Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Chitmay Anukampa Vichar

Hukmi Chand · 2011/08

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धन्नोमल कपूरपर गरी मालीयार स्ट्रीट, दिली। To be had of DIANNODAL KAPOORCHAND Jercellers, Malisar Street, DELHI. पुस्तक मिमोका पता- धन्नोमल कपूरमन्द जोशी मालोमा स्ट्रीट, दिल्ली। मुद्रक- शिवचन्द तिवारी, जगदीश प्रेस १०८, काटन स्ट्रीट, फलकता।

$3731
भूमिका
जक्ल पतिपय जैन नामधारी सिपा ने अपने विपरीत
मन्लयों द्वारा दवा-दान आदि पवित्र महाबोर स्वामी के
सिलान्त का जित निखरता के साथ शिरोध किया है उसका
अपलोकन करते हुये कहना पड़ता है कि नीयंकरों के टचन
सिमान्तों को इन निर्दय सिद्धान्तों से पताना लेक धार्मिक
उनका क्या है।
मारवाड़ और मेवाड़ मादिमें रहनेवाली यहुसंश्यक बनता
अशिक्षित तथा शास्त्र समन्यो शान से रहित होकर दान, दया
के शिरत सिद्धान्त फोमानती है। उसके सुधार तथा शिक्षा
का कोई उपयुक्त सायन सन्मति नहीं है, परिक दवा-दान
के विरोधी नामधारी "जैन साधुओं को पनाई हुई दालों
(दो) के रे में पड़कर पुरी तह से मशानान्धकार में पंसी
इनके उद्धार का स्पार-तक वितर्क करना-सन्धास्त्र
मोक्न करना, मत्यन्त निषेध (सस्त मना) किया गया है।
अतः इनके द्वार तथा धर्म सामन्या शास्त्रीय ज्ञान का एक
रही पड़ शेष रह गया है । वह है अनुकम्मा आदि विषयक
लोसाकार करना।
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(३) । नायो दाई तथा पिता का नाम धो जीवराज था। आप ओस- वाल घंश में कुवाड़ गोत्रीय थे। सांसारिफ विपयों को विर के समान समझ फर पूर्ण बैराग्य सम्पन्न हो, मात्म फल्याणार्य मुनी श्री १००८ श्री मगन मुनी जी से सं० १६४६ वि० में दीक्षा ग्रहण की। अतः आपका जन्म मारवाड़ में न होने से मातृ-भाषा मारवाड़ी नहीं है । तथापि अपनी विमल प्रतिभा से थोड़े ही समय में मारवाड़ो भाषा भी अच्छो प्रकार जानलो। धर्म सम्बन्धी सिद्धान्तों को यदि मारवाड़ी भाषा में न यना फर शुद्ध हिन्दी में रचना करते तो जिस सिद्धान्त को लक्ष्य फरफे इसकी रचना की गई है उससे सर्वथा नहीं तो अधिकांश में जनता को उस ज्ञान से घंचित रहना पड़ता, क्योंकि प्रत्येकप्राणी अपनी मातृ भाषा में जितना शीघ्र किसी ज्ञान को धारण कर सकता है. उतना किसी अन्य भाषा से नहीं। ऐसा निश्चय फर प्रायधीजो ने इन दालों को मारवाड़ी भाषा में उसी तर्ज और उदाहरण पर रवा, जिस तर्ज और उदाहरणमें दया-दान को पाप पतला फर धर्म विरुद्ध दालें पनाई गई थी। पूज्यश्रीजी ने भाषा और कविता पर उतना ध्यान नहीं दिया है जितना इन तेरह पंथी नामधारो साधुओं के अध्यारोपित दान-दया के विरुद्ध जमे हुये भावों के मिटाने पर दिया है । मापने अपनी कवित्व-शक्ति का परिचय देने के लिये नहीं, फिन्तु भयंकर अंधकार में पड़ी हुई जनता का उद्धार करने के लिये हो इनका निर्माण किया है मत: पाठक वृन्द इस पुस्तक M- को कति पीष्टि से मही, भायों को दूर से देखने की कपाकोंगे। पूज्य श्रीजीने यद्यपि शाम्यानुफाल हो दालों की रचना की है नापि अपने पि दोष से यात्रालय की या किसी कार्यकर्ता की भसागवानी रो (जमा होना स्यामायिफ है) कोई मूल द गाहोतो उसके लिये कार्यकर्ता हो उत्तरदायी है। पुस्तफ है भादि में गुद्धिपत्र लगा दिया गया है परग्नु मात्रायें यंत्रालय यी २६र जाती है। अतः कुल पुस्तक का शुद्धिपत्र होना किमी अंश में अमामव नहीं हो दुस्साध्य भयश्य है। इस मंस्करण में पूश्य श्री १००८ श्री जयादिपलाल जी महाराज के सुयोग्य शिष्य श्री गण्यलाल जी महाराप की बनाई दुरं ढाले मी उपयुन समझकर मन में सम्मिलित कर दी गई है। हमें पूर्ण विश्वास और भाशा है कि निष्पक्ष तथा साल मनोभाय से अध्ययन करने पर भवान का परदा अवश्य खुलापमा विनीत- विषय-सूची परीहाटदोहे ही सर. भनुम मांगिया पर -1-11 द्वार पहली ३ Y-unार मगरा २- ममनायडयालाअधिरार - २ धर्ममिका पर अधिकार ४-मार मालीस गोशटर पर मनुसम्मा ५-मिनमा चार ६.-पिगंग पर अधिार- 8. धिरारकिरी मुनि का ८-अधिगर पारदरा गर्म तिर अनुराग है अधिना ममी का प्रद शिल्पर मनुराम्रा-

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पेज
२-अधिकार लाय यवाने का ...
३-अधिकार बराधों को निरपराधो कहने का
४-अधिकार जीवना-मरणा बांछने का....
५-अधिकार शत तापादि संवा मासरी....
६-अधिकार नौका का पानो सताने का....
४
तीसरी ढालके दोहे
दोहे से दोहे तक
धर्म के लिये जोना-मरना चाइनेवालेमत्पधारी शरमा है....१-५
ढाल तीसरी
१-अधिकार मेयस्य रामा का पारेवा पर दया करने का... ८३
२-अधिकार अरणको का अनुकम्पा का...
३-अधिकार माता रवाने से बुनगोपिया के व्रतादि का
भंग कहनेवालों को उत्तर
शूरादेवका दाखला-
४-अधिकार नाराज सकिने अनुकम्मा नहीं को,ऐसा
कहनेवालोंके लिर उत्तर
५-अधिकार नेमिनाथजीने गजकुमालमो अनुकम्पा
नहीं की. ऐसा कहनेवालों को उतर ...
-अधिकार वीर भगवानके उपसर्ग दूर करने में पाप
कहते है, उसका उत्तर....
१०२

पेज
(४)
नाम विषय
-अधिकार 'द्वीप-समुद्रों की हिमा देवता क्यों नहीं
मेटे?' इसका उत्तर....
८-अधिकार फोणिक-चेड़ा का संग्राम मिटाने में पाप
कहते है, इसका तर....
६- अधिकार समुद्रपालजी मे चोर पर अनुकम्पा नही
फरी कहते हैं, उसके विषय में...
૧૨૨
१२३
चौथी दाल के दोहे
त्रिविध हिसा के समान विविध रक्षा को पाप पहने.
वालों के विषय में ...
चौथो दाल
पेज-१३२
गाथा सेगाथा तक
भैसे और जीवपूर्ण कालाय की कुयुक्ति का तथा
पाप मेटने में पाप कहते है इसका उत्तर ,
सहायता, सम्मान देकर मिथ्यात्वी को समक्तिी
बनाने में पाप कहते है, इसका उत्तर.
पेज-१३५
पांचवीं-दाल
घोर, हिसफ, सम्पट को केवल सनका पाप छुड़ाने के

me not
Frever...
माने पर पारमा
.
और प . नरोए
समीत, परनपाले पो हार
मरने मार लिपदेश देने की निरा
ऐनः
प.हेगा पहनेगर...
पारी रप ऐर पारा भारती
में गिर पड़ी, मी रसिक को उपदेश
देने से परेच पद, पराया और होमरी, थे
समान मा धर्मशती सो दूसरेश
पापमान सा पाने बाटोको उत्तर... ४८-16
क. टिप उपदेश नहीं देत: एक हिसर.पी
घर परसायों संग नहीं मिटात: ऐसा
मनाला परता..
४: पापा घर शान्ति नरे ऐसा पहने.
पाची सरमद बिनभावस. दापो

書

माय मदोर-श..
(cfr.
२-
Tir urineerinमहो
दाट-रात
गाथासंगा
-माधानों का पान गार ममादि
शिवाय मार्ग पो पारने १
उसर या अग्निसा, पाना या, दुपा, मांस
पा, मुख तिने पा, मनुष्य मारमा
मरप्प पवाने पावन पर दया हटाते है,
उसका उत्तर
:-वारादि दुपयोमारा भार एटाना पारने
५४
:-पम की मारपर डाय पचाना प.ह है उसका
७२
४.जिन गाने पर रिहायर मारा" धम
पर घोषणा पगा ममें पाप पाहते है इसका
एत्तर
३३
५-यो पेल्यामों का पाल देने है उसका
उतर

नाम विषय
गाथा से गाथा तक
0दा येश्यामा के दूसरे दृष्टान्त का शएडन १६१.१६८
८-साय मार नहीं मरता है, इसलिये उसकी रक्षा
में धर्म नहीं, इसका उत्तर तथा प्रसपायर की
हिमा मरीषी काहने है, इसका उत्तर १६६-१७४
1-मे में ममता उतार कर जीय पचाने पाले को
पार करते है, इसका उत्तर
१७५-१८१
माठयों ढाल के दोहे पेज २४६
दोहे से दोहे तक
भ्यदया और पादया दोनों शास्त्र सम्मत है
डाल माठयों
पेज २४७
लाय में बलने जीय को पचाने में पाप पहने हैं,
उमाकर
आधि देने में पाप कहते है, उसका उत्तर
"उपदेश देकर 'दिमा' एटाने है" ऐमा करने
२१३७
*य पाने ममय पाने को उपदेश देते
है' मा बने पालों को उत्ता
धायक के ' में अगल में मोयों को घात क्यों
प्रदानमा बाईनेताओं को सिर
गायत्री में जाय मरते है, उन्दै पाने
गे नही जाने हो', मानने वालों को स्तर
११-२०

নাম বিশ্ব
गाया में गाया तर,
"समयसरप माते जाते मनुष्योंसे जायाको धाल
होती थी और घरिफकेपछेरे नेसर के रूप में आने
गुए नन्दन मनिहार को चौथ डाला। इनको पचाने
महावीर स्वामी ने साधु क्यों नहीं भेजे !' ऐसा रहने
वालों को उत्तर
७१८४
साधु पावर को एक अनुकम्पा है, ऐसा कहने
वालोका शिवार
वर्तमानकाल में मरते भीय को सताना पाप है.
ऐसा पहनेवालों को उत्तर
लाय में उलते हुए जोय कर्मों को निर्जरा करते
है, ऐसा कहनेवालों को उत्तर
१०३""१०८
अल्पारन्म गुण में नहीं है. ऐसा कहने वालों को
उत्तर
१०६""१२१
लाय बुझाने का अल्पारम्भ यदि गुण में है, तो
साधु युझाने क्यों नहीं जाते! ऐसा कहने वालों को
१२२.१.२
आग बुझाना और कसाई को मारना एक
सरीषा कहते हैं, उनको उत्तर
१३३१४३
दत्तर
+-

साल नवमो
नाम विषय
पेज-२८१
गाथासे गाया तक
दया के साट नाम
१।२५
प्रिविधिसे जीव रक्षा करने में पाप कहते है,
उसका उत्तर
२६.३५
रक्षा करने में जीर मरते है, अतः रक्षा पाप है,
पेसा कहनेशलों को उसर
“साधु को जोप नहीं पचाने तथा रक्षा को मलो
नहीं समझनो" ऐमा फहनेवालों को उत्तर
जोय का जीना नहीं चाहते सिर्फघातक का पाप
टालना चाहते है, ऐसा कहनेशलों को उसर ६२""६९
“त्रिविधे-त्रिविधे जीव रक्षा न करणों" का उत्तर ७०.७५
प्राणी, मून, जोय, सत्य को रक्षा में एकान्त-पाप
कहते है। उसका उसर
धर्म के कार्य में भारम्भ करने में समकित जाती
है, ऐसा कहनेवालो को उत्तर
माथी यसलता को एकालपार करनेवालों
२
को उत्तर
जोयों का दुःख मिटाने में एकान्त पाप करते हैं,
उमका उत्तर
धर्मकार्य में हिमा करने से योध का पोज़ नष्ट
होता मा फहरालो को मफान के उदाहरण
सहित उत्तर
१०६१०१

(११)
नाम विषय
गाथास गाथा तफ
"दर्शन को धर्म में और हिंसा को पापमें अला
अलग मानते है उसफा खुलासा
११०."१९७
"यदि आरम्भ से उपफार होता है, तो मठ चोरी
से भी होना चाहिये" ऐसा फाइने बालों को उत्तर ११८. १२४
दयाफा स्वरूप
१२५५१२६
श्री गचूलालजी कृत ढालें
नाम विषय
पेज
पहली ढाल
३१३
टाल दुसरी
३२२
दाल तीसरी
३३१
दाल चौथी
ढाल पांचयी
दाल छठवीं
३४१
दाल सातवीं
गजल
३४९
॥ इति शुभम् ॥

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चित्रमय अनुकम्पा-विचार O दोहा करूगा वनालय प्रभो, मलमूल अनन्त । जय-जय जिनवर विबुधदर, सुखमय सुषमावन्त ॥१॥ अनन्त जिन हुना केवली, मनपर्यव मतिमन्त। अवधिधर मुनि निर्मला, दशपूर्व लगि सन्न ॥२॥ जागम पलिया ये सह, भाषे नागम सार । पचन न भद्ध तेना, ते रुलते संसार ॥३॥ अनुरुन्मा लाछी कही, जिन-मागम है मांय। अज्ञानी सावज कहे, खोटा चोज लगाय ॥ ४ ॥ हाला नहि, जालां हुई, अनुकम्पा री धान । पंचमकाल प्रभाव थो, हा : हा ! त्रिभुवन तान ॥५॥ अनुकम्पा उठायदा, मांडो मूरख मला ज्यों फैस्या. रूले अनन्नो काल ॥६॥ दाखमि जारे पंचने, फुगुरु पलायो पन्य ।। माया जाल। HRAM २ चित्रमय अनुकम्पा-विचार अनुकम्पा खोरी कहे, नाम घरावे सन्त ॥७॥ आफ-थोर ना 'ध सम, अनुकम्पा यतलाय। मन सों सावज नाम दे, भोलाने भरमाय ॥८॥ सपाप सावज नाम है, हिन्सादिक थी होप। अनुकम्पा हिंसा नहीं, सावज किस विध होय ॥९॥ मनुकम्पा रक्षा कही, दया कही भगवन्त । पाप काटे कोई तहने, मिथ्या जाणो तन्त ॥१०॥ .अमृत एक सो जाणज्यौ, अनुशम्पा पिण एक। .भेद प्रभू नहि भाषियो, स्तर मांही देख ॥ ११ ॥ तो पिण फुगुम कदाग्रहे, चढ़िया पिस्या पीस । मन सू करे परूपणा, करड़ी ज्यांरी रीम॥ १२॥ निरवदने मावद वलि, अनुकम्पा भेद । अहंता कुगुरु, करे, ते सुण उपजे वेद ॥ १३ ।। भरमजाल नाहन मण, रचे प्रयन्ध पारी भवजीयां! तुम्हे, परने गंगलमाल ॥१॥ रमाला ढाल-पहला TEEBARE १-अधिकार मेघकुंवरका (तर्ज-धिग धिग के उगी नागश्रीने) मेघकुवर हाथी रा भवमें, करुगा करी श्री जिनजो यताई। प्राणी, भूत, जीव, सन्वरी, अनुकम्पा की, समकिन पाई। अनुकन्या मावत मत जागो ॥ अनु० ॥१॥ निज देहरी परवा नहि गरखी, पर अनुफला रो हुवो रसियो। यीस पदर पग ऊंनी राख्यो, पर-उपकार न मन नहिं खमियो ॥जनु०॥२॥ पड़तसंसार किया निण चिरियां, अंगिक घर उपनो गुन पाई।

wwnxnnn RAMN" -~ चित्रमय अनुकम्पा-विचार आठ रमणो तज दीक्षा लोधी, ज्ञाता अध्ययने गनघर गाई ||॥३॥ (कहे) "बलसा जीव दावानल देखो, सुण्डर पकरके नाय बचाया" मूढमत्यारी या खोटी कल्पना, पलता जोव मृतर न पतापा ||अनु०॥४॥ मण्डल जीयां थी पुरण भरियो, शंसं पैठन ने स्थान में मिलियो। जीय लाय किण गिी मेले, खोरी-पक्ष मिथ्याती झलिणे ॥अनु०॥५॥ मुसली न मारयो अनुकम्पा पतावै, (नी) एक जोजन मण्डल रे मांई। जौर्य पणा जामें माइने पसिया, (स्यां) सगटाने हाधी तो मारथा नाहीं ॥अनु०॥६॥ (जी) मलो न मारथा रो धर्म पताओ, (ii) पूजा (ने) न मारवांरो क्यों नहि केयो। (ओ) मुसेला रो प्राण पचाया धर्म है, तो दूजाजीय पंघापारी (पिग) फेयो मनु० ॥णा जोजन मटले जी जो पधिपा,

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हाथी भवमें मेघकुमार।
ढाल पहली गाथा ०,८ का माय चित्र।
“(जो) सुमन्यो न मासो रो घम यतायो,
(तो) दूजा (ने) नमाला रो क्यों नहि फेयो।
(जो) मुमलारा प्राण घयाया घमे है,
तो इजाजीय बनाया गे (पिण) केयो॥ मनु० ॥३॥
जोजन मण्डल जीव जो यरिया,
मंदमती ताने पार यताये।।
VAANEELAM
स्पार ले गुमला विचारी,
धर्म" हो जो किण विघ पाये अनु०॥८॥

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मि मेनुमापा-विकार जीप दपा मय जगने पताया, मादयी हिंमा मेदण काजे। वनप्राणारा प्राण प्रगाथा, प्रत्यक्ष यानी से राजे ॥ मनु०॥२॥ पाद उपकार रे अर्थ, गाय करणगपात जमानी।। म्नान अयं पानी पदयां, जामें भी जीव जाने पर जानी ||अनु०||३|| fra-क्षा हिंमा मोटी, रक्षा नियमादीवानी। यादमय जगनं पाया, मिनार गा पानी ।। अनु०॥४॥ मन्दमनजानता गया मेदन माने। टीटागभान. aapit witm माम२॥५॥ मोडा मला, मालिमानता agnita wiगुना मे,

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EDIOMYRom भगवान श्री नेमीनाथजी का जीव तुड़ाना। बाल पाहलो गाला ३.४ और १३, १४ का माय वित्र । स्यादि उपकार र अर्थ, ध्यायकरणरोपातजमाना। म्नान भये पाणी पडू देख्यो, जामनी जीय जाणे पाहानी पण पशु पनीरो हिमा मोदी, सारिणी मोटी जाणी। पादाभेदमा जगने बनाया. म्नान कियो गुतारी या पाणी "प्या काम हिमारिया निर्मल मानी। माप्रभुनारा मनम्या जाणा, जाया में दिया ममप दानी ॥१३॥ मोव पर नमी दरया, पनामीशानी में गाई नयम पदणगे, म मामान दया पवार परमाणो,

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८ पित्रमय अनुकम्पा विचार PnA आमिप (मास) भक्षी रे भोजन सारु, पांध्या छ घात दिल ठानी ॥अनु०॥ ११॥ सारपि पचने कशान से जाणी, दीन दयालु दया दिल आणी। जीयां तगोहित पंछयो स्वामी, आतम सम जाण्या ते प्राणी अनु०॥१२॥ म्याद रे काज मरें पहु प्राणी, हिंसासे हरिया निर्मल ज्ञानो! सारधि प्रमुजोरी मनस्या जाणी, जीयांन छोड़ दिया अमपदानी॥अनु० ॥१३॥ जीप घुटया में नेमजी हरप्या, यक्षोसी दीनी सूत्र में गाई। कुण्डल युग्म अरू कणहारी, सर्व आमपण दीया यमाई ॥मनु॥१४॥ पीछे परपोदान जो दीयो दान-दपा दोन ओलखापा संगम समापनमें सोयो, पर ले प्रभु मोक्ष सिपापा अनु०॥१५]] (ब) "जीयां रोहित नदि नेपजी यण्यो" ९ " दीपिकादिक री साख यताये। दीपिकामें हितकारी (अर्थ) भाप्यो, उणने अज्ञानी जाग डिपावे ॥अनु०॥१६॥ नहिं मारण ने हित पनाओ, (लो) जोर पचाया सहित किम पावे। महिं मारप निज हित पहिचागो, मरतो पापा खपरहित पादे जनु०॥१७॥ जीव पने जीने रक्षा काही मनु, दही (जोब) री रक्षा ने दया ताई। सम्परद्वार में पाट उघाड़ो, मन्दम्ती मन नहिं भाई ॥ अनु० ॥१८॥ "जीवनि मेमनी नाप पडापा, मन्दमती एवी पान उपारे। "सवपूरी दीपिछटोश" अर्थ, मउदायो मार दिपार ।। अनुः ॥१९॥! Tri (दगार:०१८) ए-सनु र नुन रे रे मटके सदरनिः। - wwvvvvers h- चित्रमय अनुकम्पा-विवार जोय छुट्या री पक्षीमी दोघी, "अवचरी दीपिका टीका" देखो। +-जइ मम्झ कारणा ए ए. हम्मति मुक् मिया । न मे एवं तु निस्सेस परलोगे भविस्मई । सो कुण्डाग जुयलं, सुतगंध महायसो। मामरणागि य सागि, साहिस पगामई ॥ (उत्त० सूत्र अध्य० २२ गाथा १९-२०) दीपिका--तदा नेमिकुमारः किं चितयनोसाइ यदि मम विवाहादि कारणेन एते मुबहवः प्रचुरानोवा: हनिष्पन्ने। मारयिष्यन्ते नदाए तस् हिमाख्या कर्म पालोके पाभये निःश्रेयसं कल्याणकारी न भवि- यति पग्लोक भीरत्वस्यः अत्यन्त अभ्यस्ततया एवं अभिगन अन्यथा भगवनधरमदेहत्वात अतिशय ज्ञानरमाय कुन एवं विधा चिन्ता इति भावः ॥ १९॥ स नेमिमारो महायशाः नेमिनाथ प्या- अभिप्रायात् सर्वेषु जीवेषु वन्यनेभ्या मुक्त सत्मु मणि माभरणागि साये प्रगामयति ददाति नान्याभरणाणि कुण्डलाना युगल पुनः सूत्र करियाक पान आमाण शान हागदोनि सो मन भूपयानि सार्थये ददौ ॥२०॥ टोका-मयान्तरपु पालोक भोहवस्यात्यन्तमभ्यस्ततयैवमभिधा- नमन्यथा धम्म शरीवादतिशय ज्ञानिवास भगवतः कुन एडावित्र- चिन्तावसरः ? एवं च विदित भगवदाकृतन साधिना मोचिनेषु सत्वेषु परितोपितोऽमो यत्कृतवा स्तवाद -'सो' इत्यादि 'सुतकंचे' विकटोमूत्रम्, अर्पयतीत योग:, किमेत देवेन्याह-भाभरगानि च साम्प गपाणीति गम्यते ।

