ॥ २१ ॥
अर्थ-हा परत करने पर कहा, महामानका 4.7 14.
रिना और दूजा याहनको समर्थ नाही ॥२१॥
ऐसे मातरदानफा पट वर्णन या, आगे श्रीपतिनका न
रक्ष्यते प्रतिनो पेन शरीरे धर्ममाधनम् ।
पार्यने न फलं वर्नु: तस्य भैपग्यदायिनः ॥ २२ ॥
अर्थ-जिगरपान करनेका परि : साको
नका शरीरको रक्षा बजिर nि sirewar... पाने
गमर्थ नजि ॥ १२॥
येनाराममाया पवनपते परम् ।
शुकमायने न सो म सोनिः ॥ २१॥
श्री अमितगनिश्रावकाचार। अर्थ-आचार्य को मैं ऐसा मानूहूं कि जिम करि लोकमै औषध देनेवालेका फल वचन कार कहियह, साकरि स जल चहनि करि मापियहै ॥ ३३ ॥ चातपित्तकफोत्यान गैंगरेप न पीड्यने । दावरिख जलस्थायी मेपनं येन दीयते ॥ ३४ ॥ ---जा पुरुष करि औषध दीजिएह सो पुरुष जैसे दावान जल वि तिष्टया पुरुष न पीडिए तेसै वात पित्त कफ करि उठे रें करि न पीडिए है ॥ ३४॥ रोगनिपीडितो योगी न शक्तो व्रतरक्षणे । नास्वस्थैः शक्यते कर्नु सस्थकर्म कदाचन ॥ ३५ ॥ अर्थ-रोगनि करि पीडित जो साधु सो व्रतनिकी रक्षा समर्थ न होयह बहुरि आकुलतासहित जीवनि करि निराकुल कदाच करनेकों समर्थ न हजियह ॥ ३५॥ न जायते सरोगत्वं जंतोरीपदायिनः । पावकं सेवमानस्य तुपारं हि पलायते ॥ ३६ ॥ अर्थ-औषध देनेवाले पुरुषकै सरोगपना न होयह, जाते अ सेवते पुरुषका शीत मागह ॥ ३६॥ आजन्म जायत यस्य न व्याधिस्तनुतापकः । कि मुख कथ्यते तस्य सिद्धस्येव महात्मनः ॥ ३७ । अर्थ---जाकै जन्मने टगाय शरीरको ताप उपजावने वाला न होयह तिस सिद्धममान महात्माका मुए कहा कहिए । इहां सि समान कन्या सो जैसे सिद्धनिकों रोग नाही तसे पाकै भी रोग ना ऐगी ममानता दसि उपमा दीनी सर्व प्रकार मिदन जानलेना ॥३०
एकादश परिच्छेद।
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निधानमेप कांतीनां कीतीनां कुलमंदिरम् ।
लावण्यानां नदीनायो भैषज्यं येन दीयते ॥ ३८ ॥
अर्थ-जा पुरुष फरि भौपर दीजिए है सो यह पुरस फाति कहि-
ये दीमिनिका तो भंडार होय है, अर कात्तिनिका कुलमंदिर होय है
आमैं यश फीति सदा यसै है, परि मुंदरतानिका समुद्र होय है ऐसा
जानना।॥ ३८॥
ध्वांत दियाकरस्पेव शीतं चित्ररुचेरिव ।
भैपज्यदायिनो देहाद्रोगित्वं प्रपलायते ॥ ३९ ॥
अर्थ-जैसे सूर्यके शरीरते अथकार दार भागै है अर अनिके शरी-
रत शीत दारे भाग है तैमैं औषध देनेवाले पुरुषके देह रोगापना दरि
भाग है ॥ ३९॥
आरोग्यं कियते येन योगिना योगमुक्तये ।
तदीयस्य न धर्मस्य समर्थः कोऽपि वर्णने ॥४०॥
अर्थ-जा करि योगीशरनके मन वचन फायकी मुक्तिके अर्थ
रोगरहितपना कीजिए है ता धर्मके वर्णनविय कोई भी समर्थ नाही ॥४०॥
चारित्रं दर्शनं ज्ञानं स्वाध्यायो विनयो नयः ।
सर्वेऽपि विहितास्तेन दर येनापधं सताम् ॥ ४१॥
अर्ध-जान साधूनिकों औरदान दिया जाने चारित दर्शन शन
पिनय नीति ये सर्वही किये।
भावार्थ--औषयते मारीर नीरोग होय तब सर्व धर्मका मापन बने
है, ऐसा जानना ॥ ११॥
ऐसे पौरपदानका वर्णन किया; आगे शानदानों क है-
संमृतिउिचते येन नितिर्येन दीयते ।
मोहो विध्यते येन विवेको पेन बन्यते ॥ ४२ ॥
भीममितगतिधापकामार। कायोर्मग्रने येन मानसे येन सम्यते । अान्य लाग्यते येन कृत्ये येन प्रायते ॥१५॥ नां प्रकाश्य येन नाव निशिभ्यते। मंयमः क्रियते येन मम्यने येन पोपते ॥४४॥ देहियो दीगने येन साग मिद्धिलम्पये। कम्नेन गरयो भन्यो गिते मुगनाये ॥४५॥ अर्गा गंगा है. भर जाकर मंदिर, पापी मोर पाहै, भा जागी उमाइ है ॥ ४३ or in आरिफ मना ना कानिए, गानाकर मन नि. rahit मार्ग सादर है, भाजार प २॥॥॥ नाम prinा गया, TAMIL HPIRIT निगो, आर माग HIR मग गोरिलो म11 MIT भनामा tantan मगि मैन शानदान पाती। मी मामासान अप || | .: TETH Aanti Ark " hry mar TIME मनाना। मान}}
एकादश परिच्छेद।
अर्थ-जा शास्त्रज्ञान विश्वका प्रकाशक केवल ज्ञान पाइएहै नो
और मतिज्ञान आदिके पारने विर्षे ताकी कथनी फैसी, और ज्ञान
पावना ती सहजहीहै ।॥ १७॥
मर्यामरश्रियं भुक्का भुवनोत्तमपूजिताम् ।
शानदानप्रसादेन जीयो गच्छति नितिम् ॥४८॥
अर्थ-शानदानके प्रसादकार जीवह सो लोकविर्षे उत्तम अर
शजित ऐसी मनुष्यनिकी अर देवनिकी लक्ष्मीकी भोगकै मुक्तिको प्राप्त
होयह ॥ १८॥
चतुरंगं फलं येन दीयते शाखदायिना ।
चतुरंग फलं तेन लभ्यते न फयं स्वयम् ॥ ४९ ॥
अर्थ-जिम शास्रके देनेवाले पुरुष करि चतुरंग कहिए धर्म, अर्थ,
काम, मोक्ष, ये पार पुरुषार्थरूप फलदीजिएहै ताकरि धर्म, अर्थ, काम,
मोक्ष, रूप फल स्वयमेव कैसे न पाइए है ॥ १९॥
शास्त्रदापी सतां पूज्यः सेवनीयो मनीषिणाम् ।
पादी वाग्मी कपिर्मान्यः पातशिक्षः प्रजायते ॥५०॥
अर्थशास्त्रों देनेवाला पुरुष संतनिके जारु होय है अर
पंडितनिके सेवनीक होय है, अर बादीनिकों जीतनेवाले हैं वचन जाके
ऐसा बादी होय है, बहीरे पाग्मी पहिये सभाकौं रंजापमान करनेवाला
वक्ता होय है, अर कवि कहिये नीनबंध रचनावाला होप है, और
मानने योग्य होय है, अर विख्यात है शिक्षा जाकी ऐसा होय है ॥५०॥
ऐसे शास्त्रदानका वर्णन किया, आगे वसतिकादानों को है,
विचित्ररत्ननिर्माणः प्रोतुंगो रहभूमिकः ।
लभ्यते चासदानेन वासचंद्रकरोग्रामलः ॥५१॥
अर्थ-पान कहिये पीने योग्य पस्तु ताके दान कार मदन
श्री अमितगतिभावकाचार।
अर्थ-सतिकादान करि चंद्रमाकी किरण समान उग्र विकि-
जग्न करि रण्या महाऊंचा बहुत खणनिका महल पाइये है ॥५१॥
आगै वनदानको कहेहैं,
कोमलानि महायणि विशालानि धनानि च ।
वासोदानेन वासांसि संपर्यते सहसः ॥५२॥
अर्थ-यादानकीर कोमल अर महामोड र सघन ऐसे हम
पर पाइए है।
भावार्थ-~आजिका श्रापक प्रारिका इत्यादिकनिकी कमान
रे
साका फल इहां कहा है ॥ ५२ ।।
ददती जनतानंदं पंद्रकांतिरिवामला।
जापने पानदानेन पाणी तापपनोदिनी ॥ ५३॥
मणिगमान निर्म: लोकनिको आनंद देनयात सापकी नाश करने
मीयागोय॥ ५३ ॥
ददानः प्रामु द्रव्यं रत्नवितांदकम् ।
काशिनं गाल द्रव्यं लमने परदुलंगम् ॥ ५४॥
भन! यावाला ऐगा प्रागुक
माय भोगनिदभमा बाहिर पापो॥१४॥
रियाणयति योदानं गामानानापित
गन्य माना: ममदा गुणानिमिः ॥ ५५ ॥
ई- Trmilinादासदेवी को
writtनीमा मह
यः प्रगंगा नगादान यातियोगिनाम् ।
मनः ममदा मानिस नम्पा ॥५६॥
एकार परिषद अर्ध-जो पुरुष गुनानको प्रगा तत्पर भया दान देय गो पुष सदा प्रशंसा योग्य होयह, अर मत्पुरम में मधिकरदेषी नमें ती ताहि न है ।। ५६ ॥ दो गुथपयित्वा यो दानं गंयममालिनाम् । शुधप्यते पुधरेप भण्या गुरुरियानिशम् ।। ५७ ॥ अर्थ-जो शुश्रुषा फरिय, संयमी गुनागी दान देयोगी पर पारिरानिकार निरंतर में गुरुनियो गुथाaife in Hist कीजिए। ।। ५७॥ आरत्स दीयते दान माधुभ्यो न गर्षदा । आदरणप लोरेन निधानमिव गृह्यते ॥ ५८॥ अर्थ-मा पुष फरि भादस सानये. सदा दान. र सो या पुप करि निधान को यो Enrary कानिए ॥५॥ पूजापरायणः स्तुपा यो यपाति महात्मनाम् । विदर्शनीकारीर पता ना स पूज्यते ।। ५९।। पुर मावि सपर AAP Trerator देवी गोपुरवनि करि सा देको ति et कीय, अगिए॥ ५९॥ पपराने मतामिएनपः भरपोपार। महिलाता मतमा प्रायने पालीक्षितम् ।। ६.॥ atी मी दाम पERE Yr कारक Rrut मोमो हान भA gre प.॥
३०० श्री अमितगतिमायकाचार | दानानीमानि यच्छति स्तोकान्यपि महाफलम् । वीजानीय बटादीनां निहितानि विधानतः ॥ ६ ॥ अर्थ- कहे ने दान विधानसहित थोडे भी महाफको देयो. जैसे षड आदि क्षनिके बौन है से विधान बोए भए यो कटर देय हैं॥६॥ पाग्रेभ्यो यः प्रकृष्टेभ्यो मिथ्याष्टिः प्रपच्छति । म यानि मोगभूमी प्राधागु महोदयः ॥ ६२ ।। मई-जो मिथ्यारधी साए पारनिके अब दान देय है सोमान है दाप जाका देगा उन भोग भूमीको जाप है ॥१२॥ फोगाय पपुस्ता विपरपोपमजीपितः । निनामपिनमानिध्य म भोगगुममानुते ॥ ६३ ।। अर्थ-सा 33. मोगभूमीगि सीन कोश को शरीर मा तीन यही नामोलिकी करपा निकट मा दे मोनिका गुण भो॥ ६३ ॥ गदा मनानालामिः गम्यमाना दिशाऽनिगम। नामिन गर्ने कार्य जानने मोगमभुः ॥६५॥ अ-मन भी नामोमोग মসমানা এ গাধা নিব। যা সমাপ। काम्यानुनका गनिमारो॥६५॥ प्र म पनि मनfilam timamtarint दिसामाEिnः | मनाम: मा"
एकादश परिच्छेद।
अर्थसो यहु मध्यम भोगभूमिया दोय कोश ऊंचा है दह जाका,
अर दोय पल्य आयु, रोगरहित, बड़ा है आवास कहिये स्थान आया,
अर स्त्री नेत्रफमलनिकों भ्रमरममान सो तहां ति है ॥ ६६ ॥
'जपन्येभ्यः स पात्रेभ्यो जपन्यां याति दानतः ।
एकत्रोशोच्य भूमिमेकपल्योपमस्थिति ।। ६७॥
अर्थ-पहरि सो दाता जघन्य पाउनके अर्थ दिया जो दान ताने
जघन्य भोगभूमिको प्राप्त होय है, एक कोश ऊंचा अर एक पयकी है
स्थिति जाकी ।। ६७॥
वरदामलकविमीतकमा विद्रपेकयामरैः कमतः ।
आहारं कल्याणं दिव्यरसं झुंजते धन्याः ॥ ६८ ।।
अर्थ-से पुण्यवान भोगभूमिया घेर आमला पहेदा इन प्रमाण
कमते पल्याणरूप विम्यह स्वाद जाका ऐमा आहारको तीन दोय एकः
दिन करि खायहै।
भावार्थ-उत्तम भोगभूमिया तीन दिन येर प्रमाण आहार पर,
मप्पम भोगभूमिया दोयदिनमैं आंवले प्रमाण आहार पोहे, जघन्यभो-
गभूमिया एक दिनमैं पहेहे प्रमाण आहार को ऐसा जानन ॥ ६८॥
विधाणयन् यतीनामुत्तममध्यमजयन्यपरिणामः।
दानं यरउति भूमीरुत्तममध्यमजपन्या या ॥ ६९।।
अर्थ-पहले सो तीन प्रकार शनके तीन प्रकारही
भोगभूमि मि« ऐसा कमा; अब यह है कि दूजा बार यही कि.
पतीनको उत्तम मायम अपन्य परिणामान करियान देता से
सो उम मध्यम अपन्य भौगभूमि ॥९॥
म परित्यताः म देश विवर्जिताः।
सर्ने योधन संपमाः मः संनि प्रियंवदा ॥७॥
भी ममिHिITRALI rint ninatant, win RTAITATI मातापिरोनागा गमागमः ॥७॥ ¥• 14' Anest murarms Mar main an unt पाणी मागणीlam Runा ना mai | . . 4TARTIME . ग . - पवारस परिच्छेद। न वियोगः प्रियः साद्ध न मयोगोऽप्रियः सह । नग्रतं न तपस्तेपी न वैरं न पराभवः ॥ ७५ ॥ अर्थ-तिन भोगभामेयानके इसपदार्थन करि साप वियोग नाही, अर अनिष्ट यस्तुनि सहित संयोगता नाही अर तिनके प्रत नाही तर नाही पैर नाही अनादर नाही ॥ ७५ ॥ यतः स्वस्वामिसंबंधस्तेपा नास्ति कदाचन । परछंदानुवर्तित्त्वं ततस्तेषां कुतस्तनम् ।। ७६ ॥ अर्थ-जाते तिन भोगभूमियानके स्वस्वामि कहिये सेवक ईश्वरपने- फा मबंध कदाचित् नाही सातै पराधीन प्रवर्तना तिनकै काहेका होय ॥ ७६॥ नापूर्गे समये सर्वे ते नियंते कदाचन । रचयंति न पैन्यं सुरासागरमध्यगाः ॥ ७७ ।। अर्थ सर्व भोगभूमिया आगुके अपूर्ण फाली कदाच न मरे है, अर मुखसमुद्रके मध्य प्राप्त भये ते ईपी भारकों नाहीं करें हैं ।।७७॥ आयासेन विना भोगी नीरोगीभूतविग्रहः । क्षुतेन पुरुषस्तत्र नियते मुंभयांगना ॥ ७८ ॥ अर्थ.-खेदविना भोगनि करि सहित र रोगरहित है शरीर जाका ऐसा भौगभूमिका पुरुष तौ छींक करि मरे है अर जमाई फरि स्त्री मरे है ॥७८॥ ते जायते कलालापा मकरध्वजनिभाः । सर्वे भोगक्षमाः रम्पादिनानां सप्त मातरः ॥ ७९ ॥ अर्थ-ते सर्व भोगभूमिया दिननके मात सप्तक पहिये गुणचास दिनन करि उपमै हैं, कैसे हैं ते भोगभूमिया, मुंदर है शब्द जिनका st काम TTAR FTET A Hritten. कोमलाना it triनिगयो। कोनामा पुनः कामिना || ari--मीको मन HTTA गोकदिर है, wri-wी कोमनगर गोपीनाना सुपामा मनोनिन की भागभियानी मोपहिया, भाrif नमहिनयोगी यो ? है ॥ ८ ॥ आदेयाः गुमगाः गीम्याः मुंहगंगा गादाः । रमंने गद गमाभिः मणमामिर्मियो मुदा ॥ ८ ॥ अर्थ 4-आदर करने योग्य भर मुंदर र मौम्य अर मुदर हे अंग जिनके अाम यगन पोरगा मे ने भौगभूमिया अपने समान जेची निगरि मरित परमार पंकी ॥८॥ युग्ममुत्पदने साद्वं युग्मं यत्र विपद्यते । शोकानंदादयो दोपाम्नय मंति कुतस्तनाः ।। ८२ ॥ अर्थ-जहा श्रीपुरपका युगठ साथ उप है अर साथ ही युगल मरे है ताते शोक अर गवना इत्यादि दोर है ते कहाने होप, नाही होय है ।। ८२ ॥ करिफेसरिगा यत्र तिष्ठतो बांधवामित्र । एकत्र सर्वदा प्रीत्या सख्यं तत्र किमुच्यते ॥ ८३ ॥ अर्थ-साधी अर सिंह जहा बाधवनिकी यो एक जायगां सदा प्रीतिसहित तिटे है तहा वैरभाव कैसे कहिए, अपि तु नाहीं कहिए ऐसा जानना ।। ८३ ॥ -
एकादश परिष्छ
सुपायदानतो याति कुत्मिता भोगमेदिनीम् ।
उप्ते कः कुस्मिते क्षेत्रे सुक्षेत्रफलमग्नुतं ।। ८४ ॥
अर्थ-युपात्रके दानने और कुभोगभूमियों प्राम होय ।
यांत फहहै-मोटा क्षेत्रयि बीज बोये संत गक्षेत्र, पायो कान
माम होप है, अपि तु कोई न य है ॥ ८४ ॥
यन्तरदीपजाः संति ये नरा मरेनगंटजाः ।
फुपायदानतः सर्वे ते भवंति यथायथम् ॥ ८५ ॥
अर्थ-जे अतरतीप पाहिए एवणसमुद वि वा पा गावि
(पान भोगभूमिके टापू पर तिनविष उपजे मनुष्य? भा -
पाधि उपजे मनुष्य से सर्व पुपादान पायोग्य तोपौ ।। ८५॥
पर्यमध्यजपन्यागु तिरंगा राति भूमिपु ।
कुपायदानपक्षोत्यं मुंजने सेऽसिलाः पालम् ॥ ८६ ॥
अर्थ-तम मध्यम जपाय भोगभूमिन विविध
तुपात्रानगप ने उपम्या ओ पन्द ताहि पायौ ॥८६॥
दासीदागतिपम्लेगडमारमेयादयोऽधये।
पुपादानतो भोगरतेपो भोगयता रफुटम् ॥ ८७ ।।
अई.--| आर जे दामादाग याद
भोगत जीव विनयी ओ भोगे । मो नेपामगा
जानना ॥८७॥
स्ने नापजाताना भोगा भोगिनामिह ।
म उपासनेन रो दीर्य महोदयाः ॥ ८८ ॥
अ- Rat/ नीर भर
भ
ER तिते गई है॥८॥
- अगर धन दर्ग म्पयं संपोशिलम् । गालिने पाके शिर्त पी कुहिरीपनि ॥ ८॥ wi-4 दिया ओपन मोnim, t" जाती अशिया परमो का पर भी मालीप ॥ ८॥ माना: जिपिम ने पाTT: परम् । मो कई गो पानागपीने 10॥ n} -- ATTERT पागम, 4mn't मोग, ही पाणिमा तिम् । WTM मोदणे पाकिमतरम् ॥ 41 .WITTEE "दानी ।। भान नापी । " मM मोनाditi at माग Tim॥२॥ TRATHIमगा। witm4 नानापन: 10 १
एकादरा परिच्छेद।
३०७
अर्थ-एक सूर्य करिही समस्त जगत प्रकाशरूप कीजिए है, यर-
रि उदय भये भी सर्व नक्षत्रनिके समूह तिनकरि प्रकाशित न कीजिए
है।॥ ९॥
एकेनापि मुपाग्रेण तार्यते भवनीरधेः ।
सहस्ररप्यपात्राणां पुंजितर्न पुनर्जनः ॥ ९५ ।।
अर्थ-उपरि दृष्टांत फम्याथा ताका दार्शत कहिए है तैमै एक
भी मुपार फरि जीव संमार समुद्रतै सारिये है, यहीर एफठे किये
अपारनिके महत्रनि करि भी संसारसमुद्रत न तारिपे है, ऐमा
जानना ॥ २५॥
अपात्रदानदोपेभ्यो विभ्यता पुण्यशालिना ।
वियुद्धप यत्नतः पात्रं देयं दानं विधानतः ॥ ९६ ।।
अर्थ-अपात्रके दोगनै डरता पुण्यवान जो पुरुष साकरि पान ने
पात्रों जानिये विधानते दान देना योग्य है ॥९६ ॥
अपात्राय धनं दो यो हित्वा पायमुत्तमम् ।
साधुविहाय चौराय तदर्पयति मः स्फुटम् ।। ९७ ॥
अर्थ-जो पुरष उत्तम पात्रको छोरिक अपारके पि धन देयोह
सो प्रगट साधुओं छोडिक चौरके अघि साधनको देयौ, ऐसा
जानना ॥ ९७॥
अपायमिव या पात्र विद्भिवलोकने ।
चिंतामणिमसा गन्ये मन्यते लोष्ठमयिभम् ॥ ९८॥
अर्थ-जो निर्बुद्धि पाय अपात्र को यों अबलो मो यह
चितामारानी लोह समान मानहै, ऐसा मैं मान है ॥ ९८॥
त्यता गर्मपदं पात्रममा स्वीकरोति यः।
स कालाटमादने मुत्ता पीयपमस्तुधीः ॥ ९९॥
भीममित्रमरिभासाकार। m w:-AATEIोति मोम को भागेर निमारिका । जमी int मापदणेशागतः ॥१७॥ 1 ----- My HTTAR Pret. • नमी है सो मन । Milan गागागागा। माग गाणात पाग १॥ # ! ... MARATHIMATE Entent winita trimm१.१॥ पramifणा जाने माना। MITTEE१.५ ॥ airat TIHTTTLE | . . r L ४ 4 7 . tr , ३०९ एकादश परिच्छेद। स्तुवानामा स्तवःश्रव्य व्याभरणभामुराः । मूर्ताः केऽमी विलोक्यंने पुण्यपुंजा इयामितः ॥१०५॥ अर्थ-मुनने योग्य स्तोत्रनि करि स्तुति करते अर मुंदर आभूष- पनकरि देदीप्यमान मूर्तीक पुण्यके मम्हसमान ये च्यारों तरफ कौन देखिए है ऐमैं नवीन देव विचार हैं ॥ १०५॥ रम्याः रामा ममेमाः काचित्रचाटुपरायणाः । लावण्यांनिधेला लोकंते फलनिस्वनाः ॥ १०६७ अर्थ-रमने योग्य अर नानाप्रकार खुशामदमें तत्पर अर मुंदरता- के ममुद्रको बेला मुंदर है शन्द जिनके ऐसी स्त्री मोकी देसै है ॥१०॥ किमिदं दृश्यते म्यानं रामणीयकमंदिरम् । कथमत्राहमायातः किं वमोऽयमुतान्यथा ।। १०७ ॥ अर्थ-मुंदरताका मंदिर ये कौन स्थान दी है, इहा में फैमें आया अथवा कहा यह स्वप्न है ॥ १०७॥ किमकारि मया पुण्यं जातो येनात्र पंधुरे । न पुण्यव्यतिरेकेण लभ्यते मुससंपदा ॥ १०८ ॥ अर्थ-अथवा मैं कहा पुण्य करत भया जाकर इस मुंदर स्थान- विष उपन्या, पुण्य दिना मुखसंपदा न पाइए है ॥ १०८।। इत्थं चिंतयतां तेषां भयकारणकोऽवधिः । संपद्यतेनदां दीपः पूर्वसंधसूचकः ॥ १०९ ।। अर्थ-या प्रकार विचारते जे देव निनरी भवही है कारण जार ऐसा भवप्रत्यय अवधि अतिशयररि देदीप्यमान पहले संरे का सूचक उपजे है॥१०९॥ ज्ञानेन नेन विज्ञाय दानपुण्यप्रभावतः । प्रिदशीभूतमात्मानं भजति मुगामिकाम् ।। ११०॥. +A ताका थी अमितगतिश्रावकाचार । अर्थ-तिस जानकरि दानके पुण्यक प्रभावतें आपकौं देव मा जानिकै से देव मुखरूप समाधानताकौं मजै हैं ॥ ११ ॥ प्रीतेनामरवर्गेण स्वसंबंधेन सादरम् । क्रियमाणास्ततस्तुष्टा मजंतेजननोत्सवम् ॥ १११ ।। अर्थ--तापी आपके संबंधी जो प्रीतियुक्तदेवनिका समूह प्रसन्नकरे भये जन्मोत्सबको भहें ॥ १११॥ ज्ञात्वा धर्मप्रमावेन तत्र प्रभवमात्मनः । पूजयंति जिनार्चास्ते भक्त्या धर्मस्य वृद्धये ॥ ११२ ।। अर्थ-धर्मके प्रसादकार तहां स्वर्गमैं आपकी जानिक ते देः धर्मका वृद्धिके आई जिनभगवानकी प्रतिमानको भक्ति सहित पूजैहैं ॥ ११२॥ मुखवारिनिमनास्ते सेव्यमानाः सुधाशिमिः । सर्वदा व्यवतिष्ठते प्रतिविधरिवात्मनः ।। ११३ ।। अर्थ----ते देव मुखजलवि. इबे अर अपने प्रतिबिंघममान देवनि करि सेये भये मदा काल तिष्ट्रह ॥ ११३ ॥ ते सर्वशनिर्मुक्ता द्वाविंशतिमुदन्यताम् । आसते तत्र भुजाना दानवृक्षफलं मुराः॥ ११४ ।। अर्थ-ते देव सर्वश्शरहित दानाप वृक्षके फटको भोगते सो तहा बाईस सागर निष्ठे हैं ॥ ११४ ॥ तेषां सुखममा यति पचोमियों महात्मनाम् । प्रभाति पदविशेषगांतममी ध्वम् ।। ११५ ।। अर्थ-~-तिन महामा देवनिक मुलक प्रमाणको जो पुल यचननि करि को है सो यह निश्पकार पायनके रसायने धानेकी भाफाश तक जाय।
एकादश परिच्छेद। भावार्थ-तिन देवनि का मुख वचननै न कहा जायहे, ऐमा जानना ।। ११५॥ नवयौवनसंपना दिव्यभूपणभूषिताः । ते वरेण्यायसंस्थाना जायतेऽतर्मुहूर्ततः ।। ११६ ।। अर्थ-नायौवनसहित अर दिव्य आभूषणानि यर भूषित अर श्रेष्ट आदिका समचतुरस्त्र है संस्थान जिनका ऐमें अंतर्मुह में उपजहैं ॥११६॥ तेषां सेदमलस्वेदजरारोगादिवर्जिताः । जायते भास्कराकाराः साठिका इव विग्रहाः॥११७।। भर्थ-तिन देवनिफेरोद मल पसेव जरा रोग इत्यादि परि देदी- प्यमानहै आकार जिनके मानी स्फटिकमणिके हैं ऐसे दारीर उपने राजते हृदये तेपी हारयष्टिविनिर्मला । निसर्गसंभवा मृर्ता सम्पादटिरिव स्थिता ॥ ११८ ॥ अर्थ-तिन देयनिकै दयवि विशेषनिर्मलारफी राडी सौर, मानौ स्वभायकरि उपजी तिरत सम्पारि तिी है ॥ ११८॥ मुकुटो मतके तेपामुघोतिन दिगंतरः । निपधानामिगदित्यस्लमोबंसीव भामने ॥ ११९ ।। अर्थ-जमैं निषधाचलनके ऊपरि अप्रकारका नारा बनेगा सूर्य सौर है से तिन देवानको मनकवि पार किया। सिान. का अंतर जाने हेमा मुकुट सोह है ॥ ११०॥ निवनाशलाभिः पूर्णचंद्राननामिः ननमररिनताभिर्मन्मयाध्यामितामिः ।
વાર श्री अमितगतिमायकाचार। पृथुतरजधनामिधुराभिर्वभिः समममतानोभिः सर्वदा ते रमते ॥ १२० ॥ अर्थ-मुंदर ग्रीन फीर निर्मलपचन सहित से देर सारी कैमी हैं तेजी कामसे पनविष प्रवीण अर पूर्णनेदमा समान है मुर जिनका अर स्तनन के भाग्करि नमीभूत है अर कामकारे पास है भा मिली है जवनम्यान जिनका ऐसी देवीनसहित ते देवम ॥१२०॥ दियोचतीोजितचिनहरायो महानुभाग मुवि पुण्यशेषतः। मनि बंगे गुधार्जित विशुद्धगम्यकथना नरोरामाः ॥ १२१ ॥ अर्थ- देश पर्गने भानगिक पाली के पुण्य film निकर मिन पनि नगनियो टनम बनदिक होय ? . १ दाहे जिनका पनि निती अर महानुभाग भानिमा मायन, है धन मिनी अंगे होय ॥ १२१॥ प्रायने गधागदिगदं मनोरमामय विपुण्यदलमाम् । नयंनि काल निगिलं निगाला: नननं शिलु पापदानतः ॥ १२२ ।। अ- Hinान औनही महान att immit aming: मोरे wn it with की ! utart 4 || १२९ ।। निगमिति गमहागिनी प्रतिविमोम | एकादश परिच्छेद। ३१३ प्रदखते ध्यानकृशानुनासिलं श्रयंति सिद्धि विधुतापदं सदा ॥ १२३ ॥ अर्थ-पाप्रकार मुखको करनेवाटी महान लक्ष्मीको भोगकै दोय तीन भवनिविर्षे समस्त कर्मनिकों प्यान अग्नि करि जरायके ते जीव आपदारहित मोक्ष अवस्थाको सदा सेवैहै ॥ १२३ ॥ विधाय सप्ताप्रभवेषु वा स्फुटं जघन्यतः कल्मपकक्षकननम् । प्रति मिद्धिं मुनिदानवासिता व्रतं चरंतो जिननाथमापितम् ॥ १२४ ॥ अर्थ---अथवा मुनिराजानिके दानकी है पासना जिनके ऐसे जीव हैं से जिनभाषिततको आचरते संते जघन्यपनेसते सात आठ भकवि फर्मवनको काट निधयकरि मुक्तिको प्राप्त होयरें, ऐमा जानना ॥ १२ ॥ पायदानमहनीयपादपः शुद्धदर्शनजलेन चर्दितः। यद्ददाति फलमचित सतां तस्य को भवति वर्णने क्षमः ॥१२५ ॥ अर्थ-निर्मल सम्यादर्शनरूप जाकार वृद्धीको माम भया ऐसा पात्रदानरूपी पूजनीक पृक्षहै सो मापुरपनिक पूजित ऐसा जो पत देयह ताके वर्णनविय कोन समधेरै, अपितु कोई समर्थ नाही॥१२५॥ गणेशिनामितगतिना यदीरितं न दान फलमिदमीर्यते परः। विभामितं दिनमणिना यांचरं न भास्सते कथमपि दीपरिदम् ।। १२६ ॥
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श्री अमितगतिधायकाचार।
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अर्थ- अपरिमित हैं ज्ञान जिनके ऐसे गणधर देवनि करि पड़
दानजनित फल कह्या सो फल और करि न कहिए है जैसे जो आका•
श सूर्य करि प्रकाशित किया सौ यह दीपकनि फरि कोई प्रकार भी
नाही प्रकाशिये है, ऐसा जानना ॥ १२६ ।।
छप्पय छंद।
पात्र कुपात्र अपात्र मेद भाप्यो इम जिनपति
त्याग कुपात्र अपात्र करहु नितपात्रदानरति ।
जा प्रसाद सर भोग मोगि फिर होय महायति
ध्यान धारि अरि टारि लहै शिवरमा अमितगति ।।
तिहि काल अनंतानंत निजरूप मांहि अविचल रहे
तमु ध्यानसलिलने जीरका तुरत सकल कलिमलगी।
इत्युपासकाचारे एकादशमः परिच्छेदः ।
पर्स थी ममितगति भाचार्यविरचित बायकाचारयि
ग्यारहयां परिच्छेद गमास भया ।
अथ दादशम परिच्छेद ।
भावद्न्यसमावैयरुपताः फर्मपर्वताः ।
विमिमा ध्यानयभेण दुःसव्यालालिसंकुलाः ॥ १॥
कर्मक्षयभवाः प्राप्ता मुक्तिदूतीरपच्छिदः ।
नव फेवललधीय पंचकल्याणभागिनः॥२॥
सर्वझापामपी भाषा बोधयंती जगरपीम् ।
आर्यकारिणी येषां ताल्योएम्पंदवर्जिता ॥३॥
प्रातिहार्याएकं कृत्वा येषां लोकातिशापिनीम् ।
सपा पकिरे गर्ने मादरा भुवनेधराः ॥ ४ ॥
पामि सापहारीणि पपांसीप पयोमुषः ।
क्षिपतो लोकपुण्येन भूनले विहरति ये ॥५॥
येपामिंद्राशया यक्षः सर्गशोभाभिमाविनीम् ।
करोत्यास्थायिकी फीणां लोकषितमजंतुभिः ॥६॥
आंघसंहतिसंस्थाना नि:स्वेदा क्षीरक्षोगिता ।
राजते गुंदरा येपी गुगघिरमला मनुः ॥ ७॥
पो लिएः क्षयं यानि धो लक्ष्मी प्रपपते ।
न रुप्पंति न तुप्रति ये तयोः ममासः ॥८॥
लक्ष्मी मानिया येपा भुवनयपतोपिभीम् ।
अनन्यभारनी सनो पार्नु कश्मि वियते ॥९॥
रागपमदमोपलोभमोहादयोरिवलाः ।
पेषु दोपान मिति पुनला ३ ॥१०॥
श्री यमितगतिग्रावकाचार शक्तितो भक्तितोऽहतो जगतीपतिपूनिताः । ते द्वेधा पूजया पूज्या द्रव्यमावस्यमावया ॥ ११ ॥ अर्थ-जिन करि भाव द्रव्य स्वभावनि करि सहित ऊचे उ कर्म- पर्वत ते ध्यानरूप वन करि भेदेहै, कैसेहैं कर्मपर्वत दुःम्वरूप मनि. की पंक्तिकरि आकुल है। भावार्थ-जिन भगवान. भावकर्म रागादिक द्रव्यकर्म बानावरणा- दिक पुगलस्कंध ते ध्यानकीर नाशकिय हैं ॥१॥ बहुरि जे गर्भादि पत्र- कल्याणके भोक्ता तीर्थंकर देव कर्मकक्षयते उपजी पापके नाश करन- वाली अर मुक्तिकी दूतीसमान ऐसी नत्र केवटलब्धिनको प्राप्त भए ॥२॥ बहुरि जिनकी आचर्य उपजाबने वाली सर्व भाषामयी ता वा होठके चलने करिरहित ऐसी दिव्यध्वनि तीन जगतको ज्ञान कार्न संती है ।। ३ ॥ बहुरि जिनके छत्र चमरादि अष्ट प्रातिहार्य रविकै सर्व लोकके नायक जो इद्रादिक, ते आदरसहित लोकविर्षे अतिशय उपजाबनेवाली जो पूजा ताहि करते भए ॥ ४ ॥ बहुरि जैसे मेघ जल- निकों वरसावते लोकमें विचरै तैमैं सताप हरने वाले वचननकों फैला. वते संत जे भगवान जीवनके पुण्य करि पृथ्वीतलविर्षे विहार करें ॥ ५॥ बहुरि इंद्रकी आज्ञा करि कुबेर जिनकी ममवसरण भूमिकाओं कहैं, कैसी है ममवसरण भूमिका स्वर्गकी शोभाको जीतनेवाली अर तीन लोककै जीवनि करि भरा ऐसी है ॥ ६ ॥ बहुरि जिनकी देर मुंदर मुगंधम्प निर्मल सोहै है, कैमी है देह आदिका वापभनाराव है महनन जा वि अर आदिका समचतुरन है संस्थान जाका भर पसेवरहित अर दूधममान श्वेत है रुविर जाका ऐसी है ॥ ७ ॥ हरि जिनका देस करनेवाला पुरुष क्षयको प्राप्त होय है अर भक्ति करनेया -सा टश्मीको प्रान होय है, बहरि ने भगवान न देष को न गग यौ
द्वादशम परिच्छेद ।
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तिन दोऊन वि समान परणति है।॥८॥ जिनकी अतिशयरहित
अर तीन भुवनको संतोष करनेवाली अर अन्य हरिहादिवि न पाइए
ऐसी जो लक्ष्मी ताहि कहनेकौं फोऊ समर्थ नाही है ।। ९ ।। यही
गग दंप मद मोध लोभ गोह इत्यादिक समस्त दोष हैं से न नि?
