Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Vigyaptitriveni
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मा विज्ञप्तित्रिवेणिः। । LATED सम्पादक- मुनि जिनविजय।
*Mofos is Sasik प्रकाशक- गांधी वल्लभदास त्रिभुवनदास सेक्रेटरी-जैन आत्मानन्द सभा। (भावनगर) *NkhreliBIPIRATI964-*- - मुद्रक- छोटालाल लालभाई पटेल. लक्ष्मीविलास-प्रेस । भाउकाले की गली बडौदा । २२-९-१९१६) टरका PERSote प्रवर्तककान्तिविजयजनइतिहापमाला प्रथम पुष्प। अईम् विज्ञप्तित्रिवेणिः। (एक विस्तृत संस्कृत ऐतिहासिक पत्र ।) सम्पादक- मुनिजिनविजय। प्रकाशक- जैनआत्मानन्द सभा भावनगर। (मा-५.नि.) पार मंपन् २४४२.) सीमन् १९१६.J मुल्य मादीका ) पही मिला 1)
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EEEEEEFEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEE EEEEEEEEEEEEEEEEE धन्यवाद। 33333 प्रवर्तक श्रीमत्कांतिविजयजी महाराज के विद्वान् शिष्य मुनि महाराज श्रीचतुर- विजयजी के सदुपदेशसे बडौदे वाले जौहरी शेठ मोतिलाल गुलाबचंदकी विधवा पत्नी धर्मात्मा सुश्राविका विजळीवाईने इस पुस्तक के छपवाने में द्रव्यसंबंधी उदार मदत दी है इस लिये उन को धन्यवाद दिया जाता है। EEEEEEEEE जैनआत्मानंदसभा । U".
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अनुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. .... .... .... ३ ४ .... .... .... .... .... ६ " २४ प्रस्तावना। पर्युपणापर्व और विज्ञप्तिपत्र विज्ञप्तिपत्रों का स्वरूप वर्णन विभाग मुनियों के विज्ञप्तिलेख महोपाध्याय श्रीविनयविजयजीका इन्दुत श्रीमेघविजयजीका मेघदूतसमस्यालेख चेतोदूत सबसे बड़ा विज्ञप्तिपत्र विज्ञप्तिपत्रों की प्राचीनता विज्ञप्तित्रिवेणि .... विज्ञप्तित्रिवेणि का सारांश अधिक परिचय जिनमद्रसूरि जिनमद्रसूरि और पुस्तक-भाण्डागार कविवर मंढन और धनदराज फा ग्रंथागार अंभरचना .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... १६ .... ६२ ६६ पृष्ठ. ... ७२ ७६ .... विषय. शिष्यसमुदाय जयसागर उपाध्याय शिष्य-समूह प्रसिद्ध शिष्य तथा उनकी संतति नगरकोट्ट महातीर्थ उपसंहार मूल-ग्रन्थ । ७७ .... ९५ १ प्रथमा वेणिः द्वितीया वणिः तृतिया वेणिः २८ ५७ परिशिष्ट संख्या १ الم " ६७ शुद्धिपत्रम्. संशोधन । प्रस्तावना के २२ वें पृष्ठ की नोटमें ' अणकी-टणकी ' के विषयमें लिखा या है कि " यह......कहां पर है इसका पता नहीं लगा।" परंतु पीछे से तलायस करने पर मालूम हुआ, कि यह स्थान वंवई इलाखा के नासिक जिल्हे में है। इलुरा की तरह वहां भी कुछ जैन गुहा-मंदिर हैं, जिन में शान्तिनाथ और पार्श्व. नाथ तीर्थंकर की मुख्य मूर्तियें सुशोभित हैं । डॉ. फरग्युसन ( Fergusson ) ने अपनी " दी क्वे टेम्पल्स ऑव इन्डीया ( THE CAVE TEMPLES OF INDIA के ५०५-७ पृष्ठ पर इन गुहा-मंदिरों का हाल लिखा है। गेजेटियर ऑव बॉम्बे प्रेसीडेन्सी (Gazetteer of Bombay Presidency).” के १६ वें भाग के पृष्ठ ४२३-४ परभी इस स्थान का संक्षिप्त जिक्र किया गया है।
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तनदाउवेदनाधर्मलान्तमायाचितावादिपिसामानकटलाफलप्रदान सम्यगा जबामपुरा सतावतायतालघांधामनिससर्वबादाएसमुचित शिक्षाओं गाणाक्षणमारतणायगा विनयविलसितादितितिक्षणायौदामायण नातवापुतातिसंघासमंजसासमाविसहरोनातिनात्यंत सतीप्रसादादयसपरिवारिसमादितास्रीयामानानाधाविश्वविधानातपातयात्यागिदिश्रुतदिनानातिसएगायगाववादियों राहातावतीता तिललिपातांतसतायामाधवविलीतिततवमहापादनासलिलप्लावियमाक्षिणतरता विस्मरविद्याजिनापरणी यशापरामासादसंगनापरमतत्यानविनसम्मरिणादा नमानसिामराजा तिलिरिक्तरलवरंगत्यासादापरिनिगरिस्पुरबासम वंधनाताकाशमविनतसाितिविज्ञप्तितित पांजरवल्यविधानाधिमाविकायसनाकालालबाRENER विजलिसंधिवासकलसहरिदारनारिरणांगणार यतिसामानमहंवानिम्नांविरकालीखल्लक्षिवसुवासरावामाघ सितारमादिवासारनिछतवारसविारसामधिीतायभन्दा लेवयानयवाधिकमसंगतवायलिवितस्याहीलाधधामद्वितिसा तारिलियामनवअधिननरसिंहस्थतनायविनयाम, निलामाख्या साक्षरक्षिशनालाषणमत्यम विनाधस्वरूपातकाजाया लगानय विननिशिवणानामगंधपतिमीसमधमासिदामा किन लवंदनिकतालायालादिवगृहस्वरसाधुरामध्य वायवादस्यसदातियोविविधारिमदायाप्रतिप्रतिरोनिधनपकारपतिलाशिवमउसहजगतापरवितरितात गणारापास्यत्र नाशासविसरवीतवतमालामालमनिसन्मयावनियामंगायाशा दाता माशिमुखांशामिनिट Hal२०००१२ विज्ञप्तित्रिवेणि की हस्तलिखित प्रति का अंतिम पत्र ।
प्रस्तावना। पा ठकों के हाथ में जो पुस्तक विद्यमान है इस में कोई किसी प्रकार के शास्त्रीय या सामाजिक विपय फा वर्णन नहीं है परन्तु लगभग ५ सौ वर्ष पहले, उपाध्यायपद-धारक एक विद्वान् जैन-यति की ओर से, गच्छाधिपति आचार्य के पास, उन की आज्ञा और इच्छानुसार एक विशेप-प्रसंग संबंधी लिखा हुआ वृत्तान्त है। अत एव यह कोई ग्रंथ नहीं है परन्तु अलंकृत रूप से लिखा हुआ विस्तृत संस्कृत पत्र है। * पर्युषणा-पर्व और विज्ञप्ति-पत्र । जैन धर्म में पर्युपणापर्ध बडा महत्त्ववाला गिना जाता है । यह पर्व भादो मास में आता है और भादों चदि (गुजरात के हिसाब से श्रावण यदि ) १२ से ले कर भादों सुदिपर्यंत के ८ दिन तक यह मनाया जाता है । इन आट दिनों में जैन लोक किसी भी प्रकार का सारिक कार्य नहीं करते। पल शास्त्र के याचन-श्रवण में और तपश्चरणादि आत्मोद्धारक पुण्यकार्यों के करने में ये दिन बिताये जाते हैं । इस अष्टाहिक पर्वका अंतिम दिन जो सांवत्सरिक के नाम से प्रसिद्ध है, यह इन पाठ दिनों में भी सब से पवित्र और महान् माना जाता है । इस दिन तो छोटे से ले कर वृद्ध पर्यंत के सभी थ. और मावुक लोक अन्न-जल का भी त्याग कर देते हैं। और केवल आत्मतत्त्वचिन्तन के सिवा किसी प्रकार का आलापसंलाप तक भी नहीं करते। जैनशास्त्रों में लिखा है कि इस सांवत्सरिक दिन के सायंकाल समय में, हर एक जैन को, वर्षभर में किये हुए मुरुत्यों का अनुमोदन और दुष्कर्मों का आलोचन कर विशुद्ध-परिणामी - वनना चाहिए । इस के अतिरिक्त निर्विपमनस्क हो कर, संसार-भर के सभी प्राणियों के साथ, मानसिक, वाचिक और कायिक रूप से अपने किये हुए अपराधों की क्षमापना करनी चाहिए । अर्थात् वर्ष भर में किसी के भी साथ जो कुछ वैर-विरोध किया कराया हो उसे भूला देना चाहिए और स्वकृत अपराध की क्षमा मांगनी चाहिए । दूसरे मनुष्यने अपने साथ जो बुरा बर्ताव किया हो उसे भी विस्म- रण कर सरल-हृदयी बनना चाहिए । जो मनुष्य इस प्रकार सांव- त्सरिक-पर्व के दिन वैर का विस्मरण नहीं करता और निर्विपमनस्क नहीं बनता वह अर्हत् की आज्ञा का आराधक नहीं गिना जाता। श्रमण भगवान् श्रीमहावीरदेव की इस पवित्र आशा का पालन, के धर्मानुयायी, अपनी अपनी धार्मिक योग्यतानुसार, प्राचीन काल से करते आये हैं। जैनों के लिये यह पर्व, क्रिश्चियनों के बडे दिन और पारसियों के पटेटी दिन के जैसा उत्सव रूप और आनन्दप्रद है । इस पर्व के बाद सभी जैन अपने अपने परिचित धर्मवन्धुओं और धर्म- गुरुओं को क्षमापना पत्र लिखते हैं और स्वकृत अविनय की नम्रता पूर्वक क्षमा मांगते हैं। पूर्वकाल में डॉक का प्रबंध न होने से आज की तरह, हर एक मनुष्य, इस प्रकार के पत्र नहीं लिख सकता था तो भी गाँव के समस्त-संघ की ओर से एक ऐसा पत्र, दूसरे परिचित गाँव के संघ प्रति अवश्य लिखा जाता था। जैनधर्म में, साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविकारूप जो चतु- विध-संघ कहा जाता है, उस में सब से बड़ा दर्जा आचार्य का है। संघ के स्वामी आचार्य गिने जाते हैं। आचार्य का मान संघ में उतना होता है, जितना एक राजा का अपने राज्य में हुआ करता है । इस लिये आचार्य के पास, जहां जहां उन के गच्छा- नुयायी और शिष्यादि होते थे उन सब स्थानों के संघों की तरफ से ऐसे क्षमापना विषयक पत्र खास तौर पर भेजे जाते थे। इन पत्रों में, साँवत्सरिक-क्षमापना के सिवा पर्युषणा के दिनों में M अपने गाँव में जो जो धार्मिक कार्य होते थे उन का भी उल्लेख, आचार्य को ज्ञात करने के लिये किया जाता था। साथ में आचार्य को अपने गाँव में आने के लिये और संघ को दर्शन देने के लिये बडी खूपी के साथ विस्तार पूर्वक विज्ञप्ति (प्रार्थना ) भी की जाती थी। इसी विज्ञप्ति के कारण इन पत्रों को विशेष कर "विज्ञप्ति-पत्र " कहा करते थे। विज्ञप्तिपत्र का स्वरूप । - विज्ञप्ति-पत्र खास देखने और वर्णन करने लायक हुआ करते थे। इन के लिखने में बहुत सा खर्च और समय लगता था। इन का आकार ज्योतिषी की बनाई हुई जन्मपत्री के जैसा हुआ करता था। मजबूत और मोटे कागज़ो के १०-१२ इंच के चौडे टुकडे बना बना कर फिर उन्हें एक दूसरे के साथ सांध देते थे और इस प्रकार कागज़ का एक लंवा पत्र (बंडल) बनाया जाता था। (मेरे देखने में जितने पत्र आये हैं उन में कोई कोई ६० फीट जितने लंबे हैं!) इन पत्रों में, प्रारंभ में, बहुत से चित्र चित्रित किये जाते थे । किसी किसी पत्रके चित्र तो बडे ही अच्छे सुंदर और आकर्षक दृष्टिगोचर होते हैं। चित्र भिन्न भिन्न दृश्यों के आलेखित किये जाते थे । सब से प्रथम, बहुत कर के कुंभकलश और अष्टमंगल तथा चौदह महा-स्वप्न (जो तीर्थकर की मातायें देखती हैं) चित्रित किये जाते थे । फिर, राजा-बादशाहों के महल, नगर के बाजार, भिन्न भिन्न धर्मों के देवालय और धर्म. स्थान (मुसलमानों की मस्जीद भी), कुंआ, तालाव और नदी यादि जलाशय, नट और चाजीगरादिकों के खेल, गणिकाओं के नृत्य इत्यादि सब प्रकार के दृश्यों का आलेखन किया जाता था। पर्युपणा के दिनों में जैनसमाज के जो धार्मिक-जुलूस निकला करते हैं और जिन में थावक-समुदाय के साथ साधुजन मी रहा फरते हैं, उस भाव को लेकर भी कितने ही चित्र लिखे जाते थे। साथ में जिन आचार्य के पास यह विज्ञप्ति-पत्र भेजा जाता था उन की व्याख्यान-सभा का चिम भी दिया जाता था। इस प्रकार, लगभग पत्र का आधा भाग तो चित्रों से अलंकृत किया जाता था। बाद में, अच्छे लेखक के पास सुंदर अक्षरों में लेख-प्रबंध लिखाया जाता था जो किसी विद्वान् साधु या श्रावक का बनाया हुआ होता था। वर्णन SHAN वर्णन-विभाग | Vya चित्र-विभाग की तरह वर्णन-विभाग भी नाना प्रकार के वर्णनों से भरा हुआ होता था। यह संस्कृत और प्राकृत (प्रच. लित देशभाषा) दोनों प्रकार की भाषाओं से मिश्रित हो कर कुछ पद्य में और कुछ गद्य में लिखा जाता था । वर्णन-क्रम बहुत कर के इस प्रकार रहता था। आदि में तीर्थकर देव संबंधी स्तुति-पद्य, फिर जिस देश और गाँव में आचार्य विराजमान होते उस का आलंकारिक रूप से विस्तृत वर्णन,आचार्य के गुणों की प्रभूत-प्रशंसा, उन की सेवा उपासना करने वाले श्रावक-समूह के सौभाग्य का निरूपण, आचार्य के दर्शन करने की स्वकीय उत्कंठा का उद्घाटन, पर्युपणापर्व का आगमन और उस में बने हुए निज के गाँव के धर्मकृत्यों का उल्लेख, सांवत्सरिक दिन का विधिपूर्वक किया गया आराधन और स्वकृत अपराध के लिये आचार्य से क्षमा याचन; इत्यादि बातों का बहुत अच्छा और क्रम-पूर्वक उल्लेख किया जाता था । अंत में आचार्य को अपने क्षेत्र में पधारने के लिये विस्तार-पूर्वक नम्र विज्ञप्ति (प्रार्थना) की जाती थी और स्थानिक-संघ के अग्रगण्य श्रावकों के हस्ताक्षर- पूर्वक पत्र की समाप्ति की जाती थी। इन पत्रों में धार्मिक इतिहास के सिवा राजकीय ऐतिहासिक वाते भी कितनीक रहती थीं जो प्रसं. गानुसार लिख दी जाती थीं। GR मुनियों के विज्ञप्ति-लेख ।, जिस तरह श्रावकों की तरफ से आचार्य के पास विज्ञप्ति-पत्र भेजे जाते थे वैसे मुनियों की ओर से भी गच्छपति की सेवा में स्व- तंत्र विज्ञप्ति-लेख लिखे जाते थे । मुनिजन प्रायः करके अपने पत्र, - अपने ही हाथ से लिख कर भेजा करते थे अतः उन के पत्रों में, गृ. हस्थों के से चित्रादि नहीं होते थे। मुनियों के पत्र वाद्य सौन्दर्य से शुन्य होने पर भी यान्तरिक गुणों के कारण विशेष महत्त्व वाले होते थे। पुराणे पुस्तफ-भाण्डागारों में, खोज करने पर ऐसे पत्र बहुतायत से मिल सकते हैं परन्तु इन के वास्तविक स्वरूप से अभी तक कोई परिचित न हो सकने के कारण ये यों ही भाण्डारों में पड़े पडे सड रहे हैं और नष्ट हो रहे हैं। साहित्य-रसिक प्रवर्तक श्रीमत्कांतिविज- यजी महाराज-जो पाटन के प्रसिद्ध भाण्डारों के उद्धार कर्ता हैं-ने अपने विशाल-शास्त्र-संग्रह में ऐसे अनेक पत्रों का संग्रह किया है और मुझे उन्हें देखने तथा प्रकट करने की आशा दी है। मुनियों के पत्र विशेप कर विद्वानों के लिये ही मनोरंजक और अवलोकनीय हुआ करते हैं। क्यों कि एक तो इन की रचना संस्कृत या प्राकृत (मागधी) में है और दूसरी यात यह है कि इन का लेस प्रौढ और काव्य की तरह आलंकारिक है । मुझे मिले हुए पत्रों में से यहुत से तो बडे पाण्डित्यपूर्ण हैं । पूर्व के साधु-यति बडे बडे वि. द्वान् हुआ करते थे; इस लिये चे अपने निवृति के समय में इस प्रकार का विद्या-विनोद किया करने और अपने गच्छपति के पास, पर्युपणादि जैसे विशेष प्रसंगों पर, ऐसे विज्ञप्ति-लेरा लिख कर, अपना भक्तिभाव कहो या बुद्धि का घंभव कहो, प्रकट किया करते थे। मुझे मिले हुए पत्रों में से बहुत से पत्र, तपागच्छ के अंतिम प्रमावक और प्रतिष्ठावान् श्रीयिजयदेव, विजयसिंह और विज. यमम नाम के याचार्य-जो विक्रम संवत् १६५० से १७५० के बीच में विद्यमान थे-के समीप भेजे गये थे। इन के लेनका पं.धीला. भविजय, नयविजय, अमरचंद्र, मदोपाध्याय विनीतविजय, दिन- यविजय, मेघविजय और रविचन जैसे प्रवर पंडित और प्रसिद्ध ग्रंथकार है। कई पत्र तो ऐसे हैं जिन्दै यथार्य में राण्डकाव्य या लघुकाव्य कहना चाहिए । किसी किसी पत्र में तो महाफाप्यों के सगों की तरह, सुदा हुदा विपयों के प्रकरण पाडे हुए हैं। इन प्रकरणों में नाना जाति के छंद तथा यमक, अनुप्रास और चित्रादि विविध अलंकारों का समावेश किया गया है। कोई पत्र कवि कुलगुरु कालिदास के मनोहर काव्य मेघदूत की छाया ले कर बनाया गया है तो कोई उस की पादपूर्ति ले कर लिखा गया है। ये पत्र इतने बड़े हैं कि उन में से एक को भी यहां पर पूर्ण तया उद्धृत नहीं कर सकता तथापि पाठकों के अवलोकनार्थ एक-दो पत्रों के कुछ कुछ अंशों के देने का लोभ, मैं संवरण नहीं कर सकता। विज्ञ-वाचक इतने ही से, इन पत्रों के वास्तविक स्वरूप से ज्ञात हो सकेंगे। महोपाध्याय श्रीविनयविजयजी का इन्दुदूत। वाचक श्रीविनयविजयजी बहुत अच्छे विद्वान् हो गये हैं। ये सुप्रसिद्ध जैन-नैयायिक श्रीयशोविजयजी के समकालीन और सहाध्यायी थे। इन्हों ने लोकप्रकाश, कल्पसबोधिका और विस्तृत वृत्तिसहित हैमलघुप्रक्रिया आदि अनेक वडे ग्रंथोंकी रचना की है। ये एक समय अपने बहुत से शिष्यों के साथ मारवाड के जोधपुर नामक सहर में चातुर्मास रहे हुए थे। थोडे ही दिनों के बांद, जैनधर्म का परम पवित्र पर्युषणापर्व आ उपस्थित हुआ। चतुर्विध संघ के साथ उपाध्यायजीने पर्वाराधन कर महावीरदेव की आज्ञा का पालन किया। पर्युषणापर्व के समाप्त हुए बाद भिन्न भिन्न स्थानों पर से क्षमापना के पत्र आने जाने लगे। उपाध्यायजी भी अपने आचार्य के पास विज्ञप्ति-लेख भेजने का विचार करने लगे। जो उच्चपंक्ति के विद्वान् होते थे वे अपने विज्ञप्ति-लेख प्रति- वर्ष एक ही जैसे न लिख कर भिन्न भिन्न ढंग से लिखा करते थे। वाचक श्रीविनयविजयजी भी इस वर्ष के विज्ञप्तिपत्र का कोई नया ढंग सोच रहे थे कि इतने में, भादों सुदी पूर्णिमा की रात्रि को, उपा. श्रय की छत ऊपर से पूर्वदिशा तरफ, पर्वत के शिखर ऊपर, पूर्ण: चंद्र देख पडा । रजनीनाथ हिमरश्मि के नयनानंदकर विंय को देख कर कवि के हृदय में नाना प्रकार के कल्पना-तरंग ऊठने लगे । इन तरंगों को मूर्त और स्थायि रूप देने के - ।
७ घों का विचार से कवि किसी रमणीय विषय को, काव्यरूप में गूंथन करने के लिये, ढूंढने लगा । विचार करते करते विशप्ति का स्मरण हो आया। चंद्र को दूत बना कर, उस के द्वारा अपने विज्ञप्तिरूप संदेश को गच्छपति की सेवा में भेजने की कल्पना, कवि को बहुत ही रमणीय और उत्तम मालूम दी और तदनुसार, कालिदास के मेघदूत का अनुकरण करने वाला १३१ प. इन्दुदूत 'नाम का यह खण्ड-काव्य लिख डाला। जिन आचार्य के पास यह विज्ञप्ति भेजने की थी वे उस समय गुजरात के सुरत सहर में विराजमान थे । इस लिये कवि ने अपने दूत-इन्दु- को गन्तव्य-स्थान सुरत बताया । उपाध्यायजी गुजरात, काठिया. बाड और राजपूताना में अच्छी तरह विचरे थे इस लिये उन्हें रास्ते का ठीक ठीक हाल मालूम था। जोधपुर से सुरत तक के बीच में, सीधे रास्ते पर, निम्न लिखित प्रसिद्ध स्थलों और स्थानों के देखने का लोभ, चंद्र को दिखा कर कवि ने अपने मार्गज्ञान का सूचन किया है । कवि ने चंद्र प्रति कहा है, कि यहां से (जोधपुर से) दक्षिण की ओर चलते हुए प्रथम सुवर्णाचल (कंचनगिरि )-जो जा. लोर के पास है-आता है । उस के बाद सीरोही और आबूपहाड, वहां से सरस्वती के किनारे ऊपर का सिद्धपुर और फिर सावर- मती के तट पर बसा हुआ गुजरात का राजनगर (अहमदाबाद) आता है । अहमदाबाद के बाद लाटदेश का भूपणरूप बडौदा, नर्म- दातटवर्ती भरूच और फिर तापी के तीर पर बसा हुआ सुरत मि. लता है। पाठकों को यह जान कर आश्चर्य होगा, कि जोधपुरसे सीधे सुरत जाने का रेल-रास्ता भी आज वही है जो ढाई सौ पौने तीन सौ चर्प पहले श्रीविनयविजयजी उपाध्याय ने अपने कलित दूत को घताया था। इस काव्य में, काव्य की दृष्टि से देशविरुद्ध का एक उल्लेखनीय दोप अवश्य है; क्यों कि जोधपुर से सुरत पश्चिम दिशा मेंन हो कर दक्षिण दिशा में है इस लिये चंद्र के उक्त स्थानों पर हो फर जाने की जो कल्पना की गई है उस का होना सर्वथा असंभव है, इन्दुत में कहीं पर भी भाचार्य के नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है परंतु अन्यान्य साधनों से ज्ञात होता है कि ये आचार्य श्रीविजयप्रभसूरि थे।
८ अत एव कवि का यह कथन देशविरुद्ध होने से दुष्ट. गिना जाता है। तथापि, जिस प्रकार कविकुलतिलक कालिदास ने धूम, अग्नि, पाणि और पवन के समुदाय स्वरूप मेघ में, प्राणियों द्वारा पहुंचाने लायक संदेश के पहुंचाने की शक्ति का अभाव जान कर, लोको की हृद्गत शंका को दूर करने के लिये "कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ।" लिख कर अपने कथन को युक्ति-संगत बतलाया है और उसे सभी ने स्वीकार भी किया है वैसे गुरुदेव के चरण कमलों में नमन करने की उत्कंठा वाले और स्थितिपरवशता के निमित्त अपना अभिलाष पूर्ण न कर सकने के कारण विहल हृदय वाले कवि का यह असंगत कथन भी विद्वानों को क्षतव्य होना चाहिये। अब मैं इस 'इन्दुत ' के थोडे से पद्य यहां पर उद्धृत करता हूं जिस से पाठकों को उस की रचना और शैली आदि का ज्ञान हो जायँ । इस का प्रारंभ कवि इस प्रकार करता है- स्वस्ति श्रीणां भवनमवनीकान्तपतिप्रणम्यं प्रौढप्रीत्या परमपुरुष पार्श्वनाथं प्रणम्य । श्रीपूज्यानां गुरुगुणवतामिन्दुदूतप्रभूतो- दन्तं लेख लिखति विनयो लेखलेखानतानाम् ॥ १ ॥ + काव्यालंकार के रचयिता पुराण विद्वान् भामह ने अपने काव्यालंकार के प्रथम परिच्छेद में इस प्रकार के निर्जीव अथवा अशक्त प्राणियों को दूतादि वना कर भेजना ' अयुक्तिमद् ' बतला कर भी अन्त में- यदि चोत्कण्ठया तत् तदुन्मत्त इव भाषते । तथा भवतु भूम्नेदं सुमेधोभिः प्रयुज्यते ।। यह कह कर, सुविद्वानों की ऐसी कृतियों तरफ उपेक्षादृष्टि की है। १ यह प्रवन्ध बंबइ के, निर्णयसागर प्रेस की, काव्यमाला के चौदह वें गुच्छक में छपा है परंतु वहुत अशुद्ध और अव्यवस्थित है।
९ दूसरे कान्य से ले कर सात काव्य पर्यंत-(६) पद्यों में- जोधपुर-नगर का वर्णन है- यत्र व्योमव्यतिगशिखरेप्वहतां मन्दिरेषु मूतानार्नयनसुभगाश्चन्द्रशालानिविष्टाः । दर्श दर्श विनयविनतोऽघोविमानावतार- क्लेशं नासादयति निकरो हृद्यविद्याधराणाम् ॥ २ ॥ * * * * * * स्थास्नुः शुण्डायुध इव मदात्कुण्डलीकृत्य दन्तौ कृलोचानावुपलरचितो यत्र हस्त्यदिशने । स्वर्ग जेतुं नमसि रमसादारुरुक्षोरमुप्य शृङ्गस्येव स्फुटयति महाधीरनासीरमावम् ॥ ७ ॥ आठचे और नपर्व काव्य में भाद्रपद की पूर्णिमा की रात्रि में चंद्र के देखने और उस का स्वागत करने का उल्लंस है । तस्मिन् योधाभिधपुरवरे श्रीमदाचार्यपादा- देशान्मासांश्चतुर उपितो यो विनीतो विनेयः । साधुः सैप प्रहरपिगमे भादराकारजन्यां प्राचीगैलोपरि परिगतं शीतस्मि ददर्श ॥ ८ ॥ दृष्ट्वा चैनं स परमगुरुध्यानसन्धानलीन- स्वान्तः कान्तं तमिति रजनेः स्वागतं व्याजहार । सपः साक्षाद्गुरुपदयुगं नन्तुमुत्कण्ठितोऽपि दागेतेन स्थितिपरक्शो वन्दना प्रापयिष्यन् ॥ ९ ॥ १०) पद्य से कपि चंद्र को स्वागतादि यवनों के कहने का प्रारंभ फरता है जो ३० पद्य में जा कर समाप्त होता है। इन २१ पचों में, स्थागत, कुशाल प्रश्न, कुछ देर विधान्ति लेने का अनुरोध, अपना १० प्रयोजन, उस के करने के लिये नम्र प्रार्थना, चंद्र में उसके करने की योग्यता, चंद्र का जातिमत्त्व, उस के पिता,भ्राता और भगिनी आदि कुटुम्वियों के किये हुए जगत् के उपकारों का वर्णन और प्रार्थना के भंग करने में उस की लघुता आदि वातों का वडा ही रसमय और हृदयग्राहि वर्णन है। देखिए, १० और ११ चे पद्य में कैसे नम्र और प्रिय वचनों द्वारा इन्दु का स्वागत और कुशलप्रश्न पूछा गया है- - दिष्टया दृष्टः सुहृदुडुपते ! ऽस्माभिरयातिथिस्त्वं पीयूषोधैर्भृशमुपचरन् प्राणिनामीक्षणानि । पुण्यैः प्राच्यैः फलितमतुलै रस्मदीयैरुपेया- नापुण्यानां नयनविषयं यत्प्रियः स्मर्यमाणः ॥ १० ॥ देहे गेहे कुशलमतुलं वर्तते कच्चिदिन्दो ! नीरोगाङ्गी सुभग गृहिणी रोहिणी तेऽस्त्यभीष्टा ? । अन्याः सर्वा अपि सकुशला दक्षजाः सन्ति पत्न्यः ? पञ्चाचिः शं कलयति हृदानन्दनो नन्दनस्ते ? ॥ ११ ॥ इस प्रकार कुछ कुशलप्रश्न पूछे वाद, थोडे समय तक ठहर कर मार्ग का श्रम दूर करने के लिये कवि इन्दु से कहता है कि- - मार्गश्रान्तः क्षणमिह सुखं तिष्ठ विश्रामहेतो- रुत्तुङ्गेऽस्मिन् शिखरिशिखरे दत्तपादावलम्बः । हृद्यः पद्माभिधवरसरःसम्भवस्त्वां समीरः सर्पन्नुच्चैः सुखयतु सखे ! केतकीगन्धबन्धुः ॥ १४ ॥ और फिर अपनी प्रार्थना सुनने तथा उस के करने में मन्दभाव न दिखाने के लिये कहता है कि- शान्ति नीते श्रम इति ततश्चेतसि स्वास्थ्यमाते दत्वा कर्णाववहितमनाः श्रीप्यसि प्रार्थनां मे। न श्रान्तानां सुखयति कथा खिग्धवर्गोदिताऽपि स्वस्थे चित्ते प्रणयमधुरा बुद्धयो युद्भवन्ति ॥ १७ ॥ श्रुत्वा याच्यां मम हिमरुचे ! न प्रमादो विधेयो नो वावज्ञाऽभ्यषिकविभवोन्मत्तचितेन कार्या। प्रेमालापैश्चतुरदयितानिमितस्मृिति न प्राप्या प्रायः प्रथितयशसः प्रार्थनाभङ्गभीताः ॥ १८ ॥ क्यों कि, तुझे अपने पिता को आदर्श रखना चाहिए और वह जिस तरह जगत् का उनकार करता है वैसे तुझे भी उपकार भाव. धारण करना चाहिए । देख, तेरा पिता क्या करता रहता है ?- प्रातर् ! तातस्तव गुणनिधिः पश्य रत्नाकरोऽसौ वर्षे वर्षे नवनलधरप्रापितैरम्बुपूरैः । विश्व विश्व तरुणतपनोद्दामतापाभितप्त सेक सेकं सुखयति सदाऽभीष्टविश्वोपकारः॥ १९ ॥ ३१ वे पद्य में कवि ने इन्दु को गन्तव्यस्थान बतलाया है और कहा है- गन्तव्यस्ते तपनतनयातीरकोटीरमिन्दो ! सूर्यद्रद्रो गुरुपदयुगस्पर्शसम्प्राप्तरङ्गः । गत्वा तत्र त्रिभुवनजनध्येयपादारविन्दो द्रष्टव्यः श्रीतपगणपतिर्भाग्यसम्मारलभ्यः ।। ३१ ॥ इस प्रकार फघि अपने संदेश के पहुंचाने के स्थान का तथा तपगच्छपति के देसने का सूचन कर फिर रास्ते का वर्णन करता है और मार्ग में पंचनागरि, जालोर और सीरोही होते हुए अदाचल
१२
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(आवू पहाड) पर जाने के लिये कहता है। आवू पहुंचे बाद वहां के
भिन्न भिन्न शृङ्गों का अवलोकन कर जगद्विख्यात-जैन-देवालयों में
जाने का और उन में विराजित जिनेश्वरों की भव्य और शान्त मूर्ति-
यो के वंदन पूजन करने का आग्रह करता है।
तत्र श्रीमान् विमलवसतौ भाति नाभेयदेवः
सेवायातत्रिदशनिकरः पूर्णपादोपकण्ठः ।
नेमिस्वामी दिशति च शिवान्यानतानां निविष्टः
साक्षादिन्द्रालय इव वरे वस्तुपालस्य चैत्ये ॥ ५३ ॥
इन दोनों मंदिरों के अद्भुत और आश्चर्यकारक शिल्पकार्य का
वर्णन कवि इस प्रकार करता है-
रूप्यस्वच्छोपलदलमयौ चित्रदोत्कीर्णचित्रौ
चञ्चच्चन्द्रोदयचयचितौ कल्पितानल्पशिल्पौ ।
जीयास्तां तौ विमलनृपतेर्वस्तुपालस्य चोचौ
प्रासादौ तौ स्थिरतरयशोरूपदेहाविव द्वौ ॥ १४ ॥
आवू के इन मुख्य और सुप्रसिद्ध मन्दिरों के देखने वाद भीमा.
साह श्रेष्ठि के बनाये हुए तथा खरतरवसति के मंदिर के देखने
का भी कवि इन्दु से आग्रह करता है । अचलगढनाम के शिखर पर
जो चतुर्मुख जिनप्रासाद है और जिस में प्रचुरसुवर्णमिश्रित बृह-
दाकार धातुमय जिनमूर्तिये हैं-जिन का कुल वजन १४४४ मन कहा
जाता है-उन के देखने के लिये भी इन्दु को प्रेरणा की गई है और
कहा है कि
किञ्चिहरे भवति च ततस्तत्र दुर्गोऽचलाख्यो
मौलौ तस्मिन् विलसति चतुर्दारमुत्तुङ्गचैत्यम् ।
यादृक् तत्रोच्छूितमनुपमस्वर्णरीरीविमिश्र
न क्ष्मापीठे क्वचिदधिगतं तादृगची चतुष्कम् ॥ ५९ ॥
.६४ चे काव्य में, आबू से रवाना हो कर, सरस्वती नदी के
तट पर बसे हुए सिद्धपुर पहुंचने का इन्दु से कहा गया है । यहां पर
क्षण भर ठहर कर, फिर निमेपमान में, जगत्प्रसिद्ध राजनगर (अहम-
दाबाद ) पहुंच जाने का उल्लेख है । कवि चन्द्र से कहता है कि वहां
पर सब से पहले, समुद्र की कान्ता जो साबरमती नदी है, वह अपने
पति के पुत्र ऐसे तुझ को आया हुआ देख कर, कल्लोलरूप भुजाओं
से तुझे थालिङ्गान देने के लिये उपस्थित होगी।
तत्रालोक्य स्वपतितनयं राजतेनोभिरामं
दर्भाङ्करच्छलपुलकिता त्वामुपस्थास्यतेऽसौ
आमूलाग्रं तरलिततनुर्वीचिहस्तैरुदस्तै-
दूरादालिङ्गितुमिव रसात्साभ्रमत्यब्धिकान्ता ।। ६५ ॥
अहमदाबाद उस समय बड़ा आवाद शहर था। जैनधर्म का
वहां पर साम्राज्य सा छा रहा था। बड़े बड़े सेठों और धनाढ्यों के
विशाल और उच्च भवनों के कारण प्रेक्षकों को कुबेर की अलका का
और रावण की लंका का स्मरण होता था। अनेक मोडाधिपति इस
नगर में रहते थे। यहां का एक विशाल घर बड़े गॉव के जैसा था
और एक पाटक (पाडावाडा) सहर के जैसा था। इस तरह इस
नगर का कवि ने यहुत वर्णन किया है। देखिए-
लक्ष्मीस्तत्रारमति सततं भूरि कोटिध्वजानां
गेहे गेहे बहुविधधनैः कृप्तनानास्वरूपा ।
दृष्ट्वा चैनां सुभगभगिनीं त्यक्तचाञ्चल्यदोपा
चिन्तातीतं नियतमतुलं प्राप्स्यसि त्वं प्रमोदम् ।। ७३ ।।
एफैकोऽस्य ध्रुवमुडुपते ! पाटकोऽन्यैः पुराणां
वृन्दैस्तुल्यो जनपदसमान्येव शाखापुराणि ।
वेश्मकैकं पृथुतरमुरुग्रामतुल्यं तदस्य
माहात्म्यं कः कथयितुमलं प्राप्तवाग्वैभवोऽपि ॥ ७४ ॥
७९-८०-८१ इन तीन काव्यों में वटपद (वडोदे) शहर का वर्णन है । इस नगर के मध्य भाग में, जहां चारों तरफ के रास्ते इकडे होते हैं, २४ कमानों का एक बड़ा उच्च मण्डप है । इस के ऊपर ४ मजिल हैं । अंतिम मंजिल पर चढ कर देखने से सारा बडौदा शहर और आस पास के दूर दूर तक के दृश्य दिखाई देते हैं। यह मण्डप श्रीविनयविजयजी के समय भी मौजूद था। वे इन्दु के प्रति, इस मंडप पर ठहर कर चारों दिशा के दृश्यों को देख ने के लिये कहते हैं कि- मध्येऽस्त्यन प्रचुरसुषमो मण्डपोऽत्यन्ततुङ्ग- स्तत्र स्थित्वा चतसृषु दिशास्वीक्षणीयं त्वयेन्दो ! द्रष्टासि द्राक् श्रियमनुपमामस्य विष्वक्पुरस्य रम्यं ह्येतच्छुचिरुचिचतुर्दारचैत्यानुकारम् ।। ८१ ।। बडौदे के बाद ४-५ काव्यों में कवि भरूच और उस के पास बहने वाली नर्मदा नदी का उल्लेख कर एक दम सुरत की शोभा का वर्णन करने लग गया है । सुरत उस समय वडी उन्नत दशा में था। सारे हिन्दुस्थान में वह सब से बड़ा व्यापार का स्थान था। उस समय उस में पृथ्वी के प्रायः सभी देशों के मनुष्य व्यापार करने के लिये आया जाया करते थे । सुरत की उस समय वह दशा थी जो आज बंबई की है । दूर दूर के देशों से, तापी नदी द्वारा सेंकडों जहाज आया जाया करते थे और सब प्रकार का माल लिया दिया जाता था। कवि इस शहर का बहुत कुछ वर्णन करता है । वहां के धनाढ्य और सम्मान्य जैनसमुदाय की बडी महिमा गाई गई है। लिखा है कि- यत्र श्राद्धास्ततसुमनसो विश्वमान्या वदान्याः संख्यातीता अमितविभवाः प्रौढ़शाखाप्रशाखाः । कुत्राप्याद्याधरकजनिताः संस्थिताः कल्पवृक्षाः प्रादुर्भूतास्तपगणपतिप्रौढपुण्यानुभावात् ॥ ९९ ॥ -
सुरत में गोपीपुरा नाम का जो भाग है वह सारे शहर में बि-
शिष्ट-भाग माना जाता है। इस भाग में जैनसमुदाय की विशेष वसति
है और सम्पत्तिशाली भी अधिक है। श्रीविनयविजयजी के समय
में भी यही भाग अधिक विशिष्ट था । आचार्य इसी गोपीपुरे के
उपाधय में ठहरे हुए थे। कवि ने इस उपाश्रय की शोभा का यड़ा ही
आकर्षक और वैभववाला वर्णन किया है। देखिए-
मध्ये गोपीपुरमिह महान् श्रावकोपाश्रयोऽस्ति
कैलासाद्रिप्रतिभट इव प्रौढलक्ष्मीनिधानम् ।
अन्तर्वार्हतमतगुरुपौढतेजोभिरुद्य-
ज्ज्योतिर्मध्यस्थितमघवता ताविषेणोपमेयः ॥ १०१ ॥
भित्तौ भित्तौ स्फटिकसरुचौ कुट्टिी कुट्टिमे च
सक्रामस्त्वं सुमग भवितास्याचलक्ष्यस्वरूपः ।
युक्तं चैतत्तरणिनगरोपाश्रयस्यान्यथाश्री-
ईष्टुं शक्या न खलु वपुपैकेन युप्मादृशापि ॥ १०२ ॥
तस्य द्वारागणमुवि भवान् स्थैर्यमालम्ब्य पश्यन्
साक्षाद्देवानिव नृजनुपो द्रक्ष्यति श्राद्धलोकान् ।
हस्त्यारूढानय स्थगतान् सादिनश्वार्थपौरु-
प्यर्थान् श्रोतुं रसिकहृदयान् शीघ्रमाटीकमानान् ।।१०३||
उपाश्रय के मध्य में जो व्याख्यान-मण्डप और व्याख्याता के
यैठने का सिंहासन था उसका स्वरूप पढिए-
मध्ये तस्याः श्रमणवसतेमण्डपो यः क्षणस्य
सोऽयं कान्त्याऽनुहरति समां तां सुधर्मा मघोनः ।
मुक्ताचन्द्रोदयपरिचितस्वर्णमाणिक्यभूषा-
श्रेणीदीयो विविधरचनाराजितस्तम्भशोमी ॥१०५॥
१६ मध्ये सिंहासनमनुपमं तस्य शक्रासनामं चेतश्चैतत्सुखयति सतां हृद्यपद्यानुकारम् । सालङ्कारं सुघटितमहासन्धिबन्धं सुवर्ण स्वच्छच्छायं सुललितचतुष्पादसम्पन्नशोभम् ॥ १०६ ॥ दीप्रोपान्तः स्वसदृशरुचा पादपीठेन नम्र- क्ष्माभृच्छ्रेणीमुकुटघटनाकोमलीभूतधाम्ना । पङ्क्त्योडूनामिव गुणयुजा मौक्तिकस्वस्तिकेन व्योम्नो लक्ष्मी किल निदधतोपेन्द्रपादाञ्चितेन ॥ १०७ ॥ यहां से आगे, १४ काव्यों का एक कुलक है, जिस में आचार्य के गुणों की खूब प्रशंसा की गई है और चंद्र से कहा है, कि तूं उस उपाश्रय में जा कर व्याख्यान-मण्डप के सुवर्ण-सिंहासन पर बैठे हुए ऐसे महान और प्रभावक आचार्य के दर्शन और वन्दन कर कृतार्थ होना । आचार्य की प्रशंसा में लिखे हुए ये काव्य वहुत ही उत्तम और एक जैनाचार्य के उच्च गुणों का खयाल कराने वाले हैं। तत्रासीनं परिणततपस्तेजसा पीतमन्तः- शुक्लध्यानोद्भवनवमहोयोतितात्मस्वरूपम् । साक्षात्तीर्थंकरमिव जगज्जन्तुजीवातुभूतं मूल् शान्ताद्भुतमधुरया दत्तभव्यप्रमोदम् ॥ १०८ ॥ विद्यावद्भिः सुभगतनुभिश्चारुचारित्रचयः श्रीगुर्वाज्ञाविनयनिपुणैः सेवितं साधुवर्यैः । श्रद्धालूनां पृथुपरिषदि प्रौढधामा निषण्णं त्रायस्त्रिशरिव परिगतं संपदीन्द्रं सुराणाम् ॥ १२० ॥ वन्देथाः श्रीतपगणपति सार्वमैदंयुगीनं पीनं पुण्यप्रचयमुदधेर्नन्दन ! वं लभेथाः ।
१७ प्राच्यैः पुण्यैः फलितमतुलैस्तावकीनैः सुलब्ध जन्मतचे नमासि च गति विनी ते कृतार्था ॥ १२१ ॥ अंत के १० काव्यों में कवि चन्द्र से गच्छपति के पास जाने की और अपनी विज्ञप्ति के कहने का स्वरूप बताता है और कहता है कि स्थित्वा तस्माद्विजनसमये श्रीगुरोः पादप स्पृष्ट्वा स्वच्छै हिमकरफरैर्विज्ञ ! विज्ञप्यमेवम् । शिष्योऽणीयान् विनयविजयो द्वादशावर्तमाजा विज्ञप्ति व्याहरति महता वन्दनेनाभिवन्ध । ॥ १२६ ॥ यच्छीपूज्यक्रमयुगमिलादुर्गमध्ये नतोऽहं प्रागास नोपकृतिमिव तद्विस्मरामि क्षणार्द्धम् श्रीतातानां तदुरुकृपया भापणं स्मर्यमाणं सर्वाझीणं सपदि पुलकोद्भेदमाविप्करोति ।। १२७ ॥ तुप्यत्युल्लासयति करणान्युल्लसन्त्येव भूयो भूयो गच्छत्युपगुरुपदं गाढमुत्कण्ठते च । बाप्पलिन्ने सृजति नयने गद्दान् कण्ठनादा- नेतच्चतः प्रणयरसतश्चेष्टते नैकया मे ॥ १२८ ॥ निद्रा दोपो जगति विदितो जागरश्याप्रमादः सम्प्रत्येतन्मम तु हृदये वैपरीत्येन भाति । निद्रा आने गुणमनुगुणं दर्शनं वो ददानां जागयां च प्रगुणमगुणं तत्र विप्नं सृजन्तीम् ॥ १२९॥ जागर्यायां जपति रसना युप्मदाख्यां यथा मे निद्रायामप्युपहितमनास्त्वेन शश्वत्थैव । तस्मात्सम्प्रत्यहनि निशि वा जागरानिद्रयो १८ भेदं लोका अपि पटुधियो जानते नापरीक्ष्यम् ।। १३० ॥ शङ्कात.मलिनमगुणैरुत्सृजन् पूर्वपक्षं सिद्धान्तं सद्विभव भवदाराधनं संश्रितोऽस्मि | सम्भाव्यस्तत्परमगुरुभिः स्निग्धया प्रेमदृष्टया येनात्यर्थं फलितसकलप्रार्थितार्थों भवेयम् ॥ १३१ ॥ देखिए, कैसे अच्छे भाव और सुन्दर वाक्य हैं। कैसी अच्छी कल्पना और कैसा रमणीय वर्णन है। इस में लेखक ने केवल वि- ज्ञप्ति ही का अर्थ नहीं भरा है परन्तु अपने काल के राष्ट्रीय भावों का भी गर्भित रूप से हाल लिख दिया है जो इतिहास-प्रेमियों के लिये अवलोकनीय वस्तु है । में १ विजयप्रभसूरि के गुरु श्री विजयदेवसूरि थे । उनका स्वर्गवास सं. १७१२ हुआ था । उन्होंने पहले विजयसिंहसूरि को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा था और तदनुसार उन्हें अपने हाथसे आचार्यपद पर अभिषिक्त भी कर दिया था। परंतु दैवयोग से सं. १७१० में उन की मृत्यु हो गई । वाद में फिर विजयदेव सूरि ने किसी कारण वश, और और विशेष सुयोग्य साधुओं को छोड़ कर, विजय प्रभ नाम के विद्वान को आचार्यपद दिया। इस से कितनेक साधु नाराज हो गये और उनके जीते तक तो कुछ नहीं बोले परंतु मरे वाद, विजयप्रभरि का प्रत्यक्ष विरोध करने लगे। ये श्रीविनयविजयजी वाचक भी उन्हीं में सम्मीलित थे। कुछ वर्षों वाद आचार्य श्रीविजयप्रभ का प्रभाव वढा और पूर्व की अपेक्षा वे विशेष प्रतापी दिखाई देने लगे । संघ में उन का सन्मान भी बहुत कुछ होने लगा । इस स्थिति को देख कर, संघ में विरोध के बीज की जड़ ऊंडी न जम जायँ इस शुभ इरादे से, वाचक श्रीविनय विजयजी ने अपने विचारों की दशा को पलट दिया और उस आचार्य-विरोधी मंडली का त्याग कर गच्छपति की आज्ञा का स्वीकार किया। जिस वर्ष यह वृत्तान्त बना था प्रायः उसी वर्ष यह 'इन्दुदूत' लिखा गया था । इस लिये लेखक ने, इस अन्तिम काव्य में आचार्य से प्रार्थना की है, कि अगुणों के कारण मलिन ऐसे उस पूर्वपक्ष को छोड़ कर मैं आप के शासन का आश्रित हुआ हूं इस लिये मुझ पर प्रेमदृष्टि रक्खें कि जिस से मेरी प्रार्थना सफल हों।
ऊपर के इन श्लोकों से पाठकों को 'इन्दुदूत' नामक विज्ञप्ति- लेख के स्वरूप का ज्ञान हो गया होगा। अब एक ऐसे ही दूसरे लेख का कुछ परिचय कराया जाता है। महोपाध्याय श्रीमेघविजयजीका मेघदूतसमस्यालेख । वाचक श्रीविनयविजयजी के समकालीन और उन्हीं के जैसे उत्तम प्रकार के विद्वान् श्रीमेघविजयजी भी थे । इन्हें भी महोपा. ध्याय की पद्वी मिली थी। न्याय, व्याकरण, काव्य, ज्योतिष आदि अनेक विषयों पर इन्हों ने उत्तम कोटि के ग्रंथ रचे हैं। ये एक समय दक्षिण के औरंगाबाद नाम के शहर में वर्षाकाल रहे हुए थे। गच्छपति आचार्य श्रीविजयप्रभसूरि उस साल सौराष्ट्र के द्वीपवं. दिर (दीय बंदर ) में विराजमान थे। महोपाध्याय श्रीमेघविजयजी ने औरंगाबाद से उस साल, आचार्य की सेवामें, जो विज्ञप्तिपत्र भेजा है वह भी 'इन्दुदूत' के ढंग का है । कालिदास के मेघदूत का अंतिमपाद ले कर और तीन पाद नये बना कर अर्थात् मेघदूत की समस्यापूर्ति द्वारा-यह पत्र लिखा गया है । इस कारण इस पत्र का नाम भी लेखकने 'मेघदूतसमस्यालेख' ऐसा दिया है। इस में किसी स्वतंत्र दूत की कल्पना न कर उसी मेघ को दूत बनाया है। इन्दुदूत की तरह इस में भी, औरंगाबाद से दीववंदर तक के वीच के प्रसिद्ध प्रसिद्ध स्थानों और शहरों का सुन्दर वर्णन किया गया है और तत्तत्स्थलों में मेघ को रहने-देखने के मिप से कविने अपना भौगोलिक और प्राकृतिक शान का परिचय दिया है । नमूने के तौर पर कुछ पद्य लीजिए- स्वस्तिश्रीमद्भुवनदिनकृद्धीरतीर्थाभिनेतः प्राप्यादेश तपगणपतेर्मेघनामा विनेयः । ज्येष्ठस्थित्यां पुरमनुसरन् नव्यरङ्गं ससर्ज स्निग्धच्छायातरुषु बसति रामगिर्याश्रमेषु ॥१॥ तस्यां पुर्या मुनिगणगुरोधिप्रयोगी स योगी
T
-
नीत्वा मासान् कतिचिदचिराद्वाचिकं नेतुकामः ।
भाद्रे पञ्चम्युदयदिवसे मेघमाश्लिष्टसौधं
वप्रक्रीडापरिणतगजप्रेक्षणीयं ददर्श ॥ २ ॥
मत्वा तस्याऽभ्युदयनदशां वायुनोन्नीयमानां
चेतो वाचं झटिति गमनापेक्षमूचेऽत्य साधोः ।
प्रत्यासन्नेऽप्ययि ! तव गुरौ कार्यकार्यस्ति योगः
कण्ठाश्लेषप्रणयिनि जने किं पुनर्दूरसंस्थे ॥ ३ ॥
यह ज़माना औरंगजेवी था इस लिये भारत में सर्वत्र अरा.
