Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Shraman Sanskriti Ki Rooprekha

Shastri,purushotam Chandra · 2011/03

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श्रमण-संस्कृति
की
रूपरेखा
लेखक
प्रोफेसर पुरुषोत्तम चन्द्र जैन शास्त्री,
ATTARAKATARAAT
एमए, एम श्री एन
पटियाला
प्रकाश
प्रोफेसर पी सी जैन
पटियाला
विश्मम.२...
ईस्वी स. १६:१
जैन प्रिरिग प्रेस, नगर

1
पुस्तक मिलने का पता -
मनजर
जैन प्रिंटिंग प्रेस,
अम्बाला सिटी
ला. दीपचन्द मोहन लाल जैन जोहरी
अदालत बाजार
पटियाला (पेप्सु)
प्रो पा सी पैन म ए
स्टेडियम
पटियाला ( पेप्मु )
मुद्रक
ला० रोशन लाल जी जैन
ला० वाबू राम जी जैन
जैन प्रिंटिंग प्रेम,
अम्माला शहर।
(मवाधिकार क्र्ता के अधीन है)

QQQQQINAS
.
SETTER
KARAM
TETTER
समर्पण
मित्र
जिमजाज
MILAM
COD DE
श्रमण-सस्कृति के
पुजारियो के
कर कमलों
में
पुरुपोत्तम चन्द्र जैन

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* नम्र निवेदन
भारतीय इतिहाम में, जैन धर्म, जैन सस्कृति और
जैन दर्शन का कितना ऊँचा स्थान है यह स्मिी से छिपा
नहीं है । जिस भौतिकवाद की भयानम्ता से तंग ग्राफर
याज विश्व के सभी राष्ट्र माध्यात्मिकवाद के सर्वोत्तम
मन्देश 'विश्व शाति की स्थापना' के महत्व को
समझने लगे है उस विश्व शान्ति के सन्देश का जैन धर्म
अनादिकाल से देता याया है । जैन धर्म के मिद्धान्तों
की उत्कृष्टता निनिनाद सिद्ध है। इस महान् धर्म के
अहिमाद, र्मनाद और अनेकान्तपाद के सिद्धान्त
मदा विश्व में इस की कीति को प्रसारित करते रहेंगे।
किन्तु ममय का चक्र पड़ा विचित्र है। वह जैनधर्म जो
कभी विचधर्म होने का दारा करता था, कुछ सदियों से
श्रानति फी पोर जा रहा है और उम का प्रचार कम
हो रहा है । इस रा मूल कारण यही है कि जैन धर्म
के अनुयायी अपने आदर्शधर्म के चान्तनिक सिद्धात को
न समझ कर पथभ्रष्ट होते जा रहे है । जनदर्शन के
सिद्धान्तों का महत्व उत्तरोत्तर केरल शास्त्रीय विभूति के
रूप में ही रहता जाता है । जैन समाज के जीरन में

1 - का व्यापक रूप में पालन लुप्त होता जा रहा है। एमा परिणाम यह हुया है कि ममान में मर्मत्र पृट, ईप्या, क्लह और मिथ्या प्रचार का माम्राज्य है। अनेरात- याद के मिद्धात से निलाञ्जली दी जा रही है । प्रम और शाति के संदेश को टुरगया जा रहा है । सम्प्रदाय- वाद के भूटे रितण्डागार में धन का महान् अपव्यय पिया जा रहा है और शिक्षा जो राष्ट्र और समाज के निर्माण के लिये परमावश्या है, उस की शोर उचित ध्यान नहीं दिया जाता। इसके अतिरिक्त प्रानति शा एक शरण और भी है । जैन साहित्य को देखने में यह स्पष्ट पता चलता है जिनधर्म पिसी समय में विद्वानों का धर्म था स्न्तुि अहिंसा प्रधान धर्म होने के शरण इस के अनुयायियों ने न्यूनतम हिंमा पाले च्यापार व्यवसाय को अपनाया। व्यापार से लक्ष्मी का यागमन स्वाभारिफ है और लक्ष्मी के चर में पड़ा हुया माना अपने धर्म और संस्कृति को भूल जाए या उस की उपेक्षा करदे यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं । अस्तु, वर्तमान ममय में जैनधर्म व्यापक रूप में व्यापारियों का धर्म ही रह गया है। जो भी कुछ जैन धर्म का प्रचार यत्र तत्र दृष्टि गोचर होता है उस का श्रेय जैनमुनि राजों को

जाता है। लोग जैन सन्तों पर नुक्ता चीनी अपश्य
करते है किन्तु मैं यह दावे के साथ कह सकता है कि
यदि जैन मुनिरत्नों ने जैन धर्म के प्रचार का भार अपने
उपर न लिया होता तो जो भी जैन धर्म का प्रचार और
जैनागमों का पठन पाठन आज दृष्टिगोचर होता है उस
का भो अमान होता । च्यापारी लोग जैन धर्म के वर्तमान
प्रचार को भी कायम रखने में समर्थ न हो पाते।
अस्तु,
जैनधर्म के प्रचार, सामान्य ज्ञान और सुधार
को ही दृष्टि में रखकर 'श्रमण-मस्कृति की रूपरेखा'
नामक ग्रन्थ की रचना की गई है। अमण शन्द जैन और
बौद्ध दोनों के लिये प्रयुक्त होता है स्न्तुि यहा जैन से
ही अभिप्राय है । सस्कृति शब्द का अर्थ बहुत व्यापक
है। संस्कृति से मम्बन्ध रसने वाले सम्पूर्ण विषयों पर
इम ग्रन्थ में प्रकाश नहीं डाला गया है । जो क्ला आदि
विषय अपशेष रह गए है उन पर दूसरे ग्रन्थ में प्रमश
डाला जाएगा।
पञ्जार विमानन के समय मुझे अपना पुस्तकालय
लाहौर में ही छोड़ कर पाना पड़ा। इस ग्रन्थ के कुछ
अध्याय तो मैंने लाहौर में ही लिस डाले थे, शेप यहा
श्राकर तैयार पिये। या लिसते समय अभीष्ट मभी

ग्रन्था की प्राप्ति के प्रभार में बहुत स्थला में मुझे अपनी स्मृति से ही काम लेना पडा । अत बहुत समन है कि कई स्थानों में उद्धरणों की तथा अन्य यशुद्धियां रह गई होंगी। श्राशा है विज्ञ पाठक मुझे उन के लिये क्षमा करेंगे और यदि उन के विषय में मूचित करने का कष्ट करेंगे तो मैं उन का बहुत ही कतन हगा। अन्त में में जैनधर्म के सुयोग्य विद्वान् श्री डास्टर- वनारसीदाम जी जैन एम ए, पी एच डी का बहुत २ धन्यवाद करता है जिन्हों ने इस ग्रन्थ को भूमिरा लिखने का कष्ट क्यिा है। पाठक इम ग्रन्थ को पढ़ पर लाभ उठायेंगे तो मै अपना परिश्रम सफल ममगा। स्टेडियम, पटियाला नम्रनिवेदर - ३०-१-५१ पुरपोतम Ue មក។ SH भूमिका प्रोफेसर पुस्पोत्तम चन्द्र जैन द्वारा रचित "श्रमण- मस्कृति की रूपरेखा" नामक ग्रन्थ से पढ़-र मुझे अत्यन्त हर्ष हुमा । लेसर ने हम प्रथ की नीन लाहौर में ही रखी थी और इस के कई अध्यायों के गरे में मुझ मे चर्चा भी की थी। मेरी बड़ी इच्छा थी कि इस गन्ध का प्रकाशन हो जाए तो पाठकों को पड़ा लाभ होगा। अब हम ग्रन्थ को मुद्रित होते देख कर इस का परिचप पराने में मुझे रहा श्रानन्द होता है । 1 प्रो० पुस्पोत्तम चन्द्र जी जैन शास्त्री, एम ए , एम श्रो एल कुछ समय तक जिन विद्या भवन' लाहौर में मेरे साथ भी काम करते रहे। वहा इन को तुलनात्मक अनुसन्धान में बडी रचि हो गई । फिर ये ऐचिमनशलेज लाहौर में प्रोफेसर हो गए और डाक्टर आफ फिलामफी की टिगरी प्राप्त करने के लिये शालाराचार्य कृन 'महा- पूरिस चरियं पर थीमिस लिखना प्रारम्भ कर दिया। इस निमित्त इन को जैनाचार्य श्रीमद्विजयमल्लमसूरीश्वर जी म.' मरघर प्रातीय मत्री मुनिश्री छगन लाल जी म. तथा

।
मुनि श्री पुण्य पिजय जी म० अमे विद्वान् मता को मेगा
में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पर तु पंजार विभाजन
के कारण योमिस का काम ममाप्त नहीं हो सका।
उपयुक्त स्थन मे भलीभाति निहित होता है कि
श्री पुरुषोत्तम चन्द्र जी ने तुलनात्मक अनुमन्धान में पूर्ण
योग्यता प्राप्त करने के बाद ही प्रस्तुत ग्रन्थ की रचना की
है । यही कारण है कि प्राय प्रत्येक विषय का विश्लेपण
जैन, वैदिक और बौद्ध तीनों के दृष्टिकोण से रिया है ।
वैदिक, जैन और बौद्ध तीनों भारत के महान ६मों की
मरकृतिया माथ २ चली आई है और तीनों में पारस्परिस
प्रभाव पड़ता रहा है। नहुन मी गातों में जन सरकृति
चटिक और चौद्व सस्कृति से प्रभावित हुई और बहुत मी
वाने जैन मस्कतिने वैदिक और चौद सस्कृति को मिखाई।
श्रत जैन सस्कृति का पूर्णरूप से समझने के लिये वरिक
और बौद्व मस्कृति का समझना परमावश्यक है ।
प्रस्तुत पुस्तर में जैनधर्म विषयक कई एक महत्वपूर्ण
प्रश्नों पर विचार किया गया है जो इस के अध्याय शीर्षकों
से ही प्रस्ट होता है । पुस्तक की रचना शली प्रौढ़ होने के
माथ २ सरल और सम्म भी है। कर्ता ने अपने कथन
सी पुष्टि क लिये यत्र तत्र अनेक शास्त्रीय प्रमाण दिये हैं।

हम के पढ़ने से जहा जैन सरकति रा विद्वान् प्रानन्त ले मरता है वहा मामान्य पाठक भी लाभ उठा सस्ता है। देखने में ग्राता है कि अजेन जनता में जैन धर्म के बारे में अनेक भ्रमभूलक धारणाएँ पाई जाती है, इस पुस्तक में बड़े राचक ढद से उनका निराकरण किया गया है । पहला अध्याय पढ़ने से पता चलता है कि जैनधर्म की प्राचीनता के विषय में लोगों के कैसे निचित्र और यमत्य विचार है । श्री पुस्पोत्तम चन्द्र जी ने एक- एक को ले कर उन का सएडन झिा है । इसी प्रकार जैनधर्म और गजनीति, के प्रकरण में चैदिक राज- नोति को अपेक्षा जैन राजनीति की विशेषताएँ बड़े ही सुन्दर ढङ्ग से वर्णन की गई है। जैनी लोग अपने राजनैतिक सतन्त्र विधानों से प्राय अपरिचित है । उन विधानों का दिर्शन इस प्रकरण में कराया गया है। 'अनेका तबाद' और 'श्रमण-सस्कृति में ईश्वर का स्थान' इन अध्यायों में अन्य कर्ता की दार्शनिक विद्वत्ता का पता चलता है। दार्शनिक विश्लेपण के माथ २ वर्मा ने सामाजिक सुधार की दृष्टि नहीं खोई । यही यात अन्य अध्यायों की है।

(अ)
लेखा ने जेन मस की वर्तमान दशा पर भी रडी
स्पष्ट आलोचना की है। कहा इस का वह जानल्यमान
भूत और कहा प्राजक्ल की परिस्थिति । इम पर केवल
यालोचना ही नहीं की गई बल्कि इसे सुधारने के उपाय
भी बतलाए गए
मुझे पूर्ण विश्वाम है कि यह पुस्ता जन और जेनेतर
दोनों के लिये रडी ही उपयोगी सिद्ध होगी। जैन लोग
तो इस को पत्र अपने धर्म की भूत और वर्तमान दशा
को जान मकते है। जेनेतर लोग इम के पढ़ने से जन
धर्म विषयक असत्य धारणाओं को छोड़ कर उस का
वास्तविक सरूप समझ सकेंगे।
पजानी निमाग,
पटियाला,
बनारसीदास जैन एम ए,
पी. एच डी
(निवृत्त प्रोफेसर पजाब यूनिवसिय)

पियानुक्रमणिका
पृष्ट
१
२५
४६
५६
-नधम की प्राचानता
२-ट्राधड़ जाति म जैनधर्म
३-श्वेताम्बर मत की प्राचीनता
४-बैनम और राजनीति
५ जैन धर्म में वण-यवस्था
किवण यवस्था
वण यवस्था का प्रारम्भ
अनेक मातियों की उत्पनि
जैन व व्यवस्था
दाम वण यवस्था
-जनम मे स्त्री का स्थान
बेदिक धम में नाका स्थान
जैन धर्म में
विवाद
पर्दा प्रथा
धार्मिक जीवन
नारी सम्मान की परामा
७-हिमा परमो धम
वैदिक धम में हिमा श्राहिमा पर पान
जैन धम में घहिमा तन की साधना
राम पिता विचार
दश पुरुष या पर।
C
६०

१२५ १२६ १२७ १२८ १२E 'असि शटनिषध अहिमा की मयादित प्यारा दिमकार अहिसक उद्योग प्राचीन भारत की श्रथ यवस्था शरीर श्रम मेग विशष दावा अहिंसा समाज का प्राण हिमा अहिमा विषयक बौद्धम काण -अनेकात बाद अयदशनों पर प्रभाव जीवन में धर्म की प्रधानता घमनाम पर एक ही वस्तु में दा विरोधी धम V १३ मत भगी १४६ १५४ समवय स्यादाद के वत्तमान अनुयायी सगठन की आवश्यकता सनुचित वातावरण 1-श्रमण-सस्कृति में ईश्वर का स्थान इश्वर विषयक ज्ञान की उत्पत्ति का मून अनेक प्रमों की उत्पत्ति वैदिक मत य वेद में ईश्वर सत्ता ईश्वर ही सूधिकता है वेदान्त दशन में इश्वर १५६ २६२ (र) पृर १६३ द्वैतवार अद्वैतवार साम्य में प्रकृति और पुरुष यायशास्त्र में इश्वर की परिभाषा श्रमण मति में इश्वर ईश्वर साष्टकता क्यों नहीं। जैन मन्तव्य १६८ १७१ १७२ १७४ १५६ १७८ १७६ मृति की उत्पत्ति पर काममार में मचे घ बौद्ध धर्म में इश्वर की मा यता बौद्ध धम में निवाण बौद्ध परम्परा में चणिकवाद निन्य सत्य धम निकाय एकान ध्यान की प्रधानता १० श्रमण सस्कृति का स्वरूप सस्कृति का परिभाषा संस्कृति और सभ्यता श्रमण सस्कृति की विशषताए कर्म विपाक भौतिकवाद और धात्मतत्त्व पञ्च महात १८१ १८३ १८७ सत्य ૨૨ प्रस्तय Vब्रह्मचर्य १६३

१६५
२६६
'१६६
বিস
तपकी प्रानता
मामाजिक जीवन
गृहस्थ धम
विवाह
श्रमण सस्कृतिक प्रतक
भमण-मरकृति का मानता
२०४
२०५

पृष्ट . ३ ३ AU शुद्धि-पर पक्ति श्रशुद्ध यानुयाम चातुयाम 'निषाणमामय' इत्यादि पाट कल्पमून का रीका का है। कल्पसूत्र का पाठदम प्रकार है - उप्पि समेय मिहरमि' पृ० २०८ प्रा. ७ इत्मीण इत्यीण १० प्राचन प्राचीन सार सारष्ठे शास्त्रय शास्त्राय २ ग्रथा प्रथों ७ २३ २७ २६ २ " ६ विस्तारा " ३२ ६ १८ राजाश्र रात्राधा स्मण स्मरण ऋणान ऋणदाम विस्तारा वृदहनीति बहदईनीति तापते तापित टुष्टय दुश्श्य बना चिना व यरस्था वर्य यस्या सिद्धगण वएच व च का विसमा तो विससा नाराम नराणाम् अमान्तर मान्तर . Gmf. JANAu १० दर पत्र पति अशुद बनन স্মামী वह शुद्ध ननना श्रागामी २१ १०० ८ मना ११८ सामा मारना મીer जा उद्योग १२५ उद्याग १२ १८ " चन भातीय पचार U बन २० भारतीय प्रचार जैन सहार भूमि सभवति जावों ८ सहार ભૂમિ मभवात जर्वा कम भा ३ काम भी २७३ २० जा १७४ ४ " द्वेषदि बदन भवान् Y १८६ १६२ १६५ ६ २०० जीवन भगवान् रौरव और मनुष्य सस्कृति मागवतिन्य और मनु य मस्कृति मागमती य द्विजम्मा २१ १८ द्विज मा

अनेक गवेषणायों ने उन पर
॥ प्रीयता भगवान् शूपमनी ।
TIVYYYYYXIITY
॥जैन धर्म की प्राचीनता ।
EASLELLELATER
जैन धर्म की उत्पत्ति के नियम
जा सकता क्योंकि यह धम अनाज
पत समय तक ता कुछ भारदोष मनो
चौद्ध धम की ही एक शाखा मान्ने परन्तु इस
गवेपणाए हो चुकी हैं उन आपापन
धम बौद्ध धम से बहुत प्राचन रकम
ना कुछ विद्वान् गही मानते रहनिमाल
नाम है। इस ये पधात्
वामन
कि महावीर स्वामी वास्तवमा
उहाने हा जन धमका वन मन धमका
अस्तित्व न या विद्वानों ने मिलने वाले मार
स्वामी श्रवश्य ऐतिहासिक व्यनिन मायबोल"
समय की प्रगति प साथ २हम और भाभा
पाल्पनिक ममझी बानी या एम प्रकट हुई
१साद वो पहले
बड़ी२ गरेपणा हुई और
करों का नाम लिया जाता है या निक
व्यक्ति

[ २ । । । जिस प्रकार वैदिक मन्त य के अनुमार परमात्मा इस सुधि का सहार के बाद 'यथा पूर्वमकल्पयत् ' पूर्व को तरह पुन को तरह पुन निमाण करता है और पूर्व की तरह पिर भगवान् अनेक अवतार के रूप म अवतरित होता है । इसी प्रकार जैन धर्म म भी समय समय पर पूर्ववत् त यंकर अवतार लते रहत है श्रार जैन धमशान की सपना का प्रकर करते रहते हैं । यह चा इसी प्रकार निरतर चलता रहता है। जैनधम के श्रादि ताथ कर भगवान् ऋषभ स्वामी थे श्रार अन्तिम दा श्री पार नायबी बार भगवान् महावार जी। जैनधम का वैदिक धम से तुलना के साथ साथ इस बात का पान रखना परम वश्यक है कि दक धम -/ समार का श्रादि श्रार अन्नवाला मानता है कि तु जैन धम सार का अनादिभार अनन्त मानता है। अतएव जैन धम में वदिक सिद्धात का तरह सष्टि की उत्पत्ति श्रार सहार नहा हाते किन्नु सष्टि का प्रवाह उसी प्रकार अन त काल स चला पा रहा है शोर चलता रहेगा। हा । जैस कि पहिले लिखा जा चुका है कि पहले नो नैनधर्म को बौद्ध धम की शाग्वा माना जाता था रि मगर स्वामी को बनधम का उत्सादक माना जाने लगा किन्तु अबतक का खाज के परिणाम स्वरूप नैनों के २३ व तीथकर भी पाश्वनाथ जी को भी ऐतिहासिक यति माना जा चुका है। उदाहरण प लिये महायर स्वामी जी के पिता सिद्धाय कश्यप गोत्र के थे ओर मार क्षत्रिय थे। नायडुल चदे' ऐमा कल्प मूर में भी पाठ पाता है। महावीर स्वामी को उन 7 जावन काल में भी लोग 'जातृ पुत्र" म स बानते या पानी में नात' शात को ही कहते हैं। इस प्रकार 'ज्ञात पुर" का श्रय होता है "नात पुत्र" । 'नाय पुत्र" और 'नाययुत्त" की समानता प्रत्यक्ष है। वादों के "सामााल सुन" म नात पुन क धम का वणन करते हुए इस प्रकार लिखा है-

'यातुयाम
मपर सवुत्तो'
इस में यानुयाम शब्द बड़ा ही सार गर्मित है । पाश्चात्य विद्वान्
जैकपी ने लिम्वा है कि यहा यानुयाम श द महावीर पार २३वे तीथकर
पाय नाय इन दोना रे सिद्धान्त प्रचार की भिन्नता दिखाता है । पाश
नाय के समय चार ही महानत थे। जैसे अहिंसा, मत्य अस्तेय,
श्रार परिग्रह त्याग । ब्रह्मचय नामक महाव्रत का ता महावीर स्वामी
ने हो सम्मिलित किया श्रतएर पारानाथ का धर्म यातुयाम' और
महावीर का पच्याम' है। इस प्रकार 'पचयाम' का प्रचार करने
वाले भगवान् म पार से भिन्न 'चातुयाम' के प्रचारक जैनधम ये
२३ वे तीधर भी पाशनाथ जा ऐतिहासिक “यक्तिस म कोई
मदेह नहा रह जाता।
इसके अतिरिन गाल का मम्मेत शिवर वो पारानाथ
पहाड़ी के नाम से प्रसिद्ध है जैना के प्रधान तीयों म से एक है।
भद्रा रचित 'कल्प सूत्र' जिस का रचनाकाल ईसा पू। ३०० षष
करीर है उम में श्री श्री पारसनाथ जी के विषय में वणन श्राता है
उम का एक उद्धरण इस प्रकार है-
"णिमासन्न संमेताद्रौ ययौ प्रभु ।
(कल्पसत्र-पृष्ठ १६८)
-
अर्थात् निवाण के समय श्री पारानाथ प्रभु इसी समेत
शिखर पर श्राए और यहीं से मोक्षपद को प्राप्त हुए।
इसी प्रकार हेमचन्द्राचार्य विरचित "त्रिपत्रिशलाका पुरुष
चरित्र में भी-

ज्ञात्वा निगराएमामन समेताद्रौ ययौ प्रभु । यस्त्रिश मुनि युतो मास वनशनं व्य गत् ।। (विष श पुन पृष्ठ २१६ ) अथात् निगण र समय श्री पाश्वनाथ प्रभु भमेत शिवर पर था। ३३ मुनि भी उन माय थे और उझाने वहाँ महीने का अनशन भी किया। इस प्रकार के वणन प्रभु पारानाथ के विषय म शास्त्रा में यत्र तर उम ऐतिहामिक सत्य की पुष्टि करते हैं, जिस के श्रार पर श्रतक परपरा से चले थाने समेत शिपर को पाशनाय पहादी में नाम से पुकारा जाता है। इस तरह जैन म २३ वे तीथपर श्री पानाथ बीघामो ऐतिहामिक व्यनि मिद्ध हा जाते हैं। उपयुक्त विश्लपण से पारर यह न समझे कि श्री पाश्वनाथ प्रभु ऐतिरासिक पक्ति सिद्ध हो चुके हैं। हम कारण अनधम का प्रारम्भ उन से ही समझना चाहिये। ऐसा समझना सस्य से दूर जाना होगा। भगवान महावीर और भी पाशानाय प्रभु इन दो अवतारों के अतिरिक्त श्रय २२ तीथक र विषय में हम भले ही श्रामुनिक यज्ञानिक दृषि से महत्व रखने वाले प्रमाण देने में श्रममथ हाकिंतु इम काथ यह नहीं कि वे वास्तव में काल्पनिक ही है। उन 7 जावन रे विषय में कुछ एक प्रमाण ऐसे मिलते है जिहें महत्व दिया जाना चाहिये । मथुरा में फकाली गले की सुई से बहुत से जैनधम 4 प्रताक अवशेष निकले हैं । इनका समय ईमा पूर्व २०० वर है। यही से जी शिलालेख मिले हैं उन में भक्तान अपनी श्रद्धाञ्जलि श्री ऋषभनाथ जी स्वामी को इस प्रकार दी है। प्रीयता भगवान ऋषभ श्री , या रहे कि शपभ स्वामी जैन धर्म के प्रग्म तीयका है। इस अतिरिन पाय मभी रिमालया में "नमामिण " धाता जिमका अथ स है कि या मनी मिन्नु त से तायारोमा श्रद्धाजन दो गई है। यदि भगवान् मावार स्वामा या पार नाथ प्रभु मे जैन यम का प्रारम्भ हुअाहता ता उन दाना २ या एक पनाम निनकर ही भदायलिया दाहाता । ऐमा पर क श्रादि सायकर पम स्वामी का नाम शिलालेया में याता है। जिन का श्रद्धाल दागदार उन अतिरिक्त बाकी कमर तथरा का प्रद्धावलिया दागद है । इम स यह पण है कि श्री ऋपम स्वामी से ले कर अन्य मरतयकर ममय-समय पर अवतार ले चुर हैं पार उन मत्रा लिय हाकाली दल र शिनानन्या में श्रद्धामनिया अर्जित की ग है। निस्सन्देह हमारे पास ऐसे अकाट्य और वजनदार प्रमाण नही है बिन र श्राधार पर परम तोय करा का हा ऐतिहानिक यन मिद्ध' का 'दया वा निन्तु स २ उत्तरात्तर वानहाती जायेगी और इतिहास पर पारा जाय।। १२ श्रावकीकान्पनिक वाने मत्यमा म माना बाने लगेंगी । पहिले तो लाग जैन धमा बौद्ध धम से पृथक् अस्तित्व हा न मानने थे किन्नु श्रय मानन हैं । पहिले तो लाग भगवान महावर स्वामो और पाशनाय प्रभु को भी एतिहामिक व्यक्ति नहीं मानने थे, मिनु श्रर मभी विद्वान मानते हैं। भविष्य में जैसे ही प्रमाण मिलते जाएगे म हो अन्य तयारों को भी ऐतिहामिक यनि मान लिया जायगा। वैदिक धम के प्राचीनतम प्र य ऋग्वेद को कुछ विद्वार इमा पूर्व १२०० वा मानवे गे और कुछ २५०० थप मानते थे वितु मोहन बोड़ो नगर मी सुदाइ क याद बा मो३ हुई है उम पे आधार पर- श्रम विद्वान् लाग पद को ३ ००० वष का पुराना मनने लगे हैं। इस प्रकार प्रमाण मिशन पर पूरा प पिनार रहाते रहते हैं। मुझ पूण विश्वास है कि भविष्य को साज अवश्य ही त यसरी व व्यनि त्व पर म त्वरण प्रकाश डालगी। आ यह प्रमगवश यह दशाना श्रमगत होगा कितने प्रानीन प्राग्वेद तथा अ य व ! में यत्र तर तीथरों 7 नाम थाते हैं । 'नेस- य नश्वास नसभा उत्क्षणो शामेपा अपमृधाम माहुता। ग्वेद ११/१४ सोमि राजा परियाति यिद म प्रा पुष्टि +धयमानो म म्यारा। । या०६२५ ऋग्वे और यनुन दो मात्रा में जैनियां व श्रादि तयार की अपभ पामी और २२7 तीयदर भी मिनाथ का नाम पाया है। हम सभी जैन धर्म का प्राचीनता पर बड़ा प्रकाश पड़ता है। इम ने अतिरिन नैन धम का प्राचीनतम नाम "निग्गर पथण" अथात् निम य प्रवचन या और शब्द का प्रयोग तो सवत् १००० ये लगभग प्रयाग में श्राो लगा । इसमें पूरी जैन शब्द का प्रयोग बहुत ही कम होता था। और इमरे स्थान पर निम प प्रवचन" का प्रयाग होता था। जैनागम भी इसा सत्य की पुष्टि करते हैं। 'यण दाहामु तुम नियहा। उत्तराध्ययन श्र. १२ श्लो. १६ 'नो इक्षीण कइ कहित्ता हवइ से निम्ग थे" उत्त०१६/२ इसी प्रकार श्राचाराग श्रार कल्प मूवारि अागमा म मा निथ शद अन सानु साध्विय लिये ही प्रयाग मनाता है। बौद्धोक धम प्रय 'मगरि नि बाण मुत्त म निगाह श.का प्रयाग किया गया है। प्रशाक र शिलालेखो म भो 'निग्गर' शब्द प्राता है, जिम का अभप्राय जैन साधुश्रा स हा है। बाक पिटको मता सा बताया गया है 'निग्गर' बद्धो र तिट दाथ। इस स य स है कि निग्गर बाधम स बहुत प्राचीन काल स चले प्रात य श्रार वे ममय २ पर बौद्ध धम का बड़ा विरोध करत रहे । इस प्रकार 'निगार' शब्द क प्रयाग स भी जैन धम भारत का अत प्राचन धम सिद्ध हाता है। महननाडा और हड़प्पा को खुइ मे जा अवशर निकले हैं थे भा जैनधम की प्राचीनता पर बड़ा प्रकाश डालते हैं। इप्पा स एक साल निकली है जिस का चित्र लाहार के डाक्टर बनारसादास जैन द्वारा सम्मा दत बन विया" नामा मासिक पत्र के मुम्बपृष्ठ पर दिया गया है । हड़प्पा । इस अवशेष पर कायोत्सग मुद्रा म खई हुए एक यागो का मूर्ति है। धान रह कि तमधया का कायोत्सग पान की प्रथा जैन धम म ही परपरा स चली श्रारही है। योगा को इस मूर्ति के सिर पर सपण हैं, जिन का सारा तान दिखाई देता है। नेम धम सात तो कर मुराश्र्वनाथ श्रार तेइमवे तीथर पाव नाथ 7 सिर पर भी इसा प्रकार २ सपण पाए जाते हैं । यह मूर्ति पाश्वनाथ की तो हा नहीं सकता क्योंकि उन को हुए तो करीब २७०० वष हुआ है । ग्वाज करो वाले विद्वानों ने इस कायात्सग की मूर्ति वाली हहणा का मील का ५००० वर्ष पुरानी माना है। अत यह मुति जैन धम के मातवे तीर्थकर मुशाश्वनाथ का होनी चाहिये। इस, इस पान स पवन जैनधम ने बहुत प्रावन हाने का ही पता नहीं चनता जितु निया + सातव तथवर मुशवनाय । यत्ति स्व पर भी बड़ा प्रकाश पड़ता है। दमाम बाइ श्राश्रय न कि भविष्य में श्र र कुछ दान अवशेष मिन आयें, जिन र श्राधार पर पाश्वनाथ की तरह सासव तीथकर श्री सुगश्वनाथ का भी एतिहासिक यति मान लिया जाय। त्रिम प्रकार श्रम ता घतात काल अवशेष भविष्य का इतिहास पर सत्य का प्रमश डाला है और उम उज्वन बनाया है, हमा प्रकार भविष्य में भी हाता रहेगा।

॥ द्राविड़ जाति में जैन धर्म ॥
द्राविड़ लाग नागा करतेय! अपना न भाइसे अपनारा
ग्राम भीलो नाग पनमी कावार नना नाना ३६
मापान प्रपाका कार्य प्राय वाति वि-
मामार राव और ग्रारों ने
बुद्ध भारतीय विद्वान् ता भारत को अनादिकाल म बायोग
निवास स्थान मानते है कि कुछ विद्वान् भारा विज्ञान छ,
पर तया श्र य क ऐतिहामिक प्रमाणा के अाधार र यारों
का मार स भारत में श्रागमन बताते हैं । प्राय :
राधेपणा से यह पण है कि श्रायों य भारत में प्रागमन न पूजा
द्राचद वाति र लाग रहने थे। द्राविड़ नाति कदुम यस
प्रादि कई भेद । इतिहास से यह जाति भारत का नाम जति
सिद्ध दाती ।। श्रायों में भारत में प्रागमन के पद पाना बायोम
फारी मधप चलता रहा। वैदिक धर्म अति प्रावन म प्रय
पदम कामाक्ष देता है। उदाइरस केनिम करिता
बास ने यट यार तुवमा का हराया।
८.३
कुछ काल पथात् दोनों अनि शनि भूबर रहन ।
हमा जातियों में विवाद सम्बध भी शान र साना न ए दूसरे
वे देवता का भी अपना लिया और उनकी पूजा करने हा
देवों को मानना और पूना मान दिया । भगवान र
F
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(१०) समिभय को प्रकट करता है। जैना मातो श्रार तेईसवे तीर्थकरी फे शिरों पर सुपर के चिन्हों का भी होना कुछ २ उसी प्राचीन सभ्यता की झनक हो सकता है। अपने २ धम प्रथों के अनुमार हम भले ही इन चि हा का बेसा चाहं अर्थ कर लें किन्तु साथ २ चले आते धर्मों के पारस्परिक प्रभाव का छिगाया नह ना मकता । द्राविड़ जाति के लोग जि हे पाय अपना शत्रु मानते थे और अनाय कह कर पुकारते य अन्त म प्राय लोगों का प्रभावित करने में साल हुए। यहा तक कि वे हिन्दू ही नहीं ब्रामण वन गये । कि तु विशपता यह रहा कि प्रामण बनकर मी वे द्राविड़ जाति से अलग नहीं हुए द्राविड़ बाति का गारव सदा उन के सामने रहता था। प्राय जाति र मूलपुरुष मनु का भा उदाने दाविद बना डाला । भागवत पुराण में लिखा है- योऽसा सत्यवतो नाम राजपि विडश्वर । स ये विवस्वत पुनो मनुरासोदिति श्रुतम् ॥ श्रयात् सत्यरत नाम का राजनिविड राजा ही वैवस्वत मनु बनाया। इस शाक में तो पाया की उत्पत्ति ही द्राविड़ों से होने का प्रयत्न किया गया है । बो साथा असत्य है कि तत्कालीन द्रविड़ों के व्यापक प्रभाव का इस से शष्ट पता चलता है। प्राय जाति शायद 7 द्राविड़ लोगों को इतना प्रभावित न कर सकी जितना द्राविड़ा ने प्राय धाति को दिया। सुयोग्य विधान पण्डित रघुनतम शमा जी वैदिक मम्मति के पृष्ट ३७७ पर लिम्वते हैं कि रावण भी द्रविड़ शमा था और उम ने वेस पर भाष्य निसा था। रिमामय यश सुरापान, मांसभक्षण, व्यभिचार और लिंगपूजनादि स दूषित बातें द्रविड़ा से ही आया में श्री मिशन ची भारत यप के इतिहास भाग १४६८ पर लिखते हैं कि 'प्राचीन सय के श्रवलान से इरना अनुमान हाता है कि या अन य लोग भूत, प्रेत पति और वृद श्रादि को पूजते थे। श्राय मन से रुद्रकाली श्रादि के पूजन-विधान तत्कालिक अनायमत की छाया से ममझ पड़ते हैं।" अस्तु, उपयुक्त विवण से यह स्पष्ट है कि द्रविड़ और प्रार्य जाति या धमों म सघप के पश्चात् मेज हो गया था श्रार दोनों ने एक दूसरे की सस्कृति का अपना लिया । निश्चित रूप से यह कहन। कटिन है कि कौन सी प्रथा विमने किससे अपनाई क्योकि धममयों में निम पाट को विद्वानों का एक दल प्रक्षिम मानता है उमी को दूमग दल मौलिक स्वीकार करता है। जैन धम को हम भारत म अनादि काल से चला आता धम मानते हैं । श्रम प्रश्न यह है कि बर द्राविड़ भार प्राय जाति में सपष चल रहा था और अब अन्त में दोनों ने एक दूसरे की सस्कृति को अपना लिया । उस समय जैन धमका भी अस्तित्व मिलता है या नहा! अभी तक मेरे देवने में तो कोई प्राय नहीं पाया, जिस में उस समय के जैन धमके इतिहास का पता चल सके। हा यत्र तन जैन और वैदिक धर्म के प्रयों में कुछ उद्धरण अवश्य ऐसे पाते हैं जिनमें हम तत्कालीन जैन धम के अस्तित्व का पता लगा सस्ते हैं। जैसे दिगम्बर जैन सम्प्रदाय का "दशन सार" नामक एक मय है। इस में बहुत से जैन सपों की स्थापना बताई गई है। दर्शनमार में लिखा है कि पत्र नन्दी ने मथुरा में द्राविड़ सघ की स्थापना की। मुल संप की देव, नदी, सिंह सेन नाम की चार

उन नारी में दावि मप का ध्यान न मिनावनदान ६
स्वतत्र ही द्रावित सघ का स्थापना की। एक विद्वान् ने तो हावर
संघ का नन्दी सब को दी शाया मानानु गुम उमका
युतियां सतोष जनक प्रतीत नहीं होती। भापलिस अधी
ने मूल संघ का चार मरा में विभा किंगा पार द्वावि मा का
उमम नरिसा
पनि दाविद मम्प्रदाय मानहाता तान घार में
श्रयश्य माता श्रत यह बाद की चारना है।"
यह युति कोई सारपूण प्रतीत नहीं सकता है कि
श्री मून संघ के माय २ चले पाते द्रावर सप म ध मेदान्तिक मन
मदद बिन के कारण अधवमी 1 उसे अपने नयीन चार समों में
रखना उचित न समझा। अतएव चार सपा में दासिघ का न
रखा थाना उसकी प्राचीनता का बाधक ना अपने सपने को
मिति ये लिय भार लिगते हैं कि 'हरु गुला पय जिम में ब६ २ न
गुरुहुए हैं और जिस का द्राविड़ सघ से महा सम्बध था वह भी नदी
मर का हा भेद था। रुगुनान्वय का न दी घ की शाखा मानने
में हम कोइ आपत्ति नही वितु दाविद सघ का 5 गुलान्वय
से
मम्बध मात्र उसे नन्दी मघ की शाम किमी मूरत म सिद्ध नहीं कर
सक्ता।
११६. ईस्वी के रिकार में बो दाविद मध के अनुपाया भूत
वी, पुष्पद त ओर ममन्त भद्र श्रादि नाम पाए हैं उसे द्राविड मध
फे प्रचारक और उन्नति पथ पर सान वाले भानना अधिक गत
मालूम होता है । द्राविड सप से सम्बध रखने वाले या उस पे अनु
यायी भद्रबाहु जिनका स्वगारोपण काल वीर सपन १७. है उनको
येवल लेसा ने उनकी स्मृति बनाए रखने के लिये लिख दिया है। ऐमी
-

यहा द्रविड़ शब्द विश नमनाक
स्वामी को हम अादि तीथकर मतपत्रकादवाकर
भी दाविड़ बाति में जेनयम का इन टिपटा है।
भागवत् पुराण में इन राजनागात्र धन
पारे
उपना करना भा नहीं बचा। इस लिय द्राविड सर का श्रीमून
में
भाप्राचान या उमर साय२ चला श्राता सर मानन में कोई थारा
मालूम नहीं देती।
इम प्रकार जैन धम में द्राविड़ मघ की स्थापना से या .
प्रकार अनुमान लगाया जा सकता है कि दादि जाति का और
ऐमी राग्वा अवश्य की वा बैन धमावलम्बी थी। या दूम
प्राचीन द्राविद जाति में बैनधम का अस्तित्व भी दाविद प्रार
स्थापना में कारण हो सकता है।
जैन माहित्य के अतिरिन वदिक साहित्य में कुमार
इस मत्य के पोषक हैं। जैनधम ने यानि न यंगमन
जाते हैं। भागवत् पुराण में ऋषभ को वैमाrt
और इस में वर्णित ऋषम बावन चरित्र नम
बिस्कुल मिलता जुलता है। इतना समानता है
किन"
माना कि ये दानों वैदिक भार अन ऋषभ मिलन
मी पुत्रों व वणन म यह श्लोक प्राता है-
परिहरि रतरिक्ष प्रः चिना
श्राविोत्रोऽथ विश्वनन ॥
बाले बताया है कि तु या न्दं में देशवार'
और जैन धर्म का उस समदड मुन
दूसरे पे सिदा को को परिवािमागविक?'