जैसे तप्त भूमिमै नौले नही रहै है ॥ १०॥ इद्रादिकनि पर पूजित ते
अहंत भगवान शक्ति माफिक भक्ति ते द्रव्य भार स्वभायम्प दोय
प्रकार पूजा फरि पूजने योग्य हैं ॥ ११ ॥
वचोविग्रहसंकोचो द्रव्यपूजा निगयते ।
तत्र मानससंकोचो भावपूजा पुरातनः ।। १२ ।।
अर्थ-षचनका अर शरीरका जो संयोच कहिए और कियानिने
रोकि जिनेंरके सन्मुग करना सो द्रम्पपूजा कहिए है, पर मनका
संकोच कहिए अन्य सरकत रोकि मिनभक्तिमैं गायना सो पुराणे पुर.
पनिफार भायपूजा कहिए है ॥ १२ ॥
गंधप्रगूनमामापदीपधूपाशतादिभिः ।
क्रियमाणाप पा शेया द्रप्यपूजा विधानतः ॥१३ ।।
अर्थ- अथरा गंध पुष्प नर दीप प शनि करि विमानते
करी भई दम्पमा जाननी ।। १३ ॥
प्यापकानां विशुद्धानो जिनानामनुरागतः ।
गुणानो यदनुध्यानं भारपूजेयमुप्यते ॥ १४ ॥
अर्थ-वारे जिनगम के गुणनिय अनुरागते वारपार विमान
परना मो या भारजा कहिए है, मेरे बिन सापक ए सी
जानने अर रागादिनी ॥ १५॥
देवापि पुर्वनः पूजा जिनानां जितजन्मनाम् ।
नविते ये लोरे दुर्लभ वस्तु जिनम् ॥ १५॥
- श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-जीत्याहै संसार जिनने ऐसे जिनदेवनिकी द्रव्य भाव करि दोऊही प्रकार पूजाको करता जो पुरुष तार्को इसलोक परलोकवि उत्तम वस्तु दुर्लभ नाहीं ॥ १५॥ पैः कल्मपाष्टक मुट्वा विशुद्धध्यानतेजसा । प्राप्तमष्टगुणैश्चर्यमात्मनीनमनव्ययम् ॥ १६ ॥ क्षुधा तृपा श्रम स्वेदनिद्रातोपावभावतः । अन्नपानाशनस्तानशयनाभरणादिमिः ॥ १७ ॥ क्षुधादिनोदन]पां नास्ति जातु प्रयोजनम् । सिद्धे हि वांछिते कार्य कारणान्वेपणं पृथा ॥ १८ ॥ कर्मव्यपायतो येपा न पुनर्जन्म जायने । विलयं हि गते वीजे कुतः संपद्यतेकुरः ॥ १९ ॥ रागपादयो दोपा येषां संति न कर्मजाः । निमिनरहितं कापि न नैमित्तं विलोक्यते ॥२०॥ न नितिमी मुक्का पुनगयोति संरनिम् । धर्मदं हि पदे हित्वा दुपदं कः प्रपयने ॥ २१॥ मुराम्य प्राप्यने येषां न प्रमाणं कदाचन । आकागस्यव नित्यम्म निर्मलस्य गरीयमः ॥ २२ ॥ पत्यंनि ये गुगी भूना लोकानशिलरस्थिताः । लोर कर्मभ्रंशेन नाठामानमनारतम् ।। २३ ।। ये स्मरणमायण ऍमा पापं पलायते । ते या न कयं शिक्षा मनोगकायकर्ममिः ॥ २५ ॥ अर्ग-जिनने निर्मट पान अमि की भयो ms भामरा दिन मा अविनाशी नेगा मगर भर गुण पा ॥ १६॥ बही शुगमा धम पनिाtar mavay द्वादशम परिच्छेद। अभावते क्षुधादिकके दूर करनेवाले जे अन्न पान आमन स्थान माग्ना आभूषण इत्यादिकानि करि जिनसिद्धानके फदाचित् प्रयोजन नाही, जात यांतिकार्यसी सिनीभये कारणका इंटना थाहै । भारार्थ-टोक क्षुधादियाकी पीडा होयह नय अन्नादिक जित यही सिद्ध भगवानके भुधादिक दोपही रहे नाही सर अन्नटिकी हेरना फाहेकौं चहिए, वह सो सहज ज्ञानानंदविणे मानौ ।।१७-१८॥ घट्टर जिनके पनि अभाव फेर जन्म न होपह, जाने पीजी नारा भये संते अंथुर कहित होय, अपि तु नाही होय । भाषार्थ-जन्म होनेका पारण फर्म, सो निर्व भार कमेका अभाव भया अब जन्म से होय ॥ १९ ॥ परी धर्म जनित गग. पादि दोष जिनके नाहर जाते निमित्तरहित फाई भी म अबलानिए भावार्थ-मोहारिफर्म निमित्त पायाभत्तिया रागादि हो र सिद्धीनिकै मोहादि कर्म निमित्त रबा नाही ममितिक रागादि का होप अपि तु नाही होय ॥ २०॥ परिये मिसभगवान मोश अब. स्सको जोकि फेर संसार नाही मारे जाते गुलदायक टिकानेको छकि दुमदायक ठियानेको यौन म रोय अपितु कोई भी म रोय ॥२१॥पर जिनका आकार की ज्योनिय र निर्भर अर गुण ताका प्रमाण पारि भी न पाइये? ॥२२॥ से मुरतम्प सोको अपारीगर परिसले कप नारी निरंतर नपाया हो ोकतातिदे। भाषाई-कभरि मारनियमान अवस्था हो गिर यो पद समादियो समारने का पाप है ॥२९॥गी बिनके स्मरण मारकर पुरनिस र भागिरलिज भर- ३२० श्री अमितगतिधायकाचार। वान् मन वचन कायकी क्रिया करि कैसे पूजने योग्य नाहीं, अपितु पूजने ही योग्यहै ॥ २४ ॥ चारयंत्यनुमन्यते पंचाचारं चरंति ये । जनका इस सर्वेषां जीवानां हितकारणम् ॥ २५ ॥ येपां पादपरामर्श जीवा मुंचंति पातकम् । सलिलं हिम रश्मीनां चंद्रकांतोपला इव ॥ २६ ॥ उपदेशः स्थिरं येषां चारित्रं क्रियतेतराम् । ते पूज्यंते त्रिधाऽऽचार्याः पदं वयं पियासुभिः ॥२७॥ अर्थ-जै दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तप आचार वीर्या- चार ये जो पच आचार सर्व जावनिकों आचरणकरा है अर आप आचरण करहैं जैसे पिता हितका आचरण करावे तैसें ॥२५॥ वहरि जिनके चरणका स्पर्श होतसते जीय पापको त्यागहै जैसे चंद्र- माकी किरणनिका स्पर्श होतसत चंद्रकांतपत्थर 'जलको छोडे ते ॥ २६ ॥ यद्दरि जिनके उपदेदानि करि चारित्र अतिशय फरि स्थिर कीजिए। ते आचार्य श्रेष्ठपद जो मोक्षपद ताहि जानेको है यांचा जिनके मे पुरुषनिकीर मन वचन कायर्ने पूजिए हैं।॥ २७ ॥ उननेभ्यः समत्वेभ्यो येभ्यो दलितफल्मपाः | जायंते पापना विद्याः पर्वनेभ्य इवाऽपगाः ॥ २८ ॥ अर्य-जिनने, नाशकिया है पार जिनन ऐसी पवित्र विया उप में पर्वतन नहीं उप में, कैमे है ते य? है अर पराक्रम महिन है॥ २८॥ चनः पंचधागारं मयारण्यदयानलम् । द्वादशांगशुतस्कंधं पाठयंति पटनि ये ॥ २९ ॥.
द्वादशम परिच्छेद । ३२१ अर्थ-यही जे संसार यनों दावानल समान जो पंचाचार ताहि आवरण फरहै बहुरि जो यारह अंगरूप श्रुतस्कंधों पदावै हैं अर पदै है ॥ २९॥ येपां वचोहदे स्नाता न संति मलिना जनाः । तेऽच्यते न कथं दक्षरुपाध्याया विरेपसः ॥ ३० ॥ अर्थ-जिनके पचनरुप सरोवरविौं न्हाये जन हैं ते मलिन न होप है ते पापरहित उपाध्याय भगवान चतुर पुरुषनि फरि कैसें न जिए, पूजिए ही है ॥३०॥ यरनंगानलस्तीयः संतापितजगत्रयः। विध्यापितः शमांभोभिः पापपंकायसारिभिः ॥३१॥ दिधक्षको भवारण्यं ये कुर्वति तपोऽनघम् । निराकृनाखिलग्रंथा निस्पृहाः खतनावपि ॥ ३२ ॥ निधानमिव रक्षंतियेरत्नत्रयमाताः। ते सनियरिवस्यंते साधवो भव्यबांधराः ॥ ३३ ॥ अर्थ-संतापको प्राप्त किये है तीन टोक जानें ऐसी जो कामरूप तीन अग्नि सो जिनने पापरुप फीचके करनेवाले जे दात भावरूप जल तिन करि उडाया है ॥ ३१ ॥ बी जे संसारवनकों दग्ध कर- नेके बाउक पापरहित सपकी फरहैं कैसे हैं से साधु निराकरण किया समस्त अंतरंग बहिरंग परिग्रह जिन बहुरि अपने शरीरवि भी वांछा रहित हैं ॥ ३२॥ परि जे आदरसहित भंडारकी ज्यों दर्शन ज्ञान चारित्ररूप रनत्रपको रक्षा फौहे ते भन्म वनके वाधव जे साधु भगवान से सरपुरलनि फरि आराधिए है ।॥ ३३ ॥ अर्चपद्यसिधा पुंभ्यः पंचेति परमेष्ठिनः । नयंति तरसा विमा रिडलेभ्य इवाऽऽसवः ॥ ३४ ॥ भमि.-१७ ३२२ श्री अमितगतिश्रावकाचार । या प्रकार पंच परमेष्टीनको पूजते जे पुरुष तिनत विन शीघ्र नाशकौं प्राप्त होयहैं, जैसे बिठावन मूसा नसे तैसें । भावार्थ-पंच परमेष्टीनके पूजनादिकतै शुभपरिणाम बंधैहै ताते अंतरायकर्मका अनुभाग हीन होयहै, तब विन न होयहै, ऐसा जानना ॥ ३४॥ पूजयंति न ये दीना मक्तितः परमेष्ठिनः । संपद्यते कुतस्तेषां शर्म निंदितकर्मणाम् ॥ ३५ ॥ अर्थ-जे दीन अज्ञानी पुरुष पंच परमेष्ठीनको न हे तिन ने कर्मीनके मुख कहां तै होय, अपि तु नाही होय, ऐसा जानना॥३५ इंद्राणां तीर्थकर्तृणां केशयानां रथांगिनाम् । संपदः सकलाः सद्यो जायते जिनपूजया ॥ ३६॥ अर्थ-इंद्रनिकी तीर्थकरनिकी नारायणनिकी चक्रवनिनकी जे समरू संपदा, ते जिनपूजा करि शीघ्र होयह ॥ ३६ ॥ मानवानवावासे विदर्शविदयालये। खेचरः खेचरावासे पूज्यंते जिनपूजकाः ॥ ३७ ।। अर्थ-जिनदेयकी पूजा करनेवाले पुरुषहे ते गनुष्यलोकविने तो मनुष्यनिकरि पूजिय, अर देवलोकायि देयनिकरि पूनिवहे अर पि. धानिक टोकरि विद्यानिकारे पूजिये है ॥ ३७॥ मकामा मन्मयालापा निरिहस्तनमंडलाः । रमण्यो रमगीयांगा रमयंनि जिनाचिनः ॥ ३८॥ अर्थ-जिनदेवकी पूजा कानेवाले पुरुष यो रमणीक श्री राम व ते घी काममहिना अर मधुादै वाद निनके सर पटोर दुनमत दिन अर मुंग अंग जिनके ऐगी ।
बादशम परिच्छेद। ३२३ भावार्थ-जिनजावि पुष्पश्य होयहै ताफरि देगादि पद विय भनेक स्त्री मिलेह ॥ ३८॥ पवित्रं यन्निरातंक सिद्धानां पदमव्ययम् । दुष्प्राप्यं विदुपामर्थ्य प्राप्यते तजिनार्चकैः ॥ ३९ ॥ अर्थ-जिनदेवके पूजक जे पुरुष निनकीर मुक्त जीवनका पद जो मोशमुख सो पाइये है कैसा है मुक्त जीवनिका पद रागादिमलाहित है पवित्र हैं अर संसाररोगरहित है अर अविनाशी है अर दुर्लभ है अर क्षानीनिकीर पाउने योग्य है ऐसो पर जिनानक पाये हैं। भारार्थ-जिनपूजाके परिणामके निमित्त पाय परपराय रमनय आराध के मोक्ष होय है ।। ३९ ।। जिनस्तवं जिनस्नानं जिनपूजा जिनोमपम् । कुर्वाणो भतितो लक्ष्मी लगने पापितां जनः ॥४०॥ अर्थ-जिनदेवफा सावन जिनंदवका अभिरेर गिनदेवको पूजा महा उत्सव इनकी भक्ति करता मेता मनुष्य है सो पारित लक्ष्मीको पाव है॥१०॥ इहा साई पूजामा वर्णन किया। आने सीउका वर्णन करे- संमागरानिमीतस्य प्रतानां गुरुमाक्षिकम् । गृहीतानामशेषाणां रक्षणं शीलमुच्यते ॥४१॥ अर्ष-संसार शेत भयभीत जो पुरपना गुरको सालि महण फरे में समस्त व्रत तिनी रक्षा करना सोसार कार है॥११॥ साशीलता मतादाने सुचते परमेछिनः । भूपा इव महादुर विशारे प्रभिचारिणः ॥ ४२ ॥ अ-मसि माजी शिजे परमेती है तेरियारशिप- मिपार फरता जो पुणता राजानी यो महान पर।
३२५ श्री भमितगतिनायकावार। भाार्थ जैसे राजाकै आगै कि प्रतिज्ञा करे अर सामा जाय तो दंड पावै सैमैं अतादिकनिकै आगें लीनी जो आकडी सारे भंग होय तो महादुमा पावै । यद्यपि महंतादिक वीतराग है उनके दुम देनेका किट प्रयोजन नाही तथापि अपनेही परिणाम निका मीटनताले पाप नारि नरकादि दुःरा भोगे है, ऐमा जानना ॥ १२ ॥ एकदा ददते दुःखं नरनाथास्तिरस्कृनाः । गुरवो न्याहता दुर्ग वितरनि भये मरे ॥४३॥ -तिरस्कार किय भए राजा से सौ एफारही दुम देवर अर निगमरण भये गुहै, ते भा भर दिल देव हैं । भाषाई-गुरुनके अनादर करि महापाप होय? साने जीना. काशित महादा पा ॥ ५३ ।। मशयित्वा सिं पोरं वर प्राणा विर्जिताः। न कदानितं ममं गृहीत्वा मूरिगाशिकम् ।। ४४ ॥ अर्थ-मपान मास की पागे भरे प्राण है ? मा भानायकीमा प्रहग फार भावना प्रेमा मारा-माण होप नाहीती मग कामा योग वसनगन गालंगा गोमतं । पुलिंन गायन न पुनहिती जनः ॥४॥ wi-मन 10mgritी TAMr. APART1741 मा म मनमनमम् । पार कर भी नि ! ५६ ।।
डादशम परिच्छेद। अर्थ-शाल है सो स्वभावरूप आभूपणहै अर शील उत्तम मैडन है अर शील है सो घणी पटसारी, अर शील है सो बड़ा रक्षा करना हैं शील ही जीवनिकी रक्षा करहै ।। ४६ ।। शीलेन रक्षिनो जीवो न केनाऽप्यभिभूयते । महादनिमग्नस्य किं करोति दवानलः ॥ ४७ ॥ अर्थ-जो पुरुषकी शाट करि रक्षा कीजिएहै सो काहूकार भी निरस्कारको प्राप्त नहीं होयहै जैमें बड़े सगेवरविर्षे इम्या पुरुषका दावा- नल क्या कर सकह तैसें ॥ ४७॥ पांधवाः मुहृदः मर्ये निःशीलस्य परामुखाः । गत्रयोऽपि दुरागध्याः संमुसाः संति शीलिनः ॥४८॥ अर्थ-याधय जनमें से तथा भित्र है ते सर्व शीलरहित पुरपके "पगन्मुख होय. अरे दुःग फरि आराये जाय ऐसे शत्रुभी शीलवान पुरुषके महायक होय, ।। ४८॥ शीलनो न परो बंधुः शीलतो न परः मुहुन् । शीलतो न परा माता शीलतो न परः पिता ॥ ४९ ॥ अर्थ-दालमिवाय और बंधु नाही, शीलते सिवाय और मित्र नाही, शीलते सिराय और माता नाही, शीलते सिवाय और पिता नाही। भावार्थ--जीवका हितकारी शीलसिवाय और नाही ॥ १९ ॥ उपकारो न शीलस्य फर्नुमन्येन शश्यते। फल्पद्रुमफल दने परः कुछ महीरुहः ॥५०॥ १प सोक मूलप्रतिम ४७ के नंबर पर और रनिकी प्रतिमें ४५ मंबर परहै।
३२६
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-शालसमान टपकार करनेकौं और समर्थ न हजिएहै जैसे
कल्पवृक्ष फल देयहै सो और कहा वृक्ष फल कहा देयहै, कहूंभी न
देयहै ॥ ५० ॥
तापेऽपि सुखितः शीली शीलमोची पुनर्जनः ।
चित्रं जनांगुलिच्छायो स्थितोऽपि पदितप्यते ।। ५१ ॥
अर्थ-आचार्य कहैं हैं बडा आश्चर्य है, देखो-शीलवान जीवहै
सो ताप कहिए घामवि भी मुखीह बहुरि शीलका त्यागनेवालाह सो
मनुष्यनिकी अंगुलीकी छायात्रिय तिष्ट्याभी तप्तायमान होयहै ॥५१॥
कदाचन न केनापि सुशीलः परिभूयते ।
न तिरस्त्रियते यो हि श्लाप्यते तस्य जीवितम् ॥ ५२ ॥
अर्थ-जो मुशील पुरुष कोऊ करि भी चलायमान न कीजि है
अर तिरस्कार न कीजिएहै ताका जीवना सराहिएहै ।। ५२ ॥
भंगम्यानपरित्यागी व्रतं पालयतेऽमलम् ।
तस्करलट्यते कुत्र दूरतोपि पलायितः ।। ५३ ।।
अर्थ-भंगस्थान कहिये जिस स्थानमें शील भंग होय ऐमा
स्थानका त्यागनेवाला पुरुष है सो निर्मल व्रतको पाल, जैमें दरहीने
भाग्या जो पुरुष है सौ चौग्न करि कहा टिएहै, अपि तु नाहीं बारित।
भावार्थ-जैमै चौरनिको दरहीत त्यागे तोपुग्ष दुदै नाही असे
प्रतभंगके कारण स्थानादिक त्यागे ताका व्रत निर्मल पल ॥ ५३॥
आमें शालभगके कारण जे यूनादिक तिनका निरेश कोहैं, तो
प्रथम पतमा निषेध कहें,-
नानानयंकरं घुनं मोनच्यं शीलशालिना।
शीलं हि नायने नेन गग्लेनेर जीवितम् ॥५४॥
द्वादराम परिच्छर। अर्थ-शीलफरि शामित जो पुराय है साकरि अनेक अनेक अग- पनिका परनेवाला जो जा है गो त्यागना योग्य है, जाने निधो. ती साफरिशील नाशिए है जैसे विभक्षण कर जीयन नायि||५|| विपादः फलहो राटिः कोपो मानः श्रमो प्रमः । पशून्यं मरमरः मोकः गर्ने प्राग्य पाधयाः ।। ५५ ।। अर्थ--विवाद यह गड पोध मानत आय पुगी ग. रभाष शोक, पं गर्व गुमायो यजन।। भावार्थ-जहा जुषा होय. artोन मन भाय होय है ।। ५५ ॥ दुगनि सेन जयंते जलानीयोगुयादिना । मतानि तेन ध्यंते रजोमीप परपुना ॥ ५६ ।। भर्ष-निग मा परि जैसे वाले परिजन एपमा है, मेस उपनाइए , अर जो पारि जमएस कर उादर है। भावार्थ - परि नाना दुध बोध ? भर RTHA trai न है ॥५६॥ न पिपला निईने पूर्व पर प्रवर्तते। न जातपस्न विद्यते यत्र पारः ||५७ ॥ अ-जैसे जर आरोप are years है जहाजमान ॥५॥ मातुरपुनरी पोहरते जनजितम् । आचरेसकीया ॥ ५८॥ ... गुरुप : tre ernamant. Trt | ३२८ श्री अमितगतिश्रावकाचार। Awarna अर्थ-सो जुवा मावार्थ-कोज भी अकार्य करनेमें जुवा वालकै लम्जा नाही, का जानना ॥ ५८॥ संपदं सकलां हित्वा स गृहाति महाऽऽपदम् । स्वकुलं मलिनीकृत्य वितनोति च दुर्यशः ॥ ५९॥ खेलनेवाला पुरुप समस्त संपदाको त्याग करि महा आपदाको प्रहण कर है, बहुरि अपने कुलकौं मलिन करकै रसोटा यश विस्तार है॥ ५९॥ नारकैरपरैः त्रुद्ध रकस्येत्र मस्तके । निखन्य कितवस्तस्य दुालो ज्वाल्यतेऽनलः ॥६०॥ अर्थ-जैसे अन्य क्रोधायमान भए जे नारकी तिन करि नारकी मस्तकविय थापि करि दुःखकारी है वाला जाकी ऐसा अग्नि जटाइप तैसें जुवारीनकरि जुबारीके मिर परि अग्नि जलाइएहै ॥ ६ ॥ कर्कश दुःश्रवं वाक्यं जल्पंतो वंचिताः परे। कुर्वनि द्यूतकारम्य कर्णनामादिकर्जनम् ।। ६१ ॥ अर्थ-जिनका धन टिगलिया ऐसे जे अन्य गतकार ते क्ग्रे पर काननिको दुःखदाई वचन बोलते मते जुया रंगटनेवाले के कान नामिका आदि अंगनिकों का ॥ ६ ॥ विनायति महादोपं घृतं दीव्यंति नोत्तमाः । जानानाः पाकोष्णवं प्रविशंमि कथं युधाः ।। ६२ ।। अर्थ-या प्रसार जवानौं महादीप जानकार उत्तम पुर नारी मेरे से अनिका इण्यापना जाने मनपरित जन ने पनि प्रवता में करें, अपितु नाही कहें ॥ ६२ ।। मान वेदपावा निरक- माराम परिच्छेद। man वितनोति शो राग या वात्येव रजोमयी । विध्वंसयति या लोकं शर्वरीव तमोमयी ॥ ३ ॥ या स्वीकरोति मर्वस्वं चौरीवापरायणा । उलेन याति गृहाति शाकिनीचामिपमिया ॥ ६४ ॥ वाहियालेव या स्पृष्टा संतापयति सर्वतः । शुनीव कुरुते चाटु दानतो याति कश्मला ॥६५॥ विमोहयति या चितं मदिरेव निविता । सा हेया दूरतो वेश्या शीलालंकारधारिणा ।। ६६ ।। अर्थ-जो वेश्या नेत्रनिवि जैसे भूलिसहित पवन राग विस्तार समें राग विस्तार है वहीर या स्टोकका जैसे अधकारमयी राग नाश कोहै तैसे नाश करहै ॥ ६३ ॥ यहुरि जो वेश्या धनभै तत्पर चौरी करनेवाटाकी ग्यौ सर्व धनकौं गृहण करहै यहरि जो छलकरि मांस है प्रिय जाकी ऐसी शामिनिकी यौं मनुष्यकौं अतिशयकरि अंगीकार करेहै ॥ ६४ ॥ यदीर जो वेश्या अग्निकी माला समान स्पर्शी भई सर्व सरफ. संताप उपजावैहे, बहुरि धनके दैवत जो अत्यंत पापिनी खुशामद विस्तार है ।। ६५ ॥ महरि जो मदिगकी ज्यों सेई भई चिनो मोह उपजाह सो धेश्या शीलरूप आभूषणका धारी जो पुरुष साकरि तै त्यागनी योग्यहे ।। ६६ ।। सत्यं शौचं शमं शीलं संयम नियमं यमम् । प्रविशति वहिर्मुक्ता विटाः पण्यांगनागृहे ।। ६७ ॥ अर्थ-व्यभिचारी पुरुष ते सत्य शौच सम झील सेयम नियम पम इत्यादि मई धर्मके अंगनिको पार छोडिकरि पेश्याफे घरमैं प्रवेश फरहै। भाषार्थ-वेश्याफे घरमें प्रवेश करतेही सर्व धर्मका नारा होय है ।। ६७॥ कुत्तीको श्यों WW
३३०
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-
तपो व्रतं यशो विद्या कुलीनत्वं दमो दया ।
छियंते वेश्यया सद्यः कुठार्यवाऽखिला लताः ॥ ६॥
अर्थ--जैसे कुल्हाडी करि सर्व लता शीघ्र छेदिएहै तैसें वेश्याकरि
तपत यश विद्या कुलीनपना इद्रियनिका दमन दया ये सर्व शास्त्र
छेदियेहैं ॥ ६८॥
जननी जनको भ्राता तनयस्तनया धमा।
न संति वल्लभास्तस्य दारिका यस्य यल्लमा ।। ६९॥
-जा पुरुषकै वेदया प्यारीहै ता पुरपके माता पिता भाई पुर
पुरी बहन ये प्यारे नाहीं ॥ ६९॥
न तस्मै रोचते सेव्यं गुरूणां वचनं हितम् ।
सशर्करमिव क्षीरं मित्ताकुलितचेतसे ।। ७०॥
अर्थ-येश्या सेवने वाले पुरुषको सेवने योग्य जो गुरुनका हिता
वचन सो नहीं रुचहै जैसे पित्तकरि आकुलित: वित्त जाफा देमा जो
