Government College, Kota

Ramvangaman Sanskaran-2

Shastri, Sri Krishnmohan · 2012/04

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*श्री* हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला १८० ॥श्री.॥ बनारस-गवर्नमेष्ट-सस्कृत-कालेज-प्रथमपरीक्षापाट्यनिर्धारित पाल्मीकीय-अयोध्याकाण्डस्य २४-३१ सात्मक- रामवनगमनम् सटिप्पण-सान्वय-सुधा-इन्दुमती-मस्कृत-हिन्दी चतुष्टयप्तापितम्। 31 " 76 कासार- श्रीकृष्णमोहन शास्त्री श्रीरामचन्द्र झा 8-4-2 Herbert College Library KOTAH Cliss o Book No 5831 1196 1226 । का ताराचरण की गयी है। का का विवेचन भाजतक इतनी इस के सामने 18 से इसकी मूल्य १२) Accession No KPP 5000248 साकारहा दशकुमारचरितम् पालवियोधिनी-बालक्रीडा सम्कृत हिन्दी टीका द्वयोपेतम् । साहित्याचार्य पं० ताराचरणभट्टाचाय कृत बालविबोधिनी सस्कृत टीका तथा 'लकोडा हिन्दी टीका से युक्त परीक्षोपयोगी यह सस्करण सन संस्करणों से श्रेष्ठ । विशेष क्या आप स्वय परीक्षा कर निर्णय क्र सक्ते हैं। पूर्वपीठिका 11) पूर्वपीठिका तथा प्रथम और अष्टम उच्छ्वास २) पूर्वपीठिका तथा उत्तरपीठिका का द्वितीय उच्छ्वास ( अपहारवर्मवरित यन्त ) अभिनव भूमिका सयोजित साकण २॥1) सपूर्ण ग्रन्या) नागानन्दं नाटकम् भावार्थदीपिका-संस्कृत-हिन्दी-टीकाद्वयोपेतम् । इस अभिनव परिवर्दित द्वितीय सस्करण में सम्पूर्ण प्रयको सर्वाङ्ग पूर्ण दोपयोगी बना दिया गया है। भतिशय सरल व विस्तृत भाषा टोका को पास्थानमें सनिवेशित करके प्रत्येक वर्ग का परीक्षोपयोगी मभित हिन्दी थासार भी दे दिया गया है। द्वितीय सत्करण प्राप्तिस्यानम्-चौखम्मा सस्कृत पुस्तकालय, बनारस सिटी।

406 हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला CA SORT GE 1842 वाल्मीकिरीमायणागतम् अयोध्याकाण्डस्य २४.१२. सर्गात्मक रामवनगमनमः काशीस्थविश्वनाथमन्दिााध्यक्षप्तस्थापितश्रीभवानीशङ्करसस्कृतमहा- विद्यालयप्रधानाध्यापकन्याकरणसाहित्याचार्यठक्कुरोग्नामक श्रीकृष्णमोहनशास्त्रिरचित सुधा'टीकया तथा पण्डित श्रीरामचन्द्र झा व्यापरणाचार्यकृत- 'इन्दुमता' टीकया च विभूषितम् । (द्वितीय सस्करणम् ) CHECKED - APR 1959 प्रकाशक जयकृष्णदास-हरिदास गुप्तः- चौखम्बा सस्कृत सीरिज आफिस, घनारस सिटी। स. २००४ ]] मूल्य १0 [प्रस्य मयस्य सर्वेऽधिकारा प्रकाशनाधीना ] [ १६६७ ई.

[ Registered According to Act XXV of 1867 ]
PRINTED BY
JAYA, KRISHNA DAS GUPTA
VIDYA VILAS PRESS BENARES CITY
1947
( All Rights Reserved by the Publishers }

प्राकथनम् रामवनगमन वेद वा मोकिरामायणाऽयोध्याकाण्डान्तर्गतमिति प्रायेण पुप्रसिद्ध मेवाऽनस्तदर्थ न किञ्चिद्वक्तव्यमस्ति । यद्यप्यरत्येतिवृत्तितो रामवनगमनोपक्रम एव प्रतीयते न तु 'रामवनगमनम्' तथापि वनगमनार्यमेव श्रीमतो रामस्य मातृ दशनादि विधानाद् रामदनगमनमियस्य नामधेयम् । पितृ-मातृ-स्वामि-भ्रान- भक्तीनो यथाक्रम सन्निवेशात् सुकुमारमतीना बालाना महन्तमुपकारमय जनयि ध्यतीति द्रढोयान् मे विश्वास । यद्यपि सस्करणा तो वह पाठभेदा समुपलभ्यते कि तु नवीन नियमाव त्यनुरोधेन निणयसागरयन्त्रालयमुदितसस्करणस्य विशुद्धपाठानुक्रम एव पाठो मया मूले सनिवेशित । अस्य च परीक्षोत्तिताणा बालानामुपयोगिनी काबिपि टीका मनासाद्य सर्वयाऽतिविपमेऽपि समये चौबम्बासातपुस्तकालयाध्यक्ष गोलोकवासि- बावू-हरिदासगुप्तात्मन-श्रीजयकृष्णदासगुप्तमहोदय टोका निमोतु प्रेरितोऽह स्वल्पेनैव समयेन टीका निमितवान् । छानोपकारबद्धपरिकरै मिथिलाम यसम्पाद रिममित्रप्रवर श्रीरामचन्द्रमा व्याकरणाचार्यमहाशयमहता परिश्रमेण 'इन्दुमता' नामकहिन्दीभाषया समस्तश्चेदमतीव मारल्य भजते । यदि चैन सस्करण समादाय धाता पुन्तोपमेष्यन्ति तदाऽहमामान उफनमयरन सम्भावयि च्यामि । आशासे च मुदगदोशत् प्रमादाद्वा यत्र वचन काश्चिदशुद्धय परिलक्षिता स्युस्ता कृपया सयो य व्यवहरिष्यन्ति श्रीमत इति शम् । । थोमवानीशङ्कर सस्कृत महाविद्यालय काशी स०२००४ साहित्य याकरणावार्य श्री कृष्णमोहन शास्त्री ग्रन्थ-प्रशस्ति काव्य ग्रन्यों में महर्षि वाल्मीकि प्रणीत 'वाल्मीकिरामायण' ही एक ऐसा मुख्य अन्ध है जिसकी रचना काव्य-कलेवरमें सबसे पहले हुई। इसीलिये यह प्रय आदि काव्य के नामसे प्रसिद्ध है। इस ग्रन्थमें सबसे विशेषता यह है कि रामाव तारसे पूर्व हो वाल्मीकिनीने अपने तपेबल्से इसकी रचनाको थी। इस अन्यमें चौतीस हजार श्लोक है और प्रत्येक हजारके शुरु श्लोकके आदिम अक्षर यदि कमसे लिखा जाय तो चौगोस अक्षरकी गायत्री इस ग्रन्थसे निकल पाती है । महर्षि वाल्मीकिजीको मानव जातिका कल्याण करनेवाली और युगान्तरकारिणी अनुभूति ( रामायण ) ऐसी है जिसपर ससारके करोडों बड़े २ मनाषी लढू हो रहे हैं। इसम भारतीय सभ्यता पितृ-भक्ति भ्रातृस्नेह, स्त्री शिक्षा, स्वामि भक्ति राजनीति आदिका वणन अन्यकारने ऐसे मर्मस्पर्शी शब्दों में किया है कि विश्व अ य किसी भी धर्म ग्रन्या में नहीं है। रामायण हमें पुण्य-राज्यमें, ज्ञानीके ब्रह्मानन्दम योगीके योगानन्द-निकेतनम और भक्त के प्रेम-निकुञ्जनमें लेजाने वाली है। इस प्रथम हिन्दुनातिकी समूची संस्कृति, सारा इतिहास और समस्त ज्ञान-विज्ञान भरे पडे हैं। सोता-पनवासके उपरान्त महपि वाल्मीकिजीने अपने आश्रममें भगवती सतो सीताके गर्भसे उत्पन्न युग्मज लर-कुश दोनों भाइयों को ही सर्व प्रथम इस ग्रन्थका अध्ययन कराया था। प्रस्तुत 'रामवनगमन' इसी बाल्मीकि रामायण अयोध्याकाण्डके अन्तर्गत २४ से ३१ सर्गात्मक है। १९४८ को नवीन नियमावली अनुसार निणयसागर प्रेसले प्रकाशित वाल्मीकिरामायणके मूलाधारपरही यह प्रन्थ तैयार किया गया है । यह भी इस सस्करणको एक मुरय विशेषता है । पाठकोंको सस्करणान्तरके पाठान्तरों को देखकर म्रममें नहा पढ़ना चाहिये प्रत्युत नियमावली के अनुसार इसी सम्करणको विशुद्ध व प्रामाणिक मानकर अपनाना चाहिये । द्वितीय सस्करण गवर्नमेंट सस्कृत कालेज, बनारम मनोनीत प्रिसिपल डा मालदेव शास्त्री जीने प्रस्तुत 'रामवनगमन' की भूरि २ प्रशसा को है। चौखम्बा सस्कृत पुस्तकालय के प्रति प्रिंसिपल साहबको बहुत ही श्रद्धा वनी है। इसीके फलस्वरूप हमारे पुस्तकालयने एक महीनाके अन्दर ही प्र. सस्करण चुक जानेपर अविलम्ब पुन परिष्कृत द्वितीय सस्करण निकालनेका उत्साह क्यिा है। वि० स०२४ रामचन्द्रमा - कथा-सार: चतुर्विंशः सर्गः पिनाज्ञानुवर्त्तने हेडमनस्क स्वतनय (रामम् ) अवलोक्य कौशल्या मामपि सहैव नय, यत इह दु स्वभावाना सपत्नीना मध्ये मे वामो नोचित इत्यगादीत् । भर्तृशुश्रूषणमेव समकाया कत्तत्र्य लढते नाय पया कल्यागायेति चुवतो रामस्य वनगमन स्व विनापि सा यथाकयच्चिदनुमैने । पञ्चविंशः सर्गः बनगमनोयत राम स्थावरजङ्गमादय सर्वे देवा लोकपालादयश्च वने वो रक्ष निवरयाशिष दत्वा कोशल्या मधुदध्यक्षतादिना द्विजान स्वस्तिवाच्य वाचयामास । तेभ्यश्च दक्षिणा समप्य वृत्रासुरवधे मुरेन्दस्य, मुगानयने गहस्य, अमृतोत्पादने दैत्यान् प्रत सुराधिपस्य, त्रिविक्रमान् प्रमतो वामनस्य च यारश माल समभ वत्तादश तेऽस्त्वित्येव विशेषत पुनरप्याशिष दत्वा परिष्वज्य च बन गन्तुमादि देश । अथ रामस्तचरणारभिवाद्य प्राणवल्लभा सीतामप्यनुमानयितु तद्भवन प्रतस्थे । पविशः सर्ग अविदिताभिधेक विधाततया प्रहर्ष जनय ती सीता देवान् धम्पूज्य यारत- रागमन प्रतीक्षने तावदुमनस्क व्यपगतकात हियाऽवनतवदन समागत भर्तार (रामम्) प्रेक्ष्य कुतस्त्वामभिषेकसम्भारा राजच्छवामरादयो नोपतिष्ठ ते, तश्वेद मुखवैवल्पमिति सोत्तया पृष्ठो राम प्राह-देवि 1 पुरा मम कवेध्ये माने परद्वम(१) मे पिना प्रतिध्रुत सम्प्रतमभिषेकोद्यते पे तयापूर्वप्रतिश्रुतवरदयस्याऽयमेव समय इति विशाय एकेन ममात्मजो भरतो राज्येऽभिषेच्य अपरेण चतुर्दशवगि रामो बने तिष्ठस्विति याचिते मध्यप्रतिज्ञेन पित्रा सदनोऽङ्गीक याप्तोऽह वन प्रवजामोति । प्रायूयुजच्च स्वमिहेंच व्रतोपवास तत्परा भरतशनुभौ भ्रातृपुरसमाव बलोकयन्ती यथापूर्व मे मात पितर च तेवत्वेति । मप्तविंश मर्ग रामेण मानादिसेवार्थमिहेव वसेत्युपदिश सौता कृतमणयकोपाऽपि तद्वाक्यम्य (१) वरदय के विषय में अग्रिम चतुय पृष्ठपर "अभिनव दाने" दिये।

। [ २ ] जनापहास्यत्वमुपपाद्य मवन्निर्वासनेन ममारि निर्वासन सिमेवेति प्रदर्शयन्ती चाऽसोढव्यस्ते विरहोऽतो मा सहैव वन नयेति तमभ्यर्थयामास । अष्टाविंशः सर्ग एव प्राय॑मानो सीता मृगेन्द्रसरोस्पादिदुष्टजन्तुसत्त्वादशनपानशयनादेख्य चस्थितत्वाच सवथा वनवासस्यातिक्लेशयुक्त वेन दु सहत्व प्रदय रामस्तस्माता प्रत्यावर्त्तयितुमचेष्टत। एकोनविंशः सर्गः इत्य भर्तुर्वचन निशम्येषदश्रुमुखी सीता प्राइ~नाथ ! वने वस्तव्यता प्रति स्वदुकास्ते न दोषा प्रत्युत त्वया सह स्नेहपुरस्कृता गुणा एवेति विद्धि । अपि च पितुगृहे, सामुद्रिकशास्त्रविद्भिर्वनवासोऽस्या ध्रुव भावीत्युस्मत स समय प्राप्तोऽद्य त्वया सहाऽवश्य गमिष्यामीति प्रास्तावीत् । एव सत्यपि राम वियोग भीरता सात्ववचोभि पर्यसाखयत् । त्रिंशः सर्गः अनेकश सारव्यमानापि सीता राम परित्राणासामर्थ्यमारोप्य त गया मास-नाथ ! मार्गे त्वया सह कुशाशशरेषीका ये च कण्टकिनो दुमास्ते तूलाजिनसमस्पर्शा भवेयु । त्वत्याग एव महद्दु ख भविष्यति सहानुगमने क्लेश लेशोऽपि मयि न स्यादिति प्रतिपाद्य मा परित्यज्य वन गते वग्यह विष पीत्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि, कि तु क्षणमपि परवशा जीवितु नोत्सह इति प्रास्तावीत् । अथ तेन वशीभूतो रामस्तस्या अनुगमन स्वीकृत्य वनगमनाय मालदानादी युपपा दयितु तस्यै सदिदेश । एकत्रिंशः सर्गः एव दम्पत्यो सवाद ध्रुत्वा ल्क्ष्मणो धनुधरोऽह तेऽप्रेसरो भूत्वा गमिष्या मीति राममयावत । रामस्तु बहुभि सान्त्वववनस्त न्यषेधीत् । पूर्व दत्तानुमति रपि कथमिदानी निषेधसीति पृष्टे त्वये हैव स्थित्वा मातृपालन विधेयमिति बहुश सा त्वमानोऽपि लक्ष्मणो मत्सदशपर सहस्रपालनक्षमाणा मातणा कोऽह पालक इति तनिधीत् । अथ रामस्तदनुगमनमनुमत्य वरुणदत्तायुधादीनि गुरुगृहादानेतु तथा मीयधनसमर्पणपात्रीभूतान् सुयज्ञादि-ऋषीनानायितु च लक्ष्मण प्रेरिरत्

सुधाकर्तुः परिचय:
मिथिलादक्षिणे भागे जाहव्याश्चैव सन्निधौ ।
ब्राह्मणे कर्मनिपुणे निवैश्व सुशोभिता ।।
शास्त्रश्च सुविख्याता नद्या च समलकृता ।
एव सर्वगुणोपेता "घरौनो' वसति शुभा ॥
तस्यां वत्सकुलोद्भुतो दयावान् शुचिमास्तथा ।
'बद्रिनाथात्मज " श्रीमाल्लोकनाथति विश्रुत ॥
ज्योतिर्विदामप्रगण्य सवलोकप्रियवद ।
स चोपयेमे विधिना कश्यपवयसम्भवाम् ॥
पुनी "गृहमणे" नित्यमाबाल्याव्रततत्पराम् ।
सर्वानन्दकरी "लक्ष्मी" यथा विष्णुहि क्षीरजाम् ।।
तस्यामह समुत्पन्न 'कृष्णमोहन" सज्ञित ।
"गेनादिलाल" गुरुतो लडघा ज्ञान च शैशवे ॥
काश्यामागत्य बहवो गुरवो मेऽभवस्तत ।
तेपा सुश्रूषया किश्चिज्ञान प्राप्य व साम्प्रतम् ॥
सुघयाऽल्कृतन्त्वेनमादाय यदि चालका ।
प्रहध्येयुस्तदा मन्ये सफनश्च मम श्रम ॥
कण्टकाक्षरदोषेण भ्रमेण यदि वा मम ।
श्रुटिश्चेदिद सशोण्याऽदुष्टत्व दुलभ यत ।
शुभ भूयात् ।

अभिनव बातें पेन ५२, श्लोक २१, यहाँ 'महावरों के विषय में शका यह होती है कि, एक वर तो देवा सुरसग्रामके समय मिला था और दूसरा कद मिना या किसा किमीका मत है कि दोनों एक सो समयके हैं, पर तु एक ही कारणसे वरदयका पस्थित होना युक्तिसङ्गत प्रतीत नहीं होता। वस्तुन दोनोंकी कथा-प्रसङ्ग इस प्रकारका है एका देवराज इंद्रका निमत्रण पाकर देवासुर-सग्रामके लिये जब महाराज दशरथजी प्रस्तुत हो रहे थे, उस समय महाराज देवनोकके सग्राममें पहुचानेवाला कोई सारथी उपस्थित नहीं था । इसलिये महाराज अति चिनत हुए, तब महारानी कोयीने सारथिनी बनकर उ है बस सग्राममें लेजाकर मदद पहुचायो (जैसा कि ५२ पेजको टिप्पणी सुधा टीकाकारने लिखा है ) उसीको खुशीमें महाराजने प्रथम वर मांगनेको कहा था। दितीय वरका प्रसङ्ग इस प्रकारका है महाराज दशरथजाका नियम था कि जबतक रामजी (बचपनमें) उनके माथ भोजन नहीं परते थे तबतक महाराज भोजनपर नहीं बैठते । एक निकी बात है-मध्या हवा समय था, महाराज भोजन करनेको भागये पर रामजी अभी तक नहीं पाये। कारण यह था कि उस दिन रामजा बच्चोंके साथ खेनमें दार गये थे और अपने साथियों के दाव चुका में इतने व्यस्त थे कि वह भोजन की सुधि नहीं थी।महाराजका अनेक बार सन्देशा गया पर वे नही आये। इस तरद अपराहदा ममय हो गया । म उमें कैकेयीने कहा-हे महाराज ! यदि माशोतो में लालनको बुलाल ऊँ । महाराज देयी की तामसो प्रकृतिसे परिचित थे इसलिए उ होने मना किया और कहा कि कोई कारण ऐमा नहीं है जो तुम्हारे कहनेमे दे आजायगे । इस पर कैकेयी ने तमझ कर कहा हू , ऐसाभार क्या कह रहे हैं,मेरा लालन, जिसको मैं यौमे बढकर मानती हूँ, मरे कहनेम नहीं आवेगा? अच्छा मैं अभी उसको बुला लाती हूं। यह कहकर कैकेयी स्वय वहाँ गयो, पर रामजी माता केके वीसे देखकर बाल-सुनम चापल्यके कारण छिप गये। कैरेयाने बार बार उनसे चलनको वडा और अ तमें यह भी कहा-देखो लालन ! यदि अब तू नहीं चलेगा तो मैं जलकर खाक हो जाऊंगी, पर महाराज के सामने खाली नही लौटूगी । इत्यादि कहने पर भी पद रामजी चलनेको तैयार नहीं हुए, तब कैरेयीने नौरोको चिता सजानका भाश दिया और जलने निये चिनापर बैठ गयो। विमाता कैकेयोके इस प्रबारका दु साहस देखकर रामजीमे नहीं रहा गया, वे दौटकर पिताके पास भाकर रहने लगे-हे माताजी ! चनिये मैं चलनेको तैयार हूं। उसीकी सुरीमें महाराजनै (दिलाय) वर भागनेको कहा था। । -- श्रीवाल्मीकिरामायणान्तर्गतं रामवनगमनम् सान्वय-सुधा-इन्दुमती-संस्कृत-हिन्दी-टीकोपेतम् अयोध्याकाण्डे चतुर्विंशः सर्गः मातृ-दर्शनम्। तं समीदय व्यवसित पितुनिर्देशपालने। कौशल्या बाप्पसरुद्धा घचो धमिष्टमत्रवीत् ॥१॥ सर्वारिष्टहर सुखैकरमण श्रीसीतया शोभित मेवश्यामतर्नु प्रसन्नवदन श्रील घमणेनान्वितम् । कारण्यामृतसागर भवभयवसैक्वीज पर वन्दे ह रघुनायक प्रभुवर भूपालचूडामणिम् ॥ सुघा ब्यारया करोग्यस्य शिशुच्छात्रहितपिणीम् । कृष्णमोहनशाह लोकनाथात्मजोऽल्पधी ॥ अन्वय-पितु , निर्देशपालने व्यवसित, धर्मिष्ठ, त, ममीक्ष्य, बामसरुद्धा (सती) कौशल्या, वच , अब्रवीत्। सुधा-पितु राज्ञो दशरयस्य, निर्देशपालने आज्ञापितकरणे, व्यवसित= फुलनिमयम् , धर्मिष्ठम् = अतिशयेन धर्मव तम् , त-श्रीरामम् , समीक्ष्य अवलोक्य, बायसरुद्धा-बानमन्तहमा तेन सरद्धा अवस्या, (सती) कौशल्या राममाता, वच = वक्ष्यमाणवचनम् , अब्रवीत् = अवोचत् । श्रीजानकोचरणकअमरन्दग-श्रीरामचन्द्रसुकृती जननोपकृत्यै । टीकाम्तनोति वचसा सरलातिरम्या स्वगनिताञ्च मनसेन्दुमर्ती दधान । इन्दुमती-(तदनन्तर, आवेशमें आये हुर छोटे भाई लक्ष्मणको समझा बुझाकर शान्त करने के बाद) जब माता कौशल्याने देखा कि घमिष्ठ भीरामचन्द्र जी पिताको माशा (१४ वर्षका वनवास ) पालन करने के लिये उद्यत हो गये हैं तब उनके नेत्रों में पास उमड अाया, वे गद्गद कठसे (रामजीको) कहने लगीं-1 २ रामवनगमनम्- , , उत्पन्न अदृष्टदु खो धर्मात्मा सर्वभूवप्रियवद् । मयि जातो दशरथात् कथमुन्छेन वर्तयेत् ॥ २॥ अन्वयः-दशरथात् ,, मयि, । जात सर्वभूतप्रियवद , अष्टदुख धर्मात्मा, (राम ) उञ्छेन, कथ, वर्तयेत् । सुधा-तद्वचनमेवाह-मदृष्टेति । दशरथात् = दशदिक्षु अप्रतिहतो रयो यस्य स तथोक्त चक्रवर्तीत्यर्थ , तस्मात् । मयि = कौशल्यायाम् , जात = सर्वभूतप्रियवद = निखिलप्राणिप्रियवका (सर्वभूतेषु निखिलप्राणिषु प्रिय मधुर वदतीत्येव शील ), अदृष्टदु ख =अनवलोक्तिक्लेश, अद्याऽवधिकदा प्यननुभूतदु ख इति यावत् । धर्मात्मा-धर्मस्वरूप,, ( तादृशो भवान् रामः) उन्छेन दैवात् क्षेत्रादिषु प्रकीर्णाना ब्रीह्यादिधान्यानामगुल्या एकैकयो प्रहण मुञ्छस्तेन तथोक्तेन, फलमूलाद्याहरणादीनामुपलक्षणश्चैतत् । कय केन प्रकारेण, वर्तयेत = जीवेत् । इन्दुमतो-(कौशल्याजीने कहा है वत्स राम 1 ) जिसने कभी दुखका अनुभव नहीं किया और धर्म पथपर चलनेवाला है एव मबसे प्रिय वचन बोलने वाला है और चक्रवर्ती महाराज दशरथके औरम तथा मेरे (महारानी कौशल्याके), गर्भसे उत्पन हुश्रा है, वह (राजकुमार तू गम) वनमें (१४ वर्षतक) क्सि प्रकार उञ्छवृत्ति ( खेतमें विखरे हुए दानेको चुन-चुनकर भूथियों की तरह) से निर्वाह करेगा। यस्य भृत्याश्च दासाश्च मृष्टान्यन्नानि भुञ्जते । कथ स भोयते रामो वने मूलफलान्ययम् ॥ ३ ॥ अन्वय -यस्य, भृत्या , च, दासा , च, मष्टानि, अनानि, भुञ्जवे, स अयम् , राम , वने, मूनफ्लानि, कय, भोक्ष्यते । सुधान्यस्य =तव, रामस्य, भृत्या =भटा, च=पुन, दासा - दास्यकगा, मृष्टानि-श्लाघ्यानि, अन्नानि = अोदनादिमदयद्रव्याणि, मुजते= खादति, सन्ताहशो राजपुत्र , अयम् भवान् , (राम ) वने-दण्डकारण्ये, मूल फलानि = कन्दपलानि, क्य = केन प्रकारेण, भोक्ष्यते =खादयिष्यति । इन्दुमती-(माता कौशल्याने अधीर होकर फिर कहा हे वत्स 1) जिसके नौकर-चाकर मिष्टान्न ( सुस्वादु पक्का नादि) भोजन करते हैं, वह (मेरा पुत्र राजकुमार) राम किस तरहसे बनमें कन्दमूल फल खायगा। १ - . सुधा-इन्दुमतो-टीकादयोपेतम् । ३ क पतच्छ्रद्दधेच्या कस्य वा न भवेद् भयम् । गुणवान् दयितो राज. काकुत्स्थो दिवास्यते ॥४॥ अन्य --गुणवान , गश , दयिव , काकुत्स्थ , यद्, विवास्यते, एतत् , क, श्रद्दधेत् , वा, श्रुवा, कस्य, भयम् , न भवेत् । सुधा-गुणवान् = गुणयुक्त ,राज्ञ - दशरथस्य, दथित =अत्यन्त प्रयतम , काकुत्स्थ =राम , यद् =यस्मात् कारणात् , विवास्यते =(वन) ध्यते एतद् = एतादृश (वच ), २ ( जन ) प्रद्दधेत-गुणवत् प्रियपुत्रविवासन सभी चीन मन्येन, असम्भावितत्वादिति भाव । वा=अथवा, श्रवा आर्य, (श्रदेय ) कस्य = अयोध्यावासिनो जनस्य, भय = रामगमने कथमत्रत्याना जीवनमिति भीति , न भवेत् =न स्यात् ! अपि तु सर्वस्याऽपि स्यादेवेति भाव । यद्वा-चामविकासन सत्यमिति ज्ञात्वा स्वपित्रादिभ्यो भमाऽप्येव मविष्यतीति कस्य हृदये भय न भवेत् १ अपि तु भवेदेवेत्याशय । इन्दुमती-(पुनध कौशल्याने कहा-वे व !) चक्रवर्ती महाराज दशरय अपने अत्यन्त प्रिय तया गुणवान् रामको राज्य से निर्वासित कर रहे हैं, यह समाचार सुनकर, इसपर कौन विश्वास करेगा और इस समाचारसे किसको भय नहीं होगा अर्थात् जो कोई इस समाचारको सुनेगा वही भयभीत हो उठेगा और कहेगा कि जय महाराजने सर्वगुण सम्पन्न और सर्वप्रिय निरपराधी श्रीराम भीको कैयौके कहने से देशसे निकान दिया है तो निश्चय ही महाराजको बुद्धि मारी गयी है, अब मेरी रक्षा भी इस राज्यमें नहा हो सकेगी अथवा ब महा राजके ऐसे श्रेष्ठ जनने भी अपने पुत्रको निकालदिया है तब हमारे पिता तो हमें घरमें क्या रहने देंगे। नून तु पलवॉकोके कृतान्त सम्मादिशन् । लोके रामाभिरामस्त्व वन यत्र गमिष्यसि ॥५॥ मवय.--सवम् , अादिशन् , (सन् ) कृतान्त , तु, लोके, नून, बलवान् , यत्र, राम 1. लोके, अभिराम , ख, वन, गमिष्यसि । सुखदु स्वादिकम् , अादिशन् अदिशन् , ( सन् ) कृतान देवम् , तु, लो-इह सहारे, नून - निश्चित, बनवान् पराक्रमशाली, "इत्यह मन्ये” इति शेष । यत्र-देवे निमित्ते, हे राम !, लोके = ससारे, अभिराम = मनोश ,ख, वन-विपिन, गमिष्यसि = ब्रजिभ्यसि। यदा-हे राम । अमि. सुधा-सर्व जनम्, रामवनगमनम्- रामस्व यत्र लङ्काया, ( यदर्थ गमिष्यसि ) सा तात =धर्मध्वसझर्चा गवण , सर्व श्रादिशन-स्वाज्ञा विषयोभूत कुर्वन् , लोके-इह पृथिव्या, बलवान् , इत्यह लोके जाने एतेन सावधानतया त्वया वर्तितव्यमिति ध्वनितम् । इह पृथिव्यानित्यनेन तव सम्मुख परमार्थतो न बलवानिति घनितम् । इन्दुमतो( भाग्यके उपर पश्चात्ताप करती हुई माता कौशल्याने फिर कहा हे वत्स!) जव समस्त कोशलराज्यके सर्वप्रिय तुम (राम) बन जायोगे तब सुख-दुख के नियमनकर्चा भाग्य ही को निक्षित रूपेण सब से बड़ा मानना पड़ेगा। श्रय तु मामात्मभवस्तवादर्शनमारत । विलापदु खसमिधो रुदिताचहुताहुति ॥ ६॥ चिन्ताबाप्पमहाधूमस्तवागमनचिन्तज । कर्षयित्वाऽधिकं पुत्र! नि भ्यासायाससम्भव ॥७॥ स्चया विहोनामिह मा शोकाग्निरतुलो महान् । प्रवक्ष्यति यथा कश्न चित्रभानुहिमात्यये ॥८॥ अन्वय-हे पुत्र , तु, आत्मभव , तव, श्रदर्शनमारत , विलापदुःखस. मिध , रुदिता हुताहुति , तव, श्रागमनचिन्तज , चिन्ताबापमहाधम , नि श्वा- सायाससम्भव , महान् , अतुल , शोकामि, इह, वया, विहीना, माम् , अधिक, कर्षयित्वा, हिमात्यये, चित्रभानु कक्ष, यथा, ( तथा ) प्रवक्ष्यति । सुधा--सम्प्रति वदियोगजनित दुःख सोढुमशक्यमिति बोधयन्ती पाह- श्रयमिति । "अय तु" इयारम्भ "हिमात्यये" इत्यन्त श्लोपत्रयमेशान्वयि विशेषकमित्युच्यते । तदुत्तम्-"द्वाम्या युग्ममिति प्रोक्त त्रिभि श्लो*विशेषकम् । कलापक चतुर्भि स्यात्तदूर्व कुलक स्मृतम् ॥" इति। (प्यारया)हे पुत्र-हेराम !, तु=क्न्तुि, श्रात्मभवा स्वमन प्रादुभूत , तवादशनमाश्न = तव-भवत श्रदर्शनम्-अनवलाकामेव वक्त्वात् मारतो-वायुर्यस्य स तथोक्त , विलाप- दु खसमिक्ष विलापदुख-प्रलापजश, तदेव समित्-न यस्य स ता । रुदिताश्रुरताहुति -रुदिताभूणि-रोदनजन्यनेत्रजलानि, तान्येव हुता प्रचिता, प्राहुतियस्य स तथोक । चिन्ताबाष्पमहाधूम = चिन्ताराप-चिन्त गोष्मा, स एव, महाधूमो यस्य स तयात । तवागमनचिन्तन - तव-भवत , प्रागमनधि तज -प्रतिमेशजनदूरदेशगमनोत्तर क्यमयमागमिष्यतीति चितन . . - . - ५ सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । लनिव । निश्वासायाससम्भव =निवासायासेन-नि श्वासरूपपरिश्रमेण सन्धुक्ष- पात् , सम्भव -वृद्धिर्यस्य स ताय । महान् -अतिद(अत एव ) अतु- ल इयत्ता विघातुमशक्य , शोकामि = शोकलावहि, इइशरीरे, स्वया = जनस्थानीयेन भवता, विहीना=वियुक्ता, मा-कौशल्या, तब मातरमित्यर्थ । मा रज्यलक्ष्मीच,' इन्दिरालो कमाता मा क्षीरोदतनया रमा" इत्यमर'। अधिकम्- अत्यर्थं यथा स्यात्तया। कर्रायित्या-क्लेशप्रापणेन शुष्काकृत्य कृशा विधायेति यावत् । हिमायये-हिमध्वसरमये ग्रीष्मे इति यावत् । कक्ष-गुल्म नवादिक- मित्यर्थ । चित्रभानु = वन्योऽमि , सूों वा, यथा, ( तथा स ) प्रवक्ष्यति मस्मीकरिष्यति । प्राव लनबाहेरूपशान्तियथा जन्नेनैव भवति तथैव तवागमनेन जलस्थानीयेन मम शोजाग्नेरुपमो भविष्यतीत्याशय । इन्दुमती-(पुत्रवियोगसे होनेवानी अपनी स्थितिका सला बताती हुई कौशल्याने कहा-) हे स । तुम्हारे बन चले जानेपर मेरे मनका शोकागि तुम्हारे श्रदर्शनरूमी वायुने सुनग उठेगी और विलार तथा दुरूपी इचन (लस्सी) एव रोदनाचरूरी घृतके पड़नेते प्रज्वलित हो जायगी तब उससे चिन्तासी धूम निकलेगा और वह मुझे सुखाकर उसी तरह मस्मसात् कर देगा जिस तरह हिम (जाई) के पश्चात् प्रघम श्रानेर वृक्षों की गडसे उत्पन्न दावा नन बनके लता-पत्रादिकोंको भस्म कर देता है। कथ हि धेनु स्व वत्सं गच्छन्तमनुगच्छति । श्रह त्वाऽनुगमिष्यामि यत्र वत्स! गमिष्यसि ॥8॥ अन्यय.--हि, गच्छ त, स्व, वत्स, धेनु , कथम् , अनुगच्छति, (नया) हे वत्स ! यत्र गमिष्यसि, अहे, (तत्र )ला, अनुग'मध्यामि । सुधा-हिया, गतवजन्त, स्वम् प्रास्मीय, वस-पुत्र धेनु : गै, कथ = यथा, अनुगञ्चति-अनुव्रजति (तथा) हे वत्स ! यत्रयस्मिन् स्थाने, (a ) मध्यसिप्रजिष्यसि, अह-कौशल्या, तब माता, (तत्र) वा त्वाम् , अनुगमिष्यामि-अनुव्रजिष्यामि । अत्र क्थ शन्दो हि भथार्थ , अत एवोत्तगई तथेत्यध्याहार्यम् । वेवापत्वात् प्रयोगो शय । तथा च यत्र यत्र सकीयो वत्सो गच्छति तत्र तत्र तदनु यथा गौरनुगच्छति तथैव यत्र यत्र व गन्ताऽमि तत्र तत्राऽहमनुगमध्यामीति सरलार्थ । इन्दुमती-(अन्तमें माता कौशल्याने कदा-) हे वत्स ! जिस प्रकार - 4 ६ , - . रामवनगमनम्- गाय अपने बछड़े के पीछे २ चलती रहती है (अपनी प्रोखोंके सामने ही बछड़े रहना पसन्द करती है ) उसी प्रकार मैं तुम्हारे पीछे २ जा तुम जानोगे वहाँ में भी चलूगी ( तुम वनजानोगे तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूगी । तुम्हारे विना मैं यहा नहीं रह सकूगी)। यथा निगदित मात्रा तद्वाक्य पुरुषर्षभ । श्रुत्वा रामोऽत्रवोद्वारय मातर भृशदु खिताम् ॥१०॥ अन्वय -पुरुषर्षभ, राम , मात्रा, यथा, निगदित, तद्वाक्य, श्रुत्वा, भृशदु खिता, मातर, वाक्यम् , अग्रवीत् । सुधा-मातृवचनाणानन्तरकालिकोदन्तमाह-यथेति । पुरुषर्षभ पुरुषश्रेष्ठ, राम कौशल्यानन्दन , मात्रा = कौशल्यया, यथा येन प्रकारेण, निगदित कथित, तद्वाक्य-तद्वच , श्रुत्वा-श्राकर्य, भृशदु खिता= अत्यन्त क्लेशमनुभवती, मातर-जननी, वाक्य वक्ष्यमारवचनम् , अनवीन उक्त वान् । यथा निगदितमित्यनेन स्ववाचोऽप्यगोचरस्व दर्शित मुनिना । इन्दुमतो-पुरुषश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी माता कौशल्यानी तथाकथित ( तुम्हारे विना मैं नहीं रह सकूँगी, तुम वन चलोगे तो मैं भी तुम्हारे साथ चलें- गी इत्यादि ) बातोंको सुनकर अत्यन्त दुखिनी मातासे कहने लगे। कैकेय्या वञ्चितो राजा मयि चारण्यमाश्रिते। भवत्या च परित्यक्तो नसून वक्षयिष्यति ॥ ११ ॥ अन्वय-कैकेय्या, वञ्चित , राजा, मयि, अरण्य, च, श्राश्रिते, भव. त्या, च, परित्यक, नून, न, वर्तयिष्यति । सुधा-कैकेय्या एतन्नामिकमा मद्विमात्रा, वञ्चित प्रतारणया मदि- योगजदुख प्रापित , गजा = दशरथ , मयिक रामे, अरण्य वनम् , श्राश्रिते गते सतीत्यर्थ , च-पुन , भवत्या वया, परित्यक्त =परिवर्जित , नून-निश्चित, न=नहि, वर्तयिष्यति जीविष्यति, अतो भर्नु प्राणरक्षण भव त्याऽवश्यमेव विधेयमिति भाव । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने माता कौशल्यामे कहा-) हे माता जी! इस समय महाराज (पिताजी) को मेरी विमाता वैक्यीने वञ्चित कर दिया है (धोखा देकर दुखी बना दिया है ) मेरे वन चले जानपर वे और भी दुखी होंगे, प 6 . सुधा-इन्दुमती-टीकाद्वयोपेतम् । विसपर यदि तुम मी महाराजको छोड़कर वन चलोगी तो महाराज कभी भी जीवित नहा रह सकेंगे। भ पुन परित्यागो नृशस फेवलं लिया। स भवत्या न कर्त्तव्यो मनसाऽपि विगहित ॥ १२ ॥ अन्वयः-पुन , मर्तु, परित्याग , स्त्रिया , केवलं, नृरास', मनठापि, व मवत्या, न, कर्तव्य , () विगहित । सुधा-भवत्या क्थमपि राजा न परिवाज्य इत्युक्त तत्र हेतुमाह-मर्त्त- रिति । पुन =अन्यच्च, मर्तु -स्वामिा, परित्याग परिवर्जन, खिया =पल्या , वैवल, नृशस करतेय, न तु तेनैहिकमामुनिक वा किंचिदरि सुखमित्यर्थ । मनसाऽपि हृदयेनापि, स =परित्याग , भवत्या वया, न वर्तव्य =न विधेय न चिन्दनीय इति यावत् (यत स ) विहित =महापानिनकत्वादतिनिन्दित । इन्दुमतो-(रामच द्रजीने माता कौशल्यामे कहा-हे मातानी । महाराजको छोड़कर श्राप मेरे साप बन जाना चाहती हैं सो ठीक नहीं क्योंकि-) स्वामीका परित्याग करना स्त्री निये सबसे बढकर निन्द्य कम है। सो ऐसा निद्यकर्म करने को कल्पना मी आपका मन नहा करना चाहिये (क्योंकि-तुष्ट मतरि नारीपणा सन्तुश सवदेवता )। याव-जीपति काकुत्स्थ पिता मे जगतोपति । शुश्रूषा क्रियता तापत् स हि धर्म सनातन ॥१३॥ श्रन्यय --काकुरप , लगतीपति , मे, पिता, यावत् , बीवति, दावत् शुभषा, क्रियता, हि, सनातन , स , धर्म , "वर्चत इति शास्त्रकारै गीयत" इति शेष । रा-श्रत कि क्त्तव्यमित्यत श्राह-यावदिति । काकुत्स्था कुत्स्थ व योद्भव , जगलीपति -पृथिवीपति , मेन्मम रामचद्रस्य, पिता-जनक रामा दशरण इत्यम् । यावत्-बावकानपर्यन्त, जावति प्रायान् घारयति, इह प्रता पानयति वा, तावत्-तावरकालपर्यन्त, शुश्रूषा-सेवा, क्रियता विधीयताम् , हि-यत , सनातन' सार्वकालिक , म , धर्म-स्वामिसेवागलनरूर , "वत्तंत इति शास्त्रकार गीयत" इते शेष | तस्माद्भवत्या मर्तृशुश्रूषण न परित्याज्यमित्या- राय । अत्र "यावन्नीवति तावच्चुभूषा नियता" मित्यनेन रितुनोंकातरगम- नावश्यकत्व पनितम् । , - रामवनगमनम्- इन्दुमतो-(रामच दोने कहा-) जब तक ककुरस्थ वशमें उत्पन्न पिता चक्रवर्ती महाराज (दशरथ ) जीवित हैं, तब तक श्राप (मेरी । कौशल्या ) उनकी सेवा करें ( मेरे साथ वन जानेका विचार छोड़ दें) आपके लिये यही सनातन धर्म है। एवमुक्ता तु रामेण कौशल्या शुभदर्शना । तयेत्युवाच सुप्रीता राममल्लिप्टकारिणम् ॥ १४ ॥ अन्वय --रामेण, एवम् , उका, तु, शुभदर्शना, सुप्रीता,कौशल्या, अनि एकारिण, राम, तथा, इति, उवाच । सुधा-रामेण कौशल्यातनयेन एव = पूर्वोक्तप्रकारेण उकाकषिता, तु, शुभदशना-धर्म्यमति , सुप्रीता-सुप्रसन्ना, कौशल्या, अतिकारिणम्-उत्तम कमविधायिन कस्याऽपि जनस्य क्लेशादायिनमित्यर्थ । रामम् प्रात्मतनयम , तथा : यथा त्वं कथयसि तथैव विधास्ये, इति एवम् , उवाच-उक्तवती । इन्दुमतो--(महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं कि-) इस प्रकार रामचन्द्रजी के समझानेपर धर्म में विधास रसने वाली महारानी माता कौशल्या ने रामजी की बात मान ली (वन जानेका विचार छोड़ दिया ) और प्रसन्न हो कर बोली (हे वरस ! ) बड़े से बड़े कठिन कार्यको सहजमें करने वाले तुम जो कुछ कहते और करते हो सब ठीक है ( वैसा ही होगा)। एवमुक्तस्तु वचन रामो धर्मभृता वरः । भूयस्तामब्रवीद् वास्य मातर भृशदु सिताम् ॥ १५ ॥ अन्यय.-एव, वचन, (तया) उक्त , तु, धर्मभृता, वर , राम , भृशदु खिता, ता, मातर, भूय , वाक्यम् , अब्रवीत् । सुधा-दायार्थ पुनरुपपादयति एवमिति । एव = = भर्तृशुभूपाङ्गीकाररूप, वचन वाक्य, ( तया) उक्तस्तु प्रावितस्तु, धर्मभृता-धर्मिष्ठाना, वर श्रेष्ठ , राम , भृशदु खिता-निश्चितवियोगस्मृतिजनितदु साक्रान्ता, मातर = कौशल्या, भूय =पुन , वाक्य-वक्ष्यमाणवचनम् , अब्रवीत् उक्तवान् । इन्दुमती-(रामजी के समझाने पर जब कौशल्याने वनजानेका विचार छोड़कर महाराजको सेवा स्वीकार करली तब रामजी बहुत प्रसन हुए और ) इस प्रकार माता फौशल्याका वचन (स्वीकारोक्ति) सुनकर धामिक श्रेष्ठ श्रीरामव जी अत्यन्त दुखिनी मातासे पुन. कहने लगे। , 4 सुधा-इन्दुमतो-टोकाद्वयोपेतम् । मया चैव भवत्या च कर्त्तव्य वचन पितु । राजा भर्ती गुरु श्रेष्ठ, सर्वेषामोश्चर प्रभु ॥ १६ ॥ अन्वय-पितु , वचन, मया, मवस्या, च, कर्तव्यम् , एव, (यत) राजा, भर्ता, गुरु, श्रेष्ठ , प्रभु , सर्वेषाम् , ईश्वर , "प्रस्ती" ति शेष । सुधा-पितु वातस्य, वचन-वाय, मया-रामेण, भवत्या चत्वयाऽपि, कर्तव्यमेव = पालनीयमेव, उमयोस्तद्ववनावश्यकर्त्तव्यत्वे हेतुमुपपादयितु- माह-राजेति । अत्रोत्तरार्द्ध 'स' इत्यच्याहत्तव्यम् । तथा च स = मम पिता, राजा- भूपति , भर्ता विधिवद्भवत्या पाणिप्रहीता, गुरु = मम तत्वोरदेष्टा, तबाऽपि ( पतिरेको गुरु स्त्रीणाम् ) इति नियमाद्र , श्रेष्ठ = महात्मा, प्रभु % सालसामर्थ्य सम्पन , सर्वेषा=मानवानाम् , ईश्वर =पूज्य अस्तीति शेष । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा- ) हे माता जी । जैसे मुझे अपने पिता (महाराज दशरथ) की आशा अवश्य माननी चाहिये वैसे आपको भी चाहिये क्यों कि महारान मेरे पिता है तथा मेरे और प्रारके ( पनिरेको गुरु स्त्रीणाम् ) गुरु हैं। इस लिये दोनों के श्रेष्ठ है तथा सबके पालन-पोषण करने वाले स्वामी और प्रभु है। इमानितु महारराये विहत्य नर पञ्च च । वर्षाणि परमप्रीत्या स्थास्यामि वचने तर ॥ १७ ॥ अन्धय - महारपये, इमानि, नव, पञ्च, च, वर्षाणि, विहरय, परमप्रीत्या, तव, वचने, स्थास्यामि । सुधा-पितुनिर्देशगलनानन्तर सप्छुध्धाऽपि करिष्यामीत्याह-इमानोति । महारपये =दण्डकप्तशित महाविपिने, इमानि एतानि, नव पञ्च च मिलित्वा चतुर्दश, वर्षाणि हायनानि, विहत्य विहार कृत्वा, परमप्रीत्या - प्रतिप्रेम्या, तव मवाया , वचने-श्राज्ञा पिते, स्थास्यामि-अद्विधात्यामीत्यर्थ । प्राविहत्ये- त्यनेन वनगमनस्य स्वप्रीतिविषयोमूतख दर्शित, तेन भवत्या विषादो न विधेय इति व्यञ्जितम् । दुमतो--(रामचन्द्रजी ने कहा है माताजी ! आप दुखी मन होहये) * नोट- वात्सय यह है कि में उनकी प्राज्ञा से वन जा रहा है और आपको बन जाने की प्राश नहीं मिली है, अत आपने जो हमारे साथ वनजानेका विचार स्थगित किया है सो समुचित है।

रामवनगमनम्- मैं इन चौदहों वर्षोंको घोर जङ्गलमें (मी) विहार करके (अत्यन्त खुशीसे) विता कर भाजागा श्रीरता जो श्राप कहेंगी वही परुगा। एवमुका प्रिय पुध वाष्पपूर्णानना तदा । उमात्र परमार्त्ता तु कौशल्या सुतवत्सला ॥ १८ ॥ मन्वय -एव, तु, (पुण) उता, तदा, सुतवत्सला, परमार्ता, बाप्प निना, कौशल्या, प्रिय पुत्रम् , उवाच । सुधा-एवम् उक्तपकारेण, तु, (पुत्रेण ) उत्ताकथिता, तदा तस्मिन् समये, सुतवत्सला=पुत्रविषयकातिवात्सल्ययुक्ता, परमार्ता=अतिखिन्ना, बाष्प पूर्णानना-वाष्पेण-नयनजलेन, पूणम्-व्याप्तम् अानन-मुख, यस्या' या तयो हा, "भानम लपन मुखम्" इत्यमर । कौशल्या, प्रिय स्नेहिन, पुत्र रामम् , उवाच - उक्तवती । एतेन वियोगजनितक्लेशस्य दुनिवारत्व ध्वनितम् । इन्दुमतो-अपने प्रिय पुत्रके इन (पिताकी प्राशा पालन करने के बाद जो श्राप कहेंगी वही करूगा इत्यादि) वचनोको सुनकर दुखों को नहीं सहन करने वाली महारानी कौशल्याके नेत्रोंसे (पुन ) छन-छन आँसू बहने लगा। वे अश्रुपूर्ण मुखसे ( आँसू बहाती हुई ) रामचन्द्रजीसे कहने लगी- | मासा राम ! सपत्तोना वस्तु मध्ये न मे क्षमम् । नय मामपि काकुत्स्थ ! वन वन्या मृगोमिन ॥ १६ ॥ यदि ते गमने बुद्धि कृता पितुरपेक्षया । अन्यय -हे राम! प्रासा, सपक्षीना, मध्ये, वस्तु, मे न, क्षमम् , (श्रत) हे कारस्थ 1, पितु , अपेक्षया, यदि, ठे, गमने, बुद्धि , कृता, ( तर्हि ) वया, मृगीमिय, माम, अषि, वन, नय। सुधा-एव स्वीकृतरामवनगमनस्वमर्तृसेवाऽपि सपलीक्लेशस्मरणात् पुना रामानुगमनमर्थयते-आसामिति । प्रासावद्वियोगहेतुभूताना, सपत्नीना मध्ये, वस्तु =स्यातु, मे=मम कौशल्याया', न क्षम = नौचितम् ,(अत ) हे काकुत्स्थ = कुत्स्थवशोद्भव, पितुः = तातस्य, अपेक्षया इच्छया, यदि = चेत्, ते-तव, गमने प्रस्थाने, बुद्धि , कृता-निश्चिता, (तहि) वन्या-बने भवा, मृगी= हरिणीमिव, मामपि = कौशल्यामपि, नय= प्रापय । तथा च यथा वन्या मृगी वने सन्तुष्टा तिष्ठति तथाऽहमपि स्थास्यामिन नवन्त क्लेशपिध्यामीति भावः। इन्दुमती-(श्रव कौशल्याको यह मय होने लगा कि अगर महाराजकी सुघा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । सेवा के लिये हम अयोयामें रहें तो कैथीने पुरा कोई कुचक्र रचकर महाराजकी सेवासे वञ्चित करनेके लिये हमें भी न कहीं घरसे निकलवा दे । अा रामसे इस प्रकार कहने लगी-) हे कुत्स्यवश उपन वास राम । (तुम महाराजकी सेवाके हेतु हमें रहने को कहते हो पर ) मैं यहा इन (कैकेयीकी ऐसी ) सौतोके बीच रहनेयें असमय हूँ (नहीं रहूँगी ) इसलिये है पुर। यदि तुमने पिताकी भाज्ञा पालन करने के लिये वन जाना निधय कर ही लिया है तो मुझे भी अपने साथ वनमें लेने चलो में वहा वनैनी हरिपीकी तरह खुशसे रहूँगी (तुम्हे किसी प्रकारका कष्ट नहीं दूंगी) तो तथा रुदती दृधा-सदन रामो पचोऽब्रवीर ॥२०॥ मलय-ता, तया, रुदती, दृष्ट्वा, (स्वयम् ) अरुदन (वा-रुदन् ) राम, वचनम् , अरवीत् । सुधा-ता- कौशल्या, तया तेन प्रकारेण रुदती कन्दतों ( दृष्ट्वाऽपि स्वयम् ) श्ररुदन रोदननिवृत्ति कुवन् छन् , च =वचाम् , अग्रवीत्-प्रवो चत् । रोदने सति कातर्यप्रकाशनेन मातु भूयोऽप्यनुगमनप्रयाशाप्रमशादिति माव । यद्वा-तथा रुदतों ता ( दृष्ट्वा ) रामोऽपि रुद्रन वचोऽत्रवीदित्यन्वय । इन्दुमती-इसप्रकार रोती हुई माता कौशल्याको देखकर क्या उनके वचनों को सुनकर रामचन्द्रजी भी रोने लगे (मातृस्नेहसे नेत्रों में जल भर आया) और मातासे कहने लगे। जीवन्त्या हि स्त्रिया मर्त्ता दैवत प्रभुरेव च । भरत्या मम चैवाद्य राजा प्रति प्रभु ॥ २१ ॥ मन्चय -हि, त्रिया, मत्ता, एव, दैवट, प्रम , च, अद्य, जीवन्या', भवत्या, मम, च, राजा, एव, प्रमु, प्रमाति । सुघा-हि-यत , स्त्रिया - नार्या , भर्ता = स्वामी, एव, देवत-देवता, प्रभुश्च सर्वार्थसम्मादनसमर्थच, (अत' ) अय-सम्प्रति, जीव त्या = प्राणधारण कुर्वन्या, भवरया श्रीमत्या , मम-रामस्य, च, राजेवनृपतिरेव, प्रभु - ईश्वर , प्रभवति-प्रादेशे समों भवति । तथा च रानाशाऽभावाचवागमनम- नुचितमित्याराय । । इन्दुमती-(रामचंद्रनीने कहा हे माता जी ! महाराजले बढकर आपका कोई नहीं है) स्त्री जब तक जीती रहे तब तक उसे चाहिये कि वह थाने पतिकी . रामवनगमनम्- ही देवता और मालिक समझे । महाराज ही अभी आपके और मेरे भी मालिक है ( वे श्रापको सौतका कष्ट नहीं होने देंगे)। नह्यनाथा वय राशा लोकनाथेन धीमता। भरतश्चाऽपि धर्मात्मा सर्वभूतप्रियवद ॥ भरतीमनुवर्तेत स हि धर्मरतः सदा ॥ २२ ॥ अन्वय.-धीमा, लोकनाथेन, राग, वय, नहि, अनाया, भरत , च, अपि, धर्मात्मा, सर्वभूतप्रियवद हि धर्मरत स , भवती, सदा, अनुवर्तत, सुधा-ननु वा विना कथमह स्थास्यामि सपत्नीक्लेशवातिदु सह इत्यत आह = नहोति। धीमता बुद्धिमता, लोकनाथेन-सकलजननियन्त्रा, राज्ञा= भूपतिना, वयम् अस्मदादय नहि अनाथा सनाया इत्यर्थ, ननद्वयेन प्रकृतमर्थ द्रढीकृतम् । ननु चोक सपनीमध्यवासो दुष्कर इति तनिराकर्तुमाह-भरतश्चा ऽपीति । भरतश्चापि, कैयौहावापि, धर्मात्मा धर्मशील , सवभूतप्रियवद = अखिलपाणिप्रियवका । तथा च हि 'अनाया" इत्युक्तया राजकर्तृकगमननि योगाऽभावादुष्कराऽपि स्थितिरनुवर्तनीयव, यच्च सपलीमध्यवासदु ख तदपि भरतस्य धर्मशीलत्वान्न भविष्यतीति भाव । ननु स्वद्विध सेवको नास्तीति न शवनीयमित्याह-भरतीमिति । हि-निश्चयेन, धर्मरत =धर्मतत्पर , स - मरत , भवती स्वाम् , सदा सर्वदा, अनुवर्तेत सेवेत । इन्दुमती-(सौतके बीच में नहीं रहूँगी। इसका उत्तर देते हुए रामचद्र- जीने पुन कहा हे माता जी 1) लोकनाथ (चक्रवर्ती ) बुद्धिमान् महाराज (पिता दशरथ) के रहते हम लोग अनाय नहीं हो सकते । हमारे भाई भरत भी धर्मात्मा है और सबसे प्रिय बोलनेवाला है। धर्ममें उसका अधिक प्रेम है, सभी प्रकारसे सदा ही वह ( भरत ) नापका मन रखे गा। (श्राप जो कहें गी वही वह करेगा माता कैरेयिके कुचक्रमें कभी नहीं पड़सके गा)। यथा भयि तु निष्क्रान्ते पुत्रशोकेन पार्थिवः । श्रम नावाप्नुयात् क्रिश्चिदप्रमत्ता तथा कुरु ॥ २३ ॥ अन्यय -तु, मयि, निधान्ते,पाथिव , पुत्रशोरेन, यथा, किञ्चित् , श्रम, न, अवाप्नुयात् , तथा, अप्रमत्ता, (सतो) गुरु । सुधा-तु-कि तु, मयि गमे, निष्कान्ते-निर्गते, वनमाश्रिते इत्यर्थ । पार्थिव =गजा, पुत्रशोकेन-सुतशोरेन, यया येन प्रकारेण, किश्चित् अल्लमपि, सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । श्रम- खेद, नवाप्नुयात्न प्राप्नुयात् , तथा तेन प्रकारेण, अप्रमत्ता- अनवधानतारहिता, कुरुविधेहि । इन्दुमती-( रामचन्द्रजौने कहा है माताजी । आपको देख-रेख भरत करेगा परन्तु-) मेरे वन चले जानेपर जिससे महाराजको पुत्र-शोक (मेरे वियोग) से जरा भी कार न हो सो काम सावधानीसे पार करतो रहना। दारुणश्चाऽव्यय शोको यथैन न विनाशयेत् । राक्षो वृद्धस्य सतत हित चर समाहिता २४ ॥ अन्वय-दारुण च, अय, शोक , अपि, यथा, एन, न विनाशयेत् , (वथा ) समाहिता, (सती ) वृद्धस्य, राश , हित, सतत, चर। सुधा-दारुणम-अतिभयङ्करच, अय-मद्वियोगजनित,, थोक -क्लेश अपि, यथा- येन प्रकारेण, एन-पितर, न विनाशयेत् = लोकान्तरगमनहेतु- कादर्शनता न प्रापयेत् , तथा तेन प्रकारेण समाहिता एकाप्रविता, (सतो) वृद्धस्य :- शानक्योभ्यामधिकस्य, राज्ञ = भूपते , हितप्रिय, सतत-निरन्तर, चर= अनुतिष्ठ। इन्दुमती-(रामच जीने कहा है माताजी ! ) महाराजको अब पूरा- वस्था है अत मेरे वन चले जानेसे उसन यह भयर पुत्र-शोक जिससे महा- राजका नाश नहीं करसके ऐसा काम बड़ी सावधानीसे हमेशा करती रहना। व्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा । भर्तार नानुवत्त सा व पापगतिभवेत् ॥ २५ ॥ भर्च शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमुत्तमम् ॥ अम्बय -परमौतमा, प्रतोपनासनिरता, (अपि ) या, नारी, भर्तार, नानु- वतेत, सा, पारगति , भवेत् , भर्तु . शुभषया च, नारी, (अपि) उत्तम, स्वर्ग, लमते। सुधा-पति शुश्रूषणमेव पाया परमो धम इति सार्घ श्लोक्न दर्शयति- चतेति । परमोत्तमा उत्कर्षगुणजात्यादिमावेन सर्वोत्कृष्टा, बनोश्वासनिरताऽपि मतोपवाससराऽपि, या तादृशगुणविशिष्टा, नारी-स्त्री, भर्तार- स्वामिन, भानुवतन सेवत सा, पापगति पापस्थ - दुष्कृतस्य, गति लिमिव फ्ल यस्या सा तथोक्ता । भवेत् स्यात् । मर्नु =स्वामिन शुभषया देवया, च-अपि नारी-साधारपत्री, उत्तम = श्रेष्ठ, स्वर्ग-देवनोक, लभप्राप्नोति ।