जकता और अशांति फैली हुई थी। मनुष्यों को एक प्रदेश में से
दूसरे प्रदेश में जाना बड़ा कठिन और भयप्रद था। कविने इस
वात का ज़िक्र बड़े ही अच्छे ढंग से कर दिया है।
जज्ञे भूमावतिविषमताऽन्योन्यसाम्राज्यदौस्थ्या-
कश्चिन्मां नो नयति यतिनामीशितुर्तिवार्ताम् ।
तत्त्वां याचे स्ववशमवशासृष्टविश्वोपकारं
याच्या मोघा वरमधिगुणे नाधमे लव्धकामा ॥६॥
१० वे काव्य से २२ में काव्य तक शान्तिनाथ तीर्थकर का
वर्णन कर, फिर १२ काव्यों में औरंगाबाद का वर्णन किया है।
औरंगावाद से पूर्व दिशा में ८-१० मैल पर इतिहास प्रसिद्ध देवगिरि
नगर-जिसे आज कल दौलताबाद कहते हैं है । इस का भी कवि
ने ५-६ पद्यों में अच्छा वर्णन किया है।
अस्याः प्राच्या सुभगभगिनी देवगिर्याहयास्ति
पूर्वं प्रत्याश्रयमिह चिरं तस्थिवान् रामचन्द्रः।
सस्नौ स्नेहादिह जनकजा लक्ष्मणः केलिमाधा-
दित्यागन्तून रमयति जनो यत्र बन्धूनभिज्ञः ॥ ३५ ॥
- दौलताबाद से ८-९ मैल के फासले पर ईलोय का प्रसिद्ध पहाड़ है जो गुफामन्दिरों के कारण विश्व-विख्यात हो रहा है। यहां के जैसे मनोहर और आश्चर्यजनक गुफामन्दिर, जो पहाड में से पत्थर काटकर बनाये गये हैं, अन्यत्र बहुत कम दिखाई देते हैं । इन गुफा- मन्दिरों में भारतीय सभी देव-देवियों की मूर्तियें विद्यमान हैं। यहां पर, सय मिला कर कोई ३४-३५ गुफामन्दिर हैं जो लगभग मैल सवा मैल जितने विस्तार में बने हुए हैं। इन मन्दिरों में १२ चौद्धों के १७ हिन्दुओं के और ५ जैनों के हैं । जैन-मन्दिरों में बडी ही भव्य और विशाल जिनमतियें स्थापित हैं, जिनमें से कुछ पद्मासन लगाये बैठी हैं और कुछ कायोत्सर्ग धारण कर खडी हैं। मेघविज- योपाध्याय ने अपने दृत मेघ को, देवगिरि से इस ईलोरा के पहाडको हो कर और यहां के जैनमंदिर में विराजित पार्श्वनाथ-देव को नमः स्कार कर फिर आगे फो जाने का कहा है। इत्येतस्मान्नगरयुगलाद्वीक्ष्य केलिस्थलं ल- मीलोराद्री सपदि विनमन् पार्श्वमीशं त्रिलोक्याः । प्रातः ! प्रातब्रज जनपदस्त्रीजनैः पीयमानो मन्दायन्ते न खल्ल मुहृदामभ्युपेतार्थकृत्याः ॥ ४२ ॥ इलोरा के आगे का रास्ता यताते हुए लेसफ ने मेघ से कहा है, कि यहां (इलोरा) से चले याद, तूं नाना प्रकार के पहाड़ों और नगरी को लांघता हुया भणकिटणको के पर्वत पर पहुंचना और जल्दी होने पर भी, थोडे से समय तक यहां पर अवश्य टहरना- क्यों कि पूर्व फाल में श्रीपार्श्वनाथ भगवान् यहां पर विचरे थे इस लिये वह स्थल अति पवित्र है । वहां से उठ कर फिर तुहिमा- सैल पर-जिसे आज कल मांगी-तुंगी का पहाट फहते है-जाना और उस के शियर पर पिराजमान तथा पशुओं के भी प्रयोधक ऐसे भ्रमण-भगवान् को (तधिकर देव की प्रतिमा कों) यपनी जलधारा से सिंचन फर फिर गर्जना द्वारा यहां के पक्षियों को सूर्य नचाना।
गत्यौत्सुकेऽप्यकिटणकीदुर्गयोः स्थेयमेव पार्श्वस्वामी स इह विहृतः पूर्वमुर्वीशसेव्यः । जाग्रदूपे विपदि शरणं स्वार्गिलोकेऽभिवन्ध- मत्यादित्यं हुतवहमुखे सम्भृतं तद्धि तेजः ॥ १७ ॥ उत्पत्यास्मात्मणम विपुले तुङ्गिआशैलशृङ्गे रामं कामं श्रमणवृषभं बोधितारं पशूनाम् । तत्सम्बुद्धान्वयजशिखिनो मूर्तिमस्याभिषिच्य पश्चादद्रिग्रहणगुरुभिर्गजितैर्नर्तयेथाः ॥ ४८ ॥ तुङ्गिआ-शैल से चले बाद कुछ दूर जाने पर गुजरात की रमणीय भूमि आ जाती है और सव से प्रथम अभ्युदय और लक्ष्मी का मंदिर ऐसा सुरत-बंदर मिलता है। विनयविजयजी की तरह मेघविजयजी ने भी सुरत का वैभवशालि वर्णन किया है । लिखा है कि वहाँ के धनी धावकों ने श्रीविजयप्रभसूरि के प्रवेश-समय में याचकों के प्रति स्वर्णधारा वर्षाई थी। सभ्येभ्यानामहमहमिकावृद्धसौधावरत्नै- रातिथ्यं ते बहु विरचयन्मानयेस्तत्पुरापि । हैमैः श्राद्धवज इह गुरोरागमे मार्गणानां धारापतिस्त्वमिव कमलान्यभ्यवर्षन्मुखानि ॥ १२ ॥ सुरत के बाद, तापी, नर्मदा, भृगुपुर (भरूच ), मही नदी, हरिगृहपुर (?) और साबरमती का एक एक पद्य में उल्लेख कर, फिर सिद्धशैल (सिद्धाचल-शर्बुजय ) का वर्णन किया है। उस के बाद एक दम द्वीपपुरि (दीव बंदर ) का वर्णन प्रारंभ होता है। इस के वर्णन में कवि ने बहुतसा स्थान रोका है । नगर के वर्णन बाद आ- चार्य का गुणगान और संक्षिप्त तया उन का जीवनचरित कहकर १ यह 'अणकिटणकी' कहां पर है इस का पता नहीं लगा।
अपनी विज्ञप्ति और अपने यहां का वृत्तान्त कहना शुरू किया है। यथा- प्रादुर्भूते दिनमुखसुखे सौरतेजस्त्रिधाऽपि विश्वं व्या कथयति महीनाय ! नान्दी विशेषः । कामक्रीडानिरतमिधुनान्युत्सृजस्त्यक्तानिद्र मन्द्रस्निग्धैर्ध्वनिभिरबलावेणिमोक्षोत्सुकानि ॥ ११ ॥ सभ्यास्थायामिह भगवतीपाठपूर्वोत्तराधा- ध्यायव्याख्या भवति तदनु श्रीगुरोगतिवृत्तैः । गन्धर्वाली मुखयति जनं सोत्सवं श्रोत्रपेयैः कान्तोदन्तः सुहृदुपहृतः सङ्गमात्किञ्चिदनः ॥ १११ ॥ शिष्याध्यायोऽवतविरमणं तत्र वापूर्दिदेश कीर्त्यङ्करानिव रजतजद्वादशोद्यद्दशाकान् । वात्सल्यानि प्रबरवसनै मजापोऽईदादेः पूर्वामाप्यं सुलभविपदा माणिनामेतदेव ॥ ११२ ॥ * * एवं नित्योत्सवपरिचयैराधिोऽपि प्रकामं मेघः शिप्यो गुरुपदयुगासेवया विप्रयुक्तः । सर्व वासं मनसि रसिको मन्यमानः सुनेत- स्त्वामुत्कण्ठाविरचितपदं मन्मुखेनेदमाह ॥ ११५ ॥ इस के याद लेपक ने, अपने को आचार्य फे दर्शन की उत्कटेच्छा पतला कर अन्त में जिस दिन सुगुर के चरणकमलों का पुण्यजनक स्पर्श होगा पह दिन धन्य मानूंगा, इत्यादि कह कर पर समाह किया गया है।
२६. SION चेतोदूत । UP मेघविजयोपाध्याय की तरह एक अन्य विद्वान् ने भी मेघदूत ही के अंतिमपाद की समस्यापूर्ति कर अपना विज्ञप्तिलेख भेजा है। इस में उस ने अपने चेतः (चित्त ) ही को दूत कल्पा है और उसी के द्वारा अपना संदेश, गुरुसेवा में पहुंचाना चाहा है । इस का रचना-प्रकार ऊपयुक्त दूतों से भिन्न प्रकार का है । इस में गुरु और स्थानादि के विशेष नामों का स्पष्ट उल्लेख न कर सामान्य रूप से ही वर्णन किया है, कि जिस से सदैव और सब कोई इस का व्य- वहार कर सके। बडी अच्छी मधुर और प्रासादिक रचना है। उदाहरण के लिये इस के भी कुछ पद्य उद्धृत किये जाते हैं। ते जीयासुर्जगति गुरवः प्रौढपुण्यप्रभावा भास्वद्रूपे प्रतपति भृशं यत्प्रतापे प्रतप्ताः । दीना वादीश्वरसमुदयाः कुर्वते तापशान्त्यै स्निग्धच्छायातरुषु वसति रामगिर्याश्रमेषु ।। १ ॥ संयोगार्थी गुरुपदभुवो वल्लभायाः प्रसत्तेः शिष्यः कश्चित् समदमिह दुरणं स्वैरचारम् । चिन्तायोगात् सुचिरमचलस्वात्मनिष्ठं मनः स्वं वप्रक्रीडापरिणतगजं प्रेक्षणीयं ददर्श ॥ २ ॥ निश्शेषार्थप्रथननिपुणं चित्तमेतत्तदस्मात् स्वाभीष्टं मे नियतमचिरात् सिद्धमेवेति मत्वा । दत्तार्थाय प्रमदजनितैर्वाष्पपूरैः स तस्मै प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥ ४ ॥ १ मेघदूतसमस्यालेख' और ' चेतोदूत' दोनों प्रबंध इसी ग्रन्थरत्न- माला के २४ और २५ वें रत्नांक में, थोडे समय पहले, प्रकट हो चुके हैं।
२५ चेतः फ्लो गतवलतया नैव कार्यक्षम य- चैतन्येनापि हि विरहितं पुद्गलात्मत्वतो वा । स व्यामूढस्तदपि सहसारोप्य पुंस्त्वं ययाचे कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाधेवनाचेतनेषु ॥ ५ ॥ त्वय्याय ननु तनुमतामत्र दुःख सुखं वा त्वचो नान्यो जगति सकले कश्चिदास्ते महीयान् । तेनाहं त्वां परहितरतं प्रार्थये स्वार्थसिद्धयै याच्या मोघा वरमधिगुणे नाधमे लब्धकामा ॥ ६ ॥ सन्देश के प्रेपक ने इस प्रकार चित्त का कुछ स्वरूप दिखा फर फिर अपने गुरु के गुणों का वर्णन करना प्रारंभ किया है जो लगभग १०० पर्यों में पूर्ण होता है। गुरुवर्णन के याद शिष्य अपने को जो गुरु का घियोग हो रहा है उस का उल्लेख करता है और फिर चेतः द्वारा गुरु से कहलाता है कि- बेहि त्वं मे ननु तव विना सङ्गमालोकमेक हा ! नेप्यन्ते कथमिव मया दुखिना दुर्दिनानि । अन्तःस्फूर्जद्विरहदहनप्रोच्छल मलेखा- दियसंसक्तमविरलधनव्यस्तसूर्यातमानि ॥ ११५ ॥ इस प्रकार नाना प्रकार के चिन्ता-उदारों के निकाले याद शिप्य फिर कुछ आभ्यासन प्राप्त करता है और संसार के निस्सार भावों का विचार करता दुमा कहता है कि- निस्सारेऽस्मिन् प्रकृतिविरसे भूरिदुःखेऽल्पसौख्ये संसारे किं भवति बहुना फल्गुना शोचनेन । यम्माजन्मान्तरविरचितः कर्मभिर्देवभाजी नर्गिच्छत्युपरि च दमा चक्रनेमिक्रमेण ॥ ११९ ॥ *
२६
-
इन्दुदूतादि पत्रों के
उद्धृत किये गये इन बहु-संख्यक पद्यों के
अवलोकन से पाठकों को मुनियों के विज्ञप्ति-लेखों का स्वरूप पूर्ण तया
ज्ञात हो गया होगा। और यह भी ध्यान में आ गया होगाकि ये पत्र
कैसे महत्व के और अवलोकनीय होते हैं। मेरे पास जो पत्र हैं वे एक
से एक वढिया और देखने लायक हैं परंतु कहां तक उन का उल्लेख
किया जायें । उपर्युक्त वाचक विनयविजयजी का एक दुसरा पत्र है
जो संवत् १६९४ की साल का लिखा हुआ है । यह पत्र, उपाध्याय
जी ने वारेजा नामक गाम-जो अमदावाद के पास है-से खंभात में,
श्रीविजयानंदसूरि की सेवा में भेजा था। इस पत्र के भिन्न भिन्न
अभिधान वाले पाँच अधिकार हैं। इन अधिकारों में, अनेक तरह
का वर्णन है जो काव्यप्रेमियों के मन को मुग्ध बनाता है। चित्र-
काव्य और विविध छन्दों का तो मानों एक छोटा सा संग्र ही है।
इन्हीं का एक और तीसरा पत्र है, जो इन्हों ने देवपत्तन (प्रभास-
पाटण ) से, अणहिल्लपुर-पाटन में श्रीविजयदेवसरि के समीप भेजा
था। इस के पद्यों का आदि भाग प्राकृत में और उत्तरार्ध
संस्कृत में है।
।
इस का भी कुछ नमूना लीजिए।
श्रीजिन वर्णन-
सस्थिसिरिकमलिणीगहणदिणणायगं
नेमिजिणणायगं सिद्धिसुहहायगं।
यमतिभक्तिस्फुरत्पुलकदन्तुरतनु-
नाकिनिकरो नमत्यमलमतिवैभवः ॥ १ ॥
नेण सुहसीलवम्मेण वम्महभडो
जति मुसुमूरिओ जइवि अइउन्भडो।
चित्रमिह किमतनोः परिभवे दोमता
बलपरीक्षाविलुप्ताच्युतास्यत्विषा ॥ २ ॥
२७
नगर वर्णन-
विणिम्मियं जं विहिणा सवाणियं सरं व निचं पउमाभिरामं ।
सराजहंसं समवाप्तजीवनैरनेकलोकैर्विहितप्रशंसम् ॥ १४ ॥
*
अणेगवणं सुपयत्यसत्यं संपत्तपत्तं ससिलोगवग्गं ।
यद्राजते दक्षनिरीक्षणीयं प्रशस्तियुक्पुस्तकवत्प्रशस्तम् ॥ १६ ।।
*
सिरिमंते तत्य पुरे पमूअमणिकणयरयणपडिहत्थे ।
श्रीपूज्यचरणपङ्कजपरागतिलकितमहीमहिले ॥ २५ ॥
उत्तुंगभवणवलहीसुलहीकयरयणिकंततणुफरिसे ।
श्रीमत्पत्तनगरे गुर्जरनीचिलकतुल्ये ।। २६ ।।
जत्य जिणेसरमंदिरसुंदरसियकलसकतिपंतीहि ।
उदीतोऽपि निशि सितांशुनितंतुं शक्यते नैव ।। २७ ।।
*
वीरजिणंदपरंपररत्ता सयसङ्घसड्ढीसंघट्टा ।
श्रीमद्देवकपचननगरानगराजवसुविभवात् ॥ ३३ ॥
हरिसरसवमुल्लसिरप्पभूमरोमंचकंचुमाइन्नो।
घटितकरद्वयसम्पुटसंटङ्कितपटुललाटतटः ॥ ३४ ॥
*
छव्वणनयणपउमप्पसिावचेहि वंदिऊण सिम ।
विनयविजयाभिधानो विज्ञपयत्युचित विज्ञप्तिम् ॥ ३६ ।।
पर्युपणा वर्णन-
पदणपढावणसोहणविरयणलिहणाइएमु गंथाणं ।
पूजाप्रभायनादिपु कार्येप्वार्येषु च भवत्सु ।। ४० ॥
कालकमेणं पते मद्दवए मासि भव्यमद्दमए ।
श्रीपर्युषणापर्वानेकसुपर्वाचितमुपेतम् ॥ ४१ ॥
२८
तच-मासखवणाइदुकरतवचरणं धम्मकजसंभरणं ।
सप्तदशभेदपूजाविरचनमप्यहंदर्चानाम् ॥ ४२ ॥
वारसदिणाणि जीवाभयदाणुग्घोसणं सपुरगामे ।
याचकयाचितवितरणमपराधक्षमणकं च मिथः ॥ ४३ ॥
कप्पिकप्पतरूवमसिरिकप्पसुअस वित्तिवक्खाणं ।
नवभिः क्षणैर्विशिष्टमभावनैः क्षणशतोपचितैः ॥ ४४ ॥
नच्चंत नई गायंत गुणिजणं विविहसजियाउज्जं ।
स्थाने स्थाने जिनगुरुगुणगाथकदीयमानधनम् ॥ ४५ ॥
एवं परिवाडीए जिणहरगमणं पभाविअसतित्यं ।
सांवत्सरिकावश्यककरणं भवभूरिभयहरणम् ॥ ४६ ॥
खंडपुडसिरिफलाइहिं पभावणं भावभावणारम्मं ।
अतिमधुरभोज्यभक्त्या सार्मिकपोषणं भक्तया ॥ ४७ ॥
इच्चाइधम्मकज्जुज्जोइयजिणसासणं विगविग्छ ।
इह वेलाकूलेऽपि च विहितं पूज्यप्रसादेन ॥ ४८ ॥
आचार्य को कृपापत्र भेजने की प्रार्थना-
तेसिं सिरिपुज्जाणं संपत्तासेससाहुरज्जाणं ।
विलसत्प्रसादपत्रं समभिलपत्येष शिशुलेशः ॥ ६० ।।
तमा पउरपसायं सम्मं धरिऊण सेवगस्सुवरि ।
स्वाङ्गपरिच्छदकुशलप्रवृत्तिपीयूषजलदेन ॥ ६१ ॥
लेहेण पेसिएणं कायव्वा सिस्सचित्तसंतुटी ।
नहि सारङ्गं सुखयितुमलमन्यो जलधरात्कोऽपि ।। ६२ ।।
उववेणवं पणामो कायव्वो चित्तगोअरे मज्झ ।
बालस्यापि गरिष्ठेनमदमितनरेन्द्रततिभिरपि ॥ ६३ ॥
आचार्य की सेवा में रहने वाले साधुओं के नाम और उन को
अनुवदनादि-
किंच-अइसयबुद्धिसमिद्धा सुपसिद्धा रिद्धिविजयवरविबुहा ।
पंडितविनीतविजयाः सचित्रोत्सा महासधियः ॥१५॥
सिरिसंतिविजय विबुहा बुद्धिपहाणा महापहाणाय ।
श्रीअमरविजयविवुधा विबुधाः श्रीरामविजयाख्याः ।। ६६ ॥
कप्पूरविजयविवुहा पसरिअकप्पूरसुरहिजसपसरा ।
सुमतिततिग्रामण्यो विबुधाः श्रीमतिविजयसञ्ज्ञाः ६७ ।।
नयविजयाभिहाविबुहा गुरुसेवामुणि असयलणयविणया ।
मुगृहीतनामधेयाः परेऽपि ये मुनिवरास्तत्र ॥ ६८ ॥
तेसिं सिरिगुरुसेवारेवासाललाइकुंजरवराणं ।
अनुवन्दना मदीया प्रसाद या प्रसादाः ॥ ६९ ॥
अपने पास रहे हुए तथा अपनी आमासे अन्य स्थानों में ठहरे
हुए साधुयों के नमनादि-
एत्य गणिकणयविजया सनेमिविजयाय रयणविजयाय ।
मुनिरुदविजयसञ्जस्तथा मुनी रूपविजयाख्यः ॥ ७० ॥
एएसि साहूणं तिण्हं तह साहुणीण पइदियहं ।
प्रणतिरयधारणीया कृतप्रसादैः परमगुरुभिः ॥ ७१॥
जयविजयणामधेजा वेलाउलवंदिरे ठिआ विबुद्दा ।
अमरविजयेन मुनिना युक्ता मुनिद्धिविजयेन ।। ७२ ॥
वणपलिकयचउमासा गणिणो जे कंतिविजयणामेणं ।
ऋपिभारमल्लसहितास्तथा धुरानीपुरे ये च ॥ ७३ ॥
जिणविजयक्खा गणिणो कुंअरविजयेण पिम्मविजयेण ।
युक्ता इति ये यत्र स्थिता व्रतस्थाश्चतुर्मासीम् ॥ ७४ ॥
३० ते तत्थ सुहमणुट्टिअपज्जोसवणाइविविहसुअजोआ । प्रणमन्ति विनयविनताः श्रीगुरुचरणान् भुवनशरणान् ॥ ७५ ॥ अवि इत्थ सङ्घसढीसंघो सयलो वि नमइ गुरुचरणे । श्रीवीरपट्टवीथीकल्पद्रुमसमगुरुप्रहः ।। ७५ ॥ अहमित्थ पइदिणं चिय सिरिगुरुसमहिटिएण हियएण । प्रणमामि जिनाधीशांश्चन्द्रमभनेमिवीरादीन् ॥ ७७ ।। तुह्माण मारिसया सीसा बहुआ वि पज्जुवासंति । अयमपि शिशुस्तथापि स्मर्तव्योऽर्हत्प्रणामादौ ॥ ७८ ॥ आसोअबहुलपक्खे धण्णाए धणतेरसीइ दिणे । विनयेन निजगुरूणां लिखिता विज्ञप्तिरिति भद्रम् ॥ ८२ ।। * सब से बड़ा विज्ञप्ति पत्र । ल . तपागच्छ में जो अनेकानेक विद्वान् और विश्रुत आचार्य हो गये हैं उन में एक मुनिसुन्दरसूरि नाम के आचार्य भी हैं । ये बड़े प्रतिभाशाली और प्रभावक महात्मा हो गये हैं। ये सहस्रावधानी और सिद्धसारस्वत कविथे। इन्हों ने वारह-चौदह वर्ष जितनी छोटी उम्र में ही एक " त्रैविद्यगोष्ठी" नाम का ग्रंथ लिखा है जिस में न्याय, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंद, और अलंकार आदि विषयों संबंधी अपनी अप्रतिहतगति का अच्छा परिचय दिया है । विक्रम संवत् १४६६ में, इन्हों ने जो विज्ञप्ति पत्र अपने गुरु (आचार्य) श्रीदेव- सुन्दरसूरि की सेवा में भेजा था , वह विज्ञप्तिपत्रों के साहित्य और इतिहास में सबसे अधिक महत्त्व रखता है । इस पत्र के जैसा विस्तृत और प्रौढ पत्र अन्य किसी ने नहीं लिखा । यह पत्र १०८ हाथ जितना लंवा था ! इस में एक से एक विचित्र और अनुपम ऐसे सेंकडों चित्र और हजारों काव्य लिखे गये थे। महोपाध्याय श्रीधर्मसागरजी ने अपनी तपागच्छ की पट्टावली में, इस के विषय में लिखा है कि- येनानेकपासादपद्मचक्रषटकारकक्रियागुप्तकाभ्रमसर्वतोभद्रमुरज- सिंहासनाशोकमेरीसमवसरणसरोवराष्टमहाप्रातिहार्यादिनन्यत्रिशतीवन्धत- प्रयोगाद्यनेकचित्राक्षरद्वयक्षरपञ्चवर्गपरिहाराद्यनेकस्तवमयत्रिदशतराङ्गणी- विज्ञप्तिनामधेयाष्टोत्तरशतहस्तमितो लेखः श्रीगुरूणां प्रेपितः ।* इस के तीन स्रोत और ६१ तरंग थे। यह अय संपूर्ण तया नहीं मिलता। केवल तीसरे स्रोत का गुर्वावली-नामक एक विभाग-जिसे कर्ता ने महाहूद की संज्ञा दी है, और प्रासादादि चित्रबंध कितनेक स्तोत्र इधर उघर छूटे छूटे मिलते हैं। गुर्वायली छपकर प्रकट हो चुकी है । इस के सा मिला कर कोई ५०० पद्य हैं। इस में, गवान् श्रीमहावीर से ले कर लेखक तक के तपागच्छ के आचार्यों का संक्षिप्त, परन्तु विश्वस्त इतिहास है। इस के अन्त में लेखक ने स्वयं इस प्रकार लिखा है- श्रमणभ- इति श्रीयुगप्रधानावतारश्रीमत्तपागच्छाधिराजवृहद्च्छनायक- पूज्याराध्यपरमाप्तपरमगुरुश्रीदेवसुन्दरसूरिंगणराशिमाहमार्णवानुगामिन्यां तद्विनेयश्रीमुनिसुन्दरगणिहृदयहिमवदवतीर्णश्रीगुरुप्रभावपद्महृदप्रभवायां श्रीमहापर्वाधिराजश्रीपर्युपणापर्वविज्ञप्तित्रिदशतरङ्गिण्यां तृतीये श्रीगुरुवर्ण- नस्रोतसि गुर्वावलीनाम्नि महाहूदेऽनभिव्यक्तगणना एकपष्टिस्तराः । इस उल्लेख और गुर्वावली के अवलोकन से विश पाठक जान सकते हैं कि यह पत्र, संस्कृत साहित्य का फैसा अनुपम और अपूर्व रत्न होगा। * स्वयं मुनिमुन्दरसरिके शिष्य पं. हर्षभूयणगणि ने 'प्राविधिविीनधय' में भी ये पंफिया लिखा है।
३२. विज्ञप्तिपत्रों की प्राचीनता । इस प्रकार के विज्ञप्तिपत्र कब से लिखे जाने लगे इस का कोई ऐतिह्य-प्रमाण नहीं मिलता, परन्तु अनुमान होता है कि यह प्रथा बहुत पुराणी होगी। मेरे देखने में जितने पत्र आये हैं उन में जो सब से पुराणा है वह विक्रम की १३ वीं शताब्दी के मध्यका लिखा हुआ है । यह पत्र कागज पर नहीं परंतु ताडपत्र ऊपर है। (हिदुस्थान में जब कागज़ का प्रचार न था अथवा बहुत कम था तव अन्यान्य पुस्तक प्रबंधादि की तरह, मनुष्यों का परस्पर पत्रव्यवहार भी ताड़पत्रों पर ही चलता था।)इस का केवल एक ही-मध्य का पत्र-मिला है। यह पाटन के भाण्डार के रद्दी और खंडित ताडपत्रों में से-जो नष्ट-भ्रष्ट हुए पडे थे-उपलब्ध हुआ है। यह पत्र चंद्रकुल के आचार्य भानुप्रभ के पास, वडउद्र (बडौदा) ग्राम से, प्रभाचंद्र गणि ने भेजा था।उपलब्ध पत्र में केवल गद्य ही गद्य है,पद्य नहीं। इस का गद्य बहुत सरस और सुन्दर है। रचना सालंकारिक और सरल है । पढते लमय कादंवरी और तिलकमंजरी की पंक्तियों का आभास हो आता है। पाठकों के अनुभवार्थ कुछ सतरें इसकी भी टांकी जाती हैं। परिस्फुरच्चारुचन्द्रार्कमण्डलसमुच्छलदातिवहलकिरणजालजलकल्लो- लमालिनि, अभ्रंकपशिखरलोकालोकभूधरप्रौढपालिनि, परिभ्रमत्तारानि- करसञ्चरद्विविधवयास, जगल्लीलासरसि, सकलविवेकिजनमनःकमल: वनेषु, विकाशैकसदनेषु, सततं वसन्ति । विपक्ष कीर्तिकुमुदिनीकन्दयास- लालसाः, अन्यत्र गमनालसाः, निखिलनिर्मलाच तसाः, यद्गुणराजहंसाः । असाधारणश्रीकुलमन्दिरम् , आश्रितदूरास्तकण्टकोत्करम्, अपास्तसमस्त- जाड्याडम्बरम्, रात्रिंदिवं सविशेषोन्मेषप्रवरम्, विशुद्धपक्षालिसेव्यमा- नम्। सदामोदविधानप्रधानम्, समग्रराजहंसकृतपक्षपातम्, विकाशित. गोपतिवातम्, सर्वातिशायिवैभवसम्भवनिर्मलम्, यदीयपदकमलं विलोक्य किल निविडीडास्पदनिजविभूतिविभावनोद्भवतीव्रतरतापप्रसरतया जला- श्रयेप्वजसं विहितसदनानि समस्तान्यपि पङ्कजवनानि । ये च पड्तर्क- सम्पर्ककर्कशमति प्रागल्मीसमुद्भाविता नविविक्तयुक्तिपरंपरापरिचयचारु- वचश्चातुरीवशसकलजनसमक्षविनिर्जितानेकस्थानस्थाननिरवद्यविद्यामदाम- न्दवदावदवादिवृन्दनिरन्तरपरिस्फुरन्निविडान्तस्तापतधोच्छन्दतुच्छोच्छ्- वाशानिलप्रवलितप्रतापानलकवलितसकलविपक्षकातिकक्षतया समुद्मू- तप्रभूतजगदसम्भववैभवव्यतिकराः। तान्, शरच्चन्द्रचन्द्रिकाधवलगुणग्रामग्रथितयशःश्वेतात्पत्रविराज- मानान् , सन्मण्डलविलसदाज्ञैश्चर्यमधानान् , चारुचारित्रचक्रवर्तिस्वगुरुक- ल्याणपट्टप्राप्तप्रतिष्ठान, अक्षणक्षमामारोद्वहनकनिष्ठान्, '* * * * सकलजीवलोकतापकृत्क्रोधादिचरटोच्चाटनैकरतान्, अमिततमगौरवप्रा- सादपर्यन्तभूमिकावस्थितान्, अगण्यपुण्यपरिणातेसहचरीसमालिङ्गितमूर्तीन, परलोकसाधनाद्भुततेजः परिस्फूर्तीन् , सर्वत्र प्रवर्तितत्रिकरणशुद्धव्यापार- मनोहरान् , सदा सन्निहितसाधुकुजरान् , निरस्तसमस्तदर्शनविवादान् , सुगृहीतनामधेयपूज्यराजश्रीभानुप्रभारिपादान् , वडउद्रग्रामात् प्रभा- चन्द्रगणिः समस्तसाधुसहितः क्षोणीतलमिलन्मौलिमण्डलः, संयोजित- करकुड्मलः, प्रवर्द्धमानवहुमानविस्तारिणीम् , निर्व्याजविनयमनोहारि- णीम् , अमन्दामन्दरसोलासव्यक्तिम्, सद्भुतभक्तिम् , महाकल्लोलिनीम् , हृदयस्थलवाहिनीम् , नित्यमादधानः; अकुण्ठोत्कण्ठारसवन्धुराम् , निरू- पमादरमेदुराम् , समुद्रवददसम्ममभराम् , प्रतिपत्तिसम्पत्तिनिर्भराम्, त्रिचतुरावर्तवन्दनां विधाय विज्ञपति ।। " , पत्र के एक किनारे का कुछ भाग इट जाने से कितनेक वाक्य चले गये है।
- विज्ञप्ति-त्रिवेणि । -- । स प्रवन्ध की यह प्रस्तावना लिखी जा रही है जि उस का नाम विज्ञप्तित्रियोणि है। ऊपर जिन विज्ञप्ति पत्रों का हाल दिया गया है, यह विज्ञ- प्तित्रिवेणि भी उन्हीं में का एक पत्र है । ऊपरि वर्णित पत्रों की अपेक्षा यह विशेष महत्त्व का है । इस में केवल आलंकारिक-वर्णन ही नहीं है परंतु एक विशेष प्रसंग का सच्चा और संपूर्ण इतिहास भी है । ऐसा पत्र अभी तक पूर्व में कोई नहीं प्रकट हुआ। इस प्रकार के पत्रों के अस्तित्व की भी किसी को खबर नहीं है । अर्थात् यह एक विल्कुल नई ही चीज प्रकट होती है। ऐसी दशा में, इस अपरि. चित वस्तु का सर्वसाधारण को परिचय कराने के लिये विज्ञप्ति पत्रों के लिखने का मुख्य कारण और उन के स्वरूप आदि के विषय में विस्तृत उल्लेख करने की आवश्यकता थी । इसी आवश्यकता का विचार कर इस भूमिका को इतनी लंवानी पड़ी है और जुदा जुदा पत्रों में से इतने बहुसंख्यक और विस्तीर्ण अवतरण देने पड़े हैं । अव इस प्रकृत पत्र की ओर दृष्टि दी जाती है और इस में उल्लिखित विषय तथा लेखकादि का परिचय कराया जाता है। यह पत्र विक्रम संवत् १४८४ के माघ सुदी १० मी के दिन का लिखा हुआ है । इसे, सिन्धदेश के मलिकवाहण नामक स्थान से, श्रीजयसागर उपाध्याय ने खरतरगच्छ के आचार्य श्रीजिनभद्रसूरि- जो उस समय गुजरात के अणहिलपुरपाटण में ठहरे हुए थे- की सेवा में भेजा था। पत्र बड़ी अच्छी आलंकारिक भाषा में सुन्दररूप से लिखा गया है। पढते समय वृत्तान्त के साथ काव्य का भी कुछ कुछ आनन्द आता है । लेखक ने इस में गद्य और पद्य दोनों का उपयोग किया है जिस से और भी इसकी पठनीयता बढ़ गई है। बीच बीच में कोई कोई पद्य तो बहुत ही अच्छे लालित्यवाले हैं। साथ में छत्र और पद्मवन्धादि चित्र-पद्यों को भी स्थान दिया है । संघ - की मुसाफरी का और रास्ते के पहाड वगैरह स्थलों का जो स्या- भाविक वर्णन किया गया है वह बहुत रमणीय मालूम देता है । जो संस्थत फे अभ्यासी हैं ये तो स्वयं मूल पत्र को पढ़ कर, उल्लिखित पृत्तान्त का शान कर सकेंगे परन्तु जो संस्कृत नहीं जानते (और जिनकी संख्या जन 7-समाज में अत्यधिक हैं) उन के शानार्थ पत्र के सारांश देने की जरूरत होने से प्रथम यह दिया जाता है। - विज्ञप्ति-त्रिवेणि का सारांश | ME आचार्य श्रीजिनभद्रसरि की भाशा ले कर, श्रीजयसागरोपा- ध्याय, मेघराजगणि, सत्यरूचिगणि, पं० मतिशीलगणि और हेमकुं. जरमुनि आदि अपने शिप्यों के साथ सिन्ध के मुल्क में घिचरने गये। इधर उधर के गांवों में विचरते ठहरते, संयत् १४८३ का चात- र्मास मम्मणवाहण नाम के नगर में किया । चउमासे याद, संघ्रपति सोमाफ के पुत्र सं. अभयचन्द्र ने मरकोटमहातीर्थ की यात्रा के लिये संघ निकाला । उपाध्याय धीजयसागरजी मी उस संघ के साथ गये और यात्रा कर पीछे मम्मणयाण में आये । इसी बसें में, फरीदपुर के श्रायफ लोक मम्मणवाहण थाये और उपाध्यायजी को अपने गांव में आने की विज्ञप्ति की। उपाध्यायजीने उन की विज्ञप्ति का स्वीकार कर मम्मणवाहण से विहार फिया और द्रोहडोहादि गांवों में होते हुए फरीदपुर पहुंचे। यहां फे संघ ने उपाध्यायजी का यदा सत्कार किया और यडे ठाठ माद से उन का नगर-प्रवेश फराया। साधुओं का मुख्य कर्तव्य जो धर्मोपदेश देने का है, यह यहां निरंतर होने लगा और उपाध्यायजी के उपदेश से डनेतर ऐसे कितने एक बह्मक्षत्रिय और घायण आदि मी जैनमता. नुयायी हुए । ( मूलमंथ-पृ. २२-पं. १०-१३.) इस प्रकार कितने एक दिन यौते याद, एक दिन सयरे व्यायान दे कर उपाध्यायजी उटे थे और गायकजन पुछ गीतगान कर रहे थे, कि इतने में, की से, भावे हाथ में कमंडलु लिये हुए, फटे-पुराणे कपड़े पहने हुए भार फेश बगैर जिम के शूल से भरे हुए हैं ऐसा एक दुल मुसा- ३६ ने उस मुलाफर फर आ कर, उपाध्यायजी के सामने खडा हुआ और कुछ प्रणाम कर उन के आगे बैठ गया । उपाध्यायजीने उस की आकृति ऊपर से जाना कि यह कोई भला आदमी और तीर्थयात्रिक है । इस से उन्हों से पूछा, कि-" भाई " भाई तुम कहां से आये हो और किन किन तीर्थों के तुम ने दर्शन किये हैं ? । जो विविध देशों में फिरने वाले होते हैं वे अनेक अपूर्वापूर्व स्थानों को देखा करते हैं, इस लिये तुमने जो कोई अपूर्व स्थान या वात देखी सुनी हो तो कहो और हम लोकों का दिल खुश करो।" उपाध्यायजी के इन वचनों को सुन कर मुसाफर खुश हुआ और कहने लगा, कि-"सुनि ए, एक अपूर्व तीर्थ का पता बतलाता हूं। उत्तर दिशा में त्रिगर्तनाम का देश है जिस में अनेक अच्छे अच्छे तीर्थस्थल हैं । उन में सुशर्मपुर नाम के नगर में श्रीआदि- नाथ भगवान् का जो तीर्थ है वह सब से अधिक पवित्र और महान् है । वह धाम अनादि है । इस वर्तमान कलि काल में, अव कि सव देशों में म्लेच्छों-मुसल्मानों के अत्याचारों से तीर्थ स्थल नष्ट-भ्रष्ट हो गये हैं तव भी वह तीर्थ अखण्डित है । उस के वर्णन करने की मुज मंदबुद्धि में ताकात नहीं। जिसने उस तीर्थ के दर्शन कर लिये उसे फिर औरों के दर्शन की जरूरत नहीं । मैं तो उस तीर्थ की उपासना कर अपने आत्मा को धन्य मानता हुआ यहां पर आया हूं। वस, यही मैंने अपूर्व देखा है और उसे आप लोकों को संक्षेप मैं कह सुनाया है। मुझे अभी वहुत दूर जाना है, इस लिये मैं चलता हूं।" इतना कह कर वह यात्री रवाना हो गया। यात्री से इस वृत्तान्त को सुन कर वहां पर बैठे हुए उपाध्यायजी और उन के श्रोताजनों का चित्त चमत्कृत हुआ। उस महातीर्थ की यात्रा कर अपने जीवन को कृतार्थ करने की उत्कण्ठा, उन के मन में प्रवल हो ऊठी। उस नगर (फरीदपुर ) में राणा नामक सेठ के सोमचंद्र, पार्श्व- दत्त और हेमा नाम के तीन पुत्र थे जो धनाढ्य हो कर बड़े भावुक थे । उपाध्यायजीने अपनी तीर्थ दर्शनेच्छा इन भ्राताओं को जनाई और यात्रा कराने का उपदेश दिया । उपाध्यायजी के उपदेश को ३७ . इन भाईयों ने अपने सिर पर चढाया और नगरकोट का संघ निका. लने की तैयारी करने लगे। अपने भासपास के क्षेत्रों के महाजनों को निमंत्रण देने के लिये आहान-पत्र भेजे गये और उन का सम्मान करने के लिये यथायोग्य प्रयन्ध करने लगे। इसी बीच में मावारपपुर, कि जहां १०० घर धायकों के थे, के कुछ लोक उपाध्यायजी को अपने गाँव में ले जाने के लिये आए। उनकी इच्छा से उपाध्यायजी थोडे दिन के लिये वहां पर गये । फरीदपुर की तरह वहां भी धर्मोपदेश द्वारा अनेक लोकों को सन्मा. गंगामी घनाये । सा० शिवराज नामक धावक ने अपने पिता हरि. चन्द्र सेठ के साथ घड़ा संघवात्सल्य किया और बड़े भारी ठाट-माट के साथ आदिजिन की प्रतिमा की प्रतिष्ठा उपाध्याय श्रीजयसाग- रजी के हाथ से करवाई। इस प्रसंग पर फरीदपुर के सा० रामा, सा० सोमा, सा० हेमा,सा. देवा और दस्स आदिधावक लोक मी आये और कार्य की समाप्ति याद उपाध्यायजी को पापस अपने गांव में ले गये । वहां पर पहुंचे बाद ज्योतिषी को बुलाया और नगर- फोह तरफ जाने के लिये संघ के प्रस्थान का मुहर्त निकलवाया। उस के बताये हुए शुभ मुहूर्त वाले दिन अच्छे टाठ-माट से, सा० सोमाय संघ ने प्रस्थान-मंगल किया। । संघ को चलते समय यहुत अच्छे और अनुकूल शकुन हुए । फरीदपुर से थोड़ी ही दूरी पर विपाशा (व्यासा) नदी थी जिस के किनारों पर जम्य, कदम्य, नीम्य, सज़र आदि वृक्षों की गहरी घटा जमी हुई थी और जहां पर नदी के कलालों से ऊती हुई ठंडी घायु मन्द मन्द रीति से चली याती थी; ऐसे चांदि के जैसे चाफिले रेती के मैदान में संघ ने अपने प्रयाण का पहला पडाय किया । दूसरे दिन नदी को उतर कर जालन्धर की ओर संघ चला। संघ में सय से आगे सिपाही चलते ये जो मार्ग में रक्षण निमित्त लिये गये थे। सिपाहियों में से किसी के हाथ में तलवार थ. तो किसी के राहधाकोई धनुष्य फर चलता था तो फोर जपरदस्त लट हाथ में ३८ लिये आगे होता था। इस प्रकार सब से आगे ऊछलते, कृदते और गाजते हुए सिपाही चले जाते थे। उन के पीछे बडी तेजी के साथ चलने वाले ऐसे बडे बडे बैल चलते थे जिन पर सव प्रकार का मार्गो. पयोगी सामान भरा हुआ था। उन के बाद संघ के लोक चलते थे जो कितने एक गाडी घोडों यादि वाहनों पर चैटे हुए थे और कई एक देव-गुरु-भक्ति निमित्त पैदल ही चलते थे। कितने ही धर्मी जन तो साधुओं की समान नंगे ही पैर मुसाफरी करते थे। इस प्रकार अवि- च्छिन्न प्रयाण करता हुआ और रास्ते में आने वाले गाँवों को लांघता हुआ संघ निश्चिन्दीपुर के पास के मैदान में, सरोवर के किनारे आ कर ठहरा । संघ के आने की खबर सार गाँव में फैली और मनुष्यों के झूड के झुंड उसे देखने के लिये आने लगे । गाँव का मालिक जो सुरत्राण ( सुल्तान ) कर के था वह भी अपने दिवान के साथ 'एक ऊँचे घोडे पर चढ़ कर आया । जन्म भर में कभी नहीं देखे हुए एसे साधुओं को देख कर राजा बडाविस्मित हुआ। उपाध्यायजीने उसे रोचक धर्मोपदेश सुनाया, जिसे सुनकर नगर के लोकों के साथ वह वडा खुश हुआ और साधुओं की स्तुति कर आदर पूर्वक प्रणाम किया। बाद में संघपति सोमा का सम्मान कर अपने स्थान पर गया। संघ वहां से प्रयाण कर क्रमसे तलपाटक पहुंचा। वहां पर गुरुओं को वन्दन करने के लिये देवपालपुर का श्रावकसमुदाय आया और अपने गांव में आने के लिये संघ को अत्याग्रह करने लगा।