Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Pali Prakart Vaykaran

Motilal Banarasidass · 2012/02/01

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पाली-प्राकृत-व्याकरमान्
मार्य श्री विनयचन्द्र ज्ञान भार, जयपुर
महामहोपाध्याय पं० मथुराप्रसाददीक्षितेन
विरचितम्
प्रकाशक
मोतीलाल बनारसीदास
संस्कृत-हिन्दी पुस्तक-विक्रेता
पोस्टवक्स नं०७५ काशी

प्रकाशक:-
मोतोलाल बनारसीदास
संस्कृत-हिन्दी पुस्तक विक्रेता
पोकन नं०७५ काशी।
मुद्रक :-
काशीराज मुद्रणालय,
दुर्ग रामनगर,
(बनारस)

संस्कृतानुरागियों के लिए अपूर्व अवसर महामहोपाध्याय मथुराप्रसाद दीक्षित कृत संस्कृत साहित्य के अपूर्व अन्यरत्न भारत-विजय-नाटकम्- यह प्राचीन कवियों के सदृश नाटकीय नियमों का पालन करते हुए ऐतिहासिक तथा राजनीतिक नाटक वीसवी सदी में अपूर्व है। इसमे भारत मे अंग्रेजों के अागमन, उनके अन्याय से भारतव्यापार का नाश, अँगूठे काटना, वेगमों पर कोड़े लगाकर आभूषण उतारना, खजाना लूटना आदि दृश्यों का तथा कूटनीति से देशीराज्यों का अन्त करना आदि का अपूर्व रीति से दृश्य वर्णन है। १८५७ का स्वातन्त्र्य युद्ध, झाँसी रानी की वीरता और अन्त में कांग्रेस के स्वातन्त्र्य युद्ध से पराजित होकर महात्मा गाँधीजी के हाथों में भारत को विभक्तकर शासन सौंप कर चले जाने का अपूर्व दृश्य है। इसके पढ़ते हुये किस भारतीय का हृदय शौर्य से श्रोत प्रोत न हो जायगा, एवं किसके हृदय में स्वदेश प्रेम की लहरें न उठने लगेंगी, विदेशियों के शासन से किस के मन में घृणा न हो जायगी। इस रचना में सब से अधिक महत्त्व का विषय यह है कि दीक्षित जी ने अपनी अभूतपूर्व नीति-कुशलता से अंग्रेजों की गतिविधि समझकर आज से दश वर्ष पूर्व ही देश को विभक्त कर इनका यहाँ से १९४८ में प्रयाण करना जनता के सामने रख दिया था, १६४६ के कांग्रेस शिक्षामन्त्री के पत्र साथ में छपे हैं, दीक्षित जी की यह भविष्य-दर्शिता आज भी महर्षियों के अस्तित्व का ज्वलन्त प्रमाण है, अतः संस्कृतानुरागियों के लिये यह परमोपादेय है। अत- एव इसके गुणों में प्राकृष्ट बोर्ड के विद्वानों ने उत्तर प्रदेश संस्कृत-प्रथमा में एवम् पञ्जाव सत्कृत-बोर्ड के विद्वानों ने प्राज्ञ-परीक्षा में इसे नियत कर दिया है। मूल्य २) हिन्दी अनुवादसहित २-शङ्कर-विजय नाटक-इसमें मण्डनमिश्र का शास्त्रार्थ, मीमांसा, वेदान्त, जैन, बौद्ध, चार्वाक, कापालिक आदि दर्शनों का तात्विक वर्णन है जिससे प्रत्येक दर्शन का ठोस एवं पूर्ण परिज्ञान हो जाता है । मूल्य १) मात्र ३-भक्तसुदर्शन नाटक- यह देवी भागवत से ऐतिहासिक नाटक लिखा गया है । रामचन्द्र जी के पूर्वज सुदर्शन की भक्ति, तल्लीनता, दुर्गा देवी के मन्त्र का प्रभाव, दुर्गादेवी का प्रगट होकर युद्ध में शत्रु को मारकर सुदर्शन-अयोध्या- भूमिका सुर-सरस्वतो की अपेक्षा प्राकृत की प्राचीनता अथवा अर्वाचीनता. संबन्धी विवाद से असंपृक्त रह कर हम यह दृढता पूर्वक कह सकते हैं कि समुच्चारण सौकय इसकी समुत्पत्ति का-समुन्नति का प्रधान कारण है। एक श्रावक के प्रश्न के उत्तर में श्रीहरिभद्र सूरि जी महाराज का कथन है कि- वाल-स्त्री-वृद्ध-मूर्खाणां नृणां चारित्रकांक्षिणाम् । अनुग्रहार्थ तत्त्वज्ञैः सिद्धान्तः प्राकृतः कृतः ॥ लोक व्यवहार विषयक अनुभूति से भी उपर्युक्त सिद्धान्त का ही समर्थन होता है । अपठित परिवार के व्यक्ति, विशेषतः बालक और वृद्ध कुछ अक्षरों का उच्चारण सुगमता पूर्वक नहीं करते । उदाहरणार्थ उष्ट्र, हस्त, मस्तक, युधिष्ठिर आदि संयुक्ताक्षर समन्वित शब्दों का उच्चारण वह विकृत रूप में ही उट्ठ (ऊँट), हत्थ (हाथ ), मत्थग (माथ ) जुधिट्ठिल (युधिष्ठिर) आदि के रूप में ही कर सकेंगे। उन्हें इन शब्दों का परिज्ञान तो अवश्य है, पर शुद्ध रूप में उनके उच्चारण करने में वे पूर्णतया असमर्थ हैं । भिन्न भिन्न देशों में भी अक्षर- उच्चारण प्रणाली भिन्न भिन्न है। अतः यह निःसङ्कोच कहा जासकता है कि प्रान्तीय अथवा देशीय भाषाओं की उत्पत्ति में इस उच्चारण का भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। पाली, प्राकृत आदि भाषाओं के विवेचक वैयाकरणों ने संस्कृत साहित्य के समान २ हजार धातुओं का परिगणन तथा प्रकृति और प्रत्यय का वैज्ञानिक विश्लेषण न करके केवल परिणमन (रूपान्तर पद्धति की प्रक्रिया प्रदर्शित की है, जिसके फल स्वरूप आज का अध्ययन संस्कृत माध्यम से ही किया जाता है। इस सूत्र के निर्देश से भी उन्होंने उपर्युक्त मत की ही . -- ७ ऐत एत् । ( 3 ) ३ इदीतः पानीयादिषु । २० चौर्यसमेषु रियः। ४ उदूतो मधूकादिषु । २१ वक्रादिष्वनुस्वारः। ५ उत्सौन्दर्यादिषु । २२ मांसादिषु वा। ६ इत एत् पिण्डसमेषु । २३ नीडादिषु द्वित्वम् । २४ पौरादिष्व उत् । ८ ए शय्यादिषु । २५ अवर्णो यः श्रुतिः। ६ औत प्रोत् । २६ वसतिभस्तयोहः। १० उत ओत्तुण्डसमेषु । २७ प्रतिसरवेतसपताकासु डः। ११ ऋरीति। २८ इतेस्तः पदादेः। १२ ष्टस्य ठः। २६ इत्पुरुषे रोः। ठस्य ढोऽपि वाच्यः। ३० युक्त श्रोत उत् आदीदूतां ह्रस्वश्च । १३ स्तस्य था। १४ स्पस्य फः। ३१ अत प्रोत्सोः। १५ तस्य । ३२ स्त्रियामात् । १६ न धूर्तादिषु । ३३ नपुंसके सोबिन्दुः। १७ दशादिषु हः। ३४ अन्त्यस्य हलो लुपिः। १८ संख्यायाश्च (२ः)। ३५ सुभिसुप्सु दीर्घः। १६ उत्तरीयातीययोर्यों जो वा। ३६ क्त्वा तूण इयो। इति म० म० मथुराप्रसादकृते पा० प्रा० व्याकरणे द्वितीयोऽध्यायः । समाप्तोऽयं ग्रन्थः।

पालीप्राकृत-व्याकरणम् यत्त्वत्पादसरोरुहेण जयितां स्वान्ते प्रबालोऽदधान् मन्ये तन्नितरामसौ जड़( ल )मतिर्वालः प्रकृष्टो भृशम् । यन्नीत्वा लघुपल्लवः पदलवं साम्याय संकल्पते क्षुद्रोऽसो लवमानतो न समता नैतद्यतो वुध्यते ॥१॥ चौद्ध-जैनागमान्दृष्ट्वा तेषां व्याकरणान्यपि । पाली-प्राकृत-बोधाय लघुव्याकरणं वे ॥२॥ धात्वादेशनिपातानां तथा सुप्तिविधेरपि । वाक्यैकदेशयातत्वात्सुज्ञत्वान्नैव दर्शये ॥३॥ क-ग-च-ज-त-द-प-य-यां प्रायो लोपः॥१॥१॥ एषां प्रायो लोपः स्यात् (कस्य ) वउलो। वराई। गोउलं । चोरो। तारि- आ । मासिअं। रसिओ। सअलो। संवाहओ। हंसओ) (गस्य) सारो । उरओ । छाओ। जाअरा । पराओ । रोओ । (चस्य) सुइरं। हिन्दी । समस्तबौद्धागम और जैनागमों को एवम् उनके व्याकरणों को अर्थात् पाली व्याकरण तथा प्राकृत व्याकरणों को देखकर पाली और प्राकृत के बोध के लिये संक्षित और सरल "पाली-प्राकृत-व्याकरण" को कहता हूं । धातु के स्थान मे जायमान आदेश, निपात और सुप्तिविधि, को नहीं कहूंगा क्योंकि स्वयं इन की प्रतीति हो जाती है। कगेति । क-ग-च-ज-त-द-प-य-व-इनका प्रायः लोप होता है । प्रायः पद के ग्रहण से कहीं २ नहीं भी होता है। लक्ष्यानुसार व्यवस्था करनी चाहिये, यदि दो वर्णों का लोप प्राप्त हो तो सुखद प्रतीयमान होने से उत्तर वर्ण का लोप होगा।

.. - अनादावेवेति वाच्यम् । तेनेह न । कालो, दासो, पुराणं । अधो मनयाम् ।।२। वर्णान्तरस्य अधः स्थित्तानां मकार नकार- यकाराणां लोप: स्यात् । छ। रस्सी । तिग्गं । (नस्य) लग्गो। भग्गो। मग्गो । भुग्गो । (यस्य ) मन्ना। वन्ना । तुल्लो । यह ककारादिकों के लोप करने पर यदि अकार अथवा अाकार होगा तो उसको वक्ष्यमाण "अवर्णो य: श्रुतिः” इस (२+ २५) सूत्र से यकार हो जायगा । परन्तु यह यकार आदेश मागधी, अर्धमागधी मे होगा, क्योंकि जैनागमों में प्रायः यकार का प्रयोग मिलता है, परन्तु नाटक में नहीं । मेरे मत से सौकर्य- प्रतीति से नाटकों में भी करना चाहिए। प्राचीन कालिक नाटकों मे शौरसेनी का प्राधान्य है अतः स्त्री आदि की उक्ति मे अकार को यकारादेश नहीं है । परन्तु नैनागमों मे प्रायः यकार ही है। जैसे-भगवती सूत्रागम- "वियसिय अरबिन्दकरा णासियतिमिरा सुहासिया देवी मझ पि देउ मेहं बुह-विबुहणमंसिया णिच्चं । यहां विकसित, नासित, सुखासिता, नमंसितादिक शब्दों मे ककार तकार के लोप के अनन्तर अवशिष्ट अकार को यकार होता है। एवम् । “चम्पाणाम एयरी होत्था" यहां भी 'नगरी' शब्द के गकार लोप के अनन्तर अवशिष्ट 'अ' को 'य' होता है। दश वैकालिक जैनागम-गोचरीप्रकरण-ण य पुप्फ किलामेइ सो य पोणाइ अप्पयं । यहां-न च, स च, प्रात्मकम् , मे चकार, ककार लोप के अनन्तरं यकार होता है। अध इति-संयुक्त वर्ण के अधोभाग मे स्थित मकार-नकार-यकार का लोप हो । जैसे-छपम् , रश्मिा, तिग्मम् । कोई श्राचार्य-"कचिदन्यत्रापि” (२८) इस अहाइसवे सूत्र से वर्णविश्लेष और तत्स्वरयुक्तता करके जाल्म का जालम, विक्लव: का विपलवो, सुकः का सुकलो, सूक्ष्म का सूछम इत्यादि मानते हैं परन्तु प्राकृतमहाकाव्यादिकों मे ऐसे प्रयोग नहीं मिलते। आधुनिक प्रचलित भाषा के परिज्ञान के लिए यह प्रकार माना जा सकता है । अस्तु । नकार के-लगः, भमः, ममः, मुग्नः, इत्यादि मे अधःस्थित नकार का लोप होता है । यकार के~मन्या, वन्या, तुल्यः इत्यादिकों मे यकार का लोप होता है।

[ ५ ] शेषादेशयोदित्वमनादौ ।।४। लोपादवशिष्टस्य शेषरूपस्य, आदेश- रूपस्य च वर्णस्य द्वित्वं स्यात् न त्वादौ। शेषस्य-धम्मो सप्पो। विप्पो। लग्गो। मग्गो। उक्का । विप्पो । आदेशस्य यथा-पच्छिमो । वच्छो। उच्छाहो। लिच्छा। जुगुच्छा । अनादाविति किम् । चवणो, धो.। आदेशस्य थवओ, झाणं, खीणो। इत्यादि । संयुक्तस्यैव आदेशे द्वित्वम् । उत्तरीयानीययोर्यो जो वा' इत्यत्र द्वित्वजकारविधानाज ज्ञापकात्तेन शेषा इति । लोप से अवशिष्ट वर्ण को तथा आदेश से जायमान वर्ण को द्वित्व हो। आदि मे स्थित शेष वर्ण को तथा आदिस्थित आदेशज वर्ण को द्वित्व नहीं हो। शेष वर्ण के उदाहरण-धर्मः, सर्पः, विप्रः । लमः, मना, उल्का, विप्लवः, इत्यादि में पूर्वोक्त 'सर्वत्र लवराम्' इससे रेफ लकार के लोप करने के अनन्तर अवशिष्ट वर्णों को द्वित्व हुा । आदेश के उदाहरण-पश्चिमः, वत्सः, उत्साहः, लिप्सा, जुगुप्सा, इत्यादिकों में 'श्चत्सप्सां छः ।२३।' इस वक्ष्य- माण सूत्र से छकार करने के अनन्तर आदेशभूत छकार को द्वित्व हो जायगा, फिर 'वर्गेषु युजः पूर्वः । ७ । इससे पूर्व छकार को चकार । यह लोप द्वित्वादि पाली प्राकृत मे समान है, परन्तु 'कगचज०' इस प्रथम सूत्र से जो लोप होता है, वह पाली मे कहीं नहीं होता है। जहां आदि में शेष या आदेश वर्ण होगा वहाँ द्वित्व नहीं होगा, जैसे-च्यवनः, ध्वजः । यकार वकार लोप करने अनन्तर चकार- धकार को द्वित्व नहीं होगा । आदेश के स्तवकः, ध्यानम् , क्षीणम्' यहां, 'स्त' को यकार, 'ध्य' को झकार, 'क्ष' को खकार करने के अनन्तर द्वित्व नहीं होगा, क्योंकि आदि मे ये आदेशज वर्ण हैं। यह आदेश जहां संयुक्त वर्ण के स्थान मे कोई वर्ण हुया होगा वहीं द्वित्व होगा, क्योंकि 'उत्तरीयानीययोर्यो जो वा'। इस सूत्र मे द्वित्व 'ज' के विधान से जानते हैं कि संयुक्त वर्ण के आदेश मे ही द्वित्व होगा। अन्यथा केवल जकार विधान करते और फिर इससे द्वित्व हो जाता । फल-हरिद्रादि मे र को लकार नोट-(१) स्तस्य य: । ३+१३ । (२) ध्यायोमः । २२ । (३) कस्कक्षां खः। १६ ।

. णत्वं भवत्येव। उएणअं,अण्णं, करणा। तुएणवाओ, सएपद्धं, पण्णओ। वर्गेषु युजः पूर्वः ।१७। कवर्गादिषु वर्गेषु युजः-द्वितीयचतुर्थयोः पूर्वः प्रथमतृतीयः स्यात् । कचटतपाः पञ्च वर्गाः। तत्र क ख ग घ ङाः, इति पञ्च कवर्ग। एवं चवर्गादिष्वपि पञ्च २ बोध्याः । तद्यथा । मुक्खो, वग्यो, मुच्छिओ, गुणड्ढो, (१) पत्थिओ, अद्धओ, गुज्झो, अन्भासो। आदेशे-पूर्वोक्ता एव । पच्छिमो, वच्छो, उच्छाहो, लिच्छा, जुगुच्छा । एवमन्यत्रापि । णक्खत्त । पक्खेओ, पक्खमूलं, णिक्लेवो, णानुकु, तथा व्यवहृत आगमोक्तशब्दानुकूल कल्पना कर लेना । वर्णान्तरेणेति, यह नकार को ण कार दूसरे वर्ण से संयुक्त होने पर नहीं होगा, जैसे—अन्तरा, कन्दरा, बन्धुरा, कन्दुकः, चन्दनम् , छन्दः, मन्दिरं, मन्दु- रा,स्व से युक्त होने पर, अर्थात् नकार का नकार से योग होने पर णकार हो जायगा । जैसे-उन्नतम् , अन्यत् , कन्या, तुन्नवायः, सन्नद्धम् , पन्नगः । वर्गेष्विति-कवर्गादिक वर्गों में युक्त वर्ण का अर्थात् द्वितीय एवं चतुर्थ वर्ण का स्व से योग होने पर पूर्ववर्ण होगा, तात्पर्य यह कि ख-ख का योग होने पर क होगा, जैसे मूर्ख शब्द में रेफ लोप होने पर अवशिष्ट ख को द्वित्व, फिर युक्त 'ख' का पूर्व वर्ण ककार हो जायगा । एवं ध का पूर्व वर्ण 'ग' होगा, एवं 'छ' का च, 'ढ' का ड । 'थ' का 'तर, 'ध' का 'द', इसी तरह सर्वत्र जानना । जैसे-मूर्खः मे क, व्याघ्रः,रेफ लोप, धकार द्वित्व । 'घ' को ग । मूर्छितः, छद्वित्व,छको चकार एवम् गुणान्यः, पार्थिवः, अध्वगः, गुल्कः, अभ्यासः । आदेश मे पूर्वोक्त उदाह रणों को ही जानना । पश्चिमः, वत्सा, उत्साहा, लिप्सा, जुगुप्सा, । इसी प्रकार अन्य आदेशों में भी जानना। नक्षत्रं, प्रक्षेपः, पक्षमूलं, निक्षेपा, राक्षसः, शुष्कम् पुष्करः, रुष्टः, तुष्टः, परिभ्रष्टः, विस्वस्ता, प्रस्थितः, । इत्यादिकों में, नं० (४+ नोट-तुन्नवायस्तु सौचिकः । अमरः । अधो मनयाम् २ । सर्वत्र लवराम् ३ । श्वत्सप्सां छः ।।२३। कस्कदां खः ।।१९। टस्य ठः ॥१३॥ स्तस्य यः ।। पूर्वः इत्यावृत्य पूर्वः पूर्वः स्यादित्यर्थः, तेन प्रथमस्य ककारादयः, न तृतरस्य . - [ 8 ] परिहा, णहरो, मुहरो, सही, सेहरो, महो, साहा, णहो । (घस्य ) मेहो णिदाहो, जहणं, अहं, जिहस्सू । दुहणो, परिहो, णिहसो, अमोहो, सरहा, अवहणे । इत्यादि । थकारस्य-सवहो, कहा, मिहुणो, मिहिला, महिओ, रहगुत्ति, तिही, तहागो, सारही ।धकारस्य-रुहिरो, गोहिआ, गोहा, विहुवणं, णिहाणं, महुरो, णिही, साहू, सेवही, विहू, दही, अगाई, जलहरो, महू । भकारस्य-णहो, सोहा, विहावरी, अहिल- सिओ, अहिलासा, अहीरो, गदहो, डिंडुहो, पहूओ, पावित्रो, सुहं, विहवो । इत्यादिः- नानुस्वारासंयोगाच्चेति वाच्यम् । अनुस्वारात्परेषामेषां न हकारः । संखो, लंघणं, मंथरा, बंधुरो, किंफलो, कुंभो । णिग्घिणो, णिक्खेपो । मण्डूकप्लुत्या प्रायः पदानुवृत्तेः आदौ तुकचिदपि न खग्गो, खुरो, खइरो, मेखला, परिखा, नखरः; मुखरः, सखी, शेखरः, मखः, शाखा, नखः । (घकार) के मेघः, निदाघः, जघनम् , अघम् , जिघत्सुः, द्रुघणः, (२) परिघः, निघसः, अमोघः, सरघा, अपधन:, । थकार के-शपथः। कथा, मिथुन:, मिथिला, मथितः, रथगुप्तिः, तिथिः, तथागतः, सारथिः, धकार के उदाहरण-रुधिरः, गोधिका, गधा, १ विधुवनम् , निधानम् , मधुरः, निधिः, साधुः, सेवधिः, विधुः, दधि, अगाधम् , जलधरः, मधु । भकार के उदाहरण-नभः, शोभा, विभावरी, श्रमिलषितः, अभिलाषा, अाभीरः, गर्दभः, डुण्डुभः, प्रभूतः, प्रभावितः, शुभम् , विभवः, इत्यादिकों मे तत् तत् वर्ण को हकार हुआ है। यह इन वर्गों को हकारादेश 'पाली' मे नहीं होता है । नानुस्वारादिति । अनुस्वार से और संयोग से परे इनको हकारादेश नहीं होता है, जैसे-शंखः, लङ्घनम् , मन्थरा, बन्धुरः, किंफलः, कुम्भः । निघृणः, निक्षेपः । 'कगचज' सूत्रोक्त ।१।१। प्रायः पदकी मण्डूकप्लु ति से अनुवृत्ति कर यह मानना कि आदि मे विद्यमान खकारादिकों को हकार कहीं नहीं होगा, औ अनादि मे भी कहीं २ नहीं होगा। आदि मे जैसे-खगः, खुरः, खदिरः, खल नोट-१८आदेशात्पूर्वमेव सकारस्यैव लोपे सर्वप्रयोगसिद्धौ पुस्तकान्तरे शक रोनेति बोध्यम् ।द्रुघण-मुद्गर । २ परिघ-अस्त्रविशेष । निघस-निगलकर खाने . - " [ ] परिहा, णहरो, मुहरो, सही, सेहरो, महो, साहा,, णहो । (घस्य ) मेहो णिदाहो, जहणं, अहं, जिहस्सू। दुहणो, परिहो, णिहसो, अमोहो, सरहा, अवहणे । इत्यादि । थकारस्य-सवहो, कहा, मिहुणो, मिहिला, महिओ, रहगुत्ति, तिही, तहागो, सारही । धकारस्य-रुहिरो, गोहिमा, गोहा, विहुवणं, णिहाणं, महुरो, णिही, साहू, सेवही, विहू, दही, अगाई, जलहरो, महू । भकारस्य-णहो, सोहा, विहावरी, अहिल- सिओ, अहिलासा, अहीरो, गदहो, डिंडुहो, पहूओ, पावित्रो, सुहं, विहवो । इत्यादिः- नानुस्वारात्संयोगाच्चेति वाच्यम् । अनुस्वारात्परेषामेषां न हकारः। संखो, लंघणं, मंथरा, बंधुरो, किंफलो, कुंभो । णिग्घिणो, णिक्खेपो । मण्डूकप्लुत्या प्रायः पदानुवृत्तेः आदौ तु क्वचिदपि नाखग्गो, खुरो, खइरो, मेखला, परिखा, नखरः, मुखरः, सखी, शेखरः, मखः, शाखा, नखः। (घकार) के मेघः, निदाघः, जघनम् , अघम् , जिघत्सुः, द्रुघणः, (२) परिघः, निघसः, अमोघः, सरधा, अपघन:, । थकार के-शपथः। कथा, मिथुन:, मिथिला, मथितः, रथगुप्तिः, तिथिः, तथागतः, सारथिः, धकार के उदाहरण-रुधिरः, गोधिका, गधा, १ विधुवनम् , निधानम् , मधुरः, निधिः, साधुः, सेवधिः, विधुः, दधि, अगाधम् , जलधरः, मधु । भकार के उदाहरण-नभः, शोभा, विभावरी, अभिलषितः, अभिलाषा, अाभीरः, गर्दभः, डुण्डुमः, प्रभूतः, प्रभावितः, शुभम् , विभवः, इत्यादिकों मे तत् तत् वर्ण को हकार हुआ है । यह इन वर्गों को इकारादेश पाली में नहीं होता है । नानुस्वारादिति । अनुस्वार से और संयोग से परे इनको हकारादेश नहीं होता है, जैसे-शंखः, लवनम् , मन्थरा, बन्धुरः, किंफलः, कुम्भः । निणः, निक्षेपः । 'कगचज' सूत्रोक्त ।१।१। प्रायः पदकी मण्डूकप्लु ति से अनुवृत्ति करके यह मानना कि आदि मे विद्यमान खकारादिकों को हकार कहीं नहीं होगा, और अनादि मे भी कहीं २ नहीं होगा। आदि मे जैसे-खगः, खुरः, खदिरः, खलः नोट-१८आदेशात्पूर्वमेव सकारस्यैव लोपे सर्वप्रयोगसिद्धौ पुस्तकान्तरे रोनेति बोध्यम् । हृधण-मुद्गर । २ परिध-अस्त्रविशेष । निघस-निगलकर , - प्रा। .

[ ] रक्वमा । सुस्वं, पुक्खरो, रुहो, तुट्ठो, परिभट्ठो, वीसत्या, पत्यिो, एवमादेशान्तरेष्वप्यूह्यम् । उपरि लोपः क ग ड त द प प (१) श साम् ।।८। उपरिस्थितानामपां लोपः स्यात् । भत्त, भुत्तं, सित्यं, विवित्तं, रित्त। सित्थअं, (गस्य ) दुद्धं, मुद्धो, जद्धं, संदिद्धं, सिणिद्धो (डस्य ) खग्गो, छग्गुणो, विग्गहिलो, सज्जओ, छद्धा । ( तस्य ) उप्फुल्लं, उप्पलं उप्पाओ, तप्पिा, उप्पण्णो, (दस्य ) मुग्गरो, मुग्गलो । पन्गओ, ( पस्य) सुत्तो, गुत्तं, लुत्तो, लितं, छुत्तं । (पस्य) सुक्कं,, दुक्कला, चउपकं, विक्कंभो, विट्ठा। मुक्को। (शस्य ) णिच्छिद्दो। णिच्छंदो ( सस्य ) खलिअं, णेहः । अस्फालिअं । कत्त री, थविरो, थूणा, थूलो, थिरो, फुररणा, फुरियं । कस्य स्कष्कतामिति खकारोऽपि । संघथधमा हा शहा एपा हकारः स्यात् । (खस्य) मुहं, मेहला, ३+२३+१६+) नं० ( अ० १२+१३+) से आदेश होने पर द्वित्व पूर्ववर्ण होगा। उपरीति । किसी व्यञ्जन वर्ण के ऊपर मे विद्यमान क-गड-त-द-प-य-श-स इनका लोप हो । उदाहरण-(ककार) भक्तम् , भुक्तम् , सिक्यम् , विविक्तम् , रिक्तम् , सिक्यकम् । (गकार ) दुग्धम् , मुग्धः, जम्धम् , संदिग्धम् , स्निग्धम् , ( डकार ) खगः, षड्गुणः, विडग्रहिल:, रुड्जयः, षड्धा । (तकार ) उकु- ल्लम , उत्पलम् , उत्पातः, तत्पिता । (दकार) मुद्गरः, मुद्गलः, पदतः । (पकार) सुमः, गुप्तः, लुप्तः, लितम् , क्षुप्तम् । (पकार) शुष्कम् , दुष्कला, चतुष्कम् , विष्कम्भः, विठा, मुष्कः । (शकार) निश्छिद्रः, निश्छन्दः । (सकार ) स्खलितम् न्नेहा, आस्फालितम् , कस्तूरी, स्थविरः, स्थूणा, स्यूलो, स्थिरः, स्फुरणा, स्फुरितम् इत्यादिकों मे ककारादिकों के लोप होने पर शेष वर्ण को द्वित्व और द्वितीय को प्रथम, चतुर्थ को तृतीय होगा । परन्तु थविर, घृणा, पिरो, इत्यादि मे आदिभूत को द्वित्व नहीं होगा। यह लोप, द्वित्व, पूर्ववर्ण होना पालीग्राकृत मे समान है। खवेति । सब-यव-मन्दन को इकार हो। स्व के उदाहरण मुखम् , " [ 8 ] परिहा, रणहरो, मुहरो, सही, सेहरो, महो, साहा, णहो । (घस्य ) मेहो णिदाहो, जहणं, अहं, जिहस्सू । दुहणो, परिहो, णिहसो, अमोहो, सरहा, अवहणो । इत्यादि । थकारस्य-सवहो, कहा, मिहुणो, मिहिला, महिओ, रहगुत्ति, तिही, तहागो, सारही । धकारस्य-रुहिरो, गोहिया, गोहा, विहुवणं, णिहाणं, महुरो, णिही, साहू, सेवहीं, विहू, दही, अगाई, जलहरो, महू । भकारस्य-णहो, सोहा, विहावरी, अहिल- सिओ, अहिलासा, अहीरो, गदहो, डिंडहो, पहूओ, पावित्रओ, सुहं, विहवो । इत्यादिः- नानुस्वारासंयोगाच्चेति वाच्यम् । अनुस्वारात्परेषामेषां न हकारः। संखो, लंघणं, मंथरा, बंधुरो, किंफलो, कुंभो । णिग्घिणो, णिक्खेपो । मण्डूकप्लुत्या प्रायः पदानुवृत्तेः आदौ तु कचिदपि न । खग्गो, खुरो, खइरो, मेखला, परिखा, नखरः, मुखरः, सखी, शेखरः, मखः, शाखा, नखः । (धकार) के मेघः, निदाघः, जघनम् , अधम् , जिघत्सुः, द्रुघणः, (२) परिधः, निघसः, अमोघः, सरघा, अपधनः,। थकार के शपथः। कथा, मिथुनः, मिथिला, मथिसः, रयगुप्तिः, तिथिः, तथागतः, सारथिः, धकार के उदाहरण-रुधिरः, गोधिका, गोधा, १ विधुवनम् , निधानम् , मधुरा, निधिः, साधुः, सेवधिः, विधुः, दधि, अगाधम् , जलधरः, मधु । भकार के उदाहरण-नभः, शोभा, विभावरी, श्रमिलपितः, अभिलाषा, आभीरः, गर्दभः, डुण्डुभः, प्रभूतः, प्रभावितः, शुभम् , विभवः, इत्यादिकों मे तत् तत् वर्ण को हकार हुआ है। यह इन वर्णो को हकारादेश पाली मे नहीं होता है । नानुस्वारादिति । अनुस्वार से और संयोग से परे इनको हकारादेश नहीं होता है, जैसे-शंखः, लङ्घनम् , मन्थरा, बन्धुरः, किंफलः, कुम्भः । निणः, निक्षेपः । 'कगचज' सूत्रोक्त ।१।१। प्रायः पदकी मण्डूकालु ति से अनुवृत्ति करके यह मानना कि आदि मे विद्यमान खकारादिकों को हकार कहीं नहीं होगा, और अनादि मे भी कहीं २ नहीं होगा। आदि मे जैसे-खड्गः, खुरः, खदिरः, खल नोट-१८आदेशात्पूर्वमेव सकारस्यैव लोपे सर्वप्रयोगसिद्धौ पुस्तकान्तरे शका रोनेति बोध्यम् । द्रुघण-मुद्गर । २परिध-अस्त्रविशेष । निधस-निमलकर खाने . .

, , [ १० ] खलो। घड़ो, घणो, थिरो, थविरो। धीरो, धम्मो, धणिओ । भाणू , भालो । भीसणो । अनादावपि क्वचिन्न । अधमो, अभओ। इत्यादि । सुखोच्चारणानुकूलाद् व्यवस्था कार्या । अदातो यथादिषु वा ।१।१० । यथादिशब्देषु आदौ अनादौ वा वर्तमानस्य आतः अत् वा स्यात् । जह, जहा। तह, तहा, । पवहो, पवाहो । पहरो, पहारो। पत्रअं, पाअअं । परिआओ, पारिआओ। चमरं, चामरं । उक्खओ, उक्खाओ। हलिओ, हालिओ। 'वाग्रहणस्य व्यवस्थितविभापितत्वात् क्वचिन्नित्यम् ।ठविओ' इत्यादि । युक्तेऽनुस्वारे च नित्यमिति वक्तव्यम् । संयुक्त वर्णे परतोऽनुस्वारे च पूर्वस्य नित्यं घटः, घनः, स्थिरः, स्थविरः, धीरः, धर्मः, धनिकः, भानुः, भालः, भीषणः, । इत्यादि मे हकार नहीं हुअा, कहीं अन्यत्र अनादि मे जैसे-अखण्डः, अधमः, अभयः इत्यादि । यहां भी समास से पूर्व में अादि ही है । अदातो इति । यथादिक शब्दों के अादि अथवा अनादि मे विद्यमान आकार को अकार विकल्प से हो, जैसे-यथा-(नं० १।२०) से यकार को जकार उक्त सूत्र से हकार, विकल्प से इससे अकार होने पर । जह, जहा । एवं तथा के तह, तहा रूप होंगे। प्रवाहः, प्रहारः, प्राकृतं, प्रस्तारः (२११३ ) से स्त को थकार, अन्य कार्य पूर्वोक्त सूत्रों से जानना । पारिजातः, चामरम् । उत्खातः, 'यद्यपि अनुपदोक्त-(पास मे पूर्वोक्त) सूत्रों से बहुलांश मे प्रयोग सिद्ध होते हैं, फिर भी सुखावबोधार्थ साधुत्व दिखायेंगे। नं० । ८ से तलोप । ४ से द्वित्व, ७ से ककार । १ से तलोप । एवम् , हालिकः । सूत्रोक्त वा ग्रहण व्यवस्थित विकल्पार्थक है, तो कहीं नित्य ह्रस्व होगा, जैसे ठवियो । स्थापितः । स्थ को ठ आदेश । नं० १५ से 'प' को व । १ से 'त' लोप । नित्य ह्रस्व । ठवियो। संयुक्त वर्ण परे रहते, और अनुस्वार के योग मे नित्य ह्रस्व हो । प्राप्तः, नोट-कोटिरस्याटनी गोधा, तले ज्याघातवारणे' अमरः । किंफलः-'काफल' इति शिमला प्रान्ते । नं० २० प्रादेर्यो जः नं० १२ ऋतोत् से अकार 'क' । “कगचज' से लोप, परन्तु 'उहत्वादिषु से उकार करके 'पाउड' मानते हैं । २+१२ स्तस्य थः।

