Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Vaman Purana Khand-ii

Sharma,pt.shriram · 2012/08

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दो शब्द 'वामन पुराण' के द्वितीय खण्ड मे दैत्यवंश के पूर्व पुरुषो को फपाएं मुख्यरूप से कही गई। पिस प्रकार 'मोगवादी' असुरगण आरम्भ में 'तपस्या' करके देव शक्तियों (शिव, ब्रह्मा आदि) से वरदान प्राप्त करते थे और फिर संसार का आधिपत्य प्राप्त करने के लिए देवताग्रो के साय संघर्ष करने लगते । यद्यपि भारतीय-धर्म के अनुयायी अध्यात्म- पादियों ने 'देवासुर संग्राम' की कथाओ को सात्विक और तामसिक शक्तियो का मधपं माना है, पर पुराणकारो ने उनको बडे बडे उपा- ख्यानो का रूप देकर ऐसी रोचक कथायें लिखी हैं कि श्रोतागण उन्हे वही संलग्नता से सुनते हैं और उनसे धर्म को महत्ता और अधर्म के नाश की शिक्षा ग्रहण करते हैं । जैसा हमने इस खण्ड के अन्त में दिये गये 'उप- सहार' में ,यसलाया है इन क्याभो मे अवश्य ही कल्पना का बहुत अधिक पुट है, तो भी उनका सूत्र कुछ वैदिक वर्णनो और कुछ ऐतिहा- सिक घटनामो से लिया गया है । जंसा हम अन्यत्र लिख चुके हैं किसी समय यहाँ के निवासी समुद्र पार मेसोपोटामिया मादि के प्रदेशो को 'पाताल लोक' की तरह मानते थे और वहां के रहने वालों को असुर कहा गया था। वे असुर समय-समय पर मारतवर्ष पर आक्रमण करके यहाँ अपना राज्य स्थापित करने की चेष्टा दिया करते थे, पर कुछ समय पश्चात उनको पराजित होकर फिर अपने मूल देश को ही वापस चला जाना पडता या । इस प्रकार की घटनाओ मे सबसे अन्तिम घटना बलि राजा की हुई जिसको 'वामन देव' ने पराभूत करके स्थायी रूप से 'पाताल में ही रहने का आदेश दिया। चाहे ये पटनायें देश के एक माग मे ही सीमित रही हो, पर उनकी चर्चा दूर-दूर तक फलो और जिस प्रकार ऐसे मौखिक वयोपरयन परिवर्तित होते-होते एक नया ही रूप धारण कर लेते हैं उमी प्रकार उस समय ये 'कपाकारों ने इसमें वीर, मृगार, अद्भुत रसो का समावेश परके एक नहीं पचासों उपाख्यान रच डाले। 'वामन पुराग' के इस ( ४ ) द्वितीय खण्ड में शुम्भ-निशुम्भ, पण्ड-मुण्ड, महिषासुर, तारप, मुर, अन्धक आदि अनेक असुर वीरों के आध्यान समन्वित किये गये हैं । इन सबका सम्पर्क बिलि-दामन उपाध्यात रो इस आधार पर जोड़ा गया है कि राजा बलि जिस देत्यवश का सम्राट था, वे समस्त असुर गण उसके पूर्वज थे । महिपासुर, शुम्भ-निशुम्म आदि के उपाख्यान हो 'दुर्गा सप्त शती' और 'देवो भागवत' आदि मे बहुत विस्तार पूर्वक गएम पिये गये हैं । अन्य सब पुराणों में भी, विशेष कर पांव पुराण में उनका वर्णन पर्याप्त पाया जाता है ! प्रकार का वर्णन किसी ने संक्षेप में और किसी ने बहुत विस्तार के साथ किया है, पर मब में यही दर्शाया गया है कि जब कोई नृपति या अधिपति अहकार से भर भाता है अपवा अनीति पर उतारू होजाता है तो उसका पतन अवश्यम्भावी होता है । इस प्रकार की शिक्षा को मनुष्य मात्र के लिए कल्याणकारी ही कहा जायगा। यदि लोग इसका अनुसरण करें तो ससार मे से से झगड़े कलह और कष्ट कम हो सकते हैं। दयो का जो वर्णन पुराणों में किया गया है, उससे वै राक्षास अथवा रक्त-पिपासु नहीं जान पडते, वरन् पुराणकारी ने उनके नगरों, मलो और रहन-सहन का जो वर्णन किया है उससे ऊंचे दर्जे के शासक, कलाप्रेमी और मुसस्कृत मनुष्य प्रतीत होते हैं । वे लोग समुद्र में मौका चलाने में निपुण थे, इस लिये दूर-दूर जाकर अपनी शक्ति से धन- सम्पत्ति को एकत्र कर लाते थे। अगर उनमे कोई दोप था तो यही कि उनको अपनी शक्ति और सत्ता का अहकार बहुन जल्दी हो जाता था जिससे वे दूसरों के अधिकारों पर हस्तक्षेप करके सर्वोच्च पदवी को हो मिलापा करने लगते थे। इसी कारण आर्य जाति के नेताओं (देवताओ) से उनका समर्प हो जाता था और अन्त मे विष्णु भगवान या इन्द्र द्वारा उनको पराभूत किया जाता था। इससे हम यह भी अनुमान कर सकते हैं कि दैत्य, अमुरं अथवा राक्षसों को पिसी एक पास जाति का मानना आवश्यक नहीं है। वरन् पुराणा की दृष्टि से तो जो लोग धर्म के विरुद्ध आचरण करते थे, अथवा जो वैदिक कर्मकाण्ड के विरोधी होते थे वे सब दैत्य, असुर आदि थे। 'कल्कि पुराण' मैं तो इसी कारण वौद्ध, जैन आदि सभी अवैदिक सम्प्रदाय वालों को देस्यों के रूप में चित्रित किया है। इतना तो हम भी कह सकते हैं कि जो लोग सात्विक प्रवृतियों को त्याग कर राजसी और विशेष कर तामसी प्रवृत्तियों में संलग्न रहते हैं वे दैश्य या मसुर ही हैं । तामस प्रवृत्तिया हर हालत में व्यक्ति और समाज के लिए पतनकारी होती हैं । चाहे उनके कारण धन वैभव और सुख साधनों को कितनी भी वृद्धि होजाय पर उससे मनुष्य का मानसिक क्षेत्र क्लुपित और सकीणं होने लग जाता है । इसका अन्तिम परिणाम स्वार्थपूर्ण सघर्ष ही होता है । उस दृष्टि से हम असुरों और देवी (देवताओं की संगठित शक्ति) के युद्धों को शिक्षाप्रद ही कह सकते हैं, चाहे उनमें वास्तविकता का अंश अत्यल्प हो और वे सृष्टि निर्माण और विकास की घटनाओं के आधार कल्पना प्रसूत हों। 'वामन पुराण' में बलि के यम में वामन देव ने आगमन और तीन पग भूमि का दान मागकर उसे पाताल लोक से मावद्ध कर देने को कथा दो बार वर्णन की गई है । एक बार ३१वें अध्याय मे और दूसरी ६०वें अध्याय मे | कथानक बिल्कुल एक है, पर वे अलग-अलग लेखकों की रचना प्रतीत होती हैं । इसी प्रकार महिषासुर को कथा भी दो बार दी गई है। इस तरह की पुनरावृत्तियां पुराणों में अनेक स्थानों पर मिलती रहती हैं। दो अलग-अलग पुराणों में तो कितने वर्णन ऐसे दिखाई दे जाते हैं जिनको घटनायें ही नहीं भाषा भी पूरी तरह या अधि- कांश मे एक ही होती है । श्राद्ध वर्णन के अध्यायों में यह बात प्राय: देखने में आती है। पुराणों के कथानायक इसका जाने क्या बतलाते होंगे, पर हमारा अनुमान यही है कि विभिन्न कया- वाचक समय-समय पर इनमें अपनी रुचि के अनुसार जोड़-तोड करते रहते थे । 'वामन-बलि' का जो चरित्र आरम्भ के अध्यायों में वर्णन किया गया और वह किसी अन्य स्थावाचक को कम पसन्द आया तोउन्होंने अपनी रुचि के अनुसार उसे नये रूप में लिख कर अपनी पुस्तक के अन्दर रख कारण न ६ 1 1 . लिया और अपने थोताओ को उसी को सुनाने लगे। कुछ समय में उनके साथी अन्य कथावान्त्रक भी उसे सुगो लगे और कुछ वर्षों के भीतर धीरे धीरे वह वास्तव मे शास्त्र का अग बन गया। इस प्रकार के मिलते-जुलते वर्णन 'वामन पुगण' में इनक सिवा और भी पई स्थानो. पर हैं। अन्य पुराणो मे से हमने ऐसी पुनरावृत्तियों को प्राय, अलग, पर दिया है पर वामन पुराण पहले ही छोदा था, इस कारण इसको ज्यो का त्यों पूरा छापने की योजना बना ली गई थी। अब इसमे से किती कारण वश तीन छोटे-छोटे वर्णन छूट गये हैं, बाकी पूरा पुराण जैसे का तंसा, दिया गया है। अन्य के अन्त मे अन्य महत्वपूर्ण न थो से बलि-वामन उपाख्यान के विभिन्न विवरण भी एकत्रित करके प्रकाशित कर दिये है। आशा है इससे इसकी उपयोगिता अधिक बढ जायगी और पाठक इसका, मनन करके लाभ उठायेंगे। S -श्रीराम शर्मा आचार्य विषय सूची ६ २० ३२ ४६ € 5७ ५३ गौरी विवाह वर्णन ५४ विनायकोत्पत्ति वर्णन ५५ चण्ड मुण्ड वध वर्णन १५६ शुम्भ निशुम्भ वध वर्णन ५७ कार्तिकेय उत्पत्ति वर्णन १८ महिपासुर नारक उपाख्यान वर्णन ५६ अन्धकासुर पराजय वर्णन ६० मुर दानव चरिंन तथा भैरव प्रादुर्भाव ६१ मुर दानव वध वर्णन ६२ विष्णु-हृदय मे शिव दर्शन ६३ अन्धक प्रह्लाद सवाद वर्णन '६४ जावालि मोचन वर्णन ६५ चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ६६ दण्ड का भस्म होना ६७ सदाशिव दर्शन वणन ६८ अन्धक संन्य पराजय वर्णन ६६ जम्भ कुजम्म वध वर्णन ७० अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन ७१ मरुत उत्पत्ति वर्णन (1) ७२ मरुत उत्पत्ति वर्णन (२) ७३ वामन प्रादुर्भार तया पालनमि पध ८४ वलि वारणादि युद्ध तथा दैत्य विजय वर्णन ७५ वलि वैभव वर्णन ७८ अदिति वर प्रदान वणन १०८ १२१ १३० १४३ १५६ १८१ १८२ १६७ २०८ २२७ २४२ २४८ २६१ २७१ २७८ २८७ --

३०५
३२०
३३६
२४५
३५६
७७ अलि शिक्षादान वर्णन
७८ धु-धु पराजय वर्णन
७६ पुरूरवस उपाख्यान वर्णन
८. निक्षत्र पुरुष पूजा विधान वर्णन
८१ जलोद्भव वध वर्णन
५२ श्रीदाम चरित्र वर्णन
८३ प्रल्हाद का तीर्थयात्रा वर्णन (1)
८४ प्रह्लाद का तीर्थयात्रा वर्णन (२)
८५ गजेन्द्र माक्ष वर्णन
५६ सारस्वत स्तोत्र वर्णन
नामन जन्म वर्णन
८८ धामन भगवान का स्वस्थान कथन वर्णन
६ शुक-वलि सवाद वर्णन
१० बलि वधन वर्णन
६१ भगवत् प्रशसा
१२ नारद पुलस्त्य सवाद
उपमहार
३७१
४०६
४२६
.
४५९
४६८

वामन पुराण
(द्वितीय खरात)
५३-गौरी विवाह-वर्णन
समागतान्मुरान्दृष्ट्वा नन्दिराड्यातवान्विभोः ।
अयोत्याय हरि भक्त्या परिष्वज्य न्यपीडयत् ।।१
ब्रह्माणं शिरसा नत्वा समाभाष्य शेतकतुम् ।
आलोक्यान्यान्सुरगणान्संभावयत्स शंकरः ।।२
गणाश्च जय देवेति वीरभद्रपुरोगमाः।
शैवाः पाशुपताद्याश्च दिविशुर्मन्दराचलम् ।।३
ततस्तस्मान्महाशैलं कलासं सह देवत।।
जगाम भगवाञ्व: कतुं वैवाहिकं विधिम् ॥४
ततस्तस्मिन्महाशैले देवमातादितिः शुमा ।
सुरभिः सुरमा चान्याश्चक मण्डनमाकुलाः ॥५
महास्थि शेखरी चारुरोचनातिलको हरः।
सिंहाजिनी चातिनीलभुजंगकृतकुण्डला॥६
महाहिरत्नवलयहारकेयूरनूपुरः ।
समुन्नतजटाभारो वृषभस्यो विराजते ७
महर्षि पुलस्त्य ने कहा-वहां पर समागठ हुए सुरों को देखकर
नन्दी ने विमु से कहा था। इसके बनन्तर भगवान हर ने उठ कर हरि

१० ] [ वामन पुराण को भक्तिभाव से मिलकर निपीड़ित दिया था ॥१॥ फिर ब्रह्माजी को शिर टेक कर प्रणाम किया और इन्द्रदेव से सम्मापण किया था और अन्य सभी सुरगणो को देखकर शंकर ने उन का भी ममादर किया था ॥२॥ वीरभद्र जिनका नायक थे वे सभी गण 'जयदेव'-ऐमा कहते हुए वहा पर मन्दराचल में प्रविष्ट हुए थे, उनमे शेष तथा पाशुपत यादि सभी थे ॥३॥ इसके उपरान्त उमसे महान शेल कैलास पर भगवान् श कर समस्त देवगणों के सहित वाहिक विधि को सम्पन्न करने के लिये चले गये थे ।।४। इसके पश्चात् उस महान् शल पर परम गुमा देवमाता अदिति-सुरभि, सुरमा और अन्यो ने समाकुल होकर मण्डन किया था ॥२॥ महान् अस्थि शेखर वाले-चारु, रोचना के तिलक से समन्वित हर को किया गया था। सिंह के चर्म से मण्डित और अत्यन्त नीले भुजगो मे कुण्डलो की रचना वाले उनको बनाया था। ॥६॥ महान् जो सर्प थे उनके रत्नों के वलय-केयूर और नूपुर बनाये गये थे । समुन्नत बटाओं के भार से सयुत वृषम पर विराजमान शकर अत्यन्त शोभित हो रहे थे ॥७॥ तस्याग्रतो गणाः स्वः स्वरारूढा यान्ति वाहनः । देवाश्च पृष्ठतो जग्मुर्हताशनपुरोगमाः ॥८ वैनतेय समारूढः सह लक्ष्म्या जनार्दनः । प्रयाति देवपाश्वंस्थो हसेन च पितामहः ।। गजाधिरढो देवेन्द्रश्छल शुक्लपट विभोः । धारयामास वितत सहेन्द्राण्या सहस्रधृक् ।।१० यमुना सरिता श्रेष्ठा वालव्यजनमुत्तमम् । श्वेत प्रगृह्य हस्तेन कच्छपे सस्थिता ययौ ।।११ हसकुन्देन्दुसङ्काशं वालव्यजनमुत्तमम् । सरस्वतीसरिन्छष्ठा गजान्दा समादधे ॥१२ प्रातयः पट् समावाय कुसुम गन्धसयुतम् । पञ्चवर्ण महेशार्थे जग्मुस्ते कामचारिणः ।।१३ गौरी विवाह वर्णन ] [ ११ मत्तमरावतनिभं गजमारुह्य वेगवान् । अनुलेपनमादाय ययौ तत्र पृथूदकः ॥१४ उनके आगे समस्त गण अपने-अपने वाहनों के द्वारा समारूढ हो कर जारहे थे। हुनाशन ( अग्नि ) जिनमे अग्रगामो थे ऐसे सब देवगण भी पीछे २ जारहे थे । लक्ष्मी के साथ गरुड पर ममारून होकर भगवान् जनार्दन तथा हम पर स्थित पितामह भी देवो के पार्श्व भाग में चले जारहे थे ॥ गजेन्द्र पर स्थित देवेन्द्र थे जिनका शुक्न पर वाला छत्र था जिमको धारण कर रखा था। ऐसे इन्द्र देव भी जिनके सहस नेत्र थे इन्द्राणी के साथ में थे ॥१०॥ मरिताओं मे परम श्रेष्ठ यमुना उत्तम बाल व्यजन जो श्वेत था हाथ से ग्रहण करके कच्छप पर समारूढ होकर जा रही थी ॥११॥ हंस, कुन्द, इन्दु के समान परमो. त्तम बाल व्यजन ग्रहण कर मरिताओं में श्रेष्ठ सरस्वती गज पर समारूढ थी ।।१२॥ छ ऋनुऐं भी पाच वर्णों वाले गन्ध से युक्त कुसुमों को लेकर महेश के लिये कामचारी होती हुई साथ में गई थी ॥१३॥ पृयूदक तीर्य ऐरावत के तुल्य मत हायो पर समारूढ होकर देगयुक्त अनुलेपन लेकर वहां पर शकर की वरयात्रा में गया था॥१४॥ गन्धर्वास्तुम्बरुमुखा गायन्तो मधुरस्वरम् । अनुजग्मुर्महादेवं वादयन्तश्च किनराः॥१५ नृत्यन्त्यप्सरसश्चय स्तुवन्तो मुनयश्च तम् । गन्धर्वा यान्ति देवेशं त्रिणेत्र शूलपाणिनम् ।।१६ एकादश तथा कोटयो रुद्राणां तत्र व ययुः । द्वादशैवादितेयानामष्टौ कोटयो वसूनपि ॥१७ सप्तपष्टिस्तथा कोटयो गणानामृषिसत्तमाः। चतुर्विशत्तदा जग्मुर्गणानामूर्ध्वरेतसाम् ॥१८ असख्यातानि यूथानि यक्षकिन्नररक्षसाम् । अनुजग्मुर्महेशानं विवाहाय समाकुलाः ।।१६ ततः क्षणेन देवेशः क्ष्माधराधिपतेस्तलम् । संप्राप्तश्चगमञ्छला: कुञ्जरस्थाः समन्ततः ।।२० १२ ] [ वामन पुराण ततो ननाम भगांत्रिणेत्र: स्थावराधिपम् । शैलाः प्रणेमुरीशानं ततोऽसौ मुदितोऽभवत् ।।२१ (तुम्बा प्रमुख गन्धर्व मधुर स्वर से गायन करते हुए तथा वितर- गय वाद्यो का वादन करते हुए महादेव के पीछे २ जारहे थे ॥१५॥ अमराऐ नृत्य करती हुई जा रही थी और मुनिगण स्तवन करते हुए गमन कर रहे थे ।) त्रिनेत्र भगवान् शूनपाणि के साथ गन्धर्व भी के ।।१६।। वहा पर उस वर यात्रा मे एकादश करोड रुद्र थे । बारहो आदित्य और आठ करोड वसुगण थे ॥१७॥ हे मृपि मत्तमो इस तरह मे सडसठ करोड गण थे। ऊर्वरेता गण चौबीस करोड थे ॥१८॥ यक्ष, किनर और राक्षमो के यूथ तो इतने थे कि उनकी कोई सख्या ही नहीं थी । सभी लोग महेश्वर के पीछे २ जारहे थे जोकि श कर के विवाह देखने के लिये परम समाकुल हो रहे थे ।।१६। इसके पश्चात् थोडी ही देर मे भूमिघरों के अधिपति के तल मे देवेश्वर प्राप्त होगये थे और मुञरस्थ समस्त शैल चारो ओर से वहा आगये थे।२०।। इसके उपरान्त भगवान् त्रिनेत्र ने स्थावरो के स्वामी को प्रणाम किया था। सब शैलों ने ईशान को प्रणाम किया था। इसके बाद में वह बहुत प्रसन्न हुए थे ॥२१॥ समं सुरैः पार्षदैश्च विवेश वृपकेतनः । नन्दिना दशिते मार्गे शैलराजपुर महत् ॥२२ जीमूतकेतुरायात इत्येव नगरस्त्रियः । निजकर्म परित्यज्य दर्शनायाहताभवन् ।। माल्यदाम समादाय करेणकेन भामिनी । केशपात द्वितीयेन शकराभिमुखी गता ॥२४ अन्याऽलक्तकरागाढयं पादं कृत्वाऽऽकुलेक्षणा। अनलक्तकमेक हि हर द्रष्ट मुपागता ।।२५ एवेनाक्षणाऽजितेनैव श्रुत्वा भीममुपागतम् । साजना च प्रगृहान्या शलाका सुष्ठु धावति ॥२६ गौरो विवाह वर्णन ] [ १३ अन्या सरशनं वास. पारि नाऽऽदाय सुन्दरी । उन्मत्त वागमनग्नर हरदर्शनलालसा ।।२७ अन्याऽतिक्रान्तमीशानं श्रुत्वा स्तनमरालसा। मनिन्दत कुचो वाला यौवनं स्व कृशोदरी ॥२८ फिर सब सुरगण और पापं दो के सहित भगवान् वृषकेतन ने प्रवेश किया था। नन्दो ने मार्ग का प्रदर्शन बराया था सो माग से विमाल श लराज के पुर में शिव ने प्रवेश किया ।।२२।। जीमूतक्तु प्रभु सागये हैं-इसी कारण से नगर की नारियां अपना सब कायं छोड़कर उनके दर्शन करने के लिये आदृत होगई थी ।।२३।। उनमे एक भामिनी हाप में माला को होरी लेकर और दूमरे हाथ से अपन केशपाश को सम्हालती हुई शकर के सामने हुई थी ॥२४॥ अन्य नारी अलक्तक के राग से सयुक्त पाद को करके बहुत ही समाकुलित होती हुई दूसरे चरण पर अलक्तक नहीं लगा कर ही हर को देखने के लिये वही आगई थी ॥२५॥ तीसरी ललना एक ही नेन में अजन डालकर से ही उसने सुना दूसरे नेन को अजन रहित ही छोडकर वेग से वहा उपस्थित हो गई थी। उमरे हाथ में अञ्जन की शलाई भरी हुई लगी हुई थी मोर विना ही अञ्जन डाले दौडतो आ रही थी ॥२६॥ अन्य सुन्दरी रसना के सहित वस्ल को हाथ में लेकर उन्मत्त की भांति नग्न ही हरदर्शन लालसा से वही चली आई पी ॥२७॥ अन्या भामिनी हर को अतिक्रान्त हुए सुनकर स्तनो के भार से अत्यन्न यालस्य में मरी हुई कृशोदरी वाला अपने यौवन और उस यौवन मे बढे हुए भारी स्तनो को निन्दा कर रही पी क्योंकि उन्हीं के कारण से वह शीघ्र गामिनी न हो सकी पी ॥२८॥ इत्थ स नागरस्त्रीणा क्षोम मजनयन्हर । जगाम वृपमारदा दिव्य श्वशुरमन्दिरम् ॥२६ ततः प्रविष्ट असमीक्ष्य शभु शैलेन्द्रवेश्मन्यवला व वन्ति । स्थाने तपो दुश्चरमम्बिकायाश्चीर्ण महानेप सूरस्तु शभु।।३०

१४
[ वामन पुराण
स एप येनाङ्गमनङ्गतां कृतं कन्दर्पनाम्नः कुसुमायुधस्य ।
कतोः क्षयी दक्षविनाशकर्ता भगाक्षिहा शूलधरः पिनाकी॥३१
नमो नम.शंकर शूलपाणे मृगारिचर्माम्बर कालशत्रो।
महाहिहाराङ्कितकुण्डलाय नमो नमः पार्वतिवल्लभाय ॥३२
इत्थ संस्तूयमाना सुरपतिविधृतेना तपत्रेण शंभुः
सिद्ध वन्द्यः सपक्षरहिकृतवलयी चारुभस्मोपलिप्तः ।
असस्थेनाग्रजेन प्रमुदितमनसा विष्णुना चानुगेन
वैवाही मंगलाढया हुतवहसहितामाहरोहाथ वेदीम् ॥३३
आयाति त्रिपुरान्तके सहचर साधं च सप्तपिभिव्यं-
ग्रोऽभूदिगरिराजवेश्मानजन: कन्यासमालकृती।
व्याकुल्य समुपागताश्च गिरयः पूजादिना देवताः
प्रायो व्याकुलिता भवन्ति सुहृदः कन्याविवाहोत्सुकाः ॥३४
प्रसाध्य देवी गिरिजा ततः खियो
दुकूलशुक्लाभिवृतागयष्टिकाम् ।
भ्रात्रा सुनाभेन तदोत्सवे कृते
सा शकराभ्या शमथोपपादिता ॥३५
इस प्रकार से भगवान हर ने वहा नगर की स्त्रियों में बड़ा भारी
क्षोभ समुत्पन्न कर दिया था और वृपम पर समारूढ होकर भगवान
शकर अपने श्वशुर के मन्दिर में प्रविष्ट होगये थे ।।२६। इसके उपरान्त
जब शम्भु ने प्रवेश कर लिया था तो शलेन्द्र के घर में उनको देखकर
सब नारियां आपस में बोल रही थी। अम्बिका का दुश्चर तप उचित
ही था । यह सुर शम्भु तो एक महान् देव हैं ॥३०॥ यह वही देवेश्वर
तो हैं जिनने कन्दर्प नाम वाले कुमुमायुध के मग को नष्ट कर उसे
अनंग बना दिया था । अतु के क्षय करने वाले और दक्ष प्रजापति के
विनाश करने वाले तथा भग के नेत्र के नाशक शूलधारी और पिनाक
धनुप धाले भी यही हैं ॥३१॥ हे शकर ! आपको बारम्बार नमस्कार
है। आप तो शूलपाणि हैं और व्याघ्र पे चर्म के धारण करने वाले तथा
कार से भी सप हैं महद नपा के हार तथा कुण्डलो से विभूषित

गौरी विवाह वर्णन ] [ १५ पार्वती वल्लभ प्रभु के लिये बारम्बार नमस्कार है ॥३२॥ इस प्रकार से सस्तवन किये गये शम्भु जिनका आतपन्न (छत्र ) सुरपति ने लगा रसखा था, मपक्ष सिद्ध गणो के द्वारा वन्यमान होते हुए, सों के वलय धारण करने वाले तथा चारु भस्म मे लेपित अंगो वाले, जिनके आगे मे स्थित अग्रज (ब्रह्मा) थे और पीछे की ओर प्रसन्न मन वाले विष्णु पे, विवाह के समय म पहिनी जाने वाली माला से सयुत होकर अग्नि के सहित वेदी पर आरूढ होगये थे ॥३३॥ वहा त्रिपुरान्तक के आने पर जिसके साथ सनपि सहचर थे गिरिराज के घर में कन्या के समालकरण करने मे जन बहुत व्यग्र हो रहे थे। सभी पर्वत व्याकुलता को प्राप्त हो रहे थे और पूजादि क कार्य से सब देवगण भी व्याकुलित पे तथा समस्त सुहृद्गण कन्या के विवाह सम्पन कराने में उत्सुकता धारण किये हुए थे ।।३४। इसके पश्चात् सभी स्त्रियाँ दुकूल अर्थात् शुक्ल वस्त्र से देवी पार्वती के अगों को समावृत करके गिरिजा का प्रसाधन कर चुकी थी, सुनाम भाई के द्वारा उम उत्सव के किये जाने पर वह पार्वती शकर के समीप में उपस्थित की गई थी ॥३५॥ तत: शुभे हम्यंतले हिरण्मये स्थिता: सुराः शकरकालिचेष्टितम् । पश्यन्तिदेवोऽपि सम कृशाड ग्या' लोकानु जुप्ट पदमामसाद ॥३६ यत्र क्रीडा विचित्रा सकुमुमतरवो वारिणो विन्दुपातैः गन्धाढ्य गन्धपूर्णः प्रविरलमवनी गुण्ठिनी गुण्डिकायाम् । मुक्तादामः प्रकामं हरगिरितनयाकोडनार्थ तदाघ्नन् । पश्चासिन्दूरपुन्जरविरत विततश्चक्रतुःक्ष्मासुरक्ताम् ॥३७ एवं नोडा हर. कृत्वा समं च गिरिवन्यया । आगच्छद्दक्षिणा वेदिमृपिभिा सेविता दृढाम् ।।३८ अयाजगाम हिमवान्शुक्लाम्बरधरः शुचिः । पवित्रपाणिरादाय मधुपर्वमयाकुलम् ॥३६ १६ ] [ वामन पुराण उपविष्टस्त्रियस्तु शाकी दिशमपक्ष्यत । सप्तपिकाश्च शैलेन्द्रः सूपविष्टो विलोरयन् ॥४. सुखासीनस्य शर्वस्य कृताञ्जलिपुटो गिरिः । प्रोवाच वचन श्रीमान्धर्मसाधनमात्मनः ।।४१ इसके उपरान्त परम शुभ हिरण्मय हम्मे तल में स्थित मुरगण भगवान् शकर के काति चेष्टित को देख रहे थे । देव भी मांगी को साथ लोको का अनुसेवन करने के लिये उस स्थान पर प्राप्त होगये थे ॥३६॥ जिस स्थल मे विचित्र प्रकार वारी पुष्पों से समन्वित वृक्ष जल की विन्दुओं के पातों द्वारा क्रोहा कर रहे थे तथा भूमि पर गध पूर्ण चूों के द्वारा कही-कही पर गुण्ठित मुक्ता दामो के द्वारा हर और गरि तनया की कोड के लिये प्रक्षेप किये जारहे थे एवं अविरत वितत सिन्दूर के पुंजो के द्वारा भूमि के भाग को एक दम सरक्त कर दिया था ॥३७॥ इस प्रकार से भगवान हर गिरिकन्या के साथ क्रीडा करके ऋपियो के द्वारा सेवित दृढ दक्षिण वेदी पर चले गये ये ।।३। इसके अनन्तर शुक्ल वस्त्रधारी परम पविन्न होकर वहाँ पर हिमवान् विश द्ध हाय में मधुपर्क लेकर समाकुलित होते हुए आगये थे ॥३६॥ भगवान् त्रिनेत ऐन्द्री दिशा को देख रहे थे । शैलेन्द्र वहा सप्तपियो को देखते हुए उपविष्ट हो गये थे ॥४०॥ सुख सस्थित भगवान शम्भु के आगे हाथ जोडकर श्रीमान् अपनी पारमा के धर्म साधन वाले गिरिराज बोले-॥४१॥ मत्पुत्री भगवनकाली पौत्री च पुलहानजे । पितृणामपि दौहिती प्रतीच्छेमा मयोदिताम् ॥४२ इत्येवमुक्त्वा शैलेन्द्रो हस्त हस्तेन योजयन् । प्रादात्प्रतीच्छ भगवग्निदमुच्चरुदीरयन् ।।४३ न मेऽस्तिमाता न पितातथैव न ज्ञातयोवाऽपिचबान्धवाद्याः। निराप्रयोहगिरिशृङ्गवासीसुताप्रतीच्छामितवाद्रिराज ।।४४ इत्येवमुक्त्वा वरदोऽवपीडयसरवरेणादिकुमारिकायाः । सा चापि सस्पर्शमवाप्य शभो. परा मुद लन्धवती सुरणे ॥४५

गौरी विवाह वर्णन ]
[ १७
तथाऽघिस्टो वरदोऽय वेदि सहाद्रिपुत्र्या मधुपर्कमश्रन् ।
दत्त्वाचलाजान्कलमस्यशुक्लास्ततोविरञ्चोगिरिजामुवाच ह ।।
कालि पश्येशवदनं रमा शशधरप्रभम् ।
समदृष्टिः स्थिरा भूत्वा कुरुष्वाग्नेः प्रदक्षिणाम् ॥४७
ततोऽम्बिका हरमुखे दृष्टे शेत्यमुपागता ।
यथाऽकरश्मिसतप्ता प्राप्य वृष्टिमिवावनी ॥४८
भूयः प्राह विभोर्वक्रमीक्षस्वति पितामहः ।
लज्जया साऽपि दृप्टेति शनव्रह्माणमब्रवीत् ।।४६
हिमवान् ने कहा-हे भगवन् ! मेरी पुत्री काली जो प्रलहाप्रज की
पौत्री है और पितृगणो की दौहिती है इसको आय मेरे द्वारा प्रदान की
हुई को आप ग्रहण कीजिए ॥२४॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-लराज
ने इस प्रकार कहकर पुत्री के हाय को शिव के वर में योजित करते हुए
प्रदान किया था और 'हे भगवन् ! स्वीकार कीजिए' -यह कचे स्वर
से कहा था ॥४३॥ भगवान् हरने कहा-है अद्विराज ! मेरी कोई माता
नहीं है और न कोई पिता ही है तथा शानि के लोग और वान्धव आदि
भी मेरे कोई नहीं हैं ! मैं तो एक विना हो मापय वाला
और गिरि की चोटी पर निवास करने वाला हूँ। मैं इस
आपकी पुत्री को ग्रहण करता हूँ॥४४॥ इस प्रकार से कहते हुए वरद
ने अपने कर से उस आदि कुमारिका के करका पीडन किया था। वह
भी मम्मु के करका सस्पर्श पाकर हे मुर ! परम प्रसन्नता को प्राप्त हुई
पो॥४५॥इसक उपरान्त वह घरद प्रभु यहिराज की पुत्री के साथ वेदी
पर अधिरूद हुए थे और मधुपर्क ना अशन कर रहे थे। इसके अनन्तर
भगवान् ब्रह्मा शुक्न लाजामओ (सोलो) को ग्रहण र गिरिजा से बोले
॥४६॥ है कालि ! चन्द्र के समान प्रभा से युक्त परम सुन्दर ईश के
मुख को देखिए और समदृष्टि वाली स्थिर हाकर अब पाप अग्नि की
प्रदक्षिगा परो॥१७॥ इसके पश्चात अम्बिका ने हर मुम पर दृष्टिगली
वो शस्य से प्राप्त होगई थी जिस तरह मूर्य की उन किरणों से
उस भूमि वृष्टि को प्राप्त र शीतल तम हो जाया करती है ॥४॥

१८ ] [ वामन पुराण पितामह ने पुन: कहा-शम्भु के मुख को देखो । तब लज्जा से जगदम्बा ने धीरे से ब्रह्माजी से कहा-मैंने देख लिया है ॥४६॥ समं गिरिजया तेन हुताशस्त्रिः प्रदक्षिणम् । कृतो लाजाश्व हविपा सम क्षिप्ता हुताशने ॥५० ततो हाधिर्मालिया गृहीतो दायकारणात् । कि याचसे ते दास्यामि मुञ्चस्वेति हरोऽब्रवीत् ॥५१ मालिनी शंकर प्राह मत्सख्या देहि शङ्कर । सौभाग्य निजगोत्रीय ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥५२। अथोवाच महादेवो दत्तं मालिनि मुञ्च माम् । सौभाग्यं निजगोत्रीय योऽस्यास्त शृणुवच्मि ते ।।५३ योऽसो पीताम्बरधर शङखधृङ, मधुसूदनः । एतदीय हि सौभाग्यं दत्त मद्गोत्रमेव हि ॥५४ इत्येवमुक्ते वचने प्रमुमोच वृपध्वजम् । मालिनी निजगोत्रस्य शुभचारिखमालिनी ॥५५ यदा हरो हि मालिन्या गृहीतश्चरणे शुभे । तदा कालीमुय ब्रह्मा ददर्श शशिनोऽधिकम् ॥५६ इसके पश्चात् शम्भु ने गिरिजा के साथ अग्नि की तीन परिक्रमा की पी और हदि के साथ लाजाओका प्रक्षेप अग्नि में किया गया था ॥५०॥ इसके पश्चात् भालिनी ने भगवान् हर का घरण दाय कारण से ग्रहण पर लिया था हर ने कहा-या मांगती हो, कहो,मैं दूंगा विन्तु मेरा परण टाहो ॥५१॥ मालिनी ने शम्भु से कहा-हे शकर ! पापा मेरो गणो को निजगोत्रीय मौभाग्य प्रदान कीजिए तभी मैं परप पा रयाग शगी ॥५२॥ तर महादेव ने कहा-हे मालिनि ! मने दे दिया पर मेरा परण छोर दो । मैंने निजगोत्रीय मौमाय दे दिया है । से इसरा सौमाप है उग धान रो, मैं बनाता है ॥५३॥ जो यह पीताम्बर सारी मंस पहनने वाले मणमूदन है। मेरे गोत्र । इनका ही दिया हासोमाय ॥५४ाग वचन रहने पर मनै वृप पत्र गौरी विवाह वर्णन ] [ १० छोड दिया था । मालिनी निजगोत्र की शुम चारित्र मालिनी थी ॥५५।। जव हर का शुभ चरण मालिनी के द्वारा ग्रहण किया गया था उस समय मै ब्रह्माजी ने काली के मुख को चन्द्रमा से भी अधिक सुरम्य देखा था ॥५६॥ तदृष्ट्वा मोहमगमच्छुकच्युतिमवाप च। तच्छुक वालुकाया च खिलीचक्र ससाध्वसः ॥५७ ततोऽब्रवीद्धरो ब्रह्मन द्विजान्हन्तुमर्हसि । अमी महर्पयो धन्या वालखिल्याः पितामह ।।५८ ततो महेशवाक्यान्ते समुत्तस्थुस्तपस्विनः । अष्टाशीतिसहस्राणि वालखिल्या इति स्मृताः ॥५६ ततो विवाहे निवृत्त प्रविष्टः कौतुक हरः। रेमे सहोमया रात्रि प्रभाते पुनरुत्थितः ।।६० ततोऽद्रिपुत्री समवाप्य शभुः सर्वैः समं भूतगणश्च हृष्टः । संपूजितः पर्वतपार्थिवेन स्वमन्दिर शीघ्रमुपाजगाम ॥६१ तत: सुरान्ब्रह्महरीन्द्रमुख्यान्प्रणम्य संपूज्य यथाविभागम् । विसृज्य भूतैःसहितो महीघ्रमध्यायसन्मन्दरमष्टमूर्तिः ॥६२ ब्रह्माजी को जगदम्बा का परम सुन्दर मुख देखते ही मोह हुआ और वीर्य को च्युति होगई । उस वीर्य को भयुक्त होकर वहीं पर वालुका में मिला दिया था ।।५७|| इसके पश्चात् हर ने कहा है ब्रह्मन् ! हे पितामह ! आप इन हिजो को मारने के योग्य नहीं हैं । ये महर्षिगण परम धन्य हैं और ये बालखिल्य नामधारी हैं ॥५८॥ इसके उपरान्त महेस्वर के दाक्य के अन्त मे वे तपस्वी गण उठकर खड़े होगये घे । वे अट्ठासी सहस्र संख्या में थे जो वाल्य खिल्य नाम से पुकारे गये थे ॥५६॥ इसके अनन्तर विवाह के सम्पन्न हो जाने पर हर ने कौतुक मे प्रदेश दिया था। उमा के साथ रात्रि में रमण दिया था और प्रात.काल में पुन: समुत्थित हुए थे ॥६०॥ तव तो भगवान शम्भु समस्त भूवगणों के साय दराज की पुत्री को प्राप्त कर परम प्रसन्नता को प्राप्त हो गये थे। पर्वतराज के द्वारा भलीभांति पूजित होकर भगवान् शंकर शीघ्र

२० ।
[ वामन पुराण
ही अपने मन्दिर में आ गये थे ॥६।। इसके उपरान्त अष्टमूत्ति प्रभु ब्रह्मा.
इन्द्र आदि मुख्य देवो को प्रणाम करके और विभाग के अनुसार भली.
भाति पूजन करके भूतो के सहित उन सबको विदा करके अन्दर पर्वत
पर अधिवास किया था ।।६।।
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५४-विनायकोत्पत्ति वर्णन
ततो गिरी वसूत्रु द्रः स्वेच्छया विचरन्मुने ।
विश्वकर्माणमाहूय अवोचत्कुरु मे गृहम् ॥१
ततश्चकार शर्वस्य गृह स्वस्तिकलक्षणम्।
योजनानि चतुःषष्टिः प्रमाणेन हिरण्मयम् ।।२
दन्ततोरणनिव्यूह मुक्ताजालान्तर शुभम् ।
शुद्धस्फटिकसोपान वैडूर्य कृतरूपकम् ॥३
सप्तकक्ष सुविस्तीर्ण सर्व समुदित गुणः ।
ततो देवपतिश्चक यज्ञ गार्हस्थ्यलक्षणम् ।।४
तं पूर्वचरित मार्गमनुयाति स्म शङ्करः ।
तथा सतस्त्रिणेनस्य महान्कालोऽभ्यगान्मुने ।।
रमतासह पार्वत्या धर्मापक्षी जगत्पतिः ।
ततः कदाचिद्ब्रह्मार्थ कालीयुक्ता भवेन हि ॥६
पार्वती मन्युनाऽऽविष्टा शाइर वाक्यमब्रवीत् ।
संरोहतीपुणा विद्ध वनं परशुना हतम् ।
वाचा दुरुक्त वीभत्स न प्ररोहति वाक्क्षतम् ।।७
महर्षि पुलम्मए ने पहा- मुने ! इसके अनन्तर पर्वत पर भगवान
र स्वेच्छा से विचरण करते हुए निवास कर रहे थे । विश्वकर्मा को
घुमाकर उन्होंने उससे पहा-मेरे गृह का निर्माण करो ॥१॥ इसके
पश्चान् विश्वकर्मा ने भगवान शिव के स्पस्तिक लक्षण वाला गृह निमित
रिपा पा को हिरण्मय था और प्रमाण मे चौसठ योजने के विस्तार
वाला पा॥२॥ उम गृह मे ततौरा थे सुथा भुत एभी के जालो से

विनायकोत्पत्ति वर्णन ] [ ૨૧ अन्दर शोभित होरहा था जिसमे शुद्ध स्फटिक मणि के सोपान (सोदिया) यो जिनमें वैडूर्यमणि की भी रचना थी ।।३॥ उम गृह में सात कक्ष थे और वह समस्त गुणो से समुदित एव अत्यधिक विस्तीर्ण था। इसके पश्चात् देवपति ने यहां पर गार्हस्थ्य के लक्षणों वाला यज्ञ किया था ।४। शकर उम पूर्व में चरित मार्ग का अनुमरण कर रहे थे। इस तरह से रहने हुए है मुने! त्रिनेन भगवान् को बहुत अधिक कालचनीन हो गया था ॥५॥ धर्म को अपेक्षा रखन वाले बगत्पनि ने पार्वती के साथ रमण किया था। इसके पश्चात् क्सिी समय मे भगवान् भव ने ब्रह्मा के लिये पार्वतीजी से 'काली'-ऐसा कह दिया था ॥६॥ इमे सुनकर पार्वती को महान क्रोध हो गया था और क्रोधादिष्ट होकर वह श कर से यह वचन बोली-वाण के द्वारा हुआ क्षत तथा परशु के द्वारा हनन क्यिा हुआ वन,पुन: मर जाता है किन्तु वाणी के द्वारा दुष्ट एक दोमत्म वचन से होने वाला क्षत फिर कभी भी नहीं मरा करता है ॥७॥ वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति तैराहतः शोचति रात्र्यहानि । नतान्विमुञ्चेतहिपण्डितोजनम्नदद्यधर्मवितथत्वयाकृतम् ।। तस्माद्वजामि देवेश तपस्तप्तुमनुत्तमम् । तथा यतिप्ये न यथा भवान्कालीति वक्ष्यति । इत्येवमुक्त्वा गिरिजा प्रणम्य च महेश्वरम् । अनुज्ञाता त्रिणेनेण दिवमेवोत्पपात ह ।।१० समुत्पत्य च वेगेन हिमाद्रः शिखरं शिवम् । टच्छिन्न प्रयत्नेन विधाता निर्मित यथा ॥११ ततोऽवतीर्य सस्मार जया च विजया तथा। जयन्ती च महापुण्या चतुर्थीमपराजिताम् ।।१२ ताः संस्मृताः समाजग्मुः काली द्रष्टुं हि देवताः । अनुज्ञातास्तथा देव्या शुश्रुपा चझिरे शुभाः ॥१३ ततस्तपसि पावत्या स्थिताया हिमदहनात् । समाजगाम तं देश व्यानो दंष्ट्रानसायुधः ।।१४ २२ ] [ वामन पुराण वाणी रूपो वाण मुस से निकला करते हैं उनसे आहत हुआ पुरुप रातदिन शोन क्यिा करता है । अतएव जो पण्डितजन होते हैं वे कभी भी वचन वाणो को नही छोडा करते हैं सो आप ने आज वितथ अधर्म किया है । इसलिए हे देवेश मैं तो उत्तम तप करने के लिये जातो हूँ और ऐमा यत्न करू गो फिर आप 'कालो'-यह शब्द नही कहेगे ।।८-८।। इतना मात्र कहकर गिरिजा ने महेश्वर को प्रणाम किया और त्रिनेत्र के द्वारा अनुमात होकर दिवलोक को उड़कर चली गई थी॥१०॥ फिर वेग के माथ हिमाद्रि के शिव शिखर पर आ गई थी जो विधाता ने बडे प्रयत्न से टषच्छन्न करके निमित किया था ।।११॥ इसके पश्चात् वह उतरकर पार्वती ने जया-विजया, जयन्ती और महापुण्यशालिनी चौथी अपराजिता का स्मरण क्यिा था ॥१२॥ स्मरण करते ही वे सब वहीं आगई थी थोर वहाँ काली का दर्शन किया था । देवी के द्वारा आदेश प्राप्त कर सबने उनकी शुभ मेवा की यो ।।१३।। फिर तपश्चर्या मे स्थित पार्वती के समीर में हिमवान् के वन से एक दंष्ट्रा और नखो के आयुधो वाला व्यान उस जगह आ गया या ॥१४॥ एकपादस्थिताया वे देव्यां व्याघ्रस्त्वचिन्तयत् । मदा पतिप्यते चेष्टं तदा दास्यामि वै अहम् ॥१५ इत्येवं चिन्तयन्नैव दत्तदृष्टिमृगाधिपः । पश्यमानस्तद्वदनमेटिरजायत ।।१६ ततो वर्षशतं देवी गृणन्ती ब्रह्मणः पदम् । तपोमप्यत्ततोज्यागाद्ब्रह्मा सिभुवनेश्वरः ॥१७ पितामहस्तयोवाच देवी प्रीतोऽस्मिशाश्वते । तपमा धुतपापाऽसि पर वृणु यप्सितम् ॥१८ अयोवार पचः पाती व्याघ्रस्य कमलोद्भव । परदो नाम रोनाह मास्ये प्रीतिमनुत्तमाम् ॥१६ सनः प्रासादर प्रदा व्यानस्या तयमणः । पापाय विभो भक्तिमयर धमिताम् ॥२० विनायकोत्पत्ति वर्णन J [ २३ वरं व्याघ्राय दत्त्वैवं शिवकान्नामथाब्रवीत् । वृणीष्व वरमव्यग्ना वरं दास्ये तवाम्बिके ॥२१ एक चरण से स्थित हुई देवी को देखकर उम व्याघ्र ने सोचा था जब भी यह गिरेगी तभी में इष्ट दे दूगा ।।१॥ इम प्रकार से वह मृगाधिप मोचता ही रहा और उसने पार्वती की और अपनी दृष्टि लगा दी थी । उस देवी के मुख की ओर देखते हुए वह एक दृष्टि हो गया था ॥१६॥ इसके उपरान्त देवी ने सौ वर्ष पर्यन्त ब्रह्मा के पद को ग्रहण करते हुए तय किया था। इसके पश्चात् त्रिभुवनेश्वर ब्रह्माजी आये थे ॥१७॥ पितामह ने आकर देवी से कहा-मैं परम प्रसन्न हूँ। है शाश्वते ! आप अब तपस्या से धूत पापों वाली हो गई हो, जो भी मापका अभीष्ट हो मुझसे वरदान प्राप्त करलो ।।१८। इसके पश्चात् काली धान का वचन बोली-है कमलोद्भव ! आप दरद हो चिम्ले, मैं उत्तम प्रीति को प्राप्त होऊगी ।।१६। इसके पश्चात् ब्रह्माजी ने अद्भुत कर्म वाले व्याघ्र का वर दिया था। गणपत्य, विभुमे भक्ति, अजेयत्व धम्मिता का भी वरदान दिया था। इस प्रकार से व्याघ्र को वरदान प्रदान करके फिर ब्रह्माजी भगवान शिव की कान्ता से बोले-है अम्बिके ! अव्यग्र होकर आप भी मुझसे दर प्राप्त करलो मैं आपको वरदान दूंगा ॥२०-२१॥ ततो वरं गिरिमुत्ता प्राह देवी पितामहम् । वरः प्रदीयतां ब्रह्मन्वणं कनकसंनिमम् ॥२२ तथेत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा पार्वती चाभवत्ततः । कोश कृष्णं परित्यज्य पकिचल्कमग्निभा ॥२३ तस्मात्कोशाच्च सा जाता भूयः कात्यायनी मुने । तामभ्येत्य सहस्राक्षः प्रतिजग्राह दक्षिणाम् । प्रोवाच गिरिजां देवो वाक्य स्वर्गाय वासवः ।।२४ इयं प्रदीयतां मह्य भगिनी मेऽस्तु कौशिकी। वकोशसंभवा चेयं कौशिकी कोशिकोऽप्ययम् ।।२५ २४ ] [ वामन पुराण वह ता प्रादादिति संश्रुत्य कौशिकी रूपसयुनाम् । सहस्राक्षोऽपि तागृह्य विन्ध्य वेगाजगाम च ॥२६ तन गत्वा त्वथोवाच तिष्ठ चात्र महाचले । पूज्यमाना सुरैर्नाम्ना ख्याता त्व विन्ध्यवासिनी ॥२७ तत्र स्थाप्य हरिदेवी दत्त्वा सिंह च वाहनम् । भवामरारिहन्त्री चेत्युक्त्वा स्वर्गगुपागमत् ।।२८ इसके अनन्तर गिरि सुता देवी पितामह से बोली- है ब्रह्मन् ! सुवर्ण के तुल्य वर्ण होने का वरदान दीजिए ॥२२।। ऐसा ही होगा-यह कह कर ब्रह्माजी वहाँ मे चले गये थे और फिर पार्वती वैसी ही हो गई थी। उस देवी ने कृष्ण कोश का त्य ग कर दिया था और फिर पद्म के रिजल्क के तुल्य हो गई थी ॥२३॥ हे मुने । उम कोश से फिर वह कात्यायनी उत्पन्न हुई थी । उसके पास इन्द्र ने आकर दक्षिणी को प्रहण किया था। इन्द्र देव गिरिजा देवी से स्वर्ग के लिये वचन कहा था ।।२४।। इन्द्र ने कहा-यह भगिनी मुझे देदो। यह कौशि की होवे । आपके कोश से समुत्पन्ना यह कोशिकी है और यह भी कोशिक है ॥२५॥ रूप से समन्वित उस कौशि को दे दिया-यह वचन सुनकर इन्द्र देव भी उमे ग्रहण करके वेग से दिन्थ्य पर्वत पर चले गये थे।॥२६॥ वहा जाकर फिर यह बोले-हे महा चले । ताप यही पर ठहरिए । सुरों से पूज्यमान होती हुई आप नाम से विन्ध्य वासिनी विख्यात होगी ॥२७॥ वहा पर इन्द्र ने देवी की स्थापना की और उनको सिंह वाहन दिया था। आप शत्रुओं के हनन करने वाली होवे जो देवो के शत्रु हो. इतना कहकर वह स्वर्ग को चले गये थे ॥२८॥ उमाऽपि तं वरं लब्ध्वा मन्दिर पुनरेत्य च । प्रणम्य च महेशानं स्थिता सविनयं मुने ॥२६ ततोऽमरगुरुः श्रीमान्पावत्या सहितोऽव्यया। तस्थौ वर्षसहस्र हि महामोहनके मुने ॥३० महामोहस्थिते रुद्र भुवनाश्चेलुरुद्धताः । चुशुभुः सागराः सप्त देवानभयमागमन् ॥३१ विनायकोत्पत्ति वर्णन ] । २५ ततः सुरा महेन्द्र ण ब्रह्मरणः सदनं गताः । प्रणम्योचुमंहेशानं जगत्क्षुब्ध तु किं त्विदम् ॥३२ तानुवाच भवो नूनं महामोहनके स्थितः । तेनाकान्तास्त्विमे लोका जग्मुः क्षोभं दुरत्ययम् ॥३३ इत्युक्त्वा सोऽभवत्तूष्णी ततोऽप्यूचुः सुरा हरिम् । आगच्छ शक गच्छामो यावत्तन्न समाप्यते ॥३४ समाप्ते मोहने वालो य: समुत्पत्स्यतेऽत्र्ययः । स नूनं देवराजस्य पदमैन्द्र हरिष्यति ।।३५ उमा देवो भी उस वरदान को प्राप्त कर पुन: मन्दिर में आ गई घी और हे मुने ! महेश्वर को प्रणाम करके वहां विनयान्त्रिता होकर स्थित हो गई थी ॥२क्षा इसके पश्चात् श्रीमान् अमर गुरु जो अविनाशी हैं पार्वती के साथ हे मुने! महा मोहनक मे एक सहस्र वर्ष तक स्थित रहे थे ॥३०॥ रुद्र देव के महामोह में स्थित होने पर समस्त भुवन उद्धत होकर चचल हो गये थे। सब सागर क्षोम को प्राप्त हो गये और देव मयभीत हो गये थे ॥३१॥ तव सब सुरगण महेन्द्र देव के साथ ब्रह्माजी के सदन को गये थे। महेशान को सद ने प्रणाम किया था और कहा या-यह सम्पूर्ण जगत् सुब्ध हो गया है-यह क्या हो गया है ? ॥३२।। तब महा मोहनक मे स्थित भव उनसे बोले-उनके द्वारा आक्रान्त ये समस्त लोक दुरत्यय क्षोम को प्राप्त हो गये हैं ॥३३॥ इतना ही कह वह चुप हो गये थे। इसके पश्चात् सब सुर वृन्द ने इन्द्रदेव से कहा- है इन्द्रदेव ! आइये चलें जब तक यह समाप्त नहीं होता है ॥३४॥ इम मोहन के काल के समाप्त हो जाने पर जो एक बव्यय बालक समुत्पन्न होगा वह निश्चय देवराज के पद का हरण करेगा ॥३॥ ततोऽमराणां वचनादिवौकोवलघातिनः । भयाज्ज्ञानं ततो नष्ट भाविवर्मप्रचोदनात् ॥३६ तत: शका सुरैः सार्ध वह्निना च सहस्रदृक् । जगाम मन्दरगिरि तच्छङ्गवपि सत्तम ॥३७ विनायकोत्पत्ति वर्णन ] । २७ विनिष्क्रान्ते सुरपता देवा मुदितमानसाः । शिरोभिरवनी जग्मुः सेन्द्रार्कशशिपावकाः ।।४४ ततः प्रीत्या सुरानाह वदध्वं कार्यमाशु मे। प्रणामावनता वो हि दास्येऽहं वरमुत्तमम् ॥४५ यदितुष्टोऽसि देवानां वरं दातुमिहेच्छसि । तदिह त्यज्यतां तावन्महामैथुनमीश्वर ।।४६ एवं भवतु संत्यक्तो मयाभावोऽमरोत्तमाः। ममेदं तेज उद्रिक्त कश्चिदेव प्रतीच्छतु ॥४७ इत्युक्ताः शभुना देवा: सेन्द्रचन्द्रदिवाकरा। असीदन्त यथा मग्ना: पड्डू गावस्तथा सुराः ।।४८ सीदत्सु दैवतेष्वेवं हुताशोऽभ्येत्य शकरम् । प्रावाच मुञ्च तेजस्व प्रतीच्छाम्येव शंकर 19 हे नारद ! यह सुनते ही शम्भु ने उठकर गिरि सुता का त्याग कर दिया था और फिर अग्नि के साथ ही अपने आंगन से बाहिर निकल आये थे ॥४३॥ सुरो के स्वामी शम्भु के निकल आने पर देवगण बहुत ही प्रसन्न मन वाले हो गये थे । और सबने सूर्य-चन्द्र और पावक के साय इन्द्र ने शिर को भूमि पर टेक कर प्रणाम किया था अर्थात् सभी नत मस्तक हो गये ॥४४|| इसके अनन्तर भगवाद शकर ने प्रीति पूर्वक देवगण से कहा--मुझे आप लोग शीघ्र ही अपना जो भी कार्य हो उसे बतला दो । आप सब लोग प्रण मन करके अवनत हो गये हो मैं आप सबको घ वरदान दूंगा ।।४।। देवो ने कहा- यदि आप हम सब देवो पर परम सन्तुष्ट है और कोई वरदान भी हमको देना चाहते हैं तो हे ईश्वर ! आप अब यहाँ पर यह महा मैथुन जो कर रहे हैं इसका त्याग कर दीजिएगा ॥४६॥ ईश्वर ने कहा T-ऐसा ही होगा हे अमरोतम वृन्द ! मैंने वह भाव त्याग दिया है । मेरा जो यह उद्विक्त तेज है इसको कोई भी ग्रहण करे ॥४७॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-शम्भु के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर इन्द्र चन्द्र और दिवाकर आदि समस्त देवगण पंक में मानो गौलो की भाति बहुत ही दुःखित हुए थे ॥४८॥ इस प्रकार २८ ] [ वामन पुराण से देवों के दुखित होने पर अग्निदेव शकर ये ममीर में पावर बोले- है शकर ! आप तेज को छाडिये मैं प्रहण करता हूँ ॥४६॥ ततो मुमोच भगवास्तद्रत सन्नमेव तु । जल तृपातं वै यद्वत्तलपान पिपासित ॥५० तत पीते रेतसि व शार्वे देवेन वह्निना। स्वस्था सुरा समामन्त्र्य हर जग्मुत्रिविष्टपम् ।।५१ सप्रयातपु देवेषु हरोऽपि निजमन्दिरम् । समभ्येत्य महादेवीमिद वचनमब्रवीत् ।।२२ देवि देवैरिहाभ्येन्य यत्नात्प्रेष्य हुताशाम् । तत प्रोक्तो निषिद्धस्तु पुनोति तवोदरात ॥५३ साऽपि भतुवच श्रत्या ऋद्धा रक्तान्नलोचना। शशाप देवता सर्वा नष्टपुनोद्भवा शिवा ॥५४ यस्मान्नेच्छन्निते दुष्टा मम पुत्र ममौरसम् । तस्मात्त न जनिष्यन्ति स्वासु योपित्सु पुत्रकान् ॥५५ एव शप्त्वा सुरा-गौरी शोचशालामुपागमत् । आहूय मालिनी स्नातु मति चके तपोधन ॥५६ इसके अनन्तर भगवान् शम्भु ने उस स्कन्न रेतस् का त्याग किया था, जिस तरह तृपा से बात पुरुष जलको और पिपासित तल को पीता है वैसे ही उम शकर के रेतस को वह्नि देव ने पान कर लिया था । फिर स्वस्थ मुरगण हर की अनुज्ञा प्राप्तकर अपने विविष्टप का चले गये थे ॥५०५१॥ देवो के चले जाने पर भगवान हर भी अपने मदिर में आकर महादेवी से यह वचन बोले ॥५२॥ हे देवि 1 देवो ने यहा आकर हुताशन को पत्न पूर्वक मेरे समोष मे भेजा था फिर इ होने मुझसे निषेध करते हुए कहा था कि आपके उदर से पुत्र को उत्पत्ति न करू ॥५३।। वह देवी मी स्वामी के इस वचन को सुनकर बहुत क्रोधित हुई और उनके नेत्र लाल होगये थे। पावतो ने सभी देवो को शाप दे दिया था क्याकि अपने उदर से पुत्र जन्म न होने के कारण शिवा को क्रोध हो गया था ॥५४॥ क्योकि ये दुध मरे औरम पुत्र को नहीं चाहते विनायकोपत्ति वर्णन ] है इमोलिये ये सर मुर भी अपनी स्त्रियों में कोई भी पुत्र सप्त नहीं करेंग-यह मेरा मार है ॥५॥ म मरह मुगेको मार देर गोगे मौवमाता में पली गई थी। हे तपोजन ! नुरन मानिनी को पुनार पार्वती ने स्नान करने का प्रस्ट दी थी॥५॥ मालीनी ममि गृह्य लक्ष्मद्वर्तनं मुना। देव्यङ्गमुद्वर्तयो करान्यां नरप्रभा ॥५७ सच्चीचं पार्वती ने मेने पोटगुगेन हि । उद्वत्यं पार्वती ता तु गुभेनंदन नेन च ।५८ मानिनी तुगंमग मदगृह म्नानन्य कारणात् । तस्या गताया शैलेवी मनाचके गजाननम् ॥५६ चतुर्नु पीनवक्षः पुरतं नसणान्वितम् । त्वोमम त भूम्या स्थिता मद्रासने पुनः॥६० मानिनो तन्धित स्नानं ददो बिहमनी तदा । ईपटाममुखी दृष्ट्वा मालिनी प्राह नारद ॥६१

३० ]
। दामन पुराण
देखकर नारद ने कहा-1॥६१।। है भोप ! तुम पिस लिये शनैः २हंग
रही हो ? इसके उत्तर मे उसने पहा-में इसी प्रकार से हम रही है
कि देव ने मन्दि गणाधिप मे पहा था कि थापा तनय ऐम ही होगा ।
यह श्रवण करके हे वृशोदर । आज मुझ हमी आगई है ॥६२-६३।।
यस्माद्देवी पुत्रकामाच्छकरो विनियारित. 1
एतच्छु त्वा वचो देवी सस्नो तत्र विधानतः ॥६४
स्नात्वाऽयं शकरं भवत्या समभ्यागाद् गृह प्रति ।
ततः शभुः समागत्य तस्मिन्मद्रासनेऽपि च ॥६५
स्नातस्तस्य ततस्तस्मात्स्थिता स मलपूरपः ।
उमास्वेदभवस्वेद जलभूमिसमन्वितम् ॥६६
तत्संपत्सिमुत्तस्थौ फूत्कृत्य करमुत्तमम् ।
अपत्य हि विदित्वा च प्रीतिमान्भुवनेश्वरः ॥६७
त चादाय हरो नन्दिमुवाच भगनेयहा ।
रद्रः स्नात्वाऽर्घ्य देवादी वाऽद्भिरग्नि पितृनपि ॥६८
जप्त्वा सहस्रनामानमुमापार्श्वमुपागतः ।
समेत्य देवी विहस-शकरः शूलधुवचः ।।६६
प्राह त्व पश्य शैलेयि त्वत्सुत गुरासयुतम् ।
इत्युक्ता पर्वतस्ता ह्य पेत्यापश्यदद्भुतम् ।।७०
क्योंकि देवी ने पुत्र की कामना से भगवान् शकर को विनिवारित
कर दिया था। यह वचन सुनकर देवी ने वहाँ पर विधि पूर्वक स्नान
किया था॥६४॥ स्नान करके भक्ति भाव मे शकर की पूजा की थी फिर
घर की ओर चली गई थी। इसके पश्चात् शम्भु ने आकर उसी भद्रासन
पर स्नान किया था। फिर उस स्थान से वह मल पुरुष स्थित हुआ
था। उमा के स्वेद और शकर के स्वेद तथा जल भूमि से सयुत वह था
॥६५-६६।। उसके सम्पर्क से उत्तम कर को पूत्कार करके वह खडा
होगया था। अपत्य को जानकर भुवनेश्वर बहुत अधिक प्रीतिमान् हुए
ये ॥६७॥ उसको लेकर भग के नेत्रो के हनन करने वाले हर ने नन्दी
से कहा पा-रुद्र स्नान करके जल मे देवादि का अचन करके भौर

विनायकोत्पत्ति वर्णन ] [ ३१ परिन तथा पित गण को तृप्त करके एवं सहन नाम का जाप करके फिर उमा के समीप में आये थे। देवी के समीप में आकर शूलधारी शंकर हंसते हुए देवी से यह वचन दोले थे। हे श लेयि ! गुणों से संयुन तुम अपने पुत्र को देखो। इस प्रकार से कहने पर पार्वती ने वहां आकर अद्भुत ही देखा पा ॥६८-30!! यस्त्वदङ्गमलाहिव्यः कृतो गजमुखो नरः । ततः प्रीता गिरिसता तं पुत्रं परिपस्वजे ।।७१ मूनि चनमुपात्राय ततः शर्वोत्र वीदुमाम् । नायकेन विना देवी मया भूतोऽपि पुत्रकः ।।७२ यस्मानातस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः। एप विघ्नसहस्राणि देवादीनां हनिप्यति ॥७३ पूजयिप्यन्ति देवाश्च देवि लोकाश्चराचराः। इत्येवमुक्त्वा देव्यास्तु दलवांस्तनयं स हि ।।७४ सहायं तु गणश्रेष्ठ नाम्ना ख्यातं घटोदरम् । तथा मातृगणा घोरा भूता विघ्नकराच ये ॥७५ ते सर्वे परमेशेन देव्याः प्रीत्योपपादिताः। देवी व तं मुतं दृष्ट्वा परां मुदमवाप च ।।७६ रेमेऽय शंभुना सार्द्ध मन्दिरे चारुकन्दरे । एवं भूयोऽमवद्देवी इयं कात्यायनी विभो । या जघान महादैत्यो पुरा शुम्भनिशुम्भको ।।७७ एतत्तवोक्त वचनं सुभाप्यं यथोद्भवः पर्वततो मृडान्याः । स्वययशस्यं च तयावहारिमाख्यानमूर्जस्करमद्रिपुश्याः ।। जो आपके बंग के मल से एक दिव्य गज के समान मुख दाला नर मनाया गया है उससे गिरि मुता बहुत ही प्रसन्न हुई है और उम पुत्र का उनने समालिगन किया था I इसके मस्तक को सूघ कर भगवान् शिव उमा से यह वचन बोले-देवी, मेरा यह पुत्र भी नायक के विना हो उसन्न हुआ है इसलिये यह नाम से भी विनायक ही होगा। यह देवों के सहस्रों विघ्नों का हनन करेगा ।।७२-७३।। हे देवि ! सब घर, .

| वामन पुराण अचर लोग और देवगण इसकी पूजा करेगे। इतना कह पर सिम ने वह पुत्र देवी को दे दिया था ॥ ७४ ॥ घटीदर नाम से प्रमिद गणों में श्रेष्ठ सहायक दिया था तथा मातृगण-पोर भूत और जो विघ्न करने वाले थे वे सब परमेश ने प्रीति पूवा देवी के लिये प्रतिपादिन किये थे। देवी भी उम पुत्र को देख पर परम प्रसन्न हुई थी ॥७५.७६।। मुन्दर कन्दराओं वाले उस मदिर मे वह दवी शम्भु से गाय रमणान द प्राप्त करी लगी । हे विभो । इस प्रकार से यह वारयायनी पुन हुई यो जिसने पहले शुम्भ और निशुम्म नाम वाले महान दल्यों को हनन किया था ॥७७॥ यह सु दर भाषण करने के योग्य वचन मैंने तुम धो पतला दिया है जिस प्रकार से मृडानी का पर्वत स उद्धव हुआ पा । यह अद्रि पुत्री का आख्यान स्वर्ग देने वाला, पशप्रद, पापहारी और ऊजस्कर है ॥७॥ ५१-चण्डमुण्ड वध वर्णन कश्यपस्य दनुर्नाम्ना भार्याऽसीद्विज सत्तम । तस्याः पुनत्रय चासात्सहस्राक्षादलाधिकम् ॥१ ज्येष्ठ शुम्भ इति ख्यातो निशुम्भश्वापरोऽसुर । तृतीयो नमुचिर्नाम महाबलसमन्वित ॥२ योऽसौ यमुचिरित्येव य्यातो दनुसुतोऽमुर । त हन्तुमिच्छति हरि प्रगृह्य कुलिश करे ॥३ त्रिदिवेश समायान्त नमुचिस्तु भयादथ । प्रविवेश रथ भानोस्ततो नाशक्दच्युत ।।४ शनस्तेनाथ समय प्रवन स महामना । अवध्यत्व वर प्रादाच्छन रस्त्रश्च नारद ॥५ ततोऽवध्यत्वमाज्ञाय शोरन श्च नारद । सत्यज्य भास्कररथ पातालमुदयादथ ॥६ - चण्डमुण्ड वध वर्णन । । ३३ स निमज्जन्नपि जले सामुद्रफेनमुत्तमम् । ददृशे दानवपतिस्तं प्रगृह्य दमब्रवीत् ॥७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा है द्विज श्रेष्ठ ! महर्षि कश्यप की दनु नाम पाली भार्या थी। उसके इन्द्र से भी अधिक बल वाले तीन पुत्र थे ॥१॥ ज्येष्ठ पुत्र शुम्भ-इस नाम से विख्यात था, दूसरा असुर निशुम्भ था और तीसरे का नाम नमुचि था । यह महान् बल से समन्वित था ॥२॥ जो यह नमुचि नाम से प्रसिद्ध असुर दनु का पुत्र था उसको हाय मे बच लेकर हरि ने मारने की इच्छा की थी ॥३॥ नमुचि ने त्रिदिवेश को आते हुए देख कर भय से भानु के रथ में प्रविष्ट हो गया था। फिर बच्युत कुछ न कर सके । उम महामना इन्द्र ने उसके माथ सन्धि कर ली थी। हे नारद शस्नो और अस्त्रो से अवध्य होने का वरदान दिया था ॥४॥५॥ हे नारद! फिर शस्त्रास्त्रो से अवध्यत्व की आज्ञा पाकर उसने सूर्य के रथ का स्याग कर पाताल में गमन किया था ॥६॥ उम दादवों के स्वामी ने जल में निमज्जन करते हुए भी समुद्र के उत्तम फेन को देखा था। उसने उसका ग्रहण करके यह वचन कहा था ॥७॥ यदुक्त देवपतिना वासवेन वचोऽस्तु तत् । अय स्पृशतु मां फेनः कराभ्या गृह्य दानवः ।। मुखनासादिकर्णा दीन्समापूर्य यथेच्छया । तस्मिञ्छकोऽसृजवनमन्तहितमपीश्वरः ।। तेनासौ रुद्धनामास्यः पपात च ममार च । समये न तथा नष्ट ब्रह्महत्याऽस्पृशरिम् ॥१० स चैतत्तीर्थमासाद्य स्नातः पापादमुच्यत । ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ द्धौ शुम्भनिशुम्भको ।।११ उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान्वाधितुमागतो। सुरास्तेऽपि सहस्राक्ष पुरस्कृत्य विनिर्ययुः ॥१२ जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सवला: सपदानुगाः। शक्रस्याहृत्य च गजं याम्य च महिपं बलात् ।।१३ ३४ ] [ वामन पुराण वरुणस्य मणि छप गदा के माधवस्य च । निधयः शङ्खपद्माद्या नास्त्वाकम्य दानवैः ।।१४ देवो के स्वामी इन्द्र ने जो वचन कहा था। उस दानर ने करी में ग्रहण करके कहा यह फेन मेग स्पर्श करे 11 मुख, नासिका और कान आदि को भली भांति भर कर ईश्वर इन्द्र ने उसमे पन्छा भीतर छिपे हुए वज़ को छोड़ दिया था | उससे उसकी नासिका रुक गई थी और भी अवरुद्ध हो गया था । वह फिर गिर पड़ा और मर गया था। समय से (सन्धि से) उप्त प्रकार नष्ट हो जाने पर ब्रह्महत्या ने हरि का स्पर्श किया था ॥१०॥ फिर उसने इस तीर्थ को प्राप्त किया था और स्नान किया था जिससे बह पाप से मुक्त हो गया था। इसके पश्चात् उसके भाई वीर शुम्भ और निशुम्भ दोवों बहुत अधिक क्रोधित हुए थे । ११११॥ महान उद्योग करके वे दोनो सुरो को वाधा पहुचाने के लिये आ गये थे । देव गण मी इन्द्र को नायक बनाकर निकल दिये ये ॥१२॥ सब देव गण इन दोनो दैत्यो के द्वारा आक्रमण करके सेना तथा अनुचरो के सहित जीत लिये गये थे। उन दंत्यो ने इन्द्र का गज छीन लिया था और यमराज का महिष वाहन भी बल पूर्वक अपहृत कर लिया था ।।१३।। वरुण देवता की मणि और छत्र तथा माधव की गदा एव शख पद्म आदि आयुध और विधिया दानवो ने आक्रमण करके छीन ली थीं ॥१४॥ निलोकी वशगा चास्तेऽनयोरिद दैत्ययोः । आजग्मतुर्महीपृष्ठ ददृशाते महासुरम् ॥१५ रक्तबीजमयोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत् । स चाह दैत्योऽस्मि विभो सचिवो महिपस्य तु॥१६ रक्तबीजेति विख्यातो महावीर्यो महाभुजः । अमात्यो रुचिरी बीरी चण्डमुण्डाविति श्रुतौ ।।१० तावास्तां सलिले मग्नी भयाद्देव्या महाभुजी । यस्त्वासीत्प्रभुरस्माकं महिपो नाम दागवः ॥१८ चण्डमुण्ड वध वर्णन ] [ ३५ निहतः स महादेव्या विन्ध्यर्शले सुविस्तृते । भवन्तोकस्य तनयो किं वा नाम्ना परिश्रुतो। किंवीयौं किंप्रभावौ च एतच्छसितुमर्हथः ॥१६ अहं शुम्भ इति ख्यातो दनो: पुषस्तथौरसः। निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयाञ्छदपहा ॥२० अनेन बहुशो देवा: सेन्द्ररुद्रदिवाकराः। समेत्य निजिता वीरा ये चान्ये बलवत्तराः ।।२१ हे नारद इन दोनों दैत्यों के वश मे त्रिलोकी हो गई थी। फिर इस भूमि के पृष्ठ पर आ गये थे और यहां उन्होने महासुर को देखा था ।।१५। उन्होंने रक्तबीज से कहा था-आप कौन हैं । उसने उत्तर दिया था। उसने कहा-हे विभो ! मैं महिप का सचिव दैत्य हूँ ॥१६॥ रक्तबीज-इस नाम से वह महान् वीर्य और महान मुजा वाना विख्यात है। महिप के अमात्य तो बहुत अच्छे एव परम वीर चण्ड और मुण्ड सुने गये थे ॥१७॥ वे दोनों महा भुजाओ वाले देवी के भय से जल में मग्न हो गये थे । जो हमारा महिप नामक दानव प्रभु था वह सुविस्तृत विन्ध्य रोल पर महादेवी के द्वारा मार दिया गया था । आप दोनों किसके पुत्र हैं और किन नामों से प्रसिद्ध हैं । आपका क्या बल वीर्य है तथा क्या प्रभाव है--यह आप कहने के योग्य होते हैं ॥१८-१६॥ शुम्भ और निशुम्भ ने कहा-मैं शुम्भ, इस नाम से विख्यात हूं और मैं दनु का औरस पुत्र हूँ। यह निशुम्म मेरा माई है जो कि मुझसे छोटा भाई है और, इन्दु के दर्प का नाशक है ॥२०॥ इसने बहुत से इन्द्र-रुद्र दिवा- कर आदि देवगण सम्मुख में जाकर जीत लिये हैं और अन्य मी जो बड़े- बड़े अधिक बलवान वीर थे वे भी सब जीत लिये हैं ॥२१॥ तदुच्यतां कथं दैत्यो निहतो महिपासुरः । यावत्तान्घातयिष्यावः स्वसैन्यपरिवारिती ॥२२ इत्थं तयोस्तु बदतोनमयास्त: मुने। जलवासाद्विनिष्क्रान्तो चण्डमुण्डौ च दानवौ ॥२३ ।

[ वामन पुराण ततोऽभ्येत्य सुरथेली रक्तवीज समाश्रितो । ऊचतुर्वचन श्लक्ष्ण कोऽय तव पुरस्सरः ।।२४ स चोभी प्राह दैत्योऽमो शुम्भो नाम सुरार्दनः । कनी यानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः ।।२५ एतावाश्रित्य ता दुष्टा महिपघ्नी न संशयः । अह विवाहयिष्यामि रत्न भूता जगत्ये ॥२६ न सम्यगुक्त भवता रत्नाहोऽसि न साम्प्रतम् । य, प्रभुः स्यात्स रत्ना हस्तस्माच्छुम्भाय योज्यताम् ॥२७ तदाऽऽचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम् । भूयोऽपि तद्विधा जाता कौशिकी रूपशालिनीम् ॥२८ सो अब आप यह बताइये कि महिषासुर दैत्य कैसे मारा गया है। जिससे हम अपनी सेना बलको सपा में लेकर उस्को मार मलेंगे ॥२२॥ है मुने ! इस तरह से नर्मदा के तट पर उन दोनों वे बातचीत करने पर चण्ड-मुण्ड दोनो दानव जल के निवास स्थल से बाहिर निकल आये थे ॥२३॥ इसके उपरान्त वे दोनों सुरश्रेष्ठ वहाँ माकर रामबीज के समा- धित हो गये थे और उन दोनों ने परम लक्षण वचन कहे थे कि यह पापा आगे कोन है ॥२४॥ उमसे उन दोनों ने कहा- यह सुरों का अदन परने वाला शुम्भ नाम वाला दैत्य है । इसका छोटा भाई दूसरा निशुम्भ है ॥२५॥ ये दोनों महिषासुर के हनन करने यानी उस दुष्टा का पाश्रय लेकर रहते हैं इसमे कुछ भी समय नहीं है । इस त्रिभुवन मे रस्न के समान उसरे साथ में विवाह करूंगा ॥२६॥ चण्ड ने वहा-- बाप ने टोनही बहा है क्योंकि अब आप उस रन + प्राप्त करने के योग्य नहीं है। जो प्रभु होता है वही रत प्राप्त करने में योग्य होता है । इसलिय शुम्भ के लिये हो उसका योजन करो ॥२७॥ उस समय मे मुम्भ और निशुम्भ लिये उम उसी प्रकार की रूप शालिनी कौशिकी को उत्पन्न हुश्रा यतखाया गया था ॥२८॥ सतः शम्मी निज दूत मुग्रीयं नाम दानयम् । दरय पपयामास समाश विन्ध्यवामिनीम् ॥ - चण्डमुण्ड वध वर्णन ] [ ३७ स गत्वा तद्वच. ध्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः । निशुम्भशुम्भावाहेद मन्युनाऽभिपरिप्लुत ॥३० युवयोर्वचनादैवी प्रदिष्टा दैत्यनायको । गतवानहमद्यव तामह वाक्यमनवम् ॥३१ यया शम्मोऽतिविच्यात. कद दानवेष्वपि । स त्वा प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगनये ॥३२ यानि स्वर्गे महोपृष्ठे पाताले चापि मुदरि। रत्नानि सन्ति तावनि मम वेश्मनि नि यस. ॥३३ त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्या रत्नभूना कृशोदरी। तम्माद्भजस्व मा वा त्व निशुम्भ वा ममानुजम् ॥३४ सा चाह मा विहसती शृणु सुग्रीव मच । सत्यमुक्त निलोकेश. शुम्मो रनाह एव च ॥३५ इसके अनवर शुम्भ ने अपना सुग्रीव नामक दानव दूत जो दैत्य या विन्ध्य वामिनी के समीप मे भेजा था ॥२६॥ उमका वचन सुनकर उमने वहाँ जाकर महासुर ने क्रोध से परिप्लुत होकर निशुम्भ शुम्म को बात देवी से कही थी ॥३०॥ सुग्रोव ने कहा है दैत्यनायको । मैं आप दोनों के वचनो से देवों को कहा गया है और मैं आज ही गया था, मैंने उममे यह दाक्य कहा था ॥३१॥ जिस प्रकार से शुम्म समस्त दानवों मे अत्यन्त विख्यात है और शिरोमणि भी है-यह सभी मैंने कहा और है महामा। उसने नुमको यह सम्बाद कहा है कि मैं तीनो लोको प्रभु हूं। हे सुन्दरि । जो भी संग में, भूमि के पृष्ठ मे और पाताल म रत्न हैं वे सभी मरे घर म नित्य हो निवास करत हैं अर्थात् न लोक्य की रत्न स्वरूप सभी वस्तुएं मुझे प्राप्त हैं ॥३२-३३॥ कृशोदरी आपको चण्डमुण्डो ने रत्न के समान बतलाया है । इमलिये जब रत्नरूप सभी पदार्थों का मोक्ता मैं ही हू तो तुम मो मेरा सेवन करो अथवा मरे छोटे पाई निशुम्भ का सेवन करो ॥३१॥ जब मैंने उन देवी से प्रापका यह सम्बाद कहा तो उसने हंसते हुए मुयसे कहा था-हे सुप्रीव । मेरा ३८ ] [ यामन पुराण वचन सुनो। यह तुमने बिल्युल रात्य पहा है कि वह सोम सोपोगा स्वामी है और शुम्भ रत्नो के पाने के योग है ॥३१.३५॥ कि त्वस्ति दुविनीताया हृदये मे मनोरयः । यो मा विजयते युद्ध स मर्ता स्यान्महामुरः ।।३६ मया चोक्ताऽवलिप्ताऽसि यो जयेत्समुरासुरान् । स त्वां कथ न जयते सा त्वमुत्तिष्ठ भामिनि ॥२७ साऽय मा प्राह किं कुर्मो यदनातोचितः कृतः । मनोरथस्तु तद्गच्छ शुम्भाय स्व निवेदय ।।३८ तयैव मुक्तस्त्वभ्यागा त्वत्सकाश महासुरः। ता चाग्निकोटिसकाशा मत्वैव कुरु यत्क्षमम् । प्राह दूत विद शम्भो दानव धूम्रलोचनम् ॥३६ धूम्राक्ष गच्छ ता दुष्टा केशाकर्षणविह्वलाम् । सापराधा यथा दासी कृत्वा शीघ्रमिहानय ॥४० यश्चास्या: पक्षकृत्कश्रिद्भविष्यति महाबलः। स हन्तव्योऽविचार्येव यदि ही स्यात्पितामहः ॥४१ स एवमुक्त. शुम्भेन धूम्राक्षोऽक्षौहिणीशतः। तवृ: पड्भिर्महातेजा विन्ध्य गिरिमुपाद्रवत् 11४२ किन्तु दुनिनीता मेरे मनमे एक मनोरथ है कि जो महान असुर युद्ध मे मेरे ऊपर विजय प्राप्त कर लेगा वही मेरा भर्ता होगा ।।३६।। यह उसका कथन मुनकर मैंने उस से कहा था--तुमको बहुत ही घमण्ड हो गया है जो सभी सुर और असुरों को जीत लेता है वह तुमको कैसे नहीं जीत लेगा । हे भामिनि ! तुम मेरे साथ ही उठकर चलो चलो ॥३७॥ इसके उपरान्त उसने मुझसे कहा-क्या करें, मैंने अपने मनोरथ के विषय मे पहिले आलोचना नहीं की थी। इसलिये तुम बाकर शुम्भ यही कह देना ॥३८।। उसके द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर मैं महा- सुर आपके ममीप मे आया हूँ । अव भग्नि को कोटि के समान उसको समझकर जो भी ठीक हो आप करिए । फिर शुम्भ ने धूम्रलोचन नाम धाले दानव दूत को यह वचन बोला या ॥३६॥ शुभ ने कहा है चण्डमुण्ड वध वर्णन ] घनाक्ष ! तुम जात्रो और उन दृष्ट को एक माराधी के समान देशों को पाडार विह्वन दनाकर तया दामी बनाकर फोन ही खींवकर यहा ले आनो ॥४०॥ और जो भी कोई उमरी सहायता करे चाहे वह पितामह को क्यो न हो बिना कुछ विचार क्वि हुर ही उमे मो मार डासना ॥४१॥ इस प्रकार मुम्म के द्वारा कहे जाने पर वह छ मौ अक्षौहिणी सेनाओं मे समावृत होकर घूम्राज्ञ महान् तेजस्वी विघ्न पर्वत पर चढ़ाई कर पहुंच गया या ॥४२॥ तवदृष्ट वा चता दुर्गा भ्रान्नदृष्टिरुवाचह । एह्य हि मूटे भर्तार शुम्भमिच्छम्ब कौशिकि । न चेद नानयिमामि केशाफपंगविह्वलान् ॥४३ प्रेपितोऽमोह शुम्भेन बलान तुहि मा किल । ताकि हबला कुर्याद्यच्छसि तथा कुरु । ४४ एवमुक्ता विभावर्या बलवान्घून लोचनः । हुंकारेणेव त भस्ममाचकाराम्बिका तथा ॥४५ ततो हाहाकृतमभूग्जगत्यस्मिश्चराचरे। सवल भस्ममान्नीत कौशिक्या वोक्ष्य दानदम् ॥४६ त च शुम्मोऽपि गुथाव महच्छन्दमुदीरितम् । बयादिदश बलिनी चण्डमुण्डौ महासुरी ॥४७ एरंच वलिना श्रेष्ठ तयामजग्मुमुदान्विताः । तपा च संन्यमतुल गजान्वरयमुकुलम् ।।४८ समाजगाम सहना यत्रास्ते कोशसमवा । तदाऽयान्त रिपुवल दृष्ट्वा कोटिशनावरम् ।।४६ दहा दिमावत पर पट्टचार प्रान्त दृष्टि वाना होकर समाज ने उम दुर्ग में यह महा या हे मूडे ! ह कोशिश! मेरे माय आगामी मोर मुम्भ को बाना स्गनी बनाना। यदि ऐना नहीं करोगी तो मैं तुम्हारी सोटो याचार बनावंक तुम पाड कर से राजा ॥५॥ थी देवी ने कहा- तुमको गम्भ न भेना है और सनपूर्वक मा ने जाने रोगह दिला है तो मैं अपना उसमें कार सस्ती ई, जाभी ।

४० । [ वामन पुराण तुम चाहते हो वही करो ॥४४॥ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-इस प्रकार से विभावरी के द्वारा कहे जाने पर उस बलवान् धूम्र लोचन को अम्बिका ने एक हुकार से ही भस्म कर दिया था ॥४५॥ इसके पश्चात् इस चराचर जगत् मे हाहाकार मच गया था। कोशिकी ने इतने सबल दानव को देख कर ही भस्मसात कर दिया है ॥४६॥ उस उदीरित महान शब्द को अर्थात् ह कार की ध्वनि को शुम्भ ने भी सुना था । इसके अनन्तर महान् असुर चण्ड-मुण्डो को उसने आदेश दिया था तथा बलवानी में श्रीप्ठ रुरु को भी आदेश दिया था । ये सब परम प्रसन्न होते हुए वहाँ अ गये थे । उनको मेना असीम थी जिममे हाथी और घोडे पर्याप्त मख्या में थे ॥४७-४८|| वह सेना वहाँ पर आ गई थी जहाँ कौशिको विद्यमान थी। उम समय में लगभग सैकडो करोड शत्रु की सेना को वहाँ पर बाती हुई देखी गई थी ॥४६॥ अथ सिंहो धुतसटः पाटयन्दानवारिणे । काश्चित्करप्रहारेण काश्चिदास्येन लीलाया ।।५० नखरः काश्चिदाक्रम्य उरसाऽस्य मियाय च । ते वध्यमाना. सिहेन गिरिकन्दरवासिना ॥५१ भूतश्च देव्यनुचरश्चण्डमुण्डो समाश्रयन् । तावात स्वयल दृष्ट्वा कोपप्रस्फुरिताधरी ॥५२ समाद्रवेता दुर्गा वै पतङ्गानिव पावकम् । तावायान्ती ततो रोद्रो दृष्ट्वा क्रोधपरिप्लुता ॥५३ सिशियां भ्र फुटी चक्र चकार परमेश्वरी । अ.कुटीवुटिलाद्देव्या ललाटफरकाद्रुतम् । याली करालवदना निःसृता योगिनी शुभा ॥५४ पटवाङ्गमादाय करेण रौद्रसिं च कालीग्रमकोशमुग्नम् । संशुशगात्री मधिराप्ताङ्गी नरेन्द्र मूनोस्रजमुद्वहन्ती ॥५५ याचित्राङ्गन चिच्छेद पट वाङ्गन परारणे । न्यपूदयद् भृश क्र दा सरथान गजानिपून् ॥५६ चण्डमुण्ट वध वर्णन ] [ ४१ इसके उपरान्त देवी के सिंह ने उग रग स्थल मे अपनी जटाओ को हिलार दानवो को पाट दिया था। उनमे कुछ को तो हाथो के थोडों से गिराया था और कुछ को लीला ही में मुख में चीर डाला ॥५॥ कुछ दानको को अपने नडों में मार दिया और कुछ को अपने उर स्थल से बन कर गष्ट र दिया था। पर्वत को कादग में निवासी सिंह के द्वारा वरमान होते हुए तया भूतगलो के द्वारा जो देवी के अनुचर थे मारे हुए होकर वे मब दानद घाड, मुण्ड के पास प्रागार आगये। उन दोनो ने अरती मेना को जब आत्त दशा में देखा तर वे दोनो कोध से होठों को फटपटाने नगे ये ॥५१-५२।। दोनो क्रोध मे भर पर उम दुर्गा पर बाक्रमणकारी हुए जमे पतगे पावन पर आक्रमण पिया करत हैं। उम समय में सैट रूप वाले उन दोनो को आते हुए देवार देवी क्रोध मे एक्दम भरगई यो और परमेश्वरी ने अपनी नृाटो बिगिया कर लिया था। देवी के भूटियों के दुटिन होने मेलनाट फना से आहुन पराल मुग वाली शुमा योगिनी वाली निग्ली घी जिसके हाथ में यगया और एक परम रोद अमि थी जो पान के समान उन तथा म्यान से वाहिर थी। वह पाती गप्प गात्र वाली यो और उमरे अग रुधिर से समाप्त हो रहे थे। नरेन्द्रो के मस्नोमीमाता गले में धारण परने वारी थी॥५५।। उम माली ने पुलमो तो पा में शाट डाला था पोर कुछ को गवान से मार दिया पा : अत्यन्त प्रद होकर रयों और हापियो पर स्थित मा ओं को मार गिराया था ॥५॥ चर्माड कुशं मुद्गर च मधनु सप्टिकम् । पुअर सह मन्प्रेण प्रचिक्षेप मुगेऽम्बिका ।।५७ सचम्यूपररपं ससारयितुरङ्गमम् । सम योधेन यदने क्षिप्य चवंयतेऽम्बिका ।।५८ एक जग्राहवेशेषु ग्रोवायामपर तपा। - PATTI

४२ ]
[ वामन पुराण
ततस्तु तद्वल देव्या भक्षित सगणाधिपम् ।
रुरुर्दष्ट्वा प्रदुद्राव त चण्डो ददृशे स्वयम् ॥६०
आजधानाथ शिरसि खपाङ्गन महासुरम् ।
स पपात हतो भूम्या छिनमूल इवद्रु म.॥६॥
ततस्त पतित दृष्ट्वा पशोरिव विभावरी ।
कोशमूत्कर्त्तयामाम करादिचरणान्तिकम् ॥६२
साच कोश समादाय ववन्ध विमला जटाः।
एका न बन्धमगमत्तामुत्पाटाक्षिपद्भुवि ॥६३
उम अम्बिका ने चर्मारकुश, मुद्गर, सघनुष्क,मानुहिक और यन्त्र
के साथ पुञ्ज र को मुख पर प्रक्षिप्त क्यिा था ॥५७॥ चक्र और कूवर
के महित रथ को तथा सारथि और घोडो के सहित रथ की एव योधा के
के साथ अपने मुख म हालकर उम अम्बिका ने चवा लिया था ॥५८।।
एप को घोटी पाड पर और दूसरे की गरदन परह कर अपने घर में
दवा पर मौत के मुह में भेज दिया या ॥५६॥। इसके पश्चात् उसके
बल को गणाधिप क सहित दवीन बालिया था ।रु देखकर दौडा या
उमे चण्ड ने स्वय देवा पा ॥६०॥ स महामुर के शिर मे सडग से
प्रहार दिया था जिमसे पटे हुए मून वाले वृक्ष की भांति
वह
जमीन
पर गिर पहा पा॥१॥ उमरे पश्चान् उम विभावरी ने उसे एक पशु
के समान पहा हा देगार उमा कोश को बरो से धरणों क अत
तरतर दिया था ॥६२॥ और उमने कोग को लेगर विमल घटाओ
को बांध किया था। एक रम्य में नहीं आई पी उमे उत्साटित करके
भूमि पर दिया था ॥६॥

चण्डमुण्ड वध वर्णन ] [ ४३ श्रुत्वं वचन देव्या. साऽभ्यद्रवत तावुभो । प्रदुद्र वतुर्भयात्तौ दिशमाथित्य दक्षिणाम् ॥६७ ततस्तावपि वेगेन प्राधावत्यक्त वाससा । साऽधिरुह्य महावेग रासभ गरुडोपमम् ।।६८ यतो गतौ हि तौ दैत्यो त वानुययौ शिवा । सा ददर्श तदा पौण्ड महिप वै यमस्य च ॥६६ सा तस्योपाटयामास विपाण भुजगाकृतिम् । त प्रगृह्य करेणव दानवानन्वगाजवात् ।।७० वह मुतरा रोद्री उत्पन होगई थी जिसके वेश तल से अभ्यक्त थे। उसका शरीर आधा शुक्ल और बाधा कृष्ण था जिसे उसन धारण कर रखा था ॥६४। वह एक बार बोली भी कि मैं महामुर को मार देती हूँ । उस समय में उसका नाम चण्डमारी-यह विख्यात किया गया था ॥६५।। उससे कहा था-हे सुमगे जामो और चण्डमुण्डो को यहां पर ले जाप्रो। मैं उनको स्वय ही मारदू गो तुम तो उन्हें यहा पर ले आने पोही योग्य होती हो ॥६६॥ इस प्रकार के देवी के वचन को श्रवण करके वह उन दोनो को ओर दोहो यो । वे दोनो भय से मात्त होकर दक्षिण दिशा या आश्रय लेकर दौड गये थे ॥६७॥ वे दोनो बड़े ही पेग से दौड़ रहे थे । वह भी वस्त्र त्यागकर दौडी और महान् वेग वाले गरुड के समान रासभ पर अधिरूल होगई भी ॥६॥ जहाँ वे दोनो दय गये थे वही पर वह शिवा भी गयी थी। उस समय में उसने यम राज के पोण्ड महिप को देखा था ।। ६६ ।। उसने उम महिप के भुजग की आकृति याले विपाण को उयाट लिया था। उसको हाय से ही प्रहारसे वह वेग से दानवो ये पोहे पनी गई थी॥७॥ तो चापि भूमि सत्यज्य जग्मतुगंगन तदा । वेगेनाभिसृता सा च रासभेन महेश्वरी ॥७१ ततो ददर्श गरुड पन्नगेन्द्र विपादिपु ।

४४ ]
[ वामन पुराण
भयात्तश्चैव गरुडो मांसपिण्डोपमो बभौ ।
न्यपतस्तस्य पत्राणि रौद्राणि हि पतत्रिणः ॥७३
खगेन्द्रपनाण्यादाय नाग कर्कोटक तथा ।
वेगेनाथासरई वी चण्डमुण्डौ भयातुरौ ॥७४
सप्राप्तौ च तदा देव्या चण्डमुण्डौ महासुरी।
बद्धौ कर्कोटकेनैव बद्ध्वा विन्ध्यमुपागमत् ।।७५
निवेदयित्वा कौशिक्या: कोशमादाय भैरवम् ।
शिरोभिनिवेन्द्राणा तायपन व शोभनैः ।।७६
कृत्वा स्रजमनौपम्या चण्डिकायै न्यवेदयत् ।
घरा च मृगेन्द्रस्य चर्मणा सा समापयत् ।।७७
वे दोनों फिर भूमि का त्याग करके उम समय मे आकाश में गमन
पर गये थे। वह महेश्वरी भी बडे वेग से रामभ के द्वारा उनके पीछे
गई थी ॥७१।। इसके पश्चात् उसने गरुड को तथा विपादि मे पन्नगेन्द्र
पोटक यो देखा था और देस कर ही अवं रोमा हो गया था ।।७२।।
भय मे आत्तं गरुड माम के पिण्ड के समान होगया था और उस पतनी
बरोद पत्र गिर गरे ॥७३॥ उस खगेन्द्र के पत्रो को तथा ककोटक
नाग को लेगर वह देवी बडे वेग से आगे चनी थी और चण्ड, मुण्ड
अत्यन्त भयभीत होगये थे ।।७४॥ वै महासुर चण्ड-मुण्ड उस समय देवी
के समीर में प्राप्त होगये थे । देवी ने उन दोनों को कर्कोटक से बांधकर
दिन्शनर पर नह बागई यो। वहाँ उनको निवेदिा कर दिया था।
फिरीशियरी के भैरव कोश को ग्रहण पर दानरेन्द्रो के मस्तको से तया
शोभन सायं पत्रों से एक अनुरम माला परी रचना करके चण्डिका को
निवेदिती यो। उनले मृगे ये चम्म को घरा समति की
भी॥५-७७11
यजमन्या पोन्द्रस्य पन मूनि नियध्य च ।
बारमना सा परी पानं धिरं दानयेष्यपि ॥७८
पण्ड स्वादाय गुष्ट प मुण्ड पामुरलापको।
परारपिता दुर्गा विगिरस्को महागुरी 11७६

चण्डमुण्ड वध वर्णन ] [ ४५ तयोरेव तदा देव्या शेखरः शिरसा कृतः । कृत्वा जगाम कौशिक्याः सकाश शर्वया सह ।।८० समेत्य साऽब्रवीद्देवि गृह्यता शेखरोत्तम. । ग्रथितो दैत्यशीभ्या नागराजेन वेष्टितः ।।८१ त शेखर शिवा गृह्य चामुण्डा मूनि विस्तृतम् । बवन्ध प्राह चैवैना कृत कर्म सुदारुणम् ।।८२ शेयर चण्डमुण्डाभ्या यस्मादारयसे शुभम् । तस्माल्लोके तव स्यातिश्चामुण्डेति भविष्यति ।।८३ इत्येवमुक्त्वा वचन त्रिनेत्रा ता चण्डमुण्डस्रजधारिणी वै। दिग्वासस चाभ्यवदत्प्रतीता निपूदयस्वारिवलान्यमूनि ॥८४ सा त्वेवमुक्ताऽथ विपाणकोट्या सुवेगयुक्तेन शरासनेन । निपूदयन्ती रिपुसन्यमनचचार चान्यानसुराश्वखाद ।।८५ ततोऽम्बिकायास्त्वथ चण्डमुण्डौमार्या च मिहेन चभूतसर्थः । निपात्यमाना दनुपु गवास्तै ककुमिन सिंहमुपाश्रयन्तम् ।।८६ एक अन्य माला खगेन्द्र के पन्नों से मस्तक में निबद्ध की थी। उसने अपने आप से दानवों में भी रुधिर का पान किया था ॥७८॥ चण्ड और मुण्ड दोनों असुरनाय को लाकर उस दुर्गा ने पुपित होकर बिना शिर वाले कर दिये थे ७६। उस समय में उन्ही दोनो से देवी ने शिर का शेखर बनाया था। उसे बनाकर शर्वा के सहित कौशिकी के पास गयी थी ।।८।। उनके समीप में पहुंच कर उसने कहा-हे देवि ! इस अत्युत्तम शेखर को आप ग्रहण कीजिये । यह दैत्यों के मस्तकों से प्रथित किया गया है और नागराज के द्वारा वेष्टित किया गया है ॥१॥ शिवा ने उस शेखर को ग्रहण करपे उस विस्तृत शेखर को चामुण्डा के मस्तक में बांध दिया था कि आपने बहुन सुदारुण धम दिया है ॥२॥ क्योंकि आप चण्ड मुण्डो से निर्मित शुभ शेषर को धारण कर रही हैं इमोलिए लो में आपकी चामुण्डा--- यह गति होगो ॥३॥ इस प्रकार से कहो गयो उस चामुण्डा देवी ने इसरे उपरान्त बहे वेग से युक्त होकर विपाप कोटि से तथा शरासन [ वामन पुराण से उस प्रतीव उग्र मत्रों की सेना का संहार करती हुई मंधान किया था और असुरों का प्रक्षण पर गयी यो॥४.८५|| इसके अनन्तर उस अम्बिका देवी के सिंह के द्वारा और भूत सयों के द्वारा चण्डमुण्ड एवं अन्य दानव निपारयमान हो गये थे और उन्होंने कुपी सिंह के उपाधय ग्रहण किया था ॥८६॥ ५६-~शुम्भ और निशुम्भ वध वर्णन चण्डमुण्डौ च निहती दृष्ट्वा सैन्य च विद्र तम् । समादिदेशातिबल रक्तबीज महासुरम् ॥१ अक्षौहिणीना विशद्भिः कोटिभि. परिवारितम् । तमापतन्त दैत्याना वल दृष्ट्वं व चण्हिवा ॥२ मुमोच सिंहनाद वै काल्या सह महेश्वरी । निनदत्यास्ततो देव्या ब्रह्माणी मुखतोऽभवत् ॥३ हसयुक्तविमानस्था साक्षसूत्रकमण्डलु.। माहेश्वरी त्रिनेत्रा च वृषारूढा त्रिशूलिनी ॥४ महाहिवलया रोद्रा जाता कुण्डलिनी क्षणात् । ततोऽथ जाता कौमारी वहिपता च शक्तिनी ॥५ समुद्भूता च देवर्षे मयूरवरवाहना। बाहुभ्या गरुडारूढा शङ्खचक्रगदासिनी ॥६ शाङ्ग वाणधरा जाता वैष्णवी रूपशालिनी। महोग्रमुशला रौद्रा दष्ट्रोल्लिखितभूतला ॥७ महर्षि पुलस्स्य ने कहा--चण्डमुण्डो को मरा हुआ और समस्त सेना को वहां से भागी हुई देखकर फिर अत्यन्त बलशाली महासुर रक्तबीज युद्ध करने का आदेश दिया गया था । तीस करोड अक्षौहिणी सेना से सयुत होकर आते हुए उस दैयो के बल को चण्डिका ने देखा या ॥१२॥ उसी समय काली के साथ महेश्वरी ने सिंह नाद किया था । इस प्रकार से निनाद करती हुई महादेवी के मुख से ब्रह्माणी हुई थी ॥३॥ हसयुक्त विमान पर सस्थित, अक्षसूत्र और कमण्डलु ग्रहण करने वाली, तीन ४८ ] | वामन पुराण लोक्य में मर गया था सुनकर देवेशर शूपाणि विमोचन प्रभु वही माग पे और उन्होंने बन्दना करके फिर अस्विका से कहा था ॥६. ११॥ हे दुर्गे ! मैं मागया है। अब आप मुझे धागा दो, मैं या परू उनके वाक्य के साथ ही देवो के देह से समतन्न होने वाली शिया उपस्थित होगई और उसले देवेश से कहा-है शार ! दूत वन कर जाओ और शुम्भ तथा निशुम्भ से यह मन्देश कर हो कि क्या वे जीवित रहना चाहते हैं। यदि ऐमा है तो वै दुराचारी अब मात रमातल में चले जा । इन्द्र स्वर्ग का मुग भोगे तथा समस्त देवगण व्यथा से रहित हो जावें ॥१२-१४॥ यजन्तु ब्राह्मणद्यामी वर्णा यशांश्च साम्प्रतम् । नोचेद्वलावलेपेन भवन्तो योद्ध मिच्छथ १५ तदागच्छध्वमव्यग्रा एपाऽह वितिपूदये । यतस्तु सा शिव दौत्ये भ्ययोजयत नारद ॥१६ ततो नाम महादेव्याः शिवतीत्यायन । ते चापि शकरवचः श्रुत्वा गर्वसमन्वितम् । हुकृत्वाऽभ्यद्रवन्सवें यन कात्यायनी स्थिता ॥१७ ततः शरैः शक्तिभिरडकुशवरैः परश्वधः शुल भुशुण्डिपट्टिशैः । प्रासः सुतीक्ष्णः परिपंच विस्तृतवतुर्देत्यदरी सरस्वतीम् ॥१८ सा चापिवार्णवरकामुकच्युननिच्छेद क्षस्त्राण्यथ वाहुभित राह जधान चान्यान्रचण्डविकमा महामुरान्वारगशतैमहेश्वरी ॥१६ मारी त्रिशूलेन जधान चान्यान्लष्टङ्ग पातरपगश्च कोशिको । महाजलक्षेपहतप्रभावान्याह्मी तथाऽन्यानसुनराश्चकार ॥२० माहेश्वरी शूलविदारितोरसश्चकार दग्धाश्च पराश्च वैष्णवी। शपत्याकुमारीकुलिशेन चण्डीतुण्डीतुण्डेन चक्रे णवराहरूपिणी ।। ये ब्राह्मण आदि वर्ण सब अब यज्ञादि का यजन करे । यदि ऐमा वे नहीं करते हैं तो और मुझमे युद्ध ही करना चाहते हैं तो अभ्यग्र होकर शीन मेरे सामने पाजावें मैं उनका सहार करने को उद्यत हूँ। हे नारद ! क्योकि उस देवी ने भगवान् शिव दो दूत कार्ग में नियोजित शुम्भ और निशुम्म वघ वर्णन ] [ ४६ क्यिा था तभी से उस महादेवी का नाम शिवदूती-यह पड गया था। उन्होंने भी गर्व सेयुक्त शकर के वचन को सुन कर सव के सब हु कार परके युद्ध के चिये पडे थे जहाँ पर वह कात्यायनी देवी स्थित यो ॥१५-१७।। इसके पश्चात् उन दोनो दैत्यो ने सरस्वती देवी पर शर, शक्ति, अकुश, परश्वध, शूल, भुशग्डो, पट्टिश, सुतीक्षण प्रास, परिघ आदि विस्तृत हथियारों से वर्षा की यो॥१८॥ उस देवी ने भी अपने धनुष से बाणो के द्वारा शस्त्रो के सहित उनकी भुजाओ को काट दिया था। उस शहेश्वरी ने संकडों बाणों से अन्य बडे वीर योधा महा- सुरो को मार डाला था ,॥१६॥ मागे ने भूत से, नाशिको ने स्वट्वाग के प्रहारो से तथा ब्राह्मी ने अन्य बहुत से अतुगे को महाजल मे क्षेप करके हत प्रभाव वाले कर दिया था ॥२०॥ माहेश्वरी ने भूत से असुरो के वक्षः स्थल को फाड दिया था। वैष्णवी ने अन्यों को दग्ध कर दिया। कुमारी ने शक्ति से-चण्डी न कुलिश मे और वराह रूपिणी न तुण्ड एव चक्र मे असुरो वा निहनन किया था ॥२१॥ मविभिन्नानपि नारसिंही अट्टहासैरपि रुद्रदूनी। रुद्रस्त्रिशूलेन तथैव चान्यान्विनायकनापि परश्वधेन ॥२२ एव हिदेव्या विविधस्तु रूपनिपात्यमाना दनुपु गवास्ते । पेतुः पृथिव्यां भुवि चापि भूतस्ते भक्ष्यमाणा: प्रलयं प्रजग्मु ॥२३ ते वध्यमानास्त्वथ देवताभिर्महासुरा मातृभिरालाश्च । विमुक्तवेशास्तरलेक्षणा भयात्तं रक्तबीज शरण हि जग्मुः ॥२४ स रक्तबीजः सहसाऽभ्युपेत्यवरास्तमादायचमातृमण्टलम् । विद्रावयन्भूतगारणासमन्ताद्विवेश कोपाम्फुरिताधरश्च ॥२५ तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मातरः शस्त्र: शितानं दितिजववपुः। योरक्तविन्दुन्यंपतपृथिव्या स तत्भमास्त्वपरोऽपि जने ॥२६ सतश्च मारी स्वयमम्बिकाश्य प्रन्यता साम्प्रतमित्युवाच । पिवस्व चण्डे रुधिर त्वरानेवितम्य वक्र वडवानलाभम् ॥२७ सा त्वेवगुत्ता वरदाऽम्बिसा हि वितत्य व विकराल तुष्ट नभ.स्पृश्पृथिवीस्पृगास्यत्वा चिरंतिष्ठति पन ५० ] । वामन पुराण नारसिंही ने नखो द्वारा वितीर्ण किया था, रुद्र दूती ने जोर के हट्टहास से नष्ट किया था, रुट ने त्रिशूल से असुरो को मारा था और विनायक ने परश्वध से अन्य असुरो का हनन किया था ॥२२॥ इस प्रवार से देवी के द्वारा अनेक रूपों से निपात्यमान वे समस्त दानव भूमि में गिर गये थे और भूतगणो के द्वारा भक्ष्यमाण होकर नाश को प्राप्त होगये थे॥२३।। इसके अनन्तर देवगण के द्वारा वध्यमाव तथा मातृगण के द्वारा समाकुल वे असुर खुली हुई चोटी वाले भय से सरल नेत्रो वाले होकर रक्त बीज के शरण मे गये थे ॥२४॥ वह रक्त बीज सहसा श्रेष्ठ अस्त्र ग्रहण कर मातृमण्डल के समीप मे भागया था। उसने समस्त भूतगण को भगाते हुए रणस्थल मे प्रवेश किया था। उसके होठ क्रोध से घडक रहे थे ॥२५।। मातृगण ने आये हुए उसे देखकर उम दैत्य पर तीक्ष्ण शस्त्रो से प्रहारों की वर्षा करदी थी। उसके रक्त की बुद जो गिरती थी उसी से पृथ्वो पर उसी जैसा दूसरा खडा हो जाया परता था ॥ २६॥ इसके पश्चात् भारी अम्बिका स्वय यह बोली-अम इसको मारो। हे घण्डे ! बडवानल के समान मुख को फैलाकर इस शत्र के रुधिर का पान करो॥२७॥इस प्रकार से कहे जाने पर वरदा अम्बिका ने अपना विकराल एव अग्रमुख फैला दिया था जो परम तुष्ट था। भाषाश और पृथिवी को स्पर्श करने वाले मुख को करके चर्ममुण्डा बहुत समय तक स्थित होगई थी ॥२८॥ ततोऽम्बिका देशविकर्षणाकुल कृत्वारिपु प्राक्षिपस्वे च वक। विभेद शुलेन तथाऽप्युरस्त: क्षतोद्भवो वा न्यपतश्च वक्र ॥२६ सतस्तु शोपं प्रजगाम रक्त रक्तक्षय होनवलो बभूव । तं होनवीयं शतधा चकार चक्रण चामीकरभूपितन ॥६० तस्मिन्हते वै दनुमन्यनाये ते दानवा दीनतरं विनेदुः । हातातहा भ्रारिति व पन्ता क्व यासितिष्ठस्व मुहूतमेहि ॥३१ तपारे विलुलितरेश पाशा विशीर्णधर्माभरणा दिगम्बरा । निपातिताधरणतले मृहान्या प्रदुद्र गिटिरमृह्य दैत्याः ॥३२ शुम्भ और निशुम्भ वध वर्णन ] 47169 [ ५१ विशीर्णचर्मा युधभूषणं तद्वलं निरीक्ष्येव हि दानवेन्द्रः । विकीर्ण चक्राक्षरथेनिशुम्म:क्रोधान्मृडानी समुपाजगाम ॥३३ खड्ग समा दया च चर्मभास्वरघुन्वञ्छिरःप्रेक्ष्य च स्पमस्या । सस्तभ्य मोह ज्वरपीडिताऽथ चिने यथाऽसौ लिखितो वभूव ॥६४ त स्तम्भित वीक्ष्य सुरारिमने प्रोवाच देवी वचन विहस्य। बनेन वीर्येण सुरास्त्वया जिता अनेन मा प्रार्थय से वलेन ।।३५ इसके अनन्तर केशो के विवर्षण से आकुल शत्र, को वापर अम्बिका ने अपने मुख में हाल लिया या । शूल स वक्षस्थल को भेदन कर दिया या ओर मोदव वह मुख में गिर गया था ॥२६॥ इसम उसका रक्त मूख गया था और रक्त के क्षोण हो जान पर वह हीन बल दाला हो गया था। उमी होन वीर्य को स्वर्ण भूपित चक्र से संकहो टुकड़े कर दिये थे ॥३०॥ उस दैत्यों के स्वामी के मारे जान पर वे सब दानव दीन स्वर से चिल्लाने लगे। है तात! हा भाई ! ऐसा पुकारते कह रहे थे-आप कहां गये ? थोड़ी देर तो ठहरो, यहा आओ ॥३१॥ इसी भांति दूमरे जो दानव थे उनके केशपाश वितुलित होगये थे और चर्माभरण विशीर्ण होगये थे। एक्दम नगे उनको मृडानी ने भूमिपर गिरादिया था। शेप दैत्य गिरि पर चढकर भाग गये थे ॥३२॥ चर्माभरण और मायुधों से विशीर्ण उस बल को दानवेन्द्र ने देखा था और विकोणं चाक्ष रथ मे मास्ड होकर निशुम्म व क्रोध से मृहानी पर चढकर यागया पा॥३३॥ उमने चमभास्वर खा को ग्रहण करके इस देवी के रूप को देखकर शिर को हिलाते हुए मोह से सस्तम्भित हो गया और ज्वर से पीड़ित होतर चित्र में लिखे हुए की भांति होगया पा ॥३४॥ देवी ने उस सुरारि को अपने मागे स्तम्मित देख कर हमते हुए यह वचन रहे थे। इमी वीर्य से तूने ममस्त देवगण जीत लिया या और ऐसे ही वीर्य बल से बलात् मुझे चाहता या ॥३॥ शुदा तु वाक्यं कौशिक्या दानवः मुचरादिव । प्रोवाच चिन्तयित्वाऽथ वचन वदता वरः ॥३६ ५२ ] वामन पुराण मृकुमार शरीरा व मच्छस्त्रपतनादपि । शतधा यास्यसे भीरु आमपात्रमिवाम्भसि ॥३७ एव सचिन्तयनर्थ त्वा प्रहत्त न सुन्दरि । करोमि बुद्धि तस्मात्त्व मा भजस्वायतेक्षणे ॥३८ मम खङ्गनिपात हि नेन्द्रो धारयितु क्षमः । निवर्त य मति युद्धाद्भार्या मे भव साम्प्रतम् ॥३६ इत्थ निशुम्भवचन श्रुत्वा योगेश्वरी मुने । विहस्य भावगम्भीर निशुम्भं वाक्यमब्रवीत् ।।४० नाजिताऽह रणे वीर भवे भार्याहि कस्यचित् । भवान्यवीह भार्याथी ततो मा जय सयुगे ॥४१ इत्येवमुक्त वचने खड गमुद्भाम्य दानवः । प्रचिक्षेप तदा वेगात्कोशिकी प्रति नारद ॥४२ बौशिकी के इस वाक्य का पक्षण कर दानवेन्द्र जो बोलने वालों में बहा ही श्रेष्ठ पा, बद्भुत देर मे सोच कर यह वचन कहा था ॥३६॥ हे भी ! आपतो सुवुमार अगो वाली हैं । मेरे शस्त्र के गिरने से जल मे बच्चे पान की भाति सैकडो टुकड़ों वाली हो जाओगी।।३७॥हे सुग्दरि ! यही विचार करते हुए तुम्हारे ऊपर प्रहार नही करता हूँ। इसलिये हे आयत नेत्रो वाली! तुम मेरे पास ही रहो अर्थात् मुझे अपना स्वामी बनालो ॥३८॥ मेरे घग प्रहार को तो इन्द्र मी सहन करने मे मस- मपं है। युद्ध से अपनी बुद्धि हटालो और थब भार्या हो जाओ ॥३६॥ हे मुन ! ऐग निशुम्भ य वचन सुनकर योगेश्वरी हस पडी जो हसी बडे भाषपूर्ण एक गम्भीर पी। वह पिर निशुम्भ से बोली ॥४०॥ रण मे ममिता में किसी की भी भार्या नहीं होगी। आप यदि मुझे कार्या बनाना पाहने हैं तो फिर युर में मुझे पराजित परदो ॥४१॥ हम वचन बहन पर दानव ने राग को घुमार हे नारद ! जान समय में पड़े गाजरीपर दिया था ॥४२॥ समापनन्त निस्त्रिश पट महंगवा जिभिः। पिच्छेद पर्मणा तदद नगिनागवत् ॥४३

शुम्भ और निशुम्भ वध वर्णन ]
] ५३
खड्ग सचर्मणि च्छिन्ने गदा गृह्य महासुरः ।
समाद्रवत्कोशभवा वायु वेगसमो जवे ॥४४
तस्यापतत एमागु करौ लियो समौ दृढो ।
गदया मह चिच्छेद क्षु ग्ण रणे स्विका ॥४५
तस्मिन्निपतिते रौद्र सुरशनौ भयकरे ।
चण्डयाद्या मानरो हष्टावक्र . किलकिलाध्वनिम् ॥४६
गगनस्थास्तनो देवा. शनातुपुरोगमा
जयस्व विजयेत्यूचुईष्टा शनी निपानिने ॥४७
ततस्तूर्यायवाद्यन्न भतसड समन्ततः ।
पुष्पवृष्टिं च मुमुचु मुरा कात्या यनो प्रति ॥४८
निशुम्भ पतित दृष्ट्वा शुम्भः क्रोधान्महामुने ।
वृन्दारक समारुह्य प्रासप्राणि समभ्यगात् ।।४६
देवो न उस अपने कार प्राते हुए निस्चिरा को पट्वहंग बाणो से
धर्म के साथ छेदन कर दिया था। वह एक बडा अद्भुत ही कार्य
हुमा या ।।४३।। चर्प के साय सग के छिम होने पर महामुर ने गदा
उठाली पो और कोशिकी पर वायु के वेग के तुल्य होकर आक्रमण
किया था ॥४४॥ उसके गिरते ही दोना हाथ दृढना से श्लिष्ट हो गये
थे और रण स्थल मे अम्बिका ने गदा के सहित क्ष रप मे छिन कर
दिये थे ।।४।। उस महान् गैद्रदेव शत्र के निपनिन हो जाने पर जो के
अत्यन्त भयकर या चण्डी आदि समी मातृगग बहुत प्रसन्न होगई थी
और किलकिला हर को ध्वनि करने लगी थी॥४६॥ फिर तो इन्द्र
मादि समस्त देवता माकाश मे स्थित होकर प्रमान होते हुए विजय हुई
षय हो, यह कहने लगे थे क्यो कि शन का निपातन हो गया या
॥४७॥ फिर तो चारों ओर भून सपो के द्वारा तूप वाय वजने लगे ये
सुरो ने कात्यायनी के ऊपर पुर वृष्टि को यो ॥४८॥ हे महामुने
निशुम्भ मर गया तो शुम्भ क्रोध में भर कर प्राप्त हाथ म लेकर वृन्दा-
रक पर समारूढ़ हो याक्रमण करने वाना होगया पा॥au
जद

५४ ]
[ वामन पुराण
तमाप तन्त दृष्ट्वाऽय सगजं दानवेश्वरम् ।
जग्राह चतुरो वाणाश्चन्द्रार्धाकारवर्चसः ।।५०
क्षुरप्राभ्या सम पादौ द्वौ चिच्छेद द्विपस्य सा ।
द्वाभ्या कुम्भे जघानाथ हमन्ती लीलयाऽम्बिका १५१
निकृताभ्या गजा पद्भूया निपपात यथेच्छया।
शवज्रपमा क्रान्त शैलराजशिरो यथा ॥५२
तस्याजितनामस्य शुम्भस्याप्युत्पतिष्यतः ।
शिरश्चिच्छेद वाणेन कुण्डलाल कृत शिवा ॥५३
छिन्न शिरमि दैत्येन्द्रो निपपात सकुञ्ज।।
यया स महिए क्रौञ्चो महासेनेन सहतः ॥५४
श्रुत्वामुरामुररिपूनिहतौमृडान्या सेन्द्रा ससूर्यमरुश्विवसुप्रधाना।।
आगत्यतगिरिवरविनयावनम्रादेव्यास्तदा श्रुतिसुखत्विदमीरयन्ता
उम आते हुए गन के सहित दानवेश्वर को देखकर चन्द्रार्धाकार
वर्चम वाले चार वाणो को ग्रहण किया था क्ष रप्रो से हाथी के दो पैर
ठिन पर दिये थे और दो मे अम्बिका ने हंसते हुए लीना हो से दोनों
दूमों पर प्रहार किया था ॥५०-५१॥ पैरों के कट आने पर हाथी
यपेन्टा में गिरगया था जिम तरह इन्द्र के वच के बाघात से शैलराज
गिर जाया रता है ॥५२।। गज से हीन उठने हुए गुंभ का शिर जो
पुण्डलों मे भूपित या शिवा ने बाण से काट दिया था ॥५३॥ शिर के

शुम्भ और निशुम्भ वध वर्णन ] [ ५५ नमोऽनु ने विदशरिपुक्षयंकरिनमोऽस्तुतेशतमखपादपूजिने । नमोऽस्नुनमहिपविनाशकारिणिनमोऽस्तुनेहरिह्यनास्वरस्तुता५७ नमोऽस्तु तेऽटाद बाहुशालिनि नमोऽस्तुतेगुम्मनिगुम्भघानिनि । नमोऽस्तुतेचानिहरेत्रिशूलिनिनमोऽस्तुनागरिणचक्रधारिणि।।५८ एवम्नुनामुरवर मुशनाशोप्राह प्रहम्य मुरमिद्धमहर्षि वर्यान् । प्राप्नोमयाऽद्तनमोभवतापमादात्सग्राममून्धिमुरशत्रु जय प्रमोद इमा स्तुति भक्तिपरा नरोत्तमा भवद्धि तामनुवोत्तयन्ति । दु.स्वप्ननाशोमवितान नगपोवस्नथाऽन्योत्रियनामभीप्मिनः ॥६० देदो ने कहा है भगवति-! आपको हमारा नमम्मर है । आप पापो के नाश करने वाली हैं तया देवो के गत्रुप्रो वे दपं का शानन करने वाली हैं । बाप हरि और हर को राज्य देने वाली हैं आपकी मेवा मे हमारा प्रणाम है । हे मममुजों (दवों) के कार्य को करने वाली । आपको नमस्कार है ॥५६॥ बाप देवों के शत्रुओं का क्षय करने वाली हैं और इन्द्र के द्वारा आपके चरण बन्धमान हैं आपको हमारा बारम्बार प्रणाम है । महिषासुर के मारने वाली आपको नमस्कार है। हे हरिहय भास्कर के द्वारा स्तुन होने वाली | आपमे प्रणाम है ।।५७॥ आप अाह बाहुओं से शोभित हैं और शुम्भ-निशुम्भ के घान करन दानो हैं आपकी सेवा में हमारा प्रगाम है । है आत्तिहरे ! हे प्रिनिनि । हे नारायणि ! हे चक्रधारिणी । बापरे निये हम सबका नमस्कार है ॥५८॥ इस प्रकार से स्तुति की गई सुरो के शत्रु ओं का नाश करने वाली वह देवी हेमकर ममस्त सुर-सिद्ध और महगियों में दोनी-मैंन बाप मच लागों के प्रसाद से ही संग्राम में यह बात अद्भुत विजय प्राप्त किया है ॥५॥ जो मरोत्तम मापरे द्वारा की हुई दम स्तुति का कीर्तन भक्ति में परायण होकर करेंगे उनके दुस्दप्न का नाश हो जायगा । इसमें कुछ भी समय नहीं है । अब आप लोग अपना अन्य काई अभीष्ट वर मुझने प्राप्त करलो ॥६॥ यदि वरदा भवती विदशाना द्विजशिशुगोपु याच हिताय । पुनरपि देवरिपूनमरास्त्व प्रदह हुताशनतुन्यशरीरे ॥६१ । वामन पुगण भूयो वधिप्यामि सुरारिमुत्तम संभूय नन्दम्य गृहे यशोदया। तत्रावतीर्णा लवण तथाऽारी शुम्भ निशुम्भदनप्रहारिणी ॥६२ भूय सुरास्तिव्ययुगे निराशनानिरीक्ष्य मारोचगृहे शनकोः । सभूयदेव्याइतिसप्तधा मया सुरान्मरिष्यामिन शामरा करैः ॥६३ भूयो विपक्षक्षपणाय देवा विन्ध्ये भविष्याम्यपिग्क्षणार्थम् । दुवृत्तचेष्टान्दिनिहत्य दैत्यान्भय सभेप्यामिमरा जय हि ॥६४ यदाऽरुणाक्षो भविता महासुरस्तदा भविष्यामि हिताय देवता। महालिस्पेण विनष्टजीवित कृत्वा समेण्यामिपुनस्त्रिविष्टपम् । ६५ इत्येवमुक्त्वा वरदा मुराणा कृत्वा प्रणाम द्विज गवानाम् । विसृज्यभूतानि जगाम देवी ख सिद्धमधुरनुगम्यमाना ॥६६ इद पुराणा परम पवित्र देव्या जन मङ्गलदायि पु साम् । श्रोतव्यमेतनि यतै सदैव रक्षोत्यमेतद्भगवानुवाच ॥६७ देवो ने कहा-पदि आप देवगण को वरदान प्रदान करती हैं तो हम यही चाहते है कि आप द्विज-शिशु और गौओं के हित के लिये यत्न करने वाली रहें । हे अग्नि के ममान शरीर वाली । फिर भी कोई दूसरे देवो के शव हों तो उन्हें आप दग्ध कर देवें ॥६१॥ देवी ने कहा- फिर भी मैं नन्द की पत्नी यशोदा के यहाँ जन्म ग्रहण कर उत्तम सुर शत्रु का वध करूंगी । वहाँ पर अवतीर्ण होकर लवणासुर का तथा दूगरे शुम्भ निशुम्भ के दशनो का सहार करने वाली होऊगी ॥६२।। तिष्य युग मे निराशनो को देखकर मारीचगृह मे शतक्रतुकी देवी से जन्म लेकर शाकसकरो से पुन मैं सात प्रकार से देवो का भरण करूंगी।६३। है देवगण | फिर विपक्ष के क्षपण वे लिय विन्ध्य मे ऋषियो के रक्षण के लिये होऊगी। जो दुराचारी दैत्यो का नाश कर मैं फिर जय प्राप्त महंगी ॥६४॥ जिम ममय मे अरुणाक्ष होगा जो महान् असुर होगा तब मैं देवो के हित के लिये प्रकट होऊंगी। महालि रूप से उसे विनष्ट जीवित करके फिर स्वर्ग मे आ जाऊंगी ॥६५॥ पुलस्त्य ने कहा- वरदा ने इस तरह सुरो से कह कर फिर जिद शेष्ठो को प्रणाम करके और समस्त भूतो का त्याग करके वह देवी सिद्ध संघ से अनुगम्यमान कातिकेय उत्पत्ति वर्णन ] [ ५७ होती हुई आकाश मे चली गई थी ॥६६॥ यह परम पवित देवी का जप है जो पुरुषो को मङ्गल देने वाला है । इस को नियत होकर सदा ही सुनना चाहिए। यह राक्षसो का हनन करने वाला है-ऐमा भगवान् नै कहा है॥६॥ ५७ कार्तिकेय उत्पत्ति वर्णन कथं समहिप: क्रौञ्चो भिन्नः स्कन्देन सुव्रत । एतन्मे विस्तराद्ब्रह्मन्कथयस्वा मितद्य ते ।।१ शृणुष्व कययिष्यामि कया पुण्या पुरातनोम् ।, यशोवृद्धि कुमारस्य कार्तिकेयस्य नारद ॥२ यत्तत्पीतं हुनाशेन स्कन्न शुक्र पिनाकिनः । तैनाकान्तोऽभवब्रह्मन्मन्दतेजा हुताशनः ॥३ ततो जगाम देवाना सका शर्मामतद्य तिः । तैश्चापि प्रहितस्तूर्ण ब्रह्मलोक जगाम ह ॥४ स गच्छन्कुटिला देवी ददर्श पथि पावकः । ता दृष्ट्वा प्राह कुटिले तेज एतत्सुदुद्धरम् ।।५ महेश्वरेण संत्यक्त निद हेद्भवनान्यपि । तस्मात्प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तव धन्यो भविष्यति ॥६ इत्यग्रिना सा कुटिला स्मृत्वा स्वमतमुत्तमम् । प्रक्षिपस्वाम्भसि मम प्राह वहिं न महापगा ।।७ देवर्षि नारदजी ने कहा-हे सुव्रत ! स्कन्द ने महिप के सहित क्रोच का केसे भेदन किया था ? हे अमित ति वाले ! हे ब्रह्मन् ! इसे माप विस्तार पूर्वक मेरे सामने कहिये ॥१॥ महपि पुलस्त्य आप सुनिये, अब मैं परम पुरातन एक कया कहता हू जो परम पवित्र है। हे नारद ! इसमे कुमार कानिकेय को यश की वृद्धि मरी हुई है ॥२॥ जो हुताशन ने पिनाकी के स्कन्न शुक्र का पान किया था हे ब्रह्मन् ! उसमे आक्रान्त होकर अग्निदेव मन्द तेज वाले हो गये थे ॥शा इसके उपरान्त वह अमिता ति बाला अग्नि देवो के समीप मे गया था। ने कहा- ५८ ] [ वामन पुराण उन्होंने भी उसको शीघ्र भेज दिया था और गिर वह ब्रह्म मोर यो गया था ॥४॥ उम पावक ने मार्ग में पुटिना देवी को देपा था। उसको देखकर उमने कहा-हे कुटिले । यह दुधपं तेज है महेश्वर द्वारा यह सत्यक्त है और समस्त भुवनो को यह दग्ध कर देगा । इमरिये हमे ग्रहण कर लो यह तुम्हारा बडा धन्य पुत्र हागा ॥५-६॥ इस प्रकार से अग्नि ने उस कुटिला से कहा तो अपग उत्तम मन स्मरण करणे महापगा ने अग्नि मे कहा-इमे मेरे जल म प्रक्षिप्त कर दो।॥७॥ ततस्त्वधारय वी शावंतजस्त्वपूपुपत् । हुनाश मोऽपि भगवान्कामचारी परिभ्रपन् 16 पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवाहित्यभुक्तत । मासमरथीनि रुधिर मेदो मज्जाऽथ तम्य हि ॥ रोमश्मश्वक्षिकेशाद्या सव जाता हिरण्मया: । हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः ॥१० पञ्चवर्षमहस्त्राणि कुटिला ज्वलनोपमम् । धारयन्ती तदा गर्भ ब्रह्मण स्थानमागता ॥११ ता दृष्टवा मद्मजन्मा सतप्यन्नी महापगाम् । दृष्ट्वा पप्रच्छ केनाय तव गर्भ समाहित ॥१२ सा चाह शाङ्कर यतच्छुक पोत हि वहि नना। तदशक्तेन तेनाद्य नि. क्षिप्त मयि सत्तम ।।१३ पञ्चवषसहस्राणि धारयन्त्या पितामह । गर्भस्य वर्तते कालो नाय पतति कहिचित् ।।१४ इसके पश्चात् उम देवी ने उस श कर के तेज को धारण कर लिया था और पोषण भी किया था । हुताशन भी कामचारी होकर भ्रमण करने लगे थे। पाच सहस्र वर्ष तक हुताशन ने इसे धारण किया था। उसके मारा, अस्थि, रुधिर, मे, मज्जा, रोम, श्मश्र , अक्षिकेश आदि सब हिरण्मय हो गये थे। उसी से वह पावक लोकों मे हिरण्य रेता कहा गया है ।।६-१०॥ पांच हजार वर्ष पर्यन्त ज्वलनोपम उस तेन को कुदिला ने धारण किया था तब फिर यह गर्भ धारण किये हुए वह कार्तिकेय उत्पत्ति वर्णन ] [ ५६ ब्रह्मा के स्थान पर समागत हुई थी ॥११॥ पद्मजन्मा ब्रह्माजी ने संतप्त होती हुई उम महापगा को देखा था और देखकर उसमें पूछा था कि किमने तुझे यह गर्म ममाहित किया है ।।१२।। उसने कहा-यह शकर का तेज है जिम शुक्र को अग्नि ने पीया था। उसने अशक्त होकर मुझमें निक्षिप्त कर दिया था ॥१३॥ हे पितामह ! मैंने इसे पांच सहस्र वर्ष से धारण किया है । इस गर्म का यह काल है । यह किसी भी तरह गिरता नहीं है ॥१४॥ तच्छ वा भगवानाह गच्छ त्वमुदय गिरिम् । तत्रास्ति योजनशन रौद्र शरवा महत् १५ तन क्षिप सुश्रीरिण विस्तीर्ण गिरिसानुनि । दशवर्षमहस्रान्ते ततो बालो भविष्यति ॥१६ सा श्रुत्वा ब्रह्मणे वाक्यं रूपिगी गिरिमागता। आगत्य गर्भ तस्याज मुसेनेवाद्रिनन्दिना ।।१७ सा तु सत्यज्य त वाल प्रह्माण महमाऽगमत् । आपोमयो मन्त्रवशात्सजाता कुटिलासती ।।१८ तेजमा चापि शार्वेण रोक्मं शरवण महत् । तन्निवासरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः ॥१६ ततो दशसु पूर्णपु शरदा हि शतेप्वय । बालार्कदीप्तिः सजातो वार: कमललोचनः ।।२० उत्तानशायो भगवान्दिये शरवणे स्थितः । मुखेन समाक्षिप्य रुरोद धनराडिव ॥२१ यह सुनकर पितामह ने कहा-तुम उदयगिरि पर जाओ । यहाँ पर सो योजन का एक विस्तृत महान् रौद्र शरो का वन है ॥१५॥ सुश्रोणि ! उस विस्तृत गिरि के शिखर पर इसको प्रक्षिप्त कर दो। दश सहस्र वर्ष के पश्चात् यह बालक होगा ।।१६। उसने ब्रह्माजी के इस वाक्य का श्रवण करके रूपिणी वह गिरि पर आ गई थी । वहाँ पर उस अद्रिनन्दिनी ने मुख मे ही उम गर्भ का त्याग किया था॥१७॥ उसने उस बालक का त्याग करके पुनः सहसा वह ब्रह्माजी के पास आ गई ६० ] । वामन पुराण यो । आपोमयी वह मन्त्र के वश से सती कुटिला हो गई थी ॥१८॥ उम श कर के तेज से वह महान् शरवण रोक्म हो गया था। और उसमे निवास करने वाले सभी पादप, मृग तथा पक्षीगण सभी रोक्म हो गये थे ॥१६॥ इसके पश्चात् दश सहस वर्ष पूरे होने पर बाल सूर्य के समान दीप्ति से परिपूर्ण और कमल के समान लोचनो वाला बालक समुत्पन्न हुआ था ।।२०॥ उत्तान होकर शयन करने वाले भगवान् उम परम दिव्य शरवण में स्थित थे। मुगु मे अपना अंगुष्ठ लिये हुए घनराट् की भांति रुदन किया करते थे ॥२१॥ एतस्मिन्नन्तरे दिव्या कृत्तिका पट सुतेजस । ददृशुः स्वेच्छ्या यान्त्यो चाल शरवणे स्थितम् ॥२२ कृपायुक्ताः समाजग्मुर्यत्र स्कन्द स्थितोऽभवत् । अह पूर्वमह पूर्व तस्मै स्तन्य विचुक शु. ॥२३ विवदन्ती स ता दृट वा पण्मुख. समजायत । अबीभरच ता. सर्वाः शिशुम्नेहान्त कृत्तिकाः ॥२४ भ्रियमाणः स ताभिस्तु वालो वृद्धिमगान्मुने । कात्तिकेय इति ख्यातो जान: स बलिना वरः ॥२५ एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन्पावक प्राह पद्मभूः । किय प्रमाणः पुत्रस्ते साम्प्रत गुहा ।।२६ स तद्वचनमावण्यं जानन्नपि हि चात्मजम् । प्रोवाच वह्निर्देवेश न वेनि क्तमो गुह. ॥२७ तं प्राह भगवान्धीतस्तेजः पीत पुरा त्वया । यम्बक त्रिलोकेशो जात: शरवणे शिशु ॥२८ इसी बीच मे मुन्दर तेन वाली पट दिल्य वृत्तिकाओ ने उमे देखा था जो बातक शरवण मे मस्थित पा दे स्वेच्छा से हो वहाँ होकर गमन कर रही थी ।।२२।। वे कृपा से युक्त होकर वहाँ पर आगई थी जहाँ पर समन्द स्थित थे। उन सबने पहिले मैं स्तन्य दूगी-पहिले मैं दू गो- इम प्रसार से कह रही थीं ।।२३। इस तरह परस्पर में विवाद करती ईई उनसरो देवार यमुमो थाने होगये थे। फिर उन सब कृत्ति

कार्तिकेय उत्पत्ति वर्णन ]
काओं ने शिशु के स्नेह से उस बालक को दूध पिलाया था ॥२४॥ उन
के द्वारा भरण किया हुया वह बालक हे मुने! वृद्धि को प्राप्त हो गया
था। तभी से वह कात्तिकय इस नाम से विख्यात हुए थे । वह बल-
सालियों में परम श्रेष्ठ थे ॥२शा इसी बीच में ब्रह्माजी ने अग्नि से
कहा-इस समय तुम्हारा पुत्र गुह कितना बड़ा है ॥२६॥ वह उनके
वचन को
सुनकर
अपने
पुन को जानते हुए भी अग्नि ने देवेश से कहा-
मैं नहीं जानता हूं कौनमा गुह है ॥२७॥ भगवान् ब्रह्माजी ने प्रसन्न
होकर कहा-~-आपने पहिले तेज का पान किया था जोकि भगवान्
त्र्यम्बक का था । उससे बिलोक का स्वामी शिशु शरवण में उत्पन्न हुमा
है ॥२८॥
श्रुत्वा पिता महवनः मावकस्त्वरितोऽभ्यगात् ।
बेगिनं मेपमारुह्य कुटिला त ददर्श ह ॥२६
ततः पप्रच्छ कुटिला शोघ्र क्व जसे कवे ।
सोऽब्रवीत्पुत्रदृष्टययं जातः शरवणे शिशुः॥३०
साऽब्रवीत्तनयो मह्यममेत्याह च पावकः ।
विवदन्तो ददर्शाथ स्वेच्छाचारी जनार्दनः ॥३१
तौ पप्रच्छ किमर्थ वा विवादमिह चक्रतुः ।
तावूचतुः पुनहेतो रुद्रशुक्रोद्भवो यदि १३२
तावुवाच हरिदेवो गच्छत त्रिपुरान्तकम् ।
स यद्वक्ष्यति देवेशस्तरकुरुष्वमसशयम् ॥३३
इत्युक्तो वासुदेवेन कुटिलानो हरान्तिके ।
समभ्येत्योचतुस्तथ्य कस्य पुत्रेति नारद ॥३४
रुद्रस्तद्वाक्यमाकर्ण्य हपंनिर्भरमानसः ।
दिष्ट्या दिष्ट्ये ति गिरिजां प्रभूतपुलकोऽब्रवीत् ॥३५
पितामह के इस वचन का श्रवण कर अग्निदेव तुरन्त हो वहां गये
थे। मेप पर समारूढ़ होकर वेग से युक्त उसे देखकर कुटिला ने पूछा-
हे कवे ! इतनी शीघ्रता से आज कहा जा रहे हो ? उसने उत्तर दिया
पुत्र को देखने के लिये जो शिशु शरवण में समुत्पन्न हुआ है ॥३०॥

। वामन पुराए - यह बोली-यह पुत्र तो मेरा है पायर ने पहा-वह मेरा पुत्र है। दोनो इसी प्रकार से आपस में विवाद कर रहे थे कि उन्होंने स्वष्ठा- चारी भगवान जनादं का दर्शन विषा पा ॥३१॥ उन दोनों से पूछा गया था कि वहाँ पर वे रिम लिये वह विवाद कर रहे थे। उन्होंने यहा यदि रुद्र के शुद्र से उमका जन्म हुआ है तो उमी पुत्र के लिये यह विवाद हो रहा था। उन दोनो से देव हरि ने कहा था--बाप दोनों हो शिव के समीप मे चले जाओ । जो कुछ भी वह देवेश ,आज्ञा देंगे वही आप दोनों बिना किसी सशय करना ॥३२-३३॥ इस प्रकार से वासुदेव के द्वारा कहे जाने पर वे दोनों बुटिला और अग्निदेव भगवान शिव के समीप मे पहुच कर हे नारद | यह सब कुछ यथार्थ निवेदन कर दिया था और जानना चाहा था कि वह पुन किसका है ॥३४।। भग- वान् स्ट को उन के वचन को श्रवण कर मन मे बडी प्रममता हुई थी। बहुत हर्ष है-बही प्रसन्नता है---यह कहते हुए हातिरेक से पुलपाय मान होकर गिरिजा से बोले-॥३५॥ ततोऽम्बिका प्राह हर देव गच्छाव तं शिशुम् । प्रष्ट समाश्रयेद्य स तस्य पुत्रो भविष्यति ॥३६ वाढमित्येव भगवान्स मुत्तस्थौ नृपध्वजः । सहोमयाऽकुटिलया पावकेन च धीमता ।।३७ सप्राप्तास्ते शरवण हरोमाकुटिलाग्नय.। ददृशु.शिशुकं त च कृत्तिकोत्सङ्गशायिनम् ॥ ततः स बालकस्तेपा मत्वा चिन्तितमादरात् । योगाच्चतुर्मू तिरभूच्छिशुत्वेऽपि च पण्मुखः ।।३६ कुमारः शकरमगाद्विशाखो गिरिजामगात् । कुटिलामभ्यगाच्छाखो नंगमेयोभ्यगात् ॥४० ततःप्रीतियुतो रुद्र उमा च कुटिला तथा । पावपश्चापि देवेशः परां मुदमवाप ह । ४१ ततोऽव वकृत्तिकास्नाः पप्मुख, कि हरात्मज. । ततोऽत्रवीधर प्रीत्या विशेषवचन मुने ।।४२ कार्तिकेय उत्पत्ति वर्णन ] इसके अनन्तर अम्बिका ने भगवान हर से कहा है देव ! उस शिशु के पास चलना चाहिए और पूछे । वह जिस का भी सग श्रय ग्रहण करेगा उसी का पुत्र होगा ॥३६॥ वृपध्वज भगवान् भी 'बहुन अच्छा' यही कहकर रठ खहे थे। वे उमा कुटिला और बुद्धिमान अग्नि के साय चल दिये ये ॥३७॥ वे सब भगवान् हर, कुटिला, उमा और अग्नि शरवण में प्राप्त हो गये थे। वहा उन्होंने कृत्तिका के गोद में शयन करत हुए उस शिशु को देखा था ॥८॥ इसके पश्चात् उस बालक न आदर स उनके चिन्तित को मान कर वह योग चतुर्मूति हो गया था जोकि शिशुत्व में ही मुख वाला हुआ था ॥३६॥ कुमार तो शकर के समीप में चला गया था,विशाख गिरिजा के पास चला गया, शाख कुटिला के समीप में गया और नगमेय अग्नि के पास गया था ॥४०॥ इसके उपरान्त रद्र भी प्रीति से युक्त होगये तथा उमा, कुटिला और देवेश पावक भी परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए थे ॥४१॥ इसके पश्चात् वे कृत्तिकाएं बोलीं-क्या पण्मुख हर का पुत्र है । इसके बाद में हर ने प्रीति से विशेष वचन कहा था ॥४२॥ नाम्ना तु कात्तिकेयेति युष्माक च भवत्वसौ । कुटिलाया.कुमारोत पुत्रोऽय भाविताऽध्ययः ।।४३ स्कन्द इत्येव विख्यातो गौरीपुत्रो भवत्वसौ। गुह इत्येव नाम्ना च ममासी तनयः स्मृतः ॥४४ महासेन इति स्यातो हुताशस्यास्तु पुत्रकः । सारस्वत इति ख्यातः पुत्रः शरवणस्य च ॥४५ एवमेष महायोगी पृथिव्या स्यातिमेष्यति । पडशत्वान्महावाहुः पण्मुखो नाम गीयते ॥४६ इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्छूलपाणिः पितामहम् । सस्मार देवत:सार्द्ध तेऽप्याजग्मुस्त्वरान्विताः ।।४७ प्रणिपत्य च कामारिमुमा च गिरिनन्दिनीम् । दृष्ट्वा हुताशन प्रीत्या कुटिला कृत्तिकास्तथा ॥४८ ६४ ॥ [ वामन पुराण ददृशुर्वालमत्युग्र पण्मुख सूर्यसनिभम् । मुष्णन्तमिव चक्षुषि तेजसा स्वेन देवता ॥४६ कौतुकाभिवृताः सर्वे एवमूचुासुरोत्तमाः । देवकायं त्वया देव कृत दिव्याग्निना तदा ५० महादेवजी ने कहा--कात्तिकेय-इस नाम से तो यह आप सब का पुत्र होगा। कुमार--इस नाम से यह कुटिला का पुत्र अविनाशी होगा। जो 'स्कन्द-पह इसका नाम विख्यात होगा उससे यह गौरी का पुत्र होगा । गुद--इस नाम से यह मेरा पुत्र होगा ।।४३-४४॥ इसका नाम एक 'महासेन'-यह भी प्रसिद्ध होगा । उससे यह अग्नि का पुत्र होगा। सारस्वत-इस नाम से प्रसिद्ध यह शरवण का भी पुत्र होगा ।।४।। इस प्रकार से महायोगी यह इस भूमण्डल मे ख्याति का प्राप्त करेगा। छ अश होने से महाबाहु यह पण्मुख नाम वाला कहा जायगा ॥४६॥ इतना ही इस प्रकार से कहकर भगवान शूलपाणि ने पितामह का स्मरण किया था। वे भी समस्त देव वृन्द के साथ बड़ी शीघ्रता से वहा पर आगये थे ॥४७॥ उन्होंने काम के शव देवेश तथा गिरिनन्दिनी उमा को प्रणाम करके वहा पर अग्नि, कुटिला और कृत्तिकाओ को भी देखा था ॥४८॥ और एक सूर्य के समान कान्ति वाले छ मुख से सयुन बालक भी देखा था जो अपने अपरिमित तेज से चक्षुओ को शपा रहा था 11४11 सभी सुरगण उस कौतुक से अभिवृत होकर इस प्रकार से बोले थे । हे देव ! उस समय मे दिव्याग्नि के द्वारा आपने देवराय विया पा॥५॥ ततिष्ठ व्रजामोऽद्य तीर्थमौज समव्ययम् । पुरक्षेत्र सरस्वत्यामभिषिञ्चाम पण्मुखम् ॥५१ सेनायाः पतिरस्त्वा देवगन्धर्व किनारा महिषपातयत्वेप तारक च सुदापणम् ।।३२ बादमित्यवीरवः समुत्तस्यु. सुरास्तता। युमारमहित: जग्मुरक्षा महाफलम् ॥५३ कातिकेय उत्पत्ति दर्णन ] [ ६५ तव देवता: सेन्द्रा रुद्रब्रह्मजनाईनाः । यत्नमस्याभिषेकार्थ चक्र मुनिगणः सह ॥५४ ततोऽम्बुना सप्तसमुद्रवाहिना नदी जलेनापि महाफलेन । बनौधिष्वेवसहस्रमूतिभिस्तमभ्यपिञ्चन्तहराच्युताद्याः५५ अभिषिक्तं तु सेनान्या कुमारे दिव्य रूपिणि । जगुर्गन्धर्वऋपयो ननृतश्चाप्सरोगणाः ॥५६ इसलिये अब उठिये औजस अव्यय तीर्थ पर चलें । कुरक्षेत्र और सर- स्वती में इस पण्मुख का अभिषिञ्चन करें ॥५१॥ सभी देव-गन्धर्व तथा किन्नरो की सेना का यह पति होवे । यह महिषासुर तथा परम दारुण तारकासुर का घात करेगा ॥५२॥ 'बहुन ठीक'-यह कह कर भगवान् शिव एव सुरगण खडे होगये और कुमार के सहित महान फल वाले कुरुक्षेत्र को चल दिये थे ॥५३॥ वहाँ पर ही इन्द्र के सहित समस्त देव, रुद्र, ब्रह्मा और जनार्दन ने सब मुनिगणों के सहित इसके अभिषेक करने के लिये यत्न किया था ।।५४।। इसके अनन्तर सातों समुद्र के जल से हर एव अध्युत आदि ने वनौषधियो मे सहन मूत्तियों से उसका अभि- पेक क्यिा था ॥५५॥(उस परम दिन्य रूप वाले सेनानी कुमार के अभिषिक्त होने पर गन्धर्व और ऋपियों ने जयजयकार का गान किया तथा अप्सराओं ने नृत्य किया था ॥५६॥) अभिपिक्तकुमारहि गिरिपुत्री निरीक्ष्य हि । स्नेहादुत्सङ्गग स्कन्द मून्यजिघ्रन्मुमुहुः ॥५७ जिघ्रती कात्तिकैयस्य अभिपेकामाननम् । भात्यद्रिजा यथेन्द्रस्य देवमाताऽदितिः पुरा ॥४८ तदाभिपिक्त तनय दृष्ट वा शर्वो मुदं ययौ। पावकः कृत्तिका व कुटिला च यशस्विनी ॥५६ ततोऽभिपित्तस्य हरः सेनापत्ये गुहस्य च । प्रमथाश्चतुरः प्रादान्छन तुल्यपराक्रमान् ॥६० घण्टाकर्ण लोहिताक्ष नन्दिपैणं च दारुणम् । चतुर्थं वलिना मुख्य स्यात कुमुदमालिनम् ॥६१ । वामन पुराण हरदत्तागरणादृप्ट वा देवा:स्कन्दस्य नारद । प्रददुः प्रमथास्वाश्च सर्वे ब्रह्मपुरोगमाः ।।६२ स्थाणुब्रह्मा गण प्रादाद्विष्णुः प्रादद्गणत्रयम् । सक्रम विक्रम चैव तृतीय च पराक्रमम् ॥६३ गिरि पुत्री गौरी ने कुमार को अभिषिक्त हुआ देखा तो उनका स्नेह उमड पडा और स्कन्द को अपनी गोद मे बिठा लिया था तथा बार-बार उसके मस्तक को सूधने तगी थी॥५७॥ स्वामि कात्तिकेय के उस भीगे हुए मुख को बारम्बार सू घती हुई गिरिजा इस प्रकार से शोमित हो रही थी जैसे पहिले देवो की माता अदिति इन्द्र के मस्तक को सू घती हुई भूपित हुई थी ॥५८! उस समय मे अपने पुत्र को अभि- पिक्त देख कर भगवान् शिव को परम हपं हुआ था। पावक, कृत्तिका, कुटिला जो परम यशस्विनी थी सभी अत्यन्त हर्षित हुए थे इसके उपरान्त भगवान् हर ने सेनापति के पद पर अभिपिक्त को समान पराक्रम वाले चार प्रमथो को प्रदान किया था ॥६०॥ उन चारो गणों के नाम इस प्रकार हैं-घण्टाकणं, लोहिताक्ष, नन्दिपेण जो बहुत ही दारुण था। चौपा बलवानो मे शिरोमणि कुमुद माली नाम से विख्यात था ॥६१ ॥ हे नारद ! शकरदेव के द्वारा दिये हुए गणो को देख कर देवो ने भी जिनमे ब्रह्मा प्रधान थे सब ने स्वन्द को अपने प्रमय दिये थे ॥६२।। ब्रह्माभी ने स्थाणु नामक गण प्रदान किया था विष्णु ने सक्रम-विक्रम और तीसरा पराक्रम ये तीन गण दिये थे ॥६३॥ उक्लेशपखना शको रविर्दण्डकपिन्जली। पन्द्रो मरिण वमुमरिणमश्विनी वत्मनस्दिनी ॥६४ ज्योति तागनः प्रादाजबलजिह्व तया पुरम् । युन्दमुकुन्द युसुम श्रीन्धाताऽनुचरान्ददो ॥६५ चनानुधको त्वष्टा च वेधा निस्थिरसुस्थिरौ । पाणित्यजं कालिकं च प्रादायूपा महावलो ॥६६ स्वर्ण माल पनाहच हिमवान्त्रमधीसमो। प्रादादेवोधितो विन्ध्यवानिवृष्ण' च पापंदम् ॥६७ महिपासुर तारक उपाय्यान वर्णन ! [ ६७ सुवर्चसं च वरुण: प्रददौ चातिवर्चसम् । सग्रहं विग्रह चापि नागा जयपराजयो ॥६८ उन्माद शड. कुकरणं च पुष्पदन्त तथाम्बिका। घस चातिघस वायुः प्रादादनुचरावुभौ ॥६ परिघं वटक भीम दाहातिदहनौ तथा । प्रददावशुमान्पञ्च प्रमथान्पण्मुखाय हि ॥७० इन्द्र ने तत्क्लेश और पकज दिये थे। रवि ने दण्ड और कविञ्जल प्रदान किये थे । चन्द्र ने मणि और वसुमगि समर्पित किये थे । अश्विनी कुमारो ने वरम और नन्दी दिये थे ॥६४॥ हुतापान ने ज्योति-ज्वलज्जित तया पुर दिये थे । धाता ने कुन्द मुकुन्द और कुसुम ये तीन अनुचर दिये थे ॥६५॥ त्वष्टादेव चक्र और अनुचक दो अनुचर दिये थे । वेधा ने निस्थिर और सुस्थिर को दिया। पूपादेव ने महान् बलवाम् पाणिरयज और कालिक दियै थे ॥६६॥ हिमवान् ने उत्तम प्रमथ स्वर्णमाल और घना नाम वाले दिए थे। उच्छित विन्ध्य ने अनिकृष्ण नामक पापद दिया या ॥६७॥ वरुण ने सुवचस और अतिवचंस दिये थे। नागो ने सग्रह-विग्रह-जय और पराजय गण दिये थे ॥६८। अम्विका ने उन्माद- शकुकर्ण और पुष्पदन्त नाम वाले गण दिये थे । घस-अतिघस दो अनु- घर वायुदेव ने दिये थे १६६11 अ शुमान ने परिघ, पटक, भीम, दाह और यतिदहन नाम वाले पांच प्रमथ पप्रमुख को प्रदान किये थे ॥७०॥ महिपासुर-तारक उपाख्यान वर्णन सेनापत्येऽभिषिक्तस्तु कुमारो देवतरथ । प्रणिपत्य भव भक्तया गिरिजा पावक शुचिम् ॥१ पट, कृत्तिकाश्व सरया प्रणम्य कुटिलामपि । ब्रह्माणच नमस्कृत्य इद वचनमब्रवीत् ॥२ नमो भगवती देवीसो नमोऽस्तु तपोधना. । युष्मत्प्रसादाज्जेष्यामि शदू महिपतारको ॥३ ६८ [ वामन पुराण शिशुरस्मि न जानामि वक्त, किंचन देवताः । दीयता ब्रह्मणा सार्धमनुज्ञा मम साम्प्रतम् ॥४ इत्येवमुक्त वचने कुमारेण महात्मना । मुख निरीक्ष्य तत्सर्वा सर्वे विगतसाध्वसा॥५ शकरोऽपि सुतस्नेहात्समुत्थाय प्रजापतिम् । आदाय दक्षिणे पाणी स्कन्दान्तिकमुपायसौ ॥६ अथोमा प्राह तनय पुत्र एह्यहि शसहन् । वन्दस्व चरणौ दिव्यो विष्णोर्लोकनमस्कृती॥७ महपि पुलस्त्य ने कहा- इस प्रकार से बहुत से प्रमथो से विभूषित स्वामि कार्तिकेय सेनापति के पद पर अभिषिक्त हुए थे और सभी देवगण ने कुमार का अभिषेक किया तथा सभी ने अपनी २ ओर से उनको गण भी समर्पित किये थे । इसके अनन्तर कुमार ने भक्तिभाव से शिव-गिरिजा तथा परम शुचि अग्निदेव को प्रणाम दिया था । छयो कृत्तिकाओं को तथा सरसा कुटिला को और ब्रह्मा को भी प्रणाम करके फिर वे यह वचन बोले थे ।।१-२॥ कुमार न कहा-भगवती देवी को मेरा प्रणाम है और समस्त तपस्वियो को मेरा नमस्कार है । मैं अब आप लोगों के प्रसाद से ही महिप और तारक इन दोनो शव ओ पर विजय प्राप्त फरूगा ॥३।। मैं तो एक छोटा-सा शिशु हूं, मैं कुछ भी बोलना नहीं जानता हूँ । ब्रह्माजी के साथ ही समस्त देववृन्द अब मुझे आज्ञा प्रदान करें ॥४॥ महात्मा कुमार के द्वारा इस प्रकार से यह वचन कहने पर उस कुमार का मुख देखकर सब देवता भय रहित हो गये थे ॥५॥ भगवान् श कर भी सुत के स्नेह से उठ कर दाहिने हाथ से प्रजापति को लेकर पद के समीप मे पहुंच गये थे ॥६॥ इसके अनन्तर देवी उमा पुत्र से बोली- है पुत्र ! तुम तो शन्न ओ का हनन करने वाले हो, यहाँ पर माओ, मेरे समीप मे आ जाओ। भगवान् विष्णु के सम्पूर्ण लोको के द्वारा बन्धमान परम दिव्य धरणे की तुम वादना करो ॥७॥ सतो विहस्याह गुह. कोऽय मातवदस्व माम् । यस्यादरात्प्रणामोध्य मियते मद्विधजनः ।।