दार-पदवी मूल पाडे यक्षीसी भाषी, मन्दमनी : जरा समझो लेखो।जनु०॥२०॥ आज पिन या परतख दी है, मननाने कामसे स्वामी रीझे। जर राजी हो यज्ञीसो देवे, पडित न्याय विचारी टीजे ॥अनु०॥२॥ सीव छुव्या मनु राजी न होता, पक्षीस नेमजी काहेको देना। "निर्दय ऐसो न्याय न लेते, करताकर यों परगट कता ॥अनु०॥२२॥ ३-धर्मसचिजीज्ञा करुणा अधिकार कटुक जाहार जेहर सम जानी, परठन री गुरु आज्ञा दीनी । सावन रो निषेध जो कीनो, धर्मचिजो तदत कर लीनी ॥अनु०॥ १ ॥ कटुक लाहार किड़ियां मरती, अनुकम्पा मुनि मन मांही आनी। कडवा तुन्या रो भोजन कीयो, २ How.... भापी। मित्रमय भनुम्मा-विचार धर्मम्मीजी ! धन गुणखानी ॥अनु०॥२॥ एरु माझा पिन माहार कियो मुनि, किरिपारी 'अनुकम्पा विशुद्ध भाष मुनिरा अनि माछा, आराधिक या गुणवानी ॥ अनु० ॥३॥ कहत ती "धर्मरचीजी [i], किड़ियां पयायण भाय नल्याया। भाषां स्मरता जीव जागी ने, पाप हटा मुनि फर्म खपाया" ॥ मनु० ॥४॥ जीव बचाया में पाप पताया, पण विध माला [जन) ने भरमाये । न्यापधादी जानीगन पछे, [i] मंदममी ने ज्याप न माये ॥ मनु ॥५॥ अति मही मुनि चिन्न पाट्या, किरिया मारग रा नदि कामी। छान पिना रिड़ियां या माती, जाने पचायण कामी मामी ॥ अनु.॥५॥ मतिम पायां पार जो लागे, तोगुरु पादरी माना।

उदारादि निन मुनि पर, उपजे मर जीव त्यां माहीं देता। जनु० ॥ निण गे हिंसा मुनि ने नहिं लागे, मृतर मांही गगर भाषे। धर्मःचीनी तो विच से परख्यो, जिनमें पाप कृती दाखे ।। अनु० ॥६॥ जो मुनि फलयो तुन्मो न खाता, तो परख्यां दीप मुनीने में काई । कारगासागर किड़ियां रे खातिर, निज तन री परवा महलाई ।। अनु० ॥२॥ या अधिकाई जीवदया री, मतर में गरजी गाई। "परागुमरे नी जापानुसम्म : पापा टागामें यों दरशाई॥०॥१०॥ *-पसार Si Scx मरने नौ जाम (सार ३१२) -मान-समीर मनी कि- बलोपन नि, नुमति 'res HTTERTerrz।

चित्रमय अनुसया-विचार ~. AM- परजीयां रा प्राण पचायन, अपना प्राण रो परया न राखे। ऐमा तो पिरला इण जग में, धर्माची सा शास्तर साखे ॥ अनु० ॥११॥ ४---श्री महावीरस्वामीका गाशालकपर अनुकम्पाका अधिकार केवलजानी घोर जिनेश्वर, गौतमजी को भेद पनायो। दयाभाय [मे] अनुकम्पा करने, में पिण गोशाला ने बचायो ॥ अनु० ॥१॥ गोशाल पचाया में पाप होनी नो, गांतमगाने क्यों नहिं कोनो। "पाप किया मैं, यो उपदेश प्रम् क्यों न दीनो । अनु० ॥२॥ फेचली तो अनुकम्मा केये, मन्दमनी मामें पाप पाये। जानी यचन मज महारा माने, ये नर मोर विम्यानम पाये ॥ अनु० ॥३॥ तुम मत करज्या" दाद पहली : असंजती रो नाम लेई ने, गोशाल बचाया रोपाप जो फेरे। मासी-मृपक पात्र से काढ़े: ज्यांरा तो जार सरल नहि देने॥ अनु०॥२॥ जग असंयति ने तो पोणे, पाप जाणे तो क्यों नाहि के। जद कहे न्हारी दया उठ जागे, ता वीरने दोष कही कृण लेखे ॥ अनु० ॥२॥ प्राणि नादि अनुकम्पा करने, मायण जवां शिर धारे। मृत्र भगोती सनक पन्द्रहों, केवल ज्ञानी ननन उचारे ।। अनु० ॥३॥ प्राणी मृत जीव मत्वानुकम्पा: सातादनी रो कारण भाप्यो। सप्तम शनक इंटे उगे. वीर प्रभू गौतम ने दाख्यो । सनु० ॥७॥ मेघवर अधिकार पाठ यो. मापी नृतादि जीवदया । यां पाठ में ससंजलि आया, ॥ पित्रमय अनुरम्पा विचार xnnn Anim- पाप नहीं अनुकम्पा किया रो॥ अनु० ॥८॥ अनुकम्पा उठायन कारण, यीरने पी पाप पता। सूत्र रोम्याप यता ज्ञानी, तो मंदमती ने जयाय न आये। अनु० ॥२॥ [क] "दोय मात्रा ने क्यों न पचाया, गोशाला भी चलता जाणी।" (उत्तर) आयुष मायां जानी जाग्यो, न्याय न माये बचाताणी ॥ अनु० ॥१०॥ विशार गया मा पारे [गि] मे, दोष मोबाईरोशन लांगे। कों न विहार का म्यामो, घात जागता [ग] दोनांग मागे । अनु० ॥११॥ जट को "निधय ज्ञान देण्या, दोनों गाल पहज आई। जाम् विहार कगयो नाही, भयितरामा दादी माई" अनु॥१२॥ माल मात्र पोहो तुम गरयो, मनुसमा [मो] परम का।

साल पदो शानी झान देखे ज्यों परते. मिणरी रहौंच करो मन भात् ॥ अनु० ॥१३॥ अनुकम्पा सावज थापण ने, सूत्रपाटरा अरथ ने टेले । छेलेल्या छमस्थ पीर रे, पोरमिध्यानी पापको झेले.॥ अनु०॥१४ किसन, नील, कापीत लेश्या रा, भावमं साधुपणो नहिं पाये । प्रथम शतक दूजे उद्देशेर, (तो) वीरमें पलेल्या किम थाये ॥अनु० ॥१५॥ "कपाय कुशील" रो नाम लेई ने, अज्ञानी भोला (ने) भरमावे । मूल-उत्तर गुण दोष न सेवे, भाव माठी लेश्या किम पावे ।। अनु ॥१६॥ कपाय फुशील भाव लेश्या जो माठी, होतो (तो) अपहिसेवी क्यों कहता । इन लेखे द्रव्य लेख्या छः जाणी, भाव लेड्या (रा) शुध भाव पदीता ॥अनु॥१७॥ * भगवती मूत्र चित्रमय मनुकापा विचार ----- . an 'कापायाशील' 'सामायिक' पारिने, लेदया रीकाम जी आयो । प्रथम शतक पूजे उद्देश, शामें निणरो भेद यमायो । अनु० ॥१८॥ किमन नीम् कापान द्रन्य लेश्या (म), माधुषणी शुद्ध मात्र जाणी। रोटपा मिण गे कहिये, माय हानीनों ही शुद्ध पिछाणी [[अनु० ॥१९॥ मधोडया इय करिये, माय मोतीनो हीद पिछागी। करायकृनाल मग, मंजम मांडी, भाष पाटी लेदा मत मागोभन॥२०॥ दाम्यापन मा मामागिक, मग्यसेवाग जागा । पो ही नगर मनायजाने, भावनामा द रियायो॥अनु० ॥२१॥ गायरलेल्या पाये, माती याप सुगनमे पता । साप पिक तारे,

चार-पाली
खोटी माणले समशिन जावे ॥अनु० ॥२२॥
पुलाफ परिपन कुशील ने,
मूल उत्तरगुण दोपी भाप्या ।
ते (पिण) तीन भाव शुद्ध लेश्याम,
मृटपाटे स्तर में दारण ॥ अनु० ॥२३॥
वृषास पिण उत्तरगुण दोपी,
तीन भावलेश्या निहां पावे ।
कपायकुशीट तो दोप न सेवे,
खोटी लेश्यांरा भाव क्यों आवे मनु० ॥२४॥
कल्पातीन अरु आगम पिहारी,
छद्मस्थपणे प्रभु पाप न कोनो ।
आचारंग नवमें मध्यपने,
केयटनानी परकाश यू दोनो ॥अनु० ॥२५॥
अनुकम्पा कर गोशालो वचायो,
मन्दमनी रे मन नहीं भायो,
माती में लेदपा प्रभुरे लगाई,
अनुकम्पा-देपो आल चढायो अनु० ॥२६॥

AN 4. KArPA PuRAM चित्रमय अनुनपा-विषार है ५-जिनपीका अधिकार छ बल (क) "जिनमापि यह अनुकम्पा कीधी, रेणादेवी सामो निण जागो शैलक यक्ष हेटो उतार्यो दयो आय निण खड्ग में पायो । मा मणुकम्पा मायम जाणो" ( अनुढागा.1.) मूत्र विरुद्ध यो पास उटा येई, अनुकम्पा मावन परलाथ। मनुकम्पा पाठ विहां नहिं गायो, अज्ञानी मुटरा गोला गलाये ॥अनु०॥९॥ पदारमे ग्याजद बोली, जिन ऋपियां रे करणाम मापी। पाल्गुण पाठ जातामतामें, तोणिमाला मरम फैलायो अनु०॥२॥ कलुगरम अनुपांग वार, आठयों (हम) पाठमें वीर बतायी।

R-SH नियरी दिगंगापा यो आय: पमा श्री गारजी गायो॥ ननु० ॥३॥ हज रस जिग शारिणं रे बापो, रंणादयी रा वियांग थी पायो। दोन मर रोपाठ सरोखो. लक्षग से भी तुल्य दिखायो । अनु० ॥४॥ मोट कनुपरसमें अनुकम्पा, भेपधारयां ए सूठी गाई। शंशा हो ना नतर देखो, मन पहज्यो पटा कंद माई ॥ अनु० ॥२॥ वाणाङ्ग दहा वाण मांही. अनुकम्पादान प्रथम पकायो। कालुगी दान रोपाठ ने न्यारी, अर्थ दान्यां री न्यारो दिखायो।। अनु० ॥६॥ 'कलुण' (ग्म) 'अनुसन्मा' एक नहीं हे, "ज्ञानावत्र"भेद यनायो। अनुकम्पा, दया, रक्षा कहिये, काटुण (रस)ख वियोगमें गायो अनु०॥णा रात-दिवस ज्यों दोनों ही न्यारा, ..

- II 1१५ (मा) हिरणगमेपो ने पाप पनाये। जापण आपण रो नाम लेई ने, अनुकम्पा ने सायज गावे ॥ अनु० ॥२॥ जायण आपण री तो किरिया न्यारो, अनुकम्पा (ना) परिणाम में आई। जिन चन्दन देव आवे ने जावे, [तो पंदना सावन जिन ना यताई ॥अनु०॥३॥ आवण जायण [से] अनुकम्पा जो सावज, [तो] पन्दना ने पिण सावज फहणी । [जो] आवण जावग वंदना नहिं सावज, [ता] अनुकम्पा पिग निरवद वरणी ॥अनु०॥४॥ मंदमती अंधी शरघा सू, अनुकम्पा सावज पतलाये। वन्दना ने तो निरवद के वो, जाणे म्हारी पुजा उठजा ॥ अनु० ॥२॥ देव करी सुलसा री करणा, ते धी छेह पाल पचाया। कंस रा भय धी निरमय कीधा, अभयदान फल देवता पाया । अनु०॥६॥ .

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सांचा हेतू जक्ष सुणाया, [जद] ब्राह्मण यालक मारण आया। राजकुमारी भद्रा वास्था, तो पिण मृढ़ नहीं शरमाया ॥ अनु०॥४॥ यक्षदेवने कोप जो आयो, कष्ट देई ब्राह्मण समझाया। कूटनहार ने जक्षे कृट्या, शास्तर माहे प्रगट यताया ॥ अनु० ॥५॥ अनुकम्पा थी तो वचन उचारथा, पिण न दया धी ब्राहमण मारथा । भवजीवां ! तुमें सांची शरघो, अज्ञानी खोटा वचन उनारथा ॥ अनु०॥३॥ --अधिकार धारणीकी गर्भ विषयक अनुकम्पा गर्भ री जनुकम्पा करी राणी, घारणी अजतना सहु टारी। जयणा सू' यैठे ने जयणा सूउठे, खाटामोठा भोजन तजे भारी ।। अनु० ॥शा

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दार-पसी ऑपारी लारं सांधा जावे ।। अनु० ।।५।। भाषक रा पहला मत माई, पसम अनि पारे प्रमुयोरे। सशन समय भात पाणी न देने, [at] अनिचार लागे व्रत नहिं ॥अनु०॥६।। भानपागी छोड़ाया हिंमा, [तो] गर्भ नखे मारचा किम धर्मी। अज्ञानी इतनी नहि सांचे, गर्भ रा दया उठाई अधर्मी ॥ अनु० ॥७॥ जो पालक ने नाय बँखाणे, [नो] पेहलों व्रत प्राविका रोजागे। [जो] गर्भने पाई भूखा मारे, तो तप-नन निणरे किम धावे ।। अनु० ॥८॥ गर्भवती ने तपस्या करा, उपवासादि रो उपदेश देने । गर्भ मरे निणरी दया नाही, प्रगट अधर्म ने धर्म वे केवं ॥अनु०॥९॥ गर्भ जाहार माता रे आहारे, 'भगवती महिीं वीरजी भाषे।

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ढाल-पहली २९ वूड़ारे घर निज हाथ पुगाई। दुरगुण नाशक सद्गुण भासक, अनुकम्पा री रीत दिखाई ॥२॥ मोह-मनुकम्पा इणने बतावे, अज्ञानी ऊंघा हेतु लगाये। स्वार्थ रहित अनुकम्पा धरम ने, सावज कहि कहि जन्म गमावे ॥३॥ ईट तोकण जिन आज्ञा न देवे, तिन सूअनुकम्पा सावज केवे ऊंघी श्रद्धा धो धो सूझे, निणधी कुहेत यहुलो देवे ॥४॥ अनुकम्पा परिणाम में जाई, टतोकण किरिया के न्यारी। [जो] नेमवन्दन री मनसा जागी, [तय चतुरंगी सेना सिणगारी ॥२॥ सेन्या री जिन आज्ञा नहि देवे, वन्दनभाव तो निर्मल जागे। (तिम) ईट तोकण री नाज्ञान देवे, ।

प्रिय माविकार
(पिण) अनुहमा मिन शाछी मामाणे ||
चन्दनका रोना नालाई
भनुकम्पा का उठा।
मेना गले, पन्दन नहिं गायन,
अनुमगाईट गाना
गोत्र वन्दन कल armi,
न ! गुणतीमो मादी।
मनुस्म्मा का मानावंदनी,
भगवतिम जिन परमाई men
दांनी कारन माह ari,
ममदृष्टीने आना माई।
मोदन (गंमार पा) काम निin,
साटिका में आई
पुष्प बरे महानासन,
मम frimii पाये।
गवता प्रति,
नदा मात्रा में मारे ||
निरी

ढाल-पहली पंचेंद्रिय जीवां ने मोरण घोवे मांस अर्थी भूख दुःख रा पोड़था, वां अज्ञानी जीवांने कोण चेतावे ॥११॥ द्यावन्त [वाने] उपदेशे वारया, अचित वस्तु देई कारज सारथा । पंचेन्द्रिय जीव रा प्राण पचाया, हिंसक हिंसादि पाप ज टारथा ॥१२॥ मूरख इणमें पाप यतावे, ज्ञानी पूछे जय जाय न आये। जो हिंसा उपदेशे छुडावे, वाहिज साज देई ने छुड़ावे ॥१३॥ हिंसा छूटी दोनों हि ठामे जिण में फर्क न दीसे काई। साज , हिंसा छुटी तिण मांहीं, एकान्तपाप री कृमति ठेराई ॥१४॥ साज सू हिंसा छुट्या मांहो पापो, तो घोड़ा दोडावण जुक्ति यो लायो। *जैसा कि ये कहते है :- माय राजाने इम है, सांभलग्यो महायजो ।

पिनमय अनुकम्पा-विचार गित पायक परदेशोरापने फेगी ममण जद पर्म पताया ॥१५॥ धाडा दादाई राजाने स्पायी पण में ता धर्मदलाली पनाये। (तो) मान देई ने हिंगा हाणे (जामे) पर पाया लाज न आये॥१५॥ मुगुदि प्रधान पी निकरात्र रागा, पाणी परिणय या ममनायो। पापा धर्म दलाली मानी, आमियां ने भाग vिernो | गाना मृदा रा नाम ने, मनी लाने भामा। थाना मनासा मानायी। Au१ fruitय नै, मारो नानी विमानाfree मानो.11 मन मया wr aariwrize wint सार-पाली २३ अचित देई मादि छुड़ाने, आरी तो चर्चा मल न लाये ॥१८॥ सचिन साहाय अनुकम्पा जो हो, (नो) सचित समदृष्टि फ्यांने खवावे । जंघा हेतु अणहता लगाने, ज्ञानी रे सामे जवाप न आवे ॥१९॥ १०-अधिकार धूपमें पडे हुए जीवाके सम्बंधमें। तड़के नडात जीवां ने देखी, दया साय कोई छाया में मेले । अज्ञानी तिण में पाप पनावे, खोटा दांव कुगुरु यों खेले। अनुकम्पा सावज मन जाणो ॥१॥ * जैसा कि वे रहते है:- कराड़ी जो मैले आपा, असंजनो गे पियावन लागे । या अनुराग साधु करे तो, साग दावा हि महाब भागे। या अनुकम्मा सावज गो॥१८॥ ३ १४ विमाना-विचार P4Me भापतिमाशा, वीर प्रम् गौतम ने माते ना तो गागा, नर-वेले पारणा राम ॥ २॥ गर्ग माता नामा HMA नाग पहा प्रागी, मन, जाग दगा 'माय भी, नि उठाई माना पाला ॥३॥ वामनानी दमाजापा, तलाशर मम्मा मंगे। और रापा मार আ স প্লাস । निमिया, अनामा मादेले। मटाया मम नि मामा, गाय मा में मलं ।।। मm, अमंटन PATRE M

ढार-पहली
भेषधारी कहे "साघु मेले तो,
त्यारा पांचो ही (महा) प्रत नहिं रेवे" ॥६॥
चतुर पूढे कोई भेषधारी ने,
जूवां असंजति ने घे पोखो।
नीचे पड़ी ने पाटो उठावो,
महाबत रो धार रह्यो न लेखो॥७॥
दशकालिक चौथे अध्ययने,
उसजीवां अनुकम्पा काजे।
साधुने प्रभुजी विधी यतावे,
मूलपाठ में इणविध राजे॥८॥
उपासरा पति उपची माई,
घसजीव देख दया दिल लावे।
रक्षा रे ठामे त्यां ने मेले,
दुखरे ठाम नहां परठावे ॥९॥
जीव पचाया जो महाव्रत भागे,
(तो) शास्त्रमें आज्ञा प्रभु किम देवे।
'भारीकर्मा लोगांने भीष्ट करण ने
दया में पाप मिथ्याती केवे ॥१०॥

-- ५-." मितपण महापा-निजाम ११-अधिकार अभयकुमारकी अनुकम्पाका जमरासदी करने, नागमति योगी कर बैठो। पाप गति देने समायो, मन एकाग्र राना गैठी। अनुपमा मात्र मन जागा ॥१॥ तदिन कमाणे, भामण नादमा देवताय । नेकारी अनुामा भाई एगी तो.. "अनुकसानापामा पानी," मियानी पूरी माये । अनुपाmarini, MLA नाम लिनेल || ri प्रसमा गाममा भूटान, दाल-परजी अनुकम्पा रोधर्म उठायो॥ (सप) संपनीरो अनुकम्पा कर कोइ, समग माहाग पर प्रेमज लावे। उत्तर वैझिप कर गुणरागी, दर्श उमंग धरी देव जावे ॥५॥ दर्शण अनुकम्पा गुग राग तो, निर्मल श्रीमुख जिन फुरमावे । गेमिय करण जाग जाग रो, शिया तो निधी पारी बतावे ॥३॥ शिया योगे गुग-राग, सावज, निम जगुरुन्मा सावज नादी। सांची न्याय सुनिमूह भड़के, छोटा पक्ष री ताग मचाई जा -- লিপ দিবা १२-अधिकार पशु बांधने छोड़नेका को "माणु पो भनेरा प्रगगीयां ने, अनुकता को पनि ने छ । गौमा दण्ड माशु ने आगे, गृह (ग) पाप कप पौर" ॥१॥ सपा मारजण ऐन, शानीपों पान मारे । 'निशि' पाट अमर, माला याया मिथ्या ममवार । मनुकम्पा मात्र मत जागा ॥२ गाय मुगा दिल निशारा, करा"म मा प्राणी । feat भाaan, Farmint, HTRATE Crgintu" SEL .टाल-पहली .३९ हाभमुज चरमादिरे फांसी पांधे न छोड़े मर री वाणो ॥३॥ Eाम चाम लकड़रा कांसा, साधु रे पास में रवे नाहीं। (तो) साधु इण फांसे किम यांने, पण्डित न्याय तोलोमनमाहीं ॥ चूरणी भाप्यमें न्याय यतायो, सेजातररा घररी या बातो। जिणरी जागामें साधु उलरिया, तहां ये जोग मिले साक्षातो॥५॥ साधु जाचार तेजानर न जाणे, जद वो साधु ने घर संभलावे। खेत खटा रे कामे जाना, यांवग छोड़ग पशु रो पनावे ॥६॥ साधु कहे हम वांचां न छोहां, गृहस्थ रा घर रीचिन्ता न लावे । तप तो मुनि ने प्रायश्चित नाही, पांचे छोड़े तो अनुकम्पा जावे ॥७॥ AMMA

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४१ भाप्प पूरणी घी मिले से मोमांची, विपरीत तो विपरीत पसाणी ॥१२॥ 'कोण परियागनर पाटरी, पाणी भाष्य धी अर्थ विचारो। सांध्या पोरया अनुकम्पा न रेवे, दोप लागे कोनो निरधारी ॥१३॥ कुण पुण दोप पांरण में लागे, भाष्य, चरणी टया में देखो। आपणी पर री घात ज होवे, तिणरा पतायां इण विघ लेखो॥१४॥ यांध्या पी पशु पीड़ा पावे. आंटी खाय रखे मर जावे। अन्तराय पांध्या पो लागे, तड़ाहतो अति ही दुःख पावे ॥१५॥ पर री विराधना या यनलाई, साधु घान री हिवे सुणी पाती। सींग धी मारे ने सुर धी चांपे, मोघ पद्धो करे मुनि री घातो॥॥ .