[ ११ । हस्वः स्यात् । पत्तो, पुव्वो, पुव्वण्हो, अवरण्हो, बम्हणो, कज्जो, गुणड्ढो, धुत्तो, अस्समो, इस्सरो, उवज्माओ; मुल्लं, रक्खसो, ऊम्मिा, रत्ती, चुण्णं, तिव्वो, बम्हीलिवी, इत्यादि । अनुस्वारे-कंतो, कंचणं, लंकणं, लंगूलं, मंसो, पंसू, संजत्तिओ, संसइओ । इत्यादि (२+३०) सूत्रण हरवे सिद्ध सुखावबोधार्थ युक्तग्रहणम् ..सन्धावचामज्लोपविशेषा बहुलम् ।१।११। सन्धौ कर्तव्ये अचां स्थाने अविशेषा, लोपविशेषाश्च स्युः। बहुलग्रहणादन्यच्च स्यात् । वासेसी पूर्वः, पूर्वाह्नः । अपराह्नः। नं० २६ से ह्रको एह । उभयत्र नित्य ह्रस्व ब्राह्मणः । नं० ३० से म्ह आदेश, नित्य ह्रस्व । कार्यः । नं० २१ से जकार | आदेशस्वरूप होने से द्वित्व । संयुक्ताक्षर परे है अतः नित्य ह्रस्व । धूर्तः, अाश्रमः, ईश्वरः ! उपाध्यायः। नं० २२ से 'ध्य' को झ आदेश, द्वित्व, जकार, नित्य ह्रस्व । उवज्झायो । मूल्यम् । राक्षसः । नं० १६ सेक्ष को ख। ४ से द्वित्व । ७ से ककार। संयुक्त पर होने से नित्य ह्रस्व । रक्खसो। ऊर्मिका । रात्रिः । चूर्णम् । तीव्रः । ब्राह्मीलिपिः। नं. ३० से झको म्ह । संयुक्त पर होने से नित्य ह्रस्व । नं० १५ सेः 'प' को 'व'। बम्हीलिवी। अन्य कार्य पूर्ववत् । अनुस्वार मे-कांतः, कांचनं, लांछनम् , लाङ्गुलम् , नित्य पर सवर्ण होने से संयुक्त परत्व है, परन्तु प्राकृत मे अनुस्वार होगा। अथवा-मांसः, पांशुः, सांयात्रिका, सांशयिकः ! इत्यादिक मे अनुस्वार परक होने से ह्रस्व हुआ । सन्धाविति । अचों की परस्पर सन्धिकर्तव्य रहते अच्के स्थान मे कहीं अज् विशेष कहों लोप, कहीं द्वितीय अच् के विना, व्यञ्जन से योग होने पर भी नोट (८) उपरि लोपः क ग ड त द प ष श साम् । (४) शेषादेश- योर्द्वित्वमनादौ । (१) क ग च ज त द . ( १५) पो वः । (.२६) भष्ण- पण स्नां रहः। (३०) । ह ह ह्येषु नलमां स्थितिरूवम् । (२१) र्यशय्याऽभिमन्युपु जः । (२२) ध्यायोमः। (१६) स्कष्कक्षां खा (७) वर्गेषु युजः पूर्वः ॥ ३ [ १२ ] वासइसी । राएसी, राअइसी । कएणोरो, करणऊरो । कुंभारो, कुम्भारो । अन्धारो, अन्धआरो। तववि, तवावि । ममवि, ममावि । केणवि, केणावि । राउलं, राअउलं । सुहद्धं, तुहअद्ध । महद्ध, मह- अद्धं । पापडणं, पाअपडअं। गंगोदगं, गंगाउदगं । क्वचिद्दीविकल्पो- ऽपि बाहुलकादवसीयते" वारीमई, वारिमई । वईमूलं, वइमूलं । वेणू- वणं, वेणुवणं । केलीकला, केलिकला। तरीपवाहो, तरिपवाहो। थुई वाओ, थुइवाओ। गिरीगमणं, गिरिगमणं । भाणूरोहो, भाणुरोहो । साणूगो, साणुगो । साहूसमागमो, साहुसमागमो। क्वचिद् विक- ल्पेन ह्रस्वोऽपि । जउणतडं, जउणातडं | इसोतो, एईसोतो । बहुमुहं, बहूमुहं । लालपडणं, लालापडणं । दूइहत्थो, दूईहत्थो । चामिअरं, चामीअरं । जंबुणदं, जंबूणदं । इत्यादिकं महाकविप्रयोगानुसृतेः, शुभ- प्रतीतेर्लोकव्यवहाराच्च स्वयं कल्पनीयम् । अचू को आदेश भिन्नस्वरूप दीर्घादि हो । व्यास ऋषित, नं० ( १३ ) से ऋ को इकार । इससे विकल्प से अ इ मिलकर एकार, नं० (२) से य लोप (५) से सकार वासेसी, पक्ष मे वास इसी। एवम्-राजर्षिः के उक्त प्रयोग होंगे, कर्णपूरः । चक्रवाकः, कुम्भकारः । अन्धकारः, तव अपि मम अपि, केन अपि, राजकुलम् , राय उलं । तुह अद्धं । मह अदं । पादपतनम् -पाअपडणं, गंगा उदकम् इत्यादिको के उक्त प्रयोग सिद्ध होते है। नं० (१)+६+२+१३+ ३+५+४+से कार्य करने से प्राकृत स्वरूप होता है। कहीं पर बहुलग्रहण से विकल्प से दीर्घ जानना। जैसे-वारि-मती, रि' की इकार को विकल्प से दीर्घ हो जायगा, वारीमई, पक्ष में वारिमई । नं० १ से त लोप | एवम् -वृति मूलम् मे नं० (१२) से अकार । दीर्घ विकल्प। नोट-नं० (१३) इदृष्यादिषु । (२) अधो मनयाम् । (५) शपोः सः। (१) कगचजतदपयवां प्रायो लोपः । ( ३ ) सर्वत्र लवराम् । (१२) ऋतोऽत् । (६) नो गाः सर्वत्र । (६) खबथधमां हः। (२०) श्रादेयोजः । (१६) टो डः । (१३) स्तस्य य: । (४) शेषादेशयोदित्वमनादौ । (३२) प्रथमद्वि- तीययोस्तृतीयचतुर्थी। , [ १३ ] क्वचिदोकारस्य अत्वमपि-सिरवेपणा, सिरोवेपणा । सररहं, सरोरुहं । मणहरं, मणोहरं । क्वचिन्नैवौकारस्य अत्वम् । मणोरहो, मणोहवो। क्वचित् पूर्वपदान्तस्थस्य अकारस्य वा लोपः। राउलं, राअउलं । पापीढं, पाअपीढं । पालग्गो, पाअलग्गो । क्वचिद् हलपरस्यापि अचो नित्यमादिलोपः। तुम्हे एत्थ, तुम्हेत्य । पूर्वपदस्थस्य-राइंदो।गइंदो। मइंदो। उविंदो। इंदोपो। दीवुज्जलो । मअरंदुज्जाणं । पमदुज्जाणं । महू- सवो। क्वचिन्नित्यमिकारलोपः । तुहत्ति, महत्ति । गोत्ति, दइओत्ति । क्वचिद् यष्टिशब्दस्य वा लकारलोपः। चम्मट्ठी, चम्मलट्ठो! धम्मट्ठी, " वईमूलं । वेणुवनम् । केलिकला । तरिप्रवाहः, स्तुतिवादः, गिरिगमनम् , भानु- रोषः, सानुगतः, साधुसमागमः । दीर्घ विकल्प के अतिरिक्त (नं०६+४+६) से तत्तत्कार्य जानना। कहीं पर विकल्प से ह्रस्व भी होता है। जैसे-यमुना तटम् , मे प्राकार को विकल्प से ह्रस्व करने पर, जउणतडं, पक्ष मे जउणातडं । नं० २०४६+ १६ +४+६+२+१३ + से प्रयोगोक्त अन्यकार्य जानना । नदी स्रोतः, बधू- मुखम् , लालापतनम् , दूतीहस्तः, चामीकरम् , जम्बूनदम् । इत्यादि में विकल्प से ह्रस्व हुआ है। यह ह्रस्व दीर्घ व्यवस्था प्राकृत प्रयोक्ता महाकवियों के प्रयोग से, सुखप्रतीयमान उच्चारण से तथा लोक व्यवहार से स्वयं कर लेना चाहिये । बहुल ग्रहण से कहीं अोकार को अकार भी होता है । शिरोवेदना । सरोरु- हम् , मनोहरम् । कहीं पर अोकार को अकार नहीं होता है । मनोरथः, मनो. भवः। यहां प्रोकार को अकार नहीं होगा । कहीं पर पूर्वपदान्तस्थ अकार का विकल्प से लोप होगा । जैसे-गजकुल का राउलं, राप्रउलं। एवं पादपीठं के पापीठं, पाअपीटं। पादलग्नः । कहीं हल् परे रहते भी आदिस्थ अच् का नित्य नोट--(५) शषोः सः (१) कगचजत पयतां प्रायो लोपः। (६) नोदण: सर्वत्र । (६) खघयधभा हः । (२+१२) ठस्य ढोपि वक्तव्यः । (२) अधो- मनयाम् । (१२) ऋतोऽत् । (२+१६) दशादिषु हः (१७) संख्यायाश्च । (३) सर्वत्र लवराम्। इन सूत्रों से उक्त प्रयोग सिद्ध होंगे। ।

[ १४ ] धम्मलट्टी। क्वचिद्ग्रहणान्नेह । असिलठ्ठी। बहुलग्रहणात् क्वचित्स- धिरेव न भवति । मुहअंदो, परिअरो, उवारो । पईवो, दुराआरो विआलो । क्वचित्सस्य लोपे श्रोत्वम् । परोप्परं । क्वचिद् एत्वम् , अन्तेउरं तेरह । तेवीसा। तेत्तीसा । क्वचिदेकस्मिन् पदेऽप्योत्वम् । पुणोपुरणा । सर्वमपीदं महाकविप्रयोगात् प्रचलितप्रयोगाच्चावगन्तव्यम् । सर्वम- पीदं यथायथं परावर्तयितुं विधातुं च शक्यते । लोप होता है । तुम्हे एत्य आदिस्य एकार का लोप : तुम्हे त्य । कहीं अच् के परे नित्य अच् का लोप | राजेन्द्रः, राज इन्द्रः । रा इन्द्रों । गजेन्द्र', गग्रइंदो । ग- इंदो मृगेन्द्रः, माइंदो। मइंदो । उपेन्द्रः, इन्द्र गोपः। दीपोज्ज्वल., मकरंदोद्यानम् , प्रमदोद्यानम् , मधूत्सवः, राजेन्द्रादि शब्दों में प्रकार का लोप, मधूत्सव में उकार का । कहीं पर इकार का नित्य लोप हो । तुह इति । मह इति । गत इति । दयित. इति । इतेस्तः पदादेः (२+२८)। इससे इकार को तकार हो जाने से तुह इति का तुहत्ति, मह इति का महत्ति इत्यादि में सर्वत्र तकार हो जायगा फिर तकारा- देश के लिये इष्टि मानना निष्प्रयोजन है । कहीं पर यष्टि शब्द के लकार का विकल्प से लोप हो। चर्मयष्टिः, धर्मयष्टिः । बहुलग्रहण से कहीं लोप नहीं होगा। असियष्टिः । प्रायः संयुक्त वर्ण पूर्व रहते लकार का लोप होगा। कहीं सन्धि प्रयुक्त कुछ भी नहीं होगा। मुखचन्द्रः, परिकरः, उपकारः, प्रदीपः, दुराचारः, विकालः । कहीं सकार का लोप प्रोत्व होगा । परस्परम् । कहीं पर एकार । अन्तः पुरम् । त्रयोदश । त्रयोविंशतिः । त्रयस्त्रिंशत् । कहीं पर एक पद में भी अोकार । पुनः पुनः। यह सन्धिसंबन्धी भिन्न तरह का कार्य महाकवियों के प्रयोग से तथा प्रचलित प्रयोगों से जानना ।. प्राकृत प्रयोगों को देखकर कार्य की कल्पना कर वर्णागम वर्णविकार वर्ण लोप यादि की कल्पना कर लेना चाहिये । इसी तात्पर्य को लेकर-- बहुल पद का निर्वचन करते हुये पूर्वाचार्यों ने कहा है कि जिस सूत्र मे बहुल पद पडा हो उसकी कहीं प्रवृत्ति हो और कहीं अप्रवृत्ति हो, कहीं विकल्प से उस सूत्रोक्त कार्य हों और कहीं अन्य ही प्रकार के कार्य हो । इस प्रकार विधि के अनेक प्रकार के आगम आदेशादि को देखकर चार प्रकार के बहुल पद प्रयुक्त -- [ १५ तथा चोक्तम्- क्वचित्प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः, क्वचिद्विभाषा क्वचिदन्यदेव । विधेविधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विषं बाहुलकं वदन्ति । ऋतोऽत् । १ । १२ । ऋकारस्य अन् स्यात् । तरहा । नत्र । कण्हो। इदृष्यादिषु । १ । १३ । ऋष्यादिषु शब्दषु वा इकारः स्यात् । इसी। मसिणं, मसणं । धिट्ठो, घट्ठो । विसहो, बसहो । दिढो, दढी। मिगो । गिट्ठी। कि। गिद्धं । भिंगो, भिंगारो, सिंगारो, किपागों ! किपणो। किपा। सिालो, हि (ययं) अयं । विट्ठी, दिट्ठी । एवम्- कार्यों को मानते हैं। तो तदनुरूप शब्द स्वरूप देखकर आदेशादि की कल्पना करके रूपसिद्धि करना। ऋत इति । ऋकार को अकार हो। तृष्णा । (नं० २६) से प्रण की राह आदेश । नृत्यम् (नं १७) से त्य को चकार द्वित्व । कृष्णाः । नं० २६ राष्ट्र आदेश । द ठः इत्यादि मे पक्ष मे इससे अकार । इण्यादीति । ऋष्यादिक शब्दों मे विकल्प से इकार हो। 'या' ग्रहगा की व्यवस्थित विकल्प मान कर ऋषि मे तया मृङ्गादिक मे नित्य इकार होगा। ऋषिः (नं० ५) से ष को स । मणम् । धृष्टः (नं० २+१२) सेप्ट का । वृषभः (नं० ५) से ष को स । (E) से भ को इकार । दृढः। मृगः । गृष्टिः पूर्ववत् ठकार । कृतम् । गधः (नं० ३) रेफ लोप । नित्य इकारादेश के उदाहरण । भृतः । भृङ्गारः । शृङ्गारः नं०५ से श को स । कृपाणः । कृपाः । कृपा । शृगालः । नं० १ से ग लोप । हृदयम् । हियय प्रयोग प्रसिद्ध है। 'अवों यः श्रुतिः' से यकार । हिअयं का उच्चारण असुखकर है । विष्टिः, दृष्टिः, सृष्टिः, । तीनों मे (नं० २+१२ से ) को ठ । ४ से द्वित्व । ७ से ८ श्रादेश । वृथा, कृमिः, वृषध्वजः (नं० ५ से) को स३ से वलोप । द्वित्व, दकार पूर्ववत् नोट-नं० (२६) ह न घ्या पण मा रहः । (१७) त्यथ्यद्यां चछजाः । (५) शषोः सः । (२+१३) टस्य ठः । (E) खवयमा हः । (३) सर्वत्र लवराम् [ १६ ] सिट्टी। विथा । विसद्धो । किती । किच्चा। धिई । दिटुंतो ! निपो। अन्ये लोकव्यवहारात ऋष्यादिपु-ऋत्वादिपु वा वोध्याः । उदृत्वादिषु । १ । १४ । ऋत्वादिपु शब्देपु ऋकारस्य उ: स्यात् । उदू । पउत्ती । वुत्तंचो । मुणालं । पुहवी। मुअो । पाउसो । परहुओ। भाउओ, जमाउओ । पिट्ठो, पुट्ठो । इह उभयमपि । पुहवी । मुसा, मुसा- वाओ। वरुणरुक्खो । इत्यादियूकारः । पो वः । १ । १५ । अनादौ विद्यमानस्य पकारस्य वः स्यात् । कवोलो, उल्लावो । कवालो, उवमा । सावो, सवहो । लिवी, निवो, ज लोप १ से, कृतिः । कृत्या, नं० १७ से चकार, ४ से द्वित्व । धृतिः, दृष्टान्तः, नृपः। अन्यशब्द ऋग्यादिकों मे अथवा ऋत्वादिको मे लोक व्यवहार अथवा स्वरूपानुसंधान से जानना। उदृत्वेति । ऋत्वादिक शब्दों मे ऋकार को उकार हो । ऋतुः । (नं० २६ से) त को द । प्रवृत्तिः वृत्तान्तः (नं० १० से अथवा ३२ से) या को अकार। मृणालम् । पृथवी। (नं० ६ से ) थ को हकार । मृतः । प्रावृट् । परभृत् । पूर्वोक्त : से म को इकार । भ्रातृकः, जामातृकः । केवल क प्रत्यय रहित भ्राता का भाया होगा । “भाय' शब्द प्रसिद्ध है। जामात्म का जमाया होगा, यथादि से ह्रस्व । जमायी प्रसिद्ध है | पृष्ट यह ऋष्यादिकों मे और ऋत्वादिकों मे है। दोनों प्रकार के रूप मिलते हैं । पूठ पंजाव में, पीठ विहार यू. पी. यादि मे । पृथवी, मृषा, मृपावादः । वरुणवृक्षः । इत्यादि ऋत्वादि में जानना । पो वः इति । अनादि मे विद्यमान पकार को वकार हो । कपोलः, उल्लापः, कपालः, उपमा । शापः, शपथः। नं० ५ से श को स । 2 से य को इकार । टिप्पणी(१)मृग शब्द का मत्रो, गृल का गद्धो, गृष्टि का गद्दी इत्यादि वसन्तराज और सदानन्द मानते हैं, ये लोकन्यवहार-विरुद्ध हैं। व्यवस्थित विभाषा से भृङ्ग कृपण शृङ्गारादि शब्दों के समान इन में मी नित्य ही इत्व होगा । (२) कृपाणा, कृपण-कृपा में 'प' को व आदेश लोक विरुद्ध होने से सूत्र को वैकल्पिक मान कर नहीं लगेगा। ।

[ १७ ] वारो, उवगो, उवलद्धी । कवोदो। कविला । अनादावित्युक्त ढमो, परिअरो, परायो। परिणामो इत्यादि । टोडः। १ । १६ । टस्य डः स्यात् । घडो। कडओ। पडो। अडवी । विडवी । सडा ! धुज्जडी। णडो । रडणं । पाडली । त्यथ्यद्यां चछजाः।१।१७ । एषां यथासंख्यमेते आदेशाः युः। (त्यस्य) पच्चक्खो। मच्चलोओ । सच्चं । णिच्चं । किच्चा। आदिच्चो । पच्चूहो। अच्चओ। अवच्चओ । पच्चओ (थ्यस्य) रच्छा । मिच्छा । णेवच्छं । पच्छभोअणं । मिच्छादिट्ठी । तच्छवाणी। पच्छा । (यस्य) अज्ज । विज्जा । जूअं । मज्ज । पडिवज्जइ । अवज्ज। उज्जोओ । उज्जाणं । सज्जो । पज्जा । नृपः । नं० १३ से ऋ को इकार । उपकारः, उपगतः, उपलब्धिः, नं० १ से ककार तकार का लोप । लब्धि मे नं० ३ से ब लोप, ४ से द्वित्व, ७ से धकार को दकार । कपोतः, कपिला, इत्यादिकों मे पकार को वकार होगा। आदिस्थ पकार को वकार नही होगा । यथा-पढमो, परिकरः, परागः, परिणामः । इत्यादिकों मे प्रादिस्थ पकार को नकार नहीं होगा। टो डः इति । 'ट' को ड आदेश हो । घटः, कटकः, पटः, अटवी, विटपी, सटा, धूर्यटिः, नं० २१ से ये को जकार द्वित्व । न० २+३० से ऊ को उकार । नटः, रटनम् । न० ६ से नकार को णकार । त्यथ्येति । त्य थ्य द्य इनको क्रम से च छ ज ये आदेश हों। (त्य का) प्रत्यक्षः, मर्त्यलोकः, सत्यम् , नित्यम् , कृत्या । आदित्यः, प्रत्यूहः, अत्ययः, अपत्यकः, प्रत्ययः । (थ्य का) रथ्या, मिथ्या, नेपथ्यम् , पथ्यभोजनम् । पथ्य का 'पथ प्रसिद्ध है । मिथ्या दृष्टिः, तथ्यवाणी। पथ्या, । (ध का ) अद्य, विद्या, द्यूतम् , मद्यम् , अवद्यम्, उद्योगः, उद्यानम् । सद्यः, पद्या। नं० (५)शपोः सः। (६)खघयधमा हः । (१३) इदृष्यादिषु । (१) कगचजतदपयवां प्रायोलोपः । (३) सर्वत्र लवराम् । (४) शेषादेशयोदित्वमनादौ । (७) वर्गेषु युजः पूर्वः। (२१) र्यशय्याभिमन्युषु जः ! (६) नो णः सर्वत्र । (२-३०) युक्त श्रोत उत् आदीदूतां ह्रस्वश्च । प्रतिपद्यते, २ , [ १८ ] अक्ष्यादिपु छः । १।१८ । एषु क्षस्य छकारः स्यात् । वस्या पवादः । अच्छीइ । छीरं । छुरो। छारं । कुच्छी। इच्छू । मच्छिा। लच्छणं । रिच्छो । लच्छी । कच्छा। चिच्छेव। सिच्छा । छुहा । छो। छित्ती। कस्कक्षां खः। श१४ा कस्कक्ष इत्येतेषांवा खःस्यात । सुक्खं, पक्षे सुक्कं । पुक्खरं, पुक्करं। णिक्खो, णिक्को । णिक्खुहो, णि- क्कुहो । णिक्खमणं । णिक्कमणं। (स्कस्य ) खंधो । खंधसाला, मण्डूकप्लुत्या बहुलग्रहणमनुवय॑ते, तस्य व्यवस्थितविभाषितत्वात्क्व चिन्न खादेशः। दुक्कर, णिक्कवो । दुक्किई, णिक्कासियो । णिक्कला। सक्कलं, सकारो, णमक्कारो। तकरो । मकरो । उवकरो। अक्ष्यादिष्विति । अक्षि इत्यादिक शब्दों के 'च' को छ आदेश हो । वक्ष्यमाण "कस्कक्षा खः” इससे प्राप्त खादेश का अपवाद है। अक्षिणी, क्षीरम् , तुरः, क्षारम् , कुक्षिः, “इ च्छू,-इक्खू , मच्छिया,-मक्खिया, लच्छणं -- लक्खणं" इन मे छादेश और 'खादेश दोनों प्रकार के रूप देखे जाते हैं: । रिच्छो, लच्छी, कच्छा, चिच्छेव सिच्छा, छुहा, छो, छिती। इत्यादिकों मे सर्वत्र क्ष को छकारादेश होगा। कस्केति । एक-स्क-क्ष इन को ख अादेश हो। शुष्कम् , नं०५ से 'श' को 'स' । ४ ते द्वित्व । ७ से ककार । पक्ष में नं० ८ से पलोप । ४ से द्वित्व । एवम् , पुष्करम् । निष्क्रयः । नं० ३ से रेफलोप । ६ से णकार । निष्क्रुधः। नं०६ से धकार को हकार । अन्य कार्य पूर्ववत् । निष्क्रमणम् । (स्क का) स्कन्धः, स्कन्धशाला । इस सूत्र मे मण्डूकप्लु ति से बहुलग्रहण की अनुवृत्ति करना । और अनुवर्त्यमान बहुलग्रहण को व्यवस्थितविकल्पार्थक होने से कहीं २ नोट-नं० (५) शषोः सः । (४) शेषादेशयोढित्वमनादौ । (७) वर्गेषु युजः पूर्वः । (८) उपरि लोपः कगढतदपषसाम् । (३) सर्वत्र लवराम् । (६) नो णः सर्वत्र । (६) खघथधमां हः ।

[ १६ ] तिरक्कमओ । (क्षस्य) जक्खो। रक्खसो। भिक्खा । पक्खेवा। णिक्खेव । खीरोदो । खमा । खणा । खारो। णक्खत्तं । आदेयों जः। १ । २० । आदिभूतस्य यकारस्य जः स्यात् । जामिणी,जोव्वणं। जक्खों। जुवई ।जती (ई) जहेच्छि। जुत्तिसंगओ। जोगा । जोजणं । जुअलं । आदावेवेत्युक्तर्नेह । अवश्रवा। अश्रणं । वाअसेो । दआ (या) लू । पोहरो। समासे भूतपूर्वमादित्वमादाय जकारः। बालजुबई । संजमा । अजेोग्गा । संजोगा। णरजुचलं । रुद्दजा- गा। दीणजाचणा । वीरजाहो । खीणजवा। सुजाचओ। ध्यह्ययोः ।।२१। एतयोझः स्यात् , (ध्यस्य ) संझा, वंझा, पर 'ख' आदेश नहीं होगा। दुष्करम् । निष्कृपः । दुष्कृतिः, निष्कासितः, निष्कला, संस्कृतम् । नं० २१ २२ से अनुस्वार विकल्प । संस्कार । नमस्कारः। 'एसो- पंच णमुक्कारो" इस उकारयुक्त का भी आर्ष प्रयोग मिलता है। तस्करः, उप- स्करः, तिरस्कारः। (क्ष का) यक्षः । राक्षसः । नं० २० से य को जकार । नं० २।३० से 'रा' को र । भिक्षा, प्रक्षेपः, निक्षेपः, क्षीरोदः । क्षमा । क्षणः। क्षारः । नवत्रम् । निक्षेप प्रक्षेप में नं० १५ से पकार को वकार । आदेरिति । आदिभूत यकार को जकार हो यामिनी। य को ज । नं०६ से न को ण । योवनम् । नं० २+ २३ से द्वित्व । यदः, युवतिः, यतिः । यथेप्सि- तम् , युक्तिसंगतः, योगः, योजनम् , युगलम् , आदि में विद्यमान ही यकार को जकार होगा। यहां नहीं होगा, जैसे अवयवः, अयनम् . वायसः, दयालुः, पयोधरः । समास होने पर भूतपूर्व आदि मानकर जकारादेश होगा । बाझयुवतिः, संयमः, अयोग्यः, संयोगः, नरयुगलम् , रुद्रयागः । दीनयाचना । वीरयोषा, दोणयवः । सुयाचकः । लोप णकारादि पूर्ववत् जानना । ध्यायोरिति । ध्य-ह्य-इनको झकार श्रादेश हो । जैसे (स्य के) संध्या, वक्ष्या ध्य को झ आदेश । अनुस्वार से परे झकार है अत: द्वित्व नहीं होगा। क्योंकि (२०) श्रादेर्यो जः। २ + २३ नीडादिषु ॥ (११ सन्धौ अवलोपविशेषाबहुधम् ।

[ २ ] उसमायो, विमा यता, मका, जाओ, अमझा बुझाइ, अवमी, (यस्य ) मन, गुळ, मंगजन्मइ, मुम्का, बम, मंदिमाई, आरुम, नग्न, असम, अगि, समुन्न । अत्युमा छः ।।२२। एषां छः स्यात् , लापा पवादः । (श्चत्व) णिच्छा, पच्छिमा, पच्छानाची, अच्छरियो अन्य वैकल्यिकत्वात् अचरि- चापच्छिमईयो। पच्छची। (वय) बच्छो । उच्छाहां। मच्चा।पिपिच्छा। मच्छरा । मुंबच्छरा। बुभुच्छा । (खन्य) लिच्छा, जुगुच्छा । अच्छरा । मुमुच्छा । तुन्नुच्छा । इत्यादि । दीव ईकर असर र चतुतार से परे वणं को द्वित्व नहीं होना अतः अनुवार से परे काम होने से द्वित्व नहीं हुअा । एवम्-विध्याचलः में घ्य को भकार द्वित्वाभाव जानना,उपाध्याय, नव्यः त्वाध्यायः । नं० २+३० ने छल । अमध्यः बुध्यते, अवच्यः । ( छ के ) मह्यम् , गुथम् । संनयते, मुद्यति । वायन, नंदि- झते । अान्यम् । नेयम् । अनाम्, अवयन् , सम्बन्। (नं० १३ में) REE मे इक्रार । समृध में (नं० २+३० में) को उकार ।

-- [ २१ । यशय्याभिमन्युषुजः ।१।२३। एषुः जः स्यात् । कन्नं । पन्नतं । अन्नपुत्तो । धुज्जो । णिज्जाणं। पज्जायो । पन्नपासणा । पन्जडणं । भजा। मज्जादा । सेज्जा । अहिमज्जू । ऋत्वादिषु तोदः।।२४। ऋतुतुल्येषु शब्देषु तकारस्य दः स्यात् । उदू । खादी । पतारिंदो । रदी। पीदी। एषु दकारादेशः प्रायः शौरसेनी- मागध्योरेव द्रष्टव्यः, प्राकृते तु लोप एव । हरिद्रादीनां रो लः ॥१॥२५॥हरिद्राशब्दसदृशेषु रेफस्य लः स्यात्। हलिदा, मुहलो, सुकुमालो, जुहिट्ठिलो । किलातो, पलिया। क्लिष्टश्लिष्टरत्नक्रियाशार्गेषु तत्स्वरवत्पूर्वस्य ।१।२६। क्लिष्टादिषु यशय्येति । इन शब्दों के संयुक्त वर्ण को जकार हो । कार्यम्, पर्यन्तम्, आर्य- पुत्रः, धुर्यः, नियाणम्, पर्यायः, पर्युपासना, पर्यटनम्, भार्या, मर्यादा, शय्या. अ- भिमन्युः । संयुक्त वर्ण पर रहने से नं० २+३० से ह्रस्व । ऋत्वादिष्विति । ऋतु सदृश शब्दों मे तकार को दकार हो । ऋतुः, ख्यातिः, प्रतारितः, रतिः, प्रीतिः । यह दकारादेश प्रायः शौरसेनी और मागधी मे ही होता है । प्राकृत में तकार का लोप होगा। हरिद्र ति । हरिद्रादिक शब्दों के रेफ को लकार आदेश हो, नं० ४ से रलोप, २ से द्वित्व । एवम् मुखरः, सुकुमारः, युधिष्ठिरः, नं• २० से जकार । से घ को हकार | ८ ने प लोग। ४ से द्वित्व, ७ से टकार । जुहिटिलो । किरातः परिधा । पुलिसो, सुलसा ।

. [ २२ ] शब्देषु युक्तवर्णस्य विप्रकर्षो भवति, विकर्षे युक्तस्य पूर्ववर्णे तत्स्वरता च भवति । क्रिलिटुं । सिलिटुं । रअप, किरिआ, सारंगो। इन हीश्रीक्रीतक्लान्तक्केशम्लानस्वमस्पर्शादर्शहर्षाहंषु ।।२७ ह्री श्री इत्यादिषु युक्तस्य विप्रकर्षः, पूर्वस्य च इकारः । हिरी, सिरी । किरीतो, किलंतो, किलेसो, मिलाणो, सिविणो । स्पर्शादिषु वेत्यनुवर्तते । तेन, फरिसो, पक्षे, फंसो। एवम्, दरिसणं, दसणं। कचिन्नित्यम् । आदरिसो। हरिसो, अरिहो। कचिदन्यत्रापि ।१।२८। युक्तवर्णस्य विप्रकर्षः, पूर्वस्य इकारः, तत्स्वरवत् वा कचिदन्यत्रापि भवति । यथा प्रयोगमनुसंधेयम् । अमरिसो, वरिसो। वरिसवरो । वरिहिणो, गरिहा, गरिभिणि, गरिवो । वरिगो, मिलाणो, गोसमो। पिलासो, पिलुट्ठो, सिणाऊ, सिलोओ, वइरं । तत्स्वरवत् , यथा-खमा, सला (हा) घा। कचिदिकल्पेन । कसणो, कएहो । पुरिमं, पुवं । इकार ककार पृथक करण में लगेगा, और 'न' में तकार के साथ अकार ल. गैगा । क्लिष्टम् , श्लिष्टम् , क्रिया, इनमें इकार पृथक् वर्ण के साथ लगा। रत्न, शाङ्ग में अकार, क्यों किल में और शाङ्ग में प्रकार है। इदिति । हो श्री इत्यादिक शब्दों में संयुक्त वर्ण का विप्रकर्ष और विप्रकृष्ट पूर्ववगा के साथ इकार होगा। जैन- होः, श्रीः, क्रीतः, क्लान्तः, क्लेशः, म्लानः, स्वप्न में नित्य 'वा' पद को अनुवृत्ति करके स्पर्श, दर्श में विकल्प से श । स्पर्शः, मूल में उदाहरण उक्त है । दर्शनम् , अादर्शः, हर्षः, अर्हः। क्वचिदिति । कहीं अन्यत्र भी युक्त वर्ण का विप्रकर्ष और विप्रकृष्ट पूर्व वणं के साथ इकार हो, तथा कहीं तत्स्वर-युक्त हो । व्यवहृत प्रयोगानुकूल कल्पना कर लेनी चाहिये।अमर्षः, वर्षः, वर्षवरः, वहिणः, गर्दा, गर्भिणी, गर्वः, वर्गः, म्लानः, ग्रीष्मो, लोषः, प्लुष्टः, स्नायुः, श्लोकः, वज्रम् । विप्रकृष्ट उत्तर वर्ण स्वरवत् । जैसे. क्ष्मा का खमा, श्लाघा-सलपा । कहों पर विकल्प से। कृष्ण : का कसणो कण्हो । पूर्व में विकल्प से इकार । पूर्वम् का पुरिमं, पुन्वं । के " [ २३ ] हनष्णक्ष्णनां एहः ।।२६। एषां एहः स्यात् । ह्रस्य-जण्डु- तणया,अवण्हवो, वण्ही. जगहू (नस्य) राहाणं । पएहुदं । एहातको, एहुसा। जोण्हा, (ष्णस्य ) विरहू, जिण्हू । कण्हो । सतिण्डो, उरहो, पिण्हाओ,भविण्हु जिण्हू (दणस्य)तिएहं । निशितार्थे तु तिक्खं! सलएह। अहिण्हं । अहिक्खणं इति वयम् (नस्य) पण्हा, विण्हो, अण्हन्तो । अस्य वैकल्पिकत्वात् तिसणा, कसणो, किसणो इत्याद्यपि । हल षु णलमां स्थितिरूव॑म् ।१।३०। एषु णलमां स्थितिरूज़ भवति । पुव्वएहो, अवरोहो, पण्हो । हहह्मषु नलमां स्थितिलमि- त्युक्तौ ह्रग्रहणस्वीकारे पूर्वसूत्रे ह्रग्रहणं व्यर्थमेव स्यात् । तस्मादन हग्रहणं- स्वीकर्तव्यम् । (हस्य) कल्हारं, आल्हादो। पल्हादो । पण्हिण्णो। ह्रस्नेति । इन वर्गों को एह आदेश हो। ( ह्रके ) उदाहरण- जह्नुतनया, अपह्नवः, वह्निः, जगुः, (स्तके) स्नानम् । प्रस्नुतम् , स्नातकः, स्नुषा, ज्योत्स्ना, (ष्णके) विष्णुः, जिष्णुः, कृष्णः, सतृष्णः, उष्णः, निष्णातः, भविष्णुः, जिष्णुः, (क्ष्ण के) तीक्ष्णम् , ( नं० २+३) से ह्रस्व इकार । निशित-तीखा अर्थ मे तिक्खम् । श्लक्ष्णम् । नं० ८ से शकार का लोप | अभीक्ष्णम् । नं० ६ से भ को हकार । (२+३ से) इकार | कोई आचार्य अभिक्खणम् मानते हैं। (नं० २८ से विप्रकर्ष होगा।) १६ से ख आदेश । ४ से द्वित्व । ७ से ककार ! लोकप्रयोगानुकूल व्यवस्था जानना। (श्न के) प्रश्नः, विश्नः, अनन् । ह्र हति । ह्रह्म इन वणों मे णकार-लकार-मकार-की ऊर्वस्थिति हो । अर्थात् वर्णव्यत्यय हो, (ह के उदाहरण -) पूर्वाह्नः, अपराह्वः, प्राहः । वसन्तराजादिक सूत्र में 'ह' ग्रहण मानते हैं, वह अयुक्त है, स्योंकि 'हन' इस पूर्वसूत्र से बहादेश सिद्ध ही था, फिर 'ह' ग्रहण व्यर्थ हो जायगा । और यहां नोट--(२+३) इदीतः पानीयादिषु । (नं०८) उपरि लोपः कगडतदप- षसशाम् । (६)खवयधर्मा हः । (२८) कचिदन्यत्रापि । (१६) कस्कक्षा खः । (२) शेषादेशयोदित्वमनादौ । (७) वर्गेषु युजः पूर्वः। (२+ २२ ) चौर्यसमेषु रियः । (१०) अदातो यथादिषु वा । १३ इहष्यादिषु । १ [ २४ । (झस्य) जिन्हो, बम्हणो, बम्हपुत्तो, बम्हस्सं, बम्हसू, बम्हाणी, बम्हचरियं, बम्ही, बम्हंडं । इति । इदीवत्पकस्वमवेतसव्यजनमृदङ्गाङ्गारेषु ११३१॥ईषदादिषु शब्देषु श्रादेरत इकारः स्यात् । इसि । पिकं । विप्रकर्ष इकारश्च । सिविणो । । । . तो ह मानना चाहिये 'हन' नहीं, क्योंकि फिर तो पूर्वाहणः इत्यादि मे रहा. देश होही नहीं सकेगा । तस्मात्-'हह म' मानकर हकार णकार मानना चाहिये। 'ह' के उदाहरण-कहलारम् । आह्लादः, प्रहलादः, प्रहलिन्नः । म के उदाहरण- जिह्मः, ब्राह्मणः, ब्रह्मपुत्रः, ब्रह्मस्वं, ब्रह्मसूः ब्रह्माणी, ब्रह्मचर्यम् । ( न० २ + १६ से 2 को रिय अादेश। ब्राह्मी नं० २+३० से श्राकार को प्रकार | ब्रह्माण्डम् । इदीषदिति । ईषत्-पक्क स्वप्न-वेतस-व्यजन-मृदङ्ग और अङ्गार शब्द के प्रथम अकार को इकार हो । तात्पर्य यह कि ईषत् , वेतस, मृदङ्ग शब्दों मे आदित्य अकार नही है, परन्तु प्रथम अकार के ग्रहण से षकारगत तथा वेतस मे तकार- गत और मृदङ्ग मे दकारगत अकार का ग्रहण होगा । ईषत्-नं.२.३ से अथवा नं० ११ से ईकार को ह्रस्व । नं० ५ से षकार को सकार । प्रकृत सूत्र से इकार, नं० २+३४ से अन्त्य हल का लोप । इसि । पक्वं । नं. ३ से वकार का लोप । ४ से द्वित्व । नं० २+३१ से इकार ! पिकं । स्वप्नः । नं० २८ से सकार, वकार का विप्रकर्ष, पूर्व वर्ण के साथ इकार | नं० १५ से पकार को वकार । ३१ से इकार । ६ से पकार । २+३१ से अोकार । २+३४ से सुलोप सिविलो। वेतसः । ० १+३१ से अकार को इकार । २+२७ से तकार को है। वेडिसो। न्यजनम् । प्राकृतत्त्वात् पुंलिङ्ग । नं० २ से यलोप । ३१ से नोट नं० २+३-इदीतः पानीवादिषु । ११ सन्धौ अप्लोपविशेषा बहुतम। ' षोः सः । २+३४ अन्त्यस्य हलो लोपः । ३ सर्वत्र लवराम् । ४ शेषादे- रायोदित्वमनादौ । २+३१ इदीपत्तक ० । २७ इत् ही श्री क्रीतलान्त क्लेश- खान-स्वप्न-पर्शादर्श-हर्षापु । १५ पोवः । नो णः सर्वत्र । २-३१ अत श्रोत् सोः।

" [ २५ ] वेडिसो, विअणो, मिइङ्गो, इङ्गालो । अनादावयुजोस्तथयोदधौ २३२। अनादौ विद्यमानयोरसंयुक्त- योस्तथयोदधौ स्तः । (तस्य ) मारुदी । मन्तिदा । लदाओ । दिक्खिदो। कदम । साउदलं । ताद । लम्भिदा । एदे । अदिक्कतो । (थस्य) अध। गाधाओ। अधवा । कधा, जधाजधं । प्रथमद्वितीययोस्तृतीयचतुथौं (२३२) वर्गाणां प्रथमद्वितीययोस्तु- • इकार । १ से जलोप १६ से नकार को कार | विश्रणो । मृदङ्गः । नं० १३ से ऋ को इकार । १ से दलोप । ३१ से इकार । मिहङ्गो। अङ्गारः। प्रकृतसूत्र ३१ से इकार । २५ से रेफ को लकार । इङ्गालो। अनादाविति । अनादि मे विद्यमान, असंयुक्त तकार थकार को दकार धकार हो । अर्थात् त को द, और थ को ध। तकार को जैसे-मारुतिः मन्त्रिता। नं. ३ से रेफ लोप । मन्तिदा । लताः। दीक्षिताः। नं. १६ सेक्ष को ख । ४ से द्वित्व । ७ से ककार । २+३० से ईकार को ह्रस्व । प्रकृत ३२ से सर्वत्र तकार को द । एवम-कतमं, शाकुन्तलम् , नं० ५ से श को स । १ से कलोप । उक्त प्रकृत सूत्र से 'त' को 'द' । इसी प्रकार, तात लम्भिता, एते, अतिक्रान्तः, इत्यादिकों मे सर्वत्र तकार को द आदेश होगा। थ के । अथ । गाधाः । अथवा । कथा। यथायथम् । समास होने पर पूर्व में आदिस्थ मान कर नं० २० से दोनों यकारों को जकार होगा, यहां सर्वत्र थकार को धकार होगा। प्रथमेति । कवर्गादि वों के प्रथम और द्वितीय अक्षर को तृतीय श्रार चतुर्थ हो । इस से पूर्व सूत्रस्थ तकार थकार को दकार धकारादेश गतार्थ है यह शङ्का नहीं करना । क्यों कि 'त' को 'थ'द' को 'ध' शौरसेनी में ही होगा, प्राकृत में लोपादिक ही होगा, और पूर्व सूत्र से शौरसेनी में नित्य द ध होंगे। यह वैकल्पिक करता " १ क ग च ज त द पयवां प्रायो लोपः । २५ हरिद्रादीनां रो लः । १६ क. स्कक्षां खः । ७ वर्गेषु युनः पूर्वः। ३० युक्ते श्रोत उत् आदीदूतां ह्रस्वश्च । २० प्रादेयों नः।

.. [ २६ ] तीयचतुर्थों स्तः । एगे आया । एगोहं । विगई। एगलठाणा । (द्वितीय- स्य) असढो । जढरो । कमढो। पूर्वसूत्रं तु शौरसेन्यामेव, अयं तु प्राकृते- ऽपि । 'टो डः' इति नित्यार्थम् । नज्ञपश्चाशत्पञ्चदशेषु णः १।३३। नज्ञयोः पञ्चाशत्पञ्चदशयोर्ण- कारः स्यात् । प्रज्ञयोः संयुक्तत्वात्पञ्चाशत्पञ्चदशयोः संयुक्त एव वर्णो गृह्यते । पन्नएणो। जगणों। विएणाणं, पएणवणा। विएणत्ती । पएणासा, परणरहो। है । जैनागम तथा महाकवियों के प्रयोग से जानते हैं, कि असंयुक्त वर्णगत लोपादि आदेश प्रायः वैकल्पिक होते हैं। एकः अात्मा। एकोऽहं एगोऽहं णत्यि मे । कोवि गाहमण्णस्स कस्सइ । एवं अदीणमण सो अप्पाणमणुसासए' इत्यादि । विकृतिः । नं० १२ से १ को अकार | नं० से तलोप । २+३५ से दीर्घ । २+ ३४ से सलोप । एकः स्वार्थ में प्राकृत एकलः। सर्वत्र ककार को गकार | एग- . लठाणा, एक प्रकार का जैन मत का व्रत है । द्वितीय को चतुर्थ । यसठः । जठरः । कमठः । “असढेण समायरियं जं कज्जइ कारणे समाइएणं, इत्यादि । टो डः सूत्रसामर्थ्य से जानते हैं, प्रायः प्राकृतकार्य वैकल्पिक है, पूर्व में विशदरूप से वर्णन कर आये हैं। मज्ञ ति । मज को और पञ्चाशत् पञ्चदश के संयुक्त 'श्च' को-कार हो, म्न ज्ञ संयुक्त है इससे संयुक्त 'च' लिया जायगा । प्रद्युम्नः । नं० ३ से रेफ लोप । १७ से द्य को जकार । ४ से द्वित्व । प्रकृत से णकार, द्वित्व प्रोत्व पूर्ववत् । पज्जुएणो यज्ञः । नं० २० से य को जकार | उक्त सूत्र से ज्ञ को ण । ४ से द्वित्व | विज्ञानम् । प्रज्ञापना। ३ से रेफलोप । ६ से कार । उक्त सूत्र से ज्ञ को ण । द्वित्व । १५ से प को व । परणवणा। विज्ञप्तिः । नं. ८ से पलोप । द्वित्व । उक्त सूत्र से ज्ञ को ण | नं० २+३५ से इकार दीर्घ । विएणत्ती। पञ्चाशत् । नोट न० १२ ऋ तोत्त् । १ क मचजतदपय वां प्रायो लोपः । २+३५ सुभिसुप्सु दीर्घः, २+३४ अन्त्यस्य हलो लोपः। ३ सर्वत्र लवराम् । ४ शेषा- देशयो द्वित्वमनादौ । १७ त्यथ्यद्यां चछजाः । २० श्रादेयों जः । ६ नोणः सर्वत्र । १५ यो वः। ८ उपरि लोपः कग तद यशस्वाम् । ५. शुषोः सः । २+३२ .

