Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jeet Kalpe Shutram
Front matter
सद्गत मोदी श्रीयुत प्रेमचंद दोलतराम स्मारक-ग्रन्यांक १ अमदाबाद निवासी सद्गत श्रारक श्रीयुत प्रेमचद दोलतराम मोदीना पुण्यस्मरणार्थ, तेमना स्नेही रा. व. श्रीगिरधरलाल उत्तमराम पारेख, की ए, एलएल वी , (पब्लिकपोसीक्युटर-अमदानाद) एमणे अर्पण करेला द्रव्यमाथी आ ग्रन्थ प्रकाशित करनामा आव्यो छे, जैन साहित्य संशोधक ग्रन्थमाला जीतकल्प-सूत्र संपादक- मुनि जिन वि
---
---
--
-
।
अस्य जीतकल्पसूत्रस्य प्रथमप्रकाशनकर्तृभ्यः
जर्मनि-विषयवास्तव्य-अध्यापक
श्री अस्त लॉयमान
(Ernst Leumann)
नामधेय-पण्डितप्रवरेभ्यः
समर्पितमिदं अन्थरतम्
सम्पादकेन
जैन साहित्य संशोधक प्रन्थमाला प्रन्याङ्क ७. श्रीजिनभद्रगणि-क्षमाश्रमण-विरचितं जीतकल्प-सूत्रम् [श्रीचन्द्रसूरिसन्हध-विपमपदव्याख्याविभूषित- श्रीसिद्धसेनगणिकृत- वृहचूर्णिसमन्वितम्] संशोधक तथा संपादक मुनि जिन विजय [आचार्य-गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर-अमदावाद] प्रकाशक जैन साहित्य संशोधक समिति (अमदाबाद) वि...] [वि.स. १९४२ [मूल्यं सप्यक-त्रयम् ]
1
अस्य जीतकल्पसूत्रस्य प्रथमप्रकाशनकर्तृभ्यः
जर्मनि-विषयवास्तव्य-अध्यापक
श्री अस्त लॉयमान
(Ernst Leumann)
नामधेय-पण्डितप्रवरेभ्यः
समर्पितमिदं अन्यरत्नम्
सम्पादकेन
५
.
,
जैन साहित्य संशोधक प्रन्थमाला मन्याङ्क ७ श्रीजिनभद्रगणि-क्षमाश्रमण-विरचितं जीतकल्प-सूत्रम् [श्रीचन्द्रसूरिसन्हब्ध-विषमपदव्याख्याविभूषित- श्री सिद्धसेनगणि कृत- वृहचूर्णिसमन्वितम्] संशोधक तथा संपादक मुनि जिन विजय [आचार्य-गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर-अमदावाद] प्रकाशक जैन साहित्य संशोधक समिति । (अमदाबाद) सि.न. १९२५ [R..९४१ [मूल्य जयक-त्रयम् ]
Printed by Ramohandra Yosa Shedge, at tho Nirnaya Sagar Pross,
26-28, Kolbbat Lane, Bombay,
Published by
Muni Jins Vijayajı,
(Jaina Sibitya Sams'odhala Samiti)
AHMEDABAD
संपादकीय प्रस्तावना ५ आधारभूत प्रतिओनो परिचय जीतकल्पसूत्रनी प्रस्तुत आवृत्ति नीचे जणावेली हस्तलिखित प्रतिओना आधारे तैयार करवामा आवी छ'- [१] जीतकल्पसूत्र मूलपाठ (A) ताडपत्र ऊपर लखेली वृहचूर्णिसाथैनी,पूनाना भाडारकर ओरिएन्टलरीसर्च इन्स्टीट्युटमांना राजकीय ग्रन्थ संग्रहनी। (B) कागळ ऊपर लखेली केवळ मूलमात्रनी ३ पानानी, गूजरातपुरातत्त्वमन्दिरमा (अमदाबाद) ना सग्रहनी। (C) तिलकाचार्यकृत वृतिसमेतनी श्रीयुत के. प्रे मोदी मारफत आवेली । (D) जर्मन विद्वान् डॉ अर्नस्त लॉयमान संपादित अने Sitzungsberichte der Kongich Preussischen Akademle der Wissenschaften, Berlin, 1892 मा रोमना- क्षरमा मुद्रित । [२] सिद्धसेनसूरिकृत धृवृर्णि (A) पूनाना भाडारकर ओरिएन्टल रीसर्च इन्स्टीट्युटमांना संग्रहमानी ताडपत्रनी न २३, १८८०-८१ वाळी पति । ए प्रतिने आ आवृत्तिमा पाठान्तर सूचबवा माटे A सज्ञा आपवामा आवी छे । ए प्रतिमा लेखनकाल आपेलो नथी पण लीपिनी आकृति ऊपरथी ते विक्रमना १२ मा सैकामा लखाएली होय तेम लागे छ। प्रति बहु शुद्ध नथी । एमा मूळ सूत्र-पाठ पूर्ण आपेलो छे। (B) उक्त संग्रहमानी ताडपत्रनी न २४ , १८८०-८१ वाळी वीजी प्रति । ए प्रतिना पाठान्तर सूचक्वा माटे, एने अहि B सज्ञा आपी छ । ए, प्रमाणमा काईक वघारे शुद्ध छ। हासियाओमा घणी जग्याए एका टिप्पणो पण आपेला छ। पण एना भन्तनां केटलांक पाना नष्ट थई गया छे तेथी एनो पण लेखनकाल ज्ञात थई शक्यो नथी। वर्णाकृति ऊपरथी अनुमाने ए १३ मा सैकामा लखाएली होय तेम जणाय छ । [३] श्रीचंद्रसूरिरचित चूर्णिविपमपदव्याख्या. (A) श्रीयुत के प्रे मोदी मारफत मळेली मुनिवर्य श्रीहसविजयजीना शास्त्रसमहमानी कागळ ऊपर लखेली नवीन प्रति । (B) आचार्य श्रीविजयनेमी सूरिना संग्रहमानी ए ज जातनी वीजी प्रति । मा बन्ने प्रतिओ कोई एक ज मूल प्रति ऊपरथी लखाएली नवीन नकलो.छे । प्रतिओ सामान्यरीते बहु ज अशुद्धतावाळी छे । जूनी प्रतिनी लीपिना वळणने बराबर नहीं समर जनार एवा कोई सीखाउ लहियाओना हाथै आ नकलो थई छे तेथी एमा, एलहि भोए, एक अक्षरना बदले चीजो अक्षर लखी नाखी, मन्थनी अशुद्धिमा घणो व करी दीघो छ । उदाहरण तरीके-'ए' अक्षरनी जग्याए 'प', 'य' नी जग्याए 'घ', ना बदले 'इ', 'स्त' ना पदले 'सू', 'म' ना माटे 'च', अने 'घ' ना माटे 'ध', पक्तिए पक्तिए अनेक वर्णोनो विपर्यय करी दीधेलो नजरे पडे छ। आम, जूनी शुद्ध प्रतिनी प्राप्तिना अभावे ए व्याख्याना संशोधनमा घणी कठिनता अनुभवनी पड़ी भने तेथी फचिरस्थळे तो अशुद्ध पाटने ज स्थानस्थित राखवो पड्यो छ । जिनभद्रगणि-क्षमाश्रमण आ जीतकल्पसूत्रना कर्ता जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण छे, एम चूर्णिकारनो स्पष्ट उल्लेख छे, अन्यान्य टीकाकारोए तथा अन्य अथकारोए पण ए बाबतनो घणा ठेकाणे निर्देश करेलो रे आवश्यक सूत्रना सामायिकाध्ययन ऊपरनुं लगभग पाच हजार ग्रन्थप्रमाण प्राकृतगाथापद्ध भा से विशेपावश्यक भाष्यना नामे सुप्रसिद्ध छे तेना कर्ता पण आ ज जिनभद्र गणी हे भाष्यग्रन्थ जैन प्रवचनमा एक मुकुटमणि समान लेखाय छे अने तेथी भाष्यकार जिनमः जैनशास्त्रकारोमा अग्रणी मनाय छ । जैन दर्शन प्रतिपादित ज्ञानविषयक विचारने केव श्रद्धागम्य-विषयनी कोटिमाथी बुद्धिगम्य-विषयनी कोटिमा उतारवानो सुसंगत प्रयत्न, सौर प्रथम एमणे ज ए महामाप्यमा होय, एम जैन साहित्यना विकासक्रमनु सिंहावलोक करता जणाई आवे छे । जैन आगमोना संप्रदायगत रहस्य अने अर्थना, पोताना समय अद्वितीय ज्ञाता तरीके, ए आचार्य सर्वसम्मत गणाता हता, अने तेथी एमने 'युगप्रधान' एबु मह त्त्वस्यापक उपपद मळेल हतु । जीतकल्पचूर्णिना कर्ताए, प्रारभमा, ५ थी ११ मा सुधीना पद्य आ आचार्यनी जे गमीरार्थक स्तुति करेली छे ते ऊपरथी एमनी ज्ञानगमीरता अने सामदायिर प्रतिष्ठिततार्नु काईक सूचन थाय छे । आ पद्योनो भावार्थ आ प्रमाणे छे.- ५. अनुयोग एटले आगमोना अर्थ ज्ञानना धारक, युग-प्रधान, प्रधानज्ञानियोने बहुमत, सर श्रुति अने शास्त्रमा कुशल, अने दर्शन-ज्ञान उपयोगना मार्गस एटले मार्गरक्षक । ६ कमलना सुवासने अधीन थपला अमरो जेम कमलनी उपासना करे छे तेम ज्ञानरूप मक रन्दना पिपासु मुनियो जेमना मुखरूप निर्झरमाथी नीकळेला ज्ञानरूप अमृतनु सदा सेवन करे छे ७ ख-समय भने पर-समयना आगम, लीपि, गणित, छन्द अने शब्दशास्त्रो उपर करेल व्याख्यानोथी निर्मित थएलो जेमनो अनुपम यश.पटह दशे दिशाओमा भमी रहेलो छे। ८. जेमणे पोतानी अनुपम मतिना प्रभावे ज्ञान, ज्ञानी, हेतु, प्रमाण, मने गणधरपृच्छाद सविशेष विवेचन विशेषावश्यकमा अन्थनिबद्ध कयु छ । ९ जेमणे छेद सूत्रोना अर्थाधारे, पुरुष विशेषना पृथक्करण प्रमाणे, प्रायश्धिचना विपिन विपान करनार नीतकरुपसूत्रनी रचना करी छ ।
७ , , , १० एवा, परसमयना सिद्धान्तोमा निपुण, संयमशील श्रमणोना मार्गना अनुगामी, अने क्षमा- श्रमणोमा निधानमूत जिनभद्र गणी क्षमाश्रमणने नमस्कार । आमाना ५ मा पद्यना तात्पर्थार्थ ऊपरथी ए जणाय छे के-जिनभद्र गणी आगमोना अद्वितीय व्याख्याता हता, युगप्रधान पदना धारक हता, तत्कालीन प्रधान प्रधान श्रुतधरो पण एमने बहु मानता हता, श्रुति अने अन्य शास्रोना पण ए कुशल विद्वान् हता, अने जैन सि- दातोमा जे ज्ञान-दर्शनरूप उपयोगनो विचार करवामा आव्यो छे तेना ए समर्थक हता । ६ हा पद्यना तात्पर्यथी ए जणाय छे के एमनी सेवामा घणा मुनियो ज्ञानाभ्यास करवा माटे सदा उप- स्थित रहेता हता। ७ मा पद्यमा, जुदा जुदा दर्शनोना शास्त्रो, तथा, लीपि विद्या, गणित शास्त्र, छन्द शास्त्र, भने शब्द (व्याकरण) शास्त्र आदिमा एमनु अनुपम पाडित्य सूचित कर्यु छ । ८ मा पद्यमा विशेषावश्यकभाप्य, अने ९ मामा, जीतकल्पसूत्र विषयक एमनु कर्तृत्व प्रकट कर्यु छ। १० मा पद्यमा, एमनी परसमेयना आगम विपेनी निपुणता, खाचारपालननी प्रवणता, अने सर्व जैन श्रमणोमा रहेली मुख्यतानु सूचन कयु छ । भाटला संक्षिप्त परिचय सिवाय अन्यत्र क्याए पण ए महान् आचार्यनो कशो पण विशेष उल्लेख दृष्टिगोचर थतो नथी। हरिभद्रसुरि, शीलाकाचार्य, जिनेश्वरसूरि, अभयदेवसूरि, हेमचन्द्रसूरि, वादीदेवसरि, मलय- गिरि अने देवेन्द्रसूरि विगेरे पाछळना प्रसिद्ध प्रन्थकारो अने टीकाकारोए एमनो नामनिर्देश पोतानी कृतिओमा अनेकश करेलो छे । "भाष्यसुधाम्भोधि; भाष्यपीयूपपाथोधि, भगवान् माष्यकार, दुष्पमान्धकारनिममजिनवचनप्रदीपप्रतिमः दलितकुवादिप्रवाद प्रशस्वभा- ध्यसस्यकाश्यपीकल्प, त्रिभुवनजनप्रथितप्रवचनोपनिषद्वेदी, सन्देहसन्दोहशैलशृगमंगद- म्भोलि" इत्यादि प्रकारना विशिष्ट विशेषणोपूर्वक एम नामस्मरण करवामा आव्यु छे, अने ए रीते एमनी आततानो गौरवपूर्वक खीकार करवामा आव्यो छे । दरेक संप्रदायमा विद्वानोना वे प्रकार नजरे पडे छे एक तो आगमप्रधान, अने बीजो तर्क- प्रधान । आगमप्रधान पडितो हमेशा पोताना परपरागत आगमोने-सिद्धान्तोने शब्दश पुष्टरीते पकडी रहेवाना स्वभाववाळा होय छे, त्यारे तर्कप्रधान विद्वानो आगमगत पढार्थव्यवस्थाने तर्क. सगत अने रहस्यानुकूल मानवानी वृत्तिवाळा होय छे। आथी केटलीक खते आगममधान अने तर्कमपान विचारकोनी संप्रदायगत तत्त्वविवेचननी पद्धतिमा विचारभेद पडे छे । ए विचार- मेद नो उग्र प्रकारनो होय छे तो कालक्रमे सप्रदाय-भेदना अवतारमा अवसान पामे छे, अने सौम्य प्रकारनो होय छे तो ते मात्र मतमेदना रूपमा ज विरमी जाय छे । जैन संप्रदायना इतिहासनु अवलोकन करता तेमा आवा अनेक विचारमैदो, मतमेदो अने संप्रदायमेदो अने तेना मूलभूत उक्त प्रकारना कारणो बुद्धि आगळ सष्ट तरी आवे छे । ए विचारना एक उदाहरणमूत जिनमद्र गणी क्षमाश्रमण पण छे, अने तेथी जैन प्रवचनना इतिहासमा एमने घणी प्रसिद्धि प्राप्त थई छ। जिनभद्रगणी आगम-मधान आचार्य छ। जैन भागमाम्नाय जे परपराधी चाल्यो भावतो हतो . । - ८ , तेने शब्दशः अनुसरी ते ऊपर संगतवार भाष्य रचवानुं प्रधान कार्य एमणे कयु हतुं । ए भाष्यमां आम्नायथी विरुद्ध जनारा दरेक पक्ष ऊपर एमणे यथेष्ट आक्षेप-प्रतिक्षेप कर्या छे अने खसप्रदायनु समर्थन कयु छ । ए पोताना समर्थनमा तर्कनो उपयोग करे छे पण ते तर्क आमायानुकूल होय तो ज तेने महत्त्व आपे छ । आम्नायथी आगळ जनार तर्कने ए उपेक्षणीय गणे छ। उदाहरण तरीके एक प्रसंग लईए-सिद्धसेन दिवाकर जिनभद्रना पुरोगामी आचार्य छ । जैनवाड्मयमा अने इतिहासमा तेमनु स्थान घj ऊचु छ । जैनधर्मना जे महान् समर्थक अने प्रभावक आचार्यों थई गया छे तेमा सिद्धसेनसूरि घणा आगळ पडता छ । सम्मतितर्क, न्यायावतार, महावीरस्तुति विगेरे मौलिक-सिद्धान्त-प्रतिपादक अने प्रौढविचार-पूर्ण एमना अन्थो छ । जैन तर्कशासना ए व्यवस्थापक अने विवेचक छ । एथी ए तर्कप्रधान आचार्य मनाय छे । जैनदर्शनना ए एक अनन्य आधारभूत आप्त पुरुष छ । एमना पाछळना सर्व समर्थ आचार्यों ए एमने आप्तरूपे स्वीकार्य छ । ए आचार्ये पोताना सम्मतितर्क नामना तात्त्वि- कग्रन्थमा, केवलज्ञान अने केवलदर्शनना खरूपनो विचार करता, ए सिद्धात प्रतिपादित कर्यो छे के केवलज्ञानीने ज्ञान अने दर्शन बन्ने युगपत् ज होई शके छे, अने तेथी यथार्थमा बन्ने एक खरूप ज छे । आगमोमा जे "जुगवं दो णत्थि उवओगा" ए विचार प्रतिपादेलो छे तेनाथी सिद्धसेननो सिद्धान्त जराक विरुद्ध देखाय छे । एटले आगमवादी जिनभद्र गणी क्षमाश्रमणे पोताना भाष्यमा सिद्धसेनना विचारनो विगतवार प्रतिक्षेप कर्यो छे अने तात्पर्यमा जणाव्यु छे के तर्कथी गमे ते विचार सिद्ध थतो होय पण आगमथी बहार जता तर्कनो खीकार न करी शकाय आगममा क्याए पण युगपदुपयोगनु सूचन नथी अने तेथी ए विचार अग्राह्य छे । आ विषयनो उपसंहार करता जिनभद्र गणी क्षमाश्रमण जणावे छे के- कस्स व नाणुमयमिण जिणस्स जइ हुज दोवि उवओगा। नूण न हुंति जुवर्ग जओ निसिद्धा सुए बहुसो ॥ न वि अभिनिवेसयुद्धी अहं एगंतरोवओगम्मि । तह वि भणिमो न तीरइ जं जिणमयमनहा काउं । (विशेपावश्यकमाप्य, पृष्ठ १२१३) अर्थात्-जो जिनने-केवलीने युगपद् बन्ने उपयोग होत तो ते कोईने अनभिमत न थात । पण ते छ ज नहीं, कारण के सूत्रमा तेनो घणी जग्याए निषेध करवामा आवेलो छ । तेम ज क्रमोपयोगमा-एक पछी एक थनार ज्ञानमा-अमारी काई अभिनिवेशबुद्धी नथी। पण तथापि कहीए छीए के जिनना मतने अर्थात् आगमनी परपराने अन्यथा न ज करी शकाय । आम जिनभद्रगणी आगमपरपराना महान् सरक्षक हता अने तेथी तेमो आगमवादी के सिद्धान्तवादी ना निरुदथी जैन वाङ्मयमा ओळखाय छ । जिनभद्रगणीनी अन्यकृतिओ जिनभद्रगणीना बनावेला अन्थोनी चोकस माहिती काई मळती नथी। सामान्य रीते नीचे जणावेला पाच अन्यो तेमनी कृति तरीके सुप्रसिद्ध छ । - - - १ विशेपावश्यक भाष्य मूळ अने टीका. आ भाष्य बहु प्रसिद्ध अने प्रकाशित छ। माना ऊपर ग्रन्थकारे पोते ज एक सस्कृत टीका लखी हती पण ते अत्यारे दुर्लभ छ । वीजी टीका शीलाकाचार्य जेमनु वीजु नाम कोट्याचार्य पण प्रसिद्ध छे तेमणे लखी छे । ए टीकानी ताडपत्र ऊपर खेली एक अतिजीर्ण प्रति पूनाना राजकीय ग्रन्थसग्रहमा सुरक्षित छे । बीजी टीका मलधारी हेमचद्रसूरिनी बनावेली छे अने ते प्रकट थई गई छे। २ वृहत्संग्रहणी. आ लगभग ४०० थी ५०० गाथानो ग्रन्थ छ । एना ऊपर मलयगिरि सूरिए सस्कृत टीका ल्खी छे । ग्रन्थ सटीक प्रसिद्ध थई चुक्यो छे । ३ बृहत्क्षेत्रसमास. आ पण प्राकृत गाथाबद्ध ग्रन्थ छ । आना ऊपर पण मलयगिरि विगेरे आचार्योए टीकाओ लखी छे । ग्रन्थ प्रसिद्ध छ । ४ विशेषणवती. लगभग ४०० गाथाओनो बनेलो आ एक प्रकरण ग्रन्थ छे, अने अद्यापि अप्रकाशित छ। ५ जीतकल्पसूत्र. प्रस्तुत ग्रन्थ । आ सिवाय ध्यानशतक नामनो एक ग्रन्थ जे हरिभद्र- सूरिनी आवश्यक टीकामा समुद्धृत छे तेना कर्ता पण जिनभद्रगणी कहेवाय छे पण ते सन्दिग्ध छ । जिनभद्रगणीनी भाष्यकार तरीकेनी बहु ख्याति छ। तेमा मुख्यतया तो विशेषावश्यक भाप्य ने लईने ज ए प्रसिद्धि प्राप्त थई होय तेम जणाय छे । कारण के ज्या ज्या माप्यकारना नामे एमनो उल्लेख आवे छे त्या त्या घणा भागे विशेषावश्यकना अवतरणो टाकवामा आल्या होय छे । पण, ए भाष्य सिवाय वीजा पण कोई भाप्यो एमणे रच्या होय तो ते समवित छ । एनु काईक अस्पष्ट सूचन, कोट्याचार्यनी विशेषावश्यकभाष्यटीकामाना एक उल्लेखथी थाय छे 'पोग्गल-मोयगदन्ते' ए पदी शुरुथती विशेषावश्यकभाप्यनी २३४* मी गाथामा जे दृष्टान्तो सूचव्या छे तेमनु विवरण आ भाष्यमा करवामा आव्यु नथी । पण निशीयसूत्रना भाप्यनी पीठिकामा आ गाथा अने एमा सूचवेला दृष्टान्तोनु विवरण विगतपूर्वक आपेल छ । एटलामाटे कोट्याचार्य पोतानी टीकामा आ दृष्टात-सूचक गाथानी व्याख्या करता विवरणमाटे लखे छे के-'निशीथे वक्ष्याम:--निशीथमा आ विवरण करीशु ।' आ वाक्य कोट्याचा. थेनु होय एम तो संभवे ज नहीं । कारण के निशीथभाष्य कोट्याचार्यकृत छे एवी प्रसिद्धि के परपरा बिल्कुल सभळाती नथी । तेथी आ वाक्य जिनभद्रगणीनी खोपज्ञटीकामानु होवु जोइए। अने जो तेम होय तो ग्रन्थकारे आ गाथानु विवरण निशीथ भाप्यमा कर्यु होय एटले विशे- पावश्यकमाप्यमा पुन ते करवानी आवश्यकता नहीं रहेवाथी अहि मात्र तेनु सूचन न करी दीधु होय । विशेषावश्यकटीकाकार हेमचंद्रसूरि पण आ गाथानी व्याख्यामा अते एम लखे छे के–'एतान्युदाहरणानि विशेषतो निशीथादवसेयानि ।' मारी पासे फेटराक प्रकीर्ण पाना- मोनो एक सग्रह छे तेमा भाष्यो अने चूर्णिओमानी केटलीक नोंधो कोई विद्वाने करेली छ । * काशीथी प्रकट यएल भातत्तिमा मा गायानो क्रमांक २३५ छे, पण पूनानी कोट्याचार्यवाळी टीकानी प्रतिमा ए Rav १० . ए संद्रह आसरे ३०० करता वधारे वर्षनो जूनो लखेलो छ । एमां एक ठेकाणे निशीथभाप्यनी ३ गाथा लखेली छे, अने ते पछी "इति जिनमद्रक्षमाश्रमणकृत्तनिशीथभाष्यस्साष्टमोद्देशके" आवी स्पष्ट नोध करी छे । अभ्यासिगोए आ वावतमा विशेप शोध करवानी आवश्यकता छ । जिनभद्रगणीनो समय जिनभद्र गणीना गण-गच्छादिनो के गुरु-शिप्यादिनो कोई उल्लेख जोवामा आवतो नथी । सोळमा सैका पछी लखाएली पट्टावलिओमा तेमना समयनो निर्देश थपलो जोवामा आवे छे अने ते प्रमाणे महावीर निर्वाण पछी स० १११५ मा तेमनो स्वर्गवास थयो मानवामा आवे छे । वीरनिर्वाण १११५ ते विक्रम संवत् ६४५ बराबर थाय छे । पट्टावलिओमा उल्ले- खेलो आ सगय केटलो असन्दिग्ध छे ते जाणवानां विशेष प्रमाणो अद्यापि हष्टिगोचर थया नथी। तपागच्छ, अचलगच्छ, उपकेशगच्छ, लघुपोशालिक, वृहत्पोशालिक, आदि गच्छोनी जे आधुनिक पट्टावलिओ उपलब्ध छे तेमनी मुख्य परपरामा तो जिनभद्रनो कोई निर्देश नथी । पण खरतर गच्छीय पट्टावलिओमा कोक ठेकाणे मूल पट्टपरपरामा जिनभद्रने दाखल करी दीघेला जोवामा आवे छे खरा । पण तेमा परस्पर घणो ज विरोध नजरे पडे छ । उदाहरण तरीके, मारी पासे जे केटलाक आवा पट्टावलिना पानाओ छे तेमाथी एकमां जिनमदने महावीरथी ३५ मी पाटे लख्या छे, वीजा पानामा ३८ मी पाटे लख्या छे, त्यारे वळी त्रीजा पानामा २७ मी पाटे लख्या छ। केटलाफ पानाओमा जिनभदनी पाटे हरिभद्ने बेसार्या छे, तो केटलाकमा जिनमदनी पाटे शीलाकाचार्यने बेसार्या छ । एक पट्टावलिमा हरिभद्रने महावीर निर्वाण पछी ५८५ वर्षे भने जिनमद्रने ९८० वर्षे थएला जणान्या छे । आम पट्टावलिओनी विगतो बहु ज असंबद्ध होवाथी तेमाना कोई पण कथनने अन्यान्य पुरावाओना आधारे निर्णीत कर्या सिवाय सत्य मानी शकाय तेम नथी ए स्पष्ट ज छे। धर्मसागर गणीकृत तपागच्छ पट्टावलि के ने केटलाक ऐतिहासिक ऊहापोह पछी लखवामा आवी छे अने जेनु सशोधन पण केटलाक विद्वानोनी बनेली खास समितिए कयु छे, तेना उल्लेख प्रमाणे जिनभद्र गणी, हरिभद्र पछी ६०-६५ वर्षे थया हता। पण आ उल्लेख पण एटलो न मूलमरेलो छ । कारण के प्रथम तो हरिभद्रनो स्वर्ग समय जे ए पट्टावलिमा वीरसवत् १०५५, विक्रम संवत् ५८५ आप्यो छे ते ज बराबर नथी, ए में हरिभद्रना समय निर्णयमा विस्तृत चर्चा करी सिद्ध कयें छे, अने बीजु, हरिभद्र सूरिए पोतानी आवश्यक टीकामा अनेक ठेकाणे जिनमद्रनु सरण कयुं छे अने विशेषावश्यकनो स्पष्ट उल्लेख पण कयों छे । एटले हरिभद्र पछी जिनभद्र कोई पण रीते होई शके नहीं ए निश्चित छ । धर्मसागरकृत पट्टावलिनो उल्लेख . - आ प्रमाणे छे -- श्री वीरात् १०५५ वि० ५८५ वर्षे याकिनीमनुः श्रीहरिभद्रसरिः स्वर्गभाक् । निशीथ-वृहत्कल्प-भाण्यावश्यकादिचूर्णिकारा: श्रीजिनदासगणिमहत्तरादयः पूर्वगत- पावलिभोना केटरांक पानाओमां तो एमने "सर्व भाग्यकर्ता" पण लखेला छ ।
. ध्रुतधर-श्रीप्रद्युम्नक्षमाश्रमणादिशिष्यत्वेन श्रीहरिभद्रसरिता प्राचीना एव यथाकालमा- विनोबोध्याः । १११५ श्रीजिनभद्रगणिर्युगप्रधानः । अयं च जिनभद्रीयध्यानशतक- करणान् भिन्न: संभाव्यते । --इण्डियन एण्टीरी, पु ११, पृ २५३ खरतर गच्छनी पट्टावलिओ-जेमा छेल्ला सैकामा थई गयेला क्षमाकल्याणमुनिनी बनावेली मुख्य कही शकाय भने जेनो सार डॉ क्लाटे इण्डियन एण्टिकेरीना पु० ११, पृ०२४३-४९ मा आप्यो छे-ते अनुसारे जिनभद्रनो समय वीरनिर्वाणनो दशमो सैको छ। ए पट्टावलिमा लख्या प्रमाणे वीर सं० ९८० मा देवर्द्धिगणी थया। तेज समयमा चतुर्थीनी संवत्सरी स्थापन करनार कालफाचार्य थया ( वी सं ९९३), ते ज अरसामा विशेषावश्यक भाष्यादिना कर्ता [बीजी प्रतिप्रमाणे सर्व भाप्यकर्ता] जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण (वी स ९८०), तथा आचारागादि सूत्रोनी टीका करनार तेमना शिष्य शीलाकाचार्य थया, अने ते ज जमानामा १४४४ अन्थोना रचनार हरिभद्रसूरि थया । आ प्रमाणे आ पट्टायलिलेखकना हिसावे देवर्षिगणी, कालकाचार्य, जिनमद, शीलाकाचार्य अने हरिभद्रसूरि ए बया समकालीन छ । आ वधामा हरिभद्रसूरि सिवाय बाकीमा आचार्योनो समय हजी प्रमाण-पुरस्सर निर्णीत थयो नथी । पण, सापदायिक इतिहासनु एकदर वळण जोता ए बधा समकालीन होय तेम सभवतु नथी । हरिभद्रनो समय, लगमग विक्रमना आठमा सैकानो छेल्लो भाग निश्चित थयो छे । देवर्षिगणी अने कालकाचार्य छट्ठा सैकानी शुरुआतमा थएला मनाय छे । एटले एमनी वचे ओछामा ओछु २५० वर्ष जेटल अतर पडे छ । एमाथी हरिभद्रने बाद करी देवामा आवे-कारण के तेमनो समय निर्णीत छे-अने पाकीना वधाने समकालीन मानी लेवामा आवे तो ते सप्रमाण होई शके के केम, ए प्रश्न विचारणीय रहे छे खरो। पण, आ स्थळे देवर्धिगणी अने कालकाचार्यना समयना विचारने पुरतो अवकाश नथी, तेथी हु ए बाबतने वगर चर्चे ज मुकी देवा मागु छु । जिनमद्गणी भने शीलराकाचार्यनी समकालीनता अने गुरु शिष्य सम्बन्ध माटे काईक विचार अवश्य कर्तव्य छ । कमनशीचे, शीलाकाचार्य सवधी जे सवत्नो उल्लेख मळे छे ते पण परस्पर विरोधी छे । आचारागसूत्रनी टीकानी केटलीक प्रतिओमा टीका बनाव्याना समयनो निर्देश दे रीते मळे छे. एक निर्देश गद्यमा छे, अने चीजो पद्यमा छे । तेमाए वळी दरेकमा बब्बे पाठभेद छ । (१) A पहेलो गद्य निर्देश आ प्रमाणे "शकनृपकालातीतसंवत्सरशतेषु सप्तसु चतुरशीत्यधिकेषु वैशासपञ्चम्यो आचारटीका इन्धेति ।" खमातना शान्तिनाथना भडारमा स० १३२७ मा लखाएली ताडपत्रनी प्रति छे तेमा आ पक्ति छे जुओ, पीटर्सन रीपोर्ट ३, पृ ९० - १२ - , B. वीजो गद्य निर्देश आ प्रमाणे:- "शकनृपकालातीतसंवत्सरशतेपु सप्तसु अष्टानवत्यधिकेषु वैशाखशुद्धपञ्चम आचारटीका कृतेति ।"~-इण्डियन एण्टीफेरी, सन् १८८६, पृ० १८८. (२) पीजो, जे पद्य निर्देश छे ते मा प्रमाणे - द्वासप्तत्यधिक हि शतेषु सप्तसु गतेषु गुप्तानाम् । संवत्सरेषु मासि च भाद्रपदे शुक्लपञ्चम्याम् ॥ शीलाचार्येण कृता गम्भूतायां स्थितेन टीकपा । सम्यगुपयुज्य शोध्या मात्सर्यविनाकृतैरायः ।। -आगमोदयसमिति प्रकाशित भावृत्ति, पृ. ३१७ | मारी पासेनी एक नोंधमा, गुप्तानां ना बदले शझाना आवो पण पाठ छे । तेम न केट लीक प्रतिओमा आमानो कोई पण उल्लेख सर्वथाए नथी मळतो । आ रीते, आ उल्लेखो, जुदी जुदी ४ सालो बतावे छे । पहेलो, शक संवत् ७८८ नी, वीज ७१८ नी, बीजो, गुप्त संवत् ७७२ नी, अने चोथो शक संवत् ७७२ नी । आमानी कई साल साची छे ते चोकस कही शकाय तेम नथी* | गुप्त सवत्नी जे गणत्री अद्यापि विद्वानो करत * भाचारागटीका मा संवत्सरविषयक गोसना सवधमा डॉ० लोटे इण्डियन एण्टीकेरी, पु. १५ पृ १८८ मां एक टिप्पणी लसी छे ते जाणवा जेवी होवाथी वेतु भाषान्तर महिं आपवामा भावे छ। आचार टीकामांथी वे उतारामो श्रीयुत के पी पाठके जैन हरिवंशमाथी एक महत्त्वनो उतारो १४१ मा पान उपर भाप्यो छ । एमा गुप्त राजाभोना उलेख उपरांत महावीरना निर्वाण पछीना यशोनो नियमित क्रम भापी ए समयनो सवध यता- ववा प्रयत्न कयों छे । जो के ए सयध घरावर नथी। हु अहिं थोडीधणी एने मळती न साहित्यविषयक ध्यान खेंचे एवी पायत आपया इच्छु छु । डॉ भगवान- लाल एन्द्रजीए १८८३ नी शुरुआता, जैनप्रन्य भाचारोग सूत ऊपरनी शीलाचार्यनी भाचारटीकानी एक हस्तलिखित प्रति मो धतावी हत्ती । ए लगभग ३०० वर्ष पहेला लखाएली मनाय छ । एमाथी हु में उतारा आपु छु । पहेलो पद्यपद्ध उतारो २०७ B भने २०८ A पान ऊपर छ, भने ते भा प्रमाणे छ.- द्वासप्तत्यधिकेषु हि शतेषु सप्तसु गतेपु गुप्तानाम् । सवत्सरेपु मासि च भाद्रपदे शुक्लपञ्चम्याम् ॥ शीलाचार्येण कृता गम्भूताया स्थितेन टीफैपा। सम्यगुपयुज्य शोध्या मात्सर्यविनाकृतैरायः॥ मा उतारो, शीलाचायें टीकानो भा भाग गुप्तसवत् ७७२ ना भादरखा सुदी पाचमने दिवसे गभूता (खभात) मा पूरो कर्यो एम जणाचे छ। बीजो उतारो पुस्तकना भने २५६ B पान ऊपर आवेलो छ । भने ते गद्यमा होई मा प्रमाणे छ - शकनृपकालातीतसवत्सरशतेषु सप्तसु अष्टानवत्यधिकेषु पैशाखशुद्धः पञ्चम्पामा- चारटीका कृतेति । २५६ B पान अहिं पुरु धाय छ भने ए पीनु पानु जेमा मा तिपिनु भाकडामा पुनरावर्तन भने लेखकना उपसहारना शन्दो छे ते नष्ट यई गयु मा उतारो सपूर्ण टीकानी समाप्तिनी तिथि तरीके शकसंवत् ७९८ नी वैशाख सुदी पाचमने मुके है। - - आव्या हे ते प्रमाणे जो गणीए तो गुप्त संवत् ७७२ एटले ११४१ विक्रम सवत् (१०९१ई स०) थाय । ए समय तो शेषनवाग टीकाकार अगयदेवसूरिनो छ । प्रथमद्वितीयागटीकाकर्ता शीलां- फाचार्य तो ए अगाऊ घणा वर्षा पूरे थई गयाना पणा पुरावाओ उपलब्ध छ । तेथी का तो गुप्त सवत् ७७२ वाळो उल्लेग्य अमपूर्ण होवो जोईए, अने का तो गुप्त सवत्नी जे गणत्री आज पर्यंतना वपा शोधको गणता आव्या छे ते सोटी होवी जोईए । पण, मा आ अनिश्चित पाठ. भेदना आधारे न गुप्त सवत्नी गाउने आपणे ऊकेली शकीए तेग नथी, तेथी ज्या सुधी गुप्त- सवत्नी गणना अन्य प्रमाणोथी खोटी न ठरे त्या सुधी आ प्रस्तुत उल्लेखने आपणे सत्य न मानी शकीए । हवे रणा शक संवत्सरवाळा उल्लेखो। एमा जो के ७७२, ७८४ अने ७९८ आम त्रण भिन्न भिन सवत्सरो छे, पण ते पानो अन्तर्भाव एक ज पचीसीमा थाय छे तेथी भा यमे उताराभो एम बताये छे फे शीराचार्य गुप्त अने पर सवरने एक गण्यो छे । एमां पटरीते एक प्रकार की भूल तो ऐ गाबोभा भूल, गुप्त भयया शक सवत् जो विषे पतु अधुरु ज्ञान तु, तेनो निर्देश, फोईपण रीते दापल करी पोतानी विद्वत्ता पतापवाना हेतुने लइने पई छ । ज्या सुधी, गुप्त संवत् ७७१ थी ७९० ( ६१०९१ थी १११५) भयया शक संवत् ७७२ थी ४९० (इप ८५० थी ८७६) ए येमांची फया भरसामो पारटीका बसाई ए पताववा माटे पुरती थई पढे एपी शोलाचार्यनो सरो समय प्रदर्शित करती माहिती न मळी भावे लो सुधी ए भूल दुर थवानी थी । परंतु भा उताराभो एम पताषया माटे महत्त्वना छे के शीलाचायना समयसुधी पण ए वात सरण हतु के ए सपत् (राप्त सपत्) के जे यालमीना राजाओना पापरने सीधे जाणीतो हतो भने ऐवटे काठियावादगा पदमी सवत् सरीके प्रचलित थयो हतो, एनो मूळ भने सास संबंध गुप्त राजाओ पाये हतो जेमणे काठिया- वाट भने वीजा पाडोशना भागोमा एनो फेलावो को हतो।" भा सय भने डॉ लीटगी टिप्पणी कर प्रो पीटसने, हस्तलिखित पुस्खकोनी शोधवाळा, पोताना श्रीजा रीपोटना पृ० ३६-३७ रुपरजे गोंध फरी छे ते पण भा यावतमा उपयोगी होवामी अहिं अवतार पामा भाये । न २५५ आचारागसून ऊपरनी शीलाचार्यनी टीका शीलाचार्य के शीलांक सुप्रसिद्ध नगर अपहिलवाड पाटणना सस्थापक यनराजना धर्मगुरु तरीके विदित छ। २४७ मां पान कार जे अवतरण आपेल छे ते ऊपरथी जणाय छ के शीलाकनी आचारांगवृत्तिमा एनो रच ना-समय श स ७७८ छ । वधारेमा जणाय छे के जेलोकमा ए मिति छे ते छेवटना पान ऊपर छे एटले बहु भार मूकवा जेवी नथी । १८८६ माचना ए मा लीटनी शीलाचार्यना प्रथ ऊपर एक दूसरी नौध छ । एमां भगवानलाल इदतीनी प्रतिना आधारे ए लरो छे के प्रथना अंदरना भागमा गुप्त सवत् ७७२ अने मंतना भागमा श स ७९८ मापयामा भाज्या छ । हाल तो हु, अहिं आपेलो गुप्त अने शक संवत् वञ्चेनो गोटाळो टाळी शकु एम नथी, परंतु सवत् १३२७ अर्थात् इ स १२७१ मा लसाएली ए प्रथनी सभातवाळी प्रतिमा ए मूळ प्रथ ल्खायानो जे समय आपेलो छे ते विष मने नहीं जेवी ज शका छे। ए प्रथ श स ७८५-५ प ८६३ मा पूरी करपामा आध्यो हतो। घीजा श्लोकमानो जे दाद हु बराबर नहोतो समजी शक्यो ते "गभूता" छे, एम प्लीटना अवतरणथी समजाय छ । गभूता एटले सभात एम फ्लीटनो अभिप्राय देखाय छे । मारावाळा उतारामा एलोकनो अक बीजो आप्यो छे परंतु पहेला अकवाळो लोक एमां नथी । पनु स्थान समयनिर्देशक गद्य पकिए लीधु छ । शीलाचार्य पोतानी टीका धीरे धीरे पूरी करी हती एटले एमणे ए मे श्लोक अथवा एना जेबु काइक बचे बच्चे मूकी दीधु होय एम लागे छ ।” - , चूक्या हता अने तेनी घणी जूदी नदी पाठभेदोवाळी प्रतिओ पण थई चूकी हती। मा वस्तु- स्थिति त्यारे ज बध सती बनी शके ज्यारे शीलाकाचार्य अने जिनमद्रमणी क्षमाश्रमण वचे कालकृत विशेष अन्तर होय । जो ए बन्नेनी बच्चे काई अन्तर न होय अने पट्टावलि लेखकना कथन प्रमाणे एमनामा गुरु-शिष्यनो ज सबन्ध रहेलो होय तो विशेषावश्यकमाष्यमा आवा पाठभेदो अने प्रत्यन्तरोनी नोंध लेवा जेवी स्थिति शीलाकाचार्यनी सन्मुख उपस्थित ज शी रीते थई शके । माटे ज्या सुधी वीजा कोई स्पष्ट साधक बाधक प्रमाण न मळी आवे त्या सुधी शीला- काचार्यने जिनमद्रगणीना शिष्य पण मानी शकाय तेम नथी, तेम ज ते बन्ने समकालीन हता एम पण कही शकाय तेम नथी। जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणना समय निर्णय माटे हजी वीजी घणी पावतो चर्चवा जेवी छे, पण मा स्थळे ते बघीनी चर्चा करवा जेटलो अवकाश न होवाथी हु ए वायतनो कोई स्पष्ट निर्णय आपी शकु तेम नथी । पण, खास काई विरोधी प्रमाण नजरे न पडे त्या सुधी पट्टावलियोमा जे" वीर सवत् १११५-विक्रम संवत् ६४५ नी साल एमना माटे लखेली छे तेनो स्वीकार करीए तो तेमा कशी हरकत नथी। जीतकल्पसन्न आ सूत्र, एना नाम प्रमाणे जैन श्रमणोना आचार विषयक छ अने एमा १० प्रकारना प्रायश्चित्तनु विधान करवामा आव्यु छ । आ प्रायश्चित्त सबन्धी विषय छेद सूत्रो अने वीजा घणा प्रन्थोमा चर्चवामा आव्यो छे। तेमा, केटलीक जग्याए ते बहु ज सक्षिप्त रीते चर्चेलो छे, तो केटलीक जग्याए घणी ज विस्तृत रीते वर्णवेलो छ । एटला माटे जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणे बहु सक्षिप्त नहीं तेमज बहु विस्तृत नहीं एवी मध्यमरीते ए विषयने समजाववा माटे आ ग्रन्थनी सकलना करी होय तेम संभवे छ । आ प्रायश्चित्तना विषयमा एक वात नोंधवा जेवी छे, अने ते ए छे, के श्वेतावर सप्रदायना सन आगमोमा अने अन्य ग्रन्थोमा आ जीतकल्पसूत्र प्रमाणे ज १० प्रकारना प्रायश्चित्त वर्णवेला मळे छ । पण तत्त्वार्थसूत्रना नवमा अध्यायना २१-२२ सूत्रमा प्रायश्चित्तना प्रकार ९ न गणाव्या छे, अने तेमा, आ सूत्रमा वर्णवेला मूल, अनवस्थाप्य अने पारचिक आ छेल्ला त्रणना स्थाने, परिहार अने उपस्थापना नामना वे प्रायश्चित्त कह्या छे । दिगम्बर सप्रदायना साहित्यमा प्राय सर्वत्र तत्त्वार्यसूत्र प्रमाणे ९ ज प्रायश्चित्त मळी आवे छे। श्वेताघर साहित्यमा एक तत्त्वार्थ- सूत्र सिवाय बीजे क्याए आ प्रकार दृष्टि गोचर नथी थतो। जिनभद्रगणी क्षमाश्रमण जीत कल्पसूत्रनी अते एम पण कहे छे के तप-अनवस्थाप्य अने तप-पाराचिक आ बन्ने प्रायश्चित्त भद्रमाहुखामी पछी व्युच्छेद पान्या छ । दिगम्बर साहित्यमा आ विचार क्याए नथी । तेम ज तत्त्वार्थमाप्यमा पण आ सबधे काई सूचन नथी । विद्वान् अभ्यासिओ तत्त्वार्थसूत्रना कर्तृत्वना प्रश्ननो ऊहापोह करे त्यारे आ विषय पण तेमा विचारवा जेवो छे, ए सूचन करवा सारु महिं आ नोध करवी उचित लागी छे। - M - ។ जीतकल्पसूत्र-व्याख्या-साहित्य आ सून ऊपर उपलब्ध थता व्याख्या-साहित्यमा जूनामा जूनी कृति ते मा आवृत्तिमा प्रकाशित सिद्धसेनकृत चूर्णि छ । आ चूर्णि रचाया पहेला पण कोई चूर्णि ए सून ऊपर रचाएली हती एम प्रस्तुत चूर्णिमा, पृष्ठ २३, पक्ति २३ अपर, आवेला उल्लेखथी ज्ञात थाय छे, पण ते उपलब्ध नथी । आ मुद्रित चूर्णिना कर्ता सिद्धसेनगणिना समयादि विषेनो निर्णय करवा माटेना साधनोविपे विशेष शोध खोळ थई शकी नथी, तेथी आ सिद्धसेन कोण अने क्यारे थया-ए प्रश्नने छेच्या वगर ज हाल तो चलावी लेयु प्राप्त छ । भा चूर्णि ऊपर जे टिप्पण आपवामा आव्यु छे तेना कर्ता श्रीचन्द्रसूरिना समयादिनो उल्लेस टिप्पणनी प्रशस्तिमा आपेलो छे, अने ते अनुसारे विक्रम संवत् १२२७ मा अणहिलपुरमा तेमणे आनी रचना करेली छे । आ श्रीचद्रसूरिए श्रायकप्रतिक्रमणसूत्रवृत्ति ( संवत् १२२२), पचोपागति (संवत् १२२८), निशीविंशोदेशकवृत्ति, विगेरे वीजा पण केटलाक व्याख्याग्रन्थो लख्या छे -- प्रस्तुत चूर्णि सिवाय आ सूत्र ऊपर एक प्राकृत गाथाबद्ध भाष्य पण उपलब्ध थाय छे । ए भाष्यना कर्ता कोण छे ते काई ज्ञात थई शक्यु नथी । एनो आदि-अतनो भाग आ प्रमाणे छे- आदि-क्रयपवयणप्पणामो बुच्छ पच्छित्तदाणसखेवं । जीयव्यवहारगयं जीनस्स विसोहण परमं ॥ पययणदुपालसंगं सामाइयमाइविन्दुसारन्तं । अह व चउविहसघो जत्येव पइद्विय नाणं ।। अह वा पगयपसत्य पहाणवयण व परयणं तेण । अह व परत्तयतीई नाणाई पवयणं तेण ॥ अन्त-अप्परगन्थमहत्थो इति एसो वणिओ समासेण । पचमतो ववहारो नामेण जीयकप्पो चि ॥ कप्पन्नवहाराण उदहिसरिच्छाण तह णिसीहस्स । सुतरतणनिन्दुणवणीवभूतसारेस णातव्यो । कप्पादीए विणिनि जो सुत्तत्येहि णाहिती णितुणं । णिगदिस्सति सो एय सीसपसीसाण णहु अण्णो ।। ।। इति श्रीजीतफल्पभाष्यं ॥ ३३००॥ सं० १७२० वर्षे मार्गशीर्ष शुदि १ शुक्रवासरे अयेह श्रीपत्तने लि० श्रीमोढवाविना श्रीकाशीदासात्मजेन अवादनेन । शुभ भवतु । शिवमस्तु । 3 , चूक्या हता अने तेनी घणी जूदी जूदी पाठभेदोवाळी प्रतिओ पण थई चूकी हती । मा वस्तु- स्थिति त्यारे ज बघ वेसती बनी शके ज्यारे शीलाकाचार्य अने जिनभद्रमणी क्षमाश्रमण वच्चे कालकृत विशेष अन्तर होय । जो ए वन्नेनी बच्चे काई अन्तर न होय अने पट्टावलि लेखकना कथन प्रमाणे एमनामा गुरु-शिष्यनो ज सबन्ध रहेलो होय तो विशेषावश्यकभाष्यमा आवा पाठमेदो अने प्रत्यन्तरोनी नोंध लेवा जेवी स्थिति शीलाकाचार्यनी सन्मुस उपस्थित ज शी रीते थई शके । माटे ज्या सुधी वीजा कोई स्पष्ट साधक बाधक प्रमाण न मळी आवे त्यां सुधी शीला- काचार्यने जिनभद्रगणीना शिष्य पण मानी शकाय तेम नथी, तेम ज ते बन्ने समकालीन हता' एम पण कही शकाय तेम नथी जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणना समय निर्णय माटे हजी बीजी घणी वावतो चर्चवा जेची छे, पण आ स्थळे ते वधीनी चर्चा करवा जेटलो अप्रकाश न होवाथी हु ए बाबतनो कोई स्पष्ट निर्णय आपी शकु तेम नथी । पण, खास काई विरोधी प्रमाण नजरे न पडे त्या सुधी पट्टावलियोमा जे वीर सवत् १११५-विक्रम संवत् ६४५ नी साल एमना माटे लखेली छे तेनो स्वीकार करीए तो तेमा कशी हरकत नथी। जीतकल्पसूत्र आ सूत्र, एना नाम प्रमाणे जैन श्रमणोना आचार विषयक छ अने एमा १० प्रकारना प्रायश्चित्तनु विधान करवामा आव्यु छ । आ प्रायश्चित सबन्धी विषय छेद सूत्रो अने वीजा घणा प्रन्योमा चर्चवामा आव्यो छे। तेमा, केटलीक जग्याए ते बहु ज सक्षिप्त रीते चर्चेलो छे, तो केटलीक जग्याए घणी न विस्तृत रीते वर्णवेलो छ । एटला माटे जिनभद्रगणी क्षमाश्रमणे बहु सक्षिप्त नहीं तेमज बहु विस्तृत नहीं एवी मध्यमरीते ए विषयने समजाववा माटे आ ग्रन्थनी सकलना करी होय तेम सभवे छ । आ प्रायश्चित्चना विषयमा एक वात नोंधवा जेवी छे, अने ते ए छे, के श्वेतांबर सप्रदायना सन भागमोमा अने अन्य ग्रन्थोमा आ जीतकल्पसूत्र प्रमाणे ज १० प्रकारना प्रायश्चित्त वर्णवेळा मळे छ । पण तत्त्वार्थसूत्रना नवमा अध्यायना २१-२२ सूत्रमा प्रायश्चित्तना प्रकार ९ ज गणाव्या छे, अने तेमा, आ सूत्रमा वर्णवेला मूल, अनवस्थाप्य अने पारचिक आ छेल्ला त्रणना स्थाने, परिहार अने उपस्थापना नामना वे प्रायश्चित्त कह्या छे । दिगम्बर सप्रदायना साहित्यमा प्राय सर्वत्र तत्त्वार्थसूत्र प्रमाणे ९ ज प्रायश्चित्त मळी आवे छे। श्वेताबर साहित्यमा एक तत्त्वार्थ- सूत्र सिवाय वीजे क्याए आ प्रकार दृष्टि गोचर नथी यतो । जिनभद्गणी क्षमाश्रमण जीत- कल्पसूचनी अते एम पण कहे छ के तप-अनवस्थाप्य भने तप-पाराचिक आ बन्ने प्रायश्चित्त भद्रबाहुस्खामी पछी व्युच्छेद पाम्या छे । दिगम्बर साहित्यमा आ विचार क्याए नथी । तेम ज तत्त्वार्थमाप्यमा पण आ सपधे काई सूचन नथी । विद्वान् अभ्यासिको तत्त्वार्थसूत्रना कर्तृत्वना प्रश्ननो ऊहापोह करे त्यारे आ विषय पण तेमा विचारवा जेवो छे, ए सूचन करवा सारु अहिं मा नोध करवी उचित लागी छे । , - - जीतकल्पसूत्र-व्यारया-साहित्य आ सून ऊपर उपलब्ध थता व्याख्या साहित्यमा जूनामा जूनी कृति ते आ आवृचिमा प्रकाशित सिद्धसेनकृत चूर्णि छ । आ चूर्णि रचाया पहेला पण कोई चूर्णि ए सा ऊपर रचाएली हती एम प्रस्तुत चूर्णिमा, पृष्ठ २३, पक्ति २३ ऊपर, आमेरा उल्लेखथी जात थाय छे, पण ते उपलब्ध नथी । आ मुद्रित चूर्णिना कर्ता सिद्धसेनगणिना समयादि विषेनो निर्णय करवा माटेना साधनोविपे विशेष शोध खोळ थई शकी नथी, तेथी आ सिद्धसेन कोण अने क्यारे थया-ए प्रश्नने छेट्या वगर ज हाल तो चलावी लेबु प्राप्त छ । आ चूर्णि ऊपर जे टिप्पण आपयामा आव्यु छे तेना कर्ता श्रीचन्द्रसूरिता समयादिनो उल्लेस टिप्पणनी प्रशस्तिमा आपेलो छे, अने ते अनुमारे विक्रम संवत् १२२७ मा अणहिलपुरमा तेमणे आनी रचना करेली छे । आ श्रीचद्रसूरिए श्रायकप्रतिक्रमणसूनवृत्ति (संवत् १२२२), पचोपागवृति (संवत् १२२८), निशीविशोदेशकवृत्ति, विगेरे वीजा पण केटराक व्याख्यामन्यो लख्या छे। प्रस्तुत चूर्णि सिवाय आ सूत्र ऊपर एक प्राकृत गाथावद्ध भाप्य पण उपलब्ध थाय छे । ए भाष्यना कर्ता कोण छे ते काई ज्ञात थई शक्यु नथी । एनो आदि-अतनो भाग आ प्रमाणे छे- आदि-कयपवयणप्पणामो बुच्छ पच्छित्तदाणसखेवं । जीयव्यवहारगय जीनस्स रिसोहण परमं ।। पवयणदुवालसग सामाइयमाइविन्दुसारन्त । अह व चउविहसंघो जत्थेर पइट्टिय नाणं ॥ अह वा पगयपसत्य पहाणवयणं व पचयण तेण । अह व परत्तयतीई नाणाई पवयणं तेण ॥ - अन्त-अप्परगन्यमहत्थो इति एसो वणिो समासेणं । पचमतो ववहारो नामेणं जीयकप्पो चि ॥ कप्पव्यवहाराण उदहिसरिच्छाण तह णिसीहस्स । सुतरतणनिन्दुणवणीतभूतसारेस णातव्यो । कप्पादीए विण्णिवि जो मुत्तत्येहि णाहिती णितुण । जिगदिस्सति सो एय सीसपसीसाण गहु अण्णो ॥ ॥ इति श्रीजीतकल्पभाष्यं ।। ३३०० ।। स० १७२० वर्षे मार्गशीर्ष शुदि १ शुक्रवासरे अघेह श्रीपत्तने लि० श्रीमोढज्ञातिना श्रीकाशीदासात्मजेन अपादत्तेन । शुभं भवतु । शिनमस्तु । 3 . । - आश्विनमास, सवत् १९८२ १८ मा भाप्य, प्रस्तुत चूर्णि रचाया वाद लसायुं होय तेम जणाय छे, कारण के पूर्णिमा भाष्यनो क्याए उल्लेख थएलो नथी देखातो । चूर्णि पहेला जो भाष्यनी रचना थई होत तो चूर्णिकार तेनो अवश्य उल्लेस करत । चूर्णि अने भाप्य सिवाय, आ सूत्र ऊपर, एक संस्कृत टीका पण स्वतंत्र रीते लसारली मळे छ । ए टीका, आवश्यकसूत्रनी लघुवृति रचनार श्रीतिलकाचार्ये रची छे । ए टीकानो आदि अने अन्त भाग आ प्रमाणे छे. वन्दे वीर तपोवीर तपसा दुस्तपेन यः । शुद्धं स्वं विदधे स्वर्ण स्वर्णकार इसाग्निना ॥ जिनस्य वचनं नौमि नवं तेजस्विमण्डलम् । यतो ज्योतीपि धावन्ति हर्तुमन्तर्गतं तमः॥ निःमत्यूई प्रणिधे भवानीतनयानहम् । सर्वानपि गणाध्यक्षानक्षामोदरसङ्गवान् ।। जिनभद्रगणिं स्तौमि क्षमाश्रमणमुत्तमम् । यः श्रुताज्जीतमुद्दधे शौरिः सिन्धोः सुधामिर ॥ प्रणमाम्यात्मगुरूस्तान् घनसारशलाकये यद्वाचा । अज्ञानतिमिरपूरितमुद्घाटितं ममान्तरं चक्षुः इति नुतिकतसुकतः श्रुतरहस्यकल्पस्य जीतकल्पस्य । विवरणलवं करिष्ये खस्मृतिपीजग्नरोधाय।। श्रीमान् चन्द्रप्रभः सरिर्युगप्राधान्यभागभूत् । तदासनमलंचक्रुः श्रीधर्मपोपमरयः ।। तत्पश्रीभुजोऽभूवन् श्रीचकेश्वरसूरयः । श्रीशिवप्रभसरिस्तत्पश्रीहीरनायकः ॥ तदीयशिष्यलेशोऽहं सूरिश्रीतिलकाभिधः । अनन्यसमसौरम्यश्रुताम्भोजमधुव्रतः॥ इमामीविर्धा चूर्णे तस्याश्योपनिवन्धतः । गुरूणां संप्रदायाच विज्ञायार्थ स्वशक्तितः ॥ अकार्प जीतकल्पस वृत्तिमत्यल्पधीरपि । सा विशोध्या श्रुतधरैः सवैर्म यि कृपापरैः॥ सहस्रमेकं श्लोकानामधिकं सप्तभिः शतैः । प्रत्यक्षरेण संख्याया मानमय दिनिश्चितम् ॥ जीतकल्पसूत्रना अनुकरण-ग्रन्थ आ सूत्रना अनुकरण रूपे, पाछळना आचार्योए यतिजीतकल्प अने श्राद्धजीतकल्प ए नामना भीजा वे त्रण खतन ग्रन्थो पण लख्या छे, अने तेमना ऊपर टीका-टिप्पणी आदि केटलाक व्याख्या अन्थो पण उपलब्ध थाय छ। मा अन्थने, आ रूपमा प्रकट करवा माटे, श्रीयुत मोदी केशवलाल प्रेमचन्द भाईना उत्साह अने आग्रह ज मुख्य कारणभूत थया छे अने तेथी आ प्राचीन ग्रन्थरलना उद्धारनु मुख्य श्रेय तेमने ज घटे छे। गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर अमदाबाद -मुनि जिन विजय +जुभो, जैनमन्यावरी, पृष्ठ ५६ , परिशिष्ट -- . शीलांकाचार्य विपे वधारे विगत पाछळनां पानाओमा शीलांकाचार्य विषे केटलीक चर्चा करी छे अने तेमा में एम अभिप्राय दर्शाग्यो छे के शीलांकाचार्य घणु करीने हरिभद्र सूरिना समकालीन होवा जोईए । आ प्रस्तावना प्रेसमा गया बाद डॉ हर्मन याकोबीनी लखेली हरिभद्रकृत समराइचकहानी प्रस्तावना मारा जोवामा भावी । ए प्रस्तावनामा प्रसंगवशात् शीलाकाचार्य विषे एक ये ठेकाणे डॉ याकोबीए उल्लेस करेलो छ भने एमना मते ए माचार्य हरिभद्र करतां एक सैका पछी यया हता तेम लागे छ । प्रमाण जो के कोई नवु ए नथी आपता पण आचारोग टीकानी प्रांते जे शक सवत् ७९८ नी पति मळी आवे छे तेने ज प्रमाण मानी ए पोतानो अभिप्राय व्यक करे छ। प्रस्तावनाना पृष्ठ १. नी नोटमा ए जणाचे छ के-- In the Laghuvrtti [of Ganadhara. Sardha Sataka] V 60 Accord ing to that source and to the Pattayali of the Kharataragaccha Slılāņk was the successor of Hazıbhadra, but that is impossible, since the date of his Achārāngatiha is said to be S'aha 798=872 A D, or more than century later than Haribhadra एज प्रस्तावनाना पृष्ठ १२ ऊपर एक बीजी रीते पण हरिभा भने शीलाक बच्चे एक सैकानु भतर सूचवा ए विद्वान् लखे छे के- For according to Prof Leamann Haribhadra commented on the text in Sanskrit, but retained the Kathānalas and certain other parts of the Cūrni in the original Prabrit, while S'ilānk who flourished more than a century later, translates such passages also into Sanskrit भामाना प्रथम अवतरणमा तो आचाराग टीकाना शक संवत् ७९८ पाला उल्लेसने, ज्यां सुधी अन्य प्रमाणोथी भसिद्ध न ठरे, प्रमाणभूत मानी, खरतरगच्छ पटापलीमा जे शीलांकने हरिभद्रना दिशष्य लख्या छे देने डॉ याकोमी असभव माने छे, अने हरिभद्रनो जे समय में निर्णीत कों छे वेनो सपूर्ण खीकार करी, तेज सम यना हिसाबे, ए बने भाचार्यों वञ्चे एक सैका जेटल भतर यतावे छ । धीजा अवतरणमा प्रो लॉयमाने पोताना दशवैकालिक सूत्र ऊपरना नियधमा (Z D MG, 46 p 581 ff) जैन आगमो ऊपरना व्याख्या साहित्सना कालक्रम सबधे जे अभिप्राय जणाल्यो छे तेने अनुसरीने डॉ याकोबीए हरिभद्र अने शीलाक बचे एक सैका जेटल व्यवधान सूचभ्यु छ। आ प्रस्तावनाना वाचकोनी विशेष समजण खातर प्रो लॉयमाने दोरेला व्याख्या -साहित्यना कालक्रमव स्पष्टी फरण करवु भावश्यक छ । जैन भागमो ऊपर सौयी प्रथम नियुकि नामे प्राकृत गाथावद्ध की टिप्पणीमओ रचाई, ते पछी प्राकृत गाथामा ज विस्तृत भाष्यो रचायां, ते पछी प्राकृतबहुल भने क्वचित् संस्कृतवाला गयमा चूर्णिमओ रचाई, ते पछी सस्कृतबहुल भने कचित् प्राकृतवाला गद्यमा टीकामओ रचाई, आने ते पछी छेवटे केवल संस्कृतमा न व्याख्यामओनी रचना थई । आ प्रकारना दरेक व्याख्या-निषधोनो कालक्रम साधारण रीते एक-एक सैका जेटलो समजी लेवानो अभिप्राय ए विद्वानोनो थाय छ । उदाहरण तरीके-आवश्यक भने नदिसूननी पूर्णिना कर्ता जिनदासगणि महत्तर विक्रमना आठमा सैकाना पूर्वार्धमा थया । तेमना पछी एक सैका बाद सस्कृतबहुल एवी टीकाओ लखवानी शुरुआत करतार हरिभद्र थया । हरिभद्रे पोतानी टीकाओ माटे जो के सस्कृतमा ज लक्षवानी १ नंदिसूत्रनी चूर्णि शक सबर ५९८-विक्रमसवर ७३३ मा रचाई हती। vol 26 - - परतिनो अंगीकार फीधो हतो पण पचे पये प्रमाणरूपे जे कयानको विगेरे भापवानी जरूर पड़ी ते नेमणे पूर्वनी पूर्णिभोमायी प्राकृता ज तद्वत् तारवी लीधा । ए पछीं, एक सैका वाद शीलांकाचार्य भया जेमणे पोतानी व्याख्या मोने परिपूर्णरीते सस्कृतमा ज लखयानी शैलीनो स्वीकार कीघो। प्रो. लॉयमाने दोरेलो आ कालक्रम जो के सामान्यरीते वध येसतो जणाय छे अने जैन भागम-साहित्वना विकासकमनो इतिहास जोता ए विचार पणाभागे स्वीकारणीय पण जणाय छ। छता एमां कोक अपवाद पण दृष्टि गोचर पाय छ । दाराला तरीके इग्यारमा सैकामा शोसाचार्य उत्तराध्ययनसूध ऊपर जे टीका लसी छे ते हरि- भवनी परतीए लखी छ । गूळ सून अने नियुक्तिनी व्याख्या ज्यारे ए भाचार्य संस्कृतमा लसी छे मारे एमा भापता पर्चा कथानको प्राकृतमा ज पूर्वनी चूर्णिमांथी तद्वत् उतारी लीधा छ, भो एपी ए टीकानु यीज नाम पाइय (प्राकृत) टीका तरीके वधारे प्रसिद्ध छ । फेवल शात्याचार्य ज नहि पण तेमना पीना सैकामा पएला ए ज सूत्रना पीजा टीकाकार देवेंद्रगणिए, पण ए पद्धति अनुसरण करी पोतानी टीकामा लायी लायी कथाओ प्राकृतमा ज गुथी छ। था ऊपरथी आपणे भोई शकीए छीए के शीलाफाचार्यना समयमाटे प्रो. लॉयमान-अकित कालकम सर्वथा साधकरूप नथी । तेम ज, माचारोग टीका प्रतेि आवेलो शक संवत् पाळी पति पण विविध पाठभेदो धरावती होपाने लोधे, जेम में प्रस्तावना पृष्ठ १४ ऊपर जणाव्यु छ, तेम अभ्रान्त गणी काय तेम नी। पण ए भाचारांग टीकावाली पचिनु समर्थन करे ए जे एक बीज प्रमाण हमणा मारी दृष्टिगोचर थयु छे वेनी नोध हुँ आर्हि लऊ छु जैन साहित्य संशोधकना प्रथम भागा, २ जा अकर्मा, हिप्पनिका नामनी एक प्राचीन जैन भंथ सूचि में प्रकट करी छ । ए सूचि लगभग ५०० वर्ष जेटली जूती छे भने यहु गवेषणा पूर्वक तयार करवामां भाषी होय तेवी तेणी सकलना छ । ए सचिना २८३ क्रमांक ऊपर शीलाचार्य रचित प्राकृत मुख्य महापुरुष चार- मी नोप छ । जेनी १०००० जेटली श्लोकसया, भो ९२५ वर्षे रचना थी छे । मूलमय भद्यापि मारा जोवामां आव्यो नधी तेथी एना रचना-समयनो उल्लेख केया प्रकारको छ शकाय तेम नथी. परंतु