पुरुष ताक अर्थ मिश्रीमहित दूध नाही म्है तेसे ।
भावार्थ-वेयासक्तको गुवचन नहीं मुहाँ? ॥ ७० ॥
वैश्यायमगतां निंद्यां लाला पिपनि योग्यमः।
शुचित्वं मन्यते म्यम्य कापगतो विडंबना ॥ ७१ ।।
अर्थ-जे अपम पुग्ण वरपार मुग गि प्रारमोदिनी क साल
ताहि पी है आ आप गुपिना मान या मिपाय और कहा
शिवना ॥ ७१ ॥
पो च्यावदनं निग्न म्हो मया दिवागितम् ।
मद्यमिपरित्यागमनं सम्य कुनम्ननम् ॥७२॥
वर्षामा मशिगर वामित शाा मुग सादि पर
माय मग म स्यागमन परा॥ २॥
-- द्वादशम परिच्छेद। ३३१ वदनं जपनं यस्या नीचलोकमलाविलम् । गणिकां सेवमानस तां शौचं यद कीदृशम् ॥ ७३ ॥ अर्थ-जा वेश्याका मुस अर जघन नाचलोककै मलकरि मलिनहै सा गणिकाको सेयता जो पुण्य साकै पवित्रपना फैमा, कोई प्रकार पवि- अपना नाहीं ।। ७३॥ या परं हृदये धने परेण सह भापते । परं निपेवते लुब्धा पग्माक्ष्यते दृशा ॥७४ ॥ अर्थ-या घेश्या मनमैं अन्य पुरुषको धार है अर औरके साथ बोलेहै अर सोभनी औरकों से अर दृष्टिकार औरकों बुलाये है ॥ ७४ ॥ सरलोऽपि सदक्षोऽपि कुलीनोऽपि महानपि । ययेशुरिव निःसारः सुपर्वापि विमुच्यते ।। ७५ ॥ अर्थ-जा वेश्या करि मायाचारहित सरल भी अर चतुर भी अर कुलीन भी र बटा भी अर मुपर्वा कहिये भुदर अंगसहित भी नि:मार कहिये द्रव्यरहित होय सो साटे फी ग्यौं त्यागिए है, भावार्थ-जमै सुधा भी भला भी अर कुलीन फाहिये पृथ्वीविप टीन भी बडा भी अर मुपर्वा कहिये भली है मुटोर जाकी ऐसा भी सांटा है सो माग्रहित स्यागिए । तैसे वेश्याकरि निःसार मनुष्य त्यागिए है ।।७५॥ नसा सेव्या त्रिधा घेश्या शीलरत्नं यियामता । जानानोन हि हिंस्रत्वं व्याधीं स्पृशति फवन ।। ७६॥ अर्थ-दशील रत्नकी रक्षा करता जो पुरुप ताकारि सो वेश्या मन वचन काय फार मेवनी योग्य नाहीं जाने हिंसकरनेकौं जानता मता कोई भी पुरुप है सो व्याघीको नाही परी है ॥ ७६ ॥ आगें परस्त्रीगवनका निषेध कर है- - - श्री अमितगतियायकाचार। ये मारयति निस्त्रिंशा ये मायते च विहलाः । तेषांपरस्परंनास्ति विशेषस्तक्षणं मिना ॥ ९६ ॥ अर्थ-जे निर्दयी मारैहै अर जे मिहल जीर मारिएहै निनकै पर. एसर ता समयविना विशेष नाहीं । भावार्थ-वर्तमान समयने तो मारनेवाला अर जिनकी मारैहे ते जीव हीनारिकह बहुरि आर्गे नरकादिक परस्पर मारे तहाँ होनारिक नाही।। ९६॥ समासं परमसियें पोपयंति दुराशयाः । खमांसमेव मायने हटनो नारकैरिमे ॥ ७७ ॥ अ-जो दुष्टचित परजीवनके मोसनकरि अपना मोग पोपेर मो पे हटने अपने गांमहीको नारकीन की सगाई ।। ९७ ॥ पल्यायुर्विकलो गेगी विचक्षुधिरः गलः । वामनः पामनः पंटो जायने म भवे भरे ॥ ९८॥ अर्थ-अग आए अगरिकल गेगी रहिन या दुर वामन बुदरोगी नपुगक मी मामी भा गरपि ॥१८॥ समानि यानि दृश्यंने दामहानि जगाये। गर्वाणि नानि लायन प्रागिमदनकारिगा ॥ ९९ ।। अर्गन ने दुमा दागिण l नीमा पनि पा॥९॥ इति दोपानी मगा गया हिताक्षिणा। नानानन्याग्या गामिणा ॥१०॥ 4 - C1 : 41 44: 14: 44 4 31 1. अपनी कामी गमन HTET मादराम परिच्छेद। भोजन पुर्यता कार्य मानं शीलयना पड़ा। रांनोपित्यमिवानिय भक्ष्यादिविधापिना ॥ १.१ ।। अर्थ-जैसे भिक्षा मुनिका आनण कायारा जो गुनि नायर अनिव मसावीपना करणा योग्य में भोजन करना जो जापान सरपुर तायरि मौन पाना योग्य है ॥ १०॥ सर्वदा शस्सने जोपे भोजने तु विशेषतः । रसायनं गदा श्रेष्ठ मरोगित्वे पुनर्न किम् ॥ १०२ ॥ अर्थ-पान सदाकार सराहिए। अब भोजनालय | दिए है जग औषध समा भरी परि सरोगापन मनन रोष ॥ १०२॥ संनोपो भाग्यते सेन राग्यं तेन स्यने । संयमः पोप्यते मेन मानं येन विधीयते ।। १०३ ।। --जाकर गौन पर लाफरि Airn भार वैराग्य देखिए तायारि संयम पोरि ॥ १० ॥ पाचो प्यापारको दोषा पे भनि दुरागः । मेगवे-पि निरायने मानमतपिपापिना ॥१०॥ --धन व्यापार में सतो मापने और ही मौन धारक पुरः परि निवारित १०॥ मागपि जनो ऐन प्राप्त पनिरापमम् । मानम तम रात केन एर्णरितु गुणाः ॥ १.५ ॥ -मन.१ मा सRTri गि ति मग गुनी Mr. अjिathritt १.५॥
श्री अमितगतिभावकाचार।
.
पोषण विशता रोधः कल्मपस्य विदीयते ।
बलिष्ठेन महिष्ठेन सलिलस्येव सेतुना ॥ १०६॥
अर्थ जसे यटवान भर वडा जो सेतु यहिए पार सामरि जाका
रोध करिए तैसें प्रवेश करता जो पाप ताका रोध मौनकरि कीजिए।
हुंकारांगुलिखात्कारमूमुचलनादिभिः ।
मौनं विदधता संज्ञा विघातव्या न गृद्धये ॥ १.७॥
अर्थ-मौन धारता जो पुरुष साकार हुंकार करना असे
उटालना प्रकार करना भृकुटी धारना मरता पाना पाहिली
गदी जो अतिचाह ताके आधि सेक्षा करना योग्य नाही ॥ १० ॥
मार्यकालिकमन्या मान देधा विधीयते ।
भनिनः शत्तिनी मध्यर्मयभ्रमणमीममिः॥ १०८॥
अर्थ-समारभ्रमण भयभीत जे भन्यनीय निर भनिन
गानिमा एक ना माकारिक करिए मरणापत दूना अगागारिक
करिए काली मपदाम्प में दोय प्रसार मान की ||१.८॥
मय्यन मनितः कन्या मान नियतकालिकम् ।
जिनेंद्रमाने देया पंटिका ममहारमाम् ॥ १०॥
अ-य: काजनिी काशी मोरया
दिने मटिगा महोगामहिनाको
भए-नयन की
बंटा पहा .मा मानना ॥१०॥
नमाकानिक मान नियनिक
मनन पर याविनाशिनियां ॥१॥
द्वादशम परिच्छेद। ३३९ . अर्ध-सार्यकालिक राहिए यावजीव मौनविर्ष निर्वाह विना (निर्वा- के सिवाय ) पडितनिकरि फि भी उद्योतन न करिए है ॥ ११०॥ आवश्यक मलक्षेपे पापकायें विशेषतः। मौनी न पीयते पापः सन्नद्धः सायकरिव ॥१११ ॥ अर्थ–सामायिकादि आवश्यक क्रिया विषे मटके क्षेपण विर्षे पहरि पापकार्य जो मैथुनसेवन आदि ता कि मौनका धारी जीवहै सो पापकार न पीडिएहै जैसे वकतर पहरे योद्धा है सो वाणनिकरि न पीच्या जाय? तेसै मौनी पापनिकरि न धैर्ह ॥ १११ ॥ कोपादयो न संदेशा मानवतफलार्थिना । पुरः पथाच कर्त्तव्याः सूद्यते तद्धितः कृतः ॥ ११२ ॥ अर्थ-मौनव्रतके फटका याउक जो पुरुष ताकरि आगें वापी ग्रोधादिकाय फरणा योग्य नाही, जाते करे जे मोधादिफपाय तिन. करि माननत नाश फीजिए है । भावार्थ-पौनके पहले या पीठे कराय न करना, कापते मौन- व्रत निष्फट होयह ॥ ११२ ॥ वाचंयमः पवित्राणां गुणानां सुसकारिणाम् । सर्वेषां जायते स्थानं मणीनामिव नीरधिः ॥ ११३ ॥ अर्थ-वचनका संयम है सो पवित्र अर मुखकारी जे सर्वगुण । तिनका स्थान होय असे रत्ननिका स्थान समुद्र होयह तैसें । भावार्थ-वचनका संयमहै सो सर्व गुणनिका स्थानहै, ऐसा जानना ॥११३॥ पाणी मनोरमा तस्स शाखसंदर्भगर्भिता । आदेया जायते येन क्रियने मौनमुम्बलम् ॥ ११४ ॥ --- . ३४० धीममितगतिमापकाचार। अर्थ -जा पुग्म करि निर्मड मौन फरियाँ तासी शावरगना क गुन्न मनको पारी आदर करनेयोग्य वागी होप ।। ११५॥ पदानि यानि विद्यते वंदनीयानि कोरिदः। माणि तानि लभ्यते प्रागिना मानकारिगा ॥१५॥ अर्थ-जे पंडितनि करि यदनीक पर ते सर पर मौन भाव काला जो जीत ताफर पाइए है ॥ ११५॥ निर्मलं केवलशान लोकालोकारलोटनम् । लीलया लभ्यते येन किं नान्यत्र काशितम् ।। ११५॥ अर्ग-कालोका देगनहाग ऐगा निर्मर फेसज्ञान " पगमार की पाइर. साफर और नाशिम यम कान पात, है मनातका वर्णन किंगा, आगे उसमका वर्णन की - गगी निसायन येन धमों यन मिर्गने । पार्ण नियत गेनयमापन जगा॥१७॥ अनेहमगंपदामंकाननगरः । अपामः ग कनंगी नागीता ॥११॥ wi-hmTER : ti zir Ma TETantra the interimantuk rifa नानि | बाबामim fru॥
द्वादशम परिच्छन्। ३४१ अर्थ-जा वि सर्व स्पर्शनादि इंद्रिय अपना अपना कार्य जो स्पर्शादि विषयनिमें प्रवर्तना मान गरित भए मने भाग्माके निकट माम होयफरि यसिए सो उपयास पाहिए ॥ ११९।। ग मार्यकालिको जनरकोन्यामार्वकालिकः । द्विविधः पथ्यने तो हपीकाचनियंत्रण ॥ १२० ॥ अर्थ-सी उपवाग एकनी गार्थकाटिक कटि२ पायमीर धारणा दूजा असावकालिय. फरिल पालक प्रमाणप, काय प्रपर उन फीर पहिए है, कैगा । उपास यप घोर गेवर समर्थ ॥ १२० ॥ मप्राधो सियमाणम्य वर्गमानम्य पापरः। कालानुगारतः कार्य क्रियमाणं महापलम् ।। १२१ ॥ अर्थ-तहां आदिवा सार्वकालिष, उपशम यो जाया मरण निकटतोय मन्यास धोना हा दुसरा का 'प, उपयाम है स यतमान पुर पता : एक का लिया. दागपोप, जाने का रके अनुसारने किया भया कार्यमा1- प.साप होय ॥ १२१ ॥ पतमानी मतगंधाम क्यों मध्यमोधमः । कम्प्यः कर्मनाशाय निजशक्पनुराहकः ॥ १२२ ।। अर्थ-गोतमा पहिए : नियमाए उपाय । म उत्तम मध्यम मा तीन प्रकार पासी अपन लिपा पुन परि कमरे मारता है। भावार्थ-नि.साद उपासक inti भई का सोय , यानि शाम पूजादिवो न काना रेसा कमाए ३४२ श्री अमितगतिधारकाचार । चतुर्णा तत्र मुक्तीनां त्यागे वर्यश्चतुर्विधः । उपवासः सयानीयस्त्रिविधो मध्यमो मतः ॥ १२३ ॥ भुक्तिद्वयपरित्यागे त्रिविधो गदितोऽयमः । उपवासविधाप्येपः शक्तित्रितयमूचकः ।। १२४ ॥ अर्थ-तहां च्यार प्रकार आहारका त्याग करिए मो चतुर्विध नाना उत्तम उपवासहै, वहरि पानी सहित है सो त्रिविध नामा मध्यम टर. पास कया है ॥ १२३ ॥ बहुरि दोय वेला प्रकार भोजनका त्याग होतस्तै विविध नामा अधम टपयाम है, यह उत्तम मध्यम जन्म तीनों प्रकारहीका उपवास उत्तम मध्यम जघन्य तीनी शक्तिका सूचक है, जैसी जा पुष्पमें शक्ति होप तैसाही उपवास धार ॥ १२४ ।। भावार्थ-धारणे पारणे एकवार भोजन कर अर प्यार प्रकार थाहारका त्याग कर सो चतुर्विध नामा उत्तम उसपास कदिए है, और धारणे पारणे एक मुक्ति को अ उपचाममैं जल लय सौ ममन विविधनामा उपचाम है, अर धारणे पारणे अनेक वार गाय अर टर. यामपि पानी भी रेय सो अयम विविधनामा उपवाम काहिए, पा एकदिनमें दोय भोजनकी यला गेय है निन दो पेटामें भोजन स्पाग्या साने दोऊ भोजनका त्याग किया, ऐमा जानना ॥१२३-१२४॥ आगे उपवाम कानेका विधान की। प्रदरदिनये सुका ममेन्यावार्यममिधिम् । वंदित्वा मनितः कुना कायोन्मगं ययाक्रमम् ॥१२॥ पंनांगमानि कृत्या गृहीत्या परिसराश्यतः । सवामं पुनः कृत्वा कागोत्यग रिधानतः ॥ १२६ ।। आचार्य मातः स्नुषा दिया गणनायकम् । दिनदयं नती ने माम्यायामनातगा ॥ १२७ ॥ 1 मादाम परिच्छेद। ४ विधाय माक्षिणं गरि गृहमाणः पटीयमा । संपपनेतगमेष प्यवहार व स्थिरः ॥ १२८ ।। गर्वभौगोपमोगानां कर्मच्या विरतिग्रिपा । शयितव्यं महीपछे प्रागुके कूनगंम्नरे ।। १२९ ।। विहाय गर्यमारंभमसंयमविपद्धकम् । विरतपेतमा धेय यतिनेर पटीपमा ।। १५० ।। तृतीय वागरे कृत्या गर्वमारम्यफादिकम् । भोजयित्वानिधि भल्या भोकायं गृहमधिना ॥११॥ उपवागः हतोग्नन विधानेन विगगिणा । दिनम्त्येकोपि पासि महीय दिवाकरः ।। १५२ ।। अर्थ--भारणेके दिन दोय ॥ विभाजन कर भाचार निकट जायपरि भक्तिवाना कर भागम बसा बायोसाय ॥ १२५॥ परी पंचांग ममायार का भाया धनी सोमाण करय परिधिान कापोरा ॥ १२६ ॥ . यो मापनी मुनि कर अरगणर देशा बना दोष दिन माहिए सो प्रयाय भान ओम यतीत करणा योग्य, भावा- राापने तीन में ॥ १७॥ दुरद साकार थापाको माश्किरि ओ एपचास मोरे निभातीपणारा व सावि किसी से गुती स भास नि११८ ॥ ससा समग भौगनि मन धनगर पोर, भर tra mer से प्रभार . तर सौरमा यो॥ ११९ WEREIN श्री अमितगतिधारकाचार । आरंम ताहि त्यागिक मुनिको ज्यों विरक्तचित्त होय के बुद्धिवान करि तिष्टना योग्यहै || १३० ॥ वहरि तीसरे दिन सर्व आवश्यक क्रिया करकै अतिथिकी भक्ति करि भोजन करायकै श्रावकसरि भोजन फामा योग्य है ॥ १३१ ॥ इस विधान करि विरागी पुरख करि किरा जो उपवास सो एकभी जैसे सूर्य अंधकारको हरे तैसे पाएको हो । ॥ १३२ ॥ उपवासं विना शक्तो न परः सरमदने । सिंहनेय विदायते मिथुरा मदमंथराः ॥ १३३ ॥ अर्थ में मदोन्मत्त हस्ती है त सिंहकरि विदारिए है तैमें उ. यासविना कामके नाम करने वि और समर्थ नाही ।। १३३ ॥ उपयासेन संतप्ते शिप्रं नम्यति पानकम् । ग्रीष्माध्यिामित तोयं क्रियनिष्ठति भूनले ॥ १३४ ॥ अर्थ---उपपासकार ततायमान भया जो पुरुष ता विपाप- ही नापाको प्राप्त होय है जैमें दीमक मूर्य करि ज्यान जो पुराना ता विष जट कितना निष्ट शीघ ही मूगि जाय तम उपगगर्ने पार नसि जाय ॥१३॥ नित्यो नमिनियति धामी कथितो युधः । पोप म मतो निन्यो याहयान्यो व्यवस्थितः ॥१३॥ अर्थ-मी यह टपाम परितनिको निग्य भर मिनिक दाय र कलाद गोप्रो जो भी धतुशmi anta निय का आ अन्य मो नैमिनि सो बान मा मालि उपनामा पिधार्यते ये पंगम्यादिगोयगः । उना नैमिनिकाः मो में कर्मशागमाः ॥ १३६ ।।
द्वादशम परिच्छेद। - अर्ध-जे पंचमी आदि विर्षे उपास करिए है ते सर्व कर्मके नाश करनेमें समर्थ नैमित्तिक उपवास फहे हैं ॥ १३६ ॥ गुरुतरकर्मजालसलिलं भवपक्षकर बहुपरिणाममेघनिवहप्रभवं प्रसभम् । क्षपयति मर्वमुनमुपामपयोगपति- विरचितसंवृतेनिसिलदेहितडागततेः ।। १३७ ॥ अर्थ-या है सबर जानै ऐसा जो पुरुष ताकै उपयामरपी जो उस मूर्य है सो अतिवडा जो झानावरणादि जालम्प जल साहि बलात्कार क्षेपहे सोपेहै, कैसा है. कर्मजादरुप जल संसार वृक्षका करनेवाला है अर नानाप्रकार रागादि भायम्प मेघनिके समूहते उप- ज्या बद्दरि समस्त समारी जीवरुप सरोवररि भरयाहै । भावार्थ-संवर सहित उपचामते कर्मनिकी निर्जरा अधिक होयहै, ऐसा जानना ॥ १३७ ॥ जनयति यद्विषय विपदं रमसोपचिति पटयनि संपदं त्रिदशमानयवर्गमताम् । विधिविहितस तस्य पुरुषः श्रुतरेवलिनो वदति फलं न कोऽप्पनशनस्य परो भुवने ॥१३८॥ अर्थ----जो उपवास संचयम्प भई जो विपदा ताहि नारा कर बलात्कारत देवमनुष्य के समूहकरि मानित सपनाको रहै, ऐसा मिनि- पूर्वक फरया जो उपवास साके फल फेवली को है और पुग्म लोकवि न करे ॥ १३८॥ रनपनि यसिधा प्रतमिदं महितं महिते- रमितगतिश्चतुर्विधमनन्यमनाः पुरुषः । म
भीimfrumI
मागविकनिलो निदना पन
शिरमशिगामामामममनमनम् ।।१३
arta grane ETA TIRIT
मोगा कर गानो गाmant नाग'
गत मोगा जो ITER HIT Dnka
पुन- निकमनी पर Tra:
जा मनाम भावनामा गा॥१३.
मोवा
मन यर काग शिशुकार जो या त शुद्ध ।
नागि कर्ममल, मांशपर पार मो अगिद् ॥
इत्युपामझानारे वागः परिदः।
শৈ মিসালি গালাগালিব মায়ায়
द्वादशमां परिच्छेद ममाप्त भया।
१५
त्रयोदश परिच्छेद। शशांकामलमम्यको व्रताभरणभूपितः । शीलरलभिवासानिः पवित्रगुणमागरः॥१॥ अर्थ- माशाकादिमलरहित चंद्रमासमान निर्मलहे सन्यक्त जाका अर प्रतरूप आभूषणकरि शोभित अर शीलरत्नके उपजायवेकी गानिममान अर निर्मल गुणनिका समुद्र ऐसाहै ॥ १ ॥ मजुभूतमनोबुदिर्गुरुशुश्रूपणोधतः । जिनप्रवचनामिनः श्रावकः मप्तधोत्तमः ॥ २॥ अर्थ--अर सरल मनसबंधी बुदि जाकी अर गुरकी मेया विर्षे उपमीहै अर जिनागमका जाननेवाला है ऐमा उत्तम श्रावक साता- फार जानना ॥२॥ निसर्गजरुची जंतावेकतिरुचिगजिते । अमहाय महापासे मदापतनसेवके ॥३॥ कृतानायतनत्याग पर हष्टपरिमोहिते । मासनासादनाहीने जिनशामन हके ॥४॥ सोपानं सिदिमीपस्य कल्मपक्षपणक्षमम् । ज्ञाननारिनपोहेंतुः स्थिरं तिष्ठति दर्शनम् ॥ ५ ॥ अर्थ-ऐमे पुरए विष मम्पनि निकर नि है जो मनापजनित राचि जाकै अर निधपप्राति करि शोभित अर मरायगहल महायुद्धि- वान सदा आपतन जो भौतादि तिनका सेरक पर किए हैं अनापतन महिए कुदेवादिकका स्पाग जाने अर अन्यमकार विमोहितह अर
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प्रयांदा पहिऐ। आगमाध्ययने का इनकालागिदिना। ग्नियादविगेन यामानविधायिना ।। १ ।। अर्थ-पाnिle PERI आगममा अध्ययन पोरगा गया। पिन जाप, मा पर मागका बगा। भाग-भागतिक दिन: an Amino जिनवाणीचा भाग in 10॥ पर्यनाश्याई पोग्ग मशिनिपमामिला। परमा पूर्णता दियंजनार्थम्मनाम ॥ साय-afthitenition In 18... भाग्य NARrfronuncil t... परिदEAnima ......... पिरोपमापा संयमप्रतिपाकि। भादो धारिश्मयः परः ॥ 4 turn ... ti- Ratin' महा: साधी सर: Anil भnिreles: :। 1- माTerracial मार TAITRA : wr ३५० श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-ये सम्यादर्शन ज्ञान चारित्र तप, ते जीवनिकी दुःखम्मद टहर जामें ऐसा जो संसारसमुद्र तातें तारणे वियं समर्थ हैं ॥ १४ ॥ चतुरंगमिदं साधोः पोप्यमाणमहनिशम् । सिद्धि साधयते सद्यः प्रार्थितां नृपतेरिव ॥ १५ ॥ अर्थ -यह च्यार भेदरूप मुनिराजका आचरण निरंतर पोप्या भया शीग्रही वाछित मोक्षकों साह जैसे राजाकी चतुरंग सेना पोपी मई यांछितसिद्धिका साधहै तैसे ॥ १५ ॥ सिसाधयिपते सिद्धिं चतुरंगमृतेऽत्र यः । स पोतेन विना मूढस्तितीर्पति पयोनिधिम् ।। १६ ॥ अर्थ-जो मूढ दर्शन ज्ञान चारित्र तप इनि च्यार कारण दिना मोक्षकों साथै चाहहै सो मूढ जहाजविना समुद्री तिरया चाहहै ॥१६॥ लोकद्वयेऽपि सौख्यानि दृश्यते यानि कानिचिन् । जन्यंते तानि सर्वाणि चतुरंगेण देहिनः ॥ १७ ॥ अर्थ-निश्चयकर इम टोकमै अर परलोकमैं जे केई मुप देसि. पहे. ते मर्व जीवक दर्शन ज्ञान चारित्र तपम्प चतुरंगकरि उपजाइएहै ॥१७॥ निरस्यति रजः मयं यं मुचयने हितम् । मानव कुस्ने किं न चतुरंगनिषेत्रणा ॥ १८ ॥ अर्थ--मर्य रज जो पाप ताहि दर को. अर हित यतावहे पैसे माताकी ज्या दर्शन छान चारित्र सपकी मैया कहा न करे, सर्वही हित कोहै ॥ १८॥ चतुरंगमपाकृत्य कुर्वने कम ये परम् । कल्पद्रुममपाकृत्य ने मनि विपद्रुमम् ॥ १९॥ अर्थ- पुरुष दर्शन मान चारित्र सप इनि पार कारणनिकों माग और क्रियाकर्म का माकपाशा छापिएको रोह।१४
प्रयोदश परिच्छेद।
चतुरंग गुरं दत्ते यत्नत्कर्म परं कथम् ।
यत्करोति मुहकार्य तन वैरी कदाचन ।। २० ।।
अर्थ-सम्यग्दर्शन मानादि घ्यार फारण जो मुग देयह सी और
कर्म मुख कैसे देश जैसे जो मित्र कार्य कर मोरी फटाच नाही
करे ॥ २०॥
ये संति साधवो धन्पाचतुरंगविभूषणाः ।
विधेयो विनयस्तेषां मनोयामायकर्मभिः ॥ २१ ॥
अर्थ-जे धन्य साधु पुरुष दर्शन ज्ञान चारित्र तप ये प्यार अंग.