[ २७ ] ष्मपक्ष्मविस्मयेषु म्हः १३४। म इत्येतस्य पक्ष्मविस्मययोश्चयुक्त स्य वर्णस्य म्ह स्यात् । म इत्यनेन सह निर्दिष्टत्वात् पक्ष्मविस्मययोः संयुक्तयोरेव ग्रहणम् । गिम्हो। उम्हा|कुम्हण्डो। दुम्हलो। पम्हो। विम्हओ। इति श्रीम० म० मथुराप्रसादकृते पाली-प्राकृत-व्याकरणे प्रथमोध्यायः । नं. ५ से श को स ।२+३२ से प्राकार । ११ से सवर्ण दीर्घ । प्रकृत सूत्र से ण कार | ४ से द्वित्व। पण्णासा । पञ्चदशः । उक्त सूत्र से ञ्च को ण कार द्वित्व । नं० २ + १८ सेद को रेफ।२+१७ सेहकार श्रोत्वादि पूर्ववत् पण्णरहो हमपक्ष्मेति । ष्म इस को पक्ष्म तथा विस्मय शब्द के संयुक्त वर्ण को म्ह प्रा. देश हो । म यह संयुक्त वर्ण है अतः पक्ष्म और विस्मय शब्द का संयुक्त ही वर्ण का ग्रहण होगा । ष्म-ग्रीष्मः, ऊष्मः, कूष्माण्डः । नं० ३ से रेफलोप प्रकृत सूत्र से म्ह आदेश। तीनो में नं०२+३० से ईकार ऊकार आकार को हस्व । दुष्मलः, उक्त सूत्र से म्ह आदेश । सु का लोप अोकार पूर्ववत् : दुम्हलो । पक्ष्मः । विस्मयः । उभयत्र म्ह आदेश नं० २ से यलोप श्रोत्वादि पूर्ववत् पम्हो, विम्हो। इति श्री म० म० मथुराप्रसादकृते पालीप्राकृतव्याकरणे सुबोधिन्यां प्रथमोऽध्यायः द्वितीयोऽध्यायः अन्मुकुटादिषु ।२।११ मुकुटादिषु शब्देषु आदेरुकारस्य अत् स्यात् । मउडं, मउलं, अवरि, गरू, बाहा, गणिअं। अन्मुकुटेति । मुकुटादिक शब्दों मे आदि उकार को अकार हो, मुकुटम, मुकुलम् ; उपरि, गुरुः, बाहू, गणितम् । नं० १ से ककार तकार का लोप । नं० १५ से प को व । १६ से ट कोड। लियामात् । ११ सन्धौ अन्लोपविशेषा बहुलम । २+१७ दशादिषुहः । २+१८ संख्यायाश्च रः। २+३० युक्त श्रोत उत् आदीदूतां हत्वश्वः । अघो मनयाम् इति। नोट- (१) क ग च ज त द प य वां प्रायो लोपः। (१५) पो कः १६ से [ २६ ] उदूतो मधूकादिषु ।२।४। एषु ऊकारस्य उत् स्यात् । महुअो, मुक्खो, कुम्हण्डं, सुद्दो उद्धं, सूत्तो, सूत्ती, भुजपत्तं, सुषण, उम्मी, चुरण उपणा, दुव्वा, धुत्तो, पुवो, धुज्जडी। मुच्छा, मुल्लं । सुजो । इत्यादि । मम मते तु संयुक्ताक्षरपरत्वात् 'युक्त श्रोत उत् आदीदूतां ह्रस्वश्वे'ति हस्वः । गणेषुपाठो गौरवकृदेव । सर्वोऽप्ययं संयुक्ताक्षर परत्वे मधूकादिष्व- वगन्तव्यः, एवमाकारस्य संयुक्ताक्षरे ह्रस्वे, यथादिष्विति विवेकः । उत्सौन्दर्यादिषु ।२।५। सौन्दर्यादिषु शब्देषु औकारस्य उत्स्यात् । सुन्देरं, सुंडो, पुलोमी, उवविठ्ठअं, मुडिओ, दुआरियो। आदिग्रहणात्। उढुंवरो, उद्धदेहिनो, मुंजाअणो, मुग्गीणो, तुंदिओ कुक्खे (य) (अ) ओ, उदूत इति । मधूकादिक शब्दों की ऊकार को ह्रस्व उकार हो। मधूकः । मूर्खः, कूष्माण्डः, शूद्रः, ऊर्ध्वम् , सूत्रम् ,सूक्तिः भूर्जपत्रम् , शून्यम् , ऊमिः,चूर्णम् अर्णा । एवम् , दूर्वा, धूर्तः, पूर्व, धूर्जटिः मूर्छा, मूल्यम , सूर्यः, यहां सर्वत्र युक्ता- क्षर परे रहने पर ऊकार को ह्रस्व होता है और वे सब मधूकादिक में माने जाते हैं। संयुक्त पर रहने से ह्रस्व होगा। इसी प्रकार संयुक्ताक्षर के परे आकार को अकार होगा। और वे यथादिक में माने जायेंगे । वस्तुतः २+३० से संयुक्त वर्ण पर रहने पर हस्व हो जायगा, यथादिक मे मानना गौरव है । उत्सौन्दर्येति । सौन्दर्यादिक शब्दों में विद्यमान औकार को उकार हो । सौन्दर्यम् । नं० २+८ से एकार । शौण्डः, नं० ५ से श को सकार । पौलोमी। औपविष्टकम् , नं० १५ से प को व । (२+१२) से ष्ट को ठ । ४ से द्वित्व से टकार । १ से कलोप । मौष्टिकः, दौवारिकः, आदिग्रहण से अन्यत्र भी होगा । औदुम्बरः । औज़दैहिकः, नं० ३ से रेफ वकार का लोप । मौञ्जायनः । ६ से न को ण मौद्गीनः, तौन्दिकः (तोंदिया इति लोके) कौश्यकः । पौर्णमासी नोट-(२+ ) ए शय्यादिषु । (५) शपोः सः। (१५) पो वः। (२+१२) टस्य ठः । (४) शेषादेशयोद्वित्वमनादौ । (७) वर्गेषु युजा पूर्वः (१) क ग च ज त द प य वां प्रायो लोपः । (३) सर्वत्र लवराम् । (१) नो णः सर्वत्र । - ।

[ ३० ] पुरणमासी, पुक्खरो, मुहुत्तिओ, सुगंधिओ। इत एत्पिण्डसमेषु वा ।।६। पिण्डसदृशेषु शब्देपु इकारस्य एकारो वा भवति । पेण्ड, पिंडं । सेंदूर, सिंदूरं । धम्मेल्लो, धम्मिल्लो । वेण्हू, विएहू । वेल्लं, बिल्लं । वेट्ठी, विट्ठी । व्यवस्थितविभाषितत्वात्क- चिन्नित्यम्, कचिद्विकल्पः । कसुत्रो, केंचुलो । छेदो, छेदिओ । तेंदुओ। मेहिरिआ । विदारिक्खंधो, वेदारिक्खंधो । सिहमलो । सेहमलो। ऐत एत् ।२।७। ऐकारस्य एत् स्यात् । सेलो, केलासो, सेएण, वेरं, तेल्लं, एरावणो, केदारिओ,केवट्टो, गेरिओ। चेत्तरहो, चेलं, देवो, नेपाली, परेहिओ, वेजअंती, वेतरणी, वेतालिओ, सुहेसिणी, जोगेकांतिश्रो, धम्मेकपओ, जलेक। ए शय्यादिषु ।।८। शय्यादिषु शब्देषु अकारस्य एकारः स्यात् । सेज्जा, सुंदर, वेल्ली; तेरह, उक्करो, अच्छेरं, अणुमेत्तं, वेट । पौष्करः, मौहूर्तिकः, सौगन्धिकः । (सुगन्धिया-इति लोके) इत इति । पिण्ड सदृश शब्दों में इकार को विकल्प से एकार हो । पिण्डम् , सिन्दूरम् , धम्मिल्लः, विष्णुः । बिल्वम् , विष्टिः । वा यह व्यवस्थित विकल्पार्थक है, इसलिए कहीं नित्य और कहीं विकल्प से होगा । किंशुक , किञ्चुलकः, छिद्रः छिद्रितः, तिन्दुकः, मिहिरिका । विदारीस्कन्धः । सिध्मलः । ( सेहुयां रोगवाला) ऐत इति । ऐकार को एकार हो । शैलः, कैलाशः। सैन्यम् , वैरम् , तैलम् (२+ २३ ) से लकार द्वित्व । ऐरावणः, कैदारिक, कैवर्तः, गैरिकः, चैत्ररयः, चैलम, देवा, नैपाली, परैहितः, वैजयन्ती, वैतरणी, वैतालिकः, मुखैषिणी । योगेकान्तिकः, धर्मकपदः, जलैक्यम् । ए शय्यादीति । शय्यादिक शब्दों में अकार को एकार हो । शय्या । सौन्द- यम् । वल्ली । योदश , इस का साधुत्व प्रागे है। उत्करः, नं ८ से त लोप द्वित्व । श्राश्चर्यम् , अणुमात्रम् , वृन्तम् । (८) उपरि लोप: क ग ड त द प प स शाम् । . १ , [ ३१ ] औत श्रोत् ।।8। औकारस्य ओत् स्यात् । सोहग्गं, दोहगं, जोव्वणं, कोसंवी, कोत्थुहो, सोमित्ती, कोमुदी । गोतमो। मोणं । रोर- वो। चोरो। धोरेश्रो । कोपीणं । पोलत्थो। उत श्रोत्तुण्डसमेषु ।२।१०। तुण्डसदृशेषु शब्देषु उकारस्य ओकारः स्यात् । तोंडं, पाक्खरा, मोत्थं, पोत्थश्र, मेग्गिरो, लोद्धओ, पोण्डरीअं, पोखरिणी, लोद्धो। ऋरीति ।२।११। ऋ इत्यस्य रि इत्यादेशः स्यात् । रिणं, रिद्धो, रिच्छो, रिदुमई, रिद्धी, रित्तिो । ौत इति ।ौकार को प्रोकार हो । सौभाग्यम् । नं० २ से य लोप, ४से द्वित्व १० से श्रा को अकार । ६ से भ को हकार । दौर्भाग्यम् ।३ से रेफ लोप । यौवनम् । नं० २० से जकार ६ से न को णकार । (२+२३) से वकार द्वित्व । कौशाम्बी। ५ से श को सकार | कौस्तुभः । (२+१३) से स्त को थ । ४ से द्वित्व ७ से तकार । सौमित्रिः । कौमुदी । गौतमः । मौनम् । रौरवः, चौरः, धौरेयः, कौपीनम् । पौलस्त्यः । उत इति । तुण्ड सदृश शन्दों में उकार को रोकार हो । तुण्डम् , पुष्करः । नं० १६ से ष्क को खः, द्वित्व, ककार । मुस्तम् । पुस्तकम् । मुद्गरः । लुब्धकः। बलोप, धकार द्वित्व, दकार । लोद्धो । पुण्डरीकम् , पुष्करिणी । लुब्धः (लोष- जातिविशेष लोक में प्रसिद्ध है) ऋ इति । ऋ को रि आदेश हो । ऋणम् । ऋद्धः, ऋक्षः, ऋतुमती, ऋद्धिः ऋत्विजः। नोट-(३) अधोमनयाम् । (४) शेषादेशयोदित्वमनादौ। (१०) अदातो ययादिषु वा (६)ख घ थ ध भां हः । (३) सर्वत्र लवराम् । (२०) आदे- यो जः । (६) नो णः सर्वत्र । (२+ २५) नीडादिषु । (२+१३) स्तस्य थः (५) शषोः सः। (७) वर्गेषु युजः पूर्वः । (१६ ) कस्कक्षां खः (१३) इदृष्यादिषु। ।

[ ३३ ] मुहुत्तो, कत्तरी, आवत्तो, कित्ती, वत्ता, अत्तो, भत्ता, कत्ता । इत्यादि । दशादिषु हः ।२।१७। दशादिषु शस्य हः स्यात् । दह, एआरह, वारह, तेरह, चउद्दह, पगारह, सोलह, सत्तरह, अट्ठारह । वेत्यपक- 'र्षात क्वचिन्न । दसमी अवस्था । दससु दिसासु । संख्यायाश्च रः।२।१८। संख्यावाचिनि शब्दे अयुक्तस्यानादौ स्थितस्य दस्य रेफादेशः स्यात् । एआरह, वारह, तेरह, परणरह; सत्तरह, अट्ठारह । अयुक्तस्येत्युक्तर्नेह । चउदह । आदिस्थत्वान्नेह । दह। उत्तरीयानीययोर्यो जो वा २।११। एतयोर्यस्य जो वा स्यात् । कर्ता । मेरे मत से:२+३० से सर्वत्र ह्रस्व । दशादीति । दशादिक शब्दों में शकार को हकार हो । दश शब्द के शकार को इकार होगया । दह। एकादश । नं० १ से क लोप । वक्ष्यमाण २-१८से दकार को रेफ। एबारह । द्वादश नं.८ से द लोप। त्रयोदश। ३ से रेफ लोप । ११ से अकार, विसर्ग को एकार | चतुर्दश, ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । पञ्च- दश । 'ञ्च' को ण आदेश, द्वित्व । षोडश । ५ से ष-को सकार । सप्तदशा से प लोप। ४से द्वित्व । २+१८से द को रेफ । अष्टादश। नं०२+१२से ष्ट को ठ। द्वित्वादि । कहीं हकार नहीं भी होगा, जैसे दसमी, दससु दिसासु । संख्याया इति । संख्यावाची शब्दों में प्रयुक्त अनादिस्थ द को रेफ हो, साधुत्व पूर्ववत् । एकादश, द्वादश, त्रयोदश, पञ्चदश, सप्तदश, अष्टादश । चतु. देश में रेफ से संयुक्त दकार है, दश में आदित्य है, अतः रेफ नहीं होगा। उत्तरीयेति। उत्तरीय शब्द, और अनीय प्रत्यय की यकार को विकल्प से द्वित्व (१) क ग च न त द प य वां प्रायो लोपः । (२+१८) संख्यायाश्च (८) उपरि लोपः क ग ड त द प ष स शाम् । (३) सर्वत्र लवराम् । (५)शषो सः। (११) सन्धौ अज्लोपविशेषा बहुलम् । (२+१२) टस्य ठः । उत्तरीय १६ सूत्र में द्वित्व 'ज' आदेश से जानते है, जहां संयुक्त वर्ण के स्थान में यादेश होगा वहीं द्वित्व होगा; अतः इलिद्दा में लकार द्वित्व नहीं होगा।

. . N'Torry mimage [ ३४ ] उत्तरिज, उत्तरीशं। रमणिज्ज, रमणीयं । करणिज्ज, करणीअं। भर- णिज्जं, भरणीअ । हसणिज्जं, इसणीअं । समरणिज्ज, समरणोधे। चौर्यसमेपु रियः ।।२०। चौर्यसदृशेषु शब्देषु रिय इत्ययमा. देशः स्यात् । चोरियं, महुरियं, अच्छरियं, सोरियं, थेरियं, धोरियो, आआरिओ, कोरियं, पोरियं, मोरियो, तोरियं । वक्रादिषु बिन्दुः ।२।२१। वक्रादिपु शब्देषु अनुस्वारागमः स्यात् । वंको, तंसो, वअंसा, अंसुं, माणंसिणी, फंसो, णिसणं, सुंक, पडिंसुशं। मांसादिपु वा ।२।२२। मांसादि-शब्देषु वा बिन्दुः । तेन फचि- 'जज' यह आदेश हो । उत्तरीयम् । रमणीयम्, करणीयम्, एसनीयम्, स्मरणीयम् । चौर्येति । चौर्यशब्द के समान शब्दों में विद्यमान या एस को रिय श्रादेश हो । चौर्यम् । नं० (२+६ से श्रोकार । माधुर्यम्। १० से प्रकार । ६. से हकार । आश्चर्यम् । २२ से छ। ४ से हित्व । ७ से चकार । १० से श्रा को असार । शौर्यम् । ५ से श कोस । २-1-६ से श्री को श्रो, स्थैर्यम् । ८ से स लोप २ -- ७रो ऐ को ए । एवम् धौर्यः, श्राचार्यः, क्रौर्यम् , पौर्यम् , मौर्यम् , तौर्यम , वति । वादिक शब्दों में अनुस्वार का श्रागम हो । वः । नं. ३ से रेफ लोप । व्यसम् नं० २ से य लोप । वयस्या । प्रभु । मनस्विनी । (२-१-२ से) श्रकार को श्राकार । स्पर्शः । २ -- १४ से फ श्रादेश। निदर्शनम्। १ से दलीप । शुल्कम् । प्रतिभुतम् । मासादीति । मांसादिक शब्दों के बिन्दु का लोप हो । मसम् , नं० १० रो अकार । कथम् । २+२ रो श्राफार । ६ से थ को ह । नूनम् । ६ से न को नोट-नं० (२+१) श्रीत् श्रोत् ( १०) श्रदातो यथादिषु वा (६ ) ख घ थप भां हः (२२) श्चत्सप्सां छः (२) शेषादेशयोतित्वमनादी । (७) य- गंधु सुजः पूर्वः । (५) शषोः सः। (८) उपरि लोपः, क ग उ त द प प स शाम् । (२+७) एत एत् । (४३) सर्वत्र लवएम् । (३) अधो मनपाम् । (२२) आ समसयादिषु (६) नो णः सर्प । ( १२) तोऽत् । (श्रादोयो जा। Mirra H द्विन्दुलोपः, कचिद् बिन्दुस्थितिः । मासं, मंसं। काह, कहं । गुण, गुणं । दाणि, दाणी । समुहो, संमुहो। कचिन्नित्यम् । सकारो, सक्कों। नीडादिषु द्वित्वम् ।।२३। नीडादिषु शब्देषु द्वित्वं स्यात् । रणेड्ड, जोव्वणं, तुरिहक्को, पेम्म, एक्को, वाहित्तो, उज्जुओ, सोत्तो, चल्लिओ, मंडुक्को । पौरादिष्वउत् ।२।२४। एष अउत स्यात् । पउरो, परिसं, मउणं, मउली, रउरवो, कउरवा, गउडा, कउसलं, सउहं, कउलं, गणो, चउलं, मउरियो। अवर्णो यः श्रुतिः ।२।२५ अकारस्य क्वचिद् । यकारः स्यात् । प्रायः मागध्यामर्द्धमागध्यां चास्य प्रयोगो भवति । वियसियं । णमं- सिया । ण य कयं । सयणाणि य। गोयमो। वयणं । जीवियं । गोयरी। सयलं । भायणं । णकार । इदानीम् । संमुखः । कहीं पर नित्य अनुस्वार का लोप हो । संस्कारः, संस्कृतम् । १२ से ऋ को अकार । नीडादीति । नीडादिक शब्दों में द्वित्व हो। २+८. से एकार । ६ से ण कार णेड्ड। यौवनम् । २० से य को जकार | तूष्णीकः । २९ से ण्ह । २+४.से ऊ को उकार । २+३ से ई को इकार । प्रेम । एकः । व्याहृतः । ऋजुकः । श्रोतः । चलितः, मण्डूका | २+३० से उकार । पौरेति । पौरादिक-अर्थात्-पौर सदृश. वर्गों में औकार को अउ आदेश हो । पौरः, पौरुषम् , मौनम् , मौलिः, रौरवः, कौरवः, गौडा:,, कौशलम्, सौधम् , कौलम् , गौणः, चौलं, मौर्यः । अवर्ण इति । अकार को कहीं यकार हो । यह यकार प्रायः मागधी और अर्धमागधी में होगा। विकसितं, नमस्कृतः, न च, कृतम्, शयनानि, च । गौतमः, वचनम् , जीवितम , गोचरी, सकलम्, माजनम् । नोट-२८ ए शय्यादिषु । ६ नो णः सर्वत्र। २६ हनष्ण क्ष्ण शनापहः- २२३ इदीत: पानीयादिषुः । (२+३०) युक्तं श्रोत उत् श्रादीदूतां ह्रस्वरम । .

- [ ३६ ] वसतिभरतयोहः ।।२६। एतयोरन्त्यस्य तस्य हः स्यात् । बसही । भरहो राया । भारहे वरिसे चंपा णयरी थि । प्रतिसरवेतसपताकासु.डः ।२।२७। एषु तकारस्य डः स्यात् । पडिसरो। प्रतेरुपलक्षणमेतत् । तेन पडिवेसो, पडिलेहणा, पडिक्कमणं, पडिहारो,पडिणायगो,इत्यादि सिद्धम् । वेडिसो, पडागा, विजअपडागा। इतेस्तः पदादेः ।२।२८। इतीति पदस्यादौ विद्यमानस्य इकारस्य वसतीति । वसति और भरत शब्द के तकार को हकार हो । वसतिः-तकार को इकार हो गया । नं० २१३५ से इकार को दीर्घ । २।३४ से सकार का लोप । वसही। भरतः। तकार को हकार । नं० २।३१ से अोकार । पूर्ववत् स लोप भरहो । एवम् भारहे वरिसे चंपा णाम णयरी। प्रतीति-प्रतिसर, वेतस, पताका शब्दों में तकार को ड आदेश हो । प्रतिसरः । त को ड श्रादेश। नं० ३ से रेफ लोप ।२।३१से अोकार । पूर्ववत् स लोप । पडि. सरो । प्रतिसर शब्द प्रतिमात्र का उपलक्षक है, अत:-प्रतिवेशः । उक्त सूत्र से तर को ड । नं. ५ से श को स । ३ से रेफ लोप । २०३१ से अोकार । पडि- वेसो । एवम् प्रदिलेखना का पडिलेहणा । प्रतिक्रमणम् का पडिक्कमणं । प्रतिहारः का पडोहारो। प्रतिनायकः का पडिणायगो । वेतसः । उक्त सूत्र से तकार को ड आदेश । नं० ३१ से अकार को इकार । नं० २ । ३१ से अोकार । पूर्ववत् स लोप । वेडिसो । पताका, उक्त सूत्र से तकार को ड आदेश । नं० ३२ ककार को गकार, नं० २ । ३४ से स लोप । पडागा । प्राकृत में क लोप करने से पहाया । एवम्-विजयपडागा, विजयपडात्रा का साधुत्व जानना । इवेरिति । 'इति' इस पद के आदि में विद्यमान इकार को तकार हो। प्रिय. तर इति । उक्कसूत्र से इकार को स्वररहित 'त' आदेश होगया । पिअदरो त्ति । रेफ लोप द अोकार पूर्ववत् जानना । एवम्-स: गतः इति । सो गयो त्ति । सागरः नोट-२ । ३५ सुमिसुप्सु। दीर्घः । २ । ३४ अन्त्यस्य हलः । २ । ३१ अत श्रोत् सोः । ३ सर्वत्र लवराम् । ५२ शषोः सः । ३१ इदीपत्पक्कस्वप्नवेतसव्यजन- मृदङ्गाकारेषु । ३२ प्रथमद्वितीययोस्तृतीयचतुर्थी ।। ।

। केवलः स्वररहितस्तकारः स्यात् । पिअदुरोत्ति तक मि। सागरोत्ति कहि इत् पुरुषे रोः ।।२६। पुरुषशब्दे विद्यमानस्य रोरुकारस्य इत्स्यात । पुरिसो। युक्त श्रोत उत् आदीदूतां हश्वश्च । २ । ३० । युक्त वणे परतः पूर्वस्य ओकारस्य उत् स्यात् आदीदूतां च ह्रस्वः। पुग्गलिओ, मुग्गलिओ। पुक्खरिओ, पुएिणमा। अज्जो । अत्ताणं । अस्समो । गिम्हो। इति । सागरो त्ति । इत्यादि पूर्वोक्त सूत्रों से सिद्ध होते हैं । इदिति । पुरुष शब्द में विद्यमान रु के उकार को इकार हो । पुरुषः-उकार को इकार । नं० ५ से प्रकार को सकार । पूर्ववत् प्रोत्व, स लोप । पुरिसो । इस का 'रसोलशौ' इस हैम व्या० से र को ल, स को श करने से पुलिश होता है । संयुक्त वर्ण से पूर्व में विद्यमान प्रोकार को उकार हो और आकार ईकार ऊकार को ह्रस्व हो । पौद्गलिकः । नं० राह से औकार को रोकार उक्क सूत्र से अोकार को उकार । नं०८ से द लोप । ४ गकार द्वित्व । १ से क लोप । श्रोव स लोप पूर्ववत् । पुग्गलियो । एवम्-मौद्गलिकः का मुग्गलिश्रो । पौष्क- रिकः । श्रोकार उत्व पूर्ववत् । नं० १६ से ष्क को ख । नं. ४ से द्वित्व । ७ से ककार । श्रोकार-स लोप पूर्ववत् । पुस्खरियो । पूर्णिमा । नं. ३ से रेफ लोप । . उक्त सूत्र से उकार को ह्रस्व । पुरिणमा । आर्यः। नं० २१ से र्य को जवार। ४ से द्वित्व । उक्त सूत्र से आकार को ह्रस्व । अोकार सुलोप पूर्ववत् । अज्जो अात्मानम् । नं० २ से मकार का लोप । ४ से त द्वित्व । ६ से नकार को णकार । उक्त सत्र से संयुक्त तकार परेरहते आकार को ह्रस्व अत्ताणं । आश्रमः। नं० ३ से रेफ लोप से सकार। ४ से द्वित्व । उक्त सूत्र से आकार को ह्रस्व । अस्समो ।. ग्रीष्मः। नं० ३४. से धम को म्ह । ईकार को उक्त सूत्र से ह्रस्व। गिम्हो । दीक्षितः। नं० १९ से क्ष को.ख। ४ से द्वित्व । ७ से ककार । ईकार नोट-ौत श्रोत्।८ उपरिलोपः कगडतदपषशसाम् ।५ शेषादेशयोद्वित्वम- नादौ। १ कगचजतदपयवां प्रायो लोपः। १६ ष्क स्क क्षां खः । ७ वर्गेषु युजः पूर्वः। ३ सर्वत्र लवराम् । २१ ये शय्याभिमन्युक्षु जः।२ अधोमनयाम् ६ नोग PM - [ ३८ ] दिक्खिओ । मुक्खो। धुत्तो । मुच्छिओ । इत्यादि । अत प्रोत्सोः । २ । ३१ । सोःपूर्वस्य अकारान्तप्रातिपदिकस्य अतः श्रोत् स्यात् । अन्त्यस्य हल इति सुलोपः' रामो । गामो। सत्रो। चलो। वरो। हरो। कामो गोइंदो। चंदो । इंदो । इत्यादि । स्त्रियामात् । २ । ३२६ स्त्रियां वर्तमानस्य अन्त्यस्य हल आकारः स्यात् । लोपापवादः। संपा 1 विपश्रा । वाया। सरिया। नपुंसके सोविन्दुः । २ । ३३ । नपुंसके विद्यमानात्प्रातिपदि- कात् परस्य सोबिन्दुः स्यात् । लोपापवादः । वयणं । करणं । रअणं । को उक्त स्त्र से हस्य । दिक्खियो । मूर्खः । ऊकार को हस्य । अन्य कार्य पूर्ववत् । मुस्खो। धूतः का धुत्तो। मूर्छितः का मुच्छिो । त्तत् गण में पाठ मानने की अपेक्षा सूत्र मानना ठीक है। अत इति । अकारान्त प्रातिपदिक के सुसे पूर्व में विद्यमान अकार को रोकार हो। उकार इत् । २१३४ से स लोप । रामः-रामो। ग्रामः + गामो । सर्व:- सम्वो। चल:-चलो। वर:-~चरोहर:-हरो। काम:- कामो । गोविन्दः+ गोइंदो। चन्द्रः--चंदो। इन्द्रः--इंदो। त्रिपामिति स्त्रीलिङ्ग में विद्यमान अन्त्य हल को श्राकार हो । लोप का बामक है । संपद् । तु का लोप । 'द' को प्राकार | संपशा । विपद् का विपया। पाच का वाया । सरित् का तरिया । यह आकारादेश प्रायः स्पर्शान्त अ मङगा , न से रहित ककार से लेकर मकार पर्यन्त प्रायः चकारान्त दकारान्तादिक शब्दों में होता है। उदाहरण तदनुरूप ही अधिक देखे जाते हैं। नपुंसके इति । नपुंसक लिङ्ग में विद्यमान प्रातिपदिक से पर मु को अनुस्वार हो । लोप का अपवाद है। वचनम् । नं०१ से कार का लोप, : से गाकार । उक्त सूत्र से अनुस्वार ! मागधी, अर्धमागधी में नं. २ न.२५ मे यकार । वयणं, नोट-सर्वत्र ५ शपोः सः। ३४ म-पदम-विस्मयेषु म्हः २+३४ अन्त्यस्य हलो सोपः। १ क ग च ज ६ नो गः सर्वत्रं । २ + २५ अवों यः ध्रुतिः ।

[ ३६ ] धणं । वणं । कुलं । दहिं । महुं । अच्छि । धणु। सिरं । वासं । सप्पिं । अन्त्यस्य हलो लोपः। २।३४ । प्रतिपदिकस्यान्त्यस्य हलो लोपः स्यात् । प्रातिपदिक-कार्याधिकारात् प्रातिपदिकस्यैव अन्त्यो हल गृह्यते । चम्मो। कम्मो । जसो ! जाव । ताव । धणू । पाणी । घेणू । भाणू । वाऊ। मुभिसुप्सु दोषः। २ । ३५ । एषु इदुतोर्दीघः स्यात् । अग्गी। प्राकृत में वनणं । करणम्-उक्त सूत्र से अनुस्वार वरणं । रनम, नं० २६ से तकार नकार का विप्रकर्ष । १ से तकार लोप । २+२५ से यकार । ६ से णकार । उक्त सूत्र से अनुस्वार, रयण, धनम् का घणं । वनम्-का वणं । कुलम्का कुल । दघि ।न०६ से घ को ह । उक्त सूत्र से अनुस्वार । दहि । एवम । मधु का महुँ । अक्षि । नं० १८ से क्ष को छकार । ४ से द्वित्व, ७ से चकार । उक्त से अनुस्वार । अच्छि । धनुस् नं. २+३४ से स लोप। सु को अनुस्वार । धनुं । शिरः अन्य स का लोप ।श को स । अनुस्वार । सिरं । वासः वासं । सपिः । नं० ४ से रेफ लोप । २ से द्वित्व, अनुस्वार । सप्पि । अन्त्येति. प्रातिपदिक के अन्त्य हल का लोप हो।प्रातिपदिक कार्य का प्रकरण है, अतः प्रातिपदिक के अन्त्य वरण का लोप हागा, चर्मन्-अन्त्य नकार का लोप, पूर्ववत रेफ लोप । द्वित्व । प्राकृतत्व से पुंलिङ्ग । चम्मो। कर्म का कम्मी । यशः कान०.२० से जकार । ५ से श को स । ३१ से रोकार जसो। यावत् के यकार को जकार । अन्त्य लोप । जाव । एवम् तावत् का ताव । धनुस् के स लोय । णकारादेश । प्राकृतत्वात्-पुंलिङ्ग । २०२+३५ से दीर्घ । धणू । पाणिः का पाणी। धेनुः का.घेणू। भानुः का भाणू । वायु: का वाऊ । सर्वत्र उक्त सूत्र से सुलोप । सुमीति-सु-प्रथमा का एक बचन और मि तथा सुप् के परे इकार २६ क्लिष्ट श्लिष्ट रत्न क्रिया शाङ्गेषु तत्स्वरवत् पूर्वस्य । ६ वषयधमा हः । १८ अक्ष्यादिषु छः। ५ शेषादेशयोरित्वमनादौ । ७ वर्गेषु युजः पूर्वः । २+३४ अन्त्यस्य हलः । ४ । सर्वत्र लवराम् । २० श्रादेयों जः । ५ शुषोः सः । ३१ अत श्रोत् सोः । २+३५ सुभिसुप्सु दीर्घः । .