उपयुन प्रमाण ग यह रस कनयम प्रायों में ग्रागमन
५ पु प्रचलित मा म से। प्रयों के मान ने पभत् भी
दम न उन स वायर रकर लाश्रर अग्ने उग्व मितो मलार
पिरप्राय धम भी बन गया। ममय भान परकार यह भारत का
गजधम भी बना । म य 31 मिद्धान्त से वैदिक और गैर
स परियियों में जायत रमा। युदधम जैम पापक राजधम भारत
से
लुमवाय हो गए कि नवम अरना यति पाये हुए है।

ଯଯଯ ଯଯଯଯଯଯଯଯଯଯୟ এললে "श्वेताम्बर मत की प्राचीनता" Lagogcuocoggagoggagod ममय, परिस्थिति तथा बर किसी समाज धम या सम्प्रदाय में अने रिया तथा "यूनताए अपनी अन्तिम सीमा पर पहुंच जाता है तो उ है मुधारन के लिये किसी सुगारक महापुरुष का जम होता है प्रार वह अपने दृष्टिकोण के अनुकूल किमी नये धम या सम्प्र-य को बम देता है। इस प्रकार अनाटिकाल से प्रवाह सा ससार में पातावरण र परिवतन कारण श्रने धम और सम्प्रदायों की उत्पत्ति होती रहता है। किसी भी धम अथवा सम्प्रदाय की स्थिरता उसका मिद्धातों पर निमर है । यदि उम में सिद्धान्त समयानुकूल है प्रार समाज के लिये उपयोगी है । तो उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि र स्थिरता निश्चित है। यदि उस के नियम समय विरुद्ध है तथा समाज को अवन ते पथ पर लाने वाले हैं ता उन का अस्तित्व शान मिटने में कोई स देह नहीं हो सकता । यही कारण है कि ससार में श्राजतक सकड़ा ऐस घम या सम्प्राय उत्पन्न हुए वा अल्पकाल लिय ही पले फूल पार उत्तर समय विरुद्ध इान के कारण ये एम मिटते गए कि श्राज उन का नाम निशान भी नहीं रहा । वा समया नुकूल ये तथा जिनकी नीव सत्य भार स म ग पर रपी हुई थी वे अनेक प्रतिरोधों का सामना करते हुए श्रक अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं और ससार को उन्नत पथ की भार ले जारहे हैं। जैनधम भी उन्हीं महान धमों में से एक है। इस म भा ययपि उत्तरोत्तर अनेक सम्प्रहार मनते बाते हैं परन्तु वानव में पर परा से चले ग्राने इस [८] सीमित है । इस के अतिरिन वेद मात्रों में वा कशिन् शब्द श्राया है। यह भी ध्यान देने योग्य है ! शिन का प्रथ है लम्बे २ बालों वाला। वास्तव में लम्बी २ जरायों को धारण करने वाले पिहें हम ग्राज भी महती सख्या में भारत ३ र प्रदेशों में पाते हैं पदिक सम्म प्रय के हो साधु हाने चाहिये, दिगम्बर बन के नहीं। दिगम्बर साधु विशाल केश धारा नहीं पाए बात । अत ऋग्वेद के अन्य से यह निणय करना कि श्वताम्बर स दिगम्बर प्राचीन है सम्भव नहीं हो सकता। यतमान जैनधर्म के लिय बा । जैन शद प्रचलित है इस का प्रयाग भगवान् महावीर स्वामी क बाद म प्रयाग में थाने लगा इस के पूर्व 'तीर्थकर धम' को निग्गर पवयण" अथात् निमय प्रवचन के नाम से पुकारा न ता था। महाराज प्रशाक प शिलालवा में भी यन नग्गठ' शन का प्रयाग श्राता है। वह निग्गठ' स अभिप्राय जैन घम से ही है । कुछ विद्वान् निन्य काश्रय वस्त्र रहित करते हैं और उससे यह सिद्ध करते हैं कि अशोक ये समय में बा जैनधर्म प्रचलित था वह दिगम्बर जैन था क्योंकि दिगम्बर जैनियों की ही मूर्तिया तथा साधु नम पाए जाते हैं । इस प्रकार ये 'नि' शब्द का व्याख्या स दिगम्बर सम्प्रदाय का श्वेताम्बर सम्प्रदाय से प्राचान मिद करने का प्रयत्न करते हैं। मेर विचार से निप्र न्य, शब्द का अय उन्हाने ठीक नहीं समझा। 'निनन्य' शब्द में 'प्रमि" शब्द का अप वास्तव में राग द्वेषादि ब धन करना हा उचित बान पड़ता है। श्रात्मा को बधन में डालने वाले वास्तव म राग प ही है न कि बाधापकरण रूप वस्त्रादि । वस्त्रादि बाह्य परिग्रह को धारण करन वाले शरीर म स्थाधारमा यदि रागष श्रादि से मुक्त हो जाय तो उसे प्रयि रहित समझना चाहिये । श्राध्यात्मिक मुनि के लिये ज्ञान की प्रावश्यक्ता,है जिस ५ द्वारा रागदपादि - - For शत्रुत्रों का नाश होता है। यत्रादि ब्राह्मोपकरण प्रारम धम में किसी प्रकार की भी बाधा नहीं डाल सकते। क्या वस्त्रारि बायोपकरणों से दूर दन मात्र से प्रारमा कभी रागानि देषो से मुसी पा सकता है ! श्राबल भी हमारे सामने रोस अनक उदाहण है वहां वस्त्रादि बाह्यापकरणों के मद्भाव में भी पविगत्माए छिपी मिलता हैं | और इम विपरीत बाह्यापकरणों मेगन शर में गगीपारि से मलिन यात्माए वतमान हैं । श्रत ग्राम धम में बाधक जान का प्रभाव हो सकता है वनादि का सत्भार या प्रभाव उस के लिये अपक्षित नहीं। कितन श्राश्चय की बात है कि ग्राम विक सवार के युग में भी कितने ही समझदार पुरुष इन बातों को इतना महत्त्व देते हैं। श्रस्तु, मेरे विचार सन यश का प्रथ रागदपार मधन मुक्त करना मगत है। इस प्रकार 'निमय' शब्द दे धाधार पर दिगम्बर मराय का प्राचीनता मिटनहीं हो पाती। देवसनाचाय कृत दशनमार नाम का एक माय है। इसमय में काक याना दिस श्राधार पर कुछ विद्वाना ने दगम्बर मत का श्वेताम्बर गत से पाचन मिद करो का प्रयत्न किया है। इम मय का रचनाकाल विक्रम मच ६६ है। बार इस प्रकार छतामे बरिमसा चिजम रायस्म मरणपत्तत्स। सार' जाहीर उप्परणों सेयदो सग ॥ शोर अथात् विक्रम का मृत्यु के १३६ वर्ष पमान संराष्ट्र देश के धन्लभी पुर में श्वेताम्बर सघ को पति दुइ । इम स यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि विषम की दूसरी म 1 में ही श्वेताम्बर जैन सम्प्रदाय की उत्ति हर (२०) या। से पूर्ण दिगम्बर संप्रदाय ही परपरा से चला श्राता था। मेरे विचार से उपयुक्त दर्शनार का उदाहरण कई महत्व नहीं रखता क्योंकि इस प्रकार का एक उदाहरण श्वेतांबर ग्रन्था म भी प्राता है। वह गाथा इस प्रकार है। छब्बास स स्सेहि नमुत्तरेहि सिद्धिगयस्स पीरस्स । तो वोडियार दिट्टी रहवीर पुरे समुपन्ना ।। अर्थात्- वीर भगवान् के मुक्त होने के ६.५ षष पश्चात् पोट्टिको श्रर्थात् दिगम्बरों का प्रवर्तक रथधी पुर में पैदा इस के अतिरिक्त दशनमार के उदाहरण के आधार पर यदि श्वेताम्बर सम्प्रदाय की उत्पत्ति विक्रम की मृत्यु १३६ वष पश्चात् मान ली आए तो एक बड़ी अड़चन सामने पाती है। महाराज अशोक के पश्चात् कलिदाधिपति स्वार्वल बना । वह जैन सम्राट थे । उदयगिरि और खण्डगिरि स्थित हस्तिगुण नामक गुफा से बो खावत का शिलालेय मिला है उम का सुयोग्य विद्वान् श्री ३० पी० जयसवाल ने विवण दिया है। इस लेख का समय ईस्वीसन से १७० वध पूर्व निश्चित किया है। मम्राट ग्वावेल किस प्रकार जैन साधुनों को अनेक प्रकार के कौशेय और श्वेतवस्त्र बांग करते थे इसका इम शिलालेग्व में बड़ा सुटर वणन मिलता है। यदि श्वेताम्बरों की उत्पत्ति विक्रम की दूसरी शताब्दी में हुई होती तो खावेल का ईमा पूर्ण १७० में जैन साधुओं को श्वेत् तथा पह पत्र बांटना केस सगत हो सकता है । श्रत यह स्पष्ट है कि दशनसार की गाथा दिगम्बर मत की प्राचीनता को सिद्ध नहीं करती। ससार में जितने भी उच्चकोटि के धम प्राय सब अध्यात्मिक दृष्टि से पुरुष और स्त्री को ममान अधीकारी समझते हैं। सब धर्मों के भी मिर प्राचीन प्रमाणिक प्रया में पुरुष और स्त्री दोनों का ज्ञान 7 समान अधिकारी माना है। गत विश्व युद्ध से भी यह स्पष्ट है कि महिला " मोवन क्षेत्र के किसी भी विभाग में पुरुषों से यून नहीं रही है। साहित्य, विज्ञान और राजनीति श्रादि क्षेत्रों में स्त्रियों ने ऐका प्रवीणता दिवाई है निस क्मिी भी प्रश में पुरुषा से कम नहीं कहा जा सकता। यद्यपि हमारे देश में स्त्री जाति को अबना बाति अथवा निबन्न वाति के नाम से पुकारा बाता है रितु ममार के इतिहास में म्बी बाति के ऐसे वीरता के कारनाम मिलते हैं जिन के सामने पुरुष का मुकाना पड़ता है। भारत के प्रति प्राचीन घम प्रयो से भी यह स्पष्ट है कि स्त्री से पुरुष के समान ही अ धकार थे । यहा तक कि यज्ञ में भी पानी के बिना पति दीक्षित न हो सकता था। राम ने अश्वमेघ यश किया ता सीता के अभाव में उम को स्वणमयी मूर्ति बना कर रग्वनी पड़ा। गार्गी की विद्वत्ता से विद्वान भनी मात परिचित हैं। इस प्रकार वैदिक धर्म ग्रन्था में स्त्री का स्थान कमकाण्ड तथा शानादि क्षेत्रों में समान है। प्राचीन उपलध शिलालवों ताड़ पर लिखित ग्रन्या और मिका श्रादि के अाधार पर बा गवेषणा हुई है उम से यह सत्र है कि वैदिक धम अनेक मदिया से भारत का यापक धम रहा है। इसने महान् और व्यापक धम के साथ २ चलना और अपना सघषमय बीवन बिताना एक ऐसे दो धम के लिये सम्भव हो सकता है जिस के सिद्धान्त या तो अपने प्रतिदनी के मुकाबले के हो या किसी दृष्टि में उस से भा उत्कृष्ता रखते ह। मेरे विचार में यदि जन धम प्राचीन काल में स्त्री का शानदेन में पुरुष के समान अधिकारिणी न मानता तो वैदिक विद्वान् उमकी ऐसी विल्ली उड़ाने और उसका ऐसा खण्डन करते कि माज Arian अस्तित्व भी शायद कठिनता से रह पाता। --- .

(२२)
अनुकूल
-
समय परिवतन माय २ ममार की परिस्थिति सा चलती
रहती है। बा जाति, धम वा सम्प्रदाय अपने को समय के
बना लता है वही अपना अस्तिस्य अनाय रख सकता है। बिस में
ममशनुक्ल परिवर्तित दान की शान मही है उमका मिट जाना
माभाविक है। किंतु तिने श्राश्चय की रात है कि श्राब क जानिक
र विकासवाद के युग में भी कितने पठित पति भी पुरानी
श्र धपरम्परा द स स मुन नहीं हो पाए हैं। श्रन्तु, मेरे कहने का
अभिप्राय यह है कि य धमों का तरह बन धम म भी स्त्री का
पुरुष के समान ही शान को अधिकारिणी माना है। श्वलाम्बर
सम्प्रदाय को अनेक माधयें इसका प्रत्यक्ष प्रमाण
नाघमा सिद्धान बड़े विशाल और महत्वपूर्ण है। जेन
धम मनुष्य मात्र का चाहे वह किसी भी धम का अनुयाया हो मक्ष
का अधिकारी मानता है। जैन एम की विशालता देसने १ लिये
थी हमच विाय का अधालिम्पित भाक ध्यान देन योग्य है। पत्र
शानाय जी वैदिक मत के देवता भगवान् साम य मन्दिर के सामने
थाए ता उहीने कहा
भवयोनाकुर जनना रागाचा क्षयमुपागता यस्य ।
ब्रझा या विष्णुग हरो निनो या नमस्तस्मै ।
अथात्--ममार में उत्पत्ति के मूल कारण रांगाति । जिसमें नम
हो गए है ऐमा देवता चाह उसका नाम ब्रा हो विष्णु हो शिव हो
शानिनो'उनको मैं नमस्कार करता हूँ। इतनी विशालता रवी
वाला बैन यमत्री को मुक्ति को अधिकारिणी न मानता या सभेष
नही। श्रत उपयुम विश्लेषण से यह स्म है कि श्री को मुनि की
अधिकारिणी न मानने वाला दिगम्बर मत वाद का है और श्वेताम्बर
जैन उमस प्राचीन है।

-- . श्वेताम्बर सम्प्रदाय के प्रयां से यह स्पष्ट है कि वीर निवाण सन् ६८० (विक्रम समत् ५१.) वे ग्राम पास मैन सब कदभापुर म देवर्षि गणि क्षमाधमण की अध्यनता में एकत्रित हुया! अ सक जा शास्त्र यशान प्राचीन परम्परास शिखरा पड़ा था उस का का कारणों सलाप हाना भी प्रारम्भ हो गया था। उसका विस्तार रूप से पं नाव सवथा सभवन था। अत सम का ध्यान इम पार गया कि प्रागम और अन्य साहित्य को एकत्र प्रथित करना परमावश्यक है । ऐना करन से यह जान भषि-य के लिये मुचारु रूप स सुराक्षत भी रह सकता था और इम का सापत्रिक प्रचार भी पूर्ण रूप स हा सकता या। अत सप का अनुमति से शिखरे हुए श्रागम तथा श्रय साहित्यिक ज्ञान का एक प्रथित किया गया। दिसम्बर सम्प्रदाय का साहित्य इस साहित्यके बटुन पश्चात् लिखा गया है। १६ यतनचे लिये उदाहरण से स्पष्ट है । श्वेताम्बर सम्प्रदाय क म त य के अनुमार जैनधम रे चौबीम त थेकर पहिले देवान दा ब्राह्मणा व गम मे श्राए पश्चात् इन्द्र की यात्रा से हरिनामेमा देवता ने उहै क्षत्राणा त्रिशला के गम में रखा। यह वणन कई श्वेताम्बर प्रथा म माता है इसका विस्तार पूर्वक पणन पटना हो त पाठक कल्पमूत्र म पर सक्त हैं। दिगबर संप्रदाय के प्राथों में इस प्रकार की घरना का कई उ लेख नही और न ही दिगवर लाग इस बात को मानते ही हैं। श्वेतारों के मत की प्रमाणिकता व लिये मथुरा के कफाली टीले स एक शिला मिली है जिस पर भगवान् महावार स्वामी के गम हरण का बड़ा सुदर चित्र बुना हुआ है। लिपि तल थे धुरधर विद्वानों ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह शिला लेख ईस्वी सन् से एक शतान्दो पहले का खुदा हुआ है। इस उदाहरण से यह राष्ट हो जाता है कि साहित्य की प्राचीनता भी श्वेतार सम्प्रदाय की प्राचीनता (२४) प्रकाश डालती है। उपयुके उदाहरण स यह भी स्थप है कि विषम मवत ५१० के लगभग यल्लभी पुर म जिम ज्ञान का प्रयित किया गया था वह प्राच न परपरा से चला पाता ज्ञान है। श्रत साहित्यिक दृष्टि स भीश्वतायर मम्प्रदाय गिर समय से प्राचीन ही सिद्धदाता है। इस प्रकार दिगवर शद के अर्थ स ऋग्वेद की ऋचा से निप्रय शब्द की परिभाषा मे, दशन सार 4 उरण सग्रार साहित्यक दृष्टि से तो श्वेताबर सम्म यस दिगर संप्रदाय प्राचीन महा ठहरता। श्वेतवर ही दिगबर स प्राचीन सिद्ध हाता है। हम भविष्य म होने थाली नद गवेषणा से यदि दिगमरों का मानानता को प्रमाणित करने वाले और नए कुछ प्रमाण मिल जाए ता दूसरी बात है। यह लेख केवल गवेषणात्मक दृष्टि ह लिखा है मांप्रदायिक दृष्टि स नहीं । यदि अब भी ऐसे प्रकाव्य प्रमाण मिल सके जिनसे गिवर श्वेतांबरों से अधिक प्राचीन मिद्ध हाने होता भा मेरे लिये कम प्रसन्नता की बात नहीं। - .

जैन धर्म और राजनीति - KICROCERICSEXC वैदिक, जैन और बौद य तैनी धम बहुत प्राचीन काल से माग २ ले पाते हैं। यो का सीनों धो धाचार्यों न हिंसा परमापम' अपात् अहिंसा ही माना का महान् धर्म है इस निदात को अपने २ टिकोण मे उचित स्थान दिया किन्नु न घम में अहिमा का मिदास अपनी चरम सीमा तक पहर शुका है। महिमा का प्रतिरूप धार यासकल के समय पे अनुकूल हो चाह प्रतिकूल उस से यह कोई मतलब नही है। यह बात अवश्य दावे के साप सकता कि अदिसा का वासविक, ताविक पा गुद स्वरूप देखना होता जैन धर्म में ही मिल सकता है | जैनधर्म में रिसादा प्रकार की मानो गई है, द्रव्य हिमा पार भाव हिंसा । द्रव्यास्मिा का सामान्य अय है किमी बीय को प्रागण से विमुन करना या दूसरे शब्दो में उस मारना। भावहिंसा यह होती है बिम में विचार से किसी बीच का अनिए किया जाता है। यदिमा का निपेप तो अन्य धमों धमान्यों में भी अपन २रिकोण उचित रूप सही किया गया है कि भाय हिंसा को जितना महत्वपद स्थान जैन धम प्रपों में दिया है उतना अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। बैन शास्त्रों में भाव हिमा का सूक्ष्मस्वरूर नीचे दिये उदाहरण मे पाठको को सर सवाएगा। विक्रम को ११ वी शताब्दी में गुजर प्रान्त पे पान नगरमें रात्रा कुमार पाल राज्य करता था। पहिले वह कुन परपरागत वैशाव पम का अनुयायी या और बाद में उसने तत्कालीन प्रसिद्ध जैन विज्ञान श्री हेमचन्द्राचाय के प्रभाव में आकर जैनधम को स्वीकार किय । बैनाचय ने राजा कुमाग्पाल का हैनधम की भनी भाति रक्षा और उस मे मासाहार का त्याग करवाया। यह धम व मिद्धान्तों से इतना प्रेमावित हो गया था कि वह वास्तव में अपना चीनन उन के अनुकूल ही बनाने लग गया था। एक दिन यह बड़ा उदाम मन हाकर गुरुदेव के चरणों में पाया, और प्रायश्चित की प्रार्थना करन लगा । गुरुदेव ने पूछा • प्रायलित कान स अपराध के लिये करना चाहते हा राजा कुमार पाल ने कहा कि श्रान मैंने अपने ग्राहार में गिरी या खुम्चों को सजी पाई । उस गिरीकी सजा को दांतों से सवा रहा था तो मुझे प्राअनुभूत माम का सा स्वाद प्राने लगा और मेरी रुचि परित्यक मास की धार गई । अत यह मानसिक या भाव fसा यो। श्रार मैं उसके निवारण के लिये प्रायश्चित करना चाहता हा श्राचाय ने कहा - हो इस प्रकार की भावमया या मानसिक हिसा लिये अवश्य प्रायश्चित करना होगा। श्रार इस का मायचित महो है कि तुम एक पत्थर का टुकड़ा लेकर स्वय अपने हाथ में अपने दानों का ताड़ डाना । श्राशा पाते ही कुमारपाल 1 झर दातो को ताड़न क लिये पत्थर उठाया किन्तु वह प्रहार करने को ही था कि गुरुदेव जी ने झर उसका हाथ पकड़ लिया और कहा- मायश्चित हा गया है। तुम ने वास्तविक रिसा या द्रन्य रूप हिसा नहीं की किन्तु भाव रूप में की थी। अब तुम ने अपने दांतों का ताइने काद निश्रय कर लिया है अंतएव इस भावमयी अहिंसा से उस भावहिंसा का निवारण हा गया है। उपयुन, उदाहरण से पाठकों का भली भान्ति स्पष्ट हो गया होगा कि नैनधर्म म अहिसा क्तिनी चरम सीमा, कि पटुची हुई है। 1

(२७)
-
द्रव्य हिंसा के ता अनेक । सुदर उदाहरण श्राप का वैदिक और बाद
धम प्र था में भी मिन जायग कितु भाव हिंसा के इस प्रकार के
उदाहरण अन्यत्र कम ही देखने में पाते हैं। जैन धम मन, वाणी,
और कम इन तनों से हिंसा के परित्याग की शिक्षा देता है।
जैन धर्म में "अहिंसा परमो धम" के सिद्धान्त को अतिम्र
में देखकर कई लोगों के मन में ये शकाए उठा करती हैं कि
जैनियों के हाथ में किसी देश का राज्य पि दिया जाए वा मिलदेह
वहाँ अराजकता के सिवाय और क्या हो सकता है। बोहारदा
को मारना-नाप समझते हैं वे दुड प्रधान राज्य का से चहा मध्ते
हैं। जैनी राजा किमी प्रकार की भी हिसा करने के लिदे देर न
होगा और राज्य का चलाना हिंसा बिना बराबर है।
प्रजा में चोर, लुटेरे, धूर्त, और प्रातताइयों का चटका होना
स्वभाविक है और उन का दबाने लिये हिंग प्राय भी
अनिकाय है । इस के अतिरिक्त कोई बलवचर दि रावा यदि
चटाई कर दे तो वह सहज ही म जैन गा गमला गुनाम
चना सकता है और साथ २ उस की प्रथा कानारामा कम
भी हिसा के भय से शत्रु से युद्ध करना पम हिंसा से दा
परतता को अच्छी ममझेगा इस लिय देन मारो काम।
भारत वप में इस धम के अनुयाया पी प्राप पैदाश्य हैं । और
जाति कभी भी धीरता के लिये प्रसिद्ध एउटा वापरटार
काई हशत देना हा ता जरूर लाग दो दटे हैं।
इस प्रकार के विचार रखने बन्दु नौ केक्षित
मैं यह बताना चाहता हूँ कि वेतन प्रस्ट परपर
क्षत्रियों का
है। यही कार है कि

(२८) चप को ही सब स बड़ा वण माना है। जैन धर्म के तथवर भी क्षत्रिय पण में ही अवतृत हाते रह हैं । जैसे २ बैन घमावलपियों पर अर्टिमा के सिद्धात का गहरा प्रभाव पड़ता गया वे अन्य कृषि श्रादि कमों का छोड़ कर वाणिज्य की भार मुफ्ते गए क्योंकि आणि य में श्रय व्यवमायों को अपेक्षा हिंसा कम होती है। वाणिज्य के प्रभाव स धे वड़ी मस्या में पूजीपति बनते गए । पू बी + प्रभाव से उनमें विलास नियता भा या ई और विनास मियता ग्रान मे जमा अकसर लक्ष्मी का प्रभाव होता है उनसे वीरता के भाव भी न होने लग गए। इस प्रकार कई सदियों वे निरन्तर वाणिज्य यवमाय के प्रभाष के परिणाम स्वरूप अाज वे शुद्ध वैश्यों के रूप में हमारे सामने वतमान हैं। श्रत श्राज की जैन ममात्र में यदि वीरता प्रशं की कमी है 'ता उसके लिये जैन धम को या जैन घम के सिद्धान्तों को दाप युन नही ठहराया जा सकता। महात्मा बुद्ध का यदि कोई अनुयाया हिसक हो तो इससे महात्मा बुद्ध का या युद्ध धम का दोपी नहीं ठहराया जा सकता। मग तो यह विश्वास है कि प्रत्येक धर्म का सस्थापक या सुधारक उघ कारि वे सिद्धान्तों का ही अपने अनुयायि। क सामने रखता है। किन्तु देश काल और परिस्थितियों व कारण यदि उन सिद्धान्तो में परिवतन या जाता है या उस धम क अनुयाया उन सिद्धान्त में अपो शिकाण र धनुमार परिवतन कर लत है ता इसमें किसी सस्थापक या सुधारक का दाप नहीं होता। श्रप रही बात जैन राजा के राज्य की, अराजक्ता की और उसकी शत्रु द्वारा सहज दामता की। इस प्रकार की बातें वही लोग कर सकते हैं जो न शास्त्री व मतव्य से मवषा अनभिज्ञ है। जैन शास्त्रों में अनेक चश्यती न राजानी को कहानिये और जीवनिये मिजती है। जैन राग अहिमा का उचित स्थान देते हुए भी सुचारू रूप से

(२६)
रव्य का प्रपननाते ये और पूरा शक्ति स शत्रु का सामना करो
देशारा करते गे। यहां न शाम्रो में पाए चवता जैन समान
कचन स कई उगवरण नि वा मकने नि आधुनिक विचार
थे विद्वान उपागणिक क्याए कह कर पहनना बर देंगे। प्रत
ऐतिहानिक तथा माहिएEE से जिमको उपदा नदी को आमत
ऐमा उदाहरण देकर ही पारोको बनधम में गा माता कार्शिन
शोका प्रयत्न किया जायेगा।
तिम प्रकार वैदिक मार मार पम में गजनीति पर अनेक
उपमध होने मोकार चैन धर्म भी उमति शिम्पर पर पा
समवद्वाना में भी राजनीति विषय पर प्रचलिमे । जैसे २
जैन समता उठनो गई न राजनैतिक माहित्य सामान भी कम
होता गया और १६ नि प्रतिदिन सुप्त होता विकमी ११
थी शवागत यस "नमाति शार" उगारण पर तर
तिरे मिलने थे। अभी तक यह पता नानल मनि राजनीति
परनिोदम का बता कौन था। मगर का पता भीमें
देमचन्द्रागत "लाब" नामक प्रसगता है। कुमार
पाल राधा अन गुरु की हेमवतानार्य में यह पायना को किये
अन पर पारामा म पार करें। इस पर इमचन्द्राचाय
पहनीति" नामक मन्प की रचना की। इस अप
मगनाचरण का लिखा है -
बुमारपामापालापरेण पूर्व-निर्मितात् ।
अमात्यामधारामान मारमुदय यकिन १/६
মূৎ মা ছিনাথ ft যৰি বিঘাযহা ।
लपामीति मन्यस्त्र मुअाध कराम्यहम ॥७
r

। ३४ ] बझा ने मुव स ब्राह्मण की, भुजाओं स क्षत्रिय की, उरू से वैश्य का और पैरों से शद की उत्पत्ति की। जैन मन्तव्य भी इस के साय प्राय मिलता जुलता ही है। जैन धम ये ग्रादि पुराण अनुसार भगवान् ऋषभदेव ने हाथ में तलवार पक कर क्षत्रियकी, उरू से चलने का सरत करने वश्य की और चरणों म शब्द की उत्पत्ति का। ब्राह्मणों का उत्सति बाद में ऋषभ स्वामी ५ पुष भरत न शास्त्र पढ़ाते हुए मुग्व से की। जैन धम में षणयवस्था प्रारम्भ से कम से मानी जाती है किन्तु वैदिक धम में विशेष बार बाम से घण व्यवस्था मानने पर दिया है। यद्यपि पैदिक धम प्रयों में ऐसे भी अनक प्रमाण हमारे सामने हैं जिन से वणव्यवस्था कर्म स सिद्ध होती है कि तु व्यापक रूप से कम से होवण पवस्था प्रचलित रहा है। मरे विचार में जैन शास्त्रों में प्रतिपादित कम पण यवस्था का परित्याग कर अाज की बैन समाज जो व्यापक रूप म बमगत वण यवस्था को मानने लगी है यह वैनिया पर वैष्णवधर्म याही प्रभाव है। इसी प्रकार शनु पर घटा करने के समय के विषय में भी प्राय दानों एक मत हैं जैसे मार्गशा शुभे मासि यायाद्यागा महापति । फाल्गुन वाऽय चैत्र । मासो प्रति यथा चताम् ।। मनु०.७० १८२ श्रथात् पवित्र अगहन 4 मास में राज्ञा युद्ध की यात्रा करे अथवा सी अग्नी सामष्य हो उस के अनुसार फाल्गुण श्रथवा चैत्र क महीने में शतु फे राज्य पर अाक्रमण करे ।

अयेप्वपि तु कालेषु यदा पश्येद् ध्र व जयम् ।
तना थायाद्विगृह्य व व्यमने चोरियते रिपो ।
मनु० श्र.७ श्लोक १६५
अर्थात् - राजा जब अपनी बीत निश्चय बने तथा बम देवे कि
शतु इस समय विपत्ति में पमा है तब वह अन्य किसी महीने में युद्ध
लिए यात्रा करे।
अब पाठक जरा जैन राजनीति की ओर ध्यान:-
सुमुहूर्ते मुशकुने मार्गादो माम मप्त के ।
युद्धं कुर्वीत राजेद्रो वीक्ष्य का पलारलम् ॥
लध्व० पृ. २६ श्लोक ३३
श्रथान् - अच्छे मुहूत में नच शकुन हाने पर मागशीपादि पाठ
महीना में अच्छा समय देख कर युद्ध के लिये प्रयाण करना चाहिये।
यहां पर भी प्रावण भाद्रपद, अाश्विन और कार्तिक इन चार
महीनों में युद्ध यात्रा का निपेघ फर के अहिंसा धर्म की ओर क्तिना
प्यान राग गया है।
इसी प्रकार जैन राजनीति धर्म युद्ध के पक्ष में होते हुए भी
यह कहती है कि
शाप याय निष्ठतु कर्तय यथोचितम् ।
लप्व० पृ. २६ श्लोक ६
अथात् शतु यदि श्रयाय पर तुना हो तब तो उस के साथ युद्ध
प्रपश्य करना चाहिये।
इसी प्रकार दुष्टों को दह देने के लिये और
के लिये
जैन मन्तन्य एक ही है। जैसे
-
२१

( ३६ )
निप्रहेण तु पापाना साधूना साहेण च ।
द्विजातय इवेज्याभि पूज्य ते सतत नृपा ॥
मनु श्र०८मोक ३११
अथात् - त्रिम प्रकार दिन यज्ञों द्वारा पवित्र होते हैं उसी प्रकार राजा
लाग पापियों को दंड देने तथा साधुनों की रक्षा करने, से पविन
था करते हैं।
इस से मिलते जुलत लघ्वहनीति के उदाहरण पर पाटक जग
दृष्टि डालें
शिष्टाना पालन दुर्गन् दुष्टाना निग्रह पुन ।
पूज्यते मुक्ने स मुरासुर नृयोनिभि ॥
लव पृ० २२१ श्लोक ६
श्रयात् - सन्ननों का पालन करने और दुशों का निग्रह करने वाले
राजा लाग ससार में देव राक्षस और मनुष्य सब के द्वारा पूने
बाते हैं।
बाल पातुर और वृद्ध ये तीनो मनु और हेमच द्राचाय दोनों
की दृषि में क्षन्तय है-
क्षात य प्रभुणा नित्य निपना कार्यिण नृणाम् ।
बालवृद्धातुराणाव घुपता हितमात्मन ॥
मनु०५०८ प्रोक ११२
अपना कल्याण चाहने वाले राजा तथा कायार्थी बालक वृद्ध तथा
रोगी इन के द्वारा होने वाली निन्दा को क्षमा करता रहे ।
बालातुरालिद्धामा इतन्य कठिन बच ॥
लव० पृ० २२१ श्लोक
अपात् -बानक रागी और श्रतिबद्धों के कठिन वचन को भी क्षमा
देना चाहिये।
है
M

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(३)
क
थाला बामण भो यातायी बन कर माने तो बिना विचारही
उसे मार डाले।
चैन राजा गाय माग में स्थित रहने हुए दण्ड तो प्रत्येक
अपराधी को देना उचित समझने का अहसा धर्म का सदा
नि में रखते हुए वध के स्थान में उमे देश निकाना देना अन्धा
समझते हैं। मारने की अपेक्षा अपराधा का ऐमा दण्ड देना जिसस
यह जीवित रह कर ग्राम पश्चात्तापरता रहे अधिक प्रथा
अगधो का मार करनय करने में कोई नहीं कि उस काहनी
परिस्थिति में रग्वना निस स वह अग्ना भूल को समझ सो इस के
लिये प्रायत्ति कर स पार पुन एक म चरित्र नागरिक बन सके,
अधिक अच्छा है। विगड़ा मशीनरी को नष्ट तो हर एकहीर
सकता है किन्तु उस के पुरजा को ठीक कर पूर्ववत् चला देने वाले का
हो गौरव हाता है। श्राज का सम्य ससार भी इस सत्य को भलीभाँति
मममन लगा है और उसी का यह परिणाम है कि बस पाचात्य
देशो म अपराधियों की मृत्यु दण्ड का विधान रोक दिया गया है।
जैन राजनीति में भी मृत्यु दण्ड का मक्या प्रभाव नहीं है किन्तु दूसरे
कठिन दहा पे सदाय में इसका साग अधिक प्रम माना जाता है।
वैदिक राजनीति के अनुसार यदि कोई व्यशि अनपत्य मर
बाय तो उस की सम्पत्ति की श्चाधिकारिणी उस की परनी नहीं हो सकती
किन्तु ' रागामी तत्याय सुचय अथात् राजा ही उसका अधिकारी
होता है। मनु बी का कहना है कि -
वशाऽपुत्रासु वैध म्यादतणं नालासुच।
पतिनताच श्रीपु विधवास्यातुगसु च ॥
मनु. अ.८ लोक २६

[ ३६ ]
-
बध्या, पुत्रहीना, जिस स्ना के कुल में कोई न हो, पतिता विधवा
तथा रोगिणी स्त्री के धन का रक्षक राजा होता है।
जैन गजनीति का मन्तव्य इस से सर्वथा भिन्न है हेमचन्द्र जी
लिखने है
धनपत्ये मृते पत्यो सर्पस्य यामिनी वधू ।
अथान्पति यदि नि स तान मर बाय ता उस की सारी सम्पत्ति
की अधिकारिणी उस की पलो होती है । इसी प्रकार भागे
भ्राटे नाटे च विक्षिप्त पतौ प्रजिते मृते ।
तस्य निश्शेप वित्तस्याधिपास्याद्वरयणिनी ।।
पुत्रस्य सत्वेऽसत्व च भवत्साधिकारिणी ।।
पृ १८ ला० ५२,५५
अथात् - पति यदि भ्रष्ट हो जाये, नष्ट हा बाये, पागल हो जाये,
सन्यासो हा बाये या मर पाए इन सब हालतों में उसके पुत्र हो भाई
न हो ता पति की सारी सम्पत्तिकी अधिकारिणी उम की पत्नी होता है।
वैदिक साहित्य में पुत्र का स्थान बड़ा विचित्र है
पुनाना नरकायस्मात् त्रायते पितर सुत ।
तस्मात् पुन इति प्रोत स्वयमेव स्वयभुवा ।।
मनु अ६ ऋोक १३९
श्रयात्-जिस कारण वेरा "" नाम नरक से पितरों की रक्षा
परता है इसी से स्वय ब्रह्मा ने बेटे को पुत्र कह कर पुकारा है।
इस सत्य की और भी पुष्टि करते हुए मनुजी लिखते हैं

[ ४० । ज्येष्ठम पात मात्र पुत्री मति मानर ।। पितृ णामनृणश्वैर म मात्सर्वमहति ।। मनु श्र०६,भाक १०६ पिता ज्येष्ट के बम लेत हा पुत्रवान् हा बाता है और रितृ ऋण से उमृण हाता है अतएव पिता का सब धन पाने का अधिकारा वीहै। - इस प्रकार मनु बी के मतन्य पे अनुमार पुत्रहीन मनुष्य की गति नहीं हा सक्ती। वह मर कर नरक में जाता है। श्रत पितरों को विण्डदान के लिये पुत्र का होना नितान्त श्रावश्यक है। मनु जी का तो यहां तक कहना है कि पुत्र की उत्पत्ति केवल नरक से बचाता हा नहीं परतु स्वग के माग को खोलने में भा एक निश्रित साधन है। श्राप कहते हैं कि पुत्रेण लोकाञ्जयति पोत्रेणान त्यमश्नुने । अथ पुत्रस्य पोरण प्राप्नोति टिपम् ।। मनु श्र.६ ऋाक १२७ श्रथात्-पुत्र के बम लेने से मनुष्य स्वगादि लोकों को पाते हैं और पौत्र के बम से म्बग म चिरकाल पयन्त अयस्थिति होती है और प्रपात्र की उत्पत्ति से सूयनोक म निवास क्यिा करता है । इस प्रकार मनु बी पुत्र के साथ २ प्रपौत्र को भी स्वग का साधन मानते है । जैन सिद्धान्त इस के सर्वधा विपरीत है। भद्रवाट सहिता में लिखा है- पुत्रेण स्यात् पुण्यत्वमपुर पापयुग्भवेत् । पुत्रय तोऽरदृश्य ते पामरा क्णयाचका ॥८॥ - -- हष्णातीर्थतोऽपुरा पञ्चकल्याणभागिन । देवेद्रपूज्यपादाना लोकत्रय विलोकिन ॥ ६ ॥ अथात्- यदि पुत्र का उत्पत्ति ही गुण्यवानी का लक्षण है ता सकहो पुषों वाला को दुर्गति हाती क्यों दिखाई देती है ! इस के विपरीत पुत्र- रहित तीर्थकर पाच कल्याण के भागी, निलोकदशा और इन्द्रादि स पूजित पाए जाते है। बैन सिदात के अनुसार पिता के कर्मों का भाचा पुत्र नहीं और पुत्र के कमों का भोक्ता पिता नहीं हो सकता । दोनों को अपने अपने कमों का फल स्वतत्र रूप से भोगना पड़ता है। यदि पिता दुश्चरित और पापी है और पुत्र सलियावान् है तो पिता को तो अपने कर्मों का दण्ड अवश्य भोगना पड़ेगा ही। पुन अपन शुभ कर्मों का शुभ पल पाएगा उत्तम से उत्तम पुर भी पापी पिता के कमों को घोने में कमा समय नहीं हो सकता । पिता की मृत्यु के पश्चात् पुन भले हो पिता के कल्याण के लिये कितनी क्रियाए क्योंन करे फिन्तु मृतात्मा के लिये सब स्यथ है।बन शास्त्रों में भाद किया का काइ मापनहीं । पुत्र ऐ-लौकिक अानन्द का कारण बन सकता है, पारलौकिक प्रिया म पिता के लिये वह कोई महत्व नहीं रखता यह जैन दशन का मन्त य है। मनु बी द्विअमात्र के लिये ब्रह्म यज्ञ, पितृ यश, देव यश, भूल या नृयश ये पांच यश माने है। इन सब का लक्षण करते हुए श्राप कहते हैं कि- थध्यापन ब्रह्मयन पितृयतस्तु तर्पणम् । होमो देवो वलि तो नृयझो-तिधि पूजनम् ।। मनु.३ ला० ७. , [४] प्राचीन समय में मजय देश की राजधानी रमपुर में प्रभापनि नामक राजा राज्य करता था। उम के पुत्र का नाम परतून था वो कि बड़ा ही दुष्ट और दुश्चरिन था। रत्नपुर में एक उमेरदत्त सेठ रहता या निम ने अपनी कन्या का पाणिमण वही व एक प्रेमीपुत्र श्री त क साय पिया। या मही ही रूपवती थी। उसके मोटर्य की महिमा चन्द्रचून के कानों तक पहुंची । जबकि विवाद सरकार हो रहा था तब चन्द्रचून उम मुलरी कन्या को बलपूवक हरण करने पलिये लोगों की बड़ी भीड़ में पहुच गया। राजकुमार थे इम दुधाचार से लोगों को पता दुसया। नगर के पच मिलकर राजा के पास गए और राजकुमार कीस नीचता की शिकायत की। राजा न्यायमिय था और पक्षात करना ता जानता ही न या । बर उस ने अपने पुत्र की दुचरित्रता की बात सुनी तो उसे गम पर बड़ा फोघ श्राया । चन्द्रचूज को राजा रे सामने लाया गया | राधा ने उसे देखते ही तुरत श्राशादी- तदालोक्य किमित्येष पापीहानीयते दतम् । निशात शूलमारोप्य श्मशाने स्थाप्यतामिति ।। श्रयात् - इस पारी को यहां लाने की क्या श्रावश्यकता है। इसमें तो शीघ्र ही शमशान घाट में ताग्वे शन पर लटका था। राजा का मन्त्री बड़ा बुद्धिमान् था। उस ने राषकुमार के दण्ड देने का भार अपने उपर ले लिया। यह राजकुमार को जगह में ले गया और वहां जैन मुनिया की सेवा में उस दीक्षा दिलाई। यह थी जैन सबानों की याय परायणता और निष्पत १०- विधान ! याय के सिंहासन पर बैठ कर पक्षात नहीं दिग्वात थे

सोचिये पुराना गranायातीय
विनम दोमवन्यनीय
उशर मार मसागर
और वाहपुरविरार प्रवान हा
रारापो में
मुलाना
का दाद देना हम प्रथम यश का भलौनोति पाहन
के एएए में मद नहीं समन [ दुष्ट चाहे प्रत्रा में उसका
चार रात्र महल में, ता . प्रत उस पर
मिलना चाहिय मोर ए भी एमा वा टिम निक
प्रनुमा
माग लिया है किन्यार मेंrs
है। गार, धूत और दुष्टो १ दर देता है या सीधामा ।
मार न लामा ५ लिप बाम में 11
पसमा घरते हैं और भी कारण मियां को प्रार
उगापियो कोमामाहम करते । २ मा
मन्तिम यश पयास उत्सर होगा। रिमो
मार
प्रे पापित हुए बिना उमा उस टीका पिsamars
होतामकोयना पारकसप करने ।
अब अन्त में में धन राति --ना
भारताय विगा यदि में मार्ग
राजासादिक भान ना Hindi
पम में चार लिFTTram या
विधान है। Errl में नहाने tra
राय
प्राय माविधान न
मिमीत

[ ४६ 1 सेनाए एक दूसरे पर टूट पड़ती है। काई वीर राजा हुए ता सेना के साथ २ युद्ध में चले गये। नीता अकमर सेनाए हा लटा करती है श्रोर गजा अपने श्राप को महलों में या क्लिी में सुरक्षित रखते हैं। "म प्रकार दो यत्तियां व राज्य लाभ के लिये साम्रो सिपाही युर भूमि में अपने जीवन वाटते हैं। जैन नीतिशों का यह बात ठीक नहीं लगी। इम कारण उ हो ने गहुयुद्ध की प्रया चलाई । बाहयुद्ध म क्वान दा विराधा गानों का ही युद्ध होता था । सना उम म भाग नहीं लेती थी। बा राजा जीतता टस से पराजित गजा अधीनता म्वीकार कर लेता। इस तरह सनायो । युद्ध स जो लावा यतिनों का सहार हाता यह बन जाता। जैन धमाथों में बाहृयुद्ध बतृत स उदाहरण मिनते हैं। कहते हैं कि नेमि म राज एक बस अचानक हा भगवान् कृष्ण की शस्त्रशाना में चले गए। उहाने श्रीकृष्ण जी के चक्र या कुमार चत्र की भाति घुमा दिया। गा धनुष को मृणाल की तरह, कोमा की गदा को लाठी की तरह उठा डाला पार पाचज य शव का पूर्व जार से बजाया | शख ध्वनि को सुन कर कृण का किमी शत्रु र पान का सदेहुश्रा और 4. तुरन्त ही शनशाला में श्रा गए। वहा उहोंने नेमि महाराज का बहे पाया। दोनों ने वल परीक्षा के लिये बाहुयुद्ध को ही उचित ममझा और फिर दानों का वायुद्ध श्रा। इसी प्रकार भरत और बालि का युद्ध भी २ त प्रामद्ध है। पहले दोनों की सेनाए लड़ने की उगन थीं वितु दोनों क प्रगनमत्रियों ने मनायों के युद्ध में बहत बन सहार देखकर यही निश्चय किया कि दोनो का बायुद्ध हो और अत में हुया भी या इस प्रकार बेनराजनीति में युद्ध के विधान में 'अग्मिा पामो- धम" इस दिन का 77 ऊना स्थान है। इस घाट से शेष में पाटकों को भन भौति पता चल गया होगा कि न धम बाम्न में बार धम है। जो ल ग म म श्र यथा कल्पना करते हैं वे जैनधर्मम्म से अनभिग है। उन का चानिये कि वे न शास्त्रों का अध्यन करक इसके महत्व को मम । इम के साथ २ मैं बैन कुलासन मननी म भा निवेदन करना चाहता हू कि वे नाममार र अन हाने में हामीप न समझे। उन का अपनी प्रामीन मस्कृति पार गोवा कभी न भुनाना नाहिये । यति वे अपने पुत्रों के दिमाय पर चलेंगे तभी वास्तव में सच्चे जैन कहलाने के याग्य बन म।

जैन धर्म मे वर्णव्यवस्था । बैसा कि पहले भी यता चुके हैं वैरिक, जैन और बौद्ध ये तीनों धम अति प्राचीन काल से साथ साथ चल पाए है श्रत तीनों का एक दूसर पर प्रभाव पड़ता रहा है। तीनो धमों के अनुयायी एक दूसरे के सिद्धा तो का समय २ पर अपनाते रहे हैं । और एक दूसरे स प्रभावित होते रहे हैं। निस्स देह तीनों का जीवन चिरकाल से पारस्परिक सघषमय चलता रहा है। थौर प्रत्येक ने अपन अपने सिद्धाता को ही एक मात्र कल्याण का माधन माना है किन्तु यह सघर्ष ऐसा ही था जैसा कि तान सहादर भाइयो का होता है। तीनां धीर धर्म प्रय का यदि सूक्ष्म दृष्टि से पटा जाय तो उसके निपाइ में अति प्राचीन भारतीय सभ्यता की एक ही झलक गोचर होती है। तानो भम की गहराई में एक हो सस्कृात छिपी मिलती है । ठीक इसी प्रकार जैस= तीन सहादर भाइयों में पारस्परिक मतभेद के होने पर भी मातृस्नेह का भोत समान रूप स ही बहा करता है। श्रतएल वेदिक, जैन श्री- बौद इन तीनों में किसी एक के सिद्धात पर उस Eि काण विवेचन करना या कोई निणय दना उस मतव्य में साथ अन्याय करना होगा। किसी भी विषय का विश्लेषण तीनो धर्मा के सिद्धात को ध्यान में रखते हुए तुनगात्मक दृष्टि से ही करना चाहिये । ऐन करने से ही यह मुदर और निणयात्मक हो सकता है। अतएव छैन् धम में वण यवस्था क विश्लेषण क साथ साथ वदिक और बाद धमों से H -- में वणव्यवस्था का परिपाटी का दिग्दशन नितान्त श्रावश्यक हो जाता है। सानो धो फी साथ साप प्रगति होने के कारण तीनों ने वो एक दूमरे की मामाजिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला है उसकी उपदा नहीं की,बा.सकती । सामाजिक धार्मिक ग्रोर राजनैतिक प्रादि सभी क्षेत्रों में, यह प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है ! ॥ वैदिक वर्ण व्यवस्था । चारा वेदा में सबसे प्राचीन ऋग्वेद माना जाता है। इस पेद फै दस मदल हैं। प्रथम ना मण्डलों में कहीं भी षणं पस्या को विधान नहीं पाया बाता। दशम मदल में वर्णव्यवस्था का विधान मिलता है को इस प्रकार है- धामणोऽस्य मुखमासीद्वाहु राजन्य कृत । उरू तदस्य यद्वैश्य पझ्या शूद्राऽजायत् ।। इस मत्र में प्रामए की मुख मे, क्षत्रिय की भुजाश्रो से, बेरस को उरू से और शूद्र को पैरों से तुलना पा स्पत्ति ध्यान देन योग्य है। इस मप्र के आधार पर बढ़त से विद्वानों ने वैदिक काल में अमगत पम्यवस्था सिर्ण करने की कोशिश की है कि भाषा विज्ञान क परितो नवा सिद्ध कर दिया है कि ऋग्वेद के दरम, महल की रचना प्रथम नौ मण्डलों के बहुत बाद की है। दशम मडल की भाषा सही यह गत सिदहा बाती है कि उसकी भाषा प्रथम नीमडलो की भाषा से भिन्न प्रकार की है। प्रत ऋग्मैदिक कान में घण व्यवस्था का अस्तित नहीं माना जा सकता।

