Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Hemprakash Mahavyakarnam (purvardham) Part-i

Vijaygani · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

प्रिंटर-रामचंद्र येसू शेडगे, निर्णयसागर प्रेस २६-२८, कोलभाट स्ट्रीट, बंबई. पब्लिशर-शाह हीरालाल सोमचंद, ५७-५९ जुना मोदी स्ट्रीट, कोट, बंबई.

S'ri Ami-Soma Jaina Granthamälá No, 1
BH
THE
LIBRARY
This
ŚRİ HAIMAPRAKĀŠA MAHÄVYÄKARANA
(BASED ON SRI SIDDHAHEMA ŠABDĀNUŚĀSANA)
OF
MAHĀMAHOPADHYAYA ŚRĪ VINAYA VIJAYA GANI
WITH COPIOUS NOTES AND INDICES.
Part I
Hallow best of the proficient! why are you doubtful about the meanings of words 1
And why do you stare at the sky-you being non-plussed for making inquiries for formation
of good (correct) words? Why (do you make) any exertion in finding out the sūtras
accompanied with various uses (prayogas), when there exists this great Haimapratās'a.
which is capable of giving excessive knowledge,
EDITED BY
UPADHYAYA KSAMĀVIJAYA GANI
Thc cditor of S'ri S'rutināna Amidhārā cic.
PUBLISIIED BY
SHĀH HIRĀLĀL SOMCHAND.
BOMBAY.
1937
Pic R 8-1-7

[ All rights reserved] Priater -Ramchandra Yesu Shedge, Nirnaya Sagar Press, 26-28, Kolbhat Street, Bombay Publisher --Shah Hualal Somchand, House No 57-59 Old Nodi Street, Fort, Bombay, MARATHE VIDYA प्रकाशकका वक्तव्य. S.N...... BHAVANI LIBRARY महोपाध्याय श्रीविनयविजयगणिकृत श्रीहेमप्रकाश प्रसिद्ध करते हुए हमें अत्यन्त आनंद होता है. महोपाध्याय श्रीविनयविजयजी महाराजकृत यह ग्रंथ कलिकालसर्वज्ञ भगवान् श्रीहेमचन्द्राचार्य महाराजके महान् व्याकरण "श्रीसिद्धहेमशब्दानुशासन” की प्रक्रियारूपमें रची हुई सुबोध, सरल और सुविस्तृत टीका है. व्याकरण यह साहित्यशास्त्रका मुख्य अंग है. विचारोंकी विपुलता होते हुए भी व्याकरणके निय- मोके विना जाने उचारण करनेसे अथवा लिखनेसे विचारशील पुरुप भी हंसीके पात्र होते है. इस लिए व्याकरणके विषयकी जानकारी अति जरूरी है. इसीसे यह व्याकरण विषयका महाग्रंथ महोपाध्याय श्रीविनयविजयजी महाराजने सिद्धहेमशब्दानुशासन आदि अनेक व्याकरणोंका साररूप रचके संस्कृतवाणीके अभ्यासकी इच्छा रखनेवाले जिज्ञासुऑपर वहोत ही उपकार किया है. पूज्य विनयविजयमहाराजकृत यह ग्रंथ वडा उपयोगी होनेपरभी अभीतक अप्रकाशित था इसलीए समर्थ विद्वान् उपाध्यायजी महाराज श्रीमद् क्षमाविजयजी महाराजनें इस ग्रंथका सुसंपादन किया है. और उसके प्रचारके लिए उपदेश दिया है. इसके प्रकाशनके लीए मेरे स्वर्गीय पिताके सन्मान्य टूल्ली शेठ नगीनदास करमचंद संघवी, शेठ देवकरण खुशाल वेरावळवाला और मेरी परमपूज्य गंगास्वरूप मातुश्री कस्तुरावंती वाईनें वसियतनामामें लिखी हुई शर्तके अनुसार सम्यग्ज्ञानका संवर्धन और संरक्षणके लिये जुदी रखी हुई भारी रकममेसे खर्चनेकी संमति दी इसके लिए मैं ट्रस्टीयोंका आभारी हूं. उपाध्याय क्षमाविजयजीकी स्तुत्य प्रवृत्तियोंसे सारी जैनजनता जानकार है. इतनी छोटी उमरमें प्राप्त कीहुई विद्वत्ता, प्रभावशाली वक्तृत्वशक्ति और उनके साथ अत्युत्तम चारित्र्य केवल प्रशंसनीय ही नहीं किंतु अनुकरणीय है ! जन्मसे पंजाबी होते हुएमी गर्वी गुजरातीभापा अपर इनका पूर्ण अधिकार है. इनके गुरु पूज्यपाद सन्मार्गोपदेष्टा श्रीमद् अमीविजयजी महाराजके पास अभ्यासके समय इनको सिद्धहेमशब्दानुशासनके पढनेवालोंके लिए महामहोपाध्याय विनयविजयजीकृन हमलघु- प्रक्रियाकी अत्युपयोगिता मालुम हुई और उसकी खोपन टीका देखनेकी उत्सुकता हुई. उसकी (हेमप्रकाश) एक प्रति अमदाबादके जैन विद्याशालाके भंडारमें प्राप्त हुई और उसके आधारसे संशोधन करनेका विचार किया. यह काम चालू था ही, इस बीच में हमारे भाग्योदयले उपाध्यायजीका चातुर्मास वन्बईमें ही हुवा; और मेरे प्रार्थना करनेपर हमारे पूज्य पिताजी संग्रह किये ज्ञानभंडारको देखनेके लिए उपाध्याय महाराज पधारे. हमारे स्वर्गीय पिताश्रीने पूज्यपाद अमीविजयजी महाराजके सदुपदेशाने और जन्यमानर प्रचारकी भावनासे या अन्यभंडार संग्रह किया है, और अपने देहावसानक ममय किये ग वर्मापननागाने ट्रस्टीयाँको ग्रन्यभंडारकी उचित व्यवस्ा करनेका काम लापनमें आया है.

२ इस ग्रन्थभडारमे उपाध्यायजीको हैमप्रकाशकी एक सुवाच्य और शुद्ध प्रति संवत् १७४३ की लिखी हुई मिली. इसको, और साथही हैमप्रकाशके अभ्यासियोंको अत्यन्त उपयोगी जानकर दोनो टीकाओंके साथ अप्रकाशित हैमलिगानुशासनकोभी प्रकट करनेकी प्रेरणा की. ऐसे अप्रकाशित अमूल्य ग्रन्थों का प्रकाशन सम्यग्ज्ञानके प्रचार और सवर्धनमे अत्यन्त उपयोगी होगा ऐसा जानकर सन्माननीय ट्रस्टीयोकी शुभ समतिसे यह ग्रंथ हमने प्रकट किये है. इस प्रथकी विक्रीसे जो रकम आयगी वह उपर्युक्त ज्ञानसातेमे जमा की जायगी. वीलकी शर्तके अनुसार सम्यग्ज्ञानका प्रचार और सवर्धनमे इसका उपयोग होगा. ग्रन्थ-प्रकाशनका काम बाहिरसे जितना सीधा लगता है उतना सीधा नहीं है. कितु बहोत कठिन है. पुस्तकोंके प्रकाशनके लिये हस्तलिखित प्रतियोंका संग्रह करना, उनका मिलान करके प्रामाणिक प्रतियोंसे शुद्ध पाठका निर्णय करना, अन्य प्रतियोंके आधारसे सुधारना, सशयास्पद और गहन स्थलोका वाचकोंको सरल होवे इसके लिये टिप्पन लगाना, इन सब कामोंमे समय शक्ति और तुलनात्मक बुद्धी जितनी खर्च होनें उतनी थोडी है. और प्रैसमेसे आये हुए फोंके सशोधनका कार्य और भी कठिन है. जिस किसीने छोटे या बडे अथके सशोधनका काम किया हो वोही इस परिश्रमको जान सकता है. प्रकाशनसबधी ये सब कठिनाइयों परमोपकारी क्षमाविजयजी महाराजने उठाई है, इसके लिए मैं उनका बडा आभारी हू आपने अस्वस्थ होते हुए भी अनेक ग्रन्थोंका आलोडन करके यह व्याकरण जैसा गूढ और गहन विपय अभ्यासियोंके लिए सरल और रसप्रद हो जावे ऐसी व्यवस्थित रीतिसे और सूक्ष्मदृष्टि से प्रूफोंका सशोधनमे जो मेहनत की है वह इसके पाठकही समझ सकेंगे. हमारे कुटुंबके अनन्य उपकारक और अनेक आत्माओंको धर्ममार्गमे लगानेवाले पूज्य अमीविजय महाराज तथा मेरे स्वर्गीय पिताके जीवनका परिचय कराके यत्किंचित् ऋणमुक्त होना चाहता हूं. इसीही वजहसे यह प्रथमाला मेरे दोनो पूज्योंके नामसे निकाली है, जिसका यह ग्रन्थ प्रथम पुष्प है. इन दोनो ग्रथोकी महत्ता वाचकोको प्रथ हाथमे लेतेही मालुम होवे इसके लिए उनका सक्षिप्त परिचय अलायदा दिया जाता है. भवदीय, आश्विनशुक्ल सप्तमी स १९९३ } हीरालाल सोमचन्द.

VIDYA ДАА44. TIYA BFT S. N............ BHAVAN A LIBRARY Publisher's Foreword I really feel proud to place before the public this unique work on Sanskrit Grammar by Mahamahopadhyaya Shree Vinaivijaijee Maharaj. The book is a commentary, in the form of Prakriyā, on the great Grammatical publication "SIDDH HEM SHABDANUSHASAN" by the renowned Acharya Shree Hem Chandra Maharaj and makes the subject much smoother for the Sanskrit learing public. Importance of grammar is well appreciated. A person having vast ideas at his command will simply put himself to ridicule if he betrays his ignorance of this important subject. With the object of making this subject easy to be grasped by people with common intellect, the author has tried to make it clear and has rightly steered the course of this difficult subject. I shall be failing in my duty if I do not show my indebtedness to those who are really responsible for the publication of this great work. Personally I am not a scholar to appreciate the sterling value of the Editor of this book, Upadhyaya Shree Kshma Vijaijee Maharaj, famous in Jain com. munity for his learning, eloquence and character, who took great pains in compiling and editing this work. He is a Punjabi by birth, but has a wonder. ful mastery over the Gujarati Language. It was he who impressed upon me the usefulness of this work and another book "HEMLINGANUSHASAN" with two commentaries (now in the press) which was also unpublished. It was while taking his lessons from his Guru Shree Amivijaijee that tlie talented Upadhyayajee realised the value and importance of the publication of the books. During his stay at Ahmedabad, he procured a copy of the work from Jain Vidyashala and set to his work. Next year he came to Bombay and at my request visited our Gnän Mandir. My father was very fond of rare books and Manuscripts and had made a nice collection of them in the form of a private library, which he had left in the charge of the trustees. It was during the inspection of these manuscripts that Upadhyayajee came across a nice manuscript of Hemprakash copied in Samvat 1743. He decided to place the book before the public with the help of this copy.

( 2 ) To publish a book from a manuscript is no easy task. Procuring various manuscripts, adopting the correct version, and finally the proof reading are some of the many difficulties an editor has to face Upadhyayajee, though not keeping good health, spared no pains to make the book as correct and useful as humanly possible and I must thank him sincerely, My thanks are also due to the trustees of my father's will, Seth Nagindas Karamchand Sanghavi, Seth Devharan Kushal Veravalwala and my revered mother Bai Kasturavantibai who, out of the fund set apart by my father in his will for the purpose of propagation and protection of Samyag gnan, consented to advance the necessary amount for the publication of this book It is not unnecessary to add here that all proceeds realised by the sale of this book will go to this fund for the purposes mentioned above, Last, but not the least, I must thank all those who have directly or indirectly helped me in the successful publication of this worl To keep afresh the memory of our great-Guru Shree Amivijaijee Maharaj and my father Seth Somchand Uttamchand, the series has been named as "Shree Ami Soma Jain Granthamala of which the present book is the first flower HIRALAL SOMCHAND.

• *? 3 - sor છે. * '4 Vi પ્રકાશકનું વક્તવ્ય મહામહોપાધ્યાય શ્રી વિનયવિજયજી ગણિત શ્રી હેમપ્રકાશ પૂર્વાર્ધ પ્રસિદ્ધ કરતાં મને અત્યંત આનંદ થાય છે, આ ગ્રંથ મહોપાધ્યાય શ્રી વિનયવિજયજી મહારાજે, કલિકાળસર્વજ્ઞ ભગવાન શ્રી હેમચંદ્રાચાર્ય મહારાજના મહાન વ્યાકરણ “શ્રીસિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસન”ની પ્રક્રિયારૂપે રચી, વિસ્તૃત ટીકા સાથે શોભાવ્યો છે. વ્યાકરણએ સાહિત્યનું મુખ્ય અંગ છે. વિચારોની વિપુલતા હોવા છતાં વ્યાકરણના નિયમો જાળવ્યા વગરના ઉચ્ચાર અથવા લખાણે વિચારશીલને પણ હાંસીપાત્ર બનાવે છે. એટલે, અતિ જરૂરી એવા વ્યાકરણના વિષય ઉપરનો આ મહાગ્રંથ મોપાધ્યાય શ્રી વિનયવિજયજી મહારાજે સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસનના સર્વસ્વ દોહનરૂપે રચી સંસ્કૃતગિરાનો અભ્યાસ કરવા ઇચ્છતા જીજ્ઞાસુઓને બહુજ આભારી કર્યા છે. પૂજ્ય વિનયવિજયજીકૃત આ ગ્રંથ અદ્યાપિ અપ્રસિદ્ધ હોવાથી અને તેનું પઠન ઘણુંજ ઉપયોગી હેવાથી, સમર્થ વિદ્વાન ઉપાધ્યાયજી મહારાજ શ્રીમદ્ ક્ષમાવિજયજી મહારાજે મને આ પુસ્તકના સુયોગ્ય પ્રચાર માટે ઉપદેશ આપ્યો. આમ કરવા રજા માંગતાં, અમારા મહુમ પિતાશ્રીના ટ્રસ્ટીઓ શેઠ નગીનદાસ કરમચંદ સંઘવી, શેઠ દેવકરણ ખુશાલ વેરાવળવાળા, અને મારા ગંગાસ્વરૂપ પૂજ્ય માતુશ્રી કસ્તુરાવંતીબાઈએ વિલમાં દર્શાવેલી ઇચ્છાને અનુસરીને મારા પિતાજીએ સમ્યાનના સંવર્ધન અને સંરક્ષણ માટે જુદી કાઢેલી મોટી રકમમાંથી જોઈતી રકમ ખર્ચવાની સંમતિ આપી તે માટે હું તેઓને અત્યંત કરું છું. ઉપાધ્યાયજી ક્ષમાવિજયજી મહારાજની પ્રવૃત્તિથી સારીએ જૈન જનતા વાકેફ છે. આટલી લઘુ વયમાં તેમણે પ્રાપ્ત કરેલી વિદ્વતા, પ્રભાવશીલ વકતૃત્વ અને તે સાથે પ્રત્યુત્તમ ચારિત્ર પ્રશંસનીય અને અનુકરણીય છે. જન્મ પંજાબના હોવા છતાં ગરવી ગુર્જરી ભાષા ઉપરનો તેમને કાબુ કોઈને પણ મુગ્ધ કરવા માટે પુરતો છે. પોતાના ગુરુ પૂજ્યપાદ સન્માગોપદે શ્રીમદ્દ અમીવિજયજી મહારાજ પાસેના અભ્યાસ દરમિયાન સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસનને અભ્યાસીઓને માટે મહોપાધ્યાય શ્રી વિનયવિજયજીકૃત હૈમલઘુપ્રક્રિયાની અત્યુપયોગિતા તેમને જણાઈ અને તે સાથે તે પરની સ્વોપણ ટીકા જેવાની તાલાવેલી લાગી. તેની એક પ્રત અણધારી રીતે અમદાવાદના જૈન વિદ્યાશાલાના જ્ઞાનભંડારમાંથી મળી આવવાથી તે પ્રત સંશોધિત કરી પ્રસિદ્ધ કરવાનો વિચાર કર્યો. એ કાર્ય ચાલુ હતું તે દરમિયાન અમારા ભાગ્યોદયે તેઓશ્રીનું મુંબઈમાં જ ચાતુમસ થયું, અને અમારી વિનંતિથી અમારા સ્વર્ગવાસી પિતાશ્રીએ સંગ્રહ કરેલો જ્ઞાનભંડાર જોવા માટે પધાર્યા, અમારા મહૂમ પિતાશ્રીએ પૂજ્યપાદ અમિવિજયજી મહારાજના સદુપદેશથી સભ્યજ્ઞાનના પ્રચારની ભાવનાથી અને એ આશયથી આ જ્ઞાનભંડારનો સંગ્રહ કર્યો છે, અને પોતાના દેહવિલય વખતે કરેલા વીલમાં પણ ટ્રસ્ટીઓને તે જ્ઞાનભંડારની ઉચીત વ્યવસ્થા કરવાનું કામ સોંપી ગયા છે. એ જ્ઞાનભંડારમાંથી મહારાજ સાહેબને હૈમપ્રકાશની સંવત્ ૧૭૪૩ની લખેલી એક શુદ્ધ પ્રત મળી આવી. આ હેમપ્રકાશના અભ્યાસીઓને ઘણું જ ઉપયોગી ગ્રંથ જાણું પૂ ઉપાધ્યાયજી ક્ષમતવિજયજી મહારાજે એ ટીકાઓ સાથેના અપ્રસિદ્ધ હૈમલિંગાનુશાસનને પણ પ્રકટ કરવા પ્રેરણા કરી. એવા અપ્રકટ અમૂલ્ય ગ્રંથોનું પ્રકાશન સમ્યગ્રજ્ઞાનના પ્રચારરૂપ હોઈ અત્યંત ઉપયોગી નિવડશે એવું લાગવાથી ટ્રસ્ટીની સંમતિથી અમે એ ગ્રંથ પણ પ્રકટ કર્યો છે.

આ ગ્રંથના વિઝયમાથી જે કઈ પણ રકમ આવશે તે ઉપર જણાવેલા જ્ઞાનખાતામાં જમા કરવામા આવશે અને વીલની કલમને અનુલક્ષીને સમ્યગ્રજ્ઞાનના પ્રચારમાજ વપરાશે. ગ્રંથપ્રકાશનનું કામ જેટલું દેખાય છે તેટલું સહેલું નથી પુસ્તકના પ્રકાશન માટે હસ્તલિખિત પ્રતે શોધવી અને એ બધીમાથી વિશ્વાસપાત્ર કઈ કઈ છે એ બીજી પ્રતે જે મેળવીને નક્કી કરવું, મૂળ લખાણમા રહી ગયેલી ભૂલો બીજી પ્રતો ને ગ્રથો પરથી સુધારવી, સશયાસ્પદ બાબતમા વાચકોને સરલ થાય તે માટે ટિપ્પણ આપવુ, એ બધામાં પ્રકાશક જેટલો સમય, શક્તિ અને તુલનાત્મક બુદ્ધિ ખર્ચ એટલા ઓછા છે. અને મુદ્રણાલયમાથી આવેલા મુકોના સશોધનનું કામ તો બધા કામોમાં સૌથી વધુ તકલીફ છે જેણે ના કે મોટો કોઈ ગ્રથી એક વખત પણ પ્રકટ કર્યો હોય તેને જ આ બધા પરિશ્રમને ખ્યાલ આવી શકે પ્રકાશકને ઉઠાવવી પડતી આ બધી મુશ્કેલીઓમાથી પરમઉપકારી ઉપાધ્યાય શ્રી ક્ષમા વિજયજી મહારાજે મને ઉગારી લીધો છે, એ માટે હું એમનો જેટલો આભાર માનું એટલો ઓછો છે નાદુરસ્ત તબિયત હોવા છતા પણ એમણે અનેક ગ્રંથોનું મથન કરીને આ વ્યાકરણ જેવો ગૂઢ અને ગહન વિષય અભ્યાસને સરળ અને રસપ્રદ થઈ પડે તેવી રીતે વ્યવસ્થીત કરવામાં અને બારિકીથી પ્રફે તપાસવામાં કેટલી મહેનત લીધી છે એ થના પાઠકને ખબર પડશે જ. આ પ્રકાશનકાર્યમાં જે જે વ્યક્તિઓ પ્રત્યક્ષ અથવા પરોક્ષ રીતે મદદગાર થઈ છે તેઓને પણ હું આભાર માનું છુ અમારા કુટુંબના અનન્ય ઉપકારક અને અનેક આત્માઓને ધર્મમાગે યોજનાર પૂજ્ય ગુરૂદેવ શ્રી અમિવિ- જયજી મહારાજ તથા મારા પૂજ્ય પિતાશ્રીને જીવનપરિચય કરાવી યત્કિંચિત પણ ઋણમુક્ત થવું યોગ્ય ધાર્યું છે અને તે આશયને અનુલક્ષીને ઉપરોક્ત પ્રકાશને પણ તેમના બનિ નામાભિધાનની ગ્રંથમાળાના પ્રારંભના પુષ્પો તરીકે પ્રસિદ્ધ થાય છે આ મહાગ્રંથોની મહત્તા દરેક વાચકને હસ્તમાં લેતાજ સમજાય એ આશયથી ઉપરોક્ત અને અને સક્ષિત પરિચય ટો આપીયે છીએ આસો સુદ સાતમ, વિ સ ૧૯૯૩ હીરાલાલ સોમચંદ परिचय श्रीहैमप्रकाश पूर्वार्द्ध छोटी और वडी टीका से अलंकृत इस ग्रंथरत्नके कर्ता महामहोपाध्याय श्रीविनयविजयजी गणी है. आप श्रेष्ठितेजःपाल की अभ्युदयशालिनी पत्नी श्रीराजश्री के पुत्ररत्न थे. आपनीने महोपाध्याय श्रीकीर्तिविजय महाराज के करकमलों से दीक्षा अंगीकार करके अपने गुरुवर्यके सहोदर और वृद्ध गुरुभ्राता महोपाध्याय श्रीसोमविजयजी महाराज के पास विद्याभ्यास करके अपूर्व योग्यता पाई थी. आप श्रीलोकप्रकाश आदि अनेक बडे, और शांतसुधारसादि अनेक छोटे ग्रंथरत्नोंके रचयिता हैं. इतना ही नही परंतु महाशास्त्र श्रीकल्पसूत्रादि अनेक ग्रंथोंके टीकाकार भी हैं. आप का समय १७ मी १८ मी विक्रम शताब्दीका है. आप न्यायविशारदादि अनेकविरुद्धारक स्वनामधन्य महोपाध्याय श्रीयशोविजयजी महाराज के सहचारी और प्रेमपात्र थे। आपका रचा हुआ यह ग्रंथरत्न, गुर्जरसम्राट् श्रीसिद्धराज-कुमारपालादि अनेकभूपतिप्रतिवोधक, कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्यवर्यकृत, श्रीसिद्धहेमशब्दानुशासननामक महाव्याकरण (जिस को डॉ० एफ् किल्हॉर्न ( Kielhorn) भी "The bert Grammar of Indian middle ages." अर्थात् आर्यावर्त का मध्यकालीन सर्व श्रेष्ठ व्याकरण बताते है ) आदि अनेक व्याकरणो का दोहनरूप है. इसमें सूत्र तो हैम व्याकरण के ही हैं, परंतु टीकाएं तो प्राचीन अर्वाचीन सर्व व्याकरणो के सरल सुबोध सार से भरी पडी हैं. शुद्ध संस्कृत लिखने बोलने की इच्छा वालों को ऐसा सुगम सुबोध विशाल व्याकरण और कहीं भी प्राप्त नहीं हो सकेगा. गीर्वाण भाषा के प्रेमी शीघ्र ही हिन्दुस्तान के सर्वश्रेष्ट निर्णयसागरमुद्रणालय में सुन्दर पत्रों पर अतिसुन्दर अक्षरों से मुद्रित इस व्याकरण को अपनाकर अपने संस्कृत ज्ञान को शुद्ध, समृद्ध बनाने का प्रयत्न करें. मुद्रणालयमें "श्रीहैमलिंगानुशासन विवरण" पूर्व और पश्चिम के विद्वानों में प्रसिद्ध, धन्धूका वासी मोढ ज्ञाति के भूपण चाचिग की पत्नी पाहिनी देवी के कुक्षिरत्न, श्वेतांवराग्रणी श्रीदेवचन्द्रसूरि के शिष्यरत्न, जैनशासन नभोदिवाकर, कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्र सूरीश्वर की यह प्रशंसनीय कृति है. आपने अविद्यान्धकार को दूर करने के लिए जिस महाव्याकरण को रचा, उसी का उत्तम अंश रूप यह ग्रंथ है. मूल तो छंदसंख्या सिर्फ १३९ है. परंतु स्त्रोपज्ञ विवरण और फिर उस पर का वल्लभवाचककृतदुर्गप्रदप्रवोध तो ६००० श्लोक प्रमाण हैं. संस्कृत भाषा की लिंगव्यवस्था जैसी विशाल है, वैसी ही अनेक मतांतरों से युक्त और जटिल भी है. सैंकडो दुर्बोध ग्रंथो को हृदयंगम करके विद्यार्थिगण को उन का विषय सरलतापूर्वक समझाना तो कलिकाल के अल्पमति जीवों पर करुणा के धारण करने वाले कलिकालसर्वज्ञ महर्पिश्रीहेमचन्द्र का ही सिद्धहस्त कर्तव्य है. जो आपने इस ग्रंथ में भी कर दिखाया है. दुर्बोध विद्यार्थिगण और वैद्यवों के लिए उपयुक्त श्रीवल्लभवाचककृत दुर्गपदप्रवोध भी साथ में ही दिया गया है. एक साथ अनेक विपयों को अभ्यास करने के कारण किसी भी विषयमें पूरा समय देने में असमर्थ मॅट्रिक और कालिजों के विद्यार्थि गण, किसी भी शब्द की लिंग की निःसंशय जानकारी के शीव अभिलाषी पंडितगण, मात्र रेफरन्स के लिए अनेक ग्रंथों का उपयोग करने वाले प्रोफेसरगण, और संस्कृत शब्दों के प्रतिरूप प्राचीन लौकिक भाषा के शब्दों के जिज्ञासु भाषा शास्त्रिगण के उपयुक्त अकारादि अनुक्रमणिकाएं भी दी गई है. जो वालविधार्थियों से लेकर महान् विद्वानों तक के लिए असावशक और उपकारक हैं. प्रकाशक BHARI SN. BHAVAN INTRODUCTION LIBR RY. The author of this work having two commentaries (1) big and (2) small, is Mahopādhyāya S'ri Vinaya Vijaya Gani. He is the son of Răjas'rīs wife of the S'resthin Tejahpāla. Mahopādhyāya S'ri Kirtivijaya is his dikşāguru and Mahopādhyāya S'ri Somavijaya a fellow-brother of his dikṣāguru is his Vidyāguru. Vinayavijaya is an author of several works such as Lokaprakās'a, Slāntasudhārasa etc. Over and above he is a commentator of Kalpasūtra etc. He has flourished in the 17th to 18th centuris of Vikrama era. He is a colleague of Mahopădhyāya Yas'ovijaya endojyed with titles such as Nyāyavis'ārada etc., who cherished affection for him. This Haimaprakās'a is an essence of several grammars, chief of them being Siddhahemas'abdānus'āsana composed by Kalikālasarvajña Hemacandra Sūri who gave right instrucsions to Siddharāja and Kumārapāla, the kings of Gujarat and various other rulers. In this grammar these are sŭtras of Siddhahema but the commentaries form a digest of several grammars ancient and modern. It is not possible to come across a grammar simpler and more instructive than this. So students interested in Sanskrit should study this grammar printed at the excellent Nirnaya-sāgar Press on handsome paper. Now we shall say a few words about Haimalingănus'asana which is in press. It forms a part and parcel of Siddhahaima composed by Kalikālasarvajña S'rī Hemacandra Sūri, pupil of S'ri Devacandra Sūri. It comprises 139 verses. This work will be soon published along with the Syopajnavivarana and Durgapadaprabodha of S'ri Vallabhavācaka. In the end it is furnished with alphabe. tical indices very useful to students, one dealing with words in Vernaculars and the other with words noted in the text.

પરિચય શ્રી હેમપ્રકાશ આ ગ્રંથરત, જેને નાની અને મોટી ટીકાથી સુશોભીત કરવામાં આવ્યો છે, તેના કર્તા મહામહોપાધ્યાય શ્રી વિનયવિજયજી ગણી છે. શ્રીમાન શેઠ તેજપાલની સૌભાગ્યશાલિની પત્ની શ્રીમતિ રાજશ્રીના તેઓશ્રી પુત્ર હતા. મહોપાધ્યાય શ્રી કીર્તિવિજયજી મહારાજના વરદ હસ્તે દીક્ષા અંગીકાર કરી તેઓશ્રીએ પોતાના ગુરુદેવના સંસારી- પણાના સગા ભાઈ તેમજ દીક્ષીત અવસ્થાના મોટા ગુસ્સાઈ પાસે વિદ્યાભ્યાસ કરી અપૂર્વ યોગ્યતા પ્રાપ્ત કરી હતી, તેઓશ્રી “લોકપ્રકાશ” આદિ અનેક મહાન ગ્રન્થ તેમજ “શાંતસુધારસ” આદિ અનેક નાના ગ્રંથોના કર્તા છે એટલું જ નહીં પરંતુ મહામગળકારી શ્રીક-પસૂત્ર આદી અનેક ગ્રંશે ઉપર તેઓએ વિદ્વત્તાભરી ટીકા રચી છે. વિકમ યુગની ૧૭ અને ૧૮મી સદીમાં તેઓએ આર્યાવર્તમાં જૈનધર્મની આણ વર્તાવી હતી. ન્યાયવિશારદ આદી અનેક બિરૂદોના ધારક મહોપાધ્યાય શ્રી યશોવિજયજીના તેઓ સહયોગી હતા. પોતાની અદ્ભુત બુદ્ધિપ્રભા અને નિર્મળ ચરિધી તેઓ શ્રીમાને મહોપાધ્યાયજીને ખૂબ પ્રેમ સંપાદન કરી લીધો હતો. આ“હેમપ્રકાશ” ગ્રંથ અનેક વ્યાકરણના દહનરૂપ છે. એમાંથી મુખ્ય આધાર, ગુર્જર સમ્રા શ્રી સિદ્ધ રાજ, કુમારપાલ તેમજ બીજા શાસનકર્તાઓને પ્રતિબોધ પમાડનાર કલિકાલસર્વજ્ઞ શ્રી હેમચંદ્રસૂરીજીકૃત શ્રી “સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસન” (જેને સંસ્કૃત ભાષાના પ્રખર અભ્યાસી અને મહાનવિદ્વાન ડૉ. એફ. કહોને “The best grammar of indian middle ages” તરીકે વર્ણવ્યો છે એમાંથી લેવામાં આવ્યો છે. આ વ્યાકરણગ્રંથમાં સૂવે તો “સિદ્ધહેમ”નાજ લેવામાં આવ્યા છે પરંતુ ટીકાઓ પ્રાચીન તેમજ અવચીન અને વ્યાકરણ ઘોમાથી સારરૂપે બહુજ સરળતાપૂર્વક લેવામાં આવી છે. જેમને સંસ્કૃતભાષાને ઊંડો અભ્યાસ કરવો હોય તેમને માટે આ વ્યાકરણનું પુસ્તક અતિ આવશ્યક અને અનિવાર્ય છે. સંસ્કૃત વ્યાકરણ જેવા ગહન વિષયમાં આવું સરળ અને ઉત્તમ પુસ્તક બીજે ક્યાંય મળવું દુર્લભ છે. ગીર્વાણભાષાના પ્રેમીઓ અને ખાસ કરી વિદ્યાર્થીઓને નિર્ણય- સાગર પ્રેસમાં સુંદર કાગળ ઉપર સુંદર અક્ષરોમાં છપાયેલા આ બહુમૂલ્ય વ્યાકરણગ્રંથનો અભ્યાસ કરવાની અને ખાસ ભલામણ કરીએ છીએ. શ્રી હમલિંગાનુશાસન આ સ્થળે અમો “હેમલિંગાનુશાસન” જે અત્યારે પ્રેસમાં છપાય છે તેના વિશે બે શબ્દો કહેવાની ઇચ્છાને રોકી શક્તા નથી. શ્રી દેવચંદ્રસૂરીજીના પ્રખર વિદ્વાન શિષ્ય કલિકાલસર્વજ્ઞ શ્રી હેમચંદ્રસૂરીને રચેલો “સિદ્ધ- તેમના ઉત્તમ અશરૂપે તે એક ભાગ બને છે. એમાં મૂળ ફક્ત ૧૩૯ોકો છે કે “સ્વપજ્ઞવિવરણ” અને બી વવભવાચકના “દુર્ગાદપ્રબોધ"મા ૬૦૦૦ શ્લોકોનું પ્રમાણ છે. સંસ્કૃતભાષાની લિંગવ્યવસ્થા જેટલી વિશાળ છે તેટલી તે મતમતાંતરોથી ભરચક છે. એટલે અલ્પબુદ્ધિ છે અને વિદ્યાર્થીઓને તે બહુજ સુગમતાથી -પને સરળતાથી સમજાય તે માટે કલિકાલસર્વજ્ઞ શ્રી હેમચંદ્રસૂરીએ સેંકડો કઠિન ગ્રંથોમાંથી સાર ઉદધૃત કરીને અદ્દભુત ચ ો છે આ ગ્રંથને “સ્વપજ્ઞવિવરણ” અને શ્રી વઘભવાચકના “દુર્ગપદપ્રબોધ” સાથેજ પ્રમોટ કરવામાં અાવશે. મેક અને કોલેજના વિદ્યાથીઓ, કે જેઓને એક માથે અનેક વિષયોને અભ્યાસ કરવાનું હોય છે અને તેથી જે અમુક એકજ વિષયનો ઉો અભ્યાસ કરવા માટે પુરતો સમય ફાજલ પાડી શક્તા નથી, તેઓને બહુ કુંક સમયમાં આવનાર છે અભ્યાસ કરવા માટે આ ગ્રંથ અમૂલ્ય છે. ઉપરાંત સંસ્કૃત પડિતો અને મને “રરસ" માટે બહુ ઉપયોગી થઈ પડશે. કોઈપ લાબત જોવા માટે બહુજ સરળ મઈપડે તે કરે છેવટે થાકાર અનુમવિક પ ાપવામાં આવી છે.

सादर समर्पण,
ए
SELECTESTORE
विश्वहित-घोधिदायक-गुरुवर्य-श्रीअमीविजयपादाः
पूज्यनी! आपनेही मेरे को गृहस्थावस्था में महामंत्र-श्रीपंचपरमेष्ठि-नमस्कारमत्र का
जापक बनाकर उदयवंत किया. गृहस्थावस्था में मी जैन स्याद्वादशैली से वंचित न रहूं
इस लिए पैंतीस बोलका थोकडा उर्दू मे सिखाया. आपनेही मेरे आत्महितचिंतक
घन कर उपमितिभवप्रपचाकथा का हिन्दी रूपांतर वांचने के लिए मेरे
को उद्यत किया. आपनेही मेरी पालिका मातामही की सेवा करनी मेरे
को सिखाई. सुरुचिपूर्वक तैयार करके दीक्षित मी आपनेही क्रिया.
मिथ्यामति पण्डितो को न सौप कर शुद्ध शिक्षित भी आपनेही
बनाया. सकल विद्यामें प्रवेश करने के लिए कलिकालसर्वज्ञ
श्रीहेमचन्द्रसूरीश्वर को शरण्य स्वीकारना आपनेही
सिखाया महोपाध्याय श्रीविनयविजयजी महाराज
आदि महापुरुषो के प्रति सुरुचि आपनेही
प्रयत्नपूर्वक मेरे हृदय मे उत्पन्न करी इत्यादि
अगणित उपकारों के भार से दबे
हुए, आप ही
के
शुभ
किंचिज्ज्ञ बने हुए इस सेवक
के इस प्रारंभिक प्रयत्न
को दिव्य दृष्टि बरसाते
हुए स्वीकार करने
की कृपा कीजिए,
प्रयत्नों द्वारा
चरणसेवक
उपाध्याय क्षमाविजय गणी.
---

सादर समर्पण
REEEEE
frrfari-गुरुवर्य-श्रीजनोविजयपादाः
! मेरो गालामा में महामंत्र-श्रीपंचपरमेष्ठि-नमस्कारमय का
बारामप्रिया. गृहमारसा में भी जैन साद्वादशैली से वंचित न रहूं
इसलिए पैतीग योटमा धोका उर्दू में सिरााया. आपनेही मेरे आन्महितचिंतक
पर कर पमितिभवप्रपंचास्था का दिन्दी रूपांतर वाचन लिए मेरे
पोलिसागरतीरी प.मि पानी मेरे
fim गुरनिगर."
- पी पिया.
नियामी
परमदित भी नापनेही
मनात मा विद्या प्रवेशाने मालिकालसर्वन
श्रीहेगनन्द्रसूरीश्वर पो र मीरा अपनी
मिसाया. महोपर मीविनयविनी महागा
नादि महायो : ी गानि आपनेही
प्राक मेरे हाय -
पापयादि
'गनिन पगरों, .
गुप, आपरेशम द्वारा
मिस नेग म मतप
पर पारभिर प्रया
गेदिप am
+-+----
" मीरा
है
::..
गिणी.
-

ન્યાયાનિધિ શ્રીમદ્ વિજ્યાનંદસૂરિશ્વરના શિષ્યરત્ન શ્રીમચારિત્રવિજ્યજી
વિયરત્ન સમર્થ વક્તા શાસનપ્રભાવક શ્રીઅમીવિજ્યજી મહારાજ.
MUNIMAHARAJ SHREE AMIVIJAYAJI MAHARAJ
मुनिमहाराज थी अमीविजयजी महाराज
Kયા.
જન્મ-વિ. સં. ૧૯૨૯
શ્રાવણ વદી ૧૨
ચાણોદ (મારવાડ)
વતી દીક્ષા–વિ. સં. ૧૯૫૧
મહા સુદી ૫
પાલીતાણા કાઠીયાવાડ )
દીક્ષા-વિ. સં. ૧૯૫૦
જેઠ વદી ૧૩
જામનગર (કાઠીયાવાડ)
સ્વર્ગવાસ-વિ. સં. ૧૯૮૭
શ્રાવણ વદ ૪
પાલી (મારવાડ)

પ્રખરતા શાસનપ્રભાવક મુનિ મહારાજ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ આ હૈમપ્રકાશ મહાવ્યાકરણ પુસ્તકના સંપાદક ઉપાધ્યાયજી શ્રીક્ષાવિજયજી મહારાજના ગુરૂવર્ય શાંતમૂર્તિ શ્રીઅમિવિજયજી મહારાજ હતા. એ પ્રભાવક ગુરૂના પ્રતાપે તેમની પાસે વષોસુધી રહીને ઉપાધ્યાયજી મહારાજ શ્રીક્ષાવિજયજી મહારાજે અનેક જૈન શાસ્ત્રોનો અભ્યાસ કર્યો હતો પણ તેઓ સ્વભાવે શાંત અને આત્મભાવમાં મસ્ત રહેતા હતા તેથી તેમના પરિચયમાં આવનાર ચોક્કસ વર્ગ શિવાય બીજાઓ તેમના વિષે બહુ થોડું જાણે છે. એ કારણથી સમસ્ત શ્રદ્ધાળુ વર્ગની જાણ માટે એ ગુરુવર્યનું ટુંક જીવનચરિત્ર અત્રે અપાય છે. જન્મ-દેશ-બાયાવસ્થા મુનિ મહારાજ શ્રીઅમિવિજયજી મહારાજનો જન્મ મરૂભૂમિ–મારવાડમાં, મુંબઈમાં ધીરધારનો ધંધો કરનાર વિસા ઓસવાલ શ્રાવક શ્રેણી શ્રીધરાજજીને ત્યાં ચાણોદ નામના ગામમાં સંવત ૧૯ ના શ્રાવણ વદ ૧૧ ની રાત્રે થયો હતો. ચાણદ ગામ જોધપુર રાજ્યના ભાયાત્ ઠાકોરનું ગામ છે. તેમાં આશરે શ્રાવકોના ૨૦૦-૨૫૦ ઘર છે. તેમાં મોટી નીશાળ નથી. નાની ગામઠી નિશાળ છે. એ ગામ રાણી સ્ટેશનથી સાત ગાઉ દૂર આવેલું છે. એ ગામમાં ગાડામાં બેસી જવું પડે છે શ્રી અમિવિજયજીનું જન્મ નામ “અચલદાસ” હતું. તેમના પિતાનું નામ લેધરાજજી હતું. તેમની માતાજીનું નામ નવલબાઈ હતું. તેમના બહેનનું નામ શૃંગારબહેન હતું. તેમના મોટાભાઈનું નામ સેસમલજી હતું. કુટુંબ સુખી હતું અને મુંબઈમાં પિતાજીની ધીરધારની દુકાન હતી. જન્મ બાદ પાંચ છ વર્ષની ઉમરે અલદાસ ગામની નીશાળમાં ભણવા બેઠો. એ ગામઠી નિશાળના મેહતાજી આંખે અપંગ છતાં ગામના બાળકોને પાટી ઉપર ધુળ નાંખીને લખતાં વાંચતાં શીખવતા. અલદાસ એ ગુરૂ- પાસે નવ વર્ષની ઉમર સુધી રહ્યો અને વાંચતાં લખતાં શીખ્યો. તે ગુરુનું બહુમાન કરતો, તેના કામકાજ કરીને તેનો પ્રેમ જીતતો અને જેટલું મળે તેટલું જ્ઞાન મેળવવા પ્રયાસ કરતો. એ છતાં અચલદાસ આ બાળ ઉમરે તોફાની બહુ હતો એમ પણ જણાય છે. તે છોકરાઓ સાથે મારામારી કરતો–છાપરે છાપરે છોકરાઓને દોડાવતો અને કેટલીક વખત પોતાની માતાની શિક્ષાથી બચવા તે નાશી પણ જતો- માતા નવલબાઈને જણાયું કે આ બચ્ચું તોફાની છતાં ચંચલ છે અને કોઈથી હારીને પાછો આવે એવો નથી. એને જે મુંબઈમોલાય તો તે વધુ જ્ઞાન મેળવી શકે અને પોતાના પિતાની સાથે દુકાનમાં રહી ધંધાનું જ્ઞાન પણ મેળવી શકે. આ આશાથી માતાએ એ બાળકને મુંબઈમોકલવા નકકી કર્યું મુંબઈમાં, અચલદાસને વેપારી બનાવવા માતા નવલબાઈએ માત્ર દસ વરસની ઉમરે શ્રીધરાજજી સાથે મુંબઈમોકલ્યો. એ બાળક માત્ર દસ વર્ષની ઉમરે મુંબઈ આવવાં છતાં, તેને જૈનધર્મનું જ્ઞાન મેળવવા તાલાવેલી થઈ. નળબજારની શરાફી દુકાન પરથી દરરોજ પાયધુણી ઉપર આવેલી શ્રી શાંતિનાથજી મહા- રાજના દેરાસર પાછળ આવેલી વિદ્યાશાળામાં અચલદાસ શિખવા જતો. એ વિદ્યાશાળામાં તે વખતે એક બ્રાહ્મણ પંડિત નામે શ્રીપ્રજારામ બાળકોને જૈન ધર્મનું પ્રાથમિક જ્ઞાન આપતાં હતાં. પંડિતજીનો સ્વભાવ સરલ હતો. અચલદાસ એ પંડિત પાસે પાંચપ્રતિકમણ શિખ્યો. ચૌદ વર્ષની ઉમ્મરે તેણે જૈન ધર્મના પ્રખ્યાત આચાર્ય શ્રી વિજયાનંદસૂરિજીના કેટલાક ગ્રંથો વાંચ્યા અને કેટલીક વખત શ્રી શાંતિનાથજી મહા- રાજના ઉપાશ્રયમાં બિરાજતા યતિ શ્રીસાનચંદજી મહારાજના વ્યાખ્યાન પણ સાંભળ્યા, મદ્રાસમાં, આ રીતે અચલદાસ ૧૪-૧૫ વર્ષની ઉમ્મરનો થયો અને શરાકી ધંધાનો અનુભવ પણ મેળવ્યો. તેની હોંશિયારી જોઈને તેના પિતાશ્રી જયરાજજીએ સંવત ૧૯૪૪ માં તેને ખાતે મદ્રાસ દુકાનના કામ- ૨ કાજ માટે મોકલ્યો. ત્યાં તેણે દેવકીજીના છ પુત્રોનો રાસ વાંચવામાં આવતાં વૈરાગ્યની પ્રબળ ભાવના થઈ અને આ અસાર સંસારમાં આત્મસાધના કરવા ઈચ્છા થઈ. આ વૈરાગ્ય ભાવના, રાસ વાંચવાથી અને વિજયાનંદસૂરિકૃત ગ્રંથ મનન કરવાથી થઈ હતી. એ વખતે મદ્રાસમાં તેમજ મુંબઈમાં સાધુઓનું આગ- મન થયું ન હતું. વળી મુનિરાજોની સંખ્યા આખા દેશમાં પણ બહુ થોડી હતી. ગામે ગામ એ વખતે ચતિઓ સ્થિરતા કરતાં અને શ્રાવકો તેમને પર્યુષણ પર્વ વખતે અમુક નાણાની રકમ આપીને પર્યુષણ ઉજવતાં–તે છતાં માત્ર રાસ વાંચવાથી, મુનિરાજના પરિચય વગર શ્રી અચલદાસને વૈરાગ્ય ઉત્પન્ન થયો એ બિના ભાવિ કેટલું બળવાન છે, તેજ દેખાડે છે. પંજાબમાં, માત્ર સોળ વર્ષની વયે શ્રીઅચલદાસને વૈરાગ્ય ભાવના ઉપજી અને તે મદ્રાસથી મુંબઈ આવ્યો. તેણે મુંબઈને ગ્રાન્ટ રોડના સ્ટેશન પરથી બારોબાર પંજાબના “માલર કોટલા” જવાનો નિશ્ચય કર્યો અને પોતાના પિતાને ખબર આપ્યા વગર તે માલર કોટલા જવા નિકળ્યો. એ શહેરમાં તે વખતે આચાર્ય દેવ શ્રીવિયાનંદ સૂરિજી બીરાજતા હતા. તેઓએ અચલદાસની ઈચ્છા જાણ્યા બાદ ધર્મને વધુ અભ્યાસ કરવા તેને સલાહ આપી અને મુંબઈમાં તેના પિતાશ્રીને અચલદાસ માલેર કોટલા આવેલ હતો, તેની અબર આપી. આથી શ્રીધરાજજી અચલદાસને લેવા માલર કોટલા ગયા અને તેને સમજાવીને મુંબઈ પાછા લાવ્યા. પણ અચલદાસને શરાફી ધંધો ન રૂ. બીજી વખત તક મળતાં તે ફરીથી પંજાબ ગયો અને એક વધુ વખત તેના પિતાશ્રી તેને પાછો લાવ્યા. આ વખતે અચલદાસને ચાણોદ લઈ જવામાં આવ્યો. જ્યાં તે અઢાર વર્ષની ઉમર થતાં તેની નાની બેન વિધવા થઈ. બહેનનું દુખ અને વૈધવ્ય જોઈઅચલદાસને એ ભાવના થઈ કે બહેનને ધર્મનું જ્ઞાન આપવું અને તે ધર્મનું જ્ઞાન પ્રાપ્ત કરે તે બાદ બહેનને સાધ્વી દિક્ષા અપાવી, અને પોતે પણ મુનિ દિક્ષા લેવી. આ ઈચ્છા પાર પાડવા તેણે પોતાની હેનને સતત ધર્માભ્યાસ કરાવવા માંડ્યો અને પોતાની વીસ વર્ષની ઉમર થતાં સુધી તેમને ધર્માભ્યાસ કરાવ્યો. એ પછી તે સાધુ દીક્ષા લેવા તૈયાર થયો. તેણે એ સમયે શ્રી સમેત શિખરની જાત્રા કરી અને શ્રીમદ વિજયાનંદસૂરિજીને ખબર આપી કે હવે તો તે કોઈ પણ રીતે મુનિદીક્ષા લેવા માગે છે. જામનગરમાં મુનિદીક્ષા, શ્રીમદ્ વિજ્યાનંદસૂરીશ્વરજીએ ત્યારે હુંક મત છોડી શુદ્ધ જૈનધર્મમાં સંવેગી સાધુ દીક્ષા લીધી, ત્યારે તેમની સાથે સોળ મુનિરાજે હતાં, જેઓ પણ ઢંઢક મત શુદ્ધ ચરિત્રવાન બની શ્રીમવિજ- યાનંદસૂરીશ્વરજી સાથે સામેલ હતા. એ મુનિરાજોમાંના એકનું નામ હુંક મતમાં તેઓ હતા ત્યારે સલામત રાયજી હતું. તેઓએ સંગીદીક્ષા લીધા બાદ તેમનું નામ શ્રી ચારિત્રવિજયજી મહારાજ રાખ- વામાં આવ્યું હતું. એ મુનિરાજ તે વખતે જામનગરમાં હતાં. શ્રીમદ્ વિજ્યાનંદસૂરીજીએ અચલદાસના પત્રના જવાબમાં જરૂાવ્યું કે જે તે સાધુ દીક્ષા લેવા માંગતો હોય તો તેણે જામનગર જઈને શ્રીચારિત્ર વિજયજી પાસે દીક્ષા લેવી. એ વખતે શ્રીચારિત્રવિજયજી મહારાજને એક શિષ્ય હતા અને તેમનું નામ શ્રી કલ્યાણ વિજયજી હતું. શ્રીઅચલદાસ ઉપલો જવાબ મળતાં માત પિતાની આજ્ઞા લઈ જામનગર ગયા અને ગુરુ મહારાજને દીક્ષા આપવા વિનંતિ કરી. એ વખતે કેટલાક દંઢક મતાનુયાયીઓએ નામદાર જામ સાહેબને ખબર આપી કે એક જુવાન શ્રાવક દીક્ષા લેવા જામનગર આવેલ છે અને તેને શ્રીચારિત્રવિજ- યજી મુનિદીક્ષા આપનાર છે. નામદાર જામસાહેબે આથી અચલદાસને બોલાવ્યા અને તેમને શા કારણથી દી લેવા ઇચ્છા થઈ હતી તે વિષે સવાલો પૂછ્યા. આ સવાલોના જવાબ યોગ્ય માલમ પડતાં નામદાર કમ સાહેબે તેમને દીક્ષા લેવા રજા આપી અને દીક્ષા અગાઉના વરઘોડા માટે રાજ્યના નિશાન, , હથ, સોનાની અંબાડી, સિપાઈઓની પલટણ વિગેરે આપ્યા. આ પછી અચલદાસે ૧૯૫૦ ના જેઠ વદ ૧૩ ને દિ મુનિરાજ શ્રી ચારિત્રવિજ્યજી પાસે જૈન સાધુ દીક્ષા લીધી અને તેમનું નામ શ્રી અમિવિજયજી રાખવામાં આવ્યું. છોડી મુનિરાજ શ્રી અનિવિજયજી. મુનિરાજ શ્રીઆમિવિજયજી મહારાજે ૧૫૦ નું ચોમાસુ જામનગરમાં કર્યું અને ધર્માભ્યાસ સાથે વ્યાકરણનો અભ્યાસ ચાલુ કર્યો. તેઓએ જામનગરમાં એક બ્રાહ્મણ પંડિતને ત્યાં જઈ ચંદ્રપ્રભાવ્યાકરણ શીખવા માંડ્યું અને તે બાદ મુનિરાજશ્રી કલ્યાણવિજ્યજીએ પણ અભ્યાસમાં તેમને મદદ આપવા માંડી. સંવત ૧૯૫૧ માં તેઓ શ્રીસિદ્ધાચલજીની યાત્રાએ પધાર્યા અને ત્યાં વડિ દીક્ષા માટે જોગ વહ્યા. પાલીતાણામાં શ્રીમદ્ બુટેરાયજી મહારાજના શિષ્ય અને શ્રીમદ્ વિજયાનંદ સૂરીશ્વરજીના ગુરુભાઈ પન્યા- સજી મહારાજ શ્રીઆણંદ વિજયજી મહારાજ પાસે તેઓએ ૧૫૧ ના મહાશુદિ પાંચમના દિને વડી દીક્ષા ગ્રહણ કરી. આ પછી તેઓએ શ્રીસિદ્ધાચલજીની યાત્રાઓ કર્યા બાદ વિહાર કર્યો અને સંવત ૧૫૧ માં મોરબીમાં ચાતુર્માસ કર્યું. એ બધો વખત તેમને વ્યાકરણને અભ્યાસ ચાલુ હતો. અભ્યાસ દરમિયાન ચાતુર્માસ. સંવત્ ૧લ્પર માં જામનગરમાં, સંવત્ ૧૫૩ માં ધ્રોળમાં અને સંવત ૧૯૫૪માં મહેસાણા મુનિરાજ શ્રીઅમિવિજ્યજીએ ચાતુર્માસ કર્યો. એ વખતે તેમનો અભ્યાસ ચાલુજ હતો. મહેસાણામાં અભ્યાસ માટેની વધુ અનુકૂળતા જણાતા તેઓએ વ્યાકરણ, કાવ્ય વિગેરેનો અભ્યાસ આગળ વધાર્યો અને સંવત ૧૯૫૫માં અને સંવત ૧લ્પ૬ માં પણ મહેસાણામાંજ ચાતુર્માસ કર્યો અને વ્યાકરણ અને કાવ્યનો અભ્યાસ સંપૂર્ણ કર્યો. સાદડીમાં કન્યાશાળા, આ પછી તેઓએ વિહાર કરવા માંડ્યો અને સંવત ૧૯૫૭ માં સાદડી–મારવાડમાં ચોમાસુ કર્યું. ત્યાં તેઓના ઉપદેશથી આખા મારવાડમાં પહેલી કન્યાશાળાની સ્થાપના થઈ અને તેમાં મારવાડની જૈન બાઈઓએ અને કન્યાઓએ ધર્માભ્યાસ કરવા માંડ્યો. એ પછી છોકરાઓને શિખવવા માટે પાઠશાળાની પણ સ્થાપના થઈ. સાદડીથી રાણકપુરની જાત્રા કરીને મુનિરાજ શ્રી કેશરિયાજીની જાત્રાએ ગયા હતા, જે વખતે સાદડીના ઘણા શ્રાવકો તેમની સાથે ગયા હતા. આ વર્ષમાં મુનિરાજના સંસારી બહેને સાદેવીશ્રી તિલક શ્રી પાસે દીક્ષા લીધી અને તેમનું નામ જડાવશ્રી રાખવામાં આવ્યું રતલામમાં પાઠશાળા, મુનિરાજે મારવાડમાં જોયું કે સર્વત્ર અજ્ઞાન છે. પુરૂષો માત્ર કામ પુરતું નામું શીખે છે અને હિસાબનું જ્ઞાન મેળવે છે. કન્યાઓ અને સ્ત્રિઓ તો એવી દશામાં છે કે જે પશુ જેવીજ ગણાય. આ સ્થિતિ તેમણે પોતે પણ અનુભવી હતી. પોતાની બહેન વિધવા થતાં તે બહેનને ધર્માભ્યાસ કરવાથી કેટલો બધો લાભ થયો તે તેઓએ પોતે જોયું હતું. આ કારણથી પોતે સાત વર્ષોના સતત અભ્યાસ બાદ સાદડી પધાર્યા ત્યારે તેઓએ કન્યાઓ અને સ્ત્રિઓ માટે શાળા સ્થાપવા ઉપદેશ આપ્યો અને તેનું ફળ સારું આવ્યું તે તેઓએ નજરે જોયું. સાદડીથી વિહાર કરતાં સંવત ૧૫૮ માં તેઓ રતલામ પહોંચ્યા અને ત્યાં પણ તેઓએ જ્ઞાનાભ્યાસ અને ધર્માભ્યાસ કરવા માટે ઉપદેશ આપ્યો. પરિણામે રતલામમાં એક પાઠશાળા સ્થપાઈ રતલામમાં તેઓ હતાં ત્યારે તેમને જૈન ધર્મ સારી રીતે સમજવા માટે અને સ્વાવાદ શિલી સમજવા માટે ન્યાયશાસ્ત્રનો અભ્યાસ કરવાની જરૂર જણાઈ કાશી-બનારસમાં ન્યાયશાસ્ત્રનો અભ્યાસ, આ વિચાર આવતાં જ તેઓએ કાશી-બનારસ-તરફ સંવત્ ૧લ્મમાં વિદ્યાર કર્યો. તેઓએ સંવત ૧૯૫૯, સંવત્ ૧૯૬૦ અને સંવત્ ૧૯૬૧ માં પોતાનો અભ્યાસ કાશીમાંજ વધાર્યો અને તેમનો ન્યાય શાસ્ત્રને અભ્યાસ એટલો બધો પરિપકવ થયો કે ઘણા વિદ્યાર્થીઓ તેમની પાસે ન્યાયને અભ્યાસ કરવા આવવા લાગ્યા. તેઓએ તેમને પણ એ અભ્યાસ બહુ સારી રીતે કરાવ્યો અને એ લાભ લેનાર ઘણા ભાઈઓ હજી પણ તેમને મળેલા લાભ માટે મુનિરાજ શ્રી અગ્નિવિજયજીને યાદ કરે છે. આ દેશમાં શ્રીમદ્ અમિવિજયજી મહારાજ પોતાના ગુરૂદેવની આજ્ઞાથી રહ્યા હતા એમ જપાવવાની જરૂર છે. એ પછી તેઓ સંવત ૧૯૯ર માં વિહાર કરી માળવામાં વડનગરમાં પધાર્યા અને ત્યાં ચતુરા કર્યા બદ્ધ રતલામની વિનતિ આવતાં સંવત ૧૯૬૩ માં રતલામમાં પધાર્યા.

આચાર્ય દેવશ્રી વિજયકમેળસૂરિજી સાથે, મુનિરાજશ્રી અમિવિજયજી મહારાજનો ઉપકાર મારવાડ અને માળવા દેશો ઉપર મોટો હતો, તે ઉપર આપેલી વિગતો ઉપરથી જણાશે. પણ તેમને બહુ મોટો ઉપકાર તો પંજાબના શ્રાવકો ઉપર હતો. તેમના ગુરૂવર્યશ્રી ચારિત્રવિજયજી મહારાજ સાથે પંજાબમાં હતાં. સંવત્ ૧૯૬૪ માં આચાર્ય શિરોમણી શ્રીવિજય કમળ સૂરીશ્વરજી આચાર્યસમ્રાટ શ્રીમદ વિજ્યાનંદ સૂરીશ્વરજીના અનન્ય પટ્ટધર બંગાલ - માંથી વિહાર કરતાં, પજાબ નિવાસિ જૈન જનતાની વિનંતિથી પંજાબ તરફ વિચરી રહ્યાં હતાં. તેઓ શ્રીને લેવાને કેટલાક ગાઉ સુધી ઘણુ પજાબી જૈનો આગલ ગયાં હતાં. અને તેમનો પ્રવેશ પ્રથમ અબાલામાં થનાર હતો. એ વિહાર ચાલતો હતો ત્યારે સંવત્ ૧૯૬૩ નું ચાતુર્માસ પૂરું થતાં સંવત્ ૧૯૬૪ ની શરૂઆત બાદ કેટલાક દિવસો પછી શ્રી અમિવિજયજી મહારાજે પોતાના ગુરુવર્યની સેવા અર્થે પોતાનો વિહાર રતલામથી પંજાબ તરફ લખાવ્યો. એ વખતે શ્રીમદ વિજયકમળસૂરીશ્વર અંબાલા શહેરમાં પધારી ચૂકયા હતા અને તેમની સાથે શ્રીમદ્દલમ્બિવિજયજી મહારાજ, શ્રીમદ્દ વિરવિજયજી મહારાજ આદિ બહોલો મુનિસમુદાય હતો. આચાર્યદેવને અંબાલાની જૈન જનતાએ આખા શહેરને ધ્વજા પતાકા અને તોરણોથી શૃંગારી જેવું માન આપ્યું હતું, તેવું માન બીજા થોડાક મુનિરાજેને આપ્યું હશે. અનેક પ્રકારના વાદ્ય- વાજીંત્રો–અને મંડળીઓથી સુશોભિત સરઘસ કાઢી એ સૂરીશ્વરને અંબાલામાં જ્યારે જૈન જનતાએ પ્રવેશ કરાવ્યો ત્યારે અન્યદર્શનીઓ પણ ગુરૂસેવા જોઈને આશ્ચર્ય ચકિત થયા હતા. એ વખતે રતલામથી વિહાર કરીને શ્રીઅનિવિજયજી મહારાજ, આચાર્ય દેવ શ્રીવિજયકમળસૂરીશ્વરજીના બહોલા મુનિસમુદાય સાથે જોડાયા અને મેકરી પોતાના ગુરુવર્ય શ્રી ચારિત્રવિજયજીને મળ્યા. શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ સાથે એ વખતે બીજા આઠ મુનિઓ હતા. શ્રીવિજયકમળ સૂરીશ્વરજી મહારાજે અબાલામાં કેટલોક વખત સ્થિરતા કરીને અનેક જીવોને ધર્મ દેશના આપી ધર્મમા સ્થિરતા કરાવી. એ શહેરમાં વીસેક દિવસ ધર્મોપદેશ સંભળાવ્યા બાદ તેઓશ્રી બધા પરિવાર સાથે આસપાસના ગામોમાં વિચરતાં વિચરતાં લુધિ- આના પધાર્યા. એ શહેરમાં પંદરેક દિવસ ધર્મદેશના સંભળાવવામાં આવી. તે પછી બધા ફિલોર, ફગ- વાડા આદિ ગામોમાં વિચરી જલંધર, અમૃતસર, લાહોર આદિ-શહેરોમાં પધાર્યા અને ત્યાંની જનતાએ તેમનું બાદશાહી સ્વાગત કર્યું. એ પછી ગુજરાનવાળાની જૈન જનતાએ આચાર્ય દેવને વિનતી મોકલી કે તેઓશ્રીએ આચાર્ય સમ્રાટ શ્રીવિયાનંદ સૂરીશ્વરજીના પાકમળની પ્રતિષ્ઠા કરવા ગુજરાનવાળા પધારવા કૃપા કરવી અને ધર્મોપદેશ સંભળાવી જનતાની તરસ છીપાવવી. આચાર્યદેવ આથી ગુજરાનવાળા તરફ બધા સમુદાય સાથે પધાર્યા. ઉપલા બધા ગામોમાં વિહાર દરમિયાન તેમને સનાતની, આર્યસમાજીસ્ટ અને ટુંકો ઘણી વખત મળવા આવતા હતા અને મૂર્તિપૂજાવિવેદવિષે, પૂરાણોવિશે અનેક પ્રશ્નો પૂછતાં હતાં. એ પ્રશ્નોતર થતાં હતાં ત્યારે આચાર્ય દેવને માલમ પડ્યું કે ન્યાય અને વ્યાકરણમાં શ્રીઅર્મિવિજયજી મહારાજ પ્રવિણ હતાં અને તેઓ શાસ્ત્રના પ્રશ્નોનું નિરાકરણ સારી રિતે કરી શકતા હતા. આથી જ્યારે ઉપર જાવ્યા પ્રમાણેના અન્ય દર્શનીઓ આવતા હતાં ત્યારે આચાર્યદેવ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજને કેટલીક વખત શંકા સમાધાન કરવાનું કામ સોંપતા અને તેઓ તે સારી રિતે કરતાં. શ્રી અશાન તિમિર ભાસ્કર અને સનાતનિઓ, પંજાબના પાટનગર જેવું જૈન પૂરિ ગણાતું ગુજરાનવાળા શહેર એ વખતે મુનિર જેની મોટી સંખ્યાથી હલમળી રહ્યું હતું અને પુજ્ય આચાર્ય સમ્રાટ શ્રીમદ વિજયાનંદસૂરીશ્વરજીની સમાવિની પ્રતિeણ થવાની હોવાથી આખા પંજાબને જેને માનવ સમુદાય ગુજરાનવાળામાં સંવત ૧૯૬૪ ના વૈશાખ મામમાં મોત્સવ ઉજવવા ગયો હતો. એ વખતે પજાબ પરત મારવાડ, મહારાષ્ટ્ર, ગુજરાત, બંગાલ, મળવા આદિ રોમાંથી પણ સંકશે શ્રીમંત પ્રતિષ્ઠા મહોત્સવમાં ભાગ લેવા પધાર્યા હતા. હમેંશા સાધ- પિંક ભવ્ય, ઉત્તમ પ્રભાવના અને પૂજા અને ભાવનાનો દોર ચાલુ હતો. વૈશાખ સુદ ૬ના દિવસે ૧ મહારાજનો પબના વિહારાદિ સન્ની વૃત્તાન્ત લુધિયાને (પજાબ) નિવાસી લાલા સિબૂમલના પુત્ર . એ પૂરો પાડે છે. તેમનો એક પત્ર પા આ વાન્તને છેડે આપવામાં આવેલ છે.

આર્ય દેવની પાદુકાની પ્રતિષ્ઠા આચાર્યશ્રી વિજયકમળસૂરીશ્વરજીએ હજાર જેનો અને જેનેતોની હાજરીમાં કરી. આ અપૂર્વ મહોત્સવ ઈ ગુજરાનવાળાના અને પંજાબના બીજા ભાગના ઢંઢને દુખ થયું અને આચાર્ય દેવનું અહિત કરવા એક માર્ગ શોધી કાઢયો. પૂજ્ય આચાર્યદેવશ્રીવિજ્યાનંદસુરીશ્વરજીએ રચેલા અને વેદિમાં હિંસા દર્શાવતાં પુસ્તકો શ્રીઅજ્ઞાનતિમિર ભાસ્કર અને જનતત્વદર્શ તરફ ઢંઢકોએ સનાતનિઓનું ધ્યાન ખેંચ્યું અને જણાવ્યું કે વેદની નિંદા કરનાર શ્રીવિયાનંદસૂરિજીના શ્રીવિજ્યકમળ સૂરીશ્વરજી પટ્ટધર હોવાથી તેમની પાસે તેનો ખુલાસે માગે. આ સ્થિતિ સમજાતાં સનાતનિઓ એ શ્રીવિજ્યકમળસૂરીશ્વરજીને ચેલજ મોકલી કે શ્રી અજ્ઞાનતિમિરભાસ્કરમાં અને શ્રી જૈનતસ્વાદમાં જે શ્લોકો વેદમાં હિંસા દર્શાવનાર પૂરાવારૂપે રજુ કરવામાં આવ્યાં હતાં તે પાઠો પૂરવાર કરવા તેઓએ તૈિયાર થવું અને તે પુરવાર કરી આપવા. શ્રીમદ વિજ્યાનંદસૂરીશ્વરજીએ ઉપલા પુસ્તકોમાં વેદના પાઠો રજુ કરીને એ બિના સાબિત કરી હતી કે વેદમાં પશુય કરવાનું અને શ્રદ્ધની ક્રિયામાં પશુમાંસ ખાવાનું વિધાન છે. સ્થિતિ એટલી બધી વિફરી હતી કે સનાતનીઓએ આચાર્યદેવ ઉપર કાયદાસર ઉપાયો ચોજી ઉપલા વિધાન પૂરવાર કરવા પગલાં ભર્યા અને ગુજરાનવાલાના જજ સરદાર જવાલા સહાય મિશ્ર સમક્ષ એ બાબતની તપાસ શરૂ થઈ. આ વખતે આચાર્ય દેવે કમાલ કરી. તેઓએ વેદના અનેક પુસ્તકો મેળવ્યા અને અજ્ઞાનતિમિર ભાસ્કરમાં અને જૈનતત્યાદીમાં આપેલા પાઠો સાથે એ પુસ્તકોના પાઠો સરખાવ્યા. ત્યાર બાદ તેઓશ્રીએ એ સર્વે પાઠો સમાવવા શ્રી અનિવિજ્યજી મહારાજને જજ સરદાર જવાલાસહાય મિશ સમક્ષ મોકલ્યા. સરદાર સાહેબ પોતે સંસ્કૃતના ભારે વિદ્વાન હતા. મુનિ અમિવિજ્યજી મહારાજે પ્રતિપાદન શૈલીથી સરદાર સાહેબને બધા પાઠો સમજાવ્યા અને તેઓની ખાત્રી થઈ કે શ્રીઅજ્ઞાનતિમિર ભાસ્કરમાં અને જૈન તત્વદર્શમાં જે હકિકત છપાઈ હતી તે ખરી હતી. આથી સનાત- નિઓની વિરૂદ્ધ ચુકાદો આવ્યો અને તેઓની ખાત્રી થઈ કે વેદમાં હિંસાના વિધાન છે. આ રિતે શ્રીવિજય- કમળસૂરીજીનો પોતાના ગુરુદેવના પુસ્તકો સંબંધમાં વિજય થતાં આખા પંજાબમાં મોટો આનંદ ફેલાયો અને તેઓશ્રીએ ૧૯૬૪માં ગુજરાનવાલામાં ચાતુર્માસ કર્યું. એ વખતે શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ તેમની સાથેજ હતા. અને પાછલથી શ્રીવલ્લુભવિજયજી મહારાજ પણ લાહોરથી આવીને ગુરુદેવ સાથે જોડાયા હતા, પંજાબમાં સંખ્યાબંધ ચાતુર્માસ કર્યા, સંવત ૧૯૬૪નું વર્ષ પુરૂ થતાં, મુનિરાજશ્રી અમિવિજયજીઅન્ય મુનિરાજે સાથે રહીને આચાર્ય દેવ ત્યાં ત્યાં વિચરતાં, ત્યાં ત્યાં પોતે પણ જતાં. તેઓ ગુજરાનવાળાથી એ રિતે ઘણા ગામોમાં વિચર્યા અને લાહોર થઈ જંડીયાલા ગામમાં સંવત ૧૯૬૫ માં પધાર્યા. આ આચાર્ય દેવ સાથે જ તેઓએ ચાતુર્માસ કર્યું. એ ચાતુર્માસ પૂર થતાં પાછો વિહાર શરૂ થયો અને આચાર્યદેવશ્રી બીકાનેરતરફ વિહાર કરી ગયા અને શ્રીમદ લબ્ધિવિજયજી મહારાજ અને બીજી મુનિરાજેને પંજાબમાં મૂક્યા ગયા. શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ એ રિતે પંજાબમાં રહ્યા અને સંવત્ ૧૯૯દનું ચાતુર્માસ તેઓએ જીરા ગામમાં કર્યું સ્થાનકવાસી કુટુંબને શુદ્ધ જૈનદર્શનની દિક્ષા. જીરા ગામમાં સ્થાનકવાસી જૈનોની મોટી વસ્તી છે. શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ કરવામાં નાં તે વખતે મુનિરાજના વ્યાખ્યાનમાં લેતા વર્ગની મોટી સંખ્યા જતી હતી. એ શોના વર્ગમાં કેટલાક સ્થાનક- વાસીઓ જીજ્ઞાસુબુદ્ધિથી તેમજ પરીક્ષબુદ્ધિથી જતા હતાં અને મૃત પૃજ શાસ્ત્રોન વિશે શંકા ઉઠાવતાં હતા. તાવમાં જીરાના નામાંકિત શેઠ લાલા શંકરદાસ નવલ તેમનાં પત્તી અને તેમના ભરી લાલા ખેરામ પણ હતા. તેઓએ મૃત પૂજા વિશેની ચર્ચા અનેક વખત આવ્યા બાદ તેમની ખાત્રી થઈ કે તીર્થકરોની મૃતીની પૂજા કરવી એ શાસ્ત્રોત છે અને તે પણ મુક્તિ મળે છે. જેથી તેઓએ મહારાજશ્રી પાસે શાસ્ત્રાવ્યા કરવા માંડ્યો અને શંકા સમાધાન થતાં તે થીજ જેન બન્યા. લાલાશંકરદાસે પોતાની ધર્મપત્તી સાથે જીંદગી પયન બ્રચત્રત અંગીકાર કર્યું. હારજીના ઉપદેશની અમર લાલા શંકરદાસની પતી ઉપર પણ મોટી થઈ અને તેમાં કેટલાક વર્ષો પછી સાધ્વી દીક્ષા ગ્રહણ કરી. આ વખતે જીરાના ઘણા જૈનોએ નવપદજીની ઓળીના તપનું આરાધન વિધિસર કર્યું, અને એક જગ્યાપર જૈનોની મોટી સંખ્યા અબિલ કરવા ભેગી થતી હતી એ ઉપરાંત મહારાજ શ્રીના ઉપદેશથી જીરા અને પંજાબના બીજા ગામોને ઘણું જૈનો સિદ્ધાચલજીની યાત્રાએ ગયા અને યાત્રા ક્યા બાદ પોતાને થયેલો આનંદ મહારાજ શ્રી પાસે આવીને જણાવ્યો. એ પછી જીરામાં એક ઓસવાલ જૈને મુનિ દિક્ષા લીધી અને તેનું નામ શ્રીરામવિજય રાખવામાં આવ્યું. દિલ્લીમાં ચાતુર્માસ, સંવત ૧૯૬૭માં જીરાનું ચાતુર્માસ પૂરૂ થયું. કાર્તિકિ પૂર્ણિમા આવી પહોંચી. મુનિરાજ શ્રીઅમિ- વિજ્યજી શિવ પરિવાર સહિત વિહાર કરવા તૈયાર થયાં. એ વખતે ઇરાની જૈન જનતા મહારાજશ્રીને વળાવવા લાંબે સુધી તેમની સાથે ગઈ અને આંખમાં આશ્રુ સહિત છુટી પડી. મહારાજ શ્રી જીરાથી લુધિયાના પધાર્યા લુધિયાનામા તેઓના વીસ દિવસના વસવાટ દરમિયાન ઘણાઓએ જૈનધર્મનું સાચું સ્વરૂપ સાંભળ્યું અને ઘણાઓએ તેમને વધુ રહેવા વિનંતિ કરી. પણ મહારાજ શ્રી લાભાલાભનો વિચાર કરી, આસપાસના ગામોમાં વિચર્ય અને ધર્મોપદેશ આપવાનું ચાલુ રાખ્યું. અહિં તેઓને સમાચાર મળ્યા કે તેમના ગુરુવર્ય શ્રી ચારિત્રવિજ્યજી મહારાજ ગુજરાનવાળામાં અતિ બિમાર હતા. આથી તેઓ શ્રી ગુજરાનવાળા પધાર્યા અને વયોવૃદ્ધ ગુરુ મહારાજની વૈયાવચ્ચ અતિ શ્રદ્ધા પૂર્વક કરી. પણ “તુટી તેની બુટી નથી”. ગુરુવર્યની આયુષ્ય દોરી તુટી અને અતિ દિલગિરિ સાથે અર્મિવિજયજી મહારાજે પાછો પંજાબમાં વિહાર શરૂ કર્યો. કેટલાક ગામે વટાવ્યા બાદ તેઓએ હસ્તિનાપુરની યાત્રા કરી અને ત્યાંથી દિલ્લી પધાર્યા. દિલ્લીમાં સંવત ૧૯૬૭ નું ચાતુર્માસ, જૈન જનતાની વિનતિથી તેઓ શ્રીએ કર્યું અને દરરોજ વ્યાખ્યાન આપી ઘણા જૈનેને જૈન ધર્મમાં પાબંદ ર્યા. દિલ્હીના જૌહરી લાલા પન્નાલાલજીને મહારાજ શ્રીના વ્યાખ્યાનને એટલો બધો નાદ લાગ્યો કે મહારાજ શ્રી જ્યાં સુધી આ ભૂમિપર વિચરતાં હતાં, ત્યાં સુધી તેઓ શ્રી જ્યાં ચાતુર્માસ કરતાં, ત્યાં હરી લાલા પન્નાલાલજી પહોંચી જતાં અને વર્ષ દરમિયાન થયેલા પાપાચારનું પ્રાયશ્ચિત લેતાં, લુધિયાનામાં પ્રતિષ્ઠા મહોત્સવ, દિલ્લીમાં ચાતુર્માસ પૂરૂ થયું તે અગાઉ લુધીયાનાના ઘણ જેનો મહારાજ શ્રી પાસે ઘણી વખત આવતા હતા અને પાછા લુધિયાના પધારવા વિનંતિ કરતાં હતાં એ શ્રદ્ધાળુ જૈનોએ સંવત્ ૧૯૬૭ માં લુધિયાનાના જૈન દેરાસરમાં પ્રતિષ્ઠા કરવા માટે લુધિયાના પધારવા મહારાજ શ્રીને વિનતિ કરી. આવી વિનંતી વધુ વખત થતાં લાભાલાભ જોઈશ્રી અનિવિજ્યજી મહારાજ લુવિયાના ખાતે પધાર્યા, અને ત્યાં પ્રતિક્રિયા ઘણું ધામધૂમ પૂર્વક કરાવી. એ વખતે લુધિયાનામાં આખા પંજાબના જૈન આવ્યાં હતાં અને અગાઉ ગુજરાનવાળમાં મનાતનીઓ સાથેના કેસને ચૂકાદો આપનાર જજ સાહેબ શ્રી જવાલા સાયમિઘ પણ લુધિયાના બદલી થતાં, લવિયાનામાં રહેતાં હોવાથી, મહારાજશ્રીને મળવા આવતાં હતાં લુધિયાનાથી મહારાજશ્રીએ પ્રષ્ટિ બાદ વિહાર કર્યો અને ફિલ્લોર, ફગવાડા, નકોદર, મ્યાની વિગેરે ગામમાં ધર્મોપદેશ આપતાં જલન્ડર જઈ પહોંચ્યા. જાલંધરમાં મહારાજશ્રીએ કેટલોક વખત સ્થિરતા કરી અને શ્રદ્ધાળુ જનતા વ્યાખ્યાનમાં મોટી સંખ્યામાં આવતી. જાલંધરમાં લાલા પહાડિયામલના પુત્ર- ધુ બાઈકોરે વરસીતપની અને જ્ઞાનચમીના તપની તપશ્ચર્યા ઉચરી અને બીજા ભાઈઓએ અને નોએ બીજા વ્રત Cચર્યા, હોશિયારપુરમાં ચાતુર્માસ જાલંધરથી મકશ્રી આસપાસના ગામોમાં વિચરતા વિચરતાં હોમિયારપૂરની વિનંતિ આવતાં હોશિયારપૂર ગયા. સંવત્ ૧૯૮નું ચાતુર્માસ આ ગામમાં થયું અહિં ચાતુર્માસ દરમિયાન ઘણુ જેનોએ ઘન, પશ્ચખાણ અને તપશ્ચર્યા કર્યા અને ધર્મોપદેશ કવ કરી મનુષ્ય જન્મને લાભ ઉડાવ્યો. D 3 R સંવત્ ૧ર માં લુધિયાનામાં ચાતુર્માસ, હોસિયારપૂરમાં ચાતુર્માસ વિતતાં સંવત્ ૧૯૯૮ની શરૂઆત થઈ અને મહારાજ શ્રી અમિવિજ્યજીએ વિહાર શરૂ કર્યો. તેઓ ગામેગામ વિચરતાં અમૃતસર ગયા અને નારીવાલની વિનંતિ આવતાં ત્યાં પ્રતિષ્ઠા કરવા પધાર્યા. નારોવાલના જૈન દેરાસરમાં પ્રતિષ્ઠા થઈ ત્યારે દેશ પંજાબના અને ગુજરાતના જૈનો પણ ત્યાં પધાર્યા હતાં. એ ગામમાં પ્રતિષ્ઠા મહોત્સવ થયા બાદ મહારાજશ્રીએ વિહાર શરૂ કર્યા અને નાના ગામોમાં વિચારવા લાગ્યા. પાછી લુધિયાનાની વિનતી આવી. પરિણામે તેઓ માસા પહેલા લુધિયાના પહોંચ્યા અને પર્યુષણ પર્વ લુધિયાનાની જનતાએ ઘણુ આનંદપૂર્વક ઉજવ્યા. શ્રી મહાવીર સ્વામીના જન્મદિવસે, લુધિયાનાના ઉપાશ્રયમાં સ્વ ઉતારવામાં આવ્યાં ત્યારે તેની ઉપજ આશરે આઠસો રૂપિયા થઈ. એ રૂપિયાના લુધિયાનાના જૈનોએ ચાંદીના સ્વ બનાવ્યાં અને તે હજી સુધી ત્યાં ઉપયોગમાં લેવાય છે. આ પર્યુષણપર્વમાં પંજાબની દસ બાઈઓએ પંચમીનું તપ કર્યું. લુધિયાનાથી મહારાજ શ્રીએ એ પછી સંવત્ ૧૯૭૦ માં વિહાર શરૂ કર્યો અને જુદે જુદે ગામ ઉપદેશ આપતાં આગળ વધ્યા. વચ્ચે જાલન્ધર ગામ આવ્યું. ત્યાં અગાઉ જણાવેલા બાઈ ઈકોર બાઈએ મોટા પાયા પર ઉદ્યાપન (ઉજમણુ) મહોત્સવ ઉજવવા તૈયારી કરી હતી. જાલંધરમાં મહારાજશ્રીએ ઉદ્યાપન મહોત્સવ અતિ ઉત્સાહપૂર્વક કર્યો અને એ મહોત્સવમાં પણ દેશ પરદેશના અનેક જૈનો આવ્યાં હતાં. અહિંથી મહારાજ શ્રી અમૃતસર પધાર્યા. આ અમૃતસર શહેરમાં લાલા હરિશ્ચંદે ઉદ્યાપન મહોત્સવની મોટી તૈયારી કરી હતી. તેમાં મહારાજ શ્રીએ ભાગ લીધો અને ઘણા જૈન ભાઈઓ અને બહેનોએ ઘણું વ્રત કર્યા. અહિંથી મહારાજશ્રી જંડિ- વાલા પધાર્યા. જ્યાં લાલા હરિશ્ચન્દ્ર બ્રહ્મચારી તરફના ઉદ્યાપન મહોત્સવમાં તેઓશ્રીએ ભાગ લીધે, લાલા હરિશ્ચન્દ્ર એ મહોત્સવ વિશે એમ કહેતા હતા કે “આજ મારો વિવાહ મહોત્સવ છે.” સંવત ૧૯૭૦માં જમુમાં ચાતુર્માસ, જંડીયાલાથી ગામે ગામે વિહાર કરતાં સંવત્ ૧૭૦માં શ્રી અનિવિજ્યજી મહારાજ કામિર તરફ ગયા અને રાજ્યધાનીના શહેર જંકુમાં પહોંચ્યા. હાલના ઉપાધ્યાયજી મહારાજ શ્રી ક્ષમાવિયજી મહુ- રાજનો જન્મ મુમાં થયો હતો. જેમાં સનખતરાના નિવાસી ઉદેચંદજી તે વખતે પોલીસખા- તામાં હતા. તેમની મદદ અને ગુરૂમહારાજના ઉપદેશથી પર્યુષણના વરઘોડામાં રાજ્ય તરફથી હાથી, ઘોડા, પલટણ વિગેરેની મદદ મળવાથી, વરઘોડો મોટા ઠાઠથી નીકળ્યો હતો. કહેવાય છે કે એવો વર ઘોડો અગાઉ કદિ નીકળ્યો ન હતો. મુમાં જેનોનો વર રાજસાહી ઠાઠ સાથે જાહેર રસ્તાઓ ઉપર ફેરવાનો તેને પહેલો પ્રસંગ હતો. હું લાલા સઈદાએ નવપદજીની ઓળી ઉચરી. આ ગૃહસ્થ એ વરસપછી, મહારાજશ્રી વિહારમાં જે ગામમાં હોય ત્યાં ચેત્રની ઓળી કરવા દરવરસે તાં હતાં. એ વર્ષમાં જંયુમાં દસ સ્થાનકવાસી કુટુંબો મૂર્તિપૂજામાં શ્રદ્ધા ધરાવતાં થયાં. સંવત ૧૯૭૧માં જીરામાં ચાતુર્માસ, મુમાં ચાતુર્માસ પૂરૂ થતાં, જીરાની વિનંતી આવતાં મહારાજ શ્રી જીરા ગામ પધાર્યા અને ત્યાં ચાતુર્માસ કર્યું. આ લાલાશંકરદાસજીની ધર્મ પતીને વૈરાગ્ય ભાવના મોટા પ્રમાણમાં જગી અને સધી દીકરી માટે તે ઇચ્છા કરવા લાગી. મહારાજશ્રીએ તે છતાં તેની દીકરી માટેની દવા વધુ પરિપકવ થાય ત્યાંસુધી તેને દિક્ષા ન આપી અને સંવત ૧૯૭૩માં ભાવનગરમાં તે બાઈએ કાવનગર જઈને સાધ્વીજીશ્રી દેવશ્રીજીપ સાથ્વી દીક્ષા લીધી. રામાં જ્ઞાનપંચમીનું ઉજમ અતિ ધામધુમથી થનું હતું અને બાર ગામથી વરઘોડામાં વાથી અને ચાંદિના રથ સંગાવવામાં આવ્યા હતાં. માં ભગવાનને પધરાવવાની બોલીના રૂ. ૧પ૦ ઉપડ્યા હતા. રાંવત્ ૧ર-ભાલર કોટલામાં ચાતુમાં, સંવત્ ૧૯૭૨ ની શરૂઆતમાં જીરાનું પાતુ પૂરતાં શ્રી વિજય જ બીજ મુનિરાજે સાથે વિહાર કરવા લાગ્યા અને મહેર કોટલા પહોચ્યાં. ર લાલા દેવીજ :- રાજશ્રીનાં ઉપદેશથી રૂ ૫૦૦ શુભ માર્ગ ખર્ચા ઘણા ભાઈઓ અને બહેનોએ તપસ્યા કરી અને વ્રત ઉચર્યા. લાલા ગજવામાલના પુત્ર શ્રી અમરનાથે, સ્થાનકવાસી માર્ગમાં શંકા થતાં મહારાજશ્રી પાસે કેટ- લાક ખુલાશા પૂછ્યા અને તે ખુલાશ મળતાં તેઓ શ્રી મૂર્તી પૂજામાં શ્રદ્ધાળુ થયાં. એ વખતે પાછી લુધિઆનાથી વિનંતિ આવી અને ત્યાં અગાઉ પચમી તપ કરનાર તરફથી ઉદ્યાપન (ઉજમણુ) મહોત્સવ કરવાની જાહેરાત થતાં મહારાજ સાહેબ લુધિયાના પધાર્યા. અહિંયા ઉદ્યાપનમહોત્સવ દરમિયાન એક ભાઈને વૈરાગ્ય ઉત્પન્ન થતાં તેમને મુનિ દિક્ષા આપવામાં આવી અને તેમનું નામ શ્રી રતનવિજ્ય રાખવામાં આવ્યું. લુધિયાનાથી મહારાજ શ્રી માલર કોટલાની વિનંતિ આવતાં માલર કોટલા પધાર્યા અને ત્યાંજ ચાતુમાંસ કર્યું. માલર કોટલામાં પર્યુષણ પ્રસંગે ભગવાનના રથનો વરઘોડો અગાઉ કોઈ જૈને કાવ્યો ન હતો. મહા- રાજશ્રીના ઉપદેશથી તેમના ચાતુર્માસ દરમિયાન ભગવાનના રથનો વરઘોડો નીકળ્યો અને વ્યાખ્યાનમાં આવતાં વૈષ્ણવો અને સ્થાનકવાસીઓમાંથી કેટલાકોએ શુદ્ધ ભૂતપૂજક શ્વેતાંબર જૈન ધર્મ સ્વીકાર્યો. તુલ- શીરામજી મલેરી નામના એક સનાતની ને પચીસ વર્ષથી સ્થાનકવાસી માર્ગ સ્વીકાર્યો હતો. તેઓએ પણ મહારાજ શ્રીની ધર્મદેશના સાંભળી શુદ્ધ મૂર્તીપૂજક શ્રદ્ધા સ્વીકારી, અને નવપદજીની ઓળી કરી. શ્રી અમિવિજયજી મહારાજના આ રિતે નવ ચોમાસા પંજાબમાં થયા, તે દરમિયાન અનેક જીવોને મુનિરાજે ધર્મ પમાડે હતો, સ્થાનકવાસીઓને શાસ્ત્રપાઠોની સાક્ષી આપી મૂત પૂજક બનાવ્યા હતા અને સેંકડોને શ્રીસિદ્ધક્ષેત્ર-પાલીતાણાની-જાત્રા કરવા ઉપદેશ આપ્યો હતો. આથી ઘણા શ્રાવકોએ શ્રીસિદ્ધક્ષેત્રની જાત્રા કરવા બાધા લીધી હતી અને બાધા પ્રમાણે તેઓએ જાત્રા કરી હતી. તેઓના ઉપદેશથી ઘણા જીવોએ પ્રભુ પુજા કરવાની, દર્શન કરવાની સામાયિક કરવાની, કંદમૂળ ન ખાવાની, અભક્ષ્યના ત્યાગની અને નવલક્ષ નવકાર ગણવાની બાધા લીધી હતી અને પાકા જેન બન્યા હતા. એમ કહેવાય છે કે તેમનાજ ઉપદેશથી પજાબના જૈનોના પચાસ ટકા જેટલા જૈનોએ શ્રીસિદ્ધક્ષેત્રપાલીતાણાની જાત્રા કરી હતી, મુનિરાજ શ્રી ક્ષમાવિજ્યજી મહારાજ હાલના ઉપાધ્યાયજી મહારાજ શ્રી ક્ષમાવિજયજી મહારાજ વિશે અત્રે કેટલીક બાબતો જણાવવાની જરૂર પડે છે. શ્રીક્ષાવિજયજી મહારાજનો જન્મ કાશમીરના પાટનગર જૈમુ શહેરમાં ખંડેલવાડ કુટુંબમાં સંવત્ ૧લ્પલ્માં થયો હતો. તેના પિતાનું નામ શ્રી રામલાલ હતું અને તેઓના વડવાઓ મારવાડથી દિગંબરમૂર્તિઓ સાથે લાવ્યા છતાં પંજાબમાં આવ્યા પછી ટૂંક મતના રાગી થયાં હતાં, પરંતુ તેઓ તો શ્રીમદવિજયાનંદ સુરીશ્વરના ઉપદેશથી પાછા મૂર્તીપૂજાના રોગી થયાં અને શ્રી કાશ્મીરી લાલ અને શ્રી રાખવદાસ નામના તેમના બે પૂત્ર પણ તે મત પાળવા લાગ્યાં. જાલંધરમાં શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ વિચરતાં હતાં ત્યારે કાશમીરાલાલે શ્રી અમિવિજ્યજી મહારાજ પાસે જૈનધર્મને અભ્યાસ કરવા માંડ્યો. મહારાજશ્રીએ તેમને ૪૫ બેલના થોકડા ઉર્દૂમાં લખી આપી, તે સમજાવ્યા ને તેને આગલ અભ્યાસ શરૂ કર્યો. એ પછી મહારાજશ્રી તે વિહાર કરી ગયા, પણ લુધિઆનામાં શ્રી કાશમીરીલાલ તારખાતાનું કામ શીખવા ગયા ત્યારે તેમને ફરી મેળાપ થયો અને શ્રી “ઉપમિતિ ભવપ્રપંચ” ગ્રંથનો પ્રથમ પ્રસ્તાવ, મહારાજશ્રીએ શ્રી શાદીલાલ નામના શ્રાવક પાસે અપાવતાં, શ્રી કાશ્મીરીલાલે તે ગ્રંથ વાંચતાં તેમને વિરાગની ભાવના જાગી. માલર કોટલામાં શ્રી અનિવિજ્યજી મહારાજનું ચાતુર્માસ થતાં શ્રીકાશ્મીરીલાલ ત્યાં ગયા. તેઓએ ગુરુ દેવને મુનિદીક્ષા આપવા વિનંતી કરી પણ તે વખતે ચાતુર્માસ હોવાથી ગુરુશ્રીએ તેમને દીક્ષા ન આપી. એ પછી ગુરુદેવે માલર કોટલાથી વિહાર કરતાં તેઓ પણ તેમની સાથે પગપાળા વિહાર કરવા લાગ્યા અને પોતાના ભાઈ શ્રી રીખવદાસને પણ પોતાની સાથે રાખ્યા. સંવત ૧૯૭૩ માં મહ મહિનામાં બધા બીકાનેર આવી પહોંચ્યા અને બિકાનેરમાં ગુરુદેવે સ્થિરતા કરી. આ વખતે શ્રી કારમીરીલાલે એક વધુ વખત ગુરુદેવને દીક્ષા માટે આગ્રહ કર્યો અને તેમનો ભાવ જોઈ તેમને શ્રી અમિ- વિજ્યજી મહારાજે અશાડ સુદ બીજને દિવસે બકાનેરમાં મુનિદીક્ષા આપી. આ વખતે શ્રી બીકાનેર રત્યે વરઘોડામાં હાથી, ઘોડા, પલટણ વગેરે રાજ્યનો રસાલો આપ્યો હતો અને આખા બિકાનેરમાં દીક્ષા લેનાર શ્રીકાશમીરીલાલ વરઘોડો ઘણું ધામધૂમ પૂર્વક ફર્યો હતો. ચોમાસુ ઉતરતાં બિકાનેરમાં જ મુનિશ્રી ક્ષમાવિજયજીના સંસારી પક્ષે માસી બાઈ ઇંદકુંવરે સાધ્વીજી શ્રી તીલકશ્રીજીના શિષ્યા શ્રી જડાવશ્રીના શિષ્ય તરિકે સાધ્વી દીક્ષા લીધી અને તેમનું નામ શ્રી લાભશ્રીજી રાખવામાં આવ્યું. સંવત્ ૧૯૭૪ માં માહ ગુદ દસમના દિવસે ૪૦૦ યાત્રિકો ૪ મુનિરાજ અને ૭૫ સાધ્વીજીઓ સાથેનો એક સંઘ-છરી પાલતો સંઘ–શ્રી અમિવિજયજી મહારાજશ્રીના ઉપદેશથી સંઘવી શેઠ લક્ષ્મીચંદજી કોચરે કાઢ્યો અને બધાએ શ્રી જેસલમેર તીર્થની જાત્રા કરી. રતલામમાં ચાતુર્માસ, જેસલમેરથી વિહાર કરતાં મહારાજશ્રી આગલ વધતાં હતાં ત્યારે રતલામના શ્રીસંઘે મહારાજ શ્રી રતલામ પધારવા વિનંતિ કરી. રતલામમાં જે પાઠશાળા અગાઉ સ્થાપાઈ હતી તે પાઠશાળામાં શિક્ષક સંબંધી વાંધો પડ્યો હતો અને પાઠશાળા બંધ થઈ હતી. રતલામના શ્રી કેશરીમલજી લુનિયાએ, બે શ્રાવકોને, જ્યારે ઉપલો સંઘ બીકાનેરથી નીકળી પોકરણ ફળોથી આવ્યો હતો ત્યારે વિનંતિ કરવા એક વધુ વખત મોકલ્યા અને તેઓએ મહારાજશ્રીને રતલામ ચાતુર્માસ કરવા પધારવા વિનંતી કરી. આથી ઉપલા શ્રાવકો સાથે મહારાજશ્રીએ રતલામ તરફ વિહાર કર્યો અને ત્યાં જઈ ચાતુર્માસ કર્યું. ચાતુર્માસ દરમિયાન ઉપર જણાવેલી પાઠશાળા ફરી ઉઘડી અને સંઘનો કુસંપ દૂર થયો. વળી પોતાને ગુરુશ્રીની યાદમાં રતલામમાં શ્રી ચારિત્રવિજ્યજી જૈન જ્ઞાનભંડાર ઉઘડ્યો, જે જ્ઞાનભંડાર રતલામમાં ચાતુર્માસ કરનાર સાધુ-સાધ્વીઓને ઘણું ઉપયોગી જણાયો. રતલામનું ચોમાસુ ઉતરતાં રતલામનિવાસી શ્રી રતિ- ચંદજી બોરાણા અને શ્રી નિહાલચંદજી તલેરાએ મહારાજશ્રીના ઉપદેશથી ૩૦૦-૩૫૦ જેનો સાથે શ્રી કેશરીયાજીનો સંઘ કાઢયો અને બધાએ શ્રી કેશરીયાજીની યાત્રા કરી. શ્રીક્ષાવિજ્યજી મહારાજની વડી દીક્ષા, રતલામથી બધા મુનિરાજે વિહાર કરતાં મહેસાણા આવ્યાં. મહેસાણામાં એ વખતે વયોવૃદ્ધ પન્યાસજી મહારાજ શ્રીસિદ્ધિવિજય મહારાજને આચાર્ય પદ્ધિ આપવાની મંત્રણા ચાલી રહી હતી અને મહેસાણાના સંઘે પન્યાસજી મ. સિદ્ધિવિજ્યજીને મહેસાણામાં રોકાયા હતા. એ વખતે બધા મુનિરાજે મહેસાણા જઈ પહોંચ્યા અને મુનિશ્રી ક્ષમાવિજ્યજી મહારાજે પચાસજી શ્રી સિદ્ધિવિજ્યજી પાસે જગ વહ્યાં એ વખતે મહેસાણામાં ૩ર મુનિરાજે અને ઘણા સાધ્વીજીઓ હતાં. મહાશુદી પાંચમે પન્યા- સજી મ. સિદ્ધિવિજ્યજી મહારાજને મોટી ધામધુમ સાથે આચાર્ય પદ્ધિ અપાઈ અને મહાશુદ દસ- મના દિવસે શ્રી ક્ષમા વિજયજી મહારાજની વડી દીક્ષાની ક્રિયા થઈ. એ પ્રસંગે કેટલાક મુમુક્ષુ જનોએ યુનિદીક્ષા પણ લીધી સંવત ૧૭૫ વેરાવળમાં ચાતુર્માસ, સંવત્ ૧૭૬ માં સ્તંભતિર્થ(ખંભાત)માં મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજીનું ચાતુર્માસ થયું. સંવત્ ૧૯૭૫માં મુનિરાજ શ્રી અમિવિજ્યજીનું ચાતુર્માસ વેરાવળમાં થયું. વેરાવળમાં ચાતુર્માસમાં કપ પીસ્તાલીસ આગમની તપ આદિ ક્રિયાઓ બહુ ધામધુમ સાથે થઈ હતી અને ચાતુર્માસ ઉતરતાં વેરા- વળથી શ્રદ્ધાળુ શેઠ શ્રી જયપાલ પાનાચંદે શ્રીસિદ્ધગિરિની યાત્રાને એક સંઘ કાઢ્યો. એ સંઘ પાલી- તાણામાં ફાગણ શુદિમાં પહોંચ્યો અને સંઘે શ્રી શત્રુંજ્યની યાત્રા કરી. વેરાવળમાં મહારાજશ્રીના ઉપ- દેશથી સાધારણ ખાતાની એક ટીપ થઈ હતી. જેમાં રૂ. ૧૦૦૦૦ દસ હજાર ભરાયા હતાં. સંવત ૧૯૭૬, પાલીતાણામાં ચાતુર્માસ, પાલીતાણામાં શ્રી સિદ્ધક્ષેત્રની યાત્રા ચાલું હતી, એટલામાં મહારાજશ્રીને આંખોમાં દર્દ થયું અને તેની પીડા ઘણું વધી. દિન પર દિન આંખનું દર્દ વધતું ચાલ્યું અને મહારાજશ્રી તે દર્દ શાંતિથી ભેગ- વવા લાગ્યા. પાલીતાણાના દાકટરની દવા કરી. તેથી પણ દર્દ ન મટયું. એમ માલમ પડ્યું કે મહારાજ- શ્રીને ઝામરાનું દર્દ થયું હતું મુંબઈમાં મુનિરાજશ્રી અમિવિજયનો પ્રવેશ ઝામરાનું દર્દ પાલીતાણામાં વધતું ચાલ્યું અને મહારાજશ્રીના ભક્તોને ચિંતા થવા લાગી. માંગરોલ નિવાસી શ્રદ્ધાળુ જૈન શ્રી સોમચંદ ઉતમચંદ એ વખતે પાલીતાણામાં ચાતુર્માસ અર્થે આવ્યાં હતાં. તેઓએ ૨ મહારાજશ્રીનું દર્દ જોયું અને તેમને લાગ્યું કે મહારાજશ્રીનું દર્દ મુંબઈને નિષ્ણાત તબીબોની સારવાર વગર દૂર થાય એમ ન હતું. તેઓશ્રીએ મહારાજશ્રી પાસે બાર વૃત ધારણ કર્યો અને જૈન ધર્મનો ઉપદેશ શ્રવણ કરવા માંડયો. કેટલાક દિવસો બાદ તેઓએ મહારાજશ્રીને વિનંતિ કરી કે તેઓશ્રી જે મુંબઈ પધારે તો મુંબઈની જનતાને તેમના વ્યાખ્યાનોનો લાભ મળે અને તેમની આંખના દર્દી માટે હોશીયાર તબીબની સલાહ મળે એ માટે તે ઓશ્રીએ મુંબઈ પધારવું. મહારાજશ્રીએ આ વિનંતિ સાંભળી. એટલામાં સંવત્ ૧@૭નું ચાતુર્માસ પૂરું થયું અને સંવત્ ૧૭૮ની શરૂઆત થઈ કાર્તિકિ પૂર્ણમાની યાત્રા કર્યા બાદ મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ, શિષ્યરત્ન શ્રી ક્ષમાવિ- જયજી મહારાજ આદિ મુનિરાજેએ પાલીતાણાથી વિહાર કર્યો અને કાઠિયાવાડ અને ગુજરાતના અનેક ગામની સ્પસના કરતાં કરતાં સંવત્ ૧૮ના મહાસુદ પાંચમના દિવસે મુંબઈમાં પ્રવેશ કર્યો. તેઓશ્રીને શ્રી ગોડીજી મહારાજના દેરાસર પાછલ આવેલા ઉપાશ્રયમાં લઈ જવામાં આવ્યાં અને ત્યાં તેઓશ્રીએ પાંચ દિવસ સ્થિરતા કરી. એપછી કોટના ઉપાશ્રયના સ્ટિઓ અને શ્રી સોમચંદ ઉત્તમચંદના આગ્રહથી ધામધૂમ પૂર્વક મહાશુદ ૧૦ દસમના દિને સામૈયા સાથે શ્રી કોટના દેરાસરના ઉપાશ્રયે મહારાજશ્રી શિષ્યો સાથે પધાર્યા. ત્યાં સ્થિરતા થયા બાદ તેઓશ્રીનું આંખનું ઓપરેશન દોકટર ડગન પાસે કરાવવામાં આવ્યું હતું, જે ફતેહમંદ નિવડ્યું હતું. અહિં શ્રી ક્ષમા વિજયજી મહારાજ પણ સાથે જ હતા. તેઓશ્રી પોતાનો અભ્યાસ ગુરુદેવ પાસે વધાર્યા જતાં હતાં અને ગુરુસેવા કર્યે જતાં હતાં. આ વર્ષમાં માલવા-મેવા- અને જૈન દેરાસરના દ્વારની ટીપ થતાં એક લાખથી વધુ રકમ ભરાઈ હતી. વળી મુંબઈના શ્રી વમાન તપ આયંબીલ ખાતાની સ્થાપના પણ તેમના ઉપદેશથી થતાં શ્રી રણછોડદાસ શેષકરણે તેમાં પ્રથમ રકમ રૂ. પ૦૦૦ની ભરી હતી, જે પાછલથી વધીને રૂ. ૪૦૦૦૦ જેટલી થઈ હતી. અંધેરીમાં, શ્રી અમિવિજ્યજી મહારાજ, ચોમાસું ઉતરતાં શ્રી કોટના ઉપાશ્રયેથી શ્રી આદિશ્વરજીની ધર્મ- શાળામાં અને તે બાદ શ્રી અંધેરી ખાતે શ્રીગીલાલ લહેરચંદની વિનંતિથી તેમને બંગલે પધાર્યા. અહિં શ્રી ભોગીલાલ લહેરચદે મુમુક્ષુ શ્રી ગોરધનદાસ નાથાભાઈને મુનિદીક્ષા આપવા માટે મોટો ખર્ચ કરી તેમને ગુરુદેવ પાસે મુનિદીક્ષા અપાવી. એ દીક્ષા મુંબઈ-અંધેરી–માં પહેલી હતી અને તેમાં આશરે ૧૦૦૦૦ જેનોએ ભાગ લીધો હતો. શ્રીભોગીલાલે એવખતે નકારશી જમણનો મોટો ખર્ચ કર્યો હતો, શ્રીગરધનદાસે દીક્ષા લીધા બાદ તેમનું નામ શ્રીગુણવિજ્યજી રાખવામાં આવ્યું. અહિંથી વિહાર કરતાં કરતાં મુરત પધાર્યા ત્યાં ઝવેરી સવૈચંદ સૂરચંદે તેઓશ્રીનો પ્રવેશ તેમના મોટા ગુરુભાઈશ્રી કલ્યાણ વિજયજી મહારાજ સાથે ગોપીપુરામાં ઠાઠથી કરાવ્યો હતો. ત્યાંથી મુનિમહારાજશ્રી શિષ્યમંડળ સાથે રાપર પધાર્યા. દરાપરામાં આચાર્ય શ્રી વિજ્યાનંદસૂરિજીના પટ્ટધર શ્રીવિજયકમળ સૂરીશ્વરજી બિરા- જતાં હતાં. મુનિ મળે તેમને વાંધો. રાપરાથી મુનિરાજશ્રી અમદાવાદ, યાયજી, સંબલપૂર અને તે બાદ શ્રી શંખેશ્વર પધાર્યા અને છેલ્લે ઠેકાણે ચૈત્રી ઓળી કરી. પાટણમાં એવી લય બાદ મુનિરાજ શ્રી શિષ્યવસાથે વિહાર કરતાં ત્રવદ ૧૦ ને દિવસે યાત્રા પાટણ પધાર્યા અને તે બાદ શ્રી નગીનદાસ કરમચંદની આગ્રહભરી વિનંતિથી તેમના દહેલામાં ચાતુર્માસ કર્યું. મારું વનરનાં સંવત્ ૧૯૮૦ માં શ્રી નગીનદાસ કરમચંદે મુનિરાજશ્રી સાથે ચારૂપને સંઘ કાર- તકદને દિને કાશ્યો, જેમાં લગભગ ૧૨૦૦-૧૫૦૦ શ્રાવકો અને શ્રાવિકાઓ હતાં. ચારૂપથી વિહાર કરતાં તે બાદ ર પેથાપુર તરફ આગળ વધ્યા. પેથાપુર પાસેના રાજી ગામના રહિશ શ્રી કેશવલાલ હજુ કેટલાક વર્ષોથી મનિટ લેવા આગ્રહ રાખનાં હતાં. પિથાપુર પહોંચતાં માગશરદ પાંચમે શ્રી કેશવાલની દાન વરઘોડે હાથીના ઢા સાથે નિકળ્યો હતો, જેમાં પેથાપુરના બન્ને પક્ષોએ દીધો હતો. માગશર સુદ ના દિવસે શ્રી કેશવલાલને સુજારો માણસોની હાજરીમાં શ્રી અમિધિ- જવર મહારાજે મુનિના આપી, અને તેમનું નામ શ્રી ભક્તિવિજયજી રાખવામાં આવ્યું. પેથાપુરથી ૧૬. સર્વે મુનિરાજે રાંદેરા વગેરે ગામો સ્કર્તા કોબા ગામે પધાર્યા હતાં, અને મુનિ શ્રી ગુણવિજ્યજી મહા- રજે તેમજ મુનિશ્રી ભક્તિવિજ્યજી મહારાજે ત્યાં પન્યાસજી મહારાજ શ્રી ઉસંગવિજયજી મહારાજ પાસે વડિ દીક્ષાના જેગ વહ્યા ત્યાં એ બન્ને મુનિરાજોને પોષ વદ ૬ ના દિવસે વડી દીક્ષા આપવામાં આવી. સંવત ૧૯૮૦ શ્રીપાલનપુરમાં ચાતુર્માસ, મહારાજશ્રી પછી મારવાડ તરફ વિહાર કરવાની ઈચ્છાથી આગળ વધ્યા. મારવાડમાં મુનિવિ- હારની મોટી જરૂર હતી એમ સર્વત્ર બોલાતું હતું. મારવાડમાં ધર્મનો અને જ્ઞાનનો અભાવ હતો એમ જણાયું હતું. આથી મહારાજશ્રીની ઈચ્છા એવી હતી કે મારવાડના અનેક ગામોમાં સ્થિરતા કરી જૈન જનતાને ધર્મજ્ઞાન આપવું. વિહાર કરતાં કરતાં મારવાડની અને ગુજરાતની સરહદ પર આવેલ પાલન- પૂર શહેરમાં સંવત્ ૧૯૮૦ના ફાગણશુદ ૧૩ના દિને સર્વે મુનિરાજેએ પ્રવેશ કર્યો. ફાગણશુદ ૧૪થી પાલનપુરમાં ગુરુદેવનું વ્યાખ્યાન શરૂ થયું અને ઘણા શ્રદ્ધાળુ જીવોથી શ્રોતાવર્ગની સંખ્યા દિનપરદિન વધવા લાગી. થોડા દિવસો બાદ મુનિરાજે ત્યાંથી વિહાર કરનાર હતાં પણ શ્રદ્ધાળુ જૈનોએ ગુરુદેવને ચાતુર્માસ કરવા અતિ આગ્રહ ભરી વિનંતિ કરી જેથી મહારાજશ્રીએ સંવત્ ૧૯૮૦નું ચાતુર્માસ પાલન પૂરમાં કર્યું. એ ચાતુર્માસ માટે પાલનપૂરના શ્રાવકોએ, ખાસ છણ જઈને આચાર્યશ્રી વિજ્યાનંદ- સૂરિજીના પ્રથમ પટ્ટધર શ્રીમદ વિજયકમલસૂરીશ્વરની આજ્ઞા મેળવી હતી, કેમકે મુનિરાજશ્રી તેમની આજ્ઞામાં હતાં. પાલનપુરમાં શ્રીભગવતી સૂત્રનું વાંચન થયું હતું, જે વખતે સાચા મોતીનો એક સાથીઓ આશરે ૧૫૦૦ના ખર્ચે શ્રીમલુકચંદ બાદરમલે કર્યો હતો. એ વખતે શ્રોતાવર્ગની સંખ્યા ઘણું વધી જવાથી ચેલા હેતાની ધર્મશાળાના ચોકમાં ખાસ મંડપ બાંધવામાં આવ્યો હતો, ત્યાં ધર્મવ્યાખ્યાન થતાં હતાં. એ વખતે પાલનપુરમાં વર્ધમાનતપઆયંબીલ ખાતાની સ્થાપના ગુરુદેવના ઉપદેશથી થઈ. બેડામાં ચાતુર્માસ, પાલનપૂરથી સંવત્ ૧૯૮૧ના કારતક વદી ૧૦ના દિવસે મુનિરાજશ્રી અમિવિજયજીએ વિહાર ર્યો ત્યારે સેકડો જૈનો તેમને કેટલાક ગાઉસુધી વળાવવા ગયા હતા. એ રીતે શ્રીમુનિરાજ વિહાર કરતાં, શ્રી કુંભારીયાજી શ્રીઆબુજી વિગેરેની ચાત્રાએ પધાર્યા. આબુજીની યાત્રા બાદ ગુરુદેવે મારવાડ તરફ વિહાર કર્યો. એ વખતે તેમની પાસે દીક્ષા લેવાની ઈચ્છા રાખનાર મુંબઈના પ્રસિદ્ધ ભાવનગરનિવાસી શ્રીનરોતમદાસ ભગવાનદાસ શાહના પુત્ર શ્રી જગજીવનદાસ એક વધુ વખત મુનિદીક્ષા લેવા આવ્યા. અગાઉ તેઓ પાલનપુરમાં દીક્ષા લેવા આવ્યા હતા અને ફરીથી તેઓ આબુ આવ્યા. તેઓએ ગુરુદેવને મુનિદીક્ષા આપવા ઘણું આગ્રહભરી વિનંતિ કરી. એ વખતે વિહાર ચાલુ હતો અને શ્રી જગજીવન- દાસ પણ વિહારમાં સાથે રહ્યા. આખરે બધા વિહાર કરતાં બામણવાડામાં પધાર્યા. ત્યાં પોષવદ ૬ના દિને દિક્ષાનો વરઘોડો અતિ ધામધૂમ પૂર્વક ચઢાવવામાં આવ્યો અને તે બાદ શ્રી જગજીવનદાસને મુનિદીક્ષા અપાતાં તેમનું નામ શ્રી જયંતવિજય રાખવામાં આવ્યું. અને તેઓ શ્રીને મુનિશ્રી ક્ષમાવિજ્યજીના શિષ્ય કરવામાં આવ્યાં. બામણવાડામાં એ પ્રસંગે પાલનપુરના શ્રીહાથીભાઈભણસાળી તરફથી નકારશી જમણ થયું હતું. બામણવાડાથી વિહાર કરતાં મુનિરાજેએ અનેક ગામોને ધર્મ-ઉપદેશનો લાભ આપ્યો હતો અને કેટલેક ઠેકાણે સ્થિરતા પણ કરી હતી. છેવટે બધા નાણામાં પધાર્યા અને ત્યાં વ્યાખ્યાન વાંચવાનું ચાલુ હતું. ત્યાં મુનિરાજ કલ્યાણવિજયજી બાપજીની તબિયત બગડી અને તેઓએ ચૈત્ર વદ પાંચેમને દિવસે નાણામાં કાળ કર્યો. તેમના અગ્નિસંસકાર બાદ નાણામાં ઘણું ધર્મના કામ થયાં હતાં. ત્યાં બેડાના મહાજન તરફથી વિનતિ આવતા મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ વૈશાખ શુદ ૩ના દિવસે બેડા પધાર્યા. એ વખતે બેડા નિવાસિ શ્રાવકોએ બહુ ધામધૂમ પૂર્વક સામૈયું કર્યું હતું. બેડામાં અતિ શાંતિ- પૂર્વક ચાતુર્માસ ક્યુબાદ મુનિરાજશ્રી મારવાડના અનેક ગામોની જાત્રા કરવાની ઈચ્છાથી વિહાર કરતાં હતાં અને સડો ગામોની અપૂર્વ જાત્રા કરી હતી, અને સંવત્ ૧૯૮૨નું ચાતુર્માસ મારવાડના લુણાવા ગામમાં કરીને મારવાડની જનતાને અપૂર્વ લાભ આપ્યો. ૧૯૮૨નું ચાતુર્માસ પૂરૂ થતાં ૧૯૮૩માં ગુરુ દેવે મુનિશ્રી ક્ષમાવિજયજી મહારાજને મુનિશ્રી જયંતવિજ્યજીને જેગ કરાવવા ગુજરાત મોકલ્યા. મુનિશ્રી - ૧૨ માવિજ્યજી લુણાવાથી વિહાર કરતા વિજયસિદ્ધિસૂરિજી પાસે જેગ વહાવા પાટણમાં ૧૯૮૩માં પધાર્યા અને ત્યાંજ ચાતુર્માસ કર્યું. ગુરુદેવ શ્રી અમિવિજયજી લુણાવેથી અનેક ગામોમાં વિચરતાં ગર્ભ શ્રીમંત શ્રી ઓટરમલજીને દીક્ષાનો ભાવ થતા, ગુરુદેવ શ્રીનાણુ પધાર્યા અને શ્રીટરમલજીએ હજારો રૂપિયા ખર્ચીને અને સારે માર્ગે વાપરીને સવત્ ૧૯૮૩ના મહાસુદ પાંચમે નાણાંમાં અતિ ધામધુમ પૂર્વક મુનિદીક્ષા લીધી. એ મુનિરાજનું નામ શ્રી ભાવવિજયજી રાખવામાં આવ્યું હતું. નાણાની સર્વે વિડાર કરવાના હતા તે વખતે સાલદેરીથી શ્રાવકોએ આવીને સાવરી પધારવા વિનંતિ કરી. આથી સર્વે સાવરી ગયા અને ત્યાં ચાર તડ હતા, તેને સમજીવીને ગુરુદેવે એકત્ર કરતા ગામમાં સંપ થયો. આથી સાવડેરીના શ્રાવકોમાં અતિ ઉત્સાહ ફેલાયો અને ગામમાં દહેરાસરમાં વરસોથી મુલતવી રહેલી પ્રતિષ્ઠા કરાવવા ગામલોકોએ નિશ્ચય કર્યો. એ નિશ્ચય પાર પડયો. દેરાસરમાં પ્રતિષ્ઠા થઈ અને દેવદ્રવ્યમાં રૂપિયા એક લાખ એંશી હજારની ઉપજ થઈ શ્રીવિજ્યકમળસૂરીશ્વરજીનો કાળધર્મ, મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ સાહદેરીથી વિહાર કરતાં ખડાલા પધાર્યા ત્યારે ૧૮૩ના મહાશુદ ૬ ના દિવસે સૂરત જીલ્લામાં આવેલા જલાલપુર ગામમાં આચાર્ય શ્રી વિજયાનંદસૂરિજીના પટ્ટધર શ્રીવિજકમળસૂરીશ્વરજીએ કાળ કર્યાની ખબર તારથી મળી. આથી તેઓ ઘણા દિલગીર થયાં અને પુડલામાં દેવવંદનની ક્રિયા કરી. એ દરમિયાન મુનિશ્રી ભાવવિજ્યજી મહારાજ પાટણમાં શ્રી ક્ષમાવિજયજી પાસે થઈ ધીણેજ પધાર્યા, અને ત્યાં તેઓએ પન્યાસજી પદ્યવિજયજી મહારાજ પાસે ૧૯૮૩ના ચૈત્ર વદ ૭ના દિવસે વડી દીક્ષા લીધી. જન્મભૂમિમાં ચાતુર્માસ, અદાલામાં શ્રી અમિવિજયજી મહારાજનું વ્યાખ્યાન ચાલતું હતું તે વખતે તેમની જન્મભૂમિ ચાણોદથી અને આસપાસના ગામોમાંથી ઘણુ જેનો એ આવી ચાતુર્માસ પોતાના ગામમાં કરવા મુનિ રાજને વિનંતિ કરી. આથી મહારાજ સાહેબ લગભગ ત્રીસ વરસબાદ પિતાની જન્મભૂમિમાં, બીજા ગામોમાંથી વિહાર કરતાં કરતા ૧૮૩ ના ફાગણવદ ૧૩ ને દિને પધાર્યા ત્યાં સ્થિરતા ર્યાબાદ તેઓએ આસપાસના ગામોમાં ફરીને ધર્મદેશના આપવા માડી ચાણોદ ગામના લોકોએ તેમને પ્રવેશ વખતે ધામધૂમ પૂર્વક માન આપ્યુ હતુ અને તેમનું વ્યાખ્યાન સાભળવા આખા ગામના લોકો રાજના મોટા દિવાનનસુધી આવતાં હતા. તેઓએ ચાણોદની આસપાસના ગામોમાં વિહાર કરવા માંડ્યો તે પછી ચાદમાં તેઓએ ચિત્ર માસની સળી કરાવી હતી. સારીમાં એક બાઈને સાદીક્ષા આપી હતી. અને અંદર નાગડાના જનને કંદમૂળ ખાવાની બાધા આપી હતી. એ ગામમાં બધા લોકો કંદમૂળ-કાંદા- લસણ-વિગેરે ખાતા હતા, પણ મુનિરાજના ઉપદેશથી ૧૪ આની લોકોમાં સુધારો થયો હતો. વળી પાલીમાં એક બાઈને સદવીદીક્ષા આપી હતી. તે બાદ તેઓ ૧૯૯૩ ના આશાડશુદ બીજને દિને કરી ચાણોદ પધારતાં ઘણું ધામધુમ થઈ હતી અને એ સાલનું ચાતુર્માસ ત્યાં થયું. એ વખતે ચાતુર્માસ ઉતર્યા બાદ સંવત ૧૯૮૪માં મુનિરાજ શ્રી ક્ષમા વિજયજી મહારાજ અને મુનિરાજ શ્રી ભાવવિજ્યજી મહારાજ ગુજરાતમાથી વિહાર કરી ચાણોદ પધાર્યા અને ગુરૂમહારાજ સાથે સ્થિરતા કરી. ચાણોદના તેરાપથી શ્રાવકોએ એ દરમિયાન પાસેના ગામ કરનાના દેરાસરમાં તેરાપંથી સાધુઓને cતારો આપી ઘણી આશાતના કરાવી હતી, તેથી ચાણેદને જનોએ તેમની સાથે વહેવાર બંધ કર્યો. ચાદના ચાતુર્માસ દરમિયાન મુંબઈથી શ્રી સોમચંદ ઓતમચંદ વિગેરે તેમજ પંજાબથી ઘણા આવશે મહારાજશ્રીને વાંદવા પધાર્યા હતા. ચાતુર્માસ ઉતર્યાબાદ મુનિરાજે આસપાસના ઘg દામોમાં પધાર્યા હતાં અને સર્વેને વ્યાખ્યાનને લાભ આપ્યો હતો. તેઓ ૧૮૪ના વૈશાખ માસમાં કરી વિનંતિ થનાં ચાદન દેરાસરને ધ્વજદંડ ચઢાવવાની ક્રિયા થનાર હતી તે વખતે પાછા પપાય અને ધ્વજાદંડ ચઢાવવાની ક્રિયા કરાવી. એ ધ્વજાદડ શાહ ઈદાજી સેરાજીએ રૂ.૫૦૦૧ જેથી એ હતો, અને કારને લગભગ અગીયાર હજાર રૂપિયાની આવક થઈ હતી. એ વખતે મહારાજશ્રીએ મરણ પાછલ થતાં જમણે બંધ કરવા ઉપદેશ આપતાં એ રિવાજ ઘણી ગામોમાં બંધ થયો હતો અને મરણ થતાં અમુક રકમ દેરાસરમાં અને અમુક રકમ સાધારણ ખાતામાં આપવાને રિવાજ ચાલુ થયો હતો. ચાદથી વિહાર કરતાં મહારાજશ્રી તખતગઠ પધાર્યા ત્યારે વ્યાખ્યાન વાંચતાંજ જેઠશુદ ૯ના દિવસે તેમને લવાની બીમારી જણાઈ અને તેઓશ્રીની યાદશક્તિ પણ ઘેરાઈ ગઈ. આ બિમારી કેટલેક અંશે વાલીથી બોલાવેલા શ્રાવક ડાકટરની દવાથી દૂર થતાં અને દુજાણ વગેરેની વિનંતિ આવતાં મહારાજ સાહેબ અને મુનિરાજેએ અશાડ સુદ બીજને દિવસે તખતગઢથી વિહાર કર્યો. અહિં તેમનું ૧૯૮૪ના સાલનું ચાતુર્માસ થયું. આ વખતે શ્રી અમિવિજ- યજી મહારાજની બિમારીની ખબર પડતાં આસપાસના ગામોના, મારવાડના, ગુજરાતના અને પંજા- અના સેંકડો જેનો દુજાણ ખબર પુછવા આવ્યા હતા અને તેઓને માટેની સઘળી સગવડ શ્રી કસ્તુરચંદ કોઠારીએ કરી હતી. આ વખતે મુનિશ્રી ક્ષમાવિજયજી વ્યાખ્યાન વાંચતાં હતાં. પાલીતાણાની જાત્રાના સાઠહજારના ફંડમાં મદદ દુજાણનાં ચાતુર્માસ પહેલાં સંવત્ ૧૯૮૪ના જેઠ મહિનામાં શ્રી સિદ્ધક્ષેત્ર શ્રી પાલીતાણાની જાત્રા ખુલ્લી થવાના ખબર મળ્યા અને શેઠ આણંદજી કલ્યાણજીએ દર વરસે રૂપિયા સાઠ હજાર ભરવા માટે ફંડ ઉઘરાવવા માણસો મોકલ્યા. એ વખતે મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજના ઉપદેશની અસર થતાં ભારૂંદાવાળા શ્રી રામાજી પદ્માજીએ પ્રથમ રકમ રૂ. ૧૦૦૦૦ની ભરી હતી. અને બીજી રકો પણ ભરાણ હતી. એ રીતે શેઠ આણંદજી કલ્યાણજી ઉપર એક મોટી રકમ મોકલાઈ હતી. જોધપુર-કાપરડા-પીપાડ, સંવત્ ૧૯૮૫માં ચાતુર્માસ ઉતરતાં ગુરુમહારાજ સાથે શ્રી ક્ષમાવિજ્યજી મહારાજ વિગેરેએ વિહાર કર્યો અને ઘણા ગામોની જાત્રા કરીને તેરાપંથ અને ટુંક પંથમાંથી, ઘણા શ્રાવકોને પાછા જૈન બનાવ્યા. તેઓ જોધપૂરમાં બે માસ રહ્યા અને ત્યાંના આગળ વધેલા વિચારના કેળવાયલા જૈનોને જૈન ધર્મનું રહસ્ય સમજાવ્યું. એ બાદ તેઓએ શ્રી કાપરડાજીના સાત માલના દહેરાસરની જાત્રા કરી અને તે બાદ અનેક ગામોને લાભ આપતાં બીલાડા ગામે પધાર્યા. ત્યાં ગુરુમહારાજ સાથે મુનિશ્રી ક્ષમાવિ- જયજીએ બે માસ સ્થિરતા કરી. આ બધી વખત મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજની તબિયત સારી ન હોવાથી તેમની સેવા-ચાકરી બધા સાધુઓ કરતાં હતાં અને શ્રી ક્ષમાવિજયજી મહારાજ વ્યાખ્યાન વાંચતા હતાં. આ પછી બધા વિહાર કરતાં હતાં. પીપાડ સીટીના જૈનોની વિનંતિ આવી કે ચાતુર્માસ પીપાડ સીટી (સોટી મારવાડ)માં કરવા પધારવું. આથી વિહાર તે તરફ થયો અને વૈશાખ શુદ ૪ના દિવસે પીપાડ સીટીમાં પ્રવેશ કર્યો. ત્યાં ચાતુર્માસ પૂરું થયા પછી ચાદના એક શ્રાવક ત્રણ થોઈની સુનિ દિક્ષા લઈને શ્રી હરિવિજયજી થયા બાદ તે યોગ્ય ન લાગવાથી મુનિરાજને કહેડાવ્યું કે મારે ચાર થોઈની દીક્ષા લેવી છે. ગુરુમહારાજે તે દીક્ષા આપવા હા પાડી–ગુરુમહારાજ શિષ્યો સાથે ચાતુર્માસ ઉતરતાં સંવત્ ૧૯૮૬ ના કારતક વદ ૩ને દિવસે પીપાડથી વિહાર કરી સોજત પધાર્યા. ત્યાં ઉપલા મુનિ શ્રી હીરવિજયજી આવી પડ્યાં. અહિં તેમને માગસર સુદ ૬ને દિને ચાર થોયની મુનિ- દીક્ષા આપવામાં આવી અને તેમનું નામ હિમ્મતવિજયજી રાખવામાં આવ્યું. એ પછી બધા મુનિરાજે વિહાર કરતાં કરતાં લુણાવા પધાર્યા. ત્યાં સાદડીના ભાઈઓએ અતિ આગ્રહ ભરી વિનંતિ કરવાથી ગુરુ- મહાજ અને બીજા મુનિરાજેએ સાદડી તરફ વિહાર કર્યો. સાદડીમાં ચાતુર્માસ, આ રીતે સંવત્ ૧૯૮૯નું ચાતુર્માસ મુનિરાજ શ્રી અનિવિજયજી મહારાજે બીજા મુનિરાજે સાથે સાદડીમાં કર્યું. અહિં જુવાન પક્ષે મુનિરાજોને હેરાન કરવા અનેક ઉપાયો યોજ્યા છતાં શ્રદ્ધાળુ વર્ગની મોટી સંખ્યા હોવાથી પર્યુષણ પર્વ અને ચાતુર્માસ સારી રીતે પૂર્ણ થયા. પણ ગુરુમહારાજને અહિં શરદી લાગુ પડી અને તાવની બિમારી પણ શરૂ થઈ. સંવત્ ૧૯૮૭ ના કારતક વદમાં સાદડીથી બધા મુનિરાજેએ વિહાર કર્યો અને અનેક ગામોની ફર્સના કરતાં સંવત્ ૧૯૮૭માં બધા પાલી પધાર્યા. અહિં ગુરુમહારાજને તાવ વધ્યો અને અનેક વિદ્યાની દવા કરવા છતાં તેમની તબિયત ન સુધરી. પાલીની હોસ્પીટલમાં જોધપૂરના ડોકટર જવેરીલાલ હતા. તેઓશ્રાવક હતાં તેઓએ પણ તેમની દવા અતિ ભક્તિપૂર્વક કરી. આટલી બધી તજવીજ છતાં ગુરુમહારાજની તબીયત સુધરી નહિ અને તેથી પાલીના અને આસપાસના ઘણુ ગામના શ્રાવકો તેમની ખબર પુછવા આવવા લાગ્યા. ત્યારથી તબીયત બગડી ત્યારની ગુરુમહારાજ દરરોજ ૧૦થી ૧૫ બધી નકારવાલી ગણતા હોવાથી તેઓએ એ મુદત દરમિ- થાન થી ૭ લાખ નવકાર મંત્રનો જાપ કર્યો હતો એમ ધારવામાં આવે છે. પાલીમાં ચાતુર્માસ, એ વખતે પણ આસપાસના ગામોમાંથી ચાતુર્માસ માટે ઘણી વિનંતિઓ થઈ પણ પાલીના સંઘના આગ્રહથી સંવત્ ૧૮૭નું ચાતુર્માસ પાલીમાંજ થયું. એ ચાતુર્માસમાં મુનિરાજ શ્રી ક્ષમાવિજયજી મહા- રાજે વ્યાખ્યાન વાંચવાનું ચાલુ રાખ્યું અને ગુરુભક્તિ અતિઉત્સાહથી કરી ગુરુમહારાજની સેવા ચાકરી કરી. એ ઉપરાંત બીજા મુનિરાજે પણ આખો દિવસ સેવામાં ઉભે પગે હાજર હતાં. દવાદારૂ ઘણા કર્યા પણ દવાની ટીકી ન જ લાગી ગુરુમહારાજની તબિયત દિવસે દિવસે વધુ બગડતી ગઈ. આખરે તેમને શય લાગુ પડયો. આ બધો વખત ગુરુમહારાજ નવકાર મંત્રનો જાપ કર્યા કરતાં અને અતિ શાતિથી શરીરના વ્યાધીને સહન કરતાં હતાં. તેઓ બહુજ શાંત ચિત્તથી બધા સાથે પોતાનો સમય ગાલતાં અને વખતો વખત ધર્મદેશને પણ સંભળાવતા. આખરે શ્રાવણ વદ ૩ની રાત્રે આશરે વીસ દિવસ સંથારા પર રહ્યા બાદ, પ્રતિક્રમણ કર્યા બાદ અને સંથારપારસી ભણવ્યા બાદ નવકારમંત્રનો જાપ કરતાં કરતાં રાત્રે સાડા નવ વાગે તેઓશ્રીએ પ્રાણ ત્યાગ કર્યો. એ વખતે મુનિશ્રી ક્ષમાવિજયજી આદિ મહારાજે તેમની સાથે જ હતાં અને તેઓએ પણ તેમને નવકાર મંત્ર સંભળાવ્યા હતા. અને પાલીના ભાવિક શ્રાવકોએ તેમની અંતિમકિયા તથા તે પછી અઠ્ઠાઈઓચ્છવ આદિ ઉજવી પોતાની લક્ષ્મીને સાર્થક કરી હતી, ગુરુજીના ઉપકાર વિષે પંજાબી વલીહુકમચંદજીનો પત્ર, પંજાબથી વલી શ્રીહુકમચંદજી એક પત્રમાં નીચે પ્રમાણે લખે છે – અમિવિજયજી મહારાજ સવત ૧૭૩ માં માલર કોટલા પધાર્યા હતાં ત્યારે સંઘના અતિ આગ્ર- હથી તેઓએ ચાતુર્માસ માલર કોટલામાં જ કર્યું. પર્યુષણ પર્વમાં ગુજરાતી શ્રાવણવદિ ૧૪ને દહાડે શ્રી કલ્પસૂત્રનો વરઘોડો કાઢવામાં આવ્યો હતો તે વરઘોડો મોતીબજારમાં થઈ ગામમાં ફરી લાલા રામપ્ર- સાદ કિશોરલાલ મલેરીને ત્યાં ઉતર્યો હતો. માલર કોટલામાં આવે વરઘોડો પ્રથમ હોવાથી મોટી ધામધુમથી એ વરઘોડે કાઢવામાં આવ્યો હતો અને તેમાં ગામના ઘણા સજ્જનોએ ભાગ લીધો હતો, એ દિવસે રાત્રે જાગરણ કરવામાં આવ્યું હતું અને આખી રાત્રી, પ્રભુતુતિ અને સ્તવન ગાવામાં જનતાએ પસાર કરી હતી. બીજે દિવને લાલા શ્રી રામપ્રસાદ મલેરીને ઘેરથી કલ્પસૂત્રને વરઘોડો ઉપાશ્રયે જવા નીકળ્યો હતો, તે વખતે મોટી ધામધુમ થઈ હતી. એ વરઘોડામાં પ્રભુપુજાની સામગ્રી મોટા થાળમાં રાખીને, અને ચૌદ સુપને માથે ઉચકીને સ્ત્રીઓ ચાલતી હતી. ત્યારે શ્રાવકોનાં ભજનમંડળ વાજીંત્ર અને વાદ સાથે ગાતાં બજાવતાં હતાં. આસપાસના ગામોના ઘણા સ્ત્રીપુરુષો એ વરઘોડામાં જોડાવા આવ્યા હતા વીસસ્થાનની પૂજા દહેરાસર આગળ વરઘોડે ઉતર્યા બાદ સર્વે અંદર પધાર્યા હતાં અને વિસ સ્થાનકની પૂજા ભણાવવામાં આવી હતી. એ પૂજા બાદ પ્રભવના થઈ હતી. સંવત્સરીનો દિવસ પણ મહોત્સવ પૂર્વક ઉજવવામાં આવ્યો હતો. બીજે દિવસે લાલ રામપ્રસાદ કિશોરીલાલ તરફથી સ્વામીવત્સલ કરવામાં આવ્યું હતું અને સંવરીબાનાં પારણા વૃતધારીઓએ કર્યા હતા.

૧૫ ગામ કુસંપ દૂર કર્યો ચાતુર્માસ દરમિયાન અમિવિજ્યજી મહારાજે શ્રાવકોને પ્રેમભર્યો ઉપદેશ આપવાના પરિણામે ગામના શ્રાવકો વચ્ચે ચાલતો વરસોનો કુસંપ દૂર થયો હતો. દહેરાસરના ચોપડાઓનો હિસાબ ચોકો કરવમાં આવ્યો હતો અને પર્યુષણ પર્વની તથા સુપનની તથા પારણાની રીતે ઉપજ થઈ હતી. પારણના દિવસે રાત્રિ જાગરણ પણ થયું હતું. સિદ્ધિગિરિનો પટ ચાતુર્માસ પૂરું થયું. કાર્તિકી પૂનમ આવી પહોંચી અને કુટીમાલેરીયામાં બાંધવામાં આવેલા શ્રી- સિદ્ધિગિરિના પટના દર્શન કરવા સંઘ, બેન્ડ સાથે મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજી પધાર્યા હતા. એ વખતે થયેલો ઠાઠ અનુપમ હતો. મુસલમાનો અને અન્ય દશાનીઓ જૈન થયાં શ્રી અમિવિજયજી મહારાજના ચાતુર્માસમાં દરરોજ વ્યાખ્યાન વખતે શ્રોતાઓની મોટી ઠેઠ જામતી હતી અને તેમાં વૈષ્ણવો, અગ્રવાલો વિગેરે પણ આવતાં હતાં. ખાસ ધ્યાન ખેંચનારી બિના એ હતી કે મહારાજશ્રીના વ્યાખ્યાનમાં મુસલમાનો પણ આવતાં હતાં. તેમના પર મહારાજશ્રીના વ્યાખ્યાનની અજબ અસર થતાં, તેઓ જૈનધર્મપ્રેમી બન્યા હતા. અગ્રવાલ વૈષ્ણવ શ્રી પાલામાલ કુન્દનલાલ, શુદ્ધ મૂતપૂજક જૈન બન્યા હતા અને અગ્રવાલો શ્રીરાયનમલ અને ગેંડામલ સ્થાનકવાસી શ્રદ્ધા છોડી મૂતપૂજક જૈન બન્યા હતા. મુનિશ્રીના ઉપદેશથી દહેરાસરમાં લગ્ન પ્રસંગે સારી રકમો મોકલવાની ગોઠવણ થઈ હતી અને તેથી દેહરાસરમાં સારી ઉપજ થઈ હતી.

વંશવૃક્ષ.
વિજ્યાનંદસૂરિજી મહારાજ ક
દીક્ષા. વિ. સં. ૧૯૩૨
ચારિત્રવિજયજી મહારાજ - દીક્ષા. વિ. સં. ૧૯૩૨
૨ અમીવિજયજી મહારાજ ન ૧કલ્યાણવિજયજી મહારાજ H
દીક્ષા. વિ. સં. ૧૯૫૦
૩ મયાવિજયજી મહારાજ |
૧ વિજયજી ૨ ગુણવિજયજી ૩ ભક્તિવિજયજી
મહારાજ દીક્ષા. મહારાજ દીક્ષા મહારાજ દીક્ષા.
વિ. સં. ૧૯૭૩
વિ. સં. ૧૯૭૯ વિ. સ. ૧૯૮૦
૪ ભાવવિજયજી
મહારાજ દીક્ષા.
વિ. સં. ૧૯૮૩
૫ હિંમતવિજયજી
મહારાજ પા દીક્ષા.
વિ. સ. ૧૯૮૬
૧ લાભ વિજયજી મહારાજ વિ. સંવત્ ૧૯૮૯
૨ માણેકવિજયજી મહારાજ ૧૯૯૧
૩ અરૂણવિજયજી મહારાજ
૪ નાગેન્દ્રવિજયજી મહારાજ ૧૯૯૪
I
ક કાળ પમ પામ્યા છે.

ભાવાર્થ– T કર-સંઢ રસીધા કરી કલ્પવૃક્ષના પત્રો લઈને તોરણ બનાવો, કારણ કે સિદ્ધરાજ પૃથ્વીને જીત પ્રમાણે પોતાના ચારિત્રની જેમ વ્યાખ્યાથી વિભૂષિત તે શ્લોક સાંભળવાથી સંતુષ્ટ થઈ વ્યાકરણ રાજાના જોવામાં આવ્યું. એટલે તેણે ગુરુને પૂછયું કે આ શું છે? ત્યારે આચાર્ય મહારાજ અલકાર, નિમિત્ત, અને શાસ્ત્ર રચેલાં છે. ખાશિકા,રાજ,સિદ્ધ વક્ષ, વાસ્તુ ઉદયગઇ છે ડામણિ ગ્રંથ છે, વળી મેઘમાળા અને અર્થશાસ્ત્ર પણ છે, અને એ બધા ગ્રંથો તે રાજા અને એ પ્રમાણે સાંભળતાં સિદ્ધરાજ બોલ્યો કે “આપણું ભંડારમાં શું એ શામ નથી ! મહાભકિતથી રાજાએ નમ્રતા પૂર્વક પ્રભુને વિનંતી કરી કે હે ભગવન્! એક વ્યાકરસ - તમે અમારા મનોરથ પુરા કરો. હે મહર્ષિ! તમારા વિના એ મનોરથ પૂરવાને કોણ સમજી આ સમયમાં પ્રવર્તમાન થયેલ એ વ્યાકરણ સંક્ષિપ્ત છે, તેમ તેમાં શબ્દોની નિર્તિ પણ છે ય છે, તેથી બ્રાહ્મણ ગર્વ લાવીને એ જ * માટે હે મુનીશ્વર! વિશ્વજનોન ઉ' તમને કીર્તિ તથા પુણ્ય પ્રશ્ન થાય યા કે, અમને જે જ " પ્રશ્નવ્યાકરણટીકામાં પ્રકારના સત્યની વ્યાખ્યાના પ્રસંગે બાર પ્રકારનીલાયા આ પ્રમાણે સૂકવે प्राकृतसंस्कृतभाषा मागधपैशाचीशौरसेनी । पष्टोऽत्र भूरिमेदो देशविशेपादपभ्रंशः ॥ १ ॥ થે-પ્રાકૃત ૧ સંસ્કૃત ૨ માગધી ૩ પિશાચી ૪ શેરની ૫ અને દેશ વિદેશોના કારણે અનેક ભેદવાલી છઠ્ઠી અપભ્રંશ ભાષા છે. ઉપર જણાવેલ છ ભાષાઓમાં દરેકને અને એવાં બે વિભાગ પાડવામાં આવે એટલે ભાષાના બાર ભેટો થઈ જાય છે. પ્રશ્નવ્યાકરણે સૂત્રમાં જણાવેલ ૧૨ પ્રકારની ભાષાઓમાં સંસ્કૃત ભાષા ઉપર અનેક સ્ત્ર ઉપલબ્ધ છે અને પ્રાકૃતાદિભાવાઓ ઉપર પણ છુટાછવાયા વ્યાકરણ મલે છે. પરંતુ તે બધી ભાષાઓમાં સાંગોપાંગ સરલ વ્યાકરણ બનાવનાર તથા તેને કશો (અભિધાનચિંતામણિઅનેકાર્થ-પરિશિષ્ટ -લિંગાનુશામત--દેશીનમાલ) કાવ્યાનુશાસન-છબ્દાનુશાસન પ્રમાણમીમાંસા આદિથી સમૃદ્ધ કોઈ વિદ્વાન થયા હોય તો તે મહર્ષિ હેમચંદ્રસૂરિ મહારાજ થયા છે કે જેમણે સિદ્ધરાજ સિંહના દૂર કરવા સાથે ગુજરાતનું મુખ ઉત્તલ બનાવ્યું છે, એટલું જ નહીં પરંતુ પૂર્વ તથા પશ્ચિમ દરેક વિદ્યાભિલાવિઓ માટે એટલી બધી સુગમતા કરી છે કે વર્ણમાલાના જ્ઞાનથલઈ મહાવિદ્વાન્ થઇ છે ફકત એમનું જ શરણું લેવામાં આવે તો બીજા કોઈની પાસે શિક્ષણ લેવા જવાની જરૂર ન રહે હેમચંદ્રને વ્યાકરણાદિંરચવાનો પ્રસંગ આ રીતે સાંપડે છે (પ્રભાવક ચરિત્ર ભાષાન્તર-પુષ્ટ રન શ્રીમવ્યાકરણની ઉત્પત્તિ વિગેરે પછી એકદા માલવદેશને જીતીને સિદ્ધરાજ પોતાની રાજધાનીમાં આવ્યો ત્યારે બહાર ઓએ તેને આશિષ આપીએટલે કાના ભડાર એવા શ્રી હેમચંદ્રસૂરિ ત્યાં અભ્યશ્રમતિથી ; શ્રવણીય કાવ્યથી આશિષ આપતા બોલ્યા કે-હે કામધેનુ તું તારા ગોમયરસથી ભૂમીને હીં રત્નાકર તું મોતીઓથી સ્વસ્તિક પુરી દે, હે ચંદ્રમા તું પૂર્ણ કુંભ બની જા, હે ગિને, તમે જ છે. રાજ તેમને વારંવાર પોતાના રાજભવનમાં બોલાવવા લાગ્યો.” “એકદા અવંતીના ભંડારમાં રહેલા પુસ્તકો ત્યાંના નિયુકત પુરૂએ બતાવતાં તેમાં એક કે એ ભજવ્યાકરણ શબ્દશાસ્ત્ર તરીકે પ્રવર્તમાન છે. વિદ્વાનોમૌશિરોમણીએ માલવપતિ અધ્યાત્મ અને રવમ, તથા સામુદ્રિક શાસ્ત્રો પણ અહીં છે અને નિમિત્ત શાસ, વ્યાખ્યાન ગુર્જર દેશમાં શું કોઈ વિદ્વાન નથી? ત્યારે બધા વિદ્વાન મલીને શ્રી હેમચંદ્રસૂરિને એવા જ તથા પાણિનિનું વ્યાકરણ છે તે વેદના અંગ ઇશ કરે છે. કદાચ એક નવું વ્યાકરણ એમસ નારાજ થાય થી મને શ્રી દાને * લારની વન- કે પર ઉપોદઘાત विश्वहितबोधिदायकश्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः । રોજા રતાં વિમૂતાઃ' એ કહેવતને જેનો ઠેઠ અસંખ્યકાળ પહેલાં થએલાં પ્રથમ તીર્થંકર આદીશ્વર પ્રભુથી ચરિતાર્થ કરતા જ આવ્યા છે. જેમ તે પ્રભુએ જગતમાંથી અજ્ઞાન દૂર કરી આ લોક ને પરલોકમાં હિતકારી યાવત્ મોક્ષ પમાડનાર જ્ઞાન ભવ્યજીને આપ્યું તેમજ તેઓશ્રીના ગુણવંત ગણધરોએ તથા તે પ્રભુના પુત્રરત ભરત ચકે વર્તીએ પણ પ્રજાનું ધાર્મિક તથા નૈતિક જીવન ઉચ્ચ ધોરણનું બને તે માટેના જ્ઞાનનો પ્રચાર દ્વાદશાંગી તથા આર્યવેદો રૂપે કર્યો. તે પછીના તીર્થકર ગણધરાદિ મહાપુરૂષે પણ એવી જ રીતે પાછલા થનારાઓ માટે ઉત્તમ સામગ્રી મૂકતા ગયા. આ બધોએ ઉપકાર ગ્રુતજ્ઞાન દ્વારાજ થઈ શકે છે, કેમકે મનુષ્યો પાસે એક બીજાને પોતાના અભિપ્રાય જણાવવાનું મુખ્ય સાધન લખાતી અથવા બોલાતી ભાષાજ છે. તે ભાષા જેટલી શુદ્ધ તથા વ્યવસ્થિત હોય તેટલી જ અધિક લાભ આપનારી નીવડે છે. ભાષાને વ્યવસ્થિત રાખનાર સૌથી મુખ્ય સાધન વ્યાકરણ છે કે જે અનેક મનુષ્યોને એકજ વ્યવસ્થિત ઢબે બોલવાની તથા લખવાની ફરજ પાડે છે અને તે ઢબને ઉલંઘનાર ભોટ અને નિરક્ષર કહેવાય છે? એટલા ખાતર જ એક પ્રાચીન પુરુષે પોતાના પુત્રને ભલામણ કરી છે કે- 'यद्यपि वहु नाधीपे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् । खजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत्' ॥ १ ॥ ભાવાર્થ–હે પુત્ર ને તું બહુ ન ભણે તોપણ વ્યાકરણ ભણ જેથી સ્વજન (સંબંધી) ધજન (કુતરાનો વર્ગ ), સકલ (સંપૂર્ણ) શકલ (ટુકડો), સકૃત (એકવાર) શકૃત (વિકા) ન થઈ જાય અર્થાત્ ઉપરના ત્રણે શબ્દોમાં જે દત્ય સરકારને સ્થાને તાલવ્ય શકાર બોલાઈ જાય તો અર્થનો અનર્થ થઈ જાય છે અને તે જાતની ભૂલોથી બચાવનાર વ્યાકરણ જ છે. લીલાવતીકાર ભાસ્કરાચાર્ય સિદ્ધાન્ત શિરોમણિમાં કહ્યું છે કે – यो वेदवेदवदनं सदनं हि सम्यक् ब्रायाः स वेदमपि वेद किमन्यशास्त्रम् । यस्मादतः प्रथममेतद्धीत्य धीमान् शास्त्रान्तरस्य भवति श्रवणेऽधिकारी ॥१॥ ભાવાર્થ—જેણે વેદના સુખરૂપ સરસ્વતીના ઘર વ્યાકરણને સારી રીતે જાણ્યું, તે વેદ પણ જાણું ગયોઃ બીજા શાસ્ત્રોની વાત જ શી કરવી? આમ વસ્તુસ્થિતિ હોવાથી વ્યાકરણ જાણ્યા પછી જ બુદ્ધિમાનું બીજા શાસ્ત્રો સાંભળવાનો અધિકારી થઈ શકે છે. આથી જણાઈ આવશે કે શ્રોતા તરીકેની યોગ્યતા મેલવવા માટે પણ વ્યાકરણ ભણવાની આવશ્યકતા છે, એમ મતાંતરોએ પણ સ્વીકારેલું છે. તથા પ્રશ્નવ્યાકરણસૂત્રમાં સત્ય કેવી રીતે બોલવું તેના ઉત્તરમાં નામ આખ્યાત વગેરે વ્યાકરણના વિ- ભાગના યથાર્થ ઉપયોગ-પૂર્વક સત્ય બોલવાનું શ્રી મહાવીર ભગવાને ફરમાવેલ છે. આમ લૌકિક અનેલોકોત્તર બંન્ને માર્ગમાં વ્યાકરણના જ્ઞાનની આવશ્યકતા છે. એથી જ વ્યાકરણને મોક્ષના સાધનરૂપે લખાવ્યું છે. व्याकरणात् पदसिद्धिः पदसिद्धरर्थनिश्चयो भवति । अर्थात्तत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानात् परं श्रेयः ॥ १॥ ભાવાર્થ–ચાકરણથી પદની સિદ્ધિ થાય છે, પદ સિદ્ધિથી અર્થનો (કર્તા આદિન) નિશ્ચય થાય છે, અર્થ નિશ્ચયથી તત્વનું સાન થાય છે, તત્વજ્ઞાનથી પરમ શ્રેય-પરમ કલ્યાણ મોક્ષની પ્રાપ્તિ થાય છે ૧ આચારાંગ આદિ અગ્યાર અંગો તથા બારમા અંગમાં ચૌદ પૂર્વ તથા દૃષ્ટિવાદનો સમાવેશ થાય છે. રરીખવદેવજી ભગવાને પુરૂષોની બોત્તર કલા, સ્ત્રીઓની ચોસઠ કલા તથા પ્રજાને આવશ્યક શિલ્પાદિ શીખવી પોતાનું રાજ્ય પોતાના સે પુત્રોને દેવરભળાવદીક્ષા લીધી, તે પછી તેમના મુખ્ય પુત્ર ભરત ખંડમાં વહેંચાલ ભરત ક્ષેત્રના બત્રીસ હજાર દેશ ઉપર પોતાની રાજ્યસત્તા પ્રસરાવી. પ્રજાને એક છત્ર નીચે સુખ ભોગવતી કરી, અને તે પ્રકામાં સત્ય જ્ઞાનના પ્રચાર ધર્મ અર્થ કામ અને મોક્ષ એ ચારે પુરૂવારે યથાર્થ રીતે લખાવનાર ચાર આર્ય વેદો પ્રસરાવ્યા. હિંસક અનાદિ તો વીશ તીર્થકરના થયા પછી જ પ્રચાર પામેલ છે. ૩ બેલાતી અથવા લખાતી ભાષા દ્વારા જે જ્ઞાન ઉત્પન્ન થાય છે તે, ૪ ગણધર શ્રી સુધર્માસ્વામીએ ગુંથેલી દ્વાદશાંગી પૈકીનું દશમું અંગ. ૫ વર્ણમાલાના અક્ષરો, તથા અક્ષર સમુદાય વિભક્તિ આદિ લાગી પદરૂપ બને છે ત્યારે જ અર્થ આપનાર થાય છે.

ન્યાયાનિધિ શ્રીમદ્ વિજવાનદ સૂરિશ્વરજી શિષ્યરત્ન શ્રીમરિત્રવિજયજી
વિનયન શ્રીઅમીવિજયજી મહારાજ શિષ્યરત્ન પરમપૂજ્ય ઉપાધ્યાયજી
મહારાજશ્રી ક્ષમાવિજયજી ગણિવર
-
}
UPADHYAYAJI SHREE KSHAMAVIJAYAJI GANI
હું :
-
કો,
v"
જ મ-વિ સ ૧૯૫૮
માગશર સુદી
જ ણ (૫ જબ)
૫ પામપરિ સ ૧૯૯૯
ફગણ સુદી ૪
રાજનગર (અમદાવાદ)
દીકા-વિ સ ૧
અસાડ સુદી ૨
બીકાનેર (
ઉપાધ્યાયપદ-વિ સ ૧૯૯૨
વિશાખ સુદી ૬
(મુંબઈ)

ન્યાયાનિધિ શ્રીમદ્ વિજયાનંદ સૂરિશ્વરજી શિષ્યરત્ન શ્રીમચ્ચારિત્રવિજયજી
વિનયન શ્રીઅમીવિજયજી મહારાજ શિષ્યરત્ન પરમપૂજ્ય ઉપાધ્યાયજી
મહારાજશ્રી ક્ષમાવિજયજી ગણિવર.
f
UPADHYAYAJI SHREE KSHAMAVIJAYAJI GANI
धीमत् उपाध्यायजी महाराज क्षमाविजयजी एपी
ASWEDAMNANGNAS
-
C
/
જમ-વિ સ ૧૯૫૮
માગશર સુદી
જામપદ-વિ સ ૧૯૯૯
૧મિ સુધી ૪
રાજનગર (અમદાવાદ)
દીમા-વિ. સ ૧૯૭૩
અસાડ દી ૨
બીકાનેર (માવા)
ઉપાખ્યાયપદ-વિ સ. ૧૯૯૨
વિશાખ સુદી ૬
(મુંબઈ)

ઉપઘાત विश्वहितबोधिदायकश्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः । “પવરાર સત્તાં વિમૂત્તા એ કહેવતને જૈને ઠેઠ અસંખ્યકાળ પહેલાં થએલાં પ્રથમ તીર્થકર આદીશ્વર પ્રભુથી ચરિતાર્થ કરતા જ આવ્યા છે. જેમ તે પ્રભુએ જગતમાંથી અજ્ઞાન દૂર કરી આ લોક ને પરલોકમાં હિતકારી યાવત્ મોક્ષ પમાડનાર જ્ઞાન ભવ્યજીને આપ્યું તેમજ તેઓશ્રીના ગુણવંત ગણધરોએ તથા તે પ્રભુના પુત્રરત્ન ભરત ચક્રવર્તીએ પણ પ્રજનું ધાર્મિક તથા નૈતિક જીવન લગ્ન ધોરણનું બને તે માટેના જ્ઞાનનો પ્રચાર દ્વાદશાંગી તથા આર્યવેરો રૂપે કર્યો. તે પછીના તીર્થકર ગણુધરાદિ મહાપુરૂષો પણ એવી જ રીતે પાછલા થનારાઓ માટે ઉત્તમ સામગ્રી મૂકતા ગયા. આ બધોએ ઉપકાર શ્રુતજ્ઞાન દ્વારાજ થઈ શકે છે, કેમકે મનુષ્યો પાસે એક બીજાને પોતાના અભિપ્રાય જણાવવાનું મુખ્ય સાધન લખાતી અથવા બોલાતી ભાષા જ છે. તે ભાષા જેટલી શુદ્ધ તથા વ્યવસ્થિત હોય તેટલી જ અધિક લાભ આપનારી નીવડે છે. ભાષાને વ્યવસ્થિત રાખનાર સૌથી મુખ્ય સાધન વ્યાકરણ છે કે જે અનેક મનુષ્યોને એકજ વ્યવસ્થિત ઢબે બોલવાની તથા લખવાની ફરજ પાડે છે અને તે ઢબને ઉલંઘનાર ભોટ અને નિરક્ષર કહેવાય છે? એટલા ખાતર જ એક પ્રાચીન પુરુષે પોતાના પુત્રને ભલામણ કરી છે કે 'यद्यपि बहु नाधीपे तथापि पट पुत्र व्याकरणम् । स्त्रजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत् ॥ १ ॥ ભાવાર્થ...હે પુત્ર જે તું બહુ ન ભણે તોપણ વ્યાકરણ ભણુ જેથી સ્વજન (સબંધી) ધજન (કુતરાને વર્ગ), સકલ (સંપૂર્ણ) શકલ (ટો), સકૃત (એકવાર) શકૃત્ (વિટા) ન થઈ જાય. અર્થાત્ ઉપરના ત્રણે શબ્દોમાં જે દત્ય સકારને સ્થાને તાલવ્ય શિકાર બોલાઈ જાય તો અર્થનો અનર્થ થઈ જાય છે અને તે જાતની ભૂલોથી બચાવનાર વ્યાકરણ જ છે. લીલાવતીકાર ભાસ્કરાચાર્યે સિદ્ધાન્ત શિરોમણિમાં કહ્યું છે કે यो वेदवेदवदनं सदनं हि सम्यक् ब्रायाः स वेदमपि वेद किमन्यशास्त्रम् । यस्मादतः प्रथममेतदधीत्य धीमान शास्त्रान्तरस्य भवति श्रवणेऽधिकारी ॥१॥ ભાવાર્થ—જેણે વેદના મુખરૂપ સરસ્વતીના ઘર વ્યાકરણને સારી રીતે જાણ્યું, તે વેદ પણ જાણું ગયોઃ બીજા શાસ્ત્રોની વાત જ શી કરવી? આમ વસ્તુસ્થિતિ હોવાથી વ્યાકરણ જાણ્યા પછી જ બુદ્ધિમાનું બીજા શાસ્ત્રો સાંભળવાનો અધિકારી થઈ શકે છે. આથી જણાઈ આવશે કે શ્રોતા તરીકેની યોગ્યતા મેળવવા માટે પણ વ્યાકરણ ભણવાની આવશ્યકતા છે, એમ મતાંતરોએ પણ સ્વીકારેલું છે. તથા પ્રશ્નવ્યાકરણસૂત્રમાં સત્ય કેવી રીતે બોલવું તેના ઉત્તરમાં નામ આખ્યાત વગેરે વ્યાકરણના વિ- ભાગના યથાર્થ ઉપયોગ–પૂર્વક સત્ય બોલવાનું શ્રી મહાવીર ભગવાને ફરમાવેલ છે. આમ લૌકિક અને લોકોત્તર બંન્ને માર્ગમાં વ્યાકરણના જ્ઞાનની આવશ્યકતા છે. એથી જ વ્યાકરણને મોક્ષના સાધનરૂપે લખાવ્યું છે. व्याकरणात् पदसिद्धिः पदसिद्धेरर्थ निश्चयो भवति । अर्थात्तत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानात् परं श्रेयः॥१॥ ભાવાર્થ-વ્યાકરણથી પદની સિદ્ધિ થાય છે, પદ સિદ્ધિથી અર્થનો (કર્તા આદિનો નિશ્ચય થાય છે, અર્થ નિશ્ચયથી તત્ત્વનું જ્ઞાન થાય છે, તત્વજ્ઞાનથી પરમ શ્રેય–પરમ કલ્યાણ મોક્ષની પ્રાપ્તિ થાય છે. ૧ આચારાંગ આદિ અગ્યાર અંગે તથા બારમા અંગમાં ચૌદ પૂર્વ તથા દૃષ્ટિવાદનો સમાવેશ થાય છે. ૨ રીખવદેવજી ભગવાને પુરૂષોની બોત્તેર કલા, સ્ત્રીઓની ચોસઠ કલા, તથા પ્રજાને આવશ્યક શિલ્પાદિ શીખવી પોતાનું રાજ્ય પોતાના સો પુત્રોને દેશવાર ભળાવી દીક્ષા લીધી, તે પછી તેમના મુખ્ય પુત્ર ભરતે છ ખંડમાં વહેંચીએલ ભરત ક્ષેત્રના બત્રીશ હજારે દેશો ઉપર પોતાની રાજ્યસત્તા પ્રસરાવી. પ્રજાને એક છત્ર નીચે સુખ ભગવતી કરી, અને તે પ્રકામાં સત્ય જ્ઞાનના પ્રચારાર્થે ધર્મ અર્થ કામ અને મોક્ષ એ ચારે પુરવાને યથાર્થ રીતે ઓલખાવનાર ચાર આર્ય વેદો પ્રસરાવ્યા. હિંસક અનાર્ય વેદો તો વીરામાં તીર્થકરના થયા પછી જ પ્રચાર પામેલ છે. ૨ બોલાતી અથવા લખાતી ભાષા દ્વારા જે જ્ઞાન ઉત્પન્ન થાય છે તે, ૪ ગણધર શ્રી સુધમાસ્વામીએ થેલી દ્વાદશાંગી પૈકીનું દશમું અંગ. ૫ વર્ણમાલાના અક્ષરો, તથા અદાર સમુદાયો વિસતિઆદિલાગીપદરૂપને છે ત્યારેજ આપનાર થાય છે.

5 પ્રશ્નવ્યાકરણટીકામાં બાર પ્રકારના સત્યની વ્યાખ્યાના પ્રસંગે બાર પ્રકારની ભાષા આ પ્રમાણે સૂચવેલ છે. પ્રાતત્તમાન માનવજીવનની વા षष्ठोऽत्र भूरिभेदो देशविशेषादपभ्रंशः ॥ १ ॥ ભાવાર્થ–પ્રાકૃત ૧ સસ્કૃત ૨ માગધી ૩ પૈશાચી જ શરતેની ૫ અને દેશ વિશેષના ભેદના કારણે અનેક ભેદવાલી છઠ્ઠી અપભ્રંશ ભાષા છે ઉપર જણાવેલ છ ભાષાઓમાં દરેકના ગદ્ય અને પદ્ય એવા એબે વિભાગ પાડવામાં આવે એટલે ભાષાના બાર ભેદ થઈ જાય છે. પ્રશ્નવ્યાકરણ સૂત્રમાં જણાવેલ ૧૨ પ્રકારની ભાષાઓમાં સંસ્કૃત ભાષા ઉપર અનેક વ્યાકરણ ઉપલબ્ધ છે, અને પ્રાકૃતાદિ ભાષાઓ ઉપર પણ છુટા છવાયા વ્યાકરણ મલે છે. પરંતુ તે બધી ભાષાઓનું સંપૂર્ણ સાગપાગ સરલ વ્યાકરણ બનાવનાર તથા તેને કોશ (અભિધાનચિંતામણિ અનેકાર્થ–પરિશિષ્ટ-નિઘ -લિંગાનુશાસન-દેશીનમમાલા) કાવ્યાનુશાસન-છબ્દોનુશાસન પ્રમાણુમીમાંસા આદિથી સમૃદ્ધ કરનાર જે કોઈ વિદ્વાન થયા હોય તો તે મહર્ષિ હેમચંદ્રસૂરિ મહારાજ થયા છે કે જેમણે સિદ્ધરાજ જયસિંહના ખેદને દૂર કરવા સાથે ગુજરાતનું મુખ ઉજવલ બનાવ્યું છે, એટલું જ નહીં પરંતુ પૂર્વ તથા પશ્ચિમ દરેક દેશના વિદ્યાભિલાષિ માટે એટલી બધી સુગમતા કરી છે કે વર્ણમાલાના જ્ઞાનથી લઈ મહાવિદ્વાન થવા માટે ફક્ત એમનું જ શરણુ લેવામાં આવે તો બીજા કોઈની પાસે શિક્ષણ લેવા જવાની જરૂર ન રહે. મહર્ષિ હેમચને વ્યાકરણાદિ રચવાને પ્રસંગ આ રીતે સાંપડે છે (પ્રભાવક ચરિત્ર ભાષાન્તર–પૃષ્ટ ર૯૧-૨૨). શ્રીહૈમવ્યાકરણની ઉત્પત્તિ વિગેરે પછી એકદા માલવદેશને જીતીને સિદ્ધરાજ પોતાની રાજધાનીમાં આવ્યો ત્યારે બધા દર્શન- ઓએ તેને આશિષ આપી એટલે કલાના ભડાર એવા શ્રી હેમચંદ્રસૂરિ ત્યા અવ્યગ્રમતિથી અત્યંત શ્રવણીય કાવ્યથી આશિષ આપતા બોલ્યા કે-હે કામધેનુ તારા ગોમયરસથી ભૂમીને લીપી કહુડ, રત્નાકર તું મોતીઓથી સ્વસ્તિક પુરી દે, હે ચંદ્રમા તું પૂર્ણ કુભ બની જા, હે દિગ્ગજો, તમે પોતાના કર-સૂંઢ સીધા કરી કલ્પવૃક્ષના પત્રો લઈને તોરણે બનાવો, કારણ કે સિદ્ધરાજ પૃથ્વીને જીતીને આવે છે એ પ્રમાણે પોતાના ચારિત્રની જેમ વ્યાખ્યાથી વિભૂતિ તે લૈક સાભળવાથી સંતુષ્ટ થએલ સિદ્ધ રાજ તેમને વારંવાર પોતાના રાજભવનમાં બોલાવવા લાગ્યો.” એકદા અવતીના ભડારમા રહેલા પુસ્તકો ત્યાના નિયુક્ત પુરૂષોએ બતાવતાં તેમાં એક લક્ષણશાસ્ત્ર- વ્યાકરણરાજના જોવામાં આવ્યું એટલે તેણે ગુરુને પૂછયું કે આ શું છે ત્યારે આચાર્ય મહારાજ કહેવા લાગ્યા કે એ “ભજવ્યાકરણ’ શબ્દશાસ્ત્ર તરીકે પ્રવર્તમાન છે. વિદ્વાનોમાં શિરોમણી એ માલવપતિએ શબ્દશાસ્ત્ર, અલંકાર, નિમિત્ત, અને તર્કશાસ્ત્ર રચેલાં છે. તેમજ ચિકિત્સા, રાજ, સિદ્ધાત, વૃક્ષ, વાસ્તુ ઉદય, અક,શકુન અધ્યાત્મ, અને સ્વમ, તથા સામુદ્રિક શાસ્ત્ર પણ અહીં છે. અને નિમિત્ત શાસ્ત્ર, વ્યાખ્યાન અને પ્રશ્નચે ડામણિ ગ્રંથો છે, વળી મેઘમાળા અને અર્થશાસ્ત્ર પણ છે, અને એ બધા ગ્રંથો તે રાજાએ બનાવેલ છે.) “એ પ્રમાણે સાભળતાં સિદ્ધરાજ બોલ્યો કે “આપણુ ભડારમાં શું એ શાસ્ત્રો નથી ? સમસ્ત ગુર્જર દેશમાં શું કોઈ વિદ્વાન્ નથી? ત્યારે બધા વિદ્વાનો મલીને શ્રી હેમચંદ્રસૂરિને જોવા લાગ્યા એટલે મહાભક્તિથી રાજાએ નમ્રતા પૂર્વક પ્રભુને વિનંતી કરી કે હે ભગવન્! એક વ્યાકરણશાસ્ત્ર બનાવીને તમે અમારા મનોરથ પુરા ક હે મહર્ષિ! તમારા વિના એ મનોરથ પૂરવાને કોણ સમર્થ છે? વલી આ સમયમાં પ્રવર્તમાન થયેલ એ વ્યાકરણ સંક્ષિપ્ત છે, તેમ તેમા શબ્દોની નિષ્પત્તિ પણ તેવી નથી તથા પાણિનિનું વ્યાકરણ છે તે વેદના અગરૂપ મનાય છે, તેથી બ્રાહ્મણ ગર્વ લાવીને એ વ્યાકરણપર ઈબ્ધ કરે છે. કદાચ તે વિપ્રો નારાજ થાય તો તેથી શુ માટે હે મુનીશ્વર ! વિશ્વજનોના ઉપકાર માટે એક નવું વ્યાકરણ બનાવો કે જેથી મને યશ મળે, અને તમને કીર્તિ તથા પુણ્ય પ્રાપ્ત થાય.” “એમ સાંભળીને બુદ્ધિનિધાન શ્રી હેમચંદ્રસૂરિ બોલ્યા કે—કાર્યોમાં અમને જે પ્રેરણા કરવી, તે તમારે કેવળ યાદ કરાવવા માટે જ છે, પરંતુ વ્યાકરણના આઠ પુસ્તકો છે, તે શ્રી ભારતી દેવીના ભંડારમાં છે તો તમારા માણસો મોકલીને તે કાશ્મીર દેશથકી મગાવો કે જેથી વ્યાકરણશાસ્ત્ર સારી રીતે રચી ૧ શ્રી પ્રભાચદ્રસૂરિએ રચેવા અનેક પ્રભાવક જૈન આચાર્યોને ગૌરવયુક્ત કાર્યો ઐતિહાસિક માહિતી સાથે વર્ણવનાર આ એક અપૂર્વ સસ્કૃત કાવ્ય પ્રથા છે, જેનું ભાષાન્તર થી આત્માનંદજૈનસભા (ભાવનગર)એ છપાવેલ છે. જેમાનો ઉપયુક્ત ભાગ અને આભાર સાથે અપાય છે તથા મૂલ નિર્ણયસાગર પ્રેસ (મુંબઈ) મા છપાયેલ છે.