रामवनगमनम- - . इन्दुमती-( रामचद्रजीने कहा है माताजी ! ) व्रतोपवासमें ही निरत होकर उत्तमसे उत्तम कहलाने वाली श्री क्यों न हो जाय, परन्तु यदि वर अपनी पतिकी सेवा नहीं करती है तो पापियोकी गति (नरक) को प्राप्त करती है। और जो स्त्री (स्तीयासमें निरत नहीं होकर भी) अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें (ही) लगी रहती है वह पतिसेवासे उत्तम सर्ग लोकको प्राप्त करती है। अपि या निर्नमस्कारा निवृचा देवपूजनात् ॥ २६ ॥ शुश्रूषामेर कुर्वीत भर्नु, प्रियहिते रता। अन्य देवपूजनात् , निवृत्ता (नया) निर्नमस्कारा, अपि, या, मत्तुं', प्रियहिते, रवा, ( सती) शुभषाम् , एव, कुर्वीत, (ersपि स्वर्ग लभते)। सुघा-स्त्रिया देवपूजनादिप्रवृत्तिरपि मर्तृशुश्रूषाया सत्यां नावश्यकीति सूच यति-अपीति । देवपूजनान् = शिवादिदेवार्चनात् , निता=अशानादहिता, (कथा) निनमस्काराऽपि म भिन्नद्विजादिविषय नमस्काररहिताऽपि, या नारी, मर्तु -स्वामिन , प्रियहिते - प्रियञ्च तद्धित प्रियहित तस्मिन् तपोछे। रवातसरा, (सती ) शुश्रूषामेव-तत्प्रीतिजनक कमैव, कुवीर्त = विधीयीव । साऽपि उत्तम स्वर्ग लमते इति पूर्वेण सम्बन्ध । प्रियहिते इत्यत्र हितशब्दस्य पथादुपादानेनाऽऽपावतोऽप्रियमपि हित कुर्यात् । इन्दुमतो-(रामच द्रजीने कहा हे माताजी ! पति-सेवा ही स्त्रीका परम धर्म है इस लिये-) भले ही कोई स्त्री देवी-देवतानोका पूजन नहीं करती हो तथा हाथ जोड़कर किसीको नमन नहीं करती हो परन्तु यदि वह स्त्री पतिको सेवा ही करती हुई, निरन्तर पतिकी भलाई करने में तत्पर रहे तो निभय ही उसे स्वर्ग प्राप्त होता है। पष धर्म. स्त्रिया नित्यो वेदे लोके श्रुत: स्मृत ॥२७॥ मन्वय.-एष , स्त्रिया, धर्म, वेदे, लोके, (च) नित्य , श्रुतः, (तया) स्मृत, "जात"। सुधा-पतिशुषणमैव स्त्रिया कर्त्तव्यमित्या प्रमाणमाह-एप इते। एष'-, पतिशुश्रयरूप , स्त्रिया =नार्या , धर्म =भुकृतम्, वेदेमन्त्रब्राह्मणात्मके धुती श्रुत श्रवणविषयीमूत , वेदाऽवगत इत्यर्थ । लोके-ससारे, स्मृत मन्वादिमि समये स्मृतिविषयीभूतो नात इत्यर्थ ।

सुधा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-हे माताजी 1) स्त्रीके लिये पतिकी सेवा ही पुरातन लोकाचार सिद्ध तथा वेदशवगत स्मृत्यनुकूल धर्म है (इसलिये इस धर्मका परित्यागकर मेरे साथ श्राप वन नहीं चलें)। अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः । पूज्यास्ते मत्कृते देवि ! ब्राह्मणाश्चैव सुव्रता ॥ २॥ एच काल प्रतीक्षस्व ममागमनकाक्षिणी । अन्यय -हे देवि ! सदा, च, मत्कृत, अग्नि कार्येषु, च सुमनोमिन, देवता सस्कृता ,ते,बादाणाश्च, पूज्या,एव, ममागमनकाक्षिणी, काल प्रवीक्षव सुधा-ना नहि कर्मा तर त्याप्य कि नेति, यद्वा-तूष्णीमेव स्थितौ मदि- योगाजनित दु ग्वमेनामासाद्य क्लेशयिष्यतीति विया दुखविच्छेदनाथै समय यापनसाधन दशयितुमाह-अग्निकार्येष्विति । अत्रैकश्चकार एवकारायें द्वितीयश्च समुच्चयार्थ , अप्यर्थश्चापर तथाच हे देवि-देवतावत्पूजनीये मात ! सदासर्वदा, मते अस्मदर्यम् , अग्निकार्येषु भर्तृसमतेषु शान्तिपौष्टिकहोमेषु क्रियमाणेषु, च-एव, सुमनोभिन्नानापुमादिभि , ( चद- नताम्बूलादिभिश्च) देवता =शिवादय , पूज्या =अर्चनीया , (तथा) सत्कृता = दानमानादिभिरादर प्राप्ता , बामणा=विप्राश्च पूज्या वन्दनीया (एतेन स्वजैव परोक्षण ब्यक्तीकृतेति योध्यम् । ) एवमर्तृसमतोतपूजनादिना, मम= रामस्य, यदागमन-वनात प्रत्यावर्तन, तदाकाक्षिणी- तदभिलापावती, काल- चतुर्दशवर्षपर्यन्त ममागमनसमय, प्रतीक्षस्व-प्राशया वर्तस्व । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे देवि माताजी ! शान्तिक-ौष्टिक होमादि कम करके नाना प्रकार पुष्प, चन्दनादिसे देवताओं की पूजा और ब्राह्मणों का सत्कार मेरे मालके लिये करती रहना और इस प्रकारके अनुष्ठानसे समय बिताती हुई मेरे प्रत्यागमनकी प्रतीक्षा करना। नियता नियताहारा भर्त,शुश्रूणे रता ॥ २६ ॥ प्राप्स्यले परम स्थान मयि पर्यागते सति। यदि धर्मभृता श्रेष्ठो धारयिष्यति जोवितम् ॥ ३०॥ अन्वय' -भर्तृशुथ्षणे, रता, नियता नियताहारा, (स्थास्यसि चेत, तथा) मयि, पर्यागते, सति, धर्मभृता, श्रेष्ठ , यदि, जीवित, वारयिष्यति, (तदा) परम स्थान, प्राप्यसे। . .

रामवनगमनम्- सुधा-भर्तु =नृपस्य, शुभषणे-सेवाया, रता=निरता, नियता स्ननादि- नियमेन म्यतचित्ता, नियताहारा-मधुमासादिवर्जनेनशुद्धाहारा (स्थास्यसि चेत्, तथा,) मयि रामे, पर्यागते प्रत्यारे (सति ) धर्मभृता-घमिष्ठाना (मध्ये) श्रेष्ठ = अप्रगण्य पूज्य इत्यर्थ । (पिता) यदि = चेत् , जीवित जीवन, धार यिष्यनि-धारण करिष्यति । यता सर्वेषा जीवन पालयिष्यति । अनेन पितुर्मरयस्य सन्निहितत्वमवगमयति । (तदा) परमम् = उत्तम, काम = ! स्वेप्सितमैहिकविषय- सुखम् , प्राप्स्यसे-लप्स्यसे । भक्तजीवनपुत्रागमने सतोरेव परमकामप्राप्तिसम्भव इत्याशय । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा है माताजी 1) नित्य स्नानादि नियमसे युक्त होकर मधु मासादि छोड़कर ( सयम नियमसे रहकर ) श्राप महाराजकी सेवा करना मेरे (वनसे) लौट श्राने तक ( चौदह वर्ष तक ) यदि धर्मात्मा श्रोमें श्रेष्ठ महाराज जीवित रहें तो श्रापका उत्तम मनोरथ पूर्ण होगा । एवमुक्का तु रामेण बाप्पपर्याकुलेक्षणा। कौशल्या पुत्रशोका; राम वचनमब्रवीत् ॥ ३१ ॥ मन्वय -रामेण, एवम् , उत्ता, तु, बाप्पपर्याकुलेक्षणा, पुत्रशोकार्ता, कौशल्या, राम, वचनम् , अब्रवीत् । सुधा-रामेण स्वतनयेन, एव-पूर्वोकप्रकारेण, उक्तावथिता, तु, बाप- पर्याकुलेक्षणा = बामो-नयनजल, तेन पयाकुल-व्याप्तम् , ईक्षणम्-अवलोकन, यस्था सा तथोक्ता, पुत्रशोकार्ता-पुत्रशोकेन रामवियोगजनितशुचा, प्रात: पोडिता या सा तथोक्ता । कौशल्या=राममाता, राम-स्वतनय, वचन-वक्ष्य माण वाक्यम् , अब्रवीत् = अवोचत् । इन्दुमती-जब रामचन्द्रजीने इस प्रकार ( महाराजकी सेवा करनेके हेतु अयोध्या ही में रहने के लिये ) समझाया तब माता कौशल्याके नेत्रों में आँसूभर श्रापा । पुत्र-वियोगसे प्रात होकर कौशल्यानी वहने लगी। गमने सुकृता बुद्धि न ते शक्नोमि पुभक!। विनिवयितु वीर ! नून कालो दुरत्यय ॥ ३२ ॥ मन्वय -हे पुत्रक ! गमने, सुकृता, ते, बुद्धि, निवर्चयितु न शक्नोमि, (यत ) काल नून, दुरत्यय । सुधा-हे प्रक=हे वीर ! गमने-वनप्रस्थाने, सुकृता अतिनिविष्टा , . सुधा-इन्दुमतो टोकाइयोपेतम् । १७ सुदृटामिति यावत् । ते त्व, बुद्धि-मति, नित्तयित-प्रत्यावर्तयितु न शक्नोमि= ने समर्थो भामि । तब हेनुमाह-नूनमिति । कान = इष्टवियोगादिज- भक्दैव , यहा-कान =विजयममय । नून =निश्चित, दुरत्यय = अनियमिनुम- शक्य । विधिवशादेव मयोगवियोगी तत्प्रतिक्त्तुमशक्योऽस्माभि । इन्दुमती-(कौशल्याने कहा-) हे वत्स राम | वन जाने में मुदृढ तुम्हारी बुद्धि को श्रर हम फेर नहीं सकतीं। हे वीर | निधय ही कानका कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता ( होनेवाना होर ही रहता है)। गन्छ पुन रमेकायो भद्र तेऽस्तु सदा विभो।। पुनस्वयि निवृत्ते तु भविष्यामि गतलमा ॥ ३३ ॥ अय-हे पुत्र । एकान, (म वा) त्व, (वन। गच्छ, हे विभो । सदा, ते, भद्रम् , अस्तु, (ग्रह) तु पुन त्वयि निवृत्ते गतलमा भविष्यामि । सुधा-हे पुत्र = चत्म! एकापसमादितचित, (मृत्वा) व (वन) गच्छब्रज, हे विभो -चिरजीव गम!, सदा-पवस्मिन् काले, ते तव भद्र- कल्याणम् , अस्तु - भवतु, (अह ) तु पुन =भय , त्वयिम्भवति, निवृत्त वना दागते सति गतवमा त्यतनशा भविश्यामि - भविताऽस्मि । इन्दुमती-(अन्तमें पुत्रवत्मला माता कौशल्याने कहा-) हे वत्स राम । अब तुम एका दिन ( साव धान ) होकर वन जाओ। वनमें सदा ही तुम्हारा कल्याण हो । हे विभो । ( देवातिषि-पूजन वे महाराजकी सेवामें भने ही मैं समय बिगाउँगो परन्तु-) तुम्हारे वनसे लौट आने पर ही मेरा क्लेश दूर होगा। प्रयागत महाभागे कतार्थ चरितवते । पितुरामृण्यता प्राप्ते स्वपिध्ये परमासुखम् ॥ ३५ ॥ अन्नय -चरितवते, कृतार्थे महाभागे प्रत्यागते, (सति ) ( तया) पितु मानण्यता, प्राते, (च सति ) परम सुखम् , (अह) स्वपिध्ये । सुधा-चरितवते -चरितम् - अनुष्ठित पिशज्ञापालनका व्रत चेन, तस्मिन् तथोक्त। कृता-कृत -सम्पादित अथ -स्वप्रतिशाविषयोभूत वातु येन तस्मिन् तथोक्ते । मनमागे='ग्राम्योत्पत्तिमामृत्यो क्लङ्को यस्य नो भवेत् । स्यारचैवानुपमा कत्ति स महामा? उच्यते ॥" इत्युक्तगुणविशिष्टे त्वयि प्रत्या गते-परावृत्त ( सति ) तया, पितु =राज , धानृण्यनाम्-अनृणताम् , (स्वाय- ग्यम्) प्राप्ते-लब्धे, (च, सति,) परमम् उत्तम, सुग्दम्मानन्द, यया स्यात्तथा, २राग० रामवनगमनम्-- क्रियाविशेषणमिदम् । (अह) स्वपिध्ये =शयिध्ये,। यदा-चरितवते, प्रस्थागते, तथा, पितुरातृ ण्यता प्राप्ते इहागते च महाभागे-महाऽऽभा-रा लक्ष्मीमागच्छति-प्राप्नुवति तस्मिन् , त्वयि, परम सुख शयिष्य इत्यर्य । इन्दुमती-(कौशल्याने कहा-) हे महाभाग वत्स राम । जब तुम्हारा व्रत (पिताकी आज्ञापालनरूप, चौदह वर्षका वनवास ) पूरा हो जायगा और इस पितृ-ऋणसे मुक्त होकर (अर्थात तुम्हारे पिताके ऊपर कैकेयीका जो ऋण या उसको बनवाससे चुकाकर) जब तुम वनसे लौट पाश्रोगे तब मुझे बहुत ही आनन्द होगा और तब ही में सुखकी निन्द सोऊँगी। (अभी तो दिन-रात तुम्हारी ही चिन्ता बनी रहेगी। कृतान्तस्य गति पुत्र! दुविभाव्या सदा भुवि । यत्वा सञ्चोदयति मे वच माविद्धय राघव ! ॥ ३५॥ मन्वय -हे पुत्र । भुवि सदा, कृतान्तस्य, गति , दुविभाव्या, यद , है राघव ! मे, बच , आविद्धय, त्वा, सञ्चोदयति। सुधा-हे पुत्र-वत्स !, मुवि-पृथिव्या, सदा सर्वदा, कृतान्तस्य- देवस्य, गति = चरित्र, दुर्विभाव्या =तक्तुिमशक्या दुर्लक्ष्येति यावत् । यद् = यस्माद्धेतो, हे राघव-रघुनन्दन !, मे=मम कौशल्याया , वच -वचनम् , आवि म = प्राच्छिद्य त्या सर्वप्रिय सर्वसुन्दर भवन्त, सञ्चोदयति गमनाय प्रेरयति । यदा--हे पुत्र !, यद् = यस्माद्धतो , कृतान्तस्य = राक्षसस्य, (जातावेकवचनम् , तेन राक्षसानामित्यर्थ ) गति = गमन, दुविभाव्या-ज्ञातुमशक्या तस्मादतो, हे राघव श्राविण्य = स्वस्त्यादिविधान कृत्वा, मे, वच , त्वा, सञ्चोदयति = तत्र गमनाय प्रेरयति । इन्दुमतो (माता कौशल्याने पुन कहा-) हे वास राम इस लोकमें विधाताकी गतिको कभी कोई समझ नहीं सकता (भाग्यका लिखा होकरकै हो रहता है ) क्योंकि यह भाग्यकी ही गति है, जो मेरे वचनको टालकर तुन्द धनजानेकी प्रेरणा कर रही है ( मेरे वचनको तुम नहीं मान रहे हो)। गच्छेदानों महाबाहो ! क्षेमेण पुनरागत । नन्दयिष्यसि मा पुत्र ! साम्ना श्लक्ष्णेन चारणा ॥ ३६ ॥ अन्वयः-है महाबाहो ! इदानीं, (त्व) क्षेमेण, (सहित ) गच्छ, हे पुत्र आगत , (त्व) श्लणेन, चारणा, साम्ना, ( वाक्येन ) मा पुन , नन्दयिष्यति । सुधा-हे महाबाहो महान्तौ-पाजानुकम्दिनौ, चाहू-भुजौ, . - , यस्य , सुधा-इन्दुमती-टीकादयोपेतम् । स, तत्सम्बुद्धौ । इदानां सम्पति, क्षेमेण-मत्कृतस्वस्त्ययनादिवाचन हेतुककल्याणेन (सहित पन) गच्छ-व्रज, हे पुत्र-वत्स ! आगत वनानिवृत्त , (ख)श्लदणेन= मृदुलेन-निर्मलेन, रमणीयार्थेन वा चारणा = मनोहरेण रमणीयवर्णविशष्टेने- त्यर्थ । साम्ना-शान्तिविधायकेन, ( वाक्येन,) मा दीना मातर, पुन - भूय नन्दयिष्यसि अानन्दयिष्यसि । इन्दुमतो-हे श्राजानुहु भद्र राम | अब तुम वन जाओ और हे पुत्र (चोदर वर्षके बाद ) दुशलसे लोटकर शुद्ध चित्तसे मृदु वचन कहकर मुझे (अपनी दुग्विया माताको) आनन्दित करो। अपोदानों स कान्त स्यात् बनात्प्रत्यागत पुन । यत्त्वा पुत्रक ! पश्येय जटामरकलधारिणम् ॥ ३७ ॥ अन्वय-हे पुत्रक। यत् वनात् , प्रयागत, जटावल्कलगारिण, त्वा, पुन , पश्येय, स , काल , इदानीम् , अपि, स्थात् १ । सुधा-क्षणमात्रमप्यनवलोकनासनिष्णुत्वात् प्रत्यागमनकान समीप एव सम्भवेदिति प्राथयते -अपोति। हे पुत्रक-वीर ! यत्-यस्मिन् समये, अथवा यत् येन चतुदशवान्तेन कानेन, वनात् अरण्यात् , प्रत्यागत प्रयावृत्त, जटा वल्कल वारिण-जटा सरतकेशान् , व-कलानि-वृक्षत्वचश्व धारयनीत्येव शीनम् । त्वा भवन्त, पुन = भूय , पश्येयम् = अवलोक्येय, स = कान , इदानी समीपे-एव, थरि स्यात् =अपि भवेत् ', वियागकालस्याधिक्य यया न प्रति भासेत तथा स्यात् किमित्यय । ( अपिरत्र सम्भावनायाम् ) इन्दुमतो-(पुनवत्सला माता कोशल्याने कहा-) हे वत्स ! में प्राशा करती हूँ कि वह समय शीघ्र श्रावेगा जब में तुम्हें वनसे लौटे हुए और जटा वल्कल धारणकिये हुए देसू गी। तथा हि राम वनवासनिश्चित ददर्श देशो परमेण चेतसा। उपाच राम शुभलक्षण वयो बभूव च स्वस्त्ययनाऽभिकाहिणी ॥३८॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मोकीय श्रादिकाव्ये ऽयोध्याकाण्टे चतुर्विंश. सर्ग । मन्वय -देवी, वनवासनिश्चित, तया, शुभलक्षण, राम, परमेण, हि, चेतसा, पदर्श, (तथा ), स्वस्स्ययनाभिकाक्षिणी, च, बभूव । (स) राम, (शुभ- लण), पच, उवाच । % २० रामवनगमनम्- सुधा-वनवासनिश्चित I = निश्रितवनवास, तथा, शुभलक्षण सकलसामुद्रि. क्लक्षणलक्षित, सम=स्वतनय, परमेण = उत्कृष्टेन, हि, चेतसा -पा, ददर्श= अवलोक्यामा । तथा, स्वस्त्ययनाभिकाइक्षिणी - वस्त्ययन-मालम् , अभिका इक्षितम्-अभिलपितु, शीलमस्त्यस्या सा तथोका च, बभूव-जाता, अत एव (a) राम शुभलक्षण-शुभश्चक, वच - वक्ष्यमाणवचनम् , उवाच - उत्तवती । शुभलक्षणमित्यस्य देहल दीप यायेोभयत्र सम्बन्ध । इनि धीवाल्मीकिरामायणेऽयोध्याकाण्डे सुधा' टीकाया चतुर्विश सर्ग । इन्दुमतो-एव प्रसारण रामचन्द्र जीसे वह कर, माता कौशल्याने वन- जाने के लिये निश्चित ( दृटप्रतिज्ञ ) पुत्र गमको श्रादर दृष्टिसे देखा और शुभ सूचक वचन ( 'अयमारम्भ शुभाय भवतु' इत्यादि ) कदा और गम-वनगमन- यात्रा मङ्गलाचारमें लग गयीं। इस प्रकार इन्दुमती टीकामें अयोध्याकाण्डका चौबीसवा सर्ग समाप्त हुआ। पञ्चरिंशः सर्ग आशीर्वाद साविनीय नमायासमुस्पृश्य जल शुचि । चकार माता रामस्य मङ्गलानि मनस्विनो॥१॥ अन्वय:--मनस्विनी, माता, तम् , अायास, चिनीय, शुचि, जलम् , उप- स्पृश्य, रामस्य मङ्गलानि, चकार । सुधा-ता येव स्वस्त्ययनादीनि दर्शयितमाह-सेति। मनस्विनी दृढ- मनस्का, सा= माता कौशल्या, त = निश्चितवियोगजनिनम् , अायास - देश, विनीय = विचारेण दूरीकृत्य, शुचि-पवित्र, जल == सलिलम् , उपस्पृश्य- श्रावस्य, "उपस्पशस्त्वानमन" मित्यमर | रामस्य =स्वतनयस्य, मालानि = शुभानि स्वस्त्ययनानोत्यर्थं । चकार - कृतवनी । इन्दुमती-(अन्ततो गत्वा 'नून कालो दुरत्यय " अर्थात् भावीको कोई रोक नहीं सकता, यह समझकर ) विचार शील माता कौशल्याजी शोषको याग कर (श्रासू पोछकर ) जलमे श्राचमन करके पवित्र होकर रामजीको वनयात्राको साल बनाने के लिये तदनुक्ल मङ्गलाचार करने लगीं। ।

1 सुधा-इन्दुमतो-टोकादयोपेनम् । न शक्यते धारयितु गच्छेदानी रघूत्तम!। शीघ्र च विनियस वर्तस्व व सताक्रमे ॥ २॥ अन्चय -हे रघूत्तम !, इदानों (गमन ) वारयितु, ( मया ) न, शक्यते, (श्रत ) गच्छ, च, सता, कमे, वत्तत्व, च ( ततश्चतुद्दशवर्याने वनाद ) शीघ्र, विनिवर्तस। सुश-है रघूतम = रघुपरिश्रेष्ठ 1, इदाना = सम्प्रति, (तव गमन ) बार- यितु = निषे पयितु ( मया) न शक्यते = न पार्यते, (श्रत वन) गच्छु-ब्रज, च= तया, सता = महात्मना, क्रमे = मार्गे, वतस्व= स्थितो भव । ( ततश्चनुद- शवर्षान्ते वनात् ) शीघ्रम् अाशु, पिनियत्तस्वप्रत्यावर्तस्व । यद्वा ( चतुद्दश वर्षान्ते वनात् ) शीघ्र विनिवत्तस्व, विनिवृत्य च सता मार्ग- अभिषेचने वर्त- स्वेत्याशी शसनम् । इन्दुमतो-(कोशत्याने करा- ) हे रघुकुलदीपक वत्स राम ! मैं अब नुमको वनजाने से रोक नहीं सकती (क्योंकि मैं समझ गयो कि "विधिपति टरे न राग' श्रत ) अब तुम जानो ओर सन्मार्गका अनुसरण क्रो (पिताशाका यथाविधि पालन करो) परन्तु हे पुत्र ! चौदह वषक वाद शीघ्र ही लौटकर चला आना। यपालाम धर्म प्रीत्या च नियमेन च। सबै राघवशार्दूल । धर्मस्वाभिरक्षतु ॥ ३ ॥ अन्चय -हे रावणदूल। य धर्म, प्रीत्या, च, नियमेन, च, त्व, पान यसि, वै, स , धर्म (एस) त्वाम् , अभिरक्षा । सुधा-हे रावयादून - पुलश्रेष', य=पित्र्याशापाननरूप, बर्म, प्रीत्या प्रेम्णा, च = पुन , नियमेन यमादिनमग्रनियमेन, च, पानयसि = अच्युतमनुति प्रसि, वेनिश्चयेन, स पियाज्ञागलनरूरी घम , (एव) स्वा= भवन्तम् , अभिरक्षतु-समालयनु विघ्नादिभ्यो निवारयविति भाव । इन्दुमता-(माता कोशल्याने भाशीर्वाद देती हुई कहा- ) हे रघुकत्त केसरी (महाप्रतापी) वत्स राम । जिस धर्मका पालन तुम प्रीतिपूर्वक नियमित रूपसे करने जारहे हो वही (रिताशानन रूप ) धर्म (वनमें ) तुम्हारी रक्षाकरे । येभ्य प्रणमसे पुत्र ! देवेपायतनेषु च । ते च चामभिरक्षन्तु बने सह महर्षिभिः॥४॥ - २२ रामवनगमनम्-- अन्वय-है पुत्र !, देवेषु, आयतनेषु, च, यैन्य , प्रणमसे, ते, च, वने, महर्षिमि सह, त्वाम्, अभिरक्षन्तु। सुधा-हे पुत्र वत्म !, देवेषु देवार्चनेषु, पायतनेषु देवानयेषु, च, येभ्य : देवेभ्य , प्रणमसे नमस्कारोपि । यहा देवेषु-द्युतिमत्सु, आयतनेषु-गृहेषु येभ्य प्रणमसे च, ते देवा , चाहषय , वने-विपिने, महर्षिमि -भरद्वाजादिमि , सह- सहित, त्वां भवन्तम् , अभिरक्षन्तु प्रत्यूहरहित व तु ! यद्वा-महर्षिभि सह देवा अभिरक्षन्विति सम्बन्धी विधेय । इन्दुमती-हे वत्स राम ! देव-मदिरोंमें जिन देवी-देवताओंको, तुम नित्य प्रणाम करते हो वे देवतालोग महर्षियोंके सहित वनमें तुम्हारी रक्षाकरें। यानि दत्तानि तेऽस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता। तानि त्याममिरक्ष तु गुणैः समुदित सदा ॥ ५॥ अन्वय ~धीमता, विश्वामित्रेण, ते, यानि, अस्त्राणि, दत्तानि, तानि, गुणे समुदित, स्वाम् , सदा अभिरक्षन्तु | सुधा-धीमता- बुद्धिमता, विश्वामित्रेण = गाधिसुतेन ते= तुभ्य, यानि- सम्मोहनादीनि, अस्त्राणि-श्रायुधानि "श्रायुध तु प्रहरण शस्त्रमस्त्रम्" इत्यमर । दत्तानि = अर्पितानि, तानि निखिला यस्त्राणि, (कत्तॄणि ) गुणे = दयादाक्षि ण्यादिभि सद्गुणे , समुदित - प्रकाशित, त्वा = भवन्तम् , सदा = सर्वस्मिन् काले, अभिरक्षन्तु - सम्पालयन्तु । इन्दुमती-(माता कौशल्याने फिर कहा-) हे वत्स ! बुद्धिमान् महषि विश्वामित्रजीने तुम्हे जितने सम्मोहनास्त्र दिये हैं, वे सब श्रेष्ठ गुण युक्त अस्त्र चनमें तुम्हारी रक्षा करें। पितृशुश्रूषया पुत्र ! मातृशुश्रूपया तथा। सत्येन च महाबाहो ! चिर जीवाऽभिरक्षित ॥६॥ मन्वय -हे पुत्र !, हे महावाहो', पितृशुश्रूषया, तथा, मातृशुश्रूपया, च, सत्येन, अभिरक्षित , (स्व) चिर, जीव । सुधा-हे पुत्र हे वत्स !, हे महावादो-महान्तौ-दीर्धी, वाहू-भुजौ यस्य तत्सम्बुद्धौ । 'भुजवाहू प्रवेष्टो दो" इत्यमर । पितृशुश्रूषया जनकमेवया, तथा, मातृशुश्रूषया-अस्मत्सेवया, यद्वा-मातु -कैकेय्या, शुश्रूषया-मनोरथस- म्पादनरूपसेक्या । च- अपि च, सत्येन - तद्रपेण धर्मेधा, अभिरक्षित = ।

२३ . . सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । अभित -सर्वदिक्षु, रक्षित -त्रात , (ख) चिर-बहुकाल, जीवप्राणान् धारय, वस्तुतोऽन्तभावितण्याऽयम् , तथा सति चिर जीव चिर (प्रजा ) पालयेत्यर्थ । इन्दुमती-(पुनश्च कौशल्याने कहा -) हे आजानुबाहु वत्स राम । पिता-माताको सेवा और सत्यपालनके फ्लसे (वामें रक्षित होकर) तुम अधिक दिनतक जीवित रहो। समिस्कुशपवित्राणि घेद्यश्चायतनानि च । स्थगिडलानि च विप्राणा शैला वृक्षा क्षुपा ह्रदा ॥ पतगा पन्नगाः सिहास्त्वा रक्षन्तु नरोत्तम ! ॥७॥ श्रग्वय -हे नरोत्तम!, समित्कशपवित्राणि, वेद्य , च, पायतनानि, च, विप्राणा, स्पण्डिलानि च, शैला ,वृक्षा, तुपा, हृदा, पतझा , पन्नगा , सिंहा (वने चरन्त) रंग, रक्षन्तु । सुधा-हे नरोत्तम-नरभ्रेष्ठ ।, समित्कुशपवित्राणि समिध -होमीयपलाशादि. काष्ठानि, कुशा = वहिष पवित्राणि-दर्भग्रन्थिविशेषा, तानि च तयोक्तानि, चेद्य = अग्निधिष्ण्यानि, च = तथा, प्रायतनानि = देवगृहाणि, विप्राणा-ब्राह्म- णाना, स्यण्डिलानि = देवपूजास्थलानि शैला = शुद्रपर्वता , वृक्षा = द्रुमा , ( एतचोपलक्षणन्तेन लतादेरपि परिग्रह ) क्षुपा -हस्वशाखाशिफायुका वृक्ष विशेषा "हस्वशाखाशिफ तुप " इत्यमर । यद्वा 'हस्वशाखावृक्षेष्वेव प्रायशो देवता सनिधत" इत्यैतित्याद् वृक्षविशेषण तुपशब्दो ज्ञेय । हृदा -तड़ागादय , पतङ्गा -पक्षिण , पन्नगा =सर्पा, सिहा -मृगेन्द्रा, (बने चरन्त) वाम्भवन्त, रक्षन्तु = त्रायन्ताम् । अत्र समिदादिपदेन तत्तदधिष्ठातृदेवता प्राह्या । इन्दुमती-(कोशल्याने कहा-) हे नरोत्तम राम ! वनम समित् (हवन की लकड़ी ) कुशा, कुशाकी, बनी पवित्री तया (ऋषिमण्डपकी ) वेदिया, देवालय, ब्राह्मणोंके देव-पूजास्यन (जो कि वर, पीपल, नीम आदि देववृक्षोंके नीचे बना रहता है ), पर्वत, वृक्ष, छोटी २ शाखा वाले पौधे (चूमनेवाले तृणविशेष ), जलाशय पक्षी, सर्प, और सिंह सभी वनमें तुम्हारी रक्षा करें । स्वस्ति साध्याश्च विश्वे च मरुतश्च महर्षिभि । स्वस्ति धाता विधाता च स्वस्ति पूषा भगोऽर्यमा ॥८॥ लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा । . .

रामवनगमनम्- क्षपा, . . ऋतवः षट्च ते सर्वे मासा सवत्सरा क्षपा ॥ ॥ दिनानिय मुहूर्तीश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा । मन्वय (सदा) महषिभि (सह ) साध्या च, विश्वे, च, मस्त, (ते) स्वस्ति कुवन्तु, च घाता, विधाता (ते ) स्वति, च, (करोतु) च, पूषा, भग, अर्यमा (ते) स्वस्ति (करोतु) च, वासवप्रमुग्वा , ते सर्वे, लोकपाला, तया ते, सर्वे, पट ऋतव , च, मासा, सवत्सरा च, दिनानि, मुहूर्ता, सदा, ते स्वस्ति, कुर्वन्तु । सुधा-(सदा) महर्षिभि =भरद्वाजादिभि , (सह) साध्या साप सिद्धि , साs स्ति येषा ते गणदेवविशेषा (1), च-पुन , विश्वे विश्वेदे ग (२), मस्त - मरगणा (ते- तुभ्य) स्वस्ति - कल्याण, कुर्वन्तु (लिङ्गव्यत्ययेना इन्वय ) । च-पुन धाता दक्षप्रजापति , विधाता=ब्रह्मा, च= चका रादन्येऽपि ब्रह्माण्डाऽधिनायका (ते = तुभ्य ) स्वस्ति = मङ्गल, क्रोति च%3 पुन पूषण, भग अर्यमेत्यादिद्वादशसख्यकादित्यानान्तरभेदविशेषधाचका , (ते- तुभ्य ) स्वस्ति- मगल करोतु । च%= पुन , वामवप्रमुखा =इन्द्रादिप्रधाना. ते सर्वे(७) लोकपाला , तथा शास्त्रोक्ता (४) सर्वे पडऋता , च-पुन (शास्त्रो चा सर्वे) मासा -चैत्रादयो द्वादशमामा, सबमरा = सवसन्ति ऋतको यत्र ते तयोक्ता प्रभवनामादिका इति यावत् । क्षग रात्रय , दिनानि = सूर्यादिवारा, मुहूर्ता = द्वादशभणा 'ते तु मुहूत्तों द्वादशास्त्रियाम्' इत्यमर . सदा - सर्वस्मिन्का ने ते तुभ्य स्वस्ति = मङ्गलम् , कुर्वन्तु । इन्दुमतो-( कौशल्याने कहा-) हे वत्म राम 1 वनमें जाने पर (बारहो साभ्यगण, तेरहों विश्वेदेवगण, उनासो पवन और सभी ऋषिगण तुम्हारा मगत करें और धाता, विधाता ( दक्ष-प्रजापति ) पूषा, भग और श्रयमा ये (१)ते च यथा-'मनोमन्ता तथा प्राणो मरोऽगनश्च वीर्यवान् । नि- भयो नरकश्चैव दशो नारायणो वृष ॥ प्रभुश्चेति समाख्याता साध्या द्वादश देवना" (२) अनु-दक्ष-सत्यवसु-काल-काम-धुग्लिोचन-पुरूरवो-माद्रवस- अष्टावेते विश्वेदेवपदवाच्या । (३) इन्द्रो-वहि-पितृपति -तो-वरुणो- महत् कुबेर-ईश-अध्यावेते दिग्पालग्दवाच्यो लोक्पाला । (४) हेमन्त-शि शिर-वसन्त-ग्रीष्म-वर्षा-शरद्-एतेषड्तक । च-पुन, २५ . . . , . सुधा-इन्दुमती-टीकाद्धयोपेतम् । (मादि) लोकपाल तुम्हारा मजल करें । एव छहो मृतुयें, दोनों पक्ष, बारहो मास साठहो मिन र नामके सवत्सर, रात, दिन तथा बारहो मुहूर्च तुम्हारा मङ्गल करें। थुति स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्या पुत्र सर्वतः ॥ १० ॥ स्कन्दश्च भगवान् देर सामश्च सवृहस्पति । सप्तर्षयो नारदश्च ते त्या रक्षन्तु सर्वत ॥ ११ ॥ अन्यय-हे पुत्र', श्रुति , च, स्मृति , च, धम , वा, सर्वत , पातु । च, स्कद , भगवान् देव , च, सबृहस्पति , सोम , (तथा ) सप्तर्षय , नारद , च, ते, (मया स्तुता ) सर्वत , खा, रक्षन्तु । सुपा-हे पुत्र वत्स , श्रुति = अाम्नाय , च-पुन , स्मृति =मन्वादिघ- मशास्त्र, च-पुन , धर्म = श्रुतिस्मृत्युदित , त्या=भवन्त, सर्वत =अभित , पातु = रक्षतु । च% पुन , स्कन्द =कार्तिकेय भगवान्भग-माहात्यमस्याऽस्तोति भगवान् , देव = महादेव (नामैकदेशेन नामप्रणात् ), च =पुन, सह- स्पति = गुरुसहिन , सोम = चन्द्र यद्वा उमासहितो महादेव , एतपक्षे पूर्व "देव" इत्यस्ये द्रोऽयं । (तथा) सप्तर्षय =मरीच्यत्रिप्रमुखा (१)नारद =नार-ज्ञान, ददातोति नारदो योगी । ते= सर्वे (मया स्तुता ) सर्वत =अभिन वा भवन्त, रद तुपान्तु, तप्रत्यविनादिभ्यो निवारयन्वित्यर्थ । इन्दुमती-(कौशल्याने पुन कहा-) हे पुत्र राम ! वेद, स्मृति और तत्प्रतिपादित धर्म, वनमें तुम्हारी रक्षा करें। तथा पार्वतीनन्दन और पार्वती सहित भगवान् शङ्कर, वृहस्पति, सप्तर्षि और योगि-राज नारद जो सदैव (वनमें) तुम्हारी रक्षा करें। ते चाऽपि सर्वत सिद्धा दिशश्च सदिगोश्वरा । स्तुता मया वने तस्मिन् पान्तु त्या पुत्र ! नित्यश ॥ १२ ॥ मन्वय -हे पुत्र!, मया, स्तुना , ते, च, सदिगीश्वरा, सवत , सिद्धा, च, दिश , अपि, तस्मिन् , बने, नित्यश, रा, पान्तु । सुधा-हे पुत्र राम !, मया तव मात्रा कौशल्यया, स्तुता वन्दिता, ते सप्तादय , च-तथा, सदिगीश्वग = दिक्गलमहिता सिद्धा =पसिद्धा, यदा-तपोविशेष कृतसाक्षात्कारा सिदा च-पुन , दिश-श्राशा "दिशस्तु (१) सप्तर्षीणा ययाम नामानि- मरीचि अङ्गिरा अत्रि पुलस्त्य पुलह ऋतु वसिष्ठश्चेति ।

, । ३० रामवनगमनम्-- सुधा-ते-तव, प्रागमा = श्रागम्यन्ते इति भागमा--मार्गा, श्राग मनानुकूलव्यापारा इत्यर्थ । शिवा =मालविशिष्टा , सन्तु भवन्तु,पराक्रमा : पुरुषार्था, सिद्ध यन्तु = सफला मपन्तु, च = तथा, सर्वसम्मत्तय = वनवासापे क्षिता फलमूलादिरूपा , (सन्तु) हे पुत्रक-हेवीर राम !, (व स्वस्तिमान-मा लयुक्त , (सन् , वन) गच्छ-व्रज । इन्दुमती-(पुत्रवत्सला माता कौशल्या आशीर्वादसे हिंस्त्र जन्तुषोंका भय निवृत्ति करके अब माङ्गलिक वचन कहने लगी-) हे बरस राम | तुम्हारे मार्ग (वनगमन) कल्याण कारक हो और तुम्हारा पराक्रम सिद्ध हो तथा वनवे फ्ल, मूलादि तुम्हें प्राप्त होते रहें । हे पुत्र राम ! (यही मेरा पाशीर्वाद है ) अब तुम स्वस्तिमान होकर (निर्विघ्न पूर्वक ) वन जानो। स्वस्ति तेऽस्त्यान्तरिक्षेन्य पाथिभ्य पुन पुन । सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो ये च ते परिपन्थिन ॥ २२ ॥ सत्यय -हे राम !, आन्तरिक्षेभ्य , ते, स्वस्ति, अस्तु, पार्थिवेभ्य , पुन , पुन , (ते, स्वस्ति, प्रस्तु) देवेभ्य , ( ते स्वस्ति, अस्तु ) च, ये, च, ते, परि पधिन , ( तेभ्य ) सर्वेभ्य , एव, (ते, स्वस्ति, अस्तु) सुधा-हे राम! श्रातरिक्षम्य =गगनचारिभ्य , ते-तुभ्य, स्वस्ति: मालम् , अस्तु =भवतु, पार्थिवेभ्य = पृथिवीवतिभ्य , पुन पुन = भूयो भूय (ते स्वस्ति, अस्तु ) देवेभ्य सुरेभ्य (ते, स्वस्ति, अस्तु ) च-पुन , ये % पूर्वानुक्ता , च = अपि, ते =तव, परिपन्थिन =विरोधिन (तेभ्य ) सर्वेभ्य , एव = अपि, स्वस्ति मङ्गलम् , अस्तु = भवतु । इन्दुमती-(कौशल्याने पुन कहा-) हे पुन । आकाश और पृथिवी वर्ती पतार्थोसे पुन पुन (फिर कहती हूँ या बार २ आराधना करुगों कि) तुम्हारा कल्याण हो, तथा सभी देवताओंसे एव जो तुम्हारा विरोधी हो उनसे भी (न २ क्हूगी कि वनमें ) तुम्हारा कल्याण हो। शुक्र सोमध सूर्यश्च धनदोऽथ यमस्तथा। पान्तु त्वामचिता राम ! दण्डकारण्य(१)वासिनम् ॥ २३ ॥ (१) दण्डको नाम कश्चन सूर्यवंशीयो राजा दैत्यगुरो शुक्राचार्यस्य 'अरजाम्' नामक या बलेन धार्षितवान् तच्छुरवा शुक्राचार्यस्तु नितरा कुपित त %3D सुघा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । ३१ अन्वय-हे राम !, दण्डकारण्यवासिनम् , त्वाम् , शुन , च, सोम , च, सूर्य:, अय, धनद , तथा, यम , (एते) अचिंता , पान्तु । सुधा -हेराम = हेवरस ।, दण्डकारण्यवासिन-दण्डकवननिवासिन, स्वा= भवन्त, शुभ = भार्गव , च-पुन , सोम = चन्द्र , चन, सूर्य मादित्य , अय=अपि च, घनद -कुवेर , तथा, यम = कृतात , (एते ) अचिता -पूजिता , पान्तु रक्षन्तु । पूर्वकैकश , अत्रतु मिलित्वेति न पुनरुक्ति । इन्दुमतो-( माता फौशल्याने पुन कहा-) हे दण्डक वनमें वास करने वाले इष राम ! ( नुम बन जाओ) भगवान् भार्गव शुक्र, चन्द्र, सूर्य, कुवेर, यम ये सब हमसे पूजित (खुश) होकर वहा (दण्डक वनमें) तुम्हारी रक्षा करें। अग्निर्वायुस्तया धूमो मन्त्राश्चषिमुपच्युता । उपस्र्पशनकाले तु पान्तु त्वा रघुनन्दन ! ॥ २४॥ अन्वय -हे रघुनन्दन ।, उपसर्शनकाले, तु, अग्नि , वायु, तथा धूम , ऋषिमुखन्युता , मनाच, स्वा, पातु । सुधा-हे रघुनन्दन =नन्दयति-प्रानन्दयतीति नन्दन , रघो-रघु कुलस्य नदन -रघुनन्दनस्तत्सम्मुद्धौ । उपस्पशनकाले अस्पृश्यत्पर्शनसमये, तु, अग्नि -गाईपत्याद्यग्नि, वायु = श्राश्रमस्थपवन , तथा, धूम = वह्नमस्थित शिखा, ऋषिमुसब्युता - ऋषय -भरद्वाजादयस्तेषा, मुखाद् वदनात् , च्युता नि सुता , खया गृहीताय । पान्तु-रसन्तु । बनभ्रमणसमये अस्पृश्यस्पर्शनाशुचय पाश्रमस्याग्न्यादिना पूता सन्तस्त्वां रक्षस्वित्याशय । इन्दुमती-(अस्पृश्यका स्पर्श होनेसे प्रायुका नाश होता है, श्रत माता कौशल्याने कहा-) हे रघुकुलका आनन्दवर्धक राम 1 वनमें अछूतोसे अथवा अस्पृश्य पदार्थोसे सर्श होने पर ( दण्यकारण्यवासी ऋषि-प्राश्रमके ) अग्नि वायु, धूम और ऋषियों के मुखसे निस्सृत मत्र ( वेदध्वनि ) तुम्हारी रक्षा करें (पवित्र करें)। सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूनकर्ता तथर्षय । ये च शेषा सुरास्ते तु रक्षन्तु वनवासिनम् ॥ २५॥ गजान शथाप-मरिभ्यसि अद्यप्रभृति राज्यञ्चेद सप्ताहमध्ये महारण्यतया परिणत भविष्यतीति, तच्च विन्याचलशिखरदेशस्थ राज्य दण्डकारण्य नामाऽ भूदित्यत्र रामायपीययाऽनुसन्धेया । , . ३२ रामवनगमनम्- मन्वय.-धनवासिन, (खा) भूतकर्ता, सर्वलोकप्रमुः, ब्रह्मा, तथा, अषय च, ये, शेषा , सुरा, ते, तु, रक्षन्त । सुधा-वनवासिन-दण्डकारण्यस्थायिन (रवा) भूतक्र्ता-प्राणिनिर्माता, सर्वलोकप्रभु, सर्वे च ते लोका -चतुर्दशभुवनानि, तेषा प्रभु -स्वामी । ब्रह्मा- पितामह, तथा, ऋषय = भरद्वाजादय , च-पुन, ये शेषा = उताऽवशिष्टा , मुरा = देवा , तु तेऽपि, रक्षन्तु =पान्तु । इन्दुमतो-(कौशल्याने कहा-) हे रघुनन्दन | चौदहो लोक स्वामी ब्रा तथा प्रालियोका पालन करनेवाले भगवान् विष्णु एव ऋषिगण तथा अन्य ( पूर्वोक्तावशिष्ट, जिनका नाम पहले नहीं लिया गया हो वे ) देवता भी दण्डकारण्यमें तुम्हारी रक्षा करें। इति माल्यै सुरगणान् गन्धेश्चाऽपि यशस्विनी। स्तुतिभिश्चानुरूपाभिरामर्चायतलोचना ॥ २६ ॥ अन्वयः-इति भायतलोचना, यशस्विनी, माल्यै , च, गन्धे , अनुरू- पाभि , स्तुतिभिश्वाऽपि, श्रानर्च । सुधा-इति एव प्रकारेण, मत्वेति शेष । श्रायतलोचना-प्रायते लोचने यस्या सा तथोक्ता दीर्घातीत्यर्थ । यशस्विनी =कीर्तिमती, माल्यै सम्भि, च- पुन , ग घे - चदनादिभि , अनुरूपाभि = स्वयोग्यामि, स्तुतिभिश्वापि प्रार्थनामिबाऽपि, श्रानच= पूजयामास । इन्दुमती-(रामवनगमनके समय) इस प्रकारकी मन कामना करके सुकी तिमती विशालाक्षी सुन्दरी रामकी माता महारानी कौशल्याने पुष्प-माला-चन्दन प्रादिसे देवताओंकी यथायोग्य स्तुति-पूजा की। ज्वलन समुपादाय ब्राह्मणेन महात्मना। हावयामास विधिना राममङ्गलकारणात् ॥ २७॥ अन्वय -(कौशल्या) राममनल कारणात् , महात्मना, ब्राह्मणेन, ज्वलन, । समुपादाय, विधिना, हावयामास । सुधा-(कौशल्या) राममङ्गलकारणात् = शमाभ्युदयदेतो , महात्मना- शुद्धान्त करणेन, ब्राह्मणेन = विप्रण स्खलन चह्नि, समुपादाय -प्राहयित्वा) विधिना-शास्त्रोक्तविधिक्रमेण हावयामास = होम कारयामास । इन्दुमती-( देव-पूजनके पश्चात् पूजान्तमें माता कौशल्याने--) पवित्र . .

सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । अन्त करण वाले ब्राह्मण द्वारा अग्निस्थापन करवाकर प्रज्वलित अग्निमें राम च नजीके वन-माल के लिये वक्ष्यमाणोक्त विधिसे हवन करवाया। घृत श्वेतानि माल्यानि समिधश्चैव सर्पवान् । उपसम्पादयामास कोशरया परमानना ॥ २८॥ अवय -परमानना, कौशल्या, घृत, श्वेतानि, माल्यानि, सर्षपान , समिधा, च, अपि, उपसगदयामास । सुधा-परमानना=परमोत्तमा स्त्री, कौशल्या राममाता, घृतम् अाज्यम् , श्वेतानि= शुभ्रापि, माल्यानि = स्रज , सर्षपान् = त तुभान् , "सर्षप स्यात् सरिषर कुटस्नेहश्च त तुम" इति त्रिकाण्डशेष । समिघ = यागादिहवनीय काष्ठानि, चाऽपि, उपस गदयामास - होमाय ब्राह्मण समीप प्रापयामास | इन्दुमती-(नेव-स्तुति पूजन के पश्चात् ) राम-वन मगल काक्षिणी सीश्रेष्ठ माता कौशल्याने घृत, श्वेत पुषकी माला, समित् ( इवनकी विहित लकड़ी), सरसों आदि सभी हवन की सामग्रियों एकत्र जुगकर, वेदीपर अग्निस्थापन प्रदेशके समीपमें पहुचवायी। उपाध्याय स विधिना हुवा शातिमनामयम् । हुतह याऽनशेपेण बाह्य लिमकल्पयत् ॥ २६ ॥ मन्वय-स , उपाध्याय , शान्तिम् , अनामयम् , (उदिश्य) विधिना, हुत्वा, हुतहव्याऽवशेषेण, बाह्य बलिम् , अकल्पयत् । सुधा-स , उपाध्याय =पुरोहित (१), शानिम्-अभिभवकारकविघ्नराहि त्यम , पानमयम्-ग्रारोग्यम् , उद्विश्येति शेष । विधिना विधिपूर्वकेण, हुत्वा हवन विधाय, हुतहव्याऽवशेषेण-हुतम्-पाहुत, यद्द्दव्य-हवनीय हवि , तस्य, अवशेष -अवशिष्टो भाग तेन,तयोक्तेन । बाह्य-होमस्थानाद्वहिर्भागयोग्य, बलि- लोकपालादिव'लम् विहितलोकपालादिपूजा मत्यर्थ । अकल्पयत्-अरचयत् । इन्दमती-(माता कौशल्याद्वारा हवन सामग्री उपस्थित होने के पश्चात्-) हवन करनेवाला उपाध्याय ( पुरोहित ) ने विधिपूर्वक अनामय-शान्ति ( कष्ट घोरभय धाग्य वारय पूर्णायुवितर वितर सर्वान् कामान् पूरय २ इत्यादि रूपेगा, (१) एकदेश तु वेरस्य वेदाला यपि वा पुन । अध्यापय त वृत्यर्थमुपाध्याय स उच्यते ॥ ३रा०प० .

३४ रामवनगमनम्- - . राम-वनगमन कल्याणाय) हवन करके अग्निस्थापन प्रदेश से बाहर हवनावशिष्ट साकल्यसे लोकपालोंको बलि दी। मधुध्यक्षतघृत स्वस्तिवाच्य दिजॉस्तत । वावयामास रामस्य बने स्वस्त्ययनक्रियाम् ॥ ३०॥ अन्वय - स्वस्तिवाच्यम् , ( उद्दिश्य ) मधुदध्यक्षतघृते , द्विजान् (कृस्खा) तत , रामस्य, वने, स्वस्त्ययनक्रिया, (द्विजै ) वाचयामास । सुधा-स्वस्तिवाच्य=पुण्याहवाचनम् ( उद्दिश्य ) मधुदध्यक्षतघृत =मधु च, दधि च, अक्षत च, घृतञ्चेति मधुध्यक्षतघृतानि तैस्तयोकै ,एतैरुपलक्षितान् द्विजान्-स्वस्तिवाचनाईब्राह्मणान् ( कृत्वा ), तत तदनन्तर, रामस्य- स्वत नयस्य, वने = दण्डकारण्ये, स्वस्त्ययनक्रिया स्वस्ति-मङ्गलमस्स्वित्येवरूपा वन विषयकस्वस्त्ययनक्रियाप्रतिपादकमन्त्रमित्यर्थ । वाचयामास = पाठयामास । इन्दुमती-(हवनोत्तर माता कौशल्याने-) बाहाणोंको शहद, दही, अक्षत, और घृत देकर श्रीरामचन्द्रजीके मगलके लिये उनसे स्वस्तिवाचन कराया। ततस्तस्मैदिजेन्द्राय राममाता यशम्बिनो । दक्षिणा प्रददौ काम्यां राघव चेदमत्रवोत् ॥ ३१ ॥ मन्वय-तत , यशस्विनी, राममाता, तस्मै, द्विजेन्द्राय, काम्या, दक्षिणा, प्रददौ, च, राघव, इदम् , अब्रवीत् । सुधा-तत =स्वस्तिवाचनानन्तर, यशस्विनी कीर्तिमती, राममाता कोश ल्या, तस्मै हवनक, द्विजेन्द्राय-ब्राह्मणश्रेष्ठाय, काम्या स्वाभिलपिता, दक्षिणा कर्मसफलताप्राप्तयथ द्रव्य, प्रददौ-दत्तवती, च-पुन , राघव रामम् , इद%D अक्ष्यमाणवचनम् , अब्रवीत-अवोचत् । इन्दुमती-तदुसर (स्वस्ति वाचन करवानेके पश्चात् ) सुकीतिमती रामकी माता महारानी कौशल्याने उन श्रेष्ठ कर्मकाण्डी ब्राह्मणोंको यथेच्छ दक्षिणा दी और तदुपरात रामचन्द्रजीसे कहा- यन्मङ्गल सहस्राक्षे सर्वदेवनभस्कृते । वृत्रनाशे समभवत्चत्ते भवतु मङ्गलम् ॥ ३२ ॥ म वय-यत् , माल, वृधनाशे, सवदेवनमस्कृते, सहस्राते, सम भवत् तत् , मङ्गल, ते भवतु । -- ३५ , सुधा-इन्दुमती-टीकाद्वयोपेतम् । सुधा-यत् = यादृश, मङ्गल-विजन , वृत्रनाशे-त्रानुरवयकाले(१) सर्व देवनमस्कृते-सकन मुखदिते, सहस्राक्षे-हने, समभवद - सञ्जातम् तत् = तादृश, मङ्गल-विजय , तेस्तव, भवतु =अतु। इन्दुमती-(कौशल्याने कहा-) हे वत्स राम । वृत्रासुरको मारने के समय सब देवताओंसे नमस्कृत होनेपर जैसा मनल इन्द्रको हुआ था, वैसा ही मङ्गल ( दण्डकारण्यमें ) तुम्हारा भी हो। य मङ्गल सुपर्णस्य विनिताकल्पयत्पुरा । अमृत प्रार्थयानस्य तत्ते भरतु मङ्गलम् ॥ ३३ ॥ अन्वय -पुरा, यत् , मङ्गलम् , अमृत, प्रार्थयानस्य, सुरणस्य, विनिता, अक्षय, तत् ते, मङ्गल, भवतु । सुधा-पुरा-पूवस्मिन् समये कद्रूकृतपरामवसमय इत्यर्थ । यत् = याश मङ्गल विजय , अमृत = पीयूष, प्राययानस्य-याचमानस्य, (आर्षत्वान्मुगमावो शेय ) सुपर्णस्य = गण्डस्य, विनिता-गरुडमाता, श्रकल्पयत् - कृतवती, तत्= तादृश ते =तर, माल -विजय , भवतु अस्तु । इन्दमती-( कौशल्याने फिर कहा-है पुत्र राम 1) पहले गरुड़की माता विनिताकी देव-प्रार्थना करने पर अमृत लाने के लिये प्रस्तुत गड़का जेसा मान हुअा था वैसा ही मगन (दण्डकारण्यमें ) तुम्हारा हो। समृतोत्पादने दैत्यानतो वज्रधरस्य तत् । अदितिर्मनल प्रादात्तते भरतु मद्गलम् ॥ ३४ ॥ अन्वय --अमृतोत्पादने, दैत्यान ,प्त , वज्रधरस्य, यत् , मल अदिति , प्रादात् , तद, माल,ते, भवतु । सुधा-अमृतोलादने - अमृतोत्पत्तिसमये, (समुद्रमन्यनकाने ), दैत्यान्- असुरान् , मत = मारयत , वज्रधरस्यमदत्य, यत् , यादृश, मङ्गल-विजय , अदिति कश्यपत्री, प्रादात् दत्तवची, तत् = ताहश, मलविनय , तव, भवतु:श्रस्तु। (१) पुरा क्लि विश्वरूपाख्य राष्ट्र पुत्रे देश इते सति बुनिस्दा दस्थ हन्तार त्रास्य पुत्रान्तरमुपादयिषुराभिचारिक याग कृतवान् तस्मादुद्भूतो त्रो मामासुर । निश्च भयभीता देवा भगव व तुष्टुवु । अथ तस्माल्नवरा देवा इन्द्र पुरस्कृत्य दधीचेरामम जगमु । मनन्तरश्च सम्प्राथ्य ततोऽस्ति प्राध्य रेन रज निर्माय तेन वरच वृत्रमिन्द्रो इवानिति भागवतीया कान्नुम धेया। -- - -- - , रामवनगमनम्- इन्दुमती-(पुनश्च कौशल्याने कहा है वरस 1) इन्द्रको माता अदितिने समुद्रसे अमृत निकालने के समय दैयोको मारने के लिये प्रस्तुत वज्रधारी को जैसा मगल प्रदान किया वैसा ही यह (मेरा) मगल तुम्हे (दण्डक वनमें) प्राप्त हो। विधिनमान् प्रक्रमतो विष्णोरतुलतेजसः । यदासोन्मङ्गल राम | तत्ते भरतु मङ्गलम् ॥ ३५ ॥ अन्वय.-अतुलतेजस , विष्णो , त्रिविक्रमान् , प्रक्रमत , यत् , मङ्गलम् , श्रासीत् , हे राम, तत् , मङ्गलम् , ते भवतु । सुधा-अतुलतेजस =अतुलम्-अनुम्म, तेज पराक्रम यस्य तस्य, विष्णो: वेवेष्टि भुवनत्रय पादत्रयेणेनि विष्णुस्तस्य वामनाऽवतारस्य(१) मधुसुदनस्येत्यया । निविक्रमान् बारत्रयपादविक्षेगन् , प्रगमन -प्रकुर्वत , यत् = यादृश, माल- विजयः, श्राशीत-प्रभूत् , हे गम = वस | तत्-ताश, मङ्गल-विजय , 3 तव, भवतु-अस्तु । इन्दुमती-(कौशल्याने कहा-हे श्राजानुबाहु वत्स राम ! वामनावतारमें) अतुलित तेज शाली विष्णु भगवान्का तीन बार पादप्रक्षेप करनेसे तीनो लोक नापने जैसा मङ्गल ( विजय ) हुअा था वैसा ही माल (दण्डकारण्यमें ) तुम्हारा हो। ऋपय सागरा द्वीपा वेदा लोका दिशश्च ता । मङ्गलानि महाबाहो ! दिशन्तु शुभमङ्गलम् ॥ ३६ ॥ अन्य -हे महाबाहो !, ऋषय , सागरा, द्वीपा , वेदा , लोका , (तथा) दिशश्च, मलानि, दिशतु, (मङ्गलानि च ) शुभमालम् दिशन्तु । सुधा-2 महाबाहो = दोर्षबाहो ।, ऋषय भरद्वाजप्रभृतय , सागरा - क्षीरनिधिमभृतय , द्वीपा = अन्तर्वास्तिटानि, समुद्रमध्यवर्तिप्रदेशा इति यावत् । यदा-जम्बू १ लक्ष २ शाल्मली ३ कुश ४ क्रौञ्च ५ शाक ६ पुष्कर ७ एते सप्त- द्वीपा, वेदा गादय , लोका चतुदश भुवनानि ता प्रसिद्धा दिश =प्राच्या । (१) पुरा कश्यपाददित्या भगवान् वामन प्रादुबभूव । स च काचि मुनिभिदवश्वापनीत दलियशालायां गत सत्रासराधिपो बनियोक्तविधिना तमचयामास । अथ तब भगवान् तेभ्य- वेबल पादत्रयमितभूमियारन कृतवान् । ततो गुरुणा शुक्रण मुहुमुहुनिषिद्धोऽपि वलिस्तस्मै पादत्रयमिनभूमिदान ददौ । ततो बिराप गृहोवा पादत्रयणेव नौशायान् जिगायेति मा. बतीया कथा। - . ।

सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । दयश्च, मझलानि-शुभानि दिशन्तु = ददतु, (तानि ) (ते) शुभमङ्गल - मङ्गनानामपि मालम् , दिशतु = दद्तु । इन्दुमतो--(कौशल्याने फिर कहा-) हे महाबाहो । सप्त ऋषिगण, चारो समुद्र सातो द्वीप ( समुदके मध्यवर्ती तट-प्रदेश, लङ्का आदि) चारों वेद, चौदहो भुवन तथा दशो दिशायें तुम्हारा शुभ माल करें और वह मङ्गल तुम्हारा अतिशय मङ्गल दायक हो अर्थात् मङ्गलर मगन तुम्हारा वन में होता रहे। इति पुत्रस्य शेषाश्च वा शिरसि भामिनी। गधेश्चापि समालम्य राममायतलोचना । .७॥ श्रोपों च सुसिद्धार्थो विशल्यकरणी शुभाम् । चकार रक्षा कौशल्या मन्त्रैरभिजजाप च ॥ - ॥ अन्यय -इति, ( उक्त्वा ) आयतनोचना, भामिनी, कौशल्या, पुत्रस्य, थिरमि, शेशश्च कृत्वा, गन्धैश्वापि, समालभ्य, सुसिद्धार्या विशन्यकरणीम् , 'श्रौषधी, च ( गुन कृत्य ) शुभा, रक्षा चकार (ता) म नै अभि-जजाप च । सुधा-इत - पूर्वोककमेण, ( उक्त्वा ) अायतलोचना = दीधनेत्रा, भा मिनीसौभाग्यवती, कौशल्या राममाता, पुत्रस्य - स्वतनपस्य, शिरसि = मस्तके, शेषाम अक्षताच, कृत्वा, गधेश्वाऽपि अनेकविधच दनैधारि, समा लभ्य-विलिप्य, मुसिद्धार्या - सुमिद्ध -पराक्षित , अथ पल यस्था ता, विश- स्पकरणीम् अ तगतशल्पनिर्गमनकारिणीम् , औषध! मूलिका (गुलकीकृत्य ) । शुभा - मननप्रदा, रक्षा, चकार रक्षा हेतुस्वेन हस्ते वव घेत्यर्थ (ता) मत्रै पौ राणिकमन्त्रविशेरे , अभिजनाप-अभिमन्त्रयामास । इन्दुमतो-इस प्रकार मगन पाठ करके सौभाग्यवती रामकी माता विशालाक्षी कौशल्याजीने वनगमनोद्यत अपने पुत्र श्रीरामचन्दजी के मलकार : मगलाक्षत चदाकर नदन लगाया और तदुपरात प्रत्यक्ष फल देनेवानी । विशल्याणी नामका औषधि विशेष (जिसके लगाने से शरीर में घुसा हुआबाण ठहर नहीं सकता, अपने श्राप निकल पाता है, वइ) लगाया तथा ( हायमें ) मगनप्रद रक्षिका ब धन किया एव तेत्रोक रातिसे मत्र-जा करके उसे अभि मषित कर दिया। उपाचापि प्रहटेर सा दुखरशरत्तिनी। वाड्माण न भावेन वावा ससञ्जमानया ॥ ३६॥ . . - . r रामवनगमनम्- अन्वय -सा, दु सवशवतिनी, अपि, प्रहृष्टा, इव, ससजमानया, वाचा, उवाच, (तत्र ) वाल्मात्रेण, न ( किन्तु ) भावेन । सुधा-सा-प्रसिद्धा, दु खवशवर्तिनी अपि-वियोगजनितदु खाका ताऽपि, प्रहा इव, पुत्रमुखोल्लासार्थ सन्तुष्टेव भावयन्तीत्यर्थ । ससज्जमानया-अत्या- सक्तिबोधिकया, स्खल त्या वा, वाचा-वाण्या, उकवती (तत्र ) वाङ्मात्रेण केवलवचनेन, नोवाच, (किन्तु ) भावेन - अतिप्रेरणा उक्तवतीत्यर्थ । यदा पूर्वे मनसाभिजजाप, सम्प्रति च मन्त्रानुसन्धानेन समस्य हृत्प्रसादार्यम् , उवा चापि =मन्त्रानितिशेष, जपोत्तर स्पष्टमपि मन्त्रानुच्चारयामासेत्यर्थ । अत्रायें ससज्जमानया=खिममानसयेत्ययों शेय । इन्दुमती-(चन्दनादि लेपनके पात् ) वह रामकी माता महारानी कौशल्या पुत्र-वियोगज य दु खसे आक्रान्त होती हुई ( राम-वन-यात्राके समय अमागलिक बुद्या जवरन अनुपातको रोकती हुई) भी इर्षित होकर बोलने लगी, किन्तु बोल न सकी, पुन-स्नेह उमड़ पाया और उनकी वाणी गद्-गद हो गयी। पानम्य मूधिन चाघ्राय परिष्वज्य यस्विनी । भवद पुत्रमिधाओं गच्छ राम ! यथासुस्त्रम् ॥ ४० ॥ अन्वय-यशस्विनी, पुत्रम् , अानम्य, मूर्ध्नि, प्राणाय, च परिष्वज्य, हे राम !, इष्टार्थ , (व) यथासुस, गच्छ, (इति ) श्रवदत् । सुधा-यशस्विनी = कीर्तिमती ( कौशल्या) पुत्र = रामम् , श्रानम्य- श्रानमय्य, मुनि-शिरसि, श्राघ्राय प्राण विधाय, च = पुन , परिष्वज्य = श्रालिजप, हे राम हे वत्स! इष्टार्थ =इष्ट -अभिलषित , अर्थ-देवप्रयोजन यस्य स तथोक्त , (त्व) यथासुख-सुखमनतिक्रम्य, गम्छ-ज, (इति) श्रवदत्-नगदत् । इन्दुमतो-(अन्तमें राम-वनगमनके समय) कीतिमती रामकी माता महारानी कौशल्या पुत्रस्नेइसे विह्वन हो गयीं। उन्होने वनगमनोद्यत अपने स्नेही पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको हृदयसे लगा लिया, और प्रतिस्नेहसे उनका मस्तक सुच कर पीठपर हाथ फेरती हुइ कहा-हे वत्स राम ! अब जहा तुम्हारी इच्छा हो वहा सुखसे चले जाग्रो ( दण्डकारण्यमें नि शक होकर घूमो और अपना इष्ट साधन (निशाचरवघ) करो। , स्था, । सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । अरोग सर्वसिद्धार्थमयोध्या पुनरागतम् । पश्यामि त्वां सुख वत्स ! सन्धित राजवर्मसु ॥४१॥ मन्वय -हे वत्स!, अरोग, सर्वसिद्धाथम् , अयोध्यो, पुन , आगतम् , राजवार्मसु, सषित, वा, सुख, पश्यामि । सुधा-हे वत्स-पुत्र |, अरोग-रोगरहित, सर्वसिद्धार्थ = लघसकन्न मनो अयोध्या राजधानी पुन =भूय , श्रागत-प्राप्त, राजवमसु-राजपद्ध विषु, सधिनम् आस्थावत प्रातराज्यमित्यर्थ । स्वाभवत, मुख-मुखपूर्वक (यथास्यात्तथा क्रियाविशेषणमिदम् ), पश्यामि = द्रक्ष्यामीत्यर्थ । इन्दुमती-(माता कौशल्याने वनप्रस्थान के समय अपने स्नेही पुन राममे पुन कहा-हे वत्स ! अतुम जाओ और वनमें ) प्रारोग्य शरीरसे सभी मनोग्य (पित्राशपालन करते हुए निशाचरोका वर) सिद्ध करके फिर (१४ वर्षके गद) अयोध्या लौट आओ । हे पुन (वनसे लौटकर) जब तुम राजा होगे तब तुमको देखकर में बहुत ही सुख पाऊँगी। प्रणएदुःखसकल्पा हर्ष विद्योतितानना। द्रक्ष्यामि त्वा वनात्प्राप्त पूर्णचन्द्रमिवोदितम् ॥ अन्वय-प्रणष्टदु खसकल्पा, हर्षविद्योतितानना, (सती भह) वनात् , प्राप्त, उदित पूर्णच द्रामव, प्रक्ष्यामि । सुधा-प्रणदु खसकल्पा- दु खस्य-क्लेशस्य, सकस --मानस में वने रामस्य किं भविष्यतीति चिन्तात्मकमित्यय , प्रणष्ट -व्यपगत दुखसकलो यस्मा सा तयोचा, हर्षविद्योठितासना-हर्षेप-रामागमनम्पानन्देन 'विद्यो- तितम्-अतिदीप्तम् , अानन-मुस यस्या सा तयोका (सती अह) वनात् = भरण्यात् , प्राप्तम् = अागत, खा-भव वम्, उदितम् = उदयाचलसस्थित, पूर्णचन्द्र = सम्पूर्णे दुमिव, द्रदयामि = अवलोकयिष्यामि । इन्दुमती-(कौशल्या कहा वत्स ! ) पूर्णमासोके उदित पूर्णचन्द्रकी तरह वनसे लौटकर आये हुए तुम्हाग प्रसन्न वदनको देखकर मेरे मनका सी चिन्ता दूर हो जायेंगी और उस समय हघसे मेरा मुख प्रसन्न हो जायगा। भद्रासनगत राम ! वनवासादिहागतम् । द्रक्ष्यामि च पुनस्त्वा तु तोर्णवन्त पितुर्वच ॥ स्वाम .

रामवनगमनम्- राम, - अन्वय -हे राम!, वनवासात्, पुन , इइ, श्रागत, भद्रासनगत च, पितु , वच , तीर्णवन्त, तु, त्वा, द्रक्ष्यामि । सुधा-हे राम हे वत्स !, वनवासात् विपिननिवासात् , पुन =भूय , इह = अयोध्यायाम , श्रागत प्राप्त, भद्रासनगत राज्यसिंहासनस्थ, च= तथा, पितु = गश , वच = वचन तीर्णव तम् = उत्तीय पारगत, तु, त्वा = द्रक्ष्यामि =अवलोकयिष्यामि । इन्दुमतो-( कौशल्याने माने भावी मनोरथसिद्ध की चर्चा करती हुई पुन कहा ) हे वत्स ! पिताकी श्राशापालन करके वनसे अयोध्या लौटने के वाद भद्रासन ( राजसिंहासन ) पर बैठे हुए जब तुझे मैं देखूगी । ( तब मुके बहुत ही श्रानन्द होगा)। मङ्गलैरुपसम्पन्नो वनवासादिहागत । वयाश्च मम नित्य त्व कामान् सवर्ध याहि भो. ॥ ४२ ॥ अन्वय. - मङ्गले , उपसमन्न , त्व, याहि भो, वनवासात् , इह श्रागत , (सन् ) मम वश्वाथ, कामान् , निस्य, सवर्ष । सुधा-मङ्गले =गजोचितवस्त्राभूषणे स्वस्त्ययनादिभिश्च, त्व, याहि-गच्छ, भो, = भो' इति निपात श्राम ये वर्तते । वनवासात् =दण्डकारण्पनिवा सात्, इह = अयोध्यायाम् , अागत प्राप्त (सन् ) मम = कौशल्याया, वध्वा =सीतायाध, कामान्=मनोरथान् नित्य-प्रतिदिन, सवर्ष =वधयस्व, श्रावस्वादात्मनेपदलक्षणस्यानित्यत्वाद्वात्र परस्मैपदमित्यवगन्तव्यम् । इन्दुमती-(पुनश्च माता कौशल्याने कहा-) हे वरस राम ! अब तुम वन जानो और वनसे लौटकर राजोचित वस्त्रालकरणोंको धारण करके (राजा बनकर) षधू ( मीता ) के और मेरे मनोरयको सदा पूर्ण करो। मयाविता देवगणा. शिवादयो महर्षयो भूतगणा सुरोरगा । अभिप्रयाताय वन चिराय ते हितानि काड्झन्तु दिशश्च राघव !॥४३॥ । अन्वय -हे राघव!, मया, अर्चिता , देवगणा , शिवादय , महर्षय ,भूत गणा , सुरोरगा ,दिशश्च, चिराय, वनम् , अभिप्रयातस्य,ते, हितानि, कान तु । सुधा हे राघव-राम !, मया कौशल्यया, अर्चिता = पूजिता, देव गण देवता, शिवादय = महेश्वरप्रभृतय , महर्षय =भरद्वाजादयः, भूतगणा =विद्याघरादयो देवयोनिविशेषा , सुरोरगा = सुरा -इन्द्रादय, उरगाः , गया .

- सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । शेषप्रभृतय , सुराव उरगाश्चेति सुरोरगा, दिश = प्राच्यादय, चिराय-बहु काल, वन-दण्डकारण्यम् , अभिप्रयातस्यगच्छत , ते-तव रामस्य, हितानि = प्रियाणि, कानन्तु-अमिला तु कुस्वित्याशय , सवत्र पुत्र मारवश्यात पुनरुतिर्न दोपाय। इन्दुमती-(पुत्रवत्सला माता कौशल्याने पुन आशीर्वाद देती हुई -) हे पुत्र राघव ! मैंने जिन शकरादि देवताओं की, वशिष्ठादि महर्षियों की, विद्याधरादि भूतगणोंको, इद्रादि देवताओंकी और शेषनाग प्रमृति दिव्य सोकी पूजा की है वे सब तथा दशो दिक्पाल चिरकाल (१४ वर्ष ) पर्यन्त धनयात्रामें तुम्हारा ल्याण करते रहें। अतीय वायुप्रतिपूर्णलोवना समाप्य च स्वस्त्ययन यथाविधि । प्रदक्षिण चाऽपि चकार राघव पुन पुनश्चाऽपि निरोक्ष्य ससजे ॥१४॥ अन्य -अतीव, अ प्रतिपूण नोचना, स्वस्त्ययन, यथाविधि, समाप्य, च राघव, प्रदक्षिण, पाऽपि, चकार, पुन पुनक्ष, निरीक्ष्य, सस्वजे, अति। सुधा-अतीव-अत्यन्तम् , अभ्रप्रतिपूणलोचना=अध्रुणा-रोदनजन्य नेत्रजलेन प्रतिपूर्ण-परिपूर्णे-नोचने-नयने यस्या सा तयोक्ता कौशल्या, स्वरत्ययन = पुण्याहवाचन, यथाविधिशास्त्रोक्तप्रागरेप, समाप्य= सपाय, च= तथा, रायव-राम, प्रदक्षिण = चतुर्दितुभ्रमणश्चाऽपि, चकार = कृतवती, पुन पुनश्च = भूयोभूयश्च, निरीक्ष्य = अवनोक्य, सस्वालिलिा, अपि । यद्यपि पुत्रस्य मात्र प्रदक्षिणमनुचितमिवाभाति तथापि मातृप्रदक्षिणकरणेन पुत्रस्येष्टसिद्धिर्भवतीति धमशास्त्रे प्रसिद्धम् । इन्दुमती-इस प्रकार राम वन गमन समय प्राशीर्वाद देकर माता कौ. शल्याने यथाविधि स्वतिवाचन कर्म पूरा किया और नेत्रोमें श्रामू भरकर अपने पुत्र श्री रामचन्द्रजीको प्रदक्षिणा की और बार बार (अपनक दृश्सेि) उनके मुख को देखती हुई गमजीको पुन हृदयसे लगा लिया (पुत्रस्नेहसे विहल हो गयीं)। तया हि देव्या च कृतप्रदक्षिणो निगेड्य मातुश्चरणौ पुन पुन । जगाम सोतानिलय महायशा सरायर प्रज्वलितस्तया श्रिया ॥२५॥ इसा श्रीमहामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पञ्चविंय सर्ग । अन्वय-च, तया, देव्या, कृतप्रदक्षिण , हि, महायथा, स, राघव , । ४२ रामवनगमनम्- पुन पुन , मातु , चरणो, निपीड्य, तया, श्रिया, प्रज्वलित , सीतानिलय, जगाम | सुधा-च-तत , तया-कौशल्यया, देव्या पट्टाक्या, कृतप्रदक्षिण-विहि ततच्चतुर्दिग्भ्रमण , हि, महायशा =विपुलकीत्तिमान् , स , राघव राम, पुन पुन =भूयो भूय , मातु =कौशल्याया , चरणौ पादौ, निपीट्य-निपीडनपूर्वकम भिवाद्येत्यर्थ , तया मातृसेवा ननितया, श्रिया शोभया, प्रज्वलित -प्रदीत , ( सन् ) सीतानिलय-सीताभवन, जगाम= गतवान् । इति श्रीवाल्मीकीयरामायणेऽयोध्याकाण्डे "सुधा" टोकाया पञ्चविंशा, सर्ग इन्दुमती-इस प्रकार जब माता कौशल्याने रामकी प्रदक्षिणा करके उई हृदयसे लगालिया तब रामचन्द्रजीने पुन २ अपनी माताके चरणों पर झुककर उन्हे साष्टाग प्रणाम किया। तदुपरान्त स्वत सिद्ध शोमासे दीप्तिमान् महाप्रतापी श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके घर ( उन्हे भी साखना देने के लिये) चलदिये। इस प्रकार इन्दुमतीटोकामें अयोध्याराण्डका २५ वा सर्ग समाप्त हुआ। पड्विंशः सर्गः। पतिव्रता सीता अभिवाद्य तु फौशल्या राम सम्प्रस्थितो वनम् । कृतस्वस्त्ययनो मात्रा धमिष्ठे वर्मनि स्थित ॥१॥ अन्वय-धर्मिष्ठे, वर्मनि, स्थित , मात्रा, कृतस्वस्त्ययन , तु, राम , कौशल्याम् , अभिवाद्य, वन, सप्रस्थित , (भासीत् )। सुधा-एव मातर रामो यथाकथञ्चिदनुमान्य, सीतामप्यनुमानयितु गत इति दशयितुमाह अभीति । घर्मिष्ठे-अतिशयेन धर्मवति, वर्मनि=मार्गे, स्थित - वर्तमान , मात्रा-कौशल्यया, कृतस्वस्त्ययन =कृत-विहित, स्वस्स्ययन-उपद्रव शान्तिहेतुकपुरयाऽह यस्य स तथोक्त , कृवमङ्गलस्त्वित्यर्थ । राम , कौशल्या स्वमातरम् , अभिवाद्य-प्रणम्य, वन-दण्डकारण्य, सप्रस्थित =गन्तु प्रवृत्त , प्रासीदिति शेष । इन्दुमती-अपनी माता महारानी कौशल्या द्वारा स्वस्तिवाचन होजाने पर सर्वश्रेष्ठ (पिताकी प्राज्ञागलनरूप) धर्म-मार्गमें स्थित श्रीरामचन्द्रजी माताको प्रणाम करके वन जाने के लिये प्रस्तुत हुए ( वल्कल धारण करने के लिये अपने महल की तरफ जहा उनकी प्राणेश्वरी सती सीताजी रहती थीं, चले)। .

४३ ॥ सुधा-इन्दुमतो-टोकाद्वयोपेतम् । विराजयन् राजसुतो राजमार्ग नरैर्वृतम् । हृदयान्याममन्येव जनस्य गुणरत्तया ॥ अन्वय:--राजसुत , नर वृत, राजमार्ग, विराजयन् , गुणवत्तया, जनस्य हृदयानि, श्राममन्य इव । सुधा-मार्गवृतान्त निरूपयन्नाइ~-विराजयान्नति । राजसुन -राजपुत्र श्रीगम , नरै स्वदशनाकाक्षिजनै , वृत-युत, राजमार्ग रानान्यान, विराजयन्= प्रकाशयन् (सन् ) गुणवत्तया=प्रियवादिगुणविशिष्टत्वेन, हेतुना, जनस्य अयोध्या. स्थसवलोकन, हृदयानि-चेनासि "चित तु चेतो हृदय सात इन्मानस मन " इत्यमर । प्राममय इव-आलोइयामासेव । इन्दुमतो-(अचानक रामवन गमनका समाचार सुनकर अयोप्पावासी व्यथित हो उठे और वेदना प्रकट करते हुए रामचन्द्र जीका दर्शन करने के लिये रान भवनकी सड़क के दोनो तरफ खडे हो गये । इसी बीच-महाराज कुमार श्रीरामचन्द्रजी, माता कौशल्याने भवनसे निकल कर) दर्शनाथियोसे भरा हुश्रा मार्गको सुशोभित करते तथा अपने सद्गुणों के प्रभाव से अयोध्यावासियों के हृदयको मथन करते हुए (अर्थात् राम राज्याभिषेक्से उत्फुल्न उनके हृदयपर हठात् अारात सहुँचाते हुए) वल्कल धारण करनेके पूर्व प्राणेश्वरी सती सीताजी से मिलने के लिये अपने महलकी ओर चले । वैदेही चापि तत्सर्षे न शुश्राव तपस्विनो। तदेव हृदि तस्याश्च यौवराज्याभिषेधनम् ॥ ३ ॥ अन्वय -तपस्विनी, वैदेही, च अपि, तत्सर्वे, न, शुश्राव, तस्या च हदि, तदेव यौवराज्याभिषेचनम् , स्पितम् , पासीत् । सुधा--तपस्विनी = रामाऽभिषेकार्थवतोपवासादिनियमविशिष्टा, वैदेदी जानकी चाऽपि, वत्सवम्-अभिषेकविघातादिक, नन्नहि, शुभाव-श्रुततती, तस्या- वैदेह्याश्च, हदि-मनसि, तदेव-पूर्वनिश्चितमेव, यौवराज्याभिषेचन युवराजपदप्रापणम् , (स्थितमासीत् ) यदा-तस्वीनी - सर्व विषयकनिस्यज्ञान विशिष्टा, चाऽपि वैदेही, तत्सर्व-रामवनवासादिक, शुश्राव -श्रुतवती, तदेव तहनगमनमेव, बह्यर्थे, तस्या हदि स्थितमासीत् (अत एव यौवराज्याभिष- चन नासीदिति ध्वम्यते । इन्दुमतो-(रामच द्रजी माता कौशल्याजीसे मिलकर पन जानेके लिये रामपनगमनम्- प्रस्तुत होकर सीताजीसे मिलने के लिये चले, परन्तु-) श्रमीतक यह (कैकेयोके कुचा से रङ्गमें भा, राज्याभिषेकके बदले चौदह वर्षका वनवास, होनेका ) सारा वृत्तान्त, वह तपस्विनी (तपये रामको प्राप्त करनेवाली ) महात्मा जनककी पुत्री रामकी प्राणेश्वरी सती सीताजी नहीं सुन पाई थीं। उनके मनमें उस समय श्रीरामचन्द्रजीके राज्याभिषेककी ही बात वनी यी (इस लिये अभीतक उसी रगमें मस्त थी)। देवकार्य स्म सा कृत्वा कृतज्ञा हटचेतना । अभिशा राजधर्माणा राजपुत्री प्रतीक्षति ॥ ४ ॥ अन्वय ~ कृतज्ञा, हृटचेतना, राजधर्माणम् , अभिशा, सा, राजपुत्री, देवकार्य, कृत्वा, प्रतीक्षति, स्म । सुधा-कृतज्ञा-देवादिप्रार्थनाशात्री, यदा-अभिषिकस्वामिविषये गय पुष्पादिना पट्टमहिषीमि कृतपादाऽभिवादादिवृत्तान्तज्ञा । हृष्टचेतना-प्रफुल्ल स्वान्ता, राजधर्माणाम् = अभिषिकराजाऽसाधारणलक्षणश्वेतन्छनमामरपुरस्कृत भद्रासनादीनाम् , अभिशा = तत्त्ववेत्री सा=प्रसिद्धा, राजपुत्री = जनकसुता, देवकार्यम् = देवार्चनम् , कृत्वा = सम्पाद्य, प्रतीक्षति स्म-तदावने स्वामिना सह पदा स्थास्यामीति काल यापयतिस्मेत्यर्थ । प्रतीक्षतीत्यापत्वादेव परस्मैपदपाठ । इन्दुमती-(जब वनगमन के लिये प्रस्तुत होकर सीताजीसे मिलने के लिये उनके पासतक रामचन्द्रजी पहुंच रहे थे तब, उस समय ) राज्याभिषेक समयके मामलिक विधिको जाननेवाली तथा शशिप्रभ छत्र, चामर, सिंहासनादि राज- चि होंको जानने वाली राजा जनककी पुत्री श्री सीताजो देवी-देवतामोकी पूजाकरके प्रसन मनसे राज-पुत्र (युवराज ) श्रीरामचद्रजीकी अभ्यर्थना करने के लिये प्रतीक्षा कर रही थीं। प्रधिवेशाऽथ रामस्तु स्ववेश्म सुविभूषितम् । प्रहृष्टजनसम्पूर्ण हिया किञ्चिदवाटमुख ॥५॥ अन्यय-अय, हिया, किञ्चिद् , अवाड्मुख , (इव) राम , तु, प्रहष्टजन सपूर्ण, सुविभूषित, स्ववेश्म, प्रविवेश। सुधा-अप-यथाक्रम किञ्चिद्राजमार्गातिक्रमणानन्तरम् , हिया स्वमाता पितृकृतमिदमन्याय्य कथ कथयिष्यामीति इतो लग्जया । यदा-मदनगमने नून मौवाऽपि गमिष्यति परन्तु पित्रालापनमन्तरा कयमिमा सह नेष्यामीति हेनो ४५ सुधा-इन्दुमतो टीकाद्वयोपेतम् । लजया, किश्चित् ईषत् , वाग्मुख न वाक् वचन, मुवे-वदने, यस्य स तादृश (इव)। रामस्तु, अष्टजनसपूर्ण प्रहृष्ट-माऽभिषेचनेन प्रमुदितै , जने नगरस्थै , सपूर्ण-व्याप्त, मुविभूषितम्-चित्रादिमि शोभित स्ववेश्म स्वगृह- प्रविवेश-प्रविष्टवान् । इन्दुमती-(सीताजी प्रतीक्षा कर ही रही यों कि) इतने ही में श्रीराम चन्दजी राज्याभिषेको सब पर सुन्दर २ प्रतिमानोसे चित्रित होकर सुमज्जित अत्यन्त मनोहर अपने भवन में, जहा सीताजी थीं, लजासे किश्चित् मुख नीचे किये हुए (चुप-चाप) प्रवेश कर गये (लज्जा इस बात की थी कि माता कैकेयीके कुचक्रसे मैं वन जारहा हूँ, यह सीतासे कैसे कहूँ')। मथ सीता समुत्पत्य वेपमाना च त पतिम् । भपश्यच्छोकसन्तप्त चिता याकुलिनेन्द्रियम् ॥ ६ ॥ मन्वय -अय, वेरमाना, सीता, समुत्पत्य, चिनाव्याकुलितेन्द्रिय, शोक सन्तप्त, च, त, पतिम् , अपश्यत् । सुधा-अय-रामस्य स्वगृहप्रवेशानन्तर, वेश्माना पूर्वमिव रामकर्तृक पचनोचारणामावेन कम्पमाना। यद्वा-स्वामिन विगतहपत्वावाङ्मुखत्यायव- लोकनारकम्ममाना, सीताजनकनदिनी, समुत्पत्य स्वासनादुत्थाय, चिन्ता व्याकुलितेन्द्रिय =चिन्तया-इमा सह कय नयामीति विचारेण । यद्धा-भावि दुःखस्मरणरूपचि तया, व्याकुलितानि--व्यथितानि, इन्द्रियाणि-चक्षुरादीनि यस्य त तथोक, शोकस तप्त-शोकेन-उफविचारहेतुकशुना, सन्तप्त-हिन तगृहस्थित, पति-भारम् , अपश्यत् =अवलोकितवती । इन्दुमनी-महलम प्रवेश करने के बाद रामच द्रजीको शोक और चिन्ताचे व्याकुल देखकर सीताजी सहम गयों और कारती हुई श्रासनसे उठ खड़ी हो गयीं। ता दृष्ट्वा स हि धर्मात्मा न शशाक मनोगतम् । तं शोक राधा सोदु ततो विधृतता गत ॥७॥ अन्नय -हि, घमात्मा, स, राघव , ता, दृष्ट्वा, मनोगत, त, शोक सोदु, न, शशाक, तत , विकृतता, गन । सुघा-हि-यत , धर्मात्मा-धार्मिक, स, राघव राम , ता= सीता, दृष्ट्वा निरीक्षक्ष, मनोगत-चेतसि विद्यमान, त= सीतानयनयुक्त्यभाव मूलकस मावितसीतावियोगजनित, शोकम् = अतस्ताप, मोदु सहनकर्तु, न शशाकन समवनगमनम्- . समर्थो बभूव, तत सोढुमशतादेव हेतो, विवृतता=विवर्णता, गत प्राप्त । इन्दुमती-धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्राणेश्वरी सीताको देखकर अपने मानसिक (प्रिया-वियोग जनित ) शोकोदेगको नहीं रोक सके उनका चेहरा उतर गया। विवर्णघदन दृष्ट्वा त प्रस्विन्नममर्पणम् । श्राह दु.खामिसन्तप्ता किमिदानीमिद प्रभो !॥॥ अन्वय-प्रस्विन्नम् , अमर्षणम् , विवर्णवदन, त, दृष्ट्वा, दु खाऽमिस व सा, (सीता) श्राइ, प्रभो !, इदानीम् , इद, किम् ? सुधा-रामाभिप्रायविज्ञानजनक सौताप्रश्न वर्णयति-विवर्णेति । प्रस्वि न्न = करतलगतराज्यस्यागामित्व स्वकीयवनगमनप्रयासञ्च क्यमेना कथयिष्यामोति शोकजस्वेदम् , अमर्षण =तच्छोकधारणस्य निय तुमक्षम, तराम, दृष्ट्वा प्रव लोक्य, दु खाऽभिसतप्ता= चेष्टालक्षिततद्दु खजनितदु खेनाऽभिसतप्ता (सीता) श्राह =उवाच, हे प्रभो हे स्वामिन् । इदानी = हर्षकाले, इद = वैवोदिक दौ स्थ्य, किं कथम् १ इन्दुमती सीताजीने अत्यन्त शोकाकुन तथा पसीनासे तर रामचन्द्रजीका उतरा हुना फी का चेहराको देख अत्यन्त दु खस तत होकर पूछा-हे प्रभो स्वा मिन् ! यह क्या हुआ ? ( इस तरह स्ववसरपर आप क्यों घबड़ाये, हुए हे.) अद्य बार्हस्पत श्रीमान् युक्त पुष्येण राघर! प्रोच्यते ब्राह्मणे प्रा. केन त्वमसि हर्मना ॥६॥ अन्वेय. हे राघव !, अद्य, श्रीमान् , बाईसत , पुष्येण (युक्त ) (इति) प्राशै ब्राहाणे प्रोच्यते, (तत्) वेन, व दुर्मना , अति । सुधा-है राघव = हे राम !, अद्य-इदानी, श्रीमान् = कर्मारम्भकर्तृणा सकलसमृद्धिप्रापक , बाहस्पत = बृहस्पतिदैवत अस्ति, पुष्येण-पुष्यनक्षत्रेण, युफ अभिषेकयोग्य , ( इति ) प्रा = दुद्धिमद्भि, प्रामाणे =वित्रै प्रोन्यते = कथ्यते, सर्वसा हर्षकालोऽयमित्याशय (तत्) केन = हेतुना, त्व, दुर्मना हर्षे विहायोदोसीनचित्त , असि= भवसि | इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे आर्यपुत्र राघव ! विद्वान् ब्राह्मणलोग (गुरु वशिष्ठ श्रादि ) श्राजका दिन राज्याभिषेकके लिये बहुत अच्छा बता रहे है। क्योंकि आज लग्नमें सर्व समत्तिदायक श्रीमान् बृहस्पतिजी बैठे हैं तथा सर्व . %3D सुधा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । ४७ सिद्धिकर पुष्प नक्षत्रका योग है फिर आप ऐसे चिन्तित क्यों हैं प्रभो । न ते शतशलाकेन जलफेननिभेन च । मावृत वदन वल्गु च्छत्रेणाऽभिविराजते॥१॥ अन्वय-शतशलाकेन, च, जलफेननिभेन, छत्रेण, आवृत्त, वला, ते, वदन, न, अभिविराजते। सुधा-शतशलाकेन-शतमख्याका शलाका यस्मिन् (छत्रे) तेन तथोक्लेन, च तथा, जलफेननिमैन =जले-सलिले य फेन हिण्डीर 'हिएडीरोऽधिकर फेन" इत्यमर । तन्निभेन तत्सदृशेन ( सादृश्य च श्वेतत्वेनेत्यवधेयम् ) छनेण-आतपत्रेण "छत्र स्वातपत्रम्" इत्यमर । यावृतम् आच्छादित, वल्गु- सुदर, ते तव, बदन-मुख, न अभिविराजते =नाभिशोभते अत्र किं कारण मिति वदेति भाव । इन्दुमती-(शशिप्रभव छत्र और उभय पार्शवी चामर ये तीन मुरय राज-चिन्ह है। अत यथाक्रमसे पहले छत्रके वारेमें ही सीताजीने पूछा-हे आर्यपुत्र 1) सौ कमानियोंका बना हुआ तथा जल-फन के समान श्वेत राज छत्र से श्राच्छादित श्रापका सुन्दर मुख विराजमान क्यों नहीं है (आज अापके मस्तकपर तना हुआ राज-छत्र नहीं देखती, इसका क्या कारण है ?)। व्यजनाम्या च मुख्याम्या शतपननिभेक्षणम् । चन्द्रहसप्रकाशाभ्या चीज्यले न तवाननम् ॥ ११॥ अन्वय-चद्रहसप्रकाशाभ्या, मुरयाभ्या, च, व्यजनाम्या, शतपननिमे क्षण, तव, थानन, न, वीज्यते । सुधा-चन्द्रहसप्रकाशाम्या = चन्द्र -शशी, हस -मानसोका , तयो प्रका. शाविव प्रकाशो ययोलान्या तथोकाम्याम् , अतिघवनाम्यामित्यर्थ । मुख्याध्या- प्रधानाम्या चकात्तिमात्रवृचिम्यामित्यथ । व्यजनाभ्या=चामराभ्याम् , शतपन निभेक्षण =शतपन कमल, ('शतात्र कमलमित्यमर ) तनिभे-तरसदृशे, ईसणे-नयने यस्य तत् तथोक्तम् । वर= भवन , अानन-मुख, नम्नहि, वाज्यते- पवनयुक्त क्रियते, प्रनाऽपि हेतु वदेत्याशय । इन्दुमती-(छत्रके पश्चात् चामर वारेमें सीताजीने पूछा-हे नाथ!) क्या कारण है कि आज कमलके सदृश सुदर २ गोसे युक्त प्रापका सुन्दर मुग्वके उभय पार्श्वमें चन्द्रमा और हसदे समान शुभ्र चामर नहीं डोल रहे हैं ।

रामवनगमनम्-- तिहेतु , कृष्णमेघगिरिप्रम - कृष्ण -श्यामवणे यो मेघ -घन', तद्युतो यो गिरि पर्वत , तस्य प्रमैव प्रभा-सादृश्य, यस्य स तयोल । केवित्तु-कृष्य मेधप्रम गिरिप्रभश्चेत्युमयसादृश्यमाहुस्तन, उमयोपमानत्वे वैषम्यापत्ते । एक गुणविशिष्टो हस्ती च =गजोऽपि, अग्रत = सम्मुखात् , प्रयाणे =गमने, (तर) न लक्ष्यते =न दृश्यते तत्वस्य हेतोरिति भाव । इन्दुमतो-(सीताजीने पुन जलूम बारेमें कहा ) है वीर । प्रशस्त गज-चिन्हों से युक्त काले बादलके समान रनवाला तथा पर्वतके समान विधान हाथी आपके प्रयाण ( उत्सव-जलूस ) के आगे क्यों नहीं चलता । न च काञ्चनचित्र ते पश्यामि प्रियदर्शन !। मद्रासन पुरस्कृत्य यातं घीर । पुरस्सरम् ॥ १७॥ अन्धय-हे प्रियदर्शन | वीर । काचनचित्र, ते, मद्रासन, पुरस्कृत्य, पुर स्सर, यात, मच, पश्यामि । सुधा-है प्रियदर्शन-प्रिय-मधुर, दर्शनम्-अवलोक्न, यस्य, तत्सम्बुद्धौ। हे वीर । काञ्चनचित्र-स्वर्णमयचित्रविशिष्ट, तेदव, भद्रासन = मालहेतुमता सनविशेष, पुरस्कृत्य हस्ताने धृत्वा, पुरस्सर = अप्रग, याव=गच्छन्त, न च पश्यामि = नचावलोकयामि, तत्रापि को हेतुरित्याशय । इन्दुमती-(सीताजीने पूछा-) हे प्रियदर्शन वोर ! सोनेका बना हुआ सुन्दर प्रशसित मद्रासन लेकर आगे २ चलने वाले भृत्योंको मैं (श्राज क्यों) नहीं देख रही है। अभिषेको यदा सज्ज किमिदानीमिद तव । अपूर्वो मुखवर्णश्च न प्रहर्पश्च लक्ष्यते ॥ १८ ॥ अन्वय -यदा, तव, अभिषेक , सज , इदानीम् , मुग्ववर्य , च, अपूर्व, (दृश्यते) प्रदर्ष, च, न, लक्ष्यते, इद, किम् ? सुधा-यदा यस्मिन् काले, तव भक्त , अभिषेक स्नान सन्ज =सयोजित इदानान्तस्मिवैतस्मिन् वर्तमानकाले, मुखवर्णश्च-बदनरागध, अपूर्व = कदा प्यननुभूत, (दृश्यते) प्रहर्ष = युवराजपदप्राप्ति नन्यानन्दश्च, न लक्ष्यते दृश्यते, इद - यथावत्प्रसन्नाप्रापण, कि =क्मिथमित्यर्य । इत्यपि त्वरितमेव कारण वदेति भाव । इन्दुमती-(अतमें सीताजीने कहा-हे आर्यपुत्र) जब कि राज्या . न सुधा-इन्दुमती-टीकाद्वयोपेतम् । भिषेकको सभी तैयारिया हो चुकी हैं तब (श्रापको प्रसन्न रहना चाहिये कि तु) श्रापके चेहरेका रङ्ग ऐसा अभूतपूर्व फीका क्यों दिखाई पड़रहा है। युवराजपद- प्राप्ति जन्य प्रानन्दको देखनक दिखलाई नहीं पड़नेका क्या कारण है । इतोव शिलपन्ती ता प्रोवाच रघुनन्दन । सीते! तत्रभवास्तात प्रयाजयति मा वनम् ॥ १४॥ श्रावय - इनौव विनपन्ती, ता, रघुनन्दन , प्रोवाच, हे सोते तत्रभवान् तात , मा, वन प्रवाजयति, सुधा-सीतावच उग्सहरन् पश्नोत्तर दिदापयिषु रामक्रिया वर्णयति इतो वेति । इतीव-अनेन प्रकारेण, विनान्नों दु खेन भाषमाणा, विविध पृच्छन्ती वा, ता% सीता, रघुनन्दन = श्रोगम ,प्रोवाच = प्रोक्तवान् । तद्वचनमेव प्रतिपा- दयति-हेसीते = जनकनदिनि ! तप्रभवान् = पूज्य , “तत्रभवानत्रभवानिति शब्दो वृद्ध प्रयुज्यते पूज्ये" इति हलायुध । तात =पिता, माराम, वन- दण्डकारण्य, प्राजयतिान्तु प्रेरयति । इन्दुमतो-इसप्रकार सीनाजीने दुख भरे वचनों को सुनकर रामचन्द्र जीने कहा-हे सीते । पूज्य पिताजी ( तो) मुझे वन भेज रहे हैं ।। कुले महति सम्भूते ! धमेशे ! धर्मचारिणि ।। श्णु जानकि । येनेद क्रमेणाऽद्यागत मम ॥२०॥ अग्य-हे मइति कुले सभते । हे धर्मश। हे धर्मचारिणि । है जानकि । येन, क्रमेण, इदम् , अध, मम, श्रागत (तत्) शृणु । सुधा-उत्कटाऽप्रियाऽऽर्णनेन प्रियाया अत्यन्तमोदो मा भूदिति भयात चित्तदायार्थ विविधगुणकीर्तनेन सम्बोधयति-कुल इत्यादि । महति प्रशस्ते, कुले-वशे सम्भते समुत्पन्ने हे प्रशस्तकललब्धजने! इत्यर्थ । धर्म-धर्मे जाना- ति या सा धर्मशा तत्सम्बुद्धो । धर्मचारिणिधर्म चरति-अनुतिष्ठति, या सा धर्म चारिणी तत्सम्बुदो । है जानकि - जनसुने । येन क्रमेण हेदना, इदं = प्रवाननम् , अद्य-अस्मिनहनि, मम-रामस्य, श्रागत प्राप्तम् , उपस्थितमित्यर्थ । (तत्) शृणु - प्राकम्य । इन्दुमती-(रामचद्रजी ने कहा-) हे प्रशस्त (राजषि ) कुलमें उत्पन्न धर्म जाननेवाली तथा धर्माचरण करनेवाली जनकनदिनि ! जिस कारणसे मुझे वनवासको प्राशा मिनी है, उसे सुनो-- !