(५.) M . । - ॥ वर्ण व्यवस्था का प्रारम्भ । पण शब्द का अर्थ है रग (complexion) भारतीय प्राय लोगों का रंग गौर और सुन्दर होता था। ण या काले वर्ण के दाविद श्रादि जातियों के लोग भी भारत भूमि में घसते पे । श्रार्य बाति का काले रंग की जातियों से कुछ काल तक सपर्ष भी रहा। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रायों ने उन पण पण बाति के लोगों से नि हे घे अनाय या दस्यु कह कर पुकारते थे अपनी उस्पृष्टता की भिन्नता प्रकर करने के लिये ही वर्ण शन्द का प्रयोग प्रारम्भ किया होगा। बाद में जैसा कि ऋग्वेद ५ दशम महल में मिलता है समाज को बामण, क्षत्रिय गैश्य और शूद्र इन चार भागों में विभक्त कर दिया। मारम्भ में यह वण व्यवस्था कम गत थीम गत नहीं । कोई भी पुरुष अपने उच्च या नीच कमों मे ग्रामण, क्षत्रिय, वैश्य पा राद पन सक्ता या । यही कारण है कि वैदिक धम ये प्रसिद्ध ऋषि विश्वामित्र वशिध और दीपतमा आदि प्रमाण हाते हुए भी अपने उत्कृष्ट कर्मों से मामण पद को प्राप्त हुए । भनु बी महाराज भी इसी सत्य की पुष्टि शुद्धो माझणतामेति बाह्मणश्चेति शूद्रताम् । क्षत्रियाञातमेचतु विद्याश्यात्तथैव १॥ मनु १०/१५/ अपात् जिस प्रकार शुद्ध बामण बन पाता है और बामण शूद्र बन जाता है उसी प्रकार क्षत्रिय और बेश्य के विषय में भी बानना चाहिये। 4 कुछ काल के पश्चात् षण पे स्थान में जाति शब्द का भी मयोग होने लगा। वैदिक साहित्य में सर्वप्रथम यह रन कात्यायन श्रौत सूनमें मिलता है। उसमें इसका प्रयोग वर्ण के अर्थ में नहीं किया किन्तु परिवार या कुल के प्रथम मिलता है । परन्तु जैसे २ षण व्यवस्था बम सिद्ध अधिकारों में फ्रुती गई गैसे २ वण के स्थान में बाति शब्द का प्रयोग विशेष रूप से होने लगा। अन्त में जाति शब्द कामयोग इतना अधिक प्रचलित हो गया कि षण शन्द उसके सामने लुम सा हो गया। ग्राम कल भी हमारे देश में सार जाति शब्द का ही प्रयोग होता है। ब्राह्मण वर्ण, क्षत्रिय वण, गैश्य वण और शुद्ध पण के स्थान में ब्राह्मण बाति क्षत्रिय बाति, वैश्य बाति और शद्र जाति का प्रयोग करते हैं। ॥ अनेक जातियो की उत्पत्ति ।। प्रारम्भ में बन पण यवस्था का युग शुरु हुआ तो थार. ही पण पे। आज की भाषा में चार जातिय थीं। इही चार बातियों में से प्राज की सैकड़ों जातियों की उत्पति किस प्रकार हुई इसका पता बहुत कुछ मनुस्मृतिसे चल जाता है। मनु बी की राजनीति के अनुसार ब्रायण को तो चारोपयों की कन्याश्रा के साथ विवाह करने का 'अधिकार है और बाको ये पण या जातिय अपने से नीचे किसी भी वण की फम्या के साथ विवाह सम्बध कर सकती है किन्तु अपने से उच वर्ण थे साप नहीं। शूद्र व भार्या शूद्रस्य साप वा च विश स्मृते । । ते प स्वाचेष राक्षश्च ताव स्वाचामजन्मन || मनु अ०१ श्लोक १३ अर्थात् - शूटा ही शूद की स्त्री हो सकती है दूसरी नहीं 1 वैश्य को . -- शूटा में निराद द्वारा उसन पुन "पुकस" तथा पाद से निया क या में जायमान पुत्र कुक्कुट कह जाते हैं ॥१८॥ क्षत्ता द्वारा उन क या में जम्मा हुश्रा पुत्र "श्वपाक" कहा आता है । वैदेह से अम्बा नाम्नी कन्या में उत्पन पुत्र वेण कहलाता है।॥ १६॥ 4 - 1 . द्विजाति की सवणा यात्रों में उत्तम पुत्रो का यदि योपवीत सस्कार न हो तो वे "बाय" कहे जाते हैं ।। २० ॥ नात्य संतान से पागमा 'भूजकण्टक" पुत्र जमता है। देश मे से इसी को श्रापन्य', 'वाटयान', पुष्पप तथा "शेव" भी कहते हैं।॥ २१ ॥ क्षत्रिय जाति की प्राय से उत्पन्न पुत्र, मल, मल, निम्छिवि, नर, करण, रवस तथा द्रविड़ कहलाते हैं।। १२ । श्राजकल उपलब्ध सूत, भाभीर निषाद और शेग्य आदि अनेक भाटिया की उत्पत्ति चारों वर्षों के असवातीय विवाह सम्बन्धी से किस प्रकार होती गई यह मनु बी की राजनैतिक पवस्था से पारको को भली भाँति स्पष्ट हो गया होगा। इसके अतिरिक्त लोगों के भिन्न भिन्न पेशे या “यवसाय भी अनेक नवीन जातियों की उत्पत्ति में नवीन कारण बने । जैसे सोने का काम करने वाले स्वणकार या सुनार, लाहे का काम करने वाले लोपकार या सुहार, चमटे का काम करने वाले चर्मकार या चमार वस्त्र धोने का काम करने वाले धोबी, सौरकम फरने वाले नापित या नाई तेल निकालने वाले तेली बन्न चुनने का काम करने वाले व तुषाय या उलाहे इत्यादि अनेक त्रातियों के नाम उन कम या यवसाय के आधार पर पड़े। - म -- इस प्रकार पैदिक सिद्धान्त के अनुसार भारत में अनेक बातियों की उत्पत्ति होती गई। बैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि ऋग्वैदिक काल में तो वणव्यवस्था कम से ही मानी जाती थी ज म से नहीं। इसी सत्य का पुष्ट करने वाला एक श्लोक शुक्रनीति में भी प्राता है विश्वामित्रो वमिष्ठश्च मतगो नारदाय । तपोविशेषसंमाता उत्तमत्व न जातित ॥ अर्थात् - विश्वामित्र, वसिष्ठ, मतग, और नारदादि ऋषि तप के । प्रभाव से उत्तम पद को प्राप्त हुए जातिसे नहीं । "बाल्माकि रामायण" के कता महर्षि वाल्मीकि के विषय में ता सब जानते हैं कि यह किस प्रकार नौच जाति में उत्पन्न हो कर भी राम की महिमा से कितने उच्च पद को प्राम हुए। चक्रवर्ती महाराज की महाराणी सीता को भा उदोंने अपने ग्राभम में श्राश्य दिया था। विस्तार भय से इस नख को अधिक न बताते हुए अन्त म मैं यही बताना चाहता हूं कि वैनिककाल में वर्ण यवस्या कम से हा मानी जाती थी । उपयुक्त विवण से पाठकों को इस सन्य को भलीभाँति पता चल गया रोगा। अाज कल की अमगत वणव्यवस्था की भयान कता भग्वैदिक काल में न थी। इस का प्रचार बाद में हुशा'और यो तक दाकिनीच से नीच काम करने वाला पुरुष यदि ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुश्रा होता वह जाति की श्रेष्ठता की ढीग हाकने में कोई फसर माकी नहीं रखता। शद बाति में पैदा हुश्रा पुरुष उत्तमसे उत्तम श्राचरण करने पर भी नीच माना जाता है। बहुत से प्रशानी पुरुष तो शर्ते की छाया पड़ने पर भी अपने श्राप को अपवित्र मानने लगते हैं। इस को मूर्तता की पराकाहो ही कहा बा सकेता परी [५] । साधुनों की बात बाने दीलिए भावक तक लोगों में से बाति मूढता अथवा वाति या कुल मद को दूर करने के साधु प्रयत्न करते थे। रास्ता चलते एक भावक का समागम कुछ प्राह्मणों से हो गया माण अपने बानि मद में मत्त ये कितु भावक के युक्ति पूरा पचनों से उनका यह नशा काफर होगया। वे जान गए कि मनुष्य के शरीर में वर्ण प्राकृति के भेद देवो में नहीं आते हैं, जिससे वर्ण मेद हो। क्योकि बाह्मण श्रादि का शूटादि के साथ भी गर्भाधान देखने में आता है। वैसे गौ घोहे श्रादि की जाति का भेद पशुओं में है ऐसा बाति मेद मनुष्यों में नहीं है क्योकि यदि प्राकार भेद होता तो ऐसा मेद होना सभव था श्रत मनुष्य जाति एक है। उसमें जाति अथवा इल: का अभिमान करना क्या है। एक उपवणी मामण भी गोमांस खाने और वेश्यागमन करने से पतित हो सकता है और एक नीच गोत्र का मनुष्य ; अपने अम्छ पाचरण द्वारा बामण के गुणों का पा सकता है। भगवान् महावीर के दिय देशों में मनुष्य मात्र के लिए व्यक्ति स्वातव्य' का मूल मन्त्र गर्मित या। भगवान ने प्रत्येक मनुष्य का प्राचरण उसके नीच अथवा ऊदंपने का मूल कारण माना था उहोंने स्पष्ट कहा कि संतान कम से चले पाए हुए बीव फे'श्राचरण की गोत्र सशा है। जिसका ऊचा प्राचरण है उसका ऊँच गोत्र है और जिसका नीच आचरण है उसका नीच “गोत्र है। शुद्ध हो या स्त्री हो अथवा चाहे वो हो गुण का पात्र है वही पूजनीय है। देह या कुल की पदना 'महीं होती और ना ही चातियुक'को ही मान्यता प्राप्त है। गुणहीन को कान पूजे और माने ? भमण भी गुण से होता है श्रावक 'भी गुणों से होता है । महावीर बी के इस संदेश से जनता की मनमानी मुराद पूरी हुई और वह अपने -- - - पाति अथवा कुनमद को भून गई थी। तब भारत में विश्व प्रेम की पुण्य धारा का भटूर प्रवाह बहा । जनता गुणों की उपासक बन गई। बाक्षण, चनिय शुद्ध और वैश्यत्व का उसे अभिमान ही शेषान रहा। तब ही गुणों को पाकर भेव बनने की काशिश करते थे। धन्यकुमार सेउ को हो देथिए । उनके गुणों का नादर करपे सम्रार भेषिक ने अपनी पुत्री का विवाह उनसे कर दिया था और उन्हें यग्य देकर अपने समान गग्याधिकारी बना दिया था। यही बात इनसे पहले हुए सेठ भविष्यदत्त के विषय में घटित हुई यो । वह वैश्य पुत्र होकर भी राज्याधिकारी हुए थे। हस्तिनापुर के राबसिंहासन पर प्रारुट होकर उनोंने मजा का पालन समुचित रीति से किया था। सेठ प्रीतिकर को क्षत्री राजा लषसन ने पापा राक्य देकर राजा बनाया था। सरारात स्वतत्र अषण के अाधार से विद्वानों को मही पहना पड़ा है कि उस समय ऊपर से तीन वण (बामण, क्षत्रिय, वैश्य) तो वास्तव में मूल में एक ही थे। क्योकि राजा. सरदार और विप्रादि तीसरे वैश्य वर्ण फेही सदस्य थे जिहोंने अपने को उस सामाजिक पदपर स्थापित कर लिया था बस्तुत ऐसे परिवतन होने अरा पटिन थे, परन्तु ऐसे परिवर्तनों का होना सम्भव था । गरीन मनुष्य राषासरदार मन सकते थे। ऐसे परिवतनों के अनेक उदाहरण भन्यों में मिलते हैं। इसके अतरिक्त ब्राह्मणों के क्रिया काण्ड युक्त एष। सर्व प्रकार की सामाजिक परिस्थिति के पुरुष स्त्रियों के परस्पर सम्बर्ष के भी उदाहरण मिलते हैं और यह पेषल उधरण के ही पुरुष और मीच कन्याओं में सम्बध में नहीं है बल्कि नीच पुरुष और उच स्त्रियों के भी है नीचे दिया उदरण भी इस साल का पोषक - कया वृणीते मचित स्वयंरगताधरम् । कुलीनमकुलीनं या मोनास्ति स्ययवरे ॥ अपात्-स्वयंवर में गई हुई कन्या अग्नी रुचि ५ अनुसार पुरुष का वरण करती है। यहां कुलीन और अकुनीन का विचार नहीं किया जाता है। सेंच मुन उस समय विवाद क्षेत्र अति वशान था। चारो दणों में स्त्री पुरुष सानन्द परमार विवाद सम्म प करते थे। इतना ही क्या, म्लेग्ध और धेश्यानो प्रादि से भी विवाह होते थे। राश श्रेणिक राणी से विवाह मिया यो । सिरे उदर से मोक्षगामी अभयकुमार नामक पुत्र माया । वैश्य पुत्र ओषधर कुमार ने चर्षिय विद्याधर गाड़ वेग को कन्या गधवदचा का स्वयपर में षीया ना कर परास्त किया और विवाहा था। स्वयंवर में कुलीन अंकुनीन का भेद भाव नहीं था। विदेश देश, धरणी तिनका नगर के राजा गाविन्द की कन्या के सयवर में अपर तीन पों बाले पुरुषमाये थे। धनघर कुमार के ये मामा थे । घर ने चकपत्र को बेध कर अरोमामा की कन्या पे माप पाणिग्रहण किया था। पल्लव देश के राजा की कन्या का सप विष दूर करके उसे भी जीव घर ने ज्यादा था । वणिक पुत्र प्रीनकर का विवाह राजा अवसेन की पुत्रा के माय हुया था। विवाह । सम्बन्ध करो में त्रि प्रकार वा भेद का ध्यान नहीं रखा जाता था वैसे ही धम विरोध भी उसमें बाधक नहीं था 1 वसुमित्र ती बैन किन्तु उन की पत्नी पन भी अजैन थी। साकेत का मिगार सेठी था किन्तु उसके पुत्र पुण्यवधन का विवाह बौदधमानुपायी सेठ घनजय की पुत्री विशाखा से हुभाया । सम्राट् श्रेणिक के पिता उपशिक ने अपना विवाद एक भी कया से किया था। भगवान् महावीर के निवाणोपरान्त नंदराम महाकदिन [ ६१ ] जैन घे। इनकी राणियों म से एक शला भी थी जिससे महापा का बामदुधा था। चम्पा में श्रेयो पालित यें। उहोंने एक विदेशी कन्या से विवाह किया था। प्रतिकर सेठ जत्र विदेश में धनोपाजन के लिये गए थे तो वहां से एक रात्रक पा को ले पाए थे जिसके माय उनका विवाह हुश्रा या। इस काल पे पहले से ही प्रतिषित जैन पुरुष जैसे चारच अथवा नागकुमार के विवाह वेश्या पुत्रिया से हुए थे। सशित , उस समय विवाद सम्बन्ध करने के लिए कोई अधन नहीं था । सुशीन और गुणवाली कन्या के साथ उसो उपयुक्त वर विवाद कर सकता था। स्वयंवर की प्रथा के अनुमार विवाह को उत्तम समभा पाता था।" इसके अतिरिक्त उत्तराध्ययन के २५1 अध्ययन की महामुनि की कया किम जैन श्रावक से भूली है। ग्रामण कुल में उत्पन्न हश्रा एक जयघाप नामका याज्ञिक ब्राहाण था। उस समय एक ब्रह्मचारी महामुनि भ्रमण करते करते २ वाराणमी नगरी में पहुंचे और बाहिर एक उद्यान में हर गए ! उस समय उम पुरा में विजयघोष नामका वेदपारगत बामण यश कर रहा था। उस परा में यह मुनि भिक्षा के लिये गया। उस साधु को देखते ही याशिक ने भिदा देने से इन्कार कर दिया और कहा कि लो वेदपारगत, याशिक और ज्योति शास्त्र का बानो वाले माझण है उन्ही को पदा से भिक्षा मिन सकती है। वह महामुनि इस प्रकार का उत्तर पाकर न कुछ ही हुआ और न प्रसन्न हो । उम् ने कहा कि तुम वेद, यश, धर्म और परमारम तल को समझते हो नहीं हो। यदि बानते होतो तानो।वह याशिक बाद मुनि के प्रमका उत्सरने में असमय या। उसने हाथ वोह कर का महामुनि ! वेद, मज्ञ धर्म और परमात्म तत्व को मुझे बतायो । परमात्माद को किस 4 प्रकार पाया जा सकता है। यह बताकर मेरा सशय दूर करो। परमात्मतत्व का वणन करते हुए महामुनि ने कहा- नषि मुण्डिएण समणो, न शोंकारेण यम्मणो। न मुणो रएपण, कुसचीरेण न तावसो ॥३१॥ समयाए समणा होह, पम्भचेरण यम्भणी ।' नाणेण य मुणो होइ. तण होई तावसो ||३२|| कम्नुणा यम्मणो होई, कम्मुणा होई पत्तियो । पईसो कम्मुणा होइ, सुदो हबई कम्मुगा ॥३३॥ अपात् कोई मनुष्य पुरुष सर मुहाने से श्रमण नहीं बन सकता। ओंकार के बापमान में प्रामण नही बन सकता । वहल में पास करने से मुनि नहीं बन सकता और न ही कुश चोर भारण से तस्वी ही बन सकता है। ममता से अमगा, ब्रह्मचय से ब्राह्मण, शान से मुनि और तपस्या करने से ही मुनि बना जा सकता है। बामण का कम करने से मनुष्य ब्राह्मण मन बाता है । क्षत्रिय का काम करने से क्षत्रिय, वैश्य का काम करने से वैश्य और शद का काम करन से ही शुद बनता है। महामुनि ने कहा कि इस प्रकार 'उत्सम गुणों से युक् औं वास्तव में विजात्तम है वे ही परमारम तस्व को समझते है। इसी प्रकार को कया चराष्पयन सूत्र के १२वें अध्ययन में भी आती है। यह कथा हरिकेशी मुनिर की है। हरिफेशी मनि का अन्म एक चाण्डाल कुल में दुना या तपस्या के प्रभाव से वे एक -- - ܝ . ।

प्रसिद्ध महर्षि बने। वे भी महामुनि की तरह अब भिक्षा के लिए यह मण्डप में गए तो याशिकों ने उनका विरस्कार किया और भिक्षा देने से इन्कार कर दिया। पाशिकों की दृष्टि में वे भिक्षा के पान 'हो न ये। उनकी दृष्टि में यश मण्डप पे भिक्षा पात्र बनने के लिये 'बाह्मण कुल में जन्म लेना परमावश्यक था। हरिवंशी मुनि ने भिक्षापात्र का वास्तविक स्वरूप बताया गो वह हे कटु लगा और शक्ति में मत्त घे महामुनि को मारने लगे । तत्काल बा ने मुनि की रक्षा की और मारने वालो को उचित दह दिया। इस प्रकार मुनि के तपस्तेज का चमत्कार देखकर सब लाग हरान रह गए और । सक्संखु दीसई बोक्सिसो, न दीसई जाइविसेसेगुकोई। सोवागपुत्त इरिएस साहु, जस्सेरिसा इहि महाणभागा ॥३७॥ प्रथात् - तप की विशेषता साक्षात् दिखाई देती है और बाति की विशेषता कहीं दिखाई नहीं देती । और चाण्डाल का पुत्र होकर भी हरिपेशी मुनि तपश्चयों के प्रभाव से इतनी बड़ी द्धि की मौत हुना है। इस प्रकार बैन शास्त्रों में जहाँ भी वण व्यवस्था का प्रकरण प्राता है। पहां बया व्यवस्था कम से ही मानी गई है। सम्म को कोई महत्व नहीं दिया जाता। निस्सन्देह उत्तम कुल में उत्पन्न होना आज की तरह अघी दृष्टि से देखा जाता था किन्तु समाज में आदर पाने पे लिए 'उत्तम 'बुल में धमाकै साय २" उत्तम गुणों का होना भी बैन समात्र में परमावश्यक था, यवस्पापी मयादा को बैन धर्मफेमादि तीर - - 1 -- क - -- - स्वामी ने बांधा था और उनके प्रवचन को अन्तिम तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी तक - हारे यर अवांछन रूप से मानते और प्रचार करते रहे हैं। इसी सत्य को पुति "जैन विया नामक पत्र में भगवान महावीर स्वामी ५ बावन पर लिखे लेख में बैन विद्वान् मुनि श्री कवि अमर च द बी अमर" ने भी की है। श्राप लिखते हैं- "तरकालीन शूद्र जातियों को भी भगवान के द्वारा बड़ा सहारा प्राप्त हुआ। भगवान् जहाँ भी गए वहा of प्रथम एक ही स देश ले गए कि मनुष्य माति एक है उसमें जातपात की दृष्टि से विभाग की कल्पना करना किसी प्रकार मी उचित नही । कच नीच के सम्बन्ध में भगवान् के विचार कर्म मूलक पे, मात मूलक नहीं । भगवान् श्राज पे उपदेशकों के समान मात्र उपदेश देकर ही रह गए हो यह मात नहीं । इरिकेशी जैसे चाण्डालों को अपने भिक्षु सम में सम्मानपूर्ण अधिकार देकर उन्होंने जो कुछ कहा पहा करके भी दिखा दिया । सागम साहित्य में एक उदाहरण ऐसा नहीं मिलता बहा भगवान् क्सिी राबा महाराजा अथवा ब्राह्मण क्षत्रिय..के महलो में विराजे हो। हाँ पालासपुर में शन्दाल कुम्हार के बहा, विराजना उनकी पतित बन्धुना का यह उज्ज्वल आदश है जो कोटि कोटि वर्षों तक अजर अमर रह कर संसार को समभाव का पाठ पढ़ाता रहेगा।" - इस प्रकार शास्त्रीय ऐतिहासिक तथा अन्य प्रमाणों से पाठको को यह भलाभांति , पता चल गया होगा कि-अनादिकाल से जैन धर्म में पणत्यवस्था की मर्यादा कर्म मूलक ही रही है। मन्म मिलक महौ । अाजकल कार्यरूप में ओ सममूलक बनी हुई है। यह भी बताइगई:1 भारावर मिला -- H का मन एकतायाधम में दम नेत्रिय कार प्रादिराजनतिक तथा अन्य सदी मेंयपि बण वैदिक यणव्यवस्था का होगा किन्तु श्रादि तीर्थंकर भगवा पभ स्वामी समरमानिसप्रथम निरय 'प्रवचन अनुयाइयों को भयादाममा उकासिद्धान्तको पोषण मा तीनोवणों की व्यवस्था कारग्रामण वकीला पैश्य शर्व न भुजाओं से परिय, 'उसमे पार पैरों से शन प्रकार की इन चार वाजत्र इतर धर्मा इस पर प्रभाव है गैर मात्र को प्रशिकि यह पस्ने उम्प सिद्धान्तों को कभी न भूले। ॥ घौद्धों में वर्ण यवस्था । । बीर यातकों में (दया) कपट व सो प्राता है किन्तु उमका प्रयोग जाति के अथ म न पा गया । ष्णा" इस शब्द से चौदाकाल में पर्णभ्यदग्या का अम्लता रमन्ट प्रतीत होता किनुमोदी का वएमावस्या को ले कर नई मूलक पोखम मूनक नहीं कोई भी मनुष्याच्या उत्तमपण रमेण प्रामण बश्व और सपा माना साना है। इस वस्था में भी मोघम बैनधर्म न मानता रखता है। नाम म भी धास्तव में सम्म कम देवि का माना है। लघ्वईनीति “यवस्था का 'क्रम मानस दमि या दो दिया जिससे ऋषभ देव प पुत्र भरत ने महार अावेद मुखमासीत्, इत्यादि मा ब्रह्मा में Ree yee सला । में तलवार लेकर क्षत्रिय वर्ण की, उस से चलने का सरेत करते हुए गैश्ववण की और धरणों से शों की उत्पत्ति को अपम देव के पुत्र मम्राट भरत ने शास्त्र पर मुख से प्राणों पैदा किया । इस य अतिरित कल्पसूत्र में बो महावीर स्वामी का जीवन चरिय लिया गया है उससे भी बैन धर्म में क्षत्रिय की उतरता सिद्ध होती है । भगवान् महावीर स्वामी पहिले देवानन्दा मामी के गम में पाए । तब देवतात्रों ने सोचा कि सारे तीर्थकर चप्रिय क उत्तम कुल में बम लेते आए हैं अत यह अम्बर नसीधा कि भगवान महावीर स्वामी को ग्रामण के कुल में बन्म लेना पड़ेगा। देवतायों ने इरिनेगमेशी देवता को गभ परिवतन का कार्य सोपा अन्त में इग्नेिगमेशी देवता ने देवानन्दा प्राणी से उस गम का अपहरण किया और निशला क्षत्राणीको कोख में उस गम को स्थापना की। कुछ विद्वानों ने इस गर्भ परिवर्तन को असम्भव माना है और कुछ ने रस से वीर्य की प्रधानता मान कर भगवान महावीर को बालय मतापा है किन्तु यहाँ हमें इन बातो से कोई मतलब नहीं। यहां केवल इस घटना का उल्लेख करने का यही अभिप्राय है कि न घम में भीगेर धम की तरह क्षत्रिय जाति को ऊचा माना गया है। बैनपम क्योंकि बौदधर्म से प्राचीन है अत सभव है कि वणव्यवस्था की इस मयादा को बौदों ने चैनधम से अपनाया हो! अस्तु, यौद बातकों में यत्र तत्र ऐसे कई स्थानक मिलते है जिन से बौधर्म का कमगत वणव्यवस्था को मानना सिद्ध होता है। एक कथा में एक पत्रिय राजकुमार, किसी मुन्दरी के प्रेम में पस का कुम्हार और रसोइये आदि के काम का भी करने लगता है। इस धादिश्रोक बीवन की सुविधायों में चित्र निहाय पण के लोग उस समय अपने उघ यावरण से पतित गेने झग गए थे और मानषता का भूल गए। ऐसे युग में महात्मा बुद्धका बमश्रा। महा'मा युद्धश्रधविश्वाम, अत्याचारअर दावा पूरा शक्ति से प्रकार एक राजकुमार अग्नी बहिन प लिये राज त्याग र परस धन बाता है। पाश्चात्य विद्वान् गइम डेविडस अपनी बार भारत Buddh ist India मामक पुस्तक मनिपते है- "प्राय मभी समाजिक महत्व का श्रेणियों में प्री पुरुषों के पारस्परिक विषाहा व अनेक उदाहरण पुरोहितो के सम्प्रयो म भो पाए जाते हैं । यवल यही नहीं कि तु उच पर्यो र पुरुषों का नीच पण की स्त्रियों से विवाह और नीचवण के पुरुष का रेषण की पया के माय विगह इस के अनेक उदाहरण पाण् आते ।" वाहन मे विद्वानों का तापम ! किमगत पदयपत्यारे = विरुद्ध महात्मा बुद्ध न जो श्रापाज उठाई थी उसी परिधामस्वरूप बौद्ध धम विश्व म व्यापक रूप स ला | महात्मा बुद्ध के जन्म से पूर्व काल में प्रमगत वण यवस्था अनुत भय नक रूप पार किये हुए 01, उस ममय भारतीय समाज में ब्राह्मण ही सर्वेसर्वा य । टहने जन्मान पण यवस्था का प्रनार कर समाज म अनुचित लाभ उठाया, और अपना स्वाथ मिद किया । उनि म मगन षसच्यवस्था की स्थापना पर चारोवणों के लिये पृथक् प्रचक कानूनों का रचना की जिनम अपन लिये अनुचित दया की व्यवस्या का और री जातिया के लिये अनुचित कारता की व्यवस्था दी । शद्र वानि को श्रन्याश्यक शिक्षा विरोध किया पार लोगों का पयाण विमा सो मत्य का पुल । हए मुफोग्य वैदिक विद्वान् प.गगाप्रसाद सी एम ए अपनी 'धमका अादि पात' नामक पुस्तक के ३६ पृष्ठ पर लिखते है - " युद्ध के माटुभाव थे वुध पूर्व वैदिकधम र इतिहास में घोर अधकार का समय था। वेद-यार उपनिषदो का पवित्र और प्रशस्त घम अवनत होकर निरर्थक कृत्य और हिमापूण 'यशादि' का स्वरूप पक्षण कर चुका था। वैदिक वणव्यवस्था वा प्रारम्भ में गुणकमानुसार थी विंगह कर वश पाण्परागत जातिभेद में परिवर्तित हो गई थी। इस का यह परिणाम हुा कि प्राह्मण लांगो कवल 'जभ से अपनेको बड़ा मान कर वेदाध्ययन तथा उन सद्मयों को त्याग दिया जिनक कारण उन पूर्वजों का समुचित प्रतिक्षा की जाती थी। यह सदाचारिक और धार्मिक श्रधः पतन केवन ब्राह्मणों तक ही सीमित न रह सका। सयासी लोग भी पार्मिक-ज्ञान प्रान्तरिफ पवित्रता, मधुरशीलता पारि पातें छोड़कर तपस्याफावल बाहरी ग्रासर दिखलाने को रखते थे । साधारण लाग भी वैसे सीधे, सम्चे, पवित्र और सद्गुण सम्पन्न न रहे जैस कि वैदिक काल में'। वे लकीर के पीर और विलास प्रियता के चेले बन गए। प्राचीन श्रार्यो क सात्विक भाजन का स्थान प्रामिपाहार ने छीन लिया। उस शास्त्रोक्त सिद्ध करने के अभिप्राय से यशा में पशुओं का वध किया जाता था और उनके माम से या ति दी जाती थी। घुट प्राभाव के समय वैदिकधम या यों कहिये मिश्रायों की ममाजिक-स्थिति हम प्रकार की हो गई थी। जुद्धदेव के हृदय पर पशुपनि दान और बातिभेद इन दो बुराइयों का बड़ा प्रभाव पड़ा। उन का कोमन और प्रेम-पूण हृदयधम र नाम पर इतने निरपराष पशुओं के रक्त प्रवाह को न मह सका। उनका पवित्र श्रात्मा इस - [६] निकृष्ट और य यायपूर्ण जाति के विरुद्ध सग्राम करने को उद्यय हो' गया । श्रार इसमें उन्होंने मनुष्यमात्र में लिये सचा 'प्रेम और उनके प्राधार के लिये विशप साद दिवाया। वस्तुन यह बुराई इतनी अधिक हो गई थी कि बुद्ध भगवान के पूर्ववर्ती अनेक प्रयकारीन भी उसे सुरा कहा था। सामाजिक, पार्मिक और राजनैतिक सब बातों में इस जातिभेद की व्यापकता हो गई थी। यहां तक कि देश के कानून पर भी उस का प्रभाव पड़ चुका था। उस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय, पैश्य और द्रों कालिये पृथक् पृथक कानून बन गए थे। ब्राह्मणी के ऊपर अनुचित दया और शूटो के साथ अनुचित कठोरता का व्यवहार किया बाता या। ये बातें बहुत दिनों तकर नहीं ठहरासकती थीं । शद्र कितने ही पार्मिक और गुणवान क्यों न हो परतुन तो उन्हें धार्मिक शिक्षा देने काहा कहीं प्रधया और न उनकी मात्र में ही कुछ। प्रतित्रा थी। वे लोग इन वेदियों को तोह पंकने के अधमर की तक में बेटे थे। इस निन्यप्रथाका पजे में से थे, जिस ने उन्हें उस भोसाइटी के ससग से बुरी तरह परिष्कृत कर रखा था। उनकी लालसा थी कि इस स्थिति में परिवर्तन हो । विजाप्रपात्। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वेश्यों में भी ऐमे अनेक उपाशय उदार प्रवृति पुरय थे बा उनकी इस लालसा सेसदानुभूति रयते । अतएव 'कान्ति' का ममप भागपाया। और इस विचार के लिये असाधारण दूरदर्शिता की अावश्यकतान थी कि समय श्रावेगा जब लोग इस हानिकर प्रथा के विरुद्ध युद्ध मचा पर अपनी बेड़ियों को दोपडालेंगे। वह अवसर प्रागया राजकुलो स्पन एक क्षत्रिय ने पापणा की कि समाज में मनुष्य की स्थिति बन्मस नही प्रत्युत गुणों से होती है ।असख्य मनुष्य उसके धारो पार एकत्रित । हो गए। ऐसी दशा में हम सहवाही में इस बात का अनुमान कर सकते किनन्याचार वेभार से ददे हुए शुद लोग किस उत्साह से उनका (७२) में उत्पन्न होने के कारण आज म नीच काय करने कोस्वाय नही करते थे । मानव समाजका सगठन योग्यता और उत्ताक मिद्धान्तो पर अवलम्बिन या। देशकाल और परिस्थितिल परिवतन * कारण परिक, जैन और बौद्ध तीनों धमों में मेरक विचार अवश्य उत्तम हाते गए किन्नु तानों के अतस्तल म एक ही सस्कृति की झलक पूर्ववत् हा विद्यमान है। शुद्ध भारतीय बावन रेखा अति प्राचीनकाल स तीनो धमों का प्राधार रही है । अनेक युगों से भारत क बापन व प्रवाह को प्रसारित करने वाला सरिता एक ही है। किन्तु प्रवाह भिन्न है। एक ही वृक्ष की अनेक शाखायें हैं और एक ही सूय की अनेक किरणे हैं।

SKOKEILE KUENKEIKSIK SIKEIKEKEKEL जैन धर्म मे स्त्री का स्थान है KEIKEIKEIKEIKSIKEIKSIKKI घनेफ सदियों से भारत की प्राय सभी वातियो श्रार धर्मों में स्त्री का स्थान बहुत गिर चुका है। उसको मनुष्य से नीची श्रेणी का समझा बाने लगा है और अनेक सामाजिक मुविधाए वो पुरुष का मास हैं स्त्री उन से वचित है। पुरानी रूदियों के रह में हुए और अपने को एक मात्र प्राचीन भारतीय सस्कृति का खजाना मानने वाले बहुत से लाग पात्र भी जब कि समार और भागों के लोग बहुत पागे बर चुके हैं स्त्रा जाति को पुरुषों को काम वासना की तृप्ति का माधन या सतानोत्पत्ति की मशीन मात्र समझते हैं। ठसको अबला कहा जाता है और अनेक दुर्गुण उमके सिर पर लादे जाते हैं। भहुत से दोष तो प्राकृतिक रूप में बम से ही उसमें माने जाते हैं। मनु महाराज बा लिप्यते हैं कि - स्वभाव एव नारीणा नाराणामिह दूपणम् । अतोऽयान प्रमादयति प्रमदासु विपश्चित ।। अविद्वासमल लोके विद्वा समपि या पुन । प्रमदा [त्पथ नेतु कामक्रोधवशानुगम् ॥ अथात् -इस लोक में पुरुषों को विकार प्रस्त कर देना यह तो नारियों का स्वभाव ही है इसी लिये मुद्धिमान पुरुष नारियों को प्रोरसे कभी असावधान नहीं रहते । ससारमें काई मूख हो चाहे विद्वान का के वशीभूत हुए पुरुष को स्त्रियां अनायास कुमार्ग में लेजा सकती -

अर्थात्-बटानी से उत्तम दान भार्यादान पते का है। इस
प्रकार स्त्री का काये पैसे की तरह दान की मामग्री भी बनाया गया।
पन के लाभी घरानों में तो कया फी विकी भाबकल भी
प्रचलित है।
पुत्र के बम पर लोग अधार देने माते हैं और कन्या क
बम पर सर की नानो मर जाती है। जिन रियो के सर कन्याय
उत्पन हाती लाग उनो दशन करना पाप समझते हैं और पति
उनको छोड़कर दूसरे विवाह कर लेते हैं। जिस स्त्री के काई सन्तान
न होती हो तो दोष चाहे पुरुष का ही हो किन्तु यह भी स्त्री
के गले म दिया जाता है। नव विवाहिता पर ये थाने के बाद
पर में यदि कोई दुषरना हो जाए तो वह भी उमी पेचारी के को
का परिणाम समझा बाता है। अधिक कहां तक लिसा बाप
दुनिया भरके दोष घी पर थोप बाते हैं । महाभारत के अनुशासन
पद में लिखा है-
थतक पपनो मृत्युः पाताल बडगामुखम् ।
सुरधारा विप सो यद्विारस्येकत त्रिय ॥३८RE
अर्थात् --यम वायु, मृत्यु पाताल वडवानान, छुरे की धार, विष,
सप और अमि के साथ नारी की तुलना की जा सकती है।
चिरकाल से चले आते स्त्री जाति के इस अपमान के प्रवाह
में परम भक्त महात्मा कधीर दास भी बह गए। बरा उन की विचार
धारा पर ध्यान हालिये
नारी की माई परत बंधा होत मुजग
कवीर तिन की फौगात, नित नारिये सग॥
-
-

कामिनी सुन्दर मर्पिणी, जो छेडे तिहि साय।
जे गुरु चरनन रचिया, तिनके निकट न जाय ॥
पर नारी नी छुरी मति कोई लावे श्रङ्ग ।
रावण के टस मिर गए, पर नारी के मग ।।
मारि निरसि न देखिये, निरखि न कीजे दौर।
देखे होते विष चढ़े, मन मा कनु और ॥
नारि नाहिं जम है, तू मन राचे जाय।
। मजारी ज्यों बालिकै, काहि कलेजा साय।
नैनों काजर पाइके गाढे याचे केस,
'हाथों महदी लाईक, वापिनि न्याया इस ॥
इस प्रकार समाज को अवनति की श्रोर ले जाने वाले अध
विश्वास और सकुचितवृत्ति के कूपमडूकों को पूरा से भारत में स्त्री
को अनेक कुत्सित अपमानों का भाजन बनना पड़ा है। ऐसी स्थिति
में यदि भारतीय नारी अपनी जाति को पाप कमों का फल या ऐश्वरीय
अभिशाप समझे तो स्वाभाविक ही है। परन्तु अब विचारणीय बात
यह है कि क्या अनादिकाल से वास्तव में स्त्री जाति का इसी दृष्टि से
देवा बाता रहा है। इसका उत्तर यही मिनता है-कदापि नहीं | इस में
सदेह नहीं कि चिरकाल से स्त्री जाति को अनेक य रणाओं का सामना
करना पड़ा है और उसन बड़े र राक्षसी अपमान सहे हैं किन्तु वास्तव
में जब हम भारतीय सहकति की गहराई तक पहुंचते है तो खी जाति का
स्थान बहुत उचा पाते हैं। पुरुष को सब रियार स्त्री के बिना अपूर्ण
होती है। रियायें ही क्यों यह स्वय उसर बिना अपूग है। पत्नी को
'अर्धाहिनी' श्रयात् पुरुष का प्राधा श्रह माना जाता है। अत पुरुष
स्त्री के बिना पूर्णाह नहीं कहा जा सकता विष्णु पुराण के चौथे
। श्रध्याय में लिया है
M

(८०) कि अब २ स्त्री जाति को उसका शक्तियों के विकास क लिये उचित मौका दिया गया तो वह किमी क्षेत्र में पुरुष से कम नहीं सो। बिन कार्यों को पुरुषों ने किया उनको स्त्रिया भी कर लेती था। विद्या के क्षेत्र में ही देसिये। जिस प्रकार वेदों में प्राचीनतम ऋग्वेद के मत्रा के बनाने वाले या द्रा (पुरुष) पि ये इसी प्रकार लामा, धापा, विश्वावारा इन्द्राणी और श्रापाली श्रादि स्त्रिया भी बेदमत्रा की शूषि थीं। गागी और सरस्वती की विद्वत्ता से सब परिचित हैं ही। श्राज क्ल भी अमेरिका में भारत की राजदूत श्री विजय लक्ष्मी पण्डित और । स्वर्गीय उत्तर प्रदेश की गवनर श्रीमती सरोजनी नायडू की विद्वत्ता से कौनसा भारतीय परिचित नहीं है। भारत ही क्यो भारत की इन भय माताओं की विरचा विश्वभर में प्रख्यात है। इसी प्रकार विदेशों में भी मैडल क्यूरी श्रादि अनेक महिलाओं ने विज्ञान क्षेत्र में बड़े २ अविष्कार करके कमाल कर दिया है। इसी प्रकार धीरता के क्षेत्र में । भी स्त्री पुरुष से पाछे नहीं रही । पुरुषों की भान्ति स्त्रियां भी बड़े २ सपार्मा में वारता दिगती पाई हैं । मुद्गल पली इद्रसेना ने बड़ी चतुराई से सग्राम में रय हाका था और बड़ी वीरता से उसने इन्द्र के शत्रुओं का नाश किया था। प्रत्र सचालन कला में वह बड़ा प्रकोण मानी जाती थी। जब शत्रु गऊए चुराकर बाने लगे इस वीर नारी ने उन से ऐसा युद्ध किया कि वे गौए वह छोड़कर अपनी बान लेकर भागे। पुराने समय को बाइकर भारत पर मुगल और अगरेजी शासन के कुछ उदाहरण लीजिय । रानी दुगावती ने प्रासफ्वा को कैसे समाम भूमि में पछाड़ा या! अमरसिंह राठौर की वीरपत्नी किस प्रकार लड़ते लड़ते अपने पति की लाश मुगल कोट से उठा लाई थी। कोहापुर की गनों तागाई इछलकारनबी की अनुवाई The () इन्दौर को अहल्याबाई तथा झासी की धारागना रानी लक्ष्मीबाई ने घड़ो हा चतुराई से राज्य शासन भी चलाया और युद्ध भी किये। ताराबाई की कूटनीति के कारण श्रीरहजेर को घुरी तरह मार खानी पड़ा। अनुबाई ने अनक बार शनुओं को हगया । लक्ष्मीबाई ने अगरेजों के नाक में दम कर दिया था। 1 पुरुष की तरह राज्यसत्ता भा खियों के हाथ में रह चुकी है प्रार उस पद प्रवीणता सवे चलाती रही है। दक्षिण भारत में कुछ शिलालम्व ऐस मिले हैं जिन से स्त्रियों का राज्यशासन में भाग लना सिद्ध पाता है। सातवीं शताब्दी के मध्य भाग म चालुक्य वरा राजा श्रादित्य की महिषी पिजयमदारिका बम्बई से दक्षिण में राज्य करती थी। ९.५३ ईस्वी में चालुक्य रात्रा छोमेश्वर की महारानी मैलादेवी वनवासी प्रान्त पर राज्य करती थी। बयमिह तृतीय की बहिन अकादेवी १.२२ स्व। में किमुकद जिले पर राज्य करती या1१.७६ ई. में विचयादित्य की बहिन कुकुमदेवी नाटक धारपाद जिले पर शासन करती थी। इस से यह सच है कि शासन काय में भी स्त्री पुरुष की भांति ही बड़ी पटु रही है और बढ़ी गमारता से राज्य क सब कार्यों का सपादन करती रही है। इस प्रकार शिक्षा, विज्ञान, पोरता भार राज्यशासन श्रादि सभा सामाजिक क्षेत्र में नी पुरुष र समान ही प्रख्याति प्राप्त करती पाई है। फिर कोई ऐमा कारण टिगोचर नहीं आता कि स्त्रियों का पुरुषों के समान सम्मान न किया जाय । प्राचरण, सहनशीलता, त्याग, तपस्या, प्रेम, करुणा,उपकार, ऋतशता, साहस, सेवा और अदा इन गुणों म तो पुरुष भी स्त्री की समानता नहा कर सकता । सीता, सावित्री, पावनी, द्रोपदी और टम (८२) य ती प्रादि अनेक हिदू महिला के चरित्र इस सत्य के अलन्त उहरण है। रावण अब सीता को बलात् उठा कर ले गया तालका म बाकर उसने सीता का बहुत लालच दिये प्राथना की और बहुत राया भी किन्तु उठ कहन का बिल्कुल अवहलना करते हुए माता ने बा कुछ कहा वह भारतीय नारी के गौरव को सदा बटाता रहेगा। माता ने कहा चरणेनाऽपि सव्येन न स्पशेय निशाचरम् । रावणं किं पुनरह कामयेय निगहितम । अथात् इस निशाचर रावण से प्रम करने की बात ता दूर रही मैं तो इसे अपने बाए पैर से भा नहीं छमकती। इसी प्रकार प्रजा के अनुरजन के लिये राम ने अपनी प्राण पल्लभा सीता को बन में न्यागने का निश्चय कर लिया । सीता उम समय गभवती थी। जगल में छापने का भार लक्ष्मण पर छोड़ा गया और सीता को यह रहस्य घर पर नहीं बताया गया। बगल में छोड़ते हुए लक्ष्मण ने जब सीता का यह बताया कि राम ने उसका त्याग कर दिया है ता सीता को यह वनपात के समान लगा। जनता के समक्ष सीता की अग्नि परीक्षा हा चुकी थी और यह सिद्ध हो चुका था कि उस का चरित्र निर्मल या फिर उसपर सदेव क्यों किया जाय ! फिर गमावस्या का समय ! कितना कठिन है ऐसी घोर विपत्ति में धीरज रखना। परतु, सोता मानती थी कि उस के पति मयाना पुरुषात्तम हैं । वे उसका युग, कभी नहीं चाह सकते । उसन लक्ष्मण से कहा कल्याण बुद्धेरथवा तवायं न कामचारो माय शकनीय । ममेर ज माग्तरपातकाना विपाविस्पुजथुर प्रमेय ॥