महिपामुर तारक उपाख्यान वणन ] । ६६ त माता प्राह वचनं कृते कर्मणि पद्मभूः । वक्ष्यते तव योऽय हि महात्मा गरुध्वजः ।। केवल विह मा देव त्वत्पिता प्राह शंकरः। नान्यः परत रोऽस्माद्धि वयमन्ये च देहिनः ।।१० पार्वत्या गदिते स्कन्दः प्रणिपत्य जनार्दनम् । तम्थोकृताञ्जलि पुटस्तत्वाना प्रार्थयतेऽच्युतात् ॥१॥ कृताञ्जलि पुट स्वन्दं भगवान्भूतभावनः । कृत्वा स्वस्त्ययन देवो ह्यनुज्ञा प्रददौ ततः ॥१२ यत्तत्स्वस्त्ययन पुण्यं कृतवान्गरुडध्वज । शिखिध्वजाय विप्र तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥१३ शृगुम्वस्त्ययने पुण्य यत्वाह भगवान्हरिः। स्कन्दस्य बिनयार्थाय वधाय महिपस्य च ॥१४ इसके उपरान्त हम कर गुह ने कहा-हे माताजी | यह कौन है, यह तो मुझे बतला दो जिमको आदर भाव के साथ मेरे जैसे मनुष्य प्रणाम किया करते हैं |८|| उम समय में माता उमा उस गुह में यह वचन कहा-कर्म पूर्ण करने के पश्चात् ब्रह्माजी यह बतलायेंगे कि जो यह गरुडध्वज महात्मा है ॥६॥ हे देव । केवल आपके पिता भगवान् श कर ने मुझे तो यही बतलाया है कि इससे पर तर अन्य कोई भी नही हैं हम और अन्य तो देही हैं ॥१०॥ पार्वती देवी के द्वारा ऐसा कहने पर स्कन्द ने जनार्दन को प्रणिपात करके वही पर अपने हायो को जोडकर स्थिति करती थी और भगवान् अच्युत से आज्ञा की प्रार्थना करने लगे ॥११॥ समस्त भूतो पर कृपा करने वाले भगवान् ने अलि बांध- कर सस्थित स्कन्द का स्वस्स्ययन करके फिर देव ने उसे अपनी आज्ञा प्रदान कर दी थी ॥१२॥ देवर्षि नारद जी ने कहा-भगवान् गरुडध्वज ने जो भी उम समय परम पुण्यमय स्वस्ययन शिखिध्वज के लिये किया था हे विप्रर्य ! आप उमकी व्याख्या मेरे समक्ष मे करने को योग्य होते. हैं ॥१३॥ महर्षि पुलस्त्य जी ने कहा-अब आप उम पुण्य महिपासुर तारक उपाख्यान वर्णन ] [ ७१ महान दल वाले भूनगण, गणेद्र ये ममी आपके कल्याण करने के लिये प्रस्तुत होवें ॥२०॥ द्विपादों में, चनुप्रादो से आपका मगन होवे । बहु- पादो से और आटो से भी आपका अनामय कल्याण होवे ॥२१॥ प्राग्दिशं रक्षता बनी दक्षिणा दण्डनायकः । पाशी प्रतीचीमवतु यक्षेशः पातु चोतराम् ॥२२ वह्निदक्षिणपूर्वा तु कुवेरो दक्षिणापराम् । प्रतीचीमुत्तरा वायु शिवः पूर्वोतरामपि ॥२३ उपरिष्टाद वः पातु ह्यघम्ताच्च घरा घरः। मुसली लागली वज्री घनुष्मानन्तरेषु च ॥२४ वाराहोऽम्वुनिधौ पातु दुर्गे पातु नृकेसरी। सामवेदध्वनिः श्रीमान्सर्वद पातु माधवः ॥२५ एव कृतस्वस्त्ययनो मुहः शक्तिघरोऽग्रणीः । प्रणिपत्य मुरान्सर्वान्भूतलादुत्पपात खम् ॥२६, तमन्ये च गणा सर्वे देवाच मुनिदेवतः । अनुजग्मु कुमार ते कामरूपा विहगमाः ।।२७ मातरश्च तथा सर्वाः समुत्पेतुनंभस्तलम् । सम सन्देन बलिना हन्तुकामा महासुरान् ॥२८ आपकी वजधारी इन्द्र पूर्व दिशा में रक्षा करे, दण्डनायक दक्षिण दिशा मे, पाशो (वरुण) पश्चिम मे और यक्षराज उत्तर दिशा में आपकी रक्षा करें ॥२२॥ दक्षिण पूर्व में अग्नि देव, दक्षिणा परा मे कुवेर, प्रतोची उत्तरा मे दायु और पूर्वोत्तग दिशा मे आपकी रक्षा करें ॥२३॥ ऊपर की दिशा में धगधर शेप आपकी रक्षा करें । अन्तरो मे गुमली, लागली-बची और घनुप्मान् आपकी रक्षा करे ॥२४॥ अम्बुनिधि में वाराह रक्षक होवें । दुर्ग में नृसिंह भगवान् रक्षा करे । सामवेद की ध्वनि वाले तथा सभी कुछ प्रदान करने वाले श्रीमान् माधव सर्वत्र आपकी रक्षा करे ॥२५।। महर्षि पुलस्त्य ने कहा- इस प्रकार से स्वस्त्ययन किये हुए अग्रणी शक्तिधर गुह ने समस्त सुरो को प्रणाम करके इस भूतल से मापाश में छलांग मारी थी ॥२६॥ उनके भगवान शिव ७२ ] [ वामन पुराण पोछे अन्य समस्त गण तथा मुनियों साथ सब देवगण गये थे जो इच्छा से स्वरूप धारण करने वाले एव विहगम थे ॥२७॥ समस्त माताए भी नमस्तल में उत्यतन कर गई थी जो बलवान् सन्द के साथ ही उन महासुरो के हनन कराने की इच्छा वाली थीं ॥२८॥ तत सुदीर्घमध्वान गत्वा स्वन्दोऽप्रवीद्गणान् । भूम्या तूर्ण महावीर्या कुरुवमवत्ता रणम् १२६ गणा गुहवच श्रुत्वा अवतीर्य महीतलम् । आरा पर्वतमभ्येत्य नाद चक भयकरम् !।३० तनिनादो मही सर्वामापूय चनभस्तलम् । विवेशार्णवरन्ध्रण पाताल दानवालयम् ॥३॥ थुत स महिपेणाथ तारकेण च धीमता । विरोचनेन कुम्भेन निकुम्भेगासुरेण च ॥३२ श्रुत्वा च सहमा नाद वज्रपातोपम दृढम् । किमेतदिति सचिन्त्य तूर्ण जग्मुस्तदान्धकम् ॥३३ ते समेत्यान्धकेनैव सम दानवपु गवाः। मन्त्र यामासुरुद्विग्नास्तच्छब्द प्रति नारद ॥३४ मन्त्रयत्सु च दैत्येपुपातालात्सूकरानन । पातालकेतुदैत्येन्द्र सप्राप्नोऽथ रसातलम् ॥३५ इसके पश्चात् बहुत अधिक मार्ग को तय करके स्कन्द ने अपने गणों से कहा-हे महान वीय वालो | आप लोग अति शीघ्र भूमि पर उतर जाओ ॥२६॥ सब गणो ने के इम वचनको सुनकर महीतल पर अप- तारण कर लिया था और समीप में ही पर्वत में पहुंच कर भयकर ध्वनि का थी ॥३०॥ वह महान् पोर ध्वनि सम्पूर्ण पृथ्वी पर भर गई थी और फिर नमस्तुर में पहुंच गई यो । अर्णव रन्ध्र के द्वारा दानवालय पाताल में भी प्रविष्ट हो गई यो ॥३१॥ उस ध्वनि को महिप और बुद्धिमान तारण ने मुना था। विरोचन, कुम्म, निकुम्म असुर ने भी यण रिया था। वह शाद बहुत ही भीषण और वचपात के समान हा पा । सब न सोचा पारि यह क्या ध्वनि है। वे सब अति शीघ्र महिषासुर तारक उपायान वन ] [ ७३ SET रेनौर में पहुंच गये ये ॥३२-३३॥ हे नारद ! देनर बन्धक के ताप एकत्रित होकर ममल दानव श्रेष्ट दिन होते हुए ननि के विषय में मन्त्रा करने लगे थे।॥३४॥ इन चार बददलों के मनमा करने पर पतार ने नगर के समान मुबाना देवेन्द्र पाबापरेनु सावन में प्रान होगमाया ॥३॥ सवारणविदो व्यक्तिः कन्नमानो नुर्नु हु। नद्रवीद्वचनं दीन नमन्येत्यान्यकामुरम् ।।३६ गोहमानं दैन्येन्द्र गालवस्याप्रति। तद्विश्व नयि यलः समारब्धो क्लान्मया ॥३७ यावत्सूकररूपरा प्रविनानि तदात्रमन् । न जानेऽहं नरं राजन्येन मे प्रहितः दरः॥३८ शरसंभिन्नज भयातन महाजवः । प्रालाव्याध मातस्मात्स च मां पृटतोऽन्वगात् ॥३६ तुरङ्गरनियोपः थूपते परमोऽनुर। तिठ तिष्ठति वदतः मूकरस्य च पृष्ठतः। तद्भुयादस्मि जलधि प्राप्तो दक्षिणार्णवम् ॥४० यावत्लश्यामि तत्रस्थानानावेषाकृतीनरान् । केचिद्गन्ति घनवत्प्रत्यगर्जस्तथाऽपरे ॥४३ अन्ये चोचुर्वयं नून निहन्मो महिषासुरम् । तारक घातयामोऽद्य वदन्त्यन्ये सुतेजसः ॥४२ वह पाताल रेनु दापो से दिन हो रहा था और अत्यन पपा से पूर्ण तया दारम्बार करता हुआ रहा अन्धकासुर के समीप में बार बत्पन्न दानता पूर्वक यह वचन दोना ॥ पातालानु ने कहा- हे दपेन्ट ! में गालव ऋषि के माधम की ओर गया और मैंने बतपूर्वक उस बाथम को विश्वस्त ररने के लिये मैंने अपना पल भी बारम्भ कर दिया था ॥३७॥ ज्योंही मैं मूकर के स्वरूप मे उस माश्रम में प्रवेश करने लगा था, मैं उसे नहीं जानता हूँ पिनो राजन्य ने मुझे पर मार लिा पा ॥३८॥ शर से समिन बत्र वाना, भय से अत्यन्त नातं, ७४ ] [ वामन पुराण वेग वाला मैं उस आश्रम से पलायन करके चला तो वह भी मेरे पीछे ही चल दिया था ॥३६॥ हे असुर ! अश्व के पर का अतीव शब्द सुनाई दे रहा था और वह 'सडा रह पड़ा रह-इस प्रकार में मेरे पोहेही चला आ रहा था । तब मैं भय से दक्षिण सागर में प्रवेश कर गया था ॥४०॥ जैम हो मैंने मागर में प्रवेश दिया था मैंने वहा पर अनेक भाकृतियो वाले नगे को देखा था। उनमे कुछ तो मेघ को भाति गर्जन कर रहे थे और दूसरे भी उनके ही साथ फिर गर्जना करते थे ॥४१॥ दूसरे यो कह रहे थे हम निश्चय ही महिषासुर को मार डालेंगे । आज घात करे गे ऐमा भी दूसरे मुन्दर तेन वाले वह रहे तारक वा थे ॥४२॥ तच्छ त्वा सुतरा त्रासो मम जातोऽसुरेश्वर । महार्णव परित्यज्य पतितोऽस्मि भयातुरः ॥४३ घरण्यां विवृत गंतं स मामन्वपतद्वली। तद्भपात्सपरित्यज्य हिरण्यपुरमात्मनः ॥४४ तवान्तिकमनुप्राप्त प्रसाद कतु मर्हसि । तरुत्वा चान्धको वाक्य प्राह मेघस्वन वचः ॥४५ न भेतव्यं त्वया तस्मात्सत्यं गोप्तास्मि दानव । महिपस्तारकश्चोग्रो वाणश्च बलिनन्दनः ।।४६ अनाच्या यैव ते वीरास्त्वन्धक महिषादयः । स्वपरिग्रहमयुक्ता भूमौ युद्धाय निर्ययुः ।।५७ यत्र ते दारुणाकारा मणाश्चक महास्वनम् । तय दंच्या समाजग्मु सायुधा: सबला मुने ।।४८ दैत्यानां पतयो दृष्ट्वा कात्तिकेयगणास्ततः । अभ्यद्रवन्त सहमा ते चोग्न मातृमण्डलम् ॥४६ है असुरेश्वर ! यह श्रवण कर मुझे सुतरा बहा भय समुत्पन्न हो गया था फिर उम महार्णव को स्याग कर मैं मयातुर होकर गिरपडा ॥४|| धरणी मे एक दिवस गत था, वह बलवान् भी मेरे पोछे गिर पड़ा। उसके भय से मैं अपने हिरण्यपुर का पारियाग करके चल दिया महिपामुर तारक उपाख्यान वर्णन ] [ ७५ । ॥४५॥ अब आपके ममीप में मैं गाआप मेरे ऊपर अपना ' प्रमाद करिये । यह सुनकर अन्धक ने मेघ के तुल्य अनि वाला वचन । कहा था ॥४५॥॥ हे दानव ! इमने तुमको डरना नही चाहिए । मैं तुम्हारी रक्षा करने वाला होऊंगा । फिर महिप, तारक, उग्रवाण और । बलि का पुन आदि बहुन मे दोर अन्धक के माय महिप आदि बिना कहे । ही अपने २ परिग्रह से मयन होकर भूम पर युद्ध करने के लिये निकन आये थे ।।४६-४७।। जहां पर हे मुने ! वे दारुण आकार वा स्वामि । कात्तिकेय के गण मह - नाद कर रहे थे वही पर वे दैत्य आने २ आयुनो मे समन्वित होकर मबल होते हुए भागये थे ॥४८॥ इसके अनन्तर दैत्यो के पतियों ने वहाँ पर दानिय के गणो को देखकर उन्होने सहमा उप मातृ मण्डल पर हमला कर दिया ॥४" तेषां पुरस्सरः स्थाणुः प्रगृह्य परिघं बली । न्यपूदयत्परवलं कुद्धो रुद्रः पशूनिव ॥५० तं निघ्नन्त महादेवं निरीक्ष्य कलशोदरः । कुठारं पाणिनाऽऽदाय हन्ति मन्महामुरान् ॥५१ ज्वालामुखो भयकरः करेणादाय चासुरम् । सरथं मगज साश्व विस्तृते वदनेऽक्षिपत् ॥५२ दण्डकश्चापि संक द्धःप्रासापाणि महामुरम् । सवाहन प्रक्षिपति समुत्पा टय महार्णवे ॥५३ शड. कुकर्णश्च मुसली हलेनाहत्य दानवान् । सवूर्ण यति मन्त्रीव राजानं हीनपौरुषम् ॥५४ खङ्गनर्म घरो वीरः पुष्पदन्तो गगेश्वरः । द्विधा त्रिधा च बहुधा चके देतेयदानवान् ॥५५ पिङ्गलो दण्डमुण्डे च यत्र या प्रधावति । तन्न तम प्रदृश्यन्ते राशय: सवंदानवः ।।५६ उनके आगे बलगन् स्थान परिप लेकर आगपे थे और कदमद जमे पशु भो को मार देते हैं वैसे ही गा. के बल का उन्होंने संहार । वामन पुराण कर कलशोदर ने हाथ में वुठार ग्रहण परसे ममस्त महान् अमुरों का हनन किया था ।।५१।। भय करने वाले ज्वाला मुघ ने हाथ में को पकड कर रथ-गज और अश्व के महित अपने विस्तृत मुख में प्रक्षिप्त कर दिया था ॥५२॥ दण्ड भो अत्यन्त ऋद्ध होकर प्राम हाथ म रखने वाले महासुर को उस के वाहन घे महिन समु-पाटिन कर महार्णव में फैक देता था ।।५३।। शकुपणं और मुमती दानवो को हल ने मार कर होन पौरुष राजा को मन्त्री की भांति चूर्ण कर देता था ॥५४॥ खग और चर्म को धारण करने वाले गणेश्वर पुष्पदन्त देतेय दानवों के दो-तीन और बहुत मे टुकडे कर मार डालता था ॥५५॥ दण्ड मुण्डो के सहित पिंगा जहाँ-जहा पर भी प्रधावन करता था वही-वही पर सब दानवों के ढेर दिखलाई देते थे ॥५६॥ सहस्रनयन: शुल भ्रामयन्वै गणाग्रणीः । निजधानासुरान्वीर सवाजिरथकुञ्जरान् ।।५७ भीमो भीमशिलाव: सपुर. सरिणोऽसुरान् । निजघान यथैवेन्द्रो वज्रवृष्टया नगोत्तमान् ॥५८ रोद्र. शक टचक्राख्यो गण पश्चशिखो बली । भ्रामयन्मुद्गर वेगानिजघान बलाद्रिपून् ॥५६ गिरिभेदी तलेनैव सारोह कुञ्जर रणे। भस्म चक्र महावेगो रथ च रथिना सह ॥६० नाडोजड घो निपातैश्च मुष्टिभिर्जानुनाऽमुरान् । कीलाभिर्वजतुल्याभिजघान बलवान्मुने ॥६१ कूर्मग्रोवो ह्यग्री:शि रसा चरणेन च । लुण्ठनेन तदा दैत्यान्नि जघान सवाहनान् ॥६२ पिण्डाकरस्तु तुण्डेन शृङ्गाभ्या च कलिप्रिय । विदारयति सग्रामे दान वान्समरोद्धतान् ॥६३ गणी के अग्रणी सहन नयन बहुत वीर थे यह आपने शूल को घुमाते हुए और घोहो के सहित तथा रथो से युक्त अमुरो का वध कर रहे थे। ॥५७॥ भीम नाम दाक्षा गण भयानक शिता की वर्षाश्रो से सपुर सरी महिपामुर तारक उपाख्यान वर्णन ] [ ७७ अमुरी को वन वृष्टि में नगोतमो को इन्द्र की भाति मार रहा था ॥५८॥ परम रौद्र वालो पञ्चशिष शकर चक्र नाम धारी गण अपने मुद्गर को घुमाता हुआ वडे वेग के माथ बलपूर्वक शत्र प्रओ का नन कर रहा था ॥५६॥ गिरिभेदी रण में आगेह के महित गर्ने को तन से ही मार रहा या महावेग रयो के सहित रथ को भस्मसात् कर देता था ॥६॥ नाडी जप प्रहारो मे, मुटियों से, जानु में असुरों का वध कर देता था। यह महाब नमानी वच के तुम कोलाओं मे हे मुने ! मपुरो को मार देता था ॥६१॥ कूर्मग्रोर और हयग्रीव शिर से और चरण तथा लुण्ठन मे उन ममय मे वाहनो के महित दैत्री का वध कर देता या ॥६२। ण्डिार अपने तुण्ड (मुन्द्र) मे और कनिभिप अपने मोंगो से उम सग्राम मे समरोद्धन दानवी का विदारण कर रह थे ॥३३॥ ततो दृष्ट्वैव स्ववल वध्यमान गनेश्वरः । प्रदुद्रावाथ महिस्तारकश्च गरणाग्रणीः ॥६४ ते हन्यमानाः प्रमथा दानवाना वरायुध. । परिवार्य समन्तात्ते युयुधुः कुपिता स्तदा ॥६५ हमास्यः पट्टिशेनाथ जघान महिपामुरम् । पोडशास्यस्त्रिशूलेन शतशोर्पो वरासिना ॥६६ श्रुतायुधस्तु गदया विशोको मुसलेन च । वन्धुदत्तस्तु शूलेन मूर्टिन दैत्यमताडयत् ॥६७ तथाऽन्यः पार्षद युढे शूलशक्तपट्टिशः। नारम्पत्तुद्यमानोऽपि मनाक इव पर्वतः ॥६८ तारसो भद्रकाल्या च तथोलसलया रणे। वध्यतेऽनेक चूडाया दार्यत परमायुधैः ।।६६ तो ताटरमानी प्रमयो मातृभिश्च महासुरैः। नक्षोभ जग्मतुवारी क्षोभयन्ती मगानपि ॥३० महिपो गदया तू प्रहार :प्रमथानपि । पराजित्य प्रयात्यैर कुमार प्रतिमायुधः ॥७१ इसके अनन्नर गणेश्वरों के द्वारा अपने वर को इस तरह बुरी भांति मरता हुआ देख कर फिर महिप और गणाप्रणी तारक ने याप्रमण किया था । ६४॥ फिर दानवो के श्रेष्ठ आयुधों से वे हन्यमान होते हुए प्रमथ चारो ओर से परिवारित होकर उम समय में अत्यन्त कुपित होकर युद्ध करने लगे थे ॥६५॥ इसके पश्चात् हमाम्य ने पट्टिश में महिषासुर का हनन पिया था। पोडशास्य ने त्रिशूल से और शतशीयं ने वर असि से उस पर प्रहार किये थे ॥६६॥ यतायुघ ने गदा मे और विशोक ने मुमल से प्रहार किया था । वन्ध दत्त ने शूल से मस्तक में दैत्य को ताडित किया था ॥६॥ इसी भाति अन्य पापं दो के द्वारा भी शूल, शक्ति, ऋष्टि और पट्टिशो के द्वारा युद्ध स्थल मे उस पर खूब प्रहार किये गये थे किन्तु इस प्रकार से अत्यन्त प्रताडित होते हुए भी वह थोडा भी मैनाक पर्वत की भाति कम्पित नही हुआ यो ॥६८॥ उस रण स्थल मे वह तारक भी भद्र काली के द्वारा तथा उलूखला के द्वारा वध किया गया था एव अनेक चूडा के परमायुधों से दारण किया गया था ॥६६॥ वे दोनो प्रमथ मातृगण के द्वारा तथा महासुरों के के द्वारा ताड्यमान होते हुए भी गणो को क्षुब्ध करते हुए भी स्वय वीर तनिक भी क्षोम को प्राप्त नहीं हुए थे ।।७१॥ तमापतन्त महिप स चक्राक्षो निरीक्ष्य हि । चक्रमुद्यम्य सक दो रुरोध दनुनन्दनम् ।७२ गदाचक्राङ्कितकरी गणासुरमहारथौ । अयुध्येता तदा ब्रह्मल्लयु चिन्त च सुष्ठु च ॥७३ गदा मुमोच महिप. समाविध्य गरणाय तु । सुचक्राक्षो निज चक्रमुत्ससज्ज रथ प्रति ॥७४ गदा छित्त्वा सुतीक्ष्णार चक्र महिपमाद्रवत् । तत उच्चुक शुत्या हा हतो महिपस्विति ।।७५ तत्रत्वाऽभ्यद्रवद्वारण: प्रास माविध्य वेगवान् । जपान चक्र रक्ताक्षपञ्चगुष्टिशतेन हि ॥७६

महिपासुर तारक उपायान वर्णन ]
[ ७६
पञ्चवाहुशतेनापि सुचक्राक्ष ववन्ध सः ।
वलवानपि वाणे न निष्प्रयत्न गतिः कृता ॥७७
महिपामुर ने गदा से प्रहारो के द्वारा शीघ्र प्रमथो को भी परा-
जित कर दिया था और फिर वह आयुधों के सहित कुमार की ओर
पाया था ॥७१। उस महिषासुर को अपने ऊपर आता हुआ देखकर
उम चक्राक्ष ने अपना चक्र उठाकर अत्यन्त क्रोधी देश में आकर उस
दनुनन्दन को रोक दिया था ॥७२॥ हे ब्रह्मन् उस समय गदा और
चक्र से विभूपित कगे वाले दोनो गण मुर महारध परस्पर मे लघ -
विचिन और परम मुन्दर युद्ध कर रहे थे ।।७३।। महिप गण को समा-
विद्ध करके उसके ऊपर अपनी गदा का प्रहार किया था और सुचक्रास्य
ने उस के रथ पर अपना चक्र छोड दिया था ॥७४। उसने महिप की
गदा का छेदन करके सुतीक्ष्ण अरो वाले चक्र को महिप पर फे का था ।
तब तो सभी देत्य हाहाकार करने लग गये थे कि महिष भर गया है
॥७॥ यह सुनकर बाण प्राम को आविद्ध करके बडे वेग वाला होकर
उसके कपर घंड पहा था । पञ्च मुष्टि शत के द्वारा रक्ताक्ष चक्र मारा
गया था ॥७६।। उमने पञ्च वाहशत के द्वारा भी सुचक्राक्ष बांध दिया
या । वह बलवान् भी पा किन्तु गण के द्वारा निष्प्रयत्न गति वाला
कर दिया गया था
सुचक्राक्ष सचक्र हि वद्ध वागासुरे हि ।
दृष्ट्वाऽद्रवद्गदापाणिमकर क्षो महाबलः ॥७८
गदया मूनि पातेन निजघान महाबलः ।
स चापि तेन सयुक्तो वीडायुक्तो महामनाः ।।७६
स सग्रामं परित्यज्य शालिग्राम मुपाययो ।
वाणोऽपि मक राक्षण ताडितोऽभूत्पराट मुखा ॥८०
अभज्यत बल सर्व दैत्याना मुरतापस ।
प्रभज्य तद्वल सर्व दैत्याना ते गणेश्वराः ॥७१
तिष्ठन्तस्ते भृशं क्र दा दंत्यान्व्यद्रावयत्रणे।
1॥७॥

महिपासुर तारक उपाख्यान वर्णन ] [ ८१ वाणोऽय वीरे निहतेऽय तारके गते हिमाद्री महिपे भयार्ते। भयाद्विवेशोग्रमपानिधान गणवले विध्यति सापराधे ।।८६ हत्वा कुमारो रणमूनि तारक प्रगृह्य शक्ति महता जवेन । मयूरमारुह्यशिखण्डमण्डित ययौ निहन्तुमहिषासुर च ॥५७ स पृष्ठतः प्रेक्ष्य शिखण्डिकेतन समापतन्त वरशक्तिपाणिनम् । क्लासमुत्सृज्यहिमाचल तथा क्रौञ्च समभ्येत्य गुहा विवेश। दैत्य प्रविष्ट स पिनापि सूनुर्जुगोप यत्नाद्भगवान्गुहोऽपि । स्ववन्युहन्ताभविताक्थ त्वह विचिन्तयन्नवतत स्थितोऽभूत ।। ततोऽभ्यगात्पुष्करमभवश्च हरो मुरारित्रिदशेश्वरश्च । ब-येत्यचाचुर्महिप मलि भिन्दस्वशक्त्या कुरु देवकार्यम् ।।.. तत्कार्तिकेयः प्रियमेव तथ्य श्रुत्वा वचा प्राह मुरान्विहस्य । क्थ हि मातामहनप्तृक च स्वभ्रातर भ्रातृमुत च मातुः ॥६१ हे मह । दर्प के मान हो जाने वाले उम अपन भाई के निहत हो जाने पर महिषासुर अत्यन्त भय से मातुर हो गया था। फिर वह उस सग्राम के अगल भाग को त्याग कर दुरात्मा वह हिमाचल पर्वत पर चला गया या ॥२५॥ इमके अनन्तर बाणासुर तारक जैसे महान् वीर के मारे जाने पर और भयभीत महिषासुर के हिमाद्रि पर्वत पर जाने पर स्वय भी भय से गणों के द्वारा सापराध बल के विध्यमान दिये जाने पर उग्र जल के निधि में प्रवेश कर गया था ॥८६॥ कुमार ने रणस्थल मे शक्ति ग्रहण कर बडे वेग से तारक का हनन करके मयूर पर ममारोहण क्यिा जो नि शिमण्ड मे मण्डित था और फिर महिषासुर का वध करने के लिये गमन दिया था II उस महिपन हाय में घट शक्ति को लिये हुए पीछे से नियण्डि के तन को अपन पर आक्रमण को आते हुए देयकर नाश पर्वत को त्याग र हिमाचल पर और फिर 4 सि भी पोच्च पर्वत पर जाकर गुफा में प्रवेश कर लिया ॥८८|| उस पिनाकी पुत्र भगवान् रह ने भी उम प्रविष्ट हुए दैत्य की यान से रक्षा की थी। मैं अपा बन्यु का हला को होगा--यह चिन्तन करते हुए ही वहाँ पर स्पिन हो गया था।1८६ मा पन. पुपर ममब, हर, ५२ ] [ वामन पुराण मुगरि और विदशेश्वर नहीं पर आये और उन्होने कहा था कि इस शल के सहित महिप का भेदन कर दो तथा शक्ति से देवो का कार्य करो HE तब स्वामि कात्तिकेय ते इम प्रिय और तथ्य वचन को सुनकर हमने हुए मुरो से यह वचन वहा-मैं किस प्रकार में मातामह के नाती, अपना भाई और माता के भाई के पत्र का वध करू॥१॥ एपा श्रुतिश्चापि पुरातनी विलगायन्ति या वेदविदो महर्षयः । कृत्वा च यस्या मतमुत्तमायास्वर्गव्रजन्तित्वतिपापिनोऽपि ॥६२ गा ब्राह्मण वृद्धमथापि चाढ्य वाल स्वबन्धुललनासुदुष्टाम् । वृतापराधामपि नैव वध्यादाचार्यमुट्या गुरवस्तथैव ।।६३ एव जानन्धर्ममग्र य सुरेन्द्रा नाहं वध्या भ्रातर मातुलेयम् । यथादैत्योऽभिगमिप्यद्गुहातस्तथाशक्त्याघातयिष्यामिशत्रुम् ॥६४ श्रुत्वा कुमारयचन भगवान्मह कृत्वा मत स्वहृदये गुहमाह शकः । मत्तो भवान मतिमान्वदसे किमिस्थ वाक्य शृणुप्य हरिणा गदित हि पूर्वम् ।।६५ नकस्यार्थे वहन्हन्यादिति शास्त्रेषु निश्चयः । एक न्यायहूना हि न पापी तेन जायते ॥६६ एतत त्या मया पूर्व समयस्तैन चाग्निज । निहतोनमुचिः पूव गोदरोऽपि सहानुजः ।।६७ तस्मादयहनामर्थाय सक्रौञ्च महिषासुरम् । घातयत्व पाम्य शक्त्या पायवदत्तया ॥

महिपासुर तारक उपाख्यान वर्णन ]
दत्य गुहा से बाहिर निभलेगा वैसे ही मैं शक्ति के द्वारा उसका घात
पर दूंगा ।।६४॥ कुमार के इस वचन को मुनकर है महप ! भगवान्
ने अपने हृदय में मत को करके इन्द्र ने गुह म वहा--मुझमे अधिक तो
आप मनिमान नहीं हैं फिर किम तरह इस प्रकार का वाक्य बोरने हैं ।
मेरा वचन मनो जो कि हरि ने पूर्व में हो कहा है ।।६। एक के लिये
बहुनी की कमी नहीं मारना चाहिए, यही शास्त्री में निश्चय किया गया
है । बहुतो को रक्षा के लिए एक को मार डालना चाहिए । इमसे कभी
भी पापी नही होता है ॥६६॥ हे अग्निज ! यह सुनकर मैंने पहिले
समय दिया था । उमने पहिले मोदर सहानुज भी नमुचि को मार दिया
था ॥७॥ इमलिए बहनो की भलाई के लिये क्रौञ्च वे महित महिपा-
सुर को पद में आक्रमण करके अग्निदेव के द्वारा दी हुई शक्ति के द्वारा
मार दो॥६
पुरंदरवचः श्रुत्वा क्रोधादारक्तलोचनः ।
कुमारः प्राह वचन कम्पमान: शतकातु ॥६
मूढ किं ते वलं बाह्वोः शारी वाऽपि वृत्रहन् ।
येनाधिक्षिपसे मा त्वं भुवने मतिमानसि ।।१००
तमुवाच सहस्राक्षः स्वतोह बलवान्गुह ।
तं गुहः प्राह एह्महि युद्धचस्व वलवान्यदि 1101
शक. प्राहाथ बलवाञ्जायते कृत्तिकासुत ।
प्रदक्षिणशीघ्रतर यः कुर्या-कौञ्चमेव हि ॥१०२
श्रुत्वा तद्वचन म्यान्दो मयूर प्रोग्य तत्क्षणात् ।
प्रदक्षिणं पादचारी कतुतूर्णतरोऽन्यगात् १९०५
शनोवतीर्य नागेन्द्रात्पादनाथ प्रदक्षिणाम् ।
वृत्वा तस्यो गुहोयत्य मूढ विस्विस्थितीभवान् ॥१०४
तमिन्द्रः माह कोटिल्या-मया पूर्व प्रदक्षिणा ।
ताम्य तत्वया पूर्व शुमारः शामग्रवीत् ।।१०५
पुरन्दर इस वचन रावण रोप में पुलमान नेत्र वारे
बुम र नेपाल हुए ए से रहार! तेगे सुनाओं में क्या
के

[ धामन पुराण
.
1आप
बल है ? हे वृत्रहन् ! तेरा शारीरिख वन भी पिता है ? निमरे
कारण मेरे ऊपर ऐमा अधिक्षप कर रहा है । तू ही इस भुवन म यहा
भारी मतिमान है ॥१००१॥ सहस्रार ने कुमार स कहा-हे गुह में स्वत
बलवान हूँ। फिर गुह ने कहा-यदि तू बडा भारी बलवान है तो चना
मा-आगे आजा मुझसे युद्ध करले ॥१०१।। इन्द्र ने कहा-~-हे वृत्तिका
पुत्र । यदि बलवान है तो क्रोश्व की अत्य त शीघ्रता से प्रदक्षिणा
करो ।।१०२।। उसके वचन को सुनकर स्व द ने नुर त ही अपने वाहन
मयूर का त्याग कर दिया था और पादचारी होकर शीघ्र ही दक्षिणा
करने को आगया था ॥१०३।। शक भी हाथी से नीच उतर कर पैरो
से प्रदक्षिणा करके स्थित हो गया था। गुह ने आकर कहा-हे मूढ
कैसे स्थित होगये हैं ? ॥१०४॥ ह द ने कौटिल्य से उससे कहा-मैंने
पहिले ही प्रदक्षिणा करली है । कुमार ने इद्र से कहा तुझसे भी पहिले
मैंने प्रदक्षिणा की है ।।१०।।
मया पूर्व मया पूर्व विवदन्तौ परस्परम् ।
आगम्योचुर्महशाय ब्रह्मणे माधवाय च ॥१०६
अयोवाच हरि स्कन्द प्रष्टुमहसि पर्वतम् ।
योऽय वक्ष्यति पूव स भविष्यति महाबल ।।१०७
तन्माधववच श्रुत्वा क्रौञ्चमभ्येत्य पाकि ।
पप्रच्छादिमिद वेन कृत पूर्व प्रदक्षिणम् ।।१०८
इ पेवमुक्त क्रोवस्तु प्राह पूर्व महामति ।
चकार गोभि पूर्व त्वया कृतमथो गुह ।।१०६
एच अवन्त गौञ्च स क्रोधारप्रस्फुरिताधर ।
विभेद शवस्या कौटिल्या-महिपेण सम तदा ।।११०
तस्मिन्हतऽथतनयेवलवान्मुनाभोवेगेनभूमिधरपार्थिवजस्तथाऽगात्
ब्रह्मन्दरद्रमदश्विवसुप्रधानाजग्मुर्दिवमहिपमीक्ष्यहतगृहेन ॥१११
स्वमातुल वीक्ष्य बली कुमार शक्ति समुत्पाट्य निह-तुकाम ।
निवारितश्वमरण वगानालिगर दायां गुररित्युदोय ।।११२

महिषासुर तारक आसान वर्णन पहिले मैंन की है-पहिले मैंने प्रदक्षिणा की है-इस प्रकार से वे दोनो परस्पर में विवाद पर रहे थे और महेश्वर, ब्रह्मा तया माधव भगवान् मे यही कहने लगे थे॥१०६।। इसके अनन्तर भगवान् हरि ने स्कन्द मे कहा-पर्वत से पूटना चाहिए । जो यह कह देगा कि पूर्व म इमने की है वही महान बनवान् हो जायगा ॥१०॥ माधव के इस वचन का प्रवण कर पावक पुत्र गुह न क्रौञ्च के ममीप मे आकर उस अदि से पूछा कि किमन पहिले प्रदक्षिा की है ।१०८॥ इस तरह से पूछे गये क्रौन ने कहा-महामति इन्द्र न पहिले परिकमा को है इसके पश्चात् है गुह । फिर आपने प्रदक्षिणा की है ॥१०६। इस प्रकार मे कहने वाले उम कौन्त्र वा क्रोध में अपने अधो को फडाते हुए कुमार ने कौटिल्य मे महिषासुर के सहित उसी समय में शक्ति के द्वारा भेदन कर दिया था ।। ११० ।। इसके पश्चात अपने पुत्र के निहत हो जाने पर भूमिधर राजा का पुत्र मुनाम जो बहुत बलवान् । बडे वेग से वहाँ पर आगया था । ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, मरुद, अश्विनी कुमार, वसु आदि प्रमुख देवगण गुद के दारा महिपामुर को मरा हुआ देखकर दिवलोर को चले गये थे।।१११॥ लगालो कुमार ने आने मातुन को देवर उमे भी शक्ति उठाकर मारदेने लिये वह समुद्यत होगये थे। उसी समय में चाधर ने यहे वेग से हाथो से समालिंगन करते हुए उनमो 'यह गुरु है-यह कह पर निवारण कर दिया था॥११२॥ सुनाभमभ्येत्य हिमाचलस्तु प्रगृह्य हस्तेन निनाय त च । हरि कुमार सशिखण्डिन नयन्वेगाद्दिवपन्नगशय पत्रः ॥११३ ततो गुह. प्राह हरि सुरेशं मोहेन नष्टो भगवविवेको । भ्रातामयामानुलेयो निरस्तस्तम्मात्वरिष्य स्वशरीरशोपम्।।११४ तमाह विष्णुज तीथं वयं पृथूदक पापहर कुमार । स्नात्वीपवत्या हरमीक्ष्य भत्तया भविष्यमे मूर्यममप्रभावः ॥१५ इत्येवमुक्तो हरिणा कुमारस्स्वभ्येन्य तीथं प्रममोदय शमुम् । स्नात्वाच्यं देवान्स रविप्रकाशो जगाम शेल सदन हरस्य { वामन पुराण सुचनेनोऽपि महाश्रमे तपश्चचार शैले पवनाशनस्तु । आराधयामास वृपध्वज तथा हरोऽपि तुष्टो वरदो वमूव ।।११७ देवात्स वने वरमायुधार्थे कौश्चान्तवारी रिपुबाहुखण्डम् । छिन्द्या यथा त्वत्प्रनिम करेण वाणस्य तन्मे भगवान्ददातु ।। १८ समाहशभुज दत्तमेतद्वर हि चक्रस्य तवायुधस्य । वारणस्य तवाहुवन प्रवृद्ध सछत्स्यसे नात्र विचार्यमस्ति । वरे प्रदत्त त्रिपुरान्नकेन गणेश्वरः स्कन्दमुपाजगाम । निपत्य पादौ प्रतिवेद्य हष्टो निवेदयामास हरप्रसादम् ।।१२० एव तवोक्त महिषासुरस्य वधस्रिणेनात्मजशक्तिभेदात् । प्रौञ्चस्य मृत्यु- शरणागताना पापापह पुण्यविवर्धन च ॥१२१ हिमाचल ने सुनाम के समीप मे आकर उसे हाथ से पाड कर ग्रहण कर लिया था और उमे लेगय थे । पनग शत्रु पत्र हरि-सशिसण्डी कुमार को भी वेग पूर्वक दिवलोक मे ले गये थे ।। ११३।। इसके पश्चात् परम विवेक शील गुर हरि से बोले-ह भगवन् ! मैं मोह से नष्ट हो गया था और मैंने मानुलेय भाई को मार डाला है । इसलिये अब मैं अपने शरीर का शोषण करूंगा ॥११४ा भगवान् विष्णु ने उससे कहा- हे कुमार 1 तीथों में परम धंष्ठ पृथ्दक को आप चले जाइये क्योकि वह तीर्थ पापो के हरण करने वाला है। वहाँ पर ओघवती मे स्नान करके फिर भक्तिभाव मे हर का दर्शन कर आर सूर्य के समान प्रभाव वाले हो जायगे ।।११।। इस प्रकार मे हरि द्वारा कहे जाने पर कुमार उस तीयं पर प्रास हागये थे। फिर शम्भु का दर्शन करके स्नान करके तथा देवाचंन करके रवि के समान धुतिमान होते हुए भगवान् हर के सदन शैलपर चले गये थे॥११६॥ सुचक्र नेन भी पवन का अशन करते हुए शैल पर महाधम मे तपश्चर्या करने लगे थे । वृषभध्वज को समा- गधना को पी पौर भगवान् हर मी परम प्रसन्न होकर वरदान होगय थे ॥११॥ क्रौंचा तकारी उसने आयुध के प्राप्त करने के लिए वरदान मांगा था कि ऐमा वाण वे घर मे अपने समान अस्त्र देखें कि शन व बाहों मादन पर भगवान मुझे वही आयुध प्रदान प्रदाता अधिवासुर पराजय वर्णन ] [८७ करें ॥१३८॥ भगवान् शम्नु ने उममे कहा-जाओ, मैंने तुझको यही वरदान दे दिया है । तेरा आयुध चक्र ही बटे हुए बाण के उस वाहुओ के वन को भली मांति ईदत कर देगा-इमम पुछ विचारने योग्य बात नहीं है ॥११६॥ निरान्ता के द्वारा वरदान देने पर गणेश्वर स्कन्द के ममीर में उपस्थित हुआ। स्कन्द वे चरणो मे पड कर निवे- दन किया और भगवान् शम्भु के प्रमाद के विषय में मय मुना दिया पा ।।१२०।। इस प्रकार से आपके विषय में कहा था । द्रिणेत्रात्मज की भृत्यु के विषय में भी निवेदन किया था। शरण आर्य हुओ का रक्षण पापो का अपहरण करना तथा पुण्य का बढाने वाला होता है ॥१२॥ ५६--अन्धकासुर पराजय वर्णन योमी मन्त्र यता प्राप्तो दैत्याना शरताडितः । स न वद निभिन्नः शरेण दितिजेश्वरः ॥१ मासोन्नृपो रघुकुले रिपुजिन्महर्षे तम्यात्मजो गुणगर्णय निधिमहात्मा । शूरो रिसंन्यदमनो बलवान्स हृष्टो विप्रा.दीनपणातिशमः पृथिव्याम् ॥२ प्रातध्वजो नाम महामहीमाः म गालवार्थ तुरगाधिरूढः । पातालवेतु निजधान पृष्ठे नागेन चन्द्राधंनिभेन वेगशः ॥३ किमर्थ गालवस्यासी साधयामाम मत्तम । येनामी पत्रिणा नूर्ण निजघान नृपात्मजः।।४ पुरातपम्तयति गालवपो महाश्रमे स्वे मतत निविष्टे । पानालवेतुम्तपसोऽम्यविघ्न बरोतिमोदयात्सममाधिभगम् ।।५ न चेप्यतेऽमो तपमोन्यय हि शक्नोति यत्ययमम्मसातम् । जापाशमोध्याय न दीर्घमुष्ण मुमोच नियाममनुत्तमं हि ॥६ समोरादाजिवरः पपान भूच पाणी वाशरीरिणी च। नमो तुरङ्गोवलवालमेतत्वहनासहवाणि तु योजनानाम् ॥७ ८८ ] [ वामन पुराण देवपि नारदजी ने कहा-जो यह मन्त्रणा करते हुए देस्यो को पर ताडित प्राप्त हुआ था वह दितिजेश्वर किस शर से निर्मिन्न हुा-यह बतलाइये ॥१॥ महषि पुलस्त्य ने कहा-हे महपि ! रघुघुल में एक शत्र ओ पर विजय प्राप्त करने वाला राजा हुआ था उसका पुत्र गुणो की एक निधि था-महान् आत्मा वाला था-वडा, शूर, शन्न, सेना के दमन करने वाला-बलशाली, सुहृष्ट और पृथिवी मे विप्र, अन्ध, हीन कृपण आदि की पीडा का शमन करने वाला हुआ था ॥२।। उस राजा का नाम ऋतु ध्वज था यह महामहीश था और वह गालव के लिये ही तुरग पर अधिरूढ हुआ था । उसने वेग पूर्वक अर्ध चन्द्र के समान वाग से पीठ में मारचर पाताल के तु वा हनन किया था ॥३॥ नारद जी ने कहा-हे सत्तम । विस लिये इसने गालव का साधन किया था जिस पत्री से इसने तुरन्त ही नृपात्मज का हनन किया था ॥४॥ पुलस्त्यजी ने कहा-पहिले समय मे गालव ऋषि अपने आश्रम में बैठ कर निरन्तर तपश्चर्या करते थे। पाताल केतु मूढता से इस ऋपि की तपस्या मे विघ्न किया करता था और समाधि को भग्न करदेता था ॥शा यह ऋपि अपनी तपस्या को क्षीण नही करना चाहते थे कि इसको अपनी शक्ति मे ही भस्मसात् वर देवे जोकि वह कर सकते थे । उसने आकाश को देख कर उसने दोघं', उष्ण और उत्तम नि श्वास छोड दिया था ।।६।। इसके पश्चात् आकाश से एक परम धीष्ठ अश्व गिरा था और साप ही आकाश वाणी भी हुई थी कि यह आश्व अत्यन्त बलवान् है, और एक ही दिन में सहस्रो योजन जा सकता है ॥७॥ स तं प्रगृह्याश्ववर तुरङ्गमृतध्वज योज्य तदाऽऽत्तशस्त्रम् । स्थितस्तपस्येव ततो महपित्य समभ्येत्य नृपो विभेद ।। देनाम्वरतताद्वाजी निसृष्टो वद सुव्रत्त । वाकस्यादेहिनी जाता पर कौतूहल मम ।।६ विश्वावसुर्नाम महेन्द्रगायनो गन्धर्वराजो बलवान्यशस्वी। निमृष्टवान्भूवलये तुरङ्गमृतध्वजस्यैव सुतार्थमाशु ।।१० अन्धकासुर पराजय वर्णन ] कोर्थोगन्धर्वराजस्य येन प्रपीन्महाजवम् । राज्ञः कुवलायाश्वेस्य कोऽर्थो तृपसुतस्य य ॥११ विश्वावसोः शील गुणोपपन्ना आसीत्पुरन्ध्री सुभगा त्रिलोके। लावण्यराशि.शशिकान्तितुल्यामदालसा नाममदालसेव ॥१२ ता नन्दनो देवरिपुस्नरस्वी सक्रीडन्ती रूपवती ददर्श । पातलकेतुस्तु जहार तन्वी तस्यार्थत. सोऽश्ववरः प्रदतः ॥१३ हत्वाऽरिदत्य नृपतेस्तनूजो लब्ध्वा वरोरुमपि वस्थितोऽभूत् । दृष्टो यथा देवतिर्महेन्द्र. शच्या तथा राजसुतो मृगाक्ष्या ।।१४ उसने उस श्रेष्ठ अश्व को ग्रहण कर शस्त्रास्त्र से सुसज्जित ऋत- ध्वज को उसी समय योजित कर दिया था । इसके पश्चात् महर्षि अपने तप में ही स्थित हो गये थे । नृप ने आक्रमण करके उस दैत्य का भेदन कर दिया था ॥८॥ देवर्षि नारद जी ने कहा-हे सुव्रत ! वह येष्ठ अश्व आकाश से किसने निसृष्ट किया था-मह बतलाइये । मोर विन्त मरीर वातो जो आकाश वाणी हुई थी वह किसके द्वारा हुई थी-यह सब मुझे पतलाइये । मेरे हृदय मे बडा भारी कोतूहल हो रहा है 10 महर्षि पुलस्त्य ने कहा-एक विशान सु नाम वाला इन्द्र का गायक गन्धर्वराज था जो बहुत ही बलवान् और यशस्वी था। उसी ने इस भूमण्डल पर ऋतध्वज को वह तुर ग-छोडा पा जो शीघ्र ही सुत के लिये पा ॥१०॥ नारद जी ने पहा-गन्धर्वराज का क्या प्रयोजन था जिसने महान् वैम वाला अश्व भेना था और नृप सुत ऋतध्वज राजा का का प्रयोजन था ? ॥११॥ पुलस्त्यजी ने कहा-विश्वावसु की सील और गुगो से सम्पन्न त्रिलोक में परम सुभगा पुरन्ध्री थी जो रूप समूह यो तथा चन्द्रमा को कान्ति के तुरूप कान्तिगती थी उसका नाम महालसा या जो मदालसा के ही तुल्य पो ॥ १२ ॥ उसको कोठा करती हुई देशमा नन्दन ने देख लिया पा जोकि अत्यन्त ही रूपवती थी । उम त-जी को पातार देतु ने हरण कर लिया था। उसी प्रयोजन से वह श्रेष्ठ अश्व दिया गया था ॥१३॥ रात्रा के पुत्र ने उस घ. देश्य को मारवर उम वरोह को भी प्राप्त किया था और सारण्य को ६० ] [ वामन पुराण वह अवस्थित होगया था। वह देवपति महेन्द्र शची के साथ जिस प्रकार से शोभित होता था ठीक उसी भाति वह राज पुत्र भी उस मृगाक्षी के के साथ दिखाई दिया था ॥१४॥ एव निरस्ते महिपे तारके च महामुरे । हिरण्याक्षसुतो धोमान्किमाचेष्टत व पुनः ॥१५ तारक निहत दृष्ट्वा महिप च रणेऽन्धकः । कोप चक्र सुदुर्बुद्धिदत्याना देवसंन्यहा ।।१६ तत: स्वल्पपरीवारा प्रगृह्य परिघ करे । निजंगामाथ पातालाद्विचचार च मेदिनीम् ॥१७ ततो विचरता तेन मन्दरे चारुकन्दरे । दृष्टा गौरी च गिरिजा सखीमध्यस्थिताशुभा 11 ततोऽभूत्कामवाणातः सहसवान्धकासुरः । ता दृष्ट्वा चारसर्वाङ्गी गिरिराजसुता वने ॥१६ अयोवाचासुरो मूढो वचन मन्मथान्धकः । कस्येय चारुसर्वाङ्गी वने चरति सुन्दरी ।।२० इय यदि भवेन्नं व ममान्तःपुरवासिनी। तन्मदीयेन जीवेन क्रियते निष्फलेन किम् ।।२१ देवपि भारदजी ने कहा- इस प्रकार से महिषासुर और महासुर तारक निहत हो जाने पर धीमान् हिरण्याक्ष के पुत्र ने फिर क्या दिया था ? ॥१।। पुलस्त्य मुनि ने कहा-तारक और महपि को रण त्य में निहत देय पर अश्क ने बड़ा क्रोध किया था। यह दैत्यों मे बहा ही दुष्ट बुद्धि वाला था तथा देशों की सेना के हनन करो वाता पा ।।१९॥ गके बननर स्थल परीवार पाला वह परिप को हाय मे पण काये पाताल में निकल पापा और सम्पूर्ण भूमिपर विचरण परामगा पा॥१७॥ इमरे पश्चात् मुन्दर फन्दरामी वाले मन्दर गिरि पर विचरण परले हए उसने एक बार अपनी मचियो रे मध्य में स्थिर गिरिजागौरी देशापा ॥१॥ उम गौरी को देखने के पापी धिमा गुर महमा हो काम पाग से पीड़ित हो गया था। परम गुमा अन्धकासुर पराजय वर्णन । [६१ परम मुन्दर समस्त अङ्गो वाली गिरिराज की पुत्री उम गौरी को वन में देखकर वह काम वेदना से मूह अन्धकासुर यह वचन बोला-~यह किमकी पुत्री है जो बहुत मुन्दरतम अङ्गो वाली है और इस वन मे विचरण करनी है ।।१६-२०॥ यह सुन्दरी यदि मेरे अन्त पुर के अन्दर निवास करने वाली न हुई तो फिर मेरे इम निकल जीवन जीने से ही क्या लाभ है । अर्थात् मेरी जिन्दगी ही बेकार है ॥२१॥ यदस्यास्तनुमध्याया न परिष्वङ्गवानहम् । यतो धिड्मम रूपेण किं स्थिरेण प्रयोजनम् ।।२२ स मे बन्धुः स सचिव: स भ्राता साम्परायिकः । यो मामसिनकेशी ता योजयेन्मृगलोचनाम् ।।२३ इत्य पदति दैत्येन्द्र प्रह्लादो वुद्धिसागरः । पिधाय करणौँ हस्ताभ्या शि:कम्प वचोऽब्रवीत् ॥२४ मा मैवं वद दैत्येन्द्र जगतो जननी स्वियम् । लोकनाथस्य भार्येय शकरस्य निशूलिनः ।।२५ मा कुरुष्व सुदुर्बुद्धि सद्यः कुलविनाशिनीम् । भवतः परदारेय मा निमज्ज रसातले ॥२६ सत्सु कुत्सितमेव हि असत्स्वपि हि कुत्सितम् । शनवस्ते प्रकुर्वन्तु परदारावगाहनम् ॥२७ किं न श्रुतो दैत्यनाथेह कि तु गीतः श्लोको गाधिनापार्थिवेन । दृष्टा सन्यं विप्रयात प्रसक्त पथ्य तथ्य सर्वलोकेहित च ॥२८ अगर मध्यम क्षीण तनु वाली इसका मैंने बातिङ्गन नहीं किया तो फिर मेरे इस रूप को और ससार में स्थिति बनाये रखने को ही धिकार है ॥२२॥ वही मेरा वन्धु है और वही मेरा सचिव है, वही भाई और साम्पराधिक है जो मेरे लिये इस असित केशो वाली मृग लोचनी को लाकर मुझसे मिला देवे अर्थात् मेरा सयोग इस से करा देवे ॥२३।। वह दैत्येन्द्र इस प्रकार से जिस समय में बोल रहा था उम समय में बुद्धि का सागा प्रहाद हाथों से अपने कानो को ढककर शिर को हिलाते हुए यह वचन शेला ॥२४॥ हे दंत्येन्द्र ! ऐमा वचन अपने [ वामन पुराण यह मुख से मत बोलो और कभी भी ऐमा मत कहो-यह तो सम्पूर्ण जगत् की जननी जगदम्बा है । लोकों के स्वामी विशूल धारी भगवान् शङ्कर को यह भार्या है ॥२५॥ ऐमी दुष्ट बुद्धि कभी भी मत करो जो कि तुर. न्त ही कुल का विनाश कर देने वाली है । आप के लिये यह पराई स्त्री है । रमातल मे निमग्न मत होमो ॥२६॥ मत्पुरुष मे तो वर्म परम निन्दित है ही किन्तु जो अमत् पुरुप है उन मे भी ऐमा कर्म बुस्मित ही माना जाता है । तुम्हारे शत्रु लोग पराई स्त्रियो का अगाहन करें ॥२७॥ हे दैन्य नाथ ! क्या राजा गाधि के द्वाग गाया हुआ श्लोक आपने यहाँ नहीं सुना है जब कि प्रसक्त और विप्रयात सैन्य को देख कर कहा था। पथ्य और तथ्य ही मव लोको मे हितकारी होता है ॥२८॥ वर पाणास्त्याज्या न वत परहिंसा त्वभिमता वर मौनं कायं न च वचनमुक्त यदनृतम् । पर लीवर्भाव्यं न च परकलाभिगमनं वरं भिक्षायित्वं न च परधनाना हि हरणम् ॥२६ स प्रह्लादवचः श्रुत्वा क्रोधान्धो मदनातुरः। इय सा शत्रुजननीत्येवमुक्त्वा प्रदुद्वे।। ततोऽन्वधावन्दैतेया यन्त्रमुक्ता इवोपलाः । तानद्राबीद्वलानन्दी चक्रोद्यतकरोऽव्ययः ।।३१ मयतारपुरोगास्ते वारिता द्रावितास्तथा। कुलिशेनाहतास्तूर्ण जग्मुर्रता दिशो दश ।।३२ तार्दितारणे दृष्ट्वा नन्दिनाऽन्धकदानवः । परिघेण समाहत्य पातयामास नन्दिनम् ॥३३ शलेयं पतितं दृष्ट्वा धावमानं तयाऽन्धकम् । शात रूपाऽभवद्गीरी भयात्तस्य दुरात्मनः ॥३४ सतः स देवीगणमध्यमस्थितः परिभ्रमन्भाति महासुरेन्द्र।। पया यने मत्तकरी परिप्रमन्कारेणुमध्ये मदलोलदृष्टिः ॥३५ अन्धकासुर पराजय वर्णन ] [ २३ प्राणो का त्याग कर देना श्रेष्ठ है किन्तु दूमरो की हिंसा करना कभी भी अभिमत नहीं है । मौन रहना उत्तम है किन्तु मिथ्या पचन बोलना कभी भी अच्छा नहीं है । ससार में नपुंसक होकर जीवा विताना उत्तम है किन्तु पराई स्नियो के साथ गमन करना अच्छा नहीं है । भिक्षा करके जीवनयापन करना वहीं अधिक अच्छा है किन्तु पराये धन का हरण करके सुखोप भोग करना अच्छा नहीं होता है ॥२६। उसने प्रह्लाद के इस वचन को श्रवण करके भध्न के कारण अति यातुर होता हुआ क्रोधान्य हो गया था। यह वही शत्रुओ की जननी है-इतना कहकर उसने धावा कर दिया था ॥३०॥ इसके पीछे२ दैत्य लोग भी यन्त्र से छोटे हुए उपलो की भांति दौडने लगे थे। उन सवको हाथ में चक ग्रहण करके समुधत नन्दो ने जो कि अव्यय है बल पूर्वक रोक दिया था ॥३१॥ मय और तार जिनके पुरोगामी थे उन सबको पारित करके भगा दिया था और शीघ्र ही बघ से आहत कर दिया था जो कि भयभीत होकर दशो दिशाओ में भाग खड़े हुए थे ॥३२॥ नन्दी के उन सबको रण में अत्यन्त समदित देखकर अन्धक दानव ने परिघ के द्वारा प्रहार करके नन्दी कोप्चरणी पर गिरा दिया या ॥३३।। इस शलेय को गिरा हुआ और अन्धक को धान मान देख कर उस दुरात्मा के भय से जगदम्बा गौरी शतरूपा हो गई थी ॥३४॥ इसके उपरान्त यह महान् असुरेन्द्र देवीगण के मध्य में स्थित होकर परि- भ्रमण करता हुआ इस भांति शोभित हो रहा था जैसे वन में कोई मस्त हाथो मद से चचल दृष्टि वाला हाकर हथिनियों के मध्य मे भ्रमण कर रहा हो ॥३॥ न परिज्ञातवास्तत्र का तु सा गिरिकन्यका नापाश्चयं न पश्यन्ति चत्वारोऽमी सदंव हि ॥३६ न पश्यतीह जात्यन्धो रागान्धोऽपि न पश्यति । न पश्यति मदोन्मत्ती लोभवान्तो न पश्यति । सोऽपश्यमानो गिरिजां पश्यन्नपि वदान्धकः ।।३७ - [ वामन पुराण प्रधावन्नाददत्तासा युवत्य इति चिन्तयन् । ततो देव्या स दुष्टात्मा शतावर्या निराकृतः॥८ कुट्टितः प्रवरैः शस्त्र निपपात महीतले । वीक्ष्यान्धक निपतित शनरूपा विभावरी ॥३६ तस्मात्स्थानादपाकम्य गताऽन्तर्धानम्बिका । पतित चान्धक दृष्ट्वा दैत्यदानवयूथपाः ॥४० कुर्वन्तः सुमहाशब्द प्राद्रवन्त रणार्थिनः । तेषा मापतता शब्द श्रुत्वा तस्थौ गणेश्वरः ॥४१ मादाय वन बलवान्मघवानिव कोपितः। दानवान्समयान्वीक्ष्य पराजित्य गणेश्वरः ॥४२ वहाँ पर वह यह नहीं जान सका कि वह गिरि कन्या उनमे कौन सी थी। इसमे कुछ भी आश्चर्य की बात भी नही है क्योकि ये चार कभी भी नहीं देखा करते हैं ॥३६॥ जो जाति से ही अर्थात् जन्म से ही बाधा होता है वह भी कुछ नही देखा करता है-जो गरा से अन्धे के समान ही होता है उसे भी कुछ नहीं सूझताहै-जो किसी प्रकार के मद से अन्धा होता है वह कुछ नहीं देखता है तथा जो लोमाभिभूत होता है घह भी नही देखा करता है। उस समय मे वह अन्धक देखता हुआ मी गिरिजा को नहीं देख रहा था ॥३७॥ इधर-उधर दौड सगाते हुए भी उन्हें अन्य युवतियाँ है-ऐसा विचारते हुए उसने ग्रहण नहीं किया था। इसके उपरान्त देवी ने तावदी से उस दुष्टात्मा को निराकृत किया था ॥३८॥ वह परम श्रेष्ठ शस्त्रों से दुहित होता हुआ महीतल में गिर गया था। शतरूपा विभावरी उस स्थान से हरगई थी और फिर अम्बिका अन्तर्धान होगई थी। देस्य दानवो के यूप पति लोग अन्धवामुर f देखकर मुमहान् घोर शब्द करते हुए रण करने के लिये सधर की थोर दौड उठे थे। उनके उधर आक्रमण करने वालो के माद को मुनकर वहाँ गणेम्वर स्थित हो गया था ॥३६-४१॥ परम मुक्ति इन्द्र की माठि बलपान गणेश्वर ने हाप मेष ग्रहण करके अधिवासुर पराजय वर्णन ] [ ६५ क्रोध करते हुए समागत दानवों को देखकर पराजित दर दिया था ॥४२॥ समभ्येत्याम्बिका दृष्ट्वा ववन्दे चरणौ शुभौ । देवी च ता निजा मूर्तीस्त्वाह गच्छध्वमिच्छया ।।४३ विहरध्व महीपृष्ठे पूज्यमाना नरिह । वसतिर्भवतीना च उद्यानेषु वनेषु च ॥४४ वनस्पतिपु वृक्षेपु गच्छध्व विगत ज्वराः । तास्त्वेवमुक्ताः शलेय्या प्रणिपत्याम्बिका क्रमात् ।।४५ दिक्षु मासु जग्मुस्ताः स्तयमानाश्च विन्नरः । अन्धकोऽपि स्मृति लब्ध्वा अपश्यद्रिनन्दिनीम् । स्ववल निर्जित दृष्ट्वा ततः पातालमाद्रवत् ॥४६ ततो दुरात्मा स तदाऽन्धको मुने पातालमभ्येत्य दिवा न भक्त । रातो न शेते मदनेपु ताडितो गौरी स्मरकामवलामियः ॥४७ फिस अम्बिका के समीप में उपस्थित होर उनका दर्शन किया और परम शुम उनके चरणों की वन्दना को श्री और देवी ने उन अपनी मूत्तिनो से कहा था कि तुम अब अपनी इच्छा से ही चली जाओ। मनुष्यों के द्वारा पूज्यमान होती हुई भूमितल मे स्वेच्च्या विहार करो। बारका निवास स्थान उद्यानो में और वनों में होगा ।।४३-४४॥ विगत ज्वर होकर वनस्पतियों में तथा वृक्षो मे चनी जाओ । वे सब भी शलेयी के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर सबने अम्बिका के चरणों में प्रणिपात किया था ॥४५॥ फिर वे किन्नरो के द्वारा स्तूयमान होती हुई सभी दिशाओं में चली गई पो । मन्धक भी स्मरण शक्ति को प्राप्त पर फिर अधिनन्दिनी को देखने लगा था। उसने अपने समस्त नन को निमित देशा था और फिर वह पाताल लोक मे चला गया पा ॥४६॥ हे मुने ! तभी से फिर वह दुष्टारमा अन्धन पाढाच लोक में पहुंच कर नहीं पाता था और रात्रि मे शपन नहीं करता था। वह काम से

। वामन पुराण
अत्यन्त पौडिन था । और काम बल से अभिपन्न होकर हर समय मौरी
काही स्मरण किया करता था ।।४७।।
६०-मुर दानव चरित्र
क्व गतःशंकरो ह्यासीद्यनाम्बा नन्दिना सह ।
अन्धक योधयामास एतन्मे वक्त मर्हसि ॥१
यदा बर्यसहस्र तु महामोहे स्थितो भवः ।
तदा प्रभृति निस्तेजा होनवीर्यः प्रदृश्यते ।।२
स्वमारमान निरीक्ष्याथ निस्तजोऽश महेश्वरा।
तपोऽर्थाय तदा चके मतिमता वरा ॥३
स महाबनमुत्पाद्य समाश्वास्याम्बिका विभुः।
शैलादि स्थाप्य गोप्तार विचचार महीतले ॥४
महामुद्राप्पित ग्रीदो महाहिकृतकुण्डल. ।
धाययश्च कटीदेशे महाशड. खस्य मेखलाम् ।।५
क्पाल दक्षिणे हस्ते सव्ये गृह्य कमण्डलुम् ।
एका हवासी वृक्षाद्रिालसानुनदीपु च ॥६
स्थान लोक्यमास्थाय मूलाहारोऽम्युभोजनः ।
वाय्वाहारस्तथा तस्थौ नववर्षशत क्रमाव ॥७
देवर्षि नारद जी ने कहा-भगवान् शर वहाँ पर चले गये थे
जिमसे कि जगदम्बा ने स्वय ही नन्दी के साथ मिजवर अधिक से युद्ध
पिया या-यह मुदो बताने की कृपा परिए ॥१॥ महपि पुलस्त्य ने
पहा-जिस ममय में एक महान वर्ष पर्यन्त भगवान् भव महामोह में
स्पित होगये थे उसी ममय में लेबर तेत्रो विहीन और हीन वोर्या दिख
साई देते थे ।।२।। महेश्वर ने बरने आपरो निस्तेग मंश वाला देश पर
पतिमानों में परम पेष्ठ देवेश्वर ने उम समय में तपश्चर्या करने के
रिबाना विचाररिया पा ॥३॥ उस विभु ने महातारी उत्पन्न
पर और जगहम्मान गमावामन देकरमाको रक्षाकलिये शलादि

मुर दानव चरित्र ] के कुण्डल धारण को रक्षक नियुक्त कर स्वय महीतल में विचरण करने लगे थे । महा मुद्रा प्रोवा मे अपित करने वाले और महान अहियों ( सर्पो) किये हुए तथा महाश ख की मेखला पटि मे धारण करने वाले-दाहिने हाथ में पाल प्रहण करके एव बाये हाथ में कमण्डलु लेकर इस महाव्रत मे तत्पर होगये थे । पेवल एक ही दिन वृक्ष-अदि, शैल शिसर और नदियो में निवाग करने वाले हुए ॥५-६।। मम्पूर्ण त्रलोक्य को अपना स्थान बनाकर मूल अम्बुका बाहार करने वाले होगये थे। तथा कभी २ केवल वायु का थाहार करके नौ सौ वर्ष पय्यन्त क्रम से स्थित रहे थे ॥७॥ ततो वीटा मुखे क्षिप्य निरच्छ्वासो भवेद्यदि । विस्तृते हिमतत्पृष्ठे रम्ये समशिलातले ॥ ततो वीटा विदा व कपाल परमेष्ठिनः। साचिप्मती जटामध्यान्निक्षिप्ता घरणीतले ।। वीटया तु पतन्त्याद्रिर्दारित. मासमोऽभवत् । यावत्तीर्थवरः पुण्यः केदार इति विश्रुत ॥१० ततो हरो वर प्रादावेदारे वृषभध्वजः । पुण्ववृद्धिकर ब्रह्मन्पापग्न मोक्षसा धनम् ॥११ ये जल तावके तीर्थ पीत्वा समिनो नराः। मधुमासनिवृत्तास्तु ब्रह्मचारिखते स्थिताः॥१२ पण्मासादार यिष्यन्ति निवृत्ताः परपाक्तः । तेपा हृत्पङ्कजेवेव तल्लिङ्ग भविता ध्रुवम् ॥१३ न चास्य पापेपु रतिभविष्यनि कदाचन । पितृ णामक्षय याद भविष्यति न संशयः ।।१४ इसके पश्चात् परम विस्तृत थतीव रम्य हिमवान् के पृष्ठ पर सम जिला तन में वीटा को मुख में निक्षिप्त करके निहन्ध्वाम होगये थे। फिर परमेटी के कपाल को विदीयं कर वह अचिष्मती वोटा पटा के मध्य से धरणी तल में निशित होगई पो ॥८.। उस गिरने वाली बोटा से वह अदि दारित होकर भूमि के समान हो गया था । वया ८८ ] 1 वामन पुराण वह परम पुण्य श्रेष्ठ तीर्थ वेदार नाम से प्रमिड हुआ था ।।१०। इसके भगवान वृपमध्वज शिव ने दार को वरदान दिया था कि वह पुष की वृद्धि करन वाला-पापो का हनन करने वाला और हे ब्रह्मन् ! मोक्ष पा का साधन हो जावे ।।११।। जो मनुष्य सयमशील होकर उसके तीर्थ में जल का पान करे गे तया मधुमास से निवृत्त होकर ब्रह्मचयं के व्रत में स्थित रहे गे । इस तरह परपाक मे निवृत्त रहते हुए छ मास तक इम व्रत को धारण करेंगे उन मनुष्यों के हृदय कमल में उनका लिंग निश्चय ही हो जायेगा।।१२-१३।। इम पुरुप को फिर कभी भी पाप वमों में रति नहीं होगी और पितृगण का अक्षय श्राद्ध हो जायेगा-इसमें तनिक भी सशय नहीं है ॥१४॥ स्नानदानतपासीह होमजप्यादिका: क्रियाः। भविष्यन्त्यक्षया नृणामृतानामनर्भवः ।।१५ एतद्वर हरातीथं प्राप्य मुष्णन्ति देवताः । पुनाति पुसा केदारस्त्रिणेत्रवचन यथा ॥१६ केदाराय वर दत्त्वा जगाम त्वरितोहरः। स्नातु भानुसुता देवी कालिन्दी पापनाशिनीम् ।।१७ अवतीर्य ततः स्नातुनिमग्नश्च महाम्भसि । द्रपदा नाम गायत्री जजपान्तर्जले हरः॥१८ निमग्ने शकरे देव्या सरस्वत्यां कलिप्रिय । सार्ध: सवत्सरो यातोन चोन्मज्जतदेश्वरः ।। १६ एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा भुवनान्यर्णवास्तथा। चेलुः पेतुर्धरण्यां च नक्षत्र तारकः सह ।।२० आसनेभ्यः प्रचलिता देवाः शक्रपुरोगमाः । स्वस्त्यस्तु लोकेभ्य इति जपन्तः परमर्षयः ॥२१ यहा पर स्नान-दान और तप तया होम एव जय आदि सब दियाऐं मनुष्यों की सय रहित हो जायगी और मृत हो जाने पर फिर पुनर्जन्म नहीं होगा ॥१५॥ वह तीयं इम प्रकार से भगवान् हर मे वरदान प्राप्त कर चुका था मोर देवता भोपण करते थे। जैसा मगवान् ।

मुर दानव चरित्र । शम्भु का वचन था उसी के अनुसार केदार पुरुषो को पवित्र कर देता था ॥१६॥ वेदार को वर देकर फिर शीघ्र ही हर पापो के नाश करने वाली भानु की पुत्री कालिन्दी मे स्नान करने के लिए चले थे 1॥१७॥ इसके पश्चात् स्नान करने को जल में भीतर उतर गये और गहरे जन में निमग्न होगये थे । वह भगवान् हरने द्रुपदा नाम वाली गायत्री का जाप किया था ॥१८हे कलह पर प्यार करने वाले नारद ! देवी सरस्वती में निमग्न हो जाने पर उन्हें वहाँ पर डेढ साल होगया था पिन्तु तब भी ईश्वर उम जल से वाहिर नहीं निकले थे ॥१६॥ इम बीच मे ब्रह्मा-समस्त भुवन, सब अगव और तारो के सहित नक्षत्र चलाय मान हो गये थे और पृथिवी पर गिरने लगे थे ॥२०॥ इन्द्र आदि प्रमुख देव गण अपने आसनों से विचलित होगये थे तशा परमपि वृन्द ससार का कल्याण होवे-ऐसा जाप करने लगे थे ॥२१॥ क्षुब्धाश्च देवा लोपु ब्रह्माणं प्रष्ट मागताः । दृष्ट्वोचुः किमिदं लोकाः क्षुब्धाः सशयमागताः ॥२२ तानाह पद्मसभूतो व तद्वनि च कारणम् । तदागच्छन वो युक्त प्रष्टुं चक्र गदाधरम् ॥२३ पितामहेनैवमुक्ता देवाः शनपुरोगमा:। पितामह पुरस्कृत्य मुरारिसदनं गताः ।।२४ कोऽसौ मुरारि वर्षे देवो यक्षो नु किनरः । दैत्यो वा राक्षसो वाऽपि पायिवो वा तदुच्यताम् ॥२५ योऽसौ रज सत्त्व मयो गुणवाश्च तमोमयः । निगुणः सर्वगो व्यापी मुरारिर्मधुसूदनः ॥२६ योऽसौ मुर इति ख्यातः कस्य पुतः स गीयते । कथं च निहत: सय्ये विष्णूना तद्वदस्व मे ॥२७ श्रूयता कथयिष्यामि मुरामुरनिवर्हणम् । विचित्रमिदमाख्यानं पुण्यदे पापनाशनम् ॥२८ अत्यन्त क्षोभ को प्राप्त होकर लोकों मे सब देवता ब्रह्मा जी का दर्शन कर उनसे कहा-यह क्या कारण होगया है कि समस्त लोक १०० । । वामन पुराण बत- अत्यन्त शुब्ध होकर सशय को प्राप्त होगये हैं ॥२२॥ परम पिता ने उससे कहा-इसका कारण तो मैं भी नहीं जानता हूँ सो आप लोग सब चलो भगवान् विष्णु से इसका कारण पूछे ॥२३॥ पितामह के द्वारा इस तरह कहे हुए सब देवगण, जिनमे इन्द्रादि प्रधान थे, पितामह को अपना नेता बनाकर भगवान् मुरारि के निवास स्थान पर चल दिये थे ॥२४॥ नारद जी ने कहा-यह मुरारि हे देव ! कौन हैं ? यह कोई देव है, यक्ष या किन्नर है तथा कोई दैन्य-राक्षस अथवा पार्थिव है-यह मुझे बतलाइये ॥२५॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-यह रजोगुण और सत्वगुण से परिपूर्ण-गुणवान् तथा तमोगुण युक्त है । यह बिना गुण वाला-सर्वत्र गमन शीब-व्यापक मधुसूदन मुरारि है ॥२६॥ जो यह मुर इस नाम से विख्यात है यह किसका पुन कहा जाता है ? विष्णु ने इसको युद्ध मे कैसे मार डाला था-यह सब गाया लाइये ॥२७॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-~-अब आप श्रवण करो जिस तरह मुर असुर का सहार हुआ था। यह आख्यान बहुत ही विचित्र है, पुण्य प्रदान करने वाला तथा पापो का नाश करने वाला है ॥२८॥ कश्यपस्यौरसः पुत्रो मुरो नाम दनूद्भवः । सददर्श रणे भग्नान्दितिपुत्रान्सुरोत्तमः ॥२६ ततः स मरणागीतस्तप्त्वा वर्षगरणान्वहून् । आराधयामास विभु ब्रह्माणमपराजितम् ॥३० ततोऽस्य तुष्टो वरदः प्राह वत्स वर वृणु। स च बरोबर दैत्यो वरमेव पितामहात् ॥३१ यं यं करतलेनाहं स्पृशेय समरे विभो। स स मद्धस्तसंस्पृष्टस्त्वमरोऽपि म्रियेदज ॥३२ वाढमित्याह भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः । ततोऽभ्यागान्महातेजा मुरः सुरगिरिवली ॥३३ समेत्याह्वयते देवं यक्ष किन्नरमेव वाः। न कश्चिधुयुधे सेन सम देत्येत नारद ।। ४ मुर दानव चरित्र ] 47163 [ १०१ ततोऽमरावती ऋद्धः स गत्वा शक्रमाह्वयत् । नानेन सह योद्धचे मतिं चक्रे पुरदरः ॥३५ यह मुर नाम वाला कश्यप ऋषि का औरस है जो से समु- त्पन्न हुआ था। उसने सुरोनमों के द्वारा हिति के पुत्रों को रण स्थल में भग्न होते हुए देखा था ।।२६। इसके पश्चात् उसे भी मृत्यु से भय हो गया था और बहुत वर्षों तक उसने तपस्या करके अपराजित विभु ब्रह्मा जी को अराधना की थी ॥३०॥ इसके उपरान्त पितामह परम प्रसन्न होगये थे और वरद बोले-हे वत्स ! मुझ से कोई भी वरदान मांगतो उप मुर ने कहा और दैत्य ने पितामह से इस प्रकार वरदान मांगा था ॥३१॥ हे विमो ! समगंगण में मैं जिस-जिस को भी अपने कर तल से स्पर्ण करईं वही-वही मेरे हाय के संपर्श करदू वही वही मेरे हाय के संस्पर्श होने में अज ! मरजावे चाहे वह अमर भी क्यो न हो ॥३२॥ लोकों के पितामह भगवान् ब्रह्माजी ने 'बहुत अच्छा ऐमा हो हो जायगा-यह कहा था । इसके पश्चात् वह महान् तेजस्वी और बलवान् मुर मुरागिरि पर चला गया था ॥३३॥ हे नारद ! वह वहाँ पर पहुंच कर देव-किन्नर और यक्ष सबको वुनाता था किन्तु उस दैत्य से कोई भी युद्ध नहीं करता पा ॥३४॥ इसके उपरान्त वह अमरावती में कद्ध होकर पहुंच गया था और वहां उसने इन्द्र को पुकार। था किन्तु इन्द्र ने भी इसके साथ युद्ध करने का विचार नहीं किया पा11३५॥ ततः स करमुद्यम्य प्रविवेशामरावतीम् । प्रविशन्तं न तं कश्चिनिवारयितुमुत्सहेत् ॥३ स गत्वा शक्रसदनं प्रोवाचेन्द्र मुरस्तदा। देहि युद्ध सहस्राक्ष नोचेत्स्वर्ग परित्यज ॥३५ इत्येवमुक्तो देत्येन ब्रह्मन्हरिहयस्तदा । स्वर्गराज्यं परित्यज्य भूचरः समजायत ।।ईद ततो गजेन्द्रकुलिशी हुतो शक्रस्य शत्रु णा, सकलत्रो महातेजा देवः सह सुतेन च ॥३६ १०२ ] । चामन पुराण कालिन्द्या दक्षिणे कूले निविदेश पुर हरि । मुरश्वामि महाभोगान्यु मुजे स्वग सस्थित्त. ॥४० दानवाश्चापरे रौद्रा मयतारपुरोगमा: । मुरमासाद्य मोदन्ते स्वर्ग सुकृतिनो यथा ॥४१ स कदाचिन्मही पृष्ठ समायाता महासुर । एकाकी कुञ्जरारूढ सरयू निम्नगा प्रति ॥४२ इसके अनन्तर वह अपना हाथ उठाकर अमरावती में प्रविष्ट होगया था । प्रवेश करते हुए उसको रोकने के लिये भी किसी का उत्साह और साहस नहीं हुआ था ॥३६॥ वह इन्द्र के निवास स्थान में जाकर उम समय में मुर दैत्य इन्द्र से बोला-हे सहस्राक्ष । मुझे युद्ध हो अर्थात् मेरे साथ युद्ध करो अन्यथा इस अपने स्वर्ग के सिंहासन को त्याग दो ॥३७॥ हे ब्रह्मन् । दैत्य के दारा इस तरह कहे जाने पर उसी समय हरि हपने स्वर्ग के राज्यासन का परित्याग कर दिया था और भूमि पर भ्रमण करने वाला हो गया था ॥३८॥ फिर उस शत्र ने इन्द्र के गजे द्र और वज़ का हरण कर लिया था। महान तेजस्वी इन्द्र अपनी भार्या के-देवो के और सुत के माय वहा से चल दिया था ॥३॥ इन्द्र ने कालिन्दी के दक्षिण तट पर पुर बनाकर रहने लगा था । मुर भी स्वर्ग मे स्थित होकर वहां के स्वर्गीय महान् भोगो का आनन्द पूर्वक उपभोग करने लगा था ॥४०॥ दूसरे जो दानव थे जिनमे भय, तारक आदि प्रमुख थे मुरके पाम मे आकर सुकृतियों के भांति स्वर्ग मे परम मानन्द से रहने लगे थे ॥४१॥ वह महान् असुर किसी समय में भूमि पर आगया था। वह अकेला ही कुजर पर समारूढ होकर सरयू नदी की ओर भाया था ॥१२॥ म सरवास्तटे वीर राजान सूर्यवशजम् । ददृशे रघुनामान दीक्षित यज्ञकर्मणि ॥४३ तमुपेत्याप्रवीई त्यो युद्ध मे दीयतामिति । नोनिवर्तता यज्ञो नेष्टव्या देवतास्त्वया ॥४४ मुर दानव चरित्र ] [ १०३ तमुपेत्य महातेजा मित्रावरुणसंभवः । प्रोवाच बुद्धिमान्ब्रह्मन्वसिष्ठस्तरतां वरः ॥४५ किं ते जितनरत्य अजिताननुशासय । प्रहर्तु मिच्छसि यदि त निवारय चान्तकम् ॥१६ स वली शामनं ते व न करोनि महासुर । तस्मिजिते हि विजितं मवमन्यच्च भूतलम् ॥१७ स तद्वसिष्ठ वचनं निशम्य दनुपुगवः । जगाम धर्मराजान विजेतु दण्डपाणिननम् ॥४८ तमायान्तं यमः श्रुत्वा मत्वाऽवध्यं च संयुगे । स समारह्य महिप केशवान्तिकमागमन् ॥४६ उप मुर ने सरयू नदी के तौर पर सूर्य वश में समुत्पन्न परम वीर राजा को देखा था जिनका नाम रघु था और जो यज्ञ कर्म मे दीक्षित हो रहे थे ॥४३॥ उस राजा के समीप मे जाकर दैत्य ने कहा मुझे युद्ध दो। यदि मेरे साथ युद्ध नहीं कर सकते हो तो यन को वन्द कर दो और तुम को देवताओ का यजन नहीं करना चाहिए ॥४४॥ हे ब्रह्मद ! महान् तेजस्तो एवं बुद्धिमान तथा तपम्बियों मे परम धेर मित्रावरुण सम्म वसिष्ठ जी ने उसके समीप मे याकर कहा-॥४५॥ हे दैत्य ! मनुध्यों के भीतने से क्या लाभ होगा । जो अजित है उन पर अनुशासन करो। यदि प्रहार करने को ही इच्छा रखने हो वो उम अन्तक (यमराज) को निवारित करो अर्थात् अपने स्थान से ॥४६।। हे महासुर ! नह बहुत बनवान् भी है और तेरा शामन नहीं करता है । उसके जीत लेने पर फिर सम्पूर्ण भूमण्डल ही जीता हुआ हो जायगा ॥४७॥ वह दनु पुंगव उत वसिष्ठ जी के वचन को सुनकर फिर उस दण्ड पाणि धर्म राज को ही जीतने के लिये चन दिया था ॥४८॥ यम ने उसे आरा हुआ श्रवण कर और यह भी मानकर कि वह युद्ध मे वध के योग्य भी नहीं है। वह अपने वाहन महिप पर समा- रूड होकर भगवान केशव के समोर मे गया था ॥४॥ । दूर करदो

१०४ ]
[ वामन पुराण
समेत्य चाभिवाद्यैनं प्रोवाच मुरचेष्टितम् ।
स चाह गच्छ मामद्य प्रेपयस्व महासुरम् ॥५०
स वासुदेववचनं श्रुत्वा च त्वरयान्वितः।
एतस्मिन्नन्तरे दत्य: सप्राप्तो नगरीमुरः ।।५१
तमागत यमः प्राह कि मुरे कतमिच्छसि ।
वदस्व वचन कर्ता त्वदीय दानवेश्वर ||५२
यम प्रजासयमनानिवृत्ति कर्तुमर्हसि ।
नोचेतवाद्यच्छित्वाऽह मूर्धान पातये भुवि ॥५३
समाह धर्मराड् वाक्य यदि सयमसे महान् ।
मुरो नित्य गोपिताऽस्ति करिष्ये वचन तव ॥५४
मुरस्तमाह भवतः कोऽधिकस्त वदस्व मे ।
अहमेन पराजित्य वारयामि न सशयः ।।५५
यमस्त प्राह मे विष्णुर्देवश्चक्रगदाधरः ।
दवेतद्वीपनिवासो यः स मा सयमतेऽव्ययः ॥५६
भगवान के पास पहुचकर उनको प्रणाम करके उस यमराज ने उस
मुर दैत्य के चेष्टित कर्म को निवेदित किया था। भगवान् केशव ने
कहा--जाओ, उस महासुर को मेरे पास भेज दो ॥५०॥ वह वासुदेव के
वचन को सुनकर बहुत ही शीघ्रता से युक्त होकर वहा गया और इसी
बीच मे वह मुर दैत्य भी यमराज की संयमनी नारी को प्राप्त होगया
पा ॥५१॥ उसको आया हुआ देखकर यमराज बोले-हे मुर ! आप
क्या करना चाहते हैं ? आप वही बात मुझे बतादो । हे दानवेश्वर !
में आप के वचन को करने वाला हूँ ॥५२।। मुरने कहा-हे यम ! आप
जो सम्पूर्ण प्रजा को दण्ड देकर सयमन किया करते हैं इससे निवृत्त हो
जाइये । यदि ऐमा नहीं करते हैं तो मैं आपके मस्तक को काट कर
अभी भूमि पर गिरा दूंगा ।।५३॥ तब धर्मराज ने उससे कहा-यदि
बाप महान् सयमन करते हैं तो मुर बारतो नित्य ही रक्षक हैं और मैं
पापके वचन को अवश्य करूंगा ॥५४|| मुर दैत्य उससे बोला-यह
पतामो, पाप से भी अधिक कोई बलवान है क्या ? और यह कौन है-

मुर दानव चरित्र ] [ १०५ यही मुझे वताओ । आज मैं उसी को पराजित करके वारण करूं- इममे अब कुछ भी संशय नही है ॥५५॥ यमराज ने उससे कहा-विष्णु देव चक्र और गदा के धारण करने वाले हैं। वह श्वेतद्वीप में निवास करते हैं और अविनाशी है। वे ही मेरा भी सयमन किया करते हैं ॥५६॥ तमाह दैत्यशार्दूल: क्वामी वसति कीर्तय । स्वय तत्र गमिष्यामि तस्य सयमनोधत. ॥५७ तमुवाच यमो गच्छ क्षीरोद नाम सागरम् । तनास्ते भगवान्विष्णुर्लोकनाथो जगन्मयः ।।५८ मुरस्तद्वाक्यमाकण्य प्राह गच्छामि केशवम् । किंतु त्वया न तावद्धि सयम्या धर्म मानवाः ॥५६ स प्राह गच्छ त्वत्तो वा प्रवत्तिप्ये जय प्रति । सयन्तु वा यथा वाऽपि ततो युक्त समाचरे ॥६० इत्येवमुक्त्वा वचन दुग्धाब्धिमगमन्मुरः । यत्रास्ते शेषपयं चतुम तिर्जनाईनः ॥६१ चतुर्मूत्तिः कथं विष्णुरेक एव निगद्यते। सर्वगत्वात्कथमपि अव्यक्तत्वाच्च तद्वद ।।६२ यह सुनते ही दैत्यशार्दूल उससे बोला-~-वह कहा पर रहते हैं शीघ्र बतलाओ ! मैं स्वय ही वहां पर जाऊंगा और उसका ही सयमन करने के लिये में अब उद्यत होगया हूं ।।५॥ उससे यमराज बोले- सागर में चले जाओ वहीं पर जगन्मय लोको के नाथ भगवान् विष्णु रहते हैं ॥५८। मुर दैत्य ने यम के इम वाक्य का मुनकर कहा-अच्छा, मैं अब केशव के समीप मे ही जाता हूं किन्तु तब तक तुमको धर्म-मानवो को सयम नहीं करना चाहिए ॥५६॥ वह बोला-आप बाइये, मैं अयवा आप से जय होने के प्रति प्रवृत्ति करू गा । जिस प्रकार से भी होगा में सयमन करने का कार्य करूंगा फिर जो भी युक्त हो समाचरण करें।६०॥ इस तरह से इतना भर कह कर मुर दैत्य क्षीर मागर को चला गया था। जहां पर शेष को शय्या पर चतुमूत्ति भगवान् जनार्दन १०६ ] [ वामन पुराण शयन कर रहे थे ॥६१।। नारद जी ने कहा-विष्णु तो एक ही हैं फिर वे चत्तुमूत्ति विम तरह कह जाते हैं ? क्या वे सब जगह गमन शील हैं इमलिये या किसी भी प्रकार से अव्यक्त हैं इसलिये ऐमा कहा जाता है-यह मुझे बतलाइये ॥१२॥ अव्यक्त सवंगोऽपोह एक एव महामुन । चतुर्मूतिर्जगन्नाथो यथा व ह्मस्तथा शृणु ॥६३ अप्रतक्यमनिर्देश्य शुल शान्त पर पदम् । वासुदेवाज्यम व्यक्त स्मृत द्वादशपरकम् ॥६४ क्थ शुक्ल क्थ शा तमप्रतक्यमनिन्दितम् । कान्यस्य द्वादशोक्तानि पत्रकाणि महागुने १६५ शणुप्व वचन गुह्य परमेष्ठिप्रभापितम् । श्रुत सनत्कुमारेण तेनाल्यात न यन्मम ॥६६ वोऽय सनत्कुमारेति यथोक्त ब्रह्मण. स्वयम् । तथापि तेन गदित बंद मामनुपूर्वशः ॥६७ धर्मस्य भार्याऽहिंसाध्या तस्या पुत्रचतुष्टयम् । सजात मुनिशार्दूल योगशास्त्रविचारवम् ॥६८ ज्येष्ठ सनत्कुमारोऽभूद्वितीयश्व सनातन । तृतीयः सनको नाम चतुर्थश्च सनन्दनः ।।६६ मुर दानव चरित्र ] [ ૧૦૭ हो आपको बतलाया है-यह सम्पूर्ण गाया मुझे कस से बनलाइये ॥६॥ पुलस्त्यजी ने कहा-धर्म को मारी हिंसा नाम वाली थी उस मै ये चार पुत्र ममुत्पन्न हुए थे। हे मुनि शार्दूल! ये सब योग शास्त्र के विचार करने वाले ही उत्सन्न हुए थे ॥६८|| जो सब मे बड़ा था वह मनत्कुमार नाम वाला था-दूमरा सनातन या-तृतीय सनक और चौया सनन्दन था ॥६६॥ सांख्यवेत्तारमपरं कपिलं वोढुमामुरिम् । दृष्ट्वा पञ्चशिखं श्रेष्ठ योगयुक्त तपोनिधिम् ।।७० नतस्तस्यासनं दद्याज्ज्यायानपि कनीयसे। मौनं गुह्य महायोगं कपिला दीनुवाच सः ॥७१ सनत्कुमारश्वाभ्येत्य ब्रह्माणं कमलोद्भवम् । अपृच्छद्योगविज्ञानं तमुवाच प्रजापतिः ॥७२ कथयिष्यामि ते साध्य यदि पुत्रेति मे वचः । शृणोषि कुरुपे तच्च ज्ञानं सांख्ययुतो भवान् ॥७३ पुत्र एवास्मि देवेश यतः शिष्योऽस्म्यहं विभो। न विशेषोऽस्ति पुत्रस्य शिप्यस्य च पितामह ॥७४ विशेष: शिप्यपुत्राभ्यां विद्यते धर्मनन्दन । धर्मकर्मसमायोगे तथापि गदतः शृणु ॥७५ पुन्नाम्नो नरकात्राति पुत्रस्तेनेह गीयते । शेषः पापहरः शिष्य इतीयं वैदिकी श्रुतिः ॥७६ कोऽयं पुन्ना मको देव यस्मात्राति च पुत्रकः । तस्माच्छेपं तथा पापं हरेच्छिष्यश्च तद्वद ॥७७ एतत्पुराणं परम महर्षे योगाङ्ग युक्त च तथा सदैव । तथैव चोन भयहारि पुण्यं वदामि ते शाम्यति येन पापम् ।।७८ सांख्य शास्त्र के ज्ञाता कपिल मुनि को परम श्रेष्ठ पञ्चशिख तया योग युक्त तपोनिधि देषकर दूसरे जो पुन थे उनमें बड़े भी थे तो भी छोटे के लिये आसन दिया था और मोन, परम गोपनीय, महायोग कपिलादि को उन्होंने बतलाया था ॥७०-७१॥ सनत्कुमार ने कमल से १०८ ] [ वामन पुराण तुम उस उत्पन्न ब्रह्माजी के पास उपस्थित होकर योगविज्ञान पूछा था । प्रजापति ने उनसे कहा-ब्रह्माजी ने कहा है पुष । मैं कह तो दूगा यदि का माधन कर सको। मेरे वचन को श्रवण करो और उसको जो ज्ञान में है क्योंकि आप तो साज्य से सयुत हैं ।।७२ ७३॥ सनत्कुपार ने कहा- है देवेश | मैं तो आपका ही पुत्र हू । हे विभो । मैं आपका शिष्य भी है। हे पितामह } पुन और शिष्य में कुछ भी विशेषना तो नही है बर्यात् दोनो ही समान ही है ॥७४॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे धम्म नन्दन ! शिष्य और पुत्र दोनों में विशेषता होती है और वह धम्म तथा कर्म योग म है । मैं बतलाता हूँ उमे आप मुझसे सुनिए ॥७॥ पु नाम वाले नरक से त्राण करता है इसीलिये उसको पुत्र कहते हैं । उमसे भी शेष जो पाप हो म पाप को शिप्प हरण किया करता है इसलिये वह शिष्य कहा जाता है-यह वैदिको शृति है ।।७६|| सकुमार ने कहा- यह पलाम वाला कौन सा नरक है जिसरे पुत्र प्राण पिया करता है ? उमसे शेप क्या पाप है जिमगे शिष्य हरता है-यह सब कुछ मुझे पृपा पर बताइये ॥७॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे महर्षे । यह परम पुराण है तथा सदा ही योगाग से युक्त है। यह उसी प्रकार से उग्र भी है. -नय का हरण करने वाला है-परम पुण्यमय अर्थात् पवित है । मैं तुमसे बतलाता हूँ जिससे पाप की पास्ति होती है ।।७।। ६१-मुर दानव वध वर्णन परदाराभिगमन मापिनामुपगेवनम् । पारप्य गर्वभूताना प्रथम नरक मतम् ।।१ पस्नेय महापाप पलहीन तथाटनम् । एदन वृक्षजातीना द्वितीय नरय स्मृतम् ॥२ दर्यासन तथा दुष्टमय ध्यवपयन्धनम् । विवाहोमान्धवा मा तृतीय नरप मनम् ॥

मुर दानव वध वर्णन ] [ १०६ भयद सर्वसत्त्वानां भवभूतिविनाशनम् । भ्रंशन निजधर्माणा चतुर्थ नरक स्मृतम् ॥४ मारण मित्रकौटिल्यं मिथ्याभिशसन च यत् । मिष्टकाशनपित्युक्त पञ्चम तु नृयातनम् ॥५ याना फलादिहरण यमन योगनाशनम् । यानयुग्मस्य हरण पष्ठमुक्त नृयातनम् ॥६ राजभागहर मूढ राजजायानिपेवणम् । राज्ञाम हितकत्तत्व सप्तम नरक स्मृतम् ॥७ परमपिता ब्रह्माजी ने कहा-पराई स्त्रियो का अभिगमन परना पापी पुरुषों के साथ रहकर उनका उप सेवन करना तथा समस्त प्राणियो के साथ कठोरता का व्यवहार करना-यही प्रयम नरक माना गया है ।।१।। फलों की चोरी करना महान् पाप है तथा फ्लहीन मटन और वृक्ष जातियों का छेदन करना दूसरा नरक कहा गया है ॥२॥ जो वजित हैं उनका ग्रहण करना-दुष्ट अर्थात् दोप युक्त वस्तु का लेना और जो अवध्य हैं उनका वध एव वन्धन करना और जो अवान्धव हैं उनके साथ विवाह करना-यह तृतीय नरक है ॥३॥ सब प्राणियों को भय देना तथा भव को भूति का विनाश करना-अपने धम्मों का प्रभा करना-यह चतुर्थ नरक माना गया है ॥४॥ किसी को मारना-मित्र के साथ कुटिल व्यवहार करना-यूठी बातें कहना अर्थात् मिथ्या बोलना और मिष्ट पदार्थ को अकेले म आप ही खाजाना-यह पञ्चम नरक है ॥शा यात्रा फल प्रकृति का हरण करना-यमन, योग नाशन तथा यान युग्म का हरण—यह छटवा नरक होता है ॥६॥ राजा के भाग का हरण करना-मूढता, राजा को स्त्री का सवन तया राजाओं के अहित पम्मं को परना, यह सातवा नरक होता है ॥७॥ लुब्धत्व लोलुपत्व च लन्यधर्मार्थनाशनम् । लालासकीण मेवोक्तमष्टम नरक स्मृतम् ld विप्रोक्त ब्रह्महरण ब्राह्मणाना विनिन्दनम् । विरोध वाधुभिश्वोक्तं नवम नरयातनम् ।।

११० ]
[ वामन पुराण
शिष्टाजारविनाश च शिष्टद्वप शिशोर्वधम् ।
शास्तस्तेय धर्म स्तेय दशम परिकीर्तितम् ।।१०
पडङ्गनिधन घोर पाड्गुण्यप्रतिषेधनम् ।
एकादर्श तथैवोक्त नरक सद्भिरुत्तमम् । ११
सत्सु निन्दा सदाचौरमनाचारमसलिया।
मस्कारपरिहीनत्वमिद द्वादश मुच्यते ।।१२
हानिधर्मार्थकामानामपवर्गस्य हारणम् ।
सवेद: सविदामेततयोदशमुच्यते ॥१३
क्षपण धर्म हीन च यद्वज्यं यच्च वह्निदम् ।
चतुर्दश तयं वोक्त नरकं तहिहितम् ॥१४
लुन्धना-लोलुयरव-लब्ध धम और अर्थ का नाश कर देना तथा
मसाला लाज- सम्मानक कहा-पार है दिल के म
को नमानना-ब्राह्मण के घन का हरण, ब्राह्मणो की बुराई करना
और वन्धुओं के साथ विरोध परना-यह नवम नरक होता है |
शिष्टाचार का विनाश वरना-शिष्ट पुरुषो के साय: ५ फरना-शिशु
पायध करना, शास्त्रों की चोरी तथा धर्म की चोरी करना यह दशा
नरम है ॥१०॥ पहला पोर निधन-पाइ गुण्य का प्रतिपेध वरना
पान छ गद्गुणों का त्यागना-सको सत्पुरुषो ने ग्यारहयो नरक
बताया है ॥११॥ सत्पुरुषो मे निन्दा, सदा घोरी परना, माचार से
रहित रहना, बसरमं परना और सस्कारों से हीन रहना, यह बारहवी
माल होता है ॥१॥ धर्म, अपं, और पाम को हानि, अपवर्ग (मोक्ष)
प्राप्त करने की मष्टा म रमा तथा सविदों का पद, यह सेरहवा
भरत है ॥१॥ पण, पम ऐ हीनता, जो पर्व है की जो पहि का
ने धापा, यह चीन नारा गया है जोषि विहित
mm
मशान पाप्यगूयस्वमशीपगशुभावा ।
स्मृत सरपञ्चदशलममरसवपनानि ॥१५
.

मुर दानव वध वर्णन ]
। १११
.
आलस्य व पोडश क सक्रोधच विशेषतः।
सर्वस्य चाततायित्यमावासेष्वग्निदीपनम् ॥१६
इच्छा च परदारेपु नरकाय निगद्यते ।
ईर्ष्याभा वन शास्त्रेषु उद्धतत्व विहितम् ।।१७
एतस्तु पापैः पुरुषः पुन्नाद्य ने सशयः ।
संयुक्तः प्रोणयेद्द व सन्तत्या जगत पतिम् ।।१८
प्रोतः सृष्ट्या तु शुभया समस्यास्ने तमच्युतम् ।
पु नाम नरक घोर विनाशयति सर्वतः ।।१६
एतस्माकारणात्साध्य तत. पुत्रेति गद्यते ।
अतः पर प्रवक्ष्यामि शेपपापस्य लक्षणम् ॥२०
देय देवपिभूताना मनुजाना पितृनथ ।
लिप्सा पर धनेष्वेव सर्ववर्णेषु चंक्ता ॥२१
यज्ञान, असूया, अशोच, अशुभ का करना या बहना, गह तया
धनत वचन बोलना पन्द्रहवा नरक होता है ॥१५॥ बालस्य, पोडशक,
क्रोधयुक्त रहना अर्थात् विशेष क्रोध करना-मबके लिय आततायी होना
तथा आवास स्थानो में अग्नि लगा देना, पराई स्त्रियो में इच्छा रखना
मरक ही कहा जाता है। शास्त्रों में उद्धतता, ईर्ष्या का भाव रखना,
विशेष गहित वर्म करना यह सभी नरक कह गये हैं ॥१६-१७॥ पुरुप
इन पनामाच पापों से युक्त होता है-इसमे सशय नहीं है । इनसे संयुक्त
पुरुष सन्तति के द्वारा ही जगत् के पति देव को प्रसन्न किया करता है
॥१८॥ शुभ सूष्टि के द्वारा प्रसन्न होकर उम भगवान् अच्युत का सम.
ध्यासन किया
करता है और पुन्नाम
जो घोर नरक है
उसरा सभी ओर से मनुष्य विनाश कर दिया करता है ॥ १६॥
इस कारण से ही वह साध्य होता है इसीलिये उसे 'पुत्र' यह कहा जाया
करता है। इससे आगे भर हम शेप पाप का लक्षण बतलाते है ॥२०॥
देवपि भूत, मनुज और पितृगण का देय-पराये धन मे लिप्सा, और
समस्त वर्गों में एकी भाव रखना यह सब पाप कारक ही होत
है ॥२१॥

११२]
[ वामन पुराण
ओंकारादपि निवृत्तिः पापकारी स्मृतश्च सः ।
गुरोर्वादो महापापमगम्यागमनं तथा ॥२२
घृतादिविक्रयो घोरश्चण्डालादिपरिग्रहः।
स्वदोपच्छादन पाप परदोपप्रकाशनम् ॥२३
मत्सरित्वंवाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथाऽपरे ।
टोकित्वं तालवादित्वं नान्मा वानऽप्यधर्मजम् ॥२४
दारुणत्वमर्मित्वं नरकावहमुच्यते ।
एतैश्च पापैः सयुक्तः प्रीण येद्यदि शंकरम् ॥२५
ञानाधिकमशेपेण शेष पाप जयेत्ततः ।
शारीरं वाचिकं यच्च मानसं साधिकं च यत् ॥२६
पितृ मातृकृत यच्च कृत यच्चाश्रितनरः ।
भ्रातृभिर्वाधवैश्चापि तस्मिजन्मनि धर्मज ॥२७
तत्सर्व विलय याति स धर्मः सुतशिष्ययो. ।
विपरीते भवेत्साध्य विपरीत: पदक्रमः ॥२८
तस्माच्च पुत्रशिष्यौ हि विधातव्यो विपश्चिता ।
एतदर्थमभिध्या येच्छिष्याच्छेष्ठतरः सुतः ।
शेषांस्तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः ॥२६
ओंकार से भी निवृत्ति कर लेना भी पाप करने वाला माना गया
है। गुरु के साथ विवाद करना महान् पाप है-तथा जो गमन करने के
योग्य नही है उस स्त्री के साथ गमन करना भी महान् पाप होता है
॥२२॥ घृत आदि वस्तुओ का विक्रय करना घोर पाप होता है-
चाण्डाल आदि का परिग्रह ग्रहण करना, अपने दोपो का आच्छादन
करना (छिपाना) तथा पराये दोषो को प्रकाश मे लना,मत्सरता से युक्त
रहना-दुष्ट बाणी का मुख से बोलना, निष्ठुरता रखना, टोक्त्वि,
ताल वादिता,वाणी से भी अधर्म के उत्पन्न होने वाले का नाम लेना-
दारुणता, अधर्मी होना-ये सब नरक देने वाले कहे जाते हैं । इन पापो
से युक्त मनुष्य यदि भगवान् शबर को समाराधना से उन्हें प्रसन्न कर
लेवे ॥२३-२५।। अशेष रूप से ज्ञान की अधिकता का होना शेप पापो

मुर दानव वध वर्णन ] [ ११३ को जीत लेता है। शरीर से होने वाला- वाचिक और अधिकता से पुंक्त जो भी मानस पाप होता है । माता-पिता के द्वारा जो किया गया है और जो अपने समाश्रित व्यक्तियो के द्वारा किया गया है, हे धर्मज्ञ ! भाइयों के द्वारा तथा वान्धवो के द्वारा भी जो पाप कर्म किया गया है और उस जन्म में जो किया गया है वह सभी पाप विलय को प्राप्त हो जाता है ऐसा वह सुत और शिष्य का धर्म होता है । विपरीत पद क्रम विपरीत होने पर ही साध्य होता है ।।२६-२८॥ इसलिये विद्वान् पुरुष को अवश्य ही पुत्र मोर शिष्य करना चाहिए । इस प्रयोजन के लिये शिष्य से भी सुत अधिक श्रेष्ठ होता है । शेष पापो से शिष्य तार देता है पुत्र तो सभी पापो से तार दिया करता है ॥२६॥ श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः। निसत्य तव पुत्रोऽह देव योगं वदस्व मे ॥३० तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि । दास्यते च ततो योगं दायादो ह्यसिपुधक ॥३१ सनत्कुमारःप्रोवाच दायादपरिकल्पना । येय हि भवता प्रोक्ता ता मे त्व स्यातुमर्हसि ॥२ तदुक्त साध्यमुख्येत वाक्यं श्रुत्वा पितामहः । प्राह प्रहस्य भगवाञ्छणु वत्सेति नारद ॥३३ औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च । गूढोत्पन्नोऽपवितश्च दायादा वान्धवास्तु पट् ॥३४ अमीषु पट्सु पुरेपु ऋणपिण्डघनकियाः। गोलसाम्य कुले वृत्तिः प्रतिष्ठा शाश्वती तथा ॥३५ महपि पुलस्य ने कहा-पितामह के इस वचन का प्रण कर साध्य तपोधन बोला-यह निसरय है, हे देव ! मैं तो आपका पुत्र ही हूँ, मुझे अब पाप योग घतलाइमे ॥३०॥ वह महायोगी बोले-है पुत्र ! तेरे माता पिता यदि योग दे देंगे तो दापाद है ॥३१॥ सनतुमार ने महा जो यह दायाद को परिकल्पना आपने इस समय में कही है उमे बाप मुझे बहने के लिये योग्य होते हैं ।।१२।। साध्यों में प्रमुख के द्वारा ११४ ] । बामन पुराण उस कथित वाक्य को सुनकर पगवान् पितामह ने हमार हे नारद } महा था हे वत्म ! अब श्रवण करो ॥३३॥ औरस, क्षा, सक, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद-ये छ वान्धव दायाद होने है ॥३४॥ इन / प्रकार के पुत्रो मे ऋण पिण्ड और धन दियाएं होती हैं। गोत्र की समता, कुल मे वृत्ति और शाश्वती प्रतिष्टा होती है ।।३।। कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौन वस्तथा । स्वयदत्तः पारशवः पट पुतास्तु प्रकीर्तिताः ॥३६ समीपामृणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते । नामधारक एवेह गोत्रे च कुलसंमतः ।।३७ तत्तस्य वचन श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः । उवाचन विशेपं हि ब्रह्मम्मे ख्यातुमर्हसि ॥३८ ततोऽब्रवीत्सुरपतिविशेपं शृणु पुवक । औरसो यः स्वय जातः प्रतिबिम्वमिवात्मनः ॥३६ क्लोवोन्मत्ते व्यसनिनि प.यो तस्या ज्ञया तु यः । भार्या ह्यनातुरा पुत्रं जनयेत्क्षेत्रजस्तु सः ॥४० मातापितृभ्या यो दत्तः स दत्तः परिगीयते । मित्रपुत्र मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः ।।४१ न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढका। बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः ॥४२ कानीन-सहोढ़-क्रीत-गौनर्भव-स्वयदत्त-पाटशव ये ॐ पुन कहे जाते हैं ॥३६॥ इन छ प्रकार के पुत्रो मे ऋण पिण्ड आदि की कथा मही होती है । यहा पर संसार मे ये पुन केवल नाम धारक होते हैं और गोन मे कुल संमत होते हैं ॥३७॥ सनक के बड़े भाई ने ब्रह्माजी के इस वचन को सुनकर इनसे कहा-हे ब्रह्मन् ! इसकी विशेष व्याख्या मेरे सामने आप करके मुझे बतताइये ॥३८॥ इमके अनन्तर देवपति ने कहा-हे पुत्र ! अब विशेप को सुनो। औरस पुष तो वह होता है जो अपनी धम प्रणीता स्त्री के उदर से अपने ही वीर्य से समुस्पन्न हुआ हो । यह तो अपनी आत्मा के प्रतिविम्व के ही समान हुआ करता मुर दानव वध वर्णन ] । ११५ है ॥३६॥ पति के नपुंसक-उन्मत्त-व्यसनी होने पर उस अपने पति की आज्ञा प्राप्त कर जो भार्या आतुर न होती हुई पुत्र को जन्म देवे यह पुन दो बज कहा जाता है ॥४०॥ माता-पिता ने जिसको दे दिया है वही दत्तक पुत्र कहा जाया करता है । मित्र के द्वारा दिया हुआ जो मित्र का पुत्र है उसे उत्तम पुरुष कृत्रिम पुत्र कहते हैं । जो यह नही जाना जाता है कि गृह में किस के द्वारा यह उत्पन्न हुआ है वही पुत्र गूढ- इस नाम से कहा गया है। बाहिर से जो लाया गया हो उसको ही अपविद्ध पुत्र कहा जाता है ।।४१-४२।। कन्याजातस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढजः । मूल्यगृहीतः क्रोत: स्याद्विविधः स्यात्पुनर्भवः ।।४३ दत्ताऽप्येकस्य या कन्या भूयोऽन्यस्य प्रदायते । सज्जातस्तनयो यो लोके पौनभवः स्मृतः ।।४४ धुभिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः । स स्वयं दत्त इत्युक्तस्तथाऽन्यः कारणान्तरी ॥४५ ब्राह्मणस्य सुतः शूद्रया जायते यस्तु सुव्रत । महाया चाप्यनूढाया स पार शव उच्यते ॥४६ एतस्मात्कारणात्पुत्र न स्वय दातुमहसि । स्वमात्मान गच्छ शीघ्र पितरौ समुपाय ॥४७ ततः स माता पितरी सस्मार वचनाद्विभोः । तावाजग्मतुरीशान द्रष्टुवं दम्पती मुने ।।४८ प्रणिपत्य तु ग्रहह्माणमादेशो देव दीयताम् । उपविष्टौ सुखासीनो साध्यो वचनमब्रवीत् ।।४६ पन्या से जो पुत्र हो वह पानीन' कहा जाता है। गर्भ मे महिन जिसरा विवाह किया गया है उपसे जो पुत्र उत्पन्न हो वह "महोत्र नाम वाला होता है मून्य देवर जिसको खरीद लिया जाये वह कास पद- माता है । पुनमंव पुत्र दो प्रकार का होता है ॥४३॥ जो कन्या पहित छो एक पुरुष को देदो जाये और फिर किसी दूसरे पाप , जापे । 1 स्त्री डेज' पुत्र पंदा होता है वह पौन-स ।

११६ ] 1 वामन पुराण कहा जाता है ॥४४॥ भिक्ष में अथवा किसी महान् ध्यसन में जिसने अपने आपको स्वय ही समर्पित कर दिया हो वह पुत्र स्वय दत्त इस नाम से पुकारा जाता है । तथा दूसरे कुछ कारणो से पुत्र बना लिया गया हो वह अन्य कहलाता है ॥४५॥ हे सुव्रत ! बाह्मण का पुत्र जो किसी शूद्र वर्ण वाली स्त्री से पैदा हो चाहे यह विवाहित स्त्री हो या विना ही विवाह की हुई हो, वह पत्र पारशव-इस नाम वाला होता है ॥४६॥ इस कारण से तुम स्वय ही अपने को देने के योग्य नहीं होते हो । जाओ, शीघ्र हो अपने माता-पिता को बुला लाओ॥४७॥ इसके उपरान्त उसने विभु के बचन से अपने माता पिता का स्मरण किया था। हे मुने! वे दोनो ही दम्पती ब्रह्माजी के दर्शन करने के लिये वहाँ पर आगये थे ।।४८॥ उनने ब्रह्माजी को प्रणाम करके प्रार्थना की थी-हे देव ! हमको अपना आदेश प्रदान कीजिये। वे दोनो ही वहा पर सुख पूर्वक उपविष्ट हो गये थे,तब उस साध्य ने यह वचन कहा था॥४॥ योग जिगमिपुस्तात ब्रह्माण समचूचुदम् । मामुक्तवास्तु पुत्रार्थ तस्मात्त्व दातुमर्हसि ॥५० तावेवमुक्तो पुत्रेण योगाचार्य पितामहम् । उक्तवन्ती प्रभोऽय हि आवयोस्तनयोऽस्ति च ॥५१ अद्यप्रभृत्यय पुनस्तव ब्रह्मन्भविष्यति । इत्युक्त्वा जग्मतुः स्वर्ग येनेवाभ्यागतो यथा ॥५२ पितामहोऽपि त पुत्र साध्य च विनयान्वितम् । सनत्कुमार प्रोवाच योग द्वादशपत्रकम् ।।५३ शियासस्थस्तु मोकारो मेपोऽस्य शिरसि स्थितः । पर वंशाखमासे हि प्रथम परिकीर्तितम् ॥५४ नकारो मुखसंस्थोऽपि वृपरतत प्रकीर्तितः । ज्येष्ठमासव तत्पस द्वितीय परिवीतितम् ॥५५ मोकारो भुजयोयुग्म मिथुनस्तत्र सस्थितः । आपाट इति विभ्यातस्तृतीय पत्रक स्मृतम् ॥५६ ११८ ] । घामन पुराण देकारश्चाइ घ्रियुगले तत्रस्थमिरुच्यते । मासो माघेति विख्यातो दशम पत्रकं स्मृतम् ॥६३ भकार नेत्र युगल है। वहां पर पटक स्थित है । गाम पावा- ऐसा कहागया है-~-यही चतुयं पत्रक कहा गया है ॥५७) गकार हृदय कहा गया है, वहा पर सिंह वाम करता है 1 माग मादपद बहा गया है-इसे ही पश्चम पत्रक कहा जाता है ॥५८|| वार इवच जानना चाहिए । वहाँ पर कृपया प्रतिष्ठित है। माम आश्वयुजि कहा गया है- यही पष्ठ पत्रक बतलाया गया है ॥५६॥ तेहार मन में कहा गया है । वहाँ पर तुला सस्थित है और इसका माम कात्तिक नाम दाना है-यह सप्तम पत्रक कहा जाता है ।।६०॥ घाकार नाभि से सयुक्त है । यहाँ पर वृश्चिक स्थित है । मास इसका मागं शिरा है-इसको ही अष्टक पत्र बताया गया है ॥६१।। सुकार जघन बताया गया है और वहा पर घनुर्धर सस्थित है । इसका मास पोप कहा गया है-यह नवम पत्रक कहा गया है ॥६२॥ देकार दोनों अघि हैं । वहां पर स्थित तिमि (मकर) कहा जाता है । इसका मास मान-इस नाम से विख्यात है-यह दशम पत्रक कहा जाता है ॥६३॥ बाकारो जानुयुग्म च कुम्भस्तत्रादिसस्थितः। पनक फाल्गुनः प्रोक्त तदेकादशमुत्तमम् ॥६४ पादौ यकारी मीनोऽपि स चैत्रे वसते मुने । इद तु द्वादश प्रोक्त पत्र व केशवस्य हि ॥६५ द्वादशार तथा चक्र पण्णाभिद्वियुत तथा। विव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः ॥६६ तन चोक्त तु देवस्य रूप द्वादशपत्रकम् । यस्मिज्ञाते मुनिश्रेष्ठ न भूयो मरण लभेत् ॥३७ द्वितीय मुक्त सत्वाद्य चतुर्वण चतुमुखम् । चतुर्वाहमुदाराङ्ग श्रीवत्सधरमव्ययम् ॥६८ मुर दानव वध वर्णन ] 1 ११६ तृतीयस्तामसो नाम शेपमूर्तिः सहस्रया। सहस्रवदन: श्रीमान्प्रजाप्रलयकारकः ॥६६ चतुर्थो राजसो नाम रक्तवर्णश्चतुर्मुखः। द्विनुजो धारयन्माला मृष्टिकृत्त्वादिपूरुषः ॥७० अव्यक्तात्म भवन्त्येते वयो व्यक्ता महामुने । बनो मरीचिप्रमुखास्तथाऽन्येऽपि सहस्रशः ॥७१ वाकार जानुयुग्म है वहा पर कुम्म सस्थित है माम फाल्गुन है- यही एकादग परक कहा गया है ॥६॥ दोनो पाद यकार है वहाँ पर मोन सस्थित है। हे मुने ! वह चंद्र मे वाम करता है। ये द्वादश पत्र भगवान् के शव के कहे गये हैं ॥६५॥ तया द्वादश आर वाला चक्र है भौर पगाभिद वियुत है । त्रिव्यूह तया एक मूत्ति परमेश्वर बताये गये हैं ॥६६॥ वहा पर देव का द्वादश पत्रक रूप बताया गया है । हे मुनि श्रेष्ठ ! जिसके ज्ञान प्राप्त कर लेने पर फिर पुन: मरण प्राप्त नही होता है ।॥६॥ द्वितीय मत्वाद्य, चतुर्वणं और चतुर्मुख, चतुर्वाह, उदार अंगों से समन्तित, श्रीवरम को धारण करने वाले और अव्यय बताये गये हैं ॥६॥ तृतीय तामस नाम धारी शेप मूत्ति हैं जो सहन्न प्रकार के एक सहन मुखों वाले हैं, यो सम्पन ता इस सम्पूर्ण प्रजा के प्रलय करने वाले हैं ॥६॥ चतुयं राजस नामधारी-रणवर्ग वाले, चतुमुंघ, दो मुजाओं से सयुन-माला धारण करने पाले-एम सृष्टि के करने याले आदि पुरुप है।।७०॥हे महामुने ! उन अध्यक्त से हो ये तीनों स्वरूप व्यक्त होने हैं। इसी लिये इनसे मरीचि आदि प्रमुख ऋपि तपा अन्य भी सहलो स्वरूप उत्पन्न होते हैं ॥७९॥ एतत्तवोक्त मुनिवर्य रूप विष्णोः पुराण मतिपुष्टिवर्धनम् । चतुर्भुज चापि मुरो दुरात्माकृतान्तवाक्यात्सुनराममाद ॥७२ तमागत प्राह मने मयुघ्नः प्राप्तोऽमि केनामुर कारणेन । स प्राह योद् सह वयाऽध त प्राहयोग्मुरगहन्ता ।। यदोह मा योद,मुपागनोमि तत्कम्पते ते हृदय किमर्थम् । घरातम्स्येव महमहवेतन व योस्ये सह कातरेण ॥५४

१२० ]
। वामन पुराण
इत्येवम तो मधुसूदनेन मुरस्तदाऽस्यद्ध दये स्वहस्तम् ।
कथ क्व कस्येति मुरस्तदोक्त्या निपा तयामासविपन्न बुद्धिः ।।७५
हरिश्च चक्र मृदुलाघवेन म मोच तद्ध कमल च शत्रो:।
चिच्छद देवास्तु गतव्ययाभवन्देव प्रशसन्ति च पद्मनाभम् ॥७६
एतत्तवोक्त मुरदत्यनाशन कृत हि युक्त्या शितचक्रपाणिना।
अन. प्रसिद्ध समुपाजगाम मुरारित्येव विभु हिंस: 113
हे मुनि वर्ण भावान् विष्णु के ये स्वरूप हमने थापको बतुला
दिये है जो पुराण हैं तथा मति एव पुष्टि के वधंन करने वाले हैं। वह
दुष्ट मुर दैत्य भी यमराज के कहने से फिर वहाँ पर आकर समु.
पास्थित हो गया था ॥७२॥ हे मुने । आय हुए उसको देखकर मधु
देहर के हनन करने वाले प्रभु ने उससे कहा-है असुर ! किम कारण
से आप यहाँ पर आये हैं ? उसने कहा-मैं तो आपके साथ युद्ध करने
के लिये ही यहाँ पर आया हूं। तव असुरों के समूह के हनन करने वाले
प्रभु ने पुनः उमसे कहा था ॥७३॥ यदि मुझसे ही युद्ध करने के लिये
आप यहा पर समागत हुए हैं तो फिर आपका यह हृदय क्यो कम्पित
हो रहा है ? जैसे कोई ज्वर से आतुर पुरुष कप कपाता रहता है वही
दशा इस समय मे आपकी है कि बारम्बार कम्पित हो रहे हैं । तो फिर
मैं ऐसे कातर पुरुष से कभी भी युद्ध नहीं करूंगा । ॥७॥ इस प्रकार
से कहे जाने पर जो कि मधु सूदन प्रमु ने उससे कहा था, उसी समय
में सुर ने अपना हाथ हृदय पर रखा था और कहा--किसका-कहाँ
कैमे-यह कहते हुए ही उस समय मे विपन्न बुद्धि ने उसे निपाहन
किया था ॥७॥ भगवान् हरि ने चक्क को मृदुलाधन से छोड़ दिया था
और शत्रु का हकमल छिन कर दिया था । देवगण उस समय मे व्यथा
से रहित हो गये थे । पद्म नाम देव की सब प्रशसा कर रहे थे ।।७६।।
यह मुर दैत्य का निपातन मैंने आपको बतला दिया है जो कि शति
चक्र पाणि ने युक्ति से किया था । इमी लिये विभु नृसिंह मुरारि-इस
माम से प्रसिद्धि को प्राप्त हो गये थे ॥७७॥

। १२१ . विष्णु हृदय में शिव दर्शन ] ६२-विष्णु-हृदय में शिव दर्शन ततो मुरारिभुवनं समभ्येत्य सुरास्ततः । ऊचुदव नमस्कृत्य जगत्संक्षोभाकारणम् ।।१ तछत्वा भगवान्प्राह गच्छामो हरमन्दिरम् । सावस्यति महाज्ञानी जगत्छुन्ध चराचरम् ॥२ तथोक्ता वामुदेवेन देवाः शक्र पुरोगमाः । जनाईनं पुरस्कृत्य जग्मुर्मन्दरभूधरम् । न जय देव तृपभं न देवी च न नन्दिनम् ॥३ शून्य गिरिमपश्यन्त ह्यज्ञानतिमिरावृता।। तान्मूढदृष्टीन्सप्रेक्ष्य देवो विष्णुर्मा तिः ॥४ प्रोवाच किं न पश्यऽवं महेश पुरतः स्थितम् । तमू चुनैव देवेश पश्यामो गिरिजापतिम् ॥५ न विभः कारण तच येन दृष्टिहना हि नः। तानुवाच जगन्मूर्ति' यं देवस्य सागसः॥६ पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्या: स्वार्थतत्पराः । तेन शानं विवेको वा ह्तो देवेन शूलिना ।। महरि पुनस्त्य ने ने रहा-इसके उपरान समस्त देवगण भगवान् नुरारि के भुवन मे जाकर उपस्थित हुए थे और देव को नमस्कार करके उन्होंन बगद के सक्षोम का कारण निवेदन किया था ॥१॥ यह मुनकर भगवान ने कहा-शिव के मन्दिर मे चलें । वे महाशानी हैं और इस घराचर जगत के क्षोभ को जान लेंगे ॥२॥ इम प्रकार से कहे जाने पर भगवान् जनार्दन को नाम बनाकर इन्द्र के महित सब देवता मन्दराचल पर गये थे पिनु वहां पर देव, वृषभ, नन्दी, देवो कोई भी नहीं था ॥३॥ यह गिरि सर्वधा मून्य था। ऐमा देखकर मम अज्ञानाधिकार से ममावृत हो गये थे। महाच ति से युक्त मपवान् विष्णु ने उन सबको महष्टि याने देशापा विशुदेव ने कहा-करा मार लोग नहीं देख रहे है भगवान महावर मापके आगे ही सरियत है। उन्होने कहा-हम लोप १२२ ] [ वामन पुराण देवेश्वर गिरिजापति या दर्शन नहीं कर हैं ॥५॥ हमलोग इमवा कोई कारण भी नहीं जान पा रहे हैं जिससे कि यह हमारी दृष्टि हत हो गई है । जगन्मूनि ने उनसे पहा-आप योग देवेश्वर में अपराधी हैं ॥६॥ आप महान् पापिष्ट हैं स्वार्थ मे ही तत्पर रहते हैं । आरने मृडानी जगदम्वा के गणं का हनन किया । इसी कारण से मूलपाणि देवेश्वर ने आपका ज्ञान और विवेक नष्ट कर दिया है ॥७॥ येनात. स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यथ । तस्मात्कायविशुद्धयर्थ देवदृष्टयर्थमादरात् ।।८ तप्तकृच्छण सशुद्धा कुरुध्व ज्ञानमीश्वरे । क्षीरस्नान प्रयुजीत सागकुम्भशत पुरा दधिस्नाने चतु: पष्टित्रिशद्धविपोर्हणे । पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भा पोडश कीर्तिताः ॥ १० मधुनोऽष्टी जलस्योक्ता: मर्वे ते द्विगुणा सुराः । ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि ।।११ अनुलिम्पेत्कुडकुमेन चन्दनेन च भक्तितः । बिल्वपत्र: सकमले. कपुरागरुवन्दनं. ॥१२ मन्दारैः पारिजातश्च अतिमुक्त स्तथाऽचयेत् । अगरु सहकालेय चन्दनेनापि धूपयेत् ।।१३ जप्तव्य शतरुद्रीयमृध्वेदोक्त पदक्रमः । एच कृते तु देवेश पश्यध्य नेतरेण हि ।।१४ यही कारण है कि विल्कुल समक्ष मे स्थित होते हुए भी देवेश्वर का भाप दर्शन नहीं कर रहे हैं । इसतिये बहे बादर मे देव दृष्टि के निमित्त काम की शुद्धि के लिये तप्तकुच्छ प्रत से शोधन करो और ईश्वर में ज्ञान प्राप्त करो। क्षीर से स्थान को जो पहिले शत कुम्भो द्वारा सम्पन्न दिया जावे ॥८-६। फिर दधि स्नान चौंसठ कुम्भो से करो। हवि के पत्तो पत्तश हो तथा शुद्ध पञ्चाग के सोलह कलश होने चाहिए ॥१०॥ मधु के पाठ और सबसुरों को जन के हिगुणित कुम्भो से स्नान करना चाहिए। इसके पश्चात् रोचना से अष्टोत्तर शत के द्वारा देव का विष्णु-हृदय में शिव दर्शन ] [ १२३ अनुलेपन करो। और दुकुम तथा चन्दन मे भक्तिभाव पूर्वक प्रलेपन करो। इसके पश्चात् कमल, बिल्वपत्र, कपूर, सगर, चन्दन, मन्दार के पृष, पारिजात पुष्प और अति मुत्तों के द्वारा देवेश्वर का अर्चन करना चाहिए । अगद, महालेप नोर चन्दन में भी धूप का पाघ्रान करावे ॥११-१३॥ पद क्रमों के द्वारा ऋग्वेदोक्त शन तद्रीय का पार करना चाहिए । ऐमा कर लेने पर आप लोग देवेश्वर का दर्शन प्राप्त बारेंगे । अन्य कोई भी इसका उपाय नहीं है ॥१४॥ इन्युक्त्वा वामुदेवेन देवा: केशवमत्र वन् । विधान तप्नकृन्द्रस्य कय्यता मधुसूदन । यस्मिनीकाय शुद्धिर्भ विता सावंकालिको ॥१५ यह पुष्णाः पिबेवाप-त्र्यहमुष्णं पयः पिवेत् । यहमुष्णपिवत्सपियुमक्षो दिनत्रयम् ॥१६ पला द्वादश तोयस्य पलाष्टो पयमः मुराः । पट पला:मर्पिपः प्रोक्ता दिवसे दिवमे पिवेत् ॥१७ इत्येवमुक्त वचने सुरा: कायविशुद्धये । तप्तकृन्दरहस्य व चक शक्रपुरोगमाः ।।१८ ततो व्रते सुरात्रीणे विमुक्ताबापतोऽभवन् । विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमयाव वन् । पवासो दद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठति केशव । यं क्षोरायभिपेरेरण नापयामो विधानन: २० अयोगच मुरान्विगुरेप तिष्ठति शकरः। मद्दे है किं न पश्यध्व योग प्राप्य प्रतिक्षितम् ॥२१ भगवान वासुदेव के द्वारा इस तरह कहने पर देवगन ने मादाद देशव से कहा- ममूदन ! उत दृद्र प्रताप दिधान है उसे मार क्षिा रिसो घरने में और जिम दर के पूर्ण हो जाने पर मार भुमि मातिरी हो दासगी ॥१॥ वासुदेव ने कहा--तीन दिन पर्यन्त जन जन पोवे-चीन दिन उन पर पान पर-नीन दिन १२४ ॥ [ वामन पुराण 1 - तक गर्म घृत पोवे और फिर अन्त मे तीन दिन तक वायु काही भाण करके रहे ॥१६॥ हे सुरगण ! जन्न यारह पन लेवे । पप बाठ पल ग्रहण करे । मपि (न) के छ पत्र ग्रहण करे । ये दिन-दिन में पान बरे । ॥१७॥ STEEL मुनि ने कहा-ऐसा कहो पर सुरगण पाया की भुद्धि के लिये इन्द्र प्रभृति सबने तप्तच्छ रहस्य को लिया था ॥१८॥ इसके उपरान्त यत के पूर्ण हो जाने पर समस्त देवता पाप से मुक्त होगये थे । जब पाप रहित होगये तो उन देवो ने भगवान् वासुदेव से पहा--- 19 हे जगन्नाथ । भगवान् शम्मु कहा पर स्थित हैं जिनको कि हम अब क्षीर आदि के अभिषेक के द्वारा विधि पूर्वक स्नान परावें ॥२०॥ इसके पश्चात् विष्णु सुरों से बोरे शकर यहाँ पर स्थित हैं । क्या प्रतिष्ठिन योग को प्राप्त कर मेरे देह में नहीं देखते हैं ? ॥२१॥ तमूचुनॆव पश्यामः स्वतो वै त्रिपुरान्तकम् । सत्य वद सुरेशान महेशान. नवतिष्ठति ।।२२ ततोऽव्ययात्मा स हरि बहृत्पङ्कजशायिनमू॥ दर्शयामास देवाना मुरारिलिङ्गमश्वरम् ।।२२ ततोऽमरा.क्रमेणेव क्षीरादिभिरनु तमः । स्नापयाचकिरे लिङ्गशाश्वत ध्रुवमव्ययम् ॥२४ आलिप्य गोरोचनया चन्दनेन सुगन्धिना बिल्वपत्राम्बुजर्देव पूजयामासुरजमा १२५ धूपयित्वाऽगुरु भक्त्या निवेद्य परमौषधी. । जप्त्वाऽष्टशतनामानि प्रणाम चक्रिरे ततः ॥२६ इत्येव चिन्तयन्तस्त ववदेवो हराच्युतौ । कय योग तमापतौ सत्वेन तमसा वृतौ ॥२७ सुराणा चिन्तित ज्ञात्वा विश्वमूर्तिरभूद्विभुः । सर्वलक्षणसयुक्तः सर्वायुधरोऽव्ययः ॥२८ देवगण ने उनसे कहा-हम स्वत: विपुरान्तक को नही देखते हैं । हे सुरो के स्वामी ! सत्य बतलाइये महसर यहां पर सस्थित हैं ॥२२॥ इसके पश्चात् भगवान् हरि मुरारि ने ईश्वर के लिंग को अपने हृदय विष्णु-हृदय में शिव दर्शन ] [ १२५ कमल मे शयन किये हुए देवों को दिखला दिया था ॥२३।। इसके उप. रान्त देवो ने क्रम से ही उत्तम क्षीरादि के द्वारा उस शाशन-अव्यय और घ व लिंग का स्नपन कराया था ॥२४॥ गोरोचन और सुगन्धित चन्दन मे समालेपन दरके फिर विल्व पत्र आदि से देवेश्वर को मव ने पूजा की पी॥२५भक्ति मे अगरु से धूप प्रापन कराकर परमौषधी निवेदित करके अष्टोतर शत नाम का जप किया और प्रणाम किया या ॥२६॥ नारद जी ने कहा-वे देवगण इस प्रकार से चिन्नन कर रहे धे उसी समय मे हर और अच्युत देवो के भी देव सत्व और तमोगुण से समावृत रहने वाले उम योग को कैसे प्राप्त हुए ? ॥२७॥ पुनस्त्य जी ने कहा-सुरवृन्द का चिन्तन जान कर विभु विश्व मूत्ति होगये थे जो मर्व लक्षपो से समन्वित, समस्त आयुधो को धारण करने वाले और अविनाशी थे ॥२८॥ साद द्विनेत्र कनकाहिकुण्डलं जटागुडाकेशखगर्षभध्वजम् । समाधव हारभुजङ्गभूपणं पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥२६ चक्रासिहस्तं हलशाङ्ग पारिंण पिनाकशूलाजगवान्वित च । कपई राष्ट्वाङ्गकपालघण्ट सशड सटद्धाररवं महर्षे ॥३० दृष्ट्वैव देवा हरिशकरं त नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति । प्रोक्तप्रणामाः कमलासनाद्याश्चक मंति चकतरानियुज्य ॥३१ तानेकचित्ताविज्ञाल देवान्देवपनिहरिः। प्रगृह्याभ्यद्रवतूर्ण कुरक्षेत्र स्वमाथमम् ॥३२ ततोऽपश्यन्त देवेश स्थाणुभूत जले स्थितम् । दृष्ट्वा नमः स्पाणवे तु प्रोक्त्वासप्युपाविशन् ॥३३ ततोऽत्रवीत्सुरगातिरेहि नो दीयता वरः । क्षुब्ध जगजग ाथ उन्मज्जम्ब प्रियातिथे ॥३४ ततस्तो मधुरा वाणी शुधाव वृपभध्वजः । श्रुत्वोत्तस्यो च वेगेन सर्वव्यापी निरज्मनः ॥३५ दाई नेत्रो वाने-मुवर्ण के बहि कुण्डल धारण करने वाले, जटा से युक गुडाकेश को मासराय मामिनो श्रेष्ठ घना वाले, मात्र के महित,

१२६ ]
( वामन पुररण
भुजङ्गों के हार से भूपित, पीत धर्म से वटिमाग के समावृत परने वाले,
धन और असि हस्त मे लिये हुए, हत तथा शाझं धनुष को ग्रहण करने
वाले, पिनाक एव त्रिशूल धारी,कपदं पटवाङ्ग तथा कपाल थोर पण्टा
से समन्वित, शस की टसार ध्वनि वाते हरि और शकर को हे मह !
समस्त देवों ने दर्शन करते ही कहा-हे सवंगत एव अव्यय ! यापको
हमाग नमस्कार है ब्रह्मा थादि सब देवगण प्रणाप निवेदित करके एक
ही बुद्धि हृदय मे स्थित करने वाले हुए थे ॥२६-३१॥ देवों के स्वामी
भगवान् हरि ने उन सबको एकचित्त वाले जान कर ग्रहण करते हुए
शीघ्र ही अपने आश्रम कुरक्षेत्र मे चले गये थे ॥३२॥ इगके यान्तर जल
में स्थित स्थाणुभूत देवेश्वर को उन्होंने नहीं देखा था। ऐसा देख कर
सबने स्थाणु के लिये हमारा नमस्कार है- यह कहा और वहीं पर सब
बैठ गये थे ॥३३।। इसके उपरान्त सुरपति ने कहा-है जगन्नाथ !
आप तो अतिथियो को प्यार करने वाले हैं, बाइये, वरदान प्रदान
कीजिए और क्षुब्ध जगत् का उन्मज्जन करिए ॥३४॥ इसके अनन्तर
वृषभध्वज ने उस मधुर वाणी का श्रवण किया था और फिर सर्व व्यापी
निरञ्जन प्रभु शीघ्रता से उठ खडे
नमोऽस्तु देवदेवभ्यः प्रोवाच प्रहसन्हरः ।
स चागतः सुरै सेन्द्र प्रणतो विनयान्वितः ॥३६
तमूचुर्देवताः सर्वास्त्यज्यता शकर द्रुतम् ।
महाव्रतलयो लोकाः क्षधास्ते तेजसाऽद्दिताः ॥३७
अथोवाच महादेवो मयात्यक्तो महाव्रतः ।
ततः सुरा दिव जग्मुह ष्टा. प्रयतमानसाः ॥३८
ततो विकम्पते पृथ्वी साधिद्वीपा महामुने ।
ततो ह्यचिन्तयद्र द्रः किमर्थ क्ष भिता मही ॥३५
तत. पर्यचरच्छली कुरक्षेत्र समन्ततः ।
ददशीघवतीतीरे उशनस तपोनिधिम् ॥४०
ततोऽप्रवी.सुर पतिः किमर्थं तप्यते तपः।
जगत्क्षोभकरं विप्र तच्छीघ्र कथ्यता मम ॥४॥
थे ॥३५॥