॥णमो समणस्स भगाओ महावीरस्स ॥
सिरि-जिणभद्द-खमासमण-विरइयं
जी य क प्प-सु त्तं
कय-पवयण-प्पणामो वोच्छं पच्छित्तदाण-संखेवं ।
जीयव्यवहार-गयं जीयस्स विसोहण परमं ॥१॥
संवर-विणिजराओ मोक्खस्स पहो, तवो पहो तार्सि।
तवसो य पहाणंग पच्छित्तं, जं च नाणस्स ॥२॥
सारो चरणं, तस्स वि नेव्वाणं, चरण-सोहणत्थं च ।
पच्छित्तं, तेण तयं नेयं मोक्खस्थिणाश्वस्सं ।। ३ ।।
तं दसविहमालोयण १-पडिकमणोभय २-३ -विवेग ४-बोस्सग्गे ५।
तव ६ -छेय ७-मूल ८-अणवट्टया ९ य पारश्चिए १० चेव ॥४॥
१. करणिजा जे जोगा तेसुवउत्तस्स निरइयारस्स ।
छउमस्थस्स विसोही जइणो आलोयणा भणिया ॥५॥
आहाराइ-गरणे तह पहिया निग्गमसुऽणेगेसु ।
उच्चार-विहारावणि-चेहय-जइ-चन्दणाईसु ॥६॥
जं चन्नं करणि जइणो हत्य-सय-बारिरायरिय ।
अवियडियम्मि असुद्धो, आलोएन्तो तयं सुद्धो ॥७॥
कारण-विणिग्गयस्स य स गणाओ पर-गणागयस्स विय।
उपसंपया-विहारे आलोयण-निरइयारस्स ॥८॥
२. गुत्ती-समिइ-पमाए गुरुणो आसायणा विणय-भंगे।
इच्छाईणमकरणे लहुस मुसाऽदिन्न मुच्छासु ॥९॥
अविहीइ कास-जंभिय-खुप-चायासंफिलिट्ट कम्मेसु ।
फन्दप-हास-विगहा-कसाय-विसयाणुसंगेसु ॥१०॥
खलियस्स य सम्वत्थ वि हिंसमणावजओ जयन्तस्स ।
नाकामि॥१०॥
Il
जिणभद्द-खमासमण-विरइयं
[गाथा १२-२६
आभोगेण वि तणुएसु नेह-भय-सोग-घाउसाईसु ।
कन्दप्प-हास-विगहाईएसु नेयं पडिकमणं ॥१२॥
३. संभम-भयाउरावइ-सहसाऽणाभोगऽणप्प-वसओ वा।
सब-वयाईयारे तदुभयमासंकिए चेव ॥ १३ ॥
दुचिन्तिय-दुन्भासिय-दुच्चेट्ठिय-एवमाइयं बहुसो।
उवउत्तो वि न जाणइ जं देवसियाइ-अइयारं ॥१४॥
सब्वेसु विघीय-पए दसण-नाण-चरणावराहेसु ।
आउत्तरस तदुभयं सहसकाराइणा चेव ॥१५॥
४. पिण्डोवहि-सज्जाई गहियं फडजोगिणोवउत्तेण ।
पच्छा नायमसुद्धं सुद्धो विहिणा विगिधन्तो ।। १६ ।।
कालद्धाणाइच्छिय-अणुग्गयत्यमिय-गहियमसढो ।
कारण-गहि-उव्वरियं भत्ताइ-विगिन्नियं सुद्धो ॥ १७ ॥
५. गमणागमण-विहारे सुयम्मि सावज-सुविणयाईसु ।
नावा-नइ-सन्तारे पायच्छित्तं विउस्मग्गो ॥ १८ ॥
भत्ते पाणे सयणासणे य अरिहन्त-समण-सेज्जासु ।
उचारे पासवणे पणवीसं होन्ति ऊसासा ॥ १९ ॥
हस्थ-सय-याहिराओ गमणाऽऽगमणाइएसु पणवीसं ।
पाणिवहाई-सुविणे सयमसयं चउत्थम्मि ॥ २० ॥
देसिय-राइय-पक्खिय-चाउम्भास-बरिसेसु परिमाणं।
सयमद्धं तिनि सया पंच-सयऽटुत्तरसहस्सं ॥ २१ ॥
उद्देस-समुद्देसे सत्तावीसं अणुण्णवणियाए।
अहेव य ऊसासा पठ्ठवण-पडिकमणमाई ॥ २२ ॥
६. (१) उसज्झयण सुयक्खन्धंगेसु कमसो पमाइस्स ।
कालाइफमणाइसु नाणायाराइयारेसु ॥ २३ ॥
निविगइय-पुरिमद्वेगभत्त-आयंबिलं चणागाढे ।
पुरिमाई खमणन्तं आगाडे, एवमत्थे चि ।। २४ ।।
सामन्नं पुण मुत्ते मयमायामं चउत्थमथम्मि ।
अप्पत्ताऽपत्ताऽवत्त-वायणुदेसणाइसु य ॥ २५ ॥
कालाविसजणाइसु मण्डलि-वसुहाऽपमजणासु य ।
निव्वीइयमकरणे अक्स-निसेज्जा अभत्तहो ॥ २६ ॥
III गाथा २७-४१] जीयकप्प-सुत्तं आगाहाणागादम्मि सव्व-भंगे य देस-भंगे य। जोगे छ?-चउत्थं चउत्थमायम्बिलं कमसो॥२७॥ (२) संकाइएसु देसे खमण मिच्छोवबूहणाइसु य । पुरिमाई खमणन्तं भिक्खु-प्पभिईण व चउपहं ॥ २८ ॥ एव चिय पत्तेयं उववूहाईणमकरणे जइणं । आयामन्त निव्वीहगाइ पासत्थ-सहेसु ॥ २९ ॥ परिवाराइ-निमित्तं ममत्त-परिपालणाइ वच्छल्ले । साहम्मिओ ति संजम-हेडं घा सव्वहि सुद्धो ॥३०॥ (३) एगिन्दियाण घट्टणमगाढ-गाद-परियावणुदवणे । निव्वीयं पुरिमहूं आसणमायामगं कमसो॥३१॥ पुरिमाई खमणन्तं अणन्त-विगलिन्दियाण पत्तेयं । पश्चिन्दियम्मि एगासणाइ कल्लाणयमहेगं ॥ ३२ ॥ मोसाइसु मेहुण-वजिएसु दव्वाइ-वत्थु-भिन्नेसु । हीणे मझुकोसे आसणमायाम-खमणाई ॥ ३३ ॥ लेवाडय-परियासे अभत्तट्ठो सुफ-सन्निहीए य । इयराए छट्ट-भत्तं, अहमगं सेस-निसिभत्ते ॥३४॥ उद्देसिय-चरिम-तिगे कम्मे पासण्ड-स-घर-मीसे य । घायर-पाहुडियाए सपचवायाहडे लोभे ॥ ३५॥ अहरं अणन्त-निक्खित्त-पिहिय-साहरिय-मीसयाईसु । संजोग-स-इंगाले दुविह-निमित्ते य खमणं तु ॥ ३६॥ २ कम्मुद्देसिय-मीसे धायाइ-पगासणाइएसुं च । पुर-पच्छ-कम्म-कुच्छ्यि-ससत्तालित्त-कर-मत्ते ॥ ३७॥ अहरं परित्त-निक्खित्त-पिहिय-साहरिय-मीसयाईसु । अइमाण-धूम-कारण विवजए विहिय मायाम ॥ ३८॥ ३ अझोयर-कड-पूय-मायाऽणन्ते परंपरगए य। मीसाणताणन्तरगया इए चे गमासणयं ॥ ३९ ॥ ओह-विभागुद्देसोवगरण-पूईय-ठविय-पागडिए। लोउत्तर-परियहिय-पमिच-परभायकीए य॥४०॥ सग्गामाहड-दहर-जहन्न-मालोहडोझरे पढमे । सुहम-तिगिच्छा-सन्यव-तिग-मक्खिय-दायगो वहए ॥४१॥ १ -- - IV. जिणभद समासगण-विरइयं [गाथा ४२-५३ पत्तेय-परंपर-ठविय-पिहिय-मीसे अणन्तराईसु । पुरिमलु संकाए जं संकइ तं समावज्जे ॥ ४२ ॥ इत्तर-ठविए सुरमे ससणिद्ध-ससरक्ख-मक्खिए चेव । मीस-परंपर-ठवियाइण्सु पीएस याविगई ।। ४३ ॥ सहसाणाभोगेणव जेसु पडिकामणमभिहियं तेसु । आभोगओत्ति बहुसो-अइप्पमाणे य निविगई ॥ ४४ ॥ धावण-डेवण-संघरिस-गमण-किड्डा-कुहावणाईसु। उकुहि-गीय छेलिय-जीवरुयाईसु य चउत्थं ॥ ४५ ॥ तिविहोवहिणो विचुय-विस्तारियऽपेहियानिवेयणए । निव्वीय-पुरिममेगासणाइ, सव्वम्मि चायाम ॥४६॥ हारिय-धो-उग्गमियानिवेयणादिन-भोग-दाणेसु। आसण-आयाम-चउत्थगाइ, सव्वम्मि छ8 तु ॥४७॥ मुहणन्तय-रयहरणे फिडिए निव्वीययं चउत्थं च । नासिय-हारविए वा जीएण चउत्थ-छट्ठाई ।। ४८॥ कालऽद्धाणाईए निविइयं खमणमेव परिभोगे। अविहि-विगिञ्चणियाए भत्ताईणं तु पुरिमहूं ॥४९॥ पाणस्सासंवरणे भूमि-तिगापेहणे य निधिगई। सव्वस्सासंचरणे अगहण-भंगे य पुरिमहूं ॥ ५० ॥ एयं चिय सामन्नं तवपडिमाऽभिग्गहाइयाणं पि । निव्वीयगाइ पक्खिय-पुरिसाइ-विभागओ नेयं ।। ५१ ॥ फिडिए सयमुस्सारिय-भग्गे वेगाइ चन्दणुस्सग्गे । निव्वीइय-पुरिमेगासणाइ, सव्वेसु चायाम ॥५२॥ अकएसु य पुरिमासण-आयाम, सव्यसो चउत्थं तु । पुव्वमपेहिय-धण्डिल-निसि-वोसिरणे दिया सुवणे ॥५३॥ कोहे बहुदेवसिए आसव-ककोलगाइएसुं च । लसुणाइसु पुरिमह, तन्नाई-बन्ध-मुयणे य ॥५४॥ अझुसिर-तणेसु निव्वीइयं तु, सेस-पणएसु पुरिमखु । अप्पडिलेहिय-पणए आसणयं, तस-वहे जं च ॥१५॥ ठयणमणापुच्छाए निविसओ चिरिय-गृहणाए य । जीएणेफासणयं, सेसय-मायासु खमणं तु ॥५६॥ , । । - गाथा ५७-७१] जीयकप्प-मुत्तं दप्पेणं पञ्चिन्दिय-चोरमणे संकिलिट्ट-कम्मे य । दीहऽद्धाणासेवी गिलाण-कप्पावसाणे य ॥ ५७ ॥ सव्योवहि-कप्पम्मि य पुरिमत्ता पेहणे य चरिमाए। चाउम्मासे वरिसे य सोहणं पश्च-कल्लाणं ॥५८॥ छेयाइमसद्दहओ मिउणो परियाय-गव्वियस्स वि य । छेयाईए वि तवो जीएण गणाहिवइणो य॥ ५९॥ जं जं न भणियमिहई तस्सावत्तीऍ दाण-संखेवं । भिन्नाइया य वोच्छं छम्मासन्ताय जीएणं ॥ १० ॥ भिन्नो अविसिट्टो चिय मासो चउरो य छच लहु-गुरुया । निव्वियगाई अहमभत्तन्तं दाणमेएसि ॥ ११ ॥ इय सव्वावत्तीओ तवसो नाउं जह-कम समए । जीएण देज निव्वीइगाइ-दाणं जहाभिहियं ।। ६२ ।। एवं पुण सव्वं चिय पायं सामन्नओ विणिदिह । दाणं विभागओ पुण व्वाइ-विसेसियं जाण ।। ६३ ।। दव्वं १ खेत्तं २ कालं ३ भावं ४ पुरिस ५-पडिसेवणाओ ६ य । नाउमियं चिय देजा तम्मत्तं हीणमयिं वा ॥ ६४ ॥ (१) आहाराई दव्वं बलियं सुलहं च नाउमहियं पि। देजा हि, दुव्यलं दुल्लहं च नाऊण हीणं पि ॥ ६५ ।। (२) लुक्खं सीयल-साहारणं च खेत्तमहियं पिसीयम्मि । लुक्खम्मि हीणतरयं (३) एवं काले वि तिविम्मि ।। ६६ ।। गिम्ह-सिसिर-वासासु देजम-दसम-घारसन्ताई। नाउं विहिणा नवविह-सुययवहारोवएसेणं ।। ६७ ॥ (४) हह-गिलाणा भावन्मि-देज हहस्स, न उ गिलाणस्स। जावइयं वा विसहइ तं देज, सहेज वा कालं ॥ ६८॥ (५) पुरिसा गीयागीया सहाऽसहा तह सढाऽसढा केई । परिणामाऽपरिणामा अइपरिणामा य वत्थूणं ।। ६९ ॥ तह घिइ-संघयणोभय-संपन्ना तदुभएण हीणा य । आय-परोभय-नोभयन्तरगा तह अन्नतरगा य ॥ ७॥ कप्पट्टियादओ वि य चउरोजे सेयरा समक्खाया। सावेक्खेयर-भेयादओ वि जे ताण पुरिसाणं ॥७१॥ , प - - VI जिणभद-समासमण-विरइयं [गाथा ७२-४६ जो जह-सत्तो बहुतर-गुणो व तस्साहियं पि देजाहि । हीणस्स हीणतरगं, प्रोसेज व सव्व-हीणस्स ॥ ७२ ॥ एस्थ पुण वहुतरा भिक्खुणो त्ति अकयकरणाणभिगया य। जन्तेण जीयमट्ठमभत्तन्तं निव्वियाईयं ॥७३ ॥ (६) आउटियाइ दप्प-प्पमाय-कप्पेहि वा निसेवेजा। व्वं खेत्तं कालं भावं वा सेवओ पुरिसो॥ ७४ ॥ जंजीय-दाणमुत्तं एयं पायं पमायसहियरस । एत्तो चिय ठाणन्तरमेगं वहज दुप्पवओ ॥ ७९ ॥ आउटियाइ ठाणन्तरं च, सहाणमेव वा देजा। कप्पेण पडिकमणं तदुभयमवा विणिदिदं ॥७६ ।। आलोयण-कालम्मि वि संकेस-विसोहि-भावओ नाउं । हीणं वा अहियं वा तम्मत्तं वा वि देजाहि ॥ ७७ ॥ इति व्वाइ-बहु-गुणे गुरु-सेवाए य बहुतरं देना। हीणतरे हीणतरं, हीणतरे जाव झोस त्ति ॥ ७८॥ शोसिजइ सुवहुं पि हु जीएणऽन्नं तवारिहं वहओ। वेयावञ्चकरस्स य दिजइ साणुग्गहतरं वा ॥ ७९ ॥ ७. तव-गव्यिओ तवस्स य असमत्थो तवमसद्दहन्तो य । तवसा य जो न दम्मद अइपरिणाम-प्पसंगी य ॥८॥ सुपछुत्तर-गुण-भंसी छेयावत्तिसु पसज्जमाणो य । पासत्थाई जो वि य जईण पडितप्पिओ बहुसो ॥ ८१॥ उकोसं तव-भूमि समईओ सावसेस-चरणो य । छेयं पणगाईयं पावइ जा धरइ परियाओ ।। ८२ ॥ ८. आउटियाइ पश्चिन्दिय-घाए, मेहुणे य दप्पेणं । सेसेसुकोसाभिक्ख-सेवणाईसु तीसुपि ॥ ८३ ॥ तव-गवियाइएसु य मूलत्तर-दोस-वइयर-गएसु । दसण-चरित्तवन्ते चियत्त-किचे य सेहे य ॥ ८४ ॥ अधन्तोसनेसु य परलिंग-दुगे य मूलकम्मे य । भिक्खुम्मि य विहिय-तवे ऽणव-पारश्चियं पत्ते ॥ ८५॥ छेएण उ परियाए ऽणव-पारश्चियावसाणे य । मूलं मूलावत्तिसु बहुसो य पसज्जओ भणियं ॥ ८६॥ - । 1 - - गाथा ८७-१०१] जीयफप्प-सुत्त VII ९. अकोसं घटुसो वा पउद्द-चित्तो वि तेणियं कुणइ । पहरइ जो य स-पक्खे निरवेक्खो घोर-परिणामो॥७॥ अहिसेओ सव्वेसु वि बहुसो पारश्चियावराहेसु। अणवट्टप्पावत्तिसु पसजमाणो अणेगासु ॥ ८८॥ कीरइ अणवहप्पो, सो लिंग-क्खेत्तर-कालओश्-तयओट (७) लिगेण दव्व-भावे भणिओ पव्वावणाऽणरिहो ।। ८९॥ अप्पडिविरओ-सन्नो न भाव-लिगारिहोणवठ्ठप्पो। (२) जो जत्थ जेण दूसइ पडिसिद्धो तत्थ सो खेत्ते ॥१०॥ (३) जत्तियमित्तं कालं (४) तवसा उ जहन्नएण छम्मासा । संवच्छरमुफोसं आसायइ जो जिणाईणं ॥ ११ ॥ वासं पारस पासा पडिसेवी, कारणेण सव्वो वि। थोवं थोवतरं वा वहेज, मुञ्चेज वा सव्वं ॥ ९२ ॥ वन्दह न य वन्दिजइ, परिहार-तवं सुदुच्चरं चरह । संवासो से कप्पइ, नालवणाईणि सेसाणि ॥ ९३ ॥ १०. तित्थयर-पवयण-सुयं आयरियं गणहरं महिड्डियं । आसायन्तो बहुसो आभिणिवेसेण पारश्ची ॥९४ ॥ जो य स-लिंगे दुट्टो कसाय-विसए हिं राय-वहगो य । राय गमहिसि-पडिसेवओ य बहुसो पगासो य ॥१५॥ धीणद्धि-महादोसो अन्नोऽन्नासेवणापसत्तो य । चरिमाणावत्तिसु बहुसो य पसज्जए जो उ ॥९६ ।। सो कीरइ पारञ्ची लिंगाओ१-खेत्तर-कालओ-तवओ य ४। (१) संपागड-पडिसेवी लिंगाओ धीणगिद्धी य ॥ ९७ ॥ (२) वसहि-निवेसण-वाडग-साहि-निओग-पुर-देस-रज्जाओ। खेत्ताओ पारश्ची कुल-गण-संघालयाओ वा ॥ ९८ ।। जत्थुप्पनो दोसो उपजिस्सह य जत्थ नाऊणं । तत्तो तत्वो कीरह खेत्ताओ खेत्त-पारची ॥ १९ ॥ (३) जत्तिय-मत्तं कालं. (७) तवसा पारश्चियस्स उ स एव । कालो दु-विगप्पस्स वि अणवहप्पस्स जोऽभिहिओ ॥१०॥ एगागी खेत्त-यहिं कुण तवं सु-विउलं महासत्तो। अवलोयणमायरिओ पह-दिणमेगो कुणइ तस्स ।।१०१॥
VIII जिणभद-समासमण-विरइय [गाथा १०३-१०१ अणवदृप्पो तवसा तव-पारची य दो वि वोच्छिन्ना। चोद्दस-पुव्वधरम्मी, धरन्ति सेसा उ जा तित्थं ॥१०२॥ इय एस जीयकप्पो समासओ सुविहियाणुकम्पाए। कहिओ, देयोऽयं पुण पत्ते सुपरिच्छिय-गुणम्मि* ॥ १०३ ॥ ॥ सिरि-जिणभद्द-खमासमण-विरइयं जीयव्ववहार-कप्प-सुत्तं समत्तं ॥ + । । *प्रत्यन्तरे सूत्रपाठे १०६ गाथा लिसिता उपलभ्यते । तत्र वत्तणुवत्तपवत्तो बहुसो आसेविओ महाणेण । एसो उ जीयकप्पो पञ्चमओ होइ नायव्यो । -इय गाथा प्रथमगाथाऽनन्तरम्, अप्पा मूलगुणेसुं विराहणा अप्प उत्तरगुणेसु । अप्पा पासत्ताइसु दाणग्गहसंपओगाहा ।। -इयं गाथा अष्टमगाथाऽनन्तरम् , सोलस उग्गमदोसा सोलस उपायणा य दोसाओ। दस एसणाए दोसा संजोयणमाइ पंचे व ॥ -इय गाथा चतुर्विंशत्तमगाथाऽनन्तर च लिसिता सन्दश्यते । एतद् गा- यात्रिय मन्यान्तरगत न तु प्रकृतसूत्रकारकृत चूादिव्यारयाद्भिस्वथैव सूचितत्वात् । । %3D ममोत्थु ण समणस्स भगयो महापीरस्य सिद्धसेणसूरिकया जी य क प्प-चुण्णी 5 10 15 ॥७॥ सिद्धत्य सिद्ध-सासण सिद्धत्य-सुय सुय च सिनत्थस्म । धीर-पर घर-चरय'घर घरपहि महिय नमह जीव हिय ॥१॥ पवारस वि गणहरे दुद्धर-गुण धारए धराहिव सारे। जम्नु प्पभवाईए पणमह सिरसा समत्त सुत्तत्थ धरे ॥२॥ दस नव-पुची अइसेसिणो य अवसेस-नाणिणोय जत्तेण । सब्ने वि सच-काल तिगरण-सुद्धेण नमह जइ गुण प्पवरें ॥३॥ पत्तो नेव्याणग' नेवाण गमयतीति निव्याणग। पगय पसत्थ-धयण पहाण ययण च पययणं नमह सया॥४॥ नमह य अणुओग धर जुग-प्पहाण पहाण नाणीण मय । सव्य-सुइ-सत्थ-युसल दसण-नाणोवोग मग्गम्मि ठिय ॥५॥ जस्स मुह निज्मरामय मय-वस-गन्धाहिवासिया इव भमरा । नाण मयरन्द तिसिया रत्ति' दिया य मुणिवरा सेवन्ति सया॥६॥ स-समय पर-समयागम लियि गणिय-च्छन्द-सह निम्माओ। दससु वि दिनासु जस्स य प णु ओ गो भमइ अणुवमो जस नाणाण पाणीण य हेऊण य पमाण-गणहराण य पुच्छा। अविसेसओ विसेसा विसेसियाऽव स्म य म्मि अणुवम मइणा ॥८॥ जेण य छे य सु य त्या आरत्तीदाण विरयणा जत्तेण । पुरिस विसेसेण फुडा निजूढा जी य दा ण क प म्मि विही ॥९॥ पर-समयागम निउण सुसमिय-सु-समण-समाहि मग्गेण गय। जिण भ द स मा स म ण समासमणाण" निहाणमिव एक ॥१०॥ त नमिउ मय महण माणरिह लोभ-जिय जिय रोस। तेण" य जीय विरइय-गाहाण विवरणं भणिहामि जहत्थ ॥ ११ ॥ को वि सीसो विणीओ आवस्सय दसकालिय-उत्तरज्झयणाऽऽयार निसीह-सूयगड दसा कप्प ववहार-माइय अग पविट्ठ याहिर च सुत्तओ अत्यओ य अहिजिऊण गुरुमुवगम्म अणुजाणावेऊण वारसावत्त कय किइकम्मो पायवडिओ ठिओ कर-यल-जुयल मत्थए ठरेउ विमवेइ-भगव! कप्प ववहार फप्पियाकप्पिय घुल्लफप्प महाकप्पसुय निसीहाइएसु छेद सुत्तेसु अइ वित्थरेण पच्छित्त भणिय । पइ दिवस च तेण असमत्थो विसोहिं काउ। मइ-चामोहो 30 य मे भवई अन्नन्न भान्येसु नाणाइयारेसु" आपत्ती का, कम्मि या क दाण दिजइ ति। 1B वरद । 2 B जत्तेण। 3 B पद। 4 B निवा०। 7 B रति च। 8 B. ओगे। 9 Bहेऊण य । 10 B विसेसे य। 11 B समणनि०। 12B तेणे। 13 B भवति। 14 B भन्नोस। 15 B.न्थे सुय। 16 Aणावियारे। 20 25 5 B सदा। 6B बहु-मय ।
। ॥ -- +-- । 15 सिद्धसेनसूरिकया [गाथा १ पढमस्स य कजस्स दसविहमालोयणं निसामेत्ता। नक्सत्ते में पीला छम्मासतवं कुणह सुझे ॥ एवं ता उग्घाए अणुधाएताणि चेव कण्हम्मिामास चउमास छमासियाणि च्छेद अमओ चोच्छ । छिन्दन्तु तय भाणं गच्छन्तु तवस्स साहुणो मूलं। अन्नावडावगच्छे अधीइया वावि विहरन्तु ॥ छन्भागगुल पणए दसभाए ति भाग अट्ठपन्नरसे। वीसाए तिभागूण छन्भागूण तु पणवीसें ॥ 5 मास चउमास छक्के अंगुल चउरो तहेव छतु । एए छेयविभागा णायन्याऽहकमेण तु ॥ विइयस्स य फजस्स तहिय चउवीसय निसामेत्ता । आउत्त नमोकारा हवंतु एवं भणिजाहि ।। एव नाऊण तहिं जहोवएसेण देइ पच्छित्त । आणाय एस भणिओ ववहारो धीरपुरिसेहिं । एवं सो आयरिओ व्ववेत्तकालभावसंघयणधिइ चलाइयं च परिपुच्छिऊण सयं गमण, सीस वाऽगीयत्थ पेसेइ, अविजमाणे वा तस्सेव पेसवितस्स निगूढमेव अतिचारविसोहि पेसेह । 10 [४] धारणाववहारो संविग्गेण गीयत्थेणायरिएण दरखेत्तकालभावपुरिस"पडिसेव णासु"अवलोएऊण जम्मि ज अवराहे दिन्नं पच्छित्त त पासिऊण अन्नो वि तेसु चेव दव्वाइपसु तारिसावराहे तं चेव पच्चित्त देइ, एस धारणाववहारो। अहवा यावञ्चगरस्स गच्छोवग्ग हकारिणो फड़गपइणो वा सविग्गस्स देसदरिसणसहायरस या बहुसो पडितप्पियस्स अवसेस सुयाणुओगस्स "उचियपायच्छिचट्ठाणदाणधारण धारणाववहारो भन्नइ । [५] पचमो जीयववहारो-सो पुण व्यखेत्तकालभावपुरिसपडिसेवणाणुवत्तिं सरीर- संघयणधीवलपरिहाणिवावेक्सिऊण तहा पायच्छित्तदाण" जीय", जो वा जम्मि गच्छे केणइ कारणेण सुयाइरित्तो पायच्छित्त विसेसो पवत्तिओ अन्नेहि य यहूहिं अणुवत्तिओ नय पडिसिद्धो । भणियं च- वत्तणुवत्तपवत्तो वहुसो आसेविओ महाणेण । एसो उ जीयकप्पो पंचममो होइ ववहारो॥ जीय ति वा करणिज ति या आयरणिज्ज तिघा एगट्ठ । जीवेइ वा तिविहे वि काले तेण जीय। सुत्ताओ पुण हीण सम अइरित्त वा जीयदाणमिति"। पंचसु वि पुण ववहारेसु विजमाणेसु आगमेण ववहार धवहरेजा, न सेसेहि। एव सुएण, आणाए, धारणाए, जाव जीयव वहारेण । पुविल्लेहिं ववहार ववहरेजा न सेसेहिं ति । फि कारण ? आगमववहारी अइसइणो सकिलिस्समाण विसुज्झमाण अवट्ठियपरिणाम वा पञ्चासमुवलभन्ति, तावइय च से दिन्ति' 25 जावइएण विसुज्झइ, सुत्तभणियाओ अहिय ऊण तम्मत्तं वा,न सुयमणुवत्तए।जे पुण सुयववहारी ते सुयमणुवत्तमाणा इगिआगार वत्त णेत्त-चयण विगाराइएहि भावमुवलक्सिऊण तिक्युत्तो अश्यार आलोयावेऊण, तं-जहा-सुओवएसेण पलिउञ्चियमपलिउञ्चिय या आलोयणाकालेज जहा आलोएजा त तहा सुओवएसेण ववहर तीति।एस सुयववहारो।" सुयाभावे माणाए वर- हार ववहरेजा। आणाववहारो वि सुयववहाराणुसरिसो केवल निगूढाइयारविसेसेण विसे. 30 सिमो धारणाववहारो वि सुयववहाराणुसरिसो, केवल सुओवएसेण उचियपयाणे वेयावच्च कराईणमणुग्गहत्थो विसेसिओ। सुयववहारेगदेसो धारणाववहारो त्ति। धारणाणन्तर जीय घवहारो। सव्वत्थ य जीयववहारोऽणुवत्तए । दव्यसेत्तकालभावपुरिसपडिसेवणाधिइसघयणा 1 B तासुग्घा० । 2 B छेय। 3 B .इता। 4 Boयगु०। 5 Bणगे। 6 A..राते । 7A. पणुवी। 8 Bणेजा। 9 .णितो। 10A .यणइ.। 11 A.रिस । 12 Aणाय। 13 B .करस्स। 14 Bउचित । 15 •B तहा तहा। 16 B पच्छित्तः17A.जीत । 18 B'य'नास्ति। 19 B जीवति । 20A जीत । 21 A जीत। 22 B सेसएहिं । देद। 24 B विका। 25 B मखे०। 26 A सुत्त । 27 A मुता। 28A.दाचि 29 A विसेसण। 30 B सितो। 31 A गुचिय। 32 A .कराणुगत्य । 33 B-गएसो। 20 23B या।
गाथा २-३ ] जीयकप्प-चुण्णी पत्तिरूव' परूवेऊण पचविहयवहारमझे जीयववहारेण पगयं । जेण सो सावेक्खो चिर 'चाणुवत्तिस्सतीति। २ 'सवरविणिजराओं' इच्चाइ । एईसे गाहाए सम्बन्धो। सीसो भणइ-'सम्मदंसण नाणचरणसवरविणिजरतवपयत्था पहाणा, ते सव्वे वि मोत्तु तवेगदेस पायच्छित्त वक्सा उमुजया किमत्थ तुम्मे त्ति?' । आयरिओ भणइ-'पारपरिपण चरणपयत्थस्स विसो- 5 हिकारण पायच्छित्त । चरणविसुद्धीए य फसिणकम्मपडलुवेल्लणाणन्तर अमावाहेकति यञ्चतिय परमसमसुहलक्खणो मोक्सो सपाविजइ त्ति काउ पायच्छित्तमेव भण्णइ ।' सवरण सवर ढकण पिहाण ति एगट्ठा। विसेसेण निजरण विणिजरण। विणिजरा सोहणमिति एगट्ट। सवरण नवस्स कम्मरस अणायाण' । णिजराए पुन्वोवचियसुहासुहकम्मपोग्गल परिसाडों। अहवा विसेसिय भण्णइ-मिच्छादसणाविरइकसायपमायजोगनिरोहो सवरो । कह 110 मिच्छत्तापरोहेण सम्मत्तपडिवत्तीए मिच्छत्तनिमित्तासवनिमित्तकम्मणो सवरण कय भवइ । एवं विरइपडिवत्तीए अविरइपञ्चय कम्म पञ्चक्खाय भवइ । तहा कसायविरजणेण तन्निमित्तयं कम्मं वजिय होइ।तहा इन्दिय विगहा" निदा मज पमायासव निरोहदारेण तप्पच्चयस्स कम्मणो निरोहो को भवइ । धावण वग्गण-डेवण लघण फोडणाइ-असुह चेट्टा निवित्तीए कायजोगास- पलद्धपवेसस्स कम्मुणो निरोहो भवइ।तहा हिंस फरसा लिय पिसुण असम्भूय डभ सढ छलाइ" 15 वायानिरोहेण तप्पचय फम्म पश्चन्याय होइ। तहा ईसाऽमरिस भय सोग मिच्छाभिसधाण राग-दोसाकुसल सकप्पाइनिरोहेण तनिमित्त कम्म यजिय होइ। निजरापुण गुत्ति समिइ सम णधम्म भावणा मूलगुण-उत्तरगुण परीसहोयसग्गाहियासणरयस्स भवइ। गुत्ती तिविहा मणाइ। समिइ पचविहा इरियाइ । समणधम्मो दसविहो खमाइ । भावणा दुवालसविहा अणिचाइ । मूल्गुणा पचविहा पाणाइवायाइ निनित्ती"। उत्तरगुणा पिंडविसुद्धिमाइया" । परीसहा बावीस 20 छुहाइया । उवसग्गा सोलस । हासा पदोसा वीमसा पुढोवेमाया दिव्या एए । हासा पदोसा चीमसा कुसीलपडिसेवणा एए" माणुसा। भया पदोसा आहारहेऊ अवञ्चलेण सारक्खणया एए तेरिच्छा। घट्टणया थभणया लेसणया पडणया एए आयसचेयणिया । सो य सवरो दुविहो-देसे सव्वे य। निजरा वि दुविहा देसे सब्वे य । जोगनिरोहकाले सेलेसि पडिवनस्स दुचरिमचरिमसमए सन्यसयरो सम्बनिजरा य । सेसफाले देससवरो देसनिजरा य । एव 25 'सवरविणिजराओं' उभयमनि 'मोक्खम्स पहो' मग्गो हेऊ मोक्सकारण मोक्खमग्गों" ति। 'तासिं' पुण सवरविणिजराण 'तयो पहो' हेऊ कारण ति। तस्स य 'तवस्स पहाणमग पच्छित्त, जेण पच्छित्ते दुवालसविहो वि तवो अणुवत्तइ । तवस्स कारण पहाण पच्छित्त। तयो कारण सवरनिणिजराण | सवरविणिज्जराजो मोक्खस्स कारणमिति । 'जच नाणस्से त्ति उत्तरगाहाए सह सवज्झए । ३ 'सारो चरणमिच्चाई गाहा। सामाइयाइयस्स विन्दुसारपज्जवसाणस्स नाणस्स 'सारो चरण'। चरणस्स पुण णिव्वाण सारो। निमाणस्स अणतरफारण चरण, कारणकारण नाण । चरणस्स कारण नाणमणतर । नाणाओ चरण, चरणाओ निव्वाण ति । नाणविसुद्धीए चरण- 30 1A पडिसेवणावत्ति। 2A पाणु० । 3A वत्तइस्सत्ति। 4 B अजुया। 5A रितो। 6 B पिहण। 7A दाण । 8 B क्म्ममलपरिसाहो। 9 A .क्मणो। 10 B हवइ । 11 A. विकहा। 12 Bछलादि । 13 B सधारण । 14 B• कुल। 15A इयराइ । 16A त्तीओ। 17 B पिंडसुद्धिमादीया। 18 Bछुहातीता। 19 A एते। 20 A हेउ। 21B क्खहेउ। 22 A नास्ति। 23 Bज्झइ । ० ne KAT 1 ६ सिद्धसेनसूरिकना [गाथा ४-५ विसुद्धी, चरणविसुद्धीए निमाणफलारत्ती भव' । चरणनिसुद्धी पुण पच्छित्ताहीणा । सो निव्वाणचरणऽस्थिणा पच्छित्तं 'नेय' जाणियव्य अवस्स' भना। ४ 'त दस विह'मियाह । तमिति यणन्तरगाहानिदिट्ट पच्चित्तं सन्यनाममद्देण सम्म ज्झइ । 'त' पच्छित्त 'दमविहं दसमेयं दसविकप्पं । त जहा-आलोयणारिह, पडिकमणारिह, 5 तदुभय-विवेगोसग्गारिहं, तवारिह, छेयारिह, मूलारिद, अणयट्टप्पारिद, पारचियारिह चेति । तत्य य आलोयणारिहं आ मज्जायाए घट्ट । का सामनाया? जह वालो जपतो फजमफज च उजुओभणइ । त तह भालोपजा माया मय चिपमुयो उ ॥ एसा मजाया। आलोयण पगासीकरण समुदापत्यो । गुरुपयन्सीकरण मजायाए । ज पाय । आलोइयमेत्तेण चेव सुझइ, एय आलोयणारिह।१। पडियमणारिह-ज मिच्छादुकडमेत्तेण 10 चेर मुज्झइ न आलोइजर; जहा सहसा अणुवउत्तेण रोलसिंघाणाइयं परिट्ठविय नय हिमाय दोसमावनो तत्थ मिच्छादुर भणइ, एय पडिफमणारिह ।२। तदुभयारिए-जं पडिसेविय गुरुणो आलोइजइ, गुरासदिहोय पडिकमा त्ति पच्छा मिच्छा' दुपाड ति भणइ, एय तदुभयारिह । ३। विवेगारिहं-चिन्चिमाणो विटीए तमइयार सोहेइ जत्य, एय वेिगारिह।४। विउसग्गारिह-ज कायचेट्टानिरोहोनभोगमेत्तेण चेव मुज्झइ, जहा दुस्सुमणाइय, एय विउस 15 ग्गारिह । ५। तवारिह-जम्मि पडिसेविए निजीयाइओ छम्मासपजवसाणो तयो दिजइ, एयं तयारिह।६।छेयारिह-जम्मिय पडिसेविए सदूसियपुव्वपरियायदेसावछेयण' कीरइनाणानि. हवाहिस दूसियंगोवगछेयणमिव सेससरीरावयवपरिपालणत्य, तहेहानि सेसपरियायरफ्पणत्थ, एयं छेयारिहं।७। मूलारिहं-जेण पडिसेविएण पुणो मव्ययारोवण रिचसेसपरियायावणयणा- णन्तर कीरइ, एवं मूलारिह । ८1 अणवट्टप्पारिह-जम्मि पडिसेविए उवट्ठावणा अजोगो, फचि 20 कालं न वएसु ठानिजइ, जाव पदविसिट्टतयो न चिपणो, पच्छा य चिण्णतयो तद्दोराोवरमओ पएसु ठाविजइ, पय अणवट्टप्पारिह।९। पारचियारिट-अञ्च गइ-पूयणेसु,' पार मञ्चइ तयाईण जम्मि पडिसेनिए लिंगखेत्तकालविसिट्टाण, त पारचियारिह ।१०। एम सरोवओ पिण्डत्थो दमोह वि पयाण भणिओ।सट्ठाणे मट्ठाणे नित्थरेण वि भासियव्यो। एएहि चेय पएहिं विवरिएहि जीयववहारो समप्पासपय जहफम निहिट्ठाण दसण्ह वि पयाण विवरण भण्णइ कमेण चेव । ५ तत्थ पढ़म पयं 'आलोयण त्ति । तस्स" सस्व निरुवणत्थ गाहा 'करणिजा जे जोगा' इञ्चाइ । 'फरणिजा' नाम अवस्स कायव्वा ! 'जे' इति अणिदिणिद्देसो । 'जोगा' इति किरियाओ सुओबइट्ठाओ सजमहेउगाओ कम्मनिजरणत्य । 'तेसु' अणन्तरनिद्दिढेसु 'उपर तस्स' पवत्तस्स। अहवा जोगा इति मण वद कायजोगा एएहिंतो किरिया अणण्णा भवती ति तस्सहचरियत्ताओ! 30 जोगो विरियं यामो उच्छाह परकमो तहा चेट्टा। सत्ती मामत्थ ति" य जोगस्स हवन्ति पजाया फायजोगो कह कायचो'। कुम्मो इन "मल्लीणपल्लीणगुत्ते सुप्पणिहियपाणिपाए । अहवा, उद्धट्ट पाय रीएजा, तिरिच्छ वा कह पाय रीएजा, साहट्ट पाय रीएजा । एव कायजोगो फरणिजोवइजोगो वि एवं करणिजो- जा यऽसचा ण पत्तघा सञ्चामोसा य जा मुसा । जा य युद्धेहि नाइण्णा न त भासेज पन्नव ॥ 1B वति। 2 Bनास्ति। 3 B होई। 4 A मिच्छामिदुः। 5B.सिमणा। 6 B नास्ति । 7 Bछेदण। 8 B'सनास्ति। 10 B विवर। 11 A.तत्य । 12 A. सत्य । 13 A. अणता। 14 A भवन्ती। 15 B चरित्तायो। 16B चि। Bइव ली.1 18 A गत्तो। 19 A नितिरि। 20 A.नास्ति। 21 B. णीयो। 25 - 9 B पूयणासु। 17 - । . गाथा ६-७.] जीयफाप-पुण्णी मणजोगो वि एवं फरणिजो-अफुसलमणनिरोहो पुसलमणउदीरणा य । निरइयारस्सेव सरोनेण मुहपोत्तियार-पडिलेहणपमजणाई जा जा सजमसामायारीगया किरिया सा सव्या फरणिजजोगसवमा होइ । अहोरत्तन्भन्तराणुट्टेया। रिहयारस्स' अदुट्टभावस्स । 'छउम- त्यस्से त्ति परोपपनाणिणो। सुओवपसाणुसारेण सेस किरियाफलावाणुट्टाणपरायणस्स । 'विसोही' फम्मयन्धनियित्ती निसल्या या। 'जरणो' जयमाणस्स अप्पमत्तस्स । 'आलोयणा । भणिया जिगिन्दगणाहरेहिं । सीसो भणइ-'निरस्यारो नियमा जई चेव हो तो किमत्यं जग्गहण ।' भण्णइ-'देउ-हेउमभावेण चक्माण फायन । निरइयारलपसणाओ चेव हेउओ सो जयमाणो जइ त्ति लभर, तेण दोण्हवि गहण । अह वा जइ ति सामन्नाभिदाण । तं निरइयारत्तणेण पिसेसिजह निरइयारो जइति । पुणो चि सीसो-'ते' य जया" उपउत्तो निरयारो य' करेइ। फरगिजायते। तो तत्थ का विसोही आलोइए भणालोइए वा?' गुरू 10 भगइ-तत्थ जा चेट्टानिमित्ता सुगुमा आसयकिरिया, मुहमपमायनिमित्ता चाअणुवरक्सिया तामो" सुज्यन्ति मालोयणा मेत्तेण' । सो पुण गुरु-सदिट्ठो असदिट्टो या पुन्य घा आलोएजा, फजसमतीए वा आरोपजा । अहवा पुबि पि पच्छा वि"आलोपचा! ६ 'आहाराइ गणे'चाइ । अणन्तरगाहाप "करणिजजोगनिद्देसमेत भणिय, सपय पुण नामग्गाह फरणिना जोगा भण्णति" । के ते फरणिजा जोगा? । इमे-आहारो आईए लेसिं 16 गहणाणताणि'आहाराइ गहणाणि'। एगवयणेण"णिद्देसो"फओ।आइग्गहणेण सेजासथारवस्थ पायपुन्छणपडिग्गहगाइ सोहिय-ओघग्गहिओ"य" सेसो उपही घेप्पह। 'तह पहियाणिग्गमेसु णेगेसु'गिलाणआयरियवालदुनलसेहसमग असदुपाओग्गो सहगहणनिमित्त गिरगमणे। गहण तु गुरामापुच्छिण-गुरणाणुनाओ, सुओवपसेण उपउत्तो, विहीप गिहिऊण, तओ जहाविही गहियमालोएन्तो सुखो। सीसो मगर-'जइ गहणे अविसुद्धी, सुद्धी य आलोइए, एव गहणमेव 20 मा फरेउ' । गुरु भणइ-'जइ गहण न करेइ सओ आयरिओवज्मायार-कुलगणसघसाहम्मि यदसणनाणचरित्ततवसजमाईण यवच्छेओ-भगो हवइ । तेणावत्स गहण विहीए फायन'। अट्वा एय सम्र आहाराइ-गहणेण गयि । इमो पुणो पहियाणिग्गमोऽणेगो भण्णइ । गुरुमूलाओ सेजाओया पुलगणसघचेइयदुविहमेय तहव्वविणासनिवारणाई।अहवा पीढ" फलगतेजासथारपाडिहारियगहियप्पणत्य" बा निग्गम फरेजा। अहया एयाइ निग्गमका- 25 रणाइ । 'उच्चारविहारावणि' ति उधारभूमि-विहारभूमीओ सण्णा-सदायसनियाओ । चेश्यवाणिमित्त आसन्न दूर घा गच्छेजा । साण पुण अपुरबास्तुय सविग्गाण यन्दण ससयवोच्छेयत्थ वा गच्छेला। आइसद्देण सहासमायगओमनविहारीण वा सद्धावद्धाव पत्य साहम्मियाण चा सजमउच्छाहणिमित्त गच्छेजा। ७ 'ज चन्न करणिज'मिचाइ । 'ज चर'ति पुनगाहाभणियानो वहरित्त ति,"त सब च 30 सहेण समुचिजइ । त च रोत्तपडिलेहणथडिलसेहनिक्समणायरियसलेहणाई हत्थसयाओ परेण ज जायरिय, तमायरित्ता ससिइगुत्तिविसुद्धि निमित्त अवस्स आलोएयव्य । ज पुण 1B जणईि। 2 A. निवत्ती । 3A नास्ति। 5A. इयारत्तणाओ। GA जहा। 7 A। B का अविसोही। 9 A नासि। 10B णिमि। 11 B तातो। 13Aणेज। 14 A भमन्ति। 15A मनो। 10 B.गणे णि A. णिहोसो। 18 B गहादि। 19 B .हियअपउग्गहि । 20 B नास्ति। 21A सेता। 22 Bसमग। 23 A वाओगो। 24 A मेद। 25 Boमादी। 26 A पीढग। 27 A प्पिणण 28A oमणका० । 30A सुय। 31 B वतिरिचए। 32 BOणादी। 33A तिमृद्धि। 4A जई। 12Bal 17 29A सन्यास।
5 सिद्धसेनसूरिकया [गाथा: ८-९. हत्थसयन्भन्तरायरियं तस्य किञ्चि आलोइजइ, किञ्चि नालोइजइ । जहा पासवणखेलसिंघाण, जस्ल निविसणुट्ठाणवियम्भणाकुञ्चण पसारणोसासणीसासचेट्टाइ किञ्चि कजं नालोइजा। पासवर्ण पुण पुव्वमापुच्छिऊण वोसिरह । 'अवियडियम्मि' अणालोइयम्मि, असुद्धो साइयारो, आलोएन्तो पुण तं कर्ज आयरियस्स सुद्धो निरइयारो त्ति भणियं होइ । ८ 'कारणविणिग्गय मिचाइ । 'कारणविणिग्गयस्स'त्तिा दुविहो निगमो गच्छाओ-कार ण, अकारणेण य । असिवमओमरायदुट्ठगिलाणुत्तिमट्ठायरियपेसणाइ कारणिमओ । चझ थुम पडिमा-महिमा जम्म-निफ्यमण-नाण निव्वाण भूमि-सन्नायग-चइग-संसडिपेहाइ निकारणिओ। कारणविणिग्गयस्स। 'च' सहो आलोयणाइपय समुच्चिणइ । निरझ्यारस्स गुत्तिसमिइविसु द्धस्स कारणेण विणिगयस्स आलोयणमेत्ताओ चेव सुद्धी होइ । सा य आलोयणा-मोहमो 10 विभागओ य । ओहालोयणा अद्धमासम्भन्तरागयस्स हवइ । तं चागयमेत्तो चेव इरियावहिया पडिकन्तो समुद्देसवेलाए आलोएइ । आलोइयमेत्ते चेव सुज्नइ निरइयारो।साय ओहालोयणा इमा- अप्पा मूलगुणेसुं विराहणा अप्प उत्तरगुणेसु । अप्पा पासत्थाइसु दाणग्गहसंपओगोहा॥ एवं विहालोयणेण सुद्धो होइ।अन्नम्मि वेलाए विभागेण अद्धमासपरेणागयस्स । विभागा. 15 लोयणा निरइयारस्स वि। एवं 'सगणाओ' कारणनिग्गयस्स आलोइए सुद्धी, 'परगणागयस्स वि यत्ति । सगणो एगसंभोइया, परगणो अन्नसभोइया । ते संविग्गा" चा असविग्गा था। सविग्गाओ आगयस्स निरक्ष्यारस्स वि अवस्समेव विभागालोयणा। आलोयणाए" य सुद्धो। 'उबसपय' ति। सा य उवसंपया" पचविहा । तं-जहा-सुओवसपया, सुहदुम्सोवसपया, खेत्तोवसंपया, मग्गोवसपया, विणओवसपया यत्तिा पचविहाए वितप्पढमयाए उवसपजमाणेण 20 निरइयारेणावि आलोयणा विभागेण दायचा । सो य आलोयणाए चेव सुद्धो । 'विहारे' त्ति एगसमोइया फडगपई गीयत्थायरिया एगाह पणग पक्स चउम्मास" सवच्छरिएसु जत्थ वा मिलन्ति तत्थ निरहयारा वि विहारालोयण देन्ति । अन्नोन्नस्स विहारे वि आलोयणाए सुज्झइ । सन्नत्य 'निरइयारस्से त्ति एय पय सम्मज्झइ । एवमेयं आलोयणारिह भणियं ।। ९ इयाणि पडिकमणारिहं भण्णइ । जेसु ठाणेसु सलियरस मिच्छादुकडारोवणा होइ 26 तट्टाणसरूव निरूपणत्य" गाहा भण्णइ । 'गुत्तिसमिइपमाय' इचाइ । गुत्ति ति तिनि गुत्तिओ भण व कायसनाओ। समिई ओइरिया भासा एसणा-आयाणनिक्खेवण"-उञ्चारपासवणाइपरि- ट्रवण-नामाओ पच । एएसु अट्ठसु ठाणेसु पमाओ फओ होजा मणेण दुञ्चिन्तियाई"। घईप दुम्भासियाइ, कारण दुट्टियाइ । इरियाए कहकहेन्तो गच्छेजा, भासाए ढङ्करगिहत्य भासाई, एसणाए मिक्सा गहणकाले अणुवउत्तो," ल पमनइ आयाण निक्सेवेसु, अप्पडि- 30 लेदिय-थडिले उच्चाराइ परिवेजा। 'गुरुणों आसायण' ति । गिणाति सस्थमिति गुरू । तस्स आसायणा कया। का? अहिलेवो" परिभवो वा जच्चाइगुणहीणस्ताआयो नाणाइतिय, तस्स साडणा अवणयणं विणासो आसायणा भण्णइ। आयरियाहिक्लेव हारेणाहिक्से- 16A 2 B गुचण। 1A निवस। 3A कय । 4 A गच्छायो। 5Bनास्ति। 6AT म्मणिक्स। 7 .यणापय। 8 .तो जइसमु०। 9 A अप्पा । 11 A 10 B .णेसु । विग्गा अ०। 12 B भालोएइ य। 13 B नास्ति। 14 Bउवस०। 15 Boइगा। पई य,Boवती। 17 A मास। 18 B विसुः । 19 B .मेत। 20A .स्सरू। 21 Aणत्या। 22 A निक्रामण। 28 B होई। 24 A ज्याए। 25 B कहतो।। 26A ०पराग. 27 A उपउत्तो। 28 A रिटा। 29 B ०६आसा० । 30Bणास 31 B भपि.32A आमो।