(८३)
अथात् - राम कल्याण युद्ध हरे वे अपने प्रिय पानां के कल्याण की
कामना करने वाले हैं। वह मेरे लिये किमी अकल्याण का वस्तु की
करा कभी कचना भी कर सकते हैं। यह सर मेरे ही जमान्तर
पापों का पल है।
यहूँ उचावरण और सहनशीलता को पराकाथा के श्रादश
उगहरण का भारत की नारिया ने समार के सामने रखे हैं।
कला कौशन और भौतिक विया में ता पाबान्य देशों को
महिला भी बड़ी उन्नति कर ग. है किंतु भारताय नारी में जाग्वाम
विशेषता यह है ब्रह्म विद्या र क्षेत्र में उतरने की । यह तरस्यापूग्ण
श्राध्यात्मिक विशेषता श्रय देश की स्त्रियों में कम ही मिलती है।
पानव पऋषि ससार बावन स विरन हा गए । जब वह अरण्यम
बाने लगे तो उहाने अपनी पत्नी मेयी स बारेका श्राज्ञा मांगी।
मैत्रेया को ऐभय धन दौलत देते हुए याज्ञवल्क्य ने कहा कि तुम ममार
में रह कर सपन्न और शान्तिमय श्रीवन यतीत इसके उनरमें
मेयी ने कहा-
येनाह नामृता स्यां तेनाह किं कुयाम् ॥
(हयारण्यक)
प्रथात् - क्या में इस धन गत मे अमर हो जाऊँगा मिस मुझे
अमरता प्राप्त न हो उस वस्तु को लेकर मैं क्या कोंगी। भोगां में
कभी शान्ति नहीं मिला करती। भारत कीलो इस प्रकारक प्राध्या-
मिक और सत्यपूण उदाहरण खो जाति के महान् गौरव को
सदा बहाते रहेंगे।
इस प्रकार बत्र इम प्राचीन भारतीय माहित्य का विश्लपणा
करते हैं और उन की गहराई तक पहनते हैं तो इस निणय पर

(४) है कि भारत की मस्कृति में स्त्री काम्पान बहुत ऊना है। पुरुष और त्रा दाना का सम्बप अन्यान्याधित है । टोनो एक दूमरे के बिना नही रह सकत । पुरुष जनक है ता स्त्रो जनना है। भारतीय संस्कृति में बननी का स्थान बहुत उँचा है - जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसा ॥ अथात् - बनन और बमभूमि ये दोनों स्वग से भा बद कर हैं । जहाँ और बहुत से देश अग्ने देश को पितृभूमि कहते हैं हम अपने देश को मातृभूमि के नाम से पुकारते हैं। यह मातृत्व के प्रति अमीम श्रद्धा का ही परिणाम है कि भारतीय दन्द नामों में भी प्रथम स्थान म्त्री को दिया जाता है। जैसे- माता राम, राधाकृष्ण, गौरीशंकर, स्त्री पुरुष और माता पिता धादि। इन सब नामों में स्त्री का खान पहिले है। इस का कारण यही है कि स्त्री में मातृत्व का माधुर्य और महत्व है। पुरुष उस के विना कुछ नहीं कर सकता और यह पुरुष को मामाग दिखाने वाली है और उस के भविष्य का निमाण करने वाली है। जिन राष्ट्र की माताए सुमाग्य हो यही महापुरुष बाम लेते हैं। भगवान् राम, कृष्ण महावीर, बुद्ध और गांधी श्रादि अनेक महात्मानों और महापुरुषों को माताश्रा ने ही वम दिया अतएव मा महाराज म महावाक्य का कभी नीं भूलना चाहिये। यत्र नार्यस्तु पज्य ते, रमन्ते तर देवता । यत्रतास्तु न पूज्यते, सास्तगाऽफला क्रिया ।। मनु. ३ क ५६ अथात् - हिम किसी भी उन में स्त्रियों का पूजन या प्रादर मत्कार भली प्रकार होता है उस कुल पर देवता तक प्रसन्न रहते हैं। 44 2 (८५) और बहा प्रिया का अरपान हता है यहा सभी कम निपल होते हैं। प्रागरि मनु जी लिखते है- शोधात नामयो यत्र विनात्याशु त कुनम । न शो गति तु यौना उघते तद्धि मदा।। मनु श्र. ३, रु ५ अथात् - जिस किसी कुन का बवेरिया किसी प्रकार का क्लेश पाती है वह उन शोध ही नष्ट हो जाता है। किन्तु वहा पर रहें किमा तरह का क्लश ना हाता वह कुल सब प्रकार मुग्व मम्पन्न २६ करता है। ॥ जैन धर्म में ॥ 1 स्त्रोक लिये भारत स्थान देने वाले पनिक घम को तरह तेन धर्म में भी ना को बहुत ऊँचा स्थान लिया गया है । क्रिमा भी सस्कृति की उच्चता की कमीटी स्रा प्रति तकालीन ममात्र का व्यवहार है। जैन सस्कृति म अनादिकाल से स्त्री जाति का बड़े श्रादर मकार और श्रद्धा की जिसे देखा जाता है । जैनधम श्रयतार्य को वीर्थकर नाम मे पुकारा बाता है। तीयकर का अर्थ है तार्थों की स्थापना करने वाले। तीय चार है भावक, श्राविका, साधु और साध्वी । श्रावक के माप श्राविका को और साधु र साथ माध्वी को समान रूप से धमाचरण का श्राशा दा है । सम्यग्दर्शन, मम्यगनान, प्रार सम्यग चारित्र ये तीन बैन धर्म के रान माने जाते हैं। इन तीनों का उचित रीति स जीवन में उतारने के लिये शिक्षा नितात श्रावश्यक है जिसका विधान बेन धर्म में स्त्री और पुरुष दाना के लिये समान है। वैनधर्म प्र-यों में लिग्वा है श्रादि तो कर भगवान् ऋषभदेव ने अपना पुत्री बाली के लिये लेखन कला का घाविष्कार दिया। जी की पुत्री र नाम पर लिपि का नाम बाही पड़ा। ग्राजमल बानागरी लिपि प्रचलित है इस का प्राचीन नाम आना है। इसमयपनियों कना श्रादित पर भगवान प्रापभदेव भी पुल का नाति मी का मुगिदित नाना परमावश्यक मममी 1 वनममा में स्त्रो शिक्षाका प्रनार बार अधिकार अनागियाल से ममा शाता है। तय नाम का जनप्राविका की पिता समान चैन परिचित नहीं। शास्त्रीय रेनिय बहुत प्रसात था। उभने हा पासापाय म मौद्गल्यायन में गस्त्राय किया था। मुरमजरी और गुणमाला ये टोनों येश्य कन्या वैयक शस्त्र की बद्दी पण्डिता थी। इस स या भी मिद हाता है कि या चिकिस्मा लिये वयक कुशन न चिसिक मिन मही घी श्रार उत्तम कुल की क पाए और पवमाय का प्रम नतापूर्वक अपनाती । नाडामणि काव्य में लिखा है कि जीवधर का माता मयूम्यत्र नामक वायुयान में उड़ना सीवा करती थी। इस से स्पष्ट कि कठिन से कठिन शारीरिक काम करने में भी सियासकोनमी करती थीं श्रार पुरुए समानसी मशीनरी का सचालन प्रारउन काशन प्राप्त करना भरने लिये घावश्यक ममती या! 6 से उन मभ्यता थे य वन काल म वायुयान जैसे किसी यत्र अनिस का पता चलता है। है विवाह कन्याए अब पर लिप र पूण युवावरा का प्राप्त हो जाती थी तभी उन का विवाह मस्कार क्या बाता था। बाल विवाह कर पटुत पुरा माना जाता था। यदि पिता किसी कारण से घटी उमर कया की सगाई कर भी देता था तो कया का युवावस्था तक पहुंच में 1 तक उसका विवार राक रखा जाता था। कमरलता को इसी कारण अपन निधि पति स पृथक रहन की प्राह दी गई थी। वैसे तो कन्या का पिता भी सुयोग्य वर ढूँट देता या किन्तु स्वयवर की प्रथा उत्तम मानी बाता गी! क या अपने गुण, कम भार स्वभाव र श्राक्ल योग्य वर चुन सस्ती थी। वह वर क्मिी भी वाति का हो इम की चिन्ता नहीं की बातो 41- क्या वृणीते चित स्वयपर गता परम् । कुलीनमफुलीन या क्रमा नास्ति स्वयपरे । (हरिजिनदासहत) সুষা - ঋষ ম য র কন্যা সুহনী বঘি ঈ গুলুপ দুখী বৰ का चुन लती है । वह वा उच्चकुलाहा या नीचकुल का दम का विचार न किया जाता। इस प्रकार जैनधम में विवाह का क्षेत्र इतना विशाल था कि कुलीनता, अकुलीनता उच्च या नीच वण या भिन्न धम का काई प्रतिव ध न था। यही कारण है कि राजा श्रणिक ने ब्रामणो से विवाद कर लिया था और वैश्य पुत्र बोधर कुमार ने क्षत्रिय की कन्या ग धबंदचा का स्वयवर में विवाहा था! वणिक पुत्र प्रीतकर ने अपना विवार रामा वयसेन की पुत्री क साप किया था। नन्द रामा महानन्दी की रानियों में एक शद्रा रानी भी थी। इसी तरह धम की भिन्नता भी विवाह म बाधक नहीं बन सकती थी । बमुमिन अनी बैन थे किन्तु उन की पत्नी धनश्री जैन यो। पुण्यवधन न था किन्तु उसकी पत्नी विशाग्दा बौद्ध थी। श्रेणिक के पिता ने अपना विवाद एक भील क या से किया था। इसी तरह चाहत का विवाह एक वेश्यापुत्री के साप हुधा था। इस प्रकार प्राचीन जैन समान में विराह के लिये (८८) विशेर वपन नया स्रावाति का बड़ स्वतत्रता थी और विवाह का क्षेत्र बहुत विशान था। ॥ परदा प्रथा ॥ । मनावजानिक दृष्टि से परदा हानिकारक हा सिद्ध हाता है। जिम परतु को जितना अधिक छिपने की कोशिश का नाय उतनी ही देवने वालों को उत्तम उस देखन के लिये बढती है। पर्दे के अन्दर छिपा हुश्रा स्त्री का मुग्मण्डल दशनेच्छुकथे चित्त को बेचैन कर देता है । मनुष्य उम व दशन के लिये पता नहीं क्या २ विकृत विचार अपने मन में लाता है और तरह २ का अभिनय करता है। यदि वहा मुग्व मण्डल खुला हो तो यथ की उत्कठा से सभी मुक्त रहते हैं। अब देखना यह है कि पर्दे का कारण वास्तव में है क्या कुछ लागा का कहना है कि पर्दे से खी शालकी रक्षा होती है। ये लोग स्त्री की श्राट के दीपक के साथ तुलना करते है। उनका कहना है कि जिस प्रकार आटे के दापक को श्रदर रस्वो तो चूह का डर बाहर रखम्वा तो कौना का। टीक इसी प्रकार का डर नाफा भी है, इस लिये उसे लुकाकर ही रखना चाहिय और इस में उसके नाम 'लुगाई' की भी सार्यकता है। परतु वास्तव में इस प्रकार के विचार भ्रमपण ही सिद्ध होते हैं । पर्दा शीश की रक्षा में काइ सहायता नहीं कर सकता। शील की रक्षा के लिये ता जानबल और यात्मवल की श्रावश्यकता है। बो स्त्री पातिप्रन्य घम के महत्व को अच्छा तरह समझती है भार उसका पालन करती है वह नगे बदन भले ही कहाँ भी पिरे किमी पुरुषको क्या शक्ति है कि उसपर कुदृष्टि डाल सके। यदि स्त्री के विचार ही दूषित हा भले ही बार उसका कितने पदों में रम् श्राप उसके शील की रक्षा करने में कभी भी सन्न नहीं हा ।

(८६) मग । शीन की रना वायरधना सनहीं हो सकेगा किन्नु मानसिक अधना सहा सकती है। अतएव शल की रक्षा के लिये पर्दे का अपनाना सवथा गया है । इस म अतिरिक्त पहें को श्या स्त्री के स्वास्थ्य के लिये भी सुत हानिकारक है । हम देखते हैं कि आज जिन प्रान्तों और वातिया में पर्देकी प्रथा भयानक रूप धारे हुए है उनकी स्त्रियां कमजार, अशिक्षित बार अनेक भयानक रागों से ग्रस्त पाई बाती है । वे अादर्श गहिणी बनने प प्राय सभी गुणों से वञ्चित हाती है । मेरे विचार से पर्दा प्रथा हमारी अपनी चीज नहीं है किन्तु दीर पाल व यवन शासन से हमारे में पा. १ श्रस्तु-प्राचीन जैनधम इस पर्दे की कुप्रथा के राग से मुक्त था । जैन महिलाए घर की चार दीवारी की जेल में बन्द नहीं की जाती थीं । वे घर स माहिर काम मात्र पलिये माती पाती थीं और समय समय पर विद्वाना से शास्त्राथ तक करती थी। जब वे घर से बाहिर बाती थी ता लाग उहें बड़ी प्रतिमा और समान के साथ देखत । साधारण स्त्रियों की ता रात दी क्या रानियों का राजदरवारों म खुलमखुले चली बाती या । उत्तर पुराण म निम्ना है कि एक बार राजा मिनाथ राजदरबार मटयागनी निशला उन से मिलने के लिये वहां पहुची। सिदाथ न बड़े सम्मान से उसका अपने पास राजसिंहासन पर दाया। श्रयसन राजकीय कायों की अपेक्षा करके सवप्रथम उन्होंने विशमादेवी १ श्राने का कारण पूछना चाहा। इस स यह स्प है कि प्राचान जैन समान मप जैसी भयानर कुप्रथा न थी। वतमान जैन समाज भी कामी लोग इस १५ की प्रथा कराग से बुरी तरह स प्रस्त है । उनका अपने प्राचीन धम से शिक्षा लेनी चाहिये और १ य व धन का ताई पर स्त्री बाति में शिक्षा का प्रचार करना चाहिये । शिक्षा विना स्त्री वाति में जागृति ना या सस्ती और उस जाति के बिना चल बाला, मृगावती और मुभद्रा बसी देवियां जैन समाज में पैदा न हा सांगी। अत उन PRAwka ।

का अब जागना चाहिये। सारा संसार श्राग बढ़ता जा रहा है और पाप भी अपनी सस्कृति का पहिचानिये । ॥ धार्मिक जीवन ॥ पुरुषा में बहु विवाह की प्रथा अवश्य प्रचलित थी किन्तु स्त्रियां एक पतित धारिणी हाती या गृहस्थ श्राश्रम में गृहस्थ भार क सभालने के साथ २ स्त्रियां धामिर कार्यों की उपना नहीं बरती थी। प्रतिदिन प्रतिक्रमण करना और सतां की सेवा में बैठकर धमाय श्रवण वरना ये उनके नित्यकृत्या । प्रधान अग थे। वे अपने पति में बड़ी अद्धा पार प्रेम रखती थीं। जब व उन की इच्छा के विपरीत काय करत पता वे अपने अधिकार का भूलती न यी और उ ह युक्तियों द्वारा समझा कर ठीक कर लेती थीं। बाबू कुमार जब दीक्षा लेने क लिये तैयार हुए ता उन की पत्नियों ने उन का खूब समभाया और घर पर रहने के लिये बाध्य किया । बम्बूकुमार ने उन की सम्मति का प्रेमपूषक मुना और उस का पालन क्यिा । इस से भी पता चलता है कि पति भी अपना पत्नियों के उचित श्राग्रह की अपहलना नहीं करते थे। श्रापत्तिाल म स्त्रिया अपने शील की रक्षा भी बढ़ साहस से करती यां। च दन बाला की माता धारिणी, और महासती राजीमती इस सत्य के चन त उदाहरण है। चम्पा नगरी म दधिवाहन नाम के राजा राज्य करत थे । उनकी राणी का नाम धारिणी या जो बड़ी ही रूपवती थी। उस पर कौशाम्बी 4 राजा शतानीक ने चदाई कर दी। दधिवाइन बगल में भाग गया। रतानीर एक योदा ने राजमहल का लूट लिया और धारिणी का कार म कर लिया 1 वह उस पर आसक्त हो गया। धारिणी ने परत समझाया घुमाया परतु वह कामाध हो रहा या अट पलास्वार स अपनी पाउना पूर्ण करने लिये तैयार हो गया । धारिणी न अपने मतीत्व की रक्षा के लिये तुरन्त अपनी धीभ वीच फर बाहिर निकाल दी और प्राण दे दिय । इस प्रकार अपने शील की रक्षा पलिये भारिंगी ने श्रपा प्राणां की बलि दे दी और यादा बीवन भीम प्रारमात्मग द्वारा धामिर जीवन म बदल डाला। जैन धम के पादमई तीयकर नेमिनाप बाबाल्य काल से ही विरत थे । विवाह की इच्छा न हाने पर भी उन को मगाइ मयुरा रे राजा उग्रसेन की गुणवती पुत्री रात्रीमती से कर दी गई। ये बड़ों के श्रनुराध का रान न स । जव वगन उममेन के यह पाची ता समिनाथन प्रगति के भाजन 2 लिये लाए गए प्रशुश्रा का बाड़ा भग देवा । वे अपने विवाह के निमित्त निरपराध पशुओं पा धन देख सकते थे। वे यहां से भाग गए पी गिरनार परत पर बार दीक्षा लला । अपरात्रीमना का हम बात का पता चला ता उमो भी पति का अनुसरण किया और दीक्षा लेली। दूसरे किसी कुमार के माय विवाद करन के माता पिना १ प्रस्ताव का उस ने ठुकरा दिया। दीक्षित श्ररथा में एक्वार प्रवद गिरनार पर्वत पर बारी थी ता पाव कारण उम के धन भीग गए और उई सुखाने के लिए यह एक समीप की गुग में चली गई उस गुगामें एक रथोमि नाममा मा बैठा था! बह राजामनी के रूप लावण्य का देख कर कामासक्त हा गया और रति की मायना करने लगा। राजीमती प्रादर्श जैन महासतियों में से थी। यह अपने शीलधम् का क्या भूलो वाली थी। उसने कहा- जइ सिमवेण वेममयो, ललिगण नलागे। सहा वितेन इन्छामि जइ सि स्वयं पुरंदरे ॥

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घिरत्यु त नमो कामी जोत जीविय कारणा!
यन इन्द्रास श्रादे से, यते मरण म !! -
अतरा०प्र० २ ४.४.
श्रयान - ६ स्थीमिया तुम का म मादात् कामदेव लीला
मनल कुवेर याद भी हाता भी में तुम्हारी कामना नही कर सकती।
तुम्हें धिकार है कि म वामनामय वमन रिये हुए भागों का न्याग कर
उहरि भागन की इच्छा कर रहे ह। हम प्रसार व पतित पावन म
ता तुम्हारा मरना ही अच्छा है।
यर ६ अन नारिया र मतीत्व या शोन की महानता भार
धार्मिक वन की उच्चता। इस प्रकार नारी माय रक्षण के
उदाद गण अन्यत्र कम ही देखने म मिलने है । धारिंगी और बीमती
इनमा महिलामो उरण म यह भी है कि दान यवल
अग्ने शीन पीसी नानी किन्नु चरित्र से भ्रष्ट हाते
श्रा माशु भा भी अपने मनीष की शनि म म माग पीनार लगाया।
बैन शाम्बा म विश्वा विवाह का प्रया उMण मरे, देवन
मना अाग | "म म यह भी अनुमान लगाया जमाना मिश्रा
कल की तरह प्राचीन जैन ममात्र म विवाग्रा को मल्या कम
श्री -म लिय विवा विवाह की वरिल ममाया उन मामन नधार
१।। ना थाड़ी उन विधवा हानी होगी वे धार्मिक जीवन व्यतात
करना रगी। उपवान की मस्या कम होने के कुछ प्रमाण ता पर ही
हैं । त्रिम आनि म बान विवाह की प्रथा प्रालिन या बुजाई विवाह
हाने हा या विधवाग्रा का माया अधर चने का डर रहता है। जैन
ममामाभाग्य वश इन Tना उपयाग्रा स मुन रहा है। थान विवाह
ना जैन म म नि च मममा जाता था। और कुनोड विवाह का प्रश्न
।

(६३) हा नहीं जाता जबकि विवार के लिये वयवर की प्रथा मबसे उत्तम माना जाती है। क्या और वरदाना का अधिकार था कि वे अपने गुण, पम, और स्वभाव अनुकूल स्वयंवर में अपना बोरनमगी या वनसगिनी चुनें। जन सभ्यता कालम सामाजिक जीवन इतना ऊँगा और श्राश था कि जिम की प्रशमा रिये बनती है । लाग विपरीत कारणों सद्भाव में भी मया का उलपन नहीं करते ये गुण होंगे व दाप भी हा मकते हैं, भूल पुरुष भी करता है और स्त्री भी 1 हा आती है का सभी सवश ता हाते नज। ऐसी स्थिति में अपने में हो वाली अनेक भूलो की उपेक्षा रस दूसरे की भूल देम्वार उम से घृणा करना यह घाटेपन की निशानी है । जैन धम ने इन बातों में बड़ी विशानता दिखाई है। यानि काइम्त्री भूल से या अज्ञानता मम माग से मिल जाती थी ता समाज उम स घृणा का व्यवहार नहीं करता था। उस का भी प्रय त्रिया की भाँति धर्म काय रन की पूरा स्वत प्रता यो । बैन पुराण में गक क्या पाती है कि चा नगरी में पर क्नकलता नाम की श्री थी । उमा "क युवा मे अनुचित महा गया था। व पति पत्नी का तरह प्रत्यक्ष रूप में मन भी लग गए यता मो ममान के लाग उन सघृणा नाम करने थे । दाना अपन अनुनित मानध मेलनि । अवश्य ये रितु मनिया र याग्यान मुनने बात ५। उन्हे दान देते श और देवपूजनादि मव धार्मिक कृत्य निरतरक्यिा करते थे। दमो प्रकार अगरना या सपमें भी एक ऐमाही हात मिलना है। अठा नाम की आर्थिक अाने प्रारण म भ्रा गई यो उमे प्रारक्षित क्गकर पुन दाता नगद भी । लाग पूवत् हा उम् में श्रद्धा बने थे। हम से यह स्वय है कि चैन ममा म अमानव अारएना में पतित नाम) १५ प्रति तुम्हारा क्या प्रयाजना सस्ता है। इस य उत्तर म मलिन हाय अशारदत्त ने कहा कि इस मसार म जिस मनुष्य ने तुम्हारे दिव्या का एक बार भी देव लिया है वह तुरत अपने लिये तुम्हें पाने का प्रयाजन रखता है। क्वन एक तुम्हारा पति ही ऐमा पुरुष है जिन का नु रे ति प्रयाजन नहीं है।' प्रियदराना शाकदत्त के मलिा भावों को समझ गई और उस से नीच विचार के निय सूर लताड़ा। शाकदत्त बड़ा लजित हुधा और वह यह कह कर कि यह तो केवल परिहास के लिये कहा गया था निराश हाकर भवन से पादिर श्रागा । उस को श्राशा पर पनो पिर चुका था श्रत वह बड़ा ही खिन और उदास था। एकाएक सागर च । भा उम मिल गया और पूछने लगा कि मित्र इस खिन्नता और उदामी का कारण क्या है ? धूतना का जाल रच ते ए श्रशादत्त ने पाले जाने से मात्र दिवाया श्रावें भर ला और कुछ निश्वास भी छाट | यह सब जाल सागरन से ग्राम परान कलिये था। बच मागरने श्राग्रह क्यिा ता कान लगा - "मित्र धार बानते ही है महिला सब अनर्थों का मूल कारण है। वह बिना बाल को बिजली है, ऐसी पारि है जिम के लिये काई औषति नहीं हाती और ऐसी माह-निता है जिस का भा अन्त नहीं हाना। स्नेह से परिपूर्ण होते हुए भी जिस प्रकार दीप शिवा बनती रहती है। ठीक यही दशा स्त्री का भी हैं। ग्रान मैं धार या ढूँढने के लिये धार भवन पर गया था श्रार घा एकान्त जानकर पिय र्शना ने मुझ पर अपना क्लुषित मेम प्रकट किया। बड़ी कठिनाई से अपने श्राप का उसके पज से बचाकर श्राया हूँ । भला में श्रार जैस घनिष्ठ मित्र का क्या सप्त में भी पाखा दे सकता हू |अब साच रहा था कि क्या मैं श्रारमघात करलू या न करूँ क्य'कि वह दुराचारिणी अवश्य मेरे प्रिय मित्र के पास झूठा कनक मुझ (६७) पर ही लगाने की शिकायत करेगी। यदि बो घटना हुई है सत्य २ मित्र स बता दू तो यह भा टाक न हागा क्योंकि मैंने उस देश का मनास्थ पूर्ण नहीं किया । श्रत ५६ और भी व्रण पर नमक छिड़कने कसमान हागा। यह सब सार हो रहा था कि श्राप मिल गए। सागरचन्द्र के लिय यवचन बद्रक समान थे। उसने अपने श्रापको सभाला और शाकदत्त को सात्वना दी और उसे कहा कि हमारा मित्रता में यह घटना कोद विषमता पैदा नहीं कर सकेगी । पर प्रिय दराना लिय सागरचन्द्र का हृदय टूर चुका था । पर उस हुत्य में यह पहल का मान और प्रणय न रह गए । उनका अपनी पत्नी प्रियदशना के प्राचरण पर पूण सदेह हो चुका था। किन्तु यह सर हाते हुए भी सागरचन्द्र ने अावश्यक शिष्टाचार और मयादा का उलधन नही किया। अदर सागर का हरय अवश्य विन रहता था किन्तु वम पिनता को उसने कभी भी अपनी पत्नी के सामने प्रफर नहीं किया। बाहर से वह पूर्ववत् हो प्रिय शना के साथ ऐसे शिणचार स -यवहार करता रहा कि उसे अपने पति पर सदेह तक नहीं होने पाया। प्रियदरामा ने भी इस भय से कि दोनों मित्रों में उसके कारण वैमनस्य उत्रन नहा अशोक्दत्त प दुटाचार की पात अपने पति सन कही। इस प्रकार उन्चकारि को मशादा पानन करते हुए पानों ने अपना सारा बावन बिना किमी कालुष्य के पिता दाला। भियवशना की इस कथा स पाटकों को भल भाँति पता चल गया होगा कि जैनधम में स्त्री का कितना उत्कृष्ट स्थान है। पति के लिये पानी के चरित्र पतन से बद कर रोष का और क्या कारण हो सकता है कि सागरचन्द्र ने यह सब होते हुए भी अपनी पत्नी पर न तोकोष दा किया और न कभी उस का निरादर हो। उपरा उसके, साय ऐसे शिष्टाचार का पहार किया कि उसे वास्तविक रहस्य का पानन करवाने के लिये य, श्रयाशयक है कि समाज उनका धार्मिक वातावरण में रक्वे । किनु ब्रतवयं का पालन फाईको का म्वेल नहीं है। बचानी यमा म्वच सरन फाम हाता है किन्तु इद्रियोंका दमन बड़ा कठिन काम है। समार का इतिहास ऐम उदाहरणो से भरा पड़ा है कि बड़े २ शानी ऋषि और मुनियों का भी काम ये पाणी भाग हार वानी पड़ी। बड़ी २ शानचचा करने वाले, प्रमचय और सयम का उपदेश देवाने उपदेशक और उसका भरण करने वाले भावक क्या सच्चे हदय से वह कह सकते हैं किन्द्रिय निराध मरल फाम है ? फिर भला हा एक विधवा से यह ग्राशा करना कि वह अवश्य हो इन्द्रिय निराध कर लगी कितना भ्रमपूण है ! हमारी समाज में ऐसे अनेक घर है जहा माता पिता बड़ी उमर में भी कामवासना का या न करने और उनकी युवावस्था से परिपूर्ण शल विधवा कन्याए वैधय को ज्याना में बला करती है। ऐम माता पिता का माहिये कि वे स्वय सयम या पालन कर और अपनी या कामातिन ग्रो. धार्मिक व तावरण में रखें दिम स उस 7 विचार पित नहाने पावें। किन्तु इमा विरात श्राज फलक अधिकतर माता पिता म्वय ता विनासपूर्ण जावन व्यतन करते हैं और अपनी प्रवाध रयास असभवको मभावना करते हैं। प्रात्माइन स्वय देत है और बन अपरिपक्व अनुभव वानी क या समाग मे पतित हातो है ता शास्त्र की प्राशा के विरुद बानेर समूण ज्ञान का उम पर धारने में काई कसर बाकी नहा रखते । काई दूसरा अपराध करे ता शास्त्र चिमुम्ब हानेका दुहाई दी जाती है और स्वय अपराध दाता शास्त्र की बात भा नहीं पूछी जातो। अस्तु मेरा कहने भिप्राय यही है कि विधवात्रा कनिये सास्तिक और धार्मिक वाता घरण पैदा करना और उमी में उनका रखना यह समात्र का परम क्त है। यदि कार माग मे पतित भी पाये ता उस पर शास्त्र विमुग्वता के भार का यार कर उससे दुन्यवहार नहीं करना चाहिये किन्तु शाम के महत्व का समझाकर उसका समाग की भार प्रत्त कराना चाहिये। मेरा ता मन्तर है कि यदि वैन शास्त्र में बताए धर्म पर और नियमों पर हमारे लाग चनते तान इतना विधवाए हाहानी और न यह बरिल ममस्या ही समाज सामने उपस्थित राती। स में कोई संदेह नहीं कि प्राचीन काल से जैनधम में स्त्री का उच प्रापण सतीय रहा है और न वयं का एक अलोकिक शक्ति और असाधारण तेज माना गया है। वास्तव में यह बात सत्य भी है किन्तु उम समय कुछ वातावरण और था। अब उमसे सवश भिन्न है। उस समय लाग अपनी सस्कृति पे महल को पूर्णरूप से समझत थे और अपने बीवन में कार्यरूप में उस पर चलते थे। म के लिये उनके चारो और उप धार्मिक विचारों का वातावरण भी अनुपूल या। श्राज वातावरण बदल चुका है। अनेक वातियों और धर्मों व माय निरन्तर सदियों प स स हमारे साकार, विचार और राति रिमात्र परिवर्तित हो चुर है। अब हम प्रत्येक बात में मेन शान व विधान धनुमार चमन का दावा नहीं कर सकते। शुद्ध भमण सप्तति के पालक इम तभी य । सकते हैं कि दूसरे धर्मों व मस्कारों और विचारों का निकाल और रीति रिवात्रों का त्यागद। तब अपन मिदास्तो। समझ और है अरने औरन में उतारे। रि सामाजिक अरिल समपाए चपने आप एल बाएँगी। फि मदियों का चला रंगी निम नहीं उतर बाम। इम पे निये यह करिन परिश्रम चौर स्पागमए वन की ग्रामरता है। इस महान काय की पूतिके लियन नवयुवक यार सुशारक विधान वायक्षेत्र में उतरे तापमण सनिक पुन प्ररणार में कोई सदेह नहीं रह सकता।

- ॥ अहिंसा परमो धर्मः अहिंसा एक मान धम है। हिंसा से निवृत्त होने का नाम ही अहिसा है। श्रारमा के श्रावागमन या पुनज म पर विश्वास रखने से प्राणामार + प्राणां के प्रति प्रतिष्ठा स्वय पैदा हो जाती है। आवागमन का सिद्धात प्राणामात्र के प्रति समता रखने का श्रादेश देता है। वह कहता है कि जिस प्रकार तुम अपने टु द का अनुभव करते हा इसी प्रकार तुम्हें पराए का भी करना चाहिये। ससार में मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पनग श्रादि छोटे से बड़े तक जितने भी जीव है सब समान है । भिन २ कर्मों के कारण से वे भिन्न २ योनियों में पैदा हुए हैं । सुख दुख सच का मनुष्य की तरह ही होता है अतएव उन सत्र के दुव का अग्ने दुग्व के समान समझना चाहिये। धो पुरुष ऐसा करता है वह महापुरुष कहलाता है। यही कारण है कि विश्व के प्राय सभी धम किसी न किसी रूप म अहिंसा परमोधम , की और मनुष्य को प्रेरित करते हैं। भारत के अतिप्राचीन और प्रधान धम वैदिक, जैन और बौद्ध घों के अवतारों और प्राचार्यों ने भा अहिंसा धर्म का जीवनकल्याण के लिये महान् धम बताया है। तीनों धर्मों के प्राचार्य और महर्षि अहिंसा पालन का उपदेश देने ग्राए । किन्तु समय की गति बड़ी विचित्र है। प्रत्येक सदीमें नगीन परिस्थिति और वातावरण के कारण भिन्न २ विचार धारा के व्यक्ति पैदा होते रहते हैं। कुछ लोग स्वाथ वरा अपने जीवन का धर्म के अनुकून न मना कर धम को अपने ।

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APURों कमालकि सिद्वानों की
Pririt भरिस में प्रदाभाने से शनि
** TERNER होगा। इससे सामान
PAR अपने निमारामायापा
internोरों में पाया है। प्रशु, अपने
trateft मोर मानिसको भारतीय मी ने
र गई और पिनासका प्रचार
वैदिकधर्म में हिंसा महिंसा पर दृष्टिपात।।
PRAKा पारिसिमान्त
PER NिA
tra retric trexमियों
भा, गोदी मे
rikaRaTो नया मागे
PITA Kangrature
Rarat
mer है कि जो भाने में ६.६ पाप और
raar-trenmaARया महान
rair मेहनत
RAM मोहा॥ ॥ -

"
.
मनु.५, ठाक ३६
अर्थात् --- स्वयंभू ब्रह्मा ने यज्ञ के लिये और यशों की समृद्धि के लिये
पशुओं का बनाया है। अतएव यज्ञ में पशु का षघ अवध प्रयत्
पधजन्य दोष रहित है। इसी प्रकार भागे लिखते हैं -
श्रोषध्य पशवो वृक्षास्तियंच पक्षिणस्तथा।
यज्ञार्थ निधन प्राप्ता प्राप्नुवन्त्युत्सृती पुन ।
ममु ०५/४०
औषधि, पशु, वृक्ष श्रादि और पक्षी ये सर यश के निमित्त मारे जाने
पर फिर उत्तम यानि में जम ग्रहण किया करते हैं।
याशिकी हिंसा के विधान की तरह भार में होने वाली हिंसा
का भी मनु जी ने विधान किया है। श्रार में खिलाद बाने पालो किस
२ वस्तु से क्तिने २ दिन तक पितर प्रसन्न रहते हैं इस का वर्णन
हुए पाप लिखते हैं
करते
-
द्वौ मासौ मरस्यमासेन श्रीमासान हरिणेन तु ।
औरणाय चतुर शाकुनेनाथ पञ्च ॥
परमासाश्यागमासेन पातेन च सप्त वै ।
अष्टावणस्य मासेन रौरवेण नवैव तु ॥
दशमासास्तु तृप्यति वराहमहिषामिषै।
शशक्मयोस्तु मासेन मासानेकादशैव च ।।
• ३ श्लोक २६८, २६६, २७०'
अर्थात् -पदिनी श्रादि मछलियों के मांस से दो महीने पयन्त, हरिण
फे मास से सीन मास तक, मेद के मांस से चार महीने और खाने
:

w - दुष्टता और अत्याचार बनने लगे और मानवता में मारा गुण समता, पारी ममाधिक ध्यवम्या गिद गई और साप बुरे कमा में प्रवृत्त हात लगे। पतनान्मुद मानवसमाज का सन्माग की बार पहन कराने के निय धम से ही कुछ ऐसी सम्प्रदायां का बना दिने वैदिकी हिमा' शिष क्यिा। वैष्णव म्वामीनारायण धार धारममात्र मी मन यदिक धर्म को शाबानो घमगुरुधा ने ३ महिमा का गुले मैदान विराध किया और हिन्दूममाज की ५ घड़ी मुख्या का मामिला (१०७) लायक पनी के माम से पांच महीने पर्यत पितरोंकी तृमि होती है ३६८ पारी के माम से छ मास, पृषतमृग के मांस से सात महीने एजातीय हरिण के मांस से पाठ महीने तक, और रुकनामक मृग के माम से नौ महीने तक पितरा का तृप्ति हुआ करती है ॥ ६ ॥ बनैले मूबर तया जगली भसे वे मौत मे दम मदीन और बरहे सपा कछुए क माम से ग्यारह माम पयन्न पितर नुम रहता है ।। हैं ॥ २॥ यज्ञ और पादादि क्मों में हिंमा विधान का पान यह पाकि वैदिक समावनम्यो क्लिो कान में पापक रूप से भामिनाहार करने लग गए थे । शूद्रादि छारी जातियों के लाग ता बिना किसी बाधा के मांसाहार करते ही पे कि तु ब्राह्मणोनमी यज्ञकी आह लेकर या मामाहार पर धम की मार लगाकर मांसहार करना प्रारम लिया। इस प्रकार पशुओं का व्यापक रूप में सहार होने लगा और अन्त में हिसकाग भयानक श्री मानवजाति का पतन की पार ले उ ने बाला परिणाम हाता है वही हुआ। हिमा से सामाजिक वीरन में नियता, करता, महनशीलता, अनुस्मा और सहृदयता मानव समान लुन हान जगे। श्रय हिंसा के विरुद्ध पालन का प्रावका यो। हौभाग्य से कि ने ने । पड़ रही निनि कराने में वे साल भी हुए। सारा विग - का 8 - (RE) उन्होंने वैदिक धर्मग्यो'का त्याग नही दिया किन्तु अन्याम अनिवास हिंसामूलक पाठों का हिसामू नक अप किया। उदाहरण के लिये गामेष यश का विश्लेषण करत हुए आर्यसमाज के मुयोग्य विद्वान् प. गंगा प्रसाद श्री लिखते हैं- बहुत से विद्वानों का कथन है कि वेद में पशुवध की प्राशा १, यहाँ तक कि यज्ञ के 'लपे गावध ताका विधान है। यह प्रम इतना विवादास्पद है कि उस को यह विधेचना नहा को बा सकती। तथापि हम वैदिक यश गामेध के मम्बध में जिसके प्रयगावध पे लगाए पाते हैं कुछ कहना उचित समझते हैं। हम इस य की जिन्दावस्थामें भी पाते हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती प्राने सत्याच प्रकाश में पतला है कि सरस्त भाग के 'गो' शब्द के प्रय फेवल गाय ही नहीं प्ररयुत पृथ्वी और इलियों के भी है। गोमध हा प्राधिभौतिक अर्थ सेती के लिये परती बातना और श्राध्यामिक अद्रिय-दमन है। कुछ लोग इम पाषा का उपहास करते हुए उसे प्रयकी नींचातानी बताते हैं। वे यहां तक कह डालते हैं कि वेद के इस प्रकार अथ लगाना अपाय है। हमें देखना चाहिये कि डाक्टर हाग वैसे प्रामाणिक और विश्वस्त पुरुष पारसिया के विषय में क्या सम्मति देते हैं। गाय उई का अथ पपी का सावभौमि प्रारमा है वा सब प्रकार के जीवन और वृद्धियां का कारण है। शदफा अक्षराय' 'गो को प्रात्मा' है। यहां उपमालकार है क्योंकि पृथ्वी की गाय से तुलना की गई है । 'उस को कारने और बांटने से वी में हल लगाने का अर्थ लिया जाता है। अमजदा और स्वगीय समारोत्रो अादेश दिया है उसका मतलब यह अधर्म का प्रादि स्त्रात पृ० १५४ । देवो सस्यायप्रवास ११'समु.पृ.१५ - -

रहे हैं। उसी प्रचार का माहम प्राज'
से लोगों ने प्राविवाहार कासग भी रियासरसके
विपरीत कुछ श्रय पोगणिक विज्ञान ने पदम्नाटीका
समझा और उहोंने मांसारक एवमानसी क्रिपारिन
उन मामपरकामारमक यज्ञ का विधान में यमतापान
दे नाम पर या धर्म की प्राइPाना frrका-समापसे
रोकने के लिये और हिमाघमारने के निय यह दूसरा
पदम या ब्रिह्मपुराण श्रार प्रागार प्रदि बहुत से पैदिक
विश्लेषण से पाठक का २३ २६ मा दागा कि वैदिक
नियुकिरिया है। श्रदय
हिमा को समयन करने वाले प्रेग लिखने वाले दो
बड़े रेल
(१०)
है कि धरती का बातना चाहिये 'अतएव यह मेवी के नाम
पानावा है।"
हिनों को गाय के लिये प्रवादिया मास्त
कि प्राचीन कान रे पारसी लाग भा टसन गन कराना
तो फिर क्या यह कहना अयुक्त नहा कि गाने का प्रयगाate
भाषा और भाव दानों का समुचित विचार गम हुए समाप्रम
'घाती को जीतना कर सकते हैं।"
इस उदरण से पारी का भनिएका बन गया कि
किस प्रकार हिंसा में विराधी वैदिक विद्वानों ने Rel
अप अहिसारक किया और यो पो हो कि न एभी
उन'या को अहिंसामय मिद विया कपमान मगानीय
था। ग्रामिपाहार करने वाले लाया पर इ3 पार का नया प्रभाव
पड़ा और बहुत
में हिमात्मक यो का
वेदों
aur
-