છે શકાય. ગુરુનું એ વચન સાંભળતાં રાજાએ તરત જ પોતાના પ્રધાન પુરુષોને કાશ્મીર દેશમાં મોકલ્યા. તેઓ પ્રવર નામના નગરમાં પહોંચ્યા અને ભારતી દેવીને ચંદનાદિકથી પૂજીને સ્તુતિ પાઠ કરવા લાગ્યા. એટલે સંતુષ્ટ થયેલ દેવીએ પોતાના અધિષ્ઠાયકોને આદેશ કર્યો કે “શ્રી હેમચંદ્ર શ્વેતાંબર મારા પ્રસાદપાત્ર છે. એટલું જ નહિ પણ જાણે મારી બીજી મૂર્તિ રૂપે હોય એવા છે. માટે તેમના નિમિત્તે પ્રેગ્ય વર્ગને પુસ્તકો આપીને વિદાય કરો. પછી ભારતી દેવીએ તે પ્રધાન પુરૂનો સારો સત્કાર કરી તેમને પુસ્તકો અપાવ્યાં અને ઉત્સાહપૂર્વક વિદાય કર્યા. એટલે દેવીના પ્રસાદથી ભારે હર્ષથી રોમાંચિત થતા તે અલ્પ સમયમાં પોતાનાનગરમાં આવી પહોંચ્યા. ત્યાં એકનિષ્ઠાવાલા શ્રી હેમચંદ્રપ્રભુપર દેવીનો કેવો આદર અને સંતોષ છે તે તેમણે રાજાને નિવેદન કર્યું, જે સાંભળતાં ચમત્કાર પામેલ રાજા કહેવા લાગ્યો કે-અહો! હું અને મારો દેશ ધન્ય છે કે જ્યાં આવા સુજ્ઞ શિરોમણી ગુરુ બિરાજમાન છે. પછી શ્રી હેમચંદ્રસૂરિએ પણ તે આઠે વ્યાકરણનું અવલોકન કરીને શ્રી સિદ્ધહેમ નામે નવું અદ્ભુત વ્યાકરણ બનાવ્યું કે જે આઠ અધ્યાયના બત્રીશ પાદથી સંપૂર્ણ-ઉણાદિ, ધાતુપાઠ, લિંગાનુશાસન, સૂત્ર, સદવૃત્તિ નામમાલા અને અનેકાર્થના પાઠથી રમણીય છેઃ વલી સર્વે વ્યાકરણમાં જે મુગટ સમાન અને સમસ્ત વિદ્વાનોને આદર પાત્ર છે. પ્રથમના વ્યાકરણો બહુ વિસ્તીર્ણ હતાં, તેથી સમસ્ત આયુષ્યભરમાં પણ શીખી શકાય તેવાં નહોતાં અને તેથી પુરુ- પાર્થ સાધવામાં ખલના પમાડનાર હતાં તેમજ કેટલાક સંક્ષિપ્ત, દુધ અને દોષના સ્થાનરૂપ હતાં. તેથી આધુનિક વિદ્વાનોએ એ વ્યાકરણને પ્રમાણ કર્યું. તેના દરેક પદને અંતે એક એક શ્લોક છે, કે જેમાં મૂલરાજ તથા તેના પૂર્વજ રાજાઓનું વર્ણન કરવામાં આવેલ છે અને સર્વ અધ્યાયને અંતે ચાર શ્લોક છે તેમજ પાંત્રીશ શ્લોકમાં તેની પ્રશસ્તિ કરવામાં આવેલ છે. નગરનાં વિદ્વાનોએ તથા રાજાના પુરોહિતોએ તેનું ત્રણ વર્ષ સુધી વાંચન કર્યું. પછી તે પુસ્તક લખાવવાને માટે રાજાના નિયુક્ત પુરુષોએ સર્વસ્થાનો થકી ત્રણસેં લેખકોને બોલાવ્યા ત્યાં રાજાએ તેમને સારો સત્કાર કર્યો, એટલે પુસ્તકો લખાવતાં સર્વ દર્શનોના પ્રત્યેક અભ્યાસીને તે આપવામાં આવ્યાં. જેથી અંગ, બંગ, કલિંગ, લાટ, કર્ણાટક, કેકણ, મહારાષ્ટ્ર, સૌરાષ્ટ્ર, વત્સ, કચ્છ, માલવ, સિંધુ, સૌવીર, નેપાલ, પારસીક મુરંડક, ગંગા પારે હરદ્વાર, કાશી, ચેદિ, ગયા, કુરુક્ષેત્ર, કાન્યકુબ્સ, ગૌડ, શ્રી કામરૂપ, સપાદલક્ષ, જાલંધર, ખસ, સિંહલ, મહાબો, બોડ કૌશિક ઈત્યાદિ બધા દેશોમાં તે વ્યાકરણ ખૂબ વિસ્તાર પામ્યું. વલી રાજાએ ઉપનિબંધ સહિત વિશ પુસ્તકો અત્યાદર પૂર્વક કાશ્મીર દેશમાં મોકલ્યાં ત્યાં તે ભંડારમાં રાખવામાં આવ્યાં, કારણ કે સર્વ લોકો પોતાના વચનનો નિર્વાહ કરે છે તો દેવીની શી વાત કરવી?” હવે પોતાના કુલને શોભાવનાર એવો કાકલનામે એક કાયસ્થ હતો કે જે આઠ વ્યાકરણને અભ્યાસી અને પોતાની પ્રજ્ઞાથી શેષનાગને જીતનાર હતો. તેને જોતાંજ આચાર્ય એ શાસ્ત્રના તત્વાર્થને જાણનાર એવા તેને તરત જ અધ્યાપક બનાવ્યો.પછી પ્રતિમાસે જ્ઞાન પંચમીના દિવસે તે પ્રશ્નો પૂછી લેતો અને ત્યાં અભ્યાસમાં પ્રવૃત્ત થએલા વિદ્યાર્થીઓને રાજા કંકણક્રિથી વિભૂષિત કરતો એમ એ શાસ્ત્રમાં નિષ્પન્ન તૈયાર થયેલા જનોને રાજા રેશમી વસ્ત્રો, કનકભૂષણ, સુખાસન અને આતપત્રથી અલંકૃત કરતો હતો.” ઉપરની હકીકતથી જણાશે કે મહર્ષિ હેમચન્દ્ર સિદ્ધરાજની પ્રાર્થનાથી અનેક વ્યાકરણનું દોહન કરીને આ ઉત્તમ સરલ સંપૂર્ણ વ્યાકરણની રચના કરી અને સિદ્ધરાજે બ્રાહ્મણોની ઈષ્યની દરકાર કર્યા વગર સારી રીતે તેનો પ્રચાર કરાવ્યો. સિદ્ધરાજ પછી કુમારપાલ ગાદીએ આવતાં તેના રાજ્યમાં એ વ્યાકરણનો પ્રચાર સારી રીતે વૃદ્ધિ પામતો જણાય છે, કેમકે હેમચંદ્ર સૂરીશ્વરે સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસન ભણવાવાલાઓ વિશેષ વ્યુત્પન્ન બને તે ખાતર દ્વયાશ્રયકાવ્ય કુમારપાલના રાજ્યમાં રચ્યું છે–એટલું જ નહીં પણ સંસ્કૃત ભાષાના વિદ્વાન થઈ શૃંગારાદિ રસોથી પૂર્ણ કાવ્યો ભણે પોતાના જીવન બગાડવાને બદલે પ્રજાજનો આદર્શ સંસ્કૃતિવાલા બને તે ખાતર યોગશાસ્ત્ર અને ત્રિષષ્ટિશલાકા પુરુષચરિત્ર જેવા મહાન આદર્શ ગ્રન્થો રચી સન્માર્ગમાં વિચરવા ઈચ્છનાર વિદ્વાનો ઉપર હોટો ઉપકાર કર્યો છે. ૧ જેમાં ક્રમે કરી છએ ભાષા શીખવનાર ઉપરોક્ત વ્યાકરણના સૂત્રોના ઉદાહરણની સાથે સાથે જ ચૌલુક્ય વંશનું ઉત્તમ વર્ણન પણ સલંગ આવે છે. ૨ મહર્ષિ હેમચંદ્ર ચેલ સાહિત્ય એટલું વિશાલ હતું કે સંવત ૧૩૩૪ ની ચૈત્ર માસની શુકલ સપ્તમી પુનર્વસુ નક્ષત્ર શુક્રવારના દિવસે પૂર્ણ કરેલ પ્રભાવક ચરિત્રમાં તેના કર્તા પ્રભાચંદ્રસૂરિજી વર્ણવે છે (પૃ૪ ૩૧૪) કે, “તેમણે બનાવેલ ગ્રંથો કેટલા છે તેની સંખ્યા મલવી મહા મુશ્કેલ છે તો હારા જેવા મંદબુદ્ધિ તે ગ્રંથોના નામ પણ ક્યાંથી પણ ગુજરાતના અને પરંપરાએ આખા હિંદુસ્તાનના દુર્ભાગ્યે ઈતિહાસ અજબ પલટો ખાય છે. સિદ્ધરાજે વ્યાકરણ તૈયાર કરાવતી વખતે જે બ્રાહ્મણની ઈર્ષ્યા સામે બાથ ભીડી, તથા કુમારપાલે પણ જેને મચક ન આપી સાચા ગુણવાનું મહર્ષિની શક્તિઓનો પૂર્ણ લાભ પોતે લીધો તથા રાષ્ટ્રને અપાવ્યો, તે ઈર્ષાલુઓ સહન કરી શકશે નહીં અને તેઓને પડખે ચડેલા કુલકલંકી અજયપાલે કુમારપાલ મહા- રાજને ઝેર આપી મરાવ્યા; એટલું જ નહીં પણ પોતાની ત્રણ વર્ષની ટુંકી રાજકારકીદીમાં કુમારપાલ મહારાજે કરાવેલાં ઉત્તમ કાર્યો નાશ કર્યો, ગુજરાતના ગૌરવરૂપ અનેક શતનિબંધો રચી સંસ્કૃત સાહિત્યને સમૃદ્ધ બનાવનાર હૈમીય બ્રહસ્યાસની જેડને લઘુન્યાસ રૂપ૦૦૦ કલોક પ્રમાણુ રચનાર રામચંદ્ર સૂરિને, અને મંત્રિઓમાં મુકુટ સમાન કપર્દીમંત્રિ આદિને કમોતે મરાવ્યા એવા અનેક પાપ કરી અજયપાલ પોતાનાજ પ્રતિહારની છરીનો ભોગ થઈ પરલોક સિધાવ્યો પરંતુ તેણે પહેલા હૈધીભાવે પાટણની રાજગાદીને હચમચાવી મૂકી અને થોડા વર્ષમાં પાટણ ગુજરાતની રાજગાદી રૂપે મટી ગયું. વિરધવલ રાજાએ પોતાની રાજગાદી ધોલકામાં સ્થાપી. મંત્રીશ્વર વસ્તુપાલે તથા વીરશિરોમણિ તેજપાલે અનેક ઉત્તમ કાર્યો અને પરાક્રમ કરી ગુજરાતનું ગૌરવ સાચવ્યું. પરંતુ વિરધવલ રાજા પરલોક સિધાવતાં તેના કૃતઘી વારસદારેતેઓના ઉપયોગીપણાનેન ઓલખી ઈર્ષાલુઓના છંદે ચડી તેમને છેલ્લી અવસ્થામાં અપમાનીત કર્યા. તેઓ પોતાનું ગૌરવ સાચવી શક્યા, પરંતુ ગુજરાતમાં તથા એવી જ રીતે બીજા પ્રાંતોમાં ગુણવાનોના સ્થાને ખુશામતિયોના હાથમાં જવાને લીધે હિંદુસ્તાન પરાધીનતાની બેડીમાં જકડાયું. આવી સ્થીતિમાંએ આવા ગ્રંથરતના રક્ષણ માટે પ્રયત્ન કરનાર તથા ઈષ્યના બદલામાં ઈષ્યને આધીન નહીં થનાર અને વિઘોથી બેદરકાર જૈન મુનિવરો તથા જૈન સદગૃહસ્થોને ધન્યવાદ આપ્યા વગર રહેવાતું નથી કે જેમાં મુનિમંડલે અભ્યાસ પૂર્વક યથાશક્તિ એ ગ્રંથને સાચવ્યા તથા વિભાગિક ગ્રંથો રચી સમૃદ્ધ બનાવ્યા અને સુશ્રાવકોએ તે તે આચાર્યાદિના સદુપદેશથી તે તે ગ્રંથરોની પ્રતિયો લખાવી ખરી જ્ઞાનભક્તિ કરી દેશના ગૌરવરૂપ વિદ્યા ધનને સાચવ્યું ઉપર વર્ણવાયેલા પ્રયતોના પ્રતાપે જે કાંઈ સાહિત્ય સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસન સંબંધી અત્યારે પણ મલી આવે છે તે મારી જાણ પ્રમાણે નીચે નોંધવામાં આવે છે. (૧) મહર્ષિ હેમચંદ્રસૂરિએ પૂર્વવ્યાકરણની ક્લિષ્ટતા તથા સંકુચિતતા પરિહરી કરેલી હેમ વ્યાકરણની સૂત્રરચના, જે એવી ઉત્તમ છે કે અલ્પબુદ્ધિવાલા મનુષ્યો પણ કાંઈક પ્રયત્ન કરી મૂલ સૂત્રને ગુરુગમથી ધારી લે તો તેઓ પણ (શ્રીહેમસૂરિએ બનાવેલ) હૈમધાતુપાઠાદિ સાધનોના યોગે સંસ્કૃત ભાષામાં ચંચુ પ્રવેશ કરી શકે (આ વિભાગ છપાઈ ગએલ છે), તેમાં પણ સોનામાં સુગંધી પ્રસરાવતી સૂત્રે ઉપરની (૨) લઘુ વૃત્તિ ૬૦૦૦ કલોક પ્રમાણુ રચી છે (એની બે આવૃત્તિઓ છપાઈ ગઈ છે); (૩) કોઈ વિદ્વાને ઉદ્ધરેલ મધ્યમ વૃત્તિ ૮૦૦૦ શ્લોક પ્રમાણ છે (તેના ઉપર કોઈ વિદ્યાને રચેલી અવરિ-સરલ ટીકા સાથે મુંબઈના લાલબાગ તરફથી છપાય છે); ()બહવૃત્તિ ૧૮૦૦૦ શ્લોકપ્રમાણુ છે જેની બીજી આવૃત્તિ છપાય છે એમ સાંભલ્યું છે); (૫) હૈમલિંગાનુશાસન અવસૂરિ સાથેનું પણ છપા- એલ છે (૬) મોટી ટીકા તથા દુર્ગપદ પ્રબોધાદિ સાથેનું શેઠ હીરાલાલ સોમચંદ તરફથી છપાય છે તથા સુરતમાં વરરાજ વિનોદચંદ્ર સેહલર સી @ મૂડ હેર્લિંગનુણના અભ્યાસને ઉગી એક હમલિંગાનુશાસનની અતિ સંક્ષિપ્ત અવસૂરિસાથેની પ્રત મલી છે જે પણ શીધ્ર પ્રકાશિત કરવાનો ઇરાદો છે, (૭) હૈમધાતુ પારાયણ સટીક પણ છપાએલ છે (૮) હૈમ અને કાર્ય–ટીકામાંથી ચૂંટેલા વિભાગો સહિત છપાએલ છે, (૯) હેમી નામમાલા-અનેક રૂપમાં મૂલ તથા ટીકા સાથે છપાએલે છે; જાણતા હેય ચૌદમી સદીના વિદ્વાનોની આ સ્થિતિ હોય તો અત્યારે વીસમી સદીના તે પછીના અનેક આક્રમણથી લુપ્ત તથા અવ્યવસ્થિત થએલ સાહિત્યના વારસદાર થએલા વિદ્વાનો એ કૃતિઓના જ્ઞાનથી વંચિત હોય એ સહજ છે, ૧ જે મત્રિ વસ્તુપાલ તેજપાલના સુપ્રયત્નોથી જ રાજગાદી મેળવી શક્યો હતો ૨ આ વાતની સાક્ષી વર્તમાનમાં અચી રહેલા જૈન ભંડારોમાનાં દરેક મતના તાત્ત્વિક ગ્રંથો તથા અનેક વિદ્વાન જૈનાચાયોંએ રચેલ અન્યમતિ ગ્રોપરની ટીકાઓ પૂરે છે. ૩ અત્યારે પણ અનેક જૈન સંસ્થાઓ તથા ભારત વર્ષના પ્રાચીન વિદ્યા સાહિત્ય પ્રત્યે લક્ષ આપનાર સરકારી સંસ્થાઓ વિગેરે તરફથી જેન સાહિત્યને વ્યવસ્થિત રીતે સાચવવા તથા વર્તમાન મુદ્રણકલાનો ઉપયોગ કરી છપાવવાના પ્રયા ચાલુ છે. પ્રાયે દરેક વરસે કોઈને કોઈ અપૂર્વ ગ્રંથ વિદ્વાનોના કરકમલોને અલંકૃત કરે છે તે છતાં પણ વિદ્વાન જન મુનિઓને સહકાર સાધી હજી પણ ઘણુ સાહિત્ય ઉદ્ભૂત કરવા જેવું છે તથા છપાએલ પણ વ્યવસ્થિત કરવા જેવું છે, તે લક્ષ બહાર ન રહેવું જોઈએ ૧ (૧૦) હેમ ઉણાદિ સટીક છપાએલ છે; (૧૧) દુર્ભાગ્યે હૈમ બ્રહયાસ પૂર્ણ મલતો નથી. જેટલો મલે છે, તે છપાવવાના પ્રયત્નો ચાલુ છે (૧૨) હૈમ લઘુન્યાસ રામચંદ્રસૂરિકૃત મલતું નથી, (૧૩) લઘુન્યાસ ઉપરની દુર્ગપર વ્યાખ્યા છપાઈ છે, બીજી આવૃત્તિ છપાય છે એમ સાંભળ્યું છે (૧૪) યાશ્રય કાવ્ય છે ભાષામય સંપૂર્ણ છપાઈ ગએલ છે (૧૫) કાવ્યાનુશાસન સટીક બે આવૃત્તિઓ છપાઈ ગઈ છે, (૧૬) પ્રમાણમીમાંસા સટીક બે આવૃત્તિઓ છપાઈ ગઈ છે, (૧૭) છંદોનુશાસન સટીક બીજી આવૃત્તિ છપાય છે (૧૮) દેશી નામમાલા ત્રિીજી આવૃત્તિ છપાય છે. (૧૯) ઉણાદિ સટીક છપાઈ ગયું છે; (૨૦) સટીક યોગશાસ્ત્ર તથા (૨૧) ત્રિષણીશલાકા પુરુષનાં ગ્રંથો પણ છપાઈ ગયાં છે. આતો મહર્ષિ હેમચંદ્ર સૂરિજીના પોતાના રચેલા તથા પોતે ટીકાથી સમૃદ્ધ બનાવેલા ગ્રંની કાંઈક વાત થઈ. હવે તે પછીના મહાપુરુષોએ કેવા પ્રયતે કર્યા તે જોઈએ. (૧) ૧૩ મી ૧૪મી સદીમાં થએલ મહાકવિ અમરચંદ્ર સૂરિએ “સ્વાદિશબ્દસમુચ્ચય જેમાં સિદ્ધહેમશબ્દાનુશાસનમાં સાધેલા છએ લિંગના શબ્દોનો સંગ્રેડ કરવામાં આવ્યો છે તેની રચના કરી. તેના ઉપર તેપછી થએલા શ્રી જયાનંદસૂરિએ (જેમણે હૈમલિગાનુશાસન ઉપરની મોટી ટીકાને પણ સંક્ષિપ્ત રૂપમાં ઉદ્ધત કરી જણાય છે. પોતાના શિષ્ય દેવરના ભણવા માટે ટીકા રચી છે (આ ગ્રંથ છપાઈ ગએલ છે). ૨) અનેક ગ્રંથ રચનાર દિવ્યગુણધારી ગુણરત્નસૂરીશ્વરજીએ સંવત ૧૪૬૬ માં હૈમવ્યાકરણમાં કશેલ ઘણા ઉપયોગી ધાતુઓના રૂપોને સફલતાથી સમજાવનાર કિયારત્ર સમુચ્ચયની રચના કરી છે (આ પણ છપાઈ ગયેલ છે). (૩) અનેક વિદ્યામાં પારંગત લોક ભાષાથી લઈને ગીર્વાણ ભાષા સુધીમાં અનેક ગ્રંથો રચી લોકોપકારક થએલા હેમહંસગણિએ હૈમવ્યાકરણમાં સાક્ષાત્ વર્ણવેલા અથવા સૂચવેલા વ્યાકરણ સંબંધી ન્યાયોને વિસ્તૃત રૂપે સમજાવનાર “ન્યાયાર્ચ મંજુષાની સંવત્ ૧૫૧૫ માં, તથા તે પછી તે ઉપર ન્યાસની પણ રચના કરી છે. સૌત્ર ધાતુઓનો અર્થ સાથેનો વિસ્તૃત સંગ્રહ આ ગ્રંથ સિવાય ભાગ્યેજ બીજા ગ્રંથમાં મલી શકશે. (આ પણ છપાઈ ગએલ છે) (૪) શ્રીમેઘવિજયજીગણિએ સિદ્ધહેમશબ્દા- નુશાસનના સૂત્રોને સિદ્ધાંત મુદીની ઢબે ગોઠવી તે ઉપર લઘુ માધ્યમ દ્વૃત્તિઓ રચી છે. (હત- ટીકા યુક્ત આ ગ્રંથ ચંદ્રપ્રભા (હંમકૌમુદી) નામે છપાઈ ગએલ છે.) (૫) તે સિવાય પણ અનેક અજ્ઞાત નામ મહાત્માઓએ તથા શ્રીસિદ્ધચંદ્રગણિએ રચેલ અવચૂરિઓના અશ પાટડી, મોહનલાલજી લાયબ્રેરી મુંબઈ તથા બીજે સ્થલે પણ લિખીત રૂપે મળે છે. એટલું જ નહીં પણ કોઈ મહાપુરૂછે તો આ વ્યાકરણ અલ્પબુદ્ધિવાલા ફક્ત ગુજરાતી ભાષા જાણનાર પણ ભણી શકે તે ખાતર તેના ઉપર ગુજરાતી અથાં તથા રસમજુતી આપી છે જેનો અમુક ભાગ અત્યારે પણ દેવચંદ લાલભાઈના પુસ્તકાલય સુરતમાં ઉપલબ્ધ છેઃ કોઈ મહાન આચાર્યોએ વ્યાકરણના આઠે અધ્યાયોપર મહર્ષિ હેમચંદ્રની ટીકામાં દર્શાવેલા ઉદાહ- રને સંપૂર્ણ રીતે સમજાવનાર બૃહત્ તથા લઘુ ટૂંટિક નામે ટીકાઓ પણ રચેલી છે જે મલી શકે તે ખાસ પ્રકાશ કરવા લાયક છે. સોલમી સદીમાં હર્ષ કુલગણિએ હૈમધાતુપાઈને અર્થ સાથે કવિના રૂપે ગુંથીને તેને યથાર્થ “કવિકલ્પદ્રુમ એવું નામ આપી જનતાને ઉપકૃત કરી છે. હંમ વિક્રમાદિ ગ્રંથો પણ તે તે કાલે મહા ઉપકારી પુરુષોએ રચ્યા છે. હૈમ બ્રહલ્યાસ તથા બૃહદવૃત્તિના કેટલાક ભાગે શ્રી રામ- સુંદરસૂરિ મહારાજ આદિના ઉપદેશથી લખાએલા મલે છે. વલી અકબર પ્રતિબોધક જેનશાનનમણિ , જગદગુરુવિહરસૂરીશ્વરજીએ તો કાલ પ્રભાવે વિખલ થએલ સિદ્ધહેમ પરની વિસ્તૃત તત્વપ્રકાશિકા નામની બૃહદવૃત્તિને વ્યવસ્થિત કરવા તંભતીર્થ (ખંભાત) નિવાસી વૃદ્ધ શાખા તથા ઉકેશ કાતિના સંઘપતિ ઉદયકરણ સોમકરણને ઉપદેશ આપી તેની રાયતા દ્વારા શ્રી વિજય ઉપાધ્યાયને ભૂલી નામના ભટ્ટ (કે જે માભાથાદિ વ્યાકરણના અખંડ અભ્યાસી હતા) ની પાસે જણાવ્યા અને તે મોપાધ્યાયજી શ્રી વિજ્યજી મહારાજે સારી રીતે અભ્યાસ પૂર્વક ચિહેરાના પાન હવૃત્તિ વ્યવસ્થિત કરી તપગચ્છના ઘણા ગીતાર્યમુનિઓને ભણાવી. એટલું જ નહીં પા તેને પ્રતાપે સિદ્ધહેમ વ્યાકરણને યથાર્થ રીતે પ્રકાશનાર એક મહાપુરૂષ પણ ઉત્પન કર્યા હમપ્રકાશના કર્તા તથા તેમનાં દીક્ષાગુ અને વિદ્યાગુર, અપાધ્યાય શ્રી વિજયજી મહારાજના સંસારી અવસ્થાના ભાઈ અને દીપિત કરવામાં ગુભાઈ રૂપ શ્રી રીતે વિજયજી મહારાજ પાધ્યાય થયા તે પાય કતવિજયજી મહારાજના ૬ શિષ્ય મહોપાધ્યાય શ્રી વિનયવિજયજી થયા, તેમણે વિદ્યાગુરુ રૂપે મહોપાધ્યાય શ્રી સોમવિજયજી મહારાજને સ્વીકાર્યા અને તેઓશ્રીની પાસે વિદ્યાભ્યાસ કરીને લોકપ્રકાશ જેવો અજોડ સિદ્ધાતદોહન ૨પ ગ્રથ તથા મહાશાસ્ત્ર શ્રી કપિસૂત્ર ઉપર અત્યાર સુધી એક જ ધારાએ દરેક ઠેકાણે વચાતી સુબે વિક વૃત્તિ તથા વિદ્રોગ્ય તથા સામાન્ય જનતાને પણ ઉપકારક શાત સુધારસ, શ્રીપાલરાસ, સ્તવનાદિ અનેક ગ્રંથરતો રચ્યા એટલુ જ નહીં પણ વ્યાકરણ વિષયમા જાણે, મહર્ષિ હેમચદ્રના જ અવતાર એવા સમવિજય મહારાજને વિદ્યાગુરુરૂપે પામી, શ્રી હેમચંદ્ર મહારાજે પૂર્વવ્યાકરના દોહન રૂપ વ્યાકરણમૂનોની રચના કરી હતી તેમ વિનયવિજયજી મહારાજે પ્રથમ તો જેઓ ગામડીઆ જેવી બુદ્ધિવાયા હોવાને લીધે હૈમવ્યાકરણરૂપી રને અગીકાર ન કરી શકતા હોય તેમને હૈમવ્યાકરણરૂપ મહાવ્યાકરણમાં પ્રવેશ કરાવનાર, તથા હૈમવ્યાકરણમાં અષ્ટાધ્યાયીના કમના લીધે કાઈ પણ ક્લિષ્ટતા જણાતી હોય તો તેને પણ સર્વથા દૂર કરનાર હૈમલધુપ્રકિયાનામના સરલ વ્યાકરણની સવત્ ૧૭૧૦ મા ધનપુરમાં રચના કરી તેપછી સવત્ ૧૭૩૭ મા તે હૈમલઘુ પ્રક્રિયા ઉપર, જેમ મહર્ષિ હેમચકે પોતાના વ્યાકરણ ઉપર વ્યાકરણના દરેક વિષયને તલસ્પર્શી રીતે ચર્ચનાર બૃહત્યાગની રચના કરી હતી તેમ, હેમ લધુપ્રકિયાપર મોટી ટીકાની રચના કરી, અને તેને યથાર્થ વિનય સાચવનાર વિનયવિજયજી મહારાજે પોતાને નામે ન ચડાવતા મહર્ષિ હેમચદ્રના વ્યાકરણને યથાર્થ પ્રકાશ કરનાર “શ્રીહમપ્રકાશ રૂપેજ પ્રસિદ્ધ કરી સદ્ભાગ્યે તેને હૈમપ્રકાશ-મહાવ્યાકરણનો) પૂર્વી છપાઈ–ગયો છે, જેને અવલોક્તા એમ જણાઈ આવે છે કે વિનયવિજ્યજી મહારાજે જડબુદ્ધિવાળો જીવોને માટે હૈમવ્યાકરણ રૂપ મહાપ્રાસાદનો પ્રવેશદ્વાર રચવાની સાથે તે વ્યાકરણની સંપૂર્ણતાને પ્રકાશ જનતા આગલ કર્યો છે અને હૈમવઘુપ્રક્રિયા જેવા નાના વ્યાકરણને પણ મહાવ્યાકરણની કોટીએ લાવી મુક્યુ છે હમપ્રકાશના જુદા જુદા સત્તર વિભાગમાં ફુટ કરેલા વિષય ૧ હૈમપ્રકાશ પૂર્વાના પ્રથમ સજ્ઞાપ્રકરણમા હેમલઘુપ્રક્રિયામાં જે સ્વર વ્યાજનાદિ સત્તામાં કેટલીક સત્તા કઠિન હોવાને લીધે એમને એમ બતાવી દેવામાં આવી હતી તે એવી સ્પષ્ટ રીતે સમજાવવામાં આવી છે કે જેથી તે ભણનાર સત્તાઓના જાણકાર થવાની સાથે હૈમવ્યાકરણના ડુત પ્રકરણ તથા પરિભાષા વિભાગ જેવા કઠિન વિભાગનો વેત્તા થાય છે, એટલુજ નહિ પણ શ્રીમહસગણિએ રચેલા હૈમન્યાય મજુષા' જેવા કઠિન ગ્રંથના ભાવાર્થને પણ સરળતા પૂર્વક સમજી પછી તે મૂળ ગ્રથને પણ અભ્યાસી થઈ શકે છે આ વિભાગે સુપરરોયલ ૮ પેજી ગ્રથના ૬૧ પેજ રોકેલ છે તેમાં કેટલાક અપૂર્વ એતિહાસિક સત્યો પણ જાણવાને મળે છે ૨ સ્વરમવિવિભાગમાં મસ્કૃત ભાષામાં સ્વરો એક બીજાની નજીક આવતા કયારે ભેગા થાય છે, થાય તો કેવી રીતે અને કયા અર્થોમાં તે જણાવવાની સાથે હૈમલઘુપ્રક્રિયામાં કઠિન જાણુંને છેડી દીધેલા વિષયોને પણ સુગમતાથી ચર્ચવામાં આવ્યા છે અસથિવિભાગમાં સંસ્કૃત ભાષામાં ક્યારે કેવી રીતે કેવા અર્થમાં વર એક બીજાની પાસે આવવા છતા અલગ રહે છે તે વિસ્તર સમજાવવા સાથે હૈમવ્યાકરણમા ઉદાહરણરૂપે આપેલ શબ્દોના અ બહુજ ખુબીથી સમજાવવામાં આવેલ છે જ વ્યસનમવિવિભાગમાં મસ્કૃત ભાષાના વ્યજનો પસ્પર નજીકમાં આવતા તથા કેટલાક વ્યને બે સ્વરોની વચ્ચે આવતા, વિદ્યાર્થીઓને જે ગુચવણમાં મૂકી દે છે તે ગુચવણનો ઉકેલ બહુજ સરલતાથી અને પદ્ધતિસર કરવામાં આવ્યો છે કે જેથી અભ્યાસ કરનાર વિદ્યાથી કદી પણ વ્યર્જન સધિમાં ભૂવ કરનારો ન થાય ૫ મિથિવિભાગમાં કે જે વિભાગ સરકૃતવ્યજનોમા બધિ વિભાગના ઘણાજ સૂરો રોકી વિદ્યાર્થી ઓને ગુવણમાં મુકે છે તેને કેવી રીતે કાબુમાં લેવો તે શીખવવામાં આવ્યું છે સાવેજ હમપ્રકાશના મા પાદમાં વર્ણવેવ ધત્વ પ્રકારના ખ્યાત્મિા આવશ્યક વિભાગને કુશવતાચી ગુવી તે વિષયના જ્ઞાનથી ૧કે જેમાં સુગમતાની દૃષ્ટીએ પૂર્વ અને ઉત્તરાદ્ધ એવા બે વિભાગો કરી તે વિભાગોના પ્રવેશક દ્રષ્ટીએ પિનામા પતાવ વા નાના પથ વિભાગો રચી વિદ્યાને રાલતા કરી આપી છે ૨ જેમ નાની ઉમરના બોને ગુણાકાર આદિ કેમ થાય છે તે જણાવ્યા વગર ભવિષ્યમા ઉપયોગી નણ રુહાર ખખવવામાં આવે છે અને મોટી ઉમરના સમજદાર બને તે ગુણધરોની યથાર્થતા સમજાવવામાં આવે છે ૭ અસર પણ વિદ્યાર્થિઓને વંચિત રહેવા દીધા નથીઃ રેફસંધિ સંસ્કૃતપદો તથા સંસ્કૃત કવિતાપર પણ જે કરે છે તે પણ સ્પષ્ટતાથી વર્ણવાયું છે. આ પાંચ પ્રકરણેમાં સંસ્કૃત વ્યાકરણરૂપી ચણતરના મૂલ પાયારૂપ પંચસંધિની રચના પૂર્ણ થાય છે. તે પછી વિભક્તિ નામનો સંસ્કૃતના પલ્લિંગ (પુલિંગ સ્ત્રીલિંગ નપુંસકલિંગ પુસ્ત્રીલિંગ પુત્રપુંસકલિંગ સ્ત્રીપુંસકલિંગ)ના શબ્દો ઉપર કાબુ મેળવવા શીખવનાર વિભાગ પેજ ૮૭ થી શરૂ થાય છે. તેના પણ બાલવિદ્યાર્થીઓની સુગમતા ખાતર : પેટા વિભાગ પાડવામાં આવ્યા છે. ૬ સ્વરાંત પુંલ્લિંગ વિભાગને જાણકારગમે તે કોઈ પણ સ્વર જેની અંતમાં આવે એવાવરાંત સંસ્કૃત પંલ્લિંગ શબ્દોના સાતે વિભક્તિઓનાં તથા સંબોધનના રૂપ સુગમતાથી બનાવી શકે છે. આ વિભાગમાં સર્વાઢિ (સર્વનામો) ને તેના યથોચિત અર્થ સહિત સમજાવી વિનયવિજ્યજી મહારાજે હૃદજ કરી છે ૭ સ્વરાંત સ્ત્રીલિંગ શબ્દોના રૂપે કેમ કરવા તે શીખવ્યું છે. ૮ સ્વરાંત નપુંસકલિંગ શબ્દોના રૂ કરી બતાવ્યાં છે. ૯ વિદ્યાર્થીઓને વ્યંજનાંત પુર્લિંગ શબ્દો સાધતા શીખવ્યા છે. ૧૦ વ્યંજનાન્ત સ્ત્રિલિંગ શબ્દોના સાતે વિભક્તિઓનાં રૂપો દાખવ્યા છે. ૧૧ વ્યંજનાન્ત નપુંસકલિંગ શબ્દોના રૂપો પણ એવી જ સુગમતાથી કરતા શીખવ્યા છે. દરેક વિભાગ એવી રીતે વ્યવસ્થિત કરવામાં આવ્યો છે કે જેથી તે તે વિભાગના જાણકાર વિદ્યાર્થીને તે પછી આવત વિભાગ અડધો તો ગુરુની સહાયતા વગર પણ બેસી શકેઃ પલિંગની વ્યાખ્યામાં જણાવેલ પાછલના ત્રણ જાતના શબ્દો બે બે જાતના રૂપને પામે છે કેટલાક શબ્દો ત્રણે લિંગમાં પણ વપરાય છે તે બધાનાં રૂપો પણ સ્વરાંત શબ્દ હોય તો , ૭, ૮ વિભાગના બલથી અને વ્યંજનાત શબ્દ હોય તો ૯, ૧૦, ૧૧ વિભાગના બલથી આ વ્યાકરણને કોઈ પણ સાચો અભ્યાસ કરી શકે છે. ૧૨ યુગ્મદ અને અરમ એ બે શબ્દો ત્રણે લિંગમાં એક સરખાં રૂપો ધારણ કરનાર હોવા છતાં પણ ઘણીજ વિલક્ષણ રૂપરાશિને પામે છે એમ જાણી મહોપાધ્યાયશ્રીએ તેમને આ પ્રકરણમાં સ્વતંત્રજ રાખી પૂરી રીતે સમજાવ્યા છે. ૧૩ સંસ્કૃતમાં કેટલાક એવાં નામો છે કે જે દરેકલિંગમાં, દરેક વિભક્તિમાં, દરેક વચનમાં કોઈ પણ જાતના ફેરફાર સિવાય એકરૂપે રહી વિભક્તિ માત્રના અર્થને આપે છે ત્યારે કેટલાક સાતે વિભક્તિઓને બદલે અમુક વિભક્તિઓમાં અથવા અમુક અર્થમાંજ એ વિશિષ્ટતાને ધારણ કરે છે તે બધા આ અવ્યયપ્રકર- ણમાં ફક્ત નામનિર્દેશમાત્ર નહીં પણ તેઓના અર્થો તથા પ્રયોગોહિત ઓળખાવવામાં આવ્યા છે અર્થની સ્પષ્ટતા ખાતર ઢમરમા તથા હેમબૃહદ્યાસ જેવા મહાન ગ્રંથોનો યોચિત ઉપયોગ કરવામાં આવ્યો છે દરેક જાતની ક્વિછતા દૂર કરીને હૈમવ્યાકરણના અષ્ટાધ્યાયીકમના યોગે વિખરાએલ અવ્યય સંબંધી જ્ઞાનને એકજ સ્થળે વ્યવસ્થિત રીતે ગોઠવ્યું છે. ધાતુઓ પૂર્વ ખૂબજ ઉપયોગમાં આવતા ઉપસર્ગ (અવ્યોનો એક વિભાગ) ના વિસ્તૃત અથ આ ગ્રંથ સિવાય ભાગ્યે જ બી ગ્રંથમાં મલી શકે છે. આ અહેમત યાસમાં મહર્ષિ હેમસૂરિએ દર્શાવેલ છે ત્યાંથી ઉપાધ્યાયશ્રીએ વિદ્યાર્થીઓના ઉપકાર ખાતર લીધા છે. આ વિભાગ સુધી તો હેમલઘુપ્રક્રિયામાં આવેલ દરેક સૂત્રની વ્યુત્પત્તિ પણ હેમપ્રકાશમાં દેખા- ડવામાં આવેલ છે, જે વિદ્યાર્થીને વ્યુત્પન્ન થએલ જણ તે પછીથી પડતી મુકવામાં આવી છે. ૧૪ માં સંસ્કૃત શબ્દોના વિશેષલિંગના જ્ઞાન માટે સ્ત્રીલિંગ શો પુલિંગ શબ્દપટ્ટી કેવી રીતે અથવા કેવા અર્થમાં બને છે તે સ્પષ્ટતાથી બતાવવામાં આવ્યું છે. આ પ્રકારના અભ્યાથી ઘણા ઉપયોગી શબ્દોની (જે મોટા ગ્રંથોમાંથી પણ રાહેજે ન જડી શક) "જાણકારી મળી શકે છે. પ્રકાશમાં ૬૩ અને ૧૪ મા ભાગની પ્રશસ્તિ ભેગી આપી છે. ઉપાધ્યાયજી મારા દરેક વિભાગના છેડે પ્રશક્તિ આપે છે જેમાં પોતાના નામમાં યથાર્થ રહેલ વિનય ગુણને પ્રકટ કરતા હોય તેમ પોતાના સંસારપના ઉપકારી માતાપિન રાજશ્રી તથા તેજપાલ અને સંસારથી તારનાર ગુરુમહારાજ વાચકીર્તિવિજય મહારાજનું તેને પકડી રાતિ કમર કરી દરેક પ્રકારની સમાપ્તિ સૂચવે છે. ૧ તે શાદોની કરી ખાસ ઉપયોગી થી પ્રકાશિત માં મિનિ દિન નિ અને ટ તે તે ઠેકાણે ઊંચન ટિપની આપવી શો કરી છે અને તે કાર્ય ધના અને કામ થી અ.ન ટે આપી ચાલુ રાખવામાં આવ્યું છે.

૮ ૧૫ કારક વિભાગમા તે થકર્તાએ આ વિભાગની કઠિનતા અને વિશાવતા બતાવવા માથે કઠિન વિષયોને પણ પોતાની ગરવતાપૂર્વક અને હૃદયગમ ભાષાથી પશ્ચિય કરાવવાની શક્તિ દેખાડી આપી છે આ ભાગને અભ્યાસ કરવાથી કઈ કઈ વિભક્તિ ક્યા ક્યા અર્થમાં ક્યારે ક્યારે વપરાય છે તે જાણવાની સાથે તે તે વિષય સબધી પ્રાચીનપ્રામાણિક ભર્તુહરિના વાક્યપદયથી માડી ઝઘકર્તાની નિકટમાં રચાએ વેયાકરણભૂષણમારાદિ વ્યાકરણગ્રંથોના અભિપ્રાયો પણ સ્પષ્ટતાપૂર્વક નામ નિર્દેશ સાથે અપાય છે સિદ્ધાતકૌમુદી વાકયપ્રધશાદિ ગ્રંથો પણ તેતે સ્થળે ઉદારતા પૂર્વ નામનિર્દેશસાથે ઉપયોગ કવ્વામાં આ છે દુઃપ્રાપ્ય એવા હૈમબૃહયાસના કન્ક સબંધી વિષયને એવા સવરૂપે ગેડયો છે કે મૂવ હૈમહામ નાથે ઉપાધ્યાયશ્રીએ કરેલ તેના ક્ષિપ્ત સુદર સ્વરૂપને સરખાવતા ચિત્ત પ્રફુલ્લિત થાય છે વ્યાકરણ જેવા લુખ્ખા વિષયને પણ વિદ્વાનો કેવો સમય બનાવી શકે છે તેને ચિતાર આખ આગવ ખડો થાય છે તથા તે મહાપુરુષની ઉપકારક અને સાત્વિક દ્રષ્ટિ આગવ માથુ નમે છે ૧૬ સમાગના લક્ષણથી ચાલુ કરી ગમાનના વિભાગે અને તે વિભાગના પેટા વિભાગે ખૂબજ વિસ્તૃત રીતે સમજાવવામાં આવ્યા છે સમાસના જુદા જુદા વિષયો કે જે હૈમવઘુપ્રક્રિયામાં વિદ્યાથીને પ્રવેશ કરવા પૂરતા શીખવવામા આવ્યા હતા તે હૈમપ્રમશમાં પૂર્ણ સાગોયાગ ચર્ચા વિદ્યાર્થીઓને મહાકાવ્યોમાં પણ પ્રવેશ કરાવી શકે એવી રીતે સમજાવવામાં આવ્યા છે, જે વાચતા જાણે હેમખ્રહવૃત્તિનું સરળ રૂપાતર વાચતા હોઈએ તેવો આનદ અનુભવાય છે ૧૭ તદ્ધિત વિભાગ કે જે પૂર્વાદ્ધમાં છેલ્લો હોવા છતા પણ પશિત થના ખીચોખીચ ભરેલા આશરે ૧૪૬ પૃઇ જેટ વિભાગને શેકે છે તદ્વિત વિષયમાં મહર્ષિ હેમચઢે પોતાના મહાવ્યાકરના બે અધ્યાય રોકેલા છે તેને અત્યુપયોગી સક્ષિપ્ત પરિચય હૈમવધુપ્રક્રિયામાં આપવામાં આવે છે પણ હેમ પ્રકાશમાં તેના સપૂર્ણ સૂરને એવી વ્યવસ્થિત રીતે ગોવી ટીકા આદિથી એવા તો સુગમ બનાવવામાં આવ્યા છે કે જેથી આ વ્યાણના અભ્યાસીઓ તદ્ધિતમૂવૈયાકરણા એ દકિતને બદલે તદ્ધિતકુશવાયા કરણા એ દક્તિના પાત્ર બને છે એ તદ્ધિત પ્રખ્રણને પણ ઉપાધ્યાયજીએ અનેક વિભાગમાં વહેંચી તેને વિભાગોમાં તત્તદૂત વિષયોને સરવતા અને સુબોધતા પૂર્વક ચર્ચા છે હૈમશબ્દાનુશાસનની ટી ટીકામ આપેલ ગણપાઠ પણ યથાસ્થાન મખ્યાપૂર્વક આપવામા આવ્યા છે અમારા પ્રકરણ આદિમા આવેલા ગણપા પણ એવી જ રીતે યથાસ્થાન આપવામા આવ્યા છે અને આમ કરીને ભાષાના કોડ રજૂરૂપે ગણાતા વાક્યના વિશેષણવિભાગ જેને ઈગ્લીશ ગ્રામરોમ સગ્નેકરૂપે એ ખવામાં આવે છે તેની સમજુતીરૂપ પૂર્વા પૂર્ણ કરી પ્રવૃત્તિરૂપે વહેંચાએ વ્યાકર ની પ્રથમ વૃત્તિ પૂર્ણ કરી છે ઉતÁ પ્રકાશિત થએ બીજી બે વૃત્તિઓમાં આખ્યાત અને કુદતના વિયો કેવી બધી ઉપાધ્યાયજી મહારાજે વિદ્યાર્થીઓના ઉપર અથ છણ્યા છે તે જાણવા મળશે હાવત તેની ઝાખી પ્રશિત થએ હૈમવઘુપ્રક્રિયાના ઉત્તરદ્ધિથીજ 4 વિ પાકાય એમ છે સંપૂર્ણ ગ્રંથ સબામાં એનુ કહેવુ બન થશે કે જેમ મહર્ષિ હેમચ પ્રાપ્ત થએ અપૂર્ણ વ્યાકરણ સામગ્રીનો યા પયો કરી નવીન નવ શબ્દશુદ્ધિકાર વ્યાકરણ જનતાને અપ્યું, તેવી જ રીતે 'ઉપાધ્યાયજીશ્રી વિનયવિ જી મહારાજે તેમના જેવા નકમમનમાં જે સામગ્રી મળી તેનો યથાર્થ ઉપયોગ કરી અનેક મકાન ન બચનક્રિયા દ્વારા આદિ મહા પ્રયોમાથી પોતાના અમૂ ય ટાઈમને ફાજલ પાડી હૈમવ્યાકરના પ્રમશને તળીય બનાવી નર્વ જનતા પકૃત કરી છે ઇતિ શમ उपाध्याय क्षमाविजय गणी (નાની) ૧ અમદાનું પર્વ જીવનચરિત્ર તથા તેમના મોનો વિસ્તૃત પરિચય ઉત્તરાર્ધ પ્રપતિ થયે આપવાની પિા છે ના કાર્યમાં સહાયભૂત ના સાધનોની મતી આપવા સરવર્ગને પ્રાર્થના છે 3 સ્વર્ગવાસી શાહ સોમચંદ ઓતમચંદના જીવનની ટુંક રૂપરેખા. જે શેઠ સોમચંદ ઓતમચંદની જ્ઞાનરુચિના પ્રતાપે આ પુસ્તક પ્રગટ કરી શકાયું છે તેમના જીવનની ટુંક રૂપરેખા નીચે આપવામાં આવે છે જન્મસ્થળ અને કુટુંબ, મુંબઈના શેર બજારમાં શેર દલાલોની મોટી સંખ્યા માંગરોલના જૈનોની છે. એ માંગરોલ બંદર કાઠિયાવાડમાં આવેલું છે અને ત્યાં હાલમાં નવાબ સાહેબનો રાજ્ય અમલ છે. એ માંગરોલ બંદર, રજા કુમારપાલના વખતમાં મંગળાપૂરીના નામથી પ્રખ્યાત હતું, અને અનેક સાહસિક વેપારીઓનું એ જન્મસ્થલ હતું. એ માંગરોલમાં સંવત્ ૧૨૮ ના જેઠ વદ ૭ના દિવસે પિતાશ્રી ઓતમચંદ ઠાકરસીને ત્યાં માતા શ્રી માનકોરબાઈની કુખે શેઠ સોમચંદભાઈનો જન્મ થયો હતો. તેઓ જ્ઞાતે દશા શ્રીમાળી જૈન વાણિયા હતા અને ધર્મ મૂર્તિ પૂજક હતા. શેઠ ઓતમચંદને નીચે પ્રમાણે છ પુત્રો હતા, જેમાં શેઠ સોમચંદ પાંચમા હતા – શેઠ શેષકરણભાઈ શેઠ સોભાગચંદભાઈ શેઠ સોમચંદભાઈ શેઠ ગુલાબચંદભાઈ શેઠ સુંદરજીભાઈ શેઠ સવચંદભાઈ ઉપલા છ ભાઈઓ વચ્ચે એક બહેન પણ હતાં, જેમનું નામ દેવકોરબેન હતું. સૌથી મોટાભાઈ શેકરણ, માસ્તર તરીકે પ્રખ્યાતી પામ્યા હતા. સુંદરજીભાઈ પોતાની ઉદારવૃત્તિ માટે જાણીતા થઈ છગન બાપા તરીકે ઘણાઓના પ્રેમપાત્ર બન્યા હતા અને મુંબઈના શેર બજારના દલાલ તરીકે સારી નામના મેળવી હતી. સૌથી નાના ભાઈ સવચંદભાઈ દિલના એટલા બધા માયાળુ અને પરોપકારી હતા કે ઘણુઓ તેમને “રાજા” કહી બોલાવતા અને તેમણે પોતાના જીવનનો ઘણે ભાગ અરબસ્તાન બાજુ ગાળ્યો હતો. બાલ્યકાળ તથા મુંબઈમાં આગમન સંવત ૧૯૨૮માં શેઠ સેમચંદનો જન્મ થયો હતો. તે વખતે માંગરોલમાં શેઠ ઓતમચંદ ઠાક- રમી ધંધો કરતાં હતાં અને પ્રમાણિકણે પોતાના મોટા કુટુંબનું પાલન પોષણ કરતાં હતાં. શેઠ શોમ ચંદને શેઠ ઓતમચંદ પ્રાથમીક ગુજરાતી ભાષાની કેળવણી માંગરોલમાં આપી હતી. પણ તે એવી ન હતી કે જે ઉંચા પ્રકારની કહી શકાય થોડુંક હિસાબનું જ્ઞાન, નામું લખવાનું જ્ઞાન અને ઘોડુંક વ્યવ- હારિક જ્ઞાન, એ જશેઠ સોમચંદની બાલ્યકાળની કેળવણી હતી. આથક સ્થિતિ શ્રીમંત ન હોવાના કારણે માત્ર ૧૪ વર્ષની ઉમરે શેઠ સેમચ માંગરોળ છોડ્યું અને મુંબઈ તરફ રવાના થયા. ત્યાં તેઓ માંગરોલ નિવાસી જૈનધર્માભિમાની શેઠ કરમચંદ કલ્યાણજીની મુળજી જેઠા મારકેટમાં આવેલી કાપ- દુકાનમાં માસિક રૂપિયા ચારના પગારથી નોકરી પર ચઢ્યા અને પોતાના કિમતનો આગળ આવ- વાનો માર્ગ ખુલો કયો. આ કાપડની દુકાન પર તે સવારે વહેલા જઈ દુકાન સાફ કરી ગાદી તકિયા બિછાવતા અને તે બાદ આખો દિવસ કાપડના તાકા આપવા લેવાનું કાર્ય કરતાં. દુકાનના કામ માટે તેઓને કરાંચીમાં સવા વરસ જવું પડ્યું હતું. માસિક રૂપીયા ચારનો પગાર તેમના શરીર નિવાં પકવ ન હતો તેથી તે કેટલીક વખત દિવસમાં એક ટક પણ જમતા અને પોતાનું જીવન નિભાવ એમ કરતાં વર્ષો વિતવા લાગ્યાં કાપડની દુકાનની નોકરીમાં તેઓએ જોયું કે ભવિષ્ય બહુ સારું ન હતું. એ કારણથી તેઓએ બીજી નેકરીની શોધ કરવા માંડી. ની શેર બજારમાં એ વખતે શેર બજારમાં દલાલોને ત્યાં સારી દલાલી થતી હોવાથી તેઓએ શેર બજાર તરફ નજર દોડાવી. શેર બજારમાં શેઠ પ્રેમચંદ ગીરધર એક સારા દલાલ હતા. તેમને ત્યાં તેઓ નોકરી રહ્યા જે દરમીયાન તેઓના શેઠનું ચાંદી બજારનું કામ પણ કરવું પડતું અને પોતે ઝવેરાતની દલાલી પણ કરતા હતા. આ પ્રમાણે શેર બજારમાં અનુભવ મેળવ્યો. એ અનુભવના પરિણામે શેઠ સોમચંદે, સંવત ૧૯૬૨માં શેર બજારનું કાર્ડ મેળવ્યું અને સ્વતંત્ર દલાલીનું કામ શરૂ કર્યું. એ દલાલીનું કામ તેઓએ પોતાની અંતની ઘડી સુધી ચાલુ રાખ્યું હતું શેર બજારની દલાલી મોટી હતી, પણ તે સાથે જોખમ પણ મોટું રહેતું હતું. શેઠ સોમચંદે પ્રમાણwણે શેરોની દલાલી કરતાં સુરત, અમદાવાદ, કરાંચી, વીસનગર, વડનગર, ઉદેપુર, મુંબઈ વિગેરે શહેરોના ગ્રાહકો મેળવ્યાં અને દલાલી પણ દરરોજ સારી થવા લાગી. પરિણામે તેઓ ગરીબી- માંથી સારી સ્થિતિમાં આવ્યાં. પણ ઘણી વખત શેરની દલાલી ભારે થઈ પડતી. એ સ્થિતિમાં મૂશ્કેલી આવતાં તેઓએ કેટલીક વખત દાગીના વેચીને પણ પોતાની પ્રમાણીકતા અખંડ જાળવી હતી. ગૃહસ્થાશ્રમ, શેઠ સોમચંદના બે વખત લગ્ન થયાં હતાં. પ્રથમ લગ્નથી તેમને એક પુત્ર શ્રી કેશવલાલ થયાં હતાં, જેમના લગ્ન વખતે સંવત ૧૯૭૬ માં શ્રી સોમચંદભાઈના વડીલ પુત્ર શ્રી કેશવલાલના લગ્ન શ્રી માંગરોલમાં થયાં હતાં તે વખતે તેઓશ્રીએ આખી જ્ઞાતિમાં ઘર દીઠ પાંચ રૂપિયાનું લહાણું અને એક પીતળની થાળી અને સવાશેર સાકર મોકલ્યા હતા. એવી પહેલ કરનાર તેઓ શ્રી એલાજ હતા. એ લહાણામાં જમણવાર કરતાં ત્રણ ચાર ગણો વધુ ખર્ચ થયો હતો. તેઓ શ્રી અમદાવાદના શેર બજારના પણ છંદગી પતએક દલાલ હતાં. ભાઈ કેશવલાલ પચીસ વર્ષની ભર જુવાન વયે સ્વર્ગવાસ પામ્યા હતા અને તેમને એક પુત્ર શ્રી ચીમનલાલ હૈયાત છે. શેઠ સોમચંદના બીજા લગ્ન માંગરોળ નિવાસી શા. જીવણચંદ માણેકચંદના પુત્રી બાઈકસ્તૂરાવંતી સાથે થયા હતા. જેઓમાંના શ્રી હીરાલાલ સોમચંદ હૈયાત છે. મુનિરાજ શ્રી અમિવિજયજીની મુલાકાત, લક્ષમી વધવા છતાં શેઠ સેમચંદ એ બિના સારી રીતે સમજી ગયા હતા કે લક્ષમીનો ઉત્તમ ઉપયોગ દાન કરવામાં છે અને જે લમીપરથી મોહ ઉતારે છે તે જ તેનો ખરો ઉપયોગ કરી શકે છે. સંવત ૧૯૭૬ માં તેમને આ બાબતની બરોબર પ્રતિતિ થઈ. તેઓ સખત બીમાર પડ્યા અને મોટા મોટા ડાકટરો તેમની બિમારીને દૂર કરી શક્યા નહિ. એ વખતે તેમને સંકલ્પ કર્યો કે જે આ બિમા- રમાંથી ઉઠાય તો શ્રી શત્રુંજય તીર્થે જઈને દસ હજાર રૂપિયા શુભ માર્ગ વાપરવા. શુભ કર્મના ઉદયથી એક મામી દેશી વેદના પધથી તેમની બિમારી દૂર થઈ અને સંવત્ ૧૭૭માં તેઓ શ્રી તીર્થ શીરો- મણી શ્રી શત્રુંજયની જાત્રા કરવા ગયા. ત્યાં તેઓએ ચોમાસું કર્યું અને ત્યાં ચાતુર્માસ કરી રહેલા પુજ્ય શાંતમૂતિ શ્રી અમિવિજ્યજી મહારાજના વ્યાખ્યાનનો લાભ લેવા લાગ્યા. તેઓએ જોયું કે એ મુનિરાજ નિસ્પૃહી, દયાળુ અને શાંત સ્વભાવના હતા અને તેમના હૃદયમાં દયાનો અખુટઝરો હેતો હતો. તેમની મધુરી વાહીના શ્રવણથી તેઓએ એજ વર્ષમાં સમકિત મૂલ ખારવૃત ઉચય અને તે જીંદગી પર્વત મક્કમપણે પાળ્યા. શ્રીમદ અમિવિજયજી મહારાજના ઉપદેશથી તેમનાં જીવનમાં અદ્દભૂત પલટો થયો. આ સંસાર તેમને નિરસ લાગે, સંસારને તેમને ખોટો જણાયો. પાલીતાણામાં તેથી તેઓએ સાધર્મ બની અને સાધુ સાધ્વીઓની ભક્તિ અને સેવા કરવા માંડી અને કોઈપણ દુખી ભાઈને દેખી તેને બનની મદદ આપવા તત્પર રહેતા. એ સેવાભાવના પરિણામે તેઓએ, અન્ન, વસ્ત્ર, દવા વિગેરેમાં પાલીતાણામાં આશરે દસ હજાર રૂપિયા સંવત્ ૧૯૭૭ના ચાતુર્માસમાં ખર્ચા મુનિરાજ શ્રીઅમિવિજયજી મુંબઈમાં. પાલીતાણામાં એ વખતે શ્રી અમિવિજ્યજી મહારાજને આંખમાં ઝામરવાનું દર્દ વધ્યું હતું. એ દર્દ જોઈને શ્રી સોમચંદ શેઠને વિચાર આવ્યો કે આવા કલ્પવૃક્ષ સમાન શાંતમૂર્તિ સાધુરાજને જે મુંબઈ લઈ જઈને કોઈ નિષ્ણાત ડાકટર પાસે તેમની આંખની તપાસ કરાવવામાં આવે તો, તેમનું આંખનું દર્દ દૂર કરવાનો કોઈ ઉપાય સાંપડે અને ધર્મપસોયે તેમનું દર્દ દૂર થાય. આ વિચારથી તેઓએ મુનિરાજને મુંબઈમાં પધારવા આગ્રહભરી વિનંતિ કરી અને તેઓએ તે સ્વિકારી. તેઓશ્રી પોતાના શિષ્ય શ્રી ક્ષમા- વિજયજી આદિ સાથે વિહાર કરતાં સંવત ૧૯૭૮ માં મુંબઈમાં પધાર્યા અને પહેલાં શ્રી ગોડીજીના ઉપાશ્રયે જઈને મંગળાચરણ કર્યાબાદ શ્રીકોટના જૈન ઉપાશ્રયે અતિધામધૂમ પૂર્વક પધાર્યા. એ ઉપાશ્રય પધાર્યા બાદ શેઠ સોમચંદે આંખના બાહોશ ડાકટર દિગન પાસે મુનિરાજની આંખોની તપાસ કરાવી અને તેની સલાહ મળતાં, તેમની આંખનું ઓપરેશન, ડૉક્ટર દમનને રોકી, તેની પાસે ઉપાશ્રયમાંજ પોતાના ખર્ચે કરાવ્યું. એ ઓપરેશન ફત્તેહમંદ નિવડયું અને તે બાદ શ્રી અમિવિજયજી મહારાજે કોટના ઉપાશ્રયમાંજ સંવત્ ૧૯૭૮ નું ચાતુર્માસ શ્રીક્ષાવિજયજી સાથે કર્યું. ચાતુર્માસમાં શેઠ સોમચંદે પ્રભુ ભક્તિ, મહારાજશ્રીની અને સાધમ ભાઈઓની ભક્તિ અપૂર્વ રીતે કરી અને આશરે દસ હજાર રૂપીયા ખચ્ચ. મુનિરાજના ઉપદેશથી અનેક જૈન ભાઈઓને અપૂર્વ લાભ થયો. શેઠ સેમચંદભાઈએ ધણુ જીવોનને ધર્મમાર્ગમાં જોડ્યા હતાં તેઓ હજી પણ એ મુનિરાજને તથા શેઠ સોમચંદને એ કારણથી યાદ કરે છે. ધાર્મિક જીવન શેર બજારની દલાલી કરતાં લક્ષ્મી વધતી ગઈ અને શેઠ સોમચંનું જીવન પણ ધાર્મિક બનતું ગયું. તેઓએ બે વખત આખા હિન્દુસ્તાનના જૈન તીર્થોની જાત્રા કરી હતી. તેઓએ નવપદની આયંબિલની ઓળી સંપૂર્ણ કરી હતી અને એ વૃત્તના દિવસોમાં તેઓ કોટના ઉપાશ્રયમાં નવે દિવસ રાતદિવસ રહેતા અને ધર્મકરણ કરતાં. એ દિવસો દરમિયાન તેઓ ઘરનો સર્વથા ત્યાગ કરતા. એક આયંબિલની ઓળી વખતે તેમની તબીયત બગડતાં સખત તાવ આવ્યો હતો પણ તેઓએ ઘરે જવા અને ઓળીનું વૃત તોડવા મક્કમતાથી ના પાડી હતી. તેઓ મહીનામાં બારતીથીના દિવસોમાં આયંબિલ, ઉપવાસ, છઠ્ઠ, અઠ્ઠમ વિગેરેની તપસ્યા કરતાં અને ત્યાગ વૃત્તિ ખીલવતાં. પોતાના સાધમ બંધુને દુઃખી જોઈ તેમનું હૃદય કંપી ઉઠતું. તેઓ પોતાના દુખી બંધુઓને પોતાને ત્યાં નોકરીએ રાખતાં, બીજાને ત્યાં નોકરી અપાવતાં અને પોતે તેમને આર્થિક મદદ પણ આપતાં તેમને આયંબિલ તપ પર બહુ શ્રદ્ધા હોવાથી તેઓએ વર્ધમાન તપ આયંબિલ ખાતાની સથાપના કર વામાં, મુંબઈમાં આગેવાની ભયે ભાગ લીધો હતો, અને મુંબઈમાં વર્ધમાન તપ આયંબિલ ખાતાના અને પાલીતાણાના આયંબિલ ખાતાના છેવટ સુધી ત્રસ્ટી તરીકે રહ્યા હતા. તેઓની ધાર્મિક વૃત્તિથી રાજી થઈ શ્રી વેણચંદ સુરચંદે તેમને મહેસાણાની શ્રીયશોવિજયજી જૈન પાઠશાળાના દ્રષ્ટિ તરીકે નીમા હતા, જે પદ પર તેઓ છેવટ સુધી હતા. તેઓ ગુપ્ત દાન પણ ઘણુંજ કરતા. જ્ઞાનભંડાર, મુનિરાજ શ્રી અમિવિજ્યજીના ઉપદેશથી શ્રી સોમચંદ શેઠને જ્ઞાન ઉપર સારી રુચિ થઈ અને મુનિરાજ શ્રી ક્ષમાવિજ્યજી મહારાજે પ્રેરણા કરતાં તેઓએ પોતાના કોટના મકાનમાં એક જ્ઞાન ભંડાર રાપ્યો. એ જ્ઞાનભંડારમાં હાલમાં આશરે પાંચ હજાર ધાર્મિક પુસ્તકો, પ્રતા અને પ્રાચીન લેખિત પ્રતો છે. અને હેમપ્રકાશની શુદ્ધત પણ તેમનાજ ભંડારમાંથી મળી છે. સિદ્ધપુર પાટણમાં. દિનપર દિન શેઠ શેમચંદની પ્રીતિ અને રુચિ શ્રીગિરિજી મહારાજના વ્યાખ્યાનકારક વધતી ગઈ તેઓએ તેમની સાથે સંવત્ ૧૯૭૩માં અને છત ૧૯૭૮માં પાલીતામાં અને ૨૦ અનુક્રમે રહીને ચાતુર્માસના વ્યાખ્યાનો શ્રવણ કર્યા હતાં. સંવત ૧૭૯ માં મુનિરાજે વિહાર કરી સિદ્ધપૂર પાટણમાં ચાતુર્માસ કર્યું. એ વખતે તેઓ પાટણ ગયા અને ત્યાં ચાતુર્માસમાં વ્યાખ્યાન શ્રવણ કયાં. એ પછી શેઠ સોમચદે એવો અભિગ્રહ કે અમિવિજ્યજી મહારાજ જ્યાં હોય ત્યાં વરસમાં એક વખત વંદન કરવા તો જવું જ. આચાર્ય શ્રીવીરવિજયજી મહારાજ ૧૯૮૦ માં શ્રી ગોડીજીમાં બિરાજતાં આચાર્ય શ્રીવીરવિજયજી મહારાજે મુંબઈમાં કાળ કર્યો. એ દિવસ શ્રાવણ સુદ પાંચેમનો હતો. શેઠ સોમચંદે મુનિરાજની અગ્નીસંસ્કાર ક્રિયા કરવામાં આગેવાની ભર્યો ભાગ લીધો અને ૨- પ૫૧ બોલી તેમને અગ્નિસંસ્કાર કર્યો. જ્યારે પાટણના દાનવીર શેઠ નગીનચંદ કરમચંદે કચ્છ ભદ્રેશ્વરનો છરી પાલતો સંઘ કાઢ્યો હતો. તે વખતે શેઠ સોમચંદ માંગરોલ ગયા અને સંઘને માંગરોલમાં નોતરીને આગેવાની ભાગ લઈ સંઘ સેવાનો લાભ લીધો. એ પછીના વર્ષો દરમિયાન તેમની તબિયત બગડતી ચાલી તે છતાં તેઓ પોતાના આભગ્રહ પ્રમાણે મુનિરાજ શ્રી અનિવિજયજીના વંદનાર્થે દર વરસે જતાં હતાં. સંવત ૧૯૮૩માં એજ અભિગ્રહ પૂરો કરવા માટે તેઓ પોતાની તબિયત નાદુરસ્ત હોવા છતાં આઠેક સાધર્મિ ભાઈઓ સાથે ભાદરવા મહિનામાં જે મારવાડના ગામ ચાણોદમાં શ્રી અમિવિજયજી મહારાજ બિરાજતાં હતાં, તે ગામમાં ગયા અને મુનિરા- જેને વાંધા. ચાણોદ જતા રસ્તામાં તેમને સરદી લાગુ પડી. તેઓ મહામૂશ્કેલીએ તે છતાં પોતાના મુંબઈના કોટમાં આવેલા મોદીખાનાવાળા મકાનમાં આવી શક્યા. એ પછી તેઓ નવ દિવસ બિમાર રહ્યા અને ઘણા ઔષધો અને દવા કરવા છતાં તેમની તબિયત ન જ સુધરી. એ વખતે કોટના ઉપાશ્રયમાં શ્રીમદવિજયધર્મસૂરિજીના શિષ્ય ઉપાધ્યાયજી મહારાજ શ્રીમંગળવિજયજી બીરાજતા હતા. તેઓ તેમને ધર્મોપદેશ સંભળવવા ઘરે આવતાં હતાં. આખરે તેઓએ ભાદરવા વદ અમાસના દિવસે સાંજના ચાર કલાકે શાંતિપૂર્વક વૃતપશ્ચખાણ સાથે પરમાત્માનું ધ્યાન ધસ્તાં અને નવકારમંત્રનું શ્રવણ કરતાં, પોતાને દેહ છોડ્યો. તેમના આત્માને શાંતિ મળશે એજ પ્રાર્થના.

संपादकीयनिवेदनम् । यदा श्रीमद्विजयानंदसूरिभिः स्वजन्म-विहारादिना पवित्रिते पञ्चनददेशे मालेरकोटलामध्ये सद्गुरवः मुनिप्रवरश्रीअमीविजयमहोदयाः चातुर्मासी स्थिताः, तदाऽहं मुमुक्षुभावेन तेषां समीपे आगतः सर्वथा संस्कृतभाषाज्ञानविकलोऽभूवम् । श्रीगुरुभिरेव शास्त्रवाटिकादर्शनचक्षुःकल्पं व्याकरणमध्यापयिनुमि- च्छुभिः श्रीसिद्धहेमशब्दानुशासनस्य लघुवृत्तिः पाठयितुं प्रारब्धा । तस्याः पादद्वयमितेऽधीते श्रीगुरवः चतुर्मासपूर्त्यनन्तरं शीघ्रमेव मरुदेशं प्रति विहृतवन्तः, मयाऽपि गृहस्थावस्थास्सितेनैव तैः साई पादविहारं कृत्वा वीकानेरः समाश्रितः । विहारमध्ये पठनं शिथिलं जातम् । तच्च बीकानेरमध्ये पुनः पारव्यम् । पादत्रयमितेऽभ्यस्ते दीक्षोत्सवादिल्याक्षिप्तस्य मम व्याकरणपटने पुनः शिथिलादरो जातः । दीक्षादानानन्तरं साधुक्रियां शिक्षयित्वा पुनः व्याकरणे नियोजितः मुगुरुभिः। पट्पादमितेऽभ्यस्तेऽपि मति- मान्धात् न काचिदपि स्फूर्तिरजायत । एतादृशं जडस्वभावं मामवचार्य श्रीपरमोपकारकप्रधानः श्रीगुरुभिः श्रीलक्ष्मीचन्द्रकोचरात् महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितं श्रीहैमलघुप्रक्रियापूर्वाद्ध, समासाद्य आदितः पाठयितुं प्रारब्धम् , तच अन्धस्य लोचनमिव समासाद्य मम मन्दबुद्धरपि व्याकरणपठने आदर: समजनि । प्रभुश्रीहेमचन्द्रसूरिविहितशब्दानुशासनस्य च साधुशब्दरल पिटकरूपताऽधारिता । पूर्वाईकरण- बलेन उपरि वर्णितलघुवृत्तेः सार्द्धद्वयाध्यायादिमितो विभागो बुद्धिदर्पणे संक्रान्तः । हैमलिशानुगा- सनमप्यघीतम् । तदनन्तरं श्रीगुरुभिः श्रीहेमलघुप्रक्रियाया उत्तरार्द्ध पाठितः, तत्प्रभावेन समग्राऽपि लघुवृत्तिः परिचिता इव जातेति सुष्टु तथाऽभ्यस्ता । सा च हैमकोशाभ्यासबलबुता वृहद्वत्तरपि विलोकने मामुत्साहितवती । उपर्युक्तश्रीहमलघुप्रक्रियाध्यापनावसरे श्रीसद्गुरुभिापितोऽभूवम् यत् परोपकारप्रवीण श्रीविनयविजयोपाध्यायवर्यः न केवलं श्रीसिद्धहेममहाव्याकरणप्रासादप्रवेशद्वाररूपा श्रीहेमलघुप्रक्रिया विहिता, अपि तु एतादृशलघुप्रक्रियाऽध्येतारोऽपि तादृशीं योग्यतामासाद्य श्रीसिद्धहेमव्याकरणाद्यनेकन्या- करणपरिचिता भूयासुरित्युपकारभावनां हृयवधार्य हैमलघुप्रक्रियाया उपरि बृहट्टीकाऽपि विरचिता । महोपाध्यायश्रीविनयविजयमहोदयप्रसादादेव प्राप्तव्याकरणदृष्टेर्मम तदृहट्टीकावलोकनोत्कस्यापि श्रीसद्गुन- विद्यमानतायां सा न कुत्रापि दृष्टिपथमवतीर्णा । श्रीसद्गुरुवर्गवासानन्तरं संवत् १९८८ मध्येऽई पूज्यनीपा- ध्याय( इदानीमाचार्यवयं ) श्रीप्रेमविजयादिबन्दनाथ पाटणनगरे समागतः । तत्र तैः संपूर्णयोगोहनकरण प्रेरितः । रतलामनगरगमनोल्लुकोऽपि श्रीमहानिशीथयोगोहहनार्थं तैः सार्द्धनुपितः । योगारम्नादन विहारे जाते श्रीराधनपुरनगरे श्रीमहानिशीथयोगसमाप्तिं विधाय श्रीसिद्धगिरियात्रार्थ प्रस्तिः । नाविकार रतलामार्थ प्रस्थितोऽपि भवितव्यतावशेन महोपाध्यायः प्रेरितश्च स्वर्गीयमकागमनहन्यवेशानिन्दिनन्या- एकपृज्यानार्यश्रीविजयदानसरिभिः वंभातनगरे मिलितः । रेख साई, चातुर्मानी सानी हता। :

२ - - सपादकीयनिवेदनम् । वधारणानन्तर न मया केवल तलतिरेव समासादिता, किन्त्वह प्रात स्मरणीयगुरुगुणगरिष्ठश्रीविजयसिद्धि- सूरीश्वरप्रसादात् तदन्थरत्नभाण्डागारस्साधिकारीव जात । अन्यासामपि प्रतीना व्यापारणेऽह कृपालुना प्रसादित । मयाऽपि तस्कृपासफलीकरणोत्सुकेन तद्रन्थभाण्डागारस्य सपूर्णा सूचिरभ्यस्ता । व्याकरणविभा- गावलोकने श्रीहेमप्रकाशो विभागद्वयात्मक सत्र सूचितो दृष्ट । कोऽय ग्रन्थ इति पृच्छन्नह 'स मन्यस्त्वया निष्कास्य स्वयमेव विलोकनीय' इत्याज्ञप्त कृपालुभि । तैराज्ञप्तेन तद्रन्थावलोकनानन्तर' यद्धपोंऽनुभूत त ज्ञान्येव जानाति । यस्मात् अनेकवर्षपर्यन्त हृदि सङ्ग्रहीता हैमलघुप्रक्रियाबृहट्टी- कादर्शनाभिलापा साफल्यमासादितवती । तद्रन्थमङ्गलाचरण-उपोद्घात-ग्रन्थरचनाकारण-परमोपकारिमहो- पाध्यायवर्यश्रीसोमविजय जैनशासननभोमणिश्रीविजयहीरसूरीश्वर-सद्धपतिउदयकरणसोमकरणादिवृत्तान्त- ग्रन्थसारल्यार्थमहत्त्वाचवलोकयन् सर्वथा ग्रन्थप्रकाशनसपादनकार्याधनभिज्ञोऽपि एतद्रन्थरलप्रकाशनाय सरायितोऽभूवम् । एतस्मिन्नवसरे सर्वथाऽपरिचितस्यापि मम समीपे विवेकिधुयों रावसाहेवेत्युपाधिभूषितो वाडीलालात्मजो मोहनलाल खर्गीयगुरुवादिप्रेरित इव समागत । 'किमपि कार्यमाज्ञापयतु भवान्' इति तेन विजप्तेन मया स ग्रन्थस्तस्मै दर्शित , तत्प्रकाशनाभिलाषा च व्यक्तीकृता । तेनापि सुविवेकिना एतद्न्थरतावरोकनानन्तर सपूर्णप्रेसकॉपीव्यय वीकृत । तद्व्ययवलात् प्रेसकॉपीकरणे च मया नरोतम- दासनामाऽध्यापको प्राचीनलिप्यादिवाचना शिक्षयित्वा नियोजित । प्रत्यन्तरगवेपकेन मया 'अस्या एका प्रति वनगरस्थभाण्डागारे वर्चते' इति तदा खभातनगरस्थपूज्यपादश्रीविजयदानसूरीश्वरसकाशात् जातम् । तस्याश्च प्रत्या अर्भाशमितो विभागो महोपाध्यायश्रीप्रेमविजयाना प्रसादात् समासादित । प्रेसकॉपीकार्यारम्मानन्तर प्लुतप्रकरणे समागते प्रत्योर्महदव्यवस्थावशादुद्विमहृदयेनाऽपि मया पश्चात् साधना- न्तरसहायेन सुस्य करिप्ये इत्याशया प्रयत्नो न विघटित । अत्रान्तरे श्रीगिरिनारतीर्थोद्धारे दत्तसफलोप- देशाना श्रीविजयनीतिसूरीणा सकाशात् कुत्राप्यनुपलभ्यमानस्य केनापि प्राचीनसहृदयविदुपाऽतीव- सूक्ष्माक्षरैलिखितस्य मध्यमवृत्त्यवचूरिभ्यामलङ्कृतस्य श्रीसिद्धहेमशब्दानुशासनस्य प्रतेराशमितो भाग । तदनन्तर श्रीविजयदानसूरीणामाज्ञावशात् मोहमय्या चातुर्मासीकरणाथ समागत । तत्र मदरभातृमुनिश्रीमक्तिविजयादीना उपदेशपीयूषप्रीणितै पुनमचन्दगोमाजीत्यादिश्रावकै खण्डश श्रीहेमप्रकाशप्रकाशनार्थ व्ययस्वीकारेण प्रोत्साहित । सुरतस्थजेनानन्दपुस्तकालयाधिकारिणाऽमरचन्द्रेण निर्णयसागरप्रेसकार्यवाहक सम्मेलित , प्रकाशनकार्य चारव्यम् । सर्वथा सपादनकार्यानभिज्ञतया प्रथमाट- पृष्ठमित विभाग मुद्रितमपि वहशुद्धमिति ज्ञात्वा पन्यासपदमूपिताना श्रीनम्बूविजयगणिना पार्थे शुद्धीकरणार्थ पितम् , तैश्च तत् सपरिश्रम सशोध्य सशोधनविधिचिहादिसूचनासमन्वित विधाय प्रकाशनमार्ग सरली- हत । तासां सूचनानामनुसारेण सावधानतया अफसशोधनव्यग्रोऽपि यत्र यत्र स्खलितस्तत्र तत्र निर्णयसागरमुद्रणास्यवशास्यादिमि पुन पुन सारित इति तेपामप्युपकार न विसर्तुमुत्सहे । सुतमकरणमासाद्य आदर्शप्रत्योर्वहुस्वरनायुतत्वेन कार्य स्थगित, कथमिद ग्रन्थरत प्रकाशमानयिष्ये इति चिन्ताहान्त कोट(मुबई)स श्रेष्ठिहीरारालेन खपितृसोमचन्द्र श्रेष्ठिसङ्ग्रहीतपुस्तकरलाना विलोक- नामामग्नित , तन गतेन तत्रस्यपुस्तकाना मध्ये लिखितपुस्तकेपु हेमप्रकाशयातीव प्राचीना मन्थरचनाया पश्चात् पाठे व लिखिता मतिरपलब्धा । सपितृभाण्डागारें एतद्न्यरतस्य विद्यमानत्वेऽपि किमह न गापित इसारभ्य श्रीहीरातार सम्पूर्णअन्यमकाशनाय प्रेरित । तेनापि खम्टीनामनुमत्या पूर्वार्द्धस १निरयणवारिपनययं नमो हेमप्रकाशमानव्यप्रमवधार्य थोजम्बूविजये केवरेरेव अन्या अपि प्रती समय मुमुम्पादितमसोत विवाहय समना । उपरब्ध - संपादकीयनिवेदनम् । प्रकाशनमङ्गीकृतं, तद्योजनानुसारेणैवास्य पूर्वार्द्धस्य प्रकाशनं शक्यं जातम् । सोमचन्द्रश्रेष्ठिभाण्डागारस्थ- प्राचीनप्रत्याप्त्याहमप्यधिकोत्साहवान् जातः । संशोधनकर्मण्युपयुक्ता अन्येऽपि मुद्रितश्रीसिद्धहेमशब्दानु- शासनवृहद्वृत्त्यादयो ग्रन्थाः संगृहीताः । पूर्वोक्ता श्रीविजयनीतिसूरीणां प्रतिः संशोधनकर्मण्यतीवो- पयुक्ता समजनि । तस्याः शेपोऽप्यंशः श्रीविजयनीतिसूरीणां पार्थात् समासादितः । पुनरपि हेमप्रकाशस्य प्रकाशनं अव्ययप्रकरणं प्राप्य तथाविधसाधनानामभावे स्खलितम् । तानि च साधनानि मुद्रितरूपाणि वाक्यपदीयादीनि हीरालालद्वारा, लिखितरूपाणि तु राधनपुरीयसङ्घविजीवतलालपता- पसीद्वारा समासाद्य द्विमासानन्तरं तत्कार्य पुनः प्रारब्धम् । एतस्मिन्नवसरे लालबागस्वश्रावकाणामत्याग्रहेण श्रीविजयदानसूरीश्वराणामाज्ञाधीनतया हैमप्रकाशशीघ्रप्रकाशनलोलुपेन च द्वितीयाऽपि चातुर्मासी मोहमय्यामेव स्वीकृता । शेपकार्याणि स्थगयित्वा अस्य पूर्वार्द्धप्रकाशनन्यग्रेण चातुर्मास्यनन्तरमुपधानपूर्ववसरे मूलपूर्वार्द्ध- प्रकाशनकार्य समापितम् । अनुक्रमणिकादिकरणार्थ मुद्रितबिभागं गृहीत्वा मुम्बईतो विहृतोऽपि स्पर्शना- वशात् पूज्यपादविजयप्रेमसूरीश्वराणामाज्ञानुसारेण श्रीगोडीजीत्युपनामकोपाश्रये स्थितः । परं पूर्वकर्मवशात् शिरोऽर्तिचक्षुर्वेदनादिव्यग्रेणास्यां चातुर्मास्यां न किमपि कार्यं कृतम् । सूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिकाऽपि व्याख्यानवाचस्पति-आचार्य-श्रीविजयरामचन्द्रसूरिविनेयैः मुनिश्रीमनकविजयैः संशोषिता । शुद्धिपत्रकमपि सौभाग्यनिधिभिर्वाल्यावस्थाप्राप्तसंयमैः स्वपरानेकव्याकरणकुशलैस्तैरेव निर्मितमिति विदाकुर्वन्तु सज्जनाः । एतावंद्विद्याप्रियैः कृतेऽपि महति प्रयत्ने यद्यस्मिन् ग्रन्थे काश्चनाशुद्धयो विदुषां दृष्टिपथमायान्ति तदा तैः प्रकाशकद्वारेण स्मारणीयोऽयमल्पज्ञ इति प्रार्थना । अतः पूर्वं प्रकाशितानां हेमबृहद्वृत्त्यादिग्रन्थानामनुसारेणैव त्रुटितादिपाठाः संशोध्य यत्र तत्र न्यस्ता इति तेषां प्रकाशकमहोदया अपि धन्यवादमर्हन्ति । अन्येपामपि यथावसरे दत्तसाहाय्यानां साधुश्रावकादीनामुपकारं न विस्मरामि । सम्पादकीया प्रशस्तिस्तु सर्वथा कवित्व- गुणवर्जिताऽपि शीघ्रकार्यसमाप्तिहर्षसूचिकैवेत्युपेक्षणीया सद्भिः । हैमप्रकाशोत्तरार्द्रादिग्रन्था अपि समुंचित- प्रस्तावनादियुताः शीघ्र प्रकाशमानुयुरित्याशया विरमामि विस्तरतः । पूज्यगुरुवर्याणाम् श्रीअमीविजयमहोदयानां अक्षयतृतीया चरणरेणुः उपाध्यायः क्षमाविजयो गणी सूरत वीरसंवत् २४६३ . १ एतदपि ग्रन्थरत्नमतीवोपयुक्तमलभ्यं च विभाच तस्यापि प्रकाशने अमदावादस्य जवेरी मोतीलाल अधामाईला- दिभिव्ययस्वीकारेण प्रोत्साहितः, तदनुसारेणेदमपि प्रन्यरत्नं श्रीलालबागजनोपाश्रयद्वारा मुद्द्यमानं वर्तते । २ श्रीजीवतलालेन बृहन्न्यासप्रतीः श्रीलिम्बडीप्राचीनभाण्डागारस्या आनायिताः परं भाग्यागारिकैवस्थानुगारेणागिरता एव प्रेषिताः । ताभिः यथाविभागं प्रेसकॉपी संशोध्य ताः प्रेप्य पुनः शेषांशस्या नागपिला शेयांशपेन मयावदिमागः संशोधितः । एतन्मिन् शोधनकमणि वाक्यपीयादिमेलनादिभिश्चतावान् कालो व्यतीतः । ३ खोपनाविवरणदुर्गपदप्रबोधादियुतं श्रीहनलिभानुशासनं नु हीरालालेन मुद्राप्यमानमत्यरेव नामः प्रकारामासादयिष्यति । ४ गुर्जरगिरायां तत्रापि किचित्प्रस्तुतम् । नुवमानोऽप्येतद्न्यः कतिभिर्मुनिभिरयन यी नेपानप्यास सन्मतिर नन्तरपृटेऽवलोक्या।

मदीया सम्मतिः।
नाविदितमस्ति विदितवेदितव्यानां शेमुपीजुषां सुरसरखतीप्रणयिनां पण्डितप्रवर
नामन्तवासिनाञ्च यत् "शब्दशास्त्रापारशब्दसन्दोहाऽकूपारमवजिगमिपुभिर्मनोज्ञपि
खसान्तसुखाय परोपकाराय च विरचितानि नैकानि शब्दशासनानि, प्रोल्लासयि
दानि चन्द्रिका इव संन्तीति"
तेषु शब्दशाखेपु परिप्रथितयशोराशिधवलिताखण्डमण्डलैरनितरसाधारणपाणि
व्यतर्काधनेकशास्त्रपारङ्गतैमुनिप्रवरश्रीहेमचन्द्राचार्यसूरिभिर्विरचितस्य "हेमशब्दान
हितं प्राशस्त्यमध्यापनपरैरन्यैश्च दत्तावधानैर्मनीषिभिः ।
"तस्यैव हेमशब्दानुशासनस्य शब्दसाधनक्रमेण संपूर्णसूत्रसङ्कलनात्मकं"
सारखतं सर्वमनोमोदकमतीव रम्य महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचि
चेतसाम् ।
तच "हेमप्रकाशास्य" सारल्यस्वरूपैरविष्ठतब्रह्मचारिभिः खसिद्धान्तवि,
घ्यायैः" सश्रमं सुसम्पाद्यातीवोपकृतं सुरवाग्विभवस्य साधुसार्थस्येति समेषां धन
अस्मिन् अन्थरलेऽक्षराणां सौष्ठवं, पत्राणां महणता बहिरङ्गभूषासमार
एवेत्येवं सुवर्णे सौरम इव सर्वगुणसाहित्यतरां वेतश्चमत्करोति
एतच्च सम्पादनं सारवत्तया सोत्साहमध्ययनशीलानामाशुव्युत्पत्तिविधायकमि
साधुमिरन्यैश्च प्रवर्तितव्यमिति विनिवेदयन्ते-
Madam,
Bombay.
Malabar Hill,
प्राम वरनी
पो. कच्च्या-मिर्जापुर
मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी
विक्रम सम्वत् १९९३
श्रीशिवनाथो
"व्याकरणशास्त्राचार्याः" हि

श्रीहैमप्रकाशमहाव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । -- Munshi सूत्रम् पृष्ठाइः सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्टाकः अतिरतिक्रमे च २८५ अनत्यन्ते अ इ उ वर्णस्यान्तेऽनुनासिकोऽनी अतोऽति रोरुः ८३ अनद्यतने हि: १६७ दादेः ७२ अतोऽनेकखरात् ४५० अनपये अं अः अनुस्खारविसर्गों १२ अतोरिथट् ४४३ अनरे वा अं ४क पशषसाः शिट् १५ अतोऽह्नस्य ३२३ अनवर्णा नामी अंशं हारिणि ४४६ अत्र च ४२६ अनाङ्माटो दीर्घाद्वा छः अंशाहतोः ३३१ अदसोऽकवायनणोः ३१७, ३४१ अनाच्छादजायादेवा १९६ अः सपत्याः ४३८ अदसो दः सेस्तु डौ १४२ अनान्यऽद्विः प् ४१९ अः स्थानः ३२९ अदिस्त्रियां वाञ्चः ४३७ / अनाम् स्वरे नोऽन्तः ११८ अकद्रूपाण्ड्वोरुवर्णस्यैये ३४९ अदीर्घाद्विरामैकव्याने ६६ अनाऐं वृद्धेऽणिनी बहुखरगुरूपा- अकमेरुकस्य २५२ अदूरे एनः १७२ न्त्यस्यान्तस्य प्यः ५७,२०१ अकल्पात् सूत्रात् ३७२/अदृश्याधिके २५० अनिदम्यणपवादे च दित्यदित्या- अकालेऽव्ययीभावे २७१ अदेतः स्यमोलक दित्ययमपत्युत्तरपदाळ्यः ३२७ अकेन क्रीडाजीवे २८१ अदेवासुरादिभ्यो वैरे ३८३ अनियोगे लुगेवे ६५ अक्लीवेऽध्वर्युक्रतोः ३११ अदेशकालादध्यायिनि ४०९/अनीनादट्यहोऽतः अक्ष्णोऽप्राण्यङ्गे २९४ अदो मुमी ७० अनुकम्पातधुक्तनीयोः ४६४ अगारान्तादिकः ४०९ अदोराय निः प्रायः ३५६/अनुग्वलम् अग्रहानुपदेशेऽन्तरदः । १८४ अदोनदीमानुषीनाम्नः ३४९ अनुपदं बद्धा ४३५ अघोषे प्रथमोऽशिटः ७६ अद्व्यन्जनात्सप्तम्या बहुलम् ३१७ अनुपद्यन्वेष्टा ४४५ अस्थाच्छन्त्रादेरन् ४०६ / अव्याने अनुब्राह्मणा दिन् ३७२ १२१ अधण्तखाद्याशसः १६५/ अनुशतिकादीनाम् ३५१ अचित्ताददेशकालात् ३८८/अधरापराच्चात् १७१ अनेकवर्णः सर्वस्य ५२ अच्च प्रारदीर्घश्च १२२ अधर्मक्षत्रत्रिसंसर्गाङ्गाद्विद्यायाः ३७२ अनोः कमितरि अजातेनानो बहुखरादियेकलं वा ४६४ अधातुविभक्तिवाक्यमर्थवन्नाम ८७ अनोऽव्ये ये ३५३ अजादिभ्यो धेनोः ३३६ अधातूदृदितः १९० अनोर्देशे उप २९२ अजादेः १८७ अधिकं तत्सद्यमस्मिन् शतसहसे १४६ अज्ञाने ज्ञः षष्ठी २४० शति शद्दशान्तायाः ४४२ अनोऽस्य 'अचः १९० अधिकेन भूयसस्ते २४८ अन्तः पूर्वादिकण ३७९ अजनादीनां गिरी २९० अधेः शील्स्थास आधारः २२३ अन्तर्वहिन्यों लोनः भन्वर्गात खरे वोऽसन् ४४७ अन्यो घोपवान् अणनेयेकण्ननल्टिताम् ३३३ अध्यात्मादिभ्य इकण ३९८ अन् खरे २८४ ४३६अपः तः कृकमिकंसकुम्भकुशाकर्णी. अनः २७७ अपघमान्तस्थो धुद पानेऽनव्ययस्य ८१/अनक् १३६ अपये जीवने ४३८ : स्यमोऽम् ११५ अनजिरादिबहुसरशरारीनां मती ३६६ अपायेऽवधिरपादानम् २४० । आः स्यादी जस्भ्याम्ये ८८ अननो मूलात् १९७ अपीलयादेवहे २९१ इन् ३३५/अनहहः सा १४४ अपोटे पवादेरीषदसमाप्ते कल्पप्देदयप् अनतो छप् (१।४।५९) ११८ पोनपादपानपातस्तृचानः 'शीयर ४६३ सनतो टप् (३।०६) २७० अपो यन् वा है. प्रका० पूर्वा० ६० अचः ४४७ अनो वा ७१/अधेरास्ते ३३४ अध्वानं येनौ हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । ३ उ उक्ष्णो लुक इच् युद्ध इतावतो लुक इतोऽतः कुतः सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् पृष्टाङ्क: आश्वयुज्या अन् ३८७ ईयसोः २६० उवर्णयुगादेयः ४२३ आसन्नः ५८ ईश्वाववर्णम्यानव्ययस्य १७७ उवर्णादिक आसन्नादूराधिकाध्यादिपूरणं ईषद्गुणवचनैः २७९ उपासोपसः द्वितीयाद्यन्याथै २६१ ३३ उष्ट्रमुखादय २५९ आन्तयम् ३७८/३ वा ६७ उष्ट्रादक आहितान्यादियु उष्णात् ४४७ आदि दूरे १७१ उपदान्तेऽनूत् १४९/उणादिभ्यः कालात् ३९४ इ इकण्यथर्वणः ३३४ उतोऽनडुचतुरो वः १३० ॐ चोन् इचापुंसोऽनिक्याप्परे १८८ उतोप्राणिनश्वायुरजवादिभ्य ऊङ् २०१ ऊडायाम् इच्यखरे दीर्घ आच्च २७६ उत्करादेरीयः ३६० जनार्धपूर्वाद्यैः २८० २७६ उत्कृष्टेऽनूपेन २२७ ऊर्जा विन्वलावस् चान्तः ४५५ इल इतः २०० उत्तरादाह ३९० ऊर्णाहंशुभमो युस ४५३ ४०३ उत्थापनादेरीयः ४१३ अर्बादिरिष्टातावुपश्चास्य १७९ उत्पातेन ज्ञाप्ये २३७ ऊर्याद्यनुकर्णचिडाचश्च गतिः १७६ इतोऽत्यर्थात् १९३ उत्सादेर ३२८ ऋ १६६ उदकस्योदः पेपन्धिवासवाहने २९२ ऋलति हखो वा ७२ इतोऽनिनः ३५० उदग्ग्रामाद्यकृल्लोम्नः ३९२ ऋक्पूः पथ्यपोऽत् २९३ इदं किमोऽतुरिकिय चास्य ४४० उदच उदीच् १२३ ऋक्सामय॑जुषधेन्वनडहवाम- इदमः १२९ ? उदन्वानधौ च ४४९ नसाऽहोरात्ररात्रिंदिवनकंदि. इदमदसोऽक्येव १३६ उदरे विकणाधूने ४४६ वाहर्दिवोर्वष्ठीवपदष्ठीवाऽक्षि- इदुतोऽस्नेरीदूत् ९८ उदितगुरोर्भाधुकेशन्दे ३५९ ध्रुवदारगवम् ३१३ इनः कच् २६७ उदुत्सोरुन्मनसि ४४७ ऋगृद्विखरयागेभ्यः इन् टीखरे लुकू १३४/उपज्ञाने ३८४ ऋचः शसि २९२ इन्द्रियम् ४४५ उपत्यकाधिसके ४३९ ऋणाद्धतोः २४३ इन्द्रे ६८ उपमान सामान्यैः ३००ऋणे प्रदशार्णवसनकम्बलवत्सरव- इन्हनूपूषार्यम्णः शिस्योः १३१ उपमानसहितसंहितसहशफवामल त्सतरस्या इवृद्धिमत्यविष्णो ३०८ क्ष्मणायूरोः २०१ ऋत इकण ३८१ ४५२ उपमेयं व्याघ्राद्यैः साम्यानुक्ती ३०१ ऋतां विद्यायोनिसम्बन्धे ३१८ इवर्णदेरखे खरे यवरलम् ६५ उपसर्गस्यानिणेधेदोति ६५ ऋते तृतीयासमासे ६४ इटादेः ४४५/उपसर्गात २६९/ऋते द्वितीया च २५२ इसुसोर्वहुलम् १७७/उपसर्गादध्वनः २९३ ऋतो डर उपसर्गाद्दिवः २२४/ऋतो वा तोच इपोमवरुणेऽग्नेः ३०८ उपाजेऽन्वाजे १८५/ऋत्यारुपसर्गस्य ६४ इौ वा ९७उपात् ३७९ लादिभ्योऽण ४१३ इतोऽकन् ३९५/उपान्वध्यावसः २२५/ऋलिज्दिश्शूस्पृश्लज्दषु- ईदूदेद्विवचनम् ७० उपायाद्रखश्च ४७० ष्णिहो गः १३८ इनम् च ४१२/उपेनाधिकिनि २४६ अदुदितः १२७ इनयो चाशब्दे ३८७ / दुदित्तरतमरूपकल्पनुवपिलमो- इनेऽध्वात्मनोः ४२४ उभयाद्द्युस्च १६४ चमतहते वा हखश्व ४६२ इनोऽह्नः क्रतो ३६१ उमोर्णाद्वा ३६२ ऋदुशनस्पुरुर्दशोऽनेहसश्च से १०७ ईयः खसुश्व ३५२/उरसोऽप्रे २९५ ऋन्नरादेरण ४०५ रेय कारके ३१५/उरसो याणी ३८६/ऋषिसदितः २६७ इलश्च देशे ३७८ उसे ४ हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसुत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । १६० कर्तरि ४२५/ भोत औः ३४३ ओदन्तः ६४/और कसोमा ट्यण पृष्टाका पृष्टाः सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् २५० उपणेवणेदोनिमुसाश्वदकस्मात्त ऐषमः परुत्परार वर्षे कस्येतो लुरु ३९३ ऐषमो ह्या श्वसो वा ३९२) कर्तुळाप्यं कर्म वोवाखरादेरादेला प्रत्या ओ कर्मजा तृचाच ४६४ ओज सहोम्मसो वर्तते ४०० कर्मणः सन्दिष्टे २२० ऋश्यादेः कः ३६९ मोजोजः सऽहोम्भस्तमस्तपस्रष्टः ३१७ कर्मणि २५० १.९ कर्मणि कृता पभोपानदाम्भ्यः ऋषियष्ण्यन्धककुरुभ्यः ७१ कर्मणोऽण ४११ पेरप्याये ३८० ओदीतोऽवाव ६० कर्मवेषायः हो विश्वस्य मिने २९० ओमः प्रारम्मे १० कर्माभिप्रेयः सम्प्रदानम् २३४ ओमाठि ६५/कलापिकुथुमिततलिजाजलिलामलि. मस्तयोः ६२ औ शिखण्डिशलालिसब्रह्मचारिपीठ- औता ११० सर्पिसूकरसअसुपर्वणः सतमालालभ्यो पा ६२/मोदन्ताः स्वराः ६ कलाप्यश्वत्थयवसोमाव्यासैषमसो- लसाल्दा १९५ Sक: क कल्यमेरेयण ३२८ सूदन्ता समानाः १२ कंशंभ्यो युस्तियतुतवभम् ४५३ कल्याणादेरिन् चान्तस्य ३५० कंसार्धात् ४१९ कवचिहस्त्यचित्ताचेकण् ३६० एऐ मो मो सभ्यक्षरम् १२ कंत्रीयाभ्यः ३६२ वर्गकखरवति १३२ १३३ | ककुदस्यावस्थायाम् २७० | कसमासेऽध्यर्थः एकद्विनिमाया दीर्घष्ठताः ७ कखोपान्यकन्यापलद नगरपामहदो- एकनाराया इक. ४३८ तरपदाहोः ३९७ काकतालीयादयः एकस्वरात ३६२ कच्छादेनृस्थे ३९६ काकवी वोणे २८७ যুগ ४५३ काकायः क्षेपे एकात्सापास्य १७. फटः ४३९कासपयोः २८७ एकादशयोपोटरपोढा यहा ३१४ कटपूर्वारप्रायः ३९५ काण्डाण्डमाण्डादीरः एकदाकिन् पाऽसहाये ४६३ कठादिभ्यो वेदे उप ३८५/काण्डात्प्रमाणादक्षेने एप्रदे पर्मपारमात ४५५कणे मनस्तृप्ती १८५ कादिय॑नम् १३ एकार्य पानेच २५० तरकतमो जातिप्रने २९९ कारकं कृता २८० एप्पा एयम् २१२] इति २८७ कारिका स्थिलादी १८४ एतदप मानेऽनग्नसमावे ८६ यादेखेयकम् ३९१ कार्षापणादिषट् प्रतिधास्य वा ४१९ १११ कप मिरयम् १६८काल २७९ एलोऽसाय (कथादेरिका ४२२ कालहेतुफलादोगे एदोतः पदान्वेऽस लए ६१/कन्यामा कम् ३९२ कालाजघाटात क्षेपे एसोरेस एपेमारी ३४० कन्यात्रियया फनीननिवर्ण ३५०चाराव सोपी रशियोस ९० पिशावरेय १२कारातनतरतमकाले ३१८ परस्मोति कपियोपादादिरसे २४. कालारपरिमध्यलभ्यफार्यमुकरे ४१२ २१२/पेगोत्र ३२. कालाये ऋणे परमीविपारादेः १९५कालाद्ववत १४म्परामाग्नि ४२४ रापः एमरजेन. २५१ रजप २२४ बारापनोव्याप्ती २६९ ये ३७९बालापमावदेश वा फर्म पाकमै- १० २५९ दिएपनिम् TRE पम् १४परेवायें प भारद ४४७ समाटर स्टे पर हमप्रकाशव्याकरणपूर्वाधंगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । २३३ कृताचैः २८६ कृति ३६७ कृते ३६० क्लीवे सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्ठा काले भान्नवाधारे २३३ क्यङ्मानिपित्तद्धिते कालो द्विगौ च मेयैः २८१ क्रियामध्येऽध्वकाले पञ्चमी च २४८ काशादेरिलः ३८४ क्रियाविशेषणात् २२५ काश्यपकोशिकाद्वेदवच ३८५/कृत्यतुल्याख्यमजाया ३०० क्रियाश्रयस्याधारोऽधिकरणम् २४४ काश्यादेः ३९४ कृत्येऽवश्यमो लुक् २८९/ क्रियाहेतुः कारकम् २०३, कासूगोणीभ्यां तरह ४६५ कृयस्य वा २५० क्रीतात्करणादेः १९५ किंयत्तत्सर्वेकान्यात्काले दा १६८ कृत्सगतिकारकस्यापि ५८ क्रुद्रुहेासूयाोंगे यं प्रति कोपः २३४ किं क्षेपे ३०२ कृयेनावश्यके २८२ क्रुशस्तुनस्तृच् पुंसि १०८ किन्त्यायेऽव्ययादसत्त्वे तयोरन्त कृपाहृदयादालुः ४५३ क्रोशयोजनपूर्वाच्छतायोजनाचा स्याम् ४६० कृभ्वस्तिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां प्राग भिगमाहे ४१० किमः कस्तसादौ च तत्तत्त्वे चिः १७६ क्रोष्टजलको क् च ३४२ किमयादिसर्वाधवैपुल्यवहो:पित्तस् १६६ कृशाश्वकर्मन्दादिन् ३८६ कौड्यादीनाम् २०२ किशरादेरिकटू ४०५ कृशाश्वादेरीयण ३६८ क्लिन्नालश्चक्षुषि चिल्पिलचुल् कुनादेायन्यः ३०२ कृष्या दिभ्यो वलच् ४५२ चास्य कुटिलिकाया अण ४०८ केकयमित्रयुप्रलयस्य यादेरिय् च ३३० क्लीवमन्येनैकं च वा कुटीशुण्डाद्रः ४६५ केदाराण्ण्यश्च ११८ कुण्ड्यादिभ्यो यलुक्च ३९१ केवलमामभागधेयपापापरस- क्लीवे वा १५१ कुला दुपः ४६५ मानार्यकृतसुमङ्गलमेषजातू १६७ कुत्सिताल्पाज्ञाते ४६४ केवलसखिपतेरी ३७५ कुन्त्यवन्तेः स्त्रियाम् ३५८ केशाद्वः ४६५ कुम्भपद्यादिः २६९ केशाद्वा कुमहद्यां वा २९४ केशे वा १४१ कुमारः श्रमणादिना ३०० कोः कत्तत्पुरुपे २८७ क्विन्वृत्तेरसुधियस्तो १०४ कुमारी क्रीडनेयसोः ४६६ कोटरमिश्रकसिध्रकपुरगसारिकस्य केहामात्रतस्वसस्त्यच ३९१ कुमुदादेरिका ३६९ वणे कुरुयुगन्धराद्वा ३९६ कोऽण्वादेः ९ कुरोर्वा ३५० कोपान्त्याचाण ३७४ कुर्वादेर्व्यः ३५३ कोऽश्मादेः ३७५ क्षुद्रकमालवात्सेनानान्नि कुलकुक्षिग्रीवाच्छ्वाऽस्यलकारे ३९१ कौण्डिन्यागस्त्ययोः कुण्डिनाग क्षुद्राभ्य एरण् वा ३५२ कुलटाया वा ३५० ३३७ क्षत्रेऽन्यस्सिन्नाश्ये इयः ४४५ कुलत्यकोपान्यादण् ४०२ कौपिजलहास्तिपदादण् ३८३ क्षेपातिप्रहाव्यथेष्वक स्तृतीयायाः १६५ कुलाख्यानाम् २०२ कौरव्यमाण्डूकादसुरेः १९९ कुलाज्जल्पे ४३४ कौशेयम् ३६२ खरखुरान्नासिकाया नस् २६९ कुलादीन: ३५३ /कं नमादिभिन्नः २९९/खलादिभ्यो लिन् ३६१ कुलालादेरक ३८६ फयोरसदाधारे २५१ खारीकाकणीभ्यः कच् ४२० कुलिजाद्वा लुप् च ४१५काः २६२/खार्या वा कुल्मासादण.. ४४७काच नाम्नि वा २०१|खितिखीतीय उर १०१ कुशलायुक्तोऽनासेवायाम् ૮૧ २४६ कात्तमवादेचानत्यन्ते कुशले ३७५/कादल्पे १९५ ग कुशाग्रादीयः २८२ गच्छति पथिदूते ३८८ कुसीदादिकट २८० गडदवादेश्वतुर्यान्तस्यैकखरस्यादेश्व- कृपः प्रतियने २२३ त्तवातुमम् १७५ तुर्थः स्वोध प्रत्यये १३० फगो नवा १९४ गवादिभ्यः २६३ ८०, १८५मा पलितासिता १९२ क्वकुत्रानेह १०२कचित् ४५४ क्वचित्तुर्यात् ३६० क्वचित्वार्थ ४२५ क्वसुमतौ च २९० क्षत्रादियः ४५८ क्षियाशीः प्रेपे ३९६ क्षीरादेरेयण स्ती च ४६८ ख्यागि ४३७/केन ४०४ केनासत्त्वे ६ हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । AAL ८७ २९५ चतस्राईम् गवि युके २९४ चतुर्थी पृष्ठाङ्क: पृष्ठाका सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् गणिकाया पय: ३६० गोत्रादकवत् ३८१ सोऽपये गतिः १७५ गोत्राददण्डमाणवशिष्ये २७८ ३८३ स्युक्तं कृता डिडौं गोनोक्षवत्सोष्ट्रवृद्धाऽजोरभ्रमनुष्यरा- ९९ गतिकारकस्य नहिचविषिव्यघिर- चिसहितनी वो १९० जराजन्यराजपुत्रादक ३६. ङित्यदिति के सिन् गतिकन्यस्तत्पुरुषः २८६ गोत्रोत्तरपदागोत्रादिवाऽजिह्वाकात्य- गतिबोधाहारार्थशब्दकर्मनिसाऽकर्म हरितकात्यात् १५८ ३२९/ डेडसा ते में णामनीखाद्यदिहाशब्दायकन्दाम् २१७ गोदानादीनां ब्रह्मचर्य ४१० कस्योर्याती गते गम्येऽध्वनोऽन्ते नेकाध्य था २४७ गोधाया दुष्टे णारच ३५२णोः कटावन्तौ शिटि नवा गतेनैवाउनाले २३८ गोपूर्वादत इकण ४५५/ड्यादिदूतः के १८८,२९१ गत्यर्थवदोऽच्छः १८५/गोमये वा ३९६ व्यादेणस्याकिपस्तद्धितलुक्यगो. गम्भीरपञ्चजनबहिर्दयात ३७० गोऽम्याम्पसव्यापद्वित्रिभूम्यनिशेकु. णीसूच्योः २४२ गम्ययपः कर्माधारे शडक्वङ्गमजिपुजिवर्हिःपरमेदि- २९१ ज्यापो बहुलं नाम्नि गम्यस्याप्ये २३८ वेः स्थस्य ३२०व्याप्यूडः गर्गमार्गविका ३४६ गोरथवातावस्कट्यल्लम् ३६१ गर्गादेर्यम् ३३९ /गोर्नाम्न्यवोक्षे ६८चजः कगम् १२१ गोत्तरपदाशयः ३९७ गोधान्ते हखोऽनंशिसमासेयो बहु- चटकाणैरः स्त्रियां तु लुप् गोदप्राणिनि नीही २६१/चटते सद्वितीये गवाधादिः ३१० गोष्टान्ते शुनः २८९ गोठादीनम् ४५८ चतुरः गवियुधेः स्थिरस्थ ३२० गोस्तत्पुरुषात् २३४ महादिभ्यः ३९७ गौणात्समयानिकषाहाधिगन्तरान्त- चतुर्थी प्रकृत्या २८० गायिविदपिकेशिपणिगणिना ३३४ रेणातियेनतेनैतिीया २२८ चतुर्मासान्नानि ३७८ मान्धारिसाल्वेयाभ्याम् ३५५ गौणो व्यादिः ५७ चतुष्पाद् गर्भिण्या गिरिनदीपौर्णमास्याप्रहायण्यपथम- गोरादिभ्यो मुख्यान हीः १९० चतुष्पाद्य एयम् पर्यादा २७७ | गौष्ठीतेकीनकेतीगोमतीशूरसेनवाही. चतुस्नेहायनस्य वयसि ३२३ गिरिनचादीनाम् ३२३ करोमकपटयरात् ३९२ चत्वारिंशदादी वा ३१५ गिरेरीयोऽलाजीचे ३९. म्मिन् ४५३ चन्द्रयुक्तात्काले लुप्तप्रयुक्त गुणाजादेष्ठेयस् ४६. प्रणाद्वा ४४६ चन्द्रायणं च चरति गुणादनियो नवा २४४ प्रामकोटात्तक्ष्णः २९४ चरकमाणवादीमम् ४२४ गुणादिभ्यो यः ४५५ प्रामजनबन्धुगजसहायात्तल ३६१ चरणस्य स्थणोऽद्यतन्यामनुवादे ३११ गुणोडरेदोत् १९ प्रामराष्ट्रांशादणिकणी ३९८ चरणादकम् पुरावेकर २५५/मामामालिया ३२३ चरणाद्धर्मवत् ३६१ पृथ्यादा ३५२/प्रामादीनम् च ३९०चरति पहेडमीधोरण पथ ३८४माम्याशिशुद्विशफपये स्त्री प्रायः ३०९ चर्मण्यम् गोः ४५५ प्रीवातोऽण च ३७० चर्मण्वसष्ठीवश्चक्रीवत्कशीवद्रुम- गोःपुरी २६२ ग्रीष्मवसन्ताद्वा ३८७ प्रवद ३११/प्रीष्मावरसमादकम् ३८९ चमिवर्मिगारेटकार्कय्यकाकलवावा. गोण्यादेष ४३८ किनाच कथान्तोऽन्यवरात् ३५६ गोग्या ये २९.चवर्गदषदः समाहारे गोत्रानियेभ्योऽयम् प्राया २८८ चोपदादेरका १५७ चातुर्मास्यन्ती यलुक् च गोत्रपरणाव घपालापरप्राप्लव घोपवति ८४ चादयोऽसत्वे चादिः सरोऽना गोत्रारास थाद् १५५ चा इन्द्रः सहोजी २९६ गो.सरेयः १९१पभ्युपसर्गस बहुलम् . ट हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । ७ १७७ न्यायान ३४६ तदन्नास्ति ३८३ टः पुंसि ना ४४५ टस्तुल्यदिशि सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्ठाङ्क सूत्रम् पृष्ठा चाहहवैवयोगे १६० जायाया जानिः २६९ तत्पुरुपे कृति ३१६ चितीवार्य १० जासनाटकाथपिपो हिंसायाम् २२२ तत्र १७५ चितेः कचि २९१ जिहामूलादमुलेश्चयः ३७८ तत्र कृतलब्धीतसम्भूते ३७५ चित्रारेवतीरोहिण्याः स्त्रियाम् ३७६ जीर्णगोमूत्रावदातसुरायवकृष्णा तत्र घटते कम्मणष्ठः ४३९ चिरपरुत्परारेः नः च्छाल्याच्छादनसुराहिनीहितले ४५८ तत्र नियुक्त ४०८ चूडादिभ्योऽण ४१३ जीवन्तपर्वताद्वा ३४३ तत्र साधी ४२२ चूर्णमुद्गाभ्यामिनणौ ४०२ जीविकोपनिपदौपम्ये १८६ तत्रादाय मिथस्तेन प्रहत्येति सरूपेण चैत्रीकार्तिकीफाल्गुनीश्रवणाद्वा ३७० जीवितस्य सन् ४१६ युद्धेऽव्ययीभावः २७६ चौरादेः ४३२ ज्ञानेच्छा धारक्तेन २८३ तनाधीने १७३ च्चो कचित् ४६० तत्राहोरात्रांशम् २८२ ज्योतिरायुभ्यां च स्तोमस्य ३२० तत्रोद्धृते पात्रेभ्यः छगलिनो णेयिन् ३८५ ज्योतिषम् ४२६ छदिर्वलेरेयण ४२५ ज्योत्नादिभ्योऽण ४५२ तदः सेः खरे पादार्था ८६ छन्दसो यः ३८० तदन्तं पदम् छन्दस्यः ३८६ निदाांदणिनोः ३६५ छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकवठ्ठचाच तदन्नास्मै वा वृध्यायलाभोपदारानं द धर्मानायसङ्के देयम् ९८ ४१५ छन्दोऽधीते श्रोत्रश्च वा ૨૮૮ तदर्थार्थन २८२ छेदादेनित्यम् ४१८ टाटसोरिनस्यौ ८९ तदस्य पण्यम् ४०५ ज टायोसि यः १५४ तदस्य सजातं तारिकादिभ्य इनः ४४० जङ्गलधेनुवलजस्योत्तरपदस्य तु टादौ खरे १०९ तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः ४४७ वा ३३३ / टास्यनः १३६ तद्धितयखरेऽनाति २५४,४२२ जण्टपण्टात् ३५२ / टोस्येत् १११ तद्धिताककोपान्त्यपूरण्याख्याः २६४ जम्व्वा वा तद्धितोऽणादिः ३२७ ३८७ डकश्चाष्टाचत्वारिंशतं वर्षाणाम् ४१० तद्भद्रायुष्यक्षेमार्थार्थनाशिषि २३९ जरत्यादिभिः २८५ डतिष्णः सङ्ख्याया लुप् १०३ तद्यायेभ्यः ४१० ११७ डत्यतु सङ्ख्यावत् १६९/तद्वति धण १७४ जराया जरस् च २७७/डाच्यादी १७९ तद्वत्यधीते ३७१ जराया जरखा ११२ डित्यन्त्यखरादेः ९९ तद्युक्त हेतो २४६ ९२ डिद्वाण ३७४ | तनुपुत्राणुवृहतीशून्यात्सूत्रकृत्रिम- जस्येदोत् ९८ डिन् ४४१ निपुणाच्छादनरिक्त ४६६ जखिशेष्यं वाऽऽमच्ये १५९ ः सः सोऽधः १२५ तन्त्रादचिरोद्धृते ४४६ जातमहद्वृद्धादुक्ष्णः कर्मधारयात् ३०२ ण तप्तान्ववाद्रहसः जातिकालसुखादेर्नवा २६२ णश्च विधसा विश्लुक् च वा ४१७ जातिश्च णितदितयखरे ४४३ णषमसत्परे स्यादिविधौ च १४० तमिस्रार्णवल्योत्स्नाः जातीयैकार्थेऽच्वेः ४२१ तं पचति द्रोणाद्वान् ४१५ जाते ण्योऽतिथेः ४२२/तं प्रत्यनोर्लोमेपकूलाव ४०८ १७३ तं भाविभूते ४१२ जातेरयान्तनित्यत्रीशुदात् १९६ तः सौ सः १२९ तयोचा खरे संहितायाम् ९ जाती ३३५/ततः शिटः ७५ तयोः समूहवच बहुपु ३५३ /तत आगते ४०२ जाल्याख्यायां नवैकोऽसद्ध्यो बहु ततोऽस्याः ६६ तरुतृणधान्यमृगपक्षिण बहुते ३०९ वत् २५४ ततो हश्चतुर्थः ७३'तव मम स्मा १५५ जयिनि च जरसो वा जस इ. ३४८/ तमर्हति ३०१/ णोऽनात् जातेः सम्पदा च जाती राज्ञः ३८१/तरति ८ हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । द शानो घुट्यार तस्य वापे दिन इकण तेन निवृत्ते च तेन हस्तायः तो वा ७५ ३०६ दशैकादशादिकर पृष्ठासूनम् पृष्ठाङ्कः सूत्रम् पृष्ठा तवर्गस्य वर्गष्टवर्गाभ्यां योगे तृतीया तस्कृतः चटवा ७५ तृतीयान्तात् पूर्वापरं योगे ९७ दक्षिणाकडारस्थालीविलादीययौ ४१८ 'सिः १७५ तृतीयायाम् २८३ दक्षिणापश्चात्पुरस्त्यण ३९१ तसे मृताऽधीरे च ४१२/तृतीयोकं वा २७९/दक्षिणेर्मा व्याधयोगे २६७ तसे योगादेः शके ४११/तृनुदन्ताव्ययकस्तानातृश्शत दक्षिणोतराचातस् १७१ तस्मै हिते ४२४ ठिणकच्खलर्थस्य २५१ दगुकोशलकारच्छागवृषाद्यादिः ३५५ १७५ तृप्तार्थपूरणाव्ययाऽतृश्शत्रानशा २८३ दण्डादेर्यः ४१७ तस्य तुल्ये कः संज्ञाप्रतिकृत्योः ४३७ तृखसनप्तनेष्टलष्टक्षत्तृहोतृपोतृप्र. दण्डिहस्तिनोरायने १०८ ३७५ तेन च्छन्ने रथे तस्य व्याश्याने च प्रन्थात् ३७४दध्यस्थिसक्थ्यक्ष्णोऽन्तस्याम् ११९ तस्येदम् तेन जितजयद्दीव्यत्खनरसु ३२५, ४०१ ૩૮૨ दध्युरः सर्पिमधूपानच्छाले. तस्याहे क्रियाया पत् १७५ दन्तपादनासिकाहृदयासग्यूयोद- तेन प्रोत तादये ३८४ कदोर्यकृच्छ कृतो दत्पन्नस्हृद- ताभ्यो वा डित तेन विते चक्षुचणौ ४४६ सन्यूपनुदनदोषन्यकन् तारकावर्णकाएका ज्योतिस्वान्तव- ४११ छन् वा ९६ पितृदेवत्ये वे १८९ लुग्वा २८९ दन्तादुग्नतात ४५३ सालानुपि ३६२ तेषु देये ४११दर्भकृष्णाग्निशमरणशरद्वच्छुनका. विफकितवादी द्वन्द्वे ३४५ १७९ दामायणब्राह्मणवर्षगण्यवाधि- विकादेरायनिम् तो मुमो व्याने खौ ३५५ छभार्गववारस्ये ३४२ वितिरिवरतन्तुखण्डिकोसादीयम् ३८५ यदादिः (३।१११२०) तिरसस्तियति त्यदादिः (६।१७) १२३ ३४८ दाण्डाजिनिकायःशूलिकपार्धकम् ४४५ तिरसोचा त्यदादेर्मयद ३८२ दामः सम्प्रदानेऽधम्र्ये आत्मने च २३४ विरोऽन्ती सदामेनदेतदो द्वितीयाटीस्य. १८५ श्यन्ते दामन्यदेरीयः ४६९ दिलयबादनानि १२९ ३६४ त्यादिसर्यादेः खरेवन्यात् दान्नः १४६ तिलादिभ्यः हे तेला ४३९ दिकपूर्वादनानः पूर्वोऽ ३९२ विग्विलादयः ४६७ २७४ दिवासी विष्यपुष्पयोर्माणि ३५९ सादध प्रशस्ते रूप दिक्शब्दात्तीरस्य तारः दीयं विषय वा २९२ ९५ दीयाम्बपीजागा पृषी हाच दिकशब्दादिग्देशकालेषु प्रथमा- त्यादी क्षेपे ज्यन्यखरादेः पचमीसप्तम्या: १७२ ४२९ धीयारीकण न विया पेत् प्रपुजतोः पोऽन्तध दिगधिकं संज्ञातद्धितोत्तरपदे भ्यंम पया ३६२ १५४ दिगादिदेहाशाद्यः निककुद् गिरी २७० त्रिचतुरस्तियचतम स्यादी १४८ तुमोऽथे भाववचनाव निशशिर्डको संज्ञायामाईदर्थे ४१५ दिव औः सौ रायणपारायणं यजमानाञ्चीयाने ४११ त प ww|दिवस् दिवः पृथियो पा तुस्पस्थानासप्रयमः स्वः शुस्यास्तृतीयापटपो दिशो स्ट्यान्तराले एपेपर्मला एपम् ४२९ दीपः ४१३ सुम्नीः १५३ दीर्घप्यायव्यसनासे ११० एपीपम् ४.समो प्रलयोत्तरपदे चकस्मिन् १५४ीपश्चिमण्यरूपेषु च हमा छ ४२६ दीपों नाम्यविमुक्तएर ४२१/इ.सात् प्रातिकूल्ये एबीपस्मृतीयप दुनादिकवियोगलाभादाभ्यः ३५७ इटमा परमे १॥ दुर्मिन्दार ८० स्यादेः साकाहस्साजेन दमप मनापामे दिवेश्चैयण् वा १४९ दियो धावा १५ प्रेषयः २५२ घालारितम् ३९.सदे गुणः ४.६समदं रिना प्रारचाक: १५७ सुमे जारी प यो ए -- हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । द्वयोर्विभव्ये च तर ७द्वारादेः देये त्राच न सूत्रम् पृष्ठाकः सूत्रम् पृष्ठापासूनम् दृष्टाः टुस्कुलादेयण वा ३५३ द्वन्द्व वा ९४ धनहिरण्ये कामे ४४६ दूरादामध्यस्य गुरुवैकोऽनन्त्योऽपि ४५९/धनादेः पत्युः ३२७ लन्त् ४०८ धनुषो धन्वन् दूरादेत्यः ३९० द्विः कानः कानि सः ७४ धर्मशीलवर्णान्तात् दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यहेरेयण ३७०/ द्विगोः संशयेच ४४१ धर्माधर्माचरति इन्पुनवकारर्भुवः १०४ द्विगोः समाहारात् ३०३ धर्मार्थादिषु द्वन्द्व दृश्यभिवदोरात्मने २२० द्विगोरनपत्ये यखरादे यद्विः ३२९/धवाद्योगादपालकान्तात् १९७ दृश्यथैश्चिन्तायाम् १५९ द्विगोरनहोऽट् ३०३ धातोःपूजार्थखतिगतार्थाधिपति- हटे सानि नाम्नि ३७४ द्विगोरीनः मार्थाविवर्जः प्रादिरुपसर्गः १७३ द्विगोरीनेकटी वा ४१५ प्राक्च १७९ देवता ३७० द्वितीया खरा क्षेपे २७९ / धातोरिवर्णीवर्णस्येयुत् खरे प्रत्यये १०३ देयतानामावादी ३०८,३५१ द्वितीयात्स्वरादूर्वम् ४६५) धान्येभ्य ईनन् ४३४ देवतान्तात्तदर्थ ४२३ द्वितीयायट्यावेनेनानन्छः २५३ धुटस्तृतीयः देवपथादिभ्यः ४३० द्वित्रिचतुरः सुच् १७० धुटां प्राक् ११७ देवव्रतादीन् डिन् ४१० द्वित्रिचतुप्पूरणाग्रादयः २८६ धुटो धुटि सेवा ६७ देवात्तल् ४७० द्वित्रिवहोर्निष्कविस्तातू ४२० धुरोऽनक्षस्य देवाद्यन् च ३२८ द्वित्रिभ्यामयड् वा ४४१ धुरो यैयण ४२० देवानां प्रियः ३१७ द्विनिखरीपधिवृक्षेभ्यो नवाऽनिरि धूमादेः ३९५ देविकाशिंशपादीर्घसनश्रेयसस्तत् कादिभ्यः ३२३ धेनोरनमः प्राप्तावा: ३३१ द्वित्ररायुषः ३०३ देशे ३२३ द्विर्धमलेधी वा १६९/न R२४ देय॑ऽनुः २७४ द्विनी वा २६५ नः शि देवयनिशीचिवृक्षिसाल्यमुनिकाण्ठे द्वित्यष्टानां द्वात्रयोऽष्टाः प्राक्श- १८९ विदेर्वा २०२ तादनशीतिवहुव्रीही ३१५/न कर्तरि २८३ दो मः स्यादी १३६ द्विव्यादेर्याण वा ४२० न किमः क्षेपे २९६ दोरमाणिनः ३६४ द्वित्वे गोयुगः ४३९ नखमुखादनानि दोरीयः ३९३ द्वित्वेऽधोऽध्युपरिभिः २२८ नखादयः दोरेव प्राचः ३९५ द्वित्वे वांनी १५८ नगोऽप्राणिनि वा द्यावापृथिवीशुनासीराऽनीपोमम द्विपदादर्मादन् २६७/नन् २८३ स्वतास्तोप्पविगृहमेषादीययी ३७० द्विपो वातृशः २५० ननः क्षेत्रज्ञेश्वरकुशलचपलनिपुण, धुद्रोमः ४५२ द्विखरब्रह्मवर्चसाद्योऽसङ्ख्यापरि- शुचेः धुप्रागपागुदप्रतीचो यः माणावादे ४१४ नजत् २६७ युप्रावृट्वशिरकालात ३१९ द्विखरादण: ३५६ नवव्ययात्सङ्ख्याया डा २९६ द्रव्यवस्नात्तकम् ४१६ दिखरादनद्याः ३४९ / न वस्त्राझादेः दीगो वा ३४६ द्विहेतोरख्यणकस्य वा २६७ देरमणोऽप्राच्यमर्यादेः ३५८ द्वीपादनुसमुद्रं ण्यः ३९० नन्तत्पुरुषात् २९७ द्रोणारा ३४३ देस्त्रीयः ४४३ नञ्तत्पुरुषादवुधादेः ४२८ द्रोर्मव्ये ४३० घ्यन्तरनवर्णोपसर्गादप ईप् २९२ नन्वहोचो माणवचरणे २६६ द्रोचयः ३६३ च्यादेगुर्णान् मूल्यक्रेये मयद ४४२/नसुदुर्व्यः सक्किमक्थिहलेबी २६६ द्वन्द्वं वा ३१६ धेकेषु पट्यास्तत्पुरुपे यनादेवी ३४५ नन्सुव्युपत्रेश्चतुरः द्वन्द्वात्प्रायः ३८७ थेपसूतपुत्रवृन्दारकस्य १८८ नटानृते व्यः ૨૮૨ द्वन्द्वादीयः ३५९ नहकुमुदवेतसमहिपाडिद द्वन्द्वालित ४३२ धनगणान्धरि ४२१ नदशादा दलः है. प्रका० पूर्वा० ६१ न कचि २५० नमोऽर्थात् -- १० हैमप्रकाशच्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । ३४०/ सामिवचने ३६८ नखं मखये ३३१ नाथः ३९. नाप्रियादी २६४ नि दीर्घः १७९ नामेनानि ३६५/नामध्ये f ४७० ८५ नियुक्तं दीयते ३१७/नि वा सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् पृष्ठाङ्क: नडादिभ्य आयन ४६८ नित्यमन्वादेशे १५९ नडादे कीयः ४५३ नित्यवरस्य न तमवादिः कपोऽच्छिन्नादिभ्यः ४६३/नस् नासिकायास्तः क्षुद्रे २९२ निवं नमिनोऽण ५८,४६८ न दधिपय आदिः ३१०/नाडीतन्त्रीभ्यां खा? २६० नित्यं ण: एन्यथ नदीदेशपुरा विलिङ्गानाम् २२२ निवं प्रतिनापे नदीभिर्नानि २७५/नान्यद १५९ निसं हस्तेपाणाद्वाहे १८५ नद्यादेरेयण ११६ नद्यां मतुः ३६६ नामे भ् चाऽदेहाशा ४२३ निनद्याः नातेः कौशले न द्वित्वे २६६ निन्द्यं कुत्सनैरपापायः न द्विरद्वक्यगोमयफलात् १३१/निन्छ पाश न द्विखरावप्रारभरतात ३९३ नाम नाम्नैकार्थे समासो बहुलम् २५७ निपुणेन चार्चायाम् न ना सिदेत १०१ नामरूपभागाद्धयः निप्रेभ्यो २२३ न नाम्नि २६८ नाम सिदत्याने ९५ निय आम् न नाम्येकखरात् खित्युत्तरपदेऽमः ३१७ नामिनस्तयोः षः न नृपूजार्थप्वजचिने ४३७ नामिनो लुम्वा ११८ निर्दः सुवेः समसूतेः नयुखकस्य शि ११६ नाम्नः प्रथमैकद्विवहौ २.५ निहिराविष्प्रादुश्चतुराम् नपुंसकाद्वा २७७ नानः प्राग्बहुर्वा ४६३ निर्दुःसौः सेधसन्धिसानाम् ३२१ न पुनिषेधे ३०१/नानि (१९५) ४५० निवृत्तेऽक्षयूतादेः ४०८ नारिजतीये खरे ३४५/नानि (शा) १४६ निते ४१२ नमस्पुरसो गतेः कक्षपफिरः सः ८० नाम्नि ( ३।२।१६) १४७ न राजन्यमनुष्ययोरके ३६० नानि (३१२।७५) २९० निवासाचरणेऽण ३९७ न राजाचार्यब्राह्मणवृष्णः ४२४ नाम्नि (३१२११४४) २६. निवासादूरभवे इति देशे नाम्नि ३६६ ६७ नाम्नि (३।४।९४) २८२ निशाप्रदोषात् नरिका मामिका १८९ नानि (६४।१४२) ४१७ निष्कादेः शतसहस्राव ४५५ नरे २९० नाम्नि का ३६४ निष्कुलानिकोषणे १७८ नवभ्यः पूर्वेभ्य इस्मास्मिन् वा ९४ नानि मक्षिकादिभ्यः ३८६ निष्प्रवाणिः २६८ नवयज्ञादयोऽस्मिन् वर्तन्ते ४०७ नानि वा ६४ निष्फले विलात् पिअपेजो नवाणः ४२०) नाग्नि शरदोऽकम् ३५६ निष्प्राऽप्रेऽन्तःखदिरकार्याम्रशरे. नयादीनतनत्वं च नू चास ४७१ नानो नोडन क्षुल्लक्षपीयूक्षाभ्यो बनस्य ३२० नवाप: १८९नाम्युत्तरपदस्य च २९२] निसद श्रेयसः नवा रोगातपे ४००माम्युदकात् ३७० निसो गते ३९२ नवा शोणाः १९३ नाम्यन्तस्थाकवर्गात पदान्तः नीलपीतादकम् ३५९ नवा सुजः काले कृतस्य सः भिड्नाऽन्तरेपि ९० नीलात्प्राप्यौषध्योः २०० न विशत्यादिनकोऽधान्तः २८० मारीसखीपश्वभूः नवैकखराणाम् ४६२/नावादेरिका नशात ७० नाशिष्यगोवत्सहले २६० हेतुभ्यो सम्यमयटौ वा ૨૮૨ १३९ नासानतितद्वतोष्टीटनाटनटम् ४३९) नुनः पेषु वा ८२ न सन्धिः ८६ नासिकोदरौष्ठजवादन्तकर्णशक्षा नेनसिहस्से म पन्धितीय छिद्विी सद्विधा- ३१६ गानकण्ठात १९५ नेमार्थप्रथमचरमतयायाल्पकतिप. यस्क्लुकि ५५ नाविकास्तिकदैष्टिकम् ४०७ यसवा न ससमीन्दादिभ्यय २६३। निकटपादस्य न सर्वादिः ३११/नेरिनपिटकाचिचिकिश्वास ४३९ १४ निकटादिषु वसति ४०९ ने वे मसस्य ३२४ नित्यदिद्विखराम्बार्थस्य हवः १११/ नेकखरस्य ४२९ न रात् खरे ४०० २०१नुर्जाते ४५०/नुवा नशो वा हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकारायनुक्रमणिका । नोपसर्गात् क्रुद्रहा न चोधसः ४०४ पात्राती ४१८ सप्रम् पृष्टाकः सूत्रम् पृष्ठाहः सूत्रम् पृष्टाः नेकार्यऽक्रिये ८२ पदक्रमशिक्षामीमांसासानोऽकः ३७२/पर्षदो ज्यः ४०५ नोमादेः ४५२ पदस्य १२२ पर्षदो ध्यणी ४२२ नोऽपदस्य तद्धिते २७७ पदस्यानिति वा ४०३ पशुभ्यः स्थाने गोष्ठः ४३९ २३६ पदाधुरविभक्त्यैकवाक्ये वनसी पशुव्यजनानाम् ३०९ नोपान्त्यवतः १४६ बहुत्वे १५७ पश्चात्यनुपदात् ४०४ नोऽप्रशानोऽनुखारानुनासिकी च. पदान्ताहवर्गादनानगरीनवतेः ७८ पश्चादायन्ताग्रादिमः ३९८ पूर्वस्याऽधुट्परे ७४ पदान्ते १३९ पश्चोऽपरस्य दिक्पूर्वस्य चाति १७२ नोभयोहतोः २५१/पदिकः ४०२/पश्यद्वादिशो हरयुक्तिदण्डे ३१७ नो मट् ४४२/पदोत्तरपदेभ्य इकः ३७२ पाककर्णपर्णवालान्तात् १९७ नोादिभ्यः ४४९ / पन्ध्यादेरायन ३६८ पाणिगृहीतीति १९५ नौद्विखरादिकः ४०२ पयोद्रोर्यः ३६२) पाण्टाहृतिमिमताण्णश्च ३५५ नौविपेण तार्यवध्ये ४२०परः ५८ पाण्डकम्बलादिन ३७४ ४२४ अपरः शतादिः २८२ पाण्डोयण ३५७ न्यग्रोधस्य केवलस्य ४०९/परजनराज्ञोऽकीयः ३९३ पात्पादस्याहस्त्यदिः २६९ न्यको ४०९ परतः स्त्री पुंवत् स्येकार्थेऽनून २६३ पानाचिताढकादीनो वा ४१५ न्यायादेरिका ३७१/परदारादिभ्यो गच्छति न्यायार्थादनपेते ४२० परशव्याघलुक्च ३६२/पात्रेसमितेत्यादयः २८२ न्स्महतोः १२७ परवधाद्वाण ४०६ पाव्यशूद्रस्य ३११ प परस्त्रियाः परशुश्वाऽसावर्ण्य ३३० पादाद्योः १५९ पक्षाचोपमानादेः १९५/परस्परान्योन्येतरेतरस्याम् पाचार्य ४२३ पक्षात्तिः स्यादेर्वाऽपुंसि ३१५/पानस्य भावकरणे ३२३ पक्षिमत्स्यमृगार्थाद प्रति ४०३ परात्मभ्यां टे. ३१७/पापहीयमानेन पञ्चको वर्ग: १७१ पारावारं व्यस्तव्यत्यस्तं च ३९०, ४३६ पञ्चतोऽन्यादेरनेकतरस्य दः ११६ परावराधमोत्तमादेर्यः ३९८ पारावारादीनः पञ्चद्दशद्वर्ग वा २३९ पारेमध्येऽग्रेऽन्तः षष्ट्या वा २७६ पञ्चमी भयाथैः ४२५/पाशादेश्च ल्यः पञ्चम्यपादाने २४० परिणामिनि तदर्थे ४२५ पिता मात्रा वा ३०७ पञ्चम्या निर्दिष्टे परस्य परिपथात् ४०३ पितुर्यो वा ३८१ पञ्चसर्वविश्वाज्जनत्कार्मधारये ४२४ परिपन्थात्तिष्ठति च ४०३ पितृमातुर्व्यडुलं भ्रातरि पणपादमापाद्यः पतिराजान्तगुणागराजादिभ्यः परिमाणात्तद्धितलुक्यविस्ताचित पित्तिथट बहुगणपूगसंघात ४४३ कम्मणि च ४३१ कम्बल्यात् २०० पित्रो महट ३५९ पंतिवन्यन्तवन्यौ भार्यागर्भिण्योः १९६ परिमुखादेरव्ययीभावात् पत्तिरों गणकैन परेर्मुखपार्थात् ४०८/पीलासाल्वामण्डूकाद्वा ३४९ २८१ पत्युनः परोवरीणपरम्परीणपुत्रपौत्रीणम् ४३५ पील्वादेः कुणः पाके ४३४ १९६ पत्रपूर्वादका ३८४ पर्णकणाद्भारद्वाजात् ३९७ पुंवत्कर्मधारये ४१० पदेरिकट्र ४०२/पुंसः ८१ पथः पन्थन्व ३७६ पर्यनोमात् ३७९ पुंसो पुमन्स् १४२ पथिन्मयिनुभुक्षः सौ १३३ पर्यपावहिरच् पञ्चम्या २७४ पुंस्त्रियोः स्यमौजस् १९ पथोऽकः ३७५ पर्यपाभ्यां वर्षे २४२ पुच्छात् १९५ पथ्यतिथिवसतिस्पतेरेयण १६५ पुजनुषोऽतुजान्धे ३१३ पदः पादस्याज्यातिगोपहते ३९७ पुत्रस्यादिन् पुत्रादिन्याक्रोशे ६७ पदकल्पलक्षणान्तकखाख्याना- पक्षिण ३६० पुत्रान्तात् ३५६ ख्यायिकात् ३७२/पर्वादेरण ४६९ पुनायो ,४१४ १३ परावरात्तात् ४१७ परिक्रयणे २८० परिखाऽस्य स्यात् ३७८ पिष्टात् पथ इकट ४२२ पर्यमेः सर्वोभये २९२ पर्वतात् " १२ हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । ८० पुरुषः त्रिया ३६१ प्रष्टोऽप्रगे पुरुषे वा प्रजाया अस् सूत्रम् पृष्टाङ्कः सूनम् पृष्टाका सूत्रम् पृष्ठाङ्क: पुत्रे ३०७ पृथिवीमध्यान्मध्यमश्वास्य ३९७ प्रमाणान्मात्रट् पुने वा ३१७ पृथिवीसर्वभूमेरीशज्ञातयोश्वाञ् ४१४ प्रमाणीसहयाइडः पुनर्भूपुत्रदुहितननान्दुरनन्तरेऽञ् ३३५ पृथिव्या नाम् ३२८ प्रयोजनम् ४१३ पुमनडुन्नीपयोलक्ष्म्या एकत्वे २६५ पृथुमृदुमृशकृशदृढपरिवृढस्य ऋतो प्रशस्यस्य श्रः ४६० पुमोऽशियघोषे ख्यागिः ४२९/प्रश्नाचा विचारे च सन्धेयसन्ध्य- पुराणे कल्पे ३८५ पृथ्वादेरिमन्वा ४२८ क्षरस्यादिदुस्परः पुरुमगधकलिजासुरमसद्विखरादण् ३५७ पृषोदरादय. ३२४ प्रश्ने च प्रतिपदम् ३०९/पृष्ठायः ३२० पुरुषहृदयादसमासे ४३२ पैड्गाक्षीपुनादेरीयः ३७० प्रसितोत्सुकाऽवव?ः २३३ पुरुषात्कृतहितवधविकारे चैयन् ३६२ पैलादे. ३४७/प्रस्वारसस्थानतदन्तकठिनान्तेभ्यो- पुरुषादा २०० पोटायुवतिस्त्रोककतिपयगृष्टिधेनुव. व्यवहरति ४१० पुरुषायुषद्विस्तावनिस्तावम् २९६ शावेहबकयणीप्रवक्तृश्रोत्रि प्रस्थपुरवहान्तयोपान्यधन्वार्थात ३९५ २८७) याध्यायकधूर्तप्रशंसारूढैर्जाति अस्यैषैष्योढोड्यूहे खरेण ६५ पुरोडाशपौरोडाशादिकेकटौ पौत्रादिवृद्धम् २९९ प्रहरणम् पुरो नः ३९९) पौत्रादि वृद्धम् ३३८ प्रहरणात् २६२ पुरोऽस्तमव्ययम् ८०, १८५/प्रकारे जातीयर ४५७ प्रहरणात् क्रीडाया णः पुष्करादेदेशे ४५६ प्रकारे था १६७, २७३ प्राकारस्य व्यञ्जने पुष्यार्थाझे पुनर्वसः ३१० प्रकृते मयट ४५७प्राक्टात् पूगदिमुख्यकाञ्यो दिः ४६९ प्रकृष्ट तम ४५७ प्राक्खादगडुलादेः ४२८ पूतक्रतुषाकप्यमिकुसितकुसी. २६६ प्रागनित्याका दादेच १९८ प्रज्ञादिभ्योऽण् ४७० प्रागिनात् १४३ पूरणाद् अन्यस्य प्राहके को लुक् प्रज्ञापोंदकफेनाल्लेली ४५३ प्रारप्रामाणाम् ३३१ चास्य ४४६ प्रशाश्रद्धा वृत्तणः ४५२ प्राग्जितादण् ३२७ पूरणाद्वयसि ४५६ प्रतिजनादेरीन ४२२ प्रारदेशे ३४० पूरणीभ्यस्तप्राधान्येऽप २६४ प्रतिना पञ्चम्याः १६५ प्राग्भरते बहुखरादिनः पूर्णमासोऽम् ४५५/प्रतिपथादिकश्च ४०४/प्रारवत स्त्रीपुंसामनन् ३२९, ४२६ पूर्णादा २७० प्रतिपरोऽनोरव्ययीभावातू २७३ प्राचा नगरस्य ३५१ पूर्वकालैकसजरपुराणनवकेवलम् २९० प्रतिश्रवणनिगृह्यानुयोगे १० प्राच्येनोऽतौल्वल्यादेः ३४७ पूर्वपदस्थालाम्यगः ३२४ प्रवेः नातस्य सूने ३२० प्राणिजातिवयोऽर्थादम् पूर्वपदस्य वा ४६५/प्रतेपरससप्तम्या. २९४ प्राणितूर्याङ्गाणाम् पूर्वमनेन सादेवेन् १४४ प्रत्सनोणाऽऽख्यातरि २३७ प्राणिन उपमानात पूर्वापरप्रथमवरमजपन्यसमानमध्य- प्रत्सन्ववात्सामलोना २९४ प्राणिनि भूते मध्यमवीरम् २९८ प्रत्ययः प्रकृत्यादेः ५७ प्राणिस्थादखावादद्वन्द्वरनिन्द्यात ४५५ पूर्वापरापरोत्तरमभिन्नाधिना २८५ प्रत्ययस्य ५२ प्राण्यारयखलतिलयवषब्रह्ममा- पूर्वापरायरोत्तरान्यान्यतरेतरादे प्रत्यये ८१ पाद्यः १६८ प्रत्यये च ७३ प्राण्यौषधियोभ्योऽस्य च पूर्वावरायरेभ्योऽसतातो पुरष. प्रत्याइः धुवाधिनि २३/प्रात्पुराणे नथ घपाम् १७०प्रयमादधुटि शमः ७५ प्रात्यवपरिनिरादयोगतकान्तकुष्ट- पूर्वाहाराहातनट ३१७/प्रथमोकं प्राक २७० ग्लानकान्तायाः प्रथमायन्तैः २७८ দুবদিয়াতসহীহুং प्रभवति ३८१ प्रादाहशस्यैये ३७६/प्रभूतादिभ्यो ब्रुवति ४०४ प्राध्वं बन्धे पूर्वोत्तरगाव प्रकर २९५ प्रमृत्यन्यार्थदिवशन्दवहिरारादि. प्रपा नाना पचमी च २५२] सरः २४३/प्रायोऽतोयसदमात्र ३३३ प्राप्तापसी तयाध हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । १३ ४७० भ फलस्य जाती सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्टाङ्क: प्रायोऽन्नमस्मिन्नान्नि ४४७ वह्वल्पार्थात्कारकादिष्टानिष्टे शस् १७३ भिक्षादेः प्रायो बहुखरादिकण ३८० वाढान्तिकयोः साधनेदी ४६० भिस् ऐस् १८९ प्रायोऽव्ययस्य ३९८ वाहूर्वादेवलात् ४५६ भीरुष्टानादयः ३२१ प्रावृप इकः ३७६ वाहन्तकद्रुकमण्डलोर्नान्नि २०१/भूतपूर्व प्वरः ४५७ प्रावृष एण्यः ४०१ वाहादिभ्यो गोत्रे ३३५ भूयःसम्भूयोऽम्भोऽमितौजसः स्कू प्रियः २६२ बिडविरीसौ नीरन्ध्रेच प्रियसुखादानुकूल्ये १७८ विदादेव॒द्ध ३३७ भूल चेवणेस प्रियस्थिरस्फिरोरुगुरुवहुलतृप्रदीर्घ बिल्वकीयादेरीयस्य ३७७ भूषादरक्षेपेऽलंसदसत् : १८५ वृद्धवृन्दारकस्येमनि च प्रास्था ब्रह्मणः ३३४ मृग्वशिरस्कृत्सवसिष्ठगोतमाऽत्रेः ३४४ स्फावरगरयंहापद्राघवर्षवृन्दम् ४३० ब्रह्मणस्तः ४३३ मेषजादिभ्यष्ट्यण प्रेक्षादेरिन् ३६७ ब्रह्मास्तिराजपल्यावर्चसः २९४ भोगवद्गौरिमतो नि ४६२ प्रोकात् ३७३/ब्राह्मणमाणववाडवाद्य: ३६० भोगोत्तरपदात्मभ्यामीनः ४२४ प्रोष्ठभद्राजाते ३३१/ब्राह्मणाच्छंसी ३१८ भोजसूतयोः क्षत्रियायुवत्योः २०२ प्लक्षादेरण ३६५ ब्राह्मणाद्वा ३३६ भौरिक्येषु कार्यादेविघभतम् सुताद्वा ७ ब्राह्मणान्नान्नि ४४६ चातुर्व्यः ३५२ सुतोऽनिती ६९ धातुः स्तुती २६८ सुप् चादावेकस्य स्यादेः ३१६ भकाण्णः ४२२ श्रातुष्पुत्र कस्कादयः ८२,३२० भत्तौदनाद्वाऽणिकट ४०७ भ्रातृपुत्राः स्वसदुहितृभिः फलवहांचनः ४५२ महिसायाम् २१९/ध्रुवोऽचकंसकुट्योः २९१ ३१० भक्ष्यं हितममै ४०७ श्रवो भ्रुव च ३५० ३६३ भात् गर्ते ३४१ भ्रूनोः १०६ फल्गुनी प्रोष्ठपदस्य मे २५४ भर्तृतुल्यस्वरम् ३१४ भ्वादेर्दादेघः १४४ फल्गुन्याष्टः ३७६ भर्तुसन्ध्यादेरण ३९९ म भर्त्सने पर्यायेण ९ मड्डकझर्झराद्वाण ४०६ बन्धे घलि नवा ३१८ भवतोरिकणीयसौ ३९३ मण्यादिभ्यः ४५४ वन्धी वहुव्रीही ५७ भवत्तायुष्मदीर्घायुर्देवानांप्रियै- मतमदस्य करणे ४२२ बलवातदन्तललाटादूल: कार्थात् १६६ मत्स्यस्य यः १९२ बलवातादूल: ३७७ मभद्रादपने १७८ बलादेर्यः ३६८ भनादेरिकट ४०८/मद्राद ३९२ बष्क्रयादसमासे ३२९ भागवित्तितार्णविन्दवाऽकशापेया मधुबभ्रोर्ब्राह्मणकौशिक वहिपष्टीकण च ३२८ निन्दायामिकण्वा ३५५ मध्ये उत्कर्षाऽपकर्ययोरः ३९९ बहुगणं भेदे १६९ भागाद्यको ४१५ मध्याद्दिनण्णेया मोऽन्तश्च ३७५,३७८ बहुलमन्येभ्यः ३७७ भागिनि च प्रतिपर्यनुभिः २२७ मध्यान्तादुरी ३१९ वहुलानुराधापुष्यार्थपुनर्वसुहस्त भागेऽष्टमाञ् नः ४६६ मध्यान्मः विशाखाखातेर्लप् ३७६ भाजगोणनागस्थलकुण्डकालकुश मध्येपदेनिवचनेमनस्युरस्यनस्या- वहुविषयेभ्यः ३९५ कामुककटक्रयरात् पक्कावपन- धाने १८५. वहुव्रीहेः काठे टः २६५ स्थूलाऽकृत्रिमामनकृष्णायसी- मध्वादिभ्यो ः ४५२ बहुष्वस्त्रियाम् ३५६ रिरंसुश्रोणिकेशपाशे १९२/मध्वादे: बहुप्त्रेरीः १४३ भादितो वा ३२० मनः १४६ बहुखरपूर्वा दिकः ४०७ भान्नेतुः २६६ मनयवलपरे है। बहूनां प्रश्न डतमश्च वा ४६८ भावघोऽस्यां णः ३७१ मनसशाज्ञायिनि ३१७ वहोर्टः २९७ भावादिमः ४०७ मनुर्नभोऽजिरो वति पहोणाष्ठे भूय् ४६०भावे सतल् ४२६ मनोरौ च वा १९८ व - ४३४ भवे १४ हेमप्रकोशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकारावनुक्रमणिका । ४५६ /मोर्वा १२५/ये वर्ण सूनम पृष्टाः सूनम पृष्टाः सूनम् दृष्टाह मनोर्याणी पश्चान्तः ३५३ मुहद्वहनुहमिहो वा १४५ युजच्चक्रुधो नोटः १२२ मन्तस्य युवाची द्वयोः १५३ मूल्यैः क्रीते ४१४ युज्रोऽसमासे १२६ मन्यौदनसक्तुबिन्दुवजमारहार मृगक्षीरादिषु वा २८१युववृद्धं कृत्साचे वा ३४२ वीवधगाहे वा २९२ मृदस्तिका ४७१ युवाखलविपलितजरद्वलिनैः २९९ मन्दाल्पाच मेधाया: २६७ मेधारथानवेर ४५४ युवादेरण ४३२ मन्माब्जादेनोनि १५७ युष्मदलदोः १५४ मन्यस्याऽनावादिभ्योऽतिकुत्सने २३९ मोऽवर्णस्य १४३ युष्मदस्मदोऽसोमादिस्यदिः मयूरव्यंसकेत्यादयः २८८ मौदादिभ्यः ३८५ यूनस्तिः २०१ मरुत्पर्वणस्तः ४५३ नां धुड्वर्गेऽन्योऽपदान्ते ११७ यूनि लुप् ३४६ मादिभ्यो यः ४७१ य यूनोऽके ३३४ मलादीमसच ४५१.यः ३८४ यूयं वयं जसा महतः करघासविशिष्टे डाः ३०१ यजसृजमृजराजभ्राजभ्रस्जवश्वप. येयौ च लुकच महत्सर्वादिकण रिवाजः शापः ४२५ महाकुलाद्वानीनमी ३५३ यज्ञादियः ४१० ययकवावसमासे वा महाराजप्रोष्टपदादिका ३७१/यज्ञानां दक्षिणायाम् ४११ योगकर्मभ्यां योऽको ४११ महाराजादिकम् ३८८ यज्ञे ध्या ३७० योग्यतावीप्सानितिकृत्तिसादृश्ये २७२ महेन्द्राद्धा ३५० यमयोऽश्यापर्णान्तगोपवनादेः ३३७ योद्धप्रयोजनाद्युद्ध मांसस्थानड् पनि पचि नवा २८९ यनिमा ३४१ योऽनेकखरस्य १०६ माणवः कुत्सायाम ३५३ यनो डायन् च वा १९७ योपान्त्याद्गुरूपोत्तमादसुप्रख्या- मातमातृमातृके पा ५७ यतः प्रतिनिधिप्रतिदाने प्रतिना २४२ दक मातरपितरं वा ३०७ यत्तत् किमः सङ्ख्याया इति ४४१ यौधेयादेर मातुर्मातः पुत्रेऽहें सिनाऽऽमध्ये ११४ यत्तकिमन्यात ४६८ व्यक्ये ३६१ मातुराचार्योपाध्यायावर १९९ यत्तदेतदोडावादिः ४४० स्वः पदान्तात् प्रागदौत मातृपितु: ख ३१८ यथाकथा चापगः ४११ वर्णाल्लम्पादेः ४३० मातृपिनादेयणीयणी ३५३ ययाकामानुकामात्यन्तंगामिनि र मात्र ४४१यथाऽथा २७३/ः कखपफयोःकर पी मायोत्तरपदपदव्याकन्दामावति ४०४ यथामुखसंमुखादीनस्तदृश्यतेऽ. रःपदान्ते विसर्गस्खयोः সরকম लिन् ४३५रतानित्यवर्णयोः ४६६ मानम् ४१६ यद्भावो भावलक्षणम् २४० रक्षदुन्छतोः मानसेवत्सरस्पाशाकुलिजस्थाs. यद्भदेस्तददाख्या १३३ रहोःप्राणिनि वा ३९१ লাষ্টি ३३१ यद्वीक्ष्ये राधीक्षी २३७रयवदे मानात क्रीतवत् ३६३ यरलषा अन्तस्था: १४ रयात्सादेव वोटो ३८४ मानादसंशये उप ४४० यषयवस्पष्टिकाचः ४३४ रवांनो ण एकपदेऽनन्यसाल- ४६६/यवयषनारपहिमाद्दोपलिप्युरुम घटतवर्गशखान्तरे मालायाः क्षेपे ४५६ हत्त्वे १९७ रहस्यमर्यादोफिय्युत्क्रान्तियशपा. मारेषीकेटसान्तेऽपि भारितूल. ययोरसः १७५ प्रप्रयोगे २९१यस्कोदेगोत्र ३४४ रागाो रके ३५६ मावान्तोपान्लारथमदर्गान् मतो. यखरे पादः पदायिधुटि २६९/राजदन्तादिषु ४४/याचितापनियात्रण ४०८ राजम्यादिभ्योऽकम् माशन्द इत्यादिभ्या ४.४ याजकादिभिः २८१ राजन्वान् सुराशि मापनिवासनस्य राधादी रुग्या ९५) याशियश्यिकलोकायितिकम् ३७२/राजन्मखे. १९४ मासवनप्रावनुपूर्वम् ३१४ यावदियरवे २७३/राश्यह.सवत्सराच दिगोधी ४१२ माणदूपति द. यावादिभ्यः कः ४६६रास: ८. माने कध माका हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । १५ १९२ वातोरिक सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्ठाः सूत्रम् पृष्टाङ्कः रादेफः ४७० लोकज्ञातेऽत्यन्तसाहचर्ये ३१६ वाः शेपे १९,१३७ राष्ट्रक्षत्रियात् सरूपाद्राजापसे लोकसर्वलोकात् ज्ञाने ४१४ वाऽकर्मणामणिका णों-.. २१७ द्विरम् ३५६ लोकात् २०वा क्लीवे २५२ राष्ट्राख्याद्ब्रह्मणः २९४ लोमपिच्छादेः शेलम् ४५२ वागन्ती २६८ राष्ट्रा दियः। ३९० लोन्नोऽपत्येषु ३२९ वाप्रान्तशुद्घशुभ्रषवराहाहिमूषि. राष्ट्रनिनादिभ्यः ३६९ लोहितादिशकलान्तात् १९९ कशिखरात् २६९ राष्ट्रेभ्यः ३९५, लोहितान्मणी ४६६ वाच आलाटी. ४५३ रिति ३०१ व वाच इकण रिरिटात् स्तादस्तादसतसाता २५१ वंशादेर्भारादरवहदावहत्सु ४१५/वाचस्पतिवास्तोष्पतिदिवस्पतिदि. चिकृप्यर्थधारिभिः प्रेयविकारोत्त वंश्यज्यायोनानोर्जीवति प्रपौत्राद्यs वोदासम् ३१९ मणेषु ਕੀ युवा ३४२ वा जाते द्विः ३७४ जार्थस्याऽज्वरिसन्तापेर्भावे कर्तरि २२२ / वंश्येन पूर्वार्थे २७६ वाजलेरलुकः स्ढावन्तःपुरादिकः ३७९ वटकादिन् ४४७ वाडवेयो वृपे ३५२ रूपात्प्रशस्वाहतात् ४५५/ वतण्डात् ३०२ वाणुमाषात् ४३४ सप्योत्तरपदारण्याण्णः ३९२ वत्तस्याम् १७४) वातपित्तश्लेष्मसन्निपाताच्छमन- रेवतरोहिणाद्ध २०० वत्सशालाद्वा ३७७ कोपने ४१४ रेवल्यादेरिकण् ३५२ वत्सोक्षावर्षभाद् हासे पित् ४६५ वातातीसारपिशाचात्कश्चान्तः रैवतिकादेरीयः ३८३ वयति दन्तस्य दत २६९/वा तृतीयायाः २७१ रोः काम्ये ८१ वयस्यनन्ये ४१९ रोपान्त्यात् ३९५ वराहादेः कण ३६९/वात्यसन्धिः ७२ रो रे लुग्दीर्घश्वादिदुतः ८४ वरुणेन्द्ररुद्रभवशवमृडादान् चान्तः १९९/वा दक्षिणात् प्रथमासप्तम्या मा १७१ रोर्यः ८३ वर्गान्तात् ३७५,३७८ वाद्यात् ३२७ रो लुप्यरि ८५) वर्चस्कादिष्ववस्कारादयः रोऽश्मादेः ३६७ वर्णदृढादिभ्यष्ट्यण् च वा ४३१ वा नानि ( १।२।२०) ६५ ईदिईखरस्यानु नवा ६७ वर्णाद् ब्रह्मचारिणि. ४५६ वा नाग्नि (७३३१५९) २६९ वर्णावकन् ३९२/वान्तिके ३१२ लक्षणवीप्स्येत्थम्भूतेवभिना २२७ वर्णाव्ययात् स्वरूपे कारः ४७०/वान्तमान्तितमान्तितोऽन्तिया- लक्षणेनाभिप्रत्याभिमुख्ये २७४ वर्मणोऽचक्रात् न्तिपत् लक्ष्म्या अनः ४५३ वर्षक्षरवराप्सरःशरोरोमनसो जे ३१९ वान्यतः पुमांष्टादी खरे ११९ लध्वक्षरासखीदुत्खराद्यदल्पखरा वर्षाकालेभ्यः ३९९ वा पाद: २०० ~मेकम् ३१३ वर्षादव वा ४१२/वाऽभिनि विशः २२५ लवणादः ४०२/ वलच्यपित्रादेः ४५३ वामदेवाद्यः लाक्षारोचनादिक ३५९ वलिवटितुण्डेभः ४५३/वामाद्यादेरीनः ४२० लि ली ७८/वसनात् ४१९) वाम् शति १०० लक् चाजिनान्ताद ३६९/वायनणायनिनो ३४६ लुक्युत्तरपदस्य काम २९० वा युष्मदस्मदोऽजीनली युध्माका- लुगस्यादेस्यपदे ४३८ माकं चास्यैकत्वे तु तवकमम- लुगातोऽनाप: ९७वनात् ४०३ कम् ३९८ लुप्यम्वृल्लेन ५६ वहतिरथयुगप्रासज्ञात ४२० वाय्तुपित्रुषसो यः ३७१ लवच्चेः १७२ वहीनरस्यैत् कृलस् १७० लुब्बहुलं पुष्पमूले २६८ लुब्वाऽध्यायानुवाके ४५६ वहेतुरिश्वादिः ३८४ वाशिन भायनी ३३४ लूनवियातातू पशी ४६६ वइल्यूपिदिकापिझ्याष्टायनण् ३९१ वाश्मनो विकारे ३२१) वाद्री र ४६४ वसातेवी ४६४ वसुराटोः १२० वस्त्रेयन् ३३१/वारे २१९/वाल्पे ३६३ वहेः प्रवेयः ૨૬ हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । वाटन आः स्यादौ ३२० चेः सुखप्रम् १० वेः स्वः पृष्ठाका सूत्रम् पृष्ठासूनम् घावादीयः ३६० विध्वचो विषुश्व ४५२ वोशनसो नश्वामध्ये सौ १३५ विसारिणो मत्स्ये ४६९ पोशीनरेषु घासुदेवार्जुनादका ३८८ वृकाट्टेण्यण ४६९ वौष्टीतो समासे ६४ ३८४ जिमद्राद्देशात्कः वाहनाव ३९४ व्यञ्जनस्यान्त ईः १७७ वाऽहर्पत्यादयः ८५ वृत्तोऽपपाठोऽनुयोगे ४०७ व्यञ्जनात्तद्धितस्य १९२, ३४० चाहीकेषु प्रामात ३९४/वृत्त्यन्तोऽसषे ९० व्यञ्जनात्पञ्चमान्तस्थायाः सरूपे घा ६७ वाही केवब्राह्मणराजन्येभ्यः ४६९/वृद्धस्त्रियाः क्षेपे णश्च ३५२ व्यजनेभ्य उपसिके ४०२ माह्यपध्युपकरणे ३८४ वृद्धस्य च ज्य: ४६१ व्यतिहारेऽनीहादिभ्यो नः याह्याद्वाहनस्य ३२३ वृद्धाधुनि ३४२ व्यत्यये लुग्या विंशतिकात् ४१९ वृद्धिः खरेष्वादेणिति तद्धिते ३३० व्यस्तव्यत्यस्तात विशतेस्तेर्डिति ४१७ वृद्धिरारदोत् १९/व्यस्त्राच क्रय विक्रयादिकः ४०३ विशत्यादयः ४१७ वृद्धिर्यस्य खरेष्वादिः ३४८ व्यादिभ्यो मिकेको विंशत्यादेवा तमः ४४२ वृद्धेशः ३९३ व्याप्ती विकर्णकुपीतकातू काश्यपे ३५० वृद्धो यूना तन्मात्रमेदे ३०८ व्याप्तौ स्सात् १७३ विकर्णच्छगलाद्वात्स्याये ३४८ वृन्दारका ४५१ व्याप्ये केनः विकारे ३६२ वृन्दारकनागकुरैः ३०२ व्याप्ये द्विद्रोणाद्विभ्यो वीप्सायाम् २३४ विकुशमिपरेः स्थलस्य २७०व्याश्रये तम १६५ विचारे पूर्वस्य ३२० व्यासवस्टसुधातृनिषादबिम्बच- विचालेच १६९ वेणुकादिभ्य ईयण ण्डालादन्तस्य चाक ३३६ विद्यायोनिसम्बन्धादकञ् ३८१/चेतनादेर्जीवति ४०३ च्याहरति मृगे ३८७ विध्यत्यनन्येन ४२१ वेदसहश्रुताऽवायुदेवतानाम् ३०८ व्युदः काकुदस्य उक विनयादिभ्यः ४७० वेदूतोऽनव्ययम्दीच्डीयुवः पदे २९१ च्युष्टादिष्वण् ४११ विना दे तृतीया च २५२ वेदेन्ब्राह्मणमत्रैव ३७३ व्योः विनिमेयद्यूतपणं पणिव्यवहोः २२४ वेयुवोऽस्त्रियाः १०५ वातादस्त्रियाम् विन्मतोणीष्ठेयसौ लए ४६० वेविस्तृवे शालशङ्कटौ ४३९ वातादीनञ् विभतिथमन्ततमाथाभाः १७४ वेष्ट्यादिभ्यः ४०७ ब्रीहिशालेरेयण ४३४ विभक्रिसमीपसमृद्धिम्यूचीमावा वेसुसोऽपेक्षायाम् ८२/ब्रीहेः पुरोडाशे त्ययाऽसम्प्रतिपश्चात कमख्याति. चिकत्र यो २५० ब्रीह्यर्थतुन्दादेरिलच युगपत् सहसम्पत्साकल्यान्ते - वैकव्यजने पूर्ये २९२ ब्रीह्यादिभ्यस्तो व्ययम् २७० वैकाद ४६८ विभाजयित विशसितुणींइ लुक प ४०५ वैकाद्वयोनिर्धार्ये उतरः ४६७ शकटादण् विमुक्षदेरण १६९ शकलकर्दमाद् वा ३५९ विरागाद्विराय ४१० वैडूर्यः ३८२ शकलादेर्यनः ११६ बोत्तरपदान्तनस्यादेरयुवपक्काः ३२३ शकलादिभ्यो दुर्लप् विरोधिनामद्रव्याणां नवा द्वन्द्वः खः ३१० दोसरपदेऽर्धे १७२ शतार्थवषइनमःखतिखादाख- विवधवीवधाता १७२ धाभिः विवाहे दन्दादक २४. ३८३ चोदश्चितः विद्यासापाढान्मन्यदण्डे ३७५ शकियटेष्टीकण ४१३ वोपकादेः विशिकहिपदिपूरिषमापेरनात्सपूर्व. ३४४ शत्तरकान्ताराजवारिस्थल- २६८ जङ्गलादेस्तेनादतेच पदाव ४११ विशेषण विशेष्येणेकार्यकर्मधारयच २९७ वोमामलातिलात् ४६४ शाण्डिकादेयः ३८९ विशेषणमन्तः ४३४ शतदात्ती विशेषणं पादिसझ बहुवीही २६बोर्ध्यात् ४४० शतपटेः पथ इकट २६९/शतात्केवलादतस्मिन्येकी ४१८ ४५७/ वैकाद् ध्यम विरामे वा " ४०० वोत्तरात् वोपमानात् ४१३ वोपादेरडाको च ५६ घोषं दनदयसर ३७२ हैमप्रकाशन्याकरणपूर्वागतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । शम्या दरी सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् शत्तादिनासादमाससंवत्सरात् ४४२ शीतात्र चारिगि यातांद्यः ४२० शीतोष्णनृपादाचरसहे शन्शाद्विशतेः ४४१ शीतोष्णाहती शपमरद्वाजादानेये ३४१/शीयः खरे तदिते शब्दनिष्कघोपमिदा २९२/श्रीपच्छेदायो वा ४६५ शीलम् शन्त्रालः ३६२ शुक्रादियः शयवानिवासेवकालात् ३१९ शुजाभ्यां भारद्वाजे शरदः श्राद्ध कसेनि ४०० शुण्डिकादेर शरदर्भकूदीतृणसोमवल्बजात् ३६४ शुनः शरदादेः २७७ गुनोवोदून शर्करादेरण ४३८ मुत्रादिभ्यः शर्कराया इकणीयाऽण च ३६७ शूर्पाद्वान् शलालुनो वा ४०६ मूलासाके शपसे शपनं वा ७१/शूलोखाद्यः शमोऽता सश्व नः पुंति ८८ रावलकः करने १५४ मात् शन्नजीविसहायड् वा ४६९ शेपपुच्चलालेषु नानि शुनः शाकटशादिना क्षेत्रे ४३४ शेवलाद्यादेतृतीयात् शाकलादकन्च ३८४ शेपाहा शाकीपलालीदईवा हवन ४५२ शेषे ( २२२१८१) शाखादेयः ४३७ शेषे (६३१) शाणात् ४२० शेपे लुक शाब्दिकदा१रिकलालाटिकाटि गोममाने ४०४ शानकादिभ्यो गिन् पृष्टाः सुत्रम् पृष्टादः ४४७ धारः बन्यां वा ४३४ यशुराद्यः ४६५/श्चमस्तादिः ४२५ यसो वसीयतः ४१८:यादिभ्योऽञ् ४०६ वादेरिति ४०२ प १४८ पति कतिपचात् थट ३८१ पवे पढ्गवः २९ पशजकन्वरपूर्वपदस्य सरे ८६४ ४२४ पग्नासादवयनि ण्यत्री ४१२ ३५० पग्मासायनिक ४१३ ४१९ पट्यादेरमाबादः ४४२ १७८/पटात् ३७४ पष्टी वानादरे ४४७ पध्ययनाच्छेने २८१-२८२ ४५१ पट्याः क्षेपे ३१७ ३१०/पटाः नमूहे ४०५ २६७/पध्वान्यन्य २४८/पटवा स्प्यप्चर ३७५ पावटाहा १९.९ १५५ यि तवर्गस्य ४११ प्यापुत्रपलोः केवलयोरी तयुको ५७ १८५ शसो नः ४६५ पट्याधन्य हेमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्षगतसिद्धहेमसूत्राणामकारायनुक्रमणिका । २८३/ साधुना सूत्रम् पृष्ठाकसूत्रम् पृष्ठाङ्क सूत्रम् पृष्ठाह संख्याव्ययादडले. २९६ सप्तम्या आदिः ५६ सलातुरादीयण संख्या समासे ३१४ सप्तम्या पूर्वस्य ५२ सविशेपणमाख्यातं पाक्यम् सख्या समाहारे २७७ सप्तम्या वा २७१ ससर्वपूर्वाल्लुप् संख्या समाहारे द्विगुधानाध्ययम् ३०३ समयात् प्राप्त: ४१३ सम्झौ प्रशस्ते ४५२ संख्यासायवेरहस्याहन डी वा १५१समयाद्यापनाया १७८ सस्य शो सख्यासंभवान्मातुर्मातुर्च ३०७ समर्थः पदविधिः ५९ सस्थाद्गुणात्परिजाते मुख्य कार्थाद्वीप्सायां शस् १७४|समवान्धात्तमसः २९३ सहसमोः सधिसभी १२३ संघघोषालक्षणेऽज्यनिमः ३८३ समस्सतहिते वा २८१ सहस्तेन सज्ञा दुर्वा ३४८ समासमीनाद्यवीनाद्यप्रातीनाऽऽरा. सहनशतमानादण ४१८ सन्ध्यक्षरात्तेन वीनसाप्तपदीनम् ४३६ सहस्यसोऽन्यार्थे समाजानो झुंझी २६९ समानपूर्वलोकोत्तरपदात् ३९९/सहात्तुल्ययोगे २६८ सप्रोः सकीर्णप्रकाशाधिकसमीपे ४३९ समानस्वधर्मादिषु २६७ सहायाद्वा सवन्धिना सबन्धे ५९. समानादमोऽत. ८८सहाथै २३२ सभवदवहरतोश्च ४१५/समानाना तेन दीर्घः ६२ साक्षादादिश्व्यर्थ १८६ समयसूयाकोपकुत्सनेष्वाद्यामध्य समानामर्थनकशेषः ३०५ साक्षाद् द्रष्टा मादौ खरेष्वन्त्यश्च सुतः ९ समाया ईनः ४१२ सादेः १९६ सयोगस्यादौ स्कोलक् १२६ समासेऽनेः स्तुतः ३२० सादेश्चातदा सयोगात् १०५ समासेऽसमस्तस्य ४२ साधकतम करणम् २३१ सयोगादिनः ३३४,४४० समिध आधाने टेन्यण् सवत्सराप्रहायश्या इकण् च ३८९ समीपे २७४ साधुपुष्प्यत्पच्यमाने संशयं प्राप्ते ये ४११ | समुद्राचनावोः ३९६ सायंचिरप्राप्रगेऽव्ययात् समष्टे ४०२ समूहात्समवेते ४०५ सायाहादयः २८५ सस्कृते ४०२/समेंशेऽध नवा सारवैश्वाकमैनेयत्रीणहत्यधैवत्यहि- सस्कृते भक्ष्ये ३७४ समोज्ञोऽस्मृती वा रण्मयम् सक्थ्यक्षमः खाओं २६५/सम्राजः क्षत्रिये साल्वागोयवाग्वपत्तो सखिवाणिग्दूताद्यः साल्वाशप्रत्यप्रथकलकूदाऽश्मका- १२६ संख्यादेरेयण दिबू ३६८ सरजसोपशुनानुगवम् सख्युरितोशावत् १०. सरूपाद् द्रः सर्व राष्ट्रवत् सास्य पौर्णमासी ३८८ ३७० सरोऽनोऽश्माऽयसो जाविनानोः २९५ सिकता शर्करा सजुषः ४५२ सतीर्थ्यः ४१० सर्व चर्मण ईनेननौ २२९ सत्यादशपथे १७० सर्वजनाण्येनभो ४५३ ४२२ यदाधुनेदानींतदानीमेतर्हि सिन्ध्धपकारात्काऽणी १६८ २८२ ३७६ सद्योऽयपरेयव्यहि १६८ सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टं पूजायाम् ३०१ सर्वोदयोऽस्यादी सिंहाथैः पूजायाम् २६१ सपन्यादी सीतया सगते १९५ सर्वादिविध्वग्देवाड्ड दिः क्यचौ ४२३ सपननिष्पत्रादतिव्यथने सु पूजायाम् १७८ सादेः पथ्यकर्मपनपानशरावं २८५ सपिण्डे क्यास्थानाधिके जीवद्वा ३४२ व्याप्नोति सुखादेः सपूर्वादिका २५३ सुज्या सयासहरये संस्थया बहुव्रीहिः सप्तमी चाविभागे निर्धारणे ११२ सुतंगमादेरिन् सप्तमीद्वितीयाद्देवादिभ्यः ३६८ १७३ सर्वादेरिन् ४५५ सुपन्ध्यादेर्यः सप्तमी शौण्डायैः ३६७ ४३५ सुपूत्युत्सुरमेर्गन्धादिद्गुणे २६८ सप्तम्यधिकरणे २४४ सर्वाशसाव्ययात् २९५ सुप्रातसुधमुदिवशारिकुक्षचतर- सतम्या: १६७ सामयाभिपरिणा तसा २२९/ पीपदाऽजपदप्रोष्ठपदभद्रपदम् २६६ ४३२ सम्राट सिद्धौ तृतीया ३८६ सिध्मादिक्षुद्रजन्तुरुभ्यः सर्वपवादादयः सर्वाणो वा सिन्वादेर .. ४३५ सुचो वा सपूर्वाद प्रथमान्ताद्वा १५९ सर्वादेः सर्वाः ३९० सर्वादेः स्मैस्माती २४७ सर्वादेईस्पूर्वाः २८१ सर्वानमत्ति हैमप्रकाशव्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । १९ ४०८ २६७ स्नानस्य नानि हलस्य करें १९२ स्मृत्यर्थदयेशः स्यादी वः सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् पृष्टाः सूत्रम् सुवादिभ्यः २६८ स्थानान्तगोशालखरशाला ३७७ सुयान्नः सौवीरेप्वायनिन् ३५५ स्थानीवावर्णविधी ५३ हनो घि १३२ नुवर्णकार्यापणात् ४२० स्थामाजिनान्ताल्लुप् ४०१ हनो होना १३२ सुसवीद्राष्ट्रस्य ३३१ स्थूलदूरयुवहक्षिप्रक्षुद्रस्यान्त हरत्युत्समादेः मुसह्यात् २६९ स्थादेर्गुणश्च नामिनः ४३१ हरितादेरमः सुनातादिभ्यः पृच्छति ४०४ बाताद्वेदसमाप्ती ४६६ हलतीरादिकम् ६।३.१६१। ३८३ मुहरिततृणसोमाजम्मात् ३२० हलसीरादिकम् १६४२० सुहृद्दईन् मित्रामित्रे स्पर्धे ५८ ४२३ सूक्तसानोरीयः स्पृहेळप्यं वा हविरम्नमेदापूपादेयों वा ४२३ सूर्यागस्वयोरीये च २२२ हविष्यटनः कपाले २८९ सेट् नानिटा स्यादावसयेयः २९९ हस्तदन्तकराजाती ४५६ स्यादेरिवे सेनामचद्रजन्तूनाम् ३०९ दस्तिपुरयाद्वाण १०६ सेनान्तकारलक्ष्मणादिन् च ३५४ स्याजसमाशस्टाभ्यांभिस् भन्यो- हायनान्तात् सेनाया वा ४०५ हितनानो वा सेनिवासादस्य भ्यस् पतिभ्यांभ्यस् सोसाम् ३८९ हितमुखाभ्याम् २१९ सौदर्यसमानोदवा ज्योस्सुपां त्रयी त्रयी प्रथा मादिः २८० सोरुः ७९ संसध्वंस्कस्सनढहो दः १४१ / हिमहतिकापिये पद सोऽस्य ब्राह्मचर्यतद्वतोः ४१३ समाजमनाऽधातुलयकात् १८८/ हिमादेलुः सहे सोऽस्य मृतिवनांशम् ४१६ खतन्त्रः कर्ता ४४७/स्वयं मामिक्तेन २८६ कोनया सीनवेती ७२ सरस्य परे प्राविधी ५४ हृदयस्य हलासन्दसाग्ये २९२,४३४ सीयामायनियामुन्दायनिवााय. खराच्छी १०६ गनिन्धोः ३५० गेरीयन वा ३५५/स्वरादयोऽव्ययम् १६१ हयपद्यतुत्यमूल्ययायपध्ययनन्य. ३९६ खरादुतो गुणादरारोः ९९३ धेनुभ्यागाईपत्यजन्यधर्मम् ४१ खेनान टुक्च ४३२)खरेभ्यः प्रमाख्याने खोकाल्यकृच्छकतिपयादतत्त्वे का. वरे या ६८ हेतु करमत्यम्भूतलक्षने रणे २४२/वरे पान ६८ हेतुमदायऽगुना २२८ ४१७ सगतस्तिवाचनादिभ्यो बड़ी ४१३ गोलंयोगोत्याने स्वादिर्षिभचिः १८ समपल्लो वा ३१८ हेवयानुनीयानाः Tran anime ८७) हितादिभिः २२९ हीनात्स्वानादः सोऽस्य मुख्यः सौवीरेषु फूलात् खोमे दद ५ हैमप्रकाशे स्पष्टीकृतन्यायानामनुक्रमणिका । प २५ न्यायः पृष्टम् न्यायः पृष्ठम् न्यायः पृष्ठम् णिलोपोऽप्यनित्यः अदाधनदाद्योरनदादेरेव ३६ ऋकारापदिष्ट कार्य लकारस्यापि जो यत्कृतं कार्य तत्सर्व स्थानिवद् अनन्तरस्यैव विधिनिषेधो वा ४९ मतोद्धिमद्विधारक्यवेभ्यः २१ भवति ४२ अनित्यो णिच् चुरादीनाम् ४३ (ऋवर्णमहणे लवर्णस्यापि ) ३७ त अनिनस्मन्प्रणान्यर्थवताऽनर्थके- तद्धितीयोभावप्रत्ययः सापेक्षादपि ४० न चतदन्तविधि प्रयोजयन्ति ३० एकदेशविकृतमनन्यवत् तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहगोन गृह्यते अन्तरङ्ग बहिरङ्गात् ३२ तिवा शवाऽनुबन्धेन निर्दिष्ट यद् एकशब्दस्यासङ्ख्यात्व क्वचित् अन्तरजाच्चानवकाशम् गणेन च । एकानुबन्धग्रहणे न धनुबन्धकस्य ३० अन्तरजानपि विधीन्यबादेशो. एकस्वरनिमित्तं च पञ्चैतानि न बाधते यड् लुपि ॥१॥ अपवादात् कचिदुसर्गोऽपि कि हि पचनानभवति ५१/(ते वै विधयः सुसगृहीता भवन्ति अपेक्षातोऽधिकारः २३ कृत्रिमाकृत्रिमयो कृत्रिमे येषा लक्षणं प्रपञ्चश्व) (अभिधानलक्षणाः कृत्तद्धितस कृतेऽन्यस्मिन् धातुप्रत्ययकार्यप सदादिष्वन्योऽन्य नाऽसरूपोत्सर्ग- मासा स्युः) ५१ थाद् वृद्धिस्तद्वाभ्योऽटू च विधिः अर्थवग्रहणे नानर्थकस्य २४ कचिदुभयगति. २८ द अर्थवशाद विभक्तिपरिणामः २४ क्विपि व्यञ्जनकार्यमनित्यम् ४२ द्वन्द्वात्परः प्रत्येकमभिसम्बध्यते अवयवे कृत लिझं समुदायमपि विवन्ता धातुत्वं नोज्झन्ति श. द्वन्दै सति पूर्वस्य विकारेषु बाघको विशिष्टि चेत्त समुदाय सोऽव ब्दत्व च प्रतिपद्यन्ते न बाधक ३९ यवोन व्यभिचरति ४४ क्विवर्थ प्रकृतिरेवाह ५० द्विवद्धं सुबद्धं भवति असिद्ध बहिरङ्गमन्तरले द्वौ नौ प्रकृतमर्थ गमयत. आ गतिकारक्युक्ताना विभत्य- आगमात् सर्वादेश ३४ न्तानामेव कृदन्तैर्विभक्त्युत्पत्ते धातवोऽनेकार्था. भागमा यद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन ४० धातो खरूपग्रह तत्प्रत्यये कार्य- गृह्यन्ते ३६ गली ज्ञानार्था- विज्ञानम् २८ (आगमोऽनुपघाती) ३६ गामादामहणेष्वविशेष आत्मनेपदमनित्यम् ४२ गौणमुख्ययोमुख्य कार्यसंप्रत्ययः २७ न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तच्या भादशभ्यः सङ्ख्या सयेये वर्तते ग्रहणवता नाना न तदन्तविधिः ३० नमुक्त तत्सदृशे न समाने ४१ (ग्रहणवता नाना न तदादिविधि) ३० नखराऽऽनन्तर्ये आदेशादागमः ३४ नानिष्टार्था शास्त्रप्रवृत्ति भाधन्तवदेकस्मिन् वित्वेन किरवं वाध्यते नानुबन्धकृतान्यसारूप्याने कसरत्या- ४९ ऽनेकवर्णलानि उचार्यानामप्रयोगः २८ नान्वाचीयमाननिवृत्तौ प्रधानस्य दयोऽव्युत्पन्नानि नामानि चारो यस्मात् परस्त सजाती नामप्रहणे प्रायेणोपसर्गस्य न प्रह- उत्सर्गादपवाद यमेवसमुचिनोति णम् (उपपदविधिषु न तदन्तविधि ) ३८ चानुकृष्टं नानुवर्तते ४७ नामग्रहणे लिजविशिष्टस्यापि २५ उपपदविमः कारकविभकि. चानुकृष्टेन न यथासहसम् ४७/ नानो व्युत्पत्तिरव्यवस्थिता ४३ उपमगाम व्यवधायी उभयस्माननियमोन्यतरव्यपदे पिच् सनियोगे एव चुरादिनाम. निमित्ताऽभावे नैमित्तिकस्याप्यमावः २८ साभार दन्तता ४३ निरनुबन्धग्रहणे न सानुबन्धकस्य २९ गेव समास * * * ४८ ण नित्सादन्तरजम् हैमप्रकाशन्याकरणपूर्वार्धगतसिद्धहेमसूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका । २१ ४४ . तेन सः ८८ ४० ४८ मपि ग्रहणम् पृष्टम् न्यायः पृष्टम् न्यायः पृष्टम् निरनुवन्धग्रहणे सामान्येन ३६ यत्रोपसर्गत्वं न सम्भवति तत्रोप शीलादिप्रत्ययेषु नासल्पोत्सर्ग- निरवकाशं सावकाशात् सर्गशब्देनप्रादयो लक्ष्यन्ते न विधिः (निर्दिश्यमानस्यैवाऽऽदेशाः स्युः) ३९ तु सम्भवत्युपसर्ग ४५ शुद्धधातूनामकृत्रिम रूपम् न्यायाः स्थविरयष्टिप्रायाः ५१ यथासक्यमनुदेशः समानाम् २३ श्रुताऽनुमितयोः श्रौतो विधिबलीयान् ३९ प ( यथोद्देशं निर्देशः) यदुपाविभापा तदुपाधेः प्रतिषेधः ४८ सकारापदिष्ट कार्य तदादेशस्य शका. परादन्तर बलीयः ४९ परानित्यम् यस्य तु विधेनिमित्तमस्ति नाऽसौ वि. ३४ रस्थापि ३७ विध्यते परार्थ प्रयुज्यमानः शब्दो वतं ३१ सदगते स्पर्द्ध यद् बाधितं तद् विनापि वदयं गमयति यस्य येनामिसम्बन्धो दुरस्थस्यापि ४६ वाधितमेव पर्जन्यवलक्षणप्रवृत्तिः ४९ संज्ञा न संज्ञान्तरवाधिका पूर्व पूर्वोत्तरपदयोः कार्य कार्य यावत्संभवतावद् विधिः ४६ संझोत्तरपदाधिकारे प्रत्यग्रहणे पश्चात् सन्धिकार्यम् येन धातुना युक्ताः प्रादयत्वं प्रत्ले- प्रत्ययमात्रस्यैव प्रणं न तद- वोपसर्गसंज्ञाः पूर्वेऽपवादाः अनन्तरान् विधीन् न्तस्य वाधन्ते नोत्तरान् येन नाप्राप्त यो विधिरारभ्यते स सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तस्यैव वाधकः प्रकृतिग्रहणे यलुवन्तस्यापि २५ तद्विधातन्य येन विना यन्न भवति तत् तस्या- प्रकृतिग्रहणे खार्थिकप्रलयान्ताना- सन्नियोगशिष्टानामेकापायेऽन्यतर- निमित्तस्यापि निमित्तम् ३५ स्याऽप्यपायः येन नाव्यवधानं तेन व्यवहितेऽपि प्रकृतिवदनुकरणम् २२ संभवे व्यभिचारेच विशेषगमधे. स्थात् (प्रतिकार्य संज्ञा भिद्यन्ते) वत् ४६ प्रत्यलोपेऽपि प्रलयलक्षणं कार्य यं विधि प्रति उपदेशोऽनयंकः स समासतद्धितानां.मृत्तिर्विकल्पेन वृत्ति- विधिर्वाध्यते विज्ञायते ३१ ४९ विषये निलंबापवादवृत्तिः ३२ प्रत्ययाप्रत्यययोः प्रत्ययस्यव वृद्ध वृदाश्रयं च समासान्तागमसंज्ञाज्ञापकगणनन्- प्रधानस्य तु सापेक्षत्वेऽपि समासः ४० निर्दिष्टान्वनिलानि (प्रधानानुयाय्यप्रधानम् ) (प्रधा लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोफखैत्र सर्वत्रापि विशेषेण सामान्य याप्यते नानुयायिनोव्यवहाराः) ग्रणम् २४ न नु सामान्येन विशेषः ४९ प्राकरगिज्ञाऽप्राकरगिकयोः प्राकर लुबन्तरनेभ्यः . ३३ सर्व वाक्यं सावधारणम् णिकरसंव ३६ लोपात खरादेशः ३४ सर्वेभ्यो लोपः सापेक्षमसमर्थम् ४० व बलवनिलमनिलात् ३३ वर्णग्रहणे जातिग्रहणम् ३६ सामान्यातिदेशे विशेषस्य नातिदेशः ४८ वर्णकदेशोऽपि वर्णग्रहणेन गृह्यवे माहचर्यात् सहायव বাসার দামু ३३ नि मृत्यारम्भो नियमार्य: २८ भाविनिभूतवदुपचारः विचित्रा सूत्राणां कृतिः) ५१ मुनादिनादन्यो जनपदर्स भूतपूर्वकन्तदुपचारः विचित्राः शब्दराजयः ५० खरस हसीना विधिनियमयोनिधित्व ज्यायान ४९ संरू शब्दन्यागन्दनंगा मायेऽपवादाः पूर्वान् विधीन् विवक्षानः कारयानि २३ सालमव्यवधादिः याधन्ते नोतरान् ३१(विशेषाऽनिदियो विधिः प्रोता. सीरालमा माटीयागः शिया मानालापवमप्युत्सवाय मन्यन्ते विकारं न यामते) उलनी याकरणाः) ५१/व्याख्यातो विशेषार्थप्रतिपत्तिः स्थानियशावचनाकोपर वगवन्यगिलानि श समाऽन्यत् शिपाप न भूपये विमाननिमातियोगधास्नी समाऽसिगनपरः प्रयुज्यते ४८ ४८ सांगवानुरोका विलिः ५. सारीपाट कार्य महान Pimi Winn. ३ २७ शुद्धिपत्रम् । "लघो- गोरखा- येवंशीला *गमे पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् २११ "अलघो- २ २६ गौरवा- २९ सेवं सीला ४३२ गमे० ४३३ व्या ५२५ ॥९॥ ७ २ न्याय्यरवम्, ७ २६ दूरामवणे १० १४ किमिति १. २७ अभिवादयेऽहं ११ ३३ जनादेशो, १२ २ शिघ्यो १३ २९ वर्ग: " . ८ ओंकारे ६५ " ३२ वर्ग: ॥१॥ न्यायत्वात् । दूरादामन्त्रगे किमिदमिति । अभिवादये स्थाल्यह अनादेश शिस्यो वर्ग वर्गः वर्ग, आधाः यथा पूर्वोका इनणनमा नासिकास्थाना पदसंज्ञाफलं लोक्यते सत्वासना- देशविकृत नुनासिकाभ्यां भिक्षयोपित जस्भ्योये, शिस्यो' स्थापोध- 'भासमादूरा- तपा नयति लुनातीति , ३३ वर्ग १४३१ भाय: १६ १४ ययापूर्वाफा " ३४ हमनमा " ३४ नासिकस्थाना- १८ २३ पदसज्ञा फलं २० ५ लोकते २० १४ सखासमा- २२ २७ देशाविकृत- २३ १५ नुन सिकाभ्यो २३ २१ भिक्षयोपित २४ ५ जस्भ्यो ये २४ १५ शिष्यो.' २४ १९ स्योपोद्य. २४ २८ 'भासदूरा " ३२ सपा नातीति २७ ५छो सन्तः पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् शुद्धम् ५१ १० सिद्ध। सिद्धः। ८ कण्वादे- कण्डादे- ५५ ११ खनुसारे खनुखारे ५८ ३३ दरच्छश० दरच्छ० ६२ १३ तौमुमो तौ मुमो ६२ २३ ऋतूतो लतो ६३ ३ मस्तयो. समानानामिक ६३ १३ निपरस्यमानं निष्पत्स्यमान कार्यों कार्य ईटे इत्येवंशील २१ ध्यप्र० व्यण् प्र० ओकारे ८ वा स्यात् स्यात् १६ लुप् वा सुरवा " ३२ अकारलुप् अकारलुक ६७ २५ "द्विर्धातु. "खरादे." ६८ ३१ गोरक्षि गोअक्षि ७० २६ अच्लोपे अस्लोपे ३१ इति लोपे इति च्लोपे ७१ १९ ऐन्द्रतः एन्द्रत ७४ १९ "स्थुढत् 'थुडत् २९ चतु पदम् चतुष्पदम् ७९ १७ अनेनेव ८२ १० फसेत्युक्त करोतीत्युक्ते ८२ ३४ रोनिस रोनियं ८६ १७ पादाइदं पादाययं ९.३३ सेक सेक ९२ २८ नामार्थों नागमाया ९३ २६ "पुनरेषाम्" पुनरेकेपाम् ९४ १० टिस्वात् टित्वात् ९६ ६ सिला सिश्वात् ९७ १२ निर्जर निर्जा १५ निर्जरसेन निर्जरसिन १.१ १५ नोन्ताभावे नोन्तामावः १.६११ योऽशिति प्वोः प्पय व्याने उक् १.९२३ रे परे मी परे १११ ४ "प्र.उ." ४ अनाम्यदि अनाम्यदिः ११८ [वि. रा] [वि. १४५९] अनेनैव ७ ही सुकः टी: सद्भतः टी सुक, १२ ११ यन्तखरादे' ८ ११ सिदिभूनि. १. संधी युगादेनं पा तत् किसस एसटि 'भ्यन्यखरादे. विदिभुजि. मशि युनादेवा तकिरवस पृष्टयाटि. , "प्रारछ.