५२ रामवनगमनम्- राज्ञा सत्यप्रतिशेन पिता दशरथेन वै। कैकेय्यै मम माने तु पुरा दत्तो महाररौ ॥ २१ ॥ अन्वय -सत्यप्रतिज्ञेन, राज्ञा, दशरथेन, मम, पित्रा, पुरा, कैकेय्यै, माने, तु, वै, महावरी दत्ती। सुधा-सत्यप्रतिशेन = सत्यप्रतिश्रुतेन, राज्ञा =नरपतिना, दशरथेन त ना मप्रसिद्धन, मम पित्रा-मजनकेन, पुरा=देवासुरसङ्नामकाले, कैरेय्यै एतन्नान कनीयस्यै, मात्रे-जन ये, तु, वै= निश्चयेन, (१) महावरी-वरद्वयमित्यर्थ, दत्तौ अपितो, अत्र वरे महत्त्व त्वनिवार्यत्वमेवेति बोध्यम् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा है सीते ! मेरे वनवासका कारण सुनो-) सत्यप्रतिज्ञ मेरे पिता महाराज दशरपने मेरी माता कोयीको पहले दो वर दिये थे। तयाऽद्य मम सज्जेऽस्मिन्नभिषेके नृपोद्यते । प्रचोदित. स समयो धर्मेण प्रतिनिर्जितः ॥ २२ ॥ अन्वय -मृपोद्यते, मम, अस्मिन् , अभिषेक, सज्जे, (सति) तया, श्रद्य, प्रचोदित (तेन राजा) धर्मेण, प्रतिनिर्जितः । सुधा-नृपोद्यते-नृपेण राशा दशरयेन, उद्यते प्रस्ताविते, मम-रामस्य, अस्मिन्प्रस्तुते, अभिषेके यौवराज्याभिषेचने, सज्जे प्रसक्ते (सति ) तया = लब्धवरया कैकेय्या, अद्य=इदानी, स , समय = "वद्याचित दास्यामीति कृतशपथ इत्यर्थ "समय शपथाचारकालसिद्धान्तसविद ॥ इत्यमर ,। प्रचो दित ="पूर्वदत्त वरस्य देही ति प्रक्र्षेण प्रेरित "आसीत्" (तन राजा) धर्मेण- धर्ममार्गेण, प्रतिनिजित = स्वायत्तीकृत । इन्दुमतो-(रामचन्द्रनीने कहा-हे सीते 1) आज महाराजको मेरा राज्या भिषेक करनेमें उद्यत देख, कैकेयीने समय पाकर धर्मसे (शपथद्वारा अथवा नट खटवाजीसे) महाराजको वशमें कर लिया और वचन बद्ध (जो मागोगी दूगा) (१) पत्र परम्परया चेद ध्यते-पुरा किन दैवानरममामे देवपक्षमाश्रित्य 'राजा दशरथो युध्यमान भासीर । तत्राऽसुरा देवाजेतु दशरथस्योपरि स्वमाया वितेनु । तथाविधं तमवलोक्य कैकेयी स्वयमेव दानवै सह युद्ध्वा त मायां विनाश्य स्वपति रक्षिनवती । तर प्रसनो दशरथस्तस्यै वरदय दत्तवान् । तत्र कैकेयो प्राह-नाय! सम्प्रति वरदयेन प्रायनीय न किञ्चिदपि, अवो न्यासभूतमेव तितु, समाइ देवास्स्विति । समय, 1- -- , सुवा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम् । ५३ महाराजको अग्नी पानी दोनों वरदान (भरतको राज्याभिषेक और मुझ (राम) को चौदह वर्षका वनवास) देनेको कहा । चतुर्दश हि वर्षाणि वस्तव्यं दण्डके मया । पित्रा मे भरतश्चाऽपि योरराज्ये नियोजित ॥ सोऽह स्वामागतो द्रष्टु प्रस्थितो पिजन वनम् ॥ २३ ॥ अन्वय-मया हि, चतुर्दश वाणि, दण्डके, वस्तव्यम् (इति) मे, पित्रा, नियोनित , भरन , च, अपि, यौवराज्ये, नियोजित । (मया चाऽपि स नियोजित) विजन, वन, प्रस्थित , स , श्रह, वा, द्रष्टुम् , आगत , (अस्मि )। सुधा-मया-रामेण, हि, चतुर्दश वर्षाणिचतुरधिकदशहायनानि, दण्ड = दण्डकारण्ये, वस्तव्य = निरसितव्यम् । इति) मे-मह्य, पित्रा = जनकेन, नियोनित = नियुक्तीकृत , भरत = कैश्योमुतवाऽपि, यौवराज्ये- युवरानादे नियोजित प्रतिष्ठापित ( मया चाऽपि स नियोजित ज्येष्ठाझा विना तस्य तत्प्राप्स्यसम्भवादिनि भाव )। विग्न = जनरहित, विशिष्टजनसहित वा, वन- । महारण्य प्रस्थित , स = स्त्रिारत , श्रह राम , वा-भवती, द्रष्टुम् अवलो कयितु तत्यतस्तु-उपदेष्टुमित्यर्थ । श्रागत = प्राप्त , अस्मीति शेष । इन्दुमती-(गमच द्रजीने कहा-हे सीते ! कैरेयोका इस तरह के बरदान मागने पर-) सत्यप्रतिश पिताजीने ( उन दोनों वरोंके अनुसार ) मुझको चौदह वर्ष तक दण्डकारण्यमें रहना चाहिये ऐसी योजनाकी है और भरतको युपराज पदपर नियोजित किया है । इसलिये हे सीते । पिताकी श्राज्ञा पाकर मैं निर्जन वनमें जानेके लिये प्रस्तुत होकर तुम्हे देखनेके लिये ( तथा उपदेश देने निये ) यहा पाया हूँ। भरतस्य समोपेतु नाऽह कय्य कदाचन ॥ २४ ॥ मयय-तु, भरतस्य, समोपे, कदाचन, श्रह, न, क्थ्य । सुधा-अथ सीताया गृहेऽवस्थितौ भरतादिना सुखप्राप्त्यर्य तजनकबुद्धि- रुपदिश्यते-मरतस्येति । यद्वा-सीताहृदयमागतु बुद्धायुपदेशद्वारा प्रणयकोरमु- पादयनि-भरतस्येति । तुमितु (दे सीते ! यदा त्वत्प्रणामविधानाय सविधे- भरत आगमिष्यति तदा भरतस्य कैरेयीसुतस्य ममानुजस्य, समीपे-सनियो, कदाचन-कथमकि, (बया ) अह, न कथ्य -न श्लाघनीय , अथवा प्राप्तैश्वर्य- - -- रामवनगमनम्- . . . खाद्गवित परगुणकीत्तन न सहिष्यत इत्यतो मद्गुणकोत्तन न विधेयमित्याशय । इन्दुमती-(रामच द्रजाने कहा-हे प्रिये । देसना ) कभी भी अब राजा भरत के सामने मेरी प्रशसा मत करना (क्यों कि-)। ऋद्धियुक्ता हि पुरुषा न सहन्ते परस्तवम् । तस्मान्न ते गुणा कथ्या भरतस्याऽनतो मम ॥ २५ ॥ अन्वय-हि, ऋद्धियुत्ता , पुरुषा, परस्तव, न सहते, तस्मात् , ते, मम, गुणा, भरतस्य, अप्रत,न कथ्या । सुधा-मद्गुणकीर्तन सत्सविधे कय न कर्तव्यमित्यत्र हेतुमाह-ऋद्धि युक्ता इति । हि=यत , ऋद्धियुक्ता = प्रासश्वर्या , पुरषा = नरा , परस्तव= स्वातिरिक्त जनस्तुति, न सहन्ते सोढ समर्था न भवन्ति, एव महता स्वभाव एव येन प्रतिपक्षिण उत्कर्ष न सहन्त इत्याशय । तस्मात् = हेतो, ते प्रसिद्धा, मम, गुणा = प्रियवदत्तादय , भरतस्य = कैकेयीसुतस्य, अप्रत =समुखे, न वथ्या =न श्लाघनीया , न वर्थनीया इत्यर्थ । इन्दुमती-(प्रिये ।) ऐश्वयवान् पुरुष दूसरोकी स्तुति-प्रशसा (अधिक बनाई ) सहन नहीं करते (क्यो -"प्रकृति खलु सा महीयस सहते ना यस मु नतिं यया") इसलिये हे प्रिये । अब तुम राजा मरतके सामने मेरा गुणानुवाद मत करना (अर्थात् मरतको अब देवर समझकर छोटा मत मानना प्रत्युत चक्रवर्ती राजा सझर तद्योग्य उसका सत्कार करना )। नापि त्व तेन भर्त्तव्या विशेपेण कदाचन । अनुकूलतया शक्य समीपे तस्य वर्जितम् ॥ २६ ॥ अन्वय:-तेन, स्व, कदाचन, अपि, विशेषेण, न भत्तव्या, (तथा) तस्य, समोपे, अनुकूलतया, वत्तितु, शक्यम् । सुधा-वेन- पूर्वोक्तेन हेतुना, ख - भवती, कदाचन कस्मिन्नपि समये, विशेषेण = सर्वविशिष्टरवेन रूपेण, न भर्चव्या=न भरणीया, ब धुसाधारण्येन भरणीया इत्यर्थ । श्रशनादिभरण लक्ष्मणशत्रुप्तपत्नीम्या विशेषेण नाभिलय णीयमिति भाव । ( तथा ) तस्य = भरतस्य, समीपे-निक्टे, अनुकूलतया अप्रतिकूलतया, वर्तितु =स्थातु, शक्य योग्य त्वयेति शेष । इन्दुमती-(रामचन्द्रमीने कहा-हे सीते!) अगर तुम मेरे कहने मुताविक %3D सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । नहीं रहोगी तो मरत विशेष रूपसेकी भाभी या राज बहू समझकर) तेरा भरण- पोषण नहीं करेगा। तस्मात् हे सोते । भरतके सामने तुमको अनुकूल होकर ही रहना चाहिये(१)( भरतके सामने प्रतिकूल वचन (मेरी प्रशसा ) मत बोलना)। तस्मै दत्त नृपतिना यौवराज्य सनातनम् । स प्रसाद्यस्वया सीते! नृपतिश्च विशेषत ॥ २७ ॥ अन्वय-नृपतिमा तस्मै, सनातन, यौवराज्य, दत्तम, च (तस्माद ) हे सीतेस, नृपति , विशेषत , त्वया, प्रसाद्य । सुधा-तदनुक्लाचरणे हेतुमुपपादयन्नाइ-तस्मै इति । नृपतिना=राशा दशरथेन, तस्मै - भरताय, सनातन- पितॄपारम्पर्यक्रमादागत, यौवराज्य युवराजपद, दत्तम् - तत्पदेऽभिषिक्तमित्यय , च% तस्मात् , हे सौते = जनका स्मजे !, नृपति = राजा, स-भरत , विशेषत -विशेषेण, त्वयाभवत्या, प्रसाद्य = सत्करणीय । इन्दुमतो--( रामचन्द्रजीने कहा-हे सीते। अब इस राज्यको महा- गनी बननेको हैसियत तुममें नहीं रहो क्यों कि-) महाराजने रघुकुल के पापरागत रूपसे भरतको युवराजपद दिया है (कैकयीके कहनेसे श्रावेशमें श्राकर गुडिया सरकार कहीं बनाया है ) श्रत हे सोते ! अब तुम्हारे लिये वह राजा भरत विशेष खुश करने योग्य है (उसके सामने मेरी मशसा तम करना)। अह चापि प्रतिज्ञा त गुगे समनुपालयन् । वनमद्येव यास्यामि स्थिरा भर मनस्विनि । ॥२॥ अन्वय -अहम् , अपि, गुरो, ता पतिशा, च, समनुपालयन् , अद्य, पक, वन, यास्यामि (अत ) हे मनस्विनि (व) स्थिरा भव । सुधा--ग्रहरि, गुरो =पितुर्दशरथस्य, ता=पूर्वप्रतिश्रुता, प्रतिज्ञा कैकेयी प्रनि "तुभ्य वरद्वय दास्यामि" इत्यात्मिका, समनुपालयन् = सम्यतया पालन कुर्वन् , श्रयेव - अस्मिनहन्येव, वन = दण्डकारण्य, यास्यामि = गमिष्यामि (प्रत ) हे मनस्थिनि- दृढमनस्के । (त्व) स्थिरा भव-मद्वियोगहेतुकान वस्थिति न माग्नुहीत्यर्थ । (१) नोट -पाठक यह न समझे कि रामचन्द्रजी इन सक्तियोंस भ्रातृ-स्नेहमें । भविश्वास प्रकट कर रहे हैं। यह राजनीति है। अथवा रामचद्रजी अपनी उद्देश्य-पत्ति के लिये सीताजीको वनमें साथ लेजानेका स्वांग रख रहे है।

रामवनगमनम्- इन्दुमती-(रामचन्द्रजोने कहा- हे सीते ! भरत राजा करार दिया गया और ) मैं मी पिताकी श्राहा-पालन करनेके लिये अाज ही वन जारहा हूँ। श्रत हे मनस्विनि सीते ! तुम स्थिरचित्त होर रहो (घवानो मत)। याते च मयि कल्याणि! वन मुनिनिपेवितम् । प्रतोपवासपरया भवितव्य त्वयाऽनघे ! ॥२६॥ अन्वय' -हे क्रयाणि । मुनिनिषेवित, वन, मयि, याते च, (सति ) हे अनघे । व्रतोपवासपरया, त्वया, भवितव्यम् । सुघा-हे कल्याणि =मङ्गलस्वरूपे , मुनिनिषेवित = तास्विननसेवित, वन= दण्डकारण्य, मयि = रामे, याते च=गते च, (सति) हे अनधे निष्पाप । व्रतम् = एकादश्यादि, उपवाम "उपावृत्तस्य दोषेभ्यो यस्तु वासो गुणे सह । उपवास स विज्ञेय सर्वभोगविवर्जित ॥” इत्युक्तनक्षण , तया च प्रतोरवास परया = व्रतोपवासतत्सरया, त्वया = भवत्या, भवितव्यम् =भाव्यम् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने पुन कहा-) हे अनघे ( पापरहित ) कल्याणि साते । मुनिवेषधारण कर मेरे वन चले जाने के बाद तुम्हे व्रतोपास करना चाहिये (अर्थात् विलासताको त्याग देना चाहिये क्योंकि-"हास्य परगृहे पान स्यजेत् प्रोषित मर्तृका)। कल्यमुत्थाय देवाना करवा पूजा ययाविधि । वन्दितन्यो दशरथ पिता मम जनेश्वर ॥३०॥ अन्वय:-हे साते ! कल्यम् , उत्याय, यथाविधि, देवाना, पूजा, कृत्वा, जनेश्वर मम, पिता, दशरथ , (खया) वन्दितव्य । सुघा-(हे सीते 1 ) कल्य-प्रात काले "प्रप्यूषोऽहर्मुख कल्यम्" इत्य मर । उत्थाय - शय्यातोऽवतीर्य यथाविधिशास्त्रमनतिक्रम्य, देवाना=शिवा- दोना, पूजाम् = अर्चा, कृत्वा सम्माद्य, जनेश्वर = नरेश्वर , मम, पिता- श्रमज्जनको दशरथ , ( वया) वन्दितव्य =प्रणम्य । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-हे सीते 1 मेरे वन चले जाने के बाद) निय प्रात सवेरे उठना और नित्यकर्म करके पहले (अपने वशपूज्य सूयादि)देव ताओंका ययाविधि पूजन करना । तत्पश्चात् मेरे पिता महाराज दशरपजीको वदना करना।

- , सुधा-इन्दुमती-टीकादयोपेतम् । माता च मम कौशल्या वृद्वा सन्तापकशिता। धर्ममेवाप्रत सत्या रयत सम्मानमर्हति ॥ ३१ ॥ अन्वय -सन्नापकर्शिता, मम, वृद्धा, माता, कौशल्या, च, धर्मम् , एव, प्रपत, कृत्वा, खत, मम्मानम्, अर्हति सुधा--सन्तापयर्शितासन्तापेन-महियोगजेन खेदेन, कशिता-भतिरी । हिता, मम, वृद्धा-ज्ञानवयोम्यामधिमा, माता-जननी, कौशल्या, च- अपि, धमम् एव अप्रत वा-धर्ममेव मुख्य फ्ल बुद्धौ कृत्वेत्यर्थ । वत्ता वस- काशात् , सम्मान = सस्कृतिम् , अर्हति = प्रा शक्रोति । यदा- मय्यतिशय प्रेम्णा वन ग तु प्रवृत्ताऽपि पतिशुभषणरूपधर्ममेव अपर कृत्वा वर्तमानेनि मातुविशेषणमित्यवधेयम् । दन्दुमतो-(रामचन्द्रजीने कहा-हे सीते। ) मेरे वियोगसे अति पीडित मेरी वृद्धा माता कौशल्याजी मी धर्मत तुमसे सम्मान पाने योग्य है (पिताजीकी वन्दना करने के पश्चात् इनकी व दना करना भी अपना धर्म समझना) चन्दितव्याश्च ते नित्य या शेषा मम मातर । स्नेहप्रणयसम्भोगे समा हिमम मातर ॥३०॥ मन्यय-या, शेषा, मम, मातर , (ता सवा अपि) तेहित्य, वन्दि- तव्या , च, हि, मम, स्नेहप्रयण सम्भोग , मातर , समा , सुधा-स्वमातुर्व दतादिक विधायान्यासामपि तत्कर्तव्यमित्युपदिशति- चन्दितच्यावेति । या , शेषा = कौशल्यातिरिक्ता , मम, मातर = -कैकेयीप्रभू सयो मम विमाता, (ता सर्वा श्रपि ) ते = त्वया नित्य प्रतिदिन, दिन- च्या = प्रणम्या , चकारात् सम्मानादिकमपि कन्या , हियत , मम, स्नेह- प्रणयसम्भाग - स्नेह -प्रतिप्रीति , प्रणय -अतिसौहार्द, मोग-पानन, ते , माय स्नेहादित्रयमविशेषेण कुन्त अतस्ता (कैकेय्याद्या ) कौशल्यातुल्यतया प्रणम्या इति भाव । इन्दुमतो--(रामचद्रजीने कहा-हे सोवे 1) कौशल्याके अतिरिक्त ( कैकेयी, सुमित्रा ) जो मेरी विमात्रायें है उनका भी नित्यसत्कार करना क्योंकि उन्होंने भी सस्नेह सुहावसे मेरा सम्भोग (पालन-पोषण) किया है मत एव मुझमें उनकी प्रीति और सौहार्द वैसा ही है जैसा माता कौशल्याका है। समाल्या.

रामवनगमनम्- भ्रातपुत्रसमौ चापि द्रष्टव्यौ व विशेषन । स्वया भरतशत्रुघ्नौ प्राण प्रियतरौ मम ॥ ३३ ॥ अन्वय -खया, घ, मम, प्राणे , अपि, प्रियतरौ, भरतशत्रनौ, च, विशे घत , भ्रातृपुत्रसमो, द्रष्टव्यौ। सुधा-सया भवत्या, च, मम, प्राणै प्राणेभ्योऽपि, प्रियतरौ-अत्यन्त प्रियौ, मरतशत्रुघ्नौ-तन्नामानुजौ, च, विशेषतः स विशिष्टत्वेन रूपेण, भ्रातृपु असमौ भ्राता पुत्रेण च तुल्यो, स्वत्तो ज्येष्ठो भरतोऽतस्तं भ्रातृवत् , शत्रुघ्नम्भ खत्त कनिष्ठ इति त पुत्रवदित्याशय । द्रष्टव्यो अवलोकनीयौ । इन्दुमती-(रामचदजीने फिर कहा-हे सोते 1 ) अपने प्राणोंसे भी बढ कर प्रिय जो मेरे भाई भरत और शत्रनजो हैं उनको तुम भाई और पुत्रकी तरह समझना अर्थात् भरतजी तुमसे बड़े हैं श्रत उनको भाईकी तरह और शत्रुघ्नजी छोटे हैं श्रत उनको पुत्रवत् मानना । विप्रिय च न कर्त्तव्य भरतस्य कदाचन । स हि राजा च वैदेहि । देशस्य च कुलस्य च ॥ ३४ ॥ अन्वय -हे वैदेहि । कदाचन, भरतस्य, विप्रिय, न च कर्तव्यम् , हि, स च, देशस्य, च, कुलस्य, च, राजा च (अस्ति)। सुधा-हे वैदेहि जनकात्मजे , कदाचन कस्मिनपि समये, भरतस्य, ममानुजस्य, विप्रिय = विरुद्ध, न च कर्तव्य-न च विधातव्य, हिभ्यत , स च- भरत , देशस्य =भारतवर्षस्य, च-पुन , कुलस्य रघुकुलस्य, राजा चपाल कत्वेन राजपहशश्व, (अस्ति ) च इवार्थेऽत्र । इन्दुमती-(अत्तम रामचन्दजीने कहा-) हे वैदेहि (१) सीते । भरतका विरुद्ध आचरण कमी मत करना क्यों कि अब वे समस्त आर्यावर्त के स्वामी हैं तया रघुकुलके भी राजा (नायक ) हैं। आराधिता हि शीलेन प्रयत्नेश्वोपसेरिता । राजान सम्प्रसीदन्ति प्रकुप्यन्ति विपर्यये ॥ ३५ ॥ (१) यहाँ पर वैदेही कदमका तात्मय यह है कि तुम अपने पिता मिथिलेश महाराज जनक्के भरोसे पर मी भरतका विरुद्ध आचरण (मिथिला और अयोध्याको लहानेका षडयन्त्र) मत करना क्योंकि तुम्हारे पिता विदेह ( राजर्षि) हैं वे सत्य प्रनिश महाराज दशरपके विरुद्ध नहीं खडे होंगे प्रत्युत उनके सत्य-पालनका समाचार सुनकर खुध ही होंगे। .

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सुधा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम् ।
मन्वय -हि, गजान , शोलेन, आराधिता, प्रयत्नैश्च, उपसेविता , सप्र.
सीदन्ति, विपर्यये, प्रकुप्यन्ति ।
1. सुधा-सम्प्रति सीतासमीपवविज्नानप्युपदिश नाह-आराधिता इति ।
हि-यत , गजान -नृपतय , शीलेन तदनुकूलस्वस्वभावेन, आराधिता =
। स्वाभिलषितधर्मगलकत्वसिदि प्राप्ता , प्रयत्न =तदपेक्षितसायकव्यापारै , उपसे-
विता तद्व्यापारजनितानन्द प्राता , सम्पतीदन्ति-सम्यकतया प्रसन्ना भवन्ति,
विपयये = शीलाद्यभावे, प्रकुप्यत्ति-कोषयुक्ता भवति। तस्माद्राजप्रसन्नाथ
सुखार्षिभिरनुकूलाचरणेन भाष्यमित्याशय ।
इन्टमती-(रामचन्दजीने कहा-हे सीते ।) कुटिलताको त्यागकर विनम्र
। भावसे सेवा करनेर तथा तत्साधक प्रयत्न पूर्वक उरसेवनसे ही गजालोग प्रस
न्न होते हैं और इसके विपरीत रामे वे बुद्ध होजाते हैं (अत राजा भरतके
प्रतिकन कार्य मत करना)।
मोरसापि पुत्रान् हि त्यजन्त्यहितकारिण ।
ममर्थान् सम्प्रगृह्णन्ति जनानपि नराधिपा ॥ ३६॥
भनय --हि, नराधिपा , अहितकारिण , औरसान , अपि,पुत्रान् ,यजन्ति,
समर्थान् , जनान् श्रिपि, सप्रगृहन्ति ।
सुधा--अथ राजधर्ममुपदिशति-औरसानिति । हियन , नराधिपा -
राजान , अहितकारिण = हित-प्रिय, कुर्वन्ति ये ते हितकारिणस्ते न भवतीति
तथोकान् राजविरुद्धारणानित्यर्थ । औरसान्-अपि "सस्कृताया तु माया स्व
यमुत्पादयेत्तु यम् । तमोरस विजानीयात् पुत्र प्रथमकल्पितम् ॥” इत्युक्तलक्षणा
नामजानपि, पुत्रान् मुतान् , जन्ति = मुश्चन्ति, समथान् = श्रनुकूलकारिण ,
जनान् =सम्बबलेशहोनानकि, सम्प्रगृहन्ति स्वीकुर्वन्ति । तस्माद्राजविप्रिय
क्यमपि नानुष्ठेपमिति भाव ।
इन्दुमती-(रामचद्रजीने कहा-हे सीते 1) राजालोग अनिष्ट करने
वाले औरस (अपनी विवाहिता स्त्रीसे उत्पन्न ) पुत्रोंको भी त्याग देते हैं और
हित करनेवाने अन्य ( सम्बन्धी से भिन्न ) साधारण लगोको अपना लेते हैं
(श्रत राजा मरतका अहित तुम कभी मत करना)।
सा त्य वसेह कल्याणि ! राज्ञ समनुत्तिनी।
भरतस्य रता धर्म सत्यव्रतपरायणा ॥ ३७॥

६० रामवनगमनम्- अन्नय:-हे क्ल्याणि । सत्यवतरायणा, धर्म, रता, भरतस्य, समनुव तिनी, सा, त्वम् , इह, राज , ( समीपे ) वस । सुधा-हे कल्याणि मङ्गलस्वरूपे ! सत्यवत्परायणा अमोषव्रततत्परा, धर्म - स्वाम्याशपालने, रता-तत्परा भरतस्य =ममानुजस्य कैकेयीनन्दनस्य, समनुवत्तिना = अनुकूला, सा, त्वम् , इह-अयोध्याया, राज दशरथस्य (समीपे) वसम्वास कुरु । इन्दुमती-(रामच द्रजीने कहा-इसलिये-) हे कल्याणि! तुम राजा भरतकी अाशाके अनुकून याचरण करती हुई सत्यव्रत परायणा होकर यहीं (अयोध्या राजधानामें ) रहो। मह गमिष्यामि महारन प्रिये ! खया हि वस्तव्यमिहेव भामिनि ! यथा व्यलीक कुरुपे न कस्यचित्तथा त्वया कार्यमिद वचो मम ॥३॥ इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय प्रादिकाव्येऽयोध्याकाण्डे पड्विंश रार्ग । अन्वय-हे प्रिये । अह, महावन, गमिष्यामि, (प्रत ) त्वया, दि. इह, एव, वस्तव्य, हे भामिनि (त्व) यथा, कस्यचित् , व्यलीक, न, कुरुषे, तथा, इद, मम, वच , त्वया, ( सदैव ) कार्यम् । सुधा-ननु त्वद्विनाऽहमप्यत्र न स्थास्यामि किन्तु त्वया सहेव वन गमि यामीत्यत पाह-अहमिति । हे प्रिये-बल्लभे ।, अह, महावन = दण्डकारण , गमिष्यामि अजिष्यामि, वने महत्व त्वद्गमनायोग्यत्वेन । (अत), स्वया भवत्या, हि, इह एव = अयोध्यायामेव, वस्तव्य =निवसितव्यम् । हेत्वन्तरमाह-यथेति । हे भामिनि = सौदर्यवति, (त्व) यथा- येन प्रकारेण, कस्यचित् = मत्पित्रादे, ध्यलीकम् = अप्रिय, न कुरुषे =न विदधासि, तथा तेन प्रकारेण, इद, मम, उक्ति, स्वया = भवत्या (सदेव) कार्य = कर्त्तव्यम् । यद्वा--यया कस्य चिद्मद्वचस व्यलीकम् = अनृतत्व न कुरुषे तयेदमपि मे वचा, कार्यम् = अनु ठेयमित्यर्थ । एवञ्च विद्गमने मस्पित्रादीनामत्यन्तखेदो भविष्यतीति त्वगमन नोधितमित्याशय । इति श्रीवाल्मीकीयरामायणेऽयोध्याकाण्डे "सुधा" टीकाया षड्विंश सर्ग । इन्दुमती-(अन्तमें पुन रामचन्द्रजीने कहा--) हे प्रिये सीते 1 में महावन (दण्डकारण्य) जाता है । तुमको यहीं (अयोध्यामें ही रहना चाहिये । . . घच सुधा-इन्दुमती-टीकाद्धयोपेतम् । हे भामिनि ! तुमको मेरो इस पूर्वोक शिदाको धारण करना चाहिये और किसीका अप्रिय नहीं करना चाहिये। (तभी तुम मेरे परोक्षमे मुग्वसे यहा रह सकोगी)। इस प्रकार इन्दुमतीटीका में अयोध्याएइका २६ वा सर्ग समाप्त हुआ। सप्तविशः मर्गः। पतिव्रता सीता एवमुक्ता तु वैदेही प्रिया प्रियवादिनी। प्रणयादेव सत्रुद्धा भर्तारमिदमत्रवीत् ॥ १॥ मन्वय -प्रिया, प्रियवादिनी, वैदेही, एवम् , उक्ता, तु, भएयात , एव, सकुद्धा, भरिम् , इदम् , अग्रवीत् । सुधा-एव गमकर्तव्य सामायधर्मानुष्ठानमुपराध अथ सीतानुष्ठेय पाति व्रत्यधर्ममुपपादयितु समासेनोपक्षिपति-एपमित्यादि। प्रियाही-अप्रियवादिन्यपि प्रियसभाषणार्हा, प्रियवादिनी-मधुरभापिणी, वैदेही-सीता, एव = "स्वया हि वस्तव्यमिहेव भामिनि" इत्यादिप्रकारेण, उक्ता - अप्रियमभिहिता, तु, प्रणयात्र स्नेहादेव हेतो , न तु वैरात् , सनुदा कय मम भिनवासमादिशतीत्यमर्षवती, भरि = स्वामिनम् , इद = वक्ष्यमाणवत्तनम् , अरवीत् =उकवती। इन्दुमतो-रामचन्द्रजा एव ( तुम अयोध्या भरतकी हितैपिणी बनकर रहो इस्यादि)रूपेण जब प्रिय वचन बोलनेवालो अत एव समीका प्रिय अपनी प्राणेश्वरी सीताजीसे कहा, तब सीताजी प्रणयपूर्वक ( उपरसे क्रोध प्रकट करती हुई नम्रतापूर्वक ) रामजीसे कहने लगी-1 किमिद भापसे राम! वाक्य लधुतया ध्रुवम् । स्वया यदपहास्य मे शुत्वा नरपगेत्तम ! ॥२॥ अन्यय -हे नरवरोत्तम ! राम । त्वया, लघुतया, ध्रुव, यद् , बास्य, झुरवा, मे, बरदास्य, (नद्वाक्य त्व) मापसे, इद, किम् । सुधा--हे नारोनम = नरवरो नरश्रेष्ठस्त माऽप्युत्तम श्रेष्ठ , तरसवृद्धौ है राम ! वया=श्रीमना, भवन समाशादित्यर्थ । लघुतया-मयि तुदत्वालम्ब नेन, ध्रुवम् निमितम् अत्यन्तनि सारमित्यर्थ । यद् , वाक्य-अपन, श्रुत्वा% श्राकण्य, मेमम त्रिया अपि, अपहास्यम् तशयितो हासो भवति (तद्वा क्य त्व) भाषसेन्सपीषि, इद किम् = अथमपूर्व प्रकार इत पूर्व न हचर इति .

रामवनगमनम्- महदाश्चर्यमित्यर्थः । इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे यार्यपुत्र ! राम ! आप कैसी छोटी बाते करते हैं । हे महाराज कुमार । अापने जो कुछ कहा है वह सुनकर मुझे इसी प्रारही है । ( नरश्रेष्ठ चक्रवर्ती महाराज दशरथ पुत्र होकर आपको ऐसी शिक्षा हमें नहीं देनी चाहिये। वीराणा रापुत्राणा शस्त्रास्त्रविदुषा नृप!। मनहमयशस्य च न श्रोतव्य त्वयेरितम् ॥ ३॥ अन्वय-हे नृप । त्वया ( यत् ) इरित (तत्) शस्त्रास्त्रविदुषा, वीराणा, राजपुत्राणाम् , अनर्हम् , अयशस्य, च, (अत ) न, श्रोतव्यम् । सुधा-हे नृप = राजन् , त्वया श्रीमता, ( यत् ) इरित = कथित (तत्) शस्त्रास्त्रविदुषा-शस्त्राणि-लौहनिर्मितग्वडगादीनि, अस्त्राणि श्रायुधानि, विदन्ति ये वे तथोकास्तेषा तथोक्तानाम् "शस्त्रे लोहास्त्रयो बीचम्" "श्रायुध तु प्रहरण शस्त्रमत्रम्" इत्यमर । वीराणाक्षात्रतेज सपनाना राजपुत्राणा=क्षत्रियकुमारा गाम् , अनहम् - अयोग्यम् , अयशस्य च-कीर्तिकरच यशोनिवर्तकमिति तात्यम् । न श्रोतव्य =श्रोतुमयोग्यमित्यथ , मयेति शेष । इन्दुमतो-(सीताजीने व्यगभरे शब्दोमें पुन कहा-) हे राजन् । (१) आपने जो ( मुझे भरतकी खुशामद सीखनेको) कहा है वह शस्त्रास्त्र विद्यामोमें निगा (श्रापके ऐसे) वीर क्षत्रिय योद्धाओंके लिये अयोग्य है (बोलने योग्य नहीं है ) और अकीर्तिकर (कलकास्पद ) है इसलिये मेरे ( राज-कन्या तथा वीर-पत्नी सीताके ) लिये भी सुनने ( मानने ) योग्य नहीं है । आर्यपुत्र ! पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुपा। स्वानि पुण्यानि भुजाना स्व स्व भाग्यमुपासते ॥ ४ ॥ अन्वय. हे आर्यपुत्र ! पिता, माता, भ्राता, पुत्र , तथा, स्नुषा, स्वानि, पुण्यानि, भुजाना, स्व, स्व, भाग्यम् , उपासते । सुधा-मम वाक्यस्य क्य परिहासास्पदवमित्यत आह-आर्यपुत्रेति । हे आर्यपुत्र=महाकुलप्रसून 1 पिताजनक , माता-जननी, भ्राता-सोदर्यादि , पुत्र आत्मज, तथा, स्नुषा-वधू, 'समा स्नुषा जनीवध" इत्यमर । स्वानि=निजानि, पुण्यानि=सुकृतानि, एतच्चोपलक्षणमधर्मस्याऽपि तथाच पुण्या (१) राजन् कहनेका तापय यह है कि मैं भरतको राजा नहीं मानती हूं। . .

. न P . सुघा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । नीत्यस्य कर्मफलानी , भुजाना = अनुभवन्न सन्त , स्व स्व-स्वत्यैव पन्न- प्रद, भाग्य = शुभाशुभ कम, उपामते = उपजीवन्ति, न पुत्रादिकृत तत्र तेषा 7 सहाधिकारामावात् । “भाग्य कर्म शुभाशुभम्" इत्यमर । इन्दुमतो-(सीताजीने पुन कहा--हे प्रायपुत्र प्रापने अयोध्यामें मुके रहनेको भी समुचित नहीं कहा है । अगर श्रापको वनजानेके लिये महाराजकी आशा मिली है तो मुझे भी उनको आज्ञा पालन करना चाहिये क्योकि--) हे आर्यपुत्र ! पिता, माता, भाई, पुत्र और पुत्र वधु ये सब अपने अपने कर्म । पनको भोगते हुए अपने भाग्यके भरोसे रहते हैं । (किन्तु--) भर्नुर्भाग्य तु नाउँका प्राप्नोति पुरपर्षम! । अतश्चैवाहमादिष्टा वने घस्तव्यमित्यपि ॥ ५ ॥ मन्वय, हे पुरुषर्षभ !, एका, नारी, तु, भर्तु , भाग्य, प्राप्नोति, अत , । अहम्, अपि, वने, वस्तव्यम् , इति, आदिश, एव । सुधा--पित्रादय पूर्वोता सर्वेऽपि स्कायकर्मग्लान्यनुभनन्ति भ तुरर्ध- शरीरमा स्त्री तु भर्तृकृतभाग्यफलमेवानुभवतीति दशयति-भत्तुरिति । हे पुरु षर्षभ = पुरुषश्रेष्ठ । एका-केवल नारी = भार्या, तु, भर्तु भाग्य - भत्रनुष्ठितं शुभाशुभ कर्मफल, प्राप्नोतिलभते, (दम्पत्यो सदाधिकागत् ) अत - । भर्तुकृतकमफ्लभोक्त्रीवाखेतो, अहमपि, वने - दण्डकारण्ये, वस्तव्य = निव- सितव्यम् , इति, अादिष्टा = आशमा, एव, तथाच तव वनवासादेशेनैव त्वलि , तभ्या सर्वकर्मणि सहाधिकारन्ममाप्यादेश सिद्ध एवेति भाव । एवञ्च पित्राद्या झापनमन्तरा इमा क्य सह नेष्यामीति सकोचो भरता न विधेय इत्याथय । इन्दुमती-हे पुरुषश्रेष्ठ (मर्यादापुरुषोत्तम)। केवल अर्धाङ्गिनी होने के का. रण स्त्री ही ऐसी होती है जो अपने पति के भाग्यका पल भोगती है। श्रत (श्रा- 'पको आज्ञा मिलनेस) मुझे भी महाराजकी प्राज्ञा वन जानेकी मिल चुका । न पिता नात्मजो नात्मा न माता न सखोजन । इह प्रेत्य च नारीणा पतिरेको गति गदा ॥ ६॥ अन्वय-६ स्वामिन् ! नारीणान , इह प्रेत्य, च पिता, न, गति ,अात्मज न, (गति ) (तया) आत्मा न,(गति ) माता चाऽपिन, (गति) सखीजन , न,(गति) (किन्तु ) सदा. एक , पति (एव ) गति [ 6 सुधा-एव स्वगमने भर्तृसमानभाग्यल हेनुरित्युपपाय, तदेकगति - नात्मज , . , रामवनगमनम्- कत्वमपि स्वगमने हेतुरित्युपपादयति--नेति। हे स्वामिन् ! नारीणा-स्त्रीणाम् इह-अस्मिलोके, प्रेत्य-परलोके च, पिता-जन्मदाता, न गति =नाश्रय तनयोऽपि, न (गति) (तथा) श्रात्मा स्वकीयमाश्यल , न (गति ) माता- जननी ( चाऽति ) म (गति ) ( तया) सखीजन =सहचरीजनथ, न (गति) | (कि तु) सदा = सर्वस्मिन् काले, एक =मुख्य , पति = भर्ता (एव) गति = याधार । "एको गति" रित्यत्र सवनाम्नामुद्देश्यविधेयान्यतरलिमत्वेन पुस्त्वम् । तया च भवता सह ममाऽपि गमन सरचितमेवेति भाव । इन्दुमती-(सीताजीने कहा--) हायपुत्र ! स्त्रीके लिये इस लोकमें क्या ? मरने के बाद परलोकमें भा पतिको छोड़कर पिता, पुत्र, भाई-बन्धु, माता और सखीजन कोई भी काम नहीं पाता । वेवन पति ही उसका आश्रय-स्थान (सद्गतिप्राप्त करानेवाला) है (अत अापरे साथ मेरा वनजाना अनुचित नहीं होगा) यदि त्व प्रस्थितो दुर्ग वनमद्यैव राघव ।। अप्रतस्ते गमिष्यामि मृद्गन्ती कुशकएठकान् ॥ ७॥ अन्वय -हे राघव । यदि, त्वम् , अथैव, दुर्ग, वन, प्रस्थित , (तदा) ते, अप्रत , कुशकएटकान् , मृद्गन्ती, (अहमपि ) गमिष्यामि । सुधा-फलिताथमाह-यदीति । हे राघव =राम । यदि = चेत्, व= श्रयैव =अस्मिनहन्येव, दुर्ग-गहन, वन = दण्डकारण्य, प्रस्थित = गन्तु निर्गत , (तदा) ते तव, अप्रत =सम्मुखात् , कुशकण्टकान-कुशा : दर्भा , कण्टका -तुद्रशत्रव , फुशाश्च कण्टकामेति कुशकण्टकारतान् तथोक्तान् । मृगन्ती = पद्या मयन्ती मृद्र्वन्तीत्यर्थ , (अहमपि ) गमिष्यामि ब्रजि प्यामि । तथा च तवाप्रतो मम गमने कुशकण्टकादिना तव क्लेशो न भविष्यतीति भाव , एतेन गमने स्वविलम्पाभावो व्यजित । इन्दुमतो-(सीताजीने कहा-हे नार्यपुत्र । वनमें श्रापको मैं कष्ट नहीं दूगी, प्रत्युत सुग्व पहुचाऊगी) हे राघव । यदि ग्रान ही श्राप उस दुगम दण्ड कारण्य वामें जा रहे हो तो (चलिये ) मैं आपके प्रागे २ कुश-काटोको पैरोंसे कुचलती हुइ कुश-कण्टकाकीर्ण मार्गको निष्कटक करती हुइ चलूगी । ईर्ष्या रोष वहिष्कृत्य भुक्तशेषमिवोदकम् । नय मा वीर! विश्रब्ध पाप मयि न विद्यते ॥८॥ मन्वय हे वीर ! ईर्ष्या, रोष, भुकशेषम् , उदकम् , इष, बहिष्कृत्य, - भवान्, ६५ सुधा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । विभन्ष (सन् ) मा, नय, ( यत ) पाप, मयि, न, विद्यते । सुधा-हे वीर क्षात्रतेज सम्पन्न ! ईश्या स्त्रिया वनगमनसाहस क्यमि त्यक्षान्निरूग, रोपम् = "अनेर मुखमास्वेति म्योकापि स्वयमनुगमिण्या- मीति वीतीति रोष त, वहिष्कृत्य-त्यक्त्वा नि शेष निरस्ये यर्य । विश्रन्ध - विश्वल नि शङ्क मन् इत्यथ । भुक्तशेष = शास्त्रनिषिद्धतयोत्तमुच्छिष्टम् , उद क= जलमिव, माम् आत्मपत्नी, नय-वन प्रापयेत्यर्थ , (पत) पाप- स्यागप्र. योजक दुष्कृत, मयिनव भार्याया, न विद्यते-नास्ति । वीरेति सम्बोधने नैनामेकाकी कान्तार क्थ नयेयमिति सदेहो न कर्तव्य इति सूचितम् । यद्वा- ईयो रोपन बहिष्कृत्य विश्रन्धो मा नय । ननु भुक्तभोगया त्वया वने किं प्रयो- जनमित्यत पाह-भुक्तशेषमिति । तथाच यथा दुष्प्रापगनीयवनगत्रा पौवशेष कमण्डलुगतमुदकमवश्य नेतव्यमेव, तथाऽइमपि त्वया नेतन्यैवेत्याशय । इन्दुमतो-(सीताजीने पुन कहा-हे नाय ! ) उच्छिष्ट जल की तरह (जैसे मस्थान में सर करने वाना मुसाफिर अग्ने पात्रस्य जनका पान करनेपर उसे - उच्छिष्ट सगझकर फेंक नहीं देता, प्रत्युत सावधानीसे अपने सायमें रखकर चनता है, उसी तरह ) ईर्ष्या और रोगको त्यागकर नि शङ्क होकर अपने सायमें मुझे लेते चनिये । ह वीर ! मेरेमें कोई ऐसा पाप नहीं है ( जो मुझे वन नहीं लेजा नेका कारण हा)। प्रासादाप्रैविमाने; वैहायसगतेन वा। सविस्थागता भर्त पादच्छाया विशिष्यते ॥६॥ अन्य --प्रासागौ वा विमान , वा, वैहायसगतेन, सवावस्थागता, भत्तुं', पादच्छाया, विशिष्यते । सुधा-अत्र प्रासादवास परित्यज्य किमर्य वनवासममिलषसात्यत आह प्रासादारिति । सर्वत्र पञ्चम्यर्थे तृतीया । तथा च प्रासादाने सार्वभौमवासो त्तमप्रासादस्थितिम्य , वा-अथबा, विमान स्वलोकादिस्थितविमानेभ्य , वा वैहायसगतेन= अणिमाद्यष्टैश्वर्यसिद्धिसम्पनोचिताकाशसम्बधिगमनाद्वा, सर्वा वस्थासु-दुरवस्थापन्नावपि प्रायता प्राप्ता, मत्तु' = स्वामिन , पादच्छाया- पादसेवा, विशिष्यते अतिरिच्यते अधिक भवतीत्यर्थ । सकलभर्तृधर्मरहितस्यापि भ: सर्वपरित्यागेन पादसेवनमेव स्त्रीणां समुचितमिति भावः । इन्दुमतो-(सीताजीने कहा-हे नाप । ) राजाप्रोके ऊँची प्रालियों में रा०५० - । पुन, रामवनगमनम्- वास करनेसे तथा स्वर्गके पुषविमानो पर चलनेसे तथा पाठो प्रकारके अपि मादि ऐश्वर्योकी प्राप्तिसे जो सुख मिलता है, उससे कहीं अधिक सुख स्त्रीको पतिकी सेवा करने से प्राप्त होता है। अनुशिष्टास्मि मात्रा च पिशाच विविधाश्रयम् । नास्मि सम्प्रति वक्त या वत्तितव्य यथा मया ॥१०॥ अन्वय -यया, मया, वतितव्य (तथा) विविधाश्रय, पित्रा, च, मात्रा च, अनुशिष्टास्मि, (श्रत ) सम्प्रति, न, वक्त-या, अस्मि । सुधा-उरदेशानुसारादपि मयानुगन्तव्यैवेति दर्शयति-मनुशिऐति यया = येन प्रकारेण, मया सीतया, वर्तितव्य-मविषये स्थातव्य, (तथा ) विविधाश्रय == विविधप्रकारम् अनेकदृष्टान्तविशिष्टमित्यर्थ , पित्रा=जनकेन, प- मात्रा-जनन्या च, अनुशिष्टास्मि-उपदिष्टाऽह शिक्षिताहमित्यर्थ अस्मीत्य हमर्थकमव्ययम् । (श्रत ) सम्प्रति इदानों, (भवता) न वक्तव्या अस्मि-पतिसे वाविषये नोपदेष्टच्यास्मि । एवध तव सेवायामेव यथाव तितव्यमित्याशय । इन्दुमती-(सीताजीने पुन कहा-हे नाथ ! पति-सेवाका क्या महत्व है और वह किस विघिसे करनी चाहिये इसको मैं अच्छी तरहसे जानती हूँ क्यों कि-) मेरी माता और पिता राजर्षि मिथिलेश महाराज जनक्ने अनेक प्रकारका दृष्टात दे देकर पति-सेवाको विधि समझा दी है। अत अब इस विषय में मुझे अधिक वतलाने की आवश्यकता नहीं ( मैं आपके साथ वन अवश्य चलूगी)। अह दुगं गमिष्यामि वन पुरुषवजितम् । नानामृगगणाकोणं शार्दूलवृफसेवितम् ॥ ११ ॥ अन्वयः--ग्रह, नानामृगगणाकीर्ण, शाईलकसेवित, दुर्ग, वन, पुरुषवर्जित (पथास्याचथा) गमिष्यामि। सुधा-उपदेशपल प्रतिपादयवि-अहमिति । श्रह, नानामृगगयाकार्य- नानामृगाणा-विविधप्रकारहरिणाना, गणे --समूहै , आकीर्ण-व्याप्त, मूग पथौ कुरङ्गे च । करिनक्षत्रभेदयो" इति विश्व , शालकसेवित =शाईला व्याघ्रा, वृका महामृगा तैः सेवितम्--श्राश्रित "शालदीपिनी न्याभ्रे इति, कोक ईहामृगो वृक" इति चामर | दुर्गगहन, वन-दण्डकारण्य, पुरुषवा जित मृत्यादिरहित ( यथास्यात्तथा, क्रियाविशेषण मिदम् ) श्रह, गमिष्यामि - मजिग्यामि - - - r सुधा-इन्दुमतो टीकाद्वयोपेतम् । इन्दुमतो-(सीनाजीने कहा- हे नाथ !) मैं अवश्य ही मापके साथ वन जाऊँगी, चाहे वह वन नाना प्रकार के चित्र विचित्र वनजे पशुश्रोमे व्याप्त और व्याघ्र एव वृक (हुराड़) आदि भयानक व घातक जन्तुओंसे सेवित तथा पुरुष- वर्जित (निर्जन) अत एव दुर्गम वन क्यों न हो । (इसकी मुझे परवाह नहीं है)। सुस चने निवस्यामि यथैव भवने पितु । अचिन्तयन्ती पोलोकाश्चितयन्तो पतिवतम् ॥ १२॥ मन्चय:-पितु , भवने, यथा, (तथा ) एव, त्रीन् , लोकान् , भचिन्त- यती (केवल ) पतिव्रत, चिन्तपन्ती, (खया सह ) वने, सुखे, निवरस्यामि । सुधा-वया सह वनवासे क्लेखलेशयहाऽपि नेत्याह--सुखमिति । पितु = जनकस्य, भवने रहे, यपा=येन प्रकारे ए, ( सुवपूर्वक तिष्ठामि ' तथा )एव, नीन् लोकान् त्रैलोक्याविषयमरि, अचि तयनी =अगणयन्तो, 'पतित्रत अतिविषयक व्रत पनि मेवालार्ममित्यर्थ । दिपायन्ती (बया सह) वने-दण्डकारण्ये, सुख-सुवपूर्वक (यथास्यात्तया) निवस्यामि-स्याप्यामि । इन्दुमती-(सीताजीने कहा--हे स्वामिन् । ) में जैसे अपने पिता घरमें सुखमे रहनी यो वैसे हा वनमें बडो खुशीसे रहूँगी। (हे नाथ ! ) वनमें मुझे केवल पति-सेवाकी ही चिन्ता रहेगी। पति-मेवाके सामने मैं तीनों लोकों के मुख-प्राप्तिको तुच्छ समझती हूँ । पनमें उस मुखकी करना भी नहीं करूगी । शुश्रूषमाणा ते नित्य नियता ब्रह्मचारिणो। सह रस्ये वया घोर ! बनेषु मधुगन्धिपु॥ १३ ॥ अन्यय -हे वीर, मधुराधिधु, वनेषु नित्य, (वा) शुश्रूषमाणा, नियता, ब्रह्मचारिणी, (सती) त्वया, सह रस्थे । सुधा-हे वीर = दानेन सम्पन्न 1, मधुगन्धिषु = पुमरससुरभि "मधु मद्य मधु क्षौद्र मधु पुभरम विदु" इत्यनेकार्थ । वने - अरण्येधु, नित्यप्रति । दिन,(स्वा)शुषमाणा सेवमाना, रियतामयदुरदिष्टनियमयुक्ता, ब्रह्मचारिणी नियतेन्द्रिया काममोगारिवर्वित्वर्थ, (सती) वया = मवता, सह साक, रस्ये - विहरिष्ये, अपूर्वदर्शनसतुष्टा भविष्यामीत्यर्थ । अनेन वनगमनविषयक उत्साहो दर्शित । इन्दुमतो-(सीताजीने कहा-) हे वीर क्षत्रिय कुमार ! मैं वनमें स्थादेशानुसार प्रति-दिन नियमपूर्वक विषय-वाणाम्रोसे निरत होकर - - ६. रामवनगमनम्- उन मधुर गधयुक्त दण्डकारण्य आदि महावनोंमें विचरूगी । त्व हि कर्तु वने शक्तो राम ! सम्परिपालनम् । अन्यस्यापि जनस्येह किं पुनमम मानद ! ॥ १४ ॥ श्रन्यय-हे गम | हि, त्वम् , इह वने, (यदि) अन्यस्य, अपि, जनस्य, सपरिपालन, वक्तुं, शत, (तहिं ) हे मानन्द । मम, पुन किम् । सुधा-हे राम = स्वामिन् । हि-यत , व=भवात् , इह-अस्मिन् । वने=महारण्ये ( यदि ) अन्यस्य स्वधर्मरहितस्यापि, जनस्य-जीवसमुदायस्य, सपरिपालन = सरक्षण, कत्तु = विधातु, शक =समर्थ (तहिं ) हे मानद समानद 1, ममतवानुगामिन्या सीताया, पुन किं=ff वक्तव्यम् ' सक लजीवसरक्षणसमर्थस्य तव ममापि सरक्षण स्यादेवेति भाव । इन्दुमती-(सीताजीने कहा- ) हे मानद (मनोरयको सिद्ध करने वाले) । राम ! यहां पर मुझे यह शा ही नहीं होती कि-जब आप वनमें दूसरों भरण-पोषण करने में समर्थ हैं, तब फिर आप मेरी (अपनी पत्नी की ) रक्षा नहीं कर सकेंगे। साह त्वया गमिष्यामि वनमद्य न सशय । नाह शक्या महाभाग । निवर्तयितुमुधता ॥ १५ ॥ अन्वय-सा, अहम् , अद्य, स्वया, (सह) वन, गमिष्यामि, (अत्र) सशय , न, हे महाभाग ! उद्यता, अह, (खया) निवचयितु, न, शक्या । सुधा-ममानुगमननिवत्तिगर्ता भवता न विधेये यवगमय ती ग्राह-सेति । सा, अह = सीता, अद्य-अस्मिनहनि, त्वया भवना, (सह) बन=दण्डकारण्य, गमिष्यामि = प्रजिष्यामि, (त्र) सशय = सदेह ननहि, विषयेऽस्मिन् सदेहस्त्वया न विधेय इत्याशय । हे महाभाग%3D "भारभ्योत्पत्तिमामृत्यो क्लङ्को यस्य नो भवेत् । स्याच्चैवानुपमाकीति स महाभाग उच्यते ।" इत्युक्सनक्षण 1, उद्यता= उद्युक्ता उद्योग कुर्वन्तीत्यर्थ, वन गन्तुमिति शेष' अह ( वया) निवर्तयितु = बच्छक्तिरूपत्वेन न्यायप्राप्तानुगमनस्वाद प्रत्याव तयितु, न शक्यान योग्या । इन्दुमती-(सीताजीने पुन कहा-) हे महाभाग ! मैं अाज अवश्य श्रापके साप बन जाऊँगी। अब कोई भी कारण मेरे यहा रहने का नहीं है, सुधा-इन्दुमती-सीकाइयोपेतम् । 1) भाप मेरी बन याशको रोक नहीं सकते। फतमूलाशना नित्यं मरिष्यामि न सराया। नते दुख करिष्यामिनिवसन्तोत्वया सह। अग्रतस्ते गमिप्यामि मोध्ये मुक्तपति त्वयि ॥ १६ ॥ अन्वय ~नित्य, पललाराना, मविपामि, (अत्र शय , म, (सपा) अप्रत , गमिष्यामि, खनि, मुतवति, मोदये. (एव) सपा, सह, निवस वो, दुख, न, करिष्यामि। सुरा-ननु वदुद्देश्यारानादिप्रपन मम क्लेरा स्वादिस्त श्रार- शमूले यादि । नित्य प्रतिदिन, पनमूलारामा बार्जिवरलमुलमोनना, मो. मि, (अत्र ) सराय सदेह, ननहि, (तथा ) = गमनावेशित तर, मत सम्मुम्वाद , गमिष्यामिम्वनिमामि त्वपि भति, मुहाति वादिनवति ति, मोदये प्रास्यामि, (एव) वया-मवता, सह-माक, निरसन्नीवास बद्धती, तेस्तव, दुखम् - अरानपानाम्यनिरूप,न करिष्यामि - नोसादसि. यामि । यथा राजिम्पत्वात्सया सह सर्वदा निवसन्ती इन्मयकापोर, या वं कस्मिन्न समये दुख न कृतजवी एवमऽपि न करितामोत्याशय । इन्दुमतो-(सीताना ने कहा-मैं बनमें क्या साऊँगी इसकी चिन्ता पार नकर हे नाथ 1) श्रार सशय मत कीनिये प्रत्युत विश्वास करे, पारके साय इनमें श्रापकी तरह हा मैं रहूँगी। आपके मोनन करने के बाद में मौ निय फल-मून दो मोजन करूगी और आपको उसके लिये ) द नहीं देगी। इधाम सरित शैलान् पल्बलानि सरासि च । द्रष्टु सर्वत्र निर्माता त्वया नायेन धीमता ॥ १७ ॥ मन्वय-धीमता, नायन, स्वया (महिला) सरिद , शैनान , पत्रतानि, सरास, च सर्वत्र, निभाता, द्रधुम् , इच्छामि । सुधा-धीमता बुद्धिमता, नायन स्वामिना, खयामाता (महिला) सरित मद्य, शेनान पर्वतान् , पत्तदनि असमराधि, सरावि-महातहागांश्च "भय नशे मरिन् । पालोऽल्लननाराय" इसमर } "मरो नौरत. डागयो" इति कोश । सवत्र = मस्चन, निर्माता-निर्मोका मादित्यय । द्रष्टुम् अवनोचवितुम् , इच्छामि-अभिनगामि । पवनानीलावात् जीवनम् । इन्दुमतो-(माताजीने कहा-मैं प्रारको बनने अपने भरण-पोपया ७० . रामवनगमनम्- कष्ट नहीं दूगी) केवल यही चाहती हूँ कि-हे नाय ! मैं आपके ऐसे बुद्धिमान) प्राणनाथके साथ भय रहित होकर बनमें सर्वत्र धूमती हुई बनके नदियोंको बड़ेर ऊँचे विशाल पर्वतोंको, झीलोंको और महाताङ्गोंको देखू । हसकारण्डवाकीर्णा पद्मिना साधु पुष्पिता । इच्छेय सुखिनो द्रा त्वया वीरेण सगता ॥ १८ ॥ अन्वय - वीरेण, स्वय, संगता, सुखिनी (अह) हसकारण्डवाकोणा , साधु, पुष्पिता , पद्मिनी , द्रष्टुम् , इच्छेयम् । सुधा-वीरेण =क्षात्रतेज सम्पन्नेन, शूरेणेत्यर्थ । बया भवता, समता सयुता, सुखिनी = प्रमोदवती, (अह ) हसका ण्डवाकीर्णा महेसा -मानसौकस , कारएडवा-जलकुक्कुटा हसाथ कारएडवाश्च हसकारण्डवात श्रावी- व्यासा , "हसास्तु श्वेतगरुतश्चक्राङ्गा मानसौकस " इति "मद्गा कारगडव प्लय" इति चामर । साधु-सम्यक् , पुष्पिता = विकसिता, पद्मिनी == कमलिनी , द्रष्टुम् = अवलोकयितुम् , इच्छेयम् = अभिलषेयम् । इन्दुमती-(पुनध सीताजीने कहा- हे नाथ!) में चाहती हूं कि आपके ऐसे वीर क्षत्रिय कुमारके साय सुरखपूर्वक (निर्भीक होकर ) बनके हस तथा काण्डको (जलमुर्गो) से सेवित तथा सुन्दर विकसित क्मलिनियोंसे युक्त वनके सुन्दर तदागोंको देख। अभिषेक करिष्यामि तासु नित्यमनुव्रता । सह त्वया विशालात ! रस्ये परमनन्दिनी ॥ १६ ॥ भन्यय -हे विशालाक्ष ! तासु, नित्यम् , अनुव्रता, (अहम् ) अभिषेक, करिष्यामि, ( तथा ) परमनन्दिनी ( सती ) वया, सह, रस्ये। सुधा हे विशालाक्ष-विद्याले-दीघे, अक्षिणी-लोचने यस्य स विथा- लाक्षस्त सम्मुद्धौ । तासु= पद्मिनीषु, नित्य - प्रतिदिनम् , अनुवता = = ब्रह्मचर्या दिक्तपालनतत्सरा, (अहम् ) अभिषेक = स्नान, करिष्यामि = विधास्यामि, (तथा) परमनदिनी =परमानन्दयुका, (मती ) त्वया =भवता, सह रस्ये = विहरिष्ये, तत्रापूर्वावलोकनेन स तुष्टा भविध्यामीत्यर्थ । इन्दुमती-(सीताजौने कहा-) हे विशालाक्ष | वन के उन ( हस-का रएडवाकीर्ण तथा कमलिनियोंसे सुशोभित ) तड़ागोमें व्रतनियम तर होकर (जल क्रीडाकी भावना त्यागकर ) श्रापके साथ स्नान करूगी और परमानन्दित सुधा-इन्दुमनी-टोकाद्वयोपेतम् । किर वन-विहारका सुख प्राप्त कलगी। एच वर्षसहवाणि शतं वापि त्वया सह । व्यतिकमनस्यामि स्वगोऽपिहिन मे मत.॥२०॥ अन्वय-एव, व्यतिक्रम, वपसहसाण, वा, शवम् , अपि, त्वया, सह, (बसन्ती, ) न, वेरस्यामि, हि, स्वर्गः, श्रपि, मे, न मत । सुधा-एवम् = एतादृशरमणप्रकारेण, व्यतिक्रम-वनवासदु ख वर्ष- महाविसहस्रवर्षपर्यन्त, वा अथवा, शतम् -शतवर्षमपि, स्वयम्भवता, सह, (वसन्ती ) न वेस्यामिन शास्यामि, किन्तु क्षणमिव चतुर्दशवर्षसमय नेप्यामीत्याशय । तत्र हेतु दशयति--स्वर्ग इति । हिपत स्वर्ग = सुम्व- विशेषोऽपि, मे मम सीताया , न मत =नाभिलषित , स्वया विनेति शेष । इन्दुमतो-(सीताजीने कह -) हे नाथ 1 इस प्रकार आपके साथ (वनमें रमण करती हुई चौदह वर्ष को कौन कहे ) सौ या हजार वर्ष भी क्यों न बीत जाय पर वनवासका कष्ट हमें नहीं मालम होगा। हे नाथ! अापके विना मैं स्वर्गसुखकी भी अभिलाषा नहीं करती। स्वर्गेऽपि च विना वासो भविता यदि राव।। स्वया विना नरव्याघ्र नाह तदपि रोचये ॥ २१॥ अन्वय. हे राघरायरिस्वर्ग, पि, त्वया, विना, वास , भविता, (तदा) हे नरव्याघ्र । तदपि वा विना, अह, न, रोचये । सुधा-'स्वर्गोऽपि हि न मे मत इयुक्त तदेव सष्टपति--स्वर्गीति । हे राघव राम ! यदि चेत् , स्वर्गेऽपिम्सुरलोकेऽपि, त्वयाभवता, विना, वास = स्थिति , भविता - सम्भवेदित्यर्थ , (तदा) हे नव्यानरश्रेष्ठ । तदपि तत्सुखमपि, त्वया भवता विना, अहम रोक्ये ग्रह न कामये । यत्र येन प्रकारेगा भवान् स्थास्यति अहमपि तत्र तेन प्रकारेण स्थास्यामि ततोऽधि सुखमकिञ्चित्करमे देत्याराय वियेलेकमपि पदमर्यमम वयायोभयत्रापि योजनीयम्। इन्दुमती--(मीताजीने स्वगरे वारेमें पुन कहा-) हे राघर ! हे नरश्रेध! यदि आपके विना मुझे स्वर्ग में रहना पड़े, तो मुझे वह भी पमन्द नहीं होगा। श्रह गमिष्यामि वन सुदुर्गम, मृगायुत वानरवारणयुतम् । पने निवास्यामि यथा पितुगृहे, तचैव पादायुपगृह्य समता ॥२२॥ अन्वय -( राघब ! ) मृगायुत, वानरबारणे, युत, सुदुर्गम, .