उनलोकों को किसी तरह समझा-बुझा कर संघने वहां से आगे प्रयाण किया और विपाशा (व्यासा) नदी के किनारे किनारे होता हुआ क्रम से मध्यदेश में पहुंचा। जगह जगह ठहरता हुआ संघ इस देश को पार कर रहाथा, कि इतने में एक दिन, एक तरफ से पोषरेश यशोरथ के सैन्य का और दूसरी ओर से शकन्दर के सैन्य का, “ भगो, दोडो, यह फौज आई, वह फौज आई;" इस प्रकार का चारों तरफ से कोलाहल सुनाई दिया। इसे सुन कर संघ के हौंस ऊड गये। सव दिङ्. सूढ हो गये । यात्रीलोक दिल में बड़े घबराये और अब क्या किया जाय इस की पिक में निश्चेष्ट से हो रहे । किसी प्रकार होस संभाल कर और परमात्मा का ध्यान धर संघ पीछा लौटा और विपाशा के तट का आश्रय लिया। नावों में बैठ कर जल्दी से उस को पार किया और कुंगुद नाम के घाट में हो कर, मध्य, जांगल, जालन्धर और काश्मीर इन चार देशों की सीमा के मध्य में रहे हुए हरियाणा नाम के स्थान में पहुंचा । इस स्थल को निरुपद्रव जान कर वहां पर पडाव डाला । यहीं पर, कानुकयक्ष के मंदिर के नजदीक, शुचि और धान्य प्रधान स्थान में, चैत्र सुदी एकादशी के रोज सर्वोत्तम समय में, नाना प्रकार के वाद्यों के यजने पर और भाट-चारणों के, विरुदावली बोलने पर, सब संघ इकट्ठा हो कर, साधुश्रेष्ठ सोमा को उस के निषेध करने पर भी, संघाधिपति का पद दिया। मल्लिक- वाहन के सं० मागट के पौत्र और सा० देवा के पुत्र उद्धर को महा- घर पद दिया गया। सा. नीया, सा० रूपा, और सा. भोजा को भी महाधर पद से अलंकृत किया गया। सैल्लहस्त्य का बिरुद बुञ्चा- सगोत्रीय सा० जिनदत्त को समर्पण किया गया। इस प्रकार वहां पर पक्षीदान करने के साथ उन न मनुष्यों ने संघ की, भोजन- घस्त्र-भाभूपणादि विविध वस्तुओं द्वारा भक्ति और पूजा कर याचक लोकों को भी खूब दान दिया। संघ के इस कार्य को देख कर मानों खुश हुमा हुआ और उस के गुणों कागान करने के लिये हीमानों गर्जना करता हुआ दुसरे दिन खूब जोर से मेघ वर्पने लगा। देर बर जितने बड़े बड़े ओले बादल में से गिरने लगे और झाडौं तथा झुपडीओं को उखाड़ कर फेंक देने वाला प्रचण्ड पवन चलने लगा। इस जल- वृष्टि के कारण संघ को यहां पर पाँच दिन तक पडाव रखना पडा । ६ वें दिन सवेरे ही यहां से कूच की । सपादलक्षपर्वतकी तंग घाटियों को लांघता हुआ, सधन झाडियों को पार करता हुआ, नाना प्रकार के पार्वतीय प्रदेशों को आश्चर्य की दृष्टि से देखता हुआ और पहाडी मनुष्यों के आचार-विचारों का अनुभव करता हुआ संघ फिर विपाशा के तट पर पहुंचा। उसे सुखपूर्वक उत्तर कर, अनेक बडे बडे गाँवों के बीच होता हुआ, और त्तत्तद गांवों के लोकों और स्वामियों को मिलता हुमा, क्रम से पातालगंगा के तट ऊपर पहुंचा । उसे भी निरायास पार कर फ्रम से आगे बढत हुए और पहाडों की चोटियों को पैरों नीचे कुचलते हुए संघ ने दूर से, सोने के कलश वाले प्रासादों की पंक्तिवाला नगरकोट्ट, कि जिस का दूसरा नाम सुशर्मपुर है, देखा। उसे देख कर संघजनो ने तीर्थ के प्रथम-दर्शन से उत्पन्न होने वाले आनंदानुसार, दान-धर्मादि सुकृत्यों द्वारा अपनी तीर्थ भक्ति प्रकट की। नगरकोट्ट के नीचे वाण- गंगा नदी बहती है जिसे उतर कर संघ गांव में जाने की तैयारी कर रहा था कि इतने में उस का आगमन सुन कर गांव का जैनसमुदाय, सुन्दर वस्त्रा-भूषण पहन कर, स्वागत करने के लिये सामने आया। अनेक प्रकार के वादित्रों और जयजयारवों के प्रचंड घोषपूर्वक महान् उत्सव के साथ, नगर में प्रवेश किया । सहर के प्रसिद्ध प्रसिद्ध मुहल्लों और बाजारों में घूमता हुआ संघ, साधु क्षीमसिंह के बनाये हुए शांतिनाथ-देव के मंदिर के सिंह-द्वार पर पहुंचा । निस्सही निस्सही नमो जिणाणं' इस वाक्य को तीन वार वोलता हुआ जिनालय में जा कर, खरतरगच्छ के आ- चार्य श्रीजिनेश्वरसरि की प्रतिष्ठित की हुई शांतिजिन की प्रतिमा का दर्शन किया। तीन वार प्रदक्षिणा दे कर, नाना प्रकार के स्तुति- स्तोत्रों द्वारा अत्यंत आनंदपूर्वक प्रभुकी पर्युपासना की । इस प्रकार संवत् १४८४ वर्ष के ज्येष्ठ सुदी पंचमी के दिन, अपनी चिरकाल की दर्शनोत्कण्ठा को पूर्ण कर फरीदपुर का लंघ कृतकृत्य हुआ। शान्तिजिन के दर्शन कर संघ फिर, नरेन्द्र रूपचन्द्र के बनाये हुए मंदिर में गया और उस में विराजित सुवर्णमय श्रीमहावीरजिन विंव को पूर्ववत् वन्दन-नमन कर, देवल के दिखाये हुए मार्ग से युगादि जिन के तीसरे मंदिर में गया। इन मंदिरों में भी उसी तरह परमात्मा की उपासना-स्तवना कर निज जन्म को सफल किया । इस प्रकार नगर कोट्ट शहर के मंदिरों की परम उत्साह पूर्वक यात्रा कर संघ ने उस दिन अपने ठहरने करने की व्यवस्था की और रास्ते का परिश्रम दूर करने के लिये विश्रान्ति ली । दूसरे दिन प्रातःकाल, शहरं के पास, पहाडी पर, कङ्गदक (काङ्गडा) नाम का जो किला है और जिस में अनादियुगीन, अतिप्रभावशाली श्रीआ- दिनाथ भगवान् का प्राचीन और सुन्दर मंदिर है उस की यात्रा करने के लिये बड़े भारी समारोह के साथ संघ ने प्रस्थान किया । संघ- पति मार्ग में याचक गणों को इच्छित दान देता हुआ चला जाता था। किले में जाने के लिये राजमहलों के बीच में हो कर साना पडता था । इस लिये राजा नरेन्द्रचन्द्र-जो उस समय यहां का राज्य करता था-ने अपने नौकरों को, संघ के माने जाने में हरफत न करने की आज्ञा दे दी। साथ में हेरंय नाम के एक आत्मीय नौ. फर को फिले का मार्ग बताने के लिये भेजा। इस प्रतिहार के बताये हुए मार्ग से, शनैः शनैः राज-भवनों के मध्य हो फर और एक के बाद दूसरे को इस प्रकार सात दरवाजों को, जो किले में जाते वक्त घोच में पड़ते थे, पार फर संघ ने किले के अंदर प्रवेश किया। मार्ग में जाते समय, संघ को देखने के लिये, राजकीय और प्रजाकीय मनुष्यों की बड़ी भारी भीड लग गई थी । इन मनुष्यों के, चिरकाल परिचितों की तरह, प्रेम पूर्वक देखते हुए, संघजनों ने परमेश्वर पर- मात्मा श्री आदिनाथ को, अति भक्ति और आहाद पूर्वक प्रणाम किया। मुनियों ने नाना प्रकार से स्तवना कर भाव पूजा की और थावोंने भावपूजा के साथ अगण्य फल-फूलादि द्वारा ट्रष्य पूजा कर अपने भात्मा को निर्मल बनाया । इन आगन्तुक यात्रियों के प्रति चहाँ के वृद्ध मनुष्य इस तीर्थ का बहुत कुछ माहात्म्य वर्णन करने लगे। पुराना हाल सुनाते हुए वे कहने लगे कि-" यह महातीर्थ, श्रीनेमिनाथ तीर्थकर (२२) के समय में सुशर्म नाम के राजा ने स्थापित किया था । यह आदिनाथ भगवान की जो मूर्ति है वह किसी की घड़ी हुई न हो कर स्वयंभू-अर्थात् अनादि है । इस का बड़ा भारी अतिशय चमत्कार-है, जो आज भी प्रत्यक्ष है । देखिए, भगवान् के चरणों की सेवा करने वाली यह जो मंचिकादेयी है (देवी की मूर्ति है), इस के प्रक्षालन का पानी चाहे वह फिर एक हजार घडों जितना हो-भगवान के प्रक्षालन के पानी के साथ, वि. 'ल्कुल पास पास होने पर भी, कभी नहीं मिल जाता । मंदिर के मुख्य गर्मागार में, चाहे फितना ही स्नाप-जल पड़ा हुआ हो और फिर बाहर से दरवाजे ऐसे बंध कर दिये जायं कि जिस से कोटि का भी अन्दर न जा सके, तो भी क्षणमर में वह सब पानी सूख जाय गा। ऐसे ऐसे बहुत से प्रभाव आज भी इस महातीर्थ के प्र- ६ ४२ 20 ने अपना त्यक्ष हो रहे हैं। इस प्रकार वहां के वृद्ध मनुष्य तीर्थ की महिमा का वर्णन कर रहे थे और संघ के मनुष्य प्रेम-पूर्वक सुन रहे थे, कि इतने में, राजा नरेन्द्र चन्द्र ने अपने प्रधान-मनुष्यों को भेज कर संघ सहित उपाध्याय जयसागरजी को वहुमान पूर्वक अपने पास बुल- वाये । यह राजा बडा न्यायी, सुशील, सद्गुणी और धर्मप्रेमी था। यह विशुद्ध क्षत्रिय था। इस का कुल सोमवंशीय कहलाता था। इस ने सपादलक्ष पर्वत के पहाडी राजाओं का पराजय कर उन्हें गतगर्व किया था। श्वेताम्बर-साधुओं पर इस का बड़ा प्रेम और आदर था। अपने महल में पूर्वजों की स्थापित की हुई आदिनाथ भगवान् की प्रतिमा का यह बहुत उपासक था । राजा के बुलाने पर उपाध्यायी अपने संघ के साथ उस के सभा-स्थान में पहुंचे । राजा मस्तक नीचा नमा कर उपाध्यायजी को प्रणाम किया जिस के बदले में उन्हों ने, निर्ग्रन्थों के खजाना का सर्वस्वभूत ऐसा धर्म लाभ रूप आशीर्वाद दिया । सव के यथायोग्य-स्थान पर बैठ जाने बाद राजा ने कुशल प्रश्नादि पूछ । फिर स्वयं वह उपाध्यायजी के साथ विद्व- गोष्टी करने लगा । साथ में और और बाह्मण-क्षत्रियादि भी विविध प्रकार के वार्तालाप करने लगे। एक काश्मीरी विद्वान् कुछ देर तक शास्त्रार्थ भी करता रहा । उपाध्यायजी की विद्वत्ता और वाक्चातुरी देख कर राजा आदि सभी सभ्य बहुत खुश हुए और जैन विद्वानों की भूरि भूरि प्रशंसा करने लगे। इस के वाद राजाने अपना निज का देवागार दिखलाया जिस में स्फटिक आदि विविध पदार्थों की बनी हुई तीर्थकर आदि अनेक देवों की मूर्तिये विराजित थीं । इस प्रकार दिवस का बहुत कुछ भाग वहीं पर व्यतीत हो गया। सायंकालीन क्रियाकाण्ड के करने का अवसर प्राप्त हुआ देख उपा. ध्यायजी ने, राजा से, अपने स्थान पर जाने की इच्छा प्रकट की। राजाने, आदर पूर्वक, फिर भी मिलने का निवेदन कर संघकीय मंडली को जाने का आदेश दिया। इस प्रकार जैनशासन का बहु- मान करा कर सायंकाल के समय में उपाध्यायजी स्वस्थान पर पहुंचे । सप्तमी के रोज संघ की ओर से नगर और किले में के चारों मन्दिरों में महा-पूजा रचाई गई । मन्दिरों को, गर्भागार से ले ४३ कर ध्वजादण्ड तक, बहु-मूल्य ध्वजापताफाओं से खूब सजाये गये। नाना प्रकार के फल, फूल, पक्काम्न और नैवेद्य आदि पदार्थों के ढेर के ढेर भगवान् के सम्मुख भेंट किये गये। जगह जगह वाजे यजने लगे, नृत्य होने लगे और स्त्रिये मंगल-गीत गाने लगी । संघपति ने गरीय से ले कर तवंगर तक-सभी को प्रीति-भोजन करवाया। इस तरह यह दिन बडे उत्सव और भानंद में बिताया गया । अष्टमी के दिन, शांतिनाथ के मंदिर में खूब ठाठ-मार से नन्दी की रचना की गई और मेघराजगाण, सत्यधिगणि, मतिशीलगणि, हेमकुंजरमुनि और कुलकेशारिमुनि को उपाध्यायजी ने पंचमङ्गलमहाश्रुतस्कन्ध की अनुशा दी। एवं दशदिन तक नगरकोह में संघ ने स्थिति की। जीदो- वोरो आदि वहाँ के थावकों ने उपाध्यायजी को चातुर्मास रहने के लिये बहुत कुछ आग्रह किया। ११ वें दिन सकलसंघ इकट्ठा हो कर फिर सभी मंदिरों में गया और गद्दस्वर से, परमात्मा की प्रार्थना करता हुआ प्रास्थानिक चैत्यवन्दन कर, अपने गाँव की ओर रवाना हुआ। अनेक पहाड़ों, नदियों और जंगलों को पीछे छोड़ता हुआ गोपाचलपुर-तीर्थ को पहुंचा। यहां पर सं. घिरिराज के बनाये हुए विशाल और उच्चमंदिर में विगजमान शांतिनाथ भगवान के दर्शन- चंदन किये। ५ दिन तक वहां पर मुकाम किया। वहां से चल कर संघ विपाशा के तट पर बसे हुए नन्दनवनपुर गया, कि जहां पर श्रीमहावीर भगवान् का सुन्दर मन्दिर था । नन्दनयनपुर से कोरिल ग्राम पहुंचा और वहां पर श्रीपार्श्वनाथ की यात्रा की। यहां से फिर कूच कर, पर्वतों के घाटों और शिखरों को उलंघ कर कोठीपुर नगर में आया। यहां पर श्रीमहावीरदेव के दर्शन किये । इस गांव में धायकों की संख्या बहुत थी इस लिये उनके विशेपाग्रह में संघ को यहां पर दश दिन तक ठहरना पडा। सं सोमा ने यहाँ पर सारे संघ को प्रीति-भोजन दिया और नाना प्रकार के वस्त्रा भूपणादि द्वारा सार्मिक बंधुनों का सत्कार किया । ११ घे दिन यहां से प्रयाण किया और चलते चलते कुछ दिन बाद, सप्तरुद्र नाम का यडे भार्ग प्रवाह वाला जो जलाशय है उस के निकट प- हुंचा। यहां से सारा ही संघ नाथाओं में सवार हो गया और ४० ४४ कोश जितना लंबा जलमार्ग घेडाओं द्वारा पार कर, सुखपूर्वक, देव- पालपुर पत्तन को पहुंचा। वहां के मृदुपक्षीय सं० घटसिंह आदि और खरतरगच्छीय सा० सारंग आदि श्रीमान् श्रावकों ने संघ का बडे भारी समारोह के साथ नगर प्रवेश कराया। यहां पर भी कोठी- पुर की तरह सार्मिक वात्सल्य आदि संघ-सत्कार संघपति महा. धर आदि ने अच्छे प्रेम और उत्साहपूर्वक किये। यहां के श्रावक- समुदाय ने उपाध्यायजी को अपने शहर में चातुर्मास रहने के लिये अति आग्रह किया । उपाध्यायजी ने क्षेत्र की योग्यता मुताविक, मेघराजगणि, सत्यरूचिगणि, कुलकेसरिमुनि और रत्नचंन्द्र क्षुल्लक; इन चार शिष्यों को यहां पर चातुर्मास करने के लिये रख दिये । विविध प्रकार के महोत्सव और पूजादि कार्यों में आनंदपूर्वक १० दिन निर्गमन कर संघ यहां से अपने गांव फरीदपुर की तरफ रवाना हुआ। जाते वक्त रास्ते में जो जो दृश्य देखे गये थे वे ही फिर अव मसे दृष्टिगोचर होने लगे । एवं अविच्छिन्न प्रयाणों द्वारा विपाशा नदी को पीछे छोडता हुआ संघ उसी मैदान में जा पहुंचा, जहां चलते समय, पहला मुकाम किया था । इधर संघ के आने की खबर फरीदपुर में पहुंच गई थी इस लिये गांव के सब लोक स्वागत करने के लिये सामने आये । अच्छे ठाठ से संघ का गांव में प्रवेशोत्सव कराया गया । संघपति सोमा के भाई सा० पासदत्त और हेमा ने नालियर, सुपारी और ताम्बूल आदि दे कर सब नगरनिवासियों और यात्रियों का सत्कार किया । यात्रियों के मुंह से, तीर्थ का मा- हात्म्य और रास्ते के विविध बनावों तथा दृश्यों का वर्णन सुन सुन कर गांव के लोक भी आश्चर्य और आनन्द में निमग्न होने लगे। इस प्रकार निर्विघ्न पूर्वक यात्रा की समाप्ति हुई और सर्व यात्री पूर्ववत् अपने अपने जीवन-व्यवहार में विचर ने लगे। कुछ दिन बाद उपाध्यायजी को आह्वान करने के लिये, मम्म- णवाहण और मलिकवाहण नामक गांवों के श्रावकसमुदाय एक ही साथ फरीदपुर आये और अपने अपने गांव में ले जाने के लिये बहुत आग्रह करने लगे। फरीदपुर के लोकोंने भी अपने नगर में ४५ रहने के लिये जुदा आग्रह करना शुरू किया। इस प्रकार तीनों तरफ से खींचा-तान होती देश उपाध्यायजी ने स्थानिक श्रावकों को तो कुछ समझा-बुझा कर शांत कर दिये परंतु आगन्तुक संघों का किसी तरह समाधान न हुआ । उपाध्यायजी ने दोनों के दिल राजी रखने के लिये एक युक्ति निकाली और उन से कहा कि यहां से रवाना होते समय जिस तरफ अच्छे शकुन होंगे उसी गांव में हम आयेंगे । इस यात का दोनों ने स्वीकार कर भाग्य के भरोसे पर आधार रक्खा । उपाध्यायजी उसी दिन सायंकाल को विहार कर प्रथम मम्मणवाहण की ओर चलने लगे परंतु गांव से बाहर निकलते ही अपशकुन हुए इस लिये उस मार्ग को छोड़ कर मलि. कवाहण की तरफ प्रयाण किया। जो श्रावक आमंत्रण करने के लिये आये हुए थे उन्हीं के साथ वहां पर पहुंचे । द० मालाफ ने उपाध्यायजी का प्रवेशोत्सव किया और वहीं पर सं. १४८४ का चातुर्मास निर्गमन किया। चातुर्मास-पर्युपणा पर्व में अनेक श्रावक- श्राविकाओं ने मासक्षपण आदि बड़े बड़े तप किये । चउमासे बाद, पोपमहिने में, नन्दि महोत्सव किया गया और तीन साधु, चार श्रावक तथा २४ श्राविकामों ने तपश्चरण आदि नाना प्रकार के अभिग्रह धारण किये । नगरकोट्ट से आते वक्त, देवपालपुर में मेघ- राजगणि आदि जिन ४ साधुओं को चातुर्मास रहने के लिये रख आये थे वे भी इस समय उपाध्यायजी के समीप आ पहुंचे। * * बस यही इस विक्षप्तित्रिवेणि का सार है। उपाध्याय श्रीजय- सागरजी की इस मुसाफरी का और तीर्थयात्रा का कुछ हाल, किसी मुख से, आचार्य श्रीजिनभद्रजी ने सुना तो उन्हों ने इस का पूरा हाल जानना चाहा और तदनुसार पत्र द्वारा उपाध्यायजी को अपना ब्रमणवृत्तान्त लिख भेजने की सूचना की। इसी सूचना के प्रत्युत्तर में यह विज्ञप्तित्रिवेणी लिखी गई और नगरको बगैरह तीर्थों की यात्रा के वृत्तान्त को आलंकारिक भाषा में निबद्ध कर थाचार्य को भेंट किया गया। * ४६ ? ऊपर दिये गये विज्ञप्तित्रिवेणि के सारांश से पाठक जान गये होंगे की यह पत्र ऐतिहासिक दृष्टि से कितने महत्त्व का है ? । इस में लिखा गया वृत्तान्त मनोरंजन हो कर जैनसमाज की तत्कालीन स्थितिपर कैसा अच्छा प्रकाश डालता है ? 1 इस के अवलोकन से हमें यह बात प्रत्यक्ष हो रही है कि उस समय, भारत के उन प्रदेशों में भी जैन धर्म का कैसा अच्छा प्रचार और सत्कार था कि जहां आज जैन शब्द से भी लोक विल्कुल परिचित नहीं हैं, अथव बहुत ही कम हैं । इस पत्र से साफ प्रकट हो रहा है कि पुराण समय में गुज- रात और राजपूताना की तरह सिंध और पंजाब में भी श्वेताम्बर जैन संप्रदाय का बहुत कुछ प्रचार था। उस समय इन प्रदेशों में हजारों जैन वसते थे और सेंकडों जिनालय मौजूद थे, कि जिन में का आज एक भी विद्यमान नहीं। जिन मरुकोह, गोपाचल, नन्दनवन- पुर और कोटिल्लग्राम आदि तीर्थस्थलों का इस में उल्लेख है उन का आज कोई नाम तक भी नहीं जानता। जहां पर पांच पांच दश दश साधु चातुर्मास रहा करते थे वहां पर आज दो घंटे ठहरने के लिये भी यथेष्ट स्थान नहीं। जिस नगरकोट्ट-महातीर्थ की यात्रा करने के लिये इतनी दूर दूर से संघ जाया करते थे वह नगरकोट कहां पर आया है इस का भी किसी को पता नहीं । अस्तु । Sh + अधिक परिचय । - स प्रवन्ध में मुख्य कर तीन व्यक्तियों का विशेष उल्लेख है। आचार्य जिनभद्रसूरि, उपाध्याय जयसागर और नगरकोह-महातीर्थ इन्हीं तीन नामों की इस पत्र में म- ख्यता है। देखें तो अब इन के विषय में और भी कुछ विशेष वृत्तान्त या अधिक परिचय कहीं मिलता है नहीं? - जिनभद्रसूरि । - अन्यान्य ऐतिहासिक साधनों के देखने से मालूम होता है कि ४७ ये आचार्य बहुत अच्छे विद्वान और प्रतिष्टित हो गये हैं । ये वर- तरगच्छ की आचार्य परंपरा के ५६ वें पट्ट-घर-मुख्य शाखा के प्र. धान-आचार्य थे । इन के विषय में खरतरगच्छ की पट्टावलि-जो १९ वीं शताब्दी के अन्त में, बीकानेर (राजपूताना ) के यति क्षमा- कल्याणकजी ने बनाई है-में इस प्रकार लिखा है तत्सद्दे श्रीजिनभद्रसूरयः । तत्रवन्धो यथा-प्रथमं सं० १४६१ वर्षे सागरचन्द्राचार्येण श्रीजिनराजसूरिपट्टे श्रीजिनवर्द्धनसूरिः स्थापित आसीत् । स चैकदा जेसलमेरुदुर्गे श्रीचिन्तामणिपार्श्वदेवगृहे मूलनाय- कपाधैं स्थितां क्षेत्रपालमूर्ति पिलोक्य स्वामिसेवकयोस्तुल्यस्थानेऽवस्था- नमयुक्तमिति विचिन्त्य च क्षेत्रपालमूर्ति तत उत्पाठ्य द्वारे स्थापितवान्। ततः कुपितः क्षेत्रपालो यत्र तत्र गुरूणां चतुर्थवतभंगं दर्शयामास । अनया रीत्या एकदा [ सूरयः ] चित्रकूटे समागतास्तत्रापि देवेन तथैव कृतम् । ततः सर्वेऽपि श्रावकाश्चतुर्यप्रतभङ्ग ज्ञात्वाऽयं पूज्यः पदयोग्यो नेति कथयामासुः । अथ वर्द्धमान(बर्द्धन)सूरयो व्यन्तरप्रयोगतो अथिली- भूताः सन्तः पिप्पलकमामे गत्वा स्थिताः, कियन्तः शिष्याः पार्थे स्थि- तवन्तः । अथ पश्चात् सागरचन्द्राचार्यप्रमुखसमस्तसाधुवर्गेण एकत्री- भूय गच्छस्थितिरक्षणार्थ नवीन आचार्यः स्थाप्य इति विचारं कृत्वा, एक नवीन क्षेत्रपालमाराध्य तं च सर्वदेशेषु सम्प्रेष्य, " यद् यूयं करियध्व तदस्माकं प्रमाणम् इति समस्तखरतरगच्छीयसंघस्य हस्ताक्षराणि आनाय्य सर्वसाधुमण्डली संमील्प, भाणसोलग्रामे आ- जग्मे । तत्र श्रीजिनराजसूरिभिरेकः स्वशिप्यो वाचकशीलचन्द्रगणिपाचे अध्यापनाय रक्षितोऽभूत् । स चाधीतसकलसिद्धान्तार्थो भणशालिक- गोत्रीयो भारो इति मूलनामा सं० १४६१ [वर्षे ] गृहीतदीक्षः क्रमेण पञ्चविंशतिवर्षाणो जातः । तं च योग्यं ज्ञात्वा श्रीसागरचन्द्रा- चार्यः सप्त भकाराक्षराणि समीत्य सं० १४७५ [व] माघमुदिपूर्णि- " ..
४८ - ] मास्यां भणसालिक-नाल्हासाहकारितसपादलक्षरूपकव्ययरूपनन्दिमहो- त्सवेन सूरिपदे स्थापितवान् । सप्तभकारस्तु अमी-भाणसोलनगरम् १, भणशालिकगोत्रम् २, भादौनाम ३, भरणीनक्षत्रम् ४, भद्राकरणम् ५, भट्टारकपदम् ६, जिनभद्रसूरि-नाम ७ । अथैवंविधा अर्बुदाचलगिर- नारजेसलमेरुप्रमुखस्थानेषु बिम्बप्रासादप्रतिष्ठाकारकाः। श्रीभावप्रभाचार्य- कीर्तिरत्नाचार्यस्थापकाः । स्थाने स्थाने पुस्तकमाण्डागारस्थापकाः श्री- जिनभद्रसूरयः सं० १५१४ मार्गशीर्षवदिनवम्यां कुम्भलमेरुनगरे स्वर्ग प्राप्ताः । तद्वारके सं० १४७४ [ वर्षे ] श्रीजिनवर्द्धमानसूरितः पिप्पल- खरतरशाखा निर्गता।" अर्थात्-जिनराजसूरि के पट्ट पर जिनभद्रसरि बैटे । उन का वृत्तांत्त इस प्रकार है । सं. १४६१ के वर्ष में जिनराजसरि के पट्ट पर १ जिनराजसूरि को सं. १४३२ ( एक दूसरी पुराणी पट्टावलि में ३३ की साल लिखी है ) में, फाल्गुन वदि ६ के दिन, अणहिलपुर में, लोकहिताचार्य-जिन को जिनोदयसूरि ने सूरिपद दिया था-ने आचार्य पट्टी दी थी। इस पद का महो. त्सव सा. धरणाने किया था । इन्हों ने सुवर्णप्रभ, भुवनरत्न और सागरचंद्र, इन तीन विद्वानों को आचार्य पद दिया था। सं. १४४४ में, इन्हों ने चित्तोड़-गढ पर आदिनाथ पिम्ब की प्रतिष्ठा की थी। ( देवकुल पाटक-पृ. १५ )। इन का स्वर्ग- वास सं. १४६१ में, देलवाडा ( उदयपुर के पास ) में हुआ था । इन के स्मरणार्थ वहां के सा. नान्हाक श्रावक ने इन की संगमर्मर-पत्थर की एक मूर्ति वनाई थी जो आज भी विद्यमान है । इस मूर्तिपर निम्न लिखित लेख खुदा हुआ है । संवत् १४६९ वर्षे माघशुदि ६ दिने ऊकेशवंशे सा० सोषा संताने सा० सुहडापुत्रेण सा० नान्हाकेन पुत्र वीरमादि परिवार युतेन श्रीजिनराजसूरिमूर्तिः कारिता प्रतिष्ठिता श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनवर्द्धन- सूरिभिः ।, (देवकुलपाटक-पृ०१५।) " सागरचंद्राचार्य ने जिनवर्द्धनसूरि की स्थापना की। ये एक . समय जेसलमेर (राजपूताना ) गये तो वहां के चिन्तामणि-पार्श्वनाथ के मंदिर में मूलनायकतीर्थकर की प्रतिमा की यरायरी में बैठी हुई क्षेत्र पाल-देव की मूर्ति देखी। उसे देख कर इन के मन में विचार हुआ कि क्षेत्रपाल, जो तीर्थकरों का सेवक है, उस की प्रतिमा को पर- मात्मा की प्रतिमा के वरायरी में बिठाना अयुक्त है; इस लिये इन्हों ने उस मूर्ति को वहां से उठा कर दरवाजे में रख दी। यह देख कर क्षेत्रपाल कुपित हुआ और जहां तहां इन आचार्य के ब्रह्मचर्य का भंग दिखलाने लगा-स्त्रीका रूप धारण कर रात्रि के समय में इनके मकान में आने जाने लगा। इसी तरह कितनेक दिन बीत गये। ये फिरते फिरते चित्रकोट (चिचोड) गये वहां भी इस क्षेत्रपाल ने वैसा ही किया जिसे देख कर थावकों की श्रद्धा इन पर से ऊठ गई । थोडे समय याद इस व्यंतर के प्रयोग से ये भ्रमचित्त (पागल) यन गये।और कितने एक अपने शिष्यों के साथ पिप्पलगाँव में जा कर स्थिर वास हो कर रहने लगे। यह स्थिति देख कर, सागरचंद्राचार्य मादि स. मस्त साधुवर्ग एकत्र हुआ और गच्छ की स्थिति को व्यवस्थित रखने के लिये किसी नये आचार्य की स्थापना करने का विचार किया। १ सागरचन्द्राचार्य ने, जेसलमेर के चिन्तामणि-पार्श्वनाथ के मंदिर में जिनराजसूरि के आदेश से, संवत् १४५९ में जिनविम्य की स्थापना की थी। " नवेपुवान्दुिमिते (१४५९)ऽथ वर्षे निदेशतः श्रीजिनराजसूरेः । अस्थापयन् गर्भगृहेऽत्र विम्यं मुनीश्वराः सागरचन्द्रसाराः ॥२१॥" जैसलमेर का तत्कालीन राजा लक्ष्मणदेव राउल सागरचन्द्राचार्य का बहुत कुछ प्रशंसक और भक्त था; ऐसा निम्नलिखित पद्य से जाना जाता है । ॥ गाम्भीर्यवत्त्वात्परमोदकत्वाद्दपार यः सागरचन्द्रलक्ष्मीम् । युक्तं स भेजे तदिदं कृतज्ञः सूरीश्वरान् सागरचन्द्रपादान् ॥१४॥" (S. R. Bhandarkar's Second Report, 1904-5 and 1905-6, Page 94.) .. ७ जी परतरगच्छीय ज्ञान मन्दिर, पायपुर एक दूसरे क्षेत्रपाल का आराधन कर संब जगह के खरतर संघों की इस विषय में अनुमति मंगाई और फिर सव साधु इकट्ठे हो कर भणसोल नामक गाँव में आये। वहां पर श्रीजिनराजसूरि ने अपने एक शिष्य को, वाचक शीलचंद्र के पास अध्ययन करने के लिये रक्खा हुआ था जो सकल-सिद्धान्तों का अच्छा वेत्ता हो गया था। यह शिष्य *भणशाली गोत्रीय था । इस का मूल नाम भादो था । इस ने सं. १४६१ में दीक्षा ग्रहण की थी। इस समय इस की कुल उम्र २५ वर्ष की थी । आगन्तु साधुओं ने इसे आचार्यपद के योग्य समझ कर, सागरचंद्राचार्य ने सात भकारों का मिलान कर, सं. १४७५ में आचार्यपद दिया। सात भकार इस प्रकार है १ भाणसोल. नगर, २ भणसालि गोत्र, ३ भादो मूल नाम, ४ भरणी नक्षत्र, ५ भ- द्राकरण, ६ भट्टारकपद और ७ जिनभद्र सूरि (नया )नाम । आचार्य पद का महोत्सव भणसाली सा० नाल्हा ने सवा लाख रुपये खर्च कर किया था । इन्हों ने अपने आचार्यत्व काल में आबू, गिरनार, जेसलमेर आदि अनेक स्थलों में, अपने उपदेश ले, जिनमंदिर, जिन प्रतिमा और प्रासाद-प्रतिष्ठा आदि अनेक धर्मकृत्य करवाये थे। भावप्रभ और कीर्तिरत्न नाम के विद्वानों को आचार्य पद्वी प्रदान की थी । अनेक जगह पुस्तक-भाण्डार नियत किये थे । इस प्रकार वहुंत कुछ शासनोन्नति कर सं. १५१४ा के मार्गशिर्ष वदि ९ मी के * पुराणी पट्टावलि में, छाजहड गोत्र लिखा है और पिताका नाम सा. धा. णिक तथा माता का नाम षेतलद लिखा है। इस में इन के जन्म की तारिख सं. १४५९ चैत्र वदि ६ और आद्रा नक्षत्र दी हुई है । यथा- "सं० १४५९ चैत्र वदि ६ आद्रायां छाजहडान्वय सा० धाणिग भार्या घेतलदे कुक्षिभुवां-" + वावू पूर्णचंद्रजी नाहार एम्, ए; " जैनलेखसंग्रह " नाम की एक पुस्तक छपवा रहे हैं । इस में १२९ नंवर वाले लेख में-जो धातुमय जिनप्रतिमा ऊपर से लिया गया है-लिखा है कि- दिन कुंभलमेर (ताये उदयपुर) में स्वर्गवास प्राप्त किया । इन के समय में, स. १४७४ में, जिनवर्द्धनसूरि से पिप्पल-खरतर नाम की खरतरगच्छ की ५ ची शाखा निकली। " जिनवईनसूरि के विषय में जो उल्लेख इस में किया गया है वह कहां तक सत्य है उस का निर्णय मैं नहीं कर सकता; तथापि इतना तो अवश्य सत्य है कि, प्रथम जिनराजसूरि के पट्ट पर जिन. वर्द्धन ही स्थापित किये गये थे परन्तु पीछे से किसी मतभेद के कारण या अन्य किसी निमित्त सागरचन्द्राचार्य और कितने एक खरतरगच्छ के अग्रगण्य मनुष्यों ने जिनभद्र को अपना आचार्य बनाया था। जिनवर्द्धनत्रि के भ्रमितचित्त होने का तथा क्षेत्रपाल के उठाने और उस के उपद्रव करने का जो उल्लेख किया गया है उस में तथ्य हों ऐसा प्रतीत नहीं होता। केवल मतभेद या पक्षवि. रोध के कारण यह वृत्तान्त्र गढ़ लिया गया है । मेरे पास सरतर. गच्छ की एक और पुराणी पट्टावलि है, जो जिनमाणिक्यसूरि के - सं० १५१५ वर्षे आषाढ वदि २ श्री ऊकेशवंशे वरडा.गोने सा० हरिपाल सुत भा० आसा सापू तत्पुत्र मं० मंडलिकसुश्रावकेण भार्या सं. रोहिणि पुत्र सं० साजणप्रमुख परिवारसहितेन निजश्रेयसे विमलना- थवियं कारितं प्रतिष्ठितं च श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनराजसूरिपदे श्रीजिन- भद्रसूरिभिः। यदि यह लेख में होगलत न हो-तो पावलि में लिखी हुई जिनमद. सूरि को स्वर्गतिथि भ्रान्त ठहरती है। परंतु इस पावलि के सिवा एक और जूनी पहावलि में भी यही तिथि दी हुई है-और प्रामाणिक भी विशेष यही प्रतीत होती है। क्यों कि ऐसा न हों तो फिर जिनचंद्रसूरि, जो निमसूर के उत्तराधिकारी थे, की आचार्यपदी की तिधि भी प्रान्त ठहरती है । संभव है कि अकलेरा के पदने में गायद हो गई हों और १० का जगह १५ पदा गया हों, पयों कि जननागरी लिपि में शुन्य भार पाँच के अंक में यहुत थोडा- नहीं के सा-फरक होता है।
- समय में (सं. १५८३-१६१२ ) लिखी गई है, उस में इस बात का कुछ भी उल्लेख नहीं है। केवल इतना ही लिखा है कि- " सं. १४६१ वर्षे आषाढवदि १० श्रीदेवकुलपाटके सा. नान्हाकारितनन्द्यां सागरचन्द्राचार्यैः स्थापितानां प्राच्यादिपु देशेषु कृत- विहाराणां सङ्घोन्नति-गणवृद्धिकारिणां चतुर्थवतविराधनशंकया तैरेव प्रथक्कृतानां श्रीजिनवर्द्धनसूरीणां शाखा पिप्पलगणो जातः । इस अवतरण में सत्य की मात्रा, पूर्व के करते अधिक प्रतीत होती है । क्यों कि इस में, आक्षेप के रूप में कोई बात नहीं लिखी गई। प्रत्युत जिनवर्द्धनसूरि के पूर्वादि देशों में विचरना और संघ की तथा गच्छ की वृद्धि करना आदि वाक्यों से, गुणों का उल्लेख किया है और फिर एक दोष का-वह भी शंका ही के रूप में-जिक्र किया है। इन दोनों लेखों से यह तो सावित होता है कि वास्तव में जिन- वर्द्धनसूरि कोई सदोष न थे परन्तु सागरचंद्राचार्य-जो उस समय खरतर गच्छ में बहुत करके सब से वृद्ध और प्रतिष्ठित साधु थे-को चाहे तो, उन के आचरण में शंका पडी हों, या चाहे किसी बात पर परस्पर मनोमालिन्य हो गया हो, जिस से उन्हों ने गच्छ में, अपना जोर चला कर जिनवर्द्धनसूरि को पदच्युत करने के इरादे से नये आचार्य की स्थापना की । यद्यपि संघ के विशेष भागने, जिन- भद्रसूरि ही को अपना गच्छपति माना था तथापि जिनवर्द्धन सूरि का पक्ष भी प्रबल अवश्य था । यह बात, उन के पीछे जो जि. नचंद्रसूरि आदि जुदा आचार्य हुए और उन्हों ने अनेक स्थलों में प्रतिष्ठादि कार्य किये तथा पिप्पलखरतर के नाम से अद्यावधि जो उन की सन्तति विद्यमान रही; इसी से सत्य प्रतीत होगी। अस्तु, प्रकृतविषय में जिनवर्द्धनसूरि की प्रधानता न हो कर जिनभद्रसूरि की है; इस लिये उन्हीं के जीवन पर दृष्टि डालनी उ. चित होगी। इस में तो कोई संदेह नहीं कि जिनवर्द्धनसूरि की अ- पेक्षा जिनभद्रसूरि का भाग्य अधिक तेजस्वी था । गच्छ के बहुत .
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से प्रतिष्ठित साधु और श्रावक इन्हीं की आज्ञा का आदर करते थे
इन्हों ने अपने जीवन-काल में, उपदेश द्वारा अनेक धर्मकार्य कर.
चाये। कई राजा महाराजाओं को अपने भक्त बनाये । विविध देशों
में फिर कर जैनधर्म की समुन्नति करने का यथेष्ट प्रयत्न किया।
जैसलमेर में संभवनाथ के मंदिर में, संवत् १४९७ का एक घडा
शिलालेख है जिस में, इन के उपदेश से उक्त मंदिर के यनने का
तथा प्रतिष्ठादि होने का वृत्तान्त है। इस लेख में, इन के गुणों
का तथा इन के करवाये हुए धर्मकार्यों का संक्षिप्त उल्लेख करने वाला
‘गुरुवर्णनाष्टक ' है । इस अटक के अवलोकन से, इन के जीवन
का अच्छा परिचय मिलता है । देखिए,
एक
" ये सिद्धान्तविचारसारचतुरा यानाश्रयन् पण्डिताः
सत्यं शीलगणेन यैरनुकृतः श्रीस्थूलभद्रो मुनिः।
येभ्यः शं वितनोति शासनसुची श्रीसंघदीप्तिर्यतो
येषां सार्वजनीनमाप्तवचनं येप्दद्भुतं सौभगम् ॥ १ ॥
श्रीउज्जयन्ताचलचित्रकूटमाण्डव्य पूर्जा [ ] रमुत्यकेषु ।
स्थानेषु येषामुपदेशवाक्यान्निर्मापिताः श्राद्धवरैपिहाराः ॥ २ ॥
अणहिल्लपाटकपुरप्रमुख स्थानेषु यैरकार्यन्त |
श्रीज्ञानरत्नकोशा विधिपक्षश्राद्धसद्देन ॥ ३ ॥
मण्डपदुर्गमहादनपुरतलपाटकादिनगरेषु ।
यैर्जिनवरबिम्बानां विधिप्रतिष्ठाः क्रियन्ते स्म ॥ ४ ॥
थेनिजवृद्ध्यानेकान्तजयपताकादिका महामन्थाः ।
पाट्यन्ते च विशेषावश्यकमुख्या अपि मुनीनाम् ॥ ५ ॥
फर्मप्रकृतिप्रमुरुग्रन्थार्थविचारसारकथनेन ।
परपक्षमुनीनामपि थैश्चितचमत्कृतिः क्रियते ॥ ६ ॥
छत्रधरवैरिसिंहव्यम्बकफदासक्षितीन्द्रमहीपालैः (1) ।
यैपां चरणद्वन्द्वं प्रणम्यते भक्तिपूरेण ॥ ७ ॥
शमदमसंयमनिधयः सिद्धान्तसमुद्रपारदृश्वानः । श्रीजिनभद्रयतीन्द्रा विजयन्ते ते गणाधीशः ॥ ८ ॥ के (S. R. Bhandarkar's Second Report, 1904-5 and 1905-6; Page 96-97.) तात्पर्यार्थ यह है कि ये बडे प्रभावक, प्रतिष्ठावान् और प्रति. भाशाली आचार्य थे । सिद्धान्तों के विचारों को जानने वाले बड़े बड़े पण्डित इन के आश्रित (सेवा) रहते थे। इन के उत्कृष्ट ब्रह्मचर्य और सत्यव्रतको देख कर लोक इन्हें स्थूलभद्र की उपमा देते थे। इन वचन को सब कोई आप्तवचन की तरह, स्वीकारते थे। इन्हों ने अपने सौभाग्य से शासन को अच्छी तरह दीपाया-शोभाया-था। गिरनार, चित्रकूट (चितोड़-गढ ) और माण्डव्यपुर (मंडोवर) आदि अनेक स्थलों में इन के उपदेश से श्रावकोंने बड़े बड़े जिनभवन बनाये थे। अणहिल्लपुर-पाटण आदि स्थानों में विशाल पुस्तक- भाण्डार स्थापन करवा ये थे। मण्डपदुर्ग, प्रल्हादनपुर (पालन- पुर) तलपाटक आदि नगरों में अनेक जिनबिम्बों की विधि-पूर्वक प्रतिष्ठायें की थीं। इन्हों ने अपनी बुद्धि से, अनेकान्तजयपताका ( हरिभद्रसरि रचित ) जैसे प्रखर तर्कगन्थ और विशेषावश्यक- भाग्य (जिनभद्रगणिक्षमाश्रमण प्रणीत ) जैसे महान् सिद्धान्तग्रन्थ अनेक मुनियों को पढाये थे। ये कर्मप्रकृति और कर्मग्रन्थ जैसे गहन ग्रन्थों के रहस्यों का विवेचन ऐसा सुन्दर और सरल करते थे कि जिसे सुन कर भिन्नगच्छ के साधु भी चमत्कृत होते थे और इन के ज्ञान की प्रशंसा किया करते थे । राउल श्रीवैरिसिंह' और व्यम्बक- दास जैसे नृपति इन के चरणों में भक्तिपूर्वक प्रणाम किया करते थे । । १ वैरिसिंह जेसलमेर के राजा थे। ये राउल श्रीलक्ष्मणदेव के पीछे, उन के उत्तराधिकारी बने थे। इन्हों ने सं. १४९४ में, जेसलमेर में, लक्ष्मीकान्त प्रीत्यर्थ पंचायतन-प्रासाद बनवाया था जिसे आज-कल लक्ष्मीनारायण का मन्दिर कहते हैं। यह बात इस मन्दिर के शिलालेख से निश्चित होती है। यथा- इस प्रकार ये आचार्य बड़े शान्त, दान्त, संयमी, विद्वान् और पूरे योग्य गच्छपति थे। इन के उपदेश से, जैसलमेर के श्रावक सा. शिवा महिश, लोला और लापण नाम के ४ भ्राताओं ने, संवत् १४९४ में बड़ा भव्य जिनमन्दिर बनाया जिस की प्रतिष्ठा इन्हों ने सं. १४९७ में की थी और संभवनाथ प्रमुख ३०० जिनयिम्य प्रतिष्ठित किये थे । इस प्र. तिष्ठा में उक्त ४ भ्राताओं ने अगणित द्रव्य खर्च किया था । दूर दूर के प्रदेशों से हजारों श्रावकों को कुंकुमपत्रिकायें भेज भेज कर बुल- पाये थे। प्रतिष्ठा वाद समग्रसार्मिक बन्धुओं को नाना प्रकार के लक्ष्मणस्य तनयो विराजते वैरिसिंह इति विश्रुतः सदा । तेन देवभवनं प्रतिष्ठितं राज्यवृहा(द्धय ) खिल पाप विशुद्धये ॥५॥ वेदाङ्काधीन्दुवर्षे शिशिरऋतुवरे माघशुक्ल च पक्षे षष्ट्यां वै शुक्रवारे स्वितिभइठनउदयोनि:) इन्दौ तु मेपे । भूपः श्रीवैरिसिंहः स(सु !) रवरमवने कारयत्युप्रतिष्ठा- मृतिम्भिवेदिविद्भिर्नृपतिभिरनिशं वन्दिताट्यब्जयुग्मः ॥ ६ ॥ (S. R. Bhandarkar's Second Report, 1904-5 and 1905-6, Page 65.) इन ४ भाईयो ने अनेकानक सुकृत कर अपने न्यायोपार्जित द्रव्य का सदुपयोग किया था । सं. १४८७ में इन्हो ने जैसलमेर से, शत्रुजय और गिरनार की यात्रा के लिये संघ निकाला था और सं. १४९० में, पञ्चमी-तप का उद्यापन किया था। विक्रमवर्षचतुर्दशसप्ताशीती विनिर्ममे यात्रा। शत्रुजयरेवतगिरितीर्थे सवान्वितैरेमिः ॥२॥ पञ्चभ्युद्यापनं चक्रे वत्सरे नवती पुनः । चतुर्भि बन्धिवैरेभिश्चतुर्घा धर्मकारकैः॥ ३॥" .