'२३ पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् " " " " २ " " ११८ २२ नोऽतो १२१ २८ स १२२ ३० अन्यस्यरादेः १२३ ९ णिघुटो १२५ ५ दृपक्षी ८ पितॄची पितृम्ची १२६ १८ धुटादौ १२७ ३१ ऋदिलात् ३३ न्सम० १२८ ५ च्यार्थ १२९ २० अन्यादेशभावे ३३ अथो एतेन १३० ३२ "नोर्मादिभ्यः" १३२ १५ नामस्यो. १३४ २४ र च न च प् २५ पचन १३४ ३४ प्रियपत्रः १३५ ५ अत्वे २३ नेरनिटि १३६ १ प्रेयेयं १३६३११-४-३४ १३८ २१ सादेशे १३८ २३ दृशष्टक १४० १३ किले १४० १८ पल- १४० ३३ श्रेयान् १४१ १७ इत्यन्त्यस्वादि० १४४ ८ अनुदन् १४६ ३० प्रहणान्यन्य. १४८ १० ठसा १५० १५२ ७ काष्ठं तक्षी १५२ १५ मगमत् १५४ २८ पूर्वाऽक् १६० २४ सदः शीखा १६१ १६ वेय १६१ १७ पद्यन्त १६२ २७ पापार्थे...न्या. १६३ १ यथालक्षमा १६५ १० तद्वत्त- १६६ १४ तुन्ना १६६ १५ [वि० २।२।८९] तिरःकृला शुद्धम् नोऽन्तो स् ज्यन्त्यखरादेः णिक्यघुटो दृपच्ची पितॄची पित्रची धुडादौ ऋदित्वात् नस्म व्याद्यर्थः अन्वादेशाभावे अथो एनेन नोादिभ्यः नागमस्यो० रच प् च न पश्चन् प्रियपञ्च्नः आत्वे णेरनिटि प्रियेयं १-४-४ त्सादेशे दृशष्टक कित्त्वे पत्वे श्रेयान्स् इत्यन्त्यस्वरादि० अनरन् ग्रहणान्य. उसा तौ (२१११८५) काष्ठतदक्षी मगमन् पूर्वोऽक् सदःशिखा चेय पद्यत (पापा) यथालक्ष्यम० तवृत्त- गुन्ना [सि० ॥२८९) शुद्धिपत्रम् । पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् शुद्धम् १६७ ३३ किमादेशः क्रिमादेः १६८ ८ सर्वेकान्यात्० सर्वकान्यातू० १७१ २८ दिग् दिक् १७३ २ प्रागतत्तत्वे प्रागततरवे १७३ १० तत्त्वेन तत्तत्त्वेन १६ तत्तत्वे तत्तत्त्वे २१ देयोऽपा देयोपा० २५ सप्तम० सप्तम्य. १७४ १४ सङ्ख्यकादि० सबैकार्थादि० १७ एकैकमकक एकैकमेके योर्द्वयोः द्वयोर्द्वयोः १७५ १९ क्रियार्थमिदं अक्रियार्थमिदं २६ तुल्यादिवत्वे तुल्यदिक्त्वे १७६ डाच्च १७६ १७ भ्यस्ति । च भ्वस्तिच १९ प्रागतत्त्वम्, प्रागतत्तत्वम्, २१ प्रागतत्तख० प्रागतत्तत्त्वम् १८० २१ समन्ताद समन्ताद १८४ २६ प्रकाश्यते १८५ ८ तिरस्कृला १८६ १३ नितिपातना निपातना १८६ १७ तावदुद्वादे तावदुद्वाहे १८७ २५ नित्यानेलम् नित्वान्नेत्वम् १८८ ८ कश्चिचि कश्चि १८८ १८ यावयवौ याववयवो १८९ २८ खसादेवीः स्वप्नादेठी: १९२ १० तद्धित्तस्येति तदितस्येति १७ क्वचिनाम्नि क्वचिन्नाम्नि १९५ २४ मादे: मानादेः २०१ २२ पङ्गः २०१ ३४ अर्थकथमिदं अर्थकथनमिदं २०३ ९ विशेषण विशेषण- २११ ३० सत्कार्यवाद सत्कार्यववाद २१२ २० "व्याप्तेकेनः" "व्याप्येवेनः" २१३ २० यद्विकाराणात्तरा० यद्विकारान्तरा २१६ ५ भिक्षतेगां भिक्ष्यते गां ६ शतं दण्डयन्ताम् शतं दण्यन्ताम् २१६ १५ इति इति २१७ ६ संश्रियमाणत्वात् संश्रीयमाणत्वात् १८ दिग्मात्रमा र्दिामात्रमा २१ वा कर्मका० वाऽक्रममा २२२ १२ मातरध्येति मातरमध्येति २२३ ८ उत्स्य टस्त्राय ६ तो" .

शुद्धिपत्रम् । . --- २४ शुद्धम् , पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् २८३ ५ गहणोत्पत्ती १९ राज्ञा ज्ञातः २९ गौशब्दमि० २८४ १३ मन्यन्ते २९ "अमो० २८५ ३ क्षीये गर्हणोलती राजा ज्ञात गोशब्द मन्यते "अमा) क्षीयते " " . ४ नं दुः० A न चेतावमा " पृष्ठ पति अशुद्धम् २२४ १३ द्यत २२७ १ .नि-पाद्यत्वा० २३१ २७ पन्था २३४ २६ का २३६ ७ मैत्रायषितव्य २३५ १३ दृष्टमनिष्टा २३८ १८ विधेहिति २३९ ७ मनतेराप्ये २३९ २५ कती सम्भोगाय २४० २४ क्रियाश्रयबाद २४० ३२ प्रदीप २४१ १३ वाक्यप्रदीपे २४१ २२ विराम प्रमादेषु २४३ १९ ०शब्दोऽपादा० २४४ २८ प्रदीप २४७ १४ सूर्योऽभ्युदय २४८ १७ सम्बन्धीभूत २५१ ३२ राज्ञा २५४ २१ फल्गुन्यौ २५५ २४ घटो २५६ ४ यन २५८ २ सज्ञाप्राप्ता २५८ १६ सादताड २५८ १५ असति २१ एकपद्या दिक २५८ २९ सज्ञा २६. २३ शिशिप २६२ १ नि कोशाम्बि २६३ २३ इविड् २६३ २९ द्रोप्यादि चूत निष्पायवार पथा कर्ता मैत्राययितव्य दृष्टमिष्टा पिधेहीति मन्यतेराप्ये कर्ता 'सम्भोगाय कियानाश्रयलाद पदीये वाक्यपदीये प्रमादविरामेषु शब्दोपादा० पदीये सूर्येऽभ्युदयं सम्बन्धी अभूत् राज्ञा फाल्गुन्यो घटी ७ सूधू মুন্বিগ जदारच यन नियामारि १६ जरत्यर्थ. লংঘ २८८ १३ आहार आहर २८८ २२ सैहियाहिरा सहिरेवादिरा २९१ १३ नवेत्ताव्यया २९२ ६ अदधिरिति उदधिरिति २९३ २० जलयल जलपथ २९६ १९ श्वश्रेयसम् श्व श्रेयसम् सुधू २९८ १३ एकपर्यः एकर्षय ३०० १८ सन्नि प्रतिभ- १ :जवृन्दारकेति ३०३ १ औशिज वृन्दारका औशिज ही ३०८ १२ अग्निरि अग्नरि १ गाग्यो নার্থী ३०९ १५ गार्यो যায়ী ३१४ ३४ स्त्रियामपि ३१७ १६ लुब् भवति ३२० ५ "निष्पागे. ३२१ ३ यदागु ३२७ ११ मुपी ३२९ ९ सुबाष्कपिः ३२९ १० यजन्दा ३२९ १४ इत्यन्त ३२९ १४ आश्वत्थाम: ३३० ३ त्रैहिशाला ३३० २१ प्यौपगव ३३४ २४ अकन् ३३५ १२ दक्षि. , २५ ऋषिरवृषि ३३६ १९ सलोप ३३८ २२ इन्द्रडु ३४० ५ जिन्य" ३४९ २४ दैधिकरण्ये ३५० २८ "चणका. ३५८ १ अजादीनाम ३६० २१ क्षोदकामालवी "निम्न यवागू मुपसाव सौबार " याता सज्ञाऽप्राप्ता सादता जस्थति ऐकपद्यादिक संज्ञा शिशप निष्कौशामित्र ऐडविड् द्रुण्यादि ०७१ पवाद नुस्य पश्चादनुरथं २७२ १. "प्रन्यावे" "प्रन्थान्ते" ११ सफल सकल २५३११ प्रकृताथों प्रस्तुतार्या २७३ २१ अनुत्तार्थोप्रदर्शने प्रस्तुतार्थोपदर्शने २५३ २९ इय परिमा. इदंपरिमा० २५५ ३२ नोदना नौदना २८.४ अरमना पचम मात्मनापञ्चमः आत्मना पर थात्मनाषष्ठ धारमन पूरण आत्मन पूरण २८२१७ पर प्रतादि पर शतादि प्पोपी दाद " सोर बा Maza 0 २८ च्टये श्रीहैमप्रकाशपूर्वार्द्धस्य स्थूलानुक्रमणिका । " विपयाः १ संज्ञाधिकारः २ खरसंधिः ३ असन्धिः ४ व्यजनसन्धिः ५ रेफसन्धिः ६ खरान्ताः पुंल्लिङ्गाः पृष्टाका: विषयाः पृष्टाङ्काः विषयाः पृष्टाङ्काः १-६१ ७ स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः ११०-११५/१३ अव्ययानि १६१-१८६ ६२-६९ ८ नपुंसकलिनाः ११५-१२०१४ स्त्रीप्रत्ययाः १८७-२०२ ६९-७३ ९ व्यवनान्ताः पुंलिङ्गाः १२१-१४५/१५ कारकप्रक्रिया २०३-२५६ ७३-७९/१० वीलिगाः १४५-१५० १६ समासप्रक्रिया २५७-३२५ ७९-८७११ नपुंसकलिङ्गाः १५०-१५२/१७ तद्धितप्रक्रिया ३२७-४७२ ८७-११०/१२ युष्मदस्मदोः प्रक्रिया १५३-१६०१८ सूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका १ अतिसूक्ष्मसूचिका तु प्रत्येकपृष्टद्वयस्योपरिभागेऽवलोकनीया पृष्ठं पंक्तिः अशुद्धम् " " २२ निश्रेणिः . ३६६ ४४४ ४४८ शुद्धिपत्रकशेषः। शुद्धम् पृष्ठं पंतिः अशुद्धम् शुद्धम् ३६१ ३ वानरहस्तिकं वानरहास्तिक ४२८ १० लादिः त्त्वादिः निःश्रेणिः ४२८ २२ ट्यणादि० व्यणादि २४ लित्वामा लित्त्वाभावा० ४२८ २७ स्थावर स्थविर ९ शाल्मयो शाल्मलो २८ अपाठव० अपाटव० ३६६ १५ प्रत्ययमयोगात् प्रत्यययोगात् ४३१ २८ क्रियी क्रिया ३७५ १८ दिश्यः दिश्यः । ૪૨૨ १६ (७१।७७) (१७०) २८३ ३४ णिलं णित्त्वं ८ पश्चादनुगुः पश्चादनुगु ३८५ ६ पैप्लादाः पप्पलादाः १० अवकुटः अवकटः ३८५ २७ देव वच्च- वेद बच्च- ४४२ २७ टित्वात् टित्त्वात् ३८६ २५ (६।३।१८६) ६।३.१९६ ३० पूरणं पूरणः ३८७ १८ दिग्मात्र दिमात्र १ पटिष्टा पटिष्ठा ३०८ ६ ६-३-१०४ ६-३-२०४ २५ सामान्यात्रा० सामान्यमानामि० ३९३ ५ वृद्धऽनः वृद्धवः ४५२ २६ विष्वग्नतानि विष्वग्गतानि ३९४ ३४ नापिक नापित ४५२ ३५ कृषिक्षेत्रम् कृषिक्षेत्रम् ? ३९७ ११ लक्षणे णि. लक्षणेऽणि ४५७ ११ दिग्मान दिङ्मात्र ३९७ ३२ वरणः धरणाः १४ ।आख्या आट्या- ३९८ ११ अस्माकः आत्माकः ४५८ २ स्थलकः स्थूलकः ३९९ ७ दिनणादय दिनण्णादय ४६६ १७ नर्थक्यात् ०ऽऽनर्थक्यात् ४०७ १७ एकदशान्यिकः एकादशान्यिकः ४६९ "उतोs- ४०८ ५ यावया याचया २३ दिगमात्रम् दिड्मात्रम् ४१३ १९ समीपनीयम् समापनीयम् २३ इकण इकण ४१५ ५ शुक्लं शुल्कं ३३ हुकति हुतिः ४१५ ७ शुक्ल शुल्क १ १/२९ २४० २४४ ४१९ ५ नेकरलोप नेकारलोपः १ ३/३८ अपीलवा० अपील्वा० पञ्चशाण्यम् पञ्चशाणम् ७ ३/२१ इनः इतः यत्त्व० ८ ३/२४ दामन्य- दामन्या- ४२२ २५ प्रतिजनीनः प्राविजनीनः १० ३/१९ निवृत्ते निवृत्त ४२७ २९ गोजते वो गोजाते वो १७ २/३८ कृतादि कृतायः पृ० १५१ पं. १७ गत 'शारीरः प्रत्याविशेप' इत्यस्य स्थाने 'धातुविशेषः' इति मूलप्रतियु दृश्यते । पृ० ४७२ तमगतप्रशत्त्वां द्वितीयपक्षी म विजयन्तु इत्यस्य स्थाने 5 विजयन्ताम् । प्रथम लोके 'आत्मारामेति ख्यातानां विजयानन्दसूरीणाम्' इत्यस्य स्थाने 'आत्मारामेति ख्यातस्त्र विजयानन्दसद्गुरोः' । दशमे लोके "विजयतु' इसस स्थाने 'विजयता' इति च वाच्यम् सुधीभिः ।। ० ३२ "उतो ४७० ४७० ४२० १४ पञ्चशाणम् ४२०३४ यल० .

शुद्धिपत्रम् । - पृष्ठ पक्ति अशुद्धम् मुद्धम् धूत निमायत्वा० पथा शुद्धम् गहणोत्सत्तो राज्ञां ज्ञातः गोशब्दमि० मन्यते "अमा() क्षीयते नक दु. कर्ता मैत्राययितव्य इष्टमिटा पिधेहीति मन्यतेराप्ये पृष्ठ पंक्ति अशुद्धम् २८३ ५ हर्णोत्पत्ती १९ राज्ञा ज्ञात' २९ गौशब्दमि० २८४ १३ मन्यन्ते २९ "अमो. २८५ ४ ० दु. १६ जरत्यर्थ २८८ १३ आहार २८८ २२ सेहियाहिरा २९१ १३ -चेताव्यया २९२ ६ अदधिरिति २९३ २० जलथल २९६ १९ वयसम् ३ क्षीये " जरत्यर्ध. फर्ता " ७ सूधू २२४ १३ चत २२७ १ .नि-पाचवा. २३१ २५ पन्या २३४ २६ कना २३६ ७ मनायर्पितव्य २३७ १३ हटमनिष्टा २३८ १८ विधेहिति २३९ ७ मनवेराप्ये २३९ २५ पत्ता सम्भोगाय २४. २४ प्रियायवाद २४० ३२ प्रदीप २४१ १३ वाक्यप्रदीप २४१ २२ विराम प्रमादेषु २४३ १९ शब्दोआदा० २४४ २८ प्रदीप २४७ १४ सूर्योऽभ्युदय २४८ १७ सम्बन्धीभूत २५१ ३२ राशा २५४ २१ फ्ल्गुन्यो २५५ २४ पटो २५६ ४ यज २५८ २ संशाप्राप्ता २५८ १६ सादसाद २५८ १५ जाति २१ एकपयादि २५८ २१ संशा २६. २१ कि २६३ निशामि २६३ २३ दाविद् २१॥ २९ोम्यान पपाद गुर २५११. "पावे" ११ पास २५० मापा २.१ २१ प्रतापात्राने. २७५ २९ सपरमा. २७॥ २२ नोदना 'सम्भोगाय कियानाश्रयलाद पदीये वाक्यपदीये प्रमादविरामेषु शन्दोपादा. पदीये सूर्येऽभ्युदयं सम्बन्धी अभूत् राशा पारगुन्यौ घटी चन सताप्राप्ता गादत्ता जस्थति ऐपधादिक सहा सिराप निष्कौशामि आहर सहिरेयाहिरा न चेतावव्ययौ उदधिरिति जलपथ श्व श्रेयसम् सुधू एयः सन्निष्प्रतिम •जवृन्दारिका औशिन यदारिका अग्नेरि गाग्यो गायी नियामापि छन् न भवति २९८ १३ एकपर्यः ३०० १८ सनि प्रतिभ- १ जयन्दारकेति १ आशिज धृन्दारका ३०८ १२ अतिरि १ गाग्यो ३०९ १५ गायों ३१४ ३४ नियामपि ३१५ १६ लुन् भवति ३२० ५ "निष्पागे. ३ यवागु ३२७ ११ मुपवर्या ३२९ ९ सुबाष्कयि ३२९ १० यनन्दा ३२९ १४ इयत्त १२९ १४ आश्वस्थाम ३ पहिशाला ३३० २१ प्यौपगा. ३३४ २४ का ३३५ १२ दादी , २५ पिरपि ३२६ १९ सरोष ३२८ २३न्दा २४. ५ मपन्य २४९ २४ देधिराये ३५. २८ "प". २५८ भानाम- २१. दामादी ऐडविद् "निष्प्रा० यवागू मुपरवपत्य सौवष्कयि. यमन्ता इत्यन्स अधत्यामः भेदिशाकरण: प्योपगवि. इम् दाक्षिः प्रापिरपिः सरोप द्वस्यादि पचादरपं "प्रन्या" पाल प्रमुता শাবন परमा. मोदना पानापया सामना धामन राग पर नगद १२ " सामना ? मन प १८११७ पर. •पन्य यधिहरप्पे "चटा. " क्षसिमानी श्रीहैमप्रकाशपूर्वार्द्धस्य स्थूलानुक्रमणिका । विषयाः १ संज्ञाधिकारः २ स्वरसंधिः ३ असन्धिः ४ व्याबनसन्धिः ५ रेफसन्धिः ६ खरान्ताः पुंलिङ्गाः पृष्टाकाः विषयाः पृष्टाका: विषयाः पृटाकाः १-६१ ७ स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः ११०-११५१३ अव्ययानि १६१-१८६ ६२-६९ नपुंसकलिङ्गाः ११५-१२०/१४ स्त्रीप्रत्ययाः १८७-२०२ ६९-७३, ९ व्यसनान्ताः पुंलिगाः १२१-१४५/१५ कारकप्रक्रिया २०३-२५६ ७३-७९/१० स्त्रीलिङ्गाः १४५-१५०/१६ समासप्रक्रिया २५७-३२५ ७९-८७/११ नपुंसकलिङ्गाः १५०-१५२/१७ तद्धितप्रक्रिया ३२७-४७२ ८७-११०/१२ युष्मदस्मदोः प्रक्रिया १५३-१६० | १८ सूत्राणामकाराद्यनुक्रमणिका १ अतिसूक्ष्मसूचिका तु प्रत्येकपृष्ठद्वयस्योपरिभागेऽवलोकनीया " पृष्ठं पंक्तिः अशुद्धम् ४४८ शुद्धिपत्रकशेषः। शुद्धम् पृष्ठं पंक्तिः अशुद्धम् शुद्धम् ३६१ ३ वानरहस्तिकं वानरहास्तिकं ४२८ १० वादिः त्त्वादिः २२ निश्रेणिः निःश्रेणिः ४२८ २२ घ्यणादि० व्यणादि. २४ लित्वाभा. लित्त्वाभावा० ४२८ २७ स्थावर स्थविर ९ शाल्मयो शाल्मलो २८ अपाठव० अपाटव० ३६६ १५ प्रलयमयोगात प्रत्यययोगात् ४३१ २८ क्रियी क्रिया ३७५ १८ दिइयः दिश्यः । १६ (७१७७) (1१७०) २८३ ३४ णिलं णित्त्वं ८ पवादनुगुः पश्चादनुगु ३८५ ६ पैलादाः पप्पलादाः १० अवकुटः अवकटः ३८५ २७ देव वच- वेद बच्च- ४४२ २७ टित्वात् टित्त्वात् ३८६ २५ (६।३।१८६) ६३।१९६ ३० पूरणं पूरणः ३८७ १८ दिग्मात्र दिङ्मात्र ४४४ १ पटिष्टा पटिष्ठा ३८८ ६ ६-३-१०४ ६-३-२०४ २५ सामान्यात्रा० सामान्यमानामि० ३९३ ५ वृद्धऽनः वृद्धवः ४५२ २६ विष्वग्नतानि विष्वग्गतानि ३९४ ३४ नापिका नापित ३५ कृपित्क्षेत्रम् कृषिक्षेत्रम् ? ३९७ ११ लक्षणे णि. लक्षणेऽणि ४५७ ११ दिग्मान दिङ्मात्र ३९७ ३२ थरणः धरणाः १४ | आया आव्या- ३९८ ११ अस्माकः आत्माकः ४५८ २ स्थलकः स्थूलकः ७ दिनणादय दिनण्णादय ४६६ १७ नर्थक्यात् ०ऽऽनर्थक्या ४०७ १७ एकदशान्यिकः एकादशान्यिकः ४६९ "टतोऽ- ४०८ ५ याश्चया यात्रया २३ दिगमात्रम् दिङ्मात्रम् ४१३ १९ समीपनीयम् समापनीयम् २३ इकण इकण ४१५ ५ शुक्लं शुल्क ३३ हुकृति हुऋतिः ४१५ ७ शुक्ल शुल्क १ १/२९ २४० २४४ ४१९ ५ नेकरलोप नेकारलोपः १ २/३८ अपीलवा० अपील्वा० पञ्चशाण्यम् पञ्चशाणम् ७ ३/२१ इनः यत्त्व० ८ ३/२४ दामन्य- दामन्या- ४२२ २५ प्रतिजनीनः प्राविजनीनः १०३/१९ निवृत्ते नियते ४२७ २९ गोजतेर्भावो गोजावे वो १७ २/३८ कृतादि कृताः पृ० १५१ पं. १७ गत 'शारीरः प्रलमविशेष' इलस्य स्थाने 'धातुविशेषः' इति मूलप्रतिषु दृश्यते । पृ० ४५२ तमगतप्रशस्यां द्वितीयपट्टी के विजयन्नु इत्यस्य स्थाने 5 विजयन्ताम् । प्रथम लोके 'आत्मारामेति ख्याताना विजयानन्दसूरीणाम्' इलस्य स्थाने 'आत्मारामेति ख्यातस्य विजयानन्दसद्गुरोः' । दशमे श्लोके 'विजयनु' इत्यस्य स्थाने "विजयतां' इति च वाच्यम् सुधीभिः ।। - ३२ "उतो ४७० ४७० ४२० १४ पञ्चशाणम् ४२०३४ यत्र श्रीहेमप्रकाशपूर्वार्द्धगतगणानामकाराद्यनुक्रमणिका । पृ. पं. मणाः १२ २० १७३ ४०९ १२ + १२ २६७ ३१४ १२ २८ २८४ ३४१ १६ २१ २१ ३० ४०९ २ १ अक्षयूतादयः अज्ञादयः अज्ञादयः अजादय: अजिरादयः अजनादयः अग्वादयः अध्यात्मादय: अनुशतिकादयः अपूपादयः अब्जादयः अनादयः अरीहणादयः अवस्थादयः अश्मादयः अध्यादयः अथादयः अहरादयः अहर्पत्यादयः आयादयः आहिताम्यादयः इन्द्वादयः इथादयः इथ्यादयः उस्कादयः उत्यापनादयः उत्सहादेः उत्सादयः उपकादयः ऊम्यादयः प्रस्वादयः ऋश्यादयः एहीदादयः ऐपुमर्यादयः कच्डादयः कन्यादयः १४/न्यायादयः १७ १३ पृ. पं. गणा: २ किशराद्यः १९/कुञादयः २० कुज्ञादयः ३३६ १४|कुण्ड्यादयः ३६६ २७ कुमुदादयः ७.कुम्मपद्यादयः ४५८ २ कुर्वादयः १३ कुलालादयः ३५१ ९ कृतादयः ४२३ १९ कृशाश्वादयः ४५६ १७ कृष्यादयः २१ कोडादय. २३ गौड्यादयः १३ खलादयः ३६७ १४ गडुलादयः ३४० २८ गद्वादयः ४१४ २८ गतप्रत्यागतादय: ३६८ १२ गादयः ८५ २४ गवाश्वादयः १६५ ३३ गहादयः २६२ २८ गुणादयः २६३ ६/गृष्ट्यादयः ४४५ ११ गोण्यादयः ४०७ २ गोदानादयः ३६८ २३ गोपवनादयः ४१३ १४ गौरादयः घोषदादयः ३२८ ३४ ४४९ २० चौरादयः ४१३ २५ छत्रादयः ३ छैदादय. ૨૮૮ जरत्यादयः ३१ ज्योत्स्नादय. २३ तारकादयः ३९१ १०तिकफितवादयः ४२२ २१ तिष्टदूग्वादयः ४३४ ३१ सुन्दादयः २९ तृणादयः ३२० १६ तोल्वत्यादयः ४३८ २३ दण्डादयः २८१ ३० दधिपय भादि २६७ २. दामन्यादयः ३९४ १५ दिगादयः पृ. पं. गणाः ३२ दृढादयः देवपथादयः २३ देवव्रतादयः १४ | देवादयः १०द्वारादयः १९ धनादयः ३५४ १३ धर्मादयः २१/धर्मार्थादयः २९९ ५|धूमादयः ३६८ ३४ नखादयः ३५ नडादयः १९४ २१ नडादयः २०२ १९ नद्यादयः ३० नरादयः ४२८ १४|नवयज्ञादयः २६३ १० नावादयः २८९ २ निकटादयः ३३९ ३१२ ३ पन्थ्यादयः २१/परदारादयः ४५५ १२ परिमुखादयः ३५२ १६ पर्यादयः ३५ पादयः ४१० १५/पानेसमितादयः ३३९ १.पाशादयः १९. २५ पिच्छादयः ८पील्चादयः १८/पील्वादयः ४१३ १० पुष्करायः ४३२ २२ पूर्वादयः १९ पृथ्वादयः ४१८ ४ पृषोदरादयः २८६ १ पैलादयः ४५२ ४.प्रज्ञादयः ४४० ५ प्रतिजनादयः प्रभूतादयः २५ प्रद्धादयः २७४ ३०.प्राच्या २७ प्रियादयः १७/प्रेक्षादयः ३४७ २७ भादयः ३० बलादय: ३१२ १२घाद्वादयः ३६ विदादयः ३१ विल्वकीयादयः ३६८ ४०४ ३७९ ४०२ ४६९ २८२ २४ ३३ २४ ३१चादयः ३२ चूडादयः २९१ ४३४ ४५६ २८० ३ ३० २४ २ ३५ २४ १८ १८ २५ ४२२ २७ विकादयः १४ ३५८ २६४ ३६५ कर्णादयः कणादयः कस्याणादयः कस्वादयः काकतालीयादयः काकादयः कतारयः कास्पारयः १६ ११ ३३५ ३३८ २९ २५ २१ श्रीहेमप्रकाशपूर्वार्धगतगणानामकाराद्यनुक्रमणिका । गणा: . पं.गणाः पं. गणाः पृ. पं. युधादयः १५ ४२९ ૨૮૦ ३५८ ३८५ २८१ ३०० २७९ २९९ २४ ९ २२ १५ वामादयः १ १ ३२१ ४७१ ३६९ ३२० ३८६ ३६८ ३९९ ९१ १३ २६ - . ४५४ ४५२ ७ ४ ३६७ २८८ س 0. प्र. ३/लोमादयः ४५२ - १७ शौनकादयः २८ वंशादयः ४१६ ५ शीण्डादयः २० वराहदयः ८धमणादयः ९ वर्चस्कादिप्ववस्करादयः ३२१ २३/वितादयः ४२१ ८ श्रेण्यादयः ४ विनयादयः ४०१ ३४ धादयः १२ विमुक्कादयः ४५७ ४ सह्यादयः २९ वेणुकादयः ३९८ २ सन्ध्यादयः १३ वेतनादयः सर्वादयः ४०३ ९ १७ व्याघ्रादयः ३०१ साक्षादादयः १६ व्यादयः सायाहादयः न्युटादयः सिध्मादयः ४११ २ बीखादयः सिन्ध्वादयः ४५० सिंहादयः ५/शकादयः शण्डिकादयः सुखादयः ३१ मुखादयः १८ शरदादयः २७७ सुतंगमादयः शरादयः १३ २७ शर्करादयः सुपन्ध्यादयः ४३८ ३० ५ शाकपार्थिवादयः २८९ सुवादयः २६ शाखाद्यः ४३८ २० शिक्षादयः खरादयः ३८० ११/शिखादयः १९ स्वर्गवाचनादयः २ शिवादयः ૨૪ રે १० स्वस्तिवाचनादयः २३ शिशुक्रन्दादयः ३८७ १/वाझादयः २१ शुण्डिकादयः ३८१ २९/हरितादयः २२ शुभ्रादयः ३५० १०/हितादयः २७ | शोणादयः १९३. ३ हेमादयः भयादयः भर्गादयः भखादयः भिक्षादयः भीष्टानादयः नेपजादयः गौरिक्यादयः धातुप्पुनादयः मक्षिकादयः मण्यादयः मध्वादयः मध्वादयः मयूरव्यंसकादयः भर्तादयः माशब्देत्यादयः मृगक्षीरादयः 'यस्कादयः याजकादयः यावादयः युगादयः युवादयः योगादयः राजदन्तादयः राजन्यादयः राजादयः रेवत्यादयः रेवतिकादयः १८६ २८६ ४५३ ३८९ २८१ २६२ ४ ४७१ 10. - ४०४ २८१ ३४४ २८१ ૨૬૮ ३६८ २६८ ९ २२ ४०४ :१५ सुनातादयः २४. १६१ ४१३ ४१३ २१ ४२३. ४३३ ४११ २९३ ३६९ ४३१ ३५२ ३८३. ४०९ २२ विदाद्यंतर्गताः २८० २४ . ९१ पलप्रकरणम् विद्यागुरोरतिहासिकपरिचयः मुतप्रकरणम् आस्यप्रयत्ना: न्यायाः परिभाषा चक्षुश्योततेः २५६ रूपाणि विशिष्टस्थलानामनुक्रमणिका । ३ अहर्पतेर्विशतिरूपाणि ८५/ सकर्मकतादि ७ सर्वादीनामर्थाः ३२२ १७ *खरादीनामर्थाः १६१ अन्या अपि विषयाः वृहन्यासाद्यनु. २० *चादीनामर्थाः १६३ सारेण कारकप्रक्रियायां चर्चितास्तत्र १७९/तन द्रष्टव्याः । समासतद्धितादिविषया अनामार्थः २०५ अपि यथाक्रमं सविस्तरं व्याख्याताः २११ प्रत्येकपृष्ठद्वयावलोकनेन ज्ञेयाः । ५२ *उपसर्गाणामाः MARA - मूलप्रतिषु कथमप्यनुलब्धे द्वे विशिष्टसूत्रे सिद्धहेमबृहद्वृत्तितः संग्रहीते द्विदण्ड्यादिः [सि० ३७५ ।।] द्विदण्डि इत्येवमादयः समासा इजन्ताः साधवो भवन्ति । द्वौ दण्डावस्मिन्प्रहरणे द्विदण्डि प्रहरति, एवं द्विमुसलि । उभादन्ति उभयादन्ति । उभावाहु उभयावाहु । उभौ हस्तावस्मिन्पाने उभाहस्ति पिपति, एवमुभयास्ति । *उभापाणि उभयापाणिः । उभाञ्जलिः उभयाञ्जलिः । उभौ कर्णावस्मिन्श्रवणे उभाकर्णि शृणोति, एवमुभयाकर्णि । अन्ते यासोऽस्मिन्स्थानेऽन्तेवासि तिष्ठति । अन्तेवासी गुरोरिति वाच्छीलिकान्तोऽन्य एव शब्दः । संहितानि पुरुपान्यस्मिन् सरणे संहितपुच्छि धावन्ति । एकः पादोऽस्मिनामने एकपदि गच्छति । समानौ पादावस्मिन्सपदि गच्छति । आच्यपादौ आच्य- पदि शेते । एवं प्रोद्यपदि हस्तिनं बाहयति । निकुच्यकौँ निकुच्यकर्णि धावति, तिष्ठग्वित्वाव्ययी- भावः । उभाषाहु उभयावाहित्यत्र निपातनादिज्लुपि स्थानिवद्भावादिजन्वत्वेनाव्ययीभावसंज्ञा विभ- घयलुक पादस्य पद्भावः समानस्य सभावश्चेत्यदि सर्व निपातनात् सिद्धम् । क्रियाविशेषणाचान्यन न भवति । द्रो दण्डावस्यां शालायां द्विदण्डा, द्विमुसला | उभस्य उभयोऽद्वित्वे इत्यनुपदकारसूत्रं ततः उभयः पाणिः उभये वा पाणयो यस्मिन्नित्येकत्वे बहुत्वे एव वाक्यं कार्यम् एवमन्यत्रापि ॥ संख्यादेः पादादिभ्यो दानदण्डे चाऽकल्लुक च [सि०७२।१५२] संख्यायाः प्रकृत्या- यवयवात् परे ये पादादयस्तदन्तानानो दानदण्डे चकाराद्वीप्सायां च विषयेऽकल् प्रत्ययो भवति, वत्संनियोगे च प्रकृतेरन्तस्य लुग्भवति । द्वी द्वौ पादौ ददाति द्विपदिकां ददाति । त्रिपदिकां ददाति । द्वे शते विसृजति द्विशतिकां विसजति । द्विमोदकिकां त्रिमोदकिकां त्यजति । दण्डे-द्वौ पादौ दण्डितः द्विपदिकां दण्डितः । एवं निपदिकां द्विशतिकां त्रिशतिको द्विमोदकिकां त्रिमोदकिकाम् । वीप्सायाम्- दो द्वो पादौ मुझे द्विपदिकां मुझे, विपदिकां द्विशतिका विशतिका द्विमोदकिकां त्रिमोदकिकाम् । संख्यादेरिति किम् ? पादं ददाति, पादं दण्डितः, पादं पादं मुझे । पादादिभ्य इति किम् ? द्वौ द्वी मापो ददाति । दानदण्डे चेति किम् ? द्वौ पाद्वौ मुझे। चकारो चीप्साया अनुकर्पणार्थः । लकार: स्त्रीत्वार्यः । लुग्यचनमनिमित्तलुगर्थम् (नन्यकलि 'अवर्णेवर्णस्य' इति प्रकृत्यन्तस्य लुप भविष्यति, किमर्थ लुग्वचनमित्यारावा), तेन पादः पद्भावो भवति । परनिमित्तायां तु लुचि स्थानियद्भावो न स्यात् । पादादयः प्रयोगतोऽनुसर्तव्याः ।। .

॥ विश्वहितबोधिदायकश्रीअमीविजयगुरुभ्यो नमः ॥ ११ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितं श्रीहैमप्रकाशाख्यं महाव्याकरणम् । अथ पूर्वार्धम् ।। ॥ ॐ नमः । श्रीगुरुभ्यो नमः । श्रीसरस्वत्यै नमः । श्रीशद्वेश्वरपार्श्वनाथाय नमः ॥ प्रणम्य पार्श्वविश्वेशं शद्वेश्वरपुरस्थितम् । स्वोपज्ञप्रक्रियावृत्तिस्तन्यते विदुपां मुदे ।। १ ।। इह हि श्रीसिद्धराजजयसिंहदेवप्रभृतिपरःशतक्षितिपालमौलिमाणिक्यमालोत्तेजितक्रमनखसहस्रपादाः, प्रत्यक्षसरस्वतीचक्रेश्वर्यादिदेवताचतुष्टयकृताहादाः, व्याकरणकाव्यालङ्कारच्छन्दस्तांद्यनेकशास्त्रनिर्माण-१९ कृतसकलकोविदप्रसादाः, श्रीहेमचन्द्रसूरिपादाः, परपरिगृहीतपाणिनीयादिव्याकरणाध्ययने तेषां विनयादिविधाने च जैनयतयो मा स्म खिद्यन्तीति तेषां कृपया, श्रीसिद्धराजप्रार्थनया च, सकल- - व्याकरणोपनिपद्भूतमलौकिकसूत्ररचनाप्रधानं, विविधविशेषार्थनिधानं, श्री सिद्ध]हेमचन्द्राभि- धानं महाव्याकरणं विरचयाञ्चक्रुः । तस्मिंश्च रत्नाकर इवातिगम्भीरेऽनुवृत्त्याद्यानुकूल्येन सूत्ररचनाञ्चिते शब्दव्युत्पत्ती व्यस्तसूत्रतां विलोक्य केचनाल्पमतयो ग्राम्या इव माणिक्यपरिग्रहेऽलसायन्ते । ततस्तेषा-१५ मस्मिन्महाव्याकरणे प्रवेशोपायभूतां शब्दसाधनक्रमेण कतिपयहमसूत्रसङ्घटनामिका हैमलघुप्रक्रियां चिकीर्षुर्ग्रन्थकारः शिष्टाचारप्रतिपालनाय विन्नविधाताय च मङ्गलाचरणं प्रेक्षावत्प्रवृत्तयेऽभिधेयप्रयोजन- सम्बन्धाधिकारिणश्च प्रथमपद्येन प्रकटयति- प्रणम्य परमात्मानं वालानां बोधसिद्धये । ... करोमि प्रक्रियां सिद्धहेमचन्द्रानुसारिणीम् ॥ १॥ 'ग्रणम्येति', अहं प्रक्रियां करोमीत्यन्वयः, प्रकृतोपयोगिसूत्रसङ्घटनेन प्रकरणं शब्दव्युत्पादन प्रक्रिया, ताम् । केचित्तु प्रक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दा अनयेति प्रक्रियेत्यूचुस्तत्र "स्त्रींखलना अलो वाधकाः, स्त्रियाः खलनौ” इति न्यायात् शं वाधित्वा अनःप्रवृत्तौ प्रकरणीति रूपप्रसङ्गः । किंविशिष्टां प्रक्रियाम् ? 'सिद्ध- हेमचन्द्रानुसारिणीम्', सिद्धहेमचन्द्राभिधानं महाव्याकरणमनुसरतीति सिद्धहेमचन्द्रानुसारिणी ताम् , एतेन सम्यग्दृष्टिप्रणीतव्याकरणानुसारितयास्याः प्रक्रियायाः कौमुद्यादिभ्यो विशिष्योपादेयतां स्वकपोल-२५ कल्पितशङ्कानिरासेन सम्प्रदायशुद्धतां चाह । कस्यै ? 'वोधसिद्धये', बोधः सर्वोपाधिशुद्धं शब्दज्ञानम् , तस्य सिद्धिनिष्पत्तिस्तस्यै । केपाम् ? 'वालानाम्' वालाः शब्दापशब्दविवेकविकलास्तेंपाम् । अत एवं व्युत्पत्तिलक्षणस्य फलस्य परगामितया 'करोमी' यत्रं परस्मैपदम् । किं कृत्वा ? प्रणमनम् , पूर्व 'प्रणम्य' मनोवांकायपहीभावगोचरीकृत्य । कम् ? 'परमात्मानं-परा प्रकृष्टा 'मा' लक्ष्मीः कान्तिर्यस्य स परमः, पर्योगिभिर्मीयते ज्ञायते इति वा परमः, परान् शत्रून् रागादीन्मीनाति हिनस्तीति वा परॅमः, यद्वा ३० "मानं' मा, परा प्रकृष्टा मा-ज्ञानं यस्य स परमः । . 'अत सातत्यगमने' अतति-सातत्येन गच्छति ताँस्तान ज्ञानादिपर्यायानित्यात्मा.। परमश्वासावात्मा च परमात्मा । तं परमात्मानं, परमेश्वरमित्यर्थः । ३२ ।' - '.. २० i २ .. महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते.खोपज्ञहेमलघु- अन्न 'प्रणम्ये त्यादिना मङ्गलाचरणमाचरितम् । 'प्रक्रियामि'त्यनेन चाभिधेयमभिहितं शब्दव्युत्पाद- नस्यैव प्रतिपाद्यत्वात् । 'बालानां वोधसिद्धये' इत्यनेन प्रयोजनमधिकारिणश्वाभिंहिताः । तत्र प्रयोजनं द्विविधं, प्रन्यकर्तुम्रन्थपठितुश्च । पुनरेकै द्विधा, अनन्तरपरम्परभेदात् । तत्र ग्रन्थकर्तुरनन्तरप्रयोजन घालानुमहादि । ग्रन्थपठितुश्च शब्दज्ञानादि । परम्परप्रयोजनं तूभयोरपि निःश्रेयसावाप्तिस्तथोक्तम्, ५ व्याकरणात्पदसिद्धिः, पदसिद्धरर्थनिर्णयो भवति । अर्थात्तत्त्वज्ञानं, तत्त्वज्ञानात्परं श्रेयः" ।। १।। इति । अधिकारिणश्च व्युत्पित्सवो वालाः । सम्पन्धश्च शब्दशास्त्रयोः प्रतिपाद्यप्रतिपादकभाव इति । अथ साधनिका लिख्यते-- 'णमं प्रत्वे' णम् , “पाठे धात्वादेणों न" इति णस्य नः, "धातोः पूजार्थे”ति प्रपूर्वः, प्रणमनं पूर्व प्रणम्य "माझाले" इति क्त्वाप्रत्ययः । प्रस्य "ऊर्याद्यनुकरणे"त्यादिना गतिसंज्ञायां "गतिकन्यस्तत्पुरुष" १० इति समासः, "अनमः क्त्वो यप्" इति क्त्वाप्रत्ययस्य यवादेशः, “अदुरुपसर्गान्तरो महिनुमीनाने"- रिति नस्य णत्वं प्रणम्य १-१, "क्त्वातुमम्" इति क्त्वान्तस्याव्ययत्वात् "अव्ययस्ये"ति सिलुप् । परमात्मन् २-१, "सन्महत्परमोत्कृष्टं पूजायामि"ति कर्मधारये "कर्मणी"ति द्वितीयायां-"नि दीर्ध" इति दीचे परमात्मानम् । वाल ६-३ आम्-"हस्वापश्चे"ति नाम् , "दी? नाम्यतिसचतसृष्ट" इति दी पालानाम् । 'बुधिं मनिं च ज्ञाने' बुध्, वोधनं बोधः, "भावाकों", "अलघोरुपान्त्यस्ये"ति १५ उपान्त्यगुणे बोधः । "विधू गत्यां" पिथ्, "पः सोप्यैष्ठिवष्वष्कः''-सिधू, सेधनं सिद्धिः- "त्रियां क्तिः", "अधश्चतुर्थात्तथोध" इति तस्य धत्वं, "तृतीयस्तृतीयचतुर्थ” इति पूर्वधस्य दः सिद्धिः, बोधस्य सिद्धिः-"पष्ठपयनाच्छे" इति पष्ठीतत्पुरुषः, "ऐकार्थ्य" इति पष्ठीलुक् बोधसिद्धि ४-१ "हित्य- दिति" इति इकारस्य एत्वे, “एदेतोऽयाय्” इति अयादेशे योधसिद्धये । 'दुकंग करणे' छ, वर्तमाना मिव्, “कगतनादेरुः” इति उप्रत्ययः, "नामिनो गुणोऽकिति" इति कृधातोर्गुणः, "उओ"रिति उप्रत्य- २० यस्य गुणः, करोमीति सिद्धम् । प्रपूर्वः 'हुकंग करणे' क, प्रकरणं प्रक्रिया कृगः शमत्ययः ॥रिः शक्याशी" इति कारस्य रिः "संयोगा"दितीयादेशे शप्रत्ययस्य व्यधिकारविहिवत्वात् "आत्" इति आप्रत्ययः, प्रक्रिया २-१अम्, "समानादमोतः” इत्यकारलुप् प्रक्रियाम् । 'पिधू गत्यां' पिधू, सिभ्यति स्म सिद्धः, "तक्तवतू" इति क्तप्रत्ययः शेपं प्राग्वत् । 'हिंद गतिवृद्ध्योः हिनोति स्वतेजसा पृद्धिमाधत्ते "हिभ्यां वै"ति मप्रत्ययः, "नामिनो गुणोऽद्विती"ति गुणे हेमः । 'चदु दीप्त्याहादयोः' २५पद्, "उदितः स्वरान्नोन्त" इति नोन्ते चन्दत्साहादयति लोकानिति "भीवृधि" इति रप्रत्ययः चन्द्रः । हेमवद्गौरयाद्धमः चन्द्रवदाहादकत्वाचन्द्रः, हेमश्चासौ चन्द्रश्च हेमचन्द्रः-हेमचन्द्राचार्य इत्यर्थः । "पदैक- देशे पदसमुदायोपचारात्" सिद्ध' इति सिद्धराजजयसिंहदेवः ततश्व सिद्धराजेन कारितत्वात् सिद्धं, हेम- पन्द्रेण कृतत्यात् हेमचन्द्र, सिद्धं च तद्वेमचन्द्रं च सिद्धहेमचन्द्रमित्यस्य व्याकरणस्य नाम । सिद्धहेम- पन्द्र २-१ अम्, अनुपूर्वक 'एं गतो', सिद्धहेमचन्द्रमनुसरतीत्येवं शीला "अजातेः शोले" इति ३०गिन्, "गतिकारकरस्युत्तानां कृदन्तैर्विभक्त्युत्पत्तेः प्रागेव समास" इति न्यायात् "सस्युक्तं कृते"ति सूत्रण विभफ्त्युत्पत्तेः प्राम् समासः, "ऐकाप्ये" इत्यम्लुप्, "नामिनोऽकलिहलेरि"ति वृद्धिः, "स्त्रियां मृवोऽम्पप्लादेही रिति शी:-ई, "रपृवर्णान्नो ण एकपदेऽनन्यस्यालचटतवर्गशसान्तरे" इति णत्वे सिद्ध- देगपदानुसारिणी,२-१अम्, "समानादमोव" इत्यफारलुपि सिद्धहेमचन्द्रानुसारिणीम् ॥ ननु नत्येत्यनेनापि सिध्यति प्रोपसर्गोपादानं किमर्थम् । अत्रोच्यते-प्रोपसर्गो वाफायमनसां प्रही. १५माया योतयति, उपहासनमस्कारसंशयं प निराकरोति, अन्यथा "नमस्सं वत्सखि प्रेम घण्टा- ३ . प्रक्रियावृचिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । मङ्गलाचरणादि रसितसोदरम् । क्रमऋशिमनिस्सारमारम्भगुरुडम्बरम्" ॥ २ ॥ इत्यादिवदुपहासनमस्कारभ्रमोऽपि स्यादिति । मङ्गलाथं च प्रशब्दोपादानम् , तथोक्तम् , "प्रशब्दश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ” ॥ ३ ॥ ननु प्रणम्येत्यत्र क्त्वाप्रत्ययः कर्मणि भावे वा ? कर्मणि चेत्तर्हि कर्मण उक्तत्वात् कर्मणि प्रथमा प्राप्नोति, अथ चेद्भावे तर्हि "भावोक्तौ कर्म नो भवे- दि"ति कर्म न स्यादिति; अनोच्यते भाव एव "क्त्वातुमम् भावे” इति वचनात् , किन्तु “सकर्मका-५ णामुत्पन्नस्त्यादिर्भावविवक्षया । अपाकरोति कर्मार्थ स्वभावान पुनः कृतः” ॥ ४॥ इति कर्म भवत्येव । ननु प्रणम्येत्यत्र 'प्रणम् क्त्वा' इति स्थिते प्रकृत्याश्रितत्वेन "अहन्पञ्चमस्य विकिति” इति दीर्घोऽन्तरङ्गः, प्रत्ययाश्रितत्वेन यवादेशो बहिरङ्गो, "बहिरङ्गाच्चान्तरङ्गं वलीय" इति पूर्वं दीर्वं ततो यवादेशे 'प्रणा- म्येति रूपं कुतो न स्यादिति; अत्रोच्यते; प्रजग्ध्येत्यत्र “यपि चादो जग्ध्”-तादौ किति प्रत्यये यपि चादेग्ध् स्यात्-इत्यन्तरङ्गत्वात् यवादेशात् प्रागेव जग्धादेशे सिद्धे यग्रहणमन्तरङ्गानपि विधीन यवादेशो १० वाधते इति ज्ञापनार्थम् , तथाहु:-"तादौ किति जग्धि सिद्धे यपि चेति यदुच्यते । ज्ञापयत्यन्तरङ्गाणां यपा भवति वाधनम्" ।। ५ ॥ न चैवं कृतेऽपि यवादेशे "स्थानीवावर्णविधौ” इति आदेशस्य स्थानि- वद्भावेन दीर्घः प्राप्नोतीति वाच्यम् , "न सन्धिङीयक्तिद्विदीर्घासद्विधावस्क्लुकी"ति दीर्घविधौ स्थानिव- द्भावाभावात् "सकृद्गते स्पर्धे बाधितं वाधितमेवे"ति न्यायाद्वा न दीर्घः । अन्तरङ्गबहिरङ्गयोश्च लक्षणमिदम्- "प्रकृतेराश्रितं यत्स्याद् , यद्वा पूर्वं व्यवस्थितम् । यस्य चाल्पनिमित्तानि अन्तरङ्गं तदुच्यते” ॥६॥ "प्रत्ययस्याश्रितं यत्स्याद् , बहिर्वा यद् व्यवस्थितम् । बहूनि वा निमित्तानि वहिरङ्गं तदुच्यते” ॥७॥१॥ अथ ग्रन्थारम्भादिशुभकायें स्वोपकारिणः स्मर्तव्या इति तदर्थमुपक्रमते- औं नमो हेमचन्द्राय हैमव्याकरणाय च । शब्दपाथोधिसोमाय जगद्विख्यातकीर्तये ॥ २ ॥ 'भो नम' इति । हेमचन्द्राय नमोऽस्तु इत्यन्वयः। किंविशिष्टाय हेमचन्द्राय ? ओ अवतीत्यों रक्ष- कायेत्यर्थः । 'ओ नम' इति मातृकादौ पठितः पाठसिद्धः सारस्वतमन्त्रो ज्ञेयः । 'च'-पुनः । हैमव्याक- रणाय नमोऽस्तु । किंविशिष्टाय हेमचन्द्राय हैमव्याकरणाय च ? 'शब्दपाथोधिसोमाय' शब्दाः पाथो- धिरिव शब्दपाथोधिः, सोम इव सोमः, शब्दपाथोधौ सोमः शब्दपाथोधिसोमः, तस्मै, शब्दज्ञानोल्लास- कारिणे इत्यर्थः । पुनः कथम्भूताय हेमचन्द्राय हैमव्याकरणाय च ? 'जगद्विख्यातकीर्तये । जगति २५ विख्याता प्रसिद्धा जगद्विख्याता, जगद्विख्याता कीर्तिर्यस्य स तथा तत्तथा वा, तस्मै । अथवा शब्द- पाथोधिसोमाय नमोऽस्तु । शब्दानां पायोधिः शब्दपाथोधिः-शब्दरत्नरत्नाकर इति यावत् , स चासौ सोमश्च श्रीसोमविजयोपाध्यायस्तस्मै । किविशिष्टाय 'हेमचन्द्राय ? । हेमचन्द्र इव हेमचन्द्र- स्तस्मै, अस्मिन् कलिकालेऽपि श्रीहेमचन्द्राचार्यवत् प्रौढप्रभावाय निरवद्यव्याकरणविद्याहृद्याय च । पुनः किंविशिष्टाय 'हैमव्याकरणाय ? । हैमं व्याकरणं स्वभ्यस्तं यस्य स हैमव्याकरणस्तस्मै । तथा श्रूयते ३० हि कालानुभावतस्तत्त्वप्रकाशिकाख्यांया हैमव्याकरणबृहद्वृत्तेः सम्प्रदाये ज्युच्छिन्नप्राये सति जगद्गुरुश्रीहीरविजयसूरिनिर्देशात् स्तम्भतीर्थवास्तव्यवृद्धशाखीयोकेशज्ञातीयसङ्घपति-उदयकरण- सोमकरणसाहाय्याच, बहुशः परिपठितमहाभाष्यादिमहाव्याकरणात् भूधीभद्वात् सम्यगवगम्य, महो- पाध्यायश्रीसोमविजयगणिभिस्तत्त्वप्रकाशिका तपागच्छे वहूनां गीतार्थानां पाठिता । ततोऽद्यापि ३४ - २० + क महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- सम्प्रदायसुद्धा सा प्रवर्तते इत्येतद्विशेषणं युक्तमेवेति । पुनः किंवि०। अभगवैराग्यरजसुधारससर- सदेशनाद्यमिरामगुणग्रामरामणीयक्त्वेन जगति विख्याता कीर्तिर्यस्य स तथा तस्मै । अथवा 'जगद्वि- ख्यातकीर्तये नमोऽस्तु । स्वविरचितविचाररत्नाकरहीरप्रश्नोत्तरादिग्रन्थप्रथितयशोभरत्वेन, स्वशिष्य- विरचितलोकप्रकाशफल्मसुरोधिकावृत्तिजिनशतकवृहदत्तिहैमप्रक्रियातत्तिप्रभृतिमन्थाप्रजापन्नामधेय- ५त्वेन,जगति विख्यातः प्रसिद्धः, स चासो कीर्तिश्व-श्रीकीर्तिविजयोपाध्यायस्तस्मै । किवि० 'हेम. चन्द्रायेत्यादि प्राग्वत् । अत्र च राजप्रतियोधविधायकत्वेन अलौकिकव्याकरणाद्यनेकमहाशास्त्रविधा- यित्वेन च सक्लजिनशासनोपकारित्वात ग्रन्थकारस्यापि सुतरामुपकारीति प्रथम श्रीहेमचन्द्राचार्यनम- सरण न्याय्यमेव । श्रीहेमव्याकरणस्यापि नमस्करणीयत्वमसन्तमुचितमेव, सम्यग्दृष्टिप्रणीतत्वेन भुतज्ञानत्वात् सक्लशास्रव्युत्पत्तिहेतुत्वेन लोकेऽपि महोपकारितया प्रतीतत्वाच । तथाह लीलावतीकारो १० भास्करः सिद्धान्तशिरोमणी-"यो वेद वेदवदनं सदनं हि सम्यक् ब्राहयाः स वेदमपि वेद किमन्यशास्त्रम् । यस्मादतः प्रथममेतदधीत्य धीमान शास्त्रान्तरस्य भवति श्रवणेऽधिकारी" ॥ ८ ॥ सत्यनतविशुद्धयाधायित्वेन निर्जराहेतुतया सिद्धान्तेऽप्यभिहितत्वाच, तथोक्त प्रश्नव्याकरणाने- "अह पेरिसयं पुणाइ स तु भासिअव्वं जं तं दव्वेहिं पजवेहि य गुणेहिं कम्मेहिं बहुविहेहिं सिप्पेहि आगमेहिं य नामक्सायनिवायउपसगतद्धिअसमाससधिपदहेतुजोगियउणाइकिरियाविहाणधातुसरवि- १५भत्तिवण्णजुत्त तिकल्ल दसविहमि"यादि । व्याकरणनमस्कारेण च सरस्वत्या अपि नमस्कारः कृतों भवति, सरस्वतीरूपत्वात् व्याकरणस्य । श्रीहीरविजयसूरिशिष्यमुख्ययोः सोदरयोः सतीर्थयोश्च महोपाध्यायचावर्तिनो. पितृव्यगुरुतया स्वगुरुतया च परमोपकारित्वान्नमस्करणं समुचितमेवेति द्विती. यसोवेन चत्वारोऽप्युपकारिणः स्मृता इति तत्त्वम् । ओ ४-१, 'अव्ययस्येति विभक्तिलुप्, । नमः १-१, 'अव्ययस्येति, विभक्तिलुप् । हेमचन्द्र- २०४-१, "शवार्यवपढ्नमास्वस्तिस्थाहास्वधाभिः" इति चतुर्थी, "हेडस्योर्यातौ” य "अत आः स्यादी जस्- भ्यां ये” इत्यात्वे हेमचन्द्राय । हेनो-हेमचन्द्राचार्यस्येदं "तस्येदम्” इत्यण-हेमन् अ-"नोऽपदस पद्धिते" इत्यन्यस्वरादिलुप्, “घृद्धिः स्वरेप्पादेगिति तद्धिते” इति वृद्धी हेमं, वि आइपूर्वक 'हुकंग परणे पृ, व्याप्रियते अनेनेति व्याकरणं, "परणाधारे" इसनट् "नामिनो गुणोऽहिती"ति गुणे व्याकरण, हेमं प सद् व्याकरणं च "विशेषण विशेष्येणेकार्थ पर्मधारय"ति कर्मधारये हैमव्याकरण४-१, २५माग्यत् हैमव्याकरणाय। ११-१'अव्ययस्येति विभक्तिटुप् । 'शपी आनोशे' शप्, शपति- भागोशाति यूटोमारपमिति "शापिमनिकनिभ्यो दः" इति दप्रत्ययः, "तृतीयस्तृतीयचतुर्थे” इति पस्य पत्वे शब्दः, शब्दते इति वा । पाथस् १-३, 'दुधाग धारणे चेति धापातुः, पायासि धीय- म्तेऽग्मिमिति च्याप्यादाधारे" इति नि:, "इडेतपुसिचातो लुम्" इत्यकारलुरि, "इस्युक्तं पृते"ति ससुरुषसमासे, "कार्य" इति विभक्लुिपि पायोधिः, शब्दाः पायोधिरिव "उपमेयं व्याघ्रायः २० साम्यातुको" इति पर्मधारये विभफिलुपि शलपायोधिः, सोम इव मोमः, अभेदोपचारः, शब्द- पायोपो मोमः "मिहारः पूजायानि ति सप्तमीतत्पुरुषः विमतिलुए सन्दपाथोधिसोम ४-१, भाग्यमान्दपाधोधिमोमाय । 'गम्लं गतो' "गमेरिवेष-अस्मात् डिमचाम्य रूपै म्याताम्, गगग-पापरजामो टोकः । या गद्धतीति जगा "विशुद्दरजगहवामाधीश्रीसूज्यायतस्सूफा- परिनभानादयः पिप्" इति निपानना जगन् इति । विपूर्वः 'स्याए प्रमथने विन्यायतेरस पिपरावा, जगति पिण्या सानियाना, "मिहाधेः पूजयामि"नि समामः । 'कवा समन्दने कीर्तन ना, तिमिसिनिः" इति सम्रा पिान: 1 जगद्विग्याता पीनियम्य-"एकार्य .

-- . प्रक्रियावृत्तिरूपें श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । मङ्गलाचरणांदिः चानेकं चे"ति समासः-स जगद्विख्यातकीर्तिस्तस्मै जगद्विख्यातकीर्तये । व्याकरणविशेषणे तु परतः क्लीवत्वात् "वान्यतः पुमांष्टादौ स्वरे" इति पुंवद्भावपक्षे जगद्विख्यातकीर्तये इति सिद्धम् ॥ २ ॥ आदौ विघ्नविघाताय शिष्टाचाराच शास्त्रकृत् । परमेष्ठिनमस्कारं कुरुते भावमङ्गलम् ॥३॥ महाव्याकरणप्रतिष्ठितप्रथमसूत्रप्रस्तावनाकारिका स्पष्टा। 'आदाविति, परं शास्त्रकदिति-श्रीहेमसूरिः।६ भावमङ्गलमिति-उपयुक्तस्याहन्नमस्कारादिकं भावमङ्गलम् । शेपं तु दधिदूर्वादिकम् , अनुपयुक्तस्याहन्न- मस्कारादिकं च, द्रव्यमङ्गलम् "अनुपयोगो द्रव्यम्” इति वचनादिति ॥ ३ ॥ अथ श्रीसूरिपादैर्महामाङ्गलिकतया व्याकरणादाबुपन्यस्तं प्रथमसूत्रं प्रक्रियाकारोऽपि मङ्गलार्थ प्रथममुपन्यस्यति- अहं ॥१॥ [ सि०-१११] 'अर्ह मह पूजायाम्' अर्हति त्रिभुवनकृतां पूजां इत्यर्हन् , "अच्” इति अप्रत्ययः, 'पोदरादयः इत्यनेन अर्हम् इति निपातः, अहम् १-१ 'अव्ययस्य' इति सिलोपः ॥ १॥ - -अत्र च संज्ञाधिकारे प्रक्रियाकारः प्रतिसूत्रं कारिका विधास्यतीत्यस्य सूत्रस्य कारिकामाई 'अर्ह- मित्यक्षरमिति 'अहमित्यक्षरं ध्येयं परमेश्वरवाचकम् । शास्त्रादौ पठतां क्षेमव्युत्पत्त्यभ्युदयप्रदम् ॥ ४ ॥ 'अहमित्यक्षर' शास्त्रादौ 'ध्येयं'-प्रणिधानविपयीकार्यमित्यन्वयः । प्रणिधानं चानेन आत्मनः सर्वतः सम्भेदस्तदभिधेयेन चार्हता सह आत्मनोऽभेदः । अर्हदभिन्नमर्हकारेण सर्वतो 'वेष्टितमात्मानं ध्याये- दिति भावः । किंवि० अर्ह ? 'अक्षर' न क्षरति स्वस्मात् स्वरूपादित्यक्षरम् । पुनः किं ? 'परमेश्वर-c:- पाचकम्'-अर्हसिद्धाचार्योपाध्यायसाधुरूपेषु पञ्चसु परमेष्ठिपु मध्ये शेपपरमेष्टिचतुष्टयोपदर्शकत्वेन २० मुक्तिमार्गोपदेशकत्वेन च प्रकृष्टस्य परमेश्वरस्य अहंद्रूपस्याभिधायकम् । पुनः किं ? 'पठतां' क्षेम- कल्याणं विघ्नाभाव इति यावत् , व्युत्पत्तिः-शब्दार्थपरिज्ञानम् , अभ्युदयः-ऐश्वर्य पाण्डित्यप्रतिष्ठाद्य, भीष्टप्राप्तिरिति यावत् , तान् प्रकर्षेण ददातीति क्षेमव्युत्पत्त्यभ्युदयप्रदम् । अथ व्याकरणस्य सर्वपार्षदत्वेन पराभिप्रायेणापि अहमित्यक्षरं परमेश्वरवाचकं भवति, तथाहु:- "अकारेणोच्यते विष्णू रेफे ब्रह्मा व्यवस्थितः । हकारेण हरः प्रोक्तस्तदन्ते परमं पदम्” ॥९॥ इति ॥४॥२५ ननु शब्दव्युत्पादनमिदमारभ्यते, शब्दं च प्रति विप्रतिपद्यन्ते विद्वांसः, केचिन्नित्यं केचिदनित्यं केचिन्नित्यानिलं मन्यन्ते तदन्न कं पक्षमाश्रित्येदमुपक्रम्यत इत्याह- सिद्धिः त्याद्वादात् ॥ २॥ [ सि०-१।११२ ] 'सिद्धि' १-१ स् “सो रुः" र "र: पदान्ते विसर्गस्तयोः” सिद्धिः । स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योत--. ।"वद व्यक्तायां वाचि" वद् वदनं वाद:-'भावाकोंः' घळ अप्रत्ययः, "णिति” इति वृद्धौ-३० वादः । ततः स्याद्वादोऽनेकान्तवादः, नित्यानित्याद्यनेकधर्मशवलैकवस्त्वभ्युपगमः ॥२॥ अत्र कारिका-- शब्दानां ज्ञप्तिनिष्पत्ती साता स्याद्वाददर्शने । शब्दे ह्येकान्ततो नित्येऽनित्ये वा तद्वयं कुतः ॥ ५ ॥ २३ - - कम् ? - महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- 'शदानामिति' । शाप्तिीनं, निष्पत्तिश्च प्रकृतिप्रत्ययादिविभागेन निष्पादनम्, एतदुभयं शब्दानां स्थाद्वाददर्शने जैनमते एव स्थानान्यमतेऽघटमानत्वात् । तन हेतुमाह-'शब्दे हीत्यादि । एकान्तेन शब्दे नित्ये स्वीकृते एकान्तेन च क्षणिके स्वीकृते तहयं-ज्ञप्तिनिष्पत्तिलक्षणं कुतः स्यात् ? कथमपि न स्यादि- त्यः : । तथाहि-एकान्तेन नित्यानां शब्दानामुच्चारणावसरे स्थानप्रयत्नादिना कश्चिद्विशेषो जन्यते ५नया ? जन्यते चेन्नित्यत्वहानिः, न जन्यते चेत्तर्हि प्राग्वत्तदापि ज्ञान न स्यात्सर्वदा वा स्यात्, न चानुपारिताः शब्दा ज्ञायन्ते, तदेवमेकान्तनित्यत्वे शब्दानां ज्ञप्तिन घटते । प्रकृतिप्रत्ययादिद्वारेण निष्प- त्तिस्तु नित्सत्यपक्षे दुरापालेय, ततश्च साधुष्वसाधुपु च शब्देपु स्वत एव नित्येपु सत्सु व्याकरणारम्भ- प्रयासोऽपि व्यर्थ एव । किश्च एकान्तेनानित्यत्वेऽपि टकारोच्चारणकाले एव धकारे नष्टे कथं घटशब्द- शाप्तिः स्यात्, उच्चारितमालायामेव प्रकृती नष्टायां मृतमण्डनन्यायेन का प्रत्ययादिना विशेष्यते इति १० निष्पत्तिरपि दुर्घदा, ततश्च प्राग्वत् व्याकरणारम्भो व्यर्थ एप । सस्काररूपेण वर्णास्तिष्ठन्तीति चेत् ? एकान्तानित्यत्वपक्षक्षतिः । तदेवं द्रव्यार्थिकनयेन शब्दानां नित्यत्वे पर्यायाथिकनयेन चानिस्सत्वे वीक- से न कोऽपि दोपः, न च व्याकरणवैयर्थ्यम् । व्याकरणज्ञानसस्कृतप्रतिमो हि शब्दद्रव्याणि शब्दत्वेन परिणमप्य सत्यवाग्योगेन मुञ्चन् साधुशब्दवादी भवति, ते चाक्षणिकाः साधुशब्दाः सत्यं शाब्दयोधं जनयन्तीति न काप्यनुपपत्तिः । नचैकस्मिन्निसत्वमनित्यत्वं च दुर्वचनं तत्तदपेक्षयैकस्मिन् पुसि पिट- १५पुनमातुलभागिनेयादिव्यपदेशवत्तस्य लोके सुप्रतीतत्वादिति दिक् । किञ्च वैयाकरणानां स्याद्वादाश्रयण- मेव शरणमन्यथा विकल्पवाहुलकादिनिरूपण "सुरैः स्तूयमानो जिनो जयती"त्यादिवदेकस्मिन्कारकेऽने- फ्कारक्समावेशश्च दुर्घट इति । तथा वादात् विविक्तसाधुशब्दप्रयोगासिद्धिनिःश्रेयस स्यादिति प्रयो- जनपरतयाप्येतत्सूनं व्याख्येयमिति ।। ५ ।। अध संज्ञासूत्रप्रस्तावना- तनादौ व्यवहाराय संज्ञा दिशति शास्त्रकत् । 'सभापाविति' फारिफाई स्पष्टम् । 'व्यवहारायेति' यथालोके सन्धिविप्रहप्रेपणाध्येपणादिव्यवहार- प्रमिवादिसंशां विना न प्रवर्तते तथान सन्धिविश्लेषादिव्यवहारः खरव्यञ्जनादिसंज्ञा विना न सम्भ- पतीति संहाविधानमायश्यप मिति भारः । अध जलधरदिनरादिवत्सर्वोपकारिणः श्रीसूरयः प्रत्याहारपरिगणनादिलिष्टपद्धति परित्यज्य २५माजलेन पया सारशास्त्रव्ययहार प्रवर्तयिष्यन्तोऽनादिकालसिद्धमातफापाठक्रमेणेव सझा निर्दिशान्ति- औदन्ताः खराः॥३॥ [सि०-११४४] 'मोरन्तामोत् अन्ते येषां ते औदन्ताः, "उष्ट्रासादय" इति पहुनीहिः । औदन्त १-३, "अत आ: सादो." आ, पुनः "समानाना तेन.” इति दीघे "सोरुः" "र: पदान्ते." औदन्ताः । स्वयं १-१ "राना दुधानि दीप्तौ” रान् , राजन्ते इति स्वराः । "फचित्" इति हामसया, "डित्यन्त्यस्वरादः ३०पन्यसपरिटोपे "पृषोदरादय" इति स्वयसन्दस्स स्वभावे खर १-३ प्राग्यत्स्वराः । द्विपदमिदं सूत्रम् । 'मोदन्ता इयत्र तपरफरणं विस्सष्टार्थमन्यथा आफ्न्ता इति ते दुयोधता स्वादिति ॥ ३ ॥ भर शारिका (म्)- औपारान्ता अबारायाः परा वर्णाचतुर्दश ॥६॥ आई उसकल ल ए ऐ ओ औ-१४ २० ७ न . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः। खरसंज्ञाः 'औकारान्ता' इति । कुत आरभ्येत्याकाङ्क्षायामाह 'अकाराद्या' इति । 'चतुर्दशेति', न तु नव । ध्यानयेत्यादौ प्रतिपदमुपयोगित्वेन दीर्घाणां पृथक् खरेषु गणनाया न्याय्यत्वम् , सुतानां तु “सम्मत्य- सूर्य"त्यादिसूत्रैर्विधीयमानत्वेन स्वतःसिद्धत्वाभावात्तथा प्रायः कार्येष्वनुपयोगच न खरेषु पृथग्गणना । 'औदन्ता' इति बहुवचनेन तेपां सङ्ग्रहात् स्वरसंज्ञा भवति । तथाहु:-"औदन्ता, इति वहुवचनं वर्णेष्वपठितानां दीर्घपाठोपलक्षितानां प्लुतानां सङ्ग्रहार्थमि"ति ॥ ६ ॥ हुखदीर्घप्लुतस्वरलक्षणमाह- एकद्वित्रिमात्रा हस्वदीर्घप्लुताः ॥ ४॥[सि०-१।१।५ ] एका च द्वे च तिस्रश्च एकद्वितिस्रः । “सर्वादयोऽ स्यादौ” इति पुंवद्धावः । एकद्वितिस्रो मात्रा येषां ते "गोश्चान्ते हस्खोऽनंशि समासेयो वहुव्रीहौं” इति हस्खत्वे एकद्वित्रिमात्र १-३, “अत आः स्यादौ०" "समानानां०" "सोरुः", एकद्वित्रिमात्राः। 'तुस हस हस रस शब्दे' ह्रसधातुः । हसत्यपचितो भवति लटिखटि० इति वप्र० ह्रस्वः । 'दृश विदारणे' हणाति-विदारयत्युच्चार्यमाणो मुखमिति "मघाघवाघदी-१० _दयः” इति निपातः । 'च्युङ ज्युंछ जुन मुंङ प्लुङ् गतौ' प्लवते मात्राधिक्यमिति प्लुतः "पित्ते"त्यादिना निपातः । हखश्च दीर्घश्च प्लुतश्च "चार्थे द्वन्द्वः सहोक्तौ” इति द्वन्द्वसमासः हस्वदीर्घप्लुत १-३, प्राग्वत् हखदीर्घप्लुताः । “अवर्णभोभगोऽघोलुंगसन्धिरि"ति रुलुक् । एकद्वित्रिमात्रा हस्खदीर्घप्लुताः द्विपदं सूत्रम् ॥ ४ ॥ मात्रा-कालविशेष:-मात्राशब्देन किमुच्यत इत्याह-कालविशेष इति । अत्र लोकसम्मतिमाह- १५ एकमात्रो भवेद्रखो द्विमात्रो दीर्घ उच्यते । प्लुतः स्वरस्त्रिमात्रः स्याध्यञ्जनं चार्धमात्रकम् ॥ ७॥ अ, इ, उ, ऋ, लं, इति हस्ताः । आ, ई, ऊ, ऋ, ल, ए,- ऐ, ओ, औ इति दीर्घाः । आ ३, ई ३, इत्यादि प्लुताः। 'एकमात्र०' इति (स्पष्टम् )। तथा-"चाषो वदत्येकमानं द्विमानं वायसो वदेत् । त्रिमात्रं तु शिखी २० ब्रूयात् नकुलस्त्वर्द्धमात्रकम्” ॥ ८ ॥ कुक्कुटस्तु कु कू कू ३ इति क्रमेण त्रीनपि ब्रूते ॥ ७ ॥ अथ तुतानां प्रदेशानाह- दूरादामन्त्रणे प्रश्ने प्रश्नाख्याने च भर्त्सने । सम्मत्यसूयाकोपादौ यथायोगं स्वराः प्लुताः॥८॥ 'दूरादामन्त्रणे' इति । योगाः-सूत्राणि, योगानामनतिक्रमेण यथायोगं स्वराः प्लुताः स्युः । सप्तमा-२५ ध्यायपर्यन्तप्रोक्तसूत्रानुसारेण स्वराः प्लुता भवन्तीति भावः । तथाहि-दूरामत्रणे इति । अत्र सूत्रम्-"दूरादामन्यस्य गुरुवैकोऽनन्त्योऽपि लन्त्" । सि० ७।४।९९] यत्र प्राक- तात् प्रयत्नात् प्रयत्नविशेषे आश्रीयमाणे सन्देहो भवति, अयं श्रोष्यति न वेति, तरम् । वाक्यस्य यः खरेष्वन्त्यःस्वरो दूरादामन्त्र्यस्य पदस्य सम्बन्धी गुरुर्वानन्त्योऽपि ऋकारवर्जितः स्वरो लकारश्चैको दूरादामन्त्र्यस्यैव सम्बन्धी स प्लुतो वा स्यात् । आगच्छ भो माणवकपिलक ३ । आगच्छ भो देवदत्त-३० ३ । पक्षे प्लुतरहितं रूपं सर्वत्र वा वचने ज्ञेयम् । आगच्छ भो इन्द्रभूते ३, आगच्छ भो क्लुप्तशिख- ३ पक्षे प्राग्वत् । 'गुरुवैकोऽनन्त्योऽपि लनृत्' । सक्तून् पिव दे ३ वदत्त, पक्षे० । आगच्छ दे३वदत्त, । अनृदित्यत्र हस्खऋकारवर्जनात् दीर्घऋकारोऽनन्त्यः प्लुतः स्यात्-आगच्छ भो ऋ३पम २ । लकारस्त्वनन्त्यः प्रतः स्यात-आगच्छ भो क्ल३प्तशिख २ । महाविभाषयैव प्लुतविकल्पे सिद्धे वाग्रहणं ३५ पक्षे ..

८ महामहोपाध्यायश्नीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- न विकल्पार्थ कित्वन्यप्लुतेन सह गुरोरसमावेशार्थम् , तेन कुश्प्तशिख३ इति न भवति । दूरादिति किम् । शृणु देवदत्त । आमन्न्यस्येति किम् ? आगच्छतु देवदत्तः । प्रधाने कार्यसप्रत्ययाद्रिह न भवति आगछ मो माणवकपिलक३, अन माणवेति कपिलक इत्यस्य विशेषणमित्यवधानता ततोऽस्य न प्लुतत्वम् । गुरुरिति किम् । अनन्त्यस्य लघोर्माभूत् । एक इति किम् १ अनेकस्य गुरोयौंगपद्येन मा भूत् । अन- ५न्योऽपीति किम् ? अन्त्यस्यैत्र मा भूत् । लकारग्रहणमनृद्रिति प्रतिपेनिवृत्त्यर्थम् । अथ ऋतः प्रति- पेथे लकारस्य कः प्रसङ्ग. उच्यते-'इदमेव ज्ञापकम्-वर्णग्रहणे लवर्णस्यापि ग्रहण भवतीति । तेना- चीकृपदित्यादी स्वर्णकार्य लवर्णस्यापि सिद्ध भवति । अदिति किम् ? कृष्णमिस्त्र कृष्णमित्र ३ । अदिति गुरुर्विशिष्यते न स्वरेष्वन्यस्तेनेहापि भवति-आगच्छ भोः कर्तृ ३, आगच्छ भोः कर्तु । वाक्यस्य स्वरेप्पत्याप्लुतः इत्यनुवृत्तेरिह न भवति-देवदत्त अहो आगच्छ [बृहद्वृत्तावयं विशेपः । १० अभिपूजितेऽपि दूरादामव्यस्यैव प्लुत इष्यत इति अभिपूजिते चेति नारम्भणीयम् । शोमनः सल्वसि माणवक३ शोभन: सल्वसि माणवक] अनायं विशेष:-"हेहेष्वेषामेव" सि० ७४११००] दूरादामन्न्यस्य सम्बन्धिनौ यो हेहैशब्दौ- कौ च तो ? यौ तदामन्त्रणे वर्तेते-तयोः प्रयुज्यमानयो:-तयोरेव वाक्ये यत्रतत्रस्थयोरन्यास्वरः लुतो वा स्यात् । हे३ देवदत्त आगच्छ । आगच्छ हे३ देवदत्त । आगच्छ देवदत्त हे३ । एवं हैशब्दप्रयो- १५गेऽपि । रेहेष्वित्यवधारणस्य विषयार्थम् । एपामिति स्थानिनिर्देशार्थम् । बहुवचन ‘ह इ हे, ह ए है' इति ': लाक्षणिफयोरपि परिग्रहार्थम् । एवकारोऽन्यस्य प्लुतत्वव्युदासार्थः । अत एव चैवकारायत्रतत्रस्थयोः प्लुतो विज्ञायते । प्रश्ने प्रश्नाख्याने चेति, अन सूत्रम् । “प्रश्ने च प्रतिमदम्" [सि० ७४१९८] प्रश्ने चका- रात् प्रश्नाख्याने वर्तमानस्य वाक्यस्य सम्बन्धिनः पदस्य स्वरेष्वन्त्यःस्वरः प्लुतो वा स्यात् । अगमः ३ २० पूर्वा ३ न मामा ३ न मैत्र ३ । पक्षे प्लुताभावः सर्वत्र । प्रश्नाख्याने अगम ३म् पूर्वा ३ न् ग्रामा ३ न ' पैन ३, पक्षे प्लुताभाव. । प्रने चेति किम् ? देवदत्त ग्राम गच्छ । प्रतिपदमिति किम् ? वाक्यस्मैवान्त्यः स्वरः प्लुतो भाभूत् । अनायं विशेपः । "हे प्रश्नाख्याने" [सि०७।४।९७] प्रश्नस्याख्याने पृष्टप्रतिवचने वर्तमानस्य पाक्यस्य स्वरेवन्त्य.स्वरो हिशब्दसम्बन्धी प्लुतो वा स्यात् । अकार्षीः कट देवदत्त ? अकापं हि ३ २५अकादं हि । हेरिति किम् ? अकार्षीः क्ट चैत्र? करोमि ननु । प्रश्नग्रहण किम् ? कट देवदत्ताकार्ष हि, अप्रभपूर्वके आरयाने न भवति । आरयानग्रहण किम् ? देवदत्त क्टमकापीर्हि । "प्रभे च प्रतिप्रदम्" इति सूत्रेण सिद्धे नियमाथं वचनम् , हे प्रश्नाख्याने एव, वाक्यस्वरेष्वन्य एव प्लुत, इति च । रिभ । "प्रश्ना_विचारे च सन्धेयसन्ध्यक्षरस्यादिदुत्परः" [सि० ७४।१०२ ] सन्धेयः सन्धियोग्यः यः पचित् स्वरे परे विकारमापद्यते । प्रमेऽर्चाया विचारे प्रत्यभिवादे च वर्तमानस्य ३० याक्यस्य सम्बन्धिनः स्वरेप्वन्त्यस्वरस सन्धेयसन्ध्यक्षरस्य प्लुतो भवन् आकार इदुत्परः प्लुतो भवति, - स प प्रत्यासत्या प्रकारेकारयोरिवारपरः, ओगारीकारयोरकारपरो भवति । प्रश्ने अगमः ३ पूर्वा ३ न प्रामा ३ नप्रिभूवा ३ ६ । अदास्तस्मा ३ इ । अपचा ३ । पटा ३ उ । अहोपी ३ रमा ३ उ । "प्रमेय प्रतिपदमि"ति शुनः । अर्चा पूजा तम्या "दूरादामश्यस्यै"ति प्लुतः । शोभनः पल्वसि अमिभूता ३३ । प्रटा ३ उ । विचारे, यमव्य बि निर्मन्यम्य सागारिका३६ उतानगारिका३३ । प्रत्यभिवादे १५ आयुष्मानधि अमिभूना ३ ३ । पटा ३ उ । आयुष्मन्ती भूयासा पैनमैना ३ उ । प्रभा विचारे चेति प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः स्वरसंज्ञाः । लुतप्रकरणम् किम् ? आगच्छ भो अग्निभूते ३ । सन्धेयग्रहणं किम् ? क्वचित् ३ कुशल ३ म् भवत्योः ३ कन्ये ३ । अगमः ३ पूर्वा ३ न् ग्रामा ३ नहो ३ भद्रकासि गौः ३ । आयुष्मानेधि भोः ३ । सन्ध्यक्षरस्येति किम् ? भद्रिकासि कुमारि ३ । वाक्यस्य स्वरेष्वन्त्यस्वर इति विज्ञानादिह न भवति । अगमः३ पूर्वी ३ ग्रामौ ३ देवदत्त ३। "तयोचौं स्वरे संहितायाम्" [सि०७४।१०३ ] तयोः प्लुताकारात्परयोरिदुतोः स्थाने स्वरे५ परे संहितायां विपये यथासङ्ख्यं यकारवकारावादेशौ भवतः । अविरामः संहिता । अगमः३अग्निभूता- ३ यत्रागच्छ । अगमः३अग्निभूता३यिहागच्छ । अगमः३पटा३वत्रागच्छ । अगमः३पटा३ वुदक- मानय । खे दीर्घत्वस्य अस्खे स्वरे हस्वत्वस्य वाधनाथ वचनम् । स्वर इति किम् ? अग्ना३३ । पटा ३ उ । संहितायां इति किम् ? अना३३ इन्द्रं । पटा३उ उदकम् । अग्ना३इ अत्र । पटा३उ अन्न । केचिदौतोश्चतुर्मानं प्लुतमिच्छन्ति । ऐ४ तिकायन औ४ पगव । १० भर्त्सने इति । अत्र सूत्रम् “भर्सने पर्यायेण” [सि० ७।४।९०] भर्त्सनं कोपेन दण्डाविष्क- रणम्, तत्र द्विर्वचनं 'सम्मत्यसूया०' इत्यादि सूत्रेण सिद्धमेव, प्लुतार्थ आरम्भः । भर्सने वर्तमानस्य वाक्यस्य यदामध्यं पदं तद्विरुच्यते । तत्र पर्यायेण पूर्वस्यामुत्तरस्यां वोक्तौ स्वरेष्वन्त्यःस्वरः प्लुतो वा भवति । चौर ३ चौर, चौर चौर ३ घातयिष्यामि त्वां, पक्षे प्लुतरहितं रूपम् । अनायं विशेषः । “त्यादेः साकाङ्क्षस्याङ्गेन" [सि० ७।४।९१ ] वाक्यस्य स्वरेण्वन्त्यः प्लुतो १५ वेत्यनुवर्तते भर्सने इति च । भर्त्सने वर्तमानस्य वाक्यस्य स्वरेष्वन्त्यः स्वरस्त्याद्यन्तस्य पदस्य वाक्या- न्तराकाढस्य अङ्ग इत्यनेन निपातेन युक्तस्य सम्बन्धी प्लुतो वा भवति । अङ्गकूज ३ इदानी ज्ञास्यसि नाल्म, पक्षे अङ्गकूज० । अङ्ग व्याहर ३ इदानीं ज्ञास्यसि जाल्म, पक्षे अङ्ग व्याहर० । त्यादेरिति किम् ? अङ्ग देवदत्त मिथ्या वदसि । साकाङ्क्षस्येति किम् ? अङ्ग पच, नैतदपरमाकाङ्क्षति । अङ्गेनेति किम् ? देवदत्त कूज इदानी ज्ञास्यसि । भर्त्सने इत्येव अङ्गाधीष्व मोदकं ते दास्यामि । अस्यापरोऽयं विशेषः । "क्षियाशी प्रेषे” [सि० ७४।९२] क्षिया आचारभ्रेपः, आशी: प्रार्थनाविशेषः, |पोऽसत्कारपूर्विका व्यापारणा, एतेषु वर्तमानस्य वाक्यस्य स्वरेवन्त्यःस्वरस्त्याद्यन्तस्य पदस्य वाक्यान्तराकाङ्क्षस्य सम्बन्धी प्लुतो वा भवति । क्षियायां, स्वयं ह रथेन याति ३ उपाध्यायं पदाति गमयति, पक्षे० । आशिपि, पुत्रांश्च लप्सीप्ठाः ३ धनं च तात, पक्षे० । प्रैपे, त्वं ह पूर्व प्रामं गच्छ ३ चैनो दक्षिणं, पक्षे० । त्यादेरित्येव, भवता खलु कटः कर्त्तव्यः ग्रामश्च गन्तव्यः । साकाङ्क्षस्येत्येव, २५ दीर्घ ते आयुरस्तु । सम्मत्यसयेत्यादि । अत्र सूत्रम्-"सम्मत्यसूयाकोपकुत्सनेष्वाधामन्त्र्यमादौ स्वरे-, वन्त्यश्च प्लुतः" [सि० ७।४।८९] कार्येष्वाभिमत्यं सम्मतिः पूजनं वा, परगुणासहनमसूया, कोपः क्रोधः, कुत्सनं निन्दा, एते प्रयोक्तृधर्मा नाभिधेयधर्माः, एतेष्वर्थेषु वर्तमानस्य वाक्यस्यादिभूतमामव्य- ममित्रणीयार्थं पदं द्विरुच्यते, तन द्विर्वचने आदौ पूर्वोक्तौ स्वरेपु स्वराणां मध्ये योऽन्त्यस्वरः स प्लुतों ३० या भवति । सम्मत्यसूयाकोपकुत्सनेष्विति वहुवचनात् द्विवचने विकल्पो न सम्वध्यते । सम्मतौ; माणवक ३ माणवक, अभिरूपक ३ अभिरूपक शोभनः खल्वसि । असूयायां; माणवक ३ माणवक । कोपे; अविनीतक ३ अविनीतक इदानीं ज्ञास्यसि जाल्म । कुत्सने; शक्तिके ३ शक्तिके यष्टिके ३ यष्टि के रिक्ता ते शक्तिः । सम्मत्यादिष्विति किम् ? देवदत्त गामभ्याज शुक्लां दण्डेन । आदीति किम् ? शोभनः खल्वसि माणवक । आमन्त्र्यमिति किम् ? उदारो देवदत्तः । आदाविति किम् ?३५ है. प्रका० पूर्वा० २ २० १० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- उत्तरोक्तौ मा भूत् । खरेविति किम् ? व्यञ्जनान्तस्यापि यथा स्यात् । अन्य इति किम् ? आदिमध्यो वा मा भूत् । कारिकायां कोपादावित्यत्रादिशब्दग्रहणात्- "चितीवार्थे” [सि० ७।४।९३ ] इवार्थे उपमायां चिदिति निपाते प्रयुज्यमाने वाक्यस्य स्वरे- ५प्यन्त्यः खरः प्लुतो वा स्यात् ; अग्निश्चिद्भाया ३ त् राजाचिद्भाया ३ त् अभिरिव राजेवेत्यर्थः । चितीति किम् ? अमिरिव भायात् । चितीति रूपसत्ताश्रयणादप्रयोगे न भवति, अग्निर्माणवको भायात् । इवार्थ इति किम् ? कर्णवेष्टकांश्चित्कारय कर्णवेष्टकानेवेत्यर्थः । कथञ्चिदाहुः कृच्छ्रेणाहुरित्यर्थः । "प्रतिश्रवणनिगृह्यानुयोगे”[सि० ७१४१९४ ] प्रतिश्रवणं परोक्तस्याभ्युपगमः स्वयंप्रतिज्ञानं श्रवणाभिमुख्यं च; निगृह्य स्वमतात्पच्याव्यानुयोगो निग्रहपदस्याविष्करणं निगृह्यानुयोग उपालम्भ इति १० यावत् ; एतयोर्वर्तमानस्य वाक्यस्य स्वरेष्वन्त्यः स्वरः प्लुतो वा भवति । अभ्युपगमे, गां मे देहि भोः! हन्त ते ददामि ३ हन्त ते ददामि । स्वयंप्रतिज्ञाने, नित्यः शब्दो भवितुमर्हति३ पक्षे० । श्रवणाभि- मुख्ये, भो देवदत्त किं मार्प ३, पक्षे० । माति श्रवणाभिमुख्यद्योतको निपातः । निगृह्यानुयोगे, अद्य श्राद्धमित्यात्थ ३, प० । अद्य श्राद्धति घादी युक्त्या स्वमतात्प्रच्याव्यैवमुपालभ्यते ॥ "विचारे पूर्वस्य" [सि० ७४.९५ ]। किमिदं स्यात् किमिति निरूपणं विचारः संशय इति यावत्। १५ तस्मिन्विपये संशय्यमानस्य यत्पूर्व तस्यान्त्यावरः प्लुतो वा स्यात् । अहिर्नु३ रज्जुर्नु । अहिर्नु रजुर्नु ।। "ओमा मारम्भे' [सि० ७।४।९६ ] 1 प्रणामादेरभ्यादाने वर्तमानस्य ओमशब्दस्यान्त्यावर। सुतो या भवति । ओ३म् ऋपमं पवित्रम्, ओम् ऋपमं पचित्रम् । एवं ओ३म् ऋपभमुपभगामिनं प्रणमत । ओ३म् अमिमीले पुरोहितम् । प्रारम्भ इति किम् ? ओम् ददामि, ओमत्राभ्युपगमे ।। "अस्त्रीशद्रे प्रत्यभिवादे भोगोत्रनाम्नो वा"[सि०७४४।१०१] । यदभिवाद्यमानो गुरुः २० फुसलानुयोगेनाशिपा वा युक्त वाक्यं प्रयुङ्क्ते स प्रत्यभिवादस्तस्मिन्नस्त्रीशद्रविपये वर्त्तमानस्य वाक्यस्य स्वरेवन्यासरो भोःशब्दस्य गोत्रस्य नानो वा आमन्त्र्यस्य संवन्धी प्लुतो वा भवति । अभिवादये देवदत्तोऽहं भोः, आयुप्मानेधि भोः३ आयुष्मानेधि भोः आयुष्मानेधि देवदत्त भोः ३ ! गोत्र, अभि- पादये गाग्योऽहं मोः! कुशल्यसि गाय ३ । राजन्यविशारपि गोत्रत्वमेव । अभिवादयेऽहमिन्द्रवर्मा भो!! आयुष्मानेधीन्द्रवर्मन् ३ । अभिवादये इन्द्रपालितोऽहं मोः! आयुष्मानेधीन्द्रपालित ३ । नाम, २५ अभिवादये देवदत्तोऽहं भोः, आयुष्मानेधि देवदत्त३, पक्षे सर्वत्र प्लुताभावः । स्त्रीशूद्रवर्जनं किम् । अभिवादये गार्यहं मोः, आयुष्मती भव गार्गि । अभियादये तुपजकोऽहं भोः, आयुष्मानेधि कुशल्यसि 'सुपजक, नात्र तुतः । प्रत्यभिवादे इति किम् ? अभिवादयेऽहं भोः, आयुष्मानेधि स्थालि ३, अभिवा- दयिताह, खरफुटीयन्न ममेकारान्ता संज्ञा, का तर्हि, दण्डिवत्रकारान्ता, पुनर्गुरुराह, आयुष्मानेधि स्थालिन् , स पुनराह, ईकारान्तेव मम संज्ञा, स प्रत्युच्यते, असूयकस्त्वमसि जाल्म, न प्रत्यभिवाद- ३० मईसि, भियस पलस्थालि । भोगोत्रनाम्न इति किम् ? देवदत्त कुशल्यसि । एवं लुतप्रकरणं यथाशास्त्रं निरूपितम् । शासान्तराण्यनुस्मृत्य विधोपः शेष उयताम् ।। १ ।। सारखतप्रक्रियायां दूरावादाने गाने रोदने यिपारे प है तो भवती"त्युक्तम् । टिरिति ३५ समास्यस्परादेः शन्दस्य संज्ञा ॥ ८॥ स्वराणामेव प्रतिभेदानाद- . -- .

प्रक्रियावृत्तिरूपे थीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । स्वरप्रतिभेदाः । संज्ञाविशेषाः ११ -- स चैकैकस्त्रियोदात्तोऽनुदात्तः स्त्ररितोऽपि च । पोढा च सानुनासिकनिरनुनासिका इति ॥९॥ स चैकैक इति । उदात्तानुदात्तस्वरितभेदाच्च स एकैको ह्रखो दीर्घः प्लुतश्च त्रिधा त्रित्रिभेदो भवति, पोढा चेति स एव चैकैकः पोढा भवति कथमित्याह, सानुनासिकनिरनुनासिका इति, त्रयो भेदाः सानु- नासिकालयो भेदा निरनुनासिका इति । यथा ह्रस्व उदात्तः सानुनासिकः १, हस्खोऽनुदात्तः सानुना-५ सिकः २, हवः खरितः सानुनासिकः ३, इख उदात्तो निरनुनासिकः ४, हस्खोऽनुदात्तो निरनुनासिक ५, ह्रस्वः स्वरितो निरनुनासिकश्चेति ६ । एवं दीर्घः६प्लुतो६पीत्यष्टादश ॥ ९॥ अथ प्रसङ्गत उदात्तादीनां लक्षणान्याह- उच्चैनीचैः समवृत्त्योचार्यमाणाः स्वराः क्रमात् । उदात्ताश्चानुदात्ताश्च स्वरिताश्च भवन्त्यमी ॥ १० ॥ उच्चैरिति स्पष्टम् , अयमभिप्रायः, ताल्वादिपु सभागेपु ऊर्श्वभागे निष्पन्नः स्वर उदात्तसंज्ञः स्यात्, यथा आयः । नीचैरनुदात्तः, यथा अछि । उदात्तत्वानुदात्तत्वे वर्णधर्मों समाहियेते यस्मिन् स स्वरितः, यथा 'कवोश्वाः' इत्यादि, अत्र क इत्यस्यादितोर्धमुदात्तमुत्तरार्धं त्वनुदात्तमिति सिद्धान्तकौमुद्याम् ॥ १० ॥ सानुनासिकनिरनुनासिकलक्षणमाह- मुखनासोचार्यमाणो वर्णः सात्सानुनासिकः । १५ मुखेनैवोचार्यमाणः ख्यातो निरनुनासिकः ॥ ११ ॥ मुखनासेति कण्ठ्यम् । केवलं, नासिकामनुगतो यो वर्णधर्मः सोऽनुनासिकस्तेन सह वर्तमानः सानुनासिकः । निःक्रान्तोऽनुनासिकान्निरनुनासिक इति । वर्णशब्देन च स्वरा व्यञ्जनानि चेत्युभय- मप्युच्यते ततश्च स्वराः सर्वेऽपि द्विधा भवन्ति, व्यञ्जनेष्वपि यलवा द्विधा भवन्ति । उनणनमाश्च सानुनासिका एवेत्यत्र वर्णग्रहणम् ।। ११ ॥ अथ स्वराणां भेदसङ्कलनामाह- प्रत्येकमित्यवर्णाद्याः पञ्चाटादशधा स्मृताः। सन्ध्यक्षरं द्वादशधा हवपझेदवर्जितम् ॥ १२ ॥ अ इ उ मल पञ्चापि प्रत्येकमष्टादशभेदास्ततश्च समानानां नवतिर्भदा भवन्ति । ए ऐ ओ औ एतानि सन्ध्यक्षराणि च प्रत्येकं द्वादशविधानि कुत इत्याह, हस्वपड्भेदवर्जितमिति, एपां हस्खा न सन्ति इति हस्खसम्बन्धिनः पड्भेदा अत्र न गण्यन्ते इति सन्ध्यक्षाणार्मष्टचत्वारिंशद्भेदाः । सर्वे च सङ्क-२५ लिताः स्वरभेदा अष्टात्रिंशंशतं भवन्तीति तत्त्वम् ।। १२ ।। अत्रैव मतान्तरमाह- दीर्घपझेदवर्जितलकारोऽपि द्वादशधेति पाणिनीयाः- दीर्घति फक्किका स्पष्टा । पाणिनीया हि लकारं दीर्घ न मन्यन्ते ततश्च तन्मते दीर्घलकारपद्मेदवर्जने चतुरशीतिः समानानां भेदा भवन्ति, द्वात्रिंशंशतं सर्वे स्वरभेदा भवन्ति इति भावः । अथ प्रकृत- स्वराणामेव संज्ञाविशेषानाह- अनवर्णा नामी ॥ ५॥ [सि०-१११६] न विद्यतेऽवर्णों येपुते अनवर्णाः "अन् स्वरे" इति नबोऽनादेशो, अनवर्ण १-३ "अत आः स्यादी." "समानानां०" "सोरु" अनवर्णाः। 'णमं प्रवत्वे शन्दे' णम्, "पाठे धात्वादेर्णो नः", नमनं नामः, "भा-३३ २० १२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- वाकों"पञ्प्रत्ययः "णिति” इत्युपान्यवृद्धौ नामः, नामोऽस्यास्तीति नामी-"अतोऽनेकखराद्” इति इनमत्ययः, "अवर्णेवर्णस्यै"ति अलोपे नामिन् १-१, "इन्हन्पूपार्यम्णः शिष्योरि"ति दीर्घ "नानो नोऽनहः” इति नलोपे “अवर्णभोभगोऽयोलुंगसन्धिरि"ति रुलोपे; अनवर्णा नामी । द्विप० । ननु संज्ञिसामानाधिकरण्येन संज्ञानिर्देशे सति "औदन्ताः स्वरा" इत्यादिवन्नामीत्यत्र वहुवचनं युज्यते, सत्यं, ५वचनभेदेन संज्ञां कुर्वन्ने बोधयति, यत्र नामिनः कार्य विधीयते तत्र कार्याद्यदि कार्यों स्वरो न्यूनो भवति तदा नामिसंज्ञा प्रवर्तते, तेन ग्लायतीत्यादौ न गुणः, अत एव तत्राह-"ऐकारोपदेशवलान्नामि- त्वाभावाद्गुणाभाव" इति, अन्यत्र तु सेपु सुहेपु गोपु ग्लौषु इत्यादौ नामिसंज्ञा भवत्येव ॥ ५ ॥ अवर्णवर्जिताश्चैते स्वरा द्वादश नामिनः । अवर्णवर्जिताश्चेति कारिकाद्धं स्पष्टम् । लृदन्ताः समानाः ॥६॥ [सि०-११११७] लुत् अन्ते येषां ते लुदन्त, १-३, "अत आ: स्या." "समानानां." "सोरुः" "र: पदान्ते।" लूदन्ताः । समानं तुल्यं मानं परिमाणं येषां ते "समानस्य धर्मादिषु" इति सूत्रेण समानस्य सभावे समान, १-३, प्राग्वत् समानाः । द्विप० ।। ६ ।। लकारान्ता अकाराद्याः समानाख्याः स्वरा दश ॥ १३॥ १५ लुकारान्ता इति श्लोकाद्धं सुगमम् , केवलं लुकारान्ता इत्युक्ते किमादय इत्याकाहायां आह] अका. राद्या इति ।। १३ ॥ ए ऐ ओ औ सन्ध्यक्षरम् ॥ ७॥ [सि०-१।११८] एर ऐश्च ओश्च औश्च "चार्य द्वन्द्वः सहोक्तौ" इति द्वन्द्वसमासे ए ऐ ओ औ, सूत्रत्वाल्लोपः । सम्पूर्वक 'दुधांग्क धारणे' धा, सन्धान सन्धिः "उपसर्गाहः किरिति इप्रत्ययः “इडेपुसि चातो लुक्" इत्या- २०लुकि सन्धिः, 'क्षर संचलने न क्षरति नि] चलति प्रधानत्वात् इत्यक्षरं "अच्” इति अप्रत्ययः, सन्धा. वक्षरं सन्ध्यक्षरं १-१ "अतः स्यमोऽम्", "समानादमोत." इत्यकारलोपे ए ऐ ओ औ सन्ध्यक्षरम् । द्विपदं सूरम् । सन्धिना वर्णसन्धानेन जातानि अक्षराणि सन्ध्यक्षराणि यतः, अवर्णेवर्णसन्धौ एकारः, अवर्णकारसन्धावकारः अवर्णोवर्णसन्यायोकारः अवर्णीकारसन्यावाकारः ॥ ७ ॥ सन्ध्यक्षराख्याचत्वार ए ऐ ओ औ इमे स्वराः । सन्ध्यक्षाप्याश्चत्वार इति शोकाई कण्ठ्यम् । एवमेभिः सूत्रः स्वराणां संज्ञाः सम्पूर्णा इति भावः । वर्णविशेपसंज्ञामाह- अं अः अनुखारविसम्र्गों ॥८॥ [सि०-१।११९] अंप अश्व अंश:१-२, सूरत्याहोपः । अनुपूर्वक 'और शब्दोपतापयोः' अनुवर्यते संलीनमुथार्यते इति, "भावकों पञ् अप्रत्ययः "नामिनोऽफलिहलेः" इति वृद्धौ अनुस्वारः । विपूर्वक 'सृजत् विसर्गे' ३० विद्यम्यते इति "व्यसनापम्" अप"तऽनिटश्चजोः कगो घिति" इति जम्य गत्वे "लयोरुपान्त्यस्य" इति गुगे "हदिईम्परस्यानु नवा" इति गस्य द्विवे विसर्गः। अनुस्वारश्च विसर्गश्च "चार्थे द्वन्द्व०" इति समासे 'ऐकाय' इति विमछिटुपि 'दत्तार्यानामप्रयोग' इति चलोपे अनुस्वारविसर्ग, १-२-"ऐदोत् सन्ध्यक्षः" इति भोये, अ अनुस्वारविसगों । द्विपदं सूरम् । बिन्दुमानाभिव्यख्यो नासिक्यो यर्ण- -प्रक्रियावृतिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । व्यञ्जनसंज्ञाः. १३ विशेषोऽनुस्वारः, केवलविन्दुव्याभिव्यङ्ग्यः कण्ठ्यो वर्णविशेपो विसर्गः। घटाधमत्रं विना जलमि- वैतावपि स्वरोपधानं विना दुरुच्चारौ, इकाराद्युपधानसम्भवेऽपि अकारस्यैव प्राथम्येन प्राधान्यादकाराति- क्रमे हेत्वभावाच अकारावेवात्र सूत्रे उपहितौ ।। ८ ।। एतत्सर्व मनसिकृय श्लोकार्द्धमाह- अकारावेतयोर्मध्ये सुखोचारणहेतुको ।। १४ ॥ अकाराविति स्पष्टम् ।। १४ ।। वर्णविशेषाणामेव संज्ञामाह- कादिय॑ञ्जनम् ॥ ९॥ [सि०-११।१०] क आदिर्यस्यासौ कादिस् , १-१-"सोरुः" कादिर्, विपूर्वक 'अञ्जोप् व्यतिम्रक्षणकान्तिगतियु' अधातुः, व्यज्यते अर्थोऽनेनेति "करणाधारे" इत्यनद, "नां धुड्वर्गेऽन्योऽपदान्ते' इति नत्य अत्वे व्यञ्जन१-१-"अतः स्वमोऽम्" सेरम् कादिय॑ञ्जनम् । द्विपदं सूत्रम् । यथौदनादीनां नानास्वादाभिव्यञ्ज- कत्वेन दधिसूपझाकादि व्यञ्जनमभिधीयते तथैतान्यपि स्वरोपहितानि नानार्थाभिव्यञ्जकानीति व्यञ्जनान्यु-१० च्यन्ते, यथा अ अ इत्यकारद्वये विहिते न काचित्प्रकृतार्यव्यक्तिस्तत्रैव च वकारटकारयोगे भवत्यर्थाभि- व्यक्तिर्षट इति, तत्रैव पकारटकारयोगे पट इति । कादिरित्यत्र सामीप्यव्यवस्थाप्रकारावयवादिवृत्तिर- प्यादिशब्दोऽवयववृत्तियः, । ककार आदिरवयवो यस्य वर्णसमुदायस्य स कादिः, अत एवेह तद्गुण- संविज्ञानो बहुव्रीहिः । कस्यादिः कादिरिति व्याल्याने व्यवस्थावाच्योऽध्यादिशब्दः, तेन स्वराणां न व्यञ्जनसंज्ञा, अनुस्वारविसर्गयोन्तु भवति; ततोऽनुस्वारस्य व्यञ्जनसंज्ञायां संस्कर्तेत्यत्र "सटि समः' इत्यनेन सकारभवनेऽनुस्वाररूपव्यञ्जनात्परस्य 'धुटो धुटि स्खे वा' इत्यनेन स्लुक् सिद्धः, विसर्गस्य तु व्यञ्जनत्वे सुपूर्वस्व दुःखायते किपि णिलुकि सेव लुकि "पदस्य" इति विसर्गरूपसंयोगान्तस्थस्य खस्य लुसिद्धस्ततश्च प्रागुक्तव्याख्यानेन विसर्गस्य "अपञ्चमान्तस्यो घुट्" इति धुट्वे "धुटस्तृतीय" इति स्यान्यासन्नगत्वे च सुदुगिति सिद्धम् ।। ९ ।। अत्र कारिकार्द्धम्- व्यञ्जनाख्यास्त्रयस्त्रिंशद्वर्णा हान्ताच कादयः । क ख ग घ ङ १ च छ ज झ ज २ ट ठ ड ढ ण ३ त थ द ध न ४ प फ ब भ म ५ य र ल व श प स ह । व्यञ्जनाल्या इति । च भिन्नक्रमः पूर्वसमुच्चये । कादयश्च त्रयस्त्रिंशद्वर्णाः, व्यञ्जनं आख्या येषां ते व्यजनसंज्ञा भवन्ति । किम्पर्यन्ता इत्याकादायामाह हान्ता इति । एतान्यपि केवलानि दुरुचाराणि इति प्रागुक्तन्यायेन अकारोपहितानि पश्यन्ते, अकारश्च कार्यकाले जलामत्रवत् स्वतो निवर्तत इति । अथ व्यसनानां संज्ञाविशेपानाह, तत्रापि वर्गादिसंनाज्ञानं विना वक्ष्यमागधुढादिसंजोपयोगि- वर्गपञ्चमादिज्ञानं न त्यादिति सूत्रक्रममुल्य प्रथमं वर्गादिसंबामाह- पञ्चको वर्गः ॥ १०॥[सि०-१।१।१२] पञ्चनशब्दान् पश्चेति संख्या मानमन्य "संच्याटतेश्चाशत्तिष्टेः कः" इति कन्यये "नामसिदयव्य जने' इति पदसंज्ञायां नानो नोऽनः" इति नलोपे पथक, १-१, म्, "मोनः" २ । 'गद व गृयानु:३० प्रियते बहुभिरामचते "गन्यमिरन्यजिगदि" इति गे "नामिनी गुणोऽशिनि दनि गुणे "दादा"नि द्वित्व वर्ग, १-१, न् , मोलः" "र: पदान्ने"। "चोपयनीति चे "अवयवादिना आचे पथ्यको वर्ग: । द्विपदमिदं सूत्रम् । श्रीदिः संपन्न श्यादियहर्ग इस्त्र जानायकवचनं शेन वीमा लायते ॥ १० ॥ अन कामिका--- २० - ।

महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहेमलघु- मान्तेपु कादिवर्णेपु कचटतपसंज्ञकाः ॥१५॥ पञ्चभिः पञ्चभिर्वर्गवर्गाः पञ्च प्रकीर्तिताः । मान्तेप्विति । कादिपु मपर्यन्तेपु पञ्चविंशतो वर्णेषु पञ्चभिः पञ्चभिर्वणः क च ट त प संशकाः पश्च वर्गा भवन्ति ॥ १५ ॥ अयं भावः, अन घर्णपञ्चविंशतौ प्रथमे पञ्च घर्णाः कवर्गसंज्ञास्ततः परे ५पञ्च चवर्गसज्ञाखतः परे पञ्च दवर्गसज्ञास्ततः परे पश्च तवर्गसंज्ञास्ततःपरे पश्च पवर्गसज्ञा इति । यरलवा अन्तस्थाः ॥ ११॥ [सि०-१११११५] यश्च रश्च लश्च वश्व यरलव, १-३-"अत आः स्यादौ०” “समानानां०" "सोरुः” । अन्तस्था १-३ "समानानां." "सोरुः" "r: पदान्ते." । मध्ये 'रोय:' "स्वरे वा” यस्य लुक् । यरलवा अन्तस्थाः । द्विपदं सूत्रम् । सूनस्यातिस्पष्टत्वादत्र कारिका नास्ति । अन्तस्थाशब्दो बाहुलकात् स्त्रीलिङ्गः, अन्यथा १० शिधु-शब्दवद्विपयनामत्वात्पुंस्त्वं स्यात् 'मानगुमाद्रिविपयाशुगशोणमास' (पुं० ३३) इति लिङ्गानु- शासनवचनात् । यरलवा इत्यत्र वहुवचनं सानुनासिकादिभेदपरिग्रहार्थम् ॥ ११ ॥ अपञ्चमान्तस्थो धुद ॥ १२॥ [सि०-१।१।११] पश्चन्दशब्दात् "नो मट्" इति मप्रत्ययः, "नामसि." इति पदसज्ञायां "नानो नो०" इति नलोपे घ पञ्चमः । अन्तस्था १-३-'टा गतिनिवृत्ती' छाधातुः, "प. सोऽध्यैष्टिवष्वष्कः" इति पः सः 'निमिचा- १५भावे नैमित्तिकस्याप्यभाव' इति ठस्य थत्वे स्था, अन्ते तिष्ठन्ति इति अन्तस्थाः "स्थापास्नानः कः" इति धमत्ययः "इडेन्युसि०" इत्यालुरु "आत्" इत्यापि अन्तस्थाः । पश्चमांच अन्तस्थाय पश्चमान्तस्थाः, न विद्यन्ते पञ्चमान्तस्था यत्र "गोश्वान्ते.” इति इखः, "नमत्" इति नस्य अः, अपञ्चमान्तस्य १-१. "सोरः" । धुक्षि विक्षि संदीपने' धुझ्धातुः धुक्षते इति धुद, किप्प्रत्ययः, १-१ "दीर्घडयाबि"ति सिलुर, "अप्रयोगीत्" किल्लोपः "संयोगस्यादौ स्कोर्द्धग्" इति क्लुरु, "धुटस्तृतीयः" इति पस्य २०१: "विरामे वा" डस्य टः, "घोपपति" रो उ: "अवर्णस्ये." ओ, अपश्चमान्तस्थो धुट् । द्विपदमिदं सूनम् ॥ १२॥ अवर्गपश्चमान्तस्यास्ते चतुर्विशति(टः॥ १६ ॥ फस ग घ च छ ज झ । ड। त थ द ध। पफषभरा प स ह । वर्गेषु पत्रमा वर्गपञ्चमाः । वर्गाणां पञ्चमा इति पटोवरपुरुषस्तु "तृप्तार्थपूरणाव्ययात्राशनानो"ति निधान भवति । ततध, पर्गपञ्चमाय अन्तस्थाश्च धर्गपञ्चमान्वस्थाः, न विद्यन्ते वर्गपञ्चमान्तस्था येपु ते अयापनमान्तस्थाः । घर्गपञ्चमाः पञ्च, हुमणनमा इति, अन्तस्थाश्च चवस्रो, यरलया इति, एभिनयभिनिताले पूर्वोत्तात्रयसिंशयशनाख्याश्चतुर्विंशति(टो घुसज्ञा भवन्तीति भावः ॥ १६ ॥ आद्यद्वितीयशपसा अघोपाः ॥ १३ ॥ [सि०-११।१३ ] आप० । आपूर्वक 'इदांगर दाने' आदीयत इति "उपसर्गादः विः" इति विप्रत्ययः, "इडेपुसि" सादुर आदि।, आदी भवा "दिगादिदेवांशाः" इति यप्र. 'अपर्णेवर्णस्य.' इति इलोपे आधः । द्वयोः पूरणो हिलीयः, "देसीय" इति तीयः । आद्याश्च द्वितीयाच आरद्वितीयाः १.३१शश्च पश्च सध सरसाः १-३॥ पापदितीयाशशपयाधापतितीयसपसाः १-३ । "अव आः स्यादी." "समानानां." ३४"सोरु" । "पुर शब्दं पातुः, पोपा पोपः "भायात्रो" घम्, अप्र०, "लघोरुपान्त्यस्य" इति - १० - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । व्यञ्जनसंज्ञाः । स्वसंज्ञा १५ गुणः । न विद्यते घोपो घण्टानिहींदवदनुस्खानो चेपां ते "नचत्” नन अ, अघोप १-३ । प्रान्वत् "रोय: "स्वरे वा" यस्य लुक आद्यद्वितीयशपसा अघोपाः । द्विपदामिदं सूत्रम् ।।१३।। कारिकार्द्धम्-~- आद्यद्वितीया वर्गाणामघोपाः शपसा अपि । आद्यद्वितीयत्वं त्वापेक्षिकमिति केपामित्याकाङ्क्षायामाह-वर्गाणामिति, पञ्चानामपि वर्गाणामाद्याः पञ्च द्वितीयाः पञ्च त्रयश्च शपसा इत्येते त्रयोदश अघोपसंज्ञा भवन्ति । ते चामी क ख । च छ ।५ दठात थ। पफ। शपस। १३ । अन्यो घोषवान् ॥ १४ ॥ [सि०-१।१।१४ ] अन श्वसन प्राणने, अन्धातुः अनिति परभावोऽत्रेति "स्थाच्छामासासूमन्यनि.” इति यम० अन्य १-१, "सोरुः" घोपोऽस्यास्ति तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः" । घोपमत् "मावर्णान्तोपान्तापञ्चमवर्गान्म- तोर्मों वः” इति मस्य वः "ऋदुदितः” इति नोन्तः "अभ्वादेरत्वसः सौ” इति दीर्घः “दीर्घडयाव्-१० व्यञ्जनात्सेः” इति सिलुक् “पदस्य” इति लुक् । “धोपवति" "अवर्ण०", अन्यो घोपवान् । द्विपदमिदं सूत्रम् ।। १४ ॥ अथ कारिकार्द्धम्- अन्ये स्युर्गादयो वर्णा घोषवन्तश्च विंशतिः ॥ १७ ॥ ग घ ङ। ज झ ञ । ड ढ ण । दधन।भ म । यरल चहा अन्ये च अघोपव्यतिरिक्ता गादयो विशतिर्वर्णा घोपवन्तो भवन्तीत्यर्थः ॥ १७ ॥ अंकप शषसाः शिट् ॥ १५॥ [सि०-११।१६ ] अंच अश्व ४कश्च ८पश्च शश्च पञ्च सञ्च अंक पशपस १-३, "अत आ०" "समाना." "सोरुः" "रः पदान्ते." । 'शिप्लंप् विशेषणे' शिपधातुः शिनष्टीति किप् "अप्रयोगीत्" किन्लोपः, १-१ "दीर्घड्याव्०” सिलुक् "धुटस्तृतीय०" इति पस्य डः "विरामे वा” डस्य टः । अं अःxxप-२० शपसाः शिद । द्विपदमिदं सूत्रम् ॥ १५ ॥ [अथ कारिका] शिट्संज्ञका अमी सप्त तत्र कः कुलिशाकृतिः। गजकुम्भाकृतिः -पश्च कपात्रुच्चारणार्थको ॥ १८ ॥ एपु सप्तसु आद्यौ प्राग्ज्याल्याती, अन्न्यास्रयश्च प्रतीता एव, ततः शेपो द्वी लक्षयति । तत्रेति । कुलिशं वनम् । वाकृतिमात्रव्यद्गयो जितामूलोगार्यों वर्णविशेपो जिहामूलीयापरनामा ४क इति, गजयु-२५ म्भाकृतिमात्रव्यङ्गय उपध्मानीयापरनामा ओप्टोभार्थो वर्णविशेषः -प इति । एती च कंबली उभारवि- तुमशक्यौ यथाक्रमं क ख, प फ, योगे निष्पद्यते तदुपहितावेय च पश्यते, तत्रापि रुपयोरेव मुग्य- त्यात्तदुपहिती सूत्रे उपात्ती, एतत्सर्वं कुटीकर्तुमाह-कपाशारणार्यको इति ।।१८।। अब म्यसंशामाद- तुल्यस्थानास्यप्रयत्नः स्वः ॥ १६ ॥ [सि०-११।१७ ] 'तुलण उन्माने तुल्यातुः, तोलनं "तुलाभिदादयः" इति निपानः, तुलया सन्मितन्नुन्यः "प-20 धतुल्यमृन्यवश्यपध्यययवधेनुष्यागाईपत्यजन्यधन्यम' इति सूत्रेण निपातः । 'गनिनियनी का ":मो" निमित्ता' खा, धीयतेऽम्मिन्निति "करणाधारे" अनट म्यानम । चत्र पुरन्धानमय- भावापत्तिलल्यानं फण्ठादि । 'असून् क्षेपणे बस धातुः, अन्यनि विपनि यानिति "शियानी -- १६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगंणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- यप्रत्ययदी आस्लम् । ओष्ठात्प्रभृति प्राधाकलकात्कण्ठमणेः । प्रपूर्वः 'यतै प्रयत्ने प्रयतनं "यजिस्खपि- रक्षियतिप्रच्छो नः" इति नप्रत्ययः आस्ये प्रयत्नः आस्यप्रयत्नः आन्तरःसंरम्भः। स्थानं च आस्यप्रयत्नश्च स्थानास्यप्रयत्नी । तुल्यो वर्णान्तरेण सदृशौ स्थानास्यप्रयत्नौ यस्य स तुल्यस्थानास्यप्रयत्नः १-१ । स्व १-१ "सोरुः" "र: पदान्ते०" । द्विप० सूत्रम् ॥ १६ ॥ अत्र कारिका- सानकास्यप्रयत्नाभ्यां तुल्या वर्णाः स्वसंज्ञकाः। यो वर्गों वर्ण प्रति स्थानकास्यप्रयत्नाभ्यां तुल्यः स वर्णस्तं वर्णं प्रति स्वसंज्ञो भवति, सवर्णसं- अकश्च लोके । आस्यमहणं वाह्यप्रयत्ननिवृत्त्यर्थम् , ते हि "आसन्न" इत्यन्नैवोपयुज्यन्ते नतु सवर्णविधी, वापि महाप्राणस्यैवावकाशोऽन्येषां तु वेदे प्रयोजनम् । सवर्णसंज्ञाप्रयोजनं च तमानमित्यादौ "तृती- यस्य पञ्चमें" इत्यनुनासिके सवर्णत्वात् दकारस्य नकारो यथा भवति तन्मानमिति । अत्र दृष्टान्तद्वारेण १० सर्वानपि मिथः स्वान् वर्णान् सार्द्धश्लोकेन निर्दिशति-- अकारादि स्वराणां स्वाः स्वस्खभेदा यथा मिथः ॥ १९ ॥ पञ्चपञ्चैकवर्गस्था वर्णाः स्वाः स्युः परस्परम् । यलवाः सानुनासिकनिरनुनासिका अपि ॥ २० ॥ 'अकारादीति यथापूर्वोक्ता हस्वादयोऽष्टादशभेदा अवर्णस्य ते सर्वे कण्ठस्थाना विवृतकरणाः पर- १५स्परं स्या इति, एवमन्येऽपि, रेफोप्मणां त्वन्यः तुल्यस्थानास्यप्रयत्नः कोपि नास्ति इति खा न भवन्ति । स्थानमहणं किम् ? कचटतपानां तुस्यास्यप्रयत्नानामपि भिन्नस्थानानां स्वसंज्ञा मा भूत्, तथात्वे तु तर्ता इत्यत्र "घुटो धुटि स्खे वा" इति पकारस्य तकारे लोपः स्यात् । आस्यप्रयत्नग्रहणं किम् ? चवर्गयशानां तुल्यस्थानानामपि भिन्नास्यप्रयत्नानां स्वसंज्ञा मा भूत्तथात्वे हि अरुक्थ्योततीत्यन्न "धुटो धुटि स्वे वा" इति शकारस्य पकारे लोप: स्यात् । स्वसंज्ञायां स्थानमुक्तम् किं तत् स्थानमित्याह- स्थानं कण्ठादि । तथाहुः। स्थानं कण्ठादीति । तथाहुरिति पूर्वप्रसिद्ध लोकमाह- अष्टौ स्थानानि वर्णानामुरः कण्ठः शिरस्तथा । जिह्वामूलं च दन्ताच नासिकोष्ठौ च तालु च ॥२१॥ अथ एषु स्थानेषु स्थानिनो वर्णान् सार्द्धश्लोकत्रयेणाह-- २५ विसर्गोऽयाकुहाः कप्ठ्यास्तालव्या इचुयाय शा। उपूपध्मानीया ओष्ठया मूर्धन्या प्रदुपाथ रः ॥२२॥ दन्त्या लतुलसा एऐ कण्ठतालसमुद्भवी । ओ औ कण्ठोष्ठजी ज्ञेयौ यो दन्तोष्ठयः प्रकीर्तितः ।। २३ ।। जियश्व जिहामूलीयोऽनुसारो नासिकोद्भवः । ३० स्वस्थाननासिकास्थानाः स्युर्डनणनमा इति ॥२४ ।। सादुरस्यो हकारस्तु सहान्तस्थः सपञ्चमः । विसगोऽयेति । विसर्गः अय अपुहा सवर्ण-फवर्ग-हमाराः कण्ठे भवाः कण्ट्या भवन्ति; कु. इत्या उगारस पक्षमपरत्वेन पासंस्थापकत्वान्, पत्रवर्णात्मकः कयगों गृसते, एवं पयारादि- १४प्परि । हमननाः सम्याननासिपथाना इति, म्यस्थान पठादि नासिरा प ताभ्यामुशायन्ते । स्यार:- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः। आस्यप्रयलाः १७ -- ? फण्ठनासिकास्थान एवमन्येऽपि ॥२२-२३-२४॥ उरस्येति० हकारस्तु सहान्तस्थामिर्वर्तमानः सहान्तस्थः सह पञ्चमैर्वर्त्तमानः सपञ्चमः उरस्यः स्यात्, यथा यह हा इत्यादि, केवलस्तु कण्ठ्य एव । सर्वमुखस्थानमवर्णः । हविसौं उरस्यौ । कवर्गा जिहामूल इत्यन्ये । रेफो दन्तमूल इत्येके । ए ऐ तालव्यो, कण्ठतालव्यावित्यन्ये । ओ औ ऑप्टयो, कण्ठोष्टयावित्यन्ये । वो दन्त्यौप्ठयः, सकस्थान इत्यन्ये । जिद्दामूलीयो जिहयः, कण्ठ्य इत्यन्ये । नासिक्योऽनुस्वारः, कण्ठनासिक्य इत्यन्ये । अथावसरप्राप्ता-५ नास्यप्रयत्नानाह- आसप्रयताः स्पृष्टाधा विचाराधास्तु बायकाः ॥ २५ ॥ आस्यप्रयत्ना इति । प्रयत्नो द्विधा आम्यन्तरो वाह्यश्च । तत्र चतुर्विध आभ्यन्तरप्रयत्नस्तथाहि, स्पृष्टता १ ईपस्पृष्टता २ विवृतता ३ ईपद्विवृतता ४ केचित् संवृताख्यं पञ्चमं प्रयत्नं मन्यन्ते । एपां कण्ठादिस्थानाभिघाते भावात् आभ्यन्तरत्वं, विवारादीनां तु वायुना कोप्टेऽभिहन्यमाने प्रादुर्भा-१० वाद्वाह्यत्वम् । अथवा स्पृष्टतादीनां वर्णनिप्पत्तिकाले भावादान्तरत्वं, विवारादीनां तु वर्णनिष्पत्ति- कालादूवं वायुवशेन भवनाद्वाह्यत्वम् । स्पृष्टतादयो वर्णानामुत्पादका विवारादयस्तु संस्कारका इति विवेकः । करणं तु जिह्वामूलमध्याग्रोपाग्ररूपं स्थानास्यप्रयत्नतुल्यत्वे सति नातुल्यं भवति इति पृथग् नोक्तम्, कथमिति; जिह्वामूलेन जिहयानां, जिहामध्येन तालव्यानां, जिहोपाग्रेण मूर्धन्यानां, जिह्वायाधः- करणं वा ? जिह्वाग्रेण दन्त्यानां, शेपाः स्वस्थानकरणाः । वाह्यप्रयत्नस्त्वेकादशविधस्तथाहि-विवार ११५ संवारौ २ श्वास ३ नादौ ४ घोपवद् ५ अघोपता ६ अल्पप्राणता ७ महाप्राणता ८ उदात्त ९ अनुदात्तः । १० स्वरितश्च ११ इति । एपामुत्पत्तिं चैवमाहुः-नाभिप्रदेशात् प्रयत्नप्रेरितः प्राणो नाम वायुरूर्व- माक्रामन्नुरःप्रभृतीनां स्थानानामन्यतमस्मिन्स्थाने प्रयत्नेन विधार्यते, स विधार्यमाणः स्थानमभिहन्ति, तस्मात् स्थानाभिघाताद् ध्वनिरुत्पद्यते आकाशे, सा वर्णश्रुतिः, स वर्णस्यात्मलाभः । तत्र वर्णध्वना- वुत्पद्यमाने यदा स्थानकरणप्रयत्नाः परस्परं स्पृशन्ति सा स्पृष्टता १ यदा ईपत्स्पृशन्ति सा ईष-२० स्पृष्टता २ यदा सामीप्येन स्पृशन्ति सा विवृतता ३ यदा दूरेण स्पृशन्ति सा ईषद्विवृतता?? ४। एपोऽन्तःप्रयत्नः । इदानीं बाह्यप्रयत्नः, यदा प्राणो नाम वायुरूर्वमाक्रामन् मूनि प्रतिहतो निवृत्तः कोष्ठमभिहन्ति तत्र कोप्टेऽभिहन्यमाने कण्ठविलस्य विवृतत्वाद् विवारः १ संवृतत्वात् संवारः २ । तत्र यदा कण्ठविलं विवृतं भवति तदा श्वासो ३ जायते, संवृते तु नादः ४ तावनुप्रदानमाचक्षते । अन्ये तु ब्रुवते, 'अनुप्रदानमनुस्वानो घण्टानिींदवत्' इति । तत्र यदा स्थानकरणाभिघातजे ध्वनौ २५ नादोऽनुप्रदीयते तदा नादध्वनिसंसर्गाद्घोषो ५ जायते । यदा तु श्वासोऽनुप्रदीयते तदा श्वासध्वनिसं- सर्गादघोषो ६ जायते । अल्पे वायावल्पप्राणता ७ । महति वायौ महाप्राणता ८ जायते, महाप्राणत्वादूष्मत्वम् । यदा सर्वगात्रानुसारी प्रयत्नस्तीत्रो भवति तदा गात्रस्य निग्रहः कण्ठविलस्य चाणुत्वं स्वरस्य वायोश्च तीव्रगतित्वाद्रौक्ष्यं भवति तमुदात्त ९ माचक्षते । यदा तु मन्दः प्रयत्नो भवति तदा गात्रस्य स्रेसनं कण्ठविलस्य च महत्त्वं खरस्य वायोश्च मन्दगतित्वात् स्निग्धता भवति३० तमनुदात्त १० माचक्षते । उदात्तानुदात्तस्वरसंनिपातात् स्वरित ११ इति । तः स्पृष्टं करणं [स्पर्शानाम् , स्पर्शा वाः ] वाणाम् । ईपत्स्पृष्टमन्तस्थानाम् । ईपद्विवृतं शप- सहानां । एते चान्यत्र ऊष्माण इत्युच्यन्ते । विवृतं स्वराणा, खरेपु ए ओ विवृततरौ, ताभ्यामपि ऐ औ, ताभ्यामप्यवर्णः । अकारः संवृतः इत्यन्ये । इत्याभ्यन्तरप्रयत्नविभागः । वर्गाणां प्रथमद्वितीयाः शपसविसर्गजिह्वामूलीयोपध्मानीयाश्च विवृतकण्ठाः श्वासानुप्रदाना अघोषाः । वर्गाणां तृतीयचतुर्थ-३५ है. अंका० पूर्वा०३ , ५ १० १८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- पञ्चमाः अन्तस्था हकारानुस्वारी च सवृतकण्ठा नादानप्रदाना घोषवन्तः । वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा अन्तस्याश्वाल्पप्राणाः, इतरे सर्वे महाप्राणाः । इति बाह्यप्रयत्नविभागः ॥ २५ ॥ अथ प्रस्तुतोपयोगिनीः कतिचित्सज्ञा आह. उक्त वर्णे सवर्णोऽपि ग्राह्यः कारे च केवलः। संयोगः स्याद् व्यञ्जनानि स्वराव्यवहितान्यहो ! ॥ २६ ॥ उक्ते । पूर्वार्द्ध स्पष्टम् । सयोगः स्यादिति । अहो इति सम्बोधने, अहो शिष्य ! स्वरेण अव्यव- हितानि अनन्तरितामि व्यञ्जनानि सयोगः स्यात् । यथा धानाभ्रस्ज् इत्यत्र "संयोगस्यादौ स्कोलक", इति सकारम् भवति ॥ २६ ॥ अप्रयोगीत् ॥ १७॥[सि०-११३७] अप्र० । प्रपूर्वक 'युजंपी योगें' युज्, प्रयोजनं प्रयोगः, "भावाकोंः", घम् , अप्रत्ययः । "क्तनि- टश्चजोः कगौ घिति" इति जस्य गः "लघोरुपान्यस्य” इति गुणः, प्रयोगः । प्रयोगोऽस्यास्तीति "अतोऽ- नेकवरात्" इति इन्प्रत्ययः, "अवर्णेवर्णस्य” इति अलुक् प्रयोगिन् १-१ "इनहन्पू०" "दीर्घड्या०" सिलुक् । "नानो नो.” न्लुक्, प्रयोगी, "नात्" नस्य अः । इत् १-१ "दीर्घडया०", अप्रयोगीत् । द्विपदं सूनम् ॥ १७ ॥ अन कारिका- १५ वर्णो वर्णसमूहो चा पाठे समुपलभ्यते । न दृश्यते प्रयोगे यः स इत्संज्ञक इप्यते ॥ २७॥ वों वर्णसमूहो वेति । एको वर्णो, द्विव्यादिवर्णात्मको वर्णसमुदायो वा, यः कस्मैचित् कार्याय पाठकाले उधार्यते ततश्च प्रयोगकाले एति-निवर्तते स इत्सज्ञो भवति । तनैकवों यथा 'एधि वृद्धौ अन इकार आत्मनेपदार्थः । वर्णसमूहो यथा 'दुपवीप पावे' इत्यत्र पधातुः शेपाः सर्वे इत इति ॥२७॥ "स्वादिस्त्यादिविभक्तिः" (१२१२१९) स्याद् "विभक्त्यन्तं भवेत्पदम्" (शश२०)। "सविशेषणमाख्यातं वाक्यम्" (१।१।२६) मिनवदागमः ॥२८॥ स्यादि'सि ओ जस् इत्यादि स्यादिविभकिः । तिव तस् इत्यादि त्यादिविभक्तिः तदन्तं च पदं यथा देव इत्यादि स्याद्यन्तं पदम्, भवतीत्यादिक च त्याद्यन्त पदमिति । पदसज्ञा फलं च पदस्य संयोगान्तस्य लुक् स्यात् इत्यादि । सविशेषणमित्यादि प्रयुज्यमानैरप्रयुज्यमानैर्या विशेषणः सहितं प्रयुज्यमानमप्रयुज्य- २५मानं या आरयावं याक्यं स्यात् , यथा धर्मो वो रक्षतु । अप्रयुज्यमानविशेपण यथा, लुनीहि ३ पृथुकांश साद । अप्रयुज्यमानमाख्यातं यथा शील ते स्वमिति । अर्थात्प्रकरणाद्वाऽऽस्त्यातादेर्गतावप्र- योगः । लोगदेव वाक्यसिद्धी साकाहत्वेऽप्याख्यातभेदे वाक्यभेदार्थ वचनम्, आख्यातमित्यक्त्वस्य वियक्षितत्वात् , तेन ओदनं पच तव भविष्यति मम भविष्यति इत्यादी श्रूयमाणे गम्यमाने याऽऽरया. शान्तरे भिनयास्यत्याद्वस्नसादयो न स्युः । लोरिये तु वास्येऽङ्गीक्रियमाणे आरयातभेदेऽप्येक्याक्यत्वा- ३० वरससादयः प्रसज्येरन् । कुरु कुर नः पटमित्यादी तु कृते द्विवचनेऽर्थाभेदादेक्मेवारयातमित्येक्वाक्य. स्वादलसादयः स्युरिति । वाक्यसमाफल प पदाद् युग्विभक्त्येक्वान्ये यस्नसाविति । मित्रवदिति, यः सान्यनुपपातेन मित्रयदागच्छति स आगम इत्युच्यते । अयं चार शाखे अन्तरान्दोपलक्षितो भवति, पया पारीगि इन्यन "अनामस्वरे नोऽन्तः" इति । प्रत्ययोऽपि स्थान्यनुपपातेन मिनयदागच्छति परं परासी र पनन्तरम् । २(7. 11111८) इत्ला दर्शिता । ३ (सि. ३३) इलादिस्पदर्शिता । २० - - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । कतिचित् संज्ञाः १९ 4 . 4 . स (२११०३८) पञ्चम्याद्विहितोऽन्तशब्दनिर्दिष्टश्च न भवति, यथा देवः इत्यत्र "नाम्नः, प्रथमैक- द्विवहौं” इति प्रथमैकवचनं सिः । उपलक्षणत्वाचात्र प्रत्ययोऽपि सङ्गृहीतो बोद्धव्यः ॥ २८ ॥ अवसानं विरामः स्यादादेशः शत्रुवद्भवेत् । त्रयो लुक् लुप् च लोपश्च वर्णादर्शनवाचकाः ॥ २९ ॥ अव० । अग्रे वर्णानामनुच्चारणं विलम्बेनोच्चारणमुच्चारणाभावश्च अवसानं विरामश्च भवति । अयं५ भावः, सातत्येनोच्चारणे 'जिनो जयती'त्यत्र सन्धिर्भवति, अत्रैव मध्ये विलम्वेनोचारणे विरामे सति "न सन्धि"रिति वक्ष्यमाणनिषेधात्सन्धिर्न भवति, 'जिनः जयतीति । वाक्यादिसमाप्तौ अग्रे उच्चारणाभावे विरामो भवति । यथा 'प्रथमं भवति मङ्गलम्म्', अत्र विरामत्वाद् "अदीर्घाद्विरामे"ति मकारस्य द्वि- त्वम् । आदेशः शत्रुवदिति, स्थान्युपमर्दैन प्रवर्त्तमानत्वात् , यथा “जस इ." "टाङसोरिनस्यौं” इत्यादि । त्रय इति लुक्लुप्लोपास्त्रयोऽप्येते वर्णस्य अदर्शनं वदन्ति । परं त्वैपामयं विशेषः; लुकि स्थानिव-१० द्भावो भवति, लुपि तु स न भवति, यथात्रैव वक्ष्यते; हे वारि १-१, “नामिनो लुग्या" इति सिलुकि, लुकि च स्थानिवद्भावालुप्तप्रत्ययनिमित्तं कार्य स्यादिति सिना सह गुणे हे वारे । पक्षे "अनतो लुप्” इति सिलुपि स्थानिवद्भावाभावाद्गुणाभावः, हे वारि इति । लोपशब्देन तु लुक् लुप् च द्वयमप्युच्यते इति सामान्यवाची लोपशब्दः, यथा 'सर्वेभ्यो लोपः' इति न्याये उभयमपि गृह्यते इति ।। २९ ।। दी| विसर्गानुस्खारयुक् संयोगपरो गुरुः । असंयोगपरो हस्वो विसर्गाद्युज्झितो लघुः ॥ ३० ॥ दीर्घो, विसर्गश्च अनुस्वारश्च विसर्गानुस्वारी, विसर्गानुस्खारौ युनक्तीति विसर्गानुस्वारयुक् । ततश्च आ ई ऊ ऋ लू ए ऐ ओ औ एते नव दीर्घस्वराः, विसर्गयुक् , अनुस्वारयुक् , संयोगः परो यस्मात् स संयोग- 'परः यथा वप्र इति वकारः, एते सर्वे गुरुसंज्ञा भवन्ति । गुरुसंज्ञाप्रयोजनं "गुरुनाम्यादेरनुच्छ्र्णोः' इत्यादौ । असंयोगपर इति, न संयोगपरः असंयोगपरः, यथा नयन इत्यत्र; तथा अ इ उ ऋ ल इति २० पञ्च ह्रस्वाः स्वराः तथा विसर्गानुस्वाररहिताश्च, एते सर्वे लघुसंज्ञा भवन्ति । लघुसंज्ञाप्रयोजनं "लघो- 'रुपान्त्यस्य.” इत्यादौ ॥ ३० ॥ अरेदोतो [सि० ३१३१२ ] गुणसंज्ञा ऋइ उ स्थानभाविनः । वृद्धिसंज्ञाः [सि० ३।३।१] स्मृता आ आर ऐदौच स्वरसम्भवाः॥३१॥ अरेदोत इति । स्वर्णेवर्णोवर्णस्थानभाविनः अर् एत् ओत् एते गुणसंज्ञा भवन्ति, यथा "हस्वस्य २५ 'गुणः” इति गुणे हे पितः, हे मुने, हे साधो इति । वृद्धिसंज्ञा इति; स्वरस्थानभाविनः आ आर् ऐत् औत् एते वृद्धिसंज्ञा भवन्ति; अकारस्थाने य आ, ऋवर्णस्थाने य आर् , इवणेकारस्थाने य ऐत्, उव- #कारस्थाने य औत्, एते सर्वे वृद्धिसंज्ञा भवन्तीत्यर्थः, यथा 'वृद्धिः स्वरेष्वादौ णिति तद्धिते” इति वृद्धौ आश्वम् आर्पम् जैनं दैव्यं पौत्रः सौम्यः । स्वरसम्भवा इति प्रायिकं स्वाभाविकानामपि आम्रगुप्ता; यनिरित्यादौ वृद्धिसंज्ञादर्शनात् ॥ ३१ ॥ स्थमौजसः स्यु[सि० १।१।२९ ](ट्संज्ञाः पुंस्त्रियोः शि[ सि० १।१।२८ नपुंसके । विना सम्बोधनार्थ सिं शेपघुद [ सि० ११४८२ वृ०] संज्ञका अमी ॥ ३२ ।। स्यमौ० । पुंत्रियोः पुंलिङ्गस्त्रीलिङ्गयोः स्यमौजसो घुटः स्युः, तत्र प्रथमायाः स्यौजसो नामार्थाः सम्बोधनार्थाश्चेति, द्वतीयाया अम् औ चेति । तथा नपुंसकलिङ्गे जस्शसादेशः शिः, तत्र जसादेश शिर्नामार्थसम्बोधनार्थभेदाहेधा, शसादेशः शिश्चः । एवं च जात्यपेक्षया पद्सु व्यक्त्यपेक्षया च एकोन-३५ . १० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- विंशती घुट्सु, सम्योधनार्थ प्रथमैकवचनं जात्यपेक्षयैकविधं व्यत्यपेक्षया द्विविधं सिं मुक्त्वा, अन्ये अमी पूर्वोक्ताः शेषधुदसंज्ञका भवन्ति । सिशब्दस्य विपयनामत्वात्पुंस्त्वं "मातुर्मातः पुत्रेऽहे सिनामव्य" इति पुंस्त्वनिर्देशाय ॥ ३२ ॥ लोकात् ॥ १८॥ [सि०-१।११३] लोका० । 'लोकङ् दर्शने' लोकधातुः, लोकते इति लोकः "व्यञ्जनाद् घम्" अप्रत्ययः, लोक ५-१ "डेडस्योर्यातौ” इत्यात्, "समाना०" लोकात् । एकपदं सूत्रम् ॥ १८ ॥ अत्र कारिका यदत्र संज्ञा न्यायादि वर्णाम्नायादि नोदितम् । तद्वैयाकरणादिभ्यो लोकेम्यो युध्यतां बुधैः॥ ३३ ॥ इति महोपाध्यायधीरीतिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितायां हैमलघुप्रक्रियायां संज्ञाधिकारः समाप्तः । यदुन्न । अत्र संज्ञेति संज्ञाः स्वरव्यञ्जनाद्याः, क्रियागुणद्रव्यजातिकाललिङ्गस्वाङ्गसङ्घयाऽपत्यवी- प्सादीनां च, तथा न्यायाः "स्खं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा" इत्यादयः, अत्रादिशब्दात् “पञ्चम्या निर्दिष्टे परस्य” इत्यादयः परिभाषा ग्राह्याः । वर्णानायादीति वर्णानामानायः सम्प्रदायाधिगम्यः स्थान- प्रयत्नादिविवेकः, अनादिशब्दात्सत्यासन्नत्वादिकं ग्राह्यम् । एतेपु मध्ये यन्त्र शास्त्रे उक्तं तदितो ज्ञेयं १५यचात्र शाले विस्लरभयानोक्तं तत्सर्व वैयाकरणतार्किकादिलोकेभ्यो ज्ञेयमिति भावः ॥ ३३ ॥ वत्र संज्ञाः प्रकृतोपयोगिन्यः काश्चिदुक्काः काश्चिञ्च यथास्थानं यक्ष्यन्ते; वर्णाम्नायादिकत्वमप्युक्तम् । ॥ न्यायास्त्वेवम् ॥-- नीयते सन्दिग्धोऽर्थो निर्णयमेभिरिति न्यायाः । न्यायावाय." (५।३।१३४ ) इत्यादिसूत्रेण पनि निपातनान्यायाः स्वेटसाधनानुगुणा युक्तयः । तथाहुः श्रीसूरयो न्यायसूत्रप्रक्रमे । “अथ ये २० तु शास्त्रे सूचिता लोकप्रसिद्धाश्च न्यायास्तदर्थ यत्नः क्रियते” इति । न्यायशब्दश्च दृष्टान्तेऽपि रूढो यथा सूचीकटाइन्यायः, काकाक्षिगोलकन्यायः, डमरुकमणिन्यायः, घण्टालालान्याय इत्यादि, नच तेऽनाधिकृतास्तेपामपरिमितत्वान् । ये तु शास्त्रे व्याकरणादिग्रन्थे सूचिता वैयाकरणादिलोकप्रसिद्धाश्च तेनाधिक्रियन्ते इति । सूत्राणि प्रतिव्याकरणं भिद्यन्ते न्यायास्तु चिरन्तनत्वात् सर्वव्याकरणेष्वेक- रूपा एवेति शेयम् ।. २५ वत्र श्रीसूरिभिः सप्तपञ्चाशन्यायाः श्रीहेमचन्द्रव्याकरणप्रान्ते निरूपितास्ते प्रथममभिधीयन्ते । खं रूपं शब्दस्साशब्दसंज्ञा ॥१॥ १६ व्याकरणे शब्दम्य खं रूपं माझं यदि तच्छब्दस्वरूपं फस्यापि संज्ञा न स्यात्, यथा “समा न्यः" (५/१७७) इत्यत्र 'रयांक प्रायने' इति घातुः, चक्षादेशश्च रयांग् इति द्वयमेव स्यारूपं गृहते, नत्वधि-व्याकरणे कस्यापि ग्येति संझाया अकरणात् , तेन गाः सद्भपाति सम्बष्टे या "समः ३.स्पः" इति हे गोसह इति सिद्धम् । यत्र तु शब्दसंझा तर तु शब्दरूपं न प्रासं किन्तु संझिनो माहाः, यया "उपसर्गादः फि:" (५।३२८७) इत्यत्र "भवी दाधी दा" (३३३३५) इति कृतदा. संशानां प्रणम् । बं रूपं शन्दस्यत्वंशम्प सापकं "नदीभिनानि" (३६११२७) इसन बहुवच- नम्, अन्ययानेन न्यायेन नदीशब्दस्वरूपप्रहणे "सयासमाहारे" (३।१०२८) इत्युत्तरसूत्रेण पश्वानां ३४नदीनां समाहारः पचनदमिसनयान्ययीभावः स्वानतु नदीविशेपयाचिभिः द्वियमुनं विगङ्गमित्यादौ ।

, प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुच्चिता न्यायाः २१ अशब्दसंज्ञेयस्य ज्ञापकं "स्वरादुपसर्गादस्तिकित्यधः" (४।४।९) इत्यत्र धावर्जनम् अन्यथा दाग्रहणे धावर्जनमनर्थकमिति ॥ १ ॥ सुसर्वार्द्धदिक्शब्देभ्यो जनपदस्य ॥२॥ ये दिग्वाचकत्वेन रूढाः शब्दास्तेऽर्थान्तरवृत्तयोऽपि दिग्वाचिसाश्यादिक्सान्दा एव ततो जनप- दवाचिनो यो विधिः स सुसर्वार्द्धदिकशब्दपूर्वस्य जनपदान्तस्यापि स्यात्। 'ग्रहणवता नाना न तदन्त-५ विधि'रिति न्यायस्यापवादोऽयं न्यायः, एवमुत्तरोऽपि । यथा मगधेपु भवो मागधकः तथा सुमागधका सर्वमागधक अर्द्धमागधकः पूर्वमागधक इत्यादौ "बहुविषयेभ्यः” (६।३।४५) इत्यकञ् सिद्धः । सुमागधकादिषु च त्रिषु "सुसर्वा द्राष्ट्रस्य” (७।४।१५) इत्यनेन, पूर्वमागधक इत्यत्र तु "अमद्रस्य दिशः” (७४।१६) इत्यनेनोत्तरपदवृद्धिः । सुसर्वादिभ्य इत्येव, ऋद्धमगधेषु भवः आर्द्धमगध इति; अत्र "भवे” (६।३।१२३) इत्यणेव न तु "बहुविपयेभ्य" इत्यकञ् 'ग्रहणवतेति न्यायेन तदन्तविधे-१० निषेधात् । ज्ञापकं च आभ्यां सूत्राभ्यामुत्तरपदवृद्धिरेव अन्यथा 'ग्रहणवतेति न्यायात्तदन्तविधि- निषेधात्स्वादिपूर्वाजनपदान्तात् णित्प्रत्ययनिपेधे उत्तरपदवृद्धेरेवासम्भव इति ॥ २ ॥ ऋतोद्धिमद्विधाववयवेभ्यः॥३॥ यस्मिन् परे वृद्धिप्राप्तिः स णित्प्रत्ययो वृद्धिमानिह गृह्यते । ऋतुवाचकात् णित्प्रत्ययविधौ कर्तव्ये तदवयवपूर्वाह्त्वन्तादपि स विधिः स्यात् , तेन यथा वर्षासु भवं वार्षिकमित्यत्र “वर्षाकालेभ्यः” (६१३३८०) १५ इतीकण् , तथा पूर्वः प्रथमोऽवयवो वर्षाणां पूर्ववर्षाः “पूर्वापराधरोत्तरमभिन्नेनांशिना" (३।११५२ ) इत्यंशितत्पुरुपः, यद्वा पूर्वावयवयोगात्पूर्वाः प्रथमा इत्यर्थः ताश्च ता वर्षाश्च पूर्ववर्षाः तासु भवं पूर्व- वार्षिकमिति, अत्र वर्षान्तादपि “वर्षाकालेभ्यः” इतीकण् । यथा शिशिरे भवं शैशिरमित्यत्र "भर्नुसन्ध्या- देरण्” ( ६।३१८९) इत्यग् [ वृद्धिः ], तथा पूर्वशैशिरमित्यत्रापि “अंशाहतोः” (७।४।१४) इत्युत्तरपद- वृद्धिः । वृद्धिमद्विधाविति किम् ? "प्रावृष एण्यः” (६।३।९२) इत्येण्यस्य विधौ पूर्वप्रावृपि भवः पूर्व-२० प्रावृपेण्य इति मा भूत् । अवयवेभ्य इति किम् ? पूर्वा ऋत्वन्तरैर्व्यवहिता वास्तासु भवं पौर्ववार्षिक पौर्वशिशिरकं, उभयत्रापि “वर्षाकालेभ्य” ( ६।३।८०) इति काललक्षण एवेकण् । इह च पूर्वशब्दो न ऋतोरेकदेशं ब्रूते किं तर्हि ? व्यवहितत्वमिति । “अंशाहतोः” इत्यनेनोत्तरपदवृद्ध्यप्राप्तेः “वृद्धिः खरेव०” (७४।१ ) इत्याद्यस्वरस्यैव वृद्धिः । ज्ञापकं त्वस्य "अंशाहतोः” इत्युत्तरपदवृद्धिविधान- मेव अन्यथा 'ग्रहणवतेति न्यायात्तदन्तविधिनिषेधे अवयवपूर्वादत्वन्तात् णित्प्रत्ययाभावे इदमुत्तर-२५ पदवृद्धिविधानं निर्विपयं स्यादिति ॥ ३ ॥ खरस्य हस्त्रदीर्घप्लुताः ॥४॥ हस्वाद्यादेशाः स्वरस्यैव स्थाने स्युः, न तु व्यञ्जनस्येत्यर्थः । स्थानविशेषानुक्त्या स्वरवद्व्यञ्जनस्यापि हखाद्यादेशप्रसङ्गे प्रतिपेधार्थोऽयं न्यायः । हस्खो यथा, सश्रि कुलमित्यादौ "क्लीवे” (२।४।९७ ) इति स्वरस्यैव हस्खो न तु तत् इत्यादौ व्यञ्जनस्य, अन्यथात्राण्यासन्नत्वात्तकारस्य लकारो ह्रस्वः प्राप्नोति ।३० प्रतीच इत्यादावचश्चत्वे पूर्वस्थस्येकारस्य दीर्घः, न तु पच्च इत्यादौ व्यञ्जनस्य, अन्यथात्राप्यचश्वत्वं प्राक्स्थितस्य दस्य प्राग्वदासन्नो दीर्घलकारः प्राप्नोति । प्लुतो यथा चैत्र३ एहि । व्यञ्जनस्य तु प्लुतत्व- सम्भव एव नास्ति स्वरस्यैव प्लुतादेशोक्तेः । वोधकं त्वस्य 'क्लीवे' इत्यादि ह्रस्वदीर्घविधायकसूत्रेपु स्थान्य- नुपादानमेव । यद्यप्यत्र न्याये प्लुतग्रहणं नोपयुक्तं प्लुतविधौ [प्लुतस्य ] स्वरस्यैव स्थानित्वेनोक्तेस्तथापि हखदीर्घसाहचर्यात् स्थानपूर्तयेऽनुवादमानमेतत् ।। ४ ।।

7 .. :२२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- आद्यन्तवदेकसिन् ॥५॥ यत्रैक एव वर्णों नाम वास्ति, कार्य तु तदादिकस्य तदन्तस्य वोक्तं तत्र तदेवैकमादित्वेनान्तत्वेन च प्रकल्प्य तत्कार्य कार्यम् । अप्राप्तप्रापणार्थोऽयं न्यायः, एवमुत्तरोऽपि । तत्रादित्वेन वर्णकल्पनं यथा ईहा- श्चक्रे इत्यादौ धातोर्गुरुनाम्यादित्वेन "गुरुनाम्यादेरनृच्छूर्णोः” (३।४।४८) इति परोक्षाया आम् स्यात्, ५तथा 'ईद च गतौ' अयाचक्रे इत्यादौ नामिमात्रस्यापि धातो म्यादित्वकल्पनया परोक्षाया आमादेशः सिध्यति । नानो यथा “इन्द्रे" ( १।२।३०) इत्यस्य "सप्तम्या आदिः” (७।४।११४) इति परिभाषया 'इन्द्रादौ शब्दे परे' इति न्यासकारव्याख्यानात् इन्द्रयज्ञशब्दे परे गवेन्द्रयज्ञ इत्यादावेवादेशः प्राप्नोति, परं गवेन्द्र इत्यत्रापि इन्द्रादित्वकल्पनादवादेशः सिद्धः । अन्तत्वेन वर्णकल्पनं यथा, जेता इत्यादी धातोर्नाम्यन्तत्वेन "विशेपणमन्तः" (७४।११३) इति परिभापया "नामिनो गुणोऽशिति” (४,३३१) १० इति गुणः स्यात्, तथा एता इत्यादौ नामिमात्रस्यापि धातोर्नाम्यन्तत्वकल्पनात् "नामिनो गुणोऽकृिती"ति गुणः सिद्धः । नानो यथा “सादेः स्मैस्मातौ” (१।४७) इत्यत्र सादेरित्यस्य स्याद्यधिकाराक्षिप्त- नामविशेपणत्वात् "विशेषणमन्तः" इति परिभापया 'सर्वाद्यन्तस्य नान्न' इति न्यासकारव्याख्यानात् परमसर्वस्मै इत्यादावेव स्मायादयः प्रामुवन्ति, परं सर्वस्मै इत्यादायपि सर्वशब्दस्य सर्वाद्यन्तत्वकल्प- नात् मायादयः स्युः । ज्ञापकं त्वस्य यन्तीयादावियचाधनाथं "द्विणोरप्विति व्यौं” (४।३।१५) १५इति इणो यत्वविधानम् , तद्धि 'धातोरिवर्णोवर्णस्येयुव् स्वरे प्रत्यये' (२।१।५०) इति इयादेशापवादः, ।' इयादेशश्च इण इवर्णान्तत्वकल्पनयैवेति ॥ ५॥ प्रकृतिवदनुकरणम् ॥ ६॥ अनुकार्य धात्वादिकं प्रकृतिः, अनुकरणेऽपि प्रकृतिवत्कार्यं कार्यम् ; यथा “परिव्यवात् क्रियः" ( ३।३।२७) इत्यत्र धात्वनुकरणस्य क्री इत्यस्य धातुवद्भावाद्धातुकार्य "संयोगात्” (२।११५२) इती- २० यादेशः । वत्करणाच सर्वथा धातुत्वाभावान्न त्यादयः । ज्ञापकं त्वस्य 'क्रिय' इति सूत्रनिर्देश एव । अनित्यत्वाचास्य “परावेजें:” (३।३।२८) इत्यादौ नेयादेशः ॥ ६ ॥ एकदेशविकृतमनन्यवत् ॥ ७ ॥ , 'छिनाङ्गुलिकोऽपि स एव चैत्र' इतिवदेकस्मिन्प्रदेशे वैसदृश्ये नान्यत्वं गण्यते, किन्तु तथाविधस्यापि व्यथोक्त कार्य क्रियत इत्याशयः; लक्ष्यमाणवैसदृश्यापहवार्थोऽयं न्यायः, एवमुत्तरत्रापि । यथा अतिजरसा २५ कुलेनेत्यादौ "लीवे" इति हस्खे कृते अतिजरशब्दस्यापि "जराया जरस्था” (२।११३) इति जरसादेशः स्यात् । एकदेशेयस्योपलक्षणत्वात् कचिदनेकदेशविकृतमप्यनन्यवत्, यथा “यमिरमि०” (४।२।५५) इति न्लोपे प्रणिहत इत्यादावेकदेशाविकृतस्येव प्रणिघ्नन्ति इत्यादौ हनेः “महन." (४२।४४) इत्यल्लोपे "हनो ह्रो नः" (२१११११२) इति प्रादेशे हो घे च कृते अनेकदेशविकृतस्याप्यनन्यत्वात् तस्मिन् परे "नेड्मादापतपद.” (२१३७९) इति नेनों णः सिद्धः । ज्ञापकं त्वस्य "सस्युरितोs- ३०शावेत्” (१।४।८३) इत्यत्र इत इति वचनम् । तद्धि सखीशब्दस्य ऐत्वनिषेधार्थम्, एतन्न्यायाभावे च सखीशब्दस्य ऐत्यप्राप्तिरेव नास्ति, सूत्रे ससिशब्दस्यैवोक्तरिति । अनित्यत्वाचास्य "सङ्ख्याहर्दिवा." (५।१।२०२) इति सूत्रे लिपिलिच्योहणम् , अस्स न्यायस्य नित्यत्वेऽन्यतरग्रहणेनापि सिध्येत् ॥७॥ भूतपूर्वकस्तद्वदुपचारः ॥८॥ यथा हासन्यादी प्रण्यहन् इत्यादी साक्षाद् हनौ परे ने। प तथा अद्यतन्यादौ प्रण्यवर्धादित्यादी हिनादेशस वर्भूतपूर्वहरूपत्वोपचारात्तस्मिन्नपि "नेादा” (२१३१७९) इति सूत्रेण नेर्नो णा J . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुच्चिता न्यायाः २३. सिद्धः । ज्ञापक त्वस्य "नेमादे"तिसूत्रे वधेरग्रहणमन्यथोक्तसूत्रे वधेरगृहीतत्वात् प्रयवधीदित्यादौ ने! णो न सिध्यति ॥ ८ ॥ भाविनि भूतवदुपचारः ॥९॥ यथा नृणामित्यादौ निष्पन्ने पदे “रपृवर्णान्नो ण.” (२।३।६३) इति णत्वं, तथा रवणं तक्षणमि- त्यादौ यद्यपि पदत्वं स्याद्युत्पत्त्यनन्तरं भावि तथापि भाविनः पढ़त्वस्य भूतवदुपचारान्नामावस्थाया-५ मपि “रपृवणे"ति कृतणत्वानामेव रवणादिशब्दानां न्यासः । ज्ञापकं त्वस्य “रपृवर्णे"ति सूत्रे पद एव. णत्वविधानमिति ॥ ९ ॥ यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् ।। १० ।। सङ्ख्यया एकट्यादिवचननिर्देशेन चेति द्विधापि मिथः समानां पूर्वेपां परेपां पदानां सङ्घयानतिक्र- मेणैवानुकूलं देशनमनुदेशः कार्यः, आद्यमायेन द्वितीयं द्वितीयेनेत्यादिरीत्यैव योजना कार्या, नत्वन्य-१०. येत्यर्थः, योजनाया यादृच्छिकत्वे प्रसक्ते नियमार्थोऽयं न्यायः । यथा "डेडस्योर्यातो” (१।४।६) इत्यादौ स्थानिनोरादेशयोश्च द्विद्विसङ्ख्यत्वेन द्विवचननिर्दिष्टत्वेन च समत्वाद्यथासङ्खथं योजना सिद्धा। समानामिति किम् ? "नमस्पुरसो गतेः कखपफि रः सः” (२।३।१) इत्यत्र नमस्पुरसोः - कखाद्यैः- सह समानवचननिर्देशेऽपि यथासङ्ख्यं न, [ सङ्ख्यया तुल्यत्वाभावात् । तथा "तौ मुमो व्यञ्जने स्वौं". ( ११३१४ ) इत्यत्र मुमयोरनुस्वारानुनसिकाभ्यां सह समसङ्घयत्वेऽपि यथासङ्घयत्वं न] वचननिर्दे-१५ शेन तुल्यत्वाभावादिति ।। १० ।। विवक्षातः कारकाणि ॥ ११ ॥ भवन्ति न भवन्ति अन्यथा भवन्ति चेति शेपः । कारकनैयत्यनिषेधार्थोऽयं न्यायः । तत्र भवन यथा, भिक्षा वासयतीत्यादौ भिक्षादेनिर्व्यापारत्वेन हेतुमानत्वात्तत्त्वतोऽकारकत्वेऽपि स्वतन्त्रतया वास- नादिव्यापारविवक्ष्या कर्तृकारकत्वं सिद्धम् , न च तत्त्वतोऽकारकत्वं नास्तीति वाच्यम् , अकारकत्वा-२०: देव भिक्षयोपित् इत्यादौ "कारकं कृता” (३।१।६८) इति प्राप्तसमासाभवनात् । अभवनं यथा मापाणामनीयादित्यादौ मापादीनां कर्मत्वे सत्यपि तदविवक्षणात् सम्बन्धमाने पष्टी सिद्धा । अन्यथा-, भवनं यथा, ओदनः स्वयं पच्यते, असिश्छिनत्तीत्यादावोदनास्योः कर्मकरणयोरपि स्वातन्त्र्यविवक्षया. कर्तृत्वं सिद्धमिति ॥ ११ ॥ अपेक्षातोऽधिकारः ॥ १२ ॥ अपेक्षा इष्टता, तत एवाधिकारः प्रवृत्तिमान्निवृत्तिमांश्च ज्ञेयो, नतु तत्र किञ्चिज्ज्ञापकमपेक्ष्यमिति भावः । यथा 'णपमसत्परे स्यादिविधौ च” (२।११६०) इत्यतः सूत्रादसत्परे इत्यधिकारो "रात्सः” (२।१।९० ) इति यावदनुवर्तते नोर्द्धम् ; स्यादिविधौ च इत्यधिकारस्तु "नोादिभ्यः (२।१।९९) इति यावत् , [इयेपोऽर्थो ज्ञापकं विनापि सिद्धः] । 'विशेषातिदिष्टो विधि, प्रकृताधिकारं न वाधते' इत्यपि न्यायोऽस्ति, यथा, "धातोरिवर्णोवर्ण०” (२।११५०) इत्य-३६० तोऽनुवर्तमानो धातोरित्यधिकारो "भ्रूनोः” (२।११५३) इत्यादि सूत्रत्रये विशेपोत्यानुक्तोऽप्येतन्न्यायन "योऽनेकवरस्य” (२।११५६) इत्यत्र पुनः प्रादुर्भूतः, परमिदं प्रकृतन्यावेनापि सिध्यतीति सोऽत्रै-) वान्तर्भूतः । 'मण्डूकम्युतिन्यायो'ऽप्यस्यैव प्रपञ्चस्तथाहि-यत्र पूर्वसूत्रस्थोऽधिकारः कतिचित्सू- त्राणि मुक्त्वा मण्डूकवने याति तत्रायं न्यायो, यथा “अव्व्वर्गात्वरे वोऽसन्” (१।४०) इति सूत्रस्थोऽसन्नित्यधिकारो "अ इ उ वर्णस्यान्तेऽनुनासिकोऽनीदादेः” ( ११२१४१) इति सूत्रमन्तराले ३५ २५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलधु- मुक्या "तृतीयस्य पञ्चमे" ( १।३।१) "प्रत्यये च" ( १।३।२) इति सूरयोर्गतस्तेन हि ककुम्मण्ड- लम् अम्मयम् इत्यादौ समासान्ततिविभत्त्या पदान्तस्थस्यापि मस्यासत्त्वात् "तो मुम०" (१।३।१४) इति अनुस्खारानुनासिकौ मा भूताम् । अत्राप्यधिकारप्रवृत्तिनिवृत्त्योरपेक्षात एव सिद्धिरिति ॥ १२ ॥ अर्थवशाद् विभक्तिपरिणामः ॥ १३ ॥ परिणामः परावर्तः, कार्य इति शेषः । यथा "अत आः स्यादौ जस्भ्यां ये” (१।४।१) इत्य- तोऽनुवर्तमानस्य पाठयन्तस्यापि अत इति पदस्य "मिस ऐस्” (१।४।२) इत्यन पञ्चम्यन्ततया परि- णामः । अस्यानित्यत्वात् 'तृतीयस्य पञ्चमें' ( १।३।१) इत्यतोऽनुवर्तमानस्य तृतीयस्येति पदस्य पञ्चम्यन्ततया परिणामनासिद्धावपि "ततो हश्चतुर्थः” (११३१३) इत्यन तत इत्युक्तम् ॥ १३ ।। अर्थचद्ग्रहणे नानर्थकस ॥ १४ ॥ १० सम्भवति, ग्रहणं, कार्यमिति त्रयः शब्दा अनाध्याहार्याः । अर्थवतः प्रत्ययादेहणे सम्भवति सत्य- नर्थकस्य ग्रहणं न कार्यम् । शब्दसारूप्यादुभयोर्ग्रहणे प्रसक्तेऽयं न्यायः, एवमग्रेतनेऽपि वाच्यम् । तत्र प्रत्ययस्य यथा, "तीयं डिस्कार्ये वा” (१।४।१४) इत्यत्र "द्वैस्तीयः" (७।१।१६५) इति सार्थ- कस्य तीयप्रत्ययस्यैव ग्रहणं, नतु जातीयत्ययगतस्यानर्थकस्य तीयस्य, तेन द्वितीयशब्दस्यैव स्माया- दिविकल्पो न तु पटुजातीयशब्दस्य । प्रकृतेर्यथा, प्लीहा प्लीहानी इत्यादौ हनो निरर्थकत्वात् “इन्ह- १५न्यूपार्यम्णः शिष्योः” (१।४१८७) इति सूत्रोक्तनियमाभवनेन “नि दीर्घ!" (११४१८५) इति दीर्घः । ज्ञप्तिकरं चास्य "तृस्वस०” (१।४।३८) इति सूने नप्तादीनां पृथगुपादानम् , तद्धि नप्तादीनां पृथगुपादानमौणादिकतृप्रत्ययान्तानामपि 'उणादयोऽन्युत्पन्नानि नामानि' इति न्यायात् अव्युत्पन्नसज्ञाश- ब्दत्वेन तृशब्दस्यानर्थकत्वाद् ग्रहणं न स्यादिति तेषां पृथग्रहणम् । अनित्यश्वायम् । 'अनिनस्मि- म्हणान्यर्थवताऽनर्थकेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्तीति न्यायेनास्योपोद्यमानत्वादिति ॥ १४ ॥ लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्तयैव ग्रहणम् ॥ १५ ॥ सम्भवतोरिति शेषः । यत् सामान्येन लिङ्गमान निर्दिश्य विहितं तलक्षण, लक्षणेन चरति "चरति" (६।४।११) इति इकणि लाक्षणिकमप्येतदुच्यते, यत्तु नामग्राहं विहितं तत्प्रतिपदोक्तम् । तत्रोभयो- ग्रहणे सम्भवति प्रतिपदोक्तं ग्राह्यं न तु लाक्षणिकम् , यथा "नोऽप्रशानो.” (११३१८) इत्यनेन वन्तत्रेयादो नस्य सो न स्यात् , अय हि नः "तौ मुम०” ( १।३।१४) इत्यनेनानुनासिक इति सामा- २५न्येनैव विहितः, पर वहयादिच्छन्नदेशे ककुदं दृष्ट्वा गवान भाव्यमितिवत्तकारं पुरो दृष्ट्वा तकारस्य खानु- मासिकेन नकारेण भाव्यमिति युक्त्या लक्षणाचिह्नादागत इत्यतो लाक्षणिकः । प्रतिपदोक्तस्य तु नस्य सः स्यात् । यथा भवास्तत्र, अत्र हि नोऽन्त इति नकारमेवोक्त्वा विहितत्वात् प्रतिपदोक्तः । ज्ञापकं त्वस्य "एकार्य चानेक च" (३३१०२०) इत्यनेनैव सिद्धेऽपि बहुव्रीही "आसन्नदूराधिक.” (३।१।२०) इत्यादि प्रतिपदोक्त बहुव्रीहिविधानम्, तद्धि "प्रमाणीसङ्ख्याः” (७३।१२८) इति डप्रत्ययविधी ३० तद्वहुव्रीहिमहणार्थम् , तेन आसन्नदशा इत्यत्रैव डः, "एकार्थ चानेकं चे”ति विहिते तु बहुव्रीही डो न स्वात् , यथा प्रिया दश येपांते प्रियदशान इति । अनित्यत्वाचास्य यथा “एदोद्भ्यां असिडसोर: (१।४।३५) इत्यत्र सेः गोः इत्यादौ प्रतिपदोक्योरेदोतोर्ग्रहणम् , तथा लुनातीति विचि गुणे डसि- डसोः परयोर्नेलरोः इत्यादापि "एदोद्भ्यां इसिडसोरः" समजनि । अस्य नित्यत्वे तु गुणलक्षणकृत- त्यादेदोती लामणिकाविति डसिडसोरत्वं न प्राप्नोति, । अस्य कचिल्लक्षणेन व्याकरणेन निष्पन्नं लाक्ष- ३५ णिक, अव्युत्पन्नं तु प्रतिपदोक्तमित्यप्यर्थो दृश्यते, यथा हनो हस्तनीदिवि अहन इत्यस्य लाक्षणिकत्यात् २० को प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुचिता न्यायाः "अह्नः” (२२११७४) इति नस्ल रुन स्वात् किन्तु अव्युत्पन्नस्यैव दिनार्थस्साहन्शब्दस्वेति, सोऽपि पूर्वव्याख्ययैव सङ्ग्रहीतो द्रष्टव्य इति ॥ १५ ॥ नामग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम् ॥ १६ ॥ नाममात्रनिर्देशे स्त्रीत्वादिलिङ्गविशिष्टमपि नाम ग्राह्यम् । झन्द्रार्थभेदादप्राप्तग्रहणस्य प्रापणार्थोऽयं न्यायः, एवमुत्तरन्यायेऽपि वाच्यम् , यथा "त्यदामेनदेतद०” (२।११३३) इति सूत्रे त्यदामिति नाम-५ मात्रनिर्देशेऽपि सदाद्यधिकारे सर्वत्र स्त्रीत्वादिविशिष्टानामपि त्यदादीनां ग्रहणात् सा स्या इत्यादी "तः सौ सः” (२।१।४२) इति से कर्तव्ये त्यदादेः सेश्च आपा व्यवधानं न स्यात् , आवन्तोऽपि सदादिस्त्यदादिरेवेति । नाममात्रग्रहणे इति किम् ? यत्र सलिङ्गनिर्देशस्तत्र तल्लिङ्गविशिष्टस्यैव ग्रहणं यथा स्यात् , तेन "अतः कृकमिकंस०” (२।३।५) इति सूत्रे कुशानिर्देशात् अयःकुश इत्यत्र रः सो न स्यात् । जापकं त्वस्य "राजन्सखेः" ७।३।१०६) इत्यत्र राजनिति नान्तनिर्देशः, स हि स्त्रीलिङ्गे-१० ऽनकारान्ते राजन्ाब्दे अट्समासान्तनिषेधाय, यथा महती चासौ राज्ञी च महाराज्ञी इत्यत्रानेन न्यायेन अप्राप्तोऽपि नान्तनिर्देशेन निपिध्यते । अनित्यत्वाचास्य "सर्वादिविष्वग्०” ( ३।२।१२२) इति डद्रिविपूचीशब्दान्न स्वात् [तथा सति विपूचव्यङ् इत्यनिष्टरूपापत्तेः] ॥ १६ ॥ प्रकृतिग्रहणे यलुवन्तस्यापि ग्रहणम् ।। १७ ॥ यस्मात् यः प्रत्ययो विधीयते सा तस्य प्रकृतिः, सा चात्र धातुरूपैव ग्राह्या, यङ्लुवन्तत्वस्यान्यत्रा-१५ सम्भवात् , एवमुत्तरन्यायेऽपि । यस्य धातोर्यत्कार्यमुक्तं तत्तस्य यङ्लुवन्तस्यापि स्यात् , तेन यथा प्रणिदत्ते इत्यत्र ने! णः तथा प्रणिदाद इत्यत्रापि स्यात् । ज्ञापकं त्वस्य “एकखरादनुस्वारेतः इति वृहत्सूत्ररचनम् । तथाहि-यद्यपि अनुस्वारेतः कृगादिधातवः सर्वेऽप्येकखरा एव तथापि यड्लुबन्तीकृता एते चर्क इत्यादिरूपा बहुस्वराः स्युस्ते एतेन न्यायेन कृगादिग्रहणेन गृहीता अनु- स्वारेतश्च स्युः । तेषां, स्थानिवत्तयाऽनुस्वारेतो वहुस्वरस्य हनादेशस्य वधधातोश्चेनिपेधनिवृत्तये एक-२० स्वरादिति वचनं सार्थकम् । तेन चर्करिता, अवधीत् इत्यादाविनिपेधनिवृत्तिर्वभूवेति । अनित्यत्वं चास्याग्रेतनेनापोद्यमानत्वादिति ।। १७ ।। तिवा? शवा२ऽनुवन्धेन३ निर्दिष्टं यद्गणेन ४ च । एकस्वरनिमित्तं५ च पञ्चैतानि न यलुपि ॥ १८ ॥ निर्दिष्टमिति तिवादिषु चतुर्वपि योज्यं, शेषं स्पष्टम् । तिवा निर्दिष्टं द्विधा, अलुप्तेन लुमेन च । तत्रा-२५ लुप्तेन यथा "न कवतेर्यक” (४।१।४७) इति कस्य चत्वनिषेधः, अयं कोकूयते इत्यादौ स्याचोक- वीतीत्यादौ तु न, लुप्तेन यथा, "डे पिवः पीप्य्” (४।१।३३) इति पीप्यादेशः पिवतेः केवलस्य स्थाद्यथा अपीप्यत्, यलुबन्तस्य तु न, यथा अपापयत् । १ । शवा निर्दिष्टं यथा, "निसस्तपेऽनासे- वायाम्” (२।३।३५) इति निसः सस्य पत्वं निष्टपतीत्यादौ स्यात् , निस्तातपीतीत्यादौ तु न । २ । अनु- वन्धेन यथा, "गापास्थासादामाहाकः (४।३।९६ ) इत्येत्वम् हेयादित्यादी स्यात् , जहायादित्यादौ ३० तु न । ३ 1 गणेन निर्दिष्टं त्रिधा, सङ्ख्यया, आदिशब्देन, बहुवचनेन च, तत्र सङ्ख्यया यथा, "रुत्पञ्चकाच्छिदयः” (१।४।८८) इति इट् स्वपितीत्यादौ स्यात् सोपोप्तीत्यादौ तु न स्यात् ; आदि- शब्देन यथा, "दिवादेः श्यः” (३।४।७२) अयं दीव्यतीत्यादौ स्यात् , देदिवीतीत्यादी तु न; बहुव- चनेन यथा “द्युझ्योऽद्यतन्याम्" (३।३।४४) इत्यात्मनेपदविकल्पः, सोऽद्युतत् अद्योतिष्ट इत्यादी स्यात् , अदेद्योतीदित्यादौ तु न । आदिशब्देन बहुवचनेन चेत्युभाभ्यां यथा, "तेर्महादिभ्यः” (४४.३३) ३५ है. प्रका० पूर्वा० ४ ..