में पाते हैं । किधमावलम्बियो में श्रामिपाहार रोपाला की सख्या भा बड़ी है और ग्रामिनाहार काधार विराध करन वाल शाकाहारियो की भी कम नहीं । कुछ भी हा यह बात निर्विवाद सिद्ध है कि वैदिकधम में भी अहिंसा परमो धम' इस सिद्धान्त का सम्मान हुआ है और वैदिक धमवलम्बिी बहुत बड़ा सरत्या में इमा पालन करते रहे हैं। ॥ जैनधर्म में अहिंसातत्व की साधना ।। में वैदिक धर्म में जब हिमा प्रवृति ‘यापक रूप में पैल गई थी तो हिंसा का विरोध करने वाले श्रामिपाहारियों के लिये छोभ का कारण बने वितु इसके विपरीत बैन घमक परम्परागत शास्त्रीय गान में जब बुछ पाथास्य विद्वानों ने मांसाहार का विधान यताया ता अहिसा घम पपुजारी जैनममाव में बड़ा क्षाभ उत्सर शा। याकामी ग्रादि अमन विद्वानो ने पाचाराग के कुछ सूत्रों का मासक अय किया है जिस यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि नी लोग भी प्राचीन समय मासाहार कर सकते थे। इस से जैन ममान में यहा क्षाभ हुना और इस का विरोध वैदिक धम में आर्यसमाज के समान बनधम के स्थानक पासी सम्प्रदाय ने किया। स्थानकवासी सम्प्रदाय ये पानार्यों और विद्वानों ने सूत्री म श्राए मामपरक शब्दों का अथ बनस्रतिपरक किया और हिंसात्मक अथका सण्डन किया। चैनवम की दिगम्बर सम्प्रदाय पूज्यपादादि प्राचार्यों ने नायो या मांसमस्यपरक ही अथ मानकर उन भूत्रा का मानने वानी की निकी और उपदेश दिया कि ऐस मुत्रों को नहीं मानना चाहिये। सूत्रों रे न मानने के लिये यह केव महाना मात्र है। वास्तव में दिगम्बर लाग मूत्रा को इस कारण न मानते कि उन में यत्र तत्र वन का विधान है जिम में श्वेत म्बर मतक 1 पुटि होता है। प्रस्तु, मेरे अपने विचार रो बैनधम या प्रमण सस्कृति सिकी नीव ही 'रिसा परमो धम' पर रखी गई है उस में मांस मान्यादि का विधान अपवार रूप में भी कर दिया हो यह सभव प्रतात नही हाता । अत प्रारम्भसे ही सूनाका वनस्पतिपरक अर्थ होना चाहिये । बैन दशन के धुर घर विद्वान् श्री प० सुखलाल जी सश्वी तो भू मानमत्या परक अथों को श्रापवादिक मानते हैं । उनक निष्पक्ष विचारत भी पाठकों की ज्ञान वृद्धि पे लिये यहा निये बाते हैं. L "काई भी बुद्धिमान् यह तसाच ही नहीं सकता कि सूत्रों की रचना के समय रचनाकार को धनम्पति और मास श्रादि दोनो अर्थ अभिप्रेत होने चाहिए । निश्चित अर्थ के बाधक सूत्र परस्पर विराधी ऐमे दो श्रयों का बोध करावें श्रार जिज्ञासुओं को सशय या भ्रम में डालें यह संभव ही नहीं है । तब यही मानना पड़ता है कि रचना के समय उन सूत्रों का कोई एक ही अर्थ सूत्रकार का अभिप्रेत था। कौनमा प्रय अभिनत था इतना विचारनामर बाकी रहता है। अगर ममान लें कि रचना र समप मूत्राका पनसतिपरक अथ या ना हमें यह अगत्या मानना पड़ता है कि मालमत्यादि का अर्थ पाछे स किया जाने लगा। ऐसी स्थिति में निप्रन्य इंघ के विषय में यह भी साचना पड़ेगा कि क्या काई ऐसी अवस्था पाई थी जबकि प्रारचिवश निग्रन्थ-मथ-मास मत्स्या दि का भी महण करने लगा हा और उस का धमयन उहीं सूत्रा से करता हो। इतिहास पहता है कि निर्भय-सत्र में काई भी ऐसा बारा बदा दल नगै हुना जिस ने आपत्तिकान में, क्येि गए मसिमस्यादि के प्रइश का समथन, वनस्पति बाघ सूत्रो का मामु मत्स्यादि अथ करके किया दा! अलबचा निग्रंथ सथ ये शम्बे इतिहास में आपत्ति और दिनों निम्प सम्पदा० १८ २०11' । ३ ( १९२) अपवाद के हजारों प्रसग श्राप है पर किसी निप्रस्थ दल ने श्राग्वादिक स्थिति का समर्थन करने के लिये अपने मूल सिद्धान्त चाहिंसा से दूर जाकर सूत्रों का निरकुल विरुद्ध अर्थ नहीं किया है। सभी निमय अपवाद का अपवाद रूप से जुदा ही पणन करते रहे है। जिसकी सादी कैद सूत्रों में पद पदहै। निग्रन्यसघ का पधारण भी ऐसा रहा है कि कोई ऐसे विकृत अथ की सूत्रों की व्याख्या में पीउ स्थान दे ता पर प्रियसपका श्रग रह ही नहीं सकता। तब यही मानना पड़ता है कि रचनाकाल में सूत्रों का असली अर्थ तो मचिमत्स्य ही था और पीछेसे वनस्पति अर्थ भी किताबाने लगा।" "इस के सिवाये कोइ २ साहसिक निर्णय प्रचारक नए २ प्रदेश में अपना निरामिष-भाजन का तथा अहिसा-प्रचार का ध्येय ले कर बाते ये बहा कि उन का पक्के अनुयायी मिलने के पहले मौजुदा खान पान की व्यवस्था, में से भिदा ले कर गुजर-बसर करना पड़ता था। कभी कभी ऐसे भी रागादि सकर उपस्थित होते ये जब कि मुवैद्यों की सलाह के अनुसार निम् यो का खान पान में अपवाद मार्ग का भी अवलम्बन करना पड़ता था। वे और इन पे बसी अनक परिस्थितिया पुराने निग्रन्थतष के इतिहास में वर्णित हैं। इन परिस्थितियों में निरामिष भावन और अहिमा प्रचार प ध्येय का प्रात्यन्तिक ध्यान रखते हुए भी कभी २ निग्रन्थ अपनी एषणीय और कल्प्य, आहार की मयादों को सस्त रूप से पालते हुए मांस मस्स्यादि का प्रहण करते हो वा कोई अचरज की बात नहीं है हम क्य याचारोग और दशवैकानि कादि.मागर्मों के मामिए प्राधार -सूचक सूत्र देखते हैं और इन सूत्रों में वाणित मर्यादात्रों पर विचार करते है तब रूपए प्रतीत होता है कि सामिष थाहारका विधान बिल्कुल पवारिक और अपरिहार्य स्थिति का है।"

अस्त उपभ हा यह बात ता स्पष्ट है कि क्षम र समान जैनधम में हिसारक शास्त्राय पाठक धागार पर राई सम्प्रदाय या नए दल पैदा नहीं हुए। हाँ बनधम क्योकि अनामिन म अहिंसात्मक है या दूसर शो म अहिंसा को इस के प्राण है इस कारण जब भी कभी किमाने जैनवम पर हिंसा का साधारण भी दाप लगाया ता सारी जैनममात्र ने एक श्रावाज स उम का विरोध किया । बाधम अनादि कान से अन्य धर्मों में हिसा प्रवृत्ति का घार विराध करता थापा है या मानव समाज का हिमामाग स हरान क लिये समयलशाल रहा है पद भाला अपने पम न लिय हिंसा का कल्पना भी कम कर सकता है। महात्माउदनेता वद विहित यानिकी रिमा का विसर पाद म किया किन्तु जैनधम पाले से ही उमा विराष करता पा रहा था। गातम शुद्ध शिष्य ता उनके जीवनकाल में ही श्रामिहार म प्रवृत्त धागा ये क्नुि महावीर क अनुयायी कठिन से कठिन समय म भी अक्सिापय स विमुग्व नहीं। यही कारण है रि युद्ध की अदिमा का अपना माशर की अहिमा का प्रभाव मारताय समायर अधिर पड़ा। भगवान महावीर ने दिया धम का प्रतिवान श्रार प्रचार बड़े ही अलौकिस किया। उ ने मानव जारि का ममता का उपदेश देते हुए कहा कि जीवा में दिखाई देन वाला शारीरिक या मानसिक वेपन्य मर कम मूनक है वास्तविक नहीं । म लिय क्षुद्र स क्षुद्र योनि में पड़ा हुया बीष भी कमा मानव यानि म पैदा हो सकता है श्रीर मानव का जीव भी क्षुद्र कमी के परिणाम स्वरूप क्षुद्रयोनि में पैदा हा सकता है। अतएव अहिमा माग का अनुसरण करन हुए सब के साथ समता का व्यवहार करो। इसके अतिरिक्त भावान् ने अहिंसा का अविच्छिन महल एक ही पापित करत हुए भी साधु लिये पृथक पार श्रावक के लिए पृषक अहिंसामाग का उपदेश दिया। साधु केलिये ( ११४) ता उ1हिमाधमरा पाला करने कलिय सब प्रकार का कठिन म करिन श्रापत्तियाको सुन्न करा की भीयाशा दी। उन्हाने का सिमा क मामने सघ स बड़ा लीवन का लदा मात प्राम और श्रादिमा धम का मनमा, याचा और कमणा पालन किये रिना यह प्राम हाने बानी नहा है उदी ने यह भी बताया कि सत्य, अचीय, ब्रमचय श्रार परिग्रह त्याग य चार मदाबत भा अहिमा धम की पूर्णता पेलिय हा परमावश्यक है। । गृहस्था के लिये भगवान् ने कहा है कि गारया को यथापि हिसाधम का पालन करना पूणकर से कठिन है रितु ता भी है मोनर चन मोश्रो नावन के सभी कार्यों में हिमा का पालन करना चाहिय । गृहस्थ बीवन की मानता के निय सदाचार श्रार सदिचार परमावश्यक हैं जिनका प्राधार भी शाहिसा धर्म है । परन्तु गृहस्थ का माधुमाग को अतिठिन सोपान पर उतरो को यावश्यक्ता नहीं है। वह अपन लिये प्रतिपादित मका हा श्राचरण करता रहे तो उस के कल्याण के लिये पयाप्त है। व िक धम म मनुष्य के भाग्य का निणय इश्वर के हाथ में है किन्तु बैनधर्म म मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का क्ता धना है है । भगवान् अपने उपदेश में कहते थे कि यदि सुप चाहते हो ता शत्रुता बनाने वाली हिंसा की भावना का त्याग करा और जीवमात्र के प्रति मैत्री की भावना रखा और फिर देम्वना तुम उत्तरोत्तर मुख की श्रार हो बदाग। यह भगवान् + 37 दिव्य और श्राश उपदेशो का ही प्रताप है कि प्राचीन परम्परा से चले श्राते अमण सस्कृति के प्राणभूत अहिंसामाग पर पाच मी बैनममाज मुचारू रूप से चल रही है। श्रादि तीथकर भगवान ऋषभदेव के समय जिस प्रकार अहिंसा

(११५)
धम ने माल को समझा बाता था और उम का पान दिया जाता
था ठाक उमी प्रकार की मा यण पतमान ममय में भा जैन ममाज म
पा- जाती है। प्राय मम धमा अनुपाया पड़ी सन्या में प्रामिपाहार
प्रवृत्त दान है किन्तु माभाग्यवश मधमावलम्मा अब भा पूर्ववत्
शाकाहारी है और भगवान ५ मदेश का ना भूल है। ग्राम भा चैन
समाज के म्यवहारिक, मामाजिक और अध्यात्मिक श्रानिममाक्षेत्रा में
हिमा मस्व का उपश नहीं की जानी। पर तर शिथिलता का
छाना ता अवश्यभाषा है कि पापकरूप म बीमार माधम का
पालन करना है।
यमग मसति का श्राचार नीति में
मापाने पर
का विधान है। ब्रत - प्रकार हैं-
अहिमा मायमस्लेय परिप्रहा।
प्रयान्-अमिा, मत्व, अचीय, ब्रह्मवय, अर अगिद य पान
महानत हैं। इन पान महानों मभी पाठक दरग वि मरमयम स्थान
अहिंमा महारत को दिया गया है। वानर म देवा आग नाधम
को नीव दी श्राहिमा धम पर टिका है। यह कारण है कि नाया
या पावक जावन में अन चिह, उपकरण या दिया अभिमाय
पलन का बोध कराते हैं। मुखवत्रिका, रखोरण और मयूर
पिच्छादि
मन उपकरण अग्तिा पालन करने के उपकरण है। प्रतिलवन मिया
भाइसी सिद्धान्त की प्रतीक है। सक्षप में जैनधम की प्रत्येक किया
शाहिसा सिदान्त स श्रातपात है। ऐसा लगता है कि दिमाहा
बैनरम है और जैनधम ही अहिमा मिदा त का नागताप । अनिमा
पानव में जन धम का श्रात्मा है। यदि उपयुन पाश्च महानता मस
श्रधिमा म बिन को गुलरिया बाये और बैनधम के पेवः

वाकी व चार महारत ही मान लिये जाए तो वैधम, जैनधम नहीं साता। प्रताप अहिमा महारत को यदि शेष चार महानों का राजा मान लिया जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा। भगवान् महावीर के उपदेश सभी यह पता चलता है कि शेष चारा महानता का पालन भी अहिमा महानत की पृणता का श्रोर ले बान वाला है । पभ प्रकार ननधम श्राहिमा प्रधान धम है भार इसी अस्मिा र प्रचार श्रीर पालन र कारण जैनधम विश्व के धर्मों में एक ऊँना स्थान प्राप्त करता है। अहिमा श द की परिभाषा मच घी के प्राचार्यों न अपन२ दृष्टिकोरा मे भिन्न २ प्रकार से की है। जैनाचार्यों की परिभाषा * श्रनुमार स्किा मे बचो का नाम अहिमा है। ये कहते हैं कि पारग प्रमा' के वशाभूत होकर मनसे, वाणी स या कम से दूमरे प्राणो को दव पर चाना या प्राणा म विमुन करना हिसा हाती है। बा प्राणी रोमा नहा करता वह हिमाधर्मका पालन करता है। हिमा दो प्रकारकी हानी है। पहली भावहिमा और जमरा हिमा। यात्मा म गग द्वेष काम बाध मान, माया भारि विकत भाव का उत्पन्न होना भाव हिमा है। न पायों से शात्मिक ज्ञान का महान् हानि पहुँचती है। इहाँ पाया वशीभून हाकर अब काई प्राणी दूसरे प्राणी का वध कर देता है तो वह व्य हिंमा बन जाती है। न मिक्षान्त में श्रनुमार या दाना प्रकार की हिसा त्याज्य है। वास्तव में देखा जाय ता हिमाही ममस्त गोषी या पापो का जननी है। हिंसा से बदकर ममार में कोई पाप नह! । असत्य भाषण, चौर्यक्म और दुराचरण श्रादि मन हिसा की हा भित्र २ शाखाए है। अतएव हिंसा के त्याग से दो मानव बीवन मुन्नी बन सकता है। भगवान महावीर स्वामी ने विश्व को प्रतिमा काम देश देते हुए कहा था - *बापन का धान लय शाति है और शान्ति का एकमात्र उपाय अहिमा है। यत या तुम जीवन ये लदा त 'पटुनना चाहने हा तो उस कमार माधन अस्सिा धम को कभी मत भूला।" वहम मच शानिय बावन तिाना चाहते है तो हमारा कर पाता है कि हम दूमय का भी शान्तिपूर्वक श्रीवन यतीन करने हैं। दूसरों के जीवन पर प्रारमण कर अपने लिये शान्ति की र करना था है दिमा की प्रतिक्रिया अवश्य हाती? शार उमर ने मे वीवन म शान्ति का श्राना साभाविक। अत शान्तिपूर्ण बीवन यतास करन क लिय अश्मिा माग हा श्रेषतम है। इस पर चलने से वन म शान्ति का ही साम्राज्य मिलता है। बेन धम की अग्सिा में एक और बड़ी विशेषता हम मिलती है। किमी का मत है कि पशु का न मारना अहिंसा । फाइ करता है मनुष्य का न म माघ सा है किन्तु जैन धर्म ता प्राणीमात्र को मन, बचन और कम से मारने को हिमा मानता है। इस प्रकार उन धम को अन्सिा मागीमार पति मैत्रीभाव समाका आदेश देती है। बेन धम में प्राण पाश्च प्रकार के मारे बाते हैं। एक इन्द्रिय वाले दो इन्यिायाले, तीन इनिया पाले चार इन्द्रियों वाले और पाच इद्रिया वाल । एक इन्द्रिय बाल बैस पल । पल रे क्वल सशयि होती है। दा इन्द्रियों वाले शव, मप और लट धादि । इनर देवल काया और मुम्ब दा इद्रियें होती है। तान इन्द्रियों वाले लीव, कीड़ी ग्वटमन प्रादि। इनके काया मुग्व और नामिका तान इन्यि होती है। चार इन्द्रियों वाले मक्खी, मच्छर और वृधिक श्रादि । इन काया, मुख, नाक और शाम्ब ये चार इन्द्रिय क्षती है।

स्वथ पर लिया गया है। प्रत कट्टरपथी सुमनों को उस प्यान पूयक विक सममझना श्रीर जीवन में उतारना चाहिय । हिमा यदि बीवन की एक वास्तविकता, तो असा वन का एक महान् धम है। मा से बावन का निवाह हाता और अहिमा वन का परिपूर्णता का श्रार लजाती है। प्रत हमारा यह पतय होताता है कि हम बीवन की परिपुणता की धार बरे किन्तु परिए पता को पार करने लिये जीवन निवाइ की भी उपक्षा नही काजामकनी। बावन सामाजिक प्राधिकार राजनैतिक ग्रादि सभा नाम जीवन की शातिमय प्रगति लिये श्रोक हिवामय उपायो का काम म लाना पड़ता है जिनके रिना सामारिक व्यवहार चल नहीं सकता। यदि वाक्, चार, तुटेरे और घातकों का भी दण्ड देने में हिसा मान कर उस पालन करने लगे तब ता ससार में अराजकता छा जाए और भयानक से भयानक अस्पात होने लगवाएँ रि भला ससार में शान्ति की स्थापना कैसे हो सकती है। प्रताप संसार की व्यवस्था का ठीक बनाए रग्बने व लिये और शान्तिपूण अवन की स्थापगलिये बा हिंसा की बात है बहता पुण्य का रूप धारण कर लेता है या दूसरे श । म वह किसा द तक हिसा धम का पोपण करती है । अत धूतों और प्रातलाइयां को दण्ड देने में का दौर नीं। इसम असा धम के पालन में कोई बाधा नही पड़ती। यही कारण है कि न राजनीति अनुसार बी पांच यश बतलाए है उनमें सबसे पहला यह 'दुष्टस्य दण्ड' अथात् दुष्ट का दण्ड देना है। इसी प्रकार यदि काई रातु हमारे राष्ट्र पर धानमय करे, हमें परतत्र बनाना चाहे या लूट मार करे तो उसका मुकाबला करके उम पाउ हटाने या मारने में भी काइ हिंसा नहीं माननी चाहिये। वैन राजनीति म रिपु राष्ट्र रक्षा श्रयात् शन से राष्ट्र का क्षा क ने को पाचवाँ यज्ञ बत या है। दुष्ट अतितायी और शारे बारने में यदि कुछ सिमा मान भी ली जा ता भी यह 'अहिसा धमा की भार ही मनुष्य का नाती है। विगषय अल्प हिंसा से भविष्य नहाने वाली महती हिंसा से मुक्ति मिलती है। विरोध न करक जाने विचारों को कुचलना, कायरता दिखाना और शत्रु का शिकार न माना यह क्या हिमा नहीं है। इस सत्य का पाषण करते यात्म-सरक्षण पर आर देते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गाधी लिम्वते है. "आततायी के सामने कायर बन जाना, भाग जाना या न से हिंसा करते रहना ज्यादा बुरा है। उसकी अपक्षा तो निभय और यहादुर यन कर हिमा करना ही अच्छा है। क्योंकि इस रास्ते कसी न किमी दिन मनुष्य अहिंसा तक पहुच जायगा ।" एर बार एक बहन ने महात्मा जी को पत्र लिखा कि यदि काई देस्य जैसा पुरुष राह चलती स्त्री पर बलात्कार करे तो ऐसे सक्र में पसी हुई यह क्या करे १ दशक क्या करें। इसके उत्तर में, महात्मा श्रीन लिखा- 'असल चीज ना यह है कि स्त्रियाँ निर्भय बनना सीख जाएँ। मेरा यह हद विश्वास है कि वो स्त्री निडर है और दृढ़तापूर्वक यह मानती है कि उसकी पवित्रता ही उसा सत त्त्व की सर्वोत्तम दाल है, उसका शील सवथा सुरक्षित है। निडरता या प्रास्था यह शिक्षा एक दिन में नहीं मिल सकता । अत एव यह भी समझ लेना चाहिये कि इस दरम्यान क्या किया जा सकता है। जिम श्री पर इस तरह का हमला हो, वह हमले के समय हिंग हिलाका विचार न करे। उस समय अपनी रक्षा ही उसका परम धम है। उस समय जो साधन उसे सूझे उसका उपयोग करके वह अपनी पवित्रता ( १२२) की और अपने शरीर की रक्षा करे। इसर ने उस नापन दिय हैं। दात रिय है और तक्त दी है। वह इनका उपयोग करे पार करते २ मर जाय । मौत भय से घुन हर एक पुरुष या स्त्री स्वय मर के अपनी और अपनों की रक्षा करे । सच तो यह है कि मरना हमें पसन्द ना होता। इम निये याबिर हम घुटने टेक देते हैं | फोइ मरन ५ बदले सलाम करना पसन्द करता है, काई धन देकर जान छुड़ाता है, फोई मुंह में तिनका लेता है और काई चीटी की तरह रेंगना पसन्न करता है। इसी तरह काइ स्रो लाचार हाकर जूझना छोड़, पुरुष का पशुता के पश हाजाती है। यनात मैंने तिरस्कारश नहा निवीं केवल वस्तु स्पति का ही जिक्र क्यिा है। सजामी से लेकर सतीत्वमग तक की सभी क्रियाएँ एक ही चीज की मूचक हैं । बीवन का लोम मनुष्य स क्या क्या नहीं कराता। अतएव यो जीवन का लोभ, छोड़कर बीता है यही सीवित रहता है । 'तेन त्यक्तेन भूनीया' इस मात्र के श्रथ का इर एक पाठक समझ ले और कण्टाम कर ले।" दर्शक पुरुष क्या करें? 'यह तो स्त्रो का धर्म हुआ लेकिन दशक पुरुष क्या करें । सच पूषा इस का अवार मैं अपर दे चुका हू बह दशक न रहकर रक्षक बनेगा । वह खड़ा २ देवेगा नहीं ! वह पुलिस को नहीं दूदने बायंगा यह रेल को बोर चर, अपने अापका कृताय न मानग । अगर वह अहिंसा को बानता होगा ता उस का उपयोग करते २ मर मिटेगा,और सकट में फ्मी बहन को, नबारेगा । अहिंसा से नहीं हिंसा दाग बहन की रक्षा करेगा।' महात्मा जी क हम उत्तर से यह स्पष्ट है कि दुष्ट को दण्ड देने - समय दिसा अहिमा का विचार बिल्कुल छोड़ देना चाहिये । म्नी को निभ हार अपने सतीत्व की रक्षा के लिये हिसा-अहिंसा का विचार छोड़ कर विस प्रकार भी हो सर दुए का सामना करना चाहिये और मर मरने तक का सकोच न करना चाहिये। दशक को भी स्त्री की रक्षा के लिये अपनी जान की बाजी लगा देना चाहिये जो सच्चे अहम धर्म को ममझता है और उसका पानन करता है वह दुष्ट 2 मामने कभी भी कायरता दिग्वाता । वह बारों की तरह या तो दुष्ट को खतम र हालता है या स्वय लड़पर मिट जाता है। इसलिये अहिमा धम मीरा का घम है। कायर और दरपोक इस धम का पालन नहीं कर सकते। गापिता महात्मा गाधी को यदि धीमी सनी के प्रति अवतार मान लिया जाये ता इम में अतिश्यानि न होगी। बहुत से विद्वान ने महात्मा गांधा की तुलना भगवान् महावीर और महात्मा बुद्ध से की है और बहुत से इन को उन से भी ज्दा चदा कर मानते हैं । निम्स देह कुछ लागों को इस मे इतराज भी है कि तु चुछ भी हो मैं अपने विकोण से यह दाये से कह सकता है कि पूषावतारों या पूषाचार्यों की भाँति ही महात्मा जी ने अहिमा प धास्तधिक स्वरूप को समझा था । उहों ने अपन बीरन में सुचारू रूप से हिंसाधम का पालन किया और विश्व में उस का प्रचार किया। मैं ता कहगा कि महात्मा गांधी की अहिंसा में कुछ और भी विशेषता है जिसके कारण ससार में अाज उम का इतना महत्व है। बीसवी सदी जैसे विकास घाद के युग में गजनैतिक क्षेत्र म अहिंसाधर्म को जो ऊंचा स्थान मिला है इसका श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का हो जाता है। महात्मा श्री ने अपना सारा जीवन अहिसाधम को उगमना म लगया। उनकी उपासना भी ससार के साधारण महामाया की भाँति निष्क्रिय नही थी। वह मत्रिय थी। उन्होंने वेवन अहिंसाधम क म ख का समझने में ही अपनी शक्ति नष्ट नहा को कितु जीवन क ध्यवहारिक सामाजिक, आर्थिक, और राजनैतिक प्रादि सभ क्षेत्र में अस्मिा धम का कार्य का में परिणित करके देखा और उई सर्वत्र उसका चमत्कार टिगोचर हुश्र।। बा भी यादोलन वे चनाते थे उस का मूलाधार अहिसा होता था और ये उम में माल हाते थे। भारत की स्वतंत्रता के आन्दोलन की नीव भी महात्मा जी ने अहिमा के मिवान्त पर रग्यो । वरतानियां जैमी बड़ी सल्तनत पसाय टक्कर भी उन्हाने अहिमा ये शस्त्र के साथ ली। वारता प्रान करने के लिये भारतीयों का अस्मिा के शस्त्र का अभ्यास और उपयाग भी मामा जी ने मिग्याया । भारत के लोग उन ५ बताए हुए माग पर चले और उम का परिणाम यह हुआ कि प्रत में भारत की विजय हुई। विदेशियों का भारत भूमि छोड़ पर जाना पड़ा और अनेक सदियों से साई हुई म्यननता को हमरि से पाया। जमा घर बापान से बई २ रत्रधारी युद्ध का प्राधा य देते थ अपनी स्वत तास वाचता चोर भारत अहिमाम के उन पर म्वत हुआ। यह मर राष्ट्र पिता महात्मा गापा के नेतृत्व कारण हुना। भारत भूमि का यह म भाग्य था कि "म में महात्मा श्री जैम महापुरुष का जम हुश्रा। मैं ताद हे चानव में अस्मिाधम का अयनार मानता है। वाम गामी सेवा मघ कीमा म एक बार महान जी ने भाषणािमा जिम में अहिमा घमक महत्व पर प्रकाश डाला पा। उस भाषण युवरा यहा परको के मान लिये देता।

(५) 'अहिसा' शब्द निषेध। । "यो अहिंसक है उस के हाप में चाहे को भी उद्यम क्या नरहे उम में व अधिक से अधिक अहिमा लाने की कोशिश करेगा हो । यह तो पतुस्थिति है कि बगैर हिंसा के कोई उद्गग नल नहीं सस्ता । एक ष्टि से जीवन के लिये हिंसा अनिवाय मालूम होती है। मरिसा को घराना चाहते है और हमके तो उसका लोर करना चाहत हैं। मतलब यह कि हम हिमा करने है परन्तु अहिंसा की धार कदम बगना चाहते हैं। हिंसा को त्याग करने की इमारी कन्पनाम से अहिमा निकना है इसलिये हमें श भी निषेधात्मक मिना है। झिारा निषेधात्मा है।" ।। अहिसा को मर्यादित व्याग्न्या । - श्रयात् जो अहिंसा को मानता है वह उद्योग करेगा उस में कम से कम हिमा करने का प्रयत्न करेगा। लेकिन पुच उद्गेग ही ऐम है बाfat चाते हैं। जो मनुष्य स्वभाव से ही अमिक १६ रोमन एक उद्यागा को पार ही देता है । उदहरणार्थ यह कामना होनाकी वा सक्तो किवा कसाई का धधा करेगा। मेरा मतलब पह नहीं कि मामामारी अधिक होनही महता। मामाहार मरी चब है।स्थान में था, स ब्राझए और वश्यां का बाद रमाकी के सब ता मासाहारी है हो। किन्तु फिर भी वे हिसा को 'पपरम मानते हैं। यहां हम मांसाहारी का सिाका विचार नहीं कर रहा है। बा मनुथ मासाहारी है वे मारे सिाबादी न है। मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि सादारी मनुष्य अनि नीता ऐपडू न स घटकर अहिसक मनुष्य कहा मिलेगा लेकिन यह भी तो पहिले मौसकारी था। बाद में उस ने मांसाहार छाइ दिया। लेकिन जब मासाहारा था तर भी अग्मिा तो था हो । छाइने पर भी, मैं जानता हूँ कि कभा २ जब वह अपनी चान पास चला जाता था तब मास खा लेताथा या डाक्टर लाग थाना करते ५ तो पा लेता था। लेकिन उस से उम की अहिंसा यदे ही कम हा पाती थी। इस लिये यक्ष पर हमारी अादिमा की यार या परिमित है। हमारी अदिमा मनुष्यों तक मयादित है। - ॥ हिमक और अहिमक उद्योग ।। लेकिन मामाहारी अमिक तो बाज चीज मोड़ ही देता है । जैसे मह शिकार कभी नहीं करेगा। यानी जिस से हिमा का विस्तार बरता ही नाता है। इन प्रवृत्तियों में वह कभी न पड़ेगा। वह युद्ध में नहीं पड़ेगा । युद्ध में शस्त्रास्त्र बनाने कारस्थानों में काम न करेगा। उन के लिये नए २ शस्त्रों की सोच नहीं करगा। मतलब वह ऐमा फाई उद्योग नहीं करेगा वो हिसा पर ही प्राश्रित है और हिंसा का बनाता है। अव कामद्योग एम भी है जो जीवन में लिये भाषश्यक है नेकिन वे बिना हिंसा के चल ही नही मक्ते। जैसे रोती का उद्योग है ऐमे उद्योग अश्मिा में या बात है। इसका मतलब यह नहीं कि उनमें हिंसा की गु जायश नहीं है अथवा वे बिना हिंसा में चल सकते हैं। लेकिन उनकी बुनियाद हिसा नहीं है। और ये हिंमा को बढ़ात भी नहीं है। ऐमें उद्योगों में होने वाली हिंसा हम पटा सकते है और उसे

अररिहार्य सिा की हद तक ले जासकते हैं। साकि श्रादिरा अहिंसा
मार दरका यम है। हम यह महासक्ते कि किसी उयाग कर
अस्मिा स अनिवार्य सार है। वह ता माग भावना पर निभा है।
हमारा हय अमिक होगा ताम अपने उद्यागम अहिंमा लाएगे।
r
असा केवल पाय +3 नहा है। मान लीजिये एक मनुष्य
है। कारी कमा लेता है। और सुग्व से रहता है। किसी का मन
वगैरह नहीं करता। लेकिन हमेशा मरों को हमारत और मिलक्ष्यित
पर शनि ग्वता है । एक कपड़ स करोड़ करना मारता है ता
मैं
उस अस्मिक नहीं पहूगा। ऐसा का पचा नहीं सिम हिंसा हा ही
नहो । लकिन चन्द धधै एमे हैं बोरिमा को ही बढाते हैं। श्रहिसक
मनुष्य को हे प य समझना चाहिये। दूसरे अनेक घों में अगर
हिंसा के लिये स्थान है ता अहिमा के लिये भी है। हमारे हिलम
अगर अहिमा भरी हुइ है ता हम अस्मिक वृत्ति मे उन घों का ।
हम उन उद्यागी का रुपयाग न करें।
प्राचीन भारत की अर्थ व्यवस्था ।
मेरा कुछ ऐसा खयान है कि बिहान दिनुस्तान के गावों क]
निमाण किया डहाने समाज का महठन ही ऐमा किया जिसस
शेषय और पिसा ऐ लिये कम से कम स्थान रहे । उहोने मनुष्य के
अधिकारका विचार नहीं किया। उस धम का विचार किया।
अपनी परम्परा और योग्यता अनुसार समान हित का उद्योग
परता था। उसमें से उमे रोटी भी मिल, बाती थी यह दूसरी बात
थी। लेकिन उसमें कपड़ों को चूमने की भावना न थी। लाभ की,
भावना + ले धम की भावना यी । वे अपने धमका
क

( १२८) यात थ रोटीसा यों ही चल जाती थी। समाज की सवा हा मुख्य उयाम करने का उद्देश्य इयमिगत नगन था। समाज का सरन ही ऐसा था। उगारण ५ - गांव में की हत हानी थी यह पती के लिये ग्रोबार याबरता था लेपिन गांव उसे पैस नदक्ष देता था। देहाती ममात्र पर यह धन लगा लिया था कि उस अनाज दिया जाय। उसमें भी हिंसा कापी सकता थी। लेकिन सयवस्थित समाज में उस न्याय मिलता था और किसी समय में समाज सुव्यवस्थित या ऐसा मैं मानता हूँ। शरीर-श्रम । दमी म शरीर प्रमश्रा बाता है। मनुष्य अपने भम स थोड़ी सादी खेती कर सकता है। लेकिन अगर लाग्यो बघ अमीन फे दो चार ही मानिक हाजाते हैं ता बाकी क सब मजदूर हो जाते हैं। या वगैर हिसा नहीं हो सकता। अगर थाप कहेंगे कि ये मजदूर नहीं रखग यत्रों से कामसँग ता भी हिसा याहीती है। जिसके पास एक लाब बाघा जमीन पड़ा ६ उस यह धुमण्डता श्रा ही आता है कि मैं इतना जमीन का मालिक हू । धरे २ उसमें दूसरों पर सत्ता वायम करने का लालच प्रा बाता है। यत्रों की मदद से यह दूर २ क लोगों का भी गुलाम बना लेता है र उहैं इसका पता भी नहीं हाता कि वे गुलाम हा रहे हैं। गुलाम बनाने का एक खूपरत तरीका राने दूर लिया है। उस पार है एक बारम्बाना बना कर धेट गया है। दाम्मी उमके वर्ग काम करते हैं। लोगों को प्रलोभन देता है विज्ञापन निकालता है हिंसक प्रवृत्ति का ऐसा मोहक रास्ता निकाल लिया है कि हम उसमें पाकर फस जाते हैं। हमें इन बातों पर विचार करना है कि क्या हम उसमें पसना चाहते हैं। या उससे बचा रहना (१२६) min मेरा विशेष दावा। अगर हम अपनी अहिंसा का अविधिम रखना चाहते है और मारे ममात्र का अस्मिा बनाना चाहते हैं तो हमें उसका रास्ता वाना होगा। मेरा त याताया रहा है कि सत्य, अहिमा ग्रादि को यम है वे भूपि मुनियों प लिये नहा है। पुराने लाग मानते कि मनु या यम बनाए हैं वे ऋषि मुनियों के लिये है व्यवहारी मनुष्यों के लिये नहीं है। मैंने या विशेष दावा किया है कि यदिशा सामालिक चीज है । अप्नुय केवन व्यक्ति नहीं है वह पिगड भी है और झाट भो। या अपने बाद काम अपने पर लिय रिता है। जो धम यदि ये माप बस हो जाता है १६ मेरे कम का नहीं है मरा यह दावा है कि हिमा सामाजिक चीज है रेषन व्यक्तिगत व नही है। मेरा यह दावा है कि सारा समाज अहिंसा का पालन फर सकता है । मन इसो विधाम पर चलने की कोशिश की और में मानना हकि मुझ उसमें निरलता न मिला। अहिंसा समाज का प्राण है। मेरे लिय अहिंसा समाज के प्राण के समान चीन है वह सामाजिक धर्म है, यति साय खतम होने वालाना है। पशु और मनुष्य में यही तो मे है। पशु को ज्ञान नहीं है मनुष्य को है। इसलिये अस्मिा उसको विशेषता है । यह समाप्र के लिये भी मुलभ होनी चाहिये । समाज उसी के बल पर रिका है। किमो समाजम उसका विकास कम हुमा है किसी म अधिक विकास हुश्रा है। लेकिन एमक बिना समाज नहीं टिक सकता।" महात्मा जी ने अहिंसा धम का विस रूप में समार सामने रक्या, किस प्रकार के उसका पालन स्वरं करते थे और किस प्रकार वे हिंसा का पालन हमारे से चाह्न ५ यह उपयुक्त अहिमा पर सट किए गए उन विचारों से पाठक भली भाति समझ गए होंगे। वे अहिमा धमका समाजका ग्रह समझते । और कहते थे कि समाज इसरे दिनारिक नहीं सकता। महात्मा श्री कहा क्लयकि शत्रधारी पुरुष रता में अहिंसक व्यक्ति की यराबरा महा पर माता| शत्रधारी व लिये ता शम्न का सहारा चाहिये और उस बिना पर अपने प्रारमा निजल अनुभव करता है। यही कारण है कि नि शस्त्र हाकर वह शत्रु के मामो कायरता दिखाता है। शत्र क दिना यह अशत हो जाता है। अहिंसा धम अशक्तों का शस्त्र नहीं है, यह ता शतों का रात्र है। इसका पालन निपल लाग नहीं कर मकन । अहिंसा के विषय में ठीक यही मन्तव्य उन घम का भी है। जैन धम भी अहिमा का वीरधम मानता है। हिमा-मा विषयक यौद्ध दृष्टिकोण।. अनयम क समान धुद्ध धम को भी नवता 'पहिसा परमा धम' पर ही रकवी गई थी और महात्मा बुद्ध ने भी भगवान मावीर स्वामी की तरह वैदिकी हिंसा का विरोध दिया। वास्तव में देखा बाए तो घुर का वैदिकी हिंसा विरुद्ध यादोलन ही बुद्ध धम को पापक रूप से पैलाने म कारण बना। अहिंसा के विरोध से महात्मा बुद्ध को बड़ी सफलता मिली। वह समय ऐसाया कि हिंसा बहुत बड़ी हुइ थी। यश के नाम पर पशु बलि श्राम हागई थी। अत्यचारों मे तग याद भारतीय समाज किसी मुधारक की ताक म थी। ऐसे समय में महात्मा युद्ध की अावाज लोगों को प्रीष्म के पश्चात् वर्षों के समान लगा। सर लोग उनके उपदेशों से आकर्षित हुए और अहिंसा धम का प्रचार हुअा। किंतु यह देखकर आश्चय होता है कि बुद्ध के बाद उनके अनुयायी यापक रूप में हिंसा में प्रवृत्त हुए और मामाहारी भने । - [पागर अन्य देशो समान बौद्ध देशो में भी पात्र प्रापिपाहार प्यार में किया जाता है। सबसे बड़ा प्राश्चर्य हमें इस बात से होता कि बौद्ध पिटको तया श्रय मूत्रों म भी पर तत्र श्रामिगधार के विधान र प्रकरण मिलते हैं। एक सूत्र में लिखा है कि महात्मा ग्रुद्ध ने एक प्रस्थ स भिक्षा में सफर का माम ग्रहण किया उसक वान से नर पट में शन पैदा हुआ और उसी शलप कारण "ग्न की मृत्यु । उमा प्रकार अन्य बौद्ध मयों में भी नौद भित्री पलिये एस ग्रामिराबार प्रहा करने को भागा दी गई है जो उनसे निमित्त से न बनाया गया हा। हिंसा विराधी बौद्ध धम् + य में इस प्रकार के मोसारका विधान मिनना एक बड़ी विचित्र मात है। महारमा बुद्ध र बीवनकात र उदारण होने के कारण नओ प्रतिम भी माना जा माता। श्रावन भी बाधमावलम्बी ध्यापक रन श्रामिपार से हैं उनकी अपने धर्म + प्ररियन धान कदापी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि गैद्ध धम प्रया में ग्रामिनाहार का विधान त दम दम निणय पर पहुच मरते है कि बौद्ध धम सबसे पहले अपनी जमभूमि भारतवप म हा पला पना और फलो पूलने क लिये भी मका पदिक्ष-क्षेत्र मिला बोध्यापक सरसे ग्रामिपाहार म प्रदत्त या बिकि लोग पयपि बीरधावली घोगए थे किन्नु एक दमयं यामिपामार का त्याग नहीं करम और नौद्ध हानेर बाद भी ये उमका मवन करत १६ और उन्होंने प्रामिपादार परक पाटो का बौद्ध प्रपों में स्थान PिAI! कितु यह निणय भी कोई विशेष मतापना प्रतीत नहीं होता। यदि उपयुत निणय मान लिया जाए ता एक हा प्रश्न हमारे सामने यह प्राता है कि महात्मा बुद्ध ने अपने न काल में शामिपार मारे पागकी और उसके प्रचारक की उपहा क्या का क्या गौतम महापरिनिर्वाण मुत्त।

। १३४) कल्याण अक्षिता घम को शरण में रही हो सकेगा] अहिंसाधम का सपने घड़ा महार या उपदेश है 'ग्रामवत् सर्वभूता' अर्थात् समार में सपका अपो समान ममभो। मा पाहार तुम दूस अपने प्रति चाहते हो वैसा हो दूसरों से भी कर। यदि इस महान् उपदेश के तत्व को समार ये लोग ममके होने और उन्होंने इस पर अमल किया होता ता ममार म बद २ युद्धों का मूरगान न पाहता। गत दा महायुद्धों में मानव जाति का बदुत बड़ी सयमा में संहार हुआ। उम सहार का मुग्प कारण था सानाति विक्षरे द्वारा बलवान् राष्ट्र निवल राष्ट्र को डर कर आना चाहता था। उसी प्रकार की प्रवृत्ति पतमान समर में भी अनेक गदा म दृटिगार होती है। अलवान् राष्ट्र निपल राष्ट्रा का सा पाना चाहते हैं और तरह २ श्री धमकियां स उ है राते हैं। मारे विषम बढ़ २ नेतानो और वैज्ञानिसका मुख तृतीय महायुद्ध की श्रार ना रहा है। बड़े २ शानिकों व मस्तिष्क भी दिवानिश इस प्रकार की प्यास में लगे हुए हैं कि किस प्रकारची से बल्दी का ऐग प्राविध्यार हा सरे तिसरे द्वारा प्रातिशान मानन दाति का सहारा बाये । परमाणु मम और हाहा इलेकिक म बस भयानक और घातक श्राविष्कार में भी उनकी म ताप नहीं हो रहा। वैशानिका के मस्तिष्क की इलोषिक शक्ति का मानव जाति के उत्थान और निमाण में लगनी चाहिये यी दुभाग्यवश उमरे महार में लगी हुई है। कितनी गिरावर है इस युग की जिसका नाग विकासवार का युग कहत है। अपने पी सहार के लिये प्रवृत्त होना ही क्या विमिवाद के युग का लक्षण है। वा हिंसा के गत को श्रोर बटना ही विकामवा की निशानी है। यदि प्रकार की मानवसमाव की मनाति उत्तरात्तर पमन की भोर ही ती गई तो मानवाति का एक अद्भुत बड़े सहार म से गुजरना हाया (१५५ जिमको फल्पना से भील दहल उरता है। उस सहर से बचने लिये मानवजाति को चाहिये कि वह अदिमा घम की शण ले और भौतिकवाद के बाह्यार्पणा का ही सब कुछ न समझे। अाज का युग श्रस्परिक रूप से भौतिकवाद की और बा रहा है और श्राध्यात्मिक तत्व को उपक्षा की बारही है। यही कारण है कि विश्व किसी कोने में भी मानसिक या यात्यिक शान्ति नहीं है। मनुष्य ने ६२ महार- प्रद अाविष्कार करने प्रकृति पर विजय पाई है। उसने बड़े श्राश्चयजनक चमत्कार किये है कि तु भौतिकवाद की इस उन्नति से वह यात्मिक शान्ति नहीं प्राम पर सका है । उल्टा वा उमस बहुन दूर चला गया है। यात्मिक और मानसिक शान्ति के लिये प्राध्यात्मिकवाद के रहस्य को समझने की थावश्यक्ता है जिसकी भौतिकवाट उपक्षा करता है। श्राध्यात्मिस्वाद का सबम पड़ा श्रादश है ग्रामिक और मानसिक शान्ति और यदि जीवन उससे वचित है ता भले ही कितनी हा सम्पत्ति और ऐश्वय के साधन मनुष्य के पास हो वे सब निरथर हैं। एक अम्चिन पुरुष भी जिसका औवन शान्तिपूण है उस अनेक वैज्ञानिक साधनों से युक्त समृद्ध-पुरुष स लाग्य दरें अच्छा है बो दिउघ रहता है और जिसको चिता के मारे निद्रा तक दुलभ होती है। पात्र का युग यो शान्ति से बचित है उसका मु'य कारण भौतिकवाद का अधिक विकास और उसकी और प्रवृत्ति है। यही कारण है कि हमारे पूर्वज महर्षियों ने भौतिकवाद की उपक्षा करके अहिंसात्मक प्राध्या- स्मिकवाद का स देश मानवजाति को रिया और कहा कि यदि कल्याण चाहते हो तो समता रक्यो और सब प्राणियों को शान्तिपूर्ण बीवन व्यतीत करने दो। उन्होंने कहा कि विश्व की यवस्था को समीचीन प्रकार से चलाने के लिये अहिंसा धम का पालन परमावश्यक है।