.. - [ ४० ] पंती । गिरी ! हरी । पवी, छवी । वाऊ । तंतू । भाणू । अग्गीहिं । पंतीहिं । वाऊहिं । तंतूहिं । अग्गीसु । पंतोसु । वाअसु । तंतूसु । क्त्वा तूण इयौ । २ । ३६ । क्त्वेति लुप्तषष्ठीक पदम्.. सौत्रत्वान्न सन्धिः । क्त्वा प्रत्ययस्य तूण इय इत्यादेशौ स्तः ! हंतूण । उकार को दीर्य हो । अमि:-नं० २ से नकार का लोप । ४ से द्वित्व | २+३४ से स लोप । अग्गी । पङितानं०८ से क लोप अनुस्वार से परे होने से तकार द्वित्व नहीं होगा ! उक्त सूत्र से दीर्व। पंती। गिरिः का-गिरी। हरिः का हरी । पविः का पवी छविः का छवी। वायु:-नं. १ से य लोप । स लोप । उक्त सूत्र से दीर्घ । वाऊ। तंतुः का तंतू । भानुः का भाणू । नं० ६ से णकार। प्रकृत सूत्र से दीर्घ । भाणू । मि के परे । अग्निभिः । न लोप, द्वित्व पूर्ववत् अग्गीहिं । पङ्क्तिमिः का पंतीहिं । वायुमः का वाऊहिं । तंतुमः का तंतूहिं । एवं सुपू के परे दीर्व। अन्य कार्य पूर्ववत् । अग्निषु-अग्गीसु । पङ्क्तिपु-पंतीसु । वायुघु-वाऊसु । तन्तुपु-तंतूसु । क्त्वेति । वत्त्वा यह षष्ठअन्त पद है । सौत्रत्व से षष्टी का लोप । एवम् तूण- इय इस में मी सन्धि सौत्रत्व से नहीं होगी । क्त्वा प्रत्यय को तूण इय आदेश हो । हन् क्त्वा । इस स्थिति में क्त्वा को तूण आदेश । नकार को अनुस्वार । हंतूण। अनुस्वार से तकार पर है अतः त लोप नहीं होगा । एवम् गम् क्त्वा। क्त्वा को तृण आदेश । गंतूण । कृ क्त्वा । तूण आदेश । नं. १ से त. लोपं । प्राकृतत्वात् अाकार । काऊण । दा क्त्वा । दाऊण । श्रु क्त्वा । नं० ३. से रेफ् लोप । ५ से श को स । गुण । क्त्वा को तूण आदेश । १ से त लोपः। सोऊण । चलित्वा । चलिऊण । इयादेश के उदाहरण । भूत्वा, क्त्वा को इयादेश । गुणावादेश। भविय । मणित्वा-मणिय । चलित्वा-चलिय । प्रणम्य । प्रनम् क्त्वा । क्त्वा को इय आदेश। नं० ३ से रेफ लोप । ६ से णकार । नोट-~०३ अमो मनयाम् । २ शेषादेशयोदित्वमनादौ । २+३४ अन्त्यत्य इलो लोपः । ८ उपरि लोपः क ग त द प षःश साम् । १क गच ज त द पयवां प्रायो लोपः । ६ नो णः सर्वत्र। ४ सर्वत्र नवराम । ५ शपोः सः।

[ ४१ ]
गंतूण । तलोपे काऊण। दाऊण । सोऊण। चलिऊण । इत्यादि।
इयादेशे-भविय । भणिय । चलिय । पणमिय ।
इति श्री-महामहोपाध्याय-पं० मथुराप्रसाददीक्षितकृतौ
पाली-प्राकृत-प्रदीपे द्वितीयोऽध्यायः ।
प्रान्ते हल
ङ
पण मिय । यह तूण और इय आदेश समास और असमास में क्त्वा की इच्छा
के अनुकूल होते हैं । ये सूत्र पाली प्राकृत साधारण हैं। परंतु पाली में कहीं २
मेद है । जैसे प्राकृत में ज्ञ को एकार होता है। परंतु पाली में श के जकार
का लोप ञकार को द्वित्व होता है । जैसे-सर्वज्ञः का प्राकृत में सव्वएगो (एणू)
परंतु पाली में सव्वञो । इत्यादि भेद है। कुछ वर्ण ऐसे हैं। जो पालीप्राकृत.
में समान रूप से हैं। जैसे-
ऐ औ स्फ स्य ऋ ऋ ल प्लुत श षा विन्दुचतुर्थी क्वचित्
जनाः पृथग् द्विवचनं नाष्टादश प्राकृते ।
रूपं चापि यदात्मनेपदकृतं यद्वा परस्मैपदं
भेदो नैव तयोश्च लिङ्गनियमस्तादृग् यथा संस्कृते । १ ।
ये ऐ औ इत्यादिक पाली प्राकृत में समान रूप से हैं। जैसे ये प्राकृत में
अठारह ऐ श्री इत्यादिक नहीं होते हैं एवं पाली मागधी शौरसेनी पैशाची
इत्यादि में भी नहीं होते हैं।
शौरसेनी-
शूरसेन देशोद्भव भाषा को शौरसेनी कहते हैं । इसके उद्गम का मूल
संस्कृत ही है । प्राकृत और इस शौरसेनी में बहुत ही थोड़ा मेद है । प्राकृत में
प्रथमा सुभक्ति के प्रयोग में प्रोकार होता है । जैसे. देवो हरो माणुसो. इत्यादि ।
शौरसेनी में एकार। देवे हरे, माणुशे। दूसरा मेद यह है कि सकार को
शकार होता है। प्रथम द्वितीय को तृतीय चतुर्थ आदेश होता है सूत्र नं. ३२
से हमने कह दिया है।
।

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।
-
[४२ ]
पैशाची-
प्रकृतिः शौरसेनी । पैशाची भाषा की प्रकृति शौरसेनी है। इस में वर्ग के
अनादिस्थ तृतीय चतुर्य वर्ण को प्रथम द्वितीय वर्ण होते हैं। जैसे गगनं का
गकनं । राजा-राचा । निर्भरः-पिच्छ। पहिशम्-वटिशं । दशवदनः-दशवतणो
इत्यादि । सकार की शकार रेफ को लकार पैशाची में अधिक होता है। जैसे
अरे रे रुद्रोऽस्ति का अले ले लुद्दोत्यि इत्यादि ।
मागधी-
मागधी, शौरसेनी और प्राकृत के समान ही है । प्रायः ह्रस्व अकार के
स्थान पर यकारादेश मगधदेशीय ग्रार्हत ग्रन्यों में अधिक रूप से है । उदाहरण
नैनागमों के आगे दिखाचेंगे उससे जानना चाहिए ।
लोक व्यवहारे तु संयुक्तलोपे पूर्वस्य दीर्घा वाच्यः । लोक में प्राकृत शब्द
के
संयुक्त वर्ण के पूर्व वर्ण का लोप करने पर संयुक्त से पूर्व स्वर का दीघ करने से
प्रचलित हिन्दी शब्द सिद्ध हो जाते हैं जैसे-नच्च-नाच । कम्म-म ।
धम्म-धाम। चम्म-चाम । पुत्त-पूत । मुत्त-सूत । हावु-ईख । रिच्छ-रीछ ।
करज-काज | पिपीठ। इत्यादि।
इति श्री म०म० मयुराप्रसाददीक्षितकृते पाली-
प्राकृतप्रदीपे द्वितीयोऽध्यायः
H
अथ नाटकोक्तानि उदाहरणानि एमिरेवसूत्रनिप्पाय दर्श्यन्ते ।
अस्मत्कृते भक्तमुदर्शन-नाटके -
पुरिमुत्तम-मुगहीयो विविहवित्रुहसेविया-अरणो। मारदरज्जाहिवई, मुदं-
सो सव्वदा जयउ।
पुरुषोत्तम-नं० २+२६ से उ को इकार । ५ से १ को सकार ।
पुरुष-उत्तम । नं० २१ से पकाराफार का लोप । (पुरिमुत्तम ) मुगृहीतः।
१२ से कार को प्रकार । नं०१ से तकार का लोप। २+३१ से अोकार ।

[ ४३ ] (सुगहोरो) विविध बुबुध । नं०६ से धकार को हकार। (विविह विबुह ) विताचरणः। नं. १ से तकार एवं चकार का लोप । नं. २+३१ से अोकार । (सेवियाबरणो) भारतराज्याधिपतिः । नं० २+२६ से तकार को हकार । न. २ से यकार का लोर । ४ से जकार द्वित्व । १० से आकार को अकार | नं. ६ से धकार को हकार । १ से तकार लोप । नं० २+३५ से दीर्य (भारहरज्जाहिबई ) सुदर्शनः । नं. ३ से रेफ लोप । २+२१ से अनुस्वार नं०५ से श को स ।६ से न को णकार। २+३१ से अोकार । (सुदंसणो सर्वदा । नं. ३ से रेफ लोप । ४ से वकार द्वित्व । ( सव्वदा ) जयतु । न. १ तलोप । जयउ । इति- प्रथम अङ्क। पुनत्तत्रैव-अवेशकः प्रियंवदा-अब्जेव्व ससिकलाए सबवरो त्थि सा पडिक्खणं कुदो रोइदि अद्यैव-नं०१७ से 'ध' को जकार । ४ से द्वित्व । ११ में बहुल ग्रहण से ए के एकार का लोप । नीडादित्व में वकार को द्वित्व । नं. २+.७ मे ऐकार व एकार । (अज्जेम्व ) शशिकलायाः। नं. ५ से दोनो शकारों को सकार आकारान्त षष्ठी विभक्ति को एकार । विभत्तियों के अनुगम हो जाने में आदेश सूत्र नहीं कहे हैं । ( ससिकलाए) स्वयंवरो । न० ३ से वलोप । ' से य लोप नं० २+३१ से सुको श्रोकार। (सवरी) कोई प्राचार्य नं० ११ में बहुल अहण व को उकार "सुग्रंवरो" मानते हैं। अस्ति । नं. ११ मे अकार लोप । २+१ मे स्त को-थकार । ४ से थकार 'द्वित्व । ७ 'से प्रथम थकार को तकार । ( स्थि "प्रतिक्षणम् । नं. ३ से रेफ लोग।२*२७ से त को ड श्रादेश । नं० १६ नोट - २+२+ ईत्पुरषे रोः । ५ शपोः सः। ११ सन्धी अज्लोप विशेष बहुलन् । १२ ऋ तोपत् । १ क ग च ज त द प य वां प्रायो लोपः। २+२८ अत श्रोत सोः । ६ खद्यथधमा हः । +२६ वसति भरतयोहः । अघो मनयाम् २ शेषादेशयोद्वित्वमनादौ । .. श्रदातो यथादिषु वा । २+३५ सुभिसुप्सुदीर्घ सर्वन लवराम् ! २+२ वक्रादिषु । १७ त्य थ्य द्यां च छ जाः । २+७ ऐर एत् । २+१३ स्तस्य यः। ७ वर्गेषु युजः पूर्वः । १६ क स्क क्षां खः । ३६ अनादावयुजोत्तयौ । २+२७ प्रतिसर वे तसपताकासुडः । ... .. ३ [ ४४ ] च को खकार । ४ से द्वित्व । ७ से ककार । ( पडिक्वणं) कुतः । नं०.१४३२ से 'त' को 'द । ११ से विसर्ग को प्रोकार (कुदो) रोदिति । नं० १ से दलोप ३२ से तकार को दकार । शौरसेनी में यह दकारादेश जानना । सुलो० सहि। ताए सिविणे मुदंसणो वरियो, अश्रो सा सुवरं रणाहिलसह। सस्त्रि ! नं०६ से 'ख' को '६' । सहि । तया-ताए । स्वप्न। नं०३ से वलोप । ३१ से । अकार को इकार । २७ से • पकार और नकार का विप्रकर्ष प्रकार को इकार । ६ से नकार को गाकार । १५ से पकार को वकार | सिविणे । सुदर्शन:- मुदंसरणः पूर्ववाक्य में साधुत्व कहा गया है। वृतः । प्राकृतत्वात् इट् गुण । नं. १ से तकार लोप । २+३१ से अोकार । वरियो । यतः। १ से त लोप । ११ से ग्रोकार । अयो।स्वयंवरं । नं.३ से बलोप | १ से य लोपासवरं । नामिलपति । नं०६ से नकार को णकार । ६ से भ को 'हः । ५ से पकार को मंकार । १ से त लोप । शाहिलसइ । प्रियं तत्थं गंतूग मुदसणं चेव वर को दोसो। तत्र । सप्तमी में स्ति, म्मि, त्य, तीनों आदेश होते हैं । त्य अादेश । तत्य । गत्रा । नं० २+३६ से क्त्वा को तुग आदेश । मकार को अनुस्वार । गंत्रण । सुदंसणं । साधुत्व प्रथम कर आये । सुदर्शनम् । एव । एव के स्थान में चेव यह अव्यय है । वृणोतु । 'वर' प्राकृत में सवी प्रायः स्वादिवत होती हैं नं० १ मे तलोप । वरऽ। कः । न० ३४ प स लोप । ३1 से अोकार । 'को'। दोषः । नं० ५ से ष को सकार । प्रोकार पूर्ववत् । दोसी । सुलो० सा कहे । एगदा वरिन्जइ पती। (दी) पुणो २ बराहिलासा गब्ब करिजह । अविच बरगत्थं श्रएणं पुरिसं णे *" ।

[ ४५ ] कथयति । नं. ६ से थकार को हकार । १ से त लोप । कहेइ । एकदा । नं. ३२ से ककार को गकार । एगदां । 'वरिज्जइ' भाव और कर्म में यक विकरणं के 'विषय में ज्ज होता है, जैसे-करिजइ, गमिज्जइ, भविज्जइ इत्यादि । नं. १ से त लोप । वियते-वरिज्जइ। पति: । नं. २+३४ से स् लोप । २+३५ से दीर्य । पती । (दी) पुनः २ नं. ६ से शंकार । ११ से अोकार । पुणो २ । राजकुमारीभिः । ०१ से जकार का लोप । २+२५ से यकार । भस् को हिं। रायकुमारीहिं । वरणाभिलाषा । नं०६ से भ को है । ५ से ष को स । वरणाहि- लासा। नैव।नं० ६ से णकार ।+११ से एकार। नं०२+२३ सेव को द्वित्व । णेब्व : क्रियते । करिज्जइ । अपि च । नं० १५ से पकार को वकार । १ से च लोप । अविवरणाथ । नं०३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ७ से थ को स |२+३० से आकार को अकार । वरणत्थं । अन्यं । पूर्ववत् य लोप । द्वित्व । ६ से नकारको णकार। अण्णं । पुरुषं । नं. २ + २६ से उकार को इकार [५ से 'ष' को 'स' । पुरिसं । नैव । १+११ से एकार । २+२३ से व को द्वित्व । ६ से रा'कार । गव्व । द्रक्ष्यामि । दंसहस्से । २।२१ से अनुस्वार । ५ से श को स! प्राकृतत्वाद् इडागम । और आत्मनेपद । य लोप द्वित्व पूर्ववत् । प्रियं० तदा रगणा बुदो आग्गहो करिज्जइ । सुलो० सो सुदसणं णाहिलसइ । कहेइ कपि रज्जाहिवई रायकुमार वरसु । प्रियं कुतः । नं० ३२ से तकार को दकार । नं० ११ से रोकार | कुदो। अाग्रहः । नं०३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ३१ से अोकार । अाग्गहो । करिज्जइ क्रियते । पूर्ववत् । सुलो० सः । नं० ३१ से श्रोकार । सो । सुदर्शनम् । नं. ३ से रेफ लोप । ५ से शकार को सकार । ६ से नकार को णकार । २+२१ से अनुस्वार । ( २+ २५) अवर्णो यः श्रुतिः । १+११ सन्धी अज०। (२+२३) नीडादिषु द्वित्वम् । (१५) पो वः । शौरसेनी में ३२ से अनंदावयुजोस्तथयोदधौ से दकार । अयवा (३२) प्रथमद्वितीययोः से दकार होगा। (३) सर्वत्र लवराम् । (५) शेषादेशयोदित्वम नादौ (७) वर्गेषु :युजः पूर्वः । (१० ) अदातो ययादिषु वा (६) नो णः सर्वत्र (२+२६) । [ ४६ ] मुदंसणं । नाभिलषति । पूर्ववत् णकार । ६ से हकार । ५ से सकार । नं० १ से तकार का लोप । णादिलसइ । कथयति । नं. ६ से थकार को हकार । एयन्त में शप अयादिक नहीं होते हैं किंतु अ इ मिलकर एकार हो जायगा ।नं० १ से तलोप । कहइ । कमपि । नं. ११ से अकार लोप । कं पि । राज्याधिपतिम् । नं० २ से यलोप । ५ से द्वित्व । १० से रेफोत्तर आकार को अकार । अथवा २+३० से अकारादेश । ६ से धकार को हकार । १५ से पकार को वकार । १ से तलोप । रन्जाहिवई । राजकुमारं । नं० १ से जकार का लोप । २५ से प्रकार को यकार | रायकुमारं । वृणु । ऋकारान्त या सवी धातुओं से शपं गुण होता है। वरसु। प्रियं० सुदंसणो वि रायकुमारोऽस्थि । सुदर्शनोऽपि राजकुमारोऽस्ति । सक का साधुत्व पूर्ववत् जानना । नं. २+१३ से स्त को यकार । ४ से द्वित्व । ७ से य को त । स्ति-का इस प्रकार स्थि होगा। नं. ११ से अल्लोप । सुलो० सुदंसणो रायकुमारो स्थि, परं सो रज्जाहिवई णस्थि । सुदर्शन: राजकुमारोऽस्ति परं स राज्याधिपतिर्नास्ति । पूर्वोक्त वाक्यों में प्राप्त सवी पदों का साधुत्व दिखा पाये हैं। पति शब्द की इकार को नं० २+३५ से दीवं होगा। अभिज्ञान-शाकुन्तले-प्रस्तावनायाम् । नटी-सुविहिद वयोगदाए । सुविहित प्रयोगतया । नं० ३२ से तकार को, दकार । नं. ३ से रेफ का लोप । ४ से पकार द्वित्व । १ से गकार और गकार का लोप | ३२ से त को द। तृतीया के एक वचन को प्राकारान्त स्त्रीलिङ्ग में एकार होता है। सुविहिद घयोगदाए । अज्जस्स । अार्यस्य । नं० २१ से ये इत्पुरुषे रोः । (५) शपोः सः २+७) ऐत एत् । (११) सन्धौ अज लोपविशेषा बलम् (२+२१ ) वक्रादिपुविन्दुः व ( २४ ) ऋत्वादिषु तो दः। अथवा । (२+३०) अनादावयुजोस्तथयोदधौ २+३१ अत श्रोत् सोः । (६) खघयधमां हः । (१) क ग च ज त द प य वां प्रायो लोपः। (२) अघो मनयाम् । (१५) पो वः । (२+५) अवर्णो यः श्रुतिः । (२+१३ ) स्तस्य यः । (२+३५) मुभिमुप्सु दीर्घः । (३२) प्रथमद्वितीययोस्तृतीवचतुर्थी । (२१) यं शय्यामिमन्युपु जः।

[ ४७ ] को जकार | ४ से द्वित्व । १० से या० २+३० से आकार को ह्रस्व । नं. २ से यकार लोप । ४ से द्वित्व । अन्जस्स । अथवा अ इ उ अकारान्त सवी शब्दों में ङस् को स्स होता है । ण किं पि । किमपि । नं ११ से अकार लोप । ६ से णकार । परिहाइस्सइ । परिहास्यते । प्राकृत में अनिट् सेट सव कवि की इच्छा- नुकूल होती हैं, इनका कोई नियम नहीं है । एवम् , आत्मनेपद परस्मैपद भी कवि की इच्छानुकूल होता है, परिहास्यति । न० २ से यलोप ! ४ से द्वित्व । १ से तलोप । प्राकृतत्वाद् इडागम । परिहाइस्सइ। नटी अज्ज ! एव्वं णेदं । अयं ? एवं न्वेतद् । नं० २१ से यं को जकार ४ से द्वित्व । २+३० से ह्रस्व अकार । अज्ज । एवं २+ २३ से द्वित्व । एव्वं । न्वेतद । नं. ३ से वलोप । ६ से णकार । ३२ से तकार को दकार २+३४ से त् का लोप । २+३३ से अनुस्वार । एव्वं णेदं । अणंतर-करणिज्जं ! अनन्तर करणीयम् । नं. ६ से णकार, २+ १६ से पानीय प्रत्यय को 'ज' आदेश । २ + ३१ से ईकार को इकार । अणंतर करणिज्ज। अज्जो। पूर्ववत् । प्राणवेदु। अाज्ञापयतु । ३३ ते ज्ञा को 'ण' आदेश । १५ से पकार को वकार । एयन्त्र में प्राकृतत्वात् शप अय् न होने से श्राणवेतु हुआ । ३२ से तकार को दकार । आणवेदु । पुन:-अघ कदमं उण उर्दु अधिकरिय गाइस्स । अथ कतमं पुनः ऋतुम् अधिकृत्य गास्यामि | अथ । नं० ३२ से धकार । यह सूत्र शौरसेनी प्राकृत में लगता है । आधुनिक समय में इन आदेशों के करने से प्राकृत नितान्त दुरूह हो जाता है । अतः स्त्री वा नीचादिपात्रों में प्राकृत अथवा मागधी या अर्धमागवी का नाटकादि में प्रयोग करना चाहिये। कतमं, ३२ से 'त' को दकार । कदमं । पुनः । नं० १ से प लोप । ६ से णकार । ११ से विसर्ग लोप । उण । ऋतुं । नं० १४ से उकार । ३२ से तकार को दकार, उदुं । अधिकृत्य, नं० २+३६ से क्त्वा को इय आदेश । अधिकरिय । गास्यामि । नं०३ से य लोप । ४ से द्वित्व। इडागम । गाइसं। पुनः-तह । तया । यहां यकार को ३२ से धकार नहीं किया, किन्तु नं. ६ से इकार होगा। १० से हस्व । तह । सर्वत्र साधुत्व में दर्शित अङ्कों के अनुकूल सूत्र देख ले।

[ ४ ] पुनः-ईसीसि चुंविआई, भमरेहि सुउमार-केसरसिहाई। ओदंसयंति प्रमाणा, पमदाश्रो सिरीसकुसुमाई।४। ईषद् ईषद् । नं० ५ से घ को सकारादेश। ३१ से षकाराकार को इंकार । २+३४ से दोनों दकारों का लोप । ईति-ईसि । नं० ११ से दी । इसीसि । चूंवितानि । नं० १ से तकार का लोप । चुंबिनाई। भ्रमरैः । तृतीयां में मिस् कों हिं अादेश होगा।३ ते रेफ लोप । भमरेहि । केशरशिलानि । नं० ५ से श को साह से स्त्र को हकार । केसरसिहाई। अवतंतयन्ति । नं. ३२ से तकार क दकार | नं० ११ से व को उकार गुण । एवं अब का रोकार होगा।अोदंसन्ति । दयमानाः । नं० १ से यलोप । ६ ते णकारं । २+३४ से सकार लोप । द- अमाणा । प्रमदाः। नं० ३ से रेफ लोप । पमदात्रो । शिरीषकुसुमानि । नं० ५ से शकार षकार को सकार | जस को नपुंसक लिङ्ग में इंकार | सिरीसकुसुमाइं ।४। पुनत्तत्रैव, णं अज्जमिसेहि पठम एब अाणचं, अहिण्णाण साउंदलं णाम अउ णाडनं अहिणीअदु ति । ननु~णं । निपातन से, अथवा बहुल ग्रहण से ननु को 'णम्' आदेश । आर्थमित्रै; नं-२१ से र्य को ज आदेश । ४ से द्वित्व । २४३० से आकार को अकार । ३ से रेफ लोप | ४ से नकार द्वित्व । तृतीया मे मिस को हिं आदेश । अज्जमिल्सेटिं। प्रथमं । ४ से रेफ लोप, थकार को ढ । पदमं । एव । नं० २४२३ से वकार द्वित्व । एच । आजतम् । नं० ३३ से ज्ञ को पकार । दीर्व, आकार से प्रकार पर है, अत: द्वित्व नहीं होगा। नं०८ से पकार लोप । ४ ते "त' द्वित्वम् । प्राणत्तं । अभिज्ञानशाकुन्तलम् , नं०६ से भकार को हकार । ३३ सेको कार । ४ से द्वित्व। ६ ते नकार को एकार । ५ से श को त ? से क लोन । ३२ ने त को द। अहिराणाणसाउन्दलं । नाम । ६ से नकार को यकार । णाम | अपूर्वन् । १ ते प लोप । ३ ले रेफ लोर ४ से द्वित्व । २४३१ से ऊकार को उकार। अउन्| नाटकन् | नं० ६ सेन को ए । १६ से टकार को ड।१ ते क लोप । गाडनं। अभिनीयताम् । नं. । सेम को इकार । ६ से णकार । १ य लोप । प्राकृतत्वात् परस्मैपद । अहिणीयद । ३२ से तकार को दकार । अहिणीप्रति । २४२८ ते तकार । इदो-इदो पिअसहीनो।

- [४६ ] पुनस्तत्रैव-प्रथमेऽङ्क इतः इतः । प्रियसख्यौ । नं. ३२ से तकार को दकार । ११ से विसर्ग को श्रोकार । इदो इदों । नं. ३ से रेफ लोप। १ से य लोप 1 से ख को हकार । प्राकृत में द्विवचन नहीं होता है । अतः जत् को प्रोकार । पिसहीयो एका-हला सई (त) दले तुबत्तो वि तादकएणसभासमक्खा पिअदर त्ति तकमि । हला, 'हण्डे हजे हलाऽऽहाने नीचा चेटी सखों प्रति । एवम्-सखी के सम्मुखीकरणार्थ संबोधन मे हला का प्रयोग होता है । शकुन्तले । नं० ५ से श को सकार । १ से क लोप । ३२ सेत को द । सउन्दले । त्वत्तोऽपि २८ से तकार वकार का विप्रकर्ष । तकार के साथ उकारागम । तात्पर्य यह है, कि-यकार के साथ विप्रकर्ष करने पर पूर्ववर्ण के साथ इकार का, और वकार के साथ विप्रकर्ष करने पर पूर्ववर्ण के साथ उकार का योग हो जाता है, अतः नं० २८ से विपकर्ष करने पर उकार का योग होगा । ११ से अपि के प्रकार का लोप । १५ से पकार को वकार । तुवत्तोवि । तातकण्वस्य । ने० ३२ से तकार को दकार । ३ से व लोप । ४ से णकार द्वित्व । २ से य लोप । ४ से सकार द्वित्व । तादकरणस्त आश्रमवृक्षाः। नं० १६ से क्ष को ख श्रादेश । ४ द्वित्व । ७ से प्रथम ख को ककार। से ककार का लोप 'वृक्ष वेनरुवा को रु । रुक्खा । प्रियतराः। नं. ३ से रेफ लोप। १ से य लोप । ३२ से तकार को दकार । पिथदर ति । इति का २+ २८ से त्ति होता, संयुक्त परे रहने से नं० २+३० से ह्रस्व अकार होगा। पिअदरति । तयामि । नं. ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ण्यन्त मे शप् अयादेश नहीं होगा। अत: तमि ব্রহ্মা जेण सोमालिया-कुसुमपरिपेलवावि तुम एदाणं ग्रालवालपरिऊरणे णिउत्ता । येन । २० से यकार को जकार । ६ से एकार । जेणा | नवमालिका- कुसुमपरिपेलवाऽपि । नं. ६ से नकार को साकार । नं. ११ से नवमालिका के अकार वकार को प्रोकार | १ से क लोप। १५ से पकार को वकार । णव- मालियाकुसुमपरिपेलवावि । सखियों की परस्पर उक्ति मे पेलव शब्द ब्रीडा व्यजक अश्लील होते हुये भी दोषरहित ही है । त्वम् । तुमं। एतेषाम् । नं० ३२ से दकार षष्ठी मे आम् को णं । एदाणं । ग्रालवालपरिपूरणे । नं. १ मे १ ३ ।

[ ५० ] पकार लोप । श्रालवालपरिऊरणे । नियुका । नं० ६ से णकार । १ से य लोप । ८से क लोप । ४ से तकार को द्वित्व । णिउत्ता। पुनस्तत्रैव-हला अणसूए ण केवलं तादस्स णिोश्रो, मम वि एदेसुं सहोअर सिणेहो । इला अनसूये । नं० ६ से न को ण । १ से य लोप । अणसूए ।। न केवल तातस्य ।नं. ६से एकार । ३२ से दकार।२ से य लोप । ४से द्वित्व । ण केवलं तातस्य । णिश्रोश्रो। पूर्ववत् णकार, और यकार गकार का लोप । ममापि एतेषु । नं० ११ से अंपि के अकार का लोप । १५ से पकार को व आदेश । नं. ३२ से त को द । ५ से ष को स । प्राकृतत्त्वात् अनुस्वार । मम वि एदेसुं । सहोदरस्नेहः । नं० १ से द लोप । २८ से विप्रकर्ष । निह धातु के इकार से तत्स्वरयुक्तता। अर्थात् स के साय इकार युक्तता । नं. ६ से णकार । 'सहोअरसिणेहो । प्रथमा विभक्ति मे सर्वत्र नं० ३१ से अोकार होता है, अतः उसके साधुत्व को बार २ नहीं दिया। पुनस्तत्रैव-द्वितीया-सहि सउंदले सउंदले उदयलम्भिदा एदे गिमाल- कुसुमदाइयो अस्समरुक्खया दाणिं अदिकंतकुसुमसमए वि रुक्खगे सिञ्चहा' तेण अणहिसंधिगुरुयो धम्मो भविस्सदि । सखि शकुन्तले । न० ६ से हकार । ६ से सकार । १ से क लोप । ३२ से त को द अादेश ! सहि सउन्दले । उदकलम्भिता । १ पूर्ववत् क लोप । दकारादेश। उदयालम्भिदा । एते ग्रीष्मकालकुसुमदायिनः । ३२ से दकार । ३ से रेफ लोप । नं. २+३० से इकार । ३४ से आम को म्ह ! ५ से ककार-यकार का लोप ६. से नकार को णकार । एदे गिम्हयालकुसुमदाइ । अाश्रमवृक्षाः | ३ से रेफ लोप । ५ से सकार । ४ से द्वित्व । १० से हस्व वृ को रु । १६ सेख । ४ से द्वित्व । ७ से प्रथम ख को ककार । जस् को दीर्घ । अस्समरुक्खया। इदानीम् । ११ से इकार लोप । ६ से णकार । नं० २+३ से ईकार को इकार । दाणिं । अतिक्रान्तकुसुमसमयेऽपि । ३२ से त को द अादेश । ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व ४ + ३० से अकार । १ से य लोप । १५ से वकार ।। अदिफन्तकुसुम-- समए वि । वृक्षकान् । पूर्ववत् साधुत्व । ३२ से ककार को गकार । रुखगे। सिचामः | सिञ्चन्ह । तेन अनभिसन्धिगुरुको । ६ से न को णकार।। से ।

[ ५१ ] हकार । १ से के लोप । तेण अणहिसंघिगुरुत्री । धर्मः भविष्यति । ३ से रेफ लोप | ४ से द्वित्वं । २ से य लोपं । ५ से सकारं । ४ से द्वित्वं 1 से तलोप । धम्मो भविस्संह पुनस्तत्रैव-चतुर्थेऽ३ १३ श्लोकादनन्तरम्- गौतमी-जादे णादिजणसिणि द्धाहिं अणुण्णादगमणाऽसि तवौवणदे- वदाहिं ता पणम भवदीर्ण । जाते । नं० ३२ से त को द । जादे। ज्ञातिजनस्निग्धाभिः। ३३ को णकार । द्वित्व अशुद्ध है, क्यों कि आदिस्थ होने से द्वित्व नहीं होगा। ३२ से त को द । २८ से स्नि का विप्रकर्ष और तत्स्वरता पूर्व में होने से सिंनिग्ध । ६ से दोनों नकारों को णकार । नं०८ से गकार लोप । ४ से द्वित्व । ७ से ध को दकार । भिस् को प्राकृत में हिं होता है। एवं-णादिं जणंसिणि द्धाहिं । अनु- ज्ञातगमनासि । पूर्ववत् । ३३ से ण । ४ से द्वित्व । ३२ से दंकार । ६ से दोनों नकारों को णकार । अणुण्णादगमणासि । तपोवनदेवताभिः । नं० १५ से वकार । ६+से णकार । ३२ से दकार । तवोवण देवदाहिं । तत् प्रणम, भगवती ननु । नं० २+३४ से तकार को लोप । ११ से आकार । ता । नं. ३ से रेफ लोप। १ से गकार लोप । ३२ द । ननु अव्यय के स्थान मे णं का प्रयोग प्राकृत में करते हैं, जैसे-"ते णं कालेणं तेणं समए णं” इत्यादि । ता पंQमं भगदीणं शकुं० हला पिवदे । अन्ज उत्तदंसणोत्सुनाए वि अस्समपदं परिच्चन्तीए दुक्खदुक्खेण चलणां मे पुरोमुहा णं गिवडन्ति । हला-प्रियंवदें। नं. ३ से रेफ लोप । १ से य लोप । पिवदे । आर्य- पुत्रदर्शनोत्तुकाया अपि । नं. २१ से र्य को जकार । ४ से द्वित्व । २+३० से आकार को अकार । १ से पलोपं । ३ से रेफ लोपं । ४ से त द्वित्व । ३ से श के ऊर्वस्य रेफ का लोप । २+२१ अनुस्वार । ५ से सकार । ६ से णकारे । ८ से सुके तकार का लोपं । ४ से द्वित्व । १से कलोप । ११ से अपि के प्रकार का लोप । १५ सेप को वं । अन्जत्तदंसहोस्सुनाए वि । आश्रमपदं परि- त्यजन्त्याः । नं. ३ से रेफ लोप। ४ से द्वित्व । २+३० सें अकार । १७ से चकार । २ से द्वित्व । १ से ज तोप । अस्सपदं परिच्चअन्तीए । दुःखदुःसेंन ।

न [ ५२ ] नं० ११ से विसर्ग लोप । २ से ख द्वित्व । ७ से ककार | ६.से णकार | दुक्ख- दुक्खेण । चरणो मे पुरोमुखौ न निपततः । नं० २५ से रेफ को लकार | प्राकृत में द्विवचन नहीं होता है, किंतु वहुवचन ही द्विवचन के स्थान में भी होता है । से ख को हकार । ६ से नकारों को णकार । १५ से पकार को वकार | चलणा मे पुरोमुहाणंण णिवडन्ति । प्रियं० ण केवलं तुमं जेन्न तवोषणविरहकादरा तुए उवत्थिदविनोअत्स तवोवणस्स वि अवत्थं पेक्ख दाव । केवलं त्वम् एव । नं.६ मे णकार । त्वम् को तुमं, एव अन्यय के स्थान मे जेन्च । निपात अव्यय होता है । ण केवलं तुमंजेव्व । तपोवनविरहकातरा । नं० १५ से वकार । ६ से पकार । ३२ से त को द । तवोवणविरहकादरा । त्वया उपस्थितवियोगस्य तपोवनस्यापि । त्वया के स्थान मे तुए । नं० १५ से व को व ८से स लोप । ४ से द्वित्व । ७ से प्रथम थ को तकार । ३२ से दकार । . १ से यकार गकार का लोप। उवत्थिद विप्रोग्रस्त "तवोवणसवि' । इसका साधुत्व पूर्ववत् जानना । स्य के यकार का नं० २ से य लोप । ४ से द्वित्व । अवस्था प्रेचस्व तावत् । नं०८ से स लोप ! ४ से द्वित्व । ७ ते तकार । प्राकृतत्वांत् हत्व नं० ३ से रेफ लोप । १६ से क्ष को खकार । ४ से द्वित्व । ७ से ककार । प्राकृतत्वात् परस्मैपद । नं. ३२ से त को द । नं० २+३४ से अन्त्य दकार का लोप । अवत्यं पेक्व दाव । उग्गिएण व्भकवला, मिई परिच्चचणत्तण मोरा । ओसरिअ पोण्डुपत्ता, मुअन्ति अंसुं विअ लदाओ । (१४) उद्गीर्णदर्मकवला, नं० ८ से द लोप | ४ से ग द्वित्व । २+३० से ईकार को इकार । ३ से रेफ खोप । ४ से द्वित्व, दर्भ मे भी ३ से रेफ लोप, ४ से म द्वित्व । ७ से बकार, उग्गिएणदन्मकवला । मृगी । नं० १३ से इकार । १ से ग लोप । मिई। वास्तविक प्रयोग को न सममकर जो 'मई: पाठ मानते वह अयुक्त है । नं० १२ से अकार करने पर यद्यपि मई हो सकता है, परंतु 'मिरगा' यही लोक मे प्रयोग होता है, न कि 'मरगा यह । इससे सिद्ध है, कि इकार ही युक्त है।

[ ५३ ] परित्यक्तनतना । न० १७ से त्य को चकार । ४ से द्वित्व, नं० ८ से क लोप ४ से त द्वित्व । ६ से दोनो नकारों को णकार । ३ से रेफ लोप, ७ से त द्वित्व। परिच्चत्तणतणा । मयूराः, नं० १ से य लोप । ११ से वैकल्पिक गुण करने से । मोरा (१) 'मोरी' यह शकुन्तला नाटक का पाठ अप्रामाणिक है, क्योंकि मयूरी कभी भी नहीं नाचती है । अपसृत । नं० ११ से अप उपसर्ग को रोकार स धातु से इट गुण प्राकृत मे सभी सेट् है । नं० १ से त लोप । अोसरिन। पाण्डुपत्रा। नं० ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व, पाण्डुपत्ता । नं० २+३० से ह्रस्व होने से पएंडुपत्ता पाठ युक्त है, "मुञ्चन्ति अश्रु इव लताः" प्राकृतत्वात् नुम् का अभाव । नं०१ से च लोप, नं० ३ से रेफ लोप । नं०२+२१ से अकार के साथ अनुस्वार । अनुस्वार से परे होने से सकार को द्वित्व नहीं होगा । २+३३ से अनुस्वासंगम । विश्र, इवा- र्थक अव्यय है । ३२ से तकार को दकार । "मुअन्ति अंसु वित्र लदानोर (१४) 'अस्सु द्वित्व सकारात्मक प्रयोग अशुद्ध है, लोक में आँसु प्रसिद्ध है। ' शकुं०-ताद ! लदावहिणी दाव माहवीं आमंतइस्सं । तात ! लागिनी तावत् माधवीम् अामन्त्रयिष्ये । नं०:३२ से तकार को दकार । वाद ! लदा भगिनी शब्द के म को प्राकृतत्वात् वकार । और ग को हकार | नं०६से एकार | लदा वहिणि । तावत् माधवीम् ३२ से त को द।२+२६ से हल तकार का लोप । दाव 1 8 से घ को ह। १ से य लोप । दाव.माहवीं आमंतइस्सं । रेफ यकार लोप, द्वित्व पूर्ववत् जानना । शकुं०-लदा वहिणि ! पच्चालिङ्गस्त मं, साहामएहिं बाहहिं । लताभगिनि । पूर्ववत्साधुत्व । लदावहिणि ! प्रत्यालिङ्ग(स्त्र) नं० १७ से त्य को चकार, ४ से द्वित्वः । ३ से रेफ लोप । नं०२ से य लोप। ४ से द्वित्व । पच्चालिङ्गस्स । मां को हस्व । म । शाखामयैः बाहुभिः, ५ से श को स । से ख को ह । १ से य लोप । मिस को हिं । नं. ३५ से उकार को दीर्घ, साहामएहिं बाहूहिं। नोट (१) उक्त प्रक्रिया से मोरो, मऊरो सिद्ध है, मयूर सूत्र चिन्त्यप्रयोजन है। : ..