७२ रामवनगमनम्- - अह, गमिष्यामि, (तथा ) यथा, पिता, गृह (तथा ) पादौ, उपग्रह्म, तब समता, एव, वने, निवत्स्यामि। सुधा-थोपसहरति--अहमिति । (हे राघव!) मृगायुत -मृगे- हरिण , श्रा-समन्ताव , युत-युरू वानरबारणे -वानरा -कपय , वारणा- हस्तिन , वानराम वारणाश्वेति वानरवारणा तैस्तथोक्त , युत = सयुतम् , सुदु र्गम कातरगमनान, वनदण्डकारण्यम् , श्रह गमिष्यामि,-अह व्रजिष्यामि, (तथा ) यया-येन प्रकारेण, रितु = जनक्स्य, गृहे-भाने ( सुखपूर्वक मास तया) पादौ = भवञ्चरणौ, उपगृह्य गृहीत्वा, तव समतेव - भवत्समत विषयीभूतव, भवदाशावर्तिन्येवेति यावत् , बने निवरस्यामि = वने वसिम्यामि, अत्र धनपदस्य पुनरुपादानादपरोऽर्योऽपि प्रतीयते । तथाहि-मृगायुत मृगरूपधारि मारीचयुत, वानरवारणे = कपिश्रेष्ठ सुग्रीवादिमि , युत-युक, सुदुर्गम, वनमह गमिष्यामि, तथा तवैव पादावुपगृह्य, समता-सयता, तितुह हव, पने-अशोक वनेऽपि निवत्स्यामि । तथा च वने मारीचमृगप्रसनावयोर्षियोगे "ख मया विना कय स्थातु शफाऽसी" स्पेव न चिन्ननीयमित्यभिप्राय । इन्दुमती-(अन्तमें सीताजीने कहा-ईनाथ ! ) मैं तो श्रापके साथ ही उस महान् दुर्गम दण्डकारण्य वन में चलूगी, जो हरिणों से युक्त और बदरों तथा हाथियोंसे सेवित है । हे नाथ ! जैते में अपने पिता मिथिलेश जनकके घरमें सुखसे रहती थी, उसी प्रकार वनमें प्रारको चरण-सेवा करती हुई सुख पूर्वक रहूँगी। अनन्यभाषामनुरक्तचेतस, वया वियुक्ता मरणाय निश्चिताम् । नयस्व मा साधु कुरुप याचना, न ते मयातो गुरुता भविष्यति२३ मन्वय -अनन्यभावाम् , अनुरक्तचेतस, वया, वियुका, मरणाय निधि- ताम् , मा, नयस्व, मया (ता) याचना, मधु, कुरुम्व, श्रत ,ते, गुरुता, न, भविष्यति। सुधा-अनन्यभावाम् नास्ति, अन्य -त्वदतिरिक्तविषयक , भाव - -स्नेह, यस्या सा ता तयोताम् , अनुरक्तचेत % वद्विषयकपरमानुरागयुक्तचित्ताम् , (अत एव ) त्वया वियुक्तावद्वियोगयुला, स्वव्यतिमालक्ष्य' इति शेष । मर- पाय-प्राणत्यागाय, निश्चिता-कृतनिध्य, मास्वप्राणवल्लमा, नयस्व- प्रापय, वनमिति शेष , मया-सीतया, (इना) याचना मामिका बनानुगमनमा थना, साधु % चरितायो, कुरुप-सपादय, अत = अनुगमनाद, तेस्तव, .

-- सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । ७३ गुरुता भार , (यद्वा) गुरुता-लघुता, न भविष्यति न भविता । अपरार्थोऽपि पथा-अनन्यभावामनुरक्तचेतसगवणगृहीतामपि त्वय्येवासकादया, खया वियुक्ता, (वेण्युप्रथनेन ) मरणाय निभिता, हनुमत्सदेशादिप्रेषणेन-नयस्वेति, याचना=सुरकृतरावणवधप्रार्थना, साधु कुरुष्वेति शेष पूर्ववत् । इन्दुमतो-(सीताजीने कहा--हे नाथ ! ) आपको छोड़कर मैं किसी 'दुसरेको जानती हो नहा, मेरा चित्त सदा अापहीमें अनुरक रहता है। अत हे नाथ ! यदि आपसे विछोह हा ( अपने साथ वन नहीं ले गये) तो निधय ही मरनेके लिये में तैयार हूँ । हे नाथ | मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिये और अपने साथ मुझे भी वन लेते चलिये। मेरे ले जाने से आपको कुछ भी । मार नहीं होगा। तथा मुराणामपि धर्मवत्सला, न च स्म सीता नृवरो निनोपति। उवाच चैना बहु सनिवर्त्तने, पने निवासस्य च दुखिता प्रति ॥२४॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽयोध्याकाण्डे सप्तविंश सर्ग । . मन्चय -धर्मवत्सला, तथा, ब्रुवाणाम् , अपि, सीता, मृवर , न च निनीपतिस्म, च, एना, सनियनने, वने, निवासस्य, दु खिता,प्रति च, बहु, उवाच । सुधा-धर्मवत्सला-धमयुक्तवात्सल्यविशिष्टा, तथा तेन प्रकारेण, ब्रुवा. णाम् अपि = अभिदधानामपि, सीता= जनकनन्दिना, नृवर नरश्रेष्ठ, न च निनीषति स्म-न च नेतुमिच्छति रम, च-तथा, एना-सीता, मनिवसनेचन गमनप्रवृत्तिनिवृत्यर्थे, वने निवासस्य = वनवासस्य, दुखिता-तत्सबन्धिदु ख प्रति च, बहु-अनेकविध ( यथास्यात्तथा क्रियाविशेषण मिदम् ) उवा-उक्तवान् । इति श्रीबाल्मीकीयरामायणेऽयोग्याकाण्डे "सुवा" टीकाया सप्तविंश सर्ग । इन्दुमती-पति-धर्ममे स्नेह रखने वाली सती सीताजी के इसप्रकार प्रार्थना पूर्वक कहने पर भी पुरुषश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी सीताजीको अपने वन लेजानेके लिये राजी नहीं हुए, प्रत्युत सीताजाको वनगमन प्रवृतिको दूर करनेके लिये वनवा सके अनेक कष्टोश वर्णन करने लगे। इस प्रकार इन्दुमती टीकामें अयोध्याकाण्डका सत्ताइसवा सर्ग समाप्त हुआ -- ७४ - रामवनगमनम्- अष्टाविंशः सर्गः पतिव्रता सीता स एव सुवती सौता धर्मशो धर्मवत्सलः । न नेतु कुरुते बुद्धि बने है खानि विन्तयन् ॥ १॥ अन्वय -धमवमल , धर्मश , स, वने, दु खानि, चिन्तयन् , (सन् ) एक, अवती, सीता, नेतु बुद्धि, न कुरुते । सुधा-'वने निवासस्य च दुखितामि" युक्तमेव स्पष्टीकुर्वनाह-स एच. मिति । धर्मवत्सल =धर्मप्रिय , बान्तालेशासहिष्णुरिति वेचित् , धम घमवेत्ता, सराम , बने दुखानि = वनवासदु खानि, चितयन् = विचारयन् (सन् ) एवम् उत्तप्रकारेण, भुवी कथयन्ती, सीतास्वधर्मपत्नौं, नेतु-वन प्रापयितु, बुद्धि-निश्चय, न कुरुते =न विधत्त । इन्दुमतो-(प्रत्यकार महर्षि वाल्मीकिमी कहते हैं कि) एव प्रकारे सीताजीके अनुनय-विनय पूर्वक प्रार्थना करने पर भी धर्म में नह रखने वाले धर्मज्ञ श्रारामच द्रजी वनवे कटोको स्मरण कर सीताजीको वन लेजानेका विचार नहीं करने लगे। सास्यत्वा ततस्ता तु बाप्पपितलोचनाम् । निवर्तनाथै घारमा, वाक्यमेतदुवाच ह ॥ २॥ अन्वय.-तत , तु, धर्मात्मा, वाष्पदूधितलोचना, ar, सान्त्वयित्वा, ह, निवर्तनायें, एतत् , वाक्यम् , उवाच । सुधा-तत तदनन्तर, तु, धर्मात्मा-धर्मशील राम , वापदूषितलोचना- वापेण-अश्रुजलेन, दूषिते-व्याप्ते, लोचने नयने यस्याः सा बाष्पदूषितलोचना ता तयोता ता सीता, सान्त्व यवा-प्रणयरचोभिरावास्य, ६-तत , निवत्तना- निवृत्तिरूपप्रयोजनार्थम् , एतद् वाक्य = वक्ष्यमाणवचनम् , उवाच - उपवान् । इन्दुमती-तत (वन नहीं लेजानेका विचार समझनेस) रोती हुई अपनी प्राणेश्वरी सीताको धर्मारमा श्रीरामचन्द्रजीने पुन समझाया भोर सीताजीको वन नहीं जानेका कारण इस प्रकार कहने लगे-- सोते ! महाकुलोनासि धर्म च निरता सदा । इहाचरस्व धर्म स यथा मे मनसः सुखम् ॥ ३॥ .

७५ सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । श्रन्त्रय -हे सीते! (ख)महानुलीना, असि, च,सदा, मे, धमें निरता, (असि, क्या मति) यथा, मनस , सुख (स्यात् , तथा ) स्वम्, इह, धर्ममाचरन । सुधा-तद्वाक्यमेवाह-सीते इति । हे सोते जनकात्मजे 1 (स्व ) महा- कुलीना-प्रशस्तवशीया, असि- भवास, च-तथा, मदासबस्मिन् काले, मे-मम, धर्मे = धर्मानुष्ठाने, निरता = तत्परा, (असि, तथा सति) यथा येन प्रकारेण, मनस-चित्तस्य, सुरम् आनद (स्यात् , तपा) त्वम् , इह- अयोध्यायामेव, धर्मम् , अाचरस्व विधास्य । एवञ्च मदाशप्तमरित्रादिसेवो कृते मे मनस सुख स्यादतस्तद्यथा भवेत्तथा त्वया सम्पादनीयमित्याशय । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कश-) हे सोते ! तुम महाकुलीना हो (अर्थात् जगत्प्रसिद्ध महर्षि महाराज मिथिलेश जनककी पुत्री तथा सूर्यवंशी महाराज दशरथकी कुल-वधू हो और सदा धर्म-पालनमें तार हो) श्रत यहा (अन्त पुरमें पर्दोके भीतर ) रहकर ही तुम अपना धर्म-मालन करो जिससे मेरा मन मुसी रहे। सोते ! यथा वा वक्ष्यामि तथा कार्य त्वयाऽचले।। वने दोषा हिवहवो वसतस्तानियोध मे ॥४॥ अन्यय -हे सीते ! वया, यथा, कार्य, तया, वा, वरिम, हि, हे अवले !, वने, वसत , बहव , दीपा , ( सन्नि) तान् , मे, निवोध । सुधा-हे सीवे = जनकात्मजे, त्या भवस्या, यथा -येन प्रकारेय, कार्य कर्तव्य, तथा तेन प्रकारेए, स्वोभवी वच्मि = कथयामि उपदि शामीत्यर्थ । हि-यत, हे अबलेनास्ति बरम्-धात्मवन यस्या सा अपला, तरसम्बुद्धी । वने, वसत =निवसत , वहव =अनेके, दोषा - अापत्तय , (सन्ति) तान् = दोपान् , मेमच , निबोध - नानीहि । एकत्र यतो वन बहुदोषा- न्तमसो मदुक्तमवश्यमेव विधेयमिति भाव । इन्दुमती-( रामचन्द्रजीने कहा-) हे सोते । मैं जेसा कहता हू वैसा ही तुमको करना चाहिये । हे अत्रले ( बलरहिते ! अर्थात् तुम स्त्रो हो) वनवाघमें अनेक प्रकारके षष्ट होते हैं। मैं उन इष्टोको बतलाता हूँ तुम मुनो-। सीते! चिमुच्यतामेषा वनवासाता मति । यहुदो हि कान्तार वनमित्यभिधीयते ॥५॥ .

७६ रामवनगमनम्- - , अन्वय-हे सीते । एषा, वनवासकृता, मति , विमुच्यताम् , हि, वन, बहुदोषम् , का तारम् , इति, श्रमिधीयते । सुधा-हे सौते= जनकात्मजे ! एपा= मत्समीपे बोधिता, वनवासकृता = बनधासनिश्रिता, मति = बुद्धि, विमुच्यता - परित्यज्यताम् , हि-यत , वनम् अरण्य, बहृदोषम् = अहिएटकादिवृत्तित्वादनेकदोपविशिष्टम् , का तार-गहन- खाददुष्प्रवेश "महारण्ये दुगपथे कान्तार पुनपुसकम्" इ यमर । इति एवम् , अभिधीयते-कथ्यते श्रमिशैरिति शेष । इन्दुमती-(रामचद्रजीने कहा-) हे सीते । तुम अपना वन जानेका विचार छोड़दो क्योंकि वनवासमें अनेक तरह के कष्ट होते हैं इसी लिये शास्त्र- कारोने दडकारण्य भादि महापौका नाम 'कान्तार' रखा है (जो वन चोर, काट, व्याघ्र श्रादि उपद्रव युक्त दुर्गम हो उसे 'कान्तार' कहते हैं )। हितया खलु वचो मयैतदभिधीयते । सदा सुख न जानामि दुःखमेव सदा धनम् ॥ ६ ॥ मन्वय -सदा, मुख, वन, न जानामि (किन्तु) सदा, दु खमेव, (जानामि श्रत ) हितबुद्धया, मया, एतद् वच , अभिधीयते । सुधा-सदा = सर्वकाल, सुख- मुखजनक, वनम् अरण्य, न जानामि= न निश्चिनोमि (किंतु ) मदासर्वदा, दु खमेव =प्लेशमेव, खलु =निधयेन, (जानामि, अत) हितबुद्धया-त्वद्विषयकप्रीतिबुद्धधान तु वद्भरणादिशेनेत्यय , मया त्वद्धितकारिणा, एतद्-वनगमननिरोधक, च = वचनम् , अभिधीयते - कथ्यते। इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा है प्रिये ! ) मैं (पुन २) तेरे कल्याण के लिये ही ऐसा कहता हूँ। (तुम विश्वास करो) वनमें कभी किसी प्रकारका मुख नहीं है वस्तुत सदा दुख ही दुख है। गिरिनिर्भरसम्भूना गिरिकन्दवासिनाम् । सिंहाना निनदा दु खा श्रोतु दु खमतो वनम् ॥ ७ ॥ मन्वय -गिरिकन्दवासिना, सिंहाना, गिरिनिझरसम्भूता, निनदा , श्रोतु (यतो) दुखा, अत , वन, दुखम् । सुधा--महावने विद्यमानानि दुखान्येवाह-गिरिनिर्भरेत्यादिना । गिरि- कदरवासिना=गिरिक दरा -पर्वतनिर्दयं , तत्र वासिना-निवसनशीलाना, पर्व.

1 सुधा-इन्दुमती-टीकाद्वयोपेतम् । तकन्दरासु कृतनिलयानामित्यर्थ । सिंहाना-मृगे द्राणा, गिरिनिमरसम्भूता- गिरनिहरा-गिरिनद्य (तस्या निनदैः ) सम्भूता - प्रवृद्धा पवतनदीशब्दव- दिता इत्यर्थ , निनदा शब्दा "शन्दे निनादनिनद" इत्यमर , 1 श्रोतुम् श्रा कर्णयितु (यती ) दु खा-क्लेशदायका , प्रत - अस्माद्धतो, वन-महारण्य, दुस-क्लेशजनकम , अस्तीति शेष । इन्दुमती-(रामन द्रजौने कहा-हे सौदे ! वनमें बडा कष्ट है क्योंकि-) पर्वतोंकी नोटीसे गिरता हुया मरनों की गड़गड़ाहट सुननमे तथा पर्वतोदे गुमा भोमें रहने वाले सिंहोंका भयङ्कर शब्द सुनोमे वडा वध होता है। इसन्निये हे प्रिये । वन बदा कष्टप्रद है। क्रीडमानाश्च विनम्या. मत्ता शून्ये तथा मृगा। हवा समभिवर्तन्ते सीले ! दु खमतो वनम् ॥ ८ ॥ अन्वय-हे सौते । शून्ये, विनधा , (सन्त) श्रीहमाना , तथा, मत्ता', मृगाल, (मनुष्यान् ) दृष्ट्वा, (या) समभिवर्तन्ते, प्रत , वन, दु खम् । सुधा-हे सीते-जनकात्मजे शून्य-निमानुषे प्रदेशे, विरब्धा-विश्वस्ता निश्यतिता इत्यर्थ (सत ) कोदमाना = खेलन्त , तथा, मचा-मदेनाकान्ता, मृगा - हरिणा , अथवा पथव , ( मनुष्यान् ) दृष्ट्वा अवलोक्य, (यत) सम भिन्ते - अपूर्वदर्शनाद्धन्तु सम्मुवमायान्ति, अत = अस्मात् कारणात्, वन-महारण्य, दुख-क्लेशजनकम् , अस्तीति शेष । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने पुन कहा-) हे सोते ! निर्जनवनमें निशक होकर विचरण करनेवाले बदमाश वन पशु (सोगवाले हरनामृग आदि) मनुष्य को देखते ही मारडालने के लिये स मुख दौड़ते हैं अत वन बड़ा कष्टप्रद है। समाहा सरितश्चैव पट्टवत्यस्तु दुस्तरा । मतैरपि गनित्यमतो दुसतर यनम् ॥ ६ ॥ अन्वय सरिल , समाहा , च, पहवत्य , मत्तै , अपि, गजै , (युका) (यत ) दुस्तरा, श्रत अपि, वन, ई, नित्य दु खतरम् , एवं । सुघा-रित नेद्य , समाहा - सनका, 'प्रादोजपही नमस्तु" इत्य- मर , च-तपा, पङ्कक्त्य = बहुकदमयुक्ता , मत्त दानवारिणो कट, गजे: इस्तिमि (युका यत ) दुस्तरा -तरितुमथक्या. प्रत अपि - अस्माद्धेतोरपि, वन-महारण्य, तु, निरय - प्रतिदिन, दुपतर अतिदु खजनकम् । इन्दुमती-( रामवद्जीने कहा-हे माते । और सुनो--) वनकी - .

व्याता, रामवनगमनम्- निदियों में मगर घड़ियाल रहते हैं और नदियों के प्रदेश इतने दल-दल होते है कि नित्य उनको पार करना कठिन है (अर्थात हस कारण्डवाकीर्ण और पद्मिनी सुपुष्पिता होनेपर भी वे नदिया नित्य स्नान करने योग्य नहीं हैं) और बड़े २ मत्त जालौ हायीके लिये भी वे नदिया दुस्तर है । (अथवा बडे बड़े मत्त हायी उस वनमें धूमाकरते हैं )श्रत हे सीते । वन श्रत्य त इष्टप्रद है । लताकण्टकसकोर्णा कृकवाकूपनादिता. । निरपाच सुदु खाश्च मार्गा दुखमतो वनम् ॥ १०॥ अन्वय-( यतस्तन ) लताकण्टकसकीर्ण , ककवाकूपनदिता , निरपा , च, सुदु खा, मार्गा (मन्ति) प्रत , च, वन, दु खम् । सुधा-ननु यत्र गिरिनिझरादयो न सात तेनैव पथा गमिष्यामीत्यत माह- लताकण्टकेत्यादि । ( यतस्तम) लताएट कसकीर्ण =लता-पदाकर्षिय व्रतत्य , कण्टा-पादवेधका , लताच कण्टकावेति लताकपटकास्तै सकीर्ण कृक्वाकूपनादिता = कृषवाश्व -वनकुक्कुटा तै उपनादिता -तन्ना दयुका इत्यर्थ । निरपा =निर्गतजन्ना , च=तया, सुदु या = अतिदु खहेतब , मार्गा =पन्या पन्थान , ( सन्ति ) अवध-अस्मादपि देतो, वनमहारण्य, दुख = क्लेशजनकम् , अस्तीति शेष । इन्दुमती-(रामव द्रजीने पुन कहा-हे सीते । और ) पैरों में लिपट जाने वाली लताओं तथा चूमने वाले काँटोसे वनोके मार्ग वीहह रहते हैं, एवं वनमुर्गोका शब्द होता रहता है तथा मागों में पीनेको जल मी नहीं मिलता। इस तरह वनके मार्ग बडे दु खदायी होते हैं श्रत वन बडाही दुखप्रद है। सुप्यते पर्णशय्यासु स्वय भाग्नासु भूतले । रात्रिपु श्रमसिन्नेन तस्मादु खतर वनम् ॥ ११ ॥ अन्वय -रात्रिषु प्रमखिन्नेन ( वनवासिना जनेन यस्मात् ) भूतले स्वय, भग्नासु, पर्णशय्यातु, सुप्यते, तस्मात् , वन, दु खतरम् । सुधारात्रिषु-निशासु, न वहत्सु, श्रमखिन्नन पलमूलाद्याहरएश्रमले शिवेन ( वनवासिना जनेन यस्मात् ,) भूतने-पृथिव्याम् एव न तु पर्यवे, स्वय = जीर्णतया स्वयमेव, भग्नासु = पतितासु, पर्णशय्यासु- पर्णमयतल्पेघु न तु मृदुत्लास्तरणेवित्यर्थ , मुप्यते शय्यते, एवश्च तवापि स श्रमस्तदेव शयन- चऽपि स्यादित्याशय । तस्मात् हेतो, वन-महारएय, दुखतरम् - अत्यन्त- क्लेशदायकम् , अस्तीति शेष । , 14 1 . . सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । ७४ इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा--हे सीते। इस तरह के दुर्गम मार्गको पार करनेक वाद-) रातमें थके हुए वनवासियों को जमीनमें अपने पाप सूख कर गिरी हुई पत्तियों विछाकर उनपर सोना पड़ता है । अत वनवडा कष्ट-प्रद है। अहोरात्र च सन्तोष कतै यो नियतात्मना। फले वृक्षारपतिते. सोते ! दुःखमतो पनम् ॥ १२ ॥ अन्वय.-ह सीते । नियतारमना, वृक्षावपतिते , अहोरात्र, च, सतोष , (यत ) कर्तव्य , अन वन, दु खम् । सुधा-हे सीते-जनकात्मजे ! नियतात्मना = यतमनस्का, (वनवासिना जनेन ) वृक्षावपतितः वृत्तेभ्य स्वयमेव पृथिन्या भग्न , अहोरान-साय प्रातब्ध सन्तोष भोजनाति, ( यत ) कर्चव्य = विधेय , अत - अस्मादेतो वन- महारण्य, दुख-दुखजनम्, अस्तीति शेषः। इन्दुमती-(रामचन्द्र जीने कहा ) हे सीते। वनवासियों को सभी अन्य भोज्य पदार्थो की अभिलाषा त्यागकर साय प्रात वृक्षोंसे गिरे हुए फल खाकर ही सतोष करना पड़ता है। अत वन बड़ा कष्टपद है। उपासश्च कर्तव्यो यथापाणेन मैथिलि ।। जटाभारश्च फर्त्तव्यो वर क्लाम्बरधारिणा ॥ १३ ॥ देवताना पितृणा च कर्त्तव्य विधिपूर्वकम् । प्राप्तानामतिधोना च नित्यश प्रतिपूजनम् ॥ १४ ॥ काखिरभिपेक्श्च काले काले च नित्यय । चरता नियमेनेव तस्माद्दु सतर वनम् ॥ १५ ॥ अन्वय -हे मैथिलि 1 वल्क्लाम्बरधारिणा, (जनेन) यथामाणेन, उप- वास , कर्शव्य , च, जटाभारा, च, कर्तव्य , (तया) देवाना, पितृणां, च प्राप्तानाम् , (च) अतियाना, विधिपूर्वक, प्रतिपूजन, च कर्तव्य, काले, काले, च, नियमेन, एव, चरता, नित्यश , त्रि, अभिषेक, च, (यत ) कार्य , तस्मात् , वन, दुखतरम्। सुधा-हे मैथिलि मिथिलेशसुने !, वल्कलामरधारिणा = वृक्षावग्वत्रपरि धायिना (जनेन ) यथाप्राणेन = यथाशक्त्यनुसारेण, उपवास उपोषण भौज- नविरह इति तात्पर्यम्। कर्शव्य = विधेय , च = तथा, जटाभार -जटाया: सटाया , भार -धारण च कर्त्तव्य , सस्काराभावामटाभारविधानम् । (तया) - o रामवनगमनम- । देवाना-विरवादीना, पितृणा-पितृनोश्वासिता, तथा, प्रासाना- यथास्थाचदागतानाम् , प्रतिधीनाम् अभ्यागताना, विधिपूर्वक ब्रह्मचयविहि तविधिना, प्रतिपूजन - प्रत्यच्चन, च, कर्चव्य : विधेयम् , काले काले चम्पात मध्याहणयाहवित्यर्ष , नियमेन एव यमादिनैव, चरता = समययापन कुर्वता जनाना, नित्यश = प्रतिदिन, त्रि-त्रिवारम् , अभिषेक स्नान, कार्य =art व्यम् । तथा च तमासाधारए दु खमित्याशय । इमन्दुती-( रामचन्द्रजीने कहा- ) हे मौमिलि सोते । वनमें यथा शक्ति उपवास भी करना पडता है (वृक्षोंसे गिरे हुए पल मी समय २ पर नहीं मिलते) तथा नटा धारण करना पड़ता है और वनकी जगह वस्कल (वृक्षकी हाल) पहनना पड़ता है । (हे सौते । इसप्रकार मुनिवेष धारण कर ) यहा देवताओं, मितरों, और समय र आये हुए अतिथियों का विधिपूर्वक नित्यपूजन काना पड़ता है तथा सपम-नियमसे रहकर समय बिताते हुए निकाल मान वरना पड़ता है। अत एव वन बहुतही कष्टप्रद है। उपहारश्च वर्तव्य कुसुमै स्वयमाते । भाषण विधिना वेद्या सोते ! दु समतो वनम् ॥ १६ ॥ अन्यय-है मोवे ! ज्या , प्राहवे , कुसुमे , प्राण, विपिना, वेद्याम् उपहार, च, कर्तव्य , अत , वन, दु खम् । सुधा-हे सोते जनकात्मजे ! स्वयम्स्त्वत , थाह पानीलेकुममै पुष्पे प्राण वेदविहिवेन, विधिना-जमेण, उपहार-पूजा, च इतव्य विधेय , अत - अस्मादेतो , वन-वनवास , दुख-दुखननम् , प्रस्ताति शेष । इन्दुमती-(रामच दहीने कहा-) हे सौते । वनमें अपने हापसे पूत तोडकर वेद विहित विधिसे वेदीकी पूजा करनी पड़ती है व वनमें वडा कष्ट है। यथालन्येन कर्तव्य सन्तोपरतेन मैथिलि। यताहारधनवरै सीते 1 दु खमतो वनम् ॥ १७ ॥ मन्वय-हे मैथिलि | यथालन्धेन, वेन, यताहार, वनचरे, सन्तोष, वर्तव्य , अत , हे सौते 1, वन, दुम्वम् । सुधा-हे मैथिलि-विदेहसुते !, ययालन यथाकाल मातेन, नमन- मूलादिना, यताहार नियमितभोजन , वनचरे - वियतादिभि, कन्य . . . - . सुधा-इन्दुमती-टीकादयोपेतम् । वियेय , अत -अस्माद्धेतो, हे सीते-जनकात्मजे !, वन- महारण्यम् , दुख = क्लेशजनकम् , अस्तीति शेष । इन्दुमती-(गमच दजीने पुन कहा-) हे मैथिलि ! वनवासीको जिस समय जितना जो कुछ भोजन के लिये मिलता है उतने ही से उसे सन्तोष करना पड़ता है । अत हे सोते ! वन बड़ा कष्टप्रद है। मतीर वातस्तिमिर भुना चास्ति नित्यश । भयानि च महान्स्यन्त्र ततो दु खतर वनम् ॥ १८ ॥ अन्वय -अत्र, अतौव, वात , (तथा ) तिमिर, च, (रात्रिषु अतीय, अस्ति) बुभुक्षा, च (अतीव ) अस्ति, नित्यश, महान्ति, भमानि च, (भतीव, सन्ति ) तत, वन, दु खतरम् । सुधा-अमहावने, अतीव वहुल , वात =वायु ,(तपा) तिपरम् अन्ध- कारम (रात्रिषु अतीव अस्ति) बुभुक्षा-जिघत्सा, च, (अतीव) अस्ति-वर्तते, नित्य श-प्रतिदिन, महान्ति-विपुलानि, भयानि-पूर्वोकत्रासाः, (अतीव, सन्ति)तता तस्माद्धेतो , वन =महारण्य, दु खतर-पूर्वोचदु ससमेलनादतिशयेन दुखवत् । इन्दुमती-(पुनश्च रामचन्द्रजीने कहा- ) हे सौते । वनमें वायुका बफा प्रकोप रहता है, जोरोकी भयकर आँधी श्राती रहती है, भयावह घोर अधकार छाजाता है तथा और मी अनेक प्रकारके भयके कारण उपस्थित रहते है एवं वनमें भूख-प्यास भी अधिक लगती है। प्रत वन बड़ा कष्टप्रद है। सरीसृपाश्च बहवो बहुरूपाश्च भामिनि ! | चरन्ति पथि ते दत्ततो दुःखतर वनम् ॥ १४ ॥ अवय -हे भामिनि !, बदव , बहुरूग, ते, सरीसृपा , च, दर्षात् , पयि, चरन्ति ततश्च, वन, दु खतरम् । सुधा-हे भामिनि-विनासवति ।, वहव =अनेके, बहुरूपा -पृथुशरीरा , ते प्रसिद्धा , सरीसृपाश्च = गिरिसश्चि, स्थननिवासिसा वा, दर्षात् "मम घातक कश्चन न विद्यत" इत्यसकारात् , पथि-मार्ग, चरन्ति भ्रमन्ति, तत = तस्मादपि हेतो वनमहारण्य, दु खतरम-अतिशयेन दुःखवत अस्तीति शेष । इन्दुमती-(रामचन्द्रजाने कहा-) हे भामिनि (विलासिनि ) सीते। घनमें अनेक प्रकारके पहाड़ी अजगड आदि भयकर सर्प बड़े दर्पके साथ फुफकार करते हुए घूमा करते हैं । अत वन बड़ा कष्टप्रद है। - ६रा.ग. . .

- - सर्पा भुजङ्गा, रामवनगमनम्- नदीनिलयना सर्पा नदीकुटिलगामिनः । तिष्ठन्त्यावृत्य पन्थानमतो दु खतरं वनम् ॥ २०॥ अन्वय-नदौनिनयना, (अत एव ) नदीकटिलगामिन , सर्पा, पन्या नम् , अाहत्य, तिष्ठन्ति, प्रत , वन, दु खतरम् । सुधा-नदौनिलयनाम्-नदी-सरिदेव, निलयनवासस्थान येषा ते तोता, (भत एव) नदीकुटिलगामिन = नदीवत् कुटिलगमनशीला, पन्यान-मार्गम् , श्रावृत्य परिपृत्य, तिष्ठन्ति उपविशन्ति, अत - अस्माद्धेतो, वन-महारण्य, दु खतरम् -अतिशयेन क्लेशवत् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने पुन कहा-हे सौते 1 ) वनकी नदियों रहने वाले सर्प, जो कि नदीकी ही तरह टेढ़ी-मेढी चालसे चला करते हैं, रास्ता रोककर सामने खड़े हो जाते है । श्रत हे सौते । वन बड़ा कष्टप्रद है । पताका वृश्चिका कोटा दशाश्च मशकै सह । थायन्ते नित्यमवले ! सर्वे दुखमतो वनम् ॥ २१ ॥ अन्वय:- भरले । निस्य, पतला, वृश्चिका, कीटा, मशकै , सह, दशाश्च, पाचन्ते, मत , सर्व, वन, दु खम् । सुधा-है अयले - कातरे !, नित्य - प्रतिदिन, पतझा= शलमादय , वृद्धिका =अलय "मलिगुणौ तु वृश्चिके" इत्यमर । कीटा =कृमय , मशकै = दन्दरके , सह-साघ, दशाव-वनमक्षिकाश्च, बाधन्ते-पीस्यन्ति, मत =अस्मा देतो, सर्व = निखिल, वन = महारण्य, दुख-क्लेशजनकम् । अत्राऽबलेतिपदो पादानेन तनिवारणासामथ्र्य व्यज्यते । इन्दुमती-(रामचद्रजीने कहा-) हे अवले। (भीर ) वनमें पतिंगे, भौरे, कीड़े-मकोड़े, मधुमक्खिया, मच्छर श्रादि नित्य पोडा देते हैं अत हे सीते । वन बड़ा कष्टप्रद है। दुमा कण्टकिनश्चैव कुशा काशाध भामिनि । यने व्याकुलशाखाग्रास्तेन दुःखमतो वनम् ॥ २२ ॥ मन्वय-हे भामिनि !, वने, व्याकुलशाखामा , कण्टकिन , हमा, (सन्ति) च, ते, कुशा, काशाश्च, न (सन्तीति न किन्तु सन्ति ) एव, अत , वन दुखम्। सुधा-हे भामिनि-विलासवति !, वने महाररये, व्याकुलशाखामा .

. सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । व्याकुला -परस्परसकोणेन व्यामा, शाखामा -कन्याग्रा येषा ते तयोका , करटकिन = बहुकण्टकवन्त , द्रुमा =वृक्षा , ( सन्ति ) चम्तया, सेन्प्रसिद्धा , कुण - बहिष , काशाध - इक्षुगन्धाश्च "अयो काशमस्त्रियाम् । इक्षुगन्धा पोटगल " इत्यमर । (इत्युक्ता ) न ( सतीति न किन्तु सन्ति ) एव, अत = अस्माघेतो वन = महारण्य, दुख क्लेशजनकम् । इन्दुमतो-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे भामिनि । चूमने वाले कॉटोसे युक्त तथा विखड़े हुए शाखावाले सघन वृक्षोंसे तथा कुश, काश आदिसे समस्त वन बीहड़ पात रहता है अत हे मामिनि (विनासिनि)! पन बड़ा ही कष्टप्रद है। कायक्लेशाश्च बहवो भयानि विविधानि च । अरण्यवासे वसतो दु खमेव ततो वनम् ॥ २३ ॥ मन्वय -- अरण्यवासे, वमत , घव , कायक्लेशा , च, विविधानि, भयानि, च, (भवति ) तत , वन, दुःखमेव । सुघा-अरण्यवासे काननरूपवासस्थाने, वप्तत =निवसत , बहब भनेके, कायक्लेशा = व्रतोपनासादिटु खानि, च =तथा विविधानि-नानापकाराणि, भयानि = पूर्वोकनासाथ, ( भवन्ति ) तत = तस्माद्धेतो, वनमारण्य, दुख मेव क्लेशजनक्ने । इन्दुमती-(रामचद्रीने सहा-हे विलासिनि 1) इस प्रकार वनमें शारीरिक अनेक क्लेश होते हैं तथा विविध प्रकारके मय उत्पन हुश्रा करते हैं। श्रत हे सौते । धन बड़ा कष्टप्रद है। क्रोधलोभौ विमोकन्यो कर्तव्या तपले मति । न भेतन्य च भेतव्ये दुःख नित्यमतो वनम् ॥ २४ ॥ अन्यय --(वने हि ) क्रोधनोमो, विमोक्तव्यौ, (भवत ) तपसे, मति , काव्या, ( भवति ) च, मैतव्ये, भेतव्य, न ( कर्तव्य, भवति ) अत , नित्य, वन, दुखम् । सुधा-(वने हि ) कोघलोभौ = कोष -किञ्चिदपि बातेऽपराधेऽसहिष्णुत्व, लोम --धनाद्यागमे बहुधा जायमानेऽपि पुन पुनवर्षमानोऽभिनाष , क्रोषश्च लोमधेति तो तयोगी, विमोक्तव्यो - परित्यक्तन्यौ (भवत ) तपसे = तपश्चर्या- या, मति = बुद्धि , करडया = विधेया, (भवति ) चतथा, भेतव्य-भयहे- तुमतोलसर्पादौ तत्सन्निधावित्यर्थ । भेतव्य =मय, न, ( कर्तव्य भवति ) श्रत = ते वन%D रामवनगमनम्- अस्माद्धेतो, नित्य - प्रतिदिन, धन = महारज्य, दुख = क्लेशजनकम् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा- ) हे सौते । (और सुनो) वनमें प्रोष तथा लोभको त्यागकर तपमें मनको लगाना पड़ता है और डरने योग्य वस्तुप्रोसे भी डरना नहीं होता । श्रत वन इटा कष्टप्रद है। तदलं ते वन गत्वा क्षेम नहि वन तव । विमृन्निव पश्यामि बहुदोपकर वनम् ॥ २५ ॥ अन्वय-तत् , ते वन, गत्वा, अल, हि, तव, वन, क्षेम, न, (अस्ति इति अह), विमृशन् , (इहस्थोऽरि ) पश्यामि, इव (श्रत ) बहुदोषकरम् , (इति वौमि) सुधा-उपसहरति-तद्लमित्यादिना । तत् = तस्मात्कारणात् , महारण्य, गत्वावजित्वा, अलव्ययम् , हि =यत , तव = भवत्या, क्षेम कल्याण, न (अस्ति इति श्रह ) विमृशन् = तत्यदोषान् , विचारयन् , (इह- स्थोऽपि ) पश्यामि इव-अवलोक्यामीव, ( श्रत ) बहुदोषकरम् - अनेकापति- जनक, वन =महारण्यम् , (इति ब्रवीमि) इन्दुमती-(अन्तमें रामचन्द्र जीने कहा-हे सीते!) वनमें (उपर्युक्त बहुत ही कष्ट होते है ) प्रत तुम बनजानेको अभिलाषा मत करो। वनमें तुम्हारा कल्याण नहीं होगा। में विचार कर (सीता हरण वृत्तान्त यादकर) देखता हूँ तो मुझे वन बहुत ही कष्ट-प्रद मालुम पडता है । धन तु नेतुन कृता मतिर्थया, बभूव रामेण तदा महात्मना। न तस्य सीता वचन चकार तं ततोऽवनोदाममिदं सुदु खिता॥२६॥ मन्वय-यदा, तु, महात्मना, रामेण, वन, नेतु, मति , न, कृता, बभव, तदा, तस्य, वचन, सीता, न चकार, तत, सुदु खिता, (सती)त, रामम् , इदम्, अब्रवीत् । सुधा-यदा=यस्मिन् काले महात्मना=विद्यालहृदयेन, रामेण = स्वप तिना, वन = महारण्य, नेतु-प्रारयितु, मति निश्चय , न कृता बभूएन विहितेत्यर्थ , सदा-तस्मिन् काले, नस्य-रामस्य, वचन-वनगमननिषेधावाक्य, सौता वैदेही, न चकार=न स्वीचकार, भवतैव न वाच्यमित्यनभिधार तूष्णीमय सस्पावित्यर्य , तद्धने विश्वास कृतवतीत्याशय ! तत =तदनन्तर, सुद खिता:- .

८५ सुधा-इन्दुमतो-टोकादयोपेतम् । स्वगमननिरोधनिश्चयेनातिदु खिता ( सती)त, राम- स्वबस्नभम् , इदमू- उत्तरसगें वक्ष्यमाणवचनम् , अब्रवीत् -अवोचत् । इति श्रीवाल्मीकीयरामायणेऽयोध्याकाण्डे "सुघा" टीकायामष्टाविंश सा । इन्दुमतो--(महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं कि ) इस प्रकार कहकर जम महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीको वन लेजानेका विचार नहीं किया तब सीता जी उनकी कही बातोको (वनगमन निषेधक उपर्युक्त सभी कारणोको)न मान कर अति दुखिनी होकर कहने लगी। इस प्रकार इन्दुमती टीकामें अयोध्याकाण्डका अट्ठाइसौं सर्ग समाप्त हुआ। एकोनविंशः सर्गः। पतिव्रता सीता एनत्तु वचन श्रुत्वा सीता रामस्य दुसिता। प्रसक्ताऽश्रुमुखी मन्दमिदं, यचनमन्वयात् ॥ १॥ अन्वय-तु, एतत् , रामत्य, वचन, श्रुत्वा, दुखिता, (अत एव) अश्रु मुखी, प्रसत्का, सीता, मन्दम् , इद, वचनम् , भवात् । सुधा-अप्रिममन्यसङ्गतिप्रदर्शनायानुपदोक्कमप्यर्थे कथयनाह-एतदिदि । '' इति पादपूर्णार्थक । एतत्-विरहसूचक, रामस्य स्वदल्लभस्य, वचनम् आक्यम्, भ्रुत्वा प्रामे, दुविता क्लेशिता, (श्रत एव ) अश्रुमुखी-नयनबिन्दुयुक्तानना, प्रसक्ता पतिविषियकात्यनुगगयुक्ता, सीता वैदेही, मद-शनै , इद-वक्ष्यमाण, वचन वाक्यम्, अरवीत्-श्रवोचत् । पूर्वतर्गाते "इद"मित्यभिहितेऽपि विशेषण- विशेषकथनार्थमिदपदस्य पुनरिहोगदानम् । इन्दुमती-( महर्षि वाल्मीकिजी कहते हैं-) रामचद्रों के इस प्रकार (वनवासमें बड़ा कष्ट है प्रत तुम यही रहो) वचन सुनकर सीताजी बहुल दुखिनी हुई, उनके नेत्रों में प्रासू उमड़ पाये । वे अपूर्ण मुग्वसे धीरे धीरे विश्य पूर्वक (पुन ) रामचन्द्रजीसे कहने लगों-। ये त्वया कोत्तिता दोषा वने वस्तन्यता प्रति । गुणानित्येव तान्विद्धि तव स्नेहपुरस्कतान् ॥ २॥ अन्वय बने, वस्तव्यता, प्रति त्वया, ये, दोघा, कीत्तिता , तान्, तब, स्नेहपुरस्कृतान , गुणान् , हत्येव, विद्धि । - रामवनगमनम्- - , सुधा-तचनमेव प्रतिपादयति-ये स्वयेति । वने-महारण्ये, वस्तध्यता वास, प्रति, त्वया = भवता, ये-पूर्वोक्ता , दोषा = अापत्तय , कीर्तिता कथिता , तान् = दोषान् , तव स्नेहपुरस्कृतान् = त्वनिष्ठ प्रेमपुरस्कृतान , गुणान् हित- करान् , इत्यैव विद्धि =इत्येव जानीहि । प्रेयसा भवता सह वर्चमानाया मम क्लहसकोक्लिालापचन्दनमलयरवनवदानन्ददायकान् ताजानीहीत्यर्थ । इन्दुमती-(सीताजोने कहा-हे नाथ 1) वनवास के प्रति जिन २ दोषोका उल्लेख आपने किया है उन सभोंको गुण ही जानिये, क्योंकि वे सब अापके स्नेहके सामने मुझे गुणवत् प्रतीत हो रहे हैं । मृगा सिंहा गजाश्चैव शार्दूला सरमास्तथा । चमराः सृमराश्चैव ये चान्ये वनवारिण ॥३॥ अदृष्टपूर्वरूपत्वात्सर्वे ते तव राघव!। रूप हवाऽपसयुस्तव सर्व हि विम्यति ॥ ४॥ अन्वयः-मृगा , सिहा, च, गजा , तथा, शार्दूला , शरभा , चमरा समरा, च, ये च अन्ये एव, वनचारिण, वे, सर्वे, हे राघव 1, अपूर्व रूपत्वात् , तव, रूप, दृष्ट्वा, अपसर्पयु, हि, सर्वे, तव, विभ्यति । सुधा-मृगा हरिणा, सिंहा = मृगेन्द्रा, च- पुन , गजा हस्तिन , एव = अपि, एवकारोऽत्राऽप्यर्थको प्राह्य एवमप्रेऽपि । तथा, शार्दूला व्याघ्रा, शरभा अष्टपादवन्तो मृगविशेषा, चमरा - कृष्णसारमृगविशेषा , सुमरा - गवया , च-पुन , ये च अन्ये एवएतदतिरिका अपि, वनचारिण =वनपर्य टनकारिणो वराहादय , ते, सर्वे - निखिला , हे राघव राम , अष्टपूर्वरूप स्यात् = अहटम्-अनवलोकित, पूर्व-पार , रूपं-स्वरूप ये तेषा भावस्तस्मात अष्टपूर्वपत्वात् , तव -भवत , रूप-स्वरूप, दृष्ट्वा = अवलोक्य, अपसपैयु - अपगच्छेयु , पलायिता भवेयुरित्यर्थ , हि =यत , सर्वे-ले पूर्वोका , तव = स्वत्त , विम्यति - प्रस्यन्ति त्वचो भय प्राप्नुवन्तीत्यर्य । इन्दुमतो-(सीताजीने कहा-) हे राव ! मृग, सिंह, हाथो, व्यान, शरम (श्राम का जन्तुविशेष ), कृष्णसारमृग और समर (नीलगाय) तथा और भी जो वनमें विचरन करने वाले (दु खदायी ) जीव जन्तु है वे सब भी आपके इस अपूर्व रूपको (पहले पहल) देखकर भाग जॉयगे क्यों कि वे सब आपसे (घनुपधारियोसे) डरते हैं । .