होहै भूपण जिनके ऐसे तिनफा विनय मन बचन फायरि फरना
योग्य है ॥ २१॥
गुणनामनवधानां नदीयानामनारसम् ।
निंतनीयं पीयोमिरूपणकारणम् ॥ २२ ॥
अर्थ-तिन साधून निर्म: गुणनिका निरंतर मुभियाननिपरि दिन-
यन फरणा योग्यह फैमाह साधूनके गुणका चितवन धर्म पटापनेया
कारणहे ॥२२॥
ध्यापतो योगिनां पथ्यमपध्यप्रतिपेपनम् ।
मानमो विनयः साधोर्जायते मिद्धिसापकः ॥ २३ ॥
अर्थ-योगी परनका हितमप अर अहितका निरेश करने वाला
कार्य ताहि व्यापता जो पुरर ता साधुकै मोशका साश मानसिक
दिनप होय ॥ २३ ॥
यधिवयति साधनामनिष्टं दुष्मानमः ।
मानिएपनि हो जायते म मरे भवे ॥ २४ ॥
अर्थ-जो दुए साधुनका अनिय विचार है सो मा मई
निकी रानि भर भर दिदाबह ॥ २५॥
३५२
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
दुर्भगो विकलो मूखों निर्विवैको नपुंसकाः।
नीचकर्मकरो नीचो याति दूपण चिंतकः ॥२५॥
अर्थ--यतीनके दूषणका चितवन करनेवाला पुरुष है सो दुर्भग
होयहै विकलाग होयहै मूर्ख होय विवेकरहित होय नपुसक होय नाच-
कर्मका करनेवाला नीच होय ॥ २५ ॥
विवायेति महापानाः संयतानामरेपसाम् ।
संचिंतयंति नानिष्टं त्रिविधेन कदाचन ।। २६ ॥
अर्थ-ऐसें जानकरि महाबुद्धि हैं ते पापरहित जे मुनिराज
तिनका अनिष्ट मनवचन कायकरि कदाच न चितवैहैं ।॥ २६ ॥
श्रयणीयमनाक्षेपं सपर्याप्रतिपादकम् ।
अनवजापरं तथ्यं मधुरं हृदयंगमम् ॥ २७ ॥
अर्थ-मुनने योग्य संदेहरहित पूजाका उपजायनेवाला अर अनि-
दामें तत्पर सत्यार्थ मधुर हृदयकों प्यारा ॥ २७ ॥
वचनं बदतः पथ्यं गगद्वैपायनाविलम् ।
वाचिको विनयोध्याचि वचनीय निसर्यकः ॥ २८ ॥
अर्थ-रागसादि करि मलीन नाहीं ऐसा हितमप योलता जो
पुष ताके वचनमबंधी दोपनिका दूर करनेवाला वचनसंबंधी दिन
जानना ॥ २८ ॥
अभ्याग्न्यानतिरस्कारकारकं गुणदपकम् ।
न वाच्यं वचनं मनम्नपोधनविनिंदकम् ॥ २९ ॥
अर्थ-जाने माधून दोर प्रगट होप ऐमा यचन तथा अनादर
करनेवाला वचन तथा गुणवादपक वचन तथा मानिका निंदकापन
धावकनि करि बांटना योग्य ना॥२९॥
प्रयोदश परिच्छेद। ३५३ वदंति दूपणं दीना ये साधूनामनेनसाम् । ते भवति दुराचारा दप्या जन्मनि जन्मनि ॥ ३० ॥ अर्थ-जे अहानी पापरहित साधनके दूषण कहैं हैं ते दुराचारी जन्म जन्म विर्षे दूपणकी भगैहैं ।। ३० ॥ अनादयगिरो गर्याः क्लेगिनः शोकिनो जडाः । यतिनिंदापराः संति जन्मद्वितयपिताः ॥ ३१ ।। अर्थ-जे पुरुप साधूनिकी निंदामें तत्परहै ते इस भवमै अर परभवमैं दूषित होयहै, नाही आदरने योग्य है वाणी जिनकी अर निंदने योग्य अर लेशसहित अर शोकवान अर अज्ञानी ऐसे होय है ॥ ३१ ॥ - किं चित्रमपरं तस्माघदौदासीन्यचेतसाम् । वंदका पंदितास्तेषां निंदकाः संति निंदिताः ॥ ३२ ।। अर्थ-जाते उदासीनहै चित्त जिनका ऐसे साधूनके वेदनेवाले तीसबनिफरि यदनाक होय, अर निंदकर ते निंदक होय हैं, ताने पा सिवाय आचर्य कहा है, फिछ भी नाहीं ॥ ३२॥ आगें ऊपरि दाति कहा ताका दृष्टांत कहे हैं। यादृशः क्रियते भावः फलंतत्रास्ति नादृशम् । यादृशं चर्च्यते रूपं तादृशं दृश्यतेऽब्दके ॥ ३३ ॥ अर्थ-जैसा भाव करिए सहाँ सैसा फल होप है जैसे दर्पण जैसा रूप करिए तैसाही देसिए है। भावार्थ-साधु तो वीतराग है तिनमैं जैसा भक्तिरूप या पम्प परिणाम पर तैसाही शुभ अशुभ फल पावै जैसे दर्पग ती निर्मल है कामै जैसा रूप कर तैसा ही दो सा जानना ॥ ३३ ॥ अमि.-१३
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
.
प्रतिनां निंदकं वाक्यं विबुद्धयेति न सर्वदा ।
मनोवाकाययोगेन वक्तव्यं हितमिन्छना ॥ ३४ ॥
अर्थ --या प्रकार साधुनकी निंद्राम महापाप जानकरि हितका
वांछक जो जीय ताकरि तीनका निंदक मन वचन कापके योगकार
सदाकालही कहना योग्य नाहीं ॥ ३४ ।।
अभ्युत्थानासनत्यागप्रणिपातांजुलिक्रिया ।
आयाते संयते कार्या यात्यनुब्रजनं पुनः ॥ ३५ ॥
अर्थ-संजमी मुनीका आगमन होतमंत उठना आसनका त्यागना
नमस्कार करना अंजुलिक्रिया कहिए हाथ जोडना क्रिया करनी योग्य
है, बहुरि संजमीको गमन करते संत पीठे चालना योग्यहै ।। ३५॥
आयांतं ये तपोराशिं विलोक्यपि न कुर्वते ।
अभ्युत्थानासनत्यागो नैभ्यः संत्यधमाः परे ॥ ३६ ॥
अर्थ-जो पुरुष आवता जो तपका समूह मुनि ताहि देखकर में
उठबैठना अर आसनत्यागना रूप विनय नाही कौ हैं इनते तिवाद
और नीच कोक नाहीं ॥ ३६॥
यत्र यत्र विलोक्यंते संयनायतमानसाः
तत्र तत्र प्रणनव्या विनयोधतमानसः ॥ ३७॥
अर्थ-यत्नसहित है मन जिनका ऐसे संयमी मुनि जहाँ जहाँ
देखिए तहां तहां विनयम उद्यमी है मन जिनका ऐसे पुरुयनिकीर नम-
स्कार करना योग्य है ।। ३७ ॥
शय्योपवेशनस्थानगमनादीनि सर्वदा ।
विधातव्यानि नीचानि संयताराधनापरः ॥३८॥
प्रयोदश परिक अर्ध-संयमीनकी आराधनावि सपा जे गुण निनकीर गोगने. यी सप्या भर पेटना असई गहना गमनमाना पाहिक, का' मांचे करना योग्य है। भावार्थ----जहां महेत पुरुष विराजे होय ना स्थान Ans. नीचे स्थान करना ऊँची जगह न बरना, जाना ॥॥ पुण्यवंनो वयं येपामाता यति योगिनः । मन्यमान रिति प्राय: फर्नप्पं परिभापिनम् ।। ५९॥ अर्थ-दम पुष्पस मिनप योगदार बाबर जे परित तिनकारि यतीनया का पारणा यापी। भावार्थ-वर मा पार सो गुमुखीको कमा पोय, अपने मामा मानना जीप धन्या मिगौ गुना Ent में भाशर्ष परना, ऐमा मानना ॥ १९ ॥ मिठीवनमपट जभणं गायभजनम् । असत्यभापणे नर्म हारर पामगारणम् ॥1॥ अभ्याप्पान करण्फोट कोण करताटनस् । विकारमै गर्गरकार पर्जपनिसभिधा ॥४१॥ art-4तान निक: बियान में कई वा. नाही अHni मासन, ADMRI, समय, हा राग मन रोन nit, ari का २२, हा griमारे, PREPARE, INVE जान निमारी ||..
अर्थ-विनय करि हीन जो पुरुष ताके व्रत शील आदिसमन श्री अमितगतियायकाचार। उचस्थानस्थितः कार्या वंदना न तपस्विनः । न गति वामतः कृत्वा विनतिन च पृष्ठतः ।। १२ ।। अर्थ-ऊंचे स्थानपरि तिष्ठतेनकीर तपस्वीनको वंदना कान योग्य नाही अर विनययाननि करि याद नरहने गमन करके पाछैनें वंदना करणी योग्य नाहीं । भावार्थ-मुनिनके दक्षिण तरफत प्रदक्षिणारूप गमन काकै वंदना करणी, वाई तरफ्ते जायकरि पाछैन वंदना न करणी ॥ १२॥ विधेति विनयोऽध्यक्षः करणीयो मनीपिमिः । परोक्षेपि स साधूनामानाकरण लक्षणः ॥ ४३ ॥ अर्थ-ऐसे मन वचन काय करि तीन प्रकार प्रत्यक्ष विनय करना योग्यहै अर मुनिनकों परोक्ष होते तिनकी आजा करणा टक्षण जाका ऐसा परोक्ष विनय करणा योग्यहे ॥४३॥ संघे चतुर्विधे भच्या रत्नत्रितयराजिते । विधातव्यो यथायोग्यं विनयो नयकोविदः ॥ ४४ ॥ अर्थनीतिविर्षे चतुर जे पुरुष तिनकरि रत्नत्रयकरि शोभिन जो मुनि आर्यिका श्रावक श्राविका ऐसा च्यार प्रकार संघ ताविर्षे यथा योग्य विनय करना योग्य है ॥ १४॥ विनयेन विहीनस्य व्रतशीलपुरः सराः । निष्फलाः संति निःशेपा गुणा गुणवता मताः ॥ ४५ ॥ .. गुणहैं ते निष्फल गुणवाननिके कहैहैं ॥ ४५ ॥ विनयंति समस्तानि तानि विनयं विना । सरोरुहाणि तिष्ठंति सलिलन विना कुतः ॥ ४६॥ wamirkatinka -
प्रयादश परिच्छेद।
मर्थ-सर्व व्रत है ते विनय विना नाशको प्राप्त होयह में जल
विना कमल हैं ते कहां ति, अपि तु नाही ति है तैम जानना ॥ ४६॥
नितिस्तरमावस्या विनयेन विधीयते ।
आत्मीनमुखाधारा सांभाग्येनेव कामिनी ॥ ४७ ॥
अर्थ-विनय करि आत्माका हितम्प मुग्पकी आधारभून जो मुक्ति
अवस्था सो मंगकरि वश कीजिए है, जसे मौभाग्य पने परित्री का
फीजिए तैमें पिनयकार मुक्ति, यश होयह ॥ ४७ ॥
सम्यग्दर्शनचारित्रतपोबानानि देहिना ।
अवाप्यते विनीतेन यशांसीय चिपचिता ।। ४८॥
अर्थ-जैसे पंडितजनकरि या पाइएहै तेरी विनयपान पुरषकार
मम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र सप ये पाइराहे ॥१८॥
तस्य कल्पद्रुमो भृत्यस्तस्य चिंतामणिः करे ।
नस्य मनिहितो यक्षो विनयो यस्य निर्मलः ॥४९॥
अर्थ-जा, पुरुष निर्मल विनयहै साया कपाश किकरहे. भर
साफे हायरिय चितामणि, अर यक्ष ताके निकटया है ।
भावार्थ-विनरते गुभ परिणामके वसते पुण्यवंर होय नाके
उदयते सर्व कपाशादि कार्य मुग्यदाई होर परिण हें ॥ ४९ ॥
आराध्यते-सिला येन विदशाः मपुरंदराः ।
संयस्याराधने तम्य विनीतम्यास्ति कः श्रमः ॥५०॥
अर्थ-निसहित समन देव जा विनयवान कर आराति
सायमघके भाराधनविकरा धमहे ।
भावार्थ-मा विनयभानकारि मादिक देव परननकी सेवा की है
ऐसा संघका विनय करने का हारी है ॥ ५० ॥
३५८
श्री अमितगतिश्रावकाचार ।
क्रोधमानादयो दोपाश्छिद्यते येन वरदाः ।
न वैरिणो विनीतस्य तस्य संति कथंचन ।। ५१ ॥
अर्थ-जा विनयवानकरि वैरभावके देनेवाले ऐसे से क्रोधमाना-
दिक परिणाम ते नाश कीजिएहै ताकै कोई प्रकारभी वैरी न होयहै ।
भावार्थ-विनयधानतें कोई वैर राखे नाहीं ॥ ५१ ॥
कालत्रयेऽपि ये लोके विद्यते परमेष्ठिनः ।
ते विनीतेन निःशेषाः पूजिता वंदिताः स्तुताः ॥५२॥
अर्थ-लोकमै भूत भविष्यत वर्तमान ऐसे तीनों काल वि. मी
जे अर्हतादि परमेष्टी विद्यमान, ते समस्त विनयवान पुरुषकरि पूजे अर
वंदे अर वचनकरि गोचर किये।
भावार्थ-जाकै विनयह ताकै समस्त परमेष्ठीनकौं भक्तिहै ।। ५२॥
गर्यो निखळते तेन जन्यते गुरुगौरवम् ।
आर्जवं दयते म्यस्य प्रश्रयं वितनोति यः ॥ ५३ ।।
अर्थ-जो पुरुष विनयकौं विस्तार है ता पुरुष करि आपका मान
कपाय नाश कीजिए है आ गुम्नका मान उपजाइए. है अर सरतमा
प्रवाइए है ॥ ५३ ॥
विनीतम्यामला कीर्तिर्वभ्रमीति महीतले ।
मुखयंतीजनं सेव्या कांनिः शीतरुचेरिव ॥ ५४॥
अर्थ-विनयवान पुरुषको निर्मल कोक्ति पृथ्वीतलविणे अतिशय कीर
भ्रमै है सई जगतमै पल है, कमी है कीनि लोकको मुस उपनामी
१ अर चंद्रमाकी कानिममान निर्मल है ॥ ५४॥
विनयः का मुक्तर्विनयः कारणं श्रियः ।
विनयः कारण प्रातर्विनयः कारणं ननेः ॥ ५५ ॥
प्रयोदश परिच्छेद। अर्थ-विनय है मो मुक्तिका कारण है अर पिनय है मो लामी- फा कारण है अर विनय है सो प्रीतिका कारण है अरविनय है मो युद्धिका कारण है ॥ ५५॥ पिनयेन विना पुंसो न संनि गुणसंपदः । नवीन विना कापि जायंते मम्यजातयः ॥ ५६ ॥ अर्थ-जैसे वीज बिना फह भी धान्यकी जानि नाही उप ने विनयविना गुणरूप संपदा न होय ॥ ५६ ॥ प्रथयेण पिना लक्ष्मी यः प्रार्थपनि दुर्भनाः । स मूल्येन विनानूनं रत्नं स्वीकर्तुमिच्छनि ॥ ५७ ।। अर्थ-जो दुरचित्त पुरष विनय गिना गायों बाद, यो पुर. प निधय करि मोल विना रनको अंगीकार करनेयों है ॥५७ ॥ फा संपदविनीतस्य का मंत्री पलयेतसः । का तपस्या विशीलरय फा कीर्तिः कोपचिनः ।।५८।। अर्थ-विनयहित पुरषको सेपनि कहा भर पापमान । चिन जाका से पुरुषको मित्रता कहा भर रहन पुरुष तरस्या पारा भर क्रोधी पृरकी फीनि कहा ॥ ५८॥ नगठस्पेह यरयाम्ति तस्यामुरु कथं गुरुम् । नगडे फटीयस्य गृहेनस्य पुतस्तनी ॥ ५९॥ अर्थ-जा पुरस इस होर संताप मुग नाही ना. पर- क कम होर जमे जाशी का बकमी नाही तोपको पोहोप, भनिन मारो ॥ ५९॥ साभालाभो बिद्धपनि भोपिनीतापिनीतयोः । पिनीनेन मदा मात्र शिप्पारिन विधा।।६.॥
श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-व्या प्रकार विनयवानकै अर पिनयरहित लाम अटान जानिकार भी शिष्य | मन पचन कार्यते अविनयको त्यागकै विनश्न- हित होना योग्य है ।। ६० ॥ ऐसे विनय का वर्णन किया आगै वैयावृत्य का वर्णन करहैं;- कृतांतरिव दुर्वारः पीडितानां परीपहः। वैयावृत्यं विधातव्यं मुमुक्षूणां विमुक्तये ॥ ६१ ॥ अर्थ-काल समान दुःखत निवारण जिनका ऐसे जे गेगादि पर पह तिनकरि पीडित जे मोक्षके अभिलापी आचार्य आदि तिनका वैया वृत्य कहिए टहल चाकरी करणा योग्यहै, काहेकै अधि-मुनिके . आर्थ। - चासंग भावार्थ-लौकिक कार्यकी वाला रहित मुक्तिींके आधि वैपात्य करना ।। ६१ ॥ दुर्भिक्षे मरके रोगे चारराजाद्युपद्रुने । कर्मक्षयाय कर्तव्या व्यावृतिम्रतवर्तिनाम् ।। ६२ ।। अर्थ-दुभिशविर्षे अर मरी विर्षे अर रोगवि अर चौर राजा दिकर्ते उपसर्ग विय करनिक नाशके अधि व्रतीनकी टहल करनी योग्यहै ।। ६२॥ आचार्येऽध्यापके वृद्ध गक्षरक्षे प्रवर्तक । शुक्ष्ये तपोधने संघे गणे ग्लाने दशस्वपि ॥ ६३ ।। प्रासुकरौपधैर्योग्यमनसा वपुषा गिरा। विधेया व्यावृतिः सद्भिर्भवम्रांतिजिहामुमिः ॥ ६४ ॥ अर्थ-जाते व्रतनिका आचरण करिए सो आचार्य कहिए, बड्डीर जाके निकट शास्त्राध्ययन करिए सो उपाध्याय कहिए, यहुत बालके दीक्षित होय सो वृद्ध महिए, मर गणकी रक्षा कर सो गणरक्ष पहिर . प्रयोदश परिच्छदा ३६१ सर सब प्रपती सो प्रवर्तक कहिए, अर शास्त्र के सीसनेमें तत्पर - रोप सो शक्ष्य कहिए अर महोपासादिक करनेवाले तपस्वी फहिए, पर प्यार प्रकार मुनिनका समूहकी सघ कहिए, अर बडे मुनिका मता- गग कादिए अर गेमादिक परि मारप भारीर जाफा होय सो ग्लान फाहिए. ऐसे दश प्रकार मुनिनधिदै म पुरुपनिकारि योग्य कहिए मीनके रेने योग्य प्रामुफ औपनि करि नथा मन वचन काय करि टहल चाकरी करनी पोय है कैमेह वैपाय करनेवाले पुरुष ममार भ्रमणके न्याग करने पाठक है ॥६३-६४ ॥ तपोनिफर गेगः पीयमानं तपोधनम् । यो लोपेक्षते शक्तो निधर्मा न ततः परः ॥ ६५ ॥ अर्थ 2-दुग्ध करि फरे जौय ऐसे तपनि करि रोगनिकरि पीडित जो माधु साहि देखकर जो शक्तिसहित पुग्प उपेक्षते कहिए किछु इलाज न कहे देशताहि रहि जायह सामिवाय और अधर्मी नाहीं॥६५॥ गृहस्योऽपि यतियो वैयावृत्यपरायणः । वयात्यविनिर्मुक्तो न गृहस्थो न संयतः॥ ६६ ॥ अर्थ-जो वैयाहत्य विष तत्पर है सो गृहस्स भी यतिममान जानना बहरि यायकार रहितह मो गृहस्थहै न मुनिहै ।।.६६ ॥ वैयाहत्यपरः प्राणी पूज्यते मयतरपि । लमते न युतः पूजामुपकारपगयणः ।। ६७ ॥ अर्थ-चयात्यरिौ तत्पर जीवहै सो संपमीन करि भी प्रमिएहै, जाते उपकार िपरायणजे पुम्प ते किमते पूजा न पा सर्व होने पावै ॥ ६७॥ संयमो दर्शनं ज्ञानं स्वाध्यायो विनयो नयः । सर्वेऽपि तेन दीयंते यावत्यं तनोति यः ॥ ६८ ॥ माल कहिए ॥ ६८॥ अर्थ-सीन सोको क्षोभ उपनावने विण समर्थ जाके प्रभारी थ्री थमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-जो पुरुष वैयावृत्यको विस्तारैहै ताकरि संयम सन्यादर्शन ज्ञान स्वाध्याय विनय नीति ये सर्वही दीजिएहै। भावार्थ-वयात्य करनेते व्रती स्वस्थ होय तव संयमादि निविद्र- सधै, तात जो वतीनकी टहल चाकरि कर ताकरि संयमादिक सर्व दिये निर्धतिर्दीयते येन तेन धर्मो विधाप्यते । आगमोऽध्याप्यते तेन क्रियने तेन या न किम् ॥ ६९॥ अर्थ-जा पुरपकरि धर्मात्मा जीवनिका मुख दीजिएहै ता करि धर्म कराइरहै अर आगम पढाइएहै अथवा ता करि कहा उत्तमकार्य न कीजिएहै मर्वही कीजिएहै। भावार्थ-धर्मात्मा निराकुल होय नत्र धर्मसाधन कर दानापादन कर और भी धर्मकार्य कर जात जो धर्मात्माको निराकुल करे तार धर्मादिक सर्व उत्तम कार्य किए कहिए ॥ ६ ॥ समाधीपिहितस्तेन जिनामा तेन पालिता। धर्मो विस्तारितस्तेन तीर्थ नेन प्रवर्तितम् ॥ ७० ॥ अर्थ-जो वैयावृत्य का है ताने समावि जो शुभच्यान अर जिनगनकी आता पाटी अर ताने धर्म विस्तारपा अर तार्य को एनत्रय मो वतीया || ७०॥ दुष्मापं तीर्थकर्तृत्वं लोरयक्षोमणक्षमम् । प्राप्यते म्यानयम्या नस्याः किन परं फलम् ॥७॥ सो किया M इंद्राटिकनिकं यामनानादि शाम टप मा मसिगना जा वैयार स्य मावनाका फल पा. नाका और पाठ करानपाट,
त्रयोदश परिच्छेद।
परस्यापोयते दुःसं सदा येनोपर्वता ।
संपद्यते कथं तस्य क काय कारणं विना ॥ ७२ ।।
अर्ध-जिस पर उपकार फग्नेवाले पुरष करि परका दुपदर
कीजिए है ताकै दुःख फैसे होय, जाने कारण विना कार्य कसोय ।
भावार्थ-दुःपया कारण अशुभभाव है सो परोपकारीक अशुभ-
भार नाही सर आप दुःती कम होप, पेसा आनना ।। ७२ ॥
सेप्यो दीर्घायुरादेयो नीरोगो निरुपद्रवः ।
पदान्यः सुंदरो दक्षो जायते स प्रियंवदः ॥७३ ।।
अर्थ-रो क्याध्य करनेगाला संरने योग्य होय हे दो युरोचर
आदर करने योग्य होय है उपयरहित होय है मुंदर अरबीग भर
प्रियवादी होय है॥७३ ।।
में धार्मिकः म सदृष्टिः म विषेकी म कोविदः ।
ग तपम्चीस पारिणी प्यायनि विदधानि यः ।। ७४॥
अर्थ--जो बयाश्य फर सो धर्मामा होय । सो सम्पदा
सो विषयी है सो पदिता सो सपस्वीरमा पारित्रशन है।
भावार्थ-पैयारयत संत सर्व धर्म, अंग हो जाने पर
नांमा तप सब तपनिया सारभूत का है ॥७५ ॥
ऐसे बयाश्य लपका वर्णन किया, माग प्राधिक मामा सा
वर्णन कर-
आथित भक्तिनः गरि रत्नवितयभूपितम् ।
भापति विधातव्यं गृहीत्या पाशुपये ॥ ७ ॥
अर्थ-दर्शनहान परिधापीरनगर परिभावित गाजलाई
ता प्रति भतिमाहोर कर मजारी प्रा.
गरि भाषरण काला दोप॥५॥
श्री ममितगतिधायफाचार। न मदोषः क्षमः कर्तु दोषाणां व्यपनीदनम् । कदमात कर्य वासः कर्दमेन पिशोध्यते ॥ ७ ॥ मोर पुरुर है सो टोर दूर करने की समर्थ नाही, अने: कारपिटा नारकीनकी म सोपिये। भा-निनोर गुरही दोष दूर कर शुद को सो दूर होप नाही ।। ७६॥ दोषमालोनित शानी गरिरमो प्योहितम । अगनिन न येन व्याधिः कापि चिकित्स्यने ।। ७३॥ अचित करिए शिगन का जो दरant पानापानेको गमर्थ है, नान अनानी की ग पन: 11m द्वामा सो इलाज करा ॥३॥ पालीगणमान जानिने गया। नदीयागतः कार्य प्रायशि मीलिया ॥७॥ *~ITH AREALHERITAarti ... मामाने माने निम,/mri14 । प्राचिन काला ॥७८ ॥ प्रदीयतयःमा गगनविता। frमक माननिर्मिम || in 14taa frred *h-ita Katekar HALA HIran को 10 त्रयोदय परिषद। - फलाय जायते पुंगो न चारित्रमशोधितम् । मलयस्तानि शस्यानि कीडगं कुर्वते फलम् ।। ८०॥ अर्थ-विना सोप्या चारित्र सो पुरपके फरके अर्थ न होयहै जैसे मल जो कृडा साकरि प्रसे जे सस्य धान्य ते फैसै पल निपजावे, अपि तु नाही उपजावे ।। ८० ।। मै मापधित्त का वर्णन किया, आगै स्वाध्याय नामा नप का वर्णन करे - वाचना प्रच्छनाऽऽम्नायानुप्रेक्षा धर्मदेशना। बाध्याय: पंचधा कृत्यः पंचमी गतिमिच्छता ॥ ८१॥ अर्थ-पंचमी गति जो मिद्ध अवस्था ताहि इच्छता जो पुरुष तापरि पाच प्रकार स्वान्याय करना योग्यहै, स्वं कहिए आनाके अध्यायग्रूप जो पढना अथवा मु काहिए भलेप्रकार शास्त्रका अध्ययन पाहिए याचनादिक फरना सो साप्यायहै, सो पाच प्रकारहै-तहाँ निर्दोष ग्रंथ अर्थ उभय इनिका जो भन्यजीवनिको देना सिखावना सो तो वाचनाह, बहुरि संशयके दूर करनेकौं निर्वाधनिश्चयके पुष्ट करनेकों प्रथ अर्थ उभयका प्रश्न फरना मो प्ररछनाहै जो आपकी उच्चतारे अर्थ परको ठगनेके अर्थिनीचा पाडनेके अधि परकी हास्य फरनेकों इत्यादि पोटे खोटे आशयत पूछ सो प्रष्ठनातप नाही, बहुरि जिस पदार्थका स्वरुप जान्या ताका मन वि वारंवार चितवन करना सो अनुप्रेक्षाहै, बटुरि पाठकों शुद्ध घोकना सो आम्नापहै, बहुरि धर्मकथा आदिका अंगीकार उपदेश देना सो धर्मोपदेशहै; ऐसे पंच- प्रकार जानना ॥ ८१ ॥ तपोजरानंतरभेदमिने तपोविधी किंचन पापहारि ।
३६६ श्री अमितगतिश्रावकाचार। स्वाध्यायतुल्यं न विलोक्यतेऽन्यद हुपीकदोपप्रशमप्रवीणम् ॥ ८२ ॥ अर्थ-अंतरंग अर बहिरंग भेदकार मिन जो यारहप्रस्थर ताप विधान ता वि स्वान्यायसमान पापको हरनेवाला और तप न देखि एहै, कैसाहै स्वाध्यायनामा तप इंद्रियनिका दो जो इष्टानिष्ट विषय निमें रागद्वैप करना ताके टपसमावनेमैं प्रत्रीणहै ।। ८२ ॥ स्वाध्यायमत्यस्य चलखभावं न मानसं यंत्रपितुं समर्थः। शनोति नोन्मूलयितुं प्रपद्ध तमः परो भास्करमंतरण ॥ ८३|| अर्थ-चचल है भाव जाका ऐसा जो मन ताके रोकने स्वाध्यायविना और समर्थ नाही असे वृद्धिको प्राप्त भया जो अपकार ताके नाशको सूर्य विना और ममर्थ नाही तमें ।। ८३ ।। यः म्याध्यायः पापहानि विधने कृत्वकाप्रचं नोपयामः क्षमताम् । शक्तः कर्नु मनानां न कार्य लोके दृष्टोऽरती दुष्टचेष्टः ।। ८४ ॥ अर्थ-स्वाध्यायनामा ता एकामाना कार जो पापकी हानिकी ता पारको हानि के करनेको केवल उपमाम समर्थ नाही, सौकरि सर रहिन अर दुरद चटा जासी ऐमा पुस्ल सेरमहित जीवनिके काने योग्य जो कार्य है साह करने समर्थ नाही। मा-मापारिक संवाद साने कर्मकी निगराई थर मायाय मिना के 3 उपवामही कर मी शादित दुरी सपा नियंग होय नाही ८१॥
-
प्रयोदश परिच्छेद।
विज्ञाननिः शेषपदार्थजानः
फर्मासवद्वारपिधानकारी।
भूत्वा विधने म्बपरोपकारं
खाध्यायवर्ती वृधपूजनीयः ॥ ८५॥
अर्ध-पाप्यायरिध प्रयतनेवाला पुरपह. मो जान तयानक
परते सकटपमा जान अर मात्रय आवनेके वारजे निण्या वारिष
निनका रोकनेवाल ऐसा होगा आपका षा परका टपकार का?