२६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते सोपज्ञहेमलघु- इति इटोऽनुज्ञाविधिः भणितिरित्यादौ स्यात्, न तु वम्भाण्टि इत्यादौ । ४ एकखरनिमित्तं यथा "एकस्वरादनुस्वारेतः” (४।४५६) इतीनिषेधः शक्त इत्यादौ स्यात् शाशकित इत्यादौ तु न, नचात्र बहुस्वरत्वान्नेनिषेध इत्याशङ्कनीयं, पूर्वोक्तन्यायेन शकिग्रहणेन गृहीतत्वादेकस्वरत्वमेवेति 'एकस्वरनिमित्तं यड्लुपि न इतीनिषेधो न । ५। ज्ञापकं त्वस्य तत्तत्सूनेषु तिवादिनिर्देशा एव । अनित्यत्वं चास्याये ५पञ्चमे वाशे न दृश्यते शेपेषु तु दृश्यते, तन द्वितीये यथा अपात् इत्यादाविर अपापादित्यादायपि पिबैतिदा०" (४।३।६६) इति शनिर्दिष्टोऽपि सिचो लुविनिपेधश्चाभूताम् , तृतीये यथा नृत्त इत्यादाविव नरीनृत्त इत्यादावपि "डीयश्व्यैदितः” (४।४।६१) इत्यनेनानुवन्धनिर्दिष्टोऽपीड्निपेधोऽजनि, तुर्य यथा, स्प्रष्टेयादाविव स्पृशेर्यड्लुपि रागमे तिवि पप्रेष्टि इत्यादावपि "स्पृशादिसृपोवा” (४।४।११२) इति गणनिर्दिष्टोऽप्यदागम आगात् ॥ १८ ॥ सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य ॥ १९ ॥ सन्निपतति सङ्गच्छते कार्यमस्मिन्निति सन्निपातो निमित्तं तल्लक्षणं चिह्न यस्य कोऽर्थ:-स्वनिमित्तादु- द्भूतः, सविधिस्तस्य प्रस्तावात् स्वनिमित्तस्य विधाताय न भवति, लोके पितृधातकपुनादी कार्यादपि कार- णविघातस्य दर्शनाद् व्याकरणे तथात्वनिषेधार्थोऽयं न्यायः । यथा पपाचेत्यादौ णवा जातमनेकवरत्वं "धातोरनेकखरादाम्०" (३।४।४६) इत्यामादेशसम्पादनेन गयो विघाताय न भवति । ज्ञापकं १५त्वस्य "धातोरनेकस्वरादाम्" इत्यत्र सामान्येनानेकस्वरत्वाभिधानं, तद्धि अनेन न्यायेन पपाचेत्यादाव- नेकवरत्वस्य णग्निमित्तत्वादाम् भविष्यति, चकासाञ्चकारेत्यादौ स्वाभाविकानेकस्वरत्वाद्भविष्यति इत्य- भिप्रायेणेति । अनित्यश्चायं, तेनातिजरसैरित्या अतिजरशब्दस्यादन्तत्वेन निष्पन्नो "भिस ऐस्" (१।४।२) जरसादेशहेतूभवनेन स्वहेतोरदन्तस्य विघाताय जातः । अनित्यत्वज्ञापकं च एस्करणे- ऽपि देवैरित्यादिप्रयोगसिद्धावपि ऐस्करणमतिजरसैरिति प्रयोगसिद्धयर्थम् , स च प्रयोगोऽस्य न्यायस्य २० नित्यत्वे न सम्भवतीति प्रागेवोक्तमिति ॥ १९ ॥ असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे ॥ २० ॥ प्रकृतेराश्रित यत्स्याद्यद्वा पूर्व व्यवस्थितम् । यस्य वाल्पनिमित्तानि अन्तरङ्गं तदुच्यते ।। १ ॥ प्रत्ययस्याश्रितं यत्स्याद्वहिर्वा यद्व्यवस्थितम् । बहूनि वा निमित्तानि यस्य तद्बहिरङ्गकम् ।। २ ॥ वहिरङ्ग कार्यमन्तरङ्गे विधौ कर्तव्येऽसिद्धमसदिव स्यात् । बहिरगदौर्बल्यख्यापनार्थोऽयं न्यायः; यथा गिर्योरित्यादौ प्रत्ययाश्रितत्वावहिर्व्यवस्थितत्वाद्वा बहिरङ्गस्य यत्वस्य प्रकृत्यानितत्वात्पूर्वव्यवस्थि- तत्वाद्वाऽन्तरङ्गे "भ्वादेर्नामिन०" (२।११६३) इति दीर्घे कर्तव्येऽसिद्धत्यादी! नाभूत् । ज्ञापकं त्वस्य "न सन्धिडी.” (७।४।१११) इति सूने सन्धिविधित्वेनैव द्वित्वविधौ स्थानिवद्भावनिषेधे ३० सिद्धेऽपि द्विग्रहणम् , तथाहि दयनेत्यादौ "अदीर्घाद्विराम०” (१।३।३२) इति सूत्रेण धस्य द्वित्वे नियमाणे "स्वरस्य परे प्राग्विधौ” (७४।११०) इति यत्वस्य स्थानिवद्भावो विघ्नीभवन न सन्धि०" इति सूने सन्धिग्रहणेन निपिद्धः । द्वितीयतृतीयपादयोः सन्धिविधी हि क्रमेण स्वरव्यञ्जनसन्धी उच्येते, एव स्थितेऽपि यत् "न सन्धिः” इति सूने सन्धितः पृथग् द्विग्रहणं, तदनेन न्यायेन यत्वस्य स्थानिवद्भावो मा भूदित्यभिप्रायेणेति । द्वित्वं हि पूर्वव्यवस्थितत्वादन्तरङ्गं यत्वं च बहि- ३५व्यवस्थितत्वादहिरगामिति ॥ २० ॥ २५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संशाधिकारः । सूरिसमुच्चिता न्यायाः २७ न खरानन्तर्ये ॥ २१॥ स्वरयोरानन्तर्ये सति यदन्तरङ्गं कार्य क्रियते, तस्मिन्कर्तव्ये वहिरङ्गमसिद्धं न स्यात् , पूर्वस्या- पवादोऽयं न्यायः, यथा इयेप, बभूवुपा, अत्र वहिर्व्यवस्थितत्वाद्वहिरङ्गोऽपि इप्धातोर्गुणः कसोरुपादेशश्च पूर्वव्यवस्थितत्वादन्तरङ्गे यथाक्रम "पूर्वस्यास्खे स्वरे०” (४३११३७ ) इतीयादेशे "धातो- रिवर्णस्ये०” (२।१।५०) इत्युवादेशे च कर्तव्येऽसिद्धो नाभूत् , स्वरयोरानन्तर्यसद्भावात् । ज्ञापकं५ त्वस्य "वृत्त्यन्तोऽसपे" ( १।१।२५) इति निर्देशस्तथाहि, अन "अतोऽति रोरुः” (१।३।२०) इत्यनेन कृतस्य उत्वस्य पदान्तरस्थाकारसापेक्षत्वेन बहिरङ्गस्य, "अवर्णस्येवर्णादि०” ( १।२।६) इति सूत्रेण प्रास्थिताकारेण सह ओत्वे एकपदापेक्षत्वेनान्तरङ्गे कर्त्तव्ये, पूर्वन्यायेन यद्यसिद्धत्वं स्यात्तदा ओत्व- स्याभवनात् "वृत्त्यन्तोऽसपे' इति निर्देशो न सम्भवतीति ॥ २१ ॥ गौणमुख्ययोर्मुख्य कार्यसम्प्रत्ययः ॥ २२ ॥ यथा "नामिनो गुणोऽविति” (४।३।१) इत्यत्र मुख्यधातोरेव ग्रहणं तेन नीभ्यां लूभ्यां इत्यादी विवन्तत्वेन गौणधातोर्गुणो न स्यात् । अनित्यत्वाचास्य "धातोरिवर्णोवर्णस्य” इत्यत्र गौणस्यापि ग्रह- णम् , तथाहि वस्विच्छतः वसूयतस्ततः क्विपि "अतः” (४।३।८२) इत्यल्लुकि "योऽशिति" (४।३।८०) इति यलुकि वस्वौ वस्त्र इत्यादी वत्वसिद्धयर्थ "स्यादौ वः” ( २।१।५७) इति सूत्रं कृतम् , वत्वं च "इवर्णादेरखे स्वरे०” ( १।२।२१) इत्यनेनापि सिद्ध्येत् परं 'वार्णात्प्राकृतमि तिन्यायात्परत्वाच्च १५ "इवर्णादेरि"ति वत्वं वाधित्वा "धातोरिवणे"त्युवेव प्रवर्तते इति तद्वाधनाथ "स्यादौ वः" इति सूत्रम् , ततोऽस्य न्यायस्यानित्यत्वात् "धातोरिवर्णे"त्यत्र गौणस्यापि धातोर्ग्रहणमिति । "प्रधानानु- यायिनो व्यवहारा” इत्यपि न्यायोऽस्ति, यथा मुनीन् इत्यादौ इकारस्य शसोऽकारस्य चेत्युभयोः स्थानित्वेऽपि पष्टया निर्दिष्टत्वेन मुख्यस्थानिन इकारस्यैवासन्न ईकारो दीर्घः स्यात्, नत्वकारस्यासन्न आ, "शसोऽता०" (११४।४९) इति सहार्थनिर्देशेनाकारस्य गौणत्वादिति । परमयमपि न्यायोऽत्रैवा-२० म्तर्भूत इति । 'प्रधानानुयाय्यप्रधान'मित्यपि न्यायोऽस्ति, यथा नीलोत्पलमित्यत्रोभयोरपि पदयो- य॑भिचारित्वेनान्यव्यवच्छेदकत्वाद्विशेपणसम्भवे "विशेपणं विशेष्येण०” (३।११९६) इति कर्मधा- रये उत्पलनीलमित्यपि स्यात्तथापि 'द्रव्याश्रयी गुण' इति न्यायागुणवाचिनो नीलशब्दस्याप्रधानत्वं द्रव्य- वाचिन उत्पलशब्दस्य प्रधानत्वमिति स एव पुरोभूयावतिष्ठमानः क्रियान्वयित्वं लभते इति । अय- मपि न्यायोऽत्रैवान्तर्भूतः । मुख्ये एव कार्यसम्प्रत्यय इति क्रियान्वयित्वलक्षणं कार्यं मुख्ये एव २५ भवतीति ॥ २२ ॥ कृत्रिमाकृत्रिमयोः कृत्रिमे ॥ २३ ॥ कृत्रिमं परिभाषानिष्पन्नं, तच्च गौणमौपाधिकत्वात्। ततोऽन्यदकृत्रिमं लोकप्रसिद्धं तच्च मुख्यमनौ- पाधिकत्वात् । तयोर्मध्ये कृत्रिमे कार्य कार्यम् , पूर्वेणाकृत्रिमस्य ग्रहणे प्राप्ते तद्पवादोऽयं न्यायः; यथा "असहनञ्” ( २१४।३८) इत्यादिसूत्रेपु, "अविकारो द्रवं मूर्त प्राणिस्थं स्वाङ्गमुच्यते । च्युतं ३० च प्राणिनस्तत्तत्तन्निभं च प्रतिमादिपु” ॥१॥ इति पारिभाषिकमेव स्वाङ्गं ग्राह्यं तेन दीर्घमुखा शालेत्यत्र स्वाङ्गत्वाभावात् ङीन स्यात् । ज्ञापकं त्वस्य "आङो यमहनः स्वेऽङ्गे च" ( ३१३१८६) इत्यत्र स्वाङ्गशब्दयोय॑स्ताभिधानम्, इदं हि आयच्छति पादौ मैत्रस्य चैत्र इत्यादौ पारिभापिकाङ्गलक्षणे सत्यपि मैत्रपादयोश्चैत्रस्य स्वावयवत्वाभावादात्मनेपदं मा भूदित्येवमर्थम् । स्वाङ्ग इति समस्ताभिधाने तु स्वाङ्गलक्षणसद्भावादेतन्न्यायादवात्मनेपदमभविष्यदेवेति । अनित्यत्वं त्वस्योत्तरेण दर्शयिष्यते ॥२३॥ ३५ . २८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- क्वचिदुभयगतिः ॥ २४ ॥ कचित् कृत्रिममकृत्रिमं चेत्युभयमपि ग्राह्यम् , यथा "नाडीतत्रीभ्यां स्वाङ्गे" (७।३।१८०) इत्यनेन 'बहुनाडिः कायो', 'बहुतन्त्री प्रीवे'त्यत्र कृत्रिमवाझवृत्त्योः नाडीतत्रीशब्दयोर्यथा कच् निषिध्यते, तथा 'बहुनाडिः स्तम्बो', 'बहुतत्री वीणे त्यादावपि कच् निषिध्यते, अत्र हि नाडीतत्र्योरप्राणिस्थत्वात् ५न कृत्रिमं स्वाङ्गत्वम् । न च स्तम्बस्यैकेन्द्रियत्वात्कथमप्राणिस्थत्वमित्याशङ्कनीयम्, "प्राण्यौपधिवृक्षे- भ्य” (६।२।३१) इत्यत्र वृक्षौपधीनां प्राणिभ्यः पृथदिशेनेह शास्त्रे प्राणिशब्देन सा एव प्राह्या नतु स्थावरा इति । अनित्यश्चायं कचिदित्युक्तेः ॥ २४ ॥ सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः ॥ २५ ॥ नैरर्थक्यशङ्कानिरासार्थोऽयं न्यायः, यथा दण्डीत्यादौ "नि दीर्घः” (१४८५) इति दी सिद्धेऽपि १० "इन्हन्पूषा.” (१।४।८७) इति सूत्रारम्भो नियमार्थ एव । नियमश्चायं-इनादीनां शिस्योरेव दी! नान्यघुटीति, तेन दण्डिनावित्यादौ "नि दीर्घ" इत्यनेनापि दी| न स्यात् । ज्ञापकं त्यस्य पुनः सूत्रारम्भ एव । अनित्यत्वाचास्य पूजार्ह इत्यादौ "लिहादिभ्यः" (५।११५०) इत्येवाचि सिद्धे "अर्होऽच्” (५।११९१ ) इत्यादि पसूत्रारम्भो लिहादिप्रपञ्चाओं नतु नियमार्थ इति ।। २५ ॥ धातोः स्वरूपग्रहणे तत्प्रत्यये कार्यविज्ञानम् ॥ २६ ॥ १५ यत्कार्य धातोः स्वरूपमुच्चार्य प्रत्यये परे उक्तं तत्तस्य धातोरेव सम्बन्धिनि प्रत्यये परे स्यात् न तु किबन्तत्वेन नाम्नोऽपि सम्बन्धिनि, यथा दुष्यन्तं प्रयुझे दूपयतीतिवत् दोपणं दुट् किप तां करोतीति णिजि दुपयति, अत्र "ऊदुपो णौ" (४।२।४०) इत्यनेन उत ऊन, यतोऽन्न किवन्ता धातुत्वं नोज्झन्ति शब्दत्वं च प्रतिपद्यन्ते' इति धातुत्वनामत्वोभयसद्भावः । ज्ञापकं त्वस्य "ऊहुपो णावि"- त्यादि सूत्रेषु विशेषणानुक्तिरेव ॥ २६ ॥ नजुक्तं तत्सदृशे ॥ २७॥ यत्पदं ना योगानिषिध्यते, तत्र तत्सदृशमेवापरं ग्राह्यं नत्वसदृशम् , यथा "यक्ये" ( ११२।२५) इत्यत्र क्यप्रत्ययेन नचुक्तेन क्यसदृशस्य यकारादेरपि प्रत्ययत्वनियमनात् गां नावं वेच्छति क्यनि गव्यति नाव्यतीत्यत्रवद् गोयानं नौयानमित्यादाववावौ न । अनित्यत्वाचास्य पर्युदासे प्रवृत्तिने प्रसज्ये । उक्तं च-'पर्युदासः सहग्ग्राही प्रसज्यस्तु निषेधकृदि'ति, ततश्च "अनतो लुप्" (१४५९) २५ इत्यत्र प्रसज्यनसद्भावादकारसदृशस्य केवलस्य स्वरस्यैव न ग्रहणम्, किन्स्वकारवर्जसर्वस्वराणां व्यञ्जनानां च ग्रहणम् , तेन पय इत्यादौ व्यञ्जनान्तादपि स्यमोल्प् सिद्धा । एवं च निषेधमात्रपर्य- वसायिनः प्रसज्यनजः प्रतिकूलोऽयं न्यायः ॥ २७ ॥ उक्तानामप्रयोगः ॥२८॥ उक्तः प्रत्यायितोऽन्यः प्रत्ययाद्यैरों येषां तेषां द्वितीयादि विभत्यादीनां ? प्रयोगो न कार्य, ३० यथा क्रियते कटोऽनेनेत्यादौ कर्मादिपूत्पन्नैरात्मनेपदाथैः कर्मादिशक्तयः प्रत्यायिता इति न तत्प्रत्यायनाय फटादेर्द्वितीयादि, ततः परिशिष्टेऽर्थमाने प्रथमेति ।। २८ ॥ निमित्ताभावे नैमित्तिकस्याप्यभावः ॥ २९ ॥ निमित्तनिवृत्तौ नैमित्तिकं तज्जातं कार्यमपि निवर्त्तते इति भावः, लोके कुम्भकाराभावेऽपि घटो दृश्यते, इह तु नैयमिति स्यातिकरोऽयं न्यायः । यथा विम्वशब्दालताविशेषविवक्षायां स्त्रीत्वे गौरादित्वात् ड्याम्, २५"अस्य डयां लुक" (२।४।८६) इति बिम्वाकारलुकि च पिम्बी, तदनु बिम्ब्याः फलं विम्बम्, अत्र २० २९ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुच्चिता न्यायाः 'हेमादित्वादनि “फले" (६।२।५८) इति तल्लुपि, “ड्यादेगौणस्य.” (२।४।९५) इति डी- निवृत्ती, "अस्य डयां लुक्” ( २।४।८६) इति ङीजाताया अल्लुकोऽपि निवृत्त्या अकारः प्रत्यावृत्त इति । अस्य ज्ञापकं तु "न सन्धि०” (७।४।१११) इति सूत्रे ङीलुकोऽल्लुकि कार्ये स्थानिवद्भावनिपेधोक्तिः, तथाहि-"न सन्धिः” इति सूत्रवृत्तौ डीपरे विधि/विधिस्तस्मिन् अल्लुग्लक्षणे डीविधौ कर्त्तव्ये डीलुगलक्षणः स्वरस्यादेशः स्थानिवन्न भवति, यदि च लुग्रूपस्य खरादेशस्य स्थानिवद्भावेन ङी सद्भूतः ५ स्यात् तदा पुनरपि "अस्य यां लुक्" इत्यकारलुकि विम्वमिति न सिद्धयति, ततो "न सन्धिङी” इति सूत्रे ङी लुकः स्थानिवद्भावो निपिद्धः, ततोऽनेन न्यायेन डीनिवृत्तौ अल्लुको निवृत्तौ विम्वमिति सिद्धम् । अनित्यत्वाचास्य "दी? नाम्यतिसृचतसृष्टः” (१।४।४७) इति दीर्घे कृते हवनाशेऽपि हस्त्रजो नाम् न नष्टः ॥ २९ ॥ सन्नियोगशिष्टानामेकापायेऽन्यतरस्याप्यपायः ॥ ३० ॥ १० सन्नियोगः सहोक्तिस्तेन शिष्टानामुक्तानामेकस्याभावेऽन्यस्याप्यभाव इति भावः । अभावश्च द्विधा, भूत्वा निवर्त्तनं मूलतोऽप्यभवनं च । तत्राद्यं यथा, पञ्चेन्द्राण्यो देवता अस्य पञ्चेन्द्रः, अत्र "देवता" (६।२।१०१) इत्यणि "द्विगोरनपत्ये यस्वरादे बद्विः” ( ६।१।२४ ) इत्यण्लुपि "यादेगौणस्य." (२।४।९५) इति डीनिवृत्तौ “वरुणेन्द्ररुद्र०" (२।४।६२) इति ङीसन्नियोगशिष्ट आनपि निवृत्तः, द्वितीयं यथा, एतान् गाः पश्येत्यत्र गोरोतः शसोऽता सह "आ अम्झसोऽता” (१।४।७५ ) १५ इत्यात्वे शसो अकारस्याभावात् “शसोऽता सश्च नः पुंसि” (१।४।४९) इति दीर्घस्याभवनात्तेनैव सूत्रेण दीर्घसन्नियोगे उक्तं नत्वमपि नाभूत् । ज्ञापकं त्वस्य आननिवर्तनाय नत्वनिषेधाय च यत्नाक- रणमिति ॥ ३० ॥ नावाचीयमाननिवृत्तौ प्रधानस्य ॥ ३१ ॥ अप्राधान्येन विधीयमानमन्वाचीयमानं, तन्निवृत्तौ प्रधाननिवृत्तिर्न भवति, किन्तु 'मुख्यस्याभावे २० गौणस्याप्यभाव' इत्येव स्यात् , पूर्वेण यदृच्छायां प्राप्तायां नियमार्थोऽयं न्यायः; यथा बुद्धीः धेनूः, अत्र पुंस्त्वाभावात् "शसोऽता” इत्यनेन शसः सस्य नत्वाभावेऽपि प्रधानतयोक्तो दीर्घः स्यादेव । ज्ञापकं त्वस्य "शसोऽता सञ्च०” इति सूत्रे नत्वविधेः 'सश्च नः' इत्यन्वाचयार्थेन चेन निर्देशः । यतो गौणत्वेन समु- चयस्तावदन्वाचय उच्यते, गौणत्वस्य चैतावानेव विशेपो यद्गौणस्यं निवृत्तौ मुख्यं न निवर्तत इति । [ अनियमस्त्वस्य न प्रतिभासते] ॥ ३१ ॥ निरनुवन्धग्रहणे न सानुवन्धकस्य ॥ ३२ ॥ कार्य स्थादितीहोत्तरत्र च विशेषः । निरनुवन्धं कञ्चनशब्दं सूत्रे उच्चार्य यत्कार्यं विहितं, तत्कार्य तस्य शब्दस्य निरनुवन्धस्य ग्रहणे सम्भवति सानुवन्धकस्य न स्यात् , अविशेपोत्त्योभयोर्ग्रहणे प्राप्ते तंद- पवादोऽयं न्यायः । यथा “येऽवणे" (३।२।१००) इत्यत्र "तस्मै हिते" (७१।३५) इत्यादि चिहिते निरनुवन्ध एव ये नासिकाया नसादेशः स्याद्यथा नासिकायै हितं नस्यं घृतम् । सानुबन्धे तु ये झ्यादिरूपे ३० न स्यात् , यथा नासिकानास्ति "सुपन्ध्यादेयः” (६।२।८४) इति चातुरर्थिक ब्ये नासिक्यं नगरम् । ज्ञापकं त्वस्य "न यि तद्धिते” (२।१।६५) इत्यत्र ये इत्यकरणम् , तथाहि-यं इति व्यञ्जनमात्रो पादाने ताशस्य यप्रत्ययस्यासम्भवादेतन्यायाप्रवृत्तेनिरनुवन्धसानुवन्धयोर्ग्रहणं कर्तुं शक्यते, अकारस- हितोपादाने तु तादृशस्य निरनुवन्धस्य यप्रत्ययस्य सम्भवात्सानुबन्धस्य यादेः प्रत्ययस्य ग्रहणमेतन्न्याया- कत्तुं न शक्यते, अतः सानुवन्धस्यापि यस्य ग्रहणार्थ यिति व्यञ्जनमानोपादानं कृतं, ये इति तु ने कृतमिति ॥ ३२ ॥ my ३० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते स्वोपज्ञहैमलघु- एकानुवन्धग्रहणे न यनुवन्धकस्य ॥ ३३ ॥ सूत्रोक्तस्यैकानुबन्धस्य ग्रहणे सम्भवति सति तत्सूत्रकार्य ब्यनुवन्धकस्योपलक्षणाच्याद्यनुवन्धकस्य न स्यात्, यथा “य्यक्ये” ( १।२।२५) इत्यत्र एकानुवन्धस्य क्यस्य वर्जनात् ब्यनुवन्धके क्यनि क्यडि चावाचौ स्यातामेव, यथा गव्यति गव्यते, नाव्यति नाव्यते । ज्ञापकं त्वस्य दीर्घश्वि०" (४३३१०८) ५इति सूत्रे बहुवचनम् , इदं हि क्यन्क्यड्क्यड्यामविशेषेण ग्रहणार्थम् , यदि चायं न्यायो न स्यात्तदा जातिविवक्षया एकवचनेनापि सर्वेषां ग्रहणं सिध्यतीति किमर्थ वहुवचनं क्रियेतेति ॥ ३३ ॥ नानुवन्धकृतान्यसारूप्यानेकखरत्वानेकवर्णत्वानि ॥३४॥ असारूप्यं मिथो विसदृशरूपत्वं तथाऽनेकस्वरत्वमनेकवर्णत्वं चानुवन्धवशान्न स्युः । यथा अणो डेना- सरूपत्वं नास्तीत्यतो गोद इत्यत्र "आतो डो ऽहावामः" (५।११७६) इति डविपये "कर्मणोऽण" १०(५।१।७२) इत्यण "असरूपोपवादे वोत्सर्गः प्राक् क्तेः" (५।१।१६) इत्यनेनानुमतत्वान्न स्यात् । अणि हि गोदाय इत्यनिष्टं रूपं स्यादिति । तथा 'डुपचीपू पाके' इत्यस्य धातोरनुवन्धवशादनेकखर- त्वाभावात्पपाचेत्यत्र परोक्षाया "धातोरनेकखरादाम्०” (३।४।४६) इत्यामादेशो न स्यात् । तथा अनुवन्धवशादनेकवर्णत्वाभावात् "वन्याड्पञ्चमस्य" (४।२।६५) इत्याडादेशस्य डिवेनानेकवर्णत्वा- 'भावात् 'घुणि भ्रमणे', 'धन भक्तावि'त्याभ्यां "मन्वनकनिप्०” (५।१।१४७) इति पनि घ्यावा, १५वावा इत्यत्र "पष्टयाऽन्त्यस्य” (७४।१०६) इति परिभापया पञ्चममात्रस्यैवाडादेशो नतु "अनेक- वर्णः सर्वस्य" (७१४।१०७) इति परिभाषया पश्चमान्तस्य सर्वस्य धातोरिति ॥ ३४ ॥ समासान्तागमसंज्ञाज्ञापकगणननिर्दिष्टान्यनित्यानि ॥ ३५ ॥ एतानि पट् अनित्यानि अनियतानि, यथासूत्रं कचिन्न स्युः कचिदन्यथा स्युरित्यर्थः । समासान्ता- दीनां नित्यत्वे प्राप्ते तन्निषेधार्थोऽयं न्यायः । तत्र समासान्तो यथा वह्याम्पि, वह्नम्पि, सरांसि इत्यत्र २० "ऋक्पःपथ्यपोऽत्” (७३।७६ ) इत्यत् समासान्तः प्राप्तोऽपि न स्यात् । ज्ञापकं त्वस्य "ऋक्पू:- पथ्यपोऽत्" इति निर्देश एव, अत्समासान्तो हि पथ्यपादिति स्यात् । आगमो यथा पट्टा पटिता अत्र पटेः सेट्वात् नित्यं प्राप्तोऽपि वेद, पक्का पचिता, आस्कन्तव्यम् आस्कन्दितव्यमित्यत्र पचि- स्कन्द्योरनिट्वेऽपि वेट , तथा धावेरूदित्त्वाद्वेट्वेपि गतौ क्तयोनित्यमिट धावितः धावितवान् , शुद्धौ तु नेट् धौतः धौतवान् , तथा जभेस्तिवि जम्भतीत्यत्र “जभः स्वरे” (४।४।१००) इति नागमः, २५ जञ्जभीति इत्यन्न तु अनित्यत्वात् न, तथा कमेणिडि आनशि मागमे कामयमानः, अनित्यत्वान्माग- माभावे कामयान इत्यपि । ज्ञापकं तु इड्नागममागमादिविकल्पयत्नाकरणम् । संज्ञानिर्दिष्टं यथा, परोक्षेति संज्ञानिर्दिष्टो "धातोरनेकखरादाम्०" (३।४।४६) इत्याम् चकासामासेत्यादौ स्यात्, ददरिद्री इत्यादौ न स्यात् । ज्ञापकं त्वस्य "आतो णव औः” (४।२।१२०) इत्यत्र ओकारे- णैव पपौ इत्यादि सिद्धावपि औविधानम् , तद्धि ददरिद्रौ इति सिध्यर्थं कृतम् , अन्यथा "अशियसन् ३० गकच्णकानटि” (४।३।७७) इत्यालोपे ददरिद्रा इति रूपं प्रसज्यते, यदि च दरिद्रेर्णव आम् ऐका- न्तिकः स्यात्तदा दरिद्राञ्चकार इत्येव भवनादौत्वस्यानवकाशत्वादौत्वं नाकरिष्यदिति । ज्ञापकं-सौत्र- निर्देशगणपाठादि तनिर्दिष्टं यथा “दशैकादशादिकश्च" (६४।३६) द्वितीयान्ताद्दशैकादशशब्दात् गृहाति इत्यर्थे इक इकट् च स्यात्, दशभिरेकादश दशैकादशाः तान् गृहातीति दशैकादशिकः, दशैकाद- शिकी स्त्री, अन सौत्रनिदेशेन दशैकादशशब्दस्यादन्तत्वप्राप्या दशैकादशान् गृहातीति याक्यम्, सौत्र- ३५निर्देशसिद्धस्यादन्तत्वस्यानित्यत्वाच्च दशैकादश गृहातीत्यप्यवाधितमेय; ज्ञापकं त्यस्य "पूर्वपदस्थाना- ३१ १ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुच्चिता न्यायाः त्र्यगः” (२।३।६४) इत्यत्राग इति, तञ्च ऋगयनमित्यत्र णत्वनिषेधार्थ, तन्निपेधश्च "शिक्षादेश्चाण" (६।३।१४८ ) इति सूत्रे शिक्षादिगणे ऋगयनमिति नान्तपाठरूपाज्ज्ञापकात् सिध्यति । परं गणपाठ- निर्दिष्ट्रस्यानित्यत्वं सम्भाव्य प्रागुक्तसूत्रे अग इत्युक्तमिति । ननिर्दिष्टं यथा क्रुङ् उ आस्ते क्रुङ्- वास्ते, किम् उ आवपनं किम्वावपनं, अत्र वस्य "अब्वर्गात्स्वरे वोऽसन्” ( १।२।४०) इत्यसत्त्वात् स्वरे परे "हस्वान्डणनो द्वे" ( ११३२७) इति ङस्य द्वित्वं जातं मस्य तु पुरो व्यञ्जनाभावात् "तौ५ मुम०” ( १।३।१४) इत्यनुस्खारानुनासिकौ नाभूताम् , असद्भावस्य नग्निर्दिष्टत्वेनानित्यत्वात्तु तद् उ अस्य मतं तव्वस्य मतमित्यादौ "ततोऽस्याः" ( १।३।३४) इति वस्य द्वित्वम् ; ज्ञापकं त्वस्य, "च्याप्तौ स्सात्” (७।२।१३०) इति द्वितीयः सः, अयं हि अग्निसादित्यादौ पत्वनिषेधाय, तन्निपे- धस्तु "वृत्त्यन्तोऽसपे" ( १११।२५) इत्यत्र वृत्त्यन्तः पदसंज्ञो न स्यात् , परमसपे सस्य पत्वे कर्तव्ये पदमेवेति 'सात्' इत्यस्य पदसंज्ञत्वात्पदादित्वादेव पदान्तर्भावी पो न भविष्यति, परं त्वस्य ननिर्दिष्ट-१० त्वेनानित्यत्वं सम्भाव्य प्रागुक्तसूत्रे द्वितीयसकारग्रहणं कृतम् । अनित्यत्वाचास्य केचिदेव समासान्ता- दयोऽनित्यत्वाद्यथाप्रयोगदर्शनं क्वचिद् भवन्ति कचिन्न भवन्ति च, अन्ये तु समासान्तादयः पडपि स्वविपयं प्राप्य स्युरेदेति नित्या एवेति ॥ ३५ ।। पूर्वेऽपवादा अनन्तरान् विधीन् बाधन्ते नोत्तरान् ॥ ३६ ॥ पूर्वमुक्तानि वाधकानि वक्ष्यमाणवाध्यमध्येऽनन्तरान् विधीन्प्रतिपेधन्ति न तु व्यवहितान् , तेषा-१५ मपि निपेधे प्राप्तेऽयं न्यायः। यथा "श्लिप:" (३।४।५६) इति सक् अनन्तरं पुष्याघडं बाधते न तु व्यवहितं भावकर्मविचं तेन आश्लिक्षत्कन्यां चैत्र इत्यत्रा न स्यात् , आश्लेपि कन्या चैत्रेणेति बिच् स्यादेव । ज्ञापकं त्वस्य सअनिचूसूत्राणामेवमुपन्यासक्रम एव ।। ३६ ।। मध्येऽपवादाः पूर्वान् विधीन् वाधन्ते नोत्तरान् ॥ ३७ ॥ वर्तमाना इति शेषः। उक्तवक्ष्यमाणवाध्यमध्ये वर्तमानानि वाधकसूत्राणि प्राविधीन् वाधन्ते नोत्त-२० रान्, तेषामपि वाधकत्वे प्राप्तेऽयं न्यायः, यथा “ब्रह्मभ्रूणवृत्रात् किप्” (५।१।१६१) इत्यनेन भूतकाले विहितः विप् ब्रह्महतवान् ब्रह्महा इत्यादौ प्रागुक्तान् "कर्मणोऽण्” (५।१।७२) इत्यणं "ब्रह्मादिभ्यः" (५।१।८५) इति टकं "हनो णिन्” (५।१११६०) इति णिनं च वाधते न तु वक्ष्यमाणं "क्तक्त- वतू" ( ५।१।१७४) इति क्तवतुं तेन भूतेऽर्थे वाच्ये ब्रह्मघातः ब्रह्मनः ब्रह्मघातीति प्रागुक्तसूत्रप्रत्ययानि न स्युः । ब्रह्महतवानिति क्तवतुरूपं तु स्यादेव । ज्ञापकं त्वस्येहकप्रयोगा एवेति ॥ ३७ ॥ यं विधि प्रत्युपदेशोऽनर्थकः स विधिर्वाध्यते ॥ ३८ ॥ यस्य सूत्रस्य यत्र प्रवर्त्तने किञ्चित् फलं नास्ति तत्सूत्रं तत्र वाध्यते न प्रवर्त्तते इत्यर्थः, यथा 'तनि- यजियजिभ्यो डद्' (उणा० ८९५) इत्यौणादिके डप्रत्यये तद् त्यद् यद् अन्न दस्य पुनः "धुटस्त- तीयः” (२।११७६) इति प्राप्नोति, परं निष्फलत्वान्न क्रियते, तथा संचस्कारेत्यत्र स्कृ स्कृ इति द्वित्वे "अघोपे शिटः” (४।१।४५) इत्याद्यस्सटो लुकि तत्स्थाने पुनः स्सट् तल्लुक् च प्राप्नुतः परं व्यर्थ-३० त्वात्तौ न क्रियेते निष्फले हि कृते क्रियानुपरमप्रसङ्ग इति ।। ३८ ।। यस तु विधेनिमित्तमस्ति नासौ विधिर्वाध्यते ॥ ३९ ॥ यथा तचारु इत्यादौ दस्य तृतीयविधिः क्रियते एव न तु वाध्यते निमित्तसत्त्वात् , तथाहि-"धुट- स्तृतीयः” इत्यसदाधिकारविहितस्य दत्वस्य "चजः कगम्” (२।११८६) इति परकार्ये कर्तव्ये अस- स्यात्तत्स्थाने "तवर्गस्य श्चवर्ग." (११३।६०) इति कृतं जत्वमप्यसत् तत्स्थाने "अघोपे प्रथमोऽ-३५ ૨૧ ३२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- शिटः” (११३५०) इति कृतं चत्वमप्यसदभूतथा च गत्वकत्वे नाभूताम् । ज्ञापकं त्वस्येदृग्रूप- सिद्धिरेवेति ॥ ३९ ॥ येन नाप्राप्ते यो विधिरारभ्यते स तस्यैव पाधकः ॥४०॥ येन विधिना नाप्राप्तं किन्तु प्राप्तमेव-तस्मिन्सति यस्यैकान्तेन प्राप्तौ सत्यामित्यर्थः यो वाधकविधि- ५रारभ्यते स तस्यैवैकान्तेन प्राप्तिमतो विधेर्बाधकः स्यात् , यस्तु कचित् प्राप्नोति कचिन्न तस्य प्राप्यप्राप्ति- मतो विधेर्वाधको न स्यादित्यर्थः । यथा उसासद् पर्णध्वद् विद्वत्कुलमित्यादौ "सोरुः" (२।११७२) इति रुत्वं, स्वनडुत्कुलमित्यादौ "हो धुद पदान्ते” (२।११८२) इति ढत्वं च प्राप्मोत्येव, एवं सति "संसध्वंस्कसू०७ (२॥१॥६८) इति दत्वसूत्रं प्रारब्धं तदेकान्तप्राप्तिमती रुत्वढत्वे एव वाधते न तु प्राप्ताप्राप्तं "पदस्य" ( २१११८९) इति संयोगान्तलोपम् , यतः संयोगान्तलोपो विद्वानित्यादौ प्राप्नोति, १० विद्वत्कुलमित्यादौ च न प्राप्नोति, तेन विद्वान् अनडान इत्यादौ संयोगान्तलोपः स्यादेव न तु "संस्- ध्वंस्” इति दत्वसूत्रेण वाध्यते । ज्ञापकं त्वस्य कसः सिति विशेषणम् , तथाहि कसः सो दवि- धिर्यदि रुत्वमिव सयोगान्तलोपमपि बाधते तदा कसः सन्ततं न व्यभिचरति किमर्थ सिति विशेषणं क्रियते, यत्तु कृतं तज्ज्ञायते दत्वविधिः संयोगान्तलोपं प्राप्ताप्राप्तत्वान्न बाधते, ततो यत्र संयोगान्त- लोपस्तत्र कसोः सन्तत्वं नास्तीति तन्निरासाय कसोः सिति विशेषणं सार्थकमिति ॥ ४० ॥ अत. पर सप्तदश बलाबलोकिन्याया उच्यन्ते । बलवनित्यमनित्यात् ।। ४१ ॥ यद्यसिन् कृतेऽप्यकृतेऽपि च प्राप्नोति तत्तदपेक्षया नित्यम् , यत्तु अकृते प्राप्नोति नतु कृते तदनित्यं, तयोर्युगपत्प्राप्तौ नित्यं कार्यमनित्याद्वलवदिति प्रथमं प्रवर्त्तते, यथा अकाटेंत्यादौ "धुड्ह्रस्वात्०" (४।३।७०) इति सिज्लुकः प्रथमं नित्यत्वात् "सिचि परस्मै" (४।३।४४) इति वृद्धिस्ततश्च हस्याभावान्न सिलुक् । २० ज्ञापकं त्वस्य "नामिनोऽकलिहलेः" (४।३।५१) इत्यत्र कलिहलिवर्जनम् , तच्च कलिहल्योरेतन्या- यात् कलिं हलिं वा आख्यदिति ङपरे णौ अन्त्यस्वरादिलुगो नित्यत्वात्पूर्व "त्र्यन्तस्वरादेः" (७।४।४३) इतीकारलोपे समानलोपित्वेन सन्वद्भावाभावात् अचकलत् , अजहलत् , इति सिद्धयति । कलिहलिव- जर्जानां अन्येपां पटुलध्वादिशब्दानां तु णावनियामप्यन्त्यखरवृद्धिं पूर्व कृत्वैव पश्चान्नित्याप्यन्त्यस्वरादिलुक् कार्या, ततश्चासमानलोपित्वात्सन्वद्भावेन अपीपटत् , अलीलपदित्यादि सिद्धयतीत्यभिप्रायेणेति दिक।।४१॥ २५ अनित्याश्चैते वलावलोक्तिन्याया यथासंभवमुत्तरोत्तरैर्याध्यमानत्वात्- अन्तरङ्गं पहिरङ्गात् ॥ ४२ ॥ बलवदिति शेपः, एवमप्रेऽपि सर्वत्र । यथा त इन्द्रं वृक्ष इन्द्रं इत्यत्र क्रमेण जस इत्वे डौ च कृते "समानानां तेन." ( ११२११) इति इन्द्रेकारेण सह जसो डेश्चेकारस्य प्राप्तात्पदद्वयापेक्षत्वेन पहि- रगादीर्घात्प्रथमं "अवर्णस्य.” (१।२।६) इत्येत्वमेव स्यात्, एकपदापेक्षत्वेनान्तरङ्गत्वात् । ज्ञापकं ३० त्वस्य "वृत्त्यन्तोऽसपे" ( ११११२५) इति निर्देश एव, तथाहि अन वृत्त्यन्तशब्दपुरःस्थरोः उत्वे कृते उभयं प्राप्नोति, पूर्वेण सह उत्वं परेण अकारेण सह वत्वं च, तत्र पदवयाश्रयत्वाद्वहिरङ्ग वत्वं याधित्वैक्पदापेक्षत्वादन्तरगमुत्वं यनिर्दिष्टं तदेतन्यायादेवेति ॥ ४२ ॥ निरवकाशं सावकाशात् ॥ ४३ ॥ निसहशब्दावत्राल्पवहीं, निर्धन, सधन इतिवत्, ततश्चात्पविषयं कार्य बहुविपयात्कार्याव- ३५स्वदिति कोऽर्थः-तद्बाधित्वा स्वयं प्रवर्त्तते, यथा “एद्वहुस्मोसि” (१।४।४) इत्यस्य भिसि भ्यसि च प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुच्चिता न्यायाः ३३ विषयः, "भिस ऐस्” (१।४।२) इत्यस्य तु भिस्येव । ततो देवैरित्यत्रं परमपि "एद्वहुस्भोसि" इति बाधित्वा निरवकाशत्वात् "भिस ऐस्” प्रवर्तते "एद्वहुस्०” इत्यस्य देवेभ्य इत्यत्र सावकाशत्वात् । ज्ञापकं त्वस्य "मिस ऐस्" इति सूत्रमेव अन्यथैतत्सूत्रं व्यर्थं स्यादिति ॥ ४३ ॥ वार्णात्प्राकृतम् ॥४४॥ प्रकृतिरत्र धातुरूपा ग्राह्या न नामरूपा, तत्कार्याणां वाणेष्वेवान्तर्भावात् । वर्णमुच्चार्य विहितात्५ कार्यात् प्रकृतिमुच्चार्य विहितं कार्य वलवदिति । यथा अवतुः अवुरित्यन “यजादिवः०” (४।११७९) इति वृति द्वित्वे च उकारद्वयावस्थाने प्रकृत्याश्रितत्वेन पूर्वव्यवस्थितत्वेन चान्तरङ्गादपि समानदीर्घलक्षण- वर्णकार्यात् प्रागेव वहिर्व्यवस्थितत्वेन प्रत्ययाश्रितत्वेन च बहिरङ्गोऽपि पूर्व "धातोरिवर्णोवर्ण०” (२।१।५०) इत्युव् स्यात् पश्चात् समानदीर्घत्वम् । ज्ञापकं तु "हिणोरप्विति व्यौ” (४।३।१५) इति व्यत्ववि- धानम् । तथाहि-यद्येप न्यायो न स्यात्तदा वार्णाभ्यामिवर्णादेरिति यत्ववत्वाभ्यां यन्ति जुह्वति इति १० सिद्ध्यत्येवेति किमर्थं "ह्विणो"रिति सूत्रं विदध्यात् । परमेतन्न्यायात्प्राकृताभ्यां धातोरियुभ्यां यत्ववत्वे वाधिष्येते इति तत्प्रतिप्रसवार्थं "हिणो"रिति सूत्रं कृतमिति ॥ ४४ ॥ वृद् बृदाश्रयं च ॥४५॥ स्वृद् य्वृदाश्रयं च कार्यं वार्णमपि प्राकृताद्वलवत् । यथा उपशूयेत्यत्र त्यो यपि स्वस्य तः पित्कृति" (४।४।११३) इति तागम हस्तान्तप्रकृत्याश्रितत्वात्प्राकृतमपि वाधित्वा सखरान्तस्थारूपवर्णा-१५ श्रितत्वाद् वार्णमपि “यजादि०” (४।११७९) इति य्वृदभूत् । तदन्वपि तागमं वाधित्वा वृतो "दीर्घ- मवोऽन्त्यम्” (४।१।१०३) इति दीर्घ एवाभूत् य्वृदाश्रितकार्यत्वात् । ज्ञापकं त्वस्येदृक्प्रयोगा एव ॥४५॥ उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिः ॥ ४६॥ बलवतीति योगः। यथा नमस्यति देवानित्यत्र "शक्तार्थवषड्नमःखस्ति०" ( २।२।६८) इति नमो- योगलक्षणां चतुर्थी वाधित्वा कर्मकारकलक्षणा "कर्मणि" (२।२।४०) इति द्वितीया स्यात् । अनित्य-२० श्वायम् , “दुहेा०” (२।२।२७) इति सूत्रे यस्मै कोप इत्यनिर्दिश्य यं प्रति कोप इति निर्देशात् , अन्यथा "भागिनि च प्रतिपर्यनुभिः” ( २।२।३७) इति प्रतियोगविहितां द्वितीयामुपपदविभक्तिं विजित्य "क्रुद्दुहेर्येति सूत्रविहितसम्प्रदानसंज्ञकाद्यच्छब्दाचतुर्थी कारकविभक्तिरेव यदि प्राप्नोति तदा यस्मै इत्येव निर्दिश्येतेति ॥ ४६॥ लुवन्तरङ्गेभ्यः ॥४७॥ अपिरत्राध्याहार्यः। वहिरङ्गोऽपि लुप् अन्तरङ्गानपि विधीन्वाधित्वा वलवत्त्वात् प्राक् प्रवर्तते । यथा गर्गस्य वृद्धापत्यानि "गर्गादेर्यन्” (६।११४२) इति यवि गर्गाः । अत्र प्रकृत्याश्रितत्वेनान्तरङ्गामपि "वृद्धिः स्वरेष्वादेः०” (७।४।१) इति वृद्धिं बाधित्वा प्रत्ययाश्रितत्वाद्वहिरङ्गोऽपि “वहुवस्त्रियाम्" (६।१।१२४ ) इति यत्रो लुवेव प्रथमं स्यात् , पश्चात् प्रत्ययस्य लुब्भवनान्न वृद्धिः । ज्ञापकं त्वस्य "त्वमौ प्रत्ययोत्तरपद०” (२।१।११) इति सूत्रे त्वदीयः, मत्पुत्र इत्यादिसिद्ध्यर्थ प्रत्ययोत्तरपदग्रह-३० णम् । तथाहि युष्मद् ६-१ अस् ईय स् अस्मद् ६-१ अस् पुत्रः इति स्थिते विभक्तिद्वारेणैव पूर्व त्वमादेशे कृते पश्चात् "ऐकायें" (३।२।८) इति विभक्तिलोपे पूर्वोक्तं प्रयोगद्वयं सिद्धयतीति । तथानेन न्यायेन विभक्तिमानाश्रितत्त्वेनान्तरङ्गादपि त्वमादेशात्पूर्वमेव द्वयोः पदयोरेकार्थापेक्षत्वेन वहिरङ्गोऽपि विभक्तिलुप् प्रवर्तते, ततश्च विभक्त्यभावात्त्वमादेशौ न स्यातामिति प्रत्ययोत्तरपदग्रहणं सफलमिति ॥ ४७ ॥ है. प्रका० पूर्वा०५ २५ ३४ , . ३४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- सर्वेभ्यो लोपः॥४८॥ लोपशब्दस्य लुप्लुको पाचकल्लेऽपि लुपः पूर्वन्याये उक्तत्याल्लोपशब्देनात्रादर्शनमात्ररूपो लुक् ग्राह्यो, गोवलीवर्दन्यायात् । ततश्चायमर्थः-सर्वविधीन्बाधित्वा बलवत्त्वात् लुग्विधिः प्राक् प्रवर्तते । यथा अबुद्धेत्यत्र "धुड्ड्स्वात” (४३७० ) इति सिचः सर्वेभ्यः प्रथमं लोपे — गडवादे०” ( २१११७७) ५इत्यादेश्चतुर्थत्वं न । न च लुप्तस्यापि सिचः स्थानित्वेनादेश्चतुर्थत्वं करिष्यते इति वाच्यम् , चतुर्थत्व- विधेः सकारादिप्रत्ययाश्रितत्वेन वर्णविधित्वात्तस्मिन् स्थानिवद्भावाप्राप्तेः । तथा शं सुखं तत्र तिष्यतीति शंस्थाः, अत्र स्थाधातोराकारस्य ईय॑ञ्जनेऽयपि" (४।३।९७) इति ईन, किपः अदर्शनस्य सर्वका- र्येभ्यः प्रथम भवनात् , ईत्वसूत्रे व व्यञ्जनशब्दस्य साक्षाव्यञ्जनप्रतिपत्तये ग्रहणादिति ॥ ४८ ॥ लोपात्खरादेशः॥४९॥ लोपशब्दोऽत्रापि लुग्वाची पूर्वापवादत्वादस्य। श्रीदेवताऽस्य "देवता" (६।२।१०१) इत्यणि श्रायं हविरित्यत्र परमपि "अवर्णेवर्णस्य” (७४।६८) इति ईकारलुक बाधित्वा स्वरादेशो वृद्धिरभूत् । ज्ञापकं त्वस्य वृद्धिसूत्रस्य "अवर्णेवर्णस्ये"ति सूत्रात्प्राविधानम् , लुक्सूत्रादनु वृद्धिसूत्रे कृते हि परत्वादेव वृद्धिः सिद्धयेत् । परन्तु यत्तथा न कृतं तदेतन्यायाशयवेति ॥ ४९ ॥ आदेशादागमः ॥ ५० ॥ १५ यथा अर्पयतीत्यत्र ऋधातोरें वृद्धिमादेशरूपां बाधित्वा प्रथमं प्वागमस्ततः "पुस्पौ” (४।३।३) इति गुणरूप आदेशः । ज्ञापकं त्वस्यैतदर्थ यत्नाकरणम् । अनित्यत्वाचास्य द्वयोः कुलयोरित्यत्र द्विश- ब्दात् "अनाम् स्वरे नोऽन्तः” (१।४।६४) इति नागमं बाधित्वा "आढेरः” (२।१।४१) इत्यदा- देश इति ॥ ५० ॥ आगमात्सर्यादेशः॥५१॥ २० पूर्वापवादोऽयम् । यथा प्रियतिसृणः कुलात् , अत्र सर्वादेशे तिसरि कृते सति नागमः सिद्धः । ज्ञापकं त्वस्य "ऋतो रः स्वरेऽनि” (२।१२) इत्यत्र तिस्रादिऋतो रत्वविधावनीतिशब्देन नकार- विषयवर्जनोक्तिस्तथाहि-यद्ययं न्यायो न स्यात्तदा खरादौ स्यादौ परे प्राग्न्यायेन पूर्व नागमस्यैव भवनात्तब्यवधाने च तिस्राद्यादेशाभवनात् कस्य ऋतो रत्व विधौ नकारविषयो वज्यंतेति ॥ ५१ ।। परान्नित्यम् ॥ ५२॥ "स्पर्धे" (७।४।११९) इति परिभाषापवादोऽयम् । यथा युष्मान् अस्मान् वा आचक्षाणेन युष्या अस्या अत्र युष्मदस्मद्भ्यां णिजि "यन्त्यखरादेः” (७४।४३) इत्यद्लुकि किपि "अप्रयोगीत्" ( १।१।३७ ) इति तल्लुकि "णेरनिटि" (४।३।८३) इति णिज्लुकि टाप्रत्यये पराभ्यामपि त्वमादे- शाभ्यां प्रागेव नित्यत्यात् "टाडघोसि यः" (२।११७) इति मस्य यत्वं सिद्धम् । यत्वं हि प्रथमं युष्म् अस्म् इत्येतयोर्मस्य प्राप्नोति, समादेशकरणानन्तरं तु त्वमयोरकारस्य यत्वं प्राप्नोतीत्यतो यत्वस्य २०नित्यत्वम् ।। ५२ ॥ नित्यादन्तरङ्गम् ॥ ५३ ॥ अनित्यमपीति शेपः । यथा प्रेजुः प्रोपुरित्यत्र यज्वपोः 'प्वृद् य्यदाश्रयं च' इति न्यायात्प्रथमं वृति द्वित्वे पदद्वयापेक्षत्वेन बहिरगानित्यादप्येत्यादोत्वाच प्रथममेवाऽनित्योऽप्येकपदाश्रितत्वेनान्तरङ्गत्यादीर्घ ३४ एव स्यात् । ज्ञापकं त्वस्य "आशी:०" (३।३।१३) इति सूत्रनिर्देशस्तथाहि-अत्र तावत्सेलोपे आशिस्

,
प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसमुचिता न्यायाः
३५
इति स्थिते सो रुत्वे विसर्गः प्राप्नोति “पदान्ते" (२।१।६४) इति दीर्घश्च, तत्रैतन्न्यायान्नित्यमपि विसर्ग
वाधित्वा पूर्वव्यस्थितत्वेनान्तरङ्गत्वात् प्रथमं दीर्घस्ततो विसर्ग इति ॥ ५३ ॥
अन्तरङ्गाचानवकाशम् ।। ५४ ।।
बहिरङ्गमपीति शेपः। यथा त्वं, अहं अत्र प्रकृतिमात्रादेशत्वेनान्तरङ्गाभ्यामपि त्वमादेशाभ्यां प्रागेव
प्रकृतिप्रत्ययादेशत्वावहिरङ्गावपि त्वमहमादेशौ निरवकाशत्वात् स्याताम् । ज्ञापकं त्वस्थ "त्वमहं ५
सिना.” (२।१।१२) इति सूत्रकरणमेव, एतन्न्यायाभावे निर्विपयं सूत्रं कुतः कुर्यादिति ॥ ५४ ॥
उत्सर्गादपवादः ॥ ५५॥
यथा आपचन्त्यस्मिन्निति आपाकः, अत्रौत्सर्गिकस्य "पुंनाम्नि घः” (५।३।१३०) इति घस्यापवादो
"व्यञ्जनाद् घञ् (५।३।१३२) इति घव बलवत्त्वात्स्यात् । ज्ञापकं त्वस्य गोचरादीनां "गोचर-
संचर" (५।३।१३१) इति सूत्रेण निपातनम् । तद्धि निपातनाभावे एतन्न्यायादौत्सर्गिकं घं वाधित्वा १०
अपवादत्वाद् घमेव मा प्रसाडीदिति कृतमिति ॥ ५५ ॥
अपवादात्क्वचिदुत्सर्गोऽपि ॥ ५६ ॥
मख गतौ' मखन्ति स्वर्ग गच्छन्त्यनेनेति मखः । 'मठ निवासे' मठन्ति निवसन्ति छात्रा अत्रेति
मठः इत्यादौ "व्यञ्जनाद् घम्” (५।३।१३२) इति पञमपवादमपि बाधित्वा एतन्न्यायेन वलवत्त्वा-
दौत्सर्गिक: "घुनान्नि०” (५।३।१३०) इति यः स्यात् । कचिदित्युक्तेश्चायमनित्यः ।। ५६ ॥
नाऽनिष्टार्था शास्त्रप्रवृत्तिः ॥ ५७ ।।
शास्त्रस्येति सूत्रस्य न्यायस्य वाऽनभिप्रेतार्थसिद्धथै प्रवृत्तिर्न कार्या । शिष्टप्रयोगसिद्धयर्थमेव तत्स-
द्भावात् । तन्न सूत्रस्य यथा, नयतेर्गित्त्वात्फलवत्कर्तरि विवक्षायामात्मनेपदे सिद्धेऽपि "कर्तृस्थामूर्ती-
प्यात्” ( ३।३।४०) इति यत्सूत्रं कृतं तन्नियमार्थम् , नियमश्चायं-कर्तृस्थामू प्यादेव नयतेरात्मनेपदं
स्यात् , यथा श्रमं विनयते शमयतीत्यर्थः । कर्तृस्थामूर्तीप्यत्वाभावे तु फलवत्कर्त्तर्यपि न स्यात् , यथा २०
चैत्रस्य मन्युं विनयति, गर्ल्ड विनयति, वुद्धया विनयतीति । अयं च नियमः "कर्तृस्थेति" सूत्रे अर्थ-
विशेपानुक्तावपि शमयतिक्रियार्थस्यैव ज्ञेयो नत्वन्यार्थस्य इत्थमेव शिष्टानामिष्टत्वात् । तेन शमयति-
क्रियातिरिक्तार्थे नियमाभावाद् गित्वविहिते उभे अप्यात्मनेपदपरस्मैपदे भवतः । यथा स्वप्नज्ञां वृद्धिं
नयति नयते । न्यायस्य यथा, 'लोपात्स्वरादेश' इति न्यायः चिकीर्ण्यते इत्यादी सनो “दीर्घश्चि०"
(४।३।१०८) इति दीर्घरूपाय स्वरादेशाय नोत्सहते, दीर्घस्य शिष्टानामनिष्ठत्वात् ; ततश्च "अतः" २५
(४।३।८२) इत्यल्लोप एव स्यादिति ।। ५७ ।।
इति श्रीसूरिभिः समुचिताः सप्तपश्चाशन्न्यायाः समाप्ताः ।
३०
अथ व्याकरणे सूचित्ता अपि तैरसमुञ्चिताः पञ्चपष्टिाया उच्यन्ते -
प्रकृतिग्रहणे स्वार्थिकप्रत्ययान्तानामपि ग्रहणम् ।।
अस्य न्यायस्य सूचनं त्वेवम्-अनेन न्यायेन सर्वस्वार्थिकप्रत्ययान्तानां सर्वादिशब्दानां सर्वादित्वे
प्राप्त नियमार्थ डतरडतमोपादानम् । नियमश्चायं-यदि स्वार्थिकप्रत्ययान्तानां सर्वादित्वं स्यात् तदा
डतरडतमान्तानामेव नान्यस्वार्थिकप्रत्ययान्तानाम् । तेन प्रकृष्टार्थे स्वार्थिकतमपि सर्वादित्वाभावात्सर्वत-
मायेत्येव स्यादिति ॥ १ ॥

३६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- प्रत्ययाप्रत्यययोः प्रत्ययस्यैव ॥२॥ प्रहणमिति शेपः । यथा "कालात्तनतरतमकाले" (३१२।२४) इति सप्तम्यलुम्विधायिसूने पूर्वाहे- सरामित्यादी वरतमो प्रत्ययौ ग्राह्यो, न तु तरति तान्यति इसचि व्युत्पन्ने नाम्नी ॥ २ ॥ अदाधनदायोरनदादरेव ।।३॥ यया "उपान्वथ्याइवसः” (२।२।२१) इत्यत्र यस्तेयुदासेन वसतिरेषाप्राहि ॥ ३॥ प्राकरणिकाप्राकरणिकयोः माकरणिकसैव ॥४॥ यथा "इन इतः" (२।४।७१) इति डीसूने "यनो डायन् च वा” (२।४।६७) इत्यतः प्रार-- धात्तद्धिताधिकारात्तद्धितीय एवेन् प्राह्मो न तु "प्रभाख्याने वे" (५।३।११९) इति कृत्सूत्रोक्तः । तेन मुतद्गमेन निवृत्ता "मुतगमादेरिम्” (६।२।८५) इतीनि सौतगमीत्यन डीः स्यात्, प्रभास्यान- १० योस्तु-हे चैन कां त्वं कारिमापीः ? सर्वा कारिमकार्पमिति फारिशब्दादिनन्तान् डीन स्यात् ॥ ४ ॥ निरनुवन्धग्रहणे सामान्येन ।। ५॥ प्रहणमिति शेपः । यथा सः कः इत्युभयत्र "रः पदान्ते." ( ११३१५३) इति रस्य रोश्च विसर्गः सिद्धः ॥ ५॥ साहचर्यात्साय ॥६॥ १५ प्रहणमिति घर्तते । अभ्यभिचारिणा व्यभिचारी यनियम्यते तत्साहचर्यम् । यथा "क्त्वातुमम्" (११११३५) अन पत्यानुमोः साहचर्यान् कृहम् माहो न तु द्वितीयैकवचनम् ॥ ६॥ वर्णग्रहणे जातिग्रहणम् ॥७॥ यया-रंरम्यते इत्यादी रमेरकारपरकानुनासिकान्तत्वे सति यथा "मुरतोऽनुनासिकस्य" (४१३५१) इति म्यागमतथा हम्मतेर्यडि जहम्म्यते इत्सादावनुनासिकजातिप्रणानुनासिक्दयान्तत्वेऽपि म्यागमः २.सिद्धः ॥ ७ ॥ वर्णरुर्दशोऽपि वर्णग्रहणेन गृह्यते ।। ८ ।। सामध्येऽसा रेफोऽ प्रशा तुरीयः सरसोऽस्ति, एवं सारेमा इलादि शनि ar माणुः सतोऽनेन न्यापेन प्रीयमानमिन्यायित्नप्यमानमित्यादायपि ल्ययपाने तदेक्देशमूतल- पारेणारि व्ययधानान् अदपटतेी निषेधेन (२।३३८५ पत्वं नाभूदिति ॥ ८॥ उन्मघ्पपतितस्तद् ९॥ भास्मिन्यये पर मिलनेरस्मिन्यान्तःपतित । तकस्मिन् पया, परगन् अत्र अन्त: पान:पवितरि दमाई पर पकं नहानिकार ५०५ मासिी ॥९॥ १५i 5 अत्र भेइजि ।

my ५ १० .. १५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः (२।३१७९) इति ने! णः सिद्धः। द्वौ यथा प्रण्यपनीपतत् इत्यादौ अड्नीसहितस्यापि पते! णः सिद्ध इति । अत्र द्वित्वजपकारेणाव्यवधानं त्वतनन्यायेन समाधास्यते इति मा त्वरिष्ठाः । यो यथा प्रनिपूर्वस्य यमेर्यलुपि अद्य० दि, प्रण्ययंयंसीत्यादावडागमम्बागमसहितेऽपि यमो परे "अकखाद्य- पान्ते पाठे वा" (२।३।८०) इत्यनेन ने! ण इति ॥ १० ॥ स्वाङ्गमव्यवधायि ॥ ११ ॥ स्वमङ्गं द्वित्वादिकं धात्वादेर्निजाङ्गिनः कार्ये कर्त्तव्ये व्याघातं न कुर्यात् , यथा सञ्चस्कारेत्यत्र सम् कृ इति स्थितेऽन्तरङ्गत्वात्प्रथमं स्सटि, ततः "स्सटि समः” (१।३।१२) "लुक्” (१।३।१३) इति सूत्रे वाधित्वा परत्वान्नित्यत्वाद्धातुमात्राश्रयत्वेनान्तरङ्गत्वाच णवि तदाश्रिते [ द्वित्वादौ च कृते संचस्कृ इति स्थिते ] एतन्न्यायात् धात्वङ्गेन द्वित्वजचकारेण समोऽव्यवधाना निमित्ताभाव' इति न्यायप्राप्ता स्सटो निवृत्ति जनि ॥ ११ ॥ उपसर्गो न व्यवधायी ॥ १२ ॥ "धातोः पूजार्थ०” (३।१।१) इति सूत्रेणोपसर्गस्य प्राक्त्वं नियमितं नत्ववयवत्वमिति पूर्वेण न सिद्ध्यति । यथा 'उक्षां प्रचक्रुर्नगरस्य मार्गान्' इत्यत्र "गुरुनाम्यादेः०” (३।४।४८) इत्यामादेशे कृते आमन्तस्य कृगश्च प्रेण न व्यवधानमिति ॥ १२ ॥ येन नाव्यवधानं तेन व्यवहितेऽपि स्यात् ॥ १३ ॥ यत्र येन वर्णादिनावश्यं व्यवधानं स्यान्नत्वव्यवधानं तत्र तद्व्यवधानेऽपि तत्कार्य स्यादेव । यथा चार्वी, गुर्वीत्यादौ स्वरोकारयोर्व्यञ्जनान्तरितत्वेऽपि "स्वरादुतो गुणादखरोः” (२।४।३५) इति डीः सिद्धः । स्वरात्परस्याव्यवहितस्य उतो गुणवाचिशव्देष्वसम्भवादिति ॥ १३ ॥ ऋकारापदिष्टं कार्य लकारस्यापि ॥ १४ ॥ यथा कृपौङः सनि “वृद्ध्यः स्यसनोः" (३।३।४५) इति परस्मैपदे चिक्लप्सति । अत्र निनिमि-२० तत्वात्प्रथमं "ऋर ललं.” (२।३।९९) इति ऋत लत्वे पश्चाद् द्वित्वे "ऋतोऽत्" (४।११३८) इति लतोऽप्यत् सिद्धः ।। १४ ॥ सकारापदिष्टं कार्य तदादेशस्य शकारस्यापि ॥ १५ ॥ यथा 'पस्च् गतौ' अस्य "पः सोऽष्टयै०” ( २।३।९८) इति पस्य से "सस्य शौ” (११३।६१) इति स्वः सस्य शे यङ्लुपि दिवि "व्यञ्जनादेः०” (४।३।७८) इति तल्लुक्येतन्यायात् 'संयोग-२५ स्यादौ स्कोलुंकू" (२।११८८) इति सकारादेशस्य शस्य लुकि चस्य कत्वे च असासक् इति सिद्धम् ॥१५॥ हखदीर्घापदिष्टं कार्य न प्लुतस्य ॥ १६ ॥ तत्र हस्खापदिष्टं यथा । हे राज३निह । अन परत्वान्नित्यत्वाच्च "दूरादामन्त्र्यस्य.” (७४।९९) , इत्यनेन पूर्व प्लुते तस्मात्परस्य नस्य "हस्वाद् ङणन० ( १।३।२७) इति न द्वित्वम् । दीर्घापदिष्टं यथा "अदीर्घाद्विराम" ( १।३।३२) इत्यनेन दीर्घादित्युक्तावपि दीर्घस्थाननिष्पन्नप्लुतस्यैतन्न्यायवलेन ३० वर्जनाऽभवनात् हे गो३त्रात, हे गो३त्रात इत्यत्र दीर्षस्थाननिष्पन्नप्लुतादपि परस्य तकारस्य "अदीर्घा- द्विरामैक०” (१।३।३२) इत्यनेन वा द्वित्वं सिद्धम् ॥ १६ ॥ संज्ञोत्तरपदाधिकारे प्रत्ययग्रहणे प्रत्ययमात्रस्यैव ग्रहणं न तदन्तस्य ।। १७ ॥ . ३३ प्रश्नाख्यान- -- ३६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्रत्ययाप्रत्यययोः प्रत्ययस्यैव ॥२॥ ग्रहणमिति शेपः । यथा “कालात्तनतरतमकाले" (३।२।२४) इति सप्तम्यलुविधायिसूत्रे पूर्वाहे- सरामित्यादौ तरतमौ प्रत्ययौ ग्राह्यौ, न तु तरति ताम्यति इत्यचि व्युत्पन्ने नानी ॥ २ ॥ अदाधनदायोरनदादेरेव ॥ ३ ॥ यथा "उपान्यध्यावसः” (२१२१२१) इत्यत्र यस्तेयुदासेन वसतिरेवाप्राहि ॥३॥ प्राकरणिकानाकरणिकयोः प्राकरणिकस्यैव ॥४॥ यथा "इल इतः" (२१४७१ ) इति डीसूत्रे "यो डायन् च वा” (२।४१६७) इत्यतः प्रार- ब्धात्तद्धिताधिकारात्तद्धितीय एवेञ् ग्राह्यो न तु "प्रभाख्याने वे" (५।३।११९) इति कृत्सूत्रोक्तः । तेन सुतगमेन नियुत्ता "सुतगमादेरिब्" (६२१८५) इतीभि सौतनमीत्यत्र ङीः स्यात्, १० योस्तु-हे चैन का त्वं कारिमकार्षीः? सर्वा कारिमकार्पमिति कारिशब्दादिमन्तात् डीन स्यात् ॥ ४ ॥ निरनुवन्धग्रहणे सामान्येन ।। ५॥ ग्रहणमिति शेपः । यथा स्वः कः इत्युभयत्र "र: पदान्ते०" ( ११३१५३) इति रस्य रोश्च विसर्गः सिद्धः ॥५॥ साहचर्यात्सदृशस्यैव ॥६॥ १५ प्रणमिति वर्तते । अव्यभिचारिणा व्यभिचारी यन्नियम्यते तत्साहचर्यम् । यथा "क्त्वातुमम्" (११११३५) अत्र क्त्वातुमोः साहचर्यात् कृदम् ग्राह्यो न तु द्वितीयैकवचनम् ।। ६ ।। वर्णग्रहणे जातिग्रहणम् ॥७॥ यथा रम्यते इत्यादौ रमेरकारपरैकानुनासिकान्तत्वे सति यथा "मुरतोऽनुनासिकस्य" (४३१५१) इति म्वागमस्तथा हम्मतेर्यडि जहम्म्यते इत्यादावनुनासिकजातिग्रहणादनुनासिकद्वयान्तत्वेऽपि म्बागमः २०सिद्धः ॥ ७ ॥ वर्णैकदेशोऽपि वर्णग्रहणेन गृह्यते ॥८॥ ऋकारमध्येऽर्धमात्रो रेफोऽग्रे पश्चाच तुरीयः स्वरभागोऽस्ति, एवं लकारेऽर्धमानो ल् इत्यादि इति वृद्धाः प्राहुः ततोऽनेन न्यायेन प्रलीयमानमित्यादिवत्कृप्यमानमित्यादावपि लकारव्यवधाने तदेकदेशभूतल- कारेणापि व्यवधानात् अलचटतेति निपेघेन "स्वरात्” (२।३।८५) इति प्राप्त णत्वं नाभूदिति ।। ८॥ तन्मध्यपतितस्तद्रहणेन गृह्यते ॥९॥ भादिप्रत्यये एकस्मिन्ननेकस्मिन्यान्तःपतितेऽपि सति धात्वादेर्यथोक्तं कार्य स्यादेव । तत्रैकस्मिन् यथा, अरुणत् अत्र भेन्तःपतितेऽपि रुघेः प्रागद् सिद्धः । अनेकस्मिन् यथा अतृणेट् अत्र ने ईति चान्तःपतितेऽपि राहेः प्रागट् । ज्ञापकं त्वस्य "त्वमहं सिना०" (२।१।१२) इत्यत्र प्राचाक इति । तच त्वकं अहकमित्यत्राश्रवणार्थम्, अन्यथैतन्न्यायात्साकोरपि युष्मदस्मदोस्त्वमहमादेशेऽनवणं न ३० स्यादिति ॥ ९॥ आगमा यद्गुणीभूतास्तद्रहणेन गृह्यन्ते ॥ १० ॥ आगमा ये आदिशब्देनान्तशब्देन वा निर्दिष्टाः । यथा "अड्धातोरादि०" (१।४।२९) इति, "अनाम् खरे नोऽन्तः” (११४६४ ) इत्यादि, ते यस्सावयवीभूतास्तद्रहणेन गृह्यन्ते, केवलस्य यत्कार्य- ३४ मुक्तं तत्तस्य सागमस्यापि स्यादित्यर्थः । तत्रैको यथा प्रण्यपतत् इत्यत्रासहितेऽपि पतौ "नेआदा०" प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः ३७ (२१३७९) इति ने! णः सिद्धः । द्वौ यथा प्रण्यपनीपतत् इत्यादी अड्नीसहितस्यापि पते! णः सिद्ध इति । अत्र द्वित्वजपकारेणाव्यवधानं त्वतनन्यायेन समाधास्यते इति मा त्वरिष्ठाः । त्रयो यथा प्रनिपूर्वस्य यमेयङलुपि अद्य० दि, प्रण्ययंयंसीत्यादावडागमम्वागमसहितेऽपि यमो परे "अकखाद्य- पान्ते पाठे वा” (२।३।८०) इत्यनेन ने! ण इति ।। १० ।। वाङ्गमव्यवधायि ॥ ११ ॥ स्वमङ्गं द्वित्वादिकं धात्वादेर्निजाङ्गिनः कार्ये कर्त्तव्ये व्याघातं न कुर्यात् , यथा सञ्चस्कारेत्यत्र सम् कृ इति स्थितेऽन्तरङ्गत्वात्प्रथम स्सटि, ततः "स्सटि समः” (१।३।१२) "लुक्” (१।३।१३) इति सूत्रे बाधित्वा परत्वान्नित्यत्वाद्धातुमात्राश्रयत्वेनान्तरङ्गत्वाच णवि तदाश्रिते [द्वित्वादौ च कृते संचस्कृ इति स्थिते ] एतन्न्यायात् धात्वङ्गेन द्वित्वजचकारेण समोऽव्यवधाना निमित्ताभाव' इति न्यायप्राप्ता स्सटो निवृत्ति जनि ॥ ११ ॥ १० उपसर्गों न व्यवधायी ॥ १२ ॥ 'धातोः पूजार्थ.” (३।१।१) इति सूत्रेणोपसर्गस्य प्राक्त्वं नियमितं नत्ववयवत्वमिति पूर्वेण न सिद्ध्यति । यथा 'उक्षा प्रचक्रुर्नगरस्य मार्गान्' इत्यत्र "गुरुनाम्यादेः०” (३१४१४८) इत्यामादेशे कृते आमन्तस्य कृगश्च प्रेण न व्यवधानमिति ॥ १२ ॥ येन नाव्यवधानं तेन व्यवहितेऽपि स्यात् ॥ १३ ॥ यत्र येन वर्णादिनावश्यं व्यवधानं स्यान्नत्वव्यवधानं तत्र तब्यवधानेऽपि तत्कार्यं स्यादेव । यथा चार्वी, गुर्वीत्यादौ स्वरोकारयोर्व्यञ्जनान्तरितत्वेऽपि "स्वरादुतो गुणादखरोः” (२।४।३५) इति ङीः सिद्धः । स्वरात्परस्याव्यवहितस्य उतो गुणवाचिशब्देष्वसम्भवादिति ॥ १३ ॥ ऋकारापदिष्टं कार्य लकारस्यापि ॥ १४ ॥ यथा कृपौङः सनि "वृद्भ्यः स्यसनोः” (३।३।४५) इति परस्मैपदे चिक्लप्सति । अत्र निनिमि-२० त्तत्वात्प्रथमं 'ऋर ललं.” (२।३।९९) इति ऋत लत्वे पश्चाद् द्वित्वे "ऋतोऽत्" (४।१।३८) इति लतोऽप्यत् सिद्धः ।। १४ ।। सकारापदिष्ट कार्य तदादेशस्य शकारस्यापि ॥ १५ ॥ यथा 'पस्थ गतौ' अस्य "पः सोऽध्यै०” (२।३।९८) इति पस्य से "सस्य शपौ” (१।३।६१) इति स्वः सस्य शे यङ्लुपि दिवि "व्यञ्जनादेः०" (४।३।७८) इति तल्लुक्येतन्यायात् “संयोग-२५ स्यादौ स्कोलुंकू” (२।१।८८) इति सकारादेशस्य शस्य लुकि चस्य कत्वे च असासक् इति सिद्धम् ॥१५॥ हस्वदीर्घापदिष्टं कार्य न प्लुतस्य ॥ १६ ॥ तत्र हस्खापदिष्टं यथा । हे राजनिह । अन्न परत्वान्नित्यत्वाच "दूरादामन्त्र्यस्य ०” (७।४।९९) , इत्यनेन पूर्व प्लुते तस्मात्परस्य नस्य "हस्वाद् ङणन० ( १।३।२७) इति न द्वित्वम् । दीर्घापदिष्टं यथा "अदीर्घाद्विराम०” (१।३।३२) इत्यनेन दीर्घादित्युक्तावपि दीर्घस्थाननिष्पन्नप्लुतस्यैतन्न्यायवलेन ३० वर्जनाऽभवनात् हे गो३त्रात, हे गो३त्रात इत्यत्र दीर्घस्थाननिष्पन्नप्लुतादपि परस्य तकारस्य "अदीर्घा- द्विरामैक०" ( १।३।३२) इत्यनेन वा द्वित्वं सिद्धम् ॥ १६ ॥ संज्ञोत्तरपदाधिकारे प्रत्ययग्रहणे प्रत्ययमात्रस्यैव ग्रहणं न तदन्तस्य ।। १७ ।। ३३ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- संज्ञेति संज्ञासूत्राणि, तन्न संज्ञाधिकारे यथा "स्त्यादिर्विभक्तिः” (१।१।१९) इत्यत्र स्त्याद्यन्तं विभक्तिरित्यर्थो न । ज्ञापकं त्वस्य "तदन्तं पदम्" (१११।२०) इति सूत्रेऽन्तग्रहणम् । एतन्न्यायस्या- भावे प्रत्ययः प्रकृतिमाक्षिपति' इति 'सा पदम्' इत्युक्तेऽप्यन्तविधिलभ्यत एवेति । उत्तरपदाधिकारे यथा "न नाम्येकखरात्" (३।२।९) इति सूत्रादनुवर्तमानोत्तरपदाधिकारस्थे "कालात्तनतर०" (३२२२४) ५इति सूत्रे तनाद्याः प्रत्ययाः स्वरूपेणैव ग्राह्या न तु तदन्तनामानि ॥ १७ ॥ ग्रहणवता नाना न तदन्तविधिः ॥ १८ ॥ निर्देशे सतीति शेपः । साक्षानामग्रहणेन यस्य यत्कार्यमुक्तं तत्तस्य नाम्नः समासादिना समुदाया- न्तभूतस्य सतो न स्यात् , यथा सूत्रप्रधानो नडस्तस्यापत्यम् "अत इञ्” ( ६।११३१) इतीनि अनु- शतिकादित्यादुभयपदवृद्धौ सौत्रनाडिरित्यत्र सूत्रनडशब्दात् “नडादिभ्यः” (६३११५३) इत्यायन १० नाभूत् । ज्ञापकं त्वस्य "मालेपीकेएकस्यान्तेऽपि०” (२।४।१०२) इति सूत्रेऽन्तेऽपीति ग्रहणमेतन्न्या. याभावे अन्तविधिनापि मालभारीतिवदुत्पलमालभारीत्यत्रापि हवः सिद्धयत्येवेत्यन्तेऽपीतिग्रहणं व्यर्थ स्यादिति । 'उपपदविधिषु न तदन्तविधिः' इत्यपि न्यायोऽस्ति, यथा योगक्षेमौ करोतीति शीला योगक्षेमकरी, अत्र क्षेमशब्दस्य समासान्तगत्वात् "क्षेमप्रियमद्रभद्रात् खाण्” (५।१।१०५) इत्यनेन क्षेमोपपदकगो विहितौ खाणौ न, किन्तु "हेतुतच्छीलानुकूले.” (५।१।१०३) इति ट एव, साणो वने १५तु योगक्षेमंकरा योगक्षेमकारीति च स्यात् । परमयमपि 'ग्रहणवता नान्ने यत्रैवान्तर्भूत इति ॥ १८ ॥ अनिनसनग्रहणान्यर्थवताऽनर्थकेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्ति ॥ १९ ॥ अनाद्यन्तानां चतुर्णा कार्ये सार्थकवदनर्थका अप्येते ग्राह्या इत्यर्थः, 'अर्थवद्हणे.' इत्यस्यापवादोऽयम् । तत्र सार्थकोऽन् । यथा राजे: “उक्षि तक्षि" (उणा० ९००) इत्यौणादिकेऽनि राजा, अनर्थकः- अश्नोतेः "पप्यशोभ्याम्” (उणा० ९०३) इति तनि अष्टन् । शसादौ खरे उभयत्रापि "अनोऽस्य” (२॥१॥ २०१०८) इत्यनोऽल्लोपे राज्ञः प्रियाणः पश्येति सिद्धम्। सार्थक इन् दण्डोऽस्यास्तीति "अतोऽनेकस्वरात्" (७१२।६) इतीनि देण्डी, अनर्थकः तपोऽस्यास्तीति "अस्तपो मायामेधा०” (७।२।४७) इति विनि तपस्वी, उभयत्रापि "इनुहन्पूप०” (१।४।८७) इति दीर्घः । सार्थकोऽस् "विश्वाद्विदिभूजिभ्याम्" (९५६) इत्यौणादिकेऽसि विश्ववेदाः अनर्थकः-यथा सरस्येव नासिकाऽस्य "सरखुरानासिकाया नस्” (७३।१६० ) इति सरणाः, उभयत्रापि "अभ्वादेः” (१।४।९०) इति दीर्घः । सार्थको २५मन् “स्यतेरी च वा" (उणा० ९१५) 'पांच अन्तकर्मणी'त्यस्मान्मनि स्यतेरात ईत्वे च सीमा, अनर्थकः, महतो भावः "पृथ्वादेरिमन्या” (७।१।५८) इति इमनि महिमा तमतिक्रान्ता अतिमहिमा स्त्री, उभ- यत्रापि "मनः" (२।४।१४) इति डीनिषेधः । उपलक्षणत्वात् अतुप्रत्ययोऽपि सार्थकवदनर्थको प्रायः, तत्र सार्थको यथा । किं प्रमाणमस्य "इदं किमोऽतुरिकिय चास्य” (७११११४८) इत्यतु- प्रत्यये किमः कियादेशे च कियान् , अनर्थकः-गावोऽस्य सन्ति "तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः” (७२।१) ३० इति मतो गोमान् , उभयत्रापि "अभ्वादेः०” (१।४।९०) इति दीर्घः ॥ १९ ॥ गामादाग्रहणेप्वविशेपः ॥ २० ॥ तत्र गाग्रहणे 'गाड् गतौ' गै शब्दे' इत्येतयोयोरपि यड्लुपि आशीः क्याति जागेयानाम गीतं घा, अनोभयोरपि "गापास्थासा.” (४१३९६) इत्येवं सिद्धम् , अन्यथा गायतेप्रूपस्य लाक्षणिकत्वात् 'लक्षणप्रतिपदोक्तयोः' इति गातेरेव महणं प्राप्नोति । माग्रहणे मांकमाइमेड् एषां क्योर्मितः मितवान्, ३५"दोसोमास्थ इः” (४।४।११) इति इः । अन्यथा 'अदाधनदाद्योरिति 'कृत्रिमाकृत्रिमयोरिति वा , .- " प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः मेङ् एव ग्रहणं प्राप्नोति । दाग्रहणे यथा “प्राज्ञश्च" (५।१।७९) इति सूत्रे ज्ञारूपसाहचर्यादन दारूपमेव ग्राह्यं न तु दासंना इयेतावदेव दारूपमेव संसाध्य तदन्वेतन्यायवलादविशेपेण पड्भ्यो दारूपेभ्यो डाकृतो, डुदांग दाम् वा धनप्रदः, दो, वृक्षप्रदः, देङ् पुत्रप्रदः, दांवक् केदारप्रदः, व् भाजनपद इति । अन्यथा 'अदाधनदाद्योरिति दांग्क्दांवक्वर्जनाचतुर्णामेव, यद्वा 'लक्षणप्रतिपदो- क्तयो रिति दोंदेड्बर्जानां त्रयाणामेव, यद्वा 'कृत्रिमाकृत्रिमयो रिति दादांवदाम्बर्जानां त्रया-५ णामेव ग्रहणं प्राप्नोतीति ॥ २० ॥ श्रुतानुमितयोः औतो विधिर्वलीयान् ॥ २१ ॥ श्रुतः सूत्रे साक्षाच्छन्देनोक्तः । अनुमितः परिभापया पूर्वानुवृत्ताधिकारादिना वा आरोपितः । यथा "ऋतां कृिती" (४।४।११६) तीर्णम् , अत्र श्रुतस्य ऋत एव ईर् न तु "अनेकवर्णः सर्वस्य" (७४।१०७) इति परिभाषया ऋदन्तधातोः सर्वस्य, यत ऋदन्तत्वमृतामित्यस्य धातुविशेषणत्वेन १० "विशेपणमन्तः" (७४।११३) इति परिभाषयारोपितमित्यनुमितमिति ॥ २१ ॥ अन्तरङ्गानपि विधीन् यवादेशो बांधते ॥ २२ ॥ प्रत्ययाश्रितत्वात्पदद्वयापेक्षत्वाच बहिरङ्गोऽपीति शेपः । यथा प्रणम्येत्यत्र "अहन्पञ्चमस्या ४।१।१०७) इति प्रकृत्याश्रितत्वादेकपदाश्रितत्वाचान्तरङ्गमपि दीर्घत्वं वाधित्वा पूर्व यप् , पश्चात्तु धुडादिप्रत्ययाभावान्न दीर्घत्वम् । ज्ञापकं त्वस्य प्रजग्ध्येति सिद्ध्यै “यपि चादो जग्”. (४।४।१६) १५ इत्यत्र यपि चेति वचः, यदि क्त्वापरे जग्धादेशः पश्चाच्च यप् क्रियते तदापि प्रजग्ध्येति सिद्धयति, तथापि यपि चेति यदूचे तदेतन्न्यायाद्यपः सर्वकार्येभ्यः पूर्वभवनादेव । आहुश्व-"तादौ किति जग्धि सिद्धे यपि चेति यदुच्यते । ज्ञापयत्यन्तरङ्गाणां थपा भवति वाधनम्” ॥१॥ इति ॥ २२ ॥ . सकृद् गते स्पर्द्ध यद्बाधितं तद्वाधितमेव ॥ २३॥ गते इति धातूनामनेकार्थत्वाजाते 'गत्यर्था.ज्ञानार्थी' इति ज्ञाते वा । द्वयोर्विध्योरन्यन्त्र सावकाशयोरे-२० कत्रोपनिपातः स्पर्द्धः । द्वयोः स्पर्द्ध सति यत्सूत्रं केनापि हेतुना वाधितं तद्वाधितमेव वाधकसूत्रप्रवृत्त्य- नन्तरमपि न प्रवर्तते, यथा द्वयोः कुलयोरित्यत्र द्वि ओस् इति स्थिते 'आदेशादागम' इतिन्यायात्प्रथम 'अनाम् स्वरे०” (१।४।६४) इति नोऽन्तः प्राप्तः, स च परत्वादन्तरङ्गत्वाच "आढेरः” (२।११४१) इत्यत्वेन वाधितस्तत “एद्वहुस्भोसि” (१।४।४) इत्येत्वे कृते पुनः प्राप्तोऽपि नोऽन्तो न स्यात् ॥२३॥ द्वित्वे सति पूर्वस्य विकारेपु वाधको न वाधकः॥ २४ ॥ द्वित्वे सति यः पूर्वोऽवयवस्तस्य विकारेषु कर्त्तव्येपु यो वाधको विधिः स स्त्रं वाध्यविधि बावितुं. न प्रभवति । 'स्पः परः' 'चलवन्नित्यमनित्यात्' इत्याद्यपवादोऽयम् । अचीकरदित्यन "लघोर्दी" (४।१।६४) इति दीर्घविधिः परोऽपि नित्योऽपि सन्वद्भावं वाधित्वा पूर्व न प्रवर्तते । प्रवृत्तौ त्वचाकर- दित्यनिष्टं रूपं स्यादिति ॥ २४ ॥ कृतेऽन्यसिन् धातुप्रत्ययकार्ये पश्चाद् वृद्धिस्तद्वाध्योऽद च ।। २५ ॥ वृद्धिरिति सामान्योक्तावप्यत्राडागमवाधिका "स्वरादेस्तासु" (४।४।३१) इति विहितैव ग्राह्या ।। अन्यथाऽटस्तद्वाध्यत्वानुपपत्तेः । 'बलवन्नित्यमनित्यात्' 'अन्तरङ्गं बहिरङ्गात्' इत्याद्यपवादोऽयम् । तत्र वृद्धिर्यथा 'क् गतौं' ह्य० अन् ऐयरुः । अधिपूर्व 'इं अध्ययने ह्य० अन्त अध्ययत, अत्र कृता- कृतप्रसङ्गित्वेन नित्यापि वृद्धिः "धातोरिवर्ण०” (२।११५०) इतीयादेशं कृत्वैव क्रियते । पूर्व वृद्धी हि आयरुः अध्यायतेति स्यात् । अट् यथा अचीकरत् इत्यादौ प्रागुक्तहेतुना नियोऽप्यल्पनिमित्तत्वा-३५ २५ ३० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- दन्तरङ्गोऽपि चाऽडागमो लघोर्दी" (४।१।६४) इति दीर्घ कृत्वैव क्रियते, पूर्वमटि हि स्वरादि- त्यादी? न स्यादिति ।। २५ ।। पूर्व पूर्वोचरपदयोः कार्य कार्य पश्चात्सन्धिकार्यम् ॥ २६ ॥ तत्र पूर्वपदकार्य यथा, अमिश्वेन्द्रश्च अग्नेन्द्रौ अन पूर्वपदस्याग्नेरितो "वेदसहश्रुतावायुदेवतानाम्" ५(३।२१४१) इत्यात्वं कृत्वैव पश्चाद्, "अवर्णस्येवर्णादिना.” (१।२।६) इत्येत्वं कृतम् । उत्तरपदकार्य यथा, परमश्वासावयं च परमायमित्यत्रोत्तरपदस्थेदम "अयमियं पुस्त्रियोः सौ” (२।११३८) इत्ययमा- देशः पुंल्लिङ्गापेक्षत्वेन बहिरङ्गोऽपि पूर्वं क्रियते न तु तदनपेक्षत्वेनान्तरङ्गमपि "अवर्णस्येवर्णादिना." ( ११२॥६) इत्येत्वरूपं सन्धिकार्यम् । पश्चाच्च यथाप्राप्तं समानदीर्घरूपं सन्धिकार्य क्रियते इति ॥२६॥ संज्ञा न संज्ञान्तरवाधिका ॥२७॥ यथा प्रस्थ इत्यत्र प्रस्य गत्युपसर्गसंज्ञयोः सद्भावाद् , "गतिकन्य०" ०" (३३१२४२) इति तत्पुरुषः "उपसर्गादातो डोऽश्यः" (५।११५६) इति डश्च युगपदभूतामिति ॥ २७ ॥ सापेक्षमसमर्थम् ॥ २८॥ पदान्तरसापेक्षं पदं समासादिपदविधीन प्राप्तुं नालम् । यथा ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः इत्यत्र राजश- ब्दस्य मद्धविशेपणसापेक्षत्वात्पुरुषशब्देन सह न समासः ॥ २८ ॥ प्रधानस्य तु सापेक्षत्वेऽपि समासः ॥ २९ ॥ यस्य क्रियया सामानाधिकरण्यं तत्प्रधानम्। यथा राजपुरुषोऽस्ति दर्शनीय इत्यादी समासात् प्रागव- स्थायां पुरुपशब्दस्य स्खविशेपणदर्शनीयशब्दसापेक्षत्वेऽपि राजशब्देन तत्पुरुषः ॥ २९ ॥ तद्धितीयो भावप्रत्ययः सापेक्षादपि ॥३०॥ यथा काकस्य कृष्णस्य भावः काकस्य काष्ण्येमित्यादौ कृष्णशब्दात्काकशब्दसापेक्षादपि पतिरा- २० जान्त.” (७११६६०) इति ट्यण् सिद्धः । ज्ञापकं त्वस्य “पुरुषहृदयादसमासे” (७११७०) इत्यत्र 'असमासे' इति । तद्धि परमस्य पुरुपस्य भावः परमपौरुपमित्यणभावार्थमिति ॥ ३० ॥ गंतिकारक.स्युक्तानां विभक्त्यन्तानामेव कृदन्तैर्विमच्युत्पत्तेः प्रागेव समासः॥३१॥ यद्यपि "नाम नाम्नैकाध्य०" (३११११८) इति सूत्रेण नानो नाम्ना समास उक्तस्तथाप्यकायें इति समासान्ततिविभक्तिलुपकरणाज्ज्ञापितं यदुत विभत्त्यन्तानामेव समास इति । ततश्चोभयोरपि पद- २५ योविभच्यन्तत्वे प्राप्ते गत्यादीनामुत्तरपदस्य कृदन्तस्याविभक्त्यन्तत्वनियमार्थोऽयं न्यायः । तत्र गते- यथा, विकिरति पक्षाविति विकिरी इत्यादौ पक्ष्यर्थमानापेक्षत्वेनान्तरङ्गत्वात्प्रथमं "यौ विकिरो या" (४।४।९६) इति स्सटि विस्किर इति स्थिते "ऊर्याद्यनुकरण०" ( ३११।२) इति कृतगतिसंज्ञस्य के "नान्युपान्यप्रीकृगृज्ञः कः” (५।११५४) इति कप्रत्ययान्तेन स्किर इत्यनेन सह "गतिकन्य (३॥१॥४२) इति तत्पुरुपस्ततो "असोडसिवूसहस्सटाम्” (२।३।४८) इति स्सटः सस्य पत्वे विकिर: ३० पक्षी, ततः खीत्यविवक्षायामदन्तत्वात् "जातेरयान्त" (२।४।५४) इति डीः सिद्धः, यदि वेतन्या- यानपेक्षणाद्विभत्त्यन्तेन स्किरेत्यनेन समास इप्यते तदा कर्मादिशक्तिसह्याद्यपेक्षत्वेन बहिरङ्गाया विभक्तरुत्पत्तः मागेव नीत्वमात्रापेक्षत्वेनान्तरङ्गस्यापः प्राप्तायदन्तत्वाभावात् डीन स्यात् ॥ १॥ कार- कस्य यथा पर्मणा फ्रीयते स्म धर्मक्रीती इत्यादौ चर्मन् टा क्रीत इति स्थिते करणकारकस्य "कारक .॥ (३।१।६८) इति तत्पुरुपः, ततः स्त्रीत्वविवक्षायां "क्रीवात्करणादेः” (रा४४) इति क्रीव- ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः ४१ शब्दाददन्तात् ङीः सिद्धः; यदि तु विभक्त्यन्तेन क्रीतेन समास इष्यते तदा प्राग्वदन्तरङ्गत्वाद्विभत्त्यु- त्पत्तेः प्रागेवापः प्राप्तावदन्तत्वाभावात् डीन स्यात् , पूर्वपदस्य तु विभक्त्यन्तत्वनियमाचर्मक्रीतीत्यत्र पदत्वान्नस्य लोपः ।। २ ।। कृत्प्रत्ययविधायिसूत्रे ङसिनेयेकदेशस्य समुदायोपलक्षणत्वात्पञ्चम्यन्तेनोक्तं ङस्युक्तम् , तत्र ङसिनैवोक्तस्य यथा कच्छं पिवतीति कच्छपीत्यादौ कच्छ अम् प इति स्थिते "नाम्नो गमः खड्डौ च विहायसस्तु विहः” (५।१।१३१) इत्यतोऽधिकृतान्नाम्नः परस्य स्थादिधातोर्विहितो यः५ "स्थापानावः कः” (५।१।१४२) इति कप्रत्ययस्तदन्तेन पेत्यनेन सह कच्छशब्दस्य "डास्युक्तं कृता' ( ३।११४९) इति तत्पुरुषः, कच्छशब्दस्य नाम्न इति ङसिनोक्तत्वात् , ततः स्त्रीत्वविवक्षायां "जातेर- यान्त०” (२।४।५४) इत्यनेन कच्छपशब्दाददन्ताद् डीः, यदि तु विभक्त्यन्तेन पेत्यनेन समासः स्यात्तदा प्राग्वदापः प्राप्तावदन्तत्वाभावाद् डीन स्यात् । पञ्चमीभ्यस्युक्तमप्युक्तयुक्त्या उस्युक्तमेव, तस्य यथा विषं धरतीति विपधरीत्यादौ विप अम् धर इति स्थिते विपशब्दस्य "आयुधादिभ्यो धृगोऽ-१० दण्डादेः” ( ५।११९४ ) इति सूत्रे भ्यसुक्तस्यापि डस्युक्तत्वादच्प्रत्ययान्तेन धरेत्यनेन [ सह 'डस्युक्तं कृता' इति तत्पुरुपस्ततः स्त्रीत्वविवक्षायां 'जातेरयान्त०' (२।४५४ ) इति ङीः । यदि तु विभक्त्य- न्तेन धरेत्यनेन ] समासः स्यात्तदा प्राग्वदन्तत्वाभावाद् ङीन स्यात् ।। ३१ ॥ समासतद्धितानां वृत्तिर्विकल्पेन वृत्तिविपये च नित्यैवापवादवृत्तिः ॥ ३२ ॥ परार्थाभिधानं वृत्तिः । सा च त्रिधा, समासतद्धितान्तनामधातुभेदात् । राजपुरुपः, औपगवः, १५ पुत्रकाम्यतीति । समासवृत्तौ समस्यमानपदानि शेपवृत्त्योस्तु प्रकृतिप्रत्ययौ सम्भूयार्थ ब्रुवन्तीति स्वार्थातिरि- क्तसमुदायार्थाभिधायित्वात्परार्थाभिधायित्वं, तत्र वाक्येनाभिधाने प्राप्ते वृत्तिरारभ्यमाणा येन नाप्राप्ते.' इति न्यायाद्वाक्यस्य वाधिका स्यादिति विकल्पेन तस्यानुज्ञार्थोऽयं न्यायः; तथा वृत्तिपक्षे उत्सर्गापवा- दरूपयोवृत्त्योः सम्भवे उत्सर्गस्य नित्यमेव वाधश्चानेनोच्यते । तत्र समासवृत्तिर्यथा, कायस्य पूर्वोऽशः पूर्वकायः । अत्र "पूर्वापर०" (३।१।५२) इत्यनेनांशीतत्पुरुषो वाक्यं च; न तु “पष्ठ्ययत्नाच्छेपे” २० (३।१।७६ ) इत्यौत्सर्गिकः कायपूर्व इति पष्ठीसमासः । तद्धितवृत्तिर्यथा । गर्गस्यापत्यं वृद्धं गार्ग्यः । अत्र “गर्गादेर्यम्” ( ६।११४२) इति यञ् वाक्यं च । नत्वौत्सर्गिको गार्गिरिति "अत इन्" (६।१।३१) इतीम् ॥ ३२ ॥ एकशब्दस्यासङ्ख्यात्वं क्वचित् ॥ ३३ ॥ एकशब्दस्य सङ्ख्यात्वप्रसिद्धेः कचिन्निपेधार्थोऽयं न्यायः । यथैकमह इत्यत्रैकस्यासङ्ख्यात्वात् "अह्नः" २५ (२।१।७४) इत्यसमासान्ते "नोऽपदस्य तद्धिते” (७४।६१) इत्यन्त्यस्वरादिलोपे "अहनियूहक- लहाः” (लिङ्गानु० पुं० १५१३) इति पुंस्त्वे प्राप्तेऽपि 'अहः सुदिनैकतः' (लिङ्गानु० न० ८।२) इति विशेपविधिना क्लीवलिङ्गत्वे एकाहमिति सिद्धम् , सङ्ख्यात्वे तु “सर्वांशसङ्ख्याव्ययात्” (७।३।११८) इत्यनेनादि अनेनैव चाहादेशे 'अर्धसुदर्शनदेवनमहा' (लिङ्गानु० पुं० ११।१) इति पुंस्त्वे च एकाह्न इत्यनिष्टं रूपं प्रसज्येत । ज्ञापकं त्वस्य “सङ्ख्यातैकपुण्य०” (७।३।११९) इति सूत्रे चकारेण "सर्वा-३० शसङ्ख्याव्ययात्” इतिसूत्रात्सङ्घयानुवृत्तावपि पृथगेकशब्दग्रहणम् ।। ३३ ।। आदशभ्यः सङ्ख्या सङ्खयेये वर्त्तते न सङ्ख्याने ॥ ३४ ॥ अयं भावः-अष्टादशावधि सङ्घया सङ्खयेयेन सह सामानाधिकरण्येन प्रयोज्या । यथैको द्वौ त्रयो वा यावदष्टादश घटाः न तु घटानामिति । आदशभ्य इति किम् ? एकोनविंशत्यादिसङ्ख्या तु सङ्ख्थेये सङ्घयाने च प्रवर्तते । यथैकोनविंशतिघंटा घटानां वा, यावन्नवनवतिशतं सहस्रं लक्षं कोटिर्वा घटा, घटानां वेत्यादि ॥ ३४ ॥ है. प्रका० पूर्वा० ६ ४२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमेलघु- गौ यत्कृतं कार्य तत्सर्व स्थानिवद्भवति ॥ ३५ ॥ णाविति निमित्तसप्तमी । यथा स्फुरत् णौ सनि, पुस्फारयिपति, अत्र "चिस्फुरोर्नवा" (४।२।१२) इति आत्वस्य णौ निमित्ते सति कृतस्य स्थानिवद्भावात् स्फु इति द्वित्वं सिद्धम् ।। ३५ ॥ द्विद्धं सुबद्धं भवति ॥ ३६ ॥ ५ यदर्थ व्याकरणधातुपाठादौ प्रयत्नद्वयं कृतं तत्सुबद्धमव्यभिचारि भवति । यथा 'असूच क्षेपे' अद्य० दि, आस्थत् । अत्राडो न व्यभिचारः, अस्यतेः “शास्त्यसूवक्ति०" (३।४।६०) इति सूत्रे पुष्यादौ च पाठात्। अन्येषां तु तद्व्यभिचारोऽपि यथा 'भगवन्मा कोपी रिति बालरामायणे, अन पुष्यादित्वेऽप्यङ् न ।। ३६ ।। आत्मनेपदमनित्यम् ।। ३७॥ यथाशिष्टप्रयोगं कचित्प्राप्तमपि न स्यात्, कचिच्चाप्राप्तमपि स्यात् । एवमुत्तरत्र न्यायचतुष्कऽपि यथा- १० योगमनित्यशब्दार्थो व्याख्येयः, । यथा--"सम्यक् प्रणम्य न लभन्ति कदाचनापि” 'डुलभिप् प्राप्तौ' "परार्थे क्लिश्यतः सतः” 'क्लिशिच उपतापे' "नरपति सेवन्ति किं मानिनः" 'पेड सेवने "मिथ्या न भापामि विशालनेत्रे" 'भापि व्यक्तायां वाचि' 'तर्जिणू सन्तर्जने तर्जयति । 'भर्सिण सन्त ने भर्त्सयति । 'भलिण् आभण्डने' भालयति । 'शमिण आलोचने निशामने' निशामयति । 'कुत्सिण् अवक्षेपे' कुत्सयति । 'वञ्चिण प्रलम्भने' वञ्चयति । विदिण चेतनाख्याननिवासेपु' वेदयति । इत्या- १५ दिषु धातूनामिडित्त्वेऽपि नात्मनेपदम् ‘पसूज् गतौ' "प्रकृतिगुणकर्मसु सनमानकार्येपु" अनेडित्त्वा- भावेऽप्यात्मनेपदम् । ज्ञापकं त्वस्य 'एजुड् भ्रेजृड् भ्राजि दीप्तौ' इति भ्राजेरात्मनेपदेपु पाठेऽपि 'राजगू टुभ्राजि दीप्तौ' इत्युभयपदिष्वात्मनेपदित्वेन पुनः पाठः । अयं हि द्विवद्धं सुबद्धमिति न्यायेनास्यात्मने- पदाव्यभिचारज्ञप्त्यर्थः, तज्ज्ञानं चानेन न्यायेनान्येषां धातूनामात्मनेपदव्यभिचारशङ्कायां सार्थक- मिति ॥ ३७॥ किपि व्यञ्जनकार्यमनित्यम् ॥ ३८ ॥ तत्राख्यातकिपि यथा । राजेवाचरति "कर्तुः विप्०” (३।४।२५) इति क्विपि राजनतीत्यादी किप्सत्कवकारख्यञ्जनद्वारप्राप्तस्य "नामसिदय्व्यञ्जने” (१।१।२१) इति पदत्वस्याभवनात् "नाम्नो मोऽनह्नः” (२।१।९१) इति नस्य लुग् नाभूत् । कृक्तिपि यथा गीर्यते इति "क्रुत्संपदादिभ्यः कि!" (५।३।११४ ) इति किपि गिरौ गिरः, अन्न प्राग्वत्प्राप्तपदत्वाभवनात् "पदान्ते" (२।१।६४) इति २५दी| न ॥ ३८ ॥ स्थानिवद्भावपुंवद्भावैकशेपन्दैकत्वदीर्घत्वान्यनित्यानि ॥ ३९ ॥ कचिदिति शेपः, एवमुत्तरन्यायेऽपि । द्वन्द्वैकत्वं समाहारद्वन्द्वः, दीर्घत्वं "भ्वादेनामिना" (२।१।६३) इति सूत्रविहितं प्राह्यम्, ततः पञ्चैतान्यनित्यानि । तन्न स्थानिवद्भावो यथा । स्वाद्वकात्ि णिजि असिस्वददित्यन उकारस्य वृद्धावन्यस्वरादिलुकि तस्य स्थानिवद्भावाभवनेनाकारस्योपान्त्यत्वात् ३० "उपान्त्यस्यासमान." (४।२।३५) इति हवः । १ । पुंवद्भावो यथा । दक्षिणस्यां भवो "दक्षिणा- पश्चात्" (६।३।१३) इति त्यणि दाक्षिणात्यः, अन "सर्यादयोऽस्यादौ" (३।२।६१) इति प्राप्तोऽपि पुंबद्भावो न, ज्ञापकं त्यस्य "कौण्डिन्यागस्त्ययोः०" (६।१।१२७) इति सूत्रनिर्देशः । अयं हि कौण्डिन्यशब्दः पुंवद्भावानित्यत्वं विना न सिद्धयति । तथाहि-'कुडुड् दाहे' इत्यस्मात् "अजातेः शीले” (५।१।१५४) इति णिनि स्त्रीत्वे डयां कुण्डिनी, ततो वृद्धापत्यार्थे यति जातिश्व- २० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः ४३ णितद्धितयखरे" (३।२।५१) इति प्राप्तः पुंवद्भावो यदि स्यात्तदा डीनिवृत्तौ "नोऽपदस्य." (७४।६१) इति इन्लोपे कौण्ड्य इति प्राप्नोति । २ । एकशेपो यथा । "तदतदात्मकं तत्त्वमातिष्टन्ते जैनाः” अत्र "त्यदादिः" (३।१।१२० ) इति प्राप्ततच्छन्दैकशेपो न । ३ । द्वन्द्वैकत्वं यथा शसदुन्दुभिवीणाः अत्र "प्राणितूर्याङ्गाणाम्” (३।१।१३७ ) इति प्राप्तोऽपि समाहारद्वन्द्वो न, ज्ञापकं त्वस्य "प्राणितूर्याङ्गाणा- मि"ति सूने बहुवचनमेव । ४ । दीर्घत्वं यथा 'कुर्दि क्रीडायां' कुर्दते "रम्यादिभ्यः कर्तरि"५ (५।३।१२६ ) इत्यनेन कुर्दनः, 'गुर्वे उद्यमें' "णिन् चावश्यका०” (५।४।३६) इति णिनि उयां गुर्विणी इत्यादौ "भ्वादेर्नामिनः०” ( २।१।६३) इति दी? न, ज्ञापकं त्वस्य स्फूर्ज ऊर्ज इत्यादीनां कृतदीर्घाणामेव धातुपु पठनं न तु हु मुर्छादीनामिवाकृतदीर्घाणां, तच्च स्फूर्जादीनां दीर्घत्वाव्यभिचा- रद्वारेणान्येपां तव्यभिचारज्ञापनार्थमिति । ५ ।।। ३९ ॥ अनित्यो णिचुरादीनाम् ॥ ४० ॥ सर्वत्र भवन्नपि यथाप्रयोगदर्शनं कचिन्न स्यादपीत्यर्थः । यथा चुरण चोरति । चितुण चिन्तति । छदण् छदनम् । तुलण "भिदादयः” (५।३।१०८) इत्यङि तुला इत्यादि सिद्धम् । घोषकं त्वस्य चुरादिघुप ऋदित्त्वम् , तद्धि "ऋदिच्छुिस्तम्भू०” (३।४।६५) इत्यङि, अघुपदित्यादिरूपसिद्धयर्थ कृतं, णिच ऐकान्तिकत्वे तु विशेषविधित्वात् "णिश्रिद्रुश्रु०” (३।४।५८) इति ङस्यैव प्राप्तेरजूघुपदित्यायेव भवनेनाङोऽवकाशस्यैवाभावात् , अस्यानित्यत्वाच युजादिवर्जानामेव चुरादीनां यथाशिष्टप्रयोगमनियतो १५ णिच् , युजादीनां तु "युजादेर्न वा” (३।४।१८) इति नियत एव णिजूविकल्पः ॥ ४० ॥ णिलोपोऽप्यनित्यः ॥४१॥ कचिदित्यध्याहार्य, यथाप्राप्ति सर्वत्र भवन्नपि क्वचिन्न भवतीत्यर्थः । यथा “मधवो युधि सुप्रक- म्पयाः", अत्र सुप्रपूर्वात् ण्यन्तात्कम्पेः खलि, गेर्लयोऽनित्यत्वादभवनेऽयादेशः सिद्धः ॥ ४१ ॥ णिच्सन्नियोगे एव चुरादीनामदन्तता ॥ ४२ ॥ चुरादीनामिति सामान्योक्तेऽप्यङ्कादीनां कुहण्यन्तानामिति ज्ञेयं नान्येपां; तेपामदन्तत्वस्यैवासम्भवात्। प्राग णिचः सर्वत्र यथादर्शनमदन्तत्वोक्तेर्णिजभावपक्षे अकादीनामदन्ततानिपेधार्थोऽयं न्यायः । यथा जगणतुरित्यादौ णिजभावपक्षेऽनदन्तत्वेनानेकस्वरत्वाभावादामादेशो नाभूत् ॥ ४२ ॥ धातवोऽनेकार्थाः ॥४३॥ ततो धातुपाठेऽनुक्तोऽप्यर्थों लक्ष्यानुसारात्तेषां प्रयोज्य इत्यर्थः । यथा 'विधत् विधाने' । अयं २५ व्यधार्थेऽपि, यथा वेधः शब्दवेधी । एधि वृद्धौ । अयं दीप्त्यर्थेऽपि, “पुरश्चक्रं तवैधते", प्राप्त्यर्थेऽपि औपवस्त्रफलमेधते । 'शुच् शोके' अयं पावित्र्येऽपि शुचिः । मननं मतं मतशब्दः साम्येऽपि । यथा "मतीकृता क्षेत्रभूः", समीकृतेत्यर्थः । ज्ञापकं त्वस्य "तक्षः स्वार्थे वा” (३।४।७७ ) इत्यत्र स्वार्थे इति विशेपणं तेनेहार्थान्तरे झुन-"संतक्षति वाग्भिः शिष्यं", निर्भर्त्सयतीत्यर्थः ॥ ४३ ॥ गत्यर्था ज्ञानार्थाः ॥४४॥ धातच इति योगः । यथा “गमयति शब्दोऽर्थ", ज्ञापयतीत्यर्थः । ज्ञापकं त्वस्य "णावज्ञाने गमुः" (४।४।२४) इत्यत्रेणोऽज्ञान इति विशेषणमेतन्न्यायाभावे गत्यर्थस्येणो ज्ञानार्थत्वासम्भवेऽज्ञानार्थेत्युक्ति- व्यथैव स्यादिति ॥ ४४ ॥ नाम्नां व्युत्पत्तिरव्यवस्थिता ॥ ४५ ॥ नामान्यनेकधा व्युत्पाद्यन्त इत्यर्थः । यथा अश्वस्याम्बा वडवा, असृगालेढि सृगालः, मह्यां रौति ३५ २० , ४४ - महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- मयूरेत्यादि पृपोदरादित्वात् सिद्धम् । पुनः 'वड आग्रहणे' इति सौत्रधातोः "वडिवटि." (उणा० ५१५) इत्यवे वडवा, सृधातोः "सर्तेर्गोऽन्तश्च" (उणा० ४७८) इति कित्याले गागमे च सृगालः। मीनाते: "मीमसि.” (उणा० ४२७) इत्यूरे मयूर इत्युणादिसूत्रैरपि साधितम् । तथा सूर्यशब्दः कृति ''यभिदा.” (५।११३९) इति सूत्रेण सृधातोः क्यपि सज्ञायां निपातितः, पुनस्तद्धिते सूर- ५शब्दस्य "मादिभ्यो यः" (७२।१५९) इति यप्रत्यये साधितः । अनित्यत्वाचास्य रूढनाम्नामेव व्युत्पत्तिरव्यवस्थिता न तु यौगिकानां नीलकण्ठादीनामिति ॥ ४५ ॥ उणादयोऽव्युत्पन्नानि नामानि ॥ ४६॥ अवयवावयविनोरभेदोपचारादुणादय इत्युणादिप्रत्ययान्तानि । अयं भावः-"कृवापाजिस्खदि० (उणा० १) इत्यादिना पश्चोत्तरसूनसहस्रेण "उणादयः" (५।२।९३) इति सूत्रसूचितेन कारुवायु- १० पायवादीनि नामानि व्युत्पादितानि तत्प्रकृतिप्रत्ययविभागेन वर्णानुपूर्वीनिर्ज्ञानार्थमेव न तु कर्त्तत्यादि क्रियाशब्दवदन्वर्थदर्शनार्थमिति । तत्त्वतस्तान्यव्युत्पन्नान्येव तेषां रूढिशब्दत्वेन व्युत्पत्तेरकिश्चित्करत्वात् । यथा, वीरधातोः "पटिवीभ्याम्०” ( उणा० ५७९) इति डिसे विसं, तत्त्वतोऽस्याव्युत्पन्नत्वेन सस्य कृतत्वाभावात्पत्वं न स्यादिति, अनित्यत्वाचास्य वपेरौणादिके "रुद्यति" (उणा० ९९७) इत्युसि वपुपेत्यादी कृतत्वात्सस्स प: सिद्धः । अनित्यत्वज्ञापकं त्वस्य "तृस्वस" ( ११४१३८) इति १५सूने अस्य न्यायस्यानित्यत्वात् एग्रहणेनैव नानादिग्रणे सिद्धे नियमार्थ नज़ादीनां पृथग्रहणं, नियम- श्वायम्-औणादिकमत्ययान्तानां नत्रादीनामेवार तेन मातरौ, पितरौ इत्यनार् न स्यात् ॥ ४६ ॥ शुद्धधातूनामकृत्रिम रूपम् ॥४७॥ धातुपाठपठितरूपा धातयः कृता इति नोच्यन्ते । यथा 'मुसच् सण्डने', उणादी कित्यले मुसलम् । अन सस्य कृतत्वाभावात्पत्वं न स्यात् ।। ४७ ॥ फियन्ता धातुत्वं नोज्झन्ति शब्दत्वं च प्रतिपद्यन्ते ॥४८॥ धातुत्वमिति नामार्यसंवलितधात्वर्थाभिधायित्वाद्गौणधातुत्वं तत एव शब्दत्वं च उपचाराद् पृक्षादि- यग्नामत्वं च प्रतिपद्यन्ते, धातुत्वनामत्वयोः कार्य लभन्ते इत्यर्थः । यथा नियौ लुयी इत्यादी धातुत्वा- दियुवो, नामत्वात्स्यादयश्च ॥ ४८ ॥ उमयस्थाननिप्पन्नोऽन्यतरव्यपदेशभार ।। ४९ ।। यया आइ, 'ईपि गतो' आ ईप्यः एप्यः । ततः प्रेण योगे आइ ईतो स्थानजस्य एतोः यदा आहा- देशत्यं तदा "ओमाहि" ( १।२।१८) इत्यहोपे प्रेप्य इति स्यात्, धात्यादेशत्ये च "उपसर्गस्यानिणे. घेदोति" ( ११२।१९) इत्योपः स्यात्, परं तं बाधित्वा विशेषविहितत्वात् "प्रस्यैपेप्योढोदयूहे स्वरेण" (१४) इयरचे प्रेप्य इति सिद्धम् । अनित्यत्वासाम्य राजानमारयदरराजदित्यनान्यस्वरादि- रोपस अनरूपस्वरव्यसनोमयस्थाननिष्पनऽपि स्वरादेशनेय व्यपदेश्या न तु व्यञ्जनादेशता, तप ३० देशे सममानटोपित्यादुपान्यतस्सम्य सन्यायादेव सिद्धावरीरजदिति स्यात् ।। ४९ ॥ अपपये क लिई समुदायमपि विशिनष्टि चेत्तं समुदायं सोऽभययो न व्यभिचरति ॥ ५० ॥ यया 'पुग्मिण गुग्मयने अम्मार "चुरादिभ्यो गि" (३।४।१७) इति गिचि पुस्मयते । चिरान भाभदाय हित, चित्रं फरोतीति पास्ये "नमोयरियधिग्रहोऽासेयाश्च" (शा३७) इति क्यनि ३vचित्रीले । 'मदी पजापा' फण्डादिः, "धानो: फरहादेयह" (३।४।८) इति यकि मदीयते इत्यादी, प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः ४५ १० कुस्म्यादीनामिङित्त्वेन णिक्यन्यंगन्तसमुदायस्यापि इङित्त्वादात्मनेपदम् ; कुस्म्यादीनां णिचाद्यन्तसमु- दायेनाव्यभिचारित्वात् । चेत्तं समुदायमित्यादि किम् ? कुस्म्यादीनां णिचाद्यागमादनु प्रयोक्तव्यापारा- थणिगन्तानां समुदायङित्त्वहेतुकमात्मनेपदं मा भूत् । णिगः प्रयोक्तृव्यापारे सयेवोत्पत्तेः, कुस्म्यादीनां णिगन्तसमुदायव्यभिचारित्वादिति ॥ ५० ॥ येन धातुना युक्ताः पादयस्तं प्रत्येवोपसर्गसंज्ञाः ॥५१॥ तदन्यधात्वादियोगे उपसर्गकार्य न स्यादित्यर्थः । यथा प्रर्च्छक इत्यत्र प्रगता ऋच्छका यस्मादिति वाक्ये गतार्थमन्तर्भाव्य प्रवर्त्तमानेन प्रेण णकप्रत्ययस्यैवार्थः कर्ता विशेप्यते न तु ऋच्छिप्रकृतेरर्थः । ये ऋच्छन्ति कर्तृरूपास्ते प्रगताः तदेवं प्रस्य ऋच्छिना सह सम्बन्धाभावादनुपसर्गत्वाद् "प्रत्यारुपस- र्गस्य” (११२।९) इत्यार् न ।। ५१ ॥ यत्रोपसर्गत्वं न सम्भवति तत्रोपसर्गशब्देन प्रादयो लक्ष्यन्ते न तु सम्भवत्युपसर्गत्वे ।। ५२ ।। यथा प्रगतोऽध्वानं प्राध्वो रथ इत्यादौ प्रस्यानुपसर्गत्वेऽपि "उपसर्गादध्वनः” (७३।७९) इत्यत् समासान्तः । प्रस्थानुपसर्गत्वं तु उपसृत्य धातुमर्थविशेष सृजतीत्यन्वर्थानाश्रयणात् ॥ ५२ ।। शीलादिप्रत्ययेषु नासरूपोत्सर्गविधिः ॥ ५३ ॥ आदेर्धर्मसाध्वर्थयोर्ग्रहः । प्राप्तप्रतिपेधार्थोऽयं न्यायः एवमुन्तरोऽपि । यथा अलङ्करिष्णुः कन्यामि-१५ त्यादौ "भ्राज्यलग्निराकृग्०” (५।२।२८) इति इप्णुरेव स्याद् न तु "तृन् शीलधर्मसाधुपु" (५।२।२७) इत्यनेन तृन् । तेन शीलाद्यर्थेऽलङ्कर्तेत्यादिप्रयोगो न साधुः ॥ ५३ ॥ त्यादिप्वन्योन्यं नासरूपोत्सर्गविधिः ॥ ५४ ॥ यत्रोत्सर्गरूपायास्यादिविभक्तर्विपयेऽपवादरूपा त्यादिविभक्तिः प्राप्नोति, तद्विषये औत्सर्गिकी त्यादिविभक्तिः "असरूपोऽपवादे०” (५।१।१६) इत्यनेन प्राप्ताप्येतच्यायेन निषिध्यते । यथा स्मरसि २० चैत्र कश्मीरेषु वत्स्याम इत्यादौ "अयदि स्मृत्यर्थे०” (५।२।९) इति भविष्यन्ती, तद्विपये "अनद्यत- ने हस्तनी” (५।२।७) इत्यौत्सर्गिकी विभक्तिर्न स्यात् । त्यादि विभक्तीनामेवान्योन्यमसरूपोत्सर्गविधि- निविध्यते प्रत्ययेन तु समं त्यादिविभक्तीनां सोऽस्त्येव, तेनोपशुनाव इत्यादौ "श्रुसदवस्भ्यः परोक्षा वा" (५।२।१) इति परोक्षावत्तद्विपये उत्सर्गभूताः क्तादयोऽपि स्युरेव, यथा उपश्रुतः उपश्रुतवान् । ज्ञापकं त्वस्य "श्रुसद०” इत्यत्र वाग्रहणम् । तद्धि पक्षे यथाकालमद्यतनीह्यस्तन्यर्थम् । ते चैतन्या-२५ याभावे सरूपत्वात् सिद्धे एवेति ।। ५४ ॥ स्त्रीखलना अलो वाधकाः स्त्रियाः खलनौ ॥ ५५ ॥ स्त्रीति रुयुक्ताः; अन् इति चानट्प्रत्ययः । "असरूपोपवादे.” (५।१११६) इत्यनेन क्तेः माग् ये प्रत्ययास्तेपु पाक्षिकोऽसरूपविधिर्व्यवस्थापितस्तद्ग्रेतनप्रत्ययानां तु स्पर्द्ध सति व्यवस्थार्थोऽयं न्यायः । यथा चयनं चितिरित्यादौ "स्त्रियां क्तिः” (५।३।९१) "युवर्ण०" "युवर्ण०” (५।३।२८) इत्याभ्यां क्रमात् ३० ख्यलोः प्राप्तौ परत्वात् त्येव । दुःखेन चीयते दुश्चयमित्यादी "दुःस्वीपतः०” (५।३।१३९) "युवर्ण." इत्याभ्यां क्रमात् खललोः प्राप्तौ परत्वात् खलेव । पलाशानि शायन्तेऽनेनेति पलाशशा- तनो दण्ड इत्यादौ "करणाधारे" ( ५।३।१२९) "युवर्ण०" इत्याभ्यां क्रमादनडलोः प्राप्तौ परत्वा- दनडेव } "स्पर्द्ध" (७४|११९) इति परिभाषायाः प्रपञ्चोऽयम् । अनित्यत्वाचास्य जय इत्यादौ ३४ ..

-- - ४६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "स्त्रियां किः" "युवर्ण." इत्याभ्यां कमात्रूयलोः प्राप्तावलेव । शिरसोऽर्दनं शिरोऽतिरित्यादौ च अर्दतेः "स्त्रियां क्तिः" "अनट् ( ५।३।१२४) इत्याभ्यां क्रमालयनटोः प्राप्तौ रुयेव ।। ५५ ॥ यावत्सम्भवस्तावद्विधिः ॥५६ ॥ यथाप्राप्तस्य सूत्रस्य न्यायस्य वा यावतो वारान्प्रवृत्तेः सम्भवः स्यात्तावतो वारांस्तस्य प्रवृत्तिः ५कार्येव नत्वेकवारं कृतेति बुद्धयाऽधिकवारं सम्भवे सत्यपि न क्रियत इति । सम्भवे व्याहते च प्रवृत्तिन पार्येव । 'यस्य तु विधेनिमित्तमस्ति' इत्यादि न्यायस्य प्रपञ्चोऽयं न्यायः । तत्र सूत्रस्य त्वक् इत्यादौ प्रथमं विरामे परे "अदीर्घात.” (१।३।३२) इत्यनेन कस्य द्वे रूपे क्रियेते त्वक् , पुनरनेनैव एक- व्यञ्जने परे सूत्रप्रवृत्तेः सम्भवस्य सद्भावादाद्यकस्य द्वे रूपे क्रियेते यथा त्वक्छ । ततः परं तु मध्यम- फस्य "धुटो धुटि खे वा” (१।३।४८) इति लुकि पुनराधकस्य "अदीर्घात्" ( १।३।३२) इति द्वे रूपे १० प्राप्नुतः परं न क्रियेते, तथाकरणे क्रियानुपरमप्रसङ्गाद् , 'यं विधिं प्रति' इति न्यायेन व्यर्थविधिनिषेधेन प्रवृत्तेः सम्भवस्य व्याहतत्वात् [न्यायस्य यथा-गः कृतवचादेशस्य प्रण्यवोचतेत्यादौ भूतपूर्वकन्या- यस्य प्रथमवारं प्रवर्त्तनेन वोचस्य धचत्वोपचाराहितीयवारं प्रवर्त्तनेन च वचस्यापि ब्रूत्वोपचारात्त- स्मिन् परे "अकसादि०” (२॥३॥८०) इत्यनेन ने! णः । नन्वत्र भूतपूर्वन्यायस्य द्वे अपि प्रवृत्ती किमर्थ क्रियेते; वोचे एव हि परे नेर्णः करिष्यते । मैवम् । वोचस्य धातुष्वपठितत्वात् । "अकसा- १५दि.” (२।३।८०) इत्यत्र च पाठविपयस्यैव धातोर्ग्रहणात् ] ॥ ५६ ॥ सम्भवे व्यभिचारे च विशेषणमर्थवत् ॥ ५७ ॥ यत्र विशेष्ये विवक्षितविशेपणस्य न सम्भवो नापि सम्भवासम्भवरूपो व्यभिचारस्तन तद्विशेपणोप- न्यासो व्यर्थत्वान्न कार्य इत्यर्थः । 'यं विधि प्रत्युपदेशोऽनर्थक०' इति न्यायस्य प्रपञ्चोऽयं न्याय:- अनेनापि व्यर्थविशेपणोपन्यासविधेरेव निपिध्यमानत्वात् । यथा "तौ मुम०" (१।३।१४) इत्यत्र 'पदान्त' २० इति विशेपणं म्यागमस्य न योज्यते असम्भवात् , मस्य तु योज्यते त्वन्तरसीत्यादौ सम्भवेन, रम्यत इत्यादावसम्भवेन च पदान्तस्थत्वस्य व्यभिचारित्वात् ॥ ५७ ॥ सर्व वाक्यं सावधारणम् ॥ ५८ ॥ एवम्यानयोगेऽपि सर्ववाक्येप्नेकोऽवधारणार्थो सभ्यते, "सिद्धिः स्पाद्वादात् ( १११२) इत्युच्या सर्वत्र साद्वादाश्रयणे प्रसक्ते कचित्तदनाश्रयणार्थोऽयं न्यायः । यथा “समानानां तेन." (श२।१) २५ इत्यत्र दीर्घः स्यादेवेति वाक्यस्यायधारणादण्डाममित्यत्र दीर्घोऽभूदेव । ज्ञापकं त्वस्य "ऋलति ह्रस्यो या" (२२) इत्यादी विक्ल्पोचिस्तथाहि-एतन्यायाभावे हस्वः स्यादित्युक्तेऽपि हस्वः स्याच न स्थाय । "विधिनिमन्त्रणा.” (५।४।२८) इति सूत्रेण कामचारेऽपि सप्तम्या विहितत्वात् तथाप्येतन्या- याप्तिसं इसे प्राप्ते विक्स्पवचनं सफ्लम् । वाक्यस्योपलक्षणत्वात्कचित्पदमपि सावधारणं यथा "लुगलादेत्यपदें" (२१११११३) इत्यत्रापदे एवेसपदादिस्थे एवादेति परे इत्यवधारणात् दण्डाममि- ३० सत्र "पृत्त्यन्तोऽसपे" (१२५) इति वृत्त्यन्तस्य पदत्वनिपेघेनामशब्दस्यापदत्वात्तस्याकारे परे प्राप्तोऽप्यनुग् न भवति, यतोऽमशब्दम्य मृत्त्यवस्थायां पदत्वाभावेऽपि पूर्व पदत्वमासीत्ततोऽयधारणं नाति । यत्वेषान्तत्वेनापदादिस्थ एवाकारसस्मिन् परे "लुगस्या.” (२१११११३) इत्यस्लुर स्यादेव, यथा परन्ति-अत्र शवोऽपारम्यान्तिपरे लुम् ॥ ५८ ॥ परार्थे प्रयुज्यमानः शन्दो वतं विनापि यदर्थ गमपति ॥ ५९॥ यथा "पान्यतः पुमांष्टादी स्वरे" (शा६२) इत्यत्र पुमानित्यस्य पुंवदित्यर्थः । अन हि पपर्यो ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । सूरिसूचिता न्यायाः नपुंसकस्तत्र च प्रयुक्तः पुंशब्दस्ततो नपुंसकोऽपि सन् पुंस्त्वकार्याणि लभते इति भावः । यथा मृदवे कुलाय इत्यादौ मृदुशब्दस्य पुंवद्भावानपुंसकत्वलक्षणो "अनाम् स्वरे नोऽन्तः” (१।४।६४) इति नागमो नाभूत् ॥ ५९ ॥ द्वौ नौ प्रकृतमर्थ गमयतः ॥ ६०॥ नमावित्यर्थप्रधानो निर्देशस्ततो द्वौ निपेधौ विधिमेव ब्रूतः । यथा “न नाम्येकवरात्०” (३२।९)५ इति सूत्रस्थो नशब्दः पुरः पुरोऽनुवर्तमानो यावत् "नेसिद्धस्थे०” ( ३।२।२९) इति सूत्रस्थद्विती- यनमा मिलितस्तावता विभक्तिलुपो विधिमेवाह स्म । ज्ञापकं त्वस्य "न नाम्येक०" (३।२।९) इत्यतो विभक्तिलुनिषेधार्थे नभ्यनुवर्तमानेऽपि विभक्तिलुविध्यर्थ "नेन् सिद्ध०" इत्यत्र पुनर्नग्रहणम्। "नमो नमस्ते सततं नमो नमः" इत्यादौ नमःशब्दादीनामसकृत्प्रयोगे स्वार्थद्रढनमेव दृश्यते, ततो नमोऽपि तथैव प्रसक्ते सति तन्निपेधार्थोऽयं न्यायः । इह च द्वाविति समसङ्ख्योपलक्षणं, तेन चतुःप-१० डादयोऽपि नमो विधिगमका एव, एकद्वित्र्यादिविपमसङ्ख्यास्तु निषेधगमका एवेत्यूह्यम् ॥ ६० ॥ चकारो यस्सात्परस्तत्सजातीयमेव समुचिनोति ॥ ६१ ॥ चस्याविशेपेण समुच्चयमात्रार्थत्वाद्विजातीयस्यापि समुचये प्रसक्तेऽयं न्यायः । तत्रोपसर्गादुपसर्ग यथा “प्रतेश्च वघे” (१।४।९४) १ । प्रकृतेः प्रकृतिं यथा “एतदश्च व्यञ्जने ऽनग्नसमासे" (११३१४६) २ । प्रत्ययात्प्रत्ययं यथा "अझै च” (१।४।३९) ३ । आदेशादादेशं यथा "आ च १५ हो” (४।२।१०१) ४ । आगमादागमं यथा "अश्च लौल्ये” (.४।३।११५) ५ । अर्थादर्थं यथा "अतिरतिक्रमे च" (३।११४५) ६ । वाक्यार्थाद्वाक्यार्थं यथा "तस्य व्याख्याने च ग्रन्थात्" (६।३।१४२) इत्यादि ७ । एषु क्रमेणोपादिति १ तद् इति २ घुटीति ३ इरिति ४ स्सोऽन्त इति ५ पूजायामिति ६ तत्र भवे ७ इत्येषां समुच्चयः । एकपदरूपोऽर्थः पदद्वयादिमयस्तु वाक्यार्थ इत्यनयोः (अर्थवाक्यार्थयोः) भेदः ॥ ६१ ।। चानुकृष्टं नानुवर्तते ॥ ६२ ॥ समुच्चय एव हि वलात्कारपूर्वकोऽनुकर्पणमुच्यते अतश्चेनानुकृष्टं पुरो न यातीति युक्तमेव समुच्चया- नुकर्पणयोर्विशेपनापनार्थोऽयं न्यायः । यथा “सदोऽप्रतेः परोक्षायां त्वादेः” (२।३।४४) इत्येताव- द्वाक्यं "स्वञ्जश्च" (२।३१४५) इति सूत्रे चेनानुकृष्टं तेन स्वञ्जः परोक्षायां द्वित्वे कृते आदेरेव सस्य पः स्यान्न तु द्वितीयस्य, यथा परिपस्वजे। एतच्च "परिनिवेः सेवः” (२।३।४६) इत्युत्तरसूत्रे नानुव-२५ तते, तेन सेवेः परोक्षायामुभयोरपि सयोः पः स्यात् । यथा परिपिपेवे इति ।। ६२ ।। चानुकृप्टेन न यथासङ्घयम् ॥ ६३ ।। यथा "वौ व्यञ्जनादेः सन्चाय्वः". (४।३।२५) इत्यत्र सन्क्त्वोर्वा वित्यनेन अब इत्यनेन च सङ्घयाया वचननिर्देशस्य च साम्ये सत्यपि यथासङ्ख्यं नास्ति त्तवश्चानुकृष्टत्वात् । वौ इत्यादेरयमर्थ:- वौ इत्युकारे इकारे वा उपान्ये सति व्यञ्जनादेर्धातोः परौं सेटौ क्त्वासनौ प्रत्येकं किवा स्याताम् ।३० यथा मुदित्वा मोदित्वा, मुमुदिपते मुमोदिपते, लिखित्वा लेखित्वा, लिलिखिपति, लिलेखिपति । अय्व इति यकारान्ताद्वकारान्ताच न भवति यकारान्त० विश्च य् च विय् वियिवाचरति किप्, लुक् , बेयनं ; पूर्व क्त्वायां वेयित्वा । चकारान्त० देवित्वा दिदेविपति ॥६३ ॥ 1. व्याख्यातो विशेपार्थप्रतिपत्तिः ।। ६४ ॥ यथा करीपगन्धेरपत्यं वृद्धं स्त्री "ङसोऽपत्ये" (६।१।२८) इत्यणि "अनार्पे वृद्धे०” (२।४।७८) ३५ २० ५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- इत्यनेनाणः प्यादेशे "अणफण्०" (२।४।२०) इत्यणन्तलक्षणोडीः प्राप्नोति, परं न स्यात् । तत्राणः स्वरूपस्थस्य ग्रहणात्, इह चाणः प्यरूपीभवनात्। एतच "अणये." इत्यत्र व्याख्यानत एव लभ्यते ज्ञाप. कान्तराभावात् । ततश्च ड्यभावेऽदन्तत्वात् "आत्" (२।४।१८) इत्यापि कारीपगन्ध्येति स्यात् ॥६४॥ यत्रान्यत् क्रियापदं न श्रूयते तत्रास्तिर्भवन्तीपरः प्रयुज्यते ॥ ६५ ॥ योति वाक्यागभूतपदसमुदाये इति विशेष्यमध्याहार्यम् । अस्तिना च भवतिर्विद्यतिरित्यादयोऽपि लक्ष्या एकार्थत्वात् । भवन्ती वर्तमाना, प्रकरणादिवशात्सप्तम्यादिपरोऽपि प्रयुज्यते । आख्यातं विना पाक्यं न स्यादिति पदसमुदायस्य वाक्यीकरणार्थोऽयं न्यायः । यथा 'जम्बूद्वीपस्तत्र सप्तवर्षाणि' । अवास्ति, सन्तीति । पञ्चम्याशिप्यो यथा, 'देवो मुदे वो वृपभः परे च' अवास्तु सन्त्विति भूयाद् भूयासुरिति वा । सप्तमी यथा, "शिधुंद" (१।१।२८) "औदन्ताः स्वराः” (१२११४) अत्र स्यात् १० स्युरिति । हालन्यद्यतनीपरोक्षा यथा । 'अवन्त्यां विक्रमनृपस्तस्य द्वापञ्चाशद्वीराः' । अत्रासीदा. सन्निति पभूव, बभूवुरिति वा । श्वस्तनी यथा । 'अतः परं श्वो भोजनम्', अत्र भवितेति । भविष्यन्ती यथा । 'अद्य नश्चतुर्यु गन्यूतेपु भोजनम्'; 'भाविन्यां तु पद्मनाभः सूरदेव' इत्यादि । अत्र भविष्यतीति । क्रियातिपत्तिप्रयोगस्तु प्रायः साक्षादेवेक्ष्यते । अनित्यत्वाचास्य कचिदन्यक्रियापदाध्याहारोऽपि यथा। अहमित्यत्र प्रणिध्महे इति ॥ ६५ ॥ १५ इति पञ्चषष्टिन्यायाः पूर्वैः सह द्वाविंशंशतं व्यापका ज्ञापकादियुनाथ । २० अतः परं ये वक्ष्यन्ते ते केचिदव्यापकाः प्रायः सर्वे ज्ञापकादिरहिताच ते चामी यदुपाधेर्विमापा तदुपाधेः प्रतिषेधः ॥१॥ इट इति शेपः ॥ १ ॥ यस्य येनामिसम्बन्धो दूरस्थसापि तेन सः ॥२॥ यथा अश्वेन घेत्रः सनरते । अन्न घेत्रशब्देनान्तरितेनापि तृतीयान्तेन योगे "समस्तृतीयया" (३३३३३२) इत्यात्मनेपदम् ॥ २ ॥ येन विना यन्न भवति तत्तस्यानिमित्तस्यापि निमित्तम् ॥ ३ ॥ यथा पतणः की देशो गिचा सहचरित एव दृश्यतेऽतो णिच् की देशस्य निनिमित्तं विहितस्यापि २५निमितं विदितम् । तथा प्रततीयन गिचोऽनित्यत्वात् तदभावे की देशोऽपि नाभूत् ॥ ३ ॥ नामग्रहणे प्रायेणोपसर्गस्य न ग्रहणम् ।। ४ ।। यथा उपरातीत्यत्र एशेरूपरूपानाम्नः परत्वेऽपि "स्पृशोऽनुदकान्" (५।१।१४९) इति किएन सा । तेनोपरागिति प्रयोगो न साधुः ॥ ४ ॥ मामान्पातिदेशे विशेपस्स नातिदेशः ॥५॥ अन्यत्र प्रसिद्धम्माम्यान्यत्र पथनमनिदेशः । यथा “भूतयगाशंम्ये या" (५४२) इति भूतमात्र: सैयाऽतिदेशेऽनयतनपरोयविशिष्टभूतपालम्यानतिदेशान् 'उपाध्यायधेदागमा एते तमभ्यागीमहि न्यायी मानाऽमि भूतमात्राणाऽवतन्येय भूतयति सूश मत्वनइतनत्वपरोमलविशिष्टभून- ॥हिसे सनीपरोही ॥ ५ ॥ - ४९ प्रक्रियावृत्तिरूपै श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । अव्या० न्यायाः सर्वत्रापि विशेषेण सामान्यं वाध्यते न तु सामान्येन विशेपः ॥६॥ यथा कोऽर्थ इत्यादौ सेः “सोरुः” (२।१।७२) इति रुत्वे "रोर्यः" ( १।३।२६) इति सामान्य- खरनिमित्तकं सूत्रं घाधित्वा "अतोऽति रोरुः" ( ११३।२०) इति विशेपस्वरनिमित्तकं सूत्रं प्रावतिष्ट । 'तक्रकौण्डिन्यन्यायोऽप्यस्यैव प्रपञ्चः । द्विजेभ्यो दधि देयम् ; तक्र कौण्डिन्यायेत्युक्ते कौण्डि- न्यस्य दधिनिषेधोऽनुक्तोऽपि प्रतीयते ॥ ६ ॥ ङित्वेन कित्त्वं वाध्यते ॥ ७ ॥ यथा ''त् स्तवने' कुटादिः नुवितः, अत्र “उवर्णात्” (४।४।५८) कित्प्रत्ययस्यादी विहित इड् निषेधो नाभूत् । कुटादित्वहेतुकेन क्तस्य ङित्त्वेन तकित्वस्य वाधनात् ॥ ७ ॥ परादन्तरङ्गं वलीयः ॥ ८॥ यथा स्योमा इत्यत्र सीव्यतेः "मन्वन्” (५।१।१४७) इति मनि "वोः प्वय्" (४।४।१२१) १० इति वलोपमपवादत्वात् "लघोरुपान्त्यस्य" (४।३।४) इति गुणं च नित्यत्वाद्वाधित्वा, अटि कृते, तदनु च परत्वादुपान्त्यगुणे प्राप्तेऽप्यन्तरङ्गत्वात् प्रथमं यत्वं सिद्धं, पश्चात्तु गुणः । यद्यपि 'परान्नित्यं' 'नित्यादन्तरङ्गमित्येताभ्यामयं गतार्थ एव, तथाहि-परान्नित्यं बलवत्ततोऽपि यद्यन्तरङ्गं वलवत्तदा परादन्तरङ्गं बलवत्प्रतीतमेव, तथापि तदनुवादपरोऽयं न्यायः ॥ ८ ॥ प्रत्ययलोपेऽपि प्रत्ययलक्षणं कार्य विज्ञायते ॥ ९ ॥ लोपशब्दस्य लुकलुपोर्वाचकत्वेऽपि लुकि स्थानिवद्भावेनैव सिद्धत्वाल्लुप्येप न्यायः । यथा पापचीत्यत्र 'लुबन्तरङ्गेभ्य' इति प्रथममेव यङ्लुप्यपि यङन्तलक्षणं "सन्यङश्व” (४।१।३) इति द्वित्वं सिद्धम् ।।९।। विधिनियमयोविधिरेव ज्यायान् ॥ १० ॥ यी "प्रत्यंभ्यतेः क्षिपः” ( ३।३।१०२) इत्यत्र 'क्षिपीत् प्रेरणे' इति क्षिपिरुभयपदी तौदादिको ध्याख्येयस्तस्यैव परस्मैपदविध्यर्हत्वात् , न तु "क्षिपंच प्रेरणे” इति केवलं परस्मैपदी । तस्य सिद्धपरस्मै-२० पदत्वेन सूत्रस्य नियमार्थताप्रसक्तेः, नियमश्चैवं प्रसज्यते-प्रत्यभ्यतिपूर्वादेव क्षिपः परस्मैपदं नत्वन्योप- सर्गपूर्वादनुपसर्गाद्वेति ॥ १० ॥ अनन्तरस्यैव विधिनिषेधो वा ॥ ११ ॥ तत्र निषेधो यथा “नामध्ये” ( २।१।९२ ) इत्यनेन "नाम्नो नोऽनह्नः” (२।१९९१) इत्यनन्तर- सूत्रविहितस्य नलुको निषेधः क्रियते । विधिर्यथा "क्लीवे वा” (२।१।९३ ) इत्यनेनानन्तरसूत्रविहितस्य २५ नलुको निषेधस्य विकल्पेन विधिः क्रियते । यद्यपि च शब्दशक्तिरेवैपा यद्विधिनिषेधो वाऽनन्तरस्यैव स्यादिति; परं शब्दशक्तेरेवानुवाद्ययं 'विचित्राः शब्दशक्तय' इत्यादिवत् ॥ ११ ॥ पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्तिः ॥ १२ ॥ यथा पर्जन्य ऊनं पूर्ण वाऽनपेक्षमाणः सर्वत्र वर्पति तथा स्वविषयं प्राप्य लक्षणेन सर्वत्र फलाभा- वेऽपि प्रवर्तितव्यम् , अप्रवृत्तौ हि तस्याऽऽनर्थक्यं स्वादिति । यथा गोपायति, पापच्यते, चिकीर्पती-३० सादी धातूनामदन्तत्वेन शवोऽनाकाङ्क्षायामपि शव् भवसेव ॥ १२ ॥ न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्या ॥१३॥ प्रकृतिरिह नामरूपा ग्राह्या न तु धातुरूपा । यथा कटं करोति भीप्ममुदारं दर्शनीयमित्यत्र द्रव्यस्यैव कर्मत्वेऽप्येतन्यायाधीप्मादीनामविभक्तिकानां प्रयोगानहत्वात्समानविभक्तिं विना सामानाधिकरण्यविशे-३४. है. प्रका० पूर्वा.. - - ५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पणत्वायोगानिर्द्धनानामपीश्वरसुहृदां तद्धनेन धनित्वपदेपामकर्मकाणामपि कटकर्मत्वेनैव द्वितीया सिद्धा। ननु भीष्मादीनामविभक्तिकानां प्रयोगाऽनईत्वे सामान्यविभक्तिः प्रथमैव प्रयोक्तुमहीं; न तु कर्मादि- शक्तिप्रकाशिन्यो द्वितीयाद्या इत्याशङ्कायामस्य व्याख्यान्तरमुच्यते । केवलेति कोऽर्थः-क्रियारहिता प्रकृतिर्न प्रयोज्या किन्तु प्रयुज्यमानया गम्यमानया वा क्रियया सहितैव प्रयोज्या । ततोऽन यथा कटस्य ५करोतिना सम्बन्धस्तथा भीष्मादीनामपि । कटं कुर्वस्तद्गतान् गुणानपि करोत्येव, यत्तु करोतिना व्याप्तुमिष्टं तत्सर्व द्रव्यं गुणश्च कर्मेति सर्वेषां पृथकर्मकत्वे सर्वेभ्योऽपि द्वितीया एव पश्चातु गौणमुख्यभावे विशे- पणविशेष्यभावः [विशेषणानां विशेष्यसमानविभक्त्युपपादनार्थोऽयं न्यायः ] १.१३ ॥ किवर्थं प्रकृतिरेवाह ॥ १४ ॥ यथा त्वां मां चाचक्षाणेन इति णिजि, किपि, तल्लुकि च युष्म् अस्म् इति मान्ताद् डौ "टाडयोसि यः १०(२०१७) इत्यनेन मस्य प्राप्तं यत्वं बाधित्वा परत्वात्त्वमादेशे पश्चाच्च त्वमयोरकारस्य प्राप्नुयतोऽपि यत्वस्य 'सकृढ़ते स्प?' इति न्यायादभवने युष्मदस्मदोश्वान णितिवन्तत्वेन सर्वादित्वाभावात् स्मिन्ना- देशाभावे त्वे में इति स्यात् इति प्रकृतन्यायानपेक्षः पक्षः, प्रकृतन्यायापेक्षया तु प्रकृति विना किप न भवति इति प्रकृतेरेव प्राधान्यात् णिक्कियन्तयोर्युष्मदस्मदोः केवलाभ्यां ताभ्यामभेदविवक्षया सर्वादि. त्वाद् डेः स्मिन्नादेशे त्वस्मिन् , मस्मिन्नित्यपि स्यात् । एवं च णितिबन्तयोर्युष्मदस्मदोः शब्दभेदादर्थ- १५भेदाचाप्राप्तस्य सर्वादित्वस्य प्रापणार्थोऽयं न्यायः॥ १४ ॥ द्वन्द्वात्परः प्रत्येकमभिसम्बध्यते ॥ १५ ॥ शब्द इति शेपः । यथा “एकद्वित्रिमात्रा हस्वदीर्घप्लुताः” (१११।५) अत्र मात्राशब्दः प्रत्येक सम्बध्यते एकमात्रो द्विमात्र इत्यादि ॥ १५ ॥ विचित्राः शब्दशक्तयः ॥ १६ ॥ तेनैव लिङ्गसङ्कादौ वैचित्र्यं दृश्यते इति ज्ञप्त्यर्थोऽयं न्यायः । तत्र लिङ्गवैचित्र्यं यथा । प्ररास पचति "त्यादेश्व प्रशस्ते रूपप्” (७३।१०) इति स्वार्थिके रूपपि पचतिरूपमित्यादौ "पदं वाक्यम- व्ययं चेत्यसद्धयं च” (लिङ्गा० पर० ४।२) इति लिङ्गानुशासनपाठादलिङ्गस्यापि त्याद्यन्तपदस्य छीबलि- गत्वं सिद्धम् । तथा फुत्सिता स्वा ज्ञातिः स्वार्थि के कप्रत्यये "स्वज्ञाऽजभनाऽधातुत्ययकात्” (२।४।१०८) इत्याप इत्वे स्विका, अत्र ज्ञाती "कामलकुद्दालावयवस्वाः" (लिगा० पुं० १४१) इति लिगानुशास- २५ नपाठापुंलिङ्गस्यापि सशब्दस्य फुत्सितार्थविचक्षणाद्वाक्यावस्थायां कप्प्रत्ययान्तत्वे च स्त्रीलिङ्गत्वम् । तथा हस्या फुटी "कुटीशुण्डाद्रः” (७३।४७) इति स्वार्थिके रे कुटीरः कुटीरम्, अत्र कुटीशब्दस्य "वितस्तिकुटयसुटिः” (लिङ्गा० पुंस्त्री० ९।२) इति वचनात् पुंस्त्रीलिङ्गस्यापि पुंछीबलिद्गत्वम् । तथा हवं यनं वनिका; अत्र नान्तत्वात् "नलस्तुतत्तसंयुक्त"-(लिङ्गा० न० २१) इति पाठात् छीपलि. नस्यापि वनशब्दस्य स्वाधिके कपि स्त्रीलिङ्गता ॥ तथा केऽपि शब्दाः पदान्तरसापेक्षाः केऽप्यनपेक्षाश्च ३० तत्तलिङ्गान्याहुः । तर सापेक्षा यथा । इयं गौः, अयं गौः, अत्र गवार्थस्योभयलिङ्गत्वादियमयमिति ' पदापेक्षेण गोपदेन खीपुंस्त्वमुच्यते; अनपेक्षास्तु त्रिधा नाममात्रेणादेशेन प्रत्ययेन च, तत्र नाममा प्रेण यया । माता पिता अग्र नाममात्रमेव स्त्रीपुंस्त्रोक्तो क्षमम् । आदेशेन यथा । तिस्रः, अत्र बीत्वं विनाऽनुपपद्यमानेन तिस्रादेशेन स्नीलं प्रतीयते, एवं क्रोष्टा अग्र पुंस्त्वेन क्रुदास्तुनस्सृजादेशेन पुंस्त्वम् । प्रत्ययेन यथा राशी; अत्र स्त्रीत्योद्भवेन हीप्रत्ययेन प्रीत्वम् । गोचर, अत्र पुनामत्वोद्भवेन गोप- ३५रसर०" (५।३।१३१) इति पेन पुंस्त्यम् । सहयावैचित्र्यं यथा “अं अःxxप शपसाः २० .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । अन्या० न्यायाः ५१ शिद (१२१२१६) अन संझिवहुत्वेऽपि संज्ञाया एकवचनम् । दाराः; अन्नार्थकत्वेऽपि बहुवचन- मित्यादि ॥ १६ ॥ किं हि वचनान्न भवति ॥ १७ ॥ वचनमिष्टार्थप्रत्यायनं [तद्वलास्किं न स्यात्-काका सर्वं स्यादित्यर्थः, इष्टार्थप्रत्यये सति शिष्टप्रयोगानु- सारेण केचिद्विधयोऽप्राप्ता अपि प्रवर्त्यन्ते, प्राप्ता अपि च केचिन्न प्रवर्त्यन्ते, इष्टार्थप्रत्ययाभावे तु प्राप्ता५ अपि केचिद्विधयो न प्रवर्त्यन्ते इति यावत् । “समर्थः पदविधिः” (७।४।१२२) इत्यस्यापवादोऽयं न्यायः । तत्राप्राप्तप्रवर्तनं ] यथा सूर्यमपि न पश्यन्त्यसूर्यपश्या राजदाराः "असूर्योपाद् दृशः" (५।१।१२६) इति खश, वत्सेभ्यो न हितो अवत्सीयो गोधुक्; "तस्मै हिते” (७१।३५) इतीयः; अत्र नमः क्रमाद् हशिना हितेन च सम्बन्धोऽस्ति; न सूर्येण वत्सैश्चेति समस्यमानपदानां मिथः सम्बन्धाभावादसाम- येऽपि इष्टार्थगमकत्वात् समासः सिद्ध । प्राप्ताप्राप्तप्रवर्त्तनं यथा । "नहाहोर्धतौ” (२।११८५) अत्र १० धात्वग्रे इकिश्तिवो न । इष्टार्थप्रत्ययाभावे प्राप्ताप्रवर्त्तनं यथा, सङ्घस्य भद्रं भूयादित्यत्र सङ्घभद्रमिति पष्टीसमासो न, नहि सङ्घभद्रं भूयादित्युक्ते सङ्घस्य भद्रं भूयादिति प्रतीयते, किन्तु सचशब्दसम्बन्धि- तया प्रसिद्ध किञ्चिद्भद्रं कस्यचिद्भूयादिति प्रतीयते । 'अभिधानलक्षणाः कृत्तद्धितसमासाः स्युरित्यपि न्यायोऽत्रैवान्तर्भूतः, अस्यार्थः-अभिधानमिष्टार्थप्रत्यायनं तदेव लक्षणं चिह्नं येषां कृदादीनां; कोऽर्थः-इष्टार्थप्रत्ययसम्भवे कृदादयः स्युस्तदभावे तु नेति । अथ 'किं हि वचनादिति न्यायस्यान्योऽर्थः-१५ वचनादिति कोऽर्थः ? सूत्रोक्तविधानवलात् िन स्यात् ; काका अप्राप्ता अपि विधयः प्रवर्त्तन्ते इत्यर्थः । यथा श्रेयानित्यादाविष्ठेयस्वोः परयोः "प्रशस्यस्य श्रः” (७।४।३४) इति श्रादेशविधानवलेन प्रशस्य- शब्दात् क्रियाशव्दत्वेन गुणाङ्गादपि “गुणागाद्वेप्टेयसू” ( ७।३।९) इति इप्ठेयसूप्रत्ययौ सिद्धौ, अस्यां व्याख्यायां चाप्राप्तप्रापणार्थोऽयं न्यायः ॥ अपि च 'विचित्रा सूत्राणां कृतिः' १ 'मात्रालाघवमप्युत्स- वाय मन्यन्ते वैयाकरणाः' २ 'ते वै विधयः सुसङ्ग्रहीता भवन्ति येषां लक्षणं प्रपञ्चश्च' ३ इत्यादयोऽपि २० न्यायप्रकारा वाग्विशेपाः सन्ति । परमेते व्याकरणसूत्ररचनायामेवोपयुज्यन्ते ॥ पारिशेष्यादयोऽपि न्यायाः सूत्रार्थव्यवस्थापनायामेवोपयोगिनो न तु प्रस्तुतप्रयोगरचनायाम् ।। 'यथोद्देशं निर्देश' इत्यादयोऽपि वहवो न्यायाः सन्ति; ते लोकाज्ञयाः ॥ १७ ॥ न्यायाः स्थविरयष्टिप्रायाः ॥१८॥ यथा स्थविरो गमनादिकाले तत्साधनाय यष्टिमवलम्बतेऽन्यदा तु न तथा न्याया अपि शिष्टप्रयोगा-२५ न्यथानुपपत्त्यैवाश्रीयन्ते नत्वन्यथा । यथा रायमतिक्रान्तानां कुलानां अतिरीणामित्यत्र "क्लीवे" (२।४।९७) इति हस्खे तजे नामादेशे परे 'एकदेशविकृतमनन्यवत्' इति न्यायात्प्राप्तमपि "आ रायो व्यञ्जने” (२१११५) इत्यात्वं "सन्निपातलक्षण"न्यायेन निषेधान्न स्यात् , तत्करणे ह्रस्वविघातसम्भ- वात् , "दी? नाम्यतिमृ०” ( ११४।४७) इति दीर्घावसरे तु 'सन्निपातलक्षण'न्यायानाश्रयणानिर्विन दीर्घः सिद्ध इति ॥ १८ ॥ शिष्टनामनिष्पत्तिप्रयोगधातूनां सौत्रत्वालक्ष्यानुरोधाद्वा सिद्धिः ॥ १ ॥ शिष्टाः शेपाः ये व्याकरणेन नान्वाख्याताः नामानि १ निष्पत्तयः २ प्रयोगाः ३ धातवश्च ४ तेपां स्रौत्रत्वादिति व्याकरणादिसूत्रनिर्दिष्टत्वात् , लक्ष्याणि पूर्वमहाकविप्रयोगास्तदनुसरणाच सिद्धिः । सिद्धि- शब्दो न्यायसमाप्तौ मङ्गलार्थः । नानां यथा। चतुर्थी पष्ठीत्यादौ चतुर्णा पण्णां सङ्ख्यापूरणीति वाक्ये "चतुरः” (७।१।१६३) "पट्कतिकतिपयात्थट्” (७।१।१६२) इति सूत्राभ्यां थट्प्रत्यये "नाम-३५ - પર महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलधु- सिद०" (शश२१) इति पदत्वे चतुस्थी पट्ठीति प्राप्नोति, परं "चतुर्थी” (२।२२५३) अज्ञानेश: पष्ठी" (२१२१८०) इति सौत्रनिर्देशान्न जातम् । लक्ष्यानुरोधाच भिस्सटा, कच्छाटिका ग्रामटिकेत्यादी टागमः, तथा कान्दविका, काम्वविकः, वैणविक इत्यादौ "ऋवर्णोवर्णदोसि." (४७१) इति प्राप्त इकण इलुग न । निष्पत्तीनां यथा “अं अः अनुस्वारविस!" (११११९) "आपो डिन्तां यैयास्यास्- ५याम्” (११४११७) इत्यत्र क्रमादौजसोलुक सौत्रत्वात्सिद्धः । प्रयोगाणां यथा ।रणादिधातूनां शब्दार्थ- स्वाविशेपेऽपि रणितं नूपुरशब्दे; मणितं रतिकूजिते; कणितमार्तध्वनौ, कणितं वीणादिरवे, कूजितं विह- गाना, बृंहितं गजानां वासितं पशूनां गर्जितं मेघस्य गुञ्जितं भ्रमरादीनां शब्दे इत्यादिकं लक्ष्यानुरो- धात्सिद्धम् । धातूनां सौत्रत्वं तु "धातोः कण्वादेर्यक्” (१४१८) इत्यस्य सूत्रस्य व्याख्यानाद् ज्ञेयम् ॥ १॥ न्यायानां पालबोधाय दिड्मात्रमिह दर्शितम् । न्यायमञ्जूषावगाह्या विशेपार्थप्रथार्थिभिः ॥ १॥ विशेपतश्च न्यायानां ज्ञापकव्याप्तितात्पर्यादिकं हेमव्याकरणपारीणवैयाकरणशिरोमणिमहोपाध्याय. श्रीहेमहंसगणिविरचितन्यायमनपायां विज्ञेयं विज्ञैरिति श्रेयः ।। - भा अथ "परितो व्यापूतां भापां परिभाषा प्रचक्षते” इति वचनात् सर्वत्र व्याकरणे उपयोगिनीः परिभाषाः प्रयन्ते १५. पञ्चम्या निर्दिष्टे परस्य ॥१॥ (७।४।१०४) पञ्चम्या निर्दिष्टे यत्कार्यमुच्यते तत्परस्य स्थाने भवति सर्वत्र व्याकरणे । अतो "मिस ऐस्" (१२४२) वृक्षैः । इह न भवति मालाभिरत्र । निर्दिष्टग्रहणस्यानन्तर्यार्थत्वादिह न भवति पद्भिः । व्यवहितेऽपि परशब्दो दृश्यते यथा महोदयात्परं साकेतमिति । अत इत्यादौ दिग्योगलक्षणा पश्चमी । तत्र पूर्वस्य परस्य च कार्य स्यादिति नियमाथं वचनम् ॥ १ ॥ ससम्या पूर्वस्य ॥२॥ (७४।१०५) सप्तम्या निर्दिष्टे यत्कार्यमुच्यते तत्पूर्वस्यानन्तरस्य स्थाने भवति । "इवर्णादेरखे स्वरे यवरलम्" (१।२।२१) दध्यत्र मध्वत्र । निर्दिष्टाधिकारादिह न भवति-समिन त्रिष्टुपत्र । व्ययहितेऽपि पूर्व- शब्दो दृश्यते मथुरायाः पूर्व पाटलिपुत्रमिति । स्वर इत्यादौ औपश्लेपिकमधिकरणं पूर्व परं च सम्भवति तन परमेव माहमिति नियमार्थ वचनम् ॥ २ ॥ पष्ठथाऽन्त्यस्य ॥३॥ (१४।१०६) पष्टया निर्दिष्टे यत्कार्यमुच्यते तदन्त्यस्य पष्ठीनिर्दिष्टस्यैव योऽन्यो वर्णस्तस्य स्थाने भवति न तु सम- स्तम्प । "घाटन आः खादी" (१६४५२) अधाभिः, अष्टासु ।। ३ ।। अनेकार्णः सर्वस्य ।। ४ ।। (७४।१०७) अनेफपर्ण आदेशः पष्ठया निर्दिष्टम्यय सर्वस्य स्थाने भवति । "त्रिचतुरतिसृचतम स्यादौ” (२३१३१) ३० विमभिः, पतगृभिः । सर्वस्वैति निर्दिश्यमानापेक्षं तेन व्यापादित्यत "पात्पादस्याऽहस्त्यादेः" (७।३।१४८) इति निर्दिष्टम्य पादशब्दम्य भवति न तु समुदायस्य । "ऋतां शिवीर" (४।४।११६) फिरवि । पूर्वस्वापपादोऽयम् । एपगुत्तरोऽपि योगः ॥ ४ ॥ प्रत्यपस ॥ ५॥ (७४.१०८) .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । परिभाषाः . प्रत्ययस्य स्थाने विधीयमान आदेशः सर्वस्यैव भवति । सर्वे । अष्टौ । कृति ।। ५ ।। स्थानीवाऽवर्णविधौ ॥६॥ (७४।१०९) स्थानं प्रसङ्गः सोऽस्यास्तीति स्थानी आदेशी । आदेशस्थानिनोः पृथक्त्वात्स्थानिकार्यमादेशे न प्राप्नो- तीत्यतिदिश्यते । अन्यत्र प्रसिद्धस्यार्थस्यान्यत्र कथनमतिदेशः । आदेशः स्थानिवद्भवति स्थान्याश्रयाणि कार्याणि प्रतिपद्यते, अवर्णविधौ-न चेत्तानि कार्याणि स्थानिवर्णाश्रयाणि भवन्ति । तत्र धातु १ प्रकृति ५ २ विभक्ति ३ कृद् ४ अव्यय ५ पदादेशा ६ उदाहरणं । धात्वादेशो धातुवद्भवति, "अस्तित्रुबोभूव- चावशिति” (४।४।१) भूवचोस्तृजादयो भवन्ति । भविता, भवितुं, भवितव्यं, वक्ता, वक्तुम् , वक्ता- व्यम् १ । प्रकृतिरिह गोवलीवर्दन्यायात् धात्वतिरिक्ता नामरूपा ग्राह्या । प्रकृत्यादेशः प्रकृतिवत्-कस्मै, के, केपाम्, किमः कादेशे सर्वादित्वात्स्मादयो भवन्ति २ । विभक्यादेशोऽपि विभक्तिवत्-वृक्षाय, प्लक्षाय, राजा, अत्र चतुर्युकवचनादेशस्य यस्य स्यादित्वादीर्घः, "दीर्घड्याव०” (११४१४५) इति लुग-१० रूपस्यादेशस्य स्यादित्वाद्दीर्घत्वं पदत्वं च भवति । पचेयम् , पचेयुः, अत्र यामयुसादेशयोरियमियुसोस्त्या- दित्वात् "तदन्तं पदम्” (१।१।२०) इति पदत्वम् ३ । कृदादेशः कृद्वद्भवति-प्रकृत्य, प्रहृत्य, अत्र क्वो यवादेशे "हस्त्रस्य तः पित्कृति" (४।४।११३) इति तोऽन्तो भवति ४ । अव्ययादेशोऽव्यय- वत् । प्रस्तुत्य, उपस्तुत्य, अत्र "अव्ययस्य" (३।२।७) इति से प् ५ । पदादेशः पदवत्-धर्मो वो रक्षतु, धर्मो नो रक्षतु, अत्र पदत्वात्सोरुत्वम् ६ । स्थानीवेत्यत्र इवग्रहणं स्थानिनोऽपि कार्यप्रतिपत्त्यर्थ, १५ इवेनातिदिष्टे हि उभयत्र कार्यमन्वेति चन्द्र इव मुखमित्यादौ, चन्द्रे मुखे चाहादकत्ववत् । एवं हनो वध इत्यादौ हनुरूपस्य स्थानिनो वधरूपस्यादेशस्येत्युभयस्याप्यात्मनेपदादिरूपकार्यान्वयोऽस्तीतीवग्रहणम् । अन्यथा स्थानीयादेशस्य संज्ञेति प्रतीयेत, ततश्च देवदत्तः पिण्ड इव वधाद्यादेशरूपे संज्ञिन्येव कार्या- न्वयो न तु स्थानीति रूपायां संज्ञायामपि । तथाहुःश्रीसूरयः । इवग्रहणं स्वाश्रयार्थ स्वस्य स्थानि- स्वरूपहन इत्यादेराश्रय आश्रयणं तदर्थम् । अन्यथा स्थानीत्यादेशस्य संज्ञा विज्ञायेत । तेन आहत,२० अवधिष्टेत्यादौ "आङो यमहनः स्वेऽङ्गे च" (३।३।८६) इत्यनेनोभयत्राप्यात्मनेपदं भवति, अन्यथा वधेरेव स्यादिति । अत्र वध इत्यकारान्तादेशविधानवलेनानेकस्वरत्वात् इडिपेधो न, नैकखरादित्यत्र ह्येक- खराद्विहितस्य "स्ताद्यशित०” (४।४।३२) इनिपेध इति । स्थानिवद्भावेऽनेकखरत्वे त्वकारान्तादेश- विधानमनर्थकं स्यादिति ।। अवर्णविधाविति किम् ? यत्कार्य वर्णमुच्चार्य विधीयते तद्वर्णाश्रयम् । यत्तु धात्वादिसमुदायोचारणेन न तद्वर्णाश्रयं वर्णस्य तत्र शब्देनासंसर्गात् । तत्र वर्णाश्रयो विधिर्वर्णवि-२५ धिरिति समासस्याश्रयणाद्वर्णात्परस्य विधिः १ वर्णे परतो विधिः २ वर्णस्य स्थाने विधिः ३ वर्णेन विधिः ४ अप्रधानवर्णाश्रयो विधिः ५ इति सर्वत्रावर्णविधाविति प्रतिपेधो भवति । तत्र वर्णात्परस्य विधि: द्यौः पन्थाः सः । अत्र औत्वात्वत्यदाद्यत्वेषु कृतेपु स्थानिवद्भावाद् व्यञ्जनात्परस्य सेर्लोपः प्राप्नोति स न भवति । १ । वर्ण परतो विधिः-क इष्टः स उप्तः । अन य्वृति कृते "घोषवति” (१।३।२१) इति रोरुत्वम् “एतदश्च०" ( ११३१४६) इत्यादिना च सेर्लोपश्च न भवति । २ । वर्णस्य स्थाने विधिः-३० श्रीदेवतास्य श्रायं हविः । अत्रेकारस्य वृद्धौ कृतायां स्थानिवद्भावात् "अवर्णेवर्णस्य” (७४।६८) इति लोपः प्राप्तो न भवति । ३ । वर्णेन विधिः-उरःकेण उरःपेण उरकेण उरxपेण अत्र सकारादेशानां विसर्जनीयजिह्वामूलीयोपध्मानीयानां स्थानिवद्भावप्रतिषेधादलचटतवर्गशसान्तरे इति णत्वप्रतिषेधो न भवति । व्यूढोरस्केन इत्यत्र तु प्रत्यये इत्यनेन यः कृतः सकारस्तदाश्रयो णत्वनिषेधो न तु मूलसकारस्य, स्थानिवद्भावेन वर्णाश्रयविधौ तदभावात् । ४ । अप्रधानवर्णाश्रयो विधिः, यथा "स्ताद्यशितोऽत्रोणादे- रिट्" (४।४।३२) इत्यत्रान्यपदार्थस्याशितः प्राधान्यात् स्तोरप्राधान्यं, ततः प्रदीव्य प्रसीव्य इत्यत्र ३६ ५४ -- महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- यपः स्थानिवद्भावेन क्त्वाप्रत्ययापेक्षया स्तायशितप्राप्त इड् न भवति । ५ । स्थानिवर्णाश्रयकार्यप्रति पेधाच आदेशवर्णाश्रयाणि स्थान्यनुवन्धाश्रयाणि च कार्याणि भवन्त्येव । आदेशवर्णाश्नयागि-सर्वे- पाम् । अत्र सामादेशे सकाराश्रयमेव भवति । स्थान्यनुबन्धाश्रयाणि-प्रभिद्य निरुध्य प्रणीय प्रलय इत्यत्र क्त्वो यवादेशे कृते स्थानिवद्भावेन हितीति गुणप्रतिषेधो भवति । अनुबन्धा बसन्त एव गुणा- ५भावादिकं कार्य कुर्वन्ति । अथ कथमग्रहीदित्यनेटो दीर्घत्वे स्थानिवद्भावादिद ईतीति सिलोपो, वर्ण- विधिोपः । उच्यते । नायं वर्णविधिः । विशिष्टं ह्येप इदरूपं वर्णसमुदायमाश्रयते । अथ शोभना दृपदोऽस्य सुदृपदित्यत्र जस्लुपः स्थानिवद्भावेनासन्तत्वात् "अभ्वादेरत्वसः सौ” (११४९०) इति दीर्घः कस्मान भवति । "लुप्यरमुल्लेनत्” (७।४।११२) इति प्रतिषेधात् । भ्वादिप्रतिषेधेन श्रूयमाणा. सन्तपरिग्रहाच न भवति । सुदृपद्वानियत्र तु इतिकरणसामर्थ्यादसन्तलक्षणो विन्न भवति । "अस्त- १० पोमाया.” (७।२।४७) इति सूत्रे हि "तदस्यारत्यस्मिन्निति.” (७।२।१) सूत्रादिति शब्दोऽनुवर्तते स चेतिकरणो विवक्षार्थ इत्युक्तम् । विवक्षा च व्यवस्थेति भावः ॥ ६ ॥ स्वरस्य परे प्राविधौ ॥ ७॥ (७४।११०) स्वरस्यादेशः परे परनिमित्तको व्यवहितेऽव्यवहिते वा पूर्वस्य विधी कर्तव्ये स्थानीय भवति । फथयति, अवधीत् । अत्राल्लुकः स्थानिवद्भावादुपान्त्यलक्षणा वृद्धिर्न भवति । स्पृहयति, मृगयते । अन १५ लघूपान्त्यलक्षणो गुणो न भवति । पादाभ्यां तरति पादिकः । अत्र “यस्वरे पादः पदणिक्यघुदि" (२।१।१०२) इति पायो न भवति । शातनी, पातनी । अत्रानोऽस्य लुग् न भवति । धरणस्यापत्यं धारणिः रवणस्यापत्यं रावणिः अत्र "नोऽपदस्य.” (७४।६१) इत्यन्यस्वरादिलोपो न भवति । भ्रंश्यते धंस्यते अत्र गिलुगः स्थानिवद्भावादुपान्त्यनकारलोपो न भवति । याज्यते वाप्यते अत्र वृन्न भवति । निरादनं पूर्व निराध समाध अन जग्धादेशो न भवति । घात्यात् अत्र वधादेशो न भवति । २० निगार्यते निगाल्यते अत्र "न वा स्वरे” (२।३।१०२) इति पक्षे लत्वम् । चातुरौ । आनडुहो । अत्र औत्वादेशस्य स्थानिवद्भावात् "चाः शेपे” (१।४।८२) इति वा न भवति । पादे अत्र एत्वादेशस्य स्थानिवद्भावात् पद्भावो न भवति । उभयजन्यत्वेऽपि अन्यसरव्यपदेशादौत्वैत्वयोः परनिमित्तत्वम् । अवीयदद्वीणां वादफेनेत्यन तु गिजात्याश्रयणादुपान्त्यस्य हस्खो भवति । द्वाभ्यामित्यन निमित्तापेक्षया प्राविधौ आत्वे तु "आवरः” (२०११४१) इति जातस्य अस्य न स्थानित्यं "वैकर द्वयो.” (२१२।८५) २५ इति निर्देशात् । स्वरस्येति किम् ? अक्राष्टाम् अद्राष्टाम् अत्र सिज्लोपो न स्वरादेश इति "पढोः कः सि" (२।१।६२) इति पत्वे स्थानी न भवति । आगत्य, अभिमत्य, अन पश्चमलोपो इस्खलक्षणे सकारे स्थानी न भवति । पर इति किम् ' द्वौ पादौ ददाति, द्विपदियां ददाति । अनाल्लुकः पर- निमित्तत्याभायात् स्थानिलाभावे पदादेशो भवति, "सहयादेः पादादिभ्यो दानदण्डे पाकल लुरु च" (१२।१५२) इति अफ्ल्सन्नियोगशिष्टत्वादलुचो नाफल्लिमित्तमिति परनिमित्तलाभायः । प्राग- ३०विधाविति किम् ? याव्यस्य छानाः धानवीयाः अन "तद्धितयखरेऽनाति" (२२४९२) व्यसना- परस्यापत्यस यकारस्य यकारादावाकारादिवर्जिते स्वरादौ च तद्धिते लुग् भवति । इति यलोपे पर- विधी कर्तव्येऽयादेशः स्थानी न भवति, स्थानित्वे हि उकारान्तत्वेन व्यञ्जनाभावात् यलोपो न स्यात् । निधानं निधिस्तस्यापत्यं नेयः निधिकः अन "इडेपुसि घातो लुह" (४३३९४) इत्यागरलोपो विस्तरलाणे एयनिरूप्रत्ययविधी परस्मिन् स्यानी न भवति अन्यथा निवरत्वात्प्रत्ययो न स्यात् । इलु. पाया अदूरम [नगरम् ] ऐलुसम् परिसायाः पारिसम् तन भवः ऐलुकीयः, पारिसीयः । अत्राण्या- फारटोपः परविषो पसोपान्त्यदलणे ईये स्यानी न भवति । पूर्वसानिधिः प्राविधिरित्ययात्रीयते सेन -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाश संज्ञाधिकारः । परिभीपाः ५५ अधुक्षन्त इति "स्वरेऽतः" (४३७५) इति सकोऽकारलोपस्य परमप्यदादेशं प्रति स्थानिवद्भाव इति स न भवति । पूर्वत्रावर्णविधाविति प्रतिपेधाद्वर्णविध्यर्थं वचनम् ॥ ७ ॥ "न संन्धिङीयक्तिद्विदीर्घाऽसँद्विधावस्क्लुकि" ॥ ८॥ (७।४।१११) पूर्वेणातिप्रसक्तः स्थानिवद्भावः प्रतिषिध्यते । सन्धिविधौ १ डीविधौ २ यविधौ ३ किविधौ । द्वयोत्विस्य विधौ ५ दीर्घविधी ६ “संयोगस्यादौ स्कोलक्” (२।१।८८) इति स्कलुक्वर्जिते अस-५ द्विधौ ७ च स्वरस्यादेशः स्थानीय न भवति । 'समानानां तेन' (१।२।१) इति सूत्रादारभ्य "लि लो". (१।३।६५) इति सूत्रं यावत् द्वितीयतृतीयपादौ सन्धिविधिः, तत्र वियन्ति, अपयन्ति । अत्रेणोः यत्वं खरादेशः परनिमित्तकः पूर्व विधौ दीर्घत्वे एत्वे च कर्त्तव्ये स्थानी न भवति । तानि सन्ति, तो स्तः अत्रास्तेरल्लोपो यत्वे आवादेशे च कर्तव्ये स्थानी न भवति । वैयाकरणः, सौवश्वः अत्र यत्ववत्वयोः । स्थानिवद्भावाभावाददातोरायावादेशौ न भवतः । शिण्ढि पिण्डि अत्र भस्याकारलोपो "नां धुड्वर्गेऽन्यो-१० ऽपदान्ते” (११३।३९) इति वर्गान्ते कर्तव्ये स्थानी न भवति । शिंपन्ति; पिंपन्ति इत्यत्र त्वनुसारे कर्तव्ये स्थानी न भवति । जक्षतुः, जक्षुः । अत्र “गमहन०” (४।२।४४) इत्युपान्त्याकारलोपलक्षणः परनिमित्तकः स्वरादेशः "अघोपे प्रथम०” (११३५०) इति घस्य कत्वलक्षणेऽव्यवहिते प्राविधी कर्तव्ये स्थानीव न स्यात् , यदि स्यात्तदा घकारसकारयोर्मध्येऽकारेण व्यवधाने घस्य कवं न स्यात्तद- भावे "नाम्यन्तस्था" (२।३।१५) इति सस्य पत्वं न स्यात्तदभावे क्षो न स्यात् ।। निमित्तापेक्षयापि १५ प्राविधिरिष्यते तेन नयनं, लवनमित्यत्र गुणस्य स्थानिवद्भावाभावादयवादेशौ सिद्धौ स्थानिवद्भावे लियुवादेशौ स्याताम् ॥ १ ॥ डीविधी विम्याः फलं विम्बम् , हेमादित्वादञ् “फले” (६।२।५८) इति लुप् "ड्यादेः०” (२।४।९५) इत्यादिना डीलुक् तस्य परनिमित्तकत्वेऽपि स्थानिवद्भावनिषेधात् "अस्य ङ्यां लुक्' (२।४१८६) इत्यकारलुक् न भवति, एवमामलक्याः फलमामलकम् “दोरप्रा- णिनः” (६।२।४९) इति मयट् तस्य च "फले" इति लुप्, पञ्चभिः खारीभिः कृतः पञ्चखारः । "कृते" २० (६।३।१९०) इत्यण "द्विगोरनपत्ये." (६।१।२४ ) इत्यादिना लुप्, पञ्चेन्द्राण्योऽग्नाय्यो वा देवतास्य पञ्चेन्द्रः पञ्चाग्निः अत्र "देवता” (६।२।१०१) इत्यण् तस्य लुपि ङीप्रत्ययस्यापि लुप्, तस्य स्थानिवद्भाव- प्रतिषेधात् तत्सन्नियुक्तः अनागम ऐकारादेशश्च न भवति २ ॥ यविधौ, कण्डूतिः कण्डूयतेः क्तावतो लोपः परनिमित्तको 'ग्योः प्वळ्यञ्जने लुक्” (४।४।१२१) इति लोपे कर्तव्ये न स्थानिवद्भवति, सूर्येणैकदिग् सौरी वलाका अत्रैकोऽण्यकारलोपो द्वितीयो ड्यां तयोः स्थानिवत्त्वाद्यकारस्थानन्तरो डीन २५ भवतीति यलोपो "सूर्यागस्त्ययोरीये च” (२।४।८९) इति ईये ङीप्रत्यये प्राप्तो न स्यात् स्थानिवद्भाव- प्रतिषेधाच्च भवति ३।। किविधौ, देवयतेः विप् , दयूः लवमाचष्टे लवयतेः विप् , लौः अत्र णिलुग- लुचौ किब्विधावूटि कर्तव्ये न स्थानिवद्भवतः ४ । ॥ द्वित्वविधौ, दद्ध्यत्र मद्ध्वत्र अत्र यत्वव. त्वयोः स्थानिवद्भावादेकन्यचनलक्षणं धकारस्य द्वित्वं भवति। द्वित्वस्य सन्धिकार्यत्वेनैव स्थानिवद्भाव- प्रतिपेधे सिद्धे द्विग्रहणम् 'असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे' इति न्यायवाधनार्थं तेनान्तरङ्गे द्वित्वे क्रियमाणे ३० यकारवकारौ परपदाश्रितत्वेन वहिरगावपि नासिद्धौ भवतः ५ । ॥ दीर्घविधौ अपि, शामंशामम् अशामि, शंशामं शंशाम अशंशामि अत्र णिगन्ताद्यङन्ताच णिगि ख्णम्बिचोः परयोर्णिम् लुग् यङो लुक् च स्थानिवन्न भवति.६।। असदाधिकारे विहितो विधिरसद्विधिःतत्र, थायज्यते यायष्टिः, नान्नि- तिक्, पापच्यते पापक्तिः याजयतेर्याष्टिः पाचयतेः पाक्तिः अत्राणिलोपयोः स्थानिवद्भावप्रतिषेधात् पत्वकत्वे भवतः । देहयतेदेग्धिः लेहयतेलेढिः अत्र णिलोपस्य स्थानिवद्भावप्रतिपेधात्-धुनिमित्ते घन-१५ .. १ ५६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- ढत्वे भवतः । प्रतिदीना प्रतिदीले अत्र "अनोऽस्य" (२।१११०८) इति अलोपो"भवादे मिन." (२) श६३) इत्यादिना दीर्घत्वे स्थानी न भवति ॥ स्क्लुविधेः प्रतिषेधः किम् ? सुकुस्मयतेः किम्, सुकूः, काष्टं तक्षयति कि काष्टतक् अत्र संयोगायोः स्कोलकि णिलुकः स्थानिवद्भावप्रतिषेधाभावात् स्कोलग् न भवति । संयोगान्तलोपरत्वसद्विधौ स्थानिवद्भावप्रतिषेधात् भवत्येव । काष्टतडित्यण्यन्तस्य । ५प्रायिकोऽयं निषेधः तेन मधुभ्युतमाचष्टे मधुश्चयतीति किप, मधुक् अत्र शलोपः सिद्धः, वेत- खानित्यल्लुकः स्थानिवद्भावाभावेऽपि "न स्तं मत्वर्थे” (१११।२३) इति पदत्वाभावात्सोरुन भवति, ब्रह्मबन्धी, ब्रह्मवन्ध्यः इति उडादेशस्य वकारस्य स्थानिवद्भावाभावेऽप्यन्तरङ्गे धस्य तृतीयत्वे लुकि च बहिरङ्गत्वेनासिद्धत्वम् । अयं भावः यद्यपि कडो वत्वे 'स्वरस्य परे' इति प्राप्ती वस्य स्थानिवद्भावों "व्यचोऽनसि" (४|११८२) इत्यनेन निपिध्यते तथाप्यूडो वत्वेऽस्य व्यञ्जनादित्वात् "नामसिद १०(१११।२१) इति पदसंज्ञायां प्राप्तायां धस्य तृतीयत्वं लोपश्च वकारस्यासिद्धत्वान भवतः । एवं किया:, 'गिर्योः इति नामिनो दीर्घत्वे । काक्यर्थ वास्यर्थमित्यत्र तु पदस्थति यलोपे यत्वस्यासिद्धत्वम् । अथ सखीयतीति विप् , अल्लुको यविधौ स्थानिवत्याभावाद्यलुकि डसि "योऽनेकस्वरस्य" (२१११५६) इति यस्य "वो.” (४।४।१२१) इत्यादिना किबाश्रयो लुक कथं न भवति ? बहिःप्रत्ययाश्रितत्वेन पहि- रजस्य अन्तःकियाश्रये लुक्यसिद्धत्वात् ॥ ८ ॥ १५ लुप्यय्बल्लेनत् ।। ९॥ (७४।११२) परस्य प्रत्ययस्य लुपि सत्यां लुभूतपरनिमित्तकं पूर्वकार्य न भवति 'अय्युलेनत्' रवृल्लत्वमेनच्च वर्ज- यित्वा । तद्, अत्र स्थानिवद्भावप्रतिषेधात् त्यदाद्यत्वसत्वे न भवतः । गर्गस्यापत्यानि गर्गाः गर्गादित्याद्य "यषऽनोऽश्यापर्णान्तगोपवनादेः" (६।१।१२६) इति लुप् । कुवल्या विकारः फलं, कुवलम् हेमादि- त्वादन् “फले" (६।२।५८ ) इति तस्य लुप् अत्र वृद्धिर्न भवति । प्लुप्यपि लुपतास्त्येव । तेन २० पञ्चगोणिरित्यत्रेकणः लुपि वृद्धिर्न भवति, लपीति वचनात् लुकि भवत्येव 1 गोमान् यवमान् अत्र सिलुकि तन्निमिसं दीर्घत्वं भवति, लुपीति सप्तमीनिर्देशात् पूर्वस्य यत्कार्य प्राप्तं तनिषिध्यते, समु- दायस्य तु भवत्येव । पयः, साम, पञ्च, सप्त । अत्र पदसंज्ञा तथा च तन्निबन्धनानि रुत्वनलोपादीनि भवन्ति । कथं पापक्ति, पापचीति इत्यत्र द्वित्वम् ? नेदं यङि निमित्ते किन्तु यडन्तस्य । अप्लेनदिति किम् , स्वृत्-व्यम् , वेविद्धि, श्वि शोशवीति, ग्रह जरीगृहीति । लूना, निजागलीति । एनत्-एनत्पश्य, २५एनच्छ्रितकः । स्थानीवावर्णविधाविति लुपः स्थानिवद्भावेन प्राप्ताना पूर्वेषां कार्याणां प्रतिषेधार्थ वचनम् ॥ ९ ॥ विशेषणमन्तः ॥१०॥ (७४३११३) विशिष्यतेऽनेनेति विशेषणम् । विशेषणं विशेष्यस्य समुदायस्यान्तो भवति । इह शास्ले धात्यादिः समुदायोऽवयवविशेषण उपादीयते । तत्र सोऽवयवस्तत्समुदायस्यान्तत्वेन नियम्यते । “अतः स्यमोऽम्" १३०(१।४।५७) कुण्डं तिष्ठति, कुण्डं पश्य । इह न भवति-तद् , "युवर्णवृदृवशरणगमृद्ग्रहः" (५।३।२८) जयः, स्तवः । इह न भवति-सेकः योगः । इणोऽलि अय इत्यादौ व्यपदेशिवदावाद्भवति ॥ १० ॥ सप्तम्या आदिः ॥११॥ (७४११४) सप्तम्यन्तस्य विशेष्यस्य यद्विशेषणं तत्तस्यादिरवयवो भवतीति वेदितव्यम् । "इन् डीखरे लुक्" (१४७९) पथः, पथाम् । इह न भवति-पथिषु । "युक्तोपान्त्यस्य शिति खरे" (४३१४) .: अनैनिजम् । इह न भवति-नेनेक्ति । "उत और्विति व्यञ्जनेऽद्वे" (४।३।५९) योति, - -- .