सुधा-इन्दुमती-टोकादयोपेतम् । वयाच सह गन्तव्य मया गुरुजनाज्ञया। स्वद्रियोगेन मे राम ! त्यक्तव्यमिह जीवितम् ॥ ५॥ अन्वय -हे राम । गुरुजनाच्या स्वया, सह, मया, चे, (वन) गन्तव्य, पद्धियोगेन इह जीवित सतव्यम् ( भवेत् )। सुधा-है गम-स्वामिन् !, गुरुजनाज्ञया-पित्रोराश्या, त्वया - भवता, सह, मया च-सौतया च तव पल्या, (वन) गन्तव्य प्रबजितन्यम् , जायाप स्योरेकारमकत्वात् स्वनिदेशेनैव ममाऽप्यादेशो जात इत्याशय । यदा-"इय सीता मम सुता छायेवाऽनुगता सदा" इति मपिनाद्याशयोकरीत्याऽपि त्वया सह मया गन्तव्यमित्यर्थ । स्वद्वियोगेन भवद्विहरहेण, इह, जीवितम् जीवन, त्यक्त व्य-परित्याज्यम् , ( भवेत् ) तस्मादयश्य नेतव्यमित्यभिप्रायः । इन्दुमती-(माताजीने कहा-) हे आर्यपुत्र राम ! मुझको पित्ता-माता धादि गुरुजनोंकी श्राशा है कि मुझे आपके साथ चलना चाहिये ( सुख-दुख में बराबर आपके साथ रहना चाहिये)। अत हे नाथ! यदि आप मुझको धन साप नहीं ले चलेंगे तो मुझे श्रापके वियोगमें प्राणोंको त्याग देना पड़ेगा। नदिमा स्वत्समीपस्थामपि शक्नोति राघव !! सुराणमीश्वर शक प्रधर्षयितुमोजसा ॥ ॥ मन्वय-हे राघव । वत्समीपस्या, मा सुराणाम् , ईश्वर , शक, अपि, ओजसा, प्रवर्षयितु, नदि, शक्नोति । सुधा हे राषध राम , स्वत्समीरस्था= भवन्निकटवत्तिनों, मा तव आया, सुराणा- देवानाम् , इश्वर राजा, शक =इद्र , अपि, मोजमा - स्वपराकमेण, अधर्षयितु-पराभवितु, नहि शक्नोति नहि समर्थों भवितुमर्हति। पत्र सुराधिपत्येय दशा तत्रान्येषा का गणनेत्याशय । इन्दुमतो-(सीताजीने कहा-) हे राघव । अापके साथ रहनेपर (वनके जानवरों को कौन कहे) देवताओं के स्वामी इन्द्र मी अपने पराक्रमसे मेरा कुछ विगाव नहीं तक्ता । पति होना तु या नारोन सा शल्यति जीवितुम् । कामवविध राम! त्वया मम निदर्शितम् ॥ ७ ॥ अन्वय-तु, या, नारी, पतिहीना, सा, जीवितु, न, अक्ष्यति, हे गम ।, एवविध, स्वया, मम, काम, निदशितम् ।

7 रामवनगमनम्- सुपा-तु-किन्तु, या, नारी-ली, पतिहीना = पतिवियुकाम, मानारी, जीवितु = प्राणान् धारयित, मनहि, शत्यति = समयों मविष्यति । इत्य कय शातमत प्राह-काममिति । हे राम-राघव , एवविध-पतिहीनाया जीवन मशस्यमित्येवरूप, त्वया = भवता, मम, कामम् = प्रत्यर्थ, निदशितम् उपदि. धम् , एष सति भरताऽनुकूलतया वयेह वस्तव्यमित्युपदेशोऽकिञ्चित्कर इति खया सह यात्याम्येवेत्याशय । यदा-यद्यपि एवविध - उत्तप्रकारेण वनवा सदुख, काम, स्वया, मम, निदर्शित, तथापि, ताहशवने, पतिहीना-स्वामिहीना नारी, न जीवितु शक्ष्यति न तु मादृशी प्रबलमत्तु केति मम गमने न कापि वित्र तिपत्तिरिति भाव । इन्दुमती-(सीताजीने पुन कहा-) हे राम ! श्रापही ने तो मुझे यह उप देश दिया है कि-पतिव्रता नो पतिके विना जीवित नहीं रहसकती (फिर क्या समझ कर मुझे वनजानेको नहीं कहते!)। मथापि च महाप्राश बाह्मणाना मया श्रुतम् । पुरा पितृहे सत्य वस्तव्य किल मे वने ॥८॥ मन्वय -मथ, अपि, हे महाप्राश, पुरा, पितृगृहे, च,मया, ब्राह्मणाना, मे, वने, वस्तव्य, किल, ( इति ) सत्य (वच ) श्रुतम् । सुधा--स्ववनवासस्यावश्यकत्व प्रदशयन्ती आह-अथेति । अप अपि = वनस्य सदोषत्वेऽपि, हे महाप्राश-महाबुद्धिशालिन् ।, पुरा= बाल्यावस्थाया, पितृरहे जनकरहे, च, मया सीतया, ब्राह्मणाना-ब्राह्मणेभ्यो ज्योतिर्विद्भप, मेमया, वने-महारपये, वस्तव्य-निवसनीयम् , किल-निश्चयेन, (इति) सत्य-तथ्य (वच ) श्रुतम् = श्राकर्णितम् , अतोऽवश्यभावित्वान्मम वनवा सस्य न दोषगणनेत्यभिप्राय । इन्दुमती-(सताजीने कहा-) हे महाप्राज्ञ ! और पिताके घर रहते समय पहले (वचपनमें ) ही ज्यौतिषो ब्राह्मणोंसे मैं यह बात सुनी थी कि मुझे वनमें निश्चय ही रहना पड़ेगा (श्राप महाप्राज्ञ (त्रिकालवित् ) है, सायद प्रापभी इस बातको जानते होंगे)। लक्षणिभ्यो द्विजातिभ्यः श्रुत्वाऽह वचन गृहे । धनवासकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल! अन्वय-हे महाबल । अह, लक्षणिम्य , द्विनातिभ्य , (सकाशात) गृहे, .

. सुधा-इन्दुमतो-टोकादयोपेतम् । ह वचन, श्रुत्वा, पनवासकृतोत्साहा, नित्यम् , एव, ( अस्मि )। सुधा-उतमेवार्थ द्रढयति-लक्षणिम्य इति । हे महाबन-अतुलप• राक्रम , अह, लक्षणिभ्य -शुभाशुभमूवलक्षणशातृभ्य , द्विजातिभ्या-विप्रेभ्य , (सकाशाद ) गृहे - पितृभवने, बचन = वनवासबोधकवाक्य, श्रुत्वा आर्य, वनवासकृतोत्साहावाबासजनिताध्यवसाया, "उत्साहोऽध्यवसाय स्थात्" इत्यमर । नित्यम् एव:त प्रामपि, (अस्मि )। इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे महाबनवार वीर राघव । सामुद्रिक शास्त्र जाननेवाले (उन विश्वस्त) दैवज्ञ ब्राह्मणों के मुग्वमे अपने पिता के घरमें ही जब मैंने अपने वनवासकी बात सुनी थी तब ही मे ( उनकी बात सुनकर वचपन से हो, न कि आजसे ) वनजानेका मेरा उत्साह है। भादेशो वनरासस्य प्राप्तव्य स मया किल । मा खया सह भर्नाऽह यास्यामि प्रिय नान्यथा ॥ १० ॥ मन्वय-स , बनवासस्य, यादेश , दिल, मया, प्राप्तव्य , हे प्रिय !, सा अह, मर्मा, क्या, सह, (वन) यास्यामि, अन्यया, न । सुधा-स = ब्राह्मणोक्त , वनवासत्यम्वननिवासस्य, आदेश लादेश, किल = निभयेन, मया-सीतया, प्राप्तव्य भवसायालय বলাবলি खितस्यापरित्याज्यत्वादित्याशय । प्रिय = बल्लम | सा अपवमादिष्टाह, भर्ना स्वामिना, त्वया भवता, सह-साध, (वन ) यास्यामिगमिष्यामि, अयया केवल स्वेच्छया,न यास्यामीत्यर्थ , एतेन ब्राह्मणवचन भवता अन्यथा न विधेयमिति सूचितम् । इन्दुमती--(सीताजीने कहा-)हे प्रिय आर्यपुत्र । वनवासका (वह जम-पत्र लिखित देवशोका कहा) श्रादेश मुझे प्राप्त करना ( भोगना ) पड़ेगा और उस तकदीर में लिखा हुमा वनवासका भोग करने वाली में प्रापके साथ वन चलूगी। इसके विपरीत नही होउक्ता (वह समय श्रागया है, आप मुझे वन नहों लेजा- नेका विफल प्रयत्न मत कीजिये)। छतादेशा भविष्यामि गमिष्यामि त्वया सद्ध । कालचाऽय समुत्पन्ना सत्याग भवतु द्विज ॥ ११ ॥ मन्वय --(हे राघव ! ) कृतादेशा (अह ) भविष्यामि, (अत एव ) स्वया, सह, (वन) गमिष्यामि, अय, कानम, समुत्रन , द्विज , स यशम् , मवतु ।

४० 1 रामवनगमनम्-- सुधा मर्यादापालकत्वेन भवदादेशोऽवश्य भविष्यतीत्यतपाइ कृतादेशेति।) (हे राघव ।) कृतादेशा = कृत -दत्त , आदेश-श्राज्ञा, यस्यै मा तयोका, यद्वा-द्विजकृतफ्लादेशा (श्रह ) भविष्यामि, (अत एव) त्वया भवता, सह- साक, गमिष्यामि यास्यामि, अय कालक्ष वनवासकालथ, समुत्पन्न = सप्राप्त, द्विज, फ्लादेष्टा ब्राह्मण , सत्यवाक्-यथार्थवादी, भवतु =अस्तु | "द्विज' इति जातावेकवचनम् । अत्र द्विजपदेन रावणोऽपि प्राह्य , तेन यच्छ्वेतद्वीपे तेनोळं "लक्ष्मीनिमित्त त्वत्तो मे वधोऽस्त्वि"ति तरसत्य भववियपि गूढ चितमितिभट्टा । इन्दुमती-(सीताजीने कहा-हे प्रिय आर्यपुत्र ) आपके साथ में वन जाऊ गी और कृतादेशा ( जैसा जम-पत्र देखकर दैवज्ञोंने कहा था वैसा-वनवाधिनी) मैं हो बाऊ गी । हे नाथ ! दैवश ब्राह्मण सत्यवादी हों ( उनका कहा भविष्य फल ठोक हो) ऐसा यह समय अब श्रागया है (श्राप मुझे वन नहीं जानेका वचन मत दीजिये । में श्रापसे आशा प्राप्त करके ही रहूगी) वनवासे हि जानामि दुःखानि बहुधा किल । प्राप्यन्ते नियत वीर! पुरुषैरकृतात्मभिः ॥ १२ ॥ अन्वयः--वनवासे, बहुधा, दुखानि ( सन्ति इति ) क्लि, जानामि, हि, (तथापि ) हे वीर | अकृतात्मभि , पुरुष , ( तानि ) नियत, प्राप्यन्ते । सुधा-एव तात्त्विकमर्थमभिघाय सप्रति लोकानुसारेण बोधयन्ती पाह- वनवास इति । ( अत्र हिरेवार्थे किलेति निभये ) वनवासे - अरण्यवासे, बहु धा= नानाविधानि, दु खानि =क्लेशा, (सति इति ) किल-निश्चयेन, जाना. मि हि = अवगच्छाम्येव, (तथापि ) हे वीर = पराक्रमशालिन् !, अकृतात्मभि = अजितेन्द्रिय , पुरुष तरै , (तानि ) नियत = निश्चित, प्राभ्यन्ते लभ्यन्ते, न तु भवा (मा) दृशैर्जनैरिति भाव । अत्र पुरुषप्रकरणाभावेऽपि तदुक्तिस्त्वयाऽपि सा बुद्धिर्वनवास ख दृष्ट्वा न निवर्तनीयेति सूचयितुम् | इन्दुमती-(सीताजीने कहा-हे पोर आर्यपुत्र ! आपने जो पहले कहा कि वनवासमें अमुक २ कष्ट होते हैं वह) में जानती हूँ कि निषय हो वनवासमें बडे बड़े कष्ट होते हैं किन्तु में यह भी निश्रित जानती हूं कि यह कष्ट वे हा पाते हैं जो कायर हैं (न कि अापके ऐसे जितेन्द्रिय वीर पुरुष और न उनके साथ उनकी वीरपत्नी)। - . . सुघा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम् । कन्यया च पितुर्गेहे वनवास श्रुतो मया । भिक्षरया शमवृत्ताया मम मातुरिहाप्रत ॥ १३ ॥ भन्रय -पितु , गेहे, मम, मानु , अप्रत , शमवृत्ताया, मिक्षिण्या , कन्यया, च, मया, वनवास (भावी इति ) श्रुत । सुधा-"सिंहावलोकन"न्यायेन स्वगमने प्रमाणान्तरमपि दर्शयनि- कन्ययेति । (अत्र दकारोऽप्यर्थक' 'इत्यस्याप्रिमश्नोरेऽन्वय ) पितु - मिथिलेशस्य, गेहे-भवने, मम, मातु -जनन्या , अप्रत समक्षत, शमवृत्ताया- ग्रमादिधरनापा , मिक्षिम्पा तापस्या, कल्पया-पुया, मयासीठपा वन- वास = अरण्यवास , ( मावी इति ) श्रुत आकर्षित शमवृत्ताया" इत्यनेन वरकन्योक्तमन्यथा न भवितेति वनितम् । इन्दुमती-(सीताजीने कहा-हे प्रार्यपुत्र ! मेरा वन जाना निक्षत है क्योंकि-) जब मैं वचनमें अपने पिता महाराज मिथिलेशके घरमें रहती थी, तभी मेंने माताके सामने एक बाल ब्रह्मचारिणा साध्वी तस्विनी कन्याके मुखसे भी अपने इस वनवासकी बात सुनी थी। प्रसादितश्च वै पूर्व व मे बहुतिय प्रभो।। गमन वनवासस्य काठि हि सह खया ॥ १४॥ अन्वय ~हे प्रभो !, च, इह, पूर्व, त्व मे, बतिथ, वनवासस्य, गमन, (प्रति ) प्रसादित , व. (श्रत ) हि, स्वया, सह (गमन मे ) काहिक्षतम् । सुधा-पूर्वकान्तिकोदन्त गमने सहायमाह-प्रसादित इति । "इह" इत्य- नुग्दोफरद्यस्यमानेतव्यम् , एवकाराचे वै इनि (हि निमये)। हे प्रभो स्वामिन् । चतया, इह-अस्मिन् गृहे, पूर्व-पूवस्मिन् काले, व-भवान् , मे=मया सौतया, बहुतियम् अनेकवार, वनवासस्य-अरण्यवासत्य, गमन नीलार्य जाह वीवीरतपोवनादिगमन (प्रति) प्रमादितो 2 -प्रापित पव, (अत) हि-निश्चयेन, त्वया मवता, सह-ठाक, (गमन मे) कातितम्-अभिलषितम्, (इति जानीहि) इन्दुमतो-(सीताजाने पुनः कहा- मेरे वन गमनमें भारका प्रस्तुत वन- गमन असाधारण कारण नहीं है, प्रत्युत निमित्त मात्र है । क्योकि-) हे प्रभो। इसके पहले भी कितने दिन वन-विहार करनेके लिये मैं आपसे बनजानेकी प्रार्याना कर चुकी हू । अत हे स्वामिन् । आपके साथ वनजानेकी मेरी अमि लापा (नयी नहीं ) है।

१२ रामवनगमनम्- कृतक्षणाऽह भते गमन प्रति राघव !! वनवासस्य शरस्य मम वार्या हि रोचते ॥ १५ ॥ अन्वय.-हे राघव !, ते, भद्रम् , (अस्तु ) ग्रह, गमन, प्रति, विदणा, (अस्मि ) हि, वनवासस्य, शूरस्य, चर्या, मम, रोचते। सुधा--हे राघव = राम |, ते-तव, मद्र कल्याणम् , (अस्तु) अह, गमन - वनगमन, प्रति, कृतक्षणा जातोत्सवा 'अस्मि" "निांगरस्थितौ । कालविशेषोत्सवयो क्षण " इत्यमर । हि = यत , वनवासस्य वने चासो यस्य तस्य तथोकस्य वननिवासिन इत्यर्थ । शूरस्य - वीरस्य, चर्या-शुश्रूषा, मम रोचते मद्य रोचते । यद्वा-ताशस्य, तव, चर्या-रक्षावधादिसरा, मम रोचते मसबन्धेनैव शोभते सपद्यत इत्यर्थ इति भट्टाः। इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे राघव | श्रापका वनगमन प्रति (से) (विश्वका) कल्याण हो । ह राघव ! मुझे भी यह (जिसके लिये मैं पहले भी प्रार्थना क्सी यी वह) ममय प्राप्त हो गया है, मैं सहर्ष वनजानेको तैयार हूँ। है राव । वन में आपके ऐसे अपो वीर पतिकी सेवा करना मुझे बहुत पसन्द है । शुद्धात्मन् ! प्रेमभावाद्धि भविष्यामि विकल्मषा । भारमनुगच्छती मा हिमम देवतम् ॥ १६ ॥ अन्धय --हे शुद्धात्मन् !, प्रेमभावात् ,हि, भर्तारम् , अनुगच्छन्ती, विक रूमषा, भविष्यामि, हि भत्ता, मम, दैवतम् । सुधा-अत्र "ह" शन्द प्रसिद्धी ज्ञेय । हे शुद्धामन स्वच्छान्त करण !, प्रमभावात् ईध्यादिरहितस्नेहस्वभावात् , हि, भारस्वामिनम् , अनुगन्छ न्ती भनुयान्तो, विकल्मपा-इत्पाग, भविष्यामि, त्वया विनात्र स्थिती हि लोक कल्मष सभावयिष्यतीति भाव । नचाव स्थित्वा कुन देवतामाराभ्य विशुद्धा मवेत्यत्राह-भतेति । दिल्या, भर्ता पति , मम, दैवत देवता वर्तते" इति शेष । इन्दुमतो--(सीताजीने कहा-) हे शुद्धान्त करण प्रभो ! यह निक्षय है कि प्रेमभावसे (पातितधर्मानुकूल श्राचरणसे) प्रारका अनुगमन करती हुई (मुख- दुखमें समान भावसे सेवा करती हुई ) में पाप रहित हो जाऊँगी क्योकि स्वामी हो मेरे (स्त्रोके लिये ) देवता हैं। - सुधा-इन्दुमतो-टोकाद्वयोपेतम् । प्रेत्यभावेऽपि कल्याण संगमो मे सह त्वया ॥ १७॥ अन्नय -(हे शुद्धात्मन् !), प्रेत्यभावेऽपि, त्वया, सह, मे, सगम , कल्याण , (मविष्यति । सुधा-ननु विलक्षणो निरवच्छिनसम्बन्ध विमर्थ प्रार्थ्यत इत्यत श्राइ- प्रेत्येति । (हे शुद्धात्मन ! ) प्रेत्यभावेऽपि-मृत्वा शरीरान्तरपरिग्रहेऽपि, स्वया= भवता, सह, मेम्मम, सगम सयोग , कल्याण =शोभन , दिव्यसुखहेतुरित्यय । इन्दुमतो-(सीताजीने पुन कहा-है प्रमो। यदि इस तरह सच्ची पति- सेवा मैने की तो हसलोकमें ही क्या १) मरने बाद परलोकमें भी श्रापके साथ मेरा पुन सुदर मिलन होगा (क्योंदि-)। श्रुतिहि श्रूयते पुण्या ब्राह्मणानां यशस्विनाम् । इहलोके च पितृभियां स्नो यस्य महामते !। अद्भिर्दशा स्वधर्मेण प्रेत्यभावेऽपि तस्य मा ॥ १८ ॥ मावय --हि, यशस्विना, ब्राह्मणाना, ( मुखात् ) पुण्या, श्रुति , श्रूयते । है महामते ।, यस्य, या, स्त्री, पितृमि , अनि , स्वधर्मेण, दचा, सा, इहलोके, (तस्य सयोग लभते ) तस्य च, प्रेत्यभावे, अपि, ( सयोग लभते)। सुधा-त्यसङ्गमसद्भावे प्रमाणमाह-श्रुतिहित्यादिना । अत्र पितृ- मिरिति बहुवचन पितामहाद्यपेक्षया । चो मिन्नक्रम एवकाराय । हिक यत, यशस्विना-कीत्तिमता ब्राह्मणाना, विप्राणा, ( मुखात्) पुण्या- सुकृतिजनिका, भुति = उतार्थप्रतिपादक श्राग्नाय , यते = आकएयते। ता श्रुतिं पठति-इहेति । हे महामते = मदाबुद्धिशालिन् ।, यस्य पुरुषस्य यस्मै पुरुषायेत्या या स्त्री या कया, पिवृमि = स्तृिपितामहमात्रादिभि , अद्भि - जलै , स्वधर्मेण स्वस्वजातीयक यादानधर्मेण, दत्ता = अर्पिता, साम्री, इहलोके = अस्मिन् ससारे, (तस्य सयोग लभते ) तस्य च तस्यैव, प्रेरयमावे अपि परलोकेऽपि ( सयोग लभते इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे महामते । मेंने यशस्वी ब्राह्मणों के मुखसे यह पवित्र वाणी सुनी है कि-इसलोकमें स्व स्व वर्णधर्मानुक्न विवाह विधिसे हायमें जन लेकर मत्रोच्चारण करके पिता अपनी कन्याका दान जिस पुरुषको देता है मरने के बाद परलोक्में भी वही स्त्री उस पुरुषकी पुन होती है।

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३४
रामवनगमनम्-
एवमस्मात्स्वका नारी सुवृता हि पतिव्रताम् ।
नाभिरोचयसे नेतु त्व मा केनेह हेतुना ॥ १६ ॥
अभय एव, हि, इह, पतिव्रता, सुवृत्ता, स्वका, नारों, मा, लम् ।
• अस्मान , नेतु, केन, हेतुना, न, अभिरोचयसे ( त बद)
सुधा-एवम् पूर्वोक्तश्रुतिरूपप्रवलप्रमाणसद्भावेऽपि, हि, इह = ससारे,
पतियताम् = पतिधर्मपरायणाम , सुवृत्ता-शोभनवृत्तान्तविज्ञापनकी , स्वका
स्वीया, नारी = पत्नी, मा- सीता, स्वम् , अस्मात् = अयोध्यानगरात् , यद्वा-
अद्भिर्दा त् , नेतु = वन प्रापयितु, केन, हेतुनाकारणेन, न अमिरोचयसे-
नेच्छसि ( त वद)।
इन्दुमती-(सीताजीने कहा- ) हे महामते 1 जब ऐसा है (परलोकमें
भी पतिवता स्त्री अपने पतिको नहीं छोड़ती ) तब अपनी सदाचारिणी पतिव्रता
स्त्री मुझ (सीता) को किस कारण आप अपने साथ (वन) लेजाना पद
नहीं करते।
भक्ता पतिव्रता दीना मा समा सुखदु खयोः।
नेतुमर्हसि काकुत्स्थ । समानसुखदुःखिनोम् ॥ २० ॥
अन्त्रय-हे काकुत्स्थ , भक्ता, पतिव्रता दोना, सुखदुःखयो, समा,
समानसुखटु खिनी, मा (वन) नेतुम् , अर्हसि ।
सुधा-है काकुत्स्य-काकुत्स्थवशोद्भव !, भत्तास्त्वत्प्रीत्यनुकूलव्यापार
वती, पतिव्रताम् पतिधमपरायणाम् , दीना दयनीया, सुखदु खयो समा-
प्राप्तयो सुखदु खयोरेकरूा, समानसुखदु खिनौ वत्तुल्यसुखदु खा, मा, (वन)
नेतु-प्रापयितुम् , श्रहसि = शक्नोसि ।
इन्दुमती-(सीताजीने कहा-मुझमें कोई अवगुण नहीं है ) हे नाथ ।
मैं थापमें भक्ति-श्रद्धा रखने वाली दयाका पात्र हूँ, श्रापके मुखसे सुखी एव
अपके दुससे दुखी रहने वाली पतिव्रता स्त्री हूँ तया ( यह भी नहीं है कि मैं
वनका कष्ट वरदास्त नहीं क्रूगी ) मेरे लिये सुख-दुख समान है । अत
हे कारस्थ ! मैं वन लेजाने योग्य हूँ।
यदि मा दुःखितामेव बन नेतु न चेन्छसि ।
विपग्नि जल वाऽहमास्थास्ये मृत्युकारणात् ॥ २१ ॥

सुधा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम् । श्रन्वय --एव, दुःखिता, मा, यदि, वन, नेतु, न, व इच्छुसि, (तदा) मृत्युकारणात्, विषम् , अग्नि, जल, बा, अहम् , आस्थाये। '' सुधा~एवम् अनेन प्रकारेण, दुखिता = पोडिता, माम् = श्रात्मजाया, यदि चेत् , वन - महारण्य, नेतु प्रापयितु न च इच्छसिनचाऽभिलपसि । (तदा) मृत्युकारणात - मृत्युसशदु खहेतो , विष-गरलम् , अग्नि-वहि, 1 जलसनिल पा, अहम् , अास्थास्येतत्तद् भवणादिनिश्चय करिष्ये । विषमक्ष- । यादिजनितपीदया विरहक्लेशाल्पता भवितेत्याशय । इन्दुमती-(अन्तमें सीताजीने कहा-हे नाय ! मुझमें कोई अवगुण नहीं है पिर भी- यदि आप मुझ दखिनी साताको अपने साथ वन नहीं ले चलेंगे तो मुझे मृत्यु के समान क्ट होगा, अत में विष खाकर या अग्निमें जलकर अथवा पानीमें डूबकर प्राय दे दूगी। पव बहुविध त सा याचते गमन प्रति । नानुमेने महाबाहुस्ता नेतु विजन धनम् ॥ २२ ॥ मन्वय -एक, बहुविध, त, गमन प्रति, सा, याचते, (किन्तु) महाबाहु , विजन वन, ता, नेतु न, श्रनुमेने । सुधा--एवम् - उत्तप्रकारेण, बहुविधम् = अनेककार, ३प्राणबल्लम, गमन = वनगमन, प्रति, सा= सीता याचते = प्रार्थयति (कितु ) महाबाहुक श्राजानुबाहु राम , विजन-वधूप्रतिरक्षकजनरहित, वन-महारएय, ता-सीता नेतु प्रापयितु, न अनुमेने उन स्वीचकार । इन्दुमतो--(महर्षि वा मीकिजी कहते है-) इस प्रकार सीताजीने अपने साथ वन लेजानेके निये श्रीरामचन्द्र जीसे बहुत प्राथना की परन्तु श्रीरामचन्द्रजी उनको उस निजन दण्डकारण्य वनमें ले जाने को राजी नहीं हुए (अतएव सीताजीके वचनोका कुछ भी उत्तर नहीं दे सके)। एवमुक्ता तु सा चिन्ता मैथिली समुपागता । स्नापयन्तीव गामुष्णैरवभिनयनच्युते ॥ २३ ॥ अन्वय ~एवम् ,उता, तु, चिन्ता, समुपागता, सा, मैथिली, नयनच्युते , उभ्यो , अभ्रभि , गो, स्नापयन्ती, इव, ( तस्यौ )। सुधा-एवम् = अननुमतिबोधकवाक्यम् उत्ता=अभिहिता, तु, चिता मोसह नेष्यति नदेति सदेह, समुपागता प्रासा, साम्प्रसिखा, मैथिली - मिपि- । रामवनगमनम्- लेशसुता सीता, नयनच्युतै = लोचनस्यन्दितै , उम्णे तसे , अभुमि == जले, गा-भुव, स्नापयन्ती इव-स्नान कारयन्ती इव (तस्यौ)। इन्दुमती-(बाल्मीकिजी पुन कहते हैं-) एव प्रकारेण श्रीरामचन्द्रजीके श्रनभिमत वचन कहनेपर (रामजी को असम्मन देखकर) सीताजी अत्यन्त चिन्तित हुई (सिसक-सिसक कर रोने लगी ) और अपनी आँखोंकी सतप्त अश्रुधारासे पृथिवीको तर करने लगी । विन्तयन्ती तदाता तु निवर्तयितुमात्मवान् । क्रोधाविष्टा तु वैदेही काकुत्स्थो बहसान्त्वयत् ॥ २४ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे बाल्मोकीय धादिकाव्येऽयोध्याकाण्डे एकोनत्रिय सर्ग समाप्त । मन्वय --आत्मवान् , काकुत्स्थ , तदा, क्रोधाविष्टा, चिन्तयन्ती, ना, वैदेही, तु, निवर्चयितु, बहु, मसान्त्वयत् । सुधा-श्रात्मवान्(१)- धैर्यवान् , "श्रारमा जीवे पुतौ देहे स्वभावे पर मात्मनि" इत्यमर | कारस्थ =राव , तदा तस्मिन् काले, क्रोधाविष्ठा- प्रयायकोपयुक्ता, चिन्तयन्ती-सहगमनोपाय विचारयन्तों, ता, वैदेहोजनका (मनो, तु, निवर्तयितु=कोप दूरीक्त्तु वनगमनाय मनः प्रत्यावर्तयितु वा, बहु- अनेकप्रकार ( यथा स्यात्तथा ) असान्त्वयत् = सान्सवचनान्यत्रवोदित्ययं । इति श्री वाल्मीकीयरामायणे अयोध्याकाण्डे "सुधा" टीकायामेकोनत्रिंश सर्ग समाप्त । इन्दुमती -जव रामचन्द्रजीने देखा कि सीताजी बहुत चिनत हो गयी है। तथा मारे कोषके उनके प्रोठ लाल लाल हो गये हैं तब उन्होंने सीताजीको बहुत समझाया, जिससे वे उनके साथ बन न जॉय । इस प्रकार इन्दुमती टीकामे अयोध्याकाण्डका उन्तीसवाँ सग समाप्त हुआ। (१) यञ्चाप्नोति यदादत्ते यच्चाति विषयानिह । यचास्म सततो भावस्तस्मादात्मेति कम्यते ॥

६७ सुधा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम्।। निंशः सर्गः पतिव्रता सीता साव्यमाना तु रामेण मेयिली जनकात्मजा। चनपासानिमित्तार्थ भारमिदमनमीत् ॥ १॥ अन्वय-रामेण, सा त्यमाना,तु, जनकात्मजा, मैथिली, वनवासनिमित्ता यम् , भत्तारम् , इदम् , (वचनम् ) अनीत् । सुधा-सीतावृत्त वर्णयितुमुपक्रमते-सान्व्यमानेति । प्रत्राप्यये विति। रामेण स्ववल्लभेन, सारव्यमाना तु-विविधवचोभिरावास्यमानाऽपि, जनका स्मना - मिथिलेशमुता, मैथिली = सीता, वनवासनिमित्तार्थ वनवास हेत्वनुम तिसिद्धयर्थ, मार स्वामिनम् , इद = वदयमाण (वचनम् ) अब्रवीत् = अवोचत् । जतकात्मतेति विशेषण स्वरलोचिताचारदाढयाय । इन्दुमती-( महर्षि वाल्मीकिजी *ते हैं कि मारे क्रोधके लालर ओंठ क्येि देस पर भी) जब श्रीरामचन्द्रजी महाराज जनककी कन्या (श्रादि शक्ति) मैथिनी सीताजीको (पुन ) सास्वना देने लगे (जलेपर नमक छिडको लगे) तय (सीताजीको क्रोधामि और भी भभक उठी ) वे अपने पति श्रीरामचन्द्रजीको अपने साथ वन ले चलने के लिये (पुन २) कहने लगीं। सा तमुनमसघिग्ना सीता विपुलवक्षसम् । प्रणयाचाभिमानाथ परिचिक्षेप राघवम् ॥ २॥ अन्वय-उत्तमसविझा, सा, सीता, विपुलवक्षस, त, राघव, प्रणयात्, च, अभिमानाच, च, परिविक्षेप । सुधा-वचनस्य विशेषस्वरूप प्रतिपादयभाइ-सेति । उत्तमसविग्नावि रहहेतुकात्युद्धग प्राप्ता, सा- जगप्रसिद्धा, सीता - मैथिली, विपुलवक्ष-विपुल स्थूल वक्ष उरो यस्य त तथोक्त पीरोर स्थलमित्यर्थ , त = जगप्रसिद्ध, राघव राम, प्रथयात् % स्नेहात , च-पुन , अभिमानाञ्च महमस्यानन्यति मा त्यक्त मयमसमर्थ इत्यहवाराच, परिचिक्षेप - सोरहामवचनमुचारयामास निनिन्देत्यर्थ । इन्दुमती-(वाल्मीक्जिी कहते है कि पुन इस वारकी प्रार्थनाको अस्वी- कार करते देख ) सीताजी उद्विग्न होकर मारे क्रोधर कापती हुई विशाल वक्ष . स्थल वाले महापराक्रमी श्रीरामच जीको (अपनायबुट्या निडर होकर) म और ७रा०प० रामवनगमनम्- अभिमानके साथ उपहास पूर्ण शब्दोमें कहने लगी (उनकी खिल्ली उड़ाने लगी)। किं त्वा मन्यत वैदेह पिता मे मिथिलाधिप । राम ! जामातरं प्राप्य स्त्रिय पुरुपविग्रहम् ॥ ३॥ अन्वयः-हे राम !, वैदेह , मिथिलाधिप , मे, पिता, पुरुषविप्रह, त्रिय, जामात र, त्वा, प्राप्य, किम् , अमन्यत | सुथा--हे राम = सौन्दर्यमानेण परिभ्रामक राघव , वैदेह = विदेह कुलोत्पन्न "कर्मणैव हि ससिद्धिमास्थिता जनकादय " इति कर्मप्रधानतया क्दा चिदपि पत्नीविरहमसहमान इत्यर्थ , मिथिलाधिप =मिथिलाजनपदस्य सभ्यप्रक्षक , मेमम, पिता- जनक , पुरुषविग्रह - बहि पुरुषवेष, स्त्रियम् = अन्त स्त्रीत्व भाव, जामातर-दुहितु पति, "जामाता दुहितु पति" इत्यमर , स्वावा, प्राप्य=लावा, किम् , श्रमन्यत-अवबुध्यत । तव तत्व न ज्ञातवानित्यर्थ । मा परित्यज्य वन गत स्वा यदि पिता मे शृणुयात्तदा त्वां स्येव काचित्पुरुषवेष धृत्वा मकन्यामुश्येम इत्यवश्य तस्य हदि स्याद किन्तु पूर्व यद्येव निश्चित स्या तत मां तुभ्य न प्रयच्छेदिस्याशय । एतेन पितुभ्रंम सूचित । स्वेति स्वामि- त्ययऽऽर्ष । इन्दुमती-(सीताजीने कहा हे राम ! यदि मेरे पिता मिथिलेश राजर्षि महाराज जनक यह जानते कि, श्राप स्वरूप मात्र के पुरुष हैं और क्रिया श्रापकी स्त्री-सी ( डरपोक) है तो कभी भी वे श्रापको अपना दामाद ( मेरे भाग्य विधाता ) नहीं बनाते (अर्थात् पुन र अतो दु खतर वनम्' कहर कर मुझे वन नहीं लेजाना श्राप जैसे वीर योद्धाको शोभा नहीं देता)। अनृत बत? लोकोऽयमज्ञानादि वक्ष्यति । तेजो नास्ति पर रामे तपतीव दिवाकरे ॥ ४॥ मन्यय-यदि ( मा त्यक्त्वा भवान् वनगमनभार ) वदयति (तदा) बत ! अय, लोक : (यत् ) रामे, पर, तेज , अस्ति, (तत्) तपति, दिवा करे, नास्तीव (इति) अज्ञानाद्, अनृतम्, वक्ष्यति । सुधा-न केवल मपितुरेव भ्रम , एव भवद्वाक्यश्रवणे सर्वेषा भ्रान्तिः स्फुटीभविष्यतीति प्रतिपादयती श्राह-नृतमिति । यदि-चेत् ( मां त्यक्त्वा भवान् वनगमनमार) वक्ष्यति-प्राप्स्यति (तदा) बतेति खेदे "खेदानुकमा सन्तोषविस्मयामन्त्रणे बत" इत्यमर ] लोक = ससारिजन, श्रय सुधा-इन्दुमती-टीकाद्वयोपेतम् । ( यत् ) रामे, परम् - उत्कृष्ट, तेज दीप्ति प्रभावो वा "तेज मभावो दीप्ती च" इत्यमर । अस्ति (तत्) ताति-किरण प्रकाशमाने, दिवाकरे - सूर्ये, नास्तीव - न विद्यत इव, (इति यद् तद् ) अज्ञा--अबोधाद् , अमृतम् = असत्य, वक्ष्यति - वदिष्यति । एताहक पराक्रमयुकोऽपि यदि मा विहाय भवान् गमिष्यति तहि एतामहश तेज तपति सूर्य नास्त्येवेति मिथ्यैव लोक कथयिष्यतीति भाव | "वक्ष्यतीति वह प्रापणे, वच परिभाषणे, इत्यनयो रूपम् , एकत्र लूट अपरत्राऽनद्यतनत्वादेरविवक्षा। इन्दुमती-(सीताजीने पुन कहा-हे राम । यदि वनमें श्राप मेरी रक्षा नहीं कर सकते तो निश्चय ) श्राप निस्तेज पुरुष हैं, फिर भी यदि संसार आपको सूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी (अथवा रामके समान सूर्य में भी तेज नहीं है यहा तक जो) कहता है तो खेद है कि वह अशान वश मिथ्या कहता है। कि हि कृत्वा विषण्णस्त्व कुतो या भयमस्ति ते । यत्परित्यक्तुकामस्व मामनन्यपरायणाम् ॥ ५ ॥ अन्वय-व, किं, हि, कृत्वा, विषण्ण , वा, ते, कुत , भयम् , अस्ति, यत् , अनन्यपरायणा, मा, व, परित्यक्तुकाम , 'असि"। सुधा-नु गमनामावकारण स्वयैवाभिधाय लोको बोदव्य इत्यत पाह- किमिति । ब, किं हि कृलाव कि मनसि विचार्य, विषण्ण -खिन्न , "अप्यकार्यशत कृत्वा भत्तव्या मनुरप्रवीत" इत्युक्तावश्यभरणीयविषये विषाद प्राप्ति चिवेति भाव । बा-अथवा, ते-तव कालाग्निसदृशमोधस्येत्यर्थ, कुत = करमात , भय = त्रास , अस्ति-विद्यते, यत् = यस्मात् कारणात् , अनन्यपरायणानास्ति अन्य -स्वदतिरिक, परायण -गतियस्या साता तयो- ला, मा,प्राणवल्लभा, परिक्तुकाम - परित्यागेच्छुक, "असि” इति शेष । तथा च परित्यागे कारण्महमेव न वेनीति लोकान् क्य बोधयिष्यामीति भार । इन्दुमती-(सीताजीने कहा-हे राम 1 ) क्या विचार कर ( मैने श्रापका क्या किया (विगाडा ) है जो श्राप उदास हो रहे है अथवा किससे ( राजा भरतसे तो नहीं) आप डर रहे हैं जो सुझ जैसी अग्नी अनन्य भक्का प्यारी पत्नीको यहा छोपकर, वन जाना चाइते हैं । धुमत्सेनसुत वीर सपबन्तमनुव्रताम् । सावित्रीमिव मा विद्धि त्वमात्मवशतिनोम् ॥ ६॥ F रामवनगमनम्- . अन्वय-धुमत्सेनसुत, वीर, सत्यवन्तम् , अनुवता, सावित्रीम् , इव, मान त्वम् , अात्मवशवचिनी, विद्धि । सुधा-नाऽह परित्यागयोग्येति बोधयन्ती श्राह -घुमदिति । धुमसेन सुत = द्युमरसेनपुत्र, वीर= पराकमव त, सत्यपन्तम् = "सत्यवान्" इति नामा नम् , अनुव्रता-ताशवर्तिनी, सावित्रीम् = अश्वरतिपुत्रीम् , इव, मामीदाम, स्वम् , आत्मवशवत्तिनी-स्ववशवत्तिनी, विद्धि-जानीहि । तथा च सावित्री यथा पति विना न जिजीविषुरासीत्सयाऽहमपीत्यवश्य मामपि नयेति भाव । इन्दुमतो-(हे राम ! ) द्युमत्सेनके पुत्र वीर सत्यवान् का अनुवजन करने वाली सती सावित्रीकी तरह मुझे भी आप अपने वशमें समझिये (अर्थात् जैसे सावित्री अपने पतिके पीछे २ वन गयी थी वैसे में भी भारके पीछे २ वन चलूगी । अथवा यदि एक साधारण-सा राजा द्युमत्सेनका पुत्र सत्यवान् अपनी स्त्रीको वन ले जाने में समर्थ हुअा तो महापराक्रमी सूर्यवशी महाराज दशरथके पुत्र होकर आप वनमें मेरी (सीताकी) रक्षा नहीं कर सकते १ धिकार है आपको । न वह मनसाऽप्यन्य द्रष्टाऽस्मि स्वदृतेऽनघ!। स्वया राषत्र ! गच्छेय यथान्या कुलपासनी ॥ ७॥ अन्वय-हे अनध !, यथा, अन्या, कुलपासनी, अन्य, (पश्यति, तथा ) मनसा, अरि, त्वद् , भूते, भयम् , श्रह, न द्रष्टा, अस्मि, (श्रत ) , हे राघव , त्वया, (वन ) गच्छेयम् । सुधा-हे अनघ - निधार !, यथा-येन प्रकारेण, श्रन्या कुलरासिनी% अ या कुलटा स्त्री, अन्य-परपुरुष ( पश्यति ) रमणायेति शेष, (तथा) मनसा अपि- हृदयेनाऽपि कि पुन शरीरचेष्टया, त्वद् ऋते त्वद्विना, अन्य- परपुरुष, न द्रष्टा अस्मि नाऽवलोक्तिाऽस्मि, (अन ) तु-निश्चयेन, हे राव- राम !, त्वया भवता, सह ( वन ) गच्छेय प्रोयम् । इन्दुमती-हे राघव ! जैसी कुलठा लो परपुरुषरत होती है वैसी हो मुझे मत सममिये । हे अनघ ! (निष्पाप ) मैंने आपको छोड़कर पर पुरुषको देखनेकी कल्पना भी मन में कभी नहीं की श्रत मैं (सीता) आपके साथ ही (बन ) चलूगी (पर पुरुष (भरत) के पास मुझे मत छोडिये)। स्वय तु भार्यो कौमारी विरमध्युपिता सतीम् । शैलप इव मा राम ! परेभ्यो दातुमिच्छसि ॥ ८॥ , , सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । मरय-हे राम ! चिरम् , अध्युषिता, कौमारी, मायाँ, (तथा) सती, मा शैलूप, इब, परेभ्य , स्वय, दातुम् , तु, इच्छसि, । सुधा-एव दृढपातिनत्यप्रदर्शनेऽपि पनगमनाऽननुमतिमेव शास्वा पुनरा क्षिति-स्वयमिति । अन तु किमर्थे । हे राम-राघव ।, चिर-बहु कालम् , अप्युषिता-स्वसमीपवत्तिनों, कौमारी-कुमारभावापना, माया = पत्नों, (तथा ) सती = साध्वी पतिव्रतामित्यर्थ , मा-सीता, शैलूप इव-जायाजीवा इव, नया इत्यर्थ "शैलालिमस्तु थैलूघा जायाजोवा कृशाश्विन " इत्यमर । परेभ्य =स्वातिरिक्तेभ्य , भरतादिम्य इत्यर्थ । स्वयम प्रात्मनैव, दातु-तरसन्निधौ स्थापयितुम् , तु = विममिमिवान्छसि । इन्दुमतो-हे राम! कौमारावस्था ( १० वर्षको वाल्यावस्था) में ही विवाहित होकर चिर दिनोंमे आपके पासमें रहनेवानी अपनी सती भार्या (मुझ सीता ) को नटकी तरह अपनेमे भिन तुरुष (भरत ) के पास छोड़ना श्राप क्यो चाहते हैं । यस्य पथ्य च रामास्थ यस्य चार्थेऽररुध्यसे । स्वतस्य भव वश्यश्च, विधेयश्च सदाऽनघ 110 अन्वय-हे राम! यस्म, पथ्य, च, (माम् ) प्रात्य, यस्य, च, श्रय, (माम्) अवरुभ्यसे, हे अनव , सदा, तस्य, व, वश्य , च, विधेय , च, भव । सुधा---पूर्व "तस्मै दत्त नृपतिना" इत्यादिना मरतानुकूल्येन स्थितिरुका सम्प्रति तत्सरिहारमाइ~यस्येति । हे राम-रघुकुलमणे !, यस्य-भरतस्य, पथ्य: हित, च, (माम) श्रात्य-प्रीषि, यस्य भरतस्य, च अर्थ = प्रयोजनार्य (माम ) अवरुभ्यसे निवारयसि । यद्धा-यस्य चार्थे अभिपेरूपप्रयोजनानिमित्त, अवरुष्य से-निगडीतोऽसि, हे अनध-निष्पाप, सदा-सवस्मिन् काले तस्य भरतम्य, पे, चश्य -श्रनुकूल, च = पुन , विधेय =प्रेभ्यश्च, भव, नाह तदनुकूला तद्विधेया चेह वसिष्यामोत्यभिप्राय । यद्वा- माता च मम कौशल्या इत्यादिना मातर शुभ्रषस्वेति यदुक्त तपरिहारमरि-यस्यति । यस्य-मातृजनस्य, पथ्यमि स्यादि पूर्ववदेश व्यारयेयम् , तथा चाह तु स्वामनुयास्यामीति तदाशय । अथवा यस्य मद्र्पजनस्य पथ्य चात्य, एतावस्य त यस्य चाथै अरुभ्यसेनिश्यसि तस्य- जनस्य, स वश्यो विधेयश्च भासमेव मड्चन शृशिवत्यर्थ । इन्दुमती-हे निभा सम! जिसका हित श्री चाहते हैं और जिसके AN १०२ रामवनगमनम्- कारण मुझे वन नहीं लेजाना चाहते अथवा जिसके कारण आपके राज्याभिषेकमें बाघा पडी है उम ( भरत ) के वशमें और उसका आज्ञाकारी श्राप ही बनें । मैं (सीता) उसके वशमें होना अथवा उसकी दासी वनकर रहना नहीं चाहती । स मामनादाय वन न स्व प्रस्थितुमर्हसि । तपो या यदि पारण्य वर्गो वा स्यात्वया सह ॥ १० ॥ मन्वय -( हे राम!) स , त्व, माम् , अनादाय वन, प्रस्थितु, न, बाई सि, यदि, तप, बा, अरण्य,वा, स्वर्ग , वा, स्यात् , (हि) स्खया, सह, भवतु । सुधा--(हे राम!) स प्रसिद्ध , त्व, मा-प्राणबक्षमाम् , अनादाय: श्रगृहीत्वा, वन-मदारण्य, प्रस्थितु गन्तु न अर्हसि = न शक्नोषि, तत्र हेतु- माह--तपो वेत्यादि । यदि-चेत्, तप = पञ्चाग्न्यादिसाधन चाद्रायणादिक, वा= अथवा, अरण्य - महावन, वा= अथवा, स्वग =देवलोक, स्यात् - भवेत् , (तर्हि) वया=भवता, सह-साम ( एव भवतु )। इन्दुमती-(सीताजीने कहा-हे नाथ ! ) जिम (मरत) के कारण आपका वनवास हुआ है उसीके श्राश्रित ) मुझे छोडर श्राप बन चले जाय यह उक्ति नहीं है (और न मैं ऐमा मान सकती हूँ अत हे नाथ 1) श्रापको अपने साथ ही मुझे वन ले जाना चाहिये । क्योंकि चाहे श्राप वनमें-तरस्या करें (चित्त-त्ति निरोधकर योग-माघन करें), चाहे वन-वास करें (भिल्ल और किरातकी तरह रहें ), चाहे स्वर्ग-वास करें ( वहा पर भी राजसीय सुखसे रहें ) मुझे आपके साथ ही रहना उचित है। न च मे भविता तत्र कश्चित्पथि परिश्रम । पृष्ठतस्तर गच्छन्त्या विहारशयनेष्विव ॥ ११ ॥ अन्वय -तत्र, पथि, तव, पृष्ठत , गच्छन्त्या, विहारशयनेषु, इव, मे, कश्चित् , परिश्रम , न च, मविता। सुधा-तत्र पथि :- यस्मिन्महावनमागें, तव-भवत , पृष्ठत = पश्चादागात् , गच्छ त्या ज्या त्या , विहारशयनेषु =विहार -परिकम उद्यानसञ्चार इति यावत् "विहारस्तु परिक्रम" इत्यमर । तत्र शयनेषु-स्वापेषु इय, मे मम सीताया, कश्चित् = कोऽप, परिश्रम खेद, न चनहि, मविता भविष्यति । इन्दुमती-( सीताजीने कहा-हे नाथ!) मुझे वन जाते समय मागमें कुछ भी परिश्रम नहीं होगा। प्रत्युत श्रापक पीछे २ चलनेमें मुझे ऐसा सुख प्रतीत . सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । १०३ होगा जैसा कि वाग-बगीचों में प्रापके लाय धूमने फिरने से या श्रापके साथ शनय करनेसे पास होता है। कुशकाशशरेपोका ये च कष्टकिनो हुमा । तूलाजिनसमस्पर्शा मार्ग मम सह त्वया ॥ १२ ॥ अन्वय -मारों, स्या, सह, मम, ये, कुशकाशशरेषीका, च, करटक्नि , द्रुमा (स्यु ते ) तूनानिनसमस्पर्शा ( भवेयु )। सुधा~-२८ सर्गस्थ 'द्रुमा करटकिनश्चैव कुशकाशाम भामिनि " इत्यस्योतरमाह-कुशकाशेति । मार्गे-पयि, क्या-भवता, सह-साक, मम सोलाया , ये, कुशाशशरेपीकाव-कुशा बर्हिष , काशा -पोटगना , "अपो काशमस्त्रियाम् । इक्षुगन्धा पोटगल" इत्यमर | शरा-गुद्रा "सरदरी" इति लोके प्रसिदा , "गुन्द्रस्तेजनक थर" इत्यमर । शीका वृक्षविशेषा , कुशाख, शराब, इपीराधेति ते तयोकाथ, एटक्निकण्टकवन्त , द्रुमा =वृक्षा, (स्यु ते) तुलाजिनामसा तूल-तूनराशि, अजिन-कोमल कदत्यादिमृगविशेष धर्म, "कदलीकन्दलीचीनचमूरुप्रियका अपि । समूरति हरिणा अमी अजिा- योनय " इत्यमर । तूलाजिनयो सम -तुल्य सशों येषो ते तयोक्ता (भवेयु)। इन्दुमती-(अट्ठाइसवा सर्गमें रामचन्द्रजीने कहा था-"द्रमा कण्टकि नवैव कुशकाराश्च भामिनि" इसोका उत्तर सीताजी देती है-) हे नाय' कुश, काश, सरसत, मूंज तथा और भी जो अन्य कटीले वृक्ष है वे सब बन जाते समय गस्ते में मुझे कई और मृग-चम की तरह सुखरशी जान पड़ेंगे। महापातसमुद्भुत यन्मामपकरिष्यति । रजो रमण तम्मन्ये परामिन बन्दनम् ॥ १३ ॥ अन्वय-हे रमण !, महागतसमुद्भुत, यद् , रज, माम् , अारियति, तत् , पराध्य, चन्दनम् , इव, मन्ये । सुधा-'अतीव वातस्तिमिरम्" इति यदुक्त तदुत्तरयति-मद्देति । हेरमण बल्लम !, महावातसमुदत महावायूषित यद्, रज धूलि , मा त्वरसहचा रिणीम् , अपरिष्यति अगोदर पनन्न क्लुपोवरिष्यति व्याप्स्यतीति यावत् त-रज , पराये श्रेष्ठ, चन्दनमिव-मलयजम् इव, वासित च दनचूणमिवेत्या शय । मये-जाने। इन्दुमती-"अनीव वाशस्तिमिाम्" सर्ग २८ श्लोक १८का उचर सीताजी .