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दाज पइसे
-
करुणा, रया, शान्ति, ऋषि चावे,
तिण रो दण्ड मुनी नहिं पाये ॥२१॥
मनुकम्पा लायां रो प्राछित के,
झूठा नाम सुतर रा लेने।
भाष्य, सुनर, चूरणि, रन्या में,
कहिन चाल्यो तोपिण केवे ॥२२॥
अनुकम्पा री पी पी.
झूठा नाम लेना नहिं लाजे।
अज्ञान अंधेरे स्याल ज्यों कृके,
ज्ञान प्रकाशे डरकर भाजे ॥२३॥
खाड़ में पहला ने अग्नि में जलतां,
सिंह यो खाता साबू जाणे।
लाय दया यांचे छोई तो,
प्राहित नाही अर्थ प्रमाणे ॥२४॥
प्राचीन भाष्य अरु चरणि में,
पं.रुगानुकम्ग करणी पनाई।
मरतां जाण यांचे सरु छोड़े,
इणविधि में काट पारित नई ॥२॥

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दामी AN. "भोप्य पनि" "टया" रो पुपिण: फ्यों ना मानो ? मुगुरु यो देवे ॥३०॥ मन रे मने मनहीणा पोले, सह-परम्परा मध ने उसे। मातीने तो पांच अरु छोरे, दूजा जीयां री फुयुक्ति क्यो मेले १ ॥३१॥ मन निशीप उद्देशे बादश, पूणरे नाम भी हन्द मपाया। निण कारण यो में किया खुलासो, सूत्र रो सायो नर्थ पतापो ॥३२॥ जिण बांध्या जनुकम्पा न रेवे, तिण रो मायसिन नियय जाणो। पांध्या छोड़यां जीय पचे तो, दण्ड नहीं नजो बैंचानाणी ॥३॥ १३-अधिकार व्याधिमिटावण विषयक ज्याचि बहुत कोड़ादिक सुण ने, वैद्य अनुकम्पा निणरी लाये। प्रामुक मोपच दुःख मिटावे,

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ढाल-पहला 3 साधू धो दूजा ने साता जो देको, पाप लगे अज्ञानी को नारिभोग दृष्टान्त देई ने, दुर्गुणि केई मिथ्यामत सेगे ॥६॥ मारिभोगे पंचेन्द्रिय हिंसा, मोह उदेरणा दोनां रे होगे। यो दृष्टान्त दया (अनुकम्पा) रे जोड़े, जो देवे वो भव-भव रोवे ॥ रोग छुड़ावण तिरिया सेवण, दोनां ने कोई सरीस्वा केवे । त्यां दुर्गुण रो भेद न जाण्यो, खोटा हेतु कृपन्धी देवो ॥८॥ रोग तो नंदनी कर्म उदय में, नारिभोग मोहकर्म में जागो। रोग मिटाया दुःख मिट जाव, नारिभोग मोह बघवा रो ठाणा ॥५॥ रोग मिटावा पाप घणेरो, नारोभोग समान पतावे।

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ढाल-पइलो जिन जिन देश तोर जावे, सौ-सौ कोसां रोबुख मिट जावे । धान (रो) उपद्रव मूल न होवे, 'इनि मिटण अतिशय यो धावे ॥१५॥ मिरगी रे रोग मनुज यहु मरता, जिनजी गया मिरगी नहिं रेवे, लाखों मनुष्य मरण धी परिया, मिथ्यानी इणने दुर्गुण केवे ॥१६॥ देश री सेन्या देशने मारं, स्ववको नृप रो भय थावे । ए गुणनोस अनीसे प्रभावे, भोनि (भय) मिटे जन शान्ति पावे । १७॥ 'पर' राजा री सेना जाई, देश लूटे वो हात ति देवे । प्रभु परतापे भय मिट जादे, नीस अतिशय तर केवे ॥ १८ ॥ लति वर्षा यहु जन कुख पावे. नदो री पाहे जन घपरा।

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दान-प "समवायंग पौनान" में , पो हसान नो पाठमें गायो। सी-सी कामां उरद्रव टलना, केवल ज्ञानी आप पनापो ॥२४॥ दलियो उपब दुर्गुण जाणा, ना प्रभुजी रा जोग हूँ ण मानो प्रभु जोगे दुर्गण नहिं होवे, तो मिटियो उपद्रव गुगमें यखानो॥२२॥ आरत द जीवां रा टले अरु, प्रभु कार शुद्ध भाव ज आवे । परतख लाभ यो कुख मिया , प्रभु अतिशय गगवर करमावे ॥२६॥ "रायपसेगी" मृतर में देखो, चित्त "केशीमुनिजी" ने पोले। परदेशी ने धर्म सुणाया, किग ने गुण होती विवरो खोले ॥२॥ दोपद चौपद जीवांने वडगुण, समग माहाण भिखारी रे जागी।

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रामा शुद्ध मार आर. पिन जारम्भ थी, मुनि पन्या जधिको फल पावे। निम कोई रोगी रोग मिटावे, (तो) धादिक गुण रो फल पावे ॥३॥ १४-अधिकार साधुकी लब्धिसे साधु की पाणरक्षाका लब्धिधारी रा 'खेलादिक' में, सोले रोग शरीर जावे। साथ ने रोग सँ मरता पचावे, (तो) ज्यां पुरपांने भी पाप पतावे। अनुकम्पा सावज मत जाणो ॥१॥ पाप अठारह प्रभुजी भाड्या, * जमा गिफरत है .. पियागे ग सादिक नं, सोलह हा गेग शगेर जाये ।। व मागे इग गंगा में साधु मरसो, अनुपा आगो नहीं गा गंवाये। आ अनुकंपा सावन आगो।। (म०टा०१ गा० २५)

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लमिधारी ने पाप क्यों जायो॥३॥ उत्तराष्पयन न्यारवें मांई, रोगी ने शिक्षा अजोग यतायो। लविवारीरा चरण फरसने, रोग निम्या शिक्षा गुग पायो॥ रोग नियां गुण चाणतरन गुणा निगविध अवगुण कुगुरु यताये। गुनने अवगुण से थाप करी ने, मिथ्यानी पोल में होल यावे॥ १५-अधिकार मार्ग भूले हुएका साधु किस कारण राला नहीं बतावे जानी रे मांहि गृहस्थी मूल्यां. साधु ने मारग पूछग लागे। किण चरण मुनि नाहि बनावे, "अर्थ भाष्य" में देखो सागे अनुसना सावज म जागो॥॥ मुनि रेताये मारग जाना

चित्रमय अनुकम्पा-विचार
-~~
चोर कदाचित् उणने लूटे।
सिंहादिक श्वापद दुःख देवे,
तिण उपसर्ग थी माण भी छूटे ।
वा, तिण रस्ते गृहस्थी जातां,
मृग आदिक जीवां ने मारे।
तिण कारण दयावन्त मुनीश्यर,
मार्ग यताया रो परिचय सरे ।
इसड़ा सूत्र रा सरल अरय ने,
अज्ञानी तो उलटा मोड़े।
अनुकम्पा कर मार्ग पनायां,
चार मास चारित्तर* तोड़े ॥
"भाष्य चूरणि" अरु मूल में देखो,
*-जैसे कि ये कहते हैं---
गृहस्थ भूलो जड़ धन में, अस्वी ने वले उजड़ जाने।
अनुकम्पा पागो साथ मागे यताये, तो चार महीनागे
पास्त्रिाये॥
व्य अनुकम्पा सावज जाणो।
(मनु० दा०१ गा०२७)

दार-पहलो अनुकम्रो नाम ही नहीं। तो पिण अनुकम्पा राह पी रे, मूठ पोटण लाज न कांहीं ॥५॥ हितसारा मुनि सर्व जीयां रा, अनुकम्पा रोमाछित माहीं। समष्टि सो गुर री पान देवे छिटकाहो ॥६॥ सूकर माने, , • FAIR

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वासरी
.
मनुकम्पा कारण कोई (गृहन्य)
सावज कर जो (कोई) कान।
(ते) कारण अनुकम्पा नहीं,
फरणा (अनुकम्पा) निरवद्य नाम ॥९॥
सावज कारण सेवा, वन्दन सावज नांय ।
अनुकम्पा निमजानज्यो, निरमल ध्यान लगाय १०॥
भापा सुमनी धो करे, वन्दन नो उपदेश ।
तिम जनुकम्पा नो कर. मुनिराग न पिर
गेही पिण समयू हुये, विवेक मनमें लाप।
वन्दन अनुकम्पा करें, वैसा ही फल पाय १२॥
फुगुरु कड़ी खेंच हूँ, अनुकम्पा उत्थाप।
चन्दन रा नो लोलुपी, जोर मांडे थाप ॥१३॥
कारण कारज भेद ते, कुगुरु खोले नाय ।
कारण ने नागे करि, करुणा दावि उठाय।१४।
चन्दन कारण प्रगट में, पहुविय जारंभ थाय ।
कुगुरु देखे तोहि पिणः यन्दन प नाय (१५॥
रस्ता री सेवा तणो, अतिशय लोभ यताय ।
गृहस्थी राखे साथ में, भोजन खाता जाय ॥१६॥

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दूसरी-ढाल १-अधिकार जीवां रो दया खातर दयावान मुनि ने बांधने छोड़ने का। (तर्ज-हीवे सामलज्यो नरनार) हाभ मजादिक रे फांसे, गाय भैसादि पंध्या विमासे। जो छोड़ रसे दुःख पास अटवी में दाड़ी ने जासे ॥१॥ रखे सिंहादिक याने खाचे म्हारी अनुकम्पा उठ जावे। अनुकम्पा घणी घट माही; तेथी मुनिवर छोड़े नांहीं ॥२॥ छोड़या मनुकम्पा उठ जावे, मुनिजीने प्रायछित आवे।

पिमर अनुमा पिता ----- इम वाया म तसे पाणी, रखे मर जाये सही जाणी ॥३॥ इण कारण पांरे नाई, अनुकम्पा पणी घर माई। मरता जाणे तो पाप ने खोले, दोप नाही मर्थ पोले ॥४॥ साधु जन रा पातरा मांही, चिड़ियां उन्दिर पडिपो माई। भेपारी पिण काढणो केवे, पिन काढचा दया नहि रेवे ॥५॥ (तो) अनुकम्पा थी छोल्यां पापो, एह्वी खोटो करो किम पापो। अनुकम्पा निरवच जाणो, तिणरा साधु रे नहिं पचषाणो ॥६॥ साधू पातरा संजीय काढ़े, तामें धर्म कहे चोड़े-घाड़े। प्रस्तो यदि जीय छुड़ाये, पाप लागा रोहल्लो उदावे ॥७॥ प्रस्ती रे भूजरा पासा,

१३
पशु गंध्या पावे प्रासा।
जो उगने वो नाहिं खोले
पाप लागे मृत्तर यो योले ॥८॥
जो खोले तो पाप न यचियो,
हुवो जनुकन्या रोरसियो।
भेषवारी उलटी मिसावे,
ग्रस्ती (३) छोड़यां पाप यनावे ॥९॥
तय उनम नर कोई प्राणी,
भेषधारयां मेवाल्यो वागी।
धार पारिकरे मांझी,
जी
नड़क
निणने जोवनों काड़ा के नांहों
के मरवा देवो असंजनि ताहीं।
कहे जीवनो काहां में पाणी,
नहि काड्या पाप लंबो जागी ॥१॥
साधु नहीं काहे नो पापी,
या तो ठीक तुमे पिण थापो ।
(जो) जीव घोड्यां में पाप न लागे,
रयो दाख
पाई ॥१०॥

am
चित्रमय अनुकम्पा विचार
उत्तर-(कोई) खोले तिण ने पाप पतावे,
(बलो) धर्म शरच्या मिथ्यातं लगावे ।
नर पचिया पाप कहे मोटो,
जारों हिरदो हुवो घणों खोटो।
थीवरकल्पी मुनि पिण खोले,
ठाणापंग पोभंगी रे और
यार खोल पाहर निकलणो,
थीचरकल्पी रा कल्प रो निरणो॥३
पररी.........मनुकम्पा लावे,
द्वार खोल्या माहित नहीं आ
अगनी संगधने मुनि टारे,
मनुजाँ ने तो सायु उपारे ॥१
पोते तो निकल झट जाये,
दाँ मरताँ री दया न ला
उणने तो निरदपी जाणो,
ठाणाअंग रो है परमाणी॥
अनुकम्पा रो दण्ड न आवे,
शानीजन परमारय पाव ।

दाल-दूसरी जनुकम्पा रो दण्डश्यतावे, अणहँता ही जरय टगावे ॥६॥ भोला ने पहु भरमाया, कूड़ा कूड़ा अरथ बताया। अनुकम्पा में पाप ने गायो, हलाहल कलियुग चलि आयो ॥७॥ अधिकार अपराधीको निरपराधी कहनेका कोई चोर भने परदारी, हत्या कोनी मनुज री भारी। अपराघो राजा ठहरायो, मारण योन्य जगन दरसायो ।।१।। वधवा योग्यते 'यध्या' कहावे, "वल्झापाणा" पाठमें गावे। मुनि मध्यस्थ भावना भावे, जैसा किरहत है। अनुकम्पा किपा दण्डपाचे पानारय nिा पाये। निपरो र रं... साप्पोदपारो रेमो। मनु दासान।

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दाल दूसरी जाने ज्ञानी न्याय वनावे । मतमार मुनि नित केवे. तेथी "माहण" पद प्रभु देवे ।। ७॥ मतमार कहाँ पाप नाही, भव्य ! समझो हिरदा रे माहीं। 'मतमार' में पाप जो केवे, मिथ्यामत रो पद वो लेवे ॥८॥ साधु धी अनेरा जो प्राणी, थापे हिंसक खेंचाताणी। चाने मत मारण नहि केणी, ये कुगुरु तणा के वेणों ॥९॥ जगजीव राखण रे काजे, सत-शास्त्र कह्या जिनराजे। प्रश्नव्याकरण सूत्तर देखो, संवरद्वारे, कयो जिन लेखो॥१०॥ चार भावना मुनि नित भावे, ते थी संवर गुण पढ़ जावे। मैत्रो प्रमोद करुणा जाणों, me -- मित्रा मनुकम्पा-निसार मायारा बोली....."पखाणा॥११॥ मैत्रिमा ममी लाये, गुणिजन से हर्ष पहाये। मा लिप-जीवों री लाये, गया पोगग मिटाया माये ॥१२॥ नोटा-कर्म को कोई जाणी, बारी जारी जाहल्या मन आणी। रिमा रकम रोकारी, देवे बाल जगत ने मारी॥१३॥ पपाष्टमे मुनि प्राणी, मयमा मारे गुणगी। माग योगा गोनहिवाले, "अनमा"""नारी ॥१४॥ ग. शिम मारी, मममा मटा मुलदानी। मला () मामिल, मन्दिरम१॥ बम मामा, - सालमा इणरी सुगराजंग दरखागो। दुष्ट जीवों से यहाँ अधिकारी, अध्यपन पौगयें पानी पिलारी॥१६॥ ॐ अरघ करी भ्रम पाहे, नाग्य मिथ्यामन रो खारे। "बारें माधु पी अनेरा माणो. जाने हिंसा लेगो जागी" ॥१७॥ (को निणन ) मनमार को जरो गी. ना करणेसाहागी।। 'मनमार' जीष नाहि शेगा. ऐमा इममि पाई देगा ।।१८।। रिमा विशालो. ममा गए । पुरानी पाया. ""मर में दरडो । १ सरि. अपन. रहा। मानदिपनी

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७३
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दाल-दुसरी
(तो) भदिक अर्थ री होवे हाणो ।
तिम हिंसक सर्व नहिं प्राणी,
अति-दुष्ट हिंसक लेवो जाणी ॥ २५ ॥
यध्याने यध्या न यतावे,
निरदोपी करा दोप आवे ।
या मध्यस्थ भावना भाई,
दुरगुण री उपेक्षा यताई ॥ २६ ॥
करुणारी यात यहाँ नाई,
"सुगडाअँग" टीका रे माई।
इणरो ऊँघो अर्थ केई ताणे,
'मतमार' में पाप यखाणे ॥२७॥
नाम सुगडाअँग रो लेवे,
खोटी जुगत्याँ मन सं. देवे ।
तिण हेत कियो विस्तारी,
शुद्ध-श्रद्धा धो है निस्तारी ॥२८॥

चित्रमय अनुफम्पा-विचार ४-अधिकार जीवणा मरणा वांछणेका जोवणो आपणो मनमें आनी, भोजन-पान करे शुद्ध ज्ञानी। उत्तराध्येन छयोस रे माँई, छे कारण में यात या आई ॥१॥ जो पिन अवसर अन्न त्यागे, (तो) आतमहत्या मुनिने लागे। जीवन हेते आहार रो फरणी, सूतर में कोनो यो निरणो॥२॥ अवसर जाण मरण रे काजे, तजे आहार धर्म शुद्ध साजे। पों जोवनो मरणो चाये, पाप न लागे सूत्र पनाये ॥३॥ राजमतो रहनेमीने मापे, चिक्कार तु जीयन राये। मरणो तुमने श्रेयकारी, धर्म सांभ हुये तुस भारी ॥४॥ धी अज्ञानी अनुकम्पा मागा, ढाल-दूसरा ७५ ऊँधा अरंथ करण यू लागा। "आपणो जीवणो* साधू वंछे, (तो) पाक-कर्म रो होवे संचे" ॥५॥ करुणा थी परजीव पचावे, तिणने पाप सँताप लगावे इणमें साख संथारा री देवे, ऊँधा अरथ सँ दुरगति लेवे ॥६॥ पूजा-श्लाघा सँधारा में देखो, जोवणो चावे कोई विशेखो। अतिचार सँधारा रो भाख्यो, पिण नहिं अनुकम्पा रो दाख्यो ।।७।। महिमा पूजा नहिं पावे, तथा कष्ट शरीर में आवे। तप मरण आशंसा लावे, जैसे कि ये कहते है। मापनों पंछे तो हो पापो, परनो पुण घाले संतापो मरणो जीपणो च्छे मामानी, समभाव राप्ते मुहानी (अटाल २ गापा ४९)

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दाल दूसरी भोला ने नांखे खोले उपद्रव मिटण कोई चावे, निण मोटी पाप पतावे॥३॥ "संघरहार" जिनजी भाख्यो, खमंकर"मुनिगुण दाख्य। उपद्रव मेटे ते खेमंकर, ते जीवों रो जाणो हितंकर ।।४॥ श्री वीर रा गुण इम भाखे, आदर कुवर गोशाला ने दाखे । प्रस-थावर (रे) खेम करता, शान्ति करणशील भगवन्ता ॥५॥ पर-उपद्रव मेटण चावे, तिणमें तो पाप न धावे शोत तापादि उपद्रव कोई, निज पे जायो मुनि लियो जोई॥६॥ होवो मतहोवो मुनि नहिं केवे, आरत-ध्यान जाण मौन रेवे। आरत-ध्यान रो तीजो भेदो, বিশ্বাস লা-বিশ্বা रोग आग को कोई लेदो ॥७॥ गविणांग जो गाये, भारत गान प्रणी बताये। मीर मुनिया रोग मिटाये, सेतो भारत नाहि कहा॥८॥ तिम र गाय रोजाणा, বা ল না মপি লিয়াগ। गों पन्दना मुनि नहिं गाये, गाया ॥॥ at आरणा आ जाणी, "गुगा' पर form) कोई पदना मुनिने ६ infr पत्र को॥१.|| म' निसादर निम नागा, nirmanarगी। मंस पुनी करणे, में शामि॥

दाल-दूसरी ६-अधिकार नौकाका पानी बतानेका साधू पैठा नावामें जाई, नावड़िये नाव चलाई। नाव फूटो माँय आवे पाणी, उपरा उपरी जल न भरागी ॥१॥ साना पानी पतावा रोमी तेथी मुनी पनावे केनो। अवसर इपण केगे जावे, जननाले निकल मुनि जाये ॥ वितिने उतरवा नहिं घाट. "आहारियरिया" पाठ । जनना में निकलने जागी इपलाने से नारि पसागा ॥३॥ एवा साल-अर्धने ही दाटी दालों में डा में जोड़ी। (कई ) "मनुज पापा पा. तेयो (मुनि) अट नावे जाती। .

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नो मदिज सनसारे भाई पररी अनुकम्पा धर्मरे माई ॥५॥ मनुजांन पचाया में धनों यो ठाणायगरो माँ। निज (अनुकम्पा ) काजे न पाणी यनावे, (निम) परका पिग नाहिं दिखावे ॥१०॥ पाणी यताबारी कल्पनाही, मनुजरक्षा धर्म रे माहीं। जीव पचियां नमन में भी 'निणगेमाखी आचारगो॥११॥ "अनुकम्पा फ्णिरी, करणी पनी ज्ञानारंगेन वरणी। शंका होना मृतर देखो, मायरा बनाया जंट लेखा ॥१॥ *द्वितीय हाल सम्पूर्णा * * जैसे कि वे रहते है:- आप उसे अनेरा प्राणी अनुकमा रिपरी नहिं आनो। । अनुदाल२गार है। ६

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दाल-तीसरी। तीसरी-ढाल १ अधिका मेघरथ राजाका परेवा पर दया करनेका। (तर्ज-विछिया नी) इन्द्र करी परसंसिया, मेघरथ मोटो महाराय-रे जीवां। दयावन्न दानेश्वरी, शरणागत देवे महाय-रे जीवां ॥१॥ मोह अनुकम्पा न जाणिये, नाहिं मोह तणो यह काम-रे जीवां। परकाश अन्धेरा ज्यू जुवा, दीयां रा न्यारा नाम-२० मो०॥२॥ तिण काले एक देवना, दयाभाव देखण रे काजरे जीवां।

चित्रमय अनुकम्पा-पिचार रूप परेयो पाज नो, तिण कीनो पैफिय साज-२०मी० ॥३॥ पदिपो रायरी गोद में, भय धी ततस काप-रे जीयां। भारणी दियो महारापजी, भप मनपायो फदियापरंजीयां, मोगा। पाज कहे भए माहरो, मुन्न भूला नो यह जिकार- जीयां । और कह से नहीं, मोने आपो म्हारो माहार. मो० ॥५॥ यो शरणागत माहा, और मांग त यातु रशाल- जीयां । जे मांग से आप जीवदया प्रतिपादन जीयां, मो० ॥३॥ माम मा निज देना, अगर परामर तोले-जीयां । पनि हो गयइम को, परतो भलों को पोसने जापा, मोसा .

तीसरी-दाल तुरत तराजू मांड में, राय खण्डन लागो कायरे जीवां। हाहाकार हो घगो, अन्तेवर अति विलखायरे जीवां मो० ॥८॥ उत्तर दीयो राजवी, नहिं मोह तणो यहां काम-रे जीवां। क्षत्री धर्म है महारो, धर्म राखधारोमान- रेजोवां,मो० ॥२॥ सप समझाया ज्ञान पिरखाया नाना जाय-रे जोया । इमड़ी धनः जगत. दुजो वरी हामा कांजीवां मां०॥१०॥ निज नो मरगा बारमा. नेता जागा धनग कामजीवां। माग करीनाचगा. शुद को नाम जीवां मा० ॥१३॥ नन यो मन नहीं. जगजारो।

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तीसरी दाल देव योले इण पर वाय-जीर्वा। अनुबन पांचो निर्मला, दया-धर्म धारे चिचाय-जीवां, मो० ॥१॥ व्रत तोड़ हिंसा करती नहीं अनुकम्पा न छोड़सी जाज-जीवां। (जाब ) धर्म न छोड़सी ताहरो तो है करन मोरोजकाज-रंजीवां मो० ॥२॥ पचन सुणी उरियो नहीं इन चिन्तये चित्त मुझारजीवां। धर्म योधणरे नहीं तेथी पाप करण इंझार-रे जीवां मो॥३॥ सुमति नजी कुमती भजी तेहथी धर्म सुहावन चाय-जीवां। मैं मन जाण्यो है पहनी तेथी धर्म छोड्यो किन जाय रे जीवां मो०॥४॥ पाप है घातक जगत कु:ख देवे कर सकाजरं जीवां। जगवच्छल जिन-धन है

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हाल-तोसरा मरता नहिं रायो एक-रे जीवां मोगाथा पदवी अणहँ ति यात उठायने अनुकम्पाने थापे पाप-रे जीवां । जारे मोह उदे अति आकरों तेही सोटी करे हे थाप-रे जीवां मो०॥९॥ झाइ राखण धर्म छोटयो नहीं तेधी मोह कन्गा री थाप-रे जीवां । त्यांने बुधवन कहे इण परे इक हेतु देवा जान रेजीयां मो॥१०॥ "रायण सीनान कई तुजन न करवीकार --रे जीवां। तेथी मरसेर आन नाना थारे नदिया प्यार जीवां मो०॥११॥ दया धन है तो सगर वा बम जीवां। धारे हिरवे दाटीवाननः म्हारे हिस्सांना नम-जावां मो०॥१॥ शील नसोना हण्डया नज मन या

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तोमरी दास जीव रक्षा धर्मरे माय-२० मो०॥११ कोई देव कई श्रावक भणी तृ दे जिन धर्मने छोड़-जीवां। नाहिं नो साधवी गुमणी नाहरी जारो शीलने नाखतँ नोड़-२० मो०॥१८॥ घर्म न छोड़े तेहधी कोई मूर्ख उठावे भरम-रे जीवां । शील पवायामें पाप है तिणरे हेते न मोडयो धर्म-२० मो॥१९॥ (यलि ) देव कहे धर्म न छोड़सी झुट चोरी रो करत्यै पाप -रे जीवां । तय धर्म न छोड़े तेहथी कोई मूढ़ कर पदवी धाप--२० मोगा२०॥ धर्म त्याग चोरी न हुड़ावनां चोरी झूट छोडावा में पाप -रे जीवां । या मूरखरी परूपणा इम ज्ञानी जाणेसाफ रे मो० ॥२१॥ इम अठाराही पाप रो

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तीसरी-दाल छोड़ो धर्मन भेप रो लाज-२० मो० ॥२६॥ ३-अधिकार "माता बचानेसे चुलणी पियाके व्रतादिका भंग नहीं हुआ सरणक नी परं जाणज्यो, चुलणीपिया नी यात-रंजीवां। पुत्र मार ला कर छांटता, अनुकन्या राखो साक्षात-जीवां मो०॥१॥ अपराधीने नाहिं मारणो. कीयो पोसा माही नेमजीवां। तेथी पुत्र रामारणहार पे. अनुकम्पा राखी घर प्रेमजीवां मो० ॥२॥ मूडमनी उलटरी कह. जारे दया नहि दिल मांय-जीवां। करगान की अंगजाननी. एवी खोटी योले वाय-जीवां मो० ॥३॥ सो देव इणी विध योट तो. थारा पुत्र पचायामें धर्म-जीवां।