५६ वस्त्रादि भेंट कर उन का खूब स्वागत किया था। राउल श्री वैरिसिं. हजी का भी बहुमूल्य वस्तुओं द्वारा अच्छा सन्मान किया था जिस के बदले में उन्हों ने भी इन चारों भाईयों को, विविध प्रकार के वस्त्र और आभूपणादि दे कर अपना प्रेम प्रदर्शित किया था । यह बात इसी प्रशस्ति के अंत में लिखी हुई है। अथ संवत् १४९४ वर्षे श्रीवैरिसिंहराउलराज्ये श्रीजिनभद्रसूरी- णामुपदेशेन नवीनः प्रासादः कारितः । ततः संवत् १४९७ वर्षे कुंकुम- पत्रिकाभिः सर्वदेशवास्तव्यपरःसहस्र श्रावकानामन्य प्रतिष्ठामहोत्सवः सा० शिवायैः कारितः । तत्र च महसि श्रीजिनभद्रसूरिभिः श्रीसंभव- नाथप्रमुखबिम्बानि ३०० प्रतिष्ठितानि प्रासादश्च ध्वजशेखरः प्रतिष्ठितः। तत्र संभवनाथो मूलनायकत्वेन स्थापितः । तत्र चावसरे सा० शिवा- महिश-लोला-लापणश्राद्धैः दिन ७ साधर्मिकवात्सल्यं कृतं राउलश्रीवै- रिसिंहेन साकं श्रीसको विविधवस्त्रैः परिधापितः । राउलश्रीवैरिसिंहेनापि चत्वारस्ते बान्धवाः स्ववान्धववद्वस्त्रालंकारादिदानेन सन्मानिता । इति । (S. R. Bhandarkar's Second Report, 1904-5 and 1905-6, P. 97.) इस प्रकार इन्हों ने अनेक स्थानों पर बड़े बड़े जिन मन्दिरं बनवाये, प्रतिष्ठा महोत्सव करवाये और हजारों जिनविम्ब प्रतिष्ठित किये थे । इन की प्रतिष्ठित प्रतिमाओं के अनेक लेख मेरे पास हैं परन्तु उनके यहां पर देने की कोई आवश्यकता नहीं केवल ऊपर दिये गये इसी एक लेख से, सब का दिग्दर्शन हो जाता है। जिनभद्रसूरि और पुस्तक-भाण्डागार । - जिनभद्रसूरि ने अपने जीवन में सब से अधिक महत्त्व का और विशिष्टत्व वाला जो कार्य किया है वह भिन्न भिन्न स्थानों में विशाल पुस्तकालय स्थापन कराने का है। ।
" अथवा इन्हों ने जैसे और जितने शाख-भाण्डार स्थापित किये-फ. राये पैसे शायद ही अन्य किसी आचार्य ने किये-कराये हों । इस ग्रंथोद्धार-फार्य के प्राचुर्य में इन के और सुकृत्य मानो गौण हो गये थे। पिछले कितने ही विद्वानों ने तो, इन का उल्लेख करते समय इस कृत्य को विशेषण तया उल्लिखित किया है । वाचनाचार्य श्रीगुण- विनयगणि ने, अपने संबोधसत्तरि के विवरण के अन्त की प्रशास्ति में इन का उल्लेख करते हुए लिखा है कि- श्रीज्ञानकोशलेखनदक्षा जिनभद्रसूरयो मुख्याः। तत्पट्टे सञ्जातास्ततोऽद्युतन् दिव्यगुणजाताः ॥ १७ ॥ वाचक श्रीसमयमुन्दरगणि ने, अपनी " "'अटलक्षी अर्थ रत्नावली" की प्रशस्ति में लिखा है कि- श्रीमज्जेसलमेरुदुर्गनगरे जावालपुर्यां तथा श्रीमद्देवगिरी तथा अहिपुरे श्रीपत्तने पत्तने । माण्डागारमबीभरद्वरतरैर्नानाविधैः पुस्तकः स श्रीमजिनभद्रसूरिसुगुरुर्भाग्याद्भुतोऽभूवि ॥ २१ ॥ (Professor P. Peterson's Fourth Roport, Page 12.) पाटन के बाढीपुर-पार्श्वनाथ के मंदिर की प्रशस्ति में भी इस यातका उल्लेख है- " स्थान(ने) स्थान(ने) स्थापितसारज्ञानमाण्डागारश्रीजिनमद्र- सरि- - (Epigraphia indica, Vol, I,XXXVII.) इस पुस्तक में " राजानो ददते सोध्यम्" इस एक वाक्य के जुदा जुदा प्रकार से भाठ साग अयं किये गये है! ८ -- जिनभद्रसूरि के पूर्वमें तो बहुत करके ताड़पत्रों पर ही ग्रंथों के लिखने की प्रथा थी परन्तु इन के समय में इस प्रथा में एकदम बड़ा भारी परिवर्तन हुआ। इनके समय में चाहे तो ताड़पत्रों को प्राप्ति दुर्लभ हो गई हो चाहे कागजो की प्रवृत्ति विशेष बढ़ गई हो, कुछ भी हो, परन्तु इस अर्से में ताड़पत्रों पर लिखना एकदम बन्ध हुआ और उनका स्थान कागजों को मिला! ताड़पत्र पर जितने पुराणे ग्रंथ लिखे हुए थे उन सब की नकलें इस समय में काग़ज़ पर की गई थीं। गुजरात और राजपूताने के प्रसिद्ध भाण्डारों के ताडपत्रों का इसी एक ही समय में, एक साथ, जीर्णोद्धार हुआ था। पाटन और खंभात के ग्रंथों का कागजी संस्करण तो इधर तपा- गच्छ के आचार्य देवसुन्दर और सोमसुन्दरसूरि की मंडली ने किया था और उधर जैसलमेर के शास्त्रों का समुद्धार, खरतरगच्छके अधि. पति जिनभद्रसूरि की मण्डली ने किया था । ऐतिहासिक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस समयमें पुस्तकोद्धार के कार्य का प्रवाह अति तीव्र वेग से बहने लगा था। इस १५ वीं शताब्दी के मध्य और अन्त में कोई लाखों प्रतिये लिखी गई थीं ! जैसलमेरका प्रदेश, मरुस्थल होने के कारण बहुत विषम है इस लिये गुजरात की अपेक्षा, मुसलमानों के उद्वेगजनक आक्रमण वहां पर कम होते थे। इस स्थितिका विचार कर, पुराने आचार्यों ने गुज- रात में से बहुत सी पुस्तके वहां पर पहुंचा दी थीं। ये पुस्तके वहां पर बडे प्रयत्न से संरक्षित रक्खी गई थीं । जैसलमेर खरतरगच्छ का प्रधानस्थान था । जिनभद्रसूरि इस गच्छ के नेता थे इस लिये ये सव पुस्तकें इनके स्वाधीन थीं । तपागच्छीय समुदाय द्वारा गुजरात के भाण्डारों के उद्धार होने की बात जिनभद्रसूरि के सुनने में आई तो इन्हों ने भी जैसलमेर के शास्त्र-संग्रह के उद्धार करने का संकल्प किया। अनेक अच्छे अच्छे लेखक इस काम के लिये रोके गये और उन के द्वारा ग्रंथों की, ताडपत्रों पर से कागजों पर नकलें कराई जाने लगीं । जिनभद्रसूरि स्वयं जुदा जुदा प्रदेशों में फिर कर श्रावकों को शास्त्रोद्धार का सतत उपदेश देने लगे। इस प्रकार सं. १४७५ से ले कर १५१५ तक के ४० वर्षों में हजारों-बल्के लाखों- ग्रंथ लिखवाये और उन्हें भिन्न भिन्न स्थानों में रख कर अनेक नये पुस्तक-भाण्डार कायम किये। इन्हों ने अपने उपदेश से ऐसे कितने भाण्डार तैयार करवाये इस की पूरी संख्या ज्ञात नहीं हुई। ऊपर दिये हुए 'अटलसी के प्र. शस्ति-पद्यसे जैसलमेर, जावालपुर, देवगिरि (दौलताबाद), अहिपुर और पाटन इन५ स्थानों के भाण्डारों का तथा मंडपदुर्ग (मॉडव गढ़), आशापल्ली या कर्णावती और खंभायत इन तीन और अन्य भाण्डारों फा उल्लेख मिलता है। इन भाण्डारों में से वर्तमान में, केवल एक ही भाण्डार ठीक ठीक हालत में, उपलब्ध है-जो पाटन के घाडीपुर-पा. नाथ के मंदिर में संरक्षित है । यद्यपि, इस में की पुस्तकों का भी अधिकांश भाग इधर उधर हो गया है तथापि उल्लेख करने योग्य पुस्तकें अब भी बहुत कुछ विद्यमान हैं । इस में सब मिलाकर वर्त- मान में ७५० लगभग पुस्तकें हैं जो न्याय, व्याकरण, काव्य, साहित्य और धर्म आदि प्रथक् प्रथक् विषयों के साथ ताल्लुक रखती हैं। इस में कितने ही तो ऐसे अपूर्व ग्रन्थ हैं जो अन्यत्र कहीं नहीं दृष्टिगो. चर होते । इस के अधिकांश ग्रंथ एक ही नाप के कागजों पर, एक ही जैसे अक्षरों में लिखे हुए हैं । प्रायः कर के हर एक पुस्तक के अंत में जिनमद्रसूरि का जिक्र और जिस धावक ने उसे लिखवाई, उस का उल्लेख किया हुआ है। उदाहरण के लिये नमूने लीजिए- "सं. १४८४ वर्षे श्रीजिनराजसूरिपझालंकारसारश्रीजिनभद्र- सूरिगुरूणामुपदेशेन श्रीउकेशवंशे घोरयाडशाखायां महं० लखमसिंहमुता महं० हरिराज-खेता--पद्मा-वीराभिधा जाताः । तत्र पद्माकस्य साधु जिनराज-साधुनोडा-साधुधणपतिनामानो विजयन्ते । तत्र जिणराजपु- प्राभ्यां जासलदेवीकुक्षिसंभूताभ्यां सा. वांग-सा० समरसिंहाभ्यां सा० वजांगमुत-समघर-श्रीराज सहिताभ्यां श्रीमदणहिल्लपचननगर- ६० भाण्डागारे श्रीबृहत्कल्पटीका स्वपितृसा. जिणराजपुण्याथ लेखयांचने साधुजनैर्वाच्यमाना चिरं नन्दतात् । " " संवत् १४८१ वर्षे सिन्धुमण्डलवास्तव्य सा० घेरू पुत्र सं० सोमाकेन सा० अभयचंद्र सा. रामचंद्र प्रमुख पुत्रपौत्रादियुतेन श्रीख- रतरगच्छे श्रीजिनराजसूरिपट्टे श्रीजिनभद्रसूरिसुगुरूणामुपदेशेन श्रीआव- श्यकवृत्तिटिप्पनकं लिखापितं वाचंयमैर्वाच्यमानं चिरं नन्दतात् । " संवत् १४८८ वर्षे पोपसुदिषष्ठयां सोमे अद्येह श्रीपत्तने खरतरगच्छे श्रीश्रीजिनभद्रसूरिविजयराज्ये भाण्डागारे ज्योतिप्करण्डक- टिका लिखापिता । मंत्रिवहुलाकेन प्रतिः शुद्धा कृता ।। * इस प्रकार बहुत सी पुस्तकों के अन्त में स्मरण-लेख दिये हुए हैं। ऊपर जो मैं ने अष्टलक्षी के प्रशस्ति-पद्य में गिनाये हुए पांच भाण्डारों के सिवा तीन और भाण्डारों का उल्लेख किया है वह ऐसे ही प्रमाणों के आधार से लिखा गया है। पाटन के इसी भाण्डार में कितनीक पुस्तकें हैं जो आशापल्ली या कर्णावती के भाण्डार में समर्पित की गई थीं। उन्हें पीछे से कोई साधु, वहां से पढ़ने के लिये लाया होगा और वे फिर इस जगह रख दी गई होंगी। इन के अन्त में भी ऊपर के से स्मरण लेख दिये हुए हैं और उन में आशापल्ली का नाम लिखा हुआ है । यथा- १ यह सं. सोमा, सिंधदेश के मम्मणवाहण का रहने वाला था। इसी ने सं. १४८३ में, मरुकोट्ट की यात्रा करने के लिये संघ निकाला था जिस में जय- सागर-उपाध्याय भी सम्मिलित थे । (देखो, विज्ञप्तित्रिवेणि-मूल, पृ. २१.) २ यह आशापल्ली, जिसका दूसरा नाम कर्णावती भी था, जहां पर अहम- दाबाद वसा है वहां पर थी। इसी के स्थान पर अहमदशाह ने अहमदाबाद बसाया है " संवत् १४९३ वर्षे श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनभद्रसूरिगुरूणामु- पदेशेन श्रीमालवंशे भांडियागोत्रे सा० छाडा मार्या साध्वीनी मेघू तत्पुत्र सा० समदा सा० काला सुश्रावकाभ्यां श्रीसूदा श्रीहेमराज प्रमुखपुत्रपौत्रादिपरिवारकलिताभ्यां श्रीसूर्यप्रज्ञप्तिीका लेखिता । श्रीआ- शापल्लयां पातशाह श्रीअहम्मदशाहराज्ये ।" * सं. १४९४ वर्षे खरतर श्रीजिनभद्रसूरिगुरूणामुपदेशेन आ- शापल्लीनगरे श्रीमालवंशे भांडियागोत्रे सा० छाडा.... .श्रीदशवै- कालिकचूर्णिलेखिता। ........ " * पाटन और आशापल्ली के भाण्डार एक ही श्रावक के लिखाये हुए न ही ये; किन्तु, जुदा जुदा गृहस्थों ने अपनी इच्छानुसार एक, दो; अथवा दश, घीस पुस्तकें लिखवा लिखवा कर इन में दी थीं। परंतु खंभायत का भाण्डार तो सारा, एक ही श्रावक ने अपनी ओर से तैयार करवाया था। इस का नाम धरणाक था। यह परीक्षगोत्रीय और इस के पिता का नाम गूजर तथा पुत्र का नाम साइया था। इस की लिखाई हुई पुस्तकों के अन्त में निम्नलिखित प्रशस्ति लेख है। "सं० १४९० वर्षे चैत्रसुदिपंचम्यां तिथी रविवारे श्रीमति श्रीस्थंमतीर्थे अविचलत्रिकालज्ञाज्ञापालनपटुतरे विजयिनि श्रीमत्खरतरगच्छे श्रीजिनराजसृरिपट्टे लमिलालानिलयवन्धुरबहुबुद्धिबोधितम्बलयकृतपाप- पूर्णलयचारुचारित्रचंदनतरुमलययुगप्रवरोपममिथ्यात्वतिमिरनिकरदिनकर- प्रसरतमश्रीमद्गच्छेशभट्टारकथीजिनभद्रसूरीश्वराणामुपदेशेन परीक्ष्य सा. गुजरमुतेन रेखामाप्तमुश्रावकेन सा० परीक्ष्य धरणाकेन पुत्र सा० साइ- यासहितेन श्रीसिद्धान्तकोशो लेखितः स्वश्रेयसे ।"
१२ " सं० १४९० वर्षे चैत्रशुदि १० शनी श्रीमति श्रीस्थंभतीर्थ श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनराजरिपट्टे श्रीजिनभद्रसूरिराज्ये सा० गूर्जरसुत सा० धरणाकेन सत्तरीवृचिलिखापिता । पु० हरीयाकेन लिखितं । शुभं भवतु । (Professor P. Peterson's, Fourth Report, Page 130.) । , कविवर मंडन और धनदराजका ग्रंथागार । > मालवे का मांडवगढ़ (मंडपदुर्ग ) इतिहास-प्रसिद्ध स्थान है। यह शहर औरंगजेब के समय तक तो बड़ा आवाद और मशहुर था परंतु आज तो इस की वही दशा है जो गुजरात के गंधार-बन्दर की है । मॉडव या मॉडू जिस समय उन्नति के शिखरपर चढ़ा हुआ था उस समय वहां पर जैनधर्म की भी वैसी ही दशा थी। उस समय वह जैनधर्म में मालवे का केन्द्र गिना जाता था। बड़े बड़े धनाढ्य और सत्तावान जैन वहां पर रहा करते थे । कहते हैं कि वहां पर जैनों की कोई एक लक्ष ले अधिक संख्या थी । अनेक कोट्यधीश और सैकडों लक्षाधिपति जैन इस शहर को अलंकृत करते थे। जन-श्रुति है कि इस शहरमें एक भी गरीव श्रावक न था। जो कोई वाहर से दारिद्रय-पीडित जैन आता था तो, शहर के अच्छे अच्छे श्रीमान् एक एक रूपया, उसे सहायतार्थ देते थे । इन श्रीमा. नों की इतनी संख्या थी कि जिस से सहज में वह आगन्तुक दरिद्र अच्छी संपत्ति वाला बन जाता था ! जैन इतिहास के देखने से पता लगता है, कि मंत्री पेथड. झाँझण, जावड, संग्रामसिंह आदि अनेक श्रावक यहां पर हो गये हैं जो विपुल-ऐश्वर्य और प्रभूत-प्रभूता के स्वामी थे । इस प्रकरण के सिरे पर जिन दो भ्राताओं का नाम लिखा हुआ है वे भी ऐसे ही श्रावकों में से थे। ये श्रीमालीजाति के सोनिगिरा वंश के थे । इन का वंश वडा गौरव और प्रतिष्ठावान् था । इस के वर्णन करने की यहां पर जगह नहीं। मंत्री मंडन और धनराज के पितामह का नाम झंझण था । इस के १ चाहड, २ बाह- 1 ण्य ड, ३ देहड, ४ पदम, ५ आरहा और ६ पाहु नाम के छः पुत्र थे। इन में से देहड और पदम तो मांडवगढ़ के तत्कालीन बादशाह आलमशाह के दिवान थे । बाकी के अन्यान्य व्यवसायों में अग्रग- थे । इन ६ भाईयों के अनेक पुत्र थे जिन में से ये मंडन और धनदराज विशेष प्रसिद्ध थे। मंडन वाहड का छोटा पुत्र था और धनदाज देहडका एक मात्र लडका था। इन दोनों चचेरे भाईयों पर लक्ष्मीदेवी की जैसी प्रसन्नदृष्टि थी वैसे सरस्वती देवी की भी पूर्ण कृपा थी । अर्थात् ये बड़े भारी श्रीमान् होकर विद्वान् भी वैसे ही उच्च कोटी के थे। मंडन ने व्याकरण , काव्य, साहित्य, अलंकार और संगीत मादि भिन्न भिन्न विषयों पर, मंडन शब्दांकित अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। इन ग्रंथों में से आठ नौ ग्रंथ तो पाटन के ऊपरि-उल्लिखित वाडीपुर-पार्श्वनाथ के भाण्डार में, मंडन ही के (सं० १५०४ में) लिखवाये हुए, विद्यमान हैं । इन के नाम ये हैं-१ काव्यमंडन (को. रव-पाण्डव विषयक ), २ चंपूमडन (द्रौपदीविषयक), ३ कादं. वरी मंडन (कादंबरी का सार), ४ शृंगारमंडन, ५ अलंकार मंडन, ६ संगीतमंडन, ७ उपसर्ग मंडन, ८ सारस्वत मंडन (सारस्वत ध्याकरण ऊपर विस्तृत विवेचन.) और ९ चंद्रविजय प्रबंध। मंडन के जीवन-चरित्र के विषय में, इस के मित्र महेश्वर नाम के कवि ने काव्य-मनोहर नाम का सात सगों वाला एक छोटा सा काव्य लिखा है। इस में मंडन के पूर्वजों का तथा मंडन का संक्षेप में जीवन वृत्तांत उल्लिखित है। यह काव्य मंडन की विद्यमान ता ही में लिखा गया है। इसकी भी दो कापी-जो मंडन की लिखवाई हुई और एक ही लेखक की लिखी हुई हैं-उक्त भाण्डार में हैं। मंडन की तरह धनदराज या धनद भी घड़ा अच्छा विद्वान् १ यदि बन सका तो ये अंध इसी ग्रंथमाला में, भविष्य में, प्रकट करने का विचार है।
६४ मैं था । इस ने 'धनदत्रिशती' नाम का एक ग्रन्थ राजर्षि भर्तृहरि की 'शतकत्रयी' का अनुकरण करने वाला लिखा है । प्रसंग न होने से इन के विषय में विशेप-उल्लेख नहीं कर सकता तथापि इतना अवश्य कह देना चाहता हूं कि इन ग्रन्थों में इन का पाण्डित्य और कवित्व अच्छी तरह प्रकट हो रहा है। मंडन का वंश और कुटुम्ब खरतरगच्छ का अनुयायी था। इन भ्राताओंने जो उच्च कोटि का शिक्षण प्राप्त किया था वह इसी गच्छ के साधुओं की कृपा का फल था । इस समय, इस गच्छ के नेता जिनभद्रसूरि थे इस लिये उन पर इन का अनुराग और सद्भाव, स्वभावतः ही अधिक था । इन दोनों भाईयों ने अपने अपने ग्रंथों में इन आचार्यकी भूरि भूरि प्रशंसा की है । धनद ने अपनी त्रिशती में लिखा है कि- . " चिन्तामणिः संप्रति भक्तिभाजां तपस्यया त्रासितदेवनाथः । दयोदयः प्रीणितसर्वलोकः सिद्धो गरीयाजिनभद्रसूरिः ।। (नीतिधनदशतक, पद्य-९४।) मंडन के चरित विषय का जो काव्यमनोहर है उस में भी महे. श्वर कवि ने लिखा है- जयत्यतः श्रीजिनभद्रसूरिः श्रीमालवंशोद्भवदत्तमानः । गम्भीरचारुश्रुतराजमानस्तीर्थाटनैः : सन्ततपूतमूर्तिः ॥ (काव्यमनोहर, ७ सर्ग, ३८ पद्य ।) इन भ्राताओं ने जिनभद्रसूरि के उपदेश से एक विशाल सि- द्धान्त-कोश लिखाया था । यह सिद्धान्त-कोश आज विद्यमान नहीं । पाटन के एक भाण्डार में-जो सागरगच्छ के उपाश्रय में संर- , १ यह प्रवन्ध बंबई के, निर्णयसागर-प्रेस की, काव्यमाला के १३ वें गुच्छक में छप चुका है।
। क्षित है-भगवतीसृप (मूलमात्र) की प्रति है जो मंडन के सिद्धान्त. कोश की है। इस प्रति के अन्त में, मंडन की प्रशस्ति है जिस में लिखा है कि- " संवत् १५०३ वर्षे वैशाखसुदि १ प्रतिपत्तियौ रविदिने अधह श्रीस्थमतीर्थे श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनराजरिपट्टे श्रीजिनभद्रसूरी- श्वराणामुपदेशेन श्रीश्रीमालज्ञातीय सं० मांडण सं० धनराज भगवती. सूत्रपुस्तकं निजपुण्या लिखापितं । जयति जगदाधारो देशः स मालवनामको जयति विजितस्वर्गदुर्गः स यत्र च मण्डपः । जयति विजयी यस्याधीशो महानलमायो जयति मतिमान् यस्यामात्यः कृती पदमाभिधः ॥ १ ॥ यस्य मातृपु दातृपु प्रशमिपु श्रीमत्सु धीमत्सु च लाध्यः श्लोकतमः समं सममवत् सद्धेश्वरो वाहडः। यत्योदश्चित पूर्वजन्मनिचयैः सत्सञ्चितानां महत् पुण्यानां फलमेकमेप जयति मामण्डनं मण्डनः ॥ २ ॥ यत्कतिव्रततिर्वितत्य गगने दानोदकासेचनात् काष्टानां दशकस्य मण्डपतले सम्मान्ति नैवैकिकाः । सोऽयं सोनिगिरान्वयः खरतरः श्रीवाइडस्यात्मजः श्रीसिद्धान्तमलेखयद् भगवतीसम्झं सुधीर्मण्डनः ॥ ३ ॥ १ मंडन का वासस्थान माँव होने से पुस्तक-माण्डार भी वहीं स्थापित किया होना चाहिए । इस पुस्तक के खमायत में लिखे जाने का कारण यह प्रतीत होता है कि पुस्तके राय जिनभद्रसूरि की देखरेस नीचे लिखी जाती होगी और इन (सूरि) के, उस समय रांभायत. में ठहरने के कारण यह पुस्तक यहां पर लिखी : गइ होगी। * ये ही तीन पद्य (अंतिम पाद को छोड कर ) सारस्वतमंटनकी प्रशस्ति में भी है । इस मे ज्ञात होता है कि ये सब पद्य स्वयं मंडन ही के बनाये हुए है।
- उद्यत्सान्द्रजिनेन्द्रसुन्दरपदद्वन्दप्रसादोद्भवद्- भूयोऽभीष्टपुमर्थसार्थक जनुः श्रीमालमालामणिः । सोऽयं सोनिगिरान्वयः खरतरः श्रीवाह डम्यात्मजः श्रीसिद्धान्तमलेख यच्च सकलं संघेश्वरो मण्डनः ॥ ४ ॥ श्रीमालिज्ञातिमण्डनेन संघेश्वरश्री मण्डनेन सं० श्रीधनराज सं० खीमराज सं० उदयराज । सं० मंडनपुत्र 'सं० पूजा जीजा सं० संग्राम सं० श्रीमाल प्रमुखपरिवार परिवृतेन सकल सिद्धान्तपुस्तकानि लेखयां चक्राणानि ॥ श्रीः ॥ -ग्रन्थरचना । । जिनभद्रसरि ने, विद्वत्ता के प्रमाण में ग्रन्थों की रचना की हों ऐसा प्रतीत नहीं होता । अन्यान्य आचार्यों के जैसे नये नये ग्रंथ तथा पुराणें ग्रंथों पर टीका-टिप्पनादि लिखे हुए मिलते हैं वैसे इन की कोई विशेष कृतियां उपलब्ध नहीं होती। कहीं पर इस विषय का उल्लेख भी नहीं देखा गया । तथापि, सर्वथा अभाव भी नहीं है । इन का बनाया हुआ एक ग्रंथ मेरे दृष्टिगोचर हुआ है । इस का नाम जिनसत्तरीकरण' है । यह प्राकृत में गाथावन्ध है । इस की कुल गाथायें २२० हैं । इस में २४ तीर्थकरों के पूर्व भव सख्या, द्वीप, क्षेत्र, विजय, नगर, नाम और आयु आदि ७० वातों की सूची है इस के अन्त में इन्हों ने अपने गुरुका तथा निज का नामोल्लेख किया है। " गणहरसुहम्मवंसे कमेण जिणरायसूरिसीसेहिं । पयरणमिणं हियट्टुं रइयं जिणभदसूरिहिं ॥ संभव है कि और भी कोई छोटा बड़ा ग्रंथ बनाया हो परंतु मेरे देखने-सुनने में नहीं आया।
- " शिष्य -समुदाय | जिनभट सरि का शिष्यममुदाय बहुन धड़ा और प्रभावशाली था। इन शिप्यों में से एक को, इन पछि कानिरत्नाचार्य ने पट्टधर बनाया था। यह शिप्य, जैसलमेर के चम्मगोत्रीय सा. पच्छ. राज और पाल्हादेका पुत्र था । इम का जन्म सं. ११८७ में हुआ था और १४९२ में, पाँचही वर्ष जैसी छोरी उम्रमें, दीक्षा ली थी- दी गई थी। आचार्यही सं. १५६४ के चशासवादि २ को कुंभल- मेर (मेवाड राज्य के अर्थलीपहाडी वाले प्रसिद्ध स्थान ) में, दी गई थी। ये पीछे से जिनचंद्रसरि चौथे ) के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन 2 का संक्षिप्तवृत्तांत पहाधलि में इस प्रकार लिखा है। श्रीजिनभद्रसूरिपट्टे जिनचन्द्रसूरिः, तस्य च जेसलमेरुवास्तव्य चम्म डगोत्रीय साह वच्छराजः पिता बाहादेवी माता सं० १४८७ जन्म, सं० १४९२ दीक्षा सं० १५१४ वैशाखदिद्वितीयायां कुम्भलमेरु वास्तव्य कूकडाचौपडागोत्रीय साह समरसिंहकृतनंदिमहोत्सवेन श्री कातिरत्नाचार्येण पदस्थापना कृता । तते ऽर्बुदाचलोपरि नयफणापाच- नाथप्रतिष्ठाविभापक.श्रीधर्मरत्नसूरिगुणरत्नसूरिप्रमुखानेकपदस्थापक श्रीजि- नचन्द्रसूरयः सं० १५३० जेसलमेरुनगरे स्वर्ग प्राप्ताः॥' २-दूसरे प्रसिद्ध शिप्य श्रीकमलसंयमोपाध्याय थे । ये भी अच्छे विद्वान थे। इन्हों ने सं. १९७६ में दीक्षाग्रहण की थी । संवत् १५१८ में, जिनचंद्रसरि, जिन का जिक्र ऊपर किया गया है की आज्ञा से पूर्वदेश में बिहार किया था और चंपा, साकेत (अयोध्या), कुंडपुर, काशी और राजगृह आदि तीर्थक्षेत्रों को यात्रा का थी। जिनसमुद्रसरि-जो जिनचंद्रसरि के याद पट्टधर आचार्य हुए थे और जिन्हें स्वयं जिनवंद्रसरि ने गच्छपति बनाया था-के आदेश से, इन्हों ने, १४००० श्लोक प्रमाण उत्तराध्ययनसन पर टीका लिखी है। इस का संशोधन भानुमेरु वाचक ने किया है । यह सब " ६८ कथन इसी टीका के प्रशस्ति-पद्यों में लिखा हुआ है । सं. १५११ में, सं० नगराज की पुत्री सोनाई ने, जिनवल्लभसार का बनाया हुआ संक्षिप्त चीर-चरित्र, सुनहरी शाही से लिख कर इन्हें समर्पण किया था। इस पर लिखा है- " सं. १५६१ वर्षे श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनभद्रसूरिशिप्य वा. श्रीकमलसंयमगणिवाचनाय सा० नगराजपुत्रिकया सोनाई श्राविकया लिखितं । संवत् १५२२ का चातुर्मास इन्हों ने यवनपुर (दिल्ही) में किया था। आचार्य जिनचद्रसूरि भी इस लाल वहीं पर थे । इन की आज्ञा से, सं० कालिदास की स्त्री सं० हरसिणी ने, उपाध्यायजी को कल्प. सूत्र की एक प्रति भेंट की थी जो बड़े खर्च के साथ तैयार करवाई गई थी। यह पुस्तक सुवर्णाक्षरों से लिखी गई है और प्रत्येक पत्र पर नाना प्रकार के वेल-बूटे और विविध चित्र चित्रित किये गये हैं। यह दर्शनीय पुस्तक यहों ( बडौदे ) के “जैनज्ञानमंदिर" में, शांत- मुनिवर श्रीमान् हंसविजयजी महाराज के " शास्त्र-संग्रह " में संर- क्षित है। इस के अंत में इस प्रकार उल्लेख है- संवत् १५२२ वर्षे भाद्रपदसुदि २ शुक्रे यवनपुरे श्रीहुसेनसा- हिराज्ये । श्रीमालज्ञातीय सं० कालिदासभार्यया साधुसहसराजपुत्रिकया सं० हरसिनि श्राविकया पुत्रधर्मदाससहितया कल्पपुस्तकं लिखापितं । विहारितं च श्रीखरतरगच्छे श्रीजिनभद्रसूरिपट्टालंकारश्रीजिनचंद्रसूरि- राजादेशेन श्रीकमलसंजमोपाध्यायानां ॥ लिखितं च गौडान्वय कायस्थ पं० कर्मसीहात्मजवेणीदासेन ॥ शुभमस्तु ।। * कर्मस्तविवरण नाम का एक और भी इन का बनाया हुआ ग्रंथ है जो जैसलमेर के भाण्डार में विद्यमान है । यह सं. १५४९ में रचा गया है, ( देखो, जैन ग्रंथावली, पृ० ११९ ।) * कमलसंयम नाम के एक दूसरे भी उपाध्याय, खरतरगच्छ में, इसी अर्से में हो गये हैं । ये जिनवर्द्धनसूरि की शिष्य-सन्तति में के जिनहर्षसूरि के शिष्य थे। - ३-सिद्धान्तरूचि महोपाध्याय:--जिनमद्रसूरि के शिष्यों में ये भी उच्च विद्वान् और प्रतिष्ठावान् थे। ये वे ही सिद्धान्तरुचि है, जिनका नाम विज्ञप्ति त्रिवेणि के १५घे पृष्ट पर जिनभसरि के इन के हाथ की लिखी हुई एक पुस्तक पाटन के संघ वाले माण्डार में है जिस पर लिखा है- " संवत् १५७३ वर्षे प्रावृपि ऋतौ श्रावणिके मासे कृष्णपक्षे द्वितीयातिथौ सूर्यवासरे प्रातःकाले श्रीचित्रकूटकोट्टोत्तमे श्रीसंग्रामराज्ञो विजयिनि राज्ये श्रीखरतरगच्छस्वच्छे तुच्छेतरे श्रीजिनवर्द्धनसूरिपट्टे श्रीजिनचंद्रसूरयस्तत्पट्टे श्रीजिनसागरसूरयस्तरपट्टांभोजमार्तण्डाः श्रीजिन- सुंदरसूरयस्तसहोदयादिनिस्तंद्रमित्राः श्रीजिनहर्पसूयोऽभूवन् । अथ तत्पसकैरवाकरविकस्वरक्रियोद्यतेषु सांप्रतं श्रीजिनचंद्ररिपु निजगणा- धीशत्वं कुर्वत्सु तत्सतीर्थ्यः श्रीकमलसंयमोपाध्यायैः स्वहस्तेनैपा श्रीमहा- खंडनटीका विद्यासागरीत्यभिधाना स्वस्यान्यस्य वोधायालेखितराम् । इन के उपदेश से पाटन की एक श्राविकाने कोटि-उद्यापन किया था और उस के निमित्त कुछ शान लिसपाये थे। इन शास्त्रों में की एक प्रति पाटन के इसी भाण्डार में है निस के अंत में इस प्रकार स्मरण-लेस है- " सं. १५७० वर्षे पैशाखवदिअमावस्यातिथी मृगुवासरे अघेह श्रीअणविल्हपुरपचने ठाणांगवृचिलिखता । सं० ११७० वर्षे श्रीवृहत्खरतरगच्छे श्रीजिनसागरसूरिपट्टे श्रीजिनमुन्दरसूस्पिट्टे श्रीजिनह- पपट्टालंकारश्रीजिनचंद्रसूरिविजयराज्ये श्रीकमलसंयमोपाध्यायानामुपदे- शेन थीमोकेशवंशे श्रीसूराणागोत्रे सं० चांपा भार्या सं० चांपलदे पुत्र सं० सहस्समल्ल भार्या सं० भीमी पुत्र सं० विजयसिंह भार्या सं० मटकू पुत्र सं० सोमा इत्यादिपरिवारयुतया भीमीश्राविकया कोट्युद्यापने श्रीटाणांगवृचिखयां चके।" (बॉम्बे गवर्नमेन्ट की ओर से हेमचंद्राचार्य का जो प्रातमाश्रय एपा है उसके अंत में भी इन का उस।)
शिष्यों का नामोल्लेख करते हुए के जयसागरोपाध्याय ने “पं० सिद्धान्त रूचिगणि" के सामान्य विशेषणसे, उल्लिखित किया है। इस विज्ञप्तित्रिवेणि के समय वाद, पीछे से इन्हें महोपाध्याय का. पद मिला था। इन्हों ने ग्यासुद्दीन बादशाह की सभा में विपक्षियों के साथ वाद कर विजय प्राप्त किया था । इन के एक शिप्य साधु: सोमणि ने सं १५१९ में, जिनवल्लभसरिकृत महावीर चरित्रकी टीका बनाई है जिस की प्रशस्ति में यह उल्लेख किया गया है । श्रीखरतरगच्छेशश्रीमज्जिनभद्रसूरिशिष्याणाम् । जीरापल्लीपार्श्वप्रभुलव्धवरप्रसादानाम् ॥ १ ॥ श्रीग्यासदीनसाहेमहासभालन्धवादिविजयानाम् । श्रीसिद्धान्तरुचिमहोपाध्यायानां विनेयेन ॥ २ ॥ साधुसोमगणी शेनाक्लेशेनार्थप्रयोधिनी । श्रीवीरचरिते चक्रे वृत्तिश्चित्तप्रमोदिनी ॥ ३ ॥ : चावी चरित्रपञ्चकवृत्तिविहिता नेवैकति थिवर्षे हर्षेण महर्षिगणैः प्रवाच्यमाना चिरं जयतु ॥ ५ ॥ सिद्धान्तरुचि महोपाध्याय के एक दूसरे शिष्य विजयसोम थे। इन की सहायता से, मांडवगढ़ के मण्डनले ठने ( ऊपर जिस मंडन कवि का उल्लख हो चुका है वह नहीं। ) शास्त्रसंग्रह लिख.. वाया था। यह सेठ भी बड़ा धनी और दानी था। इस ने तीर्थ यात्रा, दानाशाला, जिनमंदिर. प्रतिष्ठा और उत्सव आदि कार्यों में बहुत द्रव्य खर्च किया था। इस के लिखवाये हुए ग्रंथों में का एक ग्रंथ, पाटन के सेठ हालाभाई वाले भाण्डार में है जिस पर निम्न लिखित प्रशस्ति लिखी हुई है। १-ग्यासुद्दीन मॉडव-गढ का वादशाह और खिलजी महमूद का बेटा था। यह वाद किनके साथ और किस विषय में हुआ था इस का कुछ पता नहीं लगा । 7 " सं. १५३२ वर्षे आश्विनमासे मंडपदुर्गचित्कोशे श्रीखरतर- गच्छे श्रीजिनभद्रसूरिपट्टपूर्वाचलालंकरणतरुणतरत रणिश्रीजिनचंद्रसूरिवि- जयराज्ये श्रीसिद्धान्तरुचिमहोपाध्यायशिप्यविजयसोमसाहाय्येन श्रीमाल- ज्ञातीयठकुरगोत्रे सं० जयतामाहीमीसुतेन श्रौजिनप्रासादप्रतिमाआ- चार्यादिनदप्रतिष्ठाश्रीतीर्थयात्रासत्रागाराद्यगण्यपुण्यपरंपरापचित्रीक्रियमाण- निजजन्मना स्वभुजार्जितशुक्लद्रव्यन्यूहव्ययलेखितसकलश्रीसिद्धान्तेन सु- श्रावक संमंडनेन पुत्रसं०वीमराज संजाऊ पु०वीना प्रमुखसकलकु- टुम्बपरिवारवृतेन श्रीभगवतीसूत्र लेखितं श्रीपत्तने । वाच्यमानं चिरं न- न्यात् ॥ इन के सिया पं० पुण्यमतिगणि, पं० लक्ष्मीसुंदरगणि, पं० मतिविशालगणि, पं० लब्धिविशालगणि और पा रत्नमर्तिगणि मादि और भी अनेक विद्वान् शिष्य थे-जिन के नाम इस विशाते. त्रिवेणि (पृष्ठ १५ और ६४) में दृष्टिगोचर होते हैं--परंतु उन के विषय में कोई ज्ञातव्य-वृत्तांत शात नहीं हुआ। जिनमसर की एक पापाणमय मूर्ति, जोधपुर-(मारवाड ) राज्य के खेडीट के पास जो नगरगांव हैं यहां के जैनमंदिर के भनिगृह में स्थारित है । यह मनि उकेशवंश के कायस्थल वाले किसी धायक ने (नाम नहीं मिला ) संवत् १५१८ मैं धनवाई थीं। + जिनरंगसूरि के समय में (सं. १७०१-२०) ५. विनययाम को लिस हुई पहावलि में, जिनमहरि के १८ विद्वान् शिष्य लिरो हैं। तस्य अष्टादश शिष्याः श्रीसिद्धान्तरुचिपाटक-श्रीकमलसंय. गोपाध्यायादयो विद्वांसः।" + भाषनगर प्राचीनधिसंगह, प्रथम भाग, (संवत् १९४२ में मुदित) पृध (परिशिर)...
७२ जयसागर उपाध्याय । न के जन्म-स्थान और माता-पितादि के विषय में कुछ भी वृत्तांत उपलब्ध नहीं हुआ। होने की विशेष संभावना भी नहीं है । विशेप कर इन वातों का उल्लेख पट्टावलि में हुआ करता है परंतु उस में भी केवल गच्छपति आचार्य ही के संबंध की बातें लिखी जाने की प्रथा होने से इतर ऐसी व्यक्तियों का विशेष हाल नहीं मिल सकता । ऐसा व्यक्तियों के गुर्वादि और समयादि का जो कुछ थोडा बहुत पता लगता है वह केवल उन के निज के अथवा शि. ध्यादि के बनाये हुए ग्रंथों वगैरह की प्रशस्तियों का प्रताप है। यदि इस प्रकार की प्रशस्तिये न मिले तो फिर उन के विषय चाहे जितने इधर उधर गोते लगाये फिरो, कुछ भी हाथ नहीं आता। उपाध्याय जयसागरजी के किये हुए ग्रंथों के अवलोकन से ज्ञात होता है, कि इन के दीक्षा-गुरु जिनराजसूरि थे (जिन का जिक्र ४७ वे पृष्ठ पर किया गया है)। अर्थात् जिनभद्रसूरि के ये गुरु-बन्धु थे। इन्हें विद्याभ्याल जिनवर्द्धनसरि ने कराया था। वे इन के विद्यागुरु थे । उपाध्याय-पद जिनभद्रसार की ओर से इन्हें दिया गया था । संवत् १५.३ में, प्रल्हादनपुर (पालनपुर-उत्तरगुजरात) में, माल्हा श्रावक की वसति ( उपाश्रय ) में रह कर, अपने शिष्य सत्यरुचि की प्रार्थना से इन्हों ने “पृथ्वीचंद्रचरित्र" नाम का एक कथा-ग्रंथ लिखा है जिस की प्रशस्ति में इन बातों का संक्षेप में जिक किया है । यथा- तत्पदृशाङ्कलवृक्षः स्थलकौस्तुभसन्निभः । श्रीजिनराजसूरीन्द्रो योऽभूद्दीक्षागुरुर्मम ॥ ३ ॥ तदनु च श्रीजिनवर्द्धनसूरिः श्रीमानुदैदुदारमनाः । लक्षणसाहित्यादिग्रन्थेषु गुरुर्ममप्रथितः ॥ ४ ॥ श्रीजिनभद्रमुनीन्द्राः खरतरगणगगनपूर्णचन्द्रमसः ।
ते चोपाध्यायपदप्रदानतो मे परमपूज्याः ॥ ५ ॥ श्रीजयसागरगणिना तेन मया वाचकेन शुचि वाच्यम् । पृथ्वीचन्द्रचरित्रं विरचितमुचित विस्तारम् ॥ ६ ॥ प्रल्हादनपुरनगरे त्रिविन्दुतिथिवत्सरे कृतो ग्रन्थः । माल्हाश्रावकवसती समाधिसन्तोपयोगेन ॥ ७ ॥ अभ्यर्थनया सत्यरुचेर्वमूव साहाय्यकारी गणिरलचन्द्रः। उपक्रमोऽयं फलवान् ममाभूत् क्रिया हि सहायकसव्यपेक्षया ।।८।। [जिस समय यह ग्रंथ लिखा गया उस समय जयसागरजी जिनभद्रसूरि के पक्ष में थे और जिनपर्धनरिका समुदाय इन्हें प्रति- पक्षी गिनता था तो मी पूर्व-उपकार (विद्यागुरु होने से ) के कारण इन्हों ने जिनवर्द्धनमरि के गुणों को अच्छी प्रशंसा की है । इस से इन की गुणशता का अच्छा परिचय मिलता है। ] उपाध्याय-पद इन्हें कर दिया गया इस का कहीं उल्लेख नहीं मिला परंतु अनुमान होता है, कि सागरचंद्राचार्य ने जिनवर्द्धनसरि के स्थान पर जय सं० १४७५ में जिनभद्रसूरि को स्थापन किया था तभी इन को भी अपने पक्ष में लेने के लिये-उपाध्यायपद प्रदान किया गया होगा। क्यों कि सं. १४७८ में इन्हों ने जो पर्वरना. घली" कथा लिपी है उस में ये अपने को उपाध्याय-विशेषण- विशिष्ट लिराते हैं। श्रीखरतरगच्छेशाः श्रीजिनराजसूरयः । तच्छिप्यः भोपाध्यायः किचिनो जयसागरः ॥ अपि च दिग्गजसप्तचतुःसितयुतिमिते परितः परिवत्सरे । नगरपचनमेत्य समर्थिता जयतु धर्मकथा जिनशासने ॥ उपयुक्त पृथ्याचंद्र घरित' भार ' पपरत्नायली' के सिया . संदेहदोलावलीलघुटीका' ' उपसर्गहरस्तोत्रवृत्ति', 'गुरुपारतंत्र्य- वृत्ति' आदि और भी छोटे बड़े अनेक ग्रंथों की इन्हों ने रचना की है। जुदा जुदा तीर्थकरों, तीर्थक्षेत्रों और प्राचीन ऋषिमुनियों के गुणानुवाद करने वाले ऐसे प्राकृत, संस्कृत और प्रचलितदेशभापा में अनेक प्रकार के स्तवन-स्वाध्याय भी इन के बनाये हुप उपलब्ध होते हैं । प्रवर्तकजी महाराज के शास्त्रसंग्रह में एक प्राचीन (अधुरी) पुस्तक है जिस में इन की ऐसी बहुतसी कृतियों का एकत्र संग्रह किया हुआ है। इस संग्रह में एक "तीर्थराजीस्तवन" है जिस में उन सव तीर्थों का उल्लेख है जो इन्हों ने फिर फिर कर उनके दर्शन किये थे । फरीदपुर से सं. सोमा के संघ के साथ जा कर नगरकोट्ट वगैरह जिन तीर्थों की यात्रा की थी और जिन का वर्णन इस विज्ञ- प्तित्रिवेणि में हैं उन का भी उल्लेख इस स्तवन में किया हुआ है। लिखा है- - १ यह टीका सं. १४९५ में वनाई गई थी। इस की प्रथम प्रति सोमकुंजर नामके इन के शिष्य-जिस का नाम वि. नि. के पृष्ठ १७ और ६३ में दृष्टिगोचर होता है-ने लिखी थी। इस का संशोधन स्वयं जिनभद्रसूरि ने किया था । अंतमें लिखा है कि- जैनेन्द्रागमतत्त्ववेदिभिरभिप्रेतार्थकल्पद्रुभिः सद्भिः श्रीजिनभद्रसूरिभिरियं वृत्तिविशुद्धीकृता । तद्वत्तार्किकचक्रिमिः श्रुतपथाध्वन्यैर्महावादिभिः प्रामाण्यं गमिता विचार्य च तपोरत्नैः पुरावाचकैः ॥ सोमकुञ्जरनामास्ति विनेयो विनयी हि नः । न्यधित प्रथमादर्श ग्रन्थमनमनाकुलः ॥ विक्रमतः पञ्चनवत्यधिकचतुर्दशशतेषु वर्षेषु । अथितेयं श्लोकैरिह पञ्चदशशतानि सार्द्धानि ॥
७५ मपि च नगरको? देशजालन्धरस्थे प्रथमजिनपराजः स्वर्णमूर्तिस्तु वीरः। खरतरवसतौ तु श्रेयसां धाम शान्ति- स्त्रयमिदमभिनम्याहादमावं भजामि ॥ १८॥ आनन्दाश्रुजलाविले मम दृशौ जाते चिरोत्कण्ठया दिष्टया कङ्कटकस्थितः प्रथमतो दृष्टो यदादिप्रभुः । तत्कि साऽपि सरस्वती स च गुरुगं प्रसन्नो यतो जिह्वा तद्गुणवर्णनादमिनवान्नाद्यापि विश्राम्यति ॥ १९ ॥ श्रीगोपाचलतीर्थे शान्ति, कोरिल्लके परं पार्श्वम् । नन्दनवन-कोठीपुरपूज्यं प्रणमामि वीरमहम् ॥ २० ॥ एते तेपु सपादलक्षगिरिषु प्रत्यक्षलक्ष्याः खलु क्षेमा एव मया चतुर्विधमहासङ्घन चाभ्यार्चिताः । प्रायः काञ्चनकुम्मशोभितगुरुप्रासादमध्यस्थिताः सान्द्रानन्दपदं दिशन्तु मम ते विश्वत्रयस्वामिनः ।। २१ ॥ इस के सिवा इस संग्रह में एक और स्तवन है जिस में स्वास नगरकोह ही के चैत्यों का वर्णन है (देखो परिशिष्ट नं. १)। संवत् १४८७ के घर्ष में इन्हों ने उत्तरगुजरात और सौराष्ट्र के सब तीर्थ- स्थलों की यात्रा की थी। इस यात्रा का प्रारंभ पाटन (अणहिल्लपुर) से हुआ था और बडली, रायपुर, महसाणा, व्यरगिरि (जिसे आज कल "कुणगेर" कहते हैं ), सलखणपुर ( संखलपुर ), धंधूका आदि स्थानों में हो कर शर्बुजयतीर्थ की यात्रा की गई थी। वहाँ से फिर तलाझा, दाठा, घृतकलोल, मेलिगपुर, अजाहर, दोर, ऊना, कोडि. नार, प्रभासपाटण, चोरवाड, घेरायल, और मांगलोर आदि स्थानों के जिनमंदिरों की यात्रा कर गिरनार तीर्थ के दर्शन किये गये थे। गिरनार से वापस गुजरात का रस्ता लिया गया और वलदाणा चूडा, राणपुर, धीरमगाम, मांडल, सीतापुर, पारि, हिंझवाश :
७६ इत्यादि गॉवों मे हो कर, हांसलपुर में इस तीर्थाटन की समाप्ति की गई थी। इस यात्रा के स्मरणार्थ भी एक स्तवन उपाध्यायजी ने बनाया है सो भी इस संग्रह में संगृहीत है (देखो परिशिष्ट नं. २)। जिनभद्रसूरि ने जो ग्रंथोद्धार का महान् कार्य प्रारंभ किया था उस में जयसागरजी का भी पूर्ण हाथ था। इन्हों ने भी अपने उपदे- शद्वारा श्रावकों को प्रतिवोध कर कर हजारों पुस्तकों का पुनर्लेखन करवाया था। इन के उपदेश से लिखे गये भी अनेक ग्रंथ पाटन के ऊपर्युक्त भाण्डागार में विद्यमान हैं जिन पर निन्नप्रकार के स्मरण- लेख लिखे हुए हैं। संवत् १४ चैत्रादि ९५ वर्षे चैत्रमासे कृष्णपक्षे पंचम्यां तिथौ सोमदिने धवलकपुरप्रत्यासन्नमुफरेपुरग्रामे व्यवहारचूर्णेः पुस्तकं लिखित- मिदं । श्रीखरतरगच्छेशश्रीजिनभद्रसूरीणां श्रीआशा पल्लीकोशसत्के श्रीमन्महोपाध्यायजयसागरैलिखापितं ॥ संवत् १४९७ वर्षे खरतरगच्छाधीशश्रीजिनराजसूरि शिष्य श्री- जयसागरोपाध्यायोपदेशेन सा० सरवण भार्या सियाणी तत्पुत्रिकया श्रीजिनधर्ममामकर्पूरचूरवासितहृदयया फुल्लूश्राविकया शास्त्रमिदं लेखयां चके श्रीपत्तने वाच्यमानं चिरं नंदतु ॥ ** शिष्य-समूह । * जिनभद्रसूरि की तरह जयसागर उपाध्याय के भी अनेक शिष्य थे और विद्वान् भी बहुत से थे। विज्ञप्तित्रिवेणि से मालूम होता है के प्रथम शिष्य पं० मेघराजगणि थे । यद्यपि इन का बनाया हुआ कोई ग्रंथ मेरे देखने में नहीं आया तथापि विज्ञप्तित्रिवेणि में (पृष्ठ ४३-४५) नगरकोट्ट के आदिनाथ भगवान् की स्तवनानिमित्त २४ काव्यों का हारचित्रबंध-स्तोत्र जो इन का बनाया हुआ है उस के कि इन देखने से पाठक जान सकते हैं कि ये अच्छे विद्वान् थे । सोमकुंजर नाम के दूसरे शिप्य भी इन्हीं के जैसे विद्वान् प्रतीत होते हैं । वि०वि० के पृष्ठ ६१ से ६३ तक में जो द्विव्यंजन, रसनोपमा आदि विविध थालंकारिक पद्य है ये इन्हीं के बनाये हुए हैं । जैसलमेर के संभव. नाथ-मंदिर की वृहत्प्रशस्ति भी, जिस का कुछ भाग ऊपर-पृष्ठ ५३ और ५६ पर-दिया गया है, इन्हीं की रचना है । स्थिरसंयम नामक शिष्य के भी किये हुए ६-७ पद्य वि०वि० के ६३ वे पृष्ट पर नजर आते हैं। इन के सिवा +सत्परुचिगणि, पं० मतिशीलगणि आदि शिष्य, जिन का नाम वि०नि० (पृ.१७ ) में हैं, के विषय में कोई उल्लेख-योग्य यात जानी नहीं गई। प्रसिद्ध शिष्य तथा उनकी संतति । जयसागरजी के शिष्यों में से अधिक प्रसिद्ध शिष्य रत्नचंद्र थे। ये वही रत्नचंद्र हैं जिन का जिक्र वि०नि० में-पृष्ठ १७, २१ और ५५ पर -शुल्लक (नवदीक्षित ) के विशेषण से किया गया है । इस विशेषण से मालूम होता है कि सं० १४८४ के लगभग दी इन्हें * S. R. Bhandarkar's Report of a Second Tour in Senrch of Sanskrit manuscripts made in Rajputana and Central Indin in 1904-05 and 1905-0G, P.66. + सलरचि को प्रार्थना से " पृथ्वीचंद्र चरित्र"-जिस के प्रति पद्य ऊपर दिये गये हैं-जयसागरजी ने बनाया था। : इन के अध्ययन निमित्त सं १५०१ में कियारत्न समुपय नाम फा व्याव- रम-विषयक प्रथ जयसागरजी मे लिगा या जो आज तक पाटन के भांमार में रवित है। इस पर लिया हुआ है कि- सं० १५०१ वर्षे पोपशुदि ११ रवी श्रीसरतरगच्छेशीजिनरा- जसरिशिष्याणु उपाध्याय श्रीजयसागराणानुपदेशन सच्छिप्यरलचंद्रपट- नार्थ परोपकारपियाऽयं सवीनकः क्रियारत्नसमुचयो नामा ग्रंथोऽलेसि।
दीक्षा स्वीकार की होगी। क्रम से इन्हों ने शास्त्राभ्यास में उत्तरोत्तर अच्छी प्रगति की और थोडे ही समय में ऊंचे दर्जे के विद्वान् वन गये । 'पृथ्वीचंद्र चरित्र' की प्रशस्ति में स्वयं जयसागरजी ने लिखा है कि गणि रत्नचंद्र की सहायता से यह कार्य सफलता को पहुंचा है। (देखो ऊपर पृष्ठ ७३). योग्यता और अवस्था को प्राप्त होने पर पीछे से इन्हें भी ग- च्छपति की ओर से उपाध्याय पद समर्पित किया गया था। उपा. ध्याय पद बहुत कर के जिनभद्रसृरिने दिया होगा । क्यों कि, इन विषय के जितने उल्लेख, इस पद विशिष्ट, मिले हैं उन में सब से प. हले की साल १५२१ की है। इस लिये १५२१ के पहले और १५१५ के पीछे अर्थात् इन ७ वर्ष के बीच में-इन्हें उपाध्याय पद मिला होगा और इस समय गच्छपति जिनचंद्रसरि ही थे इस लिये उन्हीं के द्वारा वह दिया गया होने का अनुमान मिथ्या नहीं होगा । इन की संतति का संतान दीर्घ काल तक चला और उस में अनेक अच्छे अच्छे विद्वान् हुए । १८ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में खरतरगच्छ में श्रीवल्लभ नाम के जो उपाध्याय और प्रसिद्ध ग्रंथकार हो गये हैं वे इन्हीं की संतति में से थे। श्रीवल्लभ ने, हैमलिंगानुशासनदुर्गपदवृत्ति, अभिधानचिन्तामणिव्याख्या, शिलोञ्छव्याख्या, विजयदेवमहात्म्य इत्यादि अनेक ग्रंथों की रचना की है। शिलोञ्छव्याख्या के अंत की प्रशस्ति में इन्हों ने अपनी गुरुपरंपरा इस प्रकार लिखी है:- रण * यह उल्लेख, पाटन के वाढीपुर-पार्श्वनाथ के भांडार में " सिद्ध हैम व्याक- की पुस्तक है उस पर किया हुआ है। यथा- सं० १५२१ वर्षे शीरोही वास्तव्य उकेशवंशीय माल्हूगोत्रीय साह सहसा भार्या सोनलदे पुत्र साह ईला सुश्रावकेण भ्रातृ सेला चांपा पुत्र पद्मा जिनदास प्रमुखपरिवारसहितेन श्रीखरतरगच्छे श्रीजयसागर- महोपाध्यायशिष्य श्रीरत्नचंद्रोपाध्यायानामुपदेशेन श्रीसिद्धहमलक्षण- हद्वृत्तिकक्षापट्टग्रंथोऽलेखि ॥
७९ शुशुभिरे जिनराजमुनीश्वराः खरतराहगणाप्रदिवाकराः। तदनुभूरिगुणा जयसागरा जगति रेजुरनुत्तमपाठकाः ।।७।। तेपां शिष्या मुख्या दक्षा आसन्नदुप्यगुणलक्ष्याः । श्रीरत्नचन्द्रनामोपाध्यायाः साधुपरिधायाः ॥८॥ तत्पदृस्फुटपद्मप्रकाशनोदारसूरसङ्काशाः । श्रीभक्तिलाभनामोपाध्यायाः शास्त्रकारः ॥ ॥९॥ धीमन्तोऽन्तिपदस्तेषां कलाकौशलपेशलाः । समजायत राजन्तो ग्रन्थार्थाम्भोधिपारगाः ॥१०॥ चारित्रसारपाठक-भावाकर-सद्गणीश्वरा दक्षाः । श्रीचारुचन्द्र-वाचकधुर्याः स्मार्या मुनीशानाम् ।। ११ ॥ वेषां क्रमशः पट्टव्योमागणशीतरश्मितकाशाः । श्रीभानुमेरु-वाचक-जीवकलश-कनककलशाहाः ॥१२॥ तत्र चारित्रसाराख्या उपाध्याया महाशयाः। बभूवुः श्रुतपाथोधिपारीणाः साधुवृत्त्यः ॥ १३ ॥ तत्प? सममूवन् विलसत्संवेगरनसँल्लीनाः वाचकपदप्रधानाः श्रीमन्तो भानुमेहाः ॥ १४ ॥ जयन्ति क्ष्मायां समयकथितज्ञानविमला- श्चिरं चञ्चत्पाटकपदवरा ज्ञानविमलाः। लसतत्पट्टे वचनरचनारक्षितजना महावादिनाजप्रमितिकथनावाप्तविजयाः ॥ १६ ॥ वैराग्यरससॅलीना तद्गुरुमातरोऽधुना । विजयन्ते महान्तस्तेजोरगगणीश्वराः ॥ १७ ॥ तेषां जयन्ति जयिनः सुनया विनेयाः . सद्भाग्यधेयमतिमत्पतिवायजेयाः । श्रीज्ञानसुन्दरसुधी-जयवल्लभाया वाग्देवताप्रतिमसत्प्रतिभाप्रधानाः ॥ १८ ॥ श्रीज्ञानविमलपाठकसत्पदाम्भोजचञ्चरी केण श्रीवल्लभेन रचिता शिलोन्छशाले शुभटीका ।। १९ ॥ इन श्लोकों का तात्पर्य केवल यह है कि-जिनराजसरि के शिप्य जयसागर उपाध्याय गुए। उनके शिष्य रत्नचंद्र उपाध्याय और उन के शिप्य शास्त्रों के कर्ता ऐसे भक्तिलाभ उपाध्याय हुए। भक्तिलाभ के शिष्य चारित्रसारादि चोर उन के शिष्य भानुमेरु आदि हुए। भानुमेरु के दो शिप्य थे-१ ज्ञानविमलपाठक और २ तेजोरंगगणि । शानविमलपाठक के विद्वान् और विनयवान् ऐसे ज्ञानसुंदर, जयवल्लभ और श्रीवल्ल नाम के शिष्य हुए जिन में से श्रीवल्लभ पाठक ने इस ग्रंथ की रचना की । यदि इनका वंशवृक्ष बनाया जाय तो प्रकार होगा। (देखो सामनेका पृष्ट । ) * इन के लिये लिखा गया नाम का ग्रंय पाटग के संघ वाले भाण्डागार में है जिस १६ यह लिखा हुआ है- सं. १५३२ वर्षे श्रीजयसागरमहोपाध्यायशिष्यरत्नचंद्रोपाध्या- यराजानामुपदेशेन शिष्यभक्तिलाभाय [पटना)] स्तंभतीर्थवास्तव्य श्रीमा- ' लवंशे फोफलियागोत्रे श्रे० वाछा भा० देल्हू पुत्र लापाकेन भार्या ली- लादे पुत्र जागा जेसिंघादिपरिवारेण स्वपुण्याथै लिखापितं ॥ इन का बनाश हुआ कोइ ग्रंथ अभी तक मेरे देखने में नहीं आया। जैनग्रंथावलि (पृष्ठ २९८) में भकिलाभ का बनाया हुआ " बालशिक्षा व्याकरण लिखा है और वह जेसलमेर की टीप में बताया गया है; संभव है कि वह इन्हीं का किया हुआ हों। । चारित्रसार के पढनेके लिये लिखे गये " शशधर नामातग्रंथ " ( जो पाटन के सेठ हालाभाई के भांडार में संगृहीत है ) के अंत में इस प्रकार उल्लेख है- " प्राकृतव्याकरण " - * जिनराजमूरि (स्वर्ग १४६१) ११ मा . । जिनभद्रसूरि (स्व. १५१४) जयसागरोपाध्याय, जिनवर्द्धनसरि. (मूल शारा.) (पिप्पल खरतर । शासा) रत्नचंद्रोपाध्याय. मेघराज, सोमकुंजर, सत्संकाचे. जिनचंद्रसूरि (स्व. १५३०) कमलसंयमोपाध्याय. (प्रधानशिष्य) जिनचंद्रसूरि. ...) जिनसमुद्रसरि (स्थ. १५५५) मफिलाभोपाध्याय, जिनसागरसूरि. सिधान्तरचि जिनहससरि (स्व. १५७२) महोपाध्याय. जिनसुंदररि. चारित्रसारोपाध्याय. भावसागर. सोमचंद्र. जिनमाणिक्यसूरि (स्व. १६१२) जिनहर्षसूरि. साधुसोम, विजयसोम. जीवकलश. कनककलश. जिनदरि (स्व. १६७०) शानपिमल. तेजोरंग. जिनचंद्रसूरि. कमलसंयमो. जिनसिंहसूरि (स्व. १६७४) पाध्याय (२) श्रीवहभपाठक. ज्ञानसुंदर. जयवालम. जिनराजसूरि (स्व. १६९९) । । * इस टेबल में, प्रस्तावना में और भी जिन जिन का उल्लेख हुआ है उन सब के नाम दिये गये हैं।
८२ श्रीवल्लभोपा ध्याय के गुरु ज्ञानविसलजी भी चडे अच्छे विद्वान् थे । संवत् १६५४ में, बीकानेर (राजपूताना-मारवाड) में, कि जिस समय वहां पर राजा राजसिंहजी राज्य कर रहे थे, रह कर इन्हों ने महे- श्वर कवि के किये हुए "शब्दप्रभेद" कोश ऊपर एक अच्छी विस्तृत टीका लिखी है । इस के अवलोकन से इन के पाण्डित्य का परिचय मिलता है । इस टीका की प्रशस्ति में अपने विद्वान् शिष्य श्रीवल्लभ का भी उल्लेख किया है और लिखा है कि यह टीका उन्हीं के गाढ साहाय्य से सिद्धि को प्राप्त हुई है। अस्मदन्तिपदो गाढसाहाय्यात् सिद्धिमागता । विद्वच्छ्रीवल्लभायस्य युक्तायुक्त विवेचिनः ।। श्रीवल्लभोपाध्याय की कृतियों में से एक कृति बडी ध्यान खींचने लायक है। इस का नाम है विजयदेवमहात्म्य । इस में तपा- गच्छ के प्रसिद्ध आचार्य श्रीविजयदेवसूरि (जिनका नाम ऊपर १८ सं० १५४१ वर्षे श्रीपत्तनमहानगरे श्रीखरतरगच्छे श्रीजिन- राजसूरिशिष्य श्रीजयसागरमहोपाध्यायशिप्यशिरोमणिश्रीरत्नचंद्रमहो- पाध्याय शिष्य श्रीभक्तिलाभोपाध्याय शिष्यवा० चारित्रसारगाणपठनार्थ लिखितोऽयं शशधरनामा तर्कग्रंथः ।। * इस टीका की एक प्रति, जो कि इन्हीं के उपदेश से लिखाई गई है और पाटन के सागरगच्छ के उपाश्रय में अब तक मौजूद है, उस पर इस तरह लिखा हुआ है:- सं. १६५७ वर्षे श्रीमद्गृहत्खरतरगच्छे श्रीमेडतानगरे........ श्रीमज्जिनचंद्रसूरिविजयि राज्ये श्रीजयसागरमहोपाध्यायसंतानीय श्रीज्ञा- नविमलोपाध्यायानामुपदेशेन लोढाकुलावतंस संघपति जयवंत भ्रातृ सं० भीम-राजाभिधयोः पुत्ररत्नाभ्यां सं० राजसिंह सं० पुंजराजाह्वयाभ्यां शब्दप्रभेदवृत्तिप्रतिरियं लेखयित्वा विहारिता........।
धे पृष्ठ की फुटनोट में आया है) का सविस्तर जीवनचरित्र वर्णन किया गया है। (ध्यान में रहे कि चरित्रनायक और चरित्रलेखक दोनों समानकालीन है और विजयदेवसूरि, अपने महात्म्य के निर्माण समय में विद्यमान थे।) उस समय परस्पर सांप्रदायिक विरोध इतना बढा हुआ था कि एक गच्छ वाले दूसरे गच्छ की प्रतिष्ठित व्यक्ति के गुणानुवाद करने तो दूर रहे पंतु श्रवण में मी मध्यस्थता नहीं दिखला सकते थे । अर्थात् तपागच्छ वाले खरतर- गच्छीय व्यक्ति के प्रति अपना बहुमान नहीं दिखा सकते थे और खरतरगच्छानुयायी तपागच्छ के प्रसिद्धपुरुष की प्रशंसा करते दिलमें दुःख मनाते थे। ऐसी दशामे, खरतरगच्छीय एक उपाध्याय के द्वारा तपागच्छ के एक आचार्य के गुणगान में बड़ा ग्रंथ लिखा जाने वाला काम अवश्य आश्चर्य उत्पन्न करता है । समाज की यह विरोधात्मक प्रकीत, श्रीवल्लभ पाठक के ध्यान से यहार न थी। चे इस यात को अच्छीतरह जानते थे कि मेरे इस-भिन्नगच्छ के आचार्य की प्रशंसा और स्तचना करने वाले ग्रंथ के लिखने रूप- कार्य से बहुत से दुराग्रही स्वसांप्रदायिक असंतुष्ट हो कर मुझ पर कटाक्ष करेंगे। इस लिये इन्हों ने ग्रंथ के अंतमै, संक्षेप में परंतु असरकारक शब्दों में लिख दिया है कि- यदन्यगच्छप्रभवः कविः किं मुक्वा स्वसूरिं तपगच्छसूरेः । कथं चरित्रं कुरुते पवित्र शङ्केयमाने कदापि कार्या ।। आत्मार्थसिद्धिः किल कस्य नेष्टा सा तु स्तुतेरेव महात्मनां स्यात् । आमाणकोऽपि प्रथितोऽस्ति लोके गंगा हि कस्यापि न पैतृकीयम् ॥ तलान्मया केवलमर्थसिद्धथै-जिहापवित्रीकरणाय यद्वा । इति स्तुतः श्रीविजयादिदेवः सूरिस्सम श्रीविजयादिसिंहैः ।। अर्थात्--अन्य (खरतर ) गच्छवाला कवि अपने गच्छ के आचार्यको छोट फर तपागच्छ के आचार्य का चरित्र कैसे बनाता है, यह शंका विद्वान् मनुष्यों को न लानी चाहिए। क्योंकि आत्म.