विष्णु हृदय में शिव दर्शन । [ १२७ - भगगन हर हंसते हुए बोले-देवदेवों के लिये नमस्कार है जो इन्द्र और सब देवगप के माथ प्रगत एवं विनय से अन्वित होकर यहाँ पर आये हुए हैं ॥३६॥ समस्त देवताओं ने उनमे कहा है शंकर ! अब आप शीघ्र ही इन महा व्रत का त्याग कर दीजिए । सापके तेज से दित होर वीनों सोक क्षुब्ध होगये हैं ॥३७॥ इसके पश्चात् महादेव ने कहा- मैंने महा मन को त्याग दिया है। इसके उपरान्त मद देवगण परम प्रसत होते हुए प्रयत मन दाले स्वर्ग लोक को चले गये थे ।।३।। हे महा मुने ! इसके पश्चात् सागर बोर पर्वनों के सहित समस्त पृथ्वी विम्पिन हुई यो योर मगदान् द ने मोचा था कि यह भूमि क्सि कारण से सुभित हुई है ।।३६॥ इसके उपरान्त भगवान् शूली दुरुक्षेत्र के पारो ओर परिचरण करने लगे थे। तब उन्होंने ओघवती के तट पर पोनिधि उशना को देखा या ॥१०॥ तब सुरपति ने उससे कहा-यह सपस्या माप विसति कर रहे हैं ? इमसे सम्पूर्ण जगत् को बहा क्षोन हो रहा है। हे विप्र ! इसका कारण आप हमको शीघ्र ही बनाइये ॥४१॥ तवारायनकामाथ तप्यते हि महत्तपः । तस्मात्सजीविनी विद्या ज्ञातुमिच्छे त्रिलोचन ॥४२ तपसा परितुष्टोऽस्मि सुतप्तेन तपोधन । तस्मात्सं जीविनी विद्या भवान्ज्ञास्यति तत्त्वतः॥४३ वर लम्वा तता गुकस्तपसः सन्यवत्तंन । तथापि चलते पृथ्वो सान्धिभूभृतमा वृता ॥४ ततोगमन्महादेव: सप्तसारस्वत शुचि । ददर्श मृत्ममानं च भूपि मणस शितम् ॥४५ भावेन पोप्लूयति वाल वत्म भुजो प्रसार्यव ननत वेगन् । तस्य वेगेन ममाहता तु चचाल भूमिधरैः सहव ॥४६ त शंबरोयेत्य करे निगृह्यामोदाच वाक्य प्रहमन्महएँ । किमावितो नृत्यसि वेन हेतुना वदस्वमामा किमय तुष्टिः ।।४७ १२८ ] [ वामन पुराण स ब्राह्मणः प्राह ममाद्य तुष्टियनेह जाताशृणु तद्विजेन्द्र । तपस्मतो मे बहवो गता हि सवत्सरा: कायविशोधनार्थम् ।।४८ ततोऽनु पश्यामि कराक्षतोत्थं निर्गच्छते शाकरसं ममेह । तेनातितुष्टोऽस्मि भृशद्विजेन्द्रयेनास्मिनृत्यामिसुभावितात्मा ॥४६ उशना ने कहा-यह महान् तर तो आपके ही समाराधन करने के लिये किया है। हे त्रिलोचन ! मैं तो सजीविनी विद्या को जानना चाहता हूँ॥४२॥ भगवान् हर ने वहा~है तपोधन ! आपकी इस तपस्या से जो बहुत ही भली भांति की है में परम प्रसन्न एवं सन्तुष्ट हो गया हूँ। अतएव आप सजीविनी तात्त्विक रूप से आप अब जान लेंगे ॥४३॥ शुक्र इस प्रकार का वरदान प्राप्त करके तप से निवृत्त हो गये थे तो भी यह पृथ्वी समुद्र और पर्वतो के सहित चलायमान हो रही थी ।।४४॥ इसके पश्चात् शम्भु परम शुचि सप्त सारस्वत पर गये और वहाँ पर मईण नाम वाले ऋषि को नृत्यमान देग्या था ॥४५॥ बडे भात्र से पोप्लूयमान होता है और मुजाओं को फैलाकर वेग से नाच रहा है उसी के वेग से समाहत होकर यह भूमि पर्वतों के सहित चलायमान हो गई है ॥४६॥ भगवान् शकर उसके पास पहुंच कर उसे हाथ से पकड़कर हे महर्षे! हमते हुए बोले --किस हेतु से इतना भावित होकर नृत्य कर रहे हो ? मुझे आज बतलाओ। क्या इसमें तुम्हारी सुष्टि होती है ? ॥४७॥ उस ब्राह्मण ने कहा-आज यहाँ पर जिससे मुझे तुष्टि हुई है हे द्विजेन्द्र ! उसे आप सुनिए । तपस्या करते हुए मुझे बहुत वर्ष बीत गये थे जो कि काया के विशोधन करने के लिए की थी ॥४८॥ इमके पश्चात यही मेरे कर से क्षत से निकला हुआ शाकरस बहता है । इससे में बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हुआ हू । द्विजेन्द्र ! जिससे मैं शावित आत्मा वाला होकर नृत्य कर रहा हू ॥४६॥) त प्राह शभूद्विज पश्य मह्य भस्म प्रवृत्तं करतोऽतिशुक्लम् । सताडनादेव न च प्रहर्षो ममास्ति नून हिं भवान्प्रमत्तः । ५० श्रुत्वाऽय वाक्यं वृप भध्वज तं नत्वा मुनिर्मणको महर्षे । नृत्य परित्यज्य सुविस्मिनोऽय ववन्द पादौ विनयावनमः।।५१ विष्णु-हृदय मे शिव दर्शन । [ १२६ तमाह शर्द्विज गच्छ लोक तं ब्रह्मणो दुर्गम एव यन्न । इद च तीर्थ प्रवर पृथिव्या पृयूदक स्यात्सुमत्कल हि ॥५२ सानिध्यम व सुरामुराणा गन्धर्वविद्याधरक्निराणाम् । सदाऽस्तु धर्मस्य निधानमग्रय सारस्वत पापमलापहारि॥५३ सुप्रभा काञ्चनाक्षी च सुवेणु विमलोदका । महोदरा चौधवती विशाला च सरस्वती ॥५४ एताः सप्त सरस्वत्यो निवसिष्यन्ति नित्यशः । सोमपानफ्ल सर्वा प्रयच्छन्ति सुपुण्यदाः ।।५५ भगवान् शम्भु ने उमसे कहा--हे द्विज । देखो मुझे, मेरे कर मे अत्यन्त शुक्ल भस्म प्रवृत्त है जो सताहन से ही होती है किन्तु मुझे इसका कोई भी प्रदपं नहीं हो रहा है । आप तो निश्चय ही प्रमत्त हैं ॥५०॥ हे मह । इस वाक्य का श्रवण कर उस वृषभध्वज को उम मगर मुनि ने प्रणाम किया था और नृत्य का त्याग करके वह विस्मयान्वित हो गया था तया विनय से अति विनम्र होकर उसने शिव के चरणो को बन्दना की यो ॥५१॥ शम्भु ने उससे कहा-हे द्विज ! आप अब उस लाक को चन जाओ जो ब्रह्मा को भी बडा दुगम है । यह तीर्घ लोक में बहुत ही प्रेट और पृयूदक नाम वाला पृथ्वी मे होगा जिमका सुगहान फल होगा ॥५२॥ यहा पर ही सुरासुरों का तथा गन्धर्व विद्याधर और किन्नरों का सदा सान्निध्य होगा। यह धर्म का निधान परम ४ एव प्रमुख सारस्वत तीर्थ पार्यों के मनों का अप. हरण करने वाला होगा ॥५३॥ सुन्दर प्रमा वाली, काञ्चनाक्षी सुवेगु और विमल जल वाली तया महान् उदर से युक्त, श्रोध रो सयुन एव विशाला और सरस्वती ये सात सरस्वनी यहाँ पर नित्य हो निवास फरेंगी। ये मुपुण्य प्रदान करने वाली नदिया र सोमपान का पन देंगी ॥५॥ भवानपि बुरुक्षेत्र मूर्ति स्थाप्य गरीयसीम् । गमिप्यति महापुण्य ब्रह्मलोक सुदुगमम् ।।५६ १३० ] [ वामन पुराण इत्येवमुक्तो देवेन शंकरेण तपोधन । मूत्ति स्थाप्य कुरुक्षेत्र ब्रह्मलोकमगाद्वशी ॥५७ गते मङ्कणके पृथ्वी निश्चला समजायत । अथागान्मन्दरं शभुनिजनावसथं शुचि ॥५८ एवं तवोक्त द्विज शंकरस्तु गतस्तदाऽऽसीत्तपसम्तु शैले। शून्येऽभ्ययाद्दष्ट मतिर्हिदेव्या स योजितोयेहि कारणेन ॥५६ आप भी कुरुक्षेत्र में एक गरीयसी मूर्ति को स्थापित करके सुदुर्गम महापुण्य से युक्त ब्रह्मलोक को गमन करेंगे ॥५६॥ हे तपोधन ! इस प्रकार से भगवान शकर के द्वारा कहे जाने पर वह वशीभवण कुरुक्षेत्र मे एक मूर्ति को स्थापित करके ब्रह्मलोक को चले गये थे ॥५७॥ मण के चले जाने पर यह पृथ्वी निश्चल हो गई थी। इसके पश्चात् भगवान शम्भु निज आवास स्थल शुचि मन्दर गिरि पर चले गये थे ॥५॥ है द्विज ! इस प्रकार से यह आपको बता दिया है । भगवान् शकर उस समय में शैल पर तप के लिये गये थे। देवी द्वारा जिस कारण से उनको योजित किया था शून्य मे वह देखने को मति वाले होकर चले गये थे॥५६॥ ६३--अंधक-प्रह्लाद संवाद वर्णन गतोऽघकस्तु पाताले किमचेप्टत दानवः । पाकरो मन्दरस्थोऽपि यच्चकार तदुच्यताम् ॥१ पातालस्थोन्धको ब्रह्मवाचते मदनाग्निना। सतप्तविग्रहः सर्वान्दानवानिदमब्रवीत् ॥२ स मे मुहत्स मे वन्यु। स भ्राता स पिता मम । यस्तामद्रिसुता शीघ्र ममान्तिकमुपानयेद ॥३ एवं पति दायेन्द्र अन्य मदनारे। मेपगम्भीरनि?प प्रहादी वाक्यगद्रवीत् ॥४ अंधक-प्रह्लाद संवाद वर्णन ] [ १३१ येयं गिरिसुता वीर सा माता धर्मतस्तव । पिता त्रिनयनो देवः श्रूयता मन कारणम् ॥५ तव पिता त्वपुत्रेण धर्मनित्येन दानव । आराधितो हरो देवः पुत्रार्थाय पुरा किल ॥६ तस्मै त्रिलोच नेनासीद्दतोऽन्धोऽप्येव दानवः । पुरकः पुत्रकामस्य प्रोक्त्वेत्थं वचन विभो ॥७ देवपि नारद जी ने कहा- पन्धक तो पाताल में चला गया था। वह फिर उस दानव ने क्या चेशश की थी ? मन्दराचल पर से स्थित भगवान् शकर ने भी जो कुछ किया या उसे भी बतलाइये ॥१॥ पुन- म्त्य जी ने कहा- हे ब्रह्मन् ! पाताल में स्थित अन्धक मदन की अग्नि से वाधित हो रहा था। वह अतीव सतप्त शरीर वाला होकर समस्त दानवों से वह बोला ॥२॥ मेरा वही मित्र हैवह ही वन्धु है-वही भाई है और मेरा वही पिता है जो उम अद्रि पुत्री को शीघ्र ही मेरे पास प्राप्त करा देवे ।।३। दैत्येन्द्र अन्धक के ऐमा कहने पर जो कि काम से अत्यन्त ही आतुर हो रहा या प्रलाद मेघ के पोप के तुल्य गम्भीरता युक्त यह वाक्य बोले-हे वीर ! जो यह गिरि की तनया है वह धर्म से तेरी माता है और बिनयन देवेश्वर तेरे पिता हैं । इसमें जो भी कारण है उसका श्रवण तुम मुझसे कर लो ॥४-५॥ हे दानव ! नित्य हो धर्माचरण करने वाले विना पुन वाले तुम्हारे पिता ने पहिले पुन की प्राप्ति के लिये देवेश्वर हर का समाराधन किया था ।।६। पुत्र की सामना करने वाले को पुत्र होगा-यह वचन कहकर उसके लिये अन्य दानव ही पुत्र दिया या ॥७॥ नेतनयं हिरण्याक्ष सनमसुतया मम । पिहिन योगसंस्थस्य ततोलमभवत्तमः ।। तस्माच्च तमसो जातो भूतो नीलघनस्वनः। तदिदं गृह्यतां दंत्य तवोपयिकमात्मजम् ॥ यदा तु लोकविहिष्ट कर्म चाय करिष्यति । सलोक्यजननी चापित्तभिवान्छिप्यतेऽधमः॥१० १३२ ] [ वामन पुराण घानयिष्यति वा विप्र यदा प्रक्षिप्य चासुर । तदाऽस्य स्वयमेवाहं करिष्ये कायशोपणम् ।।११ एवमुक्त्वा गतःशभुः स्वस्थानं मन्दराचलम् । स्वपि ताऽपि समभ्यागात्त्वामादाय रमातलम् ।। २ एतेन कारणेनाम्बा शैलजा तब दाम । सर्वस्यापीह जगतो गुमः शभुः पिता ध्रुवम् ॥१३ भवानपि तथा युक्तः शास्यवेत्ता गुणाद्भतः। नेदृशे पापसंकल्पे मतिं कुयाद्भवद्विधः ।।१४ योग मे सस्थित मेरे हिरण्याक्ष को सनम सुता ने नेत्रत्रय पिहिन कर दिये थे । तभी से ऊपर की ओर तम छा गया था। उस तम से नील घन स्वनभूत उत्पन्न हुआ था। सो है दैत्य ! इसे तुम ग्रहण करो। यह तुऔषयिक आत्मज है 180 जिस समय में यह लोक का विद्वप युक्त कर्म करेगा और लोक्य जननी को भी यह अधम चाहेगा तथा विद्र का घात करेगा हे असुर ! उसी समय मे मैं स्वय ही इसके काया का शोषण कर दूंगा ||१०-११॥ इस प्रकार से कह कर भग- वान् अपने स्थान मन्दराचल पर चले गये थे और तुम्हारे पिता भी तुमको लेकर रसातल मे चले आये थे ॥१२॥ हे दानव ! इस कारण से शैलजा तुम्हारी माता है । इस सम्पूर्ण जगत् के भगवान् शम्भु गुरु तथा पिता हैं ||१३|| आप भी परम योग्य और इस प्रकार से समुत्पन्न हए हैं । आप शास्त्रो के मेत्ता तथा अद्भुत गुण गण से समन्वित भी हैं । अतएव इस प्रकार के पाप युक्त संकल्प मे आप जैसो को कभी भी मति नहीं करनी चाहिए ॥१४॥ लोक्यप्रभु रव्यक्तो भवः सर्वैर्न मस्कृतः। अजेयस्तस्य भार्यय न खम)ऽमरार्दन १५ न चापि शक्तः संप्राप्तुशलराजात्मजा शुभाम् । अजित्वा सगण रुद्र सच कामोऽय दुर्लभः ।।१६ यस्तरेत्सागरं दोभ्यो पातथेद्भवि भास्करम् । मेमुत्पाटयेदाऽपि स जयेन्द्रलपाणिनम् ।।१७ मंधक प्रह्लाद सवाद वर्णन ] [ १३३ उताहोस्विदिमां शक्तः क्रिया क्तुं महाबलः । न न सक्यो हरो ज्ञातु सत्यं सत्यं मयोदितम् ।।१८ किं त्वया न श्रतं दैत्य यथा दण्डो महीपतिः । परस्त्रीकामनामटः सराष्ट्रो नाशमाप्तवान् ।।१६ आमोहण्डो नाम नृपः प्रभूत बलवाहनः ।। स च व महातेजा पौरोहित्याय भार्गवम् ।।२० ईजे च विविधैर्यज्ञमुंपतिः शुक्रपालितः। शुक्रस्यासीच्च दुहि ता अरजा नाम नामत: २१ लोक्य के स्वामी--अव्यक्त भगवान् सम्मु सभी के द्वारा वन्दिर हैं । वे अजेय भी हैं। उनकी ही यह भार्या हैं है अमरों के मर्दन करने वाले ! आप इस वमं वरने के योग्य नहीं हैं ॥१२॥ शंलगज की बारमना जो परम शुम है आप प्राप्त करने में किसी प्रकार भी समर्थ नहीं हैं । गमों के सहिन भगवान् हद को बिना जीते हुए यह सम्भव भी नहीं है और वह काम अत्यन्त दुर्लभ है ॥१६॥ जो महासागर को हायों से ही तेर र पार करदे-जो भगवान् भास्कर को भूमण्डल मे गिरा देव-जो मेरु पर्वत को उसाह कर फेंक देव वही मुलपाणि को जोत साता है ।।१७॥ कोई महान् बलवान् भले ही इस समस्त क्रिया को भी कर देवे किनु भावान हर जानने के योग्य नहीं हो सकते हैं। यह मैंने बिल्कुल ही मस्य-मत्य कह दिया है ॥१८॥ हे दैत्य ! वया तुमन नही मुना है कि महीपति दर पराई स्त्री की कामना से महामुह राष्ट्र के सहित नान को प्राप्त होगया था ॥१६॥ एष दण्ड नाम वाला राजा अत्यधिक दल तया वाहनों वाला था । महान् तेज वारे उमने भार्गव से पौरोहित्य कर्म करने के लिये कहा पा ॥२०॥ उम शुक्र के दारा परिपालित नप ने अनेक यतों के द्वारा भी यजन दिया था। मुका पाम्यं जो की एक अरदा नाम बालो पुत्रो यो ॥२१॥ मुकः कदाचिद्गमहापपर्वामामुरम् । तेनाचितिर तत्र तस्यो भार्गवसतमः ॥२२ १३४ ॥ [ वामन पुराण अरजा. स्वगृहे वह्नि शुश्रूपन्ती महासुर । अतिष्ठत सुचार्यङ्गो ततोऽम्यागानराधिपः ॥२३ स पप्रच्छ क्व शुकोऽरिन तमूचु. परिचा रिकाः । गत स भगवाञ्छुक्रो याजनाय दनो सुतम् ।।२४ पप्रच्छ नृपतिः का तु तिष्ठते भागं वाथमे । तास्तमूचुगुरो पुत्री सतिष्ठत्यरजा नृप ॥२५ तामाश्रमे शुक्सुता द्रष्टु मिक्ष्वाकुनादन. । प्रविवेश महावाहुर्ददर्शारजस ततः ॥२६ ता दृष्ट्वा कामसतप्तस्तरक्षणादेव पार्थिवः सजातोऽन्धक दण्डश्च कृतान्तवलचोदितः ॥२४ विमजयामास तदा भृत्यानभ्रातृन्सु हृत्तमान् । शुशिप्यानपि चली एकाकी पृष्ठ आव्रजत् ॥२८ एक बार शुक्रापर्वा वृषवर्वा असुर के यहां चले गये थे । उसके द्वारा अर्चा की गई थी और वह वही पर अधिक समय पर्यन्त स्थित हो गये थे।।२२।। हे महासुर । अरजा अपने घर में वह्नि की सेवा करती हुई वह सुन्दर अ गो वाली रहा करती थी। उसी समय राजा वहाँ पर आगया था ।।२३। उस राजा ने उससे पूछा-भगवान् शुक्राचार्य कहाँ पर हैं। परिचारिकाओ ने उससे कहा- भगवान् शुक्रध्नु के पुत्र को याजन कराने के लिये गये हुए हैं ॥२४॥ फिर राजा ने पूछा-- भार्गव के बाथम में कौन रहती है । उन परिचारिकाओ ने उससे कहा- हे नृप ! गुरु जो की पुत्री अरजा घर मे रहनी है ॥२५।। वह इक्ष्वाकु- नन्दन राजा उसको शुक्राचार्य की पुत्री को देखने के लिये आश्रम में प्रवेश कर गया था और उसने उस अरजा को देख लिया था ।॥२६॥ उस परम सुन्दरी गुरु पुत्री को देखकर वह काम से अत्यन्त सतप्त हो गया था। हे अन्धक कृतान्त के बल से प्रेरित होकर उसी क्षण मे काम से महा पोदित हो उठा था ॥२७॥ उमने उसी समय में भृत्यों को भाइयों को और अपने सुहृदों को भी निजित कर दिया था तथा अंधक-प्रह्लाद सवाद वर्णन ] १३३ जो शुक्राचार्य के शिष्य थे उनको भी त्याग दिया । वह बलवान् अकला ही उमके पौछे चल दिया था ॥२८॥ तमागत शुकमुता प्रत्युत्थाय यशस्विनी। पूजयामास सहृष्टा भ्रातृभावेन दानव ॥२६ ततस्तामाह नृपतिर्खाले कामाग्नितापिनम् । मा समालादयस्वाद्य स्वपरिप्वङ्गवारिणा ॥३० साऽपि प्राह नरश्रष्ठ सुविनोता तमासुरम् । पिता मम महाक्रोधी निदशानपि निदहेत् ।।५१ . मूडबुद्ध भवान्भ्राता ममापि स्वयमागतः। भगिनीधमतस्तंह भवाञ्छिप्यः पितुर्मम ॥३२] सोऽब्रवीद्भीरु मा शुक्र कालेन परिघश्यति । कामाग्निनिर्दहति मामाव तनुमध्यमे ॥३३ सा प्राह दण्ड नृपति मुहून परिपालय । तमेव याचस्व गुरु स ते दास्यत्यसंशयम् ॥३४ दण्डोऽब्रवीरमुत्तन्वनि कालक्षेपो न मे क्षमः । हुतावसरकर्तृत्व विघ्नमायाति सुन्दरि ॥३५ मुकाचार्य की पुत्री ने जो परम यशस्विनी थी उमरो अपनी ओर समागत देखकर उठ पडी हुई और परम प्रसन्न होकर हे दानव ! भाई के भाव से उमने उमरा मकार किया था ॥२६॥ इसके पश्चात् वह राजा समसे दोला-हे बाले! सामाग्नि से सतप्त मुझको भाज परिष्वङ्गली जल से समाहादित कर दो ॥३०॥ वह मो परम विनीत होरर तम असुर से जो कि नरश्रेठ पा बोली-मेरे पिताजी महान् कोपी है । वे देवो को भी बता देते है ॥३१॥ हे मूड बुद्धि थाले ! माप भी मेरे भाई हैं और स्वय यहाँ आये हैं । मैं तो धर्म की रीति मे यापकी बहिन पपोरि भाप मेरे पिताजी + निष्प ई ॥३२॥ वह बोला है भीर! मह मुनाचार्य तो कुछ समय के बाद ही मुझे जला देंगे रिन्नु यह कामाग्नि सो हे तनुमध्यमे ! मुये यब हो जला रही है ॥३३॥ वह दर राजा बोली-थोड़ी देर प्रतीक्षा करो। तुम उसो अपने गुरुजी से १३६ ] [ वामन पुराण मेरी याचना करना । वे निश्चय ही मुझे आपको दे देंगे ॥३४॥ दण्ड राजा ने कहा-हे मुनन्वनि ! मैं तो थोडा सा भी समय सहन नही कर सकता हूँ। हे मुन्दरि ! हुतावसर कर्तृत्व में विधन आ जाता है ॥३॥ ततोऽब्रवीच्च विरजा नाह त्वा पार्थिवात्मज । दातुं शक्ता तथाऽमानमस्वतन्त्रा हि योपितः ॥३६ किंवा ते बहुनोक्तन द्राक् व नाश नराधिप । गच्छस्व शुक्रशापेन सभृत्यज्ञातिवान्धवः ।।३७ ततोऽब्रवीन्नरपतिः सुतनु शृणु चेष्टितम् । चित्राङ्गदाया यवृत्त पुरा दवयुगे शुभे ॥३८ विश्वकर्मसुता साध्वी नाम्ना चित्राङ्गदाऽभवत् । रूपयौवनसपन्ना पद्महीना तु पद्मिनी ।।३६ सा कदाचिन्महारण्य सखीभिः परिवारिता। जगाम निमिप नाम स्नातु कमललोचना ।।४० सा स्नातुमवतीर्णा च अथाभ्यागानरेश्वरः । मुदेवतनयो धोमान्मुरथो नाम नामतः ।। १ सवृता सा सखी: प्राह वचन सत्त्वसंयुतम् । असो नराधिपसुतो मदनेन कदथ्यते ॥४२ इसके अनन्तर विरजा ने कहा--हे पापिवात्मज ! मैं अपने आप को तुम्हें समर्पित करने के लिये समय नहीं हूं क्योकि योपित कभी स्पन्न नही होती हैं ॥३३॥ तुम अब मुझसे अधिक मुछ भी मत बही- सभी पा है। है नराधित ! आप बहुत ही गोघ्र शुक्राचार्य के शार भूप-जाति और बायको हित नाग को प्राप्त हो जाओगे ॥३७॥ गो पापात् वह राजा बोला-हे मुतनु ! पहिले समय में परम गुम देश युग में चित्राणदा पा जो पेष्टित हुआ पा उसे सुनो।३८॥विषय गौरी पुत्री परम मासो चिवारा पी। बद रूप और यौन 0 मापन गया पदिमनी ही पी ॥३६ वह गिी समय में सखियों हेरवासिहोर महारप में गई यो वह वमल के समान नेयों अ धक-प्रह्लाद संवाद वर्णन ] [ १३७ वाली निमिप में स्नान करने दो गई थी।॥४०॥ वह स्नान करने को तीयं मे नीचे उतरी थी और मुदेव का पुत्र परम धीमान सुरथ नाम वाला राजा वहां आगया था ॥४१॥ सवृत होकर उमने मत्व सयुत वचन सखियो से कहा-यह नराधिय का पुत्र काम से पोहिन हो रहा है ॥४२॥ यदर्थे च क्षम मेऽम्य स्वप्रदान सुरु पिणः । सरयस्तामवन्ववाला अप्रगल्भाऽसि मुन्दरि ॥४३ अस्वातन्त्र्य नवास्तीह प्रदाने स्वात्मनोऽनघे । पिता तवास्ति मिष्ठ सर्वशास्त्रविशारदः ।।४४ न ते युक्तमिहात्मान दातु नरपते स्वयम् । एतस्मिन्नन्तरे राजा सुरथः सत्यकः शुचिः ।।४५ समभ्येत्याबवीदेना कन्दर्पशरपीडिन: । त्व मुग्धे मोहयसि मा दृष्टयं व मदिरेक्षणे ॥४६ त्वदृष्टिशरवाणेन स्मरेणाभ्येत्य ताडितः । तन्मा कुचनले तल्पे अभिशायितुमर्हसि ॥४७ नोचेत्प्रघक्ष्यते कामो भूयो भूयोऽतिदर्शनात् । ततः सा चारुमर्वाङ्गी राज्ञो राजीवलोचना ॥४८ वार्यमारणा सखीभिस्तु प्रादादात्मानमात्मना। एव पुरा तया तव्या परित्रात. स भूपतिः ॥४६ मुन्दर स्वरूप वाले इसरो मुचे अपना प्रदान करने से सामन है । मखियों ने उम बाला से रहा-हे सुन्दरि । माप तो बहुत ही अप्रगल्म है ॥४३॥ यहाँ पर आपको अपने माप का प्रदान कर देने की स्वतन्त्रता नहीं है । हे अनधे ! आपके पिता परम धमिट हैं और सब शास्त्रों में महापण्डित भी हैं ॥४४॥ आप यह उचित नहीं है कि भाप स्वय हो अपनी बारमा को राजा को मस्ति स्वय करदें। इसी बीच में रावा मुरप जोमयक और गुचे पा समरे ममोप में बागया और उसे रोरा दा, कोंकि वह राम से अरपन्त पोषित हो रहा था। है मदिरेसने है मुग्धे । माप तो अपनी दृष्टि से हो मुपे मोहित पर 1

१३० ]
। वामन पुराण
रही हैं ॥ ४५-४६ ॥ आपकी दृष्टि रूपी बाण से मैं काम के द्वारा
अत्यन्त ताडित होगया हूँ। इसलिये आप शय्या पर अपने कुचतल के
समीप शयन करा देने के आप योग्य हैं ॥४७॥ नहीं तो यह काम मुझे
स्म पर देगा । बारम्बार अत्यन्त दर्शन से यह काम मुझे सता रहा
है । इसके पश्चात् वह सुन्दर संगो वाली और राजीव लोचना ने
सखियो के द्वारा निवारित किये जाने पर भी अपने आप ही
अपने को रारा को समषित कर दिया था । इस प्रकार से पुराने
समय मे उम तन्व गो ने उम राजा का परित्राण किया था ॥४८-४६॥
तस्मात्वर्माप सुथोरिण मा परित्रातुमर्हसि ।
अरजस्कायवीद्दण्डं तस्या यवृत्तमुत्तमम् ।।..
कि त्वया न परिज्ञात तस्मातकथयाम्यहम् ।
तदा तया नु तन्वङ्गया मुरथस्य महीपतेः ।।५१
आत्मा प्रदत्त स्वातन्ध्यात्ततस्तामशपत्पिता।
यस्मादम परित्यज्य स्त्रीभावान्मन्दचेतसे ॥५२
मात्मा प्रदत्तस्तस्मादिन विवाहो भविष्यति ।
विवाहहिता नैव सुख लप्स्यसि भर्तृतः ।।५३
न च पुषफल नैव पतिना योगमेध्यसि ।
उस्मृष्टमारे शापे तु पोवाह सरस्वती ॥५४
अकृतार्थ नरपति योजनानि त्रयोदश।
अपकृष्ट नरपती साऽपि मोहमुपागता ॥५६
तनम्ता: मिवियु: मर्वा, सरस्वत्या जलेन हि ।
सा मिच्यमाना सुतरा शिशिरणाथ बारिणा ॥५६
मृतरस्या हतोत्माहा विश्वकर्ममुताऽभवत् ।
ता मृतामिय विज्ञाय जम्मः मध्यस्त्वरान्विता: 1५७
मनिये हे मुयोणि ! धाप भी मेरा परिघाण करने के लिये योग्य
मरस ने उम १६ राजा रहा था जो कि उगमा उत्तम दृत
पा॥५०॥ भाग नहीं जानते है ? अतएव में हो तुम से बहती हूँ।
म पम महापान गुरष रारा को अपना मण वोर

अंधक-प्रह्लाद संवाद वर्णन ]
[ १३६
दिया था और स्वतन्त्रता का प्रदर्शन किया था फिर उसके पिता ने
उमको शाप दे दिया था। पिता ने कहा-हे मन्दचेतसे ! क्योकि धर्म
का परित्याग करके स्त्री भाव से तूने अपने आपको समर्पित कर दिया
है इसलिये अब तेरा विवाह नहीं होगा । विवाह से रहित होती हुई
भर्ता से सुख प्राप्त नहीं करेगी ।।५१-५३॥ और पुन का फल भी नहीं
होगा और पति के माय भी तेरा योग नहीं होगा । शाप के उत्मृष्ट भर
हो जाने पर सरस्वती का अपोवाहन दिया । कृतार्थ नरपति को
अयोदश योजन अपक्ष्ट होन पर वह भी मोह को प्राप्त हो गई थी
॥५४.५५।। इसके सपरान्त उन सब ने सरस्वती के जल से सेचन किया
था। वह शीतल जल मे सुतरा सिच्यमाना होती हुई वह विश्वकर्मा की
सुना मृत के समान और हतोत्माह हो गई थी। उसको मरी हुई समझ
कर सभी सखिया शीघ्रता से युक्त होकर चली गई थी ।।५६-५७।।
आहर्तुमपराः काष्ठं वह्निमानेतुमाकुलाः ।
सा च तास्वपि सर्वामु गतासु वनमुत्तमम् ॥२८
सज्ञा लेभे सुचावनी दिशश्चेत्यवलोक्य च।
अपश्यन्ती नरपति तथा स्निग्ध मखीजनम् ।।५६
निपपात सरस्वत्या पयोभिस्तरलेक्षणा।
ता वेगात्काञ्चनाक्षी तु महानद्या नरेश्वर ॥६०
गोमत्या च प्रचिक्षेप तरङ्गकुटिले जले।
तयाऽपि तस्यास्तद्भाव्य विदित्वाप्य दिशा पते॥६१
महावने परिक्षिप्ता सिंढ्याघ्रसमाकुले ।
एव तस्या: स्वयं तत्र या त्ववस्था श्रता मया ॥६२
तस्मान दास्याम्यात्मान रक्षन्ती शोलमुत्तमम् ।
तस्यास्तद्वचन श्रुत्वा दण्डः शक्रसमो वली।
विहस्य त्वरजा प्राह स्वार्थमङ्गक्षयंकरम् ॥६३
दूमरी काठ लाने के लिये तया अग्नि लाने के लिमे समाकुल हो रही
थी। वह उन मबई चले जाने पर उम उत्तम वन मे सना को प्राप्त हुई
थी । जब होध में उस चावंगी ने सभी दिशाओ की ओर देखा था उसने

१४० ] [ वामन पुराण उस ममप मे देखते हुए भी राजा को तथा स्निग्ध सखियो को नही देखा था ।।५८-५६।। वह तरलेक्षण ! जोकि जल से हो रही थी सर. स्वती मे गिर पड़ी थी । काञ्चनाक्षी ने हे नरेश्वर ! बैग से महानदी गोमनी के कुटिल जल में उसे प्रक्षिप्त कर दिया था। हे विज्ञापते ! उमने भी उमके तद्भाव्य को समझ कर सिंह और व्याघ्रो से समाकुल एक महान् वन मे प्रक्षिप्त कर दिया था। इस प्रकार से वहा पर उसकी स्वय जो अवस्था हुई थी वह मैंने सब श्रवण को है ॥६० ६२।। इस लिये मैं अपने उत्तम शोल का मरक्षण करती हुई अपने आपको सम- पित नही करूंगी। उमके इस वचन को मुनकर इन्द्र के सौमान बलवान् राजा दण्ड ने हंस कर अंग के क्षय करने वाले स्वार्थ को ही अरजा से पहा ॥६३॥ तस्या यदुत्तर वृत्त तस्पितुन कृशोदरि । सुरथस्य तथा राज्ञस्तच्छ्रोतु मतिमादधे ॥६४ पदा प्रकृष्ट नृपती पतिता सा महावनम् । तदा गगन सचारी दृष्टवान्गुह्यको जनः ॥६५ तत. सोऽभ्ये ताबाला परिभाष्य प्रयत्नतः । प्राह चागच्छ सुभगे नयामि सुरथ प्रति ॥६६ ध्र वमेप्यसि तेन त्व सयोगमसितेक्षणे। तम्माद्गच्छस्व शीघ्रत्व द्र, श्रीकण्ठमीश्वरम् ॥६७ इत्येवमुक्ता सा तेन गुह्यकेन सुतोचना । श्रीकण्ठमागता सूर्ण पालिाद्या दक्षिणोत्तरम् ॥६- दृष्ट्वा महेशं श्रीकण्ठ स्नाप्वा रविसुनाजले। थातठन शिरोनना यावामध्ये स्थितो रविः ॥६५ अयाजगाम देवस्य स्नान यतुं तपो धनः । गुम: पाशुपताचार्यः सामवेदी प्रतुध्वजः ॥७० राजा ने रहा- मोदर सो बाद में जो छहभा पा उमरे पिता और राग गुरप मागेआ था उगे थक्षण परले को गति रो ॥१४॥ जर राश उमगे दूर हो गया था और महान अंधक-प्रह्लाद संवाद वर्णन ] [ १४१ धन मे गिरगई थी उस समय व आकाश मे विचरते एक गुहार ने उसे देखा था ॥६शा फिर वह आकर उस घाला से प्रयत्न पूर्वक भाषण करके उससे उसने कहा-हे मुभगे ! आओ, मैं तुमको सुरथ के समीप ले चलता हूँ ॥६६।। है असितेक्षणे तुम निश्चय ही उस राजा का सयोग प्राप्त कर लोगी। इसलिये तू शीघ्र ही प्रो कण्ठ ईश्वर का दर्शन करने के लिये चलो ॥६७।। इस तरह से उसके द्वारा कहे जाने पर वह सुलोचना उस गुह्यक के साथ श्री कष्ठ के समीप में कालिन्दी के दक्षिणोत्तर भाग में शीघ्र ही आ गई थी॥६८|| महेश श्री कण्ठ का दर्शन करके और रविसुता के जल में स्नान करके जब तक रवि मध्य में स्थित रहे वह शिर के नीचा करके वहा स्थित रहो पो ॥६६॥ इसके अनन्तर तपोधन देव के स्नान करने को आ गये थे। वह परम शुम सामवेदी पाशुपताचार्य ऋतुध्वज ये 11७०॥ रुदतीमिव स्थिता तामनङ्गपरिवजिताम् । ता दृष्ट्वा स मुनियन मगमत्केयमित्यथ ।।७१ अथ सा तमृपि वन्द्य कृताञ्जलिस्पस्थिता। सा प्राह पुनि कस्यासि सुता सुरसुतोपमा १७२ किमयमागताऽसीह निर्मनुष्यमृगे वने। ततः सा प्राह तमृपि यायातथ्य कृशोदरी ।।७३ श्रुत्वपि. कोपमगदशपछिल्पिना वरम् । यस्मात्स्वतनुजातेय परदयाऽपि पापिना ॥७४ योजिता नव पतिना तस्माच्छाखामृगोऽस्तु सः । इत्युक्त्वा स महाभागो भूयः स्नात्वा विधानतः ॥७५ उपास्य पश्चिमा सध्या पूजयामास शकरम् । सपूज्य देवदेवेश ययोक्तविधिनाहरम् ॥७६ उवाचागम्यता सुन्न रुदन्ती पनिलालसाम् । गच्चस्व सुभगे देश सप्तगोदावर मुभम् ।।७७ यहां पर स्थित मनग परिवजित रोश्न करती हुई उसे वाहोंने देगा पा। उस मुनि ने ध्यान लगाया कि यह ौन है ।।७१॥ इसो

१४२
। वामन पुराण
उसने उम ऋषि की वन्दना की धी और हाथों वो जोड कर उनके
समक्ष में उपस्थित हुई थी। मुनि ने उमसे कहा-हे पुनि । तू मुर.
सुता के समान है । किसकी पुत्री है ? यहाँ किसलिये आई है ? यह
तो निर्जन वन है । इसके बाद वह बोली-वृशोदरी उमने उस ऋति मे
जो सत्यर बात थी वह सब कह दी थी ।।७२-७३।। ऋषि ने सुनकर
कोप किया और शार दिया कि क्यो कि स्वकीय तनु से समुत्पन्ना यह
दूसरे को भी पापी के द्वारा देय है ॥७४॥ पति के साथ योजित नहीं
की गयी थी। इसी कारण से बह शाखामृग (बन्दर) है । इतना भर
कह कर उम महाभाग ने पुनः विधि-विधान के साथ स्नान किया था
७५३॥ फिर पश्चिमा सन्ध्या करके भगवान् शङ्कर का पूजन किया
था । यथोक्त विधि से देवो के भी देव हर का भली भाति पूजनान
करके उसने सुभ्र और पति के लिये लालसा रखने तथा रुदन करने
वाली से कहा-आओ और हे सुभगे ! सप्त गोदावर परम शुभ देश को
चली जाओ ॥७६/७७॥
तत्रोपास्य महादेव महान्त हाटकेश्वरम् ।
तत्र स्थिताया रम्भोरु ख्याता देववती शुभा ॥७८
आगमिष्यति दैत्यस्य पुत्री कन्दरमालिनः ।
तथाऽन्या गुह्यकसुता दमयन्तीति विधता ।।७६
अञ्जनस्यापि तत्रापि समेष्यति तपस्विनी ।
तथाऽपरा वेदवतीपर्जन्यदुहिता शुभा ।।८०
यदा तिस्रः समेप्यन्ति सप्तगोदावरे जले।
हाटकाख्ये महादेवे तदा सयोगमेष्यसि ।।८१
इत्येवमुक्ता मुनिना वाला चित्राङ्गदा तदा।
सप्तगोदावर तीथमगमत्त्वरिता ततः ॥८२
संप्राप्य तत्र देवेश पूजयन्ती त्रिलोचनम् ।
समध्यास्ते शुचिपरा पालमूलाशनाऽभवत् ॥८३
स चपिनि रापता श्रीकण्ठाय तसोऽलिखत् ।
श्लोक त्वेक महात्मान तस्याश्च प्रियकरम्यया १८४

१४४ ] [ वामन पुराण विश्वकर्माऽपि मुनिना शप्तो वानरता गतः । न्यपतन्मेरुशिखराद्भूपृष्ठ विधिनोदित: १२ वनं घोर सुगुल्मान्य नदी शालूकिनीमनु । स त्वेव पर्वतश्रेष्ठ समावसति सुन्दरि ॥३ तत्रासतोऽस्य सुचिर फलमूलान्यथाश्नतः । कालोऽत्यगाद्वरारोहे बहुवषगरणो वने ॥४ एकदा दैत्यशार्दूल कन्दराय्य सुता प्रियाम् । प्रतिगृह्य समभ्यागारख्याता देववती दिवि ॥५ ता च तद्वनमायाता सम पित्रा वराननाम् । ददर्श वानरथष्ठ. प्रजग्राह बलात्करे ॥६ ततो गृहीता कपिना स दैत्य. स्वमृता शुभे । कन्दरो वीक्ष्य सकद्ध खङ्गमुद्यम्य चाद्रवत् ॥७ दण्ड वे कहा-हे अरजे । वहाँ पर वीर सुरथ का स्मरण करने वाली सुख पूर्वक उस सती चित्रागदा का महान् काल व्यतीत हो गया या ॥१॥ मुनि के द्वार शाप दिया गया विश्व कर्मा भी वानर योनि को प्राप्त होगया था। विधि के द्वारा उदित होता हुआ वह मेरु की चोटी से पृष्ठ पर निपतित हो गया था ॥२॥ हे सुदरि । सुन्दर गुल्मो (झाडियों) से युक्त घोर वन वाले शालूकिनी नदी के साथ उस श्रेष्ठ पर्वत पर वह इसी तरह से निवास करता था ॥३॥ वहा पर बहुत समय तक फलमूलो का अशन करते हुए हे वरारोहे । वन में बहुत अधिक वर्षों का समय उसे व्यतीत हो गया या ॥४॥ एक बार दैत्यो मे शार्दूल के समान कन्दर नाम वाला अपनी प्रिय पुन्नी को लेकर वहा पर आया था जो दिवलोक मे देववती के नाम से प्रसिद्ध थौ ॥शा अपने पिता के साथ मे उस वन मे आयी हुई उस वरानना को उस वानर श्रेष्ठ ने देखा था और बलपूर्वक उसे हाथ से पकड लिया था ॥६॥ है शुभे । उस दैत्य ने अपनी पुत्री को कपि के द्वारा बलात् प्रहण पोहुई देखा तो दर अत्यन्त कद होगया और पग उठा कर उस पर उसने आक्रमण किया था ।।७।। भूमि के -- | वामन पुराण पुत्रो के साथ जाकर वहाँ मे गा करने की इच्छा पाना होगया था॥१४॥ ता दृष्ट्वाऽमन्यत श्रीमान्सेय देववती ध्रनम् । तन्मे वृथा श्रमो जातो जलमजनसभवः ।।१५ इति सचिन्तयन्नेव समाद्रवत सुन्दरि । सा तद्भयाच्च न्यपतनदी व हिरवतीम् ॥६ गुह्यको वीक्ष्य तनया पतितामापगाजले । दुःखशोकसमायुक्तो जगामाञ्जनपर्वतम् ॥१७ तत्रासौ तप आस्थाय मौनव्रतधरः शुचिः । समास्ते में महातेजाः सवत्सरगणान्वहून् ॥१८ दमयन्त्यपि वेगेन हिरण्वत्याऽपवाहिता । नीता देश महापुण्यं कोसल साधुभियुतम् ॥१६ गच्छन्ती सा च रुदती ददृशे वटपादपम् । प्ररोहप्रावृततनु जटाधरमिवेश्वरम् ॥२० त दृष्ट्वा विपुलच्छाय विशश्राम वरानना । उपविष्टा शिलापट्ट ततो वाच प्रशुश्रुवे ॥२१ उस श्रीमान् ने उसको वहीं देखकर यह समझ लिया था कि यह वही देववती है । इमलिये मैंने जो जल मे मज्जन करने का घोर श्रम किया था वह सब व्यर्थ ही होगया ॥१५॥ हे सुन्दर ! ऐसा चिन्तन करते हुए ही उसने उसकी ओर वेग से गमन किया था और वह भय- भीत होकर हिरवती नदो मे गिर गई थी ॥६६॥ गुह्यक अपनी पुत्री को नदी के प्रवाह में गिरी हुई देखकर अत्यन्त दुःख और शोक से समन्वित होकर अञ्जन पर्वत का चला गया था ॥९७। वहाँ पर यह मौन बत धारण करते हुए शुचि होकर तार वर्मा में समास्थित हो गया था। वह महा तेजस्वी से वर्षों तक उमी तपस्या में स्थित रहा था ॥१८) दमयन्ती भी हिरवती नदी के वेग से अपवाहित होकर साधुओं से युक्ती, परम पवित्र कोसल देश मे पहुंचादी गई थ१६ावहा जाती और रोती हुई उमने एकावट के वृक्ष को देखा या जो प्ररोही से एकदम ढके हुए जावालि मोचन वर्णन ] । १४६ फोगो से मागेगा। भूमि शम्या में शयन और पदाना भोजन होगा ॥३३॥ इस प्रकार म तिाक द्वारा कहा गया बालक मैं ओr पाँच वर्ष का हूँ हिरणती में स्नान करने को गमन करता हुमा मही के पृष्ठ पर विवरण करता हूँ ॥३४॥ इसके पश्चात् मैन रविवर से देखा था उसने मुझम पूछा था कि तुम कहाँ जारह हो ? और मूड प्राप्रम में ज्यस्त इम देववती को पहा करने जा रहे हो ॥३५॥ ततोऽमी मा ममादाय विस्फुरन्त शिमुतत.। वटाग्रेऽस्मिन्नुदव-ध जटाभिरपि मुन्दरि ॥३६ तथा च रक्षा व पिना ना भीरु निरन्नरः। लतापाशमंहायन्नमध्यम्या दुष्टबुद्धिना ।।३७ अभेद्योऽयमनाभ्य उपरिधातथा वध । दिशा मुसेषु मवेषु कृत यन्त्र लतामयम् ॥३८ सयभ्य मा कपिवर. प्रयातोऽमरपवंतम् । ययेच्च्या मया दृष्टमेनत गदित शुभे ॥३६ भवती का महारण्ये ललना पतिवजिता। समायाता मुचावंगी वैन कारण मा वद ॥४० साऽनवीदजनो नाम गुह्यकेन्द्रः पिता मम । दमयनीति मे नाम प्रम्लोचागभंसमवा ॥४१ तन में जातके प्रोतमृपिणा मुद्गलेन हि । इय नरेन्द्रमहिषी भविष्यति न संशयः ।।४२ इसके उपरान्त विस्पुर्यमाण शिशु मुझो लाकर इस वट वृक्ष अग्रभाग में जटाओं से उदन्धन कर दिया है ॥३६॥ है भीरू ! इस दृष्ट बुद्धि वाले कपि ने निरन्तर लनापागों के द्वारा महायन्त्र के मध्य में स्थित मेरी रक्षा की है ॥३७॥ यह लतामय यन्त्र सद दिशामो के मुखों में ऐसा क्या दिया है कि जो अभेद्य और आक्रमण करने के अयोग्य है। कार में इसका ऐसा ही वध है ॥३८॥ वह कपिवर मुदी यहाँ पर इस प्रकार से समित करके अमर पवंद पर चला गया था। मैंने यथेच्या उसे देखा था। हे शुभे ! मैंन यह तुमको सब बता दिया १५० ] यामन पुराण है ॥३६॥ आप फोन है । इग महारराय में पनि मे रहित सातना गुन्दर अंगों वाली वम यायं मे यहा ममामात हई हो ? यह मुही मार बत. लाइये ॥४०॥ उस ललना ने उत्तर दिया था वहन नाम वाला गुह्ययों का स्वामी मेरा पिता है मेरा नाम दमयन्ती है। मैं प्रतीचा के गभ से समुत्पन्न हुई हूँ ॥४१॥ में जाता में मुद्रा प्रषि ने यह स्पर लाया है रि यह किसी नरेन्द्र की पट्टामिपिनी महिणी होगी- इसमे कुछ भी सपाय नहीं है ।।१२।। तद्वाक्यसमकाल तु न्यनदद्दिवि दुन्दुभिः । शिवाश्चाशिव नि?पास्ततो भूयोऽब्रवीमुनिः ॥४३ न सदेहो नरपतेमहाराज्ञी भविष्यति । महान्त सशय घोर कन्याभावे समेप्यसि ।।४४ तुनो जगाम स ऋपिरेख मुक्त्वा वचो द्तम् । पिता मामपि चादाय समागन्तुमर्थच्छत ॥४५ तीर्थ ततो हिरण्वत्यास्तोरात्कापिरथोत्पतत् । तद्भयाच्च भया ह्यात्मा क्षिप्तः सागरगाजले। तयास्मि देशमानीता इम मानुपवजितम् ।।४६ श्रुत्वा जावालिरथ तद्वचन वै तयोदितम् । प्राह सुन्दार गच्छस्व श्रीकण्ठ यमुनातटे ॥४७ तत्रागच्छति मध्याह्न मत्पिता शिवमचितुम् । तस्मै निवेदयाशु त्व ततः श्रेयोऽभिलप्स्य से 11४% ततस्तु त्वरिता काले दमयन्ती तपोनिधिम् । परित्राणार्थमगद्धिमाद्री यमुनानदीम् ॥४६ उसके वाक्य के सम बात मे ही दिव लोक मे दुन्दुभि बजी थी। शिव और अशिव निद्याप हुए । तद पुन: मुनि ने कहा । इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है । तुम नरपति की महारानी बनोगी। कन्या के अभाव में महान् घोर सशय को प्राप्त होगी ॥४३-४४॥ मके पश्चात् वही भूपि इस वचन को कहकर शीघ्र धले गये थे। मेरे पिता भी मुझको लेकर तीर्थ का समागमन करने की इच्छा करने लगे थे ॥४५॥ इसके जावालि मोचन वर्णन ] ( ૧૧ अनन्तर हिरवती के तट में कपि ने उत्स्तन किया था। उसके भय से अपने पार को मागर के सर में प्रक्षिप्त कर दिया था। उमी नदी के द्वारा मैं इस मनुप्पो से रहित दश में ले आयो गरी हूं ॥४६॥ दण्ड ने कहा-इमके कारान्त जावालि न उसन जो कुछ कहा था उम वचन को मुनार कहा था--मुन्दरी ! यमुना तट पर प्रो काठ के ममीन गे वो जाओ ॥४॥ वहाँ पर मध्याह्न में मेरे पिता भगव न शिव को अचना करने के लिये आया करने हैं । उनसे तुम यह सब निवेदन करना । इसके पश्चात् तुम कल्याण की प्राप्ति करोगी ॥४८॥ इस उपरान उस समय म तुरन्त ही शान गापिनी हाती हुई परिवाण पाने के लिये हिमाचल म यमुना नदो पर तपोनिधि क समीप में गई थी ॥४॥ सा म्वदीर्पण कालेन कन्दमूलफलाशना । सप्रानाश करस्थान यत्रागच्छनि तापम: ॥५० तत: मा देवदेवेश श्रीकण्ड लाकदन्दितम् । प्रतिवन्ध ततोऽपश्यदक्षराणि महामुने ।।५१ तेपामयं हि विज्ञाय सा तदा चारुहासिनी । जापमाल्युदित श्लोकमलिबच्चान्यमात्मनः ॥२ मुद्गलेनास्मि गदिता राजपत्लो भविष्यति । सा चावस्यामिमा प्राप्ता कश्चिन्मात्रातुमीश्वरः ॥५३ इन्युल्लिव्य शिलापट्टे गता स्नानु यमानुजाम् । ददृशे चाश्रमवरं भत्तकोकिलनादितम् ॥५४ मतो मध्यमसावृपिनन तिष्ठति सत्तमः। इत्येव चिन्तयन्मी सा सविष्टा महाथमम् ॥१५ ततो ददश देवाना स्थिता देववती शुभाम् । शुप्काम्या चलनेत्रां तु परिम्लानामिवाजिनीम् ।।५६ दह पौडे ही ममय में कन्द-मून फ्तो काशन करती हुई भगवान् शकर के स्थान पर प्राप्त हुई पी ही पर वह वापस मापा घरते हैं ॥५०॥ इसके बाद में वह लोक वन्दित देव देवेच श्री कृष्ण भगवान् १५२ ] [ वामन पुराण को बन्दना करके है महामुने । फिर उसने अक्षरो को देखा था ॥५१॥ उनके प्रयोजन को उस ममय मे समझ कर उस चारु हासिनी ने अपना जाप माल्युदित अन्य श्लोक लिखा था ॥५२॥ मुद्गल मुनि ने कहा था कि तू राजा की पत्नी होगी । वह मैं अब इस अवस्था की प्राप्त हो गई हूं कौन मेरी रक्षा करने को समर्थ है ॥५३॥ एक पत्थर की शिला पर यही लिखकर वह यमुना नदी में स्नान करने के लिये चली गई धी। और दहा पर एक परम घेठ आश्रम देखा था जिसमें मत्त कोयलो का विवाद हो रहा था॥५४॥ दसलिये इसके मध्य मे निश्चय ही यह श्रेष्ठतम ऋषि स्थित होगे-ऐसा चिन्तन करती हुई उसने उस महान् आश्रम में प्रवेश किया था ॥५१॥ इसके पश्चात् देवो की उस शुमा देववती को सस्थित देखा था जिम का मुख शुष्क पा और नेम चचल हो रहे थे जमे कोई परिम्नान पद्मिनी हो ॥५६॥ सा चापन्नी ददृशे यक्षजा दैत्यनन्दिनीम् । केयमित्येव सचिन्त्य समुत्थाय स्थिराऽभवत् ।।५७ ततोऽन्योन्य समाश्लिप्य गाद गाढं मुहृत्तया । पर्यपृच्छतदाऽन्योन्य कथयामासतुस्ततः ।।५४ ते परिज्ञानतत्त्वार्थे अन्योन्य ललनोत्तमे। समासात काथाभिस्ते नानारूपाभिरादरात् ।।५६ एतस्मिनन्तर प्राप्त: मुनिः श्रीकण्ठमचितुम् । प्रतःवजो मुनिश्रेष्ठस्ततोऽपश्यदयाक्षरान् ॥६० स दृष्ट्वा वाचियित्वा च तदर्थमधिगम्य च । मुहूतं ध्यानमास्थाय व्यजानाच तपोनिधिः ॥६१ सतः सपूज्य देवेश त्वरया स ऋतध्वजः। अयोध्यामपरिक्ष द्रष्टुमिश्वायुमीश्वरम् ।।६२ त दृष्ट्वा नृपत्तिष्ठ तापसो वावयमावीत् । यता नरशार्दूल विज्ञप्तिमम पार्थिव ॥६३ यो मन भी भाती हुई यात्री को देखा। यह दोन है ऐमा मोती यह रिपर हो गई ॥७॥ फिर एक दूसरीशे मोहा गाय से दूर जावालि मोचन वर्णन ] [ १५३ बापन अच्छी तरह समारपा करके एक दूमरी ने आरम में उस समय में पूजा था और अपना२ हाल बताया था ॥५८॥ वे दोनो अत्युत्तम ललनाओं ने में एक दुमरी का पूरा२ हाल जान लिया था और फिर अनेक रूप वालो कथाओं को कहती हुई आदर पूर्वक वे दोनों वहा पर बैठ गई थीं ॥५६॥ इमो बीच में मुनि वहा पर भगवान् श्री कठ की अर्चना करने के लिये प्राप्त हुए थे और मुनि श्रेष्ठ अनध्वज ने फिर उन यक्षरों को देना था ॥६०॥ उसने देखा और वांचा तथा उनके अर्थ को भी भलो भाति समझ लिया था। थोडी देर तक ध्यान में समास्थित होकर उप तरोनिवि ने विशेष रूप से समझ लिया था ॥६१।। इसके पश्चात् उम ऋतध्वज ने शीघ्रता से देवेश्वर का पूजन करके वह शोघ्र ही ईश्वर इक्षाकु मे मिलन के लिये अयोध्या पुरी में आ गये थे ॥२॥ उम नृपति धेट से मिल कर वापस ने उम से यह वाक्य कहा था-है नर शार्दूल ! हे राजन् मेरो विज्ञप्ति का प्रवण करो ॥६३॥ मम पुलो गुणयुक्तः सर्वशास्त्रविशारदः । उद्वद्धः कपिराजेन विषयान्ते तवैव हि ॥६४ तं हि मोचयितु नान्यः शक्तस्त्वत्तनयादृते । शकुनि म राजेन्द्र स ह्यन विधिपारगः ॥६५ तन्मुनेर्वाक्यमाकर्ण्य पिता मम कृशोदरि। आदिदेश प्रिय पुत्रं शकुनि नामशान्तये ॥६६ तत: स प्रहितः पित्रा भ्राता मम महाभुजः। सप्राप्तोऽय वनोद्देशं सम हि परमपिरणा ॥६७ दृष्ट्वा न्यग्नोधमत्युचप्ररोहश्वेतदिङ्मुखम् । ददर्श वृक्षशिखरे उद्बद्धमृपिपुत्रकम् ॥६८ ततश्चललतापाशं दृष्टवान्स समन्ततः । दृष्ट्वा स मुनिपुन तं स्वजटासंयतं वटे ॥६६ धनुदाय बलवालविच्य स नकारह । लाघवादृपिपुत्रस्य समं चिच्छेद मार्गणः ॥७० १५४ ] । वामन पुराण मेरा पुत्र सभी मद्गुणो मे युक्त और परम विद्वान है जिसे मभी शास्त्रो का पाडित्य है । वह तुम्हारे ही देश के अन्त उस्त हो रहा है जिमको कपिराज ने बांध दिया है ॥६४॥ वह आपके लडके के बिना अन्य किसी के द्वारा भी उन्मोचर प्राप्त करने में समर्थ नहीं है। हे गजेन्द्र | वह यहां पर शकुनि नाम वाला विधि का पारगामी है ॥६५॥ है कृशो हरि । फिर मेरे पिता ने उम मुनि के वाक्य का श्रवण कर अपने प्रिय पुत्र शकुनि को उमको शान्ति के लिये आदेश दे दिया था ॥६६।। इसके पश्चात् मेरे पिता ने महा भूज मेरा माई भेजा था ! इसके अनन्तर वह परमपि के साथ वनोद्देश में प्राप्त हुआ था ॥६॥ उनने प्ररोहवेत डिमुख अत्यन्त ऊँचे बट के वृक्ष को देखा था और फिर उस वृक्ष की चोटी पर उरुद्ध ऋपि के पुत्र को देखा था ॥६८|| इसके पश्चात् उसने धारो ओर चल लातानों के पाश को देखा था। उमने वट वृक्ष मे अपनी जटाओ से सुप्तगत मुनि पुत्र को देखकर उसने फिर धनुष उठाकर बलवान ने उसे अधिप किया था। फिर बहुत ही लाघव मे वाणो के द्वारा ऋषि पुत्र के सम का छेदन किया था ॥६६७०॥ कपिना यत्कृत पूर्व लतापाशं चतुर्दिशम् । पञ्चरपंशते काले गते कृत्त तदा शरैः ।।७१ लताउछन्न तनस्तूर्णमारुरोह मुनिवंटम् । प्राप्त स्वपितर दृष्ट्वा जावालि: मयतोऽपि मन् ॥७१ आदरातिशयान्मूर्ना ववन्दे तु विधानतः । सपरिप्यज्य स मुनियाघ्राय समन्तत ।।७३ उन्मोचयितुमारब्धो न शशाक सुन्यितः । ततस्तूर्ण धनुर्नाम्प वाणाश्च शनिवती ७१ आरोह क्ट पूर्ण समुन्मोचयितु जटा । ."

जावालि मोचन वर्णन ]
[ ११५
जग्राह च धनुर्वाणांचकारशरमण्डपम् ।
लाघवादर्धचन्द्राभ्या शाखा चिच्छेद स विधा ।।७७
शाखया कृत्तया चासौ भाग्वाही तपोधनः ।
शरमापानमार्गेण अवतीर्योऽय पादपात् ।।७८
तस्मिस्तथा म्वननये ऋतध्वजस्ततो नरेन्द्रम्य मुतेन धन्विना ।
जावालिनामारवहेमपुनःममाजगामायनदोम सूर्यजाम् II
कपि ने हिले जो लताओं का पाश चारो दिशाओं में बना दिया
या उसे पांच सौ वर्ष का ममर यतीत हो चुका था अब इम समय में
वह काट दिया गया था जो कि वाणों के द्वारा हित हुआ है ॥७१।।
जिसकी लताएँ छिन्न हो गई हैं उस वृक्ष पर फिर मुनि वहत हो शीघ्र
आरोहण कर गये थे। नाबानि ने अपने पिता को वहाँ पर ममागत
देख कर मुमथत होते हुए मो आदर को अत्यधिकता होने के विधि
शिर के द्वारा उनकी वन्दना को। उम मुनि न मी भली भांति
सनानिङ्गन करके उसके मम्त का घार क्यिा था ॥७२-१३।। मुझे
उन्मोचन करने का कार्य आरम्म तो किया या किन्नु सुयन्त्रित कर
म सका । इसके उपरान्त शीघ्र ही धनुष मे नमित करके वली भनि
वागों को छोडा या ॥७४।। फिर तुरन्त ही बटाओं का उन्मोचन करने
के लिये उम बट के वृक्ष पर वह चढ़ गया था । किन्तु कपिवर द्वारा
अत्यन्त दृढ सयन वह खोल न माथा उमी समय में शकुनि परमपि
के साथ उस वृक्ष के नीचे उतरा पा १७५-७६|| मने धनुप दाों को
प्रण किया था और मरमण्डप किया था। फिर उसने लाघव से अर्घ
चन्द्रों में तीन स्थानों शाखा का छेदन कर दिया या ॥७७॥ काटी
हुई शाखा से वह भार वाही तपस्वी शरो के सोपान मार्ग के द्वारा
उस वृक्ष से नीचे उतरा या ॥८॥ इसके पश्चात् अपने वनय के नीचे
उतरने पर धन्त्री नरेन्द्र के सुत के साथ ऋतध्वज भार वह वादालि के
सहित वह यमुना नदी तट पर आ गया था ॥७३॥

१५६ 1
[ यामन पुराण
चिनागदा विवाह वर्णन
एतस्मिन्नन्तरे वाले यक्षासुरसुने मुने।
समागते हर द्रष्टु त मुनि योगिना वरम् ॥१
ददृशाते परिम्लान सशुष्क मुम विभुम् ।
वहुनिर्माल्यसयुक्त गते तस्मिन्नृतध्वजे ॥२
ततस्तु वीक्ष्य देवेश ते उभे वर कन्यक ।
स्नापयेत विधानेन पूजयेते अहनिगम् ।।३
ताभ्या स्थिताभ्या तव ऋपिरभ्यागमनम्।
द्रप्टु श्रीकण्ठमव्यक्त गालवो नाम नामतः ॥४
स दृष्ट्वा कन्यकायुग्म कस्येदमिनि चिन्तयन् ।
प्रविवेश मुनि. स्नात्वा कालिन्द्या विमले जले ५
ततोऽनु पूजयामास श्रीकण्ठं गालवो मुनिः ।
गायेते सुस्वर गीत यक्षासुरसुते तत ॥६
ततः संगोतमाम गालवो द्वे अजानत।
गन्धर्व कन्यके चैव सदेहो नान विद्यते ॥७
दण्डक ने कहा- हे मुने । इसके पश्चात् ह वाले ! इसी बीच मे
यक्षासुर सुता के समागत होने पर भगवान शंकर का दर्शन करने के
लिये योगियो मे श्रेष्ठ उस मुनि को बहुत निर्माल्य से युक्त पारम्लान
और सशुष्क कुसुम वाले विभु को देखा था जब कि वह नवज चला
गया था ॥१-२॥ इसके उपरान्त उन दोनो श्रेष्ठ कन्याओ ने देवेश्वर
का दर्शन किया और सविधि स्नपन कराया था तथा अनिश पूजन
किया था ॥३॥ उन दोनों के वही पर स्थित रहते हुए गालव नाम
वाले भगवान् अव्यक्त, श्री कण्ड का दर्शन करने के लिये उस वन में
आये थे ।।४) उसने उन कन्याओ के जोड़े को देखकर मनमे विचार
किया था कि ये दोनो कन्याएं किसकी है। मुनि ने स्नान करने को
कालिन्दी के विमल जल में प्रवेश किया था। इसके अनन्तर गालव
मुनि ने भीषण्ड का पूजन किया था। फिर यक्षासुर के सुनाओ ने

चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १५७ सुन्दर स्वर में गीतो का गायन किया था ॥६॥ इसके पश्चात् उस सुन्दर सगीत को सुनकर गालव मुनि ने उन दोनो को जान लिया था कि ये गन्धर्व की दोनो कन्याएं है-इसमे कुछ भी सदेह नहीं है ॥७॥ सपूज्य देवमीशान गालवस्तु विधानतः । कृतजप्यः समध्यास्ते कन्याभ्यामभिवादितः ।। तत: पप्रच्छ स मुनिः कन्यके कस्य कथ्यताम् । कुलालङ्कारकरणे भक्तियुक्ते भवस्य हि ॥ तमूचतुमुनिश्रेष्ठ याथातथ्य शुभानने । जातो विदितवृत्तान्तो गालवस्तपता वरः ॥१० समुष्य तन्त्र रजनी तान्या सपूजितो मुनिः । प्रातरुत्थाय गौरीश सपूज्य च विधानतः ॥११ ते उपेत्याब्रवीद्यास्ये पुष्करारण्यमुत्तमम् । आमन्त्रयामि वा तन्व्यौ मामनुज्ञातुमर्हथ ।।१२ ततस्ते ऊचतुर्ब्रह्मन्दुर्लभ दर्शन तव । किमर्थं पुष्करारण्ये भवान्यास्यत्यथादरात् ॥१३ ते उवाच महातेजा अहवारसमन्वितः । कार्तिकी पुण्यदा भावि पुष्करेष्वेव कातिके ।।१४ गालव मुनि ने विधि से ईशान देव की समर्चा करके जप करके पही पर बैठ गये और उन दोनो कन्याओ ने उनको किया था ।।८। इसके अनन्तर उस मुनि ने पूछा-हे कन्याओ, तुम किसकी हो-यह हमको बतलाओ। तुम अपने कुन की अलकार स्वरूपा हो मोर भगवान् शिव की परम भक्ति से युक्त भो हो ॥६॥ है शुमा. नने ! उन दोनो ने उस मुनि से जो यथार्थ बात थी वही सब सत्य २ हिदी थी । तपस्वियो मे श्रेष्ठ गालव ने फिर ममी वृत्तान्त जान लिया रा॥१०॥ उस रात्रि मे वही पर निवास करके मुनि उन दोनो कन्याओ के द्वारा भली भांति पूजित हुए थे। प्रात.काल मे उठकर विधि पूर्वक परीश्वर की पूजा करके उन दोनो के पास आकर वह बोले- 'रव मैं उत्तम पुष्कर वन मे जाऊंगा। आप दोनों को भी मैं आमान्त्रित प्रणाम १५८J [ बामन पुराण करता हूँ। है तबियो । अब आप दोनों मुझे विदाई दो ॥१११२।। इसके उपरा त उन दोनो ने कहा-है ब्रह्मन् । आपका दशन तो बहुत दुलभ है । अब आर पुरकर अरण्य मे मिस लिये जारहे है--यह बहे आदर के पाय उ होने जानने की इच्छा की थी।।१३।। उस महा तेजस्वी ने अहकार से युक्त होकर उन दोनों से कहा-कात्तिकी यूणिमा परम गुण्य देने वाली हागो जोकि कार्तिक माम म पुष्करी म हा होती है ॥१४॥ ते ऊचतुवय यामो भवान्यन गमिष्यति । न स्वय स्म विना ब्रह्मनिह स्थातु समुत्सहे ।।१५ बाढमाह मुनिश्रष्ठस्ततो नत्वा महेश्वरम् । गतु च पिणा साध पुष्करारण्यमादरात् ।।१६ तथाऽ ये पयस्तन समायाता सहस्रश । पाथिवा वा जानपदा मुक्त्वक तु ऋतध्वजम् ।।१७ तत स्नातु च कातिव्यामृपय पुष्प रेवथ । राजानश्च महाभागा नाभागेक्ष्वाकुसयुता ॥१८ गानवोऽपि सम ताभ्या क यकाभ्यामवातरत् । स स्नातु पुष्परजले मध्यमे घनुपा प्लतौ ॥१६ निमग्नश्वापि ददृशे महामत्स्य जलेशयम् । बह्वाभिमत्स्यकन्याभि प्रीयमाण मृहुं महु ॥२० स तारवाह विनिता इम धर्म न जानथ । जनापवाद घोर हि न शक्त सोदुमुल्बरणम् ।।२१ उन दोनो ने बहाह! आप नायग वही पर हम जाती है। है ब्रह्मन् । आपये बिना हम यहाँ रहन की इच्छा नहीं रखती हैं ॥१५॥ मुनि ने कहा-बहुत अच्दा है फिर महेश्वर को प्रम किया। पर बादर : पिक साप परारण्य में चले जान पर उसी भाडि वह 47 महमा ऋषिगण आय ५। राा भी पाय और जान भी माप थे वयम एप तथ्यज ही नहीं बार थे ॥१६-१७॥ अपि । पुषरों वाली मिमा के दिन स्नान गरम को आय 2-~महान चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १५६ भाग वाले राजा लोग जिनमें नाभाग और इक्ष्वाकु भी थे ॥१८॥ गालव मुनि भी उन दोनों कन्याओ के साथ स्नान करने को उतरे थे। धनुषों की प्लुति मे मध्यम पुकर जल में स्नान करने को जैसे ही निमग्न हुए तो उन्होने जल मे शयन करने वाले एक महान् मत्सा को देखा था जो बहुत मो मत्स्य पन्याओ के द्वारा बारम्दार प्रीयमाण हो. रहा था ।।१६-२०॥ उसने विनिमुक्त उनसे रहा~इस धर्म को तुम नहीं जानती हो । हस महान् उवण घोर जनायवाद को सहन करने के लिये समथं नहीं है ॥२१॥ तास्ता ऊचुमहामत्स्य किं न पश्याम गालबम् । तापस कन्यकाभ्यां वै विचरन्त यथेच्छया ।।२२ यद्यसावपि धर्मात्मा न विभेति तपोवनः। जनापवादात्तकि त्वं विभेपि जलमध्यगः ॥२: ततश्चाप्याह स निमिर्नेप वेति तपोधनः। रागान्धी नापि च भय विजानाति मुवालिशः ॥२४ तच्छुत्वा मत्स्यवचनं गालबो वीडया युतः । नोत्ततार निमग्नोऽपि तस्थौ स विजितेन्द्रियः ।।५५ स्नात्वा द्वे तेऽपि रम्मोरू समुत्तीर्य तटे स्थिते । प्रतीक्षन्त्यो मुनिवरं तद्दर्शनसमुत्सुके ॥२६ वृत्ता तु पुष्करे यात्रा गतो लोको यथागतम् । ऋपय: पार्थिवाश्चान्ये नानाजानपदास्तथा ॥२७ तत्र स्थितका सुदती विश्वकर्मतनूरुहा । चित्राङ्गदा सुचार्वनी वीक्षन्ती तनुमध्यमा ॥२८ १६० ] [ लामन पुराण ही नहीं है ॥२४॥ इस मत्स्य के वचन का श्रवण करके गालव लज्जा से समन्वित हो गया था । वह निमग्न होते हुए भी उत्तरा नहीं किया तथा विजितेन्द्रिय होकर वह वहीं पर स्थित हो गया या ॥२॥ वे दोनों रम्भीरू भी स्नान करके समुत्तरण करके तट पर स्थित होगई थीं और उम मुनि वर को प्रतीक्षा कर रही थी क्योकि मुनि के दर्शन करने को वे अति उस्मक थीं ॥२६॥ पुष्वर की यात्रा पूर्ण होगई थी। जो लोग जहाँ से अये थे वही पर चले गये थे। सभी ऋषिगण राजा तथा अनेक जनपद निवासी सभी चले गये थे॥२७॥ वहा पर सुन्दर दांतो वाली एक अकेली विश्वकर्मा को पत्री स्थित रह गयी थी जो वृश मध्य माग वाली तथा परम सुन्दर अगो वाली चित्रागदा थी और वह इधर-उधर देख रही थी॥२॥ ते स्थिते वापि वीक्षन्त्यो गालवं मुनिसत्तमम् । सस्थिते निजने ती गालवोन्न्तले तथा २६ ततोऽभ्यगाद्वेदवती नाम्ना गन्धवकन्यका । पर्जन्यतनया साध्वी घृताचो गभंसभवा ।।३० धूल पुण्ये समभ्येत्य स्नात्वा मध्यमपुष्करे । ददर्श कन्यालितयमुभयोस्तटयोः स्थितम् ॥३१ चित्रागदा समभ्येत्य पर्यपृच्छदनिष्ठुरम् । कासि फेन च कायँग निर्जने स्थितवत्यसि ॥१२ सा तामुवाच पुत्री मा विन्दस्व मुरवर्धके । चित्राङ्गदेति मुधोणि विध्याला विश्वकाम॥३३ साम्हमभ्मागता भद्रे स्नातु पुण्या सरस्वतीम् । नमिषेकाञ्चनाक्षी तु विरयाता पमंमातरम् ॥३४ तत्रागता सुराहीह पृष्टा वैदभवण हि । गुरपन म कामाता मामेव शरण गतः ॥३५ चिगङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १६१ वही बायो यो जो पर्जन्य की पुत्री पी और परम साध्यो यो तथा पृताची के गर्भ से समुत्तन्न हुई थी। उमने उम पुण्य वृल पर आकर और मध्य पुष्कर में स्नान करके दोनो तटों पर स्थित तीनों कन्याओं को देवा या ॥३०.३१॥ चित्रागदा के समीप में आकर बहुत ही मृदुता से पूछा था-याप कौन है? जिम कार्य से इम निजन वन मे आप स्थित हैं ॥३२॥ वह उममे बोली-है सुरवध ! मुझे विश्वकर्मा की है सुयोणि ! विख्यात पुत्री चित्रागदा सममो ॥३३ हे मद्रे ! मैं इस परम पुण्यमयी मरस्वती में स्नान करने के लिये यहाँ पर आयो हुई हूँ। और नंमिप में धर्ममाता परम विधात काञ्चनाशी में स्नान करने गायी थी ॥३४॥ वहाँ पर आई हुई मैं मुराहीं वंदभंक के द्वारा पूछा गयी थी। जिसका नाम मुस्य या । वह इतना कामात हो गया था कि मेरी ही शरण उसने ग्रहण करली थी ॥३२॥ मयाऽऽत्मा तस्य दत्तश्च सखीभिर्यिमाणया। ततः शप्ताऽस्मि तातेन वियुक्ताऽस्मि च भूभुजा ॥३६ मतुं कृतमतिमंद्रे वारिता गुह्यकेन च । श्रीकण्ठमगम द्रष्टुं ततो गोदावरीजलम् ।।३७ तस्मादिद समायाता तीर्थप्रवरमुत्तमम् । न चापि दृष्टः सुरथः स मनोह्लादनः पतिः ॥३८ भवतो चात्र का वाले वृत्त यात्राफलेऽघुना । समागता हि तच्छस मम सत्येन भामिनि ॥३६ साऽब्रवोच्छ यता याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी। यथा याताफले वृत्तं समायाताऽस्मि पुष्करम् ॥४० पजन्यस्य घृताच्या तु जाता वेदवतीति हि । रममाणा वनोद्द शे दृष्टाऽस्मि कपिना सखि ॥४१ स चान्येत्याव्रवान्मा तु यासि वेदवति क्व हि। मानीतास्याश्रमात्केन भूपृष्टान्मेरुपवतम् ॥४२ म्पिः के द्वारा मुझे वारिह लिया, गरम भ. से. भी. मैंने अपनी आत्मा उमको समपित करदी ।। इसके पश्चात् मेरे पिताजी ने मुझे १६२ । [ वामन पुराण शाप देदिया था और मैं उस राजा से वियुक्त होगई थी ॥३६॥ हे भद्रे मैं मरने को एक दम तयार होगई थी किंतु गृहक ने मुहो मरने मे रोक दिया था। इसके पश्चात् मैं श्रीकण्ठ भगवान् के दर्शन करने तथा गोदावरी के जल मे स्नान करने के लिये चली आयी हूँ ॥३७॥ इसलिये इस परमोत्तम श्रेष्ठ तीथ मे यहाँ आयी हूं। वह मेरे न को आहाद देने वाला पति सुरथ मैंने नहीं देखा ॥३८॥ हे बाले ! आप यहा पर कौन हैं ? अब यात्रा का पल पूर्ण होने पर मैं आई हूँ। आप है भामिनि ! मुझे सत्य २ हो ।॥३६॥ वह बोली-आप सुनिये कि जो मैं मन्द भाग्य वाली कृशोदरी हूँ। जैसे ही यात्रा फल वृत्त हुआ, में पुष्कर मे आगई थी ॥४०॥ पर्जन्य की घृताची मे उत्पन्न वेदवती मैं वनोद्देश मे रमण करती हुई हे सखि । एक कपि क द्वारा देखी गई थी ॥४१॥ और उसने मेरे पास आकर मुझसे कहा--हे वेदवति ! कहा जारही है। भूमि पृष्ट आश्रम से तुम किसके द्वारा इस मे पर्वत पर लाई गई हो ? ॥४२॥ ततो मयोक्त नास्मीति कपे वेदवतीत्यहम् । नाम्ना वेदवतीत्येव मेरावपि कृताश्रया ॥४३ ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेणाभिविद् ता । समारूढाऽस्मि सहसा बन्धुजीवं नगोत्तमम् ॥४४ तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत । ततोऽस्य विपुलां शाया समालिङ्गच स्थिता त्वहम् ॥४५ ततः प्लवङ्गमो वृक्ष प्राक्षिप.सागराम्भस । सह तेनैव वृक्षेण पतिताऽस्म्यहमाकुला ।।४६ ततोऽम्वरतलावृक्ष निपततात यदृच्छया। ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥४७ ततो हाहाकृत लोकर्मा पतन्ती निरीक्ष्य हि। उन सिदगन्धर्वाः वष्ट सेय महात्मनः ॥४८ इन्द्रधुम्नस्य महिपी गदिता ब्रह्मणा स्वयम् । मनो. पुत्रस्य वीरस्य राहग्नतुयाजिन. ।।४६ चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १६३ फिर मैंने कहा-हे पे ! मैं वेदवती हो हूँ और नाम से वेदवती हूं इमी प्रकार से मेर में भो आश्रय करने वाली हूँ ॥४३॥ इसके पश्चात् उम दुष्ट दानर ने मेरा पीछा किया था और मैं समा बन्यु जीव घेट वृक्ष पर चढ़ गई थी ॥४४॥ उमने भो वेग के साय वह वृक्ष पादाक्रान्त कर लिया था। इसके पश्चात् में उम वृक्ष को विपुल शाखा का समा. प्रय कर स्थित होगई थी ॥शा फिर उन वानर ने सागर के जल में उसे प्रक्षिप्त कर दिया था। मैं मी उमी वृक्ष के साथ बहुत ही आकुल होती हुई गिर गई थी ॥४६॥ फिर अम्बर तल से यदृच्छा से गिरते हुए चम वृक्ष को समस्त प्रापियों ने तथा स्थावर एवं चरो ने देखा था।४॥ तब तो गिरती हुई मुझे देख कर सभी लोगो ने वहा हा हा कार किया था। सिद्ध और गन्धों ने कहा था-~-अरे, बडे दुःख की बात है रह तो महात्मा इन्द्रय म्न की महिपो है । ऐमा हो बह्माजी ने भी स्वयं कहा था कि मनु के पुत्र महान वीर और एक सत्र क्तुत्रो के यजन करने वाले को महिपी है ॥४॥ ता वाणी मधुरा श्रुत्वा मोहमस्म्यागता ततः। न च जाने स केनापि दृक्षश्छिन्नः सहस्रधा ।।५० ततोऽस्मि वेगाद्वलिना हुताऽनलसखेन हि । समानीताऽस्म्यहमिम त्व दृष्ट्वा चाद्य सुन्दरि ॥५१ तत उत्तिाय गावके उभे सस्थिते वरे। कायके अनुपश्येह पुष्करस्योत्तरेतटे ॥२ एवमुक्त्वा वराङ्गीसा तया सुतनुकन्यया । जगाम कन्यके द्रष्टुप्रष्टु काय तु कौतुकात् ॥५३ ततो गत्वा पर्यपृच्छ्त्त ऊचतुरुभे अपि । यातातथ्यं तयोस्ताभ्यां स्वमात्मान निवेदितम् ॥५४ तनस्ताश्चतुरोपोह सप्तगोदावर जलम् । सप्राप्य तीरे तिष्ठन्ति अचन्त्यो हाटकेश्वरम् ॥५५ ततो वहून्वर्पगणान्वभ्रमुस्ते जनास्थ्यः । तासामर्थाय शकुनिर्जाबालिः स ऋतध्वजः ॥५६ १६४ ] | वामन पुराण उस अति मधुर वाणी को सुनकर फिर मैं मोह को प्राप्त हो गई है। मैं नहीं जानती उस वृक्ष के सहस्रो टुक्डे छिन्न कर के किसने कर दिये थे ॥५०॥ इसके बाद वेग पूर्वक अति बली अनल सखा के द्वारा मैं हृत हुई और यहाँ पर ले आयी गई हूँ। हे सुन्दरि ! आज मैंने तुमको देखा है ॥५१॥ मो अब उठो, चलें-ये दोनो परम श्रेष्ठ कोन कन्याएँ सस्थित हैं जो कि पुष्कर के उत्तर तट पर है चलो इन्हे देखें ॥५२।। इस प्रकार स कह कर वरागी वह उस सुतनु कन्या के साथ उन दोनों कन्याओ को देखने के लिये तथा कौतुक से ये कौन हैं-यह पूछ ताछ करने को चली गई थी ॥५३॥ फिर वहाँ पर जाकर उनस पूछा था और उन दोनो न भी बो कि ठोकर उनका अपना आत्म निवेदन था सब कह दिया था ।५४॥ इस के अनन्तर वे चारो ही सप्त गोदावर जल पर पहुंच कर हाटकेश्वर प्रभु का अर्चन करती हुई बहा तीर पर स्थित हैं ॥५५।। इसक पश्चात् उनको प्राप्त करने के लिये भावुनि-भावालि और ऋतध्वज ये तीनो जन बहुत वर्षों तक प्रमण करते रहे थे ॥५६॥ भारवाही ततो भिन्नो दशान्दतिके (?) गते । पाले जगाम निर्वेदारसम पित्राऽनु शाक्लम् ॥५७ तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रद्युम्नो मनोः सुतः । समध्यास्ते स विज्ञाय साधपाद्यो विनिययौ ॥५८ सम्पयमपूजितस्तेन रा जावालितध्वज. । स चक्ष्वाकुमुतो धीमान्शनिधान्जोचितः ॥५६ रातो यावय मुनि. प्राह इन्द्रद्युम्नमृतध्वजः । राजना मुताऽम्माष दमपन्तीनिविता ॥६० तदर्थ पंव यगुधा अस्माभिरटिता नृप । तस्माति मागस्य गाहाय्य पर्नुममि ॥६१ अयोवान तो ब्रह्मम्ममापि सलगोलगा। मा वृदयमस्यापि यम्याद पयामि नाम् ॥६२ विनाङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १६५ आकाशात्पर्वताकार. पतमानो नगोतमः । सिद्धाना वाक्यमाकर्ण्य वाणश्छिन्न. सहस्रधा ।।६३ फिर दशान्दशतिक (कोशत्र) मे जाने पर भार वाही भिन हो गया था। उम काल में निवेद से पिता के माथ शाकत में चले गये थे ।।५७॥ उमम मनुका पुत्र श्रीमान् इन्द्रद्या नरपति स्वता था जो जानकर अपंपाद्य के मस्ति निकल कर आ गया था ॥५८॥ उमने भली भांति से ब्रह्म जाबालि और ऋतध्वजा का पूजन किया था और इक्ष्वाकु का पुत्र प्रात्न परमधोमान् शकुनि भी सचिन हुआ था ॥५६॥ इसके बाद मुनि ऋनवज ने इभ म्न मे यह वाक्य कहा था-हे राजन् । दमयन्नी-इम नाम से प्रख्यात हमारी पुत्री नष्ट हो गई है ॥६०॥ उसके लिये यह मम्गं पृथ्वी हे नृप । अब तक खोज डाली है । अतएव आप उठिए, इस मार्ग म बाप हमारी कुछ सहायता करने के योग्य होते हैं ।।६१। इसके अनन्नर वह राजा भी बोला-हे ब्रह्मन मेरी परमोत्तम ललना नष्ट हो गई है । मैंने भी बहुत कुछ श्रम किया था। मैं उसके लिये किम से क्या कहूँ ॥६२।। आकाश से पर्वत के समान आकार वाला वृक्ष श्रेष्ठ था जो कि सिद्धो के वाक्य को सुन कर सहस्रो टुकडे काट कर कर दिया गया है ।।६३।। ते चैव सा वरारोहा विभिन्ना लाघवान्मया । न च जानामि सा कुन तस्माद्गच्छामि मागितुम् ॥६४ इत्येवमुक्त्वा स नृप. समुत्याय त्वरान्वितः। स्यन्दनानि द्विजाम्या स भ्रातृपुत्राय चार्पयत् ।।६५ तेऽधिस्वरथास्तूर्ण मार्गन्ते वसुधा क्रमात् । वदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसा निधिम् ॥६६ तपमा कशित दोन मल पङ्कजटाधरम् । नि.श्वासायासपरम प्रयमे वयसि स्थितम् ॥६७ तमुपेत्याब्रवीद्राजा इन्द्रद्युम्नो महाभुजः । तपस्वियोन्वने घोर आस्थितोऽसि सुदुरश्चरम् ॥६८ चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १६७ याऽमौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नमिपे । सप्तगोदावरे तीर्थ सा मयैव विजिता ।।७५ यागच्छ चागमिष्यामस्तस्मादेव हि कारणात् । तवास्माक समेष्यन्ति कन्यास्तिस्रस्तथाऽपराः ॥७६ इत्येवमुक्त्वा म ऋषिः समाश्वास्य सुदेवजाम् । शकुनि पुरतः कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुत्रकः ।।७७ म्यन्दनेनाश्वयुक्ने नगन्तुसमुपचक्रमे । सप्तगोदावर तीर्थ यत्र ता: कन्यका गताः ।।७८ मैं मनु का पुत्र और इक्ष्वाकु का प्रिय भाई हूं-यह आपको बनला दिया है । उस नृर ने अपना पूर्व मम्पूर्ण चरित कह सुनाया था ॥७१।। यह सुनकर वह राजपि वोटा-शरीर का त्याग मत करो। तुम मेरे भ्रातृज हो । उम तन्वङ्गी को खोजने के लिये आजाऊंगा ॥७२॥ इतना कहकर उसने धर्म मे सुमयत नृप को भली भांति परिध्वजन कर फिर शीघ्र ही रय मे बिठाकर तापमो में निवेदन किया ॥७३॥ पुत्र युक्त ऋतध्वज ने उस राजा को देख कर कहा था-हे राजन् ! आओ, आओ, मैं तुम्हारा प्रिय करूंगा ॥७४॥ जो यह चित्राङ्गदा नाम वाली तुमने नमिप मे देखी थी वह मप्त गोदावर तीर्थ मे मैंने ही विवजित की है ।।७५॥ आओ, इसी कारण से आयेंगे। वहाँ पर दूमरी भी तीन कन्याएं हमारे पाम आयेंगी ॥७६॥ इतना भर कह कर उम ऋषि ने सुदेवजा को समाश्वासन देकर आगे शकुनि को करके अपने पुत्र और इन्द्रद्यमा के अश्व से युक्त रथ के द्वारा नहीं जाने का उपक्रम किया था जहां सप्त गोदावर तीर्थ था और जहा पर वे कन्याएं गयी हुई थी॥३७-७८।। एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकसंयुना। विचचारोदयगिरि विचिन्वन्ती सुतां निजाम् ॥७६ तमासमाद च कपि पर्यपृच्छद्ययाऽप्सराः । कि वाला न त्वया दृष्टा करें सत्यं वदस्व मे ॥८० साथ

१६६ ।
[ वामन पुराण
तपः किमथं तच्छंग किमभिप्रेतमुच्यताम् ।
सोऽप्रवीत्को भवान् हि ममात्मान सुहृत्तया ॥६६
परिपृच्छसि शोकात परिवून तपोऽन्वितम् ।
स प्राह राजाऽस्मि बली तपस्विन्शाकले पुरे ।।७०
वे और वह वरारोहा लाघद के कारण मुझ से भिन्न हो गई है।
मैं नहीं जानता हूँ कि वह इम समय में कहाँ पर है । इसीलिये मैं उमे
खोजने के लिये जा रहा हूँ ॥६४। बस इतना ही कह कर वह राजा
त्वरा (शीघ्रता) से युक्त होकर उठ खडा हुआ था और द्विजो से युक्त
स्पन्दनो (ग्थो) को भाई के पत्र को दे दिये थे ॥६५॥ वे उन रथो पर
अधिरूढ होकर शोघ्र ही क्रम से पृथ्वी की खोज कर रहे थे। बदरी
आश्रम मे आकर उन्होने तपोनिधि को देखा था ॥६६।। वह प्रथम
अवस्था मे स्थित होता हुआ भी तपश्चर्या से अत्यन्त कुश-दीन और
मल पक तथा जटा के धारण करने वाला था ॥६७॥ महान् भुजाओ
वाला इन्द्रद्युम्न राजा उसके समीप मे आकरबोला-आप तपस्वियो के इस
घोर वन मे मास्थित हो रहे हैं। यह अत्यन्त सुदुरचर ता किम लिये
कर रहे हैं ? वह मुझे बतलाइये । आपका अभिप्रेत क्या है-यह भी
कहिए । उसने मुझमे कहा-आप कौन हैं । सौहार्द भाव से मुझे अपने
मापका परिचय दीजिए ॥६८-६६। आप को इस परधून शोक मे
आतीव दु.खित तपोनिधि को पूछ रहे हैं ? उसने कहा है तपस्विन् !
शाकल पुरसे में एक बलवान् राजा हूँ॥७०।
मनोः पुनः प्रियो भ्राता इक्ष्वाको: कथित तव ।
स चास्मै पूर्वचरित सर्वं कथितवान्नृप ॥७१
श्रुत्वा प्रोवाच राजर्षिर्मा मुञ्चस्व कलेवरम् ।
आगमिष्यामि तन्वङ्गी विचेतु भ्रातृजोऽसि मे १९७२
इत्युक्त्वा सपरिष्वज्य नृप धर्मे सुसयतम् ।
समारोप्य रथ पूर्ण तापसाभ्या न्यवेदयत् ।।७३
ऋतध्वजः सपुनस्तु त दृष्ट्वा पृथिवीपतिम् ।
प्रोवाच राजन्नेह्यहि करिष्यामि तव प्रियम् ॥७४

चिनागदा विवाह वर्णन ] [ १६७ याऽमो चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नमिपे । सप्तगोदावरे नीर्थ सा मयैव विजिता ॥७५ मागच्छ चामिप्यामस्तस्मादेव हि कारगात् । तवास्माक ममेष्यन्ति कन्चाम्निनम्नथाऽपराः ॥७६ इत्येवमुक्त्वा स ऋपिः ममाश्वास्य नुदेवजाम् । शकुनि पुरत कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुनकः ।।७७ म्यन्दनेनाश्वयुक्ते नगन्तुसमुपचक्रमे । सप्तगोदावर तीर्थ यन ताः कन्यका गताः ॥७८ मैं मनु का पुत्र और इक्ष्वाकु क प्रिय भाई हूँ -यह आपको बनला दिया है । उप नूर ने अपना पूर्व मम्पूर्ण चरित कह सुनाया था ॥७१॥ यह सुनकर वह राजर्पि बोला-गरीर का त्याग मत करो। तुम मेरे भ्रातृज हो । उम तन्वङ्गी को खोजने के लिये आजाऊ गा ॥७॥ इतना कहकर उमने धर्म मे मुमत नृप को भली भांति परियजन कर फिर शीघ्र ही रय मे बिठाकर तापमो से निवेदन किया ॥७३।। पुत्र युक्त ऋतध्वज ने उस राजा को देखकर कहा था -हे राजन् ! आओ, आओ, मैं तुम्हारा प्रिय करूंगा ||७४।। जो यह चित्राङ्गदा नाम वाली तुमने नमिप में देवी थी वह मप्त गोदावर तीये मे मैंने ही विजित को 1७५॥ आओ, इसी कारण से आयेंगे। वहां पर दूमरी मी तीन कन्याऐ हमारे पाम आयेंगी ॥७६॥ इतना भर कह कर उम ऋषि ने सुदेवजा को समाश्वासन देकर आगे शकुनि को करके अपने पुत्र और इन्द्राम के साथ अश्व से युक्त रथ के द्वारा नहीं जाने का उपक्रम किया था जहाँ सप्त गोदावर तीर्य था और जहाँ पर वे पन्याऐ गयी हुई थी ।।३७-७८।। एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोक्सयुता। विचचारोदयगिरि विचिन्वन्तो सुता निजाम् ॥७१ तमासमाद च कपि पर्यपृच्छद्ययाऽप्मराः । किवाला न त्वया दृष्टा व सत्यं वदस्व मे ।।८० क १६८ 1 [ वामन पुराण तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह वालिकाम् । दृष्ट्वा देववती नाम सा च न्यस्ता महाश्रमे ।।८१ कालिन्द्या विमले तोरे मृगपक्षिममन्विते । श्रीकण्ठायतनस्याने मया सत्यं तवोदितम् ।।८२ सा प्राह वानरवरं नाम्ना वेदवतीति सा । न हि देववती स्याता तदारच्छ वजावहे ।।८३ घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः । पृष्ठनोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कोशिकोम् 11८४ इमी बीच मे तन्वी घृताची शोक से युक्त होकर अपनी पुत्री को खोज करती हुई उदय गिरि पर विचरण कर रही थी ॥७६३ उम कपि के समीप में प्राप्त हुई थी। उम अप्मरा ने पूछा-हे कपे ! क्या आपने वह वाला देखी है ? मुझे सस्य २ बतलादो ॥२०॥ उसके इम वचन को श्रवण कर वह कपि उस बालिका से बोला-देववती नाम धारिणी को देखा है और उसे एक महान् आश्रम मे न्यस्त है ।।८१॥ कालिन्दी के विमल तट पर जहा मृग और पक्षी गण विद्यमान हैं । भगवान् श्रीकण्ठ के आयतन के आगे मैंने आपको बिल्कुल सच बतला दिया है।।८२सामने उम श्रेष्ठ वानर से कहा-वह नाम से देववती है। तो देववती तो विख्यात नही है सो आओ, वहाँ पर चलें ॥३।। घृताची के इस वचन को सुनकर वानर बहुत शोघ्रगामी होकर इसके पीछे हो कौशिकी नदी पर आगया था ॥४॥ प्राप्ता राजपिप्रवरात्रयस्ते चापि कौशिकीम् । द्वितयं तापसाभ्यां च रथा: पञ्चाश्ववेगिभिः ।।८५ अवतीयं रथेभ्यस्ते स्नातुमभ्यागमनदीम् । घृताच्यपि नदी स्नातु सुपुण्यामाजगाम ह ॥८६ तामन्वेव कपिः प्रायादृष्टो जावालिना तथा । दृष्ट्व पितर प्राह पार्थिव च महायलम् १८७ स एप पुनरायाति वानरस्तात वेगवान् । पूर्व जटास्वेव क्लाद्य न यद्वोऽस्मि पादपे ।। कर दिया चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ १६६ तज्जावालिवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः । सशर धतुरानम्य इद वचनमब्रवीत् ।।८६ ब्रह्मन्प्रदीयता मह्यमाज्ञा तात वदस्त्र माम् । यावदेन निहत्म्पच शरेणकेन वानरम् ॥६० इत्येवमुक्त वचने सर्वभूतहिते रतः । महर्षि: शकुनि प्राह हेतयुक्त वचोमहत् ।।६१ वे तीनो राजषि प्रवर मो कोनिकी नदो पर प्राप्त हो तपस्वी और अति धेग वाले पांवो तथा वेग धाले अश्वों से युक्त रथ भी वहां आगये थे ।।८।। वे गब रथ से नीचे उतर कर नदी में स्नान करने के लिये गये थे वह घृताची भी परम पुष्पमयी उस नदी मे स्नान करने के लिये आगई थी ।।६।। उसके पोछे ही वह कपि भी आगया था तथा उसे जाबालि ने देखा । उसे देखते हो महान् बलवान् पिता राजा से उमने कहा-1८॥ हे तात ! यह वेग से समन्वित वानर फिर यहां आरहा है जिसने पहिले बलपूर्वक जटाओ मे इम पादप में मुझे बाध दिया था । ८ जावालि के उम वचन को सुनकर शकुनि अत्यन्त क्रोध से युक्त होगया था और वाण से युक्त धनुप को खींचकर यह वचन कहा था ॥८६॥हे ब्रह्मन् ! मुझे आप अपनी आज्ञा प्रदान कीजिये । हे तात ! मुझे आप बतलाइये । मैं आज बस्ने एक बाण से इम वानर को मार डालता हूं ॥९॥ इस प्रकार के वचन के कहने पर फिर समस्त प्राणियो के हित मे रति रखने वाले महर्षि शकुनि हेतु मे युक्त परम महान् वचन । बोले ॥१॥ न कश्चितात केनापि वध्यते वध्यतेऽपि वा। वधबन्यो पूर्वकर्मवशो नृपतिनन्दन ॥६२ इत्येवमुक्त: शकुनिऋपिं वचनमब्रवीत् । ममाज्ञा दोयता ब्रह्मन्शाधि किं करवाण्यहम् ॥६३ इत्युक्तः प्राह स मुनिस्त वानरपति वचः । मम पुत्रस्त्वयोबद्धो जटाभिवटपादपे ॥६४ १७० ] । वामन पुराण न चेन्मोचयितु वृक्षाच्छानुयाच्चापि यन्नतः । तदनेन नरेन्द्र ण विधा कृत्वा तु शाखिनम् ॥६५ शाखां वहति मत्सूनुः शिरसा तां विमोचय । दशवर्षशतान्यस्य शाखा व वहतो गताः ॥६६ न वास्ति पुरुषः कश्चिद्यो ह्य मोचयितु क्षमः । स ऋपेवक्यिताकण्यं कपि वालिनो जटाः ।।६७ शनरुन्मोचयामास क्षणार्धान्मोचिताश्चताः । ततः प्रीतो मुनिश्रशे वरदोऽभूदृतध्वज.11८८ हे तात किमी के द्वारा भी कोई बाधा नही जाया करता है अथवा बौधा भी जाता है तो यह पन्ध्रन दोनो पूर्व जन्म मे किये हुए कम के अधीन ही हुमा करते हैं । हे नृपति नन्दन ! अन्यथा न तो, कोई मारा जाया करता है और न बौधा ही जाता है ॥४२॥ इस भौति से फहे हुए भी शकुनि ऋषि से यही पवन बोला-हे ब्रह्मन् ! मुझे आप आदेश प्रदान कीजिए और शासन करिये कि मैं क्या करू V६३॥ इम प्रकार से कहे जाने पर वह मुनि उम वानरपति से बोला- वृक्ष मे जटाओ से बोया या १६॥ यल करने पर भी उस वृक्ष से उन्मोचन नहीं कर सका था । सो इस मरेन्द्र ने उस शाषी के तीन भाग कर दिये थे।६५ मेरा पत्र शिर में अभी भी उसको पाखा का वहन कर रहा है । उस शाखा को दूर करदो । एक हजार वर्ष. इस शादा को वहन करते व्यतीय होगए हैं ॥६६॥ कोई भी ऐमा पुरुष, नहीं है जो इससे उमगा उन्मोचन करने में ममर्थ हो सके । वह कपि, सृषि के इम वचन को सुनकर जावालि को उन जटाओ को क्षण भर में उन्मोचित कर दिया था। इसके पश्चात् वह घेष्ठ मुनि परम प्रसन हमापा और ऋतारा वरद होगपा पा ॥६॥ कपि प्राह वृणीष्व स्वं वरं यन्म मेप्सितम् । तध्वजवचः युवा इमं वरमयाचन ।।६६ विश्वकर्मा महातेजा फपिरवे प्रतिसस्थितः। बहान्भवान्वरं महा यदि रानु यथेमि ॥१५१. तुमने मेरे चित्राङ्गदा विवाह वर्णन , [ ११ तन्त्र दतो महाघोरो मम शापो निवर्त्यताम् । चिनाङ्गदायाः पितर मां त्वष्टार तपोधनम् ।।१०१ अभिजानीहि भवत: शापाद्वानरतां गतम् । सुबहूनि च पापानि मया यानि कृतानि हि ॥१०२ कपिचापल्यदोपेण तानि मे यान्तु सक्षयम् । ऋतध्वजस्ततः प्राह शापस्यान्तो भविष्यति ॥१०३ यदा घृताच्या तनयं जनियसि महावलम् । इन्येवमुक्ती सहृष्टा स तथा कपिमत्तमः ।।१०४ स्नातु तूर्णं महानद्यामवतीर्णः कृशोदरि। ततस्तु सर्वे क्रमश: स्नात्वा च पितृदेवताः ॥१०५ वह उम कपि से दोला-तू अब मुझसे को भी तुम अमीष्ट हो बरदान मांगले । ऋतश्वर के वचन को सुन कर उसने यह वरदान मांगा था ॥६६॥ महान् तेजस्वी विश्व कर्म कपिच में प्रति सस्थित हो बावे । हे ब्रह्मन् ! आप यदि मुझे कोई वरदान देता हो चाहते हैं तो यही वरदान देवें ॥१०॥ और मुझे दिया हुआ महान् घोर वह शाप निवृत्त हो जाये । चिन्ताग पिला स्वष्टा तपोरन मुझको जान लेवे कि आपके शाप से वानरता को प्राप्त हुआ है । जो बहुत से पाप मैंने किये हैं और कपि के चपलता के स्वभाव के वशी- भूत होकर दिये हैं वे सभी मेर क्षय को प्राप्त हो जावे । फिर ऋतध्वज ने कहा-शाप का अन्त होगा ।।१०१-१०३।। जिम समय में घृताची में महान बलवान तनय को नुर समुसम्म करोगे तभो शाप को समाप्ति होगी । इस प्रकार से कहा गया वह श्रेष्ठ कपि अत्यन्त प्रसन्न हुमा था ।।१०४॥ है कृशोदरि! फिर वह उस महानदी में स्नान करने के लिये अवतीर्ण हुआ था। इसके पश्चात् सभी पितृगण और देव वृन्द ने क्रमशः स्नान किया था ।॥१०॥ जग्मुहूं या रथेभ्यस्ते धृनाची दिवमुत्पतत् । सामन्देव महावेगः स कपिःप्लवता वरः ॥१०६ चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ ૧૭ . छोड दिया था। वे घोहे घास दाले दन के भागों में योडी देर प्रचरण कर रहे थे ।।११२॥ तृप्ता: समाद्रवन्सर्वे देवालयमनुतमम् । तुरङ्गखुरनिर्घोपं श्रुत्वा ता योपितां वरा: ॥११३ किमेतदिति चोक्त्व प्रजग्मुर्हाटकेश्वरम् । आरह्म वलभी तास्तु ममुदैक्षन्त सर्वशः ।।११४ अपश्यस्तीर्थसलिल आप्लुनाङ्गानरोत्तमान् । ततश्चित्राङ्गदा दृष्ट्वा जटा मण्डलधारिणम् । हसन्ती सुरथं प्राह सरोहत्पुलका सखीम् ॥११५ योऽसौ युवा नीलघनप्रकाश: सलक्ष्यते दोघभुजः सुरूपा। स एव नूनं नरदेवसूनुर्बु तो मया पूर्वपतिः पतिर्य: ॥११६ यश्चंप जाम्बूनदतुल्यवर्णः श्वेतं जटाभारमधारयिष्यत् । स एप नून तपता वरिष्ठऋतध्वजो नात्रविचारणास्ति ।।११७ ततोऽब्रवीदथो हृष्टा दमयन्ती सखोजनम् । एषोऽपरोऽस्यव सुतो जावालि न संशयः ।।११८ इत्येवमुक्त्वा वचनं बलभ्या अवतीयं च ॥११६ समासन्नाध्यतः शभोर्गीयन्ती गीतकाञ्छुभान् ।।१ . वे सब जन तृप्त होगये, उस परमोत्तम देवालय में दौड़कर पहुंच गये थे। उन अश्वों की टापों की ध्वनि प्रवण फरके उन नारी रत्नों को परम आश्चर्य हुआ या ॥११॥ यह क्या मामला है-ऐमा कह कर ही दे सब हाटकेश्वर के निक्ट चली गयी थी। तभी पर चढ़ कर उन सब ने देखा ॥११॥ उन्होंने उस तौर्य के उत में गोता लगाते हुए नरोतमों को देखा था। इसके पश्चात् चिन्नागदा ने जटामण्डल के करने वाले का देना था। सुरथ को हंसती हुई उसने स्वय पुलकारमान होकर सखी से कहा-॥११॥ जो यह नील मेघ के समान प्रकाश याला-दीघ भुजाओं से युक्त सुन्दर स्वरूप से सम्पन्न युवा दिखलाई देशा है विश्वास ही यह वही नरदेव का धुन है जिसको मैंने प्रपा पति वरण किया था ॥११६।। और जो यह जाम्वूनद के समान वर्ष वाला १७४ ] [ वामन पुराण है और जिसने श्वेत जटाओं के भार को धारण किया है। वही तप- स्वियो मे परम श्रेष्ठ ऋतध्वज निश्चय ही है-इसमे कुछ भी विचार की यावश्यकता नहीं है ।।११७॥ इसके उपरान्त परम प्रसन्न दमयन्ती सखीजन से बोली-यह दूसग जो है वह इसी का पुत्र जावालि है- इसमे कुछ भी सशय नहीं है|११||इतना कह कर ही वलभी से उतर फिर भगवान् शम्भु के आगे समीप मे आकर उपस्थित होगई और परम शुभ गीतो का मान करने लगी थी॥११६-१२०॥ समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योषितः शुभाः । स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम् ।।१२१ ततः सुदैवतनयो विश्वकर्म सुता प्रियाम् । दृष्ट्वा हृषितचित्तस्तु सरोहरपुलको वभौ ।।१२२ ऋतध्वजोऽपि तन्वङ्गी दृष्या चित्राङ्गदा स्थिताम् । प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा बाला मुदितमानसः ।।१२३ ततस्तेऽपि समभ्येत्य देवेश हाटवेश्वरम् । सपूजयन्तस्त्र्यक्ष ते सस्तुवन्तः क्रमात्ततः ।।१२४ चित्राङ्गदाऽपि तान्दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान् । सम ताभिः कृशाङ्गीभिरभ्युत्थायाभ्यवादयत् ।।१२५ स च ता: प्रतिनग्धव सम पुत्रेण तापसः । सम नृपतिभिहट. सविवेश यथासुखम् ॥१२६ वे सब समारूढ़ होकर तथा भली भांति स्नानादि करके शिव के आगे अत्युत्तम गीतो को गाती हुई उस परम शुभ योपितो को देखने लगे थे ॥१२१॥ इसके पश्चात् सुदेव के पुत्र ने विश्वकर्मा की प्रिय पुत्री को देखकर परम हगित चित्त वाला हो गया था और पुलकायमान होकर शोभित हुआ था ॥१२२॥ऋतध्वज भी वहा पर सस्थित तन्वङ्गी चित्रा- गदा को देखकर योगात्मा ने उसे भली भांति पहिचान लिया पा तब मन मे अत्यन्त प्रसन्न हो गया था । १२३) इसके पश्चाद ने सब भी वहा पर या गये पे और देवेश्वर भगवान् हाटकेश्वर की पूजा करते हुए त्रिलोचन प्रभु यी प्रम मे स्तुति करने लगे थे ।।१२४॥ चिनागदा ने भी ऋतध्वज 'चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ] [ ૧૭ जिनमे अग्रगामी या उन सब को देखकर उन सब कृशागियो के साय खडी होगई थी और फिर आदर पूर्वक सबको अभिवादन किया था ॥१२शा और उसने भी जोकि एक तापस था पुत्र के सहित उनका प्रत्यमिनन्दन किया था तथा सब राजाओ के साथ परम प्रसन्न होकर सुख पूर्वक वहाँ बैठ गया था ॥१२६।। ततः कपिवरः प्राप्तो घृताच्या सह सुन्दरि । स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिक्षुहर्हाटकेश्वरम् ।।१२७ ततोऽपश्यश्व ता तन्वी घृताची शुभदर्शनाम् । साऽपि ता मातरं दृष्ट्वा हृष्टाभूद्वरणिनी ॥१२८ ततो घृताची स्वा पुत्री परिष्वज्य न्यपीडयत् । स्नेहात्सवाप्पनयना मुहुस्ता परिजिघ्रती ॥१९६ ऋतध्वजस्ततः श्रीमान्कपि वचनमब्रवीत् । गच्छानेतु गुह्यक त्वमञ्जनाद्री महाजनम् ।।१३० पातालादपि दैत्येश वीर कन्दरमालिनम् । स्वर्गाद्गन्धर्वराजान पजन्य शीघ्रमानय ।।१३१ इत्येवमुक्त मुनिना प्राह देववती कपिम् । गालव वानरश्रेष्ठ इहानेतुत्वमर्हसि ।।१३२ इत्येवमुक्त वचने कपीन्द्रोऽमितविक्रमः । गत्वाञ्जन समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम् ।।१३३ इसके पश्चात् वह कपि श्रेष्ठ भी वहाँ पर घृताचो के माय हे सुन्दरि ! प्राप्त हो गया था। वह भी गोदावरी तीर्य में स्नान करके भगवान् हाटकेश्वर के दर्शन करने की इच्छा वाला होगया था ॥१२७। इसके पश्चात् परम शुभ दर्शन वाली तन्वी घृताची को देखा था। भी उम अपनी माता को देख कर वर वणिनी अत्यन्त हपित होगई थो ॥१२८॥ इसके पश्चात् उस घृताचो ने अपनी पुत्री का आलिंगन किया या। स्नेह के कारण उमके नेत्रो में अब आगये थे और बारम्बार उसका प्राण कर रही थी।१२। इसके अनन्तर मृतध्वज ने उस कपि से यह वचन कहा था-तुम अञ्जनादि में चरे बाओ और उस

१७६ ]
। वामन पुराण
महाजन गुह्यक को लिवा लाओ ॥१३०॥ पाताल से भी परम धीर कादर
माली दैत्येश्वर को तथा स्वर्ग से माधवों के राजा पजन्य को अति शीघ्र
लिया लाओ ॥१३१।। इस प्रकार से मुनि के द्वारा कहने पर देवयती ने
उस कपि से कहा--हे कपिथा । तुम गालव वो भी यहा लाने के
योग्य हो ॥१३२।। इस तरह वचन के कहे जाने पर अमित बल विक्रम
वाला वह कपीन्द्र अञ्जन पवत पर समानत करके अमर पर्वत
पर चला गया था ।।१३३॥
पर्जन्य तत्र चामन्त्र्य प्रेपयित्वा महाश्रमे ।
सप्तगोदावरीतीर्थे पातालमगमत्कपि ॥१३४
तत्राम-श्य महावीर्य कपि कन्दरमालिनम् ।
पातालादतिनिष्क्रम्य मही पर्यचरजवी ।।१३५
गालव तपसो योनि दृष्ट्या माहिष्मतीमन् ।
तमुत्पत्यानयच्छीघ्र सप्तगोदावरीजलम् । १३६
तत्र स्नात्वा विधानेन सप्राप्तो हाटकेश्वरम् ।
ददृशे दमयन्ती ता स्थिता वेदवतीमपि ॥१३७
त दृष्ट्वा गालव चंव समुत्थायाभ्यवादयत् ।
ते चापि नृपतिधेष्टास्त सपूज्य तपोधनम् ।।१३८
प्रहमतुल गत्वा उपविष्टा यथा सुखम् ।
तेपूपविष्टपु तदा वानरेण निमन्निताः ।।१३
समायाता महात्मानो यक्षगन्धवंदानवा ।
तानागतासमीक्ष्यंव पुश्यस्ता:पृथुलोचनाः ।।१४०

चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ]
[ १७७
वहा विधान पूर्वक स्नान करके भगवान् हाटवेश्वर के समीप में प्राप्त
हो गया था । वहा पर उसने उस दमयन्ती और वेदमती को सस्थित
देखा था ॥१३७॥ उस गालद मुनि का दशन करके उठकर अभिवादन
किया था। उन श्रेष्ठ नृपतियों ने भी उस तपोधन का भली भाति
पूजन किया था ॥१३८|| मब को अत्यन्त ही हपं प्रात हुआ था और
फिर सब सुखपूर्वक बैठ गय थे । उन सबके बैठ जाने पर उम वानर
के द्वारा निमन्वित महात्मा पक्ष, गन्धर्व और दानव वदा ममायात हाम्ये
थे। उन सब को दहा पर आये हुए देखकर ही वे सब पुत्रियां विकसित
नेवो वाली होगई थी ॥१३६-१४०।।
स्नेहा नयनास्ता वै तदा सस्वजिरेपितृन् ।
दमयन्त्यादिका दृष्ट्वा पितृयुक्ता वरानना ।।१४१
सवाप्पनयना जाता विश्कममुता तदा।
अथ तामाह स मुनिः सत्य सत्यध्वजो वचः ।।१४२
मा विपाद कृथा: पुवि पिताऽय तव वानरः ।
सा तद्वचनमाकण्यं वीडोपहतचेतना ॥१४३
क्थं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्व गतोऽधुना।
दुप्पुल्या मयि जाताया तस्मात्यक्ष्ये कलेवरम् ।।१४४
इति सचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह ।
परित्रायस्व मा ब्रह्म पापोपहतचेतसम् ।।१४५
पितृघ्नी मतुमिच्छामि तदनुज्ञातुमहसि ।
अयोवाच मुनिस्तन्वी मा विषाद कृथाधुना ॥१४६
सभाव्येन विनाशोऽस्ति तन्मात्याक्षीः कलेवरम् ।
भविष्यति पिता तुभ्य भूयोऽप्यमरवर्द्ध कि. ॥१४७
जातेऽपत्ये घृताच्या तु नात्र कार्या विचारणा ।
इत्येवमुक्त वनने मुनिना भावितात्मना ॥१४८
स्नेह से आई नेत्रो वाली उन सबने उस समय मे अपने पिताप्रो का
स्नेहालिंगन किया था। दमयन्ती आदि सभी वरानना देख कर पिता से
युक्त हो गई थी ॥११॥ उस समय मे विश्वकर्मा की सुता वाप्प युक्त

१७८ ] । वामन पुराण 1 नेत्रो वाली होगई थी। इस पश्चात् वह सत्यध्वज मुनि उससे सत्य वचन बोला-॥१४२॥ है पुनि ! अब तुम कुछ भी हृदय में विपाद मत करो,तुम्हारा पिता यह वानर है। उसने अतध्वन के उस वचन को जैसे सुना था कि वह वीडा से उपहत चेतना वाली हो गई थी ॥१४३॥ यह विश्व कम क्यो अब बानर योनि को प्राप्त हो गया मैं ऐसी दुष्ट पुत्री उत्पन्न हुई है इस लिये अब मैं तो अपने इस शरीर का त्याग कर दूगी ।।१४।। उसने अपने मन में ऐसा चिन्तन करके फिर वह ऋतध्वज से बोली-हे ब्रह्मन् । आप मुझ पाप से उपहत चित्त वाली का परिवाण करो ॥१४५।। मैं तो पिता का हनन करने वाली हूं-मैं अब मरना चाहती हूँ-~-आप मुझे अपनी आज्ञा दीजिए। इसके पश्चात् वह मुनि बोला-हे तन्धि । इस समय मे तुम विपाद मत करो सम्माव्य से विनाश है । इसलिये तुम अपने शरीर का त्याग मत करो। यह तुम्हारा पिता फिर भी वैसा ही अमर वदंकि हो जायगा ॥१४६- १४७।। जब घृताची मै सन्तान को उत्पत्ति हो जायगी तो यह बसा ही हो जायगा-इसमे कुछ भी सन्देह का अवसर नहीं है। इस वचन २ भावितात्मा मुनि के द्वारा कहे जाने पर घृताची चित्रागदा के समीप में आगयी थी ।।१४८॥ घृताची ता समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदा वचः । परित्यजस्व शोक त्व मासंदशभिरात्मजः ।।१४६ भविष्यति पितुस्तुल्यो मत्सकाशाप्न सशयः । इत्येवमुक्ता सहृया बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥१५० स्व प्रत्यक्षत चावंगी विवाह पितृदशनम् । सर्वास्ता अपि तावन्त काल सुतनुकन्यकाः॥१५१ प्रत्यक्षात विवाह हि तस्या एव प्रियेप्सया। ततो दशसु मासेषु समतीतेप्वथाप्सराः ।।१५२ तस्मिन्गोदावरीतीरे प्रसूता तनय नलम् । जातशत्ये पपिरवाच विश्वकर्माऽप्यमुच्यत ।।१५३

चित्राङ्गदा विवाह वर्णन ]
[ १७६
समभ्येत्य प्रियां पुत्रों पयंप्वजत चादरात् ।
ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्ध किः ।।१५४
फिर घृताची ने चित्राङ्गदा से यह वचन कहा-तुम अब शोक
का त्याग करदो । दश मासों में आत्मज होगा और अपने पिता के
तुल्य ही मेरे उदर से समुत्पन्न होगा-इसमें संशय नहीं है । इस तरह
से जब घृताची के द्वारा वह कही गयी तो फिर उसी समय मे चित्रा-
ङ्गदा बहुत ही अधिक प्रसन्न होकर शोभित हुई थी।॥१४६-१५०।।
वह चारुतम मंगों वाली अपना विवाह और पिता के दर्शन की प्रतीक्षा
करने लगी थी । और सब भी सुतनु कन्यकाऐ उस काल तक की
प्रतीक्षा में थी कि उसके विनाह में उसके प्रिय की अभिलापा पूर्ण हो।
इसके पश्चात् दश मातों के व्यतीत हो जाने पर उस अप्परा ने गोदावरी
के तट पर तनय नल का प्रसब किया था। उस सन्तान के समुत्पन्न
होने पर विश्वकर्मा भी कपित्व से मुक्त होगया था। १५१-१५३।।
उसने फिर आकर अपनी प्रिय पुत्री का स्नेहानिगन किया था और
बहुत कुछ मादर भी किया था। फिर प्रसन्न मन से सुर वकि ने
स्मरण किया था ।। १५४ ।।
सुराणामधिप शक सहैव सुरकिन्नरः ।
स्वष्ट्राऽय संस्मृतः प्राप्तः शन्नोऽमरगणवृतः ॥१५५
सुरेमहेन्द्रः सप्राप्तस्तत्तीयं हाटकाह्वयम् ।
समायातेपु देवेषु गन्धर्वप्वप्सरस्मु च ।।१५६
इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रष्ठमृतध्वजमुवाच ह ।
जावालेीयता ब्रह्म सुता कन्दरमालिनः ।।१५७
गृह्णातु विधिवत्पाणि देतेय तनया तव ।
दमयन्ती च शकुनिः परिणेता स्वरूपवान् ।।१५८
ममेयं वेदवत्यस्तु हुत्वा हव्य विधानतः ।
वाढमित्यब्रवीत्सोऽपि मुनिर्मनुसुतं नृपम् ।।१५६
ततोऽनुजह्न स्त हृष्टा विवाहविधिमुत्तमम् ।
ऋस्विजो गालवाद्याश्च हुत्वा हम्य विधानतः ।।१६०

दण्ड का भस्म होना ] [ १५॥ सहृष्टा समुस तस्थुर्भुजाना विषयेन्द्रियान् । चित्राङ्गदायाः कल्याणि पूर्ववृत्त पुरा किल । तस्मात्कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ।।१६७ इत्येवमुक्त्या नरदेव सूनुस्ता भूमिदेवस्य सुता वरोरुम् । स्तुवन्मृगाक्षीमृदुनाक्रमेण सा चापि वाक्य नृपतिवभापे ।।१६८ इसके पश्चात् विधि पूर्वक इन्द्रद्य म्न ने वेदवती का पाणि ग्रहण किया था। तत्पश्चात शकुनि ने यक्ष की कन्या का प्राणि ग्रहण किया था ।।१६२।। हे कल्पाणि । फिर चित्रागदा का पाणिग्रहण सुरथ ने किया था। हे तनुमध्यम । इसी क्रम से विवाह निवृत्त हो गया था।॥१६३।। विवाह के सम्पन्न हो जाने पर मुनि ने इन्द्र आदि से कहा जिनमे दानव गण भी थे। इस तीर्य मे आप मदा सप्त गोदावर मे यही आवं ॥१६४॥ और विशेष करके इस उत्तम माधव मास में यही पर ठहरा करें । सब देवो ने कहा-ऐमा ही होगा । यह कह कर सब देवगण परम सन्तुष्ट होते हुए दिवलोक को चले गये थे ॥१६५।। मुनिगण रापुन मुनि को लेकर आदर पूर्वक चले गये थे। राना लोग भी अपनी भार्याओ को लेकर अपने नगरो को चले गये थे ॥१६६।। सर लोग अत्यन्त हर्पित थे और विपयेन्द्रियों का उपभोग करते हुए स्थित रहने लगे थे। हे कल्याणि ! चियागदा का पहिले यही वृत्त था। इसलिये हे रमल पयो के समान नेत्रो वालो ! हे उत्तम ललने ! अब तुम मेरा सेवन करो ॥१६॥ इतना हो कहर वह नरदेव का पुत्र उम भूमि देव की वरोरु सुना री स्तुति कर रहा था । वह मृगाक्षी भी क्रम से बहुत ही मृदुस्थर मे नृपति से यह वाक्य बोली-॥१६॥ ६६-दण्ड का भस्म होना - तव दास्यामि बहुनोक्त न कि तव । 10 शापादारमान च महीपत ॥१ १८० ] यामन पुराण स्वष्टा । गायन्ति तत्र गन्धर्वा नृत्यन्त्यसरगस्तथा। आदी जावालिनः पाणिगृ होतो दैत्यकन्यया ॥१६॥ सुर किन्नरो के सहित सुरो वे अधिप इन्द्र को में स्मरण किया था और अमर गणों के माया वहीं पर हो गया था ॥१५॥ सुरो के साथ महेन्द्र भी उम तथं हारवेश्वर नाम वाले पर मप्राप्त हो गये थे। मब देव-धर्व और ममराओं के वहां पर समायात हो जाने पर इन्द्रद्युम्न गुनिश्रेष्ठ ने ऋतध्वज में कहा था-हे ब्रह्मन् अत्र कन्दरमाली की पुत्री को जावालि को दे देना चाहिए ॥१५६. १५७।। हे देतेय ! आपकी पुत्री विधि पूर्वक पाणिग्रहण परे । स्वरूप- वान् शकुनि दमयन्ती का परिणेता हो जाये ॥१५८।। मेरी यह वेदवती तो विधान से हृव्य का हवन करके मनुसुत नृप का वरण करे । उस मुनि ने भी बहुत ठीक है-यही कह दिया था ॥१५६। इसके उपरान्त मब ने प्रसन्न होकर विवाह की उत्तम विधि का पालन किया था। गालव आदि सब ऋत्विज थे जिन्होने विधि पूर्वक हव्य का हवन किया था ॥१६०।। वहा पर उस समय मे गन्धर्व लोग गान कर रहे थे और अप्सराभो ने नृत्य किया था । मबसे आदि मे जावालि ने दैत्य की कन्या के साथ पाणि ग्रहण किया था ।।१६१॥) इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः । तत. शकुनिना पाणि होतो यक्षकन्यया ।।१६२ चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत् । एव क्रमाद्विवाहस्तु निवृत्तस्तनुमध्यमे ॥१६३ वृत्ते मुनि विवाहे तु शकादी प्राहदानवान् । अस्मिस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ।।१६४ स्थेय विशेषतो मासमिम माधवमुत्तमम् । बाढमुक्त्वा सुराः सर्व जग्मुर्हष्टा दिव क्रमात् ।।१६५ मुनयो मुनिमादाय सपुत जग्मुरादरात् । भायश्चिादाय राजानः स्वस्व नगरमागता: ॥१६६ दण्ड का भम्म होना ] [१५] सहृष्टा: समुख तस्थुर्भुजाना विषयेन्द्रियान् । चित्राङ्गदायाः कल्याणि पूर्ववृत्त पुरा किल । तस्माकमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥१६७ इत्येवमुक्या नरदेवसूनुस्ता भूमिदेवस्य सुता वरोरुम् । स्तुव-मृगाक्षीमृदुनाक्रमेण सा चापि वाक्य नृपतिवमापे ।।१६८ इसके पश्चात् विधि पूर्वक इन्द्रद्य म्न ने वेदवती का पाणि ग्रहण किया था । तत्पश्चान शनि ने यक्ष को कन्या का प्राणि ग्रहण किया या ।।१६२।। हे कल्याण | फिर चित्रागदा का पाणिग्रहण मुरथ ने किया पा । है तनुमध्यम । इसी क्रम से विवाह निर्वृत्त हो गया था ॥१६३।। विवाह के सम्पन्न हो जाने पर मुनि ने इन्द्र आदि स कहा जिनमे दानव गण भी थे। इम नोयं में आप मदा मन गोदावर में यहां आई ।।१६४।। और विशेष करके इस उत्तम माधव मास मे यही पर ठहरा करें। सब देवो ने कहा-ऐमा ही होगा । यह कह कर सब देवगण परम सन्तुष्ट होते हुए दिवलोक को चले गये थे ॥१६५॥ मुनिगण सपुन मुनि को नेर आदर पूर्वक चले गये थे। राजा लोग भी अपनी मार्याओं को लेकर अपने नगरो को चने गये थे ॥१६६॥ सर लोग भवन हपित थे और विषयेन्द्रियों का उपभोग करते हुए स्थित रहने लगे थे। हे वल्याणि ! चियागदा का पहिले यही वृत्त था । इमलिये है कमल पत्रों के समान नत्रों वाली! है उतम ललने ! अब तुम मेग सेवन करो।।१६।। इतना ही कहकर वह नरदेव का पुत्र उम भूमि देव की बरोक सुना की स्तुति कर रहा था। वह मृणाक्षी भी क्रम से बहुत ही मृदुम्बर में नृपति से यह वाक्य बोली-१६८॥ ६६--दण्ड का भस्म होना नारमान तव दास्यामि बहुमोक्तन कि तव। रक्षन्ती: भवत शापादात्मान च महीपत ॥१ १८२ ] [ वामन पुराण इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्र सुतां वलात् । कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः ॥२ तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्ध: पृथिवीपतिः । निश्चकामाश्रमात्तस्माद्गतश्च नगरं मिजम् ॥३ साऽपि शुक्रप्लुता तन्वी अरजा रजसा प्लुता। आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी ॥४ चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः। महाग्रहोपरुद्ध व रोहिणी शशिना प्रिया ।।५ ततो बहुतिथे काळे समाप्ते यज्ञ कर्मणि । पाताला स्वमाश्रमपदं मुनिः॥६ आश्रमात्ते च ददृशे सुतामेत्य रजस्वलाम् । मेघलेखामिवाकाशेसंध्यारागेण सञ्जिताम् ।।७ अरजा ने कहा-आपके अत्यधिक कथन से कोई भी लाभ नही है । मैं अपने आपको आपकी सेवा में समर्पित नही करूगी। हे महीपते! आपके शाप से मैं अपनी आम्मा का सरक्षण भी करती रहूंगी ॥१॥ प्रह्लाद कहा-इस प्रकार से विवाद करती हुई उस भार्गव की कन्या को बलपूर्वक पकड़ कर उस कामदेव से उपहत आत्मा वाले मन्द बुद्धि ने विभ्रष्ट कर दिया था ॥२॥ मद से अन्धा वह पृथिवीपति उसको चरित्र से च्युत करके उस आश्रम से अपने नगर को निकल कर चला गया था ॥३॥ वह भी शुक्र से लुप्त हुई मरजा रस से भी लुप्त हो गई थी। वह फिर आश्रम से बाहर निकल कर नीचे की ओर मुख किये हुए ही एक स्पख पर बाहर ही स्थित हो गई थी ॥४॥ वह अपने पिता का चिन्तन करती हुई बारम्बार रुदन करती जा रही थी और ऐसी प्रतीत हो रही थी जैसे किसी महान् ग्रह से दण्ड का भस्म होना ] [ १८३ देखा था त्रिम प्रकार से याकाश में सम्मा के राम से रन्जित कोई मेघ को लेखा हो 11७11 तां परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि पिता । क. क्रीडति सरोपेण सममाशविपेण हि ॥८ क्वाधव यामि क्व गत: पापकृत्स सुदुमतिः । कस्त्वा शुद्धममाचारां विध्वंसति पापकृत् ॥६ तत: स्वपिनरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुन: पुनः । रुदन्ती ब्रोडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह ।।१० तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत् । बलादनाथा मदती नीताऽह वचनीयताम् ।।११ एतत्पुया वचः श्रुन्वा क्रोधसरक्तलोचनः । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत् ।।१२ यस्मात्तेनाविनीतेन ममाजाभयमुत्तमम् । गोरव च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजाः कृता ॥१३ तस्मात्सराष्ट्रः सवल: सभृत्यो वाहनः सह । सप्तरायान्तराद्भस्म नग्ना दृष्ट्वा भविष्यति ।।१४ उस अपनी बेटी को इस भाति देख कर भार्गव मुनि ने उससे पूछा पा-है पुत्रि ! क्सिने तुझे धषित किया है ? ऐसा कौन पुरुष है जो रोष में भरे हुए सपं वे माय क्रीडा करता है ? || आज ही मैं कहा पर जाऊ ! वह दुष्ट बुद्धि वाला पापारमा अब कहां चला गया है ? ऐसा कौन है पाप करने वाला जो इस परम शुद्ध आचार वालो तुझको विध्वस्त करता है ? || इसके पश्चात् यह अरजा अपने पिता को देय पर बारम्बार कापती हुई-रुदन करती हुई सजा से युक्त होकर बहुत ही धीमे स्वर में बोली ॥१०॥आपके शिष्य दण्ड ने बार-बार पारित किये जाने पर भी बल पूर्वक अनाय सहन करती हुई मुझे बच- नीता को प्राप्त कर दिया या ॥१॥ अपनी पुत्री के इस वचन को मुन कर क्रोध से नाल नेत्रों वाने शुक्राचार्य ने भुट होकर उपस्पर्गन frया और यह वचन कहा-पो कि जिस अविनीत ने मेरी आमा-मय १८४ [ वामन पुराण और उतम गौरव का तिरस्कार करके मेरी पुत्री अरना को ध्युत धम्म वाली कर दिया है इसी कारण वह नग्ना को देखकर स्वयं अपने राष्ट्र- घल भृत्य तथा वाहन आदि सबके साथ सात रात्रि के अन्तर मे भस्म हो जायगा । १२-१४॥ इत्येवमुक्त्वा मुनिपुङ्गयोऽसौ शप्त्वा स दण्ड स्वसुतामुवाच । स्व पापमोक्षार्थमिदैव पुत्रि तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती १५ शप्रवेत्थ भगवाञ्छुको दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम् । जगाम स हि पातालं दानवालयमुत्तमम् ॥१६ दण्डोऽपि भस्ममाद्भूतः सराष्ट्रबलवाहनः । महता बलगर्वेण सप्तरावान्तरे तदा ॥१७ एव ते दण्डकारण्य परित्यक्ष्यन्ति देवताः । आलय राक्षसाना तु कृत देवेन शभुना ।।1८ एव परकलत्राणि नयन्ति सुकृतादपि । भस्मभूतान्प्राकृतास्तु महान्त च पराभवम् ॥१६ तम्माद-2क दुर्बुदिनं कार्या भवतात्वियम् । प्रानापि दहेन्नारी किम ताहोऽदिनन्दिनी ॥२० शरोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतु मुरासुरै। न द्रष्टुमपि शक्योऽसौ किमु योधयितु रणे ।२१ दण्ड का भस्म होना ] [ १८५ भी भस्मभूत प्राकृतों को और महान् पराभव को प्राप्त करा देती है 1॥१६॥ इस कारण से है अन्धक ! आपको ऐसी दुष्ट बुद्धि कभी नहीं करनी चाहिए । प्राकृत नारी ही मनुष्य को दग्ध कर दिया करती है फिर जगदम्बा अदि नन्दिनी के विषय में तो कहा ही क्या जा सकता है ॥२०॥ हे दैत्येश ! मंगवान् शंकर भी सुर-असुरों के द्वारा नहीं जोते जा सकने के योग्य हैं। इनकी ओर दृष्टि उठा कर कोई भली भांति तेज की अधिकता के कारण देख भी नहीं सकता है फिर रण क्षेत्र में युट करना तो बहुत दूर की बात है ॥२१॥ इत्येवमुक्त वचने दस्ताम्रक्षणः श्वसन् । वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकामुरः ॥२२ किमया रणे योद्ध शक्तस्त्रिणयनोऽसुर । एकाको धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः ।।२३ नान्धको विभियादिन्द्राद्वानरेभ्यः कथंचन । स कथं वृषण्वान्यादिभेति पुरवीक्षणात् ॥२४ तच्छ त्वाऽस्य वो घोरं प्रसाद: प्राह नारद । सांगा न भवता विरुद्ध धर्मतोऽयंत्तः ।।२५ हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहकोप्टुक्योरिव । गजेन्द्रमशकाभ्यां च स्वमपापारयोरी -॥२६ एतेपामेव गदितं यावदन्तरमन्धक । तावदेवान्तरं नास्ति भवतो हि हरस्य च ॥२७ वारितोऽसिमया वीर भूयोभूमश्च वार्यसे । शृणुष्य वाक्यं देवरसितस्य महात्मनः ॥२८ महापि पुतरम ने कहा-इस भांति कहे जाने पर अन्धकासुर मरपन्त कोधित हो गया था, उसके नेत्र कोष से लाल हो गये थे और बह गर्म स्वास छोड़डा हुना प्रसाद से दोना-२२॥ है अमुर ! क्या मह तीन नेत्रों वाला मेरे साप युद्ध करने के लिये समर्थ है ? यह अकेला है, धर्म से रहित है और अपने शरीर को भस्म से मरुणित रिय रहता है॥२३॥ यह बन्धक इन्द्र से अथवा मनुप्मों से पिसी भी प्रकार मय- १८६ [ वामन पुराण भीत नहीं होता है । फिर वह वृप पत्रारूप आगे देख कर कैसे हर सकता है ॥२४॥ हे नारद | उसके इस अति घोर वचन को सुन कर प्रह्लाद ने कहा--धर्म से और अथं से भी विरुद्ध एवं गहित कार्म को आप को हो सहना होगा ॥२५॥ आपका भगवान् शकर से मिहना हुताशन और पतग के समान है तथा शेर और गोदड के तुल्य है एव गजेन्द्र और मच्छड के समान है । आप और शकर मे सुवर्ण एवं पाषाण के समान महान् अन्तर विद्यमान है ॥२६॥ हे अन्धक ! इनका जो अन्तर बतलाया गया है आपका और हर का उतना भी अन्तर नहीं है ॥२७॥ हे वीर ! मैंने तुमको पारित किया है और बारम्बार अब भी वारण किया जा रहा है । महात्मा देवर्षि असित का वाक्य थवण करो ॥२८॥ यो धर्मशीलो जितमानरोपो विद्याविनीतो न परोपतापी। स्वदारतुष्टा परदार वजन तस्य लोके भयमस्ति किंचित् ।।२६ यो धर्महीनः कलहप्रिय सदा परोपतापी श्रुतशास्त्रजितः। परार्धदारेप्सुरवर्णसगमी सुख स विन्देन पर चेह ॥.. धर्मान्वितोऽभूद्भगवान्प्रभाकरःमत्यक्तरोषश्चमुनि: स वारुणिः । विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्फपुनः स्वदारसतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥३१ एतानि पुण्यानि कृतान्यमोभिनं पाप बद्धानि कुलक्रमोक्त्या । तेजोऽन्विता: शापवरक्षमाश्च जातास्तु सर्वसुरसिद्धपूज्याः ॥३२ अधर्मयुक्तोदमितो बभूव विभुश्च नित्य कलहप्रियोऽभूव । परोपतापी नमचिदंगस्मा परावलेपी सनको हि राजा ॥३३ परार्थलिप्मुदितिको हिरण्यदृड पंचतस्याप्यनुजःसुदुर्मतिः । सुवर्णहारी पदुरुत्तमौजा एते विनेशुनपात्पुरा हि ॥३४ सम्मादर्मोन सत्याग्यो धर्मों हि परमा गतिः ।

दण्ड का भस्म होना [ १८७ था भय नही होता है ॥२६॥ जो धर्म से रहित हो-कलह से प्यार करने वाला हो-सवंदा दूसगे को उपताप देने वाला हो-श्रुत और शास्त्र से वजित हो-पराई स्त्री से प्रेम करने वाला हो तथा पराये धन का इच्छुक हो और अवणं के साथ सगम करने वाला हो ऐसा पुरुष परलोक में और इस लोक मे सुख प्राप्त नहीं किया करता है ।।३०।। भगवान् प्रमा- कर धर्म से समन्वित हुए थे-वारुणि मुनि क्रोध को त्यागने वाले हुए थे अर्क के पुत्र मनु विद्या से सयुक्त हुए थे और अगस्त्य मुनि अपनी ही स्त्री से स तुष्ट मन वाले हुए थे ॥३१॥ ,इन लोगो ने ये सब पुण्य कर्म किये थे और कुल क्रम को सक्ति से कोई भी पाप बद्ध कर्म नहीं किये थे। इसी कारण से ये समी तेज से समन्वित तथा शाप और वरदान देने में समर्थ हुए थे जिनको कि समस्त सुर और सिद्धो ने पूज्य माना अधर्म से युक्त से उद्गमित और विभु नित्य ही कलह से प्यार करने वाला हुआ था, नमुचि परोपतापी और दुरात्मा था तथा राजा सनक दूसरों का अवलेपन करने वाला था ॥३३॥ दितिज हिरण्य- दृक् पराये अर्थ की लिप्सा वाला था और उसका छोटा भाई भी मूर्ख एव दुष्ट बुद्धि वाला हुआ था । उत्तमौजा सुवर्ण का हैरण करने वाला था-ये सभी अनय के कारण पहिले नष्ट हो गये थे ॥३४॥ इसलिये धर्म का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए क्यों कि धर्म ही परम गति होती है । जो धर्म से हीन मनुष्य होते हैं वे महान् गौरव नरक को जाया करते हैं ॥३॥ धर्मस्तु गदितः पुभिस्तारण दिवि चेह च । पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परन च ॥३६ त्याज्य धर्मावितनित्य परदारोपसेवनम् । नयन्ति परदारास्तु नरफानेकविंशतिम् । सर्वेपामेव वर्णानामेप धर्म इहोच्यते ॥३७ परार्थपरदारेषु यस्तु वाञ्छा करिष्यति । स याति नरक घोर रौरव बहुलाः समाः॥

१९८ वामन पुराण एव पुरा सुरपते देवपिरसितोऽव्ययः। प्राह धर्मव्यवस्थान खगेन्द्रायारुणाय हि ॥३६ तस्मात्तु दूरतो वजत्परदाराविचक्षणः । नयन्ति निकृतप्रज्ञ परदारा:पराभवम् ॥४० इत्येवमुक्त वचने प्रह्लादं प्राह चान्धकः । भवान्धमपरस्त्वेको नाह धर्म समाचरे ॥४१ इत्येवमुक्त्वा प्रल्लादम का प्राह शम्वरम् । गच्छ शम्बर शैलेन्द्र मन्दर वद शकरम् ।।४२ मनीषी पुरुषों ने धर्म को दिवलोक और इस लोक मे तारने वाला बताया है । तथा अधर्म इस लोक और परलोक दोनों में ही पतन कराने वाला हुमा करता है ॥३६॥ जो धर्म से युक्त पुरुष होते हैं उनके द्वारा नित्य ही पराई दारा का सेवन त्याज्य किया गया है । पराई स्त्री इस्कोस नरकों में पुरुषो को ले जाया करती हैं । सभी वर्गों का यही धम यहाँ पर कहा जाता है ॥३७॥ पराया अर्थ और पराई दारा इनमे को भी कोई पुरुष इच्छा रखता है वह बहुत से वर्षों तक अत्यन्त पोर रौरव नरक में जाकर पड़ता है ॥३८॥ हे सुरपते ! इसी भांति से पहिले अविनाजी देवपि असिठ ने गेट बोर भरण के लिये शर्म पो व्यवस्था रतलाई थी इसलिये विपक्षण पुरुष पराई दारामी को दूर से ही त्याग दिया करता है । पराई दारा विकृत प्रज्ञा पाले को पसमय को प्राप्त करा दिया करती है ॥४०॥ पुलस्त्य ऋपि ने कहा- इस तरह से इन एपनों के कहने पर अन्धक ने प्रहलाद के कहा--बाप हो एक धर्म में परायण हैं और बने रहे, मैं तो इस धर्म का प्रमावरम नही मया ॥४१॥साद से यही इस तरह कहकर मायक बार बोला-हैमर! तुम मन्दराचल पर बसे पामो मोर उस से पर परपरसर से कहो ॥४२॥ भिक्षो रिमयं शं मे स्वगंतुल्य समादरम् । परिरमणियनाच न दत्तो पदस्व माम् ॥४३ दण्ड का मस्म होना ] [ १८६ तिष्ठन्ति शासने मां देवाः शक्रपुरोगमा:। तत्किमथं निवससे मामनादृत्य मन्दरे॥४४ यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम । येयं हि भवत; पत्नी सा मे शीघ्र प्रदीयताम् ॥४५ इत्युक्तः स तदा तेन शम्बरो मन्दरंद्र तम् । जगाम तत्र यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक् ।।४६ गत्वोवाचान्धकचरो याथातथ्य दनोः सुतः । तमुत्तरं हरा प्राह शृण्वत्या गिरिकन्यया ॥४७ ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेणधीमता। तन्न शक्तोऽस्मि संस्यक्तु विनाऽऽज्ञां वृत्रवैरिणः ॥४८ यज्ञानवीद्दीयतां मे गिरिपुत्रोति दानवः । तदेपा यातु स्वं कामं नाहं धारयितुं क्षम: ॥४६ हे भिक्षो ! कन्दराओं से युक्त स्वर्ग के तुल्य इस शैलेन्द्र को किस लिये तुम रक्षा करते हो? यह शैलेन्द्र तुमको किसने दिया था। मर यह हमको स्पष्ट बतलाये १४३१ मेरे शासन मे ही मर लोग संस्थित है इन्द्र मादि सभी देवगण भी मेरा हो शासन मानते हैं । तुम मेरा अनादर करके इस मन्दराचल पर किस लिये रहते हो ॥४४॥ यदि तुमको इसी शैलेन से प्रेम है और यही पर रहना चाहते हो तो मेरा जो भी वचन हो उसे करो। जो यह तुम्हारी पत्नी है उसे शीघ्र मुझे दे दो ॥४५॥ इस प्रकार से उसके द्वारा हा गया वह गम्बर उसी समय में शीघ्र ही मन्दर गिरि पर षमा गया पा। जहां पर यह पिनाक को धारण करने पाले भगवान गम्भु अपनी देवी के साप रहने ये ॥४६॥ दनु का पुत्र वह दूत मन्धकका यही पहुंच कर जो भी अन्धक ने प्रिम तरह भी रहा पा यह सभी उसी तरह शम्भु से कहा था। गिरि कन्या के मुमने हुए भगवान हर ने उसको उत्तर दिया पा॥४७॥ यह मन्दराचर यंत मुस सहसास दिन है कि बड़ा बुद्धिमान है मो में हमने घृधामुर केन्द्र की माता के बिना इसको नहीं छोर गरता है | रानव ने बो यहाहा है कि गिरि पुषी को मुझे दे दो मो १६० ] । वामन पुराण अरनी ही इच्छा से भले ही चली जावे, मैं इसे रोक कर रखने में समर्थ नहीं हूँ ॥४ा ततोऽनवी गिरिसुता शम्बरं मुनिसत्तम । ब्रूहि गत्वाऽधक वीर मम वाक्यं विपश्चितम् १५० अह पदातिः सग्रामे भवानीशस्तदा हि नौ। प्राणदूत परिस्तीयं यो जेष्यति स लप्स्यते ॥५१ इत्येवमुक्तो मतिमा-शम्बरोऽन्धकमागमद । समागम्याब्रवीद्वाक्य सर्व गौर्या च भापितम् ।।५२ तच्छ त्वा दानवपतिः क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन् । समाहूया ब्रवीद्वाक्य दुर्योधनमिद वचः ।।५३ गच्छ शीघ्र महाबाहा भेरी सान्नाहिकी दृढाम् । ताडयस्वाद्य विश्रब्ध दुःशीलामिवयोपितम् ॥५४ समादिष्टोऽन्धकेनाथ भेरी दुर्योधनो बलात् । ताडयामास वेगेन यथा प्राणेन भूयसा ॥५५ सा ताडिता बलवता भेरी दुर्योधनेन हि । सस्वान भैरवाकारं रौरव रासभी यथा ॥५६ हे मुनि सत्तम ! इसके पश्चात् उस गिरि तनया ने शम्बर से कहा- बन्धक को जाकर हे वीर ! मेरे इस परम विपश्चित वाक्य को कह देना ॥५०॥ मैं सग्राम मे पदाति (पैदल) और उसी समय यह भवानीश भी होगे हम दोनों को अपना प्राणदत परिस्तीणं करके जो भी इन दोनों में जीत जायगा वही मुझे प्राप्त कर लेगा ॥५१॥ इस प्रकार से कहा गया मतिमान वह शम्बर अन्धक के समीप मे आगया था और वहां पर पाकर उसने गौरी के द्वारा दिया था ॥५२॥ दानवों के पति ने यह सुनकर बहुत ही अधिक क्रोध किया और उसके नेत्र एक दम रक्तवर्ण के होगये थे। गर्म खास लेते हुए दुर्योधन को बुला कर उससे यह वचन कहा था ।।५३।। हे महा• बाहो ! शीघ्र ही जाकर सामाहिको भेरी को आज बजादो जिस तरह किसी दुर स्वभाव वाली स्त्री को विश्रब्ध होकर ताड़ित किया जाता हुआ सब भाषण अस अन्धक से

दण्ड का भस्म होना ]
( ૧૩
उस
है ॥५४॥ इस प्रकार मे अन्धक के द्वारा समादेश प्राप्त कर दुर्योधन ने
बल पूर्वक बड़े ही वेग के साप और बहुत ही जोर के साथ
उस बलवान् दुर्योधन ने उस मेरी को साहित किया था।
ताड़ित हुई भेरी से भी गदंभी की भांति बहुत ही भैरव आकार वालो
रोरद वनि निकली थी ॥५५-५६||
तथा तं स्वरमाकण्य सर्व एव महासुराः।
समायाताः सभां तूणं किमेतदिति वादिनः ॥५७
याथातथ्यं च तान्सर्वानाह सेनापतिबंली।
ते चापि बलिना श्रेष्ठाः सन्नद्धा युद्धकाङक्षिणः ।।५८
सहान्धका नियंयुस्ते गजै रुष्ट्र हयै रथः।
अन्धको रथमास्थाय पञ्चनल्वं प्रमारणतः ॥५६
त्र्यम्बकं स पराजेतु कृतबुद्धिर्विनियंयो।
जम्मः कुजम्भो हुण्डश्न तुहुण्डः शम्बरो बलिः ॥६०
वारण। कार्तस्वरो हस्ती सूर्यशत्रुमहोदरः ।
अयःशङ कु: शिविः शाल्वो वृषपर्वा विरोचनः ।।६१
हयग्रीव: कालनेमिः संहादः कालनाशनः ।
सरभश्चैव सबलो बसो वृत्रश्च वीर्यवान् ।।२
दुर्योधनश्व पाकश्च विपशक: कालमावरौ।
एते चान्ये च बहवो महादी नहाटनाः ।
प्रजग्मुरुत्सुका योद्ध नानात्रा

१८२ ] [ चामन पुराण . थे। बन्धक भी प्रमाण में पांचनत्व रय में समास्थित होकर यम्बक को पराजित करने के लिये ऐसो ही अपनी बुद्धि स्थिर कर निकल गया या । इसके साथ में बहुत से अन्य दानव भो पे जिनके नाम ये हैं- बाम-कुजम्म, हुण्ड, तुण्ड, शम्बर, बलि, वाण, कात स्वर, हत्ती, मूयंशव, महोदर, अपः शकु, शिवि, शाल्व, वृषपर्वा, विरोचन, हयग्रीव कालनेमि, संहाद, कालनाशन, सरम, सबल, बल, वृक्ष-वीर्यवान, दुर्योधन, पाक, विपारकाल, शम्बर ! ये सब बहुत से महान वीर्य वाले नपा बल वाले थे । सभी अत्यन्त उत्सुक होकर अनेक तरह के मायुध धारण करके रण स्पन मे युद्ध करने के लिए चल दिये पे १५६.६३॥ इस प्रकार से दुष्ट मारमा पाला दनुवंत्यपाल अन्धक भगवान शंकर से युद्ध परने के मन वाला उम महान् गिरि मन्दर पर प्राप्त होगया था। मन्द बुद्धि वामा काल के पाश मे अवशित हो गया था ॥६॥ ६७-सदाशिव दर्शन वर्णन हरोऽपि ममरासप्तः समाहूयाय नन्दिनम् । प्राहामन्त्रय शं लावाये स्थितास्तव शासने ततो महेगवचनानन्दी तर्णतरं गतः । उरस्पृश्य बल श्रीमान्सस्मार गणनायकान् ॥२ नन्दिना संस्मृता सर्वे गणनापा: महायशः । ममुरपश्य परायुक्ताः प्रणतानिधरम् ॥३ यागत गमानन्दी ताबलिपुटोव्ययः । पत्रिपामास पराय महारमने ॥४ मन तापापणे नमो धिनेमाटियामापीन् । एले सारति ध्याता: पोट्यारादर्शवतु ॥५ पानामापागे मागाससमविरमान । देपो दारणा गनपाना यशोधना.