५७ प्रक्रियावृत्तिरूपें श्रीहैमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । परिभाषाः रोति । इह न भवति-असावीत् अस्तवीत् । पथा, अयौत इत्यादौ व्यपदेशिवद्धावाद्भवति । अन्तत्वा- पवादोऽयं योगः ॥ ११॥ प्रत्ययः प्रकृत्यादेः ॥ १२ ॥ (७४।११५) यस्माद्यः प्रत्ययो विधीयते सा तस्य प्रकृतिः । प्रत्ययः प्रकृत्यादेः समुदायस्य विशेषणं वेदितव्यः नोनाधिकस्य । मातुर्भोगो मातृभोगस्तस्मै हितो मातृभोगीणः "भोगोत्तरपदात्मभ्यामीनः” (७।११४०)।६ खरपस्यापत्यं खारपायणः नडादित्वादायनण् , अन "तदन्तं पदम्" ( १।१।२०) इति पदसंज्ञा समुदा- यस्य भवति न तु ऊनस्य भोगीण इत्यादिरूपस्य, तेनैकपदत्वात् णत्वं सिद्धम् । राज्ञः पुरुषः राजपुरुपः "पष्ठ्ययत्नाच्छेपे" (३।११७६) इति समासः, अधिकस्य न भवति-ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः । गाय॑स्यापत्यं गाायणः “यमित्रः" (६।११५४ ) इत्यायनण् , अधिकारसमुदायान्न भवति-परमगार्ग्यस्यापत्यम् । पुत्रमिच्छति पुत्रकाम्यति, अधिकान्न भवति-महान्तं पुत्रमिच्छति । न्यूनाधिकव्यवच्छेदार्थं वचनम् ।। तदन्तत्वं च "विशेषणमन्तः” (७।४।११३) इत्येव सिद्धम् ।। १२ ॥ गौणो ड्यादिः ॥ १३ ॥ (७४।११६) डीमारभ्य ध्यं यावत् ड्यादिः प्रत्ययः स गौण उपसर्जनं सन् प्रकृत्यादेः समुदायस्य विशेषणं भवति नोनाधिकस्य । कारीपगन्ध्यामतिकान्तः स वन्धुरस्य अतिकारीपगन्ध्यवन्धुः, अतिकौमुदगन्ध्यवन्धुः । अत्र ध्येणाधिकस्याग्रहणात् "बन्धौ बहुव्रीहौ" (२२४८४) इति ईच् न भवति । गौण इति किम् ? अगौ-१५ णोऽधिकस्यापि विशेषणं भवति । परमकारीपगन्धीवन्धुः, परमकौमुद्गन्धीवन्धुः। पूर्वेणैव सिद्धेऽगौणस्या- धिकपरिग्रहार्थं वचनम् । प्यादिसत्राण्यग्रे वक्ष्यन्ते दिमात्रं त्वेवम्-"अनार्षे वृद्धेऽणिजी बहुखरगुरूपान्त्यस्यान्नस्य ष्यः” (२।४।७८) अनार्पे वृद्धे विहितौ यावणियौ प्रत्ययौ तद- न्तस्य सतो वहुस्वरस्य गुरूपान्त्यस्य नाम्नोऽन्त्यस्य प्यः इत्यादेशो भवति, स्त्रियां गुरुग्रहणादनेकव्यञ्ज- नव्यवधानेऽपि भवति, गुरुग्रहणं हि दीर्घपरिग्रहार्थं संयोगपरिग्रहार्थं च, अन्यथा दीर्घोपान्त्यस्येत्यु-३० च्येत । करीषस्येव गन्धोऽस्य करीषगन्धिः तस्यापत्यं पौत्रादि स्त्री 'ङसोऽपत्ये" (६।१।२८) इत्यण् , तस्य ध्यादेशः कारीपगन्ध्या । एवं कौमुदगन्ध्या । शब्दशक्तिस्वाभाव्यात् ध्यादेश आबन्त एव स्त्रीलिङ्गम- भिव्यनक्ति | "ज्यापुत्रपत्योः केवलयोरीच तत्पुरुषे” (२।४।८३) मुख्य आवन्तस्य व्यः पुत्रपतिशब्दयोः केवलयोः परयोस्तत्पुरुषे समासे ईच् भवति । चकारो "वेदूतो०" (२।४।९८) इत्यादौ विशेषणार्थः । कारीपगन्ध्यायाः पुत्रः कारीषगन्धीपुत्रः, एवं कारीषगन्धीपतिः । परमकारीपग-२५ न्धीपतिः अत्र कर्मधारये परमकारीषगन्ध्याशब्दस्य ध्यान्तस्य मुख्यत्वेन केवलपतिशब्दे अनेन सूत्रेण ईच् भवति । अतिकारीपगन्ध्यापतिः अत्र तु अतिकारीषगन्ध्याशब्दस्य प्यान्तस्य गौणत्वे "गौणो यादिः" प्रकृतिमात्रस्यैव विशेषणं नाधिकस्येति कारीषगन्ध्याशब्द एव प्यान्तो नत्वतिकारीपगन्ध्याशब्द इति तत्पुरुपसमाससत्त्वेऽपि ईच् न भवति । यथा तत्पुरुषसमासे ईच् भवति तथा वहुव्रीहिसमासेऽपि कचित् ईच् भवतीति दर्शयति-"बन्धौ बहुव्रीहौं” (२।४।८४ ) मुख्य आवन्तस्य ज्यो वन्धुशब्दे ३० केवले परे बहुव्रीही समासे ईच् भवति । कारीषगन्ध्या बन्धुरस्य कारीषगन्धीवन्धुः, कौमुद्गन्धीवन्धुः, परमकारीपगन्धीवन्धुः । वन्धाविति किम् ? कारीषगन्ध्यापतिामः । वहुव्रीहाविति किम् ? कारीपगन्ध्याया वन्धुः, कारीपगन्ध्यावन्धुः, मुख्य इत्येव अतिकारीषगन्ध्या वन्धुरस्य अतिकारीपगन्ध्यावन्धुः । “मात- मातृमातृके वा” (२।४।८५) मुख्य आवन्तस्य ज्यो मातादिपु केवलेपु परेषु बहुव्रीहौं ईज्या स्यात्, कारीपगन्ध्या माता यस्य स कारीषगन्धीमातः, कारीषगन्ध्यामातः, परमकारीपगन्ध्यामातः, परमका-३५ है० प्रका० पूर्वा० ८ - महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- रीपगन्धीमातः । कारीपगन्ध्या माता यस्य स कारीपगन्धीमाता, कारीपगन्ध्यामाता । कारीपगन्धीमा- तकः, कारीपगन्ध्यामातृकः । मातेति निर्देशान्मातृशब्दस्य पुत्रप्रशंसामामध्यमन्तरेणापि मात इत्यका- रान्त आदेशः स्यात् । मातृमातृकशब्दयोश्च भेदेनोपादानादृदन्तलक्षणः कज् विकल्प्यते ॥ १३ ॥ छत् समतिकारकस्यापि ॥ १४ ॥ (७४|११७) कृत्प्रत्ययः प्रकृत्यादेः समुदायस्य गतिकारकपूर्वस्य अपिशब्दात् केवलस्यापि विशेपणं भवति । यथेह समासो भवति-भस्मनि हुतम् , प्रवाहे मूत्रितम् , तथा उदके विशीर्णम् , अवतप्ते नकुलस्थितम्, इति सग- सिकेन सकारकेण च क्तान्तेन "क्तेन" (३२१४९२) इति समासः सिद्धो भवति । तथा व्यावक्रोशी, व्यावहासी, साझौटिनं, सांराविणमिति "नित्यं भनिनोऽण्” (७।३।५८) इति अण् सिद्धः, व्याव- क्रोशीत्यादिप्रयोगाणां सूत्राणि त्वेवम्-"व्यतिहारेऽनीहादिभ्यो नः" (५।३।११६) व्यतिह- १०रणं व्यतिहारः परस्परस्य कृतप्रतिकृतिः, व्यतिहारविपयेभ्यो धातुभ्यः ईहादिवर्जितेभ्यः स्त्रियां सः प्रत्ययो भवति । बाहुलकाद्भावे । त्यादीनामपवादः। परस्परमाक्रोशनम् व्यावक्रोशी। "अभिव्याप्ती भावेऽनजिन्" (५।३।९०) क्रियया स्वसम्बन्धिनः साकल्येनाभिसम्बन्धोऽभिव्याप्तिस्तस्यां गम्यमा- मायां भावे धातोरनजिन् इत्येतौ भवतः । समन्ताद्रावः संरचणं, सांराविणं, सङ्टनं, साकौटिनम् । "नित्यं भनिनोऽण्" (७३।५८) अभिन् इत्येतत्प्रत्ययान्तात्स्वार्थे नित्यमण् प्रत्ययो भवति, नित्य- १५ग्रहणान्महाविभाषा निवृत्ता। "प्रत्ययः प्रकृत्यादेः" इत्यतोऽप्राप्ते वचनम् ॥ १४ ॥ परः ॥ १५ ॥ (७४।११८) यः प्रत्ययः स प्रकृतेः पर एव भवति । अजा खट्वा । वृक्षः वृक्षौ वृक्षाः । जुगुप्सते, मीमांसते । फार्यम्, भव्यम् । औपगवः ।। १५ ।। स्पर्द्ध ॥ १६ ॥ (७।४।११९) द्वयोर्विध्योरन्यत्र सावकाशयोस्तुल्ययलयोरेकत्रानेकत्र चोपनिपातः सर्द्धः, तत्र यः सूत्रपाठे पर: स विधिर्भवति । "शसोऽता सश्च नः पुंसि" (१।४।४९) इत्यस्यावकाशो वृक्षान् , मुनीन् । "नपुंसकस्य शि:" (११४५५) इत्यस्य तु महान्ति, यशांसि । इहोभयं प्राप्नोति-वनानि मधूनि, तत्र परत्वात् शिरेय भवति । अयं तावदेकस्य द्विकार्ययोगे स्पर्द्ध उक्तः ॥ अनेकस्याप्यसम्भवे सति भवति । ई: पोमवरुणेऽग्नेः" ( ३।२।४२ ) इत्यस्यावकाशोऽनीवरुणौ । *"देवतानामात्वादी" (७।४।२८) देवतार्थानां २५शब्दानामात्यादौ विषये णिति तद्धिते परे आदेः पूर्वपदस्य उत्तरपदस्य स्वरेप्वादेः स्वरस्य वृद्धिर्भवति इति वृद्धरवकाशः । आमावैष्णवं हविः । इहोभयं प्राप्नोति-आग्निवारुणीमनड्वाहीमालभेत । परत्वा- वृद्धिर्भवति । अत्र ह्यमेरीत्वं वरुणशब्दस्य वृद्धिरिति च नैको द्विकार्ययुक्तः । असम्भवस्त्वस्ति वृद्धौ सत्यां "इद्धिमत्यविष्णौ" (३।२४३) इति अमेरीत्वापवाद इर्भवति । परस्परप्रतिवन्धेनाप्रवृत्तौ पर्यायेण वा प्रवृत्ती वचनम् ॥ १६ ॥ ३०. आसनः ॥ १७॥ (७४।१२०) इहं आसप्नानासन्नप्रसङ्गे यथास्वं स्थानार्थप्रमाणादिभिरासन्न एव विधिर्भवति । तत्र स्थानेनं दण्डा- प्रम्, क्षुपानम् कम्यग्रोरकारयोः कण्ठ्य एयाकारो दीर्घा भवति । अर्थेन, वातण्ड्ययुवतिः। दारदवृन्दा- रिका अत्र वतण्डीशब्दस्य दरच्छशब्दस्य च "पुंवत्कर्मधारये" (३।२।५७) इति पुंवद्भावे कर्तव्ये अर्यत आसन्नो यातण्ड्यभावो दारदभावश्च भवति, तथाहि * "वतण्डात्" (६।१।४५) वतण्डशब्दादा. गिरसेऽपत्यविनेपे यडेव भवति-यातण्ड्यः । * "नियां लुप्" (६४११४६) वतण्डशब्दादागिरसेऽमत्य- २० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः । परिभाषाः ५९ ५ विशेपे स्त्रियां यत्रो लुप् भवति-वतण्डम्यापत्यं वृद्धं स्त्री आङ्गिरसी बतण्डी, अस्य पुंवद्धावे वातण्ड्य- युवतिरिति भवति । दरदां राजा, दरदोऽपत्यं वा “पुरुमगधकलिङ्गसृरमसद्विस्वरादण्” ( ६।१।११६) दारदः "दूरत्रणोऽप्राच्यभर्गादे' (१२३) इति स्त्रियामस्य लुक दरत् , अस्य पुंवद्भावे दारद- वृन्दारिकेति । प्रमाणेन अमुष्मै, अमूभ्याम , "मादुवर्णोऽनु” (१।४७) इति मात्रिकस्य मात्रिको द्विमात्रस्य द्विमानः ॥ १७ ॥ सम्बन्धिनां सम्बन्धे ॥ १८ ॥ (७४।१२१) सम्बन्धिशब्दानां यत्कार्यमुक्तं तत्सम्बन्ध एव सति भवति नान्यथा । श्वशुरायः' (६।१२९१) श्वशुरस्यापत्यं श्वशुर्यः । संनाशब्दात्तु इबेव-श्वाशुरिः । “मातृपितुः स्वसुः” (२।३।१८) मातृष्वसा, धान्यमातुः स्वसुस्तु न भवति-मातृवसा ॥ १८ ॥ समर्थः पदविधिः ॥ १९ ॥ (७४।१२२) समर्थपदाश्रयत्वात्समर्थः, पढ़सम्बन्धी विधिः पदविधिः, तेन यः पदाद्विधिः, यश्च पदे, यश्च पदस्य, पदयोः, पदानां वा स सर्वः पदविधिरेव । सर्वः पदविधिः समर्थो वेदितव्यः, समर्थानां पदानां विधि- वेदितव्य इत्यर्थः । तत्र सामथ्र्य व्यपेक्षा, एकार्थीभावश्च, अत्र व्यपेक्षायाः सम्बद्धार्थः सम्प्रेक्षितार्थो का पदविधिः साधुर्भवति । तत्र सम्बहोर्थो यत्र झटित्येव पदानामन्वयः प्रतीयते यथा राज्ञः पुरुपः इत्यादौ । सम्प्रेक्षितः कष्टकल्पनया प्रतीतो यथा-"राजोत्पले हरिभुजामिह के झवस्य, यस्योरसीन्दुरदनं च जटा- कलापे । शङ्काम्बरोऽपि पबनादरिनाथसूनुः कान्ता स बोऽगतनया विपुलं ददातु ।। १ ॥” हरिभुजा वायुभुजां शेषाऽहिर्यस्योरसि, यस्य जटाकलापे इन्दुः उत्पले निमांसे शवस्य के मस्तके अदनं भक्षणं, यस्य अगतनया कान्ता, स खाऽम्बरोऽपि विपुलं शं ददातु, स किंविशिष्टः ? पवनादः सर्पस्तस्यारिः केकी तस्य नाथः पण्मुखः स सूनुर्यस्येति सम्प्रेक्षितपदविधेल्दाहरणम् । एकार्थीभावे तु विग्रहवाक्यार्थाऽभिधाने यः शक्तः सङ्गतार्थः संसृष्टार्थो वा पदविधिः स साधुर्भवति । अत्र च पदानि उपसर्जनीभूतस्वार्थानि : निवृत्तस्वार्थानि वा प्रधानार्थीपादानात् व्यर्थान्यर्थान्तराभिधाचीनि वा भवन्ति ।। पदविधिश्च समा- सनामधातुकृत्तद्धिनोपपदविभक्तियुष्मदस्मदादेशप्लुतरूपो भवति । तत्र समासः, द्वितीया "श्रितादिभिः” (३२११६२) धर्म श्रितो धर्मश्रितः । “तृतीया तत्कृतैः” (३।१।६५) शङ्कु लया कृतः खण्डः शकुलाखण्डः, । "चतुर्थी प्रकृत्या” (३।११७० ) यूपाय दारु, यूपदारु । “पञ्चमी भयाद्यैः” (३।११७३) वृकाद्भयं वृकभयम् । “पष्ट्रयत्नाच्छेपे" (३।११७६) रानः पुरुषः राजपु-२५ रुयः । "सप्तमी शॉण्डाद्यैः” (३।११८८) अक्षेपु शौण्डः अक्षशौण्डः । "विशेपणं विशेष्येणैकार्थ कर्मधारयश्च" (३।११९६) नीलं च तदुत्पलं च नीलोत्पलम् । एपु पूर्वोत्तरपदयोर्वाक्यावस्थायां पर- सराकाडालक्षणा व्यपेक्षा, वृत्त्यवस्थायां तु पृथगर्थानां सतामेकार्थीभाव इति । तथाहि-धर्ममित्येत- साधनत्वात्साध्यभूतां क्रियामपेक्षते । श्रित इत्येतदपि श्रयणक्रियोपसर्जनकर्तृवाचि स्खक्रियाविषयं साध- नमपेक्षते । तयोश्च परस्परसंसर्गात् भूच्छितावयव इव वृत्तादेकार्थीभावो भवति । धर्म श्रितो धर्मनि-३० तश्चैत्र इति । एवं शङ्खलया कृतः खण्डः शङ्कुलाखण्डः । कर्तृकर्मणोर्गन्यमानभवतिकरोतिक्रियाकृता धाम्ये व्यपेक्षा, वृत्तावेकार्थीभावः । एवं चतुर्थीसमासादावपि यूपायेयादि सामान्यमवच्छेदाय भेदा. नाकासति । [ कि यूपाय गच्छत्यागच्छति पुप्पं दारु वेति । दार्वपि -यूपाय गृहाय दाहाय वेति भेदाना- काङ्क्षति । एवं सर्वत्रोपसर्जनानां अधानानां च परस्परमाकाहावतां वचित्प्रकृतिविकारभावलक्षणः कचिदवध्यवधिमद्भावात्मक; ऋचित्स्वस्वामिभावः कचिद्विषयविपयिभावरूपः सम्बन्धो वाक्ये व्यपेक्षा, ३५ २० - , , ६० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- वृत्ती वेकार्थीभावः । एवं नीलमित्येतद्विशेषण गुणत्वाद् द्रव्यमाकाइति । उत्पलमित्येतदपि सर्वो- सलावग्रहरूपेण प्रवृत्त सद् विशेषणं गुणमाकाइति । वृत्तौ पुनरेकार्थीभावेन पांसूदकवदविभागापन्नौ तावु- भावप्यर्थावेकस्मिन्नधिकरणे मूच्छिताविव भवतः । नीलं च तदुत्पल च नीलोत्पलमिति । तदेवं साम- यमविशेषोक्तमपि लोकव्यपेक्षया वृत्यवृत्त्योः स्वभावेन विभक्तमवतिष्ठते । यत्र त्वसामर्थ्य तत्र समासो ५न भवति । यथा पश्य धर्म श्रितो मैनो गुरुकुलम् । कि ते शङ्कुलया सण्डो मैत्र उपलेन । गच्छ यूपाय दारु शोभन शैले । निवर्तस्व व्याघ्रात् भय चैत्रस्य मैनात् । भार्या राज्ञः पुरुषो देवदत्तस्य । सक्तस्त्व- मक्षेषु शौण्डः पिवति पानागारे ॥ नामधातुः, पुनमिच्छति पुत्रीयति । श्येन इवाचरति श्येनायते । समर्थ इति किम् ? पश्यति पुनमिच्छति सुखम् । कृत् , कुम्भं करोति कुम्भकारः । समर्थ इति किम् ? पश्य कुम्भ करोति कटम् । तद्धितः, उपगोरपत्यं औपगवः । समर्थ इति किम् ? गृहं उपगोरपत्यं तव। १० उपपदविभक्तिः, नमो देवेभ्यः । अभिजानासि देवदत्त कश्मीरेपु वत्स्यामः । उपाध्यायश्चेदागच्छे. दाशसे युक्तोऽधीयीय । समर्थ इति किम् । इदं नमो देवाः शृणुत । देवदत्त मातर स्मरसि । अवसाम दीर्घ मगधेषु । युष्मदादेशः, धर्मस्ते स्व धर्मो मे स्वम् । धर्मो वः खं धर्मों नः स्वम् । समर्थ इति किम् ? ओदनं पच तव भविष्यति मम भविष्यति । लुतः, अग कूज ३ इदानी ज्ञास्यसि जाल्म । समर्थ इति किम् , अङ्ग फूजत्ययमिदानी ज्ञास्यसि जाल्मः ।। १५ पदग्रहणाद्वर्णविधिरसामध्येऽपि-तिष्ठतु दध्यशान लं शाकेन तिष्ठतु कुमारीच्छर हर देवदत्तेति यत्वं द्वित्व च भवति । एवं समासनामधातुकृत्तद्धितेपु वाक्ये व्यपेक्षा वृत्तावेकार्थीभावः शेपेषु पुनर्व्य- पेक्षैव सामर्थ्य भवति । ननु च राज्ञः पुरुषमानयेत्युक्ते योऽर्थ आनीयते राजपुरुषमानयेत्यप्युक्ते स एव तत् कोऽत्र व्यपेक्षका भावयोर्षिशेपः १ उच्यते-सङ्ख्या विशेषो १ व्यक्ताभिधानम् २ उपसर्जन. विशेषण ३ चयोगश्चेति ४ । तत्र राज्ञः पुरुषः, राज्ञोः पुरुषः, राज्ञा पुरुषः इति वाक्ये सहयाविशेषो २० भवति समासे न भवति राजपुरुषः इति । वाक्ये घुपसर्जनानि विभक्तार्थाभिधायित्वात् सत्याविशेषयुक्त खार्थ प्रतिपादयन्ति । समासे खन्तर्भूतस्वार्थ प्रधानार्थमभिदधतीत्यभेदैकत्वसायां गमयन्ति । सहया. विशेषाणामविशेषेणावस्थानमभेदैकत्वसङ्ख्या । "यथौषधरसाः सर्वे मधुन्याहितशक्तयः । अविभागेन वर्तन्ते ता सङ्ख्या तादृशी विदुः ॥ १ ॥" तामित्यभेदैकत्वसङ्ख्याम् , तादृशीमिति ममाहितशक्तिकौपधरससदृशीम् । विभक्तिवाच्यैव तु सङ्ख्या वृत्तौ निवर्तते नामादिगम्या तुन निवर्तते । यथा द्विपुत्रः, पञ्चपुत्र इत्यादी नामार्थ एवं सहयाविशेषः । तावकीनो, मामकीन इत्यादेशाभिव्यङ्गयमेकत्वम् । शौर्पिकः, मासजात इति परिमाणस्वाभाव्यादेकत्व- सायावगमः । कारकमध्यं, व्यञ्जनमध्यमित्यादौ मध्यान्यथानुपपत्त्या द्वित्वावगमः । यत्रापि वृत्ती विभत्तेर्छन् नास्ति । दास्याः पुत्रः, देवाना प्रियः, आमुष्यायणः, अप्सव्यः, गोषुचरः, वर्षासुज, इति । ३० तनापि सहपाविशेपो नास्ति सामान्येन विशेषणमात्रप्रतीतेः । अत एव वृत्तौ सयाभेदाभावात् स्वभावनि- वृत्ता विभक्तिः लुपा अन्याख्यायते। अलुप्समासे तु शब्दान्तर विभक्त्यन्तप्रतिरूपावयवमनेनोपायेन प्रतिपाद्यते । ११ तथा वाक्ये व्यक्ताभिधानं भवति-ब्राह्मणस्य कम्यलस्तिष्ठति । समासे पुनरव्यक्तं ब्राह्मण म्यलस्तिष्ठतीति । सन्दिह्यते अन पष्ठीसमासो या सम्बोधनं वेति । किश्चित्पुनरव्यक्तं वाक्ये । यथाद्ध पशोदेवदत्तस्येति । पशुगुणस्य या देवदत्तस्येति यदद्ध या सज्ञीभूतः पशुस्तस्य यदर्द्धमिति या । तच्च समासे व्यकं अर्द्धपशुर्देवदत्तस्येति ।२। तथा वाक्ये उपसर्जनविशेषणं भवति । ऋद्धस्य राज्ञः पुरुपः। ६समासे न भवति, राजपुरुषः । यथाहुः-"सविशेपणानां वृत्तिन, वृत्तस्य वा विशेषण न प्रयुज्यते” इति । ।

- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे संज्ञाधिकारः। परिभापाः ६१ विशेषणयोगे हि सापेक्षत्वेनागमकत्वादसामर्थ्य भवति । यत्र च कचिद्विशेषणयोगेऽपि गमकत्वं तत्र भवत्येव समासः । यथा देवदत्तस्य गुरुकुलम् , यज्ञदत्तस्य दासभार्या । "सम्बन्धिशब्दः सापेक्षो नित्यं सर्वः प्रवर्तते । स्वार्थवत्सा व्यपेक्षाऽस्य वृत्तावपि न हीयते ॥ १॥" ३ । तथा वाक्ये चयोगो भवति । स चयोगः स्वचयोगः स्वामिचयोगश्च । राज्ञो गौश्वाश्वश्च पुरुषश्च । ५ चैत्रस्य मैत्रस्य मित्रस्य च गौः । समासे न भवति । राज्ञो गोऽश्वपुरुपाः चैत्रमैत्रमित्राणां गौरिति ।४। यदि समर्थः पदविधिः कथमसामर्थे सूर्यमपि न पश्यन्ति असूर्यपश्या राजदाराः, न पुनर्गीयन्ते अपुनर्गेयाः श्लोकाः, श्राद्धं न भुङ्क्ते अश्राद्धभोजी, अलवणभोजी, सर्वश्चर्मणा कृतः सार्वचर्माणो रथः, कृतः पूर्वं कटोऽनेनेति कृतपूर्वी कटामित्याद्यावृत्तयो भवन्ति ? "किं हि वचनान्न भवति ?" गमकत्वा- नञ् [ इत्यनेनाऽसामर्थेऽपि बाहुलकात्समासो भवतीत्यर्थः ] ॥ १९ ॥ २० इति वरपरिभाषापद्धतिं जानतः स्याद् द्रुततरमनपायं शब्दशास्त्रप्रवेशः । न भवति परिभापाज्ञानशून्यस्य लोके व्यवहृतिपरिणद्धे कार्यजातेऽधिकारः ॥ १॥ यां शिष्योऽद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणी स्वोपज्ञसत्प्रक्रिया- वृत्तौ पूर्ण (अयम्) श्रुतिसुख (करः) संज्ञाधिकारः सुखम् ॥१॥ १८ का अथ स्त्र र सन्धि र भिधीयते अथेति-अथ संज्ञाकथनानन्तरं स्वराणां सन्धिः सन्धान फथ्यते । स च 'यथोद्देशं निर्देश' इति न्यायात् क्रमोलईने हेत्वभावाच्च अवर्णादिक्रमेणैवोच्यते । वृषभ अजितौ इति स्थिते अत्र यद्यपि 'वृत्त्यन्तोऽसपे' इत्युत्तरपदस्य वृत्त्यन्तत्वेन पदत्वनिषेधात् "लुगस्यादेत्यऽपदे" इति पूर्व- पदाकारस्य लुक् प्राप्नोति, तथापि 'सर्व वाक्यं सावधारणम्' इति न्यायात् 'अपर्दे' इत्यत्रापदस्यैवादिरि- त्यवधारणान्न भवति, उत्तरपदस्यायत्त्यवस्थायां पदत्वादिति । तत्र सूत्रम्- समानानां तेन दीर्घः॥१॥[ सि० १२२११] समानानां तेन परेण समानेन सह दीर्घः स्यात् । द्वयोः स्थाने एको दीर्घः स्यादिति संहार्थः । “लोकात्" स्वरहीनं परेण संयोज्यम् । पभाजितौ । तब आयुः तवायुः । दधि इदम् १० दधीदम् । मधु उदकम् मधूदकम् । पितृ ऋपभः पितृपभः । होट लकारः होतकारः॥ १ ॥ समाना० । समान ६-३ "हस्थापश्च" आमो नाम् दीनाम्यतिसृचतसृष्टः" इति दीर्घ समाना- नाम् । तद् ३-१ टा “आवेरः” इति दस्य अ: "लुगस्यादेत्यऽपदे" इत्यकारलुक् "लोकात्" अकारसंयोगः "टाइसोरिनस्यौ” टाया इनः "अवर्णस्ये." तेन । दीर्घ ११ "सोरुः" "र: पदान्ते." । "तो मुमौ०" मोऽनुस्वारः, समानानां तेन दीर्घः । त्रिपदमिदं सूत्रम् ॥ सहार्थ इति, यत्र कापि सहशब्दप्रयोगस्तत्र १५ सर्वत्रापि द्वयोः स्थानिनिमित्तयोः स्थाने एक कार्य स्यादिति परिभाषा ज्ञेया । ननु तेनेति सहाथै तृतीयेति द्वयोर्दीर्घत्वं प्राप्नोति यथा पुत्रेण सह स्थूल इति, नैवम् , अत्र अजाक्षीरेण सहौपधं पिवेदितिवदेक एव दीर्घ इति । "ननु तेनेत्यत्र स्खेनेति क्रियतामेवमिवर्णादेरखे इत्यत्रास्वग्रहणं न कर्तव्यं स्यादित्यत्रोच्यते, दधिशीतमित्यन इकारशकारयोलालन्यत्वान्मतान्तरेण शकारस्थापि विकृतत्वादीः प्रामोतीति तेनेत्यु. क्तम्" एतच लघुन्यासोक्तं नातिशोदक्षम, स्वमते आस्यप्रयत्नभेदेन परमते च नाज्झलाविति वचनेन २० स्वसंज्ञाप्रतिषेधात् । अत्र च स्थानिनिमित्ताभ्यां चतुर्भङ्गी यथा द्वावपि हस्त्रौ १ आयो हवः परो दीर्घः २ आयो दीर्घः परो हस्यः ३ द्वावपि दीयों ४ । उदाहरणानि च पभाजितौ १ तवायुः २ श्रद्धात्र ३ मेधायुपी ४ । एवमिवर्णादिप्वपि चतुर्भद्या सर्वत्र सन्धिरुदाहार्यः। समानानामिति बहुवचनं व्याप्त्यर्थ तेन फलति ऋलतोरपि "ऋलति हस्खोवा" इति सूत्रेण हस्य: स्यात् , क्ल ऋषभः होट लकारः, ऋस्तयोः' इति परत्वात् ऋरेव स्यादिति । अत्रायं विशेषः "लत ऋलू ऋलभ्यांचा"सि० १।२।३] २५ लतास्थाने ऋता लता च सह यथासङ्घर्ष ऋल इत्येतद्वर्णद्वयं वा स्यात् [ऋ इति स्वरसमुदायो वा स्वरव्यञ्जनसमुदायो वा वर्णान्तरं पा] तच्च [ईपस्पृष्टकरणं] द्विरेफतुरीयमध्यर्द्धस्खरमात्रमित्येके, [संवृततरं] सकलरेफारमर्द्धखरमक्तिकमित्यन्ये, द्विरेफचतिकमध्यर्धस्वरमात्रमित्यपरे । लु इत्यत्र च रेफस्थाने लकारो शेयः । क ऋकार इति स्थिते कृकारः १ पक्षे 'फलति हस्खो या' क्ल ऋकारः २ । पर्छ "स्तयो" [सि० १२२५] तयोलकारऋकारयोः स्थाने अलभ्यां सह ऋकारो द्विमात्रः स्यात् । -३० फुकारः ३ । लता, कुकारः १ क् लकारः २ कुकारः ३ । ऋतो वा तौ च [सि० १२२।४ ] एवं or -- अन्यथा - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरसन्धिः । अवर्णस्येवर्णादिना ६३ ऋतः स्थाने ऋलभ्यां सह यथासहवं ऋ लू वा स्यातां; परमयं विशेषः, पक्षे ऋतः स्थाने ऋकारेण सह ऋकारः, लकारेण लकारश्च वा स्यात् । ऋता, पितृ ऋपम इति स्थिते पितृपभः १ पितृपभः २ पितृ ऋपभः ३ 'ऋस्तयो'रिति पितृपभः ४ । लता होत लकार इति स्थिते होलकारः १ होतृकारः २ होत लकारः ३ होलकारः ४ । एवं च लकारस्य अलभ्यां सह पट् रूपाणि ऋकारस्य चाष्टौ रूपाणि स्युरिति ॥१॥ अथ अवर्णस्य इवर्णादिभिश्चतुर्भिः सह सन्धिमभिधत्ते- अवर्णस्येवर्णादिनैदोदरल् ॥ २॥ [ सि० ११२।६ ] अवर्णस्य इवर्ण उवर्ण ऋवर्ण लवणः सह एन ओत् अर अल् इत्येते आदेशाः स्युः । यथा- सङ्ख्यमनुदेशः समसङ्ख्याकानाम् । तव इदं तवेदम् । गङ्गा उदकं गङ्गोदकम् । महा ऋपिः 'जलतुम्बिकान्यायेन रेफस्योर्द्धगमनम्' महर्पिः । तव लकारः तवल्कारः ॥२॥ अवर्ण ६-१ "टाङसोरिनस्यौ” उसः स्यः, इवणं आदिर्यस्य स इवर्णादिस्तेन ३-१ आ "टः पुंसि, १० ना"; एच ओच्च अर् च अल् च एदोदरल् १-१ "अनतो लुप्" । अनेनैव सूत्रेण एत्वे "ऐदौत्सन्ध्यक्षः' इति ऐत्वे च अवर्णस्येवर्णादिनैदोदरल् । त्रिपदमिदं सूत्रम् । ननु स्वस्मिन् स्वक्रिया नोपपद्यते. निपत्स्यमानं च सूत्रं कार्यो नोत्पादयेदिति चेदुच्यते-"आत्मानं भासयन्नेव प्रदीपोऽन्यं प्रकाशयेत् । उदेष्यन्नपि मार्तण्डः पराभवति तामसम् ॥ १ ॥” इति । यदि 'सुशिक्षितोऽपि नटः स्वस्कन्धं नारो- हति' इति न्यायात् स्वस्मिन् स्वस्य क्रिया न भवति, अनुत्पन्नेन च कार्यकरणेऽतिप्रसङ्ग इति मंतं तदा १५ "लोकात्" इति सूत्रेण सर्वं सिद्धयतीति । यथासङ्ख्यमिति न्यायः, सङ्ख्याया अनतिक्रमेण यथासङ्ख्यं तञ्च क्वचित् 'स्थानिकार्ययोः' यथा "इवर्णादेरखे स्वरे यवरलम्" इत्यत्र, कचिच्च 'निमित्तकार्ययोः' यथात्र सूत्रे, ततश्च प्रथमेन निमित्तेन सह प्रथमं कार्यं द्वितीयेन सह द्वितीयमित्यादि; एवं च अवर्णस्य इवर्णेन सह एत् , उवर्णेन सह ओत् , ऋवर्णेन सह अर्, लवर्णेन सह अल् भवतीति भावः ॥२॥ अथात्रा- पवादसूत्रमाह- ऋणे प्रदेशार्णसनकम्बलवत्सरवत्सतरस्यार् ॥३॥[सि० १२७] प्रादीनां सप्तानामवर्णस्य ऋणे परे ऋता संहार स्यात् । प्रऋणं प्रार्णम् । ऋण ऋण ऋणार्णम् ॥३॥ ऋणे० ऋण ७-१ "अवर्णस्येवर्णादि०" प्रश्च दश च ऋणं च वसनं च कम्बलश्च वत्सरश्च वत्स- तरश्च प्रदशार्णवसनकम्बलवत्सरवत्सतरं तस्य इति । प्रदश०६-१ "टाङसो." आर् १-१ "दीर्घड्यां०” २५ सिलुक् । “नाम्नो नोऽनह्नः" इति दशन्शब्दस्य नलोपः अनेन सूत्रेणार् । अयमरं वाधते । येन प्राप्ते यो विधिरारभ्यते स तस्यैव वाधकः' सचापवादो बहुधा भवति, कचित् स्थानिविशेषात् , कचिन्निमित्त- विशेषात् , कचिदुभयविशेषात् , कचिदर्थान्तरविशेषाच । तत्रास्मिन् सूत्रे स्थानिनिमित्तोभयविशेषादप- वादः, तथैवाह प्रादीनामिति-प्रगतं, प्रकृष्टं वा ऋणं प्रार्णम् १-१ । दशानां ऋणं दशार्णम् १-१ । ऋणस्य अवयवतया सम्बन्धि ऋणं ऋणे ऋणं वा ऋणार्णम् १-१। वसनानां वस्त्राणां ऋणं वसनार्णम्:१-१ । कम्ब-३० लस्य ऋणं कम्बलार्णम् १-१ । वत्सरस्य वर्पस्य ऋणं वत्सराणम् १-१।हस्खोवत्सो वत्सतरः "वत्सोक्षाश्चर्प- भाद् हासे पित्” इति तरट् पित्प्रत्ययः 'दम्यवत्सतरौ समी' इति नाममालायां, वत्सतरस्य ऋणं वत्सतरार्णम् १-१ । सर्वत्रानेन सूत्रेण अरपवाद आर् “अतःस्यमोऽम्" इति सेरम् “समानादमोऽतः" इत्यकारलुप्। समानीनामिति बहुवचनस्य व्याप्त्यर्थत्वेनोक्तत्वादिहोत्तरत्र पूर्वत्र चे "ऋलति हखो वा" इति सूत्रेण ३४ , २० . . ६४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- हस्वोऽपि भवति हस्वविधानसामर्थ्यादसन्धिश्च, मह कपि, प्र ऋणं, दश ऋणमित्यादि ॥३॥ अत्रैव निमित्तविशेषादर्थविशेपाच अपवादमाह-सूनम् ऋते तृतीयासमासे ॥४॥[सि० ११२।८] अवर्णस्य ऋते परे तृतीयाममासे ऋता सहार स्यात् । शीत ऋतः शीतातः इत्यादि ॥ ४ ॥ ऋत ७-१ "अवर्णस्ये." ए। तृतीयया समासः तस्मिन् तृतीयासमासे ७-१ । द्विपदं सूत्रम् । शीतेन ऋतः "कारकं कृता" इति सूत्रेण तृतीयातत्पुरुषसमासः, अनेन आर शीतातः, हखोऽपि भवति शीत ऋत इति। तृतीयासमास इति किम् ? परमश्वासौ ऋतश्च परमर्च इत्यत्र कर्मधारयसमासे शीतेनत इत्या वाक्ये च "अवर्णस्ये.” इत्यादिना अरेव । मूले इत्यादिग्रहणाच "ऋत्यारुपसर्गस्य" [सि० ११२।९] उपसर्गस्थस्यावर्णस्य ऋकारादौ धातौ परे ऋता सह आर् स्यात् । प्राईति, परा- १०र्छति । "नाम्नि वा”[सि० १।२।१०]"लल्याल्वा" [सि० १।२।११] ऋकारादौ लकारादौ च नामधातौ परे उपसर्गस्थस्यावर्णस्य आर् आल् च वा स्यात् । प्रापभीयति, प्रर्पभीयति । उपाल्कारी. यति उपल्कारीयसि इत्यादि बोध्यम् ॥ ४॥ अथ अवर्णस्य सन्ध्यरैः सह सन्धिमाह । सूत्रम्- ऐदौत् सन्ध्यक्षरेः ॥ ५॥[सि० ११२।१२] अवर्णस्य सन्ध्यक्षः परैः सह ऐ औ स्याताम् । तव एपा तवैपा । महा ऐश्वर्यम् महैश्वर्यम् । १५तव ओदनः तचौदनः। तव औपगवः तत्रौपगवः ॥ ५॥ ऐदौ० । ऐच औच ऐदौत् १-२ सूनत्वाद्विभक्तिलोपः, सन्ध्यक्षर ३-३ "भिस ऐस्" अनेनैव च सूत्रेण ऐत्वे "सोरुः" "रः पदान्ते." सन्ध्यक्षरैः । द्विपदमिद सूत्रम् । युष्मद् ६.१ "तव मम डसा" तव । एतद् १-१ "आद्वेरः" द अ "लुगस्यादेत्यऽपदे" इत्यकारलोपः 'लोकादि'त्यकारयोगे "त: सौ सः" इति तस्य सत्वे "नाम्यन्तस्था० इति सस्य पत्वे, आप्, “दीर्घडयाव्” इति सेलृप् २० एपा, अनेन ऐत्वे तवैषा । 'ईशिक् ऐश्वर्य' ईश् ईष्टे "स्थेशभासपिसकसो घरः" इति वरप्रत्यये ईश्वरः, ईश्वरस्य भावः कर्म वा "पतिराजान्तगुणागराजादिभ्यः कर्मणि च' इति ध्यणप्रत्यये "वृद्धिः खरेष्यादेः” इति स्वरवृद्धौ "अवर्णस्य." इत्यलोपे ऐश्वर्य, महाच तदैश्वर्यं च "सन्महत्परमोत्कृष्टपूजा- याम्" इति कर्मधारये "जातीयैकार्थेऽच्चेः" इति डाप्रत्यये अनेन ऐत्वे महेश्वर्यम् । युष्मद् ६-१ तव । ओदनः १.१ "सोरुः" ": पदान्ते.", अनेन औत्वे तबौदनः । उप समीपे गावो यस्य "गोश्चान्ते० २५ इति हखे उपगुः उपगोरपत्यं “डसोऽपत्ये" इत्यण "अस्वयम्भुवोऽव्" इत्युकारस्य अवादेशे "वृद्धिः खरेप्नादेः" इति वृद्धौ औपगवः अनेन औत्वे तवौपगवः॥५॥ तथान निमित्तविशेषादपवादमाह- वौष्ठौती समासे ॥६॥[सि० १०२।१७] ओष्ठौत्योः परयोः समासेमर्णस्य लुग्वा स्यात् । बिम्बोष्ठी । विम्वौष्ठी । स्थूलोतुः । स्थूलौतुः। क्वचिदन्यत्राप्येदोतोः परयोरवर्णस लुग्वाच्या । अद्य ओम् अद्योम् । इह एव तिष्ठ इहेव ३० तिष्ठ । कचिदवर्णस्येवोवर्णाभ्यां सहैत्वौत्वे वाच्ये । स्व ईरः खैरः । स्व ईरिणी खैरिणी। अक्ष ऊहिणी अक्षौहिणी । प्र ऊहः प्रौढः ॥६॥ वौष्ठी । वा १-१ "अव्ययस्य” इति सिलुरु ओष्ठश्च ओतुश्च ओष्ठौतुः तस्मिन् ओष्ठौतु ७-१ "डिडौँ" "डित्यन्यस्वरादेः" इत्युकारलोपः, समाहारद्वन्द्वेऽपि सूरत्वान्न छीवत्वं "छन्दोवत्सूत्राणि भवन्ति" इति ३४ न्यायात् सूत्रेषु बाहुलकविधिर्भवतीति । "ऐदौत् सन्ध्यारै"रित्यौत्वं वौष्ठौती समास ७-१ "अवर्णस्से. ana प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे खरसन्धिः । अवर्णेवर्णादीनाम् ६५ वौप्टौती समासे । त्रिपदं सूत्रम् । विम्वमिव ओष्ठौ यस्याः "उष्टमुखादयः" इति वहुव्रीही अनेन अलोपे बिम्बोष्ट इति स्थिते "नासिकोदरीप्ठजवादन्तकर्णशृङ्गाङ्गगात्रकण्ठात्" इति ड्यां विम्बोष्ठी, पक्षे "ऐदी- सन्ध्यक्षरैः” इत्यौत्वे विम्बोष्ठी । स्थूलश्चासौ ओतुश्च अनेन अकारलोपे स्थूलोतुः । समास इति किम् ? हे पुत्रौष्ठं पश्य, अत्र ‘ऐदौत्सन्ध्यक्षरैरि"यौत्वमेव । अत्र सङ्केपमाह-कचिदन्यत्रापीति स्पष्टम् । इदम् ७-१ अस्मिन्नहनि अद्य "सद्योऽद्यपरेद्यव्यहि” इति सूत्रेण निपात्यते "अधण्तस्वाद्याशसः” इत्यव्यय-५ संज्ञा । अत्र सूत्रपद्धतिः-"ओमाङि" [सि० १।२।१८ ] ओमि आङादेशे च परे अवर्णस्य लुक स्यात् । अयेत्यादि अद्य १-१ "अव्यय०” सिलुप् ओम् १-१ "अव्ययस्य” सिलुप् अनेन अकारलोपे अद्योम् , एवं आडादेशे ओंकारे परेऽपि अलुक् वा स्याद् यथा आ ऊढा ओढा, अद्य ओढा अद्योढा, सा उढा सोढा । इहेव तिष्ठेति इदम् ७-१ अस्मिन्निह "क्वकुत्रानेह" इति निपातः "अनियोगे लुगे" [सि० १।२।१६ ] अनवधारणेऽर्थे एवे परे अवर्णस्य लुग् भवति यथा इहेच तिष्ठ अन्यत्र वा गच्छ १० यथेच्छं कुर्विसत्रानवधारणं प्रतीयते, अवधारणे तु इहैव तिष्ट मा गाः इत्यत्र "ऐदौत्सन्ध्यक्षरैरि"येव भवति । "उपसर्गस्यानिणेधेदोति" [ सि० १।२।१९] उपसर्गस्थस्यावर्णस्य इणेधिव कारादौ ओकारादौ च धातुपरे लुक् स्यात् । प्रपरा 'इलण् प्रेरणे' "चुरादिभ्यो णिच्” इ "लघोरुपान्त्यस्य” इति गुणे तिब शव "नामिनो०” । “एदैतोऽयाय्” । अनेन अवर्णलोपः प्रेलयति, परेलयति । इणेधिवर्जनात उपैति उपैधते । अत्रावर्णलोपो न भवति “ऐदौत् सन्ध्यक्षरैः” इत्येव भवति । तथा वा नाम्नि [ सि०१५ १।२।२०] नामावयवे एदादावोदादौ च धातौ परे उपसर्गस्थस्यावर्णस्य लुप् वा स्यात् । उपेकीयति, उपैकीयति, प्रोषधीयति, प्रौषधीयति । अथात्र विशेपमाह - कचिदित्यादि-"प्रस्यैषैष्योढोढ्यूहे खरेण" [सि० १।२।१४ ] प्राव- र्णस्यैपादिपु परेपु परेण स्वरेण ऐ औ स्याताम् । प्रैपः प्रैष्यः “उपसर्गस्यानिणेघेदोति” इति सूत्रस्याप- यादोऽयम् । नन्वेषैष्ययोर्घध्यणन्तयोर्धातुत्वाभावात्कथमुपसर्गस्यानिणेधिति सूत्रप्राप्तिः। नैवं विवन्तवद-२० न्यप्रत्ययान्तानामपि धातुत्वस्य ज्ञापितत्वात् । तथोक्तं श्रीसूरिभिः "कृकमी"ति सूत्रवृत्तौ, "इह कम्योः केवलयोः समासो न भवतीति प्रत्ययान्तयोर्ग्रहणम् । अथ विवन्ता धातुत्वं न जहति इति विवन्तयोरेव कस्मान्न भवति “गतिकारकस्य” इत्यादिसूत्रे किवग्रहणात् । नान्यप्रत्ययान्तानां धातूत्तरपदानामग्रहणे विग्रहणमर्थवद्भवति" इति । "स्वैरौर्यक्षौहिण्याम्" [सि० १।२।१५] इति । एवं प्रौढः प्रौढिः प्रोहः "अवर्णस्येवर्णादिनैः” इति सूत्रस्यापवादोऽयम् ॥ ६ ॥ अथ इवर्णादीनां सन्धिमाह- दधि अत्र इति स्थिते इवर्णादेरखे खरे यवरलम् ॥७॥ [ सि० १।२।२१ ] इ उ ऋल वर्णानामखे खरे परे यवरलाः स्युः । दध् य् अत्र इति तावद्भवति ॥ ७ ॥ इवर्णादे० । इवणं आदिर्यस्य स इवर्णादिस्तस्य इवर्णादि ६-१ "डित्यदिति” “एदोभ्यां ङसिङसो रः" इति रत्वे इवर्णादेर् , न स्वः अस्वः तस्मिन् अस्खे ७-१, स्वर ७-१ "अवर्णस्ये” एत्वं, यश्च वश्च ३० रश्च लश्च "चार्थे द्वन्द्वः सहोक्तौ"इति समाहारद्वन्द्वे क्लीवत्वमेकत्वं च यवरल १-१ "अतः स्थमोऽम्" सेरम् “समानादमोऽतः” इत्यकारलुप् । चतुष्पद मिदं सूत्रम् । ननु अखे इति किमर्थं न च दधीदमि- त्यादौ यत्वादिप्रसङ्गवारणाय "समानानां तेन दीर्घः" इत्यनेन तस्य वाधितत्वात् , एवं तर्हि "हस्खोऽपदे या" इत्यनन्तरसूत्रेऽनुवर्त्तनीयत्वादिह स्पष्टतायै गृहीतमिति । स्वर इति *"सप्तम्या पूर्वस्य" सप्तम्या निर्दिष्टे यत्कार्य तत्पूर्वस्याव्यवहितस्य स्यात् । अत्रापि हखदीर्घाभ्यां स्थानिनिमित्ताभ्यां प्राग्वञ्चतुर्भङ्गी ३५ है. प्रका० पूर्वा० ९ २५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- ज्ञेया । दधि- १-१ "अनतो लुप्” इति सिलुप् अत्र १-१ "अव्ययस्य" इति सिलुप् अनेन यत्वं दधु य अत्रेति ॥ ७ ॥ अथात्र कार्यान्तरमाह-सूत्रम् अदीर्घाद्विरामैकव्यञ्जने ॥ ८॥ [ सि० ११३६३२] अदीर्घात्स्वरात्परस्य रहवरवर्जितस्य वर्णस्य विरामे असंयुक्तव्यञ्जने च परेऽनु द्वित्वं वा स्यात् । ५इति धस्य वा द्वित्वम् ॥ ८॥ अदीर्घा० । न दीर्घः अदीर्घः "नअत्" नस्य अः तस्मात् अदीर्घ ५-१ "डेडस्योर्याती" । एकं च तत् व्यञ्जन च एकव्यञ्जनं “पूर्वकालैफसर्वजरपुराणनवकेवलम्" इति कर्मधारयः, विरामश्च एक- व्यञ्जनं च विरामैकव्यञ्जनं तस्मिन् विरामैकव्यसन ७-१ "अवर्णस्य०" । मध्ये "धुटस्तृतीयः" इति दत्वम् । द्विपदमिदं सूत्रम् । अन धस्य द्वित्वे कर्तव्ये वर्णविधित्वात् "स्थानीवावर्णविधौ" इति यस्य १० स्थानिवद्भावो न स्यात्, "स्वरस्य परे प्राविधौ” इत्यनेनापि परनिमित्तकस्य स्वरादेशस्य यस्य स्थानिव. द्भावो न स्यात्, “न सन्धिडीयक्किद्विदीर्घास द्विधावस्कलुकि" इति निषेधात् । तत्रापि सन्धिग्रहणेनैव. सिद्धे पृथग् द्वित्वग्रहणं "असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे" इत्यस्य बाधनाथ, ततोऽनेन सूत्रेण धकारस्य द्वित्वे दध् ध य अत्र इति भवति । नन्वत्र “पदस्य" इति सूत्रेण संयोगान्तस्य यस्य लोपः कुतो न इत्यत्रो- च्यते "असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे" इति न्यायात् अन्तरङ्गे यलोपे क्रियमाणे बहिरङ्गयत्वं असिद्धं भव- १५ तीति । रहस्वरवर्जनात् वर्या वयं तितउः इत्यत्र रेफादीनां द्वित्वं न स्यात् । विरामे द्वित्वं यथा-स्वक् स्वक् त्वग्ग त्वम् पट् पटू तत्त् तत् पडू पड् । एकव्यञ्जने परे-दङ्ख्यत्र ध्यन्न, पत्थ्यदनं पथ्यदनम् , मवत्र मध्वत्र, पित्रर्थः पित्रर्थः, त्वड्ड्मधुरा, त्वङ्मधुरा, त्वड्द्दकरोपि, त्वकरोपि, सॅय्य्यतः सॅय्यतः, उरxx कः उर कः, उर पः उर-पः, उर:: कः उरः कः । अदीर्घात्स्वरादित्युक्तेः प्लत- खरादपि द्वित्वं भवति । गो३त्रात गोत्रात नौ३त्रात नौ३नात । अन्वित्यधिकारात् कत्वगत्वादिषु कृतेषु २० पश्चाहित्वम् । अदीर्घादिति किम् ? वाक् भवान् सूत्रं पात्रं नेत्रम् । मतान्तरेण दीर्घस्वरादपि द्वित्वं धात्रंशः । विरामैकव्यञ्जने इति किम् ? इन्द्रः चन्द्रः कृत्स्न दधि । सयुक्तव्यञ्जनेऽपि इच्छन्त्येके इनन्द्रः राष्ट्रम् ॥ ८ ॥ पुनरपि कार्यान्तरमाह । सूत्रम्- तृतीयस्तृतीयचतुर्थे ॥९॥[सि. १३३४९] तृतीये चतुर्थे च परे धुटस्तृतीयः स्यात् । 'एकवर्गीया मिथः खा' इति पूर्वधकारस्य दकारः २५ दद्ध्यत्र दध्यत्र । मधु-अत्र मद्धत्र मध्यत्र । पितृ-अर्थः पित्रर्थः पित्रर्थः । ल-इत् लित् । इवर्णा- देरित्यत्र पञ्चमीव्याख्याने दघियत्र, मधुक्त्रेत्यादि । गौरी अत्रेत्यत्र गौर य् अत्रेति जाते अंदी- द्विरामेतिसूत्राप्राप्तेन रेफस्य द्वित्वं किन्तु ॥९॥ तृतीयश्च चतुर्थश्च "चार्थे द्वन्द्व०" इति समासः । तृतीयचतुर्थ ७-१ "अवर्णस्ये." । "चटते स. द्वितीये" इति रख सत्वम् । द्विपद सूत्रम् । तृतीये चतुर्थे च परे इति-वर्गसम्बन्धिनि तृतीये चतुर्थे ३० च परे स्वर्गसम्बन्धी धुटस्तृतीयः स्यादित्यर्थः । पञ्चमीव्याख्याने इति "इवर्णादेरखे स्वरे यवरलम्" इति सूने यथा पष्ठीव्याख्याने अखे स्वरे परे इवर्णादीनां यवरला भवन्ति तथा पश्चमीव्याख्याने अखे स्वरे परे इवर्णादिभ्यः परे यघरला भवन्ति आगच्छन्तीत्यर्थः । तथा याश्रयमहाकाव्ये प्रयोगः "रजतं चारु ईक्षित्वा हारि अन च काञ्चनम् । दधियेतन्मधुवेतत्कुमारी एवमूहते" ॥ १ ॥ सिद्धान्तस्तवेऽपि-"ज्ञातैर्मृगापुनसुबाहुवादिभिः” इत्यादि । दद्ध्यनेत्यत्र "ततोऽस्या" [सि० - * - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरसन्धिरसन्धिश्च ६७ १।३।३४ ] ततो ब्वर्जवर्गात्परस्या अस्या अन्तस्थाया द्वे रूपे स्यातामिति यकारस्य द्वित्वं वा । केपाश्चिन्मते संयुक्तव्यञ्जने परेऽपि द्वित्वमिति पुनर्द्धस्य द्वित्वे विधं रूपं एवं च एकधं एकयं १ एकधं द्वियं २ द्विधं एकयं ३ द्विधं द्वियं ४ विधं एकयं ५ त्रिधं द्वियं ६ यागमे दधि यत्रेति रूपं ७ "न सन्धिः” इति असन्धी दधि अनेति ८ अइउवर्णस्येति इकारस्य सानुनासिकत्वे दधि अत्रेति एवं नवरूपाणि एकतानि, अत्रेत्यत्र तद्वित्वे द्वितानि नव । पुनस्तद्वित्वे त्रितानि नव । एवं सप्तविंशतिः । अन्तस्याकारस्यानुनासि-५ कत्वे पुनः सप्तविंशतिरिति चतुःपञ्चाशत् । एवं मद्धत्रेत्यत्रापि चतुःपञ्चाशद्रूपाणि । यानि तु "धुटो धुटि खे वा” [सि० ११३१४८] व्यञ्जनात्परस्य धुटो धुटि स्वे परे लुग्वा स्यादिति विकल्पेन धकारलोपे तथा "व्यञ्जनात्पञ्चमान्तस्थायाः सरूपे वा”[सि० ११३।४७] व्यञ्जनात्परस्य पञ्चमस्या- न्तस्थायाश्च सरूपे वर्णे परे लुप् वा स्यादिति विकल्पेन यलोपे रूपाणि भवन्ति तानि तु पूर्वोक्तरूपेभ्यो रूपतो न भिद्यन्ते इति पृथक् न दर्शितानि स्वयं ज्ञेयानि । अदीर्घाद्विरामेति सूत्राप्राप्तेरिति-गौर यू १० अनेत्यत्र औकारस्य दीर्घवरत्वात् तत्र रहस्वरवर्जनाच "अदीर्घाद्विरामे०" इति सूत्रं न प्राप्नोति-रेफस्य . द्वित्वं न स्यादित्यर्थः । किं तर्हि स्यादित्याह-किन्विति ॥ ९ ॥ सूत्रम्- हादहवरस्यानु नवा ॥ १०॥ [ सि० १।३।३१ ] स्वरात्पराभ्यां रहाभ्यां परस्य रहस्वरवर्जस्य वर्णस्याऽनु द्वित्वं वा स्यादिति यकारस्य वा द्वित्वम् । गौर्यत्र गौर्यत्र । नहि-अत्र नयत्र नह्यत्र ॥ १० ॥ १५ हा० । र च हश्च ई तस्मात् ह ५-१ "डेडस्योर्यातौ” होत् । र् च हश्च स्वरश्च ईस्वरं न हस्वरं अर्हस्वरम् "नबत्” नस्य अः अर्हस्वर ६-१ । अनु १-१ । नवा १-१ । “अव्ययस्य”। नवा इत्यखण्ड- मव्ययं वा इत्यस्यार्थे, परं यत्र वाशब्दप्रयोगस्तत्रैकस्मिन्नेव सूत्रे विकल्पः प्रवर्तते यथा “हस्खोऽपदे वा" इति सूत्रे, यत्र च नवाशब्दप्रयोगस्तत्र बहुपु सूत्रेपु विकल्पोऽनुवर्तते यथा “सौ नवेतौ” इत्यनयोर्वि- शेपः । चतुःपदमिदं सूत्रम् । स्वरात्पराभ्यां रहाभ्यामिति अदीर्घावीर्घाञ्च स्वरात्पराभ्यां रकारहकाराभ्यां २० परस्य रहस्वरवर्जस्य वर्णस्य द्वित्वं वा स्यादिति । दीर्घस्वरात्परस्य रेफस्योदाहरणं गौयंत्र २ इति, अदीर्घ- स्वरात्परस्य स्वउति २ इति । अदीर्घखरात्परस्य हकारस्योदाहरणं नय्यत्र २, दीर्घवरात्परस्य स्नेय्यत्र २ इति । रहस्वरवर्जनात् पद्मह्रदः अर्हः करः-रेफहकाराकाराणां द्वित्वं न भवति । स्वरादिति किम् ? अभ्यते। अन्विति पश्चात्कार्यान्तरेभ्यो यथा प्रोणुनाव अन्यथा पोर्नु इत्यत्र पूर्वमेव अनेन सूत्रेण नकारस्य द्वित्वे ततो "द्विर्धातुः" इति द्वित्वे प्रोणुन्नावेति स्यात् । गौयंत्रेत्यत्र यद्वित्वे १ तदभावे २ यकारागमे ३२५ "हस्खोऽपदे वा” इति हवे ४ "न सन्धिः" इत्यसन्धौ ५ इकारस्यानुनासिकत्वे च ६ पट्रपाणि एकतानि । एवं प्राग्वत् द्वितानि ६ । त्रितानि ६ । एवमष्टादश । अन्तिमस्याकारस्यानुनासिकत्वेऽध्यष्टा- दशेति पत्रिंशत् । ह्रस्वेऽकारस्याप्यनुनासिकचिन्तने पपाधिक्ये द्विचत्वारिंशत् रूपाणीति । अनेदं ज्ञेयम्-"न रात्खरे”[सि० १।३।३७ ] स्वरात्परस्य शिटः स्वरे परे द्वे रूपे न स्याताम् । दर्शनं वर्पति वृस्या इदं वाय॑म् । “पुत्रस्यादिनपुत्रादिन्याक्रोशे” [सि० १।३।३८] आदिनि पुत्रादिनि च ३० परे आक्रोशे गम्यमाने पुत्रशब्दस्थतकारस्य द्वित्वं न स्यात् । पुत्रादिनी त्वमसि पापे । पुत्रपुत्रादिनी भव । आक्रोश इति किम् ? पुत्रादिनी शिशुमारी पुत्रादिनीति वा । पुत्रपुत्रादिनी नागी पुत्रपुत्रादिनीति बा । नायमाक्रोशः किन्तु स्वभावाख्यानं तेन "अदीर्घाद्विराम०” इति विकल्प एव ।। १० ।। सूत्रम्- एदैतोऽयाय् ॥ ११॥ [सि० ११२।२३ ] एकारैकारयोः स्वरे परे अयायौ स्याताम् । ने अनं नयनम् । नै अकः नायकः ॥ ११ ॥ - - ६८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु- एदै० । एच ऐच एदैत् ६-१ "लोकात्” “सो रुः" अय् च आय् च अयाय् १-१ "दीर्घडयाव०"। मध्ये "अतोऽति रोरुः" अवर्णस्य "एदोतः पदान्तेऽस्य लुक्” एदैतोऽयायू । द्विपदं सूत्रम् । णींग् प्रापणे' णी, “पाठे धात्वादेर्णो नः" नीयतेऽनेनेति “करणाधारे” इति अनट्प्रत्यये "नामिनो गुणोऽ- हिति" इति गुणे ने अन इति स्थिते अनेन अयादेशे नयन १-१ "अतः स्यमोऽम्" "समानादमोतः" ५नयनम् । प्राग्वत् नीधातुः नयतीति "णकतृचौ” इति णक्प्रत्ययः, अक्, “नामिनोऽकलिहले;" इति युद्धौ नै अक इति स्थिते अनेन आयादेशे नायकः ॥ ११ ॥ सूत्रम्- ओदौतोऽवाव् ॥ १२ ॥ [ सि० १।२।२४ ] ओकारौकारयोः स्वरे परे अवावौ स्याताम् । लो-अनं लवनम् । लौ-अकालावकः । अपदान्तेऽ. यायवावां योः स्वरे परे लुग् वाच्या लुकि सत्यामसन्धिश्च । ते-आगतात आगताः तयागताः। १० तस्मै इदं तसा इदं तसायिदम् । पटो इह पट इह पटविह । वृक्षौ इह वृक्षा इह वृक्षाविह ॥१२॥ ओदौ ० । ओच्च औच्च ओदौत् ६-१ अव् च आव् च अवाक् १-१ "दीर्घडया०" । द्विपद० । 'लग्श छेदने लूधातुः लूयते अनेनेति “करणाधारे" इत्यनट्प्रत्ययः "नामिनो.” इति गुणे लो-अन इति स्थिते अनेन अवादेशे लवन १-१ "अतः स्यमो.” “समानादमोऽतः" । 'लूग्छ छेदने' लुनातीति "णक- तृचौ” “नामिनोऽकलिहलेः" इति वृद्धौ लौ अक इति स्थिते अनेन आव लावक १-१ “सो रुः" " १५पदान्ते." प्रसङ्गात् अयादीना कार्यविशेषमाहपदान्त इति फक्किका-पदान्तस्थानां अय् आय् अबू आव एपां चतुर्णा यकारचकारयोः स्वरे परे [खरे वा सि० ११३२४ इति सूत्रेण ] लुग् वा भवतीत्यर्थः। पक्षे "अस्पष्टाववर्णात्त्वनुनि वा” [सि० १।३।२५ ] अवर्णात्परयोर्वययोरुवर्जे खरे परे अस्पष्ठावीषत्स्पष्टतरौ चयौ वा स्याताम् । पट इह पटविह, उनि परे तु नित्यं पटवु असावु इत्यादि । पदान्त इति किम् ? नायकः इत्यत्र यलोपो न भवति ॥ १२ ॥ सूत्रम्- खरे वाऽनक्षे ॥ १३ ॥ [सि० १०२२२९] गोशब्दसम्बन्धिन ओकारसाक्षशब्दवर्जखरे परे अव इत्यकारान्त आदेशो वा स्यात् । गो ईशा गवेशः । गवीशः । इन्द्रे परे संज्ञायां च लित्यम् । गवेन्द्रः । स्वाक्षः ॥ १३ ॥ स्वरे० । स्वर ७-१ "अवर्णस्ये." । वा १-१ अव्ययम्। न अक्षः "अन् स्वरे" इति नञो अनादेशे अनक्षतस्मिन् अनक्ष ७-१ "अवर्णस्ये." । त्रिपद० । गो ६-३ गवामीश १-१ "सो रुः" "to २५ पदान्ते." "पष्ठ्ययत्नाच्छेपे" इति षष्ठीतत्पुरुषः । गो ईश इति स्थिते अनेन अव इत्यादेशे "अव- स्ये." एरवे गवेशः । पक्षे "ओदौतोऽवा" इत्यवादेशे गवीशः इति । अक्षशब्दवर्ज इति किम् गोऽक्षम् । गोशब्दसम्बन्धिन ओकारस्येति किम् ' चित्रग्यर्थः । अन अपवादमाह इन्द्रे परे संज्ञाया च नित्यमिति-["इन्द्रे" सि० ११२१३० ॥ तथा "गो न्ययोले" सि. १।२।२८ ।। इत्या भ्याम् ] अयं भावः-इन्द्रशब्दे परे गोशब्दसम्बन्धिन ओकारस्य नित्यमवादेशः, यथा गोरिन्द्र- २० भाग्यत्तत्पुरुपे विभक्तिलोपे गो इन्द्र इति स्थिते अनेन अवादेशे गवेन्द्रः । अक्षशब्दे परे च संज्ञायामेव अवादेशो भवति नान्यन, गोः अक्षीय अक्षि गोरक्षि पष्ठीतत्पुरुपे विभक्तिलोपे अक्षेर्दा "अप्राण्यङ्गे इत्यत्समासान्ते "अवर्णेऽवर्णस्य" इत्यकारलोपे गो अक्ष इति स्थिते सज्ञायां नित्यमवादेशे गवाक्ष यातायन इत्यर्थः । समायामिति किम् ' गोऽक्षाणि इत्यत्र "एदोतः पदान्तेऽस्य लुक्" इत्यकारलुक्॥१३॥ ३४अयादेशस्त्र अवादेशस्य च अपवादमाह-सूनम्- ૨૦ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे असन्धिप्रकरणम् ६९ एदोतः पदान्तेऽस्य लुक् ॥ १४ ॥ [सि० १।२।२७ ] पदान्तस्थाभ्यामेदोद्भ्यां परस्याकारस लुक् स्यात् । तेऽत्र । पटोऽत्र । पदान्त इत्येव । ने-अनं नयनम् । इति महोपाध्यायश्रीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणि विरचितायां हैमलघुप्रक्रियायां स्वरसन्धिः समाप्तः । एदो० । एच ओच्च एदोन , तस्मात् एदोत्, ५-१ "सो रुः" "रः पदान्ते०” पदस्य अन्तः पदान्त- स्तस्मिन् पदान्त ७-१ "अवर्णस्ये०" अ ६-१ "टाङसोरिनस्यौ" । लुक् १-१ 'दीर्घड्या०" अनेनैव अकारलोपे एदोतः पदान्तेऽस्य लुक् । चतुःपदं सूत्रम् । * "पञ्चम्या निर्दिष्टे परस्य" पञ्चम्यानिर्दिष्टे यत्कार्य तत्परस्याव्यवहितस्य स्यात् । तद् १-३ "आवरः" "लुगस्यादेत्यऽपदे" "जस इ:" "अवर्णस्ये.” ते । इदम् ७-१ "ककुत्रानेह" इति निपातः । ते अत्र इति स्थिते अनेन अकारलोपे तेऽत्र । पटु १-१ "हस्वस्य १० गुणः" पटो अन इति स्थिते अनेन अकारलोपे पटोऽत्र । नयनमिति ने अनमिति स्थिते पदान्ताभावा- दनेन अकारलोपो न भवति ततः "एदैतोऽयाय्” इत्ययादेशः यां शिष्योऽद्भुतकीर्तिकीर्त्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः। तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ स्वोपजसत्प्रक्रिया- वृत्तौ द्राक् स्वरसन्धिरेप सुकृतः पूर्णः क्रमेणाद्भुतः ॥ १ ॥ अ था न्धि ते अथेति स्वरसन्धिकथनानन्तरं स्वरसन्धेरेव अपवादरूपोऽसन्धिः प्रकृतिभावः । सूत्रम्- प्लुतोऽनितौ ॥ १॥ [सि० ११२।३२] इतिवर्जे स्वरे परे प्लुतः सन्धिभाग् न स्यात् । चैत्र ३ अत्र न्वसि । इतौ तु सुश्लोकेति॥१॥२० प्लुतः १-१ "सोसः" न इति अनिति तस्मिन् अनिति ७-१ "डियन्त्यस्वरादेः" । द्विपदामिदं सूत्रम् । चैत्र १-१ "अदेतः स्यमोर्लक्” इति सम्बोधनसेलृक् । “दूरादामन्त्र्यस्य०” इति प्लुतसंज्ञा । प्लुतस्य त्रिमात्रत्वात् प्लुतसूचकस्त्रिकः सर्वत्र ज्ञेयः चैत्र३ । अत्र १-१ "अव्ययस्य" अनु१-१ "अव्ययस्य" 'असक् भुवि असूधातुः वर्तमानासिव "अस्तेः सिहस्त्वेति" इति सकारलुप् असि । “समानानां तेन०" इति दीर्घ प्राप्ते अनेन सूत्रेण सन्धिनिषेधो भवतीत्यर्थः । इतिवर्जनात् इतिपरे सन्धिर्भवति यथा शोभनः श्लोकः२५ कीर्तिः शोभनाः श्लोकाः पद्यानि वा यस्य स सुश्लोकस्तस्य सम्बोधनं हे सुश्लोक ३ । अग्रे "अव- र्णस्ये०" इति सुश्लोकेति ॥ १ ॥ अत्र विशेपमाह । सूत्रम्--- इ ३ वा ॥२॥ [सि० ०२२३३] इ: प्लुतः सन्धि वा नैति । लुनीहि ३ इति । लुनीहीति ॥२॥ इ १-१ सूत्रत्वात् सिलोपः । वा १-१ । द्विपदामिदं सूत्रम् । 'लूगा च्छेदने' लू, पञ्चमीहि "यादेः" ३० इति ना "वादेहवः" । "एपामीर्व्यञ्जनेऽदः” इतीत्वे "सम्मत्यसूया.” इत्यादिना प्लुतत्वे लुनीहि ३ इति । पक्षे "समानानां०" दीर्घः ॥ २ ॥ सूत्रम्- । ३२ ७० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-. ईदूदेविवचनम् ॥ ३॥ [सि० १२३४] एते त्रयो द्विवचनान्ताः सन्धि नाप्नुवन्ति । मुनी इह । साधू एतौ । माले इमे । पचेते इति ॥३॥ ईदू० । ईच ऊच एच ईदूदेत् १-१, "अनतो लुप्" द्वावों वत्तीति द्विवचनं रस्यादिभ्यः कर्तरि" इति अनट्प्रत्ययः १-१ "अतः स्यमोऽम्" । द्विपदमिदं सूत्रम् । मुनी १-२ "इदुतोऽरीदूत्” मुनी इह। ५साधु १-२ "इदुतो", साधू एतौ । माला १-२ "औता" माले इमे । 'डुपचीप् पाके' पच् वर्त्त- मानाआते "कर्तर्यनद्भयः श” अ. "आतामाते आथामाथे आदिः” इ, पचेते इति । *"विशेषणमन्तः॥ अभेदेनोक्तोऽवयवो विशेपणं तद् विशेष्यस्य समुदायस्यान्तः स्यात् । ततो द्विवचनान्तमीदूदेत् सन्धि न प्रामोतीति ईदूदेतो विशेष्यत्वे द्विवचनस्य विशेपणत्वे माले इत्यत्र प्राप्नोति न तु पचेते इत्यन, ईदू- देदन्तं द्विवचनं सन्धि न प्राप्नोतीति द्विवचनस्य विशेष्यत्वे ईदूदेतो विशेपणत्वे पचेते इत्यत्र प्राप्नोति न १० तु माले इत्यन, उभयोर्विशेषणत्वे समुदायस्य विशेष्यत्वे न कोऽपि दोप इत्याह-ई ऊ ए इत्येवमन्तं द्विव- चनान्तमिति । नन्वेवं कुमार्योरगारं कुमार्यगारमित्यत्राप्यसन्धिः प्राप्नोति कुमारी इत्यस्य ईदाद्यन्तत्वात्प्र- सयलक्षणेन द्विवचनान्तत्वाच मैवम् अत्र सन्ध्यधिकारे प्रत्ययलक्षणानाश्रयणात् । भाष्येऽप्येवमयं पक्षः समर्थितोऽस्तीति ज्ञेयम् । द्विवचनान्तमिति स्यादित्यादिविभक्तिद्विवचनान्तमिति ज्ञेयम् । यत्तु केचित् "मणीयोष्ट्रस्य लम्बेते [प्रियौ वत्सतरौ मम"] इत्यादिप्रयोगदर्शनान्मणीवादिगणवर्जमसन्धिरिति वदन्तो १५मणीव, दम्पतीव, रोदसीवेत्यादिपु सन्धि मन्यन्ते तदपरे न सहन्ते, "मणी इवोद्भिन्नमनोहरत्रिपा" इति दर्शनात्पूर्वोक्तप्रयोगस्य च पशब्देनैयोपमार्थेन सिद्धत्वाच । यत्तु नैपधीये "स्फुटोत्पलाभ्यामलिदम्पतीव तद् विलोचनाभ्यां कुचकुड्मलाशया । निपत्य चिन्दू हृदि कजलाविलौ मणीव नीलो तरलौ विरे- जतुः ॥ १ ॥” इति । तत्रापि पशब्द एवौपम्ये । तथोक्तमनेकार्थे-"वः पश्चिमदिगीशे स्यादीपम्ये पुनरव्ययम्" इति । प्रयोगेऽपि "शानवं व पपुर्यशः" इति कालिदासः । अन्यत्रापि "कादम्बसण्डित- २० दलानि च पङ्गजानि" इत्यादि ॥ ३ ॥ सूनम्- अदो मुमी ॥ ४ ॥[सि० ११२॥३५ ] अदम्मम्बन्धिनौ मुमी सन्धि नाप्नुतः । अमुमु ईचा । अमी अश्वाः ॥४॥ अदो० । मुश्च मीश्च मुमी अदसो मुमी अदो मुभी १-२ सूनस्यात् औलोपः । एकपदमिदं सूत्रम् । अदस् १-१ 'अधू गतो च' अधातुः अमुमश्चति इति किप "अञ्चोऽन याम्” इति नलोपे अदस् २५अय् इति स्थिते "सर्वादिविष्वग्देवाडूडदिःच्यचौ" (३।२।१२२) चिन्तेऽश्वी परे एथ्यो टद्रिः म्यादिति अदस्परो डदिः प्रत्ययः । "अप्रयोगीत्" किप्लोपः "डित्यन्यस्वरादेः" इति अचूलोपे अददि अच् इति स्थिते । “वाद्री” ( १९४६) अदसोऽद्रायन्ते दोम्या म्यान् । तन मतचतुष्टयं गधाहुः-"परतः पेचिदिच्छन्ति पेचिदिच्छन्ति पूर्वतः । उभयोः केचिदिच्छन्ति केचिदिच्छन्ति गोभयोः" ||| इति द्वितीयदवारम्य गत्वे * "मादुवर्णोऽनु” (१६४७) अदसो मः परम्य वर्णम्य उवर्णः ३० स्याहीरपारम्प रत्वे अदमुइ अच् इति स्थिते "इवर्णाद." इकारम्य यत्वे अदमुयच् इति जाते १-१ "अचः" गुमागमः "पदम्य' इति लोपे "युनश्चनुचो नोः" इति नपारम्प डसारः ततः अदमुयडू इति मिदं पूर्वदयारम्य मत्य तत्सम्बन्धिनः अरारम्य उत्वे अमुद्य उभयोर्दवारयोर्मरचे अमुमुयह उभ- गोपि मरयामा अदना एवं सर्वत्र रूपचतुप्रय भवति । ततश्च अदगु इ अच् ३.१ आ इति स्थिते "अल् प्रादपत्र" (११।१०४ ) ति मूत्रेण शमादौ स्वरे परे अचभ इत्यादेशः पूर्वम्यरम्य घ दीर्घः ...... uisit धातुम्पं सात् । अदमु ईचा १ अमुदीरा २ अनुमु ईचा ३ अदीया ४ ।

र प्रक्रियाबृचिन श्रीहनकाशे असन्त्रिकरण अत्र प्रथमतृतीयरूपयोः "वर्णादरः" इति वत्वे प्राने अनेन असन्धिः स्यान्। अदन् १-३ "आवर' न अ "लुगस्यादेत्यऽपदे" "लोकान्" इत्यकारयोगे अद इति जाते "मोऽवर्णन्य' इति वन्य मः अमति जाते "जस इ." "अवर्णस्ये." अमे इति जाते "बहुप्रीः" एकारल ई: अनी अन्याः १-६ "अन आः स्था" अनेन असन्धिः ॥ ४ ॥ सूत्रम्---- चादिः खरोऽनाङ् ॥ ५॥ [सि० ११२॥३६] आवर्जश्वादिः स्वरः सन्धि नैति । अ अपेहि । इ इन्द्रं पश्य । उ उत्तिष्ठ । आ एवम् मन्यसे । अनाङिति किम् ? आ इहि एहि ॥ ५ ॥ चादि । च आदिस्य स चादि १-१ "सोनः" "रः पदान्ते", स्वर १-१ "सोन:":. न आ अनाङ्, अनाङ् १-१ "दीर्घया." "अतोऽति रोलः" "एदोतः पदान्तेऽन्य लुक' । त्रिपद- मिदं सूत्रम् । स्वराश्चादिष्वव्ययेषु पञ्यन्ते । अ १-१ "अव्ययस्य अपपूर्वक 'इणक गी' पद्धनी-१० हि अपेहि अत्रानेन असन्धिः । इ १-१ "अव्ययन्त्र' इन्द्र २-१ "समानादमोऽनः" दन्नं यं प्रेक्षणे "श्रीतीत्यादिना” दृशः पश्यादेशः "अतः प्रत्ययालुक् हिलुप् पश्य । : १-१ "व्ययन्य" उनपूर्वक 'टा गतिनिवृत्ती टाधातुः "पः सोष्टय" पः सः, निमित्ताभावे नमिनिकन्यायभाव अनि ठस्य यः स्था पञ्चमीहि श्रोतीत्यादिना तिष्टायाः "अतः प्रत्यः” उत्तिष्ट । अ इति निभलने यया अ अपेहि दूरीभव । इ इति सम्बोधन विस्मये वा । उ इति सन्बोधने रोपोनी वा । आ एवम १.१ १५ "अव्ययस्य" 'बुधिं मनिंच ज्ञाने' मन, वर्तमाना "दिवादः श्यः" मन्यन्ने । आवर्जनात आर: सन्धिः स्यात् , आङ् 'इएक गी' पञ्चमीहि "अवर्णस्ये." एहि । उक्तं च "पदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिनिधी च यः। एतमातं हितं विद्याद्वाक्यत्मरणयोरहिन् ॥ १ ॥ क्रमेगोदाहरणानि आईपन् उत्तमः ओनमः, क्रियायोगे आ ईक्षसे एक्षसे । आ अमृतान आमृतं मोक्षं नयादीहत्य । आ इन्दनः पन्दनः इन्द्रम- भिव्याप्येत्यर्थः । आ इति आक्षेपे, आ एवं फिल मन्यसे इति वाक्य, आ एवं जिनवानमिति सरले. अनयोरर्थयोरडित् अत्र सन्धिन भवति । मयांदा र अभिविधिध नरिमन मर्यादाभिषियाविन्यत्र न. सकत्वेऽपि लिङ्गानुशासनमनित्यमिति न नोऽन्तः ॥ ५ ॥ सूत्रम् ओदन्तः ॥ ६॥ [सि० ११२।३७] -- . ७२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-. सौ नवेतौ ॥ ७॥ [सि० १२२।३८], सिनिमित्त ओकार इतौ परे सन्धि वा नैति । पटो-इति पटविति ४ ॥७॥ सौ न । सि ७-१ डिडौं" "डियन्यस्वरादेः" सौ । नवा १-१ "अव्ययस्य" । इति ७-१ "डिडौँ” "डित्यन्त्य." "अवर्णस्ये.” सौ नवेतौ । त्रिपदमिदं सूनम् । "आमन्ये” इति सूत्रेण प्रथमै- ५क्वचनं सिः । पटु १-१ "हस्वस्य गुणः” पटो इति अनेन असन्धिः, पक्षे "ओदौतोऽवाव्" इत्यवा- देशे पटविति, पक्षेऽस्पष्टो वकारः, पक्षे पदान्तेऽयायवानाम् इति वकारलोपे पट इति। रूपचतुष्टयसूच- क्श्चतुकः ॥ ७ ॥ सूत्रम् वाऽत्यसन्धिः ॥ ८॥ [सि० ११२१३१] गोरोकारस्याति परेऽसन्धिर्वा स्यात् । गो अग्रम् गवाग्रम् गोऽयम् ॥ ८॥ वाऽत्य० । वा १-१ "अव्ययस्य" । अत् ७-१ अति । न सन्धिः असन्धिः १.१ "सो रुः" "र: पदान्ते." "समानानां." "इवर्णादे०" । निपदमिदं सूत्रम् । गोरग्रम् “पष्ट्ययनाच्छेपे” इति पष्ठी.. तत्पुरुपे गो अग्र, पक्षे "स्वरे वाऽनक्षे” इति विकल्पेन अवादेशः गवामम् , पक्षे "एदोतः पदान्तेऽस्य लुरु" इति विकल्पद्वये त्रैरूप्यम् ॥ ८॥ सूत्रम्- ऋलुति हुखो वा ॥ ९॥ [सि० ११२१२] १५ ऋति लति च परे समानानां हसो वा स्यात् । हेखविधानसामर्थ्यादसन्धिः । इदमेव हख- सापि हसविधाने फलम् । पाल ऋश्यः । यालयः ॥९॥ ऋश्च लश्च ऋलस्तस्मिन् ऋलत् ७-१ । ह्रस्व १.१ "सो रुः" । वा १-१ "अव्ययस्य"। "घोप- वति" "अवर्णस्ये." फलति ह्रस्वो वा। त्रिपदमिद सूत्रम् । हस्खविधानसामादिति-यदि हवं कृत्वापि सन्धिकरणमिष्टं स्यात्तदा हवं किमर्थ कुर्यादिति हस्ते कृते सन्धिर्न स्यादित्यर्थः । वालाया ऋश्यः वाल- २०ऋश्य इति स्थिते अनेन हवे असन्धौ च बाल श्यः, पक्षे "अवर्णस्ये०” बालयः । एवं बालस्य ऋश्य इत्यन अनेन ह्रस्वस्यापि हस्वः, तत्फलं च असन्धिरेष । ऋश्यो मृगविशेषः ॥ ९ ॥ सूत्रम्-- हस्खोऽपदे वा ॥ १० ॥ [सि० ११२।२२ ] है उ मल. वर्णानामस्खे स्वरे परे हसो वा सात् । न चेत्ती निमित्चनिमित्तिनाचेकापदे साताम् । नदि एपा । मधु अत्र । एकपदे तु नद्यौ । * अ इ उ वर्णानां विरामेऽनुनासिको वा •२५माम साम । दर्षि दधि ॥१०॥ इति महोपाध्याय धीमीति विनयगनिशिष्योपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिताया हैमलघुप्रक्रियाया असन्धि समाप्त । इस्लो० । हस्त १-१ "सो रुः" न पद अपदं तम्मिन् अपद ७-१ "अवर्णस्ये." | "अतोऽति. रोशः" "अवर्णस्ये." "एदोतः पदान्ते." वा १-१ "अव्ययस्य" । विपदमिदं सूनम । नदी एपा इति स्थिते अनेन इसे असन्धौ च नदि एषा । नदी १-२ औ अन एक्पदत्यात् असन्धिर्न स्वात् ततः ३. "इयांदर." नपा । *अ इ उवर्णानामिति अनेटमनुमन्धेयम् [अ इ उ वर्णस्यान्तेऽनुनासिकोड- नीदादेः सि. ११४१ इति सूत्रम ] "ईदेहियचनम' इत्यादिसूत्रोचानामेपामनुनासियो न म्यापया अभी अमी रिमु ।। १० ।।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनसन्धिः यां शिष्योऽद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहमणे राजनीतनयो व्यवत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः। तस्यां शासितसाधुशब्दसरणी खोपनसत्प्रक्रिया- वृत्तौ क्षिप्रमसन्धिरेष सुखकृत्पूर्णः प्रवीणप्रियः ॥ १ ॥ M अ न न्धिः . अथेति-असन्धिकथनानन्तरं व्यञ्जनानां सन्धिः कथ्यते इति शेपः । वाक्-मह इति स्थिते धुटस्तृतीयः॥१॥ [सि० २।१।७६ ] पदान्ते धुटां स्वस्तृतीयः स्यात् । वाग् मह इति भवति ॥ १ ॥ धुट० । धुट ६-१ "लोकात्" "सो तः” र् । त्रयाणां सङ्ख्यापूरणः "वेस्तु च" इति तीयप्रत्यये १० निशब्दस्य त आदेशे च तृतीय १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते०", "चटते सद्वितीये" इति रेफल्य सः। द्विपदमिदं सूत्रम् । ककारस्य स्वस्तृतीयो गकार इति गकारो भवति ॥ १ ॥ वान्मह इति जाते कार्या- न्तरमाह-सूत्रम्- तृतीयस्य पञ्चमे ॥२॥ [सि० ११३।१] वेति पदान्त इति अनुनासिक इति चानुवर्तते । एवमन्यत्राप्यपेक्षितं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनी-१५ चम् । पदान्तस्थस्य वर्गठतीयस्य पञ्चमे परे स्वः पञ्चमो वा स्यात् । वामहः वाग्महः ॥ २ ॥ तृतीय ६-१ "टाङसोरिनत्यौ । पञ्चम ७-१ "अवर्णस्ये०" । द्विपदामिदं सूत्रम् । वेतीत्यादि-"सी नवेती" इति सूत्रात् वा इत्यनुवर्त्तते, "एदोतः पदान्तेऽल लुक्" इति सूत्रान् पदान्ते इत्यनुवर्तते, "विरामेऽनुनासिको वा" इत्यतोऽनुनासिक इत्यनुवर्तते । एवमन्यत्रापीति-चत्र यस्य पदस्यानुवर्नने एवं कार्यसिद्धिर्नान्यथा तत्र तत्पदमपेक्षितम् । अनुनासिकान्देन चात्र खन्यवर्गम्य पथम एव लभ्यते २० तथैव स्पष्टत्वाय फलितमयं व्याचप्टे-स्वः पञ्चम इति । एवं वान् टवते वास्यते, वाग् बकारः वार- बकारः, ककुद मण्डलं ककुम्मण्डलम् ।। २ ।। अत्र विशेषसूत्रम् । प्रत्यये च ॥३॥ [सि० ११३।२] प्रत्ययस्ये पञ्चमे परे च नित्यम् । बाग्मयं वाच्चयम् ।। ३ ।। प्रत्यय ७-१ "अवर्णस्ये " । च १-१ "अभ्ययन्य" । हिपदमिदं नवम् । प्रत्यक्ष पदमे च परे२, निन्यं सः पत्रमः न्यादिति शेषः । चकार उत्तरत्र विकल्यानुत्यर्थः । पान १-३ यानां वितर: एफसरान्मयट्" इति वारयम् । एवं "प्रायोऽनोयसट मात्रट्" यति मात्र त्यचे यावन्मानं बार- न्माननिन्यादि ।। ३ ।। सूत्रम् । ततो हश्चतुर्थः ॥ ४ ॥ [सि० १।३।३ ] पदान्नम्यानृतीपात्परम्प हस पूर्ववतीयसवर्गधयों या सान् । वाचरिः बार रिः । सन हितम् तद्धितम् तद् हितम् ।। ४ ।।

महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- ककुब् हासः ।। ४ ॥ सूत्रम्---- नोऽप्रशानोऽनुस्खारानुनासिकौ च पूर्वस्याऽधुट्परे ॥५॥ [सि० ११३८] १० " ततो० । तद् ५.१ तस्मात्ततः "किमब्यादिसर्वाद्यवैपुल्यबहोः पित्तस्” इति तस्प्रत्ययः, "ऐकाय" इति पञ्चम्या लुप् "आढेर:" "लुगस्यादेत्यऽपदे" ततस् १-१ "अव्ययस्य" सिलुप् "सोरुः"। हः ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । चतुर्गा सहयापूरणः "चतुरः” इति सूत्रेण थट्प्रत्ययः चतुर्थ १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते०" । "घोषवति" "अवर्णस्य." "चटते सद्वितीये"। "ततो हश्चतुर्थः" । निपदमिदं सूनम् । वाच् ७-१ वाचि हरिः सिंहः "सेंहाद्यैः पूजायाम्" इति सप्तमीतत्पुरुपे याच हरिः इति स्थिते "चजः कगम्" इति चस्य कत्वे "धुटस्तृतीयः" इति कस्य गत्वे अनेन हस्य घः वाग्धरिः, वाग्हरिः। एव च अच् हलो अज्झलौ, षट् हलानि षड्ढलानि, तद् हितं तद्धितम्, ककुप हासः ककुब्भासः पदान्तस्थस्य प्रशान्वर्जशब्दसम्बन्धिनो नस्य चटतेषु सद्वितीयेष्वधुट्परेषु शपसा यथासङ्खयं स्युः । अनुस्वारानुनासिकौ च पूर्वस्य । भवांश्वारु: भवाँश्वारुः । भवांश्छेका भवॉश्छेकः । भवां- पदान्तम्पस्स नसशे परे च या सान् । मनाथ शूरः भवाम् शूरः । अथ इत्येव- पर भवाँटकः । भवांटकारः भवाँष्ठकारः । भवांस्तनुः भवॉस्तनुः । भवांस्थुडति भवाँस्थुडति । प्रशान्वर्जनात् प्रशाञ्चरः । अधुडिति किम् ? भवान् त्सरुकः ॥ ५ ॥ नोऽप्र० । न ६-१ न प्रशान् अप्रशान् तस्य अप्रशान् ६-१, उभयन "लोकात्" । "सो रुः" अनु. १५स्वारश्च अनुनासिकश्च अनुस्वारानुनासिक १-२ "ओदौ०"। च १-१ "अव्ययः । पूर्व ६-१ "टाडसो. रिनस्यौ" । उभयन "अतोऽति." "अवर्णस्ये.” "एदोतः ।धुट् परो यस्मात् स धुट्परः न धुत्परः अधुट्परः तस्मिन् अधुट्पर ७-१ "अवर्णस्ये." "समानाना. । पट्पदमिदं सूनम् । भवान् चाहः इति स्थित नकारस्य शः पूर्वस्य अनुस्यारागमोऽनुनासिकादेशश्च एवं सर्वन । छेको विदग्धः । 'टकुण्वन्धने टड्कयतीति टङ्कः । ठकारः शून्यः । तनुः कृशः। 'स्थुडन् सवरणे' स्थुड वर्तमानातिय "तुदादेः शः" २० स्थुडति । प्रपूर्वकः 'शमूदमूच उपशमे' प्रशाम्यतीति प्रशान् कि "अहन्पञ्चमस्य." दीर्घः "मो नोम्योच" इति मकारस्य नकारः। प्रशान् चर इत्यत्र प्रशान्वर्जनानकारस्य शकारो न भवति, वतः "तवर्गस्य श्ववर्ग." इति नस्य नः प्रशाञ्चरः । त्सरुः खद्गमुष्टिः । त्सरौ कुशलः सरुकः "कोऽश्मादेः" इति कप्रत्ययः। अन तकारस्य धुट्परत्वात् पूर्वोक्त कार्य न स्यादित्यर्थः ॥ ५ ॥ सूत्रम्- द्विः कानः कानि सः ॥ ६॥ [ सि० ११३।११] २५ द्विरुक्तस कानः कानि परे सः स्यात् । अनुस्खारानुनासिकौ च पूर्वस्य । कांस्कान् । काँस्फान् । द्विः । द्वौ वारी "द्वित्रिचतुरः सुच्" क्रियाविशेषणमिदम् "अनतो लुप्" । कान् ६.१ "लोकात्" "सो रु" "र: पदान्ते ! कान् ७-१ । सः १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते. । चतुःपदमिदं सूत्रम् । फान इति * "पष्टयान्त्यस्य" पष्टया निर्दिष्टे यत्कार्य तदन्त्यस्य स्यादिति नकारस सत्वं मयति । किम् २.३ "किमः कस्खसादी च" "शसोऽता.” "चीप्सायाम्" इति द्वित्वं पान् कान्, अनेन ३० मस्य सः, अनुस्वारानुनासिको प पूर्यस्य । सविधानात् सो हर्न भवति । द्विरिति किम् ? कान् कान् परपति पत्र प्रथमः प्रमे द्वितीयस्तु क्षेपे ।। ६ ।। नः शि ञ् ॥७॥ [सि० ११३।१९] + .. समजा पोवति ।।७।।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनसन्धिः न ६-१ "लोकात्" "सोरुः" "र: पदान्ते.”श ७-१ "लोकात्" । व् १-१ । त्रिपदमिदं सूत्रम् । भवान् शूर इत्यत्र नकारस्य यू आदेशे भवाञ्च् शूरः । अश्च इत्येवेति--सूत्रान्तरात् ["ः सः त्सोऽश्चः" सि० ११३।१८ इत्यस्मात् ] अञ्च इत्यनुवर्त्तनीयं तस्य चायमर्थः-थावयवे झकारे परे ञ्चादेशो न स्यात्ततः "तवर्गस्य श्ववर्ग०" इति वत्वे भवाम् न्योतति इति ॥ ७ ॥ अत्र कार्यान्तरमाह-सूत्रम् प्रथमादधुटि शश्छः ॥८॥[सि० १३१४ ] पदान्तस्थात्प्रथमात्परस शसाऽधुटि परे छो वा स्यात् । भवाञ्छूरः भवाञ्च् शूरः इति विकल्पद्वये त्रैरूप्यम् । अधुटीति किम् ? वाक थ्योतति ॥ ८ ॥ प्रथ० । प्रथम ५-१ "डेडस्यो०” न धुट् अधुट् तस्मिन् अधुट ४.१ "लोकात्” । श् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "चटते सद्वितीये” इति रस्य शः । छ १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते." "धुटस्तृतीयः” । प्रथमादधुटि शश्छः । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । अनेन शस्य छत्वे भवाञ्च छुरः । पक्षे भवाञ्च् शूरः । १० उभयाभावे "तवर्ग०” इति नस्य बत्वे भवाञ् शूरः । त्रैरूप्यमिति अनेन प्रकारेण यत्र कापि विकल्पद्वयं भवति तत्र रूपत्रयं भवतीत्यर्थः । नत्वत्र रूपत्रयमेव तथाहि बादेशे रूपमेकं १ ततः "शिट्याचस्य द्वितीयो वा" [सि० १॥ ३२५९] प्रथमस्य शिटि परे द्वितीयो वा स्यादिति चस्य छत्वे रूपमेकम् , एवमेते द्वे रूपे एकशकारे । ततश्च "ततः शिट" [सि० १।३।३६] प्रथमद्वितीयाभ्यां परस्य शिटो द्वे रूपे वा स्यातामिति १५ शकारस्य द्वित्वे द्विशकारे द्वे रूपे । "प्रथमादधुटि.” इति शस्य छत्वे रूपमेकं चादेशाभावे रूपमेकम् एवं पट् रूपाणि । चकारान्तादेशविधानसामर्थ्यात् ञ्चादेशे च “चजः कगम्" इति कत्वं न भवति । अधु- टीति क्रिमिति 'चुतृस्चुतस्च्युत क्षरणे' स्च्युत् "सस्य शपौ” शः, वर्तमानातिव् "कर्तर्यनन्यः शव" "लघोरुपान्त्यस्य" इति गुणे श्योतति इति । अत्र शकारस्य धुट्परत्वात् छो न भवति ॥ ८ ॥ सूत्रम् डूणोः कटावन्तौ शिटि नवा ॥ ९॥[सि० १३१७ ] पदान्ते । प्राक् शेते । प्राक् छते । प्राङ् शेते । सुगण्ट् शेते । सुगण्टु छन् । सुगण शेते । ङ् च ण च णौ तयोः ण ६-२ ओस् "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." । कञ्च टश्च कटौ कट १.२ "ऐदौ०" 1 अन्त १-२ “ऐदौ०" । "ओदौतो."। शिट् ७-१ । नवा १-१ "अव्ययस्य"। पञ्च- पदमिदं सूत्रम् । अत्र लाघवाय अपेक्षितं वृत्त्यंशमाह-पदान्ते इति, ततश्च सूत्रेण सह योगेऽर्थव्यक्तिर्भ- वति । तथाहि-पदान्तस्थयोः णोः शिटि परे कटावन्तौ वा स्यातामिति उकारस्य कोऽन्तः, णकारस्य च २५ टोऽन्तः । नवेत्यखण्डमव्ययं वार्थे । प्रपू० 'अञ्बू गतौ च' प्राञ्चतीति प्रान् विप् “अञ्चोऽनायाम्” इति नेलोपः "अप्रयोगीत्" विप्लोपः "अचः" इति स्वरात्परो नोऽन्तः "दीर्घड्या०" सिलोपः "पदस्य" च्लोपः "युजञ्चक्रुञ्चो नो ङः" प्राइ । 'शी स्वप्ने वर्तमानाते "शीङ ए: शिति' शेते अनेन कोऽन्तः ततस्रूप्यम् , प्राच्या शेते इत्यर्थः । सुपूर्वकः गणण् सङ्ख्याने' गण चुरादिणिच् “व्य- त्यस्वरादेः" इति णस्य अलोपः सुष्टु गणयतीति कि "अप्रयोगीत्” विप्लोपः सुगण् १-१ “दीर्घ-३० डया०", शेते प्राग्वत् , अनेन टोऽन्तः ततखैरूप्यम् । उभयत्र प्राग्वत् पाप्यमपि ॥ ९ ॥ सूत्रम् तो मुमो व्यञ्जने खौ ॥ १०॥ [सि० ११३१४] मु इत्यागमस्य पदान्तस्थस्य च मस्य व्यञ्जने परे तस्यैव स्वावनुस्वारानुनासिको साताम् । चंक्रम्यते चक्रम्यते । त्वम् चारुः त्वं चारुः त्वञ्चारुः । त्वं टकः त्वण्टकः १ । क्रयः कय्यः। पुरो ३४ २० , ७७ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनसन्धिः अनाङ्माङो दीर्घाद्वा छः ॥ १४॥ [लि० १॥३॥२८] दीर्घाद् दीर्घस्थानीयाच प्लुतात् स्वरात्परश्छो द्विर्वा स्यात् । कन्याच्छत्रं कन्याछत्रम् । मुने ३ च्छत्रं मुने ३ छत्रम् । ॐ आङ्माभ्यां तु नित्यम् । आच्छाया । माच्छिदत् ॥ १४ ॥ अना० । आङ् च माङ् च आङ्माङ् न आङ्माङ् अनाङ्माङ् तस्मात् अनाङ्माङ् ५-१ "लोकात्" "सो रुः" "अन् स्वरे" । दीर्घ ५.१ "डेङस्योर्यातौ” दीर्घात् । वा १-१ "अव्यय०" छ्५ ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते०" । "घोपवति" "अवर्णस्ये" "धुटस्तृतीयः" । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । 'दीर्घस्थानीयाच प्लुतादिति "प्लुताद्वा” [सि० १।३।२९] इति सूत्रस्यार्थः सङ्गृहीतः । मुने ३, "दूरादामन्यस्य” इति प्लुतः । सूत्रे अनाङ्माङ् इति यदुक्तं तस्य सूत्रावयवस्य तात्पर्य लाघवार्थ व्यावृत्तिमुखेनैवाह-आङ्माङ्भ्यां तु नित्यमिति-आङ्माङ्मयां तु परस्य छस्य नित्यं द्वित्वं स्यादि- त्यर्थः । यथा आ ईषत् छाया १-१ "खरेभ्यः” इति सिद्धं नियं द्वित्वम् , माङ्पूर्वकः 'छिपी द्वैधीक-१० रणे' छिद् अद्यतनीदि "ऋदिच्छिस्तम्भू.” इति अप्रत्ययः "स्वरेभ्यः" इति छस्य द्वित्वं "अघोपे." छस्य चः "विरामे वा" दस्य तः "अधातोरादिस्तन्यां चामाङग” इति माङ्योगे अडागमाभावः, माच्छिदत् ॥ १४ ॥ सूत्रम्- तवर्गस्य श्चवर्गष्टवर्गाभ्यां योगे चटवौ ॥ १५॥ [सि० १।३।६० ] तवर्गस्य शचवर्गयोगे चवर्गः पटवर्गयोगे टवर्गः स्यात् । तत् शास्त्रं तच् शास्त्रम् । तत् चारु, १५ तचारु । पिप् तं पिष्टम् । तत् टकारः, तट्टकारः । ईट ते ईट्टे ॥ १५ ॥ तवर्ग० । तवर्ग ६-१ "टाङसोरिनस्यौ” तवर्गस्य । श च चवर्गश्च श्ववर्ग । प च टवर्गश्च टवर्ग, श्चंवर्ग टवर्ग च श्चवर्गष्टवर्गे ताभ्यां श्चवर्गप्टवर्गाभ्यां ३-२ "अत आः स्यादौ०" । योग ७-१ "अव- र्णस्ये." चश्च टश्च चटौ चटयोर्वगौ १-२ "ऐदौत्सन्ध्य०" । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । तद् १-१ "अनतो लुप्" "अघोपे प्रथमोऽशिटः” इति तत् , शास्त्रम् १-१ अनेन तवर्गस्य चवर्गत्वं तत्रापि तकारस्य प्रथम-२० श्वकारो यथासङ्ख्यन्यायात् । एवं स्वामिञ् जयेति तवर्गपञ्चमस्य नस्य चवर्गपञ्चमो नः । अनेन वर्गग्र- हणप्रयोजनं दर्शितम् । योगश्चात्र पूर्वतः परतो वा सम्बन्धः । तत्र पूर्वतः सम्बन्धं दर्शयति पिप्लंपी सञ्चूर्णने' पिष् पिष्यते स्म "क्तक्तवतू". अनेन क्तप्रत्यये पिप् त इति स्थिते अनेन तवर्गस्य स्वर्गत्वं पिष्टम् । तत् टकार इति स्थिते अनेन टवर्गत्वम् । 'ईडिक स्तुतौ ईड् ते अनेन तस्य टत्वं "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति डस्य टः ॥ १५ ॥ सूत्रम् सस्य शषौ ॥ १६ ॥ [सि० १३६१] सकारस्य शचवर्गाभ्यां योगे शः पटवर्गाभ्यां च योगे पः स्यात् । वृस् चति वृश्चति । दोस् पु दोष्षु । पदान्तापदान्तयोरयं विधिः ॥ १६ ॥ सस्य० । स ६.१ "टाङसो०”. शश्च पश्च शपौ। द्विपदमिदं सूत्रम् । 'ओव्रस्चौत् छेदने प्रस्च वर्तमाना तिव् "तुदादेः शः" "ग्रहबश्व०" इति रकारस्य ऋकार वृस्च ति इति स्थिते अनेन सस्य शः । दोस्३० ७-३ सुप् “नामसिदय्व्यञ्जने" इति पदसंज्ञा "सो रुः” सस्य रः "शपसे०" रस्य सः। "नाम्यन्तस्था" इति सूत्रे शिड्नान्तरेऽपीति वचनात् सकारस्य व्यवधानेऽपि सस्य पत्वे दोस् पु इति स्थिते अनेन सस्य प: । "तवर्गस्य श्चवर्ग" इति "सस्य शपो" इति सूत्रद्वयोको विधिः पदान्तेऽपि अपदान्तेऽपि भवतीति ज्ञेयम् ॥ १६ ॥ सूत्रम् ३४ " महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- व्यञ्जनाभावे तु नानुसार:-त्वम् । सम्राट् इति तु ["सम्राट' सि० ११३३१६ इत्यनेन सूत्रेण ] निपातः॥१०॥ तौमु० । तद् १-२ "आढेरः" "लुगस्या." "लोकात्" तौ । मुश्च म् च मुम् तस्य मुम् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । व्यञ्जन ७-१ "अवर्णस्ये. ख १-२ "ऐदौरसं०” । मु इत्यागमस्येति तस्य च ५उदाहरणं यथा 'क्रम पादविक्षेपे क्रम्धातुः कुटिलं क्राम्यति “गत्यर्थात् कुटिले य" "सन्यङश्च" फ्रक इति द्वित्वं "व्यञ्जनस्थानादेर्लुक्रकारस्य लुप् 'कश्चन्' इति कस्य च: "मुरतोऽनुनासिकस्य" इति पूर्वस्य मुरन्तः तस्य चानुस्वारः चंक्रम्यते । स्व इति च अनुनासिकस्यैव विशेषणं नत्वनुस्वारस्य असम्भवात् । ततश्च पक्षे स्वोऽनुनासिको भवति चक्रम्यते । युष्मद् १-१ "त्वमहं सिना प्राक्चाका" त्वम् चारुः ततो यथाक्रममनुस्वारानुनासिकौ । कमित्यव्ययं सुखादिपु कमस्यास्तीति कम्यः, "कशंभ्यां १० युस्तियतुतवभम्" इति मत्वर्थीयो यप्रत्ययस्तस्य च सित्वात् "नामसिदय्" इति पदसंज्ञा। ततः क्रमेणानु- खारानुनासिकौ । एवं त्वं करोपि, त्वकरोपि । त्वं तनोपि त्वन्तनोषि । त्वं पचसि त्वम्पचसि । त्वं लोकः वल्लोकः । कंवः कॅव्वः । “मनयवलपरे है" [सि० ११३॥१५ ] एतत्सरे हकारे परे मस्स अनुस्वारानुनासिकौ क्रमेण स्याताम् । किंालयति किम्मलयति । किहुते किन्हुते । किंह्यः किम्ह्यः । किंह्वलयति किवदलयति । किंहादयते किल्हादयते ।। १० ।। सूत्रम् १५ इवान्ङणनो द्वे ॥ ११ ॥ [सि० ०३२७ ] हस्वात्परेसां पदान्तस्थानां पना खरे परे द्वित्वं स्यात् । क्रुङ्खास्ते सुगणिह लिखन्नास्ते ॥११॥ हस्ख ५-१ "डयो." आत् "समानानां" ह्रस्वात् । डच णश्च नच उणन् ६-१ "लोकात्" "सोरु" द्वि १-२ "आवरः" द इति जाते "औरी:" "अवर्णस्ये." । "धुटस्तृतीयः" "तृतीयस्य." "घोपयति" "अवर्णस्पे०" । 'कुंच गतौ कुंच क्रुश्चतीति क्रु किप् "अप्रयोगीत" किल्लोपः २० "दीर्घडया०" सिलोपः । “पदस्य" चलोपः “युजश्नकुञ्चो नोड:" क्रुङ्, 'आसिक् उपवेशने' वर्तक ते आले अनेन डकारस्य द्वित्वम् । सुगण प्राग्वत्, इह १-१ "अव्यय०" । 'लिखत् अक्षरविन्यासे' लिखतीति लिसन् "शत्रानशावेष्यति तु सस्यो" शतप्रत्ययः "ऋदुदितः" इति नोऽन्तः "पदस्य” इति मलोपः लिसन् , आस्ते प्राग्वत्, अनेन द्वित्वम् । हस्वादिति किम् ? भवानास्ते ॥ ११ ॥ सूत्रम् खरेभ्यः ॥ १२॥[सि. १६३६३०] सरात्परस छस पदान्तेऽपदान्ते च द्वित्वं स्यात् । तव छत्रं तवछत्रम् ।। १२ ।। स्वर ५-३ "एदहुस्भोसि' एवं 'सो " "र: पदान्ते." । एकपदमिदं सूत्रम् । ध्याप्त्यर्थ तेन पदान्ते इति निवृत्तम् । स्वरात्परस्य छस्य पदान्तेऽपदान्ते च द्वे रूपे भवतः। युष्मद् ६१ "उप मम इसा' वव छत्रं बनेन छकारस्य द्वित्वे तवछत्रम् ॥ १२॥ इतिस्थिते कार्यान्तरमाह-सूत्रम् अघोष प्रथमोऽशिटः ॥ १३ ॥ [सि० ११३३५०] ३० अपोपे परे शिड्वर्जस्य घुटः स्वः प्रथमः सादित्याद्यछस्य चत्वे । ववच्छत्रम् । इच्छति ॥१३॥ अघोपे० । अघोष ७.१ । प्रथम १-१ "सो रुः" ।न शिट् अशिट् तस्य अशिद ६-१ "लोकात् "सो " ": पदान्ते." मध्ये "अतोऽति रोरुः" "अवर्णस्ये." "एदोतः पदान्ते." । विपदमिदं सूपम् । 'पन् इच्छायाम् इप यतमानातिव "तुदादेः शः" अप्रत्ययः "गमिपद्यमयः" पस्य छ। २४अनेन एस द्वित्वं प्राग्वत् इच्छति ॥ १३ ॥ अर विशेषमाह-सूत्रम् २५ बहुवचनं , ७७ अना० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनसन्धिः अनाङ्माडो दीर्घाद्वा छः ॥ १४ ॥ [लि० १॥३२८] दीर्घाद् दीर्घस्थानीयाच प्लुतात् स्वरात्परश्छो हिर्वा स्यात् । कन्याच्छनं कन्याछत्रम् । मुने ३ च्छत्रं मुने ३ छत्रम् । ॐ आइमाइभ्यां तु नित्यम् । आच्छाया । माच्छिदत् ॥ १४ ॥ । आङ् च माङ्च आङ्माङ् न आड्माङ् अनाङ्माङ् तस्मात् अनाङ्माङ् ५-१ "लोकात्" "सो रुः" "अन् स्वरें"। दीर्घ ५.१ "डेडस्योर्यातौ" दीर्घात् । वा १-१ "अव्यय०” छ५ ६-१ "लोकात्" "सो रुः” "रः पदान्ते०”। “घोपवति" "अवर्णस्ये" "धुटस्तृतीयः" । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । 'दीर्घस्थानीयाच प्लुतादिति "प्लुताद्वा" [सि० १।३।२९] इति सूत्रस्यार्थः सङ्गृहीतः । मुने ३, "दूरादामध्यस्य” इति प्लुतः । सूत्रे अनाङ्माङ् इति यदुक्तं तस्य सूत्रावयवस्य तात्पर्य लाघवार्थ व्यावृत्तिमुखेनैवाह-आङ्माभ्यां तु नियमिति-आङ्माङ्भ्यां तु परस्य छस्य नित्यं द्वित्वं स्यादि- त्यर्थः । यथा आ ईपत् छाया १-१ "स्वरेभ्यः” इति सिद्धं नित्यं द्वित्वम् , माङ्पूर्वकः 'छिद्रूपी द्वैधीक-१० रणे छिद् अद्यतनीदि "ऋदिच्छ्विस्तम्भू०" इति अप्रत्ययः "स्वरेभ्यः” इति छस्य द्वित्वं "अघोपे." छस्य च: "विरामे वा” दस्य तः "अड्धातोरादिस्तिन्यां चामाङा" इति माङ्योगे अडागमाभावः, माच्छिदत् ॥ १४ ॥ सूत्रम्- तवर्गस्य श्चवर्गष्टवर्गाभ्यां योगे चटवर्गों ॥ १५॥ [सि० ११३६०] तवर्गस शचवर्गयोगे चवर्गः पटवर्गयोगे टवर्गः स्यात् । तत् शास्त्रं तच् शास्त्रम् । तत् चारु, १५ तच्चारु । पिए तं पिष्टम् । तत् टकारः, तट्टकारः । ईट् ते ईट्टे ॥ १५ ॥ तवर्ग० । तवर्ग ६.१ "टाङसोरिनस्यौ” तवर्गस्य । श च चवर्गश्च श्ववर्ग । प च टवर्गश्च ष्टवर्ग, चंवर्ग टवर्ग च श्चवर्गष्टवर्गे ताभ्यां श्चवर्गष्टवर्गाभ्यां ३-२ "अत आः स्यादौ०" । योग ७-१ "अव- र्णस्ये चश्च टश्च चटौ चटयोर्व! १-२ "ऐदौत्सन्ध्यः” । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । तद् १-१ "अनतो लुप्" "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति तत् , शास्त्रम् १-१ अनेन तवर्गस्य चवर्गत्वं तत्रापि तकारस्य प्रथम-२० श्वकारो यथासङ्ख्यन्यायात् । एवं स्वामिञ् जयेति तवर्गपञ्चमस्य नस्य चवर्गपञ्चमो बः । अनेन वर्ग- हणप्रयोजनं दर्शितम् । योगश्चात्र पूर्वतः परतो वा सम्बन्धः । तत्र पूर्वतः सम्बन्धं दर्शयति 'पिप्लंपी सञ्चूर्णने पिष् पिष्यते स्म "क्तक्तवतू". अनेन क्तप्रत्यये पिप् त इति स्थिते अनेन तवर्गस्य स्वर्गवं पिष्टम् । तत् टकार इति स्थिते अनेन टवर्गत्वम् । 'ईडिक् स्तुतौ' ईड् ते अनेन तस्य टत्वं "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति डस्य टः ॥ १५ ॥ सूत्रम् सस्य शषौ ॥ १६॥ [सि० ११३६१] सकारस्य शचवर्गाभ्यां योगे शः पटवर्गाभ्यां च योगे पः सात् । वृस् चति वृश्वति । दोस् घु दोषु । पेदान्तापदान्तयोरयं विधिः ॥ १६ ॥ सस्य०।स ६.१ "टाङसो.".शश्च षश्च शपौ। द्विपदमिदं सूत्रम् । 'ओनस्चौत् छेदने त्रस्च वर्तमाना तिन् "तुदादेः शः" "ग्रहबश्व० " इति रकारस्य ऋकार वृस्च ति इति स्थिते अनेन सस्य शः । दोस्३० ७.३ सुप् "नामसिदय्व्यञ्जने" इति पदसंज्ञा "सोरुः" सस्य रः "शपसे०" रस्य सः। “नाम्यन्तस्था" इति सूत्रे शिड्नान्तरेऽपीति वचनात सकारस्य व्यवधानेऽपि सस्य पत्वे दोस् पु इति स्थिते अनेन सस्य पः । "तवर्गस्य श्ववर्ग' इति "सस्य शपौ” इति सूत्रद्वयोक्तो विधिः पदान्तेऽपि अपदान्तेऽपि भवतीति ज्ञेयम् ।। १६ ॥ सूत्रम् २५ ३४ .. महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- न शात् ॥ १७॥ [सि० १३१२ शात्परस तवर्गस्य चवर्गो न स्यात् । प्रश्नः ॥ १७ ॥ न १-१ "अव्ययस्य" । श ५.१ "डेडस्यो."। द्विपदमिदम् । 'प्रच्छत् ज्ञीप्सायाम् प्रच्छयति "स्वपिरक्षियतिप्रच्छो नः" इति नप्रत्ययः "अनुनासिके च छः शूट" इति छस्य शः, प्रश् नः इति , ५स्थिते "तवर्गस्य श्ववर्ग" इति प्राप्तं चवर्गत्वमनेन निपिध्यते ॥ १७ ॥ सूत्रम्- पदान्ताहवर्गादनामनगरीनवतेः ॥ १८॥ [सि० १२३२६३ ] पदान्तस्थादृवर्गात्परस तवर्गस्य टवर्गः सस्य च पो न स्यात् । पट् नयाः । पण्नयाः । पद्नु । नामनगरीनवतीनां तु सात्-पण्णाम् । षण्णगरी । पण्णवतिः ॥ १८ ॥ पदा० । पदस्यान्तः पदान्तः तस्मात् पदान्त ५.१ "डेडस्यो." टवर्ग५-१ "डेडस्यो." । नाम् च १० नगरी च नवतिश्च नामनगरीनवतिः, न विद्यते नामनगरीनवतिर्यस्मिन् स अनामनगरीनवति ६-१ "डित्यदिति” एत्वम् "एदोद्भया डसिङसो र:" "र: पदान्ते."। "तवर्गस्य श्चवर्ग." "धुटस्तृतीयः।" पदान्ताहवर्गादनाम्नगरीनवतेः । त्रिपदमिदं सूत्रम् । षट् १-३ अवयवा अस्य ' अवयवात्तयट्" पण तय इति स्थिते "धुटस्तृतीयः” इति पड् "अघोपे०” पट् , नय १.३ "अत आः स्या०" "तवर्गस्य.” इति तकारस्य टत्वं प्राप्तमनेन निपिध्यते। पण् १-३ "डति णः०," नया १-३ "अत आ:०" "धुटस्तृतीयः" इति १५पस्य डः "तृतीयस्य पश्चमे" पण नया इति । तवर्गति प्राप्त नकारस्य णत्वमनेन निपिध्यते । पप् ७.३ सु "नामसिद्" इति पदसंज्ञा "धुटस्तृतीयः" इति पस्य डा "अघोपे प्रथमो.” डस्य ट: "सस्य शपी" इति प्राप्त सकारस्य पत्वमनेन निपिध्यते । अनानगरीनवतेरिति सूत्रावयवस्य तात्पर्यतालाघवाय व्यावृत्ति- मुसैनैयाह-नामनगरीनवतीनां तु स्यादिति, तवर्गस्य टवर्गवं स्यादित्यर्थः । पप् ६-३ "सङ्ख्यानां र्णाम्" इत्यामो नाम "धुटस्तृतीयः" पस्य डः "तृतीयस्य पञ्चमे" डस्य ः "तवर्गस्य श्ववर्ग" इति नस्य णः २०पण्णाम् । पण्णां नगरी पपू नगरी इति स्थिते "धुटस्तृतीयः" "तृतीयस्य." "तवर्गस्य." पण्णगरी। पद्भिरधिका नवतिः पप् नवतिरिति स्थिते "धुटस्तृ०" "तृती." 'तवर्ग०' पण्णपतिः॥ १८॥ सूत्रम् पि तवर्गस्य ॥ १९ ॥सि० १३२६४ ] पदान्तस्यस तवर्गस्य पे परे टवर्गों न सात् । तीर्थकृत् पोडशः शान्तिः ॥१९॥ पि० । ५७.१ "लोकात्" तवर्गस्य ६.१ "टाडसो."1 द्विपदमिदं सूत्रम् । तीर्थ २-१ "समाना०, २५'दुषंग करणे झ, तीर्थ फरोतीति तीर्थकृत् किम् "हस्वस्य तः पित्कृति" इति तोऽन्तः "अप्रयोगीत्" किलोपः "दीर्घष्या०" "हस्युक्तं मृता" इति तत्पुरुषसमासः "ऐकायें" इति विभक्तिलोपः तीर्थ- फन् । पद्भिरधिका दश "एकादशपोडशपोहत्पोढापट्टा" इति पस्य उत्वे दस्य डत्वे पोडशन् इति सिसम् । पोडशानां सालापूरण: "सहयापूरणे डट' "डित्यन्यस्वरादेः" इति अन्लोपे पोडशः, तीर्थकृत् पोदशः इत्यत्र तवर्गस टबर्गमनेन निषिध्यते ।। १९ ।। सूत्रम्- लि लौ ॥ २०॥ [सि० १२३६५ ] पदान्तस्यस तवर्गस्य ले परे लो साताम् । तत्र नकारस्य सानुनासिको लः शेपाणां निरनुना- सिकः । तद् लूनं तड्नम् । मवान् लिखति, भवॉष्टिखति ॥२०॥ विमोनातिविनयगिशिरोपराप्यायधीविनयविजयगीविरचिनायो मलयप्रक्रियायां सनसन्धिः समतः । ३० . . F- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे रेफसन्धिः ७९ लि० । ल ७.१ "लोकात्" लि । ल च ल च । लौ १-२ "स्वादावसङ्ख्येयः" एकलस्य लोपः । द्वयोर्लकारयोः प्रयोजनमाह-तत्र नकारस्य सानुनासिको ल इत्यादि । तद् १-१ "अनतो लुप्" 'लग्श् छेदने लू, लूयते स्म लूनं क्लीवे क्तः "ऋल्वादेरषां तो०" इति तस्य नः । भवान् लिखति अनेन नकारस्य सानुनासिको लः । ननु नकारस्यानुनासिकत्वात् स्थान्यासन्नोऽनुनासिक एव लकारो भविष्यतीति कि लौ इत्यत्र द्विवचनेनेति ? अत्रोच्यते-अत्र द्विवचनग्रहणेन ज्ञाप्यते कचिदनुनासिकस्थाने अननुनासिकोड-५ प्यादेशो भवति यथा "वाष्टन आः स्यादौ” इत्यत्र नकारस्य स्थानेऽननुनासिक एवाकारः स्यादिति ॥२०॥ यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीतिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः। तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ स्वोपज्ञसत्प्रक्रिया- वृत्तौ व्यञ्जनसन्धिरेप सुखकृत् पूर्णः प्रतीतः सुखम् ॥ १ ॥ १० थ रे न्धिः २० अथेति व्यञ्जनसन्धिकथनानन्तरं रेफसन्धिः, उच्यते इति शेषः । कस् चारु इति स्थिते किम् १-१ "किमः कस्तसादौ च" इति किमः कादेशे कस् चारुः । अथ सन्धिमाह-सूत्रम् सो रुः ॥१॥[सि० २२११७२] पदान्ते सो रुः स्यात् । ॐउकारः स्वाभाविकरेफाझेदज्ञापनार्थ इत् ॥१॥ कर चारु इति स्थिते सो० । स् ६-१ "लोकात्" अनेनैव सूत्रेण "सो रुः" । रुः १-१ अनेनैव रुः, "रः पदान्ते." "घोषवति" "अवर्णस्ये.” । “सो रुः" । द्विपदामिदं सूत्रम् । ॐ उकार इति-स च इत्संज्ञक इति प्रयोगे नानुवर्तते ॥ १ ॥ कर चारुरित्यत्र कार्यान्तरमाह सूत्रम् चटते सद्वितीये ॥२॥[सि० १३७] पदान्तस्थस्य रस्य चटतेषु सद्वितीयेषु परेषु यथासङ्ख्यं शपसा नित्यं स्युः । कश्चारुः। निर- नुवन्धग्रहणे सामान्यग्रहणम्-प्रातश्चरति । कच्छन्नः । कप्टः । कष्ठः । कस्तः । कस्यः ॥ २ ॥ चट० । चश्च टश्च तश्च चटतं तस्मिन् चटत ७.१ "अवर्णस्ये० सह द्वितीयेन वर्तते यत् तत् सद्वितीयं "सहस्तेन" इति सहार्थवहुव्रीहिः “सहस्य सोऽन्यार्थे” इति सहस्य सः। द्वितीय ७-१ "अवर्णस्पे०" । द्विपदमिदं सूत्रम् । निरनुवन्ध इत्यादि न्यायादव द्विविधोऽपि रेफो गृह्यते तथैवो-२५ दाहरति प्रातञ्चरतीति । कस् प्राग्वत् 'छदण संवरणे "धुरादिभ्यो णिच्" छाद्यते "तक्तवतू' क्तप्रत्ययः * “णौ दान्तशान्तपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञप्तम्” दमादीनां णौ वान्तानामेते वा निपात्यन्ते इति छन्न इति सिद्धम् । कष्ट इत्यादि । टो ध्वनौ; ठो महेश्वरे शून्ये वृहद्धनौ चन्द्रमण्डले; तकारः तस्करे क्रोड- पुच्छयोः; थो मीत्राणे महीधे । एतदनुसारेण टठतथाः प्रश्नानुसन्धानेन समर्थनीयाः ॥ २ ॥ सूत्रम् शषसे शषसं वा ॥३॥ [सि० १३१६ ] पदान्तस्यस्य रस शपसेषु परेषु शपसा वा स्युः । कश्शेते ।।३॥ पक्षे महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- शप० । शश्च पश्च सञ्च प्राग्वत् शपसं तस्मिन् शपस ७.१ "अवर्ण" | 'शश्च पश्च सश्च शपस १-१ "अतः स्यमोऽम्" "समाना । वा १.१ "अव्ययस्य" । त्रिपदमिदं सूत्रम् ॥ ३ ॥ पक्षे- रः पदान्ते विसर्गस्तयोः॥४॥[सि० १३१५३] पदान्तस्थस्य रस विरामेऽघोपे परे च विसर्गः स्यात् । कः शेते । कप्पण्डः कः पण्डः २। ५कस्साधुः कः साधुः २ ।। ४ ।। रः पदान्ते । र ६.१ "लोकात्" "सो रुः" अनेनैव सूत्रेण विसर्गः। पदस्य अन्तः पदान्तः तस्मिन् पदान्त ७-१ "अवर्णस्ये. । विसर्गः १-१ "सो रुः" । तद् ६.२ "आवरः" "लुगस्या." "लोकात्" "एबहुस्भोसि" "एदेतो." । "सो रुः" र पदान्ते विसर्गस्तयोः । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । शपसानामघोपत्वात् पक्षे अनेन विसर्गे रूपद्वयं सिद्धम् । कश्शेते कः शेते इति । एवं कष्पण्ड १०इत्यादिष्वपि रूपद्वयम् । अत्र च रूपद्वयसूचको द्विको ज्ञेयः, एवमग्रेऽपि यथास्थानं रूपसङ्ख्यासूचका असा ज्ञेयाः ।। ४ ।। सूत्रम्-- रः कखपफयोः ४ क * पौ ॥५॥[सि. १३५ पदान्तस्थस्य रस्य कखयोः परयोः ४को वा पफयोश्च परयोः - पो वा स्यात् । क ४ करोति कः करोति । कर खनति का खनति । कर पचति कः पचति । क फलति का फलति । पुन ? १५पुष्टं पुनः पुष्टम् , इत्यादि ॥५॥ र ६.१ "लोकात्" "सो रुः" कश्च खश्च कखं, पश्च फच पर्फ । कखं च पर्फ च कखपफे तयोः : कसपफ ६-२ "एद्धहु०" x कश्च - पश्च ४ क ८ पौ १-२ "ऐदौत्" । पक्षे प्राग्वत् विसर्गः । कर् इति प्राग्वत् 'दुवंग करणे' क वर्तमानातिय "कुगतनादेरुः” उप्रत्यये "नामिनो." "उनोः" इति उप्रत्ययस्य गुणे करोति । 'खनूग अवदारणे' सन्, 'डुप चीप् पार्के' पच् ‘फल निप्पत्तों सर्वत्र वर्तमानाति "कर्तर्यन०" शव खनति, पचति, फलति । पुनर् १.१ "अव्यय०", 'पुस् च पुष्टौं पुप "क्तक्तवतू" क्तप्रत्ययः पुष्टम् । करोतीत्यादिपु x के "अदीर्घाद्विरामै०" इति x कस्य द्वित्वे च स्पद्वयं, पक्षे विसर्गे विसर्गद्वित्वे च रूपद्वयं एवं चत्वार्यककानि; "शिटः प्रथमद्वितीयस्य" इति निमित्त- कस्य द्वित्वेऽपि चत्वारि एवमष्टौ रूपाणि; अन्त्यस्यानुनासिकत्वे पोडश रूपाणि । एवं कर पचतीत्यादिष्वपि रूपाणि १६- *प विसर्ग-तहित्व-पद्वित्वविकल्पतः अष्ट, अष्टान्त्यानुनासिक्ये रो रूपाणि पे परे १। अत्र च ईत्यादिशब्दात् "नमस्पुरसो गतेः कखपफि रः सः" [सि० २।३।१] । नमस्कृय अनमो नमःफरणं पूर्व "साक्षादादिश्व्यर्थे" (सि० ३३११४) इति गविसंज्ञा नमःशब्दो हि साक्षा. दादिगणे पठितः । पुरस्कृत्य "पुरोऽस्तमव्ययम्" (सि० ३१७) इति गतिसंज्ञा "तिरसो वा" (सि० २३३२.) तिरस्कृत्य, तिरस्कृत्य, तिरस्कृत्वा "कृगो नया" (सि० ३।१२१०) इति गति- संसाविकल्पे त्रैरूप्यं सूक्ष्मेक्षिकया तु "एकद्वितिचतुर्द्धित्वे तदभावे तिरस्कृगः । क्त्वायां रूपशवं साद्ध ३० गलिसादिविकल्यतः" ॥ १ ॥ गतिसंज्ञायां सकारपक्षे चतुर्णा प्रत्येक द्वित्वे चत्वारि द्वयोयोदित्वे पट् त्रयाणां २ द्वित्वे त्रीणि सर्वेषां द्वित्वे एकं तदभावे चैकमिति पञ्चदश एवं विसर्गपक्षे १५ जिहा. मूलीयपक्षेऽपि १५ गत्यमा विसर्गजितामूलीयाभ्यां त्रिंशदेवं पञ्चसप्ततिरन्त्यानुनासिक्ये साईशवमिति । पुंम् २-१ 'कमु फान्तौ' पुमांसं कामयते इति "शीलिकामि" इतिणे "णेरनिटिं" इति गिड्लोपे "पदस्य" ३४६ति सलोपे पुम् यामेति स्थिते "पुमोशियघोपेऽख्यागि र" [सि० ११३९] पुम्शन्दस २० फल .

प्रक्रियावृतितपे श्रीहेमप्रकाशे रेफसन्धिः ८१ शिबर्जे ख्यागवर्जे च अघो परे रेफो भवति अनुस्वारानुनासिको च पूर्वस्य । ततश्च *"पुंसः" [सि० २१३३] पुंस्शब्दसम्बन्धिनो रेफस्य कखपफि सः स्यात् । पुंस्कामा मुस्कामा, पुंस्कोकिलः २ पुंस्त्रातः २ पुंस्पाकः २ पुंस्फलम् २ । अघोप इति किम् ? पुंदासः । अशिटीति किम् ? पुंशिरः । अख्या- गिति किम् ? पुंख्यातः । "शिरोऽधसः पदे समासैक्ये” (सि० २।३१४) अनयो रेफल्य पद- झब्ढे सः स्यात् समासैक्ये-तो चेन्निमित्तनिमित्तिनावकत्रसमासे त्याताम् । शिरस्पदं अधस्पदं "अव्ययं ५ प्रवृद्धादिमिः” इति समासः । पद इति किम् ? शिरः खण्डम् । समासेति किम् ? शिरः पदं अधः पदम् । ऐक्य इति किम् ? परमशिरः पदं परमाधः पदम् । “अतः कृकमिकसम्भकुशाकणीपात्रेऽ. नव्ययस्य" [सि० २।३.५ ] अकारात्परस्यानव्यवसम्बन्धिनो रेफस्य कृकन्यादिसप्तकस्येषु कखपफेयु सः स्यात् समासैक्ये । अयस्कृत् अयस्कारः अयस्कृतं यास्कामः अयस्कंसः अयस्कुम्भः । द्वन्द्वे अय- स्युम्भकपालानि । अयस्कुझा अयस्कर्णी अयस्पात्रम् । नामग्रहणे लिन्नविशिष्टस्यापि ग्रहणात् अयस्कुभी, १० अयस्पात्री, शुनस्कर्ण इति तु कस्कादिः । अत इति किम् ? गी:कारः, भास्कर इति तु कस्कादिः । अन- व्ययस्येति किम् ? खः कारः, प्रातः कामः । समासेत्येव-यशः करोति । ऐक्य इयेय-उपपयः कारः परमयाः कामः । अयसः कुम्भकपालं अयःकुम्भकपालम् , अत्र हि निमित्तनिमित्तिनी नकसमासस्था । यदा त्वेवं समासः-अयसः कुम्भोऽयस्कुम्भस्तस्य कपालं तदा भवत्येव अयस्कुम्भकपालमिति । इह कृकम्योः केवलयोः समासो न भयतीति प्रत्ययान्तयोर्ग्रहणम् । अथ फिवन्ता धातुत्वं न जइतीति फिव-१५ न्तयोरेव कस्मान्न भवति ? "गतिकारकस्य." इति सूत्रे फिवग्रहणात् । नान्यप्रत्ययान्तानां धातूनरपदा- नामग्रहणे किवग्रहणमर्थवद्भवति, अयं भावः-यदि धातुग्रहणेनान्यप्रत्ययान्तानां धातूनामग्रणं न्यानदा कियग्रहणमनर्थकं स्यात् । कमिग्रहणान् कामयतेन भवति पयः कामयते पयःकामा "शीलिकामि," इति णः कमेस्त्वणि पयस्कामीति भवति । कमनं कामः पयसि कामोऽस्या इति बहुग्रीहिणा तु पयकामा इत्यपि भवति । कमिग्रहणेनैव कंसे लब्धे कंसग्रहणं ज्ञापकम् अतीदमपि दर्शनम्-"उगादयोऽव्युत्पन्नानि २० नामानि" इति । "प्रत्यये"[सि. २०१६] अनन्ययसम्पन्धिरेफल्य प्रत्ययसम्बन्धिकम्पपपु सः स्यान। पाझप्कल्पप्काः प्रयोजयन्ति । काम्ये विशपविधानादन्यस्य चाभायान पयापाशं, वास्कल्पं, पयस्कम् । अनव्ययस्येति किम् ? स्वः पाशम् । प्रत्यय इति क्रिम ? पाशो बन्धः, कल्लो विधिः, कं शिरः । पयः पाशः, पयः कल्पः, पयः कम । "रोः काम्ये" [सि. २।३१७ 7 अनव्ययसम्बन्धिरेफन्च गेग्य 1 महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- - लीयोपध्मानीयविसर्गा भवन्ति । द्वि करोति । द्विः करोति नि: खनति त्रिः खनति । चतुर पचति २ चतुर फलति २।सुजन्तख चतुरः परत्वादनेन विकल्पो न तु पूर्वेण नित्यो विधिः। कखपफ इत्येय-द्विश्वरति । "सुसोऽपेक्षायाम्"[सि० २।३।११] इस उस् प्रत्ययान्तसम्पन्धिनो रेफरस कखपफेषु पो पा स्यात् । सार्वष्करोति सर्पिष्खादति सर्पिष्पिवति सर्पिष्फेनायते । धनुष्करोति धनु । ५खण्डयति धनुष्पतति धनुष्फलति । परमसर्पिष्करोति परमसर्पिष्पिवति परमधनुष्करोति परमधनुष्प- तति । पक्षे जिह्वामूलोयोपध्मानीयविसर्गाःसर्षिकरोति परमसार्पिःकरोतीत्यादि । इसुस इति किम् ? पयः करोति पय : पिबति । इसुसोः प्रत्यययोर्ग्रहणादिह न भवति-मुनि ४ करोति नदीभिः क्रियते, मुहुर कुलानि । त्याद्युस्युसोरपीच्छत्यन्यः ? अपेक्षायामिति किम् ? तिष्ठतु सर्पिः पिव त्वमुदकं । एकार्थीभावे घ पचति, मुहुरित्यव्युत्पन्नमव्ययम् । इसा साहचर्यादुस औणादिकस्य ग्रहणं तेनेह न भवति-चक्रुः १०न भवति-परमसर्पिः कुण्ड, भिन्नपदयोरेव ह्यपेक्षा करोत्युक्ते किं करोति ? सर्पिष्करोतीत्यादि, समासे तु समर्थपदानामेकप्रयत्नोधार्यत्वादपेक्षानिवृत्तिः । "नैकार्थेऽक्रिये" (सि० २।३।१२) नास्ति क्रिया प्रवृत्तिनिमित्तं यस्य तस्मिमेकार्थे समानाधिकरणे पदे यत्कसपर्फ तस्मिन्परे इसुस्प्रत्ययान्तसम्बन्धिरे- कालकम् यजुः पीतकम् । एकार्थ इति किम् ? सर्पिष्कुम्भे २ । धनुष्पुरुषस्य २ । अक्रिय इति किम् ? फस्य यो न स्यात्, “सुसोऽपेक्षायाम्" इत्यस्यायं प्रतिषेधो नान्यस्य तद्विपय एवारम्भात् । सपिः ६५ सर्पिष्क्रियते २ धनुष्माप्तम् २ । “समासेऽसमस्तस्य" [सि० २।३।१३ ] पूर्वेणासमस्तस्येसुस्प्रत्य- असर्पिः सर्पिः कृत्या सर्पिकृत्य सर्विसण्डं सर्पिप्पानं सर्विष्फलम् । धनुष्कृत्य धनुष्खण्ड धनुपृष्ठं धनु- ८२ पः स्यात्, समासे-तौ चेग्निमित्तनिमित्तानावेकन समासे स्याताम् । सर्पिष्कुम्भः यान्तस्य : कखपफेषु फलम् । समास इति किम् ? तिष्ठतु सर्पिः पिव त्यमुदकम् । असमस्तस्येति किम् ? परमसर्पिःकुण्डम् , इन्द्रधनुःखण्डम् । पूर्वेणापि न भवति-समासे सत्यपेक्षाया अभावात् । इदमेवासमस्तस्येति वचनं ज्ञाप- २० कम्-इसुसोः "प्रत्ययः प्रकृत्यादेः” इति नियमो न भवति तेन परमसर्पिष्करोति परमसर्पिःकरोती- या "सुसो." इत्यधिकस्यापि विकल्प: स्यात् । किं च यद्यपि परमं सर्पिः परमसर्पिः करोति इत्यु- तरपदार्थप्रधाने समासे प्रधानस्यापेक्षाया योगात् पत्वं सिद्ध्यति तथापि परमं सपिर्यस्य सर्पिपः समीप सपियो नितान्तमिति परमसर्पिxकरोति उपसxिकरोति निःसर्पिxकरोतीत्यर न सिद्धयति । सर्पिःश- ब्दस्य क्रियायाश्च व्यपेक्षाया अभावादिति किम् ? तदर्थमिदं ज्ञापकं तेन सपिःशब्दान्तस्यापि क्रियया २५सापेक्षत्वे विकल्पो भवति । यहुसपिप्पुण्डमित्यन बहुप्रत्ययादेरप्यसमस्तत्वादनेन नित्यं भवति । इत्या- दिकरणात्सर्वमपीदं रेफप्रकरणमिदानुसम्धेयम्-[भातुप्पुत्रकस्कादयः (सि० २।३।१४) साधवः] तथा "नृनः पेपु या" [सि० १।३।१०] ननिति शसन्तस्य नृशब्दस्यानुकरणम् । नूनः पे परे रो या सार, अनुम्बारानुनासियौ च पूर्वस्य । न पाहि १ने x पाहि २ नं पाहि ३ : पाहि ४ नृन्पाहि ५, एवं रेफ्स्योपध्मानीयत्वे पक्षे विसर्गत्वे पूर्वस्यानुस्वारानुनासिक्त्वाम्यां च चत्वारि रूपाण्येस्पानि, ३० वतथ "शिटः प्रथमद्वितीयस्य" [सि० १३३३३५] शिटः परयोः प्रथमद्वितीययोर्द्व रुपे या सातामिनि पनारम्य द्वित्ये पत्यारि, नकारस्य रत्याभावे एक्मेवं अन्सस्यानुनासिकत्वेऽपि नवेत्यष्टा- दश रूपाणि ॥ ५॥ अथान विशेषमाह-सूत्रम्- नव, स्यागि ॥६॥ [सि० १॥३॥५४ ] १४ रोनित्यं विसर्गः 1 फ स्यातः । ""शिटयघोपात्" [सि० ११३॥५५] शिदपरेऽयोपे परे- प्रक्रियाबृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे रेफसन्धिः ८३ प्येवम्-का साति । "व्यत्यये लुग्वा" [सि० ११३१५६] अघोपपरे शिटि परे रो लुग्या- चक्षुझ्योतति चक्षुःश्योतति ॥ ६॥ ख्याग् ७-१ "लोकात्" । एकपदामिदं सूत्रम् । 'ख्यांक प्रकथने' ख्यायते स्म "क्तक्तवतू" ख्यात १-१ "सो सः" "र: पदान्ते.” । 'शिट्परे इत्यादि वार्तिकं स्पष्टम् । 'अदं प्सांक् भक्षणे' वर्तमानातिन् प्साति । चक्षुस् १-१ "अनतो लुप्" "सो रुः" 'स्च्युत क्षरणे' स्च्युत् “सस्य शसी" न्युन् वर्त-५ मानातिन् "कर्त०" "लघोरुपान्त्यस्य" इति गुणः श्योतति । अत्र च "शिव्याद्यस्य द्वितीयो वा" इति विकल्पेन कस्य खत्वे रूपयम्-चत्यु न्योतति चक्षु ज्योतति "अदीर्घाद्विरामै." इति कस्य द्वित्वे रूपमेकम्-चक्नु भ्योतति । अदीर्घाद्विरामेति खस्य द्वित्वे "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति पूर्वस्य कत्वे रूपमेकम्-चक्यु त्र्योतति । एवं रूपचतुष्टयम् । एषु “ततः शिटः" इति मूर्द्धन्यस्य द्वित्वे रूपचतु- टयम्-चप्पु त्र्योतति ४ । एवमेतानि "शपसे शपसं वा” इति रोः झत्वे द्विशान्यष्टौं ल्पाणि-चक्षु-१० श्श्च्योतति ८ । पक्षे रोविसर्गेऽष्टौ चक्षुः थ्योतति ८ । पक्षे अदीर्याद्विरामेति विसर्गस्य द्वित्वेऽष्टी- चक्षुः: श्योतति ८ एवं द्वात्रिंशद्रूपाण्येकचान्येकयानि ३२ । "शिटः प्रथमद्वितीयस्य" शिटः परयोः प्रथम द्वितीययोर्द्व रूपे वा स्यातामिति चस्य द्वित्वे द्विचान्येकयानि द्वात्रिंशत्-चक्षु च्योतति ३२ । “ततोऽस्थाः” (११३३४) इति यस्य द्वित्वे एकचानि द्वियानि द्वात्रिंशत्-चक्षु भय्योतति ३२ । योरपि द्वित्वे द्विचानि द्विचानि द्वात्रिंशत्-चक्षु च्य्योतति ३२ । इत्येवमष्टाविंशत्यधिकरूप-१५ शतम् । एषु "अइउवर्णस्यान्ते०" इति विकल्पेनान्तस्वकारस्यानुनासिकत्वे च पट्पञ्चाशते द्वेशते विस- र्जनीयमूर्द्धन्यकखां द्वित्वे चयोरपि द्वित्वे रोः शत्वलुग्भ्यामन्त्यस्यानुनासिकतयापि वा सम्यग् विवेचनी- यानि वैयाकरणपुङ्गवः चक्षु ज्योततिरूपाणि पट्पञ्चाशतं शतद्वयम् ॥ ६ ॥ सूत्रम्- अतोऽति रोशः ॥७॥ [सि० ११३१२०] अकारात्परस्य रोरति परे उः स्यात् । “अवर्णस्पे०" इति ओत्वे "एदोतः०" इत्यकारलोपे च २० कोऽर्थः । रोरिति किम् ? ग्रातरत्र ॥ ७॥ अतो० । अत् ५.१ "लोकात्" "सो हः" अत् ७.१ "लोकात्" अनेन रोगः अवर्णस्ये." "एदोतः०" । २ ६-१ "स्त्यिदिति” "एदोळ्यां" रः। उ १-१ "सोनः" "रः पदान्ते." "लोकान" चतुष्पदमिदं सूत्रम् । प्रातरत्रेति अत्र रोरभावात् उर्न भवति ।। ७ ॥ सूत्रम्- रोयः ॥ ८॥[सि० १३।२६ ] अवर्णाद् भोस् भगोस् अघोस् शब्देभ्यश्च परस्य रोः स्वरे परे यः स्यात्तस्य च स्वरे परे लुग्या लुक्यसन्धिश्च । कयास्ते क आस्ते । कयिह क इह । भो यत्र भो अत्र । भगो यत्र भगो अत्र | अघो यत्र अघो अत्र । अवर्णादिति किम् ? निधिरत्र । भोम् इत्यादय आमन्त्रणे सकारान्ता अव्ययाः॥८॥ रु ६-१ "छिन्त्यदिति” "एदोग्यां" र् । १-१ "सो " "र: पदान्ते" द्विपदमिदं मूत्रम् । अत्रायं विशेष:-"व्योः" [सि० १२३।२३ ] अवर्णात्परयोर्वययोपियति परे लुम् न्यान न चा-३० सन्धिः । वृनं वृश्चति इति वृक्षवृश्च फिम् "अप्रयो" फिफ्लोपः नवं अव्ययं याऽची "निवाल नाम्नः कृगादियु" इति निजि "चन्त्य खरादेः" इति अन्त्यन्सगदिलुपि वृक्षयचति अध्ययन ति हिर "जेरनिटि" इति गिजलुपि वृक्ष १-१ अव्यय् १-१ "अप्रयोगीन" पिरलोपः दिपिक मिठोर अमे चाति ततो यकारयकारलोपे वृक्षवाति अम्पयातीनि सियति । तथायमपि विशेष:- अन्रष्टा-३४ -- महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पवर्णात्वनुभि वा” ( ११३१२५) अवर्णभोभगोअघोभ्यः परयोः पदान्तस्थयोर्वययोः स्थानेऽस्पष्टा- वीपरस्पष्टतरौ वयौ स्याताम् । अवर्णात्तु परयोयोरुब्बजे स्वरेऽस्पष्टौ वा भवतः । पटवु वृक्षावु असावु कयु देवायु भोयत्र भोयु भगोयन्त्र भगोयु अघोयत्र अघोयु । अवर्णात्त्वनुभि वा, पटविह पट. इह असाविन्दुः असा इन्दुः तयिह त इह तस्मायिदं तस्मा इदं कयिह क इह देवायाहुः देवा आहुः । ५अनुनीति किम् ? उभि अस्पष्टावेव यथा स्याताम् तथा चोदाहृतम् ॥ ८ ॥ सूत्रम् अवर्णभोभगोऽघोलुंगसन्धिः ॥९॥ [सि० १॥३॥२२] अवर्णाद् भो इत्यादिभ्यश्च रोपवति परे लुक् सात, स च न सन्धिहेतुः [असन्धिः इत्युत्तरार्थम्-सि० ११३१२३-२४ ] देवा यान्ति । भो यासि । भगो हस । अघो वद ॥९॥ अवर्णः । अवर्णश्च भोश्च भगोश्च अघोश्च अवर्णभोभगोऽपो ५.१ "एदोझ्या डसिडसो रः" । लुक् १०१-१ "दीर्घ." "धुटस्तृतीयः” । असन्धिः असन्धि १-१ "सो रु:" "र: पदान्ते." भो भगो अघो एते त्रयः प्लुतसकारा भोस् भगोस् अघोस् इत्येपामनुकरणशब्दा ज्ञेयाः। त्रिपदमिदं सूत्रम् । भोस् इत्यादि आमनणे सकारान्ता अव्यया इति बहुसम्मतम् । केचितु भवद्भगवदघवतां सम्बोधने सौ परतो वशब्द- स्योत्यं तकारस्य च रुत्वं कृत्वा एतानि रूपाणीच्छन्ति तेषां द्विवचनबहुवचनयोः स्त्रियां च न सिद्ध्यति, भोः ब्राक्षणी भोः ब्राह्मणाः भोः ब्राह्मणि इत्यादि ।। ९ ।। सूत्रम्- घोपवति ॥१०॥[सि० १३३२१ ] अतः परस्य रो|पवति उ: स्यात् । धर्मो जयति । "सामान्पशास्त्रतो नूनं विशेपो बलवान् भवेत् । परेण पूर्वबाधो वा प्रायशो दृश्यतामिह ॥१॥" रोरित्येव-प्रातर्याति ॥ १० ॥ घोप. घोपोऽस्यास्तीति घोपवान् "तदस्यारत्यस्मिन्निति मतुः" "मावर्णान्तो." मो यः घोपवत् २०७-१ "लोकात्" । एकपदमिदं सूत्रम् । ननु धर्मो जयतीसत्र अवर्णभोरिति रुलुक कथं न प्राप्नोतीत्य- माह-सामान्यशाखत इत्यादि-तत्र "बहुव्यापक सामान्य अल्पव्यापको विशेपः", अवर्णभोरिति सूत्रम- वर्णानामोति इति सामान्यं घोपवतीति च अकारादेव प्राप्नोतीति विशेषस्ततश्च अवर्णभोरिति सूत्रं घाधित्वा घोपवीति प्रवर्तते इति भावः । यद्वा अवर्णभोरिति सूत्रं देवा यान्तीत्यादौ सावकाशं घोप- यतीति सूत्रं तु यदि अवर्णभोरिति सूत्रेण वाध्यते तदा निरवकाशं स्यात्ततो "निरवकाशं सावकाशात् २५ वलीय" इति घोपवतीत्येव प्रवर्तते । परेणेत्युत्तरार्द्ध तु प्रसगादुक्तं नानोपयोगीति ॥ १० ॥ रो रे लग दीर्घश्वादिदुतः ॥ ११ ॥ [ सि० १॥३३४१] रस रेफे परे लुरु स्यारत्सन्नियोगे च पूर्वस्थानां अइ उ इत्येषां दीर्घः । मुनी राजते, साधू राजते, पुना रमते । अकारात्परस्य रोस्तु घोपपतीत्युकार:-जिनो राजते ॥ ११ ॥ रो० । र ६.१ "लोकात्" "सो २:"। "घोपवति" रोहः "अवर्णस्यै"।र ७-१ "अवर्णस्ये." ३० लुग् १-१ "दीर्घ०" । दीर्घ १-१ "सो :" । च १-१ "अव्यय." अय इस उश अदिदुत् ६-१ "लोरान्" "सोमः" " पदान्ते." "पटते." "समानानां."। पट्पदमिदं सूत्रम् । पुना रमते इति- निरगुपन्धरेफम्प टोपे इदमुदाहरणम । ननु जिनो राजते इत्यत्र "सर्वेभ्यो लोपः" इति लोपस्य यलीय- स्त्यान् परत्याबाऽनेन रो लुकिसी च मिना राजते इति कथं न भवतीत्यगोच्यते-अवान्वित्यधिकारा. ५त्युमेय पोपयतीति रोकरवे एनत्सूत्राप्रवृत्तिरिति ॥ ११ ।। सूत्रम्- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे रेफसन्धिः रो लुप्यरि ॥ १२ ॥ [सि० २१७५] रेफवर्जिते वर्णे परे पदान्तस्थसाह्रो नस्य सादिलुपि सत्यां रः स्यात् । अहरधीते । अह- नणः ॥ १२॥ 'लुकि तु रो०६-१ "लोकात्" "सो रुः" "अवर्णस्से०"।लुप् ७-१ "लोकात्। नअर् ७-१ "लोकात्" "इवर्णादे०” । त्रिपदमिदं सूत्रम् । अहन् २-१ "कालाध्वनोाप्तौ” इति द्वितीया "अनतो लुप्" इत्यम्-५ लुप्; अधिपूर्वक 'इ अध्ययने' अधीते ततश्च अनेन रः। अहन् ६-३ "अनोऽस्य" इत्यकारलोपे अह्नाम् , गण १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते.” । “षष्ठ्ययनाच्छेपे” इति पष्ठीतत्पुरुपे “ऐकाय' इति विभक्तिलुपि निमित्ताभावे नैमित्तिकस्याप्यभाव इति अकारलोपनिवृत्तौ अहन् गण इति स्थिते अनेन रः॥ १२ ॥ +यत्र तु लुप् न भवति तत्र सूत्रान्तरमाह- अह्नः ॥ १३॥[सि० २२११७४] अहन्सम्बन्धिनो नस्य पदान्ते रुः स्यात् । दीर्घाहो निदाघ । अरीति किम् ? अहोरूपम् ॥१३॥ अह्नः । अहन् ६-१ "अनोऽस्य" "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते.” । एकपदामिदं सूत्रम् । दीर्घानि अहानि यस्मिन् स दीर्घाहा निदाघः तस्य सम्बोधनं हे दीर्घाहन् “दीर्घड्या.” इति सिलुक् "नामच्ये” इति नलोपाभावः, निदाघ इत्यत्र "अदेतः स्वमोलुंक्" इति सिलुक् । अत्र लुभावात् नस्य रुः ततश्च "घोपवति” इत्युत्वमिति हरेफयोर्विशेषः हे दीर्याहो निदाघ । एवं दीर्घाहा निदाघ इति १५ अत्रासदाधिकारविहितत्वेन रुत्वस्यासत्त्वान्नोऽन्तलक्षणो दीर्घः स्यात् । प्रशस्तं अहः इति वाक्ये अहन् १-१ "त्यादेश्च प्रशस्ते रूपप्” इति रूपप्प्रत्ययः, "ऐकायें” इति विभक्तिलुपि अहन् रूप इति स्थिते अत्र लुपि सत्यामपि "रो लुप्यरि” इत्यत्र रेफवर्जनात् रो न भवति किन्तु "अह्नः" इति रुरेव । अन्ये तु रात्रिरूपरथन्तरेष्वेव [रथन्तरमिति रथं रथस्थं तरत्यतिक्रामति "भृवृजि०" इति खः] रेफादियु परेपु रेफप्रतिषेधमिच्छन्ति ॥ १३ ॥ सूत्रम् । वाऽहर्पत्यादयः ॥ १४ ॥ [ सि० १३१५८] एषु 'विसर्गाद्यभावो वा स्यात् । अहर्पतिः अहपतिः अहःपतिः । गीपतिः गी पतिः गी: पतिः ॥१४॥ वाऽह०।१-१ "अव्ययस्य" अहर्पतिरादिर्येषां ते अहर्पत्यादयः १-३ "जस्वेदोत्” “एदै." "लोकान्" "सो रुः" "रः पदान्ते.” । द्विपदमिदं सूत्रम् । अह्रः ६-१ पतिः १-१ अनेन विकल्पेन विसर्गाभावे २५ अहर्पतिः पक्षे "र: पदान्ते.” इति विसर्गे "र: कखपफयोः” इति -पत्वे च रूपत्रयम् । पझे "अदीर्घाद्विरामः" इति विकल्पेन विसर्गद्वित्वे पद्वित्वे पश्चरूपाणि एकपानि । "हादहस्वरस्त्र." इति "शिटः प्रथमद्वितीयस्य" इति च पाक्षिके पद्वित्वे दश । अदीर्घाद्विरामेति अन्त्यविसर्गन्य द्वित्वे विंश- तिरिति ॥ गिरा ६-३ पतिः १-१ गिर् पतिरिति स्थिते "पदान्ते” इति दीर्घ अनेन विसर्गाभावे गीर्पतिः पक्षे विसर्गः प इति रूपत्रयं शेपं प्राग्वन् । 'विसर्गाचभाव इत्यत्र आदिशब्दान् फचिन ३० "घोपवति" इत्युत्वमपि निपिध्यते यथा प्रगतं प्रकृष्टं वा चेतो बन्य सः प्रचेताः अत्र सम्बोधनं क्रियते हे प्रचेतः प्रचेतस् १-१ राजन् १-१ "आमन्ये” इति उभयत्र सिः "दीर्थया." सिलुक "मो नः" इति रुत्वं अनेन रोः उत्वाभावे "रो रे लुग्” इति दीर्घः हे प्रचेता राजन् परे उत्व ६ प्रचेनो राजन् ।। १४ ॥ सूत्रम्--- २० ३१ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । अकारान्ताः ८७ *संहितेति श्लोकः :-यन्न पद-विभक्त्यन्तम् , एकपदे नित्यमविरामो भवति ततश्च नित्यं संहिता सन्धिर्म- वति यथा-देवेन, भवति । धातूपसर्गयोर्यथा उपैति । समासे यथा परमेश्वरः । वाक्ये तु सा विवक्षा- मपेक्षते इति विरामविवक्षया न सन्धिरविरामविवक्षया तु सन्धिरिति । यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणा स्त्रोपझसत्प्रक्रिया- वृत्तौ बन्धुर एव (एप?) पूर्तिमभजद्रेफस्य सन्धिः सुखम् ॥ १ ॥ COLC2090E0E020ECZOEe TIOHd विभक्तिर्विभाव्यते EI9020BEOGcpostao १० -- अथेति सन्धिप्रकरणकथनानन्तरं विभक्तिप्रकरणं निलप्यते- -सूत्रम् अधातुविभक्तिवाक्यमर्थवन्नाम ॥१॥ [ सि० १।१।२७ ] धातुविभक्त्यन्तवाक्यवर्जमर्थवच्छन्दरूपं नाम स्यात् । ततः स्यादयः सप्त विभक्तयो योज्यन्ते ॥१ अधातु० । धातुश्च विभक्तिश्च वाक्यं च धातुविभक्तिवाक्यं, न धातुविभक्तिवाक्यं अधातुविभक्ति वाक्यं, अधातुविभक्तिवाक्य १-१ "अतःस्य.” समाना० । अर्थोऽस्यास्तीति १-१ "तदस्यास्त्यः” इति मतुः "मावर्णान्तो.” मो वः अर्थवत् १-१ "अनतो लुप्” । नामन् १-१ "अनतो." "नान्नो नो.”।१५ त्रिपदमिदं सूत्रम् । धात्वादिवर्जनात् 'भू सत्तायाम् भू इत्यत्र धातुत्वात् , 'देवन्य' इत्यत्र विभक्त्यन्तत्वात् , 'चैत्रः पठति' इत्यत्र वाक्यत्वात् नामसंज्ञा न स्यात्। नामसंज्ञायां चैपां स्याद्युत्पत्तिः प्रसज्यते। विभक्तिरिति केवलाया विभक्तरर्थवत्त्वाभावादप्रयोगाच विभक्त्यन्तं गृह्यते । वाक्यं प्राग्लक्षितमेव । अधातुविभक्त्य- न्तवाक्यं नाम इत्युक्ते मन्वायुधारितानां निरर्थकशब्दानां हस्ततालिकाद्यव्यक्तदाब्दानां च नामत्वं प्रसज्यते इति तद्वारणाय अर्थवच्छन्द्ररूपमिति । अर्थवच्छन्द्ररूपं नाम इत्युक्ते धात्वादीनामपि नामसंज्ञा स्यादिति २० तनिषेधाय अधात्विति । नामसंज्ञायाः फलमाह-तत इत्यादि सप्तविभक्तयो योज्यन्ते "नान्नः प्रथमैक- द्विवहाँ" "कर्मणि" इत्यादिसूत्रैः प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । तानि सूत्राणि च कारकाधिकारे वक्ष्यन्ते ॥ १ ॥ स्यौजलित्यादि ॥२॥ सि औ जस् इति प्रथमा । अम् औ शस् इति द्वितीया । टा म्यां भिम् इति तृतीया । के स्यां भ्यस् इति चतुर्थी । उसि भ्यां भ्यस् इति पञ्चमी । उस ओस् आम् इति पष्ठी । डि ओन् सुप्२५ इति सप्तमी । तत्राप्यर्थैकत्वविवक्षायां प्रथमैकवचनं सिः । इकार उच्चारणार्थ इत् । देवरम् इनि स्थिते । “सो रुः" "रः पदान्ते विसर्गस्तयोः" देवः। द्वित्वे-देव औ "एवात्सत्यक्षरः" इनि देवौ । बहुत्वे देव लस् । जकारो विशेषणार्थः ॥ २ ॥ सौजसित्यादि । अत्र च महान्याकरणसूत्रं लुचितं तदम्-"त्योजसमाशस्टाभ्यांभिडे- भ्यांभ्यस्ङसिभ्यांभ्यसूङसूओसाम्ङ्योस्तुपां नयी यी प्रथमादिः" (लि० ११११ १७) अयं भावः-एषु प्रथमवचनवयं प्रथमासंतं भवति [द्वितीयवचनत्रयं] हितीयालंज्ञामित्यादि ।३१ - महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोषज्ञहैमलघु- एतदश्च व्यञ्जनेऽनगूनङ्समासे ॥ १५॥ [सि० १२४६ ] एतच्छब्दात्तच्छब्दाच परस्य सेर्व्यञ्जने परे लुक् स्यात् । एप दत्ते । स लाति । अकि न. समासे च न । एपका कृती । सको याति । अनेपो याति । असो वाति ।। १५ ।। एत । एतद् ५-१ "लोकात्" "सो रु;" च १-१ "अव्ययस्य" "चटते." । व्यञ्जन ५-१ ५"अवर्णस्ये.” । अक् च न च समासश्च १-१ अग्नसमासं न १-१ अग्नसमासं अनमन्- समासं तस्मिन् अनमसमास ७-१ "अवर्णस्ये." । चतुष्पदं सूत्रम् । एपस् दत्ते सस् लाति अनेन सिलुरु । अनग्नसमासे इति सूत्रावयवस्य तात्पर्य व्यावृत्तिमुखेनैवाह-अकि नक्समासे च न इति सेलुप् न स्यादित्यर्थः, ततो "घोपवति" इत्यादि भवति । एपकः कृतीत्यादि-कुत्सितोऽल्पोऽशातो वा एपः "सर्यादेः स्वरेष्वन्यात्पूर्वोऽक्” । एवं सको याति । "प्रकृतिग्रहणे स्वार्थिकप्रत्ययान्तानामपि ग्रहणम्" इति १० न्यायात् अप्रत्ययान्तानामपि त्यदादीनां "आद्वेरः" "तः सौ सः" इत्यादिकार्य भवति । न एपः अनेषः न स अस इति ।। १५ ।। सूत्रम्- तदः से खरे पादार्था ॥१६॥[सि० १॥३॥४५] सच्छन्दात्परस से खरे परे लुक् स्याद् यदि सेलकि सत्यामेव श्लोकादिपादः पूर्वत ॥१६॥ "सैप दाशरथी रामः सौषधीरनुरुध्यति । अन्यत्र यथाप्राप्तम्-- "स एप भरतो राजा स एष नलभूपतिः" ॥ १ ॥ ॥ १६॥ तदः । तद् ५-१ "लोकात्" "सो रु" "रः पदान्ते०" । सि ६-१ "डित्यदिति" एदोन्यां०" "र: पदान्ते" । स्वर ७-१ "अवर्णस्ये० । पादाय इदं पादार्था पादाय ४-१ अमे अर्थशब्दः *"तदर्थार्थेन" चतुर्यर्थेन अर्थशब्देन चतुर्थ्यन्तं समस्यते इति वचनात् चतुर्थीतत्पुरुषः “ऐकायें" पादार्थ इति "डेऽर्थो वाच्यवदिति लिङ्गानुशासनवचनात् तत्पुरुपे वाच्ये अर्थशब्दो चाच्यलिङ्गो भवतीति २० स्त्रीलिङ्गत्वे "आत्" इत्याप् पादार्था १-१ "दीर्घ०" । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । पादार्था इति सूत्रांशस्य तात्पर्यमाह-यदि सेलकीत्यादि-तद् १-१ "आवरः" "लुगस्या०"। सैष इति अत्र सिलोपे सति सन्धी कृते पादः पूर्णो भवति-अष्टवर्णात्मकत्वान्न पादस्य अन्यथा सो रुत्वे तस्य लोपे असन्धौ च नव- घर्णाः स्युरिति । अनुरुभ्यतीति 'अनोरुपिंच कामे' अनुपूर्वकरुध् वर्तमानाते "दिवादेः श्यः" । अन्यन यथाप्राप्तमिति यन सिलोपं विनापि पादः पूर्यते तत्र सिलोपो न भवति किन्तु पूर्वसूत्राण्येव २५प्रवर्तन्ते यथा स एप इत्यत्र “सो रुः" "रोर्यः” तस्य च लुरु असन्धिश्च ॥ १६ ॥ सूत्रम्- न सन्धिः ॥ १७॥[सि० ११३१५२ ] उक्तः सर्वोऽप्ययं सन्धिारामे न स्यात् । दधि अत्र । जिनः जयति ॥ १७ ॥ *सहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः । नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते ॥ २ ॥ ३० ते महोपाध्यायश्री कीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिताया हैमलघुप्रक्रियाया रेफसन्धि समाप्ठ । म० न १-१ "भव्ययस्य" । सन्धि १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." । द्विपदमिदं सूत्रम् । ततश्च विरामे विवक्षिते सन्धिर्न भवति, विरामाविवक्षायाम् एस्प्रयन्नोच्चारणे तु सन्धिर्भवति ।। १७ ।। अथ २३ यन्न नित्यमविरामो भवति यन्त्र च विचक्षया अविरामो विरामश्च भवति तानि स्थानानि निर्दिशति, प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । अकारान्ताः ८७ *संहितेति श्लोक: यन्न पद-विमच्यन्तम् , एकपदे नित्यमविरामो भवति ततश्च निलं संहिता सन्धिर्भ- वति यथा-देवेन, भवति । धातूपसर्गयोर्यथा उपैति । समासे यथा परमेश्वरः । वाक्ये तु सा विवक्षा- मपेक्षते इति विरामविवक्षया न सन्धिरविरामविवक्षया तु सन्धिरिति । यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ स्त्रोपनसत्प्रक्रिया- वृत्तौ वन्धुर एव (एप ?) पूर्तिमभजद्रेफस्य सन्धिः सुखम् ॥ १ ॥ ५ DOBCEO01 09202020205C Nouad अथ विभक्तिर्विभाव्यते 2090203cposceo game -- अथेति सन्धिप्रकरणकथनानन्तरं विभक्तिप्रकरणं निरूप्यते-सूत्रम् अधातुविभक्तिवाश्यमर्थवन्नाम ॥१॥[सि० १।१।२७ ] धातुविभक्त्यन्तवाक्यवर्जमर्थवच्छब्दरूपं नाम स्यात् । ततः स्यादयः सप्त विभक्तयो योज्यन्ते ॥१ अधातु० । धातुश्च विभक्तिश्च वाक्यं च धातुविभक्तिवाक्यं, न धातुविभक्तिवाक्यं अधातुविभक्ति वाक्यं, अधातुविभक्तिवाक्य १-१ "अतःस्य.” समाना० । अर्थोऽस्यास्तीति १-१ "तदस्यात्त्यः" इति मतुः "मावर्णान्तो०" मो वः अर्थवत् १-१ "अनतो लुप्" । नामन् १-१ "अननो." "नाम्नो नो०”।१५ त्रिपदमिदं सूत्रम् । धात्वादिवर्जनात् 'भू सत्तायाम्' भू इत्यत्र धातुत्वात् , 'देवस्य' इत्यत्र विभक्त्यन्तत्वात् , 'चैत्रः पठति' इत्यत्र वाक्यत्वात् नामसंज्ञा न स्यात्। नामसंज्ञायां चैपां खाद्युत्पत्तिः प्रसज्यते। विभक्तिरिति केवलाया विभक्तेरर्थवत्त्वाभावादप्रयोगाच विभक्त्यन्तं गृह्यते । वाक्यं प्राग्लक्षितमेव । अधातुविभक्त्य- न्तवाक्यं नाम इत्युक्ते मन्वायुधारितानां निरर्थकझब्दानां हस्ततालिकाचव्यक्तदाब्दानां च नामत्वं प्रसज्यते इति तद्वारणाय अर्थवच्छब्दरूपमिति । अर्थवच्छब्दरूपं नाम इत्युक्ते धात्वादीनामपि नामसंना स्यादिति २० तन्निपेधाय अधात्विति । नामसंज्ञायाः फलमाह-तत इत्यादि-सप्तविभक्तयो योज्यन्ते "नान्नः प्रधमक- द्विवहौ" "कर्मणि" इत्यादिसूत्रैः प्राप्नुवन्तीत्यर्थः । तानि सूत्राणि च कारकाधिकारे वक्ष्यन्ते ।। १ ।। स्यौजसित्यादि ॥२॥ सि औ जस् इति प्रथमा । अम् औ शस् इति द्वितीया । टा स्यां भिम् इति तृतीया । हे भ्यां भ्यस् इति चतुर्थी । इसि भ्यां न्यस् इति पञ्चमी । उस ओस् आम् इति पष्ठी । डि ओन् मु२५ इति सप्तमी । तत्राप्यर्थैकत्वविवक्षायां प्रथमैकवचनं सिः । ईकार उच्चारणार्थ इत् । देवन इति स्थिते । “सो रुः" "रः पदान्ते विसर्गस्तयोः" देवः । द्वित्वे-देव औ "एदासत्ध्यारः" इनि देवौ । बहुत्वे देव जस् । जंकारो विशेषणार्थः ॥ २ ॥ त्याजसित्यादि । अत्र च महाव्याकरणसूत्रं नृवितं तदम्-"स्योजसमीशदायांभिन्न भ्यांभ्यस्ङसिभ्यांभ्यसूडस्ओसाम्योत्सुपां त्रयी यी प्रथमादिः (मि, ११६ १७) अचं भावः-एपु प्रथमवचनत्रयं प्रथमासंलं भवनि [द्वितीयचनत्रयं] हिगीयानंझानित्यादि । . A १ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु-. अन्न ध यालयोधाय प्रक्रियाकारः सूनतात्पर्यमेव स्पष्टं लिखति-सि औ जस् इति प्रथमा इत्यादि । इकार इत् इति "सौ नवेतो" इत्यादौ, कारो विशेषणार्थ इति "जस :" इत्यादौ विशेपणार्थः ॥२॥सूनम् अत आः स्यादौ जस्भ्याम्ये ॥३॥[सि० १।४।१] स्यादौ जसि भ्यामि ये च परे अत आः स्यात् । ततः "समानानां तेन दीर्घः" इति दी देवाः । ५ "अदीपों दीर्घतां याति नास्ति दीर्घस्य दीर्घता । पूर्वदीर्घस्वरं दृष्ट्वा परलोपो विधीयते" ॥१॥ यद्वा "पर्जन्यवाष्टक्षणप्रवृत्तिः" इति दीर्घस्यापि दीर्घत्वम् । द्वितीयैकवचने देव अम् ॥३॥ अत आ: । अत् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । आ १-१ "सो रुः" र पदान्ते." "रोर्यः" तस्य लुगसन्धिश्च । स्यादि ७-१ "डिडौँ" "डित्यं." जस् च भ्यां च यश्च जस्भ्यांय तस्मिन् जस्भ्यांये ५-१ "अवर्ण" । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । "समानानां तेन.” इति दीर्घ सिद्धेऽन जस्महणं "लुगस्या- १० देत्यऽपदे” इत्यमारलुग्याधनार्थम् । ननु अनेन अकारस्य आत्वे देवा अस् इति जाते पिष्टपेपणन्यायेन "समानानां तेन." इति सूत्रेण किं करिष्यते इत्याह-अदीर्घो दीर्घतां यातीत्यादि । नन्वन समानानां तेनेति सूनं व्यर्थ कथं भवर्तते इत्यस्यरसादाह-यद्वेति-यथा पर्जन्यो मेघः फलाभावेऽपि समुद्रादौ धर्प- येव तथा सूनमपि फलाभावेऽपि प्रवर्तते इति दीघे सत्यपि पुनरपि समानानां तेनेति दीर्घः स्यादिति- भावः । म्यादौ जसीति किम् १ 'जसूच् क्षेपणे' वाणान जस्सतीति किम् वाणजः अस्मिन् जसि परे १५दीयों न स्यादित्यर्थः ॥ ३॥ सूरम्- समानादमोऽतः॥४॥ [सि० शा४६] समानात्परस्सामोऽकारस्य लुक् स्यात् । देवम् , देवौ । बहुवचने देव शस् । शकारः प्राग्मत् ॥४॥ समाना० । समान ५-१ "हेडस्यो०" "समानानां०" अम् ६.१ "लोकात्" "सोरुः"। अत् ६-१ "लोकात्" "सोश" "र: पदान्ते." । मध्ये "धुटस्तृतीयः" इति तस्य दः, "अतोऽतिक २० : अवर्णस्ये." "एदोतः" । विपदमिदं सूत्रम् । शकारः प्राग्वदिति "शसोऽता सश्व नः पुंसि" इसादो विशेपणार्थः ॥ ४ ॥ सूत्रम्- शसोऽता सश्च नः पुंसि ॥ ५॥ [ सि. १४९] शस्मनन्धिनाऽकारेण सह पूर्वसमानस दीर्घः सात् । तत्मनियोगे च पुंलिङ्गे शसः सो नः सात् । देवान् । तृतीपैकरचने देव टा, टकार इत् ॥५॥ शमो० । शम् ६-१ "लोकात्" "सोरः", अत् ३-१ "शेतात्" "अतोऽति." "अवर्णस्पे. "एदोत:." । ६-१ "रोगत्" "मोरः" । च १-१ "अव्ययस्य" "चटते.” रम्य शः । न १-१ "सो र" "र. पदान्ते." । पुम्स् ७-१ "शिड्डूऽनुस्वारः" । पट्पदमिदं सूत्रम् । अकारेण सहेति द्वयोः स्थाने एरो दीपः स्यात् । शसोऽशरम्य स्थानित्वेऽपि प्रधानस्थान्यासनो दीर्घः स्यादिति । चीयते धान्यादिरक्षाय "रिमेडोंचडो" (उणा १२२) इति टने घश्या तृणादिमयः पुरुषः, २०परएटीय मुदी सरयुटी एरं यष्टिः, अभेदोपचारेण हि शब्दोऽन्तिरे पर्चमानः शब्दाविस्थामा. प्यार सलिनमाजग्नेय पसते इति पप्रादयः सदाः पुरपे वर्चमाना अपि नीलं न त्यजन्तीति १२मोग भपति पवाः रारफुटी: यष्टीः पुरुषान् पश्य । यता तु शन्दस्य पुंलिङ्गत्वं तदा यस्तुनः सीत्वे प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे खरान्ताः पुंलिङ्गाः । अंकारान्ताः ८९ तस्य १० श्रीवत्वे वा नो भवत्येव-दारान् भ्रूकुंसान खीः पश्य । दीर्वसन्नियोगविज्ञानादिह नो न स्यात्-एतान् गाः पश्यति ॥ ५ ॥ सूत्रम् टाडसोरिनस्यौ ॥६॥ [सि० शा५] आस्परयोष्टाङसोरिनस्यौ स्याताम् । देवेन । “अत आः स्यादौ०" इत्यात्वे देवाभ्याम् ॥६॥ टाङ० । टा च डस् च टाङसौ तयोः टाङस् ६-२ "लोकात्" "सो रुः” इनश्च स्यश्च इनस्यौ ५ इनस्य १-२ । द्विपदमिदं सूत्रम् । टास्सोरिति तृतीयैकवचनपप्ठ्येकवचनयोरित्यर्थः ॥ ६ ॥ भिस ऐस् ॥ ७॥ [ सि० १४२ ] आत्परस्य सादेर्भिस ऐस् स्यात् । देवैः । चतुर्येकवचने देव डे, डकारो डित्कार्यार्थः सर्वत्र ॥ ७॥ भिस० । भिस् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" | ऐस् १-१ "दीर्घड्या०" । मध्ये 'रोर्यः" लुगसन्धिश्च । द्विपदमिदं सूत्रम् । डकारो हित्कार्यार्थः सर्वत्रेति-हेडसिङस्डियु ॥ ७ ॥ सूत्रम्- डेडस्योर्यातौ ॥८॥[सि०१६] अकारात्परस्य डेयर्यो, उसेश्च आत् स्यात् । “अत आ०" इत्यात्वे देवाय, देवाभ्याम् । देव भ्यम् इति स्थिते ॥ ८॥ ३० । डे च ङसि च डेडस्यौ तयोः डेङसि ६-२ ओस् "इवर्णादे०" "सो रुः" । यञ्च आच १५ यातौ यात् १-२ "लोकात्" । द्विपदमिदं सूत्रम् । स्थान्यादेशयोरुभयोरपि द्विवचनान्तत्वात् द्विसद्धय- त्वाच "यथासयमनुदेशः समानाम्" इति न्यायात्प्रथमस्य प्रथम आदेशो द्वितीयस्य द्वितीय आदेशो भवतीति निश्चित्य आह-डेर्यो उसेश्च आत् इति ॥ ८ ॥ सूत्रम्- एद्वहुस्भोसि ॥ ९॥ [ सि० १।।४ ] बहुत्वे सादौ सादौ भादौ ओसि च परेऽत एत् स्यात् । देवेभ्यः । पञ्चम्येकवचने, देव सि, २० इकारो सो विशेषणार्थः, ढेङयोरित्यात् देवात् । देवाभ्याम् । देवेभ्यः । टाढसोरिति सः सादेशे देवस्य । ओस्सेत्वेऽयादेशे देवयोः । देव आम् इति स्थिते ।। ९ ।। एन० । एन् १-१ "दीर्घड्या०” स् च भू च स्म वहुपु स्म बहुम बहुभ च ओन् च पटुत्भोम् तस्मिन् बहुम्भोस् ७-१ । "धुटस्तृतीयः" । द्विपदमिदं सूत्रम् । स्यादी सादी भादी इत्युक्त सिम्यां प- रेऽपि एत्वं प्राप्नोति तद्वारणाय बहुत्वे इत्युक्तम् , बहुत्वे सादी भादी इत्युक्ते विलसन्ति प्रणन्य भान्ति २५ इत्यादिपु प्राप्नोति तद्वारणाय स्यादी इत्युक्तम् , बहुत्ने स्यादी इत्युक्ते आमि शसि परेऽपि प्रामोतीति सादी भाद्री इत्युक्तमिति ॥ ९ ॥ सूत्रम्- हखाऽऽपश्च ॥ १०॥ [सि० १३२] हखादावन्तात् स्वीदन्ताच परसामो नाम् सान् ॥ १० ॥ 80 खच आप च हत्वाप् तस्मात् हत्या ५.१ "लोकान्" "सोरुः" । १.१ "सर- यस्" । मध्ये "चटते." । हिपदानिदं सूबम् । हसान्तादिति ' मटा' इति दनदनोभ्यो ३१ १० प्रा० पूर्वा० १२ - - - । ९० महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- यथा देवानां मुनीनां साधूनां पितॄणां होतॄणाम् । आवन्तात् यथा मालानाम् । स्त्रीदन्तेभ्यो यथा नदीनां वधूनामिति ॥ १०॥ दीघों नाम्यतिसृचतस्परः ॥ ११॥ [ सि० शा४७] तिस-चतस-परान्तवर्जसमानस्य नामि परे दीर्घः स्यात् । देवानाम् । सप्तम्येकवचने देवे । ५द्विवचने देवयोः। बहुवचने "एबहुस्भोसि" इत्येत्वे देवे-सु इति स्थिते ॥ ११ ॥ दीर्घो० । दीर्घ १-१ "सो रुः" । नाम् ७-१ "लोकात्” । तिसा च चतसा च पच र च तिस- चतस्पर न तिसूचतस्पर् अतिसूचतसृष्र् तस्य अतिसूचतस्पर् ६-१ "लोकात्" "सो रु" "र: पदान्ते." | मध्ये "घोपवति" "अवर्णस्ये." "इवर्णादे । त्रिपदमिदं सूनम् । तित्रादिवर्जनात् तिसृणां चतसृणां पण्णां चतुर्णामित्यादिपु दी| न भवतीति । ननु सप्तम्या निर्दिष्टे पूर्वस्य तथानन्तर- १० स्यान्यवहितस्य स्यादिति पण्णां चतुर्णामियन पकाररेफाभ्यां समानस्य व्यवधानादीर्घप्राप्तेरभावात् किं प्रतिपेधेनेसनोच्यते-अप्र इति प्रतिषेधेन 'येन नाव्यवधानं तेन व्यवहितेऽपि स्यात्' इति ज्ञाप्यते, ततश्च पञ्चानां सप्तानामित्यादी नकारेण व्यवहितेऽपि नामि दीर्घः स्यादिति ॥ ११ ॥ नाम्यन्तस्थाकवर्गात् पदान्तः कृतस्य सः शिड्नाऽन्तरेऽपि ॥ १२॥ [ सि. .२१३१५] .१५ नाम्यन्तस्साफनर्गेभ्यः परस्य पदमध्ये वर्तमानस्य केनचित् सूत्रेण कृतस्स सस पः सात् । शिटा नकारेण च व्यवधानेऽपि स्यात् । देवेषु ॥ १२ ॥ नाम्यानामी च अन्तस्थान कवर्गश्च नाम्यन्तस्थाकवर्ग तस्मात् नाम्यन्तस्थाकवर्ग ५.१ "हेडस्यो."। पदस अन्तर्मध्ये पदान्तः ७.१ "अव्ययस्य" कृत ६.१ "टाहसो."स् ६-१ "लोकात्" "सो." "र: पदान्ते०" । शिद् च नश्च शिड्नी, शिड्नाभ्यामन्तरं शिड्नान्तर ७-१ अपि १-१ "अव्ययस्य" । २० "एदोतः" । पञ्चपदमिदं सूत्रम् । नाम्यन्तस्थाकवर्गेभ्य इति द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणः शन्दः प्रत्येकमभि- सम्पध्यते इति प्रत्येक पञ्चमी योग्यते। कमेणोदाहरणानि-नामिन:-आशिपा नदीपु वायुषु यथए पितृपु देवेषु गोपु नोपु । अन्तस्याःगीर्षु हल्यु । कवर्ग-शक्ष्यति कुपु । शिड्नान्तरेऽपि-सपिप्पु- सर्पिस् मु इति स्थिते "नामसिद." इति पदसंज्ञायां "सोस" "शपसे शपसं या" इति रोः सत्वे सन्ययधानेऽपि मुपः पत्वे ततः "सस्य शपों” इति पूर्वसस्यापि पत्वम्, पक्षे सर्पिःषु अन हि ": २५पदान्ते." इति विसर्गे यते तस्य शियान् एतव्ययधानेऽपि पत्यम् , एवं यजूंपि इत्यत्र "शिद्देऽनुस्वारः' इत्यनुस्वारे पते पत्वम् । नकारस्यारश्यमनुस्वारभवनात् शिड्प्रहणेनैन सिद्ध नारोपादानं नकारस्थाने. यानुस्रेण यया म्यादित्येवमर्थ तेन मकारानुस्वारेण न स्वायथा पुंमु।[शिटा नकारेण पान्तरे इति] प्रत्येयं याम्यसमाप्तः सिड्नपारयोर्द्वयोर्व्यवधाने पत्य न भवति-निमुकि चुम्चने निस्से । कृतस्येति सूत्रविधानेन विहितस तत्सम्बन्धिनोऽपितर कृतम्य यथा एपा, कृतसम्बन्धिनो यथा देवेषु । ३० पदावरिति विम्' इपिसेर, अत्र हि *"वृत्त्यन्तोस" [सि. १।१।२५ ] परार्याभिधायि समासारिरिसम्या अन्तोऽयसानं पदं न म्या । यथा पदुदण्डिनो यद्यो दण्टिनो ययोसी इत्य- प्रान्तमतिविमण्यारपेग प्रानं पदत्यमनेन निपिध्यते ततो नानो नोऽनहः" इति नहोपो न भवति । ३भरप इति लिन् ? .सल तु पत्ये पदमेवेति परनाा सेक इत्यस्य परसंझायां यदादित्वात् दृधिसेफ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । अकारान्ताः ९१ इत्यत्र सस्य पत्त्रं न स्यात् । कृतस्येति किम् ? विसम्-अत्र "उणादयोऽव्युत्पन्नानि नामानि"इति वचनात् 'विसच् प्रेरणे विस्वतीति के निष्पन्नत्वाद्वा सकारस्य न सूत्रकृतत्वमिति न पत्वम् ।। १२ ।। सूत्रम्- अदेतः स्यमो क् ॥ १३ ॥ [सि० १४४४] अकारान्तादेकारान्ताच सेस्तदादेशस्याऽमश्च सम्बोधने लुक् सात् । सम्बोधनाभिव्यक्तये हेशब्दस्य प्राक्प्रयोगः । हे देव । हे देवौ । हे देवाः । एवं घटपटादयोऽकारान्ताः पुंल्लिङ्गाः। ५ सर्वादीनां तु विशेष:-सर्व विश्व उभ उभयट् अन्य अन्यतर इतर इतर डतम त्व त्वत् नेम। समसिमौ सर्वार्थी । पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायाम् । स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् । अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोरपुरि । त्यद् तद् यद् अदस् इदम् एतद् एक द्वि. युष्मद् भवतु अस्सद् किम् । इत्यसंज्ञायां सर्वादिः । एते सर्वादयस्त्रिलिङ्गाः । तत्र पुंल्लिङ्गे रूपाण्युच्यन्ते । सर्वः । सौ ॥ १३ ॥ ० । अश्च एच अदेत् तस्मात् ५-१ "लोकात्" "सो रुः" "रः पदान्ते" । सिच अम् च स्यमौ तयोः स्यम् ६-२ । लुक् १-१ दीर्घड्या०"। त्रिपदमिदं सूत्रम् । तदादेशस्य अमश्चेति नपुंसकलिने यः सेरादेशोऽम् तस्यापि सम्बोधने लुक् स्यात् । यथा हे कुल १-१ "अतः स्यमोऽम्” इति सेरम. तस्य अनेन लुक् । एवं सर्वेऽप्यकारान्ताः पुंल्लिङ्गाः। प्रयोगश्चैवम्-"देवः स्तात्सुग्यदोऽस्तु वो जिनपतिर्देवं भजे चेतसा, देवेनेयमलता वसुमती, देवाय तुभ्यं नमः । देवादरमियाय दोषपटली, १५ देवस्य भृत्योऽस्म्यह, देवे ज्ञानमनुत्तरं विजयते हे देव देहि श्रियः" ॥ १ ॥ सर्वादीनां तु विशेष:-कथ्यते इति शेपः । के ते सर्वादय इत्याह-सर्व विश्व इत्यादि-पञ्च- त्रिंशत्परिमितः सर्वादिगण इति । अत्र विश्वशब्दम्य सकलार्थवाचकत्वे सर्वादित्वं न तु जगद्वाचकवे । उभशब्दो व्यर्थे । उभयदशब्दो ब्यवयवार्थे, उभयट इत्यत्र टकार इन् स्त्रीलिने उयर्थः ततश्च "अणजेये- कणनन्नन्दिताम्" इति इयां उभयी प्रकृतिः । अन्याऽन्यतरे'तरे अन्यदर्थे । डतरडतमौ प्रत्ययो २० ततो डतरडतमप्रलयान्ती झब्दी सर्वादी । "प्रकृतिग्रहणे स्वार्थिकप्रत्ययान्तानामपि प्राणाम" इनि न्यायात डतरडतमप्रत्ययान्तग्रह्ण सिद्धेऽपि डतरडतममहणमन्यस्वाधिकप्रत्ययान्तानां नादिन्यनिषेधार्थ तेन सर्वतमायेत्यत्र न सर्वादित्वम्, अत्र "प्रकृष्टे तमप्" इति स्वार्थिकस्तमप । इनरग्रहणय सिद्ध ..