5 गाथा १०-१२.] जीयकप्प-चुण्णी धन्तो आय अप्पणो साडेद' तुसिणीय हुकारस्जाइ कम्माइहिं । अहवा तिविहा आसायणा- मणेण पोसाइ, वायाए अन्तरभासाइ, कारण जमलिय' पुरोगमण-सघट्टणाइ । 'विणय- भंगे" ति । विणओ अब्भुट्ठाणासणदाणअलिपग्गहवन्दणाईओ । तस्स य भगे। 'इच्छाईणम. करणे' ति।इच्छा मिच्छा तहकारो आवस्सिया य निसीहिया आपुच्छणाय पडिपुच्छा छन्दणा य निमन्तणा उवसपयाओ' य गिज्झन्ति । एयासिमकरणे।लहुसग वा मुसावायं वएजा। जहा- पयला ओल्ले मरुए पचक्याणे य गमणपरियाए।समुदेसससडीओ खुडुग परिहारिय मुहीओ। अवसगमणे दिसासु' एगकुले चेव एक-दवे या। एए सवे वि पया लहुसमुसाभासणे होन्ति ।। लहुसाऽदिपण पुण सुहुम जत्थ जत्थ पणगावित्ती । त जहा-तण-डगल छार-मल्लग-लेच इत्तिरि-उग्गहण" चिट्ठणामु"लेच इत्तिरि उग्गहणट्ठाणेसु सुत्ताएसेण मासलहु। तहावि इह लड्स गादिण्ण चेव भण्णइ लहुसमुच्छा पुण ईसीसि ममत्त जत्थ सुहम, जहा-फागाइ साण-गोण 10 कप्पट्टा"सारक्खण मुमत्ताईसु वे लहुसमुच्छा। खेत्ते ओवास"-सथार-कुलचसहिगाम-नग ररमाईसु । फाले पुर्ण मासकप्पोपरि निवासाइ । भावेण राग-दोसाइ । एत्थ जे मासलहु- यहाणा ते सधे घेप्पन्ति"। १० 'अविहीइ-फास भिय' इन्चाइ । अविहीए हत्थमदाऊण कासह मुहपोत्तिय वा। पचं जभारे छीईपसु नि । 'चाय ति पय कम्म-सहेण सम्बज्झइ । त दुविह-उड्ड उद्योयाई, अहो 15 कुच्छिय सहो। उद्योए हत्थो दायधो मुहपोत्तियावा"। कुच्छिय-सह निग्गमे पुण" पुयापकहण"- लम्बणेण । एस विही, एयच्चारितोअविही । 'असफिलिट्ठकम्म' पुण" छेयण मेयण-सघसण पीलण अमिघाय सिंचण-कायसाराइ असुसिर सुसिराणन्तर परपरभेयभिन्न । 'कन्दप्पो' पाइओ काइओ पा । 'हास' पसिद्धमेव । 'विगहा इस्थि भत्त-चोर-जणवयाइया । 'कसाया' कोहाई । 'विसयाणुसगो' सह-फरिस रस-रुव गन्धासेवणमिति । ११ 'खलियस्सय' इन्चाइ । 'खल्यिस्स' अइयारावनस्स। सोय अइयारो सहसकारकओ" अणाभोगकओ"य। 'च' सहोपडिकमणारोवण समुञ्चिणइ। 'सवत्थ वि' त्ति सधपएसु।दसण- नाणचरित्ततवसमिइगुत्तिन्दियाइसु खलियस्स ! 'हिंसमणावजओ त्ति अकरेन्तस्स जयणा जुत्तस्स । सहसकाराणाभोगलक्खण चेय- पुर्य अपासिऊण छूढे पाप" कुलिंगज पासे । न य तर नियत्तेउ जोग सहसाफरणमेय ॥ 25 अनयर पमाएण असपउत्तस्स णोवजुत्तस्स । इरियाइसु भूयत्येसु वट्टओ हो अणाभोगो॥ एव सहसकाराणामोगेहि हिंसमणावजमाणो जयणोवउत्तो अइयारमावन्नो वि मिच्छादुघड परिणओ सुद्धो। १२ 'आभोगेण वि'चाइ । 'भाभोगेणे ति परिफुडबुद्धीए वि । 'तणुएसु' थोवेसु, 'नेहा- इसु'त्ति सम्बन्धो। नेहो कप्पटुग सनि-सन्नायगाइसु । भय इहलोग परलोग-आयाण-अफम्हा 30 आजीव असिलोग मरण-सनिय । सोगो सञ्चित्ताचित्तमीसदघाण सजोगेण विओगेण य कओ होजा। 'वाउसत्त' सरीरसुस्सूसापरायणतं हत्थपायाइधोवणदारेण । 'आई' सद्देण फुसील 1 B साडेति। 6Aसं. 5A.तणोवस। 3 B भगो। 4 B या। 2A जाम.1 खपी खुइएय। 7A सासु । 10A डगरग०। 8 A एगदव्वे य। 9 Boपत्ती। 15A वास। उग्गहचिः। 13 B इसिसि। 14 B क्प्पट्ठर० 12 B चिट्ठाणाले. भवे। 17 B धिप्प। 18 B मुहवोत्ति। 19 B पायन्ति । 20 B उपुयाई। 21 B गोए हत्यो मुहपोत्तिय वा दिनइ । 22 नास्ति । 23 B पुयतावकडण । 24 B एतव्यतिरित्तो । 25 A छेयणपील्णभेयणघसण। 26 B विवहा । 27 B सहस्स.। 28 B. भोगओ। 29 A हिंसप्पमाणा। 30A उत्तस्स। 31 Aणए। 32 Boसावरणा। २जी. क.चु. 20 A. 16A - - 1 १० सिद्धसेनसूरिफया [गाया १३-१४ पासत्थो-सन-ससत्ता घेप्पन्ति । 'कन्दप्पहासपिगहा' पुधवक्याणिया । 'भाई' सहेण कसा ; यविसयाणुसंगा गहिया। सधेसु वि एएसु तणुपसु णेयध' जाणियधं । 'पडिकमण' पाय : च्छित्तं ति भणिय होइ । एयं पडियामणारिहं भणियं ॥२॥ १३. श्याणि तदुभयारिह । 'संभमभय'-उच्चाइ। 'संभमो' हत्थी-उदग-अगणिमाइओं' ।। 'भय' दस्सु मिलफ्सु योहिय मालवाइ-सगासायो । 'आउरो' दिगिंछा पिवासाईहिं । 'आवां' चधिहा-दधखेत्तकालभावावई । दद्यावई दध दुलह । खेत्तावई बोच्छिन्नमडम्याई । काला चई ओमाई । भावावई गुरुगिलाणाई । 'सहसाणाभोगा' पुषुत्ता । एएसु हिंसाहदोसमात्र जमओ वि जयन्तस्स 'अणप्पवसओ' सधेहि कारणेहि, 'सघवयाइयार' करेजा। पलायमाणो पुढविजलजलणपवणाइवणस्सइदुरुहण वा फरेजा। वितिय चउ पञ्चिन्दिय चा विराहेजा। 10 मुसावायादिनादाणमेहुणपरिग्गहराइभोयणद्धाणकप्पलेवाडाइय" चा आवजेजा। पर उत्तर गुणेसु वि। एवमाइ भइयारावनस्सावि । 'तदुभय' आलोयणा गुरुणं । पच्छा गुरसंदिट्ठो मिच्छादुफळ ति भणमाणो सुद्धो । 'मासफिए चेव' ति कयमकयं वा जत्थ परिच्छेयं काउ न तरह तमासकिय । तत्थ य सद्यपपसु वि तदुभयपायच्छित्तफारी सुज्झाइ । १४ 'दुश्चिन्तिय' इच्चाइ। 'दु'सद्दो कुच्छाभिहाणे । संजमनिराहणाजायं पुच्छियं चिन्तियं 15 दुन्धिन्तियं । एव 'दुभासियं दुञ्चिट्टिय'। 'आई' गहणेण दुप्पडिलेशिय दुपमजियगण । 'बहुसो' अणेगसो 'उवउत्तो वि न याणइ' त्ति सम्याइ । उवमोगरूवपरिणओ नि साइन संभरह पुधकालफयमइयारहाण । आलोयणाकाले 'देचसियाई अश्यार, आइग्गहणेण राश्य पक्सिय-चाउम्मासिय संवच्छरियाइयारा घेप्पन्ति । १५ 'सधेसु य' इवाइ । 'सष्ट'ग्गहणेण सधाववायट्ठाणा सूश्या । पढम उस्सागपयं 20 यिश्य अववायपय । अपराहेसु अझ्याऐतु 'दसणणाणचरणावराहेसु' । 'आउत्तस्से'त्ति कारणे जयणाप गीयत्यो आसेवओ आउत्तो भण्णइ । तस्सेवमसेसावयाय" कालाणुट्टाणपरस्स आउत्तस्स तदुभय' पायच्छित्त" होह। तहिं चेवाववायकाले 'सहसकारेण' ज कय, तं आइसइसंगहियाणाभोगेण य तदुभयमिति । पय च तदुभयारिद ॥ ३ ॥ १६ इयाणि विवेगारिई भण्णइ । 'पिंडोवहिसेजा'इन्चाइ । 'पिंडो' सघाओ असण पाण खा- इम साइम मेयभिन्नो । 'उवही' ओहिय-उवग्गहिय मेओ। सेजा' उवस्लओ।इसदेण डगलग, छार मल्लग ओसहाणि घेप्पन्ति । 'फडजोगी' गीयत्थो भण्णइ ! पिंडेसणा-चत्य पापसणा" छेय: सुयाईणि सुत्तत्यओ अटीयाणि जेण सो गीयत्थो । तेणोवउत्तण गहिय सुओवएसाणुसारोव ओगपरिणामपरिणएणं ति भणिय होइ । 'पच्छा नायमसुद्ध' । केण दोसेण असुद्ध" नाय भण्णइ । उग्गमउपायणेसणाहिं सकियमसकिय वा दोसवत्तेण 'सुद्धो' 'निरइयारो। विहाणेण' विहिणा 30 सुओवइटेण 'विगिंचमाणो' परिवेन्तो सुद्धो हवइ । १७ 'कालद्धाणाइच्छिय' इभ्याइ । 'कालाइच्छिय' पढमपोरिसीगहिय" चउत्थपोरिसिं जाय जं धरिजद । अद्धजोयणाइरेगामो आणीय नीयं वा। असढयाए सढयाए यानिगहा किट्टा इन्दि- यमाई हिं सढो, गिलाण सागरिय थडिल्ल भयाइधामणेण य" असढो । विहीए विगिञ्चन्तो सुद्धो । अणुग्गएसूरे अत्यमिए घा ज गहियमसणाइ असढेण गिरिराहुमेहमहियारयावरिष 1A एव। 2 Bअसणि । 3A. मडगा। 4 B. मावी। 5 Boहित्ति। 6 Boया 7 BOणतो। 8 B. सियाइयारे। 9A उपस०। 10 B. याद। 11B पच्छित। 12A एव च। 13 B• पाएसणा सेजाछेय० । 14 A सुयाइय । 15 Aण मुद्ध ।' 16 B पोइसी०। 17 B नास्ति । - 5 15 गाथा १८-२१.] जीयकाप-चुण्णी सनियरि उग्गययुद्धीए अणत्यमियबुद्धीए या गहिय होजा, पच्छा य अणुग्गए' अथमिए वा' नाय तो विहीए विगिश्चन्तो सुद्धो। 'कारणे' या गहिय गिलाणायरिययाल पाहुणयदुल्लहस. इस्सदाणाइ-फारणे नाणाविहे जगहिय विहिभोयणे य फए जइ त उधरिय तमो विहीर अणा पायमसलोगाध्याए विगिधन्तो । 'भत्ताई' भत्तग्गहणेण असण, थाइग्गहणेण पाण-साइम-साइ- माणि वि घेप्पन्ति । सो य एव फरेन्तो सुद्धो हवा त्ति विवेगारिह भणिय ॥४॥ १८ इयाणि काउस्सग्गारिद भण्णा-'गमणागमण इचाइ । उवस्सयाओ गुरामूलाओ या 'गमण, भागमण' याहिरामो आयरियसमीय । 'विहारो' सज्झायनिमित्त ज अन्नत्थगमण । एत्य सहिं चेय दरियावहिया काउस्सग्गो पायच्छित्त कीरइ । 'सुयम्मि' उद्देससमुद्देसाणुना- पट्टनणपडियामणमुयफ्याधगपरियट्टणाइएसु सुए फाउस्सग्गो कीरद । 'सापजसुमिणे" पाणा- इवायाइ । माइसदेण अणरजसुमिणेपि । फम्हति । 'च'सहेण दुनिमित्त दुस्सउण पडिहणण 10 निमित्त अगुस्सामुस्सग्गकरण । 'नाया' चउधिहा-समुद्दनावा, उजाणी, ओयाणी, तिरिन्छ गामिणी। बाइमा समुहे । पच्छिला तिमि नईए"। उजाणी पडिसोत्तगामिणी । ओयाणी पुण अणुसोयगामिणी । तिरिच्छगामिणी णदि हिन्दन्ती गच्छह । 'णईसतारो" चउधिहो। सो पुण पाएहिं सघ लेन-उयरिलेयेहि तिविदो होइ, वाहाउडवाईहिं य। सपत्थ 'पायच्छिस' जयणोवउस्तस्स" विदीए 'काउस्सग्गो' पायच्छित्त होह। १९ 'भत्ते पाणे' इद्याइ । 'भत्तपाणाई' पसिद्ध चेव । 'सयण' अत्थ सुप्पइ । 'आसण' जत्थ नियिसिजाइ । 'अरहन्तसेजा' चेदयघर। 'समणसेजा' पडिस्सओ। सधेसु एएसु" भत्ताइस- मणसेजापजपसाणेसु हत्यसयाओ परेण गमणे भागमणे या कए पायच्छित्त" काउस्सग्गो। सो पणुयीसुस्सासो फायघो। उच्चारिजइत्ति 'उधारों'। पस्सवतीति 'पस्सवण" । दोसु वि परिपिएमु हत्यसयन्भन्तरे परेण वा हत्यमेत्ते वि फाउस्सग्गो पणुनीसुस्मासो फजद । २० 'हत्य सय' इचाइ । अणन्तरगाहा-जुयलेण फाउस्सग्ग पच्छित्तमुत्त, त पुण फाउ स्सग्ग किं परिमाण फरेन्ति । अभो ऊसास परिमाण निस्वणत्याओ तिमि गाहाओभण्णन्ति। गाहाए पढमद्ध पढियसिद्ध । 'पाणयहाइसुमिणए' त्ति फरणकारावणाणुमईहिं सुमिणे पाणा इवाओ कहो ओजा । तत्थ ऊसाससयपरिमाण तुल्ल । 'चउत्यामिति मेहुण "सुमिणयदसणे अट्टसयऊसासपरिमाण काउस्सग्ग" करेजा। २१ 'देसियराइय' इञ्चाइ । जहाससेण ऊसासपरिमाणकणमेय । दिवसायसाण पडिक मणे पच्छिमकाउस्सग्गतिए पढमे दो उजोया चिन्तिजन्ति। पच्छिमेसु दोसु पक्केको । एवमेए चत्तारि उजोया। एसो य उजोयदण्डगो पणुचीसूसासपरिमाणेण छिजा । तओ पणुयीसा चाहि उज्जोएहि गुणिया ऊसाससय भवति । रयणिपहाय पडिफामणे पुण पञ्चास ऊसासा सयरस अद्धण होन्ति । तत्थ दोहि उजोएहि पणुयीसा गुणिजइ । पक्पपडिकमणे वारस 30 उजोया । तेहिं पणुयीसा गुणिया होन्ति ऊसासाण तिन्नि य सयाओ। चाउम्मास पडिकमणे वीसाए उजोएहि पणुनीसा गुणिजद, पचसया होन्ति । वारिसिय पडिफमणे चत्तालीसाए उजोएहिं पणुयीसा गुणिया सहस्समुस्सासाण होइ । अन्ने अट्ठ ऊसासा नमोकारे कजन्ति । अट्ठत्तर सहस्स होइ । सो य नमोकारो सवच्छरिए बहुओ कालो निधिग्घेण गओ त्ति चिन्तिजार मगलरथ पजन्ते। 2A..मिभो। 3B सतो। 4 B 'याल'नास्ति। 7-8A .मिणो। 9 B दीए। 10 A नदी। 11 A नदि स०। 12 B जइयो । 14 A पयच्छित्त । 15 A. पुण. । 16 A. पस। 17 B करेउ ति । 18 A. सुमिणोति । 19 Aसासयप० । 20 A मिहुणः। 21 B उस्सः । 20 25 तओ 35 5 Bच. 6 B 1B. गओ। नास्ति। 13 B एतेमु।
१२ सिद्धसेनसूरिकथा [गाथा २२-२७. 5 ... - । 4 २२. 'उहेस' श्याइ । सुत्ते उद्देस-समुद्देस-अणुन्नासु सत्तावीस ऊसासा उस्सग्गो कीय। सुयक्वन्धनपरियदृणुत्तरकाले य सत्तावीसुस्सासपरिमाणुस्सग्गकरणं ।' पट्ठवणपडिक्कमणे बहसासगपरिमाणुस्सग्गकरणं । आइसद्देण दुन्निमित्तावसउणपडियायनिमित्त अट्टसासमु स्सग्ग करेइ । एयं काउस्सग्गारि भणिय ॥५॥ २३ 'उद्देसज्झयणे' म्वाइ । उस्सग्गाभिहाणाणन्तर तवारिहं भण्णइ । तत्य नाणायारा, इयारो दुविहो-मोहओ, विभागओ य । तत्य विभागेण उहेसग-अज्झयण सुयक्सन्ध अङ्गाणं कमसो य परिवाडीए कमेण, पमाइस्स कालाइकमणाइसु त्ति सम्बज्झइ । पमाइगहण, काल विणय-यामाण-उवहाण-अनिण्हवण विवजया भइयारो होइ । चक्षणमेय-अत्यमेयन्तदुभयमेया.. वा कया अइयारो होइ नाणस्स । एपसिं अट्ठपहपयाणमन्नयरट्ठाणट्टिओ नाणाइयारे, वर । -1 10 अकाले सज्झायकरणं असज्झाइए वा करण, एस कालाइयारो। विणयं न पउआइजचाइएहि वा मयावलेवलित्तो विणयभंग करेइ, हीलइ वा, एवमाइ विणयाइआरो। सुए गुरुम्मि य बहुमाण भत्तीमो न करेइ । भत्ती उवयारमेत्तं । बहुमाणो ओरसो सिणेहसम्बन्धी आयरियाणं उवरि सो धान कओ। उवहाण तवचरणं आययिलाइय न करे । निण्हवणं अवलवणं । जस्स सगासे अहीयं तदुद्देसेण भणइ 'नाई तस्स सगासे अहिजिओ'। जुगप्पहाणं चा सूरि समुदिसइ, 16 सयमेव वाहिजिय भणइ । एसा निण्हवणा । वजयह जेण अत्यो तं वक्षणं । सुत्तस्स सन्ना । ते च सुत्तं मत्तऽपखरबिन्दूर्हि ऊणमइरित्तं वा फरेड, सकय वा करेइ, अनामिहाणेण वा भणइ । एस वक्षणमेओ । एवमत्थमेय तदुभयमेया वि नेया। २४ "निधिगइय'-इवाइ। उद्देसगाश्यारे निधिगइयं । अज्झयणाइयारे पुरिमई । सुयक्वं धाइयारे एगासणय । अगाइयारे आयविल । अणागाढे एय । आगाढे पुण एपसु चेव ठाणेसु 20 पुरिमहाइ-अध्भत्तट्ट पजवसाण । अत्थसुणणे वि पुरिमहाइ समण पजन्तमेपसु चेव ठाणेसु। पयं विभागपच्छित्तं भणियं । इयाणि ओहेण भन्नइ । २५ 'सामन्नं पुण' इच्चाइ । सम्मि चेव सुत्ते ओहेण अविसेसिए आयाम । अत्थे यी अविसेसिए अभत्तट्ठो। कमेण अहिजन्तो न ताव पायइ तं सुत्तं अत्थ वा परियामओ वा. न पूरह सो अपत्तो (१), अवरो अपत्तो अजोगो। तितिणिचवलचित्त गाणगणियाइ णेगदोस 26 संजुत्तो (२), अन्नोवि अपनों' वयसा सुएण वा (३) पपसि सधेसिं चेव जो चायण देइ उद्देस समुद्देसणुना या करेइ तस्स नि समण । 'च' सहेण जइ पत्तं न पाएइ सुएण, पत्त वा जोग न पाएइ, वत्तं वा वयसुएहिं । एपसिं च उद्देसणादि जो न करेइ वा तस्स मन्भत्तहो। २६ 'कालाविसजण'-इञ्चाइ । कालाविसजण कालस्स अपडिकामण । 'आई'सद्देण अणुओगस्स अविसजण । 'मटलि चसुहा' मडलि भूमी सा तिविहा' सुत्ते अत्थे भोयणे । 30 एपसि तिण्डषि अप्पमजणे निधीयं । मुत्ते अत्थे वा निसेज न करेइ । अक्से या न रणति तो समण, 'च' सहा पदण-काउसग्गे ण करेति तहावि समण चेव। २७ 'आगादाणागाढम्मि' इम्याइ । जोगो दुपिहो-आगादो अणागाढो य । मागाढे सध. भंगो देसभंगो य । अणागा वि संघभगो देसभगो य । सबभगो नाम आयंबिल न करेइ, विगईओ सेवइ । देसभंगो नाम विगई भुसेऊण पच्छा फाउस्सग करेड । सयमेव या काउ. 35 स्सग्ग फाऊण भुअर, यिगई या एगटुं गेण्डा" अभणिो"वा 1B वीईय। 2A यत.। 4 Bहाणे. । 6B तिविपियचलपि० । 7 A भवतो । 8 A 11 A - 3. . A. तिहा। T we - " गाथा २८-३० ] जीयकप्प-पुण्णी भणइ । आगाढसखभगे छट्ट, देसभगे चउत्थ । अणागाढसवमंगे चउत्थ, देसभगे आय- विल । एस नाणाइयारो भणिओ। इयाणि दसणाश्यारो भन्नइ- २८ 'संकाइयासु देसे' इथाइ । सका आइ जेसि पयाणं ताई इमाई संकाइयाई । सेम सकाइएसु अट्टसु पपसु। काणि पुण ताणि ? इमाणि भन्नन्ति । [१] मका, [२] कखा, [३] वितिगिन्छा', [8] मूढदिट्ठी, [५] अणुववूहा, [६] अथिरीकरणं, [७] अवच्छल्ल[८] अप्प भावणया । ससयकारण सका-देसे य सबे या तत्थ देसम्मि जह-तुल्ले जीवत्ते किह भरिया अभविया', अन्ने एवमाइ सकादेसे। सधे-पागय भासपद्धत्ता मा होजाऽकुसल परिकप्पिय । दिट्ठन्तो पेजकप्पट्ठो। एत्तो कखा दुविहा-देसे, सवे य योभधा। देसे कुति- त्थियमयं कखइ । पत्थवि अहिसा मोक्सो य दिट्ठो ति । सच्चे पुण कखइ सधे कुतित्थिमए' 110 दिट्टतो रायामधा सायहिया पसत्थमपसत्था । वितिगिन्छा देसे सधे य । जहा भइमो' एरिसो परिकेसो अम्हाण केसलोयाइ कीरए होजा न था मोक्खो। विदुगुभ्छा पा-विदूशाने विद् "साधव ।ते दुगुञ्छइ मण्डलि मोय-जल्लाइएहि । मूढदिट्ठी परतित्थियपूयाओ" अइसयम- याणि वा सोऊण भइवामोहो होजा । उववूहा दुविहा-पसत्था अप्पसत्था य । पसत्था साहस नाणदसणतवसजमखमणयेयायचाइसु अभुजयस्स उच्छाहवडण उववूहण । अप्पसत्या 18 मिच्छत्ताइसु । थिरीकरण पसथमप्पसत्थ च। विसीयमाणस्स चरित्ताइसु थिरीकरणं पसत्थ । असजमे थिरीकरणं अप्पसत्थ। वच्छलमवि एवमेव दुपिह--आयरिय गिलाण-पाहु- ण-असहु" चाल वुहाईण आहारोवहिमाइणा समाहिकरण पसत्य । ओसन्नाइ" गिहत्याण अप्पसत्थ। पभावणा वि एवमेव तित्थयर पवयण निधाण मग्गपभावणा पसत्था। मिच्छत्त अण्णाणाईण अप्पसत्था एव भट्ट वि वित्थरओ परूवेऊण । तत्थ सका देसे सच्चे य। एव फंखा 20 नि। एव वितिगिन्छा दुगुञ्छा वि। एव मइ[वा]मोहो वि । अप्पसत्थुववूहा ऐसे सवे य। एव धच्छल पि देसे सवे य । अप्पसत्थप्पभावणा वि देसे सच्चे य । तत्थ चउसु वि सकाइएसु देसे समण । मिच्छोववूहणाइसु य देसे" समण। च सहेण थिरीकरण-घच्छल्ल-प्पभावणे मिच्छ ताईण देसे समण। एव ओहो। विभागओ' पुण सकाइसु अट्ठसु वि देसे भिक्खुस्स पुरिमह। घसभस्स एकासग । उवझायस्स आयविल । आयरियस्स अभत्तहो । 25 २९ 'पवचिय' इच्चाइ । एव" चेवाणन्तरहिट्ट पुरिसनिभागेण पच्छित्त पिह पिहं । जहणं साहण" उबवूहण न करेइ । आइसदेण थिरीकरण वच्छल पभावण या पवयणजइ"माइयाणण फरेइ । मिक्खुस्स पुरिमहं । वसभस एकासणय । उवज्झायस्सायविल । गुरुस्स भभत्तट्ठो। एय पढमद्धवक्खाण । पच्छद्ध पुण उवरिमगाहाए सम्बज्झइ । सा य एसा गाहा- ३० 'परिवाराई' इच्चाह । परिवारनिमित्त'ति सहायनिमित्त तिज भणिय होई । 'आई'-30 सद्देण आहारोवहि निमित्त वा तप्पसाएण आहारोवहि-सेजाओ वा लभिसन्ति ति का पासत्योसनकुसील्ससत्ताहाछन्दणियाण"उपरि ममत्त करेइ । सावग-सन्नायगाण या सधेसि 1B विगिंछा। 2A अण.1 3B अप० । 4 B'L' नास्ति। 5 B. विए। 6B 11 B विदव । 12 A पागइय। 7 B तित्थः। 8 B विइन्ज्छिा। 9A इइमो। 10 BI पूयाअइ. । 13A मिच्छाइसु । 14 B था। 15 B •णग ससु असहु। 16 Boदीण। 17 A. ०पण। 18 A एमेव। 19 B .त्तऽना। 20 B विगिंडा। 21 B •पूरा देसे। 22 A 27A विभागाओ। 128 Bएगास० । 24 B एय । 25 A जइ साहू। 26 B आदि । जति। 28 B सहस्स । 29Bएगास। 30B.ज्यति। 31 B .दनीहाण।
सिद्धसेनसूरिकया [गाया ३१-३४. 5 वा परिपालण सम्भोग-संचास सुत्तत्वदाणाणि । जइ करेइ वच्छल्ल तो भिक्षुणो णितीय'। घसभोवज्झायगुरूण' पुरिमेगासणायामाइ जहासंसं । अह पुण इममालम्यण करेइ । 'साहम्मि। ओ'त्ति एसो सजम वा करेसई । 'या'सहेण कुलगणसंघगिलाणकजाइएसु पडितप्पिस्सा ति। एवं विहाए बुद्धीए सद्यहि सुद्धो। एव दसणायारपच्छित्त भणियं ॥ श्याणि चरित्तायारपच्छित्तं भन्नइ- ३१ 'एगिदियाण' इयाद । एगिन्दिया पुढवि आउ तेउवाउ पत्तेयवणस्सई । पपसि पंचण्ड वि पि पिहु सघट्टणे निधोइय' । आउकायस्स सघट्टणे घड गोलंकय-बारगाइ टियस्स, पायहत्थाइचालियस्स ईसि परियायो, पुण गाढतरचालियस्स उवण । पिटु परितायणहणणपा णाईसु । एपसिं च परितावणा दुविहा अणागाढा आगाढा य । तत्थ अणागाढाए पुरिमह । 10 आगाढाए पासणयं । उदवणे' पुण आयाम पंचसु वि । ३२ 'पुरिमाई' इच्चाइ । अणन्तवणस्सइ विय तिय-चउरिन्दियाण संघट्टण अणागाढ आ गाढ परिताव उहवणेसु पुरिमाइ-समणन्तं जहाससं। पश्चिन्दियसघट्टणे एकासणयं । अणा गाढ परितावणे आयाम । आगाढपरितावणे समणं । उवणे एककल्लाणग। पमायसहियस्स। ३३ 'मोसाइस' इवाइ । मुसावाय-अदत्त परिग्गहेसु मेहुणवजिएसु! दाइपभिन्नेसु 15 त्ति । मुसावाओ चउधिहो-वधखेत्तकालभावेहिं । दधओ जहण्णमझिमुक्कोसो । एव सेत्त कालभायेसु नि तिविहो । एच"जहा मुसायाओ चउधिहो पुणो य एकेको तिविहो। तहाऽदत्त परिग्गहा चि । एत्थ य दवाइमेयभिन्ने चउधिहे वि" मुसावाए जो जहन्नमेओ तहिं सपत्य एमासणय, मज्झिमे सधहिं आयाम, उक्कोसे वि चउधिहे समण। एवं अदत्त परिग्गहेसु घि पच्छित्तं दाय। ३४ 'लेचास्य' इवाइ । लेवाडय परिवासे" अम्भत्तहो । सुफसन्निहिपसु वि-संठिहरसह घाडगाइसु अब्भत्तट्टो । श्यरा गिल्लसन्निही-गुलककयधयतेल्लाई तीए छठें। सेस निसिभत्ते अट्टमं । ओहसुत्ताओ"जमन्नं त सेस । किं चोहमुत्तं ? पढमभगो सेसा तिनि भगा सेसनिसि भत्तसहेण भवन्ति । एपमेयं मूलगुणाइयारे मेहुणवजिए पच्छित्तं भणियं । मेहुणाइयारस पुण मूलहाणे भणिहिई। इयाणि उत्तरगुणाइयारपच्छित्तं भन्नइ । ते य उत्तरगुणा पिंडविसोहीयाईया। तत्थ पि. डविसोही तितु ठाणेसु हवइ । उग्गमे उप्पायणाए पसणाए य । तहा सजोयणपमाणइंगाल, धूमकारणविभागेण य विसुद्धी भवइ" । एरथ य उग्गमो सोलसमेओ । ते य इमे सोलस मेया माहाकम्माई पत्थ सोलससु दोसेसु जत्थ जत्थ सरिसं पच्छित्तं त तं दोस गाहाए सपिंडिय' काहयइ । तहा उप्पायणाए वि सोलस । तत्थ जे सरिसपच्छित्ता ते समुचिणइ । एच एसणा-, 30 दोसेस वि दससु सरिसट्ठाणाई उवसंहरद । एगट्ठी किया। एए सब्ने वि पिंडनिजुत्तिणुसारेण भाणियष्टा । इह पुण पच्छित्तमेव केवल विहिजइ । आहाकम्मे खवणं। उद्देसियं दुविहं-ओहे. विभागे य । परिमियभिक्खदाणरुवं ओहो सामनमेगपगार अपिसेसियं तस्य पुरिमहं । विभागे तिनि भेया उद्देसो, कड, कम्म । एए" तिनि वि पत्तेय 1B निव्वीइय। 2 A. घसमोरझाय। 3 B करिस्सइ। 4 A तप्पस्सइ । 5 A. विश्य । 6A. भाउपायसंपट्टण | 7A बोदवणे। 8 B परियावण। 9 B खवण। 10B परियाये । 11 Bएव जरा। 12 A.'वि' नास्ति। 13 A वासेइ। 14 B ओहमुत्ता । 15.Bहोइ ।' 16 B कामाती। 17 A. एएसि। 18 A. नि । 20 25 . .
- 10 15 गाथा ३४ ] जियफप्प-चुणी १५ घउहि मेपहिं मिजन्ति । त जहा--उद्देसुद्देसिय, उद्देससमुद्देसिय, उद्देसाएसिय, उद्देमस. माएसिये। एएमु विमेपसु पुरिमद । कसं, फडममुद्देस, कडाएस, फडसमाएम । एएसु पि चउसु पिमेएसु एफासणय । तहा फमुद्देस, फम्मसमुद्देस, फम्माएस, फम्मसमाएस । तत्व पढमें आयविलं । सेसेसु तिमु मेएसु अम्भत्तट्ठो। पूय दुपिह-सुहुम यायर च। मुटुम धूमाइ । यायर उवगरणे भत्तपाणे य । तरथ उप 5 गरणपूरए पुरिमह । भत्तपाणदए एमासणय । मीसजायं तियिह-जापंतियमीसजाय पथ आयचिलं । पासटमीसजाए साहुमी. सजाए यापमणं। टयणा दुरिक्षा-इत्तिरिया तत्थ निधीश्य । चिरठवियाए पुरिमह । पाड़िया नि दुविधा सुद्धमाए निधीश्यं । थायराए खमण ! पायोकरणं दुबिह-पागडफरणे पुरिमद । पगासफरणे आयाम । कीयं दुयिद-दधे भावे या दो दुयिह-आयकीय, परकीय च । एत्थ दोसु वि आ- याम | भावे यि आयफीय परकीय च । भाषायकीए आयाम। भावपरकीए पुरिमह। पामिथ दुयिह लोइय एत्य आयाम, लोगुत्तरिए पुण पुरिमह । परियट्टिय दुविध-लोदए आयाम, लोगुत्तरिय पुण पुरिमह । आहई दुविह-सग्गामओ', परगामओ य । सग्गामाइडे पुरिमहं । परग्गामाहढे सपथ पाए चउत्था परग्गामाइडे निप्पयवाए आयाम । उम्भिण्ण दुनिह पहरउम्भिन्ने पुरिमह, पिहिओम्भिवफवाडे आयाम । मालोहर दुबिह-जहले पुरिमह, उगोसे आयाम । अच्छे तिविह-पहुअच्छेनं, सामिअच्छेज, तेण अच्छेज' । तिज वि आयाम । अगिसह तिविध-सादारणाणिसह, चोल्लगाणिसट्ट, जहाणिसटुं । तिसु वि आयाम । मझोयरो तिविदो-जावतिय पासडियमीसो, साहुमीसो। एत्थ जावतिए पुरि- मह, इयरेसु दोसु वि एकासणय । पव उग्गमदोसेसु पायच्छित्त भणिय । इयाणि उप्पायणाप' पायच्उित्त भन्ना-धाई पचविहा, सत्य आयाम । दुई दुविहा- सगाम परग्गामा, दोसु वि आयाम । निमित्त तिविह-तीए आयाम, वहमाणे यणागए य 25 समण । आजीचे जाइधुलाइभिने, सवय आयाम । घणीमए नि सधस्थ भायाम । तिगिच्छा दुपिहा-मुहमाए पुरिमा, यायराए" आयाम । कोहे माणे आयाम, मायाप एका सण, लोमे समण । सथवो दुविहो-पुब्धि सथयो, पच्छामथयो या। घयण-सथवे पुरिमहं, सम्बन्धि संथवे आयाम | विजाए आयाम । मन्ते आयाम । चुण्णे भायाम । जोगे मायाम। भूलकम्मे मूल। इयाणि एसणादोसेसु पच्छित्त भण्णइ-ते य इमे दस सकियमाईया । तत्थ सकिए धाभंगो-सक्रियगादी सक्रियभोई चरिमो णिस्सकिओ" दोसविसुद्धो, वीभो" वि विसुद्धो घेव । पढमतइए" सकियभोई। जदोस सका तस्स चेव पच्छित्तमावइ । सचित्तमक्खियं तिविह-पुढवि-आउ-यणसह । तत्य पुढाविससरसमक्सियहत्येण निधिगइय" 1 मीसकोण पुरिमह । निम्मीसकहमे आयाम | मटिया मोस-हरियाल हिंगुल्य मणोसिला मजण लोण 35 3B 'च' नास्ति। 4 B .माओ। 5 Bअच्छिज। A. साधारण अणिसट्ट। 7 A यणेए । 8 Bधाती। 9A वट्ठमा०1 10 B घणीमगे। 12 Bएगासणग। 13 Boमादीया। 11B भोती। 15A Tीसं.1 16A वि. इमो पिमु.। 17 A ततिए। 18 BIHठवीयय । 20 30 1A भिज। 2 B पढमए। II A. पाय।
सिरसेनसूरिकया [गाथा २४० - गेल्य-धन्निय-सेडिय-सोरट्टिय मक्मिए फरमचे सवत्थ पुरिमई। एयं पुढविमपिसय । झ्याणि आउमक्सियं भन्नइ-ससिणिन्द्र निधिगइयं । उदउल्ले पुरिमह । पुरकम्म पच्छकम्मे आयामा पयंाउमक्पियंभणियं। याणि धणस्सइमविपय भन्नइ-सोय वणस्सई दुनिदो-परिचो,अण म्तो थ । परित्ते तिनि मेया-पिट्ठ, रोह', फुफुसा । उकुटुं चिंचाइ । एएहि मक्सियहिं तिहिं पि, । पुरिमह। अणन्ते विएपहिं चेव तिनि मेया। पत्य पचासणय । पयं सच्चित्तमक्खिय भणिय । याणि अचित्तमतिपय भन्ना-तं दुविह-रहिय-मजायमक्सिाए मायाम । अगरहिय-ससन मक्खिए आयाम । एय मक्खियं भणियं । इयाणि णिक्खित्तं भन्नइ-पत्य चउभगो सचिचे सचित्तं निक्खित्त । एत्य तहए पच्छित्तं । तं च सचित्त छकाया-पुढयी-आज-तेज वाऊ परित्तवणस्सइकाऊ तसाण च । सप्पित्ताणमपान्तर निखित्ते भायाम । एपसिं चेव सञ्चित्ताग। 10 परपरनिक्विचे पुरिमह । एएसिं चेव मीसाणमणन्तर निक्सित्ते पुरिमह । एएसिं चेव मीसाग परपरनिक्सित्ते निधीय । अणन्तवणस्सइ-सञ्चित्ताणन्तरे समणं । एयस्स चेव परपरेण एका सणय । अणन्तवणस्सइ मीसाणन्तरणिक्खित्ते एकासणयं । एयस्स चेव परपरनिश्यिते। निष्टीयं । पिहिए चउभगो। तत्थ तइए पच्छित्त। अचित्तेण गुरुणा पिहियस्स, सचित्रण पुढवी आऊ तेजचाऊ परिसवण तस सचित्तेहिं अणन्तर"पिहिए आयाम । पहिं , नेव परपरपिहिए पुरिमहं । एएहि चेव मीसेहिं अणन्तर पिहिए पुरिमहं । एएहि चेव परपरे 16 निधीय । अणन्तवण-सचित्ताणन्तरपिहिए समण । तेण चेव परपरपिटिए पकासणय । अणन्तव पस्सइ मीसाणन्तरपिहिए एक्कासणय। एएण चेव परपरपिहिए निचीय । गुरु अचित्तपिहिए खमणं । इयाणि साहरिय भन्नइ । एत्थ वि चउभगो।तत्थ पुढवि आऊ तेऊ वाऊ परित्तवणस्सा तससचित्ताणन्तरसाहरणे आयामा एएहि परपरसाहरणे पुरिमहा एपहिं चेव मीसाण अणन्तर 20 साहरणे पुरिमई । एएहि चेव मीसाण परपरसाहरणे निधिइय"अणन्तवणस्सइसचित्ताणन्तर- साहरणे खमणं। एएहि चेव" अणन्तयणस्सइपरपरसाहरणे पफासणय। अणम्तवणस्सइमीसाण न्तरसाहरणे एकासणय । एयस्स चेव मीसपरपरसाहरणे निधिइय । वीयसाहरिए निधिगइयं । अचित्ते अचित्तं साहरिए पुरिमटुं । अह गुरुसाहरिए तो समणं । इयाणि दायारोत्ति भन्नइ-- थाले बुद्ध मत्ते उम्मत्ते चेव णेजरिए अन्धे एएसु दिन्तेसु गहणे आयामं । पगलन्तकुठे समण । पाउयारूढे वि खमण । हत्थे"दुइए नियलयद्धे य हत्थन्छिने य पायच्छिन्ने यमपुसके गुधिणी पालवच्छाए भुलन्तीए विरोलन्तीए भजन्तीए कंडन्तीए पीसन्तीएएयासु सघासु मायाम। पिंज न्तीय रूपन्तीए कत्तन्तीए पमहमाणीए पुरिमह। छायवग्गहत्था समणहा णिपिखवितुते चेय"। गाहन्ती घट्टन्ती सघट्टन्ती आरमन्ती। एयासु सट्ठाणे नी० पु० ए० मा० अभ० कलाणग। एय सहाणं। ससत्तेण दवेण लित्तहत्थाय लित्तमत्ता य आयाम, सेसेसु पुरिमह । ओयत्तन्ती" साहारण च पेन्तीए चोरियग देन्तीए पाहुडिय"ठवेन्तीए सपञ्चवायाप पर च उहिस्स आयाम ॥ इयाणि उम्मीसं भन्नइ-परित्तवणस्सइसचित्तउम्मीसे आयाम । एएण चेव परित्तण मीसेण उम्मीसे निधिइयं । अणन्तसचित्तउम्मीसे समणं । एएण चेव अणन्तमीले निधिइय । यीउम्मीसे निष्तिश्य । अह पुढवाईहिंतो जहा णिक्खित्ते। इयाणिं अपरिणयं भन्नई-तं दुविह- दधे भावे य । दधे अपरिणय-पुढवि आउ तेउ-चाउ परित्तवणस्सइ अपरिणए आयाम । अण 25 30 1B नास्ति। 2 A अणतेहि। 3 B एगाराणग । 4 A इद वास्य पतितम् । 5A ततिए 6A मीसाणतर० । 7A. परंपरे। 8 B एगासणग। 9 A ततिए। 10 A अणतरे। 11 B निम्वीय। 12 A. एतद्वाक्य नास्ति । 13 B दायगेत्ति। 14 B हत्थ । 15A सये। 16 B रुचनीए। 17 A चैव । 18 Aहिती । 19 A नास्ति। 20 A संघहमारभतीए। 21 A मोयततीए। 22 डियग। 23 A पिउ० ।। । न A गाथा ३५-४६.] जीयफप्प-पुण्णी १७ 10 15 स्तषणस्सइ मपरिणए खमणं । पत्थ य चउभगो दधे अपरिणयं, भाषे वि अपरिणय । मावा परिणय दोण्हं पि भुञ्जमाणाणं, पस्य विपुरिमह । इयाणि लिच भन्नर--संसत्तेण हत्येण धा मत्तेण पा' आयामं । इयाणि छमियं भन्नइ-पुघि भाउ तेउ पाउ परित्तपणेलु आयाम । अण म्तयणेसु खमण । एए एसणा दोसा। सजोयणा दुविहा-पाहि भायणे, अन्तो घयणे। दोह घि घमणं । परिमाणाइरित्ते । आयाम । सहगाले समणं । धूमे मायाम । अफारणे भुखर आयाम । कारणे अभुखमाणस्स आयाम । घासेसणा दोसा पए। पयस्मि पच्छित्तपरथारे- ३५ 'उहेसियचरिमतिए' इच्याइ गाहा। | पयाओ दोषि गाहामो जेसु जेसु ठाणेतु ३६ 'अहरं अणन्त' इवाइ गाहा। अम्भत्तट्ट तेन्जु तेसु ओयारिजन्ति । ३७ 'कम्मुद्देसिय' इवाइ गाहा। एयाओ दोवि जेसु जेसु ठाणेसु आयाम तेच तेच ३८ 'अइर परित्त०' इवाइ गाहा। ओयारिजन्ति । ३९ 'अज्होयर' गाहा । पगासणयट्ठाणेतु ओयारिजह । ४० 'ओह विभागा' इञ्चाइ गाहा । एयामो तिण्णि गाहाओ जेसु जेसु ठाणेसु पुरिमह ४१ 'सगामाहड' इयार गाहा । ४२ पत्तेय'मिधाइ गाहा। (तेस तेसु ओयारिजन्ति। ४३ 'इत्तरठविय' इयाइ गाहा । एसा निविईय जेसु जेसु ठाणेसु तेसु तेसु ओयारिजह । ४४ 'सहसाणाभोगे' इभ्याइ । सहसाणाभोगा पुषुत्ता । तेसु सहसाणाभोगेसु पट्टमा णस्स जेसु जेतु कारणेसु पडिकमणं भणिय तेसु तेसु चैव कारणेसु आभोएण जाणमाणो ज करेइ, अइयहुसो पुणो पुणो अप्पमाणेण पा करेइ, सव्वत्य निधिगहय । ४५ 'धावणडेवण' इञ्चाइ । धावण गइमेदो । वेवण उल्लडण । संघरिसेण गमण-20 को सिग्धगइ ति, जमलिओपागच्छ । किला अहावय-चउरंग जयाइ । फुहावण इन्दजाल पहखेबाद । आइसहेण समास पहेलिया कुठंडगा घेप्पति । उपट्टी पुकारिय कलकलो । गीय गीयमेव । छेलिय सेंटिय । जीवस्य-मयूर तित्तिर-सुग-सारसादिलविय सोसेतेसु अष्भत्तहो । आइसहेण अजीवस्ये वि-अरह गडिया पाउया-सहेसु वि । ४६ 'तिविहोवहिणो विघुय' इवाइ । तिविहोवहिणो-जहन्नो मज्झिमो उकोसो । मुहपो 25 त्तिय पायकेसरिया गोगोपतवणच एस चविहो जहन्नो। मज्झिमो छधिहो-पडलार यत्ताण पत्तायधो चोलपट्टो मत्तओरयहरण च।उकोसो चउधिहो-पडिग्गहो, तिन्नि पच्छाया । एए मोहियस्स थेरकप्पे चोइसमेया भणिया। इयाणि उवगहिओ थेरकप्पो"तिविहो भन्नइ- जहन्नो मज्झिमो कोसोपी नडगा पमजणी घडगा उगलगा पिप्पलग सूई नहरणी द्त कण्ण सोहणग दुग, एसो जहन्नो । वासतापाइओ मज्झिमगो। यासताणा पच 80 इमैपालो मुत्तो सगो" कुडसीसग छत्तए चेव ॥ तेहिं य दोनिओ ओहोवहिम्मि वाले य सोत्तिए चेव । सेसतियवासताणे पणयं तह चिलिमिलीण इमं ॥ 2A हत्थे मते वा। 3 A 'भुई' नास्ति । 10B पप्पो। 7 A उकुटिय। यप्पे। 12 A पाले मुत्ते सूई। 13 Bओहोविहि । ३जी० क.o - 1A.तु। 6A फुटा.. 4B गति। 9 B पच्छागा । 5 Bउमण । 11 B 8 B सिंटिय। , सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ४४५० . -- पालमाई सुचमई पागमई ताहय संटफठगमई। संधारगदुगमासिर मुसिरं मियं बडपणा च ॥ संट विउंडगलहि विलट्टी सह नालिया य पंचमिया । अवलेहणि मत्त तिगं पासवणुभारलेले २ चम्मतियऽत्युर पाउरतलिंगभावाविचम्मतिविमिमोफतीतलियाषभा पट्टगद्ग व होम संथारुत्तरपट्टों अहया समाहपहपहथी । मझो अजाणं पुण अपरित्तो पारगो हो । 6 सवा संथारो धा दुविधो एगंगियो य इयरोया। वियप पोत्थपणगंफलग तह होर उमोसो एस अजाण साहणं चोग्गहियो भणिओ। याणि अजाणं घोहियो भना । जो चिर्य थेरफप्पियाण ओहोवही चोइसविहो सो चेय अजाणं पि । नवर- अजाणं पस चिय चोलट्ठाणम्मि कमळगं नवरं । अन्नो य छलग्गो इमोपही हो तासि पि । ओग्गहणन्तगपट्टो अटोगचलणिया य वोधधा। अम्भिन्तरयाहि नियसणीय तह कंचुए चेष 10 उपाच्छिय घेकच्छिय संघाती चेव संधकरणी या मोहोवदिम्मि पए अजाण पनवीसाओ। पत्थ अजाणं जहनो जो चेय साहूण ओदिओ चउधिहो। उयोसो अट्टविदो-चउरो चेष पुषुविट्ठा जे साहणं । अन्ने य इमे चउरो-भिन्तरवाहिनियसणीय संघाडी संधकरण एसो उदोसओ उ अजाणं । तेरसपिहो उ मझो इणमो उ समासमो होइ॥ पत्ता वधाईया चउरो ते चेव पुष्पनिहिट्ठा । मत्तो य कमढगं घा तह मोग्गहणन्तगं चेव ॥ 15 पहो अहोरूविय चलणिय तह कंचुगे य उकच्छी। चेफच्छी तेरसमा अजाणं होई णायदा जहन्नोवहिम्मि विधुए' पलिए पुण लखे निधिईय। मज्झिमे पुरिमहं । उकोसए एकासणय 'विस्सरिया पहिए'त्ति-पडिलेहिउ विस्सरिउत्ति भणिय हो । जहन्ने अप्पडिलेहिए निधि मज्झिमे पुरिमह । उमोसे एकासणयं । 'विस्सारियानिवेयणेति निवेहउ' विस्सरिय ति आयरियाईण तिविहीं वि। तो एव चेव पच्छित्त । अह पुण सधोपही विभुः 20 पुणरवि लयो । पडिलेहिउ वा विस्सरिओ। निवेइ चा विस्सरिओ सधो चेव, तो आयाम २७ 'हारिय घो'इम्याइ । हारिए जहन्नोवहिम्मि पपासणयं । मज्झिमे आयामं । उनको चउत्थ स्वोए वि एवं चेव पच्छित तिविह। उग्गमेन निवेइए । जाणन्तो वि जहा न यह परिग्गहिउ आयरियस्स अणिवेइओ उवही । तस्सानिवेझ्यस्स तिविह एय चेव पच्छित्त अदिन वा आयरियाईहिं जहन्नाइ मेय उवहिं परिभुञ्जह एवं चेव तिविहं पच्छित्तं 26 दिन्नं वा उवहिं जहमाइ मेयं आयरियाईहिं अणणुशाओ अन्नेसि देइ । एत्य वि एव पच्छित्त तिविहं । अह पुण सप्टोवहि हारेजा। सधोवहिं वा उद्यद्धे धोवेजा । सधोवहिर उगमेउ न निवेएइ । सरोवहिं वा अदिन्न परिभुखइ । सधोवहिमणापुच्छाए अणणुनाउ वा अन्नेसिं देह । एव सघहारवणाइपसु परसु जीएण छट्ट। ४८ 'मुहह्णन्तय' इञ्चाइ । मुहणन्तए फिडिए ओग्गहाओ निधिईय। रयहरणे अन्भत्तहो 30 एव ताव अणटे । अह पुण नासिय हारवियं वा पमाएण मुहणन्तय तो से चउत्था रयहरणे छटुं ४९ कालद्धाणाईए' इचाइ । विगहाइपमारण" कालाईय करिन्ति भत्ताइ निधिहर अह पुण परिभुअन्ते चउत्यं । एवं अढाणाइकमे वि अपरिभुजन्तस्स निधिईय, परिभुजन्तर अम्भत्तहो । पारिट्ठावणिय सधमेवाविहीप विगिञ्चिन्तस्स भत्ताइ परिमई । ५. 'पाणस्सासवरणे' इन्चाइ । पाणाहारासवरणे । भूमि 36 कालभूमि । एगतर अपडिलेहणाए वि" निधिईयं । चउधिहाहारास पोरिसियाइयं पचम्पाणं ण गेण्हइ, गहियं वा पथक्खाणं मजइ 1B पुस्तके 'मई स्थाने सर्वन 'मती' पाठ । 3B 5B न्यो। GB चोरगहाणमि। 7 A निवे 11 A पमाएण। 12 A. "वि' नास्ति । - - , पणाइस।
गाथा ५१-५६.] जीयकप्प-चुण्णी १९ ५१ 'एय चिय' इश्चाइ । एय चिय पुरिमह । सामन्न अविसेसिय ति भणिय' होइ । तवो यारसपिहो । पढिमाओ वारस-मासिया, दोमासिया, तिमासिया, चाउमासिया, पञ्चमासिया, छम्मासिया, सचमासिया, पढम सत्तराइन्दिया, दोश्च-सत्तराइन्दिया, तझ्य-सत्तराइन्दिया, अहोराइया, एगराइया । अभिग्गहा दद्यखेत्तकालभावमेयभिन्ना । एएसि अगेण्हणे भगे वा पुरिमह । गाहा पच्चस्स विभासा इमा। पक्सिए अब्भत्तट्टमायविलं वा । ज वा दिवस 5 पचपखाण । ताओ जहासत्तीए तवं न करे अइरित्त, तो खुडगस्स निधीईय, थेरगस्स पुरिमहुं, मिक्स्स एफासणय, उवज्झायस्सायंयिलं, आयरियस्स अन्मत्तहो। चाउम्मासे खुडगाइ-आयरियावसाणाण पचण्ड वि जहासप पुरिमलेगासणायामचउत्यछटाइ दिजन्ति । सवच्छरिए एफासणायामचउत्थछट्ठमाइ दिजन्ति जहासंप पवह वि । ५२ 'फिडिए' चाह । फिडिओ निहापमाएणं एगस्सुस्सगस्स निधिईयं । दोसु 10 पुरिमह । तिहि वि एगासणय । काउस्सग्गाणं चेव फिडिओ पच्छादुन्तओ करेइ ताहे आयाम । सय था उस्सारेर एगाइ काउस्सग्गे तो निधीइयपुरिमद्वेगासणाइ जहासंख । सो चेव सयमुस्सारेइ आयाम । भग्गे या एगाइसुस्सग्गे अपुण्णे चेव अन्तराले तहा वि निधिईय पुरिमलेगासणाई । सधेसु भग्गेसु आयाम । पव वन्दणपसु वि एस चेव गमों। ५३ 'अफएसु' इन्चाइ । अहवा उस्सग्गमेव न करेइ । एगाइ ताहे पुरिमेगासणायामाई 115 सधावस्सयन फरे चउत्थं । जहा फाउस्सग्गे एव चन्दणाइएस पि गाहा पच्छचेण सह चउत्थ सम्यज्झइ । दिया अपडिलेहिए थडिले राओं योसिरह, दिया चा सुवह चउत्थ । ५४ 'कोहे याटु' इभ्याइ । सगिमुप्पन्न कोह पक्खाओ उपरि चाउम्मासाओ वा उरि धरे तो चउत्थ। आसवो घियड तमाश्यते चउत्थ । ककोलग लवग पूगफल जाइफल-त. बोलाइसु सपथ चउत्थ । पुधगाहाओ अणुपाविजह । लसुणे अचित्ते पुरिमह । आइसहेण 20 पलहू घेप्पइ । तण्णगमयूरतित्तिराह यधमुयणे पुरिमह । ५५ 'अझुसिर' इयाइ । अझुसिरतण कुसाइ तेसिं अकारणपरिभोगे निधिईय, सेसप- णएसु पुरिमह । सेसा पच पणगा-तणपणग, दूसपणग, पोत्थयपणग, चम्मपणग । एत्य य दूस पणग दुधिह तेण पंचपणगा। तत्थ सालीवीहीफोहवरालगआरमतण चेति तणपणग । दूमपणग दुधिह-दुप्पडिलेहिय-दूसपणग अप्पडिलेहिय-दूसपणा च । कोयवि पापारग पूरी दाढियाली 25 विराली, एय दुप्पहिलेहिय-दूसपणग । तुली आलिंगणी अगोवहाण" गडोवहाण मसूरगो य" एय अपडिलेहिय-दूसपणग | गडीपोत्थओ", कच्छवीपोत्थो, मुट्ठीपोत्थओ, छिवाडी", संपुडग, एयं पोत्थयणग। गो माहिस-अय पला मिय-चम्मपणग। पत्थ य तणपणए दुप्प डिलहिय दूसपणए चम्मपणए य पुरिमट्ठ । अप्पडिलेहिय दूसपणए एफासणय । पोत्थयप गगहणे आयाम । बेइन्दियाइ तसवहे ज च आपजद त च दिजह । विइय-चुनिकारमपण पो 30 त्थयपणगे वि पुरिमहूं। ५६ घणमणापुच्छाए' श्याइ । दाणसालअहाभइसन्निमाईणि ठपणफुलाणि । ताणि पाय- रियमणापुच्छिय भत्ताइ पविसिऊण गेडा जातो से एमासणय । तेसु य कुलेसु एगो चेष संघाडगो णिधिस सेसा न पविसन्ति । पिरिय परकमो त निगृहन्तस्स पफासणय । जीय- षषहारे एय। सुयववहाराइसु अन्नहा । पफासणयं च माया"निप्फन्न । सेसमायाओ अन्न 35 1A पुस्तके 'ति भणिय' पतित । 2 A विहासा। 3A क्मसो। 4 B.गासण आया.15 6 A तमापियते। 7 B पुस्तके 'अन्झुसिरतणेसु निव्वीय' एतावन्मानपाठ । 8 B 9 B अरणतिण । 10B कोयव पावार। 11A मडगोवहाण। 12 A 13 Bा। 14 A पोत्थगो। 15Bछेवादी। 16A.मायः। B'राओ' नास्ति। पोत्मय पणग, दूसपणग। गडोपहाणी।
सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ४५-५० - पालमई सुत्तमई पागमई तत्य संष्ठफरगमई। संथारगदुगमसिर सिर सिय डेडपणगं च ॥ इंट विएग-लहि विलट्टी सह नालिया य पंचमिया । अयलेइणि मत्त तिग पासवणुषारखेले य ।। चम्मतियऽत्थर पाउरतलिंगभइयाविचम्मतिविहमिमा फत्तीतलियापमा पहायुगं चेय होइन। सथायत्तरपट्टो' हया समापपलहरथी । महो भनाण पुण आरितो धारगो हो । अस्या संधारोघा विद्यो एगगियोय इयरोया।यिायपय पोत्थपणगंफलग तह छोड उकोसो एस अजाण साहणं चोग्गहियो मणिओ। श्याणि अजाण मोहिमो भन्नद । जोषिय' येरफप्पियाण ओहोवही चोइसविहो सो चेय अनाणं पि । नगर- अजाणं पस थिय चोलट्ठाणम्मि फमढग नवरं । असो य पेहलग्गो इमोवही होइ तासि पि॥ ओग्गहणन्तगपट्टो अटोगचलणिया य योघधा। अम्भिन्तरयाहि नियंसणीय तह कंचुए चेव ।। 10 उपाच्छिय घेकच्छिय संघातीचेच संधकरणी य । मोहोचदिम्मि एए अजाण पनधीसाओ। पत्य अन्नाण जहप्नो जो चेय साहण ओहिओ चधिहो। उनोसो अट्टविहोचउरोते चेष पुछविट्ठा जे साहणं । अन्ने य इमे चउरो-अटिमन्तरयाहि नियसणीय संघाडी सधकरणी एसो उधोसओ उ अजाणं । तेरसपिहो उ मझो णमो उ समासमो होह॥ पत्ता वधाईया चउरो ते चेय पुननिशिट्टा । मत्तो य कमढग घा तह योग्गहणन्तगं चेव ॥ 15 पहो महोकविय चलणिय तह कचुगे य उमच्छी। वेफच्छी तेरसमा अजाणं होइ णाया। जहन्नोवहिम्मि विद्युए' पडिए पुण लवे निधिईया मज्झिमे पुरिमह । उकोसए एमासणय । 'पिस्सरिया पेहिए'त्ति-पडिलेहिउँ विस्सरिउ त्ति भणिय होई । जहन्ने अप्पडिलेहिए धिईय। मज्झिमे पुरिमहं । उयोसे पासणय । 'विस्तारियानिवेयणे'त्ति निवेइ विस्सरिय ति, आयरियाईण तिविहो वि। तो एव चेव पच्छित्तं । अह पुण सधोवही विशुओ 20 पुणरवि लखो। पडिलेहिउँ वा विस्सरिओ। निवेइड वा विस्सरिओ सोचेव, तो आयाम । ४७ 'हारिय घो'इच्याह । हारिए जहप्नोवहिम्मि एमासणय । मज्झिमे आयाम । उकोसे चउत्थं चोए वि एवं चेव पच्छित्त तिविह। उग्गमेउन निवेइए । जाणन्तो वि जहा न घट्ट परिग्गहि आयरियस्स अणिवेइओ उपही । तस्सानियस्स तिनिहं पयं चेच पच्छित्त। अदिस चा आयरियाईहिं जहन्नाइ मेयं उवहिं परिभुइ एय चेव तिविह पच्छित्त । 26 दिन्नं वा उवहिं जहन्नाह मेयं आयरियाईहिं अणणुनाओ अन्नेसि देह । एत्थ वि एवं चेव पच्छित्तं तिविहं । अह पुण सधोवहिं हारेजा। सधोनहि वा उदुबद्ध धोवेजा । सधोवहिं वा उगमेउ न निवेपद । सधोवहिं का अदिन्न परिभुञ्जह । सघोचहिमणापुच्छाए अणणुनाओ घा अन्नेसिं देह । एवं सघहारवणाइएस्सु पएसु जीपण छटुं। ४८ 'मुहणन्तय' इञ्चाइ । मुहणन्तए फिडिए ओग्गहाओ निधिईयं । रयहरणे अभत्तहो। ३० पव ताव अणटे। अह पुण नासिय हारवियं घापमापण मुहणन्तयं तो से चउत्यं । रयहरणे छटुं। ४९ 'कालद्धाणाईप' इयाइ । विगहाइपमापण" कालाईयं करिन्ति भत्ताइ निधिइयं, अह पुण परिभुअन्ते चउत्थं । एव अद्धाणाइकमे वि अपरिभुञ्जन्तस्स निधिईय, परिभुअन्तस्स अभत्तट्ठो । पारिट्टावणिय सधमेवाविहीए विगिश्चिन्तस्स भत्ताह पुरिमड । ५० 'पाणस्सासंवरणे' इन्चाइ । पाणाहारासवरणे । भूमितिगं ति-उधार-पासवण- 35 कालभूमि। एगतर अपडिलेहणाए वि" निष्धिईयं । चधिहाहारासवरणे, माहवा नमोकार- पोरिसियाइयं पञ्चक्साणं ण गेण्इ, गहियं पा पञ्चक्खाणं भजइ सचत्य पुरिमहूं । 1B पुस्तके 'मई स्थाने सर्वन 'मती' पाठ । 2 A. चिय। 3 Bओतरि० । 4 A.पिइय। 5 B चेयो। 6B चोलगट्ठाणमि । 7 A निवेएउ। 8A तिविहे। 9 A निवेउ। 10 A वणाइमा 11 A पमाएण। 12 A. 'वि' नास्ति । -- ।
गाथा ६३-६७.] जीयफाप-पुण्णी २१ तिनिह देजा। ६३ 'पय पुण सघमिपाइ एय ति जहिट् । पुण सदो गिसेसणे । मय पायच्छित्त- दाणं ! पाएण याहुलेण । सामामनिसेसिय। मिसेसेण निदिह विणिहिट्ट । देयं दिमागेण । दुधाइ-आरसदेण-रोत्तकालभागपुरिसपटिसेवणाओ य। यविक्सिऊण पिसेसियं । ऊणा हरित तस्स मया (१) पेज ति। ६४, 'दधं गेत मिपार । पडमं गाद फण्ठं । गाउम्मि त चिय-जाणिऊण दधाइ 6 विभागम्मि त चेप परिमाणपरिन्टिग धेजा। या, नाउमिय चिय--इदमिति पचक्सी- भावे । इदमेव जीययवहारभणिय देखा। तम्मत्त भणियसम । दद्यसेत्तकालभावपुरिसपडिसेव गादीसु दोणेतु दीण देला । अहिएम अटियं पेजा । सादारणेसु साहारणं पेजा। ६५ 'आहाराई वध'मिपाइ । आधारो आई जेसिं दधाण ताइ दधाइ माहाराईणि । जम्मि से ताइ बलिया । जहा अणूवरसे सालिरी पलिओ । सहायेणं घेव सुलदो य। पयं 10 नाऊण ज जीयमणिय दाणं तस्सम्भाटियमनि देजा । जत्थ पुण चणफ निफाव-कजियाइ लाखाहारो, दुलदो या तत्थ जीयदाणं हीणमवि देजा। ६६ 'लुक्स'मिप्यार । लुक्य नाम नेहरहिय।सेत पाय -पित्तल या। सीयल पुण सिणि भना भणूवसेत्त था । निलफ्नं साहारण भन्नइ । इह य जीयदाणे णिधरोते अयि देजा। साहारणे जहा भणियं समं पेशा । लुम्सखेत्ते हीण देजा । एव काले मितिविहे' 15 ६७ गिम्हसिसिर'चाइ । गिम्हो लुक्यो कालो । माहारणो हेमन्तो । पासारत्तो निद्धो । गिम्हे तिविहो तवो-जहनो मन्मो मोसो जहन्नो चउत्थ, मज्झिमो छठं, उगोसो अट्ठम । हेम ते तिपिहो-जाममन्दिामुमोसो घट्टमदसममेओ । यासारते वि जहनमज्झिमुकोमो अहमरसमधारसमेयमिनो। एम नवविहो यवहारो। एयं सुटु जाणिऊण सुययपहारेण वा 20 जाणिण तिविह-काले तिविद विगप्पिय तव देजा। सो य इमो- महागुरुाद । एत्य य मूलिया नवमेया नवमेयपत्थारे दट्टया। विभजमाणा सत्तावीस । आपत्ति-दाणत्तवसा फालेणय निओपयास नवविदो पवहारो घनिओ ति । सोय नय विदो घवहारो इमो- गुरओ गुरुयतराओ अहागुरू चेव होइ पयहारो। लदुओ लायतराओ' अहालहू होइ घवहारो॥ लहुसो लहुसतराओ अह लहुसो चेव होइ घपहारो। पपर्सि पच्छित्त चोच्छामि अणाणुपुधीए--(सुत्साणुसारेण ) । गुरुगो य होइ मासो गुरुयतराओ" य होइ चउमासो। मह गुरुगो छम्मासो"गुरुपफ्रो होइ पडिवत्ती॥ सीसा य परवीसा घीसा विय होइ लायपफ्सम्मि। पनरस" दस पचे व य लहुसय" पक्खम्मि पडिवत्ती॥ गुरुगच अट्टम पलु गुरुयतराग" च होइ दसम तु। अह गुरुग धारसमं गुरपक्रो होइ पडिवत्ती॥ 1 B .मित्ता 5Bवात्त। अण्णव । 4B सुलभो । 6 B नि। 7Aतिहे। 3 लहुगत। 10B ल्हू व होइ। 11B गुरुगयरागो12A 'धीमा' पतितम् । 14 B पण्णरस। 15B लहुसप० । नवविहविगप्पेण . 25 1 30 2। 8 - सिरसेनसूरिफया [गापा ५७-६२ मायामो, ता य इमाजमा-महग भोचा विवप्नं विरसमाहरेआयरियसगासे। जसत्थी, जहा- 'पस महा तवस्सी निरसाहारो रसपरियाग फरेइति । एवमाझ्यासु मायालु समण । ५७. 'वप्पेण'एचाइ । यप्पो घग्गण धावण-डेवणाइयो । वप्पे यमाणेण पश्चिन्दिमो पहिओ होजा । संकिलिट्टफम्म-अगावाण-परिमद्दण-सुफापोग्गल निग्घायणाइ,दीहवाण पढिवनोय। आशाकम्म-याणकप्पाइयं पा यहु अश्यारं करेजा। पीडगिलाणकापरस वा अवसाणे आहाफ स्मसन्निहिसेवणं पा फय होना। एपसु कारणेसु पंचकल्लाणगं पच्छित्त। ५८ 'सघोवहि पचाइ । पाउसे जयणाप वि सरोवधि फप्पे फए पुरिमत्ताए या चरिमाए पमापणं । अप्पडिलेहिप चाउम्मासपरिसेतु य विसोदीप पउचाए निरइयारस्स वि पचकल्ला णगं विनइ । किं कारणं । जम्हा सुटुमाझ्यारे फर वि न याण न पा संभरइ । जहा पाउसहर 10 धेरतपाभाभोगकालाग्गाणे सुचत्यपोरिसि-अफरणे अप्पडिलेहियमाई । पएण कारणेण सोड वि दिजा ति। ५९ 'छेया'इभ्याइ ।जो छेयं न सहदह, किंधा छिजान छिजाति एवं भणइ । मिउणोति- जोरिजमाणे वि परियाए न संतप्पर जहा मे परियाओ छिनोति ।महवा अमेसि ओमराइ णिओ' जाओ ति परियायधिओ जो दीपपरियाओ सो परियार जिग्ने तहावि अन्नेहितो 15 सम्भहियपरियाओ न ओमराइणिो होर। नवा बीइइ परियायछेयस्साएपसिं जहुट्ठिाण छेय मावनाण वि तयो दिन । आइसदेण मूलाणवट्ठपारचियपयाघमाण वि । जीयवहारमपर्णग णाहिवाणोय। गणाहिबई आयरियो तरस छेयाइमाघमस्सावि तवारिहं दिजदमा पुण सेह- बुमुठाईण अपरिणामगाणं दीलणिजो भविस्सद ति। चसहेण कुलगणसंघाहिवा घेप्पन्ति । ६०. 'जं ज'मियाद । इह जीययपधारे ज ज पच्छित्त न भणिय अपराहमुहिसिऊण 20 तस्सायि भावत्तिविसेसेण वाणसंखेव भणामि । आवत्ती पायच्छित्तहाणसपत्ती । साय निसीहकप्पयघहारामिहिया । सुत्तओ अस्थमओय। आणा अणवत्थमिच्छचपिराहणा सधि स्थरा। तपसोय सोप तपो पणगादी छम्मासपज्जवसाणो अणेगावत्तिदाणविरयणा लक्षणो तेसु सव्धेतु गथे । इह पुण जीयवहारे संख्येणं भावत्तीदाणं निरूविज । ६१ 'भिन्नो अविसिट्ट'इथाइ । भित्र प्रति ससमयसमा पंचवीस दिवसा भिनसदेण 26 घेप्पन्ति। सोय अविसिट्ठोपको चेव। अविसिठ्ठगहणाओय सधपणगाई मेया घेप्पन्ति। पणगं- लाग, गुरुगं च दसगं-लघुगं, गुरुगंचा" पारसगं-लहुग,गुरुगच, पीसग-लहुगं, गुरुग च पचवीसग-लागं, गुरुग च । एस मिलमासो बहुमेओ यि पको चेव घेप्पर । एसो य सुयब- घहारो जेसु जेसु अपराहेतु भणिओ तेसु चेव अवरासु"जीएण सधत्व निन्विगई। मिन्नो अविसिट्ठो धिय एवं धक्खाणियं । इयाणि मासो ति । सो य लामासो गुरुमासो य । एत्य य 30 लहुमासे पुरिमह । गुरुमासे पक्षासणयं । चउरोय छच मासा सम्बन्ति । तत्थ लहुचउमासे आयाम । चउगुरुमासे चउत्यं । छल्लहुमासे छठें। छगुयमासे अट्ठम । एपं सुत्तनिहिट्टापत्ति जहावराह जाणिऊण जीएण निधिश्याइ अट्ठमभत्तन्त सघ पेजा। ६२ 'इयसधापत्तीओ' इवाइ । इय एवं एएण पगारेण । सधापत्तीओ सपतयट्ठाणाई। जएफम पायच्छित्ताणुलोमेण । समप सिद्धते । जीपण बेजा। निधिश्याइयं पाण अह जह 36 भणिय तहा तहा देज त्ति भणिय होइ । 1 1A मायातो। 2 A गादीओ। 3A निग्धाइयणाइ । 4 A पडिपनो। 5 B राइणितो।। 6 B परियागो। 7 A विच्छिन्ने। 8 ०णएण। 9 B oहारादि अभिहिया। 10 B'सम्वे' 11 A पुस्तके द्वितीय पाय नोपलभ्यते। 12 भत्र B पुस्तके 'ले अवराहेसु भगि भवराहेस' एतादृश सण्डित पाठ । - . नास्ति।
No text on this page.