. १०४ रामवनगमनमू- देती है-) हे राम! वनमें आँधीसे उड़कर जो धूल मेरे शरीरपर पडेगी, उसे मैं उत्तम चादन के समान समझेगी । शादलेषु यदा शिष्ये वनान्तर्वनगोवरा । कुथास्तरणयुत्तेपु (१) किं स्यात्सुखतर ततः ॥ १४ ॥ अन्वय-यदा, बनगोचरा, (अह) वनान्त , शालेषु, शिष्ये, (तदा) कुधास्तरणयुक्तेषु, (पर्यवेषु सुप्तात्या मम ) तत , किं, सुखतर, स्यात् ।। सुधा-"सुप्यते पर्णशय्यासु' इत्यस्योतरमाह-शादलेचिति । यदा= यस्मिन्समये, वनगोचरा-वग प्राप्ता (मह ) वानान्त =वनमध्ये, शादर्तेषु - दूर्वादियुक्तभूमिपु, वालतृणव प्रदेशेष्वित्यर्थ , शिष्ये त्वया सह स्वपिध्यामीत्यर्थ , (तदा) कुधास्तरणयुक्तेषु विलक्षणचित्रकम्बलरूपास्तरणविशिष्टेषु (पर्यषु त्वया सह पूर्व सुमाया अपि मम ) तत = शादलशयनात् , किं सुखतर स्यात् = किमधिक सुख स्यास किमपीत्यर्थ । इन्दुमती-('सुप्यते पर्णशय्यासु" मर्ग २८ भोक • का उत्तर सीताजी देती है--) हे नाथ ! वन में जाकर जब मैं हरी २ घासको शय्यापर सोऊँगी तय मुझे पलगपर विछे हुए मुलायम गलीचेपर सोनेके जैसा अत्यन्त सुखप्रास होगा। पत्र मूल फल यत्त्वमरप वा यदि वा बहु । दास्यसे स्वयमाहृत्य तन्मेऽमृतरसोपमम् ॥ १५ ॥ श्रन्यय -व, पन, मूल पल, वा, अल्प, यदि, वा, बहु, स्वयम् , शाह त्य, यद् , दास्यसे, तत् , अमृतरसोपमम् । सुधा-व, पनवणे, मूल मन्द , पलम् अाम्रादि वा, अपस्वल्प, यदि वाम्अथषा, वहु अधिक, स्वयम् , श्राहस्य -श्रानीय, यद् दास्यसे यदयि ध्यसि, तत्-पत्रादिकम् , अमृतरसोपमम्पीयूपरसतुल्य "भवेत्” इति शेष । इन्दुमती-("यथा लब्धेन सन्तोष " सग २८ श्लोक १३ का उत्तर सीताजी देती है-) हे नाथ । वनमें भोजन के लिये कन्द मूल, फल या पत्र जो कुछ थोड़ा या बहुत श्राप म्वय ला दिया करेंगे वही मुझे अमृत के ऐसा स्वादिष्ट जान पड़ेगा। 1 , (१) "अस्त्री कुश कुथो दर्भ" अमर। एवंच-'कुथास्तरयुकेषु शादलेषु' अर्थात्- हे नाथ ! वनेमें जाकर इरो र घामपर कुश बिछाकर जब मैं सोऊँगी तब उसमे बडकर सुख मुझे कहीं नहीं प्रास होगा।

सुघा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । १०५ न मातुन पितुस्तत्र स्मरिष्यामि न वेश्मन । आर्तवान्युपभुलाना पुष्पाणि च फलानि च ॥ १६ ॥ मन्वय-तन, सातवानि, पुष्पाणि, फ्लानि, च, उरमुखाना, (ग्रह) न, मातु , न, पितु , न, वेश्मन , स्मरिष्यामि । सुधा--तत्रवने, अार्तवानि-तत्तदृतूलनानि, पुभाणि = कुसुमानि, पन निग्राम्रादीनि च उपमुखाना-मक्ष तो, (अह)न, मातु =जनना, न, पितु जना, न, वेश्मन भवन, स्मरिष्यामिचि तयिष्यामि । मातुरित्यादि कर्मण शेषरव विवक्षया अधीगर्योत षष्ठी बोध्या । इन्दुमता-(सीताचीन कहा~हे नाथ! ) वनवासके समय छह सूत श्रोमें तत्तत् ऋतुके पल-पुष्पोका भोजन करती हुई म न माता, न पिता और न घर को याद करगी ( अर्थात् मेरा जी वनमे नहीं घबडायगा ) । न च तत तत विञ्चिद्दुमर्हसि विप्रियम् । मरकते न च ते शोको, न भविष्यामि दुर्भरा ॥ १७ ॥ अन्वय -तत , तत्र, (त्व ) मत्कृते, किश्चित् , विप्रिय, द्रष्टु, न च, अहंसि, (तपा मस्कृते ) ते, शोक , (च, न ( भविष्यति अत ) दुभग, न भविष्यामि। सुधा-तन = उकहेतो, तत्र = वने, (व) मते % मन्निमित्त, किञ्चि. त् ईषत् , विप्रियम्-अनभिनषितम् , द्रष्टुम् अवनोकयितु, न च महि, अर्हसि शोषि, (तया मते ) ते-तव, शोध-चिता च, न नहि, ( भविष्यति- दुभराम्दु ग्वेन मत्तव्या, न भविष्यामिन स्यामित्यर्थ । इन्दुमतो-(सीताजीन कहा-हे नाय!) वनमें पूर्वोत्तरूपसे मेरे रहने पर मेरे लिये श्रापको न तो कोई अनभिन्नषित कार्य ही करना पडेगा और न तो मेरे लिये किसी वस्तुकी चिता हो करनी पड़ेगी। अत हे नाप ! में वनमें दु ग्वमे भरण पोषण करने योग्य नहा होऊगी (मेरे लिये दु ख नहीं उठाना पड़ेगा) यस्स्या सह स स्वर्गानिरयो यस्श्वया चिना। इति जानन् परा प्रीति गच्छ राम । मया सह ॥१८॥ अन्वय --स्वया, सह, य, (वास), B , स्वा, त्वया, विना, य (वास स) निरय , इति, परा, प्रीति, जानन् , (स) गया, सह, गन्छ । सुधा--किमधिकजल्पनेन निधितमेक क्षेरत शृश्वित्याह--य इति । . त 1 - - । १०६ रामवनगमनम्-- वयाभवता, सह-साक, य, (वास ) स , स्वर्ग स्वर्गसम , स्वया-मवता, विना, य (वास स,) निरय नरकोपम वत्सयोगवियोगादन्ये न मे मुखदु खे स्त इति भाव , इतिएव, परामवियोगासहा, प्रीति स्नेह, जानम् बहुशोऽनु भवन् , (ब) मया सह, गच्छभ्याहि । यद्वा बसाहित्येन निरयोऽपि स्वर्ग स्त्वद्राहित्येन वर्गो निरय इति मम निक्षय जानन् मया सह गच्छेत्यर्थ । इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे राम । ( अधिक मैं क्या कहू) आपके साथ रहने में मुझे स्वर्गके समान सुख है और श्रापके विना नरकके समान दुख है । बस, इस तरहका मेरा प्रेम जानते हुए श्राप अपने साथ मुझे ले चलिये। मथ मामेवमध्यग्रो वन नैव नयिष्यसि । विषमद्यैव पास्यामि मा वश द्विषता गमम् ॥ १६ ॥ अन्वय-श्रय एवम् , ( अपि ) श्रव्यप्रा, मा, (यदि ) वन, नेव, नयिष्यसि, (तहि) अद्य, एव, विष पास्यामि, द्विषता, वश मा, गमम् । सुधा-कैकेयीवन्मथितसिद्धान्तमाह-अथेति। अथ अथवा, एय-मत्रा र्थनाऽनन्तरम् ( अपि ) श्रव्यग्रा वनवासे दोषानगण्य ती, माम्-श्रात्मपत्नी, ( यदि ) वन, नैव नयिष्यसि नैव नेष्यसि, (तर्हि) अद्य एव वसनिघावेव, विषम् = गाल पास्यामि = भोये, तत्र हेतुमाह-मैति। द्विषता भरतादौना स्वद्विरहहेतुकसर्ववस्तुविषयकप्रीत्यभाउयुक्तानामित्यर्थ । बशम् = अधीन, मा गमन प्राप्स्यामि तानवलोकयितु न शक्ष्यामीत्याशय । इन्दुमती-(अ तमें सीताजीने कहा-हे नाथ ! ) अब इतनी प्रार्थना करनेके अनन्तर भी यदि आप मुझे, जिसे वन-वास सम्बन्धी किसी बातका भय नहीं है, अपने साथ लेचलने को राजी नहीं हुए तो मैं आज श्रापके सामने में ही विष-पान कर लूगी किन्तु वैरियोका ( कैकेयी और भरतका ) वश होकर यहा नहीं रहेगी। पश्चादपि हि दु.खेन मम नैवाऽस्ति जीवितम् । उभितायास्त्वया नाथ ॥ तदेव मरण वरम् ॥ २० ॥ मन्वय-हे नाथ , स्वया, उज्झिताया , मम, पश्चात् , अपि दुखेन, जीवित, नैक, अस्ति, हि, तदा, एव, मरण, वरम् । सुधा-ननु विषमदस्य स्वल्पकालवृत्तित्वाद्विषपानमकिशिक्रमित्यत श्राह- पश्चादपीति । हे नाथ -स्वामिन् ।, त्वया भवता, उज्झिताया:स्यताया, - सुधा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । १०७ मम-सीताया, पश्चात् अपि-विषमदनाशाऽनन्तरमपि, दुखेन वद्विरहक्लेशेन, जीवित-प्रायधारण, मस्कर्तुत्वद्भात्रादिसेवन वेति नवितोऽर्थ , नैव अस्ति नैव भविष्यति, हि = यत , तदा एव-त्वविरहकाल एव, मरणम् इहलोकत्याग, वर= श्रेष्टम् । इन्दुमती-(सीताजीने कहा-) हे नाय । अापके वन चले जाने के बाद भी तो दु खसे मुझे मरना ही है तो बारसे परित्यक्ता होने के समय (आपके सामनेमें ) ही मरजाना अच्छा है। इमं हि सहितु शोक मुहूर्तमपि नोत्सहे। किं पुनर्दशीणि त्रीणि वैक च दुखता ॥ २१ ॥ अन्वय --ह, दुखिता, इम, शोक, मुहूर्तम् , अपि, सहित, न, उत्सहे, (तत्र) दशवर्षाणि, त्रीणि, च, एक, च, किं पुन । सुधा--मनु चतुर्दशवर्षानन्तरमिहागमन मम निभितमेव सकिमर्थमेताइश प्लेश चिकीरित्यत आह इयमिति । हि = यत , दुःखिताबद्विरहेणातिपी. डिता, इम शोक = स्वद्वियोगजनितशोक, मुहूर्तम् अपि द्वादशक्षणात्मककालमपि सहित = मपितु, न उत्सहे न समर्याऽस्मि, (तत्र ) दशवषाणि -दशहाय नानि, त्रीणि-त्रिवर्धाणि, च-पुन , एकम् एश्वर्ष च, चतुदशवर्षाणीत्यर्थ , कि पुन कि वकन्यम् । विरहिण्या श्रादी दशवर्षाणि, मध्ये श्रीणि वपारिए, अते चैक वर्षे च सममेवामातीति जनयितु विमज्य प्रतिपादितम् । एतेन वन वासकालसरयाया अतिदुस्तरस्व सूचितम् । इन्दुमतो-(सीताजीने पुन कहा-हे नाथ!) मैं आपके वियोग जनित शोकको महत्त भर भी नहीं सह सकती तो चौदह वषके वियोग जन्य दुखको, कैस सह सकती। इति सा शोक सतप्ता विलप्य करुण बहु । चुकोश पतिमायस्ता भृशमालिङ्गय सस्वरम् ॥ २२ ॥ अन्वय-शोक्सतसा, (अत एव) श्रायता, सा, इति, करुण, बहु, विलय भृश, पतिम् , प्रालिजय, सस्वर, चुकोश । सुघा---शोकसतप्ता = शोकपीड़िता, (अत एष) श्रायस्ता अत्या- यास प्राप्ता प्रशिथिलगात्रीत्यर्थ , सा-सीता, इति=एव प्रकारेण, करुणकर. गरसयुक्त, बहु-अनेकविध, विलप्यसदित्वा, भृशम् अत्यन्त, पति-वल्लभ रामनगमनम्- रामम् , प्रालिनयन्याश्लिष्य, सस्वर-मशब्द, चुकोश-सरोद । इन्दुमती-(अधोलिखित चार श्लोकोसे वाल्मीकिनी सीताजीके प्रस्तुत स्वरूपका वर्णन करते हैं -) इस प्रकार गमचन्द्रजीसे कहने के पश्चात् सीताजी शोक्से सतप्त हो अनेक प्रकारसे करुणापूर्ण विलापारके गमच द्रजी को आलिंगनकर, जोरसे रोने लगी। सा विद्धा बहुभिर्शक्यैदिग्धैरिव गजाहना। चिरसनियत वाप्प मुमोचाग्निमिवाणि ॥ २३ ॥ यचय -दिग्धै . विद्धा, गजानना, इप, बहुभि , वाक्य , (विद्वा) सा, चिरसनियत, वा पम् , अग्निम् , अरणि, इव, मुमोच । सुधा--दिग्ध विपरितवाणे, विद्धा-व्यथिता, गजाना =करिणस्नी, इन, गहुभि वियोगादिसूचकै , वास्यै =ममोक्तै (विद्धा) सा-सीता, चिरस नियत-बहुकालनिरुद्ध, आध्यम्=अन्तरष्माणम् , अग्नि-वहिम् , अरएि इव- वह्निमन्थनकाष्ठमिव मुमोच-तत्याज । सपर्पितारणि यथा यहि मुञ्चति तथैव रामयाक्य विद्धय याप्प मुश्चिनवतीति भाव । इन्दुमती-विषाच वाणोसे व्यथित इयिनीकी तरह श्रीरामचन्द्रजीके वच नौसे विद्ध सीताजीका बहुत काल से रुका या श्रास् वैसे ही प्रकट हुश्रा, जैसे अरिमोसे आग प्रकट होती है ('अरिणा' काष्ठ विशेषका नाम है रगडने पर इससे आय निकलती है जो कि विशिष्ट यशादिमें काम आती है)। तस्या स्फटिकसकाश वारि सन्तापसम्भवम् । नेनाभ्या परिसुनाव पङ्कजाम्यामिवोदकम् ॥ २४॥ श्रन्वय -पङ्कजाभ्याम् , उदकम् , इव, सन्तापसम्भव, स्फटिकसङ्काश, वस्या , वारि नेनाम्या, परिमुस्राव । सुधा-पहजाभ्या: नीलोत्पलाभ्याम् , उदकम्मर दरूप तयुष्य नि मल च भवति तदिव सन्तासम्भव = वियोगश्रुति हेनुकसन्तापननित, स्फटिकरा काश-स्फटिकसूक्ष्मगुटिकावद्भासमान, तस्या -सीताया , वारि=नयनजल,नेत्रा- भ्यालोचनाभ्या, परिसुसाव परिसस्यन्द । इन्दुमती-सीतानीकी प्राखोसे सटिक प्रत्यरकी तरह श्वेत प्राँसुओंकी चूदे वैसे ही टपकने लगी जैसे क्मलोंसे पानी की बून्द टपकती है।

, - सुधा-इन्दुमनी-टोकाद्वयोपेतम् । १०६ तत्सितामलचन्द्राम मुसमायतलोचनम् । पर्यशुप्यत चारपेण जलोद्धमिवाम्युजम् ॥ २५ ॥ अन्चय --सितामलच द्राम अापतलोचन, तत् , मुख, जलोद्धृतम् , अम्बु । जम् , इव, वापेण, पर्यष्यन (इव ) । सुधा-सितामलचन्द्राम-सिते-शुक्लरते, अमन --रावाद्यनुपरक्तत्वेन निर्मल , यश्च द्र पूणिमाचद्र इत्यर्थ , तस्य प्राभा सादृश्य यर तत् तथोक्तम् , अायतलोचन - श्रायते-दोघे, लोचने-नयने यत्र तत्तयोक्तम् मृगनयनमियर्थ , तत् = प्रसिद्ध, मुख = साताया आनन, जलोद्धृत - जल-पय , उद्धृत--निस्त यस्मात्तत्तयोक्तम् आहिताग्यादित्वात्समास । अम्बुज-कमलम् , इत्र, बाष्पेण- सतापजनितीमणा, अम्बुजपचे उमरोत्यर्थ , पर्यशुपत इव-शोषणमलमन दव, इवेत्युभयान्वयी। इन्दुमती-पूर्णिमाके उत्फुल्ल पूर्णचन्द्र के समान देदीप्यमान तथा पड़े बड़े नेत्रोंसे अति सुशोभित सीताजीका मुखमण्डल शोक-स तापसे उसी तरह मुरझा गया जैसे जलसे निकला हुआ कमल मुरझा जाता है । ता परिपज्य याहुभ्या पिसज्ञामिर दुखिताम् । उवाच वचन राम परिविश्वासयस्तदा ॥२६॥ अवय --तदा, गम , दुखिताम् , (अत एव) विसशाम् , इव, ता, बाहु म्या, परिष्वज्य, परिविश्वासयन, (सन् ) वचनम् , उवाच । सुधा-तदा = तस्मिन् काले, गम, दुखिता-वियोगश्रवण हेतुकतु खा- कान्ताम्, (अत एव ) विसशाम् इव-चेतनारहितामिव, ता-प्रेयसा सीता, बाहुभ्याम्दोम्यो, परिष्वज्य = परिरभ्य, परि विश्वासयन् साहित्यगमने विश्वास मुत्सादयन् (सन् ) वन-वक्ष्यमाणवाक्यम् , उवाच % उपवान् । इन्दुमतो-(इस प्रकार जब सीताजीका रोठे २ सुदर सरूप श्रीहत होगया तब ) श्रीरामचन्द्रमा मूचितप्राय और शाक-सतत सीताजीको अपनी दोनां विशान भुजायोसे श्रानिगन कर विश्वास दिलाते हुए कहने लगे-~! न देवि! तर दुसेन स्वर्गमध्यमिरोवये । नहि मेऽस्ति भय किञ्चित्स्य भोरिव सर्वतः ॥ २७ ॥ अन्नय हे देवि 1, तव, दुखेन, स्वगमपि, न, अभिरोचये, स्वयमो, इव, सर्वत , मे, किश्चिद् , भय, नहि, मस्ति।

- -- . रामवनगमनम्- सुधा-तद्वचनमेव वर्णयन्नाह--नेति। हे देवि = सीवे 1, तव-मवत्या, दुखेन = क्लेशेन, स्वर्गमपि न अभिरोचये = नाभिनषामि, स्वयि दुःखिताय प्राप्तस्वर्गमपि नेच्छामीत्यर्थ , तेन त्वा सह नेष्यामीति व्यज्ञितम् । यच पूर्वोक मयादिक तदप्यकिञ्चित्करमित्यत आइ-महोति । स्वयभो = नारायणम्य, सर्वत = सर्वजन्तुम्य , मे=मम, किञ्चित् = अल्पमपि, भय भीति , नहि । अस्ति = नहि विद्यते । अत्र "स्वयम्मु पदेन चतुर्मुखो न प्रावस्तस्य मधुकैट भादिदैत्येम्यो भयसम्भवात् । इन्दुमती--( रामचन्द्रजीने कहा-) हे देवि ! तुम्हारे कष्टसे सुझे स्वगकी भी अभिलाषा नहीं है । ( वनमें तुम्हारी रक्षा में नहीं कर सकूगी ऐसा तुम्हारा समझना गलत है क्योकि ) मुझे कुछ भी भय नहीं है। जैसे ब्रह्माजी निर्भय है वैसे मैं भी सबतरहसे निर्भीक हूँ (किन्तु-)। तव सर्गमभिप्रायमविज्ञाय शुभानने ।। वास न रोचयेऽरण्ये शक्तिमानपि रक्षणे ॥ २८॥ अन्धय-हे शुभानने , तब, सर्वम् , अभिप्रायम् , अविज्ञाय, रक्षणे, शक्तिमान् , अपि, (अहम् ) अरण्ये, । तव) वास, न, रोचये। सुधा--ननु गमननिषेधकवाक्य पूर्व त्वया कथमुक्तमित्यत श्राह--तवेति । हे शुभानने = शुभ =दर्शने मङ्गलदायकम् , अानन-वदन यस्या तत्सम्बुद्धी रूपम् । तव = भवत्या , सर्वसहगमनविषयक्समग्रमान्तरम् , अभिप्रायम्-प्राश यम् , अविशाय-अबुद्ध्वा (तत एव हेतो) रक्षणे त्राणे, शक्तिमान् अपि - सामर्थ्यवानपि, (अहम ) अरण्ये विपिने, ( तव ) वास-स्थिति , न रोचये= न कामये, नाजीकृतवान् "इत पूर्वमित्याशय । एतेन त्वदमिप्रायविज्ञानार्थ- नेद पूर्वमभिहितमिति ध्वनितम् । इन्दुमती--( रामचन्द्रजीने कहा-हे साते । वनमें में भली-माति तुम्हारी रक्षा कर सकूगा किन्तु) हे शुभानने । मुझे तुम्हारे मनका अभिप्राय ज्ञात नहीं था अत शक्तिमान् होकर भी मैं तुम्हारा बनजाना पसद नहीं करता या । यत्सृष्टासि मया साधं वनवासाय मैथिलि। न विहातु मया शक्या प्रीतिरामवता यथा ॥ २६ ॥ अन्वय -हे मैथिलि |, यत् , मया, सार्थ, वनवासाय, (गतु) सृष्टा, असि, (अ ) आत्मवता, यथा, प्रीति , विहातु, न, शक्या, (तथा त्व) मया विहातु, न, शक्या। - - यथा- सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । सुधा-हे मैथिलि = मिधिनादेशोलने ! यत्-यस्मात्कारणात् मया- रामेण, सार्घ-साक, वनवासाय - दण्डकारण्यनिवासाय (गन्तु ) पृथा असिः निश्चय प्राताति, यद्वा-स्टाऽमि अवनीयाste, (श्रन ) प्रात्मवता-परमा स्मविषयकविज्ञानवता, अतिकृष्छाऽवस्थायामप्यामितमनस्केन वा, येन प्रकारेण, प्रीति =परमात्मविषयकस्नेह दया बा, विहातु परित्यक्तु, न शक्या नाहीं (तथाक) मया रामेण, विहातु न शक्यान योग्या । इन्दुमती-(रामच द्रजौने पुन कहा-) हे मैथिलि । यदि मेरे साथ वनवास के लिये तुम ब्रह्मासे बनाई गयी हो (एतदर्थ हो तुम्हारा जन्म हुआ है) तो मैं तुम्हे वैसे ही छोड़कर नहीं जा सकता, जैसे कि शीलवान अपनी शीलता को नहीं छोड़ता। धर्मस्तु गजनासोरु ! सद्भिरावरित पुरा। त चाहमनुवतिध्ये यथा सूर्य सुरर्चला ॥ ३० ॥ मन्वय -हे गजनासोस ।, (य) धर्म , पुरा, सद्धि , प्राचरित त, च, धर्मम् अहम् , अनुवत्तिष्ये, (स्वच) सूर्य यथा, सुवर्चला, (अन्ववर्तत तथा मामनुवर्तत्व) सुधा-सपढोकमिद वनगमन न रागप्राप्त भवति, कितु शिष्टाचारसिद्धमिति प्रतिपादयन्नाद-धर्मस्त्यिति। हे गजनासोरु-हस्तिशुण्डासदृश जर्छ । (य) धम = श्रुतिस्मृत्युदित , पुरा-पूर्वकाले, सद्रि सपत्नीकै राजर्षिभि , श्राचरित = अनुष्टित "वर्त" इति शेष } त -पूर्वाचरितश्च, धर्मम् अहम् , अनु वतिध्ये प्रवर्तयिष्यामि, (त्व च ) सूर्य-दिवाकर, यथा-येन प्रकारेण, सुवर्चला एसमानी सपत्नी, (अववर्त तया मामनुवर्तस्व ) इन्दुमतो-( रामरहनीने कहा-) हे गजनासोर ( हाथी के सूडके समान सुदर लाध वाली सीते 1) पहले के सजन लोग जैसा धर्माचरण करचुके हैं उसीका अनुसरण मैं भी क्रूँगा और तू भी कर । जैसे मुवर्चला देवीजी अपने पति भगवान् सूयका अनुसरण करती हैं वैसे हो तू भी मेरा अनुसरण कर । न खत्मह न गच्छेय धन जनकनन्दिनि ।। ववन तनयति मा पितु सत्योपहितम् ॥ ३१ ॥ अन्वय'-सत्योवृहित, मितु , (यत ) तद् , वचन, मा, (वन) नयति, (अत) हे जनकनन्दिनि ! खलु, प्रह, वन, न, गच्छेयम् , (इति)न, (किन्तु मछेपमेव)।

- . रामवनगमनम्- सुधा-मम वनगमन तु निधितमेवेति प्रतिपादयन्नाह-न खखिति सत्योवहितः = सत्यसयुक्त, पितु मत्तातत्य, (यत ) तद् वचन दद् मान्य ("नटाबल्कलमयुतश्चतुर्दशवाणि वने वस" इति वाक्य) मा, (वन) नयति =प्रापति, ( अत ) हे. जनकनन्दिनि = जनानन्दविधायिनि, सीते , ग्वलु-निश्चयेन, अह, वन = महारण्य न गच्छेयन बनेयम् ( इति ) न (किंतु गच्छेयमेव ) नवद्वय प्रकृतमर्थ द्रढीकरोति । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे जनकनन्दिनि ! में वन नहीं गउँगा। ऐसा भी नहीं हो सकता, क्योंकि सत्य पाशमें बधे हुए पिताजीका वचन मुने । वन लेजा रहा है (अत उनका वचन-पालन करने के लिये निश्चय ही मुझे वन जाना होगा)। एप धर्मस्तु सुश्रोणि ! पितुर्मातुश्च वश्यता। माज्ञा चाऽह व्यतिक्रम्य नाऽह जोवितुमुत्सहे ॥ ३२ ॥ मन्वय-हे सुश्रोणि, पितु , मातुश्च, वश्यता, एष, तु, धर्म , अह, (यो ) श्राज्ञां च, व्यतिक्रम्य, जीवितुम् , अह, न, उत्सहे । सुधा-ननु यदि तत्र तव नेच्छा तदा पितुर्वचनमुल्लवयाऽप्यत्रैव तिष्ठत्यत पाह-एय इति । हे सुश्रोणि = शोमना श्रोणि -कटि यस्या सा तत्सम्बुदौ पितु नातस्य, मातुभ-जनन्याय, वश्यता- 'जीविते पाक्यकरणारि" ति वाक्यात अधीनता, एष = अय, तु-हि, धर्म =श्रेयस्कर , अह ( तयो ) आशाम्प्रादेश, व्यतिकम्यः = उल्लनाथ, जीवितु-प्रजापालनाय प्राणान् घारयितुम् , ग्रह, न उत्सहेनाप्यवस्ये नेच्छामीति भाव । इन्दुमती-( रामचन्द्रजीने कहा-) हे सुश्रोणि (सुदर कमर वाली) माता-पिताको शाज्ञाका पालन करना ( उनकै अधीनमें रहना) पुत्रका धर्म है । माता-पिताकी अापाका उल्लपन कर मैं जीना भो नहा चाहता। अस्वाधीन कथ देव प्रकारैरभिराध्यते । स्वाधीन समतिक्रम्य मातर पितर गुरम् ॥ ३३ ॥ मन्वय -स्वाधीन, मातर, पितर, समतिकम्य, अस्वाधीन, दैव, प्रकार, अभिराध्यते। सुधा-ननु मातृपितृवचनपालन, देवमाराध्यस्माभिरत्रैव वर्तव्यमित्यत श्राइ-अस्वाधीन मिति । स्वाधीन = प्रत्यक्षस्वसेवया भायतम् , "अधीनो निम्न क्यम्, सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । श्रायत्त " इत्यमर । मातर- जननी, पितर = तात, गुरु वशिष्ठ, समतिकम्य- परित्यज्य, अस्वाधीनम् अप्रत्यक्षत्वेन प्रत्यक्षत्वमेवायत्त वरहितम् , यद्वा-अस्वा. चीनम् = आराषकानधीन खत मिति यावत् । देव-देवता, प्रकारे मावना मात्रसाप्यागधनप्रकार, कय - केन प्रकारेण, अभिराध्यते - सेव्यते, तथा च गुरूदिष्टपथेनेवास्माभि देवा पागधनीया नाययेत्याशय । इन्दुमतो--( रामचन्द्रजी पुन कहा-हे सीते । देवमे भी बढकर माना, पिता और गुरु होते हैं क्योंकि-) देव स्वाधीन (प्रत्यद नहीं है, उसकी माराधना भावनामात्रसे ही मनुष्य करसकता है, किन्तु माता, पिता और गुरु तो स्वाधीन (प्रत्यक्ष ) हैं, अत एव उनकी श्राशाका उल्लग्न नहीं करना चाहिये। . यत्र त्रय यो लोका पवित्र तत्सम भुवि । मान्यदस्ति शुभापारे ! तेनेदममिराध्यते ॥३४॥ अन्वय -हे शुभापा 1, यन, त्रय, (मवति तथा ), (त्रय लोका , (बाराधिता भवति, अत ) तत्सम, पवित्र, भुवि, अयत् , न, अस्ति, वेन, इदम् , अभिराप्यते । सुधा-हे शुभागङ्ग-शुभ-शुभलक्षएसयुम् , अपाङ्ग-नेत्रप्रान्त यस्या तत्सम्बुद्धौ । यत्र मात्राधाराषने सति, क्य-पार्थकामरूप ( भवनि, तया) प्रयोऽधोमध्यवर्तिन , लोका जना, (पाराषिता भवन्ति, श्रत ) तत्स म मात्राधाराधनसदृश, पवित्र - पुण्यजनक, यद्वा पवि -"पविर्वज महा भयम्" इत्यभिधानात् महामयरूप संसार , तस्मास्वायते यतचयोकम् , ससार तारकमित्यर्थ , मुवि-पृथिव्याम् , अयत्-एतदतिरिक्त कञ्चन त्रैलोक्ये वस्तु, न अस्तिन विद्यते, तेन हेतुना, हद-मात्रादित्रयम् , अभिराप्यते-ससेन्यते । तथा चैतेषामाराधीनैव सक्लेष्टसिद्धिरिति यननो मात्रादिकमेवाराधनीया इत्याशय । इन्दुमतो--(रामचद्रगौने कहा -) हे शुभापागे । (शुभलोचने 1 ) इस पृथिवीर माता, पिता और गुरुकी सेवा बडार पवित्र कार्य दूसरा कोई नहीं है, इन तीनोकी सेवा करनेसे धर्म, अर्थ और काम इन तीनों की प्राप्ति होती है तथा तीनों लोकी सेवा हो जाती है, अत में इनकी आराधना (सेवा) करता हूँ। रा.ग.

. रामवनगमनम्- न साय दानमानौ वा न यज्ञाश्चाप्तदक्षिणा । तथा चलकरा सीते! यथा सेवा पितुहिता ॥ ३५ ॥ मन्वय:-हे सीते ! पया पितु , मेवा, हिता, ( मता) तथा, सत्य, न (बलकरम् ) वा, दानमानौ, न ( बलकरौ तथा ) आप्तदक्षिणा, यहा , च, न वलकरा (मता )। सुधा-सम्प्रति मितृवास्यस्य सत्यादिवलक्षण्यमुपादयति-नेति । अत्र "बलकरा" इति लिङ्गवचनविपरिणामेन यथायय व्याख्येयम् । हे सौतेजनका रमजे !, यया = येन प्रकारेण, पितु =तातस्य ( एतच्चोपलक्षण मात्रादे ( सेवा आराधना, हिता = कल्याणकरी, (मता) तथा, सत्यम् अवृत्त, न, ( बलका पारत्रिकाभ्युदयसाधक ) वा अथवा, दानमानौ दानसत्कारी, न (बलकरौपार 1 रिकाम्युदयसाधकी, तया) प्राप्तदक्षिणा = श्राता -ब्राह्मण प्राप्ता, दक्षिणा येषु ते तयोला , यशव =राजसूयादिक्कतवम, न बलकरा पारत्रिकाभ्युदय साधका (मता )। इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे सौते। सत्य, दान, भान और दविणा सहित यश भी परलोक प्राप्तिके लिये उतने हितकर नहीं हैं जितनी कि पित्रादि गुरुजनोंकी सेवा है अर्थात् पिता, माता और गुरुकी सेवा करनेमें जो फल मिलता है, वह फल सत्य बोलनेसे, दान व सत्कार करनेसे अथवा दक्षिणा सहित यज्ञ करने से प्राप्त नहीं होता। स्वों धन धान्य वा विद्या पुत्रा सुखानि च । गुरुवृत्त्यनुरोधेन न किञ्चिदपि दुर्लभम् ॥ ३६ ॥ अन्वय'-गुस्वरयनुरोधेन, स्वर्ग , घन, वा, धान्य, वा, विद्या, पुत्रा, सुखानि, च, (प्रासु शक्नुवन्ति जना, किं वक्तव्य ससारे वेषा कृवे ) किञ्चित् , थपि, (वस्त ) दुर्लभ, नास्ति । सुधा-उत्तमेव द्रढयति-स्वर्ग इत्यादिना । गुरुकृत्यनुरोधेन= गुरूणा- मात्रादीना, वृत्ति -शुभूषण तदनुरोधेन-तदनुवर्वनेन "मनुरोधोऽनुवर्तनम्" इत्यमर । स्वर्ग =देवलोक , धन-हिरण्यादिवित, वा-अथवा, धान्य ब्रीह्यादि "धान्यं ब्रीहि स्तम्बकरि" इत्यमर । वा=अथवा, विद्या प्राविक्षिक्यादय , पुत्रा सुता , सुखानि च एतदितरितलोकानुवर्तनामोदाम, (प्रान शक्नुवन्ति कि वकव्य ससारे तेषा कृते ) किञ्चिदपि किमपि (वस्तु) दुर्लमम् = अप्राप्य, नास्तिन विद्यते। . जना, सुधा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम् । इन्दुमती-(रामचद्रजीने कहा-हे सीते!) जो महारमा लोग माता, रिता और गुरुको सेवा किया करते हैं उनके निये-स्वर्ग, धन-धान्य, विद्या, सतानादि कुछ भी दुर्लभ नहीं है । देवगन्धर्षगोलोकान् ब्रह्मलोकास्तथा परान् । प्राप्नुवन्ति महात्मानो मातापितृपरायणा ॥३॥ मन्वय -मातापितरायणा, महामान , देवगन्धर्षगोलोकान् , तथा, परान् , ब्रह्मलोकान् ( अपि ) प्रामुवन्ति । सुधा-मातापितरायणा = मात्रादिशुश्रूषण करता , पहारमान दृढमान स्काः, देवगधगोलोकान्-देवच गन्धर्वच गोश्त्यषा द्वन्द्वे देवगन्धवगावस्तेषा लोकास्तान् तथोक्तान् देवलोकगन्धर्वलोकगोलोकानित्यर्थ , तथा, परान् प्रत्यु- स्कृष्टान् , ब्रह्मलोकान् सातलोकान् , (अपि) प्रामवन्तिनमन्वे । इन्दुमतो-(रामच द्रजीने कहा-) हे सौते । जो महा मालोग माता-पिता आदि गुरुजनोकी सेवा किया करते हैं, उनको-देवलोक, गन्यवलोक, गोनोक तया सबसे उत्कृष्ट नालोक भी प्रास होता है। समा पिता यथा शास्ति सत्यधर्मपथे स्थित । तथा वतितुमिच्छामि स हि धर्म सनातन ॥ ३८ ॥ मन्वय सत्यधर्मपथे, स्थित , स , रिता, यथा, मा, शास्ति, तथा, वर्ति तुम् ( अहम् ) इच्छामि, हि, यत , स , धर्म , सनातन ( वर्तते)। सुधा--सत्यधर्मपये == सत्याविशेषधर्ममार्गे, स्थित = वर्तमान , स = स्वतन्त्र , पिता = मम तात , यथा- येन प्रकारेण, माराम, शास्ति-आशा- पयति, नया-तेन प्रकारेण, वर्तितम् अनुष्ठातुम् ( अहम् ) इच्छामि-अभि- लपामि, हि-यन , स = विनाशापालनम्ए , धर्म, समातन = सार्वकालिक ( वर्तते)। इन्दुमती-(रामच द्रजीने कहा-हे सौते । इस निये ) सत्यमागमें स्थित मेरे पिता मुझे जो पाश देते हैं, तदनुकूल ही मैं करने की इच्छा करता हूँ क्योंकि यहीं सनातनधर्म है। मम सन्ना मति सीते! नेतु त्वां दण्डकावनम् । सिधामोति सावं मामनुयातु सुनिश्चिता ॥ ३४॥ अन्वय हे ते !, (वने पत्या सह) वसिम्यामि, इति, (दृढनिमयेन) . .

रामवनगमनम्- स्वम् , माम् , अनुयातु, (यत ) सुनिश्चिता, (अत ) सा, दण्टकावन नेतु, मम (या) मति ( त्वद्भावापरिज्ञानाविरुद्धासीत् ) सा (इदानी) सना (जाता)। सुधा--हे सौते = जनकात्मजे । ( वने पत्या सह) वसिष्यामि = वरस्यामि, इति-एव ( दृढनिश्चयेन ) त्व मास्वान्तम् , अनुयातुम् - अनुगन्तु (यत ) सुनिधिता= सुनिर्णाता, (अत ) त्वाम्मवती, दण्डकावन = दण्डनाममहार एय, नेतु प्रापयितु = मम-रामस्य, (या) मति =बुद्धि , (त्वदावापरिशानादि रुद्धासीत् ) सा=मति , ( इदानो) सन्ना-विशीर्णा, सम्प्रति त्वद्भाव परिशाय सहैव वन नेष्यामीत्याशय । इन्दुमतो-( रामचन्द्रजीने कहा-) हे सीते। पहले तो, तुम्हारे मनका अभिप्राय न जानने के कारण ही मेरी इच्छा तुम्हें दण्डक वनमें ले चलनेकी नहीं थी, किन्तु अब तुम्हारा मेरे साथ वन चलने का दृढनिश्चयको देखकर मेरा विचार बदल गया है, अब में तुम्हें अपने साथ दण्डकबनमें ले चलूगा । सा हि सृष्टानवद्यागो वनाय मदिरेक्षणे।। अनुगच्छस्व मा भीरु ! सहधमवरी भव ।। ४०॥ अन्वय-है मदिरेक्षणे !, हि, अनवद्याङ्गी, सा, (ख) वनाय, सृष्टा (असि प्रत ) हे भीरु | माम् , अनुगच्छस्व, (तथा वने त्व) सहधर्मचरी, भव । सुधा-हे मदिरेक्षणे =मदिग-"सौष्ठवेन परित्यक्ता स्मेरागजमनोहरा । वेरमानान्तरा दृष्टिर्मदिरा परिकीर्तिता" इत्युक्तलक्षणेन दृष्टिविशेष , तद्युक्तम् ईक्षणम्-अवलोकन यस्या तत्सम्बुद्धौ । हि = यता, अनवद्याजी-अनवद्य-निष्पा पम् , अङ्ग-शरीर यस्या सा तथोक्ता, सा= पातिव्रतधर्मपालने प्रसिद्धा, (व) वनाय = वनवासाय, सृष्टा=निश्चिता, यद्वा-श्रवती (असि, अत ) हे भीरु कातरे !, माम् , अनुगच्छस्व-अनुव्रजस्व । (तथा वने (ख) सहधर्मचरी सहधर्मविधायिनी, भर । एतेन वनवाससाध्यस्य स्वधर्मस्य रोवघजस्य त्वया विनाऽसम्भव इति सूचितम् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे मदिरेक्षणे । ( रालोचने!) जव धर्मस्वरूपा तुम वन जानेके लिये ही बनायी गई हो तब हे भीर । तुम मेरे साय वन चलो और मेरे धर्मानुष्ठानमें साथ हो जाओ। सर्वथा सदृश सीते! मम स्पस्य कुलस्य च । व्यवसायमनुकान्ता का-ते ! त्वमतिशोभनम् ॥४१॥ - सुधा-इन्दुमतो-टोकाइयोपेतम् । ११७ श्रन्यय -हे सीते, व, सर्वथा, मम, कुलस्य, च,स्वम्य, इनस्य (अप) सदृश, व्यवसाय, मनुकान्ता, (अति थन एतत्) हे कान्ते । श्रतिशोभनम् , (सनातम्)। सुधा-हे सीते-जनका मजे !, व-भवती, सर्वथा - सबप्रकारेण, मम, कुलस्य-रघुवंशस्य, च-पुन , स्वत्य-स्वकीयस्य, कनस्य -वशस्य, (अपि) सदृश - तुल्प, व्यवसा मनुसरणविषयकाध्यवसायम् , अनुकाना-प्राता, (पछि अत एतत् ) हे काते मनोग्मे , अतिशोमनम् प्रतिमय (सजातम् )। इन्दुमती-(रामच जीने कहा-) हे मोते । मेरे साप वन चलनेका तुम्हारा विचार बहुत ही उत्तम है, क्योंकि वह तेरे पितृकुल और मेरे कुनके सर्वथा अनुरूप है। भारमस्व शुमश्रोणि वनरासनमा किया । नेदानी बरते सीते ! स्वर्गोऽपि मम रोचते ॥ ४२ ॥ अन्धय-हे शुभश्रोणि, वनवासक्षमा, किया , प्रारभस्त्र, हे सीते। खहते, इदानी, स्वर्ग, अपि, मम, न रोचते । सुधा--हे शुभश्रोणिशोभनकटे', वनवासमा वनवासहिता "क्षम शक्त हिते विधु" इत्यमर । क्रिया दानादिकर्माण, प्रारमत्व प्रारमस्व, हे सीते-वैदेहि !, स्वहसे - त्या विना, इदानीम्-रख दनिधये, स्वर्ग अरि- देवलोकोऽपि मम -रामाय, न रोचतेन प्रोणाति । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे शुभोणि सीते ! वनवास जानेको तैयारी करो। तुम्हारे विना इस समय मुझे स्वर्ग भी उही रुचता। ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि भिक्षुफेभ्यश्च भोजनम् । देहि चाशसमानेभ्यः सरस्व च मा विरम् ॥ ४३ ॥ मन्वय -श्राशसमानेम्य , मिनुलेभ्य , ब्राझणेम्य , च, रत्नानि, च, भोजन, च, देहि, च सवरस्व, मा, चिरम् । सुघा-प्रारासमानेम्य = मनमुच्चारयितृम्य , भितुवेम्प याचवेभ्य , बाह्मणेम्य = विभ्यभ, रत्नानि = उत्तमवस्तूनि, च-पुन , भोजन खाद्य च, देहि = अपय च तथा, सवरवगमनाय शीघ्र प्रयतस्व, मा चिर- बिलम्ब न कुरु। इन्दुमतो-(रामच द्रजीने कहा-) हे सोते !, मगलराठ करने वाले नामयोंको लादि दास दो और मिनुकोको भोजन दो तथा अव विनम्ब मव !

- ११८ रामवनगमनम्- करो (वन चलने के लिये शीघ्र तैयार हो जामो)। भूपणानि महार्हाणि वरवस्त्राणि यानि च । रमणोयाश्च ये केचित्क्रीडाश्चिाऽप्युपस्करा ॥४४॥ शयनीयानि यानानि मम चान्यानि यानि च । देहि स्वभृत्यवर्गस्य ब्राह्मणानामनन्तरम् ॥ ४५ ॥ मन्वय.-प्राह्मणानाम् , अनन्तर, मम, च क्रीड़ार्या, रमणीया, थे, केचित् , उपस्करा , ते, च, यानि, महार्हाणि, भूषणानि, च, वरवस्त्राणि, अपि, च, यानि, यानानि, शयनीयानि, (तानि ) अन्यानि च स्वमृत्यवर्गस्य, देहि । सुधा-ब्राह्मणाना% ब्राह्मणस्प्रदानदानानाम् , अनन्तरतदुत्तर मम, च-स्वस्य, क्रीडार्या -कीडामात्रप्रयोजनका , रमणीया = मनोहरा, ये केचित् उपस्करा -स्वर्णमयपुत्रिकादिसामप्रय, ते सर्वे, च = पुन , यानि, महा हॉरिण-बहुमूल्यानि, भूषणानि-हेमाजदाद्यलहारा, च-तथा, वरवस्त्राणि भपि %3D उत्तमवसनायपि, च = पुन , यानि, यानानि-रथा शयनीयानि - स्वारयोग्य वस्त्रादीनि ( तानि ) अन्यानि- उत्ताऽवशिष्टानि च (यानि तानि) स्वमृत्य- वर्गस्य स्वदासवर्गभ्य , देहि = वितर । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे सीते ! तुम अपने और मेरे बहु मूल्यक सभी श्राभूषण तथा श्रेष्ठ (रत्न जडित) जितने वस्त्र हैं वे तथा अन्य भी जो उपहारमें प्राप्त बहुमूल्यक विनोदका सामान है वह एव भोढने-बिछौने तथा सवारी श्रादि ( जो कुछ उपभोगा सामान हो वह ) ब्राह्मणोंको देकर अवशिष्ट जो बचे वे नोकरों-चाकरों को दे दो। अनुकूल तु सा भीत्वा गमनमात्मन । तिन प्रमुदिता देवी दातुमेव प्रचक्रमे ॥ १६ ॥ अन्वय -श्रात्मन , गमनम् , मर्तु , अनुकूल, ज्ञात्वा, प्रमुदिता, (सती), देवी, सा, क्षिप्र, तु, दातुम् , एव, प्रचक्रमे। सुधा-श्रात्मन -स्वस्य, गमन बनाय गन्तुम् , म = बल्लभस्य, श्रनुकूलम् = अविरुद्धम् , हावा -अवबुध्य, प्रमुदिता = प्रहर्षिता, (ती) देवी-देवतावदाराघनीया, सा-सीता, क्षिप्रमशीन, तु, दातु = वितरितम् एष, प्रचक्रमे-श्रारब्धवतो। इन्दुमतो-(बाल्मीकिजी कहते हैं कि-) अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको 4 सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । मनुकूल देख तथा उनके साथ अपना वनजाना निधय जानकर सीताजी अति प्रसन्न हुई और (रामदनी के कथनानुसार ) शीघ्रतासे ब्राह्मणों को और नौकर- चाकरोको यथा योग्य वस्तु सब देनेके लिये उद्यत हो गयो । तता प्रहृष्टा प्रतिपूर्णमानसा यशस्विनी भरवेक्ष्य भाषितम् । धनानि रत्नानि च दातुमङ्गना प्रचक्रमे धर्मभृता मनस्विनो ॥७॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽयोध्याकारडे त्रिंश सर्गः । अन्वय -भतं , मापितम् , अवेक्ष्य, तत , प्रहधा, प्रनिपूर्णमानता, यश स्विनी, मनस्विनी, श्रङ्गना, धर्मभृता. धनानि, च, दातु, प्रचक्रमे । सुधा-भत -पत्यु , भाषित-वचनम् , अवेक्ष्य - बालोय, तत - तदनन्तर, प्रहृष्ट-प्रमुदिता, प्रतिपूर्णमानसा- प्रतिपूर्णम्-अतुग्ध मानस- चिच यस्या सा तयोका निमि तेत्यर्थ , यशस्विनी-कीर्तिमती, मनस्विनी दृढमनस्का, अञ्जना - स्त्री सौता, धमभूता- धर्मभृद्भय , धनानि = वित्तानि, रत्नानि = बहुमूल्यवस्तूनि च, दातु-पितरितु, प्रचक्रमे = प्रारब्धवती। इति श्रीवाल्मीकीयरामायणेऽयोध्याकाण्डे "सुधा" टोकाया त्रिंश सग । इन्दुमती-यशस्विनी सीताजी स्वामी श्रीरामचन्द्रजीको अपने अनुक्ल बोलते देख प्रसन्न होकर निक्षित हो गया ( उनकी सारी दुख-व्यथा दूर हो गयी ) और मनस्विनी सीताजी घमारमा ब्राह्मणोंको ( रामचन्द्रजीके क्थना नुसार ) धन-रत्नादि दान देने लगों। इसप्रकार इन्दुमती टीकामें अयोध्याकाण्डका ३० वा सर्ग समाप्त हुआ। एकत्रिंशः सर्गः भ्राता लक्ष्मण पव थुत्या स सपाद लक्ष्मणः पूर्वमागत । वाष्पपर्याकुलमुख शोक लोदुमशक्नुवन् ॥ १॥ अन्वयः--पूर्वम् , श्रागत ,दापपर्याकुनमुख , स, लक्ष्मण , एव, सवाद, भुता, शोक, मोदुम् , अशनुषन् ( सन् यास)। सुघा-एवं गमेण सौनागमने स्वीकृते लक्ष्मपत्यानुगमनप्रार्थनमुपदि पलाइ-पवमिति । पूर्व-कौशल्यागृहावामसीतासवादप्रवृत्त प्राव, आगत - .