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तीसरी-साल . हम सुण चुलणीपिया कोपियो, यो तो पुरुप अनारज थाय-रेजीवां । पकड, मार पहने, इम चिन्ती लार धाय-रेजीवां मो० ॥९॥ देव गयो आकाश में, इणरे धाँवो आयो हाथ-रे... कोलाहल कीधो घणो, तय आई भद्रा मान-रंजीवां ,मो० ॥ १० ॥ वच्छ ! विरूप देख्यो तुमे, नहिं हुई पुत्राँ रो घात-रेजीवाँ । पुरुप मारण तुम ऊठिया, व्रत-नेम भागा साक्षात-रंजीवाँ, मो० ॥११॥ योला इम कहे. जाँरे नहि अनुकम्पा संप्रम-रेजीवाँ । "अनुकम्पा करी जननी नणी, ते संभागा व्रत नेम"-रेजीवां, मो० ॥१२॥ येदा हो इण पर कहे, मिथ्यातरी चढ़ियो पूर-रेजीवाँ । इहाँ झूठा

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दालनोसरा अनुकम्पा थी व्रत भागा कहे. ते चूड़ा काली-धार-जीवां। यली भोला ने भरमाय ने, पकड टुपयो लार-रंजीवां, मो०॥१८॥ "भगवए भन्गनियन"रा, वाल भग पोप"रा अर्थ-रंजीवां। रीका में किया इण भाँत यो. थे खेंच करा क्यों व्यर्थ-रे जीवां, मो० ॥१९॥ कोप करी ने दीडियो. पुरुष मारणारे परिणाम-रे जीवां। अनुव्रत भागो तेहथी. कम्गा न रही निग ठाम जीवां. मोगा२०॥ अपराधी पिग नहिं मारगी. या पापधरा मांद जीवां। भाव हुवा मारण नगा. अन भागो मजो हटवाद मां ॥३॥ मोश फरगन्याग पा. अगर पर आयो कार-जीवां।

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तीसरी-दाल •E६ शूरादेव आवक तणी, चुलणीपिया सम वात-जीवां। देव कष्ट दियो पुवाँ तगो, तिनमें विशेष के इण भाँत-२० मो० ॥ जो हूँ दया-धर्म छोडे नहीं, को धारी देह रे माँय-जीवां। सोले रोग मैं धार, । मरने दुर्गत जायजीवां, मो॥२७॥ इम सुण कोप थी दोडियो, चुलगीपिया सन जागरजीव। व्रत-नियम भागा कह्या, ते समझ ने तज दो नाग-जीवां, मो० ॥२८॥ पोपा सानायक में तुमें एवी करो हो याप-रेजीयां। देह रक्षा निया भागे नहीं, जागार कहो तुन साफ-२० मो० ॥२९॥ . जैसा कि श्रावधम-विवार" में धावक की सानापित न की दाल कहते हैं: - . -- चित्रमय अनुकम्पा-विचार एम कपने शूरादेव रे, देह रक्षा थी भागा न त रेजीवां। हीये अनुकम्पा किणरी करा, तिण पी भागा इणरा प्रत-रे जीवां, मो० ॥० इण कयने ये जानलो, धुलणीपिया नी (पिण) पात- जीवां। जननी अनुकम्पा थकी, नाहिं प्रारी घात- जीयां, मो० ॥३१॥ गरीर कपादिक सेहना जतन करे मामारकमायनी हाय थोरादिक भय थी, एकांगम्यानक जयणा में ज्ञायी २yn मारतो आगार राम्बिया, मोगरोमही छे भागारजी। मोग नेत्याला मामा मुरे, त्याशिणविध सापेबहार जी, मित्राला प्रत प्राधि।२७" लारोगादिक गमय पी. गच्या दयायनी।

दाल-नीमरी।
१०१.
हिंसा करण ने दोटियो,
वली मोघ आयो निगवार-जीवां।
अजतना ध्योपार धी,
ब्रत नेम पोषय टूटी कार--२० मो० ॥ ३२ ॥
व्रत भागे हिंसा धकी,
यो निश्चय लीजो जाण-रे जीवां।
राएगाते
पाखतो कपड़ादिषः हुये घणा ।
स्यों ने तो बाहर न ले जाये तायनी ॥२८॥
जावता,
समाईरो भंग न थायजी
त्यागा छे त्यो ने ले जावता,
सामायो रो प्रत भाग जायजी ॥ २६ ॥
ग्यारहवें प्रत को ढाल में भी लिखा है।
पोपा ने सामायिक प्रत ना.
सरखा छे पचसाणजी।
सामायिक तो मुहत एकनी.
पोपो दिवसरात रो जाणजो ॥ ७ ॥
पोषाने सामायिक प्रत में,
यां दोयां में सरखो छे नागारजी ॥ ८॥

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तीसरी-दाल १०३ महल अन्तेवर ताहरा, अगनि में पले परतख-रे जीवां। तुम स्वामी छो पदना, ज्ञानादिक नो परे (याने)रख-२० मो०॥४॥ तय, नमीकपिजी हम कहे, ज्ञानादिक गुण जे मूझ-रे जीवां पधी पीजी यस्तु नहिं माहरे, निश्चय-नयरी ताई सूझ- रंजीवां. मो० ॥५॥ मुंझनो ते तो पले नहीं, पले. ते न म्हारो होय रे जीवां। यह मिथिला पलता थकाँ. ज्ञानादिक नाश न होर जीवां. मो० ॥६॥ वेई अज्ञानी हम करे अनुकमारी फरया घान जीयां। "नमीराज ऋषि जागी नहीं. मोह अनुसनारी पात" जीवां. मो० ॥७॥ (उत्तर) अनुकम्पारोमदन नहीं. नहिं उनर नीपान-जीवां।

AM.
१०४
चित्रमय अनुकम्पा-विचार
थाँ झूठा गाल यजाविया,
थोर मोह उदय मिथ्यात-रेजीयां, मो०८l
(जो) अन्तेवर रक्षा ना करी,
तेहथी अनुकम्पा में पाए-रेजीवां
एयी करे कोई थापना,
तो उत्तर मुणजो साफ-रे जीवां, मो०॥९॥
हिंसा, झूठ, चोरी तणा,
नमी (जी) न कराये सागरे जीयां।
यस्तर पिण राखे नहीं,
संग में न रहे महाभाग-रे जीयां, मो० ॥१०॥
निज हित में तत्पर रहे,
पर साधु रोन करे काज-रे जीवां
प्रत्येकयोधी मुनि तिके,
पर रोन पंछे साज- जीवां, मो० ॥११॥
या प्रत्येकाची रो नाम ले,
कोई मूर्य कर पायी थाप-रेजोपां।
जो कार्य नामपि ना करे,
तिग में मोहतगो, पाप-रे जीयां, मो० ॥१२॥

इन लेखे (तो) दीक्षा देश में, बलि विविध करावग नेन-जीवां। ते मोह पाप में ठहरसो. तेने ज्ञानी तो माने केम रंजीवां, मो० ॥१॥ दीक्षा, त्याग, च्यावच तणा, याँ कार्य में दोप न कोय जीवां । तिम परजीव रक्षा में जाणज्यो, थोवरकल्पीकर सय कोय-२० मो० ॥१४॥ जिणाल्पी प्रन्यायाधि नो, जिण कामाँ रो कल्प न होय जीवां। त्यारे देखा-देखी कोई ना करें: निर्दयी समझो सोय रंजीशं. मो० ॥१५॥ ठाणापंग में भाषियो. कन्गा नो अधिकार जीवां। (पल्ली) छनी शक्ति न्यावच ना करे. याँवे महा मोहणी री भार -२० मो० ॥१६॥ थीवर कल्पी रा कल्प रा; जिन पदवो भायो मर्म रेजी।

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तोतरी साल १०० शमसाणे कासरग कियो, सोगल आयो निहाँ चाल रंजीवां मायेपाल पाँधी मादी तणी, माँ घाल्या खीरा लाल रे जीवां, मो० ॥३॥ कष्ट सयो वेदना सनी, मुनिमोक्ष गया निणयार-जीवां। ई मंदमनी तो हम कई, "नन करुगान करी लिगार:-२० मो०॥४॥ पहले अनुसना आणी नहीं, और साउन मेल्या साप रेजीमां। नाशि पहले हः कमोथेरना अति जी. मेरमान भाभी गिर १८ हमोगामार पर। पहिले मनु जोन मानलमा::

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सरोडाल ११३ झूठा बोलता सरनो नाय-२० मो० ॥११॥ जय ज्वाय न आवे एदनो, जाड़ा-सवला गाल यजायरेजीयां। म्लेच्छ शस्त्र खुटा थका, , गर धो टोल गुड़ाय-रेजोवां, मो० ॥१२॥ पार्व-प्रभु दीक्षा नही, कास्सग कितावनमारजीयां। जर कमठे मेह यरसावियो. उपसर्ग दोनो जाप-जी, मो० ॥३|| तद घरगेन्द्र पदमावती, सनालोदर सानाकिया ताकिमाने. दुपदेशादेशा भगवान ने सरितामा दिनभिती

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तीसरी हाल
भीमती अमर कुमर वली,
भील सेठ आदिक नी यात-रेजीवां ।
देव साय करी (नुमे ) मानो खरो,
विच पडिया ये सक्षात्-रेजीवां मो० ॥१६॥
यह था सम-दृष्टि देवता,
शि-धर्म दिपावणहार--रे जीवां ।
नवकार महिमा कारगे,
संकट मेट कियो उपकार-२० मो० ॥१७॥
कियो कनक-सिंहासन तत्पेया।
कपर अमर कुलर प्रति पैसाएं,
इन जाण जपो ध्री नवकारं ॥८॥
बछड़ा
चरावतो जिहवा,
नो पूर आयो गुट नपकारं ।
थई ततसोप सरिता दोर कारं,
इस जाण जपा ध्रा नरकारं MER
सेठ नमुद में डूबतो.
नवकार गुप्यो धर चित्त सान्तो।
सुर जहाज उठार मेलो पारं,
इन जाप जपोथी नवकारं ॥१०॥

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बाल-तीतरी। ११७ उपसर्ग मेव्या नाक्षात-जीवां। तुम कयने पिग हुवो धर्म यो, मान लेवो छोड़ मिथ्यान-२० मो० ॥२१॥ "तो सर उपनन बोरना, देव .मन मेट्या आय"-रेजीयां । पदी शंका कोई करे, जारे सुर-गुव हिर नाय-२० मो० ॥२२॥ निदवादी अवविधरा. मिटता देगनिज ज्ञान- जी। (ते) दिवन मेरा देश नं. धर्म मेयारो देशम पान-२० मो० ॥६॥ जोनार.ना. में हार-जोगा। लौरीनान से मारना. (प) मंशांप T-नो मो. शिममार-

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तीततेमाल न्यानद घगो करुगा तगो, उदय लायो मिथ्यानरो पाप जीवां। तेयो जनुकंपा में पाप छे, एवी (कोई मंद करे पाप-२० मो० ॥२॥ पनि ज्ञानो कहे समझायवा; इन्द्र जे.जेन करे कान-जीवां। तिग में पार कहो नो विचार लो, के कानसनान-२० मो० ॥३॥ श्रीकृना नरवर महामनी, जार पहटा दीनो चिराय-जीवां। जो दीक्षा बो भी नेम पे, मैं पिउनारी कीं सहाय-२० मो०n सदसू-गुरूर संबन लिया. यो परतत महा-उपसार-जीवां। पिय इन्द्र पड़ा यो नदी. तिगरो बुरकत करो विचार-मो० जो इन्द्र कान किया मन, लिन्त कृमाने (काई) पाप-जोशं । -

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दाल तीसरा
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२२१
सायद्य ने निरवद्य वली,
अनुकंपा रा भेद दोय-रे जीवां।
इन्द्र कया नहिं तुम भगो,
| भाखो क्यों निर्बुध होय-२० मो०॥११॥
नय तो झटके योल दे,
म्हारे इन्द्र संकाई काम-रे जीयां ।
' म्हें मन से करों पल्पगा,
म्हारा गुराँ री राखाँ नाम-२० मो० ॥१२॥
तो समझोरे ममतो जरा,
अनुकम्पा न मायय होय-रेजोवां।
मन्त्र में न भायो फेवरो,
पलि :न्द्र फमोना नोय-१० मी० ॥
अण नी पात उटागनं.
मत करो अनुसन्मापान-जीयां ।
इन्द्र रोनाम लेई-.
मन फर्म पाँगो माक्षात-०मी० ॥१४॥

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पालनसते १२३ पाने पेला पिग वा नहीं, जागता था संग्राम में घान-जीवां। युद्ध मिटाया पाप ने, तेयो कदीन मेटग पान"-२० मो० ॥३॥ (उत्तर) भोला भरनावगनगो, पोतो परतल माँसो फन्द-जीवां। मानी छे तहने, तर नुसहो हो जाने पन्द-२० मो० ॥en जो मटन पोर ना गया Writer:१२:

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तोसरीढाल पलि साबुन मेल्या साय"-२० मो० ॥२॥ तो इमहिज नमजो भाव थो, संग्राम मेटण में धर्म रेजोवां । न्याय रीत समझाविधा, शान्ति हुए न यन्ये कर्म-२० मो० ॥१०॥ सय जीव खेमंतर वीरजी. "सुगडायेंग" माय देख:--रे जीवां । भय मेटे सब जीव रा. अभयंकर बिन्द विशंख-२० मो० ॥१२॥ भगवन्न विना देश में. सोसो कोमा मोर-जीवां। मनुप्यारे उपद्रव ना दे. पिण होगो को मिटे नाय मो० ॥१. तिन चेडाकोनिम संग्राम में. न्याय मिटाया माधर्मजीवां। भिटनोन देख्या ज्ञान में, मनु ना गया समझो नर्म-२० मो० ॥१६॥ मनुकम्पा ठायवा, चित्रमय अनुकम्पा विचार भूखा राग्वे भोजन मा दिये, पापक होवे दपा हीण-रे जोयां। माघु आहार न देवे गृहस्थ ने, ते तो कल्प राखण परवीण-२० मी०॥१०॥ "साघु-प्रावक दोनों तणी, अनुकम्पा प्रवृति एक". जीवा गयो (पेई) करे प्ररूपणा, उत्तर पूरयों पलटता देख-२० मो॥१॥ माधु उपधि में उलमिण, उंदरादिक जीय जाण-रंजीवां। (मा) अनुकम्पा आणी ने गंड, महिंध्या पोहोचे पाण-०मी०॥१०॥ गेही (पारस्य) रस्मीमें उलमिया गायादिक पाणी जाण- जोवां । गेही दपासेगा नगियां भी-२० मो०॥ धर्म पना सायन, गहोंने बताय पाप और नामगजान्त फर्क पायो किण कारणे खोटी श्रदा दीखे सास-२० मो० ॥२३॥ "साधु श्रावकरी गकरीत " मुंढाथीपोलो एम-रे जीरा। दोनों सरीखा काममें तुमे फर्क बनावो केम-२० मो० ॥२२॥ जोव मरे साधु योग थी, गृहस्य बनाया धर्म-जीवां।। गेही गेहो ने जीव बताय रे निण नोगताबा नपर्म-२०मो० ॥ जीब बच्या दोनों जगा दोनों रा टलिया पाप-जीप। इन दोनों सरिलो काममें उलट पलट करें खोटी थाप-२० मोगा धर्म यनावे एकमें इजामें वे पाप जीवां। यो कुटिल-पन्य गुरांनो

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मा REMITTER मामा पोसा, माजधार पर टायर माय बाप भी मामी. गार पर भी गर । मात्र आre fमय, मन्नापी पम्प काण में मन्दर्मान. सापपर मदार । अनंतीनामरे, मारा जाएगा। मारयाली अमंजनी. अमंजमी माया जाय। पर देय महावंदना. पर, (महा) दुये घराय || आग्न मार ध्यान धी. दोनों पांध पाप । पाप टलाये वेदना. ने मानी मन मार !! (प.) "हिंमा पाप हाय दां. मन भुगना कर्म । मृत मर काई नेहना नहिं मानां धर्म"|| पा प्रदा गा.नगी. मिथ्या जागा मार । मन युगी मानं नी. दर माहगा पाप ॥१॥ जीय यगाया . खाटा न्याय । (नयुक्ति भी साटन किया.मिध्यानम मिद जाय HARE चौथी ढाल । (कहे ) "माड़ो भरियो हो डक मामला, निण पर भेस्पो आयो बलाय हो भविकजन ॥ तिणने काल्या दाख थो मरे, नहीं हंकाल्या मरे तसकाप हो भविकजन ॥ करो परिक्षा सत धर्मरी ॥१॥ "धर्मी छोड़ाये केहने कर्म करो दुख पाय हो भविफजन । लाय लागी संसारमें, पीचे पड़िया पाप धाप हो" भ० करो० ॥२॥ (उत्तर) इम भोलाने भरमायया, खोटालगाया न्याय हो भ० । ज्ञानी कहे हिवे सांभलो, इण भरमने देवां मिटाय हो भ० करो ॥३॥ भेत्याने जातां देखने दयावन्न दया लाय हो भ० ।

ในระยะ ...

चाथा ढाल। (कहे ) "नाहो भरियों तो इंडक मामला, तिण पर अस्पो आयो बलाय हो भविकजन ।। तिणने काल्या दुःख यो मरे, नहीं हंकाल्या मरे तसकाप हो भविरुजन ॥ करो परिक्षा सन धर्म री || "धी छोड़ावे केहने कर्म करी दुख पाय हो भयिकजन । लाय लागी संसारमें, योचे पड़िया पाप पंधाय हो" भ० करो० ॥२ (उत्तर) इम मोलाने भरमाया, खोलालगाया न्याय हो भ० । ज्ञानी कहे हिवे सांभलो, इण भरमने देवां मिटाय हो भ० करो ॥३॥ भैत्याने जातां देखने दयावन्त दया लाय हो भ०।

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|| जल जंतु रना ॥
दाल चौथी गाथा १५, १६ फा भाव वित्र
गाय
पोवामिला
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साडा में पापा धाडफा, जोय प्रणा निण मारम.
भरिया उसक माउला पाला पिया मागाय ।
फरणावत धावन धानको. गायने दादा पाय nuमः ।
पाप टाल्या दोनां नपा इनमे धम्म दुवा नाय ! म

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पांचवा-दार घोर हिंसक लम्पट मणा पाप छोरावां हो मारो प्रहारी रेश"। इसहा कुहेतु पोलवे, जीवरक्षा में ही पनावे पाप । उत्तर पूणरो सांभलो, तेथी मिटे हो मिथ्या सन्नाप शु०॥ चोर अदत्त ले पारको, ते धन ने हो दुःख-सुख नवी कोय । धन रा धणी ने दुःख ऊपजे, पृष्ट वियोगे हो आरत पहु होय ॥शु०॥८॥ तेधी अदत्त-पाए प्रभु भाखियो, धनहर ने हो मुनि दे उपदेश । स्त्री हो पढ़ी कृयां मांदी भाय । यांरी पाप-धर्म नहि साधुने, राधा मूबा हो तीनों भवत मांय ॥०॥८ धन रो धनी राजी हुयो धन रहो, जीव पचिया ते पिण दर्पित थाय । साधु तरण तारण नहीं तेदना, नारीने हो पिण नहीं दुयोई आप मा (अनुरुम्पा दाल -५)

قرار داده شد که رفتار ماده 4 و 4
4
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पांगशवाल पकरारे कर्ज पुरे घणो, ऋण-मेटकहो पुत्तर मम जाग। साधु पिता मम तो.ने. किम पर हो कहा पतुर सुजाना॥१४॥ हिंसक ने परजे सही, करम ऋण रोहो पयों पांरे तुंभार ।" इम भोला ने भरमायवा: रच दीनी हो कृतीकडोकदार ।।शु०॥१२॥ कागनी तुमे कृहेतु थो. मिथ्यापखनी होकीनी या थाप। यकरो दुःख भी नहफहे. दुख पाये हो तेने अति सलाप ॥४०॥१६॥ शान्ति भाव उणरे नहीं, तीन आरन हो ध्यावे रुदर ध्यान । जैसा कि ये कहते है:- जे पररा से जोय. पांडे नही लिगार। ति: पर दृष्टान्न ने, वित्रमय अनुकम्पा-विचार ~~.. तेपी हल्का करम भारी हुवे, मन्द-रस ना हो तोवरस पहिचाना शु०॥१॥ अल्पस्थिति महास्थिति करे, पाप भोगतां हो यांधे माठा कर्म । एवी करकश वेदनी बेदता, आहाये हो ज्ञानी जाणे मर्म ॥शु०॥१८॥ माभन्दा मुग्यकार ॥६॥ माहुकार रे दोय सुत एक कपूत अयधार। अण करडी जागा, माथे करे अपार॥ जो सुत जग दोपतो, यश संमार मझा। काडी जागागकरज, उतार तिण वार. कहो कहने परजे पिता दोय पुत्र में देना पई कर्जकर नमु. * समेटत पेय. दाल १२ मी. ( ममता राम शिला देश) पांगतान एवा कर्मयन्य ना काम में, कर्म-टण हो लेवे मिथ्या नाम । न्याय अन्याय नोले. नहीं, परतख दीखे हो माठा परिणाम ॥१५॥ सो पकरा कमाई हणता धका; मुनिवरजी हो तिहां दे उपदेश । पर्ज माय मुत अधिर मनो। गर पार पिना यरनोरं. ममम नर पिग्ला । कारही जागा रामाये कांप पोजे, प्रत्यक्ष दुरा पामीले २ सम... अधिर माया गेवर्ज उतारे, जनक नाम नहि यार ॥ पिता ममान माधु पिडापो. यमगे रजपून घे सून मानोरे समः ॥२॥ सर्म पापमा कुप फरन.. मागला कर्म कुप अपहरनो रे । सन चम्म अप रजपूत माये कर के, सकरा मंदिन-र्म भोगवे डेरे साधु रजपून ने यजे मुहाय. कर्म करम परे काय समः ॥

चित्रमय अनुकम्पा विचार var-. ते घात टालण पकरा तणी, कसाई राहो मेटण पाप कलेश २ करकश वेदना ऊपयां, पकरा घ्यावे हो महा आरत ध्यान । बकि रुद्र-ध्यान पिण ऊपजे, "टाणाअंग" (में) हो जोयो घरध्यान॥२ पूर्व कर्म दोनों भोगवे, नया यांधे ही दोनों वैराणुएन्य । मुनि उपकारी बेहना, उपदेशे हो टाले योहना बन्ह ॥२२॥ (क) “हिमक पाप छुड़ायया, में नो देवाँ हो धर्म री उपदेश । कर्म या रणागीता माती, पा भर में दुर कामी ॥४॥ मरयर पणे निण ने समझायो, निणरो हिरणो यह मुनिनायो। मम । बकरा जीवण नहीं उपदेग, पड़ा भोरम बुद्धिमान म.. ( मिरारमा)

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पांजरा-सान दण मिथ्या-पख ने सोर दो, मन्-श्रद्धा रोहो मन जाणो ख्याल ॥३॥ निज्जरी भर्म मिटायवा, एक हेतु हो मुनो चतुर मुजाग । मास-खमणरे पारणे, गोपरी आया हो मुनिजी गुणखाग ॥३॥ कोई मूख मन में चिन्नवे, साहार येराया हो निज्जरा पन्द होय । नाहिं वेरायां निजरा घणी, नए चरसी हो मुनिने गुण जोय ॥शु०॥४॥ जिण मुपात्रदान न जोलख्यो, ते मृढ़-मति हो एवो कर विचार । मुनि जांचे हे जाहार ने, देवगवाला ने हो हुवे लाभ अपाराशु०॥३५॥ कदा आहार मुनि ने मिले नहीं, समभावे ही निजरा बहु होय । त्यांने पिण आहार आपना, दाता रे हो धर्म रो फल जोय ॥शु ६॥

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पांचवा-ठाल १५० एवो कृदेतृ बेलवी, भोला मागे हो करमतरी थाप शु०॥२०॥ (उत्तर) हिवे ज्ञानी कहे मपि सांभलो, यचियो-मरिया री हो सरखी नहीं बात । बकरारी रक्षा कारणे, उपदेशे हो मुनिजी मामात ॥शुद्ध०॥५१॥ नारी मारण (मुनि) कामी नहीं, मारण में ही नहीं पर उपकार । आत्मघात करे (कोई) पापिणी, महा मोहवश हो मरे ते नार ।।शु०॥२२॥ त्याग हेते स्त्रो मरे नहीं, मोह कारण हो वा मरे मत-हीण। तिणरी पिण घात हुदायवा, उपदेशे हो मुनि धर्म-प्रवीण ||शुद्ध॥२६॥ सुण उपदेश (कदा) पच गई, तेथी टलिया हो महा-मोहनोकर्म । आत्महत्या टल गई गुण निपज्यो हो यो धर्म रो म|शु०॥२४॥ +4 LAraria- चित्रमय अनुकम्पा रिचार पकरी नारी पचिया पका, गुण निपजे हो दले पाप विकार । स्वयाने गुण नहिं नीपजे. सुधमन धीही करो जरा पिचार || माणों पनायगां एक है। गला जाणीही विकलां राण। जार मान न धर्म-पाप गं, जाग फूटा हो हिपा नेण शुढ०1०11 मुनि उपकारी बेदना, ये जग ना हो मैटगा माता कर्म । जा अदा पामे में पेठ, नो पाम हो गयानापमं ॥1 मारत दले, पहना. प्रदा गोगा मानो हो । म निष्ण-नाग मनि टुना, काही मरि पहना जोप Poirecli कदि कम गदर देगा, मंदर प्रदापामंदिप ।