10 16 सिद्धसेनसूरिफया i -[गाथा ६७. छट्टचउत्थायविल लहुपक्खे होई' पडिवत्ती। एगासण पुरिमहं निघीय लहुससुद्धो वा ॥ ओहेण एस भणिओ', पत्तो वोच्छ पुणो विभागेण-। तिगनवसत्तावीसा पकासीतीय' मेएहिं॥ नपचिह घवहारेसो संखेवेणं तिहा मुणेयधो । उकोसो मज्झो वा जहन्नगो चेव तिविहो सो॥ उकोसो गुरुपक्यो लहुपक्पो मज्झिमो मुणेयष्टो। लहुसगपफ्यो जहनो तिविगप्पो एस णायधो॥ गुरुपक्सो उमोसो मज्झ जहन्नो य एस लहुगे वि। एमेवय लाहुसेवी पवेसो नवविहो होइ ।। गुरुपये छम्मासो पणमासो चेव होइ उकोसो। मज्यो चउ त्ति मासो दुमासगुरुमासग जहन्नो॥ लामासभिन्नमासा वीसा विय तिविहमेच लहुपक्खे। पन्नरस सग पणग लहुसुक्कोसाइ तिविहेसो॥ आपत्ति तवो एसो नवमेओ वनिओ समासेण । अहुणाउ सत्तवीसो धाणतयो तस्सिमो होइ । गुरु लघु लछुसगपक्से एकेके नवविदो मुणेयधो। उकोसुकोसो घा उकोसो महिाम जहनो। मज्मुझोसो मज्झिम मझो तह होइ मझिम जहन्नो। श्य णेया जहन्ने घी उकोसो मज्झिम मज्झिम जहनो॥ गुरुपक्खे नघ एए नव चेव य होन्ति लाय पफ्खे वि। नव वेच लहुसपक्खे सत्तावीस हवन्तेए॥ यारसमदसमअट्ठम छप्पणमासेसु तिविह वाणेय । चउत्तिमासे इस अट्ट"छ? उकोसगा" तिपिहा ॥ पमेयुफोसाई" तुमासगुरुमासिए तिहा दाणं । अट्ठम छ? चउत्थ नवविहमेय तु गुरुपफ्ये ॥ दसमं अट्ठम छट्ठ लछुमासुफोसगाइ तिह दाण। अट्ठम छह चउत्थ उकोसादेत" तिह भिन्न ॥ छट्ट चउत्थायाम उकोसादेय वाणवीसाए । लहुपक्स्नम्मि नवविहो पसो वीओ" भवे नवगो॥ अट्ठम छ? चउत्थ पसुकोसाइ" दाणपनरसा। उट्ट चउत्थायाम ससू तिविहे य दाणभवे ॥ समणायामेकासण तिविठुकोसाइ वाण"पणगेयं । लासेस तइयनवगो" सत्तावीसेस वासासु ॥ 20 26 - 80 1Bहोति। 2A निव्वीय । 3 B भणितो। 4 B एकासी इय। 5A मनिमम । GA एय। 7 A मासिग। 8 B मासो । 9 A पुस्तके 'वीस लहुधोसमझिमजहना' एतादृशो द्वितीय 10 A दसग। 11 A अहम । 12 B सगादिति। 18 B •सारी। 14 A एष । 15 A मि। 16 A एय। 17 B नितिओ। 18 B सादि। 19 B .रसे। 20 B •पारयाण । 21 ततिय। J 5 10 गाया ६८-७१.] जियफप्प-घुण्णी सिसिरे दसमाईण'चारणमेपण सत्तबीसेण । ठायई' पुरिमाम्मी अहोपान्तीय तह येथ ॥ अट्टममाई गिम्हे चारणमेपण सत्तवीसेण । तह चेव य ढोपन्ती' ठावर निधीयप नघर ।। पएहिं दाणेहिं आवत्तीओ सया सया नियमा। योधधा सधाओ असगुस्सेयोपाहासणया ॥ आय ठिय एफेफ त पीदासेज असहुणोताव । दाउ सट्टाण तव परट्ठाण वेज पमेव ॥ एक ठाणे ठाणे देटाउत्तो कमेण हासतो। नेयचं जावठियं नियमा निधीइय' एका ॥ पस नवविहो ववहारो। ६८ 'हट्टगिलाणा इचाइ । भाव पडुश्शसममयिमूणं वा देजा। हठुस्स नीरोगस्स यलिय- सरीरस्स समहिय घा देजा। गिलाणस ऊण, नवा वि देजा। जावइय था यि सकेर तायायं या वि से देजा। काल वा सहेजा, जाव पउणीहोइ । इट्ठो सन्तो करेस्सह त्ति। ६९ पुरिसा गीयागीया' इवाइ । पुरिस पडुच सममयि ऊणं वा देजा। पुरिसा केर 15 गीयत्या, केर अगीयथा। घिसंघयणसपनत्ताओ के सहा, तधिरहियत्ताओ के असहा! सदा मायाविणो, असढा उजुभूयप्पाणो । उस्सग्गे उस्सग्ग । अवयाए अयवाय । जहा भणिय सदहन्ता आयरन्ता य परिणामगा भापन्ति, अपरिणामगा पुण जे उस्सग्गमेव सइहन्ति आय रन्तिय, अववाय पुण न सहन्ति नायरन्ति या भापरिणामगाजे अववायमेवायरन्ति तम्मि चेय सजन्ति, न उस्सग्गे। ७० 'तह घिई'इचाइ । तहेत्ति आणन्तरिए । धिइ-सघयणे चउभगो। पिए सघयणेण य पढमो सपन्नो। इह य पढमपच्छिमा भगा दुवे सगहिया सुत्तेण, मज्झमिल्ला दुवे भाणियक्षा । अहया वितियचुनिकारा भिप्पाएणवत्तारि विसुत्तेणेव गहिया। कह-घिइसपना, णसघयणेण संघयणेण घा सपन्ना, धिईप २ । उभयसपना ३। उभयहीणा य ४ । अहवा इमे पच विगप्पा । आयतरे कामेगेनो परतापरत नामेगे, नो आयतरए २१ एगे आयतरए पि 25 परतगए वि ३। एगेनो आयतरए नो परतराएए" चत्तारि भंगा ठाणक्कमेण । तहा पचमो अनतरतरगो नाम विगप्पो आयतरगो नाम जो उपवासहि दढो। परतरगो नाम जो या पथकरो गच्छोवनहकरो वत्ति अन्तरतरगो" नाम जो एक सकेर काउ, सब देयापर था।न पुण दो वि सकेइ । ७१, 'कप्पट्टिय' इयाइ । कप्पट्टिया आईए" जेसिं ते कप्पट्टियादयो । आइसहेण-30 अण्णे यि चत्तारि जणाघेपन्ति अप्पष्टिया अपरिणया अकडजोगी अतरमाणात कप्पट्ठिया जे आचेलफदेसियाइ दसविहे कप्पे ठिया । कयरे ते ?-इमे वक्खमाणा- आचेलुकदेसिय सेजायररायपिंडकिइकम्मे । चयजेट पडिकमणे मास पजोसवणकप्पे ॥ 5A .ठाणे। 4 A निव्वीईए। 2 Bठायति । 3 B चेव अष्टो। 6B हेढाहन्तो। 7 A oव्वीइयग। 10 Aएवे। 9 B विइयचुनिगारा, 8A तस्मिन्नेव । 11 A पुस्तके 'अनतरगो'अपपाठ । 14 एते। 15 'एएसें' भारभ्य 'पप्पति यावत् पाठ A पस्तके पतित । 20 . 36 1 Boमादीण। । 12 A. अइया। 13 Aणता ।
२४ सिद्धसेनसूरिकया. [गाया ७२-७३ जे पुण मज्झिमजिणसन्तगा महाविदेहगा य ते अफप्पट्टिया। कप्पट्टिया दुविहा-सावक्ता निरवेफ्या या सावेक्खा गच्छवासी, निरवेफ्सा जिणकप्पियायो। एवमकप्पट्ठिया सावेफ्सा निरवेक्खा य । परिणया गीयत्था, अपरिणया अगीयत्या | फडजोगिणो चउत्थ छट्टलमाईहिं विविहतयोवहाणेहि जोगवियसरीरा । अफडजोगिणो अपरिकम्मवियसरीरा 5 तरमाणगा धिइसंघयण संपन्ना । अतरमाणगा एएहिं विउत्ता। ७२ 'जो जह' इचाइ । एएसि कप्पट्ठियाझ्याण सावेक्स निरपेक्खमेयाणं जो जह सक्के तवं काउ। वाहुतरगुणो नाम घिसंघयणसंपन्नों परिणयकडजोगी आयपरतरों वा होजा तस्साहियं पि दिजा। कमोहितो अहिय ?-जीयववहारभणियाओ। जो पुण हीणो धिहस घयणाईहिं तस्स थोवतरयं पि' जीयभणियाओ देजा । जो पुण सधहीणो तस्स सर्व झो 10 सेजा', न किंचि दिजह तिज मणियं होइ। ७३ ‘एत्थ पुण' इन्चाइ । एत्थ एयम्मि जीयववहारे बहुतरया भिक्खुणो त्ति । तेय अकय करणा अजोगविया जणभिगया अगीयत्था। च सद्देण अधिरा विय ति। तेण कारणे जीयववहारे अट्ठमभत्तं अन्तो निधीहयमाईए । एवं मसं गहियं जन्तविहीए । एयस्सेव फुडी करणत्यं जन्तविहाण भणामि । तिरियाए तेरसघरप काउ हेटाहुचो य जाव नव घराई पुण्णा 15 ताव ठावेयध्वं । पच्छा एपसिं णवण्हं हेटा जाई दाहिणेण अन्तेठियाणि दोनि घरयाइ ताई मोत्तूप अहो एगं घरयं पहाविजह । ताहे तिरियायया एकारस घरया होन्ति । पुणो एपसिं एकारसण सपदाहिणा दुवे मोत्तूणं अहोएगं घर वहाविजइ । ताहे ते आयता णव घरा होन्ति। एव दुवे दु छसन्तेण घरया हेडिल्लदाहिणिल्लाई ता नेयचं, अहो एकेक घरयवहीए जाव पयामेव घर सवाऽहोजायं । एवमेयस्स घरजन्तयस्स सघुवरि तिरियायया सेढी। तीसे सेढीए उर्वा 20 सघाईए" निरवेक्तं ठावेजा। निरवेक्सस्स य दाहिणेण विइय तइयघर मज्झनिग्गयरेह परि आयरिय कयकरणं अकयकरण च टावेजा। चउत्थपंचमघरयमज्झविणिग्गयरेहोर्वा फयकरणं उवज्झायं अफयकरण च ठावेजा" । छहसत्तमअट्ठमनवमघरयमज्यविणिग्गयरेह चरि गीयभिपतु टावेजा, थिर अधिर च । तत्थ जो सो थिरो सो फयकरणो अकयकरण य। अथिरो चि कयकरणो अकयकरणो य । तओ"पुण दसमएफकारसवारसतेरसघरयमज्द 25 विणिग्गयरेहोरि अगीयभिपतु ठावेजा, थिरमथिर च । थिर कयकरण अकयकरणं च । अथि र कयकरण अकयकरणं च ठावेजा । एवं ठावेऊण णिरवेकराहेट्ठिमघरए सुन्न ठावेयधं । जम्म तहिं पारचिय पयं होइ । सो य निरचेफ्यो सहावेण चेव पारंचिो तम्हा तहिं सुन्न ठावेयध एयस्स दाहिणेण कयकरणायरियहेट्टा पारचिय। एव" तहिं चेव अवराहे-जहिं कयकरणायरि यस्स पारचियं अकयकरणस्सायरियस्स तम्मि चेवावराहे अणवठ्ठप्प । एत्थ चेवावराहे- 30 कयफरणोवज्झायस्स अणवटुं(ट्टप्प)। एत्य चेवावराहे अकयकरणोवज्झायस्स मूलं । एरथ चे वावराहे गीयभिनय थिरकयकरणस्स मूलं । पत्थ चेवावराहे गीयभिक्खु थिरअकयकरणस्स छेभो । एत्य चैवावराहे गीयमिक्खु अधिरकयकरणस्स छेओ। एत्थ चेवावराहे गीयमिक्र अथिर अकयकरणस्स छग्गुरू । एस्थ चेवावराहे अगीयभिक्खु थिरकयकरणस्स छग्गुरू। पत्थ चेवावराहे अगीयभिक्खु थिरअकयकरणस्स छल्लाहू । एत्थ चेवावराहे अगीयभिक्खु अधिर 2A विहाणेहिं । 3B Oणगा दोहि बिजुया। 4 A पन्ना । 5A. आयतरगो।। 6 B यातो । 7A 'पि' नास्ति । 8 A सस्स । 9 A सोसेज्जा । 110B फुटीकरणल! 11 B यायता। 12 B सव्वुप्पीर। 13 B ०यायता। 14 B सन्यातीए । नास्ति। 16 A ततिय। 17 'कय आरभ्य 'टावेजा' यावत् पति पतिता A भादशैं । 18 B गीयमिः । 19 B ततो । 20 A. सभावेण । 21 B एव। 22 मन द्विना पदय पतिता ! A भाद: । 1 Aवा। । 15 A.' - गाथा ७४-७७] जीयकप्प-चुणी कयकरणस्स छल्लहू । एत्य चेवावराहे अगीयभित्यु अथिर अस्यकरणस्स चउगुरू । एच एयाए पन्तिए पायच्छित्तट्ठाणरयणा एवं कायथा । सुन्न । पारश्चियं । अणवठ्ठप्प । अणवठ्ठप्प । मूला मूल ।छेय।छेय । छग्गुरु । छग्गुरु । छल्ला छल्लहु।अन्ते चउ गुरूाएयाए हेट्टासुण्णं अणव हप्पो । मूल २ ॥छेदो २ । छगगुरू छलहु श च गुरू २ । अन्ते सचदाहिणे चउ लहु । एयाए हेट्ठा मूल २१ छेदो २। छग्गुरू । छलहु २।चउ गुरू चउ लहु २। सबदाहिणे मालगुरू । । स्याए हेटा छेदो २ छग्गुरू । छल्हुशचउगुरू शंचिउलहु । मासगुरू २ । सदाहिणे भासलहु । एयाए हेट्टा छग्गुरू २। छल्लडु २ । चउगुरू २ । चउलहु २। मासगुरू २। मासलहु २। सधदाहिणे भिन्नमासो । एयाए हेठा छलहु २। चउगुरूचउलहु २। मासगुरू २ मास, बहु २० मिनमासो २ । सघदाहिणे वीसा। एयाए हेहा चउगुरू २ । चउ लहु २। मासगुरू २१ दासलहु २१ भिन्नमासो २। वीसा २। सदाहिणे पन्नरस । एयाए चेव हेट्ठा चउलहु २ । 10 सगुरू २। मासलहु २ । भिन्नमासो २। पीसा २। पन्नरस २। सधराहिणे दस। एयाए डा मासगुरू २। मासलहु २। भिन्नमासो। वीसा २। पन्नरस २ । दस २। सवदाहिणे पग। एयाए हेट्ठा मासलहु २ मिन्नमासो २ । वीसा २। पन्नरस । दस २ । साधादाहिणे चाएयाए हेटा भिन्नमासो २। वीसा पणरस २६ दस २। सदाहिणे पणग। एयाए बाबीसा २ पन्नरस दसरासदाहिणे पणगं । एयाए हेटा पन्नरस २। दस २१ सधदा 15 णे पणग । एयाए हेट्ठा दसरा सदाहिणे पण पयाए हेटा पंच। एयासिंच तिरिया याण घरयाण आईए ज पय जहि अवराहे ठाविय तहि चेवापराहे ताए पन्तीए पुरिसावेक्साए वे पच्छित्तपया चारेयवा । एव विरईप पुरिसविभागेण पणगादी छम्मासावसाणे निधीयाह इमभत्ततं पुष भणियमेव । आहुणा पडिसेषणा भन्नइ- ७४ 'आउट्टिय' गाहा । आउट्टिया नाम अं उबेच पाणाइवाय करेइ । दप्पो नाम धावण प्रणयगणादओ, कन्दप्पो वा दप्पो । माओ नाम ज राओ दिया चा अप्पडिलेहन्तो अपम् यन्तो य पाणाइयायाध्यमावा कप्पपडिसेवा नाम कारणे गीयत्थो कडजोगी उवउत्तो यणाए पडिसेवेजा। एसा पडिसेवणापडिसेयओ पडिसेवियच च दोनि वि पडिसेवणाए याइ । तत्य पडिसेचओ पुरिसो पडिसेरियट पुण दधाइ । दद्यमाहाराइ । सित्त छिनमड 25 पर था। कालो ओम दुभिक्खाइ । भावे हष्ट्रगिलागाइ । एव एय पडिसेवियच । ७५ [ज जीयदाण' गाहा। ज जीयववहारेण मए पच्चित्तं भणिय तमणन्तर सह एवं रहपदिसेवणाण आहियाइयाणकराए पडिसेवणाए पडिसेविपु दिइ । सन्देह सम्भधे मन-तइयाए पमायपडिसेवणाए ति। दद्याइए पडिसेविए सेसपडिसेवणासु पुण कई नहपत्तो थिय ठाणन्तर यहेजा। एक पत्तोति जहामणिय पमायाण पायच्छित्ताओ 30 पहाणघुवी कायधा । पमाए निधीयाइ अहमभत्तत, दप्पेण पुण पुरिमाइ-दसमन्त दोह। ७६ 'याउट्टिया' इच्चाइ आउहि भासेवमाणस्म एकासणाई दुवालसन्त दिजह । अहवा हाण । पाणाइवाए मूल । सट्ठाण जं जम्मि वा अवराहे सवरहय तस्म दिला त चेव सट्टाणं इ । कप्पपडिसेवणाए पडिसविप पडिकमण, मिच्छादुघाडमिति च भणिय होइ । अहवा भय आलोयणमिच्छादुकाड च । ७७ 'मालोयण' इचाआलोयणकाले वि जया गुहा पलिउचर या तया सो किलिट्ठपरिणामो तस्स हिय पुणं वा दिन जो पुण भालोयणाकाले सपेगमपगओ निद बारहणाइणा मिनपरिणामो तस्स ऊणमवि देजा। जो पुण मन्मपरिणामो तस्स तम्म. 20 35 न देजा। 1 एयाए य पतीए। 2 B.लहितो। 9 मजिवो। 4 A भागीगाए सेनः। 5 Bा। ४जी.क.चु.
. २४ सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ७२-३ जे पुण मज्झिमजिणसन्तगा महाविदेहगा य ते अकप्पट्टिया। कप्पट्टिया दुनिहा-सावेक्खा, निरवेफ्पा य'। सापेक्सा गच्छवासी, निरवेक्सा जिणकप्पियायो। पवमफप्पट्ठिया कि सावेक्सा निरवेफ्खा य। परिणया गीयत्या, अपरिणया अगीयत्था । कडजोगिणो चउत्य छट्ठमाईहि विपिहतवोवहाणेहि जोगवियसरीरा । अफडजोगिणो अपरिकम्मवियसरीरा, 5 तरमाणगा धिहसघयण संपन्ना । अतरमाणगा एएहि विउत्ता। ७२ 'जो जह' इभ्याइ । एएसि फप्पट्टियाइयाण सावेक्ष-निरपेक्खमेयाणं जो जा सके तवं काउं। याहुतरगुणो नाम घिइसंघयणसंपन्नो परिणयकडजोगी आयपरतरो वा होजा तस्साहियं पि दिए । फमोहितो अहिय?-जीयववहारभणियाओ। जो पुण होणो घिास धयणाईहिं तस्स थोवतरयं पिजीयभणियाभो देजा । जो पुण सतहीणो तस्स साथ झो 10 सेजा, न किचि दिजइ तिजं भणियं होइ । ७३ ‘एत्थ पुण' इञ्चाइ । एत्थ पयम्मि जीयचवहारे यहुतरया भिक्सुणो ति! तेय अकय फरणा अजोगविया अणभिगया अगीयत्था। च सद्देण अथिरा विय त्ति । तेण कारणेण जीययवहारे अट्टमभत्तं अन्तो निधीइयमाईए । एयं मज्झ गहियं जन्तविहीए । एयरसेव फुडी फरणथ जन्तविहाणं भणामि । तिरियाए तेरसघरएकाउ हेट्ठाहुत्तो य जाव नव घराइ पुष्णा 15 ताव ठावेयष्ट । पच्छा एपसिं णवण्हं हेट्टा जाई दाहिणेण अन्तेठियाणि दोन्नि घरयाइ ताई मोनू अहो एगं घरयं वहाविजइ । ताहे तिरियायया" एकारस घरया होन्ति । पुणो एएसि एकारसण सधवाहिणा दुवे मोत्तूणं अहोएगं घर वहाविजइ । ताहे ते आयताणव घरा होन्ति। एव दुवे दुई छन्तेणं घरयाइ हेछिल्लदाहिणिल्लाइं ता नेयध, अहो एफेक घरयवडीप जाव एकमेव घरए सघाऽहोजायं । एवमेयस्स घरजन्तयस्स सधुवरि तिरियायया सेढी। तीसे सेढीप उर्वा 20 सवाईप" निरवेफ्वं टावेजा। निरवेक्सस्स य दाहिणेण विइय तश्यघर"मज्झनिगयरेहो चरि आयरियं कयकरणं अकयकरण च ठावेजा। चउत्थपंचमघरयमज्झविणिग्गयरेहोर्या फयकरणं उवज्झायं अकयकरणं च ठावेजा" ! छट्ठसत्तमअट्ठमनवमधरयमझविणिग्गयरेहो परि गीयभिक्खं ठावेजा, थिर अथिर च । तत्थ जो सो थिरो सो फयकरणो अकयकरण या अथिरो वि कयकरणो अकयकरणो यातओ"पुण दसमएक्सारसवारसतेरसघरयमझ 25 विणिग्गयरेहोवरि अगीयमिक्खु ठावेजा, यिरमथिर च । यिर कयकरणं अकयकरण च । अथि र कयकरणं अकयकरणं च ठावेजा । एवं ठावेऊण णिरवेक्सहेटिमघरए सुन्नं ठावेयध । जम्ह तहिं पारचिय पय होइ । सो य निरवेक्यो सहावेण चेव पारचिो तम्हा तहिं सुम्भं ठावेयध एयस्स दाहिणेण कयकरणायरियहेटा पारचिय। एव" तहिं चेव अपराहे-जहिं कयकरणायरि यस्स पारचियं अकयकरणस्सायरियस्स तम्मि चेवावराहे अणवठ्ठप्प । पत्य वावराहे- 30 कयकरणोवज्झायस्स अणवठ्ठ(टुप्प) । एत्य चेवावराहे अकयकरणोवज्झायस्स मूल । एरथ चे वावराहे गीयमिक्खु घिरकयकरणस्स मूलं । पत्थ चेवावराहे गीयभिक्खु यिरअकयकरणस्स छेओ। पत्य चेवावराहे गीयभिक्षु अधिरकयकरणस्स छेओ। एत्थ चेवावराहे गीयमित अथिर अकयकरणस्स छग्गुरू । एत्थ चेवावराहे अगीयमिक्सु घिरफयकरणस्स छग्गुरू । पत्थ चेवावराहे अगीयभिक्तु थिरअकयकरणस्स छल्लहू । पत्थ चेवावराहे अगीयमिक्सु अथिर 1 Aया। 2 A विहाणेहिं । Bणगा दोहि विजुया। 4 A पन्ना । 5A आयतरगो।। GB .यातो । 7 A. 'पि' स्ति। 8A सस्य । 9 A सोसेना । 10 B कुटीकरणत्य। 11 B व्यायता। 12 B सम्वुप्परिं । 13 B ०यायता। 14 B सव्वातीए । 15 A '' नास्ति। 16 A ततिय। 17 'क्य' भारभ्य 'टावेचा' यावत् पहि पतिता A आदर्श । 18 B गीयमिः। 19 B ततो । 20 A सभावेण । 21 B एव। 22 अन्न द्वित्रा पलय पतिता A पापों ।
गाया ७५-४७] , " . २५ जीयकप्प-चुण्णी nunca क्यकरणस्स छलाह । एत्य चेनाराहे अगीयमिक्खु अथिर अकयकरणस्स चउगुरू । एवं पाए पन्तिए पायन्उित्तट्ठाणरयणा एव कायदा सुन्न । पारश्चिय ! अणपट्ठप्प ! अणवट्टप्प । मूलामू छियाय । उगुरुग्गुरु छलहुछिल्लहु। अन्ते चउगुरु।एयाए हेट्ठामुण्ण अणव मूल २ छेदो २। उगुरू २ छलहु २१ चउ गुरू २१ अन्ते सदाहिणे चउ लहु । एयाए इट्टा मा छेदोछगुरू २। छल्ला २१वउ गुरू चउ लहु २। सचदाहिणे मासगुरू । 5 पार हेवा देगे उग्गुन २। छलहु शचउगुरूचउलहु २। मासगुरू २। सपदाहिणे मसल्दुपियार हेट्टा छग्गुरू २१ छल्ला २१ चउगुरू २१चउलहु २। मासगुरू२। मासलहु सदाहिणे मिसमासो। एयाए हेटा छल्लहु २। चउगुरू २१ चउलहु २। मासगुरू २ मास- र। सिनमासोमप्रदाहिणे वीसा। एयाए हेटा चउगुरू २१ चउ लहु २१ मासगुरू २। मासटहु २१ मिलमासो२॥ चीसा २। सदाहिणे पन्नरस । एयाए चेव हेटा चउलहु २। 10 भामगुरु रामासलहु । भिन्नमासो २। वीसा २। पनरस २ } सचदाहिणे दस । एयाए छा मासशुरु । मासलहु २। मिन्नमासो २। वीसा २१ पन्नरस २। दस २१ सघदाहिणे एगी एयाए हेटा मासलदु । मिनमासो २ । वीसा २१ पनरस २। दस २। सद्यादाहिणे पत्र एपार हेदा भिन्नमासो २१ वीसा २१ पण्णरस २१ दस २ सयदाहिणे पणग। एयाए पसारा पारस । दस २। सबदाहिणे पणग । एयाए हेटा पन्नरस २ । दस २॥ सधदा 15 ६ पगाएयाए हेट्टा दस २॥ सदाहिणे पणगोएयाए हेटा पच । एयासिंच तिरिया पापघापा आईए ज पय जहिं अवराहे ठाविय तहिं गावराहे ताए पन्तीप. पुरिसावेरसाए राई पच्चित्रपया चारेयधा एव विरईए पुरिसविभागेण पणगादी छम्मासाथसाणे निधीयाइ बननातन पुष मणियमेव। अहणा पडिसेवणा भन्नइ- 20 ७. 'आउष्ट्रिय गाहा । आउट्टिया नाम जउवेश पाणाइवायं करेइ । दुप्पो नाम धावण- देवचरणमाइलो, कन्दप्पो या दप्पो। पमानो नाम जराओ दिया था अप्पडिलेहन्तो' अपम । अयन्ता यापागापायाश्यमापजह । कम्पपढिसेवणा नाम कारणे गीयस्थो कडजोगी उचउत्तो गए पदिसेवेत्रा। एमा पडिसेवणा। पडिसेचओ पडिसेवियन्त्र च दोन्नि वि पडिसेवणाए पार सय पहिसेरो पुरिसो पडिसेपियधं पुण दवाइ । दद्यमाहाराइ । खित्त छिन्नमई 25 यामाहालले ओम दुन्मिस्खाइ। भावे हट्ट गिलाणाइ । एवं एय पटिसेवियच । ४५. ['अ जीपदाण' गाहा। ज जीयवहारेण मए पच्छित भणिय तमणन्तर सक्ष एय भापदिसणार आउहियायाण कयराए पडिसेरणाए पडिसेनिए दिजइ | सन्देह सम्भवे मा-तयार पायपडिसेरणाए ति। दधाए पहिसेविए, सेसपडिसेवणासु पुण कह भ - माएतो शिप जन्तर घडेना। एक पत्तो ति जहाभणिय पमाय द्वाण पायच्छिताओ 30 Pाही फायद्यापमाप निधीयार यट्टमभत्तन्त, दप्पेण पुण पुरिमाइ-दसमन्त होइ। ६ 'भारहिया वाद आउहि भालेवमाणस्स' पासणाई दुवालसन्त दिजद अहवा PRIL मूल । सट्टाप ज जम्मि या अमराहे सधराय तस्स दिजइ त चेन सटाणं मधमेशनाए पटिसेविष पदिकमण, मिच्छादुघडमिति च भणिय होइ । अहवा कारोवामियानुसार 35 माटोमा । जागोयमकाले नि जया गुदा पलिउड चा तया सो मो तम्म बाहिय पुण्ण पा दिवा जो पुण आलोयणाकाले सवेगमुचगओ निन्द men सुस्परिणामी तम्म अपमति देजा। जो पुण म-झपरिणामो तस्स तम्म བུ་ང་ IVERMB | 3 विदी। 4 A मायाए सेव० 1 5 B तदा । " " + 1 - । सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ७८-८५ ७८ 'इति दधाई'इन्चाइ । इति एवं दधसेत्तकालभावेसु चउसु वि बहुगुणेसु,' गुरुसेव पहाणसेवा भण्णइ । एएतु बहुतर देजा । 'हीणतरे हीणतर' ति। दयरोत्तकालभावा जहा जह हीणा तहा तहा हीणतर पच्छित्त देजा। सबहीणस्स झोसो वा कजइ । ७९ 'झोसिजई' इञ्चाइ । झोसिजइ ति मुच्चइ । सुबाहुगमवि जाव अन्नं तवं यहइ ताव ज 5 अन्नमावजई तो तं झोसिजइ । जहा' छम्मासपट्ठविए पञ्चहिं दिवसेहिं गएहि अन्नमावन्न गो होजा । पढमगं वहन्तस्स पच्छिम से प्रोसिजा । घेयायचकरस्स वा थोवतर दिजइ जावइय वहन्तो वेयावञ्च काउं सफेद तावइयं से दिजइ । एयं तवारिह भणियं ॥ अहुणा छेयारिहं भन्नइ- ८० 'तवगधिय' इञ्चाइ । तवगधिमओ छम्माससमओ। अन्नो वा जो विगिट्टत्तवकरण' 10 समत्यो-कि मम तवेण किज त्ति । तयअसमत्यो पुण गिलाणो असहू वालवुहो' वा । तर चा जो न सहइ । 'पुणो पुणो वा तवेण दिजमाणेण विण दम्मइ । अइपरिणामगो अइपसर्ग वा। पुणो पुणो सेवेइ, सुवहुं वा । एएसु जहुद्दिद्देसु तवारिहावत्तीए वि छेओ चेव दिजाति पुष्पपरियायस्स देसच्छेओ कजइ । ८१ 'सुबहत्तर' इच्चाइ । सुवहुगा उत्तरगुणा पिण्डविसोहिमाईया। ते जो भंसेइ विणा 16 सेद, पुणो पुणो छेयावत्तीभो करेइ । जो य पासत्यो। आइसदेण ओसण्ण फुसील-ससत्तनीओ वा । जईण साहूण सविग्गाणं । पडितप्पद वेयावञ्चं करेइ । बहुसोय अणेगसो। उत्तरगाहाप अत्थपरिसमत्ती होही। ८२ 'उकोस'मिचाइ । उकोसा तव भूमी । आइजिणिन्दतित्थे संघच्छर । मज्झिमजिणाणं अट्टमासा । वीरवरस्स छम्मासा । एय उकोस तवभूमी समईओ।जो तस्स छेओ सावसेसच 20 से चरणं, तस्स छेओ पणगाईओ" आइसक्ष्ण दस पन्नरस वीसाई जाव छम्मासा। जावं वा घरइ परियाओ। छेयारिह भणियं ॥ अहुणा मूलारिहं भन्नइ- ८३ 'आउद्दिया' चाइ । आउट्टियाए पश्चिन्दिय वहेजा । मेहुणं दप्पेण सेवेजा। सेसा मुसावाय-अदिन्नादाण परिगगहा ते उकोसेण" पडिसेवेइ । आउट्टियाए पुणो पुणो य ति। 26 एघ जहुदिहाणेसु मूलं । ८४. 'सवगधिय' इञ्चाइ । तवधिओ। आइसहेण तवसमत्थो। तव असहहन्तो तवेण य जो न दम्मइ । मूलगुणे बहुविहे बहुसो य दूसेइ भाइ वा । एव उत्तरगुणे वि एस वइयरो। दसणं पा धमह । दसणे वन्ते नियमा चरित्तं वन्तं । चरित्तम्मि दुसणे भयणा । दसणे या चरित्त वा धन्ते चियत्तकियो। किचाइ दसणाईणि । तप्परिञ्चारण चियत्तकिच्चो । सेहेय त्ति 30 सेहो जो अभिणयो सिक्ख गाहिजइ । अणुवट्ठविओ। एएसिं जहुदिहाण मूल । ८५ 'अञ्चन्तोसन्न' मिच्चाइ । अञ्चन्तोसन्नो नाम भोसन्न पव्वाविभो । सविग्गेहिं या पधा- वियमेत्तो चेव ओसन्नयाए विहरिओ जो, सो अयन्तोसनो । परलिंग दुग-घरत्थलिंग, अन्न- तिथिलिंग च । त जो आउट्टियाए दप्पेण या करेइ । मूलकम्म-इत्थीगम्भादाणसाडणं जो फरेइ । भिक्सुम्मिय विहियतवे । विहिओ तयो जस्स सो विहियतवो। छेयमूले वि अइकमिउ। 35 अणवठ्ठतव वा पारञ्चियतव वा ! अइयारसेवणाए पत्ते एएसि जहिट्ठाणं मूल सधेसि पि । 1 B पुस्तके 'चउ णेसु एतद्वाक्य नारिख । 2-3 'जहा भारभ्य 'झोसिजई' यावत् पाठ A.पुस्तके 5 B करणत्स०। 6 A कज्जा । 7 A गिलाणअसहुपाल्तुहा । 8-9 पुणोः' आरभ्य "सेवेइ' पर्यन्त पाठ A भादर्श पतित । 10 B होइ। 11 B पणगादीतो। 12 B उकोसगे। 18 B भविओ। पवित । 4 Bएव। r गाथा ८६-९१.] जीयफप्प-पुण्णी ८६ 'छेपण' इथाइ । छिजमाणे छिनमाणे जया परियाओ निरवसेसो छिनो, तदा से मूल । अणवटुप्पतयावसाणे पारश्चियतवावसाणे य मूल दिजइ । मूलावत्तीओ पा-पुणो पुणो आवजमाणस्स मूल । एव जाहिद्वकारणेसु सपत्थमूल । मूलारिह भणिय ॥ अहुणा अणवट्टप्पारिह' भन्नइ- ८७ 'उद्योस'मिचाइ । तदो (मओ) अणवट्टप्पा पनत्ता, त जहा-साहम्मियाणं तेण करे । माणो १ । अन्नधम्मियाणं तेण करेमाणो २ । हत्यादाण दलयमाणो ३ । उमोस सचित्ताइय। तेणेह-पुणो पुणो तेणेइ । मध्य पउदृचिचो सकिलिङ्कचित्तो ति कोहलो होइ । पउदृचित्तो तेणेह ! सा य तेणिया दुबिहा-साहम्मियतेणिया, परधम्मियतेणिया य । दधओ खेत्तमो फालओ भावओ य । सचित्त-अचित्त-मीसया दधे । अग्नसंजओग्गहियखेत्ते अणणुनविए अव स्थाण सेते। काले जहिं फरेर् । भावभो रत्तदुट्टो । अन्नधम्मिया दुविहा-लिंगपविट्टा, निहत्था 10 य। तिविह तेणमेतेसिं आहारो उवही सचित्त चाऽवहरति । हत्थादालो गहिओ, सो यति विदो-अत्थादाणो, हत्यालम्यो, हत्थातालो। तत्य अस्थादाणो नेमित्तिमोसन्नागारिया भधगप डिभग्गवणियपेसणरुयगसउणीवीडभो' उवणओ नउलगमेगो' घयगुलमतो यसतणकट्ठा पाहिं अन्नो य सउणिगणिमित्त । हत्थालम्यो असिवपुररोहउवसमणत्थमभिचारगाइ फरेह । हत्थातालो जटिमुट्ठिलउडोपलपहाराईहिमरणमयणिरवेक्यो अप्पणो परस्स य पहरह । सपफ्खे 15 च सहेण परपफ्से य । घोरपरिणामो निरणकोसो त्ति। ८८ 'अभिसेमो' इच्चाइ । अभिसेको उवज्झाओ।जेसुजेसु अपराहेसु पारश्चियमावजह । बहुसो अणेगसो । आवन्नो वि अणवट्टप्पो फीरइ । किं कारण । जेण अणवटुप्पपारश्चियमावन स्सावि मूलमेव दिजह मिक्खुणो। जेण तस्स पर मुलट्ठाण भवति'। तहा उवज्झायस्सावि पर अणवठ्ठप्पपय, अणवटुप्पावत्तीओ य ।जया बहुसो आवजह तया य अणवठ्ठप्प दिइ । ८९ कीरई' इवाइ । वपसु लिंगेसु वा जम्हान ठाविजइ तम्हा अणवठ्ठप्पो। सो य अण- घट्टप्पो चउधिदो-लिंगओ, सेत्तमो, कालो, तवओ। लिंग दुविह-दधे भावे य । दधलिंगं रोहरणाई भावलिंग महषयाइ । पत्थ चउभगो। अणन्तरगाहासम्बद्धा इमा गाहा- ९० 'अप्पडिविरय' इवाइ । सपफ्यपरपक्पपदुद्दो तेणगाइदोसेहि। अप्पडिविरओ सपक्ख परपक्व"पहरणुजुओ। निरवेफ्सो अणुवसन्तवेरोजो। सो दधभावलिंगेहिं दोहिं वि25 अणवठ्ठपो । हत्थालम्बो, अस्थादाणो", ओसण्णाइया य तहोसाणुवसन्ता न भावलिंगारिहा । द्धलिंगमत्थि तेसिं, भावलिंगेणाऽणवट्टप्पा । खेत्तमो अणवढप्पो जो जम्मि पेत्ते दोसमावन्नो सो तम्मि सेत्ते अणवटुप्पो । जहा भत्थादाणिओ" तम्मि चेव खेत्ते देसे या न उवट्ठाविजाइ । फि कारण पुवन्भासा लोगो पुच्छेजा" सो वा त इहिगारवमसमत्यो धारेउं । तेण अन्नत्थ उचट्ठाविजद । उत्तिमट्टपरिवनस्स या तत्थेव भावलिंग दिजह । ९१ 'जत्तिय मिचाइ । कालतो अणवटुप्पो जो जेत्तिय काल अणुवरतदोसो सोत- त्तियं काल अणवटुप्पो। तव अणवटुप्पो दुविहो-आसायणा-अणवठ्ठप्पो, पडिसेवणाअणवटुप्पो य। तस्थासायणामिमेसि करेजा। तित्धयर पवयण सुय आयरिय गणहराण महिहियाणं । जहा सव्वोवायकुसलेहिं अइकक्खडदेसणाकया।जाणता य किं घरवासे वसन्ति, भोगे य भुअन्ति। वहा इस्थीतित्थं । संघमहिक्सियह "पडिणीयताए वा वहह । अहवा भणइ अन्ने वा सघा अस्थि 35 1 पतितमेतद्वाक्य A. आदर्श। 2 A. अणहप्पारिह । 3 B निमित्तिदोसण्णगायरिया। 4 B बीइदो । 5A नउलमेगो। 6A चारुगाइ। 7 B हवइ । 8 B लिंगे या। 9A भावओ। 10 B रयहर० । 11 B पडिपक्ख । 12 B हत्थादा० । 13 B दाणितो। 14 B पुच्छिन्ना। 15 B कीलो। 16A मणवरयदोसो। 17 A 'पदिणी.' आरभ्य 'खिवई' पर्यत पाठो नोपलस्यते A. आदर्श । 20 " 30 २६ सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ७८-८५. ७८ 'इति दवाई इन्चाइ । इति एव दवसेत्तकालभावेतु चउसु वि बहुगुणेसु, गुरसेवा पहाणसेवा भण्णइ । एएसु बहुतर देजा । 'हीणतरे हीणतर' ति। दद्यसेत्तकालमावा जहा जहा हीणा तहा तहा हीणतर पच्छित्तं देजा। सबहीणस्स झोसो वा कजइ । ७९ 'झोसिजई इश्चाइ । झोसिजइ त्ति मुञ्चइ । सुवष्टुगमवि जाव अन्नं तव वहइ ताव जइ 5 अन्नमावजइ तो त झोसिजइ । जहाँ छम्मासपट्टविए पञ्चहिं दिवसेहि गएहिँ अचमावन्न' गो होजा । पढमग वहन्तस्स पच्छिम से झोसिजई । वेयावश्चकरस्स वा थोवतर दिजह । जावइय वहन्तो वेयावश्च काउ सकेइ तावश्यं से दिजा। एय तवारिह भणियं ।। आहुणा छेयारिहं भन्नइ--- ८० 'तवधिय' इचाइ । तवगधिमो छम्माससमओ। अन्नो वा जो विगिह-तवकरण- 10 समत्थो-किं मम तवेण किज त्ति । तवमसमत्यो पुण गिलाणो असह वालवुहों या । तयं वा जो न सहइ । पुणो पुणो वा तवेण दिजमाणेण विण दम्मइ । अइपरिणामगो अइपमंगी वा । पुणो पुणो सेवेइ, सुयष्टुं वा । एएसु जहुहिडेसु तवारिहावत्तीए वि छेओ चेव दिजाइ ति । पुषपरियायस्स देसच्छेओ कजइ । ८१ 'सुनहत्तर' चाइ । सुबहुगा उत्तरगुणा पिण्डविसोहिमाईया। ते जो भसेइ चिणा 16 सेइ, पुणो पुणो छेयावत्तीओ करेइ । जो य पासत्थो।आइसहेण ओसण्ण कुसील-ससत्त-नीओ वा । जईण साहूण सविग्गाणं । पडितप्पइ वेयावञ्च करेइ । बहुसो य अणेगसो। उत्तरगाहाप अत्थपरिसमत्ती होही। ८२ 'उकोस'मिच्चाइ । उकोसा तव भूमी । आइजिणिन्दतित्थे संवच्छर । मज्झिमजिणाणं अट्टमासा । वीरवरस्स छम्मासा । एय उकोस तवभूमी समईओ। जो तस्स छो सावसेसच 20 से चरण, तस्स छेओ पणगाईओ"। आइसइण दस पन्नास वीसाई जाव छम्मासा। जाव धा धरइ परियाओ। छेयारिह भणिय ॥ अहुणा मूलारिह भन्नइ-- ८३ 'आउट्टिया' श्याइ । आउट्टियाए पञ्चिन्दिय बहेजा । मेहुण दप्पेण सेवेजा। सेसा मुसावाय अदिन्नादाण परिग्गहा ते उक्कोसेण पडिसेवेइ । आउट्टियाए पुणो पुणो य ति। 26 एवं जहुदिहाणेसु मूलं । ८४. 'तवधिय' इवाइ । तवगघिओ। आइसदेण तवअसमत्थो । तव असद्दहन्तो तवेण य जो न दम्मइ । मूलगुणे बहुविहे बहुसोय दूसेइ भाइ वा । एव उत्तरगुणे वि एस घइयरो। दसण या धमइ । दंसणे वन्ते नियमा चरित्त पन्त। चरित्तम्मि दसणे भयणा । दसणे चा चरित्ते या धन्ते चियत्तकियो। किश्चाइ दसणाईणि । तप्परिञ्चारण चियत्तकिम्चो। सेहेय त्ति 30 सेहो जो अभिणवो सिफ्स गाहिजइ । अणुवट्टविओएपसिं जहुदिहाण मूल । ८५ 'अन्यन्तोसन्न' मिच्चाइ । अञ्चन्तोसन्नो नाम ओसन्न पव्वाविभो । संविग्गेहिं वा पहा. वियमेत्तो चेव ओसनयाए विहरिओ जो, सो अश्यन्तोसनो । परलिंग दुग-घरत्यलिंग, भन्न- तिथिलिंग च । त जो आउट्टियाए दुप्पेण वा करेइ । मूलकम्म-इत्थीगन्भादाणसाडणं जो करेइ । मिक्खुम्मिय विहियतवे । विहियो तयो जस्स सो विहियतयो । छेयमूले वि अइकामि। 35 भणचट्ठतव चा पारश्चियतव वा । अइयारसेवणाए पत्ते एएसिं जहुदिहाण मूल सधेसि पि । 1 B पुस्तके 'चउ णेसु एतद्वात्य नास्ति । 2-3 'जहा' आरभ्य 'झोसिजई' यावत् पाठ A. पुस्तके 4 B एव। 5 Bकरणस० । 6 A वजह । 7 A गिलाणअसहुमारवुद्दा । 8-3'पुणो आरभ्य 'सेवेई पर्यन्त पाठ A भादशे पतित । 10 B होइ। 11B पणगादीतो । उकोसगे। 13 Bअविभो। -- पतित । 12B गाथा ८६-९१.] जीयकप्प-पुण्णी ८६ 'डेएण' इथाइ । छिजमाणे छिजमाणे जया परियाओ निरवसेसो छिनो, तदा से मूल । अणवठ्ठप्पतवावसाणे पारश्चियतवायसाणे' य मूल दिजइ । मूलायत्तीभो वा-पुणो पुणो आवजमाणस्स मूल । एवं जमुट्ठिकारणेसु सपत्थमूल । मूलारि भणिय ॥ अहुणा मणवठ्ठप्पारिह भन्नइ- ८७ 'उकोसमिधार । तदो (मओ) अणवट्टप्पा पप्नत्ता त जहा-साहम्मियाण तेण करे । भाणो १ । अन्नधम्मियाण तेण फरेमाणो २। हत्यादाण दलयमाणो ३ । उकोस सचित्ताइय। तेणेह-पुणो पुणो तेणेइ । मईच पउदृचित्तो सकिल्टिचित्तो ति कोहलो होइ । पट्टचित्तो सेणेइ । सा य तेणिया दुविहा-साहम्मियतेणिया, परधम्मियतेणिया य । दधओ खेत्तमो कालो भावओ य । सचित्त-अचित्त-मीसया दधे । अनसजओग्गहियरोत्ते अणणुनविए अब स्थाण सेत्ते । काले जहिं करेह । भावभोरत्तदुट्ठो । अन्नधम्मिया दुविहा-लिंगपविट्ठा, गिहत्या 10 य। तिनिह तेणमेतसि आहारो उपही सचित्त वाऽवहरइ त्ति । हत्थादालो गहिमओ, सोय ति पिहो-अत्यादाणो, हत्थालम्यो, हत्यातालो। तत्य अस्थादाणो नेमित्तिओसन्नागारिया भयगप- डिभग्गवाणियपेसणरुयगसउणी । पीहो' उवणो नउलगमेगो' घयगुलमतो वसतणकट्ठा- पाहिं अनो य सउणिगणिमित्त । हत्थालम्यो असिवपुररोहउवसमणत्थमभिचारगाई फरेइ । हत्यातालो जट्ठिमुट्ठिलउडोपलपहाराई हिंमरणभयणिरवेक्यो अप्पणो परस्स य पहरइ । सपफ्खे 15 च सहेण परपफ्ले य । घोरपरिणामो निरणुफोसो त्ति। ८८ 'अभिसेमो' श्चाइ । अभिसेमो उवज्झाभोजेसु जेसु भवराहेसु पारश्चियमावजइ । बहुसो अणेगसो । आवश्नो वि अणवठ्ठप्पो फीरह । किं कारण । जेण अणवट्ठप्पपारञ्चियमावन्न स्सानि मूलमेव दिजइ मिक्खुणो। जेण तस्स पर मुलट्ठाण भवति'। तहा उपहायस्सावि पर अणवठ्ठप्पपयं, अणपट्टप्पावत्तीओ य ।जया बहुसो आवजह तया य अणवठ्ठप्प दिजइ । ८९ 'फीरह' इन्चाइ । वपसु लिंगेसु वा जम्हा न ठाविजइ तम्हा अणवठ्ठप्पो। सो य अण घट्टप्पो चउधिहो-लिंगओ, सेत्तो, कालो, तवभो । लिंग दुविह-दधे भावे य । दधलिंगं रोहरणाई भावलिंग महद्ययाइ । पत्थ चउभगो। अणन्तरगाहासम्बद्धा इमा गाहा- ९०. 'अप्पडिविरय' इचाइ । सपफ्लपरपक्खपदुवो तेणगाइदोसेहिं । अप्पडिविरभो सपक्ख परपक्ख"पहरणुजुओ। निरवेक्पो अणुवसन्तवेरोजो। सो दधभावलिंगेहि दोहिं वि 25 अणवठ्ठपो । हत्थालम्यो, अत्थादाणो", ओसण्णाइया य तहोसाणुवसन्ता न भापलिंगारिहा। द्धलिंगमत्यि तेसिं, भावलिंगेणाऽणपट्टप्पा । खेत्तमो अणवढप्पो जो जम्मि खेत्ते दोसमावन्नो सो तम्मि सेत्ते अणवठ्ठप्पो । जहा अत्थादाणिमो" तम्मि चेव खेत्ते देसे वा न उवट्ठाविजह । कि कारणं पुवन्भासा लोगो पुच्छेजा" सो पात इहिगारवमसमत्थो धारेउ । तेण अनस्थ उवट्ठाविजा । उत्तिमट्ठपडिवनस्स या तत्थेव भावलिंग दिजइ । ९१ जत्तिय'मियाइ । कालतो" अणवटुप्पो जो जेत्तिय काल अणुवरतदोसो सोत. त्तिय कालं अणवटुप्पो। तव अणवठ्ठप्पो दुविहो-आसायणा-अणवटुप्पो, पडिसेवणाअणवटुप्पो य । तत्थासायणामिमेसि करेजा। तित्थयर पवयण सुय आयरिय गणहराण महिहियाण । जहा सवोवायकुसलेहिं अइफक्खडदेसणा कया।जाणन्ता य किं घरवासे वसन्ति, भोगे य मुअन्ति। तहा इत्थीतित्थं । सघमहिक्सिवह "पडिणीयताप वा वह । अहवा भणइ अन्ने चा सधा अस्थि 35 1 पतितमेतद्वाक्य A. आदर्श। 2 A अणहप्पारिह । 3 B निमित्तिदोसण्णगायरिया। 4 B भीइदो। 5A नउलमेगो। 6A चारुगाइ। 7 B हवद । 8 B लिंगे या। 9A भावओ। 10 B रयहर। 11B पडिपक्स। 12 B इत्यादा० । 13 B दाणितो। 14 B पुच्छिज्जा। 15 B कीलो। 16 A. भणवरयदोसो। 17 A 'पटिणी.' आरभ्य 'सिवई' पर्यन्त पाठो नोपलभ्यते A आदर्शे। 20 , 30 - भ । - 10 1 15 २८ सिद्धसेनसूरिकया [गाथा ९२-९५. सियालसुणगाणं विगाण ति । एव सुयं अहिक्पिवर-पायय ति । थाणे थाणे वा काया, पुणो पुणो वा वयाणि, पमाय अप्पमाया वा। मोक्सदेसणाए जोइस जोणिपाहुड गणितेण वा मि पओयणं । तहा आयरियं जच्चाईहि अहिपिखवइ । तहा गणहर महिड्डियं । महिद्वियगणेण मूलगणहरा गहिया । जो या जम्मि जुगे पहाणो तमहिरिरावइ । इहिरससायगल्या, सुहसाया, 5 परोवपसुजुया मसा इव, गिहिवच्छलगा न जईणं ति एवमाईहि आसाएन्तो अणनट्टप्पं पावेइ । एस आसायणा अणवटुप्पो। पडिसेवणा-अणवट्टप्पो इमेहि कारणेहि-साहम्मिय-अन्न- धम्मिय तेणियाए हत्यादालणादीहि य आवजइ । तत्य आसायणात्तवअणवट्ठप्पो जहन्नेण, छम्मासा, उकोसेणं संवच्छर । पडिसेवणा अणवटुप्पो जहन्नेण वारसमासा उफ्फोसेणं पारस सवच्छराणि, इमाए गाहाए भिन्नई - ९२ 'वास वारस' इयाइ । सो य जइ इमेहिं गुणेहिं जुत्तो तो अणवट्टप्पतवं पद्विवजह । सघयणनिरियआगमसुत्तत्यविहीए जो समग्गो उ । तवसी निग्गहजुत्तो पवयणसारे अहिंगयत्यो । तिलतुसतिभागमेत्तो वि जस्स असुहोण विजई भावो। निजुरणारिदो सो सेसे निजदणा गस्थि ।। एय गुणसपउत्तो पावइ अणवट्टमुत्तमगुणोहो । एय गुण विष्पहणे तारिसगम्मी भवे मूल ॥ एय ता उस्सग्गेण । अववापण पुण कुलगणसंघकजाई तेणाधीणाई सिंहणाइयकर्ज या पसाहियन्ति, तो थोच योवतर चा से देजा। सयोवा से सब मेव मुन्चेजा तस्स पुण गणवट्टप्पतव पडिवजमाणस्स को विही? किं वा तवं करेइ ति । एत्य गाहा।