. १२० रामवनगमनम्-- श्रायात , बाष्पपर्याकुलमुख =अश्रुग्यासवदन , स , लक्ष्मण - सौमित्रि , एवम् अनुपदोकप्रकारेण, सवाद = सीतारामोक्तिपरयुक्तौ ध्रुखा=श्राकर्ण्य, शोकम् = अर्धशरीरभूताया सीताया अपि वनानुगमन कृच्छादेवानीकत मम कथ तत्स- भविष्यतीति सभावितरामविरहज सताप, सोटु = मर्षितुम् , अशक्नुवन् = अपारयन् (सन् प्रास)। इन्दुमती-(महषि वाल्मीकिजी कहते हैं कि-) श्री राम-सीताके श्रापब में परस्पर बात-चीत प्रारम्भ होनेके पूर्व ही श्रीलक्ष्मणजी वहा पहुँच गये थे। वे इस बात-चीतको सुनकर (अर्थात् राम-सीताका वन जाना निश्चित समझार) शोक वेगको रोक्नेमें असमर्थ हो गये, उनका मुख रोदनाश्रुमे व्याप्त हो गया। स भ्रातुश्चरणो गाढ निपीडय रघुनन्दन । सीतामुवाचातियशा राघव च महाग्रतम् ॥ २॥ अन्वय --प्रतियशा ,स रघुन दन , धातु, चरणी, गाद, निपीडय, सीताम् , महावतम् राघव च, उवाच । सुधा-अतियशा = उत्कृष्ट कीत्तिमान , स = सर्वजनविदित , रघुनन्दन - लक्ष्मण , भ्रातु =रामस्य, चरणौ = पादौ गाढ = दृढं, निपीड्य-प्रणम्य, सीता-भ्रातृजाया, (चक्षुरादिमि प्राथयन् ,) महाव्रत-न त्यनेय क्थचन एत बत मम इत्युक्तगुरुतरनतयुक्त, राघव राम, चतु, उवाच =स्वाभिमत फलाय विज्ञापयामास । स्वाभिमतप्राप्ती सीताशरणगमनमेव मगमनमजीकार यत्येवमयमेव मुख्य उपाय इति मत्वा तस्मार्थनेत्यवग-तव्या । इन्दुमता-रघुकुल का आनन्दवधक महायशस्वी श्रीलक्ष्मणी जी अपने बडे भाई श्रीरामचन्द्रजीके चरणों में साष्टाग प्रणाम कर महाव्रतधारी श्रीरामचन्द्रजी तथा सीताजी से (रोते हुए ) कहने लगे। यदि गन्तु कृता वुद्धिर्वन मृगगजायुतम् । मह त्वानुगमिष्यामि वनमने धनुर्धर ॥३॥ मन्वय -(हे राघव) यदि, मृगगजायुतम् , वन, ग तु, बुद्धि , कृता, (तर्हि ) श्रह, (तव) श्रग्रे, धनुधर , ( सन् ) वा, वनम् , अनु, गमिष्यामि । सुधा-बैर्यमथयते-यदीति । (हे राधव ), यदि-चेत् , मृगगजायुत= हरिणहस्तिस्युत, वन-महारण्य, गन्तुन्यातु, बुद्धि न्मतिः, कृता-निधिता ( तहि ) अह = लक्ष्मण , (तव) अप्रे-पुरत , धनुर्धर -धृतधनु (सन् ) , . - सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । १२१ साखा वनम तार, बन =महारण्यम् , अनु = सह, गमिष्यामि अजिष्यामि । यद्वा-अनु पश्चात् , (अपि) गमिष्यामि तया च तवाग्रे पश्चाद्वा यत्र दुष्ट. मृगादिशङ्का तत्र धृतधनुरह सावधानो गमिष्यमीत्यर्थ । "यदि इत्यनेन रामस्य दनगमन स्पानभिमतमित्यवधेयम् । इन्दुमती-(लक्ष्मण जीने कहा-हे राघव ) यदि मृग, हाथी आदि पशुप्रो- से व्याप्त धनमें जाने श्रापने निश्चय कर लिया है, तो मैं भी आपके पोछे चलूगा और वनमें श्राप ग्रागे भागे धनुष-वाए लेकर ( सगरक्षक बनकर रहूगा। मया समेतोऽरण्यानि रम्याणि विचरिष्यसि । पक्षिभिर्मूगोश्च सधुष्टानि समन्तत ॥ ६ ॥ मन्वय.--(हे राघर ! ) मया, समेत, समाव , पक्षिमि, मृगयूथै , च, सघुष्टानि, रम्पाणि, अरण्यानि, विचरिष्यति । सुधा-(हे राघर ! ) मया-धनुर्धरेण, समेत सहित , सम तत =अमित , पक्षिमि = शकुन्तै , मृगयर्थे हरिणसमूहे , च सघुधानि-सवितानि, रम्याणि मनोहराणि, अरण्यानि-वनानि, विचरिष्यसि-भ्रमिष्यसि । इन्दुमतो-(लक्ष्मणजीने कहा- हे राव ) जिन वनोंमें पक्षो और मृगों के झुरद चारो श्रोर सम्यक् प्रकारसे सुदर शब्द करने हैं ऐसे रमणीय उन वनौमें आप मुझको सायमें लेकर धूमे ( तो मुझे बहुत प्रानन्द होगा) न देश्लोकाक्रमण नामरत्वमह वृणे। ऐश्वयं चापि लोकाना कामये न स्वया विना ॥ ५ ॥ अन्वयवया, विना, अह , देवलोकाक्रमण न, कामये, (तथा स्वया- बिना अमरत्वम् , च, (अह), न, वृणे, (तथा त्वया 1 वना) लोकानाम् , यम् , अपि,न (कामये)। सुधा-नन्वय भोगानुपमुख्य बया स्थातव्यमित्या पाह-ति । खया- विना, अह-लक्ष्मण , देवलोकारमण, (१) नहुरादिवदेवलोकमारोह , (१) पुरा विन वृत्रवन ब्रहत्यापारशनिनि देवेद्र मानससरोवरे तिष्ठति देव स्वर्गलोक्मराजक वीक्ष्य चद्वशोयो राजा नहुष स्वतपोभिर्विवध्य स्वगराउये प्रतिष्ठापित । सच कदाचिदिदायाँ कामयमानस्तया-उक्त 'राजन् ! यदि भवान् महर्षिमिवाहिता शिवि कामारुन मगबनमागमिष्यनि ददा भवन्तमह मानिध्यामि" इति । तदेवीकय नवस्तु, भृग्वा दोन देवान् शिविकायर्या वाहकत्वेन नियोज्य तामारय दापी प्रति नजन् सोम वनितु पुरो भवता, १२२ रामवनगमनम्- न कामये नाभिलषाभि, (तथा त्वया विना ) अमरत्व, च न वृषे = नस्वीक रोमि, (तथा त्वया विना) लोकाना भूर्मुवस्वरित्यादिचतुर्दशभुवनानाम् , ऐश्वयम् अपि = लोकाधिपतित्वमति, ब्रह्मवमिति यावत् , न, (कामये)। इन्दुमतो-(लक्ष्मणजाने कहा-हे राघव 1 ) आरके विना न तो मुझे स्वर्गकी, न अमरत्व और न त्रिलोकोके ऐवयकी ही इच्छा है। एव वाण सौमित्रिर्वनवासाय निम्धतः । रामेण बहुमि सान्त्वैनिषिद्ध पुनरब्रवीत् ॥ ६॥ अन्वय -वनवासाय, निश्चित , एव, ब्रुवाए , सौमित्रि , बहुभि , सान्दै , रामेण, निषिद्ध (अपि) पुन , अत्रवीत् । सुधा-वनवासाय = वनवास विधातु, निश्चित = कृतनिश्चय , एवम् = उत्तप्रकारेण, ब्रुवाप = कप्यमान , सौमित्रि = लक्ष्मण , बहुभि अनेकप्रार, सान्त्वे = वियोगश्रवणजनितोद्वेगशाम , (वचन ) रामेण = ज्येष्ठमात्रा, निषिद्ध पारित , (अपि) पुन = भूय , अब्रवीत् = अोचत् । इन्दुमती-(वाल्मीकिजी कहते हैं कि-) लक्ष्मण जीके इस प्रकार कहने. पर और उनको भी अपने साथ वन जानेको उद्यत देख श्री रामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीको बहुत प्रभारसे समझाया और नहीं चलनेको कहा, परन्तु मक्ष्मणजी (नहीं माने) पुन कहने लगे- मनुज्ञातस्तु भवता पूर्वमेव यदस्म्यहम् । किमिदानी पुनरपि क्रियते मे निवारणम् ॥ ७ ॥ अन्वय–यत् , पूर्वमेव, भवता अनुशात अहम् , अस्मि, तु। इदानी, पुना, अपि, मे, निवारण कि, क्रियते । सुधा-यत् = यस्मात् कारणात् , पूर्वमेव प्रागेव, भवता-श्रीमता, अनु आज्ञापित , (तस्मादपरिताप सस्त्वमप्यनुविधाय माम् । प्रतिसहारय क्षिप्रमामिषेचनिकी क्रिया" इत्यनेनादिष्ट , तया“भ्रातृपुत्रौ ममौ चापि द्रष्टच्यौ च विशेषत । त्वया भरतशत्रुघ्नौ प्रारणे प्रियतरी मम ॥” इत्यनेन च भरतशत्रु । भयोरेव सीताया अनुसरणीयत्वोच्या चादिष्ट ) अह लश्मए , अस्मि, तु = यायिन भूगु मूनि "सप सप" इति कथयन्नताद यद । अत्रान्तर भूगोवद्यास्वन्तस्तिो भगवान गरत्यस्तत्पदेन ताडित गप व सप सन् पतितो भव" तेन च नहुए सपो मृत्ला हिमालय गुहायामपदिति महाभारतीया कथा। ज्ञात - , एतत्, . सुधा-इन्दुमती-टीकादयोपेतम् । १२३ वहि, इदानी - सम्प्रति, पुनरपि = भूयोऽपि मे=मम, निवारण-निषेध , विजय क्रियते= विधीयते । किं च "पूवम्" इत्यस्यावतरणसमयेऽपीत्यर्योऽरि । इन्दुमती-(लक्ष्मणजीने कहा-हे राव !) आपने तो पहले मुझे (वनजानेकी) आज्ञा दी थी, फिर भी इस प्रकार निवारण (मना) क्या कर रहे हैं। यदयं प्रतिषेधो में क्रियते, गातुमिच्छत । पतदिच्छामि विशातु सशयो हि ममाऽनघ !॥८॥ मन्वय ~गन्तुम् , इच्छत , यदर्थ, मे, प्रतिषेध , (भवता) क्रियते, विशातुम् , (अहम् ) इच्छामि, हि, हे अन । मम, (हदि महान् ) सशय. (अस्ति). सुधा-ननु प्रयोजनविशेषस्य विद्यमानत्वात् पूर्व गमनायानुशत सम्प्रति सदभावानिवार्यसे इत्यत श्राह-यदिति । गतुभ्यातुम् , इच्छत = अभिलषत , यदयं = यनिमित्त, मे = लक्ष्मणस्य, प्रतिषेध = निवारण (मवता) क्रियते - विधायवे, एतत् - निमित्त, विज्ञातुम् = श्रवोद्भुम् , ( महम् ) इच्छामि-अभि लपामि, हि = यत , हे अनध-निष्पाप , मम-लक्ष्मणस्य, ( हदि महान् ) सशय. पूर्व केनाऽभिप्रायेणानुमति , सम्पनि केनाऽभिप्रायेण निवारणामिति सदेह , (अस्ति)। इन्दुमतो-(लक्ष्मएजीने कहा-) हे अनध! (निष्पाप) जिस कारणसे श्राप मुझे बन जाने से रोकते हैं, उस कारणको में जानना चाहता हूँ, क्योंकि इस निषेधको सुनकर मुझे बहुत संशय हो गया है। ततोऽनवान्महातेजा गमो लक्ष्मणमग्रतः। स्थित प्राग्गामिन धीर याचमान कृताञ्जलिम् ६ ॥ अन्वय-तत , महातेना, राम , अप्रन , स्थित, प्राग्यामिन, याचमान, धीर, कृताञ्जलि, लक्ष्मण, अबवीत् । सुधा-तत लक्ष्मणकयनानन्तरम् , महातैना=अतितेजस्वी, राम , अप्रत = अग्रे, स्थित-वर्तमानम्, प्रागामिन-रामगमननिमये सति रामगमनापूवमेव गम नशील, याचमान-सहगमन प्राथयन्त, घोर-धैर्यवन्त, कृताञ्जलि यानाव्यञ्ज- कालल्युक, लहाए-मोमिनिम् , अत्रवीत्यवोचत् । इन्दुमती-(वाल्मीक्जिी कहते हैं कि--) हाथ जोड़कर बन जानेके .

. १२४ रामवनगमनम्- लिये प्रार्थना करते हुए और पहले से धन यात्रा करनेके लिये तैयार आगेमें खड़े हुए उन धीर श्रीलक्ष्मणजी उपयुक्त वचनोंको सुनकर महातेजस्वी श्रीराम चद्रजी कहने लगे-1 स्निग्धो धर्मरतो घोर सतत सत्पथे स्थित । प्रिय प्राणसमो वश्यो विधेयश्च सखा च मे ॥ १० ॥ मयाद्य सह सौमिने ! त्वयि गच्छति तद्वनम् । को भजिष्यति कौशल्या सुमित्रा वा यशस्विनीम् ॥ ११ ॥ अन्वय-हे सौमिने !, च, (त्व) स्निग्य, धर्मरत , धौर , सतत, सत्पथे, स्थित , ( मम ) प्राणमम , प्रिय , वश्य , विधेय , मे, सम्वा, च, मया, सह, श्रद्य, वयि, तदन, गच्छति ( सति ) यशस्विनों, कौशल्या, सुभित्रा, वा, फ, भजिष्यति। सुधा-तद्वचनमेवाह = स्निग्ध इत्यादिना । श्लोकद्वयमेकान्वयि, च शब्दौ यद्यपितथाप्यर्थवाचकौ, वाधायें । हे सौमित्रे लक्ष्मण । यद्यपि (त्व ) स्निग्ध =मद्विषयक्स्नेहवान् , धर्मरत = मत्तोषककर्मनिष्ठ , धीर =कर्मविषयकप्रमादरहित , सतत = निरन्तर, सत्पथे वेदोकमार्ग, स्थित वर्तमान , ( मम ) प्राणसम = प्राणतुल्य , प्रिय =स्नेही, वश्य = मदधीन , विधेयः = मया अवश्य घारणीय , मे = मम, सखा- सुहृत् , ( वर्तसे ) च- तथापि, मया = रामेण, सह-सार्ध, अद्य - अस्मिन्नहनि, त्वयिमवति, तदन = मृगगजादियुत मजिगमिषित दण्डकारण्य, गच्छति-व्रजति, (सति ) यशस्विनी कीर्तिमती, कौशल्या = मम मातर, सुमित्रा तव मातर, वाच, क भजिष्यति- क सेविष्यते । मम विरहजनितसन्तारोगसमयेऽनयोश्चित्तशाति त्वदन्य क करिष्यतीत्याशय । इन्दुमती-( रामचन्द्रजीने कहा-) हे लक्ष्मण ! तुम मेरे स्नेही, धर्ममें रत, पराक्रमी, सर्वदा सन्मार्गपर चलनेवाले, प्राणके समान प्रिय, भक्त, मेरे छोटे भाई हो और मेरे मित्र भी हो (श्रत यदि तुम मेरे साथ वन चलोगे तो मुझे थाराम मिलेगा, कि तु-) हे सुमित्रानन्दन ! श्राज मेरे साथ तुम्हारे भी वन चले जानेपर यशस्विनी माता कौशल्या और सुमित्राको सेवा-मुश्रपा कौन करेगा। मभिवर्षति कामैर्य. पर्जन्य पृथिवीमिव । स कामपाशपर्यस्तो महातेजा महीपति ॥ १२ ॥ 3D सुधा-इन्दुमती-टीकादयोपेतम् । १२५ मन्वय ~महातेजा , य , महोपति , पृषियों, पर्जन्म , इव, अभिवति, स, (सम्प्रति ) कामपाशपयस्त (अस्ति)। सुधा-ननु भतवास्या रक्षको भविष्यतीत्यत श्राह-अभिवतीति। महातेजा-अतितेजस्वी य, महीपति -राजा, पृथिवों-भूमि, पजन्य मेर इब, अभिवपति-प्रजेप्सितमखिल ददाति, 8 महीपति (सम्पति) काम पाथपर्यस्त = कामपाशेन-कैकय्यनुरागण, पर्यस्त -पद्ध, (अस्ति ) अत एव तस्मादक्षण तस्या सम्भव इयाशय । इन्दुमतो- ( रामचन्द्रजीने कहा-) हे लक्ष्मण । महापराक्रमी पृथिवीपति महाराज (पिताजी) मेघको तरह अथात् मेव जैसे पृथिवीका मनोरथ पूर्ण करता है (यथावसर पर वरस कर शस्य-समृद्धि करता रहता है ) उसी प्रकार सबरे मनोरथको पूर्ण करते थे कि तु वे तो अभी काम-पाश में बघ गये हैं (कैकेयी के कुचक्रमे फस गये हैं)धे माता कौशल्या और सुमित्राको भनाई नहीं कर सकेंग (अत तुम्हारा यहा रहना भावश्यक है)। साहि राज्यमिद प्राप्य नृपस्याऽश्वपते सुता। दुपिताना सपत्नीना न करिष्यति शोभनम् ॥ १३ ॥ मन्वय ---अश्वपते , नरस्य, मुरा, सा, हि, हखिताना, सरस्नीना, ( समीपे ) इट, राज्य, (साप्यापि ) शोभनम् , न, करिष्यति । सुधा-ननु तहि प्राप्तराज्याधिकारवाकयी रक्षिष्यतीत्यत्राइ-सेति । अश्वपते - श्रश्वपतिनाम्न नृपस्य-राज्ञ मुता-दुहिता, सा हि = कैरेयी अषि, दुखितानामद्वियोगजनितप्राप्तक्लेशाना, सपत्नीना कौशल्यादीना (समीप ) इद राज्यम्-इदमाधिपत्य (प्राप्यापि ) शोभन शोकोद्वेगसमये सा नवनावाक्यस्तस्या हृदयस्य समाधानरूप मङ्गल, न करिष्यति-न पालयिष्यति एतेन तदु ग्वदु खिता बैंकय्यप्यवश्य न भवितेति प्रचितम् । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-हे लक्ष्मण ! ) राजा अश्वपतिकी कन्या कैकेयी जय ( भरतारे राज्याभिषेक होने पर ) राज-माता होगी, तब पर अपनी दुखिनी सपत्नी कौशल्या और सुमित्रा प्रति अच्छा वि नहीं करेगी (अत तुम्हारा यहा रहना आवश्यक है)। न समरिष्यति कौशल्या सुमित्रा च सुदु खिताम् । भरतो राज्यमासाध फैकेच्या पर्यवस्थित ॥१५॥ مد - ।

१२६
रामवनगमनम्-
.
-
मन्वय -कैकेय्या, पयवस्थित, भरत , राज्यम् , अागद्य, सहुखिता,
कौशल्या, सुमित्रा, च, न, स्मरिष्यति ।
सुधा-ननु भरत पालयिष्यतोत्यपेक्षाया सोऽपि कैकेयी परतन्त्र न पाल
यिष्यतीत्यभिप्रायेणाइन स्मरिष्यतीति। कैकेय्या-कैकेयीसपत्नीतिरस्कार-
विषये, पर्यवस्थित प्रतिष्टित , भरत = कैयोसूनु , राज्य चक्रवत्तिपदम् ,
आसाद्य =प्राप्य, सुदु खिता-मद्विरह जनितक्लेशेनातिदु खिता, कौशल्या मम
मातर, सुमित्रा तव मातर, च न स्मरिष्यति = चिन्तयिष्यति वयाच यत्र
स्मरणमेव न तत्र पालनस्य का वातेति भाव ।
इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-~हे लक्ष्मण ! ) भरत भी राज्य पाकर
अपनी माता कैकेयी के प्राशानुसार ही काम करेगा श्रत वह भी दुखिनी माता
कौशल्या और सुमित्राकी खोज-खबर नहीं करेगा ( इसलिये तुम्हारा यहा
रहना श्रावश्यक है।
तामार्यो स्वयमेवेह राजानुग्रहणेन वा।
सौमित्रे! भर कौशल्यामुक्तमर्थममु चर ॥ १५ ॥
अन्य -हे सौमित्रे । राजानुग्रहणेन, वा, (तदमावे) स्वयम् , एव,
श्रआर्या, ता, कौशल्या, भर, उक्तम् , अमुम् , अर्धम् , इद, चर ।
सुधा-~-ननु यदि चैते रक्षितुमसमर्यास्तहि मयापि रक्षितु कय शक्यमित्यत
आह-तामिति । हे सौमित्रे लक्ष्मण !, राजानुपहणेन राजानुमत्या, वा-
अथवा, (तदभावे) स्वयमेव, इह-अयोध्यायाम् पायर्या श्रेष्ठो, ता-प्रसिद्धा, कौश
ल्या मम मातर, (स्वमातर ध) भरपालय । अस्योत्तर त्वया न वाच्यमित्यत
श्राह-उक्तमिति । उक्त-मया वर्णितम् , अमुम् अर्थम्-इह स्थितौ प्रयोनन,
चर= जानीहि । "ये गत्यर्यास्ते ज्ञानार्थ" इत्युफिप्रसिद्ध प्रकृते चरो शानमों
ऽवगन्तव्य ।
इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-श्रत ) हे लक्ष्मण ! इस मेरे कथन
को मानो और तुम यहीं (अयोध्यामें ) रहकर राजा (भरत ) का अनुग्रहको
पाकर अथवा (यदि भरत तुम्हारे प्रतिकूल चले तो) स्वय (अपने भुज-बल)
अपनी श्रेष्ठ माता कौशल्या (और सुमित्रा) का भरण-पोषण करो (तुम्हारे
भी वन चले जानेपर माताओं को बढ़ा कष्ट होगा)।
एय मयि च ते भक्तिभविष्यति सुदशिता।
धर्मज्ञ ! गुरुपूजाया धर्मश्चाऽन्यतुलो महान् ॥ १६ ॥

सुधा-इन्दमती-टोकाइयोपेतम् । अन्वय हे धर्मश ! एव, च, ते, गुरुपूजाया (कृताया) सुदर्शिता, मयि, भक्ति , भविष्यति, (श्रा एव ) अतुल , महान् , धर्म , च, अपि (भविष्यति)। सुधा-मन्विहस्थिती तव शुभषामा स्यादत पाह-एमिति । है धर्मश धमवेतन् । एवम्मदुरूप्रकारेण, च-हि, तेवया, गुरुपूजाया मात्रादिशुश्रु पाया (कृताया ) मुशिता-विधिनौका, मपिरामे, भक्ति =परानुरक्ति, भवि प्यति सपत्स्यति, (अत एव) अतुल =अनुपम , महान्-अधिक, धर्म , च, अपि पुरयमापि, ( भविष्यति ) इद स्थित्वा मात्रादिशुभ्रषयाऽस्मरसेवाऽपि सजातेति न तव सेवाभरलेयोनीति भाव । इन्दुमतो-( रामचन्द्रजीने पुन कहा-) हे धर्मश लक्ष्मण ! इस प्रकार कार्य करनेसे (अयोध्यामें रहकर माता कौशल्या और सुमित्राकी सेवा करने से ) तुम्हारी परम भक्ति प्रदर्शित होगी और साथ ही माताओंकी सेवा-सुश्रूषा करनेसे तुमको बड़ा भारी पुण्य भी होगा। एव कुरुप सौमित्रे ! मकते रघुनन्दन । अस्माभिरिप्रहीणाया मातुनों न भवेत्सुखम् ॥ ७ ॥ अन्वय-सौमित्रे, मस्कृते,एव,कुरुव, (अन्यथा) हे रघुनन्दन । श्रस्मा मि, विप्रहीयाया, मातु , सुग्व, न, भवेत् , न , (च सुख न भवेत् )। सुघा-उपसहरति-एव मति। सौमित्र = लक्ष्मण, मत्कृते मदर्थम् , एव = मदुकप्रकारेण, कुरुप विधत्स्व, (अन्यथा) हे रघुन दन-रघुकुलानन्द- दायक ! अस्माभि = आवाम्या सीतया च विप्रहोणाया = वियुक्ताया , मातु = जनन्या, सुख शर्म, न भवेत् न स्यात् , ( तपासति ) न =अस्माक (च सुख न भवेत् ) अत एव न विधातव्यमित्याशय । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे रघुन मान वर्धक लक्ष्मण । मेरे कहनेसे तुम ऐसा ही करो (अयोण्यामें हो रहो) क्योंकि हमलोगोंके (हमारे, तुम्हारे और सौताके) यहा न रहनेपर माता ( कौशल्या और सुमित्रा) को मुख नहीं होगा। एवमुक्तस्तु रामेण लक्ष्मण श्लदण्या गिरा। प्रत्युवाच तदा राम वाक्यतो वाक्यकोविंदम् ॥ १॥ अन्वया--तु, रामेण, एवम् , उक्त , तस, वाक्या, लक्ष्मण, स्लदण्या, गिरा, वाक्यकोविद, राम, प्रत्युवाच । .

१२८ रामनगमनम्- सुधा-यदाय विति । तु यदा, रामेण =ज्येष्ठमात्रा, एवम्-उक्तमका- रेण, उस = कथित , तदा तस्मिन् काले, वाक्यज्ञ =युक्तियुक्तवाक्यकोविद , लक्ष्मण = सौमित्रि , श्लक्ष्णया सरसया, गिग-वाचा, वाक्यकोविदं वाक्य पण्डित, राम-ज्येष्ठनातर, प्रत्युवाच - कथयामास । इन्दुमतो-(वाल्मीक्जिी कहते है कि-) इस प्रकार जब श्रीरामचन्द्रजीने ( माता कौशल्या और सुमित्राकी देख-रेख करनेके लिये अयोध्या में रहनेको) कहा, तर युक्तियुक्तितर वाक्यों को जाननेवाले श्री लक्ष्मणजी वाक्य-पण्डित श्रीरामचन्द्रजीको मधुर वचनोंसे उत्तर देने लगे-। तवैव तेजसा वीर । भरत पूजयिष्यति । कौशल्या च सुमित्रा च प्रयतो मात्र सशय ॥ १६॥ अन्वय -हे वीर , तव, एव, तेजसा, प्रयत , कौशल्या, च, सुमित्रा च, भरत , पूजयिष्यति, अत्र, सशय , न, ( कर्तव्य ) सुधा--पूर्वोक्तानुपपचिं परिहरन्नाइ-तवैवेति । हे वीर-क्षात्रतेज सपन !, तव=भवत , एव, तेजसा = पराकमेण, प्रयत = प्रयत्नेन, कौशल्या तव मातर, च=तथा, मुमित्रा-मम मातर, च, भरत = कैयौतनय , (एव) पूजयिष्यति अप्रमेयव नराममातुरसेवाया मम महाननर्थ सपरस्यतीति मत्वा सेविष्यते,। अत्र अस्मिन् विषये, सशय =भरतो मम मातु सेवा करिष्यति न वेति सदेह , न, (क्त्तव्य किन्तु )-। इन्दुमनो-(लदमणजीने कहा-) हे वीर राघव । अापके प्रतापसे ( भयसे ) भरत माता कौशल्या और सुमित्राका प्रतिपालन करेगा (न कि दुख देगा) इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ( परन्तु-)। यदि दु स्थो न रक्षेत भरतो राज्यमुत्तमम् । प्राप्य दुर्मनसा वोर ! गर्वेण च विशेषत. ॥२०॥ तमह दुर्मति फर वधियामि न सशय । तत्पशापि तान् सास्त्रैलोक्यमपि किं तु सा ॥ २१ ॥ अन्धय-हे वीर । उत्तम, राज्य, प्राप्य, दुर्मनसा, विशेषत , गर्वण, च, दु स्य , ( सन् ) भरत , यदि, ( मातर) न रक्षत, (नदा) दुर्मति, कर, वम् , श्रह, बविण्यामि, (अत्र) सशय , न ( वर्तते ) तत् पक्षान् , तान , सर्वान् , अपि. ( हनिष्यामि ) (तसक्ष) त्रैलोक्यम्, अपि, (हनिष्यामि ) "किंतु सा" इत्युत्तरश्लोकान्वयि । .

. सुधा-इन्दुमती-टोकाद्वयोपेतम् । १२६ सुधा-तदसेवने कालान्तरमव भय दर्शयति-यडीत्यादिना । हे वीर - क्षात्रतेज सपन्न राम उत्तम = श्रेष्ठ, राज्यम् = आधिपस्य, प्राप्य लब्ध्वा, दुर्म नसा- कैकेय्यनुरोधादुशन्त करणेन, विशेषत , गर्वेण प्राप्तराज्य मा किमन्या करिष्यतोत्यहङ्कारेण, च, दुस्थ = दुर्मार्गस्थ , यहा चञ्चज्ञचित्त , (सन् ) भरत =कैकेयीसुन , यदि = चेत् , (मातर) न रक्षेत न पानयेत् , (तदा) दुर्मति = दुष्टनिधयम् (अत एव ) क्रूर-शस त-भरतम् , अह, वषिष्यामिक इनिष्यामि (अव) सशय -श्रय राजा एन हनिष्पति नवेति सदेह , न (वर्तते)। ननु तेन विरोधे तत्यक्षीयराजान्तरकृतोपद्रव स्यादत आह-तत्पक्षानिति ।। तत्पक्षान्तसक्षमाश्रि य युयुत्सून , तान् , सर्वान् अखिनान् नृपतीन् , अपि, (हनिष्यामि) ननु बहुमि सह विरोध जये सशय सभाव्यत इति चेदत बाह-- त्रैलोक्यमिति । (तत्पक्ष ) त्रैलोक्य = त्रिभुवनम् , अपि, (हनिष्यामि) तावनी शक्तिरस्मत्पाश्र्वेऽस्तीति भाव । बघियामीत्या प्रयोग । इन्दुमती-(लक्ष्मणजीने तमकर कहा-) वीर राघव ! यदि वह भरत इस उत्तम (अयोध्या ) राज्यको पाकर अपनी माता कैकेयी के कुचक्रसे विचारोको गन्दा कर देगा और तदनुसार विशेषत (अत्यन्त ) गर्व से (गज मदसे ) कुश्यगामी होकर (माता कौशन्या और सुमित्राकी ) रक्षा नहीं करेगा तो मैं उस दुष्ट नृशसको मार डालूगा-इसमें सन्देह नहीं है (कि उस समय ) जितने उसके पक्षपाती होंगे उनको भी मैं मार डालू गा । ( इतना ही नहीं) तीनों लोक मी उसकी हिमायतमें खड़े क्यों न हो मैं तीनों लोकों का सहार कर डालूगा (तु) किन्तु ( इसकी अावश्यकता नहीं होगी क्योंकि ) वह-। कौशल्या विभूयादार्या सहन मद्विधानपि । यम्या सहन ग्रामाणा समाप्तमुपजीविनाम् ॥ २२॥ भन्धयः-पूर्वत "किं तु सा" इति सम्बन्धनीयम् । ( यथैव ) किं, तु, यस्या , उपजीविना, ग्रामाणा, सहसम् , सम्प्राप्त, सा, प्रायो, कौशल्या मद्विधान् , सहसम, अपि, बिमयात् । सुधा-अपि च स्वारमभरणे कौशल्याया कस्याऽप्यपेक्षा नास्तीति दर्श यति-(कि तु सा) कौशल्येत्यादिना । (यद्येव किं तु), यस्या कौशल्याया , उपजीविनाम् = उपजीविभि मृत्यादिभिरित्यर्थ , प्रामाणा- सबसपाना "समो सवसथमामौ" इत्यमर । सहस सहस्रसख्याक, समाप्त सलग्घ, साम्प्रसिद्धा, रा ०० रामवनगमनम्- श्रार्या = कुलीना, कौशल्या व माता, मद्विधान् =मसदृशान् , सहलमपि = सहलसरयाकानपि, विभृयात्मधारयेत् पोषयेच्च । यस्या उपजीविन सहसमामा- पिया विद्य ते, या च मद्विपक्षहस्रसख्याकानपि पालयितु शक्नोति, उत्पाननविष येऽस्माभि न चिन्तनीयमित्याशय । इन्दुमती-(वह) आर्या माता कौशल्याजी तो मुझ जैसे हजारों का स्वयं पालन-पोषण कर सकती है क्योंकि जिनके नेग पाने पाले सहस्रो गावोके मालिक है। तदात्मभरणे चैव मम मातुस्तथैव च । पर्याप्ता मद्विधाना च भरणाय मनस्विनी ॥ २३ ॥ अन्वय-तत् , मनस्विनी, च, एव प्रात्मभरणे, पर्याता, तथा, एव, मम, मातु , च, भरणाय, (पर्याप्ता, तथा ) मद्विधाना, च (भरणाय (पर्याप्ता)। सुधा-उत्तमेव भङ्गमन्तरेणाइ-तदिति । तत् उचहेतो, मनस्विनी- दृढमनस्का, च एव = यथैव, श्रात्मभरणे-स्वपोरणे, पर्याप्तारिपूर्णा, तथा एवम्तेन प्रकारेणैव मम, मातु =सुमित्राया, च-अमि, भरणाय गोषणाय, (पर्याता, तथा ) मद्विधाना-मत्सदृशाना च, (भराय पर्याप्ता) अस्तीति शेष । इन्दुमती-इसलिये हे गघब ! वे यशस्विनी माता कौपल्याजी पाना और मेरी माता (सुमित्रा) का तया मुझ जैसे (सहस्रों) का भरण-पोषण भनी- भाति ( स्व ) कर सकती हैं। कुरुप्प मामनुचर वैधय॑ नेह विद्यते । कृतार्थोऽह भविष्यामि तर चार्थ प्रश्पते ॥ २४ ॥ अवय -(यदेवमत) माम् , अनुचर, कुरुम्ब, इइ, वैषम्य, न, विद्यते, (एव सति ) अह, कृतार्थ , भविष्यामि, तक, अर्य च, प्रकलते । सुधा-एव रामोक्त परिहत्य प्रस्तुत स्वाभिमत वैदर्य प्रपञ्च यताह--कुरु प्वेति । ( यदेवमत ) मानदणमणम्, अनुचर मेवकम् , कुरुष= अनुम न्यस्त्र, इह = मत्मेवानुमती, वैधय॑वैपरीत्यसाधक (विञ्चिदपि ) न विद्यते - नास्ति, भवदुक्तहेतोरन्यथासिद्धरुषगदितसादिति शेष । ननु कर्याकरणे तर का हानिरित्यत आह-कृतार्थ इति । ( एव सति ) अह, वार्य इतकत्य , भविष्यामि मविताऽस्मि, तवम्भवत , अर्थ-स्वायास दिना पलनूनाद्याहरण, च, प्रकल्लते प्रसिद्धयति, एवञ्चोमयहित मदनुगमनमित्यभिप्राय | "प्रकल्वे" इति वत्तमानसामीप्ये मविति लट् । - सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । इन्दुमतो-नत एव हे गधव । श्राप मुझे अपना अनुचर बनाइये (मुझे भी साथम वन ते चलिये) मेरे चलने में कोई भी विप्रतिपत्ति नहीं होगी। प्रत्युत कृत-क्रय हो जाऊगा और आपका भी अर्थ-साधन होगा। धनुरादाय सगुण खनित्रपिटकाधर । अग्रतस्ते गमिष्यामि पथान तर दर्शयन् ॥ २५ ॥ अन्नय--वनित्रपिटराधा , (प्रह) सगुण, धनु , भादाय, तव, पन्धान, दर्शयन् , ते अप्रन, गमिष्यामि । सुधा-कैकयमेव दशयन्नाइ-धचरित्यादिना । सनित्रपिटकाघरा = खनिन-मूलक दवानसाधक कुद्दाल , पिटका-फलमूलाधाहरणयोग्या शादिनि र्मितमञ्जूपाविशेष , खनित्रेण सहिता पिटिका परति य सम्नयात , (अह) सगुण = ज्यासहित, धनु = कामुकम् , अादाय - गृहीत्वा, तव-भवन ,पथान- मार्ग, दर्शयन् = अवलोकयन् , ने-तब, अनत =अने, गमिष्यामि-बजिष्यामि । अत्र धनुग्रहण वापदादिभ्यो नृशसजन्तुम्यो रक्षार्थम् । इन्दुमती-(लक्ष्मणजी अर्थ-साधनका स्पष्टीकरण करते हैं-) हे रात्र । में तीर-धनुप, खता (जमीनसे कन्द-मूलखोदनेका औजार ) और बासकी वनी फ्लमूल रखने की पटी लिये हुए श्रापरे श्रागे भागे ( वनमें ) रास्ता बतलाता हुधाचलूगा। आहरिष्यामि ते नित्य मूलानि च फलानि च। चन्यानि च तथान्यानि स्वाहाहणि तपस्विनाम् ॥ २६ ॥ अन्नय-नित्य, मूलानि, च, फलानि, च, तथा, तपस्विना स्वाहाणि, अ यानि, च, वन्यानि ( वस्तुनि) ते, आहरिष्यामि । सुधा-दाय पघि सम्भावित कैट्दर्यमभिधाय स्थानेसम्भाविनमाह-श्रा हरिष्यामति । निय-प्रतिदिन, मूलानि च तथा, फलानि तत्तद्ऋतुभ वानि आम्रादीनि, च तथा, तारिखना नपत्यवता जनाना, स्वाहाणि - होमयोग्यानि हविभूतानि, अयानिशा प्रियानवीज द्रादीनि, च, व याir%D वनोत्पन्नानि, (वस्तूनि ) ते - पदर्थम् , आहरिष्यामिश्रानेष्यामि । इन्दुमती- और हे राघव (वनमें ) नित्यप्रति कन्द-मूल, पल तथा तास्त्रियों के हवन करने का सामग्री एव वनमैं उत्सन्न होने वाली अन्य प्रावश्यक वस्तुयें भी ला दिया करूगा।

. मय १३२ रामवनगमनम्- भवास्तु सह वैदेह्या गिरिसानुपु रस्यते । श्रह सर्व करिष्यामि जाग्रत स्वपतश्च ते ॥ २७ ॥ अन्वय-गिरिसानुषु, वैदेह्या, सह, भवान् , रस्यते, मह, तु, ते, जाग्रत , स्वपत , च, ते, सर्व, करिष्यामि । सुधा-कैर्यान्तरमाह-भवानीति । गिरिसानुषु = पर्वतशृशेषु, वैदेह्या= सौतया, सइ सार्ध, भवान् , रस्यते= विदरिष्यते, अह-लक्ष्मण , तु, जामत = जागरण विदधत , स्वपत =शयन कुवत , च, ते तव, सवम् = आशतमनु मित, च, करिष्यामि-सपादयिष्यामि । अत्र "जाप्रत स्वपतश्च" इत्युक्या स्वस्य निद्रानघीनत्व सूचयति । इन्दुमती-( लक्ष्मण जोने कहा-हे राघव ! और ) श्राप सीताजी के साथ पर्वतोंके शिखरोंपर (निमित्त होकर) विहार कीजियेगा । मैं आपके सोते-जागते (रात्रि-दिवा) सब काय कर दिग करूगा अर्थात् रातमें आपके शयनके पहरेदारका काम करूगा और दिन में उपर्युक्त (छवीसवा श्लोकोक्त) कार्य करूगा । रामस्त्वनेन वाक्येन सुप्रीत प्रत्युवाच तम् । व्रजाऽऽपृच्छस्व सौमित्रे ! सर्वमेव सुहजनम् ॥२८॥ मन्वय - अनेन, वाक्येन, सुपीत , राम , त, प्रत्युवाच, हे सौमित्रे | व्रज, तु, सर्वम् , एव, सुहज्जनम् , श्रापृच्छरव । सुधा-अनेन = स्वपतश्चेत्य तेन, वाक्येन वचसा, सुप्रीत =सुप्रसन्न , राम , तलदमण, प्रत्युवाच-प्रत्युक्तवान् , हे सौमित्र लक्ष्मण !, प्रज== मया सह अनुगच्छ, किन्तु, सर्वमेव = निखिलमेव, मुहृज्जन=सुहृद सौ हार्द, जनयति नित्य प्रकटयतीति त मात्रादिमित्यर्य । प्रापृच्छस्वअनुमतिं गृहा ण, एतेन मात्रादिसम्मानमेव कर्तव्य न तु सह नेतव्यमिति सूचितम् ।। इन्दुमतो-रामचन्द्रजी अपने छोटे भाई लक्ष्मणजीके इन (उपर्युक) वचनोको सुन अति प्रसन्न होकर वोले- हे सौमित्र लक्ष्मण । जाओ, (पहले ) अपने सब ( माता आदि ) सुहृज्जनोसे ( मेरे साथ वन चलने की ) अनुमति ले प्रामो (तदनन्तर--)। ये च राक्षो ददौ दिव्ये महात्मा वरुण स्वयम् । जनकस्य महायज्ञ धनुषी रौद्रदर्शने ॥ २६ ॥ मभेद्ये कवचे दिव्ये तूणी चाऽक्षय्यसायको । !

, . . सुधा-इन्दुमती-टोकाइयोपेतम् । मादित्यविमलामो दौ खड्गौ हेमपरितौ ॥ ३०॥ सत्कृत्य निहित सर्वमेतदाचार्यसमनि । सर्वमायुधमादाय क्षिप्रमावज लक्ष्मण 1 ॥ ३१ ॥ अन्वय-राइ , जनकस्य, महायशे, महात्मा, वरुण, स्वय, च, ये, दौद्र दर्शने, दिव्य, धनुषी, दिव्य, अभेद्ये, कवचे (तया) अक्षय्यसायको, तूणी, च, हेमपरिष्कृती, (श्रत एव) श्रादित्यविमलाभौ, द्रौ, खङ्गो, सत्कृत्य, ददौ, एतत् , सर्वम् , प्राचार्यपद्मनि, (मया) निहित, हे लक्ष्मण ! (तत्) सर्वम् , श्रायुध, (त्वम् ) क्षिप्रम् , श्रादाय, भावज । सुधा-राश - भाते , जनकस्य-वैदेहस्य, महायशे-महामसे, महात्मा, वरुण प्रचेता , स्वय च = स्वयमेव, ये, रौद्रदर्शने भयङ्करावलोक्ने, दिव्ये अमत्य, धनुषी-चापौ, दिव्ये अलौकिके, अभेद्य-अच्छेद्य, काचे उरश्छदसी "उरश्छद कङ्कटको जगर कवचोऽस्त्रियाम्" इत्यमर । (तथा) अभयसायको- अवयवाणी, तूणीषुधी, च-तथा, हेमररिस्कृती-सुवणभूषिती, (अत एय) श्रादिस्यविमलाभौ स्वच्छदिवाकरकान्तिसशो द्वौ, खड्गौ निस्त्रिंशी, 'खरे तु निस्त्रियच द्रहासासिरिय " इत्यमर | सत्कृत्य समाय, ददौ अर्पयामास, एतत् , सर्व निखिल धनुरादिकम् , श्राचार्य समनि गुरुवसगडे, (मया) निहित = पूजार्थ स्थापित, हे लक्ष्मण सौमित्रे ! (तत्) सर्वम् अविनम् , श्रायुधम् = अत्रम् , (अत्र जातावेकवचनम्) (a) विशीघ्रम्, श्रादायगृहीत्वा, पात्रज- श्रागच्छ । अत्र धनुरादिषु सर्वत्र द्विवचनोपादानादावयोर्ददाविति सिद्धम् । यद्यप्य रामायणे बालकाण्डैऽनुकोऽय विषय , तथापि यथा सुन्दरकाण्डे "मणिरत्नमिद दत्त वैदेया श्वसुरेण मे । वधूकाले यथा वदाधिक मूनि शोमते ॥" इत्युक्त सुदरकाण्डेऽनूयते यद्वदेवात्रानुवादासिद्ध इति विभागीयम् । इन्दुमतो-(सुहज्जनोंकी श्रामा पाने के पश्चात् ) पुन हे लक्षण ! राजर्षि जनक महायज्ञर्म (जानकी-विवाहके अवसरपर ) महात्मा वरुणदेवने स्वय (अपने हाथोंसे) जो भयकर दो धनुष, दो अमोघ कवच, दो दिव्य अक्षय (जो बाणों से कभी खाली नहीं होता ऐसा ), तरकस और सुपर्णसे मदा हुमा सूर्य के समान अत्यात वेदीप्यमा दो तलवार आदि (हम-तुम दोनोको) सम्मान करके दिये थे, वे सब गुरु वशिष्ठजीके घरमें रखे हैं, उन सब अस्त्र-शस्त्रोको जेकर जल्दीसे तुम यहा चले आओ।

- १३४ रामवनगमनम्- ससुहज्जनमामय वनवासाय निश्चित । इनाकुगुरुमागम्य जप्राहाऽऽयुधमुत्तमम् ॥ ३२॥ अन्धय-बनवासाय, निश्चित , स , सुहृज्जनम् , आम श्य, (तत ) इक्ष्वाकुगुरुम् , श्रागम्य, उत्तमम् , श्रायुध, जग्राह । सुधा-वनवासाय-वन ग तु, निश्चित =कृतनिणय , स =लक्ष्मण , सुह. ज्जन = मात्रादिम् , ग्राम य = अनुमा य, (तत ) इक्ष्वाकुगुरु-रघुकुलगुरु वशिष्ठम् , आगम्य = प्राप्य, उक्कम श्रेष्ठम् , अायुधम् अस्त्र घनुरादि, जग्राह- गृहीतवान् । इन्दुमती- (वाल्मीकि जी कहते हैं कि इसप्रकार श्रीरामच द्रजीके वचनों को सुनकर ) अपना बन जाना निश्चत हुअा जान, श्रीलक्ष्मण जीने अपनी माता सुमित्रा आदि सुहाननौरे पास जाकर विदा मागी और तदुपरा न कुन-गुरु वशिष्ठजीके घरसे उन उत्तम २ (वरुण प्रदत्त) अस्त्र-शस्त्रोंको ले आये (तदुपरा त-)। तदिव्य राजशार्दूल सररत माल्यभूषितम् । रामाय दर्शयामास सोमिनि सर्वमायुधम् ॥ ३३ ॥ मन्चय-राजशादूल , सौमित्रि, दिव्य, सत्कृत, माल्यभूषितम् , सर्व, तत् , श्रायुध, रामाय, दर्शयामास | सुधा-राजशादूल = राजव्याघ्र , सौमित्रि लक्ष्मण , दिव्य-दिवि भव, सस्कृत = पूजित, माल्यभूपित-नगलस्कृत, सर्वम् = अखिल, तत्-गुरगृहानी श्रायुधम् - अस्त्रम् (जातावेकवचनम्) आयुधानीत्यर्थ । रामाय श्रेष्ठभ्रात्रे, दर्शयामास = अवलोक्यामास । इन्दुमती-क्षत्रियश्रेष्ठ लक्ष्मणजीने गुरु वशिष्ठजी घरसे लाये हुए माला प्रोसे अलकृत तथा पूजित उन सभी उत्तम आयुधोका श्रीरामच जी के सामने रखकर दिखलाया । तमुवाचात्मवान् राम प्रोत्या लक्ष्मणमागतम् । काले त्वमागत सोम्य ! काहिते मम लक्ष्मण ! ॥ ३४ ॥ अन्यय -अात्मवान् , गम , वागत, लक्ष्मण, (वीक्ष्य) प्रोत्या, उवाच, हे सौम्य । लक्ष्मण ! मम, काक्षिते, काने, ख (शीनम् ) प्रागत । सुधा-अात्मवान् जीवादिनिय ता, राम =दाशरथि , श्रागतम् आयात, तम्।

सुधा-इन्दुमतो-टीकाद्वयोपेतम् । १३५ लक्ष्मण = सौमित्रि, (वीक्ष्य ) प्रीत्या - प्रेम्णा, उवाच-उक्तवान् , हे सौम्य लक्ष्मण-सुभग सौमित्रे! मम काहिते = मदोमिते, काले-प्रयोजननिमित्त सपादनोनितसमये, व, (शीघ्रम् ) श्रागत = प्राप्त । इन्दुमती--(तदुपरान वशिष्ठ जीके घरमे धनुषादि भत्र-शस्त्रों को लेकर शीघ्रतासे ) आये हुए लक्ष्मणजीको (देखकर ) रामचन्द्रजीने प्रसन्न होकर कहा-अहो, भद्र लक्ष्मण ! (में अभी तुम्हारी याद कर रहा था ) भले समप पर तुम धागये। श्रह प्रदातुमिच्छामि यदिद मामक धनम् । ब्राह्मणेभ्यस्तपस्विभ्यस् या सह परन्तप ! ॥ ३५॥ मन्वय -हे परतप ! यत् , मामकम् , इद, धन, (तत्) सया, सह, तपस्विभ्य , ब्राह्मणेभ्य , मह, प्रदातुम् , इच्छामि । सुधा-कहितमेवाह-अमिति । हे पर-तपपरमतपस्विन् लक्ष्मण यत् , मामक= मदुपाजितम् , इद =दृश्यमान, धन वित, (तत्) त्वया - मवता, सह, तपस्विम्य = तस्यानुरातृभ्य , प्राह्मणेभ्य ,-विप्रेम्प , श्रह = राम , प्रदातु-वितरितुम् , इच्छामि = अमिलामि । इन्दुमतो-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे परमतपस्विन् लक्ष्मण ! (देवो) मेरे पास जी कुछ मेरी ( उपभोग करने की निजी ) सम्पत्ति है, उसे में तपस्वी ब्राह्मणों को दे देना चाहता हू, तुम इस कार्यमें मेरी मदद करो। वसन्ताह डढ भत्या गुरुपुदिजसत्तमा । तेपामपि च मे भूय सर्घषा चोपजीविनाम् ॥ ३६ ।। धन्वय-इह, गुरुशु, भक्त्या, (ये) द्विजसत्तमा , दृढ, वसन्ति, तेषाम, श्रपि, ( तथा ) मे, सर्वेषाम् , उपजीविना, च, भय , (दातुमिच्छामि ) सुधा-इह-मत्समीपे, गुरुपु - ज्ञानदेषु, भक्त्या प्रेम्णा, (ये) द्विज सत्तमा विप्रमुरया , दृढ = दृदपूर्वक, वसन्ति = निवसन्ति, नित्य गुरुशुश्रूषण कुर्व तीत्यथ । तेषामपि वेभ्य अपि, ( कथा ) मेमम, सर्वेशम् उपजीविना च= सर्वेभ्यो भृत्येभ्यश्व, भूय =अतिशयेन ( दातुमिच्छामि ) तानानयेति शेष । इन्दुमती-(रामच द्रजीने कहा-) हे लक्ष्मण ! इस नगर में जो गुरुमें स्ट भक्ति रखने वाले उतम ब्राझण वहते हैं, उन सबको तथा अपने भृत्य वर्गों को भी (इस वनगमनके अवसर पर ) अधिक से अधिक धन देना उचित है। . .

रामवनगमनम्। धसिष्ठपुत्र तु सुयज्ञमार्य त्वमानयाशु प्रवर द्विजानाम् । अपि प्रयास्यामि वन समस्तानम्यय शिष्टानपरान्द्रिजातोन् ॥३७॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वल्मीकीय आदिकाव्येऽयोध्याकाण्ड एकत्रिंश सर्ग । अन्धय-दिजाना, प्रवर, वसिष्ठपुत्रम् , प्रार्य, सुयश, तु, आशु, खम् , श्रानय, (तथा ) समस्तान्, अपरान् , शिष्टान् , द्विजातीन् , अपि, अभ्यh, वन, प्रयास्यामि । सुधा-द्विजाना = विप्राणा, प्रवर श्रेष्ठ वसिष्ठपुत्र =कुलगुरुवशिष्ठसुतम् , आर्य- 'वर्तव्यमाचरन काममकत्त-यमनाचरन् । तिष्ठति प्रकृताचारे स तु पार्य इति स्मृत ॥" इत्युक्तलक्षणोपेत महाकुलीनमिति यावत् । सुयशम्सुयशनामान, तु, आशु-शीघ्र, त्वम् , पानय-प्रापय, (तथा) समस्तान-सममान् , अप रान-अयान् , शिष्टान-नसाधनताशे भ्रान्तिरहितान् , द्विजातीन् ब्राझ पान , अपि, (प्रानय, अह सुयज्ञ तान् द्विजाश्च ) अम्यस्य = पूजयित्वा, पनर महारण्य, प्रयास्यामि-प्रजिष्यामि ! अन "वसिष्ठपुत्र मुयशमानय" इत्यनेन मूलप्रभोर्दशरथस्य वसिष्ठ पुरोहित "तपुत्रस्य तत्पुत्र " इति न्यायेन सुयज्ञस्य विशिष्यानयननियोग इति कुशला । इति परिडतश्रीलोकनायठक्कुरात्मज-साहित्य-व्याकरणाचार्य-श्रीकृष्णमोहन शास्त्रिनिर्मित "सुधा" टीकायामेकत्रिंथ सम । इन्दुमती-(रामचन्द्रजीने कहा-) हे लक्ष्मण । ब्राह्मणों में श्रेष्ठ वशिष्ठ- जीके पुत्र पूज्य श्री सुयशजीको तुम जाकर शीघ्र बुना लामो, मैं उनका तथा तसवात् अन्य भी सभ्य कर्मठ द्विजातियों ( ब्राह्मण-दनिय-वैश्यो) का यथा योग्य सम्मान करके बन जाउँगा। इस प्रकार दरभगा मण्डलान्तर्गत तिरौनी ग्रामवासी पण्डिन श्रीरामच द्रा व्याकरणाचार्य विरचित 'इदुमती' टीकामें अयोध्याकाण्डका एक्तीसवा सर्ग समाप्त हुआ। समाप्तश्चाऽय प्रन्थ ।

- परमलघुकला (परमलघुमजूपाप्रश्नोत्तरी) प्रस्तुत सस्करण में परीक्षा में आने योग्य सभी प्रश्नों के उत्तर ऐसे सरल तथा निट परिष्कारों से युक्त लिख दिये गये हैं कि-"एक पन्थ दो काज" याने । पय लगाने में भी इस से आपको अत्यधिक सहायता पहुँचेगी और कण्ठस्थ कर लेनेपर परीक्षा में अधिक मे अधिक नम्बर भी पासकेगें। १) मनोरमाशब्दरत्नप्रश्नोत्तरी इसमें हर एक प्रश्न उत्तर इस तरह लिखा गया है कि अभ्यास करलेने पर विद्यार्थी परीक्षा में पूरी सफलता प्राप्त कर लेंगे तथा प्रयाशय का भी पूरा ज्ञान हो जायगा। प्रपम खण्ड ॥2) द्वि. तृ• खण्ड 1-) श्वन्ध-पारिजातः मुजफ्फरपुर सस्कृत कालेज के सुप्रसिद्ध बेदान्ताध्यापक कोर १० श्रीरामचन्द्र मिश्र विरचित परोक्षोपयोगी यह प्रसन्च-पारिजात नामक अन्य वस्तुत सस्कृत रचनामें प्रथम स्थान पा लिया है ) सिद्धान्तकौमुदी-जेवी-गुटका सिद्धान्तकौमुदी का ऐसा सुदर जेवी गुटका का मनोहर सस्करण यह प्रथम पार ही छपा है। प्रति दिन सिद्धान्तकौमुदी की आवृत्ति करना विद्यार्थियों के लिये आवश्यक है । मुबह-शाम घूमते-फिरते समय तथा परदेश-यात्रा करते समय विद्याथियोंका बहुत ही समय व्यर्थ में व्यतीत होजाता है । अब जहाँ हों जाना हो इस सहसरण को जेबी में रख लीजिये और जब चाहे सिद्धान्तकौमुदी की 'श्रावृत्ति कीजिये । सूत्रसूची धातुच्यादि परिशिष्ट सहित । सिद्धान्तकौमुदी-१० गोगलशास्त्रीनेनेकृत परीक्षोपयोगी 'सरला' टीका तथा रूपलेखनप्रकार-पक्तिलेखनपकार आदि परीक्षार योगी विविध परिशिष्ट सहित स्त्रीप्रत्ययान्त |) काराकान्त २) प्रासिस्थानम्-चौखम्मा सस्कृत पुस्तकालय, बनारस मिटी।

.शक्षकः ...न्धि धातुरूप मादिरी गरिरद्धित अभिनय इसमें प्रथमारीमा के छात्रों को अनुवाद के नियम प्रत त तरल रूपमे समझाए गये हैं और तदनुमार अनुवादार्य श्रायास भी दिए गये हैं। अभ्यासार्थ वाक्यों में आए हुए प्रत्ये- कठिन शब्दों के सस्कृत से दिदी तथा हिदी से सस्कृत अनुवाद करने के प्रवध भी पुस्तक रेमात में ९० प्रकरणों में दे दिये गये हैं जिनस अनुवाद करने में अत्यत सरलता हो गई है । पुस्तक की उपादेयता पर गवर्नमेण्ट स. कालेज, हिंदू विश्वविद्यालय काशी तथा प्रागग, खुर्जा, पहारनपुर, इन्दौर प्रादि २ बड़े बड़े विद्वानों ने मुक्तकरठ से समापत्र दिए हैं जो पुस्तक में प्रकाशित आप को प्राप्त होंगे | प्राथमिक विद्या. गियों के लिए इस से कटकर अनुवाद के लिए पथ-प्रदर्शक दूसरी पुस्तक नहीं है २।) प्रबन्ध-पारिजात इसमें परीक्षापी छात्रोको सस्कृत प्रबन्ध रचना लिखने के नियम अत्यन्त सरल रूपमें समझाये गये हैं और तदनुसार परीक्षोपयोगी 'प्रवन्ध लखनप्रकार' (परीक्षा में श्राने योग्य निबन्धों का उत्तर) इस तरह सरल और सक्षिप्त में लिखा गया है कि अभ्यास कर लेने पर भी विद्यार्थी परीक्षा में पूरी सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इतना ही नहीं श्रत में(१) पत्र लखन प्रकार (चिट्ठी-पत्री, आवेदन पत्र आदिका उल्लेख ) तथा प्रसगोरयुक्त (२) 'धुभाषितगद्यावली (३) मुभाषित पद्याशावली' और (४) लौकिक न्यायमाला' आदि विषयोंका समावेश करके माधुनिक चतुरस विद्वान् बननेका सुगम रास्ता दिखाया गया है। विश्वास है कि श्राजतक ये प्रकाशित प्रबन्धोपयागी प्रन्यों में इस 'प्रवन्धकारिजात' के समान दूमरी कोई भी पुस्तक नहीं है । विदुलोपाख्यानम् सान्वय-लीला लिाम-सस्कृत-हिन्दीटोकाइयोपेतम् । सन् ४८ के नवीन पाठपरम अनुसार यह प्रयप्रकाशित किया गया इस प्रयको मौला' नामक साकृत ध्याझ्यामें अन्वय, पर्याय, समास, कोश देकर सोको पति सरल व्यापणा कर दी गयी है। साथ में "विलास' नाम विस्तृत हिन्दी भाषा टीका हामम ता इस सस्करणको उपयोगिता और भी RA बदी है। प्रथमा सुकोमलमात विद्याथियों के लिये यही एक सो माण (सदो द्वितीर सस्करण प्राप्तिस्थानम्-चाम्स 7 पुस्तकालय, रनारस। - १

Ramvangaman Sanskaran-2

Author
Shastri, Sri Krishnmohan
Title
Ramvangaman Sanskaran-2
File name
Ramvangaman Sanskaran-2
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2012/04
Publisher
Varanasi, The Chowkhamba Sanskrit Series Office
Language
Sanskrit
Pages
143
Library
Government College, Kota
Classification
Devotional
DLI number
407663
Barcode
99999990303584.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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