सिद्धि किसे अभीष्ट नहीं है ?-सभी को इष्ट है । यह आत्मसिद्धि महात्माओंकी स्तुति द्वारा होती है । और महात्माओं के लिये यह कोई नियम नहीं है कि वे अमुक पंथ या समुदाय में ही उत्पन्न हुआ करते हैं और यह भी कोई प्रतिबंध नहीं है कि अमुक मतानुयायी अमुक ही महात्माओं की स्तवना करें। जैसे गंगा किसी के वापकी नहीं है-सब ही उस के अमृतमय जल का पान कर सकते हैं-वैसे महात्माओं भी किसी के रजिष्टर्ड नहीं किये हुए हैं सब ही मनुष्य अपनी अपनी इच्छा अनुसार उन के गुणगान कर अपनी उन्नति कर सकते हैं । इस लिये मैंने-खरतरगच्छानुयायी हो कर भी-अपनी जिहा को पवित्र करने के लिये तपागच्छ के महात्मा श्रीविजयदेव. सूरि और (उनके शिष्य ) विजयसिंहसरि का यह पवित्र चरित्र लिखा है । इस विषय में किसीको उद्वेगजनक विकल्प करने की जरूरत नहीं है। वाह ! कैसी उदार दृष्टि और कैसा गुणानुराग ? । यदि केवल इन ही ३ पद्यों का स्मरण और मनन हमारा आधुनिक जैन समाज करें तो थोडे ही दिनों में वह उन्नति के शिखर पर आरूढ हो सकता है। शासनदेव वह दिन शीघ्र दिखावें । .- * नगरकोट्ट महातीर्थ । वि ज्ञप्तित्रिवेणि की दो प्रधान व्यक्तियों का-आचार्य श्रीजिनभद्र और उपाध्याय धीजयसागर का-य. धिक परिचय दिया जा चुका । अब केवल एक प्रधानस्थान का परिचय वाकी है। वह स्थान नगरकोट महातीर्थ है, कि प्रधानतः जिस की यात्रा का वर्णन इस प्रबंध में किया गया है। देखें तो अब, यह स्थान कहां पर है और इसे आज कल क्या कहते हैं ? नगरकोट को आज कल काँगडा या कोट काँगडा कहते हैं। इस का आधुनिक हाल धातू साधुचरणप्रसाद ने अपने " भारत- भ्रमण" के द्वितीय-खण्ड (पृ. ४७२.) में, संक्षेप में इस प्रकार लिखा है:- " पंजाब के जलंधर-विभाग के काँगडा जिले में (३२ अंश ५ फला १४ विकला उत्तर अक्षांश; ७६ अंश १७ कला ४६ विकला) पूर्व देशांतर में काँगडा म्युनिस्पलिटी कलया है, जिस को पहिले लोग नगरकोट कहते थे । सन् १८८१ की मनुष्य-गणना के समय काँगडा में ९२८ मकान और ५३८७ मनुष्य थे; अर्थात् ४४५४ हिन्दू, ८७२ मुसलमान,९सिक्स और ५२ दूसरे। कसवा एक पहाडी के दोनों ढाल पर बसा है। यहां से वाण- गंगा देख पडती है । दक्षिणी ढाल पर कसवे का पुराना भाग; उत्त. रीय ढालू पर भवनकी शहर तली और महामायादेवी का प्रसिद्ध मंदिर और खडे चट्टान के सिर पर किला है; जिस में गोरखा रेजीमेंटका १ भाग रहता है। कॉगड़े में तहसीली, खेराती अस्पताल, स्कूल और सराय हैं। यह कसया सुंदर नीला मीनाकारी और गहना बनने के काम के लिये प्रसिद्ध है। काँगड़ा में महामाया " १४ ८६ देवी का मंदिर अति प्राचीन और बहुत प्रसिद्ध है; जहां दूर दूर से यात्रीगण विशेष करके नवरात्रों में देवी के दर्शन के लिये आते हैं। . "काँगड़ा जिला:-स के पूर्वोत्तर हिमालय का सिलसिला, जो तिव्वतदेश से इस को अलग करता है; दक्षिण-पूर्व वसहर और बिलासपुर के पहाडीराज्य; दक्षिण-पश्चिम होशियारपुर जिला और पश्चिमोत्तर चक्की नामक छोटी नदी, बाद गुरदासपुर जिले का पहाडी भाग और चंबा का राज्य हैं । काँगडा जिले का क्षेत्रफल पंजाब के सब जिलों में दूसरा याने ९०६९ वर्गमिल है; जिस में हमीरपुर, डेहरा, नूरपुर, काँगडा और कुल ५ तहसील हैं। जिले में मैदान और पहाडी देश दोनों हैं । पहाडियों के बगलों में और उन के ऊपर जंगल लगे हैं । कई एक जंगलों में अनेक प्रकार के उत्तम जंगलीवृक्ष है । वनों में चिता, भालु, भेडियाँ, बहुत है; वाघ भी कभी कभी देख पड़ते हैं और कई एक प्रकार की बनली विलाडियाँ हैं । काँगड़ा जिले में व्यास, चनाव और रावी नदियाँ निकलती हैं। व्यास कुलू के उत्तर रोहतंग पहाडियों से निकल कर लगभग ५० मील दक्षिण-पश्चिम बहने के बाद मंडी राज्य में प्रवेश करके उस को लांघती है, पश्चात् , खास काँगडा की संपूर्ण घाटियों में वहती हुई पंजाब के मैदान में जाती है । चनाव नाहुल के ढालुओं से बहती हुई मध्यहिमालय के उत्तर चंवा राज्य में प्रवेश करती है; और रावी नदी बंगहालपाटि में बहती हुई, पश्चिमोत्तर को चंबा राज्य में गई है । इस जिले में लोहा, शीशा, और तांवा की खाने हैं। व्यास नदी की वालू में कुछ सोना मिलता है। काँगडा और कुलू तहसील में स्लेट-पत्थर बहुत है, जो अंबाले जलंधर आदि जिलों में मकानों की छत पटाने के लिये भेजा जाता है। काँगड़ा का पूर्व-इतिहास भी इस पुस्तक में संक्षिप्ततया निम्न प्रकार लिखा है:- काँगड़ा कसबा पूर्व काल में कटौच राज्यकी राजधानी था। राजकुमार "तवारिखी समय के पहिले से अंग्रेजों के कटौच राजकुमार आने के समय तक काँगड़ा की घाटी पर हुकूमत करते थे। सन् १००९ ई. में गजनी के महमूद ने हिन्दुओं को पेशावर में परास्त फर के नगरकोट ( कांगड़ा) का किला ले लिया और यहां की देवी के मंदिर के बहत सोना, चांदी और रत्नों को लूटा, परंतु ३५ वर्ष पीछे पहाडी लोगों ने दिल्ली के राजा की सहायता से मुसलमानों से फिला छीन लिया। सन् १३६० में फिरोज तोगलक ने काँगड़ा पर चढाई की। राजा उस की आधीनता स्वीकार करके अपने राज्य पर कायम रहा; परंतु मुसलमानों ने फिर एक बार मंदिर का धन लूटा । सन् १५५६ में अकबर ने काँगड़ा के फिले को ले लिया। मुगल यादशाहों के राज्य के समय फाँगड़ा कसवे की जन-संख्या इस समय की आयादी से बहुत अधिक थी। सन् १७७४ में सिक्ख प्रधान जयसिंहने छलसे काँगड़ा के किले को ले लिया, जिस ने सन् १७८५ में कॉगड़ा के राजपूत राजा संसारचंद को दे दिया । सन् १८०५ के पश्चात् ३ वर्ष तक गोरखों की लूट से मुल्क में अराजकता फैली रही सन् १८७९ में लाहौर के महाराज रणजीतसिंह ने गोरखों को परास्त कर के संसारसिंह को राज्याधिकारी बनाया । सन् १८२४ में संसारचंद की मृत्यु होने पर उस का पुत्र अनरुद्धसिंह उत्तराधिकारी हुआ। ४ वर्ष पीछे जव अनरुद्धसिंह उदास हो अपना राजसिंहासन छोड कर हरिद्वार चला गया, तच रणजीतसिंह ने राज्यपर आक्रमण कर के उस का एक भाग ले लिया। सन् १८४५ की सिक्ख लडाई के समय अंगरेजी सरकार ने काँगड़ा को ले लिया, परंतु फिले पर उन का अधिकार पीछे हुमा । काँगड़ा जिले की सदर कचहरियां पहले काँगड़ा कसये में थी, परंतु सन् १८५५ में वह धर्मः शाला में नियत हुई, तब से काँगड़ा फसवे की जन-संख्या तेजी से घट गई। काँगड़ा जिले को पूर्व काल में जालंधर या विगत देश कहा १ हेमचंद्राचार्य ने अपने ' अभिधानवितामाण' कोश में भी ऐसा ही लिसा : जालन्धरालिगाः स्युः । ( काण्ड १, श्लोक २४ ।) " करते थे। इन्हीं नामों से इस वि. वि. में भी इस का उल्लेख किया गया है ( पृ० २३ और २९. ) नगरकोह का दूसरा पुराना नाम सुशर्म- पुर भी था (देखो पृ. २३ तथा ४०)। यह नाम, कोरग्राम-जो काँगड़ा से २५ मैल दूरी पर ईशान कौन में हैं-के शिववैजनाथ के प्रसिद्ध मंदिर की पुरानी प्रशस्तियों में भी नजर आता है । ऐसा प्रती होता है कि शहर का नाम नगरकोट्ट या सुशर्मपुर था और किले का नाम 'कंगदकदुर्ग' था। इसी 'कंगदक' का रूपा- न्तर वर्तमान में 'काँगड़ा' के रूपमें परिणत हो गया है। 'काँगड़ा' का किला पहले बडा रवन्नक पर था । कटोय जाति के राजपूत, जो कि असली सोमवंशी क्षत्रीय थे, इस किले पर चिर काल से अपना अधिकार रखते थे। कहा जाता है, कि महाभारत के, विराटपर्व के, ३० वें अध्याय में, दुर्योधन की ओर से विराट- नगर पर चढाई ले जाने वाले त्रिगर्त देश के जिस सुशर्मनामक राजा का जिक्र है उसी ने इस नगर को बसाया था और अपने नाम की स्मृति के लिये इस का नाम " सुशर्मपुर" रक्खा था । कटौचराजपूत इसी सुशर्म राजा की संतति हैं । म्लेच्छों के अत्या- चारी आक्रमणों के सवच यह नगर अनेक वार' उध्वस्त हुआ और फिर बसा। परंतु इंग्रेजीराज्य के प्रारंभ वाद यह स्थान सदा के लिये गौरवशून्य हो गया। * देखो, Epigraphia Indica, Vol. I, XVI. विज्ञप्ति-त्रिवेणि के पृष्ठ ४२ पर नगरकोट की आदिनाथ भगवान की मूर्ति का जो ऐतिह्य वृत्तांत कहा गया है उसे भी इस कथन से पुष्टि मिलती है । क्यों कि वहां पर भी लिखा गया है, कि नेमिनाथ (२२ ) तीर्थकर के समय मे सुशर्म नाम के राजा ने इस मूर्ति की स्थापना की थी। संभव है कि नगर की और इस प्रतिमा की एक ही साथ स्थापना हुई हों। परंतु इस विषय में इस त्रिवेणि के सिवा और कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। इस लिये इस बात की सत्यता सिद्ध करने की चेष्टा करना निरर्थक है। तथापि इतना अवश्य सत्य है कि यह मूर्ति थी वहुत प्राचीन ।
१९. , धर्तमान समय में नगरकोह या कागडे में एक भी मनुष्य जैन नहीं है। टीक टोक हालत में कोई जैनमंदिर मी नहीं है । जनसमाज में से कोई यह जानता भी नहीं, कि पूर्वकाल में यह स्थान हमारा यदा तीर्थभूत था, दूर दूर का जनसमाज इस की पामा करने के लीये आया करता था, सफड़ों जैनों का यह वास स्थान था, रूप. चंद्र से नृपति के यनवाये हुए जिनमुवन से अलंकृत था और नरेन्द्रवंद्र जैसा राजा जैनधर्म के साथ सहानुभूति रसता तथा जिनमूर्तियों का भावपूर्वक पूजन किया करता था । न जाने हमारे ऐसे कितने कतिचिद्धों पर अंधकार के और विस्मरण के घर पर यर जमे हुए हैं-पट पर पट चढे हुए हैं। इस त्रिवेणि से (और परिशिष्ट नं.१ याले “ नगरको चैत्य- परिपाटिस्तयन" से )शात हो रहा है कि पंदरहवीं शताब्दी के अंत में यहां पर, श्वेताम्यरसंप्रदाय ही के बड़े पडे ४ जिनमंदिर थे। इन के सिवा दिगम्बरसंप्रदाय के भी कुछ मंदिर अवश्य होंगे । क्यों कि जनरल ए. फनींगहामं (General A. Cunningham ) के कथन से, जो फि मागे लिया जायगा, जाना जाता है. कि बादशाही समान में यहां की दिवानगिरि दिगंबर जैन किया करते थे। इस से संमय है कि यहां पर दिगंबर जनों की भी यसति और कुछ मंदिर अयस्य दोंगे। इस नियपि में, नगरकोहफे जिन ४ जिनमंदिरों का वर्णन उन में का आज एफ. मी विधमान नदी है। न जाने पर ही के x राजा काचन्द्र इ. ग. 1986 में विमान पा । फिरोज तोगल ने इस में जमा पर पाई सरापासप उमरा गामना ने पाटा मार या I TERोगदामने पारित ग. गोट बा ५ वी मिद में, (पृ. १५. पर)- रामानों का रोटर दिशा में पर पाएका नरेन्द्र का भार उ441 भावनानि मिति १४६५ मा राकिम 12 होती। पर मरेन्द्रपरहार सास, मदिर,fri.४१ हालिदिए। 1 .
९० - भू-तल में लीन हो गये हैं। परंतु, तो भी इन के स्मृति चिह्न कुछ कुछ अव भी विद्यमान हैं। कुछ प्राचीन जिनमूर्तियाँ आज भी, इस पूर्वकालीन वृत्तांत की सत्यता को स्पष्ट प्रकट कर रही हैं । गवर्नमेंट के पुरातत्त्व-विभाग की कृपा -विभाग की कृपा से हमें हमारे इन अवशिष्ट कीर्ति- चिह्नों का थोडा बहुत पता लगता है। - गवर्नमेंट के पुरातत्त्व-विभाग के डायरेक्टर जनरल सर ए. कींगहाम सी. एस् , आई, (Sir A. Cunningham, C.S.I Director General, Archeological Survey of India ) साहव ने अपनी आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑव इंडिया की लन् १८७२-७३ की रीपटि के ५ वे भाग में ( Archeological Survey of India. Reports 1872-73, Vol. V.) काँगडा का संक्षिप्त प्राचीन इतिहास और वहां की प्राचीन इमारतों का कुछ हाल लिखा है । इस में उन जिनमतियों का भी उल्लेख है जो वर्तमान में वहां पर विद्यमान हैं। किले में के प्राचीन देवालयों का वर्णन करते हुए (पृष्ठ १६३ में) लिखा है किः- किले के अंदर जो छोटे छोटे देवालय बने हुए हैं वे कीर- ग्राम के वैजनाथ और सिद्धनाथ के बड़े मंदिरों के जैसे ही हैं । इन की दिवालों का दृश्य बहार से बहुत कुछ शोभा दे रहा है। इन के अंदर एक भी स्तंभ नहीं लगाया गया। केवल चौकोने कमरे बने हुए हैं। इन के विषय में न कोई कीसी प्रकार के लेख ही मिले हैं और न कोई दंतकथायें ही जानी गई हैं। इन मंदिरों में, एक पार्श्व- नाथ का मंदिर है जिस में आदिनाथ की वडी भव्य जिनप्रतिमा स्थापित है । इस प्रतिमा की गद्दी ऊपर एक लेख है जिस की मिति संवत् १५२३ अर्थात् इस्वीसन् १४६६ की है। यह लेख प्रथम संसा- रचंद्र राजा के समय का है। कालीदेवी के मंदिर में भी पहले एक लेख था ।......मैं ने जब इस मंदिर की मुलाकात ली तब मुझे यह लेख नहीं मिल सका । इस के विषय में किसी ने मुझ से कोई हाल भी नहीं कहा। सौभाग्य से, इस लेख की दो नकलें मेरे पास हैं, जो सन् १८४६ में मैंने अपने हाथ से लिख ली थीं। इस की मिति संवत् १५६६ और शक १४१३ है जो दोनों इ. स. १५०९ के वरावर होती हैं। इस के प्रारंभ में "ओम् स्वस्ति श्रीजिनाय नमः इस प्रकार जिन को नमस्कार किया गया है। .... .... .... .... .... काँगड़ा गाँव में सब से प्राचीन मंदिर इंद्रेश्वर का है जो राजा इंद्रचंद्र का बनाया हुआ कहा जाता है । यह राजा काश्मीर के राजा अनंतदेव के समकालीन होने से इ. स. १०२८ से १०३१ के मध्य में विद्यमान होगा। यह मंदिर यहार से मात्र ९फीट और २ इंच चौरस है । इस के दरवाजे के आगे एक कमान है जो चार स्तंभों के आधार पर टिकी हुई है। इस मंदिर के अंदर का और कमान का भू-तल, यहार की जमीन से २ फीट नीचा है जो यह बताता है, कि मंदिर के बने बाद इतनी जमीन ऊपर को चढ गई है। मंदिर के मध्य में एक सामान्य लिंग स्थापित किया हुआ है । परंतु, कमान के यहारी भाग में अगणित मृतिये, पंक्तिवद्ध स्थापित कर रक्सी हैं । इन में दो मूर्तिये, जो जैनों की है, बहुत ही प्राचीन हैं । इन में की एक मूर्ति बैठी हुई पुरुषाकृति की है जिस के दोनों हाथ खोले में रक्खे हुए हैं । इस की गद्दी पर वृषभ की आकृति खींची हुई है जो आदिनाथ का लांछन गिना जाता है । नीचे के भाग पर ८ पंक्तियों का लेख है जिस के प्रारंभ में " ओम् संवत् ३० गच्छे राजकुले सूरि "--ये शब्द हैं । अक्षरों के आकार पर से मैं समझता है कि यह लेख १० वीं अगर ११ वीं शताब्दी का है। इस से इस की मिति 1 + यह दोनों लेस विज्ञप्तित्रिवेणि के समय के याद के हैं इस से मालूम होता है, कि अन्य स्थानों की तरह काँगडा में भी समय समय पर नई नई प्रतिमायें और देवालय पना करते थे । इस से यह भी झात होता है कि वहां पर जनसमुदाय की संख्या सामान्य नहीं पर विशेष रूप से थी।
। ९५४ या १०५४ हो सकती है । इस में *अभयचंद्र का नाम आया है और इन्द्रचन्द्र के पहले के ५ वे राजा का यह नाम था इस लिये इस की साल इ. स. १०२८ अगर १०८५ से ७५-१०० वर्ष पहले हो सकती है; अर्थात् ९५० के लंगभग यह हुआ होगा।" दूसरी जो जैनप्रतिमा है वह इसी मूर्ति के पास में रक्खी हुई है और बैठी हुई स्त्री की आकृति की सी है। इस के भी दोनों हाथ खोले में रक्खे हुए हैं और गद्दी पर दो हाथ वाली स्त्री की आकृति की हुई है कि जिस के दक्षिण तरफ एक हाथी खडा है।" ये जिनमूर्तियां कमान की दिवालों में बड़ी मजबूती के साथ लगादी गई हैं । परंतु मैं समझता हूं कि यह कमान पीछे से बनाई गई हैं; क्यों कि इस के चारों थंभे भिन्न भिन्न प्रकार के हैं। इन मूर्तियों का इस लिंग-देव के साथ कोई संबंध नहीं है । इस से ये मूर्तिये किसी अन्य जगह से लाकर यहां पर रख दी गई हैं । यद्यपि, वर्त- मान समय में काँगड़े में कोई जैन नहीं है परंतु पहले दिल्ही के बादशाहों के हाथ नीचे दिगंवर-जैन यहां की दिवानगिरि किया करते थे। इस से पिछले जमाने में यहां पर जैन लोक अवश्य रहा करते होंगे। आर्कीयोलोजिकल सर्वे ऑव इन्डिया की सन् १९०५-०६ की एन्युलरपिोर्ट ( Arch. Sury. of India, Annual Report 1905-06 ) के १६ वै पृष्ठ पर भी इन मूर्तियों का संक्षेप में इस प्र. कार उल्लेख किया गया हैः- (किले में ) अंविका के मंदिर की दक्षिण की ओर दो छोटे छोटे जैनमंदिर हैं जिन के द्वार पश्चिम दिशा में बने हुए हैं। एक मं- दिर में केवल गद्दी ही का भाग अवशिष्ट है जो तीर्थकर की मूर्ति का होना चाहिए । कनीगहाम के कथनानुसार जैसा कि उन्हों ने * जनरल कनींगहाम ने अभय चंद्र को राजा संमझा है परंतु यह उन की भूल है। यह राजा का नाम नहीं है परंतु आचार्य का नाम है। 'अभयचंद्र' शब्द के पहले स्पष्ट सूरि शब्द लिखा हुआ है और उन का गच्छ भी 'राजकुल' बताया गया है । डॉक्टर बुल्हर ने भी यही लिखा है । देखो आगे के.पृष्ठ पर का लेख । - १९३ - लेन में पढा था-यह मूर्ति प्रथम संसारचंद्र राजा के राज्य में संवत् १५२३ (सन् १४६६) में, बनाई गई थी। दूसरे मंदिर में आदिनाथ की बड़ी मूर्ति स्थापित है। इस के नीचे घिसा हुमा कुछ अस्पष्ट लेख है। "..........(काँगड़ा शहर में इन्द्रेश्वर के मंदिर की) दक्षिण ओर एक दूसरा कमरा है जो पूर्व का असली मंदिर होनी चाहिए। जनरल कनीगहाम के वर्णन मुताबिक, इस के अंदर जाते समय दोनों तरफ दो जिनमूर्तिये दिखाई पड़ती हैं। ........इन में से एक ऊपर सप्तर्षि अथवा लौकिक संवत् के ३० ३वर्ष का शिलालेख है। डॉक्टर दुल्हर, जिन्हों ने इस लेख को प्रकट किया है, के कथ. नानुसार, इस लेख की लीपि, (कीरग्राम की) वैजनाथ-प्रशस्ति की लीपि से मिलती-झूलती है इस से सन् ८५४ में यह लेख लिखा गया होना चाहिए।" जिस लेख का इन ऊपर के अवतरणों में जिक्र किया गया है यह लेख डॉक्टर वुल्हर (G. Bubler, Ph. D., L: L. D.C. I.E.) ने एपिग्राफिआ इन्डिका के 'प्रथम भाग में ( Epigraphia Indica, Vol. I, XVIII.) संक्षिप्त नोट के साथ प्रकट किया है जिस की नकल यहां पर दी जाती है। कांगड़ा-बाजार में पार्श्वनाध-प्रतिमा का जैन लेख। नीचे दिया हुआ माट पंकियों का शिलालेख, काँगढा-याजार में भाये हुए इन्द्रवर्मा के हिन्दु-मंदिर की कमान में 'रपसी हुई एक पार्श्वनाथ की प्रतिमा को ही ऊपर गोदा हुया है। xतेल और सिन्दुर से यह लेख इतना दब गया है, कि जिस से इस के बहुत से अक्षर बिल्कुल नहीं दिखाई देते । मातम पंकि सर्वथा नष्ट हो गई है। x इम मर्ति को टोक भैरव की मूर्ति समाा कर तेल और सिंदर द्वारा इस पी पूजा किया करते हैं । इस पर सैल और सिंदूर का इतना दल घढ गया है कि जिस से मूर्ति के बहुत से अवयय बिलकुल दरसे गये हैं । इसी सबब से लेख भक्षर भी टौक नही पदे जा सकते।
लेख। - (१) ओम् संवत् ३० गच्छे राजकुले सूरिरभूच(द)- (२) भयचंद्रमाः [1] तच्छिग्यो मलचंद्राख्य [स्त]- (३) त्पदा(दां) भोजपट्पदः [1] सिद्धराजस्ततः ढङ्गः (४) ढङ्गादजनि [च ]ष्टकः । रल्होत गृहण] [त- (५) स्य ] पा-धर्म-यायिनी । अजनिष्ठां सुतौ। (६) [ तस्य ] [जैन] धर्मध (प)रायणौ । ज्येष्ठः कुण्डलको (७)[भ्र] [ता ] कनिष्टः कुमराभिधः । प्रतिमेयं [ च] (८) जिना - नुज्ञया। कारिता [] - भाषांतर । ओम् ३० वें वर्ष में+ राजकुलगच्छ में अभयचंद्र नाम के आचार्य थे कि जिन के शिष्य अमलचंद्र हुए । उन के चरणकमलों में भ्रमर के समान सिद्धराज था । उस का पुत्र ढंग हुआ । ढंग से चष्टक का जन्म हुआ। उस की स्त्री राल्ही थी......उस के धर्म- परायण ऐसे दो पुत्र हुए जिस में से बडे का नाम कुण्डलक था और छोटे का कुमार । .........की आज्ञा से यह प्रतिमा बनाई गई है।.. [नोट:-इस लेख की लिपि प्राचीन शारदा-लिपि है और वैजनाथ- प्रशस्ति की लिपि से बिल्कुल मिलती हुई है इस लिये इस में बताया गया लौकिक- संवत् ३०, कदाचित् इ. स. ८५४ हो सकता है । गच्छ ' शब्द ऊपर से जाना जाता है कि अभयचंद्राचार्य श्वेताम्बर थे परंतु पट्टावलियों में 'राजकुल ' मिल नहीं सका. ] -:0:- | सुप्रसिद्ध जैनतर्क ग्रंथ " सम्मतितर्क" के प्रसिद्ध टीकाकार तर्कपंचानन श्रीमदभयदेवसूरि राजगच्छ ही के आचार्य थे । क्या यही अभयदेवसूरि तो, इस लेख वाले अभयचंद्राचार्य न हों ? विद्वानों को चाहिए, कि इस विषय में विशेष खोज करें।
इस लेख और वर्णन से पाठक जान सकते हैं कि कागड़ाया नगर. कोहघहुत प्राचीन समय से जैनधर्म का तीर्थस्थल बना हुआ है। यद्यपि काल के कुटिल स्वभाव से वह प्राचीन प्रभुता आज सर्वथा विलीन हो गई है, वे बड़े बडे मंदिर और प्रभावशाली प्रतिमायें नष्ट-भ्रष्ट हो गई है, तथापि ये अपशिष्ट मूर्तिये आज भी हमारे दिल में, गत-गौ. रव को फिर समुत्पन्न करती हैं। केवल इन का नाम सुन कर ही हमारी आंखों के सामने ये सय दृश्य खडे हो रहे हैं जिन का वर्णन. इस त्रिवेणि में किया गया है। फ्या ही अच्छा हो यदि इस नाम-शेप तीर्थ का फिर पुनरुद्धार किया जायें । जो प्रतिमायें यहां पर अस्त-व्यस्त पड़ी हुई है उन्हें, एक सुन्दर मंदिर यनवा कर उस में स्थापित की जायँ । पंजाब और मध्यमान्त के जैन-समुदाय का कर्तव्य है कि वह अपने निकट के इस महातीर्थ का उद्धार करें। उन के नजदीक में इस के जैसा एक भी कोई तीर्थस्थल नहीं है ।* मा उपसंहार । विज्ञप्तित्रियोणि की प्रधान तीन व्यक्तियों का अधिक-परिचय हो चुका । साथ ही प्रस्तावना का वक्तव्य भी पूरा हो चुका । इस प्रबंध और प्रस्तावना के अवलोकन से पाठकों को जैनधर्म की प्राचीन-प्रभुता, सामाजिक-स्थिति, आचार्यों की शासनप्रणाली, साधुओं का सांप्रदायिक नियमन, श्रावको का धर्मप्रेम इत्यादि अनेक यातो का शान हो सकता है। विद्वान् लोक यह भी जान सकते हैं कि प्राचीन पुस्तकों और पुस्तक-भाण्डागारों का यदि ध्यान पूर्वक निरीक्षण किया जाये तो उन में से जैन इतिहास के लिये विश्वनीय साधनों का धिपुल-भाण्डार, अनेकानेक रूप में प्राप्त हो सकता है तो थी, कि जिस तरह नगरकोट का अधिक परिचय दिया गया है वैसे और भी उन स्थानों का परिचय लिया जाये, जिन का उमेत इस त्रिवेणि में किया गया है। परंतु बहुत कुछ प्रयत्न करने पर भी उनके विषय में कुछ नही ज्ञात दोधा .
और उन के आधार पर शृंखलाबद्ध इतिहास तैयार किया जा स. कता है । इस प्रस्तावना का बहुत सा भाग ऐसे ही साधनों द्वारा लिखा गया है। गत वर्ष में, पाटन के प्राचीन-भाण्डारों का ऐतिहासिक दृष्टि से अवलोकन करते समय वाडीपुर-पार्श्वनाथ के पुस्तक-भाण्डार में से इस पुस्तक की हस्तलिखित प्राचीन प्रति मेरे दृष्टि-गोचर हुई । पुस्तक देखते ही मुझे महत्त्व की मालूम दी और इसे छपवाने के लिये प्रेस-कॉपी तैयार कराई गई । पुस्तक उसी समय की लिखी हुई है जब कि यह बनाई गई थी । अर्थात् सं. १४८४ के माघ सुदि ८ मी के दिन इस की रचना पूर्ण हुई थी और १० मी के दिन की यह प्रति लिखी हुई है। पुस्तक पर लेखक का नाम नहीं है तो भी अनुमान से जाना जाता है कि जयसागरोपाध्याय के शिष्यों में ही से किसीने यह लिखी होंगी। पुस्तक की स्थिति जर्णि हो गई है और प्रत्येक पृष्ट पर सेंकडों छोटे छोटे छिद्र पड़े हुए हैं । अक्षर सुंदर होने पर भी पढने में कठिनता अवश्य पडती है। जल्दी जल्दी लिखे जाने के कारण कहीं कहीं अक्षर भी छूट गये हैं जिनमें से कितने क पीछे से कीसी संशोधक ने पत्रों के किनारे पर लिख दिये हैं। पाठकों के अवलोकनार्थ, इस के अंतिम पत्र का फोटू पुस्तक के प्रारंभ में दिया गया है। शमस्तु । भाद्रपद पूर्णिमा। जैन उपाश्रय -मुनि जिनविजय । (बडौदा।) -- अहम् । श्रीमद्-विजयानन्दसूरिपादपद्मेभ्यो नमः । विज्ञप्तित्रिवेणिः। नमः सर्वविदे। जयति लसदनन्तज्ञाननि ससान्द्रो निरुपममहिमत्वादार्हतः कोऽपि भावः । त्रिभुवनजनभाग्यागोचरो यत्र नित्यं विलसति कृतवासा निर्भरं सा शिवश्रीः ।। १ ।। जगन्नित्यं किश्चित्तदितरदनित्यं च सदियं यदज्ञानाद्धान्तिः स्फुरति मृगतृष्णेव भुवने । क्षणेन क्षीयन्ते दुरितनिवहा यत्परिचया- तदेवाझीकुम्मों निरभिविधि जैनेश्वरमहः ॥ २ ॥ दौर्गत्यदोपमुच्छेत्तुं विबुधा यामुपासते । फल्पवल्लीव सा जैनी चतुर्विशतिरिष्टदा ॥ ३ ॥ विश्वाशाः परिपूर्णतामुपगता वाठार्थलाभांशुभि- नष्टा तामसमण्डलीय विलसद्वैरादिवाऽपि हि । मार्गामार्गविचारचारिमघरा जाता समस्ता मही यस्यैवाभ्युदये, स शान्तिसविता सुमातराविष्क्रियात् ॥ ४ ॥ 7 - २ विज्ञप्तित्रिवेण्यां योऽद्विष्टचित्तोऽपि रिपूञ् जघान विरक्तचित्तोऽपि भुनक्ति मुक्तिम् । सदाऽभिजातोऽपि हि नाभिजातः स कामितं कामितमातनोतु ॥५॥ महामृगाङ्कः सततं प्रजानां सन्तापनिर्वापकपादसेवः । विस्मेरयन् कौमुदमादरेण जिनेन्द्रचन्द्रोऽजित एप पायात् ॥ ६ ॥ यैः क्षिप्तानि जगन्त्यपायकुहरे प्राप्तावकाशैः पुरा स्थानं नश्च हृतं प्रणेशुरधुना पापाः क्व दोपा इति । तानन्वेप्नुमिव भ्रमन्ति भुवने प्राप्तोदया यद्गुणाः स श्रीमाञ् जिनसम्भवो भवतरुच्छेदे कुठारायताम् ॥ ७ ॥ नन्दत्वसौ श्रीजिनपोऽभिनन्दनो यद्दानशौण्डीर्यगुणैकलिप्सया । प्रविश्य हेमाद्रिदरी सुरद्रुमा भृङ्गस्वरेण प्रसभं जपन्ति किम् ? ॥८॥ भ्रूभङ्गं न वभार भालशिखरे नो शोणिमानं शोः प्रागल्भ्यं हृदये नवा शममये ना तथोत्सेकताम् । हत्या मोहभटं तथापि युधि यो निर्हाटयामासिवान् भव्यस्वान्तपुराजिनः स सुमतिर्द्धम्म मतिं वर्द्धयेत् ॥ ९ ॥ शशधरकरैः सायं दूये दिवा तु विहङ्गमै- विदलितमहं स्थानं हेयं तदेतदशर्मादम् । इति सरसिजं तोयं हित्वा किलाङ्कतयाऽभज- ज्जगदभयदं पादं पद्मप्रभस्य, स शर्मणे ॥ १० ॥ भक्तिरागनिभृतेषु मुनीनां मानसेषु चिरवासवशास्किम् ।। रक्तकोकनदरङ्गदभीशुः स्पष्टयत्वभिमतं जिनषष्ठः ॥ ११ ॥ अन्तर्दीप्रसुबोधदीपकलिकोद्भुताञ्जनौघा इव श्रीसंवेगसमुद्रवीचिविलसल्लीलाप्रकारा इव । रेजुर्यस्य शिरस्युदंशुमणयः पञ्च स्फुरन्तः स्फुटा भद्राली दृढयेदचं विघटयेदेवः सुपार्श्वः स वः ॥ १२ ॥ ?
प्रथमा वेणिः। विलसदतुलशुक्लध्यानसदुग्धसिन्यो- रविरललहरीभिः प्रोद्गताभिः प्रकर्षात् । हिमहिमकरगौरा यचनुः प्लावितेवाऽ- शुभदशुभभिदे स्याद्देवचन्द्रप्रभोऽसौ ॥ १३ ॥ कृपामृताब्धिः सुविधिः समाधि सन्धातुमुत्साहयतां मनो वः। यस्मा धाश्चिन्तितवस्त्ववाप्य तृणाय चिन्तामणिमप्यमंसत ।। १४॥ अनान्तवृत्तिमधुरो हरिणाश्रितोऽयं भव्याञ् जनानवतु शीतलशीतलांशुः । यद्विम्बमुज्ज्वलकलं भृशमीक्षमाणा लोकत्रयी प्रमदतः कुमुदांबभूव ।। १५ ।। श्रेयांसः श्रितवत्सलः सृजतु वो नित्यं श्रियं श्रायसी पञ्चाङ्गप्रणिपातनिम्मितिवशाद्यत्पादपीठाग्रतः । रेजुर्मन्जुरजोऽवगुण्ठननिभाद्भालेपु भव्यात्मना- मेते योग्यतमा इतीव तिलकाः पुण्यश्रिया निम्मिताः ॥१६॥ स्वमूर्भुवःस्थायुकलोकपूज्यः श्रीवासुपूज्यो जयताज्जगत्याम् । सस्पर्द्धयेव श्रमणत्वलक्ष्म्या यस्मिस्तनुश्रीरपि भाति रक्ता ॥१७॥ कलियुगतया मीप्मग्रोप्मे प्रसर्पति भूतले- जनिपत कृशा आशानधो मदीयमनोभुवि । विमल ! तदलं वपत्वेपा प्रसादपयोमर तव पदपरीष्टिस्तत्पूरं सुवृष्टिरिवोच्चकैः ॥ १८ ॥ सभाजनप्रीणनकृत्सभाजनो महोदयस्थो विलसन्महोदयः । यकः सदाऽनन्तगुणालिनिर्मलो मनःकपि पातु नताननन्तजित् ॥ १९ ॥ (ग्दैकक्रियम् ।)
४ विज्ञप्तित्रिवेण्यां त्रैलोक्यलोकतिलकोऽस्ति जिनो गुणर्या तस्याऽप्युपर्यहमिति प्रमदादिवोच्चैः । नृत्यत्यशोकविटपी चटुलैर्दलैः किं ? यद्धर्मसद्मनि स धर्मजिनः शिवाय ॥ २० ॥ भवाभ्यन्तरे कर्मधर्माकुलत्वाद् गुणश्रेणिनिश्रेणिमालम्व्य योऽलम् । सुखं मुक्तिवातायनं प्राप्य शेते सदा निर्वृतः शान्तये स्तात्स शान्तिः।।२१ कुन्थु कान्त ! नमस्कुरु, प्रियतमे ! कः क्षुद्रजन्तुं नमेत् ? भर्तः ! श्रीतनयं वदामि, मदनः किं ? नैप सूरात्मजः । किं मन्दोऽयमयि प्रभो ! नहि जगत्प्रद्योतकस्तीर्थकृत् ; दम्पत्योरिति वक्रवाक्यविषयः पुष्यात्सुखान्येप वः ॥ २२ ॥ पूर्वोपार्जितपापकर्मपटलान्येधन्ति यत्राङ्गिनां खद्योतन्ति मृगाङ्कचण्डकिरणाचा यत्र तेजस्विनः । विश्वव्यापकमप्यनक्षविषयं यद्भासते सर्वतः तज्ज्योतिः प्रणिदध्महे भयभिदे देवारतो नापरम् ॥ २३ ॥ देवो वामनसातिगोचरगुणोऽर्वाचीनदृग्देहिनां माल्लिः पल्लवयेन्मतिव्रततिकां सोऽयं वसन्तोपमः । यस्माद्विश्वजनप्रमोदजननीमासाद्य रम्यां रमां भव्यारामगणा इह प्रतिदिनं सेव्या न कस्याभवत् ॥ २४ ॥ यो ध्यायमानोऽपि हि कृष्णवर्णस्तनोति सद्धर्मधियं बुधानाम् । सुश्यामलश्रीजलदायमानो जयत्यधीशो मुनिसुव्रताख्यः ॥ २५ ॥ तापं तापमपारदुस्तपतपः सद्ध्यानशातासिना छिन्दानं तरसात्मकर्मगहनं दृष्टुनमादीक्षणात् । आत्मोच्छेदभियेव नो ववृधिरे केशा नखा यस्य श्रामण्ये विहरन्नमिर्जिनपतिः सम्पत्तये जायताम् ॥ २६ ॥ ri प्रथमा वेणिः । मोहाल्यो नृपतिर्विकीर्णहृदधिष्ठानाद्विनिटितो देवेनेति ततो विमग्नसकलोपायान्तरोऽयं किल । स्थानप्राप्तिकृते दिवानिशमसौ रागच्छलापिच्छल यत्पादाब्जयुगं भजत्यभिमतं दत्तां स नेमीश्वरः ॥२७॥ किं भाद्राम्बुवरा अमी समुदिता आश्वासयन्तो जगत् ? किं वैताः फलभारमुग्नतनवः प्राप्ता मुवं स्वलताः । श्रीवामेयशिरस्ययत्नजनितां छत्रश्रियं विनत इत्यं प्रान्तिकराः स्फुटाः सुमनसां कुर्वन्तु वो मङ्गलम् ॥२८॥ कीहक्षे हि विधौ भवन्ति विफलाः पुंसा प्रयासाः कृताः ? मानोरुचरदक्षिणोमयगती के कारणं वर्णिते । का विश्वं निजसनमाटाकुरुते सौभाग्यभाग्योज्ज्वलं ? को वा सेवकसत्फलः कलियुगे वामेयनेता जयी ॥ २९ ॥ (प्रश्नोत्तरम् ।) श्रीवीरः पुरुपोत्तमः क्षपयतात्पापं नृपश्रेणिका- सेव्यांहिद्वितयः क्षमाभरघरः कल्याणकायं दधत् । यः सत्त्यागदयान्वितः प्रविलसत्सद्दर्शनोत्सर्पणा- तं क्षिप्त्वा नरकं समाधिमुदितं स्वस्थं जगत् संव्यधात् ॥ ३० ॥ अर्हन् सिद्धः प्रबुद्धः प्रकटगुणगणः पारगोऽनङ्गभेदी वीरो विश्वाधिनाथः किशलयतु स वोऽतुल्यमानल्यमालाम् । व्योमेवाद्यापि यस्य प्रविदितमहिमोल्लासनं शासनं त- चित्रं सूर्याट्यमप्युज्ज्वलसुशशिकुलं माति निस्तारकं यत् ॥३१॥ वर्द्धमानजिनेशस्य वचनाय नमोनमः । अज्ञानधान्तविध्वंसाद्यदेव दिवसायते ॥ ३२॥ दिनादितापसहितोऽपि हि तापहारी रुद्धप्रमादविसरोऽप्यमितप्रमादः।
विज्ञप्तित्रिवेण्यां यो निर्द्धनोऽपि धनधान्यसमृद्धिहेतु- नामस्मृतिर्नमत तं गुरुमिन्द्रभूतिम् ॥ ३३ ॥ नमः क्षमाधरोद्घाय श्रीसुधर्महिमाद्रये । जज्ञे गौरीदृशी यस्मान् महाव्रतिमनःप्रिया ॥ ३४ ॥ श्रीमद्वीरजिनेशवंशविशदप्रासादशृङ्गाङ्गणे रगच्चारुसिताम्बरप्रविलसत्कीर्तिध्वजावन्धुरे । सद्वृत्तः कलधौतकुम्भतुलनामुच्चैर्दधे यश्चिरं प्रज्ञा पल्लवयत्वसौ गणधरः श्रीमान् सुधा मम ॥ ३५ ॥ जयति जगन्ति पुनाना वाङ्मालाभिः सरस्वती देवी । करकृतमणिमिव कवयो विश्वं पश्यन्ति यदनुभवात् ।। ३६ ॥ सदुक्तिमुक्ताफलताम्रपर्यै नमोनमः श्रीगुरुराजवाण्यै जडस्वभावोऽपि हि यत्प्रसङ्गात् सिन्धुः स रत्नाकरतामवाय ॥३७॥ यदीयवागञ्जनस्य मनोशि निवेशनात् । विन्दन्ति गूढमप्यर्थं जनास्तं गुरुमर्थये ।। ३८ ॥ तदेवं सम्यगाराध्याऽऽराध्यपादान्महादरात् । लेखोऽयं लिख्यते किञ्चिदद्यपद्यमयो मया ॥ ३९ ॥ तुच्छतमा बुद्धिर्महान् कायमुपक्रमः ? । तदहं मातुमिच्छामि कुम्भैरम्भोऽम्बुधेरपि ॥ ४० ॥ गुरुप्रसादतो यद्वा ममाप्यत्रास्ति योग्यता । भेकोऽपि हि भुजङ्गास्यं चुम्बेन्मान्त्रिकयोगतः ।। ४१ ॥ विश्वाम्ब ! मे हृदि सरस्वति ! सन्निधेहि स्या सम्प्रति फलेग्रहिरुद्यमोऽयम् । क्व मे * अस्मिन् पादेऽक्षरद्वयं त्रुटितमस्ति । तच्चादौ 'स्पायेन' इत्येवं सम्भवेत् ।
प्रममा वेणिः। यद्वा चकास्ति गुरुमतिरचिन्त्यशक्तिः सैव प्रमाणमखिलार्यविधौ ममास्तु ॥ १२ ॥ - अस्ति समस्तशस्तवस्तुवास्तुभूतभारतविश्वम्मराविस्तारस्फुरत्तिल. कायमानः स्फायमानः सकलसम्पत्या समानः स्पृहणीयतया स्वर्गलोकस्य, ससुरुप इव बहुलक्षणमासुरः, नाकलोक इव सुधर्मास्यानसुन्दरः, शब्द इव प्राग्ग्रहरः सर्वविषयाणाम् , नदीपतिरिवेन्दिरासहोलसदनमहाशेषना- गाधिरूढमौदपुरुपोचममहनीयाभ्यन्तरः, सगरभूपालमूर्तिमयशोविकासा- यमानलसद्वीचिवितानेनोदन्वता परिचितपरिसरः, सारः सकलसंसारवि- स्वारस्य, आकरः सदाचारव्यवहाराणाम् , आश्रयः श्रेयसाम् , सङ्केतास्पद समस्तशस्यदिश्यसम्पदाम् , आपणो नयनैपुणादिक्रयाणाम् , रोहणो वि- नयविवेकविचारादिगुणमणिगणानाम् , मध्यप्रदेशस्फारहारायमानाद्विता- रोदारो गूर्जरो नामा जनपदः । यस्मिन्नश्रान्तमुकृतकर्मक्षणनिर्मा- णात्युत्सहिष्णुवद्धिष्णुधर्मापुरुषार्थप्रदत्ताशाः प्रशान्तदुरितोपप्लवाः श्रीआ- हतधर्मराजराजधान्यः पुरुषायुपजीविन्यः प्रमाः । अपि च वर्णविनाशो व्याकरणेषु, क्षणक्षयिमावस्ताथागतसिद्धान्तेपु, भूतविकृतिवादः सांख्येपु, जडस्वभावत्मजल्यस्तथा छलकौशलोद्भावनं निग्रहस्यानानि चाक्षपादमती- यसिद्धान्तेपु, वक्रचारिता ग्रहगोचरे, ग्रहावेशो राशिषु दृश्यते श्रूयते या, न च वास्तव्येषु लोकेषु । यत्र तुरङ्गशोभिताः प्रासादा इव मन्दुराः । यत्र च लहरिसला नय उद्यानभूमयश्च । यत्र च कौटम्बिकगृहा इव बहुधाना विपणिभागः, व्याकरणप्रन्या इव विलसद्वहुबोहयः, क्वचिद् दृश्यमानद्विगयश्ध, अव्ययीभावानुभावोत्सर्पितक्षेत्रिप्रमोदाः सद्वन्द्वाश्च व. प्रप्रदेशाः । फि बना! व्योमोपमा व्योम्न एव मुघायाश्च यथा सुधा विज्ञप्तित्रिवेण्यां तथा गूर्जरदेशस्योपमानं यदि गूर्जरः ॥ १ ॥ यत्र ग्रामा इवारामाः सदाशुकविराजिताः । निवासा इव कासारा लक्ष्मणश्रेणिसङ्कुलाः ॥ २ ॥ तत्र लसल्लक्ष्मीदेवीनिवासकमलोपमानं अणहिल्लपाटकं नामपत्तनम् । अश्रान्तोद्भवदुत्सवोत्सृतमुदुल्लोलावलीसझुलं रङ्गभूरिसितच्छदं शुभति यत्पद्माकराम्भो भूवि । यत्रोच्चैः स्फुटपुण्डरीकपडलभ्रान्त्या भ्रमचेतना रम्ये हर्म्यगणे सुधाधवलिते नूनं निलीना रमा ॥ १ ॥ मुक्तामणीविद्रुमशुक्तिशङ्खान् राशीकृतान्वीक्ष्य यदापणेषु । लोकैवित]त जलावशेषश्चित्रीयमाणैर्हृदये पयोधिः ॥ २॥ अनेकसूर्यावलिशालिमध्यं नानाबुधाख्यं बहुमङ्गलं च । श्रीदैर्महेशैरमितैः परीतं यत् पत्तनं खं प्रति जाहसीति ॥ ३ ॥ सन्नरागमना यत्र मुनिपर्षच्च भूभृताम् । राजहंसा इव जनाः सर्वदा मानसङ्गताः ॥ ४ ॥ यत्र चं- कलाकीलालकल्लोला लोकाः केलिकुलाकुलाः। कलिकालेऽकलङ्काला लीलां ललुः कलां किल ॥ ५॥ (द्विव्यञ्जनचित्रम् ।) बुधा इव जना यत्र चित्तरङ्गोपशोभिताः । मनुष्येशा इवावासा मत्तवारणराजिताः ॥ ६॥ किं च- चिरन्तनपुरुषातिशायिभविण्यत्सप्रभप्रभावकश्रावकहृदयशयाखर्वग- सर्वस्वापहारिहारिचरितत्रिभुवनप्रशंसनीयत्रिभुवनपालदेवकुलकाननो. ल्लासभासनसुरभिसमयानुकारिकाश्मीरदेवीमहासतीसदुदरस्फारवैडूर्यवर्य- वसुन्धराखनिसम्भवदतुल्यामूल्यमहायंप्रातिहार्यावार्यजनस्तुताप्रत्नरत्ना- प्रथमा वेणिः। यमानश्रीकलिकालकेवलिविरुदविशदावतारप्राप्तचातुर्विद्यमाद्यदनिन्द्यपा- रावारपारश्रीजिनशासनाम्बराम्बरमणिसुगृहीतनामधेयसिद्धश्रीहेमसुरिमुखो च्छलतुच्छाच्छपिच्छलोन्मूर्छच्छुचिरुचिरुचिरामृतच्छटायमाननिस्समा. ननिरुपमाननिर्षिगानप्पानज्ञानवर्द्धमानपरमतत्त्वमयसमयावतानव्याख्या- नविशेषनिःशेषनिर्वासिताऽऽनादिकालालीनानवीनसादीनवपीनाहीनदुर्वा- सनाविपापस्मारसारसकल जगज्जन्तुजीचातुकल्पनिर्विकल्पामारिघोषणामि- पोद्घोषिताऽऽकल्पान्तकालकालावस्थाय्यनिवर्तनीयकीर्तनीयकीर्तिकमला. कटाक्षसाक्षात्कृतश्रीकुमारपालभूपालसम्मावितनव्यनव्यभव्यभव्यजनस्पृहः णीयतत्तदुत्तमकरणीयजातिप्रतिभूभूतप्रभूततत्तादृक्षविशदप्रासादस्थाननि- ध्यानवशोद्भिद्यमानरोमाञ्चनिकायाऽऽधुनिकधामिकनिकायविधीयमानना- नाविधधर्मोत्सवारम्भसुभगं यज्जयति जगत्पुराणि पराणि । किञ्च- . . यत्र हर्येषु धयेपु पञ्जरस्थाः शुकादयः । नमस्कारं पठन्तः स्युः पुत्रेभ्योऽपि सतां प्रियाः ॥ १ ॥ सहस्रलिङ्गाख्यसरःसलिलेन सुचित्विषा । यत्रापूर्ण सदाप्यामाद्धनेनेव पुरं च तत् ॥ २॥ न्यायमार्गान्वितो यत्र राजा राजेव तज्जनः । तद्वयामाणिको लोकोऽप्येवमेव व्यवस्थितः ॥ ३ ॥ साधवो यत्र मान्यन्ते दानश्रद्धालमिर्जनैः । साधुभिश्च यथा कालं तेऽपि धर्मानुशिष्टिताः ॥ ४ ॥ विमानानीव यत्रोथैर्धर्मस्थानानि निश्चितम् । नित्योत्सवानि राजन्ते विवुधग्रीतिदानि च ॥ ५ ॥ माणिक्यमौक्तिकस्वर्णराशीविपणिगाञ्जनः । वीक्ष्य चक्रे रोहणाधिमेरुणामागमश्रमम् ॥ ६ ॥ सधना यत्र च जनाः सदाचाराः ससम्मदाः । २ १० विज्ञप्तित्रिवेण्यां स्वर्गभुक्तावशिष्टस्य धर्मस्यांशा इवाशिनः ॥ ७ ॥ सलज्जाः सदयाः सौम्याः सरूपाः समहोदयाः । लोका यत्र निरीक्ष्यन्ते सुपमाकालजा इव ॥ ८ ॥ तत्र पवित्रसुत्रामपुरापारस्मयचयव्ययकरे पुरे- जडपरिचयोद्विमा नूनं विहाय कुशेशयं कमलनिलया देवी येपामवाप पदद्वयम् । स्फुरति नितरां तस्मादेवेन्दिरोल्लसदाशयाः तदतिवरिवस्यासक्तानां गृहेषु तनूभृताम् ।। १ ।। सत्यं सन्ति सितोपलाशशिकलासद्धारहरादयो मिष्टाः किन्तु यदीयवाग्मधुरिमा कोऽप्यद्भुतो वर्तते । सक्लृप्तामृतभोजना इव जना यां कूणिताक्षाः सकृत् पीत्वा सार्वदिकं लभन्ति सततं सन्तोपपोपं परम् ।। २ ॥ शाणोत्तीर्णमणीव कान्तिकलिता दातेव चौदार्यभाक् रम्भावन्मृदुला शरद्विमलिताऽऽशैव प्रसन्नाऽधिकम् । सन्माधुर्यगुणा सितेव सुधया सिक्ता तु सूक्तावली येषामाननसम्भवा श्रुतिगता काँस्कान्न संमोदयेत् ॥ ३ ॥ जगद्गानन्दरसैकसस्त्रं येषां मुखं निश्चितमिन्दुविम्बम् । निपीय तद्वागमृतं किमन्यथा सञ्चन्द्रकान्ता बभुरार्द्रितान्तराः ॥४॥ अग्रे सत्यमरूरुपन् सपदि ये स्याद्वादवादद्रुम यस्याध्यक्षपरोक्षमानयुगलं मूलं प्रकाण्डं कृपा । शाखाः सप्तनया जिनप्रवचनं पत्रप्रकारं विदुः तत्त्वज्ञानमुशन्ति पुष्पपटलं मोक्षं तु सम्यक्फलम् ॥ ५ ॥ यैः कुन्देन्दुतुषारहारधवलैब्रह्माण्डमाभूष्यते यैर्वक्तुं हृदि कल्पितैरिह जनो मूकोऽपि वाल्मीयते ।
प्रथमा वेणिः।
यैः कर्णातिथिभिः प्रमोदजलधिश्चन्द्ररिवोल्लास्यते
तेपामद्भुतसम्पदा गुणगणानामास्पदं ये परम् ॥ ६ ॥
लोकालोकमहीधरप्रतिहतो भानोः प्रकाशोऽपि हि
विस्फूर्जातिवत्रिणोऽपि कुलिशं पायोधिना स्खल्यते ।
सर्वत्रास्खलितप्रचारमतुलं विराजते यद्यशो-
दुग्धाम्भोध्यवगाहनादिव चिरं गौरं जगल्लङ्घनम् ॥ ७ ॥
ज्योत्स्नोच्छ्रायविनाकृतेव मलिनच्छायेव मुक्तावली
साशक्केव हि दुग्धसिन्धुलहरी स्वर्गापगा निम्नगा ।
शुक्ता त्यक्तमुदेव तुच्छगरिमैचोचैस्तुपारावली
नैर्मल्यातिशयात्परादिह जिता यकीचिकात्या किल ॥ ८॥
क्षारो वारिनिर्बुिधैर्निगदितो दोपाकरश्चन्द्रमा
विष्णुश्चापलतान्वितोऽपि चपलासङ्गाधिकश्रीर्घनः ।
देवेन्द्रस्तु सुराधिपोऽपि वहुरुग् भास्वान् विपादी हर-
स्तत्केनात्र समं विशुद्धगुणिनो यत्कोपमा कल्प्यते ॥९॥
गिरो येषां मुखोद्भुताः कतकक्षोदसोदराः ।
कालप्यक्षपणाक्षेपाच्छोधयन्ति जडाशयान् ॥ १० ॥
व्याख्याक्षणे मुखे येषां स्फीतदन्तद्युतिच्छलात् ।
माधुयं शिक्षितुं वाचः प्रत्यासीदति किं सुधा ! ॥ ११ ॥
सुस्निग्धां मधुरास्वादां येषां दौर्गत्यहारिणीम् ।
पीत्या वाचं सुधां चापि युक्तं स्युर्विवुधा जनाः ॥ १२ ॥
द्राक्षाः सहुचिताः काष्ठं जमाहास्ये सितोपला ।
यदीयवाक्यमाधुर्यजिता नष्टा सुधाऽपि हि ॥ १३ ॥
अन्तस्थज्ञानकल्पद्रुकुसुमानीव यन्मुखे ।
मुस्निग्घा मधुराकारा राजन्ते रदनद्युतः ॥ १४ ॥
१२ विज्ञप्तित्रिवेण्यां व्याख्याक्षणे मुखे येषां नूनं नर्नति भारती । तन्नूपुरध्वनिरिव लक्ष्यते देशनाक्रमः ॥ १५ ॥ दोलीकृत्य यदीयं तु जिहाञ्चलं चलाचलम् । तथाविधवचोव्याजाद् वाग्देवी खलु खेलति ॥ १६ ॥ सुधा वुधा मुधा नूनमनूनापि गुणैः परम् । यद्वचःपानसंतृप्तश्रोतुरेप वचाक्रमः ॥ १७ ॥ मन्ये सरस्वती तावद्येपां जिहाधिदेवता । तत्रानुकूलवृत्तीनां यस्मात्सर्वार्थसिद्धयः ।। १८ ।। येषां सिद्धरसौपम्यं दधाति वचनक्रमः । सुबुद्धिस्वर्णतां याति यत्प्रसङ्गात्कुबुद्धययः ॥ १८ ॥ मुखं शक्तिपुटं येपां वचनानि तु. मौक्तिकाः । तल्लाभे प्रयतन्ते तु पुण्याच्या एव केचन ॥ १९ ॥ यद्वाग्वल्ली सप्तभङ्गी रङ्गन्मण्डपगोत्सृता । सुभाषितफलैः कस्य करोत्युत्कण्ठुलं न हृत् ? ॥ २१ ॥ ( वाणीवर्णनम् ।) महानुभावा निहताङ्गितापस्तोमा निरुद्धाधिविधा निकामम् । पुण्यप्रकाशा नियतेन्द्रियाणां जगन्मुदे गीश्च यशांसि येषाम् ॥२२॥ (महाद्भुतम् ।) दौर्गत्यभेदिनी रङ्गद्विभावभासिनी स्यात् । येषां वाणी च पादाब्जे शिवर्द्धि तनुतां सताम् ॥ २३ ॥ ( अद्भुतम् ।) ऋते येन नो भूपतिर्नापि रकः सजीवोऽप्यजीवोऽस्त्यहो ! जीवलोके । तदेवानुभूतं यदीयं जनानां मुदे कारणं तत्र ही सत्प्रसङ्गः ।। २४ ॥ (प्रहेलिका-1) orma प्रथमावेणिः। तपोभिर्दस्तपैर्यत्तु दुरापं योगिनामपि । तसिद्धात्ममयं ब्रह्म येषां वाक्यादपीक्ष्यते ॥ २५ ॥ तार्किकाणां मते ख्याताः ख्यातयः सदसन्मुखाः। सख्यातिरेव येषां तु सिद्धा प्रमाणिनामपि ॥ २६ ॥ . यद्वाणीवारिदोऽपूर्वी राजते विश्ववल्लभः । हरत्येव जगतापं शंवरं तु न मुश्चति ॥ २७ ॥ सत्यातपत्रमिव पादयुगं यदीयं सच्छायमेत्य गततापमरा महीयः । सातत्यतोपमवगत्य भवन्ति सन्तः सातान्विता मुवि नृपा इव संशुमन्तु ॥ १ ॥ (नवन्धः।) स्फीतसातं वितन्वन्तं शान्तस्वान्तं मतश्रुतम् । गीतवातततं कान्तं सन्ततं तं नुत द्रुतं ॥१॥ (गौमूत्रिकाचित्रं पोडशदलपमं च ।) चरारावरसासार । नवराजजरावन ।। रसानुत तनु सारं दयया ततयायद ! ॥ १॥ (भर्दभ्रमः।) महनीया मतिमतां महामहिमसंगताः । मतं नतानां ददतां महात्मानः समाहिताः ॥ १ ॥ (वीजपूरवन्धः।) मरालीवातिविमला मनोवृत्चिर्यदीयका । मनुते बहुनालीकं कस्मान्न मानसं गता ॥१॥ (भासनपन्धः।)
१४
विज्ञप्तित्रिवेण्या
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स्मयं क्षयं नयन्तो ये कुप्रावचनिकाङ्गिनाम् ।
सम्यग्धर्मोपदेशेन पुनन्त्येनं जनं पुनः ॥ १ ॥
(त्रामरवन्धः ।)
वारम्वारं हरन्ते ये सूर्या इव वचोंऽशुभिः ।
जगदुर्वासनाध्वान्तवातं ततं द्रुतन्वतः ॥ २ ॥
(चामरवन्धः।)
इति चित्राणि ।
अपि चाविकलसकलसकलमञ्जुलकविकुलविमलमुखपद्मपद्मनदोद्ग
च्छदतुच्छपिच्छलवहुलरसपेशलसरस्वतीसुरसरस्वतीविलसत्सरलतरलसमु.