१२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- चात्मीये धने स्वाल्या प्रवर्तते" तत्र यदा स्वशब्द आत्मवाची आत्मीयवाची तदा सर्वादिः यथा स्वस्मै रोचते आत्मने रोचते इत्यर्थः, स्वस्मै पुत्राय आत्मीयायेत्यर्थः । यदा तु ज्ञातिधनवाची तदान सर्वादिः- यथा एते वा ज्ञातयः, स्वानां द्रव्याणामित्यर्थः । अन्तरं पहियोगोपसंव्यानयोरपुरीति-"मध्ये १ छिद्रे २ विशेपे च ३ व्यवधाने ४ वहिर्युते ५ । उपसंव्यान ६ इत्येवं पडर्थमन्तरं विदुः" ॥ १॥ यहियोग ५इति बाह्येन सह योगो बहिर्भावेन सह योगो द्वयमप्युच्यते ततो बहियोंगोपसंन्यानयोरन्तरशब्दः सर्वादि:- यथा अन्तरस्मै गृहाय नगरवाहचाण्डालगृहयुक्ताय नगराभ्यन्तरगृहाय नगरबाह्याय चाण्डालगृहाय या इत्यर्थः । उपसंव्यानं वस्त्रान्तरेण पिहितं परिधानवस्त्रम्-"अन्तरीयं निवसनमुपसंन्यानमित्यपि" इति पचनात्, तस्मिन्नभिधेये अन्तरशब्दः सर्वादिः यथा अन्तरस्मै शाटकाय पटचतुष्टये परिहिते तृतीयाय पतुर्थाय वा अभ्यन्तरशाटकायेत्यर्थः । प्रथमद्वितीययोस्तु वहिर्भावेन बाह्येन च योगेन च सिद्धमेव १० सर्वोदित्वम् । अपुरीति-पुरि तु याच्यायो अन्तरशदः सर्वादिर्न यथा अन्तरायै पुरे चण्डालादिवाह्य- पुर्य इत्यर्थः । बहिर्योगोपसंख्यानाभ्यामन्यत्र तु अन्तरशब्दो न सर्वादिः-प्रामयोरन्तरादयमागतः मध्या- दियर्थः । प्रयोगश्च द्याश्रयमहाकाव्ये "चक्रुरस्यारयो वसायान्तरस्मै कृतस्पृहा । अन्तरायाः पुरो याच्या- मन्तरस्माद् गृहादपि" ॥१॥ इत्यसंज्ञायां सर्वादिरिति-यदा त्वेते संज्ञायां तदा न सादयः यथा सर्यो नाम कश्चित्तस्मै सर्वाय, गौणत्वेऽपि न सर्वादयः-यथा प्रियसर्वाय । तथैवैते सर्वादयः सर्वनाम- १५संझका भवन्ति यथोक्तम्- "सर्यादिः सर्वनामाख्यो न चेद्गौणोऽथवाऽभिधा पूर्वादिश्च व्यवस्थायां समोऽ- तुल्येऽन्तरोऽपुरि।।शा परिधाने पहिोंगे वोऽर्थज्ञात्यन्यवाच्यापि" ( उभशब्दस्य भवच्छब्दस्य द्विशब्दस्य त्वच्छन्दस्य युष्मदस्मदोश्च सर्वादिमध्ये महणं "सर्वादेः सर्वाः” ( २।२।११९) इति सूत्रेण हेत्वोंगे सर्वविभक्ष्यर्थम् यथा उभौ हेतू २ उभाभ्यां हेतुभ्याम् ३ उभयोहत्वोः २, द्वौ हेतू २ द्वाभ्यां हेतुभ्याम् ३ द्वयोर्हेत्वोः २, भवान् हेतुः, भवन्तं हेतुम्, भयता हेतुना इत्यादि, त्वत् हेतुः, स्वतं हेतुम् , त्वता २० हेतुना, त्वते हेतवे इत्यादि । मतान्तरे घ हेत्वोंगे सर्वादेस्तृतीयाद्या एव सर्वा विभक्तयो भवन्ति । तथा एषां "त्यादिसर्वादेः खरेवन्यात्पूर्वोऽक्" [सि० ७।३।२९] इसक्प्रत्ययार्थं च सर्वादिमध्ये महणम्-यथा कुत्सितो अल्पो अज्ञातौ वा उभौ उभको, एवं द्वको भवकान् भवकन्तौ भवकन्तः, त्वकत् इत्यादि। स्वच्छन्दः प्रायश्च्छन्दस्येव । एवं भवादृशः युष्मादृशः त्वादृशः अत्र "अन्यत्यदादेराः" [सि० ३२२३१५२ ] इत्यात्वम् । भवान् पुत्रोऽस्य भवत्पुत्रः अत्र "विशेषणं सर्वादिसवयं बहुधीही" २५[३३१११५०] इति पूर्वनिपातः । भवतोऽपसं भावतायनिः अत्र सदादित्वात् "अयुद्धादोर्नवा" (६।१।११०) इत्यायनिन् । भवत्याः पुत्रो भवत्सुत्रः अत्र "सर्वादयोऽस्यादौ" [सि० ३२१६१] इति पुंवद्भावः । भवन्तमवतीति फिपि भवद्यङ् अत्र "सर्वादिविध्वग्देवाइद्रिः क्यञ्ची" (३।२।१२२) इति इद्रिः। एवमन्येष्वपि ययायोगं सर्वादिप्रयोजन क्षेयम्। भवतु इत्यत्र उकारोडयों नामार्थो दीर्घार्यश्च भवती भयान् । क्या अस्मिन् सर्वादिगणे यदादिशिब्दपर्यन्तोऽष्टकस्त्यदादिः, पञ्चकोऽन्यादिश्चान्तर्गको ३०या । ऐते सर्वादयलिलिगा यथा सर्वे पुरुषाः सर्वाः स्त्रिया सर्वाणि कुलानि इत्यादि । १३ ।। सूत्रम्-- जस इः ॥ १४ ॥[सि० १४९] सादरकारान्तस्य जस : स्यात् । सर्वे । सर्वम् सर्वा सर्वान् । सर्वेन इति जाते ॥ १४ ॥ उस् ६.१ "लोकात्" "सो नः" । इ १-१ "सो " "र: पदान्ते." । मध्ये "रोर्यः" तस्य परे परे एम्या सुक्यसन्धिश्च । द्विपदमिदं सूरम् । पृत्तिः स्पष्टा । मन पश्यन्तस्य" इति प्राप्ते ३५."त्यसप्रत्ययस्य साने विपीयमान आदेशा सयंस सादिति परिमापा ।। १४ ।। सूत्रम्-- .

- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । अकारान्ताः ९३ रवर्णान्नो ण एकपदेऽनन्त्यस्याऽलचटतवर्गशसाऽन्तरे ॥ १५ ॥ [ सिक २।३।६३1 रेफपकारऋवर्णेभ्यः परस्य एभिः सहकपदस्थस्याऽनन्त्यस्य नो णः खात् । लादीन्विना शेपव- र्णव्यवधानेऽपि भवति । सर्वेण । एकपद इति किम् ? अग्निर्नयति चर्मनासिकः । अनन्त्य इति किम् ? सर्वान् । लादिवर्जनं किम् ? विरलेन मूर्छनम् दृढेन तीर्थेन रशना रसना । सर्वाभ्याम् ५ सवैः ॥१५॥ रश्च प् च ऋवर्णश्च रपृवणं तस्मात् रपृवर्ण ५-१ "ङङस्योर्याती" रपृवर्णात् । न ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । ण १-१ "सो रुः" । एकं १-१ च १-१ तत् १-१ पदं १-१ च १-१ "पूर्वकालैक०" इति कर्मधारये एकपद ७-१ "अवर्णस्ये." । अन्ते भवः अन्त्यः "दिगादिदेहाशाद्यः" "अवर्णवर्णस्य" इति अकारलोपे अन्त्यः न अन्यः अनन्त्यः ६-१ "टाङसो." । "धुटस्तृतीयः” तस्य दः "तृतीयस्य १० पञ्चमें" दस्य नः तथा "घोपवति" अवर्णस्ये०" तथा "रोर्यः” तस्य स्वरे परे लुग्वा लुक्यसन्धिञ्च, तथा "एदोतः पदान्तेऽस्य लुक्” चश्च टश्च तश्च चटताः चटतानां वर्गाः चटतवर्गाः शश्च सञ्च शसौ लश्च चटतवर्गाश्च शसौ च लचटतवर्गशसाः न लचटतवर्गशसाः अलचटतवर्गशसाः अलचटतवर्गशसैः अन्तरम् अलचटतवर्गशसान्तरम् तस्मिन् अलचटतवर्गशसान्तर ७-१ "अवर्णस्ये."। पट्पदमिदं सूत्रम् । लादीन्विनेतिलादीनामष्टादशानां वर्णानां व्यवधाने न भवति शेपवर्णव्यवधाने तु भवति-यथा सर्वण १५ इत्यत्र वकारैकारयोरन्तरेऽपि णत्वं सिद्धम् , चर्मनासिक इत्यत्र समासाश्रयेणकपदत्वेऽपि 'प्रत्ययलोपेऽपि प्रत्ययलक्षणं कार्य भवति' इति समासान्तर्वतिविभत्त्याश्रयणाद्भिन्नपदत्वे सति न णत्वम् ।।१५।। सूत्रम्--- सर्वादेः स्मैस्मातौ ॥ १६॥ [सि० १४७] सर्वादेरकारान्तस्य डेडस्योः सैसातौ स्याताम् । सर्वसै सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः । सर्वसात् सर्वा- भ्याम् सर्वेभ्यः । सर्वस्य सर्वयोः ॥ १६ ॥ सर्व आदिर्यस्य स सर्वादिस्तस्मात् सर्वादि ५.१ "हित्यदिति" "एदोश्यां०" स्मं च स्माच स्मैग्माती, स्मैस्मात् १-२ "लोकात्” । द्विपदमिदं सूत्रम् । सर्वेभ्य इत्यत्र "एद्वहुस्भोसि" इत्येत्वम् ॥ १६॥ सूत्रम्- अवर्णस्यामः साम् ॥ १७॥ [सि० १११५] अवर्णान्तस्य सर्वादेरामः साम् स्यात् । एत्वपत्वे । सर्वपाम् ।। १७ ॥ अवर्ण अवर्ण ६.१ "टाइसो." आम् ६-१ "लोकात्" "सो नः" "र: पदान्ते." । साम् १-१२५ "दीर्घड्या."। त्रिपदमिदं सूत्रम् । एत्वपत्वे इति-"पुनरेपाम्" इत्यादिसूत्रनिर्देशान् नापकान, सन्निपा- तलक्षणन्यायस्यानित्यत्वात् (च) “एदहुस्भोसि" इत्येत्वे "नाम्यन्तस्याः" इति पत्वमित्यर्थः ॥१७॥ सूत्रम्- उः स्मिन् ॥ १८॥ [सि० ] सर्वादेरकारान्तस्य ः स्मिन् स्यात् । सर्वस्मिन् । सर्वयोः। सर्वेषु । हे सर्व, हे सर्वी, हे संयं ॥१८॥ ० डि. ६-१ ॥हित्यदिति" "पदोळ्यां" "र: पदान्ते." ! जिन १.१ पदीयाः" । हिप-३० दमिदं सूत्रम् । सर्वयोरिति-"एदह " एत्वे "पडतो." सर्वेषु इति-"रादह " पत्ये "नान्यनगण। इति पः । हे सर्व इत्यत्र "जस इः" ।। १८ ।। सूत्रम्- महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु-- नवभ्यः पूर्वेभ्य इस्मास्मिन्वा ॥ १९ ॥ [सि० १४११६] पूर्वादिनवका जस्ङसिडीनाम् इसासिनो वा स्युः । पूर्वे पूर्वाः । पूर्वमात् पूर्वात् । पूर्वसिन् पूर्वे । नवकादिति किम् ? त्ये ॥ १९ ।। नव० । नवन् ५-३ भ्यस् "नानो नो." "सो रुः" "र: पदान्ते." । पूर्व ५-३ भ्यस् "पदहु ५"सो "। "रोर्यः तस्य लुगसन्धिश्च । इच स्माच स्मिन् च इस्मास्मिन् १-१ "अनतो लुप्" । या २-१ "अव्ययस्य" । चतुप्पदमिदं सूत्रम् ।। यद् १-३ "आढेरः" "लुगस्या०" त्य "जस इ." अवर्णस्ये०" ॥ १९ ॥ सूत्रम्- नेमार्द्धप्रथमचरमतयायाल्पकतिपयस्य वा ॥ २० ॥ [सि० शा१०] नेमादीनां शब्दानां तयायप्रत्ययान्तानां च जस इर्या स्यात् । नेमे नेमाः। द्वितये द्वितयाः। १० नये त्रयाः । अत्र नेमशब्दस्य सर्वादित्वान्नित्यं प्राप्ते, शेषाणां चापासे विकल्पः ।। २० ॥ नेम० । नेमश्च अर्द्धश्च प्रथमश्व चरमश्च तयश्च अयश्च अल्पश्च कतिपयश्च नेमार्द्धप्रथमचरमतया- याल्पकतिपयं तस्य नेमार्द्ध० ६.१ "टाडसो०" । वा १-१ "अव्ययस्य" । द्विपदमिदं सूत्रम् । नेमा. दीनां शब्दाना पण्णामित्यर्थः, तयायप्रत्ययान्तानां चेति द्वितयद्वयादिशब्दानामित्यर्थः । द्वौ अवयवो येपो ते *"अवयवात्तयद" (७१।१५१) अवयववृत्तेः सयार्थात् स्यन्तात्पष्ट्यर्थेऽवयविनि तयटू स्यात् । १५ "ऐकाध्य" इति विभक्तिलुपि "उतार्थानामप्रयोगः” इति अवयवशब्दाप्रयोगे द्वितय १-३ अनेन विकल्पेन "जस :" द्वितये द्वितयाः, एवमेकतयनितयचतुष्टयपश्चतयपट्तयसप्ततयाटतयनवतयदशत. यविंशतितयशततयसहनतयलक्षतयप्रभृतयो ज्ञेयाः । *"द्वित्रिभ्यामयडा" (७।१।१५२) आभ्यामवय. यार्थाभ्यां स्यन्ताभ्यां पष्ट्यर्थेऽयड् वा स्यात् । द्वये द्वयाः । तयट् अयट् इत्यत्र दित्वात् स्त्रियां "अण. येरणनमूलभूटिताम्” (२।४।२०) इति डयां द्वितयो द्वयी इत्यादि भवति । शेषाणां चाप्राप्त इति २० अर्द्धप्रथमचरमतयायाल्पफतिपयानां सर्वादित्याभावादप्राप्ते विकल्प इति भावः ॥२०॥ सूत्रम्- द्वन्दे वा ॥ २१ ॥ [सि० ११४११] द्वन्द्वसमासे सर्यादीनां जस इर्या स्यात् । पूर्वापरे पूर्वापराः ॥ २१ ॥ द्वन्द्वे० । द्वन्द्व ७.१ अवर्णस्ये० । या १-१ "अन्ययम्य" । द्विपदमिदं सूत्रम् । पूर्वे च परेच पूर्वा- परे १-३ पक्षे पूर्वापराः ॥ २१ ॥ सूत्रम्--- न सर्वादिः ॥ २२ ॥ [ सि० १२११२] द्वन्द्वे सर्यादिः सर्यादिर्न स्यात् । पूर्वापराय । कतरफतमानाम् ॥ २२ ॥ नान १.१ "अव्ययस्य" । सर्व आदिर्यस्य स सर्वादिः १-२ "सो रुः" "र: पदान्ते." द्विप. दमिदं सूयम् । पूर्वध अपरश्न पूर्वापरं सम पूर्वापर ४-१ स्पो." "अत आः स्यादी." द्वयो- मध्ये प्रायः ५: "पत्तकिमन्यान्" इति फिमशब्दान् सतरः पतरः १-२, पानां मध्ये प्रष्टाः फे इति ३."याना प्रभे स्तमय" इति रिमशब्दात् टतमः "डिसन्त्यसरादेः" फतरा कतमश्च कतरफ्तम ६-३ "म्यापम" "दीपों गाम्य." दक्षिणोत्तरपूर्वाणामित्राय "सादयोऽस्यादी इति पुंपारो भपत्येय वन २५ भूतपूपम्पारि सादेपणान् ।

- । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । अकारान्ताः ९५ तथा "तृतीयान्तात् पूर्वावरं योगे” (सि० १।४।१३) तृतीयान्तात्परौं पूर्वावरौ योगे सम्बन्धे सति सादी न स्याताम् । मासेन पूर्वाय मासपूर्वाय, दिनेनावराय दिनावराय, दिनेनावराः दिनावराः। तृतीयान्तादिति किम् ? प्रामात्पूर्वस्मै मासेन । योग इति किम् ? यास्यति चैत्रो मासेन, पूर्वस्मै दीयतां कम्वलः ।। २२ ॥ सूत्रम्- तीयं डिस्कार्ये वा ॥ २३॥ [सि० ११४१४ ] तीयान्तं डेङसिङिपु सर्वादिर्वा स्यात् । द्वितीयस्सै द्वितीयाय । द्वितीयस्मात् द्वितीयात् । द्विती- यस्मिन् द्वितीये । तृतीयमै तृतीयाय । तृतीयस्मात् तृतीयात् । तृतीयस्मिन् तृतीये । शेपं देववत् । उभशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः । उभौ २ । उभाभ्याम् ३ । उभयोः २ । उभयशब्दस द्विव- चनाभावः । एवं च द्वित्वे उभशब्द एकत्ववहुत्वयोश्चोभयशब्दः प्रयोज्यः-उभयो मणिः उभये देवमनुष्याः । मासशब्दस्य 'विशेषः ॥ २३ ॥ तीयं० । तीय १-१ "अतः स्यमोऽम्" "समाना० । डितां कार्य डित्कार्य तस्मिन् डिस्कार्य ७-१ "अवर्णस्ये." । वा १-१ 'अव्ययस्य" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । तीयान्तमिति तीयप्रत्ययान्तौ द्वितीयतृती- यशब्दावित्यर्थः । उसो ङित्वेऽपि सर्वादिकार्याभावादनानुपादानमित्याह-डेङसिङीनां कार्ये इति । अत्रैव सर्वादित्वं नान्यत्र तेनाक् न भवति, तथा च कप्प्रत्यये सति स्वार्थिकप्रत्ययान्ताद्ग्रहणात् स्मैप्रभृतयो न भवन्ति कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वा द्वितीयो द्वितीयकस्तस्मै द्वितीयकायेत्यादि भवतीति । द्वयोः ६-२१५ सङ्ख्यापूरणः १-१ "द्वेस्तीयः" इति द्वितीयः । त्रयाणां ६-३ सहयापूरणः १-१ *'स्तीयस्तृत्वं चास्येति तृतीयः। द्वितीयस्मै द्वितीयायेति चतुर्येकवचने, पञ्चम्येकवचने द्वितीयस्मान् द्वितीयात् , सप्तम्येक- वचने द्वितीयस्मिन् द्वितीये । एवं तृतीयस्मै तृतीयाय । उभयो मणिरिति १-१ उभयं २-१ उभयेन ३-१ उभयस्मै ४-१ उभयस्मात् ५-१ उभयस्य ६-१ उभयस्मिन् ७-१ उभये १-३ उभयान २-३ उभयः ३-३ उभयेभ्यः २ [४-३५-३] उभयेपां ६-३ उभयेपु ७-३ इति । उभयशब्दस्य द्विवचनं नास्तीति २० कैयटः अस्तीति हरदत्तः इति सिद्धान्तकौमुद्याम् । तथा समासविपये उभशब्दस्य स्थाने उभयशब्द- प्रयोग एव साधुः, यदाह कैयट:-उभानुदात्तो नित्यमिति नित्यग्रहणस्येदं प्रयोजनम् वृत्तिविपये उभ- शब्दप्रयोगो माभूत्, उभयशब्दस्यैव यथा स्यादित्युभयपुत्र इत्यादि भवतीति । पुनरपि अकारान्त- शब्देषु विशेपमाह ॥ २३ ॥ सूत्रम्- मासनिशाऽसनस्य शसादौ लुग्वा ॥ २४ ॥ [सि० २११११००] शसादी स्यादावेषां लुग्वा स्यात् । 'पष्ठ्या निर्दिष्टेऽन्त्यस कार्यम्' । मासः मासान् मासा मासेन ॥ २४ ॥ माल० । मासञ्च निशा च आमनं च माननिशासनं १-१ तन्य माननिशासन ६-१ टाटसो"। शम् १-१ आदिः १-१ यस्य स झसादिः तम्मिन् शसादि ७-१ "रिडी' "डिन्यन्त्यः" । लुग् १-१ "दीर्चः" वा १-१ "अव्यचय" । चतुप्पनिदं सूत्रम् । "पंष्ट्यान्यन्य" इति परिभाग । माल-३० भ्याम् इति स्थिते अनेन अकारलोपे माम् भ्याम् इति स्थिते कार्यान्तरमाद-॥ २४ ॥ मूत्रम्- नाम सिदय्व्यञ्जने ॥ २५ ॥ [सि० ११।२१] सिति प्रत्यये यवर्जन्यजनादौ च परे नाम पदं सात् । अवर्णभोरिति लडकि माभ्याम् । ३३ २५ - [ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- "धुटवस्तीयः" इति दत्वे माझ्याम् । मासाभ्याम् । सर्व विभक्तिपु वा लुगिति केचित्-माः, मासः ॥ २५ ॥ नाम । नामन् १-१ "अनतो लुप्" "नानो नो०" । स् इत् यस्य स सित्, न विद्यते य् यत्र तद् अय् , अय् च तद्व्यञ्जनं च अव्यञ्जनं सिम अयव्यञ्जनं च सिदयव्यञ्जनं ७-१ "अवर्णस्ये." ५द्विपदामिदं सूनम् । सिति प्रत्यये इति तस्योदाहरणमेवम्-भवतः ६-१ अयम् १-१ भवदीयः "भवतोरि- पीयसी" इति ईयस् । अस्य सित्वात्पदसज्ञायां "धुटस्तृतीयः" इति तस्य दः । यवर्जनात् ये परे नाम्नः पदसंज्ञा न भवति वाच् वाचमिच्छति "अमाव्ययात् क्यन् च" इति यप्रत्यये वर्तमानातिव "कर्त्तर्य." "लुगस्या०” याच्यति, यदि त्वर पदसज्ञा स्यात्तदा "चजः कगम्" इति कत्वे वाक्यतीति स्यात् ।। ततो ऽनेन पदसज्ञायां "सो रुः" इति सस्य रुः ततो अवर्णभोरिति रुलुक । पक्षे "धुटस्तृतीयः" इति १० दत्वे इति-'दन्या लतुलसा' इति वचनात् स्थान्यासनः सकारस्य तवर्गसम्बन्धी तृतीयो दकारो भवती- सर्थः। 'केचिदिति सारस्वतीयाः। तथाहुः-मासस्थालोपो वा मासशब्दस्याकारस्य लोपो वा भवति सर्व- विभक्तिपु परतः, मा मासः इत्यादि । निशाशब्दः स्वरान्वस्त्रीलिङ्गे आसनशब्दश्च स्वरान्तनपुंसकलित वक्ष्यते । पुनरप्यकारान्तानां शब्दानामेव विशेपमाह-।। २५ ।। सूत्रम्-- दन्तपादनासिकाहृयामृग्यूपोदकदोर्यकृच्छकृतो दत्पन्नस्हृदसन्यूपन्न- १५दन्दोपन्यकञ्शकन् वा ॥२६॥ [सि० २३१०१०१] शमादौ सादौ परे दन्तादीनां दशानां दत्प्रभृतयो दशादेशाः वा स्युः । दतः दन्तान् । दयाम् दन्ताभ्याम् । पदः पादान् । पञ्चाम् पादाम्याम् ।। २६ ।। दन्त । दन्तश्च पादश्च नासिका च हृदयं च असृग् च यूपश्च उदकं च दोस् च यकृच शकुन पन्तपादनासिकादयामृग्यूपोदक्दोर्यकच्छन् तस्य दन्त० ६.१ "लोकात्" "सो :" दैन् च पत् च २० नम् प हद् च असन् च यूपन् थ उदन च दोपन् च यपन घ शकन् च दत्पन्नसहदसन्यूपन्नुदन्दो. पन्यकशान् १-१ "अनतो लु" । या १-१ "अव्ययस्य" । निपदमिदं सूत्रम् । दन्तपादयूषा अत्र प्रस्तुताः, शेया यथास्थानं वक्ष्यन्ते । दतः दन्तानिति शसि रूपम् , दत्ता दन्या दद्भिः दत्सु । एवं पद: पदा पन्या पत्नु। पक्षे तु सर्वाणि रूपाणि देववत्। यूपशब्दस्य यूयन्नादेशे यूपन् २-३ अस् इति थिते पार्यान्तरमा ॥ २६ ॥ सूना- अनोऽस्य ॥ २७॥ [सि० २११११०८] व्यामधुरवर च अनोऽस्य लुक सा । यूप्णः, यूपान् ॥ २७ ॥ अनो० । अन ६-१ "रोफान्" "सोरुः" । अ६.१ "टाइसो." | "अवोऽति." अवर्ण."। "एशोनः" । द्विपदमिदं सूनम् । अनेन अवारलोपे "रपृवर्णा." पक्षे यूपान् । सृतीयेकवचने यूप्मा, यूपेण । तृतीयाद्विवचने यूपन् भ्यानिति स्थिते पार्यान्तरमाह ॥ २७ ॥ सूत्रम्-- नाम्नो नोऽनह्वः ॥ २८ ॥[सि० २११९१] पदान्न नामो नस सुरु सात् म घेदवो न सान् । यूपम्पाम् । यूपाभ्याम् ॥ २८ ॥ नामो० । गामन् ६-१ "मनोऽस” इत्यनुरि "टोकाम्" "सो " न ६.१ "लोकात्" "सो रः" । न मदन अनन् सम्य अनन् ६.१ "अनोऽम्य" "लोया "सोर" "पदान्ते."।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । हखदीर्घाकारान्ताः एकत्र "घोपवति" अन्यत्र "अतोऽतिः" "अवर्णस्ये." "एदोतः” । त्रिपदमिदं सूत्रम् । स चेदह्रो न स्वादिति स नकारश्चेदहन्ाब्दसम्बन्धी न स्यात्तदा लोपः स्यात् । अहनशब्दसम्बन्धिनकारस्य तु लोपो न स्यादित्यर्थः । यथा अहन्भ्यामित्यत्र पदसंन्नासद्भावेऽपि अनेन नकारलोपनिषेधात् "अह्नः इति नस्य रुत्वे अहोभ्याम् । स्त्रीलिङ्गे "नियां नृतो." (२।४।१) इति विहितायां ड्यामप्यनो नका- रस्य लोपो भवति यथा राज्ञी । सप्तम्येकवचने यूपन् ७-१ इति स्थिते "अनोऽस्य” इति सूत्रे प्राप्ते ५ विशेपसूत्रमाह ॥ २८ ॥ सूत्रम्- ईडौ वा ॥२९॥ [सि० २।१।१०९] ईकारे डौ च परेऽनोऽस्य लुग्वा स्यात् । यूप्णि, यूपणि, यूपे ॥ २९ ॥ ईश्व डिच ईडि तस्मिन् ईडि ७-१ "डिडौं" "डियन्त्य० " । वा १-१ "अव्ययस्य" । द्विपदमिदम् । रूपत्रयं स्पष्ठम् । नपुंसकलिङ्गे "औरीः" इति जाते ईकारेऽपि अनो लोपो वा प्रियराज्ञी प्रियराजनी १० कुले । दन्तपादौ प्रतीतौ । यूपा नाम अन्नरसः; "शिखरिण्यथ यूयूपो रसो” इति वचनात् । एवं निर्जशब्दस्यापि “एकदेशविकृतमनन्यवत्" इति "जराया जरस्वा” इति अन्यसम्बन्धिन्यपि स्वरादौ स्यादी जरसादेशविधानात् निर्जरसौं निर्जरौ २, निर्जरसः निर्जराः निर्जरसं निर्जरम् ; निर्जरसः, निर्ज- रान् । टाङसोः परत्वान्नित्यत्वाच प्रागेव जरसादेशेऽकारान्तत्वाभावादिनस्यौ न स्याताम्-निर्जरसा निर्ज- रसः। अन्ये तु प्रागेवेनादेश सन्निपातलक्षणन्यायस्यानित्यत्वाश्रयणात् पश्चाजरसादेशं चेच्छन्तो निर्जरसेन १५ इत्यपि मन्यन्ते, पक्षे निर्जरेण निर्जरस्य । निर्जर भिस् इति स्थिते भिस ऐस्त्वे निर्जरसैः अत्र *"सन्नि- पातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य" यो यस्माज्जातः स तस्य विधाताय न भवतीति अकारनिमित्तक ऐसादेशोऽकारविधाताय न स्यादिति जरसादेशो न प्राप्नोति, परं एस् इत्येव सिद्धे ऐसादेशकरणेनार्य न्यायोऽनियो ज्ञाप्यते, ऐस्करणं हि निर्जरसैरिति रूपसिद्ध्यर्थम् । केचित्तु निर्जरैरित्येवेच्छन्ति । एवं पञ्चम्येकवचनेऽपि निर्जरसः निर्जरसात् निर्जरात् इति रूपत्रयम् । शेषा रूपपद्धतिः स्पष्टा ॥ २९ ॥ २० आकारान्तो विश्वपाशब्दः । विश्वपाः विश्वपौ विश्वपाः । “समानादमोतः" विश्वपाम् , विश्वपौ आकारान्तो विश्वपाशब्द इति, विश्वं पातीति विश्वपा १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते०”। विश्वपा १-२ "ऐदौ०”। विश्वपा १-३ "समानानां.” "सोरुः" "र: पदान्ते०" । विश्वपा २-१ "समानाद." विश्वपा २-२ "ऐदौ०” । विश्वपा शस् इति स्थिते सूत्रम्- लुगातोऽनापः ॥ ३० ॥ [सि० २।१।१०७ ] २५ आवर्जस्याकारस्य ड्यां शसादौ स्वरे परे च लुक् स्यात् । विश्वपः। विश्वपा । विश्वपाभ्याम् । अदेतःस्यमोरित्यत्रात एव लुक उक्तत्वात् सम्बोधने सिलोपाभावः । हे विश्वपाः । एवं सोमपा- प्रभृतयः ॥ ३० ॥ लुक् १-१ "दी०"आत् ६-१ "लोकात्" "सो रुः” । न आप अनाप तस्य अनाप ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." | "धुटस्तृतीयः" इति कस्य गः "अतोति "अतोति" "अवर्णस्ये०" "एदोतः३० पदान्ते.” । त्रिपदमिदं सूत्रम् । एवं सोमपाप्रभृतय इति आपवर्जस्य आकारस्य सामान्यतो लुक्कथनात् । हाहाशब्दस्याकारलोपो भवति यथा हाहः २-३ हाहा ३-१ हाहे ४-१ हाहः ५-१ हाहः ६-१ हाहोः ६.२ हाहां ६-३ हाहि ७-१ इत्यादि भवति । अन्ये तु धातुसम्बन्धिन एव आकारस्य लोपमिच्छन्ति ३३ है. प्रक्रा० पूर्वो. १३ ५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- तन्मते हाहाशब्दसम्बन्धिन आतो लोपो न स्यात् । हाहान् २-३ हाहा ३-१ हाहै ४-१ हाहाः ५-१ हाहाः ६.१ हाहौः ६-२७-२ हाहे ७-१ इत्यादि भवति । 'शेष विश्वपाशब्दवत् ॥ ३० ॥ (इकारान्तो मुनिशब्दः-मुनिः अथ इकारान्ता शब्दा उच्यन्ते । मुनिः, मुनि १-२ औ इति स्थिते सूत्रम्- इदुतोऽस्त्रेरीदूत् ॥ ३१ ॥ [ सि० १४२१ ] स्त्रन्ययोरिदुतोरीता सह दीर्घः स्यात् । मुनी ।। ३१ ।। इदुतो० । इञ्च उच्च इदुत् ६-१ "लोकात्" "सोरुः" न त्रिः अस्त्रिः ६-१ "डित्यदिति" "एदोच्या" इंच उंच ईदूत् १-१ "अनतो.” । त्रिपदमिदं सूत्रम् ॥ ३१ ॥ मुनि १-३ अस् इति स्थिते सूत्रम्-- जस्येदोत् ॥ ३२॥ [सि० ११४॥२२] १० इदुदन्तयोर्जसि परे एदोतो साताम् । मुनयः । मुनिम् । मुनी । मुनीन् ॥ ३२ ॥ जस् ७-१ "लोकात्" । एच ओच एदोत् १-१ "अनतो." । द्विपदमिदं सूत्रम् ॥ ३२॥ मुनि ३-१ आ इति स्थिते सूनम्- टः पुंसि ना ॥३३॥ [सि. राक्ष२४] इदुदन्ताभ्यां पुंसि टाया ना स्यात् । मुनिना । मुनिभ्याम् । मुनिभिः ।। ३३ ।। १५ टा ६-१ "लुगातो." लोकात्" "सोरुः" "र: यदान्ते." । पुम्स् ७-१ "लोकात्" "शिड्हेऽनु- 1 ना १-१ सूत्रत्वाल्लोपः। निपदमिदं सूत्रम् ॥ ३३ ॥ मुनि ४-१ ए इति स्थिते सूत्रम्--- डित्यदिति ॥ ३४॥[सि. शा२३ ] दिवर्जिते डिति सादौ परे इदुतोरेदोतौ स्याताम् । मुनये । मुनिभ्याम् । मुनिभ्यः ॥३४॥ डि० । इत् यस्य स ङित् ७-१ "लोकात्" । द् इत् यस्य स दित् न दित् अदित् तस्मिन् अदित् २०७-१ "लोकात्" । "इवर्णा." 1 द्विपदामिद सूनम् । बुद्धि ४-१ इत्यादी डितां दैदासाद्यादेशेऽपि स्थानि- बद्भावेन इित्यादेदोती प्राप्नुत इत्यत आह अदितीति, "एदेतो." मुनये । मुनि ५-१ मुनि ६-१ अस् इति स्थिते डित्यदितीत्येत्वे ॥ ३४ ॥ सूनम्- एदोद्भयां ङसिडसो रः॥३५॥ [सि. १३५] प्रत्ययस्य स्थानिनो विधिः सर्वस सात् । मुनेः । मुनिभ्याम् । मुनिभ्यः । मुनेः। मुन्योः । २५ मुनीनाम् ।। ३५ ॥ एदो० । एच ओघ एदोतो ताभ्यां एदोत् ५-२ भ्याम् "धुटस्तृ०" । डसिव डस् च इसिडस् तस्य असिस् ६-१ "लोकात्" "सोः" ।२१-१ "सोरः" "र: पदान्ते."1"घोपवति" "अवर्णस्ये."। त्रिपदमिदं । "इवर्णादेरखे स्वरे यरलयम्" "धेनो व्यायाम्" इत्यादिसूननिर्देशात् "लक्षणप्रतिपदोक्त. योः" इति परिमापाया अनित्यत्वात् लाक्षणिकयोरपि मुनेःसाधोरियेतयोरेदोतोहणमन्यथा लक्षणप्र- ३०तिपदोक्योः प्रतिपदोक्तस्येय ग्रहणमिति अतिहेगोप्रभृतेरेव प्रणं प्रसज्येत । "गोर्नान्यवोऽसे" इत्यादि निर्देशाम "निमाधिमयोः पृधिमे" इत्यस्याप्यनित्यत्वं विज्ञायते, ततञ्च स्वरूपग्रहणायन तका- लोभयोरप्येदोवोर्महणं सिद्धमिति । उसिसोरित्यत्र पष्टीद्विवचने "यथासाममनुदेशः समानाम्" इति स्वारः" - ९ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे स्वरान्ताः पुंलिङ्गाः । हस्तकारोकारान्ताः प्राप्नोतीति पष्ठयेकवचनमेव । “पष्ट्यान्यस्य" इति परिभापायां प्राप्तायामपवादपरिभापामाह "प्रत्ययस्य. इत्यादि ।। ३५ ॥ मुनि ७-१ इ इति. स्थिते सूत्रम्- डिौँ ॥ ३६॥ [सिक शहा२५] इदुदन्तात्परो डिडौँ स्यात् ॥ ३६॥ डि १-१ “सो रुः" ।डौ १-१ सूत्रत्वासिलुक् । द्विपदमिदं० । मुनि औ इति स्थिते ॥३६॥ सूत्रम्-५ डित्यन्त्यस्वरादेः ॥ ३७॥ [ सि० २।१।११४ ] अन्त्यस्वरस्य तदादेः शब्दस्य च डित्प्रत्यये लुक् स्यात् । “आघन्तवदेकसिन्" । मुनौ । मुन्योः । मुनिषु ॥३७॥ सम्बोधने- डित्यन्त्य० । ड् इत् यस्य स डित् तस्मिन् डित् ७-१ "लोकात्” । अन्ते भवः अन्त्यः अन्त्यश्चासौ स्वरश्च अन्यस्वरः, अन्त्यस्वरः आदिर्यस्य स अन्त्यखरादिस्तस्य अन्यखरादि ६-१ "डित्यदिति” १० "एदोश्यां०" "र: पदान्ते०”। द्विपदमिदं सूत्रम् । ननु द्वादशानां सङ्ख्यापूरण: "सह्वयायाः पूरणे डट्" इति डट्प्रत्यये अनेन अन्लोपो भवतु अन्त्यस्वरादित्वात् , प्रकृते तु केवल एवान्त्यखर इति कथं लोप इत्याशङ्कायामाह-"आद्यन्तवदिति" एकस्मिन्नप्याद्यन्तयोरिव सतोः कार्य पर्यालोच्यते इत्यन्त्यस्वरादित्व- मिति ॥ ३७ ॥ सम्बोधने प्रथमैकवचने विशेपमाह- इस्वस्य गुणः ॥ ३८॥[सि० शा४१] सिना सह । हे मुने हे मुनी हे मुनयः । एवं रविप्रभृतयः । साधुप्रभृतय उकारान्ता अप्येवम्-साधुः साधू साधवः । साधुम् साधू साधून् । साधुना साधुभ्याम् साधुभिः । साधवे साधुभ्याम् साधुभ्यः । साधोः साधुभ्याम् साधुभ्यः । साधोः साध्वोः साधूनाम् । साधौ साध्वोः साधुषु । हे साधो हे साधू हे साधवः ॥ ३८ ॥ हस्व० । हस्ख ६-१ "टाङसो०"।गुणः १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते०”। द्विपदामिदं । हे मुने। एवं २० रविप्रभृतय इति पुंलिङ्गे इकारान्ता शब्दाः सर्वे यथोक्तमुनिशब्दवत् ज्ञेया इत्यर्थः । पुंल्लिङ्गे उकारान्ता अप्येतैरेव सूत्रैः साध्यन्ते तत्र रूपनयमाह-साधु १-१ "सो रुः” “र: पदान्ते०", साधु १-२ "इदुतो." साधु १-३ "जस्ये.” “ओदौतो०" "लोकात्” । साधु २-१ "समानाद०” साधु २-२ "इदुतो साधु २-३ "शसोता०" | साधु ३-१ "टः पुंसि ना" साधुना, साधु ३-२, साधु ३-३ । साधु ४-१ "डित्य०" "ओदौतो." "लोकात्", साधु ४-२ साधु ४-३ । साधु ५-१ "डिन्य०" "एदो यां०", साधु २५ ५-२, साधु ५-३। साधु ६.१ "डित्य०” “एदोझ्यां०" "र: पदान्ते.”, साधु६-२ "इवर्णा." "लोकात्" "सो रुः" "रः पदान्ते", साधु ६-३ "हवाप०" "दी? नाम्य०" । साधु ७-१ "डिौँ" "डियन्त्यः "लोकात्", साधु ७-२ "इवर्णा०" "लोकात्”, साधु ७-३ 'नाम्यन्तस्था०" । हे साधु १-१ "हस्वस्य० , साधु १-२ 'इदुतो०', साधु १-३ "जस्ये.” "ओदौ०" "लोकात्” ॥ ३८ ॥ +(अथ इकारान्तेपु विशेषमाहो अतिक्रान्तः स्त्रियमतिस्त्रिः। अतिक्रान्तः स्त्रियमतिस्निः, स्त्री.२-१ अति १-१ इति स्थिते त्रियमतिक्रान्त इति विग्रहे "प्रात्यवप- रिनिरादयो गतक्रान्तक्रुष्टग्लानक्रान्ताद्यर्थाः प्रथमायन्तैः" इति तत्पुरुपसमासे "ऐकायें" इति,विभक्ति- ३३ , .

१००
महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु-
लोपे "प्रथमोक्तं प्राक्” इति अतिशब्दस्य प्रागनिपाते गौणस्य जयावन्तस्यान्तस्थस्य हस्खो वक्तव्यः
इति हस्खे अतिखि १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते" । अतिनि १-२ इति स्थिते सूत्रम्---
स्त्रियाः॥३९॥[सि. ११५४]
स्त्रिया इवर्णस्य स्वरादौ प्रत्यये परे इय् स्यात् । अतिस्त्रियौ । जसि, तृतीयादौ च मुनिवत् ।
५अतिस्त्रियः॥३९॥
खि० । स्त्री ६-१ "स्त्रीदूतः" इति उसो दासादेशः अनेनैव इयादेशे लिया। एफपदमिदं सूनम् ।
अतिषियौ इति "इदुतोऽलेरीदूत्" इत्पन्न निशब्दवर्जनात् न दीर्घः । इदमेव त्रिशब्दवर्जन ज्ञापकम्
यत्सरेणापि झ्यादेशेनेत्कार्य न पाध्यते, तेन "जस्येदोत्" "डित्यदिति” "टः पुंसि ना" "सिडौं” इत्ये-
तेपु विधिपु अतिस्त्रिशब्दो मुनिशब्दवद्विज्ञायते, अन्यथा "स्त्रियाः" इतीयादेशे न्यायप्राप्ते निवर्जनमन-
१०र्थकं स्यात् एतन्मनसि विचिन्त्याह 'जसि सृतीयादौ च मुनिवत्' इति ॥ ३९ ॥ अन्शसो विशेपमाह-
वाऽमशसि ॥४०॥ [सि० २११५५]
स्त्रिया इय् । अमि शसि च वा । अतिस्त्रिम् अतिस्त्रियम् । अतिस्त्रियः अतिस्त्रीन् । अतिस्त्रिणा
अतिस्त्रये । अतिस्त्रेः २ । अतित्रौ । ओसि च इयादेश:-अतित्रियोः २ । तथोक्तम्-
"ओस्सौकारे प नित्यं स्यादम्-शसोस्तु विभापया ।
इयादेशोऽचि नान्यत्र स्त्रियाः पुंस्युपसर्जने" ॥१॥
अनामध्यस्य सखिशब्दस्य सेर्डा वक्तव्यः ["ऋदुशनस्पुरुदंशोऽनेहसश्च सेडा" सि० १४८४]
सखा । अतिसखा । आमन्त्रणे तु हे सखे ॥४०॥
वा १.१ "अव्ययस्य" अम् च शस् च अम्शस् तस्मिन् अम्शस् ७-१ "लोकात्"। द्विपदमिदं सूत्रम् ।
शेपाणि रूपाणि मुनिवत् । अधातिखिशब्दस्य यन इयादेशो नित्यं भवति यत्र विकल्पेन भवति यत्र च न
२० भयति तत्सर्व स्पष्टयितुं सिद्धान्तकौमुद्युक्तं श्लोकमाह-ओस्यौकारे चेति-ओसि पष्ठीसप्तमीद्विवचनयोः,
औकारे चेति प्रथमाद्वितीयाद्विवचनयोः, एषु चतुर्पु नित्यम् , अम्शसोस्तु विभापयेति विकल्पेन, अन्यत्र
अचि स्वरादी जस्टाउडसिडस्सु इयादेशो न भवतीति भावः । स्त्रिया इति स्त्रीशब्दस्य पुस्युपसर्जने इति
गौणस्येत्यर्थः "गुणोपसर्जनोपामाण्यप्राधान्ये' इति हैमाभिधानचिन्तामणौ ।। अनामध्यस्येति "सख्यु-
रितोऽशावत् इति सूत्रात् इत इत्यनुवर्तनीयम्, ततश्चानामयस्य इकारान्तस्य सखिशब्दस्य सेट
२५पचन्य इति "डित्यन्य." ससा । अनामध्यस्येति किम् ? आमत्रणे तु हे सखे इति स्वस्य गुणः"
इति गुणः । इकारान्तस्येति किम् ? सखायमिच्छति सखीयति, सखीयतीति सखी: अन सेहो न भवति ।
सिद्धान्तपीमुद्या तु ससायमिच्छति सखीयति ततः किम् अलोपयलोपो अल्लोपस्य स्थानिवत्वाधणि
माते को टुमं सानियत् एकदेश विकृतस्यानन्यवयाऽननित्ये ससा ससायो ससायः हे सखीः ।
अमिपूर्वरूपात्परत्वाधणि प्राप्ते ततोऽपि परत्वात् सख्युरमम्बुद्धाविति प्रवर्तते ससायं सखायो शसि
३०यण सत्यः इत्युक्तमिति शेयम् ॥ ४० ॥ सरि १-२ इति स्थिते सूतम्-
सस्युरितोऽशायेत् ।। ११॥ [सि०१३]
दन्तस सरिशन्दस समम्बन्धिन्यन्यसम्बन्धिनि वा शिवजे शेपे घुटि ऐन् स्यात् । सखायौ
पसखापः । सखापम् सखायो ससीन् ।॥४१॥

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । इकारान्ताः 8776 १०१ सखि ६-१ । "नाडिदेत्” एत्वनिषेधः "इवर्णा०” “खितिखीतीय उर्" इति डस उर् । इत् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" न शिः अशिः तस्मिन् अशि ७-१ "डिडौँ” “डिसं०” ऐत् . १-१ "दीर्घड्या०" । मध्ये "अतोति." "अवर्णस्ये०" "एदोतः०" "ओदाँतो.” । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । शिवजे इति जस्शसादेशशिवर्जनात् अतिसखानि कुलानि सन्ति पश्येत्यत्र ऐत्वं न भवति । प्रथमैकवचने तु सेर्डाविधानादैत्वं न भवति ततः प्रथमाद्वितीयाद्विवचनयोरमि शसि चेति चतुर्पु ऐत्स्यादित्यर्थः । ५ स्वसम्बन्धिन्यन्यसम्बन्धिनीत्यभिधानात् प्रियसखायौ प्रियसखायः इत्यादि । इदन्तस्येति किम् ? इमे सख्यौ-सखायमिच्छति सखीयति सखीयतीति सखीः, सख्या इत्यत्र ऐत्वं न भवति । इदमेवेद्ग्रहणं ज्ञापयति "नामग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम्" "एकदेशविकृतमन्यवत्” इति च, अन्यथा ड्यन्तस्य किवन्तस्य च सखीशब्दस्य सखिग्रहणेऽग्रहणादिद्रहणमनर्थकं स्यात् ॥ ४१ ॥ सूत्रम्- न नाडिदेत् ॥४२॥ [ सि० १।४।२७ ] केवलसखिपतेर्यष्टाया ना डिति परे एचोक्तः, स न स्यात् । सख्या सख्ये । केवलेत्युक्तेः समस्तस्य स्यात् । प्रियसखिना प्रियसखये ॥ ४२ ॥ पञ्चमीपष्ट्येकवचनयोरेत्वनिषेधात् “इव- दे:०" इति यत्वे न १-१ "अव्ययस्य" डिति एत् डिदेत् ना च डिग्देव नाडिदेत् १-१ 'दीर्घड्या०" द्विपदमिदं सूत्रम् । समस्तस्येति समासस्थस्य सखिशब्दस्य नादयो भवन्तीत्यर्थः ॥ ४२ ॥ सूत्रम्- खितिखीतीय उर् ॥ ४३ ॥ [सि० १।४।३६ ] एतत्सम्बन्धियात्परयोर्डसिङसोरुर् स्यात् । सख्युः । सख्युः ॥ ४३ ॥ खिति । खिश्च तिश्च खीश्च तीश्च खितिखीत्यः खितिखीतीनां य् खितिखीतीय तस्मात् खितिखीतीय ५-१ "लोकात्" “सो रुः" । उर् १-१ "दीर्घड्या.” "रोर्यः” तस्य स्वरे परे लुग्वा लुक्यसन्धिश्च । द्विपदमिदं सूत्रम् । अत्र ह्रखान्तौ खितिशब्दौ सखिपतिशब्दसम्बन्धिनौ दीर्घान्तौ खीतीशब्दो नामधातु-२० सखीपतीशब्दसम्बन्धिनौं । सखि २-१ पति २-१ सखायं पतिं चेच्छति "अमाव्ययात् क्यन् च" इति क्यन्प्रत्ययः "ऐकायें" इत्यम्लुप् “दीर्घश्वि०” इति दीर्घ सखीय पतीय इति नामधातू सिद्धौ ततः सखीयति पतीयति इति विप "अतः” इति अलुप्, “य्वोः प्व्यव्यञ्जने लुक्” इति यलुक् सखीः पतीः इति सिद्धम् । अथवा सह खेन वर्तते इति सखः सखं सुखं चेच्छतीति क्यनि किपि सखीः सुखीः पततीति पतः पतं सातं चेच्छति इति क्यनि विपि पतीः साती: “योऽनेकवरस्य” इति यत्वे सख्यौ २५ मुख्यौ पत्यौ सायौ। अनेन ङसिङसोरुरादेशे सख्युः सुख्युः पत्युः सात्युः "ऋल्वादेरेपां तो नोऽप्रः" इति क्तस्य नत्वे लून पूनं चेच्छति लूनीः पूनी: लून्यौ पून्यौ ॥ *"\शुपिपचो मकवम्" एभ्यः परस्य क्तयोस्तकारस्य यथासङ्ख्यं मकवाः स्युः । क्षामः क्षामवान् शुष्कः २ पकः २ क्षाममिच्छतीति क्षामी: क्षाम्यौ ।। *"प्रात्तश्च मो वा' प्रात्केवलात्परस्य स्त्यायतेः क्तयोः परयोः स्ती आदेशः क्तयोस्तकारस्य च वा मकारो भवति । प्रस्तीमः प्रस्तीमवान् प्रस्तीतः २ प्रस्तीममिच्छति प्रस्तीमीः प्रस्तीम्यौ। अत्र च ३०. "क्तादेशोऽषि" (सि० २।११६१) कोपलक्षितो यः क्तक्तवतुक्तिक्त्वानां तकारस्तस्य य आदेशः स पादन्यस्मिन्परे कार्ये स्यादिविधौ च कर्त्तव्येऽसन् स्यात् । क्षामन्यापयं क्षामिः सोऽत्रास्तीति क्षामि- मान् अत्र मत्वस्यासत्वान् "मावर्ण ०" इति मो वो न स्यात् । शुष्किका अत्र ककारस्यासत्त्वात् "स्वज्ञा- ज." इत्यादिना इत्वविकल्पो न स्यात्, "अस्यायत्तत्" इति नित्यमेवेत्वम् । पकमित्यत्र पस्थासत्त्या २४ .. 6770 P2 । १०२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- धुटि "चजः क्गम्" इति कत्वं भवति । बुद्धा दग्ध्या अन क्त्वादेशस्य धकारस्यासत्त्वाद् गिडद- चादे:०" इत्यादेश्चतुर्थो न स्यात् । स्यादिवियों च-लून्युः पून्युः क्षाम्युः प्रस्तीम्युः एषु नकारादीनाम- सत्त्वात् सितिखीतीत्याश्रित उर् भवति । अपीति किम् १ घृक्णः अन क्तादेशस्य नस्य सत्त्वात् “यज- सृजः" इति धुनिमित्तः पो न स्यात् कत्वे त्वसत्त्वाद्भवत्येव । परे स्यादिविधौ चेयेव-लनः ममः ५अनास्यादिविधौ पूर्वसूत्रकायें "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति प्रथमत्वे नत्वस्यासत्त्वाभावादघोपनिमित्तः प्रथमो न भवति । एव क्षामेण शुप्फेणेत्यादौ पूर्व णत्वं प्रति मत्वकत्वयोः सत्त्वात्तकारेण व्यवधानं नास्तीति णत्व भवति । शुप्फमिच्छति शुष्कीः पक्कीः इत्यन तु "सयोगात्" इतीयादेशे शुप्कियौ पकियो इसिडसोरपि शुकियः पक्किय इत्येव भवतीति ज्ञेयम् । खीतीसम्बन्धी यो यकारस्तस्मात् परयोईसिडसोः उर् स्यादित्यर्थः ॥ ४३ ॥ सूत्रम्- केवलसखिपतेरौः ॥४४॥ [सि० शा२६ ] केलसखिपतिभ्यामिदन्ताभ्यां परो डिरौः स्यात् । सख्यौ । केवलेत्येव । प्रियसखौ । केवला पतिशब्दः प्रथमाद्वितीययोर्मुनिवत् , तृतीयादौ च सखियत् । पन्या । पत्ये । पत्युः २ । पत्यौ । समस्तश्व सर्वन मुनिरत्-मुनिपतिना ॥४४॥ द्विशब्दो नित्यं द्विवचनान्तः क्व० । ससा च पतिश्च ससिपति केवलं च तत् सखिपति च केवलसखिपति तस्मात् केवलसखि- १५पति ५-१ । अन समाहारद्वन्द्वस्य क्लीवत्वेऽपि सूरत्वान्नोऽन्ताभाव ? "डित्यदिति" इत्येत्वं "पदोन्या." ओ १-१ "सो रु;" "र: पदान्ते."। द्विपदमिद सूनम् ॥ ४४ ॥ द्विशब्दो नित्य द्विवचनान्त इति द्वि १-२ इति स्थिते सूरम्- आदेरः ॥४५॥ [सि० २११४४१] द्विशब्दपर्यन्तानां त्यदादीनां स्वसम्बन्धिनि स्यादौ तसादौ च परे अः स्यात् । द्वौ द्वौ । २० द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् । द्वयोः द्वयोः । स्वसम्बन्धिनीति किम् ? प्रियद्वी नरौ । त्रिशब्दो नित्यं पहुवचनान्त:-प्रयः । गीन् । त्रिभिः । त्रिभ्या २ ॥ ४५ ॥ आद्वे० । आ १-१ "अव्ययस्य"। द्वि ५-१ "डित्य०" "एदोयां"। अ १-१ "सो र" ". पदान्ते"। रिपदमिद सूनम् । द्वि १-२ अनेन इकारस्य अत्वे देवशब्दवत् सर्वत्र रूपाणि । त्रिशब्दो नित्यं यहुवचनान्त इति अस्य च उपलक्षणत्वान् चतुर्मभृतयोऽयादशपर्यन्ताः सहवाशब्दाः कतिप्रभू- २५तयो डतिप्रत्ययान्ताश्च निन्यं बहुवचनान्ता इति ज्ञेयम् । गौणत्वे त्वेकवचनान्ता द्विवचनान्ता अपि स्युः यथा प्रियद्विः पुमान् , प्रियनी इमो इत्यादि । जसिहासिभिसिभ्यसोश्च निशब्दो मुनिशब्दवत् ॥४५॥ आमि विशेपमाह सूत्रम्- त्रेस्त्रयः॥४६॥ [सि० १३४] आमि प्रेसयः स्यात् ।। "अनेकवर्णः सर्वस्य" त्रयाणाम् । तत्सम्बन्धि विज्ञानाद् नियत्री- ३०णाम् । पिपु । वितिगन्दो नित्यं बहुत्वे ॥४६॥ नि ६.१ "सिदि." "दोमां०" । भय १-१ "सोम" "र: पदान्ते." । "चटते." द्विपद- मिदं मूयम् । ननु मिसनम्य पहुवचनान्तत्यातयं सूये प्रेरित्येकवचनम् ? अनोन्यते नायं निशाना साहायाची शिन्तु मन्यायाचित्रिशदम्यानुपरणशब्दोऽनुरायेंणार्ययान् प्रत्यन्तरमिसम्मादेक्यचनमदुष्ट- समिति। "पाठपान्त्यम्प" इति माने विशेषपरिभाषामाह-*"अनेस्वर्णः" इत्यादि पष्टया निहिं द्विवादि- " ५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । हखदीर्धकारान्ताः १०३ वर्णात्मको यो विधिः सः सर्वस्य स्यादित्यर्थः । तत्सम्बन्धिविज्ञानादिति अयं भाव:-त्रिशब्दो यदा गौणीभूतस्तदान्यसम्बन्धिन्यामि त्रय आदेशो न भवति यथा त्रीनतिक्रान्ता अतित्रयस्तेपामतित्रीणामिति । किं १-१ मानमेपां इति वाक्ये *"यत्तत्किमः सङ्ख्याया डतिर्वा” (७।१।१५०) सङ्ख्यारूपं यन्मानं तदर्थेभ्य एभ्यः स्यन्तेभ्यः पष्ठ्यर्थे सङ्खयेये डतिर्वा स्यादिति डतिप्रत्यये "डियन्त्य इत्यन्त्यस्वरादि- लोपे कतिततियतिशब्दाः सिद्धाः ॥ ४६ ॥ सूत्रम्- डतिष्णः सङ्ख्याया लुप् ॥४७॥ [सि० १।४।५४ ] डतिपनान्तानां सङ्ख्यावाचिनां स्वजस्-शसोर्लप् स्यात् । कति २ । कतिभिः । कतिभ्यः २ । कतीनाम् । कतिषु । खेति किम् ? प्रियकतयः प्रियकतीन् । एवं यति-ततिशब्दौ ॥४७॥ डति० । डतिश्च ष् च न च डतिष्ण तस्य डतिष्ण ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । "र: पदान्ते.” । सङ्ख्या ६-१ "आपो ङिता.” "सो रुः" । लुप् १-१ “दीर्घड्या०"। मध्ये "अवर्ण०” रुलुक । त्रिपद- १० मिदं सूत्रम् । ननु शतानि सहस्राणीत्यत्र सङ्ख्याया नान्तत्वात् जसूशसादेशस्य शेः स्थानिवद्भावेन लुक प्राप्नोति । सत्यम् । सन्निपातलक्षणन्यायान्न भवति-शिनिमित्तेन नकारेण सङ्ख्याया नान्तत्वं तत् शिविघा- ताय न भवतीति । इति सविशेषाः पुंल्लिंगा इकारान्ताः शब्दा उक्ताः ॥ ४७ ॥ ईकारान्तो नीशब्दः । नयतीति नी: अथ दीर्घकारान्ता उच्यन्ते तथाचाह-ईकारान्तो नीशब्द इति, 'णींग प्रापणे' णीधातुः "पाठे १५ धात्वादेो नः" नयतीति नीः विप् "अप्रयो०" नी १-१ “सो रुः" "र: पदान्ते." नी १-२ स्थिते सूत्रम्- धातोरिवर्णोवर्णस्येयुत् स्वरे प्रत्यये ॥ ४८॥ [सि० २।१।५० ] सप्तम्या आदिः । धातोरिवर्णोवर्णयोः स्वरादौ प्रत्यये इयुवौ स्याताम् । नियौ । नियः । निया। नीभ्याम् ३ । निये । नियः २॥४८॥ धातो० । धातु ६-१ "डित्यदि इवर्णश्च उवर्णश्च इवर्णोवर्ण तस्य इवर्णोवर्ण ६-१ "टाङसो इय् च उव् च इयुव् १-१ “दीर्घड्या०” । स्वर ७-१, प्रत्यय ७.१ उभयत्र “अवर्णस्ये." । पञ्चप- दमिदं सूत्रम् । सप्तम्या आदिरिति सप्तम्यन्तस्य विशेष्यस्य यद्विशेषणं तत्तस्यादिरवयवो भवति तत- श्वानया परिभाषया खरे प्रत्यये इत्यत्र स्वरादौ प्रत्यये परे इति व्याख्येयमित्याह धातोरित्यादि ॥४८॥ सप्तम्येकवचने विशेषमाह सूत्रम्- निय आम् ॥४९॥ [सि० ११४५१] नियः परस्य डेराम् स्यात् । नियाम् । हे नीः। एवं लूः लुचौ लुवः । लुवि । हे लूः । ॥ ४९ ॥ सेनानीशब्दस विशेषः । सेनां नयतीति सेनानीः निय० । नी "धातोरिवर्णो०" "लोकात्" "सो रुः"। आम् १-१ "दीर्घड्या०" । "रोर्यः" स्वरे लुक् असन्धिश्च । द्विपदामिदं० । "लोकात्” नियाम् । एवं लूरिति 'लूग्शू छेदने' लुनातीति लूः३० कि "अप्रयो०" अनेन उ आदेशः ॥४९॥ सेनानीशब्दस्य विशेप इति “णींग प्रापणे' णी "पाठे धात्वादे०" नी सेनां २-१नयतीति कि "अप्रयो० * "डस्युक्तं कृता" इति सूत्रेण "गतिकारकङस्यु- क्तानां विभक्त्युत्पत्तेः प्रागेव समास” इति तत्पुरुपसमासे "ऐकाय? इति विभक्तिलुपि सेनानी १-१३३ २० " " 0 २५ तस्य १०४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "सो रुः "र. पदान्ते" । सेनानी १-२ इति स्थिते "धातोरिवर्णोवर्णस्ये.” इति इयादेशे प्राप्त अपवादसूत्रमाह सूत्रम्-- क्विवृत्तेरसुधियस्तौ ॥५०॥ [सि० २।१।५८] कियन्तेनैव या वृत्तिः समासस्तस्याः सुधीशब्दवर्जितायाः सम्बन्धिनो धातोरिवर्णोवर्णयोः ५स्वरादौ सादी खौ साताम् । सेनान्यौ । सेनान्यः ४ (१-३,२-३,५-१,६.१)। सेनान्यम् , सेनान्याम् । सप्तम्येकवचने "निय आम्" सेनान्याम् हे सेनानीः । एवं ग्रामणीप्रभृतयः । सुलू: सुल्वौ सुल्वः । सुल्यां । सुल्वि । हे सुलूः । एवं खलपूप्रभृतयः । अत्र सुधीशब्दवर्जनात्तस्य नीशब्दवत्प्रक्रिया । सुधीः । सुधियौ । सुधियाम् । सुधियि ॥ ५० ॥ किप० । किपा वृत्तिः "कारकं कृता" इति तत्पुरुषः "ऐकायें" कित्तिः तस्याः किव्वृत्ति ६.१ १० "डित्यदि०" "एदोन्यां०" । न सुधीः असुधीः तस्या असुधी ६-१ "धातोरिवर्णो.” इय् "लोकात्" "सोरुः" । तद् १.२ "आद्वेरः" "लुगस्या." "लोकात्" "ऐदौत्सन्ध्य."। मध्ये "घटते." । त्रिपद- मिदं सूत्रम् । पाठीवहुवचने यत्वे सेनान्यां सप्तम्येकवचनेऽपि निय आमादेशे सेनान्यामित्येव रूपम् । सेना- नीर्दण्डनायकः । सेनापतिरित्यर्थः । एवं ग्रामणीप्रभृतय इति प्रामं नयतीति कि "अप्र०" "वस्युक्तं." "ऐकायें" "प्रामाणान्नियः" इति णत्वे ग्रामणीः माममुख्य इत्यर्थः । सुलूरिति "लूगा छेदने' सुष्छु लुना- १५ तीति किए "अप्रयो०" मुलुः अनेन वत्त्वे सुल्वौ इत्यादि । 'पुग्श पवनें खलं पुनातीति कि "अप्रयो" सलपूः क्षेत्रभूमिशोधक इत्यर्थः । सुधीरिति "डुधांगा धारणे च" सुप्ठु दधातीति सुधीः अथवा 'मैं चिन्तायाम्' सुटु ध्यायतीति सुधीः । किप् “दिद्युद्ददृज्जगजुहूवामाधीश्रीदूज्वायतस्तूकटप्रूपरिवाभ्रा- जादयः किप्” इति निपातनात सुधीः । विद्वान् इत्यर्थः । असुधिय इति सूत्रांशेन सुधीशब्दवर्जनात् "किव्वृत्ते." इति सूत्रेण न यत्वं किन्तु अपवादवाचे उत्सर्ग एव प्रवर्तते "धातोरिव!" इति २०श्येय मुधियों इत्यादि ॥ ५० ॥ सूत्रम्-- हन्पुनर्वर्पाकारैर्भुवः ॥ ५१॥ [सि० २११५९] हनादिपूर्वस्य भुवः स्वरादी स्यादौ वः स्यात् । इन्भ्यो । इन्वः । कियवृत्तेरिति वत्वे सिद्ध नियमामिदम् । 'सिद्ध सत्यारम्मो नियमार्थ' इति तेनान्यो भूशब्दो लूशब्दवत् स्वयम्भूः। स्वयम्भुवा ।। ५१॥ यवान्क्रीणातीति यवक्रीः । रन्पुन० । रन् च पुनश्च वर्षाश्च कारश्च इन्पुनर्वर्पाकाराः "चार्थे द्वन्द्वः " : इन्पुनर्वकार ३-३ "भिम ऐस्" "ऐदीत्सन्ध्य." । भू ६.१ "धातोरिवों" "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." । द्विपदमिदं० । दनादिपूर्वस्य भुव इति, इग्निति नान्तो हिंसार्थोऽव्ययः दृन् हिंसन् भवतीति भूधातोः विपि इन्भूः सविपः कीटविशेषः । इन्भूर्व्यसनसहाय इति "दिशुद्दजगजुहूवाक्०" इति सूनवृत्ती । अम्य रन्सदमानेन सूनेण स्वरादी पत्वम् । यस्तु 'भैन् प्रन्ये *"भिचपेः स्वरानोऽन्तश्च" २०(३०८४१) आभ्यामूः प्रत्ययः स्वराय परो नोन्तो भवतीति हनभूः सर्पजातियनस्पतिर्मन्यकार: यालयानपारम्य "मां धुड्यर्गेऽन्त्यो पदान्ते" इति न भवति । एवं व्युत्पादित ओणादिको इन्भूशब्द- मम्पानेन पत्यं न भवति । "इवर्णादेः" इति यत्वे इन्भ्यो इन्भ्यः इन्। एवं पुनर्भवति इति पुन मूंगपधिविदोपः पुनरूदा नी प । नयो हमकोपे"दिधिपूस्तु पुनर्मूटिरुदाऽम्या दिधिपूः पतिः" इति २५ पुन सदा सीलिंगः। वर्षामु भरीति याभूः औषधिविशेषः भेकश यादवकोपपचनानन्तरं "या- - प्रक्रियावृचिरूपे श्रीहेमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिका दीर्धकारोकारान्ताः १०५ भूः प्लवगः "शालुरजिह्वव्यङ्गदर्दुरा” इति हैमकोशवचनात् पुंलिङ्गोऽयम् , हलायुधस्तु प्लवङ्गमः प्लवगः स्यात् ॥ कारो निश्चयः कारे कारेण वा भवतीति कारभूः । अग्रेगरिति ह्याश्रयवृत्तौ । उत्तमर्णाधमण- योर्वस्तुमूल्यनिश्चायको 'दलाल' इति केचित् । करभूशब्देनापीच्छन्त्यन्ये । करभूशब्देनापि अग्रेगूरेवेति याश्रयवृत्तौ । काराशब्देनाप्यपरे काराभूरिति । नियमार्थमिदमिति । दशप्रकाराणि हि सूत्राणि भवन्ति तथाहुः-"संज्ञा च 'परिभाषा चाधिकारो विधिरेव च । ५ 'प्रतिपेधश्च नियमो विकल्पश्च समुच्चयः । 'अतिदेशानुवादौ च दशधा सूत्रमिष्यते" ॥ १ ॥ क्रमेण सूत्राणि "औदन्ताः स्वराः" (सि० १।१।४)। १ । “प्रत्ययः प्रकृत्यादेः” (७४।११५)।२ । “घुटि" (१।४।६८)। ३ । "नाम्यन्तस्थाकवर्गात् पदां.” (२।३।१५)। ४ । "न स्तं मत्वर्थे” (१।१।२३)।५। "इन्पुनर्वपाकारैर्भुवः” (२।११५९) इति । ६ । “सौ नवेतो” (११२।३८)। ७ । “वरुणेन्द्ररुद्र- भवशर्ममृडादान् चान्तः” (२।४।६२)। ८ । तयोः समूहवच्च वहुपु” (७।३।३) । ९ । "हेमा-१० दिभ्यो.” (६२।४५) इति सूत्रादारभ्यैतत्सूत्रप्रपञ्चप्रकरणम् । १० । तथा "सोऽता सश्च नः पुंसि" (११४१४९) इत्याद्यन्वाचयसूत्रमित्येकादेशोऽपि प्रकारः प्रतीयते । तत्र 'सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थ' इति नियमस्य फलमाह-तेनान्यो भूशब्दो लूशब्दवदिति स चैवम् "दिद्युदद्वज्जगज्जुहू०” इति सूत्रवृत्तौ संज्ञायामेव भूः पृथ्वी शम्भूः शिवः आत्मभूः कामः मनोभूः स एव स्वयम्भूब्रह्मा स्वयम्भूर्विष्णुश्च मित्रभूर्नामकश्चित् प्रतिभूरुत्तमर्णाधमर्णयोरन्तःस्थसाक्षी 'प्रतिभूलनकः १५ साक्षीति कोपे एपां सर्वेषामपि शब्दानां "धातोरिवर्णोवर्णस्येयुव०” इत्युवेव न तु "किव्वृत्तेर०” इति वत्तमिति । ये तु "शंसंस्वयंविप्राद्भुवो डुः” (५।२।८४) इति डुप्रत्ययान्ताः शम्भुः शङ्करः सम्भुर्जनयिता स्वयम्भुः विभुापकः प्रभुः स्वामी । वहुलाधिकारात् शम्भुः संज्ञायामन्ये त्वसंज्ञायामपि । एवं व्युत्पादिताः शब्दास्ते साधुशब्दवत् ज्ञेयाः ॥५१॥ 'डुक्रींग्य द्रव्यविनिमये' यवान् क्रीणातीति विप् “अप्रयोगीत्" यवक्रीः । यवक्री १-२ औ इति स्थिते "क्विवृत्तेर०” इति वत्वे प्राप्ते अपवादसूत्रमाह-सूत्रम्-- २० संयोगात् ॥ ५२॥ [सि० २११५२] संयोगात्परयोर्धातोरिवर्णोवर्णयोः स्वरादौ इयुवौ साताम् । किव्वृत्तेरित्यस्यापवादः । यव- क्रियौ यवक्रियः । एवं कटयूशब्दोऽपि ॥ ५२ ॥ सुश्रीशब्दस्य ङित्सु विशेषः । संयो० । संयोग ५-१ डेङस्यो० "समानानां० । एकपदमिदं सूत्रम् । एवं कटप्रूशब्दोऽपीत्यादि 'च्युंछ- '-गतो कटेन प्रवते इति कटप्रूः “दिद्युहन्न." इति किवन्तो निपातः ॥ ५२ ॥ सुश्री-२५ शब्दस्य डिन्त्सु विशेप इति, अन्यत्र तु यवक्रीशब्दवदिति भावः । सूत्रम्- वेयुवोऽस्त्रियाः ॥ ५३॥ [सि० १।४।३०] इयुव्स्थानिनौ यौ नित्यस्त्रीलिङ्गावीदूतौ तदन्तात् स्त्रीवर्जात्परेपां स्यादेर्डितां दै दास् दास् दामो वा स्युः । सुश्रियै, मुश्रिये । सुश्रियाः सुश्रियः, २। ॥ ५३॥ वा १-१ "अव्ययस्य" । इय् च उव् च इयुव् “चार्थे द्वन्द्वः०” तस्मात् इयुव् ५-१ "लोकात्" ३० "सो रुः" । न स्त्री अस्त्री तस्याः अस्त्री ५-१ स्त्रियाः' इति इय् । मध्ये "अतोऽति रो रुः" "अवर्णस्ये." "एदोतः० । त्रिपमिदं० । सुश्रियाः सुश्रियः, इत्यत्र द्विकेन पञ्चमीपष्ठयेकवचनयोस्तुल्यरूपमिति सूचितम् ।। ५३ ।। बहुवचनेऽपि विशेषमाह सूत्रम्- है. प्रका० पूर्वा० १४ " ३३.

१०६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- आमो नाम्वा ॥ ५४॥ [सि० शा३१ ] मुश्रियाम् सुश्रीणाम् । सुथियाम् सुथियि ॥५४॥ आमो० 01 आम् ६-१ "लोकात्" "सो रुः' नाम् १-१ "दीर्घडया०" । वा १-१ अध्ययस्य"। "घोपवति" "अवर्णस्ये.” । त्रिपदमिदं सूत्रम् । स्पष्टम् । इयुवःस्थानिभ्यां स्त्रीदूदन्ताभ्यां परस्यामो ५नाम् या स्यादिति भावः ।। ५४ ॥ भ्रूशब्दस्य औणादिकस्य धातुत्वाभावात् "संयोगात्" इत्युवादेशो न प्राप्नोतीति सूनान्तरमाह-- भ्रूनोः ॥ ५५॥ [ सि० २।११५३ ] भ्रूश्नोरुवर्णस्य स्वरादी उव् सात् । अति बै, अतिभ्रुवे । अतिश्रुयाः अतिश्रुवः, २ । अति- भ्रूणाम् , अतिश्रुपाम् । अतिध्रुवाम् , अतिश्रुवि । हे अतिभ्रूः । 'नित्यस्त्रीत्वाभावात् ययक्रिये १० इत्यादी आध्ये प्रध्ये इत्यादी इयुव्स्थानित्वाभावाच नायं विधिः । "विचन्ता धातुत्वं नोज्झन्ति शन्दत्वं च प्रतिपद्यन्ते" इत्येपां धातुत्वं ज्ञेयम् ॥ ५५ ॥ सखायमिच्छति सखीयतीति सखीः । 5श्व सुंश्च भ्रूश्च तस्य भ्रश्नु ६-१ । ध्रुव २-१ अतिक्रान्तः १.१ "प्रात्ययपरि०" इति तत्पुरुपे अतिभ्रूः "भ्रूनोः” इत्युवादेशप्राप्तेरस्य भ्रूशब्दस्य इयुवस्थानित्वं ततश्च “युवोऽस्त्रियाः” इति डितां दैदासाद्यादेशविकल्पा आमो नाविकल्पश्च सिद्ध इति । 'नित्यत्रीत्वाभायादिति यवनीप्रभृतिशब्दानामि- १५युवस्यानित्वेऽपि वाच्यलिद्गत्वेन नित्यत्रीत्वाभावः। आधीमधीप्रभृतीनां तु संज्ञाशब्दत्वेन नित्यत्रीत्वेऽपि नेयुपस्थानित्वम् । यदा तु आध्यायतिप्रध्यायतीत्यादिव्युत्पत्त्या "दिद्युद्दज." इत्यादिना क्विन्ता निपा- सन्ते तदा तु सुधीशन्दवद्वाच्यलिङ्गत्वे नित्यस्त्रीत्वाभाव एव नायं विधिरिति डितां दैदासाद्यादेश- विक्ल्पा आमो नाम्विकल्पश्च न भवतीति । ननु नीलूप्रभृतिशब्दानां यदि धातुत्वं तर्हि स्यादिविभक्यः क्यं यदि च नामत्वात् स्यादिविभत्यस्तहि इयादेशादि धातुकार्य कथमिति विरोधं परिहा न्यायसूत्र- २०माह "विचन्ता इति" । सखीरिति ससायं पतिं चेच्छति सखीयति पतीयतीति कि "अप्रयोगात्" "अतः" इत्यकारलोप: "योऽशिति" इति यलुक् सखी: पतीः मित्रेच्छु: स्वामीच्छुश्च ॥ ५५ ॥ सखी १-२ इति स्थिते सूतम्-- योऽनेकखरस्य ॥ ५६॥ [सि० २११५६ ] अनेकखरस धातोरिवर्णस स्वरादी प्रत्यये परे यः स्यात् । सख्यौ २ । सख्यः २ । सरयुः २५२। सस्याम् । सरिन्य । एवं पतीः । पत्यौ ॥५६॥ वमुमिच्छति वम्यति वसूयतीति वसः । यो । य १-१ "सोहः" । एकः स्वरो यस्य स एक्स्वरः न एकस्वरः अनेरखरः तस्य अनेक- स्वर ६-१ "टाइसो." । मध्ये "अतोऽति." "अवर्णस्पे." "एदोतः" । द्विपदमिदं० 1 जसि शसि घ सग्न्यः । आमि सख्याम् । सप्तम्येकवचने सस्यि ॥५६॥ यसूरिति-द्रन्यवाचिनो यमुशब्दस्य वमु इण्यतीति यास्यं नपुंसकत्वात् । राजामिदेवयाचिनस्तु पुंल्लिद्गत्यात् यमुमिच्छतीति वाक्यम् । वसू १-२ २०वि सिने सूत्रम्- स्यादौ वः ॥ ५७॥ [सि० १०५७] अनेरपरस्य धातोरुवर्णस खरादौ सादी परे यः सात् । यम्यो बखः । पखाम् । यति । मह पयः ॥ ५७ ॥ महारान्तः पिवान्दः।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे खरान्ताः पुंल्लिभाः । ऋकारान्ताः १०७ स्यादी० । सिरादिर्यस्य स. स्यादिः तस्मिन् स्यादि ७-१ "ङिडौँ” "डियन्त्य०" "लोकात्" । व १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते.” । द्विपदमिदं सूत्रम् । वातप्रमीहहूनग्नप्रभृतीनां विशेषः कथ्यते । वात २-१ प्र पूर्वक 'माङ्ग मानशब्दयोः' घातं प्रमिमीते वाताभिमुखधावनादतिजवनतया वा (वातात्प्रमः कित् उणा० ७१३ ई.) कित्ईप्रत्यये घातप्रमीर्वाताभिमुखगामुको मृग उच्यते वातप्रमीतिमृगः "इवर्णादेः०” यत्वे वातप्रम्यौ २ । वातप्रम्यः।५ "समानादमोऽतः" इत्यकारलोपे वातप्रमीम् । शसि "शसोऽता सश्च नः पुंसि" वातप्रमीन् । वातप्रम्या ३-१ . वातप्रमीभ्याम् ३ । वातप्रमीभिः। वातप्रम्ये वातप्रम्यः २ वातप्रम्योः २ वातप्रम्याम्, ६-३. सप्तम्येकव- चने, “समानानां०" वातप्रमी, हे वातप्रमीः. किवन्तवातप्रमीशब्दस्य अमि शसि ङौ च विशेपः वात; प्रम्यम् , वातप्रभ्यः, वातप्रम्यि 'यापाभ्यां द्वे च' (उ० ७१४) 'यांक प्रापणे' ययीर्मोक्षमार्गो दिव्यवृष्टि- रादित्योऽश्वश्च, 'पां पाने' पपीः रश्मिः सूर्यो हस्ती च एतौ ईप्रत्ययान्तवातप्रमीवत् । देवनन्दी तु १० वातप्रमीशब्द मृगेऽपि स्त्रीलिङ्गमाह । हूहूर्देवगायनः “इवर्णादे.” इति वत्वे हूहौं ह्हः हूई हूह्रौ हूहून् हूह्वा हूहूभ्यां ३ हूहूभिः हूढे हूहः २ हूह्वोः २ हूहां हूति हे हूहूः । एवं नग्रहूशब्दोऽपि नमहूर्मापदल- न्यादिमद्यवीजमिति । वातप्रम्यादीनां धातुत्वाभावादियुवादिकं धातुकार्य न प्राप्नोतीत्यमि "समानाद- मोऽतः", "शसोऽता.” इति स्वरादौ. च यत्ववत्वादिकं यथोक्त कार्य प्राप्तोतीति तत्त्वम् ।। ५७ ॥ अथ क्रमप्राप्ता ऋकारान्ता उच्यन्ते-पितृ १-१ इति स्थिते सूत्रम्- ऋदुशनस्पुरुदंशोऽनेहसश्च सेडी ॥ ५८ ॥ [सि० ४८४] ऋदन्तादुशनसादेश्व परस्य सेडी स्यात् । पिता । अतिपिता ॥ ५८ ॥ ऋदु० । ऋच्च उशना च पुरुदंशा च अनेहा च ऋदुशनस्पुरुदंशोऽनेहः तस्मात् ऋदुशनस्पुरुदंशोऽने- हस् ५-१ "लोकात्" "सो रुः" । च १-१ "अव्ययस्य" । "चटते.”। सि ६-१ "डित्यदिति" "एदोझ्या." । डा १-१ [ दीर्घड्या०] "जलतुम्विका० । चतुष्पदमिदं० । सूत्रे चकारः सखि-२० शब्दानुवृत्त्यर्थः सखिशब्दस्यापि सेर्डा भवतीत्यर्थः । डाप्रत्ययस्य डित्वमन्त्यस्वरादिलोपार्थम् । ऋका- रलोपे पिता । अतिपितेति अत्र स्वसम्बन्धिनो अन्यसम्बन्धिनो वा सेर्डा भवतीत्यर्थः । एवमवेतनसूत्र- द्वयेऽपि । क्लीवे गौणत्वे अतिपितृ २, अतिपितॄणी २। कर्तृवत् स्त्रियां यां अतिपित्री ॥ ५८ ॥ पितृ १-२ इति स्थिते। अडौं च ॥ ५९॥ [सि० १४३९] ऋतो डौ च घुटि च परे अर स्यात् । पितरौ पितरः । “सम्बोधने हखस्य गुणः”[सि० ११४।४१] । हे पितः । पितरम् पितरौ पितॄन् । पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः । पित्रे.. पितृभ्याम् पितृभ्यः ॥ ५९॥ अर्० । अर् १-१ "दीर्घङया०” । ङि ७-१ "ङिडौं" "डित्यन्य.” "लोकात्" "जलतुम्विका." च २-१ "अव्ययस्य" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । रूपपद्धतिः सुगमा ।। ५९ ॥ पितृ ५-१ पितृ ६-१३० .'१५ ॥ । " .. २५ - . इति स्थिते सूत्रम्- ऋतो डर ॥ ६॥ [सि०१।४।३७] ऋतः परयोसिङसोईर स्यात् । पितुः २ । पित्रोः २ । पितृणाम् । पितरि । पितृपु.। एवं नृ-भ्रातृप्रभृतयः ॥६०॥ किन्तु ।

१०८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- ऋतो०ऋत् ५.१ "लोकात्" "सो रुः" । हुर् १-१ "दीर्घड्या०" । "घोपवति" "अवर्णस्यैः"। द्विपदमिदं सूनम् । नित्यम् । पितुः २ । एव नृ-भ्रातृप्रभृतय इति ना नरौ नरः । नरम् नरौ नून् । ना नृभ्याम् नृभिः । ने। नुः २ । नोः २ ॥ ६० ।। पष्ठीबहुवचने विशेषमा किन्त्वितीति-सूत्रम्- नुर्वा ॥ ६१ ॥ [सि० १४४८] ५ नामि दीर्घः । नृणां नृणाम् ॥ ६१॥ कादीनां विशेषः। नु० । न ६-१ "ऋतो डु" "डित्यन्स०" वा १-१ "अव्ययस्य" । द्विपदमिदं० । अपेक्षित पृत्यंशमाइ-नामि दीर्घ इति ॥ ६१ ॥ ऋफारान्तानामेव विशेपमाह फर्नादीनां विशेप इति-सूत्रम्- तृखस्टनसृनेष्टुत्वष्टक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्त्रो घुट्यार् ॥ ६२॥ [सि० ११४।३८] इतन्नन्तस्य स्वस्रादीनां च घुट्यार स्यात् । इति पञ्चस्वारप्राप्तावपि 'विशेषत्वात् "ऋदुश- १० नस्" इत्यादिना सेर्डा । कर्ता । अतिकर्ता । कर्तारौ । कर्तारः । कर्तारम् । कर्तारी । शेष पिव- पत् । एवं नलप्रभृतयः ॥ ६२ ॥ क्रुश्धातोस्तुन्प्रत्यये क्रोष्टुशब्दः। सूखसृ० । ता १-१ च स्वसा १-१ च नप्ता १-१ च नेष्टा १-१ च षष्टा १-१ च क्षत्ता १-१ प होता १-१ च पोता १-१ च प्रशास्ता १-१ च तृखस्नप्तृनेतृत्वष्टक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्त तस्य तस्वस- नप्तनेष्तृत्वष्टक्षत्तृहोतृपोतप्रशास्त ६-१ "इवर्णादे०" "लोकात्" "सो रुः" घुट् ७-१ "लोकात्" १५आर् १-१ "दीपथा०" "घोपयति" "अपर्णस्यै" "इवर्णादे." । त्रिपदमिदं सूत्रम् । 'निरनुबन्धन- हणे सामान्यग्रहणम्' इति न्यायात् तृशब्देन तृच्तृनोरुभयोरपि ग्रहणमित्याह तृतुन्नन्तस्येति । 'विशेषत्वादिति "तृस्वसू०" इत्यादि सूतं सर्वन घुटि प्राप्नोतीति सामान्यं "प्रदुशनस्" इत्यादि सूत्र एकस्मिन् सावध प्राप्नोतीति विशेषसूतमिति भाषः । एवं नप्तृप्रभृतय इति स्वस्रादीनामष्टानां मध्ये खस- शब्दः स्वरान्तस्त्रीलिङ्गे यक्ष्यते ततः सप्त नप्तप्रभृतयः पुल्लिङ्गाः कर्तृशब्दयत् ज्ञेया इति भावः । उणादयोऽ- २० च्युत्सनानि नामानीति केचित् व्युत्पन्नानीत्यन्ये तनाव्युत्पत्तिपक्षे तृप्रत्ययमहणे नानादीनामव्युत्पन्नानां संशाशरदाना प्रण न भवतीति पृथरु ननादिप्रहणम् , व्युत्पत्तिपक्षे तु तृप्रहणेनैव सिद्धे नप्लादिग्रहण नियमा, तेनान्येपामौणादिकाना न भवति । पितरौ भ्रातरौ जामातरौ । केचित्तु प्रस्तोत उद्गार उन्नेह प्रतिहाई प्रतिप्रस्थाशब्दानामौणादिकानामप्यार मन्यन्ते-प्रस्तोतार प्रस्तोतारौ इत्यादि ।। ६२ ॥ क्रोष्ट- दशरद इति, 'शवाहानरोदनयोः' कुराधातुः प्रोसतीति मोष्टा 'कृमिकम्यमी ति तुन्प्रत्ययः “यजसृज०" २५ शस्य पा वर्गस्य वर्ग." तस्य दः "लघोरुपान्त्यस" इति गुणे मोटु इति सिद्धम् । प्रोष्टु १-१ इति स्थिते सूत्रम्- क्रुशस्तुनस्तृच पुंसि ॥ ६३ सिशा९१ शो यस्तुन तस शेपे घुटि परे हन् स्यात् । कोष्टा । कोष्टारी । कोष्टारः । शेपे घुटीत्येव- है मोटो । घुटीति किम् ? क्रोएन् ।। ६३ ।। भुमा० । गुम् ६-१ "रोपात्" "सो र" तुन् ६.१ "लोकान्" "सो २ः" । सृथ् १-१ "दहिया." पुम्स ७-१ "लोफान्" "शिद्देऽनुस्वारः" "घटते." । चतुष्पदमिदं । शेपे घुटीत्यु- प्रत्यात् सम्योपने सौ शासि प्यधनादो च ननस्टजादेशो न स्यात्-हे फोटो प्रोट्रन ।। ६३ ॥ दादरी पसरानो विदोपमार सूपम् - १५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरान्ताः पुंल्लिङ्गाः । ऋकारान्तादयः १०९ टादौ स्वरे वा ॥ ६४ ॥[सि० १।४।९२] तुनस्तृन् । क्रोष्ट्रा, क्रोष्टना । क्रोष्टुभ्याम् ३ । क्रोष्टे, क्रोष्टवे । क्रोष्टः क्रोप्टोः, २ । क्रोष्ट्रोः क्रोष्ट्वोः, २ । आमि तु नित्यत्वात् पूर्व नामि स्वरादित्वाभावात्तृजभावः-क्रोष्टूनाम् । क्रोप्टरि, फ्रोष्टौ । क्रोष्टषु ॥६४॥ ऋकारान्तादयोऽप्रसिद्धाः। एकारान्तः अतिहेशन्दः । स्वरादावया- देशः। अतिहयौ । सम्बोधने "अदेतः स्यमो०" इति सिलुकि । हे अतिहे । ऐकारान्तः सुरैशब्दः। दादौ० 01टा आदिर्यस्य स टादिः तस्मिन् टादि ७-१ "डिडौं" "डित्यन्त्य." स्वर ७-१ "अवर्णस्ये०”। वा १-१ "अव्ययस्य” । निपदमिदं० । अपेक्षितं वृत्त्यंशमाह-तुनस्तृच् इति, आमि तु नित्यत्वादिति तृजादेशे कृतेऽपि अकृतेऽपि च "हस्वापश्च" इति आमो नाम प्राप्नोति ततश्च कृताकृतप्रसङ्गी यो विधिः स नित्य इति नामादेशस्य नित्यत्वं ततश्च “वलवन्नित्यमनित्यादिति” पूर्वमामो नाम् स्यादित्यर्थः । ऋकारान्तादयोऽप्रसिद्धा इति भावः ॥ ६४॥ अतिहे १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते."। स्वरादा- १० वयादेश इति व्यञ्जनादौ च अविशेष इत्यपि ज्ञेयम् । आतिहेभ्याम् ३ अतिहेभ्यः २ अतिहेपु इत्यादि पञ्चमीषष्ठ्येकवचनयोः "एदोझ्या०” अतिहेः २ । एवं सह इना वर्तते यः सेः सयौ २ सयः २ सया सेभ्याम् ३ सेभ्यः २ से। २ सेषु हे से इत्यादि । एवं परमश्चासौ इश्व परमेः इत्यादि ।। सुरै १-१ इति स्थिते सूत्रम्- आ रायो व्यञ्जने ॥ ६५॥ [सि० ११५] व्यञ्जनादौ स्यादौ परे रैशब्दस आः सात् । सुराः । स्वरादावायादेशः । सुरायौ ।। ६५ ॥ ओकारान्तो गोशब्दः। आ रा० । आ १-१ "सो रु: ६-१ "एदैतो." "लोकात्” “सो रुः" । व्यञ्जन ७-१ "अवर्णस्ये" | "रो रे लुक् दीर्घ०" | त्रिपदमिदं० ॥ ६५ ॥ गो १-१ इति स्थिते सूत्रम्- ओत औः ॥६६॥ [सि० ११४७४] घुटि । "विशेषणमन्तः" । गौः । गायौ । गावः ॥ ६६ ॥ ओत० । ओत् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । औ १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." मध्ये "रोयः" तस्य रे परे लुक् वा लुक्यसन्धिश्च । द्विपदमिदं सूत्रम् । अपेक्षितं वृत्त्यंशमाह घुटि इति । सूत्रवृत्त्यंझयोः सङ्घटनेऽयं भावः "विशेषणमन्तः" इति ओदन्तस्येत्यर्थः-ओदन्तस्य घुटिपरे आः स्यात् “पष्ट्यान्त्यस्य" इति परिभाषया ओकारस्य आ स्यादित्यर्थः । स्वरादौ सर्वत्र अवादेशः व्यञ्जनादौ अविशेष इति २५ ज्ञेयम् ॥ ६७ ॥ अमि शसि च विशेपमाह--सूत्रम्- आ अम्शसोऽता ॥६७॥[सिक शा७५] अम्शसोरता सह ओत आः स्यात् । गाम् । गावौं । गाः । गवा । गोभ्याम् । “एदोश्यां ङसिङसो " इति रत्वे गोः २ । गवाम् । गोपु । एवं सुद्योप्रभृतयः ॥ ६७ ॥ औकारान्तो ग्लौशब्दः । ग्लौः । ग्लायौ । हे ग्लौः । ग्लौभ्याम् । एवं सुनौप्रभृतयः । इति महोपाध्यायश्रीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितायां हैमलघुप्रक्रियायां खरान्ताः पुंलिङ्गाः। आ० । आ १-१ "सो सः" अम् च शस् च अमशस् तस्य अम्शस् ६-१ "लोकान्" "सो तः" । अत् ३-१ "लोकात्" । "रोर्यः" तस्य खरे परे लुग्वा लुक्यसन्धिश्च । 'अतोऽति." "अत्र-३३ " २० ३० .. ११० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- र्णस्ये." "एदोतः" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । एवं सुद्योप्रभृतय इति सु शोभना द्यौर्यस्य स सुद्यौः सुद्यावी २, सुद्यावः सुद्याम् सुद्याः २ सुद्यया सुद्योभ्याम् ३ सुद्योः २ सुद्योपु हे सुद्यौः ॥ ६७ ॥ ग्लौशब्द इति ग्लीश्चन्द्रमा इति स्वरादौ सर्वम आवादेशः व्यञ्जनादावविशेष इति । एवं सुनौप्रभृतय इति सु शोभना नौर्यस्य सुनौः सुनावी सुनाव इत्यादि । यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ स्वोपज्ञसत्प्रक्रिया- वृत्तौ भेजुरनुक्रमेण घटनां पुंसि स्वरान्ताः रवाः ॥ १ ॥ ५ - अ स्व रा न्ताः स्त्री स्त्री लिझा -- तत्र आकारान्तः स्त्रीलिङ्गो गङ्गाशब्दः । अथ स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः शब्दा वक्तव्यास्तत्र अकारान्ताः स्त्रीलिङ्गा न सम्भवन्ति तेषां हि केपा- श्चित् "आन्” इति सूत्रेण आप् प्राप्नोति केपाञ्चिच्च "गौरादिभ्यो मुख्यान्डी:" इत्यादिसूत्रै ः प्राप्नोतीति प्रथममाकारान्ताः प्रतिपाद्यन्ते इत्याह-आकारान्तो गङ्गाशब्द इति । गङ्गा १.१ इति स्थिते सूत्रम्- दीर्घड्याव्यञ्जनात्सेः॥१॥[सि० १४४५] १५ दीर्घडयावन्ताभ्यां व्यञ्जनाच परस्य सेर्लक् स्यात् । गङ्गा ॥१॥ दीर्घडया डी च आप च डयापो दी! च तौ डयापौ च दीर्घडयापो, दीर्घडयापौ च व्यञ्जनं च दीर्घडयाव्यञ्जनं तस्मात् दीर्घडयाब्व्यञ्जन ५-१ "टेडस्यो." "समानानां" । सि.६-१ "डित्य- दिति" "एदोड्या." "रः पदान्ते.” । द्विपदमिदं सूत्रम् । ननु डयावियन ईकाराकारप्रक्षेपात् "गाणो ड्यादिः प्रकृयादेविशेपणं नोनाधिकस्य" इति परिभाषया वा सिलोपप्रसङ्गनिवृत्तेीर्घग्रहणं २० नातिप्रयोजकम् , सत्यम्, तथापि सुखावयोधाय कृतमिति । दीर्घग्रहणसामर्थ्यानिष्कौशाम्बिः अतिसटुः इत्यादी "भूतपूर्वकस्तद्वदुपचार" इति "एकदेशविकृतमनन्यवदि"ति वा प्राप्तः सिलोपो न भवति ॥१॥ गङ्गा १-२ इति स्थिते सूत्रम्--- औता ॥२॥ [सि० शा२०] आपन्तस्य औता सह ऐल सात् । गङ्गे । गङ्गाः । गङ्गाम् । गङ्गे ! शसि पुंस्त्याभावानत्वा- २५मावेऽकारेण सह दीर्घ एव-गलाः ॥ २ ॥ जी० । औत् ३.१ "लोकात्"। एकपदमिदं० । अनेन एत्वे गड़े जसि "समानानां." अमि "समानाद." गहाम, द्वितीयाद्विवचने "ओता" गढ़े। द्वितीयाबहुवचने विशेषमाह-शसि पुंस्त्वामाया- ननु "सप्रियोगशिष्टानामेपापायेऽन्यतरम्याप्यपायों" यथा एतान् गाः पश्येत्या दीर्घाभावे सस मो न भयति सथान घुम्त्याभावामलामाये दीर्घोऽपि न भविष्यतीसमोच्यते "नावाचीयमाने नियती प्रधानम्प," अप्राधान्येन पिहित निवृत्ती प्राधान्येन विहितस्य निवृत्तिन भवति ततोप्रधानस ३१नत्यम्स नित्तो पानस दीपम्प नितिन भयति ॥ २॥ गङ्गा ३-१ इति सिते । गगा दिति। ..

” प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे खरान्ताः स्त्रीलिंगाः 1 आकारान्ताः १११ टौस्येत् ॥३॥ [ सि० १।४।१९] आवन्तस्य टोसोः परयोरेत्वं स्यात् । गङ्गया । गङ्गाभ्याम् ३ ! गङ्गाभिः ॥ ३ ॥ टॉस्थे० । टा च ओस् च टोस् तस्मिन् टोस् ७-१ "लोकात्" ऐत् १-१ "दीर्घड्या०” । इव- दे० । द्विपदामिदं । अनेन एत्वे "एदेतो." अयादेशे गङ्गया। तत्सम्बन्धिविनानादिह न भवति बहुखवेन पुंसा । इह तु भवति ईपदपरिसमाप्तया खट्टया अखट्या विष्टरेण । एवमन्यत्रापि यथा-५ सम्भवं नेयम् ।। ३ ॥ गङ्गा ४-१ इति स्थिते सूत्रम् - आपो डितां यै यास् यास् याम् ॥ ४॥ [सि० १।४।१७] आवन्तात्परेषां ङितामेते आदेशाः स्युः । गङ्गायै । गङ्गायाः २ । “हस्त्रापश्च" इति आमो नामादेशे गङ्गानाम् । गङ्गायाम् । गङ्गयोः २ । गङ्गासु ॥ ४ ॥ आपो० । आप ५-१ "लोकात्" "सो रुः” ङित् ६-३ "लोकात्" । चैयास्यास्याम् १-१ "अनतो १० लुप्" }, "घोपवति" "अवर्णस्ये० । त्रिपदमिदं सूत्रम् । गङ्गायै इत्यादि स्पष्टम् ।। ४ ।। सम्बोधने गङ्गा १-१ इति स्थिते सूत्रम- एदापः ॥ ५॥[सि० १४२] सम्बोधने आवन्तस्य सिना सह एत्स्यात् । हे गङ्गे । हे गङ्गे । हे गङ्गाः ॥ ५ ॥ एवं श्रद्धामेधादयः। एदा० । एत् १-१ "दीर्घड्या०" । आप ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "रः पदान्ते. । "धुट- स्तृतीयः" "लोकात्" द्विपदामिदं० । हे गङ्गे इत्यादि ॥५॥ द्विस्वराणामम्बावाचिनामावन्तानां शब्दानां सर्वापि रूपपद्धतिः गङ्गाशब्दवत् किन्तु सम्बोधने प्रथमैकवचने विशेषोऽस्तीति तं दर्शयति सूत्रम्- नित्यदिद्विखराम्बार्थस्य हस्त्रः ॥६॥ [सि० १४४३ ] नित्यं ददासादयो येभ्यस्ते नित्यदितस्तेपां, द्विस्व राम्वार्थानां च सिना सह हवः सात् । हे२० अम्ब । हे अक्क । हे अत्त । हे अल्ल । शसादौ स्यादौ परे निशाया अन्त्यस्य लुक् नासिकाया नसादेशश्च वा । निशः । निशा, निशया । निजभ्याम् , निशाभ्याम् । निच्छु ।। नसः, नासिकाः । नोभ्याम् , नासिकाभ्याम् ॥ ६॥ नित्य० । द इत् अनुवन्धो येपां ते दितः । निलं दितो देदाम्दाम्दामादेशा येभ्यले निलदिनः । ही स्वरों यंपां ते द्विस्वराः, अम्बा अर्थी येषां ते अम्बाः । द्विन्दराश्च ते अन्वार्थाच द्विन्वरान्वाधीः ।२५ नित्यदितश्च द्विस्वराम्बार्याश्च नित्यदिहिसराम्बार्थ तस्य नित्यदिद्विस्वरान्वार्थ ६-१ "टायलो." । हन्यः १-१ "सोमः" "र: पदान्ते" । द्विपदमिदं सूत्रम् । हे अन्या १-१ हे अघा १-१६ अना १-१ हे असा १-१ इति स्थिते सर्वत्र अनेन हवः । नित्यदितामुदाहरणानि त्वेवम-६ न्त्रि हे लक्ष्मि है श्वनु हे वधु ॥ आवन्तयोरपि निझानासिकाशब्दयोविंशेपमाह मासादी न्यादायिन्यादि "मामनिशा- सनस्य शमादी लुग्या" इत्यन्त्यस्वरलोपे निदाः । निझा । निमभ्याम् इति न्यिते "नामसिदयन्य वने" नि २० पदसंज्ञायां 'तालच्या इचुयाञ्चयाः' इति स्यान्यासन्नत्वान, "धुटस्तृनीय" इति मन्च जत्वे निजम्यामिति सिद्धम् । एवं निम्भिः निभ्यः २ । निदान इति स्थिते "मासनिशाननन्यः" इत्यन्न्यस्यालोरं मल्ल झापा" सकारस्य अचवर्गाभ्यां पश्चाभ्यां च चोगे यथामहत्यं दावा न्यानानिति गुपः समारब मर:३३ - - . महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपेनहेमलघु- "यजसृजः" इति सूत्रे यज्ञादिधातुसाहचर्यात् शकारस्थापि धातुसम्बन्धिन एव ग्रह्णात् निशाशब्द- सम्बन्धिनः शकारस्य पत्वं न भवति, किन्तु "धुटस्तृतीयः” इति शस्य स्थान्यासन्नो जकार एव "चजः कगम्" इति परे गत्वे कर्त्तव्येऽसत्त्वात् गत्वं न भवति ततश्च "अघोपे प्रथमो शिटः" इति जस्य चत्वे "प्रथमादधुटि झच्छः" इति सस्य छत्वे निच्छु इति सिद्धम् । एवं नासिकाराब्दस्य "दन्वपादनासिका ५इति सूत्रेण नसादेशे नसः २.३ नासिकाः २-३ । नासिकाभ्यामिति स्थिते नसादेशे "सो रुः" इति रत्वे नोभ्याम् नोभिः नोभ्यः । सुपि "शपसे शपसं वा” इति रोः सत्वे नस्सु ॥ ६ ॥ सर्वादीनामावन्तानां डिसु विशेपमाह-सूत्रम् -- सर्वादेर्डस्पूर्वाः ॥७॥ [सि. १।१।१८] सवादेरावन्तस्स डितां ये यास् यास् यामो डस्पूर्वाः स्युः। सर्वस्यै । सर्वस्याः २ । सर्वसाम् । १० शेपं गद्गावत् ॥ ७॥ सर्वादे । सर्व आदिर्यस्य स सर्वादिः तस्य सर्वादि ६.१ "डित्यदिति" "एदोया." । पूर्वो ये ते डस्पूर्व १-३ "अत आः स्यादी.” 'समानानां.' "सो रुः" "रः पदान्ते." । द्विपदमिदं सूत्रम् । डस्पूर्वा इति डिस्वादन्यवरादिलोपे सर्वस्यै सर्वस्याः इत्यादि । तत्सम्बन्धिविज्ञानादिह न भवति प्रिय. सर्वाये । दक्षिणस्याश्च पूर्वस्याश्च यदन्तरालं सा दक्षिणपूर्वा दिक् तस्यै दक्षिणपूर्वाय अत्र बहुव्रीह्यादेरन्य- १५पदार्थादिप्रधानत्वात्सर्वादित्वाभायः। यद्येवं कथं दक्षिणपूर्वस्व इति प्रयोगः ? उच्यते दक्षिणा चासी पूर्वा घेति कर्मधारयोऽयम् । विभापा दिक्समासे बहुचीही अत्र सर्वनामता या स्यात् । यत्तु उत्तरपूर्वस्यै उत्तरपूर्वाय इति पाणिनीयैः सूत्रमारब्धम् तद्व्यर्थम् प्रागुक्तयुक्त्या प्रयोगद्वयसिद्धराविशेपाच । अथ यहुम्रीह्यादेः सर्वादित्याभावे कथं लकत्पितृकः मकपितृकः द्वकिपुत्रः ककिं सब्रह्मचारीत्यादावप्रत्ययः उच्यतेऽन्तरगत्यात्पूर्वमेवाकि भविष्यति । अन्ये तु बहुव्रीहावन्तरगसाप्यकः प्रतिषेधमिच्छन्ति तन्मते २० कप्प्रत्यय एव त्वत्कपितृको मत्कपितृक इति यथासम्भवं ज्ञेयम् ॥ ७॥ जरासन्दस्य विदशेपमाह-- जराया जरखा ॥ ८॥[सि० २।१३] खसम्बन्धिन्यन्यसम्बन्धिनि वा स्वरादी सादौ । बरसा जरे, २१ अरसः जराः, २॥ जरसा, जरया । जराम्याम् ३ । अतिजरसी ॥८॥ जरा० । जरा ६-१ "आपो डितां०" जरस् १-१ "दीर्घड्या०" या १.१ "अव्ययस्य" "अव- २१मो." त्रिपदमिदं० । स्वरादी सादी इत्युचत्वात् व्यञ्जनादी गद्गाराब्दवदुपनयः । जरसी २ जरे २ इत्यत्र द्विफेनान प्रथमाद्वितीयाद्विवचनयोहणम् जरमः जराः २ इत्यत्र द्विकेनाद्वेन जम्ासोहिणम् । एपमन्यत्रापि यथामम्भव शेयम् । अतिजरमी, एवमवितरसः अतिजराः पुमांस इत्यादि । केचित्तु पूर्वविप्रतिपेयेन इनातोः तयोः सन्निपातपरिमापया अनित्यत्वमाभित्स जरसि कृते निर्जरसिन निर्जरमा- दिति रूपे न तु [निर्जरसा] निर्जरम इत्येवं मन्यन्ते । इत्याकारान्ताः स्त्रीलिङ्गाः॥ ८ ॥ अथ इकारान्ताः स्त्रीलिङ्गा उच्यन्ते-तत्र इकारान्तो द्विान्दः । स च पायो मुनिरन् । बुद्धिः। युद्धी । युद्धयः । हे युद्धे । पुद्धिम् । ३१युद्धी । पुदीः । पुस्खा। - १० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरान्ताः स्त्रीलिङ्गाः । इकाराद्यन्ताः ११३ इकारान्तो बुद्धिशब्द इति स च प्रायो मुनिवदियत्र प्रायोग्रहणात् शसि पुंस्त्वाभावात्सकारस्य नत्वाभावः-बुद्धीः २-३, "टः पुंसि ना” इति टाया ना न भवति इत्यादि । बुद्धयादिशब्दानां ङित्सु विशेषमाह, सूत्रम्- स्त्रियां डितां वा दैदास्दास्दाम् ॥ ९॥ [सि० शा२८] स्त्रीलिङ्गादिदुदन्तात्परेषां स्वसम्बन्धिनामन्यसम्बन्धिनां च डितामेते आदेशा वा स्युः ।५ दकारो विशेपार्थः । बुद्ध्यै, बुद्धये । बुद्ध्याः २, बुद्धेः २ । बुद्ध्याम् , बुद्धौ । एवं प्रियबुद्ध्यै, प्रियबुद्धये पुंसे । एवं मतिभूतिप्रभृतयः । धेनुः । धेनू । धेनवः । हे धेनो । धेनुम् । धेनू । धेनूः । धेन्वा । धेन्वै, धेनवे । धेन्वाः धेनोः, २ । धेन्वाम् धेनौ । प्रियधेन्वै प्रियधेनवे पुंसे ।।९।। स्त्रियां० । स्त्री ७-१ "वीदूतः” इति डेराम् "स्त्रियाः” इति इयादेशः "लोकात्" । ङित् ६-३ "लोकात्" । वा १-१ "अव्ययस्य" । "तौ मुमो०" । दैश्च दास् च दास् च दाम् च दैदास्दास्दाम् १० १-१ "अनतो लुप्" । चतुष्पदमिदं० । दकारो विशेषार्थ इति “नित्यदिहिवराम्बार्थस्य हस्वः" "ऋन्नि- त्यदितः" इत्यादौ विशेषार्थ इति भावः । बुद्धि ४-१ अनेन दै आदेशे "इवर्णादेः०" इति यत्वे बुद्ध्यै पक्षे "डित्यदिति" इत्येत्वेऽयादेशे बुद्धये । एवं बुद्धि ५-१ अनेन दासादेशे इवर्णादेरिति यत्वे बुद्ध्याः पक्षे डित्यदितीत्येत्वे "एदोग्यां ङसिङसो रः" "रः पदान्ते.” बुद्धेः । एवं पष्टयेकवचनेऽपि । बुद्धि ७-१ अनेन दामादेशे "इवर्णादे." पक्षे "ङिडौँ” "डियन्त्य." वुद्धौ । पुंसि गौणत्वेऽपि प्रियवुद्धये, प्रियवुद्धये १५ इत्यादि । नपुंसकलिङ्गे तु गौणत्वेऽपि प्रियवुद्धयै प्रियबुद्धये प्रियबुद्धिने कुलाय एवं सर्वत्र रूपत्रयं ज्ञेयम् । उकारान्ता अपि स्त्रीलिङ्गे एतैरेव सूत्रैः सिध्यन्ति । तथा च रूपनयः-धेनुः धेनू धेनवः इत्यादि । अत्र लाघवार्थ क्रमोबनेन ईकारान्तात्पूर्वमुकारान्तानां निर्देशः कृतः ॥९॥ अथ ईकारान्ता उच्यन्ते । ईकारान्तो नदीशब्दः । “दीर्घड्याव्" इति सिलुकि नदी । नद्यौ । नद्यः । नदीम् । नद्यौ । नदीः । नद्या। ईकारान्तो नदीशब्द इति ईकारान्तानां डित्सु विशेपमाह ॥ ९ ॥ सूत्रम्- स्त्रीदूतः ॥ १० ॥ [सि० १।४।२९] नित्यस्त्रीलिङ्गादीदन्तात्परेषां स्वास्वङितां दें दास दास दामो नित्यं स्युः । नये । नद्याः २ । नद्याम् । स्वास्वेति वचनात् प्रियनद्यै पुंसे । सम्बोधने नित्यदित्वाद् हस्त्रे, हे नदि । एवं गौरीप्र- भृतयः । स्त्रीशब्दस्य ड्यन्तत्वात्से कि, स्त्री । स्वरादौ "स्त्रियाः" इतीयादेशे, स्त्रियौं । स्त्रियः १२५ "वाम् शसि" स्त्रियम् , स्त्रीम् । स्त्रियः, स्त्रीः । स्त्रिया । स्त्रियै । हे स्त्रि । लक्ष्मीशब्दस यन्त- त्वाऽभावात्सेलुग्नास्ति । लक्ष्मीः । शेपं नदीवत् । वधूः । वध्वौ । वध्वः। वधृम् । वध्वौं । वधूः। वध्वा । वध्वं । वध्वाः २ । वध्वाम् । हे वधु । एवं जम्यादयः । श्रीहीधीशब्दाः मुश्रीवत् । भूः स्वयम्भूवत् । भ्ररतिभ्रूवत् ।। १० । मातृशब्दः पिठ्यत् । माता मातरौ । मावः । स्वस- शब्दः कर्तृवत् । स्वसा । स्वसारी । शति महोपाध्यायधीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायधीविनयविजयगनिविरचितायां हमलघुप्रक्रियायां सरान्ताः सरिकाः । स्त्री० । ईच ऊच ईदून् त्रिवानीदून नीदूत तन्मात् ५-१ "लोकान्" "नो नः" ": पदान्ते"। एकपदमिदं० । नदी ४-१ अनेन नियं दे आदेदो "इवर्णादे." इत्यादि । एवं गौरीनमृतय इति सर्वेऽपि ङीप्रत्ययान्ता नदीशब्दवन् शेयाः इति भावः । पुंसि गौणत्वे प्रियनदिः प्रिपनदी नियनदयः ३४ है. प्रा० पूर्वा० १५ २० - ११६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज मलघु- स्सुि प्रियना प्रियनद्याः २ प्रियनद्याम् पुंसि । नपुंसके तु प्रियनदि प्रियनदिनी प्रियनदीनि । शेष पुल्लिंगवत् । स्त्रीशब्दो यद्यपि ड्यन्तोऽस्ति ततश्च "दीर्घड्याब्" इति से क् भवति तथाप्ययं विशे- पोऽस्ति यत् स्त्रीशब्दस्य स्वरादौ विभक्तौ परतः "स्त्रियाः” इति सूत्रेण इयादेशः स्यात् अमि शसि च विकल्पेन इयादेशः स्त्री ४-१ "वीदूतः" इति दैदासाद्यादेशे "स्त्रियाः" इति इयादेशे त्रियै स्त्रियाः २ ५स्त्रियाम् सम्बोधनेऽपि "नित्यदिहिखर०" इति हस्खे हे स्त्रि । ऊकारान्ता अपि एतैरेव सूत्रैः सिद्ध्यन्ति तथा च रूपनयः-वधूः वध्वौ वध्वः इत्यादि । एवं जम्ब्वादय इति तथा च जम्बूशब्दः स्वीक्लीवलिङ्ग इयं जम्यूः जम्यूवृक्षफलमिदं जम्बूवृक्षवाचकः स्त्रीलिङ्गे यथा नैषधे “एषा तरुस्तरुणि राजति राजजम्बू: स्थूलोपलानिव फलानि विमृश्य यस्याः । सिद्धस्त्रियः प्रियमिदं निगदन्ति दन्तियूथानि केन तरुमारुरुहुः पति" ॥ १॥ आदिशब्दात्कण्डूकच्छूकुरूरंभोरूप्रभृतयो ज्ञेयाः । श्रीहीधीशब्दाः सुश्रीशब्दवदिति । १० अयं भावः-"अवीतंत्रीतरीतंद्रीलक्ष्मीश्रीतीधियाः पुरः । भीशब्दस्य च सेर्लोपो न स्त्रीलिङ्गे कदाचन" ॥ १॥ "गोश्वान्ते हस्योऽनंशि समासेयो बहुव्रीहौ" (२१४९६) इतीयस्वन्तबहुव्रीहेहखनिषेधात् बहयः श्रेयस्योऽस्य बहुश्रेयसी पुमान् “दीर्घडयाब्०" इति सिलुक् , बहुश्रेयस्यौ बहुश्रेयस्यः बहुश्रेयसीम् पहुश्रेयसीन बहुश्रेयस्या वहुश्रेयसीभ्याम् ३ बहुश्रेयस्यै बहुश्रेयस्याः २ वहुश्रेयसीनां सप्तम्यां बहुश्रेयस्यां सम्बोधने "नित्यदिहिस्वर०” इति हस्ये हे बहुश्रेयसि । एवं प्रिया पिप्पल्य अस्य प्रिया पिप्पली पुमान १५इत्यादि बहुश्रेयसीवत् । तत्र लक्ष्मयादीनामौणादीकारान्तत्वात् श्यादीनां धात्वीकारान्तत्वात् “दीर्घ- ज्याद" इति न सेर्लोपः किन्तु विसर्ग एव श्रीः, "सयोगात्" इतीयादेशे श्रियो श्रियः श्रियं श्रियौ श्रियः श्रिया श्रीभ्याम् ३ श्रीभिः "वेयुवोऽस्त्रियाः" इति विकल्पेन दैदासाधादेशे "संयोगात्" इती. यादेशे श्रियै श्रिये श्रियाः २ श्रियः २ "आमो नाम्या” इति विकल्पेन नामादेशे श्रीणाम् ; श्रियाम् , श्रियाम् श्रियि श्रियोः २ श्रीपु हे श्रीः । एवं ह्रीशब्दोऽपि । धीशब्दस्य "धातोरिवर्णोवर्णस्य" इतीया- २० देशः एवं मीशब्दोऽपि धीशब्दवत् । अवी-तत्री-तरी-तन्द्रीशब्दा लक्ष्मीवत् ज्ञेयाः । भूरतिभ्रूवत् इति भ्रूः "भ्रूभोः" इत्युवादेशे ध्रुवौ भ्रवः ध्रुवम् ध्रुवी भ्रवः भ्रया भ्रूभ्याम् भूभिः "वेयुवोऽस्त्रियाः" इति या देदासाचादेशे ध्रुवै भ्रुवे भ्रुवाः २ ध्रुवः २ "आमो नाम्या” भ्रूणाम् भ्रुवाम् सप्तम्येकवचने भ्रुवाम् ध्रुवि भ्रुवोः२भूपु हे भ्रूः । ननु हे सुभ्र हे मीरु इत्यत्र भूमीरूशब्दयोर्नित्यदित्त्वाभावात्कथं हस्खत्वमि- त्यत्रोच्यते भ्रमणं भ्र'उणादिः सुप्ठ भ्रमणं यस्याः सा सुश्रु ततश्च सुर्घमीरुशब्दयोः वीपर्यायत्वा- २५दूष्टि कृते निसदिहिवरेत्यादिना हस्वः । सिद्धान्तकौमुद्यां तु 'हा पितः कापि हे सुद्ध्' इति भष्टिः प्रयोगः प्रमाद एवायमिति यव इत्युक्तमिति झेयम् ॥ १० ॥ मातृशब्दः पितृवदिति "दुशनसू० ." माता "अझै च" इत्यरादेशे मातरौ मातरः मातरम्, मातरौ शसि पुंस्त्वाभा- पादकारेण सह दीर्घ एव नतु नत्वम् मातृः । मात्रा मातृभ्यामित्यादि । एवं गौणत्वेऽतिमातृशब्दोऽपि । सम्बोधनेऽयं विशेपो "मातुर्मातः पुत्रेऽहं सिनामन्ये” (सि० १।४।४०) मातृशब्दस्य पुत्रे ३० पर्तमानस्य सामर्थ्यानीहो सिना सह मात इति अकारान्त आदेशः स्यात् । मातद्वारेण पुनप्रशंसायां गम्यायां फचोऽपवादः । गार्गी माता यस्य तस्यामधणं हे गार्गीमात, अन साध्यया माना तत्पुनः व्यपदेशयोग्यतया पुनः प्रशम्यते । पुन इति किम् ? हे गार्गीमारके वत्से । अहें इति किम् ? अरे गार्गीमातृक । वसूशब्दः कर्तृवदिति "वखसृनप्रानेष्ट." इत्यादिना आर् स्वसा स्वसारी इत्यादि "त्रियां नृतोऽस्वस्रादेः" इत्यन स्वस्रादिवर्जनात् स्वस्राब्दस्य ऋक्षणो डीनं भवति "जामिख ३५भगिनी खसा" । कोयुशन्दस्य विशेपमाह, सूत्रम्- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्त्रीलिङ्गा ऋकाराद्यन्ताः । नपुंसकलिङ्गाः अकारान्ताः ११५ स्त्रियाम् ॥ ११॥[सि० १।४।९३] क्रुशस्तुनस्तृच् निर्निमित्त एव स्यात् । ततो ड्यांक्रोष्ट्री ॥ ११ ॥ गो नौ शब्दाः प्राग्वत् । त्रि. स्त्री ७-१ "त्रीदूतः” इति दाम् "वियाः" इति इयादेशे लियाम् एकपदमिदं० । निनिमित्त एवेति पञ्चभिः क्रोष्ट्रीभिः क्रीतैरिति विगृह्य "मूल्यैः क्रीते” इतीकण तस्य "अनान्यद्विः प्लुवि"ति लुपि "ड्यादेौणस्य" इत्यादिना डीनिवृत्तौ पञ्चक्रोष्टमी रथैः । अत्र च निर्निमित्तत्वादादेशस्य डीनिवृत्तावपि५ निवृत्तिन भवति अत एव "कयङ्मानिपित्तद्धिते” इति पुंवद्भावो न भवति पुंवद्भावेनापि हि आदेश एव निवर्चनीयः स च निमित्तत्वाश्रयणे डीनिवृत्तावपि निवर्चत एव । ततो ड्यामिति अनेन तृजादेशे "त्रियां नृतोऽखस्रादेर्डीः" इति ज्यां "इवर्णादेरखे०” इति रत्वे क्रोष्ट्री । ततो नदीशब्दवद्रूपनयः ॥ ११ ।। रै गो नौ शब्दाः प्राग्वदिति-रैशब्दः सुरैःशब्दवत् गोशब्दस्तथैव नौशब्दः सुनौशब्दव- दिति । रैशब्दस्य "आ रायो व्यञ्जने" इति व्यञ्जनादौ आत्वं स्वरादावायादेशः राः रायौ रायः । १० गौः गावी गावः आ अम् शसोऽता" इत्यात्वे गाम् गावो गाः "एदोयां ङसिङसो रः” इति गोः २ इत्यादि। यां, शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यवत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः। तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ खोपजसत्प्रक्रिया- वृत्तौ भेसुरनुक्रमेण घटनां शब्दाः स्वरान्ताः स्त्रियाम् ॥ १ ।। - अ स्त्र रा न्ता २० पुंस कलिकाः अथ अकारादिस्वरक्रमेण प्राप्ता नपुंसकलिङ्गाः स्वरान्ताः शब्दा उच्यन्ते । तत्र अकारान्तो नपुंसकलिङ्गः कुलशन्दः। तत्र अकारान्तः कुलशब्दः इति कुल १-१ इति स्थिते सूत्रम्- अतः स्यमोऽम् ॥१॥[सि० ४।५७ ] अकारान्तस नपुंसकस्य स्वस्समोरम् स्यात् । कुलम् ॥१॥ अतः । अत् ६.१ "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." सिन्ध अम् च स्यम् तस्य स्यम् ६-१ "लोकात्" "सो रु" । अम् १-१ "दीर्घड्या." "अतोऽति." "अवर्णस्ये." "एदोतः" । त्रिपद- मिदं सूत्रम् । स्थानिमध्येऽग्रहणमुत्तरसूत्रार्थम् , सूत्रक्रमेणोत्तरसूत्रं हि "पवतोऽन्यादेरनेकतरस्य दः" २५ (२४५८) इति, तत्र हि स्यमोरुभयोरपि दकारो यथा स्यात्-अन्यत् तिष्ठति पश्य वेति । आदेशस्या- मोऽकारोच्चारणं जरसादेशार्थ तेनातिजरसं कुलं तिष्टतीति सिद्धम् ।। १ ।। कुल ओ १-२ इति स्थिते सूत्रम्- औरीः ॥२॥[ सि० १०५६ ] नपुंसकस्य खऔरीः स्यात् । कुले ॥२॥ औ० । औ १-१ "सो रुः" । ई १-१ "सो सः" "र: पदान्ते." "रो रे." । द्विपदमिदं० । अनेन औकारस्य ईत्वे "अवर्णस्ये." कुले ।। २ ।। कुल १-३ इति स्थिते सूत्रम्--- ३ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- नपुंसकस्य शिः ॥ ३ ॥ [ सि० शा५५ ] नपुंसकस्य जस्शसोः शिः स्यात् । स च घुटसंज्ञकः, शेपघुसंज्ञकश्च । शकारो विशेषार्थ ॥३॥ नपुं० । नपुंसक ६-१ "टाडसो०" शि १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते." । द्विपदमिदं । स च धुदसंज्ञक इति "स्यमौजसः स्युर्घटसंज्ञाः पुंस्त्रियोः शिनपुंसके' इति वचनात् । शेषघुसज्ञकश्चेति ५"विना सम्योधनाथ सिं शेपघुसज्ञका अमी" इति वचनात् । सकारो विशेपार्थ इति "स्वराच्छौ" "सख्युरितोऽझावैत्" इत्यादौ विशेपार्थ इत्यर्थः । कुल ३ इति जाते ॥ ३ ॥ सूत्रम्-- खराच्छौ ॥ ४॥[ सि० श६५] शौ परे स्वरान्तानपुंसका नोऽन्तः सात् ॥४॥ स्वरा० स्वर ५-१ "डेडस्योर्याती" "समानानां०"। शि७-१ "डिडौँ" "हित्यन्त्य." "लोकात्"। १०मध्ये "प्रथमाधुटि शश्छः" इति शस्य छत्वे 'तवर्गस्येति तस्य चत्वे द्विपदमिदं० । अनेन नोऽन्ता- गमे पुल म् इ इति जाते ॥ ४ ॥ सूत्रम्- नि दीर्घः ॥ ५॥[सि० शश८५] शेपघुट्परे नकारे परे स्वरस दीर्घः स्यात् । कुलानि ॥ ५॥ द्वितीयायामप्येवम् । “अदेवः समो"रिति सिलकि हे कुल । तृतीयादिपु देववत् । सर्वादिष्वन्यादीनां विशेषः । निः । न ७-१ "लोकान्" । दीर्घ १.१ "सो रुः" "र: पदान्ते." । द्विपदमिदं० । अनेन दीपे पुलानि इति सिद्धम् ॥ ५ ॥ द्वितीयायामप्येवमिति द्वितीयैकवचने "अतः स्यमोऽम्" इत्यमोप्यमादेशे "समानादमोत." फुलम् । सम्मोघनेऽपि परत्वात्पूर्वम् "अतः स्थमोऽम्” इति सेरमादेशे तस्य च "अदेवः स्वमोलक्” इति हे फुल । तृतीयादिपु देववदिति न कश्चिद्रूपे प्रक्रियायां या विशेष इति भावः । सर्वादिप्वन्यादीनां विशेप इति सूत्रम्- पञ्चतोऽन्यादेरनेकतरस्य दः ॥६॥ [सिक शा५८] अन्यादिपञ्चकस्सैकतरवर्जस समोर्दः स्यात् । अन्यद् ।। ६ ।। पर० । पञ्चेति सत्तामानमस्य वर्गस्य स पञ्चत् वर्ग: *"पञ्चाद्वर्गे वा” एतौ तदस्य मानमिति विपये घर्ग अत्प्रत्ययान्तो वा निपात्यते । पञ्चत् ६.१ "लोकात्" "सो रुः" । अन्य आदिर्यस्य स अन्यादिस्सस्स अन्यादि ६.१ "हित्यदिवि" "एदोन्या."। न विद्यते एक्तरः शब्दो यस्मिन् स अनेक- २५वर ६-१ "टाहसो०" द् १-१ "सोस" "र: पदान्ते." मध्ये "अतोऽति." "अवर्णस्ये' "एदोवः पदान्ते." 'लोकान् । चतुष्पदमिद सूरम् । अन्य १-१ अनेन सेर्दकारादेशे अन्यद् इति जावे ॥ ६ ॥ सूत्रम्- विरामे वा ॥७॥[सि० १३२५१] विरामन्यस शिड्स घुटः सप्रथमो या सान् । अन्यत् । अन्यतरद् २ | इतरद् २ । कतर ३०२ । क्तमद् २। एकवरपर्जनादेकतरम् ॥ ७॥ आसनस्य समादी सादी परेऽन्त्यलुम्वा । आसगन्दस याममादेश इति पाणिनीयाः । आमानि । आस्वा । आसन्म्याम् । हृदयोदकयो २२दमादेशी प प्रसादी सादी या ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे खरान्ताः नपुंसकलिकाः । अकारान्ताः ११७ ० । विराम ७-१ "अवर्णस्ये०" वा १-१ "अव्ययस्य" । विरामस्थत्येति पर्यन्तस्थस्येत्यर्थः । अनेन दकारस्य तकारे अन्यत् इति । एवमितरद् २ इत्यादिष्वपि रूपद्वयं द्विकेनाङ्केन ज्ञेयमिति ॥ ७ ॥ आसनशब्दस्य प्रथमवचनपञ्चके कुलशब्दवद्रूपनयः शसादिपु तु "मासनिशासनस्य.” इत्यन्त्यलुकि "नि दीर्घः" इति दीर्घ आसानि पक्षे आसनानि । आसन भ्याम् इति स्थिते अन्त्यलोपे “नामसिद०” इति पदसंज्ञायां नानो नोऽनह्नः" इति नलोपे प्राप्ते *"स्वरस्य परे प्राग्विधौ” स्वरस्यादेशः परनिमित्तकः५ पूर्वस्य विधौ विधेये स्थानीव स्यात् इत्यकारस्य सत्त्वान्नलोपो न भवति आसन्भ्याम् ३ पक्षे आसनाभ्याम् ३ । पाणिनीयानां तु आस्यशब्दस्यासन्नादेश इति पूर्वोक्तपरिभापया अनुपस्थानात् नलोपो भवति आस- भ्यामित्यादि । यत्तु सिद्धान्तकौमुद्यां आसनस्यासन्नादेश इति काशिकोक्तं प्रामादिकमित्युक्तम् तन्नातिपेशलम्-काशिकोक्तस्यानेकान्यव्याकरणसम्मतत्वात् 'आसन्यं प्राणमूचुरित्ययं प्रयोगस्त्वलौकिक एवान्यथा 'तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्ण मिति सूत्रे स्थानविशेपप्रतिपत्त्यर्थमास्ये भवमास्यमिति भाष्ये यदुक्तं १० तत्राप्यासन्यमिति प्रयोगप्रसङ्गः । हृदयोदकयोः प्रथमवचनपञ्चके कुलशब्दवद्रूपपद्धतिः शसादौ तु "दन्तपाद०” इति सूत्रेण हृदुदन् आदेशौ वा भवतः इति रूपद्वयं भवति । हृदय २-३ "नपुंसकस्य शिः” हृद् इ इति स्थिते सूत्रम्- धुटां प्राक् ॥८॥[सि० ११४६६ ] स्वरात्परा या धुइजातिस्तदन्तस्य घुटि परे धुटः प्राग्नोऽन्तः स्यात् ॥ ८ ॥ धुटां० । धुत् ६-३ "लोकात्” । प्राक् १-१ "अव्ययस्य" । द्विपद० । धुटामिति बहुवचनं जाति- परिग्रहार्थं तेन यत्र खरात्परं धुवयं भवति एको वा धुभवति तत्रानेन धुटि परे नोऽन्तो भवति यथा काष्ठत्वद्धि कुलानीति ततश्चानेन नोऽन्तागमे हृन्द् इ इति स्थिते ॥ ८ ॥ सूत्रम्- म्नां धुड्वर्गेऽन्त्योऽपदान्ते ॥ ९॥ [सि० १॥३॥३९] अपदान्तस्थानां नां वर्गे धुटि परे पुरःस्थधुट्सम्बन्धी पञ्चमः स्यात् । हन्दि । हृदा । हृदू-२० भ्याम् । उदानि उद्गा । उभ्याम् । पक्षे त्वासनादयः कुलवत् ॥९॥ नां० । म् च न च म्नस्तेपां - ६-३ धुट् चासौ वर्गश्च धुड्वर्गस्तस्मिन् धुडवर्ग ७-१ "अवर्णस्ये० अन्त्य १-१ "सो रुः" । पदस्य अन्तः पदान्तः न पदान्तः अपदान्तः तस्मिन् अपदान्त ७-१ "अव- र्णस्ये०" । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । अनेन नोऽन्तसम्बन्धिनो नस्य नत्वे हृन्दि इति सिद्धम् । ननु नस्य नत्वकरणं पिष्टपेपणवत्कथं युक्तमिति चेदुच्यते-कार्यान्तरवाधनाथ ततश्चात्र नकारस्य नकार एव स्यात् २५ न तु कार्यान्तरम् । तथाहुः श्रीसूरयः-"नामिति वहुवचनं वर्णान्तरवाधनार्थम् ,” तेन कुर्वन्ति कृपन्तिः विस्रम्भः संरम्भ इत्यत्र नकारस्य णत्वं वाधित्वानेन वर्गान्त्य एव भवति । क्रान्त्वा भ्रान्त्वा इत्यत्रापि नकारे कृते णत्ववाधनार्थं पुनर्नकारः। धुडिति किम् ? आहन्महे । धुड्वर्ग इति किम् ? हंस्यति । अपदान्त इति किम् ? भवान् करोति । अन्वित्यधिकारात् व्यक्ता व्यक्तुमित्य गत्वे कत्वे च कृते पश्चात्कवर्गान्त्यः अन्यथा च वर्गान्त्यः स्यात् ॥ ९॥अतिजरशव्दस्य "अतः स्यमोऽम्" इति स्यमोरमादेशे ३० सन्निपातन्यायस्यानित्यत्वाज्जरसादेशे "जरसो वा” [ ११४।६०] जरसन्तस्य नपुंसकस्य सम्बन्धिनोः स्यमो ग्वा भवति । अतिजरः अतिजरसं कुलं तिष्ठति पश्य वा । अन्ये द्वितीयैकवचनस्यामो योऽमा- देशस्तस्यैव लुबिकल्पमिच्छन्ति न स्यादेशस्य । केचिजरसः स्यमोर्लोपमिच्छन्ति तन्मतेऽतिजरसं तिष्ठति पश्येत्येव भवति । एवं. प्रथमाद्वितीययोर्द्धिवचने अतिजरे, अतिजरसी । बहुवचने शौ परत्वा-३४ ?

महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- जरसादेशस्ततो नागमः अतिजरांसि अतिजराणि तिष्ठन्ति पश्य वा। स्त्रियां तु विभक्तरापा व्यवधानान्न भवति । अथ आकारान्ता नपुंसकलिङ्गाः शब्दा उच्यन्ते विश्वपा १-१ इति स्थिते सूनम् - क्लीवे ॥१०॥ [सि० २।४।९७] नपुंसकस्य खरान्तस्य इस्व: स्यात् । विश्वपम् इत्यादि कुलवत् ॥१०॥ इकारान्तो बारिशब्द।। की० । क्लीव ७-१ "अवर्णस्ये० । एकपदमिदं० । अनेन हस्खे "अत: स्य०" समानादर विश्वपं फुलम् विश्वपे विश्वपानि इत्यादि सर्व कुलवत् ॥ १०॥ इकारान्तो वारिशन्द इति वारि १-१ इति स्थिते सूत्रम्--- अनतो लुप् ॥ ११ ॥ [सि० ३।२६] अकारान्तवर्जनपुंसकस्य समोलप् स्यात् । वारि २ ॥११॥वारि औ इति स्थिते "और" १०इतीकारे जाते। अनतो० । न अत् अनत् तस्य अनत् ६-१ । लुप् १-१ "दीर्घडया" मध्ये "सो २:" घोप- वति" । द्विपदमिदं० । लुकमकृत्वा लुपकरणं स्यमोः स्थानिवद्भावेन यत्कार्य तस्य प्रतिषेधार्थ सेन यत् तत् अन त्यदाद्यत्वं न भवति ॥ ११ ॥ वारि १-२ इति स्थिते "और" इति ईकारे जाते वारि ई इति स्थिते सूत्रम् अनामखरे नोऽन्तः॥ १२॥[सि०६४] नाम्यन्तस्य नपुंसकस्याम्वर्जे खरादौ सादौ नोऽन्तः स्यात् । चारिणी २ । वारीणि २ । यारिणा । वारिणे । वारिणः २ । वारिणोः २ । आमि मुनिवत् । वारीणाम् । वारिणि ॥१२॥ सम्बोधने । अनाम् । न आम् अनाम्, अनाम् चासौ स्वरश्च अनाम्खरस्तस्मिन् अनामस्वर ७-१ "अव. २०र्णस्ये." नोऽन्त १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." । द्विपदमिदं० । अनेन नोऽन्ते "रपृवर्णान्नो० णत्वे यारिणी । वारि १-३ "नपुंसकस्य शिः" "स्वराच्छौ" "नि दीर्घ:" वारीणि । द्वितीयायामप्येवम् । आमि मुनिवदिति "अन्नाम् खरे नोन्तः" इत्यत्र आम्वर्जनान्नोऽतो न भवति, किन्तु "हस्सापश्च" "दी? माम्य" "रपृव." पारीणाम् ॥ १२ ॥ सम्बोधने हे वारि १-१ इति स्थिते सूत्रम्- नामिनो लुग्वा ॥ १३ ॥ [सि० १।४।६१ ] २५ नाम्यन्तस्य नपुंसकस्य स्यमोटुंग्या स्यात् । लुकि च स्थानिवद्भावाल्लुप्तप्रत्ययनिमित्त कार्य सादिति सिना सह गुणे हे पारे । पक्षे "अनतो लुप्" इति सेल्प् । लुपि न वनिमित्तमिति गुणाभावे हे वारि । स्वसम्बन्धिविज्ञानात् हे प्रियवारे नर, नात्र विकल्पः ॥ १३ ॥ मधु २। मधुनी २ । मधूनि २ । मधुना । हे मधो । हे मधु । दध्यादीनां टादौ विशेषः । नामि० ।नामिन् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" लुक १-१ "दीर्घ." वा "अव्यय." मध्ये "घोष. ३० पति" "अवर्णसे." "धुटस्तृ०" । त्रिपदमिदं० । लुकि च स्थानिवद्भावादिति-अयमेव लुक्लुपोर्विशेपो यत् लुकिस्थानिवद्भावो भवति लुपि तु न भवतीति । एवं सर्वेपामपि नाम्यन्तानां सम्योधने प्रथमैकव- पने रूपद्वय ज्ञेयम् । परैरप्युक्तम् "सम्बोधने तूझनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्युदन्तम्।माध्यन्दि- ३३निर्वष्टि गुणं त्विगन्ते नपुंसके व्यामपदा वरिष्ठः" ॥१॥ माध्यन्दिनिर्नामाचार्यः नपुंसके इगन्ते - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्वरान्ताः नपुंसकलिङ्गाः । इकाराचन्ताः ११९ इति इ उ ल एतदन्ते गुणं त्विगन्ति वष्टिाञ्छतीत्यर्थः । माध्यन्दिनिः किंविशिष्टः ? व्याघ्रपदा व्याघ्रपद्गोत्रजानां मध्ये वरिष्ठः, श्रेष्ठ इत्यर्थः ॥ १३ ॥ एवं मधुशब्दस्यापि रूपपद्धतिः । मधु २ मधुनी २ । मधूनि २। हे मधो, हे मधु इति । यस्तु चैत्रो मधुश्चत्रिकश्चेति मधुशब्दः स तु पुंल्लिङ्गः साधुशब्दवत् । दध्यादीनां चतुर्णा टादौ विशेपमाह- ध्यस्थिसक्थ्यक्ष्णोऽन्तस्यान् ॥ १४ ॥ [सि० श६३ ] एपां नपुंसकानां स्वेऽखे वा टादौ स्वरे अन् स्यात् । "अनोऽस्य" इत्यल्लुकि दध्ना प्रियदना । "ईडौ वा" दनि दधनि । अस्था । अत्यस्मा । सक्ला । अक्ष्णा ॥ १४ ॥ इह द्विधा लिङ्ग- व्यवस्था केचिद् दध्यादिवजातिशब्दाः खत एव लिङ्गमुपाददते, गुणक्रियाद्रव्यसम्बन्धनिमित्ताश्च केचित्पवादिवद्विशेष्यानुरूपं लिङ्गमिति । दध्यस्थि० । दधि च अस्थि च सक्थि च अक्षि च दध्यस्थिसक्थ्यक्षि तस्य दध्यस्थिसक्थ्यक्षि ६-११० अनेनैव इकारस्य अन् "अनोऽस्य" इत्यकारलुप् “रपृवर्णा०” “लोकात्” “सो रुः" । अन्त ६-१ 'टाङसो” । अन् १-१ "दीर्घड्याव्०" । मध्ये "इवर्णोदे०" "अतोऽति०" "अवर्णस्ये.” "एदोतः पदान्ते." "समानानां०"। त्रिपदमिदं०। प्रथमाद्वितीययोर्व्यञ्जनादिपु च वारिशब्दवत् । दधि २ दधिनी २ दधीनि २ । दधि ३-१ इति स्थिते इकारस्य अनादेशे "अनोऽस्य" इत्यकारलोपे "लोकात्" दना। दधिभ्याम् ३ दधिभिः दन्ने दन्नः २ दध्नोः २ दन्नाम् "ईडौ वा” इति दन्नि धनि दधिपु हे दघे हे १५ दधि । प्रियदन्नेति अन्यतोलिङ्गत्वात् पुंवद्भावे प्रियदद्धिना । सप्तम्यां रूपत्रयम्-प्रियदन्नि प्रियदधनि प्रियदधौ । एवं अस्थि २ अस्थिनी २ अस्थीनि २ अस्मा अत्यस्ना अत्यस्थिना, अस्थिभ्याम् ३ अस्थिभिः अस्भे अस्थः २ अस्भोः २ अस्माम् अस्थि अस्थनि अस्थिपु हे अस्थे हे अस्थि । सक्थि २ सक्थिनी २ सक्थीनि २ सक्ना सक्ने सक्नः २ सक्योः २ सक्नाम् सक्नि सक्थनि सक्थिपु हे सक्थे हे सक्थि । अक्षि २ अक्षिणी २ अक्षीणि २ अक्ष्णा अक्षिभ्याम् ३ अक्षिभिः अक्ष्णे अक्ष्णः २ अक्ष्णोः २ अक्ष्णाम् २० अक्ष्णि अक्षणि अक्षिपु हे अक्षि हे अक्षे॥ दधि प्रतीतम्, अस्थि कीकसम्, सक्थि अरुः, अक्षि नेत्र- मिति ।। १४ । इह द्विधा लिङ्गव्यवस्थेति इह शास्त्रे लिङ्गव्यवहारो द्विधा भवति यथा केचित् स्वत्तोलिङ्गाः केचिदन्यतोलिङ्गाश्च । तत्र स्वतोलिङ्गानाह-जातिशब्दा इति जातिः प्रवृत्तिनिमित्तं येषां ते जातिशब्दाः घटपटगोमहिषादयः । अन्यतोलिङ्गानाह-गुणक्रियाद्रव्यसम्बन्धनिमित्ताश्चेति-गुणः क्रिया द्रव्यसम्ब- न्धश्च प्रवृत्तिनिमित्तं येषां ते तथा । पट्टादिवदिति । तत्र गुणप्रवृत्तिनिमित्तकाः पटुर्मूढः शुक्लः कृष्ण २५ इत्यादयः । क्रियाप्रवृत्तिनिमित्तकाश्च पाचको याचक इत्यादयः । द्रव्यसम्बन्धप्रवृत्तिनिमित्तकाश्च दण्डी धनवानित्यादयः । एते च यादृशं विशेष्यं भवति तादृशं लिङ्गं विभ्रति । 'गुणवृत्तेराश्रयाद्वचनलिङ्गे इति लिङ्गानुशासनवचनात् । तत एते अन्यतोलिङ्गा उच्यन्ते । यथा पुरुपश्चेत् पटुः खी चेत् पट्टी कुलं चेत् पटु । एवं पाचकः पाचिका पाचकम् , दण्डी दण्डिनी दण्डि। एवं लिङ्गव्यवस्थायां सत्यामन्यतो लिङ्गानां नपुंसकानां शब्दानां टादौ स्वरादौ विशेपमाह- वान्यतः पुमांष्टादौ खरे ॥ १५ ॥[सि. १९२] अन्यतो विशेष्यवशानपुंसको नाम्यन्तष्टादौ स्वरे पुंवद्वा स्यात् । पटुना २ । पटुने, पटवे । पटुनः पटोः, २। पटूनाम् २ । पटुनि, पटौ ॥ १५ ॥ नी-ग्रामण्यादिशब्दानां हस्खत्वे नि-३३ ३० " . सानुने । यस्तु स्तुः प्रस्थम् सानुरिति पुंल्लिङ्गः स्तुशब्दः सानुवाची स तु शब्दान्तरमेव । एवमवर्गवर्णो- १२० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- ग्रामणि कुलम् । निनी ग्रामणिनी । निना, निया । ग्रामण्या, ग्रामणिना । निनि । ग्रामणिनि । नियाम् , ग्रामण्याम् । हे ने, हे नि । हे ग्रामणे, हे ग्रामणि । कर्तृ. २ । कर्तणी २ । कर्तृणि २ । हे कर्तः । हे कर्तृणी । हे कर्तृणि । कर्ता । कर्तृभ्याम् । कर्तृभिः। कर्ने । एदैतो हस्खत्वे इकार ओदौत उकारश्च वाच्यौ । ततश्च अतिहि अतिरि अतिगु अतिनु कुलमित्यादि प्राग्वत् । ५ इति महोपाध्यायश्रीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिताया हैमलघुप्रक्रियाया खरान्ता नपुसकलिङ्गा । वान्यतः० । चा १-१ "अव्ययस्य” अन्यस्मादिति अन्यतः “किमद्वयादिसर्वाद्यवैपुल्यवहोः पित्तस्" इति तस् प्रत्यये अन्यतः १-१ । “अधण्तस्वाद्याशसः" इत्यव्ययसंज्ञायाम् "अव्ययस्य" इति सिलुक् । पुम्स १-१ "पुंसो पुमन्स्" "स्महतोः” इति दीर्घः पदस्य संयोगान्तस्य लुक् स्यादिति स्लोपः । टा आदिर्यस्य स टादिः टादि ७-१ "डिडौँ" "डित्यन्य." । स्वर ७-१ "अवर्णस्ये । स्वर ७-१ "अवर्णस्ये." । "समा- १० नानां०"। "सो रुः" "र: पदान्ते." "नोऽप्रशानोऽनुस्वारानुनासिकौ च पूर्वस्याधुट्परे” इति नस्य पः पूर्वस्यानुनासिकश्च । पञ्चपदमिदं सूत्रम् । पटु ३-१ पटुशब्दस्य गुणप्रवृत्तिनिमित्तकत्वेनान्यतो लिङ्गत्वात् विकल्पेन पुंवद्भावः । तत्र पुंवद्भावपक्षे "अनाम् स्वरे." पटुने अन्यपक्षे नित्यदिति "ओदौतो०” पटवे पटु ५-१, ६-१ "अनाम्०" पटुनः २ । मक्षे "डित्यदिति" "एदोझ्या." "र: पदान्ते." पटोः २ । पष्ठीबहुवचने तु पनामित्येव रूपम् । पटु ७-१ "अनाम्" पटुनि पक्षे "ङिडौँ” "डित्यन्य.” पटौ । १५पटु ६-२ ७-२ "अनाम्०” पटुनोः २ पक्षे "इवर्णादेः०” पट्टोः २ । पटुपु हे पटो हे पटु । अति- स्त्रिशब्दस्य "अनामस्वरे" इति नुमागमेन इयादेशो बाध्यते अतित्रिणी अतिस्त्रीणि । टादौ पुंवद्भाव- विकल्पेन अतिस्त्रिणा • अतिस्त्रिणे अतिस्त्रये, अतित्रिणः अतिस्रः॥ १५ ॥नीग्रामण्यादिशब्दानां ह्र- स्वत्वे इति-"क्लीवे” इति हखे नि २ ग्रामणि २ कुलमिति विशेष्यज्ञापनाय वचनं निनी • ग्रामणिनी २ नीनि २ ग्रामणीनि २ । एपामप्यन्यतोलिङ्गत्वात् टादौ स्वरादौ वा पुंवद्भावस्तत्र पुंवद्भावपक्षे “धातोरि- २० वर्णस्य०" इयादेशे निया । क्लीवत्वपक्षे "अनाम्" निना । ग्रामणीशब्दस्य पुंवद्भावपक्षे "निय आम्" इति डेरामादेशे नियाम् प्रामण्याम् पक्षे "अनाम् ” निनि ग्रामणिनि, व्यञ्जनादौ सर्वत्र पुंवद्भावाभावात् "लीचे” इति ह्रस्वत्वमेव निभ्याम् ग्रामणिभ्याम् निमिः ग्रामणिभिः इत्यादि । सम्बोधने "नामिनो लुग्या" इति सिलुकि "हस्वस्य गुणः” इति गुणे हे ने हे ग्रामणे । पक्षे "अनतो लुप्” इति सिलुप् हे नि है प्रामणि कुल इत्यादि । प्रियकोष्टुशब्दो मधुशब्दयत् टादौ स्वरे पुंवद्भावविकल्पेन प्रियक्रोष्ट्र प्रियक्रोप्टवे ..२५ प्रियकोठुने इत्यादि । मासपृतनासानूना मांस्पृत्स्नवो वाच्याः शसादौ वेति पाणिनीयास्ततश्च मासि मासानि मान्भ्यां, मांसाभ्याम् पृता, पृतनया पृपयां, पृतनाभ्याम् । सुनि सानूनि जुना सानुना सुने - , - वर्णान्ता नपुसकाः शब्दा उक्ताः । अथ ऋकारान्तास्ता कर्तृ २ कर्तृणी २ कर्तृणि २ । अस्य अन्यतो लिगत्वात् टादौ स्वरे या पुवद्भावः कर्ता कर्तृणा। सम्बोधने हे कर्तः हे कर्तृ इति । अथ एदन्ता ३० ऐदन्ता ओदन्ता औदन्ताश्च शब्दा उच्यन्ते । एदेतो ह्रस्वत्वे इकार ओदौत उकारश्च वाच्याविति- ततश्च अतिहे अतिरै अतिगो अतिनौ शब्दाना ह्रस्वत्वे हयमतिकान्तम् अतिहि २ रायमतिकान्तमतिरि २ गामतिकान्तमतिगु२ नावमतित्रान्तमतिनु२ कुलमिति अतिहिनी २ अतिहीनि एपामन्यतो लिङ्गत्वात् अतिहिना अतिया । एवमतिरिणी २ अतिरीणि २ अतिराया अतिरिणा व्यञ्जनादौ तु हस्वत्वे कृते "एकदेशविकृतमनन्यवत्" इति न्यायात् "आ रायो व्यञ्जने” इत्यात्वे अतिराभ्याम् अतिराभिः ३५ अतिरासु इत्यादि स्यात् । शेष सुगमम् ।

१२१ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । चकारान्ताः यां शिष्योचुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः तस्यां शासितसाधुशब्दसरणी स्वोपजसत्प्रक्रिया- वृत्तौ रेजुरमी समाप्तिसुपमा क्लीवाः स्वरान्ता रवाः ॥ १ ॥ थ 430 ज्य ज नान्ता पुंल्लिङ्गाः १० यथाक्रमं त्रिपु लिङ्गेषु स्वरक्रमेण स्वरान्ताः झब्दा अभिहिताः । अथ व्यञ्जनक्रमेण व्यञ्जनान्ताः शब्दास्त्रिपु लिङ्गेपु वक्तव्यास्तत्र व्यञ्जनानि च “कादिय॑ञ्जनम्” इति वचनात् कादीनि हपर्यन्तानि, तेषु कवर्गान्ताः शब्दाः प्रायोऽप्रसिद्धा इति चकारादारभ्य व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः शब्दा उच्यन्ते; एत- त्सर्वं मनसिकृत्याह-अथ व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गा इति । अथेति स्वरान्तशब्दकथनानन्तरं व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः शब्दा उच्यन्ते इति शेपः । तन चकारान्तः सुवाच शब्दः । तत्र चकारान्तः सुवाच् शब्द इति । 'वचं भापणे' उच्यत इति वाक् “दिद्युइट्टजगजु- हूवाक्प्राधीश्रीज्वायतस्तूकटप्रूपरिब्राह्माजादयः किप्” इति निपातनात् वाच् इति सिद्ध्यति । शोभना वाक् यस्य स सुवाक्, यद्यपि सुवाच्शब्दो विशेष्यलिङ्गत्वात्रिष्वपि लिङ्गेपु सम्भवति तथापि प्राधा- न्यात् पुंसि रूपाण्युच्यन्ते इति सुवाच् १-१ इति स्थिते सूत्रम् चजः कगम् ॥ १॥ [सि० २१११८६] धुटि प्रत्यये पदान्ते च चजोः कगौ स्याताम् । “धुटस्तृतीयः" इति, सुवाग, "विरामे वा" सुवाक् । सुवाचौ । सुवाग्भ्याम् । सुवाक् सु इति स्थिते, "नाम्यन्तस्था०" इति पत्वे । कपसंयोगे क्षः । सुवाक्षु । हे सुवाक् , हे सुवाग् ॥१॥ प्रत्यच स् इति स्थिते । चजः । चश्च जश्च च तस्य च ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते" कश्च गश्च कगं २० कग १-१ "अतःस्य०” समानाद०” । द्विपदमिदं० । अनेन चस्य कत्वे ततो "धुटस्तृतीयः” इति कस्य गत्वे सुवाग इत्येकं रूपम् , ततो "विरामे वा” इति पक्षे गस्य कत्वे द्वितीयं रूपं सुवाक् इति । स्वरादिवि- भक्तौ तु "लोकात्" इति स्वरसंयोग एव सुवाचौ सुवाचः । व्यञ्जनादौ तु विभक्ती "नामसिदय. इति पदसंज्ञायां "चजः कगम्” इति चस्य कत्वे "धुटस्तृतीयः” इति कस्य गत्वे सुवाग्भ्याम् , सुवाग्भिः। सुवाच सु इति स्थिते "नामसिदायि"ति पदसंज्ञायां "चजः कगमि"ति चस्य कत्वे "धुटस्तृतीयः” इति २५ कस्य गत्वे 'अघोपे प्रथमोऽशिटः” इति गस्य कत्वे 'नाम्यन्तस्था०" इति सस्य पत्वे कपसंयोगे क्ष इति सुवाक्षु इत्यादि सर्व सङ्केपेणाह-सुवाक् सु इति स्थिते इत्यादि । सन्योधनेऽपि प्राग्वत् कान्तं गान्तं वेति रूपद्व्यम् । धुटादिप्रत्ययोदाहरणं च वक्ता इत्यादि । प्रत्यच् स इति स्थिते इति प्रतिपूर्वक 'अञ्चू गतौ च' अञ्च् प्रत्यञ्चतीति विप् "अप्रयोगीत्" विप्लोपः "अञ्चोऽन याम्" इति नलोपः ततश्त्र प्रत्यच् १-१ इति स्थिते ॥ १ ॥ सूत्रम्- अचः ॥२॥[सि. ११४१६९ ] अञ्चतेर्धातोर्बुडन्तस्य घुटि परे ध्रुटः प्राग नोऽन्तः स्यात् । “दीर्वड्याव०" इति सिलकि ॥२॥३३ है .. ३० ० प्रका० पूर्वा० १६ - ho १२२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलघु- अचः । अच् ६-१ "लोकात्" "सो २ः" "र: पदान्ते." । एकपदमिदं सूत्रम् । अनेन नोऽन्ता- गमे प्रत्यन च् स् इति स्थिते "दीर्घडयाब्०” इति सिलुकि प्रत्यन् च् इति स्थिते ॥ २ ॥ सूत्रम्- पदस्य ॥३॥ [सि० २।११८९] संयोगान्तस्य लुक् स्यात् इति च लुक् ॥ ३ ॥ प० । पद ६-१ "टाडसो.” । एकपदमिदं । अनेन चलोपे प्रत्यन् इति स्थिते ॥ ३ ॥ सूत्रम्- युजञ्चकुञ्चो नो ङः ॥ ४ ॥ [सि० २।१।७१ ] एपां नस्य पदान्ते डः स्यात् । प्रत्य "तवर्गस्य श्चवर्ग." इति, प्रत्यञ्चौ । प्रत्यञ्चः । सम्बो- धनेऽप्येवम् । प्रत्यञ्चम् । प्रत्यञ्चौ ।। ४ ।। युजश्च० । युज् च अन् च क्रुन् च युजनचक्रुन्च तस्य युजन्चनुन्च् ६-१ "लोकात्" "सो २ः। १० - ६-१ "लोकात" "सो सः" । डः १-१ "सो १:" "र: पदान्ते." । "अवर्णस्ये." । त्रिपद- मिदं० । अनेन नस्य डत्वे प्रत्यड् इति प्रथमैकवचने रूपं सिद्धम् । प्रत्यन्च १-२ इति स्थिते "तव- गैस्य श्चवर्ग.” इति नस्य बत्वे प्रत्यञ्चौ, प्रत्यञ्चः इत्यादि । सम्बोधनेऽप्येवमिति । हे प्रत्यड्, प्रत्यञ्चौ हे प्रत्यञ्चः इति रूपाणि भवन्तीत्यर्थः ॥ ४ ॥ प्रत्यच् २-३ इति स्थिते सूत्रम्- अच्च प्रारदीर्घश्च ॥ ५॥ [सि० २।१।१०४ ] १५ णिक्यघुट्वर्जे यकारादौ स्वरादौ च प्रत्यये अचश्च इत्यादेशः स्यात् , पूर्वस्वरस्य च दीर्घः । प्रतीचः । प्रतीचा । प्रत्यग्भ्याम् । प्रत्यक्षु ॥ प्राङ् । प्राञ्चौ । प्राञ्चः । हे प्राङ् । प्राचा ! प्रारभ्याम् ॥ ५॥ अच्च० । अच् १-१ "दीर्घडयाव०" च १-१ "अव्ययस्य" प्राग् १-१ "अनतो." दीर्घ १-१ "सो रुः" च १-१ "अव्ययस्य" । पञ्चपदमिदं० । अनेन अघुट्स्वरादौ अचश्चादेशे पूर्वस्वरस्य दीर्थे च २० प्रतीचः प्रतीचा प्रतीचे, प्रतीचः ५-१६-१, प्रतीचोः २ प्रतीचाम् प्रतीचि । व्यञ्जनादौ तु "नामसिदयू० इति पदत्वे "चजः क्गम्” इति चस्य कत्वे "धुटस्कृतीयः" इति कस्य गत्वे प्रत्यग्भ्याम् प्रत्यग्भिः प्रत्यक्षु इत्यादि प्राग्वत् । प्रत्यञ्चति पूजयतीति वाक्ये अर्चाया नलोपाभावे "अञ्च प्राग्दीर्घश्च” इति लुप्तनका- रस्य अचो निर्देशात् इदं सूत्र न प्रवर्त्तते, “युजञ्चकुञ्चो नो डः इति सूने सामान्यतोऽञ्चतिनिर्देशात् इदं सूत्रं प्रवर्त्तते ततश्च प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वदेव रूपाणि, प्रत्यड् प्रत्यञ्चौ प्रत्यञ्चः प्रत्यञ्चम् प्रत्ययौ । २५ अघुटखरेऽपि प्रत्यञ्चः प्रत्यचा प्रत्यञ्चे प्रत्यञ्चः २ प्रत्यञ्चोः २ प्रत्यश्चि । व्यञ्जनादौ "नामसिदय इति पदसज्ञायां "युजञ्चतुञ्चो०” प्रत्यड्भ्याम् प्रत्यभिः प्रत्यक्षु । यकारादौ प्रत्ययेऽपि “शुप्रागपागुद प्रतीचो यः” (६।३।८) इति सूत्रेण भवाद्यर्थे यप्रत्यये अनेन सूत्रेण अचश्चादेशे प्रारस्वरस्य दीर्ये प्रत्यग्भवः प्रतीच्यो वायुः "अदिक् स्त्रिया वाञ्चः” (७१।१०७) इति स्वार्थिक ईनप्रत्यये प्रत्य- गेव प्रतीचीनम अनायाम अच इति स्त्रियां डीप्रत्यये प्रतीची दिक् । णिक्यघुड्वर्जनात् प्रत्यञ्चम् ३० आचष्टे "णिज् बहुल नाम्नः कृगादिपु” इति णिजि "अन्त्यस्वरादेरि"त्यन्यस्वरादिलुकि प्रत्ययति प्रत्यञ्च दच्छति "अमाव्ययात् क्यन् च" प्रत्यच्यति अत्र अचश्च आदेशो न भवति । अर्चायां स्रियां च "अञ्च" इति डीप्रत्यये प्रसञ्ची इति । एवं प्रपूर्वक अधातुः प्राञ्चतीति प्राड् प्राञ्चौ प्राञ्चः प्राञ्चम् प्राञ्चौ। प्राच् २-३ इति स्थिते "अञ्च प्राग०" इति अचश्चादेो प्रशब्दसम्बन्धिनः स्वरस्य दीर्घ प्राचः प्राचा ३४ इत्यादि । व्यञ्जनादो प्रारभ्याम् प्राम्भिः प्राच इत्यादि । अर्चाया घुट्यचनपञ्चो भाग्यत् अघुट्स्यरे । " ।

" १५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । चकारान्ताः १२३ प्रांञ्चः प्राञ्चा प्राञ्चे इत्यादि । व्यञ्जनादौ प्राभ्याम् प्राङ्भ्यः प्राङ्क्षु इत्यादि "शुप्रागपागु०” (६।३।८) इति यप्रत्यये प्राच्यः स्वार्थिके ईनप्रत्यये प्रागेव प्राचीना । अनर्चायां डीप्रत्यये प्राची । अर्चायां प्राची ॥ ५ ॥ उदचशब्दस्य पञ्चस्वविशेषः झसादौ च विशेप इति दर्शयति । सूत्रम्- उदच उदीच् ॥ ६ ॥ [लि० २।१।१०३ ] णिक्यघुड़जें यकारादौ स्वरादौ च । उदङ् । उदश्चौ । उदञ्चः । उदीचः । उदीचा । उद-५ ग्भ्याम् ॥ ६॥ उदच् ६-१ "लोकान्" "सो मः । उदीच् १-१ "दीर्घड्याव्" । "रोर्यः" तस्य स्वरे परे लुग्वा लुक्यसन्धिश्च । द्विपदमिदं सूत्रम् । अत्र सापेक्षं वृत्त्यंशमाह-णिक्यवुड्वर्ज यकारादौ स्वरादी चति । सूत्रवृत्त्योः सङ्घटनेऽर्थः स्पष्ट एव । णिक् धुटो वर्जयित्वा अन्यस्मिन् यकारादी स्वरादौ च प्रत्यये परे उदच झब्दस्य उदीच आदेशः स्वादित्यर्थः । ततश्च प्रथमवचनपञ्चके उदङ् उदछौ उदञ्चः उदञ्चम् १० उदछौ । झसादी स्वरे उदीचः उदीचा इत्यादि । व्यञ्जनादौ तु उदग्भ्याम् उदग्भिः उदग्भ्यः उदक्षु इत्यादि अर्चायां घुट्पञ्चके तथैव रूपाणि । अधुट्खरे उदञ्चः उद्या उदञ्चे । व्यञ्जनादौ उदङ्भ्याम् उदभिः उदक्षु इत्यादि । “युप्रागपाग्” इति यप्रत्यये उदीच्यः स्वार्थिके ईने उदीचीना अनर्चायां डीप्रत्यये उदीची दिक् । अर्चायां उड्ची स्त्री । अणिक्यपुटीयेव उदयति उदच्यति उदञ्चः ॥ ६ ॥ सध्यच्सम्यशब्दयोः प्रक्रियामाह सूत्रम्- सहसमोः सध्रिसमी ॥७॥[सि० ३।२।१२३ ] विवन्तेऽश्चतौ परे । सह अञ्चतीति सध्यङ् । सध्यञ्चौ । सध्यञ्चः । सधीचः । सधीचा । सममश्चतीति सम्यङ् । सम्यञ्चौ । सम्यञ्चः । समीचः । समीचा । सम्यग्भ्याम् ।। ७ ।। सह० । सहश्च सम् च सहसमौ तयोः सहसम् ६-२ "लोकात" "सो सः" "रः पदान्ते." सख्रिश्च समिश्च सधिसमि १-२ "इटुतोऽस्त्रे०" । द्विपदमिदं० । अत्रापि सापेक्षं वृत्त्यंशमाह किय-२० न्तेऽञ्चतो परे इति सूत्रवृत्त्योः संयोगेऽर्थः स्पष्ट एव । सहपूर्वक अञ्चधातुः सह अञ्चतीति किए "अप्रयो.” विप्लोपः, "अञ्चोऽन०" नलोपः, अनेन सहझब्दस्य सध्रि आदेशः "इवर्णा०” सध्यच् इति सिद्ध्यति । एवं सम्पूर्वक अञ्चधातुः समञ्चति इति क्विय् "अप्रयो०" "अञ्चोऽन०" अनेन सम्- शब्दस्य समिरादेशः "इवर्णादे.” सम्यच् इति सिद्ध्यति । ततश्च घुट्वचनपञ्चके सध्यङ् सध्यञ्ची सध्यञ्चः सध्यञ्चम् सध्यञ्चौं । सम्यङ् सम्यञ्चौ सम्यञ्चः सम्यञ्चम् सम्यञ्ची इत्यादि । अघुट्स्वरादी २५ लोकात् सध्रि अच् समि अच् इति विश्लेषः, "अञ्च प्राग दीर्घश्च" इति सूत्रेण अचश्चादेशे पूर्वस्वरस्य दीर्घ च सधीचः सधीचा समीचः समीचा इत्यादि । अधुळ्यञ्जनादौ तु सध्यग्भ्याम् सध्यनु, सम्यग्भ्याम् सम्यक्षु इत्यादि । सम्बोधनेऽपि हे सध्यङ् हे सम्यङ् इत्यादि । ईनप्रत्यये सधीचीनं समीचीनं डीप्रत्यये सत्रीची समीची । अर्चायां घुटि प्राग्वत् । झसादौ स्वरे सध्यञ्चः सम्यञ्चः सध्यञ्चा सम्यञ्चा सध्यङ्- भ्याम् सभ्यङ्भ्याम् । डीप्रत्यये सभ्यश्ची सम्यञ्ची इत्यादि ॥७॥ तिर्यशब्दस्य विशेषमाह सूत्रम्-३० तिरसस्तियति ॥ ८॥[सि० ३१२।१२४ ] अकारादो विवन्तेऽश्वतौ परे तिरसस्तिरिः स्यात् । तिर्यङ् । तियञ्चौ । तिर्यश्चः । अकारादा- विति किम् । अचश्चादेशे मा भूत् । तिरश्चः । तिरश्वा । तिर्यग्भ्याम् ॥ ८ ॥ - .