- ९३ 'वन्दइ' इञ्चाइ । गणनिक्सेवमित्तिरिय काउ परगण पडिवजा । पसत्थदधसे- त्त काल भावेसु पिसत्थदघे, उच्छु-चणसड पउमसर-चेइयघराइसुरोत्ते, फाले सुहदिवसे, भावमो सम्झागय रविगयाइय मोत्तुं आलोयण पउआइ । काउस्सग्गो कीरइ निरुवसग्गनिमित्त सेसाण" भयजणणणिमित्त च। गच्छेण सहवासो एगखेत्ते, एगउवस्सए, पगपासे, अपरिभोप अच्छह । सेहमाइए वि वन्दइ । ते पुण तण चन्दन्ति । परिहारतको गिम्ह सिसिर वासासु जह- 28 नमज्झिमुकोसो। गिम्हे चउत्थ छट्ट-ट्टमाइ । सिसिरे छट्ट मन्दसमाइ वासासु अट्टम-दसम यार- सन्ताई । पारणए अलेवकड । ससेवओ अणवट्ठप्पारिह भणिय ॥ अहुणा पारश्चियारिहं भन्नइ- ९४ 'तित्यगर' इवाइ । तित्थगराई जहा अणवट्ठप्पे तहा इह पि भाणियधो। गणहरो तित्थगराणन्तरसीसो, सोमहिहियगहणेण गहिओ जो । जहिं जुगप्पहाणो । मायो लामो संपत्ती 30 य एगट्ठा। तस्स साडणा आसायणा । जहा जहा अभिनिवेसेण हीलेई तहा तहा आयस्स साडण करिन्तो पारश्चिय पावइ । ९५ 'जोय सलिंगे' इच्चाइ । तओ पारश्चिया पन्नत्ता त-जहा-दुट्टे पारचिए, मूढे पार चिए, अन्नमन करेमाणे पारञ्चिए। दुट्ठो दुविहो-फसायदुट्टो, विसयदुट्टो यासपक्ख-परपक्खे चउभगो। सपक्सो समण समणी परपफ्सो गिहत्था।तत्य कसायदुट्टे उदाहरण" -सासवनाले 35 मुहणन्तए य सिहिरिणि उलुगच्छिओ त्ति। विसयदुट्टे वि चउभगो। तत्थ दुविह दुट्ठो वि पढम- बिईयभगे वहमाणो लिंगओ पारची। तईए अइसई देना । अणइसई न देह लिंग ।रायवहमओ 1B वदेमु०॥ 2A.तु। 3 B एवमातीहिं आसादितो। 4 A मिन्नति। 5 A असुभो। 6 A. वाए पुण। 7 B तेणहीणाइ 8A. मिंगणा। 9 A दिलेजा। 10A सघो- वा सब। 11A मुभेजा। 12 'सेसा . मित्त च एतद्वाक्य A. आदर्श गास्ति। 18A, उयाह०। 20 - - 5 गाथा ९६-१०२.] जीयकप्प-चुण्णी २९ जहा उदाइमारओ अन्नो वा । राइणो वा अग्गमहिसि पडिसेवेइ । अग्गमहिसिग्गहणेण अन्नावि जा टा। च सहेण जुवराय सेणावइमाईण वा अग्गमहिसीओ। बहुसो पुणो पुणो य, लोग- पगासो य जोस पारश्चिय पाचह। इयरासु महिलासु पुण फिन पारञ्चिओ' भन्नर-चा अवाया रायग्गमहिसीए। फुल-गण-सघ आयरिय पत्थारनिधिसयाईया दोसाजओ पहबन्ति त्तिइयरम- हिलासु पुण वयभंगदोसो, पगस्स य अवाओ होजा तेण मूल। ९६ 'थीणद्धि'इच्चाह । थीणद्धी दरिसणावरण-कम्ममेओ निदा यणगरस । अइसंकिलिट्ट- परिणामा थीणद्धी । पदुट्ठपुराभिलसिओवरि सुत्तो वाचारप केसववलद्ध च जायए। उदाहरणार- पोग्गलमोयगदन्ते फरसगवडसालभजणे चेव । पवमाई उदाहरणा । अमोनासेवण-अन्नोन्नाहिट्ठाणासेवणन्ति भणियं होह । तत्थ पार-10 श्चिय । बहुसो पुणो पुणो य तेसु पारश्चियावराहेसु पगरिसेण सज्जए पसजए जो। ९७ 'सो कीरई' [इचाइ ] । सो य पारश्चिओ चउधिहो-लिंगओ, खेत्तओ, कालओ, तवओ। तत्थ दध भावलिंगे चउभंगो। यीणद्धिमहादोसो। अन्नोन्नासेवणा पसत्तो । रायवहओ भागमहिसीपडिसेवणाइएसु अवराहेसु उभयलिंगणावि पारञ्ची। ९८-९९ वसहि' इञ्चाइ । 'जत्थुप्पनो' याइ । खेतपारचिओ जो जम्मि खेते दूसिओ15 अच्छमाणो वा दोस पावेजा। वसहीए एव निवेसण पाडग-साही निओग-पुर देस रजाओ य जत्य जत्य दोसमावन्नो आवजिस्सइ वा ताओ ताओ सेत्तपारञ्चिो कीरइ । १०० 'जत्तियमेत्त' मिचाइ । जो जावईय काल अणुवसन्तदोसो, दूसइ वा जावईय काल सो कालपारश्चिओ। तवसा पारश्चिओ दुविहो-आसायणापारञ्चिओ, पडिसेवणापारश्चिओय। आसायणापारञ्चिो तित्थगराइट्ठाणेसु । विभासा पुधभणिया। पडिसेवणापारञ्चिओतिविहो-20 दुट्टे पारशिप, पमत्ते पारचिए, अन्नमन करेमाणे पारञ्चिए । दुट्ठो दुविहो-फसायविसएहि पुषमणिओ । पमत्तो पञ्चविहो-कसाय-विगहा-वियड-इन्दिय-निद-प्पमाय' इति । एए भाणियधा वित्थरओ । अन्नमन करेमाणो पुधमणिओ। आसायणापारश्चिओ जहन्नेण छम्मासा, उकोसेण सवच्छर । पडिसेवणा पारचिओ जहन्नेण यारसमासे उकोलेण वारसवासा । सघयणाइया गुणा जहा अणवटुप्पे तयो वि तह चेव । १०१ 'एगागी' इञ्चाइ । जिणकप्पियपडिरूविओ खेत्तवाहिं ठाइ अद्धजोयणवाहिरओ। जभो विहरइ आयरिओ तओ तओ सो वि विहरइ । सेत्तओ चाहिरओ ठियस्स आयरिओ पइदिवस अवलोयण करेइ । सुत्तत्थपोरिसीओ दोनि वि दाउ गच्छइ तस्स समीव । अहवा अस्थपोरिसिं अदाउ गच्छइ । अहवा दोनिवि अदाऊण गच्छद । अहवा दुब्बलो, असमत्थो तर गतु, कुलाइकजेहिं वा वावडो, ताहे गीयस्थ सीसमन्न वा पेसेइ । भत्तपाण चायरियस' 30 आयरियपेसवियरस वा जत्थ गओ अन्तराले वा से उवणेन्ति । पारञ्चिओ वि भत्तपाणाईय पडिलेहणुपत्तणाइ वा अगिलाणो सयमेव करेइ । मह गिलाणो तो आयरिओ अन्नो वा से भत्ताइ आहारद उधत्तणाइय पि से कुणइ । सुत्तस्थेसु आयरिओ अन्नोवा से पडिपुच्छग देह । परमेय संखेवपारश्चियारिह भणियं। १०२ 'अणपट्टप्प' इञ्चाइ । तवअणवटुप्पोतवपारञ्चिओय भहबाङसामिम्मि चरिमचउद्दस-35 पुषधरे दो वि वोच्छिन्ना लिंग खेत्त कालाणवठ्ठप्प पारश्चिया ताव अणुसजिजन्ति जाय तित्या 1Bओय हुवन्ति। 2A भावओ। 3 B तातो तातो। 4 B विवरपेश! 25 15 २८ सिद्धसेनसूरिकया । [गाथा ९२-९५० सियालसुणगाणं विगाणं ति । एवं सुयं अदिक्सिवइ-पाययं ति । थाणे याणे या काया, पुणो पुणो वा वयाणि, पमाय अप्पमाया था। मोक्सदेसणाए जोइस जोणिपाहुड गणितेण या किं पोयणं । तहा आयरिय जञ्चाईहि अहिफ्सिवइ । तहा गणहर महिहिय । महिहियगहणेण मूलगणहरा गहिया । जो वा जम्मि जुगे पहाणो तमहिक्सिवइ । इहिरससायगण्या, सुहसाया, 5 परोवपसुजुया मखा इव, गिहिवच्छलगान जईणं ति' एमाई हि आसाएन्तो अणवठ्ठप्प पावेइ ! एस आसायणा जणवटुप्पो। पडिसेवणा-अणपट्टप्पो इमेहिं कारणेहि-साहम्मिय अभ- धम्मिय-तेणियाए हत्यादालणादीहि य आवजह । तत्य आसायणा-तवअणवठ्ठप्पो जहनेण छम्मासा, उकोसेण सपच्छर । पडिसेवणा अणवट्टप्पो जरनेण वारसमासा उफ्कोसेणं चारस सवच्छराणि, इमाए गाहाए भिन्नई - 10 ९२ 'चासं बारस' इञ्चाइ । सो य जइ मेहिं गुणेहि जुत्तो तो अणवठ्ठप्पतय पहिवाइ । सघयणनिरियागमसुत्तत्यविटीए जो समग्गो उ । तवसी निग्गहजुत्तो पवयणसारे अहिगयत्थो । तिलतुसतिभागमेत्तो वि जस्स असुहों ण विजई भावो। निजूरणारिहो सो सेसे नितहणा णत्यि ।। एय गुणसपउत्तो पावइ अणवठ्ठमुत्तमगुणोहो। एय गुण विप्पडणे तारिसगम्मी भवे मूल ॥ एयं ता उस्सग्गेण । अपवारण पुण कुलगणसवकजाई तेणाधीणाई सिंहणाइय कर्ज वा पसायिन्ति, तो थोष थोवतर वा से देजा। सघोवा से सच मेव मुञ्चेजा"। तस्स पुण अणवठ्ठप्पतव पडिवजमाणस्स को विही? किंवा तव करेइ ति । एत्थ गाहा ।- ९३ 'चन्दइ' इच्चाइ । गणनिक्खेवमित्तिरिय काउ परगण पडिवज्जइ । पसत्यदधखें- त काल भावेसु ।पसत्थदघे, उच्छु घणसड पउमसर-चेइयघराइसु खेत्ते, काले सुहदिवसे,भावभो सम्झागय रविगयाइय मोत्तुं आलोयण पउआइ । काउस्सग्गो कीरइ निरुवसम्गनिमित्तं सेसाण" भयजणणणिमित्त च। गच्छेण सह्वासो एगखेत्ते, एगउवस्सए, एगपासे, अपरिभोप अच्छह । सेहमाइए वि चन्दइ । ते पुण त ण वन्दन्ति । परिहारतवो गिम्ह सिसिर वासासु जह- 25 प्रमझिमुकोसो। गिम्हे चउत्य छटमाइ । सिसिरे छ? हम दसमाइ वासासु अट्ठम-दसम-धार सन्ताइ । पारणए अलेवफड । सखेवमओ अणवट्टप्पारिह भणिय ॥ अहुणा पारश्चियारिह भन्नइ- ९४. 'तित्यगर' इञ्चाइ । तित्थगराई जहा अणवट्टप्पे तहा इहं पि भाणियधो। गणहरो तित्थगराणन्तरसीसो, सो महिडियगणेण गहियो जो । जहिं जुगप्पहाणो।आयो लामो सपत्ती 30 य एगट्ठा। तस्स साडणा आसायणा। जहा जहा अभिनिवेसेण हीलेई तदा तहा आयस्स साडण करिन्तो पारश्चियं पावइ । ९५ 'जोय सलिंगे इच्चाइ । तओ पारश्चिया पन्नत्ता त-जहा-दुट्टे पारञ्चिए, मूढे पार चिए, अन्नमन करेमाणे पारश्चिए। दुट्ठो दुविहो-कसायदुट्ठो, विसयदुट्टो य ।सपक्ख-परपक्खे चउमगो। सपक्पो समण समणीपरपरयो गिहत्या। तत्य कसायदुट्टे उदाहरण-सासवनाले 36 मुहणन्तए य सिहिरिणि उलुगच्छिओ त्ति। विसयदुट्टे वि चउभगो । तस्य दुविह दुट्टो वि पढम बिईयभगे वट्टमाणो लिंगो पारची। तईए अइसई देज्जा । अणइसई न देह लिंग । रायवहमओ 1B वदेसु०॥ Aतु 3 B एवमातीहिं आसादितो। 4 Aमिति। 5A भमुभो। 6 A पाए पुण। 7 B तेणहीणाइ 8 A सिंगणा। 9A दिज्जेज्जा। 10A सघो- 11A मुभेजा। 12 'सेसा ..मित्त च एतद्वाक्य A. भादर्श नास्ति। 13 A. उयाह । 20 1 ना सच श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता जीतकल्पबृहचूर्णिविषमपदव्याख्या नत्वा श्रीमन्महावीर स्वपरोपकृतिहेतये । जीतकल्पवृहपूर्णेयारया काचित् प्रकाश्यते ॥ अनादौ शाखारम्भे विघ्नोपशमनायेष्टदेवता गणधर स्थविर प्रवचनाना ययाक्रम वर्णनाय रूपकचतुष्टयमाह- १ 'सिद्धत्थे' त्यादि । सिद्धा निष्पन्ना अर्था प्रयोजनानि यस्य ज्ञानावाप्ती सत्यों स सिद्धार्थ , समाप्तकर्तव्य इत्यर्थ । सिद्ध प्रसिद्ध शासन संघो यस्य स तथा। सिद्धा अनादिप्रवाहतया नित्या प्रसिद्धा भर्या जीवादयो यन श्रुते तत् सिद्धार्थ तच्छुत यस्य । तत पदनयस्य कर्मधारय । सिद्धार्थस्य राक्ष सुत चापत्यम् । कम्-वीरेभ्योऽति- कान्तेभ्यो वर श्रेष्ठ , उपसर्गादिसहनप्रत्यलत्वाद्वीरवरस्तम् । वरा श्रेष्ठा परा ईप्सितार्थलाभरूपास्तान् ददाति यस्तम् । वरा देवादयो यतयश्च तेभ्यो वरका प्रधाना शमादयो गणधराच तैर्महित पूजितम् । नमत प्रणमत हे जना जीवेभ्यो हितो मोक्षमार्गप्रदर्शकत्वेन स तथा, तम् ॥ २ एकादशापि गणधरान दुर्धरगुणधारकान, घराधिपो मेरुस्वद्वत्सारा मचलत्वात् , तान्। यस्य गम्यमान. स्वात् जम्बुप्रभवादीच समस्त्रसूत्रधरान् सूरीन् प्रणमत ॥ ३ दशपूर्वधरान नवपूर्वधरोथ, अतिशयिन अवधिमन पर्यायज्ञानिन , अवशेषज्ञानिनच मतिश्रुतशानिन । यझेन सर्वानपि यतिगुणप्रवरान् , सर्पकाल निकरणशुद्धेन भावेन नमत ॥ ४ इत स्थविरनमस्कारादूर्व प्रवचन नमत । निर्वाणामित्येतदेव व्याख्यानयति । निर्वाणस्यास कारण जीवानां तद्गमकत्वात्-तत्तापकत्वादित्यर्थ । निर्वाण मोक्ष गमयति । प्रापयति जतून निर्वाणगमिति प्राप्ते-आयु. खारोऽलाक्षणिको निर्वाणामिति । प्रवचनमित्यस्यार्थमाह-प्रकर्षेण गत स्थित जीवादिवस्तुवाचकतयेति प्रगतम्, भागामिफलजननसमर्थ यत्तत् । प्रशस्त वर्णादिगुणोपेत कष्टप्राप्य च यत्तत् । प्रधान तथा च दधिर्वादय प्रशस्ता उच्यते न तु प्रधानानि, प्रधान पटादिरपि भवति न तु प्रशस्त इति व्यवहियते, इत्यनयोर्विशेष । तत प्रशस्वानि ससारोत्तारीणि पचनानि यन तत्प्रशस्ववचनम् । प्रधानानि द्रव्याणि वचनानि यत्र तत्प्रधानवचनम् । इत्यर्थनयोपेत प्रवचन नमत । ५ मधुना जीतकल्पसूत्रतुर्जिनभद्रगणेवर्णनाय श्लोकपटकमय फुलकमाह-नमहेत्यादि-त जिन- भद्रक्षमाश्रमणं च नमतेति योग । शेषाणि तद्विशेषणानि । युगप्रधानमिति--तत्कालीना भागमार्थवेदिन पुरुषा युगमभिप्रेत तेषु प्रधानस्त्रम् । प्रधानज्ञानिना बहुमतम् । सर्वश्रुतिशास्त्राणि शन्दशास्त्रप्रमृतीनि तेषु कुशल तदिनम् । दर्शनशानयोर्योऽसावुपयोगमार्गवत्र स्थित तत्परम् ॥ ६ जस्सेत्यादि -यस्य पादपद्म भ्रमरा इन मुनिवरा-यतयो रानौ च दिवा व सेवन्वे सदा नित्य त नम- तेति योग । अनन्यसाधारणविशेषणसामर्थ्यादनुक्तमपि विशेष्य लभ्यते । कीदृशा भ्रमरा ?-मकरन्द मिल्क- स्वन राषितावत्पिपासव । यतय कीदृशा-ज्ञानमेवाहानशादिभेदभिन्न मकर दस्तत्तृषितास्तद्गृहीतुमिच्छव । पुन कीदृशा भ्रमरा-अमृतमयवशगन्धामिवासिता -अमृत जल तेन निर्वृत्तममृतमय पमम् , तस्य वशोऽधीनो यो गन्धरसेनामिसामस्त्येन पासिता भाहूता शब्दिता इति यावत् । वासशब्द-इत्यस्य ख()रूपम् । यतय फोदृशा --मुखमेव निर्यरोऽपां प्रसवस्थानम्, तनामृतमिव यन्मत जिनागमस्तस्य वशोऽधीनो यो गन्ध परिमल माहात्म्यरूपस्तेनाभिवासिता-तदाकृष्टमानसा इत्यर्थ ॥ ७ समयशब्द आधारार्थोऽत्र, तत खाचार-पराचारयो प्रतिपादको य भागम शास्त्रनिवहस्य च । लिपपबाटादशभेदा । गणित पारीगणितादि । छन्दासि च पिङ्गलादीनि । शब्दशास्त्रम् [व्यावरण] । तैनिर्मितों भनितो गश पटहो दाखपि दिवानुयोगविषयेऽनुपमो यस भ्राम्यति त नमत ॥ ,
सिद्धसेनसूरिफया
[गाथा १०३०
१०३ 'इतिएस' इश्चाइ । इतिकरणो परिसमत्तिवयणो। एस इति अणन्तरहिट्ठो जीय
कप्पो जीयववहारो कप्पो।वण्णणा परवण त्ति एगट्ठा।समासओ संखेवओ।सोहणं विहिय जेसिं
नाणाइय ते सुविहिया साहू। तेसिमणुकपानिमित्त । कहिओ अक्खाओ। देओदाययो अय पुण।
काहि ? पत्ते। किंविसिट्टे? संविमावजमीरू, परिणामगकडजोगी, आयरियवन्नवादी, संगहसीलो,
5 अपरितन्तबहुसुयमेहावी, एवमाइगुणसंपन्ने पत्ते। पुण सद्दोऽवधारणे । पत्ते चेव दायचो,
नापत्त । सुदु परिच्छिया गुणा जस्स । एए चेव सचिग्गाई भणिया गुणा । आइमझावसाणेसु
तावच्छेय निवसेसु य जवसुवन्नमिव अविगारिज, तं सुपरिच्छियगुणं, तम्मि सुपरिच्छिय
गुणे सुत्तत्थयओ देओयमिति ।
इति जेण जीयदाणं साहूणऽइयारपंकपरिसुद्धिकर।
10
गाहाहि फुड रयं महुरपयत्याहि पावणं परमहियं ।।
जिणभदखमासमणं निच्छियसुत्तत्थदायगामलचरण ।
तमहं वदे पयो परमं परमोचगारकारिणमहग्छ ।
॥जीतकल्पचूर्णिः समाप्ता। सिद्धसेनकृतिरेषा ॥
.
भनिसो मा पटहो दाखपि विश्वनुयोगविषयेऽनुपमो यस भ्राम्यति त नमत । . गवतेनामिसामस्येन पासिता भाहूता शब्दिता इति यावत् । वासशब्दे-इत्यस्य ख(१)रूपम् । यतय कीरशा-मुखमेव निर्झरोपों प्रसवस्थानम्, तनामृतमिव यन्मत जिनागमस्तस्य दशोऽधीनो यो गन्ध रिपपचाटादशभेदा । गणित पाटीगणितादि । छदासि च पिङ्गलादीनि । शब्दशाप्तम् [व्यावरण]। तेनिर्मितों श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता जीतकल्पवृहणिविषमपदव्याख्या नत्वा श्रीमन्महावीरं स्वपरोपरतिहेतये। जीतकल्पवृहशूर्णेयाख्या काचित् प्रकाश्यते ॥ अत्रादौ शास्त्रारम्भे विमोपशमनायेष्टदेवता गणधर-स्थविर-प्रवचनानो यथाक्रम वर्णनाय रूपकचतुष्टयमाह- १ सिद्धत्थे'लादि । सिद्धा निष्पना या प्रयोजनानि यस्य ज्ञानावाप्ती सत्यां स सिद्धार्य , समाप्तकर्तव्य इत्यर्थ । सिद्ध प्रसिद्ध शासन सपो यस्य सावितया नित्या प्रसिद्धा अर्था जीवादयो या श्रुते तत् सिद्धार्थ तच्छुत यस्य । तत पदनयस मधारय समास सुन चापत्यम् । कम्-वीरेभ्योऽति- कान्वेभ्यो घर श्रेष्ठ , उपसर्गादिसहन प्रत्यलत्याद्वारवरस्तम् । बरा श्रेष्ठा घरा इप्सितार्थलाभरूपास्वान् ददाति यस्तम् । परा देवादयो यतयय वेभ्यो वरका प्रधान कादयो गणथराध तैर्महित पूजितम् । नमत प्रणमत हे जना [जीवेभ्यो हितो मोक्षमार्गप्रदर्शकत्वेन स तथा, तम् ॥ २ एकादशापि गणधरान् दुर्धरगुणधारकान, घराधिपो मेरुस्तद्वत्सारा अवलत्वातू, तान्। चस्स गम्यमान- वातू जम्बुप्रभवादीच समस्तसूत्रधरान सूरीन् प्रणमत ॥ ३ दशपूर्वधरान नव पूर्वधरोध, अतिशयिन अवधिमन पर्यायज्ञानिन ; अवशेषज्ञानिनश्च मतिभुतशानिन । यनेन सापि यतिषणप्रवरान, सर्वकाल त्रिकरणशुद्धेन भावेन नमत ॥ इत स्थविरनमस्कारादूर्व प्रवचन नमत । निर्वाणामित्येतदेव व्याख्यानयति । निर्वाणस्या कारण जीवाना तद्गमकत्वात्--तत्यापकत्वादित्यर्थ । निर्वाण मोक्ष गमयति । प्रापयति जन्तून निर्वाणगमिति प्राप्ते अनु- रोऽलाक्षणिको निर्वाणामिति । अपचनमित्यस्यार्थमाह--प्रकर्षण गत स्थित जीवादिवस्तुवाचकतयेति प्रगतम्, भाजननसमर्थ यत्तत् । प्रशस्त्र वर्णादिगुणोपेत कष्टप्राप्य च यत्तत् । प्रधान-तथा च दधिपूर्वादय प्रशस्ता उच्च ते न तु प्रधानानि, प्रधान पटादिरपि भवति न तु प्रशस्त इति व्यवहियते, इत्यनयोर्विशेष । तत प्रयस्तानि समारोत्तारीणि पचनानि यन तत्प्रशस्तवचनम् । प्रधानानि द्रव्याणि वचनानि यन तरप्रधानवचनम् । ५ मधुना जीतकल्पसूत्रकर्तुर्जिनभद्रगणेवर्णनाय लोकपटकमय फुलझमाह-नमहेत्यादि- -त जिन- भद्रक्षमाश्रमणं च नमतेति योग । शेषागि तद्विशेषणानि । युगप्रधानमिति–तत्कालीना आगमार्यवेदिन पुरुषा युगमभिप्रेत तेषु प्रधानतम् । प्रधानज्ञानिना बहुमतम् । सर्वश्रुतिशास्त्राणि शन्दशास्त्रप्रमृतीनि तेषु कुशल तदिनम् । दर्शनज्ञानयोर्योऽसावुपयोगमार्गस्तत्र स्थित तत्परम् ॥ ६ जस्सेत्यादि-यस्य पादपद्म भ्रमरा इव मुनिवर-यतयो रानी च दिवा च सेवन्ते सदा नित्यं त नम- वेति योग । अनन्यसाधारणविशेषणसामध्यनतमपि विशेष्य लभ्यते । कीदृशा भ्रमरा - मकरन्द किल्क चन पितास्तत्पिपासव । यतय ज्ञानमेवाझानमादिभेदभिन्न मकर दस्तत्तृषितास्तद्गृहीतमिच्छव । पुन कौशा भ्रमरा अमृतमयवगन्धामिवासिता-अमृत जल वेन निर्वृत्तममृतमय पद्मम् , तस्य वशोऽधीनो यो परिमल माहात्म्यरूपस्तेनाभिवासिता तदाकृष्टमानसा इत्यर्थ ॥ ७ समयशब्द भाचारायोऽत्र, तत खाचार-पराचारयो प्रतिपादको य भागम · शाननिवारस्म च । इत्ययंत्रयोपेत प्रवचन नमत ॥
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१-26 2-29 । - । . तथा ८. तथा, येनानुपममतिनाऽऽवश्यके ज्ञानाना मसादीना विशेपा विशेपिता कथिता भविशेषत सामस्त्येन । ज्ञानिनां च विशेषा. प्रमाणानां विशेषा विशेषितास्वधा गणधराणां च पृच्छा येन विशेषितास्त नमत ॥ ९ येन छेदसूनस्था प्रायश्चित्तानामापत्तियां सविधिनियूंठ । आचार्योपाध्यायादिक पुरुषविशेषमाश्रित्य स्फुट प्रकट । केन कृत्वा दानस्य विरचना तया यहास्तेन । क जीतेन दान तस्य करपतन । अन्ये तु येन छेद- श्रुतार्थान् , फयभूतान्-आपत्तिदानयोविरचनं यत्र, तसात् जीतदानकल्पविषययोविधि पुरुषविशेषमाश्रित्य स्फुटो यमेन निर्मूढ उद्धृतस्त नमतेति, व्याचक्षते ॥ १०-११ भूयोपि परसमयवेदित्व विशेषतस्तस्याह-परेत्यादि-सुसमिता ये सुश्रमणास्तेषां य समा धिमार्ग प्रतिदिनाचरणीयमनुछान तेन क्षमाप्रधाा ये श्रमणावेपो निधानमिवैवम्, अनेनानेकमुशिष्यसपत्समन्वितस्वं तस्याह । त नत्वा । मदमथनम् । मानारिहति मानारिहस्तम् । शेष सुगमम् । स्कन्धक छन्द सर्वरूपकेषु, आर्या- गीतिरित्यपरनामकम् । पृ० प० (पृ०-पृष्ठम्, १० पक्ति ) १-26 कोवीत्यादि-आचारचूलात्यानिशीथस्याचारपदात् परत उपादानम् । -27 ववहारमाइयन्ति-आदिग्रहणादू भगवत्यादिपरिग्रह । ,-31. [नाणाइयारेसु]-नानातिबारेषु का भापति । 'आवती पायच्छित्तगणसम्पत्ति प्रायश्चितयो- ग्यता इत्यर्थ । कम्मिवत्ति-कस्यामापत्ती अपरिमूढ सन् । २-2 कप्पियाइएहिन्ति-पिण्डैपणा-वस्त्रैषणादिकल्पा येनार्थत सूनतश्चाभ्यस्ता स कल्पादिगुणोपेत उच्यते । [अपत्तापत्त]-अपानमयोग्य , मप्राप्त श्रुतेन पयसा च । येन नाधीत ध्रुत सोऽप्राप्तश्रुत । [अवत्त]-अव्यक्तो ययसा पोडशवर्षाणि यावत्, तदूर्ध्व व्यक्त पधकूर्चश्व ग । [तिन्तिणिय]-- तिन्तिणिको सिगिशिगिणस (ख) भाव । [चलचित्त]- सम्यक्त्वादिषु योऽस्थिर स चलचित्त चायोग्य उक्तो यथा- तिन्तिणिए चलचित्ते गाणगणिए य दुन्यलचरिते । आयरिय पारिभासी वामा य पिसुणे य॥ -6 [कयपवयण]-प्रोच्यन्ते तेनेवि प्रवचनम् । वक्तीति प्रवदतीति या प्रवचनम् -1 प्रतिष्ठावचन घा प्रवचनम् । प्रवचने योगानन्यत्वात् सास सर्वपक्षेष्वपि साह एव प्रवचनशब्दवाच्य । यत-प्रवचन श्रुतमुच्यते। तव भावभुतमुपयोगरूपम्। श्रुतोपयोगश्च न निराश्रय इति प्रवचनाश्रयत्वारसद्ध प्रवचनमभिधीयते। मत एवाह जेण त सुयमित्यादि तद्-सद्योपयोगात् । 1,-14. वत्तणुवत्तेत्यादि-वृत्त पात्रवन्धप्रन्थिदानादिक । एकदा नवो जात । ततोऽनुवृत्त एकपुरुष यावत् । तत प्रवृत्त पुरुषप्रवाहेण । अत एव यहुश आसेवितो महाजनेन । भाष्यकृता उक्तम्- वत्तो नाम एक्कस्सि अणुवत्तो जो पुणो विइयवारे । तईयवारपवत्तो, परिग्गडीओ महापणति ॥१॥ -18 सोहणन्ति-शोधकम् । मरुयाई-धिग्जातय । कत्थइ ति-द्विजातिवधे । -21 [पलास-खारोदगाइ]-पलासक्षारं च उदक च । आदिग्रहणादरिष्टवादिमह , तद् यथा घनमल शोधयति। -25 बिसेसणं च सहसंभवेन्यथा विद्यावान् धनवान् गोमानय पर इत्यादिषु प्रशस्तातिप्रचुराऽ नन्यसाधारणविद्याधागवादिवस्तुसद्भावेन यथाविशेष्य विशिष्यते विद्यादिमिस्सदा तत्तत्र सम्भवि विशेषण शेयम् । व्यभिचारे नीलोत्पलमित्यत्र नीलविशेषण रक्तोत्पलादेरपि सम्मवाद व्यव्यवच्छेदाय नीलपदम् । एवमिहापि शेपागमादिव्यवहारसम्भवात्तदवच्छेदाय जीतपदम् । 2-29 [केचल-मण मोहिणाणीति] केवल मण मोहिणाणीसन अधिविधा-भवप्रत्ययः क्षायो- पशमिकश्च । तनाद्यो देवरकाणाम् । तनाय विशेष उप्पलमत्तेण उ सल भवपचईओ हि जत्तिओ विसओ। सम्वत भोभासरे न य चुट्ठी नव य हाणी [हिं] ॥१॥ गुणपचारओ ओही गम्भजतिरिमणुयसपमोत्तृण । कम्माण सोवसमे तदवरणिनाण उप्पने ॥ २॥ । " - . । . २-30 ३-10] जीतकल्पपूर्णि-विपमपदव्याख्या सहयातायुकगर्भनतिर्यमाधान समयान शेषाणाक्षायोपशनिवावधिसम्भयो युगलर्मियाणाम् । अवधि, तिगद्व्यविषय ।भत्र यदा वली प्राप्यते सदा सदमो दीयते । तदमाये मापयायातिन समीपे । तस्याप्य भावे सवधिहानिन इत्यादि पाकन याच्यम् । २~30 अवसेस पुषीत्ति-अवशेषपूर्षिण -पट-सप्ताये क-तदन्ति यायत् । २-31 निशीथ कल्प व्यवहार दशाश्रुतत्कन्ध पञ्चकल्प प्रमृतिक शेष श्रुत सर्वमपि श्रुतव्यवहार । तदुक्तम्-'मायारपकप्पाई सेसं सम्प सुय विणिदिर' मिति । चतुदादिपूर्वाणा श्रुतत्वाविशेयेऽप्यतीन्द्रयाधु विशिष्टज्ञानहेतुत्वेन सातिशयत्वात् फेवलादिवदागमत्वेनैव तानि व्यपदिशानि । मत भागम्यन्ते परिच्छिद्यन्ते अतीन्द्रिया पदार्या अनेनेत्यागम उच्यते। २--32 तथा भाज्ञायत भादिश्यत इत्याशा । तद्रूपव्यवहारस्तु केनापि शिष्येण निजातिचारालोचकेन पालो- घनाचार्य समिहितोऽप्राप्त , दूरे वसो तिष्टी ।तत केनचित्कारणेन सय तावत्तन गन्तु न शनोति । अगीतार्थस्तु कवित्तय गता विद्यते । तस्य हस्ते आगमभापया गूगनि अपराधमदा लिखित्वा यदा शिघ्य प्रस्थापयति, गुरुरपि तथैव गूठपदी(दै )प्रायश्चित्त लिखित्या प्रेपयति तदासौ आज्ञालक्षणस्तृतीयो व्यवहार । तद यु(द)क्त 'देसन्तरहियाण गृहपयालरोयणा आणा।' गृहपदानि च दर्शयिष्यति पूर्णिकृत् । जहा-पढमस्म य फजस्सेत्यादिना ॥ आसेवि. यसत्यरथ त्ति-अभ्यस्खशालार्थी। २-33 दूरदेशान्तरीियासिनी । मइधारणा-युसल ति-~-सन्दिष्टवस्तुनयनसमर्थम् । २-34 गूढाथै वाक्यै । दसेवनापदमेकम्, अपरं च कल्पासेवनरूपम् । तत कल्पासेवनद्वितीयपदा- पेक्षया दपासेवनलक्षण प्रथम पदम् । तनापि दपासेवो दशपदानि दोक्ल्पनिरालम्मनादीनि । तेषु मध्ये प्रथमपदेन दपलक्षणेन पकानि च नीणि । तत प्रथमपक प्रतपट्पलक्षणम् । अभ्यन्तरतन्मध्यवति तत्र पठितमित्यर्थ । तनापि च प्राणातिपातादीनि पद स्थानाी। तेषु मध्ये पथम स्थान प्राणातिपातरूपम् , मापनमिलेव गूढपदेन प्राणाति- पातातिचार निद्दिष्टवान् । प्रथमषट् द्वितीयानिस्थानेष्वतिदिशवाह- २-35 पदमेत्यादि । सेसेलु वित्ति-द्वितीयादिषु मृषावादादिपु स्थानेषु इत्थ वाच्यम् । द्वितीय पक्ष कायपट्कलक्षणम् । तन प्रथम च स्थान पृथिवीकायविषयम् , शेषाणि च पदानि अप्कायादीनि । तेषु तृतीय पक्ष अकल्पगृहभाजनादि शोभावनपर्यन्तलक्षणम् । तन पिण्ड-उपाश्रय यन्त्र पानप चतुष्टय यदनेपणीय तदफ्ल्प्यम् । करोटककशपाच्यादिक च गृहभाजनम् । आसदकमचिकादि पत्यकरूपम् । भिक्षा गतेन सयतेन गृहे नोपवेष्टव्यमित्येव निषद्यावर्जनमुच्यते । मानवजन परमम् । शोभावना पठमिति । खस्थाने न्यक्षेण व्याख्यास्यते गाथेयम् । तत्र प्रथमस्थानमकल्पलक्षणम् । २-36 सेसेसुचि परसु त्ति-शेपाणि पदानि गृहभाजनादीनि वेषु । इदानीमतिदेशमाह-प्रथमपद दर्पक्षणममुचता तव यानि अकल्पनिरालम्बनादीनि द्वितीयतृतीयादीनि पदानि नि शङ्कपर्यन्तानि तेषु वाच्यम् । यथा पढमस्स य जस्सा विइएण पएण सेविय ज च । शेप पूर्ववत् । तत तइएण पएण सेवियं ज चेत्यादि । यावद् दसमेण पएण सेरिय ज ब ति । इत्येव प्रथमपट्कमाप्रिय धारणीयम् । भूयोऽपि द्वितीयपट्नमामिल तृतीयपङ्क चानियेत्यमेव चारणीय यावद्दशमपदमिति । अत एवाह--- ३--5 पुढविकायाइसु त्ति। अपिशब्दोऽन दृश्यखत पृथिवीकायादिष्पपीति दृश्यम् । द्वितीय च कार्य फल्पासेवनरूपम् । तर चतुर्विंशति पदानि भवन्ति । तेषु मध्ये प्रथम पद् दशनलक्षण तदर्थमासेवितमित्यर्थ । दर्पकल्पासेवना- प्रथमादिपदव्यास्यामाह-पढम ठाणमित्यादि-दप्प-करपासेवनेऽधिकृत्य प्रथम स्थान दर्प, श्रमणेन एतत्साध्यत्वादाकुहेरेतयोरेवान्तभाव । प्रमादम्य दर्प एवेति न तयो पृथक् प्रायश्चित्तीरूपणम् । ३-9 परिग्गहो चेव त्ति -~च शब्दादानिभोजनग्रह । इलेव प्रथमपङ्कविषय । ३-10 एवमफप्पाईसु वित्ति-नयसु पदेषु । ५ जी. क.चु. ।
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [3-11 ३-23 . - ३-11. द्वितीय कार्य करप , फल्पासेवनामाथिस । ३-12 तन ज्ञानादीनि नयोविंशति पदानि तेषु मध्ये एककस्मिन् पदे, एवमष्टादशमु चतुशिला गुमितेषु कल्पासेवनायामेतावन्तो भेदा -४३२ । उभयारोगायोगेंदनीलने ६१२ गाथाना भवन्ति । २-14 दुविहा पडिसेवणा-दप्पिया कप्पियेत्यादि-टप्पाईणि दसपयाणि धक्साणे - ३-17 तत्थ दप्पो-धावणडेवणाई-इत्यादि । धमीयामयमर्थ भाषण तिशी कारणेण सदयप्पयाण धावण । देवण गतवरेडाईफडण । आदिशब्दात मालमत् याहुद्धकरण, लगुडिभमाटण ॥१॥ अकप्पो नाम पुटवाइकायाण अपरिणयाण गहण करेइ । अइया उदउठ ससपिस समरक्साइएहि हत्यमत्तेहिं गिण्हह । ज वा अगीयत्वेण भाहारोवहि उप्पाइय त परिभुजता अकप्पो। पचकादिप्रायधितशुद्धियोग्यमपपाद सेवनविधि त्यक्त्वा गुरुतरदोपसेवा वा भवप्पो ॥२॥ निरालम्बो ज्ञानाचालम्मन विना Tणाइणि अवलनिउ अकपिय पटिसेवह सालम्मा, नाणाइ अवलम्वनं त्वपत्वा अकारणेण पटिसेवइ ज सा निरालम्या ॥३॥ ३-18 चियत्तत्ति -त्यक्त कृत्य करणीय येा स सस्तकृत्य , त्यक्तचारिन । अयमर्थ --जं भववायेण निसेविय गिलाणाइकारणे असथरे पा, पुणो ते चेव इहममत्यो वि होउ () सेवतो चियत्तकियो भवइ ॥ ४ ॥ अप्पसत्थे ति-वरवाद्ययं प्रामुकमोन्यपि ज परिसेवइ सा भप्रशस्वपटिसेयणा, किं पुण अविमुद्ध आहाकम्माइ ॥५॥ ३-19 पीसत्थे ति-अकिच पाणावागाइ सेवतो लोय-लोउत्तरविरुद्ध सपन परसपनात मलजिरो पीसत्यो । सपक्सो सावगाइ, परपस्यो मिध्यादृष्टय ॥ ६ ॥ अपरिच्छिय त्ति-आयव्ययमपरीक्ष्य य प्रवर्ततेऽपयादे। गायो लामो, व्ययो लब्धस्य प्रणाश , एमा अपरिच्छियपडिसेवणा ॥७॥ ३--20 अकटजोगि त्ति । जोगमकाऊण तिलानादी कार्ये गृहेषु चारनयपर्यटनमकृत्वा सेवते । यद्वा सथाराइसु तिति वारा एमणीय अनिसिउ जया तहयवाराए नि 7 ल भइ तया चउत्यपरिवादीए अणेसणीय, घेत्तव्य । एव तिगुण व्यापारमक्ष(क)त्वैव जा वियवाराए चेव चणेसणीय गिहद सोऽहजोगी ॥८॥ निरणुताविति-जो साष्ट्र अववाएणावि पुढमाईण संघटण परियारण उद्दवण वा काउ पच्छा गणुतप्पर- 'हा दुहु कय' सो अणणुतावी होइ-अपच्छायावीत्यर्थ । जो दप्पेण पडिसेवेन्तो नायुतप्येतस्य विशेप ॥ ९ ॥ ३-21 णिस्संको त्ति-निरपेक्ष । अकार्य कुन कस्याप्याचार्या राहते, नेहलोकस्यापि निभेति ॥१०॥ ३--23 दसगाईणि चउवीसपयाणि, एएसि इम बक्साण-दसण चि-दसणपभावगाणि सत्याणि सिद्धि विणिच्छय-सम्मत्यादि गिहन्तोऽसघरमाणो ज अप्पिय परिवह जयणाए तस्य, सो सुद्धोऽप्रायश्चित्त इत्यर्थ ।। नाण त्ति-गाणीमित्त सुत्त भत्य या गेम्हमाणो तत्य वि असथरे अकप्पिय पढिसेवतो मुद्धो ॥ चरित्ते त्ति -जत्थ खेते एसणदोसो, ताओ सेत्ताओ चारिनार्थिना निर्गतव्यम् । तओ निम्गच्छमाणो अ अकप्पिय सेवइ तस्य सुद्धो ॥ तव त्ति-तव काहामि त्ति घयाइ नेहऽतिपिवेज, कए वा निगिहतवे पारणे लायातरणाई पियेगा । लाया नाम वीहिया भुनिया भट्टे ताण तदुरेसु पेया कनइ त लयानरण भनइ त, विगिट्ठतवपारणए अहवा आहाकम्म पि वेना । मा अनेण दोसीणाइणा रोगो हवेजा। पारणगे आमलगसरादयो वा दीयन्ते । जयणाए सुनो । अतोऽप्रे सजमेति पद दृश्यते चूर्गिपुस्तके पु परं तदशुद्धम् । तस्य स्थाने पचयण त्ति पद पठणीयम् । निशीथे एतदीय- भाष्ये च इत्यगेव पठितत्वात् , चारिनपदीय सयमाघस्योक्तत्वाच । भत पवयण ति व्यारयायते-- पवयणट्टयाए फिचि पडिसेवतो सुद्धो। जहा कोई रायाह भणेना 'मम सियाओ नीह [२] । एत्य पदयणठया सेवतो मुझो । जह चितुअणगारो । तेण रुसिएण लक्सजोयणपमाण रूव विगुरुब्बिय लवणो चलणेणालोडिमोति ॥ समिय तिरिय न सोहेइत्यामिति चमित्त वैद्योपदेशादोपधपान पुर्यात् । इरियासमिइनिमित्त । । - ३-25 ३-30] जीवात्सपूर्णि-विपमपच्याल्या तचिनरमी होउ मा माशामिणमिमी होती तिप्पमा घोषाण प्रोत् । समाए सलिईए मोसीय पिकपदया। एमागाया दमा पराइएमा । यिनो पा भनागकप्प पदिने । आगीमानिए पादयो दाउ या दिगो गो भाभो पगमा माओवयेय करेइ, राप्पमाहया या औसह मरेगा। पादागिरिए पापमपीए पारािहेमा । मगेगौए मियः फारममा पहिरोपिय मायागुतो पारगागुतो पारिताद हवेमा। 'साइम्मिययच्छन्तार गरयुदपत्रपसाणाण' गार पा मारत्या । साहम्मियपरछा पहुंच रिम पहिरोम । जहा अजयरेहि मतियगानों परिभो । सत्य कि अपप गाद- तहे या संजय पोरो मारा कर पा । गय विह पयादिति व भाधिय पनव-शी॥ मिलोगो फट । पुरा-गण माबेशु गमुपले पतीरा उसारण-होगाइ रामाश्यमुहिस्स पउजेयस्य । सिमित गुम्म भोगा यायच्या आप असहि गिगास पाहाय अंग गाहीस कायम । यो य असर। तरप रापा पुराया सेहि-समय पुरोदिशा य ए घमा पुरिसा मनात । एए भन्सप ताप माविया । पार उशा | पारणे दिस्सिया होगा, जहा पपरसामी, राजरविलय पिया । एएसि पपगाइपाए मयणाए पेनु यमाहिदेउ दायम्मा परमार मरम्ममा पच्या मार मादासम्मेणापि रामादाय कायब्ध। ३-25 दयानि उदयाद-चसणपजयसाणाण घटाह पयाण व्याल्या उच्यते । सत्य उदय ति- यादो पातीयर सर्प । अग्गिति-पामिरागच्छति। [चोर ति-चोरा दुपिहा उपगरणसरीराण । सावय तिवाय गप्प सोह-सम्पाहा भय त्ति-एयरामासानो भय । एएसि भमयरफारणे उप्पाने धमणि विख मतेकण यमेवा । विनामा पररायद । पलाउ समस्या धातो पा परितपरा दुरदेवा, 7 दोसो। [फता. रत्ति-कतारम या गत्य भत्ताण Tram तस्य जगाए फयरगाइ फल या उदगाई वा पामय गिरहेजा। पस्वी ४, दय येत्त काल-गावाई चउहा। दव्यओ पासुय दब हर रोत्तमो अज्ञापदिवायाण आपई। मालभो दुभिक्साइमु । मापओ गिराणस्स चायई । तत्य जिपि भवप्पिय पडिसेयेना। तत्य विमुक्षो । गीयाइ- भन्मासो यास] । पोइ पारगाइदिनिगमो पमणतो गीगोधारे करेन । पुज्यभावियो पाताम्बूलपत्ताइ मुहे पक्षिवेग । एसा दसपाइया फपिया । एत्य पटिसेवओ साह, दपिया कप्पियाइ पहिसेवणा, पहिसेवियव्व च थपकाईणि अट्ठारसठाणाती। तत्य य- ३--28 यय-फायरय गाहा । व्यारया -मतपक्ष प्राणातिपातादिषयरानीमोजनविरतिपदम् । पृथिव्यादय पदनीयतिकाया । पदयेन मूलगुणा उपता । अयनवृत्तिफल्पा अकर प्यादय पडुत्तरगुणा अभि. धीयन्ते । तमारल्पो द्विविध-शिक्षकस्थापनाकल , अपल्प्यस्थापनावत्पध । तत्राय -अनधीतपिण्डीयुस्त्यादि शास्त्रसाना भानीतमाहारादि साधुभ्यो पत्यते । उक्त च- भणहीया राल जेष, पिंटेसण १ सेज २ पत्थ ३ पाएमा ४ । तेणाणिआगि जइयो पति न पिंडमाइणि ॥१॥ उउपदम्मिा अनला, पासायासे उ दोषि तो सेहा । दिविराजती सेहवाणा कप्पो इमो नवरं ॥२॥ 'दोनि ति'-नपुसकाऽनपुसारय द्वय वर्षासु न दीक्ष्यते । शीतोष्णायशेषमासाष्टके अनला नपुसका न दीक्षार्थी इति । [अकप्पो-] शिक्षकस्थापनाकरपोऽल्प्य । अन्गध पिण्डशय्यावनपानानेषणीयचतुष्टयगोच- रोऽकल्प्य । उद्गमोत्पादनादिदोषरहित च चतुष्क कल्प्यम् । [गिहिभायण--] गृहभाजन गृहस्थसम्बन्धि चायकोटवतलिकामृन्मययुण्डिादिकमशल्प्यम् । पलियक त्ति-आसन्दकशय्यामधकादिके उपवेशनशय. नीयरूपे सुमिरदोपान क्ल्पदे उपचेष्ट खप्नु वासेज त्ति-भिक्षायं गृहे प्रीष्टस्य साधोस्तन निषदन करें 7 कल्पते उत्सर्गत , अपवादतस्तु साधुनयमध्ये अयतरस्य कल्पते जरामिभूतस्य व्याधिमतो विकष्टक्षपकस्य च तपखिन इति । एते च भिक्षाटन न झार्यत एव । परमात्मलब्धिकायपेक्षया सूने त्रयस्योपवेशन योज्यम् । [सिणाण ति-J सामप्रक्षाला देशसर्वभेदमिनम्। [सोमवजण--]शोभावजन विभूषापरित्याग । इलयदश- स्थानगण प्रतिवयितम आलोचनागोचर । ३-30 सोझण. गाहा । तस्य पुरो प्रतिसेचकरस । स शिष्य, गूउपदावधारक ।
प श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [३-31. ४-2 सोऊण त्ति-श्रुत्वा, प्रतिसेवनां आलोचा। च श्रुत्या, मामविधि च श्रुत्वा मूलोत्तरगुणपिपयाम् । आगम शात्या, पुरुपनात च भाचार्यादि ज्ञारमा । तदीय पर्याय प्रतक्योविषयम् , यल च शरीरसामध्यंग, क्षेत्र च कर्कश साधारणादिरूप ज्ञात्वा । यम्मादागतस्तत्रैव गत । भमुमेयार्थ प्रकटयति अवधारेउमित्यादिना । ३–31 सो तउत्ति-स तक गूढपदालोचनाक्यक । सो गाहा । स आलोचना दाता खय गतम समर्थ खशिष्य प्रेषयति, तदभावे आगतशिष्यस्यैव क्थयतीति तात्पर्यम् । ३-32 अणुमन्जिय त्ति-निरूप्य विशोध्येसर्थ । त ति-गूढपदालोचितमतिचारम् । तस्स गुरो । पच्छित्त ति-तपोदानरूप ददाति, गूढपदैरेपा गधयति । तान्येव दर्शयति पढमस्स येत्यादिना--- ३-33 प्रथमस्येति दर्पासेवनारूपस। [दसतिहमालोयण ति-] दशविधालोचना दर्प-अकल्यादि दशपदात्मिका, ता विमृश्य, गूटपदी प्रायवित्त पाठयति । नफ्सत्तमे पील त्ति-अस्याथै - भवता पीग विराधना, नक्षने कोऽयं -चन्द्रादित्यप्रहनक्षनतारकमेदत पानिधज्योतिधामध्ये नक्षनभेदधतुर्थम्यानी । अतस्तेन चतुर्थमतगोचरा पीडा सूच्यते-इत्येफे ध्याचक्षते । भव--सत्तमेगे मूल भणति, अने हय निदिसति, अपरे मूलत्तरगुणविराहण ति। तत्य चउत्थ ( ०त्यत b) इयायविराहणाइयारे हरथ ति हत्यम्म क्य । हत्येण अदिन वा गहिय । यद्वा प्रतपवादय सप्ताविंशतिसरया अनगारगुणा मूलोत्तरगुणरूपा नक्षप्रशब्देनानाभिप्रेता , नक्षनाणामप्येतत्सस्याव्यवहारात् । तथा च अनगारगुणानाश्रित्य पटाते-'सत्तायीमाए अनगारगुणेहि ति' । तन- वयछकमिंदियाण च निग्गहो भावकरणसच च । रामया विरागया वि य मणसाईण गिरोहो य ।। कायाण छक्जोगम्मि उत्तया पेयणाहियासणया । तब मारणतियाहियासणा एए अणगारगुणा ॥ इह तपम मूलगुणा । कायपक चेति द्वादश शेषा (१)। तन मूलगुणे चतुर्थयतविषये पढने उके चतत्य भवेट्टाणमिति गाथापाठो द्रष्टव्य । उत्तरगुणविराधनामाश्रिय सुके मासे तव कुणह त्ति भगित, चउमास छमास च तर कुणह सुम इत्यप्यमतो भणितम् । परं शुलमासादिदानपक्षे उत्तरगुणानापिय द्रष्टव्यम् । कृष्णमासादि दानपक्षे मूलगुणविराधामाश्रित्येति । नवरं उग्याओ मुफमासो सद्धसत्तावीस दिवसनिष्पो । अणुरधामो पहिपुनो तीसभहोरत्तष्पनो॥ ४-2 एच ता उग्घाए[इत्यादि-तन उद्घातो भागपातलेन लियत उघातिम लवियर्थ । एतनिषेधा दनुद्घातिम गुवित्यथ । तर प्रथम पञ्चक, दशक, पघदशक, विंशतिम, पचविंशतिम, इत्येतत्सर्व भिन्नमासशब्द" वाच्य ज्ञेयम् । मासलघु, मासगुरु, चउर घु, चउगुरु, छलहु, छगुरु । अन्यच द्विमारागुरु, निमासगुरु, चउमासगुरु, पघमासगुरु, छमासगुरु-एते सम्पूर्ण निजीजपरिमाणा कृष्णमासशब्दवाच्या , अनुद्धाताश्चोच्यन्ते । तन लघुगुरुदानेऽय क्रम अद्धेण च्छिन्नसेस पुम्बद्धेण तु सजुय काउ । देजाहि लहुयदाण, गुरुदाण तत्तिय चेव ।। यथा-मासस्यार्द्धच्छिन्नस्य शेपदिन १५ । एतन् मासापेक्षया पूर्वस्य पश्चविंशतिकस्या? सार्धद्वादशकेन संयुत पृत मासाई सार्धसप्तविंशतिभवति । इत्येव दिनसत्यानिष्पन शुल्लमारा , उत्तरगुणविराधनामानिस वाच्य । शुक्लचतु र्मास प्राचीनप्रक्रियया कृत । एतावान् ११० भवति । शुक्रपण्माविक तप १६५ । अणुघाए ताणि त्ति-तानि मासिकादीनि पण्मासान्तानि तपाति भणुग्धाए त्ति सम्पूर्णानि कृष्णशब्द- पाच्यादीनि द्रष्टव्यानि । तन गुरुमासिक गुरुद्विमासनिमासचातुर्मासिक पचमासिक षण्मासिकम् । गु० मा० ३० गु० द्विमा०६० गु० त्रि. । .. गु०चा० ००० गु०प० ०००० गु०प०००००० ल०मा०२७॥ ल० १०५ १६५ " " अन्यच्चोच्यते फिचित्-अट्ठमाइणा तवेण ज बुझइ त तवगुरुय, निब्बीयाइणा छट्ठतेण पुज्झमाण तवलहुग, पालभोज गिम्हे बुज्झह त काललहुय । अन्यच्च- ज तु निरंतरदाण जस्स व तस्स व तवस्स त गुरुय । ज पुण सतरदाग गय पि हु त लहु होइ । तवकाले भासन व गुरू वि होइ लहू लहू गुरूओ । कालो गिम्हो गुरु भष्टाइनबो लट्ट सेसो । - ।