[ ५४ ] पुनः शकुन्तला-अज्ज पहुदि दूरवत्तिणी रख दे मविस, ताद अहं विय इयं तुए चिन्तणीया । अद्य प्रमृति दूरवर्तिनी । नं० १७ से ध को जकार । ४ से द्वित्व । ३ से रेफ लोप ।। से हकार । १४ से ऋ को उकार । ३२ से दकार।३से 'ति' गत रेफ का लोप । ४ से द्वित्व । ६ से णकार | अज्ज पहुदि दूरवत्तिणी । खलु ते भविष्यामि, खलु का क्खु अव्यय प्रयुक्त होता है । ३२ से त को द । नं. २ से य लोप । ४ से द्वित्व । सर्वत्र मिप के स्थान मे श्रम् का प्रयोग होता है, तु दे भविस्सं । तात अहम् इव । नं. ३२ से दकार। इव के स्थान मे विय अव्यय का प्रयोग होता है । ताद अहं विय । इयं त्वया चिन्तनीया । नं० ६ से नकार को प्रकार । नं० २+१६ से श्रनीय प्रत्यय को ज्ज अादेश होने से चिन्तेज्जा होता है परं तु 'ज्जा अादेश को वैकल्पिक मानकर स्लादेश नहीं किया । चिन्तणीया, वस्तुतः चिन्तेज्जा अथवा चिन्तणिज्जा पाट युक्त है। शकु- सख्यो उपेत्य ) एला ऐसा दोरणं वि यो हत्ये शिक्खेवो । एपा दयोः अपि वो हस्ते निक्षेपः, नं० ५. से ५ को सकार, प्राकृत मे द्विवचन नहीं होता है, अतः द्वयोः का बहुवचन दोएणं होगा। नं० ११ से अकार लोप । १५ से पकार को वकार | २+१३ से 'स्त' को थकार । ४ से द्वित्व | ७ से पूर्व थकार को तकार । हत्ये । नं. ६ से न को ण । १६ से क्ष ख । ४ से द्वित्व । ७ से ककार ! एसा दोएणं वि वोहत्ये गिक्खेयो। सख्यो । अयं जणो दाणिं कस्स इत्ये समप्पिदो। श्रयं जनः इदानीं । नं.६ से दोनों नकारों को एकार ।। ११ से इकार लोप और ईकार को इकार, श्रयं जणो दाणि । नं० २+२७ से अकारान्त सन्द के प्रयमा विमक्ति मे श्रोकार सर्वत्र होता है, अतः उसका वारंवार साधुत्व नहीं दिखाते हैं । कस्स हत्ये समप्पिो । “कस्य हस्ते" का साधुत्व अभी पूर्ववाक्य में कहा है। समर्पितः। नं. ३ से रेफ. लोप । ४ से द्वित्व । ३२ से त को द । अमप्पिदो। शकु -ताद एसा उटअपज्जन्तचारिणी गम्भहारमन्थरा मिअवह जदा मुरप्पसवा मविस्सदि तदा मे मंपि पियाणिवेदयं विसज्जएस्ससि, मा एवं पिमुमरिस्ससि । तात ! एपा उटजपर्यन्तचारिणी गर्भमारमन्यरा मृगवधूः । २०३२ । । [ ५५ ] से 'त' को 'द' ५से ष.को स । उटज नं० १६ सेट को डर से ज लोप। नं० २१ से. य को जकारः । ४ से द्वित्व । ताद एसा उडअपज्जन्तचारिणी, गर्भभार० नं. ३ से. रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ७ से बकार । ६ से म को है। नं० १३ से ऋ को इकार । १ से म लोपः । ६ सेध को इं, मित्रवहूं । यदा सुखप्रसवाः भविष्यति । न० २० से य.को जकार। नं.६ से ख को ह । ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । २ से य लोप । ४ से द्वित्व । ३२ से. त को द। जंदा सुहप्पसवा भविस्सदि । तदा मे कमपि प्रियनिवेदकं विसर्जयिष्यसि । न० ११ से अपि के प्रकार का लोप। नं. ३ से रेफ लोप । १ से यकार और ककार का लोप । ६ से न कोण ।३से रेफ लोप । ५ से द्वित्व।१ से दोनों यकारों का लोप । ५ से ष को स। ४ से सकार द्वित्व। तदा मे कम्पि पिणि वेदत्रं विसज्जहस्ससि । मा एतद् विस्मरिष्यसि । एतद् । नं० २+३४ दलोप । नं० २+३२ से तु को अनुस्वारं । ३२ से त को द । एदं । विपूर्वक स्मृ को विसुमर आदेश । अन्य कार्य पूर्ववत् । मा एदं विसुमरिस्सदि । पुनस्तत्रैव शाकुन्तले सप्तमेऽङ्क १३ श्लोकादनन्तरम् मा क्खु चवलदं करेहि, जहिं तहिं ज्जेन्च अत्तणो पइदि दसेसि: । मा खलु चपलतां कुरु । खलु का प्राकृत मे क्खु अव्यय । नं० १५ से प को व । ३२ से त को द । प्राकृतत्वात् श्रावन्त को हस्व । प्राकृत मे ऋकारान्तधातु को गुण शप् । अकारान्त मे सर्वत्र एकार होता है, यह प्रथमः कह आये हैं। मा खुः चवलदं करेहि । जहिं तहिं ज्जेन्ब अत्तणो पइदि दसेसि । यत्र तंत्र एव, आत्मनः प्रकृति दर्शयसि । नं० २० से यकार को नकार । सप्तमी के एकवचन मे हिं होता है, जहिं तहिं, एव को ज्जेव्व । प्रकृतिं । नं. ३ से रेफ. लोप । १ से क लोप । १३ से ऋ को इकार । ३२ से त को द । पइंदि । "दर्शयसि नं०३ से रेफ लोप । ५ से श को सकार । नं० २+३३ से अनुस्वार । प्यन्त प्रत्यय का एकार । दसेसिं । आत्मनः । नं. २ से अधास्य मकार कालोप।४ से त द्वित्व । नं०२+३० से ह्रस्व । ६ सेन कोण । ११ से विसर्गको श्रो अत्तणो। बाला-जिम्भ ले सिंहसावत्र ! जिम्म, दन्ताई दे गणहस्सं ।

[:५६ ] - प्राकृत मे परस्मैपद-आत्मनेपद का तथा पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसक लिङ्गादि के प्रयोग मे कामचार है। अतः जम्मका परस्मैपद । दन्त का नपुंसकलिङ्ग है । जुम्मस्व रेसिंहशावक ! जम्भस्व । नं० १३ से ऋ को इकार । २५ सेर को लकार । अथवा 'रसोर्लशौ' इस हेमसूत्र से । नं. ५ से श को स । १ से क लोप । जिम्भ ले सिंहसावत्र ! जिम्भ । दन्तान् ते गणयिष्यामि । नपुंसक लिङ्ग होने से 'दन्ताई नं० ३२ से त को द । गणयिष्यामि । नं. १ से यकार लोप । ष्यम् के यकार का नं० २ से लोप । ४ से द्वित्व | गण इस्सं । प्रथमा-अविणीद ! किं णो अवच्चणिविसेसाई सत्ताई विप्पकरेसि । अविनीत ! किं नो । नं० ६ से दोनो नकारों को णकार । ३२ से त को द । अविणीद ! किं णो । अपत्यनिर्विशेषाणि सत्त्वानि विप्रकरोषि । नं० १५ से प को व । १७ से त्य को चकार । ४ से द्वित्व । ६ से नकार को णकार । ३ से रेफ . लोप | ४ से द्वित्व । ५ से श-घ को सकार | ३ से व लोप। ४ से द्वित्व । अवच्चणिन्वितेसाई सत्ताई। विप्रकरोषि । नं० ३ से रेफ लोप | ४ से द्वित्व । ५ से घ को स । शप् , गुण एकार । विप्पकरेसि । पुनः-इन्त वडद विन दे संरम्भो, ठाणे क्खु इसि जणेण 'सव्वदमणी' त्ति किदणामहेोऽसि । हन्त वर्धते इव ते संरम्मः । इव अव्यय के स्थान मे प्राकृत मे ब्विय होता है नं० ३२ से त को द । न० २+३१ से सु को प्रोफार । वड्डइ व्विश्र दे संरम्भो । स्थाने खलु ऋपिजनेन । स्याका प्रकृतिभूत ष्ठा का नं०८ से घ लोप । स्था आदिस्थ है, इससे नं० ४ से द्वित्व नहीं होगा। खलु के स्थान मे क्खु प्राकृत मे होता है । न० १३ से ऋ को इकार । ५ से ष को स | नं. ६ से दोनों नकारों को णकार । ठाणे क्खु इसिजणेण । सर्वदमन इति कृतनामवेयोऽसि । नं. ३ से रेफ लोप । ४ से वकार द्वित्व । ६ से एकार । २+३४ से स लोप | २+३१ से अोकार । २+३८ से इकार को तकार : सव्वदमणो ति । नं. १३ से इकार । ३२ से त को द । ६ से गाकार । ६ से ध को ।। १ से य लोप । क्रिदंणाम- हेलोऽसि । द्वितीया -- एसा तुम केसरिणी लंघहस्सदि, जह से पुत्तनं ए मुंचिस्सदि। - [ ५७ ] एषा त्वां केसरिणी। नं० ५ से ष को स । त्वों को तुमं । केसरिणी । लङ्घयिष्यति । नं० १ से य लोप। २ से ष्यगत य लोप । ५ से सकार । ४ से स द्वित्व । ३२ से दकार । लंघइस्सदि । यदि तस्य पुत्रकं न मोक्ष्यति। नं० २० से य को जकार | १ से द लोप । तस्य एवम् , तस्याः के स्थान मे से आदेश होता है। नं०३ से रेफ लोप । ४ द्वित्व । १ से क लोप । ६ से न को ण । मुचधातु से इंट नुम् । क्योंकि प्राकृत मे अनिट सेट का विवेक नहीं है । नं०३ से य लोप । ४ से द्वित्व | ३२ दकार । जइ से पुत्तश्रण मुंचिस्सदि । पुनस्तत्रैव सप्तमे के एकत्रिंशत्तम-श्लोकादनन्तरम् । शकुंतला-(स्वगतम् ) दिहिया अधारणपञ्चादेसी ण अज्जउत्तो। ण उण सत्रं अत्ताणं सुमरेमि । अधवा ण सुदो सुरण हिअाए मए अनं सावो । जदों सहीहिं.अच्चाअरेण संदिट्ठम्हि-'सो रात्रा जइ तुम ण सुमरेदि तदा एदं अंगुली देसेसि ति। दिष्टया अकारण त्यादेशी न आर्यपुत्रः । नं. २+१२ से ष्ठ की ठ। ४ से द्वित्व । ७ से ट । टा को आ। दिद्विश्रा। नं. १ से ककार लोप । नं०३ से रेफ लोप । १७ से त्य को च । ४ से द्वित्व । ५ से श को स । ६ से णकार ! २१ से र्य को जकार । ४ से द्वित्व । १० से ह्रस्व अथवा २ + ३० से हस्व । १ से प लोप । ३ से रेफ लोप । ४ से तकार द्वित्व । दिहिया- अवारण पच्चादेसी ण अज्जउत्तो । 'न पुनः शप्तमात्मानं स्मरामि । नं० ६ से णकार । १ से प लोप । ६ से णकार । ११ से विसर्ग लोप । ५ से श को स । ८ से पकार का लोप। ४ से द्वित्व । एवम्नं २ से अधःस्थित मकार का लोप । ४ से द्वित्व । २+३० से आकार को अकार । ६ से णकार । स्मृ को 'सुमर' आदेश । ण उण सत्तं अत्ताणं सुमरेमि । अथवा न झुतः शून्यहृदयया मया अयं शापः । नं०३२ से य को ध। ६ से न को ण । ५ से श को स । ३ से रेफ लोप। आदित्य होने से सकारं द्वित्व नहीं होगा। नं. ३२ से तकार को दकार । नं० ५श को सं। २ से य लोप । ६ से णकार । ४ से द्वित्व । संयुक्त णकार परे है अतः मधूकादिक मे माना जायगा । तो नं० २+ से ऊकार को उकार हो जायगा अथवा नं०२+३.से उकार होगा। हृदय शब्द के ऋ को नं० १३ से इकार । १ से दकार यकार का एवम् अयं के यकार का लोप । नं०५ १ से से [ ५० ] श को सकार । १५ सेप को वकार । अधवा या सुदो सुपाहिमश्राए मए श्रयं सावो। यतः सखीमिः अत्यादरेण संदिष्टास्मि-1 नं० २० से य को जकार । ३२ से त को द । ११ से विसर्ग को श्रोकार । नं०६ से स्त्र को हकार । नं०१७ से त्य को चकार । ४ से द्वित्व । नं० २४१२ सेट को ठ। ४ से द्वित्वा से टकार। जदो सहीहिं श्रच्चादरेण संदिक्षि । स राजा यदि त्वां न स्मरति, तदा इद- मङ्गुलीयकं दर्शयिष्यसि । नं० २+२४ और ३१ से श्रोकार । सो । १ से ज लोप । २० से य को जकार । १ से द लोप । ६ से पकार । ३२ से त को दकार । एतत् के अन्त्य तकार का नं० २+३४ से लोप । २+३३ से अनुस्वार । ३२ दकार । न० १ से यकार ककार का लोप । दर्शयिष्यसि नं० । ३ से रेफ लोप । २+२१ अनुस्वार । २ से य लोप । ५ से श को सकार | ण्यन्त की एकार है। श्रतः द्वित्व नं० ४ से नहीं होगा। क्योंकि दीर्घ और अनुस्वार से पर को द्वित्व नहीं होता है। नं. २+२८ से 'इति' शब्द की इकार को तकार । सो राया जह तुम । सुमरेदि तदा एदं अंगुलोअयं दंसेसि त्ति । उत्तररामचरिते प्रथमेऽङ्क ८ श्लोकादनन्तरम् सीता - जायामि, अजउच! जाणामि । किन्तु सन्दावारिणा बन्धु जगविप्पोमा होन्ति। जानामि आर्यपुत्र ! जानामि । नं. ६ से नकार को णकार । २१ सेर्य को नादेश । ४ से द्वित्व । २+३० से श्राकार को प्रकार । १ से पकार का खोप। ४ से प्रगत रेफ का लोप । २ से द्वित्व | जाणामि, अज्जउत्त ! जाणामि । किन्तु सन्तापकारिणः । न० ३२ से त को द । १५ से प को वकार । १ से क लोप । किन्तु सन्दावनारिणो । बन्धुजनविप्रयोगा भवन्ति । नं०६ से न को ग। ३ से रेफ लोप । २ से प द्वित्व । १ से यकार-गकार का लोप । भू को 'हो' श्रादेश । अथवा नं. ६ से भ को ह-श्रादेश । प्राकृतत्वात्, शप नहीं। होन्ति । बन्धुजणविपश्रोग्रा होन्ति। पुनस्तत्रैव-सीता-भअयं ! णमो दे, अवि कुसलं सजामातु मस्स गुरुजण- स्स प्रज्माए सन्ताए। - ।

अनुस्वार । नं. ६ से नकार कोरलाप । प्राकृतत्वात् पदान्तस्थ नकार को भी [ ५६ ..] को णकार । नं० ११ से विसर्ग को अोकार, ३२ से तं को दकार | मअवं णमो दे । अपि कुशलं सजामातृकंस्य गुरुजनस्य, आर्यायाः शान्तायाश्च । न० १५ से प को वकार | ५ से श को स । नं. १४ से मातृगत ऋ कार को उकार । १ से जकार का लोप । नं० २ से स्य गत यकार का लोप । ४ से सकार द्वित्व । ६ से नकार को णकार । नं० २१ से र्य को जकार । ४ से द्वित्व ० ५ से श को सकार, १ से चकार का लोप । - षष्ठी विभक्ति को एकाकारान्त स्त्रीलिङ्ग में होता है। पुनस्तत्र वाग्रे-अदो ज्जेव राहवकुलधुरंधरो अज्जउत्तो । अत: एव । नं० ३२ से त को द । ११ से अोकार। एव अव्यय को ज्जेव्व प्रयोग होता है । राघव शब्द के धकार को नं. ६ से इंकार । अज्ज उत्तो का साघुत्व कर आये हैं। पुनरग्रे-चित्रपटदर्शने - के एदे उवरि गिरन्तरदिटा उवत्थुवंति विश्र अज्जउत्तं । के एते उप.रे निरन्तरदृष्टा उपस्तुवन्ति इव आर्यपुत्रम् । नं० ३२ से तकार को दकार । १५ सेप को व। नं०६ सेन को ण ! १३ से ऋकार को इकार । नं० २+१२ । से ष्ट को ठ । ४ से द्वित्व । ७ से टकार । दिठा । १५ से पकार को व । न. २+१३ से स्त को थ । ४ से द्वित्व । ७ से पूर्व य को त । अजउत्तं का साधुत्व कई वार कह आये हैं, अत: पूर्ववत् उक्तसूत्रों से जानना । पुनरग्रे-अम्महे, दलरणव-णीलुप्पल-सामल-सिणिद्ध-मसिण-सोहमाण- मंसल-देहसोहग्गेण विम्हअ यिमिद ताद दीसमाणा-सुन्दर सिरी अणादरखण्डिद- संकरसरासणो, सिहण्डमुद्धमुहमण्डलो अज्जउत्तो आलिहिदो । अहो, दलन्नवनीलोत्पल नं० ६ से न्न को एण । नं० 5 से त.का लोप, ४ से पहित्व । स्यामल-नं० २ से य लोप। स्निग्ध । नं० २८ से विप्रकर्ष तत्स्वर युक्तता होने से सिनिग्ध हुआ । नं०.६ से नकार को प्रकार । ८ से ग लोए । ४ से द्वित्व । ७ धकार को दकार । सिणिद्ध । मसूण-शोभमान । नं० १३ से इकार । ५ श को स । ६ से..म को - हकार । ६ ते न कोण । मांसलदेहसौमा- ग्येन । नं० १० से श्राकार को अकार । नं०२+६ से श्रीकार को श्रोकार । ।

को से में [ ६० ] ६ से भ को ह । २ से यलोप । ४ से द्वित्त्व । २+३० से भकारोत्तर श्राकार को अकार । ६ से नकार को णकार । विस्मयस्तिमित तातदृश्यमानसुन्दरनीः । नं० ३४ से स्म को म्ह । १ से य लोप । नं० २+ १३ से स्त को थ । ३२ से त को द । तात-के द्वितीयत को भी द, दृश्यमान-श् को दीसमान । अथवा, नं० १३ इकार । २ से य लोप । ५ श को स । इकार को नं० ११ बहुल ग्रहण से दीर्घ । ६ से न कोण । २७ से श्री का विप्रकर्ष । और इकार स्वर. युक्तता । ० ५ से श को स । अनादरखण्डितशङ्करंशरासनः । नं० ६ से न को ण।३२ से त को द । ५ से श को स। ६ से न कोण । शिखण्डमुग्धमुखमण्डलः, नं०५ से श को स । सेख को ह । नं०८ ते ग लोप । ४ से द्वित्व । ७ से ध को द आर्यपुत्रः । नं० २१ से र्य को ज । ४ से द्वित्व । २+३० से प्राकार को अकार । १ से प लोप । ३ से त्रगत रेफ लोप । ४ से तद्वित्व । प्रालिखितः। नं.६ से ख को ह । ३२ से त को द, आलिहिदो। पुनस्तत्र व-एदे क्खु तत्काल विद गोदाण मंगला चत्तारो भादरो विवा- हदिक्खिदा तुम्हें । अम्भहे जाणामि, तस्ति जेन, पदे से तत्सि जेव्व काले वत्तामि। एते खलु तत्कालकृतगोदानमङ्गला । नं. ३२ से त को द, खनु को क्यु प्राकृत में अव्यय है । नं. ८ से त लोप । ४ से ककार द्वित्व, नं० १३ से कह को एकार । ३२ से त को द'। ६से नकार को णकार । चत्वारो भ्रातरः । नं. ३ से व लोप, ४ से द्वित्व, ३ से भा के रेफ.का लोप । ३२ ते त को द, विवाहदीक्षिता यूयम् । ने० १६ से क्ष को ख। ४ से द्वित्व । ७ से कक,र। ३२ से त को द। यूयम् का तुम्हें । अहं जानामि तस्मिन् एव प्रदेशे तस्मिन् एव काले वर्त। अहं का अम्मले। नं०६ से न कोण । नं.२ से तस्मिन् के अधः स्थित मकार का लोप। २ से सकार द्वित्व। एवं को जेब, प्रादेश । नं. ३ से रेफ लोप । ५ से शकार को सकार । वर्ते । श्रात्मनेपद मे प्राकृतत्वात् परस्मैपद 1 नं० ३ से रेफ लोप । ४ से तकार दित्व, वत्तामि। पुनस्तत्र व-एसा पसरण पुरणसलिला भगवदी भागीरही। एपा प्रसन्नपुण्यसलिला भगवती भागीरथी । नं. ५ सेप को स । ३ से [ . ६१.. ] pada । १ रेफ लोप ।.६ से दोनो नकारों को णकार । नं० २ से अधःस्थ . यकार का लोप। ४ से णकार द्वित्व । ३२ से त को दानं०६ से थ.को हकार । भगवदी भागीरही। पुनस्तत्र व-अंग्रे दुर्मुखः--स्वगतम् । हा कधं सीदादेईए ईरिसं अचिन्तणिज्जं जणाववादं देवस्स कधहस्सं, अहवा णिश्रोत्रो क्खु ईरिसो मन्दभाअस्स । हा कथं सीतादेव्या ईदृशम् । नं० ३२ से थ को ध । और इसी से त को द। १ से व लोप । षष्ठी मे एकार देईए । नं० १ से दलोप । न० २+११ से ऋ को रि । ५ से श को स । ईरिसं । अचिन्तनीयं जनापवाद देवस्य कथयिष्यामि । नं० २+१८ से यकार को ज्ज अादेश । पूर्व को संयुक्त परे होने से नं० २+३० से ह्रस्व इकार । ६ से रण कार । १५ से ५ को वं । नं० २ से यलोपं । ४ से सकार 'द्वित्व । ३२ से थकार को धकार । १ से व लोप । 'स्य' का पूर्ववत् य लोप द्वित्व। कधइस । अथवा नियोगः खलु ईदृशो मन्दभागस्य । नं. ६ से को हकार। ६ से णकार । १ से यकार गकार का लोप । खलु को क्खु आदेश । १ से द लोप। नं०२+११ से ऋको रि आदेश । ५ से श को स । १. गकार २ यकार लोप । ४ से सकार द्वित्व जानना। पुनस्तत्र व दुर्मुखः-कधं दाणिं अग्गिपरिसुद्धाए गब्भपरिप्फुडिदपवित्त- रहुउलसन्ताणाए देईए दुज्जणवणादो एव्वं अणज्जं अभवसिदं देवेण । कथमिदानीम् अग्निपरिशुद्धायाः। नं० ३२ से थ को धकार । नं० ११ से इदानीम् के इकार का लोप और अन्त्य ई को ह्रस्व । अथवा २+३ से. इकार । नं०६ से न कोण | नं० २ से अधःस्थ नकार का लोप । ४ से गकार द्वित्व । ५ से श को सकार । गर्भपरिस्फुटितपवित्ररघुकुलसन्तानाया देव्याः। नं० ३ से. रेफ लोप । ४ से सकार द्वित्व । ७ से पूर्व भ को व । गम । नं०८ से सकार का लोप । ४ से द्वित्व । ७ से पूर्व फ को प । नं०१६ से ट को ड । ३२ से त को द ।नं. ३ से त्र के रेफ का लोप । ४ से त द्वित्व । नं०६ से घ को ह । १ से क लोप । ६ से न को ण । देव्याः के १ से वकार का लोप । देईए । दुर्जनवचनात् एवं अनार्यम् । नं० ३ से रेफ लोप । ४ से जकार द्वित्व । ६ से नकार को णकार। १ से चकार का लोप १६ से ण । पञ्चमी विभक्ति को दो श्रादेश पूर्व को दीर्घ । से .

[ ६२ ] नं० २+ २३ से द्वित्व । एव्वं । नं० २१ से र्य को जकार । ई से द्वित्व ६ से णकार । २+३० से आकार को अकार । अणज्ज । अध्यवसितं देवेन । नं०२२ से ध्य को झकार । ४ से द्वित्व । ७ से पूर्व झ को ज । ३२ से त को द । ६ से न को णकार । अझवसिदं देवेण । पुनस्तत्रैव उत्तररामचरिते तृतीयेऽके नवमश्लोकादनन्तरम्- सीता-हद्दी हद्दी में मन्दभाइणिं उद्दिसिय ग्रामीलन्तणेत्तणोलुप्पलो मुच्छिदो जेवं, हा हा कधं धरिणी पिट्टे णिरुच्छाहं णीसह विपल्हत्यो, भअवदि. तमसेः परित्ताहि २ जीवावेहि अज्जउचं, ( इति पादयोः पतति ) हा धिक् हा धिक् । यहां 'हद्धी-हद्धी' यह पाठ प्रतीत होता है। नं०२+३४, से अन्त्य का लोप । २+३५ से सु के परे दीर्घ । २+ २३ मे धकार द्वित्व, ७ से पूर्व धकार को दकार । नं० २+३० से ह्रस्व । एवम्-हद्धी २ यह प्रतीत होता है | म मन्दभागिनीम् उद्दिश्य ग्रामीलन्नेत्रनीलोत्पलो मूर्छित एव । नं० १ से गकार का लोप । नं० ६ से नकार को णकार । अमि के पूर्व को सर्वत्र ह्रस्व होता है. में 'उद्दिसिय' नं० २+३६ से क्त्वा को इय अादेश । ५ से श को स । प्राकृत मे परस्मैपद शतृ प्रत्यय के स्थान मे अन्त का प्रयोग होता है। जैसे चलन्त, गच्छन्त, पठन्त । एवम्, अामीलन्त । नं. ६ से न को ण । ३ से रेफ लोप । ४से तकार द्वित्व । पुनः ६ से रण । नं.८ से तकार लोप ४ से द्वित्व नं. ११ से अकार उकार को उकार । नं.३ मे रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ७ से चकार । नं० २+३० से ऊ-को उ ह्रस्व । ३२ से तकार को दकार | एवं को प्राकृतः मे ज्जेव का प्रयोग होता है । हा हा कथं घरिणीपृष्ठे निरुत्साह, निःसहं विपर्यस्तः। नं. ३ से थ को घ । नं. १३ से ऋ को इकार । ८ से पकार का लोप । ४ से द्वित्व । ७ से टकार | पिढे। नं० ६ से णकार | २३ से त्स को छकार, ४ से द्वित्व । ७ से चकार । 'निःसह । नं० ६ से णकार | ११ से विसर्ग लोप, इकार दीर्घ । 'विपर्यस्तः' यहां भी, 'विपल्लत्यो' पाठ टोक है, क्योंकि 'पर्यस्तपर्याण- सौकुमायेंषु लः' से ये को 'लकार ४ से द्वित्व । संभवतः प्राकृतानभिज्ञ संशोधक का दोष है, अस्तु यदि पर्यस्तपर्याण० सूत्र को वैकल्पिक माने तो नं० २१ से र्य को जकार ४ से द्वित्व पनत्यो होगा, पल्हत्यो नहीं । नं. २+ १३ से स्त को थ। ।

[ ६३. ] ६ से द्वित्व । ७ से तकार । विपल्लत्यो । भगवति। नं. १ से ग लोप ।३२ से दकार । परित्राहि । प्रस्तत्वात्परस्मैपद । ०.३ से रेफ लोप ।४ से द्वित्व जीव- य । ण्यन्त होने से आप का आगम । नं० १५ से पकार को व श्रादेश । प्राकृत- त्वात् 'हि' का लोप नहीं होगा। आर्यपुत्रः । नं० २१ से र्य को जकार । ४ से द्वित्त । नं०२+३० से हत्व । नं. ३ से रेफ लेप । ४ से द्वित्व। अज्जउत्तं । पुनस्तत्रैव-द्वादशतमश्लोकानन्तरम्। सीता-( समन्युगद्गदम् ) अज्जउत्त ! असरिस खु एवं वत्रणं इमस्स वुत्तन्तस्स । ( सास्त्रम् ) अहवा किं त्ति । वज्जमई जम्मन्तरेसु विपुणो असंभा- विददुल्लहदसणं मं जेव मंदभाइणि उद्दिसिय वच्छलस्स एवंवादिण अज्ज- उत्तत्स 'उरि गिरणुकोसा मविस्स ! अहं एदस्स हिअ जाणामि, मम एसो ति। आर्यपुत्र ! असदृशं खलु एतत् वचनं अस्य वृत्तान्तस्य । नं० २१ से र्य को जकार । ४ से द्वित्व । ३० से आकार को अकार १ से प लोप । ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । असदृशं । १ से द लोप । नं० २+११ से ऋ को रि। ५ से श को स । खलु के स्थान खु अथवा क्खु अव्यय । नं०२+२६ से अन्त्य द का लोप । २+३३ से अनुस्वार । ३२ से दकार । एदं । नं. १ से च लोप । ६ से नकार को प्रकार । वनणं । इमस्स । स्य के यकार का लोप । द्वित्व । पूर्ववत् । नं० १४ से ऋ को उकार । वुत्तन्तस्स । प्राकार को नं. २+३० से ह्रस्व । य लोप सद्वित्व पूर्ववत् । ( सात्रम् ) अथवा । नं०६ से य को हकार । अहवा । किमिति । नं. ११ से इकार लोप । किं ति अनुस्वार से पर होने से तकार २+२८ से नहीं होगा। द्वित्व 'त्ति पाठ होने से त आदेश। वज्रमयीं । नं.३ से रेफलोप । २ से द्वित्व । १ से य लोप। प्राकृतत्वात् अम् के पर हस्वा वज्जमई। जन्मान्तरेघु अपि । न्म को मकार | ४ से द्वित्व । नकार तकार को संयुक्त होने से नं. २+३० से हस्व । ५ से ष को सकार । ११ से अपि के अकार का लोप । १५ से पकार को व आदेश । पुनः । ६ से णकार । ११ से रोकार । पुणे । असंभावितदुर्लभदर्शनम् । नं०३२ से तं को द । ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्वा सेभ को ह । ५ से श को स । ३ से रेफ 'लोप ।६ से नकार को [ ६४ ] णकार । दृश् धातु को वक्रादि मे मान कर । २.४२१ से अनुस्वार । असंभाविद दुल्लहदसणं । माम् एव । मां को मं। एव अव्यय को ज्जेव । मन्दभागिनीम् । नं. १ से गकार का लोप । ६ से नकार को कार । प्राकृत द्वितीया के एक वचन मे हस्व । मंदभाइणिं । उद्दिश्य । नं० २+३६ से क्त्वा को इय आदेश। ५ से श को स । उदिसिय । वत्सलस्य । नं० २३ से त्स को छकार । ४ से द्वित्व । ७ से चकार । २ से य लाप। ४ से द्वित्व । वच्छस्स । एवं वादिणे अज्ज उत्तस्स । ० ६ से न को ण । अज्जउत्त का साधुत्व यं को ज । द्वित्व । रेफ लोपादि से इसी प्रकरण के प्रारम्भ मे कर आये हैं। उपरि निरनुक्रोशा । नं १५ से को व । ६ से न कोण । नं०३ से रेफ लेाप । ४ से ककार द्वित्व ।। ५ से श के स । णिरणुकोसा । भविष्यामि । भविस्सं । अहं एतस्य हृदयं जानामि । नं. ३२ से त को द । य लोप । स द्विस्व । नं. १३ से ऋकार को इकार । १ से दकार । यकार का लोप । ६ से न को ण। अहं एदस्स हिअयं जाणामि । मम एप इति । नं. ५ से ष को स । ११ से विसर्ग को रोकार । नं० २+२८ से इकार को तकार । मम एसो त्ति। अस्मत्कृते भारतविजयनाटके चतुर्थेऽके चरः- निगडियपयारविन्दा विकिरणवसणा मिलाणमुहकन्ती । चिन्तेन्ती किं पि मणसि सुदुक्खिया भारही माया ॥२॥ निगडितपदारविन्दा ! नं. १ से तकार दकार का लोप । महाराष्ट्री मे अकार हो रहेगा, परं तु अाधुनिक प्राकृत कवि संप्रदायानुकूल, तथा सुखबोधार्थ नं०२४२५ से अकार को यकार आदेश होगा। विकीर्णवसना । नं. ३ से रेफ लोप | २ से णकार द्वित्व । संयुक्त णकार परे होने से । नं० २+३० से प्रकार को हत्व । ६ से नकार को णकार । म्लानमुखकान्तिः । न २७ से मकार लकार का विप्रकर्ष । पूर्ववर्ण मकार के साथ इकार का योग । नं० ६ से नकार को णकार । ई सेव को ह । कान्ति संयोगी है अतः २४३० से ग्राकार को हस्व । २+३४ से सु का लोप । २+३५ से इकार को दीर्घ । मिलाणमुहकन्ती । चिन्त- यन्ती। एयन्त होने से एकार । चिन्तेन्ती किमपि । नं०.१) से प्रकार का लोप ।

[ ६५ ] मनति। ६ से न को ण । मणसि । सुदुःखिता। नं० ११ से विसर्ग लोप। ४ से ख द्वित्व । ७ से ककार । १ से त लोप । नं० २+२५ से यकार सु- दुक्खिया । भारती माता । नं० २+२६ से तकार को हकार । १ से त लोप । २+२५ से यकार । भारही माया। पुनस्तत्रैव-चर:-सव्वत्थ वङ्गदेसम्मि धणलोलुवेहिं कम्पणी-पुरिसेहि तिगुणिो करो पवड्डिों! सर्वत्र वङ्गदेशे। नं० ३ से रेफ लोप । ४ से वकार द्वित्व । सर्वादिक की सप्तमी के एक वचन मे स्सि, म्मि त्थ तीनों का यथेच्छ श्रादिष्ट प्रयोग शुद्ध होता है । अतः स्थ आदेश होने से, सम्वत्य । वङ्गदेशे । नं० ५ से श को स । वङ्ग- देसम्मि । धनलोलुपैः। नं० ६ से न को ण । १५ से प को व । भिस् को हिं । धणलोलुवेहिं । कम्पनीपुरुषैः। नं० ६ से न को ण । नं० २+२६ से रु के उकार को इकार, ५ से ष को स । कम्पणीपुरिसेहिं । त्रिगुणितः करः प्रवद्धितः । नं.३ से त्रगत रेफ का लोप । १ से त लोप । २+३७ से रोकार । तिगुणि ओ करो। न० ३ से दोनो रेफों का लोप । नं० १ से त लोप । वृधधातु के ध को ढ, पवड्डियो। पुनस्तत्रैव-चरः-तदो पवड्डियकरदाणम्मि असमत्या वङ्गदेसी पुरिसा. कम्पणी-पुरिसेहिं बहु कुट्टिया । तदो वि धणाभावेण तिगुणियकरघण अददमाणा सव्वश्रो कण्डगाइण्णेहिं बिल्लदण्डेहिं एव्वं कुट्टिया जेण के वि मित्रा, के वि मुच्छिा जाग्रा । ततः प्रवर्धितकरदाने । नं० ३ से त को द । नं० ११ से विसर्ग को प्रोकार । नं.३ से दोनों रेफों का लोप । वृधधातु के घ को ढ यादेश ४ से द्वित्व । ७ से प्रथम द को ड श्रादेश । १ से त लोप । २+२५ से अकार को यकार । नं० ६ से न को ण। तदो पवड्डियकरदाणम्मि । असमर्थाः वङ्गदेशीयपुरुषाः। नं० ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ७ से तकार । बहुवचन मे योकार । नः ५ से श को स । १ से य लोप ।नं० २+२६ से उकार को इकार | ५ से प को स । “असमत्था वङ्गदेसीअ पुरिसा कम्मरणीपुरिसेहिं"। हनका साधुत्व पूर्ववत् । बहु कुट्टिताः। नं० १ से त लोप । नं. २ + २५ से यकार । बहु कुट्टिया । ततोऽपि धनाभावेन त्रिगुणितकरदानं । नं० ३२ से त को द । १५ ने प को वा६ से न कोण। नं. ३ सेक लोफ । १ से त लोप। ६ से ५ । [ ६७ ] हो जाता है । यह अनेक नाटकों के उदाहरण दिखा कर सिद्ध कर के निश्चय करा दिया है कि इस लघु प्राकृत व्याकरण से केवल सप्ताह मात्र में एक घटिका मात्र प्रति दिन देखने से प्राकृत भाषा का अच्छा बोष हो जाता है। जिससे निर्वाध नाटकों के तथा जैनागम, बौद्धागमों के प्राकृत का ज्ञान हो जाता है। आशा है, प्राकृत भाषा जिज्ञासु विद्वत्समाज इससे पूर्ण लाभ उठाकर इसका श्रादर करेगा । इति । यथा जैनागम-दश वैकालिक सूत्र जहा दुमस्त पुप्फेसु भमरो गिबहई रसं णय पुष्पं किलामेइ सोय पीणाइ अप्पयं। यथा-नं. (२० (६) से जहा । द्रुमस्य । नं. २+३+ ४ से । दुमस्स । पुष्पेषु । नं. २-१४ सेप को फ। ४ से द्वित्व । ७ से १ । ५ से घ को ल । पुप्फेसु सिद्ध होगा। भ्रमरः । ३+२+३१ से भमरो । गृहाति। ३० से कार की अर्ध्व स्थिति । नं. १३ से इकार, १ से तलोप । प्राकृतत्वात् ईकार, गिरहई । न च । नं. ६ से ण । १ से चलोप । १२५ से यकार | पुष्पं का गुप्फ पूर्ववत् । क्लामयति । नं. २८ से क्लाम का किलम, ण्यन्त से श्राकार एवम् एकार । नं. १ से त लोप । “स च। पूर्ववत् , ओकार, च लोप, यकार । प्रीणाति । नं. ३ से रेफ लोप । १ से तलोप पीणाइ । अात्मानं का अप्पयं । आवश्यक सूत्र असंजयं न . बंदिजा मायरं. पियरं सुश्र सेणावई पसथारं रााणो देवयाणिय । उपसग तथा समास होने पर भी यत शब्द का प्रादित्व है। असंयत। नं. २० से ज । 1 से दलोप, २+२५ से य। वंदेत्, लिङ् लकार मेज होने से वंदिना । एवम्-मातरं पितरं सुतं. तीनों में नं १ से लोप । २+२५ से यकार | सेनापति, नं. १ ते तलोप, ६ से णकार । प्रशास्ता नं. ३ से रेफलोप । ५ से सकार | नं. २+ १५ से थ। ४ से द्वित्व । ७ से तकार । २+३० से श्राकार को हत्व ! राजानः । न. ११ से विसर्ग को योकार । नं. जलोप दैवतानि । नं.२+से ऐकार को एकार नं०१ से तलोप | ६ से या :