१२१ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहमलधु- तिर० । तिरस् ६-१ "लोकात्" "सो रुः” । तिरि १-१ शब्दरूपापेक्षया नपुंसकत्वे "अनत्तो लुप्" सूनत्वाद्वा सिलोपः । अत् ७.१ "लोकात्” । मध्ये "चटते." "इवर्णादे."त्रिपदमिदं । "सप्तम्या आदिः” इति परिभापया अतीति अफारादाक्त्यिर्थः । तिरस् इत्यव्ययं सकारान्तं तिर्यगर्थे "तिर्यगर्थे तिरः साची" इति वचनात् तिरस्तिरको वा अञ्चतीति किप, अनेन तिरसस्तिरि आदेशे 'इवर्णा." ५तिर्यच् इति सिद्धम् , ततो धुटि तिर्यड् तिर्यश्चौ तिर्यश्चः तिर्यश्चम् तिर्यञ्चौ । शसादौ तु अचश्चादेशे कृते अञ्चतेरकारादित्वाभावात् तिरिरादेशो न भवति तथा सकारेण व्यवधानात् पूर्वस्वरस्य दीर्घोऽपि न भवति ततश्च "सस्य शषौ" इति सकारस्य शत्वे तिरश्चः तिरश्चा तिरश्च: २ तिरश्चो २ तिरश्चाम् तिरश्चि । अघुव्यञ्जनादौ तु तिर्यग्भ्याम् तिर्यग्भिः तिर्यक्षु हे तिर्यड् इत्यादि । स्वार्थिक ईनप्रत्यये तिर्यगेव तिर- श्वीनम् , डीप्रत्यये तिरश्ची अर्चायां घुटि प्राग्वत् । शसादौ स्वरे तिर्यश्चः तिर्यश्चा । व्यञ्जनादौ तिर्यड्- १० भ्याम् तिर्यड्भिः तिर्यक्षु तिर्यड्पु । डीप्रत्यये तिर्यञ्ची । मुनि साधुमश्चति गच्छतीति वाक्ये मुन्यड् साध्यड् मुन्यञ्चौ साध्वञ्चौ मुन्यञ्चः साध्वश्चः मुन्यश्चम् साध्वश्चम् मुन्यञ्चौ साध्वञ्चौ मुनीचः साधूचः मुनीचा साधूचा मुन्यग्भ्याम् साध्यग्भ्याम् मुन्यक्षु साध्वक्षु इत्यादि । मुनिं साधुमश्चति पूजयतीति वाक्ये घुट्पञ्चके प्राग्वत् । शसादौ स्वरे मुन्यश्चः साध्यश्चः मुन्यञ्चा साध्वञ्चा मुन्यञ्चे इत्यादि । व्यञ्जनादौ तु मुन्यड्भ्याम् साधड्भ्याम् मुन्यड्भिः साध्वभिः मुन्यक्षु मुन्यड्पु साध्वक्षु साध्व- १५ड्पु इत्यादि भवति । सर्वमञ्चति विष्वगञ्चति देवमञ्चति गच्छतीति वाक्ये *"सर्वादिविष्वग्देवाडद्रिः क्यञ्चौ” सर्वादेर्विष्वग्देवाभ्यां च पर: किबन्तेऽञ्चतौ परे डद्रिरन्तः स्यात् ततश्च सर्पद्यड् विष्वग्यडू देवद्यड् सर्वद्या सर्वाञ्चः इत्यादि । शसादौ अचश्चादेशे पूर्ववरस्य दीर्घ च सर्वद्रीचः विष्वग्द्रीच: देवीचः इत्यादि । व्यञ्जनादौ सर्वयग्भ्याम् सर्वद्यक्षु इत्यादि । पूजायां प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वत् । शसादौ स्वरे सर्वद्यञ्चः विष्वग्यश्चः देवद्यञ्चः सर्वव्यञ्चा इत्यादि । व्यञ्जने सर्वघड्भ्याम् सर्वद्यक्ष २० इत्यादि । अनाया डीप्रत्यये सर्वद्रीची विष्वग्द्रीची देवद्रीची । अर्चायां सर्वयत्री इत्यादि । एवं अदसूशब्दस्य अमुमश्चति गच्छतीति वाक्ये अदमुयड् अमुअद् अमुमुयड् अयड् इति रूपचतुष्टयं यथा भवति तथा असन्ध्यधिकारे “अदोमुमी" इतिसूत्रव्याख्याने दर्शितमस्तीति ततो ज्ञेयम् । शसादौ खरे अदमुईचः अमुद्रीचः अमुमुईचः अद्रीचः अदमुईचा अमुद्रीचा अमुमुईचा अदद्रीचा इत्यादि । व्यञ्जनादौ अदमुयड्भ्याम् अमुयड्भ्याम् अमुमुयड्भ्याम् अदयङ्भ्याम् अदमुयड्भिः अमुद्यड्भिः २५ अमुमयभिः अभिः अदमुयक्षु अमुयक्षु अमुमुयक्षु अयक्षु । पूजायां प्रथमवचनपञ्चक प्राग्वदेव शसादौ नलोपाभावे "तवर्गस्य श्चवर्ग.” इति अदमुयश्चः अमुद्यञ्चः अमुमुयश्चः अदयश्चः अदमुयश्चा ४ इत्यादि । व्यञ्जनादौ अदमुयड्भ्याम् अमुयड्भ्याम् अमुमुयड्भ्याम् अदयड्भ्याम् अद- मुयक्षु अमुद्यक्षु अमुमुयक्षु अद्यक्षु । अनर्चायां डीप्रसये अदमुईची अमुद्रीची अमुमुईची अद- द्रीची। अर्चायां अव्यञ्ची एकमेव रूपम् । गामश्चति गच्छतीत्यन्न "स्वरे वाऽनक्षे” इति अवादेशे गयाइ ३० पक्षे “वाऽत्यसन्धिः" इत्यसन्धौ गो अड् पक्षे "एदोतः पदान्तेऽस्य लुक्" गोऽ। गवाञ्चौ गोअनौ गोऽयौ गवाञ्चः गोअश्चः गोऽश्चः इत्यादि । शसादौ स्वरे अचश्चादेशे गोचः गोचा । शसादौ व्याने गवार- भ्याम् गोअग्भ्याम् गोऽग्भ्याम् गवाक्षु गोअक्षु गोऽक्षु हे गवा हे गोअड् हे गोऽड् । गामश्नति पूजयती- सन प्रथमवचनपञ्चके सम्बोधने च प्राग्यत्, शसादौ स्वरे तु गवाचः गो अञ्चः गोऽनः गवाचा गोअश्या गोऽञ्चा। व्यञ्जनादौ गवाड्भ्याम् गोअड्भ्याम् गोऽड्भ्याम् गवाक्षु गोअक्षु गोऽक्षु इत्यादि। अनर्चायां स्त्रियां डीप्रत्यये अचश्चादेशे गोऽची अर्चायां गवाञ्ची गोऽश्ची इत्यादि। दृपदमञ्चति गच्छती- ३६त्या दृपद पट्यौ हपदशः दृपदश्चम् इषदचौ । शसादी स्वरे "अच प्राग् दीर्घश्च" इति अचश्चा• - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंलिङ्गाः । चकारान्तादयः १२५ देशो भवति दीर्घस्तु अन्वाचयशिष्टत्वात् "स्वरस्य हखदीर्घप्लुता" इति न्यायाच व्यञ्जनस्य न भवति ततो दकारस्य "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति प्रथमे तकारे कृते "तवर्गस्य.” इति तकारस्य चकारे कृते दृपञ्चः हपञ्चा इत्यादि । व्यञ्जनादौ उपदग्भ्याम् पदग्भिः दृपदक्षु । अर्चायां तु प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वत् । शसादौ स्वरे हपदञ्चः पदञ्चा इत्यादि । व्यञ्जनादौ पदङ्भ्याम् उपदभिः हपदक्षु इत्यादि । अनर्चायां स्त्रियां ङीप्रत्यये हपञ्ची अर्चायां दृपदची इत्यादि । एवमन्येपि योपिदञ्चप्रमुखाः स्वमूह्याः । ५ पितरमञ्चति गच्छति पिनङ् पित्रञ्चौ पित्रञ्चः । शसादौ स्वरे पितृचः पितॄचा । व्यञ्जनादौ पित्रग्भ्याम् पित्रग्भिः पित्रक्षु । अर्चायां प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वत् । शसादी खरे पित्रञ्चः पित्रचा इत्यादि । व्यञ्ज- नादौ पित्रझ्याम् पित्रभिः पित्रक्षु इत्यादि । अनर्चायां ङीप्रत्यये पितृची । अर्चायां पितृञ्ची इत्यादि । एवं कुन्च्शब्दोऽपि क्रुङ् कुञ्चौ २ क्रुञ्चः ४ । क्रुञ्चा क्रुझ्याम् क्रुक्षु हे क्रुङ् । क्रुङ् क्रौञ्चः पक्षी । 'सारसी' 'लक्ष्मणाथ क्रुङ् क्रौञ्चे' इति हैमः कोपः । इति चकारान्ताः शब्दाः समाप्ताः ॥ ८ ॥१० छकारान्ता अप्रसिद्धाः । अथ जकारान्ता उच्यन्ते । देव २-१ "यजी देवपूजासङ्गतिकरण- दानेपु” देवं यजते इति विप् “यजादिवचेः किति' इति यकारस्य इकारः “ङस्युक्तं कृता” इति समासः "ऐकायें” इति विभक्तिलोपः देवेज् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- यजस्मृजमृजराजभ्राजभ्रस्जवश्वपरिव्राजः : शः षः ॥ ९॥[सि० २।११८७ ] यजादीनां धातूनां चजोर्धातोः शस्य च धुटिप्रत्यये पदान्ते च पः स्यात् । “धुटस्तृतीयः" १५ इति डत्वे । देवेड् , देवेट् । देवेजौ । देवेड्भ्याम् ॥ ९ ॥ यज० । यजश्च सृजश्च मृजश्च राजश्च भ्राजश्व भ्रस्जश्च श्वश्च परिव्राज् च यजसृजमृजराजभ्रा- जभ्रस्जवश्वपरिव्राज् तस्य यजसृजमृजराजभ्राजभ्रस्जवश्वपरिव्राज् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "रः पदान्ते.” । ञ् ६-१ "लोकात्” “सो रुः” "रः पदान्ते०" । प १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते०" । त्रिपदमिदं० । अनेन जस्य पः "धुटस्तृतीयः” इति सूत्रेण स्थान्यासन्नः पकारस्य डकारः देवेड् "विरामे २० वा" इति डकारस्य टकारः देवेट, देवेजौ देवेजः देवेजम् देवेजौ देवेजः देवेजा । "नामसिदय्०" इति पदसंज्ञायां अनेन सूत्रेण पत्वे "धुटस्तृतीयः" इति डत्वे च देवेड्भ्याम् देवेभिः ॥ ९ ॥ देवेड् सु इति स्थिते सूत्रम्- डः सः त्सोऽश्चः ॥१०॥ [ सि० १।३।१८] पदान्तस्थाभ्यां डनाभ्यां परस्य सस्य तादिः सो वा स्यात् , अश्वः श्वावयवश्चेत्सो न स्यात् । २५ देवेन्त्सु । देवेट्सु । हे देवेड् हे देवेट् । तीर्थसृद्, तीर्थसृट् । कंसपरिमृड्, कंसपरिमृट् । सम्राइ , सम्राट् । विभ्राड् विभ्राट् ॥ १० ॥ ० । ड् च न च ड़ तस्मात् न ५-१ "लोकात्” “सो रुः" "र: पदान्ते."। मध्ये "अतोऽति." "अवर्णस्ये.” "एदोतः०" । चतुष्पदमिदं । अश्व इति किम् ? पछ्योतन्ति श्च्युतेः .सोपदेशत्वात् "शकारस्य सकारापदिष्टं कार्य विज्ञायते" तेन मधुभ्योततीति विप् मधुच्युतमाचष्टे णावन्त्यस्वरादिलोपे ३० पुनः विपि णि यलोपे सौ तल्लुकि "संयोगस्यादौ स्कोलक्” इति शलोपे चस्य कत्वे मधुगिति सिद्धम् । देवेड्त्सु अत्र सूत्रे डकारनिर्देशात् टत्वं न भवति । केचित्तु टत्वमपीच्छन्ति देवेट्त्सु पक्षे "अघोपे- प्रथमोऽशिटः" इति डस्य टत्वे देवेट्सु ! सम्बोधनेऽपि हे देवेड् हे देवेट् इत्यादि । अथ सृजधातुमाह तीर्थ २-१ "सृजीत् विसर्गे" तीर्थं सृजतीति कि "ङस्युक्तं कृता" इति समासः . "ऐकायें" इति ।

। १२३ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहेमलघु- तिर० । तिरस् ६.१ "लोकात्" "सो रु." । तिरि १-१ शहरूपापेक्षया नपुंसकत्वे "अनतो लुप्" सूत्रत्वाद्वा सिलोप. । अत् ७.१ "लोकात्" । मध्ये "चटते." "इवर्णादे०" । त्रिपदमिद | "सप्तम्या आदि." इति परिभाषया अतीति अकारादावित्यर्थ. । तिरस् इत्यव्यय सकारान्त तिर्यगर्थे "तिर्यगर्थे तिर साची" इति वचनात् तिरस्तिरको या अञ्चतीति किप् , अनेन तिरसस्तिरि आदेशे "इवर्णा." तिर्यच् इति सिद्धम् , ततो घुटि तिर्यड् तिर्यश्चौ तिर्यश्च तिर्यश्चम् तिर्यश्चौ । शसादौ तु अचश्चादेशे कृते अञ्चतेरकारादित्वाभावात् तिरिरादेशो न भवति तथा सकारेण व्यवधानात् पूर्वस्वरस्य दीर्णोऽपि न भवति ततश्च "सस्य शषौ" इति सकारस्य शत्वे तिरश्च तिरश्चा तिरश्च: २ तिरश्चोः २ तिरश्वाम् तिरश्चि। अघुव्यञ्जनादौ तु तिर्यग्भ्याम् तिर्यग्भिः तिर्यक्षु हे तिर्यड् इत्यादि । स्वार्थिक ईनप्रत्यये तिर्यगेव तिर- श्वीनम् , डीप्रत्यये तिरश्ची अर्चाया घुटि प्राग्वत् । शसादौ स्वरे तिर्यश्चः तिर्यश्चा । व्यञ्जनादौ तिर्यड्- १० भ्याम् तिर्यड्मि तिर्यक्षु तिर्यड्पु । डीप्रत्यये तिर्यश्ची । मुनि साधुमश्चति गच्छतीति वाक्ये मुन्य साघड् मुन्यश्चौ साध्वञ्चौ मुन्यञ्चः साध्यञ्च. मुन्यश्चम् साध्वञ्चम् मुन्यश्चौ साध्वञ्चौ मुनीचः साधूचः मुनीचा साधूचा मुन्यग्भ्याम् साध्वग्भ्याम् मुन्यक्षु साध्यक्षु इत्यादि । मुनि साधुमश्चति पूजयतीति वाक्ये घुट्पञ्चके प्राग्वत् । शसादौ स्वरे मुन्यश्चः साधञ्च• मुन्यश्चा साध्वञ्चा मुन्यञ्चे इत्यादि । व्यञ्जनादौ तु मुन्यड्भ्याम् साधड्भ्याम् मुन्यड्भिः साध्वद्भिः मुन्यक्षु मुन्यड्पु सापड्क्षु साध्व- १५ ड्पु इत्यादि भवति । सर्वमञ्चति विष्वगञ्चति देवमञ्चति गच्छतीति वाक्ये *"सर्वादिविष्यग्देवाइद्रिः क्यञ्चौ” सर्वादेविष्वग्देवाभ्या च पर किबन्तेऽश्चतौ परे डदिरन्तः स्यात् ततश्च सयड् विष्वग्यडू देवघड् सर्वद्यञ्चौ सर्वव्यञ्चः इत्यादि । शसादौ अचश्चादेशे पूर्वस्वरस्य दीर्घ च सर्वद्रीचः विष्वग्द्रीच: देवद्रीचः इत्यादि । व्यञ्जनादौ सर्वद्यग्भ्याम् सर्वद्यक्षु इत्यादि । पूजाया प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वत् । शसादौ स्वरे सर्वयञ्च. विष्वग्यच. देवद्यश्चः सर्वद्यञ्चा इत्यादि । व्यञ्जने सर्वद्यड्भ्याम् सर्वद्यक्षु २० इत्यादि । अनर्चाया डीप्रत्यये सर्वद्रीची विश्वग्द्रीची देवद्रीची । अर्चाया सर्वद्यश्ची इत्यादि । एव अदसूशब्दस्य अमुमश्चति गच्छतीति वाक्ये अदमुयड् अमुयड् अमुमुयड् अदयड् इति रूपचतुष्टय यथा भवति तथा असन्ध्यधिकारे "अदोमुमी" इलिसूनव्याख्याने दर्शितमस्तीति ततो ज्ञेयम् । शसादौ खरे अदमुईच अमुद्रीच अमुमुईच अदद्रीच अदमुईचा अमुद्रीचा अमुमुईचा अदद्रीचा इत्यादि । व्यञ्जनादौ अदमुयड्भ्याम् अमुद्यड्भ्याम् अमुमुयड्भ्याम् अव्यङ्गभ्याम् अदमुयड्मिः अमुद्यमि. २५ अमुमुयद्भिः अव्यभिः अदमुयक्षु अमुद्यक्षु अमुमुयक्षु अद्यक्षु । पूजाया प्रथमवचनपञ्चक प्रायदेव शसादौ नलोपाभावे "तवर्गस्य श्चवर्ग." इति अदमुयञ्च अमुद्यञ्चः अमुमुयश्चः अदयना अदमुयञ्चा ४ इत्यादि । व्यञ्जनादौ अदमुयड्भ्याम् अमुयड्भ्याम् अमुमुयड्भ्याम् अदाड्भ्याम् अद- मुयक्षु अमुक्षु अमुमुयक्षु अद्यक्षु । अनर्चाया डीप्रत्यये अदमुईची अमुद्रीची अमुमुईची अद- द्रीची । अर्चाया अदव्यञ्ची एकमेव रूपम् । गामश्चति गच्छतीत्यत्र "स्वरे वाऽनक्षे” इति अयादेशे गवाई ३० पक्षे “वाऽत्यसन्धिः" इत्यसन्धौ गो अड् पक्षे “एदोतः पदान्तेऽस्य लुक्" गोऽ। गवाञ्ची गोअनौ गोऽश्यो गवाश्च. गोअश्च. गोऽश्च इत्यादि । शसादौ स्वरे अचश्वादेशे गोचः गोचा । शसादौ व्यञ्जने गवार- भ्याम् गोअग्भ्याम् गोऽग्भ्याम् गवाक्षु गोअक्षु गोऽक्षु हे गवाड् हे गोअड् हे गोऽड् । गामश्चति पूजयती- सन प्रथमवचनपश्चके सम्बोधने च प्राग्यत्, शसादौ स्वरे तु गराञ्च. गो अश्चः गोऽश्च गवाचा गोअश्चा गोऽञ्चा। व्यञ्जनादौ गवाड्भ्याम् गोअड्भ्याम् गोऽभ्याम् गवाक्षु गोअक्षु गोऽक्षु इत्यादि। अनया स्त्रिया डीप्रत्यये अचश्चादेशे गोऽची अर्चाया गवाञ्ची गोऽची इत्यादि। पदमञ्चति गच्छती- ३६सन दृपदड दृपदश्वो हपदश्च पदश्चम् दृपद चौ । झसादौ खरे "अच प्राग दीर्घश्व" इति अचवा- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । चकारान्तादयः १२५ देशो भवति दीर्घस्तु अन्वाचयशिष्टत्वात् 'स्वरस्य हवदीर्घप्लुता” इति न्यायाच व्यञ्जनस्य न भवति ततो दकारस्य "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति प्रथमे तकारे कृते 'तवर्गस्य." इति तकारस्य चकारे कृते हपञ्चः उपञ्चा इत्यादि । व्यञ्जनादौ उपदग्भ्याम् पदग्भिः पदक्षु । अर्चायां तु प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वन् । शसादौ खरे पदञ्चः पदच्चा इत्यादि । व्यञ्जनादौ पदङ्भ्याम् पदभिः पदक्षु इत्यादि । अनर्चायां स्त्रियां ङीप्रत्यये पञ्ची अर्चायां उपदची इत्यादि । एवमन्येपि योपिञ्चप्रमुखाः स्वमूह्याः ।५ पितरमञ्चति गच्छति पित्रङ् पित्रञ्चौ पित्रञ्चः । शसादौ स्वरे पितृचः पितॄचा । व्यञ्जनादौ पित्रग्भ्याम् पित्रम्भिः पित्रक्षु । अर्चायां प्रथमवचनपञ्चके प्राग्वत् । शसादौ स्वरे पित्रञ्चः पित्रञ्चा इत्यादि । व्यञ्ज- नादौ पित्रङ्म्याम् पित्रभिः पित्रक्षु इत्यादि । अनर्चायां ङीप्रत्यये पितृची । अर्चायां पितृञ्ची इत्यादि। एवं कुन्च्शब्दोऽपि क्रुङ् कुञ्चौ २ क्रुञ्चः ४ । क्रुञ्चा क्रुङ्भ्याम् क्रुक्षु हे क्रुङ् । क्रुङ् क्रौञ्चः पक्षी । सारसी' 'लक्ष्मणाथ कुङ् क्रौच्चे' इति हैमः कोपः । इति चकारान्ताः शब्दाः समाप्ताः ॥ ८ ॥१० छकारान्ता अप्रसिद्धाः। अथ जकारान्ता उच्यन्ते । देव २-१ "यजी देवपूजासङ्गतिकरण- दानेयु" देवं यजते इति विप् “यजादिवचेः किति" इति यकारस्य इकारः "डस्युक्तं कृता" इति समासः "ऐकायें" इति विभक्तिलोपः देवेज् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- यजसृजमृजराजभ्राजभ्रस्जनश्चपरिव्राजः शः षः ॥ ९॥[सि० २।१।८७ ] यजादीनां धातूनां चजोर्धातोः शस्य च धुटिप्रत्यये पदान्ते च पः स्यात् । “धुटस्तृतीयः" १५ इति डत्वे । देवेइ , देवेट् । देवेजौ । देवेड्भ्याम् ॥ ९ ॥ यजः । यजश्च सृजश्च मृजश्च राजश्च भ्राजश्च भ्रस्जश्च श्वश्च परिव्राज् च यजसृजमृजराजभ्रा- जभ्रस्जनश्चपरिव्राज् तस्य यजसृजमृजराजभ्राजभ्रस्जवश्वपरिव्राज् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "रः पदान्ते." । ञ् ६-१ "लोकात्” “सो रुः" "रः पदान्ते०” । प १-१ “सो रुः" "र: पदान्ते.” । त्रिपदमिदं० । अनेन जस्य पः "धुटस्तृतीयः” इति सूत्रेण स्थान्यासन्नः पकारस्य डकारः देवेड् "विरामे २० वा" इति डकारस्य टकारः देवेट , देवेजौ देवेजः देवेजम् देवेजौ देवेजः देवेजा । "नामसिदय" इति पदसंज्ञायां अनेन सूत्रेण पत्वे "धुटस्तृतीयः” इति डत्वे च देवेड्भ्याम् देवेभिः ॥९॥ देवेड् सु इति स्थिते सूत्रम्- डः सः त्सोऽश्चः ॥ १०॥ [सि० १॥३॥१८] पदान्तस्थाभ्यां डनाभ्यां परस्य सस्य तादिः सो वा स्यात् , अश्वः श्वावयवश्चेत्सो न स्यात् । २५ देवेदत्सु । देवेट्सु । हे देवेह हे देवेट् । तीर्थसृङ्, तीर्थसृट् । कंसपरिमृड्, कंसपरिमृट् । सम्राइ, सम्राट् । विभ्राइ विभ्राट् ॥ १० ॥ डा० । ड्च न् च इ तस्मात् १५-१ "लोकात्” “सो रुः" "रः पदान्ते." मध्ये 'अतोऽति." "अवर्णस्ये." "एदोतः० "एदोतः” । चतुष्पदमिदं० । अश्व इति किम् ? पट्थ्योतन्ति युतेः सोपदेशत्वात् "शकारस्य सकारापदिष्टं कार्य विज्ञायते" तेन मधुथ्योततीति क्विय् मधुच्युतमाचष्टे णावन्त्यस्वरादिलोपे ३० पुनः किपि णि यलोपे सौ तल्लुकि “संयोगस्यादौ स्कोलक्” इति शलोपे चस्य कत्वे मधुगिति सिद्धम् । देवेड्त्सु अब सूत्रे डकारनिर्देशात् टत्वं न भवति । केचित्तु टत्वमपीच्छन्ति देवेट्त्सु पक्षे "अघोपे- प्रथमोऽशिटः” इति डस्य टत्वे देवेट्सु । सम्बोधनेऽपि हे देवेड् हे देवेट् इत्यादि । अथ सृजधातुमाह तीर्थ २-१ "सृजीत् विसर्गे" तीर्थं सृजतीति कि "डस्युक्तं कृता” इति समासः "ऐकाय” इति ३४ . .. ।

- १२६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहमलघु- विभक्तिलोपः "अप्रयोगीत्" किप्लोपः तीर्थसृज् १-१ इति स्थिते अनेन जस्य प: "धुटस्तृतीयः” इति पस्य डः तीर्थसृड् "विरामे वा” तीर्थसृट् । तीर्थसृजौ तीर्थसृड्भ्याम् तीर्थसृड्त्सु २ । हे तीर्थसृड् २ । इत्यादि । अथ मृजधातुमाह । कंस २-१ परिपूर्वक 'मृजौप् शुद्धौ' कंस परिमाष्टति कि "इस्युक्तं." "ऐकाये." "अप्र०" अनेन जस्य पः कंसपरिमृड् २, कंसपरिमृजो कंसपरिमृड्भ्यामित्यादि । अथ राजधातुमाह सम्पूर्वक 'राजग टुभ्राजि दीप्तो' समन्ताद्राजते इति सम्राञ् “सम्राट्" [सि० १।३।१६] समो मस्य राजतौ फिवन्ते परे अनुस्वाराभावः स्यात् । सम्राज् १-१ इति स्थिते अनेन जस्य पः ततः प्राग्वत् सम्राट् २, सम्राजौ सम्राड्भ्याम् सम्राट्सु २ । हे सम्राट् २ इत्यादि । अथ भ्राजधातुमाह-विपूर्वक 'राजुग टुभ्राजि दीप्तौ' विभ्राजते इति कि "अप्र.” विभ्राज् १-१ अनेन जस्य पः ततः प्राग्वत् विभ्राड् २ । विभ्राजौ । विभ्राड्भ्याम् । विभ्रात्सु २ । हे विभ्राड् २ । १० अथ भ्रस्जधातुमाह-धाना २-३ 'भ्रस्नीत् पाके' धाना भृजतीति कि "डस्युक्तं." "ऐकाये" "ग्रहबश्वभ्रस्जप्रच्छः" इति यत् धानाभृस्ज १-१ इति स्थिते ॥ १० ॥ सूत्रम्- संयोगस्यादौ स्कोर्लक् ॥ ११ ॥ [सि० २११८८ ] धुट्पदान्ते संयोगादिस्थयोः स्कोर्लक् स्यात् । धानाभृड्, धानाभृद् । “सस्य शपौ" इति सस शत्वे । "तृतीयस्तृतीयचतुर्थे" इति शस्य जत्वे, धानाभृजौ । एवं मूलवृद्ध, मूलघट् । मूलवृश्चौ । १५परिवाइ, परिबाट् ॥ ११॥ संयो० । संयोग ६-१ "टाडसो." । आदि ७-१ "डिडौं” । स् च क् च स्को तयो स्क् ६-२ "लोकात्" "सो रः" । लुक् १-१ दीर्घडयाव्। मध्ये "समानाना" । जलतुम्बिका० । चतुष्पद- मिदं० । धुट पदान्ते इति धुटादौ प्रत्यये परे पदान्ते च संयोगादिस्थयोः स्कोलक स्यादिति भावः। सतश्चानेन स्लोपे भृज् १-१ इति स्थिते “यजसृज० इति जस्य पत्वे प्राग्मत् धानाभृड् २ | धाना- २० भृरज् १-२ इति स्थिते “सस्य झपौ” इति सस्य शकारस्ततश्च "तृतीयस्तृतीयचतुर्थे” इति सूत्रेण स्थान्यासन्नः शकारस्य जकारः धानाभृजौ धानाभृजः धानाभृड्भ्याम् धानाभिः । धानाभृड्सु २ । हे धानाभृड् २ । अथ अश्वधातुमाह-मूल २-१ “ओत्रश्चौत् छेदने" मूलं वृश्चतीति विप् “इस्युक्तं० ऐकाये ग्रहश्चः” इति वृति "सस्य शपो” इति सकारस्य शकारः मूलवृश्च १-१ इति स्थिते "सकारापदिष्टं कार्य शकारस्यापि भवति" इति न्यायात् “सयोगस्यादौ स्कोलक्” इति शकारस्यापि लुक २५ ततश्च “यजसृज.” इति जस्य पः ततो "धुटस्तृतीयः” इति डत्वे मूल २ मूलवृश्चौ मूलवृश्चः मूलवृड्भ्याम् । मूलवृड्त्सु हे मूलवृड् २ । परिव्राजशब्दस्यापि जकारस्य पत्वं भवति यथा परि- पूर्वक 'धृज धृजु ध्वज ध्वजु ध्रज धजु बज वन पस्ज गतौ' ब्रजधातुः परिव्रजतीति "दिद्युद्दज- गञ्जुहूयाक्प्राधीनीद्रसूज्वायतस्तूकटप्रूपरिवाभ्राजादयः किम् (५।२।८३) इति किवन्तो निपातः, परिबाड् २ परिव्राजौ परिव्राजः परिव्राड्भ्याम् परिबाड्भिः परित्रात्सु । हे परिबाड् २ इत्यादि ॥ १॥ ३०जकारान्तानामेव विशेपमाह सूत्रम्- युनोऽसमासे ॥ १२॥ [सि० ११४७१] 'युजृम्पी योगे' इत्यस्यासमासे घुटि परे धुटः प्रानोऽन्तः सात् । युङ् । युञ्जौ । युजा ३३ युग्म्याम् । अममासे इति किम् ? अश्वयुक् अश्वयुग । युन इति किम् ? 'युजिश्च समाधौ' युज- - " - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । जकारान्तादयः १२७ : मापन्ना मुनयः ॥ १२ ॥ (पदान्ते ऋत्विजो गत्वं वाच्यम् ) ऋत्विक्, ऋत्विम् । तकारान्तो मरुत्शब्दः । मरुत् , मरुद् । मरुतौ । मरुभ्याम् । ऋकारानुबन्धो महत् शब्दः । युनो । युज़ ६-१ "इवर्णा." ऋकारस्य रः, "लोकात्” “सो सः" ऋकारस्य रः, "लोकात्" "सो रुः" न समासः असमासः तस्मिन् असमास ७-१ "अवर्ण०” मध्ये “अतोऽति०" "अवर्णस्ये०” “एदोत.” द्विपदमिदं । 'युजृम्पी योगे' इति धातुः युनक्तीति कि "अप्रयोगीत्” विप्लोपः युज् १-१ इति स्थिते अनेन जकारात्पूर्व नोऽन्तः,५ "दीर्घड्याव्.” सिलोप: "पदस्य" जलोपः "युजञ्चक्रुञ्चो नो ङ" युङ् । युज् १-२ अनेन नोऽन्ते "तव- र्गस्य श्ववर्ग०" इति युञ्जौ, युञ्जः, युञ्जम् , युञ्जौ । शसादौ घुट्त्वाभावान्नोऽन्तो न भवति इति युजः, युजा, युग्भ्याम् , युग्भिः, युक्षु, हे युङ् इत्यादि ॥ १२॥ ऋत्विज इति; ऋतौ ऋतुं ऋतवे ऋतुप्रयोजनो वा यजते इति वाक्ये ऋतुपूर्वकस्य यज्धातोः क्विय् "यजादिवचेः किति" इति यस्य इ: "इवर्णादेः०" ऋत्विज् , अनेन गत्वम् । “यजसृजः” इति पत्वस्यापवादोऽयम् , “चजः कगम्” इत्यस्य च प्रतिप्रसवोऽ-१० यम् । झकारान्तादयः शब्दाः प्रायोऽप्रसिद्धा इति तकारान्तान्विवक्षुराह-नकारान्तो मान्झब्द इति मरुत् १-१ "दीर्घङयाव्०” । स्वरादौ सर्वत्र “लोकात्” इति स्वरेण सह योगः । व्यञ्जनादौ तु "नामसिद" इति पदसंज्ञायां "धुटस्तृतीयः” इति दत्वे च मरुद्भ्याम् मरुद्भिः मरुत्सु हे मरुत् इत्यादि। महत् शब्दस्य विशेपमाह 'अर्ह मह पूजायाम्' महधातुः “द्रुहिवृहिमहिपृपिभ्यः कतः” (उ० ८८४) इति अतृप्रत्यये महतृशब्दः ऋकारोऽत्र ड्यर्थ इति मनसि कृत्याह-ऋकारानुवन्धो महत्दाब्द इति-महत् १५ १-१ इति स्थिते सूत्रम्- ऋदुदितः ॥ १३ ॥ [सि० ११४७०] ऋदित उदितश्च घुटि परे धुटः प्राग् नोऽन्तः स्यात् । “पदस्य" इति तलोपे ॥ १३ ॥ रुद्ध० । ऋच उच्च ऋद्भुतौ, ऋद्भुतौ इतौ यस्य सः ऋदुदित् तस्य ऋदित् ६-१ "लोकान्" "सो रुः" "र: पदान्ते.” । एकपदमिदं सूत्रम् । अनेन तकारात्पूर्व नोऽन्तागमे महन्त् १-१ इति स्थिते २० ॥ १३ ॥ सूत्रम्- स्महतोः ॥ १४ ॥ [सि० शा८६ ] न्सन्तस्य महतश्च स्वरस्य शेपे घुटि परे दीर्घः स्यात् । महान् । महान्तौ । शेपे घुटीत्येव हे महन् । हे महान्तौ । हे महान्तः । महतः ॥ १४ ॥ शतृप्रत्ययान्तानां घुटि दीर्घाभावो विशेषः । पचन् । पचन्तौ । पचन्तः । हे पचन् । उकारानुवन्धो भवत् शब्दः । न्स० । नकारेण युक्तः स् स् ।न्स् च महच्च न्स्महतौ तयोःन्समहत् ६-२ "सो रुः" "र: पदान्ते"। एकपदमिदं सूत्रम् । अनेन हकारस्य दीर्षे "दीर्घड्याव्०” सिलोपे “पदस्य” इति तलोपे महान् । महान्तौ महान्तः महान्तम् महान्तौ । व्यावृत्तिमुखेनैव पराणि रूपाणि निर्दिशति । शेपे घुटीयेवेति सम्बो- धनार्थसेः शेपघुट्त्वाभावात् अनेन दी| न भवति ततः "ऋदुदितः" इति नोऽन्तागमे "दीर्घडया" इति सिलोपे “पदस्य” इति तलोपे हे महन् हे महान्ती हे महान्तः । झसादौ परे घुट्वाभावादीर्घा न ३० भवति । महतः महता महद्भ्याम् महत्सु इति । शतृप्रत्ययान्तानामपि ऋदित्वात् महच्छब्दवन् "ऋदु- दितः” इति नोऽन्तो भवति, तत एतावानेव विशेपो-यत् महत् शब्दस्य शेपे धुटि दी| भवति शत- प्रत्ययान्तानां च "समहतोः” इति सूत्राप्राप्तेर्दी| न भवति तथैवाह-शतृप्रत्ययान्तानां घुटि दीर्घाभावो विशेष इति । "डुपचीप पाके' पचधातुः पचतीति पचन "शत्रानझावेष्यति तु सम्यों" ३४ २५ - १२८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- (५।२।२०) इति शतृप्रत्ययः अत्र शकारः शित्कार्यार्थ इत् ऋकारो ड्यर्थ इत् पचत् १-१ इति स्थिते "ऋदुदितः” इति नोऽन्तागमे "दीर्घड्याब्०" सिलोपे “पदस्य" इति लोपे पचन, पचन्ती पचन्तः हे पचन इत्यादि । उकारानुवन्धो भवत् शब्द इति 'भाक् दीप्तौं' भाधातुः भातीति भवान् “भातेर्डवतुः” ( उणा० ८८६) इति डवतुप्रत्ययः "डित्यन्त्यस्वरादेः" इति आकारलोपे भवत् । ५उकारोऽनुवन्धो ड्यावर्थः "ऋदुदितः" इति नुमागमे भवन्त् १-१ इति स्थिते ॥ १४ ॥ सूत्रम्- अभ्वादेरत्वसः सौ ॥ १५॥ [ सि. १४९०] अवन्तस्यासन्तस्य च भ्यादिवर्जस्य शेषे सौ परे दीर्घः स्यात् । भवान् । भवन्तौ । भवन्तः । हे भवन् । मतुप्रत्ययान्ता अप्येवम् । गोमान् गोमन्तौ । हे गोमन् ॥ १५ ॥ थकारान्तो दधि- मथ्शब्दस्तस्य "धुटस्तृतीयः" इति दत्वे । दधिमद् , दधिमत् । दधिमथौ । दधिमत्सु । हे दधि- १० मद्, हे दधिमत् । दकारान्तास्त्यदादयस्तेषाम् "आवरः" इत्यत्वे । अभ्वा० । भूरादिर्यस्य स भ्वादिः न भ्वादिः अभ्वादिः तस्य अभ्यादि ६-१ "डिन्त्यदिति" "एदोड्यां०” । अतुश्च अस् च अत्वस् तस्य अत्वस् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" रः पदान्ते." । सि ७-१ "डिौँ” "डियन्त्य.” । विपदमिदं सूत्रम् । अनेन दीर्घ "दीर्घड्याव्” इति सिलोपे "पदस्य" इति तलोपे भवान् । केवलं नुमागमे भवन्तौ भवन्तः । शेपे सौ इति किम् ? हे भवन् । अन्वादे १५ रिति किम् ? पिण्डं असते इति पिण्डग्रः चर्म वस्ते इति चर्मवः । "अर्थवद्हणे नानर्थकस्य” इत्येव सिद्धेऽस्यादेरिति वचनम् “अनिनस्मनग्रहणान्यर्थवताऽनर्थकेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्ति” इति न्याय- ज्ञापनार्थम् तेनात्रापि भवति-खरणाः खुरणाः । अधातोरित्यकृत्या अन्वादेरिति करणं भ्वादीनामेव वर्जनाथं तेनेह भवति-गोमन्तमिच्छतीति क्यनि किपि गोमान् । एवं स्थूलशिराः । मतुप्पत्ययान्ता अप्येवमिति-गौरस्यास्ति इति वाक्ये "तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुः” (७।२।१ ) इति मतुप्रत्यये गोमत् २०१-१, उकारानुबन्धत्वात् "ऋदुदितः" इति नुमागमे अनेन दीर्घे गोमान् । तकारान्ताः शब्दाः समाप्ताः ॥ १५ ॥ अथ धकारान्ता उच्यन्ते । दधि २-१, 'मथ विलोडने दधि मथतीति दधि- मथ् किम् “अप्रयोगीत्” किप्लोपः दधिमथ् “नामसिदय्” इति पदसंज्ञायां "धुटस्तृतीयः" इति दत्वे "दीर्घडयाव्०" सि लोपे दधिमद्, "विरामे वा” दस्य तकारे कृते दधिमत् । खरादौ विभक्तौ सर्वत्र स्वरयोगः, व्यञ्जनादौ तु "धुटस्तृतीयः” इति दः, दधिमथौ दधिमथः, दधिमाझ्याम् इत्यादि । सुपि तु २५"अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति दकारस्य तकारे कृते दधिमत्सु । सम्बोधने हे दधिमत् इत्यादि । अथ दकारान्तानाह-त्यदादय इति त्यद् तद् यद् एतद् इत्यादयः प्रसिद्धाः । त्यद् १-१ इति स्थिते "आद्वेरः" इति दकारस्य अकारे कृते स अ १-१ इति स्थिते सूत्रम- लुगस्यादेत्यपदे ॥ १६ ॥ [ सि० २।१।११३ ] अपदादावकारे एकारे च परे अस्य लुरू स्यात् । त्य इति जाते ॥ १६ ॥ ३० लुग० । लुग् १-१ “दीर्घडया" । अ६-१ "टाडसो०" अस्य । अच्च एच अदेत् तस्मिन् अदेत् ७.१ "लोकात्" । न पदं अपदं तस्मिन् अपद ७-१ "अवर्णस्ये." । मध्ये "लोकात्" स्वरहीनं० "समानानां." "इवर्णादे." । चतुष्पदमिदं० । “सप्तम्या आदिः” इत्यत आह-अपदादाविति दण्डाममियादौ पदादित्वादपारलोपो न भवति । त्यसम्बन्धिनोऽकारस्य लोपे "लोमात्" इति अकार- ३४योगे त्य १-१ इति स्थिते ।। १६ ॥ सूत्रम्- - एषः प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिमाः । दकारान्ताः १२९ तः सौ सः॥१७॥[सि० २११४२] द्विशब्दान्तानां त्यदादीनां स्वसम्बन्धिनि सौ परे तः सः स्यात् । स्यः । त्यौ । त्ये इत्यादि सर्ववत् । सः। तौ । ते । यः । यौ। ये । एषः । एतौ । एते । स्वसम्बन्धिनीति किम् ? प्रिय- त्यद् इत्यादि ॥१७॥ त: सौ०।त् ६-१ "लोकात्" "सो रुः "रः पदान्ते" | सि ७-१ "डिडौँ” "डित्यन्त्य०"५ "लोकात्"। स् १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते.” । त्रिपदमिदं सूत्रम् । अनेन तकारस्य सकारे कृते "सो रुः" "र: पदान्ते." स्यः १-१ । यद् १-२ "आवरः” “लुगस्या०" "लोकात्” "ऐदौत्०” त्यौ । त्य १-३ "जस इ." "अवर्णस्ये०" । एवं सर्वशब्दवद्रूपनयः। एवं सः तो ते, यः यौ ये इत्यादि । एतद् १-१ "आद्वेर!" "लुगस्या." "तः सौ सः" "नाम्यन्तस्था.” सस्य पः “सो रुः" "र: पदान्ते." एती एते इत्यादि सर्ववत् । प्रियत्यद इत्यादि अयं भावः-"आद्वेरः” इति सूत्रे स्वसम्बन्धिस्यादिप्रह-१० णात् "तः सौ सः" इति सूत्रे च स्वसम्बन्धिसिग्रहणात् यदा बहुव्रीयादिना त्यदादयो गौणीभूता भवन्ति तदैतत्सूत्रद्वयकार्याभवनात् प्रियत्यद् प्रियत्यदौ प्रियत्यदः प्रियत्यदा प्रियत्यद्भयामित्यादि । एवं स्त्रीलिङ्गेऽपि । नपुंसकलिङ्गे प्रियत्यद् प्रियत्यदी प्रियत्यन्दि । तद्यदेतदामप्येवम् । एषां त्यदादीनां "त्यादिसर्वादेः स्वरेष्वन्त्यात् पूर्वोऽक्" (७।३।२९) इत्यके स्यकः त्यको सके । सकः तको तके । यकः यको यके । एपकः एतको एतके इत्यादि ॥ १७ ॥ अथ एतच्छब्दस्य द्वितीया-१५ वचनत्रये टायामोसि च विशेषमाह सूत्रम- त्यदामेनदेतदो द्वितीयाटौस्यवृत्त्यन्ते ॥ १८॥ [ सि० २।१।३३ ] किश्चिद्विधातुं कथितस्य पुनरन्यद्विधातुं कथनमन्वादेशस्तस्मिन् गम्यमाने द्वितीयादौसि परे एतद् एनत् स्यात् , नतु वृत्त्यन्ते । आगत एपः अथो एनं भोजय । एनम् । एनौ । एनान् । एनेन । एतयो, एनयोः । अन्वादेशभावे । एतम् । एतौ । एतान् । वृत्त्यन्तेऽपि । परमैतं पश्य । २० इदमोऽप्येवम् ॥ १८ ॥धकारान्तो धर्मबुध्शन्दः । सदा० । यद् ६-३ "लोकात्” । एनत् १-१ "दीर्घडयाव्०” । एतद् ६.१ "लोका' "सो रुः" द्वितीया च टा च ओस् च द्वितीयाटौस् तस्मिन् द्वितीयाटौस् ७-१ "लोकात्" । वृत्तेरन्तः वृत्त्यन्तः न वृत्त्यन्तः अवृत्त्यन्तः तस्मिन् अवृत्त्यन्त ७-१ । मध्ये "लोकात्" "घोषवति" "अवर्णस्ये." "इवर्णादे०"। पञ्चपदमिदं सूत्रम् । किञ्चिद्विधातुमित्यादि अयं भावः-द्रव्यगुणक्रियादिकं कञ्चिद्विशे-२५ पमाधातुं यः प्राग् निर्दिष्टस्तस्यैव द्रव्यगुणक्रियाविशेषान्तराधानाद् यः पुनर्निर्देशः सोऽन्वादेश इति । न तु वृत्त्यन्ते इति, 'तु पुनः, यत्र शब्दः स्वार्थ परित्यज्य परार्थमभिधत्ते सा वृत्तिः "परार्थाभि- धायिनी समासादिवृत्तिरि"ति वचनात् तस्या वृत्तेरन्ते वर्तमानस्य एतच्छब्दस्य अन्वादेशे सत्यपि एनदा- देशो न भवति । तथैवोदाहरति आगत एष इति आगमनक्रियाविशेषमाधातुं यः प्राग् निर्दिष्टः स एव पुनर्भोजनक्रियाविशेषमाधातुं निर्दिश्यते ततोऽयमन्वादेशः । अन्वादेशाभिव्यक्तये च प्रायेण ३० अथोशब्दः प्रयुज्यते "अथो अन्वादेशादावि"ति वचनात् । अथो एनं भोजयेति एतद् २-१ अनेन एनदादेशे "आद्वेरः" इत्यादि एनम् । एवमेनौ एनान् भोजयेति प्राग्वत् । एवं एतेन रात्रिरधीता अथो एतेनाहरप्यधीतम् । षष्ठीसप्तमीद्विवचनयोरोसोरपि-एतयोः शोभनं शीलं अथो एनयोर्महती- कीर्तिः । साकोऽध्ययं विधिः-एतकं साधुमावश्यकमध्यापय अथो एनमेव सूत्राणीति । लाघवार्थमिदम्-३१ है. प्रका० पूर्वा० १७ - - १३० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते सोपज्ञहैमलघु- शब्दस्यान्वादेशप्रक्रियामवैवातिदिशति इदमोऽप्येवमिति । अन्वादेशाभावे तु एतम् एतौ एतान् एतेन एतयोः २ इत्येतान्येव रूपाणि स्युः । वृत्त्यन्तेऽपीति अन्वादेशे सत्यपि वृत्त्यन्ते एनदादेशो न भवति यथा परमश्चासौ एषश्च परमैपः त परमैतं, आगतः परमैपः अथो एनं परमैतं पश्येति भावः। ॥ १८ ॥ अथ धकारान्ताः शब्दाः । धकारान्तो धर्मबुधशब्द इति धर्म २-१ 'बुधिं मनिं च ज्ञाने' ५धर्म बुद्ध्यते इति धर्मबुध् कि "अप्रयोगीत्" किल्लोपः "इस्युक्त कृता" इति समासा "ऐकाये" इति विभक्तिलुप् धर्मबुध् १-१ । सूत्रम्- गडदबादेश्चतुर्थान्तस्यैकखरस्यादेश्चतुर्थस्सूध्वोश्च प्रत्यये ॥ १९ ॥ [ सि. २२१७७] यस्य गडदपानां कोऽप्यादौ भवति चतुर्थश्चान्ते भवति तस्यैकवरस्य शब्दावयवस्यादेश्चतुर्थः १० स्यात् , पदान्ते, सादौ धादौ च प्रत्यये परे । धर्मभु, धर्मभृत् । धर्मबुधौ । हे धर्मभुत हे धर्मभुद् । धर्मभुझ्याम् । धर्मभुत्सु ॥ १९ ॥ नकारान्तो राजनशब्दः-"नि दीर्घः" इति दी राजा राजानौ राजानः । अघुदसरे "अनोऽस्य" इत्यल्लोपे नस्य अत्वे जजोः राज्ञः राज्ञा । राजभ्याम्-असदधिकारविहितस्य नलोपस्सासत्त्वाद्दीर्घाभावः । राज्ञे । राज्ञः । राज्ञः । राज्ञोः। राज्ञाम् । राज्ञि राजनि, राजसु । सम्बोधने सौ दीर्घाभावः। १५ गड० । गश्च डश्च दश्च वश्च गडब समाहारद्वन्द्वः गडदवमादिर्यस्य स गडदबादिः तस्य गडद- वादि ६-१ कित्यदिति" "एदोन्या० चतुर्णा समापूरणः चतुर्थः "चतुरः” (७१११६३) इति थट्प्रत्ययः । चतुर्थोऽन्ते यस्य स चतुर्थान्तः तस्य चतुर्थान्तस्स ६-१ "टाम्सो." । एकस्वरो यस्य धातोरवयवस्य स एकस्वरः तस्स एकस्वर ६-१ "टासो." आदि ६-१ "स्त्यिदिति” एदोया० । चतुर्थ १-१ “सो रुः" "र: पदान्ते." । स् च ध्व च रध्वौ तयोः स्व ६-२ "लोकात्" । च १-१ २० "अव्ययस्य" । प्रत्यय ७-१ "अवर्णस्ये."। मध्ये "चटते." "ऐदौसं०" "समानाना." "घटते." "शपसे.” "घटते." । अष्टपदमिद सूनम् । वृत्तिः सुगमा । “नामसिद०" इति पदसज्ञायामनेन यथोक्तविशेषणविशिष्टस्य बुध् इति शब्दावयवस्य आयस्य वकारस्य सवर्णं चतुर्थे भकारे जाते "दीर्घडयाबू०" सिलोपे "धुटस्तृतीयः” इति धकारस्य दकारे जाते "विरामे वा” इति विकल्पेन प्रथमे च धर्मभुद् धर्मभुत् इति । एव धर्मभुद्भ्याम् धर्मभुन्यः धर्मभुत्सु हे धर्मभुद् २ । स्वरादौ तु सर्वत्र २५ पदान्तत्वाभावात् नास्य सूत्रस्य प्राप्तिरिति धर्मबुधौ धर्मबुधः इत्यादि । शेपाण्यस्य सूत्रस्योदाहरणानि यथास्थान दर्शयिष्यन्ते ॥ १९ ॥ अथ नकारान्ताः शब्दाः तत्र राजनशब्दस्य शेपघुट्पञ्चके रूपपद्धतिः प्रतीतैव । अघुट्खरे इति शसादौ स्वरे इत्यर्थः । ननु राजभ्यामित्यत्र "नानो नोऽनह” इति नलोपे "अत आः स्यादौ० इत्यात्वं कुतो न ' इत्यत्रोच्यते पञ्चमे पादे "णषमसत्परे स्यादिविधौ च" (२॥१॥६०) इति सूत्रादा- ३०रभ्य यत्कार्य विधीयते तत्सर्व परस्मिन् विधौ कर्तव्ये स्याधिकारविहिते च पूर्वमिभपि विधौ कर्त- व्येऽसदसिद्धं द्रष्टव्यं तच्छास्त्र याऽसद्रष्टव्यम् , असत्परे इत्यधिकारो रासः" (२।१।९०) इति यावत् स्यादिविधौ चेति तु आ "नोर्मादिभ्यः" (२१११९९) इति यावत् । “नानो नोऽनतः" (२॥ ११९१) इति सूरमपि तस्मिन्नधिकारेऽस्ति तत्र "अत आः स्यादौ.” (१।४।१) इति आत्वलक्षणे ३५स्यादिविधी कर्तव्ये नलोपोऽसन् भवति ततो नकारेण भ्यामा सह व्यवधानादात्वं न - ? भवतीत्येतत्सर्व . १० , प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । नकारान्ताः १३१ 'मनसिकृत्साह असदधिकारविहितस्येत्यादि । "ईडी वा” (२।१।१०९) इति राज्ञि राजनि । "नि दीर्घः" इति सूत्रे शेपघुटि परे इत्युक्तस्तत्र सम्बोधनसेरप्रवेश इत्यत आह-सम्बोधने सौ दीर्घाभाव इति । अथ सम्बोधने “दीर्घल्या.” इति सिलुकि "नाम्नो नोऽनह्नः" इति नलोपः प्राप्नोतीति तत्राप- वादसूत्रमाह- नामन्त्र्ये ॥ २०॥ [सि० २।११९२] सम्बोधने नाम्नो नस्य लुग् न स्यात् । हे राजन् ।। २० ॥ नाम० । न १-१ "अव्ययस्य” सिलुप् । आमयते इति आमत्र्यः तस्मिन् आमत्र्य ७-१ "अव- पस्ये०” | मध्ये "समानानां०" । द्विपदामिदं० । सम्बोधने इति सम्बोधनाहे वाच्ये नानो नस्य लुग् न स्यादित्यर्थः ॥ २० ॥ नकारान्तेष्वेव शब्देषु विशेषमाह-सूत्रम्- न वमन्तसंयोगात् ॥ २१॥ [सि० २२१११११] वान्तान्मान्ताच संयोगात्परस्यानोऽस्य लुग् न स्यात् । यज्वनः यज्वना । आत्मनः आत्मनि । शेपं राजन्वत् । एवं सुपर्वन्प्रभृतयः ॥ २१ ॥ नवम० । वश्व म् च वमौ वमावन्ते यस्य स वमन्तः वमन्तश्चासौ संयोगश्च वमन्तसंयोगः ५-१ "डेङस्यो०” । द्विपदमिदं० । अत्र वकारान्तसंयोगे यज्वन्शब्दो मकारान्तसंयोगे च आत्मन् : शब्दस्य उदाहरणम् । इदं च सूत्रम् "अनोऽस्य" "ईडी वा” इति सूत्रयोरपवादः, ततोऽघुटखरेऽकार-१५ लोपः सप्तम्येकवचने अकारलोपविकल्पश्चानेन निषिध्यते । तथैव सङ्केपेणोदाहरति । यज्वनः शसि पञ्चमीपष्ठयेकवचनयोश्च रूपम् । एवमात्मन इति । सप्तम्येकवचने आत्मनि शेषं राजन्वत् इति स्पष्टम् ॥ २१ ॥ पुनरपि नकारान्तेष्वेव विशेपमाह सूत्रम् - इन्हन्पूषार्यम्णः शिस्योः ॥ २२॥ [ सि० १।४।८७ ] इन्नन्तस्य हनादीनां च शिस्योरेव दीर्घः स्यात् । “नि दीर्घः" इति दीर्घ सिद्धे नियमार्थोऽयं २० योगः । दण्डी । दण्डिनौ । दण्डिनः । दण्डिना । दण्डिभ्याम् ३ । हे दण्डिन् । विन्प्रत्ययान्ता अप्येवम् । वचस्वी । वचस्विनौ २ । वृत्रहा ॥ २२ ॥ इन् । इन् च हन् च पूपा च अर्यमा च इन्हन्पूपार्यमन् तस्य इन्हन्पूपार्यमन् ६-१ "अनो- ऽस्य” इत्यल्लोपे "रपृवर्णान्नो ण." । "लोकात्” “सो रुः" "र: पदान्ते." । शिश्च सिश्च शिसी तयोः शिसि ७-२ "इवर्णा०" "सो रुः" "रः पदान्ते." । द्विपदमिदं० । *"प्रत्ययः प्रकृत्यादेः” यस्मात् २५ यः प्रत्ययो विधीयते सा तस्य प्रकृतिः प्रत्ययः प्रकृत्यादेः समुदायस्य विशेपणं भवति ततश्च "विशेषण- मन्तः" इति इनः प्रत्ययत्वात् इन्हाब्देन इन्प्रत्ययान्ताः शब्दा गृह्यन्ते । तथा दण्डोऽस्यास्तीति वाक्ये "अतोऽनेकस्वरात्” (७।२।६) इतीन् प्रत्यये दण्डिन्प्रभृतय इन्नन्ताः शब्दाः सिद्धयन्ति । हे दण्डिन् इति "नि दीर्घः" इति सूत्रस्य यत्र प्राप्तिस्तत्रैवायं नियम इति सम्बोधने सौ अनेन दीर्घो न भवति । ननु सार्थकेन्प्रत्ययान्तस्य दण्डिन्शब्दस्य भवत्वनेन दीर्घ; वचस्विन् इत्यत्र तु इन्शब्दो निरर्थकः ३० विन्प्रत्ययस्यैव सार्थकत्वात् “अर्थवगृहणे नानर्यकस्य” इति न्यायात् कथमस्य ग्रहणमित्यत्रोच्यते "अनिनस्मन्ग्रहणान्यर्थवताऽनर्थकेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्ति" इति न्यायात् निरर्थकोऽपि इन्शब्दो गृह्यते ततो विन्प्रत्ययान्तानामप्यनेन दीर्घा भवति एतन्मनसि कृत्याह-विन्प्रत्ययान्ता अप्येवमिति । अस्योपलक्षणत्वात् मिन्प्रत्ययान्ता अप्येवम् "स्वान्मिन्नीशे”.(७।२।४९) स्वामी, गोः-गोमी तथा इनः ३१ . - १३२ महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- सामान्यतो प्रहणात् दण्डिन इत्यादयो यथा मत्वर्थीयेमन्ता गृह्यन्ते तथा उष्ट्रकोशी साधुकारी इत्या- दयः कृदन्तीयणिन्प्रत्ययान्ता अप्यत्र प्राधाः । इनन्तानभिधाय हनादीनाह-वृत्र २-१ 'हनंक हिंसागत्योः' वृत्रं देवं हतवान् *"ब्रह्मभ्रूणवत्रात् किप्" (५।११६१) एभ्यः कर्मभ्यः पराभूतार्था- द्धन्तेः किम् स्यात् । “अप्रयोगीत" किप्लोपः वृत्रहन् १-१ अनेन दीर्घ "दीर्घउपा०" "नानो नो." ५वृत्रहा ॥ २२ ॥ वृत्रहन् १-२ इति स्थिते, अत्र "रपृवर्णान्नो ण एकपदे.” इत्यादि सूत्रेण णत्वं न प्राप्नोति समासान्तर्गतविभक्त्या भिमपदत्वेन रकारनकारयोनिमित्तनिमित्तिनोरेकपदस्थितत्वाभावात्ततो- ऽत्र णत्वविधानाय सूत्रम्-- कवर्गकखरवति ॥ २३ ॥ [ सि० २३७६ ] पूर्वपदस्थाद्रादेः परस्य कवर्गवत्येकखरवति चोचरपदे नो णः स्यात् । न चेदसौ पक्कस्य । १० धृत्रहणौ ॥२३॥ कव० । कस्य वर्गः कवर्गः एकश्चासौ स्वरश्च एकस्वरः कवर्गश्च एकस्वरश्च कवगैकस्वरम् कवर्गकखर• मस्यास्तीति कवगैकस्वरवत् तस्मिन् कवर्गकस्वरवत् ७-१ "लोकात्" । एकपदमिदं सूत्रम् । उत्तरपदे इति यथोक्तविशेषणविशिष्टे उत्तरपदे सति उत्तरपदान्तस्य तथा नागमस्य स्यादेश्व नस्य णः स्यादित्यर्थः । न चेदसौ पक्कस्येति क्षीरपकेन इत्यत्र णत्वं न स्यादित्यर्थः । कवर्गवत्युत्तरपदे इत्यस्योदाहरणं वर्ग- १५गामिणौ, उत्तरपदान्तस्य नस्य णः स्यादित्यस्याप्येतदेवोदाहरणम्। नामस्सोदाहरणं क्षीरपाणि वर्गकामाणि : कुलानीति । स्थादेनकारस्योदाहरणम् उर:केण गुरुमुखेण पुष्पमेघाणामित्यादि । पुरोगान् परममृगानित्यत्र तु अनन्यस्पेत्यधिकारान भवति ॥२३॥ वृत्रहन् २-३ इति स्थिते "अनोऽस्य" इति अलोपे, सूत्रम्-- हनो हो नः॥ २४ ॥[सि० २१११११२ ] हन्तेही न सात् ॥ २४॥ हनो० । हन् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । ह च ञ् च ह तस्य हू ६-१ "लोकात्" "सो रु"। नः १-१ "सो रु" "रः पदान्ते." । मध्ये उभयत्र "घोषवति" "अवर्णस्ये." । त्रिपदमिदं । ह इति मध्यगतस्याकारस्य लोपे हकारनकारसंयोगस्पेत्यर्थः ॥ २४ ॥ वृत्रघ्न इत्यादी भूतपूर्वकन्यायेन एकस्वरत्वात् "कवगैकखरवति" इति णत्वे प्राप्तेऽपवादसूत्रम्- हनो घि॥२५॥[सि० २३९४] २५ हनो घकारे निमित्चनिमित्तिनोरन्तरे सति नो णो न स्यात् । घृत्रमः । वृत्रभि वृत्रहणि । ॥२५॥ पूपा । पूपणौ । पूष्णि, पूपणि । अर्यमा । अर्यमणौ । अर्यम्णः । इत्यादि । हनो० । सूत्रं स्पष्टम् । “ईडौ वा” इति अल्लोपे वृत्रन्नि तदभावे पूर्वसूत्रेण णत्वे धृत्रहणि ॥ २५ ॥ एवं पूपन्शब्दोऽपि पूपणौ इति “रपृवर्णाः" इति णत्वम् । एवं अर्यमन्शब्दोऽपि । पुनरपि नकारा- न्तप्वेव विशेपमाह सूत्रम्- श्वन्युवन्मघोनो ङीस्यायघुट्खरे व उः॥ २६॥ [सि० २।१।१०६) ड्या स्थायघुदस्वरे च श्वनादीनां व उः स्यात् । श्वा । श्वानौ । श्वानः । है श्वन् । शुनः । शुना । युवा । युवानौ । हे युवन् । यूनः । मघवा । मघवानौ । मघोनः । हे मघवन् ।। २६ ॥ 'मघवत्शन्द्रस्तु मत्वन्तः। मघवान् । २० - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । नकारान्ताः १३३ - " . ? श्वन् । श्वा च युवा च मघवा च श्वन्युवन्मघवा तस्य श्वन् युवन्मघवन् ६-१ । अनेन व उ: "सो रुः” न घुट् अघुद अधुट्चासौ स्वरश्च अघुट्वरः । सिरादिर्यस्य स स्यादिः स्यादेरघुदस्वरः स्याद्यघुवरः । ङी च स्याद्यघुटस्वरश्च डीस्याद्यधुट्स्वर ७-१ "अवर्णस्ये । व् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । उ १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते." । मध्ये "घोषवति" "अवर्णस्ये.” "रोर्य:" "खरे वा" तस्य लोपः । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । धुवचनपश्चके राजन्शब्दवत्प्रक्रिया । ततः शसादौ स्वरे श्वन्-५ शब्दे अनेन वस्य उत्वे शुनः शुना इत्यादि । युवनशब्दे वस्य उत्वे "समानानां०" इति दीर्घ यूनः यूना , इत्यादि । मघवन्शन्दे वस्य उत्वे "अवर्णस्ये.” मघोनः मघोना इत्यादि । ननु मघवता इत्यादि प्रयोगाः कथं सिद्ध्यन्ति इत्याशङ्कयाह-मघवत्शन्दस्तु मत्त्वन्त इति मघो ज्ञानं सुखं वाऽस्या- स्तीति व्युत्पत्तेः । ज्यामिति "जातेरयान्त०” इति डयाम् अनेन वस्य उत्वे शुनी । युवानमतिक्रान्ता स्त्री "त्रियां नृत०” इति ड्या अतियूनी । मघोनः स्त्री "धवाद्योगादपालकान्तात्” इति ड्या मघोनी । १० एवं प्रियशुनी प्रिययूनी प्रियमघोनी कुले इति । अधुस्वर इति किम् ? प्रियश्वानि कुलानीत्यत्र वस्योत्वं न भवति । स्याद्यघुट् इति किम् ? केवलमघुटखरे इत्युक्ते शुन इदं यून इदं मघोन इदं "तस्येदम्" (६।३।१६०) इत्यणि वस्य उत्वं प्राप्नोति अणोऽप्यघुट्स्वरत्वात् , ततः स्यादिग्रहणं "प्वः पदान्तात् प्रागै- दौत्" (७४५) इति शकारवकारयोर्मध्ये औकारागमे अणि अनन्त्यस्याण्यन्त्यस्वरादेलग् न स्यादिति नलोपाभावे शौवनं यौवनं माघवनमिति ॥ २६ ॥ पुनरपि नकारान्तेष्वेव विशेपमाह-सूत्रम्-- १५ पथिन्मथिन्ऋभुक्षः सौ ॥ २७ ॥[सि० १११७६] पथ्यादीनां नान्तानामन्तस्य सौ परे आः स्यात् । इति नकारस्य आत्वे ॥ २७ ॥ पथि० । पन्था च मन्था च ऋभुक्षा च पथिन्मथिन्ऋभुक्षा तस्य पथिन्मथिन्मुक्षिन् ६-१ "इन् डीखरे लुक" इति इन्लुकि "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." । सि ७-१ "डिौँ” "डियन्त्य "लोकात्” । द्विपदमिदं सूत्रम् । नान्तानामिति पन्थानमिच्छति क्यनि नलोपे २० पथीयतीति विपि पथीः पथ्यो पथ्यः पथ्यम् इत्यादि, अन्न नान्तत्वाभावादेतत्सूत्रोक्तो विधिन भव- तीति । पथिन् १-१ इति स्थिते अनेन नकारस्य आत्वे पथि आ १-१ इति स्थिते ॥ २७ ॥ सूत्रम्- एः ॥२८॥ [सि० शा७७] पथ्यादीनामिकारय घुटि परे आः स्यात् । पथा इति जाते ॥ २८ ॥ एः । इ ६-१ "डित्यदिति” इकारस्य एत्वम् "एदोद्भ्यां ङसिङसोरः" "रः पदान्ते०"। एकपदमिदं२५ सूत्रम् । घुटि परे अनेन इकारस्य आत्वे "समानानां०” इति दीर्चे पथा १-१ इति स्थिते सूत्रम् ।। २८॥ थो न्थ् ॥ २९ ॥ [सि० १४७८] पथिन्मथिनोन्तियोस्थस्य घुटि परे न्य् स्यात् । पन्थाः । पन्थानौ । पन्थानः । हे पन्थाः ॥२९॥ थो० । थ् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" ।न्धू १-१ "दीर्घड्याव्" मध्ये "घोपवति' "अवर्णस्ये."1३० द्विपदामिदं० । अनेन थकारस्य न्यादेशे "सो रुः" "रः पदान्ते." पन्थाः । सम्योधनेऽपि न कश्चि- द्विशेष इति दर्शयति हे पन्थाः। घुटि परे इति सुपी बहुमथी कुले इत्यत्र "औरीः” इतीकारस्यं घुट्त्वाभावात्सूत्रद्वयोक्तो विधिन भवति ॥ २९ ॥ शसादिस्वरे परे विशेपमाह-सूत्रम- ३३ १३४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- इन् ङीखरे लुक् ॥३०॥[सि० शा७९] ड्यामघुटसरे च परे पथ्यादीनामिनो लुक् स्यात् । पथः । पथा। पथिम्याम् । मन्थाः। मन्थानौ । मथः । मभुक्षाः । ऋभुक्षः ॥ ३० ॥ पश्चनप्रभृतयो पहुवचनान्ताः नान्ताः सङ्ग्या- शब्दाः त्रिपुलिङ्गेपु सरूपाः । “डतिष्णः" इति जस्शस्लुपि पश्च । पञ्च । पञ्चभिः। पञ्चभ्या२। इन् । इन् १-१ "दीर्घडयाच्" । डीश्च स्वरश्च डीखर तस्मिन् डीस्वर ७-१ "अवर्णस्ये." । लुक् १-१ "दीर्घडयाब्" । द्विपदमिद सूत्रम । सूत्रे सामान्यतः स्वर उक्तोऽपि डीसाहचर्यात् अघुट्खरोऽत्र प्रायः । किमिद साहचर्यमिति चेदुच्यते अव्यभिचारिणा यत्र व्यभिचारी नियम्यते तत्साहचर्यम् यथा स्वरः अघुट घुट् च उभयथा भवतीति व्यभिचारी, डी तु अघुदस्वर एव भवतीति अव्यभिचारी, अव्यभिचारिणा या व्यभिचारी स्वरो नियम्यतेऽधुस्वर इति । तथा घुटि पथ्यादीनामिनो विशेपविधि- १०विधानादनाघुट्खर एवावसीयत इत्यत आह-डयामघुइखरे इति । सूत्रे इन लुक्पो भवतीति अभेद- निर्देशः "पष्ठ्यान्त्यस्य" इति परिभापया नकारस्यैव लोपप्रसङ्गात् शसादिपु पथ इति तृतीयैकवचने पथा इति । व्यञ्जनादौ विभक्तो परतः “नामसिद०" इति पदसज्ञायां "नानो नोऽनहः” इति लुक ततश्च पथिभ्याम् पथिषु इत्यादि रूपसिद्धिः । शोभनाः पन्थानो यस्या इति "त्रियां नृत.” इति डयाम् शोभनाः पन्थानो ययोः कुलयोस्ते "औरीः" इति जाते उभयत्रानेनेन्लुक सुपथी स्त्री सुपथी कुले वा। १५यथा पथिन्शब्दस्तथा मथिनशब्दोऽपि, नान कश्चिद्विशेषः । ऋभुक्षिनशब्दोऽप्येवमेव किञ्चान थकारा- भावात् न्थ आदेशो नास्तीति ततः ऋभुक्षाः इत्यादिरूपपद्धतिः, शसादिषु इन्लोपे ऋभुक्षः इति । पन्थाः मार्गः मन्था मन्थदण्डः ऋभुक्षा इन्द्र इति ।। ३० ॥ त्रिषु लिङ्गेषु सरूपा इति 'पुमासः पञ्च 'त्रियः पञ्च' 'कुलानि पञ्च' इति त्रिवपि लिङ्गेयु रूपे विशेषाभावात् समानरूपा इति एषा लिङ्गा- भावात् "नन्तासया डतिर्युष्मदस्मथ स्युरलिजका" इति वचनात् पश्चन् ६-३ इति स्थिते सूत्रम्--- सहयानां र्णाम् ॥ ३१ [सि० २४३३] रपनान्तानां सङ्ख्यापाचिनां खसम्बन्धिन आमो नाम् स्यात् । “दीर्थो नाम्यतिसृचतसृष्." इति दी । "नानो नोऽनहः" इति नलोपे पश्चानाम् । स्वसम्बन्धिन इत्येव । प्रियपश्चाम् । पञ्चसु । प्रियपश्चादयो राजन्वत् । एवं सप्तनप्रभृतयः ।। ३१ ।। सया० । सङ्ख्या ६-३ "हस्वापश्च” र च न च प च पूर्ण तेषां ६-३ "लोकात्" द्विपदमिद २५सूनम् । अनेन आमो नामादेशे पचन नाम् इति स्थिते "दी? नाम्य." इति दीर्घः । ननु "दी| नामी"ति सूने समानस्य नामि परे दीर्घः स्यादित्युक्तं ततो देवानामित्यत्र भवतु दीर्घः पर पश्चन् नाम् इत्यत्र तु कथ दीर्घो निमित्तनिमित्तिनोर्नकारेण व्यवधानादित्यत्रोच्यते, "दी? नामी"ति सूत्रे अति- सूचतसृष्र इति निर्देशात्, अन्यथा पण्णा चतुणी इत्यत्रापि पकाररकारव्यवधानादेव दीर्घनिषेधसि- द्धरत्र परवर्जन व्यर्थ स्यात्, प्राप्तिपूर्वको हि निषेध इति ततो "येन नाव्यवधान तेन व्यवहितेऽपि ३० स्यादि"ति न्यायोऽनेन सूनाशेन ज्ञाप्यते, ततः पञ्चन् नाम् इत्यत्र दीर्थो भवति । ततो "नामसिद० इति पदसज्ञाया "नानो नोऽनह्न." इति नलोपे पश्चानामिति सिद्धम् । पश्चादीनां गौणत्वे तु सर्वाण्यपि वचनानि सम्भवन्तीत्याहे प्रियपञ्चादयो राजन्वदिति प्रियाः पञ्च यस्य ययोर्येपा वा स प्रियपञ्चा प्रियपञ्चानो प्रियपश्चानः इत्यादि । शसादिषु "अनोऽस्य” इत्यलोपे "तवर्गस्य वर्ग." इति नस्य भत्वे ३४ प्रियपञ्चः इत्यादि ॥ ३१ ॥ अष्टनशब्दस विशेषमाह-सूत्रम्- २० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । नकारान्तादयः १३५ । वाष्टन आः स्यादौ ॥ ३२॥ [सि० १४१५२ ] अष्टनः स्यादौ परे आ वा स्यात् ।। ३२ ।। वाष्ट० । वा १-१ "अव्ययस्य" । अष्टन् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । आ १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते०” । सिरादिर्यस्य स स्वादिः तस्मिन् स्यादि ७-१ "दिन्डौँ” । मध्ये "समानानां०" "रोर्यः" "स्वरे वा” तस्य लुक् च । चतुष्पदमिदं सूत्रम् । अनेन नकारस्य अत्वे "समानानां०” दीः अष्टा ५ १.३ इति स्थिते ॥ ३२॥ सूत्रम्- अष्ट और्जस्शसोः ॥३३॥ [सि० ४।५३ ] अष्टनः कृतात्वस्य जस्शसोरौः स्यात् । अष्टौ । अष्टौ । अष्ट । अष्ट । अष्टामिः, अष्टभिः । अष्टाभ्यः अष्टभ्यः, २ । अष्टानाम् । अष्टासु, अष्टसु । प्रियाप्टा प्रियाप्टाः ॥३३॥ भकारान्तस्तु- ण्डिभूशब्दः । “गडदवादेः" इति ढत्वे । तुण्ढिव् , तुण्डिप् । तुण्डिभौ । मकारान्त इदम्शब्दः ।१० अष्ट० । अष्टा ६-१ "लुगातोऽनापः" इत्याकारलुप् “लोकात्” “सो रुः” । औ १-१ जस् च शस् च जस्ासौ तयोः जस्शस् ६-२ "लोकात्” “सो रुः" "र: पदान्ते.” । मध्ये "रोर्यः" "स्वरे वा" 1 त्रिपदमिदं सूत्रम् । अनेन जस्सोरौत्वे "ऐदौत्सं०” अष्टौ २ । पक्षे 'डतिष्णः” इति जस्- शस्लुपि "नाम्नो नो०” अष्ट २ । एवं सर्वत्र विकल्पेन आत्वम् । पष्ठीबहुवचने “सङ्ख्यानां र्णाम्" इत्यत्र बहुवचनं व्याप्त्यर्थं तेन "भूतभूर्वकस्तद्वदुपचार” इति न्यायात् भूतपूर्वनान्ताया अप्यनेन नामा-१५ देशे अष्टानामिति रूपम् , आत्वाभावपक्षेऽपि प्राग्वत् अष्टानामित्येव रूपम् । प्रियाप्टा प्रियाष्टाः इति प्रिया अष्टौ यस्य ययो य॒पां वेति गौणत्वे तु सर्वाण्यपि वचनानि सम्भवन्तीति । आत्वपक्षे प्रियाष्टाः १ प्रियाष्टो २ प्रियाष्टाः ३ प्रियाप्टाम् ४ प्रियाप्टौ ५ शसादी खरे परे "लुगातोऽनापः” इत्याकारलुप् प्रियाष्टः ६ प्रियाष्टा ७ इत्यादि सोमपावच्चतुर्विंशतिरूपाणि । नान्तत्वपक्षे प्रियाष्टा १ प्रियाप्टानौ २ प्रियाष्टानः इत्यादि राजन्वत् पञ्चविंशतिरूपाणि । एवमेकोनपञ्चाशद्रूपाणि । प्रियाप्र॒णः इत्यादौ “रपृवर्णान्नो ण.” इत्यादि २० टवर्गान्तरितत्वेन णत्वाभावेऽपि "तवर्गस्य.” इत्यादिना णत्वं भवति । इत्युक्ता नान्ताः शब्दाः ॥३३॥ शेषास्त्रयोऽप्रसिद्धा इति भकारान्ता उच्यन्ते तुण्डिभ्ाब्द इति वृद्धनाभिः पुमान् तुण्डिभः तुण्डिभमाचष्टे तुण्डिभयति तुण्डिभयतीति कि "अप्रयोगीत्" विप्लोपः "नेरनिटि" इति णिग्लोपे तुण्डिभ् १-१ "नामसिद०" इति पदसंज्ञायां "गडदवादेः०” इति डस्य ढत्वे 'दीर्घड्या०” सिलोपे "धुटस्तृतीयः" इति वत्वे तुण्ढिव् "विरामे वा” तुण्डिपू । एवं सर्वत्र पदसंज्ञायां आदिडस्य ढः । स्वरादौ २५ तु "लोकात्” तुण्डिभौ इत्यादि । अथ मकारान्ताः शब्दाः । इदम् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- अयमियं पुस्त्रियोः सौ ॥३४॥ [सि० २१॥३८] पुंस्त्रीलिङ्गयोरिदंशब्दस्य स्वसम्बन्धिनि सौ परे अयमियमौ साताम् । अयम् । स्वसम्बन्धि- नीति किम् ? प्रियेदम् ना स्त्री वा । द्विवचने "आद्वेरः" इति मस्य अत्वे ॥ ३४ ॥ अय० । अयम् च इयम् च अयमियम् १-१ "अनतो लुप्” पुमांश्च स्त्री च पुंस्त्रियों तयोः पुंत्रियोः३० पुत्री ७-२."स्त्रियाः" इति इयादेशः "लोकात्" "सो रुः" "रः पदान्ते०" | सि ७-१ "डिडौँ" "डित्यन्त्य." "लोकात्" । त्रिपदमिदं० । अनेन अयमादेशे "दीर्घड्याव०" अयम् । स्वमन्बन्धिनि सौ परे इति । यदा तु बहुव्रीह्यादिना इदम्शब्दो गौणीभूतस्तदान्यसम्बन्धिनि सौ परेऽयमियमौ न३३ 1 १३६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलधु- स्तः यथा प्रियोऽयं प्रेयेयं यस्य यस्या वा स प्रियेदम् पुमान् प्रियेदम् बी वा इत्येव भवतीति ॥३॥ इदम् १-२ इति स्थिते "आवरः” इति मस्य अत्वे "लुगस्या०" "लोकात्" इद औ इति स्थिते सूत्रम्- दो मः स्यादौ ॥ ३५॥ [सि०२।१।३९] खसादौ परे इदमो दो मः स्यात् । इमौ । इमे । इमम् । इमौ । इमान् । अन्वादेशे एनत् । ५एनम् । एनौ । इत्यादि ॥ ३५॥ दो मा0 1 द्६-१ "लोकात्" "सो रुः" 1 म १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते"स्वादि ७-१ "डिौँ" "डित्यन्य." । त्रिपदमिदं सूनम् । अनेन दस्य मत्वे "ऐदौ०" इमौ । इम १-३ इति स्थिते "जस इ." "अवर्णस्ये." इमे । शेषं स्पष्टम् । स्व इति किम् ? प्रियेदमौ । इत्यादि इत्यत्रादिशब्दप्रणात गौणस्य इदम्शब्दस्यान्यसम्बन्धिनि स्यादौ परे एवं रूपाणि-प्रियेदम् प्रियेदमौ प्रियेदमः प्रियेदमम् १० प्रियेदमौ प्रियेदमः प्रियेदमा प्रियेदंभ्याम् प्रियेदभिः प्रियेदमे प्रियेदभ्याम् ३ प्रियेदभ्यः २ प्रियेदमः २ प्रियेदमोः प्रियेदमाम् प्रियेदमि प्रियेदमोः प्रियेदंसु हे प्रियेदम् हे प्रियेदमौ हे प्रियेदमः । एवं स्त्रीलिङ्गे गौणत्वेऽपि । नपुंसकलिने तु गौणत्वे प्रियेदम् प्रियेदमी प्रियेदमि गौणत्वाभावे तु परमायं परमेय परमेमौ इत्यादि ॥ ३५ ॥ एतच्छब्दाधिकारे इदमोऽप्येवमित्यतिदेशवचनात् अन्वादेशे द्वितीयाटौसि परे इदम्शब्दस्यापि एनत् स्यात् न तु वृत्त्यन्ते । यथा आगतोऽयं अथो एनं भोजय १५एवमेनौ एनान् । अन्वादेशाभावे तु इमम् इमो इमान् वृत्त्यन्तेऽपि परमेमें पश्येत्यादि । इदम् ३-१ इति स्थिते सूत्रम्- टौस्यनः॥ ३६॥[सि० २११३७] खटासोः परयोरनकस्य इदमोऽनः स्यात् । अनेन । स्व इत्येव-प्रियेदमा । अनक इत्येव- इमकेन ।। ३६ ॥ टौ० । टा च ओस् च टोस् तस्मिन् टोस् ७-१ "लोकात्" । अन १-१ "सो रु" " पदान्ते"। द्विपदमिद० । 'अनक' इति अक्प्रत्ययरहितस्य इदमः अनादेशो भवति इत्यनेन इदमोऽना- देशे "टाडसोरिनस्यौ" "अवर्णस्ये० अनेन अन्वादेशे एनेन । साकोऽप्येव एनेन । अनक इति इदम् ३-१ "त्यादिसर्वादेः स्वरेष्वन्त्यात् पूर्वोऽक्" इदकम् इति जाते "आढेरः" "लुगस्या "दो मः स्यादौ" अनेन अनादेशाभावे "टाइसो." "अवर्णस्ये.” इसकेन ।। ३६ ॥ इदम् ३-२ २५इति स्थिते सूत्रम्- अनक् ॥ ३७॥[सि० २२१॥३६] व्यञ्जनादौ स्वस्सादौ परे अनकस्य इदमः अः स्यात् । आम्याम् ॥ ३७॥ अन० । न विद्यते अक् यस्य स अनक् अनक् १-१ "दीर्घडयाब् । शेप सर्वमनुवृत्तितो पापम् । अनेन इदमः अकारादेशे "अत आः स्यादी." आभ्याम् ॥ ३७ ॥ इदम् ३-३ इति स्थिते "अना ३० इत्यकारे जाते अ भिस् इति स्थिते "मिस ऐस्" इति सूत्रेण मिस ऐस्त्वे प्राप्ते नियमसूत्रम्-- "इदमदसोरक्येव” [ सि० ११४५३४ ] ख इति किम् ? प्रियेदंभ्याम् । "मिस ऐस्" इति नियमाद् "एगहुस्मोसि" इत्येत्वे एमिः । अकि तु इमकैः । असौ । असात् । अस्य । ३३ अनयोः । एपाम् । असिन् । एषु । २० " किम् ?

१३७ - " " । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । मकारान्तादयः इंद० । इदम् च अदस् च इदमदस् तस्य इदमदस् ६-१ "लोकात्" "सो सः" । अक् ७.१ "लोकात्" । एव १-१ "अव्ययस्य" । मध्ये "अतोऽति." "अवर्णस्ये." "एदोत:." "इवर्णादे." । "लोकात्” । त्रिपदमिदं० । अस्मै अस्मात् अस्य-अत्र "आद्वेरः” इति मस्य अत्वे "लुगस्या.” इद इति जाते "सर्वादेः स्मैस्माती" "टाङसोरिनस्यौ” इति डेङसिङसां स्मैस्मात्स्यादेशे विभक्तीनां व्यञ्जनादित्वात् "अनक्” इत्यकारो भवति । इदम् ६-२ "टौस्यनः” इत्यनादेशे "टौस्येत्” इत्येत्वेऽ.५ यादेशे अनयोः । अन्वादेशे एनयोः । साकोऽप्येवम् एनयोः । एवम् सप्तमीद्विवचनेऽपि । इदम् ६-३ "आवरः" "लुगस्या.” इदु आम इति स्थिते "अवर्णस्यामः साम्” इत्यामः सामादेशे ततोऽनक् इत्य- कारादेशे "एद्वहु० "नाम्यन्तस्था० एपाम् । इदम् ७-१ इति स्थिते " स्मिन्" इति स्मिन्नादेशे "अनक्” इत्यकारादेशे अस्मिन् । इदम् ७.३ "अनक्” "एहु०" "नाम्यन्तस्था०” एए । अकि तु अन्वादेशे द्वितीयाटौसि परे एनदादेशो न स्यादित्येके । अक्सहितस्यापीदमोऽन्वादेशे एनदादेशः १० स्यादित्यन्ये । तथा अन्वादेशे साकोऽपि निरकोऽपि इमो भ्याम्भ्यसादिपु व्यञ्जनादिस्यादिपु अदा- देशो भवति नान्यथा । एतत्सर्वं रूपदर्शनेनैव व्यक्तीक्रियते । साकोऽपि अयमादेशे अयम् । अपरे त्वादेशानन्तरमकमिच्छन्ति अयकम् । इमको इमके इमकम् एनम् , इमको एनौ इमकान् एनान् इमकेन एनेन इमकाभ्याम् आभ्याम् इमकेभ्यः एभ्यः इमकस्मात् अस्मात् इमकाभ्याम् ३ । अस्य इमकस्य इमकयोः एनयोः इमकेपाम् एपाम् इमकस्मिन् अस्मिन् इमकेपु एषु ॥ ३७ ॥ किम्शब्दस्य विशेप-१५ माह सूत्रम्- किमः कस्तसादौ च ॥३८॥ [सि० २॥१॥४०] स्यादौ तसादौ परे किमः कः स्यात् । कः । साकोऽपि कः । कौ। के । सर्ववत् ॥ ३८॥ चतुर्शब्दो बहुवचनान्तः। किम: । किम् ६-१ "लोकात्" “सो रु" "र: पदान्ते०"। क १-१ "सो रुः" । तस् आदिर्यस्य २० स तसादिः तसादि ७-१ "डिडौं" "डित्यन्य०"। च १-१ "अव्ययस्य" । मध्ये "चटते सद्वितीये" इति रस्य सः । चतुष्पदमिदं । सर्ववदिति अकारान्तत्वात्सर्वादित्वाञ्चेति भावः ।। ३८ ॥ अथ यका- रान्ता अप्रसिद्धा इति रेफान्तश्चतुर्शब्द उच्यते स च मुख्यतया बहुवचनान्त एव । चतुर् १-३ इति स्थिते सूत्रम्- वाः शेषे ॥ ३९ ॥ [सि० १४८२] खेऽस्ये वा शेपे घुटि परेऽनडुच्चतुरोरुतो वाः स्यात् । चत्वारः । चतुरः । चतुर्भिः । चतुर्व्यः २ । चतुर्णाम् ।। ३९ ।। वाः । वा १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते." । शेप ७.१ "अवर्णस्ये०" । द्विपदामिद । अनेन उकारस्य वादेो चत्वारः ॥ ३९॥ शसि घुट्त्वाभावात वादेशो न भवति ततः चतुरः । एवं चतुर्भिः ३ । "सत्यानां म्” इत्यामो नामादेशे “रपृवर्णान्नो ण" इति चतुर्णाम् । चतुर् ५-३ इति स्थिते ३० "शपसे शपसं था" इति रेफस्य सत्वे प्राने "रः पदान्ते.” इति विसर्ग च प्रामे विशेपसूत्रम् - अरोः सुपि रः॥ ४० ॥ [ सि० १।३१५७ ] रोरन्ये स्य रस्स मुपि परे र एव स्वात् । चतुर्प । प्रियचत्वाः । प्रियचत्वारी २॥४०॥ है. प्रा. पूर्वी. १८ २५ . १३ १३८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- अरोः । न रु: अरुः तस्य अरु ६-१ "डित्यदिति” “एदोयां०" "र: पदान्ते." । सुप् ७-१ "लोकात्" । र.१-१ "सो रुः" "र: पदान्ते०" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । र एव स्यादिति पत्वविसर्गत्वा- दिकं कार्य न स्यादित्यर्थः । ततो "नाम्यन्तस्था." चतुर्यु । सम्बोधनेऽपि बादेशो भवति-हे चत्वारः । गौणतया तु सर्वाण्यपि विभक्तिवचनानि सम्भवन्तीति तत्रैवं रूपपद्धतिः-प्रियाश्चत्वारो यस्य ययोउँपां ५वा स प्रियचत्वाः प्रियचत्वारौ २ । प्रियचत्वारः । प्रियचत्वारम् प्रियचतुरः प्रियचतुवा॑म् ३ । आमि प्रियचतुराम्-तत्सम्बन्धित्वाभावात् गौणत्वे आमो नाम् न भवति । प्राधान्ये तु स्यादेव परमचतुर्णाम्। प्रियचतुरि प्रियचतुर्पु ॥ ४० ॥ "वाः शेपे" इत्यत्र सूत्रे शेषे घुटीत्युक्तत्वात् सम्बोधने सौ वादेशो न भवतीति हे प्रियचतुर् १-१ इति स्थिते सूत्रम्--- उतोऽनडुचतुरो कः ॥४१॥ [सि० १४८१] १० सम्बोधने सौ । हे प्रियचत्वः ॥४१॥शकारान्तो विश्शब्दः । "यजसृज." इति पत्वे । विइ, विट् । विशौ । विड्त्सु, विसु । तत्वप्राइ, तत्त्वप्राट् । तत्त्वप्राशौ २ । उतो० । उत् ६-१ "लोकात्” “सो रुः" अनड्डांश्च चतुर् च अनडुड्चतुर् ६-१ संस्ध्वंस्कस्सन- डुहो दः” इति हस्य दः "अघोपे प्रथमोऽशिटः" इति दस्य तः "तवर्गस्य०" चः, ततो "लोकात्" "सो रुः" । व १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते." मध्ये "अतोऽति." "अवर्णस्ये." "एदोतः०" । १५ "घोषयति" "अवर्णस्ये."! त्रिपदमिदं सूत्रम् । अनेन उकारस्य वकारादेशे "दीर्घड्या" सिलुकि "र: पदान्ते.” हे प्रियचत्वः । हे प्रियचत्वारौ २ ॥४१॥ अथ शकारान्ता उच्यन्ते । विशूशब्दः स्पष्ट एव । तत्त्वप्राडिति तत्त्व २-१ 'प्रच्छंत् ज्ञीप्सायाम्' प्रच्छधातुः तत्त्वं पृच्छतीति विप् “दिद्युदर- जगजुहूवाभाट्” इति प्राश् इति किवन्तो निपातः । "डस्युक्तं कृता" इति समासे तत्वप्राश्शब्दः । ततो "यजसूज.” इति षत्वे "धुटस्तृतीयः” इति डत्वे तत्त्वप्राड् । “विरामे पा” तत्यपाद । तत्त्व २० प्राशौ "नामसिद्” इति पदसज्ञायां "यजसृजः" इति पत्वे "धुटस्तृतीयः" इति डत्वे तत्त्वप्राड्भ्या- मित्यादि । तत्त्वप्राडू सु इति स्थिते "ः सः सोऽश्चः” इति सादेशे तत्त्वप्राङ्सु पक्षे तत्त्वप्रासु हे तत्त्वप्राट् इत्यादि । शकारान्तेष्वेव विशेषमाह तद् १-१ 'दृशं प्रेक्षणे' दृश्धातुः स इव दृश्यते इति विग्रहे "त्यदाद्यन्यसमानादुपमानान्याप्ये दृशष्ट्रकूसको च" ५।१११५२) इति विपप्रत्ययः "अप्रयोगीत्" इति विप्लोपः "डस्युक्तं कृता" इति समास: "ऐकायें" इति विभक्तिलोप: "अन्य- २५ त्यदादेशः" (३।२।१५२) इति दकारस्य आत्वे तादृशशब्दः सिद्धः । ततश्च तादृश् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- ३० ऋत्विज्दिदृशुस्पृश्स्रज्दधृष्उष्णिहो गः ॥ ४२ ॥ [सि० २।१।६९] एषां पदान्ते गः स्यात् । तादृग्, ताक् । तादृशौ २ । तादृग्भ्याम् ३ । सहगादयोऽप्ये- धम् । घृतस्पृग, घृतस्पृक् । घृतस्पृशौ २ । घृतस्पृग्भ्याम् ३ ॥४२॥ ऋत्वि० । ऋत्विज् च दिश् च दृश् च स्पृश् च स्रज् च दधृप् च उष्णिह् च ऋत्विदिश- स्पृशस्रज्दधृप्णिह् तस्य ऋत्विदिश्पृशत्रज्दधृष्णिह् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" ग १-१ "सो रु" "r: पदान्ते." ! मध्ये "घोपवति" "अवर्णस्ये०" । द्विपदमिदं सूत्रम् । अनेन शस्य "विरामे चा" गस्य करवे रूपद्वयम् । “नामसिद." इति पदत्वे तादृग्भ्याम् । सुपि अनेन शस्य २४"अपोपे प्रथमोऽशिटः" इति गस्य क्त्वे "नाम्यन्तस्था" मस्य पत्वे कपसंयोगे क्षः तादृक्षु । गत्वे गत्वे १० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । शकारान्तादयः ताहग इत्यादि । सहगादयोऽप्येवमिति समान इव दृश्यते इति सहा "ग्दृशक्षे” (३।२।१५१) इति समानस्य सः । शेपं प्राग्वत् । आदिशब्दग्रहणात् अन्य इव दृश्यते इति अन्यादृक् "अन्य- त्यदादेराः” इत्यात्वम् । एवं त्यादृक् याक् । असाविव दृश्यते इति अमूहक्-अदस् दृश् "आद्वेरः" "लुगस्या०" "मोऽवर्णस्य” ततो "अन्यत्यदादेराः” इत्यात्वे "मादुवर्णोऽनु" इति दीर्घउकारः अमूहक् । अयमिव दृश्यते क इव दृश्यते इति ईदग् कीदृग् “इदकिमोऽतु०” इति इदकिमोरीकी ५ आदेशौ । एप इव दृश्यते एतादृक् । यूयमिव दृश्यते युष्माहग् । त्वमिव दृश्यते इति त्वाम् । चयमिव दृश्यते इति अस्माइग् । अहमिव दृश्यते इति माग् । भवानिव दृश्यते इति भवाहक् इत्या- दयः सर्वे ज्ञेयाः । घृत २-१ 'स्पृशंत् आमर्शने' घृतं स्पृशतीति घृतस्पृग-"स्पृशोऽनुदकात्” इति किम् । घृतस्मृक् , घृतस्पृग्भ्यामित्यादि प्राग्वत् ॥ ४२ ॥ शकारान्तेष्वेव विशेषमाह सूत्रम्- नशो वा ॥४३॥ [ सि० २१७०] नशः पदान्ते ग् वा स्यात् । जीवनम् , जीवनक् । जीवनइ जीवनट् । जीवनशौ २ । जीव- नग्भ्याम् जीवनड्भ्याम् । जीवनक्षु जीवनइत्सु जीवनट्सु । पकारान्तो दधृप्शब्दः । दधृग् दधृक् । दधृपौ । दधृग्भ्याम् ३ ॥४३॥ नशो० । ना ६-१ "लोकात्” “सो रुः” । वा १-१ "अव्ययस्य" । मध्ये "घोपवति" "अव- र्णस्ये०" । द्विपदामिदं० । जीवस्य नशनं जीवनम् "भ्यादिभ्यो वा” इति क्विप् अथवा जीवेन नश्य-१५ तीति विप् अनेन विकल्पेन शस्य गत्वम् । पक्षे “यजसृज०” इति शस्य पत्वं "धुटस्तृतीयः” इति डत्वं जीवनड् । उभयत्रापि "विरामे वा” । कत्वे च टत्वे च जीवनक जीवनट् इति चातूरूप्यम् । अन्यत्रापि "नामसिद०" इति पदत्वे द्वैरूप्यम् जीवनरभ्याम् जीवनड्भ्याम् । जीवनक्षु जीवनड्सु जीवनट्सु इति सुपि त्रैरूप्यम् ॥ ४३ ॥ अथ षकारान्ताः शब्दा उच्यन्ते 'विधृपाट् प्रागल्भ्ये' धृष्णोतीति दधृप्-चतुरः पुमान् । अत एव ऋत्विजित्यादिसूत्रनिर्देशात् दधृप् इति रूपसिद्धिः । दधृप १-१ इति २० स्थिते अनेन पस्य गत्वे "विरामे वा” दधृक् । स्वरादौ तु लोकादित्येव दधृपौ इत्यादि । “नामसिद०" पदत्वे दधृग्भ्याम् ३ । दधृक्षु । पकारान्तेष्वेव विशेषमाह 'जुपैति प्रीतिसेवनयोः' इति सजू: कि "अप्रयो०" सजुप् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- सजुषः ॥४४॥ [सि० १७३] पदान्ते रुः स्यात् ॥४४॥ सजूप् ६-१ "लोकात्” “सो रुः" "रः पदान्ते.” । एकपदमिदं सूत्रम् । अनेन पस्य रत्वे सजुर १-१ इति स्थिते ।। ४४ ।। सूत्रम्- पदान्ते ॥४५॥ [सि० २।११६४ ] पदान्तस्थयोचोदेोः परयोस्तस्यैव नामिनो दीर्घः स्यात् । सजूः । सजुपौ । हे सजूः । सजू- ाम् । सर्प ॥ ४५ ॥ पप्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । पड्, पद् । पण्णाम् । पमु । ग्रियषड् ३० प्रियपट । प्रियपपौ । सकारान्तः सुवचस्शब्दः । “अभ्वादेरत्वसः सौ" इति दीर्ये सुवचाः। सुवचसौ २ । सुवचोभ्याम् ३ । सुवचस्सु । हे सुवचः । एवं सुमनस्प्रभृतयः । पदान्ते । पदस्य अन्तः पदान्तः तस्मिन् पदान्त ७-१ "अवर्णस्ये." । एकपदामिदं सूत्रम् । अनेन दीर्घ सजूः । स्वरादी "लोकात्" सजुपौ "नामसिद०" इति पदत्वे सामित्यादि । मजुप् सु इति २४ सह जुपते १४० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलघु- स्थिते अनेन रत्वे "नाम्यन्तस्था." इति सस्य पत्वम् । यदि चान सन्निपातलक्षणन्यायाद्रेफनिमित्ता- ज्जातः पकारो रेफविघाताय न स्यादित्याश्रीयते तदा सजूए । अस्य न्यायस्यानित्यत्वात् "शपसे शपस चा" इति रेफस्य पत्वे सजूष्षु पक्षे विसर्गे सजू पु इति त्रैरूप्यम् । हे सजूः । हे सजुपौ इति । सजू- मित्रमित्यर्थः ।। ४५ ॥ पशब्दो नित्यं बहुवचनान्त इति मुख्यतयेत्यर्थः । पप् १-३ पप् २-३ इति ५स्थिते "डतिष्णः” इति जस्शस्लुपि "धुटस्तृतीयः" इति पस्य डत्वे पड़ २ "विरामे का" पट २ "नामसिद." इति पदत्वे पभिः पड्भ्यः २ पड् ७-३ इति स्थिते "सयाना म्" इत्यामो नामा- देशे "धुटस्तृतीयः" इति पस्य इत्वे तृतीयस्य पञ्चमे इति डस्य णत्वे "तवर्गस्य श्ववर्ग०" इति नस्य णत्वे पण्णाम् इति । यत्सु पसु । हे पड्, २ इति । गौणत्वे तु सर्वाण्यपि विभतिवचनानि सम्भवन्ति-प्रियाः पट् यस्य ययोर्येपा वा प्रियपप १-१ "दीर्घडयाव्०" "धुटस्तृतीयः" प्रियपड् २ प्रियपपौ प्रियपपाम् १० हे प्रियपट इत्यादि । अथ सकारान्ताः शब्दा उच्यन्ते-सुवचसूशब्द इति शोभनं वचो यस्य स सुवचाः । शेष सष्टम् । सकारान्तेष्वेव विशेषमाह-'डुकंग करणे कृधातुः कर्तुमिच्छति "तुम- हादिच्छायाम् सन्नतत्सनः" इति सन्प्रत्ययः "स्वरहन्गमोः सनि धुटि” इति दीर्घ क स इति स्थिते *"नामिनोऽनिट" नाम्यन्ताद्धातोरनिट्सन् किद्वद् भवति इति सनः क्रित्वे "ऋता कृितीर" "भ्वादे- मिनो दीर्घो ऊर्व्यञ्जने” इति दीर्घ कीर् स इति स्थिते “सन् यडश्च" इति की इति द्वित्वं "हख १५इति पूर्वस्य ह्रस्वल "कडवम्" इति यस्य चः "नाम्यन्तस्था." इति सस्य प. चिकीर्य इति जाते चिकीर्पतीति कि "अतः" इति अलोपः "अप्रयोगीत्" इति किलोपः । *"णपमसत्परे स्वादि- विधौ च”[सि० २१२६०] इतः सूत्रादारभ्य यत्पर कार्य विधास्यते तस्मिन् पूर्वस्मिंश्च सायधि- कारविहिते विधी कर्तव्ये णत्न पत्व वाऽसदसिद्ध द्रष्टव्यम् । एतत्सूत्रनिर्दिष्टयोश्च णत्वपत्वयोः परे पत्व- णत्वमसद्दष्टव्यम् । णपशास्त्र वा परे स्यादिविधौ च शास्त्रे प्रवर्त्तमानेऽसनष्टव्यम् । इति सलोपे कर्तव्ये २० पत्व असतू जात ततः चिकीर् स् १-१ इति स्थिते सूत्रम् - रात्सः॥ ४६॥[सि०२।१।९०] पदस्य संयोगान्तस्य यो रस्ततः परस्य सस्यैव लुक् स्यात् । चिकीर्पतीति चिकी। चिकीपो । चिकीाम् । चिकीर्षु । हे चिकीः ॥ ४६ ॥ उकारानुबन्धः श्रेयसशब्दः । "ऋदुदित" इति नुमागमे "न्सहतोः" इति दीर्षे च श्रेयान् । रात्सः। र ५-१ "डयोर्याती" "समानाना०" । स् ६-१ "लोकात्" "सोरु:" " पदान्तेः" । द्विपदमिद सूनम् । अनेन सलोपे रेफस्स "र: पदान्ते." इति विसर्गे चिकीः । स्वरादौ सर्वत्र "लोकात्" चिकीर्ती चिकीर्ष इत्यादि । एवं कट चिकीर्पतीति कटचिकीः कटचिकीर्षों इत्यादयोऽपि ज्ञेयाः । “पदस्य” इति सलोपे सिद्ध "रात्सः" इति सूत्र प्रारभ्यते इति नियमसूत्रमेतत् ततो रात्परस्य सस्यैव लुक् स्यात् नान्यस्येति नियमात् 'ऊर्जण वलप्राणनयोः' ऊर्जयतीति अ अन रात्परस्य ३० क्स्य "पदस्य" इत्यनेनापि लोपो न भवति । रादेव सस्पेति तु विपरीतनियमः "पुंवत्कर्मधारये" इति निर्देशात ॥ ४६॥ उकारानुवन्धो श्रेयसूशब्द इति प्रशस्योऽय प्रशस्यः अयमनयोर्मध्येऽतिशयेन प्रशस्य इति विमहे "गुणागाद्वेष्ठेयसू" इति सूत्रेण प्रशस्यशब्दात् ईयसुप्रत्यये प्रशस्यस्य प्रः" इति सूनेण प्रशस्यशब्दस्य श्रादेशे श्रेयसूशब्दसिद्धिः । अथ प्रथमाद्विवचनादौ श्रेयान् औ इत्यादिपु स्थितेषु प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिमाः । सकारान्ताः १४१ १० शिड्हेऽनुस्वारः ॥ ४७॥[सि० ११३१४०] अपदान्तस्थानां नां शिटि हे च परेऽनुस्वारः स्यात् । श्रेयांसौ । हे श्रेयन् । श्रेयोभ्याम् । वसु- प्रत्ययान्ता अप्येवम् । विद्वान् । विद्वांसी । हे विद्वन् ॥ ४७ ॥ शिड्हे० । शिट् च हश्च शिह तस्मिन शिड्ड् ७-१ "अवर्णस्ये०" । अनुम्बार १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." । द्विपदमिदं० । अनेन नकारस्यानुस्वारे श्रेयांसौ श्रेयांस इत्यादि । 'समहतोः" इत्यत्र । शेषे घुटीत्युक्तत्वात् सम्बोधने सौ दीर्घाभावः हे श्रेयन् । “न्समहतोः” इत्यत्र महत्साहचर्यात् शुद्धधातोः किवन्तस्य न भवति-मुहिंसी मुहिंसः, सुकंसौ सुकंसः इति । कसुप्रत्ययान्ता अप्येवमिति बुट्- वचनेषु श्रेवम्शब्दवत् ज्ञेया इत्यर्थः । अधुटि विशेपन्य वक्ष्यमाणत्वात् । 'विदक् ज्ञाने' वेत्तीति विद्वान् 'वा वेत्ते कमुः" इति वर्तमानकाले कसुप्रत्ययः ॥ ४७ ॥ विद्वस् २-३ इति स्थिते सूत्रम्- क्वसुष्मतौ च ॥४८॥ [सि० २।१।१०५] णिक्य घुडुजे यादौ स्वरादी मती च कस उप् स्यात् । विदुपः । विदुपा ॥ ४८ कसु०। कस् १-१ उप १-१ उभयत्रापि “दीर्घयाव्। मतु ७-१ "डिडौं" "डित्यन्त्य०" "लोकात्"। च १-१ "अव्ययस्य" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । चकारेण णिक्यघुवर्जे यकारादौ च प्रत्यये इत्यनुकृप्यते । मतौ इति तु साक्षादेव सूने उक्तम् । अत एपु परेपु कस् उप स्यात् । ततः झसादौ स्वरे अनेन उपादेशे विदुपः इति । यकारादिप्रत्ययस्योदाहरणं तु विदुपि साधुर्विदुष्यः "तत्र साधी” इति यप्रत्यये अनेन १ . उपादेशः । एवं विद्वानस्यास्तीति "विदुप्मान्” “तदस्यास्यस्मिन्निति०” मतो कस उप । णिक्य घुर्जनात् विद्वांसमाचष्टे "णिज्बहुलम्" णो उपादेशो न भवति । ततः "त्र्यन्त्यस्वरादेः” इत्यन्यस्वादिलोपे विद्वर- यति विद्वांसमिच्छति विद्वस्यति “अमाव्ययात् क्यन् च" इति क्यन्प्रत्ययः अत्रापि उप न भवति । विद्वस् १-३ इति स्थिते "ऋदुदितः" "न्समहतोः” विद्वांसः । अत्रापि उप न भवति ॥ ४८ ॥ विद्वस् ३-२ इति स्थिते सूत्रम्- लंसध्वंसूकस्सनडुहो दः ॥ ४९ ॥ [सि० २११६८] संसध्वंसोः क्वस्प्रत्ययान्तस्यानहश्च पदान्ते दः स्यात् । विद्वद्भ्याम् । विद्वत्सु । उदित्पुंस्- शब्द: ॥४९॥ लंस्० । कस् चासौ स् च कस्स् । संस् च ध्वन्स् च कस्स् च अनडुङ् च स्रन्सूध्वन्स्क्वस्सनडुङ् तस्य सन्ध्वन्स्क्स्सनडुङ् ६-१ "लोकात्” “सो रुः" । द १-१ "सो रुः” "र: पदान्ते.” । मध्ये २५ "घोपवति" "अवर्णस्ये०" । द्विपदमिदं सूत्रम् । अनेन सस्य दत्वे विद्वद्भ्याम् ३ विद्वयः २ । विद्वत्सु । कस्सिति द्विःसकारस्य पाठात् सकारान्तस्यैव च कस्प्रत्ययान्तस्य पदत्वं स्थानान्यस्य तेन विद्वान् इत्यस्य प्रथमैकवचने निष्पन्नस्य नकारान्तस्य पदान्ते सत्यपि दत्वं न स्यात् । क्लीवे गौणत्वे प्रियविद्वद् २ प्रियविदुपी २ प्रियविद्वांसि कुलानि सन्ति पश्य वा । स्त्रियां गौणत्वे ङ्यां ग्रियविदुपी । सन्मभ्रन्दोस्त्वे- बम् । 'भ्रन्शूङ् सन्सूङ् अवलंसने ध्वन्सूङ् गतौ च' उखया संसते, पर्णानि ध्वंसते इति कि "नो व्यञ्जनस्यानुदितः” इति नलोपे उखास्रसू. पर्णध्वस्। अनेन दत्वे उखासद् २ पर्णध्वद् २ उखात्रसौ पर्णध्वसौं उखास्रसः पर्णध्वसः उखासद्भ्याम् पर्णध्वयाम् उखासत्सु पर्णध्वत्सु हे उखासद् २ हे पर्ण- चंद्', २ इत्यादि । 'डुपचींप पाके' पधातुः पपाच इति वाक्ये अत्र "कसुकानौ तद्वत्” इति कसुप्र- त्ययः स च परोक्षावत् इति स्क्रऽसृवृभृस्तुद्रुश्रुस्रोर्व्यञ्जनादेः परोक्षायाः” (४।४।८१.) इति इडागमः । ३४ २० ३० ५स्थिते १४२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "अनादेशादेरेकव्यञ्जनमध्येऽतः" (४।१।२४) इत्येत्व ततः पेचिवासौ २ । यर च शसादिखरादौ कस उपादेशस्तर क्सोव्यञ्जनादित्वाभावात् निमित्ताभावे नैमित्तिकस्याप्यभाव' इति इटोऽपि निवृत्ति । पेचुपः पेचिव याम् इत्यादि ॥ ४९ ॥ सकारान्तेष्वेव विशेपमाह उदितपुंसशब्द इति । 'पाक रक्षणे' पातीति पुमान् “पातेथुम्सु" इति डुम्सुप्रत्ययः । डकारोकारायनुबन्धौ पुम्स् १-१ इति सूत्रम्- पुंसोः पुमन्स् ॥ ५० ॥ [ सि० १४७३ ] घुटि । पुमान् । पुमांसौ । हे पुमन् । पुंसा । “पदस्य" इति सलोपे पुभ्याम् । पुंसि । दोस्- शब्दस्य स्वरादौ पत्वं व्यञ्जनादौ च रुत्वम् । दो। दोपौ २। हे दोः । शसादौ स्यादौ वा दोपनादेशे दोष्णः दोपः । दोष्णा दोपा । दोाम् दोपभ्याम् , ३ । दोष्णि दोपणि दोपि । १० दोष्षु । उशनस्शब्दस्य "मदुशनस्०" से । उशना । उशनसौ ॥५०॥ पुसोः । पुम्सु ६-१ "डित्यदिति" "एदोया.” "र: पदान्ते" पुमन्स् १-१ "दीर्घड्याब्०” द्विप- दमिद० । घुटि इत्येतावान् वृत्त्यंशः सूनमृत्यशयोोंगेऽर्थः स्पष्टः ततो "नि दीर्घ." इति दी पुमान् “शिड्हेऽनुस्वारः" इत्यनुस्वारे पुमासौ इति । शेषघुटभावात् सम्बोधने सौ दीर्घाभावः हे पुमन् इति ॥ ५० ॥ दोसूशब्दः स्पष्ट. पुनपुसकलिङ्गश्च 'दोस्तित उः इत्यादि लिङ्गानुशासनवचनात् । १५ उशनसशब्दोऽप्येव किन्तु सम्बोधने सौ विशेषमाह सूत्रम्- वोशनसो नश्चामन्ये सौ ॥ ५१ ॥ [सि० १४१८०] उशनसः सम्बोधने नलुकौ वा साताम् । हे उशनन् । हे उशन हे उशनः । पुरुदंशा । पुरुदै- शसौ । अनेहा । अनेहसौ । हे पुरुदंशः । हे अनेहः ॥५१॥ वोश० । वा १-१ "अव्ययस्य" । उशनस् ६-१ "लोकात्” “सो रुः" । न १-१ "सो रु"च २०१-१ "अव्ययस्य" । आमन्यते इति आमच्यः तस्मिन् आमन्त्रय ७१ "अवर्णसे." "डिौँ" "डित्यन्त्यः" । मध्ये "घोषवति" "अवर्णस्ये." चटते सद्वितीये" "समानाना० । पट्प- दमिद सूत्रम् । उभयविकल्पे नैरूप्यम् । पुरुदंशसूअनेहसूशब्दो स्पष्टौ । तर वष्टीति उशना भार्गवः *"वष्टे कनम्” 'वशर कान्तौ' इत्यस्मात् कनस् प्रत्ययो भवति । पुरुदशतीति पुरुदशा इन्द्रः* "विहायस्सुमनस्पुरुदशस्पुरुरवोऽगिरस" एते अस्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । *'नत्र ईहेरेहेधौ च" २५ नम्पूर्वात् 'ईहि चेष्टायाम्' इत्यस्मात् अस्प्रत्ययो [भवत्यस्य] च एह एधौ आदेशौ । न ईहते अनेहा काल इन्द्रः चन्द्रश्च ॥५१॥ अदसशब्दस्य विशेषमाह अदस् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- अदसो दः सेस्तु डौ ॥ ५२ ॥ [सि. २११४३] स्वसम्बन्धिसौ परे अदसो दः सः स्यात् । सेस्तु डो । असौ असकौ । हे असौ । स्वसम्बन्धि इति किम् ? अत्यदाः ॥ ५२ ।। अदसो० । अदस् ६-१ "लोकात्" "सो रु । द् ६-१ "लोकात्" "सोरु" "रः पदान्ते."। सि ६-१ "डित्यदिति" "एदोया." । तु १-१ "अव्ययस्य" । डौ १-१ सूत्रत्वात् सिलोप । मध्ये "चटते." । पञ्चपदमिद सूत्रम् । अनेन सेडौँ आदेशे दकारस्य सत्वे "डित्यन्यः” अस्लोपे असौ अकि प्रत्यये असयौ । यदा तु याटुनीत्यादिना अदस्शब्दो गौणीभूतस्तदा अन्यसम्वन्धिनि सौ परे ३४८कारस्य सत्वं सेझै च न भवति, "आवरः" इत्यादीन्यपि सूत्राणि न प्राप्नुवन्ति, ततो "अभ्यादेर- । सि ७-१ " १० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः । सकारान्ताः २४३ स्वसः सौं” दीर्घ अत्यदाः अत्यदसौ अत्यदसः इत्यादि सुवचस्शब्दवत् रूपनयः ॥ ५२ ।। अदस् १-२ इति स्थिते आवरः" इति सस्य अत्वे "लुगस्या " "लोकात्” अद औ इति स्थिते सूत्रम्- "मोऽवर्णस्य" ॥ ५३॥ [ सि० २११४५] अवर्णान्तस्यादसो दो म् स्यात् । अमौ इति जाते ।। ५३ ।। मोऽव० । म १-१ "सो रुः । अवर्ण ६-१ "टाङसो० । मध्ये "अतोति." "अवर्णस्ये"५ "एदोतः पदान्ते." । द्विपदामिदं सूत्रम् । अनेन दस्य मत्वे "ऐदौत्सन्ध्यक्षरैः” अमौ इति जाते ॥ ५३ ॥ सूत्रम्- मादुवर्णोऽनु ॥ ५४ ॥ [सि० २११४७] अदसो मः परस्य वर्णस्य उवर्णः स्यात् । हस्वस्थाने हस्त्रो दीर्घस्थाने दीर्घः । अनु पश्चात्कार्या- न्तरेभ्यः ॥ ५४ ॥ अम् । सर्वादित्वाजस इः । अमे इति जाते । मादु० । म ५-१ "ङस्योर्यातों" "समानानां०" । उवर्ण १-१ "सो रुः" । अनु १-१ "अव्य. यस्य" । मध्ये "धुटस्तृतीयः" "अतोऽति." "अवर्णस्ये.” “एदोतः०" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । औका- रस्य दीर्घत्वात् दीर्घउकारः अमू । एवं द्वितीयावचनेऽपि ।। ५४ ॥ एवं अम् जस् इति स्थिते "जस इ:" "अवर्णस्ये." अमे इति जाते सूत्रम्- वहुवेरीः ॥ ५५॥ [सि० २११४९ ] बहुवचनान्तसादस एरीः स्यात् । अमी ॥ ५५ ॥ हे असौ । अमुम् । अमू । अमून् । अम टा इति स्थिते । बहु० । बहु ७-३ "नाम्यन्तस्था०" । ए १-१ "सो रुः” । ई १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." मध्ये "इवर्णादे०" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । अमी ॥ ५५ ।। द्वितीयैकवचने “समानादमोऽतः” इत्यकारलोपे "मादुवर्णोऽनु" अमुम् । द्वितीयावहुवचने "शसोऽता." अमान् इति स्थिते "मादुवर्णोऽनु" इति २० दी|कारः अमून् । तृतीयैकवचने अम टा इति स्थिते "टाङसोरिनस्यौ” इति सूत्रे प्राप्ते "मादुव- योऽनु" इति सूत्रस्थस्य अनु इत्यस्यावयवस्यापवादः सूत्रम्- प्रागिनात् ॥५६॥ [सि० २११४८] अदसो मः परस्य वर्णस्य इनादेशात्प्रागुवर्णः स्यात् । अमुना ॥ ५६ ॥ अमूभ्याम् । "इदमद- सोऽक्येव" इति नियमाद्भिस ऐस्त्वाभावे "एगहुस्भोसि" इत्येत्वे "बहुप्रीः" अमर्माभिः । २५ अम-म इति जाते "मादुवर्णोऽनु" अमुष्मै । अमूभ्याम् । अमीभ्यः अमुप्मात् । अमुप्य । अमुयोः २ । अमीपाम् । अमीषु । प्रागि० । प्राक् १-१ "अव्ययस्य" । इन ५-१ डेङस्यो" "समानानां" तीयः" । द्विपदमिदं० । एतत्सूत्राकरणे अनु पश्चात्कार्यान्तरेभ्य इति वचनान् पूर्व "टाइन्सो:." इति इनादेशे अमे इति जाते पश्चान् “मादुवर्णोऽनु" इत्यूकारे कृते अमून इत्यनिष्टं रूपं स्यात्ततः पूर्वमनेन ३० सूत्रेण उकारे पश्चात् "टः पुंसि ना" अमुना ॥ ५६ ॥ तृतीयाद्विवचने "अत आः स्यादी" इति आत्दे “मानुवर्णाऽनु" अमृभ्याम् । एवं चतुर्थीपञ्चमीद्विवचनयोरपि । अमीभ्यः अमीयु इत्यत्र - हुस्भोसि" इत्येत्वे "बहुप्वेरीः" । शेपं स्पष्टम् । । मध्ये "धुटस्न- । ३३.

१४४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- असुको वाऽकि॥ ५७ ॥ [ सि० २११४४ ] अदसोऽकि सत्यसुको वा स्यात् । असुकः । असकौ । हे असुक । हे अमक ॥ ५७ ।। हे असौ इति श्रीहेमसूरिवचनादस्य सम्बोधनं ज्ञायते । अक्प्रत्ययान्तयोस्तु असुकासकशब्दयो रूपाणि प्रथमैकवचन विना सर्वाण्यपि सर्वशब्दवत् ज्ञेयानि इति सकारान्ताः शब्दाः ॥ ५७ ।। ५अथ हकारान्ता:-अनडुशब्दस्य "वाः शेपे" अनड्वाह इति जाते सूत्रम्- अनडुहः सौ ॥ ५८ ॥ [ सि. १९७२ धुटा प्राग नोन्तः, "पदस्य" इति हलोपे अनड्वान् । अनड्वाही २ । शसि अनडुहः । "संस्- ध्वंस्०" इत्यादिना दत्वे । अनडुझ्याम् ३ । सम्बोधने "उतोऽनडुचतुरो वः" हे अनुवन् ॥५८॥ अन० । अनडुह् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." । सि ७-१ "डिडों" "डित्यन्त्य १० द्विपदमिदं० । प्रक्रिया स्पष्टा ॥ ५८ ॥ हकारान्तानामेव विशेपमाह---सूत्रम्- हो धुट्पदान्ते ॥ ५९ ॥ [सि० २२११८२] धुटि प्रत्यये पदान्ते च हो ढः स्यात् । मधुलिद् मधुलिट् । मधुलिहौ । मधुलिड्भ्याम् ३ । मधुलिड्त्सु । मधुलिट्सु ॥ ५९॥ हो धु० । ह ६-१ "लोकात्" "सो रुः" पदस्य अन्तः पदान्तः धुत् च पदान्तश्च धुपदान्ता १५ तस्मिन् धुट्पदान्त ७-१ "अवर्णस्ये.” । मध्ये “घोपवति" "अवर्णस्ये." । द्विपदमिदं० । “द्वन्द्वान्ते" इति न्यायात् उभयत्रापि सप्तमी सम्बध्यते इत्यादि । धुटि प्रत्यये इत्यादि । 'लिहंक् आस्वादने मधु २-१ लेढीति कि "अप्रयोगीत्” “डस्युक्तं कृता” इति समासः मधुलिह् १-१ इति स्थिते अनेन इस्स ढत्वे "धुटस्तृतीयः” "विरामे पा” मधुलिड् मधुलिट् । शेषं स्पष्टम् । पर्णगुहशब्दः किबन्तः प्राग्वत् पर्णगुह १-१ इति स्थिते अनेन हस्य ढत्वे चतुर्थान्तत्वात्पदत्वाच्च "गडदवादेः गस्य घत्वे पर्णधुड् २ । एवं २० "नामसिद०" इति पदसज्ञायां पर्णघुड्भ्यामित्यादि । यत्र च स्वरादौ पदसंज्ञा नास्ति तत्र अनेन ढत्वं "गडदवादेः०” इति धत्वं च न भवति–पर्णगुहौ पर्णगुहः इत्यादि । धुत्प्रत्ययस्योदाहरणं तु लीढः लेढा इत्यादि क्तप्रत्यये श्वस्तनीताप्रत्यये च ज्ञेयम् ॥ ५९॥ पुनरपि हकारान्तेष्वेव विशेषमाह सूत्रम्-- भ्वादेर्दादेर्घः ॥ ६०॥ [सि० २।१।८३] भ्वादधीतोर्यो दादिरवयवस्तस्य धुटि परे प्रत्यये पदान्ते च हो यः सात् । “गडदवादे" २५ इति धत्वे गोधुर गोधुर ॥६० ॥ भ्वादे० । भूरादिर्यस्य स भवादिः, तस्य भ्वादि ६-१ "डित्यदिति” "एदोड्यां"।द आदिर्यस्य स दादिः तस्य दादि ६-१ "डित्यदिति” "एदोयां." । घ १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." । त्रिपद- मिदं सूरम् । गां दोग्धीति गोदुशब्दः किन्तः प्राग्वत् । अनेन हस्य पत्ये "गडदवादेः०” इति दम्य धत्वे गोधुम् २ । स्वरादौ तु नोभयं प्राप्नोतीति गोदुही इत्यादि । सुपि तु अनेन हस्य घत्वे "गड- दनादेः" इति दस्य धत्वे "अघोपे प्रथमोऽशिटः” इति घस्य क्त्वे "नाम्यन्तस्था.” इति सस्य ३१ क्षमयोगे क्ष: गोधुक्षु ।। ६० ।। पुनरपि हकारान्तेष्वेव विशेपमाह-सूत्रम्- -- .. पत्वे प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः पुंल्लिङ्गाः स्त्रीलिङ्गाश्च मुहद्रुहस्नुहस्निहो वा ॥ ६१ ॥ [सि० २।१।८४ ] धुटि प्रत्यये पदान्ते त्वेषां चतुर्णा हो घ् वा स्यात् । तत्त्वमुग तत्वमुक् । तत्त्वमुड तत्त्वमुट् । सम्बोधने चातूरूप्यम् ॥ ६१ ॥ इति महोपाध्यायश्रीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितायां हैमलघुप्रक्रियायां व्यञ्जनान्ताः पुंलिङ्गाः । मुह । मुहश्च द्रुहश्च नुहश्च लिहश्च मुद्रुहस्नुहस्लिह तस्य मुट्ठहस्नुहस्तित् ६-१ "लोकात्" "सो५ रुः" । वा १-१ "अव्ययस्य" । मध्ये "चोपवति" "अवर्णस्ये.” । द्विपदमिदं सूत्रम् । 'मुहौच वैचित्त्य तत्त्वे मुह्यतीति तत्त्वमुग् किप्प्रत्ययः, अनेन हस्य धत्वे "धुटस्तृतीयः” इति गत्वे “बिरामे वा” गत्व- कत्वाभ्यां रूपद्वयम् , पक्षे "हो धुट्पदान्ते” हस्य ढः तत्रापि "धुटस्तृतीयः" डत्वे "विरामे वा” इति डत्वटत्वाभ्यां रूपद्वयम् । एवं सम्बोधनेऽपि चातूरूप्यम् । 'द्रुहौच जिघांसायाम् मित्राय छैह्यतीति किम् "अप्रयोगीत्” । यत्र पदत्वं तत्र अनेन हस्य घत्वै पक्षे "हो धुटपदान्ते” इति ढत्वे च "गडदवादेः"१० इति दस्य धत्वं मित्रध्रुग् २ । मित्रध्रुड् २ । मित्रभ्रुग्भ्याम् मित्रध्रुड्भ्याम् । स्वरादौ तु पदत्वाभावान्नो- भयम्-मित्रगृहौ । 'णुहीच उद्गिरणे' प्णुद्धातुः "पः सोष्टथै०” 'निमित्ताभावे.' सुह उत्निह्यतीति क्विम् "अप्रयोगीत्" । 'हिणहीच प्रीती' “पः सो." निहत्वे स्निह्यती० । उष्णिशब्दोऽपि स्पष्ट एव ॥६१।। यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यवत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणी खोपजसत्प्रक्रिया- वृत्ती भेजुरमी समाप्तिसुपमां पुंस्यस्वरान्ता रवाः ॥ १ ॥ च ज नान्ता स्त्रीलिङ्गाः २० अथ व्यञ्जनान्ताः स्त्रीलिङ्गा उच्यन्ते । तेऽपि व्यञ्जनक्रमेणैव वक्तव्यास्तत आह- तत्र चकारान्तादयः प्राग्वत् । त्यदादीनाम् "आढेरः" इत्यकारान्तत्वे । तत्र चकारान्तादयः प्राग्वदिति । तत्रेति व्यञ्जनान्तस्त्रीलिङ्गशब्देवित्यर्थः । चकारान्तेभ्यः प्रभृति थकारान्तपर्यन्ताः शब्दाः । प्राग्वदिति प्रायः पुंल्लिङ्गवत् ज्ञेया इत्यर्थः । ततः परं एव विशेपस्याभिधा- स्यमानत्वात् तथाहि ऋच्वाच्वच्शुच्प्रभृतयश्चकारान्ताः शब्दाः सुवाच्शब्दवत् ज्ञेयाः । यद्यपि सुवाच्शब्दो विशेष्यलिङ्गत्वात्रिष्वपि लिङ्गेपु सम्भवति तथापि रूपपद्धतिदर्शनार्थं मुख्यतया पुंल्लिङ्गे दर्शित इति तस्यातिदेशः क्रियते । एवं पापमुच्प्रभृतयश्चकारान्ताः । देवेज् तीर्थसृज् कंसपरिमृज् २५ गुणराज विभ्राज् धानाभृज परिवृज् युज् प्रभृतयो जकारान्ताः, भूभृत्प्रभृतयस्तकारान्ता, दधिमथ्- प्रमुखाः थकारान्ताश्च क्विवन्ताः त्रिष्वपि लिङ्गेपु भवन्ति । एवं प्रियमरुत्प्रभृतयः समासेन गौणीकृताः पुल्लिङ्गा अपि स्त्रीलिङ्गे भवन्ति । परमेपां पुंल्लिङ्गस्त्रीलिङ्गयो रूपेयु न कश्चिद्विशेप इति सुष्टुक्तं चकारा- न्तादयः प्राग्वादिति । प्रत्यच्प्राचप्रभृतीनामचन्तानां च स्त्रियां "अच" इति डीप्रत्यये पूर्वोक्तरीत्या प्रतीची इत्यादि रूपाणि स्युः । तथा ऋकारानुवन्ध पचत् भवत् गोमत् प्रभृतीनां च तकारान्तानां स्त्रीलिङ्गे ३० "अधातूदितः” (२।४।२) इति डीप्रत्ययागमे महती पचती भवती गोमती इत्यादीनि रूपाणि स्युस्तेपां नदीशब्दवद्रूपपद्धतिरिति नैतेपामत्राधिकार इति दकारान्तेभ्यः प्रभृत्येवान शब्दा अधिक्रि- यन्ते इत्यत आह यदादीनामिति यद् १-१ इति स्थिते सूत्रम्--- • प्रका० पूर्वा० १९ ३३ है "महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- आत् ॥१॥[सि० २।४।१८] अकारान्तानाम्नः स्त्रियामाए सात् । "तः सौ स" सा । त्ये । त्याः । सर्वावत् । सा । है । ताः। या । ये । याः। एपा । एते । एताः । एताम् । एते । एताः । एतया । एतयोः २। अन्नादेशे । एनाम् । एने । एनाः । एनया । एनयोः २ पकारान्तो बहुवचनान्तोऽपशब्दः ॥१॥ आत् । अ ५.१ "डेडस्यो." "समानानां.” आत् । एकपदमिदं सूनम् । आप्प्रत्यये पकारोऽनु- वन्धः शेपं स्पष्टम् । “त्यादिसर्यादेः स्वरेष्वन्यात्पूर्वोऽक्" इत्यकि त्सकद् १-१ इति स्थिते "आवरः" इत्यादि प्रक्रिया । सका इति जाते "तः सौ सः" स्यका इति । ततश्च "अस्यायत्तक्षिपकादीनाम्" इत्याप आकारस्य इत्वे स्थिका त्यिके त्यिका इत्यादि । एवं तद् यद् शब्दावपि । केवलमकि "अस्याय- तदि"ति सूत्रे यत्तद्वर्जनादनयोराप इत्व न स्यात्ततः यका यके यकाः, सका तके तकाः इत्यादि । एत- १०च्छब्दस्य अन्वादेशे द्वितीयावचनाये टायामोस्दये च एनदादेशे "आढेरः" "लुगस्या०" "लोकात्" "आत्" "समानाना.” एना इति सिद्ध शेपं कण्ठ्यम् । अन्वादेशश्चैवम्-आगता एपा अथो एना पश्य, एवमेने एनाः । एतया दिनमधीतमथो एनया रात्रिरप्यधीता । एतयोः शोभनं शीलम् अथो एनयोः प्रशस्त रूपम् । एतयोमौक्तिक तिलकम् अथो एनयोस्सौवर्ण कुण्डलमिति । अन्वादेशाभावे तु एतामित्यादि । वृत्त्यन्ते तु अन्वादेशे सत्यपि एनदादेशो न भवति परमा चासौ एपा च परमैपा १५ आगता परमैपा अथो परमैता पश्येत्यादि । एतद्शब्दस्य अप्रत्यये एतरुद्' इति स्थिते "आवर. इत्यादि । ततः "तः सौ सः "नाम्यन्तस्था.” इति पत्वे "द्वथे पसूनपुत्रवृन्दारकस्स” इति वा आप इत्वे एपिका एपका एतिके एतिकाः इत्यादि, इत्युक्ता दकारान्ताः । धकारान्तानां धर्मबुध्प्रभृतीना किवन्ताना पुस्त्रिलिङ्गयोर्न विशेषः । नकारान्तानांच राजन्प्रभृतीना स्त्रीत्वे "स्त्रिया नृतोऽस्वस्रादेी." इति डीप्रत्यये "अनोऽस्य." इत्यल्लोपे राज्ञी इत्यादि । बहुव्रीहिसमासे च"अनोवा"(२४११)अन्नन्ता २० द्वहुनीहे. स्त्रिया डीर्वा स्यात् । बहवो राजानो यस्या नग- सा बहुराज्ञी पक्षे "ताभ्यां वाप डित्” (२१४१५) मन्नन्तानानोऽन्नन्ताच बहुव्रीहेः खियामाप वा स्यात् स च डित् । ततो "डियन्त्य बहुराजा नगरी । पक्षे उभयाभावे "नि दीर्घः" इति दीर्घ वहुराज्ञी नगरी । एष बहुराज्यौ बहु- राजे बहुराजानौ नगय्यौँ । बहुराज्यः बहुराजाः बहुराजानः । सप्तम्येकवचने बहुराझ्या बहुराजायाम् । नकारान्तपक्षे "ईडौ वा” इति वाऽकारलोपे बहुराज्ञि वहुराजनि इति रूपचतुष्टयम् । अन्यत्र सर्वत्र २५ रूपनयम् । सम्बोधनेऽपि हे बहुराज्ञि हे बहुराजे हे बहुराजन् नगरी । एव रूपत्रयमिति सप्तपष्टिरूपाणि स्युः । एव "दान" (२।४।१०) सह्यादेर्दामनशब्दान्तानाम्नो बहुत्रीहेः खिया डीभवति । द्विदानी, निदानी । सह्यादेरियेव उद्दामानं उद्दामा उद्दानी वडवा पश्य "अनो वा” इति डीविकल्पस्यापवादो योगः । तथा "नाग्नि" (२।४।१२) अन्नन्ताबहुव्रीहेर्नाग्नि नित्यं डीः। अधिराज्ञी सुराज्ञी नाम प्रामः तथा "मन" (२४१४) मन्नन्तान्नानः स्त्रिया डीन भवति सीमा सीमानौ पामा पामानौ "अनि- ३० नस्मन् ग्रहणान्यन्यर्थवताऽनर्थवेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्ति" तेन महिमानमतिकान्तातिमहिमेत्यादावपि डीप्रतिषेधो भवति । बहुव्रीहेरिति निवृत्तं योगविभागात् । तथा "नोपान्त्यवत्तः” (२।४।१३) यस्यो- पान्त्यलुग् नास्ति तस्मादन्नन्ताहुनीहेः स्त्रिया डीन स्यात् । सुपर्वा, प्रिययज्या प्रियात्मा पुहिङ्गवत् । इन्नन्ताना "निया नृतो." इति डया दण्डिनी वचखिनी इत्यादि । घृत्रहनशब्दस्य त्रामा भायों "धयाद्योगादपालकान्तात्” इति डया पुरती एव पूष्णी अर्यम्णी । यदा प्रियपृनहा प्रियपूपा प्रियार्यमा ३५ इति बहुव्रीहिः रियते तदा बहुराजन्वत् सप्तपष्टिः सप्तपष्टिः रूपाणि स्युः । श्वनशब्दस्य "जातेर प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः स्त्रीलिङ्गाः । नकारान्तादयः १४७ यान्तनित्यस्त्रीशुद्रात्” इति ङ्यां युवन्शब्दस्य "स्त्रियां नृतो०” इति ड्यां मघवन्झब्दस्य "धवा- द्योगात्०” इति ड्यां "श्वन्युवन्मघोनो ङीस्याद्यधुट्स्वरे व उः” इति वकारस्य उत्वे शुनी प्रिययूनी मघोनी इत्यादि । पथिन्मथिन्ऋभुक्षिन्शब्दानां वहुव्रीह्यादिना गौणत्वे सु शोभनः पन्था मन्था वा यस्यां सा इत्यत्र "स्त्रियां नृतो.” इति ङीप्रत्यये "इन् डीखरे लुक्” इति इन्लोपे सुपथी सुमथी स्त्री। अनुमुक्षी सेनेत्यादि । प्रियाः पञ्च यस्याः सा प्रियपञ्चा इत्यत्र प्राग्वत् सप्तपष्टि रूपाणि स्युः । प्रिया अष्टौ यस्याः सा प्रियाष्टा इत्यत्र स्त्रीलिङ्गे वहुव्रीहौ प्रियाष्टन्शब्दस्य "अनो वा" इति ङीप्रत्यये "अनोऽस्य" इत्यल्लोपे "तवर्गस्य श्ववर्ग०” इति णत्वे प्रियाष्टणीशब्दस्तस्य चतुर्विंशति रूपाणि नदीवत ज्ञेयानि । तथा "ताभ्यां वाप डिन्” इति डावागमे प्रियाष्टाशब्दः तस्य गगाशब्दवञ्चतुर्विंशति रूपाणि । उभयाभावे नोऽन्तस्य प्रियाष्टन्झव्दस्य "वाप्टन आः स्यादौ" नकारस्य आत्वे पुंल्लिङ्गोक्ताष्टाशब्दवचतु- विंशतिरूपाणि । आत्वाभावे नान्तस्य प्रियाप्टन्शब्दस्य सप्तम्येकवचने "ईडौ वा” इति रूपद्वयमिति १० पञ्चविंशतिरूपाणि । एवं सर्वाणि सप्तनवतिःरूपाणि स्युरिति ज्ञेयम् । इयं चात्रानुक्ता सर्वापि प्रक्रिया प्रायः पूर्वोक्तरेव सूत्रैः सिद्ध्यतीति चकारान्तादयः प्रागवत् इत्यनेनैव वचनेन "मण्डूकप्लुति"न्यायेन सङ्ग्रहीता बोद्धव्या इत्यभिप्रेस पकारान्तान्शब्दानाह पकारान्तो वहुवचनान्तोऽप् शब्द इति-"मघा अप् कृत्तिका वहौं” इति लिङ्गानुशासनवचनात् बहुवचनान्तत्वं तु मुख्यत्व एव, गौणत्वे तु सर्वाण्यपि वचनानि भवन्ति इति दर्शयिष्यते । अप् १-३ इति स्थिते ।। १ ।। सूत्रम्- ६५ अपः ॥२॥ [सि० ११४८८] अपः स्वरस्य शेपे घुटि दीर्घः स्यात् । आपः । शसि । अपः ॥२॥ अपः । अप् ६-१ "लोकात्" “सो रुः" "रः पदान्ते०” एकपदमिदं० । प्रथमावहुवचनस्य घुट्- त्वादनेन दीर्घे आपः । द्वितीयाबहुवचनस्य घुट्त्वाभावादीर्घाभावस्तथैवाह-शसि अपः इति ॥२॥ अप् ३-३ इति स्थिते सूत्रम्- २० अपोऽद्भे ॥३॥ [सि० २।११४] भादौ स्यादौ परे अपोऽद् स्यात् । अद्भिः । अयः २ । अपाम् । अप्सु । एवं स्वाप । स्वापौ । खयाम् । ककुभशब्दस्तुण्डिशब्दवत् । इदम्शब्दस्य "अयमियं पुस्त्रियोः सौं" इयम् । इमे । इमाः । इमाम् । इमे । इमाः । "टौसनः" । अनया । “अन" | आभ्याम् । आभिः । असै। अस्याः २ । अनयोः २ । आसाम् । अस्याम् । आसु । रेफान्तश्चतुरशब्दः ॥ ३ ॥ अपो ० । अप् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" । अद् १-१ "दीर्घयाव्" । भ ७-१ "अवर्णस्ये" मध्ये "अतोऽति रो रुः" "अवर्णस्ये." "एदोतः०" । त्रिपदामिदं० । अनेन अपोऽदादेशे अद्भिः। एवं चतुर्थीपञ्चमीवहुवचनयोः भ्यसोरपि । पप्टीसप्तमीबहुवचनयोस्तु "लोकात्” अपाम् अप्सु । गौणत्वे रूपाण्युच्यन्ते-सु शोभना आपो यस्य द्रहस्य ययोर्येपां वा स स्वाप स्वापी स्वापः "ऋक्तःपथ्य- पोऽत्” (७।३।७६) इति प्राप्तोऽत्समासान्तः "पूजास्वतेः प्राक् टान्” (७३।७२) इत्यनेन निपि-३० ध्यते । स्वापं स्वापो स्वपः स्वपा स्वझ्याम् स्वद्भिः स्वपे स्वपः २ स्वपोः २ सपाम् स्वपि स्वप्यु । शेषे घुटीयुक्तत्वात् सम्बोधने सौ दीर्थो न भवति हे स्वप् हे स्वाी हे स्वापः । नपुंसकलिङ्ग वम् स्वपी, शौ "धुटां प्राक्” (१।४।६६) इति नागमे "नि वा" (१।४।८९) अपः स्वरन्य नागमे मति घुटि परे दी? वा स्यात् । स्वाम्पि स्वम्पि अत्याम्पि अत्यम्पि । समासान्तविधेरनित्यत्वात् यहापि याम्पि३४ ।

१४८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु- सरांसि सन्ति पश्य था। शेपं पुंल्लिङ्गवत् । भकारान्ताः स्पष्टा इति मकारान्तमिदम्शब्द- माह-तस्य प्रथमैकवचने सौ "अयमियं पुस्त्रियोः सौं” इति इयम् आदेशे "दीर्घडयाब्” इति सिलोपे इयम् । इदम् १-२ इति स्थिते आद्वेरः" "लुगस्या०" "दो मः स्यादौ” इम इति जाते आत्" आवागमे इमा १-२ "औता" इति औता सह एत्वे इमे । इमा १-३ "समानानां." "सो २ः" "र: ५पदान्ते." इमाः । इमा २-१ "समानादमोऽतः" इत्यकारलोपे इमाम् । इमा २-२ "औता” इमे। इमा २-३ "शसोऽता." शस् सम्बन्धिना अता सह दीर्घत्वमेव न तु नत्वं पुंस्त्वाभावात्-इमाः । इदम् ३-१ "टौस्यनः” इति इदमोऽनादेशे "आत्" इत्याप "समानानां." "एदेतो." अनया । इदम् ३-२ इदम् ३-३ "अनक्” इति अकारादेशे "आत्" इत्यापि आभ्याम् आभिः । इदम् ४-१ इति स्थिते इमा इति जाते "सर्वादेर्डस्पूर्वाः" इति उरपूर्वके यै आदेशे येन न व्यवधानं तेन व्यवहितेऽपि स्यादिति १० डसान्तरितेऽपि यरूपे व्यञ्जनादौ परे इदमोऽकारादेशो भवति ततः आ अस् यै इति स्थिते "डिय- न्यस्वरादेः" इति आकारलोपे विभक्त्यंश एवावतिष्ठते शब्दांशस्तु लुप्यते अस्यै इति । एव इदम् ५-१ अस्या इति । इदम् ६.२ "टौस्यनः" इत्यनादेशे आनागमे "टौस्येत्” इत्येत्वेऽयादेशे अनयोः । इदम् ६-३ इमा इति जाते "अवर्णस्यामः साम्" इत्यामः सामादेशे तवो"ऽनक्” इदम्शब्दावयवस्य इम् इत्येतस्य अकारादेशे आसाम् । इदम् ७-१ अस्याम् । इदम् ७-३ इमासु इति जाते "अनन्” इति इमो. १५ऽकारादेशे आसु इति । तथा अन्वादेशे द्वितीयाटौसि परेसाकोऽपि निरकोप्येनदादेशो भवति । तथा व्यञ्जनादौ स्यादौ परे साकोऽपि निरकोप्यदादेशो भवति । एतच्च सर्व रूपदर्शनेनैव व्यक्तीक्रियते । इदम् १-१ “त्यादिसर्वादेः स्वरेष्वन्यात् पूर्वोऽक्" इत्यक्प्रत्यये इदकम् इति जाते "आवरः" मस्य अत्वे "लुगस्या.” "दो मः स्यादौ" "आत्” इत्याप् इमका इति जाते *"अस्यायत्तक्षिपकादीनाम्" यदादिवर्जस्यातोऽनित्क्याप्परे इ: स्यात् इमिका । ततः साकोऽपि इयम् आदेशः । अपरे तु इयमादेशे २० सति अकमिच्छन्ति इयकम् इमिके इमिका इमिकाम् । अन्वादेशे एनाम् इमिके एने इमिकाः एना। इमिकया एनया अनया । साकोप्यदादेशः-इमिकाभ्याम् आभ्याम् २ । इमिकस्यै अस्यै । इमिकस्याः २ अस्याः २ । इमिकासाम् आसाम् । इमिकस्याम् अस्याम् । इमिकयोः एनयोः अनयोः । इमिकासु आसु किम्शब्दस्य "किमः कस्तसादौ च” इति कत्वे आपि सर्वाशब्दवत् प्रक्रिया । अथ क्रमप्राप्तं रेफान्त शब्दमाह-रेफान्तश्चतुरशब्द इति ॥ ३ ॥ सूत्रम्- त्रिचतुरस्तिस्मृचतस्ट स्यादौ ॥ ४॥ [सि० २।१।१] खेऽखे वा स्वरादौ स्यादौ परे स्त्रीलिङ्गयोस्त्रिचतुरोस्तिस चतसृ स्याताम् ॥ ४ ॥ निचतुर० । निश्च चतुश्च निचतुर्-तस्य निचतुर् ६.१ "लोकात्" "सो रुः" तिसृश्च चतम तिसृचतम १.१ "अनतो लुप्" सिलोपः । सिरादिर्यस्य स स्यादिः तस्मिन् स्यादि ७-१ "डिडौं "डित्यन्यः” मध्ये "चटते." । त्रिपदमिदं सूत्रम् । अनेन चतुर्शब्दस्य चतस आदेशे चतस १ ३० इति स्थिते ॥ ४ ॥ सूनम्- ऋतो रः खरेऽनि ॥५॥ [सि० २।१।२] तिसूचतसशब्दयोमतः स्वेऽखे वा स्वरादी सादौ परे र स्यात् नविषयादन्यत्र । चतस्रः चतसृभिः । चतसृभ्यः२। "दी? नाम्य." इत्यत्र तिसृचतसृवर्जनात् चतसृणाम् । चतसृपु । ३४ चतस्रः । एवं तिखः २। तिमिः । तिसम्यः २। तिमणाम् । तिसृषु । हे तिसः । खेऽखे इ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः स्त्रीलिङ्गाः । रेफान्तादयः १४९ प्रियतिसा प्रियचतसा ना । प्रियतित्रौ प्रियचतस्रौ । गिरशब्दस्य "पदान्ते" इति दीर्थे ! गी। गिरौ २ । गीाम् ३ । “अरोः सुपि रः" गीर्षु । हे गीः ॥ ५ ॥ ऋतो० । ऋत् ६-१ "लोकात्"। "सो रुः" र १-१ "सो रुः" "रः पदान्ते०" । स्वर ७-१ "अव- र्णस्ये०”। न न् अन् तस्मिन् अन् ७-१ "लोकात् ।मध्ये "घोपवति" "एदोतः पदान्ते."। चतुष्पद- मिदं सूत्रम् । "शसोऽता सश्च नः पुंसि" इति दीर्घत्वम्, “अझै च" इत्यरादेशः, "ऋतोडुर्" इति डुरा-५ देशश्च अनेन सूत्रेण वाध्यन्ते । सूत्रद्वयेऽपि स्वेऽस्ते वा इत्यनुवर्तनीयम् । प्रियास्तिस्रश्चतस्रो वा यस्य स प्रियतिसा प्रियचतसा प्रियतिस्रौ प्रियतिस्रः २ हे प्रियतिस्रः । प्रियास्तिस्रोऽस्य कुलस्य तत् प्रियतिस कुलम् । नविपयादन्यत्र इति नविषये तु ऋतो रत्वं न भवति यथा तिसृणाम् चतसृणाम् प्रियतिसृणि प्रियचतसृणि । एपु विभक्त्याश्रयत्वेन बहिरङ्गलक्षणतिसृचतस्रादेशस्यासिद्धत्वात् समासान्तः कच् न भवति, परत्वाच्च तिसृचतस्रादेशे पश्चानागमो नामादेशश्च । प्रियत्रिकः प्रियचतुष्कः तिसृणां प्रियः १० त्रिप्रियश्चतुःप्रियः प्रियत्रि कुलं प्रियचतुः कुलमित्यादौ तु स्यादे प्रत्वादादेशो न भवति । प्रियतिसृ कुलं प्रियचतसृ कुलमित्यत्र तु "नामिनो लुग् वा” इति से कि सति स्थानिवद्भावाद्भवति-यथा हे पो। एवं हे प्रियत्रि कुलम् , हे प्रियतिसृ कुलम् । तथा प्रियास्त्रयश्चत्वारो प्रियाणि त्रीणि चत्वारि वा यस्या ययोर्यासां वा प्रियत्रिः प्रियत्री प्रियत्रयः, प्रियचत्वाः प्रियचत्वारौ प्रियचत्वारः स्त्रियः । अत्र समास एव स्त्रियां न तु त्रिचतुरौ तेनादेशो न भवतः । प्रक्रियालायवाय समानप्रक्रियं त्रिशब्दमत्रैव निर्दि-१५ शति । एवं तिस्र इत्यादि ।। ५ ।। रेफान्तो गिशब्दः स्पष्ट एव । वकारान्तं दिवशब्दमाह-दिव् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- दिव औः सौ॥६॥[सि० २१११७ ] योः। दिवौ ॥६॥ दिव् ६.१ "लोकात्" "सो रुः"। औ १-१ "सो रुः" "र: पदान्ते." । सि ७-१ "डिडौं" २० "डियन्त्य०" । मध्ये "रोर्यः" "स्वरे वा" । त्रिपदमिदं सूत्रम् । “पष्ट्यान्त्यस्य” इति अनेन वस्य औत्वे "इवर्णादे." इति यत्वे द्यौः दिवा दिवः इत्यादि ।। ६ ॥ दिव् भ्याम् इति स्थिते सूत्रम्- उः पदान्तेऽनूत् ॥७॥ [ सि० २।१।११८] पदान्ते दिव उ: स्यात् स च दीर्घो न स्यात् । द्युभ्याम् । दिवाम् धुषु । हे द्यौः । "ऋत्विग्०" इत्यादिना गत्वे दिग् दिक् । दिशौ २ । दिग्भ्याम् ३ । हे दिग् हे दिक् । आशिशब्दस्य "सो२५ रुः" इति रुत्वे "पदान्ते" इति दीर्ष आशीः। आशिपी । आशीर्थ्याम् । आशीषु । हे आशीः । "अदसो दः सेस्तु डौ" । असौ । द्विवचनादौ अत्वे मत्वे । पदान्ते नहो धो वाच्यः । उपान उपानद् । उपानहीं । उपानमाम् ३ । उपानत्सु । हे उपानद् हे उपानत् ।। ७॥ इति महोपाध्यायधीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायधीविनयविजयगनिविरचितायां हैमलघुप्रक्रियायां व्यानान्ताः सीलिकाः । उ० । उ १-१ "सोरुः" "र: पदान्ते०" । पदान्त ७-१ "अवर्णन्ये" न ऊन् अनून । अनून ३० १.१ "दीर्घ." त्रिपदमिदं० । अनेन वकारस्य उत्वे शुभ्याम् ३ 1 इत्यादि अनूदिति तन्य च उफारम्य दीर्घत्वं न स्यात्, यथा दिव् १-१ अद्याः द्यार्भवति इति वाक्ये "कृभ्यतिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां" (७२। १२६) इति यिः "अप्रयोगीत् विलोपः "अव्ययन्य" । प्रस्तुतसूत्रेण यकारन्य ग्येशु भयनि । अन "दीश्वियश्यक्क्येषु च" इति दीर्घत्वं न भवति । शकारान्तो दिशशन्दः स्पष्टः ।३४ - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यञ्जनान्ताः नपुंसकलिझाः । चकारान्तादयः १५१ वादेशैः शतमेकं नवाधिकम्” ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युक्तम्-"जायन्ते नब सौ तथामि च नव भ्यांभिसू- भ्यसां सङ्गमे पट्सहयानि पडेव सुप्यथ शसि, त्रीण्येव तद्बजसि । चत्वार्यन्यवचस्सु कस्य विबुधाः शब्दस्य रूपाणि भोश्चेदस्ति प्रतिभा वदन्तु भवतां पाण्मासिकोऽत्रावधिः" ॥१॥ "सुक्ष्मेक्षिकया द्वित्वा- नुनासिकविकल्पनात् । रूपाणि भेपुसङ्ख्यानि गवाक्शब्दे नपुंसके” ॥ १ ॥ सौ नव, अनाम्यन्तस्य "अदीर्घाद्विराम०” इति द्वित्वे अष्टादश । औ परे चतुर्यु पूजार्थानां त्रयाणां द्वित्वे सप्त अनुनासिकस्तु५ नास्ति "अइश्वर्णस्यान्ते.” इत्यत्र अनीदादेरित्युक्तत्वात् । जसि द्वित्वस्थानुनासिकस्य विकल्पाद्वादश, सङ्कलनया ३७। एवं द्वितीयायामपि ३७ ।टायां १४ । भ्यामि ४८ । भात्पूर्वस्य यमयोश्च(?) द्वित्वान् भिसि २४ । ङयि ७, अनुनासिकस्तु नास्ति अ इ उवर्णाभावात् । भ्यसि ४८ भ्याम्वत् । ङसिङसादिपञ्चके प्रत्येकं १४ । सुपि गत्यर्थ त्रयाणां ककारपकारयोस्वेि नकारस्थानुनासिके च चतुर्विंशतिः । एवं कुपले "शिव्याद्यस्य द्वितीयो वा” इति कस्य खत्वे पण्णां उपयोत्वेिऽनुनासिके चाष्टाचत्वारिंशान् । कुगभावे १० त्रयाणां कारद्वित्वेऽनुनासिके च १२ एवं ८४ । एवं सि १८ औ ७ जसू १२ । अम् १८ औ ७ शस् १२ । टा १४ भ्याम् ४८ भिस् २४ । उ ७ भ्यां ४८ भ्यस् ४८ । उसि १४ भ्यां ४८ भ्यस् ४८ । इस् १४ ओस् १४ आम् १४ । ङि १४ ओस् १४ सुप् ८४ । एवं ५२७ सप्तविंशत्यधिका पञ्चशती रूपाणाम् । जकारान्तः असृज्झब्दः स्पष्टः । असृजि इति "धुटां प्राक्" इति नोऽन्ते "तवर्गस्य श्ववर्ग" ." इति नस्य बत्वे रूपम् । असानीति “नि दीर्घः" | अमृग रुधिरमिति । 'गम्लं गती' जंगम्यते १५ इति “दिद्युद्दबजगजुहू." इत्यादि क्विवन्तो निपातः जगत् । प्रक्रिया स्पष्टा । महत्शब्दोऽपि तथैव । यकृत् 'उदरान्तर्गतः शारीरः प्रत्यङ्गविशेषः' । शकृत् पुरीपम् । रूपसिद्धिः स्फुटव । त्यदादिपु सेलपि लुप्तनिमित्तकं कार्य न स्यादिति “आद्वेरः" इत्यादि न भवति । एतच्छन्दम्य द्वितीयाटोस्सु एनदादेशे एनद् एने एनानि । शेपं पुंल्लिङ्गवत् । अहन्झब्दे "ईडी वा' इति "औरीः" इति सूत्रनिष्पन्ने ईकारे सप्तम्येकवचने च "अनोऽस्य" लुग् वा स्यादिति भावः । अहस्सु इत्यत्र "अनः" २० इति सूत्रेण नकारस्य रुत्वे "शपसे झपसं वा” इति रोः सत्वमिति । समासान्तस्याहनशब्दस्य समन्येक- वचनेऽयं विशेषः "सह्यासायवेरहस्याहन ङौ वा” (१।४।५०) सध्यावाचिभ्यः साय- विभ्यां च परस्याहाब्दस्य को परे अहन् आदेशः स्यात् । योरहोर्भवो "भवें" इत्यण्विपये "माझ- संख्याव्ययात्” इत्यद् अन्लादेशश्च । “द्विगोरनपये वस्वरादे बहिः” इत्यणो लुपि ब्यबसस्मिन् व्यदि, बहनि ब्यहे । एवं त्र्यहनि ३ । तावदहनि ३ । याबदहनि ३ । सायमहः साचाहः अत एव निर्देशान.२५ सायमाब्दस्य मकारलोपः, साय इत्यकारान्तो वा । सायानि ३ । विगतमहो व्यदः । व्यहनि ३ । सहवासायवेरिति क्रिम ? मध्याहे । अन्येति किम् ? द्वयोरहो समाहारः व्यहम्लम्मिन दाई । नान्तानां नपुंसकलिङ्गानां शब्दानां सम्बोधने विशेषमाह मृत्रम्- क्लीवे वा ॥१॥ [सि० २।१९३] आमयस्स नानो नस्य लीये लुग् वा सान् । हे व्रत्मन् हे जन्म । इदम् । इमे । मानि । ३० किम् । के | कानि । "चतुरः शी" । चत्वारि । पयः । पयसी । पांसि । पयमा । पयोभ्याम् । हे पयः । एवं वचःप्रभृतयः । अदः । द्विवचने अमे इनि जाने "मावर्णोऽनु" अम् । अनि । शेष पुंवन् । काटतद् काटतट् । काटनक्षी । काष्ठनहि ॥ १ ॥ पति मोपासायलिदिनम:। ॐ इति पट्टालिकानि समानानि - . ܕܐ १५० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- एवं दृश्प्रभृतयोऽपि । सकारान्तानाह-आशिसूशब्दस्येति आइपूर्वक 'शासूक अनुशिष्टौ आशासने आशी: *"कृत्सम्पदादिभ्यः किप्" आडः कावित्यनुवर्तते, आड्ः परस्य शास आसः कावेव इस् स्यात् ततश्च आशिस् इति सिद्धम् , शेपं स्पष्टम् । आशीष्षु इति सप्तमीबहुवचने रूपत्रयम् । दोस्शब्दवत् अदस्शब्दः स्पष्ट एव। हकारान्तमाह-उपपूर्वक 'नहींच् बन्धने नधातुः उपनह्यतीति उपानद् कि "गतिकारकस्य नहिवृतिवृपिव्यधिरुचिसहितनी क्वी" (३२१८५) इति दीर्घः उपानद् १-१ इति स्थिते "नहाहोर्घतौ” इति सूत्रस्य सारभूतं वक्तव्यमाह-पदान्ते नहो धो वाच्य इति शेष व्यक्तम् ॥ ७ ॥ यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्नीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ वोपक्षसत्प्रक्रिया- वृत्तौ पूर्तिमशिश्रियन् खलु रवाः द्राग् व्यञ्जनान्ताः स्त्रियाम् ॥ १ ॥ १० थ व्य GA क लि अथेति प्राग्वत् । व्यञ्जनक्रमेण व्यञ्जनान्ता नपुंसकलिङ्गाः शब्दाः प्रदश्यन्ते इति वाक्यशेषः । तत्र चकारान्तः प्रत्यच्शब्दः । प्रत्यग, प्रत्यक् । “अच प्राग दीर्घश्च" इति प्रतीची । प्रत्यश्चि। सम्यक् सम्यग् । समीची । सम्यश्चि । शेषं पुंवत् । जकारान्तोऽसूशब्दः। असुर अमुक,२। १५ असृजी २ । असृञ्जि २ । शसादौ वाऽसन्नादेशे असानि । अस्ला । असृजा । असभ्याम् । असू- ग्भ्याम् । हे असृग् हे असृक् । जगत् जगद् । जगती । जगन्ति । महत् । महती । "न्सहतो" इति दीघे महान्ति ॥ यकृतशकतोः शसादौ वा यकन्शकन्नादेशे यका यकृता । यकभ्याम् यकृझ्याम् । शना शकृता । शकभ्याम् शकुमाम् । त्यदादीनां "अनतो लुप्" इति सिलुप त्यद् । द्विवचनादी अत्वे त्ये । त्यानि । सर्ववत् । एवं तद्यदादयः । अहन्शब्दस्य "अहः" इति २० रुत्वे । अहः २ । “ईडौ वा" । अह्नी अहनी, २ । अह्नि अहनि । अह्ना । अहोभ्याम् ३ । अहस्सु । हे अहः । ब्रह्मशब्दस "नाम्नो नोऽनह" इति नलुपि ब्रह्म । ब्रह्मणी । ब्रह्माणि । ब्रह्मणा । चकारान्तः प्रत्यशब्द इति प्रत्यञ्चतीति प्रत्यञ्च विशेष्यवशान्नपुंसकत्वं प्रत्यच् १-१ इति स्थिते "अनतो लुप्” इति सेल “चजः कगम्” इति चस्य कल्वे "धुटस्तृतीयः" इति कस्य गत्वे "विरामे या” इति पुनः कत्वे प्रत्यग्, प्रत्यक् इति । द्विवचने "औरीः" इति ईकारे जाते "अञ्च प्राग दीर्घश्च" २५ इति अचश्चादेशे पूर्वखरस्य दीर्घ च प्रतीची। एवं द्वितीयावचनत्रयेऽपि । शेष पुंवदिति तृतीयादौ पुंडलीयोविशेपाभावात् प्रतीचा इत्यादि । सममञ्चतीति वाक्ये "सहसमोः सधिसमी" इति समी आदेशे "अच्च प्राग दीर्घश्च" इति समीची इति । एवं सधीची। सम्यचि सध्यञ्चि। तृतीयादौ समीचा सध्रीचा इत्यादि पुंवत् । गामश्चति गच्छतीति विग्रहे "स्वरे वाऽनक्षे” इत्यवादेशे गवाक् गवार "वायऽसन्धिः” इत्यसन्धौ गो अक् २ । "एदोत:." इत्यकारलोपे गोक् २ । पूजायां नलोपाभावे ३० "युजश्चशुञ्चो०" इति नस्य डत्वै गवाड् गो अड् गोड् । अम्यपि एतान्येव नव । "औरीः" इति ईत्वे अचश्चादेशे गोची, पूजायां गवाची गो अञ्ची गोची । जसशसोः शो घुदत्वान्नोऽन्ते गतिपूजयो- स्त्रीण्येव गमाश्चि गोअचि गोश्चि। गोचा गयाञ्चा गोअञ्चा गोला। गवाग्भ्याम् गोअग्भ्याम् गोग्भ्याम्, गवाभ्याम् गोअभ्याम् गोड्भ्याम् इत्यादि । सुपि डान्तानां पक्षे "ड्णोः कटा०" इति कागमे गया. ३४ ३ गयाइपु ३ गवानु३ ।उक्तं च "गवाकूशब्दस रूपाणि छीवेऽागतिभेदतः । अहोपासन्ध्या पक्षे .. - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे व्यन्जनान्ताः नपुंसकलिङ्गाः । चकारान्तादयः १५१ - वादेशः शतनेनं नवाधिकम् ॥ १ ॥ अन्यत्राप्युक्तम्-"जायन्ते नव सौ तथामि च नव भ्यांभिसू- भ्यसां सङ्गमे पट्सयानि पडेव सुप्यथ झसि, त्रीण्येव तद्दनसि । चत्वार्यन्यवचन्मु कस्य विबुधाः शब्दख रूपाणि भोश्चेदस्ति प्रतिभा वदन्तु भवतां पाण्मासिकोऽत्रावधिः" ||१|| "मुझमेझिकया द्वित्वा- नुनासिकविकल्पनात् । रूपाणि भेपुसत्यानि गवानान्दे नपुंसके" ॥ १ ॥ सा नव, अनाम्यन्नस "अदीर्थाद्विरामः” इति द्वित्वे अष्टादश । औ परे चतुर्यु पूजार्थानां त्रयाणां द्वित्वे सप्त अनुनासिकस्तु५ नास्ति "अइश्वर्णस्यान्ते." इत्यत्र अनीदादेरित्युतत्वात् । जसि द्वित्वस्यानुनासिकन्स विकल्पाहादा, सङ्कलनया ३७। एवं द्वितीयायामपि ३७ । टायां ११ । भ्यामि ४८ । भात्पूर्वस्य यमयोश्च(?) द्विन्वान् भिसि २४ । इयि ७, अनुनासिकस्तु नास्ति अ इ उवर्णाभावात् । भ्यसि १८ भ्यान्वन् । इसिडसादिपञ्चके प्रत्येक १४ । सुपि गत्यर्थ त्रयाणां ककारपकारयोहिवे नकारन्यानुनासिके च चतुर्विशतिः । एवं कुपः "शिव्याचल द्वितीयो वा” इति कस्य खत्वे पण्णां उपयोत्वेिऽनुनासिके चाष्टाचत्वारिंदान् । कुगभावे १० याणां इकारद्वित्वेऽनुनासिके च १२ एवं ८४ । एवं सि १८ औ ७ जस् १२ । अम् १८ औ ७ झन् १२ । टा १४ भ्याम् ४८ भिस् २४ । डे ७ भ्यां ४८ भ्यस् ४८ । इसि १४ भ्यां ४८ भ्यम् ४८ । इन्न् १४ ओस् १४ आम १४ । डि १४ ओन् १४ नुप् ८४ । एवं ५२७ समविदासधिका पश्चाती रूपाणाम् । जकारान्तः अमृज्झब्दः स्पष्टः । अमृति इति "धुटां प्राक्' इति नोऽन्ते "तवर्गस्य श्रवर्ग०" इति नस्य अत्रे रुपम् । असानीति “नि दीर्घः" । अमृग मधिरमिनि । 'गलं गता जंगम्यते १५ इति "दिगुइन्जगन्नुहः” इत्यादि फिवन्तो निपातः जगत् । प्रक्रिया न्यष्टा । महताब्दोऽपि नयेव । यकृत् 'उदरान्तर्गतः शारीरः प्रत्यङ्गविशेषः । शकृत् पुरीपम् । रूपसिद्धिः मुटय । त्यदादिपु से पि लुमनिमित्तकं कार्य न स्यादिति "आवरः" इत्यादि न भवति । एनन्छन्दम्य द्वितीवाटीस्सु पनदादेशे एनद् एने एनानि । शेष पुंल्लिङ्गवन् । अहन्दगद "ईडी वा' इति "भारीः" इति सुत्रनिप्पन्न ईकारे सप्तम्यकवचने च "अनोऽस्य" लग् वा स्यादिति भावः । अहस्नु इत्यत्र "आरः इति सूत्रेण नकारम्य रत्वे "शयले झापसं वा" इति रोः मत्वमिति । समानान्नन्यादनगन्दर ममन्येक- वचनेऽयं विपः "सहबासायवेरहस्याहन औ वा" (१५८ ) मागवानिभ्यः माय- विभ्यां च परन्याशब्बल दी परे अदन आदेशः न्यान । योग्यभित्रो " भदन्यविषये "मर्यादा- मंचाव्ययान इन्वट आदेशात्र । "द्विगोरनपत्वं बन्यगदेलबद्रिः" इत्ययो लुपि वानम्मिन आदि, यानि लाद । एवं व्यहनि ३ । तापनि ३ । यावदनि । नायमतः मायादः अन पर निशान २५ सायमगदल मकालोपः, नाय प्रत्यकारान्तो वा । नायानि । विगतमामो व्यः । यानि । नागनायवेरिति किम् ? मध्याद । भान्सानि किम ? योनो ममाहारः काममागिन को । नान्नानां नपुंसफालिमानां दादानां सन्योधने वियोपमार, मनम- क्लीवे वा ॥१॥[सि. २०१२३] मामध्यन नासो नसीय न्युग या सान् । मनन है बार । इदम् । इमे दमानि। किम् । के । कानि । "चतुरः गी" । चन्यारि । परः । पवनी । पांनि । पयमा । पयोमा है परः । एवं वनःप्रभृतयः । अदः । विनने अगदनि जाने "मादयनगनुमान दोपं वन् । काटनर काटनट्र | कानी । का? ॥ २०

ઉપર
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-
क्लीवे० । क्लीय ७-१ "अवर्णस्ये." । वाँ १-१.४ अव्ययस्य" । द्विपदमिदं सूत्रम् । शेषं प्रकटम् । चतुर्-
शब्दे शेर्युट्रसंज्ञत्वात् “चाः शेपे" उकारस्य वा आदेशे चत्वारि । गौणत्वे प्रियचतुः कुलम् २ । प्रियचतुरी
२। प्रियचत्वारि २ । हे प्रियचतुः कुलम् । पयासीत्यत्र "स्महतोः" इति दीर्घे "शिड्हेऽनुस्वारः" ।
अदसूशब्दः कण्ठ्यः । शोभना अनडाहो यस्मिन् कुले तत् "लंसध्वंस्०" इत्यादिना दत्वे वनडुत्
५कुलम् स्वनडुही "याः शेपे" खनड्वाहि । हे स्वनडुत् । काष्ठं तक्ष्णोतीति काष्ठत कि "अप्रयोगीत्"
१-१ "दीर्घडया" "संयोगस्यादौ०” इति कलुरु "धुटस्तृतीयः" इति पस्य डः काप्टतडू २ इत्यादि ।
फाष्टं तदक्षीति काष्ठत १-३ "नपुंसकस्य शिः" धुटां प्राक्" इत्यत्र बहुवचनेन स्वरात्परा या धुड्-
जातिस्तदन्तस्य धुटि परे धुटः प्राक् नोन्तः स्यादित्यर्थो लभ्यते । ततो धुट् द्वयान्तस्यापि नोन्तो
भवति । ततो "नो धु०" इति नख डा। रेफान्तं वारशब्दं केचिन्नपुंसकलिङ्गमिच्छन्ति वार २ ।
१० वारी २ । वारि २ । वारा वाामित्यादि । श्रीहेमसूरयस्तु लिङ्गानुशासने "वाश्छदिईरत्पामश-
दृशोनौ"रितिवचनात् वार्शब्दं स्त्रीलिङ्गमाहुः वाः वारौ वार इत्यादि ॥ १॥
यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे
राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः ।
तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ खोपज्ञसत्प्रक्रिया-
वृत्तौ कैव्ययुजः समाप्तिमगमत् सद्वयञ्जनान्ताः रवाः ॥ १॥