फैमा स्वाध्याय करनेवाला पुरुष पहितनि करि पूजने योग्य ॥ ४५ ॥
पदुमतयो विधुनोति मयो
विध्यमिताशेपहपीकदोपः।
सपोविधानर्भयकोटिलक्ष-
नून सदसो न धुनोति फर्म ।। ८६ ॥
अर्थ-जान्या परका स्वरुप जाने पर नारा कि समान
समिपनिये दोष जानें ऐगा पुर सो जा कर्मयो निराकर
धर्मको ज्ञानी भनेर जन्मनिफरि तप आचरण करि भी निमय
परि नाही निर्जराय।
भावार्थ-निर्जा प है सोधुन मानके अभ्यास भईing-
देता तातोपाकात कापारि निरा र नाही
सामान्यागत मुरवसा जागमा ॥ ८॥
निरम्नमक्षिकापति
विधीपने पेन रिवर्गः।
प्रसन्मारमा
मापानोति ननोन गा॥ ८७॥
श्री ममितगनिधारकाचार। अर्थ-जा स्वाध्याय करि नष्ट भई है मर्च इंद्रिय अर कपादकर परिणति जाकी ऐमा जीवनिकाममूह कोशिश है, भावार्थ-विषय कपायरहित जीर कीजिएहै तात स्त्रामायने न्यारा योग कहिए ध्यान नाही, भावार्थ-श्रुनके अग्यास हात ध्यान होयह ज्ञान विना ध्यान नाही, कैसाहै स्वाध्यायतप विस्तारको प्राप्त भया जो संसारम्प अंकुर ताके सोपनेकौं सूर्यममान है ॥ ८७ ॥ गुणाः पवित्राः सममयमाद्या विवोधहीनाः क्षणतश्चलंति । कालं कियंत दलपुप्पपूर्णा- स्तिष्ट्रति वृक्षाः क्षतमूलबंधाः ।। ८८ ॥ अर्थ-पायनिकी मंदतारूप शमभाव अर संयमभाव इत्यादिक जे पवित्र गुण है ते नानरहित क्षणमात्रमै चलायमान होय, जैसे पत्र अर पुष्पनिकरि भरे ऐसे वृक्ष है ते नष्ट भयाहै जडका बंधान जिनका ऐसे कितनेकाल तिष्?है किळू भी न ति है । भावार्थ-सत्र गुणनिका मूल शन है सौ ज्ञानविना और गुण होय नाही, ऐसा जानना ॥ ८८ ॥ जानात्यकृत्यं न जनो न कृत्यं जैनेश्वरं वाक्यमवुद्धधमानः । करोत्यकृत्यं विजहाति कृत्यं ततस्ततो गच्छति दुःखमुग्रम् ।। ८९ ॥ अर्थ-जिनराजके वचनौं न जानता जो जीवहै सो न करने योग्यफौं वा करने योग्यको न जानहै तात अकार्य जो हिंसादिक सादि प्रयोदश परिच्छेद। करहै मर कार्य जो पैराग्यादिक ताहि सजे है तातै तीन दुराको प्राप्त होयहै ।। ८९॥ अनात्मनीनं परिहर्नुकामा प्रहीतुकामाः पुनदात्मनीनम् । पठंति शवजिननायवाक्यं समस्तकल्याणविधायि संतः ॥९० ॥ अर्थ-संत पुरपह ते निरंतर जिनराजके पचनको प.हैं कैसा है जिनाचन समस्तफल्याण फरणेवाला है कैसे हैं जिनवचनके पढनेवाले पुरुष आत्माके हितरूप नाहीं ऐसे मिष्यालादिक भाव तिनके दूर कर- नेके पाठकहै यहरि आपके अर्थ हित जे सम्पकादिभाव तिनके मण करनेके याउक है ॥९॥ मुखाय सूत्रमपास्य जन मृदाः भयंते वचनं परेसाम् । तापच्छिदे ते परिमुच्य तोय भजति कल्पक्षयकालवदिम् ।। ९१ ।। अर्थ-जे जिनराजके वचनको त्याग मुखके आप अन्य मिण्याष्टीनिके पचन से है ते साप दूर करनेके भघि जलकौ छोडकै प्रटयकालके अग्निको सेये है ॥ ९१ ।। विहाय वाक्यं जिनचंद्रदृष्टं पर न पीयपमिहास्ति किंचिन् । मिथ्याशा वाक्यमपाम्य ननं पश्यामि नो किंचन कालकूटम् ॥ १२ ॥ भौ--1४ कहगे । यहरि और भी ले तपके भेद मिहनि:हिनादि निभात ३७० श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-इस लोकविय जिनराजकरि कया जो पचन ता सिवाय और अमृत नाही अर मिथ्यादृष्टीनिके वचन विना और कालकूरविष में नि. श्यकरि किळू नाहीं देखं हूं ॥ ९२ ।। विधीयते येन समस्तमिष्टं कल्पद्रुमेणेर महाफलेन। आवर्यतां विश्वजनीनत्ति मुक्का परं कर्म जिनागमोऽसौ ॥ ९३ ॥ अर्थ-जा करि महाफलसहित कल्पवृक्षको ग्यों सर्व मनोग कीजिए ऐसा पहु जिनागम सर्वलोकके हितरूप परिणति सिवाय और कार्यका वर्जन करत । भावार्थ-जिनाचनके अभ्यासते हमारे सौकिक कार्यकी मांगमा होउ स्वपरके उपकाररुप परिणति होउ ॥ ९३ ।। ऐमैं स्वाध्याय नामा तपका वर्णन किया:-- परेऽपि ये मति तपोविशेषा निनंद्रचंद्रोदितम्याः। मनितस्त निगिला विधयाः रिधाननः कर्मनिकननाय ॥ ९४ ।। अर्थ---म्याध्यापपर्यंत तो पहले कहे अर प्यान तm समूपर्ने दिशा से अपनी शाकिमा सममापियानक कर्मगौरि गरम कामा योग्य है ॥ ११ ॥ माग्यं यावदीपनं येन निस्पं गगारंगश्चितं न मयः । " -- प्रयोदश परिच्छेद। पेनानंदो जन्यते याचनीय. स्नं संतोपं कुर्वते के न भव्याः ॥ ९५ ॥ अर्ध-आकारे निराकुल गुप निग्य दानिए, आ गगका दय शम पे दिए अर जाकर वाइनेयोग्य मुनिपदफा भानद रपमा । ऐगा जो तय सी फाँन भम्प न करे, सही को। भावार्थ-सब तपनि का गुरपण . निरोध पर संताप एकाहसाने तोर मय पनि Hit am पग्मतपर, ऐसा नागना ॥ १५ ॥ ने दात कोप्पुपायः गगः गीय कृणामगि सोपतोम्यः । अभोजाना का प्रमोध विधातु पत्तो हिल्या भानुमसे oिre: ॥ १६ ॥ वर्ष-मनुष्यानको बारित गुपदेपासना कर भी उपाय नाही जो पानिकमा १ery और कोई सा नरपास सो विमा गुलमा ९॥ विमुष्य मेतोपगपारनपतिः पुराय य: कोशल पनाए। दारिद्रप हानाया कपा निरस्य भाति विषetitut७॥ -जी महा मुल, अ ter *... मोगादियो) fer w३ 4 के Ram ॥१७॥ मोपलोभमरममायोकर in !
३७२
थी अमितगतिथावकाचार।
व्याघयो न सुखघातपटिष्टाः
पोपयंति कृतिनः सुखकांक्षाः ॥ ९८ ॥
अर्थ-क्रोध टोभ मान मसर शोक इत्यादिक धर्मकी हानि क
नमें प्रवीण जे भाव ते त्यागर्न योग्यहें जाते मुसके यांटक से मार
पान पुरुषहें ते मुसके नाश करनेमें प्रवीण जे रोगतिनहि पुत्र न को
भावार्य-क्रोधादिभावहे ते आकुलतामय? तात मुपके घाता
(पागने योग्यहै अर संतोगहे सो मुसमयह सो ही मुसायानि ई
सेवने योग्य है ॥ ९८ ॥
मत्येषु मंत्री गुणिषु प्रमोद
लिए जीयेषु कृपा परत्वम् ।
माध्यस्थ्यमायो विपरीनदृष्टी
सदा विधेयो विदुपा शिवाय ॥ ९९ ॥
अर्थ-एदियादि मई जीवनिकित मग्रीभाव करिए कोई भी में
दुसरी मत होऊ देगी मावना, महरि गम्यम्दर्शनादि गुण गहिन
पनि ति अनिहर्ष, आरोगादिशकार महिला जीव विनीत
गाभाव, आ विपरीती श्रदा बाकी ऐगे पुल कि मायाप्यभार
frपत पुपो देश पियाना को पहश योष नारी
गाय कटियों करना, या प्रकार प्यार भागना हानयारि viral
वादमदा कागा योग्य ॥ ९९ ।।
अनधाश्रीपतिपत्र
अनहोगिता नित्यम् ।
गिगमावः गुपिया धियों
मागमोगानियां ॥१॥
प्रयोदश परिच्छेद। अर्थ-ज्ञानी जीवकरि संसार देह भोगनिविय सदा वैराग्यभार करणा योग्यह, कैसे हैं संमार देह भोग अविनाशी टांके रोकने वाले हैं परि अनेक दोपनिकरि युक्त हैं विनाशीक ॥ १० ॥ थाकधम भजति विशिष्टं योऽनपचित्तोऽमितगति दृएम् । गच्छनि सौख्यं विगलितकाएं म क्षपयित्वा सकलमनिटम् ।। १०१ ।। अर्थ-जो पुरष अमितगति कहिए धनत है ज्ञान जाया मागे मिनराज सानै दिपाया अथवा अमितगति आचार्य, दिपाया जो य- फफा धर्म साहि सेवेह सो पुरुष सप अनियनिका नाश करके नही। काट जहाँ ऐसा मुरारूप जो मोक्ष ताहि प्राप्त होप है, फैमा धर्म विशिए फहिए अन्य धर्मनिने न्याग एक्षण जाया ऐसा है, बनि कैसा है सो पुरस पापरहित है चित्त जाया ऐमा है ॥ १०१ ॥ संपया। भावकधर्म करो जिनराज ययाविधि ताहि असंडित धार, सो अतिनिर्मलपित मुधी भवफाट अनिएममूह निगरे । पर्गनिके गुरा भोगि तया नर होय महायत भाव समार, आतम प्याय विभाष नसाय महागुररसागर धाम निधार । इत्युपासकापरे प्रयोदशः परिपोरः। विधीममितपति भाचार्यविरचित भाषापार दिपोरामा पनि समार भयान श्री अमितगतिश्रावकाचार। तहां इस जगतविर्षे और कौन जानेयाले नाही सर्वही परलोक जाय हैं ॥६॥ ऐसे अनित्यभावना कही । आगै अशरणभावनाकी कहैं हैं;- यं करोति पुरतो यमराजा मक्षणाय भुवने क्षुधितात्मा । कानने मृगमिव द्विपरी तस्य नास्ति शरणं भुवि कोऽपि ॥७॥ अर्थ-क्षुधासहित है आत्मा जाका ऐसा जमराज सो जीवकों भक्षण करनेके अर्थ आगे कर है ता जीवका लोककि कोई भी शान नाही जैसे वनभै मृगको मिह भक्षण करनेको होय तत्र ताकी कोई शरण नाही तैसें ॥७॥ अंतकेन यदि विग्रहभाजः स्वीकृतस्य समपत्स्यत पाता। रक्षितः सुखररमरिप्य- मो तदा मुखधूनिटरंवः ॥ ८॥ अर्थ काढते प्रमा जो प्राणी ताकी मरणते जो रक्षा दादिक देवनिकरि रक्षित जो देवागनानिका सम्ह सो न मरता। भावार्थ-मरणर्ने रक्षा होय तो इंद्र अपनी देयांगनानिको न माने देय, ताने मरण होने जीव शरण नाही ॥ ८ ॥ यं निहंतममरा न गमर्या हन्यने न स परः ममाती । यो दिपन ममदरपि मनो मम्यने हिसन म पृथः ॥९॥ - .
।
३७
चतुर्दश परिच्छेद।
अर्थ---जा जमराजफे हमियेकौं देव समर्थ नाही सो और जीवनि-
परि बसे हानिए,
भारार्थ-जो इंद्रादिक देय भी मरणको न निशार सके तो और-
नकी फहा कया, जैसे मतवारे हाथीन कार भी जो वृक्ष भग्न न भया
सो मुस्सानि करे भैग से कीजिए ॥९॥
स्पंदनद्विपपदातितुरंग-
मंत्रितंत्रजपपूजनहोमः ।
शक्यते न रालु रक्षितुमंगी
जीवितव्यपगमे नियमाणः ।।१०।।
अर्थ-रथ हाथी प्यादे घोडेनिफार तथा मंत्र तंत्र जप पूजन होम
इन पारि आयुके नाश भयं जो मरता जीव मो रापनेको समर्थन
हुनिरहे ॥१०॥
ये धरति घरणी सह शैले-
विपति सकलं ग्रहयकम् ।
ते मवेति भुवने न म कश्चि-
यो निइंति तरसा यमराजम् ॥ ११ ॥
अर्थ-जे जीव समस्त पर्वतनिसहित पृथ्वीको धारहै अर मफल
यहचको क्षेपैहे ऐसे पुरष सौ सोफवियह परंतु सो कोई पुरष नाही
यो गकार यमगजको नाश फरहे ।। ११॥
यो निहंति रमसेन पलिष्टा-
निंद्रपंदरविकशायरामान् !
रक्षको भवति कथन मृत्यो-
निम्तो भवभूतो न तोध ॥ १२ ॥
334 भी अभिमनिधारागार। - अर्थ-जो ममगज वेग यान जे कार्य नगर पटभट तिनहि ने मारी इम टाकीजीपनि नाम काना यम ताते यमायनेमाला की नाही। भावार्य-अन्यमनी यमकी देव मानी सोमा मिण्यार, अर आयु का जो पूर्ण भये दोज गपने की ममर्थ नाही, गम्यमतर्गनाद्रिक का अरहतादिक गणहै जाने यनुका ARE जाने माणका भय रहे नाही, अर मिदपद पर तहाँ फेर मरण होय नाही, नात पर कोऊ शरण नाही आपका आपही कारण है ।। १२ ।। या प्रकार अशरण भावना कही, आगै संसार मावनाकौं कहै ;- चित्रनीवाकुलायां तन्मागिना । कुर्वता चेष्टितं सर्वदा मोहिना । गृकता मुंचता विग्रहं संस्ती नर्तकेनेव रंगक्षिती प्रम्यते ॥१३॥ अर्थ-~इस मोही जीवकरि एकेद्रियादि नाना जीवनिकरि मरी नृत्य करनेकी भूमिसमान जो यह संसारपरिणति तावि नटया की ज्यौं भ्रमिएहै कैसाहै संसारी जीव सदा अनेक चेष्टा कहै अर शरीरको प्रहण करहै अर छोडेहे ॥ १३ ॥ वसति रोदिति सीदति सिद्यते स्वपिति रुप्यति तुप्यति ताम्यति । लिखति दीव्यति सीथति नृत्यति भ्रमति जन्मवने कलिलाकुलः ॥ १४ ॥ अर्थ-~पापकर्मकरि व्याकुल यह जीव संसारबनविय भ्रमैहै, उच्चान लेयहै, रोहै, पीडित होयहै, खेदखिन्न होपह, सोवैहै, रोप करहै, राग- - - ३७९ चतुर्दश परिच्छेद। है, तापमान होयहै, लिह, झोडा करहै, व्यवहार करेहै, साहे, च करहै, या प्रकार अनेक चेष्टा करहै ॥ १४ ॥ जनकस्तनपस्तनयो जनको जननी गृहिणी गृहिणी जननी । भगिनी दुहिता दुहिता भगिनी भवतीति पांगिगणो बहुशः ॥ १५ ॥ अर्थ-पिता पुत्र होयह पुत्र पिता होयहै माता स्त्री होयहै स्त्री माता होयह बहण पुत्री होयह पुत्री यहण होयह सो यडे खेदकी बात है पर जीव पूर्वोत्तप्रकार अनेकवार भ्रमैहै ॥ १५॥ कलिलजालपशः स्वयमात्मनो भवति यत्र मुतो निजमातरि । किमपरं यत तत्र निगद्यते विविघदुःसपना जननार्णवे ॥ १६ ॥ अर्थ---जा संसारसमुद्रपि पापफै समूहकरि यश भया संता जीय आप आपका पर अपनी माताके गर्भविष होय बडे खेदकी यातहै, 57 संसार विर्षे और और व्यवस्था कहा कहिए, कैसाई भवसमुद्र नानादुःषनिफे उपजाययेकी सानिह ॥ १६ ॥ किमपि वेति शिशुन हिताहितं विरहदुःसमुपैति युवा परम् । विकलतां भजते स्थविरम्तरां भवति शर्म कदा घरा संहतो ।। १७ ।। अर्थ---अहो संसारबिसे मुग फर होयहै वारफ सौ कि हिताहि. -को न जानेह, परि जवान सीन कामके दुपयों नाल होयह पारि श्री अमितगतिधायकाचार। दाद मो अतिशयकार विफलताको भह शरिरहित होगा बहना है ऐमे मुख कोई अवस्था नाही, दुःगह ॥ १७ ॥ न मोऽस्ति संधाविधिर्जगत्रय मम समस्तरपि देहधारिभिः। असपि योन प्रमता मवाणये शरीरिणा कर्मनियंत्रितामना ॥१८॥ अर्ग-तीन टोकरिन मी मंधकाधान नाही जो जीप में माय देहानिकार सहित अनेकवार न पाया, कंगा जी संगागरा भ्रममा अर कनिकी प्यार आग्मा जाया पेगा ॥१८॥ पत्र निश्चित: पगायत फर्मगानाग्नं प्रम्यमाणो जनः । गई दुर्ग मान कायिक नागं न हि मंगतारमनुते ॥१०॥ अर्थ-fan गारगमुद्रपिस फर्म की निर्माता प्रमाया देगी ATी नाना पायनिक ? ? की trt . गिन का मन niratn दुमद दुल कर में 1, Anm मा HITRanit TERI HARI माना AMERTami धानिमिनगिना पाNि पित। पजाति ना मनिगला गला ॥२०॥ -- चतुर्दश परिच्छेद। अर्थ-शरीर भर धुजननिके पोपणे के आर्य जीरकरि पापकर्म नानाप्रकार कीजिएहै यर ताके फलते नरकगतिको प्राप्तभया एक काप साकरि ही पीडा सहिए है शरीर कुटुयादिक फोऊ भेला होय नाहीं ॥२०॥ पदपत्रनयना मनोरमाः कारयति दुरिनं दुरुत्तरम् । दुर्गति विकटदुम्ससंकटा मेककस्य शरणं न गच्छतः ॥ २१ ॥ अर्थ-कमलके पर समान नेत्र जिनके ऐमी मनौं रमावनेवाली नसी है से दुस्तर पापको करा है बहुरि दुःसनिकरि व्याप्त जो वर्गति ता प्रति अवेले जानेको शरण फोज नाहीं ॥ २१ ॥ मात्तातगुतदारपांधवाः सर्वदा मम मुधेति तप्यते । कर्म पूर्वमपहाय विद्यते नात्र कोपि मुखदुःखकारकः ॥ २२ ॥ अर्थ-माता पिता पुत्र ती बांधव ये सदा मेरे हैं ऐसी मानि- रि सदा सेद फरहै महरि पूर्व कर्म विना इस लोक पिय मुखदुःराका रनेवाला फोऊ नाही ॥२२॥ वेदनां गनवतः सकर्मजा- मत्र यो न विदधाति किंचन । किं करिष्यति परत्र यसतो देहनादिनिवहःम पालिनः ॥ २३ ॥ अर्थ---जो पाया पोया ऐसा पुत्रादिकनिका समूह सो अपने मादयते 'उपभी जो रोगरिकको बेदना हा प्राप भया जो जोड
आपका नाहीं तहां ता शरीरके सबंधते उपजे जे अन्य पुत्रादिक ते
३८४
ध्री अमितगतिधायकाचार।
अर्थ-इस लोकवि कर्मनिके संयोगते निपजे गरीर पुत्रादिक
जे पदार्थहे ते केवल दुःखकी परपराय विना और किछू दुःखत विष-
रीत जो मुख ताहि करने सयर्थ नाहीं ।
भावार्थ-शरीरादिक परपदार्थमैं आपाकी बुद्धिहै सो दुःसहीका
कारणहै मुखका कारण नाही ॥ २९॥
अनात्मनीना मवदुःखहेतयो
विनश्वराः कर्मभवा यतोऽखिलाः ।
ततो न वाह्येपु विशुद्धबुद्धयो
ममेति बुद्धि मनसाऽपि कुर्वते ॥३०॥
अर्थ-जातें कर्मणके उदयते भये समस्त शरीरादिक पदार्थहें ते
आत्माके आर्य हितरूप नाही अर संसार दुःखके कारण है अर
विना-
शीक हैं तातै वाह्य पदार्थनिविर्षे " यह मेरे हैं " ऐसी बुद्धिको मन
करि भी न करहैं ।। ३०॥
न विद्यते यत्रकलेबरं निज
स्वकीयबुद्धधा मनसि व्यवस्थितम् ।
तदीयसंधभवाः मुतादयः
परे कयं तब निजा निगद्यताम् ॥ ६१ ।।
अर्थ-जहां आपकी बुद्धिकरि मनविधैं तिष्टया जो शरीर सो
कहो! आपके कम होय ॥ ३१ ॥
करोति यायेषु ममेति शेमुपी
परेधयं यावदनर्थकारिणीम् ।
न निर्गमस्तापदमुप्य संरते-
रिवि त्रिधा सा विदुपा विमुच्यताम् ॥ ३२ ॥
---- चतुर्दश परिच्छेद । अर्थ-जहां ताई याय पर पदार्थनि यि ये मेर हैं ऐसी अनर्थ फरने वाली बुम्हि तहां साई इस जीपका संसारनै निकसना नाही इस कारणने मो बुद्धि मन वचन काय करि त्यागना ॥ ३२ ॥ ऐसे अन्यत्वभावना यही । आगे अशुचित्वभावनाओं क हैं;-- क्षणादमेध्याः शुचयोऽपि भावाः संसर्गमात्रेण भवंति यस्य । शरीरतः संततिपूर्तिगंधे- स्ततः परं किंचन नास्त्यचौक्ष्यम् ॥ ३३ ॥ अर्थ-जा शरीरके संसर्गमात्र करि क्षणमात्रमें पवित्र पदार्थ भी अपवित्र होय, तातें निरंतर दुर्गंधररूप जो शरीर तात अन्य किछु अप- वित्र नाहीं॥३३॥ बहुप्रकाराशुचिराशिपूर्णे शुक्रासजाने शुचिता क काये। अमेध्यपूर्णः किममेध्यकुंभो दृष्टो हि मेध्यत्वमुपाददानः ॥ ३४ ॥ अर्थ-अनेक प्रकार विष्टादिफ अपवित्र यस्तुनि फेरि भरया अर वीर्य अर गघिरते उपन्या ऐमा जो सारीर सारिौं पवित्रता कहू नाही, जात शिश करि भरया अपवित्र कुंभ पवित्रताको धारता फडू देख्या नाहीं ॥३॥ मज्जाम्थि मेदोमलमांमसान विगहणीयं कृमिजारगेहम् । देहं दधानः शुनितामिमानं मुझे विधत्ते न विशुद्धयुद्धिः ॥ ३५ ॥ भनि.-१५ N
---
धारै है ।। ३५॥
अर्थ-जो जलकार पाप नाशिर तो तपश्चरणादि धर्म काहे अपि
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
अर्थ-मम्जा अर हाड अर मेद अर मल विष्टादिक इनके उपजने-
की खानि अर निंदने योग्य अर कीडानिक समूहका घर ऐसा जो देह
ताहि धारता संता पवित्रपनेका अभिमान मूर्ख घारै है, निर्मल बुद्धि न
सबन्नवस्रो विचित्रगूथ
यो वारिणा शोधयते शरीरम् ।
अहाय दुग्धेन निघृष्य मन्ये
विशुद्धमंगारमसा विधत्ते ॥३६॥
अर्थ-जो झरै है नव द्वारनित नाना प्रकार मल जाते ऐसा
शरीर ताहि जल करि पवित्र कर है सो मै ऐसा मानूं हूं ये कोयलाको दूर
तै चिसकै जटदी विशुद्ध करै है ॥ ३६ ।।
न हन्यते तेन जलेन पापं
विवद्धर्यते येन विवर्य रागम् ।।
यद्यस्य वर्णप्रभवे समर्थ
तत्तस्य दृष्टं न विनाशकारि ॥ ३७॥
अर्थ-जा जटकार गगादिभाव बढाय करि हिंसादिक पाप बढाइ
है ता जलकरि पाप कैसे नाश कीजिए, जाते जो वस्तुका वर्ण टपजाय
विप समर्थ है मो ताका नाश करनेवाला न देख्यो॥ ३७॥
विनाश्यते चेत्सलिलेन पापं
धर्मस्तदानी क्रियते किमर्थम् ।
आरोहण कोपि करोति वृक्ष
फले हि हस्तेन न लभ्यमाने ॥ ३८ ॥
करिए जावे हाय पाल आये सते कोई पक्षप चंद नाहीं ॥ ३८॥
- पतु परिर। ३८७ मापन तीयः मियने शशांको ग्रीप्मेण भानुर्यदिनाम शीतः। दहस्तदानीं पयमा विशुद्धो विधायने दुर्वचग्यपूयः ॥ ३९ ॥ अर्थ-जो माघ मासकार चंद्रमा तत कीजिए अरग्रीष्मकरि सूर्य सीताद कीजिए सी जलकार शरीर विशुद्ध कीजिर केसाहै शरीर निंद- नीक विटादिक मटका पुजह ॥ ३९ ॥ मज्ञान सम्यक्तचरित्रतोय- विंगाबमानर्मनसाऽपि जीवः । विशोध्य मानस्तरसा पवित्र- ने शुद्धिमभ्येति भवांवरेऽपि ॥ ४० ॥ अर्थ-मन फरि भी अरगाहे जे सम्यग्दर्शन सम्परज्ञान सम्यकचा- रिरूप पवित्र जल तिनकरि शीघ्र निर्मल किया जो जीर सो जन्मातर विप भी अशुद्धिनाको प्राप्त नाही होयहै । भावार्थ-जलादि परद्रयनित मिष्याची शुद्धिता मानहै सो मिथ्याहै सात जीव सौ.सम्पग्दर्शनादि आत्मपरिणामहीत शुद्ध होयहै ॥ ४०॥ ऐसे अशुचि भावना कहीं। आगे आश्रवभावनाका कहेहैं:- रंभरिवांविततैदी तरंडे जीवे मनोवचनकायविकल्पजालैः। जन्मार्णवे विशति कर्म विचित्ररूपं सद्यो निमन्जनविघाधि सुदुर्निवारम् ॥४१॥ अर्थ-जैसे समुद्री नाप विय विस्ताररूप छिद्रनिकरि जल प्रवेश परहै स संसारसमुद्रवि मन पचनपायके विकल्पबाटते नानाप्रकार ३८८ श्री अमितगतिश्रावकाचार। कर्म आश्रयेहैं ताकरि जीव दुःखकरि निवारण करने योग्य जग्दी हुब- नेकौं प्राप्त होयहै ।। ४१॥ चित्रेण कर्मपवनेन नियोज्यमानः प्राणिप्लवो बहुविधोऽमुखभांडपूर्णः । संसारसागरमसारमलभ्यपारं भूरिभ्रमं प्रमति कालमनंतमानम् ।। ४२ ॥ अर्थ-तीन मंदादि भेदनिमहित नानाप्रकार जो कर्मपवन साकरि प्रेग्या भया यह जीयम्प नौका संमारसमुद्रवि अनंतकाल अमेह फैमाह जीवरस्पी नाव नानाप्रकार दुःपम्प मांडनि करि भरपाई बहरि फैसाह मंसारसमुद्र अमारहे जामें आत्महित नाही बहुरि नाई पारने योग्यहै पार जाका ऐसा अपाग्है अर बहुत.. भौंर जा वित ऐमाई ॥१२॥ कर्मादधाति यदयं भविनः कपाय: संमारदुःखमविधाय न तदयपति । यहंधनं हि विदधाति विपक्षवर्ग स्तनाम कम्य विरचय भुग प्रयाति ॥ ४३ ॥ अर्थ-जो यह कपायमाव जीयक कर्म कोहै, सो फर्मर दुःम दिये बिना नाश नाही होप में निका मह जो बैंगन या । मो वध कौनको मुग करिक नाय है दुख कारक हो जाय है। भावार्थ-कपापकार वंध्या ओ कर्म ताका घटना महाकदिन नाने मुख्य आयरका कारण जो काय मी करणा योग्य नाही |1237 भेदाः गुगामुणविधानविधी समी ये कमंगा विविधांधामा भनि ।
चतुर्दश परिच्छेद। जंतोः शुभाशुभमनः परिणामजन्या मम्यते भवाने चिरमेप मीमे ॥ १४ ॥ अर्थ-जीवक नानाप्रकार जे चित्त परिणाम तिनकरि उपजे जे गुण दुःण करनेको विविगिरी समर्थ नानाप्रकार के अनुभागभेद तिम फरि पर जीव भयकर मगारयन विय बहुत फाल भ्रमाइए है। भावार्ध-फर्मनिका तीन मंद अनुभाग तीत्र मेद फरायतें होय है सायरि जीप नरकादि पर्यायनिर्भ भ्रम है।॥ १४ ॥ गृहाति कर्म मुखदं शुभयोगपृया दुःयप्रदायितु यतोऽशुभयोगया। आधा सुरार्थिमिरतः मततं विधेया हेया परा अनुरकष्टनिधानभूना ।। ४५ ॥ अर्थ-जाने शुभयोगकी परणनि करि जीव मुखदायक फर्मका पत्या कर यहरि अशुभयोगी परिणति करि दुःखदायक कर्मका पक्षण फोरहै, इस कारणते मुपके अर्थी जे जीव तिनकार आदिफी जो शुभपरणति सी निरंतर करणी योग्य है यहुरि प्रचुर दुःखके निधान- समान जो अशुभयोगकी परणति सो स्यागनी योग्य है |॥ ४५ ॥ एकप्रकारमपि योगवशादुपेतं कुर्वति कर्म विविध विविधाः कपायाः । एकस्यमावमुपगस्य जलं घनेभ्यः प्राप्य प्रदेशमुपयाति न किं विमेदम् ॥ ४६ ।। अर्थ-योगनिके वशकार एक प्रकार प्रहण किया भी कर्म कपाय नाना प्रकार करे है। भावार्थ-योगार समयप्रय ग्रहण कियौ सो तो एक प्रकारही है परंतु जैसा सीत्र मंद फयाय होय तैसाही नानाप्रकार तीन मंद शक्ति wan
३२०
श्री अमितगतिश्रावकाचार
लिये होय है जैसे मेवनित जटहै सो एकस्वभावको प्राप्त होयके निंग
आदि प्रदेशकौं प्राप्त होय करि कहा विचित्र भेदकी नाही प्रान होर
है, होयही है ॥ ४६॥
मिथ्यात्वदात्यापाययोग-
प्रमाददोपा विविधप्रकाराः।
कर्माश्रयाः संति शरीरमाजां
जलाश्रवा वा सरसा प्रवाहाः॥४७॥
अर्थ-मिथ्यान्य र अविरत अर कपाय अर योग अर प्रमाद
ये
दोस्वरूप नाना प्रकार जीवनिक कर्माप्रयके कारण हैं, जैसे सरोवर-
निक जलके आश्रयके कारण प्रवाह हैं तैसें ।
भावार्थ-मिध्यात्यादिक भार कर्मवधके कारण हैं तातें इनकी
रयागना, यह तात्पर्य है ॥ १७ ॥
संवरण नरमा दुरिताना-
माधवरोधफरेषु नरे।
आगमनम्य कृते हि निरोध
कुछ विगति चलानि मरः गु॥४८॥
अर्थ-मिथ्या यादिक आश्रयनिको जे मम्पाकादि भावनिक
गंकनेवाले पुरुषहै तिनकै शीर कमनिका रकना इस पर होय?