[ ६८ ] २+ २५ से यकार । देवयाणि । पूर्ववत् । चलोप | यकार | गाथा का मावाथ यह है कि सयत-पञ्चमहाव्रती साधू, यती, असंयत-गृहस्थ की वन्दना न करै परं तु व्यवहार सूत्र में यादर सत्कार के लिये प्रकारान्तर से अभ्युत्थान मात्र की याज्ञा है। वन्दना की नहीं। वंदित्तादि सूत्र- गामी अरिहंताणं णमो सिद्धाणं गामो पायरियाणं एमो उवझायाणं गमो लोए नवसाहणं | एसो पंचणमुक्कारो सन्यपावप्पणासणो मंगलाणं सब्वेसि. प्रथमं हवइ मंगल। प्राकृत मे सर्वत्र चतुर्थी के स्थान मे पष्ठी ही होती है, अन्तु । यहां सर्वत्र नं. ५ में नम: के नकार को णकार । एवम्, ११ से ग्रोकार होगा। अर्हताम् ,. ग्राकृत में शतृप्रत्ययान्त से नुम् अकारान्तता हो जाती है, जैसे चलन्ताणं गच्छ- न्ताणं अरिहताणं । अर्हन्त के, नं० २७ से रेफ हकार का वर्णविश्लेष और पूर्व मे इकार । अरिहंताणं । नमः सिद्धानाम्, उक्त सूत्रों से सिद्ध है। नमः प्राचार्यागान् । न०२+२० से यं को रिय यादेश | नं. १० से 'चा' को हृस्व । १ से चलोप ! नं० २+ २५ से यकार । ६ से णकार । उपाध्यायानां । नं० १५ मे 'प' को व नं० २२ से ध्य को क । ४ से द्वित्व । ७ से पूर्व में को जकार । नं० २+३० से संयुक्त ज्म पर रहने से पूर्व को ह्रस्व । उवझायाणं । लोके सर्वसाधूनां । नं० १ से ककार लोप । ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व । ६ ने 'ध' को ह । लोए सवसाहणं । सर्वत्र घष्टी बहुवचन में ग्राम को णं यादेश जानना । एप। नं. ५ से सकार। नं. २+३१ से श्रोकार। एसो।। नमत्कारः । नं० ६ ने णकार । ११ से 'स्' को ग्रोकार । नं० २+२३ से क कार द्वित्व । नं० ११ मे विसर्ग को उकार । २+३१ में मु को योकार | णमु-. कारी । सर्वपापप्रणाशनः । नं. ३ मे रेफ लोप | ४ मे द्वित्व । १५ से वकार । ३ मे प्रगत रेफ का लोप । ४ से द्वित्व । ६ से दोनों नकारों को कार · ५ से शु को स । पूर्ववत् अोकार, सव्वपावप्पणासणो । मंगलानां च । श्राम को णा श्रादेश। प्रथमं । नं. ३ में रेप लोप। प्रयमशिथिल निषवेषु । ढः से ढकार पटमा भवति । नं.६ने म को इकार । १ से तलोप । हवद मंगलम् । ।

-- [ ६६ ] भगवतीसूत्र समाप्तौ- वियसिय अरिविंदकरा णासियतिमिरा सुहासिया देई मझ पि देउ मेहं बुहविवुहणमंसिया णिचं । विकसित नं० १ से ककार तकार का लोप । नं०२+२५ से यकार । वियसिय-अरविंदकरा, नाशिततिमिरा। नं० ६ से णकार । ५ से श को 'स' आदेश । पूर्ववत् तलोप । यकार । णासियतिमिरा । सुखासिता देवी । नं० ६ से ख को ह। नं. १ से तकार वकार का लोप। २+२५ से यकार । सुहासिया देई । मह्यम् अपि ददातु मेधाम् । नं० २२ से झ आदेश । ४ से द्वित्व । ७ से जकार, दा का दे। नं०१ से तकार लोप । ११ अपि के प्रकार का लोप । से धकार को हकार । प्राकृतत्वात् अम् के परे ह्रस्व । मन्झ पि.देउ मेहं। बुध- विबुध नमंसिता। नं. ६ से 'य? को 'ह' । ६ से णकार । पूर्ववत् तकार लोप । अकार को यकार । बुहवि हणमंसिया। नित्यम् । नं. ६ से णकार । १७ से चकार । ४ से द्वित्व । णिच्चं । स्थालीपुलाकन्यायेन कुछ जैनागमों के उदाहरण दिखाये हैं। ऐसे ही सब जैनागमों के प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं । प्रायः पूर्ण रूप से अबाध प्राकृत का ज्ञान केवल इन ७० सूत्रों से हो जाता है। जिस को श्राप स्वयं अनुभव करके निश्चय कर सकते हैं अब कतिपय नाटकों के पुनः उदाहरण देते हैं। स्वप्नवासवदत्ते-द्वितीयेऽङ्के- किं भणासि ? एसा मट्टिदारिया माइबीलदामण्डवस्स पस्सदो कन्दुएण कोलदित्ति जाव भट्टिदारिश्र उवसप्यामि । अम्मो इअं भट्टिदारिश्रा। किं.भण सि प्राकृतत्वाद् वैकल्पिक दीर्घ । एषा भर्तृदारिका । नं०५ से को स । न० २+१५ सेर्त को ट । ४ से द्वित्व । नं. १३ से ऋकार को इकार १ से क लोप। एसा भट्टिदारिया। माधवीलतामण्डपस्य। नं० ६ से धक को हकार । ३२ से 'त' को 'द। १५ से पकार को वकार । २ से य लोप । से सकार द्वित्व । माहवीलदामएडवरस । पार्श्वतः ।नं० ३ से रेफ वकार का लोप ५ से श को स । ४ से सद्वित्व । नं. २+३० से संयुक्त सकार पर रहने ।

१ - को हस्व । ३२ से त को द। ११ से विसर्ग को प्रोकार । पस्सदो। कन्दुकेन क्रीडति इति । नं० १ से क लोप । ६ से एकार । ३ से रेफ लोप । २५ से। को ल, ३२ से तकार को दकार । नं. २+ २८ से इति शब्द के श्रादिस्थ इकार को तकार । कन्दुएण कीलदि त्ति । भर्तृदारिकाम् । पूर्ववत् टकार द्वित्व, इकार का लोप । हिदारियं । उपसपीमि नं० १५. से पकार को वकार | रेफ लोप, द्वित्व पूर्ववत् । अहो इयं भर्तृदारिका ! अम्मी, अाश्चर्यसूचक अव्यय । इयं । नं. १ में य लोप । इयं । मट्टिदारिया का पूर्वोक्त सूत्रों से साधुत्व जानना । पुनस्तत्रैव- उक्कणिदकगणचूलिएण बाग्रामसनादग्दविन्दुविइत्तिदेण परिस्सन्तरमणी- अदसणेण मुहेण कन्दुएग्ण कोलन्दी इदो एव्य प्रायदि जाय उवसनिस्सं । उत्कर्गितकर्णचूलिकेन । नं०८ से तकार लोप।४ से द्वित्व ।३ से रेफ लोप ।४ से द्वित्व । ३२ से 'त' को 'द रेफ लोप द्विव पूर्ववत्। नं. १ ले क लोप । ६ से णकार । उक्कापिगादकाचूलिएण | व्यायामसजातस्वेदविन्दुविचित्रितेन 1 नं. २ से याद्यस्थ यकार का लोप । १ मे य लोप । ३२ से 'त' को 'द। स्वेद-के वकार का नं० ३ से लोप । मेच लोप । ३ से रेफ लोप । ३२ से दकार । ६ से रएकार । वायामसंजादलेद.बन्दुविइत्तिदेण । परिश्रान्तरमणीयदर्शनेन । नं० ३ मे रेफ लोप । ५ से श को स १४ से द्वित्व । 'न्त' को संयुक्त वर्ण परे होने से नं. २+३० से श्राकार को प्रकार | नं. १ से यलोर। नं.२+२१ मे अनुस्वार । ३ से रेफ लोप । ५ से श को स ।६ में दोनों नकारों को गाकार परिस्सन्तरमणी- अदसणेगा । यहां 'रमणी 'अ' प्रयोग मे । नं० २+१६ । 'उत्तरानीययोोज्जो वा इसको वैकल्पिक मानने से उज यादेश नहीं। मुखेन । नं. ६ सेख को ' ६ से प्रकार, मुहेण । उपलक्षिता क्रीडन्ती 1 नं. ३ मे रेफ लोप । २५ से द को ल । ३२ से द । कीलन्दी । इदो एव्य याअच्छादि । नं० ३२ से त को द। ११ मे विसर्ग को श्रोकार | नं० २+ २५ से वकार द्वित्व । पूर्ववत् तकार को दकार । इदो एव्व प्रायदि । जाय उपसप्पिस्म । यावत् उपसपिप्यामि । न० २० से यकार को जकार नं० २+३६ से अन्त्य हल तकार का लोर। नं. ५ से यकार को वकार । ३ मे रेफ. लोप । ४ मे द्वित्व । भविष्यन् उत्तम पुरुष मे संका प्रयोम होता है। नाव उवसपिरस ।

[ ७१ ] वेणीसंहारे चतुर्थे । सुन्दरका-होदु । देव्वं दाणी उवालहिस्सं । हं हो देव ? एारहाणं अक्खोहिणीणं णा जेहो भादुसदस्स भत्ता गनेअहोणगराअसल्ल किवकिदवम्म अस्सत्यामप्पमुहस्स राअचक्करस सअलपुहवीमण्डले कणाहो महारा- अदुजोहणो वि अएसेसीअदि | अण्णेसीअन्तो वि ण जाणीअदि ! कस्सिं उद्देमे वदति। सुन्द० । भवतु दैवम् इदानीम् उपालप्स्ये । प्राकृत में शप के वैकल्पिक होने से भोतु | नं. ६ से 'भा को ह । ३२ से तकार को दकार हो- दु । न० २२७ से ऐकार को एकार । २+२३ से वकार द्वित्व । देव्वं । नं. ११ से इकार का लोप । नं०६ से नकार को एकार । दाणीं । वस्तुतस्तु नं० ११ से बहुल ग्रहण से ह्रस्व दाणिं का प्रायः प्रयोग होता है । अस्तु । उपालप्स्ये। नं० १५ से यकार को 'व' । प्राकृत मे सेट होने से, इट् नं० ६ से 'भ' को ह । उवालहिस्स। हं हो अव्यय । देव ! नं० २+७ से ऐकार को एकार । नं. २+२३ से वकार द्वित्व । देव । एकादशानाम् । नं. १ से ककार लोप । नं. २+८ से दकार को रेफ । २+१७ से शकार को हकार । एपारहाणं | आम् को गं आदेश | "एअादसाणं" यह मूल पाठ अशुद्ध है। किंतु 'एबारहाणं' यह पाठ ठीक है। 'अक्षौहिणीनाम्' नं० १६ से १ को 'ख' श्रादेश कर के अक्खोहिणी पाठ है, परंतु अयादि मे पाठ मान कर छ आदेश कर के अच्छौ- हिणी होगा । लोक मे ऐसा ही प्रसिद्ध है। नं १८ से छादेश । ४ मे हित्व । ७ से चकार । षष्ठी बहुवचन मे णं अच्छोहिणीणं । नाथः । नं० ६ से ण । ६ से हकार । नं०२+३१ से श्रीकार । णाहो। भ्रातृशतत्य ज्येष्ठः । नं०३ से रेफ लोप । ३२ से दोनों 'त' को 'द' । १४ से उकार । ५ से शकार को सकार । २से यकार लोप । ४ से द्वित्व । ज्येष्ठः । नं०२ से य लोप | नं. ८ सेप लोप । ४ से द्वित्व । ७ से १ कोट श्रादेश । भादुसदत्स जेहो। भर्ता । नं०४ से रेफ लोप । २ से तकार द्वित्व । भत्ता । "गाङ्गेयद्रोण(ण)अङ्गराजशल्यकृपकृत- वर्म-" नं० १ से य लोप । २०२+३० से आकार को हत्व । नं० ३ से रेफ लोप । ४ से द्वित्व | नं २ से शल्य के यकार का लोप । ४ से द्वित्ला ५ से सकार। नं० १३ से उभय ऋकार को इकार । १४ से 'य' को व । ३२ से त को द ।नं० ३ से रेफ लोप । ४ से मकार द्वित्व । गंगेश्रद्दोणगराअसल्ल-किव-किदवम्म ।

.. [७२ ] "अश्वत्थामप्रमुखस्य राजचक्रस्य सकलपृयिवीमण्डलैकनायो” । नं. ४ से व लोप । ५ से स । ४ से द्वित्व । नं. ८ से सलोप । ४ से द्वित्व । ७ से तकार । ३ से रेफ लोप ! ४ से द्वित्व। 8 से 'ख' को ह । २ से य लोप । ४ से द्वित्व । हसे 'ख' को ह । २से य लोप । ४ ले द्वित्व। नं० १ से ज लोप । रेफ य लोप द्वित्व पूर्ववत् । सकल । नं० १ से क लोप। १४ से उकार । ६ से थ को ह । नं. २७ मे ऐकार को एकार । ६ से णकार । अस्सत्थामप्यमुहस्स । 'रायच- क्षत्त । सयलपुहवीमण्डलेकणाहो' । "महाराजदुर्योधनोऽपि अन्विध्यते” नं. १ से जलाप । २१ से र्य को ज अादेश । ४ से द्वित्व । ६ मे हकार । ६ से पकार । १५ से पकार को व । नं० ११ से अकार लोप । 'महारादुनोहणो वि अरणेसीअदि' । 'अन्विष्यमाणोऽपि न ज्ञायते कस्मिन् उद्देश वर्तते इति । प्राकृत ने कर्म प्रत्यय मे भी परस्मैपद होता है। कर्म मे 'ईया प्रत्यय धातु के साथ आता है । एवम्-अन्वेप ईय अन्तः । अन्तः यह शतृ का रूप है। एवम् पूर्ववत् वलोप, कार, द्वित्व, सकार होने से अण्णेसीयन्तो वि ण जाणी- अदि । पूर्ववत् । ईय प्रत्यय । कर्म मे प्रत्यय होने पर भी ज्ञाधातु को जा यादेश। 'ना' विकरणागम होगा | नं. ३२ मे त को द । ण जागीयादि । कस्मिन् । नं० २ से मलोप । ४ से द्वित्व । ५ मे श को स । नं. २ + १५ से ते को ट। ४ से द्वित्व । १ से तलोप । प्राकृतत्वात् परस्मैपद | नं० २+२८ से इकार को तकार । श्ररागसोअन्तो वि गण जागीयदि, कस्सि उद्देने वट्टइत्ति । मुद्राराक्षसे प्रथमेऽद्वे चन्दनदासः-अचादरो सङ्कणीयो । अह इं। अजस्स प्यसाएण अखं- दिदा मे वाणिजा । अत्यादरः शनीयः । नं. १७ से 'त्य को च । ४ से द्वित्व । ३२ मे त को द । नं० २+३१ से अोकार | अचादरो। नं०५ से श को स । रणकार । १ ले य लोप । पूर्ववत् प्रोकार । सङ्कणीयो । अय किं । नं. ६ से य को ह । १ से कलोप । अदई। ग्रार्यत्य प्रसादेन । नं० २१ से र्य को जकार । ४ ने द्वित्व । नं० २+३० मे श्राकार को प्रकार | नं० २ से य लोप । से द्वित्व । ३ से रेफ. लोप । १ मे दलोप । ६ से कार । अजस पसाएरण । वस्तुतः प्रसादगत पकार को, अादित्य दोन ने द्वित्व नहीं होगा । अखंडिता। नं. ३२ ने त को द । अखंविदा । मे वाणिज्या । नं. २ में यलोर। ४ से द्वित्व ।

। [.. ७३. ] वाणिजा । पुनर- सन्तं पावं | सारअणिसासमुग्गएण वित्र पुषिणमाचन्देण चन्दसिरिणा अहिग्रंणन्दन्ति पकिदियो। शान्तं पापम् । नं० २+३० से नकार तकार का योग होने से आकार को ह्रस्व । नं० ५ से श को स । १५ से वकार । शारदनिशासमुद्गतेन इव । नं. ५ से दोनों शकारों को सकार नं. १ से दकार तकार का लोप । नं०८ से संयुक्त द का लोप । ४ से द्वित्व । ६ से णकार | इव अव्यय के स्थान मे. विय अव्यय प्राकृत का है। पूर्णिमाचन्द्रेण चन्द्रश्रिया! नं. ३ से तीनों रेफों का लोप । ४ से द्वित्व । नं. २+३०.से उकार को ह्रस्व ।नं० २ से श्री के वर्गों का विश्लप और पूर्व मे इकार । या को णा । पुरिणमाचन्देण चन्दसिरिणा । अधिकं नन्दन्ति प्रकृतयः । नं० ६ से ध को ह । १ से कलोप । ६ से णकार । नं० ३ से रेफ लोप । १३ से ऋकार को इकार । नं० ३२ से तकार को दकार ।' जस को अोकार | अहिणन्दन्ति पकिदिनो। पुनस्तत्रैव-द्वितीयेऽङ्क। जाणन्ति तन्तजुत्तिं जहहि मण्डलं अहिलिहन्ति । जे मन्तरक्खणपरा ते सप्पणराहिवे उवअरन्ति । जानन्ति तन्त्रयुक्तिं । नं. ६ से णकार | ३ से रेक लोर । २० से जकार । ८ से क लोप 1-४ से द्वित्व । जाणन्ति तन्तजुत्ति। "यथास्थितं मण्डलं अमि- लिखन्ति" नं० २० से जकार । ६ से थ को ह । ८ से सलोप । ष्ठा ध.तु है अतः ठकार अवशिष्ट रहेगा। नं० ४ से द्वित्व । ७ से टकार । नं०२+३० से संयुक्त पर होने से ह्रस्व । १ से तलोप । नं०६ से भकार खकार को हकार । जहडिअं मण्डलं अहिलिहन्ति । 'ये मन्त्ररक्षणपराः । नं० २० से जकार । ३ से रेफ लोप। १६ सेक्ष को ख । ४ से द्वित्व । ७ से ककार । 'जे मन्तरक्खणपरा' ते सर्पनराधिपें ।नं. ३ से रेफ लोप । ४से द्वित्व ।६ से णकार 18 से ध को ह । १५ से वकार । ते सप्पणराहिवे । उपचरन्ति । नं. १५ से वकार । १ से च- लोप । उवअरन्ति । इस प्रकार अनेक नाटकों के उदाहरण का साधुत्व केवल इन ७० सूत्रों से हो जाता है यह दिखा दिया। अब पाठकों के अभ्यासाथ कुछ उदाहरण मुद्रा- [ ५४ ] राक्षस से ही देते हैं, साधारण भी सूत्रों का अनुगम कर के साधुत्त्र एवम् 'अनुवाद सुगमतया पाठक कर सकेंगे। मुद्राराक्षसे २ श्रद्धे-अाकाशे- ग्रज कि तुमं भरण) ( C ) सि ] को तुमं त्ति : अज ! अहं बु आहिण्डि. श्रो जिग्णविसी राम । किं भासि अहं वि अहिणा खेलिहूँ इच्छामि त्ति । अह कदरं उग अनी बित्ति उबजीयदि । किं भणसि, राउलसेवको म्हित्ति, रणं खेलदि एव्य अजो अहिणा ! कहं विथ। अमन्तीसहिकुसलो वालग्गाही, 'पमत्तो मातङ्गपारोही, लद्धाहियागे जिदकासी रायसेवश्रोति । एदे तिरिण वि अवस्सं विणासमणुद्दान्ति ! पुनस्तत्रैव - पञ्चमेऽङ्के भागुरायणः का गदी। सुणोदु सावगी। अस्थि दाव ग्रह मन्दभग्गो पढमं पाहलिपुत्ते णियनमायो रक्खसे. मित्तत्तण उवगयो । तस्सि अवसले रक्खसेण गूढं विसक- एनन्या पत्र्योय अध्यादिप धादिदो देवी पवनीसरो। रत्नावली नाटिका-द्वितीयेऽङ्के प्रारम्भे- सुसंगता~ददी हृद्धी कहिं दाणिं मम हत्ये सारिग्रपलरं शिक्विांव गदा मे पिसही सारिया । ता कहि पुण एणं पेक्विस्सं । क ई एसा तु (ख) रि उणिया इदो जेव याअच्छदि । ता जाव एदं पुच्चिस । पुनस्तत्रैव-निपुणिका- निपुणिका-(सविस्मयम् ) अच्चरियं २ । अणएणसदिसो पभावो मण्णे देवदाए । उयलद्धी ग्वु मए भटिणा बुत्तंतो। ता गदुमागीए णिवेदइत्सं । इत्यादिकों का अनुवाद सुगमता से, केवल इन ७० सूत्रों का केवल अाध घंटा प्रतिदिन १० का अनुगम कर के एक सप्ताह मे ही साधारण संस्कृतज्ञ भी कर सकता है। केवल इस पुस्तक के एक सप्ताह मात्र अाध घंटा अनुगम करके बाँचने से प्राकृत में प्रवेश दी जायगा। प्राकृतभापाऽभिज्ञताऽभिलापियों के लिये- में यह बता देना श्रावश्यक समझता हूँ कि एक महात्मा का श्राशीर्वाद है कि इस पुस्तक से एक सप्ताहमात्र में पाली-प्राकृत का पूर्ण रूप से बोध हो जायगा । इत्यलम् । इति श्री म०म० मथुराप्रसादकृत अभ्यासार्थमनुवादप्रकरणं समाप्तम् ... SC समाप्तश्चायं मन्यः । चार -

प्राप्तित्यानम्-
म०म० पं० श्रीमथुराप्रसाद दीचित
१४६ हजरियाना
झाँसी

ॐ
र
प्राकृत बालमनोरमा
-
रचयिता-
उपाध्याय श्री आत्मान
जैनमुनिः

नमोझुगंसनगत्तभगवओ महावीरता
प्राकृत बालमनोरमा
प्रथम भाग
रचयिता
जैनधर्म दिवाकर जैनागमरत्नाकर साहित्यरत्न उपाध्याय
मुनि श्री आत्माराम जो महाराज-पंजावी
प्रकाशक
श्री जैन सुमति मित्र मंडल
(रावलपिण्डी)
प्रति १०००
मू० २ आना
वीर सं०२४६२
[ई० सन् १९३६]
वि० सं० १९६३
लाला रामशरणदास के प्रबन्ध से कमर्शियल प्रिंटिंग वर्क्स,
गनपत रोड लाहौर में छपी।

ट पुस्तक मिलने का पता- [१] मंत्री श्री जैन सुमति मित्र मंडल, जैन बाजार- रावलपिण्डी शहर । [२] ला• गुज्जरमल प्यारालाल जैन, चाड़ा बाजार- लुधियाना। नोट-पुस्तकालयों के लिए यह पुस्तक विना मूल्य भेजी जावेगी।

चित्र परिचय प्रस्तुत पुस्तक में जिस भाग्यशाली सद्गृहस्थ का चित्र दिया गया है के रावलपिण्डी निवासी ला० रामकौर शाह जक्ख-जैन के सुपुत्र हैं आपका शुभ नाम ला० ताराशाह है। आपका जन्म वि० सम्वत् १९४२ मार्गशीर्ष प्रविष्टा २ मंगलवार को हुया था । आप योग्य व्यापारी होने के अति- रिक्त धर्म में बड़ी अभिरुचि रखने वाले हैं । स्थानीय जैन समाज में आपकी असाधारण प्रतिष्ठा है। इसी लिए स्थानीय सभी जैन संस्थाओं में आपका हाथ है । धर्मार्थ जैन औष- धालय के.और जैनधर्म प्रकाशिनी सभा के आप कोषाध्यक्ष- खजान्ची हैं। जैन यंगमैन ऐसोशियेशनकी मैनिजंग कमेटी के आप सदस्य हैं, जीवदया तथा जैन साहित्य के प्रकाशन कार्य में आपने अपनी कमाई में से समय समय पर अच्छा दान दिया है। आप सराफी की दुकान करते हैं । जिस समय उपाध्याय श्री १००८ अात्माराम जी महाराज के शिष्यरत्न प्रसिद्ध वक्ता श्री १०८ खजानचन्द जी महाराज के सदुपदेश से रावलपिंण्डी शहर में श्री महावीर जैन मॉडरन् स्कृल की स्थापना हुई तो सव से प्रथम आपने ५०० रुपया नकद दिया, तथा पांच रुपया मासिक देने का वचन देकर सब को प्रोत्साहित किया । अधिक क्या कहें आप सरल स्वभावी, भद्र प्रकृति और धर्म के सच्चे प्रेमी हैं। प्रस्तुत पुस्तक भी इन्हीं के सद्व्यय से प्रकाशित की गई है। प्रत्येक भाविक सइगृहस्थ को इनका अनुकरण करना चाहिये, जिससे कि धर्म की अधिक से अधिक प्रभावना होवे। निवेदक- महामंत्री श्री जैनसुमति मित्र मंडल, [ रावलपिण्डी-शहर ] n [ला० ताराशाह जक्ख] प्रासंगिक नवेदन प्रिय सुज्ञपुरुषो ! शास्त्रीयज्ञान से सिद्ध होता है कि यह आत्मा जब गर्भ में आता है तव आहारादि छै पर्याप्तियों- आहारपर्याप्ति, शरीरपर्याप्ति, इन्द्रियपर्याप्ति, श्वासोच्छास- पर्याप्ति, मनःपर्याप्ति, और भाषापर्याप्ति को पूर्ण करके फिर जन्म धारण करता अर्थात् गर्भ से बाहर आता है। ये छैओं पर्याप्तिएं सार्थक और परस्पर सम्बन्ध रखने वाली हैं। यथा-आहार पर्याप्ति कर लेने पर शरीर की रचना होती है, और शरीर के निष्पन्न होने पर इन्द्रिये -विकास- पाती हैं, तथा इन्द्रियों के निष्पन्न होने पर श्वासोच्छ्वास का गमनागमन ठीक हो सकता है, एवं इन चारों के निष्पन्न हो जाने पर ही आत्मा के साथ सम्बन्ध रखने चाली-मन:- पर्याप्ति को प्रत्येक विचार के लिये उपयोगी माना गया है। क्योंकि अन्वय व्यतिरेक धर्मों का विचार करना तथा. प्रत्येक विषय की आलोचना करके उस की मीमांसा पूर्वक व्यवस्था करना यह सव मन का ही काम है। इसी प्रकार मन के द्वारा निर्धारित किये गये विषयों को प्रकट करना भाषा पर्याप्ति का काम है, अतः भाषा की शुद्धि के लिये शब्दशास्त्र की रचना हुई है। कारण कि भाषा शुद्धि के द्वारा ही अर्थज्ञान की सम्यक् प्रकार से प्राप्ति हो सकती है। जिस आत्मा को शब्द का ज्ञान सम्यक्तया प्राप्त नहीं हुआ, उस को अर्थ का ज्ञान भी यथार्थ नहीं होता!

लं यावन्मात्र सुसंस्कृत भाषायें हैं उन सव की नियम प्रदर्शक शिक्षा पुस्तिकायें दृष्टिगोचर हो रही हैं, जिन का, भाषा शुद्धि के लिये उपयोग किया जाता है। उन प्राचीन भाषाओं में से एक प्राकृत भाषा भी है जो सर्वांग सम्पूर्ण है ! प्राचीन जैनसाहित्य प्रायः इसी भाषा में उपलब्ध होता है। परन्तु जैनागमों की भापा *अर्द्धमागधी के नाम से प्रसिद्ध है जो कि एक प्रकार से परिमार्जित प्राकृत ही है। इस समय प्राकृत भाषा के अनेक प्राचीन आचार्यों के निर्माण किये हुए "प्राकृतव्याकरण" मुद्रित होकर विद्वत्- समाज के सन्मुख आ रहे हैं। तथा उन्हीं के आधार पर नूतन शैली के अनुसार अनेक प्रकार की प्राकृत नियम- प्रदर्शक पुस्तकों का भी सम्प्रति पर्याप्त रूप से विकास हो रहा है ! परन्तु उस में अधिकतर पुस्तकें गुजराती भाषा में उपलब्ध होती है। अतः मेरे मन में चिरकाल से यह विचार उत्पन्न हो रहा था कि एक ऐसी पुस्तक "प्राकृत. व्याकरण" की लिखी जावे कि जिस से हिन्दी भापा भापी संसार भी लाभ उठा सके। एतर्थ मैं ने इस पुस्तक को लिस्वना आरम्भ किया, जिस का यह प्रथम भाग प्रकाशित दिवा गं भंते कयराए भासाए भासंति, कयरा वा भासा भासिजमाणी विसिस्मति । गोयमा : देवा णं अदमा गहाए भानगए भासंति गाविय गं अदमागहा भाना भासिनमाणी विमिस्सति । [व्या. प्र. शत, ५ उ. ४ सू. १९१] होकर पाठकों की सेवा में उपस्थित हो रहा है। आशा है इस के अन्य भाग भी शीघ्र ही प्रकाशित हो कर पाठकों की सेवा में पहुंच जावेंगे। इस की रचना करते समय कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य प्रवर श्री १०८ हेमचन्द्र सूरि कृत "सिद्धहेशब्दानुशासन" का आठवां अध्याय, पण्डित वेचरदास जी कृत "प्राकृत- मार्गोपदेशिका" प्रोफैसर डाक्टर वनारसीदास जी का बनाया हुआ अर्द्धमागधी रीडर इन तीन पुस्तकों को उपयोग में लिया गया है, अर्थात् इन के आधार से ही यह पुस्तक वर्तमान शैली को लक्ष्य में रख कर लिखी गई है। अतः मैं इन का आभारी हूं। काल.की कितनी विचित्र गति है, कि किसी समय पर जिस भाषां को राज्य का शासन प्राप्त हो चुका हो और व्यापारीवर्ग की भी जिस ने पर्याप्त सेवा की हो आज उस- भाषा के नाम से भी जनता प्रायः अपरिचित सी नजर आती है ! इस के अतिरिक्त विशेष विचारणीय विषय तो यह है कि जिस का सम्पूर्ण धार्मिक साहित्य इसी भोपा में उपलब्ध होता है और जिसके नित्य नैमित्तिक धार्मिक कृत्यों को इसी. भाषा में संगृहीत किया गया हो वह जैनसमाज भी इस से प्रायः अपरिचित सा ही नजर आता है ! यदि जैनगृहस्थ और विशेष कर जैनभिक्षुवर्ग अपने सम्भापण में अधिक से अधिक, इस भापा का उपयोग करने लग जावे तव भी जनता में इस के विकास की अधिक सम्भावना हो सकती है।

--
घ
मेंरा तो प्रत्येक सुज्ञ व्यक्ति से यहीं साग्रह निवेदन है
कि वह भारतीय अन्य साहित्य के रसास्वाद के साथ २
प्राकृत साहित्य के रसपान की भी अपने मन में पर्याप्त लालसा
रखे, ताकि भारत वर्ष का छिपा हुआ धार्मिक और ऐतिहा-
सिक गौरव फिर से प्रकाश में आजावे। यह भाषा ललित
और मधुर होने के अतिरिक्त क्लिष्टता से भी रहित है !
एवं इस के सम्बन्ध में कतिपय विद्वानों का तो यह मत है-
[जोकि सत्य ही है ] यह भाषा सर्व भाषाओं से प्राचीन,
सर्वांग सम्पूर्ण और आर्यावर्त की एक विशिष्ट सम्पत्ति है !
इस लिए वर्तमान समय के विद्वानों को इस माषा को हर
प्रकार से अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए ।
यहां पर इतना लिख देना भी समुचित हो होगा कि इस
पुस्तक के निर्माण में मेरे शिष्यरत्न, संस्कृत प्रारत विशारद
पंडित हेमचन्द्र की संशोधनादि के कार्य में मेरे को अधिक
से अधिक सहायता मिली है अतः मैं उन का उत्तरोत्तर
अभ्युदय चाहता हूं ।
वि०-जैनमुनि आत्माराम
[द्वि०
. भाद्रपद शुक्ला ११ शनिवार सं० १९.६३, रावलपिंडी ।]

प्राकृत बालमनोरमा S नमोऽत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरस्स । । अथ स्वराः * औदन्ताः स्वराः॥११॥६॥ औकारावसान वर्णाः स्वरसज्ञाः स्युः । यथा-अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ ॥६॥ कादिर्व्यञ्जनम् ॥ १।१।१० ।। कादिवर्णो हपर्यन्तो व्यञ्जनं स्यात् । यथा-क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण । त थ द ध न प फ ब भ म । य र ल व श ष स ह इति । पञ्चको वर्गः ॥१।१।१२॥ कादिपु वर्णेपु योयः पञ्च संख्या परिमाणोवर्णः स स वर्गः स्यात् । यथा- सिद्ध हेम व्याकरण | [ २ ] कवर्ग-क ख चवर्ग-च छ ज झ ञ । वर्ग-ट ढ ण । तवर्ग-त थ द ध न । पवर्ग-प फ व भ म । आद्य-द्वितीय-शपसा अघोपाः ॥ १।१।१३ ॥ वर्गाणा माद्य द्वितीया वर्णाः शपसाश्वाऽघोपाःस्युः । क ख, च छ, ट ठ, त थ, प फ, श प स इनकी अघोप सज्ञा है। अन्यो घोपवान् ॥ १ ॥ १।१६ ॥ अघोपेभ्योऽन्यः कादिर्वर्णो घोपवान् स्यात् । ग घ ङ, ज झ ञ, ड ढ ण, द्धन, वभ म, य र ल व ह इनको घोष कहते हैं। य र ल वा अन्तस्याः। पते अन्तस्थाः स्युः । य र ल व इनकी अन्तस्थ संक्षा है। अं अः प श प साः शिद ॥ ११ ॥ १६ ॥ अ क प उच्चारणार्थाः अनुस्वार विसा बज्र गज कुम्भा. ऽऽकृती च वणों, शपसाश्च शिटःस्युः । अंमः इत्यादि उक्त वणों की शिद संज्ञा है।

[ ३ ]
प्राकृत स्वर
अ आ इ ई उ ऊ ए ओ ।।
प्राकृत व्यञ्जन *
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ,
टठ ड ढ ण,
+ प्राकृत भाषा में किसी २ स्थान पर ऐकार और औकार का प्रयोग
भी किया जाता है । यथा कैयवं-कौ रवा इत्यादि ।
* प्राकृत भाषा में व्यञ्जन नहीं लिखा जाता । यथा---फलम्,
मूलम् किन्तु फलं मूलं ऐसे लिखा जाता है । व्यञ्जन उसे कहते हैं,
जिसमें स्वर न मिला हुआ होवे । यथा - क ख इत्यादि ।
प्राकृत भाषा में यद्यपि ङ् और ञ् का स्वतन्त्र प्रयोग नहीं होता
तो भी स्व वर्गीय वर्गों के संयोग में इनका प्रयोग किया जाता है । जैसे-
[ मङ्गलं, सञ्झा] इस लिए इनका व्यन्जनों में उल्लेख किया है । श ष
के स्थान पर प्राकृत भाषा में तो केवल दन्ति सकार ही प्रयुक्त होता है,
किन्तु मागधी भाषा में श और ष का प्रयोग भी देखा जाता है। एवं
प्राकृत भाषा में ऐ और ऋ ऋ ल ल अः इन वर्गों का प्रयोग नहीं होता
किन्तु इनके स्थान पर जिन इकारादि वर्गों का आदेश होता है, वे आगे
यथा स्थान दिखलाए जायगे।
,

प्रथम पाठ अकारान्त प्रयोग त+अत अरिहन्त, हर, युद्ध, मग्ग उवज्झाय, कलह, हत्य, वाय, भार, आयरिय, वाल, सिद्ध, निव पुरिस, आइञ्च, इन्द चन्द,भारबाह, समुद्दकरण, महावीर, जिण, जय, गय, सीह, लियाल, वसह, हव्ववाह, ओठ, दंत, कुंभार, कोह, लोह, दोस, राग, धम्म, वग्ध । अरिहंतो सव्य जीवाणं अरिहंत सर्व जीवों के परम परम हिपसी भवह। हितपी है। अरहंतो सब जीवाण अर्हन्त सर्व जीवों के पूजनीय- पूयणारिहे भवइ । पूजने योग्य है। अरुहंतो जम्म मरणस्स अम्हन्त जन्म मरण के चक्र चकाओ पिहु भवन् । से पृथक है। हरो रदस्त अवरं नामऽथि हर यह रुद्र का अपरनाम है बुद्धो चि ईसरं सिट्टी कत्तारं युद्ध भी ईश्वर को सृष्टिकर्ता न मण्णई। नहीं मानता है। मगस्स परियखा करियया । मार्ग की परीक्षा करनी चाहिए. उवभाओ सत्यं भावह उपाध्याय शास्त्र पढ़ाता है । कलही न करगिज्जो। कलह न करना चाहिये ।

एवं वयइ। वालो भणइ। नृप राजा धर्मको [५] हत्थ पाआ वुसियव्वा । हाथ और पैर वश में रखने चाहिये। पसूण उवरि अइभारो न आरो पशुओं के ऊपर अति भार न वणिजो। रखना चाहिये। आयरियो संघस्स रक्खणटुं आचार्य संघ की रक्षाके लिए ऐसे कहते हैं। वालक पढ़ता है। सिद्धो परम सुही होइ। सिद्ध परम सुखी होता है । निवो, धम्म सुगेइ। सुनता है। पुरिसो आसस्स परिक्खकरेइ पुरुष-अश्व घोड़े की परीक्षा करता है। आइञ्चो पयासह। आदित्य सूर्य प्रकाश करता है इंदो आगच्छद। इन्द्र आता है। चंदो उदे। चन्द्रमा उदय होता है। भारवाहो भारं वहेइ। भारवाहक भार को उठाता है समुद्दो अइगंभीरो होइ। समुद्र अति गम्भीर होता है। सहावीर जिणो उवदेसइ । महावीर जिन उपदेश देते है गयो जयं पावेइ। हाथी जय पाता है। सीहो गजा। सिंह गर्जता है। सियालो पलाये। सियाल-गीदड़ भागता है । वृषभ-बैल वोलता है। हुन्यवाह [अग्नि जलता है वसहो ढक्कइ । हत्ववाहो जलइ।