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पांच दाल (तिम ) हिंसा घ्या यच्या जीवड़ा, उपकारो हो मुनि रक्षक जोय ॥शुद्ध॥६८॥ जोव मारण में हिंसा कही, नहीं मारे हो दयो रा परिणाम । मरता जीव यचाविया मनसा यावाही दयारो काम शुदग॥३९॥ * बेड़क हणमं इम कहे, "जोवाँ का तो नहिं दाँ उपदेश । एक हिंसक समझायने, नाहिं मेटाँ हो घगा जोवां रालश"॥७॥ मा कि वे रहते है:-- केरक असामी इमि कडे, छः काया का हा देश धर्म उपदेश । एकण .व ने समझारि, मिट जावेही घना जयां राश।। भव्य जोबा तु जिन अम अलखो॥१६॥ छः काय धरान्त दुबे, एवाभास हा अनल-ताथों धर्म । न्यां भेदन पायो जिन पर रो. ते तो भूल्या हा देश आया अशुभ कर्म ॥१७॥ (अमुकम्पा दाल-~५)

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पांनीटाल गया अनघड़ हो पररावे टोल। मिथ्या-उदय जे जीवरे, तेना मुख यो हो एवा निकले. पोल ॥७॥ व्यवहार शान्ति परजीव ने, निदचे धी हो निज री ते हाय । व्यवहार शान्ति उधापना, निश्चे पिग ही खाय बेटा सोय ॥शुमान आगे जिन अनन्ता हवा, उ: काया राहो शान्ति करतार । दुःख मेटण उपदेश थी, जगपच्छल हो जग ना सुस्वकार ॥१०॥७॥ जगनाथ, जगपन्य कन्या, नन्दी-मत्र हो गाथा प्रथम माय । मर जीव राखण उपदेश यो, सुख थापे हो पन्यू पद पाय ॥शुद्ध०॥७८१ यहता हो नहीं शदेवांग पार । ने आप तरधा और तारिया: उकापारे हो शान्ति न हुई लिगार (२॥ (अनुकम्पा दाट-५)

-
विचार अनुका frगार
আমিনা মাখা,
शानिारयादोकाया
पताल में दालो,
Tamil गुण गारा गाग शु।।
कही-गली ने पिलना है,
हा काही शातिरानाम
हो शानिनातील गरे,
शालिनदी फिम होता गामा॥
मिसरा,
पति मा हो ही गाण।
मन्ग-गाने औरणी,
मयाmfarm. It
परत नवाली,
जगहमी गुण
framnाग में,
नादीगलाल Atlant
कित अगाएगा,
तलोतीमुनि र
+

पांचाल परदेशी अति पापियो पाप करने हो अति हर्षित याय शु०॥८॥ अधर्मा यो राजयो, जर्मनीही करे निशदिन धप। मविर नोर एक समागणे, गाइ-गाड़ा हो सामो कर रयो पाप ॥८॥ योतो नर पशु पंखो ने, (भिक्षु आदिको वृति आदी होछेदो हर्पाय। विनय भाव निगम नहीं, तेयो गुल्जन (मात पिता आदि) दो सादर नहिं पाय ॥ शुद्ध० ॥८॥ देश दुःखा इण गय थो, करड़ा लेखे हो हासिन :खदाय । तेने धर्म मुनाविधा, यहु गुणकर हो होनी मुनिराय शु०॥८६॥ गुण होमी परदेशी राय ने. पशुपंछी हो नर ने गुग धाय । अमण महाण भीखारी ने, -

-~-
गि कालिया
बहु गु होनी शुमाग गुगामा
देश पर गण उपमा
जामी दो का मिला।
गा, जाग २. मिनाश,
गुण ही गर्म मानी गनर ०nkan
नीरमाणामी.
गाहामाठागे पा
()श पीटल जापती,
गुपए
नामा हो पाएगी पाल 1.0
गरपया कभी,
मनादिक्ष पो गान
नंगी नाको
पर ण 3118110011
TIT मिट जाती,
TATEfमर आगा।
निधी) it नामा,
मनिमrit डा या in mat.m
दकासी का.

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POLINILaxmragee না যা যিখান গায় বসা অনন্য। 14ISBIKRINEETARKETARIANTHA विमल नही। Tी गाना 4.1 गि। • Kumi Teacणों पामIENTAL AS arrerai मिधा बहाय TIM Merifier कर- मी का मां पार गया माf. . विमानों की पार Tum.

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SA).
c.830
राजा परदेशी, चितप्रधान और केशी श्रमण ।
प्रमण
BESO
चित्र देखने के लिए है यंदने के लिए नहीं।
दाल पाचयों गापा <a, १० का माय चित्र।
" जरणं देवाणुपिया पदेसिस्सरणो धम्ममारपस्वेजा यहु-
गुणता खल होरजा पसिम्सरणो तेसिणं पाहणय दुपप
याप्पय मिग पसु पचिव सरोसियाण।"
"जीय मारण परिणामयी,
जारे हो माटा लागे पाप
ने) उपदेशया टल जायसी,
गुणपामा हा परदेशी पार ॥॥॥
राय उपश्यना कार थी,
मनुष्यादिक ने उपजे घणालश
संयो पापकर्ममयोकर
राजा ऊपम्ही पणो उपजे 17.10

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पांच साल नदी पात्र होला पाप-में। ऋत्ति-वेद राय सोड़सी. उपदेशो हो स्वामी निर्मलवर्म शु०॥ नि-तृटा दुखिया पका. प्रमणादि हो कर हाय-विलाप । निशदिन कोपे राय पे. खोटी लेदया हो खोटा पाँचे पाप ॥२३॥ ते सगला ही शान्ती पावली. मिलासी हो खोटा परिणाम । तेथी महागुण श्रमण-महाण रे, भीखारी रे हो होमी गुण रो घाम ॥१४॥ देश दुःखी राजा कियो.. करड़ा-हाँसिल हो वांचे करड़ा पाप । ते छोड़ देशा उपदेश धी. तेथी दलसो हो ना पाप-सन्नाप शु०॥१५॥ देशवासी राजा धकी. नित्यं पाव होगाढ़ा सन्ताप । राजा पर कोपे घणा, নিগম -খা तभी पाये हो घणा गावा पाप ||९६॥ देदा फल मिट जापमो, दजामीहो मेला पार विचार देश ने पशुगण निगजातो, नुपे का हो यामी धर्म उचार || गित यिनती करो गुण-भाव भी, सुध प्रदारी तुम करो पिाण) (ग) प्रतवारी-माया मोरया, मर्मागत घरगुण रक्षा माग Rail जो जीव, भिमारी, शरी, कामा में हो न तो गर्म। Kal) अवम अर्ज मिर्ग, जित बन तन ममं ॥१०॥ जीव यमायण कारण, समित पदमा पार मौनाली. मार्ग दिती कलाविमा १०॥ मामा : firom गर्ग,

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केशी श्रमण, चित्त.प्रधान, परदेशो राजा "तथादेश। चित्र देखने के लिए है पंदने के लिए नहीं। दाल पांची गाथा ५६, ७ का भाव चित्र। "तं जाणं देवाणुप्पिया! पदेसिस्स यहुगुणता होत्या. सपस्स वियणंजणवयस्स।" CHODAI MOROSERO "देशदुखी राजा किया, फरड़ा हासिल हो षधि करड़ा पाप ॥ ते छोड़ देशो उपदेशी, तपी टलप्ती हो तेना पाप-संताप nonym "देशवासी राजा पकी, नित्य पाये होगादा संताप ॥ राजा पर कोपेपणा. तेपी बंधे हो घणागाटा पाप ॥शु.॥६॥ “देशकलह मिर जायसी, टल जासी हो मेला पाप विचार देशने यह गुण निपजसी, तुमे करो हो स्वामी धर्म उचार IPORN

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पावरी दाल चितजोरी हो अदा यो एका (तयो) विनती मानी भाव थो, चार यातां रोहा यता लेख॥शु॥११०॥ मोड़ो रे छोड़ो निध्यान ने, जीवरक्षा रो हो तुमे श्रद्धो धर्म । स्यागो कथन कुगुन तगा. खोटो शाल्यो हो जनुकमा में भर्म ॥११॥ कोई पतिव्रता सती नगो, एक पापी हो खण्टे शील विशेष। देहत्याग मांडरो सनी, नोदां मुनिजन हो दीनो उपदेश ।।१२।। प्रपांच पापी पानिशे, सनी नार ना हो रद्या शोट ने माग । मुनि उपकारी देहुना. तुमे समझो हो समझो नि सुजाग | एक मौनव्रती मुनिराज री. काई पापो हो करती यो धान । (निगन) उपदेश देई समझाधियों

V
१
1
।
चित्रमय भानुशम्पायवार
रक्षा कोबी दो मुनि मोरियात ९१
जो को पच्या पाश शुद्धी, ...
तिगरे लेणे हो मनि पगिगे पाप ।
जो मुनि पच्या यारणा कही,
नोपारोयिवाहोदया-गर्म है मार
गोटा हेतु सहणी,
काल जामोदाराजलदेसर माया
मपि मन शुद्ध प्रदता
अद्रा farमर गुग पार १५
TA. TA
.

Giri दोहा माधुजार मानी. कानन मार । भलीना मारिता, निरनिगार ॥१॥ हागांव, भार, मो, परसादनमा मोन पनि पती, श्री जिन वन प्रमाग | पोल. पोलावे. मटो, मापय यहा पेग। मीनों शरणे, खोलो अन्तर ने ॥६॥ जिम सनदीने मापुजी, पर ने करत. पोल। भर जागं मन रिमां, नोनों पारण अमोला| तिम पाये जीर ने, पर ने कई पचाय । पनिया अनुमोदन करे. मिरण शुद्ध कदाय ।।२।। (ब) मायनोलणी, निमन नागोजीब मनुधापा नायज हवे." या कुगुरी नांव ॥३॥ (क)मा निस्वास्नमें सत्यराभास्पा भेद पिण अनुक-५ रानी, मज दो ख.टी खेद ॥1 जिण पोले. परीय में, दुख उपज सुत्ब नर । में मन ने सास यो, मुगहाग रे मांय in पर पोदाकारी नहीं, हितकारी सुखदाय । : .

१.७४
चित्रमम अनुकम्पा-रिवार
ते सत निरचद्य जाणज्यो, जिन सासन रे मांया॥२॥
अनुकम्पा पर-जीय ना, प्राग पचायण द्वार ।
दुःख निण थी उपजे नहीं,निरवच निश्चे धारा॥१०॥
भय मेट्यो परजीय नो, दान अभय प्रभु गाय ।
तिण में पाप वतावियो, जैनी नाम घराय ॥११॥
अभयदान नहिं ओलख्यो, दोनी दया उठाय ।
भोला ने भरमायया, कूड़ा चोज लगाय ॥१२॥
(क) "जीवनचाये मुनि नहीं, पर ने न कहे पचाव
भलो न जाणे यचाविया'इम सोटा खेले दावा ॥१॥

पांचयों-दाल २८. ढाल-छठी (न-चनुर नर छोड़ो कुगुरु नो मंग) इण सापांराभेख में जी. योले एहवी वाय "छकाय रक्षा ना करांजी, जीव वचावांना॥ चतुर नर ममझो ज्ञान विचागा। एहवी करे पस्पणा जी, पिश यॉल यन्य न होय । बट जाय पुरयां थका जो. ने भोला ने खयर न कोय ॥चतुर०॥ २॥ थाने पाणी पानं जो. मातां पहिया जाय। दुख पाव अनि नहकहे जा. जूदा हा जीव काय तुर॥३ साधु देले तिणनावमा जी.

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छठीन्दाल (जो) पाप कहो भगवान ने जी, (तो) पोते कां छोड़ी रीति? उन्दिर माखा पचाविया (जो) थारी कृग माने परनीत ॥चतुर॥१०॥ गोमालाने यचापबा में, पाप कहो साक्षात । (सो) माखां मरता देखने जो, क्यों काडो निज हाय ॥पतुर॥११॥ इम कहां जापन पजे जी, जय खोरी काढ़े पाय। (क) “उपपि हम साधु तगो जो, जाने जीव कोई मर जाय ॥चतुर॥१२॥ नो हिंमा लागे साधने जी. (6) टालग पचावां जीव । दुजा नाय पचावगा जी, या मारी प्रदारी नोंद"यदुर॥१॥ (उत्तर) (पारो) नेसराप रो भूमि में जी, (पारा) पारा निस्ट में नाय !

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छठा दाल उन्दर चिडिपा पचावतां जी, शंके नाही लिगार। श्रावक ने पेठो किया में. पाप रो कर पुशार ।। चतुर० ॥१९॥ इतरी समज पड़े नहीं, न्यामे समकित पाव कम प्रक्रिया मोह मिथ्यात में जी, पोले मतवाला जेम ॥ चतुरः ॥२०॥ (काई) 'मापां ने उन्दर काढणों जो, पातरादिक धो पार । पाटा पर आपकमरे जी, (मा) पेटो न करा लिगार" ॥चतुर॥२॥ (कार) आया बेटोना करोजी, दर पाही जाय। आगोरी प्रहामारी जी. मिलेन पारी न्याय ॥ चतुर ॥ll (ग) परनस पास मिले नहीं जी, नावमा ही जमा

१८०
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पित्रमय मनुएम्पा-दिगार
न्यायमार्ग ज्यां लगयों जी,
ते विकलां रो माने फेम रतुर ॥२॥
(क) "पेर दुरीमो माया जी,
जुदा होये जीव काय!
(प) हाथ फेरो पेट उपर जी,
मो पायक पय जाय ॥चतुर० ॥२४॥
(जो) जोय ययाया में धर्म में नो,
माधु ने फेरणी हात।
(जो) दाप साधु फेरें नहीं,
तो मिथ्या थारी पात" चतुर॥२५
(उत्तर) साघु कहे हिये मामलो जा,
इण कुयुक्तिरोन्पाय।
(जो) हाथ फेरथा निज जीव यचे,
(तो) निज रो फेर पच जाय ॥चतुर॥२६॥
हाय फेरन रो साधु ने जी,
श्रावक केसी केम।
हटवादी समझे नहीं जी,
श्रावक जाणे (धर्म रो) नेम ॥पतुर॥२७॥

कोदाल १८१ (क) “लन्धि जानोसही साघुरेजी, करत्यांस मिट जाय। (जार) को (वह) चरण मुनि रा फरसती जी, नतमग चोखो थाय ॥ चतुर० ॥ २८ ॥ चरण सांघुरा फरसणा जी, श्रावक रोजावार। हाय फेरण रो कहे नहीं जी, में झूट करो उच्चार ॥ चतुर० ॥ २९ ।। लन्धि मुनोरी देह में जी, जो फरसे मुनि शाय। (तो) रोग मिटे साना होवे जो. मुनि ने दोप न यार ॥ चतुर० ॥३० ।। (जो) चरण फरस खड़ो मिजो. या जिन लामा मांय। तिहाँ हाथ फेरण कारण नहीं जी. थारा मन ने ली समझाय॥ (यें झूठी चाई वाय) ॥ चतुर० ॥३१॥ क्युक्यां यहु बेलबो जी.

चित्रमय अनुकम्पा-विचार मोलां दो भरमाय। ज्ञानी न्याय यताय दे जय, भरम तुरत मिट जाय ॥ चतुर० ॥३२॥ (कहे) "उंदिर मांय छोड़ायणो जी, मिन्ना मारण घाय" एवो कर-कर थापना जी, भोलो दिया फंसाय ॥ चतुर० ॥ ३३ ।। (उतार) आवश्यक-मन्त्र देखलो जी ध्यान आगारा रे मांय। उन्दरादिक ने मारया जी, दिल्ली झपटो आय ॥ चतुर० ॥ ३४ ॥ आगे सरक यचायनां जी, काउसग भागे नाय। (बलि) टीका ने नियुक्ति में जी, "रगट दियों बताव ॥ चतुर० ॥ ३५॥ हजारो वर्वा तणी जी, नयुकि निधार। चवदा सौ वषां नणी जी, रूठों-दाल (यो) टीका में विस्तार ।। चतुर० ॥३६॥ माचारजजागे हुआ जी. ज्ञान गुणांरो धार। उंदरादिक यवायवा में, पाप न कयो लिगार ॥ चतुर० ॥ ३७॥ पाट सताविस तुमे कहो जी,. प्रभु आज्ञा रा धार। तेनो की नियुक्ति में जी. यो भाख्यो निरचार ॥ चतुर० ॥ ३८ ॥ ध्यान में जोर यचयताँ जी, कासग भंग न होय। आवश्यक नियुक्ति तणो जी. निरणी लेझो जोय ॥चतुर० ॥३९॥ अठार से संवत पुरवे जी, जीव पवावन माय। कोई लाचारज नहीं कयो जी. पाप करम वन्वाय ॥ चतुर० ॥४० ॥ अपुरो हम भापियो मिनो, ." चित्रमय अनुकम्पा-पिचार फरे गुया री पात । ध्यान सोल बचायतों जी, दोष नहीं तिलमात ॥ चतुर० ॥ ४ ॥ (क) “म्मादिक ने यघायलोजी, मिनकी मे घुटुकाया पाया मरे मुए आगले जी, निणने पाया नाय" ॥ तुर॥४२॥ (उपर) मरतो जाण पाथिपा जी, दोष मुनि ने न कोय। निशिय अर्थ में देगली जी, भरम हिया रोसोय ॥ गनुर० ॥ ४ ॥ पाया पचाय धर्म र जी, माय मी बगाय। सवमा ठाम-कुटाम मोजी कल्प रो ज्यान माग || गतुर ॥४४॥ पर्म देशना (ना) धर्म में जी, पिगये कायो टाप । (तिम) जीव पायगों गर्म में पिण, उठी-दान AN- कर कल्प भी काम ॥ चतुर० ॥४॥ चिड़ियो मुजो थारा स्थान में जी, थार अटक्यो सज्झाय रो काम । परठो के परठो नहीं जी, तय उत्तर देवे नाम ॥ चतुर० ॥५६॥ "चिड़ियाँ ने ता परठदाँ जी, जाणी धर्म रो साय।" (तो) कुत्तो मरधो धारा धान में जो, तेने परठो के नाय ? ॥ चतुर० ॥४७॥ "माधू योजाँ म्हें जैन रा जी, कुत्ता घोसाँ केम" (तो) कुत्तििडया तणो थारे, रयो न सरखो नेम । शतुर० ४८॥ (तिम) जोव पवावा में जाणज्यो जी, ज्ञान से न्याय विचार । अवसर अण-अवसर तणो जी, साघु तणो आचार ॥ चतुर० (कहे) "गाड़ा हठे भरे डाबड़ोजी, चित्रमय अनुकम्पा-विचार L तुमे साधू लेवो उठाय। श्रावक मरतो जाण ने जी, निण ने उहावो के नाय" (उत्तर) म्हे तो जीव पचायवा में, धर्म रो श्रद्वाँ काम। श्रावक ने लड़का तणो जी, म्हारं न भेद रो ठाम ॥ चतुर० ॥५१॥ (कहे) “लट, गजायां, कातरा जी, दाहा धी चौथी जाय। स्यों ने मचाया तणो मुनि, क्यों नहिं करे उपाय ॥ चतुर० ॥ २२॥ जो लड़काने पचायसी जी, मोलरादि लेसी यचाय (जो) लट गजाई रक्षा न करे जी, तो लड़को पनाये कायँ" ॥चतुर० ॥५३॥ (उत्तर) दोनों यचाया धर्म के जी, धे मुठा रच्या तांकान। मिथ्या पंथ चलायवा जी, tos भाट गपा मान ।। पार० ॥५४॥ (पाल) दरकार, गाय, मोगा. सरयाना:पाय। सरको सानी नदीत. र सम काही चिम धायः॥ चतुर० ।।५।। आपपर ती पनापर. जी. को मारा प्राण। শহাব যা না মা, जारी मृर्ग फर कोई माण चतुर ॥५६ ।। सल्यानमा जयमांजा. उपदेश दे मुनिराय। पिन अवसर तो ना दिये जी, (तथी) उपदेश अधर्म में नांय चतुर० ॥२७॥ (निम) अवसर हावं साध रोजी, जीवा न लेंवे यचाय । पिन अवसर रक्षा न एक नो. न धाप ॥नुर० ।।६।। उपदेश १, रक्षा, धर्म में जी, रक्षामं पाप ANA । चित्रमय मनुकम्पा विचार दोयां में गुच परिणाम पिण अवसर होवे जद सदे जी, अद्ध आछो काम ॥ चतुर० ॥५९।। उपदेश बनावे धर्म में जी, जीव बचायां पाप। [पा] खोटो प्रदा तेहनी जी. ज्ञानी जाणे साफ ॥ चतुर० ॥३०॥ लड़का लट सरिखा कहे जी, (त) मुरख, मूढ़ गयाँर। जैनी नाम धरायने जो, भ्रष्ट किया नरनार ॥ चतुर० ॥११॥ कीड़ा, मकोड़ा, मनुज नो जो, सरखो बनावे पात। ति) भेष लई भारी हुआ जी, धर्म री कर रया घात ॥ चतुर० ॥ १२॥ चउनाणी शुध संयमी जी, चीर जगत गुरु राय। गोसालाने पचावियो जी, (जो जी चादनी पारी गोसासी पचायो । उसर, सायों पहनो जी, नपद पन्या नजनन ॥ चतुरः ३१ ॥ करे) गोमाता ने पात्रियोजी, र गया महावीर। पारोश्रीवर ने. दारी अदा पढ़ी गंभीर" ॥ नादुर० ॥३॥ पति को "साने सन्धि सोनी जी. मन भगोनीमांच। समीर वापियो जी. की रकम दाय" भर ३३॥ (इनर उपो जार पचारले डा. समिरे नाय। ते पिता न. पारी अदा २ मार गिर Estu (तंयो) महा चीज लगारिया जी.