ज्ज्वलाविरलगद्यपद्याद्यमयलक्षणान्वेषिकीप्रकटनाटकालङ्काराद्यानवद्यहृद्य-
विद्याविलाससुस्थूलकल्लोलमालारजात्तुरन्तरगततितरत्कान्तकीर्तितरुणकलह-
सिकालाध्यतमा ये शोभन्ते । याँश्च निर्मलगुणपरीतान् सदाऽमलकोपमा-
नमुक्तान् समुज्ज्वलान् सद्वृत्तान् हारानिव हृदयावनिभागान्नापसारयन्ति
क्षणमपि गुणगृह्या महान्तः । यैश्च चित्रकृच्चरित्रैर्जगज्जैत्रातिमात्रतरः सम्प-
दन्धम्भावुकसर्वजनीनस्वास्थ्यभरलुण्टाको विवेकोत्सेककुट्टाकदुर्विधः कुसु-
मायुधः शान्तदान्तैरपि पराजित्यानङ्गीकृतः । येभ्यः सदभ्यस्तप्रशस्तवास्त-
वस्तुत्यपवित्रचरित्रविचित्रशतपत्रपद्मपद्महूदेभ्यः प्रभूतां परिस्तृतस्वर्भूर्भुवो-
ऽन्तराला विशालामुत्कल्लोलमाला स्फुरत्कीर्तित्रिदशशैवलिनी स्थाने स्थाने
श्रुतिपुटाञ्जलिभिः पायं पायं प्रायः के के विबुधविसरास्तुष्टिपुष्टिजुष्टा न
- समापनीपद्यन्ते । येषु च वर्यचातुर्यगाम्भीयौदार्यस्थैर्यार्जवमाईवमहिमग-
स्मिादिमा रमणीयास्तत्तद्गुणगणाः कलियुगभयत्रस्ता इव युगपद्वास विद-
धति । अपि च-
लब्धप्रतिष्ठा नवसु ग्रहेषु ये सूरभूता अपि भूतलेऽस्मिन् ।
चित्रं न साई विबुधैर्विरोधं हवन्ति विश्वं न च तापयन्ति ॥ १ ॥
प्रथमा वेणिः। . " ते नवीनपीनशारदेन्दुमुन्दरकुन्दकुमुदकेतकोदरसोदरदरद्विचिकलकुल- कुवलयदलघवलसकलजगज्जङ्घालनिस्तुलस्थूलयशःपटलधवलीक्रियमाणत्रि- भुवनभवनभित्तिभागा गगनप्रदेशा इव सन्मङ्गला अपि बुधसेविता अपि चन्द्रोदयमासिवसतौ शोभमाना अपि नभोगसम्पन्ना अपि धनाश्रया अपि न च ये ग्रहान्विताः, पुरहता इव नाकविख्याताः, वैनतेया इव नाग- माषिक्षेपकराः, पद्माकरा इव नालसहिताः, शब्दशास्त्रप्रदेशा इव नामस- म्पन्नाः, सुकविकृतकाव्यप्रकारा इव नानायतिश्रितपादाः, आर्यानुगताश्च; सत्तमाः शान्तचेतसाम्, विशिष्टाः प्रतिष्ठावताम् , अग्रगण्या गणवताम् , आश्रयाः स्थेयःसंयमश्रियाम्, आद्या विद्यावताम्, वर्या आर्याणाम्, सार- सूरीन्द्रपट्टकमलाकमलिनीकमलिनीवल्लभा जगदुर्छभशुभप्रभावप्रकटश्रीसू- रिमन्त्रप्यानध्यानसन्धानविधुतसवाह्याभ्यन्तराधिव्याधिप्रसराः सर्वाङ्गसु- न्दराः सुगृहीतनामधेयाः परमध्येयाः श्री जिनभद्रसूरिसुगुरुसार्वभौमाः, पं० पुण्यमूर्तिगणि-पं० मतिविशालगणि-वा० लब्धिविशालगणि- वा० रत्नमूर्तिगणि-पं० मतिराजगाण-वा० मुनिराजगणि- पं. सिद्धान्तरुचिगणि-पं० सहजशीलमुनि-पं० पद्ममेरुमुनि-पं० सुमतिसेनगणि-विवेकतिलकमुनि-क्रियातिलकमुनि-भानुमभुमु- नि-प्रमुखसुमुखकल्मपपरामुखसुखसन्तोपविशेषपेत्प्रेक्षोल्लेखकृतपातक- निष्पेषदूरापसारितद्वेषविशुद्धवेषविधुतविगाननिस्समानन्यत्कृतमानसम्यग्ज्ञा- नविनीतदोपवितानदूरञ्जनीयजनरजनसार्थजन्यसाङ्गीणगुणोडामरक्रिया- काण्डशौण्डीरधीरिमोदामप्रकामसंयमारामविहारदक्षमुमुक्षुसितपक्षशिरोवि- सरशेखरीक्रियमाणक्रमणराजीवरजोविस्तारा वर्णनातीतगुणप्राग्भारा विज- यन्तेतमाम् । अन्यच्च, अखि विविधवमुघावलयभालभूषणललामोपमानो नानाप्रामाफरपुरपचनसन्निवेशसरित्सरोवरधनविपिनाद्यास्थानरामायक-
१६
विज्ञप्तित्रिवेण्यां
स्पृहणीयतमोद्देशः प्रसृमरामेयश्रीनिवेशसम्पन्नशर्मादेशः विमल तरतुरङ्गरङ्ग-
त्तरङ्गशृङ्गतरत्तरुणलक्षणचटुलचक्रवाकचलरकोटकारण्डवमण्डलीमण्डितोपा-
न्तया पुण्यागण्यपानीयया पश्चिमपयोधिमभिसरन्त्या स्थूलोल्लोलमालावि-
लासच्छलादूरात्सङ्गमोत्कण्ठया कोमलभुजलताः स्वपति प्रति विस्तारय-
न्त्येव नदीमातृकजनोज्जीवनजीवनया लालसहंसया विपाशया, चन्द्रभाः
गया, ऐरावत्या, सिन्धुमहानद्या च सर्वतोऽधिभूमिप्राप्तप्रसरयोपेक्षित-
जलदप्रवेशः सिन्धुनामा देशः।
अपि च-
नानाकेलिकलाकुतूहललसत्कल्लोलरत्नाकरो
देशः कस्य स सम्भवेन्न रतये प्रोन्निभद्रावनिः ।
क्रीडाक्रीडविहारिणो रचितविबोकानशोकानलं
लोकान्यत्र निरीक्ष्य वेत्ति जनता स्वर्गोऽयमेवास्ति किं ॥१॥
किञ्च-
यो धनैः सङ्गुलोऽप्युच्चैः सदाऽऽयोधनवर्जितः ।
वनानि यत्र पान्थानामवनानिभवन्त्यहो! ॥ २ ॥
सदम्भा यत्र तटिनी सकुरङ्गा वनावनिः ।
सक्षया च पुरी ख्याता जनता न तु यत्र हि । ॥ ३ ॥
धनानि यत्र लोकानां विपुलानि मनांस्यपि ।
परार्थकरणेष्वेव रमन्ते सर्वदाऽपि हि ॥ ४ ॥
तस्य महामण्डलस्य मुखमण्डनं श्रीमन्मलिकवाहनाभिधानं
श्रीनिधानं पुटभेदनं वरिवर्ती ।
तथा च-
रङ्गगौरीगणश्लाघ्यं श्रीदपुण्यजनाश्रयम् ।
महेश्वरकृतास्थानं यत्कैलासायते पुरम् ॥ ५ ॥
प्रथमा वणिः । वनानि नन्दनायन्ते विमानन्ति महागृहाः । दातारः स्वर्दुमायन्ते यत्रामरावतीसमे ॥ ६ ॥ जना धनैर्यत्र परं जयन्ति दानेन सर्वान्नपि रञ्जयन्ति । कलिप्रभावं परिगञ्जयन्ति देवान् गुरुश्चापि समाजयन्ति ॥७॥ कूलङ्कपाशालितसन्निकर्षेऽत्रानंकषावासलसद्ध्वजेषु । विसृज्य चापल्यगुणं स्वकीयं श्रियः स्थिरा आद्यगृहेप्वभूवन ।।८।। यस्मिन्नन्यान्यदेशीया नैगमा लामकाणिः । क्ष निवसन्ति सुखं पद्माकरे मधुकरा इव ॥ ९॥ तत्र श्रीजिनमतप्रभावकश्रावकसकुले श्रीजयसागरोपाध्यायाः, मेघराजगणि-सत्यरुचिगाण-पं०मतिशीलगाणि-हेमकुञ्जरमुनि-पं. समु(मय)कुञ्जरमुनि-कुलकेशरिमुनि-अजितकेशरिमुनि-स्थिरसंय- ममुनि-रत्नचन्द्रक्षुल्लकपुरोगप्रोत्सर्पत्परमार्थसाधनाभियोगसुस्थितमनोवा- काययोगसारानगारपरिवारप्रसापिताध्याया वर्तन्ते । तान् श्रीजिन.. भद्रसूरीश्वरांस्तथाभूतॉस्ते श्रीजयसागराभिषेकाः सादरमप्यपास्तदरं सबहुमानमवमतमानं साञ्जसमप्यनसमञ्जसं सप्रश्रयं सविनयं सहर्ष सरोमो- पं सानन्दं सविस्मयं त्यक्तस्मयं सोल्लासं सप्रकाशं दिवसकरसम्मिता- वर्चवन्दनेन सुखसम्पतिसाधनेन शिवाध्वस्यन्दनेन दुष्कर्ममर्मशिलो-. चयच्छेदनसक्रन्दनेन घनाधनेनेव विनयाकुरविपिनमुल्लास्य आलस्यं च. परास्य सुस्फीतिपुण्यप्रीतिस्यूतसयुक्तिभक्तिमात्र प्रकाशसम्ञवो गलितम- न्यवो विज्ञपयन्ति । पुनरेतदर्थसङ्घहश्चेत्यम्- नम्यान् प्रणम्य सम्यक् श्रीअणहिलपत्तनाभिधानपुरे। संस्थायुकान् सतवान् श्रीमज्जिनभद्रमुरिवरान् ॥ १ ॥ श्रीसिन्धुदेशमध्यगमल्लिकवाहणपुराजगख्यातात् । ३ १८ विज्ञप्तित्रिवेण्यां , . जयसागराभिषेका वन्दित्वा ज्ञापयन्तीत्थम् ॥२॥ तथा च- इह हि मिहरकरस्पृष्टानि पुण्डरीकाणीव सदुपकारतुष्टानि सज्जन- जनमनांसीव धाराधरधाराहतकदम्बवृन्दानीव च विलसदुल्लासपेशलानि सुखविजयारोग्यसुभगम्भावुकानि भविकानि श्रीमत्पादप्रसादसम्पदोत्सर्प- माणानि प्रोज्जम्भन्तेतमाम् । दूरापसारितामितशोचनं तमस्तोमविरोचन सुखसम्पत्तिसंयोजनं प्रीणितसज्जनजनं अकाण्डामृतकुण्डमजन प्रयोजन चादः-तथा, समायासीदसीममहिमप्राज्यश्रीपूज्यराजप्रहिता सर्वजनम- हिता हितावहस्वरूपपक्षभरं विस्तारयन्ती सन्मानसप्रिया नालीकवदना मधुरवाक्यपेशला कोमलपदपङ्किलिखितिकलहंसिका चिरकालादस्मत्करकु- ड्मलकमलाऽलङ्करिष्णुभावमिति । सा च तत्रत्य तत्तदशेषविशेषप्रख्यापनकू- जनेनास्मन्मनःपरितोषमपुषत् । सा कथमिव वर्णनातिगगुणा वर्ण्यते, या कुमुदतीवातीब विमलसितपनप्रतिष्ठिता नालसहिता च लसन्नीलमणिवर्ण- नीयसुवर्णसवर्णाक्षरदक्षरभ्रमरमालालङ्कृतमध्यभागा निरुपमतमनवनवलस- द्रसमकरन्दविन्दुद्भावनेन भव्यालिं तर्पयामास । यां चात्यद्भुतप्रचितसुरचन- वचनचातुरीचारूक्तियुक्तसूक्तवर्ण्यवर्णक्रमन्यासमञ्जुलां निभालयन्तो विस्म- यविस्मृतनिमेषतया निवातनिश्चलनीलोत्पलपलासायमानलोचनास्तत्तदर्थ., कौतुकाकूततरलितमनसो विद्वांसो बोभूयांचक्रिरे । यथा च पर्यन्यवृष्टयेव विविधवन्धुरमधुरसधुक्तिप्रकारसमाचारामृतासारं वर्षन्त्या तुष्टिपुष्टिश्चतुर- चेतश्चातका निरातङ्काश्च चेक्रीयांचक्रिरे । यस्यै च शरद इव नाना सहृद- यजनहृदयजलाशयपङकोषिण्यै सर्वजगचोषिण्यै कुवलयोल्लासपोषिण्यै सम- स्तशस्ताशाप्रसन्नीकुर्वन्त्यै स्पृहयन्ति साधुराजहंसाः। यस्याश्च चञ्चद्व- ला इवोद्वृत्तः सरससदुक्तिसूक्तफलपटलैमनोबालकं रमयन्ति सन्तः । यस्याश्च बहुलरत्नापूर्णायाः परमोदकानुभावाया विलसद्भाम्भीर्यगुणवर्याया प्रथमा वैणिः । १९ उल्लसदविरलोज्ज्वलानवद्यगद्यमालामाद्यकल्लोलायाः स्फुरद्धेतुयुक्तिजातस- म्पातवक्रनकचक्रदुरधिगमायाः पयोधिवेलाया इव मध्यं कथमप्यवगाह्य विवुधबुद्धिवेदाकप्टेन कथञ्चित्पारीणभावमनुबोभूयते । यस्यां च सरस्यामिय मधुरषनरसप्रशस्यायां जगज्जन्तुतापव्यापनिर्वापपरायां चातुरीलहरी मिरुल्ल- सन्त्यां भारती भगवती हंसीव हसन्तीवोल्लसन्तीव वसन्तीव स्नान्तीव मज्ज- न्तीवोन्मजन्तीव किलन्तीव क्रीडन्तीय साक्षादिव नित्यं लक्ष्यते । किं बहुना:- विनाजन लोचनयोविकाशनं हनप्रवृष्टिश्च वपुप्यतर्किता । विनापि राज्यं सुखसम्पदासी किमप्यपूर्वा गतिरेतदीया ॥ १ ॥ अपि च- नयनसुखदां पायं पायं मुहुर्नयनाञ्चलैः सुचिरमपि यां प्राहं ग्राहं मुदाकरकुड्मलैः । हृदयनिहितां कारं कारं स्फुरत्पुलकाङ्गका वचनविषयातीत तोपं परं स्म लमामहे ।। २ ॥ सा तादृक्षा क्षपितजगचापा स्वसुखावस्थानभव्यजनतत्तदगण्यपुण्यो- पकारविधाननवनवस्थानविहरणश्रीमज्जैनमतप्रोत्सर्पणतत्तदन्तिपदध्याप- ननानाधीत्सवविधापनवव्याख्यानविधानादिरूपशुभरूपस्वरूपनिरूपण- दीपिका यथावसरं तदनागमहिमागममुकुलितास्मन्मानसानन्दमाकन्दवृन्दो. ल्लासिनी वसन्तर्तुरिव सदाऽहाय प्रसह्य प्रसाद्या । तथा वयमत्र विघटमान- कमलकोशमध्यनिर्गच्छदतुच्छोत्साहवशमाद्यन्मधुकरझङ्कारकृतमाभातिकम. ङ्गलध्वनौ सङ्कटमानचटुलचक्रमिथुनपृथुप्रमोदौजस्विमजकूजनकोलाहलि- नि सञ्जायमाने विभातसमये, अपराशासंसर्गरङ्गद्रागात्मपत्यवलोकनोत्पन्न- मन्युवैमुख्यां प्राचिदिग्विलासिनी कोमलतरैः स्फुरत्कश्मीरजरजोराजिमजि- - ..
२० विज्ञप्तित्रिवेण्यां मजित्वररञ्ज्यत्कौनुमाम्भःशुभत्कौसुम्भकुसुमकिंशुकशुकचञ्चुचञ्चुरचलत्कि- किलिपल्लवहिङ्गुलप्रवाललीलामनुभवद्भिः प्रसृत्वरैः करप्रसरैः प्रसादयितु- मिव प्रसाधयति स्पृशति जगत्प्रवाधिप्रबोधप्रथमप्रारम्भमङ्गलकलशायमान- मण्डले मार्तण्डे कलहंसशावकेषु प्रथमोनिद्रेपूनमुद्रितलोचनेषु तत्कालो- ज्जृम्भमाणकमलाकरकेशरैः कल्पवर्त कुर्वत्यु सद्भक्तिभावोल्लासभाजनज- नितजिनसभाजनसभाजनस्वान्तपोतकान् मधुमधुररसेक्षुरसपायसमाधुर्यजैत्र- श्रीवामेयचरित्रगतोपदेशपेशलपृथुलप्रातराशप्रदानेन पुण्यपुष्टिभाजःसम्भा वयन्तः,मध्यदिने मतिशीलगाणि-सम(य)कुञ्जरमुनि-स्थिरसंयममुनी- नधीतज्येष्ठक्षेत्रसमासादिधर्मप्रकरणान् कर्मग्रन्थं कर्मविपाकाख्यमध्या- पयन्तस्तद्वयं चाभिनवकाव्यशिक्षायां योजयन्तः, रत्नचन्द्रक्षुल्लकं चाधी- यमानस्वाध्यायं शब्दब्रह्मव्याकरणमधिजिगापयिषन्तः, परान् निर्ग्रन्था- नपि तत्तल्लक्षणान्वेषिकीनिघण्टुस्वाध्यायादिग्रन्थपाठनेन यथासमयं सग्र- न्थानादधानाः, वनीपाला इव नवनवागमान् कदाचित्सारयन्तः प्रमादपि शुनोपप्लवाच्च निवारयन्तः, कदाचिदुच्चावचाभिग्रहोपचितपवित्रव्रतजात्य- विटपिनो भव्यजनस्वान्तमृदुलतमक्षितितलप्ररूढान् सदुपदेशशंवरयोगेन प्रौढिं प्रापयन्तः, कदाचिद्दन्तिषन्मतिव्रततिकाः शास्त्रतात्पर्यपालोचन- प्रकारमण्डपोन्मुखीः समारचयन्तः, कदाचिदवनीपाला इव विविधविषय- नयस्वरूपसात्म्यं परिभावयन्तः, कहिचिच्चापणिका इव प्रमाणप्रमेयव्यव- हारचातुरी परीक्षमाणाः, कदापि महासुरसेनाञ्चितं नव्यं काव्यं देवा इव निबध्नन्तः, कदाचिद्दुधवद्देवगुरुसान्निध्यात्तुष्टिपुष्टिभाजः सांयमानाचार- णीयान् योगान् समग्रानपि यथाकालं यथार्ह प्रयुञ्जानाः, आवश्यकेषु तेषु तेषु धर्येसु कर्मसु कृतावधानाः, कदाचित्संयममयात्मारामे मनो- मयूरं ररमयन्तोऽनूपदेशा इव सर्वतः कुशलताप्रधानाः श्रीपरमेष्ठिवर्द्धमान- महामन्त्रविद्याबीजाक्षरस्मरणत्रिषवणेन सर्वाङ्गीणं पापतापं न्यत्कुर्वाणाः " .
'मधमा वेणिः।
श्रीमच्छीपूज्यराजवर्यपादप्रसादसौधमध्यासीनाः प्यानशुमध्यानं दधानाः,
सपरिच्छदा विशदसमाधिनिस्तुपसुखविजयारोग्यसमापिशुद्धा वेविद्याम-
हेतमाम् । तथा शुभवद्भिस्तत्र भवद्भिर्मदन्तमहरैर्यल्लिलिखानमासीद-"य-
युप्माभिः केषु केपु स्थानेषु पुरेपु ग्रामेपु वा विहृत ! क्व वा तीर्थे या.
त्राविशेपधर्मकर्म शर्मकार्यर्जितं ! आगन्तुकलोकवार्तया तु भवन्तो न-
गरकोट्टाय प्रतिष्ठासवः शोथ्यांचक्राणास्तत्त्वं तु सम्यक्तया न जानीमः,
तेन स्वकीयविहारयात्राप्रकारादिविशिष्ठज्येष्ठपुण्यात्मकः समाचारोऽस्म-
च्छुतिशप्कुलीवलयावगाही विधेयः" इति । चत्रार्थ क्षणमेकं दताव-
थाना अवधारयन्तु गच्छेशाः, यथोचरा भवामः।
तथा च-
इतः पूर्वमपूर्वसुपर्वणिरमणीये श्रीदपुरुपोचमाश्रमे स्वःसमे
श्रीमम्मणवाहणपुरोचमे पुरातनी चतुर्मासीमसीममुखसम्पत्त्या सूत्रयां-
चक्रिम । तदनु च सं० सोमाकखपुत्र-सं० अभयचन्द्रमेलितेन सह-
धेन समं श्रीमरुकोहमहातीर्थ भवाम्भोधितीर्थ पृथ्वीभक्तयो वयमवन्दि-
महि । ततश्च क्षेमेण मम्मणपुरे परमं प्रवेशोत्सवमनुमवन्तः ससड्या
'वयं प्राप्ताः।
इतश्व-
फरीदपुरमित्यस्ति पुरं परमवैभवम् ।
बहुधान्यधनसम्पन्नं सम्पन्नोज्झति यत्क्षणम् ॥ १ ॥
यदेव देवगुर्वाज्ञासजसज्जनसकुलम् ।
पदं मुदामुदाराणां ताराणामिव पुष्करम् ॥ २॥
दीनदर्श दयन्ते ये दयन्तेऽधिजने धनम् ।
दीयते दुरितं तेषां धर्मध्यानानुमावतः ॥ ३॥
२२ विज्ञप्तित्रिवेण्यां श्रीमजिनेन्द्रशासनप्रभावकाः श्रावकाः शुचिमनस्काः । निवसन्ति तत्र वहुला बहुलामा लसितलक्ष्मीकाः ॥ ४ ॥ (युग्मम् ।) तदा च लब्धावसराः स्फुरत्सद्भावभासुराः । तेऽस्मानभ्यर्थयांचनुर्विहां स्वपुरं प्रति ॥ ५ ॥ प्रास्थिष्महि ततस्तस्मात्तदाग्रहवशाद्वयम् । साधुभानुसमीराणां स्थिति कत्र युज्यते ॥ ६॥ क्रमेण द्रोहडोहादीन् ग्रामानुद्दामवैभवान् । मध्ये कृत्योत्सवे प्राप्ताः श्रीफरीदपुरं पुरम् ॥ ७ ॥ तत्र च विविधधर्मोपदेशामृतसेकेन भव्यलोकविवेकाकुरानुज्जीव- यतां जिनमतं प्रभावयतां कांश्चिहह्मक्षत्रियन्त्रालणादीन् जिनमतानुगभक्तीन् कांश्चिद्भद्रप्रकृतीस्तैस्तैर्द्धर्मोपदेशैः कृतार्थयतां सतां सपरिच्छदानां समाधि- समृद्धो वहीयानननेहा व्यतीयाय । अन्यदा च प्राचीमुखमण्डने भानुमति जायमाने जगद्व्यवहारहेतौ प्रत्यूषसमये आसीनायां राजन्यवाणिज्यब्राह्मणादिपरःशतोत्तमजात्यजन- पर्षदि धर्मोपदेशक्षणं क्षणादासूत्र्य निवृत्तेष्वस्मत्सु गायनेषु च कलस्वर- ताललयमानबन्धुरां गीतिमुदायत्सु, अकस्मादतर्कितः कुतोऽपि- धूलिधूसरितकूर्चकुन्तलो वामहस्तविलसत्कमण्डलुः । क्षामकुक्षिरतिबीथ्यतिक्रमात्कोऽपि जीर्णवसनोऽध्वगोऽभ्यगात् ॥ १ ॥ आगत्य चोचितं विनयं व्यञ्जयन् समुदितमना मनागुन्नमितोत्त- माङ्गः पुरस्तादासांचक्रे । वयमपि सदाकृतिरिति तमाभाषयांचकृम । " भो- स्तीर्थयात्रिक ! पथिक! कुतः प्रष्टव्योसि ? केषु केषु तीर्थेषु दृष्टपूर्वीभवान् ?
प्रयमा वेणिः। २३ 'नानादेशविहारिणः खल्वपूर्वापूर्वस्थानदृश्वानो भवन्ति ।' तत्कथय का- श्चिदपूर्वामृतायमानां किंवदन्तीम् । परितोषय क्षणं पर्षदम् ।" असावपि श्रूयतां महाभागाः ।' इत्यभिधाय सुधाकिरा गिरा भणितुमारमत । तथा च- अस्त्युत्तरस्यां दिशि सश्चितः श्रिया स्त्रीपुंसरत्नोत्कररोहणाचलः। देशस्निगर्तोऽहिरोऽधिवासिनां तीर्थगैरीयानचलैरिखात्र यः ॥१॥ तत्रापि पावनं तीर्थ श्रीसुशर्मपुरे परम् । दृशोरध्वन्यतां याति पुण्यैरेव हि देहिनाम् ॥ २॥ देवाधिदेवनाभेयादिमानत्वाऽऽलयस्थितान् । द्वेधापि परमानन्दप्राप्तं स्वं मन्यते बुधाः ॥ ३ ॥ तीर्थमनादियुगीनं वामानसागोचरप्रभावाव्यम् । यैष्टं दृष्टिभ्यां तैईष्टव्यं जगति दृष्टम् ॥ ४ ॥ ते धन्यास्ते सुजन्मानस्तेषां वर्ष्या च वैदुपी । गत्वा जालन्धराधीशानानृचुर्ये जिनेश्वरान् ॥ ५॥ म्लेच्छन्यालेषु देशेषु निखिलेषु कलौ युगे । निरत्ययं हि तत्तीर्थ मराविव सरोवरम् ।। ६॥ तस्य तीर्थस्य महात्म्यं कियद्वच्म्यपटिष्ठधीः । तदुपास्य ततः पश्चाद्धन्यं मन्योऽत्र चागमम् ॥ ७॥ तदेतदत्यद्भुतं स्वदृष्टमुक्कं वाच्यं न्यक्षेण तद्विदांकुर्वन्तुः । ग. न्तव्यो नोऽद्यापि महानस्तिपन्थाः ।" इत्यभिधाय स प्राचालीत् । तदनु च तया वाया इतमनस्का इव चित्रलिखिता इव सञ्जावरणरणका इव आग्रहमहिला इव वयं ससम्या वभूविम । मनसीत्थं विचारितवन्तश्च यदुत म्लेच्छाकृलेऽस्मिन्नपि नीवृत्यभ्येत्य वचाइगमिथ्याग्दुएजनानन- - २६. विज्ञप्तित्रिवेण्यां निभालनात्पन्नमालिन्यमलस्पृशदिशोविमलतानिदानतत्तथाविधतीर्थदर्शन- सुधासर सम्पर्केण विशदता नापादयिष्यते तर्हि ' भृते सरसि तृषा, सिद्धे. परिवेषितेऽप्यन्ने बुभुक्षा, सति विभवेऽपि दारिद्यं, समुदिते, भानौ तमः ' इति न्याय आयातः । ततो येन केनापि प्रकारेण यथा कथञ्चिदेषा यात्रा समासूच्यते तदा साधु, अन्यथा पुनः क्व वयं क्व च श्रीनगर- कोहाख्यं महातीर्थमिति मनोरथोऽस्मन्मनः पूर्वाद्रौ हिमांशुरिवोदेषीत् । एवं च ते ते श्रावका अपि यात्रायां जातोत्कण्ठा वयमिव भृशं वभूवुः । विशिष्य च तदा- साधुराणासुतश्रेष्ठाः शिष्टाचारानुसारिणः । निवसन्ति त्रयस्तत्र त्रयो वर्गा इवाङ्गिनः ॥ १ ॥ तेषु प्रथमकः सोमो धर्मकार्यधुरन्धरः । द्वितीयः पार्श्वदत्तोऽस्ति हेमस्तु गरिमासदम् ॥ २ ॥ तत्र तद्योग्यतां मत्वा तत्कार्य तेभ्य एव हि । उपदिष्टं तदाऽस्माभिरुत्तमं झुत्तमो ऽर्हति ॥ ३ ॥ ते चैवं चिन्तयांचक्रुस्ततः शुद्धाशया रहः । यायावरैर्धनभारैः स्थावरं पुण्यमयते ॥ ४ ॥ गुरूपदेशाच्चेद्यात्रां कुर्मोऽत्रावसरे वयम् । निर्मलं सुकृतं कोशे विश्वे कीर्तिश्च तादृशी ॥ ५ ॥ इति ध्यात्वा स सोमेन्दुः सवन्धुः साहसांग्रणीः । क्षमाश्रमणदानेन यात्रोपक्रममादधे ॥ ६॥ ततश्चः सुमहर्द्धिकः सपरिच्छदो यावता तत्तत्सन्निवेशेषु- सङ्घम- हाजननिमन्त्रणमहामन्त्रप्रणिधानपुरस्सरं तत्सकसम्महनिकायां प्रवृत्तः, तावता वयमपि तत्रत्य सङ्घाग्रहेण श्रीमाबारपपुरं श्रद्धालगृहशतसङ्गुलं समुपेयुमः।
प्रयमा वेणिः। २५ . तत्कीदृशम्- धार्मिकोऽपि जनो यत्र चित्रं जीवाईको न हि । न-चापविद्याकुशलो मार्गणानपि नास्यति ॥१॥ तत्र च वर्चमानाः कांश्चन परतीर्थ्यानपि जिनशासनानुकूलमन- स्कान् , काश्चन नवनवाभिग्रहविशेषप्रदानश्च श्राद्धानिव वाढवक्षत्रियवै. श्यान् कृतार्थान् कुर्वन्तस्तथाविधधर्मोपदेशोलसद्देशनाप्रदीपकलिकोज्न- म्मणेन कापसञ्चरिष्णून् जनान् सत्पथपान्थतां कांचन प्रापयन्तः पुण्यफलाः कियतीरपि कालकलास्तत्रैवातिवाहयांवभूविम । अन्यदा च, तथाविधसर्वविकृतित्यागमयाभिग्रहप्रन्थि समाप्तिसत्यंकारानुरूपवस्तुक्रय- विक्रयव्यवहारिणा पितृहरिश्चन्द्रसहचरण सा० शिवराजसुश्रावकेण परमनैष्ठिकैन समाचञ्चूर्यमाणे सङ्घवात्सल्येऽनुतेष्ठीयमाने च सङ्घसरकारे तोप्यमाणे यौचित्येन याचकस्तोमे गायत्सु सर्वलोकप्रकटं गायनेषु परिसर्पत्याकाशं स्वगिणामिदं वृत्तं निवेदयितुमिव वादित्रनिनादे शुमवे- लायां ग्रामठकुरादिलोकसमक्षं श्रीआदिजिनप्रतिमा प्रत्यतिष्ठिपाम- तमाम् । एवं तोष्ट्यांचकृम च । तंतंतुतातो तीतेतिः, तांतांतांतताततुत । नृनांनिनुननानैना अन्नेनो न इनो ननु ॥ १ ॥ सम्पन्नमोक्षावसथो विकल्मषः समापयंस्तामसमयमोपमः । सनातनोद्दामसमृद्धिशस्यः स वः प्रदचामसमं समुद्धरम् ॥२॥ वन्दितो वृपमेश ! त्वं महामहिममन्दिर ! । महाशयस्य भक्तस्य समाधिभरमीश्वर । ॥ ३ ॥ (मटारचकम्, परिधिभोकः, क्रियागूटय ।)
२६ विज्ञप्तित्रिवेण्यां .. तदित्थं सङ्घकार्यमाचर्य तत्कालागत-सा० रामा-सा० सोमा- हेना सा देवा दस्मू-पुरस्सर-फरीदपुरीयसङ्घामन्त्रणेन ततो विहृत्य पद्धत्त्यन्तरालायातेपु तेपु तेषु बहलभक्तिभावमञ्जुलविपुलश्रद्धालकुलम- ण्डलाभिरामेपु ग्रामपु तत्रत्यजनकारितानुत्साहोत्सृतपताकापल्लवान् पदे पदे प्रवेशोद्धवान् साक्षात्कुर्वन्तः क्रमेण प्रस्तुतास्पदमलमकार्म । ततश्च सङ्घो गणकमुपवेश्य सङ्घयात्राप्रस्थानमुहूर्त निश्चिकाय । तदा चावसरे गुर्वास्थास्थेमभाजः सुबहवो बहुमन्यन्ते स्म । यदुतेदृशे विषमदेशकालादि- भावेऽप्यचिन्त्यादृष्टसामर्थ्यादमूदृशं नाम कार्य सरेदपीति । केचन पुनः कथञ्चित्तथाविधव्यवहारेण यात्राकारिप्वगारिपु साभ्यसूयास्तदून्नति भावि- नीमसहिष्णवो ऽन्यथाऽन्यथा व्यब्रुवन् । केऽपि च मध्यस्थाः कालादि- भाववैषम्यं ज्ञापितवन्तः, 'यदेतादृशेन सङ्घन दूरदेशान्तरप्रस्थानं न युज्यते' इति । महाकार्यारम्भे सुलभे एवं विधे लोकवादे क्षणं दोलारूढमिव नश्चेतः समभूत् । ततः पारिणामिक्या बुद्धयेति मीमांसामहे स्म । यदुत, लोकः खल्ल परविघ्नसन्तोषी, यद्वा लोकवाक्यानां नैकः प्रकारो; यदि तागू लोक- वाग्मात्रेण स्थीयते तदा द्वयोरपि न शोभा; न स्वयशो नापि परयशो रक्षितं स्यादित्येतत्कर्म निम्मितं वरम् , अनिम्मिते कृत्ये मनोमनो- रथासिद्धरसमाधिः सार्वदिकः, परेषां च प्रस्थायुकानां कलौ कालमुख्य- माविर्भविष्यति । ततश्च मनो यावन्मनाक् सत्त्वे प्रतिष्ठाप्य श्रीदेवरा- जपुरमण्डनकुशलशब्दाङ्कितगुरोर्वाञ्छितकल्पद्रोः प्रणिधानजं स्फुटरूपमु- पदेशवलमासीसदाम । तदेतत्पिपासितस्य सुधापाननिमन्त्रणं नृत्येच्छोघ- घरसम्बन्धनं भृशमुन्मनीभावमुदपीपदत् । ततश्च तदादेशेन सन्नाहेनेव स्वचेतःशरीरं सन्नह्य साध्यसिद्धौ नितरां बद्धाध्यवसाया जातवन्तः । धर्मो जयति । त एव पूर्वगुर्वादयः शरणमिति कृत्वा । इत्यलं विस्तरेण । प्रकृतं प्रस्तुमः। तु
प्रथमा वेणिः
२७
अथ च शोमने दिने प्रशस्त मुहूर्ने शुभकर्मप्रायोग्ये च योगे
प्रियंकरणे उच्चैहस्थेपु ग्रहेषु सौम्यस्वामिक्सम्पन्ने लमे यात्रा च
नक्षत्रे वर्तमाने सा. सोमाकेन श्रीतीर्थप्रणीनसया च मेरितपरमप्रमो-
दोल्लासेन चोत्साहितः श्रीसङ्घः प्रस्थानमङ्गलमसाधयत् ।
मङ्गलं भगवान् धर्मो मगलं जिनशासनम् ।
मजलं तन्मतः सद्यो यात्रारम्भोऽतिमङ्गलम् ॥ १॥
इत्येपा विज्ञप्तित्रिवेण्यां प्रस्तुतार्थप्रस्ताविका सरस्वतीकल्लो-
लाख्या प्रथमा वेणिः ॥१॥
.२८ विज्ञप्तित्रिवेण्यां ॥ अथ द्वितीया वणिरारभ्यते ।। तथा च, श्रीसङ्घस्य प्रयाणावसरे शुभोदर्कसम्पर्कशसिभिः शकु- नैश्चेत्यं विजृम्भितम् , यथा सङ्घस्य प्रस्तुतपुण्याशासाफल्यं सम्मावयन्त्य इव सावशेषा आशाः पुण्यप्रकाशा आसन् । परमाराध्यसान्निध्यकृत- मार्गविघ्नभञ्जनस्य यात्रिकजनस्य भाविसुखव्यञ्जना इव प्रभञ्जना अनु- कूलं ववुः । नास्ति किञ्चिद्युप्माकमवामदैवानां दुर्गममिति कथयन्तीव दुर्गा वामा शब्दं चकार । शकुकर्णोऽपि स्वात्मनि प्रस्तावदक्षतामिवारो- पयन् वामदिन्भागमाश्रित्य कोक्यामास । मौक्तिकाख्यः श्वा सव्याहां श्रयन् साधूनां प्रस्थानमङ्गले सानिध्यमिव व्यधात् । अपि च- - कुम्भोऽम्भोनिभृतोऽभ्यगादभिमुखं शङ्खो जुघोष क्षणं क्षोणीशाभिगमः सवत्ससुरभेरीक्षा च ढोल्लध्वनिः । फेरुमिरवश्चुकूज मधुरं जातत्वरस्तित्तिरि- रेवं सच्छकुनावलीद्विगुणितोत्साहा वयं प्रस्थिताः ॥१॥ ततश्च नातिदूर एव जम्बूकदम्बनिम्बसर्जार्जुनखर्जुरीप्रभृतिवन- स्पतिश्रेणिसच्छाये वहुलकमलकिंजल्ककल्ककलितसौरभभास्वरेण सरितु- ङ्गालिहलहरिलीलांदोलनोद्धृतपृषतशीतलेनानिलेन सेवनीयतया मनोहा- रिणि मुक्ताकणशङ्खवलक्षसिकतोल्लसद्भासि विपाट्तटिनीरोधसि सङ्घः प्रथमप्रयाणविराममकरोत् । ततश्च- - विकचकुवलयास्या सम्भ्रमझ्नमालो- ज्ज्वल बहलकटाक्षी पीनचक्रस्तनाब्या।
4.
..
द्वितीया वेणिः ।
जललवणिमरम्या दर्शिताऽऽवर्चनाभि-
श्चललहरिमुजाभ्यामाहृयन्तीव दूरात् ॥१॥
कासहंसपरिहासलीलया तं रिरंसुजनमुत्सुकयन्ती।
नव्यशप्पवसना व्यलोकि सा सिन्धुदम्भवशतो वराहना ॥२॥
सन्मार्गरोधिनी सर्वपथीनां तां च निमगाम् ।
शुद्धामिव मन्यमाना अतिचक्रमिम क्रमात् ॥ ३॥
तामुत्तीर्य च क्रमेण श्रीसद्यो नानापामानिवाऽऽरामानुल्लङ्घयन्
श्रीजालन्धराननु प्रचचाल । चलिते च तस्मिन्विस्मितान्यलोके सकलम-
हीवलयलङ्घनजङ्घालाः करकृतकरवाला महामुजा मुजावलमबलसम्पत्यः
पचयः केचिद्याप्टीकाः केचिलाधिकाः पारश्वधिकाश्च, केऽपि दृढवपुष्का
धानुष्काच,केचन वीरकोटीराः काण्डीरा नैत्रिंशिकाश्च प्रोल्ललन्तः कूर्दन्तः
पुरः स्फुरन्तो गर्जन्तो नानारूपप्राप्ता मूर्ती वीररसांशा इव स्वामिकार्यदक्षा
बद्धकक्षाः पुरस्तादुच्चेलः । तत्पृष्ठे च स्यौरीप्रष्ठा विशिष्टा भूयिष्ठास्त्वरया
तुरगानपि मन्दगतिकानिव सम्भावयन्तः प्राचालिपुः । इत्थं च ते ते
सहजनाः केचिद्वाहनासूढाः केऽपि गुरुदेवमक्त्यतिशयात्पादचारिणः
केऽपि मुक्तोपानहश्च वयमिव प्रस्थितवन्तः । तदा च प्रचलत्सङ्घजनान-
नोल्लसद्वहलकोलाहलनिनदैरासन्नवननिकुञ्जप्वकाण्डकल्पान्तापातातङ्कशका-
शङ्कुशल्यितमनसः सम्भावितापदः श्वापदाः कान्दिशीकाः कथश्चित् कापि
निलीयावत्तस्थिरे । अन्यच्च तीर्थयात्रामनोरथप्रथितपृथुप्रभावास्ताघस्यानघस्य
श्रीसहस्य क्रमस्पर्शवशोल्लसत्सुकृतेन निराकृतांहोनजं तु रजोऽप्युधैर्वि-
चचार।
तथा च:-
'नियतं सहलोकामिलचोद्भुतो रजोवजः ।
घन्यमान्यतया मन्ये नृत्यविस्म नमोऽङ्गणे ॥१॥
३०
विज्ञप्तित्रिवेण्यां
एवं चाविच्छिन्नैरेव प्रयाणैनिर्वृतिस्थानानि पुराणीव वनानि मु.