हिमा धम की शरण लकर हो विश्व युद्ध की पुनराशक्ति कक मनत १और सपार से प्रगति के नापन दूर हर सकते हैं । अहिसा प3 की शरण लेर ही मानवजाति मुत्र श्रार यान्ति की नींद सो सकत है । श्रतएव विश्व सपा का कनर है कि ये स्वाथ बुद्धि काहब मानवता के वास्तविक तर अहिंसाधम को समझे भार उसका पालन करें। 'अहिमा धम के पानन सही विश्व का कल्याण होगा।

अनेकान्तवाद fr" अनेकान्तवाद जैन दशन की अपनी विभूनि है और जेनशन को एक विशेषता है। श्राचाय अमृतचर ने तो अनेक तब द का ना गम का बीय या बीड यतलाया है। वे कहते हैं कि त्रिम प्रकार धीर रिना मृत शरीर क्मिा काम का नहाता इसी प्रकार अनेकान्त यादव बिना नाम भी मवथा निश्थक और निरमार है । यहा कारण है कि जैनधम या जैन दरान कात्री मात्व है वह अनेकान्तमा सिद्धान्त र कारण ही है। अनेका नवाद एक महान दशन है । यह ऐसा दरान है बोनसार के अन्य दशना के सदान्तिक कलह का मिराकर उन में समन्वय पराता है। और उन प बीवन को पूरा और सत्य भाग की और प्ररित करता है । ससार में वासरूपसे फैली श्रमहि भएतारूरी विर का मूल कारण साम्प्रदायिक रोग है और अनेकानबाद उम सग की निवृत्ति के लिये अमोप प्रौषध है। दूसरे की अच्छीसे अरची पात को पा मिदात को भी युग पतामा और अपने पार म तम्य का भी समयन करना, इस वातावरण को बनना साम्प्रदायिकता है। उदारता और विशालता साम्प्रदायिता छ पाम तक नहीं परहती। वह कटुता और विद्वेष फैलाती है। उस कटुता और पिप का दर करये अनेकान्तवाद माधुय और मंत्रीका सचार काता है। अनेकातवाद का सूर्य, साम्प्रदायवाद, मताधवा या घमा धता के अधिकार को दूर कर ससार को मुग्वद् ज्योति का प्रकाश देता है। यह सत्य असन्य औरअसल कहने धाला के भ्रम का निवारण, । ( १३८) । है और वादी प्रतियारियों के शास्त्रीय कलह को मिटाने के लिये ऐसी यवस्या देता है जो दोना को मा यहा । अनका तबाद की जुनिय द सत्य पर टिका हम कारण व सदा निष्पक्ष व्यवस्था का स्थान करता रहा है। हमी महानता के कारण अनेकान्तवाद ने सहार के अन्य दशनों म उचा स्थान प्राप्त किया है। अन्य दर्शनों पर प्रभाव । भारत के अय दशन वैदिक और बौद्ध भी अनेकान्तवा से बत प्रभावित हुए। वैदिक और बौद्ध धर्मों के दाशनिक प्र यो में अनेका त दशन को मा यता न उदाहरण बहुत मिलते हैं। निस्स देव वैदिक धम के कुछ दाशनिक विद्वानाने अनेका त सिद्धात का समय पर खण्डन भी किया किन्तु वैदिक दशन इसके प्रभाव से मुन्न न रह सका। बौद्ध सिद्धात पर तो अनका त सिद्धान्त का बहुत प्रभार पड़ा। दुभाग्यवश बटुन से कहर पथियो ने इसमा पानन में किया जिसमा परिणाम यह हुआ कि दिन प्रतिदिन धमा घता ब- गइ और वमनस्य का वातावरण पैलता गया। यदिशाकान्तवाद समन्वय और शाति के सदेश की ससार ने सुना हाता को उस इतिहास और हा प्रकार स लिखा हाता। जीवन मे धर्म की प्रधानता। मानवजाति के इतिहास से पता चलता है कि हमारे पूर्वज इहलौकिक और पारलौकिक दाना सुख और शाति के धर्म को ही प्रधान स्थान दिया था। ससार-सागर को पार कर लिये वे एकमात्र' धम को ही तरणी समझने ये। मानव-जीवन भयानक अापत्तियों श्रार घार कटो का अन्त उइनेि धम में ही - (१३६ ) An-e- ।। श्रादर्श-जीवन की बुनियाद भी उ होने धम पर है रवी और सारिक धनों से मुक्ति का माग भी उहोंने धम को ही बताया। अपने सारे बीवन के पियाकलाप में उन्होंने प्रधान स्थान धम को दिया और उस के पालन करने क लिय मयम तक अनिदान करने की शिक्षा दी। घे भगवान् से यदा ता प्रायना किया करते थे कि परमा मा धन दौलत भले ही बारम लेले यमराज भले ही उन के प्राण जल्दी ही लेले कितु उन की गुद्धि घम से भी विमुच न हो। घम से विमुग्ध होने की अपदा वे मृत्यु श्री अधिक अछा समझते थे। धम रहित जीवन की उहा ने पाशविक जीवन मे तुलना की। पूणरीति सधार्मिक जीवन यतीत करने वाले को उही ने परमात्मा तक की उपाधि से अलगत रिया। मागरा य" कि हमारे पूर्वजो धम का सशेगरि स्थान दिया। ॥ धर्म के नाम पर ।। " अब प्रश्न यह है कि क्या धम चाय की कसौटी पर सियर प्रशावरेपन और सायक्ता को प्रकट कर सका? जिम महती श्रद्धा और प्रेम मानव ने धम की पूजा को थो क्या धम ने उस का उम। का उचित ही पन दिया। क्या वस्तव में घम ने मानव जीवन को श्राश बनाया! क्या वास्तव में धम ने ससार को मनाकर उम का कल्याण किया। क्या ससार क लाग धमका पालन करक भयानक धापत्तियों और धार फष्टों से मुक्ति पासके। क्या वामद में मानद ने धम की तरणी पर बैठकर ससार सागर को पार पिया क्या धर्म का पालन करने से मानव वास्तव में पग्मामर को प्रात दुधा! समार का इतिगस इन सब प्रश्नों का उचर निपेक्षा में ही देना है। पोरोप और शिया सस र में सर्वत्र धम के नाम पर पड़े २ युद्ध हु"

1.
भारत में
जिन में अक्षय निरपराध प्राणियां का रक्तपात हुआ। यारोप की
इन्त्रीशन और स्टार चम्बर न्यायालय नाम की दो धार्मिक अग
लता में आसानकारी घटनाए हुई उन का पर कर हत्य गहल ।
उता है। इन दास धार्मिक यायालया में धम के नाम पर अनेका
निरपराध पत्तिया + मिर त नवारों से काट दिये जाते थे। और
बर्ता का जिदा ही अग में जला दिया जाता था। केवल इन
दो पार्मिक अदालत में हो धर्म के नाम पर एक करोड़ निरपराध
पक्तियो का मृत्यु का दण्ड दिया। इसी प्रकार
औरह की धमा धता को लाग अभी नम हा भून हैं। ससार में
धम नाम रहस्य का कराने वानी यत्रणा लागों को दागद ।
स्त्रिया पर अत्याचार किए गए और अघि बाला का तलवार
घाट उतारा गया। धम नाम पर मानव ने ऐमे २ गोर पाकिये
जिन की ममारना या पार पशुपा से भी नहीं की जा सकती।
अ मा सदी वैज्ञानिक युग है। दम का विकासवाद का युग भी कहा
नाता है। इसका माना बड़ा सम्ब और उनस माना जाता है किन्तु
मने भी धम की ना देकर रोम २ अत्याचार किये हैं जिन का
प्रकर कान भा न ना पानी है। दूर नान की क्या आवश्यक्ता है।
अभी भाग ममय पहले मन १६५७ म अब भारत का विभाजन हुश्रा
उम ममय मा पना क कारण मान ने मानस पर ओ भीषण अन्या-
चार किमि भूने है। धम नाम पर मनु य ने अपनी
जानि और भार बनाना पर ऐम र धार श्रयाय किये हैं कि
यग्नि की तुना राक्ष उ या पशु से की आय तो यह ग्नका लाचन
लगाना होगा 1-8 प्रकार धम के नाम पर हुए अत्याचारों का यदि
विनार पूर्वक लिया शय तो एक स्वतन पुस्तक तैयार हो ना |
अस्तु यह सच क्यों हया' क्या पम ने मानव जाति को यही कुत्र
मिव या या ! क्या धम का बुनियाद हमारे पूर्वज ने दही अत्याचारों
-
-

पर रस्त्रीयी। क्या धम का प्राविष्कार मानव बाति के सहा निये किया गया। क्या धमका प्रधान लक्ष्य समार में पूर डालकर परसार कनह और अन्यागर करवाना हो या न सब प्रभा का उत्तर भी निषेधरूप में ही मिनता है। इन प्रश्नों का उत्तर जैनधम का अनकान्तवाद देता है। अनेका तार का कहना है कि धमका ठाश्य हुन रुचा है धम उतम शिना देता है श्रार ममारा उनति पथ क धार ले जाता है। धर्म पृट | किन्तु मगरन और शान्तिक मदेश का नार करता है। हितु ममझने वाों ने उम या टाक बस्नहीं समझा। उह उसे गलत समझा और उम गनत समझने का परिणाम यहा कि संसार में घमरे नाम पर अनेक उरगत और श्रन्याचार हुए धम का नाम नाम हुअा। श्र! एक समार में बा प्रत्य च। हुए धर्म का समझने गला की शानता का कारण हुए धमका इम म काई दार नहीं था। धर्म की नाव लो सत्य पर हो कवी गई थी और उसका आविष्कार मानव तिथे कल्याण और मुग्वशान्ति के लिए ही किया गया। धमा प्रधान लक्षर ससार से पलह और पैमनस्य मिटाकर मगठन का प्रचार करना रहा है ति सममने वानां ने धम पूणस्वरूप को न समझ कर उसकात स्वरूप को समझा और नमी के कारण भिन्न धर्मों में कलह का पीनाराण हुग्रा । उदारण लियन साहित्य म एक करनी श्राती है जो कारी सिद्ध है। विमा देवात में दो श्रधे पुरुप राते थे। उसने कभी हाथी मही देवा था। एक दिन अम्मत काई धनी पुरुष हाथी पर चर कर उम देहात में भाया । यह समाचार उन मब अघों को मिना 3 है हामी देखने की को उठाई पार वे उस देखने को गए। पकड़ा।दुमरेोहालीका अपने (१२) सय परा। तमर ने समय पट राय चलाया। चौथ नेहाची कान का कड़ा। पान का हाथ हाथी रे दात पर ना पड़ा और छर ने उसकी म ह पर थाहा परा। इस प्रकार थे छ अथे पुरुष हाथी का दबार अपन घर लौट श्राए । सायकाल जब ये भर इक्ठे बट ताहाया का वणन करने लग | बिमने रेल पूछ का छुपा था उमने हाथी का रस्म के समान नाय 1 जिमने रोग का परदा या उमन हाथी का खम्भे समान बताया। बिमने हाथा के पेट पर हाय का था उसने उस एक बड़े पद के समान बनाया। विमने पवन कान का छुयाय उमन हाथो का बड़े सूर के समाा वणन किया। निगो वा हाथी का दात पकड़ा था उसने उसे भाग के ममान बताया। जिम ने हाया रे मूड का स्पर्श किया था उम ने हायी का मूमन जैसा वणन क्यिा । म प्रकार मम ने हाथी का भिन्न २ बरा पणन किया और श्रने ममझे स्वरूप को पत्य जान पर चे श्रापम में भगइन लग । उन में स प्रत्येक श्रधा जोरदार शाम अपने दखे इति स्वरूप को हो पुराण करता था। इतने म श्रोवो वाला एक पुरुष वहाँ से गुजरा। यह उन के भगढ़ के मूल कारण को समझ गया श्र र उस ने उन से कहा कि तुम यथ म हा अास में झगड़ हा। अनका तक सिद्धान के शनुमा वास्तव में तुम सभा स चे हो। तुम । में से किसी ने भी सपूण हायों को न देवा कि तु उस के मित्र २ श्रगो का देना है और तुम उन भिन्न अंग काही हायी ममम रेठ पा। तुम्हारी हर एक की बात उस श्रग की अपेक्षा जा उस ने देगा है मच्ची है । घुछ की अपेक्षा हाथी गरम के समान, टांग की अपक्ष खम के समन, पर की अपना घड़ के ममान, पान की अपेक्षा सूप व समान, दांत की अपेक्षा सींग व समान, और मूड की अपेक्षा मूमल समान कहला सस्ता है किंतु एका त दृष्टि सहायीको रस्से या सम के ममान समझना अज्ञानता है।" M 17 - - इम कमान में अनेमा माद का सार श्राजाता है। दम म यह भी मनीभांति सट है कि रिमी मी वानवा यदि हम एका ताप स देतो ता में पूण स्वरूा का ज्ञान हा ममताप्रत्येक धातु का ज्ञान पूणरूप मे करन यि अनेका त नि की पारश्यकता हैार अनेन टि अनेका त दशर ज्ञान महामिल समता है। ॥ एक ही उम्तु में दो विरोधी धर्म ।। ॥ श्रनेका नरादर प्रतिपक्षिया ने यह कद्द कर कि एक ही वस्तु में दारािधी धर्म नहीं रह सकते अनकान्त का प्रत्यारशन करने का प्रयास किया कि वे इस में माल नही हा मरे। हम देखते है किसलार के सारे पदार्थ अनेकात ना या अनक धमात्मा है। सागरदत्त नाम का एक ही पुरष किसी का पिता, किसी या पुन, किमा का पति, किसी का मामा और किमी का नाना श्रादि हाना है। जिस ममय पुत्र के द्वारा स का पिता कह कर पुकारा जाता है उस समय पर अय पुत्र, पति, मामा, श्रार नाना प्राधिना विरुद्ध धों को भी धारण करता है इससे यह पप है कि वह अनेक विलक्षण कार्यों के अस्तित्व का रवते हुए अन धमात्मक है। सागरदत्त ने केवल विना हा है, न फेवन पुष ही है और न केवल पनि हो । किन्न भिन्न २ अपक्षा से वर सब कुछ है। दाशनिक विद्वान माननीय १. माणिक चन्द्र जी ने अनेका तमाद का विश्लेपण पट्ट ही मुदर और सर शादा में इस प्रकार दिया है- "सयोग सब से परत में अनि है किन्तु निरस्त सम्बघ से 'देशन का म्यादालाइ ११०॥ 5 (१४४ ) श्रमि म वी परत ठहरता है। स्वनिष्ठ चियिता निम्रत विषयता मम्मघ से अथ म ज्ञाने निवास करता है साथ ही स्वनिष्ठ विषयिता निमापन विपयिता सम्बध से ज्ञान म अथ ठहर जाता है। बयत्व मन धस बरे का पार है। उसी समय बनकल सम्बध स नारका वग है । मनमाय मानव स डालियाँ वृक्ष है, तदैव समवेतन सम्बर मन म डानिया हैं। या धमाका धम बन जाना और धमका धर्मा बन जाना न दशन के सिद्धान्त र अनुमार काई विराध नहा रखना है। अग्नि में त्व, चकत्व, फारकत्व, शाषकस प्रसाशत्व धर्मों के साथ ही शेल्यसम्पादकत्व धम भी है । अग्नि स मुरसे हए का अमि से ही सका जाता है । 'विषस्य विषमापम' गमी का इलाज गर्मी दी। जल स भी बनेर ता घाव में चौगना दाह बन जाता है। जल से बमा कदाई २ में गर्मी घुमा हुई है, समुद्र में बड़वानल है।" इससे पाठक का भली भाति मा हागया होगा कि विराधी धम एक स्थान में रह सकते श्रार रहते हैं। ससार ये सब पदाथ अनेक धमात्मक हैं अत उनका अनेकान्तबाद की दृधि से देखना ही अनेकात पाद का सार है। इसी श्रनेका तवाद का स्यावाद भी कहते हैं । 'स्यात् शब्द का श्रय है यचित्' या किसी की अपक्षा से | इसलिये बहुत स लाग अनेका तथा को कचिदाद और अपेक्षावाद के नाम से भी पुकारते हैं किन्तु सिद्धान्त वास्तव में एक ही है। सप्त भगी। इसी न्यावाद का जैन दशन में सप्तभगी के रूप में वणन किया है। वस्तु और उमर प्रत्येक घम का विधान और निर्ध सापेक्ष होने के कारण वस्तु और उसके धमका प्रतिपादन सात प्रकार से किया जा सकता है। जैसे:-- --

(U स्यास्ति--- कथाचित् है।
() स्थात् नारित- नहीं है।
(1) स्याटल नास्ति- है और नहीं है।
( स्यादवक्तव्यम् -
श्रयाय है।
(५) स्यादम्ति श्रवक्तव्य च- है और श्रवान्य है।
(६) म्यानास्ति श्रवक्तयच- नहीं है प्रार श्रवान्य है।
(७) स्यानि नास्ति, श्रवनथ्य च - कचित् है, ना है
और श्रवाच्या
इन सातों प्रकार 7 ममूह को सप्तमगी का बाता है। इन
मातो वाक्यों का मूल विधि और प्रतिपेप। इस कारण त से
विद्वान इसको विरध प्रतिवध मूलक पद्धति के नाम से भी पुकारत हैं।
इस प्रकार या समभंगी जैन-शन को ही अपनी विशेषता है। भारत
श्रय किमी भी शन में हम प्रकार का प्रमद सप्तमी का पान
नही मिलता हाकि दर्शन में मत् श्रमत् उभय और अनिवचन य
भगाया वणन मिलता है निमम बनदशन ५ मत य की पुछि
होती है। पौर धर्म भी अनेकान्त र्शन से बहुत प्रभावित रहा है।
दशन में चकोटि के नाम से प्रसिद्ध वो स्त्, असत् , उभय
और अनुभय का यत्र तत्र वणन मिलता है यह इस सत्य का पापक है।
गुलमगी का वर्णन करते हुए सुयाम्य विद्वान् प० पैलाशचन्द्र बीशाली
लिम्यते है कि
-
"* हम किमी वस्तु का सत् करते है तो हमें यह ध्यान
। रखना चाहिये कि उस वस्नु क या की अपदा से ही उसे
का जा सकता है। पर वस्तु रे सा का अपहा से इनिया
वेनशन का म्यादाकपृ.६२॥

पत्येक वस्तु श्रमत् है । देवरत का पुत्र दुनिया भर ५ मनु-यों का पुत्र नहीं है और न न समार भर के पुत्र का गिता है। यदि देवन्त अपने को मसार भर के पुना का रिता क ने लगता उम पर यह मार पड़ बो जीवन भर भुनाए से भी न भूले। क्या इमसे हम यह नतीजा नहा निकाल सकते हैं कि देवदत्त पिता है नभो है। अन समार म सा कुछ है' वा किया श्रपदा मे न भी है। मवषा सत् या मवथा प्रपत् का वहन सकती।इमी अपक्षावार का सुनक स्यात्' शद है जिस नतत्वमान अपने वचन व्यवहार में प्रयुम करता है । इमा का रारिक भाषामें स्थात् सत् और स्यात् असत् करा जाता है। शद की प्रवृत्ति वना के अधीन है श्रत प्रत्यक वर में दोनों धर्मों के रहन पर भी धक्ता प्रश्ने २ दृष्टिकोण से उनका उल्लेख करत हैं । जैसे दो श्रादमी मामान खरीदने के लिये बाजार जाते है बदा किसा वस्तु का एक अच्छी बतलाता है, दूसरा उसे दुरी बन माता है। दाना में बात पर बाती है तब दुकानदार या काई राहगीर उ समझाते हुए कहता है--भाइ ! क्या भगड़ते हा? यह चीज अच्छी भी है और चुरी भी है। तुम्हारे लिये अच्छी है और इनके लिये चुरी है। अपनी २ निगाह ही ता है। ये तीनों व्यचि तीन तरह का वचन व्यवह र करत है- पहला विधि कहता है, दूसरा निफ्ध और तीमरा दोनों। वस्नु 7 उक्त दान धर्मों का यदि कोई एक साथ कहने का प्रयत्न करे ता वह कभी भी नहीं कह सकता। क्याकिश, एक समय मक ही चम का क्यन कर सकता है। ऐसी दशा में पशु अवास्य कहा जाता है। उन चार वचन व्यवहार्य का दाशनिक भाषा में

"यान् सन् ' "रयान् असत्', "यन् मद् मद, और यादव ध्य
कहते हैं । समगी के मूल यी चार भग है । इन दाम से उनुध मग
माय मा पहन दूसरे और तामर मग को मिना में पानवा,
पदाचौर माता भग बनता है।"
समन्वय ।
मैं पापा बता रहा म हि नसता. ममार या
पारम्परिक प्रेम और सधि का मतेश दिया है। कभी अन्य धमा
कअनुयायी थानी अपनी एकातre किमीशानाय मिटात पर
भगद १ ता अनेकान्तवाद उनकी मुगद वगना रहा है। ददा से
एकता प्रायासिनबाद म वस्तु तत्व का माय निम्पा
नही हा मना। उरण लिय पत्र को लीत्रिये । बोट दशन
'म नगिक मतानु' मप्रगन नियम के अनुसार 'वत्र मार
रहता है। मौदगमाथा विगत मार . उमा वन का
अषया अतिमागी श्रार निरुप मानता है। इन न य विध
निग्य विमाराम समय म अनेकान्तवाद का मिद्वानही
न विद्या की युतिया का ममाधान EPRI में मधि वाता
वा ऐमा निष्पक्ष निमा दनारदाना का माया।
अनेसायास नव या रता है। पहली प्राय
रशिया वस्तु को निय सिद्ध करती है। इपका कभी नाश नहीं
हाला । दूसरी शायाि उस अनि बनाती है । पयाय दृष्टि से
खबम बन की धार ध्यान देव है ता पता चलता है कि पदावन
आ कुछ काल पद नवीन माना पाता था उत्तराचर जग अवा
पुराना कालाने लगता है। गाई भी वस्तु जय

1
y
वाता ता उमया जीना दो दिन परिवतन का परिणाम
नहीं आता कि तुमूमम्प सेवह वा प्रतिक्षणीय होती रहती है जिनका
हमें पता नही चल पाता। पर वह पूणा से माण होताती है तब
हम उमे च । यि से देख पाते हैं। अतएव पयाय शि से विचार
करने पर दोषा पत्र को वागा मानो का मन्त। ठीक मिद
हाना है।
उमी वस्त्र या बहमदाय की शि से देमने है ता उने
अधिनाशी पाते हैं । जिन परमासुग्रा स बह रन बना है प नाशवान्
नहीं है। उनमयाकार में परिवतन भले ही हाता है किन्तु द्रव्य का
नाग कभी नहीं होता। इस कारण द्रव्य दृष्टि में यही वन निस्य सिद्ध
जाता है जा पयाय की दृष्टि स अनित्य था। इस प्रकार निन्य और
अनित्य ये गाना धर्म यसकर सुश है। पूण वसुमित्यानिया
स्मक है। इस प्रकार वैन धम ने अनान्सबाद ये मिसान्त सम्रौद्ध
और सारपमतानुपायियों के विराध को शात कर दिया अरनिषद
पवम्यानेशदानोकामा यहो।
इम तरह पोकान्ताद अपना निम निर्णय देकर अपने
प मेलातिक कलह का मिलता हाहै। अन्य धर्मों में समन्वय
पसना अनेक नवा का ठास रहा है। यदि समार ने श्रोतवाद
नामदात को भली भाति समझा हाता और उसका पालन किया
हाता तो ममार का इतिहाम धर्म के नाम पर आने वाले भयान
रन पात पार घार अत्याचारां स कभी दूषित न हाता] अाजकल भी
श्रो धम नाम पर अनक वाद विवाद और ना हाते रहते हैं
उनका श्रत मी अनेकात टशन की शरण म बारहहोमकता है।
अनेसातबार मार का शान्ति और प्रेम का मदेश देता है।
1

नष्ट होती है। प्राय सबै पाता। ईमिका परिणाम
साम्राज्य है जो दिन प्रतिदिन मनायकी वदो को खाना
५५ थान में त्रिनामस्ते ।
विद्वानो और मुनिराजों की सारी शदि एदूसरे का निदा करने में
स्यावाट के वर्तमान अनुयायी।
यह तो हुश्रा समार र पनि म्यादा का स देश और उयोग!
श्रर देखना यह है कि जिस धम का यह दशन है उस के पन्न
अनुयायियों ने इस को विम प्रकार समभा है १ मा व इम काम
योग और पालन कर रहे है। क्या वतमान जैन धमानुमाया प्रवाल
बाद के वास्तविक सार और मत्व का समझते हैं और उम मान
करते हैं ? क्या जैन समाज व विसी भी सामाजिक या श्रमात्र
में कायरूप से इस सिद्धात का शरण ली बाती है।
का उत्तर निराशाजनक हा मिलना है। दूसरों को याद
राकने वाले श्राब हम स्वय एकातवादी रने बैटे । र धनों
ममन्वय कराने वाले श्रान हम अपने ही धमग महार
पाते । सच पूछा ता दूमर र सामने अपने " ममा गन
वान्ना ने हा श्राव अपने शन की दुर्दशा का दाइ ।। मूत्रिक,
दिगम्बर, स्थानस्वामी तेरहपयो, यति भार टनम भीगर
राले श्रादि जैन धम दे अनेक सम्प्रदाय और मिस्टिना भी
दैमनस्य, विद्वेष और कटुता बन रही है । एक हा मस्कृति र पुत्र
हार भी सब एक दूसरे का त्रु समनन है। एक शात्रा कर पी
दूभरी शाखा वाले का मिथ्यात्री ने है और पात्र र सुधारक
ही वैमनस्य और द्वेष का वृक्ष करना राता है। र
सत्र
का
.
है। भगवान महावीर म पासक होते हुए
M

म "क सम्प्रदाय के अनुयायो दूमरी सम्प्रदाय के साधुओं का प्राधार पानी तक देश को रोकते हैं। मोगः विनार बाती है और नियम तक करवाए जाते है । मूर्तिपूनक की क या या स्थानकवासी व या विवाही नाय या स्थानकवासी की मूर्तिपूजक के यहाँ विवाहो बाये ता साम्प्रायिक भिनता के कारण उम कया मे युग व्यवहार न करेस मोच नही किया जाता। खुलम मुदा एकर सरेका भड़काने वाल व्यायान देते हैं। एक दूसरे का कनको हात है, चाइकाट करत है और जाति से बहिष्कार तक करने में तुम्न जान हैं। का तक लिवा पाय जैन समाज में मात्र जितनी फूट है शायद श्रय किसी जाति या धम में होगा। क्या यही अनेकान्तवाद की शिक्षा है । क्या इसी प्रकार अनेका बाद का जीवन में उनाग जाता है। क्या यही अनका तबाद का मर्म और स देश है। क्या अनेका तबाद * मल का प्रकट करने का यहा उत्तम है ! क्या दुसरा के सामने नानका तबाद के प्रादश का प्रकट करने का यही मुन्दर प्रकार है। तिमी ला की बात है हमारे निये कि विश्व को ममन्वय और शान्ति से भरा हुमा अनेकान्तबाद का म देश देन वाले बन धम अनुयायी पात्र वा एका तवादी बने बैठे हैं। निमका पालन म स्वय नहीं कर रहे, हमरा स उसका पालन करवाने को श्राशा कर मरते हैं। सगठन की आवश्यकता। अब भी समय है और मूल मुबारी जा सकती हैं। सारा संसार श्रागे बन रहा है और हम पीछे हट रहे हैं। श्रादिर कितनीक है सखया हमारी ? बहुत थोड़ी है और उसमें भी इसने सम्पदय और शगा। इतनी बड़ी पृट । यदि यही दशा और कुछ कल तक चनती सोतो बैन मुमात्र पतन के गत स 11 नही मोगा। संसार चे ( १५१ ) के पड़े र राष्ट्र और शक्ति या सगठित हो रही है। महान कमिना वर्तमान युग में बड़े २ राष्ट्र भी अपने पापा निवन्न पाते हैं। का अप मी सल्या पाले हम । इतने बड़े विश्व म क्या है हमारी तो, कमा सोचा श्रापने ! ओर फिर इतनी असरया में इतनी बडी पृट श्रा भेदभाव। छोटे २ सर भेदभाव का मिटाने का समय है। यह न मिटाया गया सा भयानक पतन अवश्यम्भावी है । श्रम सारित होने का समय है । मठित बाति वा धम ही समार म अपनी १ पायम रख सर्वग। समाज को सारी शपियाँ जा पथ में वारसारिक शुद्र कलह और वितावाद म लगा बाती हैं इसे समाज के सुर और सुम्पास्थित निमाण में लगाना चाहिये । तीयकर निगम्बर से या श्वेताम्बर थ। कोई मदिर में आकर उनकी पूजा करे, या मूर्तिपूजा का ठीक न समझे, कोई मुग्पत्रिका को हाथ में रक्ष या नभको मुग्न पर बाप ले, मुम्वस्त्रिका का प्राकार रहा हो या घाटा प्रादि अनेक साधारण बातों का प्रधानता या महत्व देकर उनके लिये कलह या विवाद करने का समय नहीं है । श्रर प्रायश्यकता है यह समझने की कि तीयक को मानने वाले, जैन सस्कृति को पानने वाले और अनकावयाद में श्रद्धा रखने वाले सर जैन समान है। वन ही क्यों, ससार का प्रत्येक मानव सो उपयु त धानों में श्रद्धा रखता है और उनका पालन करता है वह जैन है। अनेकान्तराद की शरण बाकर यदि हम इस प्रकार की विशा नता दिखाएँगे तभी हम अपने खोए हुए गौष को पाने में समर्थ हा सकेंगे। सकुचित वातावरण । अाजकल जैन समाज में बहुत समुचित वातावरण फैला हुश्रा है। अब दो जैन भाइ अापस में मिलते, ता मनसे पहला प्रश्न जो - के प्रकार समाज सुधार पर धन को नलगा कर उसका दुरुपयोग किया (१५२) एक दूसरे से पूछता है यह है - यार कौनसी सम्पदाय का मानते हैं ? सिमरी है, श्वेताम्बरा है या तरह पया है । इत्यादि यदि दोनों एक हा सम्प्रदाय के निकले तमा ठीक वरन् उन दानों का देवन दाना उनका एक ही प्रेमसूत्र में नही बाध सकता। यहीं तक नहीं " हा सम्प्रदाय के होकर भी यदि दानों के गुरु भिन्न हुए तो भी व एक दूमर स पीठ मराह कर ही पनते हैं। कितना छोटी और क्षुद्र बातें हैं ये । क्या इसी प्रकर के श्रावरण से अन समाज का उन्नति पथ पर लाने का सम्भावना को जासस्ता है ? वतमान जैन ममात्र प्राय तिने मुगरक और प्रचारक है उन मबरा ध्यान एकमात्र पादे नदिया की पार लगा हुआ है। सारे न समाज का हित किस बात म है इसकी पार का ध्यान नहीं देता। कोई यह सोचने का कष्ट नहीं करता इन बाड़े बन्दियों से सारे जैन समाज का कलेवर बीण होता जा रहा है और उसका पल मारा जैन तमाज भुगत रहा है। कोई भी इस एकान्तब द ने भीषण परिणाम पर ध्यान नहा देता। यदि देता हता सा इस प्रकार उत्तरोत्तर गुटबन्दियों की अभिवृद्धि न हा पाती। इन गुरबन्दियों के कारण समान लाग्यों रुपये पारस्परिक मगहों के परिणामभूत मुहमा का लदने म व्यय किये जाते हैं। इस जाता है या दूसरे शदा में समाज को बिगाड़ने के लिये धन खर्च किया जाता है। यही धन यदि समाज में शिक्षा प्रचार और साहित्य उनति पर खच क्यिा वाता तो कितना उपकार और लाभ हाता कि तु इन बातों को भोर ध्यान देन की पुरसत किसको मिलती है, झगड़ों से समय बचे तब न । अस्तु, हमें इन सत्र यातों को छोड़ना होगा। समाज में सकुचित वातावरण पैदा करने वाली सब शक्तियों का नाश करना परमावश्यक है ऐसा करने से ही हम अनेका तवाद की विशालता की ओर बट सक्ते हैं।

प्रत में अपने भाइयों म यहा प्राथना मगा ( यदि
व जैन सरकृति को पुनरुज्जीवित करना चाहत हैं ता सर साम्प्रदायिक
मटम । को और गुटन्दियों का मिटा दें और जैन ममात्र में सगटन
पैदा कर र उम की उन्नति के लिय कदिनदहा बाए । ये छोटी २
बातों का तुरा कर समाज के सच्चे मुधार क्षेत्र में उतरें, अनेरान्त
सा का पहले वा पालन करें और फिर उत का ठरदेश पूषवत्
सपारा। जैन धमावलम्ची थाल अगे बम का, अपना सस्कृतिका
श्रार अपन दैशन का भूल गए हैं। वे नाम प प नी रह गए हैं।
उनका चाहिये कि विश्व का शांति पार संगठन का स देश दने
माने याने अनेकात शन का ममम और उमाज वन म उतारें।
बनेकान्तवाद पालन सही मायण हगा।
+
-

ॐ
號號號弱弱的頭號號
5 श्रमण-सस्कृति में ईश्वर का स्थान
SHETREENERSITERESUESSES
संसार र सम तत्त्वां और सरस्था म ईश्वर ही मबस अधि-
पुरधाग्य तव और रहस्य है। एक ही ताव की खोज और भान
लिये जगन् म भनक धम, सम्प्रद य र सिद्धातों का सष्टिी श्वरी
गूद तत्व का मिद्ध करता है। श्रास्तिकवाद से सम्बध रखने वाले 2
दूसरे श दा में मसिद्धान्त का मानने वाले ससार के प्राय सभी ध
श्रार सम्प्रदाय किसी न किसी रूप में इश्वर की सत्ता का मानते ही है
वे
श्वर के लक्षण, गुण या परिभाषाए भले ही अपन २ हाएकोण
मिन २ करते हो धार मानते हो कि उसकी मत्ता के विषय
किसी का भी विवाद नहीं है। नाच लिये उद्धरण से इश्वर के पिप
म अनेक धमों और सम्प्रादायों की भद्धा का भली प्रकार पर
चलता है
य शैया समुपासते शिव इति अमेति वेदान्तिनो,
पौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटर क्र्तेति नैयायिका ।
अहमित्यथ जैनशासनरता कति मीमासका,
सोऽयं या विदधातु बानिपल त्रैलोक्यनाथो हरि ॥
अथात्-जिर इश्वर को शिवापासक शिव रूप में, घेदा
लाग ब्रह्म रूप में, पोर खुद का में, प्रमाणपटु नैयायिक क्ता रूप
बेनशामन को मानने घाले जैन ग्रहन 4 रूप में, और मीमांस

(१५)
म में मान सात लाक का मामी च्या
ग
पानका और मात्र यो ने अपने मता
मैं (RAIt In REE Inा में भी SAPa nानी
पर दमके लक्षण और सल में ना तर किया है। भार
PIT में उ* स् मम ममम है। मय भी
IYA कि उसना प्रहार निमी an मत्त
fra में मन! मी मनाय की पृष्टि भग
मैं भानको उदगम सात है कि जाग जिम
{का में भी मे MARITE 414 मील में गलत
रामि प्रकार एकीन प्र प्रबाह बन श्रात ओरत
में मरे अन्तिम माग में शामिल है गोमा मिन
घाँधी का सामTE माग अनक अप
नुवाका निमल AT माने एक दी।
ईश्वर शिपय ज्ञान की उत्पत्ति का मूल ।
मानव जाति किस प्रकार भिम बरसों और परिवाया
में से गुमर का उत्तरातर विरार और नपान की बार यदी मश
अधि पनt मश्विये मानीन इनिमम बनना है। मष
प्रश्रत वह मा से पूर्णता की प्रार दो का प्रयास करना
प्राया है। काम 1 ही एम aff मा पायागु
याज का मान अॉक मरिया निरत प्रयत्न
परियामहै। मशन उगवन निये ईयार उक
परिमारयों का सामना करना पड़ा कि पणता को मारने की

-- लगा ने मनुष्य का निरास नहीं होने या विस प्रकार का मघर्ष वर प्रान कर रहा है दो प्रकार अनादि काल में करता पाया है, अन्तर "पन इतना है कि नाज का भौतिकवाद का शोर है और प्राचीन मप श्राध्यामिर तय की श्रार या, अस्तु यः पाठकों *दिय यह नशाना है कि जिन ममय मनु'य र मस्तिका का विम हाना प्रारम्भ -या उम ममय जर २ मानयो बुद्धि प्रारतिक रहस्या का न समझ पाइ ता उममें अनेक प्रकार तक वितर्फ उठने लगे। प्रकृति र गृट रहस्य बड़े जरिन और उनका समझ लेना श्रमम्भव न ता नितन्त कठिन अवश्य था। मान । स्य के तत्र न द्रमा की शीनन चा ना तारागण म परिपूण नभमण्डल, क्षितिज की रेग्या तर पेले हा महामागर हरे भरे 'परतत अरण्य श्रार गगनचुम्बी परता की, श्री अग्ना मस्लिाम छाया घर उनमें बावन की मुदरता और मानवता र माय को व्यापक मा में पाया। प्रति मीन विभूतिया म उनने प्राकण ही आक्षण भरा पाया। दन मा तेक भाकपणा २ कारण यह बीन महत्त्वका उनीचर और अधिक समझो लागा ग्रार सांसारिक मुम्न के लिये उमका तृष्णा बनने लगी। कि तु दस सुवद श्रनुभव र माय २ मनुष्य न ज्वालामुम्वा पवतों का परना, भुच ल पाना बाना की भयानक गरना और उनसे विद्युत् पतन, श्रता कारण अन प्रकार और महामारी - अनेक भयङ्कर राग की उत्पनि श्राट अनेक विश्व का विश्वस करने वाले ग्राम तक कपअर वियों का लेवा पर उनका ६ अनुभव क्यिा। प्राकृतिक कार का मामना करने को गान ता दूर रद्दी उनक वास्तविक रहस्य का मनमना भी उमा लिय कठिन हो गया। मनुष्य ने अग्ना मस्तिष्क लड़ाया और प्रकृति के रहस्या का समझने का पूर्ण प्रयल किरा किंतु दय शीन हो मुमझ में.ग्राने वाले नहीं थे। उनमे समझने के लिये ग्यान ममय की अावश्यकता थी।

ममायामामैं गमकाकभीपणा से
वादा उमा भी होगइन बाह प्रश्नो
मानामनिमें nिमें कई प्रान्तरिक प्रwaims
दामोधने सगा दिए बाब मे भानित
अनेक प्रश्नो की उत्पत्ति ।
4
मानय साचने लगा कि ममार में att अनेक पदार्थ यापक
यह भयावह पदार्थों की भी कमी नहीं । बीवन में माधुय है ना कढ़या
न उस सभी अधिक हिम पड़ा है। ससार में मुख है ता दुमका
भी घत नही थारा मानीनी है कल कहो किनी माइतिक
गरमशार हो जाता है। कुछ क्षण पूर्व ही बालाग. मुराते थे
पक्षण नदी ये रान चिन दिस ६ देने हैं। प्राब सोझोडासान
अन्य ममय प पश्चात् दीया श्मशान घार बनवाता है। प्राय
वारगरलियां मर जारही हैं कम यहा आइता है। एक
पर में जान की कलियो विल रही है। दूसरे पड़ोस के ही घर में
मृत की भयानकता दहिगार होती है | यस समर में इतनी
पड़ी विषमता या! क्या इस प्रकार के शिनापूरा विश्वका लियो
शनि विशेष ने पैदा किया था या पालिसी ने इसन जाने दिया कि 'तु
अनादकाल से ऐमा ही या गोर ऐमा हो जाना है। यदि किसी
निविरमसार को उत्पन AIR Cी मानक विषमता क्यो
तालिका को माना गोमती वा दम की नियमित
पसासि प्रकार गम का मयादित व्यवस्था
भोजनादिकाल से यशान है। यह दृश्यमान नराबर
HEIR भी हो जाता है। यह रोगा
म मम १६ ११, अनुभा करता'