जनिक, आवनेका द्वार शेरे मने मगेपरनिति र कति भ.'
कडू भी न था ॥ १८ ॥
नन्यति कम कदाचन जनाः
संवरपन पिना न गृहीतम् ।
शुष्यनिय अलं हिनडाग
मंगमने पापा मिनरम्य ॥ ४ ॥
चतुर्दश परिच्छेद।
अर्थ-जीवकै प्रहण किया भया जो कर्म है सो मगर बिना
कदाच नाश न होयहै, जैसे सरोपरविणे बहुत प्रकार नवीन जलका
मागम होरासते जर कराते सूर्ण, अपि तु नाही सूरी है तैसें जानना
॥४९॥
योगनिरोधकरस्य सुदृष्टे-
रस्तकपायरिपोर्षिरतस्य ।
यत्नपरस्य नरम्य समस्तं
संप्रतिमृच्छति नूतनमेनः ॥ ५० ॥
अर्थ-मन वचन कापका रोकनेवाला अर सम्पष्टि अर नाश
किये कपाय थैरी जाने अर हिंसादिकतै विरक्त अर यनाचारमैं तपर
ऐसा जो पुरष साके समस्त नवीन फर्म के हैं।
भावार्थ-मिथ्यावादिके प्रतिपक्षी जे सभ्यस्कादि भाव तिनकरि
संबर होप है॥५०॥
धर्मधरस्य परीपहजेतु-
नियतः समितस्य मुगुप्तेः।
आगमवामितमानसपत्तेः
संगतिरस्ति न फर्मरजोमिः ॥ ५१ ॥
अर्थ---उत्तम क्षमादि दश प्रकार धर्मका धरनेगा भर क्षुधादि
परीवहनिफा जीतनेवाला अर सामापिकादि चारित्रका धारी अर पना
चार रूप समितिनिफरि मुक्त भर भले प्रकार योगनिका निमहरूप है
गुप्ति जाफै ऐमा जो पुरष साफै फर्मरूपी रजनि की संगति नाही
होय है।
भाशर्थ--इनिके होतसत दम्पनर होर है, ऐसा जानना ॥५१॥
મર श्री अमितगतिश्रावकाचार। - दर्शनबोधचरित्रतपोमि- श्वेतसिकल्मपमेति न जुष्टे । शूरतरैः पुरुपैः कृतरक्ष शत्रुवलं विशति क पुरे हि ॥ ५२ ॥ अर्थ-दर्शन ज्ञान चारित्र तप इनकरि सहित जो वित्त ता वि पापकर्म नाहीं प्राप्त होय है जैसे शूरवीर पुरपनिकरि करी है रक्षा जाकी ऐसा जो नगर ताविपैं शत्रुको सेना कहां प्रवेश करे, अपितु नाहीं करै है ॥ ५२ ॥ पातकमाश्रयति स्थिररूपं संभृतिमात्मवतां न यतीनाम् । वर्मधरान नरान् रणरंगे कापि भिनत्ति शिलीमुखजालम् ॥ ५३॥ अर्थ-स्थिरम्प आत्माका अनुभव करने जे आत्मज्ञानी यतशिर तिनके कर्म नहीं आश्रयैहे अमें रणभूमिविर्षे वक्त यफतरके धरनेवाले पुग्प निनहि वाणनिका समूह कहू भी भेदै नाहीं ॥ ५३ ॥ कामपायहपीकनिरोधं यो विदधाति परैग्मुमाध्यम् । केवललोकविलोफितलोको याति स मुक्तिपुरी दुगापाम् ॥ ५४ ।। अर्ग---ज्यो पुरुष काम अर कपाय अर इंगिय इनिका निरोग है सो पुरा मुनि पुरीको प्राप्त होय है, कमा है कामादिकका निरीर और सामान्य पुपनि करि भसाप्य है, यहीर कैसा है वह पुरुप फेस- रहानपी प्रकाश करि देश्या है संक जाने कैसी है मुतिपुरी दुआ
चतुर्दश परिच्छेद।
३९३
करि है पावना जाका यडे चंडे मुनीश्वर जाके आध रोद करें हैं तो
भी न पाये हैं।
भावार्य-जे कामादिकका सबर करैहे ते केवली होय मुक्तिपुरीकौं
पात्र हैं इस बिना कोटि करनें भी मुक्ति न होय है ऐसा नात्पर्य है
दृढीकृतो याति न कर्मपर्वतः
शरीरिणां निर्जरया विना क्षयम् ।
न धान्यपुंजः प्रलयं प्रपद्यते
च्ययं विना कापि रिवर्द्धितश्विरम् ॥ ५५ ॥
अर्थ----जीवनीकै दृढ किया जो कर्मरूपी पर्वन सो निर्जरा विना
क्षयको प्राप्त न होय है जमैं बहुत कालले वृद्धिको प्राप्त किया जो
धान्यका समूह सी खरच कर विना कडू भी नाशकौं प्राप्त न होय है
तैसें।
भावार्य–जितना फर्म वैध तितना ही उदय देय खिरे ती अना-
दिकालके मचयरूप फर्म नसें नाही, बहुरि जब तपश्चरणादिकसे अनेक
कालके याचे फर्म एककालमैं सिप तय कर्मका नाश होय तात तपश्च-
रणादिक प्रवर्तना योग्यहै, यह तात्पर्यहै ॥ ५५ ॥
निरंतरानेकभवार्जितस्य या
पुरातनस्य क्षतिरंकदेशतः।
विपाकजापाकजमेदतो द्विधा
यतीश्वरास्ता निगदंति निर्जराम् ॥ ५६ ॥
अर्थ-निरंतर अनेक भवनि वि उपाी जो कर्म साकी एकदे-
जोहानि साहि यतीवर निर्जरा यह सो निर्जरा सरिपाक अवि-
पाक भेदते दोय प्रकारहै ॥ ५६ ॥
श्री अमितगनियायकाचार। . . आगे सत्रिपाक निगमा सम्प करें- अनेहसा या कलिलम्प निर्जग विपाकजांनां कयति मायः । अपाकलां नां भवदुःखम्पत्रिणी विधीयते या तपमा गरीयसा ॥ ५७॥ अर्थ-जो अपनी स्थिति पूर्ण रूप ददय काय करि कर्मको निर्जग है तहि आर्य हैं ते विपाकजा निर्जग के हैं, वहरि जो उप्र तपबला- करि करिएहै ताहि संमार द खको नाश करने वाली अपाक निर्बरा कहैं ।। ५७॥ विपाकजायामुदितस्स कर्मणो मता परस्यामखिलस विच्युतिः । यतो द्वितीयाऽत्र ततो विधानतः सदा विधेया कुशलेन निर्जरा ॥ ५८ ॥ बो अर्थ-जाते सविपाकाजा निर्जरा विर्षे तो उदयकों प्राप्त भया कर्म ताकी हानि होयहै वहरि अविपाकजाविर्ष उदय आया अर विना उदय आया ऐसा सर्वही कर्मका नाश होयहै ताते प्रवीण पुरुष दूसरी जो अविपाकनिर्जरा मो तपश्चरणादिविधानते सदा करणी - . करि योग्यहै ॥५८॥ तपोभिरुनः सति संवरे रजो निद्यमान सकलं पलायते । निराश्रयं वारि विवस्वदंशुभि न शोष्यमाणं सरसोऽवतिष्ठते ॥ ५९ ।। अर्थ—आगामी कर्मनिका संवर होतसत उम्र तपश्चरण करि नारा किया जो कर्म सो समस्त नाशकौं प्राप्त होयहै जैसे नवीन । i चतुर्दश परिच्छेद। जलके आश्रयरहित जो सगेवरका जल मी सूर्यको किरणानि कर सोष्या भया न तिरह तैमें जानना ॥ ५९॥ परेण जीवनपमा प्रनापिनो विनिर्मलत्वं रममा प्रपद्यते । मुवर्णगलस्य मलोयतिष्ठन प्रताप्यमानम्य कृशानुना कथम् ॥ ६० ।। अर्थ- उमए तर यसपाया जो जीबी सो निर्मक प्रास होयह जमे अधिकार तपापा जो मुरणंका गरा गांक 7 . निष्ट, अपि तु नाही निट है। भावार्थ-गम्यान हानास्फित जावरा मानना मिल सिद्ध पदयामास होय तान सम्पादनात भारापना योगद ॥ ६. निर्जग भावना या।। आने कभाषनायो :- प्योममध्यगमकृत्रिम स्थिर लोकमगिनियहिन संकुलम् । सप्तरग्नुपनगम्मितं जिना पर्णनि परमानएितम् ॥ ११ ॥ अर्थ-जिनसेलोको मा वर्णन मारमा अनाम जो भारता. मप मात, पीका भला माहीतर जागनिय, मगानिकर भाया। परि मा रापन जो तीन बाम्तामा परिणत १.गा॥१॥ जन्मपत्यकतिनेन जंतुना करियसपनिमा मा ३१६ श्री अमितगतिधायकाचार। - यो न यत्र बहुमो विगाहितो विद्यते न विषयः स कथन ।। ६२ ।। अर्थ-ता टोकविर्ष मा क्षेत्र नाही जो जीवन बहुत बार नाही अक्गाद्या फैमा है जीव जन्म मरणकरि ब्यात है वहरि कर्म धैर्गक वशवर्ती है अर अस्तित्वरूप है। भावार्थ-जीनसै तेनालीस गमें ऐसा क्षेत्र नाहीं जहां यह जीवन उपञ्या अर न मरया ऐसा पैगम्यक आर्य विचारना ॥ ६२॥ भूरिशोऽत्र मुखदुःखदायिनी भूतिजातिगतियोनिसंपदाः। यत्रितो विविधकर्मशृंखलः का न निर्विशति चेतनश्चिरम् ।। ६३ ।। अर्थ-नानाप्रकार कर्मस्प माकलनि करि बंध्या यहु जीर है सो वारंवार मुखदुःखकी देनेवाली विभूति जाति देवादिक गति योनि संपदा कौनसीको प्राप्त न होय? महीको प्राप्त होय है । भावार्थ-इस लोकर्म या जीवको मुग्वदुःखके कारण अनेकमार प्राप्त होय है तिनमें हर्ष विपाट करना क्या है, ऐसा विचारना ॥ ६२ यांधयो भवति शात्रवोऽपि वा कोन कस्य निजकायवर्जितः । धुरेप मम शत्रुरेप या शेमुपीमिति करोति मोहितः॥ ६४ ॥ अर्थ-इस लोकमै कार्य करि रहित कान किसीका भाई बंधु का । शनु होयह कोई भी न होय है ताते यह मेरा भाई है यह मेरा यगो पैसी बुद्धिको मोही जीव को है यह युद्धि मिथ्या है ऐसा जानना ३९७ . चतुर्दश परिच्छेद। देवमयंपशुनारकैप्वयं दुम्यजालकलितेवनारतम् । कामकोपमदलोभवामितो वर्तते मवविपर्ययाधुलः ॥ ६५ ॥ अर्थ-दुःपनिके समूहकरि भरे जे देव मनुष्य तिर्यच नारकी तिन यि यह काम मोध मद लोभ इत्यादि विभावनिकरि वासित जीप निरंतर प्रवत्त है, केमाहै यह समारविष विपर्यय बुद्धिकरि माकुल है, संसार, तो इष्पानिष्ट वस्तु नाहीं अर यहु काहूको इष्ट माने है फाहूकौं अनिष्ट माने है तात दुःखी है ॥ ६५॥ जन्मवर्तिनिवदो वियोज्यते योज्यते सतकर्मभिः पुनः। शुष्कपनिकरः परस्परं मारुतरिव विमीमतिभिः ॥ १६ ॥ अर्थ-आप करि किए जे कर्म तिनकरि ससारी जीवनिक्य फहूं परस्पर वियोगरूप कीजिए है कई संयोगस्यप कीजि है ने - वेगसहित जो पवन तिनकार पत्तानिका समूह कई निटात है पिदुगइएहै मूरो " मेयोग वियोगका कारण कर्म है के नाही" ऐमा विचारना ।। ६६ ।। एप वेदयति भोगकांक्षया कोशकार इव लालया स्वपम् । कर्मवीजमवया विनिंद्यया घोरमृत्युमयदानदक्षया ।। ६७ ॥! अर्थ-जैसे योशकार जो कुसेरा को मशकरे आप पांघेह से यह जीव भोगनिको काहारी बाबा । श्री अमितगतियायकाचार। कैसीहै भोगनिकी वांछा कर्मवीजकीर उपजीहै, मोहोदय अनित स्वभावतें नाहीं, वहुरि विशेपपर्ने निघहैं अर भयानक मृत्युके देनेनें प्राण है अनंतवार मरण करावहै ऐसी है ॥ ६७ ॥ चेतसीति सतवं वितन्वतो लोकरूपमुपजायते परा। राक्षसीत इव संसृतेः स्फुट धर्मकर्मजननी विरक्तता ॥ ६८॥ अर्थ-या प्रकार जो लोकका स्वरूप चित्तविष विचार है ताके धर्म कर्मकी उपजावनेवाली संमारतें परम उदासीनता प्रगट उपजे है जैसे राक्षसीते भय उपजै तैसे ससारतें भय उपजै है ॥ ६८॥ या प्रकार लोकभावना कहीं । आगें वोधिदुर्लभभावनाओं कहेहैं;- देशजातिकुलरूपकल्पता जीवितव्यवलर्यिसंपदः। देगनाग्रहणधुद्धिधारणाः संति देहिनिरहस्य दुर्लभाः ॥ ६९ ॥ अर्थ-मुक्ति होने योग्य भरनादिक्षेत्र अर क्षत्रियादिजाति अर कुल वहरि मुंदरम्प अर नौगगता बहरि दीर्घ आयु अर शरीरसा वल अर आत्मामधी वीर्य अर सपा अर जिनगानीका उपदेश र ताके जाननकी बुद्धि यहीर जानकार ताकी धारणा रागनी यह या जीवनिक समूहको पारना दुर्लभह, यड़े भाग्यके उदय मिहे ॥६॥ हत ! नागु गुमदानकोविदा मानदर्शनचरिग्रसंगतिः। लभ्यते ननुमनाऽतिहरात: कामिनीषिकाता मती ।। ७०|| .
. चतुर्दश परिच्छेद। अर्थ----आचार्य गेरकार कहे हैं-अहो तिन पूर्वोक्त सामानिविर्षे भी मुसदनभै मर्याण ऐमी जो ज्ञानदर्शन चारित्रको सगति सो जीवकरि करते पाइएहै जैसे स्त्रीनिविर्षे मुदर कृतज्ञता काटते पाइए तैसें पूर्वोक्त सामग्रीनिमें बोध पावना दुर्लभ है ॥ ७०॥ साधुलोकमहिता प्रमादतो पोधिरत्र यदि जातु नश्यति । प्राप्यते न भविना तदा पुन नीरधाविव मनोरमो मणिः ॥ ७१ ।। अर्थ---इम लोकमैं साधु पुरुषनिकरि पूजिन ऐसी सम्यक्तादिककी प्राप्तिरूप जो योधि सो कदाचित् प्रमादः नसिजाय तो फेरि जीवनि फरि न पाइप है जैसे समुद्रवि पडी मुंदर मणि न पाइए तेसै योधि पावना दुर्लभ है ।। ७१॥ हंत ! योधिमपहाय शर्मणे योऽधमो वितनुते:धनार्जनम् । जीविताय विपपल्लरी स्फुटं. सेवतेऽमृतलतामपास्य सः ॥ ७२ ॥ अर्ध-अहो बडे खेदकी यातहै जो अधम पुरुष सम्यक्तादिककी प्रातिरूप बोधिौ छोडकरि मुराके अघि धन उपार्जन करहै सो जीव- भेके अर्थि अमृतवेलको छोडफै प्रगटपने विपलिकौ सेवेहै ॥ ७२ ॥ योघ धर्ममुपलभ्य मुंचते रेशमेप लभते तिदारुणम् । यो निधानमनपं व्यपोहते सिघते स नितरां फिमद्भुतम् ॥:७३ ॥ -- .
४०० श्री अमितगतिश्रावकाचार। अर्थ-जो पुरुष धर्मको पारकरि छोडेहै सो यह अति मयानन कदाको पात्र में जो निर्मल भंडारको छोई सो असंत रोद सित होयही होय. यामै कहा आर्यहै ॥ ७३ ।। मुंचता जननमृत्युयातनां गृम्ना च शिवतातिमुचमाम् । शाश्वती मतिमता विधीयते योधिरदिपविचलिका स्थिरा ॥ ७४ ॥ अर्थ-जो जीव जन्म मरणकी तीन वेदनाको त्यागताह पहीर शाश्वती कल्याणकी संतनिकी प्राण करता है ता बुद्धिमान पुरस्कार दर्शनादिककी प्रामिग्रप जो बौषि मी मुमेरको टिकाममान निल 1 भाग--जो जीव दुःपकी त्यागि मुली भया चाहे मो सम्म दानादिकको हट गग यह नापर्य है ।। ७४ ॥ में योधिभाषना कही । आगे धर्म भावनामा वर्णन कहे- निरुपमनिग्यपशर्ममूले दिनममिपूजिनमम्नमदोषम् । मजति जिननिवदितं म धर्म मरनि जनः गुममाजनं मदा पः ॥ ७ ॥ दर्थ- पुगनिभापित धर्मवी मो. सोममा गुपकागाने Eाय है, ३ मा रिनभाषित धर्म उपमान मा पादित गुण नर, दम भागनिमी जित मान? भो दशा देगा।।७५॥ प्यपनयति मां दुनिता शितानि मुनि.पदं निगमयं यः।
चतुर्दश परिच्छेद। ४०१ भवति कृतधिया विधा विधेयः सकलसमीहितमाधनः स धर्मः ॥७६ ।। अर्थपूर्ण है बुद्धि जाकी ऐमे पुरुष करि सो धर्म मन वचन कायकीर करणा योग्य है, फैमाहै धर्म सकल वोरित वस्तुका साधन है जाने ममस्त इष्ट पदार्थ मिले हैं, बहुरि जो धर्म-दूरहै अंतजाका ऐमा है दुर जामैं ऐसा जो संसार ताहि दूर करहै, अर निर्दोष मुक्तिपदों देय है ।। ७६ ॥ मनुजमवमवाप्य यो न धर्म विषयमुसालितः करोति पथ्यम् । मणिकनकनग समेत्य मन्ये पिपविपति स्फुटमेप जीवितार्थी ॥ ७७॥ अर्थ-मनुष्य जन्मको पायकै विषयनिके मुसनि विर्षे आकुलित जो पुरुष हितरूप धर्मको न यर है सो में ऐसा मानूं हूँ कि यह रत्न मुवर्णके पर्वतको प्राप्त होय करि प्रगटपने जीवनेका अर्थी पडनेफौं इच्छै है, मनुष्यभव पायकरि तौ धर्म करनाही योग्य है ॥ ७७ ॥ कलुपयति कुर्धानिरस्तधर्मा भवशतमेकभवस्य कारणं यः। अभिलपितफलानि दातुमी त्यजति तृणार्थितया स कल्पवृक्षम् ॥ ७८।। अर्थ-जो त्यागाहै धर्म जानें ऐसा कुयुद्धी पुरुष एक भरके अर्थ अनेक भत्र विगांडहै सो फलानिके देव ममर्थ जो कल्पक्ष ताहि त्यागेहै अर तृणके आध अभिलासा कर है। अमि.-२१
४०२
श्री अमिगगनिधारागार।
भाग--जो एक भा गयी किचित् यि मुग अर्थ धन
छोई मी अनेकवार निगोदादि पर्यायनिमें भ्रम ता. अनेक मर
विगाइना कयाहै, ऐमा जानना ॥ ७८॥
समयमनियमत्रनामिगम
चरति न यो जिनधर्ममस्नदोपम् ।
भवमग्णनिपीडितो दुगत्मा
भ्रमति चिरं मरमानने म मीमे ॥ ७९ ॥
अर्थ-जो पुरुष दूर किये है हिंमादि दोर जान ऐसा जो बिन-
धर्म ताहि नाही आचरण करहै सो जन्म मरण कारे दुःम्मित दुगना
बहुत काल ताई भयानक मंसारवन वि भ्रमहै, कैसाहै जिनधर्म
कपायक अभावम्प समभाव अर यायजीव त्यागरूप यम अर कालको
मर्यादाग्यप नियम अर अहिंसादि व्रत इनकरि मुंदर है युक्त है ॥ ७९
विगलितकलिलेन येन युक्तो
भवति नरो भुवनस्य पूजनीयः।
शुचिवचनमनःशरीरवृत्या
भजति वुधो न कथं तमत्र धर्मम् ।। ८० ॥
अर्थ--जो पापरहित धर्म करि युक्त मनुष्य है सो लोक पूज-
नोक होयहै ता धर्मकों इसलोकमै पवित्र मन वचनकायकी परणति
करि कौन पडित जन न सेवेहै, सवैहीहै ॥ ८० ॥
शांतिर्दिवमार्जवं निगदितं सत्यं शुचित्वं वप-
स्त्यागोकिंचनता मुमुक्षुपतिमिब्रह्मवतं संयमः ।
धर्मस्येति जिनोदितस्य दशधा निर्दपणं लक्षणं
कुर्वाणो मवयंत्रणाविरहितो मुत्यंगनां श्लिष्यति ॥८१॥
धनुश परिच्छेद। ४०३ -- अर्थ-योधकरायके अभावरूप क्षमा अर मानके अभावरूप मार्दव अर माया अभावरूप आर्जव अर मत्यरचन अर लोभके अभावरूप शुचिपना अर अनदानादि सप अर शक्तिसाद स्पाग अर निष्परिग्रहता अर प्राचर्य अर संयम ऐम दशप्रकार सक्षण जिनधर्मका मुनीश्वरनि पार पाया ताहि जो आचरण फरहै सो संसारवंधनकार रहित भया सैमा मुक्तिनी को आलिंगेहे ॥ ८१ ॥ ऐसे धर्मानुपेशा कही । आगे अधिकारको संकोचेह;- योऽनुप्रेक्षा द्वादनापीति नित्यं भन्यो भन्था ध्यायति ध्यानशीलः । हेयादेयागेपतत्त्वावरोधी सिद्धि सदो याति स ध्यस्तकर्मा ।। ८२ ॥ अर्थ-या प्रकार जो पुरष दादर्श अनुप्रेक्षानिको ध्यान रूपहे स्वभाव जाफा ऐसा भव्य भनि फरि नित्यही प्यावहै विचार सो हेय उपादेय सत्यका जाननेगला शीघ्रही मुक्तिपदको प्राप्त होयह फैमाहे मो नाश फियेहैं फर्म जा. ऐमाहै । भावार्थ-जो द्वादश अनुप्रेक्षा भावहै सो मुक्तिको प्राप्त होयहै, ऐसा भावनाफा फल दिखयाह ।। ८२॥ सूचिततचं ध्वस्तकुतत्वं भवमयविदलनदमयमकथनम् । यो हदि धने पापनिहते शुचिरुचिरचिरं जिनपतिवचनम् ।। ८३ ॥ केवललोकालोकितलोकोऽ- मितगतियविपतिमुरपतिमहिताम् ।
धीममिनमतिमायकाचार। A-1 यानि म सिद्धि पापनशुद्धि मकलिनकलिमलगुणमणिमहिनाम् ॥ ८४ ॥ अर्थ-जो पुरुष मिनराज यननको पापरहित हपवित्र धारे है मो पुरुष मोक्षको प्राप्त होय?, कैमा जिनगजका यवन मूचित किया है ( बताया है ) वस्तुमा स्वरुप जानें वहरि नाश किया है अन्यथा वस्तुका स्वरूप जानें ( यम्नु ती जैमा अनेकांतस्वरूप तैसाही है परंतु अन्यथा माननेम्प मिथ्या अभिप्रायका जाने नाम किया है ऐसा है ) बरि ससार भयका नाश करनेवाला है इद्रियनि- का दमन अर संयमका कयन जाविप वहरि पवित्र रचिकरि मुंदर है गचिकारी है, वहरि कैमाह सो जिनवचनको हृदयमें धाग्नेवाला पुष केवलज्ञान दर्शनम्पी प्रकाशकार देख्याहै टोक जाने, भावार्थ-जिनवचनके अभ्यासतें केवला होय है, कैसीह मुक्ति अनंतहै महिमा जिनकी ऐसे जे गणधगदिक अर देवनिक इद्र तिनकरि पूजितहै वहुरि रागादि दोपरहित अन्यत पवित्र है बहुरि खंडित किये हैं पापम्प मैल जिननें ऐसे सम्यत्कादिगुणरत्ननिकरि पूजित है युक्तहै, ऐसा जानना ।। ८३.८४ ॥ सर्वया इकतीसा। जग है अनित्य ताम सरन न वस्तु कोय, तात दुसरासि मयवासकी निहारिए । एक चित्त चिन्ह सदा भिन्न परद्रव्यनित अशुचि शरीरमैं न आपाबुद्धि धारिए । रागादिक भाव कर कर्मको वहाव तात संवरस्वरूप होय कर्मबंध डारिए ।
चतुर्दश परिच्छेद।
तीन लोक माहि जिनधर्म एक दुर्लभ है
ताते जिनधर्मको न छिनहू विमारिए ।
दोदा।
द्वादश भावना भापी अमितगतीम।
जो मार मो मुसलहै कर्ममहागिरि पीम ॥
इत्युपासकाचारे चतुर्दशः परिच्छेदः।
में थी अमितगति आचार्यविरचित भाषकाचारवर्ष
चतुर्दशमां परिच्छेद समाप्त भया।