श्चन् वल्लभारागोचितानि तरुणचित्तानीव वप्रान्तराणि साक्षात्कुर्वन् पच्य-
मानगोधूमसङ्कलानान्त्यजपाटकानिव क्षेत्रसीम्नः सुदूरं त्यजन् क्रमेण
निश्चिन्दीपुरीपरिसरसरोवरान्तर्वर्तमानोद्दामविपिनोद्दण्डपद्मखण्डान्तरे
कलहंसकलामनुभवान्निवासांचकार श्रीसद्धः ।
अपि च-
कृताश्रितपरित्राणः सुरत्राणोऽस्ति भूधवः ।
परन्तपः पुरे तस्मिन्नाके नाकपतिर्यथा ॥ १ ॥
सोऽथाऽऽकर्ण्य सकर्णानामग्रणीः सङ्घमागतम् ।
चित्रीयमाणहृदयो द्रष्टुं सोऽप्यौत्सुकायत ॥ २ ॥
तुङ्गाङ्गतुरगारूढः प्रौढामात्यादिसङ्गतः ।
अदृष्टपूर्तीनिर्ग्रन्थानुपेत्योचितमाचरत् ॥ ३ ॥
अपूर्वदर्शनान् साधून् दर्श दर्श नरेश्वरः ।
विसिमिये समं पौरै राजहंसान्मरुयथा ॥ ४ ॥
तैस्तैस्तथाविधैर्धन्यैरुपदेशैः सुरञ्जिताः ।
प्रमोदमेवं मनुजास्तदा पुरीश्वरादयः ॥ ५ ॥
(गुप्तक्रियः।)
" वनमप्यभवद्धन्यं नगरी तु गरीयसी ।
प्रदेशोऽयं प्रशस्योऽभूयेन यूयमुपागताः ॥ ६ ॥
पुरा श्रुताः स्थ गोष्ठीषु श्रुतिभ्यामभ्युपायतः ।
पुण्योदयेन नः प्राप्ताः साम्प्रतं दृष्टिगोचरम् " ॥ ७ ॥
एवं स्तुत्वा च नत्वा च भूमानानन्दतुन्दिलः ।
सम्मान्य सङ्घपं वेगात्ततो धाम जगाम स ॥ ८ ॥
द्वितीया वेणिः। विपाशापयसा छिन्नपिपासाः सधपूरुषाः । स्वगेहनिर्विशेषण मुखेन प्रस्थितास्ततः ।। ९ ।। सर्वतो विसारिणी सरिलक्ष्मी वामतः साक्षात्कुर्वतामघोऽयो विवि. धपादपान् सञ्चरतां तेषां व्यतीते कियत्यपि पथि साधुरिव परमोदकः सचित्तप्रकाश इवालब्धमध्यः स्त्रीचरित्रप्रकार इवामुगहनः क्षत्रिय इव महासत्त्वादयः क्रीडकुरुरुकेकिचकचकाङ्गचक्रवालशालितपरिसरः विस्मे- रारविन्दवृन्दो महानेको नदः पुरो दृग्गोचरमवततार । दृष्ट्वा चैत्यूहांच- कृवांस । .. नूनं यानतया निषेव्य सुचिरं धातारमाऽऽतूतुषद् हंसः स्वीयकपक्षिजातिनियतस्थानाय चाभ्यार्थयत् । तुष्टोऽसौ तदिदं पदं हि विदधे व्याधायगम्यं क्वचित् तसादत्र पतत्रिणः प्रमुदिताः क्रीडन्त्यहो निर्भरम् ॥१॥ परितोऽपि विसारिणा परितं पयसाऽत्यच्छगमीरभावमाजा। वनमेतदुदनराजधानीमिव सेवन्ति सुखं बिहकराजाः॥२॥ अपिच- स्मितकोफनदं नदममि रभसा सम्भ्य सारसा एते । विशमफरन्दावादनमचाः क्रीडन्ति निडिम् ||३|| ममिकजमफरन्दमापतन्ती स्थूलोनीलसशमृनमालाम् । अवलोक्य शिखी घनप्रमेणोकेको नृत्यति मासयकलापम् ॥ ४ ॥ एवं च समन्तानदभियं केननिद्वनेचरेण वर्ण्यमानां श्रुत्वा दृष्टुमिव रविरुधः पुष्करदेशमारुरोह।
विज्ञप्तित्रिवेण्यां - - - तदा च-- सारङ्गास्तरुकोटराणि शरणीकुर्वन्ति तापार्दिता हित्वा रङ्गममी विहङ्गमगणाः कुजं भजन्तेऽजसा ।.. वीथ्यः पान्थनखंपचोच्चरजसा जाता अमूर्दुर्गमा- स्तेजोराशिभिरुत्सृते दिनपतौ जाते ललाटंतपे ॥५॥ अयं नदपरिसरः, एते च सान्द्रद्रुमच्छायाः प्रदेशाः, एतेच तुङ्ग- तुरङ्गोद्गृहीतपृषतशीतला अनिलाश्च यथासमयोपपन्ननिरुपाधिसुख- साधनं तदस्य वचनं तथ्यं सम्भावयंस्तत्रैव सजनः समग्रोऽपि स्थिति व्यरचयत् । अथ च- प्रदेशे सजले केऽपि तस्थुः केऽपि तरोस्तले । आर्द्रदूर्वावणे केचित्पान्थानामीदृशी दशा ॥ ६ ॥ हंसवत्सुचिरं कृत्वा जलकलिं नदाम्भसि । केऽपि निर्बापयामासुमनांसीव वपूंष्यपि ॥ ७ ॥ समाधिमानसौ जातः प्रयाणमकरोत्ततः । अथ क्रमात्समायातस्तलपाटकसन्निधिम् ॥ ८ ॥ तत्पुरोपवनेषु चतुष्पथेण्बिवोद्गन्धिसौगन्धिकेषु मन्दमृदुमरुदन्दो- लिताभिलताभिवर्तीज्यमान इवातुच्छगच्छच्छायाच्छलेन च्छत्रेणाऽऽभूष्य- माण इव पिककोकचाषादिपक्षि-कारैः स्वागतं तद्वनाधिष्ठाच्या पृच्छ्- यमान इव क्यापि महाशोणाभ्यणे कीर्णकमलमकरन्द बिन्दुवृन्दसौगन्ध्य- स्पृहणीये भूभागे प्रयाणविच्छेदमकरोत्सः । तत्र च पवित्रविकसितपझ- वनरामणीयकमनालोकितपूर्व निर्वर्णयन्तो जना एवमूहांचक्रुः ।
द्वितीया वेणिः। ३३ किममी सलिलाधिदेवतानां प्रत्यक्षाः प्रसरन्यहो । कटाक्षाः ।। किमु वा शुचि तन्निवासयोग्या तासां सौधपरंपरा नलान्तः । ॥ १ ॥ किमन्यत् ! एके पावनं दृशा निपिपन्तोऽङ्गलिभिः पार्श्वगान् सौत्सुक्यमाहुः--" पश्यत पइयत मोः ! कथममीपु कमलेषु मुगन्धला- भलोलपा मधुपाः पतन्ति । कथं चाकृतपरपीडाः साध्यापीडा इव रस- माहरन्ति ! । अस्माभिरहो । कूपमण्डकप्रायरियद्यापद्यन्नानुशीलितं तदपि गृहानिर्गतर्दृष्टम् " इति । अन्ये तु दाडिमीफलेषु तेप्विव बीजपूरेषु फलि- तपुपितेषु तद्वदाग्रेषु द्राक्षासर्जूरीषु च चक्षुः क्षिपन्ति स्म, तदभिलापपरा- मुखं नतु मुखम् । इत्येवं यावदभिनवदर्शनोत्पावितचक्षुरानन्दः सह- स्तत्र प्रदेश यावदास्ते, तावता- " ममिगमणवन्दणनमंसणेण पडिपुच्छणेण साहूर्ण । चिरसंचियपि कम्म खणेण विरलतणमुवेइ ॥१॥ इत्यापर्यजातं कृतार्थयनिव श्रीदेवपालपुरीयः सद्यो गुरुवन्दको टुटीके तथाविधातर्षितगुरुसमागमोत्कटक्तिः । तदा चास्माभिरपि वावियोपदेशरसायनेन सम्भावितः परमास्थास्थय तपानिजत् स्वशासने यथा मिथ्यात्वकन्दमुद्दालेपु पुरपेषु प्रथमां रेखां सस्वात्मनः समपुपत् । ततच "मवन्तोऽस्मदास्पदं पवित्रयन्तु स्वपादावधारणेन" इत्यवितपक- तामहं तं मयश्चित्सम्बोध्य पुरः प्रचलियांसः। ततथविपाशाकूलंकपायाः कूलमनुयजन्तः श्यचिद्धतस्वतः यवापिकुगद्वतः कुत्रापि नडकीयाननूपदे- गन् शादलान् सरसान् हन्गोचरयन्तो मध्यदेश प्राप्ताः । यत्र गोमाला मामाः रक्षाराध धेनवः । क्षीराणि प्रचुराज्यानि नपेयानि तान्यपि ॥ १॥ "
३४
विज्ञप्तित्रिवेण्यां
Co-
अपि च-
कोमलचनकाहारः कनकमयाभरणजातपरिहारः।
मुग्धगतिव्यवहारो ग्राम्यजनेष्वेष आचारः ॥ २ ॥
अदेयराजभागास्ते निरङ्कुशैकवृत्तयः ।
ग्रामीणा नागराँस्तस्मात्कथंकारं हसन्ति नः ॥ ३ ॥
चिरायुषः सुसंस्थानाः सुवद्धदृढसन्धयः ।
ते हि कृतयुगोत्पन्ननरेभ्य उद्धृता इव ॥ ४ ॥
अपि च-
कृतनापितकर्माणो हलकर्षादिकर्ममिः ।
पाणिपादेपु नैधन्ते नखास्तेषां शिखा इव ॥ ५ ॥
महाकूपसमुद्रेभ्यो जलाकर्षणशेमुषी ।
दृष्टा ग्रामेयकेष्वेव यदि वा धूमयोनिषु ॥ ६ ॥
कृष्णोर्णामयवस्त्राणि वसाना ग्रामवासिनः ।
माञ्जिष्ठेष्वपि वस्त्रेषु दृष्टा नित्यमनादराः ॥ ७ ॥
शास्त्रशिक्षा विनाऽप्येषां मतिः स्फुरति निस्तुषा ।
आजन्मक्षीरपुष्टानामिदं लक्षणमादिमम् ॥ ८ ॥
यत्र च-
यासां वराशयश्चोला वराशयश्व सुन्दरः ।
अतोऽल्पधनयोगेऽपि पौरीभ्योऽप्यधिकाः सुखैः ॥९॥
चण्डातकैस्तु पामर्य आपादतललम्बिभिः ।
यान्ति सन्मार्जनीकार्य कुर्वन्त्योऽध्वन्ययत्नतः ।। १० ॥
ग्रामस्त्रीणां न शृङ्गारों न संस्कारश्च तादृशः।
तथापि तासां सौंन्दर्य गुणाः प्रकृतिजाः खलु ॥ ११ ॥
द्वितीया वेणिः। उचाधूढाः शिरस्युच्चैर्दघाना मामयोषितः । या विनापि तदाधारं घटानुत्पाटयन्त्यलम् ।। १२ ॥ पशूनां परमा पुष्टिः क्षेत्रेपूत्पचिरुतमा। नव्यं रसायाः साद्ण्यमहो । देशस्य सौष्ठवम् ॥ १३ ॥ पीयूपपानपर्याप्तिमाम्याणां घुसदां तथा । तद्वासस्थान यो ग्रामः स किं मन्ये ऽमरावती ॥ १४ ॥ खन्यपानमवाल्येऽपि यथेच्छं दधिभोजनम् । घृतं च सलिलन्यायाद् प्राम्याणामप्यहो । सुखम् ॥ १५ ॥ तदित्यं देशचर्यानुभवपारदृश्वरी शेमुषी साहटयन्तस्तज्जानपदम- ध्यगा एव यावत्कृतिचिद्दिनानि स्थाने स्थाने विलम्बितवन्तः, तावदक- स्मादेकतः पोपरेशयशोरथानीकस्य, अन्यतस्तु तुरुष्काधीशशकन्दरा- नीफस्य च सर्वतः " इदमागतं कटकम् इदमागतं कटकम् नश्यते पला- य्यते " इत्यादितुमलारवो विश्वमयंकरो वीप्सायहुलः सर्वत्र प्रसारमापे. दानः । ततश्च क्षणं किंफर्चव्यताविमूदाः पुनः प्रणिधेयप्रणिधानमधानी- कृतमानसोत्साहरलाः कथञ्चिदुपलव्यतादृशोपायनिरपायास्तमस्काण्डमिव तादृगुदममयं विदरडम्बर सूर्योदयेनेव सङ्घपुण्योदयेन दूरमुज्जास्य स- हसा पुनर्विपाशस्तटमुपसपिम । नाव्यां तां च क्षणात्सममापदा पार- यित्वा कुड्दाख्यं पदं सहयन्तो मध्यदेश-जागलदेश-जालन्धर- देश-काश्मीरदेश-सीमासन्धिभूतं स्वाचारनिष्ठमहाजनपूतं हिरिया- णाख्य-महास्थानामध्यासामासिम । तत्र च शुचिम्पदेशे प्रधानधान्यक्षेत्रे महाजलाशयं समया कानुफयक्षायतनस्य नातिदूरे शादलसच्छायशा- स्मलि महासालमूले माधवमासि धवल कादशीवासरे सोचमवेलायां प्रस्तु. तपासापुरवास्तव्येपु मिलितेषु महाजनमेलापकेषु, परः शतैर्भट्टचट्टादि- भिस्याट्यमानेषु पुण्यपुरुषावदानेषु, मन्जुटवलमाटपचास तास वाट ३६ विज्ञपित्रिवेण्यां नितम्बिनीपु, खेलनलीलामाकलयत्सु निखिलखलोच्छृङ्खलग्रामखेलकेपु, गन्धर्वविद्यां विशदयत्सु गन्धर्वजनेषु, दानधर्मायोद्धपितरोमसु जायमानेषु दातृजनवपुष्पु, पुष्यमाणेषु तैस्तैः कालोचितेपु तेषु तेषु रसेपुः सुश्राद्धा- चारधूरीणस्य तथाविधोदारकार्यप्रवीणस्य साधुश्रेष्ठसोमाकस्यानिच्छतोऽपि सङ्घाग्रहात्तथाविधां योग्यतामवधारयद्भिविधिवत्सङ्घाधिपतिपदं व्यदायि। तेनाऽपि पात्रापात्रसापेक्षं दानमदायि। विशिष्य सङ्घोऽपि मुक्कलकरकुड्म- लनिर्गतेन ताम्बूलादिना देयवस्तुप्रकारेण तथा रञ्जितो यथा प्राचीनानपि सङ्घपुरुषान् विस्मारितवान् यदि भविष्यतीति । किं वहूच्यते, ह्युत्सवोऽयं सर्वाङ्गसुन्दरः संवृत्तः । तदा च मल्लिकवाहननिवासिना साधूद्धरेण पाश्चात्यवाहनपदं गृह्णता कुलमप्युद्धृतम् । अपि च सं० मागटपौत्रः साधुदेवाङ्गजो महाधरपदमुद्धरः सम्मदात्समुपादात् । अन्येऽपि साधु- नीवा-साधुरूपा-साधुभोजाख्यास्त्रयो महाधरतामेवाधार्युः । सैल्लह- स्त्यं तु बुच्चासगोत्रीयसाधुजिनदत्तसुश्रावके निदधे । एतैश्च सङ्घपत्यादि- भिर्यदवदानमाधायि तद्वयं वक्तुं न शक्ताः, परन्तु तत्करणीयचिन्तनप्रभा- वजः पुलकस्त्वद्यापि नोदास्ते । . साम्मिकवात्सल्यप्रमुखो यो विधिस्तदा । चक्रे वक्रेतराकूतैः स तैरेव भवेद्यदि ॥ १ ॥ अथ कृतकृत्येषु तेषु तेषु सङ्घपुस्सु द्वितीयदिने तदवदानं दृष्ट्वा गर्जनव्याजेन [१]द्गुणानुद्गृणन् तदानस्पर्द्धयेवानिवारितप्रसराभिः साराभिः सलिलधाराभिः श्रीमताडितां पृथिवीमाश्वासयन्नदृष्टपूर्वमहावर्षोपलवर्षेण पान्थान् यथा कथञ्चित्कातरयन्नतिप्रचण्डपवननिपातेन पटकुटीकुटीरकादि विसंस्थुलयन् माधवोऽवर्षीदिति हेतोस्तत्र महाव्रतमिता वासरा अवस्था-
द्वितीया वेणिः।
नमवेक्ष्य लमाः। अथ सपादलक्षपर्वतभुवं सह सधेनोल्लङ्घयितुं यथा
वत् प्रवृत्ताः।
यत्र च-
पटखण्डान्यतम खण्डं यद्वा द्वीपान्तरं किमु ।
परदेश्या विकल्पन्ते दृष्ट्वा शिलोच्चयानिति ॥ १ ॥
उच्चगां तारकश्रेणिं परिचेतुमिवोच्छ्ताः ।
शैलाश्चानंकषैः शृङ्गैनिझरोद्गारनिर्मलैः ।। २ ।।
वीथ्यां वितस्तिमात्रायां सञ्चरन्नतियत्नतः ।
जनोऽधःपातमीत्यापि साधुचर्या श्रयत्यहो ! ॥ ३ ॥
दिवापि सिद्धाञ्जनवन्नेक्ष्यन्ते भूमिगनरैः ।
वीक्ष्यन्तेऽधित्यकासंस्था वानरा इव वा नराः ॥ ४ ॥
दुर्लभाम्रफलावात्यैः कर्वरैः कोपयन कपीन् ।
फलं तैरत्रतां नीत्वा जनश्चक्रे समाहितः ॥ ५ ॥
भूमिदेशोद्गता वृक्षाः ये चाद्रिशृङ्गसन्नताः ।
शीर्षे द्वयेऽपि ते साम्यावद्धस्पर्द्धा इवावृद्धन् ॥ ६ ॥
: शाखाशिखालग्ना इव तारा निशागमे ।
वृक्षाघस्तात्सञ्चरतां कुर्वन्ति कुसुमभ्रमम् ॥ ७ ॥
विचित्रवर्णैः कुसुमैः सम्पन्ना वनराजयः ।
प्रादुप्कुर्वन्त्यकालेऽपि सन्ध्यामरागसम्ममम् ॥ ८ ॥
अन्यच्च-
ताक्षतीर्थमाहात्म्यवृष्टिप्रतिहता इव ।
दवामयो वनप्लोषा नोतिष्ठन्ते कदाचन ॥९॥
मालतियूधिकाजातिप्रमुखास्तरुजातयः ।
पुप्पगुच्छरमुर्नमास्तरुण्यः स्वस्तनैर्यथा ॥ १०॥
३८
विज्ञप्तित्रिवेण्या
प्रफुल्लैः कुसुमैवल्यः समीरावेगवेल्लिताः ।
अवाकिरन्ति श्रीसाई गुरुं लाजैरिव स्त्रियः ।। ११ ।।
मल्लिकाफुल्लकल्हारकेतकाख्याश्च शास्विनः ।
शाखाभङ्गेऽपि मधुरा ददुः पुष्पाणि सार्थिनाम् ॥ १२ ॥
भपि च--
क्वापि जम्बीरदाडिमाम्राणि नारगवदराणि च ।
पाकिमानि विलोक्य स्यालोला कस्य न लोलुपा ? ॥ १३ ॥
फलानां कुसुमानां च कालाकालान पेक्षया ।
प्रसूतिः परमा दृष्टा तत्तीर्थातिशयादिव ॥ १४ ॥
खर्जूरीदाडिमी द्राक्षारम्भाभम्भायिकादयः ।
छायां कुर्वन्ति सङ्घस्य खाद्यं च ददते तथा ॥ १५ ॥
विनापि जालदी वृष्टिं निरौघाः पदे पदे ।
मन्ये तैर्गिरयः सङ्घातिथ्यं कर्तुमुपस्थिताः ॥ १६ ॥
अपि च-
वहज्झरे चूतमहीरुहस्तले विश्रामयन् पान्थजनः पदे पदे ।
फलानि मिष्टानि यथेच्छमाहरन् स्वगेहसाध्यं सुखमश्नुते क्षणम् ॥१७॥
एकतश्च-
उदुम्वरवटप्लक्षाः परोलक्षाः पुरः स्थिताः ।
विश्रामस्थानमा नां सज्जना इव मानिताः ॥ १८ ॥ .
श्रीफलाश्च फलैः स्वीयैर्निजपादतलस्थितम् ।
टाचक्यभन्मशिरसं त्रासयन्ति खला इव ॥ १९॥
अस्पृष्टमध्याः सूरस्य करैः क्वापि प्रसारिभिः ।
विभ्रते कुलनारीणामाचारं किल कन्दराः ॥ २० ॥
द्वितीया वणिः।
अपि च-
अभयामलकीमुख्यवृक्षावाप्तफलैः क्वचित् ।
गान्धिकापणनामापि शङ्के विस्मारितं जनैः ॥ २१ ॥
अपरं च-
पाद्याः कर्करिकाः क्वापि पत्सुखा वालुकाः क्वचित् ।
हपत्खण्डाश्च तीक्ष्णामाः स्वोचितं चलतां व्यधुः ॥ २२ ॥
क्वापि समा विषमा वा क्वापि नीचैस्तथोन्नताः।
नैकरूपा भुवः शैले दशा इव भवेऽगिनाम् ॥ २३ ॥
क्वापीक्षुशाकटस्तोमः तिल्यं भागीणमेकशः।
कौद्रवीणं च मौद्गीनं शालेयं क्वापि शाल्यते ॥ २४ ।।
तदित्थं स्थाने स्थाने नवीना नवीना वनराजीः परिचिन्वन्तस्त-
दीयाभिः पिच्छलामिश्छायाभिस्तपनातपप्रसरागोचरीभवन्तः पर्वती-
यान् जनानिव तदाचारान् शुचीन् साक्षात्कुर्वन्तोऽतिमीष्मग्रीप्मर्तुमपि
तथाविधदेशस्वाभाब्याच्छिशिरर्तुमिव मन्बानाः सुखेन विपाशातटिनीं भू-
योऽप्युत्तीर्य पदे पदे समृद्धान् महापामान् सम्भावयन्तो दर्शनेन तदधी-
शांश्चाभिमुखमायातानुचितालापैश्च रञ्जयन्तः क्रमेण पातालगङ्गातटम-
न्वंसान।
..
अपि च--
यस्यां हि जलयात्रेषु दृष्ट्वा सक्त्वादिपेषणम् ।
के नाम न प्रशंसन्ति दाक्ष्यं पर्वतवासिनाम् ? ॥१॥
पानीयमविमुक्ताधि जानुदमाऽम्बुवाहिता ।
सान्द्रो ध्वनिः प्रवाहस्योनिद्रयेदूरगानपि ॥ २ ॥
विज्ञक्षित्रिवेण्यां तां च तथा तामनिहितेप्वपि स्वयोगसन्निहितेषु सुश्लिष्टश्लक्ष्ण- तलेषु निश्चलेषु गण्डशैलेषु परमयतनया क्वापि पादन्यासमुपकल्पयन्तो निरायासमुत्तीर्णाः । ततश्च पुनरकुण्ठानि गिरिशिरांसि त्वरितपादचारेण कुण्ठयन्त इव क्वापि तुङ्गतरगिरिशृङ्गमधिरूढा हेमकुम्भमालोपशोभितप्रभूतप्रासादपति- दर्शनीयं विविधस्थानमनोरमं नेत्रानन्दामृतप्रपोपमानं श्रीमन्नगरकोट्टाप- रपर्यायं श्रीसुशर्मपुरमहातीर्थ दृग्गोचरीकृतवन्तः । ततश्च-- आः किं व्योम्नश्चयुतमिदमहो । स्वर्गखण्डं प्रचण्डं ! किं वाप्युद्भिद्य हृद्यः क्षितितलमसको निर्गतो नागलोकः ? । रङ्गगाङ्गेयकुम्भावलिकलितमहोद्दामहातिरम्यं दर्श दर्श पुरमिति वितर्कास्पदं सम्भवामः ॥ १ ॥ तदनु सङ्ग्रेन प्रथमतीर्थदर्शनप्रभवन्महानन्दानुसारेण दानधर्माद्यु. चितमनुल्लङ्घयता तीर्थभक्तिर्व्यक्तीचके । शनैः शनैरयत्नोपस्थितां कृत्रिमा सजलां नगरस्य परिखामिव पातालगङ्गाज्ञातिजामिव वाणगङ्गाम् “एगं पायं जले किच्चा, एगं पायं थले किच्चा" इत्यादि पदानि यतनाङ्गान्यअ- नुस्मरन्त उल्लाघा उल्लचितवन्तः। तदा च सङ्घागमनमाकर्ण्य चम्पकस्र- क्वलापकलितमौलयो मसृणधुसृणरसाक्तोज्ज्वलाच्छपीनवसनाः,नागवल्लीदल- चर्वणेनेव विमलवचनेन रञ्जितवदनाः, काञ्चनमयशस्विकया वय॑स्वर्णा- लङ्कारेणेव भासुरितकटितटाः, स्वर्णशृङ्गारा निजरूपशृङ्गारितस्वर्णा वा, निरुपाधिप्रीतिगौराः पौरास्ते तेऽभ्यागतवात्सल्यविधित्सया सङ्घस्याभिमु- खीना बभूवुः, इति । ततश्च तान् गुर्जरेभ्योऽप्यधिकितविवेकाँल्लोकान् साधूचितभाषया. सम्भावयन्तस्तैरेव सह महत्युत्सवे . जायमाने पुरं द्वितीया वेणिः। . प्रवेष्टुमुपकान्ताः । चित्रमिव बहुवर्णोपशोभित धर्मागारमिव बहु गणिक नगरान्तरं मध्ये कुळणाः, सहसामाचारीविद्भिः पौरैः सः वार्थे क्रियमाणं प्रवेशमङ्गलं तत्साहचर्याद्वयमप्यनुमवन्तः, शनैः शनैर- पूर्वापूर्वस्यानावलोकनाद्विस्मितविस्मिताः, पताकापीतगगनं हट्टश्रेणिसङ्कुलं राजमार्गमतिक्रम्य शनैपितहपिता इव किश्चित्त्वरितत्वरिताः प्रेरिता इव परमोत्साहेन, आकृष्टा इव सुकृतलक्ष्म्या, कटाक्षिता इव भाग्यमृगाक्ष्या, आता इव सन्मत्या, विधृता इव धृत्या, आहूता इव सद्गत्या, रमिता इव रत्या, विस्मारिता इवारत्या, उपेक्षिता इव चुमुक्षया, मनवलोकिता इवातङ्केन, अचिन्तिता इव चिन्तान्तरेण, विस्मारिता इव मार्गश्रमेण, म- स्पृष्टा इव तृपया, अभिगमिता इव परमानन्देन, किमप्यतितरमानन्दतु- न्दिला उद्भिद्यमानरोमकन्दला महामदनभेर्यादिवादकेषु शब्दब्रह्माद्वैत- मिव वितन्वत्सु सर्वार्थसिद्धिद्वारमिव श्रीशांतिनाथजिनमासाद-सिंह- द्वारमनुप्राप्ताः-" निस्सही निस्सही नमो जिणाणं " इत्यादि विस्तार- स्वरेणोचन्चूर्यमाणा रोमाञ्चकन्चुकितगात्राः, तृपिता इव सुधासरः, क्षुधिता इव परमान्नम्, निर्द्धना इव रत्नसम्भृतनिधिलाभम् , द्रमका इवैश्व- यम् , फान्चनकलशोपशोभितं साधुक्षीमसिंहकारितप्रासादे परमखरतर- श्रीजिनेश्वरसूरिप्रतिष्ठितं श्रीशान्तिजिनपति भेटितवन्तः परया भ- क्त्या। ततश्च त्रिःप्रदक्षिणीकृत्य कृत्यविदा सह सङ्घन पुराणाभिनवैस्त. वैर्गृहस्थोचितैः पुष्पैरिव संवत् १४८४ वर्षे ज्येष्ठमासे ज्ञानपञ्चमी- दिवसे सम्भावितवन्तः । ततश्च सफलमिव जन्म मन्वाना मार्गप्रयासमपि पूरिताशमिव गणयन्तस्तत्तनिर्विकृत्याचभिग्रहप्रन्थि छुटितमिवावधारय- न्तस्तदा तदा च पूज्यान युष्मादृशान् पुण्यपुरुपानप्यविस्मारयन्तो द्विती- यस्मिन् विहारे नरेन्द्ररूपचन्द्रकारितं शाश्वतप्रतिमानुकारि जात्यजाम्बू- नदमयप्रतिममत्यद्भुतं श्रीवर्द्धमानस्वामिनं तमस्युद्योतमिव तथाविधका ६ ४२ विज्ञप्तित्रिवेण्यां . न्त्यतिशयान्नेत्रामृतप्रवाहमिव परमकप्पूराणुनिर्मितमिव परमानन्दमयमिव दर्श दर्श चिरं चेतसि कारं कारं प्राग्वन्नमस्कृतवन्तो भगवन्तम् । ततोऽपि देवलादिदर्शिताध्वानश्चमत्कृतचेतसो विगलितरेफसः कवलितालस्याः प्रमदातिरेकादुज्जृम्भमाणास्या बाह्याभ्यन्तररजः शिशमयिपयेव नयनेभ्यो हर्षाश्रुधारा वर्षन्तस्तृतीयभवनगान्युगादिजिनपादानन्ववन्दिप्महि पूर्वन्या- येनेति । ततश्च द्वितीयेऽहि कद्दकमहादुर्गमध्ये माधववक्षोलङ्कारकौस्तुभा- यमानानादियुगीनश्रीयुगादिजिननिनसयोपिञ्जलितहृदयान्तरालाः, प्रम- वद्ध श्रुप्रणालाः, क्रमेण नभोङ्गणलम्बिकपिशीर्षमालाविलसत्सप्तशाला- लीनसप्तप्रतोलीद्वाराणि सप्तसुखानीवाकामन्तः, स्वर्णकम्बाकरेण प्राकथं- चिदावर्जितेन महर्द्धिना मौलभूपालप्रतिशरीरभूतेन हेरम्बाख्यप्रतिहारेण सोपानसहस्रसङ्गुलं राजपथं परिचाय्यमानाः, पदे पदे जायमाने दानोत्सवे नृपकारितमानोत्सवे च प्रकाशमाने राजाशरङ्गद्वाद्यनिनादे उच्छलद्धव- लमजलध्वनिभिः प्रतिशब्दमुखरी क्रियमाणेषु सप्तप्राकारेष्विव, नृपतिसौ- धमध्येषु वक्षिणापन्नकुतूहलिराजलोकः पाणिन्धमतां नीयमानेषु, पृथुष्वपि पथिषु निरङ्कुशैरपि दौवारिकैश्चानवारिताः, अनवरतप्रणयपरिचितमिव राजसमाजजनसमूहमूहमानाः श्रीनाभेयं प्रीत्या प्रणिपतिवांसः । तदा च-तत्र वृद्धास्तत्तीर्थतिलमित्थमाहुः । यथाहि-" इदं किल कमनीयकनककुम्भोपशोभितोत्तुङ्गशृङ्गरज- प्रासादमयं महातीर्थ विजयिनि भगवति श्रीनेमिजिनपतौ श्रीसुशर्म- भूमीभुजा संस्थापितम्, तदिदं चाघटितमटङ्कितं स्वयं भूतमिवानादियु- गीनं श्रीमद्युगादिदेवविम्बमचिन्त्यचिन्तामणिमवृतकल्पपादपममितमाहा. स्यमनन्तातिशयं जानन्तु । इयं च भगवञ्चरणारविन्दमकरन्दचञ्चच्चञ्चरीक- कुटुम्बिनी श्रीमदम्बिका, यस्याः किमप्यसामान्यमतिशयं व्यावर्णयन्ति- सन्तः । अस्या हि प्रक्षालाम्भः कुम्भसहस्रप्रमाणमपि जगद्गुरोस्तावत्प्रमा-
द्वितीया वेणिः। .
णेन स्नात्राम्भसा सह तदाशातनमीत्येव तुल्यस्थानस्थितमपि नैकीमवति ।
प्रत्यक्षं नाधुनापीदम् । अथवाऽसम्मावितकीटिकाप्रवेशनिर्गमे लघुन्यप्यमु-
मिन् गर्भागारे कृतकपाटसम्पुटे भूयोऽपि स्नात्रतोयं सङ्घदुरन्तदुरितमिव
क्षणादकस्मादूर्वशोषं शुप्यति । इह हि कृतं स्तोत्रादिपूनाचं सत्कृत्यं
सत्क्षेत्रे निहितं वीजमिवैकान्तेनाविसंवादि फलं स्यादित्यागमः।" तदिदमु-
कण्ठितस्याऽऽद्वानं घटितसुवणे वर्णिकाघानमित्याभाव्य स्ववाग्वल्लेः प्रका-
मफलभूतामिमां स्तुतिमित्यमाविरवीमवाम ।
तद्यथा-
जगजीवनं पावनं यस्य वाक्यं महोक्षध्वज चनगाङ्गेयकायम् ।
तिरस्कृत्य कर्मस्थितं जन्तुतातं श्रये तं मतिश्रीकृते तीर्थराजम् ॥१॥
गलन्त्याशु पापान्यनन्तानि तानि प्रसर्पन्त्यगण्या मुदश्चावदाताः।
महासिद्धिरायाति कीर्तिश्चकास्ति प्रभो त्वां नमस्कुर्वतां शान्तमूर्णिम् ॥२॥
छेकः कप्टोच्छेदने दीतिभानुभक्तस्यातुच्छेप्टदो भीतिमेदी ।
युक्त्या युक्तः स्वागमागाधवाक्यः सिद्धयै रोद्धा युग्मिधर्म क्षतागाः ॥३॥
दिष्टया दृष्टे तेऽम्वुजोजिष्णुवके दूरं नष्टाऽऽदिप्रभो क्लेशराजिः।
नन्वारूढे मास्करे पर्वतं तं ध्वान्तं कि नक्षीयते निष्कलापम् । ॥ ४॥
रयापारसंसारनीहारसूरं रजोभारसंहारणासारनीरम् ।
कृपालु रसालं महाधीवरं सत् प्रमावं महामो ऽअसाऽधीश्वरं तम् ॥५॥
(नायकमणिः।)
तरन्ति सन्तो विपदर्णवं ते पोतायितं येऽनुसरन्ति तेऽदः ।
नतं पदान्जं मुवि सावधाना यस्मान् मनुष्येप्वध शर्म मावि ॥ ६ ॥
जगप्रमुः सत्यनयः स्वयम्भूः स्वाद्वायजन्मा निहतान्तरायः ।
तेजोमयस्तात्त्विकयोगगम्यो जीया गतेह ! त्वमाद्रिवायो ! ॥७॥
विज्ञपित्रिवेण्यां
गीर्वाणपद्माप्यतिशायिनी सा तावच गीयेत मरुद्भवीशा ।
बुधैर्न यावद्वहुधांतिभक्तेः शक्तिः प्रवुद्धा जिन तेऽस्तवाधा ॥ ८ ॥
जन्मभूषितनिजायतवंशं देशनाजनितभव्यशिवायम् ।
साधितेष्टसुखसङ्गमरझं भद्रसान्द्रमभिनौमि सदङ्गम् ॥ ९ ॥
राकाशशाङ्काननमादिदेवं वन्दे युगादौ जगदुद्धरन्तम् ।
तं रङ्गदुत्तङ्गयशःसुरंहं हरत्तमं लोकभवोरुकाराम् ॥ १० ॥
नय प्रभो ! सेवकमात्मसङ्गं जय प्रभावोद्वलितान्पङ्क !।
नमन्महाराजकृतोरुभागधेय ! प्रयच्छाऽविकलं चरित्रम् ॥ ११ ॥
वरं गृहं हाववती च नारी वर्ष्या च लक्ष्मीर्भवतोऽनुभावात् ।
वरेण्यलावण्यवचास्ततोऽहं बहे तवाज्ञां भव मे शिवाय ॥१२॥
दर्शनं दुरितरोधि तावकं नाभिनन्दन ! भवेद्भवावधि ।
मज्जतान्मम मनोहिमरश्मिस्त्वद्गुणामलमहाम्बुनिधौ हि ॥ १३ ॥
महामोहमाद्यत्तमस्तोमभानोरखण्डोत्तमज्ञानसङ्केतवास्तो ! ।
त्रसस्थावरप्राणिमोहान्तकस्य स्तवासूत्रणाते जनः स्यादनंहाः ॥ १४ ॥
रवीन्दुप्रदीपप्रभूतप्रभाभ्योऽधिकं विस्फुरदर्शनं तेऽद्यजातम् ।
दयाद्री स्वदृष्टिं त्वमातिष्ठिपश्चेत् सुधाम्भो मदङ्गेन चित्ते विभाति॥१६॥
षडंहिवत्खेलतु पादपङ्कजे तवाऽरुषं मे हृदयं सभन्द ! ।
कृताश्रयार्थे हि कृतिप्रकाण्डा यत्रासकृत् स्वर्द्धमतां वदन्ति ॥ १६ ॥
दलन्तं दरं भन्दमाकंदराचं दयाकन्दलीकन्दमानन्दसारम् ।
नतस्त्वां शुभंयुः कुकर्माण्यधस्तात् प्रकास्मि कहींश नम्रामर! श्राक्।१७।
धराधीशधीर महोदध्यगाधं निरस्तधं प्रावृषेण्याव्दनादम् ।
लसन्मुक्तिलक्ष्मीवरं मुक्तमोहं महामोऽमलज्ञानमानन्दतोऽमुम् ॥ १८॥
रोचीींचीमोल्लसद्देहदेशे सौम्याकारोस्पेक्षितान्तःप्रमोदे ।
शेषस्फूर्जद्योगलम्भनविष्टे दृष्टेऽधीशे जायतामिष्टलाभः ॥ १९॥
द्वितीया वेणिः। १५ न्योनो मानं वेति यौऽज:पकार- बुंध्या काव्योऽप्येषु ते तीर्थराज ! । नो सोऽपीशो यद्गुणान् जपितुं ही तको मानो मेऽत्र मूर्खत्वमाजः ॥ २० ॥ यदाहुश्चिदानन्दसन्तानरूपं श्रितानां मयनं परब्रह्मयाताम् । दयालो ! तदेव लदीयं प्रपद्ये शरण्यं पदद्वन्द्वमाविष्कृतायम् ॥ २१ ॥ जयति जगतामर्चिच्छेदी युगादिजिनः परं तदनु विजयन्ते योगीशा बुधा जयसागराः । तदधिमहिमस्तोत्रं हारं तदन्तिपदः कृति दघदलमुरोदेशे भन्यो जनो जयतादयम् ॥ २२ ॥ जन्मजीवितगिरां सफलत्वं मङ्गलं च वृपभेश ! ममाघ । यलतोऽसमसमांसनितान्तं यन्महावृपगतेऽधिगतोऽसि ॥ २३ ॥ इति हि नगरकोटालमृतेरादिनेतुः स्तवनमजनि पूर्ण हारवन्धाभिधानम् । अहह ! सुकृतयोगः कोऽपि मे स्फातिमागा- दिति वदति यथावत्यालिर्मेघराजः ॥ २४ ॥ तदित्यं यावता प्रस्तुतस्तवनादिविधानेन कृतकृत्या इव जाताः । इतश्च श्री चन्द्रोज्ज्वलसोमवंशविशदमुक्ताफलायमानावतारेण पत्रिंश- दाजफुलीगृहारसारण चपलोच्छूशलभूपाल लक्ष्मीकरेणुकाचापलसंयमननि- समानालानस्तम्मभूतोद्दण्डदोर्दण्टेन विपमविविधविकटसंपादलक्षपर्वत- मालामलगधिष्ठाक्षोदिष्टविपक्षक्षोणीनायशिरोनिवेशितनिजाशास्फारनाम्मा- रेण प्रपलातुरशतिनृपतिमतष्ठिकाधिनयवेटच्छिरःकमलपुपूजयिपिवचारु- चरणेन्दीवरेण धनसमृद्धग्रुपहसितधनदेन सौराज्यजनितजनानन्देन सर्व- पदर्शनविषामच्छायापादपेन विशिष्य श्वेताम्बरभिक्षुरलक्षपक्षपातो-
विज्ञप्तित्रिवेण्यां
पलक्षितचिच्चक्षुषा पितृपर्यायागतस्वसौधमध्यस्थितश्रीयुगादिजिनमक्ति-
पुषा निजमुखकोमललावण्यापहसितचन्द्रेण भृभुग्नरेन्द्रचन्द्रेणात्मीयप्रधा-
नपुरुषैः सबहुमानमाहूताः सङ्घसङ्गतास्ततश्चातुवर्ण्यजनमहत्तरैः परितोऽल-
कृतं विचित्रमपि सचित्रमतुलमपि सतुलं विशालमपि सुविस्तीर्णशालं
निजशोभापराभूतपुरहूतास्थानं तदीयसभास्थान प्राप्ताः । ततश्च वीज्य-
मानवरचामरं स्वरूपान्तरावस्थितं चामरमिव वरेण्यहिरण्यमणिमयसर्वा-
झीणाभरणशृङ्गारसौन्दर्यापहसितमारं सकलकलाकुशलं ग्रहगणमध्यव-
तिनं निशावल्लभामिव राजसभावस्थितं पुरुषोत्तममिव तमद्रामोऽक्षाम-
मुदः । अथेपन्नम्रशिरसं तमधिकृत्य निर्ग्रन्थभाण्डागारसर्वस्वभूताशीर्वाद-
सन्दर्भगर्भमुवाहवः पद्यमिदं स्मोदाहरामः ।
तद्यथा-
श्लाघे जन्म कुले तनौ सुभगता हृद्या कला सद्वधूः
सन्तानदिसमृद्धिसौख्यमतुलं भोज्यं च राज्यं परम् ।
चक्रित्वं त्रिदशाधिपत्यमपि ही प्रामोति जन्तुर्यतः
सोऽभीष्टार्थविशुद्धसिद्धिजनकः श्रीधर्मलाभोऽस्तुवः ॥१॥
अपि च-
कादककोट्टकन्दरमध्यासीनो रिपुद्विपान्हत्वा ।
श्रीमान्नरेन्द्रचन्द्रक्षितिपतिहरिणाधिपो जयति ॥ २ ॥
अथ च जलार्थ कस्मिन्नपि जने कृतभ्रूसञ्ज्ञमाभाव्य नृपतिं प्रस्तु-
तमिदं स्माचक्ष्महे ।
वक्त्राम्भोजे सरस्वत्यधिवसतितरां शोण एवाधरस्ते
बाहुः काकुत्स्थवीर्यस्मृतिकरणपटुर्दक्षिणस्ते समुद्रः ।
वाहिन्यः पार्श्वमेताः कथमपि भवतो नैव मुञ्चन्त्यभीक्ष्णं
स्वच्छेऽन्तानसेऽस्मिन् किमिव नरपतेऽम्बुपानाभिलाषः॥२॥
द्वितीया चणिः । ४७ अपरं च- नद्यो नीचरता दुरापपयसः कूपाः पयोराशयः क्षाराः क्षुद्रकोटसङ्कटतटोद्देशास्तटाका अपि । प्रान्त्वा भूतलमाकलय्य सकलानम्भोनिवेशानिह त्वां भो मानस ! संस्मरन्नुपगतो हंसोऽयमानन्द्यताम् ॥ ४॥ पुनर्विवेकमुज्जीवयितुमियमन्योक्तिः- रे चूत ! नूतन मदं मलिनानुकूल ! त्वां वर्णयन्तु कवयो न वयं वयस्य । शुक्लच्छदो यदिह शैवलमुग् मरालो रोलम्बकोकिलकुलं कुसुमैर्द्धिनोपि।।५॥ तथा- अये वापीहंसा निजवसतिप्तहोचपिशुनं कुरुध्वं मा चेतो वियति वलितान्वीक्ष्य विहगान् । ममी सारङ्गास्ते भुवनमहनीयतभृतो निरीहाणां येषां तृणमिव भवन्त्यम्युनिधयः ॥ ६ ॥ इत्यादिभिर्नवपुराणैः सूक्तैर्नृपमनोऽनुजीवितं यावत्तावता तवल्ल- क्षणसाहित्यादिरसपरिमलितमतिर्नृपतिरमोघगङ्गाप्रवाहानुकारिण्या तत्चदूह- प्रत्यूहाम्बुसारिण्या प्रवीणोचितवाण्या पश्यत्सु पार्पधेपु साशङ्कमिव तिष्ठत्सु राजकीयेषु विद्वत्सु सहास्माभिः स्वयमेव क्षणं गोष्ठीसुखमन्वभूत् । तदानी च- स कोपी न सदो मध्ये मूर्को वा यदि पण्डितः । वालो वृद्धः पुमान् स्त्री वा यो नाश्चर्यरसं पपौ ॥ ७ ॥ अथ विद्याविनोदप्रियेण राज्ञा सज्ञापिताः सभासदो विद्वांसो बामणा केऽपि केऽपि राजन्याश्च सम्भूय यत्तत्फल्गुवलिगतप्राय सम्यग्रूपं विज्ञप्तित्रिवेण्यां वा प्रष्टुं सहसोपस्थिताः । ततश्च तान् प्रश्नानुरूपोत्तराधानेन च्युतमदनि- भानिव निरभिमानान्मनागापाद्याऽन्तराले चेदमवदाम- के दारपोषणरताः ? कं बलवन्तं न वाधते शीतम् ? । के संजघान विष्णुः ? का शीतलवाहिनी गङ्गा ? ॥ ८ ॥ जीवन्ति जन्तवः केन ? धातूनां सम्भवः कुतः ? । बुधानां वर्ण्यते काचित् ययोक्तमपि नोखते ॥ ९ ॥ विकल्पार्थापकः कोऽर्थो विनाशः शक्यते कुतः । पद्मोत्पत्तिः कुतः कीदृग् दुस्थः सर्वत्र वारितः ॥ १० ॥ ( इति प्रश्नोत्तराणि।) कृपणोऽपि नृपार्थ्यः स्यादुदारस्यापि लौक्यता । भावाभावेन यस्यास्यादाख्यातोऽपि न बुध्यते ॥ ११ ॥ (प्रहेलिका।) काचिद्गृहान्तःप्रियविप्रयोगमसासहिः प्राप्य तरुं प्रफुल्लम् । ज्वलद्वियोगामिरियं व्यहासीच्छायां तदीयामपि किं निदाघे ॥१२॥ (भावालङ्कारः।) इत्यादिपद्यानां प्रत्युत्तरदानमूकान् विदग्धमन्याँस्ताँस्तान् यावंदु- दनैष्म, तावदेकः काश्मीरदेशीयः कुशाग्रीयमत्यवगाहितविततप्रमाणग्रन्थ- स्तार्किकचक्रचूडामणिमन्यश्छलजातिप्रभृत्युल्लापमुखरः कश्चिद्विपश्चित् स- हास्माभिः स्वपक्षपरपक्षसाधनदूषणाभ्यां चिरं निश्चितवाग्विवदितु लग्नो महताऽऽटोपेन । सोऽपि, अचिन्त्यश्रीपूर्वगुरुसान्निध्यसन्नद्धससम्बद्धवाङ्मा- त्रेण प्रतिहतवार वीक्षापन्न इव क्षणं क्षोणीशाध्यक्षमेव सितभिर्ननुनिनी- पादलग्नपाणिरिदमुच्चैरुच्चचार । यतः - भो ! जैनानां. पुरःकोऽहं बराकः, क्षमध्वमागः, अथेत्यादिसरसेष्टगोष्ठीप्रकारेण परमप्रीतितन्त्वनुस्यू- द्वितीया वणिः। तमना मनुजेश्वरोऽस्मत्सनाथस्य सदस्य सर्वस्यापि बहुमानसारं सत्कार चकार । ' अहो ! आईतो धम्मो विजयते । धन्यमिदं मतान्तराजय्यं श्रीजिनशासनम्, यत्रै विद्वत्तादिगुणा निरुपमाना विभान्तीति । ' अ- नन्तरं च चञ्चच्चन्द्रकान्तादिविविधवर्णदेवताल कृतं देवागारं स्वकीय द- शितवान् । अचकथञ्च स्ववीणान्, यदस्य सङ्घस्य प्रवेशनिर्गमयोर्न स्खलना कार्या ।' अथ 'प्रत्यासीदति नः सान्ध्यो, विधिः' इत्या- दिना प्रतिगमनाय प्रत्याव्यमानोऽस्माभिः कथञ्चिदेवं महामणयाविर्भाव- कमिदमवादीत् । मा गा इत्यपमद्गलं, मज इति स्नेहेन हीनं वचः, तिछेति प्रभुता, यथारुचि कुरुप्वैपाऽप्युदासीनता | किं ते साम्प्रतमाचरामि हितमेतत्सोपचारं वचः स्मर्तव्या वयमादरेण भवता भूयात्पुनदर्शनम् ॥ १ ॥ ततस्तमापृच्छ्य श्रीजिनशासनप्रोन्नतिदर्शनोत्सर्पत्प्रमोदप्लुतह- दयाः स्वमठमागताः । अथाऽपरेाश्चातुर्वर्णयन्धमानार्हद्विम्बभूपितेपु तेषु चतुर्वपि प्रासादपु महत्युत्सवे थीदेवमहापूजावसरे क्रमेण श्रीसहश्रावका गन्धोदकसम्भृतैः स्वर्णकलशैः श्रीजिनचन्द्रपादान् दर्शनदत्तमनःप्रसादान् यथाविध्यसिस्नपन् । तदनु मुलभैः शुभगन्धवन्धुरचम्पकपवित्रशतपत्रप्रफु- हमालतीजात्यादिजात्यपुप्पैर्वहुमझीभिरपूपुजन् । पेशलफलपक्वान्नाक्षता- दिवलि पुरो जगद्गुरूणामुपाहरंश्च । ततश्च चतुर्विधश्रीधर्मास्थास्थेमोत्पाद- फेषु चतुर्वपि काचनकुम्मोपलम्भसम्भावितद्रष्टमनःप्रसादेपु प्रासादेषु ग- मांगारादाराभ्यादण्डकलगावलम्धिनो ध्वजान् व्यदीपपन् । तदा चरेणुर्या- यानि, जगुः कुलनार्यः, नृत्यन्ति स्म स्मेिराम्या नागर्यः, ददुईल्लीस- फानि यालाः, ताध्यन्ते तालाः, खेलन्ति खेलास्ते चात्यन्तं सहेलाः, दी- - ५० विज्ञपित्रिवेण्यां . यते यथेच्छं दानं, यथा दूरेत्यतामञ्चति दुरितविगानं, प्रगुणीभूता सुगतिः, प्रणष्टा कुगतिः, वर्द्धते धृतिः, विशीर्यते कुसृतिः, उच्छृसन्ति दानिनः, लभन्ते मानं मानिनः, खिद्यन्ते कृपणाः, विकसन्ति वितरणनिपुणाः, जाग्रति योगिनः, विहसन्ति चैत्यनियोगिनः, निजचित्ते चमत्कुर्वन्ति ज्ञा- निनः, समाधिमधिश्रयन्ति ध्यानिनः, प्रमीलत्यविद्या, उन्मीलति विद्या, विलसति पुण्यम्, वर्द्धते श्रेयः । किं च-- तन्मन्ये येन दृष्टोऽयं श्रुतः स्नात्रोत्सवोऽथवा । यदि तस्य मुदे न स्यादत्र प्रतिभुवो वयम् ॥ १ ॥ तदनु च भट्टचट्टनटबटुकवाडवादिदुस्थितसुस्थितजनसाधारणानि शालि- सपिस्ताराणि सङ्घकारितानि अवारितानि भोजनानि सर्वत्र प्रावृतन्यानि रहःस्थितमप्यवदान्यं प्रकाशयन्ति । अथाष्टमीदिने श्रीशान्तिजिनविधि- चैत्ये जयजयशब्दमुखरेषु बन्दिवृन्देषु महोद्दण्डे भवत्युत्सवे मेघराजगणि -सत्यरुचिगणि-मतिशीलगणि-हेमकुञ्जरमुनि-कुलकेसरिमुनीनां पञ्चमङ्गलमहाश्रुतस्कन्धाद्यनुज्ञाहेतुका नन्दी मिलितेषु नागरेप्विव सङ्घ- जनेषु व्यधासिष्म । तत्र चाश्रान्तं स्थाने स्थाने देववन्दनावहिताः कार्यान्त- रपराङ्मुखा भ्रामं भ्रामं भावपूजया जगदीशान् त्वरया श्रद्धया सम्भावयन्तः, सङ्घश्राद्धविधीयमानां द्रव्यपूजां चानुमोदयन्तः, सह जन्मना निजजीवि- तमपि कृतार्थं गणयन्तः, यावद्वारानष्टोत्तरं शतमपि चैत्यपरिपाटी पञ्च- शक्रस्तवाविर्भावसारां सपरिवारा वितेनिवांसः। इत्थं श्रेयःकृत्येन पुण्यलभ्येन स्वात्मानमिव तदनुमोदकं परमपि संसारभवाम्भोधिपारवर्तिनमिवानुमि- नुमः । सपरिवारश्रीमदाराध्यध्येयपादप्रत्ययमपि विशिष्य श्रीजिनवन्दनं तत्रान्यत्रापि नामग्रहणपुरस्सरं विहितमस्तीति ज्ञपरिज्ञयाऽनुमोद्य तन्नम- द्वितीया वेणिः। स्यकैरिव स्थानस्थैरपि प्राज्यं पुण्यं विटपनीयमिति । अन्यच्च यथा योग गोचरचर्यादिस्वार्थसिद्धये पुरान्तराले चक्रम्यमाणाः क्वचिदुपधारायन्त्र मठस्थस्य महापुरुपप्रमाणानुकारिणः कान्तजात्यजातरूपनिप्पन्नस्य रेखा- प्राप्तरूपस्य राज्ञो रूपचन्द्रस्य रूपेक्षणं चक्षुर्विश्रामसुखमुपलभमानाः, क्वचिच प्रत्यासन्नहिमाचलशैलराजकूराहतानि भीष्मग्रीमविपि हिमा- नीखण्डानि पुण्यपुरुपयशांसीवात्यन्तं विमलान्युन्नयमानाः, अधिविपणि- मार्ग च व्यापार्यमाणचारुचम्पकशतपन्नादिगन्धद्रव्यपरिमलबाहुल्येऽपि नाशाविषयं रसमनाददानाः, सततप्रवृत्तोत्सवानां गीतनृतनादरसलाल- सानां दिवश्युतानां देवीनामिवानुपमतमतनुसौन्दर्याणां पौरपुरंध्रीणां श्रोत्रमधिगतैर्मधुरध्वनिभी रागमगच्छन्तः, गृहोद्यानवर्तमानामृतरुपरिपा- किमफलेषु मुग्यलोकोपनीतप्वपि जीहालौल्यलेशमप्यस्पृशन्तः, विचित्र- मूर्जपत्रवन्मूलस्पर्शान् कम्बलान्करस्पर्शमात्रतायामुपदोकयन्तः, याबद्दश- दिनी तनावतस्थानाः । ततश्च 'तिष्ठथ चतुर्मासीम् , वयमपि शुद्धावकी- भवामः, महांश्च लामो वः, कुरुध्वमनुग्रहमस्मासु' इत्यत्यन्ताग्रहपरान् नामश्रावकान् तत्रत्यान् जीदो-वीरो-हो-चंभो-संभो-गंभो-प्रमु. सान् कथमपि सम्बोधयामासिवांसः । ततः सर्वेष्वपि विहारेपु जिनेन्द्र पादानधिकृत्य सपरिवाराः ससवाः सगद्दस्वरा वाप्पप्लुतेक्षणाः प्रास्था- निकी चैत्यवन्दनां मुचिरमारचय्य ललाटघटिताजलयः खल्वेकान्तशान्त- रसवशीतस्वान्तासदानीम्--- तव दर्शनमेवास्तु किमन्यैः प्रार्थनागतः । सरागचेतसोऽप्युधैर्लभन्ते निवृति यतः ॥ १ ॥ चारं वारमियं चिन्ता वारं वारमियं कथा । यददं त्वां प्रपश्यामि भूयो दर्शनमस्तु ते ॥ २ ॥ तदित्यममजगलायनम्यर्थनामिना प्रथयित्वा, असाच्च शिरम. - ५२ विज्ञप्तित्रिवेण्यां णाम कारं कारं कथञ्चित्तीर्थमहामोहप्रतिबन्धवशास्खलितपादप्रचारं क्षणं शून्या इव हृतहृदया इव ततः प्रस्थातुमुदयच्छाम । अथ च- -- -- ज्वालामुख्या जयन्त्या च श्रीमदम्बिकया तथा । वीरेण लङ्गडाख्येन यदसेवि सदैव हि ॥ १ ॥ संसारसागरोत्तारतीर्थात्तीर्थोत्तमाचतः । श्रीमन्नगरकोटाख्यात्यस्थिताः सह साबिकः ॥ २ ॥ (युग्मम् ।) अथ गिरिसरिदुपलशैलेलातले वहन्तः, एकतः किल ' पव्वउ- खोट्टउ' इति मृदुलघुशिशूनिव किञ्चिद्व्यक्तवाचा संशब्दनेन गिरिभूवि पथिकेभ्यो ह्यविश्वासशिक्षामाख्यान्त इव कांश्चन पक्षिणः पदे पदे प्रदक्षि- णीवभूवांसः । अन्यतः पुनस्तत्प्रतिपिपेविषयेव कांश्चन विपश्चित इव होकोकिमइ, होकोकिमइ ' इति स्फुटप्रतिरावेण जगद्वैचित्र्यं प्रचिक- टयिपून् विहगान् स्वात्मनि माध्यस्थ्याद्वैतमुत्तेजयन्तः शुश्रुवांसः । विस्मयस्मेरिताऽऽनन्दाटोपा गोपाचलपुरतीर्थ जन्मिबांसः । सं० घिरि- राजकारितोत्तुङ्गप्रासादस्य श्रीशान्तिनाथं सगौरवं च प्रणेमिवांसः । अत्र च देवसेवापराः सङ्घकृत्यानुमोदनासमाहितहृदः सदसद्विवेकं प्रति- वास्तव्यास्तिकांश्च कांश्चन प्रवीणयन्तः, पञ्चाहोरात्राणि तस्थिवांसः । अथ पारेविपाशस्थितं श्रीवीरस्वामिपादमहाप्रासादकलितं श्रीनन्दव- नपुरं प्रापिवांसः। तत्र च पूज्यपूजां विधिवद्विधाय सह तत्रत्यसङ्घनाऽऽ- गन्तुकसोऽपि खल्वात्मानं धन्यममन्यत । तत्र च सुविहितगुणपक्षपातर- सिकमनोभिरात्मकरणीयातिनन्दिभिः शुद्धमार्गाभिनन्दिभिः सौजन्यस- म्भिन्नसर्वभावैः पार्वतिकभूपाललोकपालितवचोभिः सह स्वयूथ्यैरनुमितसं- विमपाक्षिकपदस्थैर्भृशमजर्यमासोसूच्यामहिरूपम् । ततोऽपि प्रस्थाया-
द्वितीया वेणिः।
तिनिविडतमसि निश्यपि पुरोवहमानाभिद्योतमानखद्योतरिच्छोलीभिर-
न्तरान्तरा त्रुटत्तहिद्भिरिय समुज्जृम्भितचक्षुरायुप्याः कोदिल्लग्रामे कमे-
गाभिनवोत्तुङ्गशृङ्गरत्प्रासादे श्रीवामेयजिनेन्द्र-दर्शनेन सफलप्रयासा
बभूवांसः । सङ्घो यावता पूजादिककर्मणि प्रवृतोऽथ तावता वयं समिति
स्तोतुं प्रवृत्ताः।
तथा च--
अमिमतफललाभकर चिन्तामणिपार्श्वनाथतीर्थकरम् ।
यरलवशपसहवर्णैः किञ्चिदहं वर्णयिष्यामि ॥१॥
श्रीवल्लिराशिसुरसालरसालवाल |
श्वःश्रेयसाय स विहासरसोऽसहायः ।
अंहो विहाय सहसैव विशालबाहुः
श्रेयःश्रियं सह वृपैरिह शिश्रिये यः ॥ २॥
यो विधसंशयविलेशयरैशरीरो
यः संवरारिसवलाहववारवीरः ।
यो हर्षवासररविषिपयारिसु-
यविह संवरसरोवरशालिहंसः ॥ ३ ॥
शेपाहिवावहिशरा पहुहावहेला-
लीलाविलासविवशामु घशास्त्रवश्यः ।
सेव्योऽसि वासयविशां सविशेपवीर्य-
शौर्याश्रयोस्यविरलं सरलाशयोऽसि ॥ ४ ॥
अर्हन् यशःसलिलराशिशी रसायाः
सार्वः शिवालयविटासरसाय सोऽयम् ।
सर्वे मुरासुरसुरेश्वररिसिंहाः
संसारवासविरहाय सिपेचिरे यम् ॥ ५ ॥
५४ विज्ञप्तित्रिवेण्यां यः स्वैरिवैरिविलयाय सहः सहस्वी स्वीयस्ववंशबहुलाम्बरशर्वरीशः। शश्वलल्लौ वशविहाररसीह शील श्रेयोरहस्यसरसीरुहसूर एपः ॥ ६ ॥ (चतुर्थमिदं ।) ये पञ्चवर्गपरिहारसमेतमेतत् पञ्चाक्षनिग्रहपराः स्तवनं पठन्ति । ते ही चतुर्थपुरुषार्थसुखं लभन्ते तद्वोधिलाभसुभगास्तु ममापि बुद्धिः ॥ ७ ॥ इति भगवन्तमभिष्टुत्य कृतकृत्येन सहैव सद्धेनानघीभवन्तो ऽथ गिरिगह्वरकूटसङ्कटान् मार्गान् दुर्गमानुलङ्घयन्तः, क्वापि पर्वतप्रदेशो- द्भुताभिः सप्रत्ययाभिस्तमः कवलयन्तीभिज्वलन्तीभिरौषधिभिरतिभास्वर- प्रदीपकलिकासाध्यं कर्म प्रत्यक्षयन्तः, पर्वतघट्टानतिक्रम्य पर्वतदेशमध्यगं नानाविधश्राद्धसङ्कुलं श्रीकोठीपुराभिधमहानगरं प्रापिम । तत्र च देवार्य- देवपादा विधिवदभिवन्दिताः । तत्र च सं० सोमाकोऽवारितवाहनासारं सरसशर्कराचूर्णपूर्ण भोक्तृमनोमोदकं महामोदकं प्रचुरघृतपूरपक्वान्नसम्पन्न- शाकप्रीणितरसिकलोकमिन्द्ररसास्वादमाद्यद्ररसज्ञरसनाविषयं स्तूपीभवद- पूपं सुनिष्पन्नरूपं मुग्धस्निग्धदध्योदनजनितजनसमाधानं सुगन्धिशालि. परिमलोद्भारमानाप्यायमानजनं प्रसर्पत्सर्पिर्द्धाराप्रवाहप्रवाहिताहितदौर्म- नस्यं नानास्वाद्यपेयलेह्यखाद्यहृद्यं प्रकाश्यमानबहुविनयप्रकारं श्रीसाधर्मि- कवात्सल्योपचारं सारं कारं कार तथा समस्तवास्तव्यवस्तुवित्तसार्थिकस- छपुरुषेषु सम्पन्नचित्तरङ्गः सुरङ्गश्चङ्गवसनदानेन मनागस्खलितचित्तस्ता- म्बूलादिना च सचमत्कारं सत्कारं चकार तथा, यथा सार्वत्रिकी प्रशंसा- माससाद; इत्यलं बहुक्त्या ?। तदेवं देववन्दनसावधानास्तत्रापि दिन- द्वितीया वेणिः। ५५ दशकं स्थितिमजीघटाम । अथ ततः प्रचल्यातिदुरन्तमहामार्गमागरमति- क्रमयन्तः क्रमेण सप्तरुद्राख्यमहाप्रवाहमयं जलनिवेशमक्लेशेनैव क्रो- शचत्वारिंशत्प्रमाणं तरीभिरतिवाहयन्तो यथाक्रमं चक्रम्यमाणाः श्री. देवपालपुरपचनं प्राविशाम । तत्रत्य मृदुपक्षीय-सं० घटसिंहादि-ख- रतरपक्षीय-सा सारङ्गादि-विविधशुद्धश्रद्धश्राद्धसद्देन घुमघुमायमान घनतूर्यम्, गुमगुमायमानगन्धर्वम्, टवटायमानकालम्, दमदमायमानद- मलम् , टमढमायमानढोल्लम् , प्रौढीभवज्जयजयरवं प्रवेशोत्सवमन्वबोभूया- महि च । तत्रापि कोठीपुरवत्तानि तानि साधर्मिकवात्सल्य सङ्घपूजादीनि स- इपत्युचितानि निखिलान्यपि करणीयानि सङ्घ-पतिमहाधरादिभिस्तथा च- क्राणानि यथा श्रीजिनशासनस्य सङ्गस्य साधूनां श्रावकाणां च प्रशंसो- लापः स्वपरपक्षीयेपु प्रोल्ललास । तदेवं श्रीजिनशासनं भासयन् सङ्घस्तत्र दशदिनी स्थितिमकरोत् । ततश्च तत्रत्यसयलोकाग्रहेण तथाविधां तत्र योग्यतां मत्वा मेघराजगणिः सत्यरूचिगणि-कुलकेसरिमुनि-रत्न- चन्द्रक्षुल्लकः सहितश्चतुर्माशी स्थापितः । स च यावत्साम्प्रतं तत्रत्य सधेन सम्प्रहेठितो()ऽस्मदुपकण्ठं विजयी समायासीदीति । अथातो वयं सह सहागतेन तेनैव सडेन सहसा प्रचेलिवांसः । क्रमेण श्रीमद्देवगुरुप्रसादसान्निध्यवोहित्थेनातिदुरुत्तरमहत्तरसरणिसागर मुखसुखेनाकुतोभयाः समुलढयन्तः, पदे पदे गमनावसरपरिचितानि निवासस्थानानि निश्चिन्वन्तः, अविच्छिनैः प्रयाणैर्विपाशाकूलङ्कपां पश्चा- न्मुन्चन्तः, प्रामस्थानमङ्गलवेलापरिचितं पुरोपवनं प्राप्ताः । इतश्च श्रीस. छागमनकिंवदन्तीपानोल्लसदाल्हादमेदुरः समस्तालस्यच्छिदुरः प्रस्तावोधि- तक्रियाविदुरः श्रीफरीदपुरीयः सहस्तत्कालमिलितान्यग्रामसइश्च, किं बहुना ! सर्वोऽपि प्रामश्च तीर्थयात्रापुण्यपवित्रिताङ्गसदिक्षयाऽतितृपित- लोचनः सम्मुखीनोऽन्यौत्सुक्यभावादागात् । ततश्च तमुचिताशीर्वादेन , ..