(१०८) वह अहका तब भी सामुमार र अय पदाया की भाँति उत्तम श्रोर नाश होता है या वह अनादि ग्रार अविनाशी तव है ? यदि वह तत्व अनाहि और नित्य है तो उसका सम्बन्ध मसार के सादि अनिस्य या नाशवान पार्यों से क्या और कैसे माघ ना ? इस प्रकार अनेक जटिल और दुधिगम्य अत्र मानवी बुद्धि विकास कान में मानव पे मस्तिष्क में उसन हुए। श्विक भिन्न २ प्रदेशों ये मानकों ने इन अभी का मनन किया और विश्व में वाय तथा यातरिकहयों को ममझने के लिये पूरा प्रयत्न दिया। अनेक युगो के दि तन और मनन के पश्चात् मनुष्य ने श्रारम तव के रहस्य को सम्मा और ईश्वरीय सत्ता की स्थापनामा दोरान के मनन के पधात् मानव इस निणय पर पहुच गया कि इस पाय मसार से परे श्रा तरिक मसार में कोई सर्पशीर सर्वशक्तिमान् सता है जिसको ईशर याहना चाहिये। उस सत्ता का जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है ससार वभिन्न २ धमों के विशनों और श्राचार्यों ने अपने २ भिन्न २ दृष्टिकोण से अवश्य माना कि तु श्वर को सत्ता का सपने साकार किया। ससार क धमों और मम्प्रदाया की सरया तो बहुत पड़ी है और उन मनकी ईश्वर विषयक मान्यता यहाँ नही दी जा सकती। यो ता वन वैदिक, जैन और बौद्ध इन तीनों भारत के महान धों के ईश्वर विषयक म तव्य ही सरस दिये बाएगे। वेदिक मन्तव्य। वैदिक धर्म भारत का एक विशाल और ध्यापक धम रहा है। अतिप्राचीन वैदिक संस्कृति के आधार पर ही वैदिक धर्म से अनेक नए सम्प्रदाय निश्ले श्री नई २ दार्शनिक शाखाओं का जमश्रा। उन सम्प्रदायर्या और शासायो की सरश तो बहुत बड़ी है प्रत उन सर पर यहा विस्तारमय से नहीं लिया जा सकता। यहां ता पारका क साधारण ज्ञान के लिये केवन वेद वेदा नदशन साय और याय पशन के ईश्वर विपरक मत यों पर ही सः। से प्रकरश डाला आएगा। वेद मे ईश्वर सत्ता। वैदिक धर्म का सबसे प्राचीन ग्रय ऋग्वेद है। चारा वेदों में ऋग्रही प्राचीनतम है। हम वेद के अध्ययन से यह ता स्पष्ट है इसके रचनाकार के या माथता के समय ईश्वर विषयक बोत्र का इतना प्रावन्य नहीं था जितना कि बाद में हुअा हो ऋग्वादक काल में लोगों ऐश्वर के विषय में श्रार शृष्टि को उत्पत्ति के विषय क्या विचार य वे भलीभाति समझे पासते हैं। उस काल में ईश्वर, बीच और प्रति इन तीना पदार्थों का अनादि माना जाता यानीचे लिखा मन इसकी साक्षी देता है द्वापणी सयुमा ससाया समान वृक्ष परिपरमाते । तयोरय पिपल साहयनसन यो अभियाक शीति॥ अपात्- *असे दो मभान अायु पाले और मित्रतायुक्त पक्षी एक वक्ष पर बैठते हैं, इसी प्रकार दो अनामि और मित्रतायुक्त श्रात्मा अपान्-श्रीवारमा और परमात्मा अनादि प्रकृति में रहते हैं। दोनो में से एक (अपात बीवारमा) इस प्रकृतिको वृक्ष के पानको चखता है (अयान्-सुष दुम भागता है वा भौतिक शरीर में अपने का परिणाम है) और दूसरा परमात्मा इसके फल को न खावा श्रा (अथात्-मुपद्न न भोगता हुआ) सब कुछ देखता या प्रकाशमान हो रहा है। *पर्म हानाहात पृ० १३४ (१६२) ३ । सत्य की पुष्टि याग चलकर उमनपा ने भी की है। मण्डका-प में लिखा है कि यमानाभि सृजते ग्रहते च यथा प्राथ यामे पधय सभात । यथा सत पुरुषात् केशलामानि,तथाऽनरात् मम प्रतीह विश्वम् ।। श्रथान-जिग्न प्रकार मकई वाले को अपने शरीर में से चनाती ४ पार अन्त में रि उस जाले को श्ररने में हो श्रावञ्चित कर लना है और जैसे पथ्वी से अनक प्रकार की श्रोषाधये पैदा होता है और अन्त म सभो पृथ्वीम्प हो हावानी हैं जैसे चेतन पुरुष से शादि का उदात्त होती है, डीक उसी प्रकार अक्षर, अविकृत श्रार अविनाशी इश्वर से मार विश्व की उत्पत्ति धाता है और अन्त में सारा विश्व उमी"श्वर में लीन होनाता है। वेदान्त दर्शन मे ईश्वर । वैदिक धर्म की जितनी भी दार्शनिक शाग्वा है उन में वान्त दशन के सिद्धात का स्थान बहुत ऊचा। घेदान्तदर्शन में श्राम तत्व और परमात्मतत्व की जो खाज की गई है वह बड़ी गभोर हैं और वैटिक धम में वदा त मान्यता अनुयायी चिरकाल सब त बड़ी सरया में रहे हैं। बर सारा भारत महत्मा बुद्ध के प्रभाव म बौद्ध धमावलम्बी हागया था उस समय वदान.र्शन के महान विद्वान् म्वामी श्री शकराचाय ने वेदशन प्रचार पर ही पुन-भारत में यापक रूप स वा क धम का स्थापना की थी । भानु, वेदrत दशन की वैतवाद और अद्वैतवा- नाम की दो बड़ी शाखाए है। ईश्वरीय या ब्रह्म की मसा को दान मानते हैं किन्नु दानों में सैद्धातिक भ, काका,है।

दानां क मन्वन्या ये मदित न रन से पाठ वय मैदा मिलता
काममझवाएगे।
ढतगद।
4
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W
देतादिया का कहना है कि यदि हम कह कि *श्वर का
अस्तित्व नहीं है तो हम निवेधात्मक वाक्य से ही-वर काहाना मिड
हो जाता है। इमी प्रकार देत शन्द म देतवाद का मिद्धि हा जाती
है। गान मदेव देत है क्य किया जाता और भय महता है ना
का अपोन्य मित मम्बध है । द्वैतवारिया क मा यता र अनुमार
बेवात्मा और परमात्मा ये नो मित गनियाँ है। उन का कहना है
कि परमात्मा व कान का विषय है।
श्रद्वैतवाद।
प्रतवारिया जाना है कि यदि परमात्मा को श्रारमा +
HTA का विषय मान लिया जाए तो यह आवश्यक है कि परमात्मा
"पारमा य मभन्न विषयस्य हा कर उपस्थित होगा। यदि वविय!
नो प्रश्न यह उठता है कि वह प्रारमा + अतर में क्मिरामि में तो
विषय और विषयी एक लकड़ी के धागे के ममान पृथक् २
हाने है। एक छार का दूसरे छोर येतर में थाना सवथा असभव है।
प्रतएव परमात्मा का वात्मा का विषय न मान कर बाबारमा का
अंतरतम श्रात्मा मानना चाहिय! अतिवाद की मान्यता के अनुसार
श्रीवात्मा श्रार परमा मा एवं हो हैं। उनका ना दिवा
पवलम अथात्-चाव साक्षात् 'बगहा है1 मार में
महमें अनेक दिवारले।मै

( १९४) है किन्तु भिन्न र पार्थिवश का सयाग हाने स भिन्न २ मा का धारण करता है । वही मल निम्बू न पौधे को दिया हुया खट्टाहो जाता है, अगूर की लता को सचिने से मीठा हो जाता है भार अरीम के पाय में जाकर कटु हो आता है किंतु जल वास्तव में एक ही है। चन्द्रमा एक ही है कि तु तालाब नटी और ममुद्रादि में प्रतिविम्ब पड़ने से अनेक भासता है। ठीक इसी प्रकार एक ही झभिन्न बाकि रूप में श्रनेक भासता है। जीवात्मा के लिये इस समार को अस्तित्व तभी तक है जब तक यह प्रविया या माया व यावरण से अच्छादित है। उम श्रावरण के दूर होते ही वद ब्रमम्प हात्राता है। यही अतधार्द . T . " - . 14t- है साग्व्य में प्रकृति और 'पुर्प ।। वेदा त दशन में जिस प्रकार ब्रा और मया की प्रधानता मातरह स मारयदशन में प्राति और पुरुष की प्रधानता अखिल पा पार अचर,माष्ट और सहार का विवनन करने में पश्चान् मास्य इस निणय पर पहचता कि अन्त में पुरुष और प्रक' ये ही दो स्वतत्र तग अनानि मूलतत्त्व अवशिष्ट रहते हैं। पुरुष क माक्ष प्रति तथा सर, दुग्यों का निवृत्ति के लिये प्रकृति से अपन भिन्नता बानना श्रावश्यक है और त्रिगुणातीत होना, परमावश्यक है वेसे क्षेत्र और क्षेत्रचार परिणामस्वरूप 'द्रष्टा या पुरुष निधय होता है इसी प्रकार हर एष अक्षर जगत् के निचार के परिणा- स्वरूप सत्व, रज, तम इस त्रिगुणात्मक प्रकृति का ज्ञान हाता पुरुष और प्रकृति ये दोनों तत्त्व एक दूसरे से भिन्न है। पुरुष चेच है और प्रकृति भद है। चेतन पुस्प का बड प्रकृति के साथ पर्य 8

कापलदाठा लघर नित्य ऐश्वयसा
परमकारुणिक और शारे विश्व के लिये विar
जान सइम परिदृश्यमान जगत् को रचना न
ता एक हा है. किन्तु त्रिगुणात्मक प्रकृति ,
असत्यरूप में भासता है। पुरुष निगुर है और
पुल के लाभ के लिये प्रति पुरुष के
समय
बहुत से विद्वानों ने प्रति गुमा
उन दोनों में परे परमात्म तत्व को समय
है कि प्रकृति और पुरुष ये परमात्म व
वेदन्यास सौख्य का वणन करते हुए नि
म पुरुपस्त्वन्य परमानेवाला
यो लोकत्रयमाविश्य विमल
का अर्थात्-मो पुरुष और 2
उत्तम पुरुष है। उसी का परमाया है
शक्तिमान् है ।तीनो लाडोने का हर
1
M
s
यहा प्राति और पुरसरल
किया गया है जो दोनों में और पुरस्म
इस प्रकार दर्शन के
पुरुषोत्तम इनका उमण अपन, वायगई।
17 न्याय शास्त्र में देश की परिभाषा
.
न्याय निदान्द्र निराकार
सर्वश

- कर्मनाग म, भनि माग से यागमाग से श्री ज्ञानमाग स उपाय है। श्रवण, मनन निदिध्यासन एव देशन भा उमका उपासना के प्रकार है। मवक्मप्रवतक उस स्वर में अनुवा र बिना मनुष्याका काम म माल नही हो सकता। नैयायिका का कहना है कि कम अचेतन ई श्रत उसका शनि का भी अचेतन हाना स्वाभाविक है। श्रत मिमा चतन के अविधातृत्व के अभाव में कोई भी प्राणा रिसा भी कार्य में प्रवत्त नहाँ हो मस्ता। इमानये कमाल देने लिये ईश्वर का मत्ता का मानना परमावश्यक है। महर्षि गौतम लिखत है इश्वर कारण पुरुषकमफलंदशनात् । (गौतम सूत्र.) अथात्-पुरुषा के अन मालों को देखते हुए हमें "श्वर की कारणता का सट शान हाजाता है। इस मा यता के विद्वानों का कहना है कि जीवात्मा में श्रधर्म, मि यान और प्रमाद ये दाप होते । जिस प्रारमा म ये सब नहीं पाए जाते किन्तु इनके स्थान म चमनान मार समाधि पूणरूप मे पाकाती है वैमा चारमा हा थर है। मन्तान के लिय जिम प्रकार पिता यथाथवादी, हितापदेण श्रार दयामय है उसी प्रकार ईश्वर भी सर भूतों के लिये पितृतु य हैं ! इस प्रकार दे की मान्यता के अनुमार श्यर अनादि है श्रार सूणि का कता है। रात में ब्रह्मा श्रार माया को व्यापाता, मारय में प्रकृति और पुरुष की प्रधानता, पार यायशास्त्र म पुरुष के कमाल दानाय इश्वर की कारणता श्रादि प्रक्षिप्त विवरणसे पाठकों को भली प्रकार पता चा गया आगा कि वैदिक धर्म की इन भिन्न २ शाग्योनी में इश्वर का और विश्व के स्वरूप का किस प्रकार समझा है श्रार उसका प्रनिपान किया है। संवा सिद्धा तो माग मिन्न होते हुए भी सब ईश्वरीय सत्ता की एक ही लक्ष्य की और बात है। - -

1
-
मग उयकाल +लका अब तक अगत्व प्रार परमात्मा
म तत्वा को ख भ में मानवी बुद्धि कितनी प्रयत्नशील रही है १६ मा
रसुत भिन्न २ मिद्वान्ता र वन स स हाजाता है। वाय और
आन्तरिक विश्व व गूर प्रमों को मममन में लिय मानष का मस्ठिक
कास परेशान होता रहा है और उसने अपनी उपत्र के अनुमार
उन प्रभा का उत्तर मे दिया श्रीरान का प्राथयां यादेस सुलझाया
या विश्व में इतिहास से और अन धमों के धर्मा स भनी
भाति समझ सक्न है।
श्रमण-संस्कृति में ईश्वर।
जैनधर्म वैदिकधर्म के समान-इश्वर का अनन्न राति पाला
सवान दमय, सबा और अविनारी नो मानता है कि "मुका
जगन् काता और नियता नहीं मानता है। जनदर्शन मात्मा का
प्रमादि मानता है। जिस प्रकार वेगनशन में अधिकार प्रारगा
काही. जीवामा प्रसार बन जाता है । इस प्रकार नाशन
अनुमार जीवात्मा से मका प्राण दूर होते इस यह प्रश्वररूप
हाबाता है। प्रात्मा रागरादि से.नित हाने . कारण असे
वास्तविक स्वरूप का भूल जाता है। और अपने भिन्न कमी
पाणामस्वरूप अनदान यानियां मा बन्न लता रहता है।
भक विवेक शदि विमिन दाताती है यह अपसकमी द्वारा राग
द्वप र सहकारी का नाट १८ जना और यमन धन स मुक्त
हाजाता। वह अपने वास्तविक स्वरूप का पहचा लेता और
कि वही मुक्तामा मवज्ञ, भान "रू, और सशषिमान, हाकर
पामारमाद का माल हा । बनदराम का प्रसार वर जमी.,
सतप स काई शक्ति, न है कि तु ईयर के समान गुण
३

में रहते हैं। इस लिये बनधम के अनुसार प्रत्येक जीव में श्वरत्व पद प्राप्त करने की शक्ति रहता है। यदि बीव कमों के श्रावश्य से दबी हुई उस शनि का काम करले तो स्वय इश्वर 'बन जाता है। इस प्रकार जैनधर्म ईश्वर तत्व को धैदिकधम के समान भिन्न स्थान नहीं देता किंतु ईश्वर तत्त्व को मा यता रखता है और उसकी उपासना को भी मानता है। बाजा' धात्माए कमबधनों से मुक्त होती जाती है वे सभी समान रूप से ईश्वर पद को पाती है । अविद्या या कम के पावरया प दूर होने से जीवात्मा ही ब्रह्म या ईश्वर बन जाता है इस विषय में वेदान्त, और जैनदरान दोनों एक मत हैं । ईश्वर 'स्मृष्टिकर्ता क्यों नहीं । । यह पहले भी बताया जा चुका है कि जैनधम ईश्वर का मसार का रचयिता और शास्ता नहीं मानता है। बो लाग ऐसा मानन है उनक प्रमाण और युक्तियें जैन दृष्टि से सारगर्भित नहीं है। ईश्वराको ससार का कता और शास्ता मानने वाले कुछ विद्वानों का कहना कि वन ईश्वर ही शाश्वत और अनादि है। उसके पिना संसार की काई वस्तु अनादिनहीं। इनमें से भी कुछ लोगों का तो कहना है कि पहले कार चीप नहीं थी, केवल ईश्वर था। ईश्वर ने नहीं स या अभाव से ही मारे मसार की रचना कर डाली। दूसरे लोग कहते है कि इश्वर ने अपने अन्दर सही सारे संसार का उत्सम किया या बनाया। धम के अनुसार दोनो मतन्य नि सार है। महति अध्ययन से हमें पता चलता है कि ससार का कोई भी पदाप प्रभाव से पैदा नही हाता। प्रत्येक पदाय को कुछ पूर्वावस्था अवश्य होती है और विमी भी पदाय का साया अभाव नही हाता।

समा' म इमें कई उदाहरण ऐमा नहीं मिलता बहा अभाव स किसी वस्तु का उत्पत्ति होती है। प्रत या नहीं माना जामकता कि ईश्वर न मसार का प्रभाव स पैदा किय । - पो लाग यह कहते है कि ईश्वर ने अपने में से हो विश्व की रचना का उनकी मा यता भी ठीक नहा बचती। श्वर सर्वश है और पूर्ण है इस सर को सब स्वीकार करत है। उम सवा और पूण श्वर से उत्पन्न हया २ यह मसार अपश और अपूष कैम हो सकता है। यदि ऐसा मार लिया जाय तो इसर में भी अल्पता और अपूर्णता के दोष जत हैं। फिर ससार का ता बहुत बड़ा भाग बह भी है, समश चेतन भाषान् स बद की उत्पत्ति किस प्रकार सक्तीहै। इसके अतिरिक्त सष्टि में प्रालि म बब ईश्वर न सब श्रात्मानों को अपने में से निकाला तो उस समय सब पारमाए श्वर में मिली होने के कारण सब प्रकार के कर्मबंधनों से मुक्त थी और इस कारण शुद्ध पौ। पिर उन सर प्रात्मा को किस दोष या गुण के कारण भिम २ ऊँच पानीव योनियों में जाने के लिये बाध्य किया गया। इन प्रभो का कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिलता अत यह मिद्ध है कि ईश्वर ने ससार की रचना अपने में से नहीं की। इसके अतिरिक्त ईश्वर पूर्ण है और वहां पूषता हाती है वहीं किसी वस्तु की भी कमी नहीं हो सकती । यह तो पूर्णता शब्द से ही या है। इच्छा वा पैदा हती है नहो किसी वस्तु की कमी हो। इश्वर ने बससार को रमा तो उसने रचन की इच्छा अवश्य की होगी क्योंकि बिना इच्छा के समार की रचना हो नहीं सक्ती 1 बचाया हागई तो ईश्वर में अपूर्णता पानात' है। अत यदि *श्वर को समार कारयिता माने नो वह पूर्ण नहीं बना सकेगा।

(१७) जैन धम कता है कि ममार श्रम प्रकार की भयानक महामार्ग प्राति याधिया, भूकम, अतिमि और अनाधि या प्रारतिक प्रकोपो म हाले वाल वान मत्यु और अ पहायादि नक भय नक अापत्तियो म भरा पड़ा है। मुम्ब का प्रश कमाई 14 तु दु ग्व म पादित प्राणियों का प्रतन नारा भार मुनाई देता है। क्या मज पार मरशनि मान् ईश्वर ने ऐस ममार का उत्पन्न करना ही म किया। स्या पड सक्शनिमान् होने हुए अपनी शनि स ऐम ममार का उत्सान नहीं कर सकता था वा मुम्ब, शान्ति और मानन्द से परिपृण हता। ऐसी स्थिति में उसका भी निय प्रण करने की परेशानी न उगाना पती। यश और सशक्तिमार ईश्वर न पहल तामसार का अपण और शनि रहित बनाया और फिर उसके लिये पूर्णता तर पहचानिये अनेक नियम धर्म बनाए। काई साधारण युद्धि... रम्बन वाला पनि भी जान इझ कर किसी वस्तु को पहले पूरी नहीं बनाता कि बाद में नमका सुधार करना पड़े। प्रतएव सवश-और मशक्तिमान् श्वर ने यदि इस संसार का बनाया होता तो अवश्य हो यह पहल मे ही पूरा और समय दाना। कुछ विद्वाना का कथन है कि इश्वर न ही संसार का रची है और इस कारण वह ससार का जनक या रिता है। समार में बो लाग वा, गगा काकुल और भूमि अकाल मृत्यु के माम अन्न है यह मय उना पूर्व भव या इस भव में किए ५ का पल जिसका भाग लि दी श्वता । जिस प्रकार पिता सद्गुण व ल पुत्र का पुरस्कार देता है श्रार दुष्ट एम करने वाले का अनुरूप दण्ड देता है इसी प्रकार ईश्वर भिन्न २ अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार अषों का दता है। मार मार का शामन और नियत्रण यही करता है। 7

-
एक तरह साधन बन जातनिहताममा परमाणावर
श्रात्मा में मिलते हैं। प्रात्मामाइदमयोगस १५
प्रकार की शक्ति मन्वितोवारिका र उनाटो
कि
बबश्रात्मा अपने वास्तविक खपानासठा
म मान्यनामी युक्त की सग पर ठीक नही उसाती और
सशक्तमान् बिरबमा चाहता धैमा ममार बना सकता थामने
सपा
का युग कर्म करने की शक्ति ही क्या दी! पल उनका पुग
कम करने का विती और उस शक्ति का प्रयाग करनी
ता नको गड दिया। कोई भी रिता पहले अपने पुत्रों का मुरे हार्मा
में प्रवन कराए और फिर उहे दण्ड दे, भला यह भी का दिमत
बड़ी नामकती है। प्राश पिता अपने पुत्रों में युग कम पानी
प्रवृत्ति दी नपिंग हाने देगा।
जैन मन्तव्य । -
जैन धम के अनुमार मल रिलान र मिया मदना ।
प्राषश्यकता ना मानी बाटी। न म मा म
शान और जद वस्तु ये दानो अनार कान म मिन दूर नप याने
है। ये दोनों ही दृश्य सतार से उत्पन्न करन में गाई। श्रामा
वास्तविक स्वरूप एक ही छाता है चाहे पर गुराग पुरम में
मिला। सूदम भौतिक शक्तियां कसमें Frjar riग्रा में
मिला हुआ है और इसी कारण भाराम राज पद भाव पैन
जाते हैं। ये विकार ही अच्छे शकुर को पिस्न कारण बनकर
धारमा में मुम्ब दुख उपना हान बात है। यह
समाप्त हालाती है तो वह वस्तु बागरे पाशता
1
है

(७२) शस्तियों की निजग हाजाती है और श्रात्मा परमात्म पद को प्राप्त होता है। - सृष्टि की उत्पत्ति। नधर्म सिदा त के अनुसार समार की रचना सज्ञान और प्रशान दो कारणों द्वारा होती है। या दूसरे शा में छ द्रव्यों जीव या प्रात्मा, आकाश, कान पुद्गल घम और अधम इनक द्वारा हाता है। नमें से एक कारण तो बैसे बीच समान अथात् शन वाला है और शेष पाँच कारण अज्ञान अर्थात् अ६ हैं। इन छt द्रव्यों या वस्तुमा अनक पाय गुण या स्वभाव सहममार की रचना होता है। मज्ञान कारण का विभव जान लेना है और बाबा के पांच बड़ है बाहार है। यद्रिय शनादिकाल म विद्यमान है और रहेंगे। किसी वाम समय में इनर 'सयाग से मसार का उत्सनि नहा हुइ किन्तु ससार अनादि है। इन छद्रिया की भिन्न २ परिवर्तनशाल दशाना, पयायो और परस्पर समधात स मसार की सरिदातो है। इन मारे दया का यापार एक दूसरे पर पहता रहता है। इनम सनहाने नाश होने और स्थिर रहने की शक्ति है। इसी शक्ति को सत्ता भी कहा जाता है। यह मतान छ द्रव्यों में ही रहनी है उनस भिन्न काई वस्तु नहाँ! या दूसरे शब्दों में इस सत्ता का द्र यो से नित्य सम्बध है। इससे यह स्पष्ट है कि ससार को उत्पन यानाश करन वानी शक्ति छ द्रव्या के अन्तर्गत ही विद्यमान है। संसार से पृगक वह कोई शक्ति, सत्ता या व्यक्ति नहीं है। द्रव्यों के अतगत रहने वाली इम शक्ति को बैन धम इश्वर नहीं मानता।

महापुरुष, वीर, महारमा वा विदा मने का प्रयत्न L - इस का उत्तर बेन मिदान्त सपरार देन है। शारिन के उरत होने लगते हैं और देश को दुश्मा शोध प्रजाता। इसी प्रकार जब कभी किसी महात्मा या महापुरुष के हम दशन करते हैं या उस का चिन्तन करते है या चित्र में बढ़ी मन्नता और शान्ति उपती है। पवित्र रिचार स्त्री र सरकार शुद्ध होते हैं। विश्व भर में बड़े २ महापुरुष, वा, विद्वानी और ताश्री के जा धुत बनाकर य वर चौरतों कों में रखे गए हैं और air दिवम महासको पर उन चुना है माफूल माला डाल उसको भवन भी। योग दि लोग उनका ईश्वर का ससार से सम्बन्ध । अब प्रश्न यह है कि जैन मिझात र अनुभार वन वासमार का कर्ता है और न जीवों क र्मग्ल भुगताने वाला नियन्ता र उस का समान से समय ही क्या हा! अब यह समारक कामों में और उसकी व्यास्था में हम्नर नही कर सकता और भी किसी को हानि या लाभ ही पहुंची सस्ता है तो फिर एम सरका मानने से, उम की पूजा और उपासना करने में समार का क्या नाम । उमर की "सवजसा और अनन्त शक्तिमा स ममार की मग पायदा १ बैनी लोग जो मन्दिरों में बाकर भगवान की प्रार्थना करने हैं दीप और चादन अादिमे भगवान् का वचन करते हैं, म्यान और उपासरों में जाकर उस का ध्यान चितन और इतन करते हैं, यह सब फरने से मिर क्या लाभ होना है। बावन में अनुभव में हम देखते हैं कि बस हम किसी दुःश पुरुष को देख लेते हैं या उस का चिन्तन । भावात्य में बुरे भाव है

मन्दिर में भगा पतिमा न पाने में ई NR में
पर भगवान में प्रसानिमा और
बदला घरमा मावा गुणां यो नान arntam
Altra पागोया प्रमाणे मना में
विषनाम amt. RAS अपनी सस
मूलबार अपन मा सुटकारा पानाचारमा की
उपति ममता चार र पपता की मापदन माता ।
परमारमा में हो गया ५ प्रामा में भी Hि
प्रावरण कारण हो । भावान १ पूजन या चिन्तन
करीस ग्रामा सपथ ग्रार दोमामा गगन
का 18मा सरबा| भगवान के लिए मना
नसन से मामा घरने वास्तविक को मममन सगता
सापारिमा उपति और मानव सपा के
म मापन, चिन्तन स्मरा भार न नितान्त मारक
twr Arres
चौद्ध धर्म में ईश्वर की मान्यता ।
मामा पु ने क्षा के परिनत और नास्तिव में महना
को टोक नही समासरीय ज्ञान को मानना का म मानना यह
बौद्ध दरकाण से कोई प्रारक या मदद मिदा नहीं है।
यह मंसार का प्रारम्भ हुना सका फल त हागा पाकिसी ने
मनाया १० अनादि और अनन्त समार के वादविवादों को
पुर निश्पक और मूषतापूर्ण, सममते पे देता विशेष सरमाम
सुधार पर और सयम पालन पर देते । कभी भी उनके शिया
में इस प्रकार के सारी यति विषयक प्रम उनसे पूछे रोने
~

१७५) उन्हें प्रात्पाहन न देकर प्रमों की निरथक्तान ताम प्रकार विषयों पर वितण्डावा करने वालों का करण 'मनास मुत्त में प्राता है या इस प्रकार है- "वर भूगल है जा इस प्रकार के पिचार करता है कि मैं भूतकाल म या या नहीं। भूनकाल में मैं क्या था और भविष्यत् काल में मैं रहूंगा या नई । भविपत् कान में मेरा क्या स्वरूप 'गा और बत्तमान काल में भी अपने दिल में ऐमे विचार करता है कि मेरा वास्तव में अस्तित्व है भी या नहीं ! म क्या तु है ! यदि में कुछ वस्तु हु ता कहां से प्रागया पार मृत्यु में बाद यहां चला वाऊँगा महात्मा बुद्ध अपने उपदेश। म दूसरो को भनाई और सदाचार पर जोर देते थे। इसवर की सत्ता के विषय में उनके कुछ विधार तेवित्र मुत्त' में भी मिलते हैं। इस सूत्र के प्रारम्भ में दो बादाम युवक शिव और भारद्वाज वा-विवाद करते हैं। उनके दिवार का विषय है कि ब्रह्मा की प्राप्ति के लिये सचा माग कौनसा है। ये दाना अपना शका क निधारणाय महात्मा बुद्ध की सेवा में वाते हैं। ये साय को महात्मा बुद्ध इस प्रकार दूर करते हैं। ""हे वसि। इस प्रकार के ब्राह्मण सो तीनों में को पर्द कर भी उन गुणो का तिरस्कार करते हैं जिनसे मनुष्य ब्राह्मण बनता है और ये ऐमा पाठ करते है इम इन्द्र को पुकारते हैं साम को पुगरते है, वरुण को पुकारते हैं, ईशान का पुकारते हैं, प्रभारति को पुकारते हैं, ब्रह्म का 'पुकारते है महिदि का पुकारते हैं, यम को T A

पुकारते " मित! पद कभी मान प्रिय बाप
पए है पर उन गुम्नं का निरासर का त्रिम मनु
वारत में प्राण बनता है पर उन गुणों का पता करने
मनु र मासण बनता पक्ष नुति और भागना का ५
दे रथात् र शरीर दूर तामको पाम "
धग्धा मि! पद सम्भव कि प्राए l
पेद देने पर भी अपने हक में प्रोध और गधारप पिए,
बा पारी और श्रमपमी वीर शहारने पर उम
मन को प्रा कर सके भामोध, दए और पार गरित और सयम
रखमा"
इस प्रकार मारमा पुन १५ प्रतिव चौर नास्तिस्य
के बाद विवाद में न पर कर साप और देषक स्याग प्रारसंयम
प पालन पर अधिक बोर देते हैं। काकी उपेक्षा और मामयों की
निउरोंने इस कारण की तत्कालीन प्राण की मार
लेकरकाप, देष, असयम और हिंसा में योगए थे और ब्राह्मणात्य
वास्तविक स का भूल पुरुये।
वैदिक धर्म के समान वर अस्तित्व का प्रचार न करके
महारमा पुर ने प्रारममयम, प्रारम मुधार, माना जाति तथा प्राणिमात्र
के प्रति महद्भाष, शुभकमी का सामरण और मानसिक पवित्रता
पे प्रभार पर जोर दिया। सबनीचे पाठको के हानाय दमके
मुम्य मिद्धान्ता या मन्तव्यों पर मझेर से प्रकाश डाला बागा।
घोद्ध धर्म में निर्माण ।
निर्वाण शन्द का प्रथमेशान्तियों का प्रमानन्द नहीं है।

( १७७) पैद्ध धर्म में इसका श्रथ-यामना श्रार मानादि विषयों का ज्याला को बुझा देने का नाम ही निवाण है। पारहारिक सत्य का अनुभव होने * पथात् पारमार्थिक सत्य की खान की बात है और इसी सत्य का अधिगत करना ही निवाण'मा करना है। मर्य प्रपञ्चानामुपशम । अपात्-सर प्राचो का नाश करना हा निवाण प्राम करना है। निवारण के मुख्य दाम--(१) उगधिशेप और (२ अनुगधि शेए) निवाण की प्राप्ति तृष्णा के उच्छेद से छाती है | Arung का सामना राहित्य और बौतों का तृष्या उच्छ- ये मिलते जुलते हा है। चार पायमत्य माने गए हैं जिन अंनुभव से ही तृष्पा का नाता है। ये चार प्राय मत्य दुत, समुदय निरोध और प्रतिपत्ति हैं। परिदृश्यमान लगत् में मर टुम्ब ही दुख है। जवन में हुए के निधाय और कुछ दिखाई नहीं देता। इस टु म का उदय जीव की कामना में पाता इसका निरोध हो सकता है और इसकी प्रतिपत्ति 'अष्टागिमग' और शशीलादि से होती है | घे प्रधागि मार्ग' पे है --(1) मम्यक दृष्टि (२) सम्यक् सकल्प (३) सम्यक वाक् (४) सम्यक् कम, (५) सम्यक् श्राजीव, () साया व्यायाम, (७) सम्यक् स्मति और ,(८) सम्यक समाधि । इसी प्रकार नाचे दस भाव इस माग फे बाधक है -(१) सत्काय दृष्टि, (२) विचिकित्सा, (३) शीलमृत्त परामरा (४) काम, (५) प्रलिघ, (६) पराग, १७) अमर राग () मान(E) प्रौद्धस्य और (१०) अविद्या। ऐसे ही दम ही निपेचात्मक शिक्षाए हैं-(१) प्राणादिरात, (२) अदत्ता दान, (३) अब्रह्मचर्य १४ म्यावार, (५) पशु य (६) प्रौदत्य, (७था प्रलाय, () लाभ, (E) देष श्रार (१०) पिचिमा ! बैद्ध धम- (१७) मम्म योनानी मियामा साग २ यही काय यावारिक है यार मायका श्रज्ञानना प्रकार म प्र लाना है। यो मलम का ग्वाम मिनि थी जिम मममान श्रीम का स्थापित किया था। बौद्ध परम्परा म क्षणिकवाद । मामा बुद्ध ने अत्तवाद' अपात्-श्रामाद की नि का मारक सत्र पदायों का क्षणिक माना। हर एक वस्तु का क्षण ण म नाराहाता रहवा । उारणाय धापवान से निकला इ पुस्तक मी या अनुमान से मासो थपों के पात् बाणं हालातो है श्री त हाथ से छूने ही उस पत्र भरने लगते हैं। क्या या करने वाली शनि एक ही दिन में पैदा हालाती है । नहा, उस पुस्तक में सण क्षण में नाशरूर परिपतन राता रहता है और अन्त में उस पुस्तक, परमाणु अपनी ननमा वमुंधरा में हो जा मिलत हैं। इस ar९ सबार धमका मायना अनुमार समार के मम मत पगथ क्षणिकवाद म म बात है। यहा तक धारमा का भी नाश माना है। श्रर झट यह प्रश्न उर्ट जाता है कि अगर श्रारा पा भी नाश जाता है ता मृ यु के बाद 'निर्वाण' मा मुक्ति रिक्सि तत्त्व की होती है। वर का ना बैस ही बौद्ध धर्म में महल न दिया गया श्रीरश्रात्मा का नाशवार मान लिया पिर ऐमा कौनसा तव अवशिष्ट हा निमकी मुन दान को सम्भावना की जाती है। इसका उत्तर यहा है कि नाद प्र म त्रिम तव का श्रारमा पे नाम से कहा है वह व तु है ना सस्कार श्रार कमा रे कारण एक दूसरे म भिन्नता पर देता है और बा निर्वाण' की प्राप्तिानी न होजाता है। म श्रावानानं हा याला सम्बार उस वस्तु म है बाहर कचराचर

और में ध्याय है, मा वाणिनित है, बा अपनी सूक्ष्म अवस्या का
म हार मस्कार और कमा,मे होने वाले घर का सार र निया
पद 1 ग्राम करता है। या नश्वर सार कमामार ल ीर मुदम
गाना है और नए-नए म परिपतन होता कता है।
नित्य सत्ता
म) मा शुद्ध हा या गि-हात्र मागनि हनि नानानि'
श्रयान-इम ममार म माना प्रकार के बटन मस्य नहीं है। नियम य
५ मापा में बन पाई से ही हैं। इन नित्य-सत्यों के प्रामार चलकर
हा मनुष्य मरे माग को भार बसा है। अज्ञानाकार का नाश
रन गनी जाति उहा से मिल सकता है और श्रीधन का वातविक
लदर या येव पलाभूत होमरता है। दशना का प्रामार मानले
। पाले मा अपोशनो मारूप बकर में से रहते हैं। तक भा
अप्रतिशत शन हानिकारक है।
--
निम्म दे। यह बात का ६ नम और भी मालूमता ६
fr"तु दशन के प्रभावशारिक नान प्राप्त करने का और का
साधनाता दिखाई नहीं देता। इस प्रकार 4 मिदाना और
प्रश्नों का चयू मारमा पुद्ध शिया में भ डालने का कारण
धना। उनके शिष्य बाद म दावों में 10 सुप्रथम बौद्ध धम
के दो सम्पाय हुए ना हीनयान और मायान पनाम से प्रसिद्ध
है। हीनयान माभी वैभामि पार सौत्रातिक नाम दा भेट हुए ।
वैसे ही महापान में योगाचार यो मायमिन नाम र दा वग हुए।
धर्म निकाय ।
- इश्वर,श ६.५३ प्रयाग पैदाशनों में नहीं किया f+-Home

स्थान पर या उस का पशय 'धम निकाय' शन मिलता है जिसे बुद्ध का शरीर भी कहते हैं। समता का बाघ भी इसी से हाता है। बौद्ध- धम प्रथों में धर्म निकाय या युद्ध का स्वरूप इसी प्रकार वर्णन किया है । बुद्धकाय की यह प्रकृति है कि यह दृश्यमान जगत् क नानात में स्वयमेव यतिवरूप धारण करता है, वह किसी विशेष अस्तित्व के बाहर स्थित नहीं रह सकता, बल्कि वह उस में निवास करके उसे जीवन प्रान करता है। बा हम दृश्यमान ससार के पार्या की निमित्तानों को सूक्ष्म दृष्टि से देवते हैं तो हमें सवत्र धर्मकाय के मित्राय और कुछ भी दखाई नहीं देता और इस तरह से हमें वस्तुओं की ममता या दिवाई देने लगती है। दृश्य जगत् की यथार्थता और नानास्व को मानन पे साथ २ नौद्ध वम को यह मान्यता है कि जितने भी पतार्थ हमें रिया देते है वे मच एक अतिम कारण से उत्पन्न होते हैं जो सर्वशक्तिमान् , सवश और मप्रिय है। यह अगत् उम कारण प्रात्मा अपवा बीवन का पत्त स्वरूप है। म क मदाव म भी सामारिक सभी पदार्थ परमतत्व * स्वभाव से युन हाने हैं। अतएव ईश्वर बा इस जगत् में नहीं है पर अमन है और नगर जो इश्वर में नहीं है वह मिया है। समार के सत्र पाय एक ही तव में लान हो जाते हैं और एक ही तत्व अनेक “पायों के रूप में कम करता है । अवएव अनेक एक में है और एक अनेक म है। ममार भार परमात्मा के विषय में शैद्धो का यही सिद्वान्त है। त्रिम प्रकार मार की अनेक तरगें और लहर लहराती और उमगित होती हुई वेवल एक मलके ही नित्य स्वरूप की ही विभिन्न मतिया है इमो प्रकार समार की मर मियाय भी भिन्न २ रूप से भामने पर भी एक ही तत्त्व की प्रतिबिम्बमात्र है। इस से विज्ञ पाठक भली प्रकार ममझ गए कांगे कि जैसे प्रतिपाद में अनामिन्य का सातत्व की सत्ता मानी है और समार सब प्रारमा उमी एक तत्व १ प्रकाश है और उस से अमिन है ठीक उसी प्रकार बौदधम पे उपयुक्त मिदात में भी नानात्व का सद्भाव एक ही तत्व से माना है वो नानात्व से भिन्न नहीं है। एकाग्र ध्यान की प्रधानता । बौद्ध धर्म की एक और विशेषता ध्यान देने योग्य है । इस में किनी वस्तु का जानने के लिये उम के लिये तक दशन या वादविषद का महत्व नहीं दिया जाता किन्नु अपने एका ध्यान से उसे समझने पर जार दिया जाता है । किमी अनुभव म न पाई हुई वस्तु पर उस * अस्तित्व या अच्छेपन १९ तक करना या उस विवाद का विषय बनाना या किसी तत्व पर देवल श्रद्धा के भाव रखना मर्वया मूग्वता मानी है। यदिईभर है ता उम के लिये प्रश्नोत्तर करना व्यय है कि मनुष्य का चये कि यह स्वय अपने अनुभव से बो ध्यान द्वारा प्राता है उसे समझे। यदि पारमाही परमात्मा है तो इस भाषा को थान से शायरूप में परिगात करना चाहये येवल श्रमुक बस्तु ऐसे ऐमी भदा या विश्वास करने से कोई लाभ नहीं। चौददशनों में अधिकतर बार यान पर ही दिया है। पौधम की मान्यता है कि धर्म का प्रय अनुभव करना है, प्रदशन करना नहीं। इस लिये धार्मिक पुरुषों को तत की जिज्ञासा करनी चाहिये, छाया को न । प्रकाश की गवेषणा करनी चाहिये, प्रतिबिम्ब की नहीं। श्रत वास्तविक तत्व की खोज और शान के लिये प्यान को ही प्रधानता देनी चाहिये विशद और वरकोनही ।

। १८२)
इस प्रकार श्रत में कथन यही कहना पयाम होगा कि बौद्धधम
म केवल एक हो मन तत्व माना है और समारय सम प्राणी उम
पक्षणिक स्त्ररूर है। जर वे मब उम तत्व के अनुकूल चलते हैं तो
म निन्य हैं और बर अहकार और अमान के द्वारा उम से विपरीत
चलते हैं तानाश का प्राप्त होने हैं।
इस प्रकार वैगिक 27 अर अड.इन तीना भारतीय महान्
धर्मो 7 इश्वर विषयक सहित विश्लपण से पाकी का भली प्रकार
पता चल गया होगा किसानों धमों में भर का क्या स्थान है और
तोना किस २ र म उम्र की सत्ता का स्वाकार घरते हैं।।

श्रमण-सस्कृति का स्वरूप
PDAEASEALAKAARIA
श्रमश साकृति भारत को श्रातप्राचीन मस्कृत है। जैन श्रर
बाद य दोन भमण सस्कृति की । भित्र २ भागएँ हैं। अमद
का प्रयाग मैन और चोर दानों २ मात्रा के लिय किया जाता है ।
या श्रमण-सस्कृति से जैन सस्कृति समझना चाहिय । 'वनमा समय
म ताथार धर्म य अनुयायिया र लय बा जैन श. पा प्रयाग
प्रचलित है यह विक्रम संवत १... लगभग प्रयाग मान
लगा। उसके पूर्व इस धर्म को श्रमण धम या निमय प्रवनर के
नाम स पुकारा जाता था। यादि त यपर भगवान् भूषभ देव स्वामी
स लेकर जा परपरागत प्रवनन चलाशाता है उसका मानने वाले
4 भगा-धमावलम्बी फेरते हैं। तीयर का ही दूसरा नाम जिन है
मिशानुपायो पत्तमान समय में जैन कहलात हैं।
सस्कृति की परिभाषा
मम् उपसर्ग पूर्दक है' धातु से। भूषण श्रय में सुटका
श्रागम पर तिन' प्रत्यय लगाने स सस्कृति शब्द मन आता है।
इम प्रकार सस्थति शब्द का अर्थ होता है भूषणभूत सम्यक् कृति !
शाचर सारे विश्व में मानव ही एक ऐमा प्राणी है जिसका सम्यक
और असम्यक क्म का विवस होता है और यही विवेक पशु समार
की अपेक्षा मानव को उरष्ट और उत्तम बनाता है। इसके अतिरिक्त,
प्रकृति का पण अथ समान के लिये मस्कार शुभ का माय
PAK
M
AM

भी परमावश्यक है। सस्कार का अर्थ है किसी वस्तु को शुद्ध करना या उमक पातरिक प्रकाश को प्रकर वरना । निस्सदेह साकारों की उत्पत्ति और सम्बध थाह्य जगत् स भी बहुत है किंतु वास्तव में सस्कारों का उद्देश्य मानसिक श्रार प्राध्यामिक होता है। अब हम किसी मनुष्य का कहते हैं कि यह मुमस्कत है ता हमारा अभिप्राय उसकी यह बात से नहीं हाता विन्तु इम देनते है कि उसका मन और श्रात्मा कितने उर उठे हुए हैं या विकसित हा चुके हैं। यही कारण है कि मुसस्कृत मनुष्य मन और श्रात्मा के उत्थान के कारण सदा सत्कर्मों की ओर हा प्रवृत्त होता है। इस प्रकार सरकृति मानव का श्रान्तारक गुण है और इसके विकास से ही मानव जाति के मारे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक यवधार सुचारू रूप से चल सकते है। सस्कृति ही मानव को मानवता की श्रोर ले जाती है। सस्कृति और सभ्यता। बहुत से सजन इन दानो शब्दों को एक ही अथ में प्रयुक्त करते हैं कि तु वास्तव में दोनों में महान् मेद है। सस्कृति मानव की श्रान्तरिक मस्तु है और सम्यता बाहर की। सस्कृति मानव को प्राध्या मिस्वाद की ओर ले बाती है और सम्यता प्रकृतिवाद की पार । अतएव यह श्रावश्यक नहीं कि जो लोग सभ्य हो वे सुसम्मत भी अवश्य होंगे। श्रद्धेय श्री स्वामी सत्यदेव परिव्राजकाचाय ने इसका बड़ा मुन्दर त्रितचन किया है* "जब हम यह कहते हैं कि जर्मन जाति सभ्य है, तो इसका देखो कल्याण का हिन्दू मस्कतिक प० २३४ ।

(१५) अर्थ यह है कि वह बानि अपने दैनिक जीवन म सुधरे हुए साधनों का ववहार परती है। अथात् शारीरिक श्रावश्यक्ताओं की पूति लिये उसके पास आधुनिक वैज्ञानिक मापन है और वह सदा रस बात कालये प्रयत्नशीन रहती है कि शरीर को अधिक से अधिक सुव और मजा मिले। अमरीकन लोग बड़े सम्य है, क्योंकि वे बिजली स खाना बनाते हैं और ट्रैक्टरा दाग खती करते हैं। उनके यहाँ इक्य ताग बैसी कोई मयारा नहीं, और उनकी भागदी के प्रत्यक चौथे व्यक्ति पास पनी मोटरकार है। ला जातिया श्राज वैज्ञानिक साधना का प्रयाग फरती हु अपने बीवन स्तर का ऊँचा उठाती चली जाती है, वे जातिया सभ्य कहलाती है अगरेजी भाषा में सभ्यता के लिये 'Civilization' शन का व्यवहार किया जाता है। इन नातियां की जीवन आवश्यकताए उत्तरोत्तर बरता बाती है और यन्ती रहेगी क्योंकि इन का मुह सम्यता की धार है। ये प्राकृतिक पदार्थों तथा भोगा के श्रदर ही मुग्व गन्ति की तलाश करती है, बिन काही अन्त ही नही है। इन बातियों पास सस्कृति अथात् 'Culturd' या 'तमद्दत' भी है किन्तु वह सभ्यता के पीछे २ उस की चेरी बार चलता है। ये सुन्दर चित्र बनाए गे, कलाकारा को उत्साहित करेंगे, कवियों को पुरस्कार देंगे और उत्कृष्ट कलायुक्त भवन बनाकर उस में निवास करेंगे, अपनी मोल चाल में होटलो तथा दुकानों में उन की भाषा मि और शिष्ट होगी। लकिन उन सब का मुख्य लक्ष्य होगा सभ्यता के खुदा धन' को प्रसन्न करना और दूम की जेबों में से पैसा निकालना। दूसरे शन्दों में यह सुसंस्कृत अवश्य है किन्तु अपनी सभ्यता का आगे बढाने लिये प्राकृतिक मुपों का मजा लूटने के लिये उन का सारा 2ी वृत्ति बहिमुबी होने ५ कारण वे सभी .