चित्रमा काया-विया सन्धि येरे मामा अनुकम्पा उठापया जी, यो मिथ्या-पतरो काम || चतुर० ।। ६८ हिम] ममुचर लधिरा नाम लेजो, भोला ने दे भरमाय। पिण मांगो कोई मत गाणायोगी, मंद सुगा चिल हाय ॥ तुर० ॥ १९ ॥ मीनल लेगा बलि नो भी, दोष न मगर मांगा गुणदाई दृण नाहीयेगी, (पी) शाय-हिमा नहिं पापाचातुर०॥3॥ अंग अपार अन्य में, मधिगदापनकोग। पिग पार पत्रााया जी, यो करट गुम गाययता ॥१॥ दोपहाव र पीने, नाम नमानिया ये, घटनाल तजो कपट से काम ॥ चतुर० ।। ७२ ।। [कहे] "उष्ण ने शीतल एक ऐजी, तेज घिरा मंद" मद किया हम ऊचर जी, [] सुणताँ उपजे खेद ॥ चतुर० ॥ ७ ॥ (उत्तर) शीतल थी शान्ति होवे जी, जीयन विणले फोय। उपण धी जीव मरे घणा जी एक किसी विष होय ॥ चतुर० ॥ ७४ ॥ (कहे) "अग्नि पाणी भेला होवे जी, जीव घणा मर जाय। [तिम] तेज शीनल लधि मिल्या जी, घात जीवा री थाय" ॥तुर०॥ ७ ॥ [उत्तर] तेज लेश्या पदगल भणी जी। अचित कथा जिनराय । मुन्न भगोती में देखलो , खोटा लगावो न्याय ॥चतुर०॥७३॥ हिंसादी कूकर्म यो जी, . m १९२ चित्रमय अनुकम्पा-विचार nnr . Awumnnar AN -- खोटो लेश्या थापा जीय रक्षा रा भावमें जो, मली लेश्या सुखदाय ॥चतुर ॥७॥ मोठो लेश्यामें ना करो जी, जीव रक्षा रो काम। उतराध्येन जोतिस में जी, लक्षण द्वार रे ठाम ॥चतुर०॥७॥ सदा शुद्ध-लेश्या धीर में जी, पाप कहो किम होय। आचारगे देखलो जी, प्रमु पाप न कोनो कोय ॥चतुर ॥७२॥ करें] "राग हुतो तय वीर में जी, लियो गोसाल पचाय । 'एटमस्थपणे चूकिपा' म्हें, पाप केयां इण न्याय' चतुर०incoll [उरार] छदमस्थ राग रो नाम लेने, पड़िया पाप रे कृप अरिहन्न आसातना करी जी,

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१६५ - चित्रमय अनुकम्पा विचार गोसालाने यायियो जी, पाप जाणता व्याम, सो मर्य सार्या ने यर्जता जी, इमो न करजो काम || चतुर० ॥ केवल जान में प्रभु को जी, अनुकम्पा रो धर्म। गोमालाने पगापियों प्रभु, प्रकट करो यो मर्म || चतुर० ॥ दोष न लेश प्रभु कोजी, गोमाल पगाया माँय। योतराग गोप नहीं जी, प्रस्ट देयं कुम्माय ॥ चतुर० ॥८८॥ गानमने प्रमजी कयोजी. मानन्द भयो माय। प्राधिकले निमल यांप, दोष यांग मिट जाए ॥ चतुर० ॥ ८ ॥ गोतम दाप मिटाया जी, प्रकट कमी प्रमु मार।

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छठी-दार
खोटा न्याय लगावता जो,
कह्या कठा लग जाय ॥ चतुर० ॥ २९॥
(उत्तर) आयुष नायो तेहनी जो,
देख्यो श्रो जिनराज।
निश्चय टाल्योन टल्यो (जी),
ज्यां सारथा जातम काज ॥ चतुर० ॥१०॥
(कहे) "गोतमादिक गणधर हुनाजी,
छात्थ सब्धि ना धार।
ज्यायें क्यों न यचाविया जी,
शीतल लेश्यां निकार" ।। चतुर० ।। १०१
(उत्तर) जिन नहिं जिनसमा काया जो,
:
गोतमादि गुणधार ।
जाणे
लायु सर्व नोजी
यदि होनहार निराधार ।। चतुर०॥ १०.
धर्मयोष मुनि जामिया जी.
घमे रची विरनन्न ।
सार्थ-सिद में खिया वे.
पूरवर था मदन्त ॥ चतुर० ॥१०॥

.
२९
श्रावक शरणं
गोसाला
साधु-श्रावक
सक्यो गोस
मिथ्याती मिथ्य
हुआ गोशाल
मिथ्यात पधियो
म्योटी थारी
पायक गोमाला
प्रहरी नहि करे।
कन्द मूल पिपाना म.
या सूत्र भगोती में
तर तो मराहो
पोटी करया थापा
अनुकम्मा रापपी
जीय पचाया
पलि कपट करा
"दो सायु

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ܕܺ ܚܪ

AR चित्रमा अनुम्मा-विचार rammarpan आयुष मुनि रोजाणता जोri गोतमादि गुण धार :: बिहार मुन्यों ने करावना जी,EOPEN (पारपिण) जामें दोप न गंक लिगार ॥१०॥ (मुनि) निदये देख्यो ' ज्ञान में जो ते किम दारयो जाय। ते जाणी ज्ञानी मुनी जी, नमयया स्यां ने बचाय ॥ यतुर० ॥१०॥ मोकोमा बेर न अपजे जी, अरिस अतिशय विशेष। समयसरण में उपना है. होणहार री रंप, चतुर० ॥ १० ॥ निमय होज रानाम में जी, गोशाल यमाया में पाप , उलटा न्याय लगायने जी, में कर रपा खोटीथाप ॥ चतुर॥१०॥ सततु सुण ममामी जी, जामें शुद्ध पिका +--- पक्षात जपाननी जी. निरमल सनक्ति एक चतुरः॥ १०८॥ निय्या-तण्डन करी जी. जोड़ जुगत बरन्याय। हा मात्र अदमा का जी. मानन्द मंगर यार ! चतुर ! १०२ ॥ मंचन जीते नजी. भोपासीमाला जापाद मुस्ता पंचमी जी. बरते मंगल भार ! बरः ॥ १० Pro

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एठी-दार पक्षपात मज पाममी जी, निरमल समकिन एक ॥ चतुर०॥ १०८॥ मिध्या-पाटण ने पारी जी, जोर जुगत धर न्याय । शुद्ध भावे श्रदपा धका जी, मानन्द मंगल धाय ॥ चतुर ॥१०२ ।। संयत जाणीसे मणे जो, डोयाँसी रे साल। आपाद शुक्ला पंचमी जी, घरते मंगल माल ॥ चतर उठी दाल सम्म rict... TETTE . .. start Trrh दोहा सपल निपल ने मारता, देख्या दोन दयाल । हितार धर्म परूपियो, जीव दया प्रतिपाल ॥१॥ निरपट जीव पचायवा, सयलां ने समझाय । ग्यामें पाप. पतावियो, केदक कुमति पलाय ॥२॥ मांसादिक छुड़ाप है, अपित यस्तु रे साय । एकान्म पाप तिणमें कहे, केइ कुबुद्धि उठाय॥३॥ कहे मिन श्रद्धा नहीं, श्रद्धयां हो मिथ्यात । पर्म पाप एकान्त है, यो खोटो पखपान ॥४॥ अल्प-पाप पहु-निर्जरा, मन भगोतो देख । मूलपाठ प्रभु भाखियो, (तेथो)कूड़ोयारोलेस॥२॥ हेप अनुकम्पादान रो, ज्यार है घट माय। निणने सम-पय लायया, ज्ञानोइम समझाय ॥६॥ ऋतु चौमासो मावियो, यो प जोर । सट गजाई हुँडका, उपन्या लाख फिरोर ॥॥

,
एक वेश्या एक साधुरा, भक्त नो मन हुलसाय ।
तिण पेलामें नोसरथा, पेठा गाड़ी मांय ॥८॥
साघुभक्त तो माधुरा, दर्शन रे फाम ।
वेश्या अभिलापो तिको, जावे वेश्या घाम ॥९॥
गाड़ी चलता चग दिया, जीव अनन्ना जाय।
इतनामें बिजली पड़ो, दोइ मुवा ते मांय ॥१०॥
धर्मा पापो कोग छे, इण दोणां रे माय ।
हिंसा याने सारखी, देवो अर्थ यताय ॥११॥
तय तो ते चट ऊचरे, मारा दर्शन काम ।
आता रस्तामें
मुआ,
तिणरा शुध परिणाम॥१२॥
धर्म लाभ तिगने हुवो, हिंसा तणो तो पाप ।
शादो आरंभ धी हुवो, यू बोले ते माफ ॥१॥
वेश्या अर्ये नीकल्यो, निण में धर्म न कोय ।
एकान्त-पापरो काम प, यो साँचो लो जाय ॥१४॥
वेश्या अर्थी जाणज्यो, एकान्त-पाप रे माय ।
दर्श(म)अर्थिगाड़ी चढ्यो, धर्म-पाप येहुधाय॥१५।।
मन्दमति यो पोलिया. तब ज्ञानी कहे एम।
मितुमे नहिमानना,(हिवे)योली पदलोकेम ॥१६॥
नप पाछा ते यों कहे, दर्शन धर्म रो काम ।
गाड़ी चढ़नो पाप में, इम जूदा येहुठाम ॥१७॥

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वाल-सातवी परमार मानी. भरा माना। REET ने दिया. अनिस एनभीगी भर मिटाय।। भविमर्म आरमी ॥१॥ पदमर (भाग. कामाना। पातामन्दानगी मोदीदीमे पानी ने मार ॥ भ. मसान्त पाप पम्पा, नई पगर काटा नाम गि प्रदामन थापा, गगां में जाये दा भाग ॥ म०॥॥

२०४ -~- . चित्रमय अनुकम्पा-विचार भोलाजन भेला करी, खोटा हेतृमो थोपा गाल पजाय । घर में घुस घुरकाय ने, इण विय यो हो रया पन्य चलाय ॥०॥४॥ सुणो दृष्टान्त हिवे तेहना, किणविध बोले होते आल-पंपाल। युदयन्त युद्ध यो परख ले, निरयुद्धी हो से मापा जाल ॥ भ० ॥५॥ (क) “सो मनुष्य ने मरता राखिया, मूला गाजर हो जमोकन्द खवाय। (पले) मरता राखिया सो मानवी, कायो पापो हो त्यांने मणगलपाय""म०॥३॥ इम भोलां (भरमापया, गाजर मूलां रो हो मुख आणे नाम । चमी होको, मांस, मुरदा तणो, नाम लेवे ही नम घालण काम भ०॥७॥ फासु-अन्न यी मरता राखिया, तिण रो तो हो छिपावे नाम ।

सातवी हाल
२०५
PIK
.."
जाणे खोटी-प्रदा चोड़े पड़े,
जद पिगड़े हो घा-पन्यरो कामाभ०॥८॥
कोई जीव मारे पंचेन्दरी,
भूख दुखड़ो हो मिटावण काम ।
(तिणने) समझाय अचित अन्न से,
पाप मिटायो हो कोई शुध परिणाम[भ०॥९।।
जीव पचायो पंचेन्दगी,
तिण रोटलियो हो दु:ख आरत पाप।
मारणवाला ने टल्यो,
हिसाकारीहो मोटो कर्म सन्तापभि०॥१०॥
इम मारतां ने मारणहार रे,
शान्ति करता हो सायक युद्विमान ।
एकान्त-पाप तिण में कहे,
ते तो भूल्या हो जिन-धर्म रो भान ॥भ०॥११॥
जीव घचे आरंभ मिटे,
तिण में पिण हो यतावे पाप ।
ते जीव पचे आरंभ हुवे,
(एवा) प्रश्न पूछे हो खोटो नीयत साफ॥१२॥

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नेयाला

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। बकरी और भृवे की रना ॥
दाट सानयों गापा..... रामाय मित्र
Tामा केन्द्र र दुगा TER कार
विजन सभार दिन में पायावर का शुद्ध पारा
शारवाया केन्द्र काहस भारत पार।
मावासाने त्या सासर मार..

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॥ हुका छुड़ाना ॥
दाल सातवी गाथा १८ फा भाव चित्र
।
सबसिर
बनेका
“पेट दुख या होको पावता, अवित औषधे हो दोनो होको छोड़ाय।
भारंभ टल्यो उहु कायनो. पण काममें हो हवा धर्मफेनाय ॥ १८ ॥

-

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सानों-दाल २०६ कोई ज्ञानो तेदने एक रोगी होरयो अति दुखपाय। लियां आयो वैद्य चलायने मंमाई याहयारीतियार चितमें चाय ॥२३॥ दयावंते सेज उपाय धी रोगी ना हो दीना रोग मिटाय ॥ मंमाई थी मरती नर बच्यो पाप धर्म रो हो देवो भेद यताय ॥२४॥ (कोई) भद्रिक अनुकम्पा कर, अल्पार भी हो हलूकर्मी जोय । महारम्भो महा-परिग्रही, तिणरे घर में हो करुणा किम होय ॥२५॥ मोटी हिंसा स-काय नी, धावर नो हो छोटी सूत्र जावश्यक, उपासक दशा, भगोती में हो प्रमु भाखी सोय ॥ २६॥ मोटी हिंसा झुठ चोरी री, श्रावक रे हो व्रत री मर्याद । में जोय। --

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سمیه حسنععبه جعلهععهعه
اسمه
به ۲ خو کي
- لم

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. मांस माहार नरक (रो) हेतु है. ठागाअंग हो पाई रे माय न्हें साधू राजां जैन रा, मांस खादे हो माता उठ जाय" ३२॥ मांस पाणी एक सरीता, मटा पो हो तुम्हें कहता एम । (पोते) काम परयो जद ददलिया, परतीतो हो पारो जावे हेमामयिगा। पाणी, मांस अचित पेटू, पाणी पोवो हो मांस खावो नाय । तो सरता दिवे ना रमा. किम भोलों ने हो नाल्या भर्म रे माय ॥३॥ पागी पोदे संजम पले. मांस खादे हो साघू नरक में जाय । (तेपी) सानों दृष्टान्न सरिता नहीं, पोग्य-जयोन्य हो त्या में जन्तर पाय ॥३५॥ जो सम परणामी साघुरे, पागी मांस में हो गठुलो सन्तर होय ।

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मानों द्वार मांस न साये माधुजो. फासुरु पिण ही जागे नरक रोसान। अन्न, मांस सरीखो नहीं, साधु प्रावक हो करे अन्न-जल पान ॥४॥ जो श्रावक मांस खावे नहीं, दुजा ने ही खवावे कम। अनुकम्पा ठायवा, जणहनो हो यो घान्यां येन ॥४२॥ अचिन तो येहू सारखा, मांस खाया हो होवे संजमरो घात । पाणी पीवा संजम पले, (तो) उथप गई हो सातों हेतु री बात ॥४॥ ग खोटा दृष्टान्त गुरु तणा. ते दीया हो मेटण दया धर्म । ते समदृष्टि श्रद्ध नहीं, चोई जागे हो खादी श्रद्धा रो मर्म ॥४॥ जीवांरी रक्षा जो करे, मिट जाव हो तेना राग ने देष!

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सातपो-टाल २१५. भूख मरतो हणे पंचेन्दरो, करुगा कर हो तेने दे समझाय । फामुक से खड़ो देय ने, जोवरक्षा हो इणविध पिण पाय ॥२०॥ माहण माहण उपदेश यो, बचाया ही पर-जोवां रा प्राण। या सत्य वचन माराधना, जोधरक्षा होई परवानामवि०॥५१॥ चोर लुटे धन पारको, धन घणो हो मरणे-मारण धाय । समझाय चोरी छोडाय दी, दोनां री हो रक्षा हुई इण न्याय ॥६॥ शोल सण्डे एक लम्पटी, शीलवती हो खण्डन लागो काय । लम्पट ने समझावियो, प्राण पचिया हो सती रा धर्म रे साय ॥५३॥ धन अयें हणे एक सेठ ने, धन घगी होदीनों परिग्रहो त्याग ।

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माननी-पाल झट पोरो व्यभिचारकरो, नाम लेकर हो तुमे घालो भर्म । मुठा हेतु लगाय ने, छोड़ दोनी हो तुमे लाज - शर्म ॥२९॥ जीवदया-टेपी को. मरता राखे हो मैथुन सेवाय । निणरो तर होवे सांभलो, मिट जावे हो वांरी पकवाय ॥भ०॥६॥ एक विधवा धारा पन्य री, निज पूजजीरा हो दर्शन री चाय । बोरा पूज्य रहा परगाम में, खरची पिन हो दर्शन नहिं पाय ॥११॥ व्यभिचार धो सो जोड़ने, दर्शन काजे हो आई पूज्यतो रे पास । भावना भाई (माल) येरावियो, जैसा कि वे कहते है: जीव मार भयोलने. पोरी करनेका परजीव पवाय । घले फरे सकारज एहयो, मरता राखे हा मंथन सेवाय ॥२१॥ (मनुकम्पा दाल-७)

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हठी-दाल दर्शन दान रोहो तिणरं धर्म रो घाम । घटी मारम्भ माधव सही, तिण पिना हो तिणरा किम पले काम" ६७ (उत्तर) तो समझो इग दृष्टान्त धी, मैथुन सेवे हो जीव रक्षा रे काज । ते परथम नारी सारखी, नहि विवेक हो नहीं मिण रे लाज ।।६८॥ काई जीव पचावे गुण भरी, घही आदिक हो मेनन रे साय । अनुकम्पा तस निरमलो. मारम्भ तो हो अणसरते कराय ॥ १९॥ न्यभिचार घी मरोग्बा नहीं, हम समझी हो मप कर्म कुकर्म । समझे विवेकी विवंक में, अणसमझूरे हो उपज अनि भौ ॥ ७० ॥ शील खण्ड दर्शण कही कृण करे. तो जीव पनावे हो .ण मैथुन सेव । कुठेतु कुगुरु रा काटवा.

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सातशे-नाल
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मन्दमति हो सुन ने कु:ख पाय ।
जीव दया राफ्यिा,
कंघी मति यो हो दुरगन में जाप ।। ८४ ॥
मतिमारोजाना राय (णिक) री,
या माखी हो स्तर में वात ।
पाप कहे अणिक भणी,
ते तो पोले हो चोड़े झूठ मिप्यात ।। ८५॥
"अमारी" धर्म जिन मापियो,
नप पाल्यो हो पलायो जग (देश) माय।
तेमां पाप कहे ते पापिया,
भोला ने दो नात्यां कन्द रे माय ।। ८६ ॥
(क) वीरजो नाय सिखावियो,
पडो फेरजे हो थारा राजरे मांय ।
* असा कि वे कहते हैं-
अधिकराय पड़हो फिराधियो.
पह तो जानो हो मोद्य रामारी रोत।
मगरन्त न सराड्यो तेहने,
तो किन मावे हो तिन रीमतीत ३७.
(अनुकम्पा दाल-3)

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सरकार यो एपम रामाणिक ना आज्ञाकारीही गाया जाय ॥५२॥ अंणिक ने प्रभु ना पायो, घोपण पारजे ही महारा स्थान रे फाज । तो पाप एवो तुम पधन धी, सेजा रोहा धीर ने दोनों साज ॥९॥ पलि मोटा होता राजवी, स्थान घोपणारी) हो नहीं पाली पात। तो श्रेणिक घोपणा किम फरी, न्याय तोलो हो हिरदे साक्षात ॥२४॥ श्रोष्ण करी उदघोषणा, दीक्षा लेवो ही श्री नेम रे पास। साय करू पिछला तणी, ज्ञात में हो यो पाठ है खास ॥२५॥ आज्ञा नदीची घी नमजी, उधोपणा हो करा नगरी मंझार । (तो) धार लेखे पाप हुवा घणों, दीक्षा दलाली (में)हो नहीं धर्म लिगार ॥२६॥ अन्य परी चाली नहीं,

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सातवी-डाल श्रेणिक ने प्रभु नहिं कायो, घोषण कोजे हो म्हारे स्थान रे काम | आव-जाव कार्य करण रो, गृहस्थी ने हो केणो यर्यो श्याम ॥१०॥ समष्टि निर्मल भाव धी, स्थान-दलाली हो कीयो श्रेणिक राय। तिणरे विवेक अति निरमलो, कारण काज हो समझे मन माय ॥१०॥ उद्घोपण आज्ञा में नहीं, दीक्षा दलाली हो निर्मल परिणाम। धर्म-दलाली नीपजी, समदृष्टी हो कर एहवा काम ॥१०४॥ नाम गोत्र सुणे साधु रो, जति फल कह्यो हो स्तर रे माय । कोणिक सुणतो (प्रभु) वारता, भक्तो रो हो फल मोटो पाय ॥१०॥ वारजी नाय सिखावियो मुझ वार्ता हो नित लीजे. मंगाय चलीन जणाई मामना,

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1.n't smitrum MAITRummittane EENA l REP धोinाना RE Fi पर्मनी पाट पार ॥११॥ •Tariamen it. दETTER Romar | Ratifण. मग, मापा मार ११॥ पर धान दंपला. धापान पाया माRI मा निम पाया. ममित माना गे शाम ॥११॥ ही में धर्म या नु ताजा मत पनामा पाप । गादी प्रहात मणी, मिनायादाटीतम दामी को मार॥१५॥ (4.) "मनिमार भी नायकमी नहीं",

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बाबर यो मारमा ज्पोरनामे निदान मतिमार पापगा नाही परी. पारा मुरधी (पारी) पर गईपार ॥१०॥ जो रीत मोटा राजा मरी, तो पोहो पालीम ऐम । अनुकम्पा राप थी, नहिं सूजेहो निज पोल्या रो नेम ॥१२॥ 'मनिमारो'ने 'दोक्षारी घोपगा, राजीनी हो.पल ते नांप । ममदृष्टी राजा मणी, कृष्ण, श्रेणिक हो कोधी मन रे माया१२२ दीक्षा रा उदघोपणा, कृष्ण ही हो जा राजा री नाय । (पिग) निषेध नहीं हग पान रो, फरोसी ही कोई समप्टिराया॥१२॥ मापदप्त पक्री भणी. चिन मुनि हो समझावग आप । आरज फर्म ने आदरो,

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जोव येह छोड़ारिया. नव्या मरखी हो सरक नहिं जाय।१२९॥ (उत्तर) भोला ने महकाविया, दृष्टान्न नी हो रची मायाजाल। (हि) करहो उक्त दिन दिया, नहीं कटे हो योरी जाट कराल ॥१३॥ काँग यो कांटो काहनो, तेयी नुम्ने हो मन करयो रीस। हेतु शल्य उवारवा, करड़ा दृष्टान्त हो दे विश्वा वीस ॥१ दो यायां अनुगमग तुन तगी, पूज्य दर्शन हो गई रेट मांय। किणवित्र लाई यायां उन्हें. पूल्य पूछया हो दायर्या को सुगाय ॥१२॥ *उसा कि कहने है:- কেননা নাৰ , ने. उन हो यो बान । र पड़मोनेस पर धर्म हसी होटेनरियाय ॥२॥ (vg दार-)

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- एमापोरीला ने देशा॥१३॥ सध्या मालय पाँचमी, मोदी माईपांशी जाप मेप । दोयां भेद पताप दो, माधव सरसाही पार पाय ॥१६८९ सुण पपराया अपनी उतर नाही सदाफ। (दोना) सगरती यागांशा नही. शनि (याग। फलशरीख ॥१६॥ परतावर वारिपा. गणाना साधा दान मार । निणरी पुदि ना निरमा तनहुषा । अपार ॥४०॥ पीजी पुलकणा नार . दर्शन पाजाचामा आधबहार सेन्यो ता महापापणा. (विवेकपिपलकी रहा RAIPT सिगार १४१॥ नय पोल्या निहां मर्माकन धारा प्रद्वा हा यार ..