[६] ओट्टदंताणं परोप्परं संबंधो ओट-होट और दांतों का पर- अस्थि स्पर सम्बन्ध है। कुंभारो घडं घडइ। कुम्भार घड़े को बनाता है। कोहो बुद्धि नासेह। क्रोध बुद्धि का नाश करता है लोहो पावस्स मूलमस्थि । लोभ पाप का मूल है। दोबाउ बरं द्वेप से वैर बढ़ता है। रागो कम्माण वंधण करेइ। राग कमाँ का बन्धन करता है रागे दुविहे पण्णत्ते। गग दो प्रकार से वर्णन वट्टइ। किया है। पसत्यो अपसन्थो । प्रशस्त और अप्रशस्त (राग) धम्मस्स रागो पसत्यो अत्थिा धर्म का राग प्रशस्त है। विसयस रागो अपसत्यो विषय का राग अप्रशस्त है। अस्थि। वग्यो भावेद । व्याघ्र भागता है। इसी प्रकार अन्य अकारानव शब्दों के रूप भी प्रार बना लेने चाहिए।

द्वितीय पाठ अव इस द्वितीय पाठ में सदा व्यवहार में आने वाले आवश्यक शब्दों का संग्रह दिया जाता है। प्राकृत के जिज्ञा- सुओं को यह शब्द संग्रह कण्ठस्थ कर लेना चाहिये। नयण-नयन - आंख पुच्छ - पूंछ पिच्छ-पङ्ख, मोरपिच्छ मत्थय-मस्तक वण वन नाण-ज्ञान वेर-वैर भय-भय वयण-वचन वयण-वदन-मुख णयर, णगर) -नगर शहर नयर नगर चम्म -चाम पास-पास (समीप ) गल-गला, कंठ ( गर्दन) अजिण-अजिन, चाम सिंग-शृङ्ग अस्व-आम घड-घट, घड़ा मंस-मांस पडह-ढोल भायण-भाजन मोह-मोह भाण-पात्र सद्द-शब्द मढ-मठ मंगल-मङ्गल हियय-हदयं मुह-मुख पित्त-पित्त कुढार-कुहाड़ा, समण-श्रमण, साधु घर, गिह -- गृह [ ८ ] अप्पा -[ण]-आत्मा कन्ज कार्य - रययय-रजत मित्त मित्र भड-सुभट, शूर काय-काय, शरीर हरिस हर्प सढ़-शठ, धूर्त पाढ-पाठ मोक्ख-मोक्ष चेय-वेद दुक्ल, दुह-दुःख चारित-चारित्र गुत्त गोत्र पंजरा-पिञ्जरा लावरण - लाघण्य' कान्ति रुप्प-चान्दी गरल-गरुड़ वार-क्षार खध- स्कन्ध घाण-नाक पद- पाद खय-क्षय लक्षण, लच्छण-लक्षण पाण-प्राण, जीव काम-काम, इच्छा पुट पुष्ट मुक्ख, सुख, सुह-सुस्व सीस शीर्ष मस्तक जल-जल गीत-गीत फाम-स्पर्श गण-तण सील-शील, सदाचार तलाय-तालाव रसायल-रसातल, पाताल -- कम्म-कर्म पोश्वर-तालाब कोस-कोस, कोद सयद-शकट, गाड़ा खीर-दूध गन्ध-गंध मूढ-मूद

[ ९ ]
पंडित -पण्डित
संजय-संयत
पंडिय-पण्डित
धम्म-धर्म
दुल्लह दुर्लभ
नर-नर
संजम-संयम
अत्थ-अर्थ, धन
आकारान्त प्रयोग
प्+आ-पा।
सोमपा,
खीरपा।
हा हा.
हाहा नाम देवा नच्चति
हाहा नाम
वाले देवता
नाचते हैं।
सोमपा सोमं पिवति. सोमपा सोम को पीते हैं ।
खीरपा वाला कीलंति दूध पीने वाले वालक खेलते हैं
गोपा धेणुओ दोहंति ग्वाले गौओं को दोहते हैं।
अन्य भी आकारान्त शब्द इसी प्रकार जान लेने.चाहिये

de अभोगी मोक्खं गच्छ सउणी उड्डे thes [ ११ ] कुल बई भणेइ कुलपति कहता है सेठ्ठी धम्म करेइ सेठ धर्म को करता त्यागी मोक्ष में जाता है पक्षी उड़ता है भूवई सासण करे राजा शासन करता कोही कोहं करेइ क्रोधी क्रोध करता है मोही मुज्झा मोही मोह को प्राप्त होता है भोगी भोगे चयइ भोगी भोगों को छोड़ता है नर वई आणं करेइ नरपति-राजा आज्ञा करता है उदाहं तरइ हत्थि सीहाओ पलाया हाथी सिंह से भागता है पक्खी उड्डेइ पक्षी उड़ता है सोमित्ती रामेण सद्धिं गच्छइ लक्ष्मण रामचन्द्र के साथ जाता है गिरि उवरि मेहो दीसेइ पर्वत पर से बादल दीखता है घरवई गिह रक्खेह घर का स्वामी घर की रक्षा करता है अमुणी दुक्खं पावेइ असाधुं दुःख पाता है. समुद्र को तैरता है इसी प्रकार अन्य इकारान्त शब्दों के वाक्य भी बना लेने चाहिये। अन्य इकारान्त शब्द जैसे-

। १२ ]
अगि- आग
दहि-दधि
गिहि-गृहस्थ
नमि-नमि-राजर्षि
महेसि-महर्षि
पाणि-प्राणी
कवि कवि
मेहावि- बुद्धिमान
गणि-आचार्य
विज्जस्थि
विद्याधी
मणि ---मणि-मणिरत्न
विज्ञहि
रायरिसि-राजर्षि
प.पि-वानर
अच्छि
अरिस
चार त्यागी
पाणि-हाथ
अहि-अस्थि-हाड
যা নানা
सुहि - सुखी- मुद-विम
वणफ्फर, वणस्सा वनस्पति सुगन्धि-सुगन्ध वाला पदार्थ
} भक्षी भाग

[ १३ ]
नारी घरमं सुणेइ
नारी धर्म को सुनती है
पत्ती, पइवय धम्म पालेइ पत्नी पतिव्रतधर्मका पालन करती है
पची उदियो भक्त्तिा अंधकारं सूर्य उदय होकर अन्धकार का
पणासेड़
नाश करता है।
पहीपुरिसो वक्खाणं करे। प्रधी-बुद्धिमान् पुरुष व्याख्यान
करता है।
गामणी गामं गच्छइ
ग्राम का नेता ग्राम को जाता है।
सुसिरी दाणं देई
सुश्री धनवान् दान देता है ।
स्त्री धर्म को करती है।
इत्थी धम्म सुणावेइ
स्त्री धर्म को सुनाती हैं।
प्रत्येक विद्यार्थी को योग्य है कि वह प्राकृत के रूपों
की इसी क्रम से रचना करने का स्वयं भी अभ्यास करे
और पूर्वोक्त रूपों को कण्ठस्थ करके परस्पर सम्भाषण करने
का भी अभ्यास करे।
थी धम्म कुणइ

गुरुणा भासिय [ १५ ] विण्हुणो लोआ उवासणं ! विष्णु की लोग उपासना करते हैं करेति चक्षुणा जणा पस्संति आंख से लोग देखते हैं। गुरु ने भाषण किया। वाहुणो वलं दंसह भुजा का बल दिखाता है। कुंथू न दीसेइ | कुंथु दिखाई नहीं देता है। कुंथू अइसुहुमो जीवो होह कुंथु अति सूक्ष्म जीव होता है । सो मंतुं सहेई वह अपराध को सहन करता है। विदु समं जीवणं अत्यि विन्दु के समान जीवन है। वाऊ चलेइ वायु चलता है। भिक्खू भिक्खलु गच्छा भिक्षु भिक्षा के लिए जाता है। सयंभुणा कडे लोए एवं केवि | स्वयम्भु ने इस लोकः का निर्माण मरणते किया है । इस प्रकार कितने एक मानते हैं। तरुणो छाया सीयला अत्थि वृक्ष की छाया शीतल है विहुणो चदिमा सुहकरा भवइ चांद की चान्दनी सुखकर होती है जंबू वच्छो फलं देइ जम्बू वृक्ष फल देता है। पहुणो वंदियव्वा हुँति प्रभु वन्दनीक होते हैं। तंतूहिं वत्थो भवइ तन्तुओं से वस्त्र वनता है। पसु धम्म चईऊण पुरिसधम्मो पशु धर्म को छोड़कर पुरुष धर्म को गिहियो ग्रहण करना चाहिए। - पञ्चम पाठ पाठकों को यह स्मरण रहे कि प्राकृत भाषा में वास्तव में ऋकारान्त शब्द नहीं रहता है । किन्तु ऋकार को अकार. इकार, उकार, आदेश हो जाते हैं । जिनका क्रमशः उल्लेख आगे किया जाता है। (क) ऐसे शब्द जिनमें ऋकार को अकार आदेश होता है। वृत-घय । तृण-तण । वृषभ-वसह । कृत-कय । मृग ~मय । घृष्ट-घट्टो इत्यादि अकारा आदेश वाले शब्द हैं । और कहीं २ पर ऋकार को आकार का आदेश भी हो जाता है। जैसे कि -- कृष-कास । मृदुक-माउक्क इत्यादि । (ख ) इकार आदेश वाले शब्द- सृष्टि-सिट्टि। कृपा-किवा । कृपण-किवण । भृगु- भिउ । नृप निव । समृद्धि-समिद्धि । शृङ्गार-सिंगार। मृष्ट-मिठ्ठ । भृङ्ग-भिंग । ऋषि इसि । कृति-किइ । दृष्टि- दिहि । शृगाल-सियाल । घृणा-घिणा । धृति-धिइ । कृपाण-किवाण । वृत्ति-वित्ति । सकृत् - सई । हृत-हिय इत्यादि शब्दों में ऋकार को इकारादेश हुआ है । (ग) उकारा देश वाले शब्द- (१६) मवयाणं किवा दिट्ठी अस्थि किं? क्या आपकी कृपादृष्टि है। केवणो दाणं न देह कृपण दान नहीं देता। इसी सस्थ भणावेइ ऋषि शास्त्र को पढाता है। विद्ध कइणो कहयंति वृद्ध कवि कहते हैं- धिई न जहियो धृति (धैर्य्य) न छोडनी चाहिए। सियालो सीहाओ वीहेइ गीदड सिंह से डरता है। - इत्यादि इकारा आदेश वाले ऋकार के वाक्य जान लेने चाहिए ॥ उकारादेशवाले शब्दों के वाक्य- उसभ वन्दे ऋषभदेव को वन्दना करता हूं। उऊ परिवह ऋतु वदलता है। मुसावायो जहिअब्बा मृषावाद को छोडना चाहिए। सा पाहुड देइ वह प्रामृत देता है। भिऊ रिसी कासो दीसइ भृगु ऋषि कृश दीखता है। बुद्ध सावगा धम्मं चरंति वृद्ध श्रावक धर्म का आचरण करते सव्व धम्माणं मूलं मोसावा सर्व धर्मों का मूल मृषावाद का यस्ल चायोऽस्थि त्याग है। । इत्यादि, उकार आदेश वाले कार के प्रयोग हैं । रिकार आदेश वाले ऋकार के प्रयोग जैसेः-

छठापाठ
शब्द संग्रह
लोह-लाम
अंब-आम्र
'धवल-धवल,
सुफैद
गुड, गुल-गुड़
कयली, केली-कदली, केला
अहिनव-अभिनव
अग्गि-अग्नि, आग
आइञ्च -आदित्य, सूर्य
आरिय आर्य
अय-लाहा
समण-श्रमण, साधु
माधव - कृष्ण
आसाढ- आषाढ
उच्चाह उत्साह
आयरिय ~आचार्य
आस-अश्व, घोड़ा
आहार आधार, भोजन
उदहि - उदधि, समुद्र
उवज्झाय-उपाध्याय
सूई -सूची, सूई
नयर नगर
अक-अर्क, सूर्य
अप्प, अप्पाण - आत्मा
प्राकृत भाषा में ए ओ यह दोनों स्वर तो होते हैं, किन्तु
पकारान्त और ओकारान्त प्रयोग देखने में प्रायः नहीं आते,
क्योंकि एकारान्त और ओकारान्त शब्द विभक्ति के लगने से
उसी रूप में नहीं रह सकते । यदि कदाचित एकारान्त और

[ २२ ]
ओकारान्त शब्दों का वाक्य में प्रयोग आ भी जाय,
तो वहां
सन्धि नहीं होती जैसे-
अम्हे-ल्य अही--अध्यारियं इत्यादि।
यहां पर सन्धि प्रान होने पर भी सन्धि कार्य नहीं हुआ
एकागन्त और ओकारान्त शब्द निपात वा अव्यय
भी होते हैं । अब टम म्यान पर पन शब्दों को संगृहीत
किया जाता जिनके आदि में एकार या ओकार है।
प.- अव्यय है-सम्बोधन और निश्चय अर्थ में आता है।
एक जटि-- पक जटावाला नाग।
पकल विग-अकेला ही विहार करने वाला, माधु ।
पकारनंग-~-ग्यारह अ-आचागलादि ११ अशास्त्र ।
पकासन-काशन नप-दिन में एकवार ही माना।
पन साचिय-एक, पृग बम्ब-जो सन्धि से रहित हो।
पावादी-- एक मान्मा का मानने वाला (बदान्ती)
पगन-कान्त।
पगनवंट- एकान्ल कप गवंद भोगने योग्य ( हिंसक)।
पगन दिहि-एकान्न धि।
गगन नारि- पशान्त वासी ।
पगंन गर - एक पुर बाला पशु घोड़ा, गधा आदि ।
पगंन पन पकान मा. मियाट।
पग ना]--TE. , काणा, पर आंग याला ।
पग-i, T. मगर माना जाने वाला।

[ २३ ] एगनाणि-केवल ज्ञानी । एगपक्ख-एक पक्ष । एग पक्त्त-एक पत्र। एग पक्खिय - एक गुरु के शिष्य । एग रूप - एक रूप हो जाना। एग साल --एक मजला मकान । एगाहिय-नित्य का ज्वर। एगेन्दिय एकेन्द्रिय जीव । एत्थ-यहां पर । एलग-मींढा एलमूयत्त - बकरे की तरह अव्यक्त वाणी के बोलने वाला। एसज-ऐश्वर्य । एषणा सामइ-एषणा समिति-निर्दोष आहार पानीग्रहण करना । एसि- एषणा करने वाला । एहा- समिधा, इन्धन । एहिय- इस लोक सम्बन्धी कार्य । एवंपि -इसी प्रकार । एवमाइ - इत्यादि । एरावण शकेन्द्र का मुख्य हाथी । एरावई-ऐरावती, इस नाम वाली नदी ( रावी) इत्यादि। ओकारादि शब्दः ओ- अव्यय पादपूर्ति अर्थ में है। ओ अंसि ओजस्वी-धैर्य वाला । ओरिय-औदरिक- उदर के भरने वाला। ओआर-अवतार । ओंकार ओङ्कार शब्द । ओआस-अवकाश, तथा खुली भूमिका । ओघसण्णा सामान्य वोध । ओ चूलअ-घोड़े की लगाम । ओच्छाइय ढका हुआ । ओजशक्ति । ओट्ट होठ । ओदण-चावल । ओधारिणी- निश्चयकारी भाषा । ओभावणा उपहास्य । ओम ऊणा - न्यून -अधूरा । ओमंथिअ-नीचा मस्तक कर

[ २२ ]
ओकारान्न शब्दों का वाक्य में प्रयोग आ भी जाय, तो वहां
सन्धि नहीं होती जैसे-
अम्हे-त्य - अहो- अध्यारियं इत्यादि।
यहां पर मन्धि प्रान होने पर भी सन्धि कार्य नहीं हुआ
तथा एकारान्त और ओकारान्त शब्द निपात वा अव्यय
भी होते हैं । अब इन्न स्थान पर एस शब्दों को संगृहीत
किया जाना है जिनकं आदि में एकार या ओकार है।
प.- अब्बय है-सम्बोधन और निश्चय अर्थ में आता है।
एकदि--एक जटावाला तारा।
एकल विहारी-अकेला ही विहार करने वाला, साधु ।
एकाग्मंग-ग्यारह अ-आनागादि ११ या शास्त्र ।
पकासन-काशन तप- दिन में एकवार ही ग्याना।
पक, मारिय--एक पूर्ण वस्त्र-जो सन्धि से रहित हो।
पाशावादी- एक आन्मा का मानने वाला (बंदान्ती)
पगंत-कान।
पंगत मंद गवान्न रुपम दंड भोगने योग्य ( हिंसक)।
गगन विहि- एकान्त धि।
पंगन नारि एकान्त वासी ।
पगंन गर-- एक पुर वाला पशु घोना, गवा आदि ।
पगंन जन पकान्न मा, मिथ्याष्टि।
पग नाग-पान, माणा, प. आंग याया।
पग-पानं, प. भव देणे. मोना जाने वाला।

[ २३ ] एगनाणि-केवल ज्ञानी । एगपक्ख-एक पक्ष । एग पक्त्त-एक पत्र । एग पक्खिय - एक गुरु के शिष्य । एग रूप - एक रूप हो जाना। एग साल-एक मजला मकान । एगाहिय-नित्य का ज्वर । एगेन्दिय-एकेन्द्रिय जीव । एत्थ-यहां पर । एलग-मींढा एलमूयत्त - वकरे की तरह अव्यक्त वाणी के वोलने वाला। एसज-ऐश्वर्य । एषणा समिइ-एषणा समिति-निर्दोष आहार पानीग्रहण करना । एसि- एषणा करने वाला । एहा- समिधा, इन्धन । एहिय- इस लोक सम्वन्धी कार्य । एवंपि -इसी प्रकार । एवमाइ - इत्यादि । एरावण शकेन्द्र का मुख्य हाथी । एरावई-ऐरावती, इस नाम वाली नदी (रावी) इत्यादि । ओकारादि शब्दः- ओ- अव्यय पादपूर्ति अर्थ में है । ओ अंसि ओजस्वी-धैर्य वाला । ओरिय-औदरिक- उदर के भरने वाला। ओआर-अवतार । ओंकार ओङ्कार शब्द । ओआस-अवकाश, तथा खुली भूमिका । ओघसण्णा सामान्य वोध ।ओ चूलअ-घोड़े की लगाम । ओच्छाइय ढका हुआ । ओज-शक्ति । ओट्ट होठ । ओदण-चावल। ओधारिणी- निश्चयकारी भापा । ओभावणा उपहास्य । ओम ऊणा - न्यून -अधूरा । ओमंथिअ-नीचा मस्तक कर

[ २२ ]
ओकारान्त शब्दों का वाक्य में प्रयोग आ भी जाय, तो वहां
सन्धि नहीं होती जैसे-
अम्हे-पत्थ- अहो-अध्वरियं इत्यादि।
यहां पर सन्धि प्राप्त होने पर भी सन्धि कार्य नहीं हुआ
तथा एकारान्त और ओकारान्त शब्द निपात वा अव्यय
भी होते हैं । अब इस स्थान पर ऐसे शब्दों को संग्रहीत
किया जाता है जिनके आदि में एकार या ओकार है।
प-अचय है-सम्बोधन और निश्चय अर्थ में आता है।
एकजडि-एक जटावाला तारा ।
एकल विहारी-अकेला ही विहार करने वाला, साधु ।
प्रकारसंग-ग्यारह अङ्ग-आचाराङ्गादि ११ अङ्ग शास्त्र ।
पकासन-एकाशन तप-दिन में एकवार ही खाना।
एक साडिय-एक पूर्ण वस्त्र-जो सन्धि से रहित हो।
पक्कावादी-एक आत्मा का मानने वाला (वेदान्ती)
पगंत-पकान्त ।
पगत दंड-एकान्त रूप से दंड भोगने योग्य ( हिंसक)।
पगंत दिट्टि-एकान्त दृष्टि।
पंगत चारि एकान्त वासी।
एगंत ग्युर-एक ग्युर वाला पशु घोड़ा, गधा आदि ।
पगंत मुत्त - एकान्त मुप्त, मिथ्यादृष्टि ।
पग चस्व-एक चक्षु, काणा, एक आंख वाला।
पग-पकार्य, पक भव लेके मोक्ष जाने वाला।

[ २३ ] एगनाणि-केवल ज्ञानी । एगपक्ख-एक पक्ष । एग पक्त्त-एक पत्र । एग पक्खिय -एक गुरु के शिष्य । एग रूप-एक रूप हो जाना। एग साल -एक मजला मकान | एगाहिय-नित्य का ज्वर। पगेन्दिय -एकेन्द्रिय जीव । एत्थ-यहां पर । एलग-मींढा एलमूयत्त - बकरे की तरह अव्यक्त वाणी के वोलने वाला। एसज-ऐश्वर्य । एपणा समिइ-एषणा समिति-निर्दोष आहार पानीग्रहण करना । एसि-एषणा करने वाला । एहा- समिधा, इन्धन । एहिय- इस लोक सम्वन्धी कार्य । एवंपि -इसी प्रकार । एवमाइ -इत्यादि । एरावण शकेन्द्र का मुख्य हाथी । एरावई-ऐरावती, इस नाम वाली नदी (राची) इत्यादि । ओकारादि शब्दः ओ- अव्यय पादपूर्ति अर्थ में ओ अंसि ओजस्वी-धैर्य वाला । ओरिय-औदरिक- उदर के भरने वाला। ओआर-अवतार । ओंकार ओङ्कार शब्द । ओआस-अवकाश, तथा खुली भूमिका । ओघलण्णा - सामान्य वोध । ओ चूल-घोड़े की लगाम । ओच्छाइय - ढका हुआ । ओज-शक्ति । ओट्ट होठ । ओदण-चावल। ओधारिणी- निश्चयकारी भापा । ओभावणा उपहास्य ओम ऊणा - न्यून-अधूरा। ओमंथिअ-नीचा [ २४ ] के बैठने वाला । ओम चेलग-सैले और पुराने वस्त्रों के पहिरने वाला। ओमाण-अपमान । ओमुय-जलता हुना अङ्गार (कोयला ) । ओरस-पुत्र । ओरोह-अन्तःपुर, स्त्रियों का स्थान । ओलम्च-नीच लटकता । ओलम्बणदीव साकल से चन्या हुआ दीपक, अथवा लालटैन। ओलग्ग -बीमार । ओवगारिश- उपकार करने वाला । ओवत्था- णिय-सभा का नौकर । ओवाय -उपाय । ओवीलग-दूसरे को निर्लज करने वाला । ओवेहा - उपेक्षा । ओल-ओस, अवश्याय ! ओसण-प्रायः करके । ओसहि-औषधि । ओसाण --अवसान, समीप । ओलायण-नाश करना । ओसास - उच्छास । ओसित्त-सिञ्चित किया हुआ । उस्लुय-उत्सुकता, उत्कण्ठा । ओसोवणी-गाढ़ीनिद्रा । इत्यादि। इन शब्दों से प्राकृत वाक्य स्वयं बना लेने चाहिए यथा- पगासण तरजुत्तो भवित्तापुणो ओभाले चिट्टियब्बो एकामन तपयुक्त होकर फिर अवकाश में रहना चाहिए इत्यादि ॥ , अत्र अनुस्वार युक्त शब्दों का उल्लेख किया जाता है । यथा- अंक रन्न, या गोद । अंकबर- चन्द्रमा । अंकाई- अद में लेकर बालक को क्रीड़ा कगाने वाली बाई । अंक मुह --पदासन का मुख्य भान । अंकिल्ल (देशीयं प्रा० ) [ २५ ] नट-नाचने वाला । अंकुडग-कीला । अंकुस, अङ्कुश- हाथी को वश में करने वाला । अंकल्लण-घोड़े को मारने वाला चावुक । अंग- शरीर का अवयव । अंग जणवय- अङ्ग जनपद-देश । अंगण शाला आदि के आगे का आग, आङ्गन ( वेडा ) खुली भूमिका । अंगणा-स्त्री । अंग पडि. यारिया--सेवा करने वाली दासी । अंगप्फुरणा-अङ्ग " स्फुरणा । अंग भंजण --- अंगड़ाई, लो कर उठने पर अङ्ग मर्दन करना । अंग अंग-अङ्ग उपाङ्ग । अंग रख-- अङ्ग की रक्षा करने वाला । अङ्ग रंग-अंग पर सलने वाला पदार्थ, जैसे चन्दन आदि । अंग रूह-पुत्र । अंगरूहा-पुत्री । अंग विजा --अङ्गविद्या, अङ्ग स्फुरण के सम्बन्ध में कहने वाला शास्त्र । अंग संचाल--अङ्ग का सञ्चालन । अंगदाण-पुरुष चिह्न, लि। अंगाल-कोयला । अंगुली कोस-अंगूठी। अंगुलि - अङ्गुलि । अच्छण - खींचना। अंजण --रसाञ्जनादि अंजन । अंजलिप्पगह हाथ जोड़ कर नमस्कार करना। अंतकम्म -वस्त्र का किनारा । अंतकरण-नाश करने वाला। अंतकाल -मरण काल । अंतद्धाण-अदृश्य होजाना । अंतद्धाणिया -- अदृश्य हो जाने की विद्या । अंतपाल-सीमा का रक्षक पुरुष । अंतमुहुत्त । मुहूर्त के भीतर का समय। अंतर -अन्तर, व्यवधान । अंतरंग-अन्तःकरण अंतरप्प--अन्तरात्मा । अंतरभाव परमार्थ । अतंर सत्तु- अन्तरङ्ग शत्र काम क्रोधादि । अंतरावास - विश्राम लेते हुए गुह ।

[ २६ ] पथ में गमन करना । अतंरिक्स-अन्तरिक्ष, आकाश । अंतेवासि-शिष्य । अंतो दुदृ-भीतर का शल्य । अंदोलग- हिण्डोलना । अंध · आंख से रहित । अंबर वत्थ-स्वच्छ वस्त्र । अम्बु -पानी । अंसोत्थ-पीपल का वृक्ष । अकंड विना समय । अकंपिय .. अकम्पित, महावीर स्वामी का आठवां गणधर | इत्यादि अनुस्वार शब्दों का संग्रह है। यथास्थान बोलने के लिये सानुस्वार शब्दों का प्रयोग इस प्रकार करना चाहिए जैसे कि- अकंतवत्युं न को वि इच्छा । अंतकाल समए जीवस्स धम्मो सरण भवइ । अंतपालो सीम रवइ । अंतरंग सुद्धिं- विणा अपणोमोक्खो न भवः । अंतरिक्खे पक्खी उद्देद अंतेवासी मुत्तस्स अत्थं पुच्छइ । अंतो दुट्ट पुरिसो वीसास घायं करेइ । अंधो पायेण निल्लजो होइ । अंबर वत्थु पहिरे । मूढो अकंत भासइ । तस्स अंगमहो विज्ज भणेइ । अंकघरो पयासेड़ । अंकि इल्लो नचड़। अंगरक्खो वत्थं परिहावेद ।

सातवां पाठ
प्राकृत भाषा में विसर्ग के स्थान पर ओकारादेश हो
जाता है। जैसे कि-
।
सम्वो सर्वतः । पुरओ- पुरतः । अग्गओ अग्रतः।
मग्गओ मार्गतः । भवओ-भवतः । भवन्तो भवन्तः ।
सन्तो- सन्तः। कुओ-कुतः । पुणो-- पुनः इत्यादि।
तथा प्रथमा विभक्ति के एकवचन में भी एकार और
ओकार आदेश होता है । जैसे कि
धम्मे, धम्मो, जिणे, जिणो, वीरे, वीरो इत्यादि।
इन शब्दों के प्रयोग भी स्वयं बना लेने चाहिए यथा
सवओ पासइ । पुरओ गच्छइ । अग्गओ पेहेइ । मग्गओ
आगच्छइ । भवओ किवा दिट्टी । भवन्तो किं कहति। तं कुओ
आगच्छसि।
तथा प्राकृत भाषा में स्वरों को स्वर आदेश भी होते हैं
जैसे कि-अकार को इकारादेश
१ कहीं २ विसर्ग के स्थान पर एकार और रकारादेश भी हो
जाता है । यथा--कतरः गच्छइ । कयरे गच्छइ । पुनः अपि-पुनरापि,
पुनरपि ।

[ २६ ] होता है, किन्तु एक वर्ण का लोप हेकर शेष रहा हुआ वर्ण द्वित्व हो जाता है, यह वात नीचे लिखे हुए उदाहरणों से समझ लेनी चाहिए। संस्कृत प्राकृत भुत्तं क भुक्तम् ग दुग्धम् ट पदपदः त उत्पलम् द मुद्गः प सुप्तम् र सूत्रम् छप्पओ ड खड्गः खग्गो उप्पलं मुग्गो सुत्तम् सुत्तं श निश्चलः निच्चलो प गोटी गोट्टी स स्खलितम् खलियं जुग्गम् नग्गो य सौम्यः सोम्मो संस्कृत प्राकृत मुक्तं सुत्तं स्निग्धः सिणिद्धो कट्फलम् कप्फलं षड्जः सज्जो उत्पातः उप्पाओ मुद्गरः सुग्गरो पर्याप्तम् पज्जत्तं रात्री रत्ती श्च्योतति चुयइ निष्ठुरः निहरो स्नेहः हो रश्मि रस्सी मग्नः भग्गो वाक्य वक्कं वल्कलम् बक्कलं विक्लवः विक्कवो. वर्गः वग्गो म युग्नम् न नग्नः ल उल्का उका ल इलक्षणम् सण्हं र अर्कः अक्को चक्क ग्रहः र चक्रम् व लुब्धः लुद्धो सद्दो लुब्धक: गहो लुडओ अहो व शब्दः अन्दः तथा निम्न लिखित शब्दों में भी भिन्न वर्गीय संयुक्त वों में से एक का लोप और तत्स्थानीय द्वित्त्व विधान स्पष्टतः प्रतीत हो रहा है। जैसे कि- प्क पुष्करम् पोक्खरं । स्कः स्कन्धः - खंधो । त्य-सत्यम्, सच्चं । त्वा-ज्ञात्वा, णच्चा । थ्व-पृथ्वी, पिच्छी। छ.-विद्वान्, विजं । ध्वा - युध्वा, बुज्झा । श्य- पथ्यम्, पच्छं । मिथ्या, मिच्छा । श्च -- पश्चिम्. पच्छिमं । स-उत्साह, उच्छाहो । प्प-पुप्पम्. पुष्पं ।न-प्रश्नः, पण्हा । ण-विष्णु, विरह । स्न-ध्यात्स्ना, -ध्यात्स्ना, जाहा । क्ष्ण-तीक्ष्णम् तिराह । इम -काश्मीरः, कन्हारा । पम - ग्रीप्मः, गिम्हा । स्म-अस्मादृशः. अम्हारिसेा । ह्म- ब्रह्मा, वम्हा । ह्य मह्यः, सज्झे । र्य-भार्या, भज्जा । न्म - जन्म, न ज्ञानम्, णाणं, नाणं |ध्य • उपाध्यायः, उबज्ज्ञाओ । द्य--विद्या, विज्जा । कम--रुक्मं, रुप्प । रुक्मिणी, सप्पिणी डम--कुमलम्, कुम्मल । ख्या-व्या- ख्यानम्, वक्वाणं । ट--मुष्टि, मुट्ठी । स्त-हस्तः, हत्या । स्तोकम् - थायं, थायं । यायं थेवं । स्तवः थवा । स्तुति-थुई। इसी प्रकार अन्य रूप भी जान लेने चाहिए । जम्मा ।

आठवां पाठ बारह महीनों के लोकोत्तर-जैनागम प्रसिद्ध नाम -- -- एक संवच्छरस्स वारस मासा पण्णत्ता तं जहा- 'एक वर्ष के वारह मास होते हैं तद्यथा- अभिणंदिए-अभिनदित पइठिय-प्रतितिष्ट -भाद्रपद श्रावण विजय-विजय पियवद्धण-प्रीतिवर्द्धन आश्विन -कार्तिक सेयंसे-श्रेयान सिव-शिव -मार्गशीर्ष -पोष हेमन्ते-हिमवान् सिसिरे-शिशर -माघ -फाल्गुन वसन्ते वसन्त कुसम संभव-कुसम संभव -वैशाख णिदाह-निदाघ वण विराह-वन विरोध -ज्येष्ट -आषाढ़ नोट वारह मामों के लौकिक श्रावण भाद्रपद आदि नाम तो प्रसिद्ध ही हैं परन्तु जनागमों में इन जो ऊपर नाम दिए हैं वे लोकोत्तर के नाम से विख्यात है।

[ ३२ ] शब्द संग्रहः उजाण उद्यान, वाग । उज्जाणगिह-उद्यानगृह, (कोठी)। उज्माण जत्ता-बाग की यात्रा । उज्जाण पाल- माली। उन्जाण साला-उद्यानशाला । उज्जा गलयण- उद्यान में बैठने का गृह । उज्जुवालिया-नदी । उडुबर-सूर्य उल-जबल । उत्तमंग-मस्तक | उत्तम कहा-उन्तम - कथा । उत्तमहाण-उत्तम स्थान । उदाग साला-जल का n " . १ स्थान । अन्ल साला-अश्व शाला । उट्ट साला-ऊँट शाला गद्दम साला-गर्दभ झाला । गोण साला-वृपम झाला , रह साला-रथ शाला , वानर-बांदर कह-कपि , मास -अश्व, बाड़ा , पात साला-जहाज शाला , जंघा-जांघ , चामर-चमार चामाकर नुवर्ग चाय-त्याग चार पुरिस गुमचा (ग्युफिया) ,चारगसाला-जेलखाना चारग पालव-जेलर, बन्दीगृहाध्यक्ष चारग साहण- कौदयों का जेल से छोड़ना । चार भइ-मुभट, वा चार' चारिया -- परित्राजिका, साबी, चारित-चारित्र , चारिय- विनाधित. चार - मनोहर, चान भानि-~मनोहर बोलने वाला चालय - चालना (कानी), चालण पूर्वपक्ष , चिल्लद- ,

[ ३३ ।
शिकारी जानवर चित्ता आदि, चीणांसुय-चीनांशुक, चीन
देश का सूक्ष्म वस्त्र, चीणपिठ सिन्दूर , चीणविठ्ठ-हिंगुल,
चुल्लपिउय, पितृव्य-पिता का छोटा
भाई,
, चुल्ल माउया -चाची , मतेरमां, चुल्ली-छोटा चूल्हा,
चूड़ामणि-मुकुट , चूयवर्ण-अम्वों का वन, चूला
चीर-वस्त्र
,
शिखा चाटी,

नवमा पाठ पहिले के पाठों में प्राकृत भाषा के बहुत से शब्दों का वोध, प्रायः विना विभक्तियों के कराया गया है । अव इस पाठ में कतिपय विभक्तयन्त शब्दों की रूपावली दी जाती है। साथ ही विद्यार्थियों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि प्राकृतभापा में द्विवचन नहीं होता, किन्तु द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है और चतुर्थी विभक्ति के स्थान पर भी प्रायः षष्ठी ही होती है। जैसे कि सँस्कृत में- पुरुषो वदतः-दो पुरुप बोलते हैं। तो प्राकृत में 'पुरिसा वयंति' तथा दापुरिसा वयंति, इस प्रकार से उच्चारणा किया जावेगा। तथा 'नमः अर्हद्भ्यः' यहां चतुर्थी के स्थान पर 'नमो अरिहंताणं' इस प्रकार स पष्टि का प्रयोग किया जाता है। शब्द रूपावली ( क ) अकारान्त पुंल्लिन वीर शब्द- वह वचन १ वीरो वीरे (वीरः) वीरा (वीराः) २ वीरं (वीरम् ) वीरा, चीरे (वीरान्) पकचत्रन

..
( ३५. )
३-वीरेण वीरेणं (वीरेण) वीरेहि, वीरेहि, वीरेहि (वीरैः)
४-वीराए, वीराय, वीरस्स, वीराण, वीराणं.
(वीराय)
(वीरेभ्यः)
५. वीरा, वीरत्तो वीराओ, वीरत्तो, वीराओ, वीराउ,
वीराउ, वीराहि, वीराहि, वीरेहि, वीरा-
वीराहिता (वीरात्) हिंता, वीरासुंता
वीरे सुंता (वीरेभ्यः)
६-वीरस्स, (वीरस्य) वीराण, वीराण (वीराणाम् ।
७-वीरे, धीरंसि ( वीरे) वीरेसुं, वीरेसु (वीरेषु)
सम्बोधन--
है वीर, वीरो थीस (धीर) वीरा, (वीराः)
एक वचन
१-सव्वो सव्वे (सर्वः) सव्वे (सर्वे)
२-सन्यं (सर्वम् ) सन्ने, सवा. (सर्वान् )
३- सब्वेण, सव्वेणं (सर्वेण) सब्वेहि, , सब्जेहिं .
सकेहिं ( सर्वैः )
४-सव्वस्स (सर्वस्मै) सव्वेसिं (सर्वेभ्यः )
सव्वाण-सव्वाणं
५-सवतो सवाओ सवाहि, सब्वेहि, सवाहितो
सव्वाउ सवाहि
सचोहितो. सव्वासुतो.
सन्चेहि
सव्वाहिंतो . सव्वेसुतो,
वहु वचन

(सर्चस्मात् )
(सर्वेभ्यः
६ -सव्वस्त, (सर्वस्य )
सम्वसि सन्चाण, सद
( सर्वेपार
७-सचोसि सबम्मि सव्वस्थ
सक्वेसु, सब्वे
(सर्वस्मिन्)
( सर्वेषु)
सं० हे सन्या हे सव्वो
हे सब्वे
अकारान्त नपुन्सक वण-[वन] शब्द के रूप
१-वणं (वनं)
वणाई, वणाणि, वणाई (वनानि
शेष रूप वीर शब्द की तरह ही होते हैं।
इकारान्त पुल्लिङ्ग रिसि शब्द
एकवचन
वह वचन
१-रिसी (अापिः) रिसउ, रिसओ,
रिसिणो, रिसी (क्रपयः)
२-रिसिं (ऋषिम् )
रिसी, रिसिणो (ऋषीन)
३-रिसिणा (कपिणा) रिसीदि, रिसीहि, रिसीहि
(पिभिः)
४-रिसिस्स, रिसिणो रिसीण, रिसीगं
रिसये-(प्रपये)
(ऋपिम्पः)