अथ पञ्चदशः परिच्छेदः । नियम्य करणग्राम प्रतशीलगुणादृतः। सर्वो विधीयते भव्यविधिरेप विमुक्तये ॥ १॥ न सा संपद्यते जंतोः सर्वकर्मक्षयं विना। रजोपहारिणी दृष्टिलाहकमिवोर्जिता ॥२॥ समस्तकर्मविश्वेपो ध्यानेनैव विधीयते । न भास्करं विनाऽन्येन हन्यते शार्वरं तमः ॥३॥ यत्नः कार्यों युधाने कर्मभ्यो मोक्षकांक्षिमिः। गोगेभ्यो दुःखकारिभ्यो न्यापितरिय भैरजम् ॥५॥ अर्थ-व्रत अर शील अर गुणनिर्म किया. आदर जिनमें ऐमै भन्य जीवनिकरि इंद्रियनिके ममूहको रोकि करि यह सर्व पूयोक्त; अनादि आचग्ण मुक्तिक अर्थि कीजिए है ॥ १॥ मो मुक्ति मर्य कर्मनिक क्षयविना जायक न होय? जैमें गिना रनकी उपममायनेवाली दृष्टि न होय ते ॥ २॥ बहुरि समन्न कर्मका नाश म्यानही कार मारिए जैमें सूर्य पिना और करि गर्मियधी अंधकार न निवारिए तेसै ॥ ३ ॥ तान कर्मनने मोक्षके वांछक जे पंडितजन तिनकार ध्यान यन करणा योग्यहै, मैं गगनने घटनेके यालक जे गगी विनिफी औरवका बन्न करणा योग्यह सौ ॥ ४ ॥ आगे ध्यानका सामान्य पक्षण को- पशद परिषछ। ४०० आपत्रिसंहतः साधरांतमाहसिक परम् । वस्तुन्येकत्र चिपस स्थैर्य ध्यानमुदीर्यते ॥५॥ अर्प-आदिफे यमपभनाराच यम नाराच अई नागच ये लोग संहनन जिनफै पाइए ऐसे जे पानफे साधनेया पुप लिनि पारिक वास्तविणे उसार अतर्मुहूर्त मनको घिरता यानिए माध्यान काहि ॥५॥ तदन्येषां यथाशक्ति मनोरोधविधायिनाम् । एकद्वित्रिरतुः पंच पडादिक्षणगोचरम् ॥ ६॥ अर्थ-यारि सो प्यान, मनके रोयनेयानिक. पानि एवटोय सीन पार-पाय यह आदि समयनिक, गांचाह। भारार्थ---उप्यान उत्तम महननवाले ताक. in. निक पपाशाकि एक आदि समय पान होय, ऐगा जानना ॥६॥ माधकः मापनं माध्यं फलं पेति पतुष्पम् । दिवोदय विधानेन पुधः सिद्धि रिपिन्गमिः ॥७॥ अ-गोभये जानने का प्राव रोनेके बापजे पति मन तिनकरि साधन पारनेशल गायक, भर आफरि सारिए सौ साधन, बहरि सारने योग्य होय सो साप्य, अर साधनका परमार पान विधान सहित जानना योग्य है ॥७॥ सोहरीकर,1-- संगारी गायो भन्या माधन पानग्बलम् । निर्माण कम्पने माध्यं फलं मायमनशम् ॥ ८॥ art-- भम्प जीतो साधनेवा मार मार निर्म- ध्यान है सो सारनी, गरि मोक्ष माने योग्य साnt it. हैमो दाना प.मानना ॥८॥ मान, म ४०८ श्री अमितगतिमायकावार। आत्तं रौद्रं मतं घम्यं शुक्र चेति चतुर्वियम् । ध्यानं ध्यानवना मान्यभवनिर्वाणकारणम् ।। ९॥ अर्थ -प्यानयान जे मुनीश्वर तिनि कीर मानने योग्यजे गगवर, दिक तिनि करि आर्न, रोड, धर्म, शुभ ऐमें न्यार प्रकार का ध्या संसारका अर निवार्णका कारण कया है ।। ९॥ संमारकारणं पूर्व परं नितिकारणम् । इत्यायं द्वितयं त्याज्यमादेयमपरं युधः ॥१०॥ अर्थ-पहले आर्त रौढ तौ मसारक कारण है यहुरि पर जे धर्म शुक ते मोक्षके कारण हैं इस हेतुत पंडितनिकरि आदिके आर्त, रौद्र दोनों त्यागने योग्य हैं बहुरि और जे धर्म शुट ते ग्रहण करणा योग्यहैं ॥ १०॥ तहां प्रथम ही आर्तध्यानके भेद कहैं,- प्रिययोगाऽप्रियायोगपीडालक्ष्मीविचिंतनम् । आत्तं चतुर्विधं ज्ञेयं तिर्यग्गतिनिबंधनम् ॥ ११ ॥ अर्थ---इष्ट वस्तुका वियोग अर अनिष्ट वस्तुका संयोग अर रोगा- दिककी पीडा अर लक्ष्मीकी अभिलापारूप जो विचार सो च्यार प्रकार आर्तध्यान तिर्यंचगतिका कारण जानना ॥ ११ ॥ आगै रौद्रध्यानका स्वरूप कहेहै;- रौद्रं हिंसानृतस्तेयभोगरक्षणचिंतनम् । ज्ञेयं चतुर्विधं शक्तं श्वप्रभूमिप्रवेशने ॥ १२ ॥ अर्थ-~-हिंसा अर झूठ आर चोरी अर विषयनिकी रक्षा इनिविर्षे हर्परूप जो चितवन सो च्यार रौद्रध्यान नरकभूमिर्थेि प्रवेश कराने विर्षे समर्थ जानना योग्य है ॥ १२ ॥ आमैं धर्मध्यानके भेद कहेहैं;- पश्चात परिया ४०९ आनापायविपासानां नितनं लोकस्थितेः । पतुपां मिहिनं धम्यं निमिनं नाकशर्मणः ॥ १३ ॥ अर्थ- दानरागको आशा अर समार दुमका नाश अर कनिका उदय नफा विचाग्ना आलोक आकारकाविचारना ऐमें पार प्रकार धर्मप्यान वर्गमुगका कारण कया है ॥ १३ ॥ भागे शुभयानक भेदनिकी यो:- शुनं प्रयत्नातकर्याचारं प्रथमं मतम् । जिनकन्वीनर्काचीचारं च द्वितीयकम् ॥ १४ ॥ अन्यन्यूक्ष्मक्रियं तुयं ममुच्छिमनियं मतम् । इत्वं चतुरविधं शुर मिद्धिमाघप्रवेशकम् ॥ १५ ॥ अर्थ-जिनदयनि करि पृथस्कावितवीचार पहला शुरुध्यान कया पृथक कहिये भिन्न भिन्नपने फरि वितर्क जो श्रुत ताका पीचार फदिए अर्ध शब्द अर योगको पलटना साको पृथत्कवितर्क वीचार करिये, बहुरि एक पनाकार शुतका जाम चितवन होय पलटन न होय मो एकपवितकर्याधीचार कयाहै, यहुरि योगनिकी क्रिया जामैं सूक्ष्म होय मी मूक्ष्मनियातीसराहै, वहरि नष्ट भईहै योगनिकी क्रिया जामें मो समुच्छिन्नक्रियंह, ऐमें प्यार प्रकार शुक्रध्यान मुनिमहलकं प्रवेश यगवनेवाला फखा है॥१५॥ आगे ध्यानके स्वामी कहहै;- आन तन्मतां ध्यानं प्रमनांतगुणाश्रितम् । मंयतामयतांतानां राद्रं ध्यानं प्रवर्तते ॥ १६ ॥ अर्थ-जीवनकै आध्यानहसो छहा प्रमत्त गुणस्थान पर्यंत तिष्ट्रह अर संपनासयत जो पंचम गुणस्थान तहां ताई दिध्यान प्रयहि ॥१६॥ -
४१०
श्री अमितगतिप्रायकाचार।
अनपेतस्य धर्मस्य धर्मतो दशमेदतः ।
चतुर्थः पंचमः पष्टः सप्तमय प्रवर्तकः ॥ १७ ॥
अर्थ- आज्ञादिक दाप्रकार धर्म जो स्वभाव ताकरि युक्त ओ
धर्मध्यान ताका प्रयविने वाला ध्यायनेवाला चतुर्य पंचम पट सप्तम
गुणस्थानवी जीव जानना।
भावार्थ-~~-यद्यपि चतुर्थादि गुणस्थाननिमें परिणामनिकी निर्मलता
था वस्तुविचारमैं लीनता अधिक अधिकह तथापि सामान्यपन सर्व
धर्मध्यानही कह्याहै ॥ १७ ॥
समय निर्मलीकर्नु शुक्लं रनशिखास्थिरम् ।
अपूर्वकरणादीनां मुमुक्षूणां प्रवर्तते ।। १८ ॥
अर्थ-निर्मल करनेकों समर्थ ऐसा जो शुक्लध्यानहै सो अपूर्वकरण
आदि सात गुणस्थानवाले मोक्षके वांछक जे आत्मा तिनकै प्रवत्तहै,
कैसाहै शुक्लध्यान रत्नकी शिखासमान स्थिरहै, जैसे रत्नकी शिखा
पवनादिकतै न चले तैसे शुक्लध्यान रागादिफते न चलैहै ॥ १८ ॥
अहायोभूयते सर्व कर्म ध्यानेन संचितम् ।
वृद्धं समीरणेनेव वलाहककदंबकम् ॥ १९ ॥
अर्थ-संचय किया जो सर्व कर्महै सो ध्यानकरि शीघ्र उडाइएहै
जैसे वृद्धिको प्राप्त भया वादलानिका सम्ह सो पवनकरि उडाइएहै
ध्यानद्वयेन पूर्वेण जन्यंत कर्मपर्वताः ।
वजेणेव विमिद्यते परेण सहसा पुनः ॥ २० ॥
अर्थ-पहले दोय ध्यान जे आर्त रोद तिनिकर फर्मपी पर्वत
उपजाइएहै, बहुरि पीछले जे दोष धर्मध्याप शुक्लध्यान तिनिकरि कर्म-
पर्वत शाग्रही भेदिएहै।
तैसें ॥ १९॥
पश्चदश परिउद। भावार्थ-आतरोदत कर्म वैधैह अर धर्म शुलनिः फर्मनिका नाश होयहै, ऐसा जानना ॥२०॥ यो ध्यानेन विना मृढः कर्मच्छेदं चिकीर्षति । कुशिलेन विना शेलं स्फटमेप विमित्मति ॥२१॥ अर्थ--जो द ध्यान विना कर्मनिका नाश करनेकौं इछैहै सो मगट यह याविना पर्वतके दिनेको इहै ॥ २१॥ ध्यानेन निर्मलेनाऽऽशु हन्यते कर्ममंचयः । हुताशनकणेनापि स्नुष्यते किं न काननम् ॥ २२ ॥ अर्थ-निर्मल पान फरि शीघ्र फर्मनिकी समूह नाश कीजिए जैसे अनिके कण फार भी कहा पन न जलाइए, जलाइएही है। ॥ २२ ॥ ध्यानं विधिरसता शेयं ध्याता ध्येयं विधिः फलम् । विधेयानि प्रसिदधति सामग्रीतो विना न हि ॥ २३ ॥ अर्थ-ज्यान फरनेको इछता जो पुरुष साकार याता कहिये प्यानका करनेवाला अर प्येय कहिये प्यावने योग्य बस्तु विधि कहिए प्यानका विधान अर ध्यानका फर ये जानने योग्य है, से मामग्री बिना सिद्ध होय नाही, याता आदिका स्वम्प जाने तो प्यानको मितितोय ॥२३॥ आगै पानाका स्वगए करें- निमर्गमार्दवोपेतो निफपायो जितेंद्रियः । निर्ममो निरहंकारः पराजितपरीपहः ॥ २४ ॥ हयोपादयतत्वज्ञो लोकाचारपरामुगः । विरक्तः कामभोगेषु भवभ्रमणमीलुकः ॥२५॥ . 4 श्री अमितगतिश्रावकाचार। लाभेलामे सुखे दुःखे शत्री मित्रे प्रियेऽप्रिये । मानापमानयोस्तुल्यो मृत्यु वितयोरपि ॥ २६ ॥ निरालस्यो निरुद्वेगो जितनिद्रो जितासनः। सर्ववतकृताभ्यासः संतुष्टो निप्परिग्रहः ॥२७॥ सम्यकालंकृतः शांतो रम्यारम्यनिरुत्सुकः । निर्भयो भाक्तिकः श्राद्धो वीरो वरंगिकोयाठः ॥२८ । निर्निदानो निरापक्षो विभाहपंजरम् । भव्यः प्रशस्यते ध्याता पियामुः पदमव्ययम् ।। २९ ।। अर्थ-स्वभाव करि ही कोमल परिणाम करि युक्त होय, कपायर हित होय ( तीत्रकपायी न होय ) अर जीते हैं इंद्रिय जानें ऐमा होय बहरि परद्रव्यनिमें ममकाररहित होय, अहंकार रहित होय ( पर दर मेरेहैं ऐसी बुद्धि सो नी ममकार कहिये, पर, सो मैं हूं ऐसी बुद्धि अहंकार कहिए इन करि रहित होय ) अर जाते हैं क्षुधादि पीपद जानें ऐसा होय ॥ २४ ॥ अर त्यागने योग्य अर ग्रहण करणे योग्य जे सत्य तिनका ज्ञाना होय अर लौकिक आचारसे अमूठो होय, अर काम भोगनि वि रिक्त होय, अर संसारभ्रमण भयभीत होय ॥ २५ ॥ दाभ अटाभ, मुग दुःख, शत्रु मित्र, प्रिय वस्तु अप्रियवस्तु, मान अपमान, अर मग्ण जीवन विष भी समान होय । भागार्थ-मर्यको क्षेपपना करि समान जानि इटानिदि नाही की ॥ २६॥ निगटमी होय, देगरहित होय, जीना दियो जान, अर जीया है भासन जाने, आमन वाग्ले धो नाही, अर सो अहिंसादि पञ्चदश परिच्छेद। 8 मनानका करपा अम्पास जाने, अर संतोष सहित प्रसन्नचित्त होय, और परिवाहित होय ॥२७ ।। अर मम्मदर्शनकरि शोभित होय, शांतपरिणामी होय, अर मुंदर चित्तको रमावनेयाती पस्तु तिनमें उत्माहरहित होय, निर्भय होय, देव गुरु धर्म विर भक्त होय, धर्म वेरीफे जीतनेकौं मुभट होय. वैरागी होय, पंडित होय ॥ २८॥ निदान रहित होय, काही अपेक्षा लिये न होय, देहरूपी पीजरेके भेदनेका इटुफ होय. भन्य होय ऐसा अविनाशी स्थानके जानेका इछुक प्यासा सराहिये। ॥२९॥ ऐसे प्याताया स्वरूप काया। आगे ध्येयकों कहेहैं;- ध्येयं पदस्थपिंडस्यरूपम्यारूपमेदतः। ध्यानस्यालंवनं प्राज्ञश्चतुर्विधमुदाहृतम् ।। ३० ॥ अर्थ-प्यानका आटेवन कहिए जार्को प्यानविष चिंतिए ऐसा ध्येय, पदस्य १ पिंडस्य २ रूपस्य ३ अरूप ४ इन भेदनिकरि बुद्धि- माननिने प्यार प्रकार कहा है ॥ ३०॥ तहा प्रथमही पदस्थका स्वरूप कहेहै; यानि पंचनमस्कारपदादीनि मनीपिणा । पदस्थं ध्यातुकामेन तानि ध्येयानि तत्वतः ॥ ३१ ॥ अर्थ-जे पंचनमस्कारपद आदि अक्षरनिके समूहरूप पद ते पदस्थ ध्यावनेका वाछक जो युद्धिमान पुरुष साकरि निश्चयनै ध्यावने योग्य हैं। भावार्थ-पदस्थ पंचनमस्कारमंत्र आदि पद ध्यावना ॥ ३१॥ आर्गे मंत्रनिका विधान हैहै;- ४.४ श्री ममितगतिधायकावार। मगत्सम्बगिमो वर्गो मूतांतः शमिनेगरः । आपलब्यादिको नात्वा ध्यातुः पापं निपूदने ।। ३२ ।। स्थितोऽसि आ उ मा मंत्रमनुप्पत्रे कुगंगये । ध्यायमानः प्रयत्नेन कर्मान्मूलयन गिलम् ॥ ३३ ।। तनामी हृदये वो ललाटे मस्तके स्थिनम् । गुरुप्रमादनो बुला चिंतनीयं कुशेशयम् ।। ३४ ॥ अयुयवित्यमी वर्णाः स्थिताः पद्म चतुदले । विश्राणयंति पंचापि सम्यग्नानानि चिंतिताः ।। ३५ ।। स्थितपंचनमस्काररत्नत्रयपदैर्दलः। अष्टमिः कलिते पये खरकेमरराजिते ॥ ३६॥ स्थितोऽई मित्ययं मंत्रो घ्यायमानो विधानतः । ददाति चिंतितां लक्ष्मी कल्पवृक्ष इबोर्जिताम् ।। ३७ ॥ हसती कारस्तोमः सोऽहं मध्यस्थितो विगतमूर्दा । पार्श्वप्रणवचतुष्को ध्येयो द्विप्रांतकृतमायः ॥ ३८॥ ही ॐ डी यंत्रः हः सहस्रा द्वादश प्रोक्ता जपहोमविचक्षणः । ॐ जोगेत्यादिमंत्रस्य तद्भागो दशमः पुनः ।। ३९ ।। ॐ जोग्ने मग्ने तच्चे भूदे भले भविस्से अखे पवे विणपारस्मे बाहा । अय मंत्रः, जाप्यं द्वादशसहस्र १२०००, होमः द्वादशशतं २००।
पम्चदश परिषद mmun. पक्रस्योपरि जापेन जातीपुष्पमनोरमः । विद्या गुचयने सम्पर म्यमे गर्व शुभाशुभम् ॥ ४० ॥ *ही कारद्धांतस्थो कारो रेफभूपिनः । ध्यानन्योटदले पो फल्मपक्षपणक्षमः ॥ ४१ ॥ सप्ताक्षर महामंत्रं ही कारपदानतम् । विदिग्दलगत तर म्याहात विनिषेशयेत् ।। ४२ ।। "दिशि साहातमों ही* *नमो ही पदोतमम् । उप साहातमों ही फर्णिकायां विनिक्षिपेत् ।।५।। तत्पमं ग्रिगुणीभून मायाजिन पेटयेत् । पिषितएपीभूतः म्यएकृत्यप्रमिदये ॥४४॥ पयस्योपरि यत्नेन देयोपादेयलमये । मंप्रेणानेन फर्नयो जपः पूर्व विधानतः ॥ ४५ ॥ नमो मो भरहताणही नम नि गर । जाप्य १०००० राम १०००। मप्येनापनिपमेण फाडिति प्रत्येकमक्षाम् । कोणपत्रे दिनकाय पाहा पापमप्यतः ।। १६॥ निविश्य विधिना दक्षो माये तस्य निपेशयेत् । भूतात विंदुरांपुर चितव विशस्वीः ॥ १७ ॥ विधाय पलयं पाच तस्य मध्ये विधानतः । पमो जिणाणमित्याः प्रयागादिकः ॥१८॥ Mamil mewat:- रितिशतमोमोसमम् । राममोर्षित। --- --- ४१६ धीममितगतियायकाचार। 1 * णमो जिगागं १ * गमो परमारिनिमार्ग 2 * पनी मन्चाधि जिणाणं ३ *णमा अग्रताधि जिणाणं न कोड- वुदीण ५ * णमो योजयुद्धीगं ६ नमो पाटानुमागणं ७ ॐ णमा मंभिष्णमोदराणं ८ *पमा उम्जुमदीणं, *गमो बिलमदीन १०. णमो दसपुचाग ११ *मो चौदसवीर्ण १२ पानो अगणिभित्तकुमटाणं १३ * णमो विगुन्यणहिपत्ताशं १४ ॐ णमो विग्नाहगणं १५ * गमो चारणाणं १६ ॐ मी पणनम- णाणं १७ * णमो आगासगानीगं १८ ॐ ओं झा श्री ही धृति कीनि युद्धि लक्ष्मी स्वाहा इति पदर्यलयं पूग्येत् । एवं पंचननम्कारेण पचागुटीन्यस्तेन सकली क्रियते; * णमो अरहंताग हाँ स्वाहा अंगुष्टे, * णमो सिद्धाणं ही स्वाहा तर्जन्यां, ॐ णमो आयरियाणं है स्वाहा मध्यमाया, ॐ णमो उवझायाणां हो स्वाहा अनामिकायां, ॐ पो लोए सव्यसाहूण कनिष्टकायां, एवं वारत्रयमंगुलीषु विन्यस्य मस्तकस्पो- परि पूर्वदक्षिणापरोत्तरेषु विन्यस्य जपं कुर्यात् । इहा ताई यहु मंत्रविधान वा यंत्ररचना वा क्रियाविशेष आदि वर्णन किया, सो याका अर्थ हमको यथार्थ सर्व प्रतिभास्या नाही ठाने न लिल्याहै, विशेषबुद्धि जिनौं मंत्रशाम्रका ज्ञान होय ते यथार्थ समझ लोज्यो। अमिधेया नमस्कारपये परमेष्टिनः । पदस्थास्ते विधीयते शब्दयस्य व्यवस्थितः ॥ ४९ ॥ अर्थ-जे अर्हतादि परमेष्ठी नमस्कारपदनिकरि कहनेयोग्य, ते पदस्थ कहिएहै, जाते शब्दवि पदार्थकी व्यवस्थितिहै ।
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थी अमितगतिश्रावकाचार।
कहिए, बहुरि कसाह पिंडस्य ध्यान औदारिकादि पंच शरीरनिका नाश
करनेवालाहै, सिद्धपदकी देने वालाहै ॥ ५३ ॥
आगै रूपस्य प्यानकी फहेहैं;--
प्रतिमायां समारोप्य स्वरूपं परमेष्ठिनः ।
ध्यायतः शुद्धचित्तस्स रूपस्थं ध्यानमिप्यते ॥ ५४॥
अर्थ-परमेष्ठीका स्वम्प प्रतिमावियें भले प्रकार आरोपण कर
ध्यानकरता शुद है चित्त जाका ऐसा जो पुरप साकै रूपस्य पान
यहिए है ॥ ५४॥
आगे आयपस्थ प्यानको यो-
मिद्धरूपं विमोशाय निरस्तापिपरमपम् ।
जिनरूप मिवध्येयं स्फटिकमनि विविनम् ॥ ५५ ॥
अरूपं ध्यायति ध्यानं परं संवेदनात्मकम् ।
गिद्धरूपस्य लामाय नीरूपस्य निरेनमः ।। ५६ ॥
अर्थ-दूर भये हैं समान फर्म जाके ऐगा मिदभगवानका समय
जमा स्फटिकीि प्रनिविचित जिनराजका समय,
भावार्य-टिकमणि जगा जिनयि होयगा प्यायना;
गंवरम गर्गहन ऐमा अमृतीक मा मरकारित ऐगा नौ गिभग
স্বল দ ন রাদি খাও যানধল গা লা
ध्यान है॥५५५६॥
आग परमामाका ध्यान में वाना, गो -
परितः पायति धारमा परिकीसितः ।
प्रथम दिनीयं हिला पगमार्न विगितपेत् ॥ ५॥
पंचदश परिष्छ। ४१९ अर्थ-बहिरामा अतरामा परमामा ऐसे आत्मा तीन प्रकार का महा बहिरामा भर संतरामाौं छोडके परमात्माका चिंतन ॥ ५७॥ पहिरात्मात्मविभ्रांतिः शरीरे मुग्धचेतसः । या चेतस्यात्मविभ्रांतिः सोंतरात्मा विधीयते ॥ ५८ ॥ अर्थ---जो म्हयुद्धीकै शरीरविर्षे आमाको भाति है शरीरमै आपी मानहै सो बहिरा मा है, बहुरि चैतन्यके विकार जे रागादिक तिनविय सापो मानहै सो अंतरामा कहिर है ॥ इहा प्रभ-जो और प्रधनि तौ मिपाधकौं बहिरामा कहा है अर सम्पग्पष्टीकी अंतरामा कयाहै इहां ऐसा कैमें कया । ताका उत्तर-~-देहभै आश मानना सो बहिरामा अर रागादिकमें बापा मानना सो अंतराना ऐनैं इहाँ तो दोऊ त्यागनेपोग्य कहे । अर जहाँ भतरामा सभ्यग्धीकौं कसा तहां उपादेय का, कि आसपरें विरोध नाही वक्ताकी इछाने अर्थ भेदही है, ऐसा जानना ।। आओ बहिरामाका स्वरूप कहें हैं;- म्यामोगीर-कशःस्थूल:काग:कुंठोवलो कली । वनिता पुरुषः पंढो विरूपो रूपयानहम् ।। ५९ ॥ जातदेहात्मविभ्रांतरपा भवति कलना । विवेकं पश्यतः पुमो न पुनर्देहदेहिनोः ॥६॥ अर्थ- काला है, गौरा है, पतडा हूँ, मोटा है, कागा है. हान हूँ, बलवान है, निर्वः है, मी है, पुरस है, नमक है, बिरूर है समान है, ऐसी पटु कसना है सो उपजी है सरीर आसा की मानि जाफै जो शरीरही लामाह से निभायी होप है जाने काला गौरा आदि देहके धर्म है आमाके नाही, यहारे से पुरस पारीपर - * ... * * +111 गामिाामाTam दलिन जीरप निगेन।।११॥ को attit करा Heartri" Annait tekari २am tant र गोभी नारेमा प्रोमो गो ग्रीमा with lerki, मानेर माप्नियंगेमा मामीनि फिन्गना। याप्रतिपदागिगंगनी न ममारतः ॥ ६२ ।। w-में नाकी है, लिपर ई, मनु, मी पर करना। मां ना तन मनुमरि शगर म सनावने नारी ।। ६२ ॥ वालको मागदं तम्गोन्हम जरी। एता दहपरिणामजनिताः संति कल्पनाः ।। ६३ ।। अर्थ- बालक हूं, में कुमार ई, में ताण ई, द ई कयना है ने शरीरक परिणाम कार उपनाहै ॥ १३ ॥ विद्ग्यः पंडितो मूखों दरिद्रः सधनोऽधनः कोपनीऽस्यको मूबी द्विष्टस्तुष्टा शठोऽगठः ॥ ६४ ॥ सानो दुनो दीनो लुब्धो मत्तोपमानितः । जातचित्तात्मसंभ्रांतरेसा भवति शेमुपी ।। ६५ ।।
पंगत परिमंद। ४२१. अर्थ- चतुह, पोडेनह. महे, दरिद्रोह. धनगनह, निर्धनहे, मायुना माहीहै. नईगगीहं. अज्ञानोई, ज्ञानीह, । सामना, दुर्जना, दीना, लोभाई. प्रमादी है अपमानसहितई ऐमी यह बुद्धि उपजीह रागादिकभावनि, आरेको भाति जाकै ऐसा जो पुरुष नाक हो । ६४-६५॥ माग मिष्यामि मम्पर मुनिका फल कहहै;- देहे यान्ममतिजनोः सा बर्द्धयति संस्थितिम् । आत्मन्यात्ममनिया मा मयो नयति नितिम् ॥ ६६ ॥ अर्ध-जो देहरिस आपकी बुद्धि है सो जौवकै ससार यहाथै घरी जो आमावि आत्मबुद्धि है सो शाम मुक्ति की प्राप्त करहें ।। ६६॥ यो जागत्यन्मिनः कार्य कायकाय स मुंचति । यः स्वपित्यात्मनः कार्ये कायकायं करोति सः ॥६॥ अर्थ---जो पुरुप आमाके कार्य जागैहै अपने हितमै सारधान है मो पुरष दारीरक कार्यको स्यागेहे सरीरसंबंधी क्रिया मैं उठानि रहहै, यहरि जो आमाके कार्य वि* सौहे आमाके हित में उद्यमी नही सो शरीरसंबंधी क्रिया करेंहै ॥ ६७ ॥ ममेदमहमस्सास्मि म्यामी देहादिवस्तुनः । यावदेपा मतिर्श नावद्धयानं कुतस्तनम् ॥ ६॥ अर्ध-ये शरीरात परदम्य मेरा है अर मैं शरीरादि परसस्तुरा स्वामीई ऐसी बुद्धि जहा ताई यार परदम्पविर्षे है तहां ताई पान पहात होय ॥ ६८॥ नाहं कस्यापि मेरुविम मावोऽस्ति पहिस्तनः । यदपा शेमुपी साधोः शुद्धध्यानं तदा मतम् ॥ ६९ ।। MH ४२२ श्री अमितगतिमायकावार। - 1 अर्थ में कोई बाद्य पदार्थका नाही अर वाद्यपदार्य मग काई नाहीं ऐसी यह बुद्धि जब साधुकै होय तब गुयान कदाई ॥६९॥ रागद्वेपमद्रकोपलोभमन्मयमन्मराः । न यस्य मानसे संति तम्य ध्यानास्ति योग्यता ||७०|| अर्थ-जाक मन वि गग अद्वेष अर मान अर क्रोध अर टोन अर मन्सर अर काम अर इभाव ये नाही ता पुरुषकै ध्यान विरें योग्यताहै ॥ ७० ॥ रांगद्वपादिभिः क्षिप्तं मनः स्थय प्रचाल्यते । कांचनस्येव काठिन्यं दीप्यमान ताशनः ।। ७१ ।। अर्थ-रागद्वेषादि करि आक्षिप्त ऐसी मनकी स्थिरता चलायमान होजायहै जैसे देदीप्यमान अग्नि करि मुत्रर्णका कटिनपनां चलाय मान होजाय तेसैं । भावार्थ-मन चाहे जेता स्थिर होय परंतु रागद्वेषादि करि चलाय मान होही जायहै || ७१।। विद्यमाने कपायेस्ति मनसि स्थिरता कथम् । कल्पांतपवनः स्यैये तृणं कुत्र प्रपद्यते ।। ७२ ।। अर्थ-जैसे प्रलयकालकी पचनविर्षे तृणहै सो थिरताको कैसे प्राप्त होय तेसै कपाय भाव विद्यमान होत संत मनकी थिरता के होय ॥७२॥ अक्षय्यकेवलालोकविलोकितचराचरम् । अनंतवीर्यशर्माणममूर्तमनुपद्रवम् ।। ७३ ॥ १ यह श्लोक वचनिकाकी प्रतिमे नहींई, संस्कृत प्रतिसे लिख कर वनिकर कर दी है।