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दर्शन रा हो भाव किग विष होय ।
यात असम्भयती दिने,
दृष्टान्ते हो कदा मानां मोय ॥१४॥
तो मति खोटी तेहनी,
कुकर्मिफी हो मोटो धोनी अन्याय ।
पाप सेव्यो अति मोरको,
फिट-स्टि हो हृये जगन रे माय ॥१४८॥
(वलि) लोभ मिटयो नहिं तेदनो.
तीन पधियो हो निगरे मोह जंजाल ।
तेथी पापणी दूजो नार है,
दर्शन रो हो धोयो आल-पंपाल" ॥१४२।।
न्यायपक्षी तब बोलियो,
सेवारो हो धारे दीखे राग ।
तेधी सिद्धा योलिया,
(पिण) जोवरक्षा में हो दोनो सत्य नेत्याग॥१५०॥
कथन विचारो तुम तणा,
दो वेश्यारा हो यां लीना नाम ।
गेणाने व्यभिचार थी,
जीवरक्षारी होत्या कीदा काम ॥१५॥

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जा सारी धान ।
जादारीमा लापता.
तरी पनीरीती मांटी जागिर ॥६६॥
(ब) रामराज मल (दाम) परी,
मारामागील पर मांग।
दजी पनगरी सापणी,
माना गरयाती माय जीव सोडाय ॥१६॥
पन आपोटा पाय घरी,
निगरे लाया ही दोनों विध कामे
नो जामुराया ता.न.
उणे लोहा हुवा पापने धर्म" ॥१६८॥
पदो साटो न्याय गाय ने,
आप मने हा कर खाडी थाप ।
पितु विच पाप पेली फियो,
दुजी हो याही धर्म में पाप ॥१६९॥
हो पायन हमारी सांभली.
में (लो) नहीं करांही धर्म-पाप रो पाप।
मिथ्या हेतु मिथ्यानि करे,
तेने उत्तर हो न्दं देवाँ सारः ॥१०॥

17 २४२ AAMAAL 1. विनमय अनुकम्पा-विचार', (एक) नारो कुकर्म सेव ने, सहस्र नाणो हो लाई घर मांय। दूजी सेवी व्यभिचार ने, द्रव्य खरचे हो साधु सेवा रे मांय ॥१५॥ घन माणो खोटा कृन फरी, तिण रे लम्या हो दोनों विध कर्म । तो दूजी सेवा करी थाहरी, पारे लेखे हो हुयो पाप ने धर्म ॥१२॥ पाप गिणे व्यभिचार में, उणरी सेवा में हो तेन गिणे धर्म, पोते अद्वारी खपर पोने नहीं, दपा उठाया हा वांधे भारी-कर्म ॥१७॥ इम कथा ज्यापन अपजे, चर्या में ही अटके ठामोठाम। तो पिण निर्णय मा करे, जोपरक्षा में हो लेवे पाप रो नाम ॥१७॥ मोव, द्रव्य, अनादी शासनो, प्राण-प्रजा हो पलटे पारंपार । से प्राणोंरी पात हिंसा कहो, रक्षा तो दया की सुरसार ॥१७॥ से रक्षा करेसमभाव पी. समदृष्टिहोघर गुण पाय । मोक्षमा रक्षा कही. मोक्ष-जों हो कर अनि हाय १७३॥ पच्यादिर, महुंकाय ना, प्राणरक्षा में हो रहे पाप नजाग जा रिसारक्षा जागी नहीं, खोटी कर रपारी निजमन नी तान||१७॥ (पति) प्रमयावर नहीं सारखा. जांरामागां में ही कपो फरक अपार । तेयो हिंसा माही कार है. स्थ वृक्षम हो भत्तर निरशार ॥१८॥ निम शक्य अशक्य रा भेद ने, हिंसा रक्षा में हो समझो तुर सुजान। (ई) समुचय नाम पताय ने, शक्य छोड्ने हो तरंजशक्य (रीनाग।१७॥ थावर रक्षा करोना सरे, famirmit riyatfont, rniti Ire are all afrating माता torrnmमाले, IIT पाहा त म ||१.१॥ सपना सारा पान) माला पाहा ram धाHATARurmun In fat an amar केसा ॥१.२॥ () पाना बना दे, समापकहा माल पाग। माशायरसार का, (निदान माना Ratopat नाना शहाागी, परिम. fun मिन्न-भिन्न १ ममता पारिप कमा. उपधि में लेश ॥१८॥ एपकार ममता है। उपसरे हा हम पीले हो कुगुन निदर्शक। इन बनन उत्थापने. निध्यात रा हो मा माटा-टंक ॥१८॥ दान, शोरल. नप भावना, मोक्षमारग हो चारों सुखकार। अभयदान भय मेटे कयो, जो देव हो पाई भवपार ॥१८॥ अनुतना अर्थ प्रचशिनी, द्वार जोड़ी हो चुरू शहर मजार । उगनोल छियांसी नगे. आग सप्तमी हो सुखदायी वार ११८७! नानी दमापूर्ण।

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पाठयों दाम ढाल--आठवीं Hum (त-अनुफ.म्पा सावज मत मापो) ट्रव्यलाय में पले जद प्राणी, आरत-ध्यान पावे दुख भारो। थिल-मिलता ध्यान जो ध्यावे, अनन्त संसार पधे दुखकारी ॥ चतुर घरम रो निर्णय कीजे ॥१॥ कोई दयावन्त दया दिल घारी, अग्नि में पलता ने जो वचावे । द्रव्य भाव दया तिणरे हुई, विवरो सुणी तिणरो शुद्ध भावे ॥०॥२॥ द्रव्ये तो उणरा प्राण री रक्षा, भावे खोटा ध्यान घटाया। यह उपकार इणभव परभव रो, विवेक विकल यों भेद न पाया ॥१०॥३॥ द्रव्य मागसे चलता राख्या, भाव माग तिणरो टल जावे। .

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आडवा-ढाल
२४१
द्रव्य, भाव रोनाहीं निवेरो।
दयाहीन कृपन्य चलायो,
त्या कुगति सन्मुख दियो डेरो ॥चतु०॥९॥
स्वारयत्यागी परस्पकारी,
दुखी दी रो र्द मिटावे।
ते पिण माठा-ध्यान मिटावण,
तिण में पाप मिध्यातो पतावे ॥चतु॥१०॥
(क) "साधु गृहस्य ने लोपच देने,
कु:ख जारत निणरो न मिटावे।
तेधो पाप में गृहस्थ ने केवां,
साधु न करे ते पाप में आवे" ॥१०॥११॥
(उत्तर) चौमासे उत्पत्ति जीवां री जाणो,
गामानुगाम विहार न करणी।
विधेि (त्रिविषे) साधू त्यागज कोषा.
सूत्र
में
साधु
ने यतायो निरणो॥१०॥१२॥
साधु न कर ते पाप में गावो,
तो चौमासे (में) साधु ने जाणो न जाणो।
गेही चौमासा में वन्दण जावे.
(तो) तिणमें एकान्त पाप धनाणीव०॥१३॥

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आठवा-ढाल
छोड़ावा में न्हें धर्म तो जाणां।
(पिण) सगले ठिकाने जाय ने हिंसा,
छोड़ावा रो उद्यम किम ठाणां ॥"॥२८॥
तो इमहिन समझो रे भाई,
कोड़ादि रक्षा धर्ममें जाणां
मार्गादिक में सगले ठिकाणे,
पचावग री उद्यम किम ठाणां न०॥२॥
हिंसा छुड़ाया सगले न जावो,
तिम ही जीव यचारा रोजाणो ।
जीवरक्षा रो देप घरी ने,
मिथ्याति क्यों अंधी ताणी ॥१०॥30॥
आपणा तरी रक्षा करें और,
परजीवां रा प्राण यचावे ।
हिंसाधी मरता जाणी ने,
उपदेश ई जीव छुडावे ॥चतुर॥३॥
हिंसादि अकृत्य करता देखी.
भेषधारी कदे झट समझाया।
गृहस्थ पग हेटे जीव आवे तो.
तिण ने तो कटे न्हें नाय पतावां-॥२॥

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आठवी-ढाल २५५ वोल यदल मिथ्यामत सेवे ॥चतु०॥३७॥ (कहे) "हिंसादि अकृत्य करता देखो, उपदेश देई में हिंसा छुड़ावां । अकृत्य करता रा पाप मेटण में, फुरती करां में देर न लावां" ॥चतु॥३८॥ डफोरसंख ज्यों यात या थारी, काम पड़था से झट नट जावो। गृहस्थी रा पग हेटे जीव मरे जय, हिंमा छोड़ावण तुम नहीं चावो ॥३९॥ तेल हुलण दृष्टान्त रे न्याय,, पगतल जीव यतावा खोटो। ते दृष्टान्त थी धारो श्रद्धा में, हिंसा छुड़ावण में होसी नोटो ॥४॥ युक्ति पे युक्ति सुणो चिन लाई, जीव वचावणो धर्म रे माई। जो जीव पचावा में पाप यतावे, वाने उतर (यो) दो समजाई ॥४॥ जो कहते है, पर करते नहीं, उन्हें इफोरसंस जाता है।-संग्राहक पहा

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जो मिटेनोयारलागले, (नप) गृहस्थ ने अनरथ ग पाप था।३॥ निणनं पर्जन पाप हुदायो, जनरथ होता ने अटकाया। • जो निणने तुमे चनों नहीं तो, हिंसा हुवां यं यूठ सुणायो ॥४॥ हिमा टुसावाँ मुख से पोले, तेल म् होतो हिसा न छुड़ावै । यह खोटी श्रद्वा उघाली दीसे, अन्नर संधारी नजर न आवे ॥४५॥ (बाई) "पग से मरता जीव तुमे पनायो, तेल से मरता ना में न पनाया"। (उत्तर) खोटा पालो मन रे मते थे, म्हारं तेल पगां री सरीखो दावी ॥४६॥ पग से मरता ने तेल में मरता, मुनि जावां री रक्षा में धर्म पतावे । म्हारी तो प्रद्धा कंठह न अटके, तो अणदता सत पर ते कलंक चढ़ाये॥४॥ कठे कहे "हिंसक (ने) समझायां,"

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धारातु रो भालेको ।। पतुर ॥५०॥ परता विहार पारगमें धारा, श्रावक मामा मिरया आये। मार्गाने जज जावे, प्रसपायर री हिमा पाये ॥चतुर०॥५१॥ मायने अपंथ जाना, प्रधावर (रो) हिंसा करता देखा। (जो) हिंसा छुड़ाया में धर्म में मानो, तो भावस में वर्जो इण लेरो ॥५२॥ हिंसा मांगावगी मुख से पोले, पोधा पादल जिम ते गाजे । प्रावक यन (जार) में जीव ने चोंये, मौन साजे यता फ्यों लाजे चतुर॥२३॥ फहो पका हणना ने समझावां, (तहां नी कमाई) समझे निश्चय नहिं जागा प्रावरु ने वन में हिंसा था न बजे, जहां एटे हिंसा बसवावर प्राणी ॥चतु०२४३ फसाई केगो माने न माने, प्राव तो धारा अनुरागा ।

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भाटी जीव पनाया में पाप पना। नो जितु मी तिमा हराया तेनी अहा में पगा। पर० ॥२८॥ (कोई) अन्या पुर गामान्लर जानां, जांस पिना हिंमा किमराले। कीही गजाया मारना जाये, प्रमशयर (जीर)पर पग देई चाले २०७०॥ पिण माजे साथ ही जादा. अन्श ने हिंमा करना देखा। पग-पग हिमा / नछड़ावो. (नया) खाटा यारण रोनम लेखा ॥२०॥३॥ (स्या अंध. ने) जनाय जनाय ने हिंमा हाणी कोडी मारादिर. सायन जाये प्रमधावर जाया ग माहादेशिक वन्याग महजे माया माना अंधा ग पग ममग्ना नावाने दग। यह पग-पग माया ने नहा बनाय, नोमोटो धदा जानन्या इन लेखे येश. . ३ . (अनुकम्पा द्वार--- .

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आटयोबार २६३ पहन मरे हिंसा पर धागो ॥चतुर॥३३॥ गृहस्य रे ज्ञान न पाप लागण रो, ते कदा धारे समय में जायो। में हिंसा देखो छोड़ागो येवो. [नो]माटो दुरना हिंमा यो क्यों न मुकायो ॥३४॥ [कहे ] "गृहस्थ री उपरी सूजोय मरं छे, सर ठोरतावा ने क्यों नाहिं जावो" नो उत्तर सिद्धो धारा हेतुरो हिंसा छुड़ाया ने | [स्यों नहाँ घावो ॥६५॥ किणहिक ठौर हिंसा छुड़ावे. किणहिक ठौर शंका मन आणे। मिथ्या उदय धी समझ पड़े नहों. अज्ञानी जन नो ऊंची नाण चतुर०॥६६!' *सा वि. ये कहते है इत्यादिक गृहस्थ रे अनेक उपधि स प्रसपायर जार मुवा ने मरसो। एक पग हेटे जोय यताये. त्यां ने सगलो हो ठोर यतारणा पड़ता। (अनुकम्पा दाल-

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THEERCIA::::00H SETAIL Jआउनादालत CIKANE nu?UTARE एक में धर्म में पापो. अवसर थो हिसा छुड़ावे, अवसर जीव यनावा जावे ॥चतुर॥१॥ जोव पचायगो हिंमा छुहावगो, दोनां रो एक ही मनझो लेखो। दुजा हम श्रद्ध ने मिथ्यामनि देखो।चतुर०॥७२॥ गृहस्थी रा पग हेठे जीव आवे नो, माधु यनावे नो पाप न चाल्यो । भेषधारी निणमें पाप पनावे. परतब धोनो कृगुस् घाल्यो ।चतुरणा॥ (महे) "ममरमरण जन आना ने जाना. ईरा पग से जीव मर जागा । जो जीव पनाया धर्म हा नो. भगवन्न कंटंटी न दीले पनाया ||मनु०॥७४|| नन्दण मनिहार उँटको हाय ने, पोर वन्दण जाता मारग मांगा। निगने चींय मारया अंगिक मा परें, वीर साधु सामांमेट क्यों न पायो"॥४॥ "तेयो जीव पनापा में पाप नायां:

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M .. पार्य किया गुण Fruitml सीद पापाजी। भी पटापा पग-पग पर, माण गरोदरी दुर्गशिरे ॥पर० ॥८॥ प्राव मारता अरगामेटी, मा पर्न पमुख दावें। अपघ, फाल, भाव रे अवता. साथ पाये ॥ पतुर॥८२॥ मजला, ध्यान, सप विहार विचरणों, घ्याण्यान, यापन धर्म री कामो। पल पुद्धि और क्षेत्र फाल रे, विवेक करे माधु गुण धामी ॥चतुर॥८॥ पिन अवसर ये नांय करे तो, मजा ध्यान न पाप में आये । (निम) पिन अवसर जोय नाय छापा, (तिथी) जीव हाहावी पाप न थावे ॥८॥ कदा ई एम परूपे, साधु-पायक (रो) मनुकम्पा एको। साधु फरे तिम भावक ने करणी, .

14. गावे। चित्रमय अनुकपा-विकार पिण काम पड़े जय फिरता ही देखो ॥८५॥ साधु, साधु थी मरता जीव यताये, पाप टले अनुकम्पा आवक, श्रावक पी मरता जीव पताये, झटपट तेने पाप यताये चतुर ॥८६॥ श्रावक श्रावक ने(मरता) जीव यताय, (लो) किमा पाप लागे किमी व्रत भागे। मिण री तो उनर मूर न आये, धोया गाल पजावा लागे ।। चतुर० ॥८॥ मिदान्न (रा) यल पिना योले अज्ञानी, मंभोग (7) नाम अनुकम्पा में लाये। गालांरा गोला मुम्ब में चलाये, ने न्याय मुगा भविषण चित चाय ॥१०॥८८ माधु रे मंभांग प्रावफ मे नाही, (नया) जीय यताया में पाप वनामा । (ना) पायक मात्र ने जाय यता, निण में ना धम तुमे पर्चा गाया ॥८॥ जद कहे म्हारी हिंमा लाई (तथी) धर्मग काम किया मुमदाई।

(नो) धारा प्रायन (माता) जोर (मी) पा पिगम मानो रयों न माहा॥ सार भी पता जोर पनाया, प्रावर पी मरना निमही पचाया। एक में धर्म ने दूजा में पापा. मा धारा अदा में मचिया ॥१०॥२१॥ पारा प्रकार ग संभोग भाग्या. मन समापंग माई देखा। जोव पनाया संभाग लाग, एमागाही मसर में लेखा ॥चतु०॥२२॥ प्रायर, पायक न जाव बनाया. पाप लाग यो मन काढ्यो करी । तिण लेसे जीन ग भेद मियाया. पौरी श्रद्धा में (होसो) पाप रो पृ॥९॥ (कहे) "जीवां रा भेद तो ज्ञान रे खातिर, (वली) दया रे खातिर न्हें पिण यतायौं। भूत भविष्य में जीव पनाया. धर्म रो काम म्हें कहि समझावाँ ॥१०॥१४॥ वर्तमान (काल) पग हेठे आया पताया,

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जनता से निर्गमा मामी, दाग लिया गंमांग रहा। or gाग माग में नारी, नाहाना फी भवि निरी०१०॥ नहीं मारत ने जीय पनाया, संभोग टांग मां पनाये। सो पार गुहारग परतर एतावो. भागलपगांधी प्रहा में आवे॥०॥१.१॥ हाय दागी गस्ती जर देखे. (लो) तुर्न पुसावे रक्षा मन धारी । हुप रक्षा से काम गृहत्य कर के, निग में एशान पाप कडे. सांगवारो॥१०२॥ (को.) "लाय में पले जारे कर चुके है, (पांध्या) कर्म टुटगरी निर्जरा भारो। पिच पर ज्यान जो कोद काड़े, या होवे पार नो अधिकारो" ॥१०॥ इन परतारे का स्टना पनावे: कागवालाने पाप पनाये। स्पारो तो तर परतीती नावे,

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पदी र समीपनो गुणां में, तुमे कही पारा ग्रन्थ में दाग्यानि॥१०॥ अन्पारम्भी गुण प्रायशगे. उपार सुगमासंग में देखा। माटारम्भो प्रावक नहीं होये, (तेथी) अल्बारम्भीमावरु रो लेखो॥११०॥ नाप लगाये महा अवगुग में, मन माहीं जिन इणविध भाल्यो। (सम्पन्न) भानावगी आदि.कम रो कर्ता, नंधा महाकमा प्रभु दाख्यो ।। १११ ।। मटा शिवन्न तेने जाणी, महा आश्रर कामपन्य ना करना। परजीव ने मटा वेदनदाता, परवा दुर्गुण ना न धरना ।। च० ११२ ॥ लाय चुनाव तेना गुग नो. भगरती मांग पर बोले. अल्पकर्म ज्ञानावण्यादि. तेधी हलुकमा इण तोले ॥ च० ॥ ११३ ॥ अल्पकिया अल्प आश्रवी ते छे, -

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पारा नम- विसरमाहो. नहारमोनेसी • सायो। बल्लारम्भ महामना. पो गिगुग है पठे हो गायोतीब-1॥११२ सान्निधो मरना जोर पारा, देप यो तुम इहाँ बता पोलो। "समारंभ नो सेनाही". [सत्य मोहयो तुन हिरदा में तालार जरभात [स] गुपोले. निसांनी तायुगांगुन जानो। नेपी साबु-शरो धर्म है जही. दो चित्र धन (मात्र खाना २०१२९॥ - तार- होनास्सरघा गुरु रसिकार इस गुरु देवता हुने छ । -रन-... परनमश्राम समान्ममरचा रहा। साइनानिदेसी र नई ९पुरचे कन ----

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भाउयान्दाल २७ अतिचार दलवा रो धर्म है मागे ॥१२॥ साधु रा मातपितादि गृहस्थो, (जाने) सायु जिमावे तो दूपग लागे। गृहस्यो (अपना) मनुष्यों ने भूखा राखे तो, दूपग लागे पेलो प्रत भागे ॥चतुर०॥१२॥ गृहस्थी, गृहस्थी रो धापग नहिं देवे, दूजो तोजो व्रत निणरो भागे। यापण देदे साधु न केले, पिग गृहस्थ दिया व्रत रेवे सागे॥०॥१२८।। इम अनेक पोर माधु रे दृषग, ते गृहस्योरेना रक्षा रा टानो। (तयो) गृहस्थ ने मायु गे जानार मुद्दो. एक कहे ते मियात गधामो ॥२०॥१२२॥ सुगे (ववाग) धर्म आई पड़ने पागो. एकान पाप नो निनने न। लाय में बाढ़ मनुष्य पचाया. एकन्न पापोरी पद देवे ॥चतु॥१३॥ (एम) उलटो कपनी कलीयोने, मोटाने पुराना नहाया।

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ते महा मिथ्यानि चोटे दावाना१३२ अनि यो परता मनुध्य निकाले। दोयां री एकहो लेखा पनाये, वे अन्याय रे मारग चाले चतुर॥१६॥ फुगुमरा मन रा पाया पारिका, मग्नि तो निन हो लगाये बुझाये। (ते) मनुष्य रा मारण जेसा महापापी, धारो अद्वारे लेखे थावे ॥चतुर ॥१३॥ मोरी में मोटो मनुप्य रा हिंसा, अग्निरी हिमा सुक्ष्म भाखो। दाय युगावे ते अल्गारं भो, भगवनो नत्र में निगरो मान्नी ॥२८॥ वकरा पनावर मनु ने मारे, अग्नि यो पटना मनुष्य यचाये। दोयां ने मर्गवा कु.गुरु केवे, पकरा पनाग मनुष्य ने मारे, ते तो पानव छ किमी अनि यो यनना मनुष्य वाद. जल्यारम्भी ने दयः वः ॥२२०

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दोहा जोवहिंसा में अति युरो, निण में दोप अनेक । जोवरक्षा में गुण घणा सुणतो आणि विवेक ॥१॥ दुहाल-नवमी (तर्ज-यो भव. रतनचिन्तामगि मरिसा) रक्षा देवो सब (ने) सुखदाई, या मुक्तिरो नी साई जो। साठे नामे दया कही जिन. दशमां अंग रे माईजी ।। रक्षा धरम प्रो जिनजारा दाणी ॥१॥ प्रसथावारे सेमरी कना, अहिंसा बटना जो। दोप तणो परे माला शरण पा. गरधर एम उरताजी रक्षा 'निर्वाण' निवृत्ति' नाम के प्यारो, 'समाधि' शक्तिम्यरूपा जा।

निमाविमार -- Halfजा प्रमिद (1) करता, 'कान्ति' महमुत पोगो रक्षा०॥३॥ मानन्दमुपणापा, विनि'm fपानी गो। ८ अनाना' मान पी उपनो, मृमकर में '' हो रक्षाका क्षा मा दया' गाने, 'मगि प्राजिलला गदारोती माना' मांगा, 4aar ka mation मा बम भनदान पाय, मानी mratn| मा हिमाग 'AIR REf नयमो-ढाल तेयो 'योचि कहिये जो। २१ 'युद्धि' 'धृति' 'नमृद्धि' ऋद्धि' वृद्धि, 'स्थिनि' शाश्वतो एथी लहिये जी राणा 'पुष्टि' पुण्य रो उपचय इण थी, १ समृद्धि लावे 'नन्दा' जो। जीवां रे कल्याण रोकतो, 'भद्रा भणे मुनिन्दा जो रक्षा०॥८॥ 'विशुद्धि निर्मलना दाता, २७ लब्धि रोदाना 'लद्वि जो। सय मन में प्रधानता इणगे, 'विशिष्टाष्ट' प्रमिद्धो जो रक्षा०.९॥ २६ कल्याणा' व ल्याण रो दाता 'मंगलिक विघ्न मिटावे जी। हर्ष कर तेथी यह 'प्रमोदा'

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नवी दाल
२८५:
हिंसा उपरति 'संयम' कहिये,
.
'शीलपरोघर' जाणो जी।
४४
'मंवर' गुप्ति व्यवसाय' नामे,
निश्चय स्वरूप धो जाणोजी ॥रक्षा॥१५॥
उच्छय' भाव उन्नतता समझो.
'यज्ञ' भाव पूजा देवां री जी।
गुण आश्रय रो स्थानक निर्मल,
४७
'आयत्तन' नाम छे भारी जोरक्षा०॥१६॥
४८
'यजन' अभयदान थो ज.णो
जीवरक्षारी उपायाजी।
नेधी यतना इण ने कहिये
पर्याय नाम कहायो जोक्षा॥१७॥
जीव पचाया में पाप पतावे.
ते कुपन्धे पड़िया जी।
परतख पाठ देखे नहीं भोला.
हिरदा मिध्यात से जड़ियाजोपर०॥१८॥

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नरमीर नपवा पूजा अर्थ अणो रो, भाव से देव पूजिजे लो। द्रव्य सावज पूजा हिंसा में, ते इहां नाय गणोजे जो ! रक्षा० ॥ २३ ॥ 'विमल' 'प्रभासा' अरु निर्मदतर', साठ नाम मनु भाख्या जो। प्रवृत्ति और निवृत्ति रा योगे, भिन्न-भिन्न नाम ये दाख्या जी ॥२०॥२४॥ नहिं रणनो निदृनि जामो, परवरतो गुण रक्षा जो। प्रवृति निवृति दोनों सोलखाया, पां (साठ) मामांरो दोनी शिक्षा जो ॥२५॥ त्रिवि त्रिवधे :काय न हणनी. पणने तो धर्म पनावेजी. त्रिविवे-त्रिविये जवरक्षा काण मे, पाए कहि धर्म लजावे जो ।। रक्षाः ॥२६॥ महिं रणनो ने रक्षा करणी, ते प्रभु आज्ञा मारायो जो - निr Arjा-पिगार (1) "HTarat Anitar जाणे, ( ATTITHILI my Trinita it tam ort, पप गाजी" TR T नि का RT-11311 tomमार RT महां, fमान पाया, पाक्षिा साक्षा॥10॥ प्रास , TRI निanा। पदा गाना ॥ भाnuman" मद्रास

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वनी-दाल (तो) मरणपालो पण पाप थी बचियो, तेनो करुणा में पाप क्यों गावोजीर०॥२९॥ हिंसक (री) करुणा में धर्म क्तावे, मरणेवालारी में पापो जी। या खोटी श्रद्धा परतख दीसे, जे थापे ते पामे सन्तापो जी॥रक्षा०॥६॥ (कहे) “छकाया रा शन्न जीव अव्रती, (त्यारो) जीवणो-मरगोन चावेजी।" तो पाणी थी इन्दिर माखा काढ़ी, (तेधी] धारी श्रद्धा खोटी धावेजो रक्षा०॥६॥ (मह) 'म् तो जीवणा मरणो न चावाँ, पाप टालणां चा जी।" (उत्तर) नो जीवरक्षा पिण पाप टालण में, स्व-पर नो पाप पनावा जी रक्षा॥३॥ मारण ने मरणेवाला रो. पाप सोडावा बचावांजी। मरणेवालारी दया किया घामक रा पाप मुहागं जी रक्षा॥६॥ जीप गरीप, नाती री, सं.