: प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे युष्मदसदोः प्रक्रिया १५३ 200Odeon2000290 अथ युष्मदस्मदोः प्रक्रिया : RelaoPoG00HRom . १० उक्तव्यञ्जनान्तशब्देभ्यो वैलक्षण्यात् युष्मदस्मच्छन्दौ पृथक् निर्दिशति । तदेव वैलक्षण्यमाह-- तयोश्च त्रिष्वपि लिङ्गेषु समान रूपमलिङ्गत्वात् । तयोश्चेति-निष्वपि लिङ्गेपु समानरूपत्वे हेतुमाह-अलिङ्गत्वादिति । अलिङ्गत्वं च पुंसि स्त्रियां क्लीवे५ त्वम् अहम् इत्यादि समानरूपप्रयोगात् “नन्तासङ्ख्या डतियुष्मदस्मच स्थुरलिङ्गकाः" इति वचनाच्चेति । युष्मद् १-१ अस्मद् १-१ इति स्थिते सूत्रम्- त्वमहं सिना प्राक् चाऽकः ॥१॥ [ सि० २।१।१२ ] सिना सह युष्मदसदोस्त्वमहमौ स्याताम् , तौ चाक्प्रसङ्गेऽकः प्रागेव । त्वम् । अहम् । त्वकम् । अहकम् ॥१॥ त्वम् । त्वम् च अहम् च त्वमहम् “चार्थे द्वन्द्वः” त्वमहम् १-१ "अनतो" लुप् । सि ३-१ "टः पुंसि ना” । प्राक् १-१ "अव्ययस्य" । च १-१ । अक् ५-१ "लोकात्” “सो रुः" "रः पदान्ते."। मध्ये "तो मुमो०" "समानानां०" । एवं पञ्चपदमिदं सूत्रम् । तौ चाकः प्रसङ्गे इति अन्यथा कुत्सितोऽल्पो- ऽज्ञातो चा त्वमिति वाक्ये *"युष्मदस्मदोऽसोभादिस्यादेः" अनयोः सोभादिवर्जस्याद्यन्तयोः स्वरेष्व- न्यात् पूर्वोऽक् स्यादिति युष्मद १-१ इत्यत्रान्यवरात्पूर्वेऽकि युष्मकद् १-१ इति स्थिते 'तन्मध्यपतित-१५ स्तद्हणेन गृह्यते' इति साक एव त्वमहमादेशेऽकः श्रवणं न स्यात्ततः पूर्वं त्वमहमादेशे पश्चादकि त्वकम् अहकम् इति । एवं "मन्तस्य युवावौ द्वयोः” एवं "यूयं वयं जसा" "तुभ्यं मह्यं डया" "तव मम डसा' एतेष्वपि सूत्रेषु प्राक्चाक इत्यनुवर्तनीयमिति ॥ १॥ युष्मद् १-२ अस्मद् १-२ इति स्थिते सूत्रम्- मन्तस्य युवावौ द्वयोः॥२॥[सि० २।१।१०] द्वित्वे वर्तमानयोर्युष्मदस्मदोर्मन्तावयवस्य स्यादौ परे युवावौ स्याताम् । युवद् आवद् इति २० तावद्भवति ॥२॥ मन्त० । म् अन्ते यस्य स मन्तः तस्य मन्त ६-१ "टाङसोरिनस्यौ" । युवश्च आवश्च युवाव १-२ "ऐदौत्सन्ध्यक्षरैः" । द्वि ६-२ "आढेरः" "एद्वहुम्भोसि" "एदेतोयाय्" "सो रुः" "रः पदान्ते." । त्रिपदमिदं सूत्रम् । अनेन युव आव इत्यादेशे "लुगस्या०” अकारलोपे युवद १-२ आवद् १-२ इति स्थिते ॥ २ ॥ सूत्रम्- अमौ मः ॥३॥ [सि० २।१।१६ ] युष्मदरसमा परयोरम् औ इत्येतयोर्मः सात् ॥ ३ ॥ अमौ० । अम् च औ च अमी ६-२ सूत्रत्वात् विभक्तिलोपः । म १-१ "सोन" "र: पदान्ते." द्विपदामिदं सूत्रम् । अकार उच्चारणार्थः । व्यञ्जनमकाररूप आदेशः । युवद् म आवद् म् इति स्थिते ॥३॥ सूत्रम्-- है. प्रका० पूर्वा० २० २५

१५४
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-
युष्मदस्मदोः॥ ४ ॥ [सि० २११।६ ]
व्यञ्जनादौ सादौ परे युष्मदसदोराः सात् । युवाम् । आगाम् ॥ ४ ॥
युष्म० । युष्मच अस्मञ्च युष्मदस्मदो तयोः युष्मदस्मद् ६-२ "लोकात्" "सो रु" ".
पदान्ते." । एकपदमिदं सूत्रम् । “पठ्यान्त्यस्य" इति दस्य आत्वे "समानानां०" युवाम् आवाम् ।
५अकि-युवकाम् आवकाम् ॥ ४ ॥ युष्मद् १-३ अम्मद् १-३ इति स्थिते सूनम्-
यूयंवयं जसा ॥ ५॥ [सि० २।१।१३ ]
जसा सह युष्मदस्मदोरेतौ स्याताम् । यूयम् । वयम् ॥५॥ द्वितीयैकवचने ।
यूय० । यूयं च वयं च यूयंवयम् १-२ सूरत्वात् लोपः । जस् ३-१ "लोकात्" । द्विपदमिदं
सूत्रम् । व्यक्तम् । अकि-यूयकम् , वयकम् ॥ ५ ॥ युष्मद् २-१ अस्मद् २-१ इति स्थिते सूत्रम्---
त्वमौ प्रत्ययोत्तरपदे चैकस्मिन् ॥६॥ [सि० २।१।११]
स्यादौ प्रत्ययोत्तरपदयोश्च परयोरेकत्वे वर्तमानयोर्युष्मदसदोर्मान्तापयवस्स त्वमौ साताम् ।
"लुगस्यादेत्यपदे" इत्यकारलोपे अमो मत्वे दस्यात्वे च त्वाम् । माम् ॥ युवाम् आवाम् ॥६॥
त्वमौ० । त्वम् १-२ "ऐदौत्स"
उत्तर च तत् पद् च उत्तरपदं प्रत्ययश्च उत्तरपदं च प्रत्ययोत्तरपद
तस्मिन् प्रत्ययोत्तरपद ७-१ "अवर्णस्ये."। च १-१ "अव्ययस्य" । एक ७-१ "डे: स्मिन्" । चतुष्पद-
१५ मिदं सूनम् । प्रक्रिया स्पष्टा । अकि-त्वकाम् मकाम् युवकाम् आवकाम् ॥ ६ ॥ युष्मद् २-३ अस्मद
२-३ इति स्थिते सूत्रम्--
शसो नः ॥७॥[सि० २।१।१७]
युष्मदसयां परस्य शसो नः स्यात् । युष्मान् । असान् ॥ ७॥ टायां समादेशे।
शसो० । शस् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" न १-१ "सो रुः" : पदान्ते." मध्ये "घोप-
२० वति" "अवर्णस्ये०" । द्विपदमिदं सूत्रम् । अकार उच्चारणार्थः । व्यञ्जननकाररूप आदेशः । अकि-
युष्मकान् अस्मकान् ॥ ७ ॥ टाया त्वमादेशे त्वद् ३-१ भद् ३-१ इति स्थिते सूत्रम्-
टाडयोसि यः॥८॥[सि० २०१७]
एषु चतुर्पु युष्मदसदोर्यः स्यात् । त्वया । मया ॥ ८॥ युवाभ्याम् । आवाभ्याम् । युष्मामि
असामिः।
टाइयो० । टा च डि च ओस् च टाडयोस् तस्मिन् दाडयोस् ७.१ "लोकात्" । यः १-१ "सो
रुः" "र: पदान्ते." । द्विपदमिद सूत्रम् । अकि स्वयका मयका। "युष्मदस्मदोऽसोभादिस्यादेः" इति
सूने सकारादि ओकारादि भकारादिवर्जनात्, अन्यविभक्तिः स्याद्यन्तयोर्युष्मदस्मदोरन्त्यस्वरात्पूर्वोऽक
भवति सोभादिषु च परेषु, "त्यादिवरेवन्यात्पूर्वाऽक्” इति सूत्रेण युष्मदस्मदोरन्यवरात्पूर्वोऽक
भवति, ततश्च युप्मकद् अस्मक्यामिति स्थिते मान्तावयवस्य युवावादेशे "युष्मदस्मदोः" इत्यात्वे युव-
३० पाभ्याम् आवकाभ्याम् युष्मकाभिः अस्माभिः ॥८॥युष्मद् ४-१ अस्मद् ४-१ इति स्थिते सूत्रम्--
तुभ्यंमा ड्या ॥९॥[सि० २।१।१४]
हया सह युष्मदसदोरेतौ स्याताम् । तुभ्यम् मह्यम् ॥ ९॥

- - 1 १५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे युप्मदस्मदोः प्रक्रिया १५५ तुभ्यं० । तुभ्यं च मह्यं च तुभ्यंमह्यम् १-२ सूत्रत्वात् लोपः । उ ३-१ "एदेतो." "लोकात्” । द्विपदमिदं सूत्रम् । अकि-तुभ्यकम् माकम् । युवकाभ्याम् आवकाभ्याम् ।। ९ ॥ युष्मद् ४-३ अस्मद् ४-३ इति स्थिते सूत्रम्- अभ्यं भ्यसः॥१०॥[सि० १११८] युष्मदस्सयां परस्य चतुर्थीभ्यसोऽभ्यम् स्यात् । अकारो व्यञ्जनादित्वव्यावृत्त्यर्थस्तेन युष्मद-५ स्मदोरित्यात्वं न भवति ॥ १० ॥ अभ्यं० । अभ्यम् १-१ "दीर्घड्याव्” । भ्यस् ६-१ "लोकात्" "सो रुः" "र: पदान्ते." मध्ये "तौ मुमो०" । द्विपदमिदं सूत्रम् । युष्मद् अस्मद् अभ्यम् इति स्थिते ।। १० ।। सूत्रम्- शेषे लुक् ॥ ११ ॥ [सि० २११८] यसिन्नायौ कृतौ ततोऽन्यः शेषस्तस्मिन् स्यादौ परे युष्मदस्मदोर्लक् स्यात् । युष्मभ्यम् । १० असभ्यम् ॥ ११ ॥ शेपे० । शेप ७-१ "अवर्णस्ये." । लुक् १-१ "दीर्घड्याव्०” द्विपदमिदं सूत्रम् । यस्मिन्नायो कृतौ इति-व्यञ्जनादौ स्यादौ परे आत्वम् , टाङ्योस्सु परेपु यत्वम् , एभ्योऽन्यः शेपस्यादिरिति । ततोऽनेन लोपे अभ्यमोऽकारस्य च "अप्रयोगीत्” इति निवृत्ती युष्मभ्यम् अस्मभ्यम् । अकि- युप्मकभ्यम् अस्मकभ्यम् ॥ ११ ॥ युष्मद् ५-१ अस्मद् ५-१ इति स्थितें सूत्रम्- ङसेश्चाद् ॥ १२॥ [सि० २।१।१९ ] युप्मदसयां परस्य उसेः पञ्चमीभ्यसश्च अद् स्यात् । अकारः प्राग्वत् । त्वत् मत् । युष्मद् असद् ॥ १२ ॥ ङसे० । ङसि ६-१ "डित्यदिति" "एदोझ्या ङसिङसो रः”। च १-१ "अव्ययस्य" । अद् १-१ 'दीर्घड्याव्०” । मध्ये "चटते.” “समानानां०”। त्रिपदमिदं सूत्रम् । “त्वमौ प्रत्ययोत्तर०" त्वमादेशे २० "लुगस्या०" "शेपे लुक्” इति दलोपे "अप्रयोगीत्” इति अकारनिवृत्ती त्वत् मत् । अकि-चकत् मकत् । द्विवचने प्राग्वत् । बहुवचने पञ्चमीभ्यसोऽप्यदादेशे युष्मद् अस्मद् । अकि-युग्मकद् अस्म- कद् ॥ १२ ॥ युष्मद् ६-१ अस्मद् ६-१ इति स्थिते सूत्रम्- तवमम ङसा ॥ १३ ॥ [सि० २।१११५] उसा सह युष्मदस्मदोरेतो साताम् । तव । मम । युवावादेशे "टायोसि यः" इति ये । २५ युवयोः आवयोः ॥१३॥ तव । तब च मम च तवमम १-२ सूत्रत्वात् लोपः । अम् ३-१ "लोकात्" । द्विपदामिद सूत्रम् । अकि-तवक ममक । शेपं स्पष्टम् । युवयोः आवयोः इति स्पष्टम् । अकि-युवकयोरावकयो- रिति ॥ १३ ॥ युष्मद् ६-३ अस्मद् ६-३ इति स्थिते सूत्रम् - आम आकम् ॥ १४ ॥ [ सि० २।१।२० ] युप्मन्यां परस्य आम आकम् सात् । युप्माकम् । अम्माकम् । त्वयि । मयि । शुष्मासु । अस्मासु ॥१४॥ ३० ६२ १५६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमरघु- आम । आम् ६-१ "लोकात्" "सो रु" । आकम् १-१ "दीर्घडया" । मध्ये "रोर्यः" "स्वरे वा" तस्य लुग् । द्विपदमिद सूरम् । "शेपे लुग्" इति दलोपे “समानाना०" युप्माकम् अस्माकम् । अकि-युष्मकाकम् अस्मकाकम् । सप्तम्येकवचने त्वमादेशे "टाडयोसि यः" इति दस्य यत्वे त्वयि मयि । युवयोः आवयोः । "युष्मदस्मदोः" इत्यात्वे युष्मासु अस्मासु । अकि वयकि मयकि ५युवकयोः आवकयोः युष्मकासु अस्मकासु ॥ १४ ॥ सम्बोधनं चात्र न सम्भवति ॥ अथ गौणत्वे युष्मदस्मदो रूपाण्युच्यन्ते-तत्रेद तत्त्वम् त्वमौ प्रत्ययोत्तरपदे चैक- स्मिन्" "मन्तस्य युवावौ द्वयोः" इत्येतयोः सूनयोः सप्तम्या युष्मदस्मदोविशेषणेऽयमभिप्रायः । समा- सार्थस्यैकत्वद्वित्वबहुत्वविशिष्टत्वेऽपि यन युष्मदस्मदी एकत्वविशिष्टे तर त्वमावेवादेशी, या च युष्म- दस्मदी द्वित्वविशिष्टे तत्र युवावादेशौ भवतः । तथोक्त सिद्धान्तकौमुद्याम् "समस्यमाने ब्येकत्य- १० वांचिनी युष्मदस्मदी । समासार्थोऽन्यसपश्चेत् स्तो युवावौ त्वमावपि” ॥ १॥ यत्र च सूने सहार्थ- तृतीयानिर्देशो यथा “त्वमह सिना प्राक् चाकः" "यूय वयं जसा' "तुभ्य मह्य डया" "तव मम डसा" इति तत्र समासार्थस्य एकत्वबहुत्वविशिष्टत्वेऽपि परत्वादेते एवादेशा भवन्ति । तथोक्तं तत्रैव-सु जस् डे ङस्सु परतः आदेशाः स्युः सदैव ते । त्वाही यूयवयौ तुभ्यमह्यौ तवममावपि ॥ १ ॥ एते परत्वा- द्वाधन्ते युवायौ विपये स्वके । त्वमावपि प्रवाधन्ते पूर्वविप्रतिपेधतः ॥ २॥ व्येकसञ्जयः समासार्थो १५ वर्षे युष्मदस्मदी । तयोरट्येकतार्थत्वान युवावी त्वमौ न च ॥ ३ ॥ एतत्सर्व रूपलिखनेन व्यक्तीक्रियते-त्वा मा वा अतिक्रान्तो अतिक्रान्तौ अतिक्रान्ता वा "प्रात्यवपरिनिरादयो गतक्रान्त.” इत्यादिना द्वितीयातत्पुरुषे अतित्यम् अत्यहम् । "अमौ मः" "युष्मदस्मदोः" इति च अतित्वाम् अतिमाम् । अतियूयम् अतिवयम् । १ । अतित्वाम् अतिमाम् अति- स्वाम् २ । अतित्वान् २।२। अतित्वया २, अतित्वाभ्याम् २, अतित्वाभिः २।।अतितुभ्यम् २, २० अतित्वाभ्याम् २, अतित्वभ्यम् ।।४। अतित्वत् २, अतित्वाभ्याम् २, अतित्वत् अतिमत् । ५। अतितव अतिमम, अतित्वयोः अतिमयोः, अतित्वाकम् अतिमाकम् । ६ । अतित्वयि अतिमयि, अतित्वयोः अतिमयोः, अतित्वासु अतिमासु ।७। हे अतित्वम् हे अत्यहम् , हे अतित्वाम् २, हे अतियूयम् हे अतिवयम् । (युवामायामतिक्रान्तोऽतिक्रान्ती अतिक्रान्ता चा, अतित्वम् अत्यहम् , अतियुवाम् अत्यावा, २५ अतियूयम् अतिवयम्, १ । अतियुवाम् अत्यावाम् , अतियुवाम् अत्यावाम् , अतियुवान अत्यावान् । अतियुयया अत्यावया, अतियुवाभ्याम् अत्यावाभ्याम् , अतियुवाभिः अत्यावाभिः ३। अतितुभ्यम् अतिमह्यम् , अतियुवाभ्याम् , अत्यावाभ्याम् , अतियुवभ्यम् अत्यावभ्यम् ४ । अतियुवत् अत्यावत्। अतियुवाभ्याम् २, अतियुवत् अत्यावत् ५ । अतितव अतिमम, अतियुवयोः अत्यावयोः, अतियुवा- फम्, अत्यावाकम् ६ । अतियुवयि अत्यावयि, अतियुवयोः अत्यावयोः, अतियुवासु अत्यावासु ७ । ३० हे अतित्वमित्यादि १।) प्रतिष्वदृश्यमानोऽप्ययमुपयोगितया सङ्गृहीतः । युष्मानस्मानतिप्रान्तो अतिक्रान्तो अतिमान्ता वा अतित्वम् अत्यहम्, अतियुष्माम् अत्यस्माम्, अतियूयम् अतिवयम् ।१ । अतियुष्माम् अत्यस्माम् , अतियुष्माम् अत्यस्माम् , अतियुष्मान अत्यस्मान् । २। अतियुप्मया अत्यस्मया, अतियुष्माभ्याम् २, अतियुष्माभिः २।३। अतितुभ्यम् २, अतियुष्मा- भ्याम् •, अतियुप्मभ्यम् २।४। अतियुष्मत् , अतियुष्माभ्याम् २, अतियुष्मत् २।५। ३५अतितव २, अतियुष्मयोः २, अतियुष्माकम् ।६। अतियुष्मयि अयस्मयि, अतियुप्मयोः २, H प्रक्रियाबृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे युप्मदस्मदोर्गीणते रूपाणि । आदेशविशेपाश्च १५७ अतियुप्मासु अत्यस्मासु ।७। हे अतित्वम् हे अत्यहम् , हे अतियुप्माम् हे अत्यस्माम् , हे अतियूयम् हे अतिवयम् २।१। त्वां युवां युष्मान् मामाधामस्मानतिक्रान्तं कुलमिति समासेऽपि युष्मदस्मदोरलिङ्गत्वान्नपुंसकाश्रितः स्थमोलोपो न भवति । अतित्वम् अत्यहम् कुलमिति । एवं प्रियस्त्वम् प्रियोऽहम् वा यस्य चयोर्येपां वा प्रियत्वम् प्रियाहम् , प्रियत्वाम् प्रियमाम् , प्रिययूयम् प्रियवयम् । तथा प्रियौ युवां प्रियावावाम् यस्य ययोर्येपां वा प्रियत्वम् प्रियाहम् , प्रिययुवाम् प्रियावाम् प्रिय- यूयम् प्रियवयम् तथा प्रिया यूयम् वयम् वा यस्य ययो घयां वा प्रियत्वम् प्रियाहम् , प्रिययुष्माम् प्रियास्माम , प्रिययूयम् प्रियवयम् इत्यादि सर्व प्राग्वत् । युवां युष्मानावामस्मान् वा आचष्टे युष्मयति अस्मयतीति "णिज्वहुलं नान्नः कृगादिषु” इति णिचि युष्मयति अस्मयतीति विपि तल्लुकि च युष्म् अस्म् इति युष्मदस्मदोर्मान्तत्वं अनयोः सिजस्डेङस्तु १० प्रत्ययेषु परत्वात्त्वमहमादय एवादेशाः स्युः । त्वम् अहम् । अमाभ्याम्सु परत्वात्त्वमाद्यादेशे पश्चा- दात्वम् । अयमर्थः-द्वयोरन्यत्र सावकाशत्वाच्छन्दान्तरप्रवृत्त्या चानित्यत्वात् परत्वात्पूर्वं त्वमाद्यादेश इति । प्रथममात्वे तु सति मान्तत्वाभावात्त्वमाद्यादेशा न स्युरिति, ततः पूर्व "अमौ मः" इति पश्चा- त्वमाद्यादेशस्ततो "युष्मदस्मदोः" इत्यात्वम् युवाम् आवाम् , यूयम् वयम् । युवां युप्मानावामस्मान्या आचक्षाणः आचक्षाणौ आचक्षाणाः इति भावः । एवं त्वां मां युवां आवां "शसो नः" इति शसो १५ नत्वे 'युष्मदस्मदोः” इति मस्यात्वे युपान् असान् २। टाङयोसि नित्यत्वात्त्वमादिकार्येभ्यः प्रथममेव पूर्वेण मकारस्य यत्वे युष्या अस्या । अथ प्राक् मकारस्य पश्चादकारस्य यत्वप्राप्तिरथवा पूर्व युमिति प्रकृतेः पश्चात्त्वेति प्रकृतेरिति शब्दान्तरप्राप्त्या यत्वमप्यनित्यमित्यमाश्रीयते तदा परत्वात्पूर्व त्वमाद्या- देशे अकारस्य यत्वे व्या म्या । अथ 'सकृद्गते सः यद्वाधितं तद्वावितमेवेति' यद्याश्रीयते तदा पर- वाभावे त्वेन मेन युवाभ्याम् आवाभ्याम् युपाभिः असाभिः ३। तुभ्यं मह्यम् , युवाभ्याम् २ १२० मोर्वा (सि० २।१।९) यस्मिन्नायौ कृतौ ततोऽन्यः शेपस्तस्मिन शेपे स्यादौ परे मान्तयोर्युष्मदस्म- दोलक वा स्यादिति युपभ्यम् असभ्यम् , युप्मभ्यम् अस्मभ्यम् ४ । त्वत् २, युवाभ्याम् २, युपत् युप्मत् , असत् अस्मद् ५ तव मम, युष्योः अस्योः, युव्योः आव्योः, युपाकम् युष्माकम् असाकम् अस्माकम् ६ युष्यि अस्थि, व्यिं म्यि । त्वमहंवाचके युप्मदस्मदी सर्वादिगणमध्ये दृश्येते, अत्र त्वां मा यो वक्ति तद्वाचके इति न सर्वादिनी ततोऽसर्वादित्वान्न स्मिन्नादेशः त्वे मे । अथ *"किवथं प्रकृति-२५ रेवाह' विवन्तयोर्युष्मदस्मच्छन्दयोर्योऽर्थस्तमर्थ प्रकृतिरेवाह, नहि प्रकृति विना किप् भवति ततः स्मिन्नादेशे त्वस्मिन् मस्मिन् । “सन्निपातन्यायस्यानित्यत्वे" त्वास्मिन् मास्मिन् । युट्योः अस्योः युन्योः आव्योः, युयासु असासु ७। [युवयोः आवयोः, २, ६-२, ७-२] ' हेमवृहद्वृत्तिगतः । अथानयोरादेशविशेपाः अथ युष्मदस्मदोरादेशविशेपविधिनिरूपणाय प्रक्रमते । अथानयो- रादेशविशेषा इति । उच्यन्ते इति सूत्रशेषः । सूत्रम्- पदाधुग्विभक्त्यैकवाक्ये वस्नसौ बहुत्वे ॥ १५ ॥ [ सि० २।१।२१] द्वितीयाचतुर्थीपष्टीबहुवचनैः सह पदात्परयोर्युप्मदसदोबसूनसा वा स्याताम्, न तु वाक्यान्तरे। धर्मो रक्षतु वो लोका धर्मो रक्षतु नः सदा। नमो वः श्रीजिनाः शुद्धं ज्ञानं नो दीयनां धनम् ||१||३४ , , - ३० १५८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- दर्शनं वो जिनाधीशाः पापं हरति नो रयात् । पक्षे धर्मो युष्मान् रक्षतु इत्यादि ॥ १५ ॥ पदा० । पद ५-१ "डेडस्यो०" "समानानां०" । युज्यते इति युक् २। युग चासौ विभक्तिञ्च युग्वि- भक्ति ३-१ "इवर्णादे." । एकं च तद्वाक्यं च एकवाक्यं तस्मिन् एकवाक्ये ७-१ "अवर्णस्ये"। वस् च नस् च वस्त्रस् १-२ "लोकात्” । बहो वो बहुतं तस्मिन् वहुत्व ७-१ अवर्णस्पे० । पञ्चपद- ५मिदं सूनम् । युग्विभक्त्येति युग्विभक्तिः समविभक्तिः । सप्तसु हि विभक्तिपु द्वितीयाचतुर्थीपष्ट्यः सम. विभक्तयः इति तथैवाह-द्वितीयाचतुर्थीपष्ठीवहुवचनैः सहेति । एकवाक्ये इत्यस्यार्थमाह-न तु वाक्या- न्तरे इति । अथ सार्द्धश्लोकेनोदाहरणमाह-धर्मो रक्षतु इत्यादि । हे लोका वो युष्मान् धर्मो रक्षतु पालयतु । तथा सदा निरन्तर नोऽस्मान् धर्मो रक्षतु । अत्र पदात्परयोः शसन्तयोर्युष्मदस्मदोर्वस्नसौ ॥ हे श्रीजिनाः वो युष्मभ्यं नमोऽस्तु "नमः स्वस्तिस्वाहास्वधाभिः" इति नमोयोगे युष्मच्छब्दाने चतुर्थी- १० वचनम् तथा हे जिनाः भवद्भिर्नोऽस्मभ्यं शुद्धज्ञानरूपं धनं दीयतां अत्र "कर्माभिप्रेयः सम्प्रदानम्" इति सम्प्रदानसज्ञायां चतुर्थी ततः पदात्परयोश्चतुर्थीबहुवचनभ्यसन्तयोयुष्मदस्मदोर्वस्नसावादेशी ॥१॥ हे जिनाधीशाः वो युष्माकं दर्शनं रयात् वेगात् नोऽस्माकं पापं हरति । अत्र पष्ठीवहुवचना- न्तयोर्वसनसौ ॥ पक्षे धर्मो युष्मान् रक्षतु । इत्यादिशब्दात् धर्मोऽस्मान् रक्षतु, नमो युष्मभ्यम् , श्रीजिनाः अस्मभ्यं १५ज्ञानं धनं दीयतां युष्माकं दर्शनमस्माकं पापं हरति । पक्षे एवं रूपाणि भवन्ति इति ।।१५।। सूत्रम्--- द्वित्वे वामनौ ॥ १६॥सि० २।१।२२ ] समविभक्तिद्विवचनैः सह पदात्परयोर्युष्मदसदोम्निौ वा स्याताम् । पातु वां नौ जिनोऽयं च दद्याद्वां नौ परं पदम् । मनो वां नौ सदा भूयादृढं धर्मे जिनोदिते ॥ २ ॥ २० पक्षे जिनो युवां पात्वित्यादि ॥ १६ ॥ द्वित्वे । द्वयोर्भावो द्वित्वं तस्मिन् द्वित्व ७-१ 'अवर्णस्ये" । वाम् च नौ च १-२ सूत्रत्वा- ल्लोपः । द्विपदमिदं सूत्रम् । श्लोकेनोदाहरति--पातु वामित्यादि जिनो वां युधां च पुननौ आवां पातु अत्र पदापरयोर्द्वितीयाद्विवचनान्तयोयुष्मदस्मदोर्वानावादेशौ । च पुनः अयं जिनो वां युवाभ्या नौ आयाभ्यां परं पदं दद्यात्, अत्र चतुर्थीद्विवचनान्तयोर्युष्मदस्मदोन्निौ । वां युषयोनौ आवयोध २५ मनः सदा जिनोदिते धर्मे दृढ भूयात्, अत्र पष्ठीद्विवचनान्तयोर्युष्मदस्मदोर्वाग्नौ । पक्षे जिनो युवां पात्वित्यादि स्पष्टम् ॥ १६ ॥ सूत्रम्-- अमा त्वामा ॥ १७ ॥ [सि० २११२४ ] अमा सह पदात्परयोर्युष्मदसदोस्त्वामा वा स्याताम् । धर्मस्त्वा पातु त्वां पातु । धर्मों मा पातु मां पातु ॥१७॥ अमा० । अम् ३-१ "लोकात्" । त्वा च मा च त्यामा १-२, सूत्रत्वात् लोपः । द्विपदमिदं सूत्रं स्पष्टार्थ च ॥ १७ ॥ सूत्रम्- डेङसा ते मे ॥ १८॥ [सि० २२१॥२३] डेडस्भ्यां सह पदास्परयोर्युप्मदसदोस्ते मे वा स्याताम् । धर्मस्ते ददातु तुभ्यं ददातु । धर्मो ३४ मे ददातु मयं ददातु सुखम् । धर्मस्ते स्वम् तव खम् । धर्मों में स्वम् मम स्वम् ।। १८॥ ३० १५९ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे युप्मदस्मदोरादेशविशेषाः ढे च ङस् च डेङस् तेन डेडस् ३-१ "लोकात्” । ते च मे च तेमे १-२ सूत्रत्वात् लोपः । द्विपदमिदं सूत्रं स्पष्टं च ॥ १८ ॥ अत्र विशेपसूत्रमाह- नित्यमन्वादेशे ॥ १९ ॥ [सि० २१॥३१ ] वस्नसादिः । यूयं विनीतास्तहो गुरवो मानयन्ति ॥ १९ ॥ नित्यम । नित्य २-१ "समानादमोऽतः” । अन्वादेश ७-१ "अवर्णस्त्रे" । द्विपदमिदं सूत्रम्५ यूयं विनीता इसादि पूर्व विनीतत्वेन उक्तानां ततो गुरुमाननाविषयत्वेन वचनमित्यमन्वादेश इति ॥ १९ ॥ सूत्रम्- असदिवामयं पूर्वम् ॥ २० ॥ [ सि० २।१।२५] युष्मदस्मयां पूर्व सम्बोधनमसदिय स्यात् ततो वस्नसादयो न स्युः । जना युष्मान्पातु धर्मः । कचिद्वा-जिनाः शरण्या वो युप्मान् वा सेवे । कचिन्न-साधो सुविहित त्वा सेवे ॥ २०॥ १० असदिवा० । न सत् असत् १-१ "अनतो लुप्” । इव १-१ "अव्ययस्य" आमच्यते इति आमन्त्र्य १-१ "अतःस्यमोऽम्" "समानाद०”। पूर्व १-१ "अतःस्यमोऽम." "समानानां"। मध्ये "धुटस्तृ- तीयः" "समानानां." "तो मुमो०" । चतुष्पदमिदं सूत्रं व्यक्तं च । इवकरणं किम् ? श्रवणं यथा स्यादन्यथाऽसदित्युक्त प्रयोग एव न स्वान् । कचिद्वेति-युष्मदस्मद्भ्यां पूर्वमामत्र्यं पदं कचिदसदिव वा स्यादिति-तथाहि "जविशेष्यं १५ वामन्ये" (२।१।२६) युप्मदस्मद्भ्यां पूर्व जसन्तमामत्रयं पदं क्वचिदस दिव वा स्यादिति विशेष्य- वाच्यामये अर्थात्तद्विशेपणे परेऽसदिव वा स्यात् । जिनाः झरण्याः युप्मान् शरणं प्रपो-पक्षे जिनाः शरण्या वः शरणं प्रपद्ये । जसिति क्रिम् ? साधो सुविहित वोऽश्रो शरणं प्रपद्ये । अत्र "नान्यत्" (२।१।२७ ) इति सूत्रेण असदृद्भवनन्य निषेधासाद्देशोऽभूत् । विशेषणमिति किम् ? शरण्याः साधवो युप्मान् शरणं प्रपद्ये । आमत्यविशेष्यविशेपण इति किम् ? आचार्याः युष्मान २० शरण्याः शरणं प्रपद्ये । अर्थात्तद्विशेषणभूत इति किम् ? आचार्या उपाध्याया युष्मान शरणं प्रपद्ये । "सपूर्वात्प्रथमान्ताद्वा” (२।१।३२) विद्यमानपूर्वपदात्प्रथमान्तान परयोर्युप्मदम्मदोरन्वादेशे वनसादिर्चा स्यान् । यूयं विनीतास्तद्गुरवो वो मानवन्ति तद्गुरवो युष्मान्मानवन्ति । कचिन्नेति-युष्मदस्मद्भ्यां पूर्वमामन्यं पदं कचिदसदिव न स्थान तथाहि "नान्यत्" (२।१।२७) युष्मदस्मयां पूर्व जसन्तादन्यदामञ्यं विशेष्यमामत्र्ये तद्विशेषणे परेऽसदिव न स्वान् तनः पूर्वपदन्य २५ सत्त्वाद्वन्नसादयो भवन्ति । साधो सुविहित त्वा झारणं प्रपद्ये साधो सुविहित मा रक्ष ॥ नथा "दृश्यर्थश्चिन्तायाम्” (२।१।३०) शिना समानार्थेचिन्ता नुभिर्योने एव पदात्यायुप्म- दस्मदोर्वन्नसादिन स्थान-जनो युष्मान संध्यागतः, जनवां समीक्ष्यागनः, जनन्यामपक्षने । एवं उत्पश्यति निरूपयति नियायति उपलक्ष्यति आलोचयतीत्यादि नर्वत्र मनमा चिन्ननं दृश्यर्या- नामर्थः । व्यर्थरिति क्रिम ? जनो बो मन्यते । चिन्नायामिति किम ? जनो यः पश्यनि ।। २० ॥३० अव विशेपमाह सूत्रम्- पादायोः ॥ २१ ॥ [लि० २११२८] नियतमात्राऽक्षरपिण्टः पादः। पादस्याऽऽदिन्यायुमदनदोन्निनादिन स्यात् । चीग विशेष देवो युप्माकं कुलदेवता । स एव नाथो भगवान् अन्माकं पापनाशनः ।। २१ ।। ।

.
१०
१६०
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमरघु-
पादाद्योः । आदिश्व आदिश्च आदी पादस्य आदी पादादी तयोः पादादि ७-२ "इवर्णादे
"लोकात्" । एफपदमिदं सूनम् । पादस्य लक्षणमाह-नियतमात्राक्षरपिण्डः पाद इति । तन नियता
यथाशास्त्रं निर्णीता या मात्रास्तासा पिण्डः पादः स तु आर्यादिसम्बन्धी, नियतानामक्षराणां पिण्डः
पादः स तु शोकादीनामिति द्वैधयोरपि पादयोरादौ युष्मदस्मदोर्पस्नसादयो न स्युः ।
श्लोकेनोदाहरति-वीरो विश्वेश्वरो इत्यादि व्यक्तम् ।। २१ ॥ सूत्रम्-
चाहहवैवयोगे ॥ २२॥[ सि० २१॥२९ 1
एभिः पञ्चभिर्योगे वलसादिन सात् । ज्ञानं युष्मॉश्च रक्षतु ॥२२॥
इति श्रीमहोपाध्यायश्रीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिताया हैमलघुप्रक्रियाया
युष्मदस्मदो प्रक्रिया समाप्ता ॥
चाह । चश्च अहश्च हश्च वा च एवश्व चाहवैवाः चाहहवैवैर्योगः चाहहवैवयोगः तस्मिन्
चाहवैवयोग ७-१ "अवर्णस्ये.” । एकपदमिदं सूनं स्पष्टार्थं च ।। २२ ॥
किञ्च यथा युग्विभक्तिपु वरनसादय उक्तास्तथाऽयुगविभक्तिप्वपि कचिदि-
प्यन्ते-
"एकं दृष्ट्वा धनुःपाणिं मानुपं समुपस्थितम् । राक्षस बलमुत्सृज्य किं वो भीता इव स्थिताः" ॥ १॥
१५ अन्न वो यूयमित्यादि प्रथमावहुत्वे । "श्रुतं वश्चिनगुप्तस्य भापित मनसः प्रियम्" । इह वो युष्मा-
भिरित्यर्थः । प्रथमायां गेये केन विनीतौ वा कस्य चेयं कृतिः कवेः । इति राज्ञा स्वयं पृष्टौ बाल्मी-
किनमशसताम्" ॥१॥ इत्यन वा युवामित्यर्थः । “देहे विचरतस्तस्य लक्षणानि निवोध में" मत्सकाशा-
दित्यर्थः । अन पञ्चम्या में आदेशः ।
यद्वा स्याद्यन्तप्रतिरूपकाण्येतान्यव्ययानि । तथोक्तं मनोरमायाम्-एतेन गेयकेन विनीतौ वामिति
२० व्याख्यानं युवामित्यर्थे हि वामित्यव्यमिति ॥ २२ ॥
यां शिष्योद्धुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे
राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः ।
तस्या शासितसाधुशब्दसरणौ स्वोपज्ञसत्प्रक्रिया-
वृत्तौ सिद्धिसदः शिखामगमतां तौ युष्मदस्मद्धनी ॥१॥

१६२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- वस् यथाक्रमं नागमनुष्यलोकयोः । यथा "भूर्भुवः स्वस्त्रयीशानमिति” । स्वस्ति कल्याणे। समया समीपे मध्ये च । निकषा अन्तिके । अन्तरा २५ विनार्थे मध्ये चाधेयप्रधाने । पुरा भूतभविष्यत्परीप्साचिरन्तनेषु, पुरेत्यविरते चिरातीते भविष्यदासन्ने चेति मनोरमायाम् । पहिस् वाह्ये बहिर्भावे अनावृतप्रदेशे, यथा बहियोग इत्यत्र बाह्येन योगो पहिर्भावेन योग इति । अवस् पहिरर्थे । ५अधस् सामीप्यादौ । असाम्प्रतम् अनौचित्ये। अद्वेति स्फुटावधारणयोः, तत्त्वातिशययोरित्येके तथाच प्रयोग:-"मध्ये श्रुतीनां प्रतिवेशिनीनां सरस्वती वासवती मुखे नः । हियेय ताभ्यश्चलतीयमद्धा पथान्न संसर्गगुणेन नद्धा" ॥१॥इति नैषधीये, (है वृ० न्या० तु अवधारण-मत्यतिशययोः)। ऋतम् शुद्धौ । सत्यम् प्रश्नप्रतिषेधयोः । इद्धा प्राकाश्ये । मुधा व्यर्थे (है० वृ० न्या० तु निर्निमित्त-प्रीतिकरणयोः)। मृषा मिथ्या इत्येतौ वितथे । वृथा व्यर्थे । मिथो ओकारान्तो रहःसहार्थयोः । मिथु मिथस् १० विजनवियोगेतरेतरार्थे । मिथो मिथस् (एतौ)रहःसहार्थयोरिति मनोरमायाम्। मिथु स्वाङ्गे द्वावित्यर्थे इति मनोर० । मिथुस् सगमे । मिथुनं स्त्रीपुससयोगे । अनिशं नैरन्तर्ये । मुहुस् अभीक्ष्णं एतौ पुनः पुनरित्यर्थे । मंक्षु झटिति शीघ्रार्थो । उच्चैस् महति । नीचैस् ५० अवकृष्टे, अल्पे इति मनोर० । शनैसु क्रियामान्थे । अवश्यं निश्चये आवश्यके । सामि अर्द्धजुगुप्सितयोः । साचि वक्रतिर्यगर्थयोः। विष्वक् समन्तादित्यर्थे नानार्थे इत्यपि । अन्वक् पश्चादर्थे । ताजा द्राक् साक् १५ शीघ्रार्थे, साक् एवार्थे इत्यपि । ऋधक वियोगे शीघ्रान्वितसामीप्यलाभेपु । (ऋधक् सये । वियोग- शीघ्रसामीप्यलाघवेष्वित्यन्ये इति मनोरमायाम् ) । पृथक् भिन्ने वियोगे इत्यपि । धिक् निन्दार्थे । हिरुक वियोगे । 'हिरुग्नानाप्पथविना' इत्यभिधानचिन्तामणौ । ज्योक् कालभूयस्त्वे, प्रश्ने शीघ्रस- प्रत्यर्थयोश्च । मनाम् ईपदप्राप्तयोः, ईषद् अप्राप्ते, इमावल्पे इति मनोर० । ज्योपं जोपं तूष्णीम् एते त्रयोऽप्यभापणे । कामं निकामं प्रकामं एते त्रयोऽतिशयार्थे, कामं स्वाच्छन्ये इति मनोर० २० अकामानुमतौ काममित्यभिधानचिन्तामणौ । अरं शैध्ये अत्यर्थेऽपि । वरं मनागिष्टे, ईपदुत्कर्षे इति मनोर० । परं ७५ वेवले, किन्त्वर्थे इति मनोर० । चिरं दीर्घकाले । आरात् दूरसमीपयोः । तिरस् अन्त_वज्ञातिर्यग्भावेषु । मनस् नियमे । नमस् नतौ । भूयस् पुनरर्थे आधिक्ये च । प्रायस् बाहुल्ये । प्रवाहु ऊर्थेि प्रवाहुक प्रवाहुकम् द्वावप्यद्धार्थे प्रवाहुकमिति समकालार्थे सिद्धार्थे च । प्रवाहिकेति पाठान्तरमिति मनोरमायाम् । आर्य प्रीतिसम्बोधने । हलं प्रतिषेधे विपादे च २६ समस्तमित्येके । आर्यहलमिति बलात्कारे । शाकटायनस्तु आयेंति प्रतिबन्धे हलमिति प्रतिषेधविवा- दयोरित्याहेति मनोरमायाम्। स्वयमात्मने इत्यर्थे । अलं भूषणपर्याप्तिशक्तिवारणनिषेधेषु। कु कुत्सितेपद्- र्थयोः, पापाथै इति है० ० न्या० । बलवत् निर्भरे, बलवदित्यतिशये इति मनोर० । बलवत्सुष्टु किमुता- तीय निर्भरे इत्यभिधानचिन्ता० । अतीव अतिशये। सुष्ठु दुष्टु यथाक्रमं प्रशंसानिन्दयोः । ऋते वर्जने घर्जनेत्वंतरेणर्ते इति वचनात् वियोग इत्यपि । सपदि शैघ्ये, (हृते इति है० वृ० न्या०) साक्षात् प्रत्यक्ष- ३० तुल्ययोः। सन् परिमाणे ।प्रशान १०० चिरन्तने, समानार्थे इति मनोर० । सनात् हिंसायां । सनत् चेदर्थे । सना नित्ये, सना सनत् सनात् एते त्रयोऽपि निये इति मनोर० । नाना पृथग्भावे, अनेक- विनार्थयोरिति मनोर० । विना योगप्रतिपेधे, वर्जने इति मनोर० । क्षमा सहने । शुः पूजायाम्। सहसा अतर्किते, आकस्मिकाविमर्शयोरिति मनोर० । युगपत् क्रियासमभिहारे सहार्थे च । उपांशु अप्रकाशोचारणरहस्ययोः । पुरतस पुरस् एतावप्रतोऽर्थे । पुरस्तात् प्रथमे पुरोऽर्थे च । शश्वत् पौनःपुन्ये, नित्ये सहार्थे च । कुवित् योगप्रशंसास्तिभावेषु, भूर्यर्थे इति मनोर० । आविस् प्रादुर ३६प्रावाश्ये इति, प्रादुस् नान्यपि, इति स्वरादयः सप्तदशोत्तरं शतमव्यया हेमवृहद्वतिनिर्दिष्टाः परिगणिताः । - - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे अव्ययानि । स्वरादयः । चादयः १६३ १० ? "स्वरादय" इति सूत्रे बहुवचनमाकृतिगणार्थ तेनान्येपामपि यथालक्ष्मव्ययसंज्ञा भवति । उपधा भेदे । तोपं सुखे मौने च । अम् शैध्ये अल्पे च । आम् अङ्गीकारे। प्रताम् ग्लानौ । साम्प्रतं न्याये । नियं नित्यदा सदा अजस्रं सततं सातये ।झगिति तरसा । आशु शैव्ये । अञ्जसा तत्त्वशीघ्रार्थयोः । आनु- पक् आनुपूर्थे । अन्नस् शीघ्रसाम्प्रतिकयोः । स्थाने इति युक्ते । शुदि शुक्लपक्षे । वदि कृष्णपक्षे । संवत् वर्षे । सत्यमित्याङ्गीकारे। एवमेते द्वाविंशतिः। केचिदेवम् "अथाव्ययानि वक्ष्यन्ते” इत्यादिभ्योऽभिधान-५ चिन्तामणिपर्यन्तश्लोकेभ्यो ज्ञेयाः 'अर्थकथनं चैपामुपलक्षणमात्रम् । तथाचोक्तम्-"निपाताश्चोपसर्गाश्च धा- तवश्चेति ते त्रयः। अनेकार्थाः स्मृता लोके पाठस्तेषां निदर्शनम् ॥ १॥ अव्ययसंज्ञायामेव सूत्रान्तरमाह- चादयोऽसत्त्वे ॥२॥ [ सि० १।१।३१] अद्रव्यार्थाश्चादयोऽव्ययानि स्युः। च अह ह एव वा एवम् नूनं ननु खलु विना नाना ईपत् किल वै नो न मा मास्स यत् तत् स्वराश्च ॥२॥ चादयोः । च आदिउँपां ते चादयः । चादि १-३ । सीदतोऽस्मिन् लिङ्गसंख्ये इति सत्त्वम् । लिङ्ग- संख्यावद्व्यं इदंतदित्यादि सर्वनामव्यपदेश्यं विशेष्यमिति यावत्, न सत्त्वमसत्त्वं तस्मिन् असत्त्व ७.१ । द्विपदमिदं सूत्रम् । वृत्तिः कण्ठ्या । अद्रव्यार्था इत्यादि । ततश्च चादयः पदान्तरोपहिता एव प्रयु- व्यन्ते अन्यपदोपात्तार्थद्योतकत्वात्-यथा वृक्षश्च प्लक्षश्चेति । स्वरादयश्च स्वतः स्वार्थवाचकत्वात्केवला अपि प्रयुज्यन्ते स्वः सुखयतीत्यादि । अत एव चादयो द्योतकाः, स्वरादयो वाचका इति । असत्त्व इति १५ क्रिम् ? यत्र चादीनां सत्त्वरूपेऽनुकार्यादावर्थे वृत्तिस्तत्राव्ययसंज्ञा माभूत्-चः समुच्चये, एवोऽवधारणे इत्यादि । नामग्राहं चादीनि कानिचिनिर्दिशति । च अह इत्यादि । आदिशब्दस्यानुक्तसमु- ञ्चयार्थकत्वादेषां विस्तरतः परिगणनमर्थकथनं चैवम्-च अन्वाचयसमाहारेतरेतरयोगसमुचयेपु । अह निर्देशविनियोगकिलार्थेषु, पूजायामपि । ह अवधारणे पादपूरणे प्रसिद्धावपि । वा स्याद्विकल्पोपम- योरेवार्थे समुच्चये । एव अवधारणपृथक्त्वपरिमाणेपु, अनवकृतावपि । एवमुपमानोपदेशप्रश्नावधारण-२० प्रतिज्ञानेयु, उक्तपरामर्शेऽपि । नूनं वितर्के अर्थनिश्चये च । शश्वत् स्वरादावपि पठितः । सूपत् : कूपत् द्वावपि प्रश्नवितर्कप्रशंसासु, कचित् स्वरादावपि पठितः । नेत् चेत् द्वावपि प्रतिषेधावधारण- समुच्चयेपु । नेदिति शंकायां विचारेऽपि । चेदिति यद्यर्थे इति मनोर० । नचेत् निषेधे । चण् अयं चेदर्थे णित् , समुच्चयादौ त्वननुवन्धः । कचिदिष्टप्रश्ने । यत्र कालेऽधिकरणे, मनोरमायां तु यत्रेत्य- नवलुप्त्यमर्पगर्दाश्चर्येषु । नावकल्पयामि न मर्पये । गर्हे आश्चर्य वा । यत्र भवान् वृषलं याजयेत् ।२५ नह प्रत्यारम्भविपादप्रतिविधिपु । नहि अभावे । हन्त प्रीतिविषादसम्प्रदानेपु, मनोरमायां हन्तेति हर्षे विपादे अनुकम्पायां वाक्यारम्भे च । माकिस् नकिस् द्वावपि निषेधे वर्जने च । मा मान नञ् एते सर्वेऽपि निषेधार्थाः । माकिः माकिं नकिरिति त्रयोऽपि वर्जने इति मनोरमायाम् । वाव सम्बो- धने । त्वाव न्वाव वावत् त्वावत् न्वावत् एते अनुमानप्रतिज्ञाप्रैपसमाप्तिपु । त्वै तुवै न्वै नुवै चत्वारोऽप्येते वितर्के पादपूरणे च। रैदाने अनादरे च (दाने दीप्तौ च इति है० वृ० न्या०)।रै करोति ददा-३० तीत्यर्थः त्वं रे किं करिष्यसि इति मनोरमायाम् । वै निश्चये (स्फुटार्थे इति है० वृ० न्या०)। औपट् वौषट् वपट् देवहविर्दानादौ । वट वाट वेट् एते त्रयोऽपि वियोग-पादपूरणयोः । पाट् प्याट् द्वावपि सम्बोधने । अत्र डकार केचित् पठन्ति । फट् हुंफट् छंवट् एते त्रयोऽपि निर्भर्त्सनसम्बोधनयोः। अध अधोऽर्थे । आत् कोपपीडयोः । स्वधा पितृभ्यो हविर्दाने, खाहा देवताभ्यः । अलमिति स्वरादौ निरूपितम् । चन अप्यर्थे पादपूरणे च । हि हेताववधारणे च । अथ मंगलानन्तरारम्भ-३५ १६४ महामहोपाध्यायत्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्रश्नकालाधिकारप्रतिज्ञासमुच्चयेषु । अयं स्वरादिरपि । तेन मंगलवाचकस्य द्रव्यार्थत्वेऽपि अव्ययत्वं सिद्ध्यति । तथा च श्रीहर्षः "उदस्य कुंभीरथ शातकुंभजाश्चतुष्कचारुत्विपि वेदिकोदरे । यथा- कुलाचारमथावनीन्द्रजां पुरन्ध्रिवर्गः स्लपयाम्वभूव” इति, अन हि अथ स्लपयाम्बभूवेत्यस्य मङ्गलं स्नपनं चकारेत्यर्थः । निपातस्तु स्वरूपेणैव मङ्गलं मृदङ्गध्वनिवत् इति मनोरमायाम् । ओमिति स्वरादौ ५ पठितम् । अथो अन्वादेशादौ । नो नोहि एतौ निषेधे । भोस् भगोस् अघोस् अयो हो हो अहो आहो उताहो नवाप्येते सम्मोधने । हा ही एतौ विपादविस्मये (हा विपादशू- (शो)कार्तिषु, ही विस्मये इति है. वृ० न्या०)। हे है हये अये अयि अररे अङ्ग रे अरे अवे हेप्रमुखा दशाप्यनुशयसम्बोधनयोः ([हाप्रभृति ] द्वादशैतेऽनुशयसम्बोधनयोरिति है० वृ० न्या०)। ननु विरोधोक्तौ अनन्वयादौ च । शुकम् सुकम् नुकम् हिकम् नहिकम् पञ्चाप्येते प्रत्याख्याने। १० शुकम् शैन्ये शुकमतिशये इति मनोर० । ऊम् प्रश्ने। हुम् भर्त्सने । कुम् प्रश्ने । उ रोपोक्तौ (अस्ति सत्त्वे रोपोक्तौ च सुञ् उध्वत् इति है. वृ० न्या०) कम् पादपूरणे (स्वरादौ ज्ञातव्यमिति है ० ० न्या०) हम् रोषानुपमादौ (रोपानुकम्पादौ इति है ० वृ० न्या०)। किम् प्रश्ने वितर्के च। हिम् संभ्रम- भर्त्सनयोः । अद् विस्मये । कद् कुत्सायाम् । यद् तद् हेत्वर्थवाक्योपन्यासयोः । इद् अपूर्वेऽर्थे ईपदर्थे च । चिद् प्रश्नावधारणयोः । विद्' भर्त्सनपादपूरणयोः । खिद् विमर्शप्रश्नयोः । उत १५ वितर्के (विकल्पे इति है० वृ० न्या०)।बत खेदानुकम्पासंतोपविस्मयामत्रणेषु । इव उपमावधारणयोः । तु विशेषणपादपूरणयोः । नु वितर्कपादपूरणयोः । यच्च वाक्यान्तरोपक्रमे । कञ्चन कच्चिदर्थे । किमुत विकल्पे । किल सप्रश्नवार्तयोः अलीकेऽपि । किंकिल किलार्थे । किंखिद् उदखिद् आहो- खिद् एते त्रयोऽपि प्रश्नवितर्कविकल्पेषु । अहह अद्भुतखेदयोः । नहवै नव द्वावपि प्रत्याख्याने । नवा विभाषायाम् । अन्यत् अन्यार्थे । अन्यत्र अन्याधिकरणे काले । शव शप् द्वावपि प्रतिग्रहे। २० अथकिम् अङ्गीकारे । विषु नानार्थे । पट् पाटवे । पशु दृश्यर्थे । पशु सम्यगर्थे 'पशु मन्यमानाः' इति मनोर० । खलु निषेधवाक्यालङ्कारजिज्ञासानुनयेषु । यदिनाम पक्षान्तरे । यदुत पराशय- प्रकाशनादौ । प्रत्युत उक्तवैपरीये । यदा देशाद्यधिकरणे । जातु कदाचिदित्यर्थे, अवधारणपादपूरण- योरपि । यदि पक्षान्तरे । यथाकथाच अनादरे । यथा योग्यतावीप्सार्थानतिवृत्तिसादृश्येषु । तथा साम्ये । यथायथमिति मकारान्तमव्ययं यथास्वमित्यर्थे इति “सामीप्येऽधोध्युपरि ( ७४।७९) २५ इति द्विर्वचनसूत्रवृत्तौ । पुद् कुत्सायाम् पुरा स्वरादौ पठितः सत्त्वभूते काले, अत्र त्वसत्त्वभूते । ध हिंसाप्रातिलोम्ययोः । यावत् तावद् एतौ साकल्यावधिमानावधारणेषु । साकल्ये-यावत्कार्य ताव- स्कृतम् । अवधौ-यावद्गंतव्यं तावत्तिष्ठ । माने-यावद्दत्तं तावद्भुक्तम् । अवधारणे-यायदमत्रं ब्राह्मणा- नामवयस्ख (मर्यादावधिपरिमाणेषु इति है० ० न्या०) दिष्टया सम्मदे, पूर्वप्रीतिसेवनयोः सभाजन- प्रातिलोम्ययोर्वा । मर्या सीमावन्धे । आम पीडायाम् । नाम प्राकाश्यसंभाव्यत्रोधोपगमकुत्सनेषु । ३०स्म अतीते पादपूरणे च । इतिह पुराश्रुतौ । सह तुल्ययोगविद्यमानयोः । अमा सहार्थे समीपे च । समम् सत्रा साकम् सार्द्धम् एते सहार्थे (समम् समन्ततोऽर्थे इति है. वृ० न्या०)। ईम् कीम् सीम् निर्देशनिवेदनवाक्यपादपूरणेषु । (ईम् अव्यक्त कीम् संशयप्रश्नानुमानेषु । सीम् अभिनवव्याहरणामर्पपादपूरणेपु इत्येके इति है० वृ० न्या०) । आम् प्रतिवचनावधारणयोः । आसू स्मृतिसेदयोः, कोपे च । इति एवमर्थे प्रकारार्थे ग्रन्थसमाप्तौ शब्दप्रादुर्भावे अर्थसमाप्तौ पदार्थविपर्या- सादी (एवमर्थे आद्यर्थे हेत्वर्थे प्रकारार्थे शब्दप्रादुर्भावे ग्रन्थसमाप्तो पदार्थविपर्यासादौ च इति है: ३६पृ० न्या०) । अव अड अट एते त्रयोऽपि भर्सने बाह्या निप्पत्तौ । अनुपक अनुमाने केचित्तान्त -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे अव्ययानि । चादयः । अधण्तखाद्याशसः १६५ केचिद्दान्तमपरे दीर्घादि च मन्यन्ते । खोस् कुत्सायाम् । खराश्चतुर्दशापि पूरणभर्त्सनामन्त्रणनि- पेधेपु । अ इति सम्वोधनेऽधिक्षेपे निपेधे च । आ इति वाक्यस्मरणयोः । इ सम्बोधनजुगुप्साविस्म- येपु । इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ सम्बोधने इति मनोरमायाम् । चादय इत्यत्र बहुवचनमाकृतिगणार्थ तेन आत इतोऽपीत्यर्थे । यत्तत् यतस्तत एतौ हेतौ । अनुकं वितर्के । शंवट् अन्तःकरणे आभिमुख्य च । व पादपूरणे इवार्थे च । चाड चटु प्रियवाक्ये । हुं भर्त्सने । तुमिति तुकारे गुरुं ५ तुंकृत्य । इव सादृश्ये । अद्यत्वे इदानीमित्यर्थे, इत्यादयो ज्ञेयाः ॥२॥ अव्ययसंज्ञायामेव सूत्रमाह- अधणूतवाद्याशसः ॥३॥ [सि० १११।३२] धण्वर्जास्तखादयः शसपर्यन्ता ये प्रत्ययास्तदन्तं नामाव्ययं स्यात् । अध० । तसुरादिर्यस्य तत्तस्वादि । न धण् अधण् अधण् च तस्वादि च अधण्तस्वादि १-१ "अन- तो लुप्" । आ १-१ "अव्ययस्य" । शसू ५-१ *"आङावधौं” अवधिर्मर्यादा अभिविधिश्च तद्वृत्त-१० राङा युक्तात्पञ्चमी स्यादिति पञ्चमी । शस्पर्यन्ता इति अत्राङोऽभिविध्यर्थत्वात् शस्प्रत्ययान्तानामप्य- व्ययसंज्ञा सिद्ध्यति । अथ तस्त्रादीनां प्रत्ययान्तानां कतिचित्सूत्राणि निर्दिशति सूत्रम्- व्याश्रये तसुः॥४॥ [सि० ७।२।८१ ] पष्ठयन्तात् नानापक्षाश्रये गम्ये तसुः स्यात् । देवा अर्जुनतोऽभवन् रविः कर्णतोऽभवत् ॥४॥ व्याश्रये इति । नानापक्षाश्रयो व्याश्रयः तसुरित्यत्र उकारोऽधण्तस्वाद्याशस इत्यत्र विशेपणार्थः । १५ देवा अर्जुनतोऽभवन् रविः कर्णतोऽभवदिति । अर्जुनकर्णयोर्विवदमानयोरर्जुनस्य पक्षे देवाः कर्णस्य पक्षे आदित्योऽभवदित्यर्थः । अत्रादिशब्दात् “रोगात्प्रतीकारे” (७१२१८२) तसुः । मूर्छातः कुरु- अस्य रोगस्य चिकित्सां कुर्वियर्थः । क्षेपातिग्रहाव्यथेष्वक स्तृतीयायाः” (७२।८५) तृतीयान्तादकर्तृवाचिनः क्षेपादिविषये तसुः स्यात् । वृत्तेन वृत्ततः क्षिप्तः, निन्दित इत्यर्थः । अतिक्रम्य ग्रहणमतिशयेन वा ग्रहणमतिग्रहः । वृत्तेन वृत्ततोऽतिगृह्यते । साधुवृत्तोऽन्यानतिक्रम्यातिशयेन वा गृह्यते २० साधुवृत्त इति सम्भाव्यते इत्यर्थः । अचलमव्यथा अभीतिर्वा वृत्तेन वृत्ततो न व्यथते न चलति न बिभेति वेत्यर्थः । क्षेपादिष्विति किम् ? वृत्तेन भिन्नः । अकर्तुरिति किम् ? चैत्रेण क्षिप्तः। तृतीयायाः इति किम् ? चैत्रं क्षिपति । पापहीयमानेन [सि० ७।२।८६] अकर्तृवाचिनः तृतीयान्तादाभ्यां योगे तसुः स्यात् । वृत्तेन वृत्ततः पापः, वृत्तेन वृत्ततो हीयते । शव्दतो हीनः स्वरतो वर्णतो वा । अकर्तुरित्येव- चैत्रेण हीयते । आभ्यामिति किम् ? चारित्रेण शुद्धः । तृतीयाया इत्येव-ग्रामे हीयते । क्षेपाविवक्षायां२५ तत्त्वाख्याने यथा स्यादिति वचनम् । "प्रतिना पञ्चम्या:" ( ७।२।८७) प्रतिना योगे या पञ्चमी विहिता तदन्तात्तंसुः स्यात्, वा । प्रद्युम्नो वासुदेवात् प्रति, वासुदेवतः । प्रति मापानमै तिलेभ्यः, तिलतः प्रतियच्छति ॥ ४ ॥ सूत्रम्---- पर्यभेः ( सर्वोभये) ॥५॥[सि०७२।८३ ] तसुः । परितः । अभितः॥५॥ पर्य० । परिश्च अभिश्च पर्यभि तस्मात् पर्यभि ५-१ । तसुः इत्यस्य वृत्तिलेशस्यायमर्थः । परि अभि इत्येताभ्यां यथाक्रमं सर्वोभयार्थे वर्तमानाभ्यां तसुः स्यात् । परितः सर्वतः, अभित उभयत इत्यर्थः । एवम् "आद्यादिभ्यः” (७।२।८४) एभ्यः संभवद्विभक्त्यन्तेभ्यस्तसुः प्रत्ययो भवति । आदी आदेर्वा आदितः एवं मध्यतः अन्ततः अग्रतः वक्षस्तः पार्वतः पृष्टतः मुखतः सर्वतः विश्वतः उभयतः अन्यतः पूर्वतः ३४ - ३० १६६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- एकतः इतः । प्रमाणेन प्रमाणाद्वा प्रमाणतः । पृष्ठेन पृप्ततोऽक सेवेत । एव पार्श्वतः इतः। दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा । शब्दतः अर्थतः अभिधानतः । येन यस्मिन्वा यतः, ततः, पृपोदरादित्वादलोपः । आद्यादयः प्रयोगगम्याः ॥ ५ ॥ अहीयरुहोऽपादाने ॥ ६॥ [सि० ७।२।८८] ५ अपादानपञ्चम्यास्तसुर्वा स्यात् । ग्रामतो ग्रामात् । हीयरुहोस्तु न-सार्थाद्धीना, गिरेव- रोहति ॥६॥ अहीय० । हीयश्च रह च हीयरुह्', न हीयरुह् तस्य अहीयरुह् ६-१ । अपादान ७-१ । अपादानप- श्चम्या इत्यादि-अपादाने या पश्चमी विहिता तदन्तात्तसुः प्रत्ययो वा भवतीत्यर्थः । हीयरुहोस्तु नैति- तयेदपादान हीयरहोः सम्बन्धि भवति तर्हि तसुर्न स्यादित्यर्थः । सार्थाद्धीन इत्यन सार्थादिति कर्तुरपा- १० येऽवधिविवक्षा सार्थेन हीयते देवदत्त इत्यर्थः । हीयते इति कर्मकर्तरीत्यन्ये सार्थात् स्वयं हीयते, स्वय देवदत्त इत्यर्थः । हीयेति क्यान्तस्य जहातेर्निर्देशो जिहीते इत्यस्य व्युदासार्थः । तेन तन प्रतिषेधो न भवति-भूमित उजिहीते । हागिति निर्देशेनैव हाडो निवृत्तिसिद्धौ हीयेति निर्देशो यनैव भावे कर्मणि कर्मकर्तरि च जहातेः प्रयोगस्तवापायविवक्षा नान्यत्येवमयं तेन सार्थाजहातीति न भवति (सार्थों जहातीति वाक्ये)। अपादान इति किम् ? ऋते धर्मात्कुतः सुखम् , आ स्तुघ्नादृष्टो देव इति ॥ ६ ॥ किमझ्यादिसर्वाद्यवैपुल्यबहोः पित्तस् ॥ ७॥ [ सि० २२२३८९ ] किमो यादिवर्जसर्वादिभ्योऽवैपुल्यार्थबहोथ पञ्चम्यन्तात्पित्तसू स्यात् । कुतः । सर्वतः । बहुत ॥ ७॥ किम० । द्विरादिः येषां ते व्यादयः, न ज्यादयः अध्यादयः, सर्व आदियेषां ते सर्वादयः, अध्यादयश्च ते सर्वादयश्च अध्यादिसर्यादयः, विपुलस भावो वैपुल्यम्, न वैपुल्यमवैपुल्यम् , अवैपुल्ये बहुः अवैपुल्यबहु, २० किम् च अव्यादिसर्वादयश्च अवैपुल्यबहुश्च किमयादिसर्वाद्यवैपुल्यबहुः, तस्मात् किमठ्यादिसर्वाद्यवैपुल्य- घहु ५-१ । पित् १-१ तस् १-१ । कुत इत्यादि-कस्मात् कुतः सर्वेभ्यः सर्वतः बहुभ्यो बहुतः । किमा सर्वादित्वेऽपि ब्यादिवर्जनात् न प्राप्नोतीति पृथगुपादानम् । ब्यादिवर्जन किम् १ द्वाभ्याम् । त्वत् । कथं द्वित. त्वत्त इत्यादि ? "अहीयरुहोपादाने” (७१२१८८) इति भविष्यति । अनेन हि तस्विधाने "आवरः" इत्यत्यं स्यात् । यहोर्वैपुल्यप्रतिषेधः किम् ? वहोः सूपात् । किमयादिसर्वाद्यवैपुल्ययहो। २५ इति किम् ' वृक्षाद्विना । किसर्वादिबहोश्च तसुविषयेऽपि परत्वात् अयमेव तस् । यत आगच्छति तत आगच्छति । निरनुबन्धप्रत्ययान्तरकरण "आवरः” इत्यत्वार्थम् । पित्करण पुवदावार्थम्-बहीभ्यो बहुतः । पञ्चम्यन्तमानादयं विधिः-सर्वतो हीयते सर्वतो रोहति सर्वतो हेतोः सर्वतः पूर्वः ॥ ७ ॥ इतोऽतः कुतः॥८॥[सि० ७।२।९० ] एते तसन्ता साधवः ॥८॥ इतो० । इतश्च अतश्च पुनश्च श्तोऽतः फुतः १-१ "अव्ययस्य" । साधयः इति-एते शब्दा निपात्यन्ते इत्यर्थः । इदशब्दस्य इत्त इति, एतच्छन्दस्य अत इति, किम्शब्दस्य कुत इति । साकोऽप्येवम्-अस्मात् इमकस्मात् इतः, एतस्मात् एतस्मात् अतः, कस्मात् कुत इति । इह पञ्चम्या इति नानुवर्तते, लक्षणान्तरेण ससि वसो वा सिद्धे आदेशमान विधीयते, लेनोत्तरसूनेण तसि इतो भवान् । आद्यादितसौ इत: आस्पता- २५ मिति भवति । अनादिशब्दससर्गात् "भवत्वायुष्मदीर्घायुदेवानांप्रियैकार्थात्" [७॥२२९१ ] . ? + १६७ तेन भवता तत्र, " तं तत्र- - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे अन्ययानि । अधण्तस्त्राद्याशसः एभिश्चतुर्भिः समानाधिकरणात् किमब्यादिसर्वाद्यवैपुल्यवहोः सर्वविभक्त्यन्तात् पित्तस् स्यात् । स भवान् ततो भवान् , चौ भवन्तौ ततो भवन्तौ, ते भवन्तः ततो भवन्तः, तं भवन्तं ततो भवन्तं, तेन भवता ततो भयता, तस्मै भवते ततो भवते, तस्मात् भवतः २, तस्य भवतः २ । एवमयं भवान् इतो भवान् । को भवान् कुतो भवान् इत्याद्युदाहार्यम् । तथा स आयुष्मान् तत आयुष्मान् । स दीर्घायुः ततो दीर्घायुः । स देवानांप्रियः ततो देवानांप्रियः । अयमायुष्मान इत आयुष्मान् क आयु० कुत आयु० । एवं दीर्घायु-५ देवानांप्रियाभ्यामपि । भवत्वित्युकारः सर्वादिपरिग्रहार्थः । तेन मतुशत्रंतव्युदासः । त्रप् च [७।२। ९२ ] भवत्वादिभिः समानाधिकरणात् किमब्यादिसर्वाद्यवैपुल्यवहोः सर्वविभयन्तात् त्रप् स्यात् । स भवान् तत्र भवान् , तौ भवन्तौ तत्र भवन्तौ, ते भवन्तः तत्र०, तं भवन्तं तत्र०, तस्मै भवते तत्र भ०, तस्माद्भवतः २, तत्रभवतः २, तस्मिन् भवति तत्र०, । एवमायुष्मदा- दिभिरप्युदाहार्यम् । योगविभागश्चकारेण पुनस्तस्विधानार्थस्तेन सप्तम्यन्तात् अपि तस् भवति । ततो भवति १० तत्र भवति, अन्यथा हि ततः "सप्तम्या: परत्वात् त्रवेव स्यात् । रूढिशव्दाश्चैते ततोभवदादयः समुदायाः पूजावचना यथाकथंचिद्व्युत्पाद्यन्ते अत एव पुनस्तदादिरनुप्रयुज्यते । स तत्रभवान् , भवन्तम् । केचित्तु भवच्छब्दस्यामन्त्रणे सौ भो इत्यादेशं कुर्वन्ति तन्मते ततो भोः तत्रभोरित्यपि भवति केचित्तु भवदाद्ययोगेऽपि त्रप्तसाविच्छन्ति क्क गमिष्यसि कं देशं गमिष्यसीत्यादि ॥ ८ ॥ सूत्रम्- सप्तम्याः ॥९॥ [सि० ७।२।९४ ] सप्तम्यन्तारिकमादेवप् । सर्वत्र । बहुत्र ॥९॥ सप्त० । सप्तमी ५-१ । किमादेरिति किमोऽध्यादिसर्वादिभ्यो अवैपुल्यवहोश्चेति ज्ञेयम् । पकारस्य पुंवद्भावार्थत्वाद् वह्वीपु वहुत्र ॥ ९ ॥ क्वकुत्रानेह ॥ १०॥ [ सि० ७।२।९३ ] क, कुत्र, अत्र, इह, एते वन्ताः साधवः ॥१०॥ कश्च कुत्रश्च अत्रश्च इहश्च ककुत्रात्रेह १-१ "अव्ययस्य" । केति किमः कादेशः नपश्चाकारः । कुत्रेति किमः कु इत्यादेशः । अत्रेति एतदो अकारादेशः एतस्मिन् अत्र, साकोऽपि एतकस्मिन् अत्र । इहेति इदम इकारादेशः अपश्च हादेशः, अस्मिन् इमकस्मिन् इह । एपु "सप्तम्याः" इति त्रप् । अपमात्रे चैते आदेशा विधीयन्ते तेन भवदादियोगेऽपि भवन्ति । क भवान् कुत्र भवान् , अत्र भवान् इह भवान् , क आयुष्मान् कुत्रायुष्मान इत्यादि ।। १० ॥ सूत्रम्- अनद्यतने हिः ॥ ११ ॥ [ सि० ७।२।१०१ ] ड्यन्तादनद्यतनकाले यथासंभवं किमादेः हिः स्यात् । कर्हि । यहि । बहुहि ॥ ११ ॥ अनद्य० । कस्मिन्ननद्यतने काले कर्हि । यहि तर्हि अन्यहिं । एतस्मिन्ननद्यतने काले एतर्हि । एतदः साको नेष्यते । अमुष्मिन् काले अमुर्हि । इदमस्तु अनेन नेष्यते । बहुपु कालेपु बहुर्हि । काल इत्येव-यस्मि- ननद्यतने भोजने यत्र । अनद्यतन इति किम् ? यस्मिन् काले यदा । अनद्यतनेऽपि काले कालमात्रविव- क्षायां दादिः प्रत्ययो भवति-कदा । सप्तम्यर्थमानविवक्षायां अवपि भवति अमुत्र काले ॥११॥ सूत्रम् - प्रकारे था ॥ १२ ॥[ सि० ७।२।१०२ ] यथासंभवं स्याद्यन्तारिकमादेशः प्रकारे था स्यात् । सर्वथा ॥ १२ ॥ २० - २५ ३० , सद्यो । एते त्रयोऽह्नि काले निपात्यन्ते । समानशब्दात् सप्तम्यन्तादहि काले वर्तमानात् धस्प्रत्ययः १६८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्रका० । "सप्तम्याः" इति निवृत्तमत आह-सभवत्स्याद्यन्तादिति । प्रकारे इति सामान्यस्य भिधमा- नस्य भेदान्तरानुप्रवृत्तो भेदः प्रकारः । सर्वेण प्रकारेण सर्वथा । बहोस्तु परत्वाद्धा भवति, संख्यावात्रि- त्वादिति ॥ १२ ॥ सूना-- कथमित्थम् ॥ १३ ॥ [सि०७।२।१०३ ] ५ एतौ प्रकारे साधू ॥१३॥ कथमिति किमस्थापवादः थम् निपात्यते, केन प्रकारेण कथम् । इत्थमिति इदम एतदो वा थम्- प्रत्यय इदादेशश्च । अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्थम् ॥ १३ ॥ किंयत्तत्सर्वेकान्त्याकाले दा ॥ १४ ॥[सि० ७।२।९५] कदा । यदा । तदा । सर्वदा । एकदा । अन्यदा ॥ १४ ॥ १० किंयत् । एभ्यः पड्भ्यः सप्तम्यन्तेभ्यः काले दा स्यात् । कस्मिन्काले कदा । एवं यदा तदा सर्वदा एकदा अन्यदा । काल इति किम् ? क्व देशे ॥ १४ ॥ सदाधुनेदानींतदानीमेतहि ॥ १५॥ [ सि० ७।२।९६ ] एते काले साधवः ॥ १६ ॥ एते पञ्चशब्दाः काले वाच्ये निपात्यन्ते । सदेति सर्वशब्दादाप्रत्ययः सभावश्चास्य, सर्वस्मिन् १५ काले सदा । सर्वदेत्यपि पूर्वेण । इदमो धुनाप्रत्ययः अकारादेशश्च, अस्मिन्काले अधुना । इदमो दानी- प्रत्ययः इकारादेशश्च, अस्मिन् काले इदानीम् । तच्छब्दादानींप्रत्ययः तकारादेशश्च, तस्मिन्काले तदानीम् । इदमो हिप्रत्ययः, एतादेशश्च अस्मिन्काले एतहि ॥ १५ ॥ सद्योऽद्यपरेद्यव्यति ॥ १६॥ [ सि० ७।२।९७ ] एतेऽहि काले साधवः ॥१६॥ . समानस्य च सभावो निपात्यते, समानेऽहि सद्य. । इदम्शब्दात् द्यप्रत्ययः अकारादेशश्चास्य, अस्मिन्न- हनि अद्य । परशब्दात् एद्यविप्रत्ययः, परस्मिन्नति परेद्यवि । सद्य इति केचित् कालमाने निपात- यन्ति ।। १६ ॥ पूर्वापराधरोत्तरान्यान्यतरेतरादेद्युस् ॥ १७ ॥ [सि०७।२।९८] डयन्तेभ्यः सप्तभ्य एभ्योऽह्नि काले एद्युस् । पूर्वेद्युः ।। १७ ॥ पूर्वा० । पूर्वस्मिन्नहनि पूर्वगुः । एव अपरेशु अधरेद्युः उत्तरेयुः अन्येाः अन्यतरेयुः इतरेयुः ॥१७॥ उभयाद् द्युश्च ॥ १८ ॥[सि०७।२।९९] उभयद्युः । चादेधुम्-उभयेयुः॥ १८ ॥ उभ० । उभयम्मिनहनि उभयद्यः उभयेयुः १८ ॥ ऐषमापरुत्परारि वर्षे ॥ १९॥ [सि०७।२।१००] १ पूर्वसिन्य परुन् । पूर्वतरे वर्षे परारि ॥ १९ ॥ + ५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे अन्ययानि । अघण्तखाद्याशसः १६९ ऐप० । एते त्रयो वर्पकाले निपात्यन्ते । इदम्शब्दात् सप्तम्यन्तात् वर्षे वर्तमानात् समसिण- प्रत्ययः इदमकारादेशः अस्मिन् संवत्सरे ऐपमः । इमकस्मिन् ऐपमः । पूर्वशब्दात्परशब्दाद्वा उत्प्र- त्ययस्तस्य च पर इत्यादेशः पूर्वस्मिन् परस्मिन् वा संवत्सरे परुत् । पूर्वतरशब्दात्परतरशब्दाद्वा आरि- प्रत्ययस्तस्य परादेशः पूर्वतरे परतरे वा संवत्सरे परारि ॥ १९ ॥ सङ्ख्याया धा ॥ २० [सि० ७।२।१०४] प्रकारे । एकधा ॥२०॥ सङ्ख्या० । सहया ६-१ । धा १-१ । एकवेति-एकेन प्रकारेण एकधा । एवं द्विधा त्रिधा चतुर्धा पञ्चधा शतधा बहुधा गणधा कतिधा तावद्धा ॥ २०॥ एकड्यादीनां सहयात्वं प्रसिद्धं कत्यादीनां तु नः तथेति सङ्घयाया अतिदेशमाह- डत्यतु सङ्ख्यावत् ॥ २१ ॥ [सि० १११।३९] डत्यन्तमत्वन्तं च सङ्ख्यावत् स्यात् । कतिधा । यावद्धा ॥ २१ ॥ डत्यः । डतिश्च अतुश्च डत्यतु १-१ । सङ्ख्येव सयावत् १-१ ॥ २१ ॥ बहुगणं भेदे ॥ २२ ॥[ सि० १।११४०] तथा । बहुधा गणधा ॥ २२ ॥ बहु० । बहुश्च गणश्च बहुगण १-१ । भेद ७-१ । तथेति बहुगणशब्दो सङ्ख्यावदित्यर्थः । भेदे इति १५ किम् ? वैपुल्ये सद्धे च सह्यावद्भावो मा भूत् ॥ २२ ॥ एवम्- विचाले च ॥ २३ ॥ [सिक ७१२२१०५] द्विधा । एकधा ॥ २३ ॥ विचलनं विचालः द्रव्यस्य पूर्वसङ्ख्यायाः प्रच्युतिः सयान्तरापत्तिरेकस्यानेकीभावः (अनेकस्य चैकीभावः) तस्मिन् गम्यमाने सङ्ख्यावाचिनो नानो धाप्रत्ययो भवति । एको राशिौं क्रियते-द्विधा २० क्रियते, एको राशि: भवति-द्विधा भवति । अनेक एकः क्रियते-एकधा क्रियते, अनेक एको भवति- एकथा भवति । चकार उत्तरत्र प्रकारे विचाले चेत्युभयोः समुच्चयार्थः। प्रकारोऽवस्थितस्य धर्मिणो भवति । विचाले तु अवस्थितं एव धर्मी (धर्मः) पृथक क्रियते ॥ २३ ॥ वैकाद् ध्यमञ् ॥ २४ ॥ [सि० ७।२।१०६ ] ऐकध्यम् । एकधा ॥ २४ ॥ वैका० । वा १-१ । एक ५-१ । ध्यमञ् १-१ । एकशब्दात्प्रकारे वर्तमानाद्विचाले च गम्यमाने ध्यमब् प्रत्ययो भवति वा । एकेन प्रकारेण ऐकध्यम् एकधा भुङ्के । अनेकमेकं करोति ऐकध्यं करोति । एकधा करोति । बाग्रहणं धार्थम् ।। २४ ॥ द्विर्धमधौ वा ॥ २५॥ [सि० ७।२।१०७ ] द्वित्रिभ्यां प्रकारादिश्वेतौ वा स्याताम् । द्वैधम् । धम् । द्वेधा त्रेधा । द्विधा त्रिधा । इति ॥२५॥३० द्वित्रि० । द्विश्च त्रिश्च द्वित्रि, तस्मात् द्वित्रि ५-१ । धमन्न् च एधा च धमधा १-२ । वा १-१ । प्रकारादिष्विति आदिशब्दात् विचाले गम्यमाने इति । प्रकृतिप्रत्यययोर्वचनभेदायथासंख्यं नास्ति १३२ है. प्रका० पूर्वा० १२ .

१७० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां निभिः प्रकारैः वैधम् , त्रैधम् , द्वेधा, नेधा मुके । वावचनाद्विधा निधा। एक राशि द्वौ त्रीन् वा करोति, द्वैधम्, धम्, द्वेधा, त्रेधा, द्विधा, त्रिधा करोति ।। २५ ।। वारे कृत्वस् ॥ २६ ॥ [ सि०७२।१०९ । सङ्ख्याया। पञ्चकृत्वः॥२६॥ वारे । वारो धात्वर्थस्यायोगपद्येन वृत्तिस्तत्कालो चा। तस्मिन्वर्तमानात्सयाया इति सङ्ख्याशब्दा- तद्वति वारवति धात्वर्थे क्रियायामर्थे कृत्वस् प्रत्ययो भवति । पञ्च वारा अस्य पञ्चकृत्वो भुके। भुज्यर्थो धारवानिति भुज्यर्थस्येदं विशेषणम् । तद्वतीत्येव-भोजनस्य पश्च चाराः । सङ्ख्याया इत्येव-भूरयो यारा अस्य भोजनस्य ॥२६॥ द्वित्रिचतुरः सुच् ॥ २७ ॥ [ सि० ७।२।११०] १० पारे । द्विस्त्रिश्चतुर्धा भुते ॥ २७ ॥ द्वित्रि० । द्विश्च त्रिश्च चतुर् च द्वित्रिचतुर् तस्मात् । सुच् १-१ । वारे इति-एभ्यः सङ्ख्याशब्दे- भ्यस्तद्वति सुच् प्रत्ययो भवति । कृत्वसोऽपवादः । द्वौ वारावस्य द्विः, एवं निश्चतुर्भुते ॥ २७ ॥ एकात्सकृच्चास्य ॥ २८॥ [सि० ७।२६१११ ] एकवारं भुते । सकृद्धते ।। २८ ।। १५ एका० । एकादिति एकशब्दाद्वारे वर्तमानात्तद्वत्यभिधेये सुच्प्रत्ययः सकृदिति चास्यादेशो भवति । कृत्वसोऽपवादः । एकवार भुते सकृद्भुते । अगायं विशेषः “यहोर्दासन्ने" (७।२।११२) बहुश- दात्सङ्ख्यावाचिनः आसन्ने अविदूरेऽविप्रकृष्टकाले वारे क्रियाप्रवृत्तौ तत्काले चाऽविप्रकृष्टे वर्तमानात्तद्वति धाप्रत्ययो भवति । बहव आसन्ना चारा अस्य बहुधा भुते । आसन्न इति किम् ? बहुकृत्वो मासस्य भुझे । आसन्नबारेऽपि पारमाने द्योये कृत्वस् भवत्येव-बहुकृत्वोऽहो भुते। आसन्नता तु प्रकरणा- २० दिना गम्यते । एके तु गणधा मुझे, तावद्धा मुझे इत्यनापीच्छन्ति ॥ २८ ॥ ऊर्ध्वाद्रिरिष्टातावुपश्चास्य ॥ २९ ॥[सि० ७१२।११४] ऊर्ध्वादिग्देशकालार्थात्प्रथमापश्चमीसप्तम्यन्तादेतौ (धापवादौ) स्याताम् , उपश्चास्यादेशा स्यात् । उपरि उपरिष्टा रम्यं आगतो चासो वा ॥ २९ ॥ ऊर्ध्वा० । एताविति रिरिष्टात् इत्येतौ प्रत्ययौ भवतः उपश्चास्येति अस्य ऊर्ध्वशब्दस्य उप इत्यादेशो २५ भवति । उपरि उपरिष्टाद्रम्यमित्यत्र ऊद्ध दिगू ऊखों देशः उर्वः कालो वा रम्य इत्यर्थः । क्रिया- व्ययविशेपणे' इति वचनात् रम्यमित्यत्र नपुंसकत्वम् इति प्रथमान्तस्यो शब्दस्योदाहरणम् । भागत इति-उपरि उपरिष्टात् आगतः ऊर्ध्वदिशः अर्ध्वदेशात् ऊर्ध्वकालाद्वा आगतः इति पञ्चम्यन्तस्योदाहरणम् । वासो वेति-उपरि उपरिष्टाद्वास इति ऊर्वदिशि ऊर्ध्वदेशे अर्ध्वकाले वासचैनस्येति सप्तम्यन्तस्योर्ध्वश. दस्योदाहरणम् । वाशब्द आगतो वास इत्यत्र प्रत्येक उपरि उपरिष्टादित्यस्य समुच्चयार्थः । एवमन्य- ३० नापि रम्यमित्यादिभिः पदैः प्रथमा-पञ्चमी-सप्तमीभावना कार्या ॥ २९॥ पूर्वावराधरेभ्योऽसऽस्तातौ पुरवधश्चैपाम् ॥ ३०॥ [ सि० ७५२।११५] ३१ प्रथमापञ्चमीसप्तम्यन्तानाम् । पुरः पुरस्तात् । अपः अयस्तात् । अधः अधस्ताव रम्यम् ३॥३०॥ - स्याताम्, ५ . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे अव्ययानि | अधण्तस्त्राद्याशसः पूर्वा० । सूत्रं कण्ठ्यम् , प्रथमेत्यादि वृत्तिलेशः । सूत्रवृत्तिलेझसङ्घटने चायमर्थः । दिग्देशकालार्थेभ्यः प्रथमापञ्चमीसप्तम्यन्तेभ्यः पूर्वादिभ्यत्रिभ्योऽस्-अस्तात् इत्येतो प्रत्ययौ एषां त्रयाणां यथा- सङ्ख्यं पुर् अव अध् इत्येते आदेशा भवन्ति । पुरः पुरस्तादित्यादि । रम्यमित्यत्र त्रिकेनाकेन आगतो वासो वेति पदन्नयसूचनम्, एवमन्यत्रापि ज्ञेयम् । भावना प्राग्वत् ।। ३० ॥ परावरात्स्तात् ॥ ३१॥ [सि०७।२।११६ ] परस्तात् अवरस्तात् रम्यम् ३ ॥३१॥ परा० । पर अवर इत्येताभ्यां दिग्देशकालार्थाभ्यां प्रथमापञ्चमीसप्तम्यन्ताभ्यां स्वार्थिकः स्तात्प्रत्ययो भवति । परा दिग् देशः कालो वा रम्यः । परस्तादम्यं परस्तादागतः परस्तावसति । एवमवरस्ता- द्रम्यम् ३ ॥ ३१ ॥ दक्षिणोत्तरपरावरेभ्योऽतस् ॥ ३२ ॥ दक्षिणतो रम्यम् ३ ॥ ३२ ॥ दक्षिणोत्तराचातस् [सि० ७।२।११७ ] दक्षिण उत्तर इत्येताभ्यां चकारात् परावराभ्यां च दिग्देशकालेषु वर्तमानाभ्यां प्रथमापञ्चमीसप्तम्यन्ताभ्यां स्वार्थेऽतस् प्रत्ययो भवति । दक्षिणशब्दः काले न सम्भवतीति दिग्देशवृत्तिर्गृह्यते । एतत्सर्वं सङ्केपत आह-दक्षिणोत्तरेत्यादि-दक्षिणतो रम्यमिति दक्षिणा दिग् देशो वा रम्य इत्यर्थः ॥ ३२ ॥ अधरापरदक्षिणोत्तरेभ्य आत् ॥ ३३ ॥ अधरांत् रम्यम् ३ इत्यादि ॥ ३३ ॥ अधरापराच्चात् [सि०७।२।११८] अधर अपर इत्येताभ्यां दिग्देशकालवृत्तिभ्यां प्रथमापश्चमीसप्त- म्यन्ताभ्यामात्प्रत्ययो भवति । चकारात् दक्षिणोत्तराभ्याम् । एतदपि सङ्केपेणाह-अधरापरेत्यादि ॥३३॥.? वा दक्षिणात्प्रथमासप्तम्या आ ॥३४॥[सि० ७।२।११९ ] दक्षिणा रम्यम् २ ॥३४॥ वा दक्षिः । दक्षिणशब्दादिग्देशवृत्तेः प्रथमान्तात्सप्तम्यन्ताच आः प्रत्ययो वा भवति । दक्षिणा रम्यं दक्षिणा वसति । पक्षे अतसातौ-दक्षिणतो रम्यं दक्षिणतो वसति, दक्षिणाद्रम्य दक्षिणाद्वसति । पञ्चम्यां सावकाशौ अतसातौ आत्प्रत्ययो वाधेतेति वाग्रहणम् । प्रथमासप्तम्या इति किम् ? दक्षिणत आगतः, दक्षिणादागतः ॥ ३४ ॥ आही दूरे ॥ ३५॥[सि० ७।२।१२० ] दूरदिग्देशार्थात्प्रथमासप्तम्यन्ताद्दक्षिणादा आहिश्च। गिरेर्दक्षिणा दक्षिणाहि रम्यवासोचा॥३५॥ आही० । दूरदिग्देशार्थादिति-दिग्शब्दा अवध्यपेक्षाः । तत्रावधेर्दूरे दिशि वा वर्तमानादित्यर्थः । गिरेरित्यादि-गिरेर्दूरा दक्षिणा दिग् देशो वा रम्यः दक्षिणा दक्षिणाहि रम्यमिति । दूर इति किम् ? दक्षिणतः दक्षिणाद्रम्यम्-आहिर्न भवति आकारस्तु पूर्वेण सामान्येन विधानाद्भवत्येव । इह तु आमहणं विशेषविहितेन आहिना वाघो मा भूदिति । प्रथमासप्तम्या इत्येव-दक्षिणत आगतः ॥ ३५ ॥ ३१ २० . 1

F
..
१७२
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-
वोत्तरात् ॥ ३६ ॥ [सि०७२।१२१ ]
उत्तरा उत्तराहि उत्तरतः उत्तरात् रम्यम् २ ॥ ३६॥
वोत्त० । उत्तरशब्दात्प्रथमासप्तम्यन्तात् आ आहि प्रत्ययौ या भवतः । योगविभागाहूर इति नानु-
वर्तते । उत्तरा उत्तराहि रम्यम् । पक्षे अतसातौ द्वौ-उत्तरतः उत्तराद्रम्यम् । द्विकेनाङ्केन वासो वेति
५सप्तम्यन्तमुदाहरणं सूचितम् ।। ३६ ॥
अदूरे एनः॥ ३७॥ [सि०७।२।१२२]
दिक्शब्दात्प्रथमासप्तम्यन्ताददरे एनः स्यात् । पूर्वेणास्य रम्यं चासो वा ॥ ३७ ।।
अदूरे० {वोत्तरादिति नानुवर्तते । दिक्शब्दादिति-दिग्वाचिन: शब्दादिन्देशकालवृत्तेः प्रथमासप्तम्य-
न्तादवघेरदूरे वर्तमानादेनः प्रत्ययो भवति । अस्मात्पूर्वा अदूरा विग देशः कालो वा रम्य:-पूर्वेणास्य
१० रम्यम् । एव वासो वेति सप्तम्यन्तता भावनीया । एव अपरेण दक्षिणेन उत्तरेण अधरेण । अदूर इति
किम् ' पुरो रम्यमित्यादि । प्रथमासप्तम्या इत्येव-पुर आगतः । दिग्देशकालमाने द्योत्ये ये सामान्य-
प्रत्यया उक्ता, अदूरेऽपि सामान्यविवक्षाया ते भवन्त्येव, प्रकरणादेश्चादूरता गम्यते इति नार्थों वाग्रह-
णेन । अन्ये तु दक्षिणोत्तराधरशब्देभ्य एव एनप्रत्ययमिच्छन्ति ॥ ३७ ॥
दिक्शब्दादिग्देशकालार्थात्प्रथमापश्चमीसप्तम्यन्तात्स्वार्थे धा स्यात् ।
(दिकशब्दादिग्देशकालेषु प्रथमापञ्चमीसप्तम्याः [२।११३] इत्यनेन)
लवञ्चेः॥३८॥ [सि०७२।१२३ ]
अश्वत्यन्तादिशब्दाद्विहितयोर्धेनयोर्लए स्यात् । तल्लुपि च स्वीप्रत्ययस्यापि लुच् भवति ।
प्राची दिक् प्राइ देशः कालो वा रम्यः प्रागम्यम् । एवमागतो वासो वा ॥ ३८॥
दिक० लुब० । सूनद्वयं स्पष्टम् । लुपि चेत्यादि *"डयादेौणस्यापिस्तद्धितलुक्यगौणीसूच्यो
२० इयादेः प्रत्ययस्य गौणस्याकियन्तस्य तद्धितलुकि लुक स्यात्, न तु गौणीसूच्योरिति प्रामन्यमिति प्राची
दिग् अदूरा वा । एवं देशः कालो या रम्यः प्राग् रम्यम् । एव प्रत्यक्-अवाक्-उदक्-अर्द्धपूर्वापरादीना
दिक्शब्दानां विशेपसूनविहितै रिरिष्टात्प्रभृतिभिः प्रत्ययैर्बाधितो धाप्रत्ययो न भवतीति । अत्यन्ता
एव विक्राब्दा उदाहृता. ॥ ३८ ॥ अपरशब्दस्य प्रत्ययपरे विशेपमाह--
पश्चोऽपरस्य दिक्पूर्वस्य चाति ॥ ३९॥ [सि० ७।२।१२४ ]
अपरा दिक् पश्चात् । दक्षिणपश्चात् ॥ ३९ ॥
पश्चो० । अपरशब्दस्य केवलस्य दिक्पूर्वस्य च आति प्रत्यये परे पश्चादेशो भवति । अपरा दिगू
देशः कालो वा रम्यः पश्चाद्रभ्यम् । पश्चादागतः, पश्चाद्वसति। दिक्पूर्वात्-दक्षिणा चासौ अपरा च दक्षि-
णापरा दिग् देशः कालो वा रम्या, दक्षिणपश्चात् रम्यम् , आगतो यासो वेति भावना प्राग्वत् ॥३९॥
वोत्तरपदेऽर्धे ॥४०॥[सि०७।२।१२५]
३० पश्चार्षम् । अपरार्धम् ॥ ४० ॥
पोत्तर० । अपरशन्दस पेवलस्य दिग्पूर्वपदस्य अर्द्धशब्दे उत्तरपदे परे पश्चादेशो चा भवति ।
अपरमद्धं पार्द्धम् । दक्षिणापरस्या अर्द्ध दक्षिणापश्वार्द्धम् । पक्षे अपरार्द्धम् दक्षिणापराचम् । उत्तरपद
२३इति किम् ? अपरा अर्दै शोमते । असमासोऽयम् । पूर्वपदमुत्तरपदमिति हि समासे भवति ॥ ४०॥

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे अव्ययानि । अधण्तवाद्याशसः १७३ व्याप्तौ स्सात् ॥४१॥ [सि० ७१२२१३०] कुम्वस्तिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां योगे प्रागतत्तत्वे स्स सादिः सात् स्यात् , व्याप्तौ गम्यायाम् । द्विः सकारपाठान्नास्य पत्वम् । अग्निसात्करोति काष्ठम् , भवति स्यात् वा ॥४१॥ व्याप्तौ० । कृभ्वस्तिभ्यामित्यादि-करोति कर्मणो भ्वस्ति कर्तुश्च प्राक् पूर्वमतत्त्वस्य तत्त्वे गम्य- माने कृभ्वस्तिभ्यां च योगे स्सात्प्रत्ययो भवति । व्याप्तावित्यादि-प्रागतत्तत्त्वस्य चेम्याप्तिः सर्वात्मना५ द्रव्येणाभिसंबन्धो गम्यते । द्विः सकारेत्यादि-अयं सकारः सकार एवास्तु, अस्य पत्वं माभूदित्येवमर्थं द्वितीयस्य सकारस्य ग्रहणात् । अग्निसात् करोति काष्टमिति-सर्वं काष्ठं प्राग नाग्निमग्निं करोति अग्नि- सात्करोति । एवं सर्व काप्टं प्राग नाग्निरग्निर्भवति अग्निसाद्भवति अग्निसात्स्यादिति ।। ४१ ।। जातेः सम्पदा च ॥४२॥ [सि० ७।२।१३१] कृभ्वस्तिभिः सम्पदा च योगे कृगकर्मणो स्वस्तिसम्पत्कर्तुश्च प्रागतत्त्वेन जाते. सामान्यस्य १० व्याप्तौ स्सात् स्यात् । असां सेनायां सर्वं शस्त्रमग्निसात्करोति दैवम् । एवमग्निसाद्भवति । अग्नि- सात्स्यात् । अग्निसात्सम्पद्यते । चकार उत्तरत्रोभयोः समुच्चयार्थः ॥ ४२ ॥ तत्राधीने ॥ ४३॥[सि०७२।१३२ ] सप्तम्यन्तादधीनेऽर्थे कृभ्वस्तिसंपद्योगे स्सात्स्यात् । राज्ञि अधीनं राजसात्करोति । भवति स्यात् सम्पद्यते वा ॥ ४३ ॥ तत्रा० । कृभ्वस्ति संपदा चेत्यनुवर्तते । कर्मकर्तृभ्यां प्रागतत्तत्वे इति च निवृत्तम् । अत आह सप्त- म्यन्तादित्यादि सप्तम्यन्तादेयोपाधिकेऽधीने आयत्तेऽर्थे कृभ्वस्तिसंपद्योगे त्रा स्यात् । क्रमेणोदाहरति- राशि अधीनमिति केवलमधीनत्वे उदाहरणं राजसात्करोति राजस्वामिकं करोतीत्यर्थः ॥ ४३ ॥ देयेऽधीने च त्रा॥४४॥ [सि० ७।२।१३३ ] देवत्राकरोति द्रव्यम् ॥४४॥ २० देयोऽपाधिकेऽधीनेऽर्थे उदाहरणम्-देवत्रा करोतीति देवेऽधीनं देयं करोति देवत्रा करोति द्रव्यम् देवाय दातव्यमिति यत्स्थापितं तदिदानी देवाय दातीत्यर्थः । देवेऽधीनं देयं द्रव्यं भवति देवत्रा भवति एवं स्यात्संपद्यते इति ॥ ४४ ॥ सप्तमीद्वितीयाद्देवादिभ्यः॥४५॥[ सि०७।२।१३४] सप्तमन्तेभ्यो द्वितीयान्तेभ्यश्च देवादिश्यः स्वार्थे वा स्यात् । देवेषु वसति देवत्रा वसति ।२५ देवेषु भवति देवत्रा भवति । देवेपु स्यादेवत्रा स्यात् । देवान् करोति देवत्रा करोति । देवान् गच्छति देवत्रा गच्छति । एवं मनुष्यत्रा वसति, गच्छति । मर्त्यत्रा पुरुपत्रा, गच्छति । देवा- दयः शिष्टप्रयोगगम्याः ॥४५॥ बह्वल्पार्थात् कारकादिष्टानिष्टे शस् ॥ ४६॥ [सि०७।२।१५० ] बह्वर्थात् अल्पार्थाच कारकवाचिनो नाम्नः शस्प्रत्ययो वा स्यात् । यथासङ्ख्यमिप्टेऽनिष्टे च ३० विपये । इष्टं प्राशिवादि, अनिष्टं श्राद्धादि । बर्थ. ग्रामे वहयो ददति बहुशो ददति । बहु धनं ददाति बहुशो धनं ददाति । विवाहे बहुभिर्भुक्तं बहुशो भुक्तमतिथिभिरित्यादि । एवं भूरिशः ३२

यास याद पत्ते नयत्तते याति नयाति पश्यति पश्यत आदह आदङ्क आवक इति त्यादिविभचयन्त.
१७४
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-
प्रभूतशः गणशः । अन्यार्थ. अल्प आयाति (कर्तृकारकवाक्यम्) अल्पश आयाति । अल्प
धनं दत्ते अल्पशी दत्ते । श्राद्धे अल्पैर्युक्तम् अल्पशो भुक्तमित्याद्यपि । एवं स्तोकशः कतिपयशः
बह्वल्पार्थादिति किम् ? गां ददाति, अश्वं ददाति । कारकादिति किम् ? बहूनां स्वामी । इष्टा-
निष्ट इति किम् ? बहु ददाति श्राद्ध, अल्पं ददाति प्राशित्रादौ । पकारः पित्कार्यार्थः ॥४६ ।।
सहयैकार्थाद्वीप्सायां शस् ॥ ४७॥ [सि०७।२।१५१]
सङ्ख्याथैकार्थाभ्यां वीप्सायां द्योत्यायां शस् वा स्यात् । एकैकमेकशी वा दत्ते । मापं माएं
मापशो वा देहि ॥४७॥
सद्वषैः । एकत्वविशिष्टोऽर्थ एकार्थः सङ्ख्या च एकार्थश्व सङ्खयैकार्थः तस्मात् । सहयाथैयादि-
सहावाचिन एकत्व विशिष्टार्थवाचिनश्च कारकाभिधायिनो नानो चीप्सायां द्योत्यायां शस् वा स्यात् ।
१० वीप्सायां द्विर्वचनस्य प्राप्तौ तदपवादोऽयम् । वाऽधिकारात् पक्षे द्विर्वचनमपि भवति । एकैकं दत्ते
एकशो दत्ते । द्वौ द्वौ द्विशः । एवं निशः तावच्शः कतिशः गणशः । एकार्थः-मापं मापं देहि मापशो
देहि । एवं कार्पापणशः पणशः पादशः पलशः प्रस्थशः अर्द्धशः पर्वशः तिलशः संघशः पूगशः वृन्दशः
पतिशः वनशः प्रविशति । कूपीशः सनति । कुम्भीशः कलशीशो ददाति । क्रमश इति क्रमवतां भेदात्
प्रमेण प्रमेण इति वीप्सा भवति । सङ्घयकादिति किम् ? भाषौ मापो ददाति । वीप्सायामिति
१५ किम् ? द्वौ ददाति, मापं ददाति । तानेकैकशः पृच्छेत् । एकैकशी निघ्नन्ति एकैकशो ददातीति चीप्सायो
द्विरुक्तात् "यहल्पार्थात् कारकादिष्टानिष्टे एशस्" इत्यनेन अल्पार्थात् एशस् । वीप्सितवीप्साया वानेनैव
शस् एकैकमेकैक पृच्छेदित्यर्थः । कारकादित्येव-द्वयोर्द्वयोः स्वामी 1 मापस्य मापस्येप्टे ॥ ४७ ।।
तद्वति धण् ॥ ४८॥ [सि० ७।२।१०८ ]
द्वित्रिभ्यां प्रकारवति धण् । द्वौ प्रकारावेषां द्वैधाः । धण्वर्जनात्तस्य नाव्ययत्वम् ॥ १८॥
तद्व० । द्वित्रिभ्या सहावाचिभ्यां तद्वति प्रकारवति विचालवति चाभिधेये धप्रत्ययो भवति । द्वी
प्रकारी विभागो वा एपा द्वैधानि त्रैधानि । राजद्वैधानि राजधानि । द्वैधीभायः । त्रैधीभावः । धण-
पर्जनादिति- अधण्तस्याद्याशस" इत्यव्ययसज्ञाविधायकसूने हि धण्वर्जितः ॥ ४८ ॥
विभक्तिथमन्ततसाद्याभाः॥४९॥[सि० १२१३३१]
विभत्त्यन्तामास्थमवसानतसादिप्रत्ययान्ताभाथाव्ययानि स्युः । चिराय चिरात् । भवतु
२५ अस्तु । पुतः । कथम् ।। ४९ ॥
विभक्ति । थम् अन्ते येषा ते थमन्ताः, तस् आदिउँपां ते तसादयः,
थमन्ततसादयः । विभक्तयश्च थमन्ततसादयश्च विभक्तिथमन्ततसादयः । ते इयाभान्तीति विभक्तिः
थमन्ततसाद्याभाः। “विशेषणमन्तः” इत्यन्तशब्दः प्राप्यते इत्यत आह-विभयन्ताभा इत्यादि । अहं.
शुभं १ पृत पर्याप्त २ येन तेन चिरेण अन्तरेण ३ ते मे अहाय चिराय चिरात् अपस्मात् ५ चिरस
३० अन्योन्यम्य मम ६ एयपदे अप्रे प्रगे प्राहे हेतौ रातो वेलायां मातायाम् ७ एते स्यादिविभत्यन्तप्रतिरूपका
पव्ययाः । अनि नासि असि अस्मि विद्यते भवति एहि यूहि मन्ये शङ्के अस्तु भवतु पूर्यते स्वात
:
।
२०
थमन्ताश्च
ते तसादयध
३
प्रतिरूपरा अय्ययाः ॥ ४९ ॥
वत्तस्याम् ॥५०॥सि० ११३४]
३५ एतदन्तमव्ययम् ॥ ५० ॥

५ ? ? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे अन्ययानि । वत्तस्याम् तिवातुमम् । गतिः १७५ वृत्त । एतदन्तमिति वत्प्रत्ययान्तं तसिप्रत्ययान्तमाम्प्रत्ययान्तं चाव्ययसंगं स्यात् ॥ ४५ ॥ एपां प्रत्ययानां विधायकसूत्राण्याह- स्यादेरिवे ॥५१॥[सि०७।१।५२] स्माद्यन्तादिवाथै क्रियासादृश्ये वत् स्यात् । अश्व इव अश्ववत् । मैत्रवद्याति चैत्रः । देवमिव देववत्पश्यन्ति मुनिम् ॥५१॥ स्यादेरि० । स्याद्यन्तादिति-इवशब्दः सादृश्यं द्योतयति तच्चेत्साहश्यं क्रियाविषयं भवति । अश्व- वदिति प्रथमान्तस्योदाहरणम् , देववदिति द्वितीयान्तस्य । एवं साधुनेव साधुवदाचरितं मैत्रेण, ब्राह्मणा- येव ब्राह्मणवदत्तं क्षत्रियाय, पर्वतादिव पर्वतवदवरोहत्यासनात् । स्यादेरिति किम् ? गच्छन्नास्ते इव मन्दत्वादीप्सितदेशस्यासम्प्राप्तेः । अधीयानो नृत्यतीव अङ्गविकारप्रायत्वात् ॥ क्रियायामित्येव-गौरिव गवयः । देवदत्त इव गोमान् । हस्तीव स्थूलः । अत्र द्रव्यगुणविपये सादृश्ये न भवति ॥ कथं देवदत्तवत् १० स्थूलो यज्ञदत्तवत् गोमान् ? अत्र तुल्यायामस्तो भवतौ च क्रियायामध्याह्रियमाणायां प्रत्ययो भविष्यति । अत्र सूत्रेत्यवक्तस्य ? । अत्र च "मनुनभोगिरो वति” ( १।१।२४) मनुस्-नभस्-अङ्गिरस् इत्येतानि वतिप्रत्यये परे पदसंज्ञानि न स्युः । मनुरिव मनुष्यत् । एवं नभस्वत् अङ्गिरस्वत् । अपदत्वात् रुन भवति पत्वं तु भवति । पष्ठीसप्तम्यन्तयोः सादृश्ये वत् । चैत्रसेव चैत्रयन्मैत्रस्य मुखम् । मुक्ताविव मुक्तिबच्छान्तौ १५ सुखम् तत्र [सि० ७१११५३] तत्रेति सप्तम्यन्यादिवार्थे वत्प्रत्ययो भवति । सुन्नवत् साकेते परिखा । तस्य (७।११५४) तस्येति पष्ट्यन्तादिवार्थे वत् स्यात् । चैत्रस्येव चैत्रवन्मैत्रस्य गावः । एतत्सझे- पेणाह-पष्टीसप्तम्यन्तयोरित्यादि । क्रियासादृश्ये पूर्वेणैव सिद्धम् , क्रियार्थमिदं वचनम् । चैत्रस्येवेत्यादौ चैत्रमैत्रयोर्मुखविपर्य सादृश्यं, मुक्ताविवेत्यादौ मुक्तिशान्त्योः सुखविपयं सादृश्यमिति । एवं "तस्याहे २० क्रियायां वत्” (७११५१) अर्हतीत्यहम् "अच्” (५।१।४९) इति अच् ? षष्ट्यन्तादर्हेऽर्थे वत् स्वात् , यदहं तच्चेत् क्रिया भवति । राज्ञोऽहं राजवत् वृत्तमस्य राज्ञः । राजत्वस्य युक्तमस्य राज्ञो वृत्तमित्यर्थः ॥ ५१ ॥ तसिः॥५२॥ [सि०६।३।२११] टान्तात्तुल्यदिश्यर्थे तसिः स्यात् । सुदाम्नैकदिक् सुदामतो मेघः । आम् वक्ष्यते ।। ५२ ।। तसि० । टान्तादिति-तृतीयान्तात् तुल्यादिक्त्वे-उभयोरेकदिगधिकरणत्वे । सुदाम्नैकदिगिति सुदामा नाम पर्वतो यस्यां दिशि तस्यां दिशि मेघ इति तेन सह एकदिगुच्यते । तसिरित्यत्रेकारो "वत्तस्याम्" इत्यत्र विशेपार्थः । तथा यश्चोरसः (६।३।२१२) अतष्टान्तातुल्यदिक्त्वे यतसी स्याताम् । उरस्यः । २५ दरस्तः ॥ ५२ ॥ ३० क्त्वातुमम् ॥ ५३ ॥ [सि० १११३५] एतदन्तमव्ययम् । कृत्वा । कर्तुं । यावजीवम् । प्रत्ययाश्चैते वक्ष्यन्ते ॥ ५३॥ गतिः॥ ५४॥[सि० ११३६] गतिसंज्ञमव्ययं स्यात् ॥ ५४॥ - -- १७६ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- ज्या गतिः। सूत्रद्वयं स्पष्टम् ॥५४॥ गतिसंज्ञानामव्ययत्वमुक्तमिति गतिसंज्ञकान् लक्षयति। ऊर्याद्यनुकरणविडाचश्च गतिः ॥ ५५॥ [सि० ३।१।२] एते उपसर्गाच गतयः स्युस्ते च प्राग धातो प्रयोज्या ऊरीकृत्य उररीकृत्य खाटकृत्य ॥१५॥ ऊर्या० । अरी आदिउँपां ते ऊर्यादयः । ऊर्यादयश्च अनुकरणानि च विश्च डा च ऊर्यातुकरण: ५पिडाचः । चकार उपसर्गानुवृत्त्यर्थस्तेनोपसर्गाणामपि गतिसंज्ञा सिद्धा । तत्रापि विडाची प्रत्ययो । प्रत्ययश्च प्रकृत्यादेविशेपणमिति च्यन्तानां डाजन्तानां च गतिसंज्ञा भवति । गतिसंज्ञाश्च सर्वघातो. मारु प्रयोज्याः । ऊरीकृत्येति ऊर्यादीनां गतिसंज्ञत्वात् "गतिकन्यस्तत्पुरुषः" इति समासे सति "अनना क्यो यप्" इति चवो ययादेशो भवति । अरी उररी अंगीकरणे 'विस्तारे च । उरुरी अंगीकारे । एते त्रयों भृशार्थप्रशंसयोरपि । श्रीपद् वौषट् वपट् स्वाहा स्वधा देवतासंप्रदानमात्रयोः । वपट् पूजायामपि । १० स्वधा ऐप्तिप्रीतिप्रत्यभिवादनेष्वपि । श्रत् |द्धाने शैध्ये च । प्रादुस् आविस् प्राकाश्ये । पशू केवाली हिंसायाम् । वेताली विस्तारे । एवमन्येपि पापीपार्दालीमस्मसामसमसाधूलीप्रभृतय ऊर्यादिपु ज्ञेयाः । एप चिडाचसाहचर्यात् कृभ्वस्तिभिरेव योगे गतिसंज्ञा । अंतश्च दधाति करोतिभ्यां । प्रादुराविःशब्दो कृग्योगे विकल्पार्थ साक्षादादावपि पठ्यते । गतिप्रदेशा "गतिः" इत्यादयः ॥ ५५ ॥ अनुकरणानामा नन्त्यानिर्देशोऽशक्य इति विप्रत्ययं निर्दिशति- १५ कृभ्वस्तिभ्यां कर्मकर्तृभ्यां प्रागतत्तत्वे चिः॥५६॥ [सि०७२।१२६ ] कर्मार्थात् कृगा योगे कर्थाच स्वस्तियोगे प्रागभूततद्भावे चिः स्यात् ।। ५६ ।। फभ्व० । भूध अस्तिश्च भ्वस्ति का च भ्वस्ति । च कृभ्वस्तिनी, ताभ्याम् । कर्म च कर्ता च कर्म- फीरो, ताभ्याम् । उभयत्र द्विवचनं कृभ्वस्तिभ्यां यथासयार्थम् । नसः असः, प्राग् असः प्रागसः । तस्य भावस्तत्त्वम्, प्रागतस्य तत्त्वं प्रागतत्त्वम् , तस्मिन् । करोति कर्मणो भ्वस्ति कर्तुश्च पूर्वमतस्य २० सद्भावे गम्यमाने भ्वस्तिभ्यां च योगे च्यिा प्रत्ययो भवति । एतत्सर्व सदुपत आह-कर्मार्थात् कृगा योगे इत्यादि ॥ ५६ ॥ अत्र व्यस्य गुणक्रियाद्रव्यसंबन्धसमूहविकारयोगे प्रागतत्तत्वमुदाहार्यम् । २२ अनोपयोगिसूत्रमाह- १ एपनावस्थितस्य स्वावयवैरनियतदिनदेशव्याप्तिविस्तारः । २ देवतासम्प्रदान देवताभ्यः सम्प्रदीयमानं हविर्द्रव्य दानमत्र दानसामान्य सभा पितृभ्यः इति श्रुतेः, कथं स्वधा देवतासम्पदाने वर्तते १ उच्यते-पितृणमपि देवतारूपवाददोषः । १ तृप्तिः भयोच्छेदः, प्रीतिगनन्दा, प्रत्यभिवादनं प्रविनमस्किया। । धर्मकर्मविषयोऽभिलापः भक्षानम् । ५ भमोर्यादिप्वपरिगणिता अप्युपयोगितया वृदयनुसारेण नददर्य-ते-पापी विध्वंसमाधुर्यकरुणविलापेषु ( रसेन्द्रियग्राह्यो मनः प्रीतिजनको गुणविशेती माधुर्यम्, इष्टवियोगजनित शन्द रोदनं करुणविलाए । ताली भाताली वर्णोत्तमार्थयोः । धूशी कान्तिकालयोः (कान्ति परा उत्कर्षना, काला अभिलप.)। पाम्प्यादयो विस्तारेऽपि । शकला संशकला घंशरला Jशकला (पाशाः खला मस्या दाम हिंसा । संगता, पसा, भूरा, शकला संशकलेत्यादि-पृषोदरादिखादिष्टरूपनिष्पत्तिः) मालम्वी केयाशी शेवाली पाली मला मममसा एते हिंसायाम्, आयाधसारः परिभवेऽपि, ततः परे चलारथाविष्कारेऽपि, अन्यो ची पूर्ण ऐवरणयोरपि ( भयविनः सूक्ष्मावयपविभागपूर्णम् ) । पाली शान्दाऽपि । मनसा मममसा भनुकरणेऽपि (सर्वत्रापि पम्मी हिंमागम्यन्योतनार्थः) । चित्तु गम्मसेसन प्राकारी निपाल मति पान्ति । फेचिसालम्पीस्थाने भालोमोति पटन्ति ॥ गुदगधा बीयापीयोः । गुगुलन्य मन्यन्ते । राजा महा । फल फली विल्ली भाली एते विचरे, मादी कियागमतिानियटकेपपि, भन्लोद रिमारिचारयोरपि विभागो भिसनिमितं गुणविशेषः) । फेषित पूना यानी पास विरली मानप्पपीयन्ते। या योगे भासदेण्यापयतया धो निर। पातमोग एप गतिगिलपः । - 'गृश्ये (५॥1.1) सत्र प्रदति निरवाद समेत प्रयोगदर्शनासमस्याउमाद- - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे अन्ययानि । विनिमित्त कार्याणि १९७ ईश्वाववर्णस्यानव्ययस्य ॥ ५७ ॥ [ सि०४।३।१११ ] अनव्ययस्सावर्णाऽन्तस च्वावीः सात् । अशुक्लं शुक्लं करोति शुक्लीकरोति पटम् । मालीकरोति पुप्पाणि । अशुक्लः शुक्लो भवति । शुक्लीभवति । शुल्लीस्यात् ॥ ५७ ॥ ईश्वा० । शुद्धीकरोति पटमिति-द्रव्यस्य गुणयोगे प्रागतत्तत्वम् । कारकीकरोति चैत्रमिति क्रियायोगे, दण्डीकरोति राजपुरुपीकरोति इत्यादि द्रव्ययोगे, सन्धीकरोति गाः मालीकरोति पुष्पाणि इति समूहयोगे,५ घटीकरोति मृदमिति विकारयोगे । एवं शुक्लीक्रियते पटः प्रागशुक्लः शुलः क्रियते इत्यर्थः । स्वस्थीभूयते चत्रेण अस्वस्थेन स्वस्थेन भूयते इत्यर्थः । शुक्लीस्यादिति-एवं स्वस्तियोगे उदाहरणानि क्षेचानीत्यर्थः । सर्वत्र "अप्रयोगीत्" इति व्यञ्जनविकाररूपस्य च्चिप्रत्ययस्य लोपः । अनव्ययस्य इति किम् ? दिवा- भूता रात्रिः, दोपाभूतमहः-अत्रावर्णान्तस्य ईन स्यात् ।। ५७ ।। अत्रैव इवर्णाद्यन्तानां विशेषमाह- दीर्घश्चियङ्यक्क्येषु च ॥ ५८ ॥ [सि० ४।३।१०८ ] एषु चतुर्पु यादावाशिपि च स्वरस्य दीर्घः स्यात् । शुचीकरोति । दीर्घ । च्विश्च यङ्च यक् च क्यश्च च्वियङ्यक्क्यास्तेषु । चकारो यादावाशिपि चेत्यस्यानु- त्यर्थः । शुचीकरोतीति प्रस्तुतोदाहरणम् । शेपाण्युदाहरणान्येवम् या तोष्ट्रयते ! यक् सन्तूयति । क्य इति क्यन् क्या-क्यङ्प-क्यानां ग्रहणम् , दधीयति “अमाव्ययात् क्यन् च" (३।४।२३) इति क्यन् । हंसायते "क्यङ्” (३।४।३६) इति सूत्रेण क्यङ् । लोहितायते "डाच् लोहितादिभ्यः पित्" १५ (३।४।३०) इति क्यङ् । स्तूयते-क्यः । यादावाशिषि-ईयात् । अत्रैव विशेपमाह- अमनश्चक्षुश्चेतोरहोरजसा लुक् च्चौ (७।२।१२७) अरूकरोति । उन्मनीखात् । अरु० बहुवचनं तदन्तानामपि परिग्रहार्थम् , अन्यथा ग्रहणवता नाम्ना न तदन्तविधिरित्युपतिष्टेत । अत्रणम् । अनरुः अरुः करोति "पष्ट्यान्यस्य" इत्यनेन स्लोपे पूर्वेण दीर्थे अरूकरोति । महारू- करोति ! मनीकरोति उन्मनीकरोति । चक्षुकरोति उचक्षुकरोति । चेतीकरोति विचेतीकरोति । रह एका-२० न्तम्, रहीकरोति । विरहीकरोति । रजीकरोति विरजीकरोति । एवं भ्वस्तिभ्यां योगेऽप्युदाहार्यम् । इसुसोर्वहुलम् (७२।१२८)। स्लुप् । सपीकरोति नवनीतम् । धनूस्याद्वंशः । इसु० । इस्प्रत्ययान्ताः सर्पिस्प्रभृतयः उस्प्रत्ययान्ता धनुस्प्रभृतयस्तेषां च्चौ परेऽन्तस्य बहुलं लुप् भवति । एतत्सर्वं लेशेन आह स्लुपीति-सपीकरोतीत्यादि । वाहुलकान्न भवति-सर्पिर्भवति धनु- भवति । वहुलग्रहणं प्रयोगानुसरणार्थम् ।। अत्रादिशब्दानुवृत्तेः, "च्चो क्वचित्” (३।२।६० ) परतः२५ रुयनूङ् च्चौ पुंवद्भवति, कचिल्लक्ष्यानुरोधात् । अमहती महतीभूता महद्भूता कन्या । एवं बृहत्कृता । क्वचिद्रहणादगोमती गोमतीभूता गोमतीभूतेत्यादौ न स्यात् । एवं पट्टीभूता पटूभूता मृद्वीकृता मृदूकृतेत्यादी विकल्पः । महतीभूतेत्यपि केचित् ।। किञ्च "आपत्यस्य क्यच्च्योः” (२।४।९१) आपत्यस्य यस्य क्चे च्ची च परे लुक् स्यात् । अगार्यो गार्यो भूतो गार्गीभूतः । आपत्यस्येति किम् ? । संकाशेन निर्वृत्तं सांकाश्यम् । असांकाश्यं सांकाश्यं भूतः सांकाश्यीभूतो देशः । व्यञ्जनान्तस्यान्त ई: (७२।१२९)। बहुलम् । उपदीभवति दृपद्भवति शिला ॥५८ ॥ व्यञ्ज० । वहुलग्रहणात् समिधीभवति समिद्भवति काष्टमित्यादि प्रयोगानुसरणार्थम् ।। ५८ ॥ क्रमप्राप्त डाचप्रत्ययं सङ्केपतो गयेनाह- है. प्रका० पूर्वा० २३ ३३ १७८ महामहोपाध्यायभीबिनय विजयगणिविरचिते खोपजहेमलघु- ५ समयादिभ्योऽर्थविशेपे कृयोगे यथायोगं डाज्वाच्यः ॥ ५९ ॥ कालक्षेपे-समयाकरोति, अद्य श्वो वा पटं दास्यामीति कालक्षेपं करोति कुविन्दः । अति. पीड़ने-सपनाकरोति निष्पत्राकरोति मृगम् । निष्कोपणे-निष्कुलाकरोति दाडिमम् । आनुकूल्य-सुखाकरोति प्रियाकरोति गुरुम् । प्रातिकूल्ये-दुःखाकरोति शत्रुम् । पाके- शुलाकरोति मांसम् । वपने-मद्राकरोति भद्राकरोति बालं नापितः । एवं क्षेत्रकर्षणे-द्विती- याकरोति क्षेत्रम् । पटापटाकरोतीत्यादि । ५९ ॥ समयादिभ्य इत्यादि० [समयाद्यापनायाम् (७।२।१३७) इत्यनेन् ] समयाकरोति कुविन्द इति-तन्तुयायः अद्य श्वस्ते पटं दास्यामीमि कालक्षेपं करोतीत्यर्थः । [सपत्रनिष्पनादतिव्यथने (५।२।१३८)] अतिपीडने गम्यमाने सपत्रनिप्पन इत्येताभ्यां डाच् भवति । सपनाकरोति मृगमिति- १० पनं शरः, सह पत्रमनेनेति सपत्रम्, तं करोति शरमस्य शरीरे प्रवेशयतीत्यर्थः । निष्पनाकरोतीति निर्गत पत्रमस्मादिति निष्पत्रम् , तं करोति शरमस्यापरपा निष्कामयतीत्यर्थः । सपनाकरोति वृक्षं वायुः निष्पत्रा करोति वृक्षं वायु:-अत्र परशातनमेवातिव्यथनम् । सपनाकरोतीत्यपि मगलाभिप्रायेण वृक्षस्य नि:पत्राक रणमेवोच्यते, यथा दीपो नन्दतीति ध्वंसः । अतिव्यथन इति किम् ? । सपत्रं करोति वृक्षं जलसेका, निप्पत्रं करोति वृक्षतलं भूमिशोधकः। निष्कुलान्निष्कोपणे (७२।१३९)] निष्कोपणे इति निकृष्ट १५ फुलमवयवसंघातोऽस्मादिति निष्कुलम् , अन्तरवयवानां घहिनिष्कासनं निष्कोपणम् ; निष्कुलाकरोति दाडिमं निष्कुष्णातीत्यर्थः । एवं निष्कुलाकरोति पशुं चण्डालः । निष्कोपण इति किम् ? । निष्कुलं करोति शाम्।[ प्रियसुखादानुकल्ये (७।२।१४०)] आनुकूल्य इति प्रियाकरोति सुखाकरोति गुरुमिति । गुरोरानुकूल्यं करोति-तमाराधयतीत्यर्थः । आनुकूल्य इति किम् ? प्रियं करोति सामवचनम्।सुसं करोत्यौ- पधपानमिति। [दुश्वात्मातीकृल्ये (७।२।१४१)] प्रातिकूल्य इति दुःसाकरोति शत्रुमिति शत्रोः २० प्रातिकूल्यं करोति, अनमिमतानुष्ठानेन तं पीडयतीत्यर्थः । प्रातिकूल्य इति किम् ? दुःसं करोति रोगः। [शूलात्पाके (७।२।१४२)] शूलाकरोति मांसमिति शूले पचतीत्यर्थः । पाके इति किम् ? मूलं फ्रोति कदन्नम् । [सत्यादशपथे (७।२।१४३)] सत्याकरोति इति कार्पापणादिदानेन मयावश्यमेतत्के. तव्यमिति विझतारं प्रज्ञापयति । असपथ इति किम् ? यदीदमेवं न स्यादिदं मे इष्टं मा भूदनिष्टं या भवत्यिति शपथं करोतीत्यर्थः । [मद्रभद्रादपने (७२।१४४)ी मद्रं भद्रं वपनं करोति मद्राकरोति २५ भद्राकरोति शिशोद्गिल्यं केशच्छेदन करोतीत्यर्थः, मद्रभद्रशब्दो मागल्यवचनी । वपन इति रिम् ? मद्रं फरोति भद्रं करोवि साधुः। [तीयशम्पयीजात्कृगा कृपोडाच ( १२।१३५)] द्वितीया- फरोति क्षेत्रमिति । तीयप्रत्ययान्तान् करोतिना योगे ऋषिकायें डाच प्रत्ययो भवति। द्वितीययारं परोति द्वितीयाकरोति द्वितीयवार कृपतीत्यर्थः । एवं तृतीयारोति । शम्ययोजाभ्यामपि-शम्याकरोति अनुलोम- पृष्टं पुनस्सियपतीत्यर्थः । यीजाकरोति उन्ले पश्चाद्वीजः सह कृपतीत्यर्थः । कति किम् ? द्वितीयवार ३.पति । अपाविति रिम्? द्वितीययारं पटं फरोति । एवं "सायादेर्गुणात्" (७१२११३६) सादायाः परो गुणशब्दसदन्तात्कृग्योगे कृषिविपये दान् प्रत्ययो भवति । द्विगुणं कर्षणं करोखि ऐयम्प द्विगुणापरोति क्षेत्रम् । पटापटारोतीत्यादीति-"अव्यक्तानुफरणादनेकखरात् कृभ्यः स्तिना अनिती द्विय" (२।१४५) यस्मिन् पनामादयो या विशेषरूपेण नाभि- ३४प्याप सोऽध्यमस्यानरमानेमरादनिविपरात् मासिभियोंगे टार् प्रत्ययो या भवति । भना पनपनः ताससि । एषमतरपि। ।

? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे अव्ययानि । चिनिमित्तकार्याणि । उपसर्गविवरणम् १७६ द्विश्चास्य प्रकृतिरुच्यते, प्रत्ययस्य द्विवंचनानर्थक्यात् । पटत्करोति पटपटाकरोति, पटपटाभवति पटपटास्यात् । अव्यक्तवर्णस्यापि कथंचिद्धनिमात्रसादृश्यात् व्यक्तवर्णमनुकरणं भवति । अव्यक्तानु- करणादिति किम् ? पत्करोति-अत्र व्यक्तवर्णमनुकार्यम् । अनेकखरादिति किम् ? श्रत्करोति खाद- करोति । अनिताविति किम् ? पटिति करोति । "इतावतो लुक्” (७।२।१४६) अव्यक्तानुकरण- स्थानेकस्वरस्य यो अत् इत्ययं शब्दः तस्य इतिशब्दे परे लुग् भवति । पटत् इति पटिति एवं छमत्५ इति छमिति । "असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे" लुकि सति तृतीयत्वं न भवति । अव्यक्तानुकरणस्येत्येव-जग- दिति । अनेकस्वरस्येयेव-छत् इति छदिति । अत् इति किम् ? मरुत् इति मरुदिति । शरद् इति शरदिति । कथं "घटदिति गम्भीरमम्बुदैनंदितं चकदिति तडितापि कृतमिति" ? दकारान्तावेतौ द्रष्टव्यौ । “न द्वित्वे" (७१२।१४७) अव्यक्तानुकरणस्यानेकस्वरस्य द्वित्वे द्विवंचने कृते इतिशब्दपरे योऽत्शब्दस्तस्य लुग् न भवति । पटत्पटदिति । वीप्सायां द्विवचनम् । द्वित्व इति किम् ? पटिति । कथं चटचदिति धगद्धगिति १० पटत्पटिति ? नान द्वित्वमपि तु समुदायानुकरणमिति भवति । "तो वा” (७।२।१४८) द्वित्वे सत्य- व्यक्तानुकरणस्यानेकस्वरस्य योऽत्शब्दस्तत्संबन्धिनस्तकारस्येतौ परे वा लुग् भवति । पटत्पटेति करोति । पटत्पटदिति करोति । "डाच्यादीं" (७।२।१४९) अव्यक्तानुकरणस्यानेकस्वरस्याच्छन्दान्तस्य द्वित्वे सत्यादौ पूर्वपदे योऽतस्तकारस्तस्य डाचि परे लुक् भवति । पटपटाकरोति । आदाविति किम् ? पतपताकरोति । डाच्यन्त्यस्वरादिलोपे मूलप्रकृतेस्तकारस्य लुग्न भवति । एतत्सर्वमित्यादिशब्देन १५ सूचितमिति ॥ ५९॥ क्रमप्राप्तानुपसर्गान् लक्षयति । प्रपरापसमन्ववनिर्दुरभि व्यघिसदतिनिप्रतिपर्यपयः। उप आङिति विंशतिरेप सखे उपसर्गगणः कथितः कविभिः ॥१॥ "धातोः पूजार्थखतिगतार्थाधिपर्यतिक्रमातिवर्जःप्रादिरुपसर्गःप्राक् च"(३।१।१) धातोः संवन्धी तदर्थद्योती चाद्यन्तर्गतः प्रादिशब्दगण उपसर्गसंज्ञो भवति । तस्माच्च धातोः प्राक् २० प्रयुज्यते न परो न व्यवहितः । पूजार्थों स्वती, गतार्थावधिपरी, अतिक्रमार्थमतिं च वर्जयित्वा । ततश्च सुसिक्तं अतिसिक्तं भवतेत्यत्र धात्वर्थः प्रशस्यते इति पूजार्थत्वात् स्वत्योरुपसर्गसंज्ञाया अभावात् पत्वं न भवति । पूजार्थग्रहणं किम् ? सुपिक्तं किं नाम तबान-धात्वर्थोऽत्र कुत्स्यते । गतार्थावधिपरी अध्या- गच्छति, आगच्छति अधि । पर्यागच्छति आगच्छति परि । उपरिभावः सर्वतो भावश्चान्यतः प्रकरणादेः प्रतीयत इति गतार्थत्वम् , ततश्चाधिपर्योरुपसर्गसंज्ञाया अभावात् प्राक्त्वनियमाभावः । यत्र तु प्रक-२५ रणादिना न गतार्थत्वं तत्रोपसर्गसंज्ञायाः सत्त्वात् प्राक्त्वनियमो भवत्येव । अतिक्रमार्थमतिमिति यदर्थ क्रिया तस्मिन्निष्पन्ने क्रियाप्रवृत्तिरतिक्रमस्तत्राते!पसर्गत्वम् यथातिसिक्तं भवतेत्यत्र पत्वं न भवति । ते चामी प्रपरेति । तोटकछंदसि श्लोकः । प्र परा अप सम् अनु अब निर् दुर् वि आङ् नि प्रति परि उप अधि अपि सु उद् अति अभि । निर् दुर् एतौ रान्तौ । अत्र निस् दुस् इति सान्तौ निसस्तपता- विति निर्देशादिति मनोरमायाम् । निसस्तपेनासेवायामिति हैमसूत्रेऽपि । श्लोके उक्तक्रमविपर्ययो ३० वन्धानुलोम्यात् । प्र आदिकर्मोदीरणभृशाथैश्वर्यसम्भवनियोगशुद्धीच्छाप्रीतिशान्तिपूजादर्शनतत्परप्रशंसासङ्गदिग्योगा- वयववियोगान्तर्भावहिंसाबहुत्यमहत्व स्थितिदाननानार्थदक्षिणानुवृत्त्यादिपु २६ । आदिकर्मणि [ कर्तु- मारब्धः ] प्रकृतः कटो देवदत्तेन १ उदीर्णे उदीर्णा मूपिकाः प्रचला भूपिकाः २ भृशार्थे भृशं वृद्धाः प्रवृद्धा नद्यः ३ ऐश्वर्ये ईश्वरो गृहस्य प्रभवति गृहस्य, प्रभुदेशस्य ४ सम्भवे हिमवतो गङ्गा न . , -

१८०
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहमलघु-
नियोगे नियुक्तः सैन्ये प्रकृतः सैन्ये ६ शुद्धौ प्रसन्ना आपः प्रसन्ना धौः [प्रसन्नेन्द्रियः] ७ इच्छार्थे
इच्छति कन्यां प्रार्थयते कन्याम्, इच्छति परदारान प्रकुरुते परदारान ८ प्रीतौ प्रीणाति राजा प्रसीदति
राजा ९ शान्तौ शान्तात्मा प्रश्रितः प्रशान्तः प्रश्रित वाक्यमाह १० पूजाया प्राञ्जलिः प्रहः ११ दर्शने
प्रिया दृष्ट्वा क्रीडति प्रक्रीडति १२ तत्परे पितामहात्परः प्रपितामहः, एव प्रनप्ता प्रपौत्रः १३ प्रशसाया
५शोभन शास्त्र प्रधानं शास्त्रम् १४ सङ्गे प्रसक्तः, प्रमत्तः १५ दिग्योगे पूर्वा दिक् प्राची दिक् १६ अवयवे
प्रघणोऽगारस्य प्रघाणोऽगारस्य १७ वियोगे वियुक्तो वसति प्रवसति १८ अन्तर्भावे अन्तर्भूतः प्रविष्टा,
अन्तः क्षिप्तः प्रक्षिप्तः १९ हिंसाया प्रहरण प्रहरति २० बहुत्वे बहुचौरो देश. प्रचौरो देशः २१ महत्वे
महानध्वा प्रकृष्टोऽध्या २२ स्थितौ शास्त्र प्रमाण लोकः प्रमाण २३ दाने देवेभ्यो ददाति प्रयच्छति २४
नानार्थे नाना कीर्णाः प्रकीर्णा', नाना दक्षिणा प्रदक्षिणम् २५ अनुवृत्तौ अनुवृत्तः शिष्यः अशिष्य इति २६
१० परा बधघर्पणवर्गतिविक्रमाप्रत्यक्षानाभिमुख्यभृशार्थमोहप्रातिलोम्येषु ९ । वधे पराघातः १ घर्पणे
परामर्शनम् २ स्वर्गतौ स्वर्गतः परेतः ३ विक्रमे पराक्रमः ४ अप्रत्यक्ष परोक्षम् ५ अनाभिमुख्ये परावृत्तः
पराङ्मुखः ६ भृशार्थे पराजितः ७ मोहे पराभूतः ८ प्रातिलोम्ये परावृत्तो युद्ध इति ९ । इति ॥२॥
अप पर्जनवियोगालेसनचौर्यनिर्देशवैकृतविधिविपर्ययऋणग्रहणावयवपूजानिहवसव्यवृत्तिषु १२ ।
पर्जने अपसाताद् वृष्टो देवः १ वियोगे अपयुक्ता गौर्वत्सेन २ आलेखने अपस्किरते वृषभः ३
१५ चौर्ये अपहरति ४ निर्देशे अपदिशति परम् ५ वैकृते अपजल्पति ६ विधिविपर्यये अपशब्दः, अपनयः ७
ऋणग्रहणे अपमित्य याचते ८ अवयवे अपस्करो स्थानम् ९ पूजाया अपचितो गुरुर्देवदत्तेन १० निहवे
शतमपजानीते सहस्रमपजानीते ११ सव्यवृत्तौ अपसव्य गच्छति १२ ॥ ३ ॥
सम् मूर्तिवचनैक्यप्रभवसमन्तादावभूपणसमवायाभिमुख्ययोगपद्यशेषणभृशार्थदर्शनीयत्वसार-
श्यानास्थितापिधानकोधमर्यादेाचीवरग्रहणास्पष्टप्रीतिस्वीकरणाल्पार्थाभ्यासप्राधान्यपुन.क्रियासु २५ ।
२० मूर्ती सहता मूर्तिपटादीनाम् १ वचनैक्ये एकवादः सवादः २ प्रभवे तिलेभ्यस्तैल सम्भूतम् ३ समन्ता-
द्भावे समन्तादगच्छति सद्गच्छते ४ भूपणे भूपिता कन्या सस्कृता कन्या ५ समवाये सकरः ६ आभि-
मुल्ये समुत्तिष्ठति ७ यौगपद्ये युगपत्कृतः क्तः सकेतः ८ शेपणे सन्धिः ९ भृशार्थे सन्नाति १०
दर्शनीयत्वे सस्थिता कन्या दर्शनीयेत्यर्थः ११ सादृश्ये गोसस्थान गवयस्य १२ अनास्थिते सस्थितः
पेतुः १३ अपिघाने सवृत द्वारम् १४ क्रोधे सरम्भः १५ मर्यादाया सस्था १६ ईर्ष्याया सलापः १७
२५ चीवरमहणे सचीवरयते भिक्षुः १८ अस्पष्टे सशयः १९ प्रीती सभापणम् २० स्वीकरणे सङ्ग्रहाति
२१ अल्पार्थे समर्थम् २२ अभ्यासे समीपम् २३ प्राधान्ये समर्थः सम्राट् २४ पुनःक्रियाया पुनर्धावति
सधावति, पुनस्तपति सतपति २५ ॥ ४ ॥
अनु देशाधीष्टसामीप्यखाध्यायसाम्यार्थाभावायतिनिसर्गभृशार्थसादृश्यानुवृत्तिहितार्थलक्षणहीनार्थ-
तृतीयार्यस्वाध्यायाधिक्यवीप्सासु १७ । देशे अनूपो देश. १ अधीष्टे इन्द्रानुहि २ सामीप्ये अनुशोग
३० पाटलिपुनम् ३ स्वाध्याये अनुपदम् , अनुवाक्यम् ४ साम्ये अनुमतम् , अनुवदति ५ अर्थाभावे अनुतपति ६
आयत्या अनुशय', अनुवन्धः ७ निसर्गे अनुज्ञातोऽसि ८ भृशार्थे अनुरक्त, अनुस्मरति ९ सादृश्ये
अनुक्रोति, अनुरूपम् १० अनुवृत्ती सुवर्चला आदिसमनुपर्येति ११ हितार्थे अनुलोममनुक्रोशं करोति,
अनुगृहावि १२ लक्षणे वृक्षमनु विद्योतते १३ हीने अनुनिनभद्रमणि व्यारयावारः १५ तृतीया
नदीमन्वयसिता सेना नया सह सपद्धेत्यर्थः १५ स्वाध्यायाधिम्ये अनूचान उपाध्यायाः १६ वीप्साया
३५पृश्रमसियति १७ ॥५॥

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे अव्ययानि । उपसर्गविवरणम् " अव विज्ञानाधोभावस्पर्द्धालम्बनसामीप्यशुद्धिवादुकारेपदर्थव्याप्तिभृशार्थनिश्चयपरिभवप्राप्तिगाम्भी- वृत्तान्तवियोगवर्चस्कदेशाख्याऽहितक्रियाश्रयस्पर्शपु २१ । विज्ञाने अवगच्छति १ अधोभावे अधः क्षेपणं अवक्षेपणम् २ स्पर्द्धयां अवक्षिपति मल्लो मल्लम् ३ आलम्बने अवष्टभ्य याष्टिं गच्छति ४ सामीप्ये अवष्टच्या शरत् ५ शुद्धौ अवदातं मुखम् ६ स्वादुकारे अवदंशः पानस्य ७ ईपदर्थे ईपल्लीढमवलीढम् ८ व्याप्ती अवकीर्ण पांशुभिः ९ भृशार्थे अवगाढो दोपः १० निश्चये अवधृतं कार्यम् ११ परिभवे अव-५ मन्यते १२ । प्राप्तौ अवाप्तोऽर्थः अवायाति सुखं १३ गाम्भीर्ये अवस्थितः १४ वृत्तान्ते का अवस्था १५ वियोगे अवमुक्तनूपुरा कन्या १६ वर्चस्के अवस्करः १७ देशाख्यायाम् अवकाशः १८ अहितक्रियायां अवदूष्यते कार्यम् १९ आश्रये अवलीनो वायसः २० स्पर्शे अवगाहसुखं तोयम् २१ ॥ ६ ॥ निर् वियोगभृशार्थाऽभावात्ययप्रादुर्भावहेत्ववधारणादेशातिक्रमणाभिनिस्सरणेषु १० । वियोगे वियुक्तः शल्येन निःशल्यः १ भृशार्थे भृशं दग्धो निर्दग्धः २ अभावे मक्षिकाणामभावो निर्मक्षिकम् , १० निर्मशकम् ३ अत्यये अतीतमेघ नभो निर्मघम् ४ प्रादुर्भावे निर्मितं निष्पन्नम् ५ हेतौ हेतुना उक्तं निरुक्तम् ६ अवधारणे निश्चयः ७ आदेशे निर्देशः ८ अतिक्रमणे अतिक्रान्तः कौशाम्ब्याः निष्कौशाम्विः ९ अभिनिस्सरणे अमिनिःसृतजिह्वो निर्जिह्वः १० ॥ ७ ॥ दुर् ईपदर्थकुत्सावैकृतव्यृद्धिकृच्छ्राऽप्रतिनन्दनाऽनीप्सासु ७ । ईपदर्थे दुर्वलः, दुर्गृहीतः १ कुत्सायां दुर्गन्धः, दुरन्तः २ वैकृते दुर्वर्णः, दुश्चर्मा ३ व्युद्धौ कम्बोजानां व्युद्धिर्दुष्कम्बोजम् ४ कृच्छ्रे कृच्छ्रेण १५ क्रियते दुष्करम् ५ अप्रतिनन्दने असम्यगुक्तं दुरुक्तम् , दुरागतम् ६ अनीप्सायां अनीप्सितभगा दुर्भगा ७ ॥८॥ वि नानार्थापायात्ययदूरभृशार्थकलहेश्वर्यवियोगमोहहर्षकुत्साप्रादुर्भावानाभिमुख्यानवस्थानप्राधान्य- भोजनसंज्ञादाक्ष्यव्ययकृत्त्नाप्तिपु २१ । नानार्थे नानाचित्र विचित्रम् १ अपाये विदुःखः विशोकः २ अयये व्यक्षं नमः, विहिमः कालः ३ भये विषण्णः, विभीतः ४ दूरे विप्रकृष्टोऽध्वा ५ भृशार्थे २० भृशं वृद्धा विवृद्धा नद्यः, भृशं रौति विरौति ६ कलहे विग्रहः, विवादः ७ ऐश्वर्ये विमुर्दे- शस्य ८ वियोगे विपुत्रः, विभूपणः, विशिरस्कः ९ मोहे विचित्तः, विमनाः १० हर्षे विस्मितमुखः ११ कुत्सायां कुत्सितमङ्गं यस्य स व्यंगः, विरूपः १२ प्रादुर्भावे प्रादुर्भूतलोहितो विलोहितः १३ अनाभिमुख्ये विमुखः १४ अनवस्थाने विभ्रान्तः १५ प्राधान्ये विशिष्टः १६ भोजने विपक्कम् १७ संज्ञायां विष्किरः शकुनिः, विकिरो वा १८ दाक्ष्ये दक्षो विक्रान्तः १९ व्यये शतं विनयते सहनं २५ विनयते २० कृत्वाप्तौ-व्याप्तौ, कृलमस्याप्तं शरीरं दोपैयाप्तम् २१ ॥ ९ ॥ आडूः मर्यादामाप्तिस्पर्शलिप्साभयम्लेपकृच्छ्राऽऽदिकर्मग्रहणनीडसमीपविक्रियाहणावृत्त्याशी:स्वीकर- पदर्थाभिविधिक्रियायोगान्तर्भावस्पर्द्धाभिमुख्यो कर्मभृशार्थप्रादुर्भावसमवायस्मरणविस्मयप्रतिष्टानिर्देश- शक्यप्रसादविवृतानुवन्धपुनर्वचनेषु ३५ । मर्यादायां आ पाटलिपुत्रादृष्टो मेघः १ प्राप्तौ आसादितः २ स्पर्श आलिप्तः, आलभते ३ लिप्सायां आकाङ्क्षति ४ भये आविनः ५ श्लेपे आलिङ्गति ६३० कृच्छ्रे आपत् ७ आदिकर्मणि आरब्धः कर्तुम् ८ ग्रहणे आलस्यते यष्टिम् ९ नीडे आवसथः, आलयः, आवासः १० समीपे आसन्नो देवः ११ विक्रियायां आवृत्तं सुवर्णम् , आक्रन्दति बालः १२ अर्हणे आमन्त्रितः १३ आवृत्तौ आवृत्तो दिवसः १४ आशिपि आयुराशास्ते, पुत्रमाशास्ते १५ स्त्रीकरणे आदने फलानि, आदत्ते रसान् सूर्यः १६ ईपदर्थे ईपन् कृतिः आकृतिः, आताम्रः, आच्छाया १७ अभि- विधौ आकुमारं यशः शाकटायनस्य १८ क्रियायोगे आयोगः ऐष्टिः १९ अन्तर्भावे आपानमुदकम् २० ३५

१८२
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु-
स्पर्द्धायां आह्वयते मल्लो मल्लम् २१ आभिमुख्ये आगच्छति २२ अर्यकर्मणि आरोहति वृक्षम् २३ भृशायें
आधूता शासा, आपीनानीव घेनूनां जघनानि प्रसुनुवुः २४ प्रादुर्भावे आपन्नसत्वा स्त्री २५ समवाये
आसेवा आकुलम् २६ स्मरणे आभवतु विज्ञानम् २७ विस्मये आश्चर्यम् २८ प्रतिष्ठायां आस्पदम् २९
निर्देशे आदिष्टम् ३० शतौ आधर्पयति ३१ अप्रसादे आविलमुदकम् ३२ विवृते आकाशम् ३३ अनु-
५वन्धे आयाति ३४ पुनर्वचने आनेडितम् ३५ ॥ १० ॥
नि लेशराशिभृशार्थाधोभावप्रसादसन्यासार्थार्थगत्यादेशदारकर्मोपदर्शनकेतनोपरमणावृत्तिवन्धन
दर्शनावसानकौशलासेवानियमसमीपान्तर्भावमोक्षतमस्तापसान्नाश्रयग्रहणवर्णवृक्षाभावातिशयेपु ३१ ।
लेशे लेशेन हसति निहसति निहासः, निघर्षः १ राशौ धान्यनिकरः, यवनिकरः २ भृशार्थे
भृश गृहीतो निगृहीतः ३ अधोभावे अधः पतति निपतति ४ प्रसादे प्रसन्न पानं निपानम् निगवा
१० आपः ५ सन्यासे निक्षेपः, निश्रेणी ६ अर्थे निधानम् ७ अर्थगतौ गतार्थानि वाक्यानि निगतानि
वाक्यानि ८ आदेशे आदिष्टः कर्तुं नियुक्तः कर्तुम् ९ दारकर्मणि निविशते १० उपदर्शने अर्थ निदर्शयति
११ केतने निमन्त्रयते १२ उपरमणे निवृत्तः पापात् १३ आवृत्तौ निवृत्तः सूर्यः १४ बन्धने निगलम्
१५ दर्शने निध्यायति, निशामयते १६ अवसाने निष्ठित नितिष्ठति १७ कौशले विद्यासु निष्णात,
निपुणः १८ आसेवाया नियतः पन्थाः, नियतो रथः १९ नियमे नियमः २० समीपे निपार्थः २१
१५ अन्तर्भाव निपीवमुदकम्, निहित द्रव्यम् २२ मोक्षे निसृष्टम् २३ तमसि निहारः २४ तापसान्ने नीवारो
ब्रीहिः २५ आश्रये निलयो निवासः २६ ग्रहणे निग्रहः २७ वर्णे नीलः २८ वृक्षे नीपः २९ अभावे
निर्द्रव्यः ३० अतिशये न्यूनः, निपीडितः ३१ ॥ ११ ।।
प्रति पुनःक्रियाऽऽदानसादृश्यहनननिर्यातनतद्योगविनिमयाभिमुख्यवामदिग्योगव्याप्त्याध्यानमाना-
र्थसम्भावनतत्त्वारयाभागलक्षणवारणसम्बन्धवीप्साव्याधिस्थानेषु २२ । पुनः क्रियायां पुनरुक्के प्रत्युक्तम्
२०१ आदाने प्रतिगृहाति, प्रतियाचते • सादृश्ये प्रतिरूपकम् ३ हनने प्रतिहत पापम् ४ निर्यातने प्रतिकृत
प्रतिकारः ५ तद्योगे प्रतिपन्नः, प्रेष्यः ६ विनिमये तैलार्थी घृत प्रतिददाति ७ आभिमुख्ये प्रत्यानि
शलभाः पतन्ति ८ यामे प्रतिलोम करोति ९ दिग्योगे प्रतीची दिक् १० व्याप्तो प्रतिकीर्ण
पुष्पैः ११ आभ्याने प्रतिवेदयति मन्त्रम् १२ मानार्थे सूपोऽल्पः सूपप्रति १३ सम्भावने प्रत्ययः
प्रतिपत्तिः १४ तत्त्वारयाया शोभनो देवदत्तो धर्म प्रति १५ भागे यदन मा प्रति स्यात्तद्देयम् १६
२५ लक्षणे वृक्ष प्रति विद्योतते विद्युत् १७ वारणे प्रतिपिद्ध- १८ सम्बन्धे अक्षसम्बद्धं प्रत्यक्षम् १९ वीप्साया
वृक्षं २ प्रति सिञ्चति २० व्याधौ प्रतिश्यायः २१ स्थाने प्रतिष्ठान प्रतिष्ठितः २२ ॥ १२ ॥
परि ईपदर्थव्या युपर्याभ्याससान्त्वसमन्ताद्भावभूषणपूजासमवायवर्जनालिगननिवसनशोक-
भोजनलहनवीप्साऽयज्ञानतत्त्वारयास्पर्शलक्षणाभ्यावृत्तिनियमेषु २२ । ईपदर्थे पर्यमिकृत परिवेपितम् १
च्यामौ परिगतोऽग्निः परिवातम् २ उपर्यर्थे परिपूर्ण परिधानम् ३ अभ्यासे गत्या गत्वा आगच्छति परि-
३० गच्छति ४ सान्त्वे परिगृहाति ५ समन्ताद्भावे परिधानति, परिवृत्तम् ६ भूपणे सुरर्णपरिष्कृतमासनम् ७
पूनाया परिचरति ८ समवाये परिपत् , परिसरः ९ वर्जने परि निगत्तेभ्यो पृष्ठो देवः, वर्जयित्वा साति
परिनाति १० आलिगने परिप्पजते कन्यां माणवकः ११ निवसने परिधत्ते वासः १२ शोके वृत
परिदेवयते १३ भोजने प्रापूर्णान्परिवेपयति १४ लाने परिस्मन्दति १५ वीप्साया वृक्ष वृक्ष परिसिधति
१६ अवसाने परिभवति १७ तत्त्वारयाया परिसरयातम् १८ स्पर्श परिपकम् १९ लक्षणे देवलक्षणेन
३५शावः परिभातश्चारः २० अभ्याची परिहत्तः सवत्सरः २१ नियमे परिसमातम् २२ ॥ १३ ॥

A मक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे अव्ययानि । उपसर्गविवरणम् उप वर्जनप्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारलवनपरीक्षासंपत्सर्पणगुह्यागःक्षयसामर्थ्याचार्यकरणसाह- यस्त्रीकरणपीडामन्त्रक्रियाव्याप्तिदोपाख्यानयुक्तिसंज्ञापूर्वकर्मपूजादानसामीप्याधिकहीनलिप्सासु · २८ । वर्जने उपवासः, उपवसति अशनवर्जनं करोति १ प्रतियत्ने एधोदकस्योपस्कुरुते २ वैकृते उपस्कृतं भुङ्क्ते, उपस्कृतं सहते ३ वाक्याध्याहारे सोपस्कारं वाक्यमाह ४ लवने उपस्कीर्य मद्रका लुनन्ति ५ परीक्षायां उपेक्षितव्यम् ६ संपदि उपपन्नमस्य, उपपन्ना शरत् , उपपन्नवाक्यः साधुः ७ सपणे उपसर्पति, उपतिष्टते ५ कर्मकरः ८ गुह्ये उपह्वरः, उपांशु, उपगूर्णम् ९ आगसि उपालम्भः, उपघातः १० क्षये उपक्षीणः, उपयुक्तं द्रव्यम् ११ सामर्थ्य उपचितः १२ आचार्यकरणे उपदिशति उपाध्यायः १३ सादृश्ये उपमानम् १४ स्वीकरणे उपगृहाति १५ पीडायां स्तनोपपीडं शेते उपपीडितः १६ मन्त्रक्रियायां उपनयते उपनयनम् १७ व्याप्ती उपकीर्णं सर्वतः १८ दोपाख्याने उपघातः १९ युक्तौ लवणोपसृष्टं देवोपसृष्टम् २० संज्ञायां उपधा, उपसर्गः २१ पूर्वकर्मणि उपक्रमः, उपकारः २२ पूजायां उपतिष्ठते देवं उपस्थानम् , १० उपचारः २३ दाने उपहरत्यर्थं वलिमुपहरेत् २४ सामीप्ये उपकुम्भम् , उपमणिकम् २५ अधिके उपखार्यां द्रोणः २६ हीने उपार्जुनं योद्धारः २७ लिप्सायां उपयाचते, उपसादितोऽर्थः २८ ॥ १४ ॥ अधि अधिकाराधिष्ठानपाठोपर्यथैश्वर्यबाधनाधिक्यस्मरणसहयोगस्ववशतासु १० । अधिकारे अधिकारो राज्ञः, अधिकृतो ग्रामे १ अधिष्टाने मय्यधिष्ठितं अध्यात्मकथा वर्तते २ पाठेऽधीतं व्याक- रणम् ३ उपर्यर्थे अधिरोहति, अधिक्रान्तम् ४ ऐश्वर्ये अधिपतिर्देशस्य, अधिश्रेणिके मगधाः .५ बाधने १५ अधिकुरुते शत्रून् ६ अधिक्ये अधिखायाँ द्रोणः ७ स्मरणे मातुरध्येति, पितुरध्येति ८ सहयोगे अधि- वसति ९ स्ववशतायां आत्माधीनः १० ॥ १५ ॥ अपि पदार्थानुवृत्त्यपेक्षासमुच्चयान्वयसर्गगर्दाशीसम्भावनभूपणसंवरणप्रश्नावमर्शपु १२ । पदार्थे सर्पिषोऽपि स्यात् , सर्पिषो मात्रापि स्यादित्यर्थः १ अनुवृत्तौ अपि मा योजय २ अपेक्षायां अयमपि विद्वान् ३ समुच्चये अपि सिञ्च अपि स्तुहि ४ अन्ववसर्गे भवानपि च्छत्रं गृह्णातु ५ गर्दायां अपि तत्र-२० भवान् सावधं सेवते ६ आशिपि अपि मे स्वस्ति पुत्राय, अपि शिवं गोभ्यः ७ सम्भावने अपि पर्वतं शिरसा भिन्द्यात् ८ भूपणे अपि नह्यति हारम् ९ संवरणे अपिहितं द्वारम् १० प्रश्ने अपि कुशलम् , अपि गच्छामि ११ अवमर्श अपि भज्येय न नमेयम् , अपि काकः श्येनायते १२ ॥ १६ ॥ सु । पूजाभृशार्थानुमतिसमृद्धिढाख्याकृच्छेपु ६ । पूजायां पूजितो राजा सुराजा, सुगौः १ भृशार्थे सुपुप्तम् , सुषिक्तम् २ अनुमतौ सुकृतम् , सूक्तम् , सुदत्तम् ३ समृद्धौ-समृद्धो देशः, सुदेशः, सुमगधः२५ सुमद्रं वर्तते ४ दृढाख्यायां सुवद्धम् , सुकृतम् ५ अकृच्छ्रे सुकरः कटो भवता ६ ॥ १७ ॥ उद् प्रावल्यसम्भवलाभोर्ध्वकर्मप्रकाशास्वस्थमोक्षदृश्यसमृद्धात्ययान्यायप्राधान्यशक्त्यवरपरदिग्योग- निर्देशेषु १६ । प्राबल्ये उद्बला मूषिका, उद्बलं याति १ सम्भवे उद्गतो दो नीचस्य २ लाभे उत्पन्नं द्रव्यम् , उद्पादि भैक्षम् ३ ऊर्ध्वकर्मणि आसनादुत्तिष्टति ४ प्रकाशे प्रकाशं चरति उच्चरति, उद्भवति ५ अस्वस्थे उत्सुकः, उच्चितः, उन्मत्तः ६ मोक्षे उत्सृष्टः ७ दृश्ये उत्सवः, उद्यानम् ८ समृद्धौ उच्छ्रितं ३० कुटुम्बम् ९ अत्यये अतीतमेघं नमः उन्मेघम् १० अन्याये उत्कुरुते कन्याम् , उत्कुरुते परदारान् ११ प्राधान्ये उत्कृष्टोऽश्वः, उत्तम कुलम् १२ शक्तौ उत्सहते गन्तुम् १३ अवरपरे उत्तरः १४ दिग्योगे उदीची दिग् १५ निर्देशे उद्दिशति, उद्देशः १६ ॥ १८ ॥ अति पूजाभृशानुमत्यतिक्रमणसमृद्धिभूताभावावज्ञानहीनार्थेपु ८ । पूजायां पूजितो राजा अति- राजा, अतिगौः १ भृशार्थे अतिकृतम् , अतिसारः, अतिवृष्टिः २ अनुमतौ अतिचिन्तितम् ३ अतिक्रमणे ३५ . घीयेत्यादावन्तरगत्वादेत्वदीर्घत्वयोः कृतयोर्हस्वाभावात्तोन्तो न प्राप्नोति । सत्यम् । असिद्धं यहिरङ्गमन्तरले १८४ महामहोपाध्यायश्रीनिनयनिजयगणिविरचिते खोपज्ञहेगलघु- अतिकान्तोऽन्यान रथान अतिरथः, अतिरि फुलम् ४ समृद्धौ समृद्धो देशोऽतिदेशः ५भूताभावे अतीतमेघ नभः ६ अवज्ञाने अतिच्छिनत्ति, अतिहीनम् ७ हीनाथें हीनम् वायति अतिवादति ८॥१९॥ अभि शाभिमुख्यसनिकृष्टवशीकरणोर्ध्वकर्मपूजाकुलसान्त्वव्याप्तीच्छादोपोल्वणरूपवचनलक्ष्यवी- प्सानवप्रणयेषु १६ । आभिमुख्य अभितः १ सन्निकृष्टे अभ्यासम् २ वशीकरणे अभिचरति मत्रैर्माणवका ५कन्याम् ३ ऊर्ध्वकर्मणि अभिरोहति वृक्षम् ४ पूजायाम् अभिवादयते ५ कुले अभिजातो माणवकः ६ सान्त्वे अभिमन्यते कन्याम् ७ व्याप्तौ अभिकीर्ण पांशुभिः ८ इच्छायामभिलपति मैथुनम् ९ दोपोल्बणे अभिष्यन्दः १० रूपे अभिरूपो माणवकः ११ वचने अभिधेयः साधुः १२ लक्ष्ये अभिविध्यति १३ वीप्सायाम् वृक्षं वृक्षमभिसिञ्चति १४ नवे अभिनवं माल्यम् १५ प्रणये अभिमनितोऽग्निः१६॥२०॥ ॥ इति बृहन्यासगतमुपसर्गविवरणं समाप्तम् ॥ एते त्वेकत्र धातावापश्चभ्यः प्रयोज्याः। असमभिव्याहरतीति । एते चैकत्रधातावित्यादि-"धात्वर्थं वाधते कश्चित् कश्चित्तमनुवर्तते । तमेव विशिनष्टयन्योऽनर्थ- कोऽन्यः प्रयुज्यते ।। १॥ वाधते यथा प्रतिष्ठते प्रस्मरति प्रवसति प्रलीयते प्रतीक्षते प्रतिपालयति । तमनुवर्तते यथा अधीते अध्येति आचामति आचष्टे अनुरुध्यते प्रलोकयति । तमेव विशिनष्टि यथा अपचति प्रकरोति प्राणिति प्राभाति निरीक्षते निष्टपति । अनर्थको यथा प्रलम्बते प्रार्थयते विजयते १५विजानाति । आपश्चभ्य इति प्रायेणेतावतामेव प्रयोग इष्यते यथा आहरति व्याहरति अभिव्या- हरति समभिव्याहरति प्रसमभिन्याहरतीति । स्तोत्रकारोऽप्याह-"एकत्र धातावुपसर्गपञ्चकप्रयोग इष्टः कविभिनिरन्तरम् । तद्ध्यानधातावुपसर्गविंशतिं सुरः प्रयोक्का न कथं फुलक्षणः" ॥१॥ अथ कि धातुः पूर्व क्रियाविशेपकेणोपसर्गेण युज्यते उत साधनाभिधायिना प्रत्ययेनेति ? साधनेनेति केचित् । साधनं हि क्रियां निवर्तयति तामुपसर्गो विशिनष्टि । अभिनिवृत्तस्य चोपसर्गेण विशेषः सक्यो यतुं २० नानभिनित्तस्य । तदयुक्तम्-यो हि धातूपसर्गयोरभिसंबन्धस्तमभ्यन्तरीकृत्य धातुः साधनेन प्रयुज्यते । यस्माद्विशिष्टैव क्रिया साधनेन साध्यते न तु साधनाल्लब्धरूपान्यतो विशेष लभते, तस्मात्पूर्वमुपसर्गेणेति युक्तम् । तथा च समस्करोत् संचरकारेसनान्तरङ्गत्वात् स्सटि कृते प्रत्ययनिमित्ते अडागमद्विवंचने भवतः। अतश्चैवम् पूर्व हि धातोः साधनेन संवन्धे, आस्यते गुमणेत्यकर्मकः, उपास्यते गुरुरिति सकर्मको धातुः फेन स्यात् । न चैतद्वाच्यम्-प्रत्ययसंवन्धमन्तरेण क्रियाविशेष स्थानभिव्यक्तेन धातोः पूर्वमुपसर्गेण संयन्धो २५ युज्यते । यतः "पीजकालेषु संबद्धा यथा लाक्षारसादयः । वर्णादिपरिणामेन फलानामुपकुर्वते" ॥१॥ "बुद्धिस्थादभिसंबन्धात्तथा धातूपसर्गयोः। स्वभ्यन्तरीकृतो भेदः पदकाले प्रकाश्यते ॥शा यद्येवमुपेत्या- प्रयोगः इति भविष्यति । प्रेजुः प्रोपुरियन तु यज्वपोर्म्युति द्वित्वे च सति अन्तरङ्गत्वान् समानदीर्घत्वे पश्चादे- दोती। यद्वा पूर्वमेदोतो ततोऽययादेशे "व्यञ्जनस्यानादेर्लुक्” (१।१।४४) इति लुकि पुनरेदोतौ । ननु ३० पतु प्रकणच्छति प्रचिकीर्पतीत्यादी धात्वन्तरसंवद्धस्योपसर्गस्य तदर्थप्रतिपादकप्रत्ययादेव प्रार प्राप्नोति ? नैवम्-तस्साधातुत्वात् समुदायस्यैव धातुत्वादिति । कारिकास्थित्यादौ [सि० ३।१।३] पारिफाशब्दः पित्यादावर्षे धातोः सम्बन्धी गतिसंज्ञो भवति । स्थितिर्मयादा यत्तिर्वा । आदिशब्दावन धात्पपनिर्देशो गृपते । पारिपाकृत्य स्थिति यनं क्रिया या फत्पत्यर्थः । स्थित्यादाविति किम् ? पारिका मृत्या फी प्रत्येत्यर्थः । अग्रहानुपदेशेऽन्तरदः (३५) अन्तर अदम् इत्येती शब्दो ययाः ३५संस्यममहेऽनुपदेशे पाय गम्यमाने पावोः संपन्धिनो गतिसंग भपतः अहोऽसीकार-अन्तईस । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे अव्ययानि । गतिसंज्ञा १८५ मध्ये हिंसित्वा शत्रून् गत इत्यर्थः, अन्तःशब्दो मध्ये अधिकरणभूते वर्त्तते परिग्रहे च, तत्र परिग्रहे प्रतिपेधादितरत्र गतिसंज्ञेति । स्वयं परामर्शोऽनुपदेशो विशेपानाख्यानं वा । अदःकृत्य एतत्करिष्य- तीति चिन्तयति, विशेपानाख्याने चिन्तयतीत्यस्य स्थाने कथयतीति प्रयोगः । अग्रहानुपदेश इति क्रिम् ? अन्तर्हत्वा मूपिका श्येनो गतः, परिगृह्य गत इत्यर्थः । अदः कृत्वा गत इति परस्य कथयति । अदः- शब्दस्त्यदादौ । अव्ययमिति केचित् इत्यादि । एवं "भूबादरक्षेपेऽलंसदसत्” (३।११४) गतिसंज्ञम् । अलंकृत्य । सत्कृत्य । असत्कृत्य । "कणे मनस्तृप्तौ” (३।१।६) कणेहत्य । मनोहत्य ! "तिरोऽन्तधौ” (३।११९) तिरोभूय । "कृगो नवा” (३।१।१०) तिरस्कृत्य तिरस्कृत्वा । मध्येकृत्य २ । साक्षात्कृत्य २ । "नित्यं हस्ते पाणावुद्बाहे" (३।१।१५) हस्ते कृत्य पाणौ कृत्येत्यादयो यथायोगं गतिसंज्ञा ज्ञेयाः। एवं भूषादरक्षेपे इत्यादि । एवमिति सङ्केपसूचनम्-भूपा मण्डनम् अलंकृत्य अलंकृतम् । प्रीत्या संभ्रम आदरः-सत्कृत्य सत्कृतम् , क्षेपोऽनादरः-असत्कृत्य असत्कृतम् । भूपादिष्विति किम् ? अलं कृत्वा माकारीत्यर्थः, सत्कृत्वा विद्यमानं कृत्वा, असत्कृत्वा अविद्यमानं कृत्वेत्यर्थः ॥ कणे मन इत्यादि । एते अव्यये धातोः संवन्धनी गतिसंज्ञे भवतः । तृप्ताविति-तृप्तिः श्रद्धोच्छेदः, कणेहत्य मनोहत्य पयः पिवति, तावत् पिवति यावत् तृप्त इत्यर्थः । तृप्ताविति किम् ? कणे तन्दुलावयवे हत्वा गतः । मनो हत्वा१५ गतः, चेतो हत्वेत्यर्थः । एवमिति निर्देशात्-"पुरोऽस्तमव्ययम्” (३।१।७) पुरस् अस्तम् इत्येते 'अव्यये गतिसंज्ञे भवतः । पूर्वपर्यायः पुरःशब्दः । अनुपलब्धार्थोऽस्तंशब्दः । पुरस्कृत्य गतः, पुरस्कृ- तम् । अस्तंगत्य पुनरुदेति सविता । अस्तंगतानि दुःखानि ।। “गत्यर्थवदोऽच्छः” (३।१।८) अच्छे- त्यव्ययमभिशब्दार्थे दृढार्थे च वर्त्तते । तद् गत्यर्थानां वदश्च धातोः संवन्धि गतिसंज्ञं भवति । अच्छ- गत्य अच्छत्रज्य अच्छोद्य । गत्यर्थवद इति किम् ? अच्छकृत्वा गतः । अव्ययमित्येव-उदकमच्छं गत्वा २० स्थितः । “तिरो०" तिरःशब्दोऽन्तौं व्यवधाने वर्तमानो धातोः संवन्धी गतिसंज्ञो भवति । तिरो- भूय तिरोधाय । अन्तर्द्धाविति किम् ? तिरो भूत्वा स्थितस्तिर्यग् भूत्वेत्यर्थः ॥ "कृगो.” तिरस् इत्य- व्ययमन्तों वर्तमानं कृगो धातोः संवन्धि गतिसंज्ञं वा भवति । तिरस्कृत्य तिरःकृत्य, तिरस्करोति तिरःकरोति इति, गतिसंज्ञायां "तिरसो वा” (२।३।२) इति वा सत्वम् , पक्षे गतिसंज्ञाभावे तिरः- कृत्वा । अन्त वित्येव-तिरःकृत्वा काप्टं गतः । तिर्यगित्यर्थः ।। मध्येकृत्येति “मध्येपदेनिवचने-२५ मनस्युरस्यनत्याधाने” ( ३।१।११) एतानि पञ्च सप्तम्येकवचनान्तप्रतिरूपकाण्यव्ययान्यनत्याधा- नेऽर्थे वर्तमानानि कृगो धातोः संवन्धीनि वा गतिसंज्ञानि स्युः । अत्याधानमुपलेपः आश्चर्य च, ततोऽन्यदनयांधानम्-मध्येकृत्य धनं धिनोति जलधिः । द्विकेनाङ्केन वैकल्पिकं द्वितीयं रूपं ज्ञेयम्-मध्ये- कृत्वेति । पदेकृत्य पदेकृत्वा । निवचनेकृत्य निवचनेकृत्वेति-निवचने वचनाभावः, वाचं नित्यम्येत्यर्थः । मनसिकृत्य मनसिकृत्वा, उरसिकृत्य उरसिकृत्वेति-उभयत्र निश्चित्येत्यर्थः । अनयाधान इति किम् ?३० मध्ये कृत्वा धान्यराशिं स्थिता हस्तिनः । पदेकृत्वा शिरः शेते । मनसि कृत्वा सुखं शेते, उरसि कृत्वा पाणि शेते । अव्ययमित्येव-मध्ये कृत्वा वाचं तिष्टति । एवं "उपाजेऽन्वाजे" (३।१।१२) एते अव्यये सप्तम्येकवचनान्तप्रतिरूपके स्वभावदुर्वलस्य भग्नस्य वा वलाधाने वर्तमाने कृगो धातोः संव- धिनी गतिसंज्ञे वा भवतः । उपाजेकृत्य उपाजेकृत्वा । अन्याजेकृत्य अन्वाजेकृत्वा । स्वभावदुर्बलस्य भन्मस्य वा वलाधानं कृत्वेत्यर्थः । शकटस्य धुरोऽक्षस्य वा भग्नस्य यत्काप्टमुपधीयते तदुपाजेऽन्वाजे इति ३५ है. प्रका० पूर्वा० २४ । ।

.. - महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- चोच्यते । तथा "स्वाम्येऽधिः" (३६११३) अधीयेतदव्ययं स्वामित्वे गम्यमाने कुमो धातोः संवन्धि गतिसंज्ञं चा स्यात् । चैत्रं ग्रामेऽधिकृत्य अधिकृत्वा वा गतः, स्वामिनं कृत्वेत्यर्थः । स्वाम्य इति किम ? ग्राममधिकृत्य उद्दिश्येत्यर्थः । साक्षात्कृत्येति-"साक्षादादिश्यर्थे" (३।१।१४) साक्षादादयः शब्दाव्यर्थे वर्तमानाः कुगो धातोः संबन्धिनो गतिसंज्ञा वा स्युः । साक्षात्कृत्य साक्षा- ५स्कृत्या, असाक्षाद्भूतं साक्षाद्भूतं कृत्वेत्यर्थः । एवं मिथ्याकृत्य २ । यदा साक्षाद्भूतमेव किश्चित्करोति तदा साक्षात्कृत्वेत्येव भवति । व्यर्थे इति वचनात् च्च्यन्तानां ऊर्यादिसूत्रेण नित्यमेव गतिसंज्ञा-लवणीकृत्य उष्णीकृत्य ! साक्षात् मिथ्या चिन्ता भद्रा रोचना लोचना अमा आस्था अग्धा प्राजर्या प्राजुरा प्राजरहा वीजा धीजरहा ससा अर्थे अमौ क्शे वत्से विकपने प्रकपने विसहने प्रतपने । अर्थे प्रभृतयोऽष्ट सप्त- म्येकवचनप्रतिरूपकाः स्वभावान्निपातनाद्वा । अन साक्षात् सादृश्यप्रत्यक्षयोः । मिथ्या अलीके । चिन्ता १० मनोव्यापारे । भद्राद्रयस्त्रयः प्रशंसायाम् । अमा सहार्थे । आस्था प्रतिज्ञादरयोः । अग्धादयः पट शोमार्थे । वीजर्या वीजरुहेति वीजप्रसयनेऽपि । ससा प्रयोजनसंवरणयोः । अग्नौ तैक्ष्ण्ये । चशे वत्से अस्वातस्ये। विकपने प्रकपने, उभौ पैरूप्ये, विकपने हिंसायाम् , प्रकपने इत्यन्ये । विसहने प्रसहने, उत्साहे साम च । निपाताद्वेति-आकारान्तां ध्वनीनां नितिपातनादाकारान्तत्वं न तु आबन्तत्वम् । लवणम् उष्णम् शीतम् उदकम् आर्द्रम् । लयणादयः पञ्च क्रमेण रुच्यर्थे १ अभिभवे २ अनादरे ३ क्लेद द्रवयोः ४ सोदका- १५भिनवयोः ५ । एपा चैतत्सून विहितगतिसज्ञासन्नियोगे एव मान्तत्वं निपात्यते । प्रादुस् आविस् नमस् इत्यादि इति साक्षादादिरेकत्रिशकः । नित्यं हस्ते इत्यादि-हस्ते पाणावित्येतौ सप्तम्येकवचनान्तप्रति- रूपकाव्ययौ । सप्तम्यन्तावनव्ययावित्येके । तावुद्वादे दारकर्मण्यर्थे गम्यमाने कृगो धातोः संबन्धिनौ नित्यं गतिसंज्ञो भवतः । हस्तकृत्य पाणौकृत्येति-भार्या कृत्वेत्यर्थः । उद्वाह इति किम् ? हस्ते कृत्वा कार्पापणं गतः । इत्यादय इति आदिशब्दात् “माध्वं वन्धे" (३३१११६) पन्धहेतुके आनुमूल्य २० वर्तमानं प्राध्यमित्येतन्मान्तमव्ययं कृगो धातो. सर्वधि गतिसंज्ञं स्यात् । प्राध्वंकृत्य, बन्धनेनानुकूल्य कृत्वेत्यर्थः । बन्धे इति किम् ? प्राधं कृत्वा शकटं गतः । “जीविकोपनिषदौपम्ये" (३३१११७) जीविकोपनिपच्छब्दायौपम्ये गम्यमाने कृगो धातोः सवन्धिनौ गतिसंज्ञौ भवतः । जीविकाकृत्य उप- निपत्कृत्य-जीविकामिय उपनिषदमिव कृत्वेत्यर्थः । औपम्य इति किम् ? जीविकां कृत्वा उपनिपदं कृत्वा गतः । यथायोगमिति-योगाः सूत्राणि यथोक्तसूत्रानुसारेणेत्यर्थः । अथाव्ययाधिकारमुपसहरति- इत्यपरिमिता अव्ययाः इत्यपरिमिता अव्यया इति-इत्युक्तप्रकारेण अपरिमिता इति । "इयन्त इति संख्यानं निपातानां न विद्यते । प्रयोजनवशादते निपात्