जातियां को धनी उमर में नेता और बच्चे मानकामा में पृथ्वी कराना। एका माग बनने लिये ग प्रकार के दौर-एक, बल प्राय काम में लगे सोय नरक सभीनहीने। श्रम प्रारये भरति की प्रोग, भिम पर मानव की मानवता पृगत से निभर है। राति २ प्रारमा की बग्नु, घाम उत्थान काचिद, प्रारिमा उत्तर की मोदी और प्रारमशन का माग सम्पता है अारा विद्या और सम्मृति है 1ि) यदि में इन दो शका लरण अमवी भाषण मटक करना हम उसे गप्रकार करेंग- (Croslization is an ovpreasjon of flesh, siulo culture is the manfestation of saul अपात् - सभ्यता शरीर के मनोविकारों की घोतक है, बकि संस्कृति प्रामा फे प्रत्युत्थान की शिका। सभ्यता का उत्थान मानव का प्रतिवा- को पार ल बाता है, जबकि सहमति मानव को अन्तली करके उम्र के साविक गुणों को प्रकट करती है।' श्रमण सस्कृति की विशेषताए । भ्रमण सस्मृति प्राणामात्र के प्रति समापने का उपदेश देती है। विक्ष के सब जीवों के प्रति दया रबमा और उनका कल्याण चाहना भमण साति का प्रधान उद्देश्य है। इसकी दया की मीमा देवल बम सार ये प्राणियो लिये ही सीमित नहीं अपितु स्थावर संसार + जारों के लिये भी प्रसारित है। प्रश्न सुरुष ३१ व समान दी m

(१७)
समार के सर बीशे के सुख दुखको सममना चाहिये, यह म देश
समय सस्कृति ने समार को दिया है। भम सम्वृति का सारा
कमकाएर समता के उपदेश से अलात है। जैन धम १ राय,
प्रापता, स्थूल ग्रार सून्म जितने भी श्रानार विचार है सब समता
के बादश की भार ही इगित करते हैं।
कर्म वियाक।
श्रमण मतिरे मिदान्त के अनुमार प्रत्येक श्राम्मा चाई
यह सार मुमार में पनापति की राह में हा, चारकीर, पतग या
पशुपती शरीर में और चाहे मानर की देश में हो तालिक
त्रि से प्रभान । बाटा या बड़ा श्राकार शरार का होमरता है
मामाकानीग्रामा म प्राणियों में समान है। बाबा मजा
शारीख और मानमिक पिस्ता दृष्टिगा रहता है वह वर्मनाक
है। बैसा-सा जीव उत्तम या अधम माधना रहता है सावमा
ही उसकी पन भोगना पड़ता है। हम अनुमार हो जाव भिन्न-भिन्न
अच्छी या धुरा योनियों में बम लेता रहता है। यम के अनुसार ही
उसे सुख या दुग्व मिलते हैं। जब वैसा २ कम करता है साहा
उसका सस्तार बनता है भार उम महार ये अनुमान
अतकरण का वृशिश्नती है ! उस वृनिक अनुसार हा अव की
शिन विषयों में प्रवृत्ति होता है। अतएर यदि म उत्यो
श्राण्यात्मिक पथ की ओर बोलगता है और यदि बम निपट हो
ता जीव पतन की मार बदता है। क्षुद्र मे क्षुद्र यानि में पड़ा हुधा
बीबीसमक्मों परिणाम स्वरूप मानद योनि में न ले सस्ता
और मानव योनि में पड़ा था बच नि मा य प्रभार से

(१८) भद्रतम यानि में घम लेता है। इस प्रकार कैन नीच यानि, मुख दुख चार बम, मरण - सपा प्रापार कर्म ही है। दिक सपा अन्य मदत से धर्मों में मापा नियंत्रण रेश्वरीर सतारे अधीन माना है किन्तु भमण सस्कृति उससे मदमत नहीं। बैन दर्शन में अनुसार लीव का माँ पापल भुगताने प लिये सिता सर जैसी मत्ता का यावश्यक्ता नहीं माफी गइ। अनादि धार अनन्त समार म बीच और अजीव नाम ये दा प्रधान पदार्थ हैं। जय चेतन ? और अजीव बड़। पीव मिद भार सहारी दा प्रकार का है। मिक्षा- वस्था जीव का गुर स्वरूप है। ससारी जव म धन से मधातुधा है। श्यमान पाय पुद्गल द्रव्य के भिन्न २ प है। चर चारमा अपने घान्तविक पाप का भूलवर पुरक द्रन्या की ओर प्रवृत्ति करता है और उन पर भानपश ग्राम तानाशारमा में राग भाव उत्पन्न होता है और उस सग से ही ट्रेप की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार राग से देपा शिकारी भावास धारमा साय कम पुराना का मयोग समय होता है और रागद्वेष रूप निकनाहर के कारण मर शाकर दीव के साथ निपट जाती है। राग पर प्रभाव में नर्मस्या नहीं मक्ता। त्रिम प्रकार मनपान से नशा स्वप ग्राणताहै। मी पकार कमों का भी जीव साय रोमा बध होता है क को म अनुरूप पल प्रदान की शक्ति उत्पन्न होता है। जब २ जिम २ एम का उदय होता है तब-तब वह अपने स्वभावानुमार की पन्त सम कर देता है। भौतिकवाद और आरम तत्त्र । प्रागमो मियात अनादिकाल मे मानव को प्राप्पा { १८६) Fमक उन्नति को भार प्रेरित करते पाए हैं। प्रकृतिवार पाभ तिवार भी सदा ही श्रेम धम के महर्षियों ने उपना की है। भोनिया को ही सर्व मा मानने वाला ग्रास का मानव भल ही नमापिया को उपेक्षा की दृष्टि से देने, या उपकी मुद्धि को प्रतिशत के क्षेत्र में अविकसित सममे किन्तु तात्त्विक दृष्टि से विचार करने पर उनकी ही दृनि विशाल अँचती है। यह ठीक है कि मानव आति ने परत हद तक प्रति पर प्रशसनीय विजय प्राप्त करली है। मानव धायुयाना पर श्राकाश में उड़ने लग गया है और मदानों की यात्रा घाम हा सुनम होगद। रेबिया यत्र के आविष्कार से बद घरठे ही मार समार ममानार मुन सकता है। पनडुरिया म बैठ कर यह समुद्र पेस्तल पर. बामकता है और युद्ध-बातों को तोड़ देता है। स्वाद नहात्रों द्वारा एटम बाद बरसा कर वह कुछ क्षण में प्रलय मचा सकता है तुइन सत्र और यय अनेक प्रकार में भौतिक श्राविकारीस पाधास्तव में ऊँचानही उठ पाया है। भौतिकवाद की इस उन्नति की प्रार बनने के परिणामस्वरूप ही विश्व को गत दो महायुद्धों की भीषणता का सामना करना पड़ा। और अब तीसरे महायुद्ध पे बाल र मँडराने नबंर धारद है। विश्व कमी पाने में भी शानि नहीं है। सपत्र प्रशान्ति, भय, क्लेह और अत्याचार पढ़ रहे हैं। यह सब होते हुए भी भौतिकवाद का दास श्राज का मान डी शान से यह कहना है कि यात्र का युग विज्ञान का युग है, विकास का युग है और प्रगति का युग है। अाज के युग में जो देश अधिक से अधिक मरया में पानक शस्त्र अत्र तैयार कर सके और शक्ति के बल से निबल देश को हड़प कर सके उसको बहुत उन्नत और सभ्य देश समझा जाता है। यह बात कही सस्प है यह पाठक स्वय विचार सकते है। अनु सस्पति ( १६.) फ महपियां का इस प्रकार ५ भातिक विकास निरर्थक प्रतीत हुए। या यात अभय है कि उनकी बुद्धि श्रापुनिक श्र विकागे तक पहुंच नहीं सकती थी। वास्तव में ये भौतियार ये परिणामों से भला भति परिचित इम कारण व उनकी पार जान ही नही देते थे। इसी मय की पुष्टि भारतय तथा अव सरपतिया १ मम मा अरविन्द बी ने इस प्रकारकीरे- - 'याध्यात्मिकता दी भारतीय मन की मुख्य भी है, अन तना को भारना उसकी समान भावना है। भारत प्रादिकाल में ही यह देख लिया और अपने तय युद्धि युग में क्या अपने बरते ए अशान के युग में भी उसने यह य तहट कभी न खाई कि जीवन को क्वल उनकी या परिस्थिति के प्रकाश में हो ठीक-ठीक नही देवा जासकता और न वह येवल उही की शक्ति से पूरी तरह बिनाया बामकता है । पद प्राकृतिक नियमों तथा शचि यो यी महासा र प्रति जागरूक था, उसे भातिक विगानो के महत्त का सूक्ष्म पाप था, वह माधारण जीवन की कलापों का सहटित करना जानता था। परन्तु उसा यह देखा कि भौतिस्ता को अग्नी पूरी सार्थकता तब तक नहीं मात होती, बब तक यह अतिमीनिक से ठीक सरधनही स्थापित कर लेती, उसने देखा कि समार की रिलता की प्यारया मनुष्य की वतमान परिभ पायो से नहीं की जामती और न मनुष्य की स्थूल Eि से समझी जासकती है, और यह कि विश्व के मूल श्रय शक्तियाँ भी हैं तथा सय मध्य पे भीतर भी कुछ श्रम शक्तिया हैं जि है वह साधारणतया नहीं जानता।' इस प्रकार सामग्य के मद्भाव में भी प्राचीन ग्राचार्य भौतिक * देखो क्याण का नि..श्र.प. २०७३ तों की उपक्षा करके पारिमा सचों की योर स्टन का मानय वाति को प्रेरणा करते या धात्मा कीसम्मति का गन्तिम लक्ष्य मान या। समार में चित् श्रोर अनिल या दूसरे शब्दों में चेतन और बड़दास दानों का उचित विनार हा कि चेतन का प्रभार है कि वह पदाथों का धग काम म माता हावा या दा कोरिया है-मुक्त थोर संसारी। ससारी को मैं भी कुछ मन बाले, और युद्ध मन हित प्रम और म्पायर ) है ! मुति का माधन धम तत्व है और मुनि में प्रति हाना थाना सत्व अधम है। जीव, अजीव, श्राम, ध सबरनिबरा और मोद य मात तब है। पुण्य और पारा मिना कर नोमा मान वाते हैं। वा वध का यह प्राधय है। काया, या! भार मन में पाभव सुम्ति दाना है। मियादशन, यविति, पमा पार फपाय के कारण बीव में प्रायः द द्वारा उसका पुल से योग राता है, यह साराध ही बन्ध है। श्रावस्त समार प्रवाह को दफने वाना नवर है। यही सवर मोक्ष का कारण है । सम्यक् दशन, मम्यक मान और सम्या चारित्र ये तीन मोक्ष माग है । जान और दरान ताशात्मा के अनादि अनन्त नित्र गुण हैं। मान प्राप्ति के बाद भी ये प्रात्मा के साथ ही रहत हैं! दशन और ज्ञान दोनों का नित्य सम्बन्ध है। चरित्र दोनों की पूर्णता को श्रार प्रवृत्ति कराता है। इन तीनों के प्रभाव से बब सब कर्मों का क्षय हा बाता है ता अात्मा मुक्त हा त्राता है। तब यात्मा सस्चिदानद स्वस्त बन जाता है। श्रमण सस्कृति सदा से मानव को इस सचितानन्द स्वरूप मोक्ष की और परा को ही प्रेरणा परतो अाई है। पञ्च महात्रत। अहिंसा, सत्य, अम्नेष, ब्रह्मचय, और अपरिग्रह. ये ( १९२ ) मस्कृति के पाच प्रधान महारत हैं । इन का विधान ता येन केन रूपेण भरत प्राय सभी धर्माचार्यों ने किया है पर श्रमण धम इन के पालन पर विशेष ही जोर देता है। इन पांचों के पालन करने से मानव मानवता की और कदम पटा सकता है। किसी भी बीव की मन, वचन और काया से हिंसा न करने का नाम हो अहिंसा है। हिसा श्रमण सस्कृति के प्राण है। इस का विस्तृत विवेचन 'अहिंसा परमा धम के प्रकरण में कर दिया है। सत्य। रान्य नामक दूमरे महानत पा अहिंसा से पनि सम्म ध है। सत्य पर चलता हुश्रा मानव ही पूर्णरूप से अहिंसा महावत का पालन कर सकता है । मन्य बोलने और सत्याचरण करने यादि सबारमा का उत्थान हाता है। सत्य से श्रात्मा को बल मिलता है और और असत्य स श्रात्मा पतन की ओर जाता है । सत्य बोलने वाला व्यक्ति सदा निश्शक भार निभय रहता है और इस विपरीत असत्यभाषी सदा पाल खुलने 7 डर स शक्ति श्रार सभय रहता है। असत्य की सदा अन्त में हार होती है और सत्य की बीत होता है। 'सत्यमेव जयते ना नृतम् इस महावाक्य को कभी नहीं भूलना चाहिये। बिस समास, धम या बाति के लोग सत्य की उपेक्षा करते हैं वह समाज, धम या जाति कभी भी विवेक और नैतिकता ऊँचे स्तर क्षक नही एएच सकती। अतएव सामाजिक जीवन को ऊँचा बनाने के लिये सत्यवादिता परमावश्यक है। अस्तेय । अस्तेय श्रथात् चारी न करना। बावस्तु अपनी नहीं उस पर अधिकार नहीं करना चाहिये । सामाजिक व्यवस्था का सुचारू रूप से चलाने के लिये इस तीसरे महाप्रत का पालन भी मुसस्कृत ससार ये नये परमावश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति का वह क्त य है कि यह दूसरे र अधिकारों का आदर करे और उनको अपने अधिकारों के समान उमझे बलपूर्वक हाका दालकर या छुप कर चोरी करके यदे कोर पनि दूसरे व माल को छीने तो इससे सामाजिक व्यवस्था भंग होती है और श्रास्मा का पतन होता है। माअक्ल भी जो सबल राष्ट्र निवलों पर श्रारमण कर उनको उनकी बामसिद्ध स्वत प्रता से बञ्चित करते हैं वे भी हाकुश्ना की ही कोटि में आते हैं। सबन निबल के अधिकारी को घाने यह अनधिकार चेष्टा है। श्रत जीवन के श्राश माग की और बदने के लिये इसका त्याग ही कल्याणकारी है। अस्तेय सामाजिक जीवन की सुव्यवस्था के लिये मूल शिक्षा है। ब्रह्मचर्य । है मनुष्य में अनेक प्रकार की वासनाओं और लालसाओं का हाना स्वाभाविक है। विवेक द्वारा उन वासनानों और लालसानों पर नियन्त्रण रम्बना ही ब्रह्मचर्य है। बा व्यक्ति ऐसा नियन्त्रण नहीं रखता है वह विषयों के गड्ढे में ऐसा गिरता है कि फिर उसका उत्थान हाना बड़ा कटिन हाना है। विषयों का रसास्वादन बाहर से मधुर पिन्न परिणाम में दुखरर है। इनका अधिक से अधिक उपभोग करने पर भी क्षुधा शात नही होती कि उत्तरातर बरती है। भाग में जिस प्रकार घृत डानने से वह अधिकाधिक प्रचण्ड ही होती है टीक इसी प्रकार विषयों के उपभोग से उत्तरात्तर तृष्णा बढ़ती जाती है घटती नहीं। अतएव विवेको मनुष्य विश्या के दुखावह परिणाम को

{ १९४)
सला ध्यान म रम्बत हुए उनम मने नर्भा पार उनका याग करना !
भैठ समझते हैं। कुत्ते का बच सम्मा ! का टुकड़ा मिल जाता है
बह उमको पद चाव मे रख चराता है और उम हाय सीमा भाग
य भने से उमा अपा सही सून निकनो हाना है। यह
कुता यह समभरकन डास निकल रहा उमश्रार प्रतिक
माता जाता है। ठीक यही दरा शास्त्रकारों ने विषय लपट ५८पो
की भी बनाई है। विपया क भोग से नाश ता उनका अपना हा
दाता है किन्तु वे समझते हैं कि रस विषयों से मिल रहा विषय
का पान करने में किस प्रकार मनुष्य उत्तराचर पतन का भार बना
है इसका बड़ा ही मुन्दर चित्रण गाता में खींचा है
ध्यायनो यिषयान् पुम सगस्तपनायत ।
सगात्सजायते काम काम लोधोऽभिजायत ।
घोघाट्भवति समोह ममोहाल्मृतिविभ्रम ।
स्मृनिध्र शाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
(गीता २।६२६३)
अपात्-विषयो का निर तर ध्यान करन से मनुष्य का उनमें
लगार हा जाता है। लगाव अथात् सग से काम की उरति हाता।
काम सोध पैदा दाता है, प्रोध से भून हाती है, भूल स स्मृति
चिगहता है, स्मृति के बिगड़ो स बुद्धि का नाश और बुद्धि का नारा
हाने समष्य का सवनाश हाजाता है।
गांता इन दा साफ रत्नों में मनोविज्ञान का कितना सुदर
ओर सारपण मित्र वाचा है इसकी प्रशमा किए बनती है।

अपरिग्रह ।
ममार व सुग्वा का अपनो का मे स्याग कर दना, तृष्णा
सविरलि, और शने वानुमान मह का माE TRE70 अपरमद
कहलाता है। मनुष्य जितना ही अधिक वस्तुओं का परिग्रह करता
जानाद, उतना हा उमका उनके प्रति माह बना बाता है और
उममा का परिणाम मा अशान्ति प्रार दुखाता है। अतएव
जितना ही कम हो उतना हो मनु य मिमित, सुवो और प्रसन्न
२.ता है। मास्तिक और गाधीवाली मुजकारी होता है। यदि
समार ने अपरिग्राम व को ममका होता तो श्राज जो जिपतियों
श्रार माम्यवाया में मनुष चल रहा है और भयानक रनपात हा
रहा है. यह कभी न ता । श्रम सस्कृति के अनह या गरे
अनुमार यदि समार के लोग मा जीवन व्यतीत करने और अपने
भारयों के शाप सपना दवा न करन ता यह स्वाभाविक या कि
वह पूजा बेवल प्रल्प सत्या माप पाम न रहर बन साधारण
तक लीहती। ऐसी स्थिति में साम्यवा' जैम सिद्धान्त का नमी
नदा पता। अपरिम १ मा व का न समभन के कारण ही पात्र
मानव दानन धन हा है। चार बापारी का बाजार कम है। परिवह
के उपामक लोभी और लालभी लोगांव कारण श्रार विश्व म
श्रमत्य परिवार भनक भयानक काय भार म पिस रह है। अस्पा
वश्य बंधन क साधन भी दिन प्रतिदिन टुलभ इ रह हैं और जान
भारत बना रहा है। किमी न पाम इतना है कि यह यमन
में लगता है और अधिक लोगों के पास इतना भी नव
सामा यरूप से बीवन निवां भी काम मन और मानव
इस प्रकार का महान विषमता ही लह अर पका कारण है
.

यदि सम्पन राष्ट्र और लोग पम्ग्रिह के माह का त्याग दें तो समार की सब सामाजिक अरिलता दूर हाजाएँ और कठिन समस्याएँ मुनक नाएँ । यही कारण है कि श्रमण संस्कृति के महर्षि अनादि काल से विश्व का अपरिग्रह महावत का पालन करने का स देश देने श्राए हैं। तप की प्रधानता। उपर्युक्त पाच महारत ही नैतिक श्राचरण के श्रधार है। इनको कायरूप में परिणत करने के लिये तरचया की यावश्यक्ता है। तप हा मानव को धर्म की पार प्रवृत्त कराता है। तप दो प्रकार का मना है ---(१) बाह्य और (२) श्राभ्य तर । बाह्य में (१) अनशन, ( (२) अवमो रिका, (३) भिक्षाचया (४) रम परित्याग, (५) काय क्लेश भार (६) लानता सम्मिलित हैं। ग्राभ्य तर तर म (१) प्राय श्विन (२) विनय, १३) वैया य (v) स्वाध्याय, (५) ध्यान और (६) यु मग । तरचया स यात्मशुद्धि होती है और श्रत करण के क्लेश की निवृत्ति होती है। इसके लिये सहनशीलता की नितात श्रावश्याता है। भगवान महावार स्वामान तपश्चया क समय अनेक प्रकार के कायालशा का अविचलित भाव से सहन किया। जन वे अनाय देशा म विहार कर रहे थे तो अज्ञानी मनु या ने उन पर कुत्ते छाड़ रितु उनकी कुछ भी परवाह न करते हुए वे अपने ध्यान में अटल रहे। श्रमग मुमति में प्रात्मशुद्धि को जीवन का लक्ष्य माना है श्रोर इसी कारण से तप क्या की प्रधानता है। जैन धर्म ग्रन्य ऐसे अनेक उदाहरण से भरे पड़ है जिनसे पता चलता है कि साधारण

(१७)
गायों की तो बात ही का बहे-पड़े पत्ता सा भी ग्रामशुदि
के लिये पोरतास्या करत थे। महाकवि भी मीरन दाबी लिखते १..
"मुनिर के प्रागे विनय से सिर मुका कर चरवर्ती अजितसेन
ने सक्षेप में कहा कि मैं श्रारक ग्राभम में ही बाो वाला था। पर
मेरे पुण्यों के कारण पार यहाँ प्रागए । बप मनुष्य दुगति में गिरने
लगताहेतर सेना प्रादिभव और पापा कोई भी प्रापमानही
दे मरते। यह जानकर मेरा बी चाहता है कि में श्रापकी ही सवा में
रह। घरायक, इसलिये प्रसन्न कर श्राप मुझे अपनी दीशश
दाजिये। स्मोकि पापा पोही मी भा पा शुभ करके अशुभ का
मिरा देती है। मजनों का अनुमह क्या नहीं कर सकता ! इस प्रकार
राजानबर अरने हदय की बात कदी तय समय राजा के माहम की
परावा करके इरादे से मुनिका ३ हैं उनका इण्यास परने बान
वचन कहना शुरू किया। राजन्, पटिन ररीर पाल मुभ गम
भाउ जन निसटुकर तरको श्राव नहीं Bह सकने उमादत
पराग कुकुम लेप से लालित मुरुमार लोग फेस पर सकने । इन
दयालु, धम को ही धन समझने वाले श्रार अपने वैभव को
में लगाने वाले हो। तुम्हारा चरित्र ऐमा नहीं कर
उसकी निन्दा करें। तुम रहस्य हो, तब भी तुम्हारा प्रार
के ही समान है। इस लिये राशन, पार दयालु, माना
बने रहर युग भर इस पृथ्वी का सामन करा Ari
को पालो और उपाग! दोनों को उबारने का
नहीं है। मुनिक इस प्रकार कहने पर हदसम्म ३ मानक
मार्ग में दोकर फिर इस प्रकार अपने
दिन प्रारम्भ
*देखो चन्द्रप्रभ चरित्र हि... १११, ११॥
नाव
+

किया-है देश, मैं परम पूजनीय बो यार है उनकी इमामा र विषय में फिर तो कुछ कहना चाहता हू, उमका कारण जम मरण दुग्नों का जाना है। इन दीया को इष्टानिष्ट के वियोग सयाग स यदि दुष्ट पादाय नहंता तात्रिोद्रचन्द्र द्वारा धारण किये इस सत्य श्रार महापरिन महानता को कौन प्रण करता ! यदि गृहस्थ रहने पर भी विचित्र दुख दो पाला अम-मरण का चम मिट जाता है तारि श्राप जैस विवकी मापों का तप में परिभम करना गृपा हो ठहरा। जिन-दीक्षा में रिनका मन लगाया है उन उदार चरिभ राजा के ये वन मुमार मुनवर को यह निधय होगया किरहीने साच विचार कर यही द निधय कर लिया है। तहाने राजा की प्राथना का स्वीकार किया। परिवार य ब धन से मु7 राम मुनि की अनुमति पाकर अपने पुत्र को यह निष्क० गप दे दिया। उसके बाद उधान परिगह छोड़ कर सयम का बलकार रूप तर ग्रहण कर लिया। घार ता करते हुए मयय राजा पुरबाहर पहासन से स्थित रहकर हेमन्त की रात बिताने लगे। धैर्य-वत्रधारी रात्रा हा पाले और दण्डी हवा के वेग का सहते थे। भयानक सेंकदा उल्कापाता से दुस्मा और धार धन-धरा से अधिकार फैला देन वाली पपाऋतु की रानोम क्षमताशाली घे पड़ों की बढ़ में येटे हुए मूसलाधार पानी सहते थे। वे गर्मियों में सूर्य के सामने खड़े रहते थे। तपा हुई सूई के समान शरीर में नुमने वाली सूर्य की किरणों के लगने पर भी वे ध्यान से नहीं हिंगे 1 कत्तव्यकाम कितना ही कठिन क्यों न हो उसे करने के लिये सजन लाग हद रहते हैं।"

( १६९) म सामाजिक जीवन । वैदिक धर्म के सामाजिक जीवन में चार प्राधमां का विधान है । जैसे --ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा। पने गृहस्थ प्रभयाश्वतार पृथगाथमा ॥ मनु०६८० श्रयात्-ब्रह्मचारी, गृहस्थ, पानमस्थ, तथा सयासी ये चारों थाभम अलग २ होने पर भी गृहस्थाश्रम मे ही आयमान होते हैं। ठीक इसी प्रकार कामत बैन धर्मग्रन्था में भी मिलता है। प्रहाचारी गृहस्थश्च वानमयोऽय भितुझ । इत्याश्रमास्तु जनानामुत्तरोत्तर शुद्धिन ।। जिनसन-श्रादि पुराण । अर्थात्-अमचारी, गृहस्थ, वानप्रस्य और भिक्षुक ये जैनियों चार श्राश्रम उत्तरात्तर शुद्धि के लिये हैं। यहा यह बात ध्यान म रखने योग्य है कि बिस पकार वैदिक धम में पाश्रम व्यवस्था पर बार दिया है और कायरूप में उसका पालन भी दिया गया है इस प्रकार जैन धम में नहीं । नागमों ने चार तीयों के प्राचार विचार पर ही और दिया है। जैन सस्कृति ये थागम तथा अन्य धम मय तीर्थ विषयक क्मकाण्ड से ही भरे हुए हैं। श्रमण सस्कृति म कठिन तपस्या के लिये चतुर्षाधम तक मतीदा करने की श्नावश्यकता न चिन्नु बीव का सरकार यदि उत्कृष्ट है तो किसी अवरया में भी यह तपश्चर्या का अधिकारी है। मेरे विचार से बैन पुराणों में बो श्राश्रम यवस्या का विधान है यह बहुत पीछे का है और यह अन सस्कृति की अपनी चीज नहीं किंतु पाही नमस्कृति पर प्रभाव है। A

गृहस्थ धर्म।
भ्रमणधर्म निवृत्ति और तपप्रधान धम है इस कारण यह न
समझना चाहिये व इसमें गृहस्थमाग की उपवा की गई है और उसका
इसमें प्रादर नही है। वैदिक सस्कृति के समान घमण सस्कृति में भी
गृहस्थाश्रम का धम की श्राधार शिला माना है। ग्रहस्थ क बिना धम
की प्रवृत्ति और प्रगति नहीं हो सकता। केवल सिद्धात विधान मात्र
से प्रारमशुदि प्रधान ता की क्रिया नहीं हो सकती और नहीं क्वल
आगम ज्ञान के बोधस श्राचार विचार का पालन ही हो सकता
निम्तु सब प्रकार की धार्मिक रियाद्या के लिये पाप साधनों की
श्रावश्यक्ता रहती है जिनका एहस्थ पूरा करता है। यही कारण है
कि पर तर बेन घमग्रयों में 'गृहस्था धम हेतव' और 'भावका
मूल कारणम्' जैसे पाय मिलते हैं। इसी सत्य की पुष्टि वैदिक महर्षि
भी करत है-
सर्वपामपि चेतेपा वेदस्मृति विधान ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठ स त्रीनेतान् यिति हि ।।
मनु०६८९
श्रथात्-समस्त श्राश्रमों में वेद और स्मृति की बताई हुई
विधि के अनुसार चलने वाला गृहस्य भेष्ठ माना जाता है। क्योंकि
गृहस्प ही इन तीनों प्राश्रमों की रक्षा करता है।
जैन धर्मग्रन्थों में गृहस्थ के लिये दो तरह के धमों का विधान
मिलता है। वे है लौकिक और पारलौकिक बसे
द्वौ हि धर्मा गृहस्थाना लौकिक पारलौकिक ।
लोकाश्रयो भवेदाद्य पर स्यादागमात्रय ॥
।

भगवभिन सेनाचाय ने लिखा है कि जब युग के प्रारम्भ में भगवान् ऋषभदेव ने विवाह के लिये कुछ अनिच्या माईदी दो उनके पिता नाभि राजा ने उनको समझाते हुए ये वचन को- सामादिपूरुप दृष्टया लोकोप्येव प्रवर्दनम् । प्रजासततिरेव हि नोच्छेस्त्वति विशावर ॥ ६२॥ पजासतत्यविच्छेदै उनुन धर्मसततिः । । २०१) सर्व यहि नाना प्रमाण लौरिको लिधि । या सम्यक्त्व हानिन यत्र न त नपणम् ।। (यशस्तिना) प्रधात्-गृहस्थों के लिये लौकिक और पारलौकिक दो प्रकार धों का विधान है। लौकिक धर्म लोकाभित अपात्-सोक्किजनों का देशकालानुसारिणी प्रवृति के अधीन और पारलौकिक यागमाभित अथवा शासप्रणीत शास्रोरे अधीन पतलाया है ।* सांसारिक म्यवहारोते लिये आगम फा पाश्रय लेना भी बहुत आवश्यक नहीं सममा ग्या और साथ २ ३० भी प्रतिगदन किया है कि जैनियो प लिये ये सम्पूर्ण लाकि विधियां प्रमाण है जिनसे उनकी धार्मिक'मदा में कार बार न पड़ती हो और न व्रतों में हर कोई दूपण लगता था। इस प्रकार श्रमण-सस्कृति में गृहस्थाश्रम का स्थान ब व ऊँचा और आदरणीय है। विवाह । विवाह करना गृहस्य का परम कृर्तव्य है । प्रादिपुराण में महता मार्गवर्तीय प्रजा सुप्रजमो झम् ॥ ११ ॥ तत कलनमोष्टं परिणेतु मन ।। *विवाह समुद्देश्य पृ३२॥ ...Smtammu.

( २०२॥
यात्-श्रादि पुरुष श्रापको देवकर लाग भी आपका ही
अनुकरण करेंगे। प्रजाजन यड़ा के दिखाए आग पर ही चला करते
है। श्रतएव श्राप पत्नी के परिणयन की सायना को स्वीकार कर )
हेमा करने स सन्तानासति की सला निरतर चलती रहमा और
उस चलने से धम-सतति को वृद्धि होगा।
वण यवस्था के प्रकरण में यह बताया ब चुका है कि मूरात '
श्रमण सस्कृति में पण व्यवस्था कम से ही रही है कितु वैदिक संस्कृति
के साथ निरन्तर चिरकालीन सम्पक से यह उसके प्रभाव स मुन नहीं
रह सका। नाचे दिया उदाहरण इस सत्य की पुष्टि करता है। वैदिक
सस्कृति के अनुसार
द्रव भार्या शूद्रस्य सा च सा च विश स्मृते ।
तेच स्माचंच राज्ञश्च ताश्च स चाप्रज मन ।।
मनुस्मृति ११३
अथात्-शुदा ही शद को स्त्री हो सकती है दूसरी नहीं। वैश्य
को वैश्य वण वाली और और शुदा क्षत्रिय को क्षत्रिया, धेश्या
तथा शू । ब्राह्मणों को चार वर्षों की के यात्रओं स विवाद करने क
अधिकार है।
ठीक ऐसा ही म तय बैन पुराणों में भी मिलता है। जैसे
शूद्रा शूद्रण योढव्या नान्या साता च नंगमः ।
यहेत्स्वा तेच राजन्य म्या द्विजम्मा कचिच्चता ॥
ठीक ऊपर जैसा ही अयं इसका भी है। फममूनक श्रमण सस्था
पर य६ बममूलक सस्कृति का ही असर है और यह श्रसर बहु
श्रादि पुराण।
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(२०)
प्राचीनी किन्नु यम छ का है। भमण सति वास्तव में कम
मुनहाने के कारण विवाह क लिए विगति का कोई प्रमिक प
उगन यानी विवाद में बाति धन की प्रथा पत पाछ की
है। रात्रों में श्रमवा यावे या उदार मिलते हैं। बहे
"तिम्ति माकप भीनों और ग्लेन्छौ यादि तक की कन्यायो
म निरसमोन विवाद पर लेन । एक ही गात्र और एक ही परिवार
में भी विवाद हो सकता था। श्री मिनाय बना पसुदेव श्रीन
अपने चनापाद भाई उग्रसेन की लहकी देवकी से रिवाद पर निया
या* मामा और शी की लड़की से विवाह का श्राम प्रचलित
पा दाक्षिणात्य ब्राणां में हम प्रकार में विराज भी
प्रनलित है। पर इस प्रसार विवाद उस समय भी मादेशिक
नही । इसी कारण मापदेव हि ने लिया है - दशपुलापेक्षो
मानुनसम्धघ
विवागे में पथमे TIR म्या प्रिया का माना सता था।
श्रादि पुराण में विवाद विधान ये प्रकरण में सयका विवाद कोही
सवन यताया है।
-मनावनोस्ति मार्गोऽयतामृतिपु भापित ।
विवाहविधिभेदपु परिष्टो दिये ।।
अपात्-विवाह के पितो भेद हैं उनमें स्वयार ही मरसे
प्रेप और श्रुतिस्मृतियों में इनकी महिमा है। अनादिकाल से
विवाद का यही उत्तम माग चला पाता है।
स्वयंवर में गई कया अपनी पति अमुमार पर का
चुनती है - या वृणीने चित पयरिंगता यरम् ।
* विवाह ममुद्देश्य पृ० १८॥

! ( २०४) कुनीनमकुनी वा मोनास्ति स्वयपरे ।।* अर्थात्-स्वयपर में गई हुई क्या कुलीन और अकुलीन का विचार न करके अपनी इच्छा के अनुसार घर को चुनता है । जैनकाल में बहु विषाह की प्रथा अवश्य प्रचलित थी कि परस्त्री की थोर दृष्टि डालना पत पुरा सममा जाता था! लोग अपनी २ प्रियतमायों से ही सन्तुष्ट रहते थे। श्रमण सस्कृति के प्रवर्तक । श्रमण सस्कृति रे श्रादि प्रवनक कौन थे, वे क्व हए और किन किन परिस्थितियों में उदोने इसकी नींव रवी इसका इतिहास मे कुछ पता नहीं चलता। हा उपल 'भागमयो' या अय साहित्य से यह स्प है कि नामिपुत्र श्रादितीयार भगवान् नपभोव स्वामी श्रमण सराति के महान् समथक थे। उ होने इमका सवत्र प्रचार किया। उहोंने ही लोगों के लिये रहन-सहन के नियमा का बनाया और उन्हें पालन करने का दग सिन्याया। बङ्गली जानवर। से प्रात्म-जाण करने के लिये पहोंने लोगों का शत्र बनाना सिखाया और स्वय तन्नधार हाथ में लेकर उही लोगों को उगका प्रयोग परना मित्राया । ममूलक वण यवस्था भी उसने ही नाधी। श्रादिगज प्रापभदेव ने ही यम को छ भागों में घोटा--(1) युद्ध, (२) कृषि, (३) माहित्य, (५) शिल्प, (५) वा राज्य और (६) व्यवसाय । न्यायपूर्वक प्रापालन रे महत्त्व को भी उदो ही तत्कालीन रात्राओं ममझाया। उहोने तत्कालीन लोगों को लिखना पदना मिवाया और पि के योग्य लोगों को कृषि करने का टग बताया। • त्रिनाम हरिवश पुराण ।

। २०५ ) अनेक प्रकार की शिकनायो का अाविष्कार भी उहो । किया। सामाविक मुव्यवस्था के लिये उ हाने अनेक नियम बनाये श्रीर अनुशासन सपा मयादा में रहकर उनका पालन करना लागों को मिसाया। अब उन्होंने अनुभव किया कि उनका बड़ा पुत्र राज्यभार सभालने में और प्रचारालने में पूजा से ममय होगया है ता घे गय भार उस को माप कर और स्वयं सच कुछ स्याग पर चले गये और तपश्चर्या करने लगे। इस प्रकार अनादि परपरा से चली श्राई श्रमण सस्कृत के निर्माग म धादितीर्थकर श्री ऋषभ देव स्वामी का कितना हाय है यह पाठक स्वय अनुमान कर सकते हैं । श्रमण सस्कृति की महानता। *स प्रकार थमण भस्कृति का वाह्य रूप लोग का मन श्रामपण करने वाला न नग किम का श्रा तरिक स्वमा : मात काया तारक स्वरूप के महत्व का कारण यही दिई अाधारशिला प्राध्यामिकता है। मसार की श्रय मम्मतिबाद- डम्बर, टीर राप भौतिस्वाद राजनैतिक चातुय प्रार* विश्वास करती है कि श्रमण सस्कृति बाह्यरूप में मानाaar और अहिंसा में विश्वास करती है। श्रमण माकृति Fre- मिता , तपस्या, त्याग, मत्य और शिव प्रेम पर 119 श्री राजीविजोनन बी अमिती जो भारदद rat लिखित पक्तिया लिखी है ये श्रमण सस्कृति, होती है-. के सभी प्राणियों छग टाटर प्रेम करणा, उपकार, क्षमा, अमिा ससार * हि स अ ४५० ( २०६) रग्बना, उन के लिये अपने व्यक्तिगत जीवन के स्वाय, मुप्पोपभोग की लालसा यश और प्रतिष्टा की 1 का परित्याग करना , दूसरे के विनाश में अपना निमाण देवो की लिप्मा समाम घरना, धुपा, विद्वेष, श्रमहिष्णुता और मता धता को अपने बीवन में न श्राने देना तथा सामाजिक सावन में भी उसे नमो देना इन्द्रियों को सयम में कसकर प्रकरण की पवित्रता की ओर वरना मत्वशुद्धि के लिये उपयुक्त जीवन प्रणालीका निमाण करना और इनमें से कार उठते हुए निकाय भाव से कम करने को क्षमता प्राप्त करना यही भारतीय समति है। मनुष्य की पशुता मिरार उमे माना बनाना और फिर ईरसको श्रोर उमे पुरस्मर काना भारत य सस्कतिका कार्य है।" इस प्रकार प्राधाक्षिक, राजनैतिक और सामाजिक श्रा मभी बोनो क्षेत्रों से नमस्कृति विश्रको अयमस्कृतिया में बहुतना स्थान रखती है। पान मतों व सक्षिप्त विषण से ही पाठक भनी भाँति समझ गए होगे कि प्रमण सस्कृति में माय जीवन का अधा गतिसरी पार ले जाने वाले हिसा, असत्य, अनधिकार चेण असयम और णा का क्तिना विगध किया गया है। संसार में पापक रूपसे ली हुई विषमता, सधा, पलह और प्रशान्त का मिराने के लिये मए सस्कृति न विश्व सामो अहिमा सत्य समानत , सयम और याग के अादशी को रक्खा है । इस श्रादशी पर चलने स ही विश्व में शाति का साम्राज्य स्थापित हो सकता है और मानव जाति यात्म कल्याण की योर बढ़ सकता है।

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( २०६ ) रवना, उन के लिये अपने पतिगत जीवन के स्वाथ, मुसोपभोग की लालसा , यश और प्रतिष्टा की चाह का परित्याग करना , दूसरे के विनाश में अपना निमारा देखने की लिप्मा समात करना, घृणा, विद्वेष, अहिष्णुता और मता घता को अपने जीवन में न श्राने देना तथा सामाजिक जीवन में भी उसे न लो देना इन्द्रियों को सयम म कसकर त फरण की पवित्रता की ओर पटना मत्वशुद्धि के लिये हो उपयुक्त जीवन प्रणालीका निर्माण करना और दूदो स ऊपर उठते हुए निष्काम भाव से कम करने को क्षमता प्राप्त करना या भारतीय साति है। मनुष्य की पशुता । मिटाकर उसे माना बनाना और पिक ईरसका भार उमे पुरसर क ना भारत य संस्कृतिका काय है।" इस प्रकार प्राकालिक, राजनैतिक और सामाजिक श्रादि सभी नोक्नक क्षेत्र से जनपनि विश्वको अयमसतिया में बहुत ऊंचा स्थान रखती है। पान महावतों के सक्षिप्त विवरण सही पाठक मली भाँति ममझ गा हागे कि भ्रमण सस्कृति में मानव जीवन का अधो गतिकी बार लेबाने वाले हिमा, असत्य, अनधिकार चे] असयम और कृष्णा का क्तिना विरोध किया गया है। संसार में व्यापक रूपसे ली हुई विषमता, सपा, कलह और शाम को मियनवे लिये भ्रमण सस्कृति र विश्व सामा अहिंसा, सत्य समानत , सयम श्रीर याग 4 अाशों को रखा है। इन वादशी पर चलने से ही विश्व में शाति का मामाज्य स्थापित हा सकता है और मानव जाति प्रात्म कल्याण की योर पद सकता है।

Shraman Sanskriti Ki Rooprekha

Author
Shastri,purushotam Chandra
Title
Shraman Sanskriti Ki Rooprekha
File name
Shraman Sanskriti Ki Rooprekha
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/03
Publisher
Ambala,jain Press Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551904
Barcode
4990010032599.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Dl8q7TBxOAH
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