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माना और माय, जामें पाप माना। में पाए पनामा समशित नाग्ने, जांरा मरना ना जाय जो 11६९॥ (जो पा)"मिचित्र-विविये जाय-रक्षा न करगो" (उतर] तो हिमयरी हिंमा टोराया जी माता जीवांरीक्षा होगी, पारी श्रद्धालु पाप कमाया जी रक्षा-1oll "पीच में पर पाप नाय घादाय गो,' इमको सो धर्म पतावो जी। सो हिसक पाप करे निग पीच में उपदेश देग क्यों जावो जी ।। रक्षा ॥१॥ हे कारण जीव-हिमा करे काई, अहित अरोध ते पावे जा । जीवरक्षा थो समकिन पावे, भहित निकाल न धावे जो ॥रता ॥ जीवहिंसा प्रभु खोटो पनाई, (पाठ) कमारी गांठ यंघावेजो जोवरक्षा प्रमु आछो भातो, .

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. '...!:::... . - faran... mt.:, निदानायां

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नयी-साल निण में एकान्न पाप पनावे, ते एकान्त मिथ्याकर्मी जो रक्षा॥ २७ ॥ कोई जीयाँ रा दुःख मेव्या में, एकान्त पाप पतावेजो त्यांने जाण मिले जिन धर्म रो, (तब) किग विध मारग लाये जोरक्षा०॥९८॥ लोह नो गोलो अग्नि तपायो, ते अग्निवर्ण कर नातो जी। [ते] पकड़ संडासा लायो निण पासे, (कहे) वलतो गोलो झेलो हाथो जार०॥९९।। (जप) दयाहोण हाथ पाठो खेच्यो, तव जाण पुरुष कहे त्यांने जो । में हाथ पाछो खींचो किन कारण, थारो श्रद्धा मन राखो छाने जो ॥१०॥१०॥ जद कहे गोलो म्हें हाथ में ल्यां तो, पले दुःख पावां जी। (तो धारा) हाय पालना ने जो म्हें वाजां, तो धर्मों के पापो कहावांनो पर०॥१०॥ (कहे) “(म्हारा) हाथ पलता ने जो कोई परजे (महागे) हाथ

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wer, Harmik rare, (M) Meriarrform पोएमा शो' many 2.7 omeni, farmer में एगी कारावासोरक्षामा१०८ 'पुरपामार रानामने, शार मनापासी। पर्म का गिाए . मन मिल पान मायाजारिक्षा॥१०॥ (कर) "दर्शन घम जर हिमा पाप में, दोनों मानां पारा जा।'' (उत्तर) नापमा पन्मलना धमे में. हिमा पाप में पारां जी रक्षा ॥११०॥ गाई मुष पोलो (पान) आहार भामं. (पलि) मुख तुले पोल पराये जो । जीप असंख्य, हच्या तुम काजे, -ranium ManA APAN -- चित्रमय अनुकम्पा-पिचार चुरू कियो चोमासो जी। कोठारयां शुद्ध श्रद्धा घारी, पामी ज्ञान प्रकोशी जी रक्षा- ॥१२९॥ इति नवी दाल सम्पूर्णम् ।। शान्तिः ॐ शालि शान्तिः दयादान प्रतिपादक श्रीगन्बूलालजी महाराज (60 'ON) विरदिन- पद्य-संग्रह AN-4600-00000416

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गणारी॥ की जान दान पायोगे बाल्यापटेक॥ धमा भारमदेव भगदान, हुए भागाविसमें धमान । मी - दिपायदान, ात्र जिममा परमान । दोहा एस. भोर आठ सारा सोन्या शाप देते दान। दुख मिटापा दुखी जीवका, पापा पद निर्यन । सीने समझा सकल जहाना दान॥९॥ सत्र ठाणायंग मतार. दान फरमापा दस प्रकार । पपा मर्य लो हिरदपमें धार, तिरने चाहो यदि संसार ॥ दोहा अनुभम्पा संग्रह भय, कालुणि लज्जा जान । गारव अधर्म धर्म माठवां, काहीह कृत दान - रित्रमय मध्या विचार युक्तियाँ खोटो मनसे लगाये। सदी ही अपना स्वार्थ चाय, मौरको देना दिया उठाय ॥ "दोहा अनन्त संसार पदाय के, जावे जन्म की हार। प्राणीमासे पंधै है, "देखो शास्त्र महार ॥ 'दंसय अंगमें है यह ज्ञान दीन०॥७॥ क्षमादि घर्म निभाने कीज, मुनीको द मजमकी सीज अर्शनादिक चतुर्दश जानो, कामुक निदोषी मानो। 'दोहा भव परम्परा घटापके, पाप पुण्य अपार ॥ स्वर्गादिकको सो पाये, पावें मोक्ष दुवार ॥ पही करमा मकां पागं दान || । नरम पर पाया, सापांग दारापा. गया दाना पानी या सामनी ।। दोग नेम राजुर हो गये, पामो जिन राज। तोरण सार पशुगाये, अभयदान फाज मोक्ष गये करवे, अक्षतध्यान ॥दान०॥९॥ पन्ना शारिभद्र कुमार, दानासे पाये सुख अपार । सुपार घर आदि सुखदाय, गये जो स्वर्ग मोक्ष मुख पाय !! दोटा अनन्न जीव जो तर गप, भव संसार महान। ममी तरहका सुखको चाहो, देमो सुपात्र दान ॥

३१८ ...- वित्रमय अनुकम्पा विचार कहां तक मैं कर सक' ययान दान ॥१०॥ धर्म दान है दो परकार, सुपात्र अभयदान विचार कह दिगण सुपात्र दानका हाल, सुनो अप अभपदानको चाल ।। दोहा मरण भय सयसे यदा, मरना न चाहै कोय। मरण भए जो कोड मिटाये, तन धन देकर सोप॥ कमाये जग में धर्म महान दान ॥११॥ श्रेट ये सब दानों में दान, कहा अंग दुसरेमें भगवान । इसीसे हुए हैं शांतीनाय, सुनो मेघरथ राजाको पात ॥ दोहा भप पापा परेवड़ा आया गोद मंझार । अपना सन दे उसे पचाया, Sor: Rel :::14. 8 Yami - १६ ...' : दानमा समान दाना मुनि ! भी। दान । गया. अमर, ५ ... पाण!! मुनि सपना लिग: मम नार।

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करते ऐसे काम। पोतरागका साशय गरी करते अपना नाम ।। घाम नरोक लो पहिचानाशनगर॥ सपना पेट भरनके काज मपम ही पांचो गाडी पाज। पोलन मुखते न आई साज, मापही पन बैठे हैं जहाज ॥ दोहा॥ हम सिवाय संसारके, सप पात्र नर नार। पात्र हमारे भरदो पूरणः पोले पारंवार ! मौरको देना पाप महान ॥दानः। रणा हमको दिया धर्म फल पाप, लौरको दिया पाप याताय । भूतसे दो इसरेको दान, से करलो परतान॥

१२२ चित्रमय अनुकम्पा विचार दोहा॥ ऐसी यात अनेक पनाकर, फसा दिये नर नार। । “समझाना हो गया है मुश्किल, चाहे माप करतार ॥ माती इनकी करुगा महान दान० ॥१८॥ ढाल दूसरी म्दाने माये अनुकम्पा किस पिच, तिरमारे यारी आनमा । प्रमु कृपा फरोने मदादि, देवो तोरे मानमा ॥ टेर।। शासन नापक योर प्रम जो, चौपिसमा मिनराज। माधु साध्यो पायक प्राविका, सुमिरण करते आज ॥ मयोदधि और कलिकालमें,

सुकृत मांय
दाल-दापरी
.३२३
यहो तिरणकी जहाजरे म्हा० ॥१॥
माताका उपकार परम है,
देव गुरू समान।
विनय भक्ति आज्ञाका पालन,
पखान ॥
स्वर्ग सुखोंका सावन समझो,
यही प्रभूकी पानरे ॥म्हा० ॥२॥
तीन ज्ञान घर घे जप प्रभुजो,
गर्भावास दरम्यान ।
जननी की अनुकम्पा करके,
धर दिया निश्चल ध्यान ||
जोवन रहते संजम न लू,
अभिग्रह पहिचानरे ॥म्हा० ॥३॥
इस करगी में पाप पताते,
फलियुगके सरदार ॥
चार ज्ञान घर चूके कहकर,
चहावे सिर पर भार ॥
पाप कहें वे पापी नर हैं,
पाखंड मतके धार रे । म्हा०॥४॥

३२४ inni amner-terwsnAmAramma ধিমত্ব ক্যা দ্বিধা सर्वज्ञ मुखसे सुना है मैंने, सुन जम्यू मणगार। एमस्थपन में पाप ने कीन्हा, वीर एक भी पार । मांधारंग में सुधर्म स्वामी, यह कीन्हा निर्धार रे ॥हा॥५॥ कलोकाल के जन्मे करते, धीर गये हैं यक। अनुकम्पाकी देवी वेशी, भूठ मचाई तक। अहन्त अयगुण याद पोलकर, सत्यसे गये हैं सूखरं ॥ म्हा० ॥६॥ में लेइपा दमस्य पीर में इसदी करके पाय। का कहते थोर ममको, स्तर पचन इत्याप। भूटी कयनी यो मज्ञानी, मुनके पजे ताप ॥हा॥७॥ हाथ जोड़कर शोग नमा, रे समो पर भगवान निन्दप रोएकदा मेरे इपमा पोर minsो. मांग प्रभु दान॥1॥ हेदपाया क्षण परमाता, गणपरली गाण। पीनाममा मागको देखा, मुणजो तुम हुलसारा किन लक्षण तुग सनार, पारी हिरदय मांग रे ॥ म्हा॥९॥ हिंसा कर्मा घठ पोलता, पोर लम्पटी जानी। महा ममत्या प्रमाद। पूरा, तीन भारम्भी मानी मन एच काया रसं मोकादा, कर एकापफी हानोरे ॥ महा॥१०॥ सपफा अहित करनेवाला,

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क्षुधिर दुप्पा परा। लक्षणमाकापसे, पीरमे पार पाता ॥हा॥१४॥ रेहा पोले टेवा पाले, देवाही करे काम। कपटी सपना दोप छिपाये, मिथ्या दृष्टी नाम॥ मनार्य वन सरीखा पोले, फार चोरीका काम रे ॥ न्हा० ॥ १५॥ गुणो जनो का मत्सर घरता, कपोत लेश्या मानी। ऐसी वेश्या वीरके कहते, वे हैं पढ़े अज्ञानी। फलीफाल की महिमा देखो, कैसे हैं मभिमानो रे ।। म्हा० ॥ १६॥ प्रशस्त लेश्या पावे मुनि में, भगवती में फरमाया। प्रथम शतक उद्देशा पहिला, पूरा भेद पताया॥

चित्रमय मसुफम्पा विचार महावोरके वचन अराधी, सफल करो सर काया रे ॥म्हा०॥१७॥ द्रव्य भावसे मशस्त लेश्या, पोर मभ में जानो। छ लेश्या पानेको अब तुम, झूठो हठ मन तानो॥ परमय निश्चय जाव नो सरे, छोड़ देयो दुर्पानोरे ॥ म्हा० ॥ १८ ॥ सोन मुषनमें रूप अनूपम, कंचन वणी पदमगंधसे सुगन्य अनन्ता, श्वासोच्छवास सुखदाय॥ उज्वल लोही मांस प्रका, पही अतिशय कहाय रे ॥ हा ॥ १९ महावीर को पदमस्यमवस्था, कैसे करू पान॥ पारा वर्ष मास अधिक में, पाये केवड ज्ञान॥ घोर तपस्या करी घोर प्रभ,

ग्यारा मन,
सन्न
जात,
पर्म शान RTI में,
पनि थियो हम पार ॥ मा० ॥२१॥
किपानको लिमीटर
किन्नु पिया कन्या
पाटी हमी गति से.
महामन पाया महान ॥
शोनसार होते. आपापना,
सीपी पान कामान रे।। न्हा १२ ।।
देव मनुष्य निर्यप कासरे,
सपा परीपट भारी।
इस दिया नहिं किसी जीर को,
पन सब के हितकारी॥
गुण अनन्ना कहां तक गाज,
मल्प युदि है म्हारी रेन्हा.॥ २३ ॥

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ढाल तीली . दान की महिमा जति मारी, भाव शुद् से हैं उसफारी ॥ माज इस फालो पालमाई. निर्दयता रही जग गई। अनुकम्पा दान कौन देवे, 'खोटी मौजा मे रेवे ॥ दोहा॥ ६ण ऊपर गुरू मिले. दो अनुकम्पा उठाय ॥ सहाय कर बुखिया को दान से. उसमें पाप पताय ॥ ऐसे हैं जैन वेश धारी ।। दान०॥१॥ साधु हम भरत खंड माई, सुपातर हमहिज हैं भाई कुपात्तर नौर सभी जानो, ऐसी तो कुगुरु - ~~ AAAAA. . . , ३३० चित्रमय अनुकम्पा यिवार रिज पालिका नदी किनारे, ध्यायो शुक्ल ध्यान । नाश कियाधनघाती कर्म जय, प्रमु पाया केवल ज्ञान । बहुत जीव को तारे प्रभु ने, पाये पद निर्वाण रे ॥ म्हा० ॥ २४ ॥ अवधि मन पर्जय ज्ञान, और पांचवाँ केवल शान । जो जो भाव देखा उन माही, यही किया वृद्धमान॥ ऐसा प्रभु का सरणा लेवे, निश्चय होत कल्याण रे ॥ म्हा० ॥ २५ जवाहिर लाल जो पूज्य प्रसादे, जोड़ी गन्बू लाल। सरदार शहर के माप ने सरे, सिस्यासी के साल ॥ गाये जो कोई नर नारी, तो पाचे मंगल माल रे॥म्हा० २६ ॥ .

कुपात्तर मोर सभी जानो, वाल तीसरी दान की महिमा अति भारी, भाव एद से। सुबमारी ॥र ।। माज इस साली फाट माई, निर्दयता ती जग पाई। अनुशम्मा दान कौन देवे, खोटो मौजा मे रेवे ॥ दोहा ॥ पण पर गुरू मिले, दो अनुकम्पा उठाय ।। महाय करें दुखिया को दान से, उसमें पाप यताय ॥ ऐसे हैं जैन–वेश धारी ।। दान० ॥ १॥ साधु हम भरत खंड माई, सुपातर हमहिज हैं भाई ऐसी तो फुगुरु करे ताणो॥

पाचवीं ढाल ब्रह्मचारी होतो कहो, पारं पारियां रे ।। टेरे॥ साधु स्थान में रात पड्यां, मत आओ नारिपां रे ॥ ७० ॥ 'उत्तराध्ययन सूत्र के मांप, सोलमा मध्यपन है सुखदाप । ज्यामें भाप गया जिन राय, प्रथम गाथा देखो चित लाय॥ खोल हृदय किवाडियां रे ॥०॥१॥ माचारंग की भावना देखो, नववा हदप से पेखो । सुनिये प्रश्न व्याकरण को लेखो, अब तो काम राग ने छेको ।। सीख सुख कारियां रे॥०॥२॥ सहित मकान में रेवे, N

पांचवीं-दाल
और क्या उनही कोकेवे।
नसीध सूत्र प्रायश्चित देवे,
अष्टम उद्देशे देव लेवे ॥
किया निरवारियां रे। व्र. ॥३
जैनी
साबू
नाम धराये,
सेवा पायों से कर वावे ।
नहीं शरम जरा पिण आवे,
पुरुष पास में नहीं रहावे ।।
या सेवा बुख कारियां रे ।। ७०॥४
जिनेश्वर की आज्ञा को लोप,
मिथ्या धर्म को खटो रोप ।।
भोले नर नारो है चोप (द)
वांधन वाले पटो गोप ॥
न किसी ने विचारियां रे ॥७॥५॥
नारी स्वरूप शास्त्र
में
गाया,
जिसका पूरा भेद बताया ।
महा शानो ध्यानी हिगापा,
तुम तो हो कतिकाल के जाया ॥
हे नागन सो नारियां रे ॥5॥६॥

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छठवीं ढाल ९ कुमति घट दर्शाई रे ॥ टेर ।। अनुकरा दया को सावन टेराई रे ॥ कुमति घट० ॥ आचारंग आदि नाम स्तर, नव ही जैन मिर धारा। मूल पाठ अर्थ टोका अन्दर. नहीं (२.) शब्द उचारा रे ॥१०॥ १॥ फई व्याकरण कोप किनई, प्रसिद्ध दृनिणं माई । सावज अनुकम्पा शिद पाया, न प्युक्ति पाई ॥ ३० ॥२॥ टांका चणि भाग्य पहुत है. अवरि दापिका जागो । न्याय सरकार देर पुरान में, नहीं परमागो, पृ. ॥

.. -- निमय अगुफमा विचार मरना कहो या कहो पाहे, दपा शन्द उपारो रे । तीनु हो शन्दका रक्षा करना, मर्थ यियारो रे ॥ १० ॥४॥ मया कहते पापको माई, मशन्द मादि लगाये रे॥ पाप मधिल मावश मन्द पना है, लो भूम दिलावे ॥•u५॥ मदय किरण साज गा गर, अंधेग मति पारे। दोनों माप में कमी नहीं आते, यही प्रम माग रे ॥३०॥३॥ वलिलपनमा कर दिया फिर, मनि पसायं । भर मनी यांनी दया का कर, कि मानगाव ॥१०॥७॥ पागमा ममने नहीं मान, क्षमा नमो का बलाई, काटाल दया उठावे रे ॥ कृ० ॥८॥ साधु ने नसाघु कहे तो, मिथ्यात लग जाये रे। वैते हो कारण ने कारज बतावे, तो मिथ्यात फैलावे रे ।। कुः ॥९॥ गुरु भक्ति में तो लाभ वतावे, दरशन करवा जावे रे । गाड़ी घोड़ा ऊंट रेट चढ़े जप; जीव मर जावे रे । कृ०॥१०॥ कारज तो गुरु कारण असवारी जाणो रे॥ कारणमें जारंभ पिण होते, लाभ कारज जाणों २ ॥१०॥ ११ ॥ तिर्य हो कर दया जो पालो, अंणिक नृप घर जाया रे। मेघरप राजा दया जो पाली, नीर्घ कर कहलाया रे॥१०॥१॥ हरण गमेप्यादि कई देता, दया जोवां की कीवी । भक्ति करना, -

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उञ्चों दाल
मरते जीव पचावा रे।
जीव
दया के प्रताप सभो दिन,
साता पावो रे ॥ कु०॥ १८॥
मोह अनुकम्पा और सावन दया,
अय तो कहना छोड़ों रे ।
पूर्व पाप का पश्चाताप करो ने, .
कर्म को तोड़ो रे ॥कु०॥ १९ ॥
संवत उन्नीपौ साल निन्यासो,
सरदार शहर मांहो रे ।
असोज वदी अष्टमो दिन में,
जोड़ पनाई रे ॥ ० ॥ २०॥
पूज्य जवाहिरलाल प्रसाद,
'जैन वाल' सुख पाया रे ।
दया धर्म का मर्म भाव से,
गाय सुनायो रे ।' कु.॥ २१ ॥

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सातवीं दाल आहार मंगावे पाणी मंगावे, बोझा अपना लोकावे रे । ओघा पटावे पात्र रावे, वस्त्र सिवावे रे ॥ इच० ॥४॥ विहार करे जव राजसत्या जी, आगे आगे जावे रे । दोनों वक्त पलेपण करने, आसन विधाये रे ॥श्च० ॥५॥ साधु जीमे सतिया परपे, या विध कहां से आई रे । किस गणधर ने किस शास्त्रमाही, आज्ञा यताई रे । इच० ॥६॥ महावीर का निन्दव होता, जामाली विख्यातोरे । वीमार पड़ा जप चेलापासे, सेजा विहातारं चि० ॥७॥ पौधे मार में निन्दय होना, यह काम नहीं करता है। व से बढ़ कर वातें, चित्रमय मनुका शिवार अप करवाना रे ॥इना०॥८॥ मविधि से साधु स्थान में, अगर आरय जाये रे । सतरं योल कर पदि यहां पर, मो प्रापदियर आये रे ॥१०॥९॥ प्पयहार मूत्र माफ मना है, देग्यो आंख ग्योलो रे । पिन कारण पाया न करता, मी शिनाली रे ॥ ॥१०॥ गरमाचार पईन्गा लिया, आाधर बाये । नमा गरका यां, जा मागा पाये ॥११॥ सुप मेता गाई प्रा जी, ठागाया प्राई। माय अपने हाथ में गागरा, माय माप...॥ माल हार शिक्षा मुना, हमारा ।

सादा-दाल ३४ पुषा कार पराक्रम करके, मुगतो पधारो रे॥ इच० ॥१३॥ ॥ गजल ॥ कलियुग के जो नाम धारी जैन, प्रावक सुनिये जरा। दर्द हमको होत है करतून, तुम देखी जग॥टेर ॥१॥ । लाकर दया गरोष को कोई, दान अनुकम्पा करें । उसको पाप यताते हो तुम, कैसे वाक्य ऊचरं बचावे मरते जोव को. नभय दान भुजोने कहा । धर्म के पदले में अप जो, पाप ही तुम न्याय नीति युक्त कोई करे, है देशोत्सान है।

३५० चिपय मनुफमा विधार स्वार्थ अन्दर लिपटाय के, कहते पाप जो महान है॥४॥ माता पिता का पुत्र पे, उपकार शासतर में कहा। पाप एकन्त तुमने तो सेवा करने में कहा ॥ ५ ॥ पतित पावन जैन दर्शन, के निपम विशाल हैं। जिसके सहारे गर कोई, पाले तो होवे न्याल है ॥६॥ राप परदेशी को निर्दयता, पड़ो जो फरता । देखो न गई चित मारपी से, उसकी यही निष्ठुरता ॥ ७ ॥ प्रत्यक्ष ज्ञानी केमी स्वामी को, मरनाथ के । सदुपदेश देवो प्रमुजी, हम पे कृपा लाय के ॥ ८ ॥ भनेक पशुपक्षी को ये,

सातों-बाल
मौत से ये मारता।
जीवों को रक्षा होवे और,
राजा बने दया पालता ॥ ९ ॥
मानी अदानो है राजा,
तकलीफ भिक्षु को देन है।
दोजिये अव ज्ञान ऐसा,
सवसे भलाई लेन है ॥१०॥
कठोर कर से इनकी प्रजा,
सारो बनो व्यकाल है।
संतोष सपको हो प्रमु जी,
इन्हें ज्ञान दो अनुकूल है ॥ ११ ॥
पास में मेरे वो सावे,
ज्ञान जरूर पायगा ।
हजूर ये दास तेरा,
चरणों में उन्हें लायगा ॥१२॥
मदर का पहना दना हे..
सापा मुनी हे. पान
युकियां ज्ञान को,
मुफ शिपा मोर. पाम में ॥१॥

An Man चित्रमय अनुकम्पा पवार: ज्ञानी पना ध्यानी पना, दानी धना पना तपसी महा । दुख मिटा सुखी पनाया, धन गुरू केशी महा ॥ १४॥ मिथ्या श्रद्धा छोह के, मव चित्त समयन जाइये। दोयगा कल्याण सक्का, ये बात हिरदै लाइये ॥ १५ साल अध्यासो भादरा में, पूज्य जवाहिर लालजी । मादस सन्त साथ में, विराजे शेष काल भी ।। १६ इति शुभम् शुद्धि पत्र +- पृष्ट अशुद्ध शब्द २ कृष्गजोका वां एयवो टांडा १८ ३ १२ कृपगजोकी (वां) पहयों दांटा हंसी इप्टांत बागो हसो * : इप्टान ३ १८ १८ जागा ७६ ८६ गान निय जानी गरी पापा८ निन आ जेडी १८ ९७ दुप्पो एसोपी

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[ख] पृष्ट पंक्ति शुद्ध शब्द मशुद्ध शब्द डावडो १८ हावडा जा जो जीव २८९ १४ जाव जा १८ पचया बचाया धर्म धर्म मारता मरतां ४ याठ्यारोतियारे-पाडणरी निणरे १८ करनेको करने हो *२०२ २१७ २१९ हो श्रेणिक २२४ सेणिक तुम्हें तणा वारजो वीरो पारा २४१ जणे * कुछ प्रतियों में शुद्ध उपा है । नणी दोरजो वीर पारी उण --

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Chitmay Anukampa Vichar

Author
Hukmi Chand
Title
Chitmay Anukampa Vichar
File name
Chitmay Anukampa Vichar
Text
OCR done
Citation
1913
Published
2011/08
Publisher
Kalkatta,pavit Press
Language
Sanskrit
Pages
388
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313882
Barcode
99999990311265.00
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Banasthali University
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