सदाशिव दर्शन वर्णन ] [ १६३ पण्मुखान्पश्यसे यांन शक्तिपाणीच्छिविध्वजाद । पट च पष्टिस्तथा कोट्य स्कन्दनाम्न कुमारकान् ॥७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा~भगवान शकर भी समर करने के लिये बासन्न होगये थे। उन्होंने नन्दी को बुला कर कहा था कि शलाध जा भी तुम्हारे शामन मै सम्पित हैं उन सब को आमन्त्रित करो ॥१॥ इसके उपरात महेश्वर के वचन से नदी बहुत ही शीघ्र चला गया था । श्रीमान ने जल का उपस्पर्शन करके गण नायको का स्मरण किया था ॥शानन्दी के द्वारा स्मरण किये गये सहस्रो गण नायक सभी शीघ्रता से उपस्थित हो गये थे और उन्होंने विदशेश्वर को प्रणाम किया था ॥३॥ समागत हुए गणो को नदी में जो कि अव्यय है, हाय जोड कर सब को महात्मा शकर के सामने निवेदित किया था ॥४॥ नन्दी ने कहा- इसीलिये आपके सामने है शमो ! उपस्थित किये हैं कि आप इहे देख लेदें-ये त्रिनेत्र, जटिल और शुचि रुद्र नाम स ख्यात हैं और एकादश करो हैं ॥५॥ जो ये वानर के समान मुखो वाले है जिनको कि आप देख रहे हैं ये शार्दूल के समान विक्रम वाले हैं । इनके यशो. धन वारपाल भो सरजमान हैं ॥६॥ जिन पर मुखो वालों को माप देख रहे हैं जिनके हायो मे शक्तिया है और मिसिध्दर हैं ये कद नाम वाले कुमार छियासठ कगेट हैं ॥७॥ एतावत्यस्तथा क्रोट्य शाखनाम्न षडानना । विशालास्तावदेवोक्ता नंगमेयाच शकर । सप्तकोटिशत शभो अमीदै प्रमथोत्तमा । एकक प्रति देवेश तावत्यो पि मातर ८ भस्मारुणितदेहाश्च त्रिनेता शूलपाणय । एते शंवा इति प्रोक्तास्तत्र चोक्ता गणेश्वरा ॥१० तथा पाशुपताश्वान्ये भस्माहरणा विभो । एते गणास्त्वसख्याता साहाय्यार्थ समागता १५ पिनाकधारिणो रौद्रा गणा कालमुखा परे। तव भक्ताः समायाता जटामण्डलिनोयना 0 १६४ ] । वामनपुराण लिये यहा खट्वाङ्गयोधिनो वीरा रक्तचन्दनभूषिताः। इमे प्राप्ता गणा पोद्ध महायतिन उतमाः ॥१३ दिग्वाससो मौलिनश्च घण्टाप्रहरणाः परे । निराश्रया नाम गरया: समायाताश्च हे विभो ।।१४ इतनी ही करोड शाख नाम वाले पडानन हैं । हे शकर ! ये सभी परम विशाल और नेगमेय बतलाये गये हैं ।। है माम्मो! सात सो करोड ये प्रमयोतम हैं । हे देवेश ! इन एक के प्रति उतनी मातृगण हैं 10 प्रस्म से माणित देह याले-तीन नेत्रों से युक्त और हाथों में त्रिशूल धारण करने वाले हैं । मे सब शव इस नाम से कहे गये हैं। और उनमे गणेश्वर भी बदला दिये गये हैं ॥१०॥ हे विभो ! भस्म प्रहरण वाले अन्य पाशुपत हैं, ये सब पण असक्ष्य हैं जो इस समय सहायता के पर समागत ॥ ११ ॥ दूसरे गण पिनाक धारण करने वाले-कालमुख रोद्रगण हैं। थापके भक अब जटामण्डनो वाने आगये हैं ॥१२॥ खट्वाङ्ग युद्ध करने वाले नया रक्त चन्दन से भूषित वीर महादतों वाले अति उत्तम गण युद्ध करने को प्राप्त हो गये हैं ॥१३॥ मन्य दिगम्बर-मोली मौर घण्टा प्रहरण वाने हैं। निराथय नाम वाले गण भी हे विभो ! भागये हैं ॥१४॥ साधंद्विनेयाः पद्याक्षाः श्रीवत्साङ्कितवक्षसः । समायाता: खगारूढा वृषभध्वजिनोऽव्ययाः ॥१५ महापाशुपता नाम चक्रशूलधरास्तथा । भैरवो विष्णुना साद्ध गभेदेनाधितो हि मैः ॥१६ इमे मृगेन्द्रवदना शूलपाणधनुर्धराः । गणास्त्वद्रोमसभूता वीरभद्रपुरोगमा: ॥१७ एते चान्ये च बहवः शतशोऽथ सहस्रशः। साहाय्पापं तवायाता यथा प्रीत्या सतोऽन्येस्य गणाः सर्वे प्रणेमुपके सत्कारेणेव रमणान्समावास्योपवे सदाशिव दर्शन वर्णन ] [ १६५ महापाशुपतान्दृष्ट्वा समुत्थाप्य महेश्वरः। संपर्यप्वनताध्यक्षांस्ते प्रणेमुमहेश्वरम् ॥२० ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा सर्वे गणेश्वराः। सुविस्मितास्तदा ह्यासन्किमिद चिन्तयंस्त्विति ॥२१ ढाई नेत्रों वाले-पद्माक्ष और श्रीवत्स से अद्धित वक्षः स्थलों वाले आये हुए हैं। तया खग पर समारूढ और वृषभ की ध्वजा वाले अध्यय हैं ।।१५।। महा पाशुपत नाम वाले जो हैं वे चक्रों और शूलों को धारण कहने वाले हैं जिन्होंने भगवान् विष्णु के साथ भैरव का अभेद भाव से अर्चन किया है ॥१६॥ ये मृगेन्द्र (सिंह) के समान मुखो वाले हैं जो शूलों दाणों और धनुषों को धारण किये हैं । वे गण भी हैं जो आपके रोमों से ही समुद्भूत हुए हैं जिनमें वीरभद्र आदि पुरोगामी हैं ॥१७॥ ये तथा अन्य संकड़ों और सहस्रों ही बहुत से गण हैं जो आपकी युद्ध सहायता करने के लिये यहां पर आये हुए हैं । आप अब प्रेम से उनको अपना आदेश प्रदान कीजिए ॥१८॥ इसके पश्चात सभी गणों ने वहाँ पाकर भगवान् विपके तन को प्रणाम किया था । शम्भु ने बडे सरकार से उन गणों को समाश्वासम देकर वहाँ पर बिठा दिया था ॥१९॥ महा पाशुपतों को देख कर महेश्वर ने उठ कर उनके अध्यक्षों से स्नेहालिंगन किया था और उनने महेश्वर को प्रणाम किया यां ॥२०॥ इसके पश्चात् सभी गणेश्वरों ने उस एक अतीव अद्भुत घटना को देख कर बहुत ही विस्मय किया था और वे आश्चर्यान्वित उस समय मे हो गये थे कि यह क्या है और इस पर वे चिन्तन भी करने लगे थे ॥२१॥ विस्मिताक्षान्गणान्दृष्ट्वा शैलादियोगिनां वरः । प्राह प्रहस्य देवेश शुलपाणि गणाधिपम् ॥२२ विस्मिता हि गणा देव सर्व एव महेश्वर । महापाशुपतानां यद्दत्तमालिङ्गनं यतः ॥२३ जातं तेषां महादेव स्फुटं त्रलोक्यबृंहकम् । रूपं ज्ञानं विवेकं च तद्वदस्वेच्छया विभो ॥२४ अन्धक संग्य पराजय वर्णन ] [ १६७ बाच्छादितो गिरिवर: प्रमपंर्घनाभ- राभाति शुक्लतनुरीश्वरपादजुष्टः । नीलाजिनामततनुः शरदभ्रवों यद्विभाति बलवान्वृषभो हरस्य ॥३२ हम दोनो मे कुछ भी विशेषता नहीं है । यो समझिये एक ही मूर्ति के ये दो स्वरूप हैं । सो इन नर व्याघ्रों ने भक्तिभाव से युक्त होकर है गणी । जिस प्रकार मुझे जान लिया है उस रोति से हरि को भी समझ लिया है किन्तु आप लोगों ने ऐसा नहीं जान पाया है । इसी कारण से मूढ बुदि आप लोगों ने भगवान हरि को विशेष निन्दा की है ॥२८- २६॥ पुलस्त्यमुनि ने कहा-शिव ने कहा-बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा । और फिर उन सब को निष्पाप कर दिया था। इसके पश्चात् उन सभी गणों के साथ प्रभु ने मती मांति निष्पाप हो जाने के कारण परिष्वजन किया था।३०। इस प्रकार से प्रणतो की आत्ति के हरण करने वाले प्रभु ने गणपतियों के पाप को दूर किया और फिर सहयो- पिष मेघ रप से जो अतिगदितान्नगम था और विवुधावतस था गिरि पर मा गये थे ॥३१॥ वह गिरि श्रेष्ठ भो धनों के तुल्य आमा वाले प्रपों से एक्दम समान्ठादित हो गया पा और फिर वह ईश्वर के चरणों से जुष्ट शुक्ल तनु वाला परम शोमित हुमा पा । नौल अजिन से आतत शरीर वाला शरद काल के बादलो के समान वर्ण वाला हर का बलवान् वृषम सा हो उसी मति, शोभा दे रहा था ॥३२॥ ६८- अन्धक सैन्य पराजय वर्णन एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः समं दैत्यस्तथाऽन्धकः । मन्दर पर्वतश्रेष्ठ प्रमथाधितकन्दरम् ।।१ प्रमथा दानवान्दृष्ट्वा चक्र: किलकिलाध्वनिम् । प्रमथाश्चापि सरमा जघ्नुस्तूर्यायनेकशः IR १६६ ॥ । वामन पुराण प्रमथाधिपतेर्वाश्य विदित्वा भूतभावन । बभाये सागणासर्वान्भावाभावविचारिण २५ भवद्भिर्भक्तिसयुक्तहरो भावेन पूजिता। अहकार विमूढश्च निन्दद्भिवैष्णव पदम् ॥२६ तेन ज्ञानेन भवता सादृश्य हि निवारितम् । योऽह स भगवान्विष्णुर्यश्चासौ सोऽहमध्यय २७ उन सबगों को अत्यन्त विस्मित देख कर योगियों में श्रेष्ठ शलादि हम कर शूलपाणि गणाधिप देवेश से बोला-२२॥ हे देव । हे महे. श्वर । ये सब गण बहुत ही विस्मित हो रहे हैं क्योकि आपने महा पाशुपतो को अपना आलिंगन दिया था ॥२३॥ उनको हे महादेव । स्पष्ट लोक्य वृहक उत्पन्न हो गया है सो हे विभो । आप अपनी इच्छा से ही रूप-ज्ञान और विवेक बतलाइये ॥२४॥ भूत भावन प्रभु में उस प्रमयो के अधिपति का वाक्य श्रवण कर भाष-अभाव के विचार करने वाले उन समस्त गणो से शिष ने कहा-२५॥ श्री रुद्र ने कहा-आप लोगों ने भक्ति से सयुत होकर एक भाष से हर का पूजन किया है। बाप अहकार से विमूर हैं और वैष्णव पद की आपने हमेशा निदा हो की है ॥२६॥ उस ज्ञान से आप लोगों का सादृश्य निवारित हो गया है । जो मैं हूँ वही भगवान् विष्णु हैं और जो विष्णु हैं वही श्रव्यप मैं हूँ । भेद कुछ भी हम दोनो मे नही है ॥२७॥ वाभ्या वै विशेषोऽस्ति एका मूतिद्विधा स्थिता। तक्ष्मीभिर्नरव्याघ्रभक्तिभावयुतगणा ॥२८ यथाह वे परिज्ञातो न भवद्भिस्तथा हसि। यथा विनिन्दितो ह्यस्माद्भवद्भिभुढबुद्धिभि । तेन ज्ञान हि वो नष्ट नातस्वालिङ्गता मया ॥२६ बाढमित्यब्रवीच्छर्वश्चके निधूं तकल्मपान् । सपर्यध्वजता पक्तस्तान्सर्वान्गणयूथपान् ॥३० इति विभुना प्रणतातिहरेण गणपतय सहयोपिषमेघरथेन युतिदितान (१) गमेनविबुधावतसेन गिरिमवेत्य ॥३१ अन्धक संग्य पराजय वर्णन ] [ १६७ आच्छादितो गिरिवरः प्रमथर्घनाभः राभाति शुक्लतनुरीश्वरपादजुष्टः । नीलाजिनानततनुः शरदभ्रवर्णी यद्विभाति बलवान्वृपभो हरस्य ॥३२ हम दोनो मे कुछ भी विशेषता नहीं है । यो समझिये एक हो मूति के मे दो स्वरूप हैं । सो इन नर व्याघ्रों ने भक्तिभाव से युक्त होकर हे गणो ! जिस प्रकार मुझे जान लिया है उस रोति से हरि को भी समझ लिया है किन्तु बाप लोगों ने ऐसा नहीं जान पाया है। इसी कारण से मूढ बुद्धि आप लोगों ने भगवान् हरि की विशेष निन्दा को है ॥२८- २६॥ पुलस्त्यमुनि ने कहा-शिव ने कहा-बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। और फिर उन सब को निष्पाप कर दिया था। इसके पश्चात् उन सभी गणों के साथ प्रभु ने भली भाति निष्पाप हो जाने के कारण परिष्वजन किपा था॥३०॥ इस प्रकार से प्रणतो की आत्ति के हरण करने वाले प्रभु ने गमपतियों के पाप को दूर किया और फिर सहयो. पिप मेष रथ से जो अतिगदितान्नगम पा और विवुधावतंस था गिरि पर आ गये थे ॥३१॥ वह गिरि श्रेष्ठ भो धनो के तुल्य आमा वाले प्रमों से एक्दम समाच्छादित हो गया था और फिर वह ईश्वर के चरणों से जुष्ट शुक्ल तनु वाला परम शोभित हुआ था। नील अग्नि से आतत शरीर वाला शरद काल के बादलो के समान वर्ण वाला हर का बलवान् वृषभ जैसा हो उसी मांति, शोमा दे रहा था ॥३सा ६८-अन्धक सैन्य पराजय वर्णन एतस्मिन्नन्तरे प्राप्त: समं दैत्यस्तथाऽन्धकः । मन्दर पर्वतश्रेष्ठ प्रमथाश्रितकन्दरम् ॥१ प्रमथा दानवान्दृष्ट्वा चक्र: किलकिलाध्वनिम् । प्रमथाश्चापि सरन्या जघ्नुस्तूर्याण्यनेकशःR

१६८1
[ वामन पुराण
स चावृणोन्महानादो रोदसी प्रलयोपमः ।
शुधाव वायुमार्गस्यो विघ्ननायो विनायका॥३
समभ्ययात्सम ऋदः प्रमथरभिसंवृतः ।
मन्दरं पर्वतश्रेष्ठ ददृशे पितर तथा ।।४
प्रणिपत्य तथा भक्त्या वाक्यमाह महेश्वरम् ।
कि तिष्ठसि जगन्नाथ समुत्तिष्ठ रणोत्सुक ॥५
ततो विघ्नेश्वरवचो जगन्नाथोऽम्बिका प्रति ।
प्राह यामोन्यक हन्तु स्वयमेवाप्रमत्तया १६
ततो गिरिसुता देवं समालिङ्गय पुनः पुनः ।
हर निरीक्ष्य सस्नेह प्राह गच्छ तथाऽन्धकम् ॥७
महर्षि पुलस्त्य ने कहा--इमी बीच मे दैत्यो के साथ अन्धक पर्वतो
मेर तथा प्रमयों के द्वारा समाश्रित कन्दराओं वाले मन्दराचल पर
प्राप्त हो गया या प्रमयों ने जब दानवों को देखा तोग्लिकिला
पनि करने लगे। प्रथम भी सरव्ध हो रहे थे उन्होंने अनेक यों का
हनन पर दिया था। उस समय उस रण स्पल में दोनो धोर से
पो पनियाई उनरा एक महा नाद हो गया था जो रोदसी में
प्रमय शाप के नाद के समान था । उसको वायु मार्ग में स्थित विनी
स्वामी विनायक ने धवण रिया.पा ॥३॥ वह भी अत्यन्त क्रोधित
होमर प्रमय गर्गों में मिस वृत होकर उस मार गिरि पर आ गये
बोरमपने पिठामादान या पाया प्रक्ति मा पिता के
परणों में प्रणिपात से फिर महेयर से यह वायरहा हे जगत्
रे स्वामिन् ! साप से बंटे हुए हैं। अब तो रण परने के लिये समु.
मुमहोत हो पाये के पापाद उस पर (m)
न को मिल में हाय ही प्रभमत होगर को
मारने रेमि वमो हमनतर तिर मुनाने पर देश
समागिन तो रहा देसर स्नेह साप -भावक
मानेमिनारबाहए ।

अन्धक सन्य पराजय वर्णन ] ततोऽमरगुरोगौरी चन्दनं रोचनोज्ज्वलम् । प्रतिवन्ध सुसंप्रीता पादावेद त्ववन्दत II ततो हरः प्राह वचो वयस्यां मालिनीमिति । जयां च विजया चव जयन्ती चापराजिताम् । युष्माभिरप्रभत्ताभिः स्थेयं गेहे सुरक्षिते । रक्षणीया प्रयत्नेन गिरिपुत्री प्रमादतः ।।१० इति संदिश्य ताः सर्वाः समारुह्य वृप प्रभुः। निर्जगाम गृहादटो जग्मुस्ते पृष्ठतो गणाः ।।११ आच्छंस्तस्य भवनादीश्वरस्य गणाधिपाः । समायाता: परीवार्य जयशब्दांश्च चकिरे ॥१२ रणाय निगच्छति लोकपाले महेश्वरेशूलधरे महर्षे । शुमानिसौम्यानिसुमङ्गलानिचिह्नानिशंसन्ति जयं हि तस्य॥१३ शिवा स्थिता वामतरे च भागे प्रायात्तथाऽग्रे सुरसंतदन्ती। कव्यादसंघाश्चतथाऽमिपैषिणःप्रयान्ति हृष्टास्तृषितामृगर्थे ।।१४ इसके पश्चात् गौरी ने अमरों के गुरु भगवान् महेश्वर के चरणों की रोचन से समुज्ज्वन चन्दन से बन्दना करके फिर परम प्रसन्न होकर उनके चरणों में प्रणिपात किया था । इसके पश्चात् हर ने नय- स्मा मालिनी-जया-विजया-जयन्ती और अपराजिता से कहा-NEL आप सब अप्रमत्ता होकर इसी परम सुरक्षित घर में ठहरें और प्रयल पूर्वक गिरि सुता की रक्षा करें तथा किसी प्रकार का भी प्रमाद न होवे ॥१०॥ इस प्रकार से उन संरको सन्देश देकर प्रभु स्वयं वृप पर समास्ट हो गये थे। फिर परम प्रसन्न होते हुए घर से निकल दिये थे। उनके पीछे वे गण भी सर चल दिपेये ॥११॥ ईश्वर के भवन मे सभी गणाधिप चले गये थे। परिवारित होकर वहाँ पर आ गये थे और सब जय जयकार का शब्द करने संग थे ॥१२॥ हे महपि ! लोकों के पालक महेश्वर शूलधारो के रण करने के लिये निकलने पर परम शुभ बिहू और अनोद सौम्य एवं सुमंगल लक्षण हुए थे जो उनके विजय री सूचना दे रहे थे ॥१३॥ शिवाओ के समूह वाम भाग में २०० ] [ धामन पुराण स्थित थे जो आगे की ओर सुरी का संवाद करते हुए चले गये थे। प्रध्यादो के सघ बो आमिष की इच्छा वाले थे परम प्रसन्न होते हुए जा रहे थे जो रक्तपान करने के लिये अत्यन्त तृपित हो रहे थे ॥१३. दक्षिणाङ्ग नखान्त व समकम्पत शूलिनः । शकुनिश्चापि हारीतो मौनी याति पराङ्मुखः ॥१५ निमितमीहशं दृष्ट्वा भूतभव्यभवो विभुः । शैलादि प्राह वचनं सस्मितं शशिशेखर ॥१६ नन्दिञ्जयो भाव्यतेऽद्य न कचित्पराजयः। निमित्तानीह दृश्यन्ते सभूतानि गणेश्वरः ॥१७ तच्छभुवचन श्रुत्वा शैलादिः प्राह शङ्करम् । सदेहः को महादेव जय त्वं शात्रवान्बहून् ॥१८ इत्येवमुषत्वा वचनं नन्दी रुद्रगणास्तथा। समादिदेश युद्धाय महापाशुपता सह ॥१६ तेऽभ्येत्य दानववलं विनिघ्नन्तश्च वेगिनः । नानाशधरा वीरा वृक्षानशनयो यथा ॥२० ते भिद्यमाना बलिभिः प्रमथैर्देत्यदानवाः । प्रवृत्ताः प्रमथान्हन्तु कूटमुद्गरपागया २१ भगवान् शूनी का दक्षिमांग नबान्त तक कम्पित हो रहा था। हारीत पक्षी भी मौनी होकर पराउ, मुख होता हुआ जा रहा था ॥१५॥ इस प्रकार के निमित्त को देख कर भूत भोर भव्य के प्रभु विभु शशि- शेवर स्मित्त पूर्वक शलावि से बोले-॥१६॥ शशिशेखर ने कहा-हे नन्दिन ! आज तो रिजय हो होने वाला दिखलाई देता है । किमी प्रकार से भी पराजय तो होगा ही मही ये भाव निमित्त यहाँ पर दिख. माई दे रहे हैं। है गणेश्वर ! जो भी मक्षण यहाँ पर हुए हैं वे सब विजय के सूचक है ॥१७॥ शम्भु के इस वपन का अवग र शैलादि भगवान शंकर से बोषा-हे महादेव ! क्या सन्देह है । बाप बहुत में त्रुओ पर निामय ही विजय प्राप्त करेंगे ॥१८॥ इतना भर कह पर अन्धक संन्य पराजय वर्णन ] २०१ - नन्दी ने रुद्र मणों को महावतों के सहित युद्ध करने के लिये आदेश दे दिया था ॥१३ वे सब वहां आकर बड़े वेग से युक्त होकर दानवों की सेना का निह्नन करने लगे थे। सब नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रो के धारण करने वाले थे। शत्रुओं को ऐसी रीति से नियमित कर रहे थे जमे वज्र वृक्षों को नष्ट कर दिया करता है ॥२०॥ वे दैत्य दानव बलशाली प्रमयो के द्वारा विद्यमान होकर प्रमथों का हनन करने के लिये फूट और मुग्दर हाथो मे ग्रहण कर प्रवृत्त हो गये थे ॥२१॥ ततोऽम्बरतले देवा: सेन्द्रविष्णुपितामहाः । ससूर्याभिपुरोगाश्च समायाता दिदृक्षवा ॥२२ ततोऽम्बरतले घोपः सस्वनः समाजायत । गीतवाद्यादिसंमिश्रो दुन्दुभोनां कलिप्रिय ॥ २३ ततः पश्यत्सु देवेषु महापाशुपतादयः । गणास्तद्दानवं सैन्यं निघ्नन्ति स्म सुकोपिताः ॥२४ चतुरङ्गवलं दृष्ट्वा वध्यमानं गणेश्वरः। क्रोधान्वितस्तु दण्डस्तु वेगेनाभिससार ह ।।२५ आदाय परिघ घोरं पट्टोद्वद्धमयस्मयम् । राजते तस्य हस्तस्यमिन्द्रध्वजमिवोद्धृतम् ।।२६ तं भ्रामयानो बलवान्निजधान रणे गणान् । रुद्रादीन्स्कन्दपर्यन्तांस्तेऽभज्यन्त भयातुरा: ।।२७ तच्च भग्नं बलं दृष्ट्वा गणनाथो विनायकम् । समाद्रवत वेगेन तुहुण्ड दनुपुङ्गवम् ।।२८ इसके पश्चात् आकाश मे इन्द्र-विष्णु और पितामह के सहित समस्त देवगण देखने की इच्छा वाले होकर सूर्य को अप्रगामी बना कर आ गये थे ।।२२।। इसके पश्चात् अम्बर तल में बड़ी ही ध्वनि मे परिपूर्ण घोप हुमा था। वह घोष पलिप्रिय और गीत वाद्यादि से समि- पित दुन्दुभिषों का था ॥२३॥ इसके अनन्तर उन समस्त देवो के देखते हुए महा पापनादिक गण अत्यन्त कुपित होकर दातदों को सेना को मारने लगे थे ॥२॥ गणेश्वरों के द्वारा चतुरंगिणी अपनी से।।

२०२ ] वामन पुराण को बध्यमान होती हुई देखकर क्रोध से युक्त होते हुए दण्ड ने बड़े वेग के साथ आक्रमण किया था ॥२शा अयस्मय (लोह निर्मित) पद से उदद परिष उसने लिया था और वह उसके हाथ में स्थित उद्धत इन्द्र ध्वज की भांति शोभित हो रहा या ॥२६॥ उस बलवान ने उसे घुमाते हुए रण स्थल मे गणो का हनन किया था । रुद्रादि स्कन्द पर्यन्त सभी गणेश्वर भय से आतुर हो गये थे ।।२७॥ गण नाथ ने उस विनायक बल को भग्न देखकर बडे भारी वेग से हुतुण्ड नामक दनु श्रेष्ठ पर आक्रमण किया था ॥२८॥ आपतन्त गणपतिं दृष्ट्वा दैत्यो दुरात्मवान् । परिघ पातयामास कुम्भमध्ये महाबलः ॥२६ विनायकस्य मिपतः परिध वजभूपणम् । शतधाऽन्वरमब्रह्मन्मेरोः कूटमिवाशनिः ॥३० परिघ विफल दृष्ट्वा समायातं च पार्षदम् । बवन्ध बाहुपाशेन वलादाकृष्य दानवः ।।३१ त जघा नाथ शिरसि मुद्गरेण महोदरम् । परश्वधेन दैत्येन्द्र गणेशो हि महोदरः ॥२ काष्ठवरस द्विधाभूतो निपपात घरातले । तथाऽपि नात्यजवा बलवान्दानवेश्वरः ॥३३ मोक्षार्थमकरोद्यनं न शशाक महोदरः। विनायक संयतमीप बाहुना कुण्डोदरो नाम गणेश्वरोऽथ। प्रगृह्य तूर्ण मुशलं महात्मा बाहु समन्तास जघान तस्य ।।३४ ततो गणेश: फलराध्वजस्तु प्रासन राहु हृदये विभेद । हते तु हुण्डे विमुखे तु राही गणेश्वरा:कोधिपं मुमुक्षव।।।३५ उम दुष्ट बारमा पाले देय ने अपने कार धावा बोलने वाले गणपति पो देपर महान बल वाले ने गुम्मों के मध्य में परिप गिरा दिया था ॥२६॥ हे ब्रह्मन् सय केभी भूपण स्वरूप उस परिध प्रहार खाने वाले विनायक रोप्रपाद से उस परिष के समान होगये थे । अपने उस परिपोरिफर देवार समायात पार्षद को उप पाने अन्धक सैन्य पराजय वर्णन ] [ २०३ बल पूर्वल खींचकर वाहु पाश से बांध लिया था ॥३१॥ उसके मस्तक में मुद्गर से महोदर का हनन कर रहा या और महोदर गणेश ने भी दत्येन्द्र को परश्वध से हनन किया था ॥३२॥ वह एक काठ की भांति दो टुकडे होकर भूनल पर गिर गया था। इतना होने पर भी उम बल- वान् दानवेश्वर ने वाहको नहीं छोड़ा था । महोदर ने उसे मोक्ष पाने के लिये बहुत सा यत्न किया था किन्तु महोदर हुड़ा न सके ५ ॥३३॥ विनायक को बाहु से सयत देख कर कुण्डोदर नाम वाले गणेश्वर ने वहां आकर शीघ्र मुशल लेकर महात्माने उमको वाहु को सब ओर मे हनन कर दिया या ।।३। इसके पश्चात् कलशध्वज गणेश ने प्रास से राहु को हृदय मे भेदन किया था । हुण्ड के हत होने पर और राहु के विमुख हो जाने पर गणेश्वर क्रोध स्पो दिष्ट के छोड़ने की इच्छा वाने घे ॥३॥ पञ्चककालानलसन्निकाशाविशन्ति सेनां दनुपुगवानाम् । ता वध्यमानां स्वचमू समीक्ष्य बलिबली मारुतवेगतुल्य: ॥३६ गदां समाविध्य जघान मूनि विनायकं कुम्भकटे करे च । कुण्डोदर भग्नकरं महोदर शीणं शिरस्कनमहाकपालम् ॥३७ कुम्मध्वज पूरिणतसधिवन्धघटोदर चोरुविपन्नसधिम् । गणाधिपास्तान्विमुखांस्तु दृष्ट्वावलान्वितोवीरतरः सुरेन्द्रः ॥३८ समेत्यधावंस्त्वरितोनिहन्नु गणेश्वरान्स्कन्दविशाखमुख्यान् । तमापतन्तं भगवान्समीक्ष्य महेश्वरः श्रेष्ठतमं गणानाम् । ३६ शैलादिमामलय तदा वभापे त्वं गच्छ दंत्य जहि वीर युद्ध। इत्येवमुक्तो वृपमध्वजेन चक्र समादाय शिलादसूनुः ।।४० बलि समभ्येत्य जघान मूनि समोहितवावनिमाससाद । समोहित भ्रातृमुतं विदित्वा वली कुजम्मं मुमल प्रगृह्य ॥४१ सभ्रामयन्घूर्णनर स वेगात्ससर्ज नन्दि प्रति जातकोपः । तमापतन्तं मुसलं प्रगृह्य करेण तूणं भगवान्म नन्दो ॥४२ पक्षक का तानल के सदृश दे गोस्वर दनु श्रेष्ठों को सेना में वेश कर गये थे। फिर बलवान् रलि ने जोकि मारुत के समान वेग २०४ ] । वामन पुराण वाला या अपनी सेना को भरती हुई देपा था ॥३६॥। उसने अपनी गदा प्रहण करके विनायक के मस्तक में-कुम्भकट में और कर में प्रहार किया था। कुण्डोदर को टूटे हुए हाथ वाला-महोदर को शिरस्कान महा कपाल एव शीणे--कुम्मध्वज को पूणित सन्धि बन्धों वाला- घटोदर को अरुस्थाम मे विपन्न सन्धि दाला और गणाधियों को विमुख देखकर बल से सम्पन्न वीर सुरेन्द्र वहाँ उपस्थित हो गया था ॥३७. ३८।। वहाँ थाकर घावमान होकर शीघ्रता वाले स्कन्द विशाख आदि प्रमुख गणश्वरों को मारने के लिये प्रयत्न किया था भगवान् महेश्वर ने उसको आता हुमा देखकर गणों मे जो परम श्रेष्ठ शलादि पा उसको बुलाया और उसी समय मे उससे कहा- तुम जाओ, हे वीर । युद्ध में दैत्य को मार डालो । इस प्रकार कहे जाने पर वृषभ ध्वज की आज्ञा शिलादिसूनु ने चक्र का ग्रहण किया या ॥३६-४०॥ बलि के समीप मे आकर उसके मस्तक में प्रहार किया था और वह दे होश होकर भूमि पर गिर गया था। बलवान् ने अपने भाई के पुत्र कुजम्भ को वेहोश देख कर स्वय मुसल ग्रहण किया था ॥४१॥ उसने बडे वेग से घुमाकर अति क्रोधित होकर नन्दि पर उसका प्रहार किया था। अपने ऊपर आते हुए उस मुसल को भगवान उस नन्दी ने शीघ्र ही उसे हाय सपकड लिया था ।।४२।। जधान तेनैव कुजम्भमाहवे स प्राणहीनो निपपात भूम्याम् । हत्वा कुजम्भ मुगलेन नन्दी वज्रण नन्दी शतशो जघान ॥४३ ते वध्यमाना गरणानायकेन दुर्योधन वै शरण प्रपन्ना । दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन वचप्रहानिहतान्दितीशान् ॥४४ पाश समाविध्य तडित्प्रकाशनन्दिप्रचिक्षेप हतेस्त्वितिन वन् । तमापतन्त कुलिशेन नन्दी विभेद गुह्य पिशुनो यथा नरः ॥४५ त पाशमालक्ष्य तदा तु वृत्त सवस्य मुष्टि गणमाससाद । ततोऽस्यवत्रीकुलिशेन तूर्ण शिरोऽच्छिनत्तालफलप्रकाशम् ॥४६ हतोऽथ भूमो निपपात वेगात्याश्च भीता विगता दिशोदश । ततो हत स्व तनय निरीक्ष्य हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम 18.

अधक सैन्य पराजय वर्णन ] [ २०५ प्रगृह्य वाणाशनिमुनवेग विभेद वाणयमदण्डक्ल्पः । गणान्सनन्दीन्वृषभध्वजास्तान्धाराभिरेवाम्बुघरास्तुशैलम् ॥ ते छाद्यमाना दनु वाणजालेविनायकाद्या वलिनोपि वीराः। मिहप्रमुत्रा वृपभा यथैव भयातुरा दुद्र विरे समन्तात् ४६ उम युद्ध भूमि में उपो मुमन से नन्दि न कुम्मन पर फिर प्रहार किंग था और वह पागों से रहित होकर भूनन पर गिर गया था। उमी मुमन मे नन्दी ने कुम्मन का हनन करके फिर बब से सैकडों ही दैत्यों का भी हनन किया था ॥४३॥ गणों के नायक के पिटे हुए एव मरते हुए उन दैत्यों ने दुर्योधन को शरण ग्रहण को यो । दुर्योधन ने देखा था कि गणाधिप नन्दी ने वज्र के प्रहारों से बहुत से देवीगों को मार दिया है ॥४४॥ उसने फिर पाश ग्रहण किया था जो विद्य त के समान प्रकार वाला या । उसको नन्दी पर फैला था और यह मुह से बोर भी रहा था कि-अब मर गया है। उस पाश को बाते हुए देख कर नन्दो ने पय से टुकड़े करक दिमि कर दिरा या जिस तरह किमो गुप्त विषय को पिशुन पुरुष भेद युक्त कर दिया करता है ॥४॥ उस पाश को उस समय में कटा हुमा देशकर उन दैत्य नै मुधि बांधकर गश्वर पर हमला किया था । इमक पश्चात् बनवारी नन्दी ने वन से इसका शिर काट डाला था और वह शीघ्र होतान फन के समान भूमि पर गिर गया था ॥४६॥ जब वह मर गया तो भूमि में गिर गया और समस्त दैत्य भय मीत होकर वेग से दों दिशाओं में भाग खडे पे । इसके पश्चात् हस्ती ने अपने पुत्र को निहत देख कर उसी समय नन्दी पर धावा बोल दिया था।४। उसने उपवेग वाले वाण और अननि को ग्रहण कर यम के दह के समान बार्गों से भेठन किया था जिस तरह अम्बुधर अपनी जर को धाराओं से जनक भेदन कर दिया करते हैं उसी मांति नन्दी आदि गमों को-वृष महाजों को उसने भेद दिया या विधायक आदि बडे बनवान् भो वीर हनु के वार्गों से छायमान होकर सिंह से प्रमुन्न बृपम की भांति भर से आतुर होकर चारों ओर भागने लगे ॥van

२०६ ]
[ वामन पुराण
परस्परान्प्रेक्ष्य गणान्कुमारः शक्ति निशातामथ धारयित्वा ।
तूर्ण समभ्येत्यरिपुगवेषु प्रगृह्य शक्ति हृदय विभेद ॥५०
शक्तिनिभिन्नहृदयो हस्तीभूम्या पपात ह।
समरे चापि पृतनामध्येऽमौ दनुपुंगवः ।।५१
तमरातिगण दृष्ट्वा भग्नं कद्धा गणेश्वराः ।
पुरतो नन्दिन कृत्वा जिघासन्तश्च दानवान् ॥५२
ते वध्यमानाः प्रमथैर्देयाश्चापि पराड मुखाः।
भूयो निवृत्ता बलिनः कुर्वन्तश्च पुरोगणान् ।।५३
तामिवृत्तान्समीक्ष्यव क्रोधीप्तेक्षण: श्वसन् ।
नन्दिपेरणो व्याघ्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान् ॥५४
तस्मिन्निवृत्त गणपे पट्टिशाग्रकरे तदा ।
कान्तस्वरो निववृते गदामादाय नारद ॥५५
तमापतन्त ज्वलनप्रकाशं गणः समीक्ष्येव महासुरेन्द्रम् ।
त पट्टिश भ्राम्य जघान मूनिवान्तस्वरविस्वरमुन्नद तम् ॥५६

अन्धक सैन्य पराजय वर्णन ) [ २०७ हुए देख कर ही जोकि महान असुरेन्द्र था । उस पट्टिश को घुमाकर विस्वर-उन्मदन्त कान्तस्वर के मस्तक में हनन किया था ॥५६॥ तस्मिन्हते भ्रातरि मातुलेये पाश समाविध्य तुरङ्गकध्वजः । बबन्ध वीर सह पट्टिशेन गणेश्वरं चाप्यथ नन्दिपेणम् ॥५७ नन्दिपेण तथा बद्ध समोक्ष्य बलिनां वरः । विशाखः कुपितोऽभ्येत्य शक्तिपाणिरुपस्थित: ॥५८ त दृष्ट्वा वलिनां श्रेष्ठः पाशपाणिरय.शिराः । संयोधयामास वलि विशाखं कुक्कुटध्वजम् ।।५८ विशाख सन्निरदं व रणे दृष्ट्वा गणोत्तमा।। शाखश्व नैगमेयश्च तूर्ण दुद्र वतू रिपुम् ॥६० एकतो नंगमेयेन भग्नः शक्त्या त्वयःशिराः । एकतश्चैव शाखेन वश खप्रियकाम्यया ॥६१ स त्रिभिः शकरसुतैः पाड्य मानो जही रणम् । संप्राप्य शम्बर तूर्ण रक्ष मा हि गणेश्वरात् ॥६२ पाश शक्त्या समाहत्य चतुभिः शकरात्मजः । जगाम निलयं तूर्णमाकाशादिव भूतलम् ॥६३ पाशे निकृते याते च शम्बरः कातरेक्षणः । दिशोऽथ भेजे देव कुमारः संन्यमाई यत् ॥६४ सा वध्यमाना पृतना मह सदानवा शर्वसुतैर्गणश्च । विवर्णस्पा भयविह्वलाङ्गी जगाम शुक्र भयार्ता ॥६५ उस मातुलेय माई के हत हो जाने पर तुरंगकध्दव ने पाश को समाविद्ध करके उस पट्टिश से वीर गगेश्वर को और नन्दिपेण को बांध लिया था ॥५७॥ नन्दिपेण को उस भांति वद्ध देख कर बलानों में धेट विशाख कुपित होकर हाप में शक्ति ग्रहण करके वहा पर आकर उपस्थित होगया या ॥५६॥ बल वानों में श्रेष्ठ हाय में पाश ग्रहण करे हुए अप: शिरा ने उसको देख कर बलि-विशाल और कुमुटध्वज किया या ॥५६॥ गणोत्तमो ने विशाल को रण में देख कर शाख और नगमे ने तुरन्त ही शत्र पर आक्रमग से 4 जन्म कुजम्भ वध वर्णन ] [ २०६ शुक्रोऽन्धकवचः श्रुत्वा सान्त्वयापरमो गुरुः । वचन प्राह देवर्षे हर्षयन्दानवेश्वरम् । तद्धि तीथं गमिष्यामि करिष्यामि तव प्रियम् ।।६ इत्येवमुक्त्वा वचन विद्या सजीवनी कविः । आवर्तयामास तदा विधातेन शुचिव्रतः ॥७ महपि पुलस्त्य ने कहा-इसके पश्चात् कुजम्भ के यमालय वले पाने पर और प्रमों के द्वारा समस्त सेना पर वह महारयो अन्धक भय भीत होकर गुरु गुकावार्य के समीप में पहुचा और उस सयय में बहुत ही विनय के साथ यह वचन बोला-॥१॥ हे भगवन् ! आपके चरणों का समाप्रय ग्रहण करके भी हम इन देवताओ से बाधित हो रह हैं तथा जाप भी है विप्र ! सुर-गन्ध और किन्नर हमको सताते हैं ॥२॥ हे भगवन् । मेरी गुप्त इस सेना को बाप देखिय । जिस तरह कोई अनाप नापे होनसी भाति प्रमों के द्वारा मारी एव साई जारही है ।॥३॥ हे मार्गव ! कुमाम यादि जो मरे माई ये वे सभी मारे गये है । वे प्रमप अवरुष हैं जैस कुरुक्षेत्र घाम का फल होता है ॥४॥इसलिये अब ऐसा करियै जिसे मन्य काई भी न जानने पावे । मैं शत्र ओं को युद्ध में जीत लू आप ऐसा सब कुछ करने के योग्य हैं ॥५पुलस्त्य महर्षि ने कहा-शुक्राचार्य ने अन्धक के इस वचन का श्रवण कर परम गुरु ने उसको मान्दना प्रदान की और है देव। प्रसन्न होते हुए उसने दानवेश्वर से यह वचन कहा--में उस तीर्थ पर पाऊंगा और जो तेरा प्रिय होपा उसे करूगा ॥६॥ इस प्रकार से यही कहकर कवि ने (शुक्राचार्य ने) अपनी सजीवनी विद्या का आवर्तन मिया पा और बहुत कुछ विधि विधान से परम पवित्र होकर उसे उस समय में भारम्म करने लगे ॥७॥ तस्यामावर्तमानया विद्यायामसुरेश्वराः । ये हता। प्रमययुद्ध ते च सर्वे समुत्यिता. ॥८ कुजम्मादिषु दंत्येषु भूय एवोत्यितेष्वथ । योज्दु समागतेप्वेव नन्दी शहरमब्रवीत् ॥६ २०८ ] [ वामन पुराण ॥६० ।। एक ओर तो नैगमेय के द्वारा अयः शिरा भग्न हुमा चाओ कि शक्ति से किया गया था और एक और विशाख के प्रिय की कामना से शाख ने उसे भग्न किया था ॥६१॥ वह तीनो शंकर के पुत्रो से पीडित होकर रग स्थल को त्याग का शम्बर के समीप में पहुंच गया और उसने प्रार्थना की थी गणेश्वर से मेरी शीघ्र रक्षा करो ॥६२।। शक्ति से पाश को समाहत करके पारो शकर के पुत्रो से युद्ध करके लिये वह शीघ्र निलय पर आकाश से भूतल की भांति गया था ॥६३५ पाश के निकृत हो जाने पर शम्बर कातर दृष्टि वाला होगया था । हे देवर्षे ! कुमार ने दिशामो का सेवन किया था और सेना को अस्ति कर दिया था ॥६॥ हे महर्ष ! वह सेना वध्यमान होती हुई जोकि मकर के पुत्रों के द्वारा तथा गणेश्वरों के द्वारा दानवो के सहित मारी जारही यो विवरणं रूप वाली तपा-भय से विह्वल गो वाली होगई थी और अत्यन्त ही भर से दुःखित होकर शुक्राचार्य को गरण में प्राप्त हुई थी ॥६॥ ६६-जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ततः कुजम्भे च यमालय गते हते च संन्ये प्रमथ महारथः । सस्तोऽधकोऽभ्येत्य गुरुंचशुक्रमिदेवचःसानुनयस्तदाऽब्रवीत् ॥१ भगवंस्त्वा समाश्रित्य वयं बाघाम देवताः । अयाग्यानपि विप्रर्षे गन्धवसुरकिन्नरान् ।।२ तदिमां पश्य भगवन्मम गुप्तां वरूथिनीम् । अनायेव यथा नारी प्रमथैरपि काल्यते ॥३ कुजम्भाद्याश्च निहता भ्रातरो मम भार्गव । असंध्यातास्ते प्रमथा कुरुक्षेत्रफलं यथा ॥४ तस्मात्पुरुष्व च तथा यथा न ज्ञायतेऽपरै।। जयेम र परान्युटे तथा त्वं कमहंसि ॥५ जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ] [ २११ समुपेत्याहनन्नन्दो चक्रणाशनितेजसा । सा पपाताथ नि:संज्ञो ययौ नन्दी ततस्त्वरन् ।।१६ ततः कुजम्भो जम्मश्च वलो वृत्रश्च राक्षसाः । स्वय च रणशार्दूला नन्दिन समुपाद्रवन् १७ तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयहादपुरोगमाः। नानाप्रहरणा युद्ध गणनाथमभिद्रवन् ॥१८ ततो गणानामधिपं कुटयमानं महाबलः। समपश्यन्त देवास्त पितामहपुरोगमाः ।।१६ त दृष्ट्वा भगवान्प्राह देवान्छकपुरोगमान् । साहाय्य क्रियता शमोरेतदन्तरमुत्तमम् ।।२० पितामहोक्त वचन श्रुत्वा देवाः सवासवाः । समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात् ।।२१ उस बलवान् और महान भयकर असुरों मे पंप्ट ने उसको देखा उसका मार्ग वन में पशुओ के मार्ग को सिंह की भांति रोक दिया था ॥१५॥ वहा पहुचकर नन्दी पत्र के समान तेज चक्र से उसका हनन कर दिया था और वह वैहोश होकर गिर गया था फिर शीघ्रता से नन्दी आगे बढ गया या ॥१६॥ इसके आगे कुजम्म, जम्भ, बल, और वृन राक्षस मिलगये थे। ये सभी बड़े रण शाल थे। इन्होंने नन्दी के कार आक्रमण किया पा ॥१७॥ इसके पश्चात् और भी भय, हाद आदि प्रमुख दानव थे अनेक हथियारों से सज्जित होकर युद्ध में उस गण नाय नन्दी पर टूट पड़े थे॥१८। इसके पश्चात् महान् बलवान दैत्यो के द्वारा कुटचमान गणो के स्वामी नन्दी को पितामह जिनमें प्रमुख ये उन सहन देवों ने देखा था ॥१६॥ उसको ऐसी दशा में देख कर भगवान ने इन्द्र आदि सब देवों से कहा-इस चतम अन्तर मे आप सभी मिलकर शम्भु की सहायता करो ॥२०॥ इन्द्र के सहित समस्त देवों ने पितामह के इस वचन का श्रवण कर बडे वेग से आकाश से उस थि को सेना मे गये थे।। २१॥

९१० ] । वामन पुराण हताः प्रमथैर्देत्या यथाशक्त्या रणाजिरे । ते समुज्जीविता भूयो भागवणाथ विद्यया ॥१० तदिदं यन्महादेव महत्कर्म कृत रणे। न जातं स्वल्पमेवेश शुक्रविद्यावलाश्रयात् ।।११ इत्येवमुक्त वचने नन्दिन कुलनन्दिनम् । प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थसाधनमुत्तमम् ॥१२ गच्छ शुक्र गणपते ममान्तिकमुपानय । अहं तं संयमिप्यामि यथा योग समेत्य हि ॥१३ इत्येवमुक्तो रुद्रण नन्दी गणपतिस्ततः । समाजगाम दैत्यानां चमू शुक्रजिघृक्षया ॥१४ उस विद्या के आवत्त मान किये जाने पर जो भी असुरेश्वरं युद्ध में निहत हुए और प्रमथों ने जिन को मार दिया था वे सबके सब समु- स्थित होगये थे ॥८॥ कुजम्मादि दैत्यो के पुनः समुस्थित हो जाने पर और युद्ध करने को समागत होने पर नन्दो ने भगवान शंकर से कहा ॥६॥ हे भगवन् ! यथा शक्ति जिन दैत्यों को रण स्थल में प्रमपो ने मार दिया था वे तो भार्गव ने पुनः समुज्जीवित कर दिये हैं क्योंकि उनके पास सजीवनी विद्या है उसीसे ऐसा किया है ॥१०॥ हे महादेव ! जो यह एक महान कम्मं रण स्थल में किया गया है तो है ईश ! शुक्रा- चार्य की विद्या के बल का आश्रय होने से हमारा किया हुआ स्वल्प भी कुछ नहीं हुआ ।।११। इस प्रकार के वचन के कहने पर कुल को आनन्द देने वाले नन्दी से प्रमु शकर ने प्रीति के साथ उत्तम स्वार्थ साधन बत- लाया था ॥१२॥ हे गणपते ! तुम शुक्राचार्य के पास चले जाओ और उसे मेरे समीप में ले आओ। मैं यथायोग मिलकर उसे संयमित कर दूंगा ।।१३। इस तरह से रुद्र के द्वारा कहे जाने पर फिर गणपति नन्दी शुक्राचार्य के ग्रहण करने की इच्छा से दैत्यों की सेना में पहुंच गये थे ॥१४॥ तं ददर्शासुर श्रेष्ठो बलवांस्तु भयंकरः। स रोप तदा मार्ग सिंहस्येव पशुव॑ने ।। १५

जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ]
( ૨૧૧
समुपेत्याहनन्नन्दो चक्रणाशनितेजसा ।
सा पपाताय निःसंज्ञो ययौ नन्दो ततस्त्वरन् ।।१६
ततः कुजम्भो जम्मश्च बलो वृत्रश्न राक्षसाः ।
स्वय च रणशार्दूला नन्दिन समुपाद्रवन् ।।१७
तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयहादपुरोगमाः।
नानाप्रहरणा युद्ध गणनाथमभिद्रवन् ॥१८
सतो गणानामधिपं कुटयमानं महाबलः।
समपश्यन्त देवास्त पितामहपुरोगमाः ।।१६
त दृष्ट्वा भगवान्प्राह देवाञ्क्रपुरोगमान् ।
साहाय्यं क्रियतां शमोरेतदन्तरमुत्तमम् ।।२०
पितामहोक्त वचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः ।
समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात् ।।२१
उस बलवान् और महान भयकर असुरो मे श्रेष्ठ ने उसको देखा
उसका मार्ग वन मे पशुओ के मार्ग को सिंह की भांति रोक
दिया या ॥१५॥ वहा पहुचकर मन्दी वज्र के समान तेज चक्र से
उसका हनन कर दिया था और वह वेहोश होकर गिर गया था फिर
शीघ्रता से नन्दी आगे बढ़ गया या ।।१६। इसके आगे कुजम्भ, जम्म,
वल, और वृन राक्षरा मिनगये थे। ये सभी बड़े रण शार्दूल थे।
इन्होंने नन्दी के कार आक्रमण किया पा ॥१७॥ इसके पश्चात् और
भी मय, हाद आदि प्रमुख दानव श्रेय अनेक हथियारों से सज्जित
होकर युद्ध मे उस गण नाय नन्दी पर टूट पड़े थे ।।१८। इसके पश्चात्
महान् बलवान् दैत्यो के द्वारा कुटचमान गणो के स्वामी नन्दी को
पितामह जिनमे प्रमुख थे उन सहन देवों ने देखा था ॥१६॥ उसको
ऐसी दशा मे देख कर भगवान् ने इन्द्र आदि सब देवों से कहा-इस
उत्तम अन्तर में आप सभी मिलकर शम्भु की सहायता करी ॥२०॥
इन्द्र के सहित समस्त देवों ने पितामह के इस दचन का यवग कर बडे
वेग से आकाच से उस शिव की सेना में समापवित हो गये
थे॥२१॥

२१२ । [ वामन पुराण तेपामापतता वेगः प्रमथाना बले बभौ । आफ्गाना महावेग. पतन्तीना महार्णवे ॥२२ ततो हलहलाशब्दः समजायत चोभयो बलयोपोरसङ्काशोऽसुरप्रमथयोरथ ॥२३ तदन्तरमुपागम्य नन्दी संगृह्य वेगवान् । त भागव समाकामरिसहो वनमृग यथा ॥२४ तमादाय हराभ्याशमागमद्गणनायका। निपात्य रक्षिण सर्वानथ शुक्र त्यवेदयत् ॥२५ तमानीतं कवि शर्वः प्राक्षिपद्वदने प्रभुः । मार्गव व्यापृत तुण्डे ददृशुस्ते सुरारय ॥२६ स शभुना कवि श्रष्टो ग्नस्तो जठरमास्थितः । तुष्टाय भगवन्त त वाग्मिर्भार्गव आदराव ॥२७ वरदाय नमस्तुभ्य हराय गुणशालिने। शकराय महेशाय विश्व शाय नमो नमः ।।२८ उन देवों के कार मे नीचे आने का जो वेग या वह प्रमथो को सेना में बहुत ही शोभित हुआ था जैसे महानदियों का महान वेग जब कि वे महार्णव में गिरा करती हैं होता है वैसा ही यह प्रतीत होरहा था ॥२२॥ फिर उस समय ये दोनो सेनाओं मे एक दम हलहला शब्द समुत्पन्न हो गया था और असुर तथा प्रमयो मे घोर सकाश होगा पा ॥२३॥ उसी मन्तर मे नन्दी उपगमित होकर वेग के साथ पहच पर उस भार्गव ने पास प्राप्त हो गये थे जैसे कोई सिंह भृगों के मन में समाकान्त हो जाया परता है ॥२॥ गण नायक ने उस शुक्राचार्य दो सेर भगवान् हर के समीप मे पहचा दिया था। मन्दी ने सभी रसा मरने वालों को मारकर शुक में बहा पा ||२५|| भगवान् शंकर ने उस ममागत कपि को मुख में प्रक्षिप्त कर दिया था 1 समी मुरारि गण ने तुग में व्याप्त उम भार्गव को देखा वा ॥२६॥ शम्भु के द्वारा बहमियेष्ठ पस्त कर लिया गया था और वह जठर मे मसास्थित होगमा पा। वहीं पर भागर ने बाहर से आनी वाणियों के द्वारा जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ] [ २३ भगवान् शिव का संस्तवन रिया पा॥२७॥ शुक्राचार्य ने कहा-वरदान देने वाले-गुणशानी हर, मंकर, महेश और विश्वेश के लिये मेरा बारम्बार नमस्कार सरित है ॥२८॥ जोवनाय नमस्तुभ्यं लोकनाथ पाकपे। मदनाग्ने काल शो वामदेवाय ते नमः ॥२६ सवित्रे विश्वरूपाय वामनाय सदागते । महादेवाय शर्वाय ईश्वराय नमो नमः ॥३० सिनयन हर भव शंकर उमापते नीमूत केती गुहाश्मशाननिरत भूतविलेपन शूलपाणे पशुपतेगोपते तत्पुरुष सत्तम नमो नमस्ते । इत्यस्तुत:कविवरणहरोज्यभक्त्याप्रीतोवरंवरयभागवइत्युवाच । तप्रादेहिमगवस्तुवरममाद्ययतर्ववजठराममनिगमोऽस्तु ॥३१ ततो हरोऽक्षोणि तदा निरुध्य प्राह दिजेन्द्र किल निगमस्व । इत्युक्तमात्रो विभुना चवार देवोदर भार्गव पुङ्गवस्तु ॥३२ परिक्रमन्ददर्शासौ शङ्करोदरकोटरे । भुवनार्णवधातालास्थितान्स्थावरजङ्गमः ॥३३ आदित्यवसुरुद्रांश्च विदव देवगणांस्तथा । यक्षानिकपुरुषारचंद गन्धर्वाप्सरसां गणान् ॥३४ मुनोन्मनुजसाध्यांश्च पशुकोटपिपीलिकाः । सरीसृपान्वृक्षगुल्मफलमूलौषधानि च ॥३५ हे लोकनाय ! है वृषाक्य ! आप जीवन स्वरूप के लिये मेरा प्रणाम है । मदनाग्नि के कात स्वस्थ शत्र वामदेव यापके लिये हमारा नमस्कार समर्पित है ॥२६॥ सरिता, विश्वरूप, वामन, सदागति, महा- देव, सर्व और ईबर आप की सेवा में पुनः पुन: मेरा प्रणाम निवेदित है ॥३०॥ है त्रिनयन ! हर, मद, घर, उमापते, जीमूत केतु, गुहा- श्मशान निरत, हे मूति दिलयन ! जूनपाणि, पशुपति, गोपति, तापुरुष और हे सत्तम! बापको मेरा नमस्कार अपित है । इस प्रकार से विवर के द्वारा सस्तुत होने पर भगवान हर मक्ति से प्रसन्न हुए थे और उन्होंने कहा-दे मार्यव ! वर की पाचना करले। मार्पव ने प्रार्थना की.

२१४ ] [ वामन पुराण हे भगवन् ! आप मुझे म पम तो यही वरदान दे कि मेरा आपके पठर मे शाहिर निकास हो जावे ॥३१॥ इमके अनन्तर हरने अक्षियों को निस्त करके कहा था कि द्विजेन्द्र ! निकल जाओ । इतना भर विभु के द्वारा कहे गये उम मागं श्रेत्र ने देवोदर मे मवरण किया था ॥३२॥ इमने शकर के उदय-कोटर में परिप्रमण करते हुए स्थावर, वगों के महित भुवन, समुद्र और पाताल लोगों को देखा था ॥३३॥ उसने वहाँ पर आदित्य, वसु रुटों को, विश्व में देव गणों को, यक्ष, किम्पुरुषों को और गन्धर्व तपा अमरामों के गणों को देखा था ॥३॥ मुनियों को-स्नुको को-मायों को और पशु, पोट तथा विपी. मिशाओं को देखा पा । सरी सपो रो, गुल्म, फल, मूल और प्रोपों को देखा था ॥३॥ जलस्थानस्थल स्थांश्चानिमेपानिमिपानपि । अव्यक्तांश्चय व्यक्तरिच द्विपदोऽय चतुष्पदः ॥३६ स रष्ट्वा कौतुवाविष्ट, परिवग्राम मार्गवः । तत्रास्यतो भार्गवस्य दिव्यः मवत्सरो गतः ॥३७ न वान्तमसौ सेभे ततः प्रान्तोऽभवत्ल विः। स थान्त वीक्ष्य पात्मानं न च सेभेऽप निगमम् । भक्तिनमो महादेव ततस्तरसमुपागमद ॥३८ विश्वाप महाप्प विश्वरूपात रूपपृषः । माहा महादेव स्वामहं शरणं गतः ॥३८ नमोस्तु ते शहरवं गम्भो सहनने वाप्रिभुजगभूपण । रष्टव गमुक्न सोदर प्रान्तो म यो कारणं प्रपन्न.॥४० स्वमुतदपने महात्मा शपः प्राह तदा विहस्य । निर्गन्छ पुरोगिमगापुनारगिननेनमोमानववंगपा ४१ माम्नागुनिषरापगरपानोपनिनवात्रदिपारणारयात् । एषामाका भगवानुमोप जिनेन शुन. सपानगाम 11४२ रहने कानपस मे एनेसाबपि निपिपारो-nial fr पर सुपरी रेखा र जन्म-कुजम्म वध वर्णन ] [ २१५ मागंव कौतुक में भरकर सबको देखते हुए वहा भ्रमण कर रहा था। वहाँ रहते हुए भागेंद को एक दिव्य वर्ष व्यतीत हो गया था ॥३७॥ इसने वहाँ पर उसका कहीं भी यन्त नहीं प्राप्त किया था और इस के बाद वह कदि धान्त हो गया था। वह अपने बापको अत्यन्त प्रान्त हुआ देख कर मो निगम नहीं प्राप्त कर रहा था। फिर भक्ति भाव से अत्यन्त नम्र होकर महादेव को शरण में प्राप्त हुआ था ॥३८॥ शुक्रा- चार्य ने कहा-आप तो विश्व रूप वाले हैं। बापका रूप महान् है । है विश्वरूपाक्ष ! आप रूप धारण करने वाले हैं । हे सहसास ! हे महादेव ! मैं आपको शरणागति में प्राप्त हो गया हूँ ॥३॥ हे शकर ! हे शवं! हे शम्भो ! बापकी सेवा में मेरा प्रणाम समर्पित है । हे सहन नेत्र और चरण वाले ! आरके नुजग तो भूपण होते हैं। आपके उदर में सम्पूर्ण भुवन को देख कर मैं तो प्रान्त हो गया भव आपकी मैं शरणागति में प्राप्त हो गया हूँ ॥४०॥ ऐसा वचन कहने पर उस समय में महात्मा शम्भु ने हंसकर यह वचन कहा-हे पुन ! तू बद मेरे विश्न से निकल जा । तू भार्गव वध को प्रकाशित करने वाला चन्द्रमा के समान है किन्तु सभी चराचर नाम से तुमको 'शुक्र'-यही कह कर स्तवन करेंगे-इस में कुछ भी विचारणा नहीं होनी चाहिए। इतना मात्र कह कर भगवान् ने उसे मुक्त कर दिया था और वह शुक शिश्न के द्वारा निकल गया था ॥४१-४२।। विनिर्गतो भार्गववंशचन्द्रः शुक्र त्वमासाद्य महानुभावः । प्रणम्य शंभुस जगाम तूर्ण महासुराणाबलमुत्तमोजाः ॥४३ भार्गवे पुनरायाते दानवा मुदिताभवन् । पुनर्युदाय विदधुर्मति सह गणेश्वरैः ॥४४ गणेश्वरास्तानसुरान्सहामरगण रथ । युयुधुः संकुल युद्ध सर्व एव जयेप्सवः ॥४५ ततोऽसुरगणानां च युध्यता द्वन्द्वयुद्धवत् । द्वन्द्वयुद्ध समभवद्धोरूपं तपोधन ॥४६ २१६ ] ! बामन पुराण अन्धको नन्दिनं युद्ध शङ दुकणं त्वयःशिराः । कुम्भध्वज बलि(मानन्दिपेण विरोचन. ॥४७ अश्वग्रीदो विशाख च शाखो वृत्रमयोधयत् । बाण तया नेगमेयो बल राक्षसपु गवः ।।४८ विनायक महावीयं परश्वधधर रणे । सक्रद्धा राक्षसश्रेष्ठा दानवाः प्रमथानथ ॥४६ वह विनिर्गत भार्गवो के दश पा चन्द्रमा महानुभाव शुरुल को प्राप्त हो गया था उसने जो कि उत्तम बोजवाला महर्षि या फिर भगवान् गम्भु को प्रणाम किया था और शीघ्र ही महासुरों की सेना मे चला गया था ॥४३॥ भार्गव के पुन: समायात हो जाने पर दानव गण बहुत ही प्रसन्न हुए थे और उन्होंने पुनः गणेश्वरों के साथ युद्ध करने की बुद्धि को पी ॥४४॥ गणेश्वर भो महान् अमर गर्गों के साथ उन असुरों से सकुल युद्ध करने लगे थे और सभी विजय को इनशा वाले थे ॥४५॥ हे तपोधन ! फिर द्वन्द्व युद्ध की भाति युद्ध करने वाले मसुर गणों का महान् घोर स्वरूप वाला दन्द्र युद्ध हुआ था ॥४६॥ अन्धक ने नन्दी के साथ-अय: गिरा ने शकुकणं के साथ-धीमान् बलि ने कुम्मावज के साप मोर विरोवन ने मन्दिषेप के साम युद्ध किया था ॥४७॥ अश्वग्रीव ने विशाख से और शाख ने वृत्र के साथ युद्ध किया था । राक्षस पुगव नेगमेय ने बल के साथ युद्ध किया था ॥४॥ रण स्थल में परश्वधारी महान वीर्य वाले विनायक से युद्ध करते हुए राक्षस श्रेष्ठ दानद बडे कट हुए और प्रमयों के साथ युद्ध करने लगे थे॥४६॥ सयोधयन्तो ब्रह्मर्षे दायादाना शतानि पट ।।५० शतक्रतुसमाधीत वज्रपाणिमवस्थितम् । त चापि दानवश्रेष्ठस्तुहुण्डः समयोधयत् ॥1 हस्ती च कुण्डजठर हादो वीर घटोदरम् । एते हि बलिना श्रेष्ठा दानवाः प्रमथानय । सयोधयन्तो ब्रह्म देते याना शतानि पट् ॥५२ जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ] [ २१७ - गरगोस्ट समायान्तं वज्रपाणिमवस्थितम् । कारयामास बलवाजम्मो नाम महासुरः ॥५३ शभुर्नामासुरपति: स ब्रह्माणमयोधयत् ॥५४ मायामय: कुजम्भश्च विष्णु दैत्याधिपस्त्वियात् । वैवस्वतं रणे सोल्को वरुण त्रिशिरास्तथा ॥५५ द्विमूर्धा पवनं सोमं सहमित विरूपधृक् । एकदृक् स रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः ।।५६ हे ब्रह्म ! दायादो हूँ सो लोग भली भांति वहाँ पर युद्ध कर रहे थे ॥५०॥ शतक्रतु को जो कि वच हाय मे ग्रहण किये वहां अब स्थित था उमको देखा और उसमे भी दानवो मे श्रेष्ठ तुहुण्ड ने युद्ध किया था ॥५१॥ हस्ती ने कुण्ड जठर से और हाद ने वीर घटोदर से युद्ध किया था। ये सभी वली दानवों में परम श्रेष्ठ ये जो प्रमथो के साप वहा युद्ध कर रहे थे । हे ब्रह्म! दैतयों के छ सो लोग वहा युद्ध कर रहे थे ॥५२॥ वहां पर अवस्थित और समायात होने वाले गणोकर को जिमके हाथ मे वज था महान् अमुर बलवान जम्म ने वारित किया था ॥५३॥ शम्भु नाम वाले असुगे के पति ने ब्रह्माजो के साथ युद्ध किया था ॥५४॥ मायामय दंत्यो के अधिप कुजम्म विष्णु के समीप युद्ध करने को आया था। सोल्क ने वैवस्वत से और त्रिशिरा ने रण स्थल में वरुण से युद्ध किया था ॥५५॥ द्विमूर्धा ने पवन मे और विरूप पक ने सह मित्र सोम से युद्ध किया था। उम रण भूमि मे एक हक महान् असुर कालनेमि परम रौद्र स्वरूप वाला या ॥५६॥ एकादशव रुद्रास्तु यच्चकोऽपि रणोत्कटः । योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः ।।५७ द्वावश्विनी च नरको भास्करानेव शम्बरः। साध्यान्मरुद्गणाश्चैव निवातकवचादयः ॥५८ एवं द्वन्द्वसहस्राणि प्रमथानां च दानवैः। सजाताना सुरान्दाना पटुतानि महामुने ॥५६ २१८ ] [ वामन पुराण यदा यौद्धन शक्तास्त दानवरमरादयः । मुखं व्यादाय वेगेन ग्रसन्त क्रमशोऽमरान् ॥६० ततोऽभवच्च तत्संन्य शून्य प्रमथदेवता। आवृत वजित सर्वेः प्रमथरमरपि ॥६॥ दृष्ट्वा शून्य गिरिप्रस्थ ग्रस्ताश्च प्रमथामरान् । क्रोधादुःपादयामास रुद्रो जृम्भाम्विका वशी १६२ ययाऽऽकृष्टा दनुसुता अलसा मन्दभापिणः। वदन विकृत कृत्वा मुक्तशखा विजृम्भिरे ।।६३ एकादश रुद्रो के साथ एक ही रणोत्कट युद्ध कर रहा था । महा- सुर सेजस्वी विद्य माली ने वहीं युद्ध किया था ॥५७॥ मरक ने दानों अश्विनी कुमागे से तथा शम्बर ने भास्करों से युद्ध किया था। साध्य- वृन्द और मरुद्गणो से निवात चादि ने युद्ध किया था ॥५८। इस प्रकार से प्रमथो का दानवो के साथ सहस्रों द्वन्द्व युद्ध हुए थे। हे महा मुने । दिव्य वर्षा के छ सौ वर्ष तक ये युद्ध होते रहे थे ॥५६।। जब अमर गण दानवो के साथ युद्ध करने को समर्थ नही रहे थे तब वे दैत्य अपना मुग्व फैलाकर कम से अमर गणों के बडे वेग से ग्रसने लगे थे ॥६०।। इसके उपरान्त वह सेना प्रमथ और देव गणो से शूनी हो गई थी। सब प्रमय और देवगण मावृत एव जिन वह रण स्थल हो गया था ॥६१।। उस गिरि प्रस्थ को सूना और प्रमथो को प्रस्त हुए देखकर वशी रुद्र ने क्रोग से जम्माम्बिका को उत्पादित किया था १६२१॥ उसके द्वारा समाकृष्ट हुए मन्दमापी आलसी दनु के पुत्र शस्त्रों को छोड, मुख को विकृत करते हुए जंभाई लेने लगे ॥३॥ विजृम्भमाणेषु तदा दानवेषु गणेश्वराः । सुराश्च नियंयुस्तुणं दत्यदेहेभ्य आकुला: ॥६४ मेघप्रभेभ्यो देहेभ्यो निर्गच्छन्तोऽमरोत्तमाः। शोभन्ते पद्मपत्राक्षा मेघेभ्य इव विद्युत ॥६५ ततोऽमरगणा: सर्वे निर्गनाश्च तपोधन । मध्य त महात्माको भूय एवामियोपिता. ॥६६ जम्भ-कुजम्म वध वर्णन ] [ २१६ ततो देववरः सर्वे दानवाः शर्वपालितः। पराजीयन्त मंग्राम योभूयस्त्वहनिशम् ।।६७ तत्र त्रिणेत्रः स्वां संध्यां सप्ताष्टशतिके गते। काले ह्य पासत तदा सोऽष्टादशभृजोऽव्ययः ॥६८ संस्पृश्याप: सरस्वत्याः स्नात्वा च विधिना हरा। कृतार्थो भक्तिमान्मूनि पुष्पाञ्जलिमथाक्षिपत् ॥६६ ततो ननाम शिरसा ततश्चक प्रदक्षिणम् । हिरण्यगर्भत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ॥७० उस समय में उनके (दानवों के) विजृम्ममाण होने पर समस्त गणेश्वर और सुग्गण आकुल होकर शीघ्र ही दैत्यों के शरीरों से बाहिर निकल आये थे ॥६४॥ मेघों के समान प्रभा वाले देहो से निकलते हुए अमर गण जिनके नेत्र पद्म पत्रों के समान ये मेघो से विद्यत की भौति शोभित हो रहे थे॥६॥हे तपोधन ! फिर सभी देववृन्द निकल आये थे। फिर पुनः क्रोधित होकर वे महात्मा युद्ध करने लगे थे ॥६६॥ इमके उपरान्त शिव के द्वारा पालित देववरों के द्वारा दानव संग्रामों से बारम्बार अहनिय पराजित ये ॥६७। इसके पश्चात् सप्ताष्ट प्रतिक काल के हो जाने पर उस समय में भगवान् निनेत्र प्रभु ने अपनी सन्ध्या की उपासना को यो और उस काल में वह अविनाशी अठारह भुजाओं वाले थे ॥६८॥ भगवान् हरि ने विधि पूर्वक सरस्वती के जल का संस्पर्श करके तया उममें स्नान करके परम कृनायं हुए ये और मक्तिमान् ने इनके अनन्तर मस्तक पर पुष्पाञ्जलि प्रक्षिप्त की यो ॥६६॥ इसके उपरान्त शिर से प्रणाम किया था और फिर प्रदक्षिणा की थी। हिरण्यगर्भ-इत्यादि का उपायान किया और जाप किया था ॥७॥ द्रष्ट्र नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् । ननतं भावगम्भीरो दोईण्ड भ्रामयन्बली ॥७१ परिनृत्यति देवेशे गणाश्चब सुरास्तथा। नृत्यन्ति भावयुक्तास्तु हरस्यानुविधायिनः ।।७२ समस्त

२२० ]
। वामन पुराण
सध्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया ।
युद्धाय दानवैः साधं मति भूयः समादधे ।।७३
ततः मुरगणः सर्वैत्रिणेत्रभुजपालितः ।
दानवा निजिता: सर्वे बलिभिर्भयवजितः ॥७४
स्वबल निजित दृष्ट्वा मत्वाऽजेय च शकरम् ।
अन्धकः सुन्दमाहूय वचन चेदमब्रवीत् ॥७५
सुन्द भ्राताऽसि मे वीर विश्वास्यः सर्ववस्तुषु ।
तत्त्वा वदामि यद्वाक्य तत्वा कुख्यत्क्षमम् ॥७६
दुर्जयोऽसौ रणपटुर्महात्मा कारणान्तरी।
ममास्ति चापि हृदये पद्माक्षी शोलनन्दिनी ।।७७
(शूलधारी शिव ने 'द्रष्टा के लिये बारम्बार नमस्कार है' --ऐमा
भली मति उच्चारण करके भाव मे अत्यन्त गम्भीर होकर बलशाली
प्रभु दोदण्ड का भ्रमित करते हुए नृत्य करने लगे थे ॥७१॥ देवेश्वर
के नृत्य करने पर सभी गण और सुर वृन्द भी भाव युक्त होकर हरके
अनुविद्यायी होते हुए नृत्य करने लगे थे।७२॥देवेश ने सध्या की उपा-
सना करके और यथेच्छा से नृत्य समाप्त करके पिर दावो के साथ युद्ध
करने को बुद्धि को थी ॥७३।) इसके अनन्तर त्रिनेत्र प्रभु के बारा
यातित-बलशाली और भय से रहित समस्त सुरगणो ने सभी दानवो
को निजित कर दिया था ।।७४॥ अधिक ने अपनी सेना को निजित देख
कर तथा भगवान् शकर को अजेय मानकर सुन्द को बुलाकर यह वचन
पहा था ।।७५॥ अन्धक ने कहा है सुन्द | आप बड़े वीर है और
मेरे भाई हैं । सभी बातों में विशाम करके मैं आप से जो भी वाक्य
कहता हूँ उसे श्रवण करके जमा भी हो सके करिये ॥७६।। महात्मा
अन्य कारणों से दुजंय हैं क्योकि रण मे बहुत कुशल है। मेरे हृदय में
पद्मासी शैलनन्दिनी समाई हुई है 11७७।।
तदुत्तिष्टस्व गच्छावो यत्रास्ते चारहासिनी।
तना मोहयिष्यामि शभुरूपेण दानव ।।७८

जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ] [ २२१ भवान्भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः। ततो गत्वाऽय भुक्त्वा ता जेष्यामि प्रमथान्सुरान् ॥७६ इत्येवमुक्ने वचने वाढं सुन्दोऽभ्यभाषत । समजायत शैलादिरन्यकःशकरोऽप्यभूत् ।।८० नन्दिरुद्री ततो भूत्वा महासुरचमूपती । सप्राप्ती मन्दरगिरि प्रहारः कृतविग्रही ।।८१ नन्दिनो हस्तमालम्ब्य झन्धको हरमन्दिरम् । विवेश निर्विशड केन चित्तनासुरसत्तमः ।।२ ततो गिरिसुता दूरादायान्त वीक्ष्य चान्धकम् । महेश्वरवपुरछन्न प्रहारजंजरच्छविम् ।।८३ सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशततः। त दृष्ट्वा मालिनी प्राह यश स्या विजयां जयाम् ॥८४ सो बाप खड़े हो जाओ वहा वह चारुहासिनी है वहा पर चलें •हे दानव ! मैं शम्मु का स्वरूप धारण करके उसे मोहित करूंगा ॥७८॥ आप भव का अनुचर गणेश्वर नन्दी वन बाना । फिर वहाँ जाकर उसका उपभोग करके सभी प्रमयों और मुरों को जीत डालूगा 11७६। इतना वचन इम तरह कहने पर सुन्द ने भी 'बहुत अच्छा'- यही कहा था। फिर शैलादि बन गया था और अन्धकने शंकर का स्वरूप धारण कर लिया था 100 वे दोों महामुर चभूपति नन्दो और रुद्र बनकर मन्दर गिरि पर प्राप्त हो गये थे। ये दोनों प्रहारों से अपने विग्रह वाले वन गये ये अर्थात् ऐसे शरीर बनाये कि जिनमें प्रहारो के चिह्न ये॥८१॥ वह अमुर श्रेष्ठ अन्धक नन्दी के हायों का अवनम्ब ग्रहण करके निविकित्त चित्त से हर के मन्दिर में प्रविष्ट हो गया था ॥२॥ फिर गिरि मुताने दूर मे ही आते हुए अन्धक को देखा था जोकि महेश्वर के स्वरूप में छिग हुआ था और प्रहारों से बरित छवि काला बना हुआ का 11८३॥ लादि के रूप में अब स्थित सुन्द का अवलम्ब लेकर जिसने दहा प्रवेश किया था पार्वती ने देखा या और २२२ ] [ वामन पुराण उसको देखकर वह मालिनीय शस्या-विजया और जया बोली ॥४॥ जये पश्यस्व देवस्य मदर्थे विग्रह कृतम् । शत्रुभिर्दारुणतरस्तत्तिष्ठस्व सत्वरम् ॥८५ घृत मानय पौराण चीर व लवण दधि । व्रणभङ्ग करिष्यामि स्वयमेव पिनाकिनः ॥८६ कुरुष्व शीघ्रमस्य त्व भतुवगविनाशनम् । इत्येवमुक्त्वा वचन समुत्थाय वरासनात् ।।८७ अभ्युद्ययो तदा भक्त्या मन्यमाना वृपध्वजम् । शरपत्रेण तच्छित्त्वा भूयश्चिह्नानि यत्नतः ।।८८ अन्धि येप सदाऽपश्यत्तावुभौ पाश्वंतः स्थितौ । सा ज्ञात्वा दानव रौद्र मायाच्छादित विग्रहम् II अपमान तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने । देव्याश्चिन्तितमाज्ञाय सुन्द त्यक्त्वाऽन्धकोऽसुरः ।।.. समाद्रवत वेगे न हरकान्ता विभावरीम् । समाद्रवत दंतेयो येन मार्गेण सा गता 19 हे जये ! देखो, मेरे लिये देवेश्वर का इस दुष्ट ने शरीर बनाया है क्योंकि इसके शत्रु तो परम दारुण थे उनको जीत नहीं सका था । सो तुम शीघ्र खही हो जाओ ॥ ५॥ पुराना घृत-चीर-लवण और दधि लाओ। मैं स्वय ही पिनाकी के व्रणो का भग करू गी॥८६॥ तुम शीघ्र ही इस पावणो का विनाश करो। इतना मात्र वचन कह पर वह गिरि सुता अपने दरासन से पती हो गई थी।७।। उस समय में भक्ति पवन को मानती हुई सामने गई पोर पत्र स पुन. चिह्नो को यरन पूर्वर ठेदन करने की इच्छा को पी। उस समय में वे दोनों ही पाय माग मे सियत थे-यह देखा पा । उस गिरि सुता में माया से छादित हि वाले और दान को पहिचान कर हे मुने ! Faur की पुत्री ने वहां से अपमान किया था । देवी के चिन्तित से मानर मुन्दका याग करके गुर बग्धाने विभावरी हरकी पाता जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ] । २२३ के ऊपर बडे वेग से आक्रमण किया था जिस माग से वह गयी थी दैतेय भी उमो से पीछे दौडा था ।।८८.६१॥ कुर्वती च तिरस्कार पादप्लुनिनिराकुला । तमापतन्त दृष्ट्वैव गिरिजा प्राद्रवद्भयात् ॥२ गृह त्यक्त्वा ह्य पवन सखीभिः सहिता तदा । तताप्मनुजगामासो मदान्धो मुनिपुंगव ।।६३ तथापि न शशापेन तपसो गोपनाय यत् । तद्भयादाविशद्गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥६४ विजयाद्या महागुल्म सप्रयाता लय मुने । नष्टायामथ पार्वत्या भूयो हैरण्यलोचनिः ।।६५ सुन्द हस्ते समादाय स्वसंन्य पुनरागमत् । अ धके पुनरायाते स्वबल मुनिसत्तम ।।६६ प्रावर्तत महायुद्ध प्रमथासुरयोरथ । ततो रणे सुरश्रेष्ठो विष्णुश्चक्रगदाधरः ।।६७ निजधानासुरवलं शकरप्रियकाम्यया । शाङ्गचापच्युतर्वाण सस्यूता दानवर्षभाः ।। गिरिजा ने पादप्लुति से निराकुल होती हुई उसका तिरस्कार किया था। जब उसने उसको अपने कार एक दम आते हुए ही देखा तो वह गिरिजा भय से वहा से भाग खडी हुई थी ॥३२॥ हे मुनि पुगव समय में अपने घर को छोड़कर समी सखियो के साथ वह उपवन में चली गयी थी किन्नु वहाँ पर भी यद मद से अन्धा असुर पोछे २ ही लगा हुआ पहुच गया था ॥६३॥ तो भी तपश्चर्या की रक्षा करने के लिये गिरि सुता ने इस दुष्ट को शाप नही दिया था। फिर उसके भय से जगदम्बा गौर परम शुचि जो श्वेत अर्क का कुसुम था उसमें प्रवेश कर गयी थी ।।६४॥ हे मुने ! विजया आदि जो सखियां यो उन्होने महा- गुल्म में सम्प्रयाण कर दिया था और लय को प्राप्त होगई थी। इस तरह से पार्वती के लुप्त होकर नष्ट हो जाने पर फिर वह हरण्यलोचनि सुद का हाथ पकड कर अपनी सेना में भागया था। हे मुनिमत्तम! उम २२४ ] [ वामन पुराण अन्धक के पुन: बाजाने पर प्रमथो और असुरों में महायुट प्रारम्भ हो गया था। इसके उपरान्त चक्र बोर गदा के धारण करने गले मग- वान् विष्णु ने जो सभी सुरों में परम पर थे रण स्थल में भगवान् शकर को प्रिय करने की कामना से असुरों के बल का हनन किया था और शागचाप से निकले हुए वाणों से दानव श्रेष्ठ सब सस्यूत अर्थात् छिन्न हो गये थे ॥६५-६८।। पञ्च पद सप्त चाटौ वा अध्नपादघना इव । गदया काचिदवधीच्चक्रणान्याञ्जनाईनः ।।६ खङ्गन च चकर्तान्यान्दृष्टयाऽन्यान्भस्मसात्कृतान् । हलेनाप्य चंवान्यामुसलेनाप्यचूर्णयत् ।।१०० गरुडः पक्षपाताभ्या तुण्डे नाप्युरसाऽहनत् । स चादिपुरुपो धाता पुराणः प्रपितामहः ।।१०१ भ्रामयन्विपुल पद्ममभ्यपिञ्चत वारिणा । सस्पृष्टा ब्रह्मतोयेन सर्वतीर्थमयेन हि ॥१०२ गरणामरगणाश्चासन्नवा गणशताधिका:। दानवास्ते च तोयेन सस्पृष्टाश्चापहारिणा ॥१०३ सवाहना लय जग्मु. कुलशेमेव पवताः । दृष्ट्वा ब्रह्महरी युद्ध घातयन्तो महासुरान् ।।१०४ शतक्रतुश्च सप्राप्तो युद्धाय कृतनिश्चयः। तमापनन्त सप्रेक्ष्य बला दानव सत्तमः ॥१०५ पाँच-छ-मात अथवा आठ अध्न पादों से घनो की मति गदा से भगवान् जनार्दन ने कुछ को और कुछ को चक्र के द्वारा वध किया था ॥६॥ अन्यों को खा से काट दिया था तथा दूसरो को दृष्टि से ही भस्मसात् कर डाला था। इल से खीचकर अन्यो को मुमल के द्वारा चूर्ण कर दिया था ॥१००।। गरूड ने अपनी पखो के पातों से तथा तुम के द्वारा और उरस्थान से हनन किया था । वह आदि पुरुप-परम पुराण-घाता प्रपितामह ने अपने विपुन पदम को घुमाते हुए वारि से भिचत किया था। वह ब्रह्म जल सर्व तीर्थमय | मका जम्भ-कुजम्भ वध वर्णन ] [ २२५ पाकर गण और अमरगण मताधिक गण वाले होगये थे। वे दानव मी उस पल का सस्ससं प्राप्त कर जोकि अधो का हरण करने वाला या वाहनों के सहित कुलिग से पर्वतों की भाति स्तर को प्राप्त हो गये थे। इस प्रकार से शनकतु ने वह्माजी और भगवान् हरि को युद्ध भूमि में घात करते हुए देखा था ॥१०१.१०४॥ इन्द्र भी इन्हें देखकर वहाँ पर आगये थे और इनने भी अनुरों क साय युद्ध करने का पूर्ण निश्चय कर लिया या ! उमको आते हुए देखकर दानवो मे श्रेष्ठ बल यहां पर सागवा या ॥१०॥ नत्वा देवं गदापाणि विमानस्थं च पधजम् । क्रमेण चादवद्योदु मुष्टिमुद्यम्य नारद । बलवान्दानवपरिजेयो देवदानवैः ।।१०६ तमापतन्तं त्रिदशेश्वरस्तु दोष्णा सहस्रेण यथावलेन । वज्ञ परिभ्राम्यबलस्यमूठिनतन्निपातयामाससुरेश्वरस्तु ।।१०७ वार्ड स चास्त्रप्रवरोऽपि वनो जगाम तूण हि सहस्रधा मुने। बलोऽद्रवद्देवपतिश्च भीतः पराङ्मुखोऽभूत्सुररापमह ।।१०८ तं चापि जम्भो त्रिमुख निरीक्ष्य भूतावृतो वाक्यमुवाच चेदम् । तिष्ठस्वराजाऽसिचराचरस्यनराजधर्मगदितपलायनम् ॥१०६ सहस्राक्षो जम्भवाक्यं निशम्य भोतस्तूर्ण विष्णुमागान्मह । उपेत्याथश्रूयतांवाक्मीशत्ववनाथोभूतभव्यस्यविप्णो ।।११० जम्मम्तजयतेऽत्यर्थं मां निरायुधमादिशन् । आयुध देहि भगवंस्त्वामहं शरण गतः ॥१११ तमुवाच हरिः शक्र त्यक्त्वा वज्र बजाधुना । प्राथयस्वायुधं वह्नि स ते दास्यत्यसशयम् ।। ११२ इसने सर्व प्रथम गदा पाणि प्रभु को नमस्कार किया और फिर विमान में समवस्थित पद्म योनि को प्रणाम किया था। हे नारद ! इसके पश्चात् उसने क्रम से मुष्टि को उठाकर युद्ध करने को आक्रमण किया था। यह दानवो का स्वामी बहुत अधिक बलवान् या और देव. दानवो के द्वारा अजेप या ॥१०॥ उपको युद्ध भूमि मे आया हुआ २२६ ] । वामन पुराण देख कर निदशों के स्वामो इन्द्र ने अपने सहस्रो हाथों से यथा बल वच को सुरेश्वर ने धुमाकर बल के माथे में मारा था और वह अस्त्रों में श्रेष्ठ भी बच्च शीघ्र ही हे मुने ! सहस्रो टुकड़े हो गया था। फिर बल ने हमला किया तो हे महर्षे ! वह सुरो का राजा हर कर देवाति वहा से पराड मुख हो गया था ॥१०७।-१०॥ अम्भ ने उसको विमुख देखकर भूतो से समावृत होकर यह वचन कहा था । खडे रहो, राजा चराचर का है। राज धर्म मे इस तरह भाग जाना नहीं बताया गया है।।१०६॥ सहस्राक्ष ने जम्म के इस वाक्य को श्रवण करके भीत होते हुए हे महर्षे ! वह विष्णु के मागों को प्राप्त हुआ था और कहा है विष्णा ! हे ईश ! आप सुनिये क्यों कि आप भूत-भव्य के स्वामी है ॥११०॥ मुझ बिना आयुध वाले को आदेश देता हुआ जम्म बहुत ही अधिक तजित कर रहा है । हे भगवान् माप मुझको कोई आयुध दीजिए। मैं शारकी शरणागति मे प्राप्त हो गया हू ॥१११॥ हरि ने इन्द्र से कहा-अब तुम वन को छोड कर वह्निदेव से किमी आयुध की प्रार्थना करो वह आपको निस्सन्देह आयुध देंगे ॥११२॥ जनार्दनवच. श्रुत्वा शास्त्वमितविक्रमः । शरण पावकमगादिदं चोवाच नारद ॥११३ निघ्नतो मे बल वचः कृशानो शतधा गतः। एप चाहूयते जम्भस्तस्माद्दे ह्यायुध मम ॥११४ तमाह भगवान्वह्निः प्रीतोऽस्मि तव वासव । यस्तु दपं परोहत्य मामेव शरण गतः ।।११५ इत्युचाय स्वशक्त्या स शक्ति निजाम्य भावतः । प्रादादिन्द्राय भगवाप्रोचमानो दिव गतः ।।११६ समादाय तदा शशि रातघण्टा सुदारुणाम् । प्रत्युचयो सदा जम्मं हन्तुवामोरिमर्दनः ।।११७ तयामिसहित: पाका सह संन्यरभिद्रतः। मोघं पर तम जानो निजपान गजाधिपम् १११८ अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णम ] [ २२७ जम्ममुष्टिनिपातेन भग्नकुम्भकटो गजः। निपपात यथा शेल: शक्रवबहतः पुरा ।।११६ जम्भे हते दैत्यवले च भग्ने गणास्तु हृष्टा हरिमचंयन्तः । वीयं प्रशसन्ति शवक्रतोश्च स गाभिच्छवमुपेत्य तस्थौ ।।१२० जनार्दन के इस वचन को सुनकर अमित बल विक्रम वाला इन्द्र पावक देव के शरण में गया था और हे नारद ! वहा यह वचन बोला था ॥११३॥ इन्द्र ने कहा-सेना का निहनन करते हुए मेरा वच है कृशानो ! सैकडो टुकड़े हो गया है और यह जम्भ युद्ध के लिये मेरा बराबर आह्वान कर रहा है। अतएव मुझे आप कोई उचित आयुध प्रदान कीजिए ॥११४॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा- उससे अग्नि देव ने कहा-हे इन्द्र ! मैं तुम पर परम प्रसन्न हू क्यो कि जिम तुमने अपना बलवान होने का गर्व त्याग दिया है और इस समय में मेरी ही शरण ग्रहण की है। यह कह कर उस अग्नि देव ने अपनी शक्ति से भावना से शक्ति को विकाल कर इन्द्र को देवी थी और फिर इन्द्र परम रोच- मान होते हुए दिवलोक को चले गये थे ॥११५-११६॥ उसी समय में उम शक्ति को ग्रहण कर जो शत घण्टा और परम सुदारण यी जम्म को मारने की इच्छा वाला वह शत्रुओ का मर्दन करने वाला इन्द्र फिर युद्ध स्थल में पहुंच गया था ॥११॥ स शक्ति से अभिहित इन्द्र सैन्य के साथ अमित हुआ था। उस समय जम्भ ने क्रोध किया था और गजाधिय को मार गिराया ॥११॥ जम्भ की मुष्टि के नियात से ही गज के कुम्भ कट भिन्न हो गये थे और पहिले इन्द्र के वज से निहत शैल गिर गया था वैसे ही यह भी गिर पहा था ॥११॥ शक्ति यान से जम्म भर गया था और सुरगण परम प्रसन्न हुए सब हरि का अर्चन करने लगे और इन्द्र की प्रशसा करने लगे थे ॥१२०॥ ७०--अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन तस्मिस्तदा दैत्यवले च भग्ने शकोऽब्रवीदन्धकमासुरेन्द्रम् । एह्य हि वीराधगता महासुरायोत्स्यामभूयोहरमेत्यशलम २२८ ] [ वामन पुराण तमुवाचान्धको ब्रह्मन्सम्यक्च भवतोदितम् । रणानवापयास्यामि कुल व्यपदिशन्स्वयम् ॥२ पश्य त्वं द्विजशार्दूल मम वीर्य सुदुर्धरम् । देवदानवगन्धर्वाञ्जष्ये सेन्द्रमहेश्वरान् ॥३ इत्येवमुक्त्वा वचन हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः । समाश्वास्याब्रवीत्कदः सारथि मधुराक्षरम् ॥४ सारथे वाहय रथ हराभ्याशं महावल । यावनिहन्मि व गोधः प्रमथानथ वाहिनीम् ।।५ इत्यन्धकवचः श्रुत्वा सारथिस्तुरगांस्तदा । कृष्णवर्णान्महाकायान्प्रेषयामास त मुने ॥६ ते यत्नतोऽपि तुरगाः प्रेयमारणा हर प्रति । जधनेष्वव सीदन्तःकृच्छणोहुश्च तं रथम् ॥७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा- उस समय दैत्य वल के मग्न हो जाने पर असुरेन्द्र अधिक से इन्द्र ने कहा-हे वीर ! आमो-आ जाओ, पाज मभी महामुर तो गये फिर शैल पर पहुंच कर हर के साथ युद्ध करें ॥१॥ हे ब्रह्मन् ! अन्धक ने उममे कहा था कि आपने बहुत ठीक कहा है। मैं स्वय अपने बुल को टगपदिष्ट करता हुआ रण क्षेत्र में नहीं जाऊंगा ॥२॥ है दिज शार्दूल ! अब आप मेरे सुदुधर वीर्य को देखिये । में सभी देव-दानव-इन्द्र और महेश्वर के सहित जोन लूंगा ॥३॥ इनने पवन रह कर हो हिरण्याक्ष का पुत्र भग्धक समाश्वासन क्रोधित हुआ और अपने सारपि से मधुर अक्षरों मे बोला हे सारथे ! अब रयमो पलामो । हे महावन ! मेरे रप को हर के ममोप में ही से चलो। जब तकम वाणों के ममूह से प्रमों को और सेना को मारता हूँ॥५॥ अन्धक के इस वचन रावण पर सापि ने उमी ममय तुरंगों को जो कि कृष्ण वर्ण बाये और महान रोग गैलरे घे हे मुने ! उमके समीर में मंत्र दिया था | वे पोरे परन से हर को बोर प्रेरित भी दिये गये थे रितु पथनों में सब सौद- शाम होते हुए बड़ोठिनाई से उस रप को वहन कर रहे थे ॥

अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन ] [ २२६
वनस्तुरगा दन्यं प्राप्ताः प्रमथवाहिनीम् ।
संवत्सरेण साग्रेण वायुवेगममा अपि 15
ततः वाकमानम्य वालेन्दुसरशं दृढम् ।
नाराचः सूदयामास सेन्द्रोपेन्द्रमहेश्वरान् ॥
चाणपठादितमीदव वलं खेलोक्यरक्षिता।
सुरान्प्रोवाच भगवानपाणिजनार्दनः ।।१०
कि तिध्वं मुरयेष्ठा हतेनानेन शोभनम् ।
तस्माद्यत्ता भवन्त्वद्य त्वरिता विजयेप्सवः ।।११
शास्यन्तामस्य तुरगाः समं रयकुटुम्बिना ।
भज्यतां स्यन्दनञ्चाय विरय क्रियतां रिपुः ।।१२
विरयं तु कृतं पश्चादेनं घदयनि शकरः ।
नोपेक्ष्य: शत्रुरुद्भिक्तो देवाचार्येण धीमता ॥१३
इत्येवमुक्ता:प्रमथा वासुदेवेन सामराः ।
चक्र वेग सहेन्द्रण समं चक्रधरेण च ।।१४
तुरगों ने उम दैत्य का वहन करते हुए प्रमों की सेना को प्राप्त
पिया था। पराप दे दायु के समान वेग वाले ये तो भो डेढ वर्ष में
वहां पर पहुंचे थे। इसके पश्चात् उस देय ने बान चन्द्र के समान
अति दृढ कामुक को वींच कर अपने छोई हुए नाराचो से इन्द्र-उपेन्द्र
और महेशर को मूदित किया था l लोक्य के रक्षा करने वाले
भगवान् चक्रपाणि जनार्दन ने सम्पूर्ण मेना को वाणों से हादित देखकर
सुरवृन्द से कहा-~||१०॥ विष्णु भगवान ने कहा-हे मुरयेष्ठो ! बडे
हुए हो ? इम हनन से तो यही अच्छा है । इससे बाज यता हो जावें
और मीनता में विजय की इच्छा वाले बनो॥११॥ इसके तुर गो का
मामन करो और रय वुटुम्बो का भी शासन करो। इस रप को तोड़
डालो तथा शत्रु को रय से रहित बना दो ॥१२॥ बद यह विरय हो
जायगा तो पीछे भगवान् शकर दग्ध कर देंगे। द्विक्त शत्रु को कमी
भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आप तो देवों के माचार्य और घोमान्

[ वामन पुराण हैं ॥१३।। भगवान् वासुदेव के द्वारा इस प्रकार से इतना कहे गये प्रमष देवो ने सब के सहित इन्द्र और चक्रधर के साथ वेग किया था ॥१४॥ तुरगाणा सहस्रतु मेघाभाना जनार्दनः । निमिषान्तर मात्रेण गदया स व्यपोययत् ।।११ स महास्यन्दनात्स्कन्दः प्रगृह्य रथसारथिम् । शक्त्या विभेद हृदये गतासुध्यसृजद्भुवि ।।१६ विनायकाद्या. प्रमथाः सम शकण देवतः । सध्वजाक्ष रथ तर्णमभञ्जत तपोधनाः ॥१७ सहसा स महातेजा विरथस्त्यक्तकामुकः । गदामादाय बलवानभिदुद्राव देवताः ॥१८ ततः सोऽष्टी क्रमागत्वा मेघगम्भीरया गिरा। उवाच वाक्य दैत्येन्द्रो महादेव स हेतुमत् ॥१६ भिक्षो भवान्सहानीकस्त्वसहायोऽस्मि साम्प्रतम् । तथापि त्वा विजेष्यामि पश्यमेऽद्य पराक्रमम् ॥२० तद्वाक्य शकरः श्रुत्वा सेन्द्रान्सुरगणागणान् । ब्रह्मणा सहितान्सर्वान्स्वशरीरे न्यवेशयत् ॥२१ भगवान जनार्दन ने एक सहस्रतुर गों को जो कि मेघों के समान मामा वाले थे एक निमिष भर में ही गदा से व्यपोथित कर दिया था ॥१५॥ उस स्कन्द ने महा स्यन्दन से रथ सारपि को पुग्रहीत करके शक्ति से हृदय में भेदन किया था और वह गत पाण होकर भूमि पर गिर गया था ॥१६॥ विनापक आदि प्रमप इन्द्र और देवों के सहित हे तपोधन । बजाक्ष के सहित उस रथ को शीघ्र ही भग कर दिया पा ।।१७।। सहस्रा ही वह महा तेजस्वी विरप होकर अपने कामुक को छोडकर उम बलवान ने गदा प्रहण करली पी और फिर देवों पर हमला किया था ॥१८॥ इसके पश्चात् पाठ भ्रमो को जाकर मेघ के तुल्य गम्भीर वाणी से वह दंत्येन्द्र ने महादेव से हेतुमत् वाक्प कहा था ॥१६॥हे भिक्षो! आप तो सेना के सहित हैं और मैं इस समय में असहाय है तो भी मैं तुझको जीत तूंगा । आज मेरा पराक्रम देखो अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन ] [ २३१ ॥२०॥ भगवान् शंकर ने उसके इस वाक्य का प्रण करके इन्द्र के सहित सुरगणों को गणों को और ब्रह्मा के सहित सबको अपने शरीर मे निदेशित कर लिया था ॥२१॥ शरीरस्थांस्तान्त्रमथान्कृत्वा देवांश्च शंकरः। प्राह एह्य हि दुष्टात्मन्नहमेकोऽपि संस्थितः ॥२२ तदृष्ट्वा महदाश्चर्य समिरगणक्षयम् । दत्यः शंकरमभ्यागाद्गदामादाय वेगवान् ।।२३ तमापतन्तं भगवान्दृष्ट्वा त्यक्त्वा वृपोत्तमम् । शूलपारिणगिरिप्रस्थेपदातिः प्रतिष्ठत ॥२४ वेगेनैवापतन्तं च विभेदोरसि भैरवः । दारुण सुमहद्युद्धं कृत्वा त्रैलोक्यभीपरणः ॥२५ दंष्ट्राकरालं रविकोटिसनिभं मृगारिचर्माभिवृतंजटाधरम् । भुजङ्गहारं मलपङ्कधारिणंशार्दूलवाहु शिखिलोचनं हरम् ॥२६ एतादृशेन स्पेण भगवान्भूतभावनः । विभेद शत्रूलेन शुभदः शाश्वता शिवा ॥२७ म शूलं भैरवं गृह्य भिन्नेऽप्युरसि दानवः । विजहाराति वेगेन क्रोशमात्र महामुने ॥२८ भगवान शंकर ने उन सब प्रमयों को अपने शरीर में संस्थित करके और देवों को भी शरीर में निविष्ट करके उस दैत्य से कहा- माओ-आओ, हे दुष्टात्मन् ! अव तो मैं एक हो अकेला यहाँ स्थित हूँ ॥२२॥ इस महान् आश्चर्य को देखकर बो कि सब अमर गण का एक दम उस समय में क्षय हो गया था वह दैत्य रडे वेग दाला होकर हाथ में लेकर शंकर के ऊपर आक्रमणकारी हुआ था ।।२३।। उसको अपने कार आते देखक भगवान् शकर ने वृषोतम को त्याग दिया था और फिर वह मूलपाणि उस गिरि के प्रस्थ पर अकेले हो पदाति स्थित हो गये थे ॥२४॥ वेग से ही आते हुए उसको भैरव ने उसके उरःस्थन में भेदन किया था और लोश्च मे महान् बहुत ही दारुग महान युद्ध किया या ॥२५॥ दवाओं से कह गहा को २३२ ] । वामन पुराण मरोडो मूर्य के तुल्यस्याघ्र में धर्म से श्रावृत-जटा धारण करने वाला सों के हारों से भूपित-पन के पक को धारण किये हुए-शार्दूल के समान वाहु वाला-शि खिलोचन हर का स्वरूप उस समय में था ॥२६॥ भगवान् भूतों पर दया करने वाले ने इस प्रकार के रूप से शूल के द्वारा शत्रुओ का भेदन किया था। शिव तो शाश्वत और शुम ही प्रदान करने वाले हैं ॥२७॥ उस दानव ने चरस्थल के भिन्न होने पर भी भैरव शूल को ग्रहण करके है महामुने ! भारति को वेग के साथ एक कोश भर तक हरण किया था ॥२८॥ ततः कथचिद्भगवान्सस्तंभ्यात्मानमात्मना । तर्णमुत्पाटयामास शूलेन सगद रिपुम् ॥२६ दैत्याधिपस्तु स गदा हरमूनि न्यपातयत् । कराभ्या गृह्य शूल च समुत्पत्याथ दानवः ॥३० सस्थितश्च महायोगी सत्त्वा धारः प्रजापतिः । गदापातक्षताद्भरि मूर्नोऽस्यासृगयाणतन् ॥३१ पूर्वधारासमुद्भूतो भैरवोऽग्निसमप्रभः । विहाराजेतिविख्यात. पद्ममालाविभूपितः ॥३२ अन्यस्माद् धिराज्जातो मेरदः शूलभूषितः । रुद्रनाम्ना तु विख्यातः सर्वलोकैस्तु पूजितः ॥३३ अन्यरक्तात्समुद्भूत भैरवाणा चतुष्टयम् । चण्डाधककपाल्यन्त प्यात मुवि यथा बुधैः ॥३४ भूमिस्थाद् धिराज्जातो भैरव शूलभूषितः । ख्यातो ललितराजेति शोभाजनसमप्रभा ॥३५ इसके पश्चात् भगवान ने अपनी ही आत्मा से अपने आपको किसी तरह से सस्ताम्भित करके उस सगद रिपु को शीघ्र ही शूल से उत्पा- दित किया था ॥२६॥ उम दत्याधिप ने अपनी गदा को भगवान् के हर के मस्तक मे नियातित किया था। दानव अपने हाथों से शूल को ग्रहण करके समुत्पतित होकर सस्थित हो गया था। महायोगी शकर सत्व के आधार और प्रजापति थे। गदा पात के क्षत से इनके मस्तक अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन ] [ २३३ की धारा से अधिक रक्त का पात हो रहा था ॥३०-३१।। पूर्व धारा से समुद्भूत भैरव अग्नि के समान प्रभा वाले थे। वह विधा राजा-इस नाम से विख्यात थे और पड़ों की माला से विभूषित ये ॥३२॥ अन्य रुधिर से सूल से भूपित भैरवे ममुत्पन्न हुए थे। वह रुद्र के नाम से विरूपात थे । यह सभी लोगों के द्वारा पूजित हुए ये ॥३३॥ अन्य शकर के रक्त मे चार भैरव ममुत्पम्त हुए थे ये चारों चण्ड आधेक- कपाली और अन्त-इन नामो से बुधो के द्वारा विख्यात हुए थे जो कि भू मण्डल में परम प्रमिद हुए ये ॥३४॥ भूमिस्प रुधिर से দুল से विभूषित भैरव समुद्भूत हुए थे जो लगित राज इस नाम से निरूपात हुए थे और इनको भोमा अन्जन के समान प्रमा वाली थी ॥३॥ एव हि सप्तरूपोऽसौ कथ्यते भैरवो मुने। विघ्न राजोऽष्टमः प्रोक्तो भैरवा यते ॥३६ एव महात्मना दैत्यः शूलपोतो महासुरः। छनवद्धारितो ब्रह्मन्निन्द्रायुधसमप्रभः ॥३७ तदस्रमुल्वण ब्रह्मलूलभेदादवापतत् । येनाकण्ठ महादेवो मग्नोऽसो'सप्तमूर्तिमान् ॥३८ ततः स्वेदोऽभवद्भरि नि:श्रमाच्छकरस्य तु ! ललाटफलकात्तस्माज्जाता कन्याऽसृगाप्लुता ॥३६ यद्भ म्या न्यपतद्विप्र स्वेदविन्दुविनाशनात् । तस्मादगारपुजाभो बालकः समजायत ।।४० स चापि तृपितोऽत्यर्थं पपौ रुधिरमान्धकम् । कन्या चोत्क्षतसजाता ह्यसृक् चावलिहद् द्रुतम् ।।४१ ततस्तामाह देवेशो बालार्कसदृशप्रभः । शङ्करो वरदो लोके श्रेयोऽथं हि वचो महत् ।।४२ हे मुने ! इस प्रकार से यह भैरव सात रूपों वाले कहे जाते हैं। आठवें विघ्नयाज कहे जाते हैं । इस तरह यह भैरवों का अष्टक कहा जाता है ॥३६।। इस प्रकार से वह महासुर दैत्य महात्मा के द्वारा शूल- प्रोत किया गया था ! हे ब्रह्मन् ! इन्द्रायुध को प्रमा के समान एक २२४ ] वामन पुराण छत्र को भाति धारण कर दिया गया था ॥३७॥ हे ब्रह्मन् ! शूल के भेद न होने से उमका रुधिर अत्यन्त उल्वण रूप मे गिरा था जिसमें महादेव कण्ठपर्यन्त मप्तमूत्ति मान मग्न हो गये थे ॥३८॥ इसके पश्चात् अत्यधिक श्रम से शकर को पसीना आ गया था। उनके ललाट फलक से रक्त में समाप्लुन एक कन्या समुत्पन्न हुई थी ॥३६॥ हे विप्र । स्वेद की विन्दु के विनाश से जो भूमि मे पिर गई थी। उससे अङ्गार के पुत्र को आमा वाला एक बालक उत्पन हुआ था ॥४०॥ वह भी अयन्त प्यासा था और उसने अन्धक के रुधिर का पान दिया था। उल्क्षत सजात कन्या ने भी शीघ्र ही उस रुधिर को चाटा था ॥४१॥ इसके पश्चाद देवेश्वर ने कहा था कि बालक के तुल्य प्रभा वाला श कर लोक मे वरान देने वाला है और श्रेय-अयं तथा महन् वचन का प्रदाता है ।।४२॥ स्वा पूजयिष्यन्ति सुरा महर्षि पितरस्तथा । यक्षविद्याधराश्चैव मानवाश्च शुभकरि॥४३ त्वा स्तोप्यन्ति य सदेहो बलिपुष्पोत्करोत्करः । चञ्चिति शुम नाम यस्माद् धिरचिता ॥४४ इत्येवमुक्त्वावरदेनचिकाभूयोऽनुयातागिरिविन्ध्यवासिनीम्। महीसमन्ताद्विचचारसुन्दरोस्थानगताहिट गुलकादिमुत्तमम् ।।४५ तस्या गताया वरदः कुजस्य प्रादावर सर्पवरोतम यत् । ग्रहाधिपत्य नगनःशुभाशुभभविष्यतेतेव्यसनग्रहान्तर ।।४६ हरोऽ-धक यपंसहपमान दिव्य स्वमार्य हुताशनेन । चार त शुपयलत्यशोणितत्वगस्थिशेषभगवानसभैरवः ॥४७ तत्राग्गिना शभुममुद्भवेन स मुक्तपापोऽमुररा बभूव । ततः प्रजाना बहुम्पमीश नाथ हि सर्वस्य चराचरस्य ॥४८ गास्वाऽथ मवेश्वरमोशमव्यय व लोक्यनाथ वरद वरेण्यम् । मर्यः मुराद्यनतमीडयमाद्य ततोऽन्धरः स्तोत्रमिद पवार ॥४६ तुमरो ममी मुरवृन्द-मदपि गण और पिता पूजेंगे। है शुभंकरि। तुमको यक्ष-विधा घर और मानव भी पूजेग ॥४३॥ तुमको बलि-गुप्पो- अन्धक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन ] [ २३५ सरोकगे के द्वारा स्तवन करेंगे-इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है । तुम्हारा शुम नाम 'चर्चिका यह होगा क्यो कि तुम रुधिर से चचिन हुई हो ॥४४॥ इस प्रकार मे वरद के द्वारा कह कर वह चचिका फिर गिर विन्ध्य वासिनो के पीछे चली गई थी। उमने भूमि पर खूब विच- रण किया था और फिर वह मुन्दरी अति उनम हिङ्ग लाादि पर जो स्थान है वहीं चनी गई थी ॥४५॥ उमके वहां से चल जाने पर वह दाता प्रभु ने कुज को सब वरों में परमोत्तम वरदान प्रदान किया था कि ग्रहों का आधिपत्य जगत का शुभा शुभ होगा और ग्रहान्तरों से तुझे रसन होगा ॥४६॥ भगवान हर ने अपने नेत्र रूपी वर्क को अग्नि से दिन्य एक सहस्र वर्ष तक उस अन्धक को शुष्क बल वाला और रुधिर से रहित कर दिया था। वह केवल त्वचा और अस्थि हो शेप वाल रह गया था। वह भगवान् भैरव ये ॥४७॥ यहाँ पर शम्भु से समुत्पन्न अग्नि से वह अमुर्गे का राजा पापो से मुक्त हो गया था। इसके पश्चात् प्रजा क नाय बहुत रूप वाले और इस चराचर सबके ईश को जानकर इसके पश्चात् बन्धक ने सर्वेश्वर-ईग-अन्यय-त्रिलोकी के नाय-वरद- वरेण्य मब मुरादि के द्वारा वन्दित एक ईडय और आद्य प्रभु शकर की यह स्तोत्र रिया था ॥४८-४६॥ नमोऽस्तु ते भैरव भीममूर्त तोक्यगोप्ने सितशूलपाणे । कपालपाणे भुजगेशहार त्रिणेत्र मा पाहि विपन्नवुद्धिम् ।।३० पापोह पापकर्माऽह पापात्मा पापसभवः। त्राहि मा देवदेवेश सर्वपापहरो भव ॥५१ मम नवापराधोऽस्ति त्वया चैतादृशोऽप्ययम् । स्पृष्टः पापसमाचारो मा प्रसन्नो भवेश्वर ॥२ इत्य महेश्वरो ब्रह्मन्स्तुतो दैत्याधिपेन तु । प्रोतियुक्त: पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षमुवाच ह ॥५३ प्रीतोऽस्मि दानवपते परितुष्टोऽस्मि चान्धक । वर वरय भद्र ते यमिच्छसि ददामि तम् ॥५४ .4 २३६ ] वामन पुराण अम्विका जननी मां भवान्व त्र्यम्बक: पिता। वन्दामि चरणौ मातुर्माननीयो ममाधिकम् ॥५५ वरदो हि यदीशानस्तद्यातु विपुल मम । शारीर मानस वाऽपि दुष्कृत दुविचिन्तितम् ॥५६ नथा मे दानवो भावो व्यपयातु महेश्वर । स्थिरा तु तव भक्तिश्च वरमेत प्रयच्छ मे १५७ अधिक ने कहा-हे भैरव | भीम भूति वाले ! इस लोक्य की रक्षा करने वाले आपको मेरा नमस्कार है । आप तो सित शूल को हाथ मे ग्रहण करने वाले हैं। हे कपाल को अपने हाथ में ग्रहण करने वाले ! आपके कण्ठ में तो भुजाओं का हार शोमा दिया करता है । हे तीन नेत्रों के धारण करने वाले । मैं बहुत ही अधिक विपन्न बुद्धि वाला महान् पापी हूँ। आप मेरी अब रक्षा कीजिए। ॥५०॥ मैं महान् पापी है और पापों से परिपूर्ण कम्मों को हो अनिश करने वाला हूँ। मेरा पूर्ण रूप पाप मय ही है तथा पाप से ही मेरी उत्पत्ति भी हुई है । हे देवो के भी परम देवेश्वर ! आप मेरा परित्राण कीजिए और मेरे सम्पूर्ण पारों के हर करने वाले होइये ॥५१॥ इसमे मेरा कुछ भी अपराध नहीं है। यह ऐमा भी पापों का समाचरण बापके ही स्पर्म से हुआ है । आप अब मुझ पर प्रसन्न होइये । आप ईश्वर हैं ॥५२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-है प्रह्मन् ! इस प्रकार से भगवान् महेश्वर उस दारों के अधिप के द्वारा स्तुति किये गये थे। तब मिङ्गल नेत्रों वाले परम प्रीति से समन्वित हो गये और प्रसन्न होकर हैरप्पा से इस प्रकार पहने लगे ॥५३॥ है दानवों के स्वामिन् ! मैं तुमसे अब बहुत प्रमग्न है । हे अम्भक ! मैं इस समय तुमसे परम सतुष्ट हो गया बात जो पो कुछ चाहता हो वही यरदान मुश से याचना करले । यही वरसाम तुझे दूंगा ॥५४अपने रहा-यह पगा। माता मा मेरी जननी हैं और आप ज्यादा प्रभु मेरे पिता है। परबानी माता गोरी परण की पादता रता है पयों कि पाता के पापमा सर्वापिर माननीय है ॥५५॥ यदि स्वामी श्राप .

२३८ ] [ वामन पुराण आगे से उस उतार कर अपने ही हाथ से उसका निर्माजन किया था और फिर उस अन्धक को अपना हस्त उसके सम्पूर्ण शरीर पर फेर कर उसे व्रणों से रहित कर दिया था ॥५६॥ इसके पश्चात् उन प्रभु ने सब ब्रह्मा आदि देवों को अपने शरीर से वाहिर बुलाया था। वे सभी महान आत्मा वाले देवगण नाहिर निकल कर आगये थे और सब ने त्रिलोचन को नमस्कार किया था ।।६। फिर भगवान् शकर ने नन्दी आदि समस्त गणो को बुलाकर अपने आगे सबको सन्निविष्ट कर दिया था। फिर भगवान् पा कर ने उन सब को भृ गो को दिखलाया था कि यह मेरा एक नवीन मण है और यह वही अधिक है ।।६१॥ उन दानवो के पति को जो रिपु था और सूखे हुए माम वाला था सब ने देखा था। सब ने गणों के स्वामित्व को प्राप्त होने वाले उसे देखकर सब ने वृषभ ध्वज की बडी प्रशसा की थी ॥६२॥ इसके उपरान्त भगवान् श करने समस्त देवगण या परिष्वजन करके उनसे कहा था-आप लोग अब अपने-अपन आवास स्थानो को चले जाइये और तीनो प्रकार के सुखों का उपभोग करिये।।६३।।सहस्र नेत्रो वाले इन्द्र भी मलया चल पर परम शुभ स्थान को चले जावें। वहा पर अपना जो भी काय है उसे साग सम्पूर्ण करके पीछे त्रिविष्टय (स्वर्ग) मे चले जावें ॥६४॥ इस प्रकार से यह सब कह पर भगवान् शर ने विदशों से भली भांति भाषण परके वहाँ से विसत्रित किया था। फिर पितामह ब्रह्माजी को प्रणाम के तथा भगवान् जनादन का परिजजन करके इन पोमो विदा किया पा॥६५॥ महेन्द्रो मलय गत्वा कृत्या कार्य दिव गत । गतेपु शक प्रान येपु भगवान्सस्थित शिव. ॥६६ विसर्जयामास गणास्तनुमध्यपथाद।। गणाध शमर दृष्ट्वा स्व स्व वाहन मास्थिता ॥६७ जग्मुस्ते शुम लोपान स्वस्वस्थानेषु नारद । पम यामदुपा गाय सर्वकामपलादमा. ॥१५

माधक पराजय तया वर प्राप्ति वर्णन ]
[ २३६
नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो ह्रदाः पायसदमाः ।
स्वा स्वा गति प्रयातेपु प्रमथेषु महेश्वरः॥६६
समादायान्धक हस्ते नन्दीशेल समागमत् ।
द्वान्या वर्षसहस्राभ्या पुनरायाधरो गृहम् ।।.
ददृशे च गिरेः पुत्री श्वनाकमुमस्थिताम् ।
समायात निरीक्ष्यव सर्वलक्षणसयुतम् ॥७१
त्यक्त्वाऽकंकुसुम तूर्ण सखीस्ता. समुपाह्वयत् ।
समाहूताश्च देव्या ता जयाद्यास्तूर्णमागमन् ॥५२
महेन्द्र ने मलय पर्वत पर पहुंच कर अपना कार्य किया था और
फिर वह दिक्तोक को गये थे। जिनमें इन्द्र ही परम प्रमुन्द ये उन सब
के वहा से चले जाने पर केवल भगवान् शंकर ही वहां तस्थित रहे थे
॥६६॥ फिर तनृपध्य पय से हर ने समस्त गों को भी विसर्जित
किया था। अपने-अपने वाहनों पर समास्थित गनों ने भगवान् संकर
का दर्शन किया या ॥६॥ फिर हे नारद । वे अपने २ स्थानों में
परम गुम लोको को चले गये थे। जहाँ पर कामनाओं के अनुसार दोहन
फि जाने दानी पाय घों और सद कामो के फलों वाले म ये
॥६॥ नदियां अमृत का वहन कराने वाती थी और हद पायत के
कदम वाले ये। अपनी गति को प्रमयो के प्राप्त हो जाने पर वित
ए: महेश्वर रोप रह गये थे ॥६॥ मन्धक को महेश्वर प्रमुो हाय
मे
ग्रहण
दिया पायौर नन्दी चल पर समागत होगये थे। दो सहन
वर्ष तक वहाँ पर हो रहे थे फिर भगवान् हर अपन घर मे बार में
१७०॥ वहा आकर उन्होंने गिरि सुना गौरी को देत मा के कुमुमो
में सस्थित देवा या। बर भगवान् शकर वहा मागमे ये तो उनको
समी लक्षणों से समन्वित देखकर ही गिरि मुता ने अर्क बुसुम का त्याग
रिया या और शीघ्र ही उसने अपनी सम्मियो का समाहूर क्यिा था ।
समादन हुई वे या मादि सखियां बहुत ही शोन देवो के ममीर में
मार उपम्पित होगई थी ॥१२॥

२४. ] [ वामन पुराण यामिः परिवृता तस्थौ हरदर्शन लालसा । ततखिणेप्रो गिरिजां दृष्ट्वा हन्धकदानवम् ॥७२ नन्दिन च तथा हर्षादालिङ्गच्च गिरेः मुताम् । अथोवाचैप दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः ।।७४ पश्य त्वं प्रतियात हि स्वसुत चाहासिनि । इत्युच्चार्याहान्धक वै पुत्र एह्य हि सत्वरम् ।।७५ अजस्व शरणं मातुरेषा श्रेयस्करी तव । इत्युक्तो विभुना नन्दी अन्धकश्च गणेश्वरः ॥७६ समागम्याम्बिका पादौ वधन्दतुरुभावपि । अन्धकोऽपि तदा गौरी भक्तिनम्रो महामुने ।।७७ उन समस्त मखियो से परिवृत हुई गौरी भगवान् हर के दर्शन करने की लालसा से वहा पर खड़ी हुई थीं। इसके पश्चात् भगवान विनेन प्रभु ने गिरिजा को देखा था और वही पर अन्धक दानव को भी देखा था ॥७३।। तथा नन्दी को देखा था । फिर बडे ही हर्ष से भगवान शंकर ने गिरि मुता का समालिान किया था इसके अनन्तर उन्होंने कहा-हे देवि ! यह अन्धक है। इसको मैंने आपका दास बना दिया है ।1७४॥ माप प्रतिपात्र हुए इसकी जोर असन्त दृष्टिपात करो है चारु हासिनि ! यह आपका अपना ही पुत्र है। इतना कह कर फिर बन्धक से कहा-हे पुत्र ! आओ-आयो शीन चले आओ७५|| अपनी इस माता को यरण में प्राप्त हो जाओ। यह मापका सब प्रकार का धेय करने वाली हैं। इस प्रकार से विभु के द्वारा कहे गये गणेश्वर नन्दी और अन्धक वहाँ पर उपस्थित हुए तथा फिर उन दोनो ने जग- दम्बा भवानी के चरणों की वन्दना की थी। है महामुने ! उस समय में अन्धक भी गोरी के सामने भक्ति भाव से अत्यन्त विनम्र हो गया पा७६-७७॥ स्तुति चक्र महापुण्या पापघ्नी श्रुतिसमताम् । इत्थं स्तुता सान्धकेन परितुष्टा विभावरी । प्राह पुत्र प्रसन्नाऽस्मि वृणुष्व वरमुत्तमम् ।।७५ अधिक पराजय तथा वर प्राप्ति वर्णन ] [ २४१ पापं प्रशममायातु त्रिविधं मम पार्वति । तथेश्वरे च सतत भक्तिरस्तु ममाम्बिके 11७६ वामित्यव्रवीद्गौरी हिरण्याक्षमुतं ततः। ममाग्ने पूजयन्शवं गणानामधिपो भव ।।८० वपुर्दधानस्य तथा च तस्य महेश्वरेणाप्य विरूपदृष्ट्या। कृत्ववमुच्चभयद तु भैरव भृङ्गित्वमीशेन कृता स्वशक्त्या १ एतत्तवोक्त हरकीर्तिवधन पुण्यं पविनंशुमदं महर्षे । सकीतनीय द्विजसत्तमेषु धर्मायुरारोग्यधनपिपा सदा । ८२ फिर उस अन्धक ने महा पुण्यमयो तथा समस्त पापो का क्षय करने पाली यति से सुमम्मत स्तुति की पो। इस प्रकार भली भांति स्तुति किये जाने पर जो कि बन्धक ने भावपूर्ण रीति मे को यो विभावरी अम्बिका परम तुष्ट होगई यो और उममे बोली-हे पुत्र ! अब मैं तुझझे बहुत प्रसन्न हूँ। अब न कोई भी मुझ से उत्तम वरदान की पापना करले ।।७।। मृगो ने प्रार्थना को पो-हे पार्वति ! मैंने महान पाप किया है वह मेरा तीनों प्रकार का पाप प्रशम को प्रात हो बारे और हे अम्बिके ! मैं यही चाहता हूँ कि भगवान् श कर में मेरी निर- न्तर भक्ति होवे ॥७६ महषि पुलस्त्य ने कहा-तब जगदम्बा गौरी ने उससे कहा-बहुत अच्छा, ऐमा ही होगा । मेरे समक्ष में मगगन शहर की पूजा करता हुआ तू समस्त गों का अघिन हो जावेगा ॥८॥ उसके उस प्रकार के वपु को धारण करन वाले को महेश्वर ने अविरूप दृष्टि से बहुत ऊंचा भय देने वाला इस प्रकार मे भैरव करके फिर ईश ने अपनी ही शक्ति से उसे गित्व को प्राप्त करा दिरा पा ॥१॥ हे महर्षे ! यह आपके द्वारा कहा हुमा हर को कात्ति को बढाने वाला परम पुज्यमय पवित्र और बनीव शुम आम्मान है । इसका सकोत्तं न उनको सदा ही दिन सत्तमों में करना चाहिए जा धर्म, मायु, आरोग्य बोर था की इच्छा रखने वाले हैं ।।८८t

२२ 1
। वामन पुराण
७१---मरुत उत्पत्ति वर्णन (१)
मलयेऽपि महेन्द्रण यस्कृत द्विजसत्तम ।
निष्पादित स्वक कार्य तन्मे त्व प्यातुमर्हसि ॥१
श्रूयता यन्महेन्द्रेण मलये पवत मुने ।
कृत लोकहिते कार्यमात्मनश्च तथा हितम् ॥२
अघासुरस्य वचनान्मयतारपुगरोगमा ।
ते निजिता: सुरगणः पातालगमनात्सुका ॥३
ददृशुमलय विप्रसिद्धः सेवितकन्दरम् ।
लता विमानसछन्न मत्तसत्त्वसमाकुलम् ॥४
चन्दनरुरगाकान्त. सुशोतरतिसेवितम् ।
माधवीकुसुमामोदसुगन्धितमहागिरिम् ।।५
त दृष्ट्या शीतलच्छाय श्रान्ता व्यायामकर्शिताः
मयतारपुरोगास्ते निवास समरोचयन् ॥६
तेषु तत्र निविष्टेषु घ्राणतृप्तिप्रदोऽनिल.।
विवाति शीत शनकंदक्षिणो गन्धसयुतः ॥७
देवर्षि नारद ने कहा-हे द्विज श्रेष्ठ ! महेन्द्र ने मलय पर्वत पर
जो कार्य किया था और उस अपने कार्य को उसने निष्पादित किया
था। यह क्या कार्य था उसे अब आप मुझे बताइये ।।१॥ पुलस्त्य
महर्षि ने कहा-हे मुने । महेद्र ने मलय पर्वत पर जो भी कार्य किया
था वह लोक के लिये तथा अपने भी हित के लिये ही कार्य किया
पा उसे भी अब आप श्रवण करिये ॥२॥ अधामुर के वचन से भय
और तार जिनम प्रमुख थे ये सव पाताल लोक को गमन करने के लिये
समुरमुष थे और उनको सुरगणो ने जीत लिया था ॥३॥ सिद्ध विनों
के द्वारा सेवित पदरायो वाने मलय पर्वत को उन्होने देखा था। यह
मलय बहुत ही शोमा-मम्पन था। चारो ओर लता विमानो से सच्छन्न
पा मोर महान् सरवों के द्वारा समाकुल था । परम शीतन उरगो मे
ममानाने बदन पादपो के द्वारा अति मवित था अपति बहुत से

मरुत उत्पत्ति वर्णन (१) ] [ २४३ चन्दन के वृक्ष वहाँ पर थे । माधवी लताओं के परम सुगन्धित कुसुमों के आमोद से सभी ओर वह महान् गिरि सुगन्ध से परिपूर्ण था ॥४- ॥ ऐसे उस शीतल छाया से समन्वित पर्वत को देख कर परम धान्न और व्याम करने से कशित मयतार पुरोगों ने वहां पर कुछ समय तक निदास करने की इच्छा की थी ॥६॥ उन सबके वहा निविष्ट हो जाने पर प्राण को तृप्ति देने वाला वायु वहाँ सदा बहता ही था जो अनि शीतल और मन्द था और दक्षिण दिशा से समागत गन्ध से भी युक्त या ॥७ तत्र व च रति चक्र : सर्व एव महासुराः । कुर्वन्तो लोकपूज्याना विप सर्ववाससाम् ।।८ ताज्ञात्वा शकरः शक्र मलय प्रपयत्तदा । स चापि ददृशे गच्छन्पथि गोमातर हरिः ।। तस्याः प्रदक्षिणा कृत्वा दृष्ट्वा शेल च सुप्रभम् । ददृशे दानवान्सर्वान्सहृष्टान्मोगसंयुनान् ।।१० अथाजुहाव बलहा सर्वान व महासुरान् । ते चाप्याययुरव्यग्राः किरन्तश्च शरोकरान् ॥११ तानागतान्वाणजाल रथस्थोऽद्भुतदर्शनः । छादयामास विप्र गिरिं दृष्ट्वा यथा धनः ।।१२ तनो वाणरवच्छाद्य मयादीन्दानवान्हरिः। पाक जघान तीक्ष्णार्मागणः कङ्कवाससः ।।३ तत्र नाम विभुलभे शासनाच शरटम् । पाकशासन इत्येव सर्वामरपतिविभुः॥१४ सब उन महामुगे ने वहीं पर अपनी गति करली और मा लोक पूज्यो से वै टेप करने लगे थे ॥८॥ यह जान कर ममगन् शकर ने उम समय इन्द्र को मलय पर्वत पर प्रेपित किया । उस हरि ने भी मार्ग में जाते हुए गोमाता को देखा । उसको परिक्रमा कर और सुन्दर प्रमा पाने शेल को देवा । वहाँ पर उसने समस्त दानवों को देखा जो बहुत ही प्रमान एव अनेक भोगों से सयुत थे । १०॥ इसके घासा मरुन उत्ति वर्णन (१) ] 1 २४५ को चला गया या ॥१६॥ इसो कार्य के लिये भगवान् शकर ने इन्द्र को मलयाचल पर भेजा या । हे मुनियों में श्रेष्ठ अब बतलाओ, आप अन्य क्या श्रवण करना चाहढे हैं ? ॥१७॥ नारदजी ने कहा-किम लिये यह देवों के पति हरि' गोत्रमित्'-इज नाम में कहे जाते हैं ? यह मुझ एक बहुत बडा मगय है। हे ब्रह्मन् ! यह मेरे हृदप पे बना हो रहा करता है ॥१८॥ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-~-अब आर मुझ से यह भी सुन लीजिए कि जिस कारण मे इन्द्र गोभित् कहा गया है। हिरण कशिपु के मारे जाने पर अरिमर्दन ने जो भी कुछ किया था ॥१६॥ हे नारद ! पुत्र के विनष्ट हो जाने पर दिति ने अपने स्वामी श्यपऋषि से प्रार्थना की यो-हे विभो ! आप मेरे नाय हैं । मुने अब ऐसा पुत्र प्रदान कीजिए जो इस इन्द्र के मारने वाला जन्म पहल करे ॥२०॥ इसके पश्चात् पश्यर ने उममें कहा है असिनेक्षणे! यदि तू शौचा. चार से समायुक्ता होकर दश दराती पर्यन्न रहेगी तमो ऐना हो सकता है ॥२१॥ सवत्सराणा दिव्याना ततस्त्र लोक्यनायकम् । जनयिष्यसि त पुत्र शत्रुघ्न नान्यथा प्रिये ।।२२ इत्येवमुक्ता सा भर्ना दितिनियममास्थिता। गर्भाधानमृपिः कृत्वा जगामोदयपर्वतम् ।।२३ गर्ने तस्मिन्सुरश्रेष्ठ सहस्राक्षोऽपि सत्वरम् । तमाश्रममुपागम्य दिति वचनमबवीत् ॥४ फरिप्याम्यनुशुश्रूषा भवत्या यदि मन्यसे । वामित्यब्रवीत्साऽपि भाविवर्मप्रचोदिना ॥२५ समिदाहरणादीनि तस्याश्वत पुरदरः । विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेषो भुजङ्गवत् ॥२६ एक्दा सा तपोयुक्ता शोके महति सस्थिता। द्रशदर्पशतान्ते तु शिर स्नाता तपस्विनी ॥२७ जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तांशी निज शिरः। सुप्वाप वैशप्रान्तेषु मशिष्टचरणाभवत् ॥२८ २४४ 1 धामन पुराण पर पायात जम बस थे हनन करने वाले ने जन सघ महामुरों को युलाया था। ये भी सब अध्यग्र होते हुए शरोस्करों को फैलाते वहाँ पर आगये थे ।।११॥ रप मे स्थित अद्भुत दान वाले उसने उन समागत महा- सुरों को अपने वाणों के जाल से है विप्र ! छादित कर दिया जैसे धन किसी गिरि को छादित दिया करता हो ।।१२।। इसके पश्चात् इन्द्र ने मय आदि सब दानवो को बाणों से समा. छादित करके अपने कक वामस तीक्ष्ण अग्रभाग वाले वाणों से पाक का हनन कर दिया था ॥१३॥ वहाँ पर विभु ने शरों से हर शासन करने के कारण ही पाक शासन यह सर्व अमरों के पति विभु ने नाम प्राप्त किया था ॥१४॥ तथाऽन्य पुरनामान बाणा सुरशतं शरैः। सुपुड्खैरियामास ततोऽभूत्स पुरंदरः ॥१५ हत्वेत्थ समरेऽजपीद्गोनभिद्दानवं वलम् । तचापि विजित ब्रह्मत्रसातलमुपागमद ।।१६ एतदथ सहस्राक्षः प्रेपितो मल याचलम् । त्र्यम्बकेण मुनिश्रेष्ठ किमन्यच्छोतुमिच्छसि ।।१७ किमर्थं देवतपतिर्गोत्रभित्कथ्यते हरिः । अय मे सशयो ब्रह्मन्हृदि सपरिवर्तते ।।१८ श्रूयता गोत्रभिच्छकः कीर्तितो हि यथा मया। हते हिरण्यकशिपी यच्चकारारिमर्दनः ।।१६ दितिविनष्टपुत्रा तु कश्यपं प्राह नारद । विभो नाथोऽसि मे देहि शक्रहन्तारमात्मजम् ।।२० कश्यपस्तामुवाचाय यदि त्वमसितैक्षणे। शौचाचारसमायुक्ता स्थास्यसे दशतीदंश ॥२१ उसी भाति अन्य पुर नाम वाले वाणासुर शत को सुपुरशरो है. विदारित किया था। तभी से इसका नाम पुरन्दर हो गया था ॥१॥ इस प्रकार से सबका हनन करके गोप्रभित् ने सम्पूर्ण दानवो के दल पर विजय प्राप्त की थी। है ब्रह्मन् ! ह विस्ति भी सब बल रसातल - मरुत उत्पत्ति वर्णन (१) ] [ २४५ को चला गया था ॥१६॥ इसी कार्य के लिये भगवान शंकर ने इन्द्र को मलयाचल पर भेजा था। हे मुनियों में श्रेष्ठ ! अब बतलाओ, आप अन्य क्या प्रवण करना चाहते हैं ? ॥१७॥ नारदजी ने कहा-किम लिये यह देवों के पति हरि' गोत्रमित्'-इन नाम से कहे जाते हैं ? यह मुझ एक बहुत बड़ा मगय है । हे ब्रह्म ! यह मेरे मे बना ही रहा करता है ।।१८।। महपि पुलस्त्य ने कहा-अब आप मुझ से यह भी सुन लीजिए कि जिस कारण मे इन्द्र गोभित् कहा गया है। हिरण्य कशिपु के मारे जाने पर अरिमर्दन ने जो भी कुछ किया था ॥१६॥ हे नारद ! पुत्र के विनष्ट हो जाने पर दिति ने अपने स्वामी कश्यपऋपि से प्रार्थना की पो-हे विमो ! आप मेरे नाय हैं। मुझे अब ऐसा पुन प्रदान कीजिए जो इम इन्द्र के मारने वाला जन्म ग्रहण करे ॥२०॥ इसके पश्चात् कश्यर ने उममै बहा- असिनेक्षणे! यदि तू शौचा- चार से समायुक्ता होकर दश दगती पर्यन्त रहेगी तमी ऐसा हो सकता है ॥२१॥ संवत्सराणां दिव्यानां ततस्त्र लोक्यनायकम् । जनयिष्यसि त पुत्र शत्रुघ्नं नान्यथा प्रिये ॥२२ इत्येवमुक्ता सा भर्ना दितिनियममास्थिता। गर्भाधानमृपिः कृत्वा जगामोदयपर्वतम् ॥२३ गते तस्मिन्सुरश्रेष्ठः महस्राक्षोऽपि सत्वरम् । तमाधममुपागम्य दितिं वचनमब्रवीत् ॥ ४ फरिप्याम्यनुशुश्रूषा भवत्या यदि मन्यसे । वाढमित्यद्रवीत्साऽपि भाविकमंप्रचोदिता १२५ समिदाहरणादीनि तस्यानक पुरदरः। विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेपो भुजङ्गवत् ॥२६ एक्दा सा तपोयुक्ता शोके महति सस्थिता। द्रशवशतान्ते तु शिर स्नाता तपस्विनी ॥२७ जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तरेगी निज शिरः। सुप्वाप वेशप्रान्तेषु सश्लिष्टचरणाऽभवत् ।।२८ २४६ ] [ वामन पुराण तमन्तरममौ ज्ञात्वा देवश्वापि सहस्रदृक् । विवेश मातुरुदरे नासारन्ध्रेण नारद ॥२६ दिव्य सम्वत्सर दश पर्यन्त नियम पूर्वक रहने पर ही लोक्य का नायक उस पुत्र को जन्म देगी जो शत्रु का हन्ता होगा। अन्यथा है प्रिये । ऐसा नहीं हो सकता है ॥२२॥ भर्ता के द्वारा इस भांति कहीं हुई उम दिति ने नियमो मे समास्थित होना आरम्भ कर दिया था। ऋषि ने दिति को गर्भ का आधान कर दिया और फिर वह उदय गिरि पर चले गये थे ।।२३॥ उसके चले जाने पर सुर श्रेष्ठ इन्द्र भो उस आश्रम मे आकर दिति से वह वचन बोला-॥२४॥ यदि आप मुझे अपनी आज्ञा प्रदान करें तो मैं यही पर रहकर आपकी सेवा करता रहूंगा । बहुत अच्छा-यह उसने भी आगे होने वाले कम से प्रेरित होकर कह दिया था ॥२५॥ पुरन्दर फिर उसके समिधा आदि लाने का काम करने लगा वेमे ऊपर से देखने में बहुत ही विनम्र था किन्तु इन्द्र उसका कोई छिद्र खोजने में सलग्न रहता था जैसे कोई भुजङ्ग ॥२६॥ एक बार वह तपस्या मे सस्थित तो थी किन्तु किसी महान् शोक मे स्थित हो गई थी । दश महर वर्ष के अन्त में उसने शिर से स्नान किया था और उस तपस्विनी ने जानुओ से ऊपर सस्थापित कर केशो को खुले हुए रख कर अपने शिर को वहां पर शयन कर गई थी ॥२७-२८॥ इस देवेन्द्र ने भी उमी अन्तर को समझ कर हे नारद ! मासिकार से माता के उदर में प्रवेश कर लिया था ॥२६॥ प्रविश्य जठरे वृद्धो दैत्यमातुः पुरदरः । ददर्शीध्वंमुख वालं कटिन्यस्त करं महत् ॥३० तथैवास्येऽथ ददृशे मासपेशी च वासवः । शुद्धस्फटिकसङ्काशां कराम्या जगृहे स ताम् ॥३१ तत: कोपसमाध्मातो मांसपेशी शतक्रतु।। फराभ्यां मर्दयामास ततः सा कठिनाऽभवत् ॥३२ कानाधं च ववृधे त्वधोऽधं ववृधे तथा । शतपी सलिशः सजातो मासपेशितः ॥३३ २४८ ] [ वामन पुराण । इत्येवमुक्त्वा तान्बालापरिसान्त्व्य दिति त्वरन् । देवराजः सहैनास्तु प्रेषयामास भामिनी ॥४१ एव पुरा स्वानपि सोदरान्स गर्भस्थितानु पातितवान्भयातः । बिभेद वज्रणततःसगोत्रभित्ख्यातो महर्प भगवान्महेन्द्रः ।।४२ इन्द्र ने भी उस बालक से कहा-हे मूर्ख ! अत्यन्त घघर होकर तू क्यो रोता है। इतना ही इस प्रकार से कहकर फिर एक-ए के सात टुकडे छेदन कर दिये थे ॥३६।। वे फिर मरुत नाम वाले इन्द्र के देय भृत्य समुत्पन्न हुए थे। अनेक सुखो के उपचार से पुरस्कृत होकर वे चलते थे ।।३७॥ फिर कुलिश के सहित इन्द्र जठर से बाहिर निकल आया था । दिति के समक्ष शाप से भयभीत होकर हाथ जोडकर बोला ॥३८।। मेरा इसमें कोई अपराध नहीं है क्यो कि यह मेरा शत्रु था। इसीलिये मैंने इसको मार दिया है । हे देवि ! इसलिये आप मेरे ऊपर अब क्रोध करने के योग्य नही हैं ॥३६॥ दिति ने कहा-इसमे तेरा तो कोई अपराध नहीं है । मैंने पहिले ही भाग्य को देख लिया था कि जब सम्पूर्ण काल होगा उसी समय यह वध को प्राप्त हो जायगा ॥४०॥ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-इतना इस प्रकार से कहकर देवराज ने उन बालको को परिसान्त्वना दी थी और फिर इनको भामिनी ने इन्द्र के पास भेज दिया था ॥४१॥ इस रीति से पहिले अपने ही भाइयो को जो कि गर्भ में स्थित थे उस इन्द्र ने पतित किया था और वज से उनका भेदन किया था । हे मह ! तभी से वह महेन्द्र गोल का भेदन करने से गोमिद्-इस नाम से विख्यात हो गया था ॥४२॥ ७२~मरुत उत्पत्ति वर्णन (२) ये हमी भवता प्रोक्ता मरुतो दितिजोत्तमाः। ते के च पूर्वमासन्वं मरुन्मार्गेषु कथ्यताम् ।।१ पूर्वमन्वन्तरे चैव समतीतेषु सत्तम । के त्वासन्वायुमार्गस्थास्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥२

मरुत उत्पत्ति वर्णन (२) ]
[ २४०
ध्यतां पूर्वमरुतामुत्पत्ति कथियामि ते ।
स्वायंभुवं समारभ्य यावन्मन्वन्तर त्विदम् ॥३
स्वायंभुवम्य पुत्रोऽभून्मनु म प्रियव्रतः ।
तस्यासीत्सवनो नाम पुनस्सलोक्यविश्रुतः ॥४
स चानपत्यो देव नृपः प्रेतगतिं गतः ।
ततोऽरदत्तस्य पत्नी सुवेदा शोकविह्वला ॥५
न ददाति तया दग्धु समालिङ्गय स्थिता पतिम् ।
नाथ नाथेति बहुशो विलपन्ती त्यनाथवत् ॥६
ततोऽन्तरिक्षादशरीरिणी वाक्प्रोवाच मा राजपत्नीह रोत्सी:
यदस्ति ते सत्यमनुत्तम तत्तदा व्रज त्व पतिना सहाग्निम् ॥७
देवपि मारद जी ने कहा-आपने अभी जो दिति के उदर से
जन्मे हुए मरुद्गण दतलाये हैं वे पहिले ये मरुत् मार्ग मे कौन थे यह
बतलाइये । हे श्रेष्ठतम् ! पहिले व्यतीत हुए मन्वन्तरों में वायु मार्ग में
स्थित कौन थे-यह सब मेरे सामने व्याख्यान करने के आप योग्य हैं
॥१-२।। महर्षि पुलस्त्य ने कहा-पहिले जो महतों की उत्पत्ति थी
उसे मैं बतलाता हूँ माप प्रवण कीजिए । स्वायंभुव से लेकर अब तक
जो वह मन्वन्तर है उस सभी को बतलाता हू ॥३॥ स्वायम्भुव का
पुत्र प्रिय व्रत मनु हुआ था। उसका पुत्र सवन नाम वाला हुआ था जो
इस त्रिलोकी मे परम प्रसिद्ध हुआ है ॥५॥ हे देवपि ! उसके कोई
सनान नही थी और वह राजा प्रेत गति को प्राप्त हो गया था।
इसके पश्चात् उसकी पत्नी सुवेदा शोक से अत्यन्त विह्वल होकर रुदन
करने लगी थी॥शा वह अपने पति का समालिंगन कर बैठ गई थी और
उसके शव को दाह करने के लिये नहीं दे रही थी। हे नाय, हा नाय !
इस तरह पुकार२ कर अत्यन्त विलाप कर रही थी जैसे कोई अनाथ
रुदन किया करता है ॥६॥ इसके पश्चात् आकाश से अशरीरिणी वाणी
ने कहा--राज परनी रुदन मत करो। यदि तुम में सत्य है तो तुम परम
धेठ सतीत्व के बल का आश्रय ग्रहण कर पति के शव के साथ ही अग्नि
मे प्रवेश कर जामो अर्थात् सतो हो जाओ ॥७॥

२५० ] [ वामन पुराण सातावाणीमन्तरिक्षान्निशम्यप्राहक्लान्ताराजपत्नीसुवेदा। शोचाम्येन पार्थिव पुत्रहीन नैवात्मानं मन्दभाग्य विहङ्ग । सोऽथाब्रवीन्मा रुदस्वेति वाले पुत्रास्ते वै भूमिपालस्य सप्त । भविष्यन्तिवह्निमारोहशोनसत्यप्रोक्त श्रद्दधस्वत्वमद्य ॥ इत्यवमुक्ता खचरेण वाला चिता ममारोप्य पनि वराहम् । हुताशमासाद्य पतिव्रता सा सचिन्तयन्ती ज्वलन प्रपा १० ततोमुहून्नृिपनि श्रियायुत समात्थतोऽसौसहितस्तुभायंया । खमुत्पपाताय स कामकारी सम महिण्याचमुनाभपुत्र्या ॥१ तस्यापरेपाथियपुङ्गवस्यजाता रजःस्थामहिषींतु गच्छतः । धष्ठास्तुपुत्राबलवीर्ययुक्ता.न्यातामहान्तो भुविभूमिपाला. ॥१२ स दिव्ययोगात्प्रतिमस्थितोऽम्बरेभार्यासहायोदिवसाश्च पञ्च । ततस्तु पष्ठेऽहनि पार्थिवेन ऋतुनं वन्ध्योऽद्य भवेद्विचिन्त्य । ररामतन्च्यासहकामचारीतनोऽम्बरा प्राच्यवतास्यशुकम् ।।१३ शुक्रोत्सर्गावसाने तु नृपति यया सह । जगाम दिव्यया गत्या ब्रह्मलोक तपोधन । पुवास्तस्यावसञ्छूरः कृतास्त्रा: सत्यवादिनः ।।१४ उम विधवा सुवेदा रानी ने उम वाणो का श्रवण करके कहा था छो कि बहुत ही क्लान थी-मैं हम राजा को पुत्र होतता का शोष कर रही हूँ। हे विहंग | अपनी मद भागना का शोच नहीं कर रही है 1 इम पश्चात् उमने पहा-है दाले इस राजा के तो मात पुष होगे। तुम अति गोध्र चिता पर ममारोहण करो। मैं यह सरप बहना है । आज तुम मेरे वपन पर पदा रक्सो ॥६इस प्रकार में उस विहं. गम के द्वारा कहे जाने पर उस बाला ने वराहपनि हो चिता पर समा• रोति पर अग्नि रोमाप्ति पर यह भली भाति चिन्तन परती हुई शनि मे प्रवेश र गई थी 1100 इमो पानात् पुहत्तं भर में वह रारा परम श्री से मुमाराम हर मार्ग के सहित उम पिता से उठ बेटा था। वह पापबारी अपनी भायों से हो साप भी मुराम को पुणे सी बारात में हार पला गराया ॥११॥ वह महिषी रोगुण मरुत उत्पत्ति वणन (२) । २५१ वालो हुई तो उमका गमन करने पर उनी राजा के दूसरे परम श्रेष्ठ पुत्र समुत्पन्न हुए थे जो बल वीयं से युक्त ये और भूमण्डल मे महान् ध्याति प्राप्त करने वाले भूमिपाल हुए थे ॥१२॥ वह दिययोग मे आकाश में भार्या के सहित पांच दिन तक सस्यित रहा था। फिर छटवें दिन आज ऋतु काल का समय है उसे रोकना नही चाहिए-यह सोचकर उम कामचारी ने अपनी तन्वी के साथ वहा पर ही रमण किया था। फिर आकाश न उसका कार्य प्रयुत हुमाया ॥१३॥ वीर्य के उत्सर्ग होने के अन्त में वह नृपति यपनी भार्या के माय दियगति से हे त गोधन ब्रह्मलोक को चला गया था। उसके परम शूर कृतास्त और सत्यवादी निवास करने लगे थे ॥१४॥ तदम्बरात्प्रचलितमभ्रवणं शुक्र समादा नलिनी च पुष्यती। चित्राविशालाहरितालिनीला:पल्योमुनोनाददृशुर्यथेच्छया।।१५ तदृष्ट्वा पुष्करे न्यस्त प्रत्यूचुने तपोधनान् । मन्यमानास्तदमृत सदा यौवनलिप्सया ॥१६ ततः स्नात्वा तु विधिवत्सपूज्य च निजान्पतीन् । पतिभिः समनुज्ञप्ता पपुः पुष्करसंजितम् ।।१७ तच्छुक पार्थिवेन्द्रस्य मन्यमानास्तदाऽमृतम् । पीतमात्रैत्र शुक्रण पार्थिवेन्द्रोद्भवेन ताः ॥१८ ब्रह्मतेजोविहीनास्ता जाता: पत्न्यस्तपस्विनाम् । ततस्तु तत्यजु सर्वे सदोषास्ते स्वपत्नयः ।।१६ सुपुवुः सप्त सनयाघ्र दतो भैरव मुने । तेपा रुदितशब्देन सर्वमापूरितं जगत् ॥२० अथाजगाम भगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः । समभ्येत्याब्रवीद्वालान्मा रुदध्वं महाबलाः ॥२१ उस शुक्र को जो अम्बर तन से अम्र वणं वाला प्रचलित हुआ था समादा-नलिनी, पुष्यतो, चित्रा, विशाला, हरिता, अनिनोला आदि मुनियों की पलियों ने यथेच्छा से देखा था ॥१५॥ उसे पुष्कर देख कर भी उनने तपोधन मुनियों से इस सम्बन्ध में कुछ भी चर्चा नहीं में व्यस्त २५२ ] [ वामन पुराण की थी। उस शुक को अमृत मानती हुई सर्वदा यौवन कायम बने रहने की लिप्मा उनमे उत्पन्न होगई थी ॥१६॥ इसके पश्चात स्नान करके विधि पूर्वक भली भांति अपने पनि देवो का अचंन करके पतियो से आज्ञा प्राप्त कर उन्होने पुष्कर नाम वाले का पान किया था ।।१७। उस समय पे उस पाश्वेिन्द्र के वीर्य को अमृत मानती हुई उन्होंने ज्यों ही उस पार्थिवेन्द्र के वीर्य का पान किया था वैसे ही वे तपस्वियो की पत्नियों सब ब्रह्मतेज स हीन होगई थी। इसके उपरान्त उन सभी तपस्वियो ने दोप युक्त अपनी पत्नियो को त्याग दिया था ॥१८-१६॥ हे मुने ! फिर उन्होने भैरव रूप से रुदन करने वाले सात पुत्री को जन्म दिया था। उनके रुदन के शब्द से यह सम्पूर्ण जगत् आपूरित हो गया था ॥२०॥ इसके पश्चात वहा ब्रह्माजी आये थे जो लोक पितामह भगवान है । उन्होने यहाँ आकर उन बच्चो से कहा- हे महाबल वालो! सदन मत करो ॥२१॥ मरुतो नाम भवता भविष्यति वियरिस्थरम् । इत्येवमुक्त्वा देवेशो ब्रह्मा लोकपितामह. ॥२२ तानादाय वियच्चारी मारुतानादिदेश ह ते त्वासन्मरुतस्त्वाद्य मनो: स्वायभुवेऽन्तरे ॥२३ स्टारोचिपे तु मरुतो वक्ष्यामि शृगु नारद । स्वारोचिपस्य पुषस्तु श्रीमान्नाम्ना ऋतध्वजः ॥२४ तस्य पुवा बभूवुश्च सप्नादित्यपराक्रमाः । तपोऽर्थ ते मता शंल महामेरु नरेश्वराः ॥२५ आराधयन्तो ब्रह्माण पदमन्द्र यथेप्सवः । ततो विपश्चिमामाऽथ सहस्राक्षो भयातुरः ॥२६ पूतना सोसरोमुठ्या प्राह नारद वाक्यवित् । गच्छस्व पूतने शैल महामेरु विलासिनि ।।२७ सनि नहि तप ऋतध्वजसुता महत् । समाहितपसी विघ्नं पा भात सुपरि २८ मरुत उत्पत्ति वर्णन (२) । [ २५३ विपत् में स्थिर आप लोगो का मरुत होपा 1 इतना कह कर देवेश लोक पितामह ब्रह्माजी उनको साथ मे लेकर वियच्चारी ने मारुतो को आदेश दिया था। वे स्वायम्भुव मन्वन्तर में आश मे मस्त थे ।।२२- २३॥ हे नारद ! अब स्वारोचित मन्वन्तर मे जो मरुत थे उनको बत- लाते हैं, आप सुनिए । स्वारोचिप का पुत्र नाम परम धीमान त- ध्वज था । उसके पुत्र आदित्य के तुल्य पराक्रम वाले सात हुए थे। वे नरेश्वर तपश्चर्या करने के लिये महामेरु पर्वत पर चले गये थे ॥२४. २५।। इन्द्र के पद की इच्छा वाले उन्होंने ब्रह्माजी का आराधन किया था । तव विपश्चित् नाम वाला उस समय में जो इन्द्र था वह भमभीत हो गया था ॥२६॥ हे नारद ! वह अप्सराओ मे मुख्य पूतना से वचन बोलने में चतुर यों बोला-~है पूतने ! तुम तो बहुत ही विलास शील हो,संद महामेरु शंल पर चली जाओ ॥२७॥ वहाँ पर ऋतध्वज के पुत्र महान तप कर रहे हैं । हे सुन्दरि ! ऐसा करो कि उनको तपश्वर्या मे विघ्न हो बावे ॥२८॥ तथा कुरुष्व मा तेषां सिद्धिर्भवतु सुन्दरि । इत्येवमुक्ता शक्रण पूतना रूपशालिनी ।।२६ ताजगाम त्वरिता यत्र तैस्तप्यते तपः । थाश्रमस्याविदूरे तु नदी मन्दोदवाहिनी ॥३० तस्या स्नातु समायाता: सर्व एव सहोदराः । सा तु स्नातु सुचार्वङ्गी त्ववतीर्णा महानदोम् ॥३। ददृशुस्ते नृपाः स्नाता ततश्चुभुभिरे मुने । ततो ह्यभ्यद्रवच्छ तत्पपौ जलचारिणी ॥३२ शङ्खिनो ग्राहमुख्यस्य महाशङ्खस्य वल्लमा । तेऽतिविभ्रष्टतपसो जग्मू राज्य च यंतृकम् ।।२३ सा चाप्सराः शक्रमेत्य याथातथ्यं न्यवेदयत् । ततो बहुतिथे काले सा ग्राही शङ्खरूपपणी ॥३४ समुदता महाजालमत्स्यबन्धेन जालिना। स तां दृष्ट्वा महारावी स्थलस्था मत्स्यजीवनः।।३५

२५४ ]
[ वामन पुराण
सुन्दरि ! अब तुम वहाँ जाकर ऐमा ही कुछ करो कि उनकी
सपस्या की सिद्धि न होवे। इस प्रकार से इन्द्र के द्वारा कहे जाने पर
परम रूप लाषण से ममन्वित यह पूनना बहुत ही शीघ्रता से वहाँ
या पहुंची थी जहां पर उनके द्वारा तपाचर्या की जा रही थी । उग
माधम के समीप मे हो मन्द जल को वहन करने वाली मन्दोद वाहिनी
नाम वाली नदी थी ।।२६.३०॥ उम नदी में वे ममी सहोदर ग्रहा उस
नदी में स्नान करने के लिये आये थे । वह सुन्दर गो वाली पूतना
मी उस महा नदी में स्नान करने को उतरी यो॥३१॥ हे मुने ! उन
नृपों ने स्नान की हुई उमको देखा था और फिर उनके मन मे क्षोम
समुत्पन्न हो गया था। फिर उन। शुक्र निकत बाया था जिसको जल
पारिणी ने पान कर लिया था॥३२॥ग्राहो में मुख्य महाशप की वस्लमा
शबिनी थी। वे नप तो भ्रष्ट तप वाले हो गये थे और अपने पैतृक
राज्य को चले गये थे ॥३३॥ उम अप्सरा ने इन्द्र के समीप में आकर
जो भी घटित हुआ था वह सब ठीक २ बतला दिया था। फिर
बहुत दिन के समय के बाद जो शख रूपिणी ग्राही थी एक जाल वाले
मत्स्य वन्धी ने महाजालों से समुद्धृत करली थी। उसने जब उस महा
शखी को देखा स्थल में स्थित मत्स्य जीवी ने देख कर रामा से
कहा ॥३४-३५॥
निवेदयामास तदा ऋतध्वजसुतेषु वै।
तथाऽभ्येत्य महात्मानो योगिना योगधारिणः ॥३६
नीत्वा सुमन्दिरं सर्वे पुरवाप्या समुत्सृजन ।
ततः क्रमाछह्विनी सा सुषुवे सप्त वैशिशून् ।॥३७
जातमात्रेपु पुत्रेषु मोक्षमागमगाच्च सा।
अमातृपितृका बाला जलमध्ये विचारिणः ।।३८
स्तन्याथिनो वै रुरुदुरयाभ्यागात्पितामहः ।
मा रुदध्वमितीस्याह स्वस्थास्तिष्ठत पुलकाः । ३६
यूयं देवा भविष्यध्व वायुम्कन्धविचारिणः ।
इत्येवमुक्त्वा व्यादाय सर्वांस्ता दैवत प्रति ॥४०

मरुत्त उत्पत्ति वर्णन (२) ] [ २५५ नियुज्य च मरुन्मार्ग विराजो भवनं गतः । एवमाश्चास्य मरतो मनो: स्वारोचिपेऽन्तरे ४१ उत्तमे मरलो ये च तान्छृणुष्व तपोधन । उत्तमस्यान्वये यस्तु राजाऽमीनिपधाधिपः ॥४२ उसी समय में मृतध्वन के पुत्रोको निवेदित कर दिया था। फिर योगियों के योग धारण करन वाले महात्माओ ने वहां आकर उममा प्रहण कर लिया था ॥३६॥ उम अपन मुन्दर मन्दिर में ले जागर राव न पुरी वावटी में छोड़ दिया । इमा उपरान्त प्रम म सम ममिनो न माउ शिशुओ को पमूत पिया पा ॥३७॥ पुत्रों समु- सन्न होते ही यह तो मोक्ष के माग में चली गई थी। वे बिना माता बोर पिठाचे पालक जल , मध्य में विचरण परने वाले हो रहे थे ॥३८वे स्तन से निकलने वाले दूध के लिये स्वामाविक तौर पर रुदन पर रहे थे। इसरे परघात् वह पितामह आगये थे। उन्होंने उन शिशुओ मे महा-हे पुत्रो! तुम रुदन मत करो और स्वस्थ होकर रहो ।।३६ नुम भोग देवता हो जाओगे जोकि वायु के समय पर विवरण करने वाले रहोगे। इसना पर मह र उन सब को देवतक से गये थे ॥४०॥ मरुत के मार्ग में नियोति परे विरान अपने भवन रोधले गये थे। स्वारोचिष मनु के अन्तर में इस प्रकार में मनोरा आश्वासन दिया पा ॥११॥ तरोधन ! उत्तम रण में जो मरदगण थे उना बर रो। उत्तम रे में जो विप- पाधिप राजा पारात ही प्रसिर था ॥१२॥ यपुप्मानिति विश्यातो वपुषा भास्करोरमः । तस्य पुनो गुणभेष्ठो ज्योतिप्मान्धामियोऽभवत् ।।४३ स पुत्रार्थी तपस्नेपे नन्दी मन्दाग्निीमनु । सम्य भार्या च सुयोणी देवाचायमुना तया ॥४४ सपाभरणतन्य पर परिवारिस साउनयत्पतपुष्प प समित्युगजतादि व ॥४र

1 वामन पुराण
चकार पद्यपत्राक्षी सम्यक् चातिथिपूजनम् ।
पनि धूपमाणा सा कृशा धमनिसनता ॥४६
तेजोयुक्ता सुचार्वङ्गी दृष्टा सप्तपिभिर्वने।
ता तथा चारुसर्वाङ्गी दृष्ट्वाभ्य तपसा कृशाम् ।।४७
पप्रच्छुस्तपसो हेतु तस्यास्तद्भर्तुरेव च ।
साववोत्तनयार्थाय आवाभ्या तपसः क्रिया ॥४८
ते चास्य वरदा ब्रह्माता सप्त महर्षयः ।
प्रजध्व तनया सप्त भविष्यन्ति न संशयः॥४
उसका नाम वपुष्मान् विख्यात था और शरीर से वह सय्य के
तुल्य था। उसका पुत्र गुणों से परम श्रेष्ठ था। उसका नाम ज्योति.
मान था तथा वह अत्यन्त धार्मिक या ॥४३।। उसने पुत्र की इच्छा से
मन्दाकिनी नदी के ऊपर तपश्चर्या की थी। उनकी भार्या जो थी, वह
देवाचार्य को सुपुरी सुनीणो थी ॥४४॥ जब मह वपुष्मान
तपस्या कर रहा था । उस समय में उसकी परिचारिका होकर रहा
करती थी। वह उसके लिये फल-पुष्प-समिधा, कुशा और जल आदि
लाया करती थो ॥४५॥ उस पद्म पत्र के समान नेत्रो वाली ने भली
भाति अतिथियो का पूजन किया । जब वह अपने पति को शुश्रूषा करती
थी तो अत्यन्त कृश बोर धमनि सतत होगई थी किन्तु वह चावंगी तेज
से युक्त पी उसको वन मे सप्तपियों न देखा उस प्रकार के परम सुन्दर
गोधामी उसको तपश्चर्या के कारण वृश देख कर उन्होंने उससे
पूछा या ॥४६-४७।। उन्होने यह प्रश्न उसस किया कि इस तर करने
साकारण क्या है तथा उसका स्वामी भी हिम लिये तप कर रहा है।
उसने उत्तर दिया था कि पुत्र की प्राप्ति के लिये ही हम दोनो
को यह तपस्या राम किया जा रहा है ॥४।। है ब्रह्मन् ! वे सप्त.
पिंगण इसके लिये वरदान देने दात होगये थे। उन्होंने यह धादान
दिया था कि तुम जामो-तुम्हारे सात पृन होगे- इसमे कुछ
मीद
महीं है ॥४॥

मरुत उत्पत्ति वर्णन (२) ] [ २५७ युवयोगुणसंयुक्ता महणा प्रसादतः । इत्येवमुक्त्वा जग्मुस्ते सर्व एव महर्षयः ।।५० स चापि राजपिरगात्सभार्यो नगर निजम् । ततो बहुतिथे काले सा राज्ञो महिपी प्रिया ॥५१ अवाप गर्भ त वङ्गी तस्मान्नृपतिसत्तमात् । गुविण्यामथ भार्याया स ममार नराधिपः ।।५२ सा चाप्यारोदुमिच्छन्ती भर्तार वै पतिव्रता । निवारिता तदाऽमात्यन तथाऽपि प्रतिष्ठति ।।५३ समारोप्याथ भरि चितायामारुहच्च सा । ततोऽग्निमध्यात्सलिलमाममेवापतन्मुने ॥५४ तदम्भसा सुशीतन ससिक्त सप्तधाऽभवत्।। तेऽजायन्ताथ मरुत औत्तमस्यान्तरे मनोः॥५५ तामसस्यान्तरे ये च मरुतोऽथाभवन्पुरा । तानह कीर्तियिष्यामि चीतवाद्यकलिप्रिय । ५६ महर्षियो के प्रसाद से तुम दोनो के गुणगण से समन्वित पुन होगे-- इतना इस प्रकार से कहकर वे सब महर्षिगण चल गये थे ॥५०॥ फिर वह राजपि भी अपनी भार्या के सहित अपने नगर मे चला गया था। इसके पश्चात् बहुत दिन समाप्त होने पर वह राजा की पट्टामि. पिता रानी जा परम प्रिय थी उस तन्वगी मे उसी नृप श्रेष्ठ स गभ- धारण किया था । उस मार्या के गभिणी हो जान पर वह राजा मर गया था ॥५५-५२॥ वह पतिव्रता पत्ती थी अत वह अपन पति के साथ ही चिता पर समारोहण कर सती होना माहती थी। उसको अमात्यो ने निवारित भी किया था किन्तु उसने किसी की बात नहीं मानी और अपने दृढ सकल्प पर ही स्थित रहा थो ॥५३।। स्वामी के शव को चिता पर समारोपित कर यह भी उसी पर चढ़ गई थी। फिर अग्नि के मध्य से है मुने ! कध्वा पानी गिरा या ॥५४॥ उस पीतल जल से सात प्रकार मे ससचन हुआ था। वे ही उत्तम मन्वन्तर के मरुद्गण उरसन्न हुए थे ॥५५॥ है गीत और वाद्य और कलह से प्यार २५८ [ वामन पुराण करने वाले ! तामस मन्वन्तर में जो ममदगण पहिले हुए थे उनको अब मैं बतलाता है ॥५६॥ तामसस्यमनो: पुत्रो दन्तध्वज इति श्रुतः । स पुत्रार्थी जुहावाग्नी स्वमास रधिर तथा ।।५७ अस्थीनि रोम केशाश्च स्नायुमज्जायकृद्धनम् । शुक्र च चित्रको राजा सुतार्थी चेति नः श्रुतम् ॥५८ सप्तस्वेवाचिपु ततः शुक्रपातादनन्तरम् । मा प्रक्षिपस्वेत्य भवच्छन्दः सोऽपि मृतो नृप. ॥५६ ततस्तस्माद्ध तवहात्सप्तधा तेजसा युताः। शिशवः समजायन्त ते रदन्भैरव मुने ॥६० तेपा तु ध्वनिमाकर्ण्य भगवान्पद्मसभवः । समागम्य विचार्याथ स चक्र मरुतः सुरान् ।।६१ ते त्वासन्मरुतो ब्रह्मस्तामसे देवतागणाः । येऽभवत्र वते ताश्च शृणु च स्व तपोधन ॥६२ रैवतस्यान्ववाये तु य आसीदिपुजिद्धनी। रिपुजिन्नामतः ख्यातो न तस्यासीत्सुतः किल ॥६३ तामस मनु का पुत्र दन्तध्वज नाम वाला हुआ था। वह भी प्राप्त करने की इच्छा वाला था और उसने अपने मास तथा रुधिर का हवन किया था ॥५७॥ उस सुत के इच्छ क राजा ने जो चित्रकथा अपनी अस्थिया-रोम, केश, स्नायु, मज्जा, यकृद्धन और शुक्र का हवन किया था-ऐमा हमने सुना है ॥५८॥ फिर शुक्र पात के अनन्तर सातों अधियो से-"अब प्रक्षेप मत करो"--यह शब्द हुआ था। वह राजा भी मर गया था ॥५६॥ इसके पश्चात् उस अग्नि से सात प्रकार से तेज से युक्त शिशुगण समुत्पन्न हुए थे। हे मुने ! वे फिर रुदन करने लगे थे और उनका बहुत ही भैरव रुदन था ॥६०॥ उनके फन्दन की पनि को मुनकर भगवान् पद्म सम्प्रव ब्रह्मा जी यहां आगये थे। इसके उपरान्त उनने विचार कर उस महतों को सुर बना दिया था uent हे ब्रह्मप! ये तामस मन्वन्तर में देवगण मस्त हुए थे। हे am- मरुत उत्पत्ति वर्णन (२) ] [ २५६ धन ! जो वे नहीं हुए ये उनका भी आप श्रवण फेरलो ।।६२॥ रेवत के वश मे जो रिपुनित् धनी हुआ था वह 'रिपुजित्'-इसी नाम से विख्यात हो गया था। उमके भी कोई पुत्र नहीं था ॥३॥ स समाराध्य तपसा भास्कर तेजसा निधिम् । अवाप कन्या सुरति तां प्रगृह्य गृह ययौ ॥६४ तस्या पितृगृहे ब्रह्मन्वसन्त्या स पिता मृतः। साऽपि दुःवपरीताङ्गी स्वा तनुत्यक्तुमुद्यता ।।५ ततस्ता वारयामासु पयः सप्त नारद । तस्यामासक्तचित्तास्तु सर्द एव तपोधनाः ॥६६ अपारयन्तोतद्द :खं प्रज्वाल्याग्नि विवेग ह। त चापश्यन्त ऋषयस्तच्चित्ता भावितास्तथा ॥६७ ता मृतामृपयो दृष्ट्वा कष्ट कष्टोति वादिनः। प्रजग्मुज्वलनाचाथ सप्ताजायन्त दारकाः ।।६८ ते च मात्रा विनाभूता रुरुदुस्तान्पितामहः । निवारयित्वा कृतवाल्लोकनाथो मरुद्गणाम् ॥६६ रेव तस्यान्तरे जाता मरुतोऽमी तपोधन । शृणु त्व कीर्तयिष्यामि चाक्षुपस्यान्तरे मनोः ।।७० उसने तेज के निधि भगवान् भास्कर का तपस्या के द्वारा समा- राधन किया था और मुरति कन्या को प्राप्त कर वह लेकर अपने गृह को पला गया या ॥६४॥ है ब्रह्मन् ! जद वह अपने पिता के घर मे दाम कर रही थी तो उसका पिता मृत हो गया । वह भी से परीत अ गो वाली होकर अपने शरीर का त्याग करने को तयार हो गई की ॥६॥ हे नारद! फिर मातो ऋषियों ने उसका वारित किया । सभी तपस्वी गण उममे मामक्त चित्त वाले ये ॥६६॥ वह उम महान् दुःख को न सहन करती हुई अग्नि जला कर उसमे प्रवेश कर गई थी। या मावित और उसमे अपने चित्त को संलग्न रखने वाले ऋषियों ने उसे देखा था।॥६७। उससे मरी हुई देखकर पिवृन्द 'दहा क्ट है- ऐना कह रहे थे और वहाँ से चले गये थे। इसके अनन्तर उन अग्नि २६० ] [ वामन पुराण से सात पुत्र (बालक) समुत्पन्न हुए ॥६॥ वे शिशु बिना माता के रुदन करने लगे । उनको पितामह ने आकर निवारित किया था और फिर लोकनाथ प्रभु ने उनको मरुद्गण कर दिया था ॥६६॥ हे तपो. धन ! रवत मन्वन्तर मे ये मरुद्गण हुए थे । अब चाक्षप मन्वन्तर में जो मरुद्गण हुए उनको मैं बतलाता हूँ। तुम उसका धदण करो॥७॥ आसीन्मविरिति स्यातस्तपस्वी सत्यवाक छुचिः । सप्तसारस्वते तीर्थ सोऽतप्यत महत्तपाः ।।७१ विघ्नार्थ तस्य तुपिता देवा: संप्रेषयन्मुने । सा चाभ्येत्य नदीतीरे क्षोभयामास भामिनी ॥७२ ततोऽस्य प्राच्यवच्छुक्र सप्तसारस्वते जले। ता चैवाप्यशपन्मूढा मुनिर्मकरणको रिपुम् ।।७३ गच्छ वै वेत्सि मूढे त्वं पापस्यास्य महत्फलम् । विध्वसस्ते हि भविता सप्राप्ते यज्ञकर्मणि ॥७४ एव शप्त्वा ऋषिः श्रीमाजगामाथ स्वमाश्रमम् । सरस्वतीभ्यः सप्तभ्यः सप्त व मरुतोऽभवन् ।।७५ एतत्तवोक्ता मरुतो सि पूर्वे जाता जगद्वयाप्तिकरामह । येषा श्रुते जन्मनि पापहाभिवेच धर्माभ्युदयो महाश्च ।।७६ एक मकि नाम से विख्यात तपस्वी था जो सत्यवापी वाला और परम शुचि था। सप्त सारस्वत तीर्थ मे उसने महान् तप किया था ।७१॥ हे मुने ! उसको तपश्चर्या में विघ्न उत्पन्न करने के लिये देवगण ने एक सुपिता नाम अप्सरा को उसके समीप मे भेजा था। यह उस नदी के तट पर आकर उपस्थित होगई थी और उस भामिनी ने क्षोम उत्पन्न कर दिया था ॥७२॥ इसके पश्चात् उसका वीर्य सार- स्वत जल में प्रयुत हो गया था। उम मंकणक मुनि ने उस महामूढा भान को भी तब शाप दे दिया था। हे मूढ ! जाओ, तू भी इस पाप मा महान् फल जानले । यश कम दे सम्प्राप्त होने पर तेरा विश्वास से मार मार सशाप देवर भूमि अE, APNE.