(. ३७)
५-रिसित्तो, रिसीओ, रिसीउ ॥ रिसित्तो, रिसीओ, रिसीउ
रिसिणो रिसी हिंतो रिसि सुतो रिसीहितो ।
(ऋपेः)
(ऋषिभ्यः)
६-रिसिस्ल, रिसिणो रिसीण रिसीणं
(ऋपेः)
(ऋषीणाम् )
७-रिसिंसि, रिसिम्मि रिसीसु, रिसीसुं.
(ऋषौ)
(ऋषिपु)
सम्बोधन
रिसी, (ऋषे) रिसउ, रिसओ, रिसयो, रिसिणो,
रिसी (ऋषयः)
भाणु [ भानु] शब्द
१-भणू (भानुः) भाणवो, भाणवे, भाणओ भाणउ
भाणुणो भाणू (भानवः)
२--भ [ (भानुम् ) भाणुणो, भाणू ( भानून् )
३- भाणुणा ( भानुना) भाणूहि, भाणूहिं भाणूहि
( भानुभिः)
४ -भाणवे, भाणुणो भारण, भाणूणं,
( भानुभ्यः)
५ भाणुत्तो, भाणुओ भाणुउ भाणुत्तो, भाणूओ भाणूउ
भाणुणो, भाणुहितो भाणूहितो, माणूसुंतो,
(भानोः)
( भानुभ्यः)
माणुस्ल (भानवे)

६-माणुस्स. मागुनो भानोः) भाग्गूग. भाणणं. (भानूनाम् ) ७-भागलि, भानुन्नि, भानौ) भाग्नु, भागुन ( भानुपु) सम्बोधन भाशु. भानु ! भानो) भाणयो. भागलो. भाणउ, भाणुणो भाणू ( भानवः) इकारान्त नपुंसक लिङ्ग दहि [इथि] शब्द के रूप- १-वाह । यि ) वहींई. वहींई वहीणि ( दधीनि) - दोष गिलि शब्द की तरह ही रूप हैं। कागन्न नसकलिङ्ग महु मिथु] शब्द के रूप- म नथु) महई, महूई. महाणि निवृनि । गंष शब्द भानुवन् जानी। आकारान्त स्त्रीलिङ्गमाला शब्द कम्प- गतवचन यदुवचन माता) मालाड नालाओ. नाला मालाः २-मानं माताम् । माला) ३-माला माताह. मान्दादि मालाहि, । मालाभिः) माला मालात मालादि मालत्तो, . मालातो, मालाए ( मालायै ) (मालाभ्यः) ५-मालाअ, मालाइ, मालाए मालत्तो, मालातो, मालाओ मालाउ, मालाहिंतो, मालाओ, मालाउ, मालासुंतो मालाहिंतो (मालायाः ) ( मालाभ्यः) ६-मालाअ, मालाइ, मालाए, मालाण मालाणं (मालायाः) ( मालानाम् ) ७- मालाअ, मालाइ, मालाए, ( मालायाम् ) मालासु, मालासुं, ( मालासु) सम्बोधन माला मालाड, मालाओ, माला, (माले) (मालाः) इकारान्त बुद्धि शब्द [ स्त्री लिङ्ग ] १-युद्धी, (वुद्धिः) बुद्धीउ, बुद्धीओ, बुद्धी, (बुद्धयः) २ - वुद्धिं. ( वुद्धिम् ) (बुद्धीः) ३ - बुद्धीअ, बुद्धीआ, वुद्धीइ. वुद्धीहि, वुद्धीहि, बुद्धीहि धुद्ध ए, (वुद्धया) ( वुद्धिभिः) ४- वुद्धीअ, बुद्धीआ, वुद्धीइ बुद्धीण, युद्धीणं बुद्धीए. ( युद्धयै, वुद्धये ) (बुद्धिभ्यः) ५-बुद्धीअ, युद्धीआ, वुद्धीइ वुद्धित्तो, घुद्धितो वुद्धीए, (बुद्धयाः, बुद्धः) ( बुद्धितः ) . - ( ४० ) बुद्धित्तो बुद्धितो युद्धीओ वुद्धीओ बुद्धि वुद्धोउ, बुद्धीहितो बुद्धिहितो. बुद्धिसुतो (घुद्धितः) (धुद्धिभ्यः) ६- घुद्धीअ-बुद्धीआ-बुद्धी बुद्धीण, बुद्धीणं बुद्धीय, (बुद्धयाः बुद्धः) (बुद्धीनाम् ) ७-बुद्धीभ, वुद्धीआ. बुद्धीइ, बुद्धीसु, बुद्धीसु बुद्धीए ( युद्धयाम् युद्धौं) (युद्धिपु) सं--चुद्धि, बुद्धी, (युद्धे । बुद्धीउ, युद्धीओ, युद्धी (बुद्धयः) उकारान्त घेणु-धेनु शब्द, के रूप १-धेयू (धनुः ) घेणुउ, घेणुओ, घेणू, (धेनवः) २--घेणू (धेनुम् ) (धेनूः) ३-घेणुभ, घेणुआ, धणूड, घेणूहि, धेहि धेहि धेाग (धेन्या) (धेनूभिः) ४ घेणूत्र, धणभा घेणूह घेणूण, धेनणं थेगूप. (धेन्वे, येनबे) (धेनूभ्यः) ५-घेणूम, घेणश्रा, घेण्इ, धेणु र धेणतो, धेणुतो धणुओ. धात्तो, घेणूतो, घेणुओ, धेणुहितो घेणूमुंतो (धेनोः धेन्वाः) (धेनुभ्यः) धेउ धेहितो (धेनुतः) . ( ४१ ) ६-घेणूअ, धेणूआ, धेरणूई धेयूग घेणूण धेरणूए (धेन्वाः, धेनोः) (धेनूनाम् ) ७-धेरशूअ, धेणू धेरण्इ देणू धेरणूखं धेणूए (धेन्वाम् , धेनौ) (धेनुषु) स०-घेणु, धेणू (धेनो) घेणू उ धेणूओ धेरणू (धेनवः) ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग नई-नदी, शब्द के रूप- १-नई, नदी नदीआ नदीउ नदीओ नदी ( नदी) नईआ नईउ नईओ नई ( नद्यः) २ - नदी नई ( नदीम् ) नदीना, नदीउ नदीओ नदी नईआ नईओ नईउ (नदीः) ३-नदीअ, नदीआ नदीइ नदीहि, नदीहिं, नदीहिं नदीए नईअ नईआ नईहि नईहि, नईहि नईइ नईए ( नद्या) ( नदीभिः) ४-नदीअ नदीआ नदीइ नईअ नईआ नईइ नईए नदीए ( नये ) नदीण, नदीणं, ( नदीभ्यः) ५-नदीअ नदी नदी नदित्तो नदीतो नदीओ नदीउ नादत्तो नदीतो नदीओ नईतो नइत्तो नईओ नईउ नदीड नदीए नदीहिन्तो नदीहिन्तो नदीसुतो ( नद्याः) नईहिन्तो, नईसुतो (नदीभ्यः) ६-नदी, नदीमा नदी नदीण नदीणं (नदीनाम्) नदीए ( नद्याः) ( ४३ ) सकारान्त पुंल्लिङ्ग भर्तृ शब्द के रूप भत्तुणे। सत्तारा भत्तारे भत्तारहिं भत्तुहि भत्तुणे भत्ताराणं २-भत्तारो (भा) २-भत्तारे भत्तुणा भत्तारण ४-भत्तुलो भत्तारस्स ५-भत्ताराओ भत्तुणो इत्यादि ६-भत्तो भत्तारस्स भतार, भत्तारम्मि,भचम्मि सं-हे.भत्तार! भत्तारेहितो भत्तुणं भत्ताराणं भत्तुसु भत्तारेसु हे मत्तारा! पितृ-भात-जामातृ शब्दों में इतनी विशेषता है। १-पिया पिअरो (पिता) २-पियरं (पितरं) पियरा पिउयो। पिअवा. पिअआपिअउ,पिऊ (पितर पियरे, पियरा, पिउणापित पितनः पियरेहि, पियरेहि । पिऊहिं (पितृभिः । पियराणं पिऊण : पितृक । ३-पियरेण पिउणा (पित्रा ४- पियरस्ल पिउणो (पितुः)

( ४ )
५-पिअराओ पियरत्तो पियराहिंतो पिऊहिंतो पियरे
पिउणो इत्यादि
हितो पियरासुतो ( पितुः)
६-पियरस्त, पिउणो पियराणं पिऊणं : पितगाम्)
(पितुः)
७ - पियरे पियरम्मि पियरंसु पिऊसु (पितृपु)
पिउस्मि (पितरि)
सं-हे पिय हैं पिभर (पितः) हे पिअरा! (पितरः)
इसी प्रकार भ्रातृ और जामात शब्द के रूप होते हैं।
मातृ [स्त्री लिङ्ग] शब्द के रूप
१-माआ
माआ
२-मात्र
माए
३-माभाइमाआअ इत्यादि मापहि, माप.हिं
५-मायादो माआप इत्यादि माआहिंतो मायागुंतो
६-माधाद साभाथ
मायाण मायागां
इत्यादि
माआमु माआमुं
सं-हे. मात्र!
हे माया!
--

[ ४५ ] एकवचत वहुवचन २-मम, मिमं, मं,अम्हाम्मि अम्हे अम्हणों [ अस्मान्- अम्मि [ मां-मुझे] हमें] ३- मइ, मए, भि, मे, ममए अम्हेहि अम्हाहिं अम्ह, ममाइ [मया-मुझसे] अम्हे [ अस्माभिः हमसे] ४-मम, ममं, मे, मज्झ अम्हे, अम्ह. मो, अह्माणं [महाम्-सुझे] [अस्मभ्यम्-हमें ] ५- ममाहिता, ममत्तो,ममाओ अम्हहिंतो, अम्हेहितो ममाउ ममाहि [मत्-मुझसे] ममहितो, अह्मत्तो,अम्हाओ [अस्मत्-हमसे] ६-मम ममं (मम-मेरा) अम्ह,मो(अस्माकं हमारा) ७- ममंसि, ममंमि, महंसि, अम्हेसु, ममेसु [ अस्मासु- महम्मि (मायि-मुझमें) हममें ] युष्मद् [ मध्यम पुरुष ] शब्द के रूप एकवचन १-तुं, तुमं, ते (त्वं-तू) २-तुं, तुमे. तुए, तुम, ( त्वां तुझ) ३ - ते, तुमे तुमए तुम, (त्वया-तुझ से) ४-तुव, ते, तुम, तुह, बहुवचन तुम्मे ( यूयं तुम) तुम्भे. वो, तुझ, तुम्ह, तुम्हे. (युष्मान तुम्हें ) तुम्भेहिं तुम्हेहिं (युष्माभि- तुमसे ) तुभं तुम्हें तुज्झाण,तुम्हाण ( ४६ ) तुझ [ तुभ्यं-तुझे] [युमभ्यम्-तुम्हें] ५-तुम्हाहतो, तुबत्तो, तुम्महितो, तुम्हेहितो तुवाओ त्वत् तुझसे] [युप्मत्-तुमसे] ६-तव, ते, नुमं [तव-तेरा] तुम्भं तुम्हं [ युग्माकम् तुम्हारा] ७-तुमंसि, नुमम्मि, तुमे तुम्मेसु, तुम्हेसु, तुमसु (त्वयि-तुझमें। (युप्मासु-तुममें) युप्मद् और अम्मद् का सम्बोधन नहीं होता। यह तीनों लिङ्गों में एक जैसे रहते हैं । . तत् (अन्य प्रथम पुरुष) शब्द के रूप प.र. बहुव. प.व. व.व. ए.व. व.ब. ए.व. व.क., ते २तं ते ३ तेय्य तेहि ४ तस्स तेसि ५ ताओ, तुम्ह, नेहितो ६ तस्स तेसि ७ तसि तमि तेस्नु स्त्रीलिङ्ग- नपुंसकलिङ्ग- १से . एक वचन बहुवचन एकवचन बहुवचन - तं ताई. तापि २-तं नाओ नाओ ताहि तालि नास्तिो ३-ताप ४-तीसे ५-ताओ तेगा तहि तसि तोदत तामो, नम्हा ( ४७ ) तासि ६-तीसे ७-तीसे तेसिं तेसु तासु तसि, तम्मि इसी प्रकार अन्य शब्दों की रूपावलि प्राकृत भाषा से जान लेनी चाहिए । यहां पर तो विद्यार्थियों के लिए आदर्श- मात्र कुछ शब्दों की रूपवाल दी गई है। अव अर्थ सहित देव शब्द की रूपावली देकर इस बात का स्पष्टीकरण किया जाता है कि प्रत्येक शब्द की प्रत्येक विभक्ति का अर्थ, उक्त प्रकार से ही कर लेना चाहिए। एक वचन बहुवचन १-देबे, देवो [एक देव] २-देवं देवा [वहुत से देव ] देवे देवा " देव को ३-देवेणं देवों को देव के द्वारा " ४-देवाए देवस्स देव के लिये ५-देवाओ, देवा देव से देवेहि देवों के द्वारा देवाणं देवों के लिये देवहितो देवों से . . तुझ [ तुभ्यं-तुझे] युप्मभ्यम्-तुम्हें ] ५-तुम्हाहितो, तुबत्तो, तुम्मोहितो, तुम्हेहितो तुवाओ [त्वत् तुझसे] [ युष्मत्-तुमसे ] ६-तच, ते, तुमं [ तव-तेरा] तुभं तुम्हं [ युप्माकम् तुम्हारा] ७-तुमंसि, तुमाम्मि, तुमे तुम्मेसु, तुम्हेसु, तुमसु (त्वयि-तुझ में । (युष्मासु-तुममें ) युष्मद् और अस्मद् का सम्बोधन नहीं होता। यह तीनों लिङ्गों में एक जैसे रहते हैं। तत् (अन्य प्रथम पुरुप) शब्द के रूप ए.२. वहुव. ए.व. व.व. ए.व. व.. व.व. प.व. व... १से २ तं ते ३ तेय्य तेहि ४ तस्स तेसिं' ५ ताओ, तम्ह, तेहिंतो ६ तस्स तेसिं ७ तसि तमि तेलु स्त्रीलिङ्ग- नपुंसकलिङ्ग- ते एकवचन बहुवचन एकवचन वहुवचन ताई, तारिः तं ताओ ताओ ताहि तासि ताहतो तेणं २-तं ३-ताए ४-तीसे ५-ताओ तेहि. तसि ताओ, तम्हा तोहत).

( ४७ ) ६-तीसे तासिं तोर्स ७-तीसे तासु तंसि, तम्मि तेसु इसी प्रकार अन्य शब्दों की रूपावलि प्राकृत भाषा से जान लेनी चाहिए। यहां पर तो विद्यार्थियों के लिए आदर्श- मात्र कुछ शब्दों की रूपवाल दी गई है। अव अर्थ सहित देव शब्द की रूपावली देकर इस बात का स्पष्टीकरण किया जाता है कि प्रत्येक शब्द की प्रत्येक विभक्ति का अर्थ, उक्त प्रकार से ही कर लेना चाहिए। " एक वचन बहुवचन देवा १-देबे, देवो [एक देवा २-देवं [वहुत देव को ३-देवेणं से देव ] देवे देवा देवों को देवेहि देवों के द्वारा देवाणं देवों के लिये देवोहतो देवों से देव के द्वारा ४-देवाए देवस्स , देव के लिये ५-देवाओ, देवा देव से "

( ४८ )
६-देवस्स
देवाणं
देव का
देवों का
"
७-देवे, देवंसि
देवेसु
देव में
देवा में
सं० हे देवा, देवो!
हे देवा!
हे देव !
हे देवो!
इसी विधान के अनुसार प्रत्येक शब्द में प्रत्येक विभक्ति
का अर्थ जानलेना चाहिये।

दसवां पाठ शब्द संग्रह शव्द अर्थ अर्थ मृग झस मच्छ कुरंग 'पाठीण कच्छभ मत्स्य सैहा-ससला चमरी गाय कच्छ अटवीका पशु सरभ सँवर वारह सिंगा सस चमरी हुरम्भ मोण वकरा ससय शशक वृषभ-वैल, रोहिय रोहित पशु इय घोड़ा गय "खर गधा खग्ग बानर हाथी ऊँट बँदर बृक-व्यान बिल्ला-विडाल महिष-भैंसा गवय गैण्डा रोझ गीदड़ महाशूकर विम मजार :सियाल कोलसुणक 'विग्य -महिस व्याघ्र साण कुत्ता छगल वकरा सदूल सीह शार्दूलसिंह गाणस विना फणका साँप अयगर अजगर { ५० ) मउली फण वाला साँप हंस विशेष णउल नकुल-नेउला नाका साँप दबीकर कादस्वक बगुली शकुन्त (पक्षी) सुर्थीमुह बलाका हंस सउण शुचीमुख. तीखी: चोच वाला पक्षी चक्कवाग चकवा गरुल गरुड़ सुय शुक-तोता मयण साला मदनशाला (मैना पक्षो) मयूर-मोर कवोतक, कवाय कवृत्तर सण मयूरग तित्तिर वाज तीतर चर्म नख वायस मंस सोणिय अट्टी माँस नह रुधिर दंत हड्डी वा गुठली सिंग दान्त सांग विसाण विसाण कण्ण कांन नयण हाथी के दान्त' आंख कश नाक चाल ममर भ्रमर भौरा ऋव कूप तत्वाय ताचाव थाराम धर्मस्थान बिहार संतु थूम स्तूप प्राकार-काट पुल पागार ( ५१ ) लैण, पासाय आवण भूमिधर मंडव प्रासाद लयण गुहा, गुफा चित्रसभा. दुकान चित्तसभा भारा आवसह तपस्वियों का आश्रम. मंडप,वेदी-वस्त्रादि निर्मित गृह कम्म कर्म हत्थ हाथ वत्थ बस्त्र मजण स्नान सूप-छाज' वियण पल्ला मुह मुख कर हाथ सगड़ शकट-गाड़ा. चंदसालिया चन्द्रशालिका सभा-सहा [चौवारा] पवा पानी पिलाने का स्थान मुसंढि बन्दूक सतग्धि तोप चाव" चाप-धनुष करि हाथी दारिय बालक खंडिय विद्यार्थी माहण ब्राह्मण खत्तिय क्षत्रिय वईस्स वैश्य शूद्र विप्प दिक्ष द्विज ब्राह्मण नाइ ক্লাব साँप, वा हाथी नाग कुमार भवनपतिदेव नागकुमारी भपनपतिनागदेवी नाग दंत कीला नाग वाण नागवाण नामक अस्त्रविद्या अगणिवाण अग्निविद्या आग्नेयअस्त्र वित्र ( ५२ ) नाग रुस्ख नागवृक्ष नागलया पानकीवेल नाड़ग, नाडय नाटक नाणंतराय ज्ञानान्तराय नाणायार ज्ञानाचार नाणावरण ज्ञानावरण कर्म [अविद्या] नाणि ज्ञानी नाभि नाभि . नामकरण नामकरणसंस्कार नायपुत्त ज्ञात पुत्र [ महावीर स्वाभी] नारंग नारङ्गी नाराय नाराच वाण नारायण वासुदेव नारी स्त्री नाल पतनाला, नाली नालिया समय सूचक [जलनिकलनेकामार्ग] यन्त्र-घड़ी नानी घड़ी नावा नौका नाविध नाविक नास नाहिय नास्तिक नाहिय वाय नास्तिक वाद नाहियवादि नास्तिकवादी नियम नियम नियमिय नियमित निकम्मदंसी आत्मद्रष्टा निकल कलारहित निगाम अत्यन्त सीमारहित नियस कसौटी निच्चळ निश्चल निकरण निश्चयकरना निर्णय करना निच्य निश्चय नियाय, नियाग मोक्षमार्ग न्यास, धरोहर

( ५३ )
निरामय रोग रहित निरागरण निराकरण
नीलकंठ . नीलकण्ठ
नीलमिग नीलमृग
नीलुप्पल नीलोत्पल नीहार बड़ीनीति
नेतार नेता निवत्थ वेष
निचाण निर्वाण-मोक्ष नेसग्गिय मैसर्गिक स्वाभाविक
नेह
स्नेह
नोमालिया
नव मालिका
मिच्छादिहि मिथ्यांदृष्टि
न्हवण
स्नान
पइराणा प्रतिज्ञा

ग्यारहवां पाठ
इमीए पाडसालाए कि इस पाठशाला का क्या
नामात्थ?
नाम है ?
जहण पाडसाला
जैन पाठशाला
पत्थ कति अज्झावया सति ? | यहां कितने अध्यापक हैं।
पराणवीसा
पच्चीस
इमिया के नियमा संति ?
इस के क्या नियम हैं ?
भवंतो नियमावलं पस्संतु आप नियमावली को देखें
:पट्टकमा केरिसोअस्थि ?
पाठ्यक्रम कैसा है ?
अइ मुंदरी अस्थि
अति सुन्दर है।
अक्षावया कि मणाविति ?
अध्यापक लोग क्या पढ़ाते हैं
सवयं पागयं धम्मसत्थाई संस्कृत प्राकृत धर्म शास्त्र
तहा अगणेवि दिसए भणाविति। अन्य विषय भी
पढ़ाते हैं।
किं नाय सत्य विसपवि तसि क्या न्याय शस्त्र विषय में
गई अत्थि?
भी उनकी गति है।
हंता? नाए-चागरण साहिच्चार हां ! न्याय व्याकरण साहि-
सब विसयेमु तेसिं विसिष्ठा त्यादि सर्व विषयों में उनकी
गई अस्थि
विशेष गति है।
जया यमुत्तस्स कुमारस्स । जब अतिमुक्त कुमार को

विरागी होत्था तया तेण वैराग्य हुआ था तव उसने
अम्मा पियराणं पुरओ किं माता पिता के सामने क्या
किं भासियं?
कहा था?
कहेमि, भवतो ज्झाणपुन्वं मैं कहताहू आपध्यानपूर्वकसुना
सुणेह । ततेणं से अइमुत्ते तव वह अतिमुक्त कुमार
जहां पर माता पिता थे वहां
कुमारे जेणे व अम्मा पियरो पर आया यावत्, उसने उनके
तेणे व उवागते जाव पव्व- प्रति दीक्षा के लिये कहा।
तित्तए
अतिमुक्त कुमार के प्रति माता
अइ मुत्तं कुमारं अम्मा पियरो पिता इस प्रकार कहने लगे।
एवं बयासी
हे पुत्र तू अभी वालक है
वाले सि ताव तुमं पुत्ता!
हे पुत्र तू अभी सम्बोधरहित है
असंबुद्धे ऽसि ताव तुम पुत्ता तू धर्म को क्या जानता है।
किं नं तुम जाणसि धम्म तव वह अतिमुक्त कुमार
त तेणं से अहमुत्ते कुमारे माता पिता के प्रति इस
अम्मा पियरो एवं क्यासी। प्रकार वोला।
एवं खलु अम्म याता! जंच हे माता पिता जी यह ठीक है
जाणामि तं चेव न जाणामि जिसको मैं जानता हूं उसको
जंचेव न जाणामि,
मैं नहीं जानता हूं।
जिसको मै नहीं जानता हूं,
तं चेव जाणामि ।
उसको मैं जानता हूं।

( ५६ ) . ततेणं तं ग्रहमुत्तं कुमारं तब उस अतिमुक्त कुमार से अम्मा पियरो एवं वयासी। माता पिता ने इस प्रकार कहा। कहं न तुम पुत्ता जं चेव हे पुत्र तू किस भान्ति, जिस जाणासि तं चेव न जाणास्ति को जानता है, उसको नहीं जानता और जिस जंचेच न जाणासि तं चेव को नहीं जानता उस को जाणासी? जानता है? ततेणं से अहमुत्ते कुमारे तव वह अतिमुक्त कुमार माता यम्मा पियरा पवंबयासी। पिता के प्रति इस प्रकार कहने लगा। जाणामि अह अम्मतातो जहा हे माता पिता जी में जानता जापणं अवन्स मरियञ्चं । हूं जिस का जन्म हुआ है उसकी मृत्यु अवश्यं भावी है। चिरण वा। न जाणामि अहं अम्म तातो ! मैं नहीं जानता हूं. हे माता काहे वा काह वा के पिता जी किस समय किस प्रकार से कितने समय व्यतीत होने पर। न जाणामि अम्म यानी! कहिं हे माता पिता जी में नहीं कम्मादहि जावा नेर- जानता हूं किन कमाँ के ( ५७ ) इय,-तिरिक्ख जोणि-मणु- ग्रहण से जीव नैरयिक- स्स-देवेसु उववज्जति। तिर्यक् योनि-मानुष और देवों में उत्पन्न होते हैं, अर्थात् उक्त योनियों के कारण भूतकर्म कौन २ जाणामि अम्म यातो! जहा माता पिता जी ! मैं जानता हूँ सतेहिं कम्मायाणेहिं जीवा- यथा स्व स्व कर्मों के नेरइय जाव उववज्जति। ग्रहण से जीव (उक्त चारों गतियों में) उत्पन्न होते हैं। एवं खु अहं अस्म तातो ! जं इस प्रकार हे माता पिताजी! चेव जाणामि तं चैव न जिस को मैं जानता हूं जाणामि उस को मैं नहीं जानता। जं चेव न जाणामि तं चेव और जिस को मैं नहीं जानता जाणामि। हूं उस को मैं जानता हूँ। इमं पड़िवयणं विरागस्स कारण यही उत्तर वैराग्य का कारण मस्थि । इसीणं चयणं पमार्ण भवति । ऋषियों का वचन, प्रमाण होता है। महापसाया इसिणो भवन्ति । ऋषि बड़े कृपालु होते हैं। नहु मुणी कोहवरा हवन्ति । मुनि क्रोधी नहीं होते हैं। णिणो संसारि जीवाणं तहा | नियों का संसारि जीवों को ( ६० ) पणपण्णासा, पंचावरणा । छप्पण्णा-छप्पराणासा । सत्ता वरणा-सत्तपरणासा। अड़वना-अठ्ठपण्णासा, अठावरणा। एगूण सहि । सहि । एगसट्टि-इगसहि । वासहि । तेसहि । चउसटि-चोसहि । पणसठि । छासहि। सत्तसठि । अछु सहि, अडसहि । एगूणसत्तरि । सत्तरि-हत्तरि । एगसत्तरि-एगहत्तरि इक्कसत्तरि-इकहत्तर। विसत्तरि वासत्तरि-बिहत्तरि वाहत्तरि वावत्तरि । तिसत्तरि-तिहत्तरि।चोसत्तरि-चोहत्तरि-चउसत्तरि चउहत्तार पण्णसत्तरि-पणहत्तरि । छसत्तरि-छहत्तरि । सत्त सत्तरि-सत्तहत्तरि । अदृसत्तरि-अठहत्तरि । एगूणसीह । असीइ, एगासीइ । वासीइ, तेसिइ । चउरासीइ-चोरासीइ । पंचासीइ । छासीइ । सत्तासीइ । अठासीइ निवासीइ-एगूण- नवा । नवइ । एगणवइ-इगणवइ,एगाणवइ । वाणवइ । तेणवइ । चउण-वइ, चोणवइ । पंचणवइ, पंचाणवद । छण्णवइ । सत्तण- वइ । अट्टणवइ-अट्ठाणवइ अड़णवइ । नवणवइ-णवणवइ, एगूण- सय । सय । दुसय, विसय, बेस याइ । तिसय, तिण्णिसयाइ। चत्तारि सयाइ। सहस्स। दससहस्स दह सहस्स, अयुत अयु। लक्ष । दसलक्ख दहलक्ख पयुत-ययुअ। कोड़ि, कोडा- कोडी । इत्यादि संख्या वाचक शब्द प्राकृत में होते हैं । अधिकतर व्यवहार में आने वाले कतिपय शब्दों का संग्रह घड-घट घर-गृह हरड़-हरीतकी चंद-चन्द्र

( ६१ )
रक्ख-वृक्ष
आगयो-आगतः
सही-साक्षी मुह-मुख सेह-मेघ
सम्प-सर्प
अवञ्च-अपत्य हत्थ
हस्त, नक-नाक,
जिम्मा-जिन्हा,
कन्त-कर्म,
हुक्ख-दुःन्त्र,
काम-कर्म, चम्म-चर्म
दुद-दुग्ध, यण-स्तन, अस्वफल-यात्रफल, तन्व-तान्त्र,
होट्ट, पोष्ट

तेरहवां पाठ
धातुओं के रूप
जिग्न प्रकार एली पाटी में प्राकृत भाषा के प्रयोग वा
कुछ शब्दों की सपावलि दिलाई गई, ठीक उसी प्रकार
इस पाट में आदर्शमात्र क्रिया के विषय में लिखा जाता है,
और तीनों पुरुषों में जो म.प बनते हैं चे दिखाए जाते हैं,
प्राशन के प्रयोगों में प्रायः भूत वज्ञान और भावष्यत् तथा
भाक्षा विधि कलकार के रूप देख जाते हैं, अतएव उक्त
चारों लकारों के ही रूप यहां पर दिए गये हैं।
वर्तमान काल (कर्तृवाच्य )
पास देखना
एकवचन
प्र. पु. पालइ --चट देता है
म. पु. पासलि- दाता हैं
उ. पु. पानामि - में देखना हूं
बहुवचन
पानति वे देखते हैं,
पह-तुम देखते हो,
पासामो-
.
-
हम देखते हैं,
श-"कर" करना
प्र. पु. करेट् वा करता है.
म. पु. कोसि -- तूं, करता है.
कगति-वे करते हैं.
कोह-तुम करते हो,

उ. पु: करेमि-मैं तरता हूं । करेमो - हम करते हैं, कुछ ऐसे धातु भी हैं जिनके रूप निपात सिद्ध होते हैं, उनमें ले 'अस' धातु का प्रयोग अधिक होता है, इसलिये उसके रूप नीचे लिखे जाते हैं, एकवचन वहुवचन प्र. .पु अस्थि-वह है म., असि, सि-तूं है सि, मि - मैं हूं संति-वे हैं स्थ-तुम हो उ." मो-हम हैं भूतकाल प्रः म. उ. पुरुष एकवचन-पासित्था -उसने तूने या मैंने देखा, बहुवचन-पासिंनु - उन्होंने, तुमने या हमने देखा एकवचन-करेत्या-उसने तूने या मैंने किया, बहुवचन-करेलु,करिंसु - उन्होंने तुमने या हमने किया, भविष्यत् काल बहुवचन प्र. पु पासिस्सइ-वह देखेगा पासिंस्सीत-वे देखेंगे म. पु. पासिस्ससि -तू देखेगा पासिस्सह तुम देखोगे उ. पु. पासिस्सामि - मैं देखेंगा पासिस्लामो -हम देखेंगे इसी प्रकार "कर" धातु के भी रूप बनते हैं। अन्य प्रकार से भी भविष्यत् काल के रूप बनते हैं, जैसे- एकवचन ,

( ६४ )
प्र. पु. पासिहिइ-वह देखेगा पासिहिति-वे देखेंगे
म.पु. पासिहिाल-तूं देखेगा पासिहिह - तुम देखोगे
उ. पु. पासिहिम-मैं देगा पासिहिमो-हम देखेंगे
इस अवस्था में "कर"को "का” होजाता है, जैसे
"काहिइ,,-वह करेगा "काहिसि" तूं करेगा ॥
प्रथम पुरुष के एक वचन के रूपों में, हि और इ, इन
दोनों के स्थान में "ही"भी होजाता है जैसे - "काहिइ" के
स्थान में "काही" बन गया है, "कर" धातु का निपात सिद्ध
रूप, जैसे-करिस्सं करिष्यामि (मैं करूंगा) होता है। इसी
प्रकार “वय" (बोलना) धातु का निपात सिद्ध रूप है-चोच्छं-
(वक्ष्यामि में बोलूंगा ॥
आज्ञाकारी क्रिया [ कर्त्तवाच्य]
पास-देखना
एकचन
वहुवचन
प्र. पु. पासड बह देखे । पासंतु-वे देखें।
पास, पासाहि-तृ देख । पासह - तुम देखो।
पासामु मैं देखू ।
पासामो- हम देखें।
म.
उ.
कर-करना
प्र. पु. करेउ-बह करे।
म., करहि-तुं कर ।
२.,, करमु-मैं करूं।
करंतु-वे करें।
करह-तुम करो।
करेमो-हम करें।

[ ६५ ]
मध्यम पुरुष एकवचन में "हि" के स्थान में "" भी
हो जाता है यथा-"कहाँ' (कथय) तू कह ?
पास-धातु के कुछ अन्य रूप
बहुवचन
प्र.-पासेजा, पासिज्जा वह देखे पासेन्जा, पासिजा-वे देने
म.-पासेजा, पासिज्जा-तू देख पासेन्जासि, पासिनासि-
एकवचन
तुम देखो ?
.
उ.-पासिजा, पासेजा मैं देखू पासेन्जा, पासिजा-हम देखें
प्रेरणार्थक क्रिया के रूपों का दिग्दर्शन
को वह करता है, इसकी प्रेरणार्थक क्रिया है, करावेद-वह
करवाता है, कल्पकह काटता है, पवेत्रह करवाता है,
इत्यादि प्रेरणार्थक क्रियाओं के रूप भी जान लेने चाहिएँ ॥
वाक्य संग्रह
अहं गामे गच्छामि, धम्मोवएसं करिस्सामि । समणस्स
नायपुत्तस्स पवयणं सीसे भणावेमि, समणेण भगवया महा-
वीरेण अहिंसा धम्मो जगम्मि पयासिओ। कुमारपालोभूवई
परम धम्मिओ आसी। पुज्ज अमर सिंघो पंचाल ठाणगवासी
जहण संघस्स पसिद्धो आयारओ होत्था। हिंशा भगवया
निसेहिया, पदिसेहिया । दाणी अम्हेहिं अरिहंत भगवओ
सिद्धतस्स सम्वत्थ पयारो करियन्यो । सब्येसु धम्मसत्येसु
अहिंसा भगवीए महिमा गीया,

पायय भासाए पत्त लेहण विही [प्राकृत भाषा में पत्र लिखने की विधि ] सीसं पड़ गुरुणो पर्व- पिय ! आउसं! पवित्त चरित्त, चिरजीवी भव । : .. तुम्हाणं भित्तियुत् पेम पत्तं . आगयं तं . पढिऊण सव्य समायारे नच्चा हं. परम पसन्नो जाओ, तव परिस्समं दटुं हं कहेमि? भवं अवस्स मेव सय कवनाए समुत्तिएणो भविस्सह 'तहावि भवं अभासे पमायं मा करेज्जा सज्झायओ विज्जा सफला भवइ, सय कुसल समायारो.. दायब्बों तब सुहाकंक्खी जिणेसरदासा- अझावयो . गुरुं पह सीसस्स पत्तं-गुरुकैप्रति शिप्यका पत्र] सिरिमंतेमु. पुज्जवरेसु, विजाबुढेसु, सब गुण संपन्नेमु ! मुहो मुहो नमोकारं करेमि, भंते ! भवयाणं कियापत्तमागयं तं वायइत्ता मे हियए परमाणंदो संजाओ, भवयाणं किवाओ हं सय कक्खाए पढमके समुत्तिण्णोम्हि, मे आसीस वायाउ मे विजा सफली भविस्सह इअहं पासासे, ओस वासरे भवयाणं चलण कमलाणं संफांसं अवस्स मेव करिम्सामि, सय कक्खाए सव्वं उदंतं भवयाणं सम्मुहे उवागम्म निवेदिस्सामि, दंसणेण च संतत्त हिययं संतं

(..६७ .).
."
करिस्लामि, भवयाणं उवयारो कयाइवि न विसरिस्सामि
सिरिमन्ताणं किवाकंक्खी।
देवेन्द कुमारो
"मित्तंपइ मित्तस्स पतं-
[मित्र के प्रति मित्र का पत्र]
पिय, सव्वगुणलंकआ 1: विणयाइ गुण संपन्ना ! नमोत्थु ।
भवयाणं पेमपत्र वायइत्ता हं परम प्पसनो जाओ । एस्थ कुसल
मत्थि, तुम्ह केरं कुसलं इच्छामि, नवरं, पत्तस्स उदंतं नाऊण
विम्हियोमि । वयस्स ! सयायारो नं कयावि जहिअवो वयं
एगी भूय धम्मस्त पयार करेजा जओ जणा धम्मस्स अभिलासं
कुव्वति । एसा ममइच्छा वट्टइ । किं भवओ वि रोयए ?
पिय ! मम एसोवि वियारो अत्थि -"वयं मिलिइत्ता पायय
पाठसालाए जिण सस्थाणं अज्झयणं करेमो । दाणी मे निवासो
पत्थ न भविस्सइ, सिरीमंतस्स पर पेच्छ अहं सय कजस्स
पिच्छयं करिस्सामि परं खिप्य पेसणिज्ज ?. .
तुम्हकेरो-सुहिय-धनपालो
इइ.समत्ता पायय बालमनोरमा

गुरुपसत्थी
नाय सुश्री बद्धमाणो, नाय सुओ महामुणी।
लोगे तित्थयरो आस्त, अपच्छिमो सिकरो ॥
सतित्येठविओ तेण, पदमो अणुसासगो।
सुहम्मो गण हरो नाम, तेअंसी सम णिचओ ॥
तत्तोपट्टिो गच्छो, सोहम्मो नाम विस्सुओ ।
परंपराए तस्थासी, सूरी चामर सिंघओ ॥
तस्स संतस्स दंतस्त, मोतीरामाभिहोमुणी ।
होत्थ सीसो महापन्नो, गणिपय विभूसिओ ॥
तस्स पट्टे महाथेरो, गणावच्छेअगो गुणी।
गणपति सन्निओ साह, सामण्ण गुण सोहिओ ॥
तस्स सीसी मुरु भत्तो, सो जयरामदासो ।
गणावच्छेयगो अस्थि, समो मुत्तोव्य सासणे ॥
तस्स सीसो सच्च संघो, पवट्टग पयंकियो।
सानिग्गामो महा भिक्खू, पावयणी धुरंधरो॥
तरसंते वासिणा पसा, अप्पारामेण भिक्खुणा ।
उबझाय पयंकणं, वालाणं मुह हेचते ॥
निम्मि या लहु भूयेयं, पागय वाल मनोरमा ||
आगि गह अंक चंदेमु, विक्कमद्देसु पूरियां ।
रावलपिंडी नयरे, सावग संघ समाउले ।।

Pali Prakart Vaykaran

Author
Motilal Banarasidass
Title
Pali Prakart Vaykaran
File name
Pali Prakart Vaykaran
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2012/02/01
Publisher
Kashi, Sanskrit Hindi Book
Language
Sanskrit
Pages
151
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
407845
Barcode
99999990071069.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
DoJAfdwp570
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