६६ विज्ञप्तित्रिवेण्यां सह प्रमोदेन योजयन्तः सङ्घपतिसोदराभ्यां सा० पासदत्त सा० हेमा- भ्यामतिप्रीतिपराभ्यां पूगीफलनालिकेरादिबहुलताम्बूलादिदानेन सस्क्रिय- माणसर्वजने, वाञ्छितदानेनायाचकीक्रियमाणे याचकलोके, जायमाने प्रवेशोत्सवे फरीदपुरमबापाम । यावत्सर्वोऽपि सङ्घोऽनिर्वाच्यपरमाहाद- सुधाम्भोधौ मग्न इवाभूत् । तद्दर्श च क्यमपि सिद्धिसमीहितत्वान्निरुपम- समाधिमाजोऽजनिष्महि । अपि च- मनसि कृत्य जिनेश्वरवन्दनं प्रचलिता यत एव वयं मुदा । अभिनिनसिततीर्थनमस्यया सुफलिताभिमतास्तत, आगताः ॥ १ ॥ सिद्धयन्तीदंशि कार्याणि प्रायेणोद्यमयोगतः । स चाप्यपेक्षते पुण्यं तच्च सङ्के प्रतिष्ठितम् ॥ २ ॥ इति श्री विज्ञप्तित्रिवेण्यां तीर्थयात्रार्थसमर्थिका गङ्गातरङ्गाख्या द्वितीया वेणिः ॥
तृतीया वेणिः। ॥ अथ तृतीया वेणिः प्रारभ्यते ॥ अथ सङ्घागमनानन्तरं नितान्तमुदितचित्तौ सयपतिभ्रातरौ साधुपादत्त-हेमाभिधसुश्राद्धौ ज्येष्ठे प्रातरि सौमात्रवल्लरी पल्लवयन्ती स्वं धन्यं मन्यमानौ निस्समानमानसोत्साहौ तत्तत्प्रभूतसार्मिकादिसले- नेपु विविधाशनादिप्रकारेण न्यायार्जितवित्तवीजवापं तथाऽकाष्ट यथा कल्पान्तकालकीर्तनीयकीर्तिमतां मतिमतां सत्त्ववतां सत्पुरुषाणां द्विती- यतां धुरीणतां वा किलाचतुः । तत्किं बहुच्यते ? यतः-य एव केचन यात्रारम्भे मनागवज्ञामनाटयन्, त एवाथ सर्वाध्यक्ष स्वात्मानं निन्दन्तः सुनिप्पन्नसङ्घकर्माणि श्रावं श्राचं प्रमोदाश्रूणि चातिविस्मयात्सावं स्राव भट्टा इवैकान्तसङ्घकार्यभट्टिममुखरितमुखाः साक्षादीक्षिताः। तदहो। खलु लोको जितद्वितीयः कामितकामुकोवाऽस्तीति विदांकुर्वन्तु श्रीपुज्या लौकिकाचारम्। किंच-सामान्येनाऽप्यनेन सङ्घन सङ्घद्वयमीलनाद- विस्फारिभूतेन तेषु तेषु स्थानेषु सघान्तरेभ्योऽसामान्यैः करणीयैः सर्वथाप्यतिरिच्यत । तच्च सर्वमागन्तुका एव न्यक्षेण वक्ष्यन्तीत्यलम् । अथ यावद्दिनानि कानिचित्तत्रावसानमभूचावता श्रीमलिफवाहणीयः श्रीमम्मणवाइणीयश्व समुदायस्तत्र वन्दक आकारकश्च तुल्यकालं समु- पागात् । ततश्च स्वस्वास्पदमस्मान् विहारयितुं भृशमाग्रहीष्टाम् । वास्त- व्योऽपि तथैवावस्थापयितुं निर्वन्धपरायण आसीत् । ततोऽस्माभिर्वास्तव्यो यावहस्याक्षरमन्त्रेण सम्बोषितोऽत्याग्रहाद्विरराम, आमेत्याह च । तवयं तु तथैवान्योन्यं चिदमानं शकुनान्वेषणव्यपदेशन समाधाय तत्प्रथमं मम्म- णवाहनं प्रति मस्थिताः । सायं च दक्षिणेन गोमायवोऽरटन्। ततो मम्म- णवाहनगमनमुपेक्ष्य सह तत्सझेन तदैव श्रीमलिकवाहनं प्राप्ताः । तदा. च साधु द०मालाकेन प्रवेशोत्सवरगः परिमितप्रसारोऽपि निखिलन। नशोमासम्भारसम्पादको व्यघायि येन सर्वजनो मनसि चमदकरोत् , इति ८ विज्ञप्तित्रिवेण्यां अथ श्रीतीर्थयात्रामहापुण्यपीयूषकुण्डारचितसवना इव सुतरां सुस्थि- रस्वास्थ्यभाजः सपरिच्छदाः ससवाः सुपरिणामाः पुरा यावद्वद्महे । इतः प्रतिवर्षप्रतिनियतागमा श्रीपर्युषणाऽपि प्रत्यासीदिति । ततश्च- - दानशीलतपोभावरूपो धर्मश्चतुर्विधः । भृशं प्राप्तावकाशोऽभूदेष्यति ज्येष्ठपर्वणि ॥ १ ॥ अर्थमुक्तोऽपि दातॄणां करो गुरुतरो भवेत् । तत्पूर्णोऽपि पुनातुर्लघुरेवेति मे मतिः ॥२॥ दानं दौर्गत्यनाशाय दानं दुरितदारकम् । आशाकल्पद्रुमो दानं प्रियं त्रिजगतोऽपि तत् ॥ ३ ॥ दानेन शासनौन्नत्यं यादृशा तादृशेन वा । तस्माद्दीक्षाक्षणारम्भे तद्वयापारि जिनैरपि ॥ ४ ॥ पश्य दानस्य सौभाग्यं वस्तुपालादयो यतः । जीवन्त इव मन्यन्ते यदुत्थयशसश्चछलात् ॥ ५ ॥ अहो ! दानसमं नास्ति जगत्रितयमोहनम् । यस्माद्दुष्टोऽपि तुष्टः स्यात्तथा शत्रुः सुहृद्यते ॥ ६ ॥ दान इत्यक्षरद्वन्द्वं विभज्य जगृहे जनैः । उदारैरादिमो वर्णः स्पर्द्धयेवापरैः परः ॥ ७ ॥ राजानो दुर्जना मातापितरो गृरुवान्धवाः । नियन्ते के न दानेन ? चिरं विमुखिता अपि ॥ ८॥ तथा- कष्टानुष्ठानकारो भूयांसः सन्ति पूरुषाः। केऽपि ते विरला एव शीलशुभ्राः सदैव ये ॥ ९॥ कलिदुर्वातपातेन कथञ्चिद्विधुरा अपि ।
तृतीया वेणिः। ५९ शीलबोहित्यमास्थाय भव्यास्तीर्णा भवार्णवम् ॥ १० ॥ न त्रातारो न दातारो योगिनो न न मोगिनः । शीलपालकलोकानामन्त्येिकां कलामपि ॥ ११ ॥ अन्तराद्विपद्व्यूह गलहस्तकदायकम् । तपः सुसाधुमिस्तप्तं निर्जराङ्गमकृत्रिमम् ॥ १२ ॥ विषमाण्यपि कर्माणि दुश्चीर्णानि कथंचन । तपस्तपनयोगेन क्षयं यान्त्यन्धकारवत् ॥ १३ ॥ प्रत्यूहव्यूहतो नाम लोको यद्येप शङ्कते । नादधीत कथं कारं तपस्तद्ध्वंसमांसलम् ॥ १४ ॥ यदगम्यं यदुरापं दुःश्रद्धेयं च यद्भुवि । तदायासविनामूता लमन्ते तपसा प्रियम् ॥ १५॥ दुष्कर्ममलसंस्पृष्टस्तावदात्मा न शुद्धयति । तपोऽमिना स्वर्णमिव न यावजातु तप्यते ॥ १६ ॥ यक्षरक्षःफणिव्याघ्रा न तानाक्रमितुं क्षमाः। सिद्धमन्त्रोपमे येषां तपस्यास्था सनातनी ॥ १७ ॥ तथा- नरके नारकाः सन्ति सहन्ते दुःखमेव च । न तेषां भावना शुद्धा तस्माल्लाभो न किंचन ॥१८॥ पुण्डरीकादिभिस्तैस्तैः श्रेष्ठकानतादपि । कर्मग्रन्यित्रोटितो यद्भावना तत्र फारणम् ॥ १९ ॥ सुचिरादविवेकोऽपि कृताजानतपा अपि । भावनातो नरः शुद्धयेत् तामलीवामलाशयः ॥ २० ॥ दानं शीलं तपस्तुण्डमुण्डनादि मुबद्दपि । मफलं स्नु हिशाखीव यका नहि मावना ।। २१ ।।
६ विज्ञप्तित्रिवेण्यां अहो ! भावस्य भव्यत्वं विरत्यां विगताग्रहः । आर्जिजत्तीर्थकृल्लक्ष्मी श्रेणिकः पृथिवीमिव ।। २२ ॥ दानं दुरितनाशाय शीलं सौभाग्यवर्द्धकम् । तपः पङ्कविशोषाय भावना भवनाशिनी ।। २३ ॥ तदमूनमूहशो दानशीलतपोभावनाभेदान् परिपोपितस्वस्वसाम- र्थ्यान्नासीरतया परिस्फुरता चतुरङ्गचमूभावेन व्यवस्थाप्य तैरेवाधृष्यवि- पक्षपक्षक्षोभमुद्भावयन्ननिवारितनिजैश्वर्यकलया सपक्षानावर्जयन्नगणितस्व- परपक्षः सर्वत्र समदृष्टिरुदारचरितः सम्यक्त्वसामायिकश्वेतगजारूढः प्रौढश्रीः पर्वराजः श्रीजिनराजशासनराजधानीमध्युवासः । तदा च- आशिषः स्थानेन वाऽस्माभिः श्रीकल्पवाचनाव्यापारयिषत् श्रीकालिका- चार्यकथाद्वयोपदेशव्यपदेशेन तत्तत्तदुत्पत्त्यादिव्यावर्णनं निर्णयद्भिश्च द्वार- भट्टपटिमास्वात्मनि घटयांचक्रे च । सुश्राद्धमहाजनेन तु साङ्गतिकक्रमुकना- लिकेरीविविधवर्णवर्णनीयवासःप्रदानसाराभिरेकादशकृत्वः प्रभावनोपदाभि- रुपास्थितश्चायं पर्वराजः । किं चात्र साधुमेहाक-सं॰जसूश्रावको मास- क्षपको, ‘श्राद्धेका तु द्वादशपक्षक्षपका, अष्टाहिकाकारिण्यस्त्वगारिण्यो गणनातीताः समपत्सत । एतच्च पर्वस्वरूपं पुराऽपि श्रीपूजेभ्यः प्राभृती- कृतमभूत्तथाऽप्यधुना स्थानाशून्यार्थं पुनरपि व्यज्ञपीति न पौनरुक्तमा- शङ्कयम् । अथ सम्प्रति मिलितसर्वमहाजनो महाविस्तारस्फारो वाद्य- दातोद्यस्तोमः पौषसितपञ्चम्यां श्रीनन्दिमहःसम्पन्नः, तत्र च श्रावका- श्चत्वारः, श्राविकास्तु चतुर्विशति, संयताश्चत्रयः, सर्वविरतिवर्ज तत्तत्त- पश्चरणप्रमुखानभिग्रह विशेषान् परमयाऽहमहमिकया यथार्ह सर्वेऽप्या- ददिरे । तदा च ताम्बूलादिदानप्रधाना विश्वाश्चर्यकरी सा काचित्प्रभावना श्रावकैश्चक्राणा, ययापि सर्वः श्राद्धसङ्घो नाम सुतरां साधुवादाद्वैतवादी समवृतत् । अन्यो मुग्धलोकस्तु ताम्बुलादिप्राचुर्यं दृष्ट्वा यसमयेऽपि पर्यु- . तृतीया वेणिः । पणापर्वममं दधार । सदयं सर्वजनीनो महान् पुण्यलामः । तथोपैपीच्छ्री- मत्मसादित लेखद्वयं, परिजग्मे च ततोऽवस्थानादिनैयत्यम् । पुनरपि यथावसरं स्वसुखावस्थानादिसमाचारसुधांशुब्यापारणेन प्रल्हादनीयो नश्चित्तसागरः मुगुरुभिः । तथा वयमितः प्रस्थातुकामा अपि कल्याणी- भक्तिश्री-समुदायोपरोधातपोधनावन्दापनोत्सुका अपि स्थिताः । अथा- द्यश्वीन श्रीमम्मणवाहनीय-श्रीफरीदपुरीय-सङ्घागमः संभाव्यमा- नोऽस्ति । तदागतौ यद्योग्यता भविष्यति तद्विघास्यतेऽवश्यम् । तथा इवत्यो मेघराजगणि-सत्यरूचिगणि-प्रमृत्तियति-सा नगराज-सा० हांसा-सा० हापा-) भोजा-सा०पाहा-सा०मण्डलिकगोला-सा० रेला-द०भीमा-सा आह्वा-सादेपाल-सा विधा-सा जिणिया -सा देवा-संरतन-सं०धुम्मण-सा०सहजा-सा कान्हड-सा. मूला-सा वस्तुपालसन्चालक्खा-सं० लद्धाप्रमुखो निखिलोऽपि त्रि- वर्णः श्रीसङ्घः श्रीमत्पादपयोजन्मसु चिराचञ्चरीकेलिं कलयतितमाम् । तथा- गाम्भीर्यालब्धमध्यो धृतसगुणमणिधरितासानुमद्भिः सन्नद्धो मध्यमेघोज्ज्वलतरसलिलोल्लोटमालोत्सहिष्णुः । माधद्विधानदीनां धनरसरसितः श्रीघरोपासनीयः वोभूयेत श्रियायः मुगुरुजलनिधिः मूरिनीराशयेषु ॥ १ ॥ संसारसरसीसूर उरूराः सरसोरिसः । रसासारो रिरंसोऽरं सूरिः मूरिसु साररः॥ २ ॥ (दिव्यपनः।) सत्यल्याणधरः मुरागमधुरस्तारोदयानुत्तरः सदलोपलसद्विभूतिरुचिरो गौरश्रिया भास्वरः।
६२ विज्ञक्षित्रिवेण्यां शश्वद्धीरतरः स्फुरद्वसुभरः सत्सौमनस्योद्धरः जीयाच्छ्रीजिनभद्रसूरिसुगुरुः सर्वसहायां चिरम् ॥ ३ ॥ सद्धिः सुवंशजातैः संश्रितपादो वरेण्यशाखीव । सद्भिः सुवंशजातैः संश्रितपादो गुरुयात् ॥ ४ ॥ विहाय पङ्कोचयमुत्सृतानां सद्वासनाश्रीसमधिष्ठितानाम् । प्रबोधनायार्यमनोऽम्बुजानां प्रकल्पते यद्ववचनं रविश्च ॥५॥ यन्मूर्तिवत्प्रीतिकरी सरस्वती सरस्वतीवन्मधुरा गुणावली । गुणावलीवद्विपुला मनीपा नन्दन्तु ते पूज्यतमा जगत्याम्॥६॥ ( रसनापमा।) रोगोरुगोरुगारीगौ राङ्गगुरुरुग्गुरुः । आगोगागारिरागारंगिरांगोगेरिगो गुरुः ।। ७ ।। (द्विव्यसनश्लोकः।) प्यानध्यानधुतापदो घनतमःसम्भेदने साधवो विश्वेनाञ्चितसत्पदो भवभिदो रङ्गन्महाभानवः । चेतोद्गुणसम्पदो जनमतोत्सृष्टौ सुरोवारुहः कल्याणं ददतां सतां गुरुरसावन्येऽपि चानारतम् ॥ ८॥ (महाद्भुतम् । प्रथमैकवचनवहुवचनाभ्यांव्याख्येयं विद्वद्भिः।) जीयासुर्गुरवोऽवन्यां वन्यामिवावनीरुहाः । यमासृत्य चयं याति विद्याव्रततिसन्ततिः ॥९॥ (गुरुवर्णनम् ।) विशां हि सेव्याः सरसारवावरा विश्वाविहायोहरयः सुसंवराः । साहस्यसाराः सलयाः सुसूरयः सारश्रियो वैरविशारसूरयः॥१॥ (पञ्चवर्गपरिहारेण छत्रवन्धः।) ++
तृतीया वेणिः।
६३
वर्णनीययशोराशिवरो विततलोचनः ।
वरदो मम सम्भूयाद् वर्यस्ताररवो गुरुः ॥ १ ॥
(स्वस्तिकवन्धने काव्यम् ।)
आलवालतुलं येपामभिधानं स्थिरीकृतौ ।
ललल्लक्ष्मीमहाकारस्करस्यार निरन्तरम् ॥१॥
(चामरवन्धः।)
प्रीतिस्फीतितति येषां प्रशस्याऽऽस्यशशी नयेत् ।
सुसाधुजनताचेतःश्रोत:कान्तं ततं स्मितम् ॥ २ ॥
(चामरः।)
एवं पूज्यगुणोद्नानविधानमुखराननः ।
श्रीजिनभद्रसूरीन्द्रान् वन्दते सोमकुञ्जरः॥१॥
दोपज्ञहस्तीन्द्रसुरेशकुञ्जराः सन्मानसाम्भोनिधिशर्वरीवराः ।
भूयो गुणश्रेणिहिरण्यमन्दिरं जयन्ति ते श्रीगुरवो निरन्तरम् ॥१॥
विद्यावलीवल्लिवरेण्यमण्डपं कृपापयोधारणविस्फरन्निपम् ।
वचश्चयैराजितसर्वविष्टपं गुरुं स्तुवे पादनतोरुभूमिपम् ॥ २ ॥
गुणालिताराधरणान्तरिक्षं विध्वस्तसम्मोहमहाविपक्षम् ।
नीरन्ध्रदोपोत्करमेददक्षं गुरुं स्तुवेऽहं सुयशोवलक्षम् ॥ ३ ॥
यच्छति स्फीतिसन्तोपं यद्वारती सभासदम् ।
यथाम्भौदपयोधारा राजत्सारमसन्ततः ॥ १॥
(आसनयन्धेन वृत्तम् ।)
नरकसंहरणे कमलाधवः सदवनीनलिनीनलिनीधवः ।
कविजनग्रहराशितमीधवः शुचिधियेऽस्तु गुरुर्मधुरारवः ॥ ४ ॥
भुवनमन्दरशैलमुरागमं जिनपशासनमासनसोधमम् ।
विमलचेतनयावगतागर्म गुरुवरं प्रणुमः मुगुणोचमम् ॥ ५॥
कल्याणवारांकुरवृद्धिनीरदाः कारुण्यभूयोलहरीलसन्नदाः।
सुसेवकानां सुतराममीष्टदा जयन्तु पूज्याः परिणामिसम्मदाः॥६॥
६४ विज्ञपित्रिवेण्यां इत्थं नत्वा गुरूँश्चित्ते सुस्थिरः स्थिरसंयमः श्रीजिनभद्रसूरीशान्नन्नन्ति विनयान्वितः ॥ ७ ॥ तत्रत्यस्य पं०पुण्यमूर्तिगणि-पं लक्ष्मीसुन्दरगणि-पं०मति- विशालगणि-वा०लब्धिविशालगणि-पं० मतिराजगणि-प्रमुखसाध- वः, प्र०तपामभागणिनी-प्रवहयतिन्यः,सागेला-सा०करणा-सा धणपति-सा० वज्राङ्ग-श्रे० रूपा-भं० गुणराज-सा० आसा-सा० पद्मसिंह-मं गुणराज-श्रेहरिराजमुख्या महागारिणः, सौ गङ्गादे -सौ०सोप-सौ.जासलदेवी-सौ०पालदेवी-प्राग्ग्रह राः श्रमणसेव- कपल्यश्च तत्तदनुवन्दनाधर्मलाभमयोचिताशीर्वादकदलीफलप्रदानेन सभ्य- गानन्दमेदुराः सम्भावनीयाः । तथा श्रीमद्भिः सर्वदापि समुचितशिक्षाप्रे- षणे क्षणमप्युपेक्षणीयं न । तथाऽविनयविलसितादि तितिक्षणीयं क्षमाश्र. मणप्रवीणैः । तथाऽधुनाऽत्र किमप्यसमञ्जसासमाधिसदृशं नास्ति, तेनात्यन्त श्रीमतां प्रसादाद्वयं सपरिच्छदा अपि समाहितास्तेष्ठीयामहे । अपरं च- धातुर्विश्वविधाननैपुणमयात्पाणेर्जगद्विश्रुता- द्विज्ञानातिशयो यदीयवचने कोऽप्यद्भुतो वर्तते । भाले तेन लिपीकृतां तनुभृतां यन्मौव्यवर्णावली तत्तत्तत्त्वमहोपदेशसलिलप्लावैः प्रमाष्टिं क्षणात् ॥ १ ॥ तान् विस्मेरविद्याम्बुजिनीप्रसर्पद्यशःपरागैर्मुदितज्ञभृङ्गान् । परप्रतीक्ष्यान् जिनभद्रहरिपादान् प्रणन्नन्ति स मेघराजः ॥२॥ इति लिखितलेखरगत्प्रासादो परिचिरं परिस्फुरतु । मम वन्दना पताका श्रीमज्जिनभद्रसरिभ्यः ॥ ३ ॥ ॥ इति विज्ञप्तित्रिवेण्या ज्येष्ठकल्पविधानाद्यर्थप्रस्ताविका यमुनाकल्लोलाख्या तृतीया वणिः ॥
त्रितीया वणिः। ६५ . विज्ञप्तिसत्रिवेण्यां सूक्तलसल्लहरिवारहारिण्याम् । गुणगृहनिपुणमानसवृन्दानि स्नान्तु चिरकालम् ॥ १ ॥ जलंधि-वस-भुन-सह्ये वर्षे माघे सिताष्टमीदिवसे । रविसुतवारे रुचिरे समर्थितोऽयं महालेखः ॥ २ ॥ यन्न्यूनं यच्चाधिकमसमतं वा यदत्र लिखितं स्यात् । तच्छोध्यं धीमद्भिर्यतः सता रीतिरियमेव ॥ ३ ॥ किं च-- श्रेटिनो नरसिंहस्य तनयो विनयावनिः । : भोजाख्यः साक्षरः क्षिप्रं प्राञ्जलिः प्रणमत्यसौ ॥ ४ ॥ विशेपस्वरूपावली.-"ज्ञाप्या निष्पन्नेयं विज्ञप्तित्रिवेणीनामग्रन्थ- पद्धतिः। संवत् १४८४ वर्षे माघमासि दशम्याम् ॥ किच- द्विवन्दनीकगच्छीयाः श्रीदेवगुप्तसूरयः श्रीसाधुरनोपाध्याया वा यदीह स्युस्तदा तेषां विशिप्यास्मदीया प्रतिपचिरौचित्येन प्रकाश्यति ॥ शिवमस्तु सर्वजगतः परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः । दोपाः प्रयान्तु नाशं सर्वत्र मुखी भवतु लोकः ॥ १ ॥ भद्रमस्तु जिनशासनाय । स्वस्ति श्रीसचाय । आयुप्यमस्तु गुणगृहोभ्यः । समाधिरस्तु स्वयथ्यानामिति ॥ (ग्रंथाग्रं १०१२) Hix विज्ञप्तिनिवणिः । स परिशिष्ट संख्या-१॥ परिशिष्टसंख्या-१। मुझ मनि लागिय खंति जालंधर देसह भणिय । तीरथ वंदण रेसि नगरकोटि तउ आवियउ॥ १॥ वाणगंगा पातालगंग व्याहनइ जसु तडिहिं । वणराई घण घाट वाट ति घाटिहिं आगलिय ॥ २ ॥ तहिं माहमाभंडार पहिलडं पहिलइ जिणभवणिं | दीठउ संतिजिणिंद नयण अमियरस पारणउं ॥ ३ ॥ जिणहरि वीजइ रीजु मनि अधिकरउं ऊपजए । जहि सोवनमय बिंव रूपचंद रायह तणउं ॥ ४ ॥ जिणि दीठइ संतोसु मण आणदिहिं उससए । अंधारइ उद्योत जयउ सुजगगुरु वीरवरु ॥ ५ ॥ जइ त्रीजइ प्रासादि सरवरि राजमराल जिम । संभाविउ रिसहसु चंपकि चंदनि थुति जलिहिं ।। हिव चडियउ चमकंत अति ऊंचइ गढि कांगडए । इहु जाणे मइ किद्ध सिद्धिसिला आरोहणउ ॥ ७ ॥ अलजउ अंगि न माइ माइ ताय घरु वीसरिय । सरिय सयल मह कज तहिं रिसहेसर दंसणिहिं ॥ ८ ॥ जो हीमालय हुंत राय सुसम्मिहिं जाणियउ । नेमिसरि जयवंति कंगड कोटिन्हें आणियउ ॥ ९ ॥ चंद्रवंसि जे राय राणी जसु पयतलि लुलइ । अंबिकदेवि पसाइ तहिं मनवंछित फल मिलई ॥ १० ॥ . भास। कंचणमय कलसिहि सहिय ए च्यारइ प्रासाद ।
परिशिष्ट संख्या-१॥ च्यारइ चिहुं वरणिहिं नमिय च्यारइ हरई विषाद । गोपाचलपुर सिरिमउड संतिनाह जगसामि । कामियफल काराणि रसिय लीणउ छउं तसु नामि ॥ ११ ॥ नंदवणिहिं नंदउ सुचिरु चरमजिणेसर चंद । जग चकोरु जसु दंसगिहिं पामइ परमाणंद । पास पसंसउ कोटिलए गामिहिं महि अभिराभि । मह मन कोइलि जिम रमउ तस गुण अंबारामि ॥ १२ ॥ हेमकुंम सिरिजिणभवणि ए सवि थुणिया देव । देवालइ कोठिनयरि करउ वीरजिण सेव । दुक्खह दिन्नु जलंजलिय सुखह लद्ध पसारु । तीरथ पंचइ जइ नमिय पामिय मोख दुयार ॥ १३ ॥ . मंगल तीरथ पंथियह मंगल तीरथ पंथ । ज सुखेहि किर मई कलिय मुकतिनारिसीमथ । नारि अच्छह घरि घरि घणिय जणणी सा परु धन्न । जासु कुक्खि उप्पन्न नरु संचइ तीरथ पुन्नु ।। १४ ॥ इय जयसायर समरिय ताय सवालखपव्यय जिणराय । ता अम्हारिय पूगी आस हउं बोलउं जिणसासण दास ॥ १५ ॥ इणि समरणि नासइ नरग जोग इणि समरणि लाभइ सरग मोग । इणि कारणि तुम्हि भो भविय आज इहु पभणहु, निसुणहु, सरई काज ॥ इय नगरकोट पमुक्ख ठाणिहिं जे य जिण मई वंदिया । ते वीर लउकड देवि जालामुखिय मन्नइ वंदिया । बन्नेचि जे केवि सगि महियलि नागलोइहि संठिया । करजोडि ते सवि अज्ज वंदउं फुरउ रिद्धि अचिंतिया ॥ १७ ।। ॥ इति श्रीनगरकोह-महातीर्थ-चैत्यपरिपाटी । । कतिरियं श्रीजयसागरोपाध्यायानाम् ॥
६८ परिशिष्ट संख्या-२ । परिशिष्टसंख्या-२। मनोरंगि मइं आपणइ बुद्धि पामी ज जाणउं फिरी वंदियई भुवणसामी । त आणंदि जे वंदिया भावसारं वली ते जिणे वंदिमो वारवारं ॥ १ ॥ पुरे पाटणे मूलजिणरायपाया थुणीनइ हणउं मोहमदमदनमाया । वडल्लीपुरे पासपहु अमियमीठउ परं रायपुरि संतिजिणदेव दीठउ ॥२॥ भास। . महिमंडली सुमहंति महसाणइ महिमा घणिय । आदिल पासजिणिंद संतिनाह मई तहिं थुणिय ॥ ३ ॥ कुंयरगिरिहिं सिरिसंति सति पास सलखणपुरिहिं । पासजिणेसर संति ध्यायउं धंधूकई पुरिहि ॥ ४ ॥ परमाणंद अपार वार वार मन ऊरहसिय । चडियउ सेत्रुजसिंगि रिसह संगितहिं ऊससिय ॥ ५ ॥ रायणितलि प्रभु पाय त्रिणि प्रदक्खिण देइ करे । पणमिय सल्लोद्धार करउं विमलगिरिवरसिहरे ॥ ६ ॥ समकत अंगीकार सार पंचव्रत ऊचरिसु । सिद्धखेत्रि सुप्रसंगि हाँ आपणपउं ऊधरिसु ॥ ७ ॥ तां तम तां संताप तां चिंता तां कुगतिभिय । नहुं समरउं सेबूज जाम देवभवाणिहिं सहिय ॥ ८ ॥ भास। वीरह ए बंदण रेसि पालियताणइ आवियउ ।
परिशिष्ट संख्या-२॥ ६९ तलाऊज्झए पुरिसंतीस पासनाह मनि मावियउ ॥९॥ दाठइ ए दीठउ पास महावीर महुए महिय । पासज ए घृतकल्लोल मेलिगपुरि मेलिहिं लहिय ॥ १० ॥ अजाहरि ए वामाजाय दीवि पास अनु वीर मुहु । ऊनइ ए पुरवरि संति कोडियनारिहिं नेमिपहु ॥ ११ ॥ देवकइ ए पाटणि देव चंदप्पह बिहु गणि ठिय । श्रीजइ ए भवणि जिण नेमि, चोरियवाडइ पास पिय ॥१२॥ घात। वीर वेला वीरवेलारलिहिं पणमेवि । नवपल्लव मंगलपुरिहिं पासनाह रिसहेस जिणवर । जूनइगढि मढि नवं नवइ रिसह पासजिण वीर दिणयर ॥ हिव गिरनारिहि गरुयर सिह चडियउ चमकत | बहिं मनसउं मई दिक्खिवउ राजलदेवीकंत ॥ १३॥ नेमि मई पणमिउ नेमि मई पूइउ नेमि मई संथुउ सरियकाज | सकृतमंडार भर मरियमइ सुन्भरो करिय मई विमल निज जनम आज|| अझ चिय पूगिय मनह जगीस नेमिभवणि गिरनारशृंगि। गाइसो वाइसो नाचिसो रंगि देइसो दान मन उच्छरंगि ॥ १५ ॥ वस्तिगवसहिई आदिजिणेसरो कल्याण अइ नेमिपहु । श्रीगिरनारिहिं अवर जे केवितेवि हडं बंदिसो देव बहु ॥ ११ ॥ घात। मुजसधवलिहिं सुजसधवलिहिं पासजगनाह । वळदाणइ पासपहु संतिनाह चूडेवणी पुरि ।
परिशिष्ट संख्या-२ । देदाणइ रिसहजिण आदिनाह ऊपल्लियासरि ।। वीरमगामिहिं वीरखरु चीजउ संतिजिणिंद । अचिरानंदण भो जुयइ वंदह लवणिमकंद ॥ १७॥ मंडलि सीतापुर वरि वीर चग्धाडइ सिरिआदिल धीर । पाटरियइं पहु पास जु संति गोरइई सिरि रिसह नमंति ॥ १८ ॥ संतिजिणेसर डहियरवाडइ संति पास दुइ झंझूवाडइ । हांसलपुरवरि सीतलदेव सार नितु नितु हउं तसु सेव ॥ १९ ॥ जे मई चउद सत्यासिय वरसिंहिं जिणवर वंदिय गरुयइ हरसिहिं । नितु नितु ते मन भाविहिं वंदउं सुख समाधिहिं ता चिरु नंदउं ॥२०॥ इय दोसनासण पयडसासण सुहपयासण केविया । बहुठाणसंठिय देवजिणवइ भावभत्तिहिं सेविया । आज चहुविअ संघ मंगल रंग दाण समग्गला । मह दिंतु निव्वुइ सुजइसायर बोधिलाभ समुज्जला ॥ २१ ॥ ते KEEEEEEEEEEEEEEE EEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEER ॥ इतिश्रीचैत्यपरिपाटी समाप्ता । ।। -कृतिरिय खरतरश्रीजयसागरोपाध्यायानाम् ।। 於八八八八 33333333 शुद्धिपत्रम्। ६ २३ 'साधेन' २३ १२ यष्टं २३ ११ तैदृष्टव्यं विज्ञप्ति त्रिवेणि के (फ-संशोधनमें, कुछ जल्दी हो जाने के कारण कितनेक स्थल अशुद्ध छप गये हैं । पाठक उन्हें, इस शुद्धिपत्रके अनुसार शुद्ध कर पढे । पृष्टम्. पतिः अशुदम, शुद्धम्, पृष्ठम्. पङ्क्तिः अशुदम्. शुद्धम्. २२१ -कोद्भुता- .-कोद्भूता- १९ ३ वेढाक्टेन वेडा कष्टेन ३ १५ स्वमूर्भुवः स्वर्गवः ९ -दासी कि- -दासीतिक- ८ स्फुटाः स्फटाः १९ १२ मुदाकर- मुदा कर- 'स्यायेन' ४ -यूनमु- ४ - सम्पत्या--सम्मत्या, २० १६ -चिद्दन्ति- -चिदन्ति- ७ १६ -स्वभावत्म--स्वभावात्म २० २२. धम्मु धम्र्येषु ६ भूवि मुवि २१ ७ -विशिष्ठ- -विशिष्ट- २ -मुरि- २३ १० युधाः युधः ९ ४-प्पान -प्यान- चैटेष्ट ९१४ -मुचि- -शुचि- तद्रष्टव्यं ७-दाशया: -दाशया २३ १७ महात्म्य माहात्म्य १० ११ सप्ता संतृप्ता २३ १८ -धन्यं म- -दन्यम- १० १४ -रीव -ऽऽशेष २३१९ -र्वन्तुः वन्तु १०१५तु २३ २० जस्तिप- -नस्ति - १२ ११ शक्तिपुटं शुक्तिमुटं २३ २३ तत्ताहगमि- तत्तादृग्मि- १४ ११ -तुरा- ६ -मनः पूर्वा- -मनःपूर्वा- 1४ १२ सदाऽमल- सदामल- २४ १२ -मासदम् -मास्पदम् ४ मासिवसतौ भासि वसती २४ २२ तत्स- तत्तत्स- १६ ६ -भूमिप्राप्त- -भूमि प्राप्त- २५ १९ समुदरम् शमुद्धरम् १६ २१ परिवती परिवति २६ ३ पदत्य पद्धत्य- सवानपि २६ ९ -स्तम्नति- -स्तदुमति- * যথাবি যাথি ३ प्रणीनंस- -प्रणिनंस- १८ १४ -वाक्षर- वो ૨૮ ९ सानिध्य- सानिध्य- १८१९ -परि -पृष्टी- ३० १२ -पूर्वीनिर्म- -पूर्वी निम्र- १० ३ समिति २ पृष्ठम्. पङ्क्तिः अशुद्धम्. शुद्धम्, - -नः स्त- - ३० २२ एg एवं ३० २३ स सः ८ -चांस -वांसः ३१ १८ ततश्चविपा- ततथ विपा- ३३ १९ कापिकुमु- कापि कुमु- ३५ ५ -प्तिग्राम्या- -प्तिम्या- ३५ २०-स्थानाम- स्थानम- ३५ २२ ल्मलि महा--ल्मलिमहा- ३६ २ -योपित- -योक्षुपित- ३६ ४ -धूरीणस्व धुरीणस्य- ३७ १२ -वात्यैः वायै ३७ २२ कदाचन् कदाचन ४० १६ -मान्यअ -मान्य- ४१ १८ -वैस्त- ४ प्रमदा- प्रमादा- ४२ २३ -वर्णयन्ति- -वर्णयन्ति ४३ २२ स्वाद्वाय स्याद्वाद्य- ७ तान्पङ्क ! तान्यप ! ४६ १२ श्लाघे लाध्ये ४६ १५ -ऽस्तुवः -ऽस्तु वः ४६ २४ नरपतेऽम्यु-नरपते । तेऽम्बु- ४७ १९ कोपी कोऽपि ४८ २२ पुरःकोऽहं ४८ २३ वराकः वराकः ४९ २० द्रष्ट द्रष्ट ५२ १० गिरिभूवि गिरिभुवि -नुल्लङ्घ- ५४ १७-दरसज्ञ- -द्रसज्ञ- ५५ १३ सत्यरूचि सत्यरुचि- पृष्टम्. पतिः अशुद्धम्. शुद्धम्. ५५ १४ -श्चतुर्माशी -तुर्मासी ५५ १५ -सीदौति सीदिति ५५ १८ समुलड्य समुलध- ५५ २१ -दालाद- -दाहलाद- ५७ १३ सघान्तरे सङ्घान्तरे- ५७ १४ -प्यतिरिच्यत-प्यसारिच्यत ५७ २३ निखिलजा निखिलज- ५७ २४ इति इति । ५८ १४ श्छलात् *छलात ५८ १९ गुरुवान्धवाः गुरुवान्धवाः ५९ २४ स्नु हिशा- स्नुहिशा- ६० ६० १० वाऽस्माभिः चाऽस्माभिः ६० १० -विपत् थिपत। ६० १२ -पटिमास्वा पटिमा स्वा- ६० १४ रूपास्थि रुपस्थि- ६० १५ श्राद्धका श्राद्ध का ६० १६ श्रीपजेभ्यः श्रीपूज्येभ्यः ६० २० चतुर्विशति, चतुर्विशतिः, ६० २० -ताश्चत्रयः, -ताश्व त्रयः, ६०२४ ताम्बुला ताम्बला- ३ प्रल्हाद- प्रहाद- ६१ सत्यरूचि--सत्यरुचि- ६२ १९. यमामृत्य यमात्रिय -बन्धेन ६३ १५ -चयैरजि- -चय रजि- ६३ ११ यत्राम्भौद- यत्राम्भोद- ६४ २१ सादो परिचिरं-सादोपरि चिरं - - - ४४ - पुरः कोऽहं ८ ६३ ३ - वन्धने ५४ ११ -नुलङ्घ- -