पंचदश परिच्छेद। निरस्तकर्मसंबंधं मूक्ष्म नित्य निरास्रयम् । ध्यायतः परमात्मानमात्मनः कर्मनिर्जरा ।। ७४ ॥ अर्थ-अविनाशी जो केवल दर्शन फेवल ज्ञान लिनकरि देव या जाने चराचर समस्त यस्तु जाने, बटुरि अनंत स्वगप न बनने गप पार्य अर निराकुलतारूप आनंद जायों, अर पणादि बहिन मापूनी- कहै, अर रोगादि उपत्य रहितह, अर दूर किया. समम्म यमकायध जानें, पहार जाको मन. पर्ययज्ञानी भी देव र नाही ऐसा मी, नित्यह, अर रागादियके अभावते निराश्रवह ऐसा जो परमागा मिट भगवान साहि प्यारता जो पुरुष ताय आपके फर्मनिको निर्मग होय है ॥ ७३-७४॥ आत्मानमात्मना ध्यायमारमा भवति निर्धतः । पप्पमात्मनात्मानं पावकी भवनि गुमः ॥ ७५ ॥ अर्थ-जी सह सो दृशकार विस्था सेता भी भारको प्राप होयह त आमाह सो आपपरि आपको ग्यारसा मेना गुनायो, सिद म्पमय यह ।। ७५॥ न यो विक्तिमात्मानं देशादिभ्यो पिलोकते । म मन्नति भयाभोपा लिंगस्थोपि दुरवरे ।। ७६ ।। अर्थ-जो पुरण देशादि परम्पनि आपको पारा नाता मारी जान कर है सो पुरष मुनि पार. बEATE ARE भी दुमार प्रसार सगुन विगो मुनिधारप भी मेल तर और जानिशी पारा का ।। ७६ ॥ मविज्ञानमविनाने विनयरमनपाम् । मदानारमारमात्मीर मुग्म कायम् ॥ ७ ॥ U ४२४ श्री अमितगतिश्रावकाचार । अनेकमेकमंगादि मन्यमानो निरस्तपीः । जन्ममृत्युजरावर्ने वंभ्रमीति भयोदधौ ॥ ७८ ॥ अर्थ-जो अज्ञानी पुरुष शरीरादि जे अचनन पदार्थ तिनक चेतन मानता अर विनाशीककी अविनागी मानता अर सदा आपका नाहीं ताकी आपका मानता अर दुःखका कारण ताकी मुखदायी मानता अर एक नाही ताको एक मानता सो जीव संसारसमुद्रवि अतिशयकरि भ्रमैहै कैसाह मंसारसमुद्र जन्म मरण जरारूप हैं मोरे जा विर्षे ।। ७७-७८॥ आत्मनो देहतोऽन्यत्वं चिंतनीय मनीपिणा । शरीरभारमोक्षाय सायकस्येव कोशतः ॥ ७९ ॥ अर्थ-जैसें तरकगते तीरको न्यारा देखिए तैसें बुद्धिवान पुरुषकरि शरीरका भार त्यागनेके अर्थि मोक्ष होनेके आर्थ शरीर आत्माका भिन्नपना चितवना योग्यहै ।। ७९ ।। या देहात्मकतावुद्धिः सा मजयति संमृतौ । सा प्रापयति निर्वाणं या देहात्मविभेदधीः ।। ८० ॥ अर्थ--जो देहभै अर आत्मामैं एकताको बुद्धिहै सो संसारमै डुओं वैहै अर जो गरीरकी अर आत्माको भिन्नथुद्धिहै सो मोक्षकों प्राप्त रहै ॥ ८०॥ यः शरीरात्मनोरक्यं सर्वथा प्रतिपद्यते । पृथक्क शेमुपी तस्य गूथमाणिक्ययोः कथम् ॥ ८१ ॥ अर्थ-जो देह अर आत्मा वि सर्वथा एकपना मानहै ताकै विटा अर माणिस्यरत्नविणे भिन्नपनेकी बुद्धि कैसे होय । भावार्थ-आमा तो रत्नममान पवित्र अर देह विष्टासमान अप. विग्रहै सो कारणवश विष्टामें तिष्टना जो रन ताहि जैसे मूर्ख एक माने पंचदश परिच्छ। में कर्मोदयके पशरीरमै तिएता जो आमा ताहि मिष्पादृष्टी एफ मानहै ऐमा जानना ॥ ८१ ॥ देहवेतनयोर्मेदो मिन्नत्रानोपलन्धितः । सर्वदा विदुपा शेयः प्राणार्थयोरिख ।। ८२ ॥ अर्थ-ज्ञानवान कर देहका अर चेतनका भेद जानना योग्यहे जाते भिन्न शानफरि जाननेमें आवै जैसे नेत्र इंद्रिय अर नासिका इंद्रियके विषय जे गप गंध ते भिन्नज्ञानफरि जानने में आयेहैं तात भिन्नहींहैं । भावार्थ-देहती इंद्रियज्ञानकर दीमैहै अर आत्मा स्वसवेदनकारि दामह, इंद्रियज्ञानफरि आत्मा न दोसअर स्वसंवेदनमै शरीर न आय है, ऐसे न्यारे ज्ञान करि जाने जापहे ताने शरीर अर आत्मा मिनहै; जैसे रूप नेत्र करि जान्या जायहै गध नासिकाफोर जानिए है, म्प नामिकाकरि न जानिरहै अर गंध नेत्रकरि ने जानिएहै; सात गंध म्प भिन्न भिन्न है ऐसा अनुमान दिखाया है ।। ८२ ।। म यस्य हानितो हानि वृद्धिर्यद्धितो भवेत् । जीवस्य मह देहेन तेनैकत्वं कुतस्तनम् ।। ८३ ॥ अर्थ--जा शरीरकी हानित जीवकै हानि नाही अर जागरीरकी बुद्धिस जीवकी पृमि नाही होयहै, सात जीवकै देहके साथ एकपना काहेका ! | ८३॥ नत्यनः मह देहेन यस्य नानात्वमात्मनः । कि देहयोगजस्तस्य महकत्वं मुनादिमिः ॥८४ ॥ अर्थ-परमार्थत जिस आमाकै दहके साथ भिन्नपनाह ताके देहके संयोगते उपजे जे पुत्रादिक तिनकार एकपना कैसे होय ॥ ८५ ॥ ममत्वधिपणा येपों पुप्रमित्रादिगोचग । साऽऽत्मरूपपरिच्छेद छेदिनी मोहकल्पिता ।। ८५॥
श्री अमितगतिथावकाचार। . अर्थ-जिनके पुत्र मित्रादिविर्षे जो ये मेर हैं ऐसी ममत्वबुद्धि है तिनके ऐसी बुद्धि आत्मज्ञानको नाश करनेवाली मोहकीर भई। भावार्थ-मिथ्यात्वके उदयकरि कल्पना मात्रहै सत्यार्थ नाहीं । पत्तनं काननं सौधर्मपा नात्मधियांमतिः । निवासो दृष्टतत्वानामात्म वास्त्यक्षयोऽमलः ॥ ८६ ॥ अर्थ-मैं नगर, वसू हूं बनम बमूं हूं महलमै बसू हूं ऐसी यह बुद्धि आत्मज्ञानरहित मिय्यादृष्टीनिकै होयहै, बहरि देख्याहै तत्व जिननें ऐसे सम्यग्दृष्टीनिके अविनाशी, नित्य, निर्मल ऐसा जो आत्मा सो ही निवास है ॥ ८६ ॥ शुद्धस्य जीवस्य निरस्तमूर्तेः सर्वे विकाराः परकर्मजन्याः। मेघादिजन्या इव तिग्मरश्मे- विनश्वराः संति विभाखरस्य ।। ८७ ॥ अर्थ--अमूर्तीक जो ताकै शुद्ध आत्मा समस्त विकार है ते कर्मो- दयते उपजेहैं, भावार्थ-द्रव्यदृष्टि कर दोखिए तो विकार कर्मजनित है किछ् आत्माके स्वभाव नाहीं; जैमें देदीप्यमान जो सूर्य ताके विनाशक जे विकार ( फहू थोडा प्रकाश होना कई यहत प्रकार होना इस्या- दिक ) वादला आदिके निमित्नस होयह, स्वभावजनित नाहीं ॥ ८७॥ दृष्टात्मतत्वो द्रविणादिलक्ष्मी न मन्यते कर्ममयां स्वकीयाम् । विपक्षलक्ष्मी भुवने विषकी प्रपचने चेतमि कः सकीयाम् ।। ८८ ॥
पंचदश परिजए।
+--
अर्थ-देख्याह आत्माका स्वरूप जानै ऐसा पुरुषह सो कोदय-
करि उपजी जो धनधान्यादिकी लक्ष्मी ताहि आपकी न मान है,
शेकवि ऐसा कौन विकाहै जो शत्रुको मार्को चित्तविषै आपकी
माने
॥८८॥
शानदर्शनमयं निरामयं
मृत्युसंमयविकारयर्जिनम् ।
आमनंति मुधियोऽय पेवनं
पक्ष्ममव्ययमपास्तकल्मपम् ।। ८९ ॥
अर्थ-लोकरि पडित ते आत्माओं ऐसा मानें हैं:-आत्मज्ञान-
दर्शनमयाह अर रोगरहितह अर मरण उपजने आदि विकाररहितह अर
नष्टभयाह पाप जाया ऐसा निर्मल है अविनाशीहै सूक्ष्महै ।। ८९ ।।
विग्रहं कृमिनिकायसंकुलं
दुःखदं हदि विचिंतयंनि ये।
गुप्तियममिव ने सचेतनं
मोचयति ननुयंत्रमंत्रितम् ॥९० ॥
अर्थ-~योडानिके समूहकार भरपा दुःराठायी ऐसा जो शरीर ताहि
हृदयविणे जे पुरष भिन्न विचौहैं से पुरुष शरीर रूप पंचकरि बभ्या
ऐसा जो आत्मा साका मानी गुप्तिधन सोहैं।
भावार्थ-जे शारीर र आमार्को भिन्न भाव तिन फर्मवेधी
निर्जरा होयह ॥९॥
स्थित्वा प्रदेश विगतोपमर्गे
पर्यकर्वधस्थितपाणिपमः।
नासाग्र संस्थापिन दृष्टिपातो
मंदीकृतोरडामविस्वेगः ॥ ९१ ॥
“४२८
श्री अमितगतिश्रावकाचार।
-
विधाय वश्यं चपल स्वमा
मनोमनीपी विजिताक्षवृत्तिः ।
विमुक्तये ध्यायति ध्वस्तदोष
विविक्तमात्मानमनन्यचित्तः ॥ ९२ ।।
अर्थ-नाही अन्य वस्तुवि चित्त जाका ऐसा ज्ञानी पुरुष मुक्तिके
अर्थ रागादिदोषरहित समस्त परद्रव्यनित भिन्न जो आत्मा ताहि
ध्यावहै कैसाहै सो पुरुष देशमशकादिकी वाधारहित क्षेत्रवि तिष्ट करि
पर्यकासनविर्यै धेरैहैं हस्तकमल जाने बहुरि नासिकाकै अमविन याप्यहि
दृष्टिका पडना जानें वहरि वृद्धिको प्राप्त भया ऐसा श्वासोच्छ्वासका वेग
सो मंद कियाहै बहरि चंचलहै स्वभाव जाका ऐसा जो मन ताहि यस
करिकै जीतीहै इंद्रियनिकी परणति जाने ऐसा पुरुष आत्माको याद
॥९१-९२ ॥
अभ्यस्यतो ध्यानमनन्यवृत्ते-
रित्यं विधानेन निरंतरायम् ।
व्यपैति पापं भवकोटिबद्ध
महाशमस्येव कपायजालम् ।। ९३ ।।
अर्थ-~या प्रकार पूर्वोक्त विधान करि अंतरापरहित निरंतर
ध्यानको अभ्यास करता अर नाहीहै परपरणति जाकै ऐसा जो पुरुष
ताकै कोटि भवफार बांध्या जो पाप सो नाशको प्राप्त होयहै, जैस
उपगमभावसहित पुरक कसायनिका समूह नाश होप तैमैं ॥ ९३ ॥
ध्यान पटिष्ठेन विधीयमानं
कर्माणि मम्मीहरुले विशुद्धम् ।
किं प्रेयमाणाः पर्यनन नानि.
थितानि मधोदहनीधनानि ॥ ९४ ॥
पंचदा परिषद। अर्थ-झानी पुरपरि काश भया निर्म यानी सो कमानी मम्म कोहे जैसे पवनकरि प्रेरयाभया असिंह मो समयाप में हम निनहि शाप्रकहा नाही दग्ध को है. कहीं ॥ १४ ॥ त्यागेन हीनस्य कुतोऽस्ति कीर्तिः मत्येन हीनम्म वृतोऽम्ति पूजा । न्यायेन हीनस्य दुतोऽस्ति लक्ष्मी ध्यानेन हीनन्य कुनोति मितिः ।। १५ ।। अर्थ-दानकरि हान जो पुर ताप कान में राय, समय पुरपकी पूजा कैसे शेय, आ प्यायकरिन पुराव om होय, अर ध्यान करन जो पुरr i. सिकि जो कर हीन फेमे ॥१५॥ तपामि सदापनि विपना शापाण्यधीनामगिलानि नित्यम् । धनी परित्राणि निरस्वतंद्री नगिप्पति प्यानमत तथापि ॥१६॥ अर्थ-पोर तपनियो तर तो धारी, FRIA भारनियापनो, आ.१५ TRA NRI, it श्राम, पान PREM AM पान गुरपरे ॥१६॥ सानं पदमप ददाति मिि नाप माने। समान wिit न तास दर परीयार:९७॥ S497 ४३२ श्री अमितगतिधायकाचार। अर्थ-नाश कियाहै स्पर्शनादि सर्व इंद्रियनिक कार्यनिका समूह जाने, भावार्थ-जाने स्पर्शादि विषयनिमें इंद्रियनिका रागसहित परिगमन रोक्या है, बहुरि अपने आत्माके कार्यत्रिय उद्यम सहितहै चित्तको परणति जाकी ऐमा जो धन्य पुरुषहै सो ध्यानरूप कार्यों कर है ॥ १०३ ॥ यद्धिंडमानं जगदंतराले धनुं न शक्यं मनुजामरेंद्रेः। तन्मानसं यो विदधाति वश्यं ध्यानं म धीरो विदधात्यवश्यम् ॥ १०४ ॥ अर्थ-जो जगतविय होडता डोलता नरेन्द्र देवेंद्रनिकरि न रोकने चोग्य ऐसा जो मन ताहि यस करहै सो धीर पुरप निधपमेनी यानको को। भावार्थ-जाके वशीभूत मन है सो ही प्यान करनेको समर्थ वाणः ममं पंचमिप्रवेग. विंदगिलोकस्थितजीववर्गः। न मन्मथम्निष्ठति यम्य चिन विनिचलम्निष्टनि तस्प योगः॥ १०५॥ अर्थ-जान लोकम विध्या जो जोनिका गगृह मो जाने उनके गजिनका म ज पच याग निगरि एक काल पेच्या प्रेमा । म मा चिनीने नमा, पान निघत ति॥१०५ नरोपो न मापा न मोतीन दोषो न कामा न कंपो नमो नसामः।
पंचदश परिच्छेद। ४३३ न मानो न माया न सेदो न मोहः यदीयेऽस्ति चिते तदीयेऽस्ति योगः ॥ १०६ ॥ अर्थ-~~-मा पुरपके चित्त, मोध नाही राग नाही चौरी नाही अन्यायादिदोष नाही काम नाही भय नाही दम नाही लोभ नाही मान नाही माया नाही पेद नाही मोह नाहीं ता पुरपकै ध्यान होय है, बाके रागादिविकार है ताकै ध्यान न होय है ॥ १०६ ॥ प्रबर्द्धमानोद्धतसेवनायां जीवस्य गुप्ताविव मन्यते यः। शरीरकुटयां वसनि महात्मा हानाय तस्या यतते स शीघ्रम् ॥ १०७ ॥ अर्थ-वर्द्धमानहै तीव दुःखम्प परणात जा वि ऐसा जो शरीर. रुप फुद्दी ताविप बंद्रीयानेकी वसती समान यमतीकों जो मानहै मो महात्मा तिम शरीरकुहीक नाशके अर्थ सीमही यन कोहै, मोक्ष होनेका उपाय करहै ऐसा जानना ॥ १०७॥ समाधिविध्वंमविधौ पटिष्टं न जातु लोकव्यवहारपाशम् । करोति यो निस्पृहचिनवृत्तिः प्रार्तते ध्यानममुप्य शुद्धम् ।। १०८ ।। अर्थ-जो पुरष एकामचितफे नाश करनेमें प्रवीग जो निय लोकव्यवहार नाहि पदाचित् नाही करेंहै अर बांडारहित है चितफी परणति जाकी ऐमे पुरक निर्मड प्यान प्रवत्त है ॥ १०८॥ विधीयते ध्यानमवेक्षमाण- यंइतरोधैरिह लोककार्यम् । बनि-10
४३४
थी अमितगतिथावकाचार।
रौद्रं तदात्तं च वदंति संतः
कर्मद्रुमच्छेदनबद्धकक्षाः ॥ १०९ ॥
अर्थ--जो इस टोकसंबधी कार्यकौं बांडते जे मज्ञानी पुरुष तिन
करि ध्यान करिएहै ता ध्यानकौं संतपुरुष रौद्र या आर्त क है, कैमेहै
संत पुरुष कर्मक्षके छेदनेकों बांधीह कमर जिननें ॥ १०९॥
सांसारिक सांख्यमवाप्तुकाम-
यानं विधेयं न विमोक्षकारि ।
न कर्पणं सस्पविधायि लोके
पलाललामाय करोति कोऽपि ॥ ११०॥
अर्थ-मोक्षका कर्ता जो ध्यान मो संसारके मुसको योग कार
रना योग्य नाही, जाते लोकमें धान्यकी उपजारनेगली जो नी सो
टाटके लाभके आर्य कोई भी को नाही । धान्यके भजो मेत्री
ग्गा सापटाल तो स्वयमेव ही होयगारा तसे मोक्ष मा जो पान
Eहे साकै गसारमुपती यावत् शुभगगह तायर सयमेर होपहै, यह
चपयमुपकी याछा करना उल्टा रोदध्यान होप सान संगारमुपा
छामहिम ध्यान करना गुन. नाही ॥ ११०॥
अभ्यम्यमानं पहुधा स्थिरत्वं
पनि दुर्वाधमपीद शायम् ।
ननं नया ध्यानमपीति मन्या
ध्यानं मदाभ्यम्यतु मोक्तुकामः ॥११॥
अ-गोगनना जाका ऐमा टिन शामी भूत
काम किया भवा पिताको प्रयोग ध्यानाकाम भी
का मा माशों का को, सी मुन नेश क पुरुष
पर ध्यागम्यम ॥११॥
पंचदश परिपा ४३५ अचाप्य मानुप्यमिदं मुदुर्लभ करोति यो ध्यानमनन्यमानमः । मनति संमार दुरंतपंजरं स्फुटं स सघो गुरु दुःसमंदिरम् ।। ११२ ।। अर्थ-जो या दुटभ मनुष्यपनेकी पायफरि नाहीं है अन्यबस्तु. गि मन जाका मा यान को मो पुरुष दूर है अंत जाका ऐसा जो संगारकपा दाजरा साकी प्रगटपने भेदैहै, फैसाहै ससाररूपी पीजरा बड़े दुशानिये पसनेका घरहे ॥ ११२ ॥ यो जिनाएं शमयममाहितं ध्यानमपाहतसकलविकारः। ध्यापति धन्यो मुनिजनमहितं चित्तनिवेशितपरमविचारः ॥ ११३ ।। मर्य---जो पुरम जिनराजकरि यहा जो कपायनिके अभावरूप रामभाव अर जन्मपर्यंत पापनिसाफा त्यागरुप यमभाव तिनकार सहित जो ध्यान साहि प्यावहै सो पुरष धन्यह, कैसाहै ध्यान मुनिजननिकरि शनितह, बहुरि पै.साहै सो ध्यानी पुरुष दूर कियह रागादि सकल विकार जानें, बहुरि चित्तथि निवेशित कहिए उपग्याई परमविचार करिए आत्माका विचार जाके ऐसाहै ॥ ११३ ॥ नाकिनिकायस्तृतपदकमलो दीर्णदुरुत्तरभवभयदुःसाम् । याति स भन्योऽमितगतिरनयां मुक्तिमनश्वरनिरुपमसौख्याम् ॥ ११४ ।। अर्थ-सो पूर्वोक्त प्यान करनेवाला भन्यपुरुष अविनाशा अर अनु. पमहै मुरा जार्षि ऐसी जो निर्मल मुक्ति अवस्था सार्को प्राप्त होयहै, ४३६ श्री अमितगतिश्रावकाचार। कैसाहै मुक्ति अवस्था विदारेहैं नाशक्रिय, दुस्तर संसारके भय दुःख जानें, बहुरि कैसाहै सो पुरुप देवनिक समूहनि कारे स्तुतहे चरणकमल जाके बहुरि अमर्यादरूपहै ज्ञान जाका । भावार्थ---ऐसे ध्यानका फल मुक्ति अवस्था कही ॥ ११४ ॥ सबैया तेईसा। ध्यानस्वरूप कह्यो जिनराज व्रतादिसमाजसमेत विचार, चित्त वस परमारयमें सब रागविरोध विकार विडारे। सो सुरपूजितपादसरोज अनंतगुणातम रूपनिहार, मत्त रहै मुखबारिध नहिं जन्म भवावलिमें फिर धार। इत्युपासकाचारे पंचदश परिच्छेदः । ऐसे थी अमितगति आचार्यविरचित श्रावकाचारवि पंद्रहमा परिच्छेद समाप्त भया ।
अंधकर्तुः प्रशस्तिः। र आचार्य अपने गुरको परिपाटी फ है;- अभूमिमी यस्य न तेजसेनः म शुद्धयोपोजनि देवसेनः । मुनीघरो निर्जितकर्मसेनः पादारविंदपणतेंद्रसेनः ॥१॥ अर्प-निर्मल है न जाका ऐसा सो देवसेन नामा आचार्य मुनि- नका ईश्वर प्रगट होता भया, तेज करि मूर्य जाके ममान न होता भया, फैसा सो आचार्य जीती कामकी सेना जाने, बहुरि चरणक- म-निविप नम्रीभून भैरहें इंदनिका सेना कहिए देवनिका समूह जाके ऐमा है॥१॥ दोपांपकारपरिमर्दनबद्धकक्षो भूतस्ततोऽमितगतिर्भुवनप्रकामः । विग्मनेरिव दिनः फमलावपोधी मार्गप्रबोधनपरो घुघपूजनीयः ॥२॥ अर्थ-तिम देवसेन आचार्यका शिष्य लोकों प्रकारा: करनेवाला अमितगतिनामा आचार्य भपा, केसाहै मो मिष्यावादिदोषरूपी अध- कारफे नाश करनेकों गांधीहै कमर जाने मो जैसे सूर्यते कमलनिका प्रहित करनेवाला अर मार्गको प्रगट करनेमें तत्पर ऐमा पंडितनिकार पूजाक दिन प्रगटै तैमैं देवसेन आचापके शिष्य अमितगति सो भी sri श्री अमितगतिश्रावकाचार। -~-~ कमला कहिए लक्ष्मी ताकी प्रफुटित करनेवाला अर मौशमार्गका प्रष्ट करनेवाला अर पंडितनिकरि पूजर्नाक होता भया ॥२॥ विद्वत्समूहाचिंतचित्रग्रियः श्रीनेमिपेणोजनि तस्य शिष्यः । श्रीमायुरानूकनमः शशांकः सदा विधूताऽर्हवतत्त्वशंकः ॥ ३ ॥ अर्थ –ता अमितगति मुनिका शिष्य श्री नेमिषेण आचार्य होता भया कैसाहै सो पंडितनिकै समूहकरि पूजितहै अनेक शिष्य जाके बदुरि श्रीमाथुरसंप्रदायरूप आकाशविर्षे प्रकाशकरनेते चंद्रमा समानहै, बहुरि सदा नाश करीहै अर्हतभापित तत्त्वनि विपै शंका जाने ।। ३ ।। माधवसेनोजनि महनीयः संयतनाथो जगति जनीयः जीवनराशेरिख मणिराशी रम्यतमोऽतोऽखिलतिमिराशी ॥४॥ अर्थ-तिस नेमिसेनके पदविर्षे जगतविष पूज्य संयमीनका नाथ श्री माधवसेन आचार्य प्रगट होता भया, कैसा है सो संसारी जीव- निका हितकारीहै अर सुंदर रत्ननिकी राशि ज्यौ समस्त मिथ्याभावरूप अंधकारका नाश करनेवाला ऐसा माधवसेन आचार्य भया ॥ ४ ॥ विजितनाकिनिकायमवज्ञया जयति यो मदनं पुरुविक्रमम् । त्यजति मां किमयं परनाराधी- रिति कपायगणो विगतो यतः ॥५॥ अर्थ-जीत्याहै देवनिका समूह जानैं ऐसा महापराक्रमी जो काम ताहि तिरस्कारकरि जो जीत सो यह आचार्य मौकौं कैसै छोड़ेगा -
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४१० श्री अमितगतिश्रावकाचार। m भी ज्ञानादिगुगनिकीर ऊंचाहै, मेच ऊंचाहै ऐसे मेघसमान समय आमितगतिमूरि यह शान्त्र रचते भए ॥७॥ यदत्र सिद्धांतविरोधि मापित विगोव्य मझायनिमं मनीपिभिः । पलालमत्यय न मारकांक्षिमिः किमत्र शालिः परिगृह्यते जनः ॥८॥ अर्थ -इम शास्त्रवि जो कि मिटातनिरोध हा होय साति मोनिक मुद्धियानिकीर यह शुद्ध प्रहण करना योग्यहे, जाते लेगी. में मादके यांछक जे पुरुप निनकीर पटाल छोहि कहा चोर न कीजिए, कीजिएहीहै ॥ ८ ॥ (काम्प) यावनिष्ठति सामनं जिनपतेः पापापहारोयतं पारमयन हिमनग्गनिर्वियं तमः शारम् । यारधाग्यने महीयप्रायचितं यातापी विष्ट नारछायमिदं करोतु पिशामभ्यम्यमान बरम् ॥ अर्थ-पार हमें उच्चमी जो जिनरामा मत मी जाम निशी आ नाताई गर्य गदिमा मकल को नाना पलनिकी दिल भी लोक तासीनी याताप मना? या प्रावकाचार मात्र अपाम किसानों अन कामे मागायन आविषा: ॥९॥ समिति . ।
उपयोग दिरोशिमनियाग।' सद अर्थो मन नरं मापा मुभी मुहान । मोहिम्पभुत जानिक हेमा नमगुरु ठिान ॥३॥ गानिरीणावा दिनभुन अनुगण। भापाकारकी प्रशस्ति । रागादिक हानि जहां वन बर्द्धमानरूप तात मानजनित प्रमोद बढ़वारीहै । महित प्रमाद प्रसहिंसा आदि पाप मैल धोय पोय अधिक विशुद्धिता मम्हारीहै ।। ऐसे दर्शनादि थान एकादश भारकके तामें एक मी जो नर धार गधारी है । माधुपद चाह जाफै नांही उर मोगदाह "भागचंद" ताकी यार यार यलिहारी है ॥१॥ गोपाचन निस्ट सिंधिया नृपति कटकवर, जैनी जन बहु धर्म जहां जिनमक्तिमाग्मर । तिनमें तेरहपंच गोष्टि गत विशिष्ट अति पार्वनायविनधाम रप्यो जिन तुम उनंग अति ॥ तई देशवननिकामय भाटी "मागचंद" रचना कग्यि । अपर्वत होउ मतग परजाप्रसाद पूपि विमरिय॥॥ , २ . 1 -- भजू देव सर्वज्ञ अज्ञजनभ्रमतमनाशक, ध्याऊं सिद्धसमूह ध्यान जिस स्वपरप्रकाशक । आचारज मुनिराज तने पदवारिज बंदू उपाध्याय गुण गाय पापतरुमूल निकंदं ॥ पुनि सर्व माधु यह लोकमै तह नितप्रति चितवन करूं। यह मंगल उत्तम शरण लखि चार बार जिन चित धरूं ।।५) संवतसर उगणीससी द्वादश ऊपरि धार । अष्टामिक आपाढ़की पूर्ण वचनिका सार ॥ ६ ॥ इति श्री आचार्य अमितगतिशत श्रावकाचारकी यचनिया समाप्त भई। मूलाचार। मुनि श्रीअनन्तकीर्ति दि० जैन ग्रन्य-मालाका यह पाया प्रन्य है । इसके मूल प्रेथ कर्ना आचार्य बहकर स्वामी हैं। मूल मन्म प्राकृतमें है । उसकी भाषाटीका ५० मनोहरलालजी शालीने की है। यह मुनियों के आचारमधी ग्रन्थ है । निर्णयगागर प्रेममें ४ा हुमा है । मूल्य तीन गये। । मिलनेका पना- जैन-ग्रन्यरत्नाकर कार्यालय होगयाग, पो० मिन, बम्बई।
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