वामन प्रादुर्भाव तथा कालनेमि वध ] । २६१ 1 में चला गया था । सात मरम्वती जलों में सात मरुन समुत्पन्न हुए थे ॥३५॥ हे महर्षे । यह मरुनो को समुत्ति हमने तुग को बतलादो है जो पूर्व म हुए थे और इस जगत को व्याप्न करने वाले थे। जिनके जन्म का श्रवण करने पर पापो का क्षय हो जाता है और धर्म का महान् उदय होता है ॥७॥ ७३-वामन प्रादुर्भाव तथा कालनेमि वध एपदथं वलिदैन्यः कृतो राजा लिप्रिय । मन्त्रप्रदाता प्रह्लाद शुक्रश्वासीत्पुरोहितः ।। ज्ञात्वाऽभिषिक्त दतय विरोचनमुत बलिम् । दिदृक्षव समायाना यमरा पर्व एव हि ॥२ नानागतानिरीक्ष्यंव पूजयित्वा यथाक्रमम् । पप्रच्छ कुलजान्सर्वान्किनु श्रेयस्कर मम ॥३ ततस्तै प्रोचुरेचन शृणु चासुरसुन्दर । यत्ते श्रेयस्कर कर्म यदस्माक हित तथा ॥४ पितामहस्तथैवासीबली दानवपालकः । हिरण्यकशिपुर्वीरः स शवोऽभूज्जगत्रये ॥५ तमागत्य सुरथतो विष्णु सिंहवपुर्घर. । प्रत्यक्ष दानवेन्द्राणा नविशक्लीकृत. ॥६ अवकृष्टश्व राज्यात्स त्र्यम्बकेण महात्मना। अस्मदर्थे महाबाहो शकरेण विशूलिना ।।७ महपि पुलस्त्य ने कहा-हे नारद । इसके लिये ही कलिप्रिय दैत्य बलि को राजा किया गया था। मात्र का प्रदान करने वाले प्रल्हाद पे और मुशचार्य पुरोहित हुए थे ॥१॥ विरोचन के पुत्र को देतेय बलि को अभिषिक्त जान कर सभी देवगण उसे देखने की इच्छा वाले होकर वहां आये ये ॥२॥ उन समस्त देवों को यहां पर ममागत हुए देख कर ही उसने यपारम उन सबका पूजन विपापा और फिर उन २६२ [ यामन पुराण समो पुलजों से पूछा था कि मेरा धंय करने पाला या समं है ॥३॥ इसके पश्चात् उन देवगण ने उस बलि मे कहा पा-३ अमुर्गे मे परम सुन्दर ! सुनो । तेरा जो पस्कर पर्म वही है जिसमे हमारा हित सम्पादिन हो ॥४॥ तुम्हारे पितामह भी उमी प्रहार प ये जो वती और दानवो के पालक थे। हिरण्यकशिपु गो बहुन वीर थे। वह इम जगत्त्रय म इन्द्र हुए थे ।।५।। उपक ममीप में मुर विष्णु ने मिह का वपुधारण किया था और उसके पास पाकर दानवेन्द्रों के मामने ही प्रत्यक्ष रूप से अपने नषो मे चीर डाला था ॥६॥ महात्मा सम्बक ने हमारी भलाई के लिये हो हे महाबाहो ! त्रिशूलधारी भगवान् शकर ने उसे राज्य से अवकृष्ट कर दिया था ॥७ तथा तव पितान्योऽपि जम्भः शकण घातितः । कुजम्गो विष्णुना चापि प्रत्यक्ष पशुबद्धतः।। शङख पाको महेन्द्रण भ्राता तव सुदशनः । विरोचनस्तव पिता निहतः कथयामि ते ॥ श्रुत्वा गोत्रक्षय ब्रान्कृत शक्रेण दानवः । उद्योग कारयामास सह सर्वैमहासुरैः ।।१० रथैरन्ये गरन्ये वाजिभिश्च परेऽसुराः । पदातयस्तथाऽप्यन्ये जग्मुयु द्धाय देवताः ॥११ यथोऽग्ने याति बलवान्सेनानाथो भयकरः। सैन्यस्य मध्ये बलिन. कालनेमिश्च पृष्ठतः ॥१२ वामपार्श्व मवष्टभ्य शाल्वः प्रथित.विक्रमः। प्रयाति दक्षिण घोर तारकारयो भयकरः ।।१३ दानवाना सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । सप्रयातानि युद्धाय देव. सह कलिप्रिय ॥१४ उसी भाति बापके पिता और अन्य भी जम्म शक के द्वारा घातित हुआ था। विष्णु ने कुजम्भ को प्रत्यक्ष रूप से एक पशु की भौति भार हाला था ॥८॥ तेरा भाई सुदर्शन पाक शख महेन्द्र ने तथा तेरे पिना 1 विरोचन का भी निहत किया था यह हम तुझसे कहते हैं ॥६॥ हे ब्रह्म वामन प्रादुर्भाव तथा कालनेमि वध ] [ २६३ उस दानव ने शक के द्वारा अपने गोत्र का क्षय ओ किया गदा या उने श्रवन किया था और फिर ममो महाकुरों के माय उसने उद्योग कराया पा ॥१०॥ कुछ लोग रयो के द्वारा-अन्य लोग गजो और अरबो के द्वारा अमुरगम पदानि सुमरिजन होकर देगमप मे पुन करने के लिये गये ये ॥११॥ मर दैत्य बहुर ही बलवान् या वही मदने भागे था। यह महान् भयकर मेनापनि पा। उम मेना के मात्र में बलिया और पोके कारनाम दवया ॥१२॥ मेना के वाम भाग को रोककर प्रधित पराक्रम वाना झाल्व था । घोर दक्षिण भाग को महान् भयकर तारक नाम वाला देर सेना में जा रहा या ॥१३॥ दानों को संग बहुत ही विशाल थी। महतो प्रयुत और अर्बुद दैत्य देवों के साथ युद्ध करने के लिये हे कनिकलद) प्रिय रण स्थर मे रवाना हो गरे ये ॥१४॥ श्रुत्वाऽसुराणामुद्योगं शक मुरपनि, सुरान् । उवाच योग दैत्यानां योद्ध स्वबलसयुनः ।।१५ इत्येवमुक्त्वा वचन सुरराट स्यन्दन वलो। समारुरोह भगवान्यतमातलिवाजिनम् ।।१६ समास्ढे सहस्राक्षे स्यन्दन देवता गताः । स्वं स्वं वाहनमारुह्य निश्चेयुकाक्षिणः ॥१७ आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वऽश्विनो तथा । विद्याधरा गुह्यकाश्च यक्षराक्षसपन्नगा ॥१८ राजर्पयस्तथा सिद्धा नानाभूनाश्च सघराः । गजानन्ये रथानन्ये हयानन्ये समारुहन ॥१६ विमानानि च शुभ्राणि पक्षिवाह्यानि नारद । समारुहााद्रवन्सर्वे यतो दैत्यबल स्थितम् ॥२० एतस्मिन्नन्तरे धोमान्वंनतेयः समागतः । तस्मिन्विष्णुः सुरश्रेष्ठस्त्वधिरूढः समभ्यगात् ।।२१ असुरो के इस महान् उद्योग को सुनकर देवों के पति इन्द्र से कहा था कि वे भी अपने दल से सयुत होकर देशों से . २६४ ] [ वामन पुराण का योग करें ॥१५॥ इतना कह कर सुरों के राजा बलवान इन्द्र ने अपने रथ पर समारोहण किया था जिम रथ के अश्वो को होने वाला मातलि सारथि था ॥१६) इन्द्र के रथ पर समारत हो जाने पर समस्त देवगण भी अपने २ वाहनो पर आरूढ होकर युद्ध की इच्छा वाले होकर निकल पडे थे ॥ १७॥ आदित्य-नमुगण-रुद्रवृन्द-माध्य.विश्वे- देश-अश्विनी कुमार-विद्याधर-गुह्यक-तक्ष राक्षस-पन्नग-राजर्षि वर्ग सिद्ध और अनेक भूनो के सघ सभी निकल कर चल दिये थे । अन्य गजों पर कुछ रथो पर और कुछ अश्वो पर समारूढ हो गये थे ॥१६॥ है नारद ! कुछ पक्षि बाह्य शुभ्र विमानो पर चढ कर धावमान हो गये थे। सभी लोग वही पर दौड़ पडे ये जहाँ वह दैत्यो का विशाल दस सस्थित या ॥२०॥ इसी बीच मे परम धीमान् वैनतेय वहाँ पर आ गया था। उस पर मुरों में श्रेष्ठ विष्णु भगवान चढ कर वहां आये ॥२१॥ तमागत सहस्राक्षत्रं लोक्यपतिमव्ययम् । ववन्द मूर्नाऽवनतः सह सर्वैः सुरोत्तमैः ॥२२ ततोऽग्ने देवसैन्यस्य कात्तिकेयो गदाधरः। पालयजघन विष्णुर्याति मध्य सहस्रदृक् ॥२३ वाम पार्श्वमवष्टम्य जयन्तो वतंत मुने । दक्षिण वरुणः पार्वमवष्टभ्यागमबली ।।२४ ततोऽमराणापृतनायशस्विनीस्कन्देन्द्रविष्णूरुणसूर्यपालिता। नानानशस्त्रोद्यतदो:समूहा समाससादारिवल महीधे ॥२५ उदयाद्रितटे रम्ये शुभे समशिलातले। निवृक्षे पक्षिरहिते जातो देवासुरो रणः ।।२६ सन्निधानात्तपो रौद्रः सेनयोरभवन्मुने । महीने शान्तरजसि तद्दानववल महत् ॥२७ अभ्यद्रवन्त सहसा सम स्कन्देन देवताः। निजघ्नुर्दानवान्देवाः कुमारभुजपालिता २८ भगवान विष्णु को वहां पर समागत देखकर जो इस त्रिलोकी के स्वामी और अविनाशी हैं इन्द्र ने समस्त देवो के सहित पति भवन वामन प्रादुर्भाव तथा कालनेमि वध ] होकर शिर से वन्दना की थी ॥२२। इसके पश्चात् देवों को सेना के पति गदाधर स्वामि वातिय सबसे आगे थे। मध्य भाग की रक्षा करते इन्द्र उपस्थित थे और अन्तिम भाग का माण करके विष्णु स्थित हुए थे ॥२३॥ है मुने ! वाम भाग को रोक कर जयन्त थे। दक्षिण माग मे बलवान् वरुण थे ।।२४। इस प्रकार से देवों को बलवती सेना शत्रु की सेना के समीप पर्वत पर प्राप्त हो गई थी ॥२५॥ परम सुरम्प उदयाद्रि के तट पर जो अत्यन्न शुम और ममान शिलाओ के तल वाला था तथा वृक्षो एक पक्षियो से भी रहित था यह देवों और असुरों का युद्ध हुआ पा ॥२६॥ उन दोनों सेनाओ के समीप मे आ जाने से है मुनिवर ! वह युद्ध बहुत ही रोद्र हो गया था। अति शान्त रन वाले उस महीन पर वह महान् दानवी का बल था ।।२१।। स्वामि कात्ति. केय के साथ मभी देववृन्द ने सहमा आक्रमण किया था और कुमार की भुजाओ से परिरक्षित देवो ने दानवो को मार दिया था ॥२८॥ देवानिजघ्नुदितिजा मयगुप्ताः प्रहारिणः । महीधरोत्तमे पूर्व यथा वानरहस्तिनोः ।।२६ रणरेणू रथोद्ध तः पिङ्गलो रणमूर्धनि । सध्यानुरक्तः सहशो मेघः खे सुरतापस ॥३० तदाऽऽसीत्तुमुल युद्ध न प्राज्ञायत किंचन । श्रूयन्ते त्वनिशं शब्दाश्छिन्धि भिन्धोति वादिनाम् ॥३१ ततो विशसनो रोद्रो दैत्यानां देवतः सह । जातो रुधिरनिप्पन्दो रजसः शमनात्मकः ॥३२ शान्ते रजसि देवोधास्तानववलं महत् । अभ्यद्रवन्नसहिताः सम स्कन्देन धीमता ॥३३ निजघ्नुर्दानवान्देवाः कुमारभुजपालिताः। देवानिजघ्नुर्दैत्याश्च मयगुप्ताः प्रहारिणः ।।३४ ततोऽमृतरसास्वादाद्विनाभूता. सुरोत्तमाः । निजिता समरे दैत्यः समं संन्येन नारद ॥३५ ' बामन पुराण उघर मय दानव वे द्वारा रक्षित प्रहार करने वाले देस्यों ने देवों का हनन किया था । उस उत्तम महीधर पर पहिले जिस तरह वानर और हस्तियों का युद्ध हुआ था उसी भांति यह युद्ध हो रहा था दी। हे देवपि बर ! रयो के सचरण से उठा हुआ रण स्थल का रेणु रिंगल वर्ण का ऊपर आकाश मे सध्या से अनुरक्त मेघ के समान छा गया या॥३०॥ उस समय में ऐसा तुमुल युद्ध हुआ था कि भी नही जाना जाता था। केवल ये ही शब्द सुनाई दे रहे थे 'काट दो-भेद दो' जो कि लडाकू लोग मुंह से बोल रहे थे ॥३१॥ इसके पश्चात् देवों के साथ युद्ध करने वाले दैत्यो का महान् रौद्र रुधिर का निस्सन्द हुआ था जो उम छाई हुई रज को शमन कर रहा था ॥३२॥ उस रज के शान्त होने पर देवो के समूह ने उस महान् दानवो की सेना पर आक्र- मण किया था जो कि धीमान् स्कन्द की सुरक्षा मे थे ॥३३॥ कुमार को भुआ से पालित देव दानवो को और मय देस्य से रक्षित देस्य देवों का हनन कर रहे घे ॥३४॥ है नारद ! उम समर मे अमृत के रसा- स्वाद विना भूत देवों को दैत्यो ने सेना के साथ जीत लिया था ॥३॥ विनिजितान्सुरान्दृष्ट्वा वैनतेयध्वजोऽरिहा । शाङ्गमुद्यम्य वाणौनिजधान ततस्ततः ॥३६ विष्णुना हन्यमानास्ते दानवा गरुडोऽप्यथ । दतेयाः शरणं जग्मुः कालनेमि महासुरम् ।।३७ तेभ्यः स चाभयं दत्त्वा प्रययो यर माधवः । विवृद्धिमगमद्ब्रह्मन्यषा व्याधिरपेक्षितः ॥३८ यं य करेण स्पृशति देवं यक्ष सकिन्नरम् । त तमादाय चिक्षेप विस्तृते वदने बली ॥३६ सरम्भादानवेन्द्रो न्यमृदत दितिजः संयुगे देवसैन्यं सेद्र सार्क सचन्द्र फरचरपनरस्त्रहीनोऽपि वेगात । चक्र बश्वानरास्वनिगगनयोस्तियंगूध्वं समन्ताद्वयाप्त पल्पान्तबह जंगदखिलमिदं रूपमासीदिपक्षोः ॥४० वामन प्रादुर्भाव तथा कालनेमि वध वर्णन । ॥ २६७ त दृष्ट्वा वर्धमान रिपुमतिलिन देवगन्धर्वमुख्या: सिद्धा! साव्याच मुख्याभवतरलदृशः प्राद्रवन्दिक्षु सर्वे। पोप्लूयन्ते च दैत्या हरिममरगणरचित चारुमौलि नानाशखानपातविगलितयशस चक्र रुत्सितदर्पाः ॥४१ तानित्यप्रेक्ष्यदैत्यान्मयलिप्रमुखान्कालनेमिप्रधानान्याणरा- कृष्य शात्त्विनवरतमुरोभेदिभिवंचकल्पं. । कोपादारक्तदृष्टि सरथगजहयान्दृष्टिनिधूतवीर्यान्नाराचाख्यः सुपुङ्खजलद इव गिरि छादयामास विष्णुः ॥४२ इम तरह विशेष रूप से निजित मुरों को देख कर शत्रुओं का हनन करने वाले वैनतेय वन ने अपना शाङ्ग धनुष उठा कर सभी ओर वाणो के समूह से दैत्यो का हनन किया था ॥३६॥ भगवान विष्णु के द्वारा हन्यमान होकर उन दैत्यो ने और दानवों ने जिनको कि गरुड भी मार रहा या महान् असुर कालनेमि का शरण लिया था ।।३७॥ उन सद दैत्यो को अभय दान देकर वह कालनेमि वहां पर गया था जहा भगवान् माधव थे। अब तो वह युद्ध और भी वृद्धि को विशेष रूप से प्राप्त हो गया या जैसे कि कोई उपेक्षा किया हुआ रोग बढ जाया करता है ॥३८॥ बलवान् कालनेमि जिस जिस देव यक्ष और किन्नर को हाय से स्पर्श करता था उसी२ को लेकर अपने विस्तृत मुख में अन्दर डाल लिया करता था ॥३६॥ बड़े ही सरम्भ से उस दानवेन्द्र ने उस युद्ध मे दत्वों के साथ देवों को सेना को इन्द्र- सूर्य-चन्द्र के सहित सबको बडे वेग से अस्त्रो से हीन होते हुए भी कर- चरण और नखों से ही मदित कर दिया था उसने वैश्वानर को आमा के तुल्य आमा वाले इनके द्वारा ही भूमि और आकाश में नीचे-ऊपर अलग-बगल समी ओर इस जगत् को ऐसा कर दिया था जो ऊप्लान्त की वह्नि से जलने वाले के समान रूप वाला हो गया था ॥४०॥ उस बढते हुए अति बली शन्न को देखकर सभी देव-गन्धर्व प्रमुख- सि-साध्य आदि भय से कातर दृष्टि वाले होकर दिशाओं में भागने लग गये थे। दौत्य गण ने अगर गणों के द्वारा पूजित, चारु मौलि २६८ [ वामन पुराण हरि को अपने अनेक अस्त्रों के प्रहारों से मिक्त दणं वाले होते हुए विगलिस यश वारे बना दिया था और सभी हरि पर धावा बोल रहे थे ॥४१॥ भगवान् विष्णु ने इस प्रकार से मारमण कारी उन सब त्यो को देख कर जिनमें मर-बलि प्रमुग थे तथा घालनेमि प्रधान था अपने शाङ्ग धनुप से निरन्तर दाणो को खीच कर जो कि पर: स्थल का भेदन करने वाले वन के तुल्य थे, क्रोध से रक्त दृष्टि बाले होकर दृष्टि से ही नियंत पराक्रम वाले दैत्यो को रथ-गज और अशी के सहित सुन्दर पुख वाले नाराचों से जैसे मेघ गिरि का छादन कर दिया करता है उसी माति विष्णु ने सबको छादित कर दिया था ॥४॥ ते वाणश्छाद्यमाना हरिकरमुचितः कालदण्डप्रकाशैन!राचं. रर्धचन्द्र वलिमयपुरगा भीतीतास्त्वरन्तः । प्रारम्भे दानवेन्द्र शतमखमथनं प्रेतयन्कालनेमि स प्रायाद्दे वसंन्यप्रभुममितवलं केशवं लोकनाथम् ॥४३ दृष्ट्वा त शतीमुद्यतगदं शैलेन्द्रशृङ्गाकृति विष्णुः शाङ्गमपास्य सत्वरमथो जग्राह चक्र' करें। देवेनैव समेत्य दैत्यविटपप्रच्छेदने मालिन प्रोवाचाथ विहस्य त च सुचिर मेघस्वनो द.नवः ।।४४ अय स दनुपुत्रजिद्दनुजसंन्यवित्रासकृद्रिपुः परमकोपनो मम विघातकृत्वायुधी। हिरण्यनयनान्नको विविध पुष्पपूजारतिः क्व याति मम गोचरे निपतित: खलोऽसहशः ॥४५ योप सम्प्रति ममाहवमभ्युपैति नून न याति निलय निजमम्बुजाक्षः । मन्मुष्टिपिष्टशिपिलाङ्गमुपान्तभस्म सद्रक्ष्यते सुरजनो भयकातराक्षः॥४६ इत्येवमयावा मधुसूदन वै स कालनेमिः स्फुरिताधरोष्ठः । गदा योन्द्रोपरि जातरोधो ममोच धौले कुलिंश यथेन्द्रा १४७ वामन प्रादुर्भाव तथा कालनेमि वध वर्णन ] [ २६३ तामापतन्ती प्रसमीक्ष्य विष्णुर्घोरा गदा दानववाहुमुक्ताम् ।' चक्रण चिच्छेद सुदुर्गतस्य मनोरथ पूवकृत हि कर्म ।।४८ गदा छित्त्वा तदा विष्णुर्दानवस्य सुदारुणाम् । समुपेत्य भुजौ पीनी सचिच्छेद वेगवान् ।।४६ वे सब दैत्यगण जिनमे मय और बलि पुगेगामो थे हरि के करों से मुक्त कालदण्ड के समान प्रकाश झाले अधच द्र नाराचो से छाद्यमान होकर भय से भीत होकर भाग रहे थे। बारम्भ में शनमख के पथन करने वाले दानवेद्र कालनेमि को देखते हुए ही व दैत्य भाग रहे थे। वह काल नेमि दानव देवो को सेना के स्वामी अमित वल वाले लोकनाथ के शव के समीप पहुंचाया ॥४३॥ उस सौ शीर्ष वाले शैलेन्द्र को शिखर के समान आकृति वाले-गदा हाथ मे ग्रहण किये हुए उस कालनेमि को देखकर भगयान् विष्णु ने शाङ्ग धनुप को छोडकर अपने हाथ में शीघ्र ही सुदर्शन चक्र लेलिया था। उस समय में मेघ के समान ध्वनि वाले उस दानव ने दैत्य रूपी विटयो के छेदन करने वाले देवो के सहित समुपस्थित मालाधारी प्रभु को देखकर बहुत देर तक हंसते हुए उनसे यह बोला-॥४४॥ यही वह दनु के पुत्रो को जीतने वाला- दनुजो की सेना को मस्त करने वाला शन, परम क्रोधी, आयुधधारी शन है जो मेरे विघात को यहां आया है । यही हिरण्य नयन के नाश' करने वाला है और विविध पुष्पो से पूजा में रति रखने वाला है। अरे ! असदृश खल | अब नो मेरी दाट म आगया है । अब कहां जा रहा है ॥४५॥ य द यह अब मेरे साथ युद्ध करता है तो निश्चय ही अम्बुजाक्ष फिर अपने घर का वापिस नही जा सकेगा। इसको अभी भय से कातर नेत्रो वाले सुरगण मेरी मुष्टि के द्वारा पिष्ट और शिथिल अ गो वाले तथा राम के देर के समान हुए इसको देखेंगे ॥४६।। इस प्रकार से मधुसूदन से कहकर वह कालनमि दैत्य क्रोध से होठो को फडका फर अत्यन्त रुष्ट होते हुए उसने अपनी गदा गरुहादज के ऊपर छहरी से बसे इन अपने वचको पलता पर छेत्या करता था, In भगवान् विष्णु ने अपने कपर आती हुइ उस दानव के द्वारा प्रक्षिप्त तुरन्त हो चिन्न २५० । वामन पुराण परम पोर गदा को देसपर उसे अपने सुदर्शन चक्र कर दिया था जैसे किसी सुद्गत पुरुष का कम पूर्व कृत मनोरथ छिन्न हो जाया करता है ।।४८) उसी समय में भगवान विष्णु ने उस काल- नमि की गदा का छेदन करके जोकि उम दानव की परम दारुण धी। फिर बहे वेग दाले प्रमु ने उसके समीप मे उपस्थित होकर उसके परि- पुष्ट दोनो भुजाओं का छेदन कर दिया था ॥६॥ भुजाभ्यामथ वृत्ताम्या विष्णुना प्रभविष्णुना। कालनेमिस्तथा भाति दग्ध, शैल इवापरः ॥५० ततोऽस्य माधव: कोपाच्छिरश्चरण भूतले । छित्त्वा निपातयामास पक्व तालपल यथा ॥५१ तथा विवाहुविशिरा मुण्डतालो यथा वने। तस्थी मेरिवाकम्प्या कादयः धमाधरेश्वरः ॥५२ त बनतेयोऽप्युरसा खगेन्द्रो निपातयामास मुन धरण्याम् । यथाऽम्बरादाहुशिर प्रनष्ट धन्य महेन्द्रःगुलिशेन भूम्याम् ।। सस्मिन्हते दानव संन्यपाले मसाजमाननिदशैश्च दैत्याः। विमुक्तशस्त्रालय वर्मवस्त्रा; सपाद्रवन्वाणमृतेऽसुरेन्द्राः ॥५४ प्रभविष्णु भगवान् विष्णु के दाग दोनो भुवाओं के कट जाने पर वह दानवेन्द्र कालनेमि उस समय मे ऐमा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई मला हुआ पर्वत हो ॥५०॥ माधव प्रभु ने क्रोध से इसका शिर भी चक्र से काटकर भूतल पर गिरा दिया और वह पके समान भूमि पर गिर गया था ॥५१॥ उम प्रकार से बिना बाहुओ और शिर वाला वन में मुण्ड ताल वृक्ष के तुन्य उम कब-ध ने कम्पित होने के योग्य भूमि घरावर मरु वे समान सुहा था ॥५२॥ पक्षियों के राजा गरज ने अपने वक्ष: स्थल से उसको भो हे मुने ! धरणी म गिग दिया था। उस समय भूमि पर गिरता हुआ उसश घड' ऐसा प्रतीत हुआ या मानों महेन्द्र ने आकाश से दय के द्वारा राह का शिर वाट कर डाल दिया हो ॥ ५३॥ उस दानवों की सना के पालन करने वाले देसराज के मर जाने पर, जोषि देवों के द्वारा ससाध्यमान था, तपा के हुए ताल के पल बलि-वाणादि युद्ध तथा दत्य विजय वर्णन 1 [ २१ वाण के बिना जितने भी अमुरेन्द्र गण थे वे सब के सब अपने शस्त्रास्त्र कवच और वस्त्रो का त्याग कर वहा से भाग गये थे ॥५॥ --- ७४-बलि-वाणादि युद्ध तथा दैत्य विजय वर्णन संनिवृत्तवले बाणे दानवाः सत्वरं पुनः । प्रयाता देवतासेना सशस्त्रायुधलालसाः।। विष्णुरप्यमितौजास्त ज्ञात्वाऽजेय बले: सुतम् । प्राहामन्ध्य सुरान्सर्वान्युध्यध्व विगतज्वराः ॥२ विष्णुनाऽय समादिष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः । युयुधुर्दानवैः सार्ध विष्णुस्त्वन्तरघीयत ॥३ माधवं गतमाज्ञाय शुक्रो बलिमुवाच ह । गोविन्देन सुरास्त्यक्तास्त्वं जयस्वाधुना वले ।।४ स पुरोहितवाक्येन प्रीतो याते जनार्दने । गदामादाय तेजस्वी देवसंन्यमभिद्रुतः ॥५ बाणो बाहुसहस्रण गृह्य प्रहरणान्यथ देव सैन्यमभिद्रुत्य निजघान सहस्रशः ॥६ मयोऽपि मायामास्थाय तस्तै रूपान्तरमुने । योधयामास बलवानमराणां वरूथिनीम् ।।७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-वाण के सनिवृत्त रल पाले होने पर दानव गण फिर शीघ्र ही देवो की सेना की यौर चल दिये थे। सभी दैत्य शस्त्र और आयुधों से सुमज्जित होकर आगये थे ।।१॥ भगवान् विष्णु मी जो अमित मोज से सम्पन्न थे यह जानते थे कि यह बलि का पुत्र वाण अजेय है । उनने समस्त देवो को बुलाकर कहा-अब आप लोग विगत ज्वर अर्थात् सन्ताप चाले होकर युद्ध करो ॥२॥ इस प्रकार से विष्णु भगवान के द्वारा आज्ञा प्राप्त करके इन्द्र आदि सब देव वृन्द दानवो के साथ युद्ध करने लगे थे चोर भगवान् विष्णु वहाँ से अन्त- र्धान हो गये थे ॥३॥ भगवान माधव को गये हुए जानकर शुक्राचार्य ने 1 वामन पुराण राजा बलि से कहा-~~है बले ! अब तो गोविन्द ने सरो को त्याग कर दिया है। यह समय ऐसा है कि आप सुरों को जीतलो | यह बलि ननादन भगवान के चले जाने पर पुरोहित के गश्य से अत्यन्त प्रमात हमा था। फिर गदा लेकर तेजस्वी बलि ने देवों को सेना पर यात्मण कर दिया था ॥५॥ वाण ने भी अपनी सहस्र बाहुओं से प्रहरगों को ग्रहण किया था और देवगण की सहस्रों सेना के वीरों को मार दिया या ॥६॥ है मुने ! मय देस्य भी अपनी माया में समास्थित होकर उन- उन अद्भुत रूपो से बलवान देवी की सेना के सास युद्ध कर रहा था ॥७॥ विद्युजिह्व. परो भद्रो वृषपर्वा सितेक्षणः । विपाको विक्षरः सैन्य तेऽपि देवानुपाद्रवन् ल से हन्यमाना दिसिजर्देवाः शक्रपुरोगमाः । रते जनार्दने देवे प्रापशा विमुखपभवन् । तान्प्रभग्नान्सुरगणारबलियागपुरोनमः। पृष्ठतस्त्वद्रवन्स लोक्यविजिगीषवः ॥१० ससध्यामाना देतेयदेवाः सेन्दा भयातुरा. । त्रिविष्टप परित्यज्य ब्रह्मलोकमुपागताः ॥११ ब्रह्मलोक गतेवित्यं सेन्द्रष्वपि सुरेषु वै । स्वर्गभोक्ता बलिर्जातः समृत्यसुतबान्धवः ॥१२ शक्रोऽभूदलवान्ब्रह्मन्बलिर्वाणो यमोऽभवत् । वरुणोऽभून्मयः सोमो राहु दो महासुरः ।।१३ स्वर्भानुरभवत्सूर्य: शुक्रश्चासीबृहस्पतिः । येऽन्येऽप्यधिकृता देवास्तेषु जाता सुरारया १४ विध निजह्व, पर, भद्र, वृषपर्वा, सितेक्षण, विपाक, विक्षर भी सबै देवताओ की सेना पर धावा बोल रहे थे | दैत्यो के द्वारा बुरी तरह मारे जाते हुए इन्द्र आदि देवगण जनार्दन के वहा घसे जाने पर प्रायः सब युद्ध से परामुप होगये थे | उन मग्न होते ए भागने वाले देवों को बलि और माग आदि प्रमुख दानवो ने लोवर के बीनने की वलि-वाणादि युद्ध तथा दैत्य विजय वर्णन ] [ २७३ इच्छा रखते हुए पीछे से भी खदेड दिया था ॥१०॥ इस तरह दैत्यों के द्वारा संसाध्यमान इन्द्र के महित सब देवगण भय से अतीव आतुर हो गये थे और स्वर्ग को छोडकर ब्रह्मलोक में चले गये थे ।।११।। इस तरह इन्द्र के सहित समस्त देवो के ब्रह्मलोक मे चले जाने पर फिर राजा बलि ही स्वर्ग के सिंहामन का सुख भोगने वाला होगया था और सब उसके भृत्य तथा दान्धव गण भी वहां पर पहुच गये थे।॥१२॥ है ब्रह्मन् ! फिर बलवान् वलि तो इन्द्र बन गया था और वाण ने धर्मराज का कार्य अपने हाथ मे ग्रहण कर लिया था। मय दैत्य वरुण हो गया महामुर हाद राहु सोम बन गया था ।।१३॥ स्वर्भानु सूर्य के आसन पर समामीन होगया था और शुक्राचार्य ने देव गुरु वृहस्पति का काम समान लिया था । और जो अन्य भी अधिकार वाले मुर थे उन पर भी सद असुर ही होगये थे ॥१४॥ पञ्चमस्य कलेरादौ द्वापरान्ते मुदारुणे। देवामुरोऽभूत्सग्रामो यत्र शकोऽप्यभूद्वलिः॥१२ पातालास्तस्य सप्तासन्वशे लोकत्रय तथा। भूर्भुवः स्वः परिख्यातं दशलोकाधिपो वलिः ।।१६ स्वर्ग स्वय निवसति भुञ्जन्भोगान्सुदुर्लभान् । तत्रोपासत गन्धर्वा विश्वासुपुरोगमाः ॥१७ तिलोत्तमाद्या हप्सरसो नृत्यन्ति सुरतापमाः। वादयन्ति च वाद्यानि यक्षविद्याधरादयः ॥ ८ चविष्टपानसौ भोगान्भुजन्दैत्येश्वरो वलिः । सस्मार मनसा ब्रह्म-प्रह्लाद स पितामहम् ।।१६ सस्मृतश्च स पौनेण महाभागवतोऽसुरः। समभ्यागात्वरायुक्तः पातालात्स्यगंमव्ययम् ।।२० तमागत समीक्ष्यवत्यक्त्वा सिंहासन वलिः । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणावुभौ ॥२१ पाचवें कलियुग के आदि मे और द्वापर क अन्न मे यह देवो तथा असुरों का महान् पार सग्राम हुमाया जिम समय मे बलि इन्द्र बिन - २७४ ] [ वामन पुराण गया था |१५सातों पाताल आदि लोक तथा लोकत्रय और भूर्भुव: स्व: जो परिख्यात ऊपर पाले लोक है इन सब दश लोको का बलि स्वामी बन गया था ६१६॥ स्वय राजा बलि स्वर्ग में निवास क्या करता था और सुदुर्लभ भोगो का उपयोग करता था। वहा पर उसकी विश्वावसु प्रमुख गन्धंद उपासना क्यिा करते थे ॥१७॥ तिलोत्तमा आदि अप्सराएं नृत्य किया करती थों जो सुरो के समक्ष में नत्तन करती थी और यक्ष विद्याधर आदि वाद्यो का वादन करते थे 191) इम भांति स्वर्गीय सुखों का उपभोग करते हुए दैत्येश्वर बलि नै है ब्रह्मन् ! अपने पितामह प्रह्लाद का स्मरण किये हुए होने पर वह महा- भागवत असुर शीघ्रता के माथ उस अविनाशी स्वर्ग मे पाताल लोक से भागये थे ॥२०॥ उनको समागत हुए देखते ही बोल मे सिंहासन को स्याग दिया था और दोनों हाथ जोड़ कर पितामह प्रह्लाद के दोनों चरणो की वन्दना की थी ॥२१॥ पादयोः पतित वीर प्रह्लादस्त्वरितो वलिम् । समुत्थाप्य परिष्वज्य विवेश परमासने ॥२२ त बलिः प्राह भो तात त्वत्प्रसादारसुरा मया। निजिला. शकराज्य च हत वोयवलान्मया ॥२३ तदिद तात मद्वौर्यविनिजितसुरोत्तमम् । लोक्यराज्य भइक्ष्व त्व मयि भृत्ये पुरः स्थिते ।।२४ ऐरावत: पुण्ययुतो भविष्यामि यथाऽन्वहम् । त्वदधिपूजाभिरतस्त्वच्छिष्टारभोजनः ।।२५ न स पालयते राज्य धृतिर्भवति सत्तम । न योऽनुतिष्ठति गुरुमुथूपा कुरुते न यः ।।२६ ततस्तदुक्त वलिना वाक्य शुरवा द्विगोत्तमः । प्रलादो ययन प्राह धर्मवामाथसाधनम् ॥२७ मया कृत राज्यमयटक पुरा प्रशासितान्तः सुहृदो नुपूजिता । दसयथेष्ट जनितास्तथाऽमजा.स्थितौल सम्प्रतियोगसाप:२८ बलि-वाणादि युद्ध तथा सैन्य विजय वर्णन 1 [ २७५ एक इम भांति विनयावनत होकर अपने चरणों मे पड़े हुए वोर बलि प्रह्लाद जी ने तुरन्त उठा लिया था और उसका परिष्वजन करके फिर उसे परमासन पर बिठला दिया था ॥२२॥ राजा बलि ने फिर उससे निवेदन किया था-हे तात! आपके ही प्रसाद से मैंने समस्त देवो को निजित कर दिया है और मैंने अपने वीर्य के बल से इन्द्रासन का अपहरण कर उसका सम्पूर्ण राज्य को छीन लिया है ॥२३॥ हे तात ! सो अब आप इस बल वीर्य के पराक्रम से जोते हुए सुरो के उत्तम राज्य का सुखोपभोग आप करिये । मैं तो आपके भृत्य केममान सवदा सेवा मे समुस्थित रहूँगा ॥२४॥ इससे मे प्रतिदिन पुष्य युत ऐरावत हो जाऊंगा क्यों कि आपके चरणो को नित्य पूजा और आपका उच्छिष्ट अन्न का भोजन मुझे प्राप्त हुआ करेगा ।।२५।। हे सप्तम ! वह राज्य का पालन नहीं करता है घृति हो जाता है जो अपने गुरु बनो के अनुष्टित नहीं होता है और गुरुवृन्द की सेवा नहीं किया करता है ॥२६॥ हे द्विजोत्तम! दैत्यराज बलि के द्वारा कहे हुए इस वाक्य का श्रवण कर फिर प्रह्लाद ने धर्म-काम और अयं का साधन करने वाला वचन उमसे कहा-॥२७॥ पहिले मैंने भी इमी भौति निष्कण्टक राज्य किया था और सबको प्रशासित करके जो बहुत ही अन्तरङ्ग सुहृद थे उन सबका सादर सत्कार एव समर्चन भी किया था। सबको जितना भी को चाहता था मैंने दिया था। पुत्रो की उत्पत्ति भी की थी और हे वले ! अब मैं योग को साधना करने वाला होकर स्थित हूं ॥२८॥ गृहीत पुत्र विधिवन्मया भूयोऽपित तव । एव भव गुरूणा त्व सदा शुश्रूपणे रतः ॥२६ इत्येवमुक्त्वा वचन करे त्वादाय दक्षिणे। शाक सिंहासने ब्रह्मन्वलि तूर्णमवेशयत् ॥३० सोपविष्टो महेन्द्रस्य सवरत्नमये शुभे। सिंहासने दंत्यपतिः शुशुभे मघवानिव ।।२१ तत्रोपविष्ट वासौ कृताञ्जलिपुटो वलिः । प्रह्लाद प्राह वचनं मेधगम्भीरया गिरा ॥३२ २७६ । [ वामन पुराण यन्मया तात कर्तव्यं लोक्य परिरक्षता। धर्मार्थकाममोक्षेभ्यस्तदादिशतु नो भवान् ॥३३ तद्वाक्यसमकाल च शुक्रः प्रह्लादमब्रवीत् । यधुक्त तन्महाबाहो वदस्वास्योत्तर वचः ॥३४ वचन बलिशुक्राभ्या श्रुत्वा भागवतोऽसुरः । प्राह धर्मार्थसयुक्त प्रह्लादो वायमुत्तमम् ॥३५ है पुत्र । मैंने जो भी विधि पूवक पहिले ग्रहण किया था वह फिर तुमको अपित कर दिया था। इसी प्रा के तुम भी बनो और सर्वदा अपने गुरुजनों की शुधूपा करने मे रति रखने वाले रहो ॥२६। इस प्रकार से यह वचन कह कर ही अपने दाहिने हाथ से उसे पकड कर हे ब्रह्मन् ! फिर प्रह्लाद ने उस बलि को इन्द्र के सिंहासन पर शीघ्र ही बिठा दिया था ॥३०॥ उस महेन्द्र के सम्पूर्ण रत्नी से जटित परम शुभ सिंहासन पर बैठे हुए वह दैत्यो के स्वामी भगवान् को मांति ही सुशोभित हुआ था ॥३१) उस इन्द्रामन पर बैठा हुआ यह बलि हाथ जोडकर प्रल्हाद से मेव के समान गम्भीर वाणी से बोला-~||३२॥ हे तात ! इस कोक्य की रक्षा करते हुए अब मेरा जो भी कर्तव्य हो जिससे धर्म-कर्म-अथ और मोक्ष का लाभ हो सके माप वही अब मुझे उपदेश प्रदान कीजिए ॥३३॥ उसके वाक्य कहने के साथ ही शुक्राचार्य ने प्रल्हाद से कहा-है महाबाहो ! जो भी इसने कहा है उसका उत्तर अब आप दीजिए ॥३॥ ऐसे बलि और शुक्राचार्य दोनो के दचनो को सुनकर वह परम भागवत असुर प्रसाद न धर्य और अयं से समन्धित उत्तम वाक्य पहा था॥३५॥ यदायतिक्षम रानन्वित्त मिभुवनस्य च । अविराधेन धर्मस्य अर्थस्योपार्जन च तत् ॥३६ सर्वसत्त्वानुगमन विवगस्य फल च यत् । परह च यच् यः पुत्र तत्कम चाचर । ३७ यथा श्वाध्य प्रयास्य च यथा कीर्तिमरेत्तव । यथा नायशसो योगस्तथा युरु महायु ते ॥३८ वलि-बाणोदि युद्ध तथा सन्य विजय वर्गन ] ( ર૭૭ एतदथं श्रियं दीप्तां काङ्क्षन्ते पुरुषोत्तमाः । येनंत च गृहेऽस्माकं निवसन्ति सुनिवृताः॥३८ कुलजो व्यसने मग्नः सखिज्ञातिवहिष्कृतः। वृद्धो ज्ञातिगुणो विप्रः कीर्तिश्च यशसा सह ॥४० तस्माद्ययंते निवसन्ति पुत्र राज्यस्थितस्येह कुलोद्भवस्य । तथा यतस्वामलसत्त्वचेष्ट यथा यशस्वी भवितासि लोके ॥४१ भूम्यां सदा ब्राह्मणमूपितायां क्षत्रान्वितायां दृढवापितायाम् । शुश्रूणासक्तिसमुद्भवायामृद्धि प्रयान्तोह नराधिपेन्द्राः ॥४२! हे राजन् ! जो यह आयतिक्षम त्रिमुवन का वित्त है वह सब धर्म का विरोध न करते हुए ही अर्थ का उपार्जन है ॥३६॥ समस्त सत्वों (जोवों) का अनुगमन जो कि विवर्ग (धर्मार्थकाम) का फन होता है और इस लोक पर लोक में जो थेयस्कर कर्म है है पुत्र ! उमो कर्म का तुम समाचरण करो ॥३७॥ है महान् ति से सम्पन्न ! इस समय जिसी रीति से तुम को श्लाघ्यता प्राप्त हो और जिम भी प्रकार से तुम्हारी कीत्ति का विस्तार हो तथा जिम तरह किमी मी अयश का योग न हो वैमा हो तुमको करना चाहिए ॥३८॥ श्रेष्ठ पुरुष इसी के लिये दीप्ठ श्री की कामना किया करते हैं। और जिसमे ये हमारे घट मे सुनित होते हुए निवास किया करते हैं ॥३क्षा कुलजा (कुनीन)- 'कसन में निमग्नसखा और 'ज्ञाति से बहिष्कृत-वृद्ध-जाति-गुणी-विप्र- कीति और यश वहाँ पर है पुन! कुनोगद और राज्यासन पर सस्थित तुम्हारे घर में ये सब निवास जिस भी तरह से करें पंसा हो पल 'करो। हे अमल सत्त्व चेष्टा घाले! तभी तुम इस लोक में यशस्वी हो 'बायोगे ॥४०.४१॥ नराधिपेन्द्र सदंदा दाह्मणों से मूपित-क्षत्रियों से समन्वित-दृढ दापित और शुश्रुपण को थासक्ति के समुद्भव वाली भूमि में यहां लोक में परम ऋद्धि को प्राप्त किया करते हैं ॥४२॥ तस्माद् द्विजाग्रयाःश्रुतिशाखयुक्ता नराधिपांस्ते प्रवियाजयन्तु। यजन्तुदिव्यःक्रतुभिद्विजेन्द्रायज्ञाग्निघूमेननृपस्यशान्तिः १४३ 4 २७८ ] [ वामन पुराण तपोऽध्ययनसंपन्ना यजनेऽध्यापने रताः। मन्तु विप्राः क्षत्रपूज्यास्त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्य हि ॥४४ स्वाध्याययनिरता दातारः शस्त्रजोविनः । क्षख्यिाः सन्तु दैत्येन्द्र प्रजापालनधर्मिणः ॥४५ यज्ञाध्ययनसपन्ना दातारः कृपिकारिणः । पाशुपाल्य प्रकुर्वाणा वैश्या विपरिणजीविनः ॥४६ ब्राह्मणक्षत्रियविशा सदा शुथूपणे रता। शूद्राः सन्तु सुरश्रेष्ठ सवाज्ञाकारिणा: सदा।३४७ यदा वर्णाः स्वधर्मस्था भवन्ति दितिजेश्वराः । धर्मवृद्धिस्तदा स्याव घमवृद्धो नृपादयः ॥४८ तस्माद्वराः स्वधर्मस्थास्त्वया कार्याः सदा बले। तद्वद्धौ भवतो वृद्धिस्तद्धानी हानिरुच्यते ॥४६ इत्य वचःश्राव्य नराधिपेन्द्रो वलिमहात्मा स वसूव तूष्णीम् । ततो यदाज्ञापयसे करिष्ये इत्थ बलि: प्राह वचो मह ।।५० अतएव वेदो और शास्त्रो से युक्त थे द्विजगण उन नराधिपों को प्रतियाजित करें। द्विजेन्द्र गण दिव्य ऋतुओ के द्वारा यजन करें और यज्ञाग्नि की धूम से नृप को शान्ति होवे ॥४३॥ तपश्चर्या और अध्ययन से सुसपन्न-यजन और अध्यायन में रति रखने वाले विष आप से अनुजा प्राप्त करके क्षत्रियों के द्वारा पूज्य हो ॥४५॥ हे दैत्येन्द्र ! सुम्हारे शामन मे ऐसा होना चाहिए सभी क्षत्रिय लोग स्वाध्याय और यश में निरत होवे तथा सब दान शील और शाम जीवी हो । विय गण अपनी प्रजा के परिपालन के धर्म को मानने वाले रहें ॥५५॥ जो वैश्यगण हैं वे सर तुम्हारे प्रशासन में यज्ञ-अध्ययन से युक्त हो-दाता और पि के करने वाले-पशु पालन मे रत एवं विपणि जीवी होने चाहिए ॥४६॥ जो शूद्र वणं वाले मनुष्य हैं वे प्राहाण,दात्रिय मो. चश्यों की भूषणा गरने में रति रपने पाले हो, और हे सत्य! वे आपको पता भाज्ञा का पालन करने वाले होने चाहिए | भी ना पा दितिजेश्वर अपने धर्म में पित होगे सो उस समय २८० 1 । बामन पुराण का परिपालन किया था ||१|| उत्त ममय में कलियुग में मस्पयुग को भानि धर्म से युक्त सम्पूर्ण जगत् को देख कर स्वभाव के निषेध में वह ब्रह्माजी की शरण मे गया था। वहां पहुंच कर इन्द्र और अन्य देव गण के सहित विराजमान देवेश्वर का कलि ने दर्शन प्राप्त किरा था जो अपनी शारीरिक दोसि से सुरासुर के सहित अपने लोक को द्योतिन कर रहे थे ॥३॥ कलियुग ने उन देवेश्वर ब्रह्माजी को प्रणाम किया और उनसे निवेदन किया था कि हे देव श्रेष्ठ ! मेग जो सा- भाविक धर्म है उसको महाराज बलि ने नष्ट कर दिया है अर्थात् मेरे समय मे जो कुछ भी होना चाहिए उसके बिल्कुल विपरीत ही इस समय में हो रहा है ॥४॥ भगवान् ब्रह्मा जी ने बलि की इस प्रार्थना को सुन कर उससे कहा-उस बलवान दैत्यराज बलि ने केवल तेरा ही स्वभाव अपहृत नहीं किया है प्रत्युत सम्पूर्ण जगत् के स्वभाव को हृत कर दिया है ॥५॥ उठकर देख रहे हो देवेन्द्र को-वरुण को और मारत को-इन सब का मभी कुछ अपहृत होगया है । बलि के बल के प्रभाव से विचारा यह भास्कर भी इस समय मे होनता को प्राप्त हो रहा है ॥६॥ इस समय त्रिलोकी में उसके कर्म का प्रतिपेध करने वाला कोई भी नहीं है केवल एक सहस्र शिर और सहस्र कर तथा चरण वाले प्रभु ही हैं जो उसके बल-वंभव का क्षय कर सकते हैं ॥७॥ स भूमि च तथा नाक राज्य लक्ष्मी यशो बलम् । समाहरिष्यति बलिः कर्ताऽसौ धर्मगोचरम्।। इत्येवमुक्तो देवेन ब्रह्मणा कलिरव्ययः। दीनान्दृष्ट्वा स शकादीन्बिभीतकवनं गतः । कृतं प्रावर्तत तदा कलि सीजगत्रये । धर्मोऽभवच्चतुष्णादश्चातुर्वर्येऽपि नारद ||१० तपोहिंसा च सत्यं च शोधमिन्द्रिनिग्रहः। दया दानं त्वानृशंस्यं शुश्रूषा यज्ञकर्म च ॥११ जगन्त्येतानि सर्वाणि परिट्याप्य स्थिानि हि। बलाद्विचलितो ब्रह्म स्तुष्टोऽपि हि कृतः कृतः ॥१२

२८२ ]
[ वामन पुराण
के
स निर्ममे युक्त्यस्तु चतस्रोरूपसयुताः ।
श्वेताम्बरधरा चैव श्वेतस्रगनुलेपना १८
श्वेतवृन्दारकारूढा सत्त्वाढ्या श्वेतविग्रहा।
रक्ताम्बरधरा चान्या रक्तस्रगनुलेपना ।।१६
रक्तवाजिममारूढा रक्ताङ्गी राजसी हि सा ।
पीताम्बरा पीतवर्णा पोतनगनुलेपना ॥२०
सोवर्णस्यन्दनारूढा तामस गुरणमाश्रिता ।
नीलाम्बरा नीलमाल्या नीलगन्धालिसप्रभा ॥२॥
राजा बलि ने इन्द्र की उम पी को समागत देखकर उसमे पूछा
या-तू कौन है और यहाँ मेरे निस्ट किस प्रयोजन से आई है?
॥१५॥ उस पद्ममालिनी श्री ने बलि के इम वचन का श्रवण कर उस
समय में कहा था-है बले ! जिस कारण से मैं तुम्हारे समीप मे अब
समागत हुई हूँ उसे सुनो-मैं महिपो हूँ और बलात् तुम्हारे निकट में
माई हूँ ॥१६॥ भगवान् चक्र और गदा के धारण करने वाले प्रभु
बल को कोई भी सीमा नहीं है। यह देव तो अकित बन पाले हैं।
उनने इन्द्र को त्याग दिया है। अतएव मैं अब तुम्हारे पास आगई है
11१10 उन प्रभु ने रूप लावण्य से सयुत पार युवतियो का सजन किया
था। एक तो श्वेत वस्त्रधारिणी-श्वेत माला तथा श्वेत चन्दन के अनुः
लेपन वाली थी जो श्वेत वृन्दारक पर बा सत्व से युक्त और श्वेत
शरीर वाली थी । एक मन्य रक्त वस्त्रों को धारण किये हुए पी और
उसके कण्ठ मे रक्त वर्ण को माला और लाल हो अनुलेपन पा॥१.
१६॥ रक्त वर्ष की अव पर सवार, रक्त गो वाली यह राजसो
बर्षा रजोगुण से समन्वित पी । एक सरी पोले यस्तों को धारण
करने वाली पीत वर्ग से युक्त-पोली मासा और अनुलेपन वाली यो।
॥२०॥ गुवर्ण रे रस ये समाइ थी। जो तमोगुण का भाषय वाली
पो उम नीले पत्र थे, नीली हो माला भी यो और गेल धाति की
धमाके सुल्प प्रभा से युन थो। पह नील वर्ण' वाले वृष पर समाना
पी। हम सरह वह तीन गुणों वाली कही गई है ॥२१॥

बलि वैभव वर्णन 1 [ २८३ नीलवृपसमास्ढा त्रिगुणा सा प्रकीर्तिता। या सा श्वेताम्बरा श्वेता सत्त्वाच्या कुञ्जरस्थिता ।।२२ सा ब्रह्माण समायाता चन्द्रचन्द्रानुगानपि । या सा रता रक्तवासा वाजिस्था रजसाऽन्विता ॥२३ ता प्रादावराजाय मनवे तत्सुताय च । पीताम्बरा या सुभगा रथस्था कनकप्रभा ॥२४ प्रजापतिभ्यस्ता प्रादाच्छकाय च विशत्सु च । नीलवनालिसदृशा या चतुर्थी वृषस्थिता ॥२५ सा दानवान्नेताश्च शूद्रान्विद्याधरानपि । विप्राद्याः श्वेतरूपा ता कथयन्ति सरस्वतीम् ॥२६ स्तुवन्ति ब्रह्मणा साधु मखे मन्त्रादिभिः सदा। क्षलिया रक्तवर्णा ता जयश्री च शशसिरे ॥२७ जो वह श्वेन अम्बर वाली-श्वेत और सत्व से समन्वित थो वह कुञ्जर पर स्थित थी ॥२२॥ वह चन्द्र और चन्द्र के अनुगो से युक्त होती हुई भी ब्रह्माजी के समीप मे समागत हुई थी। जो वाली-लाल वस्त्रो से समाता, अश्त्रपर समारूढ और रजोगुण से युक्त थी उसे देवराज, मनु मोर उसके पुत्र के लिये दिया था। जो पोत अम्ब वाली, सुमगा, रथ पर स्थित और कनक के समान प्रभा वाली थी।।२३-२४॥ उमको प्रजापतियो के लिये-इन्द्र के लिये विशदों में दिया था । जो चौथो नोल वस्त्र और भ्रमर की भौति थो वह वृप पर स्थित थो॥२५॥ उसको दानवो, नतों, शूदों और विद्याधरों को प्रदान किया था। विन आदि लोग उस श्वेत रूप वाली को सरस्वती कहा करते हैं ॥२६॥ ब्रह्मा के साथ ये लोग मख मे इसका मन्त्रादि के द्वारा सदा स्तवन किया करते हैं। क्षत्रिय लोग उस रक्त वर्ण वाली को जय श्री कहा करते थे ॥२७॥ राा चन्द्रोण सुरथेष्ट मनुना च यशस्विनी। वैश्यास्ता पीतवसना कनकाङ्गी सदैव हि ॥२८ - वह रक्त व । ।

२८४ ॥ [ वामन पुराण स्तुवन्ति लक्ष्मीमित्येव प्रजापालस्तथैव हि । शूद्रास्तां नीलवर्णाङ्गी स्तुवन्ति हि सुभक्तितः ॥२६ प्रियदेवीति नाम्ना ता सदत्य राक्षसंस्तथा। एव विभक्तास्ता नार्यस्तेन देवेन चक्रिणा ॥३० एनामा च स्वस्पस्थास्तिष्ठन्ति निधयोऽव्ययाः। इतिहासपुराणानि वेदा: साङ्गास्तथोक्तयः ॥३१ चतु पष्टिकला: श्वेता महापमो निधिः स्थितः । रत्नानि स्वर्णरजत गजाश्वरथभूपणम् ॥३२ शस्त्रास्त्रादि वस्तूनि रक्ता पद्मो निधिः स्मृतः । गोमहिष्यः खरोष्ट्राश्च सुवर्णाम्वरभूमयः ॥३३ ओषध्यः पशवः पोता महानीलो निधिः स्थितः। सर्वासामपि जातीना जातिरेका प्रतिष्ठिता ॥३४ अन्येषामपि सही नीलाशखो निधिः स्थितः। एताभिश्च स्थिताना च यानि रूपाणि दानव । भवन्ति पुरुषाणा वै तन्निबोध वदामि ते ॥३५ हे सुर श्रेष्ठ ! वह चन्द्र और मनु से यश वाली थी। वैश्य लोग पीत वर्ण चाली तथा पीले वस्त्रो से भूपित और सुवर्ण के समान अंगों बालो को सर्वदा लक्ष्मी कह कर उसकी स्तुनि किया करते हैं और उसी भाति प्रजा के पालक होते हैं । जो चौथी नील वर्ण के अगों वाली थी उसको शूद्र लोग बहुत मक्तिभाव से दैत्यो तथा राक्षसो के सहित प्रिय देवी कह कर उमका सदा स्तवन किया करते हैं। उस देवे- श्वर चको ने उन नारियो का इस प्रकार से विभाजन किया ॥२८. ३०॥ इनके स्वरूप मे स्थित रहने नाली बम्पय विधियाँ थी। इनि. हास पुराण-वेद और उनके सभी अंग शास्त्र एव उक्तियों थीं ॥३१॥ चौसठ कलाऐं श्वेत और महापद्म निधि स्थित थी 1 सब प्रकार के रन सुवर्ण-रजत-गज-अश्व-रप-भूपण-शस्त्र-अस्त्र प्रभृति वस्तुएं रक्त पदम निधि स्थित थी। इसका नाम रक्त वणं वाली पद्मनिधि हो रहा गया है। गौ भैस-गया-ऊंट-सुवर्ण अम्बर भूमिपा-ओपधिया-पशुगण बलि वैभव वर्णन ] [ २८५ ये सब पीत वर्ण की पद्मनिधि कही गई है जो कि जहाँ स्थित थी। सबकी जातियों में भी एक ही जाति प्रतिति थो ॥३२-३४॥ अन्यों का भी संहार करने वाली नीलवर्ण को शस निधि स्थित थी। इनके द्वारा स्थित सभी निधियों के जो मो कुछ स्वरूप थे । हे दानव ! वे सब पुरुपों को होते हैं उन को सब को समझलो। मैं तुमको बतलाता हूँ॥३५॥ सत्यशोचामिसंयुक्ता बलदानोत्सवे रताः । भवन्ति दानव पते महापद्माश्रिता नराः॥६ यग्विनो सुभगा दृप्ता मालिनो वहुदक्षिणाः । सर्वसामान्यसुखिनो नराः पद्याश्रिताः स्थिताः ॥३७ सत्यानृतसमायुक्ता दानाशरणयज्विनः। न्यायान्यायव्ययोपेता महानीलाधिता नराः ।।३८ नास्तिका शोच रहिताः कृपणा भोगवजिताः। स्तेयानृतकथायुक्ता नराः शङ्खाधिता बले ॥३६ इत्येव कथितस्तुभ्यमासां दानव निर्णयः ॥० अहं सा रागिणी नाम जयश्रीस्त्वामुपागता । ममास्तिद निवपते प्रतिज्ञा साधुसंमता ॥४१ समाश्रयामि शोशिंन च क्लीव कथंचन । न चास्ति तव तुल्योऽन्यस्त्र लोक्येऽणि बलान्वितः ॥४२ हे दानवों के स्वामिन् ! सत्य और शौच से जो अभिसयुक्त होते हैं तथा बल-दान और उत्सव में जो रति रखते हैं वे ही मनुष्य महा पद्म श्रित होते हैं ॥३६॥ यजन करने वाले-मुभग, दप्त, मानापारी, बहुत दक्षिणा वाले एवं सब प्रकार का सामान्य सुख वाले मनुष्य पद्मा- श्रित होकर स्थित रहा करते हैं ॥ ३७ ॥ सत्य और अनृत से समायुक्त, धना शरण यजन करने वाले न्याय, अन्याय और व्यप से समुपेत मनुष्य महानोल के बाधित हुआ करते हैं ॥३८॥ ईश्वर की सत्ता को नही मानने वाले नास्तिक-~गौच से होन-कृपग-भोगों से वजित स्तंय (चौरी) अन त (मिथ्या) क्या से युक्त नर हे बले !

- २१ ] । वामन पुराण शंखाधित हुआ करते हैं ॥३६॥ हे दानव ! इन विधियों का निर्णय को भी कुछ होता है वह सब तुमको इस प्रकार से बतला दिया गया है ॥४०॥ मैं तो रागिणी नाम वाली जय श्री हूँ जो इम समय तुम्हारे समीप मे आकर उपस्थित हो रही है । है दानवों को पति मेरी एक साधु-सम्मत पतिजा है ॥४१॥ मैं सर्वदा शौर्य के श वाले का ही भमाश्रय किया करती हूँ। कभी भी कलीद पुरुष का आश्रय नहीं लेती हूँ। इस समय इस त्रिलोकी मे तुम्हारे समान अन्य कोई भी बल से समन्वित नहीं है ॥४२॥ त्वया बलवता राजनीतिम जनिता ध्रवा। यत्वया युधि विक्रम्य देवराजो विनिजितः ॥४३ अतो मे परमप्रीतितिा दानव भाश्वती। दृष्ट्वा ते परमं सत्त्व सर्वेभ्योऽपि बलाधिकम् ॥४४ शौण्डीर्यमानित वीर ततोऽह स्वयमागता। नाश्चर्य दानवश्रेष्ठ हिरण्यवशिपो. कुले ।।४५ प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तव कम यदीदृशम् । विशेषतस्त्वया राजन्दैतेय:प्रपितामहः ।।४६ विजित च क्रमाद्येन लोक्य वै परहृतम् । इत्येवमुक्त्वा वचन दानवेन्द्र जगन्मयो । ४७ जयभीश्चन्द्रवदना प्रविष्टा द्योतयच्छुभा। तस्या चव प्रविष्टाया विधवा इव योपितः ।।५८ समाश्रयन्ति बलिन ह्रीः कीर्ति तिरेव च । प्रभा गतिः क्षमा भूतिविद्या नीतिर्दया मतिः ।।४६ धृतिः स्मृतिर्वल कीतिधृतिः शान्तिः क्रिया द्विज ।

बलि वैभव वर्णन ]
.[ २८७
इसी कारण से मुझे तुमसे निरन्तर रहने वाली परम प्रीति उत्पन्न हो
गई है क्योकि मैंने तुम्हारा परम सत्व जो सभी से बल मे अधिक है
देख लिया है ॥४४॥ आप शोण्डीयमानी वोर हैं अत एव में स्वयं ही
थापके पास समागत होगई हूं। हे दानवों में प्रेष्ठ! कोई भी आश्चर्य
नहीं है कि हिरण्यकशिपु के कुल मे प्रसूत असुरेन्द्र आपका ऐमा कम्म
है । विशेष रूप से है दैतेय ! हे राजन् ! आपने अपने पिता मह
को भी जीत लिया है कि जिमने क्रम से परो के द्वाग हृत त्रैलोक्य को
विजित कर लिया है । इस प्रकार से यह दानवेन्द्र से वचन कह कर
पह चन्द्रमा के समान मुख वालो जगन्मयी शुमा जय श्री गु तिमती होती
हुई प्रवेश कर गयी थी। उसके प्रविष्ट होने पर विधवा नारियां बलशाली
का जिस तरह समाप्रय ग्रहण कर लेती हैं व से ही राजा बालि का
भी ही वीति, यति, प्रभा, गति, क्षमा, भूति, विद्या, नीति, दया,मति,
श्रुति, स्मृति, वल, धृति, शान्ति, किया, पुष्टि, तुष्टि तथा इमी माति
अन्य सभी ने इस सव श्री वाले के अन्दर अपना अवस्थान बना लिया
पा॥४५-४६॥ सब ने बलि कर समाश्रय लिगा और यथा सुख वहाँ
विश्राम करते थे ॥५०॥
एवगुणोऽभूद्दनुपुगयोऽसौ वलिमहात्मा शुभबुद्धिरात्मवान् ।
यज्वातपस्वीमृदुरेवसत्यवारदाताविभर्ता स्वजनान्त्सुगोप्ता ॥५१
निविष्टप शासति दानवेन्द्र नासीत्घातों मलिनो न दीनः ।
सदोज्ज्वलोधमरतोऽयदान्त.कामोपमोगीमनुजोऽपि जातः ॥५२
इस प्रकार के मद्गुणो से सुसम्पन्न यह महात्मा दनुव -~-शुभ
बुद्धि वाला, आरमवान्, यज्वा, तपस्वी, मृदु,मत्य बक्ता, दानशील, भरण
का और स्वजनों को सुरक्षा करने वाला हुबा ॥५१॥ स्वर्ग का
शामन इम दानवेन्द्र दमि के करने पर समुतन मनुष्य भी कमी भूष
से पोहित, मलिन, दोन नही रहा था और मदा उज्जवल, धर्म में रवि
रपने बाला-दमन शोल-कामोप भोगी रहता था ॥५२॥

२८८ ]
। वामन पुराण
७६-अदिति वर प्रदान वर्णन
गते त्रैलोक्य राज्ये तु दानवेषु पुरंदरः।
जगाम ब्रह्मसदन सह देवैः शचीपतिः ॥१
तनापश्यत्त देवेश ब्रह्माण कमलोद्भवम् ।
ऋपिभिः सार्धमासीन पितरं स्व च कश्यपम् ॥२
ततो ननाम शिरसा शक्र. सुरगणः सह ।
ब्रह्माण कश्यप चव तांस्तु सर्वास्तपोधनान् ॥३
प्रोवाचेन्द्रः सुरैः साधं देवनाथ पितामहम् ।
पितामह हत राज्यं बलिना बलिना मम ॥४
ब्रह्मा प्रोवाच शक्रं तद्भुज्यते हि कृत फलम् ।
शक पृच्छति भो हि किं मया दुष्कृतं कृतम् ॥५
कश्यपोऽप्याह देवेश भ्रूणहत्या कृता त्वया ।
त्वया गर्भो दित्युदरात्कृत्तो हि बहुधा बलात् ॥६
पितर प्राह देवेन्द्रः स मातुर्दोपतो विभो।
तन्नून प्राप्तवान्गर्भो यदशीचा हि साऽभवत् ॥७
महर्षि पुलस्त्य ने कहा-मस्त त्रिलोकी का राज्य दानों के हाथ
मे चले जाने पर शधी का पति पुरन्दर सब देवर के साथ ब्रह्माजी
के निवास स्थान पर पहुंचा था ॥१॥ वहाँ पर इन्द्र ने कमलोद्भव
देवों के ईश भगवान ब्रह्माजी का दशन किया था और अन्य ऋपि धृन्द
के साप विराजमान वहां पर अपने पिता कश्या जी को भी देखा पा
॥२॥ इसके उपरान्त वहा हम ने समस्त सरगणो
साथ ब्रह्माजी
को अपने पिता रश्यप जी को और सम्पूर्ण विराज मान सस्त्रियों को
प्रणाम पिया था ॥३॥ फिर इन्द्रदेव सुरो ये सहित देवनाय पितामह
से बोला-हे पितामह ! पति बनमाला बलि ने मेरा राज्य छीन लिया
है। ब्रह्मामी ने रहा है इन्द्र ! तुम यह सब रिये हुए पामत
हो फल भोग रहे हो ने पूछा-हे मगर ! वताये, मैं ऐमा
सपा दृषत रिया है ॥५॥ पश्यप में भी कहा-देवेश ने भग

अदिति वर प्रदान वर्णन ] । २८३ हत्या की है । तूने बल पूर्वक दिति के उदर में गनं को काट दिया या ॥६॥ देवेन्द्र ने पिता से कहा- हे विभो ! वह सब कुछ माता के ही दोष से हुया था। वह गर्भ तो निश्चय ही प्राप्त हुप्रा पा क्यो कि यह अशोचा हो गई थी ॥७॥ ततोऽग्रवीत्कश्यपस्तु मातुर्दोप: सदा सताम् । गतस्ततोऽपि निहतो दासोऽप कुलिशेन ते ॥८ तच्छत्वा श्यपवच: प्राह शकः पितामहम् । विनाश पाप्मनो बहि प्रायश्चित्त प्रभो मम ।। ब्रह्मा प्रोवाच देवेश वसिष्ठः कश्यपम्मथा। सवस्य जगतश्चापि शक्रस्यापि विशेषतः ॥१० शङ्खचक्रगदापाणिर्माधवः पुरपोत्तमः। त प्रपद्यस्व शरण स ते सर्व विधास्यति ।।११ सहस्राक्षोऽपि वचन गुरूणा संनिशम्य वै । प्रोवाच स्वल्पकालेन पश्चिदृष्टो महोदय॥१२ इत्येवमुक्तः सुरराविरश्चिना मरीचिपुत्रेण च कश्यपेन । तथैव मित्रावरुणात्मजेन वेगान्मही पृष्ठमवाप्य तस्थो ।।१३ कालसरस्योतरत: सुपुण्यस्तथा हिमाद्ररपि दक्षिण-यः । कुशस्थलात्पूर्वत एव विद्युतो वसो. पुरात्पश्चिमतोवतस्थे ॥१४ इसरे पश्चात् थप ने महा-मरपुरुषो को माता का आरममा हो गत होता है। फिर भी तने पुलिस के द्वारा यह दाग भी मार हाला मा म प्रकार के रश्यप वचन का थक्षण र इन्द्र पितामह में बोता है प्रमो! यर पार मेरे पार के विनाश करने वाला जो भी कुछ प्रायश्चित्त हो उमे बनाइये ॥६॥ ब्रह्माजी ने देवेश से पहा--वमिट तया परम्प ने भी कहा-इम सम्पूर्ण जगन् पा और विशेष करो इन्द्रपा भी शग-पर-गमा हापो में धारण करने पाते भगवान पुरोसम माधव स्यामो एवं रक्षा है । अय सुम उनके हो शरण में जामो । वही सर दुक तुम्हारा स्थान पर देंगे ॥१०. ११॥ ने भी गुरुजनों के इम वमन को मनी भानियान करके २६० ] । वामन पुराण थोडी देर मे कुछ प्रसन्न होता हुआ देखा गया था ॥१२।। इस प्रकार ब्रह्मा और मरीधि के पुत्र कश्यप के द्वारा कहे जाने पर सुरों का राजा इन्द्र उसी भांति देग के साथ मित्रावण के आत्मज के साथ भू मण्डल पर प्राप्त होपर स्थित हो गया था ॥१३॥ कालजर के उत्तर भाग मे तथा हिमालय के दक्षिण में स्थित एक सुपुष्य स्थल है। वह कुशस्थल स पूर्व की ही और विद्युत है तथा वसु के पुर से पश्चिम मे अब स्थित है ॥१४॥ पूर्व गयेन तिपेन यत्र इष्टोऽश्वमेध. शतशः सुदक्षिणः । मनुष्यमेधोऽपि सहनकृत्वस्तथा पुरा दुर्जयनः सुरारिभिः ।।१५ ख्यातो महामेध इति प्रसिद्धो यथाऽस्य चक्र भगवान्मुरासि। द्वा.स्थत्वमव्यक्ततनुः सुमूर्ति: ख्याति जगामाथगदाधरेति ॥१६ यस्मिद्विजेन्द्रा:श्रुतिशास्त्रवजिता:समत्वमायान्ति पितामहैन । यस्मिन्भक्त्या पूजयन्ये पितृ-स्वान्सोऽनन्यभावेनसकृत्तुचेतसा । फल महामेधमखस्य मानवा दधत्यनन्त भगवत्प्रसादात् ।।१७ महानदी यत्र सुरषिकन्या जलापदेशाद्विमर्शलमेत्य । चक्र जगत्पापविमुक्तमग्र या. सदर्शनप्राशनमज्जनेन ॥१८ तत्र शकः समभ्येत्य महानद्यास्तटेऽद्भुते । आराधनाय देवस्य कृत्वाऽऽशममवस्थित: 111 प्रातःस्नायो त्वध.शायी एकभुक्तोऽप्ययाचितः । तपस्तेपे सहस्राक्षः स्तुवन्देव गदाधरम् ॥२० तस्यंव सप्यतः सम्यक् जितसवेन्द्रियस्य तु । कामक्रोधविहीनस्य साग्र सवत्सरो गत. ॥२१ जहा पर पहिले गय नाम वाले राजा ने शतशः सुदक्षिण अश्वमेध का यजन किया था। मनुष्य में भी पहिले सुरारियो के साथ दुजयन ने सहस्रों वार किये थे ||१५॥ मह पल महामेध-इस नाम से ख्यात है । भगवान् मुरारि ने इसको प्रसिद्ध किया था इस दर पर स्थित अध्यक्त शरीर वाले मुमत्ति गदाधर इस नाम से छयाति को प्राप्ताए पे 1911 मि श्रुति और शास्त्र से रहित विउ गण जिसमें पहुंच कर अदिति वर प्रदान वर्णन ] [ २६१ पितामह की समता को प्राप्त हो जाया करते हैं । जिसमे जो लोग भक्ति भाव से अपने पितृ गण का पूजन करते हुए एक दार मी चित्त दे अनन्य भाव से जो मनुष्य ऐमा करते हैं वे भगवान् के प्रसाद से महामेघ मख का अनन्त फल प्राप्त किया करते हैं।॥१७॥ वहाँ पर मुरपि कन्या महा नदी जल के अपदेश से हिमवान् पर्वत पर पाकर सम्पूर्ण इस जगत् को अत्युत्तमा के दर्शन-प्राशन और मज्जन क द्वारा पापों से एक दम दिमुक्त कर दिया है ॥१८॥ वहा पर नस महा नदी में अघद्भुत तट पर इन्द्रदेव ने आकर देव की आराधना के लिये भायम बना लिया था और उसमें समदम्पित हो गया था ।।१६।। प्रात: कान स्नान करने वाला-भूमि पर शयन करते हुए-अयाचिन एक ही बार अहोरात्र में भोजन करते हुए इन्ट ने गदाघर देव की स्तुनि करते हुए तपस्या की थी ॥२०॥ इस भाति उग्र तप करते हुए और मलो पाठि अपनी समस्त इन्द्रियों को जोत कर वश में रखने वाले तया काम और क्रोध से रहित उस इन्द्र को साप्र सम्बत्सर व्यतीत हो गया था ॥२१॥ ततो गदाधरःप्रीतो वासव प्राह नारद । गच्छ प्रीतोऽस्मि भवतो मुक्तपापोऽमि साम्प्रतम् ।।२२ निज राज्य च देवेश प्राप्स्यसे नचिरादिव । यतिप्यामि तथा शक भावि श्रयो यथा तव ।।२३ इत्येवमुक्तेन गदाधरेण विमजित: स्नाति मनोहायाम् । स्नातस्य दवम्य तदनसो नरास्त प्रोचुरस्माननुशाममस्व ।।२४ प्रोवाच तान्भीषणग्मंकारानाम्ना पुलिन्दान्मम पापसभवाः । वसध्वमेवान्तरमदिमुन्ययोहिमादिवालन्जरयो. पुलि दा.।।२५ इत्येवमुक्त्वा सुराराट् पुलिन्दान्विमुक्तपापोऽमरसिदयो । सपूज्यमानोऽनुजगामचाश्रममातुस्तदाघमनिवाममोड्यम् ॥२६ दृष्ट्वादिनि मूनि कृतान्जलिम्तु विनम्रमौलिः समुपाजगाम । प्रणम्य पादो कमलादरामौ निवेदयामास तदा तदात्मनः ॥२७ २६२ ] [ थामन पुराण पुनः মারি पप्रच्छ सा कारणमीश्वरंतमाघ्रायचालिङ्गयमुदामुदृष्टया । वक्ष्ये सुराणा सबले: पराजय नदारमनोदेवगणच सादम्॥२८ हे नारद ! इसके उपरान्त भगवान् गदाधर देव परम प्रमन्न हुए और इन्द्र से बोले-हे इन्द्र ! अब तुम तपश्चर्या समाप्त कर जात्रो में तुम से बहत प्रसन्न हूँ और अब तुम ममस्त पापों से मुक्त हो गया है ॥२२॥ हे देवेश्वर | अब तुम शीघ्र ही अपन राज्य को पर लोगे। मैं है ! अब ऐमा हो प्रयान वरूगा जिसमे भावी थेय होगा ॥२३॥ भगवान गदाधर के द्वारा इस प्रकार में कहे जाने पर वह विसर्जित हो गया और उस परम मनोहर नदी में उमने फिर स्नान किया था। जब उसने स्नान कर लिया तो उसके पाप नरों ने उस देव से प्रार्थना की थी कि हमारे ऊपर याप अब अनुशासन करें ॥२४॥ तब इन्द्र ने पुलिन्द नाग वाले उन भीपण कम्मं कारो से कहा- मेरे पापा से समुत्पन्न आप लोग पर्वतो मै प्रमुख हिमालय और काल- जर के अन्तर मे ही जाकर हे पुलिन्दो ! निवास करें ॥२५॥ सुरो के राजा इन्द्र ने ऐसा उन पुलिन्दो से रह कर अमर सिह और पक्षी के साग पापों से रहित होकर सम्पूज्यमान होता हुआ फिर परम पूज्य. धर्म का निवास जो माता का आश्रम था वही पर चला गया था ॥२६॥ वहाँ पर अदिति का दर्शन करके मस्तक पर दोनों हाथों की अञ्जलि बांधकर माथा झुकाकर माता के समीप मे पहुंच गया था और कमल के उदर के समान दोनो चरणो को प्रणाम दिया था। फिर उस समय अपने आपको निवेदित किया था ॥२७॥ उसने ईश्दर कारण पूछा था और उसके मस्तक का आधाण करके और परम प्रस- नता से आलिंगन करके एक सुन्दर दृष्टि से देखा था। अपना देवगणों के साथ बलि के साथ सुरो का पराजय कहा था ॥२८॥ श्रुत्वैव सा शोकपरिप्लुताङ्गी ज्ञात्वा जितदत्यसुतः सुतं तम् । दु सान्विता देवमनाचमीड्य जगाम विष्णुशरणवरेण्यम् ।।२६ कस्मिन्जनित्री सुरसत्तमाना स्थाने हृषीकेशमनन्तमाद्यम् । चराचरस्य प्रभव प्रमाणमाराधयामास मुने वदस्व ॥६० अदिति वर प्रदान वर्णन ] . [ २६३ सुरारणिः शक्रमवेक्ष्य दीनं पराजितंदानवनायकेन । सितेऽथ पक्षे मकरदंगे: घृताचिपस्यादय सप्तमेऽहनि ॥३१ दृष्टुव देव निदशाधिप त महोदये शक्रदिशाऽघिस्ढम् । निराशना सयतवाक्सुचित्ता तदोपतस्थे शरण सुरेन्द्रम् ॥३२ जयस्व दिव्याम्बुजकोशचौरजयस्व ससारतरो: कुठार । जयस्व पापेन्धनजानवेद अघौघमरोध नमो नमस्ते ॥३३ नमोऽस्तु ते भास्कर दिव्यमूर्ते लोक्य लक्ष्मीपतये नमस्ते । त्व कारण सर्वचराचरम्य नाथोऽसि मा पालय विश्वमूर्ते ॥३४ त्वया जगन्नाथ जगन्मयेन नाथेन शनोनिजराज्यहानिम् । अवाप्नवाशक्रपराभव च ततो भवन्तं शरण प्रपन्ना ॥३५ उसने यह सुनते ही बहुत अधिक शोक किया था और दैत्य सुनों के द्वारा अपने उम पुत्र को पराजित जानकर यह दुख से अन्वित हो गई थी। फिर वह अन्नध-पूज्य एवं वरेण्य देव विष्णु को शरण में प्राप्त हुई थी ॥२६॥ देवर्षि नारद ने कहा-हे मुनियर ! अब मुझको आप यह बतलाने की कृपा घोजिए कि उम सुर ठों की माता ने किस स्थान पर होग-अनन-आय-चराचर के उत्पत्ति स्यान एव प्रमाण भूत प्रभु का पाराधन पिया पा ॥३०॥ पुलस्त्य ऋषि ने रहा-सुरारणि ने इन्द्र को दोन-परावित हुए जो दानवों के नायक ने रिय पा देवा या । इमरे अनन्तर मवर नक्षत्र पर सूर्य के हो जाने पर मुक्त पक्ष में पूताचि के मातवें दिन में त्रिदों के अधिर उस देव को मक दिशा में अधिरूढ़ देखकर ही महोदय में सपत धागो बाली होर मुचित से युक्त रिना मान किये हुए उस समय में सुरेन्ट फै शरण में उपस्थित हुई पी ॥३१-३२॥ अदिति ने कहा-दे दिब्ध अम्बुनो को चोर ! तेरी जय हो। हे इम ससार के वृक्ष के कुठार तेरी जय हो । हे पाप रूपी ईधन के निप अग्नि स्वरूप ! तेरी जय हो। हे अन्धो रे बोप का सरोघन करने वाले ! तेरे लिये मेरा बारम्बार नमस्कार है ॥३३॥ हे दिव्य मूति वाले मार देव ! तुम्हारे लिये नमस्कार है। लोर को सामी के सामो बापी सेवा में प्रगाम २६४ ( वामन पुरण समर्पित है। आप इस सम्पूर्ण परापर लोष के पारण हैं, आप सबके स्वमी हैं । हे विश्व मूर्त ! मेरा पालन कीजिये ॥३४॥ हे जगन्नाप ! जगन्मय नाय आपने हो इस इन्द्र को निज राज्य को हानि वाला प्राप्त पर दिया था और इन्द्र का जो पराभव हुआ है वह भी माप ही ने कराया है इसलिये मैं इस समय आपको शरण में प्राप्त हुई हूँ ॥३॥ इत्येवमुक्त्वा सुरपूजितेन आलिप्य रक्तन हि चन्दनेन । सपूजयित्वा करवीरपुप्पैः सधूपदीपः सलु दिव्यभोज्यः ॥३६ नैवेद्यक ज्ययुत महाहमन्न ह्य पेन्द्रस्य हिताय देवी। स्तवेन पुण्येन च सस्तुवन्ती स्थिता निराहारमथोपवासम् ॥३७ ततो द्वितीयेऽह्नि कृतप्रणामा स्नात्वा विधानेन च पूजयित्वा । दत्त्वाद्विजेभ्यःकनक तिलाज्यं ततोऽग्रतः सा प्रयता वभूव ।।३८ ततः प्रीतोऽभवद्भानु ताचि: सूर्यमण्डलाद । विनिसृत्याग्रतः स्थित्वा इदं वचनमब्रवीत् ।।३६ व्रतेनानेन सुप्रीतस्तवाह दक्षनन्दिनि । प्राप्यसे दुर्लभ काम मत्प्रसादान्न संशय ॥४० राज्य त्वत्तनयाना वै दास्ये देवि सुरारणि । दानवान्ध्वंसयिष्यामि सभूयबोदरे तव ॥४१ सद्वाक्यं वासुदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मन्सुरारणिः । प्रोवाक जगता योनि वेपमाना पुनः पुनः ॥४२ इतना कह कर सुरपूजित रक्त चन्दन से समा लेपन करके करवीर के पुष्पो से तथा धूप-दीप और दिव्य भोज्य पदार्थों से भली भांति पूजन करके समाराधन किया था ॥३६॥ आज्य युक्त महाई अन्न का नैवेद्य देवी ने अर्पित किया था । पुण्य स्तवन से स्तुति करती हुई निरा हार उपवास मे स्थित होगई थी ॥३७॥ इसके उपरान्त दूसरे दिन में प्रणाम करके तथा स्नान करके विधि-विधान से पूजन कर के दिजो को सुधण-घृत और तिलो का दान देकर फिर सामने प्रयत होकर स्थित होगई यो ॥३८॥ इसके पश्चात् भानु धृताचि प्रसन्न हो गये थे और सूप मण्डल से निकल कर स्थित हो गग्ने और परमात अदिति वर प्रदान वर्णन [ । २६५ बोने ॥३६॥ हे दानन्दिनी ! तुम्हारे इम ब्रा से मैं परम प्रसन्न हूं। अब मेरे प्रमाद से अपनो दुलभ कामना को प्राप्त कर लोगो । इसमे यब कुछ समय नहीं है ।।४०।। हे देवि ! हे मुरारणि ! में अब तुम्हारे पुत्रों का राज्य दे दूंगा। तुम्हारे ही उदर में जन्म ग्रहण करके में दानवों का बज कर दूंगा ॥४१॥ हे ब्रह्मन् ! उस मुरारणि ने भग- वान् वासुदेव के उस वाक्य का श्रवण करके यह कापती हुई और वार• म्बार पम्प युक्त होती हुई जगतों के योनि प्रभु से बोनी ॥४२॥ कथ त्वामुदरेणाह वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरम् । यस्योदरे जगत्सवं वसेत्स्थावरजङ्गमम् ॥४३ कस्त्वा धारयितु नाय शद्यवं लोक्यघार्यास । यस्य सप्ताणवा: कुझी निवसन्ति सहादिभिः ।।४४ तस्माद्यथा सुरपातः शक्रः स्यात्सुरराडिह । यथा वृथा न मे क्लेशस्तथा कुरु जनार्दन ॥४५ सत्यमेतन्महाभागे दुर्धरोऽस्मि मुरासुरैः। तथापि संभविष्यामि ह्यहं देव्युदरे तव ॥४६ आत्मानं भुवनं शैलांस्त्वा च देवि सकश्यपाम् । धारयिष्यामि योगेन मा विपादं कृथा वृपा ॥४७ तवोदरे सहं दाशे संभविष्यामि वै यदा । तदा निस्तेजसो दैत्याः संभविष्यन्त्यसंशयम् ॥४८ इत्येवमुक्त्वा भगनान्स देवस्तस्याश्च भूयोऽरिगपप्रमर्दी । स्वतेजसामेषु विवेश देव्यास्तदोदरे, सहिताय विप्रम् ।।४६ हे भगवन् ! मैं आपको अपने उदर में कमे वहन रूंगी क्योंकि माप सो परम दुर्धर है और मुझ में इतनी समम्म नहीं है जिसके सदर में यह स्पायर-अङ्गम सम्पूर्ण जगत् निवास किया परता है ॥३॥ हे नाप ! आपतो सपं सोकर वे धारण करने वाले हैं भारको कौन धारण करने में समर्थ हो माता है? जिस पारी कुक्षि में मानों एम और समस्त पत निवाम दिया करते हैं ॥४४॥ इस नि यह गुरपति इन्द्र जिस प्रकार से मुरों का रामा यहाँ पर हो पाने मोर २६६ ] । वामन पुराण जिस रीति से मुझे भी वृथा पोश न हो है अनादन ! मा ही का करके फरो ॥४५॥ भगवान् विष्णु ने कहा-हे महाभागे ! यह सर्वथा तुम्हारा कथन मत्य है कि मैं मुर और असुरों के द्वारा दुर्घर हूँ तो भी मैं तुम्हारे उदर मै है देवि ! जन्म ग्रहण करू गा॥४६॥ हे देवि ! अपने आपको-भुवन को-शैलों को और कश्यप के सहित तुमको योग के द्वारा धारण करूगा । तुम व्ययं ही विपाद मत करो ।। ४७ ॥ हे दाक्षे ! जब मैं तुम्हारे उदर से जन्म ग्रहण करूगा उसी समय मे ये सब दैत्य तेज से हीन हो जायेगे-इममे बिल्कुल भी संशय नहीं है ॥४८॥ उन भगवान् देव ने इतना भर कहकर आदि गर्गों के प्रमदन करने वाले भगवान् फिर उस देवी के सदर मे तया अगों में अपने तेज से इन्द्र के हित सम्पादन करने के लिये शीघ्र ही प्रवेश कर गये थे ॥४॥ ७७-बलि शिक्षादान वर्णन देवमातुः स्थिते देवे उदरे वामनाकृती। निस्तेजसोऽमुरा जाता यथोक्त विश्वयोनिना ॥ निस्तेजसोऽमुरान्दृष्ट्वा प्रह्लाद दानवेश्वरम् । वलिर्दानवशार्दूल स्विदं वचनमब्रवीत् ॥२ तात निस्तेजसो दैत्याः केन जातास्तु हेतुना। कथ्यता परमज्ञोऽसि शुभाऽशुभविशारद ॥३ तत्पौत्र वचन श्रुत्वा मुहूर्त ध्यानमास्थितः। किमर्थं तेजसो हानिरिति कस्मादतीव वा.॥४ स ज्ञात्वा वासुदेवोत्थं भयं दैत्येष्वनुत्तमम् । चिन्तयामास योगात्मा क्व विष्णुः साम्प्रतं स्थितः ।।५ अधो नाभेः सपातालान्सप्त सचिन्त्य नारद । नाभेरुपरि भूरादील्लोकाश्च क्रमशो वशी ॥६ भूमि ता पडजाकारा तन्मध्ये पङ्कजाकृतिम् । मेरु ददर्श शैलेन्द्र शातकुम्भ महधिमत् ॥७ वलि शिक्षादान वर्णन ] [ २६७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-देवमाता के उदर मे वामना कृते देव के स्थित हो जाने पर जमा विश्व योनि ने कहा था सब असुर निस्तेज हो गये थे ॥१॥ जब राजा बलि ने समस्त असुरो को तेज से हीन देखा था तो दानदो के स्वामी तथा दानवों में शार्दूल के समान प्रह्लाद थे उनसे यह वचन वोला-॥२॥ बलि ने कहा-हे तात! किस हेतु मे इस समय सगस्त दैत्यगग निस्तेज हो गये हैं। आप तो परमज्ञ हैं और शुभ तथा अशुम सब के ज्ञाता महामनीपो हैं यह मार 'मुझे बतलाइये कि क्या इसका कारण है ।।३।। पुनस्य सृप ने कहा- प्रह्लाद ने उस पोत्र के यवन को श्रवण करके मुत मात्र के लिये ध्यान पिया था कि किस लिये यह तेज को हानि हुई है और क्या कारण हुमा है कि यह अत्यन्त निस्तेजना उत्स्त हो गई है ॥४॥ ध्यान में प्रल्हाद ने वासुदेव भगवान मे उठने वाला यह दैत्यो में अत्युत्तम भय है । फिर योगात्मा ने चिन्तन किया था कि इस समय मे भगवान विष्णु कहां पर स्थित हैं ॥५॥ हे नारद ! नाभि से नीचे भाग में पाताल के सहित मातो भुवनों का चिन्तन करके और फिर दशी ने मामि के कार वाले भाग में भूरादि सात लोको का वशी ने क्रम से प्पान किपा पा ॥६॥ उस पकज के आकार वाली भूमिका और उसके मध्य में पकज को आकृति के तुल्य मेरु शैलेन्द्र को ध्यान में देखा था। जो शात कुम्ममय था और महान् समृद्धि से परिपूर्ण याmon तस्योपरि महापुगंस्त्वष्टौ लोकपतीस्तथा । तेषामुपरि वैराज ददृशे ग्रह्मणः पुरम् ।। तदधस्तान्महापुण्यमाश्रम सुरपूजितम् । देवमातुः स ददृशे मृगपक्षिगणावृतम् ॥६ तां दृष्ट्रा देवजननी सर्वतेजोऽधिरां मुने। विवेश दानवपतिरन्वेष्टुमघुमूदनम् ।।१० स दृष्ट्राजगन्नाथ माधवं वामनाकृतिम् । सर्वभूतवरेण्यं तं देवमातुरचोदरे ।।११ २६८ । चामन पुराण त दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्ष शरचना विनावृतम् । सुरासुरगण. सर्व. सर्वतो व्याप्तविग्रहम् ॥१२ ततस्तेनैव योगेन दृष्ट्वा वामनता गतम् । दैत्यतेजोहर विष्णु प्रयस्थिोऽभवत्ततः।।१३ अथोवाच महावुद्धिविरोचनसुत यलिम् । प्रह्लादो मधुर वाक्य प्रणम्य मधुसूदनम् ।।१४ उन मेरु गिरि के कार आठ महा पुरियों का ध्यान लिया था क्या लोक पतियों को देखा था। उनके भी ऊपर राज ब्रह्मा के पुर को देखा ।।।। उसके नीचे महा पुण्य मे परिपूर्ण गुरपूजिन आश्रम देखा था जो देव माता का था और मृग तया पक्षिगण से समावृत था 110 देवों की माता का दर्शन किया था है मुने । जो सर्व तेज अधिक यो। वहाँ पर ानव गति प्रल्लाद ने योग बल से ध्यान मधुसूदन प्रभु खोज करने को प्रवेश किया था॥१०॥वही पर उमने वामन के आकार घाले माधव जगत् के नाथ का दर्शन किया था जो ससस्त प्राणियों में धेठ देव माता के उदर में विराजमान ॥११॥ उन पुण्डरीकास विना ही शख चक्र के सुरासुर गणो से समावृत्त सर्वत: व्याप्त विग्रह वाले प्रभु का दर्शन किया था ॥१२॥फिर उसी योग के माधन बल से दैत्यो के तेज को हरण करने वाले वामन रूप में प्राप्त भगवान् विष्णु का दर्शन करके प्रहलाद प्रकृतियों में स्थित हो गये थे ॥१३॥ इसके उपरान्त ध्यान का त्याग करके महान् बुद्धि वाले प्रल्हाद मे विरोचन के पुत्र बलि से कहा था सब प्रथम उसने मधुमूदन भगवान को प्रणाम किया था फिर परम मधुर वाक्य बोला था-॥१५॥ श्रूयता सर्वमाख्यास्ये यतो वो भयमागतम् । येन निस्तेजसो दैत्या जाता दैत्येन्द्र हेतुना ।।१५ भवता निजिता देवा. सेन्द्ररुद्राकंपावकाः। प्रयाताः शरन देव हरि भिभुवनेश्वरम् ||१६ स तेषामभय दत्त्वा शनदीना जगद्गुरुः । अवती मदाबादtaraा जहरे हरि १७ ३०० ] | वामन पुराण अय शडकु: शिविः शड कुरसिलोमा विरूपधृक् । त्रिशिरा मकराक्षश्च वृषपर्वाऽसितेक्षणः ॥२३ एत चान्ये च वलिनो नानाशस्त्रविशारदाः । येपामेकंक्शो विष्णु: क्ला नाहंती पोडशीम् ॥२४ पुत्रस्यैतद्वचः श्रुत्वा प्रह्लादः क्रोधमूतिः । धिग्धिगित्याह स बलि वैकुण्ठा क्षेपवादितम् ॥२५ धिवत्वा पापसमाचार टुटवुद्ध सुवालिश । हरि निन्दयतो जिहा कथ न पतिता तव ।।२६ शोच्यस्त्वमसि दुर्बुद्ध निन्दनीयश्च साधुभिः । यत्वलोक्यगुर विष्णुममिनिन्दसि दुर्मते ॥२७ शोच्यचापि न सदेहो येन जात. पिता तव । यस्य त्वं कर्कश: पुयो जातो देवावमानद ॥२८ जिसने सूर्य के रप स वेगपूर्वक महान तेज चक्र खींच लिया था। बलवान विप्रचित्ति मेरी सेना का नायक है ॥२२॥ अय घड कु, शिषि, शाइकु, अमिलोमा, विरूपक, विशिरा, मकराक्ष, वृष पर्वा, अमितेक्षण, मद तया अन्य भी बलधारी नाना शास्त्रों के विद्वान हैं जिन एस्ए को भरमा के यागे विष्णु सोलहवीं कला के योग्य भी नहीं है ।।२३.२४॥ पुलाता महर्षि ने पहा-पुत्र के इस भाति के वचन का प्रवण करके प्रसाद कोष से मूस्टिन हो गया था और उसने भगवान कुछ नार पर यापरने नाले बलि को-धिकार है-धिकार है,ऐसा कहा पा ॥२३॥ है पापों के आचरण परने वाले ! तेरी बड़ी अधिक दुध बुद्धि है और महान् मूर्ण है तुम्ने घिवार है । भगवान् की निन्दा करने वारे सो बिहार पर क्यो नहीं हो गया ?॥२६॥ है दुबु ! तू थोपा के योग्य है और पानी में द्वारा निनीय र लोरी भगवान् विष्णुरो दुध बुद्धि वाला होने के कारण निart ॥२७॥ गोसमी हो-गमे पन्देह मही है जिसने तेरे पिता रोग दिपा पा विमान देशों के मामान ले पाता errier TBTTTT 11F sit बलि शिक्षादान वर्णन ] [ ०१ भवान्किल विजानाति तथा चामो महासुराः । यथा नान्यः प्रियः कश्चिन्मम तम्माज्जनार्दनात् ।। जाननपि प्रियतरं मम देवं जनादनम् । सर्वेश्वरेश्वरं देवं पथ निन्दितवानसि ।।३० गुरुः पूज्यस्तम पिता पूज्यस्तस्याप्यहं गुरुः । ममापि पूज्यो भगवान्गुरुर्लोक्गुरुहरिः ॥३१ गुरोगुनगुरु मूढ पूज्य पूज्यतमस्य च । पूज्य निन्दमि यत्पाप कथं न पतितोऽभ्यधः ।।३२ शोचनीया दुराचारा दानवामी कृतास्त्वया । येपा त्व यकशो राजा वासुदेवविनिन्दकः ॥३३ यस्मात्पूज्योऽचंनीयच भवता निन्दितो हरिः । तस्मात्पापसमाचार राज्यनाशमवाप्नुहि ॥३४ यया नान्यप्रियतर विद्यते मम केशवात् । मनसा रमणा याचा राज्यभ्रष्टस्तया पत ॥३५ आप स्वप भी भली भांति निश्चय रूप से जानते हैं और ये ममी मगुर भी मूब ममानते हैं कि मुझे उन भगवान् जनार्दन से अन्य कोई भी प्रिय नहीं है ॥२६॥ यह मेरे परम प्रियतम देव उनादन को जानते हुए भी उन सर्वेश्वरो के भो ईश्वर देवकी तुमने मेरे ही सामने निन्दा कसे पो है ॥३०॥ वेरे पिता सेरे गुरु और पूज्य है उम तेरे पिता का भी गुरु थोर पूग्य में हु । मेरे भी परम पूज्य एव गुरु लोक गुर श्रीहरि हैं ॥३१॥ है मूद ! गुरुवे भी गुरु से गुरु परम पूजनीय को निन्दा र रहा है। है महान् पास्मन् ! तू को नही अध:पनित होता है ?॥३२॥ ये दुष्ट पागार याले दानव सूने गोपनीय बना दिपे हैं जिनका नू एमासंग राजा बना हुआ है जो कि भगवान् वासुदेव की निन्दा गरने वाना ६ ॥३३॥ योनि मापने वन परम पूरनीय मौर चंन परने के योग्य पोहरिको निन्दा की है एव इमी पाप है पापों के समाचरण करने बा! अपने इस विशाल राग्य विनाश रोप्रान हो जायेगा ॥४॥ शिरिपेरा प्रियकर पेग भगवान में मन्य कोई भी नहीं है और वह [ वामन पुराण मन-वचन और कर्म से मेरे परम प्रिय हैं सो तू राज्य भ्रष्ट होकर पठन को प्राप्त होजा ॥३॥ यथा न तस्मादपर व्यतिरिक्त हि विद्यते । चतुर्दशसु लोकेषु राज्यभ्रष्टस्तथा पत ॥३६ सर्वपामपि भूताना नान्यल्लोके परायणम् । यथा तथाऽनुपश्येय भवन्त राज्यविच्युतम् ॥.७ एवमुच्चरिते वाक्ये बलि. सम्वरितस्तदा। अवतीर्यासनाद्ब्रह्मन्कृतालिपुटो बलिः ॥३८ शिरसा प्रणिपत्याह प्रसाद कुरु मे गुरो। कृतापराधानपि हि क्षमन्ते गुरव. शिशून् ।।३६ तत्साधु यदह शप्तो भवता दानवेश्वर । न विभेमि परेभ्योऽह न च राज्यपरिक्षयात् ।।४० नव दुःख मम विभो यदह राज्यविच्युतः । दु ख कृतापराधत्वाद्भवतो मे महत्तमम् ॥४१ क्षमस्व तत्तात कृतापराध बालोऽस्मि नीचोऽस्मि सुदुर्मतिः । वृतेऽपि दोपे गुरव. शिशूनाक्षाम्यन्ति दै-यसमुपागतानाम् ॥४२ पोकि उनके अतिरिक्त दूसरा चौदह लोको मे ऐमा वन्दनीय कोई भी नहीं है अतएव उनको निन्दा करने वाला तू राज्य से प्रष्ट होकर पतन को प्राप्त हो जा ॥३६॥ समस्त भूतों मे लोक में अन्य कोई भी परायण नहीं हैं अतएव उनका निन्दक तुझे मैं अब राज्य से व्युत दृश देखता हूँ ॥३७॥ महाँप पुलस्त्य ने कहा-इस प्रकार से वार के उरुचरित होने पर उसी समय में राजा बलि तुरन्त ही अपने राज्यासन से उतर पर है ब्रह्मन् ! हाथ जोड़कर प्रसाद के सामने हो गया था ॥८॥ शिर से प्रणाम में उनसे उगन बहा-हे गुरो ! मुा पर घर कृपा कीजिए । अपराध करने वाले भी छोटे बच्चों पर गुस्सा हो पिया रते हैं और अपराधो मोक्षमा कर देते हैं ॥३६॥ हे दान भवर ! आपने जो मुगाप दिया है वह टोर हो है। मैं दूमरो मे सभी भयभीत नहीं होता और न म मेरे राज्य में परिसय नाही" !

बलि शिक्षादान वर्णन ] [ ३०३ है ।।४०. हे विमो ! मुझे यह भी कोई दुम नहीं है कि मैं अपने राज्य से च्युत हो जाऊंगा । वेवल मुझे यही महान् दुख है कि मैंने आपका एक यह महान् अपराध पिया है ॥४१॥ हे ताठ ! मेरे इस लिये हुए अपराध को श्राप क्षमा कर देखें । मैं बालक हूँ, मूर्ख हूँ, नोच हूँ और दुए बुद्धि वाला हूं। दोप के करने पर भी गुरु वृन्द बब शिशु दीनता को प्राप्त होते हैं तो उन्हे क्षमा कर दिया करते है ॥४२॥ इत्येवमुक्ते वचने महात्मा विमुक्तमोहोहरिपादभक्तः । चिर विचिन्त्याद्भुतमेदित्यमुवाच पुत्र मधुरं वचोय ॥४३ मोहेन मेघुना ज्ञान विवेकञ्चतिरस्कृतः । येन सवंगत यिष्णु जानस्त्वां शप्तवानहम् ॥४४ तन्नूनमविवेकोऽयं भवन्तं येन दानव । ममापि स महाबाहो विवेकप्रतिपेधकः ।।४५ तस्माद्वाज्यं प्रति विभो न ज्वरं कर्तुं महंसि । अवश्यभाविनो हर्षा न विनश्यन्ति कहिचित् ।।४६ पुत्र मिसालपाय राज्यमोगधनाय च। आगमे निगमे प्रानो न विपादं समाचरेत् ।।४७ यथा यथा समायान्ति पूर्वकर्मविधानतः । सुखदुःयानि देत्येन्द्र नरस्तानि सहेत्तथा ॥४८ आपदामागम दृष्ट्या न विषण्णो भवेद्वशी। सादं च सुविस्तार्गावाप्य नी धृतिमान्भवेत् ॥४६ महपि पुनस्य ने महा-वति के एमे वचन कहे जाने पर महान् पारमा वाले हरिपरण के परम भक्त प्रसाद ने विमुन मोह याने होकर पिरास पर्यन शान र पुर में बार में इम पुगर के मधुर वचन रहे ॥४३॥ प्रसाद ने कहा--मोह ने मेरा इम ममय सम्पूर्ण मान और विर विरार दिया है बिमरे रण गर्वामी भगवान विष्ण यो जानते हुए भी नुनको मैंने झाप दे दिया है ॥४४॥ है दानव ! यह निरामय हीरामविर है जिसे मारको भौर मुमोमो समोर IIT का प्रतिपर दिया है ॥४॥ मो मा हविभो ! राग्यो ३०४ ] [ वामन पुराण प्रति तो तुम कुछ भी दुख था सन्ताप सब करो क्योकि जो अवश्यम्भावी अयं होते हैं वे कभी भी विनष्ट नही हुआ करते हैं ॥४६॥ पुत्र, मित्र, कलत्र के लिये तथा निर्गम हो जाने पर प्राज्ञापुरुष को कभी भी विपाद नही करना चाहिए ॥४७॥ हे दैत्येन्द्र ! पूर्वजन्मो में किये हुए कमी के विधान के अनुसार ये सब जिस प्रकार से सुप और दुःख आया करते हैं मनुष्य को उन्हे सहन करना चाहिए ॥४८॥ आपदाओ के आगमन को देखकर वशी पुरुष को कभी भी विपाद युक्त नहीं होना चाहिए । सुविस्तृत सम्पत्ति को देखकर या प्राप्त करके तिमान नहीं होना चाहिए ॥४॥ धनक्षये न मुह्यन्ति न हृष्यन्ति धनागमे । धोरा: कार्येषु च तदा भवन्ति पुरुषोतमाः ।।५० एव विदित्वा दत्येन्द्र न विपाद कथचन । कर्तुमर्हसि विद्व स्त्व पण्डितो नावसीदति ॥५१ तथाऽन्यच्च महाबाहो हित शृणु महार्थकम् । भवतोऽथ तथाऽन्येपा श्रुत्वा तच्च समाचर ॥५२ शरण्य शरणं गच्छ तमेतं पुस्पोत्तमम् । स ते आता भयादस्माद्दानव प्रभविष्यति ॥५३ ये संश्रयन्ति हरिमीशमनादिमध्य विष्णु चराचरगुरु हरिमी शितारम् । संसारगर्तपतितस्य करावलम्ब नूनं न ते भुवि नरा ज्वरिणो भवन्ति ॥५४ तन्मना दानवयं तद्भक्तश्च भवाधुना। स एप भवतः यो विधास्यति जनार्दनः ।।५ अह च पापीपसमाधमोशमाराधयामीह च तीर्थयानाम् । यिमुक्तपापश्च तदा भविष्य यदाच्युतो लोकपतिनृसिंहः ।।५६ इत्येवमाश्वास्य वलिमहात्मासस्मृत्ययोगाधिपति च विष्णुम् । बागान्य सपोन्टनुमन्यपासाजगाम यतुं गुमतोयामम् ॥. " ।

धुन्धु-पराजय वर्णन ] [३०५ - धीर पुरप धन के क्षय हो जाने पर मोह को प्राप्त नहीं हुआ करते हैं और धन के समागम होने पर अत्यन्त हर्षित भी नहीं होते हैं । जो उनम धीर पुरुष हैं वे तो अपने कार्यों मे ही उस समय में सलग्न रहते हैं जो उनका कर्तव्य है ॥५०॥ हे देत्येन्द्र ! इसी भांति समझ करके आप किसी भी प्रकार मे विपाद करने के योग्य नहीं है । हे घिद्वन् । आपतो पण्डित है जोकि कभी भी अवसाद नहीं किया करता है ॥५१॥ हे महा बहुओं वाले ! अब महान् अथं का सम्पादक अन्य हिन की बात मुझसे श्रवण करो। उनसे आप का तथा अन्यों का भी हित होगा से सुन कर वमा ही समाचरण भी करो ॥५२॥ उन शरण मे जाने के योग्य भगवान पुरुषोत्तम की शरण में जाओ । हे दानव । वही इस भय से तुम्हारा नाता होगा ॥५३॥ लो मनुष्य उन अनादि मध्य-ईश, चरा- गुरु भगवान् हरि का समाश्रय ग्रहण कर लेते हैं उनका इरा संसार के गव' में पड़े हुओं का निश्चय ही वे करावलम्ब दिया करते हैं । वे मनुष्य फिर कभी भी सन्ताप युक्त नहीं होते हैं ॥५४॥ हे दानव श्रेष्ठ ! अब उन्हीं में मन लगाने वाला उन श्री हरि का भक्त होजा। वह भगवान जनादन तेरा थेय अवश्य ही करे गे ॥५५।। और मैं तो अपने कृत पापो को शान्ति के लिये ईश का माराधन करता हूं, त तीर्थों की यात्रा करता हूँ। तभी मैं पापो से विमुक्ति प्राप्त करूगा सोको के पति भगवान् अच्युत नृसिंह मुझ पर कृपा करे गे ! पुलस्त्य जी ने कहा-उस महात्मा प्रह्लाद ने इस प्रकार से रा को समाशासन प्रदान करके और योगाधिपति प्रभु विष्ण पण करके समस्त दनु संन्य पालो को बामन्त्रित कर फिर शुभ तीपों की यात्रा को करने के लिय वहां से चले गये थे । चर के - ७८-धुन्धु-पराजय वर्णन पानि तीर्थानि विप्रेद्र प्रह्लादोऽनुजगाम प्रह्लादतीर्थ याता मे सम्यगाम्यानुमह 11 . ३०४ ] [ वामन पुराण प्रति तो तुम कुछ भी दुख था सन्ताप सब करो क्योकि जो अवश्यम्भावी अर्थ होते हैं वे कभी भी विनष्ट नही हुआ करते हैं ॥४६॥ पुन, मित्र, कलत्र के लिये तथा निर्गम हो जाने पर प्राज्ञापुरुष को कभी भी विषाद नहीं करना चाहिए ॥४७॥ हे दैत्येन्द्र ! पूर्वजन्मों मे किये हुए कमी के विधान के अनुसार ये सब जिस प्रकार से सुख और दुःख आया करते हैं मनुष्य को उन्हे सहन करना चाहिए ॥४८॥ आपदाओ के आगमन को देखकर यशो पुरुष को कभी भी विषाद युक्त नही होना चाहिए। सुविस्तृत सम्पत्ति को देखकर या प्राप्त करके तिमान नहीं होना घाहिए ॥४॥ धनक्षये न मुह्यन्ति न हृष्यनित धनागमे । धोरा: कार्येषु च तदा भवन्ति पुरुषोत्तमाः ॥५. एव विदित्वा देस्येन्द्र न विपादं कथचन । कर्तुमर्हसि विद्वस्त्व पण्डितो नावसीदति ॥५१ तथाऽन्यच्च महाबाहो हित शृणु महार्थकम् । भवतोऽथ तथाऽन्येषा श्रुत्वा तच्च समाचर ॥५२ शरण्यं शरण गञ्छ तमेतं पुरुषोतमम् । स ते त्राता भयादस्माद्दानव प्रभविष्यति ॥५३ ये संश्रयन्ति हरिमीशमनादिमध्यं विष्णु चराचरगुरु हरिमीशितारम् । संसारगतपतितत्य करावलम्व नूनं न ते भुवि नरा ज्यरिणो भवन्ति ॥५४ तन्मना दानवशे तद्भक्तश्च भवाधुना। स एप भवतः यो विधाम्यति जनार्दनः ।। अह च पापोपशमार्थमोशमाराधयामीह च विमुक्तपापश्व तदा भविष्य यदाच्यतो तो इस्पेयमाश्वास्य लिमहात्मा बागस्य सलिनुसंन्यपासा घुन्-पराजय वर्णन ] [ ३०५ धीर पुरुष धन के क्षय हो जाने पर मोह को प्राप्त नहीं हुआ करते हैं और धन के ममागम होने पर अत्यन्त हपित भी नहीं होते हैं । जो उमम धीर पुरुष है वे सो अपने कार्यों में हो उस समय में संलग्न रहते हैं जो उनका पतंव्य है ॥५०॥ हे देत्येन्द्र ! इसी भांति समझ करके पाप किमी भी प्रकार से विपाद करने के योग्य नहीं है । हे घिद्वन् ! आपतो पण्डित है जोकि कभी भी अवसाद नहीं किया करता है ॥५१॥ है महा बहुओं वाले ! अब महान् अयं का सम्पादक अन्य हिन को बात मुझसे श्रवण करो। उनसे आप का तथा अन्यों का भी हित होगा उसे सुन कर पा ही समाचरण भी करो ॥५२॥ उन शरण में जाने के योग्य भगवान् पुरुषोत्तम को शरण मे जाओ । हे दानव ! वही इस भय तुम्हारा नाता होगा ॥५३॥ लो मनुष्य उन अनादि मध्य-ईश, चरा- गुरु भगवान् हरि का समायय प्रहण कर लेते हैं उनका इस ससार के गव' में पड़े हुओं का निश्चय ही वे फरावलम्ब दिया करते हैं । वे मनुष्य फिर कभी भी सन्ताप युक्त नहीं होते हैं ।।५।। है दानव अप्ठ ! अब उन्हीं में मन लगाने वाला उन श्री हरि का मन होगा। वह भगवान जनार्दन तेरा येय अवश्य ही करेंगे ॥५५॥ और मैं तो अपने कृत पापो को शान्ति के लिये ईश का आराधन करता हूँ, तथा तीयों की यात्रा करता हूं। तभी मैं पापो से विमुक्ति प्राप्त करूंगा मैं, लोको के पति भगवान् अच्युत नृसिंह मुझ पर कृपा करेगे Int/ पुलरत्य जी ने कहा—उस महारमा प्रह्लाद ने इस प्रकार से राजान को समाासन प्रदान करके और योगाधिपति प्रभु विष्ण कारण परके समस्त दनु संन्य पालो को बाधित कर फिर बहार शुभ तीयों की यात्रा को करने के लिये वहां से चले गये थे ॥५७, चरक ७८ -धुन्धु-पराजय वर्णन कानि तीर्थानि विप्रेन्द्र प्रहादोऽनुजगाम ह । प्रह्लादतीर्थ यातां में सम्यगाच्यातुमर्हसि ।।

३०६ ] [ वामन पुराण शृणु त्वं कथयिष्यामि पापपड्वप्रणाशिनीम् । प्रह्लादतीर्थयाला ते सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥२ संत्यज्य मेरु कनकाचलेन्द्रतीर्थ जगामामरसघजुष्टम् । ख्यातं पृथिव्याशुभदं हि मानसयनस्थितीमत्स्यवपु पुरेशः ।।३ तस्मिस्तीर्थवरे स्नात्वा सतयं पितृदेवताः । सपूज्य च जगन्नाथमच्युत श्रुतिभिर्युतम् ॥४ उपोष्य भूयः सपूज्य देवपिपितृमानवान् । जगाम कच्छप द्रष्टु कौशिक्या पापनाशनम् ॥५ तस्या स्नात्वा महानद्या सपूज्य च जगत्पतिम् । समुपोष्य शुचिर्भूत्वा दत्त्वा विप्रेषु दक्षिणाम् ॥६ नमस्कृत्य जगन्नाथमथ कूर्मवपुर्धरम् । ततो जगाम कृष्णाया द्रष्टु वाजिमुखं प्रभुम् । तत्र देवह्रदे स्नास्वा तर्पयित्वा पितृन्सुरान् ।।७ देवर्षि नारद ने कहा-हे विप्रेन्द्र ! फिर प्रह्लाद किन-किन तोपों में गये थे । उसकी तीर्थ यात्रा का पूरा विवरण अब आप मुझे बतलाने की कृपा करें ॥१॥ पुलस्त्य जी ने कहा--अब आप धवण करो। मैं पापो के पक का प्रणाश करने वाली और सभी पापों को नष्ट कर देने को तीर्थ यात्रा को बतलाता हूँ ॥२॥ मेरु का भली भांति त्याग करके प्रह्लाद कनका चले तीथ पर चले गये थे जो देवो के समु. दाय के द्वारा संक्ति है । पृथिवी मे शुभ प्रदान करने वाला मानत विख्यात है जहां पर मत्स्य वपु पुरेश स्थित हैं ॥३।। उम परम श्रेष्ठ नाय मे स्नान करके तथा पितृगण और देववृन्न पा तर्पण करके एव धुतियों से समन्वित अच्युत जगन्नाप का पूजन किया था ॥४॥ उपवास करके और फिर अचना करपे अर्थात देव ऋपि और मानवो पो पूज करके कोशिकी मे पापो का नाश करने वाले पछप का दर्शन करने के लिये गये थे ।।५।। उम गहानदी में स्नान किया, जगरपति का पूजन किया उपवास कर शुद्धिकी, विनों को दक्षिणा दी थी॥६॥ इस अनन्तर जगनाय भुगो जो मं का पु धारण यरने वाले थे नमसार क्या । पाली प्रह्लाद पूर्वकाल मे भी त्रिविक्रम प्रभु कैसे थे और नेविसका बन्धन धारण करके जगन् के स्वामी ईश्वर बलि का बरगे॥१०॥ सो किया या-यह मुझ तलाइये ॥११॥ पुलस्यपि ने कहा--आप धुन्धु-पराजय वर्णन ] । ३०७ था । इसके उपरान कृष्णा में वाजिमुख प्रभु का दर्शन करने के लिये चले गये थे। वहां पर देव ह्रद मे स्तान करके पितृगण और सुरवृन्द का तर्पण किया था ॥७॥ संपूज्य हयशोपं च जगाम गजसाह्वयम् । तत्र देवं जगन्नाथं गोविन्दं चक्रपाणिनम् ।। स्नात्वा संपूज्य विधिवजगाम यमुना नदीम् । तस्या स्नातः शुचिर्भूत्वा सतप्यर्पिसुरापितॄन् । ददशं देवदेवेश लोकनाथं त्रिविक्रमम् ॥६ साम्प्रत भगवान्विष्णुस्त्रलोक्याक्रमण वपुः । करिष्यति जगत्स्वामी वलिवन्धनमीश्वरः ॥१० तत्कथं पूर्वकालेऽपि विभुरासीत्रिविक्रमः । कस्य वा वन्धनं विष्णुः कृतवांस्तच्चमे वद ॥११ श्रूयतां कथयिप्यामि योज्य प्रोक्तस्त्रिविक्रमः। यस्मिन्काले बभूवाथ यं च वञ्चितवानसौ ।।१२ आसीद्धन्धुरिति स्यातः कश्यपस्यौरसः सुतः । दनोगंभंसमुद्भूतो महावलपराक्रमः ॥१३ स समाराध्य च सदा ब्रह्माणं तपसाऽसुरः। अवध्यत्वं सुरैः सेन्द्रःप्रार्थयन्स तु नारद ।।१४ वहाँ पर हय के शोप वाले प्रभु को प्रणाम करके फिर ग. नाम वाले तीर्थ में चले गये थे। वहीं चक्रपाणि जगन्नाथ मीर विराजमान थे। वहां विधिपूर्वक स्नान किया, पूजन इसके पश्चात् यमुना नदी मे चले गये थे। उसमे भी न होकर ऋपि देव और पितरों का तर्पण किया था मो लोकनाथ त्रिविक्रम प्रभु का दर्शन किया था । नाई अब तो त्रैलोक्य के आक्रमण करने वाले नगवान् विष्णु देवदेवेश ने कहा- ३०८ ] [ वामन पुराण सुनिये, मैं यह बतलाता हूँ कि जो यह त्रिविक्रम कहे गये हैं जिस समय मे ये और जिसको इन ने वञ्चित किया था ॥१२॥ एक घुन्धु इस नाम से प्रसिद्ध कश्यप ऋषि का औरस पुत्र था। यह इनके गर्भ मे समुत्पन्न हुआ था और महान बल और पराक्रम से युक्त था ॥१३॥ उस असुर ने तप करके उस समय में ब्रह्मा की आराधना की थी । हे नारद ! उसने ब्रह्माजी से इन्द्र के सहित देवगण से वध के न होने की प्रार्थना की थी ॥१४॥ तस्य त च वर प्रादात्तपसा पद्धजोद्भवः । परितुष्टः स च बली निजंगाम त्रिविष्टपम् ॥१५ चतुर्थस्य कलेरादौ जित्वा देवान्सवासवान् । धुन्धुः शक्रत्वमकरोद्धिरण्यकशिपो सति ॥१६ तस्मिन्काले सबलवाह्निरण्यकशिपुस्ततः । चचार मन्दरगिरी दैत्यो धुन्धुसमाश्रितः ।।१७ ततोऽसुरा यथाकामं विचरन्ति निविष्टपे । निदशा ब्रह्मलोके च संस्थिता दुःखसयुताः ॥१८ ततोऽमरान्ब्रह्मसदोनिवासिनः श्रुत्वाऽय धुन्धुदितिजानुवाच । प्रजाम दैत्या वयमनजस्य सदो विजेतु विदशान्सशक्रान् ॥१६ ते धुन्धुवाक्य तु निशम्य दैत्याः प्रोचुनं नो विद्यति लोकपाल। गतियया याम पितामहाजिरं सुदुर्गमोऽयं परतोहि मार्गः ।।२० इतः सहस्र वहुयोजनास्यर्लोको मह म महर्पिजुष्टः । येषां हि दृष्टपाऽपणचोदितेन दह्यन्ति दैत्याः सहसेक्षितेन ॥२१ पंपोद्भव ने सपश्चर्या से प्रसन्न होकर उसको यह वरदान प्रदान पर दिया और वह बलवान् फिर स्वर्ग में चला गया था ॥१॥ पौधे पनि माया आदि मे इन्द्र के एहित मभी देवगण को जीतकर हिरण्यकशिपु गाने पर भी धुन्धु ने इन्द्र के पद को प्राप्त कर लिया पा॥१६॥ उग गमप में वह माता बलवान हिरण्य परिपु दंप पुका समाधित होकर मादागिरि पर विवरण दिया करता था | इसके पाषान् मद भगुर पधारा में विचरण शिपात और गण इसके पश्चात् दूसरा एक करोड योजनो केर वाला जन-लोक है जहाँ पर गोमातर निवास करती हैं जिन विनाश करने वाला हम में कोई भी नहीं है जो ऐसा महान् असुरेहोवे ॥२२॥ इमके उप- धुन्धु-पराजय वर्णन [ ३०६ दुखयुक्त होकर ब्रह्म लोक में स्थित रहा करते थे ॥१८॥ इसके अननर धुन्धु ने देवगण को ब्रह्मलोक मे स्थित सुनकर देत्यों से कहा था-हम सब यग्रज ब्रह्मा के लोक में ही चलें और इन्द्र के गहिन सब देवगण को जीत लेवें ॥१६॥ उन मद देवों ने धुन्धु के इस वाक्य का श्रवण तो किया था और यही कहा हे लोक पाल ! वहां कोई भी गति नहीं है जिस मार्ग से उस पिडामह के घर के बागन में पहुंच जावें क्योकि सभी और वहाँ का मार्ग बहुत ही दुर्गम अर्थात् कठिन है ॥२०॥ इस ओर बहुत से सहन पोजना वाला महर नाम वाला लोक है जो जो महपियों के द्वारा परिसेशिन है जिनकी दृष्टि से ही जो प्रेरित होकर डाली जाती है तुरन्त ही दैत्य गण दम्प हो जाया करते हैं ॥२१॥ ततोऽपरो योजनकोटिरेको लोको जनो नाम वसन्ति यत्न । गोमातरोऽम्मासुपिनाशकारीयासा न कोपोहमहासुरेन्द्रः ॥२२ ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु निशद्रािदित्यसहनदीप्तः । सत्याभिधानोभगवन्निवासो वरप्रदोऽभूद्भवतो हि योऽसो । यस्य वेदध्वनि श्रुत्वा विकसन्ति सुरादयः । सकोचमसुरा यान्ति ये च तेपा सर्मिण: ।।२४ तस्मान्मा त्व महाबाहो मतिमेता समादधः। वैराज्यभुवन धु-धो दुरारोह सदा नृभिः ।।२५ तेपा वचनमाकर्ण्य घुन्युः प्रोवाच दानवान् । गन्तुकामःस सदन ब्रह्मणो जेतुमीश्वरम् ॥२६ कथ तु कर्मणा केन गम्यते दानवर्षभाः। कथं तत्र सहस्राक्ष सप्राप्तः सह देवतः ।।२१ ते बुन्युना दानवेन्द्रा. पृष्टा. प्रोचुर्वचोऽधिपस न वय विद्मतत्कर्म शुक्रस्तद्वत्त्यसंशयम् ।। रान्त दूसरा तीस करोड़ योजनो वाला आरयों के सहनो के समान घुन्ध पराजय वर्णन ] । ३११ दत्यो के इम वचन को श्रवण कर घु.धु ने दैत्यों के पुरोहित श्री शुक्राचार्य जी से पूछा था कि क्या कर्म करके ब्रह्मसद की गति होती है ॥२६॥ कलि गिय दैत्याचार्य ने इमसे कहा था पहिले वृज के शत्रु इन्द्र के चरित को बतलाया था ॥३०॥ पहिने समय मे है दैत्येन्द्र ! एक सौ यज्ञो का यजन किया था जो कि वाजिमेध यज्ञ थे। इससे ब्रह्ममद की गति होती है ॥ १॥ वीयं शाली दानवो के पति ने शुकाचार्या के उस वाक्य का श्रवण किया था और फिर गोमेध यज्ञो का यजन करने की उत्तम मति की। इसके अनन्तर उमने असुरो के गुरु को आमन्त्रित किया था और परम श्रेष्ठ दानवो को भी बुला लिया था ॥३२॥ इसने सभी से कहा था अच्छो दक्षिणा वाले अश्वमेध यज्ञो के द्वारा मे यजन करू गा । सो आप लोग सब भू मण्डल मे जाओ और जो वसुधा के अधिप हैं उनके पास चले ॥३३॥ यथा काम गुणो से समन्वित हथमेधों को जीत कर निधियों का आह्वान करें और गुह्य को को आज्ञा दी जावे ।।३४॥ श्रेष्ठ द्विजो को आमन्त्रित करो और देविका के तट पर चलें क्यो कि वही परम पुण्यमयी सरिताओ में श्रेष्ठ नदी है जो कि सब सिद्धियो को करने वाली कही गयी है । वहीं प्राचीन स्थान को प्राप्त कर हम वाजिमेधो का यजन करें ॥३॥ इत्थ सुरारेर्वचन निशम्यासुरयाजकाः । वाढमित्यनवोदृष्टो निधीश सदिदेश सः ॥३६ ततो धुन्धुदेविकाया प्राचीने पापनाशने । भार्गवेन्द्रण शुक्रण वाजिमेधाय दीक्षितः ॥३७ सदस्या ऋत्विजश्चापि तत्रासन्मार्गवा द्विजाः । शुक्रस्यानुमते ब्रह्मशुक्रशिष्याश्च पण्डिताः ॥३८ यज्ञभागभुजस्तत्र स्वर्भानुप्रमुखा मुने। कृताश्चासुरनाथेन शुक्रस्यानुमतेऽसुरा ॥३६ तत: प्रवृत्तो यज्ञस्तु समुस्सृष्टस्तथा हयः । हयस्यानुययो श्रीमानसिलोमा महासुरा ॥४० ३१२ वामन पुराण ततोऽग्निधूमेन महीसशैतान्याप्तादिशोर्वविदिशश्नपूर्णाः । तेनोग्रगन्धेन दिव स्पृशेन मरद्वयौ ग्रह्मलोके महर्षे ॥४१ त गन्धमाघ्राय सुरा विषण्णा जानन्त धुन्धुहय मेधदीक्षितम् । ततःशरण्यशरणजनार्दनजग्मुःसशक्राजगत.परायणम् ॥४२ इस प्रकार के मुगरि के वचन को असुर यात्रों ने थवण किया और उसने 'बहुत अच्छा है, यह रहा था तथा उमने फिर परम प्रपन होकर निधीश को सन्देश दे दिया था ॥३६॥ इसके पश्चात् पुन्य को देविका नदी के परम प्राचीन पापो के नाश करने वाले स्थल में भार्गवे. न्द्र शुक्राचार्या ने वाविमेघ यज्ञ के लिये दीक्षित किया था ॥३७॥ वहीं पर सदस्य और ऋत्विज भी भागं व द्वित्र थे सभी शुक्राचार्य को अनुमति मे थे हे ब्रह्मन् ! शुक्राचार्य के पण्डित शिष्य थे ॥३८॥ हे मुने ! वहाँ पर यज्ञ भाग के भोग करने वाले स्वर्भानु प्रमुख असुर नाथ ने शुक्र अनुमत असुर कर दिये थे ॥३६॥ इसके उपरान्त यज्ञ प्रवृत्त हो गया था और अश्व छोड दिया गया था। अश्व की रक्षा के लिये उसके पीछे असिलोमा महान् असुर गया या ॥४०॥ इसके पश्चात् अग्नि घुम ने शैलों के सहित सम्पूर्ण मही व्याप्त कर ली थी और दिशाएं तथा विदिशाऐ भी सब पूर्ण हो गई थी। उस हे महर्षि ! उग्र गन्ध वाले बौर दिवलोक को स्पर्श करने वाले गन्ध युक्त घूम से वायु बन कर रहा था और वह ब्रह्मलोक में पहुंच गया या ॥४१॥ उस गन्ध का आघ्राण करके समस्त सुरगम घुन्धु को हयमेघ दीक्षित जानते हुए बहुत ही विपाद युक्त हो गये थे। इसके पश्चात् ईन्द्र के सहित सब देवता लोग जगत् के परम परायण-शरण्य भगवान् जनार्दन की शरणागति में गये थे ॥४२॥ प्रणम्य वरदं देवं पद्मनाभ जनार्दनम् । प्रोचुः सर्वे सुरगणा भयगद्गदया गिरा ॥४३ भगवन्देवदेवेश चराचरपराया। विज्ञप्तिः श्रूयतां विष्णो सुराणामातिनाशन ।।४४ धुन्ध पराजय वर्णन ] धुन्धुर्नामामुरपतिर्वलवान्बलसंवृतः । सर्वान्सुराग्विनिजित्य बैलोक्यमहरद्वलिः ॥४५ ऋते पिनाकिन देवं त्राता नोन्यो नविद्यते। अतोऽमौ वृद्धिमगमद्यया व्याधिरुपेक्षितः ॥४६ साम्प्रत ब्रह्मलोकस्थानपि जेतुसमुद्यतः। शुक्स्थमतमादाय सोऽश्वमेधाय दीक्षितः ।।४७ शतं तूनामिष्टाऽसौ ब्रह्मलोक महासुरः । आरोटुमिच्छति वशी विजेतु निदशानपि ॥४८ तस्मादकालहीन तु चिन्तयस्व जगद्गुरो। उपाय मखविध्वसे येन स्याम सुनिवृताः ॥४६ वरदान के दाता-पद्मनाम जनादन देव को प्रणाम करके सब सुर- गप भय से गद्गद वाणी के द्वारा प्रभु से प्रार्थना करने लगे ये ॥४३॥ हे भगवन् ! आपतो देवों के देवेश्वर हैं और चराचर मे परायण हैं । आप सर्वदा सुरों को वात्ति के नाश करने वाले रह हैं । हे विष्णो अब एक हमारी विज्ञप्ति का श्रवण करिये ॥४४॥ धुन्धु नाम वाला असुरों का स्वामी महान् बलशाली और विशाल बल से सम्पन है । सब सुरों को निजित करके बलि ने त्रैलोक्य का अपहरण कर लिया है ॥४शा पिनाको देव के बिना अन्य कोई भी नाता नहीं है । इसीलिये यह वृद्धि को प्राप्त हो गया है जैसे कोई उपेक्षा क्यिा हुआ रोग बढ जाया करता है ॥४६॥ इस समय में वह ब्रह्मलोक के स्पान को भी जीतने के लिये समुधत हो रहा है और उसने शुक्राचार्य के मत को प्राप्त करके वह अश्वमेघ के लिये दीक्षिप्त हो गया है ॥७॥ सौकतुओ को करके यह महान् असुर ब्रह्मलोक मे समारूढ होने की इच्छा कर रहा है और वपी फिर त्रिदशो को को जीतना चाहता है ॥४८। इसलिये हे जगत् के गुरुवर ! इस बकाल होन का कुछ विचार करो और मत के विध्वस का उपाय बतलाइये जिससे हम लोग सुनिवृत होवें ॥४॥ ध्रुत्वा सुराणा वचनं भगवान्मघुमूदना ।

३१४ 1 । वामन पुराण दत्वाऽभयं महाबाहुः प्रेषयामास साम्प्रतम् । विसृज्य च तदा सर्वांस्त्यक्त्वाऽजेय महासुरम् ॥५० वन्धनाय मतिं चक्र धुन्धोर्धर्दध्वजस्य वै । ततः कृत्वा स भगवान्वामनं रूपमीश्वरः ॥५॥ देह त्यक्त्वा निरालम्ब काष्ठव विकाजले । क्षणान्मज्जस्तथोन्मज्जन्मुक्तकेशो यदृच्छया ॥५२ दृष्टोऽथ दत्यपतिना देतेयश्च तथपिभिः । ततः कर्म परित्यज्य यज्ञियं ब्राह्मणोत्तमाः॥५३ समुत्तारयितु विप्रमाद्रवन्त समाकुलाः । सदस्या यजमानश्च ऋत्विजोऽथ महौजसः ॥५४ निमज्जमानमुजह स्ते च ते वामन द्विजम् । समुत्तार्य प्रसन्नास्ते पप्रच्छुः सर्व एव हि ।। किमर्थ पतितोऽसीह केनाक्षिप्तोऽसि वा वद ।।५५ तेपामाकर्ण्य वचन कम्पमानो मुहुर्मुहुः । प्राह धुन्धुपुरोगास्ताञ्च यतामन कारणम् ॥५६ ब्राह्मणो गुणवानासीत्प्रभास इति विश्रुतः । सर्वशास्त्रार्थवित्प्राज्ञो गोरेणापि तु वारुण. ॥३७ भगवान् मधुसूदन ने सुरो के इस वचन का श्रवण करके महाबाहु प्रभु ने देवों को अभय का वचन दिया था और उस समय उन्हे भेज दिया था। उस समय सबको विदा कर अजेय महासुर को छोड़कर मखावज घुघु के बन्धन के लिये बुद्धि की थी। इसके पश्चात् ईश्वर ने वामन रूप किया था ॥५०-५१॥ निरालम्ब देह का त्याग करके देविका नदी के जल में कार की भांति क्षण मात्र मे मज्जन करता हुआ यदृच्छा से मुक्तकेश होकर उन्मज नकर रहा था ॥५२॥ इस भांति सराडूवी करते हुए उसको दैत्य पति ने, देरयों ने और ऋषियों ने भी देखा था बोर सभी ब्राह्मणोत्तमों ने यज्ञिय कर्म का उस समय में त्याग कर दिया पा ॥५३॥ सभी लोग उस दिन को उतारित करने के लिये समाकुल होकर सदस्य, पत्रमान,ऋत्विज जो महान मोज वाले ये एपदम दौड़ पड़े धुन्ध पराजय वर्णन ] [ ३१५ वचन को थे। ५४॥ उन सब ने उस हूबते हुए वामन रूपो द्विज को डूबने से बचा लिया था । उसका समुत्तारण करके सब बहुत ही प्रसन्न हुए थे और सद ने उससे पूछा था कि किसलिए वह उसमे गिरा था अथवा किसने उसे उस नदी में फेंक दिया था-यह बतलाओ ॥५॥ उन सके इस सुनकर बारम्बार कांपता हुआ घुन्धुपुरोगामी उन सब से कहा पा-इसमें जो कारण है उसका आप लोग श्रवण करें ॥५६।। प्रभास नाम से प्रसिद्ध एक ब्राह्मण था जो बहुत ही गुणवान् था। वह सभी शास्त्रो के अर्थों का ज्ञाता परम प्राज्ञ और गोत्र से वारुण पा ||५७॥ तस्य पुत्रद्वयं जातं मन्दप्रज्ञ सुदुःखितम् । तत्र ज्येष्ठो मम भ्राता कनोयानमरस्त्वम्ह ।।५८ नेत्राभास इति स्यातो ज्येष्ठो भ्राता ममाभवत् । मम नाम पिता चक्र गतिभासेति कौतुकात् ।।५६ रम्यश्चावसथश्चापि शुभ आसीपितुर्मम । प्रविष्टपगुणयुक्तः स्वर्गवासोपमः शुमः ॥६० ततो कालेन महता आवयोः स पिता मृतः । तस्यौवंदेहिकं कृत्वा गृहमावां समागतो ॥६१ ततो मयोक्तः स भ्राता विभजाम गृहं वयम् । तेनोक्तो नैव भवतो विद्यते भाग इत्यहम् ॥६२ कुब्जवामनखज्ञानां क्लीवानां श्वित्रिणामपि। उन्मतानां तथान्धानां धनभागो न विद्यते ॥६३ उस ब्राह्मण के दो पुत्र हुए थे वे दोनों ही मन्द प्रज्ञा वाले और अति दुःखित थे । उनमें ज्येष्ठ मेरा भाई था और छोटा दूसरा मैं था ।।५८॥ मेरा ज्येष्ठ भ्राता नेनामास-दस नाम से विख्यात हुमा था। मेरे पिता ने कौतुक से मेरा नाम गतिमास किया था ॥५६॥ मेरे पिता का परम रम्य एवं अतीव शुम श्रावसय (घर) था। वह विष्टय के गुणों से युक्त था और स्वर्ग के निवास के समान परम शुभ था ॥६०॥ फिर अधिक काल होने पर हम दोनों भाइयों का पिता मृग. हो गया था। उस पिता का औवं देहिक कृत्य करके हम दोनों गृह में । वामन पुराण आगये थे ॥६१। इसके पश्चात् मैंने उस भाई से कहा था कि हम घर का विभाजन कर लेवें । उसने मुझसे कहा था कि तेरा इसमे कोई भी भाग नहीं है ॥६२॥ कुवई -बोना-खज-वलीय-फेर कोढ़ वाला उन्मत्त-अ-धा-इन का कोई भी भाग नहीं हुआ करता है ॥६३।। प्रिय वाक्यं गृहे वासो भोजनाच्छादनादिकम् । एतावद्दीयते तेभ्यो नार्थभागतरा हि ते १६४ एवमुक्तो मया सोऽथ किमर्थ पैतृकाद् गृहात् । धनार्धभारमहर्हामि नाह न्यायेन केन वै ॥६५ इत्युक्तो बलवान्भ्राता केशाजग्राह मेऽसुर। समुत्क्षिप्याक्षिपन्नद्या न जाने ह्यवतारणम् ॥६६ ममास्या निम्नगाया तु मध्येन प्लव गतः। कालः संवत्सराख्यस्तु युष्माभिरमृतोधृतः ॥६७ के भवन्तोऽन सप्राप्ताः सस्नेहा बान्धवा इव । कोऽय शक्रप्रतीकाशो युप्मन्मध्ये प्रदृश्यते ॥६८ तन्मे सर्व समाख्यात याथातथ्य तपोधनाः । महर्पिसदृशा यूय सानुकम्पाश्चमादृशे । ६६ तद्वामनवचः श्रुत्वा भार्गवा द्विजसत्तमाः। प्रोचुर्वय द्विजा ब्रह्मन्भार्गवा वशवर्धनाः ।।७० प्रिय वचन--घर में निवास-भोजन और वस्व आदि उन लोगों के लिए इतना ही दिया जाया करता है किन्तु चे अर्थ के भाग के प्राप्त करने वाले नहीं हुआ करते हैं ॥६४॥ इस प्रकार से जब मुझसे कहा गया था तो मैंने उस भाई से कहा कि मैं अपने पंतृक घर से धन का माधा भाग किस न्याय से ग्रहण करने योग्य नही हूँ ॥६५॥ है असुर । जब मैंने उम बलवान् भाई से ऐसा कहा तो उसने मरे केशों को पकड लिया था और मुझे उठाकर नदी में डाल दिया था फिर इससे मेरा अब धारण कैसे हुआ-हमे मैं नहीं जानता हूँ ॥६६॥ इस नदी मे मध्य मे प्लवमान होते हुए मुझे सम्वत्सराप काल होगया है। भाप लागो ने मुझे मरा हुआ पकड़ लिया है ॥६॥ आप लोग यहाँ पर कौन मुझे ४ . धुन्ध पराजय वर्णन ] [ ३१७ प्राप्त होगये हैं जो बिल्कुल वाधवों को ही माति हैं और स्नेह से परिपूर्ण हैं आप लोगों के मध्य में यह इन्द्र के ही समान प्रकाश वाला कोन दिखलाई दे रहा है ? ।। ६८ ॥ हे नारस- गण ! यह सभी वृत्त आप लोग मुझे बतलाइये जो रित्कुन मही-सहो हो । आप तो सभी लोग महर्पियो के तुल्य हैं और मुझ जैसे व्यक्ति पर तो बहुत अधिक दया रखने वाले हैं ॥६६॥ वामन के इस वचन को सुनकर श्रेष्ठ द्वि भागंदो ने कहा-हे ब्रह्मन् हम वंश के वघंन करने वाले मार्गव द्विज हैं ॥७॥ असावपि महातेजा धुन्धु म महासुरः । दाता भोक्ता च भर्ता च दीक्षितोयज्ञकर्मणि ॥७१ इत्येवमुक्त्वा देवेशं वामनं भार्गवास्ततः । प्रोचत्यपति सर्व वामनार्थकरं वचः ।।७२ दीयतामस्य दैत्येन्द्र सर्वोपस्करसंयुतम् ।। श्रीमदावसथं दास्यो रलानि विविधानि च । ७३ इति द्विजानां वचन श्रुत्वा दैत्यपतिस्ततः । प्राह द्विजेन्द्र ते ददि यत्त्वमिच्छसि वे धनम् ।।७४ दासीह हिरण्य च वाजिनः स्यन्दनानगजान् । गोभूमिराज्यवस्त्रादि स्वेच्छया चैववै प्रभो ॥७५ तद्वाक्यं दागवपतेः श्रुत्वा देवोऽथ वामनः । प्राहासुरपति धुन्धुन्वार्थसिद्धकरं वव: ॥७६ सोदरेणापि हि भ्रामा हियन्ते यस्य संपदः । कि तस्य नार्थों राजेन्द्र दीयते चार्थ एव हि ॥७७ यह भी महान् तेजस्वी घुन्धु नाम वाला महान् असुर है । यह दाढा, भोक्ता-भर्ता और यज्ञ कर्म के करने मे दीक्षित है ॥७१॥ देवेश्वर वामन से इतना भर वह कर भागद दाह्मणो ने सब ने मिलकर वामन का अर्थकर वचन दत्य पति से रहा था 1७२।। है दैत्येन्द्र ! इस वामन विप्र को बहुत सुन्दर श्री से सम्पन्न और सभी उपस्करो से सम- वित निवास स्थान प्रदान कीजिए-दासियों और अनेक रस्त भी ३१८ ] [ वामन पुराण, दीजिएगा ।।७३।। दैत्यपति ने भार्गव द्विजो के इस वचन को सुनकर वामन से कहा-हे द्विजेन्द्र ! मैं आपको वही देता हूं जो कुछ भी धन साप चाहते हों ॥७४।। दासी-गृह-हिरण्य-अश्व-रथ-हाथी-गो-भूमि-राज्य, वस्त्र आदि जो भी अपनी इच्छा से आप ग्रहण करना चाहे हे प्रभो ! वही सब मैं आपको देने को प्रस्तुत हूं ॥७॥ वामन देव ने दानद पति का यह वाक्य श्रवण करकै असुरो के स्वामी घु:धु से स्वायं को सिद्धि करने वाला व वन कहा था ७६।। हे राजेन्द्र ! सगे भाई ने जिसकी सम्पूर्ण सम्पत्ति का हरण कर लिया है क्या उसके अर्थ नहीं है ? आप जो धन मुझ दे रहे हैं ॥७७।। दासीर्दासान भृत्यांश्च गृह रत्नं परिच्छदान् । समर्थेभ्यो द्विजेन्द्र भ्य: प्रयच्छस्व महाभुज ॥७८ मम प्रमाणमालोक्य मामकं च पदत्रयम् । स्व प्रयच्छस्व दैत्येन्द्र एतदेवार्थये ह्यहम् ॥७६ इत्येवमुक्त वचनंमहात्मनाविहस्यदैत्याधिपति.सऋत्विजः । प्रादाञ्च विप्राय पदत्रयं वशी यदा स नान्यत्प्रगृहीतवान्पुनः ।।८० क्रमतयं तावदवेक्ष्य दत्तं महासुरे ट्रेण विभुर्यथा शशी। चक ततो लवयितुप्रिलोकी त्रिविक्रम रूपमनन्तशक्तिः ।।८१ कृत्वा च रूप दितिजाश्च हत्वा प्रणम्य चर्षीश्च स च क्रमेण । महीमहीध्रासहितांसहाणवाजहाररत्नाकरपत्तनयुताम् ॥८२ भुव स नाका विदशाधिवास सोमार्कऋक्षरभिमण्डित नमा। देवो द्वितीयेन जहार वेगास्क्रमेण देवप्रियमीप्सुरीश्वरः ।।८३ कम तृतीय न यदाऽस्य पूरितं तदातिकोपाड्नुपुङ्गवस्य । पपात पृष्ठे भगवास्त्रिविक्रमो मेरुप्रमाणेन तु विग्रहेण ।।८४ हे महान् भुजाओं वाले ! दासी-दास-मस्य-गृह-रस्न और परिम्हद उन्हीं दिनों को आप प्रदान कीजिए जो पूर्ण समयं हों 11७८॥ मेरे प्रमाण पो देस र मेरे ही परो के तीन पंह भूमि अपनी मुस दीजिए । ! यही में आप मे चाहता हूँ ॥७६॥ महात्मा के दारा तना हो वपन सुनकर विनों सहित वह दस्यों का अधिपति धुन्ध पराजय वणन । [ રૂદ્ધે हंस पहा और वशी उसने विप्र के लिये तीन पैड भूमि देने का वचन दे दिया था क्योंकि अन्य किसी भी वस्तु को लेना उपने स्वीकार हो नहीं किया था ।1८1 महासुरेन्द्र के दाग दिपे हुए पदनय की भूमि के क्रम को शशि के भांति देखा था। विभु ने जिसको अनन्त शक्ति है निविक्रम रूप धारण करके त्रिलोकी लांघ लिया था।1८१॥ ऐसा अपना स्वरुप धारण करके और दितिजों का हनन करके उस प्रभु ने ऋपियों को प्रणाम किया था। पर्वतो के सहित भूमि को कम से सम- वित एव रत्नाकर पत्तनों के सहित हरण कर लिया था ॥२॥ एक पंह से तो इस प्रकार सम्पूर्ण भूमण्डल को नाप लिया था फिर स्वर्ग की भूमि को तथा देवों के निवास स्थान-सोम सूर्य और नक्षत्रों से अभिमण्डित नम को दूसरे पैड से देवों के प्रिय करने की इच्छा वाले ईश्वर ने क्रम से वेग के साथ हरण कर लिया था ॥५३॥ जा इसका तीसरा पंड पूर्ण नहीं हुआ तो उस समय में दनुपुङ्गव पर अत्यन्त कोप किया या और भगवान् विविक्रम ने मेरु प्रमाण विग्रह से पीठ पर उसे दाल दिया था।॥४॥ पतता वासुदेवेन दानवोपरि नारद । त्रिशद्योजनसाहस्री भूमिर्गर्ते दृढीकृता ।।८५ ततो दैत्यं समुत्पाट्य तस्या प्रक्षिप्य वेगतः। ववर्ष सिकतावृष्टया त चगर्तमपूरयत् ॥८६ तत. स्वर्ग सहस्राक्षो वासुदेवप्रसादतः । मुराश्च सर्वे त्रलोक्यमवापुनिस्पद्रवा. ॥८७ भगवानपि दैत्येन्द्र प्रक्षिप्य सिकतार्णवे। कालिन्द्या स्पमाघाय ततवान्तरधीयत ॥ एव पुरा विष्णुरभूच्चवामनोधुन्यु विजेतुच सिविक्रमोऽभूत् । यस्मिन्स दैत्येन्द्रसुतो जगाम महाश्रमे मह ॥८६ हे नारद ! दानद के ऊपर गिरते हुए वासुदेव ने तीस हजार योजन वाली भूमि को गत्तं मे दृढ कर दिया या ॥८॥ इसक मनन्तर दत्य से उत्पाटित पर वेग से उस गत मे प्रक्षिप्त कर दिया था। फिर

१२० ]
| वामन पुराण
सिकता की वृष्टि की थी और उस गर्त को भर दिया पा ॥८६॥ इसके
उपरान्त भगवान् वासुदेव प्रसाद से इन्द्र में स्वर्ग की और समस्त
सुरो ने शिना किसी उपद्रव के लोक्य की प्राप्ति की थी॥७॥ भग.
मान् ने भी दैत्येन्द्र को प्रक्षिप्त करके अर्थात् उस बालू के महा सागर
मै अल कर कालिन्दी के रूप को धारण कर वे वहीं पर अन्तर्धान हो
गये थे ।।८।। इस प्रकार से पहिले भगवान् विष्णु वामन हुए थे और
धुन्धु को विजित करने के लिये त्रिविक्रम का स्वरूप धारण किया था
हे महर्षे ! वह दैत्येन्द्रसुत पुण्य युत महाश्रम मे चला गया था ।।८६
६६--पुरूरवस उपाख्यान वर्णन
कालिन्दीसलिले स्नात्वा पूजयित्वा त्रिविक्रमम् ।
उपोष्य रजनीमेकां लिङ्गभेद गिरिं ययौ ॥१
तत्र स्नात्वा च विधिवच्छिवं संपूज्य भक्तितः।
पोष्य रजनीमेकां नीर्थ केदारमाव्रजेत् ॥२
तस्मिन्स्नात्वा च विधिवत्समाराध्य जगत्पतिम् ।
उपित्वा वासरान्सप्त कुब्जाम्र प्रजगाम ह ॥३
सन गत्या महावाहुरुपवासी जितेन्द्रियः ।
हपोकेशं समभ्यर्थ्य ययौ बदरिकाश्रमम् ॥४
सतोप्यनारायणमर्यभवत्यास्नात्वाऽविद्वान्ससरस्वतीजले ।
वाराहतीर्थे गरुडासनं स दृष्ट्वा समभ्यय॑सुभक्तिमाश्च ॥५
भद्रकणे ततो गत्वाऽयजञ्च शशिशेखरम् ।
ततः सपूज्य च वशी विपाशामभितो ययौ ॥६
तस्यां स्नात्वा समभ्यच्यं देवदेव द्विज प्रियम् ।
इरावत्यां जगन्नाथं ददर्श परमेश्वरम् 11७
महर्षि पुलस्त्य ने कहा-प्रसाद ने कालिन्दी के जल में स्नान करके
भगवान् त्रिविक्रम का पूजन का यो और एक रानि का उपनिवास करके
फिर यह लिंग भेर गिरि पर चले गये थे। यहाँ विधि पूर्वक स्नान करके

पुरूरवस उपाख्यान वर्णन 1 ३२१ भक्ति भाव से शिव का अर्चन किया था और एक रानि रह कर केदार- वीयं को चले गये थे ॥१-२॥ उस तीर्थ मे विधि पूर्वक स्नान करके और जगत्पति की आराधना करके सात दिन तक यहां ठहरे और फिर कुब्जान को चले गये ये ॥३॥ वहां पहुच कर महाबाहु ने उपवास किया था तथा जितेन्द्रिय होकर निवास किया था। भगवान् हपीकैश की अर्चना करके फिर बदरिकाश्रम को चले गये थे ॥४॥ नहीं भग- वान् नारायण की अर्चना करके उन्हें पूर्ण सन्तुष्ट किया था और भक्ति भाव से विद्वान् ने सरस्वती के जल में स्नान किया था। वाराह तीर्थ में गरुडासन का दर्शन परके सुमक्तिमान् ने उनका भली भांति अचन किया था ॥५॥ इसके उपरान्त भद्रकर्ण मे जाकर भगवान् शशिशेखर का यजन किया था। फिर वशी ने भली भाति अचना करके विपाशा नदी की ओर प्रस्थान किया था ॥६॥ उस विपाशा में स्नान करके द्विजप्रिय देव-देव की अभ्यर्चना की और इरावती में परमेश्वर जगन्नाथ का दर्शन किया था ॥७॥ समाराध्य द्विजथेष्ठ शाश्वतं जगत: प्रभुम् । समवाप परं रूपमैश्वर्यं च सुदुर्लभम् ।। कुष्ठरोगाभिभूतश्च य समाराध्य वै भृगुः । आरोग्यमतुल प्राप संतानमपि चाक्षयम् ।। क्थ पुरूरवा विष्णुमाराध्य द्विजसत्तम । विरूपत्व समुत्सृज्य रूप प्राप श्रिया सह ।।१० श्रूयता कथयिष्यामि महापापप्रणाशनम् । पूर्व नेतायुगस्यादौ यथा वृत्त तपोधन ।।११ मद्रदेश इति स्यातो देशो ब्राह्मरणसत्कृतः। शाकल नाम नगर च्यात स्थानीयमुत्तमम् ॥१२ तस्मिन्विपणिवृत्तिस्थ: सधर्माज्योऽभवणिक् । घनाट्यो गुणवान्भोगी नानाशास्त्रविशारद. ॥१३ स कदाचिनिजाद्राष्ट्रात्सौराष्ट्र गन्तुमुद्यतः । सार्थन महता युक्ता नानाविपणिपण्यवान् ।।१४ ३२२ ] [ यामन पुराण है द्विजश्रेष्ठ ! परम नश्वत जगत् के प्रभु की भलीमाति बाराधना करके परम रूप तथा सुदुर्लभ ऐश्वयं के पाने का लाभ किया या 10 कुष्ट जैसे महारोग से अभिभूत भृगु ने जिसकी समाराधना करके अतुलनीय आरोग्य की तथा भय रहित मन्तति की प्राप्ति की थी | देवपि नारद ने कहा--पुरुरवा ने भगदान विष्णु का किस प्रकार से आराधन किया था ? है द्विज श्रेण ! उमने विरूपता का त्याग करके श्री के सहित परम सुन्दर हप-जावण्य की प्राप्ति की थी ॥१०॥ महपि पुलस्त्य कहा- अब आप सुनिए, मैं महान् पापों के नाश करने वाले को कहता हूँ । पहिले प्रेता युग के आदि मे हे तपोधन ! जो कुछ भी हुआ था ॥११॥ ब्राह्मणों के द्वारा सरकार किया हुआ मद्रदेश, इस नाम से एक देश विख्यात था। वहाँ पर शाकल नाम वाला परमोत्तम स्थानीय एक नगर प्रसिद्ध था ॥१२॥ उस नगर मे विपणि वृत्ति में स्थित एक सधमं नाम वाला वणिक् हुआ था । वह बहुत धनाढय-गुण गण से युक्त-नाना शास्त्रो का महा मनीपो और भोगी पा ॥१३॥ वह किसी समय में अपने राष्ट्र से पौराष्ट्र मे जाने के लिये समुद्यत हुआ था वह अनेक प्रकार के विपणिपण्य पदार्थों से समन्वित था और एक महान सार्थ से भी युक्त था अर्थात् विशाल साथियो का भी समुदाय था ॥१४॥ गच्छतः पथि तस्याथ मरुभूमो कलिप्रिय । चौराणामभवद्रावाववस्कन्दो हि दुःसहः ।।१५ ततः स हृतसर्वस्वो धणिग्दुःखपरिप्लुतः। असहायो मरी तस्मिनचारोन्मत्तवद्वशी ॥१६ चरता तदरण्य व दुःखाकान्तेन नारद । आत्मनेव शमोवृक्षो महानासादितः शुभः ॥१७ त मृगैः पक्षिभिश्चय हीनं दृष्ट्वा शमीतरुम् । क्षान्तः क्षुतुटपरीतारमा तस्य पार्श्वमुपाविशत् ।।१८ सुप्तश्चापि सुविथान्नो मध्याह्न पुनरुत्थितः । समपश्यदथायात प्रेतं प्रेनश तेवृतम् ॥१५ उह्ममान तथाऽन्येन तेन प्रेतनायकम् ।

पुरूरवस उपाख्यान वणन ] [ ३२३ धान्तः पुरो हि घावदिभः प्रेत क्षविनः ॥२० अथाजगाम प्रेतोऽसौ पर्यटित्वा धरामिमाम् । उपागम्य शमीमूले वरिणवपुत्रं ददर्श सः ॥२१ हे कलि प्रिय ! मार्ग में गमन करते हुए उमको मरुभूमि माई थी जहा पर चोरो का एक दुःमह अवस्कन्द रात्रि में हुआ था ॥१५॥ चोरो के हमले के होने पर उसका सभी कुछ अपद्दत हो गया था और वह विचारा वणिक अतीव दुःख से परिप्लुत हो गया था। उस मार- वाह भूमि में सहायता से रहित होकर वह एक दशी उन्मत्त की भाति वहा विचरण करने लगा था ॥१६।। हे नारद ! दु.ख से आक्रान्त उसने अपने ही आप उस अरण्य मे विचरण करते हुए एक शमी का वृक्ष जो महान् विशाल एव शुभ्र या प्राप्त कर लिया था ॥१७॥ उस वृक्ष शमी को मृग और पक्षियो से हीन देख कर बहुत ही शान्त-भूख- प्यास से परोत आत्मा वाला वह उसके पास बैठ गया था ॥१८॥ बहुत ही अधिक थका हुआ था अतएव वही पर वह सो गया था । जब मध्याह्नवेला हुई तो वह फिर उठा था। उसने वहां पर सैक्हो प्रेतो समावृत्त आये हुए एक प्रेत को देखा था ॥१६! एक अन्य प्रेत के द्वारा वह प्रेनों का नायक वहन किया जा रहा था और उसके आगे रूक्ष निग्रह वाले प्रेत दौड लगा रहे थे ॥२०॥ इसके अनन्तर वह प्रेत पर्यटन करके इसी भूमि पर समायात हो गया था। शमी के भूत में आकर उसने उस वणिक पुन को देखा था ॥२१॥ स्वागतेनाभिवाद्यन समाभाष्य परस्परम् । सुखोपविष्टश्छायाया हृष्टा कुशलमाप्तवान् ॥२२ प्रेताधिपतिना पृष्टः स च तेन वणिक्सखे । कुत आगम्यते व हि क्व वासो वा भविष्यति ॥२३ कथ चेद महारण्य मृगपक्षिविवजितम् । समापन्नोऽसि भद्रं ते सर्वमाझ्यातुमर्हसि ॥२४ एव प्रेताधिपतिना वरिणवपृष्टः समासतः। सर्वमान्यातवान्ब्रह्मस्वेदशधनविच्युतिम् ।।२५ ३२४ ॥ [ वामन पुराण तस्य श्रुत्वा स वृत्तान्तं तस्य दुखेन दुःखितः । वणिवपुत्र ततः प्राह प्रेतपाल: स्ववन्धुवत् ॥२६ एव गतेऽपि मा शोक कर्तुमर्हसि सुव्रत । भूयोऽप्या भविष्यन्ति यदि भाग्यवल तव ॥२७ भाग्यक्षयेऽर्थाः क्षीयन्ते भवन्त्यभ्युदये पुनः । क्षीणस्यास्य शरीरस्य चिन्तया नोदयो भवेत् ।।२८ इसका स्वागत वचनो के साथ अभिवादन करके परस्पर में भली भौति भाषण करते हुए उस वृक्ष की छाया में सुख पूर्वक बैठ गया था और परम प्रसन्न होकर कुशल प्राप्त किया था ॥२२॥ उस प्रेतो के अधिपति ने उस वणिक से पूछा था~हे वणिक मित्र ! तुम यह बत. लाओ कि कहीं से भा रहे हो और थापका वास कही होगा २३॥ इस महान् भरण्य में जो एक दम मृग और पक्षियो से भी शून्य है आप कैसे प्राप्त हुए हैं । आपको भला हो-मुझे यह सभी हाल आप बतलाने के योग्य होते हैं ॥२४॥ इस प्रकार से प्रेतो के अधिपति के द्वारा वह वणिक पुत्र सक्षेप मे पूछा गया था। उस वणिक ने भी सम्पूर्ण हाल हे ब्रह्मन् ! बता दिया था जिसमे देश और अपने धन के अपहरण होने का भी समाचार था ॥२५॥ उसके पूरे वृत्तान्त को सुनकर वह प्रेत नायक उसके दुख से पत्पन्त दु.खित हआ था। इसके पश्चात् वह प्रेत पाल अपने वन्धु की भांति उस वणिक पुत्र से कहने लगा ॥२६॥ है सुखन ! ऐसी दुर्घटना हो जाने पर भी आप विशेष शोक मत करिये। यदि आपके भाग्य में बल है तो ये धन फिर मो सर हो जायगे ॥२७॥ [भाग्य के क्षय अर्थात् मन्द हो जाने पर ही धनों का भी क्षय हो जाया करता है । फिर जब माग्य का उदय होता है तो फिर ये प्राप्त हो पायापरते हैं। चिन्ता से इस शरीर को क्षोण बना देने पर घना या भाग्य का उदय नहीं हुभा करता है ॥२८॥ इस्युचायं ममाहूप स्वाभृित्यान्वाक्यमरवीत् । अद्यातिपिरयपूज्य: राहजो देशजो मम ॥२८

पुरूरवस उपाख्यान वर्णन ]
[ ३२५
अस्मिन्दृष्ट वणिक्पुने दृष्टाः स्वजनवान्धवाः ।
अस्मिन्समागते प्रेताः प्रीतिर्जाता ममातुला ॥३०
एव हि वदतस्तस्य मृत्पात्र सुदृढ नवम् ।
दध्योदनेन सपूर्णमाजगाम यथेप्सितम् ॥३१
तथा नवा च सुदृढा सपूर्णा परमाम्भसा ।
वारिधानी च सप्राप्ता प्रेतानामग्रत. स्थिता ॥३२
तामागता ससलिला सान्ना वोक्ष्य महामतिः ।
प्राहोत्तिष्ठ वणिवपुत्र त्वमाह्निकमुपाचर ॥३३
ततस्तु वारिघान्यास्तौ सलिलेन विधानतः।
कृताह्निकावुभौ जातौ वणिक्षेत प्रभुस्तथा ॥३४
ततो वणिवसुतायासी दयोदनमथेच्छया ।
दत्त्वा तेभ्यश्च सर्वेभ्यः शेपमन्नमधात्तत.॥३५
इतना वणिक से कह कर उस प्रेत नायक ने अपने भृत्यो को बुला-
कर उनसे कहा या-आज यह अतिथि प्राप्त हो गया है जो सहज-हे
राज और मेरा पूज्य है ॥२६॥ इस वणिक् पुन के देख लेने पर सभी
स्वजन वान्धव गण प्रसन्न हुए देखे गये थे। इसके समागत होने पर हे
मेतो! मुझे अतुल प्रोति उत्पन्न हो गई है ॥३०॥ इम प्रकार से उसके
कथन करते हुए ही एक मिट्टी का नवीन बहुत मजवून पान दधि और
बोदन से भरा हुआ जो यथेप्सित था वहाँ पर आ गया था ॥३१॥
उसी प्रकार से एक नूनन एवं सुदृढ तथा जल से पूरी भरी हुई वारि-
धानी भी वहां प्राप्त हो गई थी जो प्रेतो के आगे मे स्थित हो गई थी
॥३२॥ उस समागत सलिल से परिपूर्ण तथा अन्न से भी युक्त उसको
देखकर महान मति वाले ने कहा-हे वणिक् पुन ! माप उठिये और
अपना बाह्निक का समार रण करें ॥३३॥ इसके उपरान्त उन दोनों
ने जिनमे वह वणिक और प्रेत नायक थे उस वारिधानी के जल से
विधान पूर्वक अपना माह्निक क्रिया या ॥३४॥ इसके पश्चात् इसने
उस वणिक सुन के लिये इच्छा से दध्योदन देकर इसके पश्चात् शेष
बन्न को उन सबको दिया था ॥३॥

३२६ ] बामन पुराण भुक्तवत्सु च सर्वेषु कामतोमसि सेविते । अनन्तरं स युभुजे प्रेतपालो वराशनम् ।।३६ तृप्ते प्रेते प्रकाम तु वारिघान्योदनं तथा । अन्तरर्धानमगाद्ब्रह्मन्वणिकपुत्रस्य पश्यतः ॥३७ ततस्तदद्ध ततम दृष्ट्वा स मतिमान्वणिक् । पप्रच्छ त प्रेतपाल कौतूहलमना वशी॥८ अरण्ये निर्जने साधो कुतोऽनस्य समुद्भवः । कुतश्च वारिधानीय संपूर्णा परमाम्भसा ॥३६ तथाऽपि तब ये भृत्यास्त्वतस्ते वर्णतः कृशा।। भवानपि च तेजस्वी किंचिपुष्टवपुः शुभा ॥४० शुक्लवस्त्रपरीधामो बहूनां परिपालकः । सर्वमेतन्ममाचक्ष्व को भवान्का शमी त्वियम् ॥४१ इत्थ वरिणग्वचः श्रुत्वा ततोऽसौ प्रेतनायकः। शशंस सर्वमस्याथ यथावृत्त पुरातनम् ॥४२ सबके युक्तवान हो जाने पर तथा जल के सेवन कर लेने पर जो कि इच्छा पूर्वक किया गया था इसके अनन्तर उस प्रेतपाल ने वह बरा. शन स्वयं खाया था अर्थात् सब के खाने-पीने के पीछे हो स्वय भोजन किया था जैसा कि शिष्टाचारानुमत है ॥३६॥ इच्छा पूर्वक भली भांति उस प्रेत के तृप्त हो जाने पर जिसके पश्चात् वह वारिधानी और दम्यो- दन पार वहीं अन्तर्धान को प्राप्त हो गये थे। हे ब्रह्मन् ! इस दृश्य को वह वणि पुन अपनी आखों से देख रहा था ॥३७॥ इम एक अतीव अद्भुत दृश्य को देखकर उस मतिमरन् दणिक ने उस प्रेतपाल में मन मे परम तहत धारण करते हुए उससे वशी ने पूछा पा ॥३॥ हे साधो ! इस निर्जन अरण्य मे अन्न की कहात्ति कैसे हो गई और सुन्दर जल से पूर्ण यह वारिधानी भी कहाँ से प्राप्त हो गई है ? ॥३॥ थापके ये भृत्य हैं वे आप से भी वर्ण से कृश हैं और आप तो एक तेजस्वी और परिपुष्ट शरीर वाले परम शुम हैं ॥४०॥ आप शुक्ल वस्त्रों के परिधान करने वाले बहुतों के परिपालक हैं । आप मुझे यह सभी पुरूरवस उपाख्यान वर्णन ] ३२७ बवलाइये कि आप कोन है और यह शमी कौन हैं ॥४१॥ इस प्रकार के वणिक के वचन को सुनकर इसके पश्चान उस प्रेत नापक ने सम्पूर्ण पुरातन वृत्तान्त इसको कह डाना या ॥१२॥ अह्मासं पुरा विप्र शाकले नगरोतमे । सोमसमति विख्यातो वहुलगर्भ संभवः ॥४३ ममास्ति च वणिक् श्रीमान्प्रतिवेश्यो महाधनः । स तु सोमश्रवा नाम विष्णुभक्तो महायशाः ।।४४ सोऽह कादों मूढात्मा धनेऽपि सति दुर्मतिः । न ददामि द्विजातिभ्यो न वाऽश्नाम्यन्नमुत्तमम् ॥४५ प्रमादाद्यदि भुञ्जह दधिक्षीरघृतान्दितम् । ततो रात्रो विभिोरंस्ताडयमानश्न यष्टिभिः ।।४६ प्रातभवति मे घोरा मृत्युतुल्या विपूचिका । न च कश्चिन्ममाभ्याशे तत्र तिष्ठति वान्धवः॥४७ कथं कथमपि प्राणा मया वै संप्रधारिताः । एवमैतादृशः पापी निवसाम्यति निघृणः ॥४८ सौवीरतिलपिण्याकतुपशाकादिभोजनः । क्षपयामि कदन्नाधेरात्मान कालयापन: ॥४॥ हे विप्र! मैं पहिले उत्तम नगर शाकल में था। नहुना के गर्म से मैं समुत्पन्न हुआ था और मैं सोम शर्मा के नाम से लोक में विख्यात या। मेरा परम श्रीमान् महान् धनी वणिक प्रातिबेश्य था। उसका नाम सोमवा या। वह महान् यशस्वी और विष्णु का भक्त या १४३- ४४॥ वह मैं इतना नीच वृत्तिवाला और मूढ था कि धन के रहने पर भी दुए बुद्धि वाला या न तो कमी द्विजातियों को दान देता था और मस्वयं ही उत्तम अन्न का उपमोग किया करता ॥४५॥ प्रमाद से यदि मैं कुछ सा-पो भी लू' जोकि दधि और घृत से युक्त हो तो रात्रि में परम घोर तीन यष्टिी से ताड्ममान होता या ॥४६॥ प्रात:काल में मुझे मृत तुल्य अति घोर विचिका हो जाती यो। मेरे समीप में कोई बान्धव नहीं रहा करता पा॥४७॥ किसी-किसी भी कठिनाई से मैंने - । वामन पुराण अपने प्राणों को धारण किया था। इस प्रकार का महा पापी अत्यन्त निण वहाँ पर रहा करता था ॥४}सोधीर-तिल-पिण्याक-तुष और शाकादि के भोजनो से और काल का यापन करने वाले कदन्नी के द्वारा आत्मा को क्षपित करता हूं ॥४॥ एव तत्र सतो मित्र महान्कालोऽभ्यगादथ । श्रवणद्वादशी नाम मासि भाद्रपदेऽभवत् ॥५० ततो नागरिको लोको गतः स्नातु हि सगमम् इरावत्या नड्वलाया ब्रह्मक्षलपुरस्सर. ॥५१ प्रातिवेश्यप्रसङ्गन तनाप्यनुगतोऽस्म्यहम् । कृतोपवास शुचिमानेकादश्या यतमतः ॥५२ तत सगमतीयेन वारिधानी दृढा नवाम् । सपूर्णा वस्तुसवीता छत्रोपानरसुसयुताम् ॥५३ मृत्पात्रमतिमृष्टस्य पूर्ण दहयोदनस्य । प्रदत्त ब्राह्मणायोच्य. शुचये जातिकर्मणा ॥५४ तदेव जीवता दत्त मया दान वरिण सुत । वर्षाणा सप्ततीना वै नान्यद्दत्त हि किंचन ॥५५ मृत. प्रेतत्वमापनो दत्त्वा प्रेतानमेव हि । अमी चादत्तदानास्तु महत्तानोपजीविन ॥५६ एतत्ते कारण प्रोक्त यत्तदन्न पयोमसा । दत्त तदिदमायाति मध्याह्नऽपि दिने दिने ।।५७ हे मित्र ! यहाँ पर इस प्रकार से रहते हुए मुझे महान् काnt ध्यतीत होगया था। भाद्रपः मास में प्रणवादशो आईपी ॥५॥ उस समय में नगर के रहने वाले सब लोग सगम में स्नान करने के लिये गये थे इरावती नवला और ब्रह्मान भी उसमें पा॥५१॥ पड़ोस के प्रांग में भी उन यो पोछे पना गया था। एकादशी तिथि में यात प्रत पासा होरर मैंने उपवास पिया पा और शुचिपान होगया था ॥५२ सो अनन्तर सगम के जारी एक परम मुद्रा मवीन पारि पानी को पूर्ण भरी हुई थी यशुरू सयोत पी और छ वा उपानव.