. ४-3. ४-10 ] जीतफल्पचूर्णि-विपमपदव्यारया ३७ इह तीर्थ उत्कृटतोऽपि पण्मायान्तमेवातिचारशुज्यर्थ तपो भवति । अत उक्त-मास चउमास छमासियाणि । इत ऊर्ध्व च षण्मासिगाप्यगुसी छेदमूलानवस्थाप्यपाराधिकाति तत्तालापेक्षया सूरिभिदीयन्ते । अतपूर्णि कदामाभ्यवहारे फूते गूढपदरेय ताति वक्तुकाम इदमाह-छेअ अओ चोछ ति । अओ त्ति-पण्मासीए तपस कर्ष छेदादिप्रायश्चित्त गूढपदैराहाव्यवदारवाद्वक्ष्ये । अन्यनाप्युक्तम्- 'उत्सग्गेण वि सुज्झइ अध्यारो कोइ, कोइ उ तवेण । वेण उ अमुग्झमाणे छेय विसेमा विसोहिंति त्ति' ॥ तत्र- ४-3 छिंद तु तय भाणं ति० गाहा । अस्यायमर्थ --तय तु तक्त्, भाण ति पूर्वमतपर्यायरूप भाजनम्, छिन्दन्तु अपनयन्तु उत्सारयन्तु । पर्यायच्छेद तु अतिचारानाधिस 'छन्भागगुलपणए' इत्यादिना वक्ष्यति । पूर्वपर्यायच्छेदेनाशुच्चमा माधवो प्रतस्य पर्यायस्य मूल प्रजन्तु । अष्टमप्रायश्चित्तभाजो भवतु । तस्याप्ययोग्यतायो 'अन्यायडायगच्छे-अजेयुरव्याता , भव्यापारा संतिष्ठन्तु, भनवस्थाप्याही भवन्तु । तेनाप्यशुद्धौ तदयोग्यतायो मच्विइया वापि' बिहरन्तु । अद्वितीया एकाफिन सतो वक्ष्यमाणपाराधिकप्रायश्चित्तासेविनो भवन्तु । प्रागुपात्त छेद दर्शयति- ४- छन्भागगुलेयादिना। छेदो हि पचक्दशकादिरूपतया तत्तदतिचारापेक्षया तपोभूमिमपका तस्य यावत्पर्यायधरण तावद्भवति । यदाद- "उकोस तवभूमि समईओ सावसेस चरणो य । छेय पणगाईय पावर जा परह परियाओ ॥' गाथाद्वयस्यार्थ कथ्यते-छम्भागगुलपणगेत्ति-सो भालोयणायरिओ, तस्स सीसस्स एयाए समा- गूढ छेयपायच्चित्त देइ । त जहा-मास दुमास तिमास चउम्मास पचमास छम्मासाण पत्तेय पत्तेय अगुलववएस करेह । तहा कए य जस्स मासमेत्तो परियाओ तस्स, पचगे त्ति परसु दिवसेस छिदियव्येसु, अगुल ति मासस्स छन्भागो छिदियव्वो त्ति भणिय होइ । दसभाए ति भाग त्ति-तस्सेव य अगुलसनियस मासस्स दससु दिणेसु छिदियब्वेसु अगुलस्स तिभागो छिदियन्वो ति भणइ । मासपजायस्स दसदिवसा छिदियध्व त्ति भणिय होई। अद्ध पन्नरसेत्ति-तस्सेवागुलसनियस्स मासस्स पन्नरसे त्ति पनरसमु दिवसेसु छिदियव्येसु अद्धमगुलस्स छिदियध्व ति निद्दिसइ । पनरस दिवसागि छिंदियव्याणि त्ति सम्भावो । चीसाए तिभागूण ति-तस्सेव मासस्स वीसाए दिवसाण छिंदियव्वाए तमेवगुल ति भागूण ति तइयभागेण ऊण छिंदियव्व वि भण्णइ । मासस्स दोग्नि भागा भवरा यति भणिय होइ । छन्भागूण तु पणवीसे त्ति-तस्सेव मासस्स पचवीसाए दिवसाण छिंदियव्वाए छन्भागूण ति तमेवागुल छन्भागेण कण छिदियव्वी भणइ । मासस्स पचवीस दिवसा छिंदियव्व ति । मासे छिदियव्वे अगुल छिंदियव्य ति भणइ ॥१॥ विहि मासेहि छिंदियव्वेहि अगुलदुग छिदियब ति भणइ ॥ २ ॥ ति मासे छिंदियव्ये अगुलतिग छिदियन्न ति भणइ ॥३॥ चउमासे छिदियध्वे चउरो अगुलाइ छिदियब्वाइ भणइ ॥ ४॥ पचर्हि मासेहिं छिंदियव्येहि अगुलपचग छिंदियव्व ति सन्दिसइ ॥५॥ उम्मासपरियाए छिन्दियध्वे छअगुलाइ ववइसद ॥ ६॥ ४-5 एए छेयविभाग त्ति-एए त्ति पुन्वनिविठ्ठा, छेय ति छेय सत्तमपायच्छित्त तस्स विभागा विसेसा नायथ्या-जाणियध्वा । अहकमेण तु त्ति जे जहा निहिट्ठा । आज्ञाव्यवहारे दपिकीमासेवामभिधायाधुना कल्पिकीमाह- ४-6 विइअस्स कजस्सेत्यादिना । द्वितीयस्य कल्पासेवनारूपस्य पानदर्शनादिचतुर्विशतिपदरूपस्य तद्रो- घरामासैवना श्रुत्वा शिष्येण क्थ्यमाना सूरिभृते-आउत्तनमोकार त्ति । आयुक्ता सयमोद्यमविधायिन पधपर- मेष्ठिस्मरणपरा भवतु सूरयोऽप्रायश्चित्तिन इति भाव । नवर-कारणपडिसेवा वि हु सावजा निच्छये अकरगिजा, कि सर्वपा नेलाह-बहुसो वियाइत्ता। कर्तव्यमिति शेष । अधारणिज्जेसु-अलागाढकारणेवित्यर्थ । "जद वि य सम- शुलाया-सावधप्रतिषेवेति प्रक्रम-तइवि य दोसो न वजणे दिट्ठो। दृढधम्मयाहु एव नामिक्सनिसेव नियया ।" ४-8 एय सो इत्यादि । द्रव्यादिक ज्ञात्वा परिभाव्य वेति शेष । परिपृच्छष वकीयगण स्वयमात्मगमन विधत्ते, शोपिदाता सूरि गीतार्थशिष्य या प्रेषयति । अनिजमाणे वत्ति निजगमन खशिष्याभावे । तस्सेय ति मालोचनातिचारक्यकप्रेषितशिष्यस्यैव हस्ते गूढपदैरक्षत(२)लिखित्वा वा विशोधिं प्रेषयति । ४-10 धारणाव्यवहारस्तु- श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [३-31. ४-2 । . + . सोऊण ति-श्रुत्वा, प्रतिसेवना आलोचना च श्रुत्वा, कमविधि च श्रुत्वा मूलोत्तरगुणविषयाम् । आगम ज्ञात्वा, पुरुषजात च आचायादि शाखा । तदीय पर्याय प्रतवयोविषयम् , बल च शरीरसामर्थ्यम्, क्षेत्र च कश साधारणादिरूप ज्ञात्वा । यसादागतस्तत्रैव गत । अमुमेवार्थ प्रकटयति अवधारेउमित्यादिना । ३-31. सो तउ तिस तक गूढपदालोचनाक्थक । सो० गाहा । स मालोचना दाता खयं गन्तुम समर्थ स्खशिष्य प्रेषयति, तदभावे आगतशिष्यस्यैव कथयतीति तात्पर्यम् । ३-32 अणुमजिय त्ति-निरूप्य विशोध्येत्यर्थ । त ति गूढपदालोचितमतिचारम् । तस्य गुरो । पच्छित्तं ति-तपोदानरूप ददाति, गूढपदैरेषा कथयति । तान्येव दर्शयति पढमस्स येत्यादिना- ३-33 प्रथमस्येति दर्पासेवनारूपस्य । [दसविहमालोयण ति-] दशविघालोचना दर्प-अकल्पादि दशपदात्मिका, ता विमृश्य, गूढपदो प्रायश्चित्त पाठयति । नस्सत्तमे पील त्ति-अस्यार्थ -भे भवता पीडा विराधना, नक्षने कोऽर्थ -चन्द्रादित्यग्रहनक्षातारकभेदत पञ्चविधज्योतिश्चक्रमध्ये नक्षनभेदश्चतुर्थस्थानी । अतन्तेन चतुर्थव्रतगोचरा पीडा सूच्यते--इत्येके व्याचक्षते । अनैव-नक्सत्तमेगे मूल भणति, भने हत्य निदिसति, भवरे मूलत्तरगुणविराहण त्ति । तत्य चउत्थ (स्थत b) इयचयविराहणाइयारे हस्थ ति हत्यकम्म कय । हत्येण भदिन वा गहिय । यद्वा व्रतपदादय सप्ताविंशतिसख्या अनगारगुणा मूलोत्तरगुणरूपा नक्षनशब्देनानाभिप्रेता नक्षनाणामप्येतत्सख्याव्यवहारात् । तथा च अनगारगुणानाश्रिख पठ्यते-'सत्तावीसाए अनगारगुणेहिं ति' । तन- वयकामिदियाण च निग्गहो भावकरणसच च । समया विरागया वि य मणसाईण निरोहो य॥ कायाण छकजोगम्मि जुत्तया वेयणाहियासणया। तह मारणतियाहियासणा एए अणगारगुणा ॥ इह प्रतपट्क मूलगुणा । कायपहा चेति द्वादश शेषा (१)। तन मूलगुणे चतुर्थव्रतविपये पढमे छक्के चउत्प भवेद्वाणमिति गायापाठो द्रष्टव्य । उत्तरगुणविराधनामाश्रित्य सुके मासे तव कुणह त्ति भणित, चउमास छमास च तर कुणह सुक इत्यप्यग्रतो भगितम् । परं शुक्लमासादिदानपक्षे उत्तरगुणानाश्रित्य द्रष्टव्यम् । कृष्णमासादि दानपक्षे मूलगुणविराधनामाश्रित्येति । नवर उग्घाओ सुकमासो सद्धसत्तावीस दिवसनिष्पन्नो । भणुग्घाओ परिपुभो तीसमहोरत्तीपनो ॥ ४-2 एव ता उग्घाए[इत्यादि-तत्र उद्घातो भागपातस्तेन नियुत्त उद्घातिम लम्वित्यर्थ । एतनिषेधा- दनुपातिम गुवित्यर्थ । तन प्रथम पञ्चक, दशक, पञ्चदशक, विंशतिम, पञ्चविंशतिम, इत्येतत्सर्व भिन्नमासशब्द वाच्य शेयम् । मासलघु, मासगुरु, चउरघु, चउगुरु, छल्हु, छगुरु । अन्यच द्विमासगुरु, निमासगुरु, चतमासगर, पघमासगुरु, छमासगुरु-एते सम्पूर्ण निजनिजपरिमाणा कृष्णमासशब्दवाच्या, भयुद्धाताचोच्यन्ते । तत्र लघुगुरुदानेऽय कम अद्धेण च्छिन्नसेस पुष्यद्धेण तु सजुय काउ । देजाहि लहुयदाण, गुरुदाणं तत्तिय चेव ॥ यथा-मासस्याद्धच्छिन्नस्य शेषदिन १५ । एतन् मासापेक्षया पूर्वस्य पञ्चविंशतिकस्याः सार्धद्वादशकेन सयुत कृत मासाई साधसप्तविंशतिर्भवति । इत्येव दिनसल्यानिष्पन्न शुलमास , उत्तरगुणविराधनामाश्रित्य वाच्य । शुक्लचतु मास प्राचीनप्रक्रियया कृत एतावान् ११० भवति । शुक्पण्मासिक तप १६५। अणुधाए ताणि त्ति--तानि मासिकादीशी पण्मासान्तानि तपास अणुग्घाए त्ति सम्पूणानि कृष्णशब्द पाच्यादीनि द्रष्टव्यानि । तन गुरुमासिक गुरुद्विमासनिमासचातुमासिक पञ्चमासिक पण्मासिकम् । गु० द्विमा०६० गु०नि००० गु०मा०३० गु०चा० ००० गु०प००००० गु०प०.०००० ल. मा०२७॥ १०५ १३५ " " अन्यच्चोच्यते किचित्-अट्ठमाइणा तयेण न बुज्झइ त तवगुरुय, तिव्वीयाइणा छढतेण युज्नमाण तबलहुग, फालभो ज गिम्हे युज्झइ त काललहुय । अन्यथ--- ज तुरंतरदाण जस्स व तस्स व तास त गुरुय । ज पुण सतरदाण गरुय पिस लहु होइ । तवकाले भासन प गुरू वि होह लहू रडू गुरूओ। कालो गिम्हो गुरु महारतमो लहू सेसो ।
- ४-३.४-10] जीवफसानि-विषमपरम्पायना ६६ श्री उतरतोऽपि पाणीमार सो गीत -ग परमास मालिया। स्वकाराय CHARPATराभिमानी र पेक्षया सरिमिते । अनि सम्पदारे हे गूपदी पाराम गाइभ अगो पोटति । अमोचि-पमासीए হয় অর্থ বিষয় মারা যাবার। খাবার- 'गुग समारो यो गोरव समारोग भमुरामा विशेष वियोनिति तिसर- ४-3 हिंद तु तयं भाणं ति० गादा मामय पर, मी पूर्वमतपीयरूप गाजन र दिन्न पारसारपान मनिपाEिT' मागगुरपणए इत्यारिता याी। पूर्वपर्यापदेना पायो माप पायस गर्न मन परमप्रायशिरामानो गया । राप्ययोग्यताया 'भावनागडे-गजेमुरमारता , लापारा Hity 3, घग्गस्याप्पाही भयाप्पी सदयोग्यशाया भन्मिइया पारि' पिदर मगिया पान तो गक्ष्यमापारापिफायधिसाविको भय । प्रागुपात पदगति- 44 उभागगुलेसादिता। मोदियरामादिकरतया तरादविगारापेक्षया तपोभूमिगपमा तस्स पापपर्यायधरण सापाबदाद-- "उमेर सयभूमि पमईलो गालस परणे य । पपगाईग पाया ण पर परियाभो ।' गापादपसा कम्यसे-एमागगुलपणगेत्ति-यो भालोगणागरिओ, तरस सीरारा एयाए समा- गूर ऐयपाटिस दे। जहा-माग दुमाग तिमारा पउम्मारा पचगारा सम्मासाण पतेय पोय अगुरुययएम करे । तदा फार म अस्म गासमेतो परियामा तस्य, परगे त्ति पनसु दिपसेस मिंदियध्वेश, भगुल सि मासस एमागो हिरियो ति मागिय हो । दमभाए ति भाग त्ति-तस्रोप य गंगुलरामियरस मारास्स दममुदिणेगु छिरियम्वेगु अगुलस्य तिगागो हिंदियम्वोति भगा। मासपनायस्म दरादिवसा हिंदियम्य ति मगिय हो । अद्ध पानरसेत्ति--तस्सेवागुलमनियस मायरा पारसे ति पाररागु दिवसे मुछिदियम्मु भसमगुलस्स हिंदियप्व तिलिदिराह । पारस दिवसात टिरियप्यानिति सम्मायो। घीसाए तिभागूण ति-तरसेव मासस्य पीसाए दिययाण हिंदिययाए तमेवगुल ति मागूण की तइयभागेग कप हिंदियव्य ति भण्णइ । मासस्स दोमि भागा भवरा यति भनिय होइ । उम्भागूण तु पणवीसे त्ति-तस्सेप मामस्स पचवीसाए दिवसाण छिदियवाए छन्भागूण तितमेवांगुल छम्माोण ऊग हिदियध्य त भणइ । मागस्स परवीस दिवसा हिंदियव्व ति । मासे छिपियव्ये अगुल लिंदियय्य वि गगह ।। १॥ यिहि मासे हि हिंदियध्वेहि अगुलदुग हिंदियन ति भणः ॥ २ ॥ ति मासे हिंदियध्ये अगुलनिग छिदियर ति भगः ॥३॥ उमासे छिदियो चउरो अगुलाब छिदियवाद भणइ ॥४॥ पर्हि मारोहिं छिंदियव्येहि अगुलपया सिदियच की सन्दिसह ॥ ५॥ छम्मासपरियाए छिन्दियध्वे छअगुलाइ घवहसइ ॥६॥ ४-5 एप डेयविभाग ति-एए ति पुष्यनिदिहा, छेय ति छेय यत्तमपायच्छित्त तस्स विभागा विसेसा गायध्या--जाशियया । अहवामेण तु ति जे जहादिट्टा । आताव्यवहारे दपिकीमासेवाममिधायाधुना करियकीमाह- ४-6 विअस्स जस्सेत्यादिना । द्वितीयस्य करपासेवारूपस्य ज्ञानदर्शनादिचतुर्विशतिषवरूपस्य तद्गो- चरामासेपना श्रुत्वा शिष्येण कथ्यमानो सूरिते-आउत्तनमोकार त्ति । आयुक्ता सयमोयमविधायिन पपपर मेष्टिस्मरणपरा भयतु सूरयोऽप्रायश्चिति इति भाव । नवर-कारणपडिसेवा वि हु सायचा निच्छये अकरगिजा, कि सवथा नेलाह-बहुसो वियाइत्ता । कर्तव्यमिति शेष अधारगिजेसु-अत्यागाढकारणेवियर्थ । "जइ वि य सम- शुभाया- सायद्यप्रतिपेवेति प्रम-~-तहवि य दोसोन घजणे दिहो। दढधम्मयाहु एव नामिक्सीसेव नित्यया ।" ४-8 एच सो इलादि । व्यादिक ज्ञात्वा परिभाव्य वेति शेष । परिपृच्छय खषीयगण खयमात्मगमन विधत्ते, शोधिदाता सरि गीतार्थशिष्य या प्रेषयति । अनिजमाणे वत्ति निजगमन खशिष्याभावे । तस्सेव त्ति मालोचनाविचारक्यक्प्रेपितशिष्यस्यैव हस्ते गूढपदैरक्षत(२)लिसित्वा वा विशोधि प्रेपयति । ४-10 धारणाध्यवहारस्तु- श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [३-31. ४- सोऊण त्ति-श्रुत्वा, प्रतिसेवनां बालोचा च श्रुत्वा, कमविधि च श्रुत्वा मूलोत्तरगुणविषयाम् । भागर ज्ञात्वा, पुरुषजात च आचार्यादि शारवा । तदीय पर्याय प्रतवयोविषयम् , यल च शरीरसामभ्यम् , क्षेन च कर्कश साधारणादिरूप ज्ञात्वा । यस्मादागतत्तनैव गत । भमुमेवार्थ प्रपटयति अवधारेउगित्यारिना। ३-31. सो तउत्ति 1-स तक गूढपदालोचनाक्थक । सो० गाहा । स आलोचना दाता स्वय गन्तुम समर्थ खशिध्य प्रेषयति, तदभावे भागतशिष्यस्यैव कथयतीति तात्पर्यम् । ३-32 अणुमजिय त्ति-निरूप्य विशोध्येत्सर्थ । त तिगूढपदालोचितमतिचारम् । तस्य गुरो पच्छित्त ति-तपोदानरूप ददाति, गूढपदैरेषां कथयति । तान्येव दर्शयति पढमस्स येत्यादिना- ३-33 प्रथमस्येति दपासेवनारपस्य । [दसविहमालोयण ति-] दशविधालोचना दर्प-अकल्पानि दशपदात्मिका, ता विमृश्य, गूढपदो प्रायश्चित पाठयति । नासत्तमे पील त्ति-अस्मार्थ -2 भवता पीर विराधना, नक्षत्रे कोऽर्थ -चन्द्रादित्यप्रहनक्षमतारकभेदत पञ्चविधज्योतिधामध्ये नक्षमभेदचतुर्थस्थानी । अतस्ते. चतुर्थयतगोचरा पीटा सूच्यते-इत्येके व्याचक्षते । अप्रैप-नकरारामेगे मूल भणति, भन्ने हत्य निद्दिसति, भव मूलत्तरगुणविराहण ति। तत्य चउत्य (स्थत b) इयत्यविराहणाइयारे हत्थ ति हत्यकम्म कय । हत्येप भदिन या गहिय । यद्वा प्रतपट्कादय सप्ताविंशतिसरया अनगारगुणा मूलोत्तरगुणरूपा नक्षनशब्देनात्राभिप्रेता नक्षताणामप्येतत्सख्याव्यवहारात् । तथा च अनगारगुणानाधिस पठ्यते-'सत्तावीसाए भनगारगुणेहि ति । तग- वयछकमिदियाण च निग्गहो भावकरणसय च । समया विरागया वि य मणमाईण निरोहो य ॥ कायाण छक्कजोगम्मि जुत्तया वेयणाहियाराणया। तह मारणतियाहियासणा एए भणगारगुणा ॥ इह मतपक मूलगुणा । पायपक्ष चेति द्वादश शेपा (१)। ता मूलगुणे चतुर्थवतविपये पढमे छके चउर भवेढाणमिति गाथापाठो द्रष्टव्य । उत्तरगुणविराधामाश्रित्य सुके मासे तव कुणह त्ति भणित, चटमार छमास च तर कुणह मुफ इत्यप्यप्रतो भणितम् । पर शुक्लमासादिदानपक्षे उत्तरगुणानाश्रित्य द्रष्टव्यम् । कृष्णमासा दानपक्षे मूलगुणविराधनामाश्रित्येति । नवर उग्धाशो मुफमासो ससत्तावीस दिवसनिष्पनो । अणुग्याओ पडिपुत्रं तीसभहोरत्तनिष्पनो ॥ ४-2 एवं ता उग्धाए[इत्यादि -ता उद्घातो भागपातस्तेन निर्धत उद्घातिम लम्वित्यर्थ । एतनिषेध दनुपातिम गुवित्यर्थ । तर प्रथम पञ्चक, दशक, पञ्चदशक, विंशतिम, पञ्चविंशतिम, इत्येतत्सर्व भिन्नमासशब्द वाच्य शेयम् । मासलघु, मासगुरु, चउरघु, चउगुरु, छलहु, छगुरु । अन्यय विमासगुरु, निमासगुरु, चउमासगुर पघमासगुरु, छमासगुप-एते सम्पूर्ण निजनिजपरिमाणा कृष्णमासशब्दवाच्या , भयुद्धातायोच्यन्ते । तः लघुगुरुदानेऽय क्रम - अद्धेण च्छिनसेस पुव्वद्धेण तु सजुय काउ । देजाहि रहुयदाण, गुरुदाण तत्तिय चेव ॥ यथा-मासस्याद्धच्छिन्नस्य शेषदिन १५ । एतन मासापेक्षया पूर्वस्य पश्चाविंशतिकस्पार्दै सार्धद्वादशकेन संयुत कर मासाई सार्धसप्तविंशतिर्भवति । इत्येव दिसख्यानिष्पन्न शुलमास , उत्तरगुणविराधनामाश्रित्य वाच्य । शकचन मास प्राचीनप्रक्रियया कृत । एतावान् ११० भवति । शुकपण्मासिक तप १६५ । अणुघाए ताणि त्ति-तानि मासिकादीनि पण्मासान्तानि तपास अणुग्याए त्ति सम्पूणानि कृष्णशब्द थाच्यादीनि द्रष्टव्यानि । तन गुरुमासिक गुरुद्विमासनिमासचातुर्मासिक पचमासिक पण्माधिकम् । गु० द्विमा० ६.1 गु०नि००० - गु०मा०३० गु० चा०००० गु०प० ०००० गु०प०००००० ल०मा०२७॥ ४५ १०५ १३५ " " अन्यच्चोच्यते किंचित-अट्ठमाइणा तवेण ज बुज्म त तवगुरुय, निव्वीयाइणा छढ़तेण पुज्नमाण तवलहुर पालमओ ज गिम्हे बुझइ त काललहुय । अन्यच- जतु निरंतरदाण जस्स व तस्स व तबस्स त गुरुय । ज पुण सतरदाण गरुय पि हु त लहु होइ ।। तवकाले भासम्म व गुरू वि होइ लहू स्टू गुरूओ । कालो गिम्हो गुरु अट्ठाइतको रद्द सेसो ।
४-3. ४-10 ] जीतफरपचूर्णि-विषमपदव्यात्या इह वीर्य उत्कृष्टतोऽपि षण्मासान्वमेवाविचारगुम तपो म । मन ! इत अर्व व पग्मारिकेनायशुद्धी दमूलानवापारासिकाती भर पेसर भिन्। सुदामाव्यवहारे कृते गूढपदैरेव तानि वस्नुकाम इदमाद- अमो घोर निमोति-STET तपम कल छेशदिप्रायश्चित्त गूइपदराहाव्यवहारतास्मे । बसमायुक्तम्- 'उस्सगेण वि मुज्दाइ भइयारो कोइ, सोइ त जमुनाने दिनेश ४-3 छिंद तु तयं भाण ति० गाहा सामर्थ-दर नहर, नागपूर भाजनम्, छिन्दन्तु अपनय तु उत्सारमन्तु । पर्यापच्छेद तु अविचारानाधिल 'म गुमाया। पूर्वपर्यायपद्धदेनायुसमाने सायको प्रतस पपापस मून मगन्तु । समानिनाश मान्नु । तपादन 'सव्वावडावगच्छे'-~~बजेयुरव्यारता , अध्यापारा सरन्तु, मनपसापाहा भरन्तु दिनारदमा 'अम्विइया वापि' विहरन्तु । अद्वितीया एकाफिन सन्तो वसमाराविधादिल सोने माना अपने छेद दर्शयति- ४-4 छन्भागगुलेयादिना । छेदो हि एकदशमादिकरवाया तत्तदति गरोसा कोमामादल यावत्पर्यायधरण तावसवति । यदाह- 'उकोस तपभूमि समईओ सावसेस वरणो य । य प गाईय पकना पर परसामो गाथाद्वयस्थाथै कथ्यते-उन्भागगुलपणगेति-पो भाटोपारो, दस मा एसए मु. गृह व्यपायचित्त देह । त जहा मास दुमास तिमास चन्मास पसमा एमापनेपास भगन्ने करे । तहा कए य जस्स मासमेत्तो परियामो तस्त, पचो ति पचमु दिन रिदिपमु, अपर निमाम्म छन्भागो हिंदियध्वो ति भणिय होइ । दसभापति भागतिरसेव व भरपाल मा सिदियध्वे अगुलस्स तिभागो हिंदियब्यो ति मन मानास्त रमादरमा मिश्रित नि मद । अद्ध पनरसेत्ति-तस्सेवागुलममियस्समासस्म पनरसे निपनरसन दियम्मु छिदिव्येनु परमगुरम्य दिसम्ब ति निदिमइ । पभरस दिवसानि छिदिववारी नि सम्भावा । चौसाए तिमापूर्ण निम्मेव मार दिवसाण निंदियन्वारा तमेवगुल ति-भागूण ति नइसमामेरका दिदिब्य ति म। मामला भाग यति भणिय होइ । छन्भागूण तु पणवीसे तितस्तेव मास परवीसाए दरमा दिन ति तमेवागुल छन्भागेण का छियव्य विभाइ । मासस्स परवीस दिवसा लिंदेय तिमामे देिउ छिदियव्य ति गाइ ॥१॥ विहि मासेहि छिंदियश्वेहि अगुदा जिंदसम्म नि म ॥२॥ अगुरतिग छिंदियच ति भणइ ॥३॥ चउमासे दियचे चटरो अगुरद बिदेस बाई म भ मामेरी शिदियध्वेहि भगुलपचग चिंदियच्च ति सन्दिसइ ॥ ५॥ छम्मासपरियाए हिन्दियत्वे सम्पाटार पदमा ॥६॥ ४-5 पए छेयविभागत्ति-एए ति पुन्वनिदिहा, छेय ति य सत्तमा वस बिमामा विणे नायथ्या-आलियम्वा । अहकमेण तु ति जे नहीं निरिहा । आशाव्यवहारे दर्पिीमासेवामभिधायाधुना कल्पिकीमाह- ४-6 विलस रजस्लेलादिना । द्वितीयस कालावनारूपम्प ज्ञानदानादिस्तुतिपरम्प तनो- चामलैवना श्रुत्वा शिष्येण कम्यमाना सूरिते-माउत्तनमोकार ति। आयुक्षा भरमोदविवामिन पर मेटिलर"पय भवतु सूरयोऽप्रावित्तिा इति भाव । नवरे कारणपटिमेवा विदु मारमा निउये महमिदा, कि सबथानेलाइ बहुसो वियाइए। दवब्यमिति शेष मधातीने मलागाडकारविसर्थ "ब पि य राम शुभाया सावधप्रतिपेयति प्रकम् --तइति म दोसो नबो दिलो ददामयाः एव नानिमानिय नियया ॥" - एच सो स्यादि । सादिक शाला परिमाय वेति ष । परिच्छप कीयगण लयमारमगमन विपत्ते, शोधिदाना सुरि गीताष्य का प्रेश्यति अविभातिनिगमनतिष्यामा । तस्सेप चि भादोचनातिवारश्यकप्रेषिताशियन्दैव हस्से मृत्पदैरत(तिया वा विशोधि पयति । - ४-10 भारणाध्यबदार- ३८ श्रीचन्द्रसुरिसंरचिता [४-13. ५-20 naram - - । . 'गीयत्येण दिण्ण सुद्धि अवधारिऊण तह चेव । दितस्स धारणा मा उठ्ठियए य धरणरूया जा ॥' सुगमा । ४-13 बहुसो पडितप्पियस्स त्ति-ओकश कृतकार्यस्य । अवसेसत्ति-किचिच्छेपाकर्णितागमस्य। भयमर्थ -वैयारत्त्यकरणादिना गच्छोपकारी रश्चित्साधुरयाप्यशेपच्छेदातयोग्यो न गवति ततस्वस्यामइ कृत्वा यदा गुरुरुद्भुतान्येव कानिचित् प्रायश्चित्पदानि क्थयति तदा तस्य तेपा पदाना धरण धारणा अभिधीयते । ४-15 जीतव्यवहारस्तु येवपराधेपु पूर्वमहर्षयो बहुना तप प्रकारेण शुद्धिं कृतवन्तस्तेष्वपराधेषु साम्पत द्रव्यक्षेनकालमावान् विचिन्य सहननादीना च हानिमासाद्य समुचितेन केनचित्तप प्रकारेण या गीतार्थी शुदि निर्दिशन्ति तत्समयपरिभापया जीतमित्युच्यते । अथवा यद्यन गच्छे सत्रातिरिक्त कारणत प्रायवित्त पर्तितम वैश्व बहुभिरनुवतित तत्तन रूढ जीतमुच्यते । ४-19 वत्तणु० गाहा ।- पत्तो नाम एकसि अणुवत्तो जो पुणो विइयवारे । तइयवारं परत्तो सुपरिग्गहिओ महाणेण ॥ बहुसो बहुस्सुएहि जो वत्तो न य निवारिलो होइ । चत्तणुवत्तपमाण जीएण कय हवइ एय ॥ तथा च-सो जह काईएण अपडिप तस्म निविगइय तु । मुहणतफिडियपाणग असवरे ए[व]माईसु ॥ एग दिण च बजे घट्टणतावेण गाडगाढे य । णिन्विगईमाईय जा यामतमोहवणे ॥ विगलिदणतघणपरियावणगाडगाढउद्दवणे । पुरिमढाइ क्मेण उ नेयव्व जाय समण तु ॥ पचिंदि घतावण अणगाढगाट तहेय उद्दयणे । एगासणमायाम मण तह पचकाराण ॥ एमाईओ एमो नायव्यो होइ जीयववहारो । अणरज्जविसोहीरो सविग्गणगारविन्नो ति ।। ४-~25 आगमव्यवहार(रा) 7 श्रुतमर्तगन्ति । जे पुणोत्यादि- 'आमारैरिजितर्गत्या चेप्या भापितेन च । नवनविकारश्च गृह्यतेऽन्तर्गत मन ॥' इत्यन्यापि पठ्यते । मवरम्-इशित निपुणमतिगम्य प्रतिनित्तिसूचकमीपभूशिर कम्पादि । आकार स्थूलधीसवेध प्रस्थादिभाव सूचको दिगवलोक् नादि । ४-26 पत्ति त्ति-वक्त्रम् । [णेत्त]-नेन लोचनम् । चयण त्ति-वचनम् । एतदीयविकारादिमि । तिपखुत्तो त्ति निकृत्वो वेलात्रय सवादार्यम् । पलिउचिय समाय, अपलिटचिय अमाय । ४-28 सुयाभावे त्ति-श्रुतवत्सनिधाभावे । -29 सुययवहाराणुसरिसो त्तियत श्रुतोक्तप्रायश्चित्तमेवानापि दीयते । ४-31 विसेसिउत्ति-आज्ञाव्यपहार श्रुतोपदेशोचितप्रदानम् । ४-32 सव्यस्थय त्ति-निघु कालेपु, जीतस्य चिरागुवर्तन यावतीर्थ तावत् । ५-4 तवेगदेस तिद्वादशभेदस्य तपस प्रायश्चित्त तदेकदेश एव । ५-5 पारपरिएण-परम्मरया । उन्नेल्लणाए-परमसमसुह-सम्यक्सुरालक्षण । ५-9 अनादान अग्रहण नूतनमण । ५-10 अहव त्ति-यद्वा सवरनिर्जरे एते समभेदे कभ्येते-विशिष्ट लक्षणमेतयोर्मण्यत इति भाव मिच्या स्वाविरतिक्पायप्रमादयोगाना शिरोध [सवर ] । ५-11 अवरोधेन अपगमे।। ५-13 इन्द्रियाणि पश्च, तेपा विपया शब्दरूपरसस्पर्शगन्धारयातेपु इष्टानिष्टेषु रागद्वेषाकरणम् । विकभा स्वीकथाद्याश्चतस्त्र । निद्रा पद्यविधा । मद्य विक्टम् । प्रमादोऽज्ञानसशयादि । योगा मा प्रमृतय । ५-14 धावसादिक प्राग् व्यारयातम् । सोटा याज्ञाद्यास्फोटा पटादिमेदन था। ५-15 असम्भूय त्ति-अराद्भूतोद्धानम्-अगुष्ठपर्वमानादिर्जीव , विम्मले देवदत्त इत्यादिक । ५-16 ईसामरिस त्ति-परसम्पदामसहनमायी, समर्ष' क्रोध , एते मनोव्यापारा ! - ५-20 [उत्तरगुण]- पिंडस्म का विसोही, समिइयो भायणा तयो दुपिहो । पडिमा अमिग्गहा कि य, उत्तरगुणमो वियागाहि ॥ ५-20 [परीसह]- सुहा पिपासा सीउन्ह, दसागरहथिउ । चरिया मिसीहिया सिजा, भोसरहजायणा ॥ - . - - ५-21 ७-9] जीतकरपचूर्णि-विपमपदव्यारया भलामरोगतणफासा, मलसकार परीसहा । पमानाण समत्त इह बावीस परीराहा ॥ ५-21 [उवसग्ग-] उपराणा १६- दिव्या ४ माणुमगा चा ४, वियाहिया तिरिच्या य ४ । जायसोयणीया य ४ उपसग्गा चउपिहा ।। तन [पुढोनेमाया] पृथा विमाना हास्येन प्रारब्धा प्रद्वेषेण निष्ठाता इति । ५-22 कुसीलपडिसेवण त्ति-चतुर्धनतलोपनम् । विपयामिप्यनिणा ख्यादिना । [घट्टणया] घाा राजसथधु स्थस्य । [थंभणया] स्तम्मनता पादायमस्य । [लसणया] लपनताऽशाना वातादिना । [पनडणया] प्रपतन भूमौ देहस्य । *चरणसोहणस्थ चेति चकारात ज्ञानदर्शनशुयर्थ च प्रायश्चित शेयम्, नयस्यापि मोक्षकारणत्वात् । चरणशुद्धिधारिनश्रेष्ठता। ६--13 निर्मिचमाणो विहीयद त्ति-यद् द्रव्यमधिकमकल्प्य वा गृहीत तद्विगिधयन् वजन विधिना तमविचार शोधयति। ६-20 जाव० तवो चिपणो त्ति-ततो महाप्रतेषु नावस्थाप्यते नाधिनियते इत्यनवस्थाप्य । ६-21 पार तीर तपसा अपराधस्य अश्यति गच्छति ततो दीक्ष्यते य स पाराधी, स एव पाराधिस्तस्य यदनुष्ठा- नम् । सब पाराधिक लिगक्षेनकालतपोभिर्वहिष्करणम् । लिगाईहिं पारविओ रहित क्रियते इत्यर्थ ॥दस पायच्छित्त पयाणि । तत्थ साहयो पुलाग-वउस-फुसील-नियठा-सिणाय-मेया पच । एएसि ज जस्स भवति तमियाणि भागह- आलोयण पदिकमणे मीसवियेगे तहा विउस्सग्गे । ततो तवे य हे पच्छित्तपुलाके छप्पेए॥ पउस-पडिसेवगाण पायच्छित्ता भवति स ग्रेवि । थेराण भवे क्प्पे जिणप्पे अट्टहा होइ ।। भालोयणा विवेगो या नियठस्स उ दुवे भवे । निवेगो य सिणायस्स एमेया पटियत्तिभो ॥ समायिक साध्वादीना च पञ्चानां यद्यस्य तत्कभ्यते- सामाइसजयाण पच्छित्ता छेयमूलरहियह । थेराण जिणाण पुण तवमत छव्विह होइ । छेओवट्ठावणिए पायन्ठिता हवति सब्ने नि । घेराण जिणाण पुण मूल त अढहा होइ ॥ परिहारविसुद्धीए मूल ता अट्ट हुति पच्छित्ता । थेराण जिणाण पुग छबिहमेय वि य तवत ॥ आलोयणा विवेगो य तइय तु न विजई। सुहमम्मि सपरागे अहस्साए तहेव य ॥ अयञ्च- जा सजमया जीवेसु ताव मूला य उत्तरगुणा य । इत्तिरियच्छेयसजमनियठवउसा य पडिसेवी ॥ जा तित्थ ताव एए नेया । कृत प्रसझेन । प्रकृतमुच्यते--तन 'करणिजा जे जोगा' गाथाया (गाथाइ ५) मोगा प्रयुपेक्षणादिका क्रियारूपा । ६-31 आलीण -आ ईपल्लीन । बहुतरं लीन पलीन । भाष्ये तु-"आलीणा नाणाइस पइलीणा, कोदाईया पलय जेसिं गया ते पलीणा उ" इत्युक्तम् । ६-32 पादमुद्धृत्य अघपयन्- रीयेत-गच्छेत् । तिरिच्छ ति तियक्त्वा कीटिकाद्याकुले देशे । साहटु-सहल सकोच्य अग्रेतनफ्णादिना । ६-34 जाय सञ्चेत्यादि-पदाधतत्त्वमशीलत्य या भाषा सला, परमवाव्या सावद्यत्वेन, अमुनस्थिता पानीति कौशिकभाषावत् ॥१॥ तथा सत्यामृपा न यकव्या । यथाम्मिनगरे दश दारवा जाता इत्यादि तम्यूनाधि- कमाने, व्यवहारतोऽस्या सलमृपात्वात् ॥२॥ या च मृपा, यथा-क्रोधाभिभूतो जनक पुनमाह-न त्व मम पुत्र । मानामातोऽल्पधनोऽपि पृष्ट माह-महाधनोऽहमित्यादि ॥ ३ ॥ या च बुनिनादिभिरनाचीणा असल्यामृषा भाम प्रणि-प्रज्ञापनादिलक्षणा अविधिपूपक सरादिप्रकारेणान ता भाषेत् प्रतावान्-उद्धिमान्-साधुरिति गाथाथ ॥४॥ ७-1 एव-क्ष्यमाणन्यायेन शिष्यो भगतीति शेष । ७-9 तेय त्ति तान् योगा। । 'द पद धूयो ओपलभ्यते।
श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [७-10.6-14 . । । ७--10 का अविसोही- तु विशुद्धिरेष तन विद्यते । ७--11. सुष्टुमपमाय-ययोक्तविधिहासोऽल्यो य गुरुसदिष्टो यथा आलोचयति । ७-12 पुन वत्ति-कार्यकरणकालात् । ७-14 गहणे त्ति-प्राकृनत्वात् प्रहणानीति दृश्यम् । ७-16 सेजत्ति-यसति । पायपुछणं-रजोहरण उपवेशनरूप च । ७-17 भोहिय इति-ओघेण जस्स गहण भोगो पुण फारणा स ओहोही' । मोघोपधि स । 'जस्य य दुग पि नियमा कारणाओ सो उवग्गहिओ ॥' ७-18 गहणं तु त्ति-गहण कयनमित्यर्थ । ७-21. कुलगणे त्ति-कुल नागे द्रादि , गण कोटिकादि । ७--23 पहियाणिग्गमो ति–किमपेत्य यहिरित्याह । - गुरुमूलाओ ति । किमर्थ यातीसाह- कुलेत्यादि । ७-24 चेइय दुविहमेयतहव्वेत्यादि-चैस पञ्चधा-साधर्मिकचैत्य, यथा वा रककसाध्वादीना प्रतिकृतिरूपम् १ । मालचैत्य गृहद्वारदेशादिनिकुहितप्रतिमारूपम् २ । शाश्वतचैत्य नदीश्वरादिव्यवस्थितम् ३ । मकिचैत्य भक्त्या क्रियमाण जिनायतनम् , तय द्विधा-साधुनिश्रया क्रियमाण विधाकृतम् ४ । तदश्रिया तु विधीम मामनिधातम् ५ । तस्य सामान्येन जिनायतनारयचेयस्य द्रव्य हिरण्यसुपर्णादिरूपम्, तस्य विनाशे जायमाने, तथा तद्रव्यविनाशने तस्य चैत्यस्य द्रव्य उपकारक दारूपरेटकादिवस्तु तस्य विनाशने सम्पद्यमाने द्विविधनेदे,त()त नलमो पाटितभेदतो द्विप्रकारभेदे--मूलोत्तरभेदाद्वा द्विविधभेदे । तन मूल स्तम्भकुम्भकादि, उत्तर तु छादनादि । स्यपक्षपरपक्षजनितविनाशाद्वैविध्याद्विविधभेदे । इह चैत्यतद्रव्यविनाशमुपेक्षमाण साधुरनन्तसासारिको भवती रयुक्तम् । दम्मादिद्रव्य काष्टादिदल चेत्यादिना द्विविधभेद यत्तद्रव्य चैत्यद्रव्य तस्य विनाशस्य निधारणादीनि कई निर्गतो भवतीति चूर्ण्यक्षरार्थ । ७-25 पाडिहारिय-याचितकम् । अप्पणत्थं समर्पणाय । ७-28 सन्नायग त्ति-खजना । ८-1 पासवण त्ति-मून भूमौ व्युत्सृष्ट योसिरह ति मानके । 4-6 असिव व्यन्तरादिकृतोपद्रवम् । ओम ति दुर्भिक्षम् । राजदुष्ट प्रसनीकपति । ग्लानो मन्द । उत्तमार्थ पर्यन्तक्रियाराधनविपय । 6-7 चकथूभ त्ति-अपमजिनपदस्थाने बाहुबलिविनिर्मित तक्षशिलानगर्या रत्नमयधर्मचक तदर्शनाम ब्रजति । स्तूपो मधुरायाम् । प्रतिमा जीवन्तखामिसम्बन्धिनी पुरिकायाम् । या सौरिफपुरादौ अर्हतो जन्म, निद मणभुव उज्जयतादि द्रष्टुम् , ज्ञान तनैवोत्पगम् । निर्वाणभूमि दर्शनार्थ च प्रयाति । [घइग] बजिक-गोकुलम् । साडिप्रेक्षा विवाहादिपेक्षणम्, आदिशब्दात् शोभनाहार शोभनोपधिर्यन रभ्यते । रम्यदेशदर्शनार्थ च बजतीति -- गृह्यते। ८--13 अप्पा० गाहा । अल्पशब्दोऽभाववाची सर्वपदेषु । ते मूलगुणविषमा विराधना मल्पा न रा. चित् । पार्श्वस्थाऽवसनादिपु दाने ग्रहणे च । काचित् । सम्प्रयोग सम्पर्क । स पावस्थादिभि राह न आसीत् । ओह त्ति-इयमोपत सक्षेपत भालोचना । 4--14 अन्नम्मि लाए त्ति-अर्धमासाभ्यन्तरेऽपि, अन्यस्मिन् सातिचारे, ममुद्देशवेलायां अन्यथा वेलामा विभागतो विशेषत भालोचशीयम् । 1 ४१ ८-16 ९-] जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या ८-16 संविग्ग त्ति-सविमा प्रियदधर्माण । ८-18 ध्रुतमहणायान्याचार्यमुपसम्पयमानस्य थुतोपसम्मत् । सुख या दुरा या राम सोढव्यमिति सुरादु खो- पसम्पत् । यथा क्षेने वसत मार्गे मजतय मम भवदीया ति सा तथाविधोपसम्पत् । यिनमकरणार्थमुपसम्पयवे यन गच्छा तरे सा तयेति । तदुफ भाष्यकृता- उयसपय पचविह मुयमुहदुपसे य रोत्तमग्गे या विणयोवसंपया पिय पचविहा होइ नायव्वा । -20 विभागण-विशेषेण । ८-25 तट्टाण ति-वेपो मिथ्यादुपाकरणस्थानाना स्वरूपनिरूपणाय । ८-32 अहिफ्खेवोत्ति-कि भवार जानाति, जात्याधुटादि या । तथा च पक्ति- हहरो अकुतीणो त्ति य दुम्मेहो दमगमदयुद्धि ति । अवि अप्पलाम(लोदी सिस्सो परिभवइ आयरिय ।। ९-1 जाइकम्माई हिं ति-अहो सन्तापिता ययमनेन रे यालिकेनेति । ९-2 समलिय ति-समधेण्या गच्छति । पुरोऽप्रत स्थितो मजति । गुरु प्रतीत्याभ्युत्थानकरणादिको यो विनय फायिकस्तस्य भोऽकरणम् । ९-4 इच्छा० गाहा । उसपया० गाहा-व्यारया-इच्छया बलाभियोगमन्तरेण करण इच्छाकार इच्छाकिया। तथा चेलाकारेण ममेद कुरु । इच्छाफियया 7 यलाभियोगपूर्विकयेति भाव ॥१॥ तथा मिथ्या- चित्तथानृतमिति पर्याय । मिथ्याकरण मिभ्याकार मिथ्याक्रियेत्यर्थ । तथा च सयगयोगवितथाचरणे विदितजिनवच- नसारा साधवस्त क्रियाया वेतध्यप्रदर्शनाय मिभ्याकार कुर्वते मिष्याक्रियेयमिति हृदयम् ॥२॥ तथाकरण तथाकार स च सूतप्रश्नगोचरो यथा भवनिरुफ तथेदमिलेवरूप ॥३॥ अवश्यकर्तव्योंगनिष्पना आवशि(श्य) की वसतेनिंग छद्भिर्या कियने ॥४॥षेधेन विपत्ता नैषिधिकी, यसतो प्रविशद्भिर्या विधीयते ॥ ५॥ आपृच्छनमापच्छा, सा विहारभूमिगमनादिषु प्रयोजनेषु गुरो काया ॥६॥ तथा प्रतिपृच्छा, सा च प्रामियुकेनापि कार्यकरणकाले कार्या, निपिद्धेन वा प्रयोजनत कर्तु कामेोति ॥ ७॥ तथा छ दना च, प्राग गृहीतेनाशनादिना कार्या, भवन्तो गृहन्तु ॥८॥ तथा निमन्त्रणा, भगृहीते वाशनादिना सह भवदर्थमशनाद्यानयामीसेवभूता ॥ ९ ॥ तथा चाभिहितम्- आपुच्छणा उ कमे, पुवनिसिसा होइ पडिपुच्छा । पुव्यगहिएण छदण-निमतणा होइ अगहिएण ।। ९--5 [उयसपयाओ]-शादर्शनचारिनार्थमुपसम्पच विधेया ॥ १०॥ इत्यादि शब्देन गृधते । लहु- सा-सूक्ष्मम् , तरखरूप गाथाद्वयेन दर्शयति-पयलेत्यादिना । व्यारया-पयल त्ति-दिवा कोइ साहू पय लतोऽनेण साहुणा भन्नइ कि दिवा पयलायरि" तेग भणिय-'न पयलागि' । एवमबलवन्तस्स मासलहुयोगो लहु मुसावाओ । एव जत्य जत्य मासलहु तत्य तत्प सुहमो य मुगावाओ ॥१॥ओल्ले ति-ओल, वास । कोइ साहू पासे पडमाणे अमयरपओयणे पडि(हिओ। भोण साहुणा भाइ–भयो कि पचसि ! यासते । पडि(हि)य साहुणा तो भन्नइ- ह-वासते ह न गच्छे। एव भाऊण यासते व पडि(हिमो। तेण साहुणा भपिय-नपु मनियं।' इयरो पचाह-न । कय । उच्यते-ना वासविंदवो एए । यास पानिय तस्म एए बिंदयो थियुगा। पृष्टिरिह भाईत्वेचतु (1) सा नेय ॥२॥ मरय त्ति-कोइ साहू कारणनिणि[ग्ग] यो उवस्सरमागतूण भणइ-निग्गह, मरुया द्विजा भुजते, भम्हे वि तस्य गच्यमो । ते सार जाप सपटिया-कार्ट से भुअन्ति' भिक्षाटने 7 दृष्टा । तेण भगहना सम्वगेहेसु-आत्मीयगृहेष्विति ॥ ३ ॥ पधपणे त्ति-कोह साहू केणई साहुणा उदग्गभोयणमण्डलियेलाकाले भणियो-'एहि भुनसु' । तेण भणिय-भुशह तुम्भे, पयवसाय ममेति । एष मणिमण मांडलीए तराणा व भुजिओ। तेण साहुणा युत्तो-'भब्दो तुम भणति मम पनक्साय!' । सो भणह-'कह न, शु पाणाशायाझ्या गरिए गा भए पयसापा ।' भषय प्रला- स्थातमिति भाव ॥४॥ गमणे ति-फेणइ साहुगा पेहयवदशाहपोरगे पएमागेण भो साहू भाीमो -वचसि । सो भणह-शाह यगे, पच सुम ।' सो साहू पयाभो । इसरो वि सरस मग्गो तासगादेव पयाभो। तो साहुणा पुछियो-'कह यानि ति भणिऊण पपरी !' सो भाइ-'सिस्न्त न जाणसि। ६जी क..
४२ श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [९- कह । उच्यते-'नणु गम्मइ गम्ममाण, न अगम्ममाण । जम्मि समएऽह तुमे पुट्ठो, तम्मि समए गच्छो ॥ ५ ॥ परियाए त्ति-कोइ साहू केणइ साहुणा यदिउ कामेण पुच्छिमओ-'कइ वरिसाणि याओ।' सो एव पुच्छिओ भणइ-'एयस्स साहुस्स मज्झ य दसवरिसाणि परियाओ ।' छलवाद प्रवीति । सो पुग्छतगसाहू भणइ-'मम नववरिसाणि परियाओ।' एयस्स य वे पचगा दसनो, पादपतन कुरु ॥ ६ ॥ समुद्देस त्ति-कोइ साहू कारणनिग्गओ रवि परिवेसपरिवियंत दहण वे साह भत्यमाणे तुरिय भणइ-'भोजनबेला वर्तते, उठेह ।' साहू गहियभायणा उढ़िया भिक्षाटनाय । पु 'कत्थ समुद्देस ?' छलयादी प्राह-नणु एस गमणमग्गम्मि । आदिचे गहण राहुणा क्रियमाण दर्शयति संखडे त्ति-कोइ साहू पढमालिय पाणगाइ विणिग्गओ पचायाओ भणइ----'इह अज निवेशे पउरा डीओ।' ते य साहवो मिक्षाटने गन्तुकामा इच्छति [अन क्रियान् पाठ सण्डित. प्रति- सुडग त्ति-] 'कोइ साहू उपस्सयसमीवे मय सुणही दटूण गुडग भणइ-'शुलक ! तब माता ताहे सो सुडओ पक्षण्णो । त रुयत दहण साहू भणइ-'मा रुय, जियइ ति । एव भणिए खुट्टो भने भणति-'कि तुम भणासि जहा मया' । सो मुसावायसाहू भणइ-~-'एसा साणी जा मया, सा तुर भवति' । 'कह माया भवइ ?' अतीयकाले भविंम् । जओ भगवओ भणइ--एगमेगस्स ण जीवस्स माइत्ताए भन्मपुत्तधूयत्ताए भूयपुव्वा । तेण साणी [माया] भवति ॥९॥ परिहारिय त्ति-कोइ साह उ- ओसाइ दह मागतूण भणइ-'मए दिवा परिहारिया' । सो छलेण कहइ, इयरे साहवो जाणति-- हारतवावना अणेण दिट्ठा उन्नतविहारिण ।' तदनु तद्दर्शनाय गमनादी कृते यावद् दृष्टा पार्श्वस्था । तद मादी उत्तरयति-नयेतेऽपि परिहारिका अभक्षादिपरिहरणात् । परिहरन्तीति परिहारिका इति कृत्वा । मुटीओ त्ति-एगो साहू विहा(या b)रभूमि गओ-'उजाणदेसे इत्थी घोडमुही दिहत्ति साहूण कोइ । श्री इत्यर्थ । जनगमने घोटिकों कथयति ॥११॥ अवसगमणं ति–कोइ साहू फेणइ साहुणा पुच्छिभो- गच्छसि भिक्खायरियाए " सो भणइ-'अवस्स गच्छामि ।' तेण साहुणा पगिहियभायणोवगरणेण भभइ- घचामो' । सो पञ्चाह-अवस्सगतग्वे न ताव गच्छामि' । f न जासि' पुच्छिओ भगइ--'वेला न ता परलोगगमणवेला मोक्सगमणवेला या न ताव जायइ । तो न ताव गच्छामि ! पर अपस्स परलोग में गमिष्यामीत्यर्थ ॥ १२ ॥ दिस त्तिएगो साहू एगेण साहुणा पुच्छिओ-'अज्जो कयरं दिस भिक्खा- गमिस्ससि । सो भणइ-'पुव्व ।' सो पुच्छतगसाहू अग्गाहेऊण गओ भवरदिस । इयरो वि पुन्वदिसग भवर गओ। 'मनो ! तुमे भणिय "अह पुव्व गमिस्सामि।" कीस अवरदिसमागमो एव पुढो भणइ- भवार]गामस्स इमा पुव्या कि भवइ । माइ चेव ॥ १३ ॥ एगकुले त्ति कुल गृह मियखनिमि साहुणा मनइ--'अज्जो। एहि वयामो भिक्खाए । सो भणइ–'अहमेगकुल गच्छ, एगले एव मया अनि बघह तुन्भे' । गया साह्यो । सो वि य पच्छा बहुवुलाय पविसइ । तेहिं साहूहि भणिओ-ज्ज ! तुमे भणिय- कुलै पविस्सिस । बहुकुलपवेसे पुट्ठो मणइ-'कह एगसरीरेण दोनि वुले परिस्सिस्स । एग चेव कुल पविसे एगदने त्तिसाहुणा एगेण एगो साहू भन्नइ--'वयामो भिक्खाए।' सो भणइ--'धचह तुम्भे । मया द्रव्य प्रहीतव्य' । तओ ओयणदोव्वगाइ बहुव्वे गिण्हतो तेसिं (हि) साहहि दिठो भणिो य--'ब भणिय-एग दव्य घेच्छ, यह भणेगाणि गिण्हसि । अत्यो-धम्मस्थिकायाईणि दयाणि छ तेर्सि धम्म मझे गहणलपसणो पुगलत्यिकाओ एगो चेव । अमेसिं गहणलासण नत्यि । तम्हा मह एग दन गि पहुग्गहणेऽपि सति समस्खान्यपि द्रव्यमेकमेव ॥ १५॥ ९-8 लहुसादिपण पुणेत्यादि-सूक्ष्मादत्त उपलादिप्रहणविषयम् । ९-9 इत्तिरिय-मल्लकाम वृक्षादिच्छायावप्रहादौ विधमणाय । ९-10 लहुसमुच्छा व्यक्षेत्रकालगावभेदाचतुर्घा तो झमेणाह-लहुसमुच्छा इत्यादि । कागा णे ति शम्यातरराहादी फाकादिपात नियारयति, पलीयर्दकल्पष्टक लघुपुत्रादि रक्षति ॥ १॥ ९-11 रोत्ते भोयास त्ति -~अवकाश प्रतिक्रमणादिस्थाप्रवेश । - । ९-12.११-14] जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्यारया ४३ ९-12 रागदोसाइ मारामध्येपि ॥ पत्थ त्ति-काशदी। ठाणा-आपत्तिस्थात, घेप्पन्ति-प्रतिक- मणाहमध्ये। ९-17 असकिलिट्टकम्म ति-धादौ शरीरक्रियायाम् । छेदन दुष्टाहास्य । पीलन रुधिरादिपर्मण । भेदा पवादिगडस्य । संघर्षण दरादे । अभिघातसेचा लगुडादिप्रहारस्योष्णराशिा । कायगाराइ प्रसूलादिषु । अमुचिरं पुतादि , सुसिर उदरादि । क्षण तरं अव्यवहितम् । परम्पर वनादिया व्यवहितगाम्, इत्यादिक भारलिष्टकम । क दर्प -याचिको तादिभाषणम् , कायिकच भावनादिक । ९-22. सम्धपदाणि-दसणाइणि २४ । ९-25 छूटे-उरिक्षते । पमादो धज्ञानादिक्ते । असंपउत्तस्स-असयुक्तस्य पञ्चविधप्रमादर- हितस्य । गोवजुत्तस्स-विस्मृतिरहितस्तस्य । ९-30 सन्नित्तिसशान सझादेवगुरुधर्मपरिशान, तपस्यास्ति स सज्ञी श्रापक । सन्नायगा-सज्ञा- तरा सजना मातापिनादिका । भयं-सप्तप्रकार प्रसिद्ध । सोगो-गटाना द्रव्याणा सयोगेन शोक । इसराना वियोगेन। ९-32 पाउसत्त-वयु शत्व पश्मलचारिनत्यम् । बउस सपल क्युरमेग? तमिह जस्स चारित्त । अइयारपकभावा सो घउसो होइ नायवो ॥ १०-4 सभमो-सभ्रम सक्षोभ । भय-दस्युविषय । दस्यवश्वोरा । मिलनसु-म्लेच्छा ।यो. हिय तिवन्दिका । मालवा-उनयनीतस्करा । आतुर -पीडित । दिगिछा-बुभुक्षा तृष्णादिमि । १०-6 [घोच्छिन्नमडवाइ]-वोच्छिया जस्स सव्वासु वि दिसासु नत्यि कोइ भमो गामो नगरे या स, पाचप्रामादिरहित मडम्ब । तथा चमडम्ब सवओ छिनमिति पम्यते । १०-8 अणप्पवसओ-हस्त्यादिपरवशस्य । कारणेहि-सभ्रमादिमि प्रदर्शिते । पयणाय विराधये दिति शेष । १०-10 मृपावाद कूटसाक्षित्वेन । मैथुन अतिक्रमादिना । रात्रिभोजन दियागहियाइभेदत । दीर्घमार्गे मजता पुतमिश्रलमादिरूपोऽध्यानकर । लेगाडय ति-क्षीरानादि उत्सर्गतो न माह्यम् तदप्यापयेत । १०-15 दुञ्चिन्तिय-कणायकवत् वनदवदानचिन्तनादि । दुभाषित अभूभृतोद्भावनादि । दुधेष्टित धावतादि। १०-25 उवहि त्ति-ओहेण जस्स गहण, भोगो पुण कारणा स ओहोही । जस्स दुग पि नियमा, कारणओ सो उवग्गहिओ ॥ १०-29 अशङ्कित निर्णीत दोपवदेोदमिति, दोपवत्त्वेन। निहिण त्ति-अणावायमसलोए इलादिकया। १०-31 [फालाइच्छिय-] प्रथमप्रहरगृहीत तृतीयप्रहरात यावद् ध्रियते अशनपानादि तत्कालाति मातम् । [अाणाइच्छिय-] यद्गन्यूतद्वयात्परेणानीत नीत चा परिभुज्यते तदध्यानातिकान्तम् । १०-32 इदियमाइहिं ति-इन्द्रियमाया-इन्द्रजालादिभि । चक्षुरादि-इद्रियाणा विक्रिया आसाठभू तिवत् । गिलाणेत्यादि-लानादिव्यास्तत्वेन । सागारिका या परिष्ठाप्यस्थाने सन्ति । स्थण्डिलस्य वाऽभाव । थोरादि भय वा तत्सशनादि परिष्ठाप्यातिकमेऽपि विधिना परिष्टापयन् गुद । दुर्लभद्रव्यप्राप्ती सहसाब लामो वाजात । ११-7 गमण-अमस्य हत्यसयथाहिं । ११-१ पट्ठवण त्ति-अनुयोगप्रारम्भादिविषया । पडिकमण न्ति अनुयोगस्य । परियट्टणा गुणनम् । ११--10 अणवजसुमिण दु खप्न । दुनिमित्त भपातिगोचरम् । दु शकनार्दै प्रतिघातार्थम् । अष्टोच्या सोत्सर्गकृतिरिति युतम् । तन वक्ष्यमाणगायोकादिशब्दसूचितोऽयमर्थ । ११-12 उजाणी-परकुयउ । णईसतारो-नयुत्तरणम् । ११--14 सघट्ट-१ सप २ लेग ३ उपरिलतिरपो नदीसन्तारस्खन जदार्थ सपट । ११नामि यावत् टेप ।२। परेण लेवुवरि-नाभेपरि । ३ । पाहु उडुपसुप्पाकादियतुर्थ ।।।
४४ श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [११-16.१३ ११-16. सयणासणाण जायणत्य गओ । ते य दाया परे अत्यि। वाउलो वा । तो इरिय पडियमिक किंचि काल ज्झाय करे । ११-20 हत्थमेत्ते विति-रेलए जाते इति शेप । ११-28 छिजाति-विभज्यते । पडिकगण च अनुयोगस्य ज्ञेयम् । १२--1 आदिशब्दात् कालप्रतिक्रमणे चेति च प्राह्यम् , कालादिविपर्ययात् । ज्ञानाचारातिचारो भ व्यसनादिभेदाद्वाकृतात् । १२-5 हीलयति-पायो गुरुम् । १२--12 ओरसो त्ति-आन्तर । १२-15 वजयति-व्यज्यते । सन्न त्ति-सज्ञाभिधानम् । १२-16 अनाभिहाणेण वा भणइ तियया 'धम्मो मगल'मित्यादिपरित्यागेन 'पुन काण दयासपरनिजारा' इलादि नामान्तरेण । अर्थभेदस्तैरेव व्यअनर्यन विकल्प्यते, यथा आचारसने भावन्त्यध्यय 'आवती के आवन्ती लोगसि विप्पराममन्ती ति-अन्योऽर्थ कल्प्यते-'आवन्ति होइ देसो तत्थ उभरह फेया। सा पडिया हेतु ऊ त लोगो निप्परामसइ ।' यत्र सूनार्थी द्वावपि विनश्यते स तदुभयातिचार । यथा- धम्मो मगलमुकत्यो अहिंसा पध्वयमत्यए । देवावि तस्स नस्सति जस्स धम्मे सया मसी ॥ अहागडेसु रंधति बढेसु रहकारिओ । रणो भत्तसि जो जत्य गद्दमो जत्थ दीसइ ॥ अन सून अर्थव द्वायपि विनश्येते । उभयविनाशे चरणनाशस्तदभावे मोक्षाभावस्वदभायादीक्षानरर्थक्यम् १२--19 अणागाढे सुए-दसवैकालिकादिके उद्देशकस्यातिपारेऽकालाविपाठे निर्वि० । आगाडे उत्त यनभगवत्यादिके श्रुते उद्देशादिस्थाोयु पुरिमार्धादि क्षमणान्तम् । अर्थेऽप्येवम् । १२-22 ओहेण-आगाटाणागाढादिभेदतोऽविशेपे। १२-23 कमेण अहिजतो त्ति-कमश्चाय- ति वरिसपरियागस्स उ आयारपकप्पनाममज्झयण । चउयरिसस्स सम्म सूयगड नाम अग ति ॥१॥ दसकप्पव्यवहारा सवत्सरपणगदिक्खियस्सेव । ठाण समयाओ विय अगेए अहवासस्स ॥२॥ दसवासस्स वियाहा एकारस वासयस्स इमे उ । गुहिय विमाणमाई अज्झयणा पच नायव्या ॥३॥ पारसपासस्स तदा अरुणुक्वायाइ पच अज्झयणा । तेरसवासस्स तहा उट्ठाणसुयाहया चउरो ॥ ४ ॥ एगूणवीसगस्स को दिट्ठीवाओ दुवालसममग । सपुग्नवीसवरिसो अगुवाई सध्यमुत्तस्स ॥ ५॥ ज केवलिणा भणिय केवलनाणेण तत्तओ नाउ । तस्मन्नहा विहाणे आणाभगो महापावो ॥६॥ १२----24 [अपत्तो]-तत्सूनमर्थ वा विवक्षितशास्त्रसत्क क्रमेणाधीयानो न प्राप्नोति, पठन विषये 5 पर्यायो वा यस्य न पूयते सोऽप्राप्त । अन्यथायोग्यो य सो अपत्तो त्ति-अपात्र । च तिन्तिणिकादि तितिणिमो स्तोकोकेऽपि यत्किचनभापी । चलचित-अस्थिरचित्त । गणाद्गणान्तर सक्रमणशीलो यापा भन्यश्चाव्यक्त - अपानम् । अव्यकता च वयसाऽतिलघु । वयश्च प्राणिना कालमृता शारीरावस्था । श्रुतेन म मथुतोऽव्यक्त । एतेषा सर्वेषामप्राप्तादीना वाचना-श्रुतपाठनम् । १२-26 जा पत्त प्राप्त । सुएण श्रुति हमेग । पत्त वा पान-योग्यम् । १२-30 मिसेज ति-आचार्ययोग्याम् । च शब्दात् वन्दनकायोत्सगों अनुयोगप्रारम्गे उर आयविलम् । १२-34 विगई भुजेऊण त्ति--जोगसमत्तीए तो भुक्त्वा पश्चात्कायोत्सर्ग विधत्ते । पगट्ठति । विकृतिमाचाम्लप्रायोग्य च गृङ्गाति । १३-5 सकादयोऽय। १३-11 [मइमो] -भजाम सेवयाम कुर्म इत्यर्थ । . १३---13 मडलि त्ति-तस्यां सर्वे ससृष्टमोजाजि]न । मोय त्तियोग । जल त्ति-सवें गगरू पूजा राजादिभि क्रियमाणा ऊतीथिनाम् । भतिशयाद्वा मन्त्रादिका , मतानि या तदागमान श्रुखा। । - १३-16. १५-11] जीवकल्पपूर्णि-पिपमपदध्यात्या १२-16 मित्ताइसु-निम्पामिरपालाम् । उपमा उपपदा मशरण । १३-19 ए शारीन् म प्रायषित लिम्-मिच्छत्ताईण ति। स्थिरीकरणारी मानिन्दा होतानाम् । १३-23 चशादेन देश निति योग । १३--24. गोहमोति-पुशारक्षया । असु पित्तियाविषयेषु च सर्योsarmपि देशरूपान मिरमउपायायायाांग पर्णा मयान्य पुरिमारियोपरियम् । राय देसे मिक्स्सेलारिता दर्शितम् । मम्पत्यविषयेषु च यतोऽशाम्यपि मूलगी की। १३-26. प्रास्त्रपरहणारिपु स्वामिविषयेषु माह-एवं चिप इत्यादि । यतिविषयाणा उपहादीनाम- विधाने । अणन्ताविति-पुरिगाई गमणतमिलतत् । १३--31 तप्पसापण ति-पार्थस्थादिप्रसादतम्तदयात् । पार्धम्या परिपालगादिक पाल्य पूर्यता মিয়ানী যযাতি মাষধিনস। २४-6, नामियाना पाणी भवतु रोपटर्न भकाय प्रीप संपादि संभवति, परूपरपेन सरोऽपि मरण समवादिखाह-आउमाएत्यादि । १४-7 इसिं मारु । घटादिस्यस चासो पादादिता सपा । परितापो गाउसरचालना । उदयणं प यहिना परितापन । हनन दण्डादिना । पाोन चरणादिक्षालादि च उदयन मकायस्य । १४-१ अपागाढा अभिराम् । पदियसपश्यतहमातमूपिकातिरोलिकादिसर्य विश्यो य । १४-13 पमाय०-~प्रमादतोsपापणे । एकाफलाणग । नि०। पु. 1ए । मा० । उ० । इत्येकाच्या पकादिविषय । १४-15 तम गृपापादो धर्मास्तिकायादिसर्यदन्यविषय । भदत्तादान महणधारणीयवस्तुविषयम् । परिप्रहस्त सचित्तावितमिनसबद्रव्यविषय । क्षेनतो लोकालोकविषयी मृषापादपरिग्रही भदत्तादान च मामाद्याश्रयम् । कालतब्ध दिवारानी या । भावतो रागतो देसतो या। निवयमपि जघन्यादिवस्तुविषय मृषावादायपि जघन्यायुच्यते। १४-20 देवादयपरियासे पामतम्यकपानाय पसरष्टितपयुधितत्वे अमत्तहो । सुख्यादी च । १२-22 पदमभगो ति-दिवा गृहीत दिवा भुफ पर राज्युपित द्रष्टव्यमित्यायो भा 11 दिवा गृहीत रजन्या गुफगिति द्वितीय ।। रजन्या गृहीत दिवा भुकमिवि तृतीय ३। रजन्या गृहीत तस्सामेव मुक्तमिति चतुर्थ ।। द्विनिचतुर्थेप्वष्टमम् । १४-33 भोहुद्देसिय जमप्पणोढाए र तम्मज्झाओ भिक्साओ का विकापड, दानार्थ य एष्यति तस्से दते ११ उद्देसकडे कम्मे एक चउबिहो मेओ-जावतियमुद्देस, पासंडीण भवे समुद्देस, समणाग भाएस, निग्गयाण समाएसमिति पत्यारो भेदा । तपाये जाव र उकोइएयस पार्सडीण दायव्य न गिहत्याण २ । निमयशाक्यादिमेदत परधा श्रमणास्तेपाम् ३ । निग्गन्याण साहूणमेव नऽसि ४ । तस्य ससडिभुत्तुवरिय चन्हमुदिसइ ज तमुहिट । वजणमीसाइकह फर्रवादिक । तमग्गितवियाइ पुण धम्म गुल विग्धारेऊण मोयए पपिज्जा-इति कमौद्दे सिक। १५-7. यावदर्थिकमिश्रपासडमिश्र साधुमिथ भेदतत्रिधा मिश्रम् । यत्र खगृहयोग्यजलकणादीनां मध्ये अधिक्तरजलपणादीन् मिश्रितान् कृत्वा यदशनादि प्रथमतोऽमिज्वारनाद्रहणदानादिप्रस्ताव एष राजुमारभते । थापयिकाद्यर्थ तनिधा। १५-9 संघाडगस्स एगो भिक्खग्गाही । वीओ दिसुवओग देह । तइए गिहे निष्फेडिया। इत्तरद्वविय । तओ परेण सर्वमेव चिरविय । १५-10 सुहुमा-कप्पटगरस भत्त न देह, मणइ साहुस्स अट्ठाए उहिया सुरक्ष वि दाह ति । थायरा-- कप्पटिए विवाह काउकामो रहमईसु साहुसमागम जाणिजण भोसकण करेवा । १५-1 आदारसेन्चाइय साहुणो भुजित्सति, रंघिउ भमो सध्वमेवाहार यहि नीणे साहुहाए। एय पागडकरण । रयणप्पईवजोईवायायणडोहाइएहिं उजोयकरण साहुमहाए [पयं पगा-] सफरण।
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१५-16.१५-29 १५-16 आहड ति-सग्गामाढे निष्पचवायाए ।४। भाइड चिय आइमणादा च, तिघरंतरमाइन्न । १५-18 दईरक जतुप्रध्यादिरूप । पिहित च छगणादिना ओलित्त । १५-19 माल सीकमप्रासादोपरितलादिकमभिप्रेतम् । तस्मादाहत करनास्य यदनादि दात्री ददाति त मा रापहतम् । नवरं त्रिधा एतनपन्यमध्यमोत्कृष्टभेदतः । जघन्योत्कृष्टयोरन्तरे मध्यमो गम्यत एवेति नोकम् । पाउ(B) पाटनमानस्तोकमियागृहीतत्वाजघन्य लघु । मञ्चकाद्यधो दत्वा यद्ददाति शिककादेस्तन्मध्यम मारा पहृतम् । यदा च उच्चतरशिककादेल कादिग्रहणाय मूडकनिश्रेण्याद्युदूपल वा भधो दत्वा तस्मात् ददाति तदोत्कृष्ट भवति । अनाप्यायामम् । १५-20 अच्छेनं ति-प्रभुगृहादिनायक , अन्येपा दरिदकौटुम्बिका बलादातुमनीप्सितामपि यहेय ददाति तत्प्रभुआच्छेद्यम् । खागी प्रामादिनायक , स यदा साधून दृष्ट्वा कलहेनेतरथा वा कौटुम्बिोभ्योऽश नायुदाल्य ददाति तदा खाम्याच्छेद्यम् । तेनाश्चौरास्ते सार्थकेभ्यो वलादाच्छेद्य यत्पाथेयादि साधुभ्यो दद्युस्तत तेनविपयाच्छेद्यम् । १५-21. अणिसटुंति-बहुभि साधारण बहुजनसाहिक यदशनादि ससध्यादौ खाम्यमउशात यदेश दद्यातत्साधारणानिसष्टम् । चोलको भोजाम् । यथा फिल कश्चिरकोटुम्बिको भकाहारकहस्तेन गृहात क्षेने हालिकाना भोजनाय चोक प्रस्थापयति । तत्र कौटुम्बिन साधूना दानाय मुत्कलितबोलकमध्यात् यदि हालिक विधि साधवे ददाति तदा चोलकानिसृष्टम् । तथा जड्डस्य हस्तिन सम्बन्धि पिण्डरूप वस्तु राजा गजेन वाननुज्ञात स्वादनिसष्ट जशनिसष्टम् । १५-22 यावदार्थका समरतार्थिन । पापण्डिसावरकादय । साधवश्च निग्रन्था । अन गृहिण म्यार्थमनि ज्वालनाद्याद्रहणदानान्ते आरगे कृते सति पश्चात्स्वार्थकल्पित तन्दुलमध्ये पेटिकार्य तन्दुलादीनां माणक सकल्पित प्रक्षिप्य रानोति यदा, तदष्यवपूरक । स च त्रिधा-खगृहयावदर्थिकमिध , खगृहपापण्डमिश्र , खगृहसाधुमिश्र इति । इह माहाकम्म उद्देसियचरिमतिय, भत्तपाणपूट्य, पासडसाहुमीस, वायरपाहुडिया दुविहा, मझोयर चरिमदुग एए छउग्गम दोसा अविसोही कोडी, रिसोहिकोटीए अवयवेणाविच्छिक सबमभोज विष्ठादि(ति) हुषेणेव भक्त । विसोहिकोडीए पुण सयरणे परिहवेइ । मलभे अनस्स असथरतो वा तम्मत्तगेव परिहवेड । जानि य अपयवा तहा विसुद्धो । १५-24 धाई पचहा-सीरधाई मजण-मटण कोलावण-अकधाई पाल्पालिका स्त्री धामीत्वरणमिति तत्त्वम् । एव यथासभवमन्यनापि । दूती परस्परसदिष्टार्थकयिका स्त्री-दूतीत्वकरणमित्यर्थ । तत्कथयति- खग्रामे परमागे वा । सनिवासमामस्यैव सत्केऽन्यस्मिन् पाटकादी, परप्रामे वा सदेशक नीत्वाय पिण्ट लभते स दूतीपिण्ड । १५-25 अतीतादर्थसूचक लिमित्त जातिकुलगणमैशिल्पाना क्थनादिना आजीवनम् । १५-26 वनीपक्व पिंडट्ठा समणा तिहि माहण शिविण मुणगाइ भत्ताण अप्पाण तमत्त दसद जो सो पणीयमो ति । उन(१)वर्णयति पिण्डाधमारमान दायकाभिमतेपु श्रमणारिपु समझ दर्शयतीति भावशाद्वनीपर । यद्वा यनी लब्धार्थरूपा पाति पाल्यतीति वनीप, स एव वनीपक । १५-27 चिकित्सा रोगप्रतीकार । तत्र नाह वेद्यो, अप्पणो वा अमुगो वाही अमुगदव्येण पिहोत्ति, एसा मुहमतिगिच्छा। थायरा वाय सिंभ समिवाय समुत्याण रोगाण ओसहगाइय साहह । सयमेव]से किरिय करे । माहिथियार किरिय पा से साहेइ -क्रोधादय प्रतीता । १५-28 धयण-सथयो-पुधि गुणधुइ काऊण पच्छा मग्गइ । पच्छासंघयो-नाम दिने पच्छा सथप फरे। 'ममुगम २ यूय दृष्टा' इत्यादि च । १५-29 सम्बन्धि-संथयो-नानयोजनम् । मायापियाइयो पुख्यसवन्धि सथयो, पच्छामम्बन्धि-संभयो । मिना ससाणा ! साहको मतो थी पुरिस विसयो मा । घुण्णो अपणाइओ। पायपले माइमोजोगो । गर्मादासपरिसाटो मूटकमा । 1 सासूससुराइयो १५-31 १६-13] जीतकल्पचूर्णि-विषमपदव्याल्या १५--31 शक्ति सभाविताधासम्मादिदोप भकादि । चतूरूपी भगश्चतुर्भा -प्रहणे भोजने शक्ति । भका- देग्रहणकारे भोजनकाले च यदि पुनरमुक्दोपवदिदमिति शदावान् ।। प्र०णे शकितो 7 भोजने ।२। भोजने शवितो न प्रहणे ॥३॥ न ग्रहणे न भोजने शक्षित । इति । एतेषां सभवो यथा-गृहस्थेन प्रचुरा भिक्षा भिक्षाच- रेभ्य खसै वा दीयमान दृष्ट्वा चिन्तयति किं सगृहोपस्करतया साधुभिक्षाचरादिनिमित्तराद्धतया या चेतसि शक्षित । ततो लजा सक्षोमादिना एनमर्य गृहिण प्रश्नयितुमशकवन शक्षितो गृहाति, शक्तिस्वथैव भुते ।। द्वितीयस्तथैव चैतति शकित तथैव गृहस्थ प्रयितुमनुवन् गृहीत्या सोपाध्ये समागतस्ततो भोजनसमये त दोलायमानचेतसं दृष्ट्वा अपरसाधुस्वशिक्षानि सवीकृतमाही तदभिप्राय ज्ञात्वा यदति यथा-साधोस्तहहे प्रकरण लाहण पा समा यातामेति-तद्वच श्रुत्वा शुद्धमेतदिति चित्य विगतशहापरिणामस्त इति द्वितीय । गुरो पुरत खभिक्षा- तुल्यभिक्षामालोचयत साधून श्रुत्वा समातशक्तियति यथा~यत्वरूपा यही मया भिक्षा लब्धा अमुरुगृहे, अन्यैरपि तत्र तत्स्वरूपैव यही लधा। ततो मा कदाचिदियमशुद्धा भविष्यतीति । तथा चासो शक्तिचित्तस्वा भुन इति तृतीय । चतुर्थस्तु सभव प्रतील मुगम एव । अत्र द्वितीयमशोऽपि प्रहणापेक्षयव सदोष । परमार्थतख शहितग्रहणदोपस्य निवर्तितत्वाच्छुद्ध एच । तृतीयो बहुतरमदोप । उभयत्रापि भोजनशङ्कितत्वेनाशुद्धत्वात् । अत प्रथमतृतीयावाश्रित्य यत्प्रायश्चित्त निरूपयति । य चन दोषमाधाकर्मादिक शकते, सभावयति अमुकदोषमिति तत्सक प्राप्नोति । सम्रक्षितमारूपितम् । निक्षिप्त न्यस्तम् । पिहित स्थगितम् । सहृतमन्यन क्षिप्तम् । दायग ति दायकदोषदुष्टम् । उन्मित्र पुष्पादिमिलितम् । अपरिणत भप्रासुकीभूतादि । लिप्त दुग्धादिसरंटितम् । छर्दित परिशाटितम् । एते दश शद्वितादय एषणादोषा । १५-~-33 अधुना अक्षितादीनाह-सञ्चित्तेत्यादि । पृथिव्यवनस्पतिभि सचित्तप्रक्षितयोगात् । करमान देयमपि सचित्तम् । अचित्तयोगादचित्तम् । तेन पृथिव्यादिभि सचित्तप्रैक्षित पृविकायनक्षितमिलादीनि तत्त्वम् । १५-34 हत्थेण ति। मते वि एव चेव । निर्मिश्रक्म अपरिणत सचेतनम् । १६-2 ससिणिद्ध -तानिरधनीपलक्ष्यमाणसरण्टनजलम् । हस्तादिउदकार्दै जलतीमित तदेव । १६~6 गरहियमजायमक्सिए त्ति-मासवशाशोणितसुरामूनोच्चारादिमि शिष्टजनस्याभक्ष्यापेयै साक्षा प्रक्षित सत् । एतैर्मक्षिताभ्या करमानाच्या दीयमान सत् यतीनामकरप्य उडाहादि दोषान् । ससक्तिमद्दव्यैर्द्र व्यादिभिर्लेपकृन्मवादिभिश्व हस्तमात्राभ्या प्रक्षिताभ्या देय यदेतैदीयमान म्रक्षित तदप्यमेकेन्द्रियादिवध- दोपात् । मातादिलममक्षिकाकीटिकापतङ्गादिसत्त्वयधदोपाचेति । गर्हितेऽगहिते च म्रक्षिते आयामम् । १६-7 निक्षिप्तश्चतुर्भ-सचित्त पृथिव्यादि सचित्ते पृथिव्यादो निक्षिप्त यस्तम् १ सचित्त अचित्ते २ अचित्त सचित्ते ३ अचित अचित्ते ४ विक्षिप्तम् । अन प्रथमद्वितीयभङ्गयोप्रहणप्रायोग्यद्रव्याभावान प्रायवित्त चिता । चरमस्तु शुद्ध एव । अतस्तृतीयप्रायवित्त निरूपयति-ए-थेत्यादिना-पृथ्वी कायो मृत्तिकालवणोपतवरिका चणिकादिरप । अफायो जलावश्यायहिमकरकादि । तेजस्कायो मुर्मुराझारादि । वायुमुजावातादिरूपो दृविस्थश्च । प्रत्येकवनस्पतिकायो धान्यनीहिकाहरिताम्रादिफलरूप । अनत साधारण सूरणगजरादिकन्दरप । नसा कीटिकामकोटकन्थ्वादिरूपा । एते च सर्वेऽपि पृथिव्यादय सचित्ता मिश्राश्चान प्राधा । तत पृथिव्यादियु नमान्तेपु निक्षित देय वस्तु यदचेतनम् । अनन्तरमव्यवधानम् । परम्पर स्थगरिकादिना सव्यवधानम् । सातरं पृथिव्युपरि स्थगनिकादो कृत्वा देय मुक्तम् । १६-12 अणन्तवणस्सइ त्ति-उल्यादिरूपो। वीयनिक्सित इति प्रत्येकवीजेयु अणतझायगजेपुच अनन्तरपरम्परनिस्सित्ते देये नि। १६-13 पिहिए चउभगोत्ति यथा-सचित्त सचित्तेण १ सचित्त मचित्तण २ अचित्त सचिरोण ३ सचित्त ] अचित्तेग ४ पिहिय । अत्राप्यनन्तरपिहितपरम्परपिहितता वाच्या । तया चतुर्भ-अनापि गुरुलहु- पदाभ्यों चतुर्भह स्यात् , यथा-गुरुक गुरुवण, लघुक लघुकेन, लघुक गुरुरेण, लघुक लघुकेन पिहितम् । गुरुक भारिक महद्देयभाजनम् । गुरुणा भारिकेण प्रदेडकादिना पिहितम् , गुरुक लघुकेनाल्पभारेग छगनकादिना, लघुक देयमाजन गुरुकेण प्रहेडकादिना, लघुक लघुकेन छगनकादिना पिहित ।
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१६-13. १५ १६-13 सचित्तेण पुढवीत्यादिना तृतीयभनय अचित्त सचित्तेग पिहितमित्यस्य व्याख्या मण्डकादिकं सचित्तमृदामटब्धगनन्तरपिहितम् । तउभा मृत्तिका गर्भच्छविका । अवष्टब्ध मण्डकादिपरम्परपिहि एवमकायादिशेरैरपि भावना कार्या । अस्मद्विरचितपिण्डविशुद्धिवृत्ती दर्शितत्वाच । १६-18 संहृतम्-येन मानकेण दात्री दास्यति साधोरानादिक-ता पृधिव्यादिकं तुषादिक काय तदान सचिते अचित्ते वा क्षिता तेन रिकीरता यदि साधोर्ददाति तत्सहतमशनायुच्यते । अन भागवत सचित्ते सचित्त-सचिते पृथिव्यादी, सचित्त पृथिव्यादि संहनम् १ अचित्त तुपादि सहत २. अचित्ते सचिन भभित्ते अचित्त ४ सहत । अप्राप्यनन्तरपरम्परता पाच्या । परित्तवनस्पी पनशाकादि । पृथिव्यादिपु प्रसा सचित्तस्थानेषु सहरणे साध्वयं कृते मात्रकान्तेन गृहीतेऽशनादी आ० । एकरसाद यत्र संहन्य भूयोऽपि तद अयोग्य सहस तेन ददत परम्परसहरणम् । १६-22 चीयसाहरिए तिलादिगोचरे । १६-23 दायग(यारो)त्ति-मतो मदिरापानोत्यमदविकल । उन्मत्तो महासङ्घामादिजयादा प्रहगृहीतश्च । १६-27. पमहमाणी पृथिव्यादीन् । सेसेसु त्ति भोपु । १६-29 ओयत्तन्तीए द्रव्येण द्रव्यान्तरं गृहन्या । १६-30 पर च उहिस्स त्ति-परकीयमिदमित्युक्त्वा ददाति । यद्वा यत्र दानी परेण निर्भसते । १६-~31 उम्मीसं ति--मिश्रणस्योमयाप्रितत्वात् , उत्प्रात्येन मिश्रित दाडिमगुलिकादिना, पुष्पा वा सह यन्मिलित तदुन्मित्र भण्यते । ते द्वे अपि वस्तुनी यौन्मिथ्य ददाति साधये तदशनादिउन्मित्रम् । परित्तवनस्पतिपनपुष्पशाकादिना सचित्तेन उन्मिने मा० । १६-31 अपरिणत अप्रासूकीभूतादि । तच मध्यभावमेदात द्विधा । पुनभीपापरिणत दातृगृहीतृयोगार धापा । तन परिणतद्रव्ये सचेतने दायकेा साधोदीयमाने द्रव्यापरिणतम् , दातृविषयभायापरिणत तुद्वय मौदिखामिनोर्मध्यात् यत्राशने साधारणे एकेन दीयमा द्वितीयस्य यन भायो अपरिणतो अभवनशील तृभाषापरिणतम् । १७-1 द्रव्यभाषपदाभ्या चतुर्भशोऽध अनिसृष्टभावापरिणतयोश्चासमक्षकृतो विशेष । गृहितृविषयम परिणत तु यन द्वयो साध्वोभिक्षार्थ गतयोरेकस्य मनसि तदशुद्ध परिणतम्, अन्यस्य तदेव शुद्ध मनसि परिणत सदपि मावापरिणतम् । १७-2 [ससत्त]-ससक्तेन दध्यादिना करमात्रकखरण्टकेनाशनादिप्रहणे लिप्तदोपा । १७-3. पृथिव्यादिषु दीयमाने छर्दिते परिशाटितम् । १७-5 सयोजणा-चाहि भायणे त्ति । रसहेतुकद्रव्य मिक्षाटने शाल्यादिकूर हीरं वा प्राप्तवान् ।। पहिरेव पृथक् भाजनेषु गृहातीति । वसहिदव्यसयोजनाया चेतसा क्रियमाणायाँ बाह्या द्रव्यसयोजन घसतावागतेन रसहेतो व्यसंयोजना अभ्यन्तरा । सयोजना विधा-पात्रकविषया, कवलविषया, मुसविषया - यथेन सह युज्यते तत्तेन सह भक्षयतीति भाय इत्यन्तर्वदनाध्या। 'बत्तीसकवलमाण रागदोसाहिं धूमगार यावच्चाइया कारणमवहिमि अइयारो ॥' कारण वेदनावयारत्यादिधो(१)ऽनिर्वहति । भोजनाभावे मा० . १७-9 सूचगाया ३५-३६ एतद्यास्या-कदिशिक्चरिमनिकापापटिश्रमणनिर्भयाख्ये पापण्डिकर्मा कम्मे । आधाकम्म । पापण्डमिश्रे खसाधुमिश्रे च । वादरप्रामृतिका विवाहुस्सकण भोसकणरूवा । सप्रत्यपायपरमा पाहतम् । यत्रात्मविराधना । लोभपिण्ड । अइर अणत तितरोऽन्तर्धाने, न तिरमतिरं मन्तधौत। निरन्तरमियर्थ । अय भावार्य अगन्तकाये प्यलिया निसित साहरिय मीसिय वा । अगतकायेण वा पिहि आदिप्रहणादनन्तापरिगितेऽनन्तछदिते च क्षमणम् । अनन्तकायाव्यवहितनिक्षिप्तपिहितसंहतोन्मिश्राऽपरिणत:- तेषु क्षमणम् । रसहेतुसयोजना रागान्वितभोजने च, वर्तमानभविष्यनिमित्त व क्षमणम् ॥ जावतिकारपकमाशि यमेद मिश्रप्रभमभेद । धानीरवम् । एतीत्वम् मीतनिमित्तम्। आजीवनापिण्ड विनापरवम् । वादरविधि -- १७-13 १७-2411 जीतकल्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या करणम् । क्रोधमानपि । सम्बन्धिसस्तवकरणम् । विद्यामानयोगचूर्णपिण्डा । प्रयाशकरण द्विविधम् । द्रव्यमातम् , मात्मभावक्रीतम् । लौरियामित्यपरावर्तने । प्रत्यपायपरप्रामाभ्याहतम् । पिहितोद्दिषपाटोद्भिो । उत्कृष्टमाला- पहृतम्। सर्वमाच्छेद्यम्। सर्वमरिसृष्टम् ।पुर कर्म । पश्चारकर्मी गर्दिते द्रव्यमक्षितम् । प्रत्येकाव्यरहितनिक्षिप्तपिहित सहतोन्गिाऽपरिणतछदिताी। प्रमाणोजनम् । सधूममकारणभोजो चेति । भवेद (अथे. b) सूत्रपदम्- कारणविवजिए त्ति-कारणवियजभो नाम भकारणे भुले, कारणे न समुद्दिसइ । एतेषु आचाम्ल धीयते । १७-13 अज्झोयर [गाहा ३९] मध्यवपूरफान्यभेदद्वयम् । कडे त्ति कृतौद्देशिकभेदचतुष्टयम् । भक- पानपतिम् । मायापिण्ड । अनन्तकायव्यवहिततिक्षिप्तपिहितादीनि । मिश्रान तकायाव्यवहिततिक्षिप्तानि चैत्येषु एकभक्कम् । तथा ओघौद्देशिकगुद्दिष्टमेदचतुष्टयम् । उपकरणपूतिकम् । चिरस्थापित प्रकटकरणम् । लोकोत्तर) परावतिकम् । लोकोत्तरअप्रामित्य च । मसमाइ परभावक्रीतम् । नि प्रत्सपायसप्रत्यपायखप्रामाभ्याहतम् । दी. द्वितम् । जघन्यमालापहतम् । उझरे पढमे ति-यावदर्थिकाध्यपूरक सूक्ष्मचिगिच्छागुणसस्तवकरणम् । - तिगमक्खिय त्ति-मिनकदमेन लपणसेटिकादिना च पृथिवीम्रक्षितम् । आउ उदल्ल। उट्ठरोद्दे परित्तो- एय निगमक्सिय । दायगो वहए त्ति-किंचिद्दायकदुष्टम् । यत उकम्- घाले मूढे मत्ते उम्मत्त वेविए य जरिए य । एए विसेसवचा एएसिं दायगो वहय ॥ १७-15 पत्तेय० [गाहा ४२] पत्तेयवणस्सइकाए सचित्तपरंपरहविए । तेण चेव पिहीए साहरिए मीसे परपतीविरात्त अणतीक्सित्ते-प्रोकपरम्परनिक्षिप्तादीत मिधान तरनिक्षिप्तसहतादीनि च । सर्वेषु पुरिमाम् । संकाए तिज दोस आसक्ह तस्सेव दोसस्स ज पायच्छित त आवजह। १७-16 इत्तरठविए० [गाहा ४३] करमानस्थ इत्वरस्थापितम् । सूक्ष्मप्रामृतिका सनिग्धसरजस्कम्रक्षितम् । पृथ्नीअपवनस्पतिम्रक्षितम् । पृयिव्यादिषु मिश्रेषु परम्परीक्षिप्ते ०। वनस्पतिमिग्रे परम्परनिक्षिप्ते निः। प्रत्येकयीजेध्यनन्तकायबीजेपु वानन्तरपरम्परीक्षिप्ते । एवमेतेपु स्थापितेऽपि देये नि० । अविगई-निर्विकृतिकम् । उवियगाईसु त्ति-आदिग्रहणान्मिश्रपरम्परपिहिते नि० । एव सहृतेऽपि । परित्तवणस्सइओमीसे नि० । वीउम्मीसे नि०। १७-19 अतिप्पमाणे वत्ति-तेष्वेवातृप्यमानखदेवातिमान पुश्तया कुर्वन् । १७-20. सघरिसेण-होइया । १७-21 जमलिओ-जमलतया स्थित । १७-22 बट्टा गोलया । समास त्ति समस्या । १७-24 अरहादिसरक भाजीवे रुतेऽपि क्रियमाणे रामण । [गाथा ४६] अन्यचोच्यते-जिणकप्पिया धेरकप्पिया य दुविहा साहुणो। ओहीय-ओवग्गहीय-भैया दुहा उवही । तत्थ- मोहेण जस्स गण भोगो पुण कारणा स ओहोही (ओघोपधि )। जस्स य दुगपि नियमा कारणो सो उपग्गहिओ। -जिणकप्पिया उपध्यपेक्षया । अष्टविधोपधय निय त्ति चउक पणग नव दस एकारसेव वारसग । एए अट्ट विअप्पा उवहिमि उ हानि जिणकप्पे ॥ रयहरण मुहपोत्ती दुविहो कप्पेकजुत्त तिविहो उ हरयहरण मुहषोत्ती दुकप्म एसो चउरा भो ॥ तिमेव य पच्छागा रयहरण चेव होइ मुहपोत्ती । पाणिपडिग्गहियाण एसो उवहीओ पचविहो । पत्तगधारीण पुण तवाइमेया हवति नायबा । पुव्युत्तोवहिजोगा जिणाण जा वारसुकोसो। पत्त पत्तायधो पायढवण च पायकेसरिया। पडलाइ रयत्ताण च गोच्छओ पायनिजोगो॥ निक्षेप य पच्छागा रयहरण चेव होइ मुहपत्ती । एसो उ दुवालयविहो उवही जिणकप्पियाण तु ॥ एए चेव दुवालस मत्तय भइरेगचोलपटो य । एसो उ चउड्सविहो उवही पुण परकम्पनि ॥ उकोसो अहविहो मरिझममो होइ तेरराविहो य । जहशो चउन्विहो चिय अनाग एस विविहुवही ।। कपत्तिय पडिग्गहगो भाभितर माहिरा नियसगिया । संघाडी सधकरणी उदोस्रो एस अट्टविहो । जी. क.चु० - - - -गडी, कच्छवी, मुट्ठी ५० श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [१८-9..१७ मध्यमस्रयोदशविधा- पत्तावधो पडला रयहरण मतकमढ रयताण । उग्गहपोरुचलणिया ओकच्छि कचु वेकच्छी ॥ गोच्छगपत्तद्वयण मुहणतगकेसरि जहन्नो । जघन्योपग्रहिका स्थविराणा एसो। तत्य पीढग ति काठच्छगणमय पीठ निसेज पाउछण । दडगा-पमजणी दहापुछणी । । पात्रधर्षणोपला (वर्षाष्टिसु त्राणाय रक्षणाय । बाल त्ति कम्बल । सूनमयम् । सूई-तालपत्रसून्यादिछ कुडसीसग पलासपत्रमय खुम्पकम् । पत्रक वशमयम् । सेसतिग बालसोत्रिकादन्यत् । वासत्ताणे । वर्षाकालोपयोगिसस्तारो अझुसिरो काष्ठफलकादि । झुसिरस्तृणादिमय । डडेत्यादि-तत्य लट्ठी आयपमाणा, विलट्ठी चउरंगुरेण परिहीणा । दण्डो बाहुपमाणो, विदण्डमो करसमेत्तो छ ! सिरसो उवरि चउरहुलदीहा नालिया। अवलेहणी बटादिकाष्ठमयी पादलेहणी-'वडउबरे पिलपथ अलाममि चिंचिणीया।' चर्मनिकम् । अत्थुर त्ति भूमावास्तीर्यवे अम्यादिभये प्रलयादिविकरणाय च । पाउन पदापदि]कादिभये यत् प्रावियते । तलिगा उपानह । यद्वा कृत्ति तलिगा यना (वधा b) यद्वा विहारे । णस्य शरीरेण सह बन्धनार्थ पट्ट । पल्हत्थी योगपट । मध्यम औपग्रहिक । वारगो ति-ससागारिक गनिमित्त, नित्य जनमध्य एव तासा वासात् । उत्कृष्टीपहिरूस्तूच्यते-- अक्खा० गाहा [ १८-5 ]-सथारको द्विविध -एकाङ्गस्तिनिसकाष्ठपहरूप , तदितर कम्ति मय । उत्सर्गपदापेक्षया द्वितीयपदमपवादसूत्रोत्कृष्टौपप्रहिक कथ्यते । पुस्तकपञ्चक डफलए तहा छिवाडीय त्ति' एतत्स्वयमने कथयिष्यते । फलग ति पत्रिका, समयसरणफलक वा निजोदरमान तत् प्रतिसयतिनीनाम् , अन्यथा एकभाजनभोजने गुरुकवलोत्पाटने एकया अन्यस्या अपीतिसभव १८-9. ओग्गहणंतर्ग-तौ सदृशम् । पस्तद्वन्धनम् । १८-11 साहूण ओहिओ त्ति-महपोत्तीयमायकेसरियाइओ चउरो ते चेव त्ति । पडिग्गही दनत्रयम् । अन्ने यत्ति-अभितर नियसणी १, वाहिनि० २, सघाडी ३, राधकरणी ४, पत्तावधी, रयत्ताण, रयहरण च ४, जपन्यमध्यमोत्कृष्टभेदत प्रागुकत्रिविधोपधिर्मध्याजधन्यविच्युतलब्धत्वे नि० । म विच्युतलब्धत्वे पु० । उत्कृष्टस्य विच्युतलब्धत्ये ए० । जघन्याप्रत्युपेक्षितत्वे नि० । एव मध्यमाप्रत्यु उत्कृष्टाप्रत्यु० ए० । न पडिलेहिओ त्तिनिवेदयितु गुरुभ्यो विस्मृतत्व जपन्यस नि० । मज्झिमे उत्कृष्टस्य ए० । प्रकारप्रयेण सर्वस्योपधे सपनरवे आ० । १८-21 हारिय० [गाहा ४७] हारितत्वे जघन्यस्य ए० । मध्यमस्य हारितत्वे आ। हारितत्वे समणम् । जघन्यधौतरवे ए० मध्यधौतपे माय धोतले । उपधेर्जघन्यादिभेद को न निवेदयते तनापि ए० । मा० । १० । भाचार्यरदत्त परिभो । त्रिविधमुपधि आचार्यानुश चिना पदाति । एमा० । २० । सधंमि छह तु त्ति-जघन्यादिभेदतनिविधस्स हारणे पत्रप्रक्षालनादौ पष्ठ स्यात् । १८---30 मुहर्णतय० [गाहा ४८ ] एवं तावेत्यादि । तिविदोयहिणो विभु(घ)येत्यादि [गाहा रजोहरणमुसवलिको विहाय अन्योपधौ दृष्टव्यम् । अमपात भया । सन मुहपोत्तिगाए पनि पदाए य शिविय । एव रयहरणे वियदि नातियमा पनि लन्ध तनाह अह पुणेत्या मपरं नासियं परचमादिसम्पावेन । हारियं भालसावि प्रमादेन । १८-31 काल० [गाहा ४२] पारिहापणिय अविहीप त्ति-33 स्थन्दिलायशुद्धया । १८--34 पिकालपेलाया पानकाहारस्याप्रसास्यात्वे भोजनोईमत्सर्गतभधाहारस्यापि प्राय गुरुम् । तदकरणे-अत एष साधवसिविधाहार साप्यायकरणसमय तृतीयपोरया समये प्रत्याख्या विधायवेलायर्या च पाराहारमिति । १९-1 पयं चिय० [गाहा ५१] द्वादशापिघतपो यथा--- मानगुनौदरिसा, पो संक्षेपण रसलाग । फायशः सलीनवेति माम सपा प्रोकम् ॥ .... द्वेऽपि -- १९-10 २०-7] जीवकम्पनि-विषमपध्यापया प्रायविप्यारे बामनियारपोप्दा पEETTEArth मासाई यस सा पदमा विलय Antants इद प्रतिमानिरिपपेशाने पिपरीत fry पोन mein प्रध्यामिमहेषु च पोनिधारमामविस्तां । पाक्षिके, पुifelmma raRI ITE र भिक्षु उपाप्पाप धापार्यभेदत पचपातारी मे। १९-~10 फिडिए० (गाहा ५२ मिनासो गुम परम फिदिमोम सयया उस्सारेर गुणा रायो समाज पारा ! अर्नमा बिना पानी। १९-15 अकए० गादा ५३]पय पाइपसु पिसिन तो नि० पु.। एक किरणे भाषामा सो पोसिरहORT! १९-17 कोहे (गादा ५४] सगि चिEL, ITRA हि माया, प्रग्दाद मयूरादिपद । १९--22 अन्यूसिर० [गादा ५५] प्रापेक्षित भए त गया आधुपानिरीक्षितम् । फोयविस्तारत पट. पुरमोहात पदुध्यो । पापारगो सम्मान पूरी-मल्हयी हस्ताबरणम् । दरगानिर्धातपोनि । दुगा धी परी, पडी मार पिरासी मोति भगइ । गोवहाणी गा मारिका । पुरानपके सी साम्-~ पाई गहापौरपो उभागो हो। कवि नवे तमो, गये पियो शोपमो। ३ । चरपरदादो पा, महासमुद्विगो भदा। पउरगुलमोदो सिप, पो हो पियो।। तपुरसखियहयो हो विरादी य पोरया नाग। हो याहस्मो (लो) का जो पिलो होर मयामो। त मुनियममपारा गिडि पोभी गायीह ।। संपुटगो दुगमाई फलगा। अपरमपि-चर्मपथक यथा लिगामहग पम्मे (पये) पोसग कत्तीय पीपतु । रालिमा-उगमत, परम वध्र , कोसगो-दोपार चर्म, कृति प्रलम्बहरणाय । १९-~32 ठण. [गाहा ५६] सनी--अश्रित भार । पीयायाराविमारी जियोरगूपाम् । १९---35 सुयबरहापासु अन्नद रिमायानिमम देव दीयठे इति विशेष बाराय देशनिति भाव । अनमायामोति--"शवितो महाभोगो, एस साह सिदिक्षो। सपाग करेइ ति भारति वादए " इत्यात्मनि व्यापयति । २०-3 दप्पेण० [गाहा ५७ ] यतान-दारनम् । सष्टयप्पयाग पावाम् । स हमाम् । मवानापोटन च दप । इतो कदाचित्स्यन्द्रियसबारोपण-विधान त म्यार! २०-4 माहादान-मेहून तस परिमर्दनेन शुकपुरलार्यासन-निष्काशन इत्यरसंहिरोपई । मादि- प्रहारिस हादिना प्रक्षणादि करोति । दीप्वनि यरसेवनम् । श्राधाकर्म, अपानकापादक या गुम्ककदलीफलादिधरणत । दोषंग्लानेन था पता सदाचारमवादि- धारणत । समिथिसेवन वाचरितम् । वोवेषु परयाणमिति वश्यमाणगाधान्तोष शेयं योग्यम् । २०-7 पुरिमाता-भिशापान तक न प्रतिलेखयति । चरिमभागोनायां पीर यां प्रथमायो पानाहर इलय । यद्वा चरिमपारण्यामुपोपित कदित् । ततोऽसौ तस्यां पार न पडिलेहेद । तत्र स्थान प्राधित नेयम् । चातुमासे सांवत्सरिक च शुद्धी पथकल्यापक क्षेपम् । यस्सासूक्ष्माविचारान वानुन मानातिन सरति कमिलाह-जहा पाउसे इत्यादि ।
। । ५० aanaam + -तत्य . श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [१८-9. १९-1 मध्यमस्रयोदशविध.- पत्तायधो पडला रयहरण मत्तक्मठ रयताण । उग्गहपहोचलगिया मोकाच्छि कनु वेकच्छी ॥ गोच्छगपत्तद्ववण मुहणतगफैसरि जहनो । जघन्योपग्रहिका स्थविराणां एसो। सत्य पीढग ति काष्टच्छगणमय पीठं निसेज पावरण | दडगा-पमजणी दंडापुंरगी । घटगा पात्रधर्षणोपला वर्षावृष्टिस प्राणाय रक्षणाय । पाल त्ति कम्पल । सूनमयम् । सूई-तालपत्रसूच्यादिपर फुडसीसग पलासपनमय गुम्पकम् । पनक पशमयम् । सेसतिग बालसौनियादन्यत् । घासत्ताणे ति- पर्षाकालोपयोगिसंस्तारो अझुसिरो काष्ठफलादि । झुसिरस्तृणादिमय । डंडेत्यादि- लट्टी भायपमाणा, विलट्ठी चरगुरेण परिहीणा । दण्डो याहुपमाणो, विदण्डमो काखमेत्तो उ ।। सिरसो उपरि चउरमुलदीहा नालिया। अवलेहणी घटारियाष्ठमयी पादलेणी-'वटउबरे पिलखू तस्य भलाममि चिंचिणीया।' चर्गत्रिकम् । अत्युर ति भूमापातीयते अध्यादिभये प्रलयादिविकरणाय च । पाउर ति पद[पदि] गरिभये यत् प्राप्रियते । तलिगा पानह । यद्वा कृत्ति तलिगा यांना (पना b) यद्वा विहारे उपकर णस्य शरीरेण सह यन्धनार्थ पE । पल्हत्थी योगपE । मध्यम औपाहिक । वारगो त्ति-सागारिके उद गनिमित्त, नित्य जामध्य एव वासो पासात् । उत्कृष्टोपाहिकस्तूच्यते- अफ्खा० गाहा [ १८-5 ]-यारको द्विविध - एकास्तिनिसकाष्ठपररूप , तदितर पम्पिकादि गय । उत्सर्गपदापेक्षया द्वितीयपदमपवादसूमोत्कृष्टीपप्रहिक कथ्यते । पुस्तकपञ्चक-'गडी, कच्च्वी, मुट्ठी, सपु उफलए तहा छिवाडीय ति'-एतत्स्वयमने कथयिष्यते । फलग ति पत्रिका, समवसरणफलक वा । कमढग निजोदरमान तत् प्रतिसयतिनीनाम् , अन्यथा एकभाजनभोगने गुरुकवलोत्पाटने एफया मन्यस्या अप्रीतिसंभवः स्यात् । १८-9 ओग्गहणतगं-ती सदृशम् । पटखद्वन्धनम् । १८-11 साहूण ओहिमो त्ति-मुहपोत्तीयपायकेसरियाइओ चउरो ते चेव ति। पडिग्गहो प्रच्या दनत्रयम् । अन्ने य त्ति-अगितर नियसणी १, याहिती० २, सपाडी ३, राधकरणी ४, पत्तायघो, पहला, रयताण, रयहरण च ४, जघन्यमध्यमोटष्टभेदत प्रागुतनिविधोपधिर्मध्याजघन्यविच्युतलब्धत्वे नि० । मध्यमस विच्युतलब्धत्वे पु० । उत्कृष्टस्स विच्युतलब्धत्वे ए० । जघन्याप्रत्युपेक्षितत्वे नि० । एव मध्यमाप्रत्यु. ४० उत्कृष्टाप्रत्यु० ए० । न पडिलेहिओ त्ति-निवेदयितु गुरुभ्यो विस्मृतत्वे जघन्यस्य पी० । मनिझमे पु० । उत्कृष्टस्य ए० । प्रकारनयेण सवस्योपधे संपनत्वे आ० । १८-21. हारिय० [गाहा ४७] हारितरवे गधन्यस्य ए० । मध्यमस्स हारितत्वे मा० । उल्टस हारितत्वे समणम् । जघन्यधौतरवे ए० । मध्यधौतत्व माधौतउपपेर्जघन्यादिभेदस्योद्गम कर्तुं न निवेदयते तत्रापि ए० । मा० । च० आचार्यरदत्त परिभक्त निविषमुपधि आचार्या पुज्ञ विनाप्यन्यसै पदाति । ए० । मा० । च० । सधमि छ? तु त्ति-जघन्यादिभेदतधिविधस्स हारणे मनप्रक्षालनादौ पाठ स्यात् । १८-~-30 मुहणंतय० [गाहा ४८] एवं तावेत्यादि । तिथिहोयहिणो विभु(घ)येत्यादि [गाहा ४६] रजोहरणमुरावनिका विहाय अन्योपधौ द्रष्टव्यम् । अम्रप्रति अमया उला तत्र मुहपौत्तियाए पडिया लद्धाए य तिम्चिय । एव रयहरणे नि । यदि पुनातयमा पनि तह-अह पुणेत्यादि । मपरं नासिय परचमादिसम्पातेन । हारियं भालस्यादिना प्रमादेन । १८-31 फाल० [गाहा ४९] पारिट्ठावणियं अविहीए ति-33 स्थन्दिलाघशुदया। १८--34 विकालपेलायां पानकाहारस्याप्रत्यास्यानत्वे भोजनाईमुत्सर्गतचतुर्विधाहारस्यापि प्रत्याख्यान युतम् । तदकरणे-शत एष साधवसिविधाहार खाध्यायकरणसमये गुतीयपौरुप्या समये प्रत्याध्याक्ति । विकालवेलायां च पानकाहारमिति । १९-1 एयं चिय०[गाहा ५१] द्वादशपिधतपो यथा- अनशनमूगोदरिता, पत्ते सक्षेपण रसत्याग । कायक्लेशः संलीनवेति पाय तपः प्रोफम् ॥ • द्वेऽपि काले .
। १९-10 २०-7] जीतफल्पचूर्णि-विपगपदव्याख्या प्रायश्चित्तध्याने वैयारत्त्य विनयावथोत्सग । खाध्याय इति तप परप्रकारमाभ्य तरं भवति ।। मासाइ सत्त ता पढमा बिइतइयसत्तराइदिणा । अह राइ एगराई, भिक्खू पडिमाण वारसग ॥ इह प्रतिमादिविपयेऽश्रद्धाने विपरीतप्ररूपणाया वा प्रायश्चित्त ज्ञेयम् । एतेन तपोतिचारप्रायश्चित्तसूच द्रव्याद्यमिग्रहेषु च वीर्यातिचारप्रायश्चित्तसूचन क्षेयम् । पाक्षिफे पुरुषादिविभागतो ज्ञातव्यम् । पुरुषा क्षुल्लक स्थविर भिक्षु उपाध्याय आचायभेदत पञ्चधास्तान् प्रति सूर्णिकृता दशिनमेव । १९-10 फिडिए० [गाहा ५२] निद्राप्रमादवशतो गुरुभि सह प्रतिक्रमणे फिडिओत्ति न मिलित सय वा उस्सारेइ गुरुणा अपारित कायोत्सर्ग स्वयमात्मैव पारयति । अपूर्णे वा चिन्तनीयतया तराले पारयति । १९-15 अकए० [गाहा ५३] एव घदणाइएसु पित्ति-एकद्विनिसर्वा अदानतो वन्दनेषु यथाक्रम नि० । पु० । ए० । सर्वाकरणे आयाम । राओ चोसिरइ ति निसिसज्ञोत्सर्ग कुरुते । १९-17 कोहे० [गाहा ५४] सगि त्ति-सकृत् , एकदा । तन्नगाइ चि तनको वत्सक, आदि- शब्दात् मयूरादिप्रह। १९-22 अज्झुसिर० [गाहा ५५] दु प्रत्युपेक्षित चक्षुषा सम्यगनवलोकनम् । अप्रत्युपेक्षित सर्वथा चक्षुपाऽनिरीक्षितम् । कोयवि-रूतपूरित पट पुरओट्ठीति यदुच्यते । पावारगो बृहत्कम्बल परियच्छिा पूरी-पल्हवी हस्त्यास्तरणम् । दढगालिधौतपोति । दुसर सूनी पटी, दोयडी यावत् । विराली नवओ जीणोति भनइ । गडोषहाणी गल्लमसूरिका । पुस्तक्पचके गडी पुस्तकखरूपम्- वाहलपुत्तेहिं गडीपोत्यो उ तुल्लगो दीहो । १। फच्छवि अते तणुओ, मझे पिहुलो मुणेयव्वो । २ । चउरंगुलदीहो वा, वागी मुट्टिपुत्यगो अहवा। चउरेगुलदीहो चिय, चउरसो होइ विओ। ३ । सणुपत्तूसियख्यो होइ छिवाडी य पोत्यगा नाम । दीहो वाहुस्सो (लो) वा जो पिहलो होइ अप्पवाहुछो । त मुमियसमयसारा छिवाडि पोत्थी भणतीह । ४ । सपुडगो दुगमाई फलगा । ५। अपरमपि-चर्मपञ्चक यथा-तलिगा खल्लग वन्मे (वद्ध) कोसग फत्ती य चीयतु । सलिगा-उपान, वम्भ -वध्र , कोसगो-लेहोधारे चर्म, कृत्ति प्रलम्बकरणाय । १९-32 ठवण [गाहा ५६] सन्नी-अविरत श्राद्ध । वीयाचाराविचारो निजवीर्यगृहनम् । १९-35 सुयववहाराइतु अन्नह त्ति-मायानिष्पन तदेव दीयते इति विशेष । भासणद्वय देयमिति भाव । अन्नमायाओ त्ति-"लहवित्ती महाभोगो, एस साहू जिइदिओ। रसच्चाग करेइ ति, अंतपतेहिं पाढए ।" इत्यात्मनि व्यापयति । २०-3 दप्पेण [गाहा ५७ ] वलान-उल्ललनम् । सडयप्पयाण धावणम् । खडावरंढाईण फडणम् । मालवद्वाहास्फोटन च दप । त कुर्वतो कदाचित्पञ्चेन्द्रियस्थ व्य]परोपण-विधात कृत स्यात् । २०-4 अजादान-मेहन तस्य परिमर्दनेन शुक्रपुद्गलनिर्घातन-निष्काशन इत्येतत्सक्लिष्टकर्मोच्यते । आदि- प्रहणाहिलस नेहादिना] म्रक्षणादि करोति । दीर्घावनि यत्सेवनम् । माधाकर्म, अचानकल्पादिक वा शुक्कदलीफलादिधरणत । दीर्घग्लानेन वा सता यदाधाकर्मरसादि- कारणत । सतिषिसेवन वाचरितम् । तनैतेषु पञ्चकल्याणकमिति वक्ष्यमाणगाधान्तोक ज्ञेय योज्यम् । २०-7 पुरिमत्ता-भिक्षापान तत्काले न प्रतिलेखयति । चरिममागोनायो पौरुभ्या प्रथमायां पादौनग्रहरे इत्यथ । यद्वा चरिमपौरुष्यामुपोषित कश्चित् । ततोऽसौ तस्यां पार न पडिरे हेइ । तन कल्याणक प्रायश्चित्त शेयम् । चातुर्मासे सांवत्सरिके च युद्धौ पञ्चकल्याणक ज्ञेयम् । यस्मात्सूक्ष्मातिचारान् कृतान न जानाति न च सरति । कंपमित्याह-जहा पाउसे इत्यादि।
. ५२ श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [२०-12. २३-1 २०-12 छेयाइ० [गाहा ५९] कि घा छिजइ त्ति-भो भो जना निरीक्षत निरीक्षत । छिद्यते न छिद्यते चेति भयति अश्रद्धानपर । मिउणो त्ति-मृदोनिरभिमानस्य । अभिमानाभाव दर्शयति-जो इत्यादिना । छेदाऽश्रद्धानपरस्य मृदो , पर्यायगर्षितस्य च इत्येतेषाम् । -18 दुसुण्ठा -उल्लण्ठा खिशा । इह शिष्या अनेक विधा भवन्ति-परिणामगा, अपरिणामगा, भइपरिणा मगा। तत्थ उस्सग्गे उस्सग्ग, अववाए अववाय, जहा भणिय सद्दहता आयरता य परिणामगा भण्णन्ति । भपरिणामगा पुण जे उस्सरगमेव सद्दहति आयरति य, अयवाय पुण न सद्दहति नायरति य । अइपरिणामगा जे भववायमेवा यति, तम्मि चेव सजति न उस्सग्गे । अतो अपरिणामकानो उत्सर्गदृष्टी मा निन्द्यो भविष्यति । चशब्दसूचित कुलगणसवाधिपानामपि छेद्यापनाना जीवेन तप एव दीयते न छेदादय । २०-19 जं जं० [गाहा ६०] अत्थपय ति-अर्थ सूनन्यायान भाष्यचूर्णिनियुस्यादिकम् । आज्ञामादिदोपत प्रायश्चित्तापत्ति सविस्तरा तपस उता। २१-5 दध सित्तं० [गाहा ६४] माहाराई दब सेत्त लक्साइ काल गिम्हाई । हट्ठाई भाव ती पुरिस गीयाइ जाणित्ता ॥ भाउहि-पमाय-दप्प-वप्परुवा चउव्यिहा पटिसेरणा नायव्या। साहारणेपु द्रव्यादिपु साधारण भणिय राम देजा। २१--13 लुक्खं० [गाहा ६६] वायं ति-वातलम् । अनुपक्षेन सजलक्षेत्रम् । एवं कालेवि तिविहे त्ति-वर्षाहेमन्तप्रीष्मरूप काल सामान्येन निग्धलक्षच भवति । तत्र निग्ध-शीत , रूक्ष -उष्णः। भय स्निग्धो- ऽप्युत्कृष्टमध्यमजघन्यभेदानिधा, सक्षोऽपि च विधा । तत्र उत्कृष्टन्निग्धोऽतिशीत , मध्यमस्निग्धो गतिशीत , जघन्यशीत स्तोक्शीत । जघन्यरूक्ष किंचिदुष्ण , [ मध्यमरूक्षो नात्युष्ण , ] उत्कृष्टरूक्षोऽत्युष्ण । एव च गिम्हामु चउत्थ देजा छ8 च हिमागमे । वासासु अट्ठम देजा तवो एस जहनओ ॥ गिम्हासु छ? देज्जा भट्ठम च हिमागमे । वासासु दसम देजा एस मन्दिामओ तवो ॥ गिम्हासु भट्ठम देला दसम च हिमागमे । यासासु दुवालसम एस उकोसओ तयो । एस नवविहो ववहारो। २१-21 सोय इमो त्ति सुययवहारो। आपत्ति प्रायश्चित्तयोग्यता विषया । तपराा द्वादशादिशा, कारेण वर्षादिना । अहागुरू-गुरुतम इत्यर्थे । अहालह-लघुतम । २१-28 अहाणुपुधीए-इत्यस्य व्यारयेयम्-सुत्ताणुसारेणेति । २१-29 चठमासगहणेण लहु चउमासो विदढयो। 30 छम्मासो छम्मासग्रहणात् रघुपण्मासोऽपि ज्ञेय । प्रतिपत्ति आपत्ति । 31 तीसा य ति-स्थूलतया उत्तम्, अन्यथा साघसप्तविंशतिवैक्तमुचिता । 33 प्रागुद्दिष्टानि गुरुकादी व्याचष्टे गुरुग चेयादिना । २२-2 एतदशा मिथ्यादुष्कृतेन शुध्यति । अत एवोकम्-सुद्धोय ति। २२-4 सामान्य एव श्रुतव्यवहार उक्तो विस्तरेणाधुना प्राह -तिगनवेत्यादिना। २२–१ गुरुपक्पोउकोसोत्ति -यथा गुरुपदादिवाच्य गुरु[ ] गुरुतरो गुरुतम । एव(स)लटुगे वि- उत्कृष्टादिभेदत्रयम्-उयोस-उकोसे, उस-मज्झिमो, उकस-जहनोति] उष्टे भेदत्रयम् । मध्यमेऽपि भेद प्रयम्-उफोसो, मन्दिाम जहण्णो त्ति । जहाकोसे, जहन मज्झ, पहन जहन इति जपन्ये भेदत्रयम् । २२-25 एमेवुकोसाइ त्ति-लघुतरमध्यमपञ्चविंशती उपविधापत्तिदानपञ्चमहीवेशिताया धम- छह चढत्य-उकोसा देय तिह मिन । मध्यमे उस्टम्, मध्यममध्यमम्, मध्यमजघन्यमिति योज्यम् । वृत्तीय नयालहुरा सत्कसप्तमगृहीवेशितपचदशा गोचरपली अहम छट-चरत्य-योज्यम् । रहसतरमध्यगदशके अष्टमरह निवेशिते । २ । मा. 1 यया लघुसनपन्यपचासत्के नवग्रह 1 30 १, मा० १, एरागणायामेकासणे ति 33 गायोक योज्यम् । सप्तविंशतिभेदेषु वसु पानमुक्तम् । २३-1. अधुना शीतकालाधित दामाह-सिसिर इत्यादिना। दसम उपवासचतुष्टयम् । भादा धृत्वा । .
२३-2 २४-14] जीवात्पचूर्णि-विपमपदव्याख्या २३-2 अहोगातीय तह चेपत्ति-समास्यागमविगागरूपस्य एक्सस्य या एकादिपदारमकस्य-अप- नमगवस्थाम् । शेपस मुख्यादिपदराशातरूपसक्देशस्योध्य गमा यस्यां रायो सा समयपरिभापमापीपमा तिच्यते । यथा सिसिरे जपन्यत पाम् , मध्यमतोऽटमम् , उस्तो दशमम् । २।३ । ४ । एषां मध्यादेक. देश पटरक्षणोऽामामति भपतिष्ठते । अष्टम-दशमे ऊर्भ ययासु गच्छत । सूचीय तु अप्रेताद्विादश मील्यते । ततप जघन्यतोऽटमम् , मध्यमस्तु दागम् , उरष्टस्तु द्वादा तपो वर्षामु पुति । २३-3 अट्टममार गिम्हे इलादि-भटम उपवासत्रयगादी प्रत्वा ट्विीय पर्यते यया-उपुस पथकरके यमरहे । सयासय ति साया सदा भैया आपत्तय । भसहोरेय हासस्थावस्कार्य यावत् स्थितमेकैकम् । उ० । आ• ए.नि.। २३-8 परहाण देजत्ति-आपाकमायासेवाप्राप्तम् । इह नवविधातव्यपदारे वर्षा-शिशिर-प्रीष्णरूप. कालतया सप्तविंशतिभेदेषु आपतिदान दर्शितम् । अर्धापकातिरपि तथा पारया । २३-14 फालं या सहेज त्ति-प्रतीक्षेत । २३-16 अणहीयसीसीहो अग्गीयत्यो । इतरो गीतार्य । २३-21 धिइ तितोऽपष्टग । संहारा यसरमनाराचादि। धीईए संघयण य सपनो परमो, न पिई 7 सपयण य मास , मध्यपति द्वसम्न्या न संहाोन, नहसो(त्या)सहाोन राम्पण इति द्वयमतो वाच्यम्। २३-25 विकल्पपयकमपि व्याचष्टे आयतरगो इसादिना-जो ज तपोकम्म आढवेद तमित्यरहरा भायतरग । दोऽपि धैयारत्ये सप एस फरोति 7 येयायत्यम् इत्सायतरग । परतरमपस्यपि शक परं न करोति, किन्तु वैयारत्यीय विधत्त । पचमभव्यायामाह--अशतरतरग(27)इत्यादिना । २३-30 फल्पस्थितादय सर्वेऽटो ८ । फल्पोऽवस्थितसमाचार । सन स्थितास्वत्परिपालनोद्यता । २३-33 फयरे ते दशभेदा -इमे पक्समाणा-(१)अविद्यमान चेल वस्र यस्यासावचेलकवद्भाव भाचेल्पयम् । सचेलवेऽप्यचेतव्यपदेश । दृश्यते च विवक्षितवस्त्राभावे राचेलस्वेप्यचेलव्यवहार । यदाह- 'जल(ह)जलमवगाहतो बहुचेलो वि सिरिवेढियकडिटो । भन्नइ नरो अचेलो तह मुणओ संतचेलावि ॥ तह थोषजनयुच्छियचेलेहिं नि भनए अचेलो ति । अह तर सालिय लहु देयो त्ति नम्गि यामो ति॥' (२)उद्देसेन साधुसफल्पेन निवृत्तमौदेशिक भाषाकर्म। (३४) सय्यया पयल्या तरति ससारसागरमिति पाप्यातर । स च राजा नृपश्चवादिस्तयो पिण्ड समुदानमिति शय्यातरराजपिण्ड । (५) तिकर्म वन्दनकम् । (६) तथा प्रतानि महामतानि । (७) ज्येठो रसाधिक । (८) प्रतिक्रमण भावश्यककरणम् । (९) मास मास- कल्प । (१०) परि-सर्वथा वसनमेकत्रनिवास स निरुतविधिना पर्युषणम् । इति दशविध कल्पो भेद । तमि ठिया पप्पढ़िया-दशविधकरपे स्थिता इत्यर्थ । अनच प्रथमचरमजिनसाधवो दशखपि स्थिता एव । द्वाविंश- तिमध्यमजिनसाधवो विदेहजाश्च दशकमध्यात् शय्यातरपिण्डचातुर्यामपुरुपज्येष्ठव दनकरणास्यचतुर्पु स्थिता , पदसु चास्थिता । यथा आलस्यौदेशिकप्रतिक्रमणराजपिण्डमासपर्युषणाकल्पे च वर्षाकालसमाचारा मध्यमजिना २२ विदेहजाचास्थिता , सततसेवनीयतया । दशाना मध्यात् कानिचित् स्थानानि कदाचिदेव पालयन्तीत्य- नियतव्यवस्थाम्वभावाग्ले, अतो मध्यमजिनसाधवो महाविदेहजाश्चाकल्पस्थिता । यतोऽनवस्थितसमाचारोऽकल्पो. ऽमिधीयते। २४-4 जोगवियसरीर ति~परिकर्मितदेहा । २४-11 बहुतरया भिक्खुणो त्ति-वह्व पहुभेदा इति भाव । अन आचार्यकृतकरणादि पुरुष- विभागेन श्रुतव्यवहारतो जीतकरपयन विटेरयम्। 'एय मज्झ गहियति अनया गाधया यन्त्रकमध्यवर्ति पचम- पक्तिपोगृहीतपचमपकावेवास्या गाथाया अर्थो पिततीत्यर्थ । २४-14 तिरियायए-तिर्यग्दीर्घाणि प्रयोदशगृहाणि कृत्वा अहो एग घरय च-वामपार्थे एक पतिमि सर्थ । अहो एफेकघरयडीए वामपार्थत सव्वाईए निरवेक्ख जिनकल्पिक विनस्येत् । द्वितीयपत्रपरि । - श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता [२५-11. २७- आचार्य कृतकरण । तृतीयपतरुपरि भाचार्योऽकृतकरण । चतुयी उपाध्याय तिकरण । पधम्या उपाध्यायो ऽकृतकरण [पन्या गीतार्थ स्थिरकतकरण] भिक्षु । सप्तम्या गीतार्थस्थिराकृतारणमिभु । भटम्या गीताथा स्थिरकृतकरणभिक्षु [नवम्या गीतास्थिराकृतकरणभिक्षु । दशम्या संगीतार्थस्थिरकृतकरणभिक्षु । एकादश्या गीतार्थस्थिराकृत करणभिक्षु । द्वादश्या अगीतार्थास्थिरकृतकरणभिक्षु ] प्रयोदश्या अगीतार्धास्थिराहतकरण भिक्षु । एव स्थापितदाहिणहियपणुवीसइ सरूव भिनमास निव्वीयसनियामओ, वामपाश्ववर्ति अट्टममत्त तत्य छग्गुरु सनिय जीतदाण नेय । पचमपतीए । २५-11. तहिं चेव अवराहे त्ति कोऽर्थ ? तदेवापराधमाश्रित्येसर्थ । पुरुषा-आचार्योपाध्यायप भभिक्षालम्भेदत पथविधास्तानाधित्येति भाव । २५-25 खित्तं छिन्नमडवं ति-अलाइयजोयणभ्यन्तरे जत्य वसिम अन्न नत्थित छिरमडम्ब । सर्वतोऽ मासनसभिवेशान्तरं मध्यमित्यन्ये । ओमं परिपूर्ण यत्र भकादि न लभ्यते । दुर्भिक्षं यत्र सर्वथा न लभ्यते । २५--27 तमणंतर ति निक्टवति । २५-36 आलोचनाकाले जयागूहइत्ति-सर्वथैव न प्रकाशयति पलिउंचावत्ति-अर्धकधित करोति । २६-1 बहुगुणेसु त्ति-समर्थेषु । गुरुसेवा-अशुभ प्रति प्रधानसेवा । २६-8 छेदाह प्रोच्यते--तवगधिउ० गाहा । [८०] २६-11 अइपरिणामगो-अपवादरुचि । २६-12 उत्कृष्ट तपोभूमि समईओ त्ति-अधिकतपोदानयोग्यो जात । सवि (साव० ) शेष च यस चरण तस्यातिचारदषितव्रतपर्यायस्य च्छेद क्रियते। २६-23 आफुटिरुपेत्यकरणम् , तया पधेन्द्रियवध कृत । दर्पण मैथुनसेवन च । सतीवादमस्या नाशयामीति युद्धपा स्त्रीसेवनायाम् । मृपावादे फूटसाक्षित्वादिदानत । भदते विधानाद्यपहरति । सचित्ताचित्तगोवरे परिग्गह च गृझाति। २६-27 मूलगुणान् द्विनादिभेदेन बहुविधान बहुशो अनेकश शोधयति । सर्वशकादीन करोति । इति दर्शनवमक । २६-32 गृहस्थलिंग-कच्छायन्धन तालकट्टशिरसि विधानादि कौतुकेन फुरते । अन्यतीर्थिका दयस्तेषां लिङ्ग तक्षेपकरण नटादिपकरणत । स्त्रीणां गर्भसाधान शाटनं च औपधादिकरणतो मूलकरण तोऽमी (२) २६-34 विहियतवे त्ति-विहित दत्त गुरुणा तपो यस्य सविहिततपास्तदूर्ध्व छेदमूलानवस्थाप्य पाराश्चिकानि प्राप्तस्यापि भिक्षोर्मूलमेवेत्यर्थ । तथा आचार्योपाध्याययो पाराधिकासावप्यनवस्थाप्यमेव भवति । -शाक्यतापसा- यदुक्त भाष्ये- - 'इत्य यजह नवदसमे भावनस्सावि भिक्खुणो मूल । दिजइ तहाभिसेगे पर पय होइ नवम तु ॥' २७-5 अनवस्थाप्याख्य । अनवस्थाप्ये उकोसं० गाहा ।[८७] भासेवितातिचारसनविशेष । सन्न मनाचरिततपोविशेषस्तदोपोपरतोऽपि महाव्रतेषु नावस्याप्यते नाधिक्रियत इत्यनवस्थाप्य । तदतिचारजात तच्छुद्धिरपि या मनवस्थाप्यमुच्यते । नवम प्रायश्चित्तम् । तत्र सैन्यकरणे किं सूने- नवस्थाप्यमुक्तम् ' उफमेवेत्यादि । तमोत्यादि-गायापूर्वार्द्धन साधर्मिकस्तैन्ये प्रायश्चित्तमुक्तम् । तन सूत्रपदस्यायमर्थ -साघमिका साथ- यस्वैषां सत्कस्योत्कृष्टोपधे शिप्यादेवा । वहुशो वा प्रविष्टचित्तो वा । तेन ति सेय-चौर्य कुर्वन् मनवस्थाप्य । मन्यधार्मिका -शाम्यादयो गृहस्था था। तेषां सत्कयोपध्यादे स्तेय कुर्वन् । अयमर्थोऽन्यधार्मिकयो लिझिगृहस्थरूपयो सत्क तैयमाहारोपधिशिष्यादिगोचरं त्रिधातत्कुर्वन् । अयोत्तरार्धन हत्यायालो गहिओ- सच निधा-अत्यायाण दलमाणे, हत्यालव दलमाणे, हत्यायाल दलमाणे त्ति । क्रमेण व्यारया- अत्यायाण-अर्थादान द्रव्योपादानकरण भष्टानिमित्त तद्ददरप्रयुझान इत्यर्थ । सत्र कथानकमानम्- २७-14 २८-17] जीसफल्प पूर्णि-विपमपदव्यारया उनी उस्सा दो पतिया पुच्छिण भागरिय । पवहार पयहरेती ताटे सो वेति साहेद ॥१॥ तस्म य गगिणीपुतो मोगमिलासीमो मुचए लिंग। तो अगुफपा भई-क काहिसि त विणण ॥ २॥ ता पय से पीए, गणादि-भरय पगच्छद ममम । वेण च गतु भरिया तो रि यह मह एको ॥३॥ फसो भयो अम्ह कि राउणीरूपए पद हगई। यीभो चगेरि भरेपि ग्गिउ उलयाण तु ॥ ४ ॥ गिम्हिगु जावदपहिं पमती गहिय ते । नापट्ठो । विहयमि हायणमी किं गिटामो ति वे मिति ॥ ५॥ माीमो राउगी इतो तणयष्ठ पत्यरूययप्पासे। हगुलपनमाई भन्तो यरस्स हायेहि ॥६॥ पिठ य सेहिं भागमो सयदाणेण गिरह राणाह । नगरयहि ठावापय गहिएणुपरिं च पासासु ॥ ७ ॥ छहएम हे परिते दष्ट तओ उस नगरे । तगपठाण पुजो अदव महग्यो उ सो जाओ॥ ८॥ दहमियरस्स राव ताहे तो गतु मणइ मायरिय । उच्छादिओ अहोह कि तु नाय इम तुम्भे ॥९॥ कि सउणीय निमिस हग ति अम्ह ति भगद नेमिची । होर फ्यानि तहमय रूठ नाउ तओ सामे ॥१०॥ चूर्णी भवग ति भागिीय । प्रतिभानो प्रतपालना । गोडगो च्छघदय रूपई भरिय नवलाण घेत्तूण उप- विभो । तदा धृतगुदादिप यस्य पत्तना तमध्ये राहोपदेश दत्तवान् । द्वितीयस्स रूपकदातुशतृणकाटादीनां संग्रह पत्तार पहिष्टादुपदिष्टार। पत्तनान्तर्दग्धपण्यस्य सम्मुग प्रवीति किं शशीका निमित्त हदते । एप विधार्थोपा दानकारिण पुरुषस्याभ्युस्थितस्य प्रतमहणाय सम्र क्षेने प्रायचित्त दातु यत्पते । २७-14 हत्थालम्नोत्ति -हत्यारर इस हत्यारयस्त ददत् । भशिवपुररोदा(धा)दी तत्प्रशमनार्यमभिचारु फमप्रविद्यादि प्रयुगात इत्यर्ध । हत्थायालो त्ति-हस्तेन आताटन हवातालस्त दलमाणे ददत् । यष्टिमुष्टिल गुलादिभिर्मरणादिनिरपेक्ष आरमन परस्य या प्रहरमिति माव । तम भायरियस्स विणासे गच्छे अहयावि फुलगो सेपे। पचें दिययोरमण पि काउत्थिारण पुजा॥ एव तु करेण अव्योच्छित्ती कया उतित्यमि । जयवि सरीरायाओ तहवि य भाराहओ सो उ॥ भन्यस्तु सामर्थे सति भागाढेऽपि प्रयोजो न प्रयुद्धे य स विराधक । २७-21 फीरइ० गाहा [८९] सो य ाचार्यादि । एत्य चउभगो त्ति-दवलिंग भावलिंगपदद्वयों भाचमुष्टय यथा-दवलिंगेन रजोहरणादिना अणवटुप्पो महावतादिना भावलिझेन च । १ । व्यलिंगेणाऽण, न भावलिंगेनेति शून्य ।। भावलिोन अनवहप्पो न व्यलिंगेण । ३ । भावलिंगेण अणवठ्ठप्पो, असंभवि भगोऽय।। २७-24 सपक्सपरपश्खे प्रदुष्टस्तैन्यादिदोपै स्तन्यद्वय सूचितम् । १। खपक्षपरपक्षपातनोद्यतो निरपेक्षतया अनेन हस्तातालो गृहीत । हस्थाल्यो भरयादाणो य इत्यनेन तृतीयभामाह । द्वितीयचतुर्थमही असभविनौ । २७-28 जहा अत्यादाणिओ त्तियोऽर्यमुत्पादयति शिमित्ता स। उत्तमद्वेत्यादि । तत्थेय त्ति- खस्थाने । भोसमाह अप्रयरस्स सस्थानत्यागे सति भावलिङ्गा दीयते। २७-35 संपाधिक्षेपो जात्यादिना सेय । २८-4 सुहसाय त्ति मुसखापा । २८-2 न जईण ति -बच्छा इति योग्यम् । २८-7 भाशातनया तपोऽनवस्थाप्य कियता फालेन स्यादित्साह-जहनेणेत्यादि । एतावत्कालादूर्व क्षसौ प्रतेपु स्थाप्यते। २८-12 तपस्सी यति-तपोऽन्वित । २८-14 निजूहणारिहो तिच्छात्पृथकरणाई स । सूत्रे सव्यो विति पदम् । २८-17 आशातना-प्रतिसेवानवस्थाप्यो द्विप्रकारोऽपि मूलाह उक्त उत्मर्गत अववाएण कुलादि-कार्य- कारी । तदधीनानि कार्याणि । उत्तम कार्य बहुजनसाध्य शृङ्गनादितकार्यमुच्यते । तत्प्रसाधित येन भवति । सयालो से कप्पह त्ति-मूलसूनस्थ वाक्यमिद ]-एका निवसन गच्छमध्ये तस्य कल्पते । नालपणसंभाषणादीनि । अयमन भावार्थ -योतवदनादिक्रियाकरणसैभाषणादिक्रियापरिहारेण च एकत्र सव. सनमान मुफ्त्या तपस अनवस्थाप्यलक्षणस्य विधिना प्रतिपत्ति खीकारोऽनवस्थाप्यतप प्रतिपत्ति । ।
1
-
,
श्रीचन्द्रसूरिसरचिता
[२८-20 २८-31
२८-~20 तत्प्रतिपत्तो विधिमाह-पसत्यदधेत्यादिना-परिहारतव पडिवचतो दवाइ अपसत्ये वजिता
पसत्थेसु दव्वाइसु काउस्सग्गो कीरइ । तत्थ व्यओ घडमाइखीररुक्खे। खेतओ इक्षुशालिक्षेनकुसुमितवनसड
प्रदक्षिणावर्तजलपद्मसरश्चैत्यजिनगृहादिषु । कालो पुषसूरे पसत्याइदिणेसु य । भावगो चदतारावलेसु । तनापि
सध्यागतादिदिनवज आलोचना प्रयुक्ते । यत उक्तम्---
'सझागय रविगय विहेरं सग्गह निलयिं च । राहुहय गहमित च यज्जए सत्तनक्सत्ते ॥'
मन लोकश्रीटीकाकारव्याख्या-सूर्ययुक्तादनन्तरनक्षन सग्रहणम् । सूर्यास्तगमनकाले वनक्षामुदय
मुपयाति तद्विलम्बितम् । राहुणा मुसेनाकान्त पुच्छेन वा तद्राहुहतम् । अन्ये त्याहु -यस्मिन् नक्षने ग्रहणमा
सीत्तद्यावद् रविणा न युक्त तायत्तदा हतमिति । प्रहभिन्न यन्मध्ये ग्रहो विभिद्य निर्गच्छति । केचिच्छकटमेदमेव
प्रहमेद इत्युदाहरन्ति । अन्ये त्वत्रैव ब्रुवते यथा-
'जम्मि रविनक्खत्ते ततो सझागय तु घठदसम । निढेरं तु दिइज होइ चउत्थ विलविं च ॥
अन्यस्त्वाह-'सर्वविरुद्ध दिवसे यद्येको भवत्यमृतयोगस्तु । हिमवद्दिनकरकिरणे सर्वे दोपा प्रलीयते ॥
कालत प्रतिपत्तिश्चास्य तपसो जहरीण मासो उकोसेण छम्मासा । तमि परिहारतव पडिपज्जतो मायरिओ
भणइ-अणवठ्ठप्पतवस्स निरुवसग्गनिमित्त ठामि काउत्सग्ग । 'भन्नत्थूससीएणमित्यादि कायोत्सर्गदण्डको वाच्यो
जाय वोसिरामि । 'लोगस्सुनोयर' अणुपेहित्ता, 'नमो मरहताणति पारित्ता, 'लोगस्सुजोयर' कटित्ता आयरिओ
मणाइ-
'एस तय पदिवज्जइ न किंचि आलयइ, मा य आलयह । अनस्स(ह)यितगस्स उ वाघाओ में न कायथ्यो ।'
अस्यार्थ ---एस अप्पविसुद्धिकारओ परिहारतव पडिवजह । एस तुम्भे न कि चि मालवइ । तुम्भे वि एवं मा
बालवह । एस तुम्भे सुत्तत्येसु सरीरवद्धमाणी या न पुच्छइ । तुम्भे वि एय मा पुच्छह । एव च भारमार्थचिन्त-
फस्य ध्यानपरिहारक्रियाव्याघातो न कर्तव्य । वन्दन कुरुते भवताम्, न चासौ गवद्भिर्वन्य । खेलकाइयसमामत्तंग
या न सो देइ । तस्सतिओ वा न घेप्पइ । उवगरण परोप्परं न पहिरेहति । सपाडगा परोप्परं न भवति । भतपाण
परोप्परं न करेंति । एगमडलीए न भुजति । यच्चान्यत् किंचित्करणीय ततेन सार्ध न कुर्वन्ति । गीयस्था परिहारिया
तस्स गच्छतस्स सन्वत्थ अणुगच्छति । पारणकदिने अतेवकड पारेइ । सयमाणीय निद्दिअनेण वा । इत्यन
घस्थाप(प्य)विधिरुका ॥
२८--27 अधुना पाराञ्चिकमभिधीयते-तत्र पार तीर तपसोऽपराधस्याश्चति गच्छति । ततो वीक्ष्यते
य स एव पाराधिकस्तस्य यदनुष्ठान तय पाराधिकमिति । दशम प्रायश्चित्तम् । लिगक्षेनकालतपोभिर्वहि करणमिति
भाव । तत्र पाराधिकेत्यादि-इह सूने प्रतिपेधम्पाराश्चिक एव त्रिविध उक । तदुक्तम्-
'पटिसेवणा पारंची तिविहो सो होइ माणुपुवीए । दुढे य १, पमत्ते य २, नायब्वे मनमाने य ३ ॥'
तत्र दुष्टो दोपवान् कपायतो विपयतश्च । पुनरेकैको द्विधा-खपक्षपरपक्षभेदात् । उक्त च-
'दुविहो य होइ दुट्ठो-~-कसायदुवो य विसयट्ठो य। दुविहो क्सायट्ठो सपक्सपरपास-चउभगो ।'
खपक्षकपायदुष्ट परपक्षकपायदुष्ट । १ । खपक्षन०, न परपक्षक० । २ । न खपक्षदुष्ट , परपक्षदुष्ट । ३ ।
न खप०, न परपक्षदुष्ट । ४ । चतुर्थ शून्य ।
कोद्द करेंतो कसायदुट्ठो। तत्य सपक्षे कपायदुवस्स इगे सासवनालाई चत्तारि उदाहरणा ।
२८-34 तत्थ सासवनालेत्ति-सा[स]वा मजिया। एगेण साहुणा मिक्खागएण सासवालरोख्य सुस्त
लछ । तत्य से मन गिरी । वेण त गुरुणो उवणीय । तब गुरुणा सव्व भुत्त । इयरस्स कोवो जाओ, भव्यि च ।
गुरुणा सो खामिभो तहा गोवसतो । भाइ य-भजामि ते दता गुरुणा वितिय मा एस म असमादीए मारि-
स्सइ ति गणे अन आयरिय उपिता अन गत असण पाडयन पुन्छा ते साहू कत्य में गुरयो । पुच्छति कार
गओ गुरू । न पहिति साहयो । सो अनओ सोचा गओ जय गुरखो । तेहिं कहिय-मन चेय कालगगो परि
विओ य । ताहे पुच्छर-पत्य से सरीरय गुरुणो । पुवकहिमो भजतो भगाइ-सासवनाल साइछि तिा एवं
-
-
करतो दिहो।॥१॥
२९-9] जीतकल्पपूर्णि-विपमपदव्याख्या मुहणंतपयत्ति-एगेण साहुणा लद्ध मुद्दणतग । आषिय त गुरुणा गहिय । इत्य वि सव्व पुवखाणगस- रिख । नवरं त मुहणतग पञ्चप्पिणतस्स न गहिय जीवते गओ राओ। साहुपिरह लभित्ता, गेहसि भगतो, गाढ गळे गिण्हह । समूटेण गुरुणा वि सो गहिओ। दोवि मया ॥२॥ सिहरिणित्ति-एगेण साहुणा उकोसा मज्यिया सिहरिणी लद्धा । गुरुणो आलोइया निमतिया। शुरुणा सब भावीया । से साहू पत्थर उग्गिरिता भागओ। अमेहिं वारिओ । तहावि अणुवसतो । गुरुणा सगणे चेव भत्त पचपसाण, नो अन्न गच्छ गओ ॥३॥ उलुयच्छिओ त्ति-एगो सार अत्य गए सूरिए सीवतो गुरुणा भणिो-पेच्छसि उलगच्छी । सो रुट्ठो भगइ-एव भणतस्स दोवि अच्छीणि ते उद्धरामि। एस्थ वि गुरुणा सामिओ । नोवसतो भणह-ते अच्छीणि उद्धरामि । तमो सो रओहरणाओ अयोमय किलय कटिसा दोवि अच्छीणि उद्धरित्तु ढोवेइ ॥ ४ ॥ एए चउरो वि लिंगपारची। विसयदुढे वि चउमगो ति यया सलिंगी सलिंगसावी सेवते। १। सलिंगी गिहिलिंगीत्री । २ । सलिंगी भन्नलिंगे परिमाजिका । ३ । अनलिंगी समलिंगे। ४ । शून्योऽय । परपक्षकपाय दुष्टस्तु राजवधक उदायिनृपमारकवत् । सपक्षविषयदुष्टस्तु साध्वीकामुक । स च- पावाण पाक्यरो दिद्विम्भासो वि सो न कप्पइ हु । जो जिणमुद्द समणिं नमिऊण तमेव धरिसेइ ।। परपक्षविषयदुष्टस्तु-राजग्गमहिण्यधिगन्ता, अमात्ययुवराजसेनापत्यायप्रमहिपीसेवक्य । दुट्टे पारंचिए त्ति व्याप्यातम् । सम्प्रति मूढे पारचिए त्ति व्याख्यायते [गाथा ९६]-स्त्यानर्द्धिनिद्राप्रमादवान् प्रमत्त मूढोऽपि च एवान व्यारयेय-पञ्चमनिद्रापरो य अतिसक्लिष्टपरिणामात् स्त्यानद्धिनिद्रोपगतो दिनहष्टमर्थमुत्थाय प्रसाधयति । वाधारए त्ति-व्यापारयति । तदुदये च केसवार्धवलसदृशी शचिर्भवति प्रथमसहननिन । चूर्णिकदप्यमे पारा- चिकविधौ पमत्तपारचिए इति पाठ दर्शयिष्यति । २९-9 पोग्गलेत्यादि-पोग्गल-मस १ मोदगा-लया २ दता-हत्यिदता ३ फसगो-कुम्भकारो ४ वडसाला-डाली ५ एते थीणद्धीए उदाहरणा। तस्थ पोग्गले जहा-एगमि गामे एगो कुटुवी। पहाणि म तेलियाणि य तिमण्णेसु य भणेगसो मसप्पगारा भपखेह । सो य तहारूवाण घेराण भतिए धम्म सोऊण पव्वदओ । विहरइ गामाइसु । तेण य एगत्यगामे मसत्थि. एहिं महिसो विगिंचमाणो दिट्ठो । तस्स मसे अभिलासो जाओ। सो तेण अभिरासेण अवोच्छिनेण भुत्तो। एव भव- वच्छिण वियारभूमि गओ। चरिमा सुत्तपोक्सी क्या। पाउसीयावस्सया कया । तदमिलासी चेव सुत्तो । सुत्तस्से प थीणद्धी जाया । सो उढिओ गओ महिसमडल । अन हतु भक्सिय सेस आगतु उवस्सयस्सोवरि ठविय । परसे गुरूण आलोएइ~एरिसो सुविणो दिहो । साहूहिं दिसावलोय करितेहिं दिट्ठ कुणिम । जहा एस धीणद्धी । यीणद्धिस्स लिंगपारंचिय पायच्छित्त। त से दिल ॥१॥ मोयगेत्तिएको साहू भिक्त हिंडतो मोयगभत्त पासइ । सुचिरं उविक्सिय न लद्ध । गओ जाव तद- उपसिओ मुत्तो। उप्पमा योगद्धी। राओ त गिह गतु भतूण त कवाड मोयगे भक्खयति । सेसे पडिगगहे पेत्तुमागो। वियडण । चरिमाए भायणागि पडिलेहतेण दिवा । एयस्स लिंगपारश्चिय ॥२॥ दते त्ति-एगो साहू गोपुरनिग्गओ हरियणा परिखत्तो कहवि पलाओ । सिओ चैव पसुत्तो । उदिमा यीणखी । उहिउ गमओ, पुरक्वारे भतूण गजो पावाइओ। दतमुसले गहेऊणमुपागभो । उपस्सयवाहि ठवित्ता पुगरवि पासुतो। पभाए उढिओ मुविण आलोएइ । साहूण गयदतदरिसण नाय । तहेव विसजिओ ॥ ३ ॥ फरसगत्ति-एगमि महते गच्छे कुम्भकारो पब्वइयो । तस्स राओ सुत्तस्स पीणी उभा । सो स मही- पच्छेयम्भासा समीवत्याण साहूण शिराणि विदितमारो। तागि विराणि फलेवराति य एगवे पहा । सैसा भोस रीया। पुणरवि पासुत्तो। सविणमालोयण । पभाए साहुसभारण नाप । विश च से लिंगपारंचिय ॥४॥ ८ जी. क.चु. ।
-
श्रीचन्द्रसूरिसंरचिता
[२८-20 २८-34
२८-20 तत्प्रतिपत्ता विधिमाह-पसत्यदवेत्यादिना-परिहारतव पहिवनतो दवाइ अपसत्धे वाचता
पसत्थेसु दवाइसु काउस्सग्गो कीरइ। तस्य दवओ घउमाइखीररुपसे। खेतमो इक्षुशालिनकुसुमितवाखंड
प्रदक्षिणावर्तजलपद्मसरश्चैत्यजिनगृहादिपु । कालो पुष्पसूरे पसत्याइदिणेसु य । भावमओ चदतारापलेसु । तनापि
सन्ध्यागतादिदिनवर्ज आलोचना प्रयुक्ते । यत उक्तम्-
'सशागय रविगय विहे सग्गह विलपिं च । राहुहय गहभिन्न च बजए सत्तनक्सत्ते ॥'
भत्र लोकथीटीकाकारव्याख्या-सूर्ययुक्कादान्तरनक्षन समहणम् । सूर्यास्तगमनकाले यनक्षत्रमुदय
मुपयाति तद्विलम्बितम् । राहुणा मुसेनाकान्त पुच्छेन या तदाहुहतम् । अन्ये त्याहु - यस्मिा नक्षने ग्रहणमा
सीत्तद्यावद् रविणा न युक्त तावत्तद्राहतमिति । प्रहभिन्न यन्मध्ये ग्रहो निभिद्य निर्गच्छति । केचिच्छकटभेदमेव
प्रहमेद इत्युदाहरन्ति । अन्ये त्वनैव ब्रुवतेयधा-
'जम्मि रविनक्खत्ते ततो सझागय तु चउदसम । विहरे तु विहन होइ चउत्थ निलयिं च ॥'
अन्यस्त्वाह-'सर्व विरुद्ध दिवसे यद्येको भवत्यमृतयोगस्तु । हिमवद्दिाकरकिरणे सर्वे दोपा प्रलीयते ॥'
फालत प्रतिपत्तिश्चास्य तपसो जहनेण मासो उद्योसेण छम्मासा । तमि परिहारतव पडिवजतो आयरिओ
भणइ--अणवठ्ठप्पतयस्स निरुवसग्गनिमित्त ठामि काउस्सग्ग । 'अन्नत्यूससीएण'मित्यादि कायोत्सर्गदग्डको वाच्यो
जाव पोसिरामि । 'लोगस्सुजोयरे' अणुपेहित्ता, "Tमो भरहताणति पारित्ता, 'लोगस्मुज्जोयरे' पटित्ता आयरिमो
मणाइ-
'एस तय पटिवजा न किंचि आलयइ, मा य भालवह । अन्नस्स(ह)यिंतगस्स उ बाधाओ भे न फायन्यो ।'
अस्वार्थ ~-एस अप्पविसुद्धिकारओ परिहारतय पडिवनइ । एस तुम्भे न #ि चि मालवइ । तुम्भे वि एवं मा
मालवह । एस तुम्भे सुत्तत्थेसु सरीरवद्धमाणी या न पुच्छइ । तुम्भे वि एय मा पुच्छह । एष च आत्मार्थचिन्त
कस्य ध्यानपरिहार क्रियाव्याघातो न कर्तव्य । वन्दन कुरुते भवताम्, न चासो भवद्भिर्वन्ध । खेलाइयसमामत्तग
पा न सो देइ । तस्सतिओ वा न घेप्पइ । उवगरण परोप्पर न पडिलेहति । सघाडगा परोप्परं न भवति । भत्तपाण
परोप्परं न करेंनि । एगमडलीए न भुजति । यच्चान्यत् किंचित्करणीय तत्तेन सार्व न कुर्वन्ति । गीयत्या परिहारिया
तस्स गच्छतस्स सव्वत्य भणुगच्छति । पारणकदिने अलेवकड पारे । सयमाणीय दिभनेण था । इत्यन
घस्थाप(प्य)विधिरता ॥
२८-27 अधुना पाराञ्चिकमभिधीयते तन पार तीरं तपसोऽपराधस्याश्चति गच्छति । ततो वीक्ष्यते
य स एव पाराधिकस्तस्य यदनुष्ठान तय पाराधिकमिति । दशम प्रायश्चित्तम् । लिगक्षेत्रकालतपोभिर्वहि करणमिति
भाव । तत्र पाराश्चिकेत्यादि-इह सूने प्रतिपेधकपाराश्चिक एव निविध उक्त । तदुक्तम्-
'पडिसेवणा पारंची तिविहो सो होइ आणुपुव्वीए । दुढे य १, पमत्ते य २, नायव्वे मनमाने य ३ ॥
तन दुष्टो दोपवान्–कपायतो विपयतश्च । पुनरेवेरो द्विधा स्वपक्षपरपक्षभेदात् । उक्त च-
'दुविहो य होइ दुट्टो-पसायदुट्टो य विसयदुट्ठो य। दुविहो कसायदुवो सपक्सपरपरख-चउभगो ।'
खपक्षरुपायदुष्ट. परपक्षकपायदुष्ट । १ स्वपक्षक०, न परपक्षक०।२।न खपक्षदुष्ट ,
न खप०, न परपक्षदुष्ट । ४ । चतुर्थ शून्य ।
कोह करतो कसायदुट्टो। तत्य सपक्षे कपायदुहस्स इमे सासवनालाई चत्तारि उदाहरणा !
२८-34 तत्थ सासवनालेत्तिसा[स]वा भजिया। एगेण साहुणा मिश्सागएण सासवनालसेलय सुसमृत
बद्ध । तत्य से अईव गिद्धी । तेण त गुरुणो उवणीय । तथ गुरुणा सव्व भुत्त । इयरस्स मोवो जाओ, भटिय च ।
गुरुणा सो खामियो तहा नोयसतो । भगाइ य-भजामि ते दता गुरुणा वितिय मा एस म असमाहीए मार
सहति गणे मायरिय ठवित्ता अन्न गण
गण पाडवा छह साह कस्य में गुरवो । पुरछति कर्टि
गओ गुरू । न कर्हिति साहवो । सो अभी सोचा गओ जय गुरखो। वेहिं कहिय-अन्न व कालगो परिट
विशो य । ताहे पुच्छर-फत्य से सरीरय गुरुणो । पुष्यफहिमो भजतो भगाइ-सासपनाल खाइसि ति। एय
-
परपक्षदुष्ट । ३
-
-
करतो दिवो ॥१॥
५७ सपशेयरमाना समीवस्याण साहूण शिराणि छिदिठमारतो। तागि सिराणि क्लेवराणि य एगते पडद । रोखा भोस- २९-9] जीवकल्पपूर्णि-विषमपदव्याख्या मुहणतए यत्ति-एगेण साहुणा लद्ध मुहणतग आणिय त गुरुणा गहिय । इत्य वि सम्प पुव्वसाणगस. रिस । नवरे त मुहणतग पञ्चप्पिणतस न गहिय जीवते गओ राओ। साहुविरह लभित्ता, गेहसि भणतो, गाढ -गळे पिण्डइ । समूदेण गुरुणा वि सो गहिओ । दोवि मया ॥२॥ सिहरिणित्ति-एगेण साहुणा उकोसा मज्झिया सिहरिणी लद्धा । गुरुणो आलोइया निमतिया । गुरुणा सय्य आवीया ! से साहू पत्थर उगिरित्ता आगओ। अमेहिं वारिओ । तहावि अणुवसतो । गुरुणा सगणे घेच मत्त पथक्खाण, नो अन्न गच्छ गओ ॥३॥ उलुयच्छिओ त्ति-एगो माह भत्थ गए रिए सीवतो गुरुणा गणिओ-पेच्छसि उलगच्छी । सो रहो भगइ-एव भणतस्स दोवि अच्छीणि ते उद्धरामि । एत्य वि गुरुणा खामिओ नोबसतो भणइ-ते अच्छीणि उद्धरामि । तओ सो रोहरणाओ अयोमय किलय कटिजण दोवि अच्छीणि उद्धरितु टोवेइ ॥४॥ एए चउरो वि लिंगपारंची। विसयदुढे वि चउमगो ति-यथा सलिंगी सलिंगसाध्वी सेवते।।सलिंगी गिहिलिंगीत्री । २ । सलिंगी समलिंगे परिवाजिका । ३ । भमलिंगी अनलिंगे। ४ । शून्योऽय । परपक्षफपाय- दुष्टस्तु राजवधक उदायिनृपमारकवत् । सपक्षविषयदुष्टस्तु साध्वीकामुक । सच- पावाण पाययरो दिहिन्भासो वि सो न कप्पइ हु । जो जिगमुद्द समणि नमिऊण तमेव धरिसेइ ॥ परपक्षविषयदुष्टस्तु-राजग्गमहिण्यधिगन्ता, श्रमाययुवराजसेनापत्याचप्रमहिपीसेवफश्च । दुट्टे पारंचिए त्ति व्याख्यातम् । सम्प्रति मूढे पारचिपत्ति व्याख्यायचे [गाथा ९६]-स्त्यानदिनिद्राप्रमादवान् प्रमत्त मूढोऽपि च एवान व्याख्येय ---पचमनिद्रापरो य अतिसलिष्टपरिणामात् स्त्यानद्धिनिद्रोपगतो दिनदृष्टमर्थमुत्थाय प्रसाधयति । वाधारप तिव्यापारयति । तदुदये च केसवार्धवलसदृशी शक्तिर्भवति प्रथमसहननिन । चूर्णिकदप्यमे पारा- विकविधी पमत्तपारचिए इति पाठ दर्शयिष्यति । २९-9 पोग्गलेत्यादि-पोग्गल-मस १ मोदगा-लड्डया २ दाता-हरिपदता । फरसगो-कुम्भकारो ४ पडसाला-डाली ५ एते थीणखीए उदाहरणा। तस्थ पोग्गले जहा-एगमि गामे एगो कुटुयी। पक्षाणि य तेलियाणि य तिमण्णेसु य अणेगसो मसप्पगारा भरखेइ । सो य तहारूवाण थेराण अतिए धम्म सोऊण पव्वइओ। विहरइ गामाइसु । तेण य एगत्यगामे मसत्यि एहि महिसो विगिंचमाणो पिठो । तस्स मसे अभिलासो जाओ। सो तेण अभिलासेण अव्वोच्छिनेण भुत्तो। एव अव- पच्छिमेग वियारभूमि गमो र चरिमा सुतफोरमी कया। पाउमीयावस्सया क्या । तदमिलासी चेव सुतो। सुतस्से- व धोणसी जाया । सो उढिओ गओ महिसमडल । अन्न हतु भक्सिय सेस आगतु उवस्सयस्सोपरि ठविय । पञ्चसे गुरुण पालोएइ-एरिसो सुविणो दिट्ठो। साहहिं दिसावलोय करितेहिं दिट्ट कुणिम । जहा एस थीणद्धी । थोणद्धिस्स लिंगपारचिय पायच्छित्त । त से दिन ॥१॥ मोयगेत्तिएको साहू भिक्ख हिंडतो मोयगमत्त पासइ । सुचिरं उविक्खिय न लद्ध । गओ जाव तद्- प्रसवसिओ सुत्तो । उपना धोणी । राओ त गिह गतु भतूण त कवाड मोयगे भक्खयति । सेसे पडिग्गहे घेत्तुमागओ। वियहण । चरिमाए भायणाणि मडिलेहतेण दिहा । एयस्स लिंगपारधिय ॥२॥ दत्ते त्ति-एगो साहू गोपुरनिग्गओ हथिणा पक्खित्तो कहवि पलाओ । सिओ चेय पसुत्तो । उदिशा भोगक्षी । उहित गओ, पुरवाडे भतूण गजो धावाइभो। दतमुसले गहेऊणमुवागओ। उवस्सयमाहिं ठविता पुणरवि पामुत्तो। पभाए उढिओ सुविण आलोएइ । साहण गयदतदरिसण नाय । तहेच विसजिओ ॥ ३ ॥ फरसग स्ति-एपनि महते गच्छे कुम्भकारो पाइयो । तस राओ मुक्तास पाणदी उहमा । सोग मारी- जी.
श्रीचन्द्रसूरिसरचिता [२९-13 वडसालभंजणं ति~एगो साहू भिषसायरिउ गओ। तत्य पहे पडसाला रुपयो । तस = निमेण लघेउ गओ । सो य साहू उम्हामिहयभालो भरियभायणो तिसयभुसतो इरियोवउत्तो वेगेण आग ताए सालखधाए सिरेण फिडिओ । रुसिओ जाय पासुत्तो। थीणही उदिना । उद्विषो गओ। गणत ऊणमागओ। उपस्सयदुवारे ठविया । वियहणा । नाय थीणद्धी । लिंगपारंची फओ ॥५॥ फैइ मायरिया भणति-सो पुथ्व वणहस्ती आसी। तभो मणुयभवमागयस्स धीणही जाया । पु- गंसूण घासाला भजणाणय । सेस तहेव । इह स्त्याना प्रभमसहननिन केसवार्द्धवलसदृशी शजिर्भवति । सामभवला दुगुण तिगुण चउगुण वा भणति । अन्नमन्नं करेमाणे त्ति-सूत्रपदस्य व्याख्या अन्योऽन्य परस्पर मुसपायुप्रयोगतो मैथुन फुर्व युगमिति विशेष । अभ्य (भण्य ' ) ते च--' -'आसयपोसयसेवी केवि मणूसा दुवेयगा हुति ।' तेसिं लिंगविवेगो ति-तीर्थकराधासातनापरा आसातनापारची भवति । चरिमट्ठाणापत्तिसुति [गाथा९६] परिमाण पारचियमेव । तस्यापत्तयस्वदतिचारसेवन प्रसज्यते, स च पाराधिकारी । २९---13 दधभालिंगे चउभंगो तिव्यलिश रजोहरणादि, भारलिंग महामतादि । - पारचिो, भावलिंगेण य १ दबलिंगेण पार०, न भावलिंगेण य २ भावलिंगेण पार०, न दवलिंगे- दवलिंगेण पार न भावलिंगेण य ४ इति । चतुर्ध शून्य । अग्रमहिष्यादिसेवनादी सप्रकटसेची । २९--14 उभयलिंगेणावि तिव्यलिंगेन भावलिंगेन च पाराश्चिको भवति । २९-~15 जत्थु० गाहा [९९] दोसो बतलोपादिक ॥ क्षेत्राण्यवाहचसहीएत्यादि-बसही- नियन एकनिष्क्रमणप्रवेशानियादीनि गृहाणि । पाटो प्रामादेयवच्छिन सनिवेश । साही प्रामगृहाणामेव नियोगो राजकृतपुरदेश , राज्यादिक प्रवेश, इत्येवप्रकारक्षेत्रे यस यो दोष सम्पन्नस्तसाव क्षेत्रात खिक क्रियेत् । २९--23 अन्नमन्नं ति-अन्योन्याधिष्ठासेवनम् । २९---28 सूतायपौरुपी द्वै अपि शिष्येभ्यो दत्त्वा गुरुस्वस्य समीपे गच्छति । २९-31 आचार्यप्रेषितस्य चागीतार्थस्य जत्य गोत्ति गव्यूतद्वयस्थितपाराधिकान्तिके । अतराले तत्सकाशादागच्छत । से ति सूरिशिष्यस्य वा भक पान च उपनयन्ति साधव । २९--35 अणवटुप्पो० गाहा [१०२] परिहारतवो गिम्हसिसिरवासासु जहन्नमज्झिमुकोसो-गि त्यसमाइ, सिसिरे छट्टद्वमदसमाइ, वासासु अहमदसमवारसताइ, पारणए मलेरकड। एव तप पाराधिक यतो अभिहित-अणवटुप्पो तवसा तथपारचिया दोवि वोच्छिन्नति । लिंगक्षेत्रकालैरनवस्थास्य 'उद्देसऽझयणसुयसधगेसु' इत्यादि [२३] गाथात धारम्भ 'झोसिजइ सुपहुं पितु [९] पर्यन्तगाया यावत् सप्तपञ्चाशतगायाभिज्ञानातिचार दर्शनातिचार) चारित्राविचारवस्तुत्र तवारिह पायच्छित भणिय । तदूर्व गाधानयेण च्छदाई । तदन गायाचतुष्टयन मूलाई । तदा गाथासप्तकेन स्थाप्याई । तदनु गायानवकेन पाराचिकमुक्तमिति शास्त्रसमुदायार्थ । ३०-1 अथ शास्त्रसमाप्त्यर्थमुपसहारगाषामाह-इय एस० गाहा [१०३ क्रियते अभिषीय नेनेति करण शम्द। जीयफप्पो ति-जीतमाचरितम्य मर्च कालधरणा चा जीत, तस्य फल्प यतः पठ्यते- 'सामाचे वर्णनायां च च्छेदने परणे तथा । औपम्ये चाभिवामे च फल्पशन्द विर्युपा ॥' - विकास्तीर्थ यावदनुभाता । । | कल्पशब्दो वर्णनाम:
३०-4 ३०-20] जीवकल्पचूर्णि-विषमपदव्याख्या सामध्येऽतो पर्धते कल्पाग्दस्तदर्धधातुनिष्पनत्वात् । पर्णनाया ययान । यद्वा कल्पितो पर्णित छापित । छेदने कल्पित छेदित वनम् । करणे प्राक्षणार्य पल्पिता कृता पूपा । औपम्ये मया-समुद्रकल्पमिद तडागम् । भभिवासे यथा-कल्पिता अधिवापिता मानाय सजिता प्रतिमा । एतेष्वर्येषु कल्पशब्द । ३०-4 परिणामगा-उत्सर्गापवादवेदिन । फरजोगिणो-चटत्याइ तवे फयजोगा । सग्गह- सीला-वनपानशिष्यादिसतहपराः । अपरिवान्ता भरोदयन्त महोपातादिश्रुतार्यवेदिा । पुद्धिव तो-में धाविन । एवमादीनि-आदिशन्दापरिणता श्रुतेन वयसा च। तत्र घोलवरिसारेण वयसाऽव्यतो, परेण वत्तो। धुवेन व अधीतनिपीयो व्यक्त', शेपस्वदय । तथा तरमाणगा-जे ज तवोकम्म आउयेति त नित्परति तदन्ये तरमाणा इत्यादि माध्यम्। ३०-20 पावण ति-पवित्रम् । निधितसूत्रार्थदायक्यासौ अगलचरणय, तम् । ॥ इति जीतकल्पचूर्णिविपया [ विपमपद-] व्याख्या समाप्ता । जीतकल्पगृहमो व्यारया शास्त्रानुसारत । थीचन्द्रसूरिमिदग्धा स्वपरोपकृतिहेतवे ॥१॥ मुनि नयन तरणि (१२२७ ) वर्षे श्रीवीरजिनस्य जन्मफल्याणे। प्रकृतग्रन्थतिरिय निप्पत्तिमवाप रविवारे ॥२॥ सघचैत्यगुरूणा च सर्वार्थप्रविधायिन । घशा (विशो?)ऽभयकुमारस्य वसतौ दृन्धा सुयोघरुत् ॥ ३॥ एफादशशतविंशत्यधिकश्लोकप्रमाण (१९२०) प्रधान । प्रथकृति प्रवियाच्या मुनिपुगवसूरिभि सततम् ॥ ४॥ यदिदोत्सूत्र किञ्चिद् दृब्ध छमस्थयुद्धिभावनया। तन्मयि रूपानुकलिते शोध्य गीतार्थविद्वद्भि ॥५॥ ॥ समाप्ता चेयं श्रीशीलभद्रप्रभुश्रीधनेश्वरसूरिपादपनचंचरीक श्री श्री चन्द्रसूरिसंरचिता जीतबृहचूर्णि-दुर्गपदविषया निशीथादिशास्त्रानुसारतः संप्रदायाच सुगमा व्याख्येति ॥ यावल्लवणोदन्वान् यावन्नक्षत्रमडितो मेरु । से यावश्चन्द्रार्को तावदिय वाच्यता भव्यैः ॥
03 परिशिष्टम् । पृष्ठ ५३ उपरि सूचित्रं (२४-14) जीतकल्पयत्रम् । अगी. निरपेक्ष आचा०कृत आचा अकृत उपा० गी• स्थिगी. स्थिः अकृत कृत अकृत उपा.कृत गी. गी. अस्थि अस्थि कृत अकृत अगी. स्थि. अकृत अगी. अगी. अस्थि अस्थि अकृत स्थि० व . - ६ ४॥ छेद ६) O मूल छेद ६। छेद ६) ६ ४। ६1 ६ ४ ४ . छेद ६॥ पाराचिक अनवस्था० अनवस्था० अनवस्था मूल मूल मूल छेद छद. ६ ६. ६. ६ ६ ६ ४। ४॥ ४॥ ४ ६ ६ ४1 ४ ४ . . . ४ ४ . ६ ४ ४ . . o ४१ २० १५ . . . . २५ २० २० ४ ४ . . . . २५ २५ २० १५ १५ . . . . २५ २० १५ २५ २० ५ . १५ १० . २५ २० १५ १० ५ १५ १० २० १५ २० १५ १० १५ १० १० ५ ५
No text on this page.
मुनि जिनविजय-सम्पादित ग्रन्थावली
--
"
"
"
१ जैनतत्त्वसार-हिन्दी भाषांतरः
२ विज्ञप्तित्रिवेणि-सस्कृत हिदी.
३ कृपारसकोप-संस्कृत हिंदी.
४ शत्रुजयतीर्थोद्धार प्रबंध-संस्कृत हिंदी.
५ द्रौपदीस्वयंवर नाटक-सस्कृत हिंदी.
६ प्राचीन जैनलेखसंग्रह भाग १. संस्कृत गूजराती.
भाग २.
जैन ऐतिहासिक गूर्जरकाव्य संचय-गूजराती.
९ हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णयः-( संस्कृतनिवन्धः)
१० कुमारपालप्रतिबोधः-(गायकवाडस् ओरिएन्टल सीरीज.)
११ प्राकृतकथासंग्रहः-( गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर ग्रंथावली.)
१२ पालीपाठावली.
१३ अभिधानप्पदीपिका-पालीशब्दकोप
१४ जैनसाहित्यसंशोधक त्रैमासिक पत्र. खंड १-२.
८
ASSASAIRETASTATUREROASAGERSTRAS
"
"
छपाता ग्रन्थो
१५ प्राचीन गूजराती गद्यसन्दर्भ.
१६ पट्टावलीसंग्रहः
१७ विजयदेवमाहात्म्य.
१८ गूजरातनां इतिहासना साधनो.
ERSEASERSE
No text on this page.