पुरूरवस उपाख्यान वर्णन ] [ ३२६ । से भी समन्वित थी। अतिभृष्ट दध्योदन से पूर्ण एक जाति और कम से अत्यन्त पवित्र ब्राह्मण के लिये दान दिया था ॥५३-५४॥ हे वणिक सुत ! जीवित रहते हुए मैंने बस वही दान दिया था। सत्तर वर्षों की अवस्या मेरी होगई यो किन्तु मैंने इसके सिवाय अन्य कुछ भी कभी किमी को दान नही दिया था ॥२॥। जब मैं मर गया तो प्रेत योनि मुझे प्राप्त हुई थी और इस प्रेतान्न को देकर ही यह मुझे प्राप्त हुई थी। ये जो सब हैइ होने कुछ भी दान नहीं दिया था। प्रतएव मेरे दिये हुए अन से ही ये सब उपजीवी हैं ।।५६।। यही इसका कारण है जो मैंने तुमको बतला दिया है। यह वही अन्न और जल है जो मैंने दिया था। यह प्रतिदिन मध्याह्न समय में प्राप्त होता है ॥५॥ यावन्नाह च भुजेऽन्न न तावत्क्षयमेति च । मयि भुक्त च पौते च सर्वमन्तहित भवेत् ।।५८ आतपत्र प्रदानाच्च सोऽय जात. शमीता। उपानधगले दत्त प्रेतो मे वाहन भवेत् ॥५६ इद तवोक्त सर्वं च यथा कीनाशताऽत्मनः । श्रवणद्वादशी पुण्या तथोक्त पुण्यवर्धनम् ॥६० इत्येवमुक्त वचने वरिणकपुत्रोऽब्रवीदच । यन्मया तात कर्तव्य तदनुज्ञातुमर्हसि ॥६१ ततस्य वचन श्रुत्वा वकिपुनस्य नारद । प्रेतपालो वा प्राह स्वार्थसिद्धिकरं ततः ॥६२ यत्त्वया तात कर्तव्य मतितार्य महामते। कथयिष्यामि सम्यक्त तव श्रेयस्कर मम ॥६३ गयातीर्थे तु जुहुयात्स्नात्वा शौचसमन्वितः। मम नाम समुढिस्य पिण्डनिर्वपण कुरु ॥६४ जब तक मैं इस अन्न को नहीं साता तब तक यह क्षय को प्राप्त नहीं होता है। मेरे खाने और पीने के बाद यह सब अन्वहित हो जाया करता है ॥५८।। क्योकि मैंने छत्र का भी दान दिया था वही यह शमी तरु होगया है । मैंने एक जोड़ा जूतों का दिया था उसी का, फल ।

[ यामन पुराण यह है कि प्रेत मेरा वाहन बन २१ रहता है । जिस प्रकार मे मुझे यह फोनागता प्राप्त हुई है वह सभी आपको वतलादी है। श्रवण दादशी परम पुण्यमयी है वह पुण्य का वर्धन बतला दिया है ॥६॥ इस प्रकार के वचा बहो पर वह वणिक पुद्र यह वचन बोला-है तात! अब मुझे जो भी कुछ करना चाहिए उसकी याज्ञा मुझे आप दीजिए । ॥६१ हे नारद ! वणिक पुत्र के उस वपन को सुन कर प्रेठपाल ने फिर स्वाथ की सिद्धि करने वाला वचन कहा था ॥२॥ है महामते ! हे तात ! मेरे हित के लिये जो कुछ भी आपको करना चाहिए यह में अब तुमको बसलाता हूँ जो पनी मानि तुम्हारा और मेरा दोनो के कल्याण के करने वाला है ।।६३॥ गया तोय मे स्नान करके तथा शौच से सम्पन्न होकर हवन करना चाहिए । मेरे नाम का उद्देश्य लेकर वहा पर पिण्डो का निवपन भो करना चाहिए ॥६४॥ तत्र पिण्डप्रदानेन प्रेतभावादह सपे। मुक्तस्तु सर्वदातृणा यास्यामि सहलोकताम् ।।६५ तिथिर्या द्वादशी पुण्या मासि प्रौष्ठपदे सिता। बुधश्रवणसयुक्ता साऽतिश्रेयस्करी स्मृता ।।६६ इत्येवमुक्त्वा वणिज प्रेतराजोऽनुगः सह । स च मेने यथान्याय सम्यगाय्यातवाञ्छुचिः ।।६७ प्रेतस्कन्धे समारोप्य त्याजितो मरुमण्डलम् । रम्येऽथ शूरसेनाग्थ्ये देशे प्राप्तः स वै वणिक् ॥६८ स्वकर्मधर्मयोगेन धनमुच्चावच वहु । उपार्जयित्वा प्रययौ गयातीर्थमनुत्तमम् ॥६६ पिण्डनिर्वपण तत्र प्रेतानामनुपूर्वकम् । चकाराथ स्वबन्धूना पितृणा तदनन्तरम् ।।७० आत्मनश्च समा बुद्धिर्महच्छाद्ध तिलविना । पिण्डनिवपण चक्र तथाऽन्यानपि गोबजान् ।।७१ एव प्रदत्तप्पथ च पञ्च पिण्डेपु भावतः । विमुक्तास्ते द्विजाः प्राप्य ब्रह्मलोकं ततो गताः ॥७२ पुरूरवम उपाख्यान वर्णन ] [ ३३१ हे मवे । वहाँ पर पिण्ड प्रदान करने मे में इस प्रेत भाव से मुक्त होकर मव.दाताओ के सहनोकता को प्राप्त हो जाऊ गा ॥६५॥ प्रौट यह मास में सित पक्ष मे जो परम पुण्यमयी द्वादशी तिथि है जो दुध और यवण से युक्त हो वह अत्यन्त ही कल्याण करने वानी बताई गई है ॥६६॥ इतना उस वणिक से कहकर वह अपने अनुगमन करने वालो के साथ हो त के कन्वे पर चढ़ कर मरुमपहर को छाडकर चल दिपा था और उसने शुचितापूर्वक यथा न्याय ठीक ही कह दिया है-ऐमा मान लिया था । वह वगिक मी शूरसेन नाम वाले अति रमगीय देश में प्राप्त हो गया था ।।१३.६८ रन कम और धर्म के योग से उच्चा- वच धन का अर्जन करके फिर अत्युत्तम गया तो मै वह चला गया था ॥६६ वहां पर उसने प्रतो का आनपूर्वी के अनुसार पिण्डों का निर्वपन किया था फिर अपने बन्युगग के लिये निराहदान किया था ।।७०॥ आत्मा के समान बुद्धि थी तथा तिलों के विना महान् श्राद्ध किया या एव पिण्डों का भी निर्वपन क्यिा या । जो अन्य गोत्रज थे उन के लिये भी समी कुछ किया या ॥१॥ इस प्रकार से पाच पिण्डों के देने पर वे सब मात्र पूर्वक पिण्डदान से दिन विमुक्त हो गये थे और ब्रह्मलोक को प्राप्त हो गये ये ॥७२॥ स चापि हि वणिकतो निजमालयमावजत् । श्रवणद्वादशी कृत्वा कालधर्ममुपेयिवान् ।।७३ गन्धर्वलोके सुचिर भोगान्भुक्त्वा सुदुर्लभान् । जन्म मानुष्यमासाद्य स चाभूत्सकले विराट् ।।७४ स्वधर्मकर्मवृत्तिस्थः श्रवणद्वादशीरतः। कालधर्ममवाप्यासौ गुहाकावासमाधयत् ।।७५ ततोष्य सुचिर काल भागान्मुक्त्वा च कामत्तः। मर्त्यलोकमनुप्राप्य राजन्यतनयोऽभवत् ।।७६ तत्रापि क्षत्रवृत्तिस्थो दानभोग रतो वशी। गोग्रहेरिगण जित्वा कालधर्ममुपेयिवान् । शकलोकमवाप्याथ देवैः सर्वैः सुपूजितः ॥७७ ३३२ [ वामन पुराण फिर यह वणिय पुत्र भी अपने घर में पागया था । अबण द्वादशी कर वह पाल घमको प्राप्त हुआ पा1३॥ अपना समुचित कर्म तपा योग्य धर्म की वृत्ति में स्थित वह श्रवण द्वादशी में रति रखने वाला हुआ था । यह काल धर्म को प्राप्त पर गुह्यहाँ के लोक में पहुंच कर निवास करने लगा था। ग धर्म लोक में बहुत समय तर भोगो का भोग किया था जो सामान्यतया दुर्लभ हैं। मनुष्य जन्म प्राप्त करके सकल लोक म विराट होगया पा॥७४-७५१ वहाँ पर चिरकाल तक रहकर और स्वेच्छा पूर्वक भोगो का उपभोग करके फिर मर्म लोक मे आकर राजा का पुत्र हुआ था ॥७६।। यहा पर भी क्षत्रियो की वृत्ति में स्थित होकर दान और भोग दोनो मे रति रखने घाला वशी गो ग्रहण मे शन्न गण जीत कर काल धर्म को प्राप्त हुआ था। फिर इन्द्रलोक में पहुच कर सभी देवों के द्वारा सचिव हुआ था ॥७॥ पुण्यक्षपात्परिभ्रष्ट शाक्ले सोऽभवदिजः । ततो विकटरूपोऽसौ सर्वशास्त्रस्य पारग ॥ व्यवाह्यद्विजसुता रूपेणानुपमा द्विज । सा च मेने च भर्तार सुशीलमपि भामिनी ।।७६ विरूपमिति मन्वानस्तत सोऽभूत्सुदु खित । ततो निर्वेदसयुक्तो गत्वाऽऽश्रमपद महत् ।।८० इरावस्यास्तटे श्रीमानरूपधारिणमासदत् । तमाराध्य जगन्नाथ नक्षत्रपुरुपेण हि ॥८१ सरूपतामवाप्याय तस्मिन्नेव च जन्मनि । तत प्रियोऽभूद्भार्याया भोगवाश्चामवद्वशी ॥२ श्रवणद्वादशीभक्तः पूर्वाभ्यासादजायत १८३ एव पुराऽसो द्विजपुङ्गवस्तु कुरूपरूपो भगवत्प्रसादात् । अनङ्गरूपप्रतिमो बभूव मृतश्च राजा स पुरूरवाऽभूत् ८४ जब पुष्पों का क्षय होगया तो फिर वह वहाँ से परिघठ होकर पाकल टोप में एक द्विज हुमा । फिर यह विष्ट रूप वाला था और

नक्षन पुरुष पूजा विधान वर्णन ]
[ ३३३
समो शास्त्रो का पारगामी महापण्डित हुआ था ॥७॥ हे द्विज ! फिर
इसने स्पावन से अनुपम एक द्विज की पुत्री के माय विवाह किया
था । उसने भी भामिनी ने अपने भर्ता को मुशील भी मानती पो
॥७६ अपने आपको विस्म मानते हुए वह अत्यन्त दुखित हुआ था।
उसको फिर निवद हो गया था और वह एक महान् आयम के स्थान
मे चला गया या 1500 इरावती के तट हर घीमान् ने रूप धारण
करने वाले को प्राप्त किया या नक्षत्र पुरुप के द्वारा उम जगन्नाथ की
समाराधना करके सस्पता को प्राप्त किया था और फिर उसी जन्म में
भार्या का प्रिय हो गया था तथा वशी वह भोगवान् भी हो गया या
॥८१-८२॥ श्रवण द्वादशी का भक्त पूर्वाभ्यास से हुआ था ॥५३॥ इम
प्रकार से पहले यह विजय कुरूप रूप वाला था किन्तु फिर भगवान्
के प्रसाद कामदेव के तुल्य स्प वाला हो गया था और मरने के
पश्चात् वही पुरूरवा राजा हुआ था ।।४।।
८०-नक्षत्र पुरुप पूजा विधान वर्णन
पुरूरवा द्विजथेष्ठ यथा देवं श्रियः पतिम् ।
नक्षत्रपुरुपास्येन माराधयत तद्वद ।।१
श्रूयता कथयिष्यामि नक्षत्रपुरुषव्रतम् ।
नक्षत्राङ्गानि देवस्य यानि यानीह नारद र
मूलक्षं चरणौ विष्णोर्जडघे द्वे रोहिणीस्थिते ।
कवन्धिनी तथाऽश्विन्यो सस्थिते रूपधारिणः ॥३
आपाटे च तव स्फिग्गुह्यस्य फाल्गुनीद्वयम् ।
कटिस्थाः कृत्तिका व वासुदेवस्य सस्थिता: ।।४
करसस्था चानुराधा धनिष्ठा पृष्ठसस्थिता।
विशाखा भुजयोर्हस्त: करद्वयमनुत्तमम् ॥५
पुनर्वसुरथो गुल्फो नखे सार्प तयोच्यते ।
ज्येष्ठा ग्रावा स्यिता तस्य श्रवणं कर्णयोः स्थितम् ॥६

३३४ ३
[ वामन पुराण
ओष्ठसस्थस्तथा पुप्य: स्वातिदन्तेषु कीर्तिता।
हनी पुनर्वसुश्चोक्तो मासा मंत्रमुदाहृतम् ॥७
देवर्षि नारद जी ने कहा है हिउदे | पुरवा ने घी के पति
देवकी नक्षत्र पुरुष के नाम से जिस प्रकार आराधना की पी उसे आप
मुझे बतलाइये। महपि पुलस्त्य ने कहा- आप सुनिय । मैं नक्षत्र
पुरुष व्रत को बतलाता हूँ। हे नारद । यहाँ पर देव के जो-जो भी
मक्षनाग हैं उन्हे भी बतला रहा हूं ॥१-२॥ भगवान् विष्णु के भूल
नक्षत्र चरण हैं और दो रोहिणी जाधे हैं । रूपधारी प्रभु की बर्यानी
अश्विनी सम्थित है ॥३॥ दोनो आषाढा रिफग है बार दोनो फल्गुनी
गुह्य में स्थित हैं । कटि म कृतिका वासुदेव के विराजमान है।
अनुराधा अरु म सस्थित है और धनिष्ठा पृष्ठ भाग में विराजमान है।
विशाखा दोनों भुजाओ में तथा हस्त उत्तम कर द्वय में है और नस में
सर्प कहा जाता है । मेष्टर प्रो में स्थित है या उसके कण में प्रवण
सस्थित है ॥६॥ पुष्प ओष्ठ मे स्थित रहता है एव स्वाति दातो मे
विराजमान है । ठोडी मे पुनर्वासु बताया गया है और नासिका मंत्र
कहा गया है |
प्राजापत्य नेत्रयुग्मे रूपधारि प्रतिष्ठितम् ॥
शिरोरुहास्तथवेन्द्र नक्षताङ्गमिद हरे ।
विधान सप्रवक्ष्यामि यथान्यायेन नारद ॥६
सपूजितो हरिर्धामान्विदधाति यथेप्सितम् ।
चनमासेऽसिताष्टम्या यदा मूलगत शशी ॥१०
तदा तु भगवत्पादो पूजयेच विधानत ।
नक्षत्रपुरपे दद्याद्विप्रेन्द्राय च भोजनम् ।।११
जानुनी रोहिणीयोगे पूजयेदथ भक्तितः ।
दोहदे वै हविष्याप्न पूर्व च हिजभोजनम् ॥१२
आपाढाभ्या तथा द्वाभ्या स्फिन प पूजयेद् वृध ।
सलिल शिशिर तत्र दोदे च प्रकीतितम् ॥१३

नक्षन पुस्प पूजा विधान वर्णन ) फाल्गुनीद्वितीये गुह्य पूजनीयं विचक्षणः । दोहद च पयो गव्य देय च द्विजभोजनम् ।।१४ दोनों नेत्रो में प्राजापत्य रूपधारी प्रतिष्ठित है तथा शिरोरुह ऐन्द्र है-यह हरि का नक्षनाग होता है । है नारद ! अब यथान्याय विधान बतलाऊ गा ॥८-६ भली भांति पूजा किये गये घीमान श्री हरि जो भी इप्सित हो उसे देते हैं जिस समय में चेत्र मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि मे शशी मूल गत होता है उस समय मे विधि पूर्वक भग वान के चरणों की पूजा करनी चाहिए ॥१०.११॥ रोहिणी के योग में दोनो जानुओं का पूजन भक्तिभाव से करे । दोहद में हविष्यान्न और पूर्व में द्विज भोजन देवे ॥१२॥ स्फिग रूप वाले दोनो थापाढाओ में बुध पूजन करना चाहिए। वहाँ पर दोहद में शिशिर सलिल बत लाया गया है ।१३।। दोनो फाल्गुनीयो में विचक्षणो के द्वारा गुह्य का पूजन करना चाहिए । दोहद गव्य पय और द्विज भोजन देना चाहिए ॥१४॥ कृत्तिकासु कटि पूज्या सोपवासजितेन्द्रियः। दोहद च विभोर्दय सुगन्ध कुसुमोदकम् ।।१५ पाश्वी भाद्रपदायुग्मे पूजयित्वा विधानतः । गुड शालेयक दद्याहोददेवप्रीतिदम् ॥१६ द्वे कुक्षी रेवतीयोगे दोहदे मुद्गमोदकः । अनुराधासु वक्षोऽय पष्टिकान्न च दोहदे ॥१७ धनिष्ठाया तथा पूज्यः शालिभक्त च दोहे । भुजयुग्म विशाखासु दोहदे परमौदनम् ॥१८ हस्ते हस्ती तया पूज्यौ यावक दोहदे स्मृतम् । पुनवस्वड्गुलीयुग्म पटोलस्तन दोहदे ।।१६ नखाश्लपासु सपूज्या दोहदे तित्तिरामिषम् । ज्येष्ठाया पूजयेद्ग्रोवा दोहदे तिल मोदकः ॥२० श्रवणे शवणौ पूज्यो दधिभक्त च दोहदे । पुप्ये मुख तु सपूज्यं दोहदे घृतपायमम् ॥रप ३३६ ] । वामन पुराण पृत्तियामों में परिमापूजन करना चाहिए। और उस पास र पर इन्द्रियो को जीतन हुए हो परे । विभुमो दहद मुगग्य युमुमोहर देना पाहिए ॥१५॥ दोनों मात्र पदाओं में दोनों पाया। विधान के सहित यजम परे। गुरु और शायय देव को प्रिति प्रदान वाला दोहद देना चाहिए ॥१६५ रेवती ये योग में दोनों मुशि? पा पूरन परे और दोहद म मूग ये मोदा देवे। आराधाओग वृक्षास्थल । पूजन करे और दोहद मे पटियान देना चाहिए ॥१७॥ धनिया में सी भाति पूजन करे तया दोहद में छपी का मार दे । विशामा में दोनो भुजाओं का पूजन परे और दोहद में परमोदन समारत बरे ॥१८ हस्त हाथो का यजन करे तपादोहद पावा बताया गया है । पुनवंभु में दो अंगुलियां पूजे और दोहद में पटोल दवे ॥१६आश्लेषा म गखों का यजन करना चाहिए तथा दोहद म तीतर वाभिप देवे। ज्येष्ठा में ग्रीवा का अर्चन करे तथा दोहद में तिलों ये लहड अर्पित करे ॥२०॥ श्रवण मे दोनों वानों का पूजन वरे एव दोहद में दही और मात देवे । पुण्य मे मुख को मनी भाति पूजित करने कोहद में घृत और पायस देना चाहिए ॥२१॥ स्वातियोगे च दशना दोहदे तिलशप्कुली। दातव्य केशवप्रीत्यं ब्राह्मणस्य च भोजनम् ॥२२ हन शतभिपायोगे पूजयेच्च प्रयत्नत.। प्रियहगु भक्त देय च दोहदे मधुघातिनि ।।२३ मघासु नासिका पूज्या मधुराज्य च दोहदे । मृगोत्तमाङ्ग नयने मृगमास च दोहदे ॥२४ चित्रायोगे ललाट च दोहदे चारु भोजनम् । णीषु शिर पूज्य चारु भक्ष्य च दोहदै ।।२५ सपूजनीया विद्भिरायोगे शिरोरुहा. । विप्राश्च भोजयेद्भक्त्या दोहदे च गुडाक्म् ॥२६ नक्षत्रयोगप्वेतेपु सपूज्य जगतः पतिम् । पूजिते दक्षिणा दद्याद्ब्राह्मणे वेदपारगे ॥२७ नक्षन पुरुष पूजा विधान वर्णन ! [ ३३७ पूजन करना छनोपानद्वलयुगं सप्तधान्यं सकाञ्चनम् । घृतपान च गा दोग्ध्री ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत् ॥२८ स्वाति नेक्षन के योग मे दशनो का पूजन है और दोहद में सिल और शठकुली अर्पित करने चाहिए । भगवान् केशव की प्रीति के लिये ब्राह्मण को भोजन देवे ॥२२॥ शतभिषा नक्षत्र के योग में हनू का अचा प्रयल पूर्वक करे । प्रियङ्ग. का भात दोहद में देवे जो मधु घाती हो ॥२३।। मघाओ मे नासिका पूजन करना चाहिए और दोहर में मधु एव माज्य देवे ! मृगोसमाज मे मयम नथा मृगाभिर देवे ॥२४॥ चिना के योग मे ललाट का पूजन करे और दोहद म चारु भोजन देवे । भरणी नक्षत्रो मे शिर का पूजन करे तथा दोहद मे सुन्दर भक्ष्य पदार्थ देवे। विद्वान पुरुषो के द्वारा आ के योग में शिरो रहो का मली भांति हिए तथा दोहद मे रिप्रो को गुड और आर्दक का भक्ति पूर्वक भोजन कराना चाहिए ॥२५-२६॥ इन नक्षत्रो के योगों में जगत् के स्वामी का पूजन करे । पूजित होने पर वेदों के पारगामी ब्राह्मण को दक्षिणा देनी चाहिए ॥२७॥ छत्र-उपानन्-दो वस्त्र-मात धान्य-काश्चन घृत का पात्र-गो जो दूध देने वाली हो ब्राह्मणों को सेवा मे निवेदित करे ॥२८॥ प्रतिनक्षत्रयोगेन पूजनीया द्विजातयः । नक्षत्रज्ञाय विप्राय पृथग्दद्याच्च दक्षिणाम् ।।२६ नक्षत्रपुरुषाम्य हि व्रतानामुत्तम व्रतम् । पूर्व कृत हि भृगुणा सर्वपातक नाशनम् ॥३० अङ्गोपाङ्गानि देवर्षे पूजनीयानि वै प्रभोः । सुरूपाण्यभिजायन्ते प्रत्यङ्गाङ्गानि चव हि ॥३१ सप्तजन्मकृत पाप कलिसङ्गागत च यत् । पितृमातृसमुत्थ च तत्सर्व हन्ति केशव ॥३२ सर्वाणि भद्राण्याप्नोति शरीरारोग्यमुत्तमम् । अनन्ता मनस- प्रीति रुप चातीव शोभनम् ॥३३ ३३८ । थामन पुराण समस्त पातकों का वादमाधुर्य तथा कान्ति यचान्यदभिकान्टिनम् । ददाति नक्षत्रपुमान्पूजितस्तु जनार्दनः ॥३४ उपोष्य सम्यगेतेपु कमेणापु नारद । अरुन्धती महाभागा रयातिमन या जगाम ह ॥३५ प्रत्येक नक्षत्र में योग म द्विजातियों का पूजन करना आवश्यक है जो विप्र नक्षत्रों का ज्ञाता हो उम पृथक दक्षिणा देनी चाहिए ॥२६॥ यह नक्षत्र पुरुष नाम वाला व्रत अन्य मभी प्रतो में उत्तम व्रत होता है । पहिले इम प्रत को भृगु महपि ने किया था नाश करने वाला है ॥३०॥ हे देव ! प्रभु के सभी अंग और उपाग पूजन के योग्य होने चाहिए। इससे प्रत्यक अंग सुरू हो जाया करते हैं ॥३१।। सात जन्मो में किया हुआ पाप और जो कलियुग के सग से आया हुआ पाप है तथा पाता-पिता से जो उत्पन्न हुआ पाप है उन सभी पापो को भगवान् केशव नष्ट करदिया करते हैं ॥३२।। इस महा व्रत को करने वाला पुरुष सभी भद्रो को प्राप्ति किया करता है-शरीर का अरोग्य जो अत्युत्तम हो उसस प्राप्त करता है । मन की अनन्त प्रीति और अत्यन्त शोभन रूप लावण्य प्राप्त किया करता है ॥३३ वाणी की मधु रता कान्ति और इनके अतिरिक्त अन्य जो भी वाछित हो वह सभी पूजित नक्षत्र पुमान् भगवान् जनार्दन दिया करते हैं ॥३॥ हे नारद । भली भांति इन नक्षत्रो मे उपवास करके अचन क्रम मे करे । महान भागवाली अरुन्धती ने अत्युत्तम ख्याति की प्राप्ति इससे की थी ॥३५॥ अदितिस्तनयार्थाय नक्षत्राग जनादनम् । पूजयित्वा तु गोविन्द रवत पुसमाप्तवान् ।।३६ रम्मा रूप तथा लेभे वाड्माधुर्य तिलोत्तमा । कान्ति शा वदन या च राज्य राजा पुरूरवा ।।३७ एव विधानतो ब्रह्मपक्षनाङ्गो जनादनः । पूजितो रूपधारी यस्त. प्राप्ना तु स्वकामिता ॥३८ जलोद्भव वध वर्णन ] एवं पवितं च शुभप्रदायि यशस्यमारोग्यकरंतु पुसाम् । नक्षलपुंसः परम विधानं शृणुष्व पुण्यामिह तीर्थयात्राम् ॥३६ अदिति ने तनय की प्राप्ति के लिये नक्षत्राग जनादन का पूजन करके रवत मे गोविन्द को पुत्र प्राप्त किया था।॥३६।।रम्मा ने उस प्रकार का परमोत्तम सौन्दर्य प्राप्त किया था तथा तिलोतमा ने वाणी की मधुरता का लाभ इस व्रत से किया था राजा पुरूरवा ने शशि की भांति उत्तम कान्ति और राज्य को प्राप्त किया था ॥३७॥ इस प्रकार के विधान से हे ब्रह्मन् ! नक्षताङ्ग जनार्दन रूपधारी पूजित जिन्होने किया था । उनने अपनी कामनाओ की प्राप्ति की थी ॥३|| इस प्रकार का परम पवित्र- शुभदायी-यश देने वाला-आरोग्य प्रद यह व्रत पुरुपो को होता है। यही नक्षत्र पुरुष का परम विधान है । अब परम पुण्यमयी तीर्थ यात्रा का यहाँ पर प्रवण करो ॥३६॥ ८१-जलोद्भव बध वर्णन इरावतीमनुप्राप्य पुण्यां तामृपिकन्यकाम् । स्नात्वा सपूजयामास चैत्राष्टम्या जनार्दनम् ॥१ नक्षतपुस्प कृत्वा व्रतं पुण्यप्रद शुचि । जगाम स कुरुक्षेत्र प्रह्लादो दानवेश्वरः ॥२ ऐरावतेन मन्त्रेण चक्रतीर्थ सुदर्शनम् । उपाम-न्य तत: सस्नो वेदोक्तविधिना मुने ॥३ उपोप्य क्षणदा भक्त्या पूजयित्वा कुरध्वजम् । कृतशौचस्तु त द्रष्टुं ययौ पुरुपकेसरी॥४ स्नात्वा तु देविकाया तु नृसिंह प्रतिपूज्य च । उपोप्य रजनी मेका गोकर्ण दानवो ययौ ॥५ तम्मिन् स्नात्वाऽथ प्राचीने पूज्येश विश्वकारकम् । प्राचीने चापरे दैत्यो द्रष्टु कामेश्वर ययो॥६ ३४. ] [ वामन पुराण सन स्नात्वा च दृष्ट्वा च पूजयित्वा च शंकरम् । द्रष्टु ययौ च प्रह्लाद: पुण्डरीक महाम्भसि ।।७ महर्षि पुलस्त्यजी ने कहा-पुण्यमयो इरावती को प्राप्त करके और उस ऋषि कन्यका मे स्नान करके चैत्राष्टमी मे जनार्दन का पूजन करके तथा नक्षत्र पुरुष व्रत को जो परम पुण्यप्रद है एव शुचि है दानेश्वर प्रह्लाद ने किये तथा फिर कुरुक्षेत्र को चले गये थे ॥१-२॥ हे मुने ! ऐरावत मान के द्वारा सुदर्शन चक्र तीर्थ को उपामन्त्रित करके इसके पश्चात् वेदो मे कथित विधि से स्नान किया था ॥३॥ एक रायि का उपवास करके भक्ति भाव से भगवान् कुरुध्वज का पूजन किया था। शुद्धि करके वह पुरुषों में केसरी उनका दर्शन करने के लिये गया था ॥४॥ देविका म स्नान करके और भगवान नृसिंह का अर्चन करके एक रात्रि उपवास किया था और फिर वह दानव गोकर्ण चला गया था ॥५।। ससमे स्नान करके इसके उपरान्त प्राचीन में विश्व की रचना करने वाले ईश का पूज्य किया था फिर दूसरे प्राचीन मे वह दैत्य कामे- अवर प्रभु का दर्शन करने के लिये गया था ॥६।। यहाँ पर स्नान करके- दर्शन करके और शकर की पूजा करके फिर प्रह्लाद महाम्भस मे पुण्ड- रीक का दर्शन प्राप्त करने के लिये चला गया था ॥७॥ महाम्भसि ततः स्नात्वा सतप्यं पितृदेवताः । पुण्डरीक च सपूज्य उपोष्य दिवसत्रयम् ।। विशाखरूपे तदनु दृष्ट्वा देव तथाऽजितम् । स्नात्वा तथा कृष्णतीर्थे विराम न्यवसद्भुवि ।। ततो हसपदे हस दृष्ट्वा सपूज्य चेश्वरम् । जगामासो पयोण्या तु अखण्ड द्रष्टुमच्युतम् ॥१० स्नात्वा पयोष्णीसलिले पूज्यारण्ड जगत्पतिम् । द्रष्टु जगाम मतिमान्वितस्ताया कुमारिलम् ॥.१ तय स्नात्वाऽयं देवेश वालयिल्यमरीचिभिः । भाराध्यमानोभ्ययुत हृत पापप्रणाशनम् ॥१२ जलोद्भव वध वर्णन 1 ॥ ३४१ यन मा सुरभी देवी स्वनुता कपिला शुभाम् । देवप्रियार्थमनृजद्वितार्थ जगतस्तथा ॥१३ तत्र देवह्रदे स्नात्वा शभु सपूज्य भक्तितः। विधिवच्च विधि प्राप्य मणिमन्त ततो ययौ ॥१४ फिर महाम्मर में स्नान करके तया पितृमण और देव वृन्द का मनी मानि तर्पण करके तया भगवान् पुण्डरीक का बर्चन करके तीन दिन तक का उप क्यिा या फिर विशाल रूप में अजित देव का दान करके तया कृपा तीर्य में स्नान करके उस भूमि में तीन रात्रि त निवास क्यिा या 11 इसके पश्चात् हम पद में हर ईश्वर का दर्शन करके एव उनका पूजन करके फिर यह पयोप्पी में प्रखण्ड अच्युत का दर्शन करने के लिये चला गया या ।।१०। पयोगी के जल में स्नान करके अउण्ड जगर के स्वामी का पूजन करके फिर भतिमान् यह वितम्ता में कुमारित का दर्शन करने के लिये चला गया था ॥११॥ वहाँ पर स्नान करके देवेद्य का अर्चन किया था तया वालखिल्य मरी. चियों के द्वारा बाराम्यमान होता हुआ उसने अयुत पापों का नारा पिया या ॥१२॥ जहां पर उन मुर को देवी ने अपनी पुत्री शुमा कपिता को देवों के प्रिय करने के लिये तया इस जगद के हित सम्मादन करने के लिये छोड़ दिया था ॥१३॥ न देव ह्द में स्नान फरक मक्ति से सम्मु का पूजन करके विधिवत् विधि को प्राप्त करके फिर वह मणिमान् को चना गया था ॥१४॥ तर तीयंवरे स्नात्वा प्राजापत्ये महामतिः । ददर्श शभु ब्रह्माण देवेश च प्रजापतिम् ।।१५ विधानतस्तु तान्देवान्पूजयित्वा तपोधनः । पड़ान तव च स्थित्वा जगाम मधुनन्दिनीम् ॥१६ मधुसरिले स्नात्वा च देव चकार हरम् । मूलवाहु च गोविन्द ददर्श दनुपुङ्गवः ॥१७ किमयं भगवान्शमुईघाराय सुदर्शनम् । मूल तया वासुदेवो ममैतद् हि पृच्तः ।।

२४२ ] [ वामन पुराण श्रूयता कथयिष्यामि कथामेता पुरातनीम् । कथयामास ता विष्णुभविष्याम्यवनौ सुरा ॥१८ जलोद्भवो नाम महासुरेन्द्रो घोर स तप्त्या तप उनवीयः । आराधयामास विरश्चिमारात्स तस्य तुष्टो वरदो बभूव ।।२० देवासुराणामजयो महाहवे निजश्व मास्तरमरैरवध्य.! अनन्यलयन तु ब्रह्मण पुरा न यातिशाप शममेप शत्रुः ॥२१ वह महामति उस प्राजापत्य तीथंबर में स्नान करके फिर उसने शम्भु--ब्रह्मा और प्रजापति देवेश का दशन प्राप्त किया था ॥१५॥ उस तप केधनी ने विधान के सहित उन समस्त देवी का पूजन किया था । ॐ रानि पर्यन्न वहां पर स्थित होकर फिर मधुनन्दिनी को चला गया था ।।१६१ मधु के जल मे स्नान करके देव चक्रधारी हर और शूल चाहु श्री गोविन्द का उम दानवो में श्रेष्ट ने दर्शन किया था ॥१७॥ देवर्षि नारद ने कहा-~भगवान् साम्भु ने किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये सुदर्शन को धारण किया था तथा दासुदेव ने शूल किस लिये लिया था-मैं इसे आप से पूछता हूँ अत यह मुझे आप बतलाइये 11१८॥ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-~-तुम श्रवण करो, मैं एक पुरातन कथा कहता हूँ । उस कथा को भगवान् विष्णु ने कहा था--हे सुर गण ! मैं भूमि में होऊ गा ॥१॥ जलभव नाम वाला एक महान् असुरेन्द्र था। उस उग्रवीर्य वाले ने घोर तपस्या की थी और विरञ्चिकी समा. राधना की थी। उसके समीप मे ही वह सन्तुष्ट होकर उसे वरदान देने घाले होगये थे ॥२०॥ महान युद्ध मे देवासुरो के द्वारा वह अजय हो गया था। जिनके शस्त्रो से देवो के द्वारा वह अवध्य हो गया । जो अनन्य लषय थे ऐसे पहिले ब्रह्मा के शापो से भी यह शत्रु शम को प्राप्त नहीं होता था ॥२१॥ एवप्रभावो दनुपुङ्गवोऽसौ देवान्महर्षीन्नृपतीन्समग्रान् । प्रवाधमानो विचार भूम्या सर्वा.विया.पाक्षिपदुग्रमूर्तिः ॥२२ ततोऽमरा भूमिती निपण्णा जग्मुःशरण्य हरिमीशितारम् । तश्चापि माधै भगवाजगामहिमालय नम हस्मिणेत्रः ॥२३ जलोद्भव वध वर्णन ] । ३४३ समन्त्र्य देवपिहित च कायं मतिं च कृत्वा निवनाय शत्रोः । निरायुधौ तावपि पर्यटन्तौ देवाधिपो चक्रतुरुग्रकम् ॥२४ ततश्चासौ दानवी विष्णुशवौं समायातौ हन्तुकामौ मुरेशी । मत्वाऽजेयो शत्रुभिर्घोररूपंर्भयात्तोये निम्नगाया विवेश ॥२५ ज्ञात्वा प्रविष्ट त्रिदिवेन्द्रशत्रु नदी विशालाद्विजमत्स्यपूर्णाम् । तीर समाश्रित्यस्थितौ हि देवीप्रच्छन्नमूर्तीसहसाबभूवतुः ॥२६ दिव समीक्षन्सहसा कातराक्षो दुगं हिमादि सहसा विवेश । महीध्रशृङ्गोपरि विष्णुशभूवम्भ्रम्यमाणस्वरिपु चमत्वा ॥२७ वेगादुभी दुद्र वतुः सशस्रो विष्णुत्रिशूली गिरिराश्च चक्री। ताभ्या स दृष्टत्रिदशोत्तमाभ्या चक्रेण शूलेन विभिन्नदेहः ॥२८ इम प्रकार के प्रभाव वाला यह दनु पु गव समस्त देव-महपि-मोर नपतियो को प्रवाधा करता हुआ भूमि मे विचरण करत था, उग्रमूत्ति ने सभी क्रिमो को प्रक्षिप्त किया था ॥२२इसके उपरान्त देवगण भूमि तट पर बैठे हुए थे और ईशिता हरि की शरणागति मे गये थे । उन सब के साथ भगवान् भी हिमालय पर गये जहाँ पर त्रिनेत्र हर विराजमान थे॥२३॥ देवो और ऋपयों के कार्य के विषय मे भनी भौति मन्त्रणा करके उस शन के निधन की बुद्धि की पी । वे दोनो बिना आयुधो वाले पर्यटन करते हुए देवो के अधियों ने उनकम किया या ॥२४॥ इसके पश्चात् इस दानव ने देखा दिये दोनो देवेश्वर विष्णु और शम्मु मार को इच्छा से आये हैं । गन्न ओ के द्वारा अजेय मानवर जोकि घोर रूप वाले हैं भय से निम्मगा के जल मे प्रवेग कर गया पा॥२५॥ दिन मत्स्यो से पूर्ण विशाल नदी उम देतो के शत्र को प्रविष्ट हुआ जानकर उस नदी के तटपर वे दोनों देर स्थित हो गये थे और तुरन्त ही प्रच्छन मूनियो वाले होगये ॥२६॥ वह भातर नेत्रों वाला दिवलोक देखता हुआ तुरन्त ही हिमाद्रि के दुर्ग में प्रवेश कर गया था। उसने ऐमा मानलिया था कि अपने मन को महोत्र को घोटो पर भ्रमण करते हुए विष्णु और शम्भु बडे वेग से दोनों शाइयों से मुक्त दोह पड़े थे। वितु हाप मे त्रिभून वया शिव चक्र धारण रिये । वामन पुराण हुए थे। उन दोनो देवोत्तमों ने उसे देखा था और चक्र तथा निशून के द्वारा विभिन्न देह वाला होगया था ।२७ २८] पपात शलात्तपनीयवर्णो यथाऽन्तरिक्षाद्धि मनुष्यतारा । एव निशूल च दधार विष्णुश्चक्र त्रिनेत्रोऽप्यरिसूदनाथम् ।।२६ यत्राप्यसौ शूलभवाभिघातादरा पपाताथ घराचलेन्द्रात् । जला द्वश्वापि जल विमुच्य ज्ञात्वा गतौ शरवासुदेवो ।।३० तत्प्राप्य तीथं त्रिदशाधिपाभ्यामुपोपित दैत्यपति स्वशुद्धये । उपोप्यभक्त्याहिमवन्तमागाद्दष्टु गिरीशशिविष्णुमागम्।।३१ त समभ्यच्य विधिवद्दत्त्वा दान द्विजातिषु । वितस्ताहिमवत्योश्च भृगुतुङ्ग जगाम स. ॥३२ यत्रेश्वरी देववरस्य विष्णो प्रादाद्रथाङ्ग प्रवरायुध वै । चिच्छेदयेनारिबल च शकरोविज्ञायमानोऽस्त्रवल महात्मा ॥३३ वह सुवण के समान वर्ण वाला उस शैल से नीचे इस भाति गिरा था जैसे कोई तारा अन्तरिक्ष से टूट कर गिरा हो। इस प्रकार से विष्णु ने त्रिशूत को धारण किया था और त्रिनेन ने भी अरि सूदनार्थ को धारण किया था। जहां पर भी शूल..पदाभिघात स उस घरा चलेन्द्र से श्रीदाम चरित्र वर्णन ] । ३४५ ८२-श्रोदाम चरित्र वर्णन भगवेल्लोकनाथाय विष्णवे विपमेक्षणः। किमर्थमायुध चक्र दत्तवाल्लोकपूजितम् ।।१ शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् । चक्रप्रदानसवद्धां शिवमाहात्म्यवधिनीम् ॥२ आसोद्विजातिप्रवरो वेदवेदाङ्गपारगः । गृहाश्रमी महाभागो वोतमन्युरिति स्मृतः ॥३ तस्यात्रेयी महाभागा भार्याऽऽसीच्छीलसंमता। पतिव्रता पतिप्रारणा धमशीलेति विश्रुता ॥४ मुनेस्तस्यानपत्यस्य ऋतुकालाभिगामिनः । संवभूव सुत:श्रीमानुपमन्युरिति श्रुतः।।५ तं माता मुनिशार्दूलं शालिपिष्टरसेन पोपयामास ददती क्षीरमेतद्धि दुगंता ॥६ सोऽजानानोऽस्य क्षीरस्य स्वादुतां पय इत्यथ । संभावनामप्यकरोच्छालिपिष्टरसेऽपि हि ॥७ देवपि नारद ने कहा-हे भगवन ! विपक्षण अर्थात् शिव ने लोकों के नाप विष्णु के लिये किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये लोक पूजित पक्र को दिया पा ११॥ पुलस्त्य जी ने कहा-अब आप पूर्ण सावधान होकर श्रवण करो। यह परम पुरातनी कया है जो सुदर्शन पक्र के प्रदान करने से सम्बद्ध है और भगवान शिव के माहात्मा को बढ़ाने वाली है ॥२॥ एक हिजो में अत्यन्त धेठ पेदों सपा वेदों के समस्त गों का माता एवं पारगामी विद्वान् गृहस्प और महान माग वाला विप्रथा जिसरा नाम वोतमन्यु प्रसिद्ध पा ॥३॥ उसकी महा- भागा आरेयी भार्या थी जो अत्यन्त शोल समन्वित थी। यह पूर्ण पतित्रता-पति को ही अपना प्राण मानने वाली और घमंशोला विषयात पो॥१॥ सन्तान होन उप मुनि के जबकि उसने काल में अमिग- मन पिया पा एक पुत्र उत्सम मा पा को भी सम्पन्न और उपमन्यु ३४४ | वामन पुराण हुए थे। उन दोनो देवोत्तमों ने उसे देखा था और चक्र तथा त्रिशून के द्वारा विभिन्न देह वाला होगया था ॥२७-२८।। पपात शैलात्तपनीयवर्णो यथाऽन्तरिक्षाद्धि मनुष्यतारा । एव त्रिशूल च दधार विष्णुश्चक्र त्रिनेतोऽप्यरिसूदनाथम् ॥२६ यत्राप्यसौ शूलभवाभिघाताद्वरा पपाताथ धराचलेन्द्रात् । जलो वश्चापि जल विमुच्य ज्ञात्वा गती शकरवासुदेवो ॥३० तत्प्राप्य तीथं त्रिदशाधिपाभ्यामुपोषित दैत्यपति स्वशुद्धये । उपोष्यभक्त्याहिमवन्तमागाद्रष्टु गिरीशशिवविष्णुमागम्।।३। त समभ्ययं विधिवद्दत्त्वा दान द्विजातिपु । वितस्ताहिमवत्योश्च भृगुतुङ्ग जगाम सः ।।३२ यत्रेश्वरी देववरस्य विष्णोः प्रादाद्रथाङ्गप्रवरायुध वै । चिच्छेदयेनारिवल च शकरोविज्ञायमानोऽस्रबल महात्मा ॥३३ वह सुवर्ण के समान वर्ण वाला उस शैल से नीचे इस भांति गिरा था जैसे कोई तारा अन्तरिक्ष से टूट कर गिरा हो । इस प्रकार से विष्णु मे निशूल को धारण किया था और विनेन ने भी अरि सूदनार्थ को धारण किया था। जहां पर भी शूल भवाभिघात से उस घरा चलेन्द्र से धरा पर यह गिरा पा जलोद्भव भी जल को छोड कर यह गिरा है। ऐसा जानकर शार वासुदेव भी चले गये थे ॥२६-३०॥ उस तीर्थ पर पहुँच पर उन दोनों देवेश्वरों ने उपवास किया था। दैत्यपति ने अपनी गुद्धि के लिये उपवास किया या फिर भक्ति से गिरीश के दर्शन करने के लिये शिव विष्णु मागं हिमालय को चला गया पा ॥३१॥ वहाँ पर उनका विधि पूर्वक पूजन करपे तया द्विजो को वान देकर फिर वितस्त हिमवत के भृगुनु ग पर वह चला गया था। वहां पर ईश्वर नै देव पर विष्णु को प्रवर आयुध रपांक दो दिया था जिससे शकर ने शत्रुओ के सदन और महारमा यह उस मस्त थे बल के पूर्ण बात ये ॥३२-३३॥

३४६ ] [ वामन पुराण इस नाम से विख्यात हुआ पा || माता ने उग मुनियों में गाल के समान होने वाले बालक का पोषण शात्रियों पिष्ट रस येद्वारा दिया था। वह ऐसी दुर्गति से युक्त थी कि उसो को यह दूध है-यह कहकर उस बालक को देती थी ॥६॥ इमको हो क्षीर वह जानता या और दूध के स्वाद को उमने कभी प्राप्त ही नहीं किया था। वह उम शालियो के पिष्ट रस मे हो दूध के साद को सम्भावना किया करता था॥७॥ स त्वेकदा सम पित्रा कुत्रचिद्विजवेश्मनि । क्षीरोदन च बुभुजे श्रद्धया प्राणिपुष्टिदम् ॥ स लगवानुपम स्वादु क्षीर च मृपिपुत्रक. । माश दत्त द्वितीयेऽह्नि नादत्त पिष्टकारितम् ।। रुदोद च तथा वाल्यापाथोऽयं चातको यथा । माता रुदन्त त प्राह वाष्पगद्गदया गिरा ॥१० उमापतो पशुपती शुलघारिणि शकरे । अप्रसन्ने विरूपाक्षे कुन क्षोरेण भोजनम् ११ यदीच्छसि पयो भोक्तु सद्य पुष्टिकर मुत। समाराधय देवेश विरूपाक्ष निशूलिनम् ।।१२ तस्मिस्तुष्टे जगद्धाम्नि सर्वकल्याणदायिनि । प्राप्यतेऽमृतफायित्व किं पुन क्षीरभोजनम् ॥१३ स मातुर्वचन श्रुत्वा वोतमन्युस्ततोऽब्रवीत् । कोऽय विरूपाक्ष इति त्वयाऽऽराध्यस्तु कोर्तित ॥१४ उसने एक बार अपने पिता के साथ कही किसी द्विज के घर मे घड़ी हो धठा से प्राणियों की पुष्टि का देने वाले क्षीर और ओदन का भोजन किया था 1|| उम ऋषि पुत्र ने स्वाद युक्त अनुपम क्षीर को प्राप्त कर फिर माता द्वारा दूसरे दिन मे पिष्ट द्वारा बनाये हुए उसको ग्रहण नही किया था । वह बचपन के कारण जैसे घातक जल के लिए रोता है रुदन करने लगा था। रोते हुए उस अपने बालक से माता बाण से गदगद वाणी के द्वारा कहने लगी ॥१०॥ बेटा | उमा ३४८ ] [ वामन पुराण थीवरस के हरण करने की इच्छा कर रहा था ॥१॥ भगवान जनार्दन ने उस दुष्ट के इस बुरे अभिप्राय को जानार उसके वध करने की इच्छा कर भगवान् महेश्वर के समीप मे गये थे ॥१६॥ इस बीच में योग भूत्ति धारण करने वाले अव्यय सामु नक्षण भूपित हिमाचल के प्रस्थ का आश्रय करके स्थित रहते थे ॥२०.. इसके पश्चात् जगनाथ सहन शिर वाले विभु के पास उपस्थित होकर हरि ने आरमा से स्वय हो आत्मा की आराधना को थी ॥२१॥ आसीद्वर्षसहस्र'तु पादाङ्ग प्ठेन तगिरा। गृणन्सनातन ब्रह्म योगिध्येयमलक्षणम् ॥२२ ततः प्रीतः प्रभुः प्रादाद्विष्णवे परमं पदम् । प्रत्यक्षतेजसा युक्त दिव्यं चक्र सुदर्शनम् ॥२३ तहत्वा देवदेवाय सवभूनमयः प्रभुः । कालचक्रनिभं चक्र शकरो विष्णुमब्रवीत् ।।२४ वरायुध हि देवेश सर्वायुर्धानवहणम् । सुदर्शन द्वादशार पण्णाभि द्विजवजवे ॥२५ आरासस्थास्त्वमी तत्र देवा मासाश्च राशयः । शिक्षाना रक्षणार्थाय संस्थिताऋतवश्व पट् ॥२६ अग्निः सोमस्तथा मित्रो वरुणश्च शचीपतिः। इन्द्राग्नी वाऽप्ययो विश्व प्रजापतय एव तु ॥२७ वायुश्च बलवान्देववद्यो धन्वन्तस्तिथा। तपस्यश्च तपश्चोगो द्वादशेति प्रतिष्ठिताः॥ इस प्रकार से पाद के अ गुष्ठ से स्थित होते हुए उसको एक सहस्र थप व्यतीत हो गये थे । उनकी वाणी योगियों के द्वारा ध्येय-अलक्षण सनातन ब्रह्म को ही ग्रहण कर रही थी ॥२२॥ इसके पश्चात् प्रभु प्रसन्न होकर विष्णु को परम पद प्रदान किया था। प्रत्यक्ष तेज से युक्त दिव्य मुदर्शन चक्र को जोकि कालचक्रमय था सर्व भूतमय प्रभु शकर मे देवो के देव के लिये देकर विष्णु से यह कहा-||२३-२४॥ देवेश ! यह परमनेट आधुय है और समो आयुओ का निवहंग है। यह सुद. 1 -- श्रीदाम चरित वर्णन ] [ ३४६ शन दारह आरामओ वाला है-पण्यामि नया जब मे द्विज के समान है ॥२५॥ ये देव-मास और गशियों सभी आरामों में सस्थित है । शिष्ठों की रक्षा के लिये हैऋतुएँ सस्थित हैं ॥२६॥ अग्नि-सोम, मित्र, वरुण, शचीपत, इन्द्र, अग्नि, विश्व देवा, प्रजापतिगण, बलवान् वायु देव, वैध आश्विनी कुमार, धन्वनरि, तपस्य, उपता ये द्वादश इसमें प्रतिष्ठित हैं ॥२७-२८॥ वाद्या: फाल्गुनान्ताश्च मासास्तत्र प्रतिष्ठिताः ।।६ तदेनदादाविभोरपायुधशसुराणाजहिमाविशद्विथाः।। अमोघ पोऽमरराजपूभितोधृतो मयामनगतस्तपोबलात् ॥३० इत्युत। शभुना विष्णुस्ततो वचनमब्रवीत् । क्थ शभो विजानीया ममोघ मोघमेव च ॥३१ यथाऽमोघ विमोचक सर्वत्राप्रतिम सत: । जिज्ञासाथ तवैवेह प्रेक्षिप्यामि प्रतीच्छ मे ॥३२ तद्वाक्य वासुदेवस्य निशम्याह पिनाकवृक् । यद्यव प्रक्षिपस्वेति निर्विशङ्कन चेतसा ॥३३ तन्मद्देशानवचन श्रुत्वा विष्णु: सुदर्शनम् । मुमोच तेजो जिज्ञासुः शंकर प्रति वेगवान् ।।३४ मुरारिकरविभ्रष्ट चक्रमभ्येत्य शूलिनम् । विधा चकार विश्वेश यज्ञेश यज्ञयाजकम् ।।३५ चैत्र से शादि लेकर फाल्गुन के अन्त तक बारह मास वहा पर प्रतिष्टित हैं ॥२६॥ हे विभो ! इस दरायुध को लेकर सुरो के शत्र बों पा वध करो । इसमें विशक्तिमत होना। यह अमोघ अस्त्र है-अमर राज के द्वारा पूजित और मात्र गत है । मैंने तपोवल से इसे धारण किया है।।३०।इस प्रकार से शम्भु के द्वारा जब विण चहे गये तो उन्होंने कह-हे शम्भो ! यह फैसे माना जावे यह मोप है या आमोष है । हे विभो ! जिस प्रकार से यह चक्र है अमोघ (मफ्ल) है तथा सर्वत्र अनु- पम है यह आपको ही जिज्ञासा के लिये यहीं पर देसू गा-यह मुझे आप सरिए ॥३१-३२।। पिनाक के धारी शिव ने वासुदेव रे उस वावय को । वामन पुराण सुनकर बहा-यदि ऐगा ही है तो निर्विशक्षित चित्त से इसका प्रक्षेप करो ॥३३।। महेशान प्रभु के इम वचन को सुनकर feण ने जिज्ञासु होते हुए वेगवान होकर उस तेजोमय सुदर्शन को गाकर वे प्रति प्रक्षिप्त लिया था ॥३४॥ मुरारि वे पर से विप्रष्ट चक्र शूली वे समीप मे आवर उसको विश्वेश-यज्ञश और यज्ञ याजक तीन प्रकारका पर दिया था॥२५॥ हर हरिस्त्रिधाभूत दृष्ट्वा तूर्ण महाभुज.। बीडोरप्लुतदेहस्तु प्रणिपातपरोऽभवत् ॥३६ पादप्रणामनिरत वीक्ष्य दामोदर ततः । प्राह प्रोतमना. श्रीमानुत्तिष्टेति पुन पुन. ॥३७ प्राकृतोऽय महामाग विकारो ब्रह्मणो मम । निकृत्तो न स्वभावो में अच्छेद्योऽदाह्य एव हि ॥३८ तदेतानीह चक्रेण श्रीण्यङ्गानीह केशव । कृतानि तानि पुण्यानि भविष्यन्ति न संशयः ॥३६ हिरण्याक्षस्ततो ह्य प सुवर्णाक्षस्तथाऽपर. । तृतीयो विश्वरूपाक्षस्त्रयो मे पुण्यदा नृणाम् ।।४० उत्तिष्ठ गच्छ च विभो निहन्तुं च ममाहितम् । श्रीदामान हत ज्ञात्वा नन्दयिष्यन्ति देवताः ॥४१ इत्येवमुक्तो भगवान्द्रेण गरुडध्वज.। गत्वा सुरगिरिप्रस्थ श्रीदामान ददर्श ह ॥४२ भगवान हरि ने हर को तीन भागो मे हो जाने वाला देखकर यह महा भुजाओ वाले प्रभु शीघ्र ही श्रीडा (लज्जा) से उपासुत देह वाले होगये थे और शम्भु के चरणो मे प्रणिपात परायण होगये ।।३६।। अपने परणों में प्रणाम करने में निरत दामोदर प्रभु को देखकर प्रसन्न मन वाले श्रीमान् शम्भु ने बारम्बार कहा उठो ॥३७॥ हे महाभाग ! यह विकार सो प्राकृत है जोकि ब्रह्म मेरा स्वभाव कभी भी विकृत नही हुआ है क्योंकि वह तो अच्छे और बदाह्य हो रहता है ॥३॥ है केशव ! इस चक्र के द्वारा ये लोन अग हो त हुए हैं। वे परम । - श्रीदाम चरित्र वर्णन ] । ३५६ पुण्यमय होगे-इसमे सशप नहीं है ||३६तव यह एक हिरण्याक्ष है- दूसरा सुवर्णाक्ष है और तीसरा विश्वरूपाक्ष है ये तीनो मेरे अग मनुष्यो के लिये पुण्य देने वाले हैं ।।१०।। हे विभो ! आप उटिये और जाइये तया मेरे शत्रु का निहनन कीजिए । श्री दामा को जब देवगण निहत जान लेंगे तो वे मव बहुत ही प्रसन्न होंगे ॥४१|| इस प्रकार से पहे जाने पर जोकि हर ने भगवान् गरुडध्वज से कहा था। फिर विष्णु ने सुरगिरि के प्रम्य पर जाकर यो दामा को देखा पा ॥४२॥ त दृष्टा देवदपंघ्न दैत्य देववरो हरिः। मुमोच चक्र वेगाढय हतोऽसीति द्रवन्विभुः ।।४३ ततस्तु तेनाप्रतिपौरपेण चक्रेण दत्यस्य शिरो निकृतम् । सछिन्नशोो निपपात शलाद्वजाहत शैल शिरो यर्थव ॥४४ तस्मिन्हते देवरिपी सुरारिरीश समाराध्य विरूपनेयम् । लघ्वाचचक्र प्रवरंमहायुधंजगामदेवोनिलयतपोनिधिम् ॥४॥ सोऽयं पुत्र विस्पाक्षो देव देवो महेश्वरः । तमाराधय चेत्साघो क्षीणेास भोजनम् ॥४६ तनुमातुवचन श्रुत्वा वीतमन्युः सुतो वली। तमाराध्य विरूपाक्ष प्राप्स्ये क्षीरेण भोजनम् ॥४७ एतत्वयोक्त परम पवित्रं संछेदन पापतरोमुरारेः। तीयं च ततव महासुरो वै समाससादाथ सुपुण्यहेतोः ।।४८ देववर हरि ने देवों के दर्ष के हनन करने वाले उस दैत्य को देख कार वेग से युक्त उस चक्र को छोड़ दिया था और विभु ने यह कहते हुए हो उमरो छोड़ा था किशोदामा अवहत होगया है ।।१३।। इसके अन- तर उम अप्रतिम पौरुप पाले धन से उस देव का गिर मर गया था। पटे हुए मस्तक वाला वह उस पर्वत मै वज से आहत शेल में शिखर पी माहिनीचे गिर गया था ॥४१॥ उस देव शत्र हन हो डाने पर मुरारि विष्णु ने ईश विकल नेत्र वाले प्रमु शिव की समाराधना की थी । फिर उस अबर महान् आयुध चक्र को प्राप्त करके देव तपोनिधि निलय को चले गये थे ॥४५॥ हे पुत्र ! वह यह विरूपाक्ष देवदेव है ३५२ ] [ वामन पुराण और महेश्वर है 1 है साधो ! यदिक्षीर से भोजन चाहता है हो उसकी समाराधना करी ॥४६॥ माता के उम वचन को सुनकर बल- वान् सुत वीतमन्यु विरुपाक्ष उमकी आराधना पर शोर से भोजन प्राप्त करेगा ॥४७॥ यह आपने परम पवित्र पाप रूपी तरु वे ऐदन करने वाला मुरारिका तीथ है। वहाँ पर ही सुपुण्य के हेतु से महासुर प्र.न हुआ था ॥४८॥ ८३-प्रह्लाद को तीर्थयात्रा वर्णन (१) तस्मिस्तीर्थवरे स्नात्वा दृष्ट्वा देव त्रिलोचनम् । पूजयित्वा सुवर्णाक्ष नैमिष प्रययौ ततः।। तत्र तीर्थसहस्राणि सिंशत्पापहराणि च । गोमत्या.काञ्चनाध्याश्च शुभदायाश्च मध्यतः ॥२ तेपु स्नात्वाऽयं देवेश पातवाससमच्युतम् । ऋपीनपि च सपूज्य नैमिषारण्य वासिनः ॥३ देव देवं तथेशान सपूज्य विधिना ततः । गयाया गोपति दृष्टु जगाम स महासुरः ॥४ स्नात्वा ब्रह्मतढागे तु कृत्वा चास्य प्रदक्षिणाम् । पिण्डभिवंपण पुण्य पितृणा स चकार ह ॥५ उदपाने तथा स्नात्वा तनाभ्ययं पितृ वशी। गदापारिंण समभ्यय॑ गोपति चापि शक रम् ।। ६ इन्द्रतीर्थे तथा स्नात्वा सतयं पितृदेवता. । महानदी जले स्नात्वा सरयूच जगाम सः ।।७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-उस घटतम तीर्घ मे स्नान करके तथा त्रिलोचन देव का दर्शन करके और सुवर्णाक्ष का पूजन करके फिर नंमिण को चले गये थे ।।१॥ वहाँ पर सहस्रो तीर्थ हैं जो तीस पापो के हरण करने वाले हैं। ये तो गोमती काचनाक्षी और शुभदा के मध्य मे हैं ॥२॥ उनमें स्नान करके तथा पीताम्बरधारी देवेश अच्युत की अर्चना करने और नमिषारण्य के निवापी ऋषियो का भी पूजन किया था प्रह्लाद को तीर्थयात्रा वर्णन (१) ] [ ३५३ ॥३॥ इसके पश्चान् देवों के देव ईशान का विधान सहित पूजन पिया था। फिर वह महामुर गोपति का दर्शन करने के लिये गया मे चला गया था ॥४॥ ब्रह्म तहाग में स्नान करके और इसकी प्रदक्षिणा करके उमने पितृगण के लिये परम पुण्यमय पिग्डो का निवर्णन किया पा ॥५॥ उदयान मे स्नान करके वशी ने वहां पर पितृगण का अभ्यचन किया था । भगवान् गदापाणि का अर्चन करके गोति श कर का भी यजन किया पा ॥६॥ इन्द्र तोयं मे स्नान करके ठया नितृगप का मनी माति तर्पत करके महानदी र पवित्र जल में विधि पूर्वक स्नान किया पा । इसके उपरा ३ वह यहाँ से सरयू तोयं को चल गये थे ॥७॥ तस्या स्नात्वा समभ्यच्य गोप्रतार कुशेशयम् । उपोष्य रजनीमका विनयावननो ययौ । स्नात्वा चाच्यं रजस्तीर्थे दत्त्वा पिण्ड पितृ स्तथा । दर्शनाथं ययो श्रीमानजित पुरुषोतमम् ॥ त दृष्टा पुण्डरीकाक्षमक्षर परम शुचि । पड़ात समुपोप्पंव महेन्द्र दक्षिण ययौ ।।१० तस देववर शुभ्रमर्धनारीधर हरम् । दृष्ट्वा च सपूज्य पितृन्महेन्द्र चोत्तर गत. ॥१॥ तत्र देववर शभुगोपाल सोमपीडितम् । दृष्ट्वा स्नात्वा सोमतीर्थे सहाचलमुपागत ॥१२ तत्र स्नात्वा महोदक्या वंयुष्ठ चाच्यं भत्तिता। सुरान्पितृन सनप्य पारियात गिरि गत. ॥१३ तम स्नात्वा लाङ्गलिन्या पूजयित्वापराजिनम् । मशेरदेश चाम्येन्य विश्वरुप ददर्श सः ।।१४ उममे स्नान र दुगायरा अचन पर एक रात्रि उवाम र पले गये पे सोपं में स्नान र पितृगण को लिदान दे अजित पुरषोममरा दर्शन करने घने गरे 10 मार पुरोगाय का दर्शन कर रात्रि वा उपशम पर महद्र में दलित दो पन दिये थे ॥१०॥हा अर्धनारीश रमादर्शन पूजन कर पितृगण को तृप्त कर उनर ३५४ । [ यामन पुराण को चले दिये थे ॥५१॥ दहा सोम पीडित शम्भु का दर्शन कर पूजन कर तथा सोम तीर्थ में स्नान घरके सह्य गिरि पर आगये थे ॥१२॥ वहाँ महादेवी मे स्नान पर बैकुण्ठ की, बचना की सुर और पितृगण का अचंना दिया था और फिर पाग्यिान पर्वत को चले गये ॥१३॥ वहा लागलिनी मे स्नान और अपराजित का पूजन करने पशेरुदेश मे पहुंच कर उनने विश्वरूप का दर्शन किया था ॥१४॥ यत्र देववरः शभुर्गणाना तु सुपूजित । विश्वरूपमथात्मान दशयामास योगवित् ॥१५ तत्र मडकुर्राणकातोये स्नात्वाऽभ्यर्च महेश्वरम् । जगाम नित्यसौगन्ध प्रह्लादो मलयाचलम् ॥१६ महाहदे ततः स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम् । ततो जगाम योगात्मा द्रष्टुं विध्ये सदाशिवम् ।।१७ ततो विप्राशासलिले स्नात्वाऽभ्यर्च्य सदाशिवम् । लिरात्र समुपोष्याथ अवन्ती नगरी ययौ ११८ तर क्षिप्राजले स्नात्वा विष्णु मपूज्य भक्तितः । श्मशानस्थ जगामाथ महाकालवपुधरम् ॥१६ तस्मिन्स सर्वभूताना तेन रूपेण शकर. । तामस रूपमास्थाय सहार कुरुते वशी ॥२० ततस्थेन सुरेशेन श्वेतक्र्नािम भूपतिः। रक्षितस्त्वातक दग्ध्वा सर्वभूतापहारिणम् ॥२१ जहाँ पर गणो ये पूजित शम्भु ने योग वेत्ता होने के कारण अपने आपको विश्वरूप दिखलाया था ॥१५॥ वहा मकुरणिका के जल में स्नान परके महेश्वर का पूजन किया और प्रह्लाद नित्य सौगध मलया. 'चल को चले थे ॥१६॥ महाहृद मे स्नान कर शकर का अर्चन दिया फिर योगात्मा विध्य मे सदा शिव का दर्शन करने चले गये थे ॥१७॥ वहां विपाशा के जल मे ससान-सदा शिव का पूजन कर तीन रात्रि उपनास पर अदन्ती नगरी म पहुँच गये थे ॥१८॥ वहा पर विप्रा नदी में स्नान तथा विष्णु का अचन करपे स्मशानवासी महा- प्रह्लाद की तीर्थ यात्रा वर्णन (1) ] [ ३५५ पाल वपु के समीप चले गये ॥१६॥ वहा पर उस स से हार हामन मे समास्थित होरर सब भूतो का सहार करत हैं ॥२०॥ वहा पर स्थित देव ने वेतकि नृप की रक्षा की थी और सर्व भूताप हारी अन्तक कादग्ध कर दिया था ॥२१॥ तपातिहृष्टो वसति नित्य वै सर्वदा भव । वृत. प्रमयकोटीभित्रिदशाचितविग्रहः ॥२२ त हवाऽथ महाकाल कालकालान्तकान्तकम् । यमसयमन मृत्योमृत्यु चित्रविचितम् ॥२३ श्मशाननिलय शभु भूतनाथ जगलतिम् । पूजयित्वा शूलधर जगाम निपधान्प्रति ॥२४ तामरश्वर देव दृष्ट्वासपूज्य भक्तित । महोदय समभ्येत्य हयग्रीव ददर्श सः ॥२५ अश्वती तत. स्नात्वा दृष्ट्वा च तुरगाननम् । श्रीधर च विभु पूज्य पाञ्चालविषय ययौ ॥२६ तमेश्वरगुणयुक्त पुनमयपतरय । पाञ्चलिक वशीदृष्ट्वा प्रयाग प्रयतो ययौ ॥२७ वहा पर सर्वदा परम प्रसन्न भवराम रिया परत हैं और प्रयम गों से समावृत और देव वृन्द से यदित निग्रह बाल हैं ॥२२॥ काल- पालान्तरे अन्तर और यम सयमन मृत्यु से भी मृयु महा काल का दांना शमशान यासी प्रभु का पूजन पर निषध दसो को पूनधर पा प्रचंन पर चले गये थे ॥२३-२४॥ यहा अमरेवर राशन पर और पूजन करके महोदय को जाकर उनन हपनीद का दान रिया या ॥२५॥ अव तोपं म स्नान-नुरमानन रा दरात और घर का पूजन पर वह पाञ्चाल दर को पल दिये थे ॥२६॥ दहा ईर गुणों व युक्त अयं पात र पुष पासारिश दर्शन र प्रयाग को पस गये ॥२॥ प्रयागे गुभदे तीर्थ यामुनेलोपवियुते । दृष्ट्वा यटेश्वर रद्र मापय योगशायिनम् ॥२८ । वामन पुराण हावेव भक्तिसंपूज्यौ पूजयित्वा महासुरः। माघमासमथोपोप्य ततो वाराणसी गतः ।।२६ समासाद्य च तो पुण्यांतीर्थेषु च पृथक्पृथक् । सवपापहरा ह्य पा स्नात्वाऽयं पितृदेवताः ॥३० प्रदक्षिणीकृत्य पुरी सपूज्यामुक्तरेशवो। लोल दिवाकर दृष्ट्वा ततो मधुवन ययौ ॥३॥ तन्त्र स्वायभूव देव ददर्शासुरसतमः। तमभ्ययं महातेजा: पुष्करारपयमागमत् । सेषु विष्वपितीर्थेषु स्नात्वाऽयं पितृदेवताः ॥३२ एतत्पवित परमं पुराण प्रोक्त त्वगस्त्येन महर्पिणा च । धन्यं यशस्य बहुपापनाशनं सकीर्तनाच्छ्रवणात्सस्मृतेश्च ।।३३ परम शुभ यामुन तीर्थ मे बटेश्वर रुद्र और योगशायी माघर का पूजन करके उस महासुर ने माघ मास मे वास करके फिर वह वारा- णसी को चले गये थे ॥२८-२६॥ उस परम पुण्यमयी मगरी मे पहुंच कर पृषकर तीर्थों में स्नान किया और पितृ-देवो का अर्चन किया था ॥३०॥ उस पुरी की परिक्रमा की और अमुक्त देश का पूजन किया था फिर लोल दिवाकर का दर्शन कर मधुवन को चले गये थे ॥३१॥ यहा स्वायम्भुव देव का दर्शन किया और उनका पूजन कर फिर पुष्करारण्य मे मा गये थे। वहा तीनो तीर्थों में स्नान क्यिा तथा पितृ देवगण का वर्णन किया था ॥३२॥ यह परम पुराण अगस्त्य महपि ने कहा है । यह परम धन्य-पश देने वाला-बहुत पापो का नाशक है । इसके सकोतन-प्रवण और सस्मरण से यह होते हैं ॥३३॥ ८४-प्रह्लाद तीर्थ यात्रा वर्णन (२) गते च तीर्थयातायां प्रह्लादे दानवेश्वरे । कुरुक्षेतं समभ्यागाद्रप्टुं वैरोचनो मुने ॥१ प्रह्लाद तीर्थ यात्रा वर्णन (२) ] [ ३५७ तस्मिन्महाधर्म युते तीर्थे ब्राह्मणपुङ्गवः । शुको द्विजातिप्रवरानामन्त्रयत भार्गवः ।.२ भृगुरणाऽऽमन्त्र्यमाणास्ते श्रुत्वाऽऽत्रेयसगौतमाः। कौशिकाङ्गिरसश्चैव तत्त्वज्ञाः कुरुजाङ्गलम् ॥३ उत्तराशा प्रजग्मुस्ते नदीमनु शतद्रवीम् । शातद्रव जले स्नात्वा विवास प्रययुस्तत: ॥४ विज्ञाय तत्रास्य रति स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः । ततोऽपि किरशा पुण्या दिनेशकिरणच्युताम् ।।५ तस्या स्नात्वा च देवर्षे सर्व एव महर्पयः । सुपुण्योदा वेगवती स्नात्वा जग्मुरथेश्वरीम् ॥६ देविकाया जले स्नात्वा पयोष्णाया च तापमाः । अवतीर्णा मुने स्नातु माधवाद्याः सुमानवीम् ।।७ पुलस्त्य ऋषि ने कहा-है मुने ! दानवेश्वर प्रह्लाद के तीर्य यात्रा के चले जाने पर वैरोचन कुरुक्षेत्र देखने को आया था ॥१॥ उस महा धर्मयुत ठीयं में पेष्ठ ब्राह्मग शुक्र ने द्विजातियों का आमन्त्रण किया या ॥२॥ भृगु के द्वारा आमन्त्रित सब है-ऐमा श्रवण कर आत्रेय गोठम-कौशिक-आगिरस और तत्वज्ञ वे यती नदी के अनुसार उत्तर दिशा को गये थे। शानदव जल मे नहा कर निवास को चले गये ये ॥३-४ वहां इस को रति जानकर स्नान और पितृ-देवाचन किया फिर दिनेश की किरणों से चुत किरणा में स्नान किया था। हे देव ! समी महर्षिगण पुण्योदक वाली वेगवतो मे नहाने और फिर ईश्वरी को पर दिये ये ॥५-६॥ है मुने ! देविका मे स्नान कर तपा वाम पयोगा मे नहाये थे और माधवाय सुमानवी में नहाने को उठरे ये ॥७॥ ततो निमग्ना ददृशुः प्रतिबिम्बमथात्मनः। अन्नजले द्विजधैठ महदाश्चर्यकारकम् ॥ उन्मज्जन्त ददृशुः पुनर्विस्मितमानसाः ! ततः स्नात्वा समुत्तीर्णा पयः सर्व एव हि ॥

३५८ ] । वामन पुराण पुष्कराक्षमयोगन्धि ब्रह्माण चाप्यपूजयन् । ततो भूय. सरस्वत्यास्तीर्थे खेलोक्यविश्रुते ।।१० कोटितीर्थे कद्रकोटि ददर्श वृषभध्वजम् । नमिपेया द्विजवरा मागधेयाः ससैन्धवाः 11११ धर्मारण्या। पुष्करेया दण्डकारण्यकास्तथा । चाम्पेयास्तारकच्छेया देविकातीर्थकाश्च ये ॥१२ ते तत्र श कर द्रष्टु समायाता द्विजातयः । कोटि सख्यास्तपःसिद्धा हरदर्शनलालसाः ।।१३ अह पूर्वमहं पूर्वमित्येववादिनो मुने । तानाकुलान्हरो दृष्ट्वा महीन्दग्धकिल्विषान् ॥१४ निमग्न होकर हे द्विज धेष्ट अन्दर जल में अपना प्रतिविम्ब उन्होंने देखा पा जो महान् आश्चर्य के करने वाला था 11 उन्मज्जन करते फिर देखा था जिससे मन मे बहुत ही विस्मय हुआ था। ऋषियों ने वहाँ स्नान करके सब पार पर समुत्तीर्ण हो गये थे 10 अयो गन्धी पुष्कराक्ष ब्रह्मा का पूजन किया था और पुन:लोक प्रसिद्ध सरस्वती तीर्थ-कोटि तीर्थ मे रुद्र कोटि पमध्वज का दर्शन किया था। वहाँ पर नैमिषेय बुद्धिज-मागवेय-संग्धव-धर्मारण्य-पुष्करेय दण्डकारण्यकर चाम्पेय-तार छेय और देविका तीर्थक ये सब वहाँ शकर का दर्शन करने द्विजाति गण समायात हुए थे नप मे सिद्ध करोडो की संख्या में वही हर के दर्शन के लालसा वाले थे ।।१०-१३॥ हे मुने ! पहिले मैं-पहिले में दर्शन करूंगा ऐसा बोलने वाले सभी हो रहे थे। हर ने दग्ध किल्विष एव माकुल उन महधि को देखा था ॥१॥ तेपामेवानुकम्पार्थ कोटिमूर्तिरभूच्छिवः । तनस्ते मुनयः प्रीताः सर्व एव महेश्वरम् ।।१५ सपूजयन्तस्तै तस्थुस्तीर्थ कृत्वा पृथक्पृथक् । इत्येवं रुद्रकोटीभिम शंभोरजायत ।।१६ व ददर्श महातेजाः प्रह्लादो भक्तिमावशी। - प्रह्लाद तीर्थ यात्रा वर्णन (२) ] । ३५६ कोटितीर्थ ततः स्नात्वा तपयित्वा वमूपितृन् । रुद्रकोटि समभ्यय॑ जगाम कुरुजाङ्गलम् ॥१७ ततो देववरं स्थाणु शंकर पार्वतीप्रियम् । सरस्वतीजले मग्न ददर्श सुरपूजितम् ॥१८ सारस्वतेऽम्भसि स्नात्वा स्थाणुसपूज्य भक्तितः । स्नात्वा दशाश्वमधे च संपूज्य सुरान्पितॄन् १९ सहनलिङ्ग सपूज्य स्नात्वातस्मिन्हदे शुचिः । अभिवाद्य गुरु शुक्र सोमतीर्थ जगाम ह ॥२० तन स्नात्वाभ्यच्यं पितृन्मोम संपूज्य भक्तितः। क्षीरिकावासमभ्येत्य स्नान चक्र महामतिः ॥२१ उन सब पर कृग करके शिव कोटि मूत्ति वाले हो गये थे। इसके पश्चात मभी मुनिगण परम प्रमग्न हो गये थे। उन्होंने महेश्वर का पूजन करते हुए. पृयक तीर्म करके वहाँ स्थित हुए थे। इस प्रकार र कोटि-यह नाम शम्मु का हो गया था ॥१५-१६॥ महा तेजस्वी भक्त प्रल्हाद ने उममो देखा पा । कोटि तीर्य में नहाकर वमुगण और पितरों को तृन करके रुद्र कोटि का अर्चन किया था और फिर कुरु- जाङ्गल को पले गये थे ।।१७। वही पार्वती प्रिय स्थाणु शकर से सरस्वती के जल मे मग्न देवा या ॥१८|| सरस्वती के उल में स्नान और स्यापा पूजन करे फिर दशाश्वमेध में स्नान तथा सुर और पितरों का पूजन ग्पिा पा ॥१६॥ उम हर में स्नान और पहन निग पापूजन करके गुरु गुरु को प्रणाम दिया और सोमतीयं को न दिये पे ॥२०॥ वहाँ स्नान-पिताग और मोम का अचंन करके श्रीरिका दाम में पहुंच पर महामति ने स्नान किया था ॥२१॥ प्रदक्षिणीकृत्य तावरण चाच्यं बुद्धिमान् । भूयः कुरुध्वजं दृष्ट्वा पद्माक्षी नगरी गतः ।।२२ तशाच्यं मिसावरगो भारी लोरपूजितो । कुमारधारामभ्येत्य ददर्श स्वामिनं वशी ॥२३ । बामन पुराण . स्नात्वा कपिल धारायां सतयंपीन पितृन्मुरान् । दृष्ट्वा स द समभ्यच्यं नर्मदाया जगामह ॥२४ तस्या स्नात्वा समभ्यच्यं वासुदेवं श्रियः पतिम् । जगाम भूधर द्रष्टुवाराह चकधारिणम् ॥२५ स्नात्वा कोकामुखे तीथ सपूज्य धरणीधरम् । त्रिसौवर्ण महादेव मधुदेश जगाम ह ॥२६ तत्र नारीहृदे स्नात्वा पूजयित्वा च श करम् । कालजर समभ्येत्य नीलकण्ठ ददर्श च ॥२७ नीलतीर्थजले स्नात्वा पूजयित्वा ततः शिवम् । जगाम सागरानूप प्रभासे द्रष्टुमीश्वरम् ॥२८ वृक्ष की परिक्रमा करके बुद्धिमान् ने वरुण का पूजन किया था। फिर कुरुध्वज को देखकर पद्माक्षी नगरी को चले गये थे ॥२२॥ यही लोक पूजित मित्रावरुण भास्करो का अर्चन किया और कुमारधारा जाकर स्वामी का दर्शन किया था ।।२३॥ कपिलधारा में स्नान कर ऋषि-पितृ और सुरी का तर्पण कर फिर स्कन्द का दशनाभ्यर्चन कर नर्मदा को चले गये थे ॥२४॥ उसमै स्नान करके श्रीपति वासुदेव का यजन किया और फिर चक्रधारी भूधर बाराह का दर्शन करने को चले गये थे ॥२५॥ कोकामुख में स्नान कर तथा घरणीधर का भली मांति पूजन कर निसीपणे महादेव मधुदेश को चल दिये थे ॥२६॥ वहाँ नारीहृद मे नहा कर श कर का पूजन किया और कालजर में पहुंच कर नीलकण्ठ का दर्शन किया था ॥२७॥ नील तीर्थ जल में स्नान कर शिव का पूजन किया था फिर प्रभास मे सागरानप मे ईश्वर का दर्शन करने के लिये चले गये थे ॥२॥ स्नात्वा च सगमे नद्याः सरस्वत्यार्णवस्य च। सोमेश्वर लोकपति स ददर्श कपदिनम् ॥२६ यो दक्षशापनिर्दग्धः क्षयी ताराधिपः शशी। आप्यायित: श करेण विष्णुना सकपदिना ॥३० प्रल्हाद तीर्थ यात्रा वर्णन (२) ] तावार्य देवप्रवरौ स जगाम महालयम् । तत्र स्द्र समभ्यय॑ प्रजगामोतरागकुरुन् ॥३१. पद्मनाभं स तताय॑ सप्तगोदावर ययो। तत्र स्नात्वाऽऽयं देवेशं भीमं लोक्यन्दितम् ।।३२ गत्वा दारुवने श्रीमाञ्योलिङ्गप्रददर्श ह । तमार्य ब्राह्मणी गत्वा स्नात्वाऽऽयं त्रिदशेश्वरम् ॥३३ प्लक्षावतरणं गत्वा श्रीनिवासमपूजयत् । ततश्च कुण्डिनं गत्वा संपूज्य प्राणतृप्तिदम् ।।३४ शूर्पारक चतुर्वा पूजयित्वा विधानतः । मागधारण्यमासाद्य ददर्श वसुघाधिपम् ॥३५ नदी सरस्वती मोर अणव के संगम में स्नान करके लोक पति कपी सोमेश्वर का दर्शन किया ॥२६॥ जो दक्ष के शाप से दग्ध ताराधिप-क्षयी-शशि कपदी विष्णु शंकर ने आप्यायित किया था ॥३०।। उन देव प्रवर दोनो का अचंन करके वह महालय को चले गये थे। वहां रुद्र का पूजन कर उत्तर कुरुओं को चल दिये थे ॥३१॥ वहाँ पनाम का पूजन कर सप्त गोदावर को चले गये थे । वहा पर लो- क्य वन्दित भीमदेव का अर्चन किया था और स्नान किया था ॥३२॥ दावन में जाकर श्रोलिंग का दर्शन किया था। वहां अर्चन कर वाह्मणी में जाकर स्नानाच न किया जहा विदशेश्वर प्रभु ये ॥३३॥ प्लक्षावतरण कर श्रीनिवास का पूजन किया था फिर कुण्डिन जाकर प्राण तृप्तिद का अर्चन किया था ॥३४॥ चतुर्वाह भूपरिक का पूजन करके मागधार मे नाकर मुधिर का दर्शन किया था ॥३५॥ तमर्चयित्वा विश्वेशं स जगाम प्रजासुग्रम् । महीतीर्थे ततः स्नात्वा वासुदेवं प्रणम्य च ।।३६ शोणं सप्राप्य संपूज्य स्वमधर्माणमीश्वरम् । महाकोश्यां महादेव हंसाध्यं भक्तिमानथ ॥३७ पूजयित्वा जगनाथ संन्धवारण्यमुत्तमम् । तं दृष्ट्वाऽऽयं हरिं चासो तीर्थ कनसल ययौ ॥३८ ३६२ ] । यामन पुराण तपाच्य भद्रकालीश वीरभद्र'च दानवः । धनाधिप च मे ययावथ गिरिव्रजम् ॥३६ तत्र देव पशुपति लोकनाथ महेश्वरम् । सपूजयित्वा विधिवसामरूप जगाम ह ॥४० शशिप्रभ देववर तिनेव सपूजयित्वा सहित मृडान्या । जगाम तीथं प्रवर महाव्य तस्मिन्महादेवमपूजयस १४१ ततस्त्रिक्ट गिरिमद्रिपुन जगाम द्रष्टुं सहचरपाणिम् । तमार्य भक्त्या तु गजेन्द्रमोक्षण जापजाप्यपरमपवित्रम् ॥४२ वहा विश्वेश का पूजन कर प्रना सुख को चले गये थे। म.पं में स्नान किया और वासुदेव को प्रणाम किया पा॥३६॥ शोण में पहुँच कर रुक्मधर्मा ईघर का पूजन किया था। महा कोशी मे हसाख्य महादेव तथा उतम सैन्धवारण्य जगन्नाथ का पूजन कर वहा दर्शन करके हरि का अर्चन किया और कनखल तीर्थ को चले गये थे ॥३७-३८॥ वहा दानव ने भद्रकालीश वीरभद्र का अर्चन किया था और धनाधिप मे का यजन किया, बाद मे गिरि बज को चले गये थे।॥३६॥ वहां पशुपति महेश्वर लोक नाय का पनन किया और विधिवत् कामरूप को चले गये थे ॥४०॥ मृडानी के सहित शामि त्रिनेत्र देववर का पूजन कर महाख्य धेष्ठ तीर्थ मे जाकर महादेव का पूजन किया था ॥११॥ इसके पश्चात् अदि पुत्र गिरि मे चक्रपाणि का दर्शन करने के लिये विकूट को चले गये थे। वहां भक्ति सेअर्चन कर परम पवित्र जाप्य गजेन्द्र मोक्षण का जप किया था ॥४॥ तुतोष दैत्येश्वरसूनुरादरान्मासत्रय मूलफलाम्बुमक्षी। निवेद्य विप्रप्रवरेपुकाञ्चन जगाम घोर सहि दण्डक वनम् ।।४३ तर दिव्य महाशाख वनस्पतिवपुर्धरम् । ददर्श पुण्डरीकाक्ष महास्वापद वारणम् ॥४४ तस्याधस्थ निरास स महाभागवतोऽमुरः। स्थित. स्थग्लिशायी च पटासारस्वत स्तवम् ।।४५

प्रह्लाद तीर्थ यात्रा वर्णन (२) ]
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[ ३६३
तस्मात्तीर्थवरं विद्वान्सर्वपापप्रणाशनम् ।
जगाम दानवो द्रप्टु सर्वपापहरं हरिम् ॥४६
तस्यानतो जगादासौ स्तवो पापप्रमोचनी ।
यो पुरा भगवान्प्राह क्रोडरूपी जनार्दनः ।।४७
तस्मादथागई त्येन्द्रः शालग्राम महाफलम् ।
यत्र सनिहितो विष्णुः स्तस्भेषु स्यावरेपु च ।।४८
तत सर्वगत विष्णू' मत्वा चक्र रति वली।
पूजयन्भगवत्पादौ महाभागवतो मुने ॥४६
इयं तवोक्ता मुनिसघजुष्टा प्रल्हादतीर्थानुगतिः सुपुण्या ।
यत्कीर्तनाच्छवणास्पर्शनाच विमुक्तपापा मनुजा भवन्ति ॥५०
वहीं तीन मास पर्यन्त मूल-फलों का तथा जल का मशन कर
आदर से दरपेश्वर सूनु मन्तुष्ट हुए । विप्रों को काश्चन दान कर परम
घोर दण्डक वन को चले गये थे ॥४३॥ वहाँ पर दिव्य महाशाख वन-
स्पति यपु धारो पुण्डरीकाड महा स्वापद वारण का दर्शन किया था
॥४४॥ उसके नीचे स्थित होकर तीन रात्रि तक महा भागवत वह
अमुर रहा था और स्पण्डिल शायी होकर सारस्वत स्तव का पाठ
किया था ॥४५॥ वहाँ से वह विद्वान् दानव सर्व पापों का हरण करने
वाले हरि का दर्शन करने के लिये सर्व पाप नाशक घेष्ट तीर्य को
चला गया था ॥४६॥ उसके नागे उसने पाप प्रमोचन हो स्तवों को
कहा था जिनको पहिले कोहरूपी भगवान् जनार्दन ने कहा पा॥४॥
हे मुने ! विष्णु को सर्वगत मानकर बली ने रति की थी। उसने जो
महा भागवत तपा भगवान् के चरणों का पूजन किया था ||Yan
मह मुनि संघ द्वारा सेवित प्रह्लाद को तीर्यानुगति जो परम पुज्यमपी
है आपने कही है जिसके कीर्तन यवण और सन से मनुष्य पापो से
छुटकारा जाते हैं ॥५॥

३६४ ] । वामन पुराण ८५-गजेन्द्र मोक्ष वर्णन याजप्या भगवद्भवस्या प्रह्लादो दानवोऽजपत् । गजे द्रमोक्षणादीस्त्व चतुरस्तावदस्व मे ।। शृणुष्व कायष्यामि जप्यानेतास्तपोधन । दुःस्वप्ननाशो भवति येरक्त : सस्मृतं. श्रुन. ॥२ गजेन्द्रमोक्षण त्वादी शृणु त्व तदनन्तरम् । सारस्वतो ततः पुण्यो पापप्रशमनी स्तवौ।। सर्वरलमय श्रीमास्त्रियूटो नाम पर्वतः । मुतः पवतराजस्य सुमेरो स्करातेः ।।४ क्षीरोदजलवीच्यगंधीतामलशिलातल । उत्थितः सागर भित्त्वा देवर्षिगरासेवित. ॥५ अप्सरोभिः परिवृतः श्रीमान्प्रस्रवणाकुलः । गन्धर्वे. किन्नरंयक्षः सिद्धचारणगुह्य के ५६ विद्याधरः सपत्नीक सयतश्च तपस्विभिः । वृकद्वीप गजेन्द्र श्च वृतगात्रो विराजते ७ नारद देवर्षि ने कहा-दानव प्रल्लाद ने जिन जप्यो का भगवद् भक्ति से जाप किया था जोकि गजेन्द्र मोक्षण प्रभृति हैं, आप उन पारो को मुझमे कृपा पर कहिये ॥१॥ पुल-रयगी ने कहा-हे तपोधन ! आप मुनिये मैं इन जपो को बतलाता हूँ। इनके कहने-सुनने पौर स्मरण से दुस्वप्नो का नाश होता है ॥२॥ पहिले गजेन्द्र मोक्षण को सुनो उसके पश्चात् दो सारस्वतो को जोकि पुण्य और पाप प्रशमन स्तव हैं ॥३॥ शिकूट नाम का पर्वत सर्व रत्तो से पूर्ण है। वह मास्वर युक्ति पर्वतराज सुमेरु का पुत्र है ॥४॥ क्षीर सागर के जल को तरगों से घिसके शिलाओ का मल घुल गया है वह सागर का भेदन करके उस्थित हुआ था और देवपि गण से सेवित है ।शा अप्सराओं से घिरा हुआ श्री वाला तथा प्रस्रवणो (भरनो) से व्याकुल है। गन्धर्व-किलर- सिट चारण-गुह्यक-विद्याधर-सपत्नीक एवं सयत तपस्विगण तथा वृ. दीप गजेन्द्रो के द्वारा वृत गाव वाले वह विराजमान है ॥६-७॥ - गजेन्द्र मोक्ष वर्णन ] [.३६५ पुन्नाग करिणकारश्च विल्वामलकपाटलः । चूरानीपकदम्बंन चन्दनाररुचम्मकः । तस्यक काञ्चनशृङ्ग सेवते यदिवाकरः ।।६० नानापुण्यसमाकोणं नानागन्धादिवासितम् ॥ १ द्वितीय राजत गृङ्ग सेवते यन्निशाकरः ॥१२ पाण्डुराम्वुदसङ्काश तथा रत्नचयोपमम् ॥१३ वचन्द्रनीलवडूयतेजोभिर्भासयन्दिश. । तृतीय ब्रह्मसदन प्रहृष्ट शृङ्गमुत्तमम् ।।१४ पुनाग-कणिकार-विल्व -आमलक-पाटल-आम्र-मीय- पदम्व-चन्दन-अगरु-चम्पक-शाल-ताल-तमाल-मरल अर्जुन-पर्पट नया अन्य अनेक प्रकार के वृक्षो से वह पवंत अल कृत था ।1८-६प्रसवण करने वाले अनेक धातुओ से बक्ति चारों ओर शिखरों से शोभित या। उसका एक काञ्चन शिखर है जो नाना पुष्पों से समा को और अनेक गन्धों से अधिवासित है जिसको दिवाकर सेवन करते हैं ॥१०- १२॥ दूसरा शजत शृग है जिसका सेवन निशाकर करता है । यह पाण्डुर सम्वुद के तुल्य और रनो के ढेर के समान है ॥१३॥ वन- इन्द्रनील बंडूयं -के तेजों से दिशाओ को मासित करने वाला तीसरा ब्रह्म सदन प्रष्ट उत्तम शिखर है ॥१४॥ न तत्कृतघ्नाः पश्यन्ति नृशसा नंद राक्षसाः । नातप्ततपसो लोके ये च पापकृनो जनाः ।।५ तस्य सानुमतः पृष्ठे सर काञ्चनपइजम् ॥१६ कारण्डवसमावीर्ण राजहमोपशोभितम् ।।१७ तस्मिन्सरसि दुष्टात्मा निगढोऽन्तजलेशय: 1180 आसीद्ग्राहो गजेन्द्रोणा दुराधों महावल: ॥१६ अथ दन्नोज्ज्वलवपुः कदाचिद्गजयूथपः । मदसायी जलानाक्षी पादचारीव पर्वतः ॥२० धरमददगारेन. गिरिरवतोपमः। स गजोऽञ्जनमद्भाशो मदापूर्णितलोचनः ॥२स [ वामन पुराए पृष्ठ भाग इस श्रृंग को कृतघ्न-नृशंस-राक्षम-विनातप करने वाले और जो पापो के करने वाले लोग हैं वे नहीं देखते हैं ॥१॥ उम सानुमान के मे एक काञ्चन पंकज सर है जो कारण्डवों से समाकीण तथा हसो से उपशोभित है ।।१६।। उस सर मे जल के अन्दर शयन करने पाला द्रुष्टारमा-निगूढ ग्राह था जो गजेन्द्रों के लिये महाबलवान दुरा- घर्ष था ॥१६॥ इसके समीप मे दन्त के समान उज्वल वपु वाला किसी समय मे गजो के यूथ का स्वामी-मद का साय करने वाला-जल की इच्छा से युक्त पादाचरी पर्वत के समान आया था ॥२॥ वह ऐभवत के सदृश था और मद की गन्ध से गिरि को अधिवासित कर रहा था। घह गज अज्जन के समान मद से आपूणित नेत्रो वाला था ॥२१॥ तृपितः स्नातुकामोऽसाववतीर्णश्च तज्जलम् । सलीलः पङ्कजवने यूयमध्यगतस्त्वरन् ॥२२ गृहीतस्तेन रौद्रण ग्राहेणाय्यकामूर्तिना। पश्यन्तीनां करेणूना क्रोशन्तीना च दारुणम् ॥२३ ह्रियते पङ्कजवने ग्राहेणा तिथलीयसा । गज आकर्षते तीर ग्राह आकर्षते जलम् ॥२४ तयोदिव्यं महायुद्धं जात वर्षसहस्रकम् । वारुण: संयुतः पाशै निष्प्रयत्न गतिः कृतः ॥२५ वेष्टयमानः सुपोरैस्तु पार्शनांगो दृढंस्तथा। विस्फूर्य च यथा शक्ति विकोशश्च महारवान् ॥२६ व्यथितः सनिच्छ्वासो गृहीतो घोरकर्मणा। परमामापद प्राप्य मनसाऽचिन्तयद्धरिम ॥२७ स तु नागवरः श्रीमानारायणपरायणः। तमेव शरणं देवं गतः सर्वात्मना तदा ॥२८ यह प्यासा था । स्नान की इछा से उस जल मे अवतीर्ण हा पासीलाके साप उस पात्र बन मे यूथ मे रहता हा पोप्रता से उत्तर रहा पा ॥२२॥ सब बुरी तरह घीखतीं चिल्लाती १६ देखने वाली हपिनियों में से उस अव्यक्त मूत्ति वासे भयानक पाह मध्य गजेन्द्र मोक्ष वर्णन ] [ ३६७ ने उसको पकड लिया था ॥२३॥ बलवान् ग्राह के द्वारा परजरन में यह अतीव लज्जितगत तीर की ओर खींच रहा था और प्राह उसे अन्न में खींच रहा या ॥२४॥ एक सहा वर्ष तक वही हिय महा युद्ध हुआ था। वारुण पाशों से सयुत वह निष्प्रयत्न और गतिहीन कर दिया गया था ॥२५॥ दृढ और घोर पागों से वेधमान वह नाग होगया या यथा शक्ति विस्पुरित होकर और महान ध्वनिगे को निकाल रहा था अर्थात् बुरी तरह चिगाढ रहा था ॥२६॥ घोर कर्म के करने वाले के दाग पकडा गया वह अत्यन्त व्यषित हो गया या निरन्द्रास होते हुए परम विपत्ति में पडकर मन से उसने हरि का चिन्तन दिया था ॥२॥ उस समय में बह येष्ठ गज नारायण के स्मरण में तदार होगया था। उसो देव को शरणा गति में प्राप्त हुआ या और मन से उनका ध्यान दिया पा ॥२८॥ एकात्मा निगृहीतात्मा विशुद्ध नान्तरात्मना । जन्मजन्मान्तराभ्यासाद्भक्तिमान्गरुडध्वजे ॥२६ आद्य देव महादेव पूजयामास केशवम् । मथितामृतफेनाम शङ्खचक्रगदाधरम् ।।३० सहस्रशुभनामानमादिदेवमन विभुम् । प्रगृह्य पुष्पराग्रेण वाचन कमलोद्भवम् । आपद्विमोक्षमन्विन्टन्गजः स्तोतमुदरयत् ।।३१ ॐ नमो मूलप्रनये अजिताय महात्मने । अनाधिताय देवाय नि स्पृहाय नमोस्तु ते ॥३२ नम आद्यस्य वामाय आपायादिप्रवतिने। अनन्तराय चंकाय अव्यक्ताय नमो नमः ॥३३ त्वमेव शरण देवमृपयो वेदपारगाः । कौतयन्ती च य सर्व ब्रह्मादीना परायणम् ॥३४ नमस्ते पुण्डरीकाक्ष भक्तानामभयप्रद । बब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु त्राहि मां शरणागतम् ।।३५ ३६८ ] [ वामन पुराण निगृहीत मारमा वाला एवात्मा हो गया था और परम शुद्ध नन से अन्तरात्मा से उसने चिन्तन दिया था | जन्म जन्मान्तर अभ्यास से गरुडध्वज मे भक्ति का उदय हया या ॥२६) आधदेव--महानदेव भगवान् वेशव का मन से अर्चन किया था जोकि मथित फेन की यामा के तुल्य शख-चक्र-गदा के धारण करने वाले हैं ।।३०। मन शुभ नाम वाले यादि देव-अज-विभु को मूड के अग्रभाग से कारजन कमलोद्भय को अपनी आपत्ति के विमोचन के लिये चाहते हुए गन ने इस स्तोत्र का पाठ क्यिा या--॥३१॥ गजेन्द्र ने कहा- मूल प्रकृति-अजित-महान आत्मा वाले-अनाश्रित-नि:स्पृह देव की सेवा मे मेरा नमस्कार है ॥३२॥ आद्य, धाम, आयं, आदि प्रवर्ती, अनन्तराय, एक तथा अव्यक्त के लिये मेरा बारम्बार नमस्कार है ।।३३।। वेद के पारगामी ऋपिरणों के आप ही देव शरण हैं । सभी ब्रह्मादि के परायण यापका ही कीतन किया करते हैं ॥३४॥ हे पुण्डरीकाक्ष ! आप अपने भक्तो का सदा समय प्रदान किया करते हैं । हे अन ह्मण्य ! आपके लिये मेरा प्रणाम है । अब शरण में समागत मेरी रक्षा कीजिए ॥३५॥ भक्ति तस्यानुसचिन्त्य नांगस्यामोघसंभवः । प्रीतिमानभवद्विष्णुः शङ्खचक्रगदाधरः ।।३६ सान्निध्य कल्पयामास तस्मिन्सरसि केशवः । गरुडस्थो जगत्स्वामी लोकाधारस्तपोधनः ॥३७ ग्राहग्रस्त गजेन्द्र तं तच ग्राह जलाशयात् । उजहाराप्रमेयात्मा तरसा मधुसूदनः ।।३८ जलस्थं दारयामास ग्राह चक्रेण माधवः । मोक्षयामास नागेन्द्र पाशेभ्यः शरणागतम् ॥३६ एव हि देवशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः । ग्राहत्वमगमत्कृष्णाान्मोक्ष प्राप्य दिव गतः ॥४० गजोऽपि विष्णुना पृष्ो जातॊ दिव्यवपुः पुमान् । पापाद्विमुत्तो युगपद्गजगन्धर्व सत्तमो ॥४१ गजेन्द्र मोक्ष वर्णन ] प्रीतिमानपुण्डरीकाक्षः शरणागतवत्सलः । अमवत्त्वथ देवेशस्ताभ्या चैव प्रपूजितः ॥४२ पुनस्त्यजो ने कहा-~~-अमोघ सम्भव शंख चक्रादि धारी भगवान् विष्णु ने उस गज की भक्ति को विचार कर प्रमन्तता प्राप्त की थी ॥३६॥ उस पर मे केशव प्रभु ने गरुड पर स्थित होकर सग्निधि प्राप्त की थो जो प्रभु इस लोक के आधार जगत् के स्वामी बोर तपोधन हैं ॥३७॥ मधुसूदन ने जो अप्रमेय आत्मा वाले हैं ग्राह से ग्रस्त उम गजेन्द्र को वेग के माय जलाशय से और ग्राह को भी निकाल लिया था ॥३८॥ जल में स्थित ग्राह को माधव ने चक्र से विदारित कर दिया था और शरणागत नागेन्द्र को पाशो से मुक्त कर दिया था ॥३६।। इस प्रकार से देव शाप से हूहू गन्धर्व सत्तम ग्राहत्व को प्राप्त हुआ था जो कि कृष्ण से मोक्ष पाकर दिवलोक को चला गया था ॥४०॥ वह गज भी विष्णु से द्वारा पूछा गया दिव्य देह धारण करके पुमान हो गया था । गज और गन्धर्व दोनो ही पापो से मुक्त होगये थे ॥४१॥ शरणागतों पर प्यार करने वाले पुण्डरीकाक्ष देवेश परम प्रसन्न हुए थे और उन दोनो ने उनका अर्चन क्यिा या ॥४२॥ इद च भगवान्योगी गजेन्द्र शरणागतम् । प्रोवाच मुनिशार्दूल मधुर मधुसूदनः ॥४३ यो मा त्वा च सरश्वेद ग्राहस्य च विदारणम् । गुल्मकीचकरेणूनां रूप मेरसुतस्य च ॥४४ अश्वत्थ भास्कर गड्डा नमिपारण्यमेव च । सस्मरिप्यन्ति मनुजाः प्रयाताः स्थिरवुद्धयः ।।४५ कीयिन्ति भक्त्या च श्रोप्यन्ति च शुचिव्रताः । दुस्वप्नो नश्यते तेपा सुस्वप्नश्च भविष्यति ॥४६ मात्स्य कोम च वाराह वामन तायमेव च । नारसिंह च नागेन्द्र सृष्टिप्रलयकारकम् ॥४७ एतानि प्रातरत्याय सस्मरिष्यन्ति ये नराः। सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते पुण्याल्लोकानवाप्नुयुः ॥४८ - ३७० ] [ धामन पुराण एवमुक्त्वा हृषीकेशो गजेन्द्र गरुडध्वजः । स्पर्शयामास हस्तेन गज गस्धर्वमेव च ॥४६ योगी भगवान् ने शरणागत गजेन्द्र में यह कहा था-है मुनि शार्दूल! मधुसूदन मधुरता से बोले-॥४३॥ श्रीभगवान ने कहा- जो मनुष्य मेरा-तेरा, इस सरोवर का-ग्राह के विदारण का-गुल्म कोचक रेणुओ के रूप का, मेरु सुत के स्वरूप का, अश्वस्थ, भास्कर, गगा और भैमिपा रण्य का स्मरण करे गे और प्रयत तथा स्थिर बुद्धि से करे गे-भक्ति से कीतन करेंगे या शुचिप्रत होकर प्रवण करेंगे उनका दु.स्वप्न नष्ट होकर सुस्वप्न होगा ॥४४ ४६॥ मात्स्य, कोर्म, वाराह, वामन, ताक्ष्य, नारसिंह, नागेन्द्र और सष्टि प्रलय कारक- इनका प्रात: उठकर जो मनुष्य स्मरण करेगे वे सब पापो से छूटकर पुण्यमय लोकों को प्राप्त होगे ॥४७-४८१ पुलस्त्य जी ने कहा- गरुड़ ध्वज ने ऐसा कहकर हाथ से गज और गन्धव' का स्पर्श किया या ॥४६॥ ततो दिध्यवपुर्भूत्वा गजेन्द्रो मधुसूदनम् । जगाम विष्णु शरण नारायणपरायणः ॥५० ततो नारायणः श्रीमान्मोक्षयित्वा गजोत्तमम् । पाप वन्धाश्च शापाच ग्राह चाद्भ तकर्मकृद ॥३१ ऋपिभिः स्तूयमानश्च देवगुह्यपरायणः । ततः स भगवान्विष्णुदु विज्ञेयगतिः प्रभुः ॥५२ गजेन्द्रमोक्षण दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः । वन्दिरे महात्मान प्रभुनारायण हरिम् ॥५३ महर्षयवारणाच दृष्ट्वा गजविमोक्षणम् । विस्मयोत्फुल्लनयना: संस्तुवन्ति जनार्दनम् ॥५४ प्रजापतिपातमा चक्रपाणोविचेष्टितम् । गजेन्द्रमोक्षण दृष्ट्वा इदं वचनमब्रवीत् ।।५५ य इद शृणुयानित्यं प्रातरुत्यायमानव. । प्राप्नुयात्परमा सिद दुःस्वप्नश्व विनश्यति ॥१६ सारस्वत स्तोत्र वर्णन ] । ३७१ गजेन्द्रमोक्षणं पुंसां सर्वपापप्रणाशनम् । कथितेन स्मृतेनाथ श्रुतेन च तपोधन ॥५७ एतत्पविसं परमं सुपुण्य संकीर्तनोयं चरितं मुरारेः। यस्मिन्किलोक्त बहुपापबन्धनाल्लभेतमोक्षद्विरदोनुयद्वत् ॥५८ अज धरेण्यं वरपद्मनाभं नारायणं ब्रह्मनिधि सुरेशम् । तं देवगुह्यपुरप पुराण वन्दाम्यहं लोकपति वरेण्यम् ।।५६ इसके पश्चात् दिन वपु वाला गजेन्द्र होगया था और नारायण परायण होकर विष्णु की शरण में गया था ॥५०॥ नारायण ने गज का मोक्ष करके और ग्राहको भी शाप के बन्धन छुड़ाकर अद्भुत कम क्यिा पा ॥५१॥ भूपि देवादि के द्वारा स्तूयमान होते हुए भगवान् विष्णु दुविख्यगति वाले स्थित ये ॥५२॥ गजेन्द्र मोक्ष को देखकर इन्द्रादि देवगणों ने नारायण हरि की वन्दना की थी ॥५३॥ महर्षि और चारणों मे गज विमोसण देखकर विस्मय से खिते हुए लोचन वाले होउ हुए जनार्दन का स्तवन करने लगे थे ॥५४॥ प्रजापति ब्रह्माजी ने चक्रपाणि प्रमु की इस क्रिया को देखकर गजेन्द्र मोक्ष को जानकर यह वचन कहा पा ॥५५॥ जो मानव प्रातः उठकर इमा यण ररेगा वह परम सिद्धि को प्राप्त होगा और दुःस्वप्न नष्ट हो जायगा ॥५६।। यह गजेन्द्र मोक्ष मनुष्यों के सब पापों का नाशक है। हे तपोधन! इसका क्यन- घवण और स्मरण कोई भी एक किया जावे ॥५६॥ यह परम पवित्र मुरारिका चरित्र है इसका कोत्तन करना चाहिए । जिम के पहने पर दरद की भाठि हो बहुत से पापों के बन्धन से मोक्ष प्राप्त होता है ॥५८॥ अज-वरेप्पयरपत्मनाभ-नारायण-ब्रह्मनिधि, सुरेश, देवगुए पुराण पुरप लोगपति को मैं वन्दना करता हूँ ॥५॥ ८६-सारस्वत स्तोत्र वर्णन फविदासीद् द्विजद्रोग्या पिगुना क्षत्रियाधमः । परपोडारचिः क्षुद्रः स्वभावादेव निघृणा ॥१

१७२ ]
[ वामन पुराण
नोपासिता सदा तेन पितृदेवद्विजातय ।
स त्वायुपि परिक्षीणे जज्ञ घोरनिशाचर ॥२
तेनासौ कर्मदोषेण स्वेन पापता वर ।
क रेश्चक्रे तदा वृत्ति राक्षसत्वाद्विशेषत ॥३
तस्य पापरतस्य जग्मवर्षशतानि तु ।
तेनैव वर्मोपण नाया वृत्तिररोचत ॥४
य य पश्यति सत्व स त तमादाय राक्षस ।
चखाद रौद्रकर्माऽसौ वाहुगोचरमागतम् ॥५
एव तस्यातिदुष्टस्य कुवत प्राणिना वधम् ।
जगाम सुमहान्काल परिणाम तथा क्य ॥६
स कदाचित्तपस्य त ददश सरितस्तटे।
महाभाग ह्य ध्र्वभुज यथावत्सजितेन्द्रियम 11७
महर्षि पुलस्त्य ने कहा-कोई एक दिनो से द्रोह करने वाला-
परायों को पीहा देने में रुचि रखने वाला शुद्र स्वभाव से ही निपुण
अधम क्षत्रिय पा ॥१॥ उसने पभी पितर देव और द्विजातियो को
उपासना नहीं की थी । जब उसी बायु क्षीण हुई तो यह घोर निशा-
घर पैदा हुआ था। यह पापियो म शिरोमणि पाजो अपने
हो पो म दाप स बन गया था । उसने कूगें के साथ वृत्ति की पी
घऔर सक्षम होने से विशेष रूप ऐगा किपा पा ॥३॥ पापों से
रतियार उमपो गो वष गीत हो य थे थार उसी सम दोप से
बप कोई वृत्ति माछो ही नहीं सदी थी। जिस जिम जीवो
यह देखता या यहारी राक्षस उमोरोपहरसा माता पा
॥५तरह प्राणियों रावध रोए महान समय हो गया पा
घोर पा पर धुपीपी॥६॥ उगने रिमी समभ म सरिता तट
पर परत हुए उपद मुश वाम मोर गधि:यकोच्या पा1011
माया रक्षया प्रागत तपोनिधिम् ।
योगापाय मुघि दश यागुदरपरायणम् ॥
।

सारस्वत स्तोन वर्णन ] [ ३७३ विष्णुः प्राच्यां स्थितचोविष्णुदक्षिणतो गदी। प्रतीच्या शाङ्गग्विष्णुः विष्णु बङ्गी ममोत्तरे हृषीकेशो विकोणेपु तच्छिद्रे पुजनार्दनः । कोडरूपी हरिभूमौ नरसिहोऽम्बरे मम ॥१० शुगन्तममल चक्र भ्रमत्येतत्सुदर्शनम् । तम्यानमाला दुप्प्रेक्ष्या हन्ति प्रेतनिशाचरान् ॥११ गदा चेय महनाचिरूध्वं हन्तु वृवास्तथा । रक्षोभूतपिशाचाना डाकिनीना च शातनी ॥१० शाङ्ग विस्फूजित चव वासुदेवस्य मंद्रिपून् । तिर्थड्मनुष्यवूष्माण्डप्रेतादान्दन्त्वशेपतः ॥१३ गगवाराजलज्योत्स्नानिधूता ये ममाहिताः। ते यान्तु सौम्यता सद्यो गरुडेनेव पन्नगाः ।।१४ हे ब्रह्मन् । यह योगाचार्म पामुदेव परायण-शुनि और दश इन प्रकार की रक्षा से तपोनिधि सुरक्षित पा in विष्णु प्राची में स्थित पे-चको विष्णु दक्षिा मे-गदाधारी पश्चिम में और गाङ्गपारी समके उत्तर में घना निये मिस थे ॥६॥ विकागों में शोकेश-उमो मो छिद्रों में जनार्दन । बोड रूपी हरि भूमि में तथा मेरे नारमिह अम्बर में स्थित है ।।१०॥ परान्त अमल है वो मुदर्शन प्रमण करता है। उसी रणों की माला दुर है जो प्रेत निगारों का हनन करती है ॥११॥ यह गदा मइस अचिों वाली है कार वृों का हनन करतो है। राक्षम भूत पिशाचों को सया हाहिनियों को पानी है ॥१२॥ यह विस्पूजित मा वामुर का है जो मेरे ग निर्मप-मनुर-मा- तादिरा पूरी तथा हनन गरे ॥१३॥ य धारा जन मोम्ना नित वो मेरे परिगग अहित करने वाले है ये मोम हो गरा में पनगारोमाति मोम्दना को प्राप्त हो बारें ॥१४॥ ये दूष्माण्डाम्नया दन्या यक्षा व निशाचरा.। प्रेता विनायरा मनुप्या जम्मा: रागाः ।।१५ ३७४ । [ वामन पुराण सिंहादयो य पशवो दन्दवाश्च पन्नगाः। सव भवन्तु ते सौम्या विष्णु शङ्खरवाहताः ॥१६ चित्तवृत्तिहरा ये च ये जना. स्मृतिहारकाः। बलौसा च हरिरछायाविभ्र शकाश्च ये ।।१७ ये चोपभोग हर्तारो ये च लक्षणनाशकाः । कूष्माण्डास्ते प्रणश्यन्तु विष्णुचकरयाहताः ।।१० बुद्धिस्वास्थ्य मन स्वास्थ्य स्वास्थ्यमैन्द्रियक तथा । ममास्तु वासुदेवस्य देवदेवस्य कीर्तनात् ।।१६ पृष्ट पुरस्तादथ दक्षिणोत्तरे विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः । तमोड्यमीशानमनन्तमच्यूत जनादन प्राणपति न सीदति ॥२० यथा पर ब्रह्म हरिस्तथा पर जगत्स्वरूप च स एव केशवः । ऋतेनतेनाच्युतनामकीर्तनात्प्रणाशमेतलिदिवममाशुभम् ।।२१ जो कूष्माण्ड-दत्य-यक्ष और जो निसाचर हैं। प्रेत-बिनायक- कर मनुष्य-जम्मक-खग-सिंहादिक पशु-दन्दशूक-पन्नग ये सभी विष्णु की शख ध्वनि से हत होकर सौम्य हो जावें ॥१५.१६॥ जो चित्त की वृत्ति को अपहर्ता है और जो जन स्मृति हरण करने वाले हैं-बल और ओज के हत्ता हैं तथा जो छाया विध्र शक हैं-जो उपभोग के हा हैं और जो लक्षण-नाशक हैं वे कूष्माण्ड वे विष्ण, के चक्ररय से हत होकर नष्ट हो जावें ॥१७-१८॥ वासुदेव देव के कीर्तन से मेरी बुद्धि को स्वस्थता-मन को स्वस्थता और इन्द्रियो को स्वस्थता हो जावे ॥१६॥ पृष्ट मे आगे-दक्षिण और उत्तर में तथा विकोणो मे जनार्दन हरि हैं । उन ईशान-डय-अनन्त-अच्युत-प्राणपति जनादन को कोई दुःप दे सकता है ॥२०॥ जैसे पर ब्रह्म है वैसे ही हरि हैं। जो जगत् स्वरूप है वही देशव है । ऋन उसके द्वारा अच्युत के नाम कीर्तन से मेरा यह त्रिदिव अशुभ नाश को प्राप्त हो जावे ॥२१॥ इत्येवं चात्मरक्षाथ कृत्वा वै विष्णुपजरम् । सस्थितोऽसावपि वली राक्षस: समुपाद्वत् ।।२२ सारस्वत स्तोत्र वर्णन ] [ ३७५ ततो द्विज नियुक्तया रक्षया रजनीचरः। निर्धू तवेग सहसा तस्थौ मासचतुष्टयम् ॥२३ यावद्विजस्य देव समाप्ति समाधितः । ततो जप्यावसानेऽमौत ददश निशाचरम् ।।२४ दोन हतवलोत्साह कान्दिशीक हतोजसम् । त दृष्ट्वा कृण्याऽऽविष्ट समाश्वास्य निशाचरम् ।।२५ पप्रच्छाऽऽगमने हेतु समाचष्टे ययागतम् । स्वभावमात्मनो द्रष्ट रक्षया तेजसो हतिम् ॥२६ कथयि-वा च तद्रक्ष कारण विधिवत्तत.। प्रसीदेत्यनबोद्विप्र निविण्णः स्वेन कर्मणा ॥२७ बहूनि पापानिमयाकृतानितथा च सन्तोवहवो मया हताः ॥२८ इस प्रकार से आत्म रक्षा करके तया विष्ण पञ्जर करके यह सस्थित था तो भी इस बली राक्षस ने वहीं उपद्रव किया था ॥२२॥ इसके पश्चात् द्विज नियुक्त रछा से वह रजनीचर सहसा निधूत वेग वाना होकर चार मास तक स्थित रह गया था ॥२३॥ हे देव! जब तक द्विज की समाधि से समाप्ति हुई थी फिर जाया के अवसान में इसने उस निशाचर को नहीं देखा गा ॥२४॥ दीन-नष्ट उत्माह बल वाले इत योज वाले कान्दिशीक उमको देखकर दया से अविष्ट होकर उस निशाचर का आश्वामन दिया या ॥२५॥ उसके आगमन का कारण पूछा था और ययागत जानकर अपना स्वभाव भोर रक्षा से सेज का हनन देवा पा ॥२६॥ उस राक्षम नै सब विधिवत् कारण बतला दिपा पा वह वित्र से अपने ही कम से निर्वेद को प्राप्त होकर बोला- आप मुझ पर प्रमान होइये ॥२७॥ मैंने बहुत से पाप किये हैं और मैंने बहुत से मन्तो को मार दिया है ॥२८॥ कृता स्त्रियो मया वह्वयो विधवा पुजिताः । अनागसा च सत्वानामनेकाना क्षय कृत ॥२६ तस्मात्सापादह मोक्षमिच्छामि त्वत्प्रसादतः। तत्पापप्रशमायालं कुरु मे धर्मनाशनम् ॥३० ७ ३७६ I यामन पुराण पापस्यास्य क्षयकरमुपदेशं प्रयच्छ मे। वचन प्राह धर्मार्थहेतुमच्च स्वभाषितम् ॥३१ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा निशाटस्य द्विजोतमः । कथ क रस्वभावस्यामतस्व निशाचर । सहसव समायाता जिज्ञासा धर्मवत्मनि ।।६२ स्वा वे समागतोऽस्म्यद्य क्षिप्तोऽह रक्षया वलात् । तव ससर्गतो ब्रह्मजातो निर्वेद उत्तम. ॥३३ का सा रक्षा न ता वेनिवेनि नास्याः परायणम् । यस्याः ससगमासाद्य निर्वेद प्रापितो वरम् ॥३४ त्व कृपा कुरु धर्मज्ञ मय्यनुक्रोशमावह । यथा पापा पनोदो मे भवत्यार्य तथा कुरु ॥३५ मैंने बहुत स्त्रियो को विधवा और पुत्र होन कर दिया है मैंने अनेक निरपराधी जीवों का क्षय किया है ॥२६|| उस पाप से अब मैं आपके ही प्रसाद से मोक्ष चाहता हूं। उस पार के प्रशमन के लिये मुझे उपदेश करें और मेरे धर्म नाश को समाप्त कर दो ॥३०॥ मुझे इस पाप व क्षय करने वावा उपदेश दीजिए । ऐमा धर्मार्थ हेतु वाना स्वभावित वचन नोला या ॥३१॥ द्विज ने निशाचर के वचन को सुनकर कहा-हे निशाचर ! तू तो बहुत कर स्वभाव का है ऐमे तुझे सहसा धर्म के मार्ग जानने की इच्छा क्यो हुई है ? ॥३२॥ राक्षस ने कहा-आज मैं तुम पर आक्रमण को आया था आपकी रक्षा ने बलात् मुझे प्रक्षिप्त कर दिया है । हे ब्रह्मन यह आपके ही ससर्ग से उत्तम निर्वद हो गया है ॥३३॥ वह रक्षा कौन सी है में नहीं जानता हूँ। इसका परायण भी नहीं जानता हूँ जिसके ससर्ग को पाकर इस श्रेष्ठ निर्वेद को प्राप्त हो गया हूँ॥३४॥ हे धर्मन ! आप कृपा करें और मुझ पर दया करे जिससे मेरे पापों का छुटकारा हो हे आर्य ! वही करो ॥३५॥ इत्येवमुक्तः स मुनिस्तदा तेन च राक्षसम् । प्रत्युवाच महाभाग विमृश्य सुचिर बहु ॥३६ सारस्वत स्तोत्र वर्णन 1 [ ३७ यन्मामाहोपदेशाथ निविण्णः स्वेन कर्मणा । युक्तमेद्धि पापानां निवृत्तिरुपकारिका ॥३७ करिष्ये यातुधानानां न त्वहं धर्मदेशनम् । तान्संपृच्छ द्विजान्सौम्य ये वै प्रवचने रताः ॥३८ एवमुक्त्वा ययौ विप्रांश्चिन्तामाप व राक्षसः । कथ पापापनोदः स्यादिति चिन्ताकुलेन्द्रियः ॥३५ न चखाद स सत्यानि शुधासंवाधितोऽपि सन् । पष्ठ पष्ठे तदा काले जन्तुमेकमभक्षयत् ।।४० स कदाचित्क्षुधाविष्टः पर्यटन्विपुले वने । ददर्शाथ फलाहारमागत ब्रह्मचारिणम् ।।४१ गृहीतो रक्षसा तेन स तदा मुनिदारकः । निराशो जीविते प्राह सामपूर्व निशाचरम् ।।४२ पुलस्त्यजी ने कहा-उसके द्वारा इस प्रकार कहे हुए उस मुनि ने बहुत देर सोच कर राक्षस से कहा था ॥३६॥ ऋषि ने कहा--जो तुम मुझ से उपदेश के लिये कहता है तू तो अपने ही कर्म से निर्विष्ण हो गया है । यह बहुत ही युक्त है कि पापों की निवृत्ति उपकारिका होती है ॥३७॥ मैं यातुधानों को धर्म का उपदेश नहीं करता हूँ। हे सौम्य ! तुम उन द्विजो से पूछो जो प्रवचन करने में निरत होते हैं ॥३८॥ इस तरह से कह कर विप्रों के समीप में गया था और वह राक्षस चिन्ता को प्राप्त हो गया था। कैसे मेरे पापों का अपनोद होगा--इस चिन्ता से समाकुलित इन्द्रियों वाला हो गया था ॥३॥ वह भूख से पीड़ित होकर भी जीवों को नही साता था । छटवें २ दिन के एक जन्तु को खाता था ॥४०॥ वह एक वार क्षुधा से युक्त होकर वन में धूम रहा था । उमने फलाहार करने वाले आते हुए ब्रह्मचारी को देखा था ॥४१॥ राक्षस ने उस सपय में उस मुनि के बालक को पकड़ लिया था। वह अपने जीवन में निराश होकर साम पूर्वक उस निशावर से बोला-१४२॥ समय में

६७८ ]
। वामन पुराण
भोऽनघ बहि तत्कायं गृहीतो येन हेतुना ।
तदेव ब्रूहि भद्र ते स्वयमस्म्यनुशाधि माम् ॥४३
यष्ठे काले त्वमाहारः क्षुधितस्य समागतः ।
निष्ठुरस्यातिपापस्य निर्धरणस्य द्विजद्रुहः ॥४४
यद्यवश्य स्वया चाहं भक्षितव्यो निशाचर।
आयास्यामि तवाद्यंव निवेद्य गुरवे फलम् ॥४५
गुर्वर्थमेत दागत्य यत्फल ग्रहणं कृतम् ।
ममात्र निष्ठा प्राप्तस्य फलानि विनिवेदितुम् ।।४५
स त्वं मुहूर्तमान मामलेवमनुपालय ।
निवेद गुरवे यावदिहागच्छाम्यहं फलम् ॥४७
पष्ठ काले न मे ब्रह्मन्कश्चिद् ग्रहणमागतः।
प्रतिमुच्येत देवोऽपि इति में पापजीविका १४८
एक एवात्र मोक्षस्य तद हेतुः शृणुष्वतम् ।
मुचाम्यहमसदिग्धं यदि तत्कुरुते भवान् ॥४६
प्राह्मण ने कहा है अनय! वह कार्य बलामो जिसके कारण
से तुमने पकड लिया है । वही मुझे बोलो मैं स्वयं ही हूं-मुझको आदेश
दो-तुम्हारा कल्याण हो ॥४३॥ राक्षस ने कहा-पाठ काल मे तुम
मेरा आहार आ गये हो मैं बहुत भूखा हूँ। मैं निष्ट र अत्यन्त पापी
हूँ.निघुग मोर दिनों का द्रोह करने वाला हूँ ॥४४॥ ब्राह्मण ने कहा-
हे निशाचर ! यदि अवश्य ही तुझे मुझको खाना ही है तो आम हर
मैं गुरु जी को फल निवेदित कर तुम्हारे पास आजागा ॥४५।। मैंने
गुरुजो के लिये रही पाकर फलों का ग्रहण किया है। निष्ठा को प्रात
हए मेरा फल गुरु को निवेदन करना आवश्यक है ।।१६।। आप एक
मुदत मान यही पर मेरी प्रतीक्षा करें । मैं जबतक गुरुजी को फल
निवेदन कर यहीं पर आता है ॥४॥ राक्षस बोत्रा- कान मे हे
महान् ! कोई मो मेरे हाथ नहीं लगा है । देव भी छोड देवे रितु मेरो
यही पाप जीवित है ॥४मात्र दो तुम्हारे मोक्ष का हेतु

३८० [ वामन पुराण जाऊ गा क्यों कि मैं पटपट में ही पाता हूँ ॥५५॥ उस घोर राक्षस के द्वारा इस तरह कहा गया वह मुनि पुत्र महा चिन्ता को प्राप्त हो गया था क्यो कि उसे कहने में वह असमर्थ था ॥५६॥ स विमृश्य चिर विप्र शरण जातवेदसम् । जगामज्ञानदानाय सशय परम गतः ५७ यदि शुभ्रूपितो वह्निर्गुरुशुश्रूषणादनु । व्रतानि का सुचीीन सप्ताचि. पातु मा ततः ॥५८ न मातर न पितर गौरवेण यथा गुरुम् । यथाऽहमवगच्छामि तथा मा पातु पावक. ॥५६ यथा गुरु न मनमा कर्मरणा मनसाऽपि च । अवजानाभ्याह तेन पातु मा तेन पालना ॥६० इत्येव मनमा सत्य कुवत शपथान्मुने । सप्ताचिपा समादिष्टा प्रादुरासीत्सरस्वती ॥६१ सा प्रोवाच द्विजसुत राक्षसग्रहणाकुलम् । मा भौदिजसुताह त्वा मोक्षयाम्यद्य सकटात् ॥६२ यदस्य रक्षस श्रेयो जिह्वाग्रे सस्थिता तव । तत्सर्व कथियिष्यामि तनो मोक्षमवाप्यसि ॥६३ अश्या रक्ष्सा तेन प्रोक्त्वेत्थ च सरस्वती। अदशन गता सोऽपि द्विज. प्राह निशाचरम् ।।६४ श्रूयता तव यच्छ यस्तथाऽन्येषा च पापिनाम् । समस्तपापशुद्धधयं पुण्योपचयद च यत् ॥६५ उस िवप्र ने चिरकाल तक सोच कर जातवेदा केशरण मे गया पा। परम सशत्र को प्राप्त हुपा वह ज्ञान दान के लिये ही शरण मे गया पा ॥५७t यदि हे अग्नि देव ! मैं गुरूजी को मुश्रया के पीछे पाएको गुयारी है और वो को घोणं किया है सो सप्तावि देव पाप मेरी रक्षा करे ॥५६मैं माता और पिता को गौरव में उतना नहीं समnar frना गुरु गजानता हूँ अतएव पायक देव मेरी रक्षा को m६ मन-मं ये गुरु को भी मैं या नहीं यमाता है या आप सारस्वत स्तोत्र वर्णन ] [ ३८१ अतः मेरी रक्षा करो॥६॥ हे भुने ! इस प्रकार से मन से शपयों का सत्य करते हुए उसके आगे सप्तनि के द्वारा समाविष्ट सरस्वती देवी प्रादुर्भूता हुई थी १६१० राक्षम द्वारा ग्रहण करने से व्याकुल द्विज पुत्र से वह बोली-है हिज मुत ! डरो मत । आज इस संकट से मैं तु हुडा दूंगी ॥६सा जो मो इस राक्षस को धेय है वह वेरो जिह्वा के अप्रमाग पर स्थित है वह सब कह दूंगी फिर तेरा मोठा हो जायगा ॥६३॥ उम राक्षम के द्वारा अदृश्य सरस्वती इस प्रकार मे कह कर मन्न- नि हो गई। वह द्विज भी उम शिचर से बोला ॥६४॥ ब्राह्मण ने पहा-हे राक्षास ! तेरा तथा अन्य पापियो का श्रेय श्रवण करो जो सम- स्त पापो को शुद्धि और पुण्य के उपचय का प्रदान करने वाला है ।।६।। प्रातरुत्थाय जतव्यं मध्याह्नह्नःक्षयेपि वा। असंशयं सदाजापो जपतां पुष्टिशान्तिदः ॥६६ ॐ हरि कृष्णं हपीकेशं वासुदेवं जनार्दनम् । प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे मापं व्यपोहतु ॥६७ चराचरगुरुं नाथं गोविन्द शेपशायिनम् । प्रणतोऽस्मि परं देवं स मे पाप व्यपोतु ॥६८ शविनं चकिन शाङ्ग धारिन सग्घर परम् । प्रगतोऽस्मि पति लक्ष्म्याः स मे पापं व्यपोहतु ॥६६ दामोदरमुदारं तं पुण्डरीकाक्षमच्युतम् । प्रणतोऽस्मि स्तुतं स्तुत्यो स मे पापं व्यपोतु ॥७० नारायणं नर शौरि माधवं मधुसूदनम् । प्रणतोऽस्मि घराधारं स मे पाप व्यपोहतु ॥१ केशव केशहन्तार कंसारिष्टनिपूदनम् । प्रणतोऽस्मि महावाहुं स मे पाप व्यपोहतु ।।७२ प्रात:काल में उठकर जप करना चाहिए-मध्याह्र में और दिन सप के समय में भी जप करें। दिना किसी संशय के सदा जाप करने वालों को पुष्टि और शान्ति देने वाला है ॥६६॥ वह जाप यह है- ॐहरि--कृत-हृषीकेश-वासुदेव जनार्दन और जगन्नाथ को मैं प्रणाम

३८२ ]
। वामन पुरण
करता हूँ वही मेरे पापों का व्यपोहन करें ।।६। घरावर के गुरु-नार
गोविन्द-शेषशायी परदेव को मैं प्रणाम करता हूँ। वह मेरे पापों को
दूर करें ॥६८|| शंखधारी-चक्रो-शाङ्गधारी-सग्घर-पर और लक्ष्मी के
पति के समक्ष में प्रणत है वह मेरे पाप दूर करें ॥६॥ दामादर-उदार
पुण्डरीकाक्ष, अच्युत को मैं प्रणाम करता हूँ जो स्तुतियों से
स्तुत हैं वह मेरे पाप का व्यपादन करें ॥७॥ नारायण नर, शोरि,
माधव, मधुसूदन और धरा के आधार को मैं प्रणाम करता है वह मेरे
पापो को छुड़ा देवें ॥१७१॥ केशव, केशी के हता, फसारिष्ट नियू दन
और महावाहु को में प्रगाम करता हूँ वह मेरे पाप को दूर
करें १७२।।
श्रीवत्सवक्षसं थीशं श्रीधरं श्रीनिकेतनम् ।
प्रणतोऽस्मि श्रियः कान्तं स मे पापं व्यपोहतु ।।७३
यमीशं सर्वभूतानां ध्यायन्ति यतोऽक्षरम् ।
वासुदेवमनिर्देश्यं तमस्मि शरणं गतः ।।७४
समस्तालम्बनेभ्यो यं व्यावृत्य मनसो गतिम् ।
ध्यायन्ति वासुदेवाख्यं तमस्मि शरणं गतः ।।७५
सर्वग सर्वभूत च सर्वस्याधारमीश्वरम् ।
वासुदेवं परं ब्रह्म तमस्मि शरणागतः ॥७६
परमात्मानमव्यक्त यं यान्ति च सुमेधसः ।
कर्मक्षयेऽक्षयं देवं तमस्मि शरणं गतः ॥७७
पुण्यपापनिनिर्मुक्तो य प्राप्य च पुनर्भवम् ।
न योगिना प्राप्नुवन्ति तमस्मि शरण गतः ॥७८
ब्रह्म भूत्वा जगत्सर्व सदेवासुरमानुपम् ।
यः सृजत्यच्युतो देवांस्तमस्मि शरण गतः ।।७६
श्रीवत्स को वक्ष: थल मे धारण करने वाते-पोश, श्रीधर, घी
निकेतन और पी के कान्त को मैं प्रणाम करता हूँ वह मेरे पाप दूर
करें ॥७३॥ यतिगण सब भूतों के ईश अक्षर जिसका ध्यान करते हैं
उन निर्देश्य वासुदेव प्रभु के में शरण मैं शप्त होगया है |७४॥ समस्त

सारस्वत स्तोन वर्णन ]
[ ३८३
आलम्बनो से मन की गति को व्यावृत कर जिस वासुदेव नाम वाले का
ध्यान करते हैं मैं उनके शरण में आगया हूँ॥७५।। मध गमनशील,
सर्वभूत, सब का वाधार, ईश्वर, परब्रह्म वासुदेव को शरणागति मे
मैं आगया हूँ॥७॥ सुन्दर मेघा वाले लोग परमात्मा-अव्यक्त जिमको
कर्मों के सय में अक्षयदेव को प्राप्त होते हैं मैं उन्ही को शरण में यागया
है ॥७७॥ योगो लोग पुग्य-पाप से विनिमुक्त होकर जिसको प्राप्त
करते हैं और फिर पुनर्जन्म नहीं लेत हैं मैं उन्हीं की शरण में हू
॥७८॥ ब्रह्म होकर देव-अमुर और मनुष्यों मे पूर्ण इम जगत् वा
वो अच्युन मृजन करते हैं मैं उन्हीं की शरण में प्राप्ठ हूँ 11७६॥
ब्रह्मत्व यस्य वक्र भ्यश्चतुर्वेदमय वपुः ।
वपुःप्रभो. परो जज्ञे तमस्मि शरण गतः ।।८०
ब्रह्मरूपधर देव जगद्योनि जनार्दनम् ।
स्रष्ट्टत्वे सस्थित सृष्टौ त नतोऽस्मि जनार्दनम् ।।८१
धृता मही हता दैत्या: परिलातास्तथाऽमराः।
येन तविष्णुमादेश्य प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥८२
यज्ञयजन्ति य विप्रा यज्ञेश यज्ञभावनम् ।
त यज्ञपुरुप विष्णुप्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥८३
पातालवीयोभूतानि तथा लोकानिहन्ति यः ।
तमन्तपुस्प रुद्र प्रगतोऽस्मि जनार्दनम् ॥८४
समक्षयित्वा सपल यथासृष्टमिद जगन् ।
यो वे नृत्यति रुद्रात्मा प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥८५
सुरासुराः पितृगणा यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
यस्याशभूता देवस्य सर्वग त नमाऽम्यहम् ॥८६
समस्तदेवाः सकला मनुष्याणा च जातयः ।
यस्याशभूना देवस्य सर्वग त नमाम्यहम् ।।७
वृक्षगुल्मादयो यस्य तथा पशुमृगादयः।
एकाश भूता देवस्य सर्वग त नमाम्यहम् ॥८८

३८४ ] वामन पुराण . जिसके मुखों से चतुर्वेदमय वपु वाला ब्रह्मरन प्रभु पादपु परात्पर ने उत्प न दिया था उसी ये शरण में हूँ 111०11 ब्रह्म रूपधारी देव, जगद्योनि, जनार्दन सृष्टि में सृष्टा होकर सस्थित उसी जनार्दन प्रभु को मेरा नमस्कार है ।।१।। मही को धारण दिया-दैत्यों का हनन किया था तथा देवों का परित्रात्र किया था और जिसने उन विष्णु को धादेश कर किया था उन जनादन को मेरा प्रणाम है ॥२॥ जिसका यज्ञो के द्वारा विप्रगण मजन किया करते हैं उस यज्ञस, यज्ञभावन, यज्ञ पुरुष विष्णु जनार्दन को मैं प्रणाम करता हूँ॥८३॥ जो पाताल वीपी भूतो को तथा लोको को निहत करते हैं मैं उसे अन्त पुरुष रुद्र को जनार्दन को प्रणाम करता हूँ ॥४।। सब का सरक्षण करके फिर इस तरह सृजन किया है और जो रुद्रामा नृत्य करता है उस जमादन प्रभु को मैं प्रशाम करता हूँ ॥६५॥ सुर, असुर, पितृगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस सम जिस देव के अश भूत हैं उस सदग को मैं नमस्कार करता हूँ ॥८६॥ वृक्ष देवता, मनुष्य, गुल्म प्रभूति तथा पशु-मृग आदि जिस देव के एक अश भूत हैं मैं उस सब मे रहने घाले को प्रणाम करता हूँ 1८७.६८।। यस्मान्नान्यत्पर किचिद्यस्मिन्सवं महात्मदि। य सवमध्ययोऽनन्तः सर्वगत नमाम्यहम् ॥ यथा सवषु भूतेषु गूढोऽग्निरिह दारुषु। विष्णुरेव तथा पाप ममाशेष प्रणश्यतु ।।६० यथा सर्वमय विष्णु ब्रह्मादि सचराचरम् । यच्च ज्ञानपरिच्छेद्य पाप नश्यतु मे तथा ॥६१ शुभाशुभानि कार्याणि रज.सत्त्वतमासि च । अनेकजन्म वर्मोत्थ पाप नश्यतु मे तथा ॥६२ यन्निशाया च यत्प्रातयन्मध्याह्नापराहृयो । सध्ययोश्च कृत पाप कर्मणा मनसा गिरा॥६३ यत्तिष्ठता द्वनजता यच्च शय्यागतेन मे। कृत यदशुभ कर्म वायेन मनसाऽपि वा ४ि सारस्वत स्तोत्र वर्णन ] [ ३८५ अज्ञानतो ज्ञाननो वा मदालितमानस:। तत्क्षिप्रं विलय यातु वासुदेवस्य कीर्तनात् ॥६५ परदारपरद्रव्यवाञ्छाद्रोहोद्भवं च यत् परपीडोद्भवा निन्दा कुर्वता यन्महात्मनाम् ।।.६ यच्च भोज्ये तथा पेये भक्ष्ये चोष्ये विलेहने । तधातु विलय तोये यथा लवणभाजनम् ।।६७ जिससे अन्य कोई भी वर नहीं है और जिस महान आत्मा मे सभी हैं । जो अव्यय, सर्व, अनन्त है उम सर्वम को मैं नमस्कार करता हूँ ॥८६॥ जिस तरह काटी में अग्नि निगूढ है वैसे ही वह सव विष्णु भूतो मे गूढ है । वह मेरे अशेप पाप को नष्ट कर देवे 11 जिस प्रकार विष्णु सर्वमय हैं और ब्रह्मादि चराचर हैं तथा जो ज्ञान से परिच्छेद्य है वैसे ही मेरे पाप नष्ट हो जावें ॥8॥ शुभ और अशुभ कार्य और रज- सत्व, तम है उसी भांति अनेक जन्मो के कर्मों से समुत्थित मेरे पाप मष्ट हो जावे ॥२॥ जो निशा मे-जो प्रात काल में मध्याह्न और अपराह्न म-दोनो सन्ध्याओं में जो भी मन-वचन और कर्म स पाप क्यिा है ।।६३॥ जो स्थित रहते-चलते और शय्यागत होते अशुम कर्म काया अथवा मन से क्या है ॥६॥ अज्ञान से-मद से चलित मन वालो ने पाप किया है वह वासुदेन के कीर्तन से शीघ्र ही विलय को प्राप्त हो जावे ॥श पराई स्त्री-परायी द्रव्यदाच्ठा द्रोह से उत्पन्न जो भी पाप है । पर पोहा से उद्भव वालो निन्दा महात्माओं को करते हुए जो पाप है ।।६६।। जो भोज्य मे पेय में, भक्ष्य मे-चोप्य म विलेहन मे जो पाप है वह जल म लवण के भाजन की भांति विलय को प्राप्त हो जावे ॥६॥ यद्वाल्ये यच्च कौमारे यत्पाप यौवने मम । वय.परिणतो यच्च यच्च जन्मान्तरे कृतम् ॥६८ तन्नारायण गोविन्द हरे कृष्णेति कीर्तनाद । प्रयातु विलय तोये यथा लवणभाजनम् ॥६६ ३८६ ] [ वामन पुराण विष्णवे वासुदेवाय हरये केशवाय च । जनार्दनाय कृष्णाय नमो भूयो नमो नमः ।।१०० भविष्यन्नरकघ्नाय नमः कसविघातिने। अरिष्टकेशिचाणूरदेवारिक्षयिणे नमः ॥१०१ कोऽन्यो बलेवञ्चयिता त्वामृते वै भविष्यति । कोऽन्यो बलान्नाशयिता दपं हैहयभूपत ॥१०२ क करिष्यति चान्यो वे सागरे सेतुव धनम् । बधिष्यति दशग्नीव कः सामात्यपुरः सरम् ।।१०३ कस्त्वामृतेऽन्यो नन्दस्य गोकुले रतिमेष्यति । प्रलम्बपूतनादीना त्वामृते मधुसूदन । नियन्ताऽप्यथवा शास्ता देवदेव भविष्यति ॥१०४ जो वचपन मे-जो कौमार अवस्था मे और यौवन में मेरा किया हुमा पाप हो-वय की परिपाक अवस्था में जो किया गया है और जो दूमरे जन्मो मे किया है ॥६॥ वह सब नारायण-गोविन्द हरे, कृष्ण, इन भगवन्नामो के कौतन से तोय मे लवण-भाजन की भांति विलय को प्राप्त हो ॥६॥ विष्णु, वासदेव, हरि, केशव, जनार्दन और कृष्ण के लिये बारम्बार नमस्कार है ॥१००॥ होने वाले नरकों के हनन करने याले कंस के विघाती के लिये नमस्कार है । अरिष्ट, वशी, चाणूर, देवारि के क्षय करने वाले की सेवा में नमस्कार समर्पित है ।।१०१।। आपके विना बलि का वञ्चन करने वाला अन्य कौन होगा। कौन अन्य है जो बलात् हैहय राजा के दपं का नाश करने वाला हो ।।१०२।। अन्य कौन सागर मे सेतु बौध सकता है । अमात्यों के सहित दशग्रीव का वध कौन करेगा ॥१०३।। आपके सिवाय अन्य कौन गोकुल में मद की रति करेगा । हे मधुसूदन ! आप के विना प्रलम्ब पूतनादि का नियन्ता• अपवा शास्ता हे देव देव ! होगा ।।१०४॥ जपत्येवं नरः पुण्यं वैष्णव धर्ममुत्तमम् । इष्टानिष्टप्रसङ्गम्यो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा ।।१०५ - 1

सारस्वत स्तोत्र वर्णन ]
[ ३८७
कृतं तेन तु यत्पापं सप्तजन्मान्तरेण वै ।
महापातकसज्ञ वा तथा चंवोपपातकम् ।।१०६
यज्ञादीनि च पुण्यानि जपहोमव्रतानि च ।
नाशयेद्योगिमा सर्वमामपातमिवाम्भसि ।।१०७
नरः सवत्सर पूर्णतिलपात्राणि पोडश ।
अहन्यहनि यो दद्यात्पठत्येतच्च तत्समम् ।।१०८
अविप्लुतब्रह्मचर्य सप्राप्य स्मरणं हरेः।
विष्णुलोकमवाप्नोति सत्यमेतन्मयोदितम् ।।१०६
तदेतत्सत्यमुक्त मे न ह्यल्पमपि वै मृपा।
राक्षसग्रस्तसर्वाङ्ग तथा मामेप मुञ्चतु ॥११०
एवमुच्चारिते तेन मुक्तो विप्रस्तु रक्षसा।
अकामेन द्विजो भूयस्तमाह रजनीचरम् ॥१११
जो मनुष्य इस प्रकार से परम पुज्य वैष्णव उत्तम धर्म का जप
किया करता है चाहे इष्टानिष्ट के प्रसङ्गो से अथवा ज्ञान या अज्ञान से
फरे ॥ १०५ ॥ उसने सात जनमो में जो भी पाप किया है
चाहे महा पातक हो अथवा उपपातक हो ॥१०६॥ पुण्य यज्ञ आदि और
जप होम व्रत योगियों का सब जल मे कच्चे पात्र की भाति नाश कर
देते हैं ॥१०७॥ मनुष्य पूरे वर्ष सोलह पूरे निलों के पात्र प्रतिदिन दान
करे और उसके साथ इमको पढे ॥१०८|| ब्रह्मचर्य का विलोपन
करके हरि का स्मरण करे तो वह विष्ण लोक को प्राप्त होता है-मेरा
यह कथन सत्य है ||१०६॥ यह मेरा सत्य क्थन है। इसमे थोहा भी
मिथ्या नहीं है । राक्षस के द्वारा ग्रस्त सर्वाङ्ग वाले मुझको यह छेड
देवे ॥११०॥ पुलस्त्य ने कहा-उसके द्वारा ऐसा कहने पर राक्षस ने
विप्र को छोड़ दिया था। विना इच्छा के उस द्विज ने फिर निशाचर से
कहा-१११॥
एतद्भद्र मयाऽऽज्यात तव पातकनाशनम् ।
दिष्णो. सारस्वत स्तोत्र यद्यदूचे सरस्वती ॥११२

३८८]
[ वामन पुराण
हुताशनेन दीप्ता च मम जिह्वाग्रसस्थिता ।
जगादेम स्तव विष्णोः सर्वेपा चोपशान्तिदम् ॥११३
अनेनैव जगन्नाथ त्वमाराघय वैशवम् ।
ततः शापापनोद तु स्तुते लप्स्यसि केशवे ।।११४
प्रत्यह त्व हपोकेशस्तवनानेन राक्षम ।
स्तुत्वा भक्ति दृढा कृत्वा ततः पापात्प्रमोक्ष्यसे ॥११५
स्तुतो हि सर्वपापानि नाशयिष्यत्यसशयम् ।
स्तुतो हि भक्त्या नृणा स सर्वपापहरो हरि. ॥११६
ततः प्रणम्य त विप्रमासाद्य च निशाचरः।
तदैव तपसे श्वीमान्शालिग्राममगाद्वली ।।११७
अहनिश स ऐवैन जपन्सारस्वत स्तवम् ।
देवनियारतिर्भूत्वा तपस्तेपे निशाचर. ११८
समाराध्य जगन्नाथ स तत्र पुरुषोत्तमम् ।
सर्वपापविनिमुक्तो विष्णुलोकमगाच्छुभम् ॥११६
एतत्ते कथित ब्रह्मविष्णोः सारस्वत स्तवम् ।
विप्रवकस्थया सम्यक्सरस्वत्या समीरितम् ।।१२०
य एतत्परम स्तोत्र वासुदेवस्य मानवः ।
पठिष्यति स सर्वेभ्यो दु खेभ्यो मोक्षमाप्स्यति ॥१२१
ब्राह्मण ने कहा-हे भद्र ! यह मैंने तेरे पातको नाश करने वाला
कहा है । विष्णु का सारस्वत स्तोत्र है जो सरस्वती ने कहा था ॥११२।।
हुताशन के द्वारा दीप्त मेरी जीभ के अग्रभाग मे सस्थित है। उसने ही
इस विष्णु के स्तव को कहा है जो सबको उपशान्ति देने वाला है
॥११३।। इसी के द्वारा तुम जगन्नाय केशव का माराधन करो। फिर
के शव के स्तुत होने पर तुम शाप का अपनोद प्राप्त करोगे। हे राक्षस |
प्रतिदिन इस स्तव से हृषीकेश की स्तुति कर दृढ भक्ति कर पप से मुक्त
हो जाओगे ॥११४-११५॥ स्तुत प्रभु समस्त पापों को निश्चय ही
नष्ट कर देंगे। भक्ति से स्तुत हर मनुष्यो के सब पापो का हरने वाले

वामन जन्म वर्णन ] । ३८६ होते हैं ॥११६।। पुलस्त्यत्री ने कहा-निशाचर ने उस वित्र को प्रणाम किया और उसी समय में तप के लिये शालिग्राम को चला गया था ॥११७॥ अहनिश वह इसी सारम्बत स्तव का जाप किया करता था योर निशाचर ने देव क्रिया में रति रखते हुए तपश्चर्या को पी ॥११८॥ जगन्नाथ को समाराधना करके जो वह पुरुषोनम प्रभु थे वह सब पापों से युक्त हो गया था और परम शुभ विष्णुलोक को चला गया था ।।११६॥ हे ब्रह्मन् ! यह सारस्वत स्तव हमने तुमको बतला दिया है जो भगवान् विष्णु का है । यह विप्र के मुख मे स्थित सरस्वती देवी ने मनी भांति वतनाया है ॥१२०॥ जो मानव इम वासुदेव के परम स्तोत्र का पाठ करेगा वह समस्त दु खो से निश्चय ही छुटकारा पाniu॥१२१॥ ८७-वामन जन्म वर्णन गतेऽथ तीर्थयात्रायां प्रह्लादे दानवेश्वरे । कुरुक्षेत्र समभ्यागाद्रष्टुवंरोवनो बलिः ॥१ तस्मिन् महाधर्मयुते तीर्थे ब्राह्मगपुंगवः । शुक्रोद्विजातिप्रवरानामन्त्रयत भार्गवः ॥२ भृगुरणाऽमलयमाणा व श्रुत्वाऽनेयाः सगौतमा। कौशिकाङ्गितसश्च व तत्त्वज्ञाः कुरुजागलान् ॥३ उत्तराशां प्रजग्मुस्ते नदीमनु शतद्रवीम् । शातद्रवे जले स्नात्वा विप्रास्ते प्रययुस्ततः ॥४ विधाय तत्र सुस्नान संपूज्य पितृदेवताः । प्रजग्मुः किरणा पुण्या दिनेशकिरणच्युताम् ।।५ तस्या स्नात्वा च देव सर्व एव महर्षयः। ऐरावती सुपुण्योदां स्नात्वा जग्मुरथेश्वरीम् ॥६ देविकाया जले स्नात्वा पयोपण्याश्च व तापसाः। अवतीर्णा मुने स्नातुमानेयाद्यास्तु तां नदीम् ॥७ ३६० ] [ वामन पुराण महर्षि पुलस्त्य ने कहा-दानवों के स्वामी प्रह्लाद के तीर्थ यात्रा के लिये चले जाने पर रोचन बलि फुरुक्षेत्र को देखने के लिये यागया था ॥१॥ उस महान धर्म से सयुत तीर्थ में ब्राह्मणो मे परम पेट भार्गव शुक्र ने द्विजातियो में श्रेष्ठी का आमन्त्रण किया था ॥२॥ मुगु के द्वारा आमन्त्रित होते हुए यह श्रवण करने वाग्नेय, गौत्तम, कौशिक, आगिरस तत्वों के ज्ञान रखने वाले उत्तर दिशा मे शतद्रवी नदी के सहारे कुरु जागल देशों को चल दिये थे और शातद्रव मे जल में स्नान परके वे विप्र वहा से चले गये थे ॥३.४॥ वहाँ पर सुन्दर रीति से स्नान करके पितर और देवो को भली भांति पूजन करके दिनेश की किरणो से गिरी हुई पुण्यमयी किरणा नदी पर चले गये थे ॥५॥ है देव ! उसमे सब महपियो ने स्नान करके फिर पवित्र जलवाली ऐरा. वती में स्नान करके ईश्वरी को इसके पश्चात् चले गये थे ॥६॥ देविका के जल में तथा पयोष्मी के जल मे तपस्वियो ने स्नान किया था। हे मुने ! आत्रेयादिक सब लोग उस नदी में स्नान करने के लिये अवतीर्ण हुए थे |॥७॥ ततो निमग्ना ददृशुः प्रतिबिम्बमथात्मनः। अन्तर्जले द्विजश्रेष्ठ महदाश्चर्यकारकम् ।। उन्मजन्तश्च ददृशुः पुनर्विस्मितमानसाः । तत: स्नात्वा समुत्तोर्णा ऋषयः सर्व एव हि । जग्मुस्ततोऽपि ते ब्रह्मन्क्थयन्तः परस्परम् । चिन्तयन्तश्च सतत किमेतदिति विस्मिताः ।।१० ततोऽदूरादपश्यस्ते वनषण्ड सुविस्तृतम् । धन धनदलश्याम खगश्रमविनाशनम् ॥११ अतितुङ्गतया व्योम आवृण्वानं नरोत्तमम् । विस्तृताभिलंताभिस्तु मन्तभूमि च नारद ॥१२ काननं पुष्पित वृक्ष. फलितश्च ततस्ततः। दशाधबाणसहशनमस्तारामणरिव ॥१३ वामन जन्म वर्णन ] [ ३६१ तद् दृष्ट्रा कमलाप्तं पुण्डरीकैश्च शोभितम् । तद्वत्कोकनदयाप्त वन पनवन यथा ।।१४ उसमें निमग्न होकर उन्होने अपना प्रतिविम्ब देखा था। हे द्विज थेछ ! उस जल के अन्दर ऐसा प्रतिविम्ब का देखना महान् आश्रय करने वाला था ॥८॥ उम्मजन करते भी उन्होने प्रतिविम्ब को देखा या फिर उनके मन में बड़ा हो विस्मय होगया था। फिर स्नान करके वे सभी ऋषिगण उत्तीर्ण हुए थे ।।३॥ हे ब्रह्मन् ! परस्तर में कयन करते हुए वे वहां से भी बनदिये थे। सभी इसका चिन्तन करते जारहे थे कि यह क्या बात है और सब बर्ड विस्मयापन होरहे थे ॥१०॥ इसके उपरान्त उन्होंने दूर से ही एक सुविस्तृत वनखण्ड देखा था। वह वनखण्ड बहुत घना था और घनदल के समान ही श्याम वर्ण का या जो खगो के श्रम का विनाशक था ॥११॥ हे नरोतम! वह अत्यन्त क ना होने के कारण से आकाश को आवृत-सा कर रहा था और हे नारद ! अति विस्तृत लताओ से अनभूमि को भी समावृत करने वाला था॥१२॥वह कानन पुभों वाले और फलों वाले वृक्षों से जहां तहाँ दूब स्थिर हुआ था जो कामदेव के सदृश आकाश के तारागगों की भाति थे ॥१३।। उसे कमलो से व्याप्त और पुम्हर.कों से परम शोमा सम्पन्न देखकर जोकि उसी भांति कोक नदो से व्याप्त था जैसे पद्मपन ही वह वन था ॥१४॥ प्रजग्मुस्तुष्टिमतुला ते ह्लाद परमं युयुः । विविशुः प्रोतमनसो हसा इव महासरः ।।१५ तन्मध्ये ददृशुः पुण्यमाश्रम लोकपूजितम् । चतुर्गा लोकपालाना वर्गाणा मुनिसत्तमाः ॥१६ धर्माधम प्राङ्मुखं तु पलाशविटपावृतम् । प्रतीच्यभिमुख ब्रह्मनथ पुण्यवनावृतम् ।।१७ दक्षिणाभिमुख काम्य रम्माशोकवनावृतम् । उदङ्मुख च मोक्षस्य शुद्धस्फटिकमनिमम् ॥१८ ३६२ ] । वामन पुराण कृतान्ते त्वाश्रमी मोक्षः कामस्नेतायुगे स्थितः । आश्रभ्यर्थों द्वापरान्ते तिप्यान्ते धम आश्रमी ॥१६ तमाश्रम हि मुनयो दृष्ट्वाऽऽनेयास्ततोऽव्ययाः। तत्रैव हि रति चक्र रखण्डे सविलाप्लुते ॥२० धर्माद्यो भगवान्विष्णरखण्ड इति विश्रुतः । चतुर्मू तिजगन्नाथः पूर्वमेव प्रतिष्ठितः ॥२१ उसे देखकर अतुलनीय तुष्टि को प्राप्त हुए और परम प्रसन्नता प्राप्त हुई थी । जैसे हस गण किसी महान् सरोवर में प्रवेश किया करते हैं वैसे ही ये सब परम प्रसन्न मन वाले होते हुए उसमे प्रवेश कर गये थे ॥१५।। उसके मध्य मे चारो वर्गों को लोक पालो के मुनि श्रेष्ठो ने वहां लोक द्वारा वन्दित एक पुण्याश्रम का दर्शन किया था॥१६॥ हे ब्रह्मन् ! वह धर्माथम पूर्व की ओर मुख वाला था और ढाक के वृक्षो से यावृत पा । प्रतीची (पश्चिम) को और अमिमुख पुण्य वनावृत पा ॥१७॥ दक्षिण की ओर मुख वाला काम्य बन था जो रम्भा (मेला) और अशोक के वन से समावृत हो रहा था। उत्तर की ओर मुख वाला मोक्ष का वन या जो स्फटिक मणि के समान था ॥१८॥ कृत युग के अन्त मे थाश्रमी हो मोक्ष पात्रेतायुग मे काम स्थित पा-द्वापरात मे आश्रमो अर्थ था और तिष्यान्त मे धर्म ही पाश्रमी है ॥१६॥ मुनिगण ने वहाँ पर आयम को देखकर अव्यय आययो ने वहाँ पर हो अखण्ड सलिल से समाप्लुन में रति करली पी॥२०॥ धर्माय विष्णु भगवान् अपण्ड है. ऐसा प्रसिद्ध है-ऐसा प्रसिद्ध है । चतुति जगन्नाप पहिले हो वहाँ प्रतिक्षित थे ॥२१॥ तमचंयन्ति पयो योगारमानो वहुश्रुता।। शुरूपया च तपसा ब्रह्मचर्य नारद ॥२२ एव ते न्ययसंस्तस समेता भार्गवेण हि । असुरेभ्यस्तदा भीतास्त्वाथिताः पण्डपर्वताः ॥२३ तयाऽन्ये ब्राह्मणा ब्राह्मग्नश्मपुट्टा मरीचिपाः । स्नात्वा जले हि यालिन्दाः प्रजग्मुक्षिणामुपा ।।२४ omad वामन जन्म वर्णन ] [३६३ अवन्तीविपय प्राप्य विष्णमासाद्य सस्थिताः। विष्णोरपि प्रसादेन दुष्प्रवेश महासुरैः ॥२५ वालखिल्यादयो जग्मुरवशा दानवाद्यात् । रुद्रकोटिं समाश्रित्य स्थितास्ते ब्रह्मचारिण. ॥२६ एव गतेपु विप्रेषु गोतमाङ्गिरसादिपु । शुबस्तु भार्गवा-सर्वाग्निन्ये प्रज्ञविधी मुने ॥२७ अधिष्ठितो भागवेण महायज्ञेऽमितद्युते । यज्ञदीक्षा बलेः शुकश्चकार विधिना स्वयम् ॥२८ दे वहुध त यागात्मा ऋषिगण उनका अर्चन किया करते हैं। हे नारद ! शुभूपा-ब्रह्मचर्या द्वारा दे ममर्चन किया करते ३ ॥२२॥ इम प्रकार से वे वहाँ पर भार्गव मुनि के साय निवास करते थे किन्तु उम ममय में वे असुरों स भय मौन थे और खण्ड पर्वतों का समाश्रय ग्रहण कर लिया था ।।२३।। अन्य जो दाह्मण अश्मकुट्टा और भरीचिप ये वे सब का लिन्दी के बल में स्नान करके दक्षिण को ओर मुख करके चले गये थे ।॥२४॥ अवन्नी देश म पहुंचकर महामुरी के द्वारा दुटप्रवेश वाले विष्णु के प्रसाद से विग्ण लोक को प्राप्त कर वहा पर ही संस्थित हो गये थे॥२॥ दानवीय मय से अवश वान खिल्यादिक ऋषिगण ब्रह्मचारी लोग रुद्र कोटि का समापय पण करके वही पर वे स्थित हो गये थे ॥२६॥ इस प्रकार से गौतम और मागिरम प्रभृति विप्रो के चले जान पर है मुने ! शुक ने ममस मार्गवरी को मन के विधान में ले लिया था ॥२७॥ भार्गव के द्वारा अधिपित उस महायन मे शुक्र ने अभिन धनि वाले वलि को मय विधि पूर्वक यज्ञ की दीक्षा की घी ॥२८॥ श्वेताम्बरघरो दैत्यः श्वेनमाल्यानुलेपनः । मृगाजिनास्तृतपृष्ठो बहपत्रविचित्रकः ।।२६ समास्ते वितते यज्ञ सदस्यरभिसवृतः। हयग्रीवक्षुराद्यस्तु मयवारणपुरोगमः ॥३० ३६४ । [ वामन पुराण पत्नी विध्यावली तस्य दीक्षिता यज्ञमणि। ललनाना सहस्रस्य प्रधानमृपिकन्यका ॥३१ शुक्ररणाश्वः श्वेतवर्णो मधुमासे सुलक्षणः । मही चरितुमुत्सृष्टस्तारकाक्षस्त्याच तम् ॥३२ एवमश्वे समुत्सृष्टे वितते यज्ञवर्मणि । गते च मासतितये ह्रियमाणे च पावके ।।३३ पूज्यमानेषु दैत्येषु मिथुनस्थे दिवाकरे। सुपुवे देवजननी माधव वामनाकृतिम् ।।-४ सजातमाल भगवन्तमीश नारायण लोकपति पुराणम् । ब्रह्मासमभ्येत्यसममहर्षिभि.स्तोन जगादाथसममह ।।३५ दैत्य श्वेत अम्बर धारण कर श्वेत माल्य और अनुलेपन वाला होकर मृगचर्म से मास्तृत पृष्ठ भाग शाला बनकर बही पो से अद्भुत हो गया था ॥२६॥ सदस्यो से अभिसवृत होकर जो कि हयग्रीव शुर आदि तथा मय एवं वाण प्रभृति थे वहाँ स्थित था ॥३०॥ उसकी विघ्यावली नाम वाली भी उस यज्ञ के कमं मे दीक्षित हुई थी वह सृषि कन्यका सहस्रो ललनामओ में परम प्रधान थी॥३१॥ श्री शुक्राचार्य ने एक सुन्दर लक्षणो वाला श्वेत वर्ण से युक्त मश्व मधुमास मे इस मही मण्डल में सञ्चरण करने के लिये छोड दिया था जो तारकाक्ष नामक दैत्य को रक्षा मे गया था ॥३२॥ इस प्रकार मे उस यज्ञ कर्म के वितत होने में प्रश्व के छोडे जाने पर तीन मास के समान हो जाने पर और पावक के द्वारा हियभाण जब वह हो गया था ॥३३॥ उस समय मे पूज्यमान दैत्यो मे दिवाकर के मिथुन राशि पर स्थित हो जाने पर देवों की माता ने वामन की आकृति वाले माधव का प्रसव किया पा॥३४॥ हे महर्षे !जसे हो उनका जन्म हुआ था उन भगवान ईश-पुराण पुरुप-लोकों के स्वामी नारायण के समीप में ब्रह्माजी ने बार समस्त महषियों को साथ में लेकर स्तोत्र का किया था ॥३॥ पाठ वामन जन्म वर्णन 1 । ३६५ नमोऽस्तु ते माधव सत्व मूर्ते नमोऽस्तु ते सात्वतविश्वरूप । नमोऽस्तु ने शत्रुवनेन्धनाग्ने नमोऽस्तु ते पापमहादवाग्ने ॥३६ नमोऽस्तु पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्ते जगदाधार नमस्ते पुरुतोत्तम ॥३७ नारायण जगन्मूर्त जगन्नाथ गदाधर । पीतवासः श्रियः कान्त जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥३८, भवास्त्राता च गोप्ता च विश्वात्मा सर्वगोऽव्ययः । सर्वधारिन्धराधारित्र पधारिन्नमोऽस्तु ते ॥३६ वधिष्णो वद्धिनाशेपतलोक्य सुरपूजित । कुरुष्व त्व देवपते मघोनोऽश्रुप्रमार्जनम् ॥४० रव धाता च विधाना च सहर्ता त्व महेश्वर । महालयो महायोगी योगशायी नमोऽस्तु ते ॥४१ इत्य स्तुतो जगन्नायः सर्वाःमा सर्वगो हरिः। प्रोवाच भगवान्महा कुस्पनयन विभो ॥४२ हे सत्व मूत्ति वाले ! माधव प्रभो! आपको मरा नमस्कार है। हेसात्वत विश्वरूप वाले | आपकी सेवा मे प्रणाम समर्पित है। आप तो शत्रुषो के वन के लिये ई धन के समान है और महान् पापों के लिये दवाग्नि के सदृश हैं आपको बारम्बार नमस्कार है ॥३६॥ हे पुष्परीकाक्ष | आपको नमस्कार है. आप तो इस सम्पूर्ण विश्व के पोषक हैं आपकी सेवा में हमारा प्रणाम है। आप इस नगर के आधार है। हे पुरुषोत्तम । आपको नमस्कार है ॥३७॥ हे नारायण ! जगमूर्त ! हे जगत् क नाय । गदा के धारण करने वाले! पीताम्बर धारीयो के कान्त । हे जनों के कष्टों का अदन करने वाले ! आपको नमसार है ॥३८॥ आप तो वाण करने वाले रसा करने वाले विश्व को आत्मा- सर्वत्र गमन शील और अव्यय हैं । आप सबको धारण करने वाले इस धरा को धारण करते हैं आप रूपों को धारण करने वाले हैं आपसे नमस्कार है ॥३६॥ मार बर्टन शोत हैं और इस सम्पूर्ण लोक्य को बलित करने वाले हैं। आप मुरों के द्वारा वाध्य मान हैं। हे देवों [ वामन पुराण के स्वामिन् ! अब आप इन्द्र के अधुओ का प्रमाणन करने की कृपा करें ॥४०॥ आप ही घाता- विधाता और हे महेश्वर । आप ही सहार करने वाले हैं । बाप महान् लय-महान् योगी और योगावस्था मे शयन करने वाले हैं। आपकी सेवा मे नमस्कार है ॥४१॥ इस प्रकार से जगतो के स्वामी की स्तुति की गई थी जो सबकी आत्मा हैं-सर्वत्र गमन करने वाले हैं । ऐसे भगवान हरि ने कहा- हे विभो ! मेरे लिये कुरूप की प्राप्ति है ॥४२।। ततनकार देवस्य जातिकर्मादिकाः कियाः। भारद्वाजो महातेजा बार्हस्पत्यस्तपोधनः ।।४३ व्रतबन्ध तथेशस्य कृतवान्सर्वशास्त्रवित् । ततो ददुःप्रीतियुता सर्व एव यथाक्रमम् ॥४४ यज्ञोपवीत पुलहः पुलस्त्यः सितवाससी। मृगाजिन कुम्भयोनिर्भरद्वाजस्तु मेखलाम् ॥४५ पालाशमददाइण्ड मरीचिव ह्मणः सुतः । अक्षसूत वारणिस्तु कौशचीरमथाङ्गिराः॥४६ उस ददी धुराजश्च उपानयुगल भृगुः । कमण्डलु वृहत्तेजाः प्रादाद्विष्णोई हस्पतिः ॥४७ एवं कृतोप नयनो भगवान्भूतभावनः । सस्तूयमान ऋपिभिर्वेदान्साङ्गानधीतवान् ॥४८ भारद्वाजात्साङ्गिरसारसामवेद महास्यरम् । महदाय्यानसयुक्तं गान्धवंसहित मुने ॥४६ इस यनम्वर देवी जात नर्म धादि दिया सम्पत की गई थी और महान सेस्सी तपोधन याहस्पत्य भारदार में उसे पिया था ॥४॥ समस्त मात्रा में माता ने उस जगदीश्वर हा वृत वा पिया था। मरे उपरान्त RE ने बही ही प्रीति से मुक्त होकर यथा पम रतुएं उन्हें एमविपीपी ॥४॥ पुसह प्रापिने उन वामन देव पो. पी दिपा पा सररय ऋषि ने दो वितात्र पापिन रिये। मगर पपी ने पाया और मादा मेसा रोयोwwwer ३६८ ] । वामन पुराण - में निपुणता प्राप्त करके ब्राह्मणों मे श्रेय भारद्वाज से यह वचन बोले- ॥५१॥ श्री वामन देव ने कहा- हे ब्रह्मन् ! अब में महान उदय वाले कुरुक्षेत्र को जाता है। आप मुझे थाना प्रदान काबिए । यहाँ पर दैत्यों फे स्वामी का परम पवित्र अश्व मेध यज्ञ प्रवृत्त हो रहा है ॥५॥ साप देखिये, इस पृथिवी तल में तेज समाविष्ट हो गये हैं जो सतत पुण्य वधंन मेरे अश सविधान हैं । इमलिये बलि कुरुक्षेत्र में चला गया है मैं भी प्रतिज्ञा करता हूं ॥५३॥ भारद्वाज ने कहा-आप स्वेच्छा से संस्थित रहे । हम जाते हैं । मैं आपको आज्ञा नहीं देता हूँ। हे विष्णो! हम वहाँ जायेंगे जहा बलि का यह अध्वर सम्पन्न हो रहा है ॥५४॥ हे देव ! मैं जो कुछ भी आपसे पूछता हूँ वह आप मुझे बतलाइये । हे विभो ! हे पुरुषो मे उत्तम ! किन-किन स्थानों मे बापका नित्य हो सान्निध्य रहा करता है-इसे आप मुझे बतलाइये मैं इसको तत्त्वतः जानना चाहता हूँ ॥५५॥ विष्णु ने कहा है गुरुवर्य ! अब आप श्रवण करिये जिन-जिन सुपुण्य स्थानो मे मैं बहुत से रूपों वाला निवास किया करता हूँ ॥५६॥ ममावतार,सुधा नभस्तल पातालमम्भोनिधयो दिवं च । दिशः समस्तागिरयोग्बुदाश्चव्याप्ताभरद्वाजममानुरूपैः ॥५७ ये दिव्या ये च भौमाजलगगनचरा:स्थावरा ये च ब्रह्मसेन्द्राः सार्काः सचद्रा यमवमुवरणा ह्यग्नयः सर्वपालाः । ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता द्विजखगसहिता मूर्तिमन्तोह्यमूर्वेस्ते सर्वे मत्प्रसूता बहुविविधगुणा: पूरणार्थं पृथिव्याम् ॥५८ एते हि पुण्या: सुरसिद्धदानवैःपूज्या नरा:सन्निहितामहीतले । यह टमावः सहसैव नाश प्रयाति पाप द्विजवयं कीर्तितः ॥५६ हे भरद्वाज ! मेरे अवतारों से जो मेरे अनुरूप हैं यह सम्पूर्ण वसुधा तल-नमस्तल-पाताल-सब समुद्र-दिवलोक समस्त दिशाऐ -पवंत घोणियां और अम्बुद व्याप्त हैं ॥५७॥ हे ब्रह्मन् ! जो दिव्य हैं और जो भूमिगत हैं, जो जगत में चरण करने वाले हैं-स्थावर हैं । इन्द्र-सूर्य और घान्द्र के सहित यम-वसु और वरुण हैं तथा सर्वपाल अग्नियां हैं ।

वामन भगवान का स्वस्थान कथन वर्णन ] ब्रह्मा से आदि लेकर स्यावर पर्यन्त द्विज और खगों के सहित जो सब भूनिमान हैं वे पव विना मूत्ति वाले मेरे ही द्वारा प्रसूत है और बहुत से अनेक प्रकार के गुणगण से युक्त पृथ्वी पूत्ति के करने के लिये हो हैं ॥५८॥ ये पुण्यमय सुर-सिद्ध और दानवो के द्वाग पूज्य मनुष्य इस महीतल मे सन्निहित हैं। हे द्विज वर! जिनके कीर्तन मात्र करने से और दृष्ट मान होने से सहसा हो सम्पूर्ण पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं ॥५६॥ ८८-वामन भगवान का स्वस्थान कथन वर्णन आद्य हि मत्स्यरूप मे सस्थित मानसे ह्रदे। सर्व पापक्षयकर कोतंनस्पशनादिभिः ॥१ कौममन्यत्सन्निधाने कौशिक्याः पापनाशनम् । हयशीपं च कृष्णाया गोविन्द हस्तिनापुरे ॥२ त्रिविक्रम च कालिन्द्या लिङ्ग भदे भव विभुम् । केदारे माघवे शौचकुब्जाम्र कृष्णमूर्द्ध जम् ॥३ नारायण बदर्या च वाराहे गरुडध्वजम् । जयेश भद्रकणे च विपाशाया द्विजप्रियम् ॥४ रूपधारमिरावत्या कुरुक्षेने कुरुध्वजम् । कृतशोचे नृसिंह च गोकर्ण विश्वधारणम् ।।५ प्राचीने कामपाल च पुण्डरीक महाम्भसि । विशाखयूपे ह्यजितं हस हसपदे तथा ।.६ पयोण्या यमखण्डं च वितस्तायां कुमारिलम् । मणिमत्या ह्रदे शभुब्रह्मण्ये च प्रजापतिम् ॥७ घी भगवान् ने कहा-मेरा सर्व प्रथत मत्स्य का स्वरूप है जो मानस हद में समवस्थित है। इसका कोतंन और स्पर्धन आदि के द्वारा समस्त प्रकार के पापो का सप करने वाला यह हुआ करता है ॥१॥ दूसरा कोमं स्वरूप है अर्थात् दूर्मावतार है जो PI ४०० दामन पुराण समिधान में स्थित है और पापा । विनाश पसे वाला है। हम जीय र स्याप कृष्णा मे विमान रहता है और जो vिe हस्तिनापुर में स्थित है ॥२॥ पापिन्दो में त्रिविषम स्वरूप है और भेदार मे विपक्ष मा लिंग भेद है । शौष पुमाग्न माधव में कृष्ण भूदंग है । बदरी मे अर्थात् परिवाश्रम में भगवान नारायण स्थित हैं। वामह में गरम ध्वज विद्यमान है। भरणं में जमा है और विपाशा में प्रिय हैं 100 इरावती में रूपधार है तथा कुरक्षेत्र में युवा विराजमान हैं। कृत शोच में नृसिंह हैं और गांव में विश्र धारण है ॥५॥ प्राचीन मे कामपाल हैं और महाम में पुण्डरीक प्रमु हैं। विशारा भूप मे अजित हैं तथा हा पद मे हम भगवान् विद्यमान हैं ॥६॥ पयोष्णी में यम खण्ड हैं और वितस्ता में पुमारिल हैं। मणिमिती के में शम्भु हैं और ब्रह्मण्य मे प्रजापति हैं ॥७॥ मधुनद्या चक्रधर शूलयाहु हिमाचले। विद्धि विष्णुमुनि श्रष्ठ स्थितमौषधसानुनि ।। भृगुतुङ्ग सुवर्णाख्यं नैमिषे पीतवाससम् । गयाया गोपति देव गदापारिंग तमोश्वरम् 11६ लोक्यनाथ वरद गोप्रचार कुशेशयम् । अर्द्धनारीश्वर चक्र महीध्र दक्षिणे गिरी ॥१० गोपालमुत्तरे नित्य महेन्द्र सोमपीथिनम् । वैकुण्ठमपि सह्याद्री पारियात्रेऽपराजितम् ।।११ कशेरुदेशे देवेश विश्वरूप तपोधनम् । मलयाद्री च सौगन्धिविन्ध्यपादे सदाशिवम् ।।१२ अवन्तिविषये धिष्ण्य निपधेष्वमरेश्वरम् । पाञ्चालिक च ब्रह्मर्षे पाञ्चालेषु सदा स्थितम् ॥१३ महोदये हयग्रीव प्रयागे योगशायिनम् । स्वयभुव मधुवने ह्यब्जगन्ध च पुष्करे ॥१४ मधु नदी में चक्रधर हैं तथा हिमाचल में शूल वाह है हे मुनि अोठ ! भोषघ सानु में भगवान् विष्णु को स्थित समझो ॥८भृगुः वामन भगवान का स्वस्थान कथन वर्णन ] [ ४०१ तुग मे मुवर्ण नाम वाले विद्यमान हैं तथा नमिप क्षेत्र मे पीत वस्त्र धारी हैं। गगा मेति गदा पाणि देवेश्वर हैं ॥३॥ दक्षिण पर्वत में त्रलोक्य के नाम-वरदान प्रदान करने वाले-पो प्रचार-कुशेशय अध नारीश्वर महीध्र पाकिया था ॥१०॥ उत्तर मे नित्य गोपाल को स्थित समझिये तथा महेन्द्र मे सोमपी भी को जानो। मह्यादि मे वंकुण्ठ है क्षौर पारियान में अपराजित हैं ।।११।। कशेरु देश में तपोधन दवश्वर विश्वरूप हैं । मलय पर्वत मे सौगन्त्रि है तथा विन्ध्य गिरि के पाद मे भगवान् सदा शिव विराजमान हैं ।।१२॥ अदनिका देश मे धिष्ण्य हैं और निषध देशो म अमरेश्वर प्रभु विराजमान हैं । हे ब्रह्म । पाञ्चाल देशो मे सदा पाञ्चालिक स्थित रहा करते हैं। महोदय में हयग्रीन है तथा प्रयाग योगशायी है। मधुवन मे स्वयम्भू हैं और पुष्कर में अब्ज गन्ध हैं । १३-१४॥ तथैव विप्रप्रवर वाराणस्या च केशवम् । अविमुक्त च तदेव गीयते सुरकिन्नरः ।।१५ पम्पाया पद्यकिरण ममुद्र वडवामुखम् । कुमारधारे वालीशकात्तिकेय च बहणे ॥१६ ओजसे शम्मुमनघ स्थाणु च कुरुजाङ्गले । वनमालिनमाहुर्मा विविन्यावासिनो जना. ॥१७ वीर कुवलयारढ शङ्खचक्रगदाधरम् । श्रीवत्सामुदाराङ्गनर्मदाया धिय. पतिम् ॥१८ माहिष्मत्या निणयन तव च हुताशनम् । अर्बुदे च निमौपर्ण क्ष्माधर सूकराचले ।।१६ ह द्विजवर ! उमी प्रकार से वाराणी पुरी में देशर भगवान को किन्नरो के द्वारा यही पर अवियुक गान दिया जाना है ॥१॥ पद्मा मे पच फिरण-मपुर में बवामुख-कुमार घार मे दाहोश-बहन मे काति कैप-मोबम मे अनघ शम्मु-कुरुजागर मे -पाशु और निष्किन्धा के निवास करने वाले मुझको वनमाली कहा करते हैं ॥१६-१७॥ पुरलय पर समास्ट-शस चक्र और गम को धारण करने वाले-धीवत्स

४०२
। थामन पुराण
के चिह्न से युक्त उदार बगों वाले श्री के स्वामी को नर्मदा में महि-
ध्यती म निणयन और वही पर हुनामन-अनुघ मे निमोपगं और
सूकराचल म माधर मुझको कहते हैं 11१५-१६॥
लिणाचिकेत ब्रा प्रमासे च पदिनम् ।
तलवामापि च रयात तृतीय शशिशेखरम् ।।२०
उदये शशिन मूर्य ध्रुव च प्रितयस्थितम् ।
हेमकूटे हिरण्याक्ष सन्द शरवणे मुने ॥९१
महालये स्मृत रुद्रमुत्तरेषु कुरुष्वथ ।
पद्मनाभ मुनिश्रेष्ठ सर्वसौप्यप्रदायकम् ॥२२
सप्तगोदावरे ब्रह्मविख्यात हाटकेश्वरम् ।
तवैव च महाहस प्रयागेऽपि महेश्वरम् ॥२३
शोणे च रुषमकवच कुण्डिने प्राणतपणम् ।
भिल्लोवने महायोग मन्त्रपु पुरुषोत्तमम् ॥२४
प्लक्षावतरणे विश्व श्रीनिवास द्विजोत्तमम् ।
सूर्यारवे चतुर्बाहु मगधापा सुधापतिम् ।।२५
गिरिव्रजे पशुपति श्रीकण्ठ यमुनातटे।
वनस्पति समारयात दण्डकारण्यवासिनम् ।।२६
है ब्रह्म । प्रभास मे निमाचिकेत और यहीं पर कमी और यहा
पर भी तृतीय शशि शेखर यात हूँ ॥२०॥ उदयाचल मे शशी-सूर्य
और ध्रुव इन तीनों अवस्थाओ मे स्थित मुझसे कहते हैं । है मकृष्ट
पर्वत मे हिरण्याक्ष और हे मुने । परमण मे स्कन्द मुझको ही कहा
जाता है ।।२१।१ महालय के अवसर मे मुझको रुद्र नाम से कहा गया
है है मुनि श्रेष्ठ । उत्तर कुरुओं मे समस्त सौख्यो के प्रदान करने वाले
पद्य नाम कहते हैं ॥२२॥ हे ब्रह्मन् ? सात गोगावर मे हाटकेश्वर
नाम से विख्यात हूँ। ओर वहाँ पर ही महाहस नाम भी प्रसिद्ध है
तथा प्रयाग में महेश्वर गम प्रथित है ॥२३॥ शोण मे रुवम कवच
और पुण्डन में प्राण तर्पण प्रसित है मिल्लोवन में महा योग मानों में

४०४ ] [ वामन पुराण माल वन मे भीम जानना चाहिए ॥३२॥ घटिन में विश्वामित्र और कैलाश में वृपमध्वज-महिला शैल में महेश जो कामरूप और शशि प्रम है । ये सभी मेरे ही नाम कहे जाते हैं ॥३३॥ वलभ्यामपि गोमिन कटाह ब्राह्मण प्रियम् । उपेन्द्र सिहलद्वीपे शक्राह्रकुन्दमालिनम् ॥३४ रसातले च विख्यात सहस्रशिरसं मुने। कालाग्नि कपिल चैव तथाऽन्यं कृत्तिवाससम् ।।३५ सुतले कूर्ममचल वितले पङ्कजाननम् । महातले गुरु ख्यात देवेशं वृपलेश्वरम् ॥३६ तले सहस्रचरण सहस्रभुजमीश्वरम् । सहसाप्य परिख्यात मुमलाकृष्टदानवम् ।।३७ पाताले योगिनामीशं संस्थितं हरिशंकरम् । धरातले कोकनदं मेदिन्या चक्रपाणिनम् ॥३८ भुवर्लोके च गरुड स्वलॊके विष्णुमव्ययम् । महर्लोके तथाऽगस्त्य कपिलं च जनेस्थितम् ॥३६ तपोलोकेऽखिल ब्रह्मन्वाङ्मय सप्तसंयुतम् । ब्रह्माणं ब्रह्मलोके च सममेव प्रतिष्ठितम् ॥४० सनातन तथा शंवेपर ब्रह्म च वैष्णवे। अप्रतक्यं निरालम्बे निराकारे तपोमयम् ॥४१ जम्बूद्वीपे चतुर्वाहु कुशद्वीपे कुशेशयम् । प्लक्षद्वीपे मुनि थंष्ठ प्यातं गरुडवाहनम् ॥४२ बलभी मे भी गोमित्र-करह और पाह्मण प्रिय मुझको कहा जाता है । सिंहल द्वीप में उपेन्द्र-शकात मे वुन्दमाली, हे मुने ! रमा- तन में गहन गिरा मेरा नाम विरुपात है। बालाग्नि-कपिल और अन्य तिवामा मेरा नाम कहा जाता है ॥३४-३१। सुतल में अचल धर्म- रितम परजानन और महातल में देवेश्वर पृफ्लेवर विख्यात नाम हैं ॥३६॥ तललोक में सहस परण, सहस भुज, ईश्वर और मुगल के द्वारा दानव को आवृष्ट करने वाला सहप्राध्य में कहा जाया करता है वामन भगवान का स्वस्थान कथन वर्णन ) [ ४०५ ॥३७॥ पाताल लोक में योगियों का ईश, सस्थित हरिशकर मेरा नाम है। धरातल मे कोकनद-मेदिनी में चक्रपाणि-भुवर्लोक मे गरुड- स्वर्लोक मे अब्धय विष्णु-मर्लोक मे अगम्य और जनस्थित कपिल मेरा नाम कहा जाता है ॥३८-३६॥ हे ब्रह्मन् ! तालाक में अखिल सप्त सयुत वाङ्मय मेरा नाम है । ब्रह्मलोक में ब्रह्मा और भम हो प्रतिष्ठित मेरा नाम है। जैव में सनातन और बंटणव लोक में परम ब्रह्म-निरा- लम्न में अप्रतकम-निराकार में तपोमय-जम्बूद्वीप में चारनुज्जओ वाला कुगोप मे कुशेशय-है मुनिश्रेष्ठ ! प्लक्ष द्वीप में गरुड वाहन विरुपात मेरा हो नाम कहा जाता है ।।४०-४२॥ पद्मनाभ तथा कौञ्च शाल्मले वृषभध्वजम् । सहस्राक्षः स्यिनः शाके वामनः पुष्करे स्थितः ॥४३ तथा पृथिव्या ब्रह्म शालिग्राम स्थितोऽप्यहम् । सजलस्यलपयन्तमशेषस्थावरेषु च ।।४४ एतानि पुण्यानि महालयानि ब्रह्म पुराणानि सनातनानि । ब्रह्मप्रदानीह महौजसानि सकीर्तनोयान्यवनाशनानि ॥४५ सकीर्तनानाशमुपैति पापसदर्शनादेव च देवतायाः । धर्मोऽर्थकामावपवर्गमेव देवा लभन्ते मनुजाः ससाध्याः ।।४६ एतानि तुभ्यं विनिवेदितानि महालयानोह मया निजानि । उत्तिष्ठ गच्छामि महामुरस्य यज्ञ मुराणा हि हिताय विप्र ।।४७ शौच मे पद्मनाभ----शाल्मल मे वृषम वन-शाकद्वीर में स्थित सहनाक्ष और पुष्कर में स्थित वामन मेरा नाम कहा जाया करता है ॥४३॥ हे ब्रह्मप! समी प्रकार से इस पृथ्वी मे में शालग्राम में स्थित रहता हूँ । जल-स्यन पर्यन्त समस्त स्थावरों मे है ब्रह्मन् ! इस परम पुण्यमय, महालय, पुराण, मतानन, ब्रह्मपद, महोजस और अद्यो के नाश करने वाले नामों का सकौतन बरना चाहिए ॥४४-४ा इन पवित्र गवान के नामो का सकीनन करने से पापो का विनाश हो जाता है और देवता के दर्शन से भी पापों का नाश हुआ करता है । देवता बोर सानो के सहित मनुष्य धर्म, अर्थ, राम और अपवर्ग की प्राप्ति ४०६ ] [ वामन पुराण किया करते हैं ॥४६।। इन महालय अपने नामों को मैंने आपका निवे- दित कर दिया है । है विप्र । उठिये,अब सुरों के हितका सम्पादन करने के लिये महान् असुर वलि के यज्ञ मण्डप मे मैं जाता हूँ ॥४७॥ ८६-शुक्र-बलि सवाद वर्णन तनः समागच्छति वासुदेवे मही चकम्पे गिरयश्च चेलु । क्षुब्धा समुद्रा दिवि सवंलोको बभौ विपर्यस्तगतिमहर्षे ॥१ यज्ञ समागात्परमाकुलत्वन वेनि कि मा मधुहा करिष्यति । यथा प्रदग्धोऽस्मि महेश्वरेण किं मा न सवक्ष्यति वासुदेवः ॥२ ऋयसाममन्त्राहुतिभिहुतास्तुतेऽप्यासुरीयाज्वलनास्तुभागान् । भक्ष्यान् द्विजेन्द्ररपि सप्रदत्तानं व प्रतीच्छन्तिविभोर्भयेन ॥३ त दृष्ट्वा घोररूप तु निमित्त दानवेश्वरः । पप्रच्छोशनस शुक्र प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥४ किमर्थमाचाय मही सशैला रम्भेव वाताभिहता चचाल । फिमासुरीयाश्च हुतानपीह भागान्न गृह्णन्ति हुताशनाश्च ॥५. क्षुब्धा किमर्थमकरालयाविभोऋक्षाणि से नेवचरन्तिपूर्ववत् । दिश किमर्थं तमसापरिप्लुतादोपेणकस्याद्यवदस्मे गुरो ।।६ शुक्रस्तद्वाक्यमावर्ण्य विरोचनसुतेरितम् । अयो ज्ञात्वा कारण च ततो वचनमब्रवीत् ॥७ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-इसके अनन्तर भगवान् नासुदेव के समागत होने पर भूमण्डल कम्पित होगया था और पर्वत चलायमान होने लगे थे ॥१॥ यज्ञ कर्म परम आकुलता को प्राप्त होगया था। दधुदस्य के हनन करने वाले मेरा क्या करेंगे-इसे मैं नही तरह महेश्वर के द्वारा प्रदाय होगया है । यह वासुदेव मुझमे क्या नही बहे गे ॥२॥ ऋग्वेद और सामवेद मन्त्रों के सारा दो हुई आहुतियों से हुन ये पागुरोप अग्निदेव टिजेन्द्रो द्वारा भी दिये जाने पर भक्ष्य भागों को विभु के भय से ग्रहण नहीं कर रहे हैं ॥३॥ दानेश्वर ने उस हैं। मैं जिस घोर रूप वाले निमित्त को देखकर दोनो हाथ जोडकर औशनस शुक्रा- चार्य को प्रणाम किया था और उनसे पूछा था ॥४॥ हे आचार्य देव ! शैलों के सहित यह पृथ्वी वायु से बाहत कहली के वृक्ष की भांति किम कारण से चलायमान हो रही है । और आसुरीय हुताशन भी हत किये हुए भी भागो को क्यों नही ग्रहण करते हैं ?"हे विभो ! ये मकरा- लय (सागर) किस कारण से अतिधोम वाले हो रहे हैं और नक्षत्र भी बाकाश में पूर्व की भाति इस समय में क्यो नही सञ्चारण कर रहे हैं । ये दिशाऐ किस कारण से सब अन्धकार से परिप्लुत हो रही हैं । यह किसके दोष से सब कुछ हो रहा है ? हे गुरुदेव ! आप मुझे यह स्पष्ट वतलाइये ॥६॥ पुलस्त्यजी ने कहा-शुक्राचार्य ने विरोचन क पुत्र के द्वारा कहे हुए इस वाक्य का श्रवण करके इसके अनन्तर पहिले तो उन्होंने इस सब उत्पात होने का कारण जान लिया और फिर यह वचन बोले-॥७॥ शृण्वद्य दैत्येश्वर येन भागान्नामी प्रयच्छन्ति महासुरेभ्यः । हुताशना मन्त्रहुतास्त्वमीभिर्नू न समागच्छति वासुदेवः ।।८ तदनिविक्षेपमपारयन्ती मही सशैला चलिता दिशश्च । तस्या वलन्त्या मकरालयाश्च तूतु त्तवेला दितिजाद्य जाताः॥६ शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा बलिर्भागवमब्रवीत् । धर्म सत्य च पथ्य च सत्त्योत्साहसमन्वितम् ।।१० आयाते वासुदेवे वद मग भगवन्धर्मकामार्थयुक्त कि कार्य कि च देय मणिकनकमथो राज्यमुर्वी धन वा । किं वा वाच्यं मुरारेन्निजहितमथवा तद्धित वा प्रयुञ्ज तथ्यं पथ्य प्रिय भो वद ममशुभद तत्करिष्ये न चान्यत् ॥१॥ तद्वाक्यं भार्गवः श्रुत्वा दन्यनाथेरित महत् । विचित्य नारद प्राह भूत भव्यार्थमीश्वरः ।।१२ त्वया कृता यज्ञभुजोऽसुरेन्द्रा बहिष्कृता ये श्रुतिदृष्टमार्गाः । श्रुतिः प्रमाण मखभाग भाजिनः सुरास्तदर्थं हरिरभ्युपैति ।।१३ ४०८ ] [ वामन पृगण सस्याध्य रं देस्य रामागतस्प यायं शृणु स्वं परिपृष्टगे यत् । कायं न देय हि यिनी मृगान यध्यरं भूकनकादिया था।॥१४ श्री गुजापार्य ने पहा-६ देखापर! म पार गुनालो जिगमान गे ये गयो सेवाशन महापुरी में अपने भागों का ग्रहण नही कर रहे है- यही कारण है वासुदेव निश्चय हो रहे हैं । उनके परणों विप मे ही वह मही शयों के सहित मार महनन करती हुई पलाय माना होगई है और दशाओपा भी यही कारण है। उगने वलन्ती होने पर है दितिज 1 इस समय समुा भी उद्यूत वेम। वाले होगये है ॥३॥ पुलस्त्य महपि ने कहा-~-शुपाचार्य के इस वपन का धवण र राजा बलि ने भागंद मे यह वचन हा पाकि धर्म सस्य और पथ्य है सपा सरवोरसाह मे मयुन है ॥१०॥रने पहा-भगवान् यामुदेव के समापात हो जाने पर है भगवान् ! आप मुझे तो यतला दीजिए मुझं धर्म और काम तथा अर्थ से युक्त क्या कार्य करना चाहिए और मुझे उनको पण देना चाहिए-मणि-ननक-राज्य, भूमि अथवा मुरारि से अपने हित की पया बात पहनी चाहिए या उनके ही हित पा का प्रयोग किया जावे? है गुरु देर ! जो भी तय पथ्य (हितकर) और प्रिय हो वह मुशको बत माइये। उसी शुभप्रद को मैं करूंगा और अन्य वुछ भी नही करू गा ||११|| महषि पुलस्त्य ने कहा-देस्यनाथ के द्वारा समुच्चरित उस महत् वाक्य को भार्गव ऋपि ने मुनकर हे नारद ! विचार करके ईश्वर ने भूत भन्या को कह'--||१२॥ शुक्राचार्य ने कहा-आपने तो यज्ञ का भोग करने वाले असुरेन्द्रो को कर दिया है और जो श्रुति हट मार्ग हैं वे सब वहिन कर डाले हैं । इसमे तो श्रुति ही प्रमाण है कि मन के भाग का उपभोग करने वाले देवगण ही होते हैं। इसीलिये तो इस समय में हरि यहा पर आरहे हैं ।।१३।। हे देय ! इस आपके अध्वर में उनके समाप्त होने पर जो भी करना चाहिए उसको जो आप मुझमे पूछ रहे हैं उसे भी अब श्रवण करलो । हे विभो ! तृष का अग्रभाग भी देने का कुछ शुक्र बलि सवाद वर्णन ] [४० काय नहीं है जो भी इस अधर में भूमि एव सुवर्ण आदि विद्यमान है ॥१४॥ वाच्य तथा सामनिरर्थकविभोकसत्वादरदातुमल हिश'तुमार। यस्यो दरे भूर्भुवनाकपाल रसातलेशा शियसन्ति nिemom मया तवोक्त वचन हि भागव न पाथिो पिंगा पातुपुरसदे । समागतेऽप्यथिनि होनवृत्त तद्वति देये ममगागरोहि१६ जनादने लोकपतो मह समागते नास्ति गुमति । एव च श्रूयते लोवे सता रथगता विभो ।।१७ सद्भावो ब्राह्मणेष्वेव क्तभ्यो भूतिमिच्छता । दृश्यतेऽपि तथा तच्च सत्य ब्राह्मणपुजय 115 पूर्वाभ्यासेन कर्माणि संभवन्ति नृणो स्फुटम् । वाक्कायमानसानीह योन्यन्तरगतान्यपि ॥१५ किं वा त्वया द्विजश्रेष्ठ पौराणी न श्रुता पथा। या वृत्ता मलये पूर्व कोशकारगुतस्य च ।।२० कथयस्व महाबाहो कोशयारसुताश्रयाम् । कथा पौराणिकी बहान्महायौतहल हि मे ॥२१ ४१. 1 ..[ वामन पुराण से मनुष्यो के कर्म स्फुट हुआ करते हैं । वाणी-शरीर और मन के होने वाले सभी कर्म इस लोक मे और अन्यतर जन्म में भी जाने पर हुभा करते हैं ॥१६॥ है द्विज व ! क्या आपने पौराणिक कथा का श्रवण नहीं किया है ? जो पहिले मलप मे कोशकार मृत को घटित हुई है ॥२०॥ शुक्राचार्य ने कहा-हे महाबाहो ! कोशकार के पुत्र का समा- प्रय करने वाली कथा को आप कहिए जोकि पौराणिकी है मुझे हे ब्रह्मन् ! उसके श्रवण करने के लिये अब बहुत ही कौतूहल हो रहा है.॥२१॥ शृणुष्व कथयिष्यामि कथा मेता मखान्तरे । पूर्वाभ्यासेन विद्वाह्नि सत्य भृगुकुलोदा ॥२२ मुद्गलस्य मुनेः पुत्रो ज्ञान विज्ञानपारगः । कोशकार इति स्यात आसीद्ब्रह्म स्तपोधनः ।।२३ तस्यासीद्दयिता साध्वी धर्मिष्ठा नामतः श्रुता। सती वात्स्यायनसुता धर्मशीला पतिव्रता ॥२४ तस्यामस्य सुतो जातः प्रकृत्या व जडाकृतिः । नासौ 5 ते मूर्खवच्च नासौ पश्यति चान्धवत् ॥२५ त जात साह्मणो पुन जड मूक विचापम् । सा च माता गृहद्वारि पष्ठेऽह्नि तमवासृजन ॥२६ ततोऽगाच दुराचारा राक्षसी जातहारिणी। स्व गिशु वृशमादाय शूर्याक्षी नाम नामतः ॥२७ ससोत्गृज्य स्वपुत्र' सा जग्राह द्विजनन्दनम् । समादाय जगामाय भोवतु शालोदरे गुरौ ॥२८ रयरान मलि ने महा-बाप प्रवण दीजिए मग पाको मकार में बहता हे भूमोह ! यह परम हरि शाम राम विधान है ॥२२॥ मुदगल मुनि पा पुत्र मान मोर विज्ञान का पारगामी काम पाह्मन् ! बह पोधन शाम नाम से ही कि पा॥२॥ सो पानी ही माथी और धर्म में पूर्ण निष्ट ने बानी ही माम महू यता थी। पह सती पायान, शुक्र वलि संवाद वर्णन ] ४११ को पुनो धर्म शोला एवं पूर्ण - पनिवता यो ॥२४॥ उस - पत्नी में इस तपस्वी का एक पुन समुत्पन्न हुआ था जो प्रकृति से ही बह आकृति वाला था । न तो यह एक मूर्ख की भाति कुछ बोलता ही था मोर न एक यन्धे के समान कुछ देखा ही करता था ॥२५॥ उस समुत्पन्न पुत्र को जो एक दम जड-भूत और नेत्र होन था वह ब्राह्मणी जो उसकी माता थी उसने छटवें दिन उमको गृह के द्वार पर विजित कर दिया था ॥२६॥ इसके पश्चात् एक दुराचार वालो जात को हरण करने वाली राक्षमी वहाँ पर आ गयी थी। नाम से वह शूपक्षी थी। उस कृश अपने शिशु को उमने ग्रहग कर लिया था ॥२७॥ नहीं पर अपने पुत्र का उत्सजन करके उसने उस द्विज नन्दन को ग्रहण कर लिया था। उसको लेकर शालोदर गिरि में भोग करने के लिये चली गयी थी ॥२८॥ ततस्तामागतां वीक्ष्य तस्या भर्ता घटोदरः । नेत्रहीन: प्रत्युवाच किमानीतं त्वया प्रिये ॥२६ साऽब्रवीद्राक्षसपते मयाऽस्थाप्य शिशु निजम् । कोशकारद्विजगृहे तस्यानीतः प्रभो सुना ।। स प्राह न त्वया भद्र भद्रमाचरित त्विदम् । महाज्ञानी द्विजेन्द्रोऽसौ स नः शप्स्यति कोपितः ॥३॥ तस्माच्छोघ्रमिमं त्यक्त्वा तन्नूनं घोररूपिणम् । अन्यस्य कस्यचित्सुखं क्षिप्रमानय सुन्दरि ॥३२ इत्येवमुक्ता सा रौद्री राक्षसी कामरूपिणी। समाजगाम त्वरिता समुत्पत्य विहायसा ||३३ स चापि राक्षससुनो निसृष्टो गृह्वाहनः । रुरोद सत्वर ब्रह्मन्प्रक्षिप्यागुष्ठमानने ॥३४ सा शब्दं तं घिरान्द्रत्वा धर्मिष्ठ पतिमद्रवीत् । पश्य स्वयं मुनिश्रेष्ठ सुशब्दस्तनयस्तव ॥३५ इसके उपरान्त समके स्वामी ने उसको समागउ हुई देयकर जिमका नाम घटोटर पा और जो नेत्रों से हीन था। उसने उससे रहा है ४१२ । । वामन पुराण प्रिये ! तुम क्या ले आयी हो ? ॥२६उसने उत्तर दिया था-हे राक्षस- पते ! मैंने अपना शिशु वहाँ पर रखकर कोशकार द्विज के पर में है प्रभो ! उसका पुत्र में यहां पर ले आई हूँ ॥३०॥ उसने कहा-यह 'तो तुमने बिल्कुल भी अच्छा कार्य नहीं किया है । यह द्विजेन्द्र महान् ज्ञानी है वह क्या कुपित होकर शाप नही दे देगा? ॥३१॥ इसलिये तुम घोर रूपी इसको निश्चय ही शीघ्रातिशीघ्र वहीं पर त्याग कर है सुन्दरि ! किसी अन्य के पुत्र को शीघ्र ले आओ ॥३२॥ इस प्रकार 'से कही गई रोद्री-कामरूपिणी वह राक्षसी तुरन्त ही बाकाश के मार्ग से उत्पतन करके वहां पर आगई थी ॥३३॥ वह राक्षस सुत भी गृह के बाहिर निःसृष्ट हुआ हे ब्रह्मन् ! मुख में अंगूठा लेकर शीघ्र ही रुदन करने लगा था ॥३४।। उसने बहुत देर तक उस शब्द का श्रवण कर अपने मिष्ठ पति से बोली-हे मुनि श्रेष्ठ ! आप स्वयं ही देखिए अब तो आपका पुत्र सुन्दर शब्द वाला हो गया है ॥३॥ श्रस्ता सा निर्जगामाथ गृहमध्यात्तपस्विनी। स चापि ब्राह्मणश्रेष्ठः समपश्यच्च तं शिशुम् ॥३६ वर्णरूपादिसंयुक्त तद्वत्स्वतनयं यथा । ततो विहस्य प्रोवाच कोशकारो निजां प्रियाम् ।।३७ एवमाविश्य धर्मिष्ठ भाव्य भूतेन साम्प्रतम् । कोऽप्यस्माक छलयितु स्वरूपी भुवि संस्थितः ॥३८ इत्युक्त्वा वचन पत्नी मन्तैस्त राक्षसात्मजम् । बबन्धोल्लिख्य वसुधां सकुशेनाथ पाणिना ॥३६ एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ताशूक्षी विप्रबालकम् । अन्तर्धानं गता भूमौ गृहे चिक्षेप दूरतः १४० सक्षिप्तमात जग्राह कोशकारस्तु पुत्रकम् । सा चाभ्येश्य ग्रहीतु स्व नाशकद्राक्षसी सुतम् ॥४१ इतश्चेतश्व विभ्रष्टा सा भर्तारमुपागता। कथयामास यद् तं स्वकीयात्मजहारिणम् ।।४२ शुक्रबलि संवाद वर्णन ] ।। ४१३ अत्यन्त त्रस्त होती हुई वह तपस्विनी घर के मध्य से बाहिर निकल पाई थी और उस ब्राह्मग घेष्ठ ने भी उस शिशु को देखा या ॥३६॥ वह वणं स्मादि से पूर्ण तया युक्त या बंसा कि अपना पुत्र था दिल्कुल वैसा ही था इसके उपरान्त वह हंसकर कोशकार अपनी प्रिया से भोला ॥३७॥ है धमिष्ठे ! इस प्रकार से माविष्ट होकर इस : समय में भूत से भाव्य है। कोई हमको छचने के लिये स्वरूर वाला भूमि में सस्थित हैं ॥३८।। अपनी पत्नी से यह वचन कह कर मन्नों के द्वारा उस राक्षस के पुत्र को कुरा सहित हाप से वसुधा का उल्लेखन कर बन्धन कर दिया था ॥३६॥ इसी बीच में सूर्यासो वहां पर आगई थी उसने दूर से ही भूमि में घर में उप विप्र के बालक को प्रक्षित कर दिया था और वह अन्तर्धान हो गई यो ॥४०॥ फेंके हुए उस पुष को कोशकार ने ग्रहण कर लिया था किन्तु वह राक्षसो वहाँ पर आकर भी अपने सुत को प्रहण करने समयं न हो सकी यो॥४१॥ घर से उधर विभ्रष्ट होती हुई वह अपने स्वामी के समीप में उपस्थित हो गई पी और अपने पुत्र के हरण होने वाले सम्पूर्ण समाचार को उससे कहा सुनाया था ॥४२॥ एवं गतायां राक्षस्या ब्राह्मणेन महात्मना । स राक्षसशिशु हान्भार्याय विनिवेदितः ॥४३ कपिलायाः सवत्सायाः पित्रातमतनयस्तदा। दाना संतोपितोय धोरणेक्षुरसेन च ॥४४ दावेव वद्धिती वाली,संजातो सप्तवार्षिको। पित्रा च कृतनामानी निशाकरदिवाकरौ ।।४५ नशाकरिहिवाकोतिनिशाकोतिः स्वपुत्रकः। तयोश्चकार विप्रोऽसौ ब्रतवन्यक्रियां फ्रमात् ।।४६ प्रतवन्धे कृठे वेद पाठासो दिवाकरः। निशाकरो जहतया न पपाठेति नः श्रुतम् ॥४७ तं वान्धवाः स्वपितरो माता भ्राता गुरुस्तथा । पर्यनिन्दस्तपान्ये च जना मलयवासिनः ॥४८ - ४१४ ] [ वामन पुराण का . ततः स पित्रा क द्धन क्षिप्तः कूपे तु निर्जले। महाशिला तदुपरि पिता तस्याथ व्यक्षिपत् ॥४६ इस प्रकार से उस राक्षसी के वहाँ से चले जाने पर महात्मा ब्राह्मण ने वह राक्षस का शिशु हे ब्रह्मन् ! अपनी भार्या को दे दिया पा ॥४३॥ वत्स के सहित एक कपिला गो के दधि से उस समय में पिता ने अपने पुत्र को सन्तोपित किया था और अधिक क्षीर एवं ईख के रम से तुष्ट किया था ॥४४॥ वे दोनो ही बालक वद्धित होकर सात वर्ष के हो गये थे। पिता ने इनके नामकरण किये थे। एक का नाम निशाकर खखा था और दूसरे का दिवाकर खखा गया था ॥४५॥ नशाकरि और दिवाकीति ये दोनो के नाम थे। निशानीति उसका अपना पुत्र था इस विप्र ने उन दोनों के कम से युत बन्ध क्रिया को पी ॥१६॥ व्रत बन्ध के करने पर यह दिवाकर वेद पढ़ने लगा या। निशाकर तो जड़ता के कारण से कुछ पढ़ता था और न मुनता ही था ॥७॥ उसकी समस्त बान्धव-अपने उसके माता-पिता- भ्रांता-गुरु सपा अन्य सभी मलय के निवासी लोग निन्दा करने लगे थे ॥४८॥ इसके पश्चात् एक दिन पिता ने ऋद्ध होकर उसको एक विना जल वाले अन्धे कुए मे डाल दिया था। उसके ऊपर एक महा. शिला भी पिता ने प्रक्षिप्त कर दी थी॥४६॥ एव क्षिप्तस्तदा कूपे बहुवर्षगणास्थितः । तत्रास्त्यामलकोगुल्म: पोपायफलितोऽभवत् ।।५० ततो दशसु वपु समतीतेपु भार्गव । तस्य माताऽगमत्यूपं तमपश्यच्छिलान्वितम् ॥५१ सा दृष्ट्वा निचित पूपे शिलया गिरिकल्पया। उच्च प्रोवाच सेनेय यूपोपरि शिला कृता ।।५२ पान्तस्था मुतो वाणो युवा मातुनिशाकरः। पाहाम्य दसा तातेन एपोपरि शिला स्वियम् ॥५३ सातिभौतामयीखोमि फुपान्तःस्योदभुतस्परः। सोप्याह तव पुत्रोऽस्मि निशाकर इति श्रुतः॥४ शुक्र-बलि सम्वाद वर्णन 1 । ४१५ साऽन्त्रवीत्तनयो मेऽस्ति नाम्ना च्याती दिवाकरः । निशाकरेति नाम्ना च न कश्रित्तनयोऽस्ति मे ।।५५ स च तत्पूर्वचरित मातुनिरवशेषता। कथयामास पुत्रोऽसौ यद्वृत्तं पूर्वमेव हि ॥५६ इस प्रकार से उस समय मे प्रक्षिप्त बह बहुत से वर्षों तक वहाँ पर एक आवले की झाही पी जो उसके पोपण करने के लिये फलों दाती हो गई पो ॥५॥ हे भार्गव । इसके उपरान्त दश वर्ष प्रतीत हो जाने पर उसको माता उस कुए पर गयी थी और उसने शिला से युक्त उसको वहा पर देखा था ॥५१॥ गिरि के समान एक शिला के द्वारा निचित कूप में देखकर उसने ऊ चे स्वर से कहा था---यह पिता यहा पूप के कार किसने कर दी है ॥५२॥ कूप के अन्दर स्थित सुत ने जिम का नाम निशाचर या माता की इस वाणी का श्रवण रिया था और वहा । बोना-हे माता ! यह शिला तो इस कुए के कार पिताजी ने ही हाली है ॥५३॥ वह उछे सुनकर अपन्त डर गई और बोली यह अद्भुत स्वर वाला कुए के अन्दर स्थित कौन है । वह भी बोला- आपका ही है माता ! पुत्र हूं जिसका नाम निशाकर ऐसा अत हुआ है ॥५४॥। वह वोली-मेरा पुत्र है जिसका नाम दिवाकर प्रसिद्ध है ? निशाकर इस नाम वाला तो मेरा कोई भी पुत्र ही नहीं है ।।५।। उस पुत्र ने अपना पूर्ण परित पूर्णतया माठा से कह सुनाया था जो कि पहिले ही सब घटित हो चुका था ॥५६॥ सा थुत्वा ता शिला सुयूः समुक्षिप्यान्यतोऽक्षिपद । स तु कूपान्तमुत्तीर्य मातुः पादौ ववन्द च १५७ सा स्वानुरूप तनयं दृष्ट्वा स्वजवमप्रतः । ततस्तमादाय सुतं र्धामप्ठा पत्तिमेत्य च ॥५ क्थयामास तत्सर्व चेष्टितं स्वसुतस्य च । ततो ह्यपृच्छदिप्रोसो किमिद पातवारणम् ॥५६ प्रोक्तवान्मदभूत्पूर्व महत्कौतूहलं मम । नोयार्थिना गफझोदपानः।

४१६ 1 [ वामन पुराण तच्छुत्वा वचन धीमा-कोशकार द्विजोत्तमम् । प्राह युनोऽभूत वाक्य मातर पितर तथा ॥६० धूपता कारण तात येन मूकत्वमाश्रितम् । मया जडत्वमनघ तथायित्व स्वचक्षुपा ॥६१ पूर्वमासासमह विप्र कुले वृन्दारकस्य तु ! वृपाकपेश्च तनयो मालागर्भसमुद्भव ॥६२ तत पिताऽपाठय मा शास्त्र धर्मार्थकामदम् । मोक्षमार्गपर तात सेतिहास श्रुति तथा ॥६३ उस सुभ्र ने यह सब श्रवण करके उस शिला को अयत्र उक्षिप्त करके डाल दिया था और वह कुए से निरल वाया था तथा उसने अपनी माता के चरणो को वदना की थी ॥५७।। वह अपने अनुरूप पुत्र को देखकर उसे अपने समस्त जनो के आगे लाकर फिर उस धम में मिठा रसने वाली ने अपने पति के समीप उपस्थित होकर अपने पुन के उस सम्पूण चेष्टित को कहा था। इसके पश्चात् इम विध ने उससे पूछा था कि दरा पात का मया कारण था? ॥५८ ५६। यह उसने सब कह दिया था कि मुझे इसका बडा भारी कौतूहल हो रहा है। धीमान ने इस वचन का श्रवण कर कोशकर द्विजोतम से उस पुन ने माता तथा पिता को अद्भुत वाक्य बोला या निशा कर न कहा- हार ! अन आप इसका कारण सुनिए जिसके कारण से मुझे यह मूकता थी। मैंने इस प्रकार की जडता और अपने नेत्रों से अ धता प्राप्त की थी है अनप । उसका भी जो है तु है उसका चयन का ये ॥६१।। मैं पहिले है विप्र वृ दारक के कुल संपा। मैं धुषा शपिका पुत्र या तथा माता के गर्भ से मेरा ज म हुमाया ॥६॥ इसके पश्चात् पिता ने मुझे धम-अपं और काम के प्रधान रने वाले शास्त्र को पढ़ाया था। ई Bा 1 मोशवे मार्ग में पाायण इतिहास के हित श्रुति को भी पढ़ाया था ॥३॥ सोन्ह तान महानानी परपारविशारद । जामदा परताह दुष्पमित्तानपाद ६४ .

शुक-वलि सम्बाद वर्णन ]
४१७
मदात्समभवल्लोभस्तेन नष्टा प्रगल्भता ।
विवेको नाशमगन्मदो में मोहमागतः ।।६५
मूढभावतया चाथ जातः पापरतोऽस्म्यहम् ।
परदारपरार्थेषु सदा मे मानस स्थितम् ॥६६
परदाराभिमशित्वात्परार्थहरणादपि।
मृतो ह्य् द्वन्धनेनाह नरक रोरव गतः ॥६७
तस्माद्वप सहस्रान्ते भुक्तशिष्ट तागसि ।
अरण्ये मृगहा पापः सगातोह मृगाधिपः ॥६८
न्यानवे सस्थितस्तावद्वद्धः पञ्जरग. कृतः।
नराधिपेन विभुना नीतश्च नगर द्विज ॥६६
वस्य पन्जरस्थस्य व्याघ्रत्वेऽपि स्थितस्य च ।
धर्मार्थकामशास्त्राणि प्रत्यमासन्त सवशः । ७०
हे तात । इसलिये महान् ज्ञानी हो गया था और परपार का
महा मनीपी बन गया था। इस कारण से मुझे बड़ा मारी मद समुत्पन्न
हो गया था और उस मद से मैं अन्धा बन गया था तथा फिर मदी-
न्मत्त होकर बनेक दुग्मों में मैं निरत हो गया था ॥६४॥ प्रद से
मुझे महान् लोम उत्पन्न हो गया था जिस कारण से मेरी सम्पूर्ण
प्रगल्भता विनष्ट हो गई थी। मेरा सब विवेक नाश को प्राप्त हो गया
पा जो कि उस दिन मद ने ही कर दिया था और मैं मोह को प्राप्त
हो गया था ॥६५॥ उसी मूड भाव से पापों म रवि रखने वाला में
यहाँ पर आपर समुत्पन हो गया था। मेरा मन सदा ही पराई दारामो
में और दूसरों के धनो मे स्थित रहा करता या ॥६६॥ पराई स्त्रियों
के साथ अभिम बग्ने वाला होने से तथा दूसरों के धन का अपहरण
करने के कारण से मैं उम-धन से मृत हो गया था और फिर शेरव
मरस में रिये हुए पापों को पाउनाऐ भोगने के लिये चला गया पर
॥६॥वहा पर एक सहन वर्ष तक यातनाएं भोगता रहा। इस
मन्त में जो भी कुछ पापो का पल भोगने मे रेप रह गया पा उसको
भोगने के लिये एक मरम्प में मृगों का हनन करने वाला महा पापी

४१८ ] 1 वामन पुराण मृगाधिप बनकर मैंने जन्म ग्रहण किया था ॥६५॥ व्याघ्रत की योनि में स्थित मैं एक बार वद्ध हो गया था और एक पिंजडे मे डाल दिया गया था । हे द्विज । वहाँ के विमु नराधिप ने मुझे नगर मे लिवा कर बुला लिया था ॥६६॥ मैं उस दशा मे बद्ध था और एक रिजडे मे दद भी था तथा व्याघ्र की योनि मे भी स्थित था कि उस समय में भी मुझे धर्मार्थ काम के सम्पादन करने वाले सम्पूर्ण शास्त्र प्रति- भामित हो रहे थे ॥७०॥ ततो नृपति शार्दूलो गदापाणि: कदाचन । एकवस्त्रपरीधानी नगराग्निर्ययों बहिः ॥७१ तस्य भार्याऽजिता नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि । सा निर्गत भर्तरि तु ममान्तिकमुपागता ।।७२ ता दृष्ट्वा ववृधे चित्त पूर्वाभ्यासान्मनोभवः । यथैव कामशास्तेषु ततोऽहमवद च ताम् ॥७३ राजपुत्रि सुकल्याणि नवयौवनशालिनि। चित हरसि मे भीर कोकिला ध्वनिना यथा ॥७४ सातद्वचनमाकय प्रोवाच तनुमध्यमा । क्यमेवाक्योाघ्र रनियोग उपप्यति ॥७५ ततोऽहमनव तान राजपुती सुमध्यमाम् । द्वारमुद्घाटयाय व निगमिप्यामि सत्वरम् ॥७६ साऽप्यद्रवीद्दिवा व्याघ्र लोगोऽय परिपश्यति । रानायुदायिष्यामि ततो रस्याव चेच्छया ॥७७ इसो अनन्तर एम पार वह नाति शार्दूम गदा हाप में पण से एक ही यात्रा परिधान किये हुए नगर से बाहिर निपस गपा था ॥७१॥ उसी मार्याा अजिता नाम था और इननी हरवती घोर भूमण्डल में उगमी तुरना में मन्य होई नारी नहीं थी। वह अपने ती निरम पाने पर मेरे समीप में उपस्थित हो गयी थी ॥७२॥ उमयो देशकर मुझे मेरे पूर्व जन्म मारस से मा में नामदेव बाबापति हो गई पीगि प्रार से राम दावों में है उमो भनि शुभ-बलि सम्वाद वर्णन 1 [४१ मैंने उससे कहा था ॥७३॥ है राजपुति ! है फ्ल्याणि ! आप तो नूतन योवन को शोमा वाली हैं। है भीरु ! आपने तो इस रूप सौन्दर्य से मेरे मी चिन का हरण कर लिया है जैसे कोकिल की अनि से वित्त का हरण हो जाया करता है ।।७४।। उसने उस वचन का श्रवण करके तनुमध्यमा ने कहा था--है व्याना हम दोनो का रति का योग कैसे हो सकेगा ॥७॥ हे तात ! फिर मैंने सुमध्यमा राजपुत्री से कहा- आज अप इस पिंजडे के द्वार को खोल दो मैं शोघ्र ही वाहिर निकल माऊगा ॥७६।। वह बोली-है व्याघ्र ! यह दिन का समय और य सभी लोक देख रहे हैं । मैं रात्रि के समय मे इम पिंजडे के दरवाजे को खोल दूगी तब स्वेच्छा से हम दोनों रमण करेंगे ॥७॥ तामेवाहमवोच वै कालक्षेपो न मे क्षमः । तस्मादुद्घाटय द्वार मा वधाच्च विमोचय ||७८ ततः साऽपि वरश्रोणी द्वारमुद्धाटयच्छनः । उद्घाटते ततो द्वारे निर्गतोऽह वहिः क्षणात् ॥७६ निगढादिकपासाश्चच्छिन्ना बलवता मया। सा तदा नृपतेर्भार्या गृहीता रन्तुमिच्छता 10 ततो दृष्टोऽस्मि नृपतेभृत्यरतुलविक्रमः । शस्त्रहस्तैः सर्वतश्च तैरह वरिवेष्टित. 11८१ महाशिः शृड खलाभिः समाहृत्य च मुद्गरः । बद्धस्तानद्रवं मैव मा हन्तु यूयमर्हन १८२ ते च मद्वचन श्रुत्वा मामेव रजनीचरम् । वटवृक्षे दृढ वद्धाश्चातयन्व तपोधन ।।६३ भूयस्ततश्च नरक परदारनिपेवरणात् । गतो वर्षसहस्रान्ते जातोऽह श्वेतगदंभः ।।८४ मैंने फिर उससे कहा था कि इतने समय का निकालना मेरी क्षमता के बाहिर है । इसलिय अभी तुम मेरे पिंजडे के द्वार को घोल दो और इस बन्धन से मेरा मोचन कर दो ॥७॥ इमके अनन्धर उस वरधोणी ने भी धौरे से पिंजडे के द्वार को खोल दिया था। 1 ४२० ] [. वामन पुराण फिर उस दरवाजे के खुलते ही मैं अति शीघ्र बाहिर निकल आया या [७] बलवान् मैंने निगड़ आदिक जो मेरे पाश मुझे कसे हुए थे. उनको मैंने छिन्न-भिन्न कर दिया था। उस समय मे मैंने वह राजा की भार्या रमण करने की इच्छा वाले ने ग्रहण कर ली थी ॥५०॥ इस प्रकार से रमण करने के इच्छुक मुझको नृप के अतुन विक्रम वाले भृत्यों ने देख लिया था। सब ओर से शस्त्रों का हाथो में लेकर उन्होंने मुझे परिवेष्टित कर लिया था ॥१॥ महान् पाशों से-शृजनाओं से और मुद्गरों से मुझे हताहत करके बाध लिया था। तब मैंने उनमे कहा था- इस प्रकार से आप लोग मुझे मारने के योग्य नहीं होते हैं ऐसा मत करो ॥५२॥ उन्होंने मेरे वचनों का श्रवण करके भी रजनीचर मुझको इस प्रकार से बहुत ही मजबूती से वट के वृक्ष में बांधकर है तपोधन : मेरे ऊपर वे सब आघात करने लगे थे ॥५३॥ फिर मैं पुनः पराई स्त्री के सेवन करने के पाप के कारण से नरक में यात- नाएं भोगने के लिये गया था फिर जब वहाँ एक सहस्र वर्ष समाप्त हो गये तो उनके अन्त में भुक्त शेष पाप का फल भोगने के लिये मैंने श्वेतगदंभ की योनि में जन्म ग्रहण किया था ॥४॥ ब्राह्मणस्याग्निवेश्यस्य गृहे बहुकलरिणः । तत्रापि सर्वविज्ञान प्रत्याभासत मे तदा ॥८५ उपवाह्यः कृतश्चास्मि द्विजयोपिद्भिरादरात् । एकदा नवराष्ट्रीयाभार्या तस्याग्रजन्मनः ।।८६ विमतिनमित: स्याता गन्तुमैच्छद्गृहे पितुः । तामुवाच पनिगच्छ आरुह्यं न च गर्दभम् ।।८७ मासेनागमन कार्य न स्थेय परतस्ततः । इत्येवमुक्ता सा भी तन्वो चारुह्य गर्दभम् । ८८ वन्धनादवमुध्याय जगाम त्वरिता मुने। सतोद्ध पथि सा तन्वी मरपृष्ठादवहार । ४२१ मया चाभिहता तूर्ण पतिता पृथिवीतले। तस्या उपरि भो तात पतितोऽहं तदाऽनुरः ।। दृष्टोऽभवं तदा तस्या नृणा तदनुसारिणा । तदीद्यम्य स यष्टि मां समघावत्वरान्वितः ॥६२ वहां पर भी अर्थात् उस गर्दभ की योनि में भी मुझे अग्नि वेश्य और बहुन दारों वाले वाह्मग के घर में उस समय मे सब प्रकार का विज्ञान प्रतिभामित होता था ॥८५! मुझे द्विजों की स्त्रियों ने बड़े ही आदर से उपवहन करने के योग्यवर लिया था। एकनार उस अग्रजन्मा (ब्राह्मण) को नवराष्ट्रीया भार्या थी ।।१६जिसका नाम विमति यह विख्यात पा । वह अपने पिता के घर में जाने की इच्छा कर रही थी। उसके पति ने उससे कहा था चली जाओ और इस गर्दम पर समारोहण करलो ॥७॥ एक मास में तुमको यहां वापिस बाजाना चाहिए । इतने समय से अधिक वही पर तुमको नहीं ठहरना चाहिए । इस तरह से अपने स्वामी के द्वारा कही गयी वह तन्दी गदंभ पर समा. रूढ होगई यो ॥८बन्धन से अब मोवन करके हे मुने ! वह शीघ्र गामिनी होती हुई चलो इसके उपरान्त जब आधा मार्ग पूरा होगया तो वह तन्वी मेरी पीठ मे नीचे उतर गई यो NE| वह अत्यन्त सुन्दर रूप वाली और आवगन धारण करती हुई नदी में स्नान करने के लिये अवतीर्ण हुई थी। मभी रंगों से रूप-नावण से समन्वित उसको मैंने देखा था और में उसी समय काम से दुसित होगया था |10 मैने तुरन्त हो उसका अमिहरण किया था और नह पृथिवी पर गिर गई घो। हे तात ! उस के ऊपर उस समय में कामातुर होकर गिर गया पा ॥६उस समय में उसके अनुसार पलने वाले उमो के मनुष्य के द्वारा मैं देम लिया गया था। उमी क्षण में उसने लाठी लेकर घरान्वित होते हुए मेरे पीछे दौड लगाई पो HERI वद्भयातां परित्यज्य प्रद तो दक्षिणामुखः । ततोऽमिद्रवतस्तुणं सलीनरराना मुने १६३ ४२० ] [ वामन पुराण थे फिर उस दरवाजे के खुलते ही मैं अति शीघ्र बाहिर निकल आया था 11७६॥ बलवान् मैंने निगड आदिक जो मेरे पाश मुझे कसे हुए वनको मैंने छिन्न-भिन्न कर दिया था। उस समय में मैंने वह राजा की भार्या रमण करने की इच्छा वाले ने ग्रहण कर ली थी 10}} इस प्रकार से रमण करने के इच्छुक मुझको नृप के अतुल विक्रम वाले भृत्यों ने देख लिया था । सब ओर से शस्त्रों का हाथो मे लेकर उन्होने मुझे परिवेष्टित कर लिया था |॥१॥ महान् पाशो से गृह्वनाओ से और मुद्गरो से मुझे हताहत करके बाघ लिया था। तब मैंने उनसे कहा पा-इस प्रकार से आप लोग मुझे मारने के योग्य नहीं होते हैं ऐसा मत करो ॥२॥ उन्होंने मेरे वचनो का श्रवण करके भी रजनीवर मुझको इस प्रकार से बहुत ही मजबूती से वट के वृक्ष मे बौधकर है तपोधन ' मेरे ऊपर वे सब आघात करने लगे थे ॥३॥ फिर मैं पुन पराई स्त्री के सेवन करने के पाप के कारण से नरक में यात- नाएं भोगने के लिये गया था फिर जब वहाँ एक सहस्र वर्ष समाप्त हो गये तो उनके अन मे मुक्त शेष पाप का फन भोगने के लिये मैंने श्वेतगदर्भ की योनि में जन्म ग्रहण किया था॥८४] ब्राह्मणस्याग्निवेश्यस्य गृहे बहुकलत्रिणः ! तत्रापि सर्वविज्ञान प्रत्याभासत मे सदा ॥८५ उपवाह्यः कृनश्रास्मि द्विजयोपिद्भिरादरात् । एकदा नवराष्ट्रीयाभार्या तस्याग्रजन्मनः ॥६६ विमति मत: स्याता गन्तुमच्छद्गृहे पितुः । तामुवाच पनिगच्छ आरुह्य न च गर्दभम् ॥८७ मासेनागमन कार्य न स्थेय परतस्ततः। इत्येवमुक्ता सा भी तन्वी चारा गर्दमम् । ८८ वधनादवमुच्याय जगाम त्वरिता मुने। ततोद्धयपि सा तन्वी मत्पृष्टादवरह वे ॥ अवतीर्णा नदी स्नातुसुरूपामा वाससम् । सर्वरङ्ग रूपवती दृष्ट्वा तामहमाद्रवम् ॥६० शुक्र-बलि सम्वाद वर्णन ] ४२१ मया चाभिहृता तूर्ण पतिता पृथिवीतले । तस्या उपरि भो तात पतितोऽह तदाऽनुरः ॥१ दृष्टोऽभव तदा तस्या नृणा तदनुसारिणा । तदोद्यम्य स यष्टि मा समघावत्त्वरान्वितः ॥६२ वहां पर भी अर्थात् उस गर्दभ की योनि में भी मुझे अग्नि वेश्य और बहुत दनो वाले ब्राह्मग के घर में उस समय में सब प्रकार का विज्ञान प्रतिमामित होता था ॥५५॥ मुझे द्विजों की स्त्रियों ने बड़े ही आदर से उपवहन करने के योग्यवर लिया था। एकबार उस अजन्मा (ब्राह्मण) की नवराष्ट्रोपा भार्या घी 11 जिसका नाम विमति यह विख्यात था । वह अपने पिता के घर में जाने को इच्छा कर रही थी। उसके पति ने उससे कहा था चली जाओ और इस गर्दम पर समारोहण करलो ॥७॥ एक मास में तुमको यहा वापिस पाजाना चाहिए । इतने समय से अधिक वहाँ पर तुमको नहीं ठहरना चाहिए । इस तरह से अपने स्वामी के द्वारा कही गयी वह तन्वी गर्दम पर सपा- रूढ होगई थी ॥८॥ बन्धन से अब मोचन करके हे मुने ! वह शीघ्र गामिनी होती हुई चली इसके उपरान्त जब बाधा मार्ग पूरा होगया तो यह तन्वी मेरी पीठ मे नीचे उतर गई यो ॥८६॥ वह अत्यन्त मुन्दर रूप वाली और बाद वगन धारण करतोहई नदी में स्नान करने के लिये बनती हुई थी। ममी रगों से रूप-नावर से समन्वित उमको मैंने देखा था और मैं उसी समय काम से दुसित होगया था 100 मैने तुरन्त ही नममा अमिहरण किया था और वह पृथिवी पर गिर गई पोहे ताठ ! उस के कपर उस समय में कामातुर होकर गिर गया या at उस समय मैं उसके अनुसार चलने वाले उमी के मनुष्य के द्वारा मैं देख लिया गया था। उसी क्षण में उसने लाठो लेकर स्वरान्वित होते हुए मेरे पीछे दौड लगाई यो ॥२॥ तद्भयाता परित्यज्य प्रद तो दक्षिणामुखः । ततोऽभिद्रवतस्तूपं खलीगरसना मुने ॥६३

[ वामन पुराण
समासन्ना तदा ब्रह्मम्ममासौ प्राणनाशने ।
तत्रा सक्तस्य पड़ावादभून्मे जीवितक्षयः ॥६४
ततोऽस्मि नरकं भूयस्तस्मान्मुक्तोऽभव शुकः ।
महारण्ये ततो बद्ध. शवरेण दुरात्मना १६५
पञ्जरे न्यस्य विक्रीतो वणिक्पुत्राय शालिने।
तेनाप्यन्तः पुरतरे यूवतीनां समीपतः ॥६६
सर्वशास्त्रविदित्येव दोषघ्नश्च त्यवस्थितः।
तत्रासतस्तरुण्यस्ता ओदनादिफलादिभिः ॥६७
पक्वैश्च दाडिमफलः पोषयन्त्यो दिने दिने ।
एक्दा पनपन्नाक्षी श्यामा पीनपयोधरा ॥६८
सुधोणी तनुमध्या च वणिकपुत्री प्रिया शुभा ।
नाम्ना चन्द्रावली नाम समुद्गृह्याथ पञ्जरम् ॥१६
मा जग्राह सुचावेङ्गी कराभ्या चारहासिनी।
चकारोपरि पीनाभ्या स्तनाभ्या सा तदा च माम् ॥१००
उसके भय से मैंने उस महिला को त्याग दिया था और में फिर
दक्षिण की ओर मुख करके माग खडा हुआ था। हे मुने ! इस प्रकार से
शीघ्रता से दौड लगाते हुए मेरी खली ने रसना समासन्न होगई थी।
है ब्रह्मन् ! उस समय में यह मेरे प्राणो का नाश करने वाली थी।
उसमे आसक्त मेरा छ रात्रि में ही जीवित का क्षय होगया या ॥६३.
६। इसके अनन्तर में पुनः नरक गामो हो गया था। उम नारकीय
यातना से जब मैं मुक्त हुआ तो फिर मैंने एक शुक्र का शरीर धारण
पर जन्म प्रहण किया था। इसके उपरान्त एक महान् अरण्य मे दुष्ट
मात्मा का शयर के द्वारा में बद्ध होगया या ॥९॥ मशार ने मुज
एक पिंजरे में हालदिगा पा और एक शात) वश्य के पुत्र के लिये मुस
बेच दिया था। उसने भी मुझे युवतियो के समीप में अपने अन्तः पुर के
मध्य में रख दिया पाक्योंकि समस्त शास्त्रों का जाता है-इसी
निये दोषी मात करने वाला है-
-हरा हस्थित था। वहां पर
रहते हुए वे सब सहारण या औदन और फल आदि के द्वारा तया पके

शुक्र वलि सम्वाद वर्णन ] । ४२३ - हए अनार के फलों के द्वारा दिनों दिन मेरा पोषण किया करती थी। एक बार पद्म के दल के समान नेवी वाली-पीन स्तनों से सयुत-श्यामा सुन्दर श्रोणि प्रदेश वालो और मध्यमाग कृश वाली बड़ी प्रिय एव शुभ वणिक की पुत्री थी जो नाम से चन्द्रावली थी, उसने मेरे पोजरै का ग्रहण किया था ॥६७-६६। उस सुन्दर बगों वाली ने जो बहुत ही चार हारा वाली भी मुझको अपने हाथो से ग्रहण कर लिया था और उस समय में उसने मुझे अपने पोन स्तनो के ऊपर कर लिया था।॥१०॥ ततोऽह कृतवान्मावं तस्यां विलसितु प्लयन् । ततोऽनुप्लवमानोऽहं हारे मर्कटवन्वने ॥१०१ तनाह पापसयुक्तो मृतश्च तदनन्तरम् । भूयोऽपि नरकं घोरं प्रपन्नोऽस्मि सुदुर्मतिः ।।१०२ तस्मान्मृतो वृपत्वं च गतश्चाण्डालफक्कणे। स चंकदा मां शकटे नियोज्य स्वा विलासिनीम् ।।१०३ समारोप्य महातेजा गन्तुकृतमतिर्वनम् । तनाग्रतः स चाण्डालो गतः सा चास्म पृधनः ।।१०४ गायन्ती याति तच्छत्वा जातोऽहं व्यथितेन्द्रियः । पृष्ठतस्तु समालोक्य विपर्यस्तस्तथा प्लुतः ।।१०५ पतितो भूमिमगम क्षणेन क्षणविभ्रमात् । योक्त्रेण बद्ध एवास्मि पञ्चत्वमगमं तत्तः ।।१०६ भूयो निमग्नो नरके दशवर्षशतान्यहम् । जातस्तव गृहे तात सोऽहं जातिमनुस्मरन् । तावन्त्येवाद्य जन्मानि स्मरामि चानुपूर्वशः ।।१०७ इसके अनन्तर मैंने प्लवन करते हुए उसमे दिलाछ करने की भावना करली थी और इसके अनन्तर में मर्कट बन्धन हार में प्लव मान हो गया था।१०१॥ वहा पर मैं पाप से सयुक्त हो गया था और मर गया पा। फिर भी दुष्ट बुद्धि वाला में अतिधोर नरक में आकर प्राप्त हो गया पर॥१०॥ उससे सुटकारा पाकर मैं मृत हो फिर एक चाण्डाल के - ४२४ ] [ वामन पुराण फराण में वृपश्व की योनिको प्राप्त हुआ था। उसने एक बार मुझे एक गाई में जोड़ दिया था और उममे अपनी विलासिनी को बिठाकर लाया था और फिर उस महान् तेजस्वी ने वन मे भ्रमण करने का विचार किया था। उसके आगे यह चाण्डाल गया था और वह उसके पीछे थो ॥१०३-१०४॥ वह मधुर स्वर से गायन करती हुई जारही थी। उसके उस गान का धरण कर मैं तो व्यथित इन्द्रियों वाला होगया था। पीछे की ओर देखकर इस तरह से विपर्यस्त होकर में प्लुन हुआ था कि मैं भूमि में गिर गया था एक क्षण मात्र के विभ्रम से जूए मे ही पद्ध मैं वही पर पञ्चत्त को प्राप्त होगया था अपति मर गया था ।।९०५- १०६।। मैं फिर एक सहन्न वर्ष पर्यन्त घोर नरक मे निमग्न हो गया था। हे तात । वही में अब आपके घर में अपनी जाति का अनुम्मरण करते हुए समुत्पन हुआ हूँ। मैं उतने समस्त अपने जन्मों का आनुपूर्वी स स्मरण कर रहा हूँ॥१०७।। पूर्वाभ्यासाच शास्त्राणा वचनं चागत मम । तदह ज्ञातविज्ञानो नाचरिष्ये कथचन ।।१०८ प.पाति घोररूपाणि मनसा कर्मणा गिरा। शुभ वाऽप्यशुभ वाऽपि स्वाध्यायः शास्त्रजीविका ॥१०६ बन्धन वा वधो वाऽपि पूर्वाभ्यासेन जायते । जाति यदा पोविकी तु स्मरते तात मानवः। तदा स तेभ्यः पापेभ्यो निवृत्ति हि करिष्यति ॥११० तस्मादमिध्ये शुभवर्धनाय पापक्षयायाथ मुनेशरणम् । भवान्दिवावोतिमिम सुपुत्र गृहस्थधर्म विनियोजयस्य ।।१११ इत्येवमुक्तः स निशाकरस्तदा प्रणम्य मातापितरौ महा । जगाम पुण्य सदन मुरारे: ख्यात बदर्याश्रममाधमैशम् ।।११२ एव पुराऽभ्यासरतस्य पुसो भवन्ति दानाध्ययनादिकानि । तस्माच पूर्व द्विजवयं वै मयास्वभ्यस्तपान तु ते प्रवीमि 111१३ दान तपो वाऽध्ययन महर्षे स्तेय महापातकमग्निदाह । नानानिवाम्यसनाचपूर्व भवन्तिधर्मापयशालिनान्यथा ॥

शुक्र वलि सम्वाद वर्णन ] [४२५ इत्येवमुक्तो वलवारस शुक्र दैत्येश्वरः स्व गुरुमोशितारम् । घ्यायस्तदा त मधुकैटभारि नारायणंचक्रगदासिपारिणम् ।।११५ शास्त्री के पूर्वाभ्यास के होने के कारण ही मुझे ववन आगया है सो मैं विज्ञान को जानने वाला उसे अब किसी भी प्रकार से आचरण नही करूंगा ॥१०॥ घोर रूप वाले पाप जो मन~-कर्म और वाणी द्वारा किये जाते हैं । शुम अथवा अशुभ-स्वाध्याय और शास्त्र जीविका नन्धन अयवा वध ये सभी पूर्व के हो अभ्यास से हुमा करते हैं । हे तात! जिस समय में यह मानव पूर्व में होने वाली अपनी जाति का स्मरण किया करता है। उसी समय मे वह उन अपने कृत पापो से निवृत्ति किरा करता है ॥१०६-११०। इसलिये है मुने ! मैं तो अपने शुम के वर्धन करने के लिये और पापो का क्षय करने के वास्ते भरण्य में जाऊंगा । आप अब इस दिवाकौति पुत्र को ही जोकि एक सुपुत्र है गृहस्य के धर्म में विनियुक्त करिये ॥१११॥ बलि ने कहा-इम प्रकार से कहा गया वह निशाकर उस समय में है मह ! अपने माता पिता को प्रणाम करके मुरारि के परम पुण्य मदन को चला गया या जी आद्य एव ऐश वदर्याश्रम के नाम से विख्यात है ।।११२। इसी प्रकार से पूर्वाभ्यास से रति रखने वाले पुरुष के दान और अध्ययन आदि होते हैं । इसलिये है द्विजवयं ! मेरे द्वारा पूर्व में ही यह सब अभ्यस्त हैं मैं भी नही नोलता हूं ॥११३॥ दान-उपश्वर्या-अध्ययन-स्नेय- महापातक, अग्निदाह और ज्ञान हे मह ! अम्यसन करने से पहिले ही हुआ करते हैं । धर्म, अर्थ, और यश भी पूर्वाभ्यास से ही सम्पन्न हुमा करते हैं। अन्यया नहीं होते हैं ॥११॥ इस प्रकार से वह बलवान् दैत्येश्वर अपने गुरु और ईशिता शुक्राचार्य से बोला था। उसी समय में उन मधु कैटभारि चक्र गदा और खग धारण करने वाले नारायण का ध्यान करने लगा था ॥११॥ आप में कुछ

४२६ ॥
[ वामन पुराण
६०-बलि बन्धन वर्णन
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ते भगवान्वामनाकृतिः ।
यज्ञवाट समीपे स उच्चवचनमब्रवीत् ॥१
ॐकारपूर्वाः श्रुतयो मखेऽस्मिस्तिष्ठन्ति रूपेण तपोधनानाम् ।
यज्ञोऽश्वमेधः प्रवर: ऋतना युक्त यथा स्यात्कुरु दैत्यनाथ ॥२
इत्य वचनमाकर्ण्य दानवाधिपतिर्वशी।
सार्घ्यपानः समभ्यागाद्यन देवः स्थितोऽभवत् ।।३
ततः स देवदेवेश पूजयित्वा विधानतः ।
प्रोनाच भगवन्द्र हि कि दधि तव मानद ॥४
ततोऽब्रवीन्मधुरिपुर्दैत्यराज तमव्ययः ।
विहस्य सुचिर काल भरद्वाजमवेक्ष्य च ॥५
गुरोमंदीयस्य गुरुस्तस्यास्त्यग्निपरिग्रहः ।
न स धारयते भूम्या पारक्याया च पावकम् ॥६
तदर्थमभियानाय मम दानवपार्थिव ।
मच्छरीरप्रमाणेन देहि राज-क्रमत्रयम् ॥७
महपि पुलस्त्य ने कहा- इसी बीच मे समय प्राप्त होने पर धानन
को (बौना को शका वाले ) आवृति वाले भगवान ने उपस्थित होकर
पजबाट के ममोप प यह वचन न स्वर से कहा था--॥१॥ है
दैत्यनाय ! इम मप मे ओसार पूर्वक ध्रुतिपाइन सगस्त तपस्त्रियों के
स्वरुप मै समास्थित है। यह समस्त ऋतुओं में परम थे अश्वमेध
मन है । इममें जो भी युक्त हो वह तुम करो ॥२॥ इस प्रकार के वचन
काययण पर वगो दानवों पा अधिाति अध्यं पात्र हाय में सेपर यहाँ
पर उपस्थित हो गया था जहां पर वामनदेव विराजमान पे ॥३॥ इसके
उपरान्त देशों में भी देश प्रमुरा शिघि पूर्वक उसने पूरन पिस पा और
सो भनन्तर वह बोला-हे मान देन वाले गवन् ! मुझे मलाइ मैं
पापको कथा मर्मात पर अपर मपुरिपु उठ दत्य राज
बोरी । पहिले बहन रामपा हमार और भरद्वाज की ओर होने

बलि बन्धन वर्णन ] [ ४२७ देखा था ॥शा ये मेरे गुरु हैं। इनके अग्नि का परिग्रह है । यह दूसरे की भूम म पावक को धारण नहीं किया करते हैं ॥६॥ हे दानव पायिव । इनके लिये ही मरो यही अभियाञ्चा है कि आप मेरे शरीर के प्रमाण से ही तीन पद परिणाम वाली भूमि का दान कर दवें ॥७॥ मुरारिवचन थुत्वा बलिर्भार्यामवक्ष च । बाण च तनय वीक्ष्य इद वचनमब्रवीत् ।। न केवल प्रमाणेन वामनोऽय लघुप्रिय । येन क्रमनय चोक्त याचते मष्टिधेऽपि च ॥६ प्रायो विधाताऽल्पधिया नराणा वहिष्कृनाना खलु दिव्यपुण्य । धनादिक भूरि न वै ददाति तथैव विष्णुर्न बहुप्रयास ।।१० न ददाति विधिस्तस्य यस्य भाग्यविपर्यय । मयि दातरि यश्चाय याचते च प्रमत्रपम् ॥११ इत्येवमुक् वा वचन महात्मा भूयोऽप्युवाचाथ हरि सुरारि । यावच्च विष्णो गजवाजिभूमिदासीहिरण्य यदपीप्सित च ॥१२ भवाश्च याचिता विष्णो वह दाता जगत्पतिः । दातु वै मम लज्जेय कथ न स्यात्पदनये ॥१३ रसातल स्वा पृथिवी भुव नाकमथापि वा। एतभ्य कतम दद्या स्वस्थो याचस्व वामन ॥१४ भगवान मुरारि क इस वचन का श्रवण कर राजा बलि ने अपनी भार्या को ओर दृष्टि डाली और फिर अपने पुत्र वाण की ओर दृष्टि पात पात किया था। इसके पश्चात् वह वचन बोला-11८॥ यह केवल प्रमाण से हो वामन नहीं है कि बहुत ही छोटो वस्तु को भी प्यार करने वाला है जिमन मुझ जैस विभव शाती से मा केवल तीन पद प्रमाण वाली भूमि को याचना की है । वहुधा विधाता दो अल्स बुद्धि वाले और दिब्ध पुष्पों से वहिष्कृत मनुष्यो को अधिक धन आदि का वैभव नहीं दया करता है । उसो भौति विष्णु भी बहुत प्रयास शोल नहीं होत हैं ॥१०॥ जिम के भाग्य को विपरीतता होती है विधाता उसको नहीं दिया करता है जो दाता मुझ जैसे से भी केवल तीन पैड भूमि की ही ४२८ ] [ वामन पुराण याचना कर रहा है।११स तरह से यह वचन बहार वह महान् मारमा वाला सुरों का शन फिर भी यह बचन मुरारि से बोला-ह विष्णु जितने भी गन, अश्व, भमि, दासी, सुवण' आदि हैं उनमे जो भी अभीष्ट हैं । आप तो याचना करने वाले हैं और है विष्णो । मैं इस जगत् का स्वामी दान देने वाला हूँ। इस तीन पद प्रमाण भूमि के दान करने में मुझे लज्जा कैसे नहीं होगी? ॥१२-१३॥ हे वामन । रसासल, अपनी पृथ्वी, भू, नाक (स्वर्ग) इन सब किसको दू। आप स्वस्थ होकर याचना करे ॥१४॥ गजास्वभूहिरण्यादि तदथिभ्य, प्रदीयताम् । एतावदेव सप्रार्थी देहि राज-पदयम् ॥१५ इत्येवमुक्त वचने वामनेन महात्मना । बलि गारमादाय ददौ विष्णो क्रमत्रयम् ॥१६ पाणी तु पतिते तोये दिव्य रूप चकार है। त्रैलोक्य क्रमरणार्थाय वज्ररूप जगन्मयम् ।।१७ पादे भूमिस्तथा जड्घे नभस्सैलोक्यन्दितम् । सत्य तपो जानुयुग्मे ऊरू स्तो मेरु मन्दरौ।।१८ विश्वेदेवा: कटीभागे मरुतो बस्तिशीर्पयो.। लिङ्गस्थितो मन्मथश्च वृष्णस्थ प्रजापति ||१६ कुक्षिस्था अणवा सप्त जठरे भुवनान्यथो । वलियु निषु नद्यश्च यज्ञोऽन्तजठरे स्थितः ॥२७ इष्टापूर्तादयः सर्वा क्रियाममाश्च सस्थिता । पृष्ठस्था वसवो देवाः स्कन्धो रुद्र रधिष्ठिन. ॥२१ वामनदेव ने कहा-हे राजन् । हाथी, घोडे, भूमि, और सुवर्ण आदि पदार्थों के जो भो चाहने वाले याचक हो उन्हे वे सब दीजिए। मैं तो केवल इतनी ही प्रार्थना करने वाला याचक हू जो केवल तीन पंड भूमि हो पाहता हूं ॥१५॥ इस वचन के कहने पर महात्मा वामन के द्वारा राजा बलि ने भृ गारक लेकर विष्णु को तीन पैड भूमि का दान, सकला करके दे दिया था ||१६॥ उस सकस पे जल के हाथ में लेते बलि बन्धन वर्णन ] ( ४२६ ही बामन देव ने अपना दिय रूप धारण कर लिया था जोकि इस विलोकी के क्रमग करने के लिए जगन्मय व रूप पो ॥१७॥ उनके पाद मे यह सम्पूर्ण भूमि आगई यो जघनो मे लोक्य वन्दित नभस्तल आगया था-जानु युग्म मे सत्य और तपलोक थे और करुनों में मेरु एवं मन्दराचल थे ॥१८॥ समस्त विश्वेदेव कटि भाग में पे-बस्ति और शोपं मे मद्ग घे.लिङ्ग मे कामदेव था और प्रजापति वृपणो मे सस्थित थे॥१६॥ सातो सागर कुक्षियों मे थे और जठर में अन्य ममस्त नदियों थी और यज्ञ जठर के अन्दर में स्थित था ॥२०॥ दृष्टा पूर्तादिक समस्त क्रियाएँ और उनके मन्त्र भी वहीं पर सस्थित थे। पृष्ठ भाग में सब वसुगण थे और रुद्रों से अधिष्ठित स्कन्ध या ॥२१॥ वाहवश्च दिशः सवी वमवोऽष्टी कराः स्मृताः।। हृदये संस्थितो ब्रह्मा कुलिशो हृदयास्थिषु ॥२२ श्रीसहस्रमुरोमध्ये चन्द्रमा मनसि स्थितः । ग्रोवाऽदितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलये स्थिताः ॥२३ मुसे तु साग्नयो विप्राः संस्कारा दशनच्छदाः । धर्मकामार्थमोक्षाशास्त्र व समन्विताः ।।२४ लक्षम्या सह ललाटस्यो श्रवणस्थो हि चाश्विनौ । श्वासस्थो मातरिश्वा च मरुतः सवसधिषु ।।२५ सर्वमूक्तानि दशना जिह्या देवी सरस्वती। चन्द्रादित्यौ च नयने पक्षमस्याः कृत्तिकादयः ।।२६ विशासा देवदेवस्य भ्र वोर्मध्ये व्यवस्थिताः। तारका रोमकूपेभ्यो रोमागि च महर्षयः ॥२७ गुणः सर्वमयो भूत्वा भगवान्भूतभावनः । क्रमेणवेन जगती जहार सचराचरम् ।।२८ समस्त दिशाएं उनकी बाहऐ पी और आठ वमुगण उनके पर थे। हृदय में ब्रह्मा विराजमान पे और दुपिरा आदि सब उनसे हृदय की अस्थियों में मस्थित पे ॥२श कर रे मध्य में भी सहय या तपा मन में चन्द्रमा स्पिउपा। देवमाता अदिति उनरी प्रोश पो और ४३०) ( वामन पुराण । उनके वलप मे सब विद्याएं विराजमान थी |२३|| मुख में अग्नियों के सहित विप्रगण थे और सम्पणं सस्कार दशननच्छर (होठो) में विराजमान थे। धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष सव शास्त्रों से सयुत वहीं पर विराजमान पे ॥२४॥ ललाट में स्थित लक्ष्मी के सहित नारायण थे। अश्विनी कुमार दोनो श्रवणो में सस्थित थे। मातरिश्वा श्वास मे स्थित था तथा मरुत सब सन्धि भागो में विराजमान थे ॥२॥ सम्पूर्ण सूक्त उनके दशन थे और देवी सरस्वती जिह्वा पर विराजमान थी । चन्द्र और सूर्य उनके दोनो नेत्र थे तथा कृत्तिका प्रभृति नक्षत्र सब पक्ष्यों में विराजमान थे ॥२६॥ देवो के भी देव के भ्रू ओं के मध्य में विशाखाएं विद्यमान थी। रोम कूपो मे तारक थे और सब महर्षि- गण उनके रोम थे । २७। ऐसे गुणो से भूतभावन भगवान् सर्वमय हो गये थे। उन्होने एक क्रमण से सम्पूर्ण चराचर इस भूमि का हरण कर लिया था अर्थात् नाप डाला था ॥२८॥ ऊर्ध्व विक्रममाणस्य महारूपस्य तस्य वै । दक्षिणोऽभूत्ततश्चन्दु सूर्योऽभूत्सव्यस्तथा ॥२६ तृतीयक्रमणेनाथ स्वर्महजनतापसाः । का तास् वद्धन वै राजन्नद्धनापूर्यताम्वरम् ॥३० तत' प्रवधितो ब्रह्मविष्णु दक्षिणान्तरे । ब्रह्माण्डोदरमाहत्य निरालोक जगाम सः॥३१ विश्वाइ घ्रिणा प्रसरता कटाहे भेदितेऽम्बरात् । कुटिला विष्णुपादात्तु ससाराकुलिता तत..२ तस्माद्विरणुपदीत्येव ता स्तुवन्ति च तापसाः। भगवानप्यसपूर्णे तृतीयेऽनुक्रमे विभु.॥३३ समभ्येत्य वलि प्राह ईपत्प्रस्फुरिताधरः। ऋणे भवसि दैत्येन्द्र बन्धन घोरदर्शनम् । त्वं पूरय पद तन्मे नोचेद्बन्ध प्रतीच्छ मे ।।३४ मुरारिवगः श्रुत्वा विहस्याथ बलेः सुतः । वाण प्राहामरपति वचन हेतुसयुतम् ॥३५ बलि बन्धन वर्णन ) (४३१ उस महा रूप के ऊपर की ओर विक्रममाण होने पर इन्दु तो दक्षिण भाग में हो गया था और सव्य भाग मे सूर्य देव हो गये थे ॥२६॥ तीसरे क्रमण से अर्थात तीसरे पैड के नापने से उन्होने स्व- लोक-जन लोक, मोर तप लोक क्रान्त कर लिये थे। आधे से ये क्रान्त किये और आधे से अम्बर को पूरा कर दिया था ॥३०॥ इसके उप- रान्त प्रबद्ध मान होते हुए विष्णु ने हे ब्रह्मन् ! दक्षिणान्तर मे जाकर ब्रह्माण्डोदर को आहत किया था और फिर वे निरालोक को चले गये थे ॥३१।। प्रसरण करने वाले विश्वाघ्रि से अम्बर से कटाह के भेदित होने पर विष्णु पाद से कुटिला वह ससराकुलिल हो गई थी ॥३२॥ इसी लिये तपस्वीगण उसको विष्णु पदी-इम नाम से स्रवन किरा करते हैं । विभु भगवान् भी तीसरे अनुक्रम के अपूर्ण होने पर अर्थात् जव तीसग पंड पूरा नहीं हुआ तो दैत्यराज बलि के पास उपस्थित होकर थोडे होटो को फडकाते हुए बोले-हे दैत्येन्द्र ! तुम तो मेग तीमरा पद पूरी न होने पर ऋण म फस गये हो अतएव उसका परिणाम घोर दर्शन बन्धन है। तुम या मेरे पद की पूर्ति कर दो या मुझ से अपना बन्धन स्वीकार करो ॥३३-३४॥ मुरारि के इस वचन का श्रवण करके बलि का पुत्र बाण हंसकर अमरपति से हेतु सयुत वचन बोला--॥३५॥ कृत्वा महीमल्पतरा जगत्पते स्वय विधाता भुवनेश्वराणाम् । कथवलिप्रार्थयसेमुविस्तृतायाप्राग्मवानोविपुलाचकार ॥३६ विमो मही यावती च त्वयाऽद्य सृष्टा समेता भुवनान्तराले । दता च तातेन हि तावतीयं किंवावलेनंप निवध्यतेऽद्य ॥३७ ययैव शक्त्या भवता हि पूर्व तयैव शक्त्या दितिजेश्वरोऽसो। शक्तस्तु सम्पूजयितु मुरारे प्रसीद मा बन्धनमादिशस्व ॥३॥ प्रोक्त श्रुतौ भवताऽमीश वाक्य दान पाने जायते सौख्यदायि । देशे पुण्ये तद्वदेवापि काले तन्वाशेपं दृश्यते चक्रपाणी ॥३६ दान भूमि: सर्वकामप्रदाता भवान्पात देवदेवोऽजितात्मा। कालोज्येष्ठामूलयोगेमृगाइकुरक्षेत्र पुण्यदेश.प्रमिद्धा ॥४० ४३२ ] [ वामन पुरान . किं वा देवैर्मविधैर्बुद्धिहीनः शिक्षा नेया साधुवाऽसाधु चैध । स्वय श्रुतीनामपि चादिकर्ता व्यवस्थितः सदसद्यो जगद्वै ॥४१ कृत्वा प्रमाणं स्वयमेव हीन पदवयं याचितवांस्तु यच्च । कित्वहिगृल्लासिविभोमहात्मारूपेणलोकप्रतिवन्दितेन ।।४२ वाणामुर ने कहा-हे जगत के स्वामिन् ! आपने इम मही को स्वल्पतर बना दिया है क्यो कि आप तो स्वय ही भुवनेश्वरी के विधाता हैं । आप अब बलि से कैसे प्रार्थना कर रहे हैं जिप्त मुविस्तृत को आपने पहिले विपुल नहीं किया है ॥३६॥ हे त्रिभो ! जितनी भूमि अापने आज सृजन की है और जो भुवनान्तराल मे समेत है मेरे पिता ने यह सब की मब उतनी ही आपको देदी है। अब आप वाणी के छल से इनको क्यो बाध रहे हैं ? ॥३७॥ आपने जिस शक्ति से पहिले । रचना की है उसी शक्ति से यह दितिजेश्वर है । हे मुरारे ! आपका मली भाति पूजन करने को यह शक्त है । आप प्रसन्न होइये और इनके बन्धन का आदेश मत दीजिए ॥३८॥ हे ईश! आपने ही श्रुति मे भी वाक्य कहा है कि पात्र मे दान सौख्य देने वाला होता है । पुण्य देश और काल में भी वह दान सुख प्रद हुआ करता है । वे सभी बाते चक्रपाणि मे दिखलाई देरह हैं ॥३६॥ दान तो भूमि का है सर्व कामो का प्रदान करने वाला उस दान का देने वाला है और देवो के भी देव अजित मात्मा वाले आप उस दान के पात्र हैं। काल भी बहुत अच्छा है क्यों कि चन्द्रमा ज्येष्ठा मूल के योग मे है तथा कुरुक्षेत्र जैसा परम पुण्य मय देश है जो अत्यन्त प्रसिद्ध है ॥४०॥ देवो। के द्वारा अथवा मुक्त जैसे बुद्धि होनो के द्वारा साधु अथवा असाघु क्या शिक्षा दी जा सकती है । आप तो स्वय ही घुतियो के आदि कर्ता हैं जो भी सद् और असद् जगत व्यवस्थित है ॥४१॥ स्वय ही हीन तीन पर करके जो आपने याचना की थी। अब महात्मा आप हे विमो ! लोकप्रति वन्दित रूप से क्या ग्रहण कर रहे हैं ॥४२॥ नावाश्चयं यजगढ समग्र क्रमत्रयेणव पूर्ण तवाद्य । क्रमेण भो सङ्घयितु समर्थो मही समना ननु लोकनाथ ॥४३ ।

वलि बन्धन वर्णन )
४३३
प्रमाणहीनां स्वयमेव कृत्वा वसुधरां माधव पद्मनाम ।
विष्णोनिबध्नासिकथंवलित्वंविभुयंदेवेच्छसितत्कुरुष्व ॥४४
इत्येवमुक्त वचने वलिना वलिमूनुना ।
प्रोवाच भगवान्वाक्यं ह्यादिकर्ता जनार्दन: ४५
यान्युक्तानि वचांसोत्यं त्वया वालेय साम्प्रतम् ।
तेषां व हेतुमंयुक्तं शृणु प्रत्युत्तरं मम ॥४६
पूर्वमुक्तस्तव पिता मया राजन्पदलयम् ।
देहि मह्म प्रमाणेन तदेतत्समनुष्ठितम् ॥४७
कि न वेत्ति प्रमाणं मे बलिस्तव पिताऽमुरः ।
प्रायच्छयेन निःशङ्कमम मानं पदनम् ॥४८
सत्यं क्रमेण चैनं क्रमेयं भूर्भुवादिकम् ।
वलेपि हितार्थाय कृत्तमेतत्क्रमद्वयम् ।।
इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं हैं कि आप के तीन पदों में ही आज
यह जगत् सम्पूर्ण पूर्ण हो गया है । हे लोक के नाथ ! आप तो इम
क्रम मे इम समग्र भूमि का लंघन करने में पूर्ण समर्थ हैं। ॥४३॥ है
पद्म नाम माधव ! आपने स्वयं ही इम वमुग्धरा को प्रणाम होन
किया है । है विष्णो ! अब आप बलिका बन्धन क्यों कर रहे हैं । आप
तो विभु हैं फिर जो भी कुछ आप चाहते हैं करिये ॥४४॥ पुरस्त्यजी ने
पहा-बलवान् बनि राजा के पुत्र के द्वारा इस प्रकार से बचनी के
पहने पर आदि रत्ता भगवान उनादन यह वचन रहा था ॥४५॥
त्रिविक्रम ने कहा है शालेय ! तुम में इस प्रकार में जो भी वरन इस
समप में ह डाले हैं अब उन मन बचनों का हेतु ममन्धित मेग यु.
तर तुम गुनलो ॥४६॥ हे राजन् ! पहिने तेरे पिता से मैंने तीन पंह
हो रहे थे कि उन्हें मेरे प्रमाण मे दे। वही मैंने लिया है ॥४७॥
क्या तुम्हारे पिता अमुर पनि मेरे प्रमाण को नहीं जानडे हैं जिमने
बिना किसी बाके मेरे तीन पदों में मान को दे दिया था ॥४॥
मह सत्य है कि में एक ही क्रम में मुमुवादिक प्रमाकर सेवा रिनु
यह मो मने बलि केही हित के निरे दो मरिये है ॥४६॥

४३४
[ वामन पुराण
.
तस्माद्यन्मम बालेय त्वरिपवाऽम्बु करे महद ।
दत्त तेनायुरैतस्य कल्प यावद्भविष्यति ।।५०
इदमुक्त्वा बलिसुत वाण देवास्त्रविक्रम.।
प्रोवाच बलिमभ्येत्य वचन मधुराक्षमम् ।।५१
आपूर्णाक्षिणाया गच्छ राजन्महाफलम् ।
सुतल नाम पाताल वस तत्र निरामय ॥५२
सुतले वसतो नाथ मम भोगा कुतोव्यया.।
मविष्यन्ति तु येनाह वसिष्यामि निरामयः ।।५३
सुतलस्थस्य दैत्येन्द्र यानि भोग्यानि तेथुना।
भविष्यन्ति महार्हाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ।।५४
दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धास्यशोत्रियाणि च ।
तथाऽधीतान्यतिभिर्दास्यन्ति भवतः फलम् ।।५५
तथाऽन्यमुत्सव पुण्य वृत्त शक्रमहोत्सवे ।
दोनप्रदाननामाऽसौ तव भावी महोत्सव ॥५६
हे वालेय ' तुम्हारे पिता ने जो मेरे हाथ में मकरूप करके जल दिया
था उसी से इमी आयु एक कल्प पर्यन्त हो जायगी ॥५०॥ देव क्षिवि-
क्रम ने बलि के पुत्र बाण को यह कहकर फिर बलि के समीर मे आकर
मधुर अक्षरों में यह पवन कहा था-॥५१॥ श्री भगवान्
ने कहा-
राजन् ! दक्षिणा के आपूरण से महान फन को प्राप्त करो। सुगल
गामा जो पाता है वही निरमय होपर निवास करो ॥५२॥ बलि ने
रहा है नाय गुप्तल में घास परते मेरे भोग अध्यय से होंगे जिमसे
कि मैं निरामय होर यास वगा ॥५३॥ विविका ने रहा है
देश्य है । गुनम में स्थित आप इस समय में जो भोग्य होगे वे महाई
होग। उन्हें गय प्रभार से में बताता ॥५४॥ विना विधि में
शिप
पदान-अपोत्रिय पाट और अवतियों पे अधीत ये सब
भापरीवही पर पगगे ॥५शक महोरम के हो पर मय पुभ
उरगर है मिसका नाम दोर प्रसा है यह भायो महोत्सव होगा ॥५६॥

वलि वन्धन वर्णन 1 [ ४३५ तत्र त्वां नरशार्दूला हृष्टाः पुष्टाः स्वलंकृताः। दुप्पदीपप्रदानेन अर्चयिष्यन्ति यलतः ॥५७ तलोत्सदो मुख्यतमोभविष्यति स चापिलोकेतवनामचिह्नितः । यथेवराज्ये भवतस्तु साम्प्रतंतर्थव सा भाव्यथ को मुदीति ॥५८ इत्येवमुक्त्वा मधुहा दितीश्वरं विसर्जयित्वा ससुतंसमार्यम् । उर्वी समादाय जगाम तूर्ण सशक्रब्रह्मामरसंघजुष्टः ॥५॥ दत्त्वा मघोनमधुजिविविष्ट पंकृत्वा च देवान्मखमागभोगिनः । अन्तर्दधे विश्वपतिर्महेशः संपश्यतामेव सुराधिपानाम् ॥६० स्वर्ग गते धातरि वासुदेवे शाल्वोऽमुराणां महता वलेन । कृत्वा पुरंसौममितिप्रसिद्ध तदाऽन्तरिक्षविचचारकामात् ॥६१ भयश्च कामादिपुरं महात्मा मुवर्णताम्रायसमुग्रसौख्यम् । स तारकास्यः सह वैद्युतेन संतिष्ठते मित्रकलनवांश्च ॥६२ वहाँ पर हष्ट-एवं पुष्ट नर शार्दूल स्वलंकृत होकर यत्न पूर्वक पुभदीप प्रदान के द्वारा आपका अचंन करेंगे ।।५७। वहां पर परम मुन्य नत्मव होगा और लोक मे वह आपके नाम से चिह्निन होगा । जिम से आपके राज्य में इस समय है वैसे ही वह कौमुदी वहीं पर होने वाली है ।।५८।। मघुदैत्य के वध करने वाले प्रमु ने इम प्रसर से इतना कहकर मुन और भार्या के महित दिनीनगर का विम. जन कर उर्वी को लेकर ब्रह्मा-इन्द्र और देवगण के संघ से संयुन मोघ्र ही चले गये थे ॥५६॥ मधुजित् भगवान ने त्रिविष्टप को इन्द्र के गुपुर्द कर और ममस्त देवों को मय के भाग का भोगो बना कर फिर सिनि गहेग मम्पूर्ण मुराधियों के देश२ अन्तर्धान हो गये ये ॥६॥ धाता वासुदेश के सर्ग मे चने जाने पर असुरों के महान बल से शास्त्र मोमपुर बना कर जो इनो नाम से विधान है फिर स्वेच्छा से अन्तरिक्ष में उम समय में विचरण करने लगाया ॥६१॥ महारमा मर स्वेच्छा से मुवरा-तान और आग उप मोर पाले निपुर में रहता था। यह सारक नाम वारा यात के साप मित्र और शाला हस्पित २४ादा ॥२॥ तरह [ वामन पुराण बाणोऽपि देवेऽथ गते प्रिविष्टपं बद्धघलौ चापिरसातलस्थे। कृत्वा सुगुप्तभुविशोरिणताख्य पुरं स चास्ते सहदानवेन्द्रः॥६३ एवं पुरा चक्रधरेण विष्णुना बद्धो वलिमिनरूपधारिण 1 शक्रप्रियार्थ सुरकार्यसिद्धये हिताय विप्रपं भगोद्विजानाम् ।।६४ प्रादुर्भवस्ते कथितो महर्षे पुण्यः शुचिर्वामिनस्याघहारी। श्रुते यस्मिन्कीर्तिते सस्मृते च पाप याति प्रक्षयं पुण्यमेति ॥६५ एतत्प्रोक्त वामनीय चरित्रं बद्धो बलि: पुण्यकी तिर्यथाऽसौ । यच्चैवान्यच्छ्रोतुकामोऽसि विप्रतत्तेवक्ष्येन हि ब्रह्मान शेषम् ॥६६ वाण भी देव के त्रिविष्टय में चले जाने पर तथा बलि के बद्ध और रसातल मे स्थित होने पर भूमण्डल में परम गुप्त शोणित नाम वाला पुर बना कर दानवेडो के साथ वहा पर रहता था ॥६३।। इस प्रकार से पहिले चक्रधारी विष्णु ने वामन रूप धारण करके बलि को बद्ध किया था जो कि इन्द्र के प्रिय सुरो के कार्यों की सिद्धि और विप्र गौ तथा द्विजो के हित-सम्पादन के लिये ही किया था। ॥६॥ भगवान् वामन देव का प्रादुर्भाव है महर्षे ! परम पुण्यमय-शुधि तथा अधो का हरण करने वाला है उसको हमने पापको बतला दिया है। जिमके श्रवण करने पर-कीर्तन करने पर और स्मरण मात्र कर लेने पर पास का क्षय हो जाया करता है और पुष्प का लाभ होता है ॥६५॥ यह वामन का चरित्र कह दिया गया है जिसमे बलि का बन्धन है और यह पुण्य कीति वाला है अब है विप्र ! जो कुछ अन्य आप सुनना चाहते हैं हे ब्रह्मन् ! वह मुझे बतलाओ, मैं समो पूर्ण रूप से तुमको बतलाऊ गा ॥६६॥ ६१--भगवत् प्रशंसा गत्वा रमातलं दैत्यो महामणिविचित्रितम् । शुद्धस्फटिकसोपान कामास व पुरम् ॥

भगवत् प्रशंसा ] [ ४३७ तत्र मध्ये सुविस्तीर्णे प्रासादो वहुवेदिकः । मुक्तजालान्तरद्वारा निर्मितो विश्वकर्मणा ॥२ तत्रास्ते विविधान्भोगान्भुजन्दिव्यास मानुषान् । नाम्ना विन्ध्यावलीत्येवं भार्याऽस्य दयिताऽभवत् ।।३ युवतीनां सहस्रस्य प्रधाना शीलमण्डना। तया सह महातेजा रेमे वैरोचनिमुने ।।४ भोगासक्तस्य दैत्यस्यवसतः सुतले तदा । दैत्यतेजोहरं प्राप्त पातालं वै सुदर्शनम् ॥५ चक्र प्रविष्ट पाताले दानवाना भयं महत् । अभूदलहलाशब्दः क्षुभितार्णवसनिभः ।।६ त श्रुत्वा सुमहच्छब्द वलि: खङ्ग समाददे । आ. किमेतदितीत्यं च पप्रच्छासुरपुङ्गवः ॥७ पुलस्त्य मुपि ने कहा-दत्यराज ने रसातल में पहुंच कर महान् मणियो से विचित्र ए विशुद्ध स्फटिक मगियो का सोपान युक्त पुर की रचना कराई थी | उसमे मध्य में जो कि पर्याप्त रूप से विस्तृत था एक बहुत वेदियो बाले प्रासाद का निर्माण कराया था जो कि मुक्ताओ के जाल वाले अनार द्वार जिसमे विद्यमान ये ऐमा विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित किया गया था ॥२॥ वहां पर अनेक प्रकार के दिव्य और मानुप भोगों का उपभोग करता हुआ वह रहा करता था। उसकी भार्या विन्ध्यावली नाम वाली परम प्रिया पो॥३॥ यह सहस्रो युद- तियों में परम प्रमुख यो और शील के मण्डन से मण्डित थो। हे मुने ! उसी अपनी प्रियतमा भार्या के माय वह विरोधन का पुत्र वलि यहा पर सानन्द रमण किया करता था ॥४॥ इम प्रसार भोगो के उपभोग मे परमाधिक आरक्त होकर वहाँ पर सुतन में निवास करने दैत्य के तेज को हरण करने वाला सुदर्शन उस समय मे पाताल में प्राप्त हो गग था ॥५॥ उम सुदर्शनचक्र के पाताल लोक में प्रविष्ट होने पर समस्त दानयो को भीषण भर हो गया था और क्षोम से युक्त मागर के सदस यहां पर हलाहला ध्वनि उत्पन्न हो गई यो ॥६॥ उगु महान् घोष भगवद प्रशंसा [ ४३६ बोला-और उसने विधि-विधान के साथ उस चक्र का अर्चन किया था और इस स्तोत्र के द्वारा सस्तवन किया था-1११॥ राजा बलि ने कहा- मैं दैत्यो के चक्र का विदारण करने वाले भगवान् श्री हरि के चक्र को नमस्कार करता हूँ। आप तो सहस्र किरणो वाले ---सहर आभा से सम्पन्न और सहस्र अरो से युक्त सुदर्शन देव हैं ॥१२।। मैं भगवान् श्री हरि के चक्र की सेवा मे नमस्कार अपित करता हूँ जिन भगवान् की नाभि में पितामह विराजमान रहते हैं। तुग मे त्रिशूल के धारण करने वाले भगवान् शकर हैं और अराओ के मूल मे महान् पर्वत है ।।१३।। आपके अराओ मे इन्द्र-अर्क और पावक भादि के सहित समस्त देवगण विराजमान है। जिसके वेग मे वायुदेव हैं तथा जल-अग्नि-पृथिवी और नभ विद्यमान हैं ॥१४॥ अरासधिषु जीमूता. सौदाम्न्युक्षाणि तारका.। बाह्यतो मुनयो यस्य वालखिल्यादयस्तथा ।।.५ तदायुधवर देव वासुदेवस्य भक्तितः । विधा पाप शरीरोत्थ वाग्ज मानसमेव च ।।१६ तन्मे दहस्व दीप्ताशो विष्णोचक्र सुदर्शनम् । यस्कली बहुल पाप पैतृक मातृक तथा ११७ तन्मे हरस्व तरसा नमस्तेऽस्त्वच्युतायुध । आपदो मम नश्यन्तु व्याधयो यान्तु सक्षयम् । स्वन्नामकीर्तनाच्चक दुरित यातु सक्षयम् ।।१६ इत्येवमुक्त्वा मतिमान्समभ्याथ भक्तितः । सस्मरन्पुण्डरीकाक्ष सर्वपापविनाशनम् ॥१६ पूजित बलिना चक्र कृत्वा निस्तेजसोऽसुरान् । निश्चक्रामाथ पातालाद्विपुवे दक्षिणे मुने ॥२० सुदर्शने विनिष्क्रान्ते बलिविलवता गतः । परमामापद प्राप्य सस्मार स्व पितामहम् ॥२१ आपकी अराओ को सन्धियो में जीमूत-(मेव) सौदामिनी ऋक्ष घोर तारागण सस्थित हैं और बाहर के भाग मे वालखिल्य प्रभृति ४३८ ] । वामन पुराण का श्रवण करके देस्यराज बलि ने अपना पण ग्रहण कर लिया था और असुरराज ने पूछा था कि यह क्या इस प्रकार से हो रहा है ? ॥७॥ तनो विन्ध्यावलिः प्राह सान्त्वयन्ती निज पतिम् । पोशे खङ्ग समाधाय धर्मपत्नी शुचिता । उवाच मधुर वाक्य दैत्यराज सुनिश्चितम् । एतद्भागवत चक्र देत्यचक्षयकरम् ॥ सपूजनीय दैत्येन्द्र वामनस्य महात्मनः । इत्येवमुक्त्वा चावङ्गी प्रयता सा विनियंयौ ॥१० अयाभ्यागात्सहस्रार विष्णोश्चक सुदर्शनम् । ततोऽमुरपतिः प्राह कृताञ्जलि टो मुने । सपूज्य विधिवञ्चक्रमिद स्तोत्रमुदैरयत् ।।११ नमस्यामि हरेश्चक्र दैत्यचक्रविदारणम् । सहस्राशु सहस्राभ सहबार सुदर्शनम् ॥१२ नमस्यामि हरेश्चक यस्य नाभ्या पितामहः । तुङ्ग निशुलधृवशवं अरामूले महाद्रय ॥१३ मरासु सस्थिता देवा सेन्द्राश्चि सपावका । जवे यस्य स्थितो वायुरापोऽग्निः पृथिवी नभः ।।१४ इसके अन्तर उस विन्ध्यावली ने अपने स्वामी वो मान्त्वना देती हुई ने कहा था उस समय मे परम शुचि वर वाली बलि की धर्म पत्नी खङ्ग को कोश के अन्दर करा कर प्रार्थना की थी। उस विन्ध्या- वली ने दैत्यराज से परम मधुर सुनिश्चित वचनो के द्वारा यह कहा था कि यह भगवान् का सुदर्शन चक्र है जो देस चक्र के क्षय करने वाला है ॥६॥ है दैत्येन्द्र 1 इस महात्मा वामन के चक्र की मनी भाति पूजा करनी चाहिए । इस प्रकार से अपने स्वामी से वह परम सुन्दर अङ्गों वाली विघ्यावली कह कर प्रयत होती हुई वहां से निकल कर चली गयी थी ।।१०। इसके अनन्तर सहस्र अरों वाला भगवान विष्णु का वह सुदर्शनचक्र वहाँ पर आ गया था । हे मुनिवर ! इसके उपरान्त वह असुरो का स्वामी राजा बलि अपने दोनो हाथो को जोड कर भगवत् प्रशंसा ] [ ४३६ चोला-और उसने विधि विधान के साथ इस चक्र का अर्चन किया था और इस स्तोत्र के द्वारा सस्नुवन दिया था-1११॥ राना बलि ने कहा- मैं दैत्यों के चक्र का विदारण करने वाले भगवान श्री हरि के चक को नमस्कार करता हूँ। आप तो सहन किरणों वाले--महस्र आभा से सम्मान और सहर अरो से युक्त मुदन देव हैं ॥१२॥ मैं भगवान् घी हरि वे चक्र को सेवा मे नमस्कार अपित करता हूँ जिन भगवान् को नाभि मे पितामह विराजमान रहते हैं । तुग म तिथून के धारण करने वाले भगवान् सकर है और अरामो के मूल में महान् पर्वत हैं ॥१३॥ आपरे अराओं में इन्द्र-अर्क और पावर मादि के सहित समस्त देवगण विराजमान हैं। जिसके वेश में वायुदेव हैं तथा जल-अग्नि पृथिवी और नम विद्यमान हैं ॥१४॥ अरासधिपु जीमूता. सौदाम्न्य॒क्षाणि तारका. । वाह्यतो मनयो यस्य वालखिल्यादयस्तथा ॥.५ तदायुघवर देव वासुदेवस्य भक्तित.। विधा पाप शरोरोत्य वाग्ज मानसमेव च ।।१६ तन्मे दहस्व दीप्नामो विष्णोचक सुदर्शनम् । यत्कलो बहुल पाप पंतृक मातृक तथा ॥१७ तन्मे हरस्व तरसा नमस्तेऽस्त्वच्युनायुध । मापदो मम नश्यन्तु व्याधयो यान्तु सक्षयम् । स्वनामकीर्तनाचक्र दुरित यातु सक्षयम् ।।१८ इत्येवमुक्त्वा मतिमासमभ्यपि भक्तिनः। सस्मरन्पुण्डरीकाक्ष सर्वपापविनाशनम् ।।१६ पूजित बलिना चक्र कृत्या निस्तेजसोनुरान् । निनामा, पातालाहिपुवे दक्षिणे मुने ॥२० सुदर्शने विनितान्त वलिवितावता गतः । परमामापद प्राप्य सस्मार स्वं पितामहम् ॥२स आपरी बरामों को मधियों में जीमूत-मित्र) पौरामिनी शुभ मोर ठारामा सस्पित हैं और बाहर भाग में पातपित्य प्रति दामन पुराग मुनिगण विराजमान है ॥१५॥ उन भगवान् वासुदेव र परम यंत्र भायुध देव आपकी सेवा मे में भक्ति भाव मे नमस्कार परता। तीन प्रकार में शरीर में मुस्थित पाप है वाणी में उस होने वाले और तोपरी पार पापाप मन में उत्पन्न होने वाला है ॥१६॥ है, दोन रिणो वारो ! आप तो भगवान् रिशु पे मुदर्शनपर हैं। आप मेरे इन तीनों प्रसार के पापों को कृपया ६ पर दोमिए । जो इस पलियुग मे पंतृक और मातृत बहुत सा पाप है, हे अध्युन भगवान् है वायुध ! उस मम्पूर्ण पाप का भाप सोना से हरण कर दीजिए। थापकी सेवा में मेरा प्रणाम है । मेरी ममस्त आप तथा नष्ट हो जावे और मेरी सब स्याधियोगी क्षीण हो जायें। हे चक्र आपके पास शुभ नाम के ही कोतन से मेरे सब दुरित (पाप) क्षाको प्राप्त हो जावे ।।१७-१८॥ इस प्रकार से सविनय वह पर मतिमान् रारा बलि ने भक्ति भाव से सुदर्शन चक्र वा यजन किया था। उस समय में मद पापो के विनाश करने वाले भगवान् पुण्डरीकाक्ष का स्मरण किया था ॥१६॥ अमुरो को निस्तेज परते हुए राजा बलि के द्वारा चक्र का पूजन किया गया था इसके अनन्तर हे मुने ! वह पक पाताल लोक से विपुत्र दक्षिण मे निकल कर चला गया था ॥२०॥ उस सुदर्शन चक्र के विनिष्क्रान्त हो जाने पर राजा बलि अधिक विवाद हो गया था और उस समय मे परमाधिक आपदा को प्राप्त करके अपने अपने पिता. मह का स्मरण किया था ॥२१॥ स चापि सस्मृत प्राप्तः सुतल दानवेश्वरः । दृष्ट्वा तस्थौ महातेजाःसाध्यंपात्रो वलिस्तदा ॥२२ स तमभ्यय विधिना पितुः पितरमीश्वरम् । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा इद वचनमब्रवीत् ॥२३ सस्मृतोऽपि समायातः सुविपण्णेन चेतसा । तन्मे हित च पथ्य च श्रेयासि त्वं तदा शुभम् ।।२४ किं कार्य तात ससारे वसता पुरुपेण हि । कृतेन येन व नास्य बन्धा समुपजायते ॥२५ भगवत् प्रशंसा ] । ४४१ संसारार्णवमग्नानां नराणामल्मचेतसाम् । तारणाय भवेद्यस्तु तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।।२६ एतद्वचनमाकर्ण्य तत्पौत्राद्दानवेश्वरः। विचिन्त्य प्राह वचन संसारे यद्धितं परम् ।।२७ साधु दानवशार्दूल यत्ते जाता मतिस्त्वियम् । प्रवक्ष्यामि हितां तेऽद्य तथाऽन्येषा नृणामपि ।।२८ वह दानवेश्वर मो स्मरण किये जाने पर उसी समय मे सुनललोक में प्राप्त होगया था। उसी समय में वहाँ पर पितामह का दर्शन प्राप्त परके वह महान तेज वाला राजा बलि अध्यं के पात्र के साथ ही उप- स्थित होगमा पा ॥२॥ उसने विधि पूर्वक पिता का अपर्चन किया था और फिर हाय जोड़कर यह वचन बहने लगा ॥२३॥ माप मेरे द्वारा स्मरण करते हो सुविषाद मे युक्त चिन से यहां पर प्राप्त होगये हैं इमलिये अब आप मेरा हित-पध्य-श्रय और शुभ हों उन्हें बतलाइये ॥२४॥ हे तात ! इस संसार में निवास करने वाले पुरुष को क्या-क्या करना चाहिए जिसके करने से इस जोदात्मा को फिर वन्धन नहीं रहे या उत्पन्न होवे ।।२५। इस संसार रूपी सागर मे निमार, थला चित वाले मनुष्यों के तारने के लिये जो भी कुछ साधन हो वही इम समर मे आप मेरे समक्ष में वर्णन कीजिए क्योंकि इसकी व्याख्या करने के लिये परम योग्य हैं ॥२६॥ महर्षि पुलस्त्य जी ने कहा-दानवे सर ने अपने पोत्र के द्वारा कहे हुए इन ववनो का थवण करके कुछ विचार करके ससार में जो परम हित की बात है वम वचन को उन्होने कहा था ॥२७॥ प्रह जी ने कहा-हे दानवो मे शार्दूल के समान ! जो तुम को इस समय में ऐसी बुद्धि समुत्पन्न होगई है-यह बहुत ही अच्छा सा है। मैं अब जो आपके हित की या अन्य मानशे रे मी हित की बात होगी उसे ही बतलाऊंगा ॥२८॥ भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां सुनदुहिकलपत्राणभारादितानाम् ।

भगवत् प्रशसा ] । ४४३, सफन ॥३०॥ पाश हाथ पे ग्रहण कर बीवो को बाधकर यमराज की सभा में लाने वाले अपने दूत को देखकर यमराज स्वयं उसके कान में कहा करता है कि जो भगवान् मधुसूदन प्रभु के चरण कमलो को घरण करने वाले परम भकजन हैं उनको मत बांधना और उनका तो दूर ही से त्याग कर देना । मैं दूसरे ही मानवों का प्रभु हूँ जो भगवद्भक्त वैष्णव जन होते हैं उन पर मेरा कुछ भी अधिकार नहीं है ॥३१॥ परम पुरुषो- तम भक्ति से युक्त इक्ष्वाकु ने उसी प्रकार से अन्य वचन निश्चित रूप से कहे हैं कि जो इस भूमण्डल मे भगवान् विष्णु के परम भक्त पुरुष हैं वे कभी भी यमराज के विषय नहीं हुआ करते हैं ॥३२।। जिह्वा वस्तुन वही है अर्थात् उसी जिह्वा को इस संसार मे सार्थकता होती है जो भग- वान् का सस्तवन किया करती है और वही चित भी वास्तव है जो भगवान के चरणो मे समर्पित हो गया है और वे ही कर श्लाघा करने के योग्ग हुमा करते हैं जो भगवान् को यमनाचंता में सदा संलग्नारहा करते हैं ।।३३ । निश्चय ही उन हाथों को हाय नहीं कहा जा सकता है जो श्री हरि के चरण कमलों की पूजा करने मे समामत नहीं हुआ करते हैं वे तो एक वृक्ष की शाखा के ही एक माग के तुल्य हुआ करते हैं ॥३४॥ वह कण्ठ मी एक छिद्र के ही समान है और वह जिह्वा भो प्रति जितिका सदृश है अथवा एक प्रकार का रोग के हो तुल्य है जो भगवान के गुण गणों का गान नहीं किया करते हैं ॥३५॥ शोचनीय: स बन्धूना जीवन्नपि मृतो नरः । य. पादपङ्कज विष्णोर्न पूजयति भक्तिना ॥३६ ये नरा वासुदेवस्य सतत पूजने रताः। मृता अपि न शोच्यास्ते सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥३७ शारीर मानसं वाग्ज मूर्तामूतं चराचरम् । दृश्य स्पृश्यमदृश्य वा तत्सवं केशवात्मकम् ॥३८ येनाचितो हि भगवाश्चतुर्दाऽपि त्रिविक्रमः । तेनाचिता न सदेहो लोकाः सामरदानवाः ॥३६ ४४४ ] [ वामन पुराण यथा रत्नानि जलधेरसख्येयानि पुलक । तथा गुणाश्च देवस्य स्वसख्येया हि चक्रिणः ।।४० येशङ्खचक्राब्जकरचशानिणखगेन्द्रकेतुंबरदध्रियापतिम् । समाश्रितास्तेनभवन्तिदु खिताससारगर्तेनपतन्तितेपुन: ॥४१ येपा मनसि गोविन्दो निवासी सतत भवेत् । न ते परिभव यान्ति न मृ.योरुद्विजन्ति च १४२ वही मनुष्य व.धुभो के द्वारा चिन्ता एव शोक करने के योग्य होता है और जीता हुमा भी मृत के ही समान हुआ करता है जो भक्ति की भावना से भगवान् विष्णु के चरण कमलों की अर्चना नहीं किया करता है ॥३६॥ जो भगवान की पूजा करने में सर्वदा अपनी र रक्खा करते है वे मृत हो जाने पर भी कमी शोच करने के योग्य नहीं हुआ करते है-यह मैंने परम सत्य एव तथ्य की बात तुम्हारे सामने बतलादी है ॥३७॥ शरीर से मन से और वचन से समुत्पन्न होने वाला-मूत' एव अमूर्त सम्पूर्ण चर और अचर-दृश्य, स्पर्श करने के योग्य और अदृश्य- जो कुछ भी है वह इस जगत् मे सभी के शव के सरूप युक्त ही है।।३।। जिसने त्रिविक्रम भगवान् का चारो प्रकारों से समचित किया है उसने सम्पूर्ण अमर और दानवोस समन्वित समस्त लोको को अपना करली है इसमें कुछ भी सन्देह का अवसर न ही है क्यो कि सभी भगवान् । स्वरूप मे ही अन्तर्गत हो जाया करते हैं ॥३६॥ हे मुत्र ! जिप प्रकार से जलधि के अमख्य रत्न हुआ करते हैं उमो प्रकार से भगवान देवेश्वर के गुण गण भी असख्य हा करते हैं ।।४०॥ जो मनुष्य शख चक्र और कमल के धारण करने वाले शार्ग धनुए के धारी-ड की हरजा पाले भी वरदानो के प्रदाता~महालक्ष्मी के स्वामी भगवान के चरणो का समाश्रय प्रहण करने वाले है वे कभी भी दुखित नही हुआ करते हैं और पुनः इम ससार के गर्त मे पतन नहीं किया करते हैं अर्थात् अन्त मे उनको भगवान की ही सनिधि का नित्यनिवास प्रास होजाया करता है ॥४१॥ जिन परम पवित्र मन मे निम्तर भगवान् का निवास रहा करता है वे कभी भी रिसी प्रकार परिभव प्राप्त नहीं किया करते भगवत् प्रशंसा ] [ ४.५ हैं और उन्हें फिर मृत्यु से भी किसी तरह का उद्वेग नहीं होता है ॥४२॥ देवं शाङ्ग घरं विष्णु ये प्रपन्ना: परायणम् । न तपां यमलोकोऽस्ति न च ते नरकौकसः ॥४३ सतां गतिं प्राप्नुवन्ति श्रृतिशास्त्रविशारदाः । यान्ति दानवशार्दूल विष्णुभक्ता व्रजन्तिताम् ।।४४ या गतिदैत्यशार्दूल सग्रामे निहतात्मनाम् । ततोऽधिका गति यान्ति विष्णुभक्ता नरोतमाः ॥४५ या गतिधर्मशीलाना सात्त्विकानां महात्मनाम् । सा गतिर्गदिता दैत्य भगवदिनामपि ॥४६ सर्वावास वासुदेव सूक्ष्ममव्यक्त विग्रहम् । प्रपश्यन्ति महात्मानस्तीर्थभूता भवच्चिदम् ॥४७ प्रणिपत्य यथान्याय संसारे न पुनर्भवेत् । कृतेषु वसते नित्यं क्रीडन्नास्तेऽमितद्युतिः ॥४८ आसीनः सर्वदेहेपु कर्मभिर्न स वध्यते। येपा विष्णुः प्रियो नित्य ते विष्णोः सततं प्रियाः ॥४६ शागंधारी भगवान् विष्णु के ध्यान एव स्मरण में जो परायण रहा करते हैं और उनकी पनि ग्रहण कर लिया करते हैं उनको फिर कभी भी यमलोक और नरकों का निवास नहीं हुआ करता है ।।४३॥हे दानव शार्दूल ! धुति और शास्त्र के महान् मनीपी सत्पुरुषो की गति को प्राप्त किया करते हैं उसी गति को भगवान् विष्णु के परम भक्त भी किया करते हैं भगवद्भक्ति वही भारी महिमा है ॥४॥ है दैत्यो मे शार्दूल के समान महावीर ! सग्राम मे शत्र के समक्ष में युरु करके प्राणों का परित्याग करने वालों को जो सद्गनि हुआ करती है उससे भी कहीं अधिकोत्तम गति नरो में श्रेष्ठ भगवान विष्णु देव के भक्तो की हुमा करती है ॥४५॥ जो गति धर्म मे शील स्वभाव वाले परम सात्विक महान आत्मा वालो को हुमा करती है वही सठि हे देश्य। राज ! भगवान के ज्ञान को प्राप्त करने वाले परम भक्तो को हुआ करतो ४४६ ] । वामन पुराण है ||४६|| सब में निवास करने गाले-परम सूक्ष्म स्वरूप युक्त अव्यक्त रूप वाले और इस सासारिक बन्धन का छेदन कर देने वाले भगवान् वासुदेव का साक्षा दर्शन प्राप्त कर लिया करते हैं ये महान् आत्मा वाले एक तीर्थ के ही समान हुमा करते हैं ॥४७॥ रीति पूर्णक उन भगवान् के चरणों में प्रणिपात करके फिर यह जीवारमा संमार में जन्म ग्रहण नही किया करता है वह नो फिर कृतों मे ही नित्य निवास विया करता है और अपरिमित कानि वाला होकर आनन्द क्रीडा करने वाला रहा करता है क्योकि भगवत्प्राप्ति होने पर दुख तो हुआ ही नहीं करता है ।।४ा नह भगवान का भक्त चाहे किमी भी देह में रहे सभी देहो में वह फिर कर्मों के बन्धनो से वद्ध नहीं हुआ करता है। जिनको सदा भगवान् प्रिय होते हैं वे भगवान् विष्णु के भी परम प्रिय हुआ करते हैं ॥१६॥ न ते पुनः सभवन्ति तद्भक्तास्तत्परायणाः । ध्यायेद्दामोदर यस्तु भक्तिनम्रस्तथार्चयेत् ।।५० न हि ससारपङ्कऽस्मिन्मजते दानवेश्वर। कल्यमुत्थाय ये भक्त्या स्मरन्ति मधुसूदनम् ॥५१ धावयन्ति च शृण्वन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥५२ हरिगाथामृतं पीत्वा वले वै श्रोत्रभाजनः । प्रहृष्यति मनो येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ।।५३ येपा चक्रगदा पाणी भक्तिरव्यभिचारिणी। ते यान्ति नियत स्थान यत्र योगेश्वरो हरिः ॥५४ विष्णुधर्मप्रसक्ताना तेषां या परमा गति।। सा तु जन्मसहस्रण न तपोभिरवाप्यते ।।५५ कि जप्यस्तस्य मन्तवा किं तपोमिः किमाश्रमः। यस्य नास्ति परा भक्तिः सततं मधुसूदने १५६ भगवान् की भक्ति में परायण रहने भगवान के परम भक्त संसार में for दूमरा जन्न प्रहग नहीं पिया करते हैं । भी कोई भगवान् दामोदर रा ध्यान रिया करता है और मति भगवद प्रशंसा ] ४४७ भाव में अतिशय विनम्र होकर उनको अर्चना किया करता है वह पुनर्जन्म प्राप्त नहीं किया करता है ५०॥ है दानवेश्वर ! वह मनुष्य जो नित्य ही प्रातः काल में उठ कर भक्ति के भाव से भगवान् मधु- मूदन का स्मरण किया करते हैं वे फिर इस समार की कोच में कमी भी मजित नहीं हुआ करते हैं ॥५१॥ जो स्वय भगवान् के गुणों का श्रवण किया करते हैं तथा दूसरों को श्रवण कराया करते हैं उनको फिर पुनर्जन्म ग्रहण नहीं करना पडता है ।।२।। भगगन् यो हरि की गाथा स्पो आहत का जो अपने कर्ण रूपी पात्रों के द्वारा हे भले ! निरन्तर पान किया करते हैं उनका मन मर्वदा परम प्रसत रहा करता है और वे वहे २ कष्टों को भी पार कर जाया करते हैं ॥५३॥ जिन महानुभावों की चक और गदा धारण करने वाले भगवान् मे अन्धभि- चारिणी भक्ति हुआ करती है वे निश्चत रूप से उम नियत स्थान का निवास प्राप्त किया करते हैं जहां पर साक्षात् योगेश्वर श्री भगगन विराजते हैं ॥५४॥ भपवान् विष्णु के धर्म मे अर्याद वैष्णव धर्म में प्रसन रहने वाले भगवद्भक्तों की जो सर्वोत्तम परम जाति हुआ करती है वह गति सहसों अन्मो में वही भारी उग्र तपश्चर्या करने पर भी प्राप्त नहीं हो सकती है ॥५॥ ऐसे मन्त्र के जापों के करने से क्या साम है और ऐसे तप तपा आश्रमों में रह कर उनके नियमों के परि पालन करने से भी का नाम है जिसकी मघुमूदन भगवान् के चरणों में परम भक्ति न होने अति बिना भक्ति भाव के मन्त्र जप-तप और याश्रम सब निष्फन ही होते हैं ॥५६॥ वृथा यज्ञो वृथा दानं वृथा धर्मो वृथाश्रमः । वृथा तपश्च कीर्तिश्च यो द्वेष्टि मधुसूदनम् ॥५७ कि तस्य वहुमिमन्त्रभक्तिर्वस्य जनार्दने। नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधका ॥५८ विष्णुर्येषां जयस्तैपा कुनस्तेषां पराजयः । येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ।।५६

४४८ ]
! वामन पुराण
सर्वमङ्गलमाङ्गल्य वरेण्य वरद प्रभुम् ।
नारायण नमस्कृत्य सर्वकर्माणि कारयेद ॥६०
विष्टयो व्यतिपाताश्च येज्ये दुर्नीतिसभवाः ।
ते नामस्मरणाद्विष्णोनाशं यान्तिमहासुर ॥६१
तीर्थकोटिसहस्राणि तीर्थकोटिशतानि च ।
नारायणप्रणामस्य कला नाहन्ति पोडशीम् ॥६२
पृथिव्यायानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
तानि सर्वाण्यवाप्नोति विष्णो मानुकीर्तनात् ।।६३
जो भगवान् मधुसूदन से द्वेप करता है उसका यज्ञ-दान-धर्म माश्रम
तप और कीति सभो व्यर्थ हो है। भगवद्भक्ति के सामने इन उक्त
साधनो का कुछ भी महत्त्व नही होता है । 11५७॥ जिसको भगवान
जनार्दन में भक्ति भाव विद्यमान है उनको फिर बहुत से मात्रो के
जाप करने की कुछ भी आवश्यकता नही है। भगवान् नारायण के
लिये नमस्कार है-यह मन्त्र ही सर अर्थों का साधन परने वाला है
॥५८॥ जिनके कार भगवान् विष्णु का हाथ है अर्थात् परम घेणय
१ उनको सदा जय होती है । विष्णु भक्तो की कमी हार तो होतो
ही नही है क्योंकि उनके हृदय में भगवाद जनार्दन स्वरा विराजमान
रहा करते हैं ।।५६॥ सर्व मालों के भी मगल स्वरूप-वरेण्य-परदाता
प्रभु नारायण का स्मरण परक ही समस्त क्मो को करमा पाहिए
॥६॥ विष्टय व्यतियात और जो अन्य युरी मोति से होने वाले दोष
हैं वे गभी भगवान् विष्णु के परम शुभ नामोरा स्मरण करने से
विनाश को प्राप्त हो जाया करते हैं। भगवान् ये शुभ नामो के स्मरण
तथा पीतन की ऐमी अत्यद्भुत महिमा हुआ करती है ॥६१॥ सहसों
थोर साहो करोड सी मी गावान् नारायण को दिये गये प्रणाम
को सोरहयो मा को प्रात परने के योग्य नहीं होते हैं | इस
भूमाल में पो भी तीर्थ स्थल हैं तथा परम पुग्य मय आया है वे
सग भी अगवान् विनु शुभ मामों के बीरान से मनुष्य प्रार
लिया पर है ॥६॥

भगवत् प्रशंसा ] प्राप्नुवन्ति न ताल्लोकान्द्रतिनो वा तपस्विनः । प्राप्यन्ते ये तु कृष्णस्य नमस्कारपरर्नरः ॥६४ योऽप्यन्यदेवताभक्तो मिथ्याऽर्चयति केशवम् । सोऽपि गच्छति साधूना स्थानं पुण्यकृता महत् ।।६५ सुमत्येन हपोकेशं पूजयित्वा तु यत्फलम् । नृणां सुचीर्ण तपसि तत्फलं न कदाचन ॥६६ त्रिसंध्यं पद्मनाभ तु ये स्मरन्ति सुमेधसः। लभन्ते तूपवासस्य फल नास्त्यस संशयः ॥६७ सततं शास्त्रप्टेन कमणा हरिमचंय । तत्प्रसादात्परा सिद्धि यले प्राप्स्यसि शाश्वतीम् ।।६८ तन्मना भव तद्भक्तस्तद्याजी तं नमस्कुरु । तमेवाश्रित्य देवेशं सुखं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥६६ कोई महा व्रत धारी हो या परम उम्र तपश्चर्या करने वाले हो ये लोग भी उन लोकों को प्राप्त नहीं किया करते हैं जो कि भगनान् श्री कृष्ण के नमस्कार करने में परायण मनुष्यो के द्वारा प्राप्त किये जाते हैं ॥६४॥ जो किसी अन्य देवता को आमना करने वाला हो और मिथ्या रूप से ही भगवान् का अर्चन किया करता है वह मी बढे पुण्यात्मा साधुओं के महान स्थान की प्राप्नि पिया करता है ॥६॥ परम धन्य भाव से भगवान् हृषीकेश के पूजन के करने से जो परम पुण्य फल प्राप्त होता है वह बहुत समय तक भली भाति किये हुए मनुध्यो के तप मे भी किसी भी प्रकार से कभी प्राप्त नहीं होता है मुन्दर दुद्धि वाले पुरुष तीनो कातों मे पद्मनाम भगवान् का स्मरण किया करते हैं वे परमोतम उपवास करने का फल प्राप्त किया करते हैं-इसमे कुछ भी सशय नहीं है ॥६७॥ हे वले ! अतएव शास्त्रोक्त कर्म के द्वारा निरन्तर भगवान् श्री हरि का अर्चन किया करो। उनके प्रसाद से आप परमोत्तम पावती सिद्धि के पाने का लाम करेंगे ॥६८। उन्हीं भगवान् में मन लगामो-उनके ही भक्त बनो-उन्ही श्री हरि का यजन सदा करो और उनको ही प्रगाम किया करो हे पुत्र ! ॥६६॥ जो ४५० ] । वामन पुराग उहीं देवेश्वर का माशय प्रहण करो तो बाप अवश्य मुख की प्राप्ति करेगे ॥६६॥ आद्य ह्यनन्तमजरहरिमव्यय च सवत्रग परमब्रह्मपर पुराणम् । ते यान्ति वैष्णवपद ध्रुवमक्षय च ये मानवा विगतरागपरा भवन्ति ॥७. नारायण सुरवर सतत स्मन्नि ते धौतपाड रपटा इवराज हसा । ससारसागरजलस्य तरन्ति पार ध्यायन्ति ये सततमच्युतमोशितारम् ॥७१ निष्कल्पप सपदि पद्मदलायताक्ष ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते । मातु पयोधररस न पुन पिवन्ति ये कीर्तयति वरद वरपद्मनाभम् ॥७२ शह्वाब्जचक्रवरचापगदासिहस्त पद्मालयावदनपङ्कजपट्पदाख्यम् । नून प्रयान्ति सदन मधुघातिनस्ते शृण्वन्ति ये सुदृढभक्तिपरा मनुष्या ॥७३ सकीय॑मान भगवन्तमाद्यमाजन्म पाप यदकारि यस्तु । ते मुक्तपापा सुखिनो भवन्तियथाऽमृतप्राशनतपिताश्च ॥७४ तस्माद्धधान स्मरण कीर्तन वा नाम्नामपि श्रवण पठता सज्जनानाम् । कार्य विष्णो श्रद्धधानमनुष्यै पूजातुल्य तत्प्रश सन्ति देवा ॥ ५ बाधन चान्त करणेन योगिष्वथार्च येत्केशवमीशितारम् । पुष्पैश्च पौऋतुसभर्वश्च नून स पूज्यो विधिवनरेण ॥७६ जो मनुष्य वीतराग परायण होते हैं वे आद्य अन त-अजर अध्यय. सर्वत्र गगन करने वाले परम ब्रह्म परात्पर-पुराण पुरुप हरि को प्रास नारद पुलस्त्य संवाद } [४५१ क्यिा करते है और अक्षय वैष्णव पद को प्राप्त होते हैं 11७०॥ समस्त सुगे में परम श्रेष्ठ भगवान् नारायण का जो निरन्तर स्मरण किया करते हैं वे धौत पाडर पट वाले राज ह सो के समान हुआ करते हैं अर्थात् परम विशुद्ध होते हैं । जो अनवरत ईशिता भगवान् अच्युत का निरन्तर ध्यान दिया करते हैं वे इस ससार स सागर के जल के पार हो जाया करते हैं ॥७१॥ कल्मप से रहित कमल दल के समान आयत नेत्रों वाले भगवान का ध्यान करने से तुरन्त ही पापो के नाश करके शुद्ध बुद्धि वाले हो जाया करते हैं वे मनुष्य जो निरन्तर वर दाता वर पद्म नाम का कीर्तन किया करते हैं वे पुन: अपनी माता का स्तन नहीं पिया करते हैं ॥७२॥ जो सुदृढ मक्ति में तत्पर रहा करते हैं और भगवान् के गुणो का श्रवण करते हैं वे शख चक्र गदा पद्म और खन हायो में ग्रहण करने वाले तथा लक्ष्मी के मुख कमल के मधुकर मधु दैत्य के नाशक भगवान् के सदन को निश्चय ही गमन किया फरते हैं ॥७३॥ जिन्होंने जन्म से लेकर पाप किये हैं वे जन आद्य आपका सकीर्तन करते हैं तो पापो से मुक्त होकर अमृत पान से तृप्त होने वालों को समान ही मुसो हो जाया करते हैं ॥५४॥ इमसे सज्जनो के पड़े हुए भगवान का स्मरण ध्यान कीर्तन क्रम का धवण अशा रखने वाले पुरुषो के द्वारा भगवान विष्णु का अवश्य ही करना चाहिए वह मनुष्यों की पूजा के तुल्य ही होता है और देवता भी उनकी प्रशसा किया करते हैं ॥७॥ ब्रह्म और योगियो मे अन्तःकरण के द्वारा ही शिला के शव का अचंन करना चाहिए । पुष्प-पत्र और ऋतु फलो के मारा मनुष्य को भगवान् का विधिवत् अवश्य ही पूजन करना चाहिए ॥७६॥ --- ६२- नारद पुलस्त्य संवाद भवता कथित सर्व समाराध्य जनार्दनम् । या गतिः प्राप्यते लोके सचाराध्यः कथंचन ॥

क्षयम् ।।
४५२ ]
[ वामन पुराण
वैनाचनेन देवस्य प्रीतिः समुपजायते ।
कानि दानानि शस्तानि प्रीणनाय जगद्गुरोः ॥२
उपवासादिक कार्य वस्या तिथ्यां महोदयम् ।
कानि पुण्यानि शस्तानि विष्णुतुष्टिकाराणि वै ॥३
पञ्चान्यदपि कर्तव्य हृष्टपैरनालसः ।
तदप्यशेपं दैत्येन्द्र ममाख्यातुमिहाहसि ॥४
श्रद्दधानर्भक्तिपरः समृद्दिश्य जनार्दनम् ।
दीयन्ते यानि दानानि तानि यान्ति न वै
ता एव तिथयः शस्तायास्वभ्यच्य जगत्पतिम् ।
तचित्तस्तन्मयो भूत्वा उपवासी नरो भवेत् ।।६
पूजितेषु द्विजेन्द्र पु पूजितस्तु जनार्दनः
यस्तान्दष्टि स मूढात्मा स याति नरक ध्रुवम् ॥७
बलि ने कहा--आपने सभी कुछ बतला दिया है कि जनार्दन का
समाराधन करके जो गति लोक में प्राप्त की जाती है वह किसी प्रकार
से आराधना करने के योग्य है ॥१॥ किस अर्चन के विधान से देव की
प्रीति समु-पन्न होती है जगत् के गुरु की प्रसन्नता के लिये कौन से दान
प्रशस्त होते है ।।२।। सि तिथि मे महान् उदय वाले उपवास आदि
करने चाहिए । कौन से पुण्य मर्व श्रेष्ठ होते हैं जो कि भगवान् विष्णु
वी तुष्टि के करने वाते हैं ? ॥३।। और अन्य भी जो कुछ आलस रहित
हृष्ठ रूपो के द्वारा वरना चाहिए हे दैत्येन्द्र ' वह सभी कुछ आप मुझ
से कहने के लिये योग्य होते हैं ॥४॥ प्रह्लाद ने कहा-प्रद्धा रखने
वाले और भक्ति मे पगयण लोगों के द्वारा भगवान् जनार्दन की प्रति
का उद्देश्य लेकर जो भी दान दिये जाया करते हैं वे कभी भी क्षय को
प्राप्त नहीं हुआ करते हैं ॥५॥ वे ही तिथियां परम प्रशस्त अर्थात अत्यु-
त्तम हैं जिनमें जगत्पति की अर्चना की जाया करती है उनमे ही चित्त
लगाकर और त-मय होकर मनुष्य को उपवास करने वाला होना
चाहिए ॥६॥ द्विजेन्दो को पूजा किये जाने पर भगवान् जनार्दन स्वयं

भारद पुलस्त्य संवाद ] । ४५३ समचित हो जाया करते हैं । जो पुरुष द्विजगप से प रस्ता है वह मूढ आत्मा निश्चय ही नरक में जाया करता है ।।७।। तानचयेन्नरो भक्त्या ब्राह्मणान्विगुतत्परः। एवमा हरिः पूर्व ब्राह्मणा मामको तनुः ।। ब्राह्मणो नावमन्तव्यो वुधो वाऽप्यबुधोऽपि वा। सोऽपि दिव्या तनुविष्णोस्तस्मात्तं ह्यर्चयेन्नरः ॥६ तान्येव च प्रशस्तानि कुसुमानि महासुर । यानि स्युर्वणंयुक्तानि रसगन्धयुतानि च ॥१० विशेषतः प्रवक्ष्यामि पुण्यानि तिथिभिः सह । दानानीह प्रशस्तानि माधवप्रीणनाय तु ॥११ जातो शताह्वा सुमनाः कुन्दं बहुपुटं तथा । वायं च चम्पकाशोकं करवीरं च यूथिका १२ पारिभद्र पाटला च पकुलं गिरिशालिनी । तिलकं च जपापुष्पं पीतक तगरं त्वपि ॥१३ एतानि हि प्रशस्तानि कुतुमान्यच्युताचने । सुरभीणि तथान्यानि वर्जयित्वा तु केतकीम् ।।१४ विष्णु में तत्पर रहने वाले मनुष्य को मक्ति को भावना से उन मित्रों का वर्चन अवश्य ही करना चाहिए भगवान् हरि ने इस प्रकार से स्वय ही कहा है कि ब्राह्मण मेरा ही शरीर होते हैं ॥८॥ बाहे वुध हो या अबुध (मूर्ख) हो ब्राह्मण कोई कैमा भी क्यों न हो उमका कभी भी सामान नहीं करना चाहिए । वह भो भगान् का दिव्य शरीर है । इसलिये उपका मनुष्यों को अचन सर्वदा करना चाहिए ॥६॥ हे महामुर ! वे ही कुसुम परम प्रशस्त माने जाते हैं जो वर्ण से युक्त हों तथा रस एवं गन्य से भी समन्वित होवे ॥१०॥ यह तो हमने सामान्य रूप से एक अटल सिक्षात की दात पतला दी है अब यागे हम विशेष रूप से तिथियों के सहित प्रशस्त एवं पुण्य दानो के 'विषय में बतलाते हैं जो भावान माघर को प्रसन्नता के लिये हुआ करते हैं ॥२१॥ बानी-शाह-सुमन-मुन्द-बहुपुट-बाण-चम्मक-अशोक .

४५४ ] [ वामन पुराण करवीर-यूथिका-पारिमदु-पाटल वकुल-गिरि शालिनी-तिलक-जया पुष्प- पीतक-नगर ये सब पुष्प अच्युत भगवान् के अर्चना मे परम प्रशस्त बताये गये हैं । अन्य भी सुगन्धि वाले पुष्प अच्युत के अर्चन मे उत्तम होते हैं केवल केतकी को ग्रहण नहीं किया जाता है ।।१२-१४॥ बिल्वपत्र शमीपत पत्र भृङ्ग मृगाइयोः । तमालमालतीपन्न शस्त च हरिपूजने ॥१५ एपामपि हि पुष्पाणि प्रशस्तान्यचने विभोः । पल्लवान्यपि तेपा स्युः पत्राण्य_विधौ हरेः ।।१६ वीरुधा च प्रवालेन बहिपां चाच येन्नरः । नानारूपश्चानुभावं. कमलेन्दीवरादिभिः ॥१७ प्रवालः शुचिभिः सूक्ष्मजलप्रक्षालिवले । वनस्पतीनामचर्चेत तथा दूर्वाग्रपल्लवैः ॥१८ तथैव प्रतिपूज्योऽसौ पत्रकुड्मलपल्लवैः।। चन्दनेनानुलिम्पेत कुडकुमेन च यत्नतः ।।१५ उशीरपद्मकाभ्या स तथा कालीयकादिना । महिपाख्य कण दारुसिलक नागर तथा ।।२० शङ्खजातीफल श्रीशे धूपने स्यु.प्रियाणि वै। हरिपा सस्कृता ये तु यवगोधूमशालयः ॥२१ विल्वपत्र-शमी पत्र भृग और भृगाक के पन-नमाल पत्र-मालती पर ये सब श्री हरि के पूजन मे प्रशस्त होते हैं ॥१५॥ इनके पुष्प भी विभु के पूजन के कार्य में प्रशस्त माने गये हैं हरि की अर्वा की विधि मे उनके पल्लव और पत्र भी काम में लिये जाते हैं ॥१६॥ वीरुध और वदिप के पुवाल से मनुष्य को पचन करना चाहिए । नाना प्रकार के अनुभावों के द्वारा और कमन-इन्ही वर मादि के द्वारा भी अपना परे ॥१७॥ हे बले ! मूक्ष्म अल से प्रक्षालन किये हुए वनस्पतियों के पवित्र प्रधामों मे तथा दुर्वा के पन्नों से अर्चन करना चाहिए । उसी भाति पत्र पुर मल पोर पल्लवों से इनरा पूजन करना चाहिए । पदा मोर दुम से अनुलेपन करे ||१६॥ उगीर-पप्रक तथा बासी.

नारद पुलस्त्य संवाद | [ ४५५ पक आदि-महिपाक्ष-कण-दारुसितक-नागर तथा शंख और जाती फल आदि प्रिय पदार्थों से श्रीश का धूपन करना चाहिए। हवि के द्वारा सुसंस्कृत यव-गोधूम और शाली करे ।।२०-२१॥ तिलमुद्गादयो मापा व्रीहयश्च प्रियाहरेः। गोदानानि पवित्राणि भूमिदानानि यानि च ॥२२ वस्त्रानस्वर्णदानानि प्रोतये मधुघातिनः । माघमासे तिला: शस्तास्तिलधेनुश्च दानव ॥२३ इन्धनानि च देयानि माधवः प्रीयतामिति । फाल्गुने व्रोहयो वस्त्रं तया कृष्णाजिनादिकम् ।।२४ गोविन्दप्रीणनाथं च दातव्यं पुरुषर्षभैः । चैत्रे विचित्रवस्त्राणि शयनान्यासनानि च ।।२५ विष्णोःप्रीत्यर्थमेतानि देयानि ब्राह्मणेषु च । गन्धशालीनि वस्तूनि वंशासे सुरभीणि च ॥२६ देयानि द्विजमुख्येभ्यो मधुसूदनतुष्टये । उदकुम्मायवेनु च तालवृन्तं सचन्दनम् । त्रिविक्रमस्य प्रीत्यथ दातव्यं साधुभिः सदा ॥२७ सदा भवेत्युप्रधनेन भार्यया युतश्च यो विष्णुगत: सदा भवेत् । शृणोतिनियविधिवच्चभक्त्यासंपूजयन्यःप्रणतश्चविष्णुम् ॥२८ तिन-मूग आदि-माप (उद)-जो हरि के प्रिय पदार्थ हैं उनका पहण करे । पवित्र गो दान और जो भूमि दान हैं तथा वस्त्र अन्न और स्वर्ण के दान मधु हनन करने वाले की प्रीति के सम्पादन करने के लिये करे ? माघ मास में हे दानव तिल बहुत ही प्रशस्त माने जाते हैं । तिल बोर धेनु का दान करे ।।२२-२३।। शीत काल मे ईधन का दान करे योर कहे-माधव प्रभु मुझ पर प्रसन्न होवें। फाल्गुन मास में वोहि-वस्त्र क्या कृष्णा जिन आदि पदायों का दान करना बाहिए ॥२४॥ श्रेय पुरुषों को श्री गोविन्द को प्रसन्नता के लिये इन सबका दान करना चाहिए । चत्र मास में विचित्र प्रकार के वस्त्र-चपन और आसनों का दान करे । ब्राह्मणों को श्री विष्णु को के ४५६ ] [ वामन पुराण प्रीति के लिये इन सबका दान देना चाहिए । गाउ माग में परम मुभि और गन्ध गाली वस्तुओं का दान देना चाहिर ॥२५-२६॥ मधु. मूमन प्रमु की तुधि के लिये प्रमुच दिज दरों को जल के मरे हुर कला- ताल वृन्त-चन्दन और धनु का मन करना चाहिए । साधु पुरषों को सदा त्रिविक्रम प्रमुकी प्रीति के लिये इन पदायों का दान अवश्य ही करना चाहिए ॥२७॥ जो पुरुष सदा यो विष्णु की सेवा में रत रहना है वह निश्चय ही पुन-धन मार्या से समन्वित सदा रहता है । जो भक्ति की भावना से निस्य ही विधि पूर्वक प्रवण करता है और विष्णु भगवान का अर्थन करते हुए उनको प्राप्त किया करता है ॥२८॥ स चाश्वमेधस्य सदक्षिणस्य फलं समग्र किल हीनपापः। प्राप्नोति दतस्य मुनर्णभूमेरश्वस्य गोनागरथस्य चैव ॥२६ नारी नरश्रापि च पादमैकं शृण्वन्शुचि. पुण्यतमः पृथिव्याम् । स्नाने कृते तीर्थवरे सुपुण्ये गङ्गाजले नैमिषपुष्करे वा ॥३० कोकामुखे यत्प्रवदन्ति विप्राः प्रयागमासाद्य च माघमासे । स तत्फल प्राप्य च वामनस्य संकीर्तयन्नान्यमनाः पदं हिं ।।३१ गच्छेन्मया नारद तेऽद्य चोक्त यद्राजसूयस्य फलं प्रयच्छन् । यद्भ मिलोके सुरलोकलभ्ये महत्सुख प्राप्य नरः समग्रम् ।।३२ प्राप्नोति चास्य श्रावणान्महर्षे सौत्रामणेर्ना स्त च सशयों मे । रत्नस्य दानस्य च यत्फल भवेद्यत्सूर्यचन्द्रग्रहणे च राहो:॥३३ अन्नस्य दानेन फल यथोक्त वुभुक्षिते प्राप्तवरे च साग्निके ।' दुभिक्षसंपीडितपुत्रमार्य हाती सदा पोषणतत्परे च ॥२४ देवाग्निविपिरते च पित्रोः सुते तथा भ्रातरि ज्येष्ठके च । यत्फलंतत्प्रवदन्तिदेवा:सतत्पलं लभतेचास्यपाठात् ॥३५ वह मनुष्य दक्षिणा से युक्त किये गये अश्वमेव यम का पूर्ण फर प्राप्त कर लेता है तथा समस्त पापों से भी छुटकारा पाजाया करता है। दिये हुए मुवर्ण भूमि-अश्व-गो और हापी सया रय का फर प्राप्त कर लेता है ।।२६ मारी और चाहे में हा पृथिवी मे परम शुचि और पुष्पर करता नारद पुलस्त्य सवाद ] [ ४५७ स्नान करने पर तया सुपुष्प गंगा जल में अयवा नं भिष-पुष्कर मै- कोशमुख में स्नान करने पर जो फल प्राप्त होता है विप्रोग कहते हैं कि वही माघ मास में प्राग में पह वकर वामन प्रमु का मकीनन करके अनन्य मन वाला होकर रहे तो प्राप्त हो जाता है ॥३०-३१।। है नारद ! बारको मेरे साथ आज हो चलना चाहिए मैंने आरको सब बतला दिया है जो कि राजसूप या का फल देने वाला है । जो भूमि लोर म मुरलोक के प्राप्त करने के योग्य मनुष्य समूग महान् सुख को प्राप्ति करा करता है ।॥३२॥ हे महर ! इसके प्राण पान से ही सोना मणि का फन प्राप्त करलेता है-इसमै मुझे तनिक भी सशप नहीं है रत्नों के दान में जो फर होता है तथा सूर्य एवं चन्द्र के राहु ग्रहण में वो फर होता है ॥३३॥ अन के महा दान से प्राप्त वर-माग्निक और जो वुमूक्षित और जो दुमिक्ष से पोडिन पुत्र एव मार्या के पोषण मे तत्पर हो उनको दिये हुए दान से जो फर होता है ॥३४॥ देव-अग्नि-विप्रो मे रत-माता-पिता-ज्येष्ठ भई की सेवा में सलग्न को जो फल होता है जिसको कि देवगण कहते हैं वही फर इसके राठ मान के करने से प्राप्त हो जाता है ऐसा इसका महत्व है ॥३५॥ चतुर्दश बामनमाहुरग्रय श्रुते च यस्याघचयाश्च नाशम् । प्रयान्तिनास्त्यवचसशयोणेमहान्तिपापान्यपिनारदाशु ॥३६ पाठात्सश्रवणाद्विप्र श्रावणादपि कस्यचित् । नश्यन्ति सर्वपापानि वामनस्य सदा मुने ॥३७ उपानधुगल छन लवणामलकादिकम् । कापाढे वामन प्रीत्यै दातव्यानि विपश्चिता ॥३८ मासि भाद्रपदे दद्यात्पायस मधुपिपी। हपोकेशप्रोणनार्थ लवण सगुडौदनम् ॥३६ नीलं तुरङ्ग वृपभ दधि ताम्रायसादिकम् । प्रीत्यर्थं पद्मराभस्य देयमाश्वयुजे नरः।।४० रजत कनक दीपान्मणिमुक्ताफलादिकम् । दामोदरस्य तुष्टवर्थ प्रदद्यात्कात्तिके नर. ४१ नारद पुलस्त्य संवाद ] पितामहस्य पुरतः कुलान्यष्टोत्तराणि तु । तारयेदात्मना साप विष्णामन्दिरकारकः ॥४७ इमाश्च पितरो देवा गाथा गायन्ति योगिनः । पुरतो यसिंहस्य ह्यमोघस्य तपस्विनः ॥४८ अपि नः स्वकुले कनिद्विष्णुभक्तो भविष्यति । हरिमन्दिरकर्ता यो भविष्यति शुचिवनः ।।४६ प्रासाद (महल) और नगर आदि तया गृह और प्रावरण प्रभृति का दान भगवान वामन देव की प्रपन्नता के लिये पौष मास में करे और मक्ति को भावना के साय करना चहिए ॥४३ । दासी-दारस अलकार- पड़ा से समन्वित अन्न भगवान् पुरुषोत्तम की तुष्टि को प्राप्ति करने के लिये देना चाहिए जोकि सब कामनाओं की पूति करने वाला दान है ।।४४॥ जो-जो भी भग्ना अत्यन्त अभीष्टतम पदार्थ हो अथवा इसके घर में शुचि हो-वही वही देवो के भी देव चपधारो प्रभु को प्रोति के लिये देना चाहिए ॥४५॥ जो कोई केशव प्रमु के मन्दिर का निर्माग कराता है वह तो शाश्वत परम पुण्य लोको का जप प्राप्त कर लिया करता है । पुम और फों से परिपूर्ण उद्यानो का दान करके मनुष स्वेच्छा से अतिश्लाघा के योग्य भोगों के सुख का उपभोग करता है ॥४६॥ भगवान विष्णु के मन्दिर का निर्माण कराने वाला पुरुष पिता मह से आगे आठ उनर कुनों का अपने ही साथ उद्धार कर दिया कन्ता है ॥४७॥ अति अमोघ तपम्बी यदुमिह के आगे इनकी गाथाओं को पितर-देव और योगोजन गाया करते हैं ।।४८! कग हमारे मी कुन में कोई ऐमा विष्णु का भात उत्सन्न होगा जो परम शुचित्रन वाला होकर थो हरि क मन्दिर के निर्माण करान वाना हो॥४६॥ अपि नः सन्ततो जायेद्विष्ण्वालयविलेपनः । समाजन च धर्मात्मा करिष्यनि च भक्तितः ।।५० अपि नः सन्ततो जातो दज देशवमन्दिरे। दास्यते देवदेवाय दीप पुष्पानुलेपनम् ।।३१ ४५८ ] । वामन पुराण परोष्ट्राश्वतरानागाशकटाद्यमजाविकम् । दातव्यं केशवप्रीत्यमासि मार्गशिरे नरः ॥४२ अग्रथ वामन को चतुर्दश कहते हैं जिसके श्रवण करने पर अघों के चयो का नाश हो जाता है। पापो का विनाश निश्चय ही हो जाता है- इसमे मुझ को लेशमात्र भी संशय नहीं है । हे नारद ! महान् पाप भी बहुत ही शीघ्र नष्ट हो जाया करते हैं ॥३६॥ हे मुने ! इमके पाठ करने से श्रवण करने से तथा इसको दूमरो को श्रवण कराने से समस्त पाप है विप्र ! वामन के संकीर्तन से सदा ही नष्ट होजाया करते हैं ॥३७॥ उपानत् का जोडा-छत्र-लवण और अमल नादि पदार्थ आपाढ़ मास में वामन भगवान की प्रीति के लिये विद्वान् पुरुष को दान करना चाहिए ॥३८॥ भाद्रपद मास मे भगवान् हृपी केश की प्रसन्नता के लिये पायस, मधु, घृत, गुड, ओदन और लवण का दान करना चाहिए ॥३६॥ नील तुरग, वृषभ, दधि, तान और आयस आदि भगवान् पद्म नाम की प्रसन्नता के लिये मनुष्यो को अश्विन मास मे दान करना चाहिए ॥४॥ कात्तिक मास मे रजत-कनक-दीप-मणि-मुक्ता फल आदि पदार्य भगवान दामोदर की तुष्टि के लिये मनुष्य को दान में देने चाहिए ॥४१॥ मार्ग- शीपं मास मे मनुष्यो को खर-उष्ट्र-अश्वतर-नाग (हाथी)-शाकट आदि अजाविक भगवान केशव की प्रीति का सम्पादन करने के वास्तदान में देने चाहिए ॥४२॥ प्रासादनगरादीनि गृहप्रावरणादिकम् । वामनस्य च तुष्टयर्थं पोपे देयानि भक्तिता ॥४३ दासीदासमलकारमन्न पड़ससयुतम् । पुस्पोत्तमतुष्टयर्थं प्रदेयं सार्वकामिकम् ॥४४ यदिष्टतम किचिद्यद्वाऽप्यस्य गृहे तत्तद्धि देय प्रीत्यर्थं देवदेवस्य चक्रिणः ।।४५ यः कारयेन्मन्दिर केशवस्य पुण्याल्लोकान्स जयेच्छाश्वतावा दत्त्वाऽऽरामारपुष्पफलाभिपन्नान् भोगास भुडते कामत: श्लाघनीयान् ।।४६ नारद पुलस्त्य संवाद ] [ ४५६ पितामहस्य पुरतः कुलान्यष्टोत्तराणि तु । तारयेदात्मना साध विष्णामन्दिरकारकः ।।४७ इमाश्च पितरो देवा गाथा गायन्ति योगिनः । पुरतो यदुसिंहम्य ह्यमोघस्य तपस्विनः ॥४८ अपि न: स्वकुले कनिद्विष्णुभक्तो भविष्यति । हरिमन्दिरकर्ता यो भविष्यनि शुचिव्रतः ।।४६ प्रासाद (महल) और नगर आदि तया गृह और प्रावरण प्रभृति का दान भगवान वामन देव को प्रसन्नता के लिये पौष मास मे करे और भक्ति की भावना के साय करना चाहिए ॥४३ । दामो-दारस अन कार- पर से समन्वित अन्न भगवान् पुरुषोत्तम की तुटि को प्राप्ति करने के लिये देना चाहिए जोकि सब कामनाओं की पूर्ति करने वाला दान है ॥४४॥ जो-जो मो भग्ना अत्यन्त अभीटतम पदार्थ हो अथवा इसके घर में शुचि हो-वही वही देवो के भी देव चमधारी प्रभु की प्रीति के लिये देना चाहिए ॥४॥ जो कोई केशव प्रभु के मन्दिर का निर्माण कराता है वह तो शाश्वत परम पुष लोको का जप प्राप्त कर लिया करता है । पुप और फो से परिपूर्ण उद्यानो का दान करके मनुध स्वेच्छा से अतिश्लाघा के योग्य मोगो के सुख का उपभोग करता है ॥४६॥ भगवान विष्णु के मन्दिर का निर्माण कराने वाला पुरुष पिता मह से आगे आठ उत्तर पुलों का अपने ही साथ उद्धार कर दिया कन्ता है ॥४७॥ अति अमोघ तपस्वी यमिह के आगे इनको गायाओं को पितर-देव और योगीजन गाया करते हैं ॥४८॥ वग हमारे भी कुन में कोई ऐमा विष्णु का मस्त उत्पन्न होगा जो परम शुचित्रा वाला होकर थो हरि के मन्दिर के निर्माण कराने वाला हो ॥४६॥ अपि नः सन्ततो जायेद्विष्ण्यालयविलेपन. ! समाजन च धर्मात्मा करिष्यति च भक्तितः ॥५० अपि नः सातनो जाती ध्वज केशवमन्दिरे। दास्यते देवदेवाय दीप पुष्पानुलेपनम् ।।११ ४६. ] [ चामन पुराण अपि नः स कुले भूयादेकादश्यां हि यो नरः । करिष्यत्युपवास च सर्वपातकहानिदम् ।।५२ महापातकयुक्तो वा पातकी चोपपातकी। विमुक्तपापो भवति विष्ण्वावसथचिसकृत् ॥५३ इत्थ पितृणा वचन श्रुत्वा नृपतिसत्तमः । देवतायतन भूम्यां स्वय चाकारयद्वले ॥५४ विभूतिभि: केशवस्य केशवायतनान्यथ । चित्रयामास शुचिभिः पञ्चवर्णस्तु विनकैः ॥५५ दीपपात्राणि विधिवद्वासुदेवालये वले । सुवर्ण तैलपूर्णानि घृतपूर्णानि च स्वयम् ॥५६ क्या हमारी सन्तति मे कोई ऐसा भी व्यक्ति जन्म गृहण करेगा जो भगवान विष्णु के थालय का विलेयन करने वाला हो। और देवा. लय मे धर्मात्मा भक्तिभाव से ममार्जन करेगा ॥५०॥ क्या कोई हमारी सन्तानो मे ऐसा भी जन्म लेगा जो केशव के मन्दिर में ध्वेज लगायेगा। देवो के देव के लिये दोप और पुष्पनुलेपन करेगा ॥५१॥ क्या हमारे कुल में ऐसा भी कोई होगा जो मनुष्य एकादशी के दिन मे सम्पूर्ण प्रकार के पापो का नाश करने वाला उपवास करेगा ॥५२॥ महान पातको से युक्त हो अयमा उपपातको वाला कोई भी हो जो विष्णु भगवान के मालय में चित्रकारी करने वाला हो जाये तो वह पापो से विमुक्त हो जाया करता है।॥५३॥नृपतियो में परम श्रेष्ठ ने इस प्रकार के पितृगण के वैचनो का श्रवण कर हे बले ! भूमि मे स्वयं दो देवायतनो का निर्माग कराया था ॥५४।। भगवान केशव के आयतनो का विभूतियो से परम शुचि पाच वर्षों वाले चित्रो से चित्रित भी करारा था ॥५५॥ है बले । वासुदेव भगवान के भालय मे सुवर्ण के ही पयात्र भी स्वयं कराये थे जो धृत और तेल से परिपूर्ण थे ॥५६॥ नानावाँ वैजयन्त्यो महारजनरजिता ! मष्ठिा नवरङ्गीयाः श्वेतपालिकाश्रिताः ॥५७ नारद पुलस्त्य संवाद ] [ ४६१ आरामा विविधा हृद्या: पुष्पाढ्याः फलशालिनः । लतापल्लवसंछन्ना देवदारुभिरावृताः ।।५८ कारितालं कृता मञ्चाधिष्ठिताः कुशलर्जनः । गन्धर्व विद्यारागन रलसंस्कारिभिः ॥५६ ते नित्यं प्रपूज्यन्ते यतयो ब्रह्मचारिणः । श्रोत्रिया दानसंपन्ना दीनान्धविकलादयः ।।६० इत्थं स नृपतिर्भूत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः। ज्यामघो विष्णुनिलयं गत इत्यनुशुश्रुम ॥६॥ सर्पपस्य स तैलेन मधुकातसिसंभवः । दीपप्रधानान्नरकानन्धतामित्रसंज्ञकान् । ती स भार्यया राजा विष्णुलोकमगाततः ।।६२ तमेव चाद्यापि वले मार्ग ज्यामंघकारितम् । ब्रजन्ति नर गर्दूला विष्णु लोक जिगोपवः ।।६३ अनेक वर्णों वाली वैजयन्तियां जो महारजन रजित थीं-- मजिया-नारंग वाली-श्वेता और पाटलिकाधित विरचित कराई थीं ॥५७॥ अनेक प्रकार के आराम जो परम सुन्दर और पुष्पों तथा फलों से सुसम्पन्न ये एवं लताओं के पल्लवों से स्माच्छन्न थे और देवदार के वृक्षों से चारों ओर घिरे हुए थे निमित्त कराये थे ॥८॥ कुशल जनों के द्वारा अधिष्ठित अनेक मच अलंकारित कराये गये थे जो परम दृढ रत्न संस्कारी और गन्धर्व विद्या राग के ज्ञाताओ से युक्त थे॥५६॥ उन पर नित्य ही ब्रह्मचारी तथा यति वृन्दों का पूजन घोनिय-दोन-अन्वे-दान सम्पन्न और विकल प्रभृति सभी का पूजन होता था ॥६०॥ इस प्रकार से वह राजा परम श्रद्धालु और इन्द्रियों को जीतने वाला होकर ज्यामघ भगवान् विष्णु के निलय को प्राप्त होगया था-ऐसा सुना जाता है ॥६१॥ वह सरसो के तेल से तया मघुक और अतसिसम्भूत तलों से दीप प्रधान अन्धवामिन संज्ञा वाले नरकों को नरण करके भार्या के सहित वह राजा फिर विष्णु लोक को चला गया पा ॥६२॥ हे वले ! आज भी उसी ज्यामघ कारित मार्ग को विष्णु लोक किया जाता था

४६२ ]
। वामन पुराण
पो जाने की इच्छा वाले नर शादंग जाया करते हैं अर्याप निगुनो
पोप्राप्त कर लेते हैं ।।६।।
तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र कुरु देवालयं हरेः ।
तमचयस्व यत्नेन ब्राह्मणाश्च बहुश्रुतान् ।।६४
पौराणिकाविशे पेरण सदाचाररताशुचीन् ।
वासोभिभूपर्ण रत्नोमिभूकनकादिभिः ॥६५
विभवे सति देवस्य प्रीणन कुरु चक्रिणः ॥६६
एवं क्रियायोगरतस्य तेऽद्य नून मुरारि: शुभदो भविष्यति ।
नरानसीदन्तिवलेसमाश्रिता विभुजगन्नाथमनन्तमच्युतम् ॥६७
प्रह्लादः स तदा चौक्त्वा पुनर्नगरमध्यगात्।६८
इत्येवमुक्त्वा वचन दितीश्वरी वैरोचनं सत्यमनुत्तमं हि ।
सपूजितेन विमुक्तिमाययौ सपूर्णकामो हरिपादभक्तः ॥६६
गते हि तस्मि मुदते पितामहे बलवेभो मन्दिरमिन्दुवर्णम् ।
महेन्द्रविल्पिप्रवरोऽथ केशव स कारयामास महामहीयान् ॥७०
इस लिय हे राजेन्द्र ! तुम भी हरि का देवालय निर्मित कराम्रो ।
वह हरि का अर्चन करो और जो बहुश्रुत ब्राह्मण हैं उनका भी यजन
किया करो ॥६४॥ विशेष रूप से पुराणो के नाता विप्रो को जो परम
शुचि और सदाचार मे किरत हो उनका अर्चन वस्त्र भूपण-रत्न-धनु-
भूमि और सुवर्ण आदि के द्वारा करना चाहिए ॥६५॥ यदि भव
प्राप्त है तो चक्रधारी भगवान देव को प्रसन्नता करो ॥६६॥ इस प्रकार
से क्रिया योग मे रति रखने वाले तुमको आज भी भगवान मुरारि
शुभ प्रदान करने वाले हो जायगे । हे बले ! जगत के स्वामी-अनन्त
विभु और अच्युत प्रभु का समाश्रय ग्रहण करने वाले मनुष्य कभी भी
दु.खित नही हुआ करते हैं ॥६७॥ फिर प्रह्लाद ने यह कह कर उसी
समय में नगर को गमन किया था ॥६८। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-
इस प्रकार से दितीश्वर ने वैरोचन को परम सत्य एव अत्युत्तम यह
वचन कह कर उसके द्वारा सपूजित होता हुआ वह हरि के चरणो का
भक्त सम्पूर्ण काम वाला होकर विमुक्ति को प्राप्त हो गया था ॥६६॥

नारद पुलस्त्य संवाद । उस पितामह के परम प्रसन्न होकर चले जाने पर वलि ने चन्द्र के समान वर्ण वाला मन्दिर निर्मित कराया था। महेन्द्र के शिल्पियों में परम श्रेष्ठ से उसने देशव का महान् महीयान् का मन्दिर का निर्माण कराया था 11७०11 स्वयं स्वभार्यासहितश्वकार देवालये मार्जनलेपनादिकाः । क्रियामहात्मायवशर्कराद्यावलिचकाराप्रतिमंमधुद्र हः ॥७१ दीपप्रदानं स्वयमायताक्षी विन्ध्यावली विष्णुगृहे चकार। गेयं सघर्मग्रहण च धीमान्पौराणिकविश्वरस्कारयत् ॥७२ तथाविधस्यासुरपुङ्गवस्य धर्मानुमार्गे प्रतिसंस्थस्य । जगत्पविदिव्यवपुर्जनार्दनस्तस्थौ महात्मा बलिरक्षगाय ॥७३ सूर्यायुतामं मुसलं प्रगृह्य निघ्नन्स दृष्टान्नरयूथपालान् । द्वारि स्थितो नप्रददौ प्रवेशं प्राकारगुप्तौ वलिनो गृहे तु ।।७४ द्वारि स्थिते धात.र रक्षप.ले नारायणे सर्वगुणाभिरामे। प्रासादमध्ये हरिमीशितारमभ्यर्चयामास सुरपिमुख्यम् ॥७५ स एवमास्तेऽसुरराङ् वलिस्तु समर्चयन्वै हरिपादपङ्कजे । सस्मारनित्यंतरिमापितानिसतस्य जातोविनयाइ कुशस्तु ॥७६ इदं च वृत्तं स पपाठ दैत्यराट् स्मरन्सुवाक्यानि गुरोःशुभानि । तथ्यानि पथ्यानि परत्र चेह पितामहस्येन्द्रसमस्य वीरः ।।७७ अपनी गार्या के सहित स्वयं ही उस देशाला में मार्जन तपा लेपन आदि क्रियाएं किया करता था । उस महात्मा ने यर एवं शर्करा आदि की भगवान् विष्णु को अप्रतिम बलि किया करता था ॥७॥ विशाल नेत्रो वाली उसकी भार्या विध्यारली स्वयं ही विष्णु के मन्दिर मे दोरो का प्रदान किश करती यो । घोमान् उमने गायन और धर्म ग्रहण परम श्रेष्ठ पौराणिक विप्रो के द्वारा कराया या ॥७२।। उस रोति से रहने वाले असुर श्रेष्ठ के धर्म के मार्ग में प्रति संस्थित होने पर महात्मा दिध वपु वाले जन दंन स्वयं बलि को रक्षा करने के लिये वहाँ स्थित रहा करते थे ।।७३।। दश सहस्र सूर्यो की आमा वाले मुमल को ग्रहण करके दुष्ट नर यूथपालों का निहनन करते हुए ४६४ [ वामन पुराण द्वार पर ही स्थित रहा करते थे और बल के घर में प्राचीर की रक्षा करते हुए किसी को भी प्रवेश नहीं करने देते थे ॥७४|| धाता के और सर्व गुणो से अभिराम भगवान नारायण के द्वार पर रक्षा करने भाला स्थित हो जाने पर प्रासाद के मध्य मे सब का ईशिता एवं सुर- पिपों में प्रमुख श्री हरि का अभ्यर्चन किया था ॥७॥ वह असुरो का राजा बलि धी हरि के पादपंकजों का अभ्यर्चन करते हुए इस प्रकार से रहा करता था । वह नित्य ही श्री हरि के भापितों का स्मरण किया करता था । वह उस के विनय का अंकुश हो गया था ॥५६॥ वह दैत्यो का राजा गुरु के शुभ वाक्यो का स्मरण करता हुआ इस वृत्त का पाठ किया करता था। यह वीर इस लोक मे और परलोक में मी तथ्य एव परम पथ्य इन्द्र के समान पितामह के वे वपन थे ॥७॥ ये वृद्धवाक्यानि समाचरन्ति श्रुत्वा दुरक्तान्यपि पूर्वतस्तु । स्निग्धानिपश्चान्नवनीतशुद्धामोदन्तितेनाविचार्यमस्ति ।।७० आपद्भजनदष्टस्य मन्त्रहीनस्य सर्वदा। वृद्धवाक्योषधान्येव कुर्वन्ति किल निविपम् 11७६ वृहद्वाक्यामृत पीत्वा तदुक्तान्यनुमन्य च । या तृप्तिर्जायते पुंसां सोमपाने कुतस्तथा ॥८० आपत्तो पतितानां येषा वृद्धा न सन्ति शास्तारः । ते शोच्या बन्धूनां जीवन्तोऽपीह मृततुल्या! स्युः ॥६१ मापदग्राहगृहीतानां वृक्षाः सन्ति न पण्डिताः । येपा मोचयितारो व तेपा शान्तिन विद्यते ॥२ यापजलनिमग्नाना हियतां व्यसनोमिभिः । वृद्धवाक्यविना न नवोता : थंचन ।।८३ तस्माद्यो वृद्धवाक्यानि शृणुयाद्विदधाति वा । स सद्य, सिद्धिमाप्नोति यथा वैरोचनिबंलिः।४ जो लोग पहिरो से दूरक्त भी वृद्धों के वाक्यो के अनुमार रामायण लिया रते हैं पर्या याण मे पटु एवं पुरे लाने वाले वनों। परि पालन करते है ये पीछे परम स्निाध हो जान हैं और उनसे मर नारद पुलस्त्य सवाद ] । ४६५ नीत के समान शुरू होकर वे परम प्रमन्न होते हैं-इस विषय में कुछ भी विचार करने के योग्य बात नहीं है ॥७॥ आपत्ति रूपी सर्प के काटे हुए और सर्वदा मन हीन पुरुष के लिये वृद्ध के वचन ही औषध है जो उसको विष से रहित कर दिया करते हैं ॥७६॥ वृद्ध वाक्य रूपी अमृत का पान करके और उनके कयनों का सम्मान करके जो तृप्ति समुत्पन्न होती है वह मनुष्यों को सोम पान में भी कहा हो सकटी है nol मापत्तियों मे पड़े हुए जिन लोगों के वृद्ध पुरुष शासन-करने वाले नहीं होते हैं वे दन्घुओं में शौचने के योग्य ही होते हैं और वे जीवित रहते हुए भी मृतकों के ही समान हुआ करते हैं ॥१॥ आपत्ति की प्राह के द्वारा पाडे हुए मनुष्यों को यदि वृद्ध जन नहीं हैं तो उनके आपत्तियों से मोचन कराने वाले पण्डिन नहीं होते हैं और उनको कभी भो शान्ति नहीं होती है । ॥२॥ आपत्ति के जल मे डूबे हुए पुरुष व्यसन रूपो तरङ्गो से अपहृत होत रहते हैं उन तराहुनी में पड़े हुए लोगों का वृद्धों के वाक्यो के बिना अन्य कोई भी किसी भी तरह उत्तारण करने वाल नहीं हैं ॥३॥ महापि पुलगव ने कहा-इमलिये जो भी मनुष्य वृद्धों के वचनों का समादर सहित धवग क्यिा करता है और उनके अनुरूप कार्य भी करता है वह बहुत ही शीघ्र सिद्धि को प्राप्त हो जाता है जिस प्रकार स वैरोचन बलि को सिद्धि प्राप्त हो गई थी ॥४॥ एनन्मया पुण्यतम पुराणं तुभ्य तथा नारद कीर्तित । श्रुत्वाचकोापरयासमेतोभक्त्याचविष्णो परमभ्युपैति ।।८५ यथा पापानि पूयन्ते गङ्गावारिविगाहनात् । तथा पुराणश्रवणा रिताना विगाशनम् ॥१६ न तस्य रोगा जायन्त न विष चाभिचारिकम् । शरीरे च कुले ब्रह्मन्यः शृणोतीह वामनम् ॥८७ इद रहस्य परम तवोत्रत न वाच्यमेव हरिभक्तिवजिते । द्विजस्य निन्दारतिहीनतारते सहेतुवाक्याइतपापसत्ते ।।१८ । वामन पुराण नमो नमः यारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । थीशाङ्गचकासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ।। इत्थं वदेद्यो नियतं मनुष्यः पृष्णभावनः । तस्य विष्णूः पदं मोक्ष ददाति सुरपूजितः ॥६० वाचकाय प्रदातव्यं गोभूस्वर्णविभूषणम् । वितशाठघन कठयं कुर्वन्ट्रवणन शक. ११ निस-यं च पठशृण्वन्सर्वपापप्रणः शतम् । असूयारहित विप्रः सर्वसपत्प्रदायकम् ॥६२ महर्षि प्रवर पुलस्त्य जी ने कहा--हे नारद ! यह परम पुण्यतम पुराण मैंने तुमको कह कर सुना दिया है । परा कोति के सहित उसका भक्ति भावना से श्रवण करखे विष्णु भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है ।।८।। जिस तरह से समस्त महान् पाप म गीरथी गगा के जल मे अवगाहन करने से पवित्र स्वरूप धारण कर लिया करते हैं अर्थात् विनष्ट हो जाते हैं उसी भाति पुराण के थवण करने से सब दुरितो का विनाश हो ज ता है ।।८६॥ पुगण प्रवण करने वाले पुरुष को कोई भी रोग उतान नहीं होते हैं । उस पर किसी भी विप का कोई प्रभाव नहीं होता है और न किसी के आभिचारिक (मारणादि) का असर हुआ करता है । उसके शरीर मे कुछ भी हानि नही होती है और उसके कुल में भी क्मिी तरह का अनिष्ट नही होता है । हे ग्रान् । जो भी कोई इम वामन पुराण का श्रवण किया करता है ॥८७॥ यह परम रहस्य का विषय है जो मैंने तुमको सुना दिया है। जो हरि की भक्ति से रहित पुरुष हो उसके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिए क्यों कि इसका पान नहीं होता है । जो भो निदा रति और हीनता में निरत हो और हेतु वाक्याहन पापी जीव हो उसको भी इसे मत बताना ॥८॥ कारण से वामन का स्वरूप धारण करने वाले-अमित विक्रम से युक्त भगवान् नारायण के लिये बारम्बार नमस्कार है । श्री शाङ्ग धनु सुदर्शन चक्न को मोद की गदा और असि के धारण करने वाले उन पुरुषोत्तम प्रमु के लिये नमस्कार है ।।६।।

नारद पुलस्त्य सवाद ]
[ १६७
इस प्रकार से नित्य हो यो कृष्ण के चरणो मे भावना रखने वाला जो
पुरुष नियत रूप से करता है उसको भगवान् विष्णु देव जी सुरो के
द्वारा सुपूजित हैं मोक्ष का दुर्लभ पद प्रदान किया करते हैं ॥६०|| जो
इस वामन पुराण का वाचन किया करता है उसको गो-भूमि और
सुवर्ण के भूपों का दान करना चाहिए । इसमे वित्त की शठता को
न करे अर्थात् धन रहते हुए दान में कभी कमी न करनी चाहिए ।
यदि कोई करता है तो वह श्रवण करने के महत्व का विनाश ही कर
देने वाला होता है। तीनो समयो में इसका पट-प्राण करने से सम.
स्त पापो का नाश हो जाता है । विप्र को असुपा से रहित होकर ही
इसका पठन प्रवण करना चाहिए तो यह सब समसाओ का देने वाना
होता है ॥१६॥

उपसंहार वामन अवतार की कथा और उसका प्रचार अवतारवाद भारतीय धर्म और माध्यात्मिक ज्ञान की एक बहुत बड़ी विशेषता है । यद्यपि संसार के अधिकांश मनुष्य किसी न किसी रूप मे ईश्वर का अस्तित्व मानते हैं, पर किसी जाति या धर्म के विद्वानों ने 'ईश्वर' के सम्बन्ध में इतनी खोज या विवेचना नही की जंसी भारतवर्ष में प्राचीन काल से होती आई है। लोगो ने अधिक से अधिक यही कहा है कि इस संसार को बनाने वाला एक ईश्वर अवश्य है जो विश्व ब्रह्माण्ड के किसी स्थान मे किसी रूप मे स्थित है। उन धर्मों के अनुयायी सामान्यत: उसकी बल्पना साकार रूप में ही करते हैं और उसे भले-बुरे कामो का दण्ड कर्ता या पुरस्कर्ता मात्र मानते हैं । यह भी कहा गया है कि समय-समय पर ससार मे उसके 'पैगम्बर' (स देशवाहक) आते रहते हैं, पर उन मे तथा उनके द्वारा प्रचारित परमात्मा मे मूलत: क्या सम्बन्ध रहता है, इस विषय मे कोई स्पष्ट सिद्धान्त अभी हमारे सुनने या पढने में नहीं आया । ईपामसीह ने अवश्य अपने को 'ईशपुत्र' (ईश्वर का बेटा) पहा था और कभी-कभी यह भी प्रकट किया था कि "मैं और मेरा पिता एक ही हैं।" पर इसका मर्म ग्रहण करने वाले ईसाइयो मे भी बहुत कम मिलते हैं । अन्यथा ससार के सभी धर्म 'ईश्वर को मुख्यतः एक यठोर दण्डकर्ता के रूप मे ही देखते हैं। यह एक ऐसी मान्यता है नो मनुष्यो को अनीति और धर्म से रोकने में किमी हद तक सफल हो सस्ती है, पर जिसका दर्शन-शास्त्र (क्षक और विज्ञान) से विशेप सम्बन्ध नहीं। पर भारतीय शास्त्रों में, विशेष वर उपनिपदों में ईश्वरीय सत्ता का रखना मम्मीर विदेवन रिश दश पं शीत जाने पर उपसंहार ] । ४६६ मनुष्य उससे आगे कुछ नहीं सोच सके हैं। पश्चिनीय वैज्ञानिको ने सो- दो सौ वर्ष पूर्व इस सम्बन्ध मे बही उछल-कूद मचाई थी और एक प्रकार से 'नास्तिकवाद' का प्रचार संसार भर में किया था, पर अब जैसे- जैसे विज्ञान की जहें गहरो पहुचनी जाती हैं, वह भारतीय माध्यात्मिक सिद्धान्तों के समीप पाता जाता है। हम कह सकते हैं कि मृष्टि की रचना और एक अविनाशी चैतन्य सत्ता के सम्बन्ध में अब उसकी मान्यता भारतीय शास्त्रों से मिलती-जुलती हो गई है और आगे चलकर वह उसी स्थान पर पहुंच जायगा जहां हमारे वेदान्त और साख्य दर्शन हजारों वर्ष पूर्व पहुंच चुके थे । निराकार भौर साकार पर पश्चिमीय विद्वा और वहाँ के धर्म शास्त्र वेत्ताओ की मुख्य कठिनाई है ईश्वर के निराकार और साकार रूप का समन्वय कर सकने में । सामान्य मनुष्य की बुद्धि इन दोनों में से एक को ही ग्रहण और स्वीकार करने में समर्थ होती है । वह या तो ईश्वर को किसी सबसे बडे राजा-महाराजा को तरह सबसे कार वैकुण्ठ लोक में रलहित सुवर्ण सिंहासन पर महान वैमन और ऐश्वयं के मध्य बैठा हुआ मान लेते हैं अथवा वायु से भी बहुत सूक्ष्म और अदृश्य किसी शक्ति के रूप मे ख्याल करते रहते हैं । पर जो ईश्वर वायु और आकाश को तरह अमूर्त और अन्यक्त है वही किसी समय साकार बन कर चर्म चक्षुओ के सम्मुख लीला करने लगता है, यह जल्दी उनकी समझ मे नही आता I अन्य धर्म वाले तो सष्टत. इससे इन्कार करते हैं और इसे भ्रम अथवा असत्य कह देते हैं और हमारे यहां के सामान्य जन भी 'वकुण्ठ' अयवा 'कैलाश' मे रहने वाले परमेश्वर क्यवा राम तथा कृष्ण के रूप में उसके अवतारो को 'परम्परा' या 'हि' के रूप मे मान लेने के अतिरिक्त कुछ अधिक कह सकने मे समर्थ नही हो । यद्यपि हमारे लोकप्रिय धर्म प्रय 'रामायण' में भक्त श्रेष्ठ गो• तुलसीदास इस सिदान्त को बहुत ही सरल ढग से समता नये हैं कि- ४७० ] [ पामन पुराण सगुणहि अगुणहि नहिं क्छु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध वेदा ।। अगुन अरूप अलख अज सोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई ।। अर्थात् जो परमात्म शक्त मून का मे गुण रहित, रूप रहित, अदृश्य और बिना जन्म और मृत्यु (आदि-अन्त) के रहती है वही अवसर पड़ने पर भक्ति-भावना के प्रभाव से सगुण रूप में प्रकट हो जाती है।" सत कबीर ने भी परमात्म तत्व से जीवात्मा के विकास का विवेचन करते हुये अवतार की स्थिति को बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है । वे कहते एक राम है सबसे न्यारा । एक राम ने जगत पसारा॥ एक राम घट-घट मे बोले। एक राम अवतारी डोले । जासु कृपा भव दु ख मिट जाही। सद्गुरु एक राम रघुराई।। इसका आशय यह है कि जब विश्व व्यापी चतन्य तत्त्व (परमात्मा) और प्रकृति तत्व के मिलने से सृष्टि रचना का क्रम शुरू होता है तो पहले सूक्ष्म देव शक्तियो (ब्रह्मा विष्णु महेश आदि) का आविर्भाव होता है और फिर सूक्ष्म तथा स्थूल देहधारी जीवात्मा का जो जीवारमा विकास की अनेक मजिलो को पार करता हुआ देवत्व की कोटि मे जा पहुंचता है वह 'अवतार' कहा जाने लगता है । गो० तुलसीदास और सत कबीर के विवेचन मे अगर कोई अन्तर है तो यही है कि जहाँ गोस्वामी जी ने अवतार का आगमन कुण्ठ से बतलाया है वहाँ कबीर ने जीवात्मा का विकास होते-होते ही 'अवतार' के दर्जे पर पहुंचने का सिद्धान्त प्रतिपादित किया है। बौद्ध धर्म प्रथो में भी यही कहा गया है कि जीव अनेक जन्मो मे प्रगति करते करते ही 'बुद्ध' (जगत गुरु या अव• तार) की पदवी को प्राप्त होता है। यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो निराकार और साकार मा अन्तर समझ सकना उतना कठिन नहीं है । विज्ञान भी अब 'परमाण- उपसंहार ] [४७१ सिद्धान्त' द्वारा इसी निर्ष पर पहुंचा है कि स्यूल प्रकृति भी मून अब- स्था 'न्यूक्निस' और 'एलेक्ट्रोन' आदि के ऐसे सूक्ष्म रूस में रहती है कि उसे किसी प्रकार देखा या पकहा नहीं जा सकता, केवल ठमके द्वारा बनेक यांत्रिक कार्य होते देख कर उसको सत्ता को मान लिया जाता है। यही बात विश्व व्यारी चैतन्य सत्ता अथवा परमात्म शक्ति के सम्बन्ध में भी है। निस्मन्देह वह निराकार और निर्गुण है, पर विचार और भावना की शक्ति द्वारा वह कार्य रूप में प्रत्यक्ष दिखलाई भो दे सकती है । इस प्रकार के 'परिवर्तन' को भक्ति मार्ग में प्रभु प्रास्ट्य' या 'अवतार' कह दिया जाता है और वेदान्त आदि में 'माया' कह कर पुगरा जाता है। पुराणकारों ने भी अनेक स्थानों पर अव- वारों को 'माया मनुष्य' ही कहा है। वामन अवतार की कथा- विकास सिद्धान्त के अनुयायिओ के मतानुसार तो जिस प्रकार प्रयम चार अवतार-~मत्स्य, कूर्म, वाराह और नरसिंह का सम्बन्ध मानव-जाति से पूर्ववर्ती प्राणि-जगत के साय है उसी प्रकार 'वामन अवतार' का सम्बन्ध मनुष्य को आदिम अवस्या से है। अर्थात् जिस समय गनुष्य जाति का आविर्भाव हो चुका था पर उगकी बाह्य और मान्तरिक शक्तिया बहुत अधिकसित और न्यून थीं उस समय का व्यक्ति पूर्ण विकसित मनुष् को तुलना में 'दामन (या वौना) हो या । पर 'वामन पुराण मे जिस ईश्वरोप अवतार को क्या कही गई है उसका आधार इस विवाह-सिद्धान्त के बजाय उन वैदिक कथानकों को माना जा सकता है जिनमे कहा है कि समस्त जगत विष्ण के तीन चरणों विष्णोर्नु क वीर्याणि प्रवोचय: पार्थिवानि विममे रजासि । यो अस्कभायदुत्तरं सधस्थं विचक्रमारणस्वेघोरुगायः ॥१ प्रतद्विष्णु स्तवते वीर्येण मगोन भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुपु निपु विक्रमणेष्वपि क्षियन्ति भुवनानि विश्वा ॥२ ૪૭૨ ! [ वामन पुराण - प्रविष्णवे शूपमैतु मन्मगिरिक्षित उरुगायाय वृष्णे। य इद दीर्घ प्रपत सधस्थमेको त्रिमिरित्पदेभिः ॥३ यस्यत्री पूर्ण मधुना पदान्य क्षीयमाणा स्वधया मदन्ति । य उत्रिधातु पृथिवीमुत द्यामेको दाधार भुवनानि विश्वा ॥४ (ऋग्वेद मडल १, सूक्त १५४) इम सूक्त के मृपि दीर्घतमा कहते हैं कि "मैं विष्णु के वीरता- पूर्ण कार्यों का वर्णन करता हूँ कि उन्होंने तीनो लोको को नाय लिया और आकाश को स्थिर किया। उन्होने तीन बार पाद-क्षेप किया । ससार उनकी बहुत स्तुति करता है ॥१॥ चूकि विष्णु के तीन पाद क्षेप मे सारा ससार रहता है, इसलिये समस्त जगत भयकर, हिंस्र और पर्वत में रहने वाले वन्य-जन्तु की तरह उनके पराक्रम की प्रशसा करता है ।।२।। अभीर प्रदायक और सब लोको में प्रशसित विष्णु की सब कोई स्तुति करते हैं जिन्होने तीन लोको को तीन पद. क्रमण से नाप लिया था ॥३॥ जिन विष्णु ने अकेले ही धातुप्रय, पृथ्वी शु लोक और समस्त भुवनों को धारण कर रखा है उनका निसख्यक पद क्षेप मनुष्यों को मधुर अन्न देता है ॥४॥" एक अन्य सूक्त मे विष्णु के तीन पदों द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि को व्याप्त परने का जिक्र करते हुये कहा गया है- अतो देवा अवन्तु नोयतो विष्णुविचक्रमे । पृथिव्या सप्त धामभि ||१५ इदं विष्णुविचक्रमे प्रेधा निदधे पदम । समूल हमस्य पासुरे ॥१७ श्रीणि पादा विचक्रमे विष्णुगोपा अदाभ्यः । मो धर्माणि धारयन् 111 अर्थात् "प्रिम मप्त स्थान पाली पृषी पर विष्णु ने पार प्रमण रिया, उस पृथ्वी पर देवगण हमारी रक्षा करें ॥१५॥ विष्ण ने हम पगत में पद प्रमण रिया और सीन पर रहे। उतरे सि युक्त पर उपसहार ] । ४७३ से जगत छिर गया ॥१७॥ विष्णु जगत के रक्षक है उन्होंने समस्त धर्मों को धारण करने तोन परो से परिक्रमा को ।।१८॥ (ऋग्वेद १.२२) आगे चल कर आठ मण्डल में ऋषि पर्वत काय ने इसी बात को दुहराया है- यदाते विष्णुरोजसा तोणि पदा विचक्रमे। अदित्ते हर्यता हरी ववक्षतुः ।। (ऋग्वेद ८।१२।२७) अर्थात् "हे इन्द्र । जिस समय विष्ण ने तीन परो से तीनो लोकों को नापा था, उसी अवसर पर दोनों हरि (हरे रंग के घोडे) तुमको ले आये थे।" इमी मण्डन के २६ वें सूक्त में मनु वैवस्वत मृपि कहते है- त्रोण्येक उरुगायो विचक्रमे यत्र देवासो मदन्ति । अर्थात् "एक विष्णु ही बहुतो द्वारा स्तुति किये जाने योग्य हैं । उन्होंने तीन पो से त्रिलोकी का अतिक्रमण रिया । इससे देवगण अति प्रसन्न हुने ।" इस प्रकार वेदों में कई जगह विष्णु द्वारा तोन पदोष से त्रिलोकी को नापने या ढकने का उल्लेख मिलता है। देश के 'ब्राह्मण प्रयो' मे इन ऋनामी की व्य स्पा करते समय इन वर्णनों का अधिक विस्तार किया गया है और पुराणो मे उनको एक सर्वांगपूर्ण काव्यमय उमा- ख्यान का रूप देकर अन्न मे उस ब धार पर एक पृथक् पुराण को रचना ही कर डाली गई। असुरो का अस्तित्त्व- पर इसका आशय यह नहीं कि बलि और वामन का उपाध्यान पूर्णतया कदि कल्पना है। पुराणों की रचना में एक बहो विशेषता यह है कि उनमे इतिहास और कल्पना को मिलाजुला कर एक ऐसी रचना उपस्थित कर दी है, कि जिस से वास्तविक तथ्यों और कल्पना ४७४ ] [ वामन पुराण (रचनात्मक और को अलग-अलग कर सकना प्राय: अमाभव ही है । कुछ कथाओ का विश्लेषण करने की चेष्टा की जाती है, पर उनमे भी कहां तक सफलता प्राप्त होती है यह कहा नहीं जा सकता। इसलिये हाल ही में एक लेखक ने विभिन देशो के पौराणिक साहित्य की समीक्षा करते हुये ठीक ही लिखा था- "आदिम मानव की कल्पना ने हर कही प्राकृतिक शक्तियो एव घटनाओ के आधार पर अनेक पोषक और महारक विध्वसात्मक) देवतामो को गढा था। इन देवताओ की प्रकृति इनके आपसी सबध और व्यवहार तथा मनुष्यो के प्रति इनकी मनोभावना को लेकर अनेक कथाए रची गई । ये कथाऐ प्रनीतात्मक भी थी और रोचक तथा रोमाचक भी। पूजा पाठ वाले पुरोहितो तथा मन तत्र बालो का धा इन्ही के आधार पर पनपा । आदिम विज्ञान और शिल्प ने इन्ही से जीवन-रस पाया । पर जैसे-जने सस्कृति आगे बढ़ी इन आदिम पौराणिक गाथाओ और उनके देवताओ तथा मानवीय इतिहास तथा उसके वीर पुरुषों के बीच आदान-प्रदान यहा । कभी तो पुराण इतिहास के और कमी इतिहास पुराण के सांचे में ढल कर नवीन रूप में प्रकट हुआ धीरे-धीरे दोनो पक्ष इतने घुल-मिल गये कि अब उन्हे अलग वरना कठिन हो गया है । वामन और बलि की कथा भी इसी का नमूना मानी जा सकती है । सभारत आरम्म मे रिमी वैदिक मृपि ने-'यह समस्त जगत ईश्वर सही रूप है'इम मिद्धा त कोरिचित रोचा हग से वर्णन परने के लिये वह दिया कि 'यह समस्त विश्व (तीने गोष) विष्ण, रूपी ईदर तीन चरणो मे हैं' अपान वे सत्र व्याप्त है। इमी भाव मे आग 17 पर 3 हे विविक्रम' हा गण। बाद म रिसी समय अगुरराज पति के दान में सम्बन्ध म यौई पटना। रिमी पुगण ने इन दोनों को जोड़ कर ए आसान वादि।। फिर धीर-धीरे पयावार उमगे बढ़ाते गये और उसकी ए बड़ी सी पौराणिया बन गई। ।

उपसंहार ] [४७५ इस अनुमान मे हमको कुछ सचाई की झलक इसलिये दिखाई देतो है कि अब से ढाई-तीन हजार वर्ष पूर्व ही भारत वर्ष से कुछ ही दूरी पर पश्चिमी ऐशिया में 'असोरिया' मे असुर राजागण राज्य करते थे और उनका राज्य अनेक वर्षों तक भारत के अनेक समुद्र तटवर्टी प्रदेशो पर भी रहा था। इनमें असुर वाणीपाल एक प्रसिद्ध शासक हुआ है, जिमका जिक्र अगरेजी के बडे-बहे इतिहासो मे पाया जाता है । असल में ये असुर राजा इतिहास तथा काव्य आदि के बडे अनु- रागी थे उन्होने अपने राज्य कार्य वा प्रतिदिन का हाल भी लिखकर रखा है । यद्यपि उनके पास न तो आजकल का सा कागज था और न भोजपत्र जैसा कोई उपकरण ही था। पर उन्होंने लिखने का एक नया ही तरीका निराला था 1 वे कच्ची मिट्टी की लम्बी-चौडी ई टें बना कर उन पर कील से अक्षर स्त्रोद कर लिखते थे और फिर उनको पका कर पक्का कर लेते थे। इस प्रकार की लाखों ईटो का संग्रह खोज करने वालो को असीरिया के खण्डहरो में मिला है और विद्वानो ने प्रयत्नपूर्वक उमको लिपि को पड़ कर उनमें से ३० हजार ईटो पर लिखा साहित्य नये सिरे से लिख लिया है जिनमें अनेकों काव्य और असुर नरेशो को 'डायरियां हैं। जैसे यहाँ के मुगल बादशाह 'बाबर भामा'-'अकबर नामा' 'जहाँगीर नामा' आदि लिख कर तत्का- लीन इतिहास की बहुत सी सामग्री छोड गये हैं, वैसी ही सामग्री यह भी है। इन ई टों के लेखो से ज्ञात होता है कि ईमा से ६७२ वर्ष पूर्व वापाल का पिता "हसर हैडन" असीरिया का शासक था। उसने उस वर्ष अपने अधीनस्थ सभी राजाओं तथा उप राजामो को एक सभा बुलाई । उसमें राज्य का उत्तरी भाग बडे पुत्र असुरवाण और दक्षिणी भाग छोटे पुत्र शम्स को देने की घोषणा की और राजाओं तथा सामतो से इस व्यवस्था का समर्थन कराने की शपथ खिलाई। भारतीय इतिहास को खोज करने वाले विद्वानों के मतानुसार यही असुर वाण भारतीय पुराणो में वर्णित वाणासुर है जिसे हरिवश पुराण [ वामन पुराण मे शोणितपुर का शासक लिखा है। अंगरेजी इतिहासकारो ने भी उसके रक्तरजित सग्रामों तथा अनेक कल आम की घटनाओ के कारण उसकी राजधानी का जिक्र 'ए बनडी सिटी' (खूनी नगर के नाम से किया है । इमो की पुत्री उपा से अनिरुद्ध का विवाह होने की कथा को लेकर श्री कृष्ण के साथ घोर संग्राम होने की पौराणिक गाथा रची गई है। राजा बलि को इसी वाणासुर का पिता बतलाया गया है ।यद्यपि वामन अवतार रामचन्द्र जी से भी बहुत पहले हुआ बतलाया जाता है पर विभिन्न पौराणिक कथा लेखको ने वाणासुर की चर्चा वामन अवतार- राम अवतार, कृष्ण अवतार, आदि सभी के साथ कर दी है । जब कि इतिहासकार उसका समय अब से २६०० या २७०० वर्ष पूर्व ही बनला रहे हैं। इसका कारण यह है कि कथा कहानियों के लेखक सन, सवत्, लबाई, चौडाई, दूरी आदि का यथा तथ्य वर्णन करो मे अपने आपको बंधा हुआ नही मानते । उनका मुख्य उद्देश्य उपदेश प्रद और साथ ही रोचक उपाशन बनाना होता है । इस लिये असुर वाण के शामक की घटनाये सुन कर उस नाम का उपयोग श्री कृष्ण के चरित्र वर्णन मे पर लिया तो यह उनकी दृष्टि में कोई हानिकर या आगजनक बात नही है अमुर और आर्यों का सम्बन्ध-- भारतीय पुराणों और वैदिक कालीन तथ्यों की पोजरने वालों द्वारा प्रतिपादित एक नियमपं यह भी है fr wोरिया और उनके भाग पास चीसोनिया तथा पाहिल्या धादिरहने दाने अगुप, र प्रादि यागार में भारतीय प्रायों द्वारा पाति दरियन पति थे, और इस लिये वे विदेश में रहते पर भी ग देश में आते जाते रहने और मौसगो पर प्रशामा भी जमाने की कोगित रिया थे।ग गम्बafer मम्मति' नामर पि पंपिनाने निथा है- उपसंहार [ [४७७ आया में अवैदिक्षता का संचार और प्रसार कैसे हुआ? ममाज में चाहे जसा अच्छा और दृष्ट प्रबन्ध हो, पर कुछ काल बाद उसमे शिथि- लता बाही जाती है और दुष्ट मनुष्यों का प्रादुर्भाव हो जाता है । आर्यो में भी इसी स्वाभाविक नियमानुमार आलम और प्रमाद उत्पन्न हुआ। परन्तु बुद्धिमान नेताओ ने तुरन्त इस बात को ताड़ लिया और उपाय भी करने लगे। सब से उपयुक्त उगय यही था कि ऐसे व्यक्तियो को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाय । इस प्रकार जो लोग समाज से निकाले गये, वे ही अन्यत्र जाकर दस्यु, दास, राक्षस, असुर, महिप, कपि, नाग आदि नीच नामों से 'पुकारे जाने लगे। मनुस्मृति में भी लिखा है कि ब्राह्मणों के समीप रह कर शिक्षा प्राप्त न कर सकने से अनेक क्षत्रिय जातियां क्रिया शून्य होने से पतित हो गई। वही पोड, औण्ड, काम्बोज खश, पलव, चीन, किरात, झल्ल, मल्ल, दरट, और . कि नाम को अनार्य जातियां बन गई प्राचीन काल में आर्यगण लोभी वयो को 'पणिक' कहते थे। वे उन समय लोगों को तरह-तरह से ठगने का रोजगार करते थे। जब उनको समाज से निकाला गया तो वे भारत के दक्षिणी प्रांत में चले गये । वही रहकर उन्होंने काफी वृद्धि और संगठन करके आर्यों से संघर्ष किया। पर जब वे परास्त हो गये तो फिर अन्य देशों को चले गये।" 'वैदिक सम्पत्ति' के लेखक के मतानुमार इन 'पणि' जाति वालों ने हो यहां से निकलकर मेसोपोटानियाँ, इराक,मोरिया आदि में अड्डा जमा कर अपने नाम से "फिनीशिया देश को याबाद किया। ये लोग नाव और जहाज बनाने तथा चलाने में बहुत होशियार थे और व्यापार करने मे हर तरह की चालाकी से काम लेना जानते ही थे। इसलिये उन्होने क्तिने ही देशों के साथ व्यापार करके खूब धन इकट्ठा कर लिया । भारत में सिन्ध और काठियावाड इनके बडे अड्डे थे। इन दोनों प्रदेशों मे इन दिनों जो मोहनजोदड़ो, हडप्पा आदि अनेक प्राचीन नगरों के खण्डहर निकले हैं उन से पता चलता है कि इन्होंने अब से चार-पांच हजार वर्ष पहले एक व्यापारिक तथा शासन कर्म जाति के रूप में ४७८ ] [ दामन पुराण अच्छी उन्नति कर ली थी। भारतीय आर्य शासकों से अनेक बार उनका सघर्ष भी हो जाता था जिसमे परिस्थिति के अनुसार कभी एक पक्ष की और कभी दूसरे को विजय हो जाती थी। भारतीय पुराणों मे, जो अधिकाश में विक्रम-सवत् के आरम्भिक काल में अर्थात् अब से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व लिखे गये थे, इन्हीं घटनाओ के सम्बन्ध में प्रचलित जन श्रुतियो के आधार पर उनका वणन 'असुर' 'दत्य' नाम से किया गया। साथ ही उन घटनामों को प्राचीन देवताओं की कथाओ के साथ जोहार एक नये ही साहित्य की मृष्टि कर डाली। इम प्रकार पुराणों में पुरानी धार्मिक कथाओं तथा ऐतिहासिक घटनाओं का कहाँ तक मेल हुमा है और वियो को कल्पना पह! तक दौडी है, इसका ठोr विवेचन कर सकना सहज नहीं है और न उसके लिये यहाँ उपयुक्त स्थान है । इम चर्चा से हमारा उद्देश्य यही बतलाना है कि यद्यपि 'वामन-उपशाना इतनी अलौनिक तथा नमार पूर्ण है fr मामान्य पाठT उमकी वास्तविकता पर विश्वास नहीपर समते तो भी उमा पुछ आधार अवश्य है । पुगण और इतिहास के अध्ययन से पता चलता है frसिकन्दर के आसमय से कुछ मौ वर्ष पूर्व इन विदेशी मामों ने गुजरात से भागे बदर मगध (पाशी पटना था) AN आधिपत्य जमा लिया था। कुछ समय बाद भारतीय जनता ने तयारी कर उनसे पुन देश म बाहर निसान दिया । सभवत' इसी परमाा बमरारिप वर्णन करवंबसि-वामन क उसनो रचना की गई और उगा योगदान को महता तथा मारण प्रवृत्ति के दोरदिपलाने के नियरिया गया । पिर भी हम वामन पुराण सोपानो इतिहाग बी मोटी पर रानकी मम्मति महीगते । उगा म उस भारतीय धर्म की उपमा निसादिवरना और भिन्न जातीय मान्यतापनिरीक्षण पाता हो । मी उम्मको मामा RREविभिन पुगों न सिर पूरा प मेगा वान पिसा है। उन गा पानको र भी पापा पानि तो एक उपसंहार ] [४७६ को विल्कुल ही भिन्न रूप में लिखा है । इन पौराणिक वर्णनो का परि- चय देने के लिये हम उनका कुछ अश नोचे दे रहे हैं, जिसमे पाठकों को इस बथा के विभिन्न रूपों और उसकी महत्ता का कुछ अनुमान हो सकेगा। महाभारत में वलि-वामन उपाख्यान- 'महाभारत' यद्यपि मुख्य रूप से एक एतिहासिक काय प्रथ माना गया है, पर उममे भारतीय साहित्य में प्रसिद्ध सपस्त कथाओं और उपासनी को भी विविध प्रसगो में इस प्रकार सम्मिलित कर लिया गया है कि उमे अधिकाश विद्वान् 'पुराणेतिहास' के नाम से पुकारते हैं । उसके सभा पर्व में 'वामन अवतार' का सक्षा में वहे अच्छे दंग से वर्णन किया गया है- पुरा त्रेतायुगे राजन् वलिवैरोचनोऽभवत् । दैत्याना पार्थिवो वीरो वलेनाप्रतिमो बली ।।१ तदा वलिमहाराज दैत्यसघं समावृत । विजित्य तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप सः ॥२ लेन वित्रासिता देवा वलिनाऽऽखण्डलादयः । ब्रह्माण तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोदधि तदा । तुष्टुत्रु साहताः सर्वे देव नारायण प्रमुम् ।।३ स तपा दर्शन चक्र विधाना हरि स्तुत । प्रसादज ह्यस्य विभोरदित्या जन्म चोच्यते ॥४ अदितेरपि पुनत्वमेत्य यादवनन्दन । एप विष्णुरिनि ख्यात इन्द्रस्यावरजोऽभवत् ॥५ अर्थात्-"प्राचीन त्रेतायुग मे देरोवन का पुत्र बल नाम का राजा हुआ जो वडा शक्ति शाली और वीर था। उसने अपनी दत्य सेना को सगठित करके देवनामो पर आक्रमण किया और इन्द्र का समस्त राज्य छीन लिया। तब तो इन्द्र आदि सभी देवता बडे दुखी होकर ब्रह्माजी को साथ लकर भगवान विष्णु की सभा मे क्षीर सागर के निकट पहुंचे ४८० । वामन पुराण और भगवान नारापण की स्तुति करने लगे। इस पर प्रसन्न होकर भगवान ने देवताओ को दर्शन दिया और उनकी रक्षा करने के निमित्त स्वय अदिति के गर्भ से जन्म लिया। इस समम जो यदुकुन रूप अवतीर्ण हुये हैं, ये ही उम समय इन्द्र के छोटे भाई के रूप में अदिति के पुत्र बने थे ॥१५॥ तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो वीर्यवान् बलि । अश्वमेध ऋतुश्रेष्ठमाहतुं मुपचक्रमे १६ वर्तमाने तदायज्ञ देतेन्द्रस्य युधिष्ठिर । स विष्णुमिनो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्मवेषधृक् । मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधरः शिखी ।।७ पलाशदण्ड सगृह्य वामनोऽद्भुत दर्शनः । प्रविक्ष्य स बलेयज्ञे वनैमानेतु दक्षिणाम् । देहील्युवाच दैत्येन्द्र विक्रमास्त्रीन ममैव है। दीयता विपदी मानामित्ययाचन्महासुरम् । स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा "उन्ही दिनो परम शक्तिशाली दैत्यराज बलि ने बड़ी धूमधाम से अश्वमेध यज्ञ का उपक्रम किया। जिस समय वह यज्ञ हो रहा था नस अवसर पर वामन भगवान अपने को ब्रह्मचारी के वेप मे छिपाये हुये, मस्तक मु डाये, यज्ञोपवीत धारण किये, मृगछाला बगल मे दावे, शिखा धारण किये, एक पलाश का दण्ड हाथ में लेकर, बलि के निकट पहुंचे। उन्होने उससे कहा-'मुझे' तीन पग भूमि दक्षिणा स्वरूप दीजिये। उन्होने फिर कहा मुझे केवल तीन हो पर भूमि चाहिये। यह सुन कर बलि ने भी 'तथास्तु' कह कर दान की स्वीकृति देदी ॥६-६ तेन लब्ध्वा हरिभूमि जम्भयामास वभशम् । स शिशुः सदिव खच पृथिवी व विश म्पते ।।१० निभिविक्रमणरेतत् सर्वमानमसामिभू' । ब्रह्मबलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ।

1 उपसंहार ] । ४८१ विक्रमस्तिभिरक्षोभ्या क्षोभितास्ते महासुरा. ॥१॥ विप्रचित्तिमुखा द्धा देरपसघा महावला । नाना वक्ता महामाया नानावेपघरा नृप । नाना प्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपनाः ।।१२ स्वान्यायुधानि सगृह्य प्रदीप्ता इव तेजसा । क्रममाण हरि तत्र उपावर्तन्त भारत ।।१३ "वलि द्वारा भूमि दान का सकल कर दिये जाने पर दामन भग- वान बहे बेग से बढ़ने लगे। पहल तो वे बालक जमे लगते थे पर क्षण मात्र में उन्होंने महाविशाल रूप धारण करके तीन ही परो मे त्रिलोक को नाप लिया। जब भगवान ने इस प्रकार केवल तीन ही पगो द्वारा बलि का सर्वस्व ले लिया तो उसके बडे बडे सामत महा अमुर विचलित हो उठे । उनम विप्रचित्ति आदि प्रमुख दानव थे । वे अनेक प्रकार के वेष में अनेक प्रकार के मुख वाल थे। उनका आकार बहुत विशाल था। उनके हापो म तरह तरह के हथियार थे, उहोंने मालाऐ और चन्दन धारण कर रखे थे तथा तेज की अधिकता से प्रज्ज्वलित हो रहे थे । जब वामन भगवान तीनो लोको को मारने लगे तो वे दैत्य अपने हथियार लेकर उनके चारो तरफ खडे हो गये ॥१०.१३॥ प्रमथ्य सर्वान् दैतेयान् पादहस्तलस्तु तान् । स्प कृत्वा महाभीम जहाराशु स मदिनीम् ॥१४ सम्प्राप्य पादमाकाशमादित्य सदने स्थित । अत्यरोचत भूतात्मा भास्कर स्वेन तेजसा ॥१५ प्रकाशयन् दिश सर्वा प्रदिशश्च महावल । शुशुभे स महावाहुः सर्वलोकान् प्रकाशयन् ।।१६ तस्य विक्रमतो भूमि चन्द्रादिस्य स्तनान्तरे । नभ प्रनममाणस्य नाभ्या किल तदा स्थिती। परमाक्रममाणस्य जातुभ्या तो व्यवस्थिती ॥१७ ४८२ ] । बामन पुराण विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येव द्विजातयः । अथासाद्य कपाल स अण्डस्य तु युधिष्ठिर ।।१८ तच्छिद्रात् स्यन्दिनी तस्य पदाद् भ्रष्टा तु निम्नगा.। ससार सागर साऽऽशु पावनी सागरङ्गमा।।१६ "यह देख कर भगगन ने महा भंयकर रूप ध रण करके उन दैत्यों को लातो और थप्पड़ों से ही मार कर समस्त भूमि को उनसे छीन लिया । उनका एक पर ऊपर उठ कर मादित्य मण्डल तक पहुंच गया। उस समय भगवान सूर्य से भी अधिक तेजस्वी प्रतीत हो रहे थे। वे महा बलवान विष्णु सम्पूर्ण दिशाओ को प्रकाशित करते हुये अत्यत शोभित हो रहे थे। उस समय वे इतने विशाल हो गये कि चन्द्रमा और सूर्य उनकी छाती के वरावर आ गये । और जब वे आकाश को नापने लगे तो सूर्य, चन्द्रमा नाभि के बराबर ऊ चाई में ही दिखाई पड़ने लगे । जब उन्होने अपना पैर स्वर्ग से भी ऊ चा उठाया तो चन्द्रमा और मूय घुटनो के ही सामने आ गये। इस प्रकार मगवान के चरण ब्रह्माण्ड कपाल मे जा लगे और उसमे छिद्र हो गया। उससे जल झाने लगा जो नीचे गिर कर गपा के रूप समुद्र से मिला ॥१४-१६॥ जहार मेदिनी सर्वा हत्त्वा दानवपुगवान् । आसुरी श्रियमाहृत्य जील्लोकान्स जनार्दन । सपुत्रदारानसुरान् पानाले तानपातयत् ॥२० वलिर्वद्धोऽभिगानी च यजवाटे महात्मना । विरावन कुले रावं पाताले विनिपातितम् ।।२१ "वापन भगवान ने बडे-बडे दैत्यो को परास्त करने समस्त पृथ्वी उनस छीन ली और उनकी समस्त सम्पा लेकर उनको स्त्री- पुत्रो सहित पाताल लोक म भेज दिया। भगवान ने अभिमानो रात्री ननि यज्ञ महप में ही बाँध मिश और विरोचा के समस्त वश हो पानात घने जाने सेवापलिया ॥२०.२१॥ जा उपसंहार ] । ४.३ 'पद्म पुराण' में वामन-प्रादुर्भाव वर्णन- 'पद्म पुगण' मे बलि-वामन चरित्र का वर्णन अन्य पुराणो की तरह किया गया है, पर उममें राजा बलि को भी बडो प्रशसा की गई है, अदिति और कश्यप द्वारा तपस्या का वर्णन विस्तार से क्यिा है- प्रह्लादस्य सुतो जज्ञे विरोचन इतीरितः। तस्य पुत्रो महाबाहुबलिर्वैश्वानरः प्रभु। स तु धर्मविदा श्रेष्ठः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः। हरेः प्रियतमो भक्तो नित्य धर्मरतः शुचिः ॥२ स जित्वा सक्लान् देवान् सेन्द्राश्च समरुद्गणान् । बील्लोकास्ववशे स्थाप्य राज्य चक्रे महाबलः ॥३ अकृष्ट पच्या पृथिवी वहुसस्य फलप्रदा। गाव: पूर्णदुधाः सर्वा. पादपा फलपुष्पिताः ॥४ स्वधमनिरताः सर्वे नरा. पापविजिताः । अर्चयान्ति हपीकेश सतत विगतज्वराः ॥५ एव चकार धर्मण राज्य दैत्यपतिर्वली। इन्द्रादि सिदशास्तस्य विकरा: समुपस्थिता ॥६ ऐश्वर्य विषु लोकेपु बुभुजे वलदर्पहृत् । भ्रष्ट राज्य सुत दृष्ट्वा तस्याऽपि हितकाम्यया ॥७ कश्यपो भार्यया साद तपस्तपे हरि प्रति । आदित्या सह धर्मात्मा पतोमृत समन्विनः ।। अर्थान-'दत्यपति प्रहार । पुन विरोवन नाम रा हुआ और उसका पुत्र महा बनवान और तेजस्वी बलि हुआ। वह परिमाश्री में धेट, सत्यवती और जितेन्द्रिय पा, भगवान का सच्चा भक्त या और सदेव धर्मपालन में दत्त चित्त रहता था। उसने ममम देवनामों तशा मरदगणों को जीत कर तीनों लोकों में अपना चक्रवर्ती माम्राज्य स्पा- पित पिया था । चमके राज्य मे पृष्मी रिना ओजे काय ही बहन मात्र और फल उत्पन्न करतो पी, गाये मूर दूर देती थी और वृक्ष सदा

४८४ ]
[ वामन पुराण
फल फूलो से लदे.रहते थे। सब प्रजा धर्म का पालन करती और पापों
से दूर रहती थी। सब लोग विनम्र भाव से भगवान की पूजा-अर्चा
किया करते थे। उस बलवान देत्यपति का शासन इस प्रकार पूर्ण
धर्म युक्त था और इन्द्रादि ममस्त देवगण उसके सम्मुख सेवक की तरह
उपस्थित रहते थे। वह अपने बल के द्वारा तीनो लोकों के ऐश्वर्य का
हस्तगत करके उपभोग करने लगा । तब अपने पुत्र इन्द्र को राज्य
भ्रष्ट देख कर श्यप और अदिति उसकी हित कामना से भगवान
विष्णु को प्रसन्न करने के उद्देश्य से तप करने लगे और आहार त्याग
कर केवल दूध पर रहने लगे।'
वे
बहुत समय तक इस प्रकार तप करते रहे तो भगवान ने प्रसप्त
होकर वर मांगने को कहा। उन्होने इन्द का राज्य पुनः दिलाने की
प्रार्थना की। भगवान ने वामन अवतार लेकर उनकी मनोकामना
पूर्ण करने का आश्वासन दिया। कुछ समय पश्चात् वे माता अदिति
के गर्भ से उत्पन्न हुये । जब वे देवताओं के आग्रह पर बलि के यज्ञ
में पहुंचे तो वह इनके दर्शन करके बड़ा प्रसन्न हुभी और पूजा करके
कहने लगा-
धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि सफल मम जीवितम् ।
स्वामर्चयित्वा विप्रेन्द्र किं करोमि तव प्रियम् ।।
"आपका पूजन करके मैं धन्य हो गया-तय हो गया-मेरा
जोवन सफल हो गया। बब मैं आपका करा प्रिय कार्य करू?" तब
वामन जी ने कहा-
शृणु राजेन्द्र वक्ष्यामि ममागमन कारणम् ।
अग्निकुण्डस्य पृथिवो देहि देस्य पते मम ।।
मम सिविक्रममिता नान्यरिछामि मानद ।
सर्वपामेव दानानां भूमिदानमनुत्तमम् ॥
यो ददाति ममी राजा विधायऽविन्दनाय ।
अंगुठमात्रमपिया स येत्पृथिवीपतिः ।।

उपसंहार ] [ ५८५ न भूमिदानं सदृशं पवितमिह विद्यते । भूमि यः प्रतिगृहानि भूमि यश्च प्रयच्छति ।। उभौ नौ पुण्यकर्मागी निघने स्वगंगामिनी । तस्माद्भमि महाराज ! प्रयच्छ त्रिपदी मम ॥ "हे राजेन्द्र ! मैं अपने आने का कारण बतलाता हूं। आप मुझे अग्निहोन के लिये कुण्ड बनाने को भूमि दान दीजिये । मैं केवल तीन पर पृथ्वी चाहता हूं, ज्यादा की मेरी इन्छा नहीं है । है मननीय राजन ! सब प्रकार के दानो मे भूमि का दान सर्वोत्तम है । जो किसी अकिंचन ब्राह्मण को एक अंगुल भूमि भी दान करता है वह पृथ्वी का स्वामी हो जाता है । भूमि दान के समान पवित्र दान और कुछ नहीं है । जो भूमि दान देता है और जो उसे ग्रहण करता है. वे दोनों देहान्त होने पर स्वर्ग को जाते हैं। इसलिये मैं आपसे तीन परों के दरावर भूमि की याचना करता हूं।" जब वामन भगवान ने तीन पर पृथ्वी को नापने के लिये अपना रूप बढाया तब उन्होंने पचास करोड योजन विस्तीर्ण समुद्र, पवंत, दीप, मनुष्य, देवता सहित पृथ्वी को एक ही पग मे ना लिया। तब भी बलि अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान को स्तुति करता रहा । इससे सन्तुष्ट होकर भगवान ने उमे दिन्य च देकर अपना विश्व रूप दिखलाया। इस प्रमग मे 'पद्म पुराण कार ने गगा के आविर्भाव का भी कथन किया है, पर उनका वणन दूसरे पुराणों से कुछ भिन्न है । जा हम पहले कह चुके हैं तदनुमार शिशु के पद से ब्रह्म कटाह मे ईद हो जाने से गगाजा बह निकला । पर पद्म पुराण मे कहा गया है- अथ सर्वेश्वरो विष्णुद्वितीय पदमव्ययम् । कार्य प्रसारयामास ब्रह्मलोकान्तमच्युतः ।। तत: पितामहो ब्रह्मा नामादि चिह्नितम् । पाद तद्देवदेवस्य हर्पसंकुल चेनसा॥

४२६ ]
[ वामन पुराण
धन्योऽस्मीति वदन्ब्रह्मा गृहीत्वा स्वकमण्डलुम् ।
भक्त्या प्रक्षालयामास तत्र संस्थित वारिणा ॥
अक्षय्यमभवत्तीयं तस्य विष्णोप्रभावतः ।
तत्तीर्थ मेरुशिखरे पपात विमले जलम् ।।
स्वर्गे मन्दाकिनी प्रोक्ता त्वधो भोगवही तथा ।
मध्ये वेगवती गङ्गा पावनाथं नृणां शिवा ।।
"सर्वेश्वर विष्णु का दूपरा पैर ब्रह्मलोक मे पहुंचा । तब पितामह
ब्रह्मा चक्र, पद्म आदि के चिह्नो से युक्त उस चरण को देख हर विभोर
हो उठे और उन्होने कहा "आज मैं धन्य हो गया" और तुरन्त ही
अपने कमण्डलु के जल से उसका प्रक्षातन किया । विष्णु के प्रभाव से
वह जल अक्षय हो गया और परम पवित्र तीर्थ सलिल के रूप में मेरु
शिखर पर गिरा । वही जल स्वर्ग मे मन्दाकिनी, पाताल मे भोगवती
और
भूमण्डल मे गंगा के नाम से बहता है और करोडों मनुष्यो को
तारने वाला बना है।"
वामन भगवान ने बलि की धार्मिकता की बड़ी सराहना की और
जब उसे पाताल मे भेजा तो स्वय भी उसके साथ वहाँ पर सदैव रहने
की प्रतिज्ञा की।
वायु पुराण
'वायु पुराण' मे विष्णु भगवान का महात्म्य कीर्तन करते हुये
सक्षेप मे वामन अवतार का भी जिक्र कर दिया गया है । कथानको
को बहुत मी बाते उनमे नही है, पर विशाल रूप धारण करके समस्त
विश्व को तीन पगों मे नाप लेने की घटना उसमे भी स्पष्ट रूप से
धागत है-
बलि संस्थेपु लोयेषु प्रेतायां सप्समे युगे ।
दत्यस्त्रलोक्य भाक्रान्ते तृतीयो वामनोऽभवत् ॥१
सक्षिप्यात्मानमङ्गषु वृहस्पतिपुरस्सरम् ।
यजमानन्तु दैत्येन्द्रमदित्याः कुलनन्दनः ।

उपसंहार ]
[ ४७
।
द्विजो भूत्वा मुभे काले बलि वैरोचनम्पुरा ॥२
सैलोक्यस्य भवान् राजा त्वयि सव्वं प्रतिष्ठितम् ।
दातुमर्हसि मे राजन् विक्रमास्त्रीनिति प्रभुः ॥३
ददामोत्येव तं राजा बलिरोचतोऽब्रवीत् ।
वामनन्त च विज्ञाय ततोऽनुमुदितः स्वयम् ॥४
स वामनो दिव सव पृथिवी च द्विजोत्तमा ।
विभिः क्रमैत्रिश्वमिदं जगदाकामन प्रभुः ॥५
"सातवें वेता युग मे जब बलि नामक दैत्य राजा ने तीनों लोको
पर अधिकार जमा लिया, तो विष्णु भगवान 'वामन रूप में अवतीर्ण
हुये । उस समय वे अदिते के पुत्र हुये और उन्होंने वृहस्पति के समान
रूप में ब्राह्मण बन कर राजा बलि के सम्मुख जाकर दान की याचना
की। उन्होंने कहा-महाराज ! आप तीनो लोको के स्वामी हैं, आप
मुझे तीन पंड भूमि देने की कृपा करें । राजा बलि उनको नागन
समझ कर बड़े खुग हुये और तीन पैर भूमि दान देदी। तब उन
वामन देव ने द्यौलोक, आकाश और पृथ्वी को तीन ही परो मै आकान्त
कर लिया।" १-५॥
अत्यरिच्यत भूतात्मा भास्कर स्वेन तेजसा ।
प्रकाशयन् दिश. सा. प्रदिशश्च महायशाः॥६
शुशुभे म महाव हुः सर्वलोकान् प्रकाशयन् ।
आसुरीशियमाहुत्य त्रील्लोकाश्च जनार्दन ।
सपुत्र पोयानसुरान् पातालनलमानयत् ॥७
महाभूतानि भूतात्मा सविशेषाणि माधवः ।
कालञ्च सकल विप्रास्तपाद्भुतमदर्शयन् ।।
तस्य गाये जगत्सर्वमात्मानमनुपश्यति ।
न किञ्चिदस्ति लोकेषु पद व्याप्त महात्मना ।
तद्वं रूपमुपेन्द्रस्य देवदानव मानवाः ।
दृष्ट्वा सम्मुमुहुः सर्वे विष्णुतेजो विमोहितः।।१०

४५८ [ [ वामन पुराण वलिः सितां महापश: सवन्धु ससुहृद्गण । विरोचनंकुल सर्व पाताले सन्निवेशितम् ।।११ "उस समय वामन भगवान के तेज के सम्मुख सूर्ग का तेज भी फीका पड़ गया। समस्त दिशायें और प्रदिशायें उस तेज से पूरित हो गई । तीनो लोकों और असुरो की समस्त सम्पदा को ग्रहण करके उस समय वे अत्यन्त शोमा को प्राप्त हो गये और समस्त असुरों को व.धु-बांधवो सहित पाताल में भेज दिया । उस समय वहाँ पर उपस्थित समस्त ज्ञानी जनो को उन भगवान की देह में समस्त जगत प्रतिविम्बित होता दिखाई पडा। समस्त लोको मे एक भी ऐसी वस्तु नहीं है जो उस विश्व रूप में व्याप्त न हो । भगवान 'उपेन्द्र विष्णु के उम अद्भुत रूप को देख कर देव, दानव, मनुष्य सब मुग्ध हो गये । तत्पश्चात् उन्होने राजा बलि तथा उसके वश के समस्त जनो को महापाश में निवद्ध करके पाताल भेज दिया" ॥६-११॥ इस कयानक मे भी समस्त घटना क्रम 'पद्म पुराण' के समान ही है, पर इसमे बलि की प्रशंसा की कोई बात नहीं है। उल्टा ऐमा ही भाव दर्शाया है कि दानव दुणत्मा थे और भगवान ने उनको दण्ड स्वरूप ही पाताल में रहने को विवश किया। विष्णुधमोत्तर पुराण में बलि-वामन कथा- बलि-वामन का उपाख्यान किसी न किसी रूप में सभी पुराणो मे पाया जाता है। उनके कथानको में थोडा थोडा अन्तर भी है, पर मूल कथा ज्यो को सो हैं । इस दृष्टि से 'विष्णु धर्मोत्तर पुराण' के रपिता ने उममे एक बिल्कुल नई घटना मम्मिलित पर दी है। अधिक पुराणो मे तो मही कहा गश है कि देवताओ की प्रार्थना पर विष्ण भगवान वामन रूप धारण करके बलि के यहां गये और उससे तीन पग पृथ्वी मांग कर उगवा समस्त राज्य छीन र इन्द्र को दे दिया । पर विशु चमोत्तर' में कहा गया कि स्वय इन्द्र ही छल वर वामन भगवान को लेकर यलि के पास गया था- १ .. उपसंहार ] । ४८६ तेषां बभूव देवेन्द्रो विश्वभुवलोक पूजितः । आसस्तस्यासुरा घोरास्तदा दायाद वान्धवा बभूव राजा तेपा च वाकलिन् मनामतः । येन विक्रम्य शक्रस्य हृतं राज्यं तदा वलात् ॥२ हत राज्यस्तु देवेन्द्रो ब्रह्माणं शरणं गतः । ब्रह्मादि शक्रमादाय जगाम शरण हरिम् ॥३ निवेदयामास तदा देवदेवाय शाङ्गिणे । वापूलोविजय सर्व ब्रह्मा शुभचतुर्मुखम् ॥४ अर्थात्-"जब देवेन्द्र समस्त विश्व का पूजनीय शासक बना तो उसके अन्य भाई बह बलशालो असुर बन गये । उन असुरो मे एक राजा वाकलि (बलि) नाम का हुआ, जिसने अपनी वीरता से इन्द्र के राज्य को जीत लिया। इस प्रकार राज्य च्युत हो जाने पर इंद्र ब्रह्माजी की शरण मे गया और वे उसे लेकर विष्णु भगवान के सान्निध्य में पहुंचे । ब्रह्माजी ने भगवान शाङ्गपाणि से दति द्वारा इन्द्र के परा- भव को सब बात कह सुनाई ॥१४॥ ब्रह्मन्प्रत्याहरिष्यामि राज्यमस्य शतक्रतोः । दिवि देवेषु धर्मात्मन्निवृत्तो भव मा चिरम् ॥५ अह वामन रूपेण प्रयास्ये वाप्कलि नृपम् । मा दृष्ट्वा विस्मित तन्तु गत्वा याचतु देवराट् ॥६ लोकसयं मम हृत त्वया विक्रम्य वाकले। तत्राग्नि शरणार्थाय दयिता मेकमसयम् ॥७ अतीव हस्वगात्रस्य वामनस्यास्य मा चिरम् । एवमुक्तस्तु शक्रण तदा दाता क्रमत्रयम् ॥८ "हे ब्रह्मा ! मैं इन्द्र के राग्य को पुन: इलि से छीन कर इसे दिता दूंगा । धर्मात्मा देवगण अधिक समय तक स्वर्ग से दचित नहीं रहेंगे। मैं वामन धारण करके वापूलि नप के पास जाऊंगा । पर वह मुझे देखकर विस्मित होने समेगा तो देवराज इन्द्र भी उसके पास पहुंच जायगा और कहेगा कि-'हे वाकसे ! तुमने अपनी पोरता से .

४६० । वामन पुराण तीनों लोको पर अधिकार कर लिया है। यह वामन ब्रह्मचारी मेरे पास अग्निहोत्र के निमित्त तोन पर भूमि मांगने आया है, पर मेरे पास परा भी भूमि शेप न रहने से में असमर्थ हो गया हूँ और तुम्हारे पास सहायतार्थ आया है। यह वामन बहुत ही छोटे आकार का है, इसको पोड़ी-सी भूमि तो तुम दे ही सकते हो।' इन्द्र के यह कहने पर वारकलि तीन पर भूमि मुझे दान दे देगा ॥५-८॥ इत्येवमुक्तो देवेन ब्रह्मा स्वभवनं गतः। देवोऽपि वामनो भूत्वा प्रयातो यत्र वाष्कलि । वाकलिमिनो दृष्ट्वा विस्मयोरफुल्ल लोचनः । निरीक्ष्य त यथाकाममसुरेबहुभिवृतः ।।१० एतस्मिन्नेव काले तु शक्रस्तं देश माययो। पारायमिनीयाद्यः शक्र सपूज्य वाप्कलिः॥११ किमागमनकार्य ते तमुवाच प्रहृप वाक् । अत्यापचयमिदं मन्ये तवागमन कारणम् ॥१२ "भगवान विष्णु के इस कथन को सुनकर ब्रह्माजी अपने भवन को चले गये। तब विगुजो वामन प धारण के धामलि के यहाँ खाये। उनको देख कर यह वा विििमत हुआ और अन्य भी अनेक असुर उनसे देखने को वही पागमे । इतने मे हर भी यही प्रा रहेगा और उसे देख कर वालि ने पाच सय-आवमन आदिसे जमा सागर पिया ( बालि ने इद मे रहा-'याने freeरण यहाँ बाने पर उठाया, पु तो हमसे बड़ा आश्चर्य हो रहा है ?॥६-१२ लोवमयं मेऽपाहवं विक्रमेण तु यापले । तमाग्नि शरणार्याय दीपता में नमनयम् ॥१३ अतीव हस्तगासस्य याममस्पास्य पापिय । भूमि भोगे गुपारवये यातुग स्वदमुरगहे ॥१४ कात्रये यामागे देवरान पृतं शुभम् । सत्र गृव गुविधा प्राप्त: गुगी गराने गव १५ -- .

उपसंहार J [४६१. एवमुक्तो वाकलिना त्यक्त्वा रूपं तु वामनम् । हरिविचक्रमे लोकान्देवानां हितकाम्यया ॥१६ ब्रह्मलोकं ततो गत्वा ....." र देवस्य वामश्चरणो निविष्टो दानवालये ।।१७ ततः क्रम स प्रथमं ददो सूर्य जगत्पतिः । द्वितीयं च ध्रुवे देवस्तृतीयेन च यादव ।।१८ "इन्द्र ने कहा-'हे वाकले ! मेरे समस्त राज्य पर तो आपने अधिकार कर लिया है। इसलिये मैं इस वामन ब्रह्मचारी के लिये. अग्निहोत्र के लिये तीन पर भूमि मांगने को आपके पास आया हूँ। यह अत्यन्त छोटे आकार का है, इमको इतनी थोड़ी सी भूमि देने में आपको क्या लगता है?' वाप्कलि ने कहा-'आप इसे तीन पंर भूमि दिलाना चाहते हैं तो मैं खुशी से देता हूँ।' जब उसने संकल्प पूर्वक दान कर दिया तो भगवान ने वामन-रूप त्याग दिया और देवताओं के हितार्थ इतना विशाल रूप धारण पिया कि वह ब्रह्मलोक तक का पहुंचा । उनका बांया पर तो बलि के सन्मुख रखा रहा और दया सूर्य तक पहुंच गया । दूसरे पर में उन्होंने प्रव तक नाप लिया। तीसरे पर के लिये स्थान ही नहीं रहा और वह ब्रह्माण्ड में जा टकराया ॥१३-१८॥ वामनेन समाकान्ताः सर्वे लोका यदानघ। असुरस्ते तदा त्यक्त्वा देवानां सत्य वान्धवैः ॥१६ पातालञ्च यदातेन नाक्रान्त हरिमेघसा। असुरस्तस्तदा धोररुप्यतै यदुनन्दनः ।।२० देवोऽपि हत्वा संलोक्यं जगामादर्शनं तदा। पातालनिलयश्चापि सुखमास्ते स वाप्कलिः ॥२स शकोऽपि पालयामास विपश्चिद्भुवनं तदा। इमं त्रिविक्रम नाम प्रादुर्भाव जगद्गुरो ॥२२ "इस प्रकार जब दामन भगवान ने समस्त सोगों को अपने परों से नार डाला तर अमुरों को देवताओं का राज्य छोड़ देना पड़ा।

४६२ ] [ वामन पुराण भगवान ने उन सब को पाताल चले जाने का आदेश दिया। इस पर मसुर गण बड़े नाराज हुये । पर अन्त मे उनको वहां जाना ही पड़ा। और वाष्कलि वहीं सुख पूर्वक रहने लगा। भगवान उसी समय अन्तर्धान हो गये और इन्द्र भी अपने लोक में पहुंच गया । इस प्रकार भगवान का नाम त्रिविक्रम' प्रसिद्ध हो गया ।" ||१६-२२॥ अग्नि पुराण- अग्नि पुराण के आरम्भ में ही दशों अवतारों का वर्णन किया गया है । इनमें राम-कृष्ण का वृतान्त तो काफी विस्तार से दिया गया है, मत्स्य और कूर्म का सामान्य है और शेप वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, बुद, बल्कि का संक्षेप में ही दिया गया है। फिर भी उसके दारा वामन अवतार के स्वरूप का ठोक ज्ञान हो जाता है- देवासुरे पुरायुद्ध बलिप्रभृतिमिः सुराः । जितः स्वर्गात् परिभ्रष्टा हरि ते शरणं गताः। सुराणामभयं दत्त्वा अदित्या कश्यपेन च ।।1 स्तुतोऽसौ वामनो भूत्वा यदित्या स ऋतु ययौ। वले: श्रीयजमानस्य गङ्गाद्वारे गृणन्स्तुतिम् ।।२ वेदान्पठन्तं तं श्रुत्वा वामनं वरदोऽब्रवीत् । निवारितोऽपि शुक्रण लि.यहि यदिच्छसि ॥३ तत्तहं संप्रदास्यामि वामनो वलिमप्रवीत् । पदनय मे गुर्वयं देहि दास्ये तमग्रवीत् ॥४ तोये तु पतिते हस्ते वामनोभूदवामना। भूलॊकस भुवलोकं स्वरलोकच पदत्रयम् ॥५ पार पलिप गुतले वच्छकाय ददो हरिः। शो देव हरि स्तुरवा भुवनेश: मुखी स्यभूत् ॥६ भपात-"प्रथीन पास में देशगुर संग्राम मेलि मादि मारों मेरामम् देवाओं पोतकर हम रोल दिया थाहा प्यरत देवगण nिy भगरानो शरण में १६ । उहनि देशों को उपसंहार ] । [ ४३ बमय रहने का वचन दिया। उधर महपि कश्यप तथा माता अदिति ने देवताओ के हितार्य वपस्या की । इस पर भगवान अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुये और राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे। गगाद्वार मामक स्थान में वे राजा बलि द्वारा पूजित हुये । उनके वेद पाठ से प्रसन्न होकर बलि ने कहा चाहे जो मांग लो। यद्यपि गुरुशुक्राचार्य ने उसे दान देने से रोका, पर फिर भी उसने वामन से कहा कि वो पूछ चाहो मांग लो। इस पर वामनजी ने कहा कि मुझे गुरु को देने के लिये उन पर जमीन की जरूरत है, जिससे मैं उनकी दक्षिणा पुका सकू। भूमि दान के लिये पृथ्वी पर संकल्प का जल छोडते हो वामन जो महा विशाल हो गये और उन्होंने तीन ही परों में तीनो लोक न प लिये। तब उन्होंने राजा बलि को पत कर नीचे सुतल लोक में भेज दिया और समस्त राज इन्द्र को सौंप दिया। इन्द्र ने वामनजी की स्तुति की और वह लोगो का स्वामी बन कर मुखो हुआ" नारद-पुराण- नारद पुराण में भी यह कथा विस्तार के साथ दो गई है। उसमें देवमाता अदिति को ठग का वर्णन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।दै यों ने उनकी तपस्स रा हाल जान कर उनको विचलित करन के लिये वन में आग लगा दी, पर तब भी अपने ध्यान में लगी रहीं। भगवान के सुदर्शनचक्र ने उनकी रक्षा को और दस लोग स्वर ही अपनी माग से जल मरें। फिर भी जब विष्णु भगगन उनको वरदान देने आये तो उन्होंने अपने पुत्रों के क्ट मिटाने की प्रार्थना करने के साप यह भी कहा कि मैं नहीं चाहती विदेस मारे जा, क्योंकि वे भी कश्यपजी को अन्य परनी के पुत्र होने के नाते मेरे भो पुत्र ही है। इस पर विष्णु भगवान बहुत प्रसन्न हुये और उन्होंने कहा- स्वात्मजे यान्यपुवाय. समत्वेन वतंते। न तस्य पुत्रशोक. स्यादेव धर्म. सनातन ॥ "वो अपने तथा दूसरे के पुत्रों पर पान माव रखता है, उसके हुन पमो दुरवस्था में नहीं रह सकते, यही सनाउन घर है" 3 . ४५४ ] [ वामन पुराण जव वामनदेव बलि के पास दान-लैने को पहुंचे और शुक्राचार्य ने उसे दान देने को समझाया तो उसने गुरु के वचन को धर्म विरोधी मानते हुये कहा- हरिहरति पापानि दुष्टाचित्तैरपि स्मृतः । अनिच्छमापि सस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ।। जिह्वाग्रवसते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम् । स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्ति दुर्लभम् ॥ "यदि दूपित चित्त वाला व्यक्ति भी भगवान को स्मरण करे तो वे उसके पापों को वैसे ही जला देते हैं जैसे बिना इच्छा किये भी शू लिया जाय तो भी वह जला देती है। इसी प्रकार जिसकी जिह्वा के अग्रमार्ग 'हरि' ये दो अक्षर रहते हैं वह अवश्य ही वैकुण्ठधाम को प्राप्त करता है और उसका पुनरागमन नहीं होता।" वामनदेव के तीन पग भूमि मांगने पर बलि ने सब जानते हुये भी बडो प्रसन्नता से भूमि दान दी। उस समय शुक्राचार्यजी सूक्ष्म रूप से संकल्प के जल पान मे घुस उसके जल को बाहर गिरने से रोषने लगे। यह देख कर वामनदेव ने हाथ मे लिये कुश को पलश के मुख मे घुसेड दिया जिससे शुक्राचार्य जी की एक आँख फूट गई। तत्पश्चाद वामन भगवान ने तीनों लोक को नाप कर बलि को बडे प्रेम से रसा- तल का अधिपति बना दिया। भागवत महापुराण- पर 'वामन-उप ख्यान' का सर्वोत्तम वर्णन भागवत में पाया जाता । यद्यपि 'वामन पुराण' में भी वामन-धरित्र कापी विस्तार से दिया गया है, पर 'भागवत' की विद्वता, कविस्व और साहित्यिस्ता को शायद ही कोई पुराण नहीं-वहीं पहुंच सका हो 'भागवत' में वामन भक्तार वा स्थानर भी बवाध्य मय रूप और प्रौद शली में वर्णित है। मारम्भ में भगवान पे स्वरूप और उनके शुभ जन्म समय या वर्णन ही पड़े प्रभावशाली दंग रो दिया गया है- 1 - उपसंहार ] ] ४६५ इत्यं विरश्चिस्तुत कर्मवीर्यः प्रादुर्बभूवामृत भूरदित्याम् । चतुर्भुजः शङ्खगदाब्जचक्र: पिशङ्गवासानलिनायतक्षणः ।।१ श्यामावदाणोझखराजकुण्डलस्विपोल्लसच्छावदनाम्बुजःपुमान् । श्रीवत्सवक्षावलयाङ्गदोल्लसकिरीटकांचीगुणचारुनूपुरः ॥२ श्रोणायां श्रवण द्वादश्यां मुहूर्तेऽभिजिति प्रभुः। सर्वे नक्षत्रताराद्यश्चक तस्तजन्म दक्षिणम् ।।३ शबदुन्दुभयो नेदुमृदङ्गपणवानकाः । चित्रवादित्र तूर्याणां निर्घोपस्तुमुलोऽभवत् ॥४ गायन्तोऽति प्रशंसन्ता नृत्यन्तो विवुधानुगाः । थादित्या आक्राम पदं कुसुमैः समवाकिरन् ।।५ "नव ब्रह्माजी ने भगवान को शक्ति और लीला का गुणगान किया सब वे अदिति के सम्मुख प्रक्ट हुये । उनकी चार भुजाएं थीं जिनमें संख, चक्र, गदा पदम धारण किये थे, कमल के समान नेत्र थे और पीताम्बर धारण किये थे। श्यामवणं का उनका शरीर था, वक्षस्थल पर यो वत्म का चिह्न था। वे कंगन बाजूबन्द, फिरोट, करधनी, नपुर यादि सुन्दर आभूषणों से युक्त थे। जिस समय उन्होंने जन्म लिया उस समय चन्द्रमा प्रवण नक्षत्र पर थे । भाद्रपद शुक्ल को द्वादशी तिथि थी। अभिजित अक्षत्र में भगवान का जन्म हुआ। सभी नक्षत्र और ग्रह भगवान के जन्म को शुम मूचित कर रहे थे। उस समय देवगग ने शंख, ढोल, मृदग, डफ और नगाड़े बजाये । इन तमाम बाजों और तुरहियों ने गन्द बड़े जोर का हुआ। उस समय समस्त देवगण पा उनमें अनुचर गाने, नाचने और प्रासा करने लगे और उन्होंने अदिति के आश्रम को पुप वर्षा से ढक दिया ॥१-५॥ हम प्रकार कश्यप, अदिति तथा अन्य देव सपा महापियों से पनुभुम में दर्शन देकर भगवान ने सब के देखते-देसने वामन प पारण रलिश तब उनके बाद कम यादि सस्कार रिये गये। उपनयन संस्कार में किस प्रकार ममस्त प्रमुख देवों ने उनसे मिल मामिलामा दर्शन करने

४५६ )
[ वामन पुराण
त वटु वामन दृष्ट्वा मोदमाना-महर्षय ।
कर्माणि कारयामासु पुरस्कृत्य प्रजापतिम् ॥६
तस्योपनीयमानस्य सावित्री सविताप्रवीद ।
बृहस्पतिव्रह्मसूत्र मेयला कश्यपोऽददात् ।।७
दवी कृष्णाजिन भूमिर्दण्ड सोमो वनस्पति ।
कोपीनाच्छादन माता धौश्छल जगत पते 10
कमण्डलु वेदगर्भा कुशान्सप्तर्षयोददु ।
अक्षमाला महाराज सरस्वत्यव्ययात्मन ।
तस्मा इत्युपनीताय यक्षराट् पात्रिकामदात् ।
भिक्षा भगवती साक्षादुमादादम्बिका सती ॥१०
स ब्रह्मवर्चसेनैव समा सम्भावितो वटु ।
ब्रह्मर्पिगएसजुष्टामत्यरोचत मारिप ॥११
"भगवान को इस प्रकार ब्रह्मचारी के रूप में देख कर महविगण
बडे प्रसन्न इये और अन्य सस्कार करके उपनयन की तैयारी की।
उस अवसर पर गायत्री के अधिष्ठाता सरिता देव ने स्वय उनको गायत्री
मन का उपदेश दिया । देवगुरु बृहस्पति ने यज्ञोपवीत, प्रजापति कश्यप
जी ने मेखला, माता अदिति ने कोपीन दी । आकाश के देवता ने छत्र,
ब्रह्माजी ने कमण्डल, सप्तषियों ने कुश, सरस्वती ने रुद्राक्षमाला आपत
की। जब उपनयन संस्कार हो गया तो यमो के स्वामी कुवेर ने
उनको मिक्षा का पात्र दिया जिसमे जगत् माता पावतीजी ने स्वयम्
मिक्षा ली। इस प्रकार सबके द्वारा सम्मानित होकर बटुक वेषधारी
भगवान ब्रह्मषियों के मध्य ब्रह्मतेज से अरमान शोभित हुये ।।६ ११॥
उसी समय म लूम हुआ कि परम यशस्वी 'दत्यराज बलि नर्मदा
के तट पर 'भृगुकच्छ' नामक स्थान में बहुत विशाल अश्वमेघ यज्ञ क.
रहा है । यह मालूम होने पर वे उसके लिये चल दिये । । जब वह
पर उपस्थित भृगुवशी ब्राह्मणों ने सूर्य के समान तेजस्वी वामन भगवान
से ही बाते देखा तो वे सब आश्चर्य मे पर गये और उनके
सम्बध मे तरह तरह की कल्पनाए करने लगे । वमो समय हाथ में

उपसंहार ] ; [.४७ छत्र, दण्ड और जल से युक्त कमण्डलु लेकर वामनी ने यशाला में प्रवेश किया। उनके तेज से प्रभावित होकर समस्त ऋत्तिज उठ खड़े हुपे.और उनका स्वागत. सतार करने लगे। भगवान के छोटे स्वरूप के अनुरूप ही उनके समस्त अंग छोटे-छोटे अत्यन्त मनोहर और दरानीय पे। उनके दर्शन करके राजा बलि बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने उनको प्रेष्ठ मासन दिया। उसने उनका भक्ति भाव के साथ स्वागत करके उनके चरण धोये और उस जन को अपने मस्तक पर 'धारण किया। जिस चरण-जल को स्वयं प्रगान शिव ने मस्तक पर धारण किया है उस विष्णु के पादोदक को पाकर देत्यराज बलि धन्य हो गया। उसने बड़े दिन पूर्वक उनसे निवेदन किया-- स्वागतं ते नमस्तुभ्यं ब्रह्मन्कि करवाम ते। ब्रह्मीणां तपः साक्षान्मन्ये त्वाऽऽयं वपुर्धरम् ॥१२ अद्यनः पितरस्तप्ता अद्य न: पावितं कुलम् । अद्यःस्विष्ट, कतुरयं यद् भवानागतो गृहान् ।।१३ बत्ताप्रयो मे मुहता यथाविधि द्विजात्मज स्वच्चरणावनेजनः । हताहसोवामिरियं च भूरहो तथापुनीता तनुभिा पर्दस्तव ॥१४ यद्यद्वट,वांछसितत्प्रतीच्छमेत्वापिनविप्रसुतानुतकये। गां काञ्चनं गुणवद्धाम मृष्ट तथाग्नपेयमुन वा विप्रकायाम् । प्रामानसमृदां तुरगान्गजानवारयस्तियाहत्तमसम्बतीच्छ ।।१५ "ति ने कहा मापन ! में मारा गठ करता है। मार माशा दें कि मैं आपको. या सेवा गरूं? आप दधनों से हो ऐमा मगता है कि पापियों को पाया ही मूर्तिमान होकर मेरे सम्मुय या गई है। बाप महा पधारने ये मेरे सिर तृप्त हो गये, मेरा वंग पपित हो गया, मेरा यजमान हो या बारके परशोर से मेरे समस्त पार दूर हो गये और जों में जो फर मिलता है यह नासाय हो पिन गया, मारके रन से दृषी भी पवित्र हो गई। मारपरके मानी मनोगट प्रस्ट कीजिति मारा चाहते है? गाय, मोना, सर र मुग्गिा पर, पान-गन, हिरे । ४६८ '] [ वामन पुराण लिये ब्राह्मण-कन्या, गांव, घोड, हायी, रथ आदि जो कुछ आपकी इच्छा हो मैं आपको देने को प्रस्तुत हूँ।" वलि के इन धर्म युक्त वचनों को सुनकर वामन भगवान ने सर्व प्रथम उसकी दानशीलता की जिस प्रकार प्रशसा को यह इस धर्म कथा का बड़ा महत्वपूर्ण अंश है उन्होंने कहा- वचस्तवतज्जन देव सूनृतं कुलोचितं धर्मयुतं यशस्करम् । यस्य प्रमाण भृगवः सापराये पितामहः कुलवृद्धः प्रशान्तः ।।१६ न ह्य तस्मिन्कुले कश्चिनिःसत्त्वः कृपणः पुमान् । प्रत्याख्याता प्रतिश्रुत्य यो वादाता द्विजातये ॥१७ म सन्ति तीर्थे युधि चाथिनाथितः परांमुखा ये त्यमनस्विनो नृपाः । युष्मत्कुले यद्यसमामलेन प्रह्लाद उद्भादि यथोडुपः खे ॥१८ यतो जातो हिरण्याक्षश्चरन्नेक इमा महीम् । प्रतिवीरं दिग्विजये नाविन्दत गदायुधः।।१६ य विनिजिस्य कृच्छ्रेण विष्णु क्ष्मोद्धार आगतम् । नात्मान जयिन मेने तद्वीय भूर्यनुस्मरम् ॥२० "हे राजन् ! मापने जो कुछ कहा वह आपकी कुल मर्यादा के अनुसून, धर्म युक्त और कीति-दायक है । ऐसा होना भी चाहिये क्यो कि आप अपने कुल गुरु शुक्राचार्य जी की शिक्षा तथा अपने पितामह प्रह्लादजी के आदर्श को मानने वाले हैं । आपसी वंश परम्परा मे कभी कोई होनारमा अथवा कजूस नहीं हुआ, जिसने ब्राह्मणो को मुंहमांगा दान न दिया हो अथवा जो दान के लिये कह कर बाद में नाहीं करने के लगा हो। दान देते समय पाचक की याचना सुनकर अथवा युद्ध अवसर पर किसी का सामना होने पर जिसने मुह मोड़ लिया हो ऐसा कायर मापके वश मे कोई नही हुमा है । आपके पितामह प्रसाद जी का यश तो इस दृष्टि से आकाश मे निर्मल पन्द्रमा की तरह फैन रहा है । आपके हो वश में हिरण्याक्ष जैसा पोर उत्सान हुआ, जो मलाही गा लेकर दिग्विजय के लिये निकला, पर समस्त भूमण्डल उपसंहार ] ४६६ में किसी ने उसका सामना करने का साहस न किया। समुद्र में से पृथ्वी का उद्धार करते समय उमका संघर्ष वाराह रूपधारी विष्णु भगवान से हुआ। उन्होंने उस पर किसी तरह विजय तो पाई, पर वे उसकी वीरता को सदा याद करते रहे और जीतने पर भी अपने को विजयी नही समझा ॥१६-२०॥ निशम्य तद्वधं भ्राता हिरण्यकशिपुः पुरा । हन्तु प्रातृहणं क्रु द्धो जगाम निलयं हरेः ॥२१ तामायान्त समालोक्य शूलपाणि कृतान्तवत् । चिन्तयामास कालज्ञो विष्णुर्मायाविनां वरः ॥२२ यतो यतोऽह तत्रासौ प्राए भृतामिव । अतोऽहमस्य हृदयं प्रवेक्ष्यामि पराग्दृशः॥२३ एवं स निश्चित्य रिपोः शरीर मायावतो निर्विविशेऽसुरेन्द्र । श्वासानिलान्तहितमूक्ष्मदेहस्ततप्राणरम्णविविग्नचेताः।।२४ सतनिकेतं परिमृश्य शून्यमपश्यमानः कुपितो ननाद । क्ष्मा द्या दिशःख विवरान् समुद्रान् विरविचिन्तयन् न ददर्श वीर. ॥२५ अपश्यन्निति होवाच मयान्विपमिद जगत् । नातृहा मे गतो नून यतो नाचतंते पुमान् ॥२६ "जब हिरण्याक्ष के भाई हिरण्यकशिपु को उसके वध का वृतान्ठ मालूम हुआ तो वह भगवान से बदला लेने को वैकुण्ठ लोक में पहुंचा। उसे देखकर उन माया रचने में परम मुशल विष्ण जी ने सोचा कि यह तो बार की तरह मेरी तरफ आ रहा है । अब में जहां कहीं पाऊंगा यह मेरे पापा रहेगा । इमलिये अब इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि मैं इमो के हृदय में हिप जाऊ। यह सो पहिर्मुख है, मनिये अपने भीतर का इसे पता ही नहीं चलेगा। ये सूक्ष्म रूप से नापिरा में होकर उसके हृदय में जा बैठे । स हिर. ध्यकशिपु को भगवान पुष्ठ में न मिले तो उसने पृथ्वी, माराम, पाताल, समुद्र सर्वत्र उनको दहा ।" जर नहीं उतरा पता न ५०० । वामन पुराण तो उसने विचार किया कि अवश्य ही मेरा भ्रातृघाती उस लोक में चला गया जहा से फिर लौटना नहीं होता ॥२६॥ तब उसने विचार मिया कि यदि ऐसा है तो अब उससे वैर रखने की आवश्यकता नहीं, क्यों कि सब तरह के झगडे तो देह के साथ ही समाप्त हो जाते हैं । पिता प्रह्लाद पुत्रस्ते तद्विन्द्विजवत्सल.। स्वमायुद्विजलिंगेभ्यो देवेभ्योऽदाद स याचितः ॥२७ भवानाचरितान्धर्मानास्थितो गृहमेधिभि.1 ब्राह्मण पूवजः शूरैरन्यैश्चोद्दामकीतिभिः ।।२८ तस्मात् त्वत्तो महीमीषद् वृणेऽह वरदर्षभात् । पदानित्रीणि दैत्येन्द्र समितानि पदा मम ॥२६ नान्यत् ते कामये राजन्वदान्याज्जगदीश्वरात् । नैन. प्राप्नोति वै विद्वान्यावदर्थप्रतिग्रहः ।।३० "आपके पिता विरोचन भी बडे दानी और ब्राह्मणों पर भक्ति रखने वाले थे। जब देवताओ ने छल पूर्वक ब्राह्मण को वष बनाकर उनसे याचना की तो उन्होंने सब कुछ जानते हुये भी अपनी आयु तक दान मे दे डाली। आप भी उसी धर्म का पालन करते हैं जिसका उपदेश आपके गुरु तथा अन्य पूर्व पुरुषो ने किया है । आप मुह मागा दान देने वालों में श्रेष्ठ हैं इसलिये मैं भी माप से थोड़ी सी भूमि-अपने पैरों से तीन डग मात्र मागता हूँ। मैं जानता हूं कि आप जगत के स्वामी और बडे उदार है, पर मैं इससे अधिक नुछ मांगना नहीं चाहता ।गानी जन को केवल अपनी आवश्यकतानुसार दान स्वीकार करना चाहिये, क्योंकि इसी प्रकार के आचरण से वह प्रतिग्रह के पाप बच सकता है ॥२७.३०॥ अब राजा बलि और वामनदेव के मध्य दान की न्यूनाधिकता पर जो वार्तालाप हुआ उससे वर्तमान समय के दान मांगने वाले कुछ शिक्षा ग्रहण पर मरते हैं- अहो ब्राह्मणदायाद वाचस्ते वृद्धसमताः । स्व बालो बालिश मातः स्वार्थ प्रत्ययुधोयथा ॥३॥ - उपसंहार ] . मां वचोभिः समाराध्य लोकानामेकमीश्वरम् । पदंत्रयं वृणीते योऽत्रुद्धिमान द्वीपदाशुपम् ॥३२ न पुमान् मामुपव्रज्य भूयो याचितुमहति । तस्माद् वृत्तिकरी भूमि वटो कामं प्रतीच्छ मे ॥३३ "राजा बलि ने कहा-"हे ब्रह्मचारी ! तुम्हारी बातें तो वृक्षों के समान ज्ञान युक्त हैं पर तुम्हारी बुदि अभी बच्चों की सी है, क्यों कि तुम अपना हानि लाम भी नहीं समझो । मैं इस समय तीनों लोकों का स्वामी हूँ और जिम पर प्रसन्न हो जाऊंगा उसको एक पूरा दीर भो दान दे सकता हूँ। ऐसी दशा में तुमने जो केवल तीन हग भूमि का दान मांगा यह कौन सी बुद्धिपानी है ? मैं तो ऐमा दानी हूँ कि जो एक बार मेरे पास मांगने को यादे मे फिर कमी मागने की आवश्य: कता ही न हो। इसलिये अपने निर्वाह के लिये आपको जिवनी भी भूमि की आवश्यकता हो उतनी में अभी देने को तैयार हूँ।" बलि की बात का उत्तर देते हुये भावान ने उसे बताया- यावन्तो विपयाः प्रेष्ठास्त्रिलोक्याम जितेन्द्रियम् । न शक्नुवन्ति ते सर्व प्रतिपूरपितुनृपः ॥३५ तिमिः समरसंतुष्टो द्वीपेनापि न पूर्यते । नव वर्ष समेतेन सप्तद्वीपवरेच्छया ॥३५ सप्तद्वीपाधिपतयो नृपा वन्यगयादयः । अर्थकामंगता नान्तं तृष्णाया इतिनः श्रुतम् ॥३६ यदृच्छयोपपन्नेन संतुष्टो वतंते मुखम् । नासंतुष्टस्त्रिभिलॊकरजितात्मोपसादितः ।।३७ पुसोऽय संमृतेहतुरसंतोपोऽयंतामयोः । यहरख्योपपन्नेन संतोपो मुक्तपेस्मृतः ।।३८ यदृच्छा लामतुष्टस्य तेजो विप्रस्य वर्धते । तत् प्रशाम्पत्य संतोपादम्ममेवागुगुणिः ॥ तस्मात् त्रीणि पदाम्पेव वृणे रवद् वरदमात् । एतावतंव सिनोहं वित्त यावत्प्रयोजनम् ॥४० ५०२ ] [ वामन पुराण "वामनदेव ने कहा-असन्तोषी व्यक्ति के लिये संसार की समस्त सम्पदा भी अपर्याप्त है । जो तीन पग भूमि से सन्तुष्ट न होगा वह नो खण्डों से युक्त पूरा दीप (पृथ्वी) पाने पर भी असन्तुष्ट बना रहेगा। क्यो कि एक द्वीप पा जाने पर उसके मन मे शेष छःद्वीप पाने की इच्छा हो जायगी । यह सुना जाता है कि पृथु, गय आदि नरेश सातों द्वीपी के अधिपति थे, पर उनकी धन तथा भूमि की तृष्णा तब भी पूर्ण नहीं हुई थी । अपने उद्योग तथा प्रारब्ध से जो कुछ मिल जाप उसे पाकर सतोष रखने वाला व्यक्ति उतने मे सुख से रह सकता है, पर जिसका मन और कामनायें वश में नहीं है वह तीनों लोक का आधिपत्य पा जाने पर भी दु.ख ही अनुभव करता रहेगा। पास्तव में धन और भोगो से सन्तुष्ट न होना ही इस जीवन-मरण के चक्र मे पड़े रहने का कारण है । विना सन्तोष के मुक्ति का प्राप्त होना संभव मही। जो ब्राह्मण स्वाभाविक रूप से प्राप्त होजाने वाली सामग्री से संतुष्ट रहता है उसका तेज बढ़ता रहता है, पर जो असन्तोपो ही बना रहता है उसका तेज वैसे ही लोप हो जाता है जैसे जल के सयोग से अग्नि । निस्सन्देह आप मुह मांगा दान देने वाले प्रसिद्ध हैं, पर मेरा कार्य तीन पग भूमि मिलने से ही चल जायगा, इसलिये में उतनी ही मांगता हूँ ॥३४.४०॥ वामनदेव की उक्तियों को सुनकर महाराज बलि हंस पड़े और उन्होंने कहा-'तब, अच्छी बात है आप उतनी भूमि लें जितनी आपको इच्छा है ।" यह कहकर ज्योही उन्होने संकल्प के लिये जल- पान को उठाया उसी समय उनके गुरु शुक्राचार्यजी ने उनको बुलाया और कहा- एप वैरोचने साक्षाद् भगवान्विष्णुरव्ययः । कश्यपाददितेर्जातो देवाना कार्यसाधकः ॥४१ प्रतिश्रुत त्वय तस्मै यदनर्थमजानता। न साधु मन्ये दैत्यानां महानुपगतोन्नयः ॥४२ उपसंहार ] एप ते स्थानमैश्वर्य श्रियं तेजो यश: श्रुतम् । दास्यत्याच्छिद्य शक्राय मायामाणवको हरिः।।४३ त्रिभिः क्रमैरिमाल्लोकान्विश्वकाय: क्रमिष्यति । सर्वस्वं विष्णवे दत्त्वा मूढवतिष्यसे कथम् ।।४४ क्रमतो गां पदकेन द्वितीयेन दिवं विभोः। स्वं च कायेन महता तार्तीयस्य कुतो गति: ॥४५ "हे विरोचन कुमार ! ये वामनदेव और कोई नही साक्षात् विष्णु भगवान हैं और देवताओं के हितार्थ कश्यप पली अदिति के गर्भ से प्रकट हुये हैं । तुमने इनका भेद न जान कर दान देने की प्रतीज्ञा तो कर ली है, पर ये तुम्हारा सब कुछ छीन लेंगे। मेरी सम्मति में यह दैत्यों के प्रति बढ़ा भारी अन्याय होगा। स्वयं भगवान अपनी माया से ब्रह्मचारी का रूप बनाकर यहां आये हैं और तुम्हारा समूग' राज्य, सम्पदा, अधिकार और यश छीन कर इन्द्र को दे देंगे। ये तो विश्व रूप हैं, तीन ही परों में समस्त लोकों को नाप डालेंगे। जन इस प्रकार तुम अपना सर्वस्व विष्णु को दे डालोगे, सब तुम्हारा क्या होगा? ये तो एक ही डग में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग को नाप लेंगे तब इनका तीसरा डग कहाँ जायगा ? ॥४१.४५॥ निष्ठां ते नरके मन्ये ह्यप्रदातुः प्रतिश्रुतम् । प्रतिश्रुतस्य योऽनीशः मुतिपादयितु भवान् ॥४६ न तद्दनि प्रशंसन्ति येन वृत्तिविपद्यते । दानं यज्ञस्तपः कर्म लोके वृत्तिमतो यतः ॥४७ धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च । पंचधा विभजन्वि महामुत्र च मोदते ॥४८. अत्रापि वहवर्चीतं शृणु मेऽमुरसत्तम । सत्यमोमिति यत् प्रोक्तं यन्नेत्याता नृतं हितं ॥४६ सत्यं पुष्पफलं विद्यादात्मवृक्षस्य गीयते । वृक्षेऽजीवति तन स्याद नृतं मूलमात्मनः ॥५० "दो पगों में तीनों लोक चले जाने पर जब तुम्हारे पास कुछ ५०४ ] .[ वामन पुराण बचेगा ही नहीं तो तीसरे की पूर्ति कैसे होगी ? उस दशा म प्रतिज्ञा-- भग के कारण तुमको नरक जाना होगा । दान देना अच्छा है पर इस प्रकार के दान का समर्थन कोई समझदार नहीं कर सकता जिससे जीवन निर्वाह का साधन भी न बचे। अरे, विना साधन के तो मनुष्य दान, यज्ञ, तप और परोपकार के कार्य भी नहीं कर सकता। मनुष्य को अपना धन पाच उद्देश्यो की पूर्ति के निमित्त विभाजित करना चाहिये-धर्म, यश, धन की वृद्धि, भोग और स्वजन | इस प्रकार योजनापूर्वक खर्च करने वाला हो लोक-परलोक में सुख पाता है । यदि तुमको यह भय है कि ऐसा करने से प्रतिज्ञा भग हो जायगी तो मैं , इस सम्बन्ध मे तुमको वेदो की सम्मति बतलाता हू । उनमें कहा गया है कि किसी को कुछ देने की बात स्वीकार कर लेना सत्य है और उससे मुकर जाना असत्य कहा जाता है। पर साथ ही यह भी विचारना चाहिये कि यह शरीर एक वृक्ष के समान है और सत्य इसका फल फूल है । यदि वृक्ष न रहे तो फल फूल कैसे रह सकते हैं ? शरीर की रक्षा अपनी सम्पति को दचाये रहने पर ही हो सकती है।" ५६-५०॥ पर बलि ने किसी सासरिक हानि-लाभ के विचार से अपनी प्रतीज्ञा को भग करना उचित न समझा और गुरु तथा इष्ट-मित्रो का विरोध होते हुये वामनदेव को दान देने का सकल्प कर दिया। इन विविध वर्णनो से प्रतीत होता है कि बलि-वामन का उपा. ख्यान वास्तव मे प्राचीन है और उसका कुछ आधार भी हैं । यद्यप इस प्रकार की रचनाओं में जो रोचकता और प्रभाव होता है, उसका श्रेय मुख्यता कवि को प्रतिभा और काव्य-शक्ति को होता है, तो भी धर्म भाव और सदाचार की वृद्धि की दृष्टि से उसकी बेपता स्वीकार करनी ही पडेगी। निस्सन्देह इस पाख्याम ने हमारे सामने एक ऐसा मादशं रखा है, जिससे हम सत्य की महिमा को समझ कर अपने बीवन से सायंक कर सकते हैं। M

Vaman Purana Khand-ii

Author
Sharma,pt.shriram
Title
Vaman Purana Khand-ii
File name
Vaman Purana Khand-ii
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2012/08
Publisher
Barely.,uttar Pradesh.,sanskriti Sansthan Vednagar
Language
Sanskrit
Pages
493
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313031
Barcode
99999990321760.00
Scanning centre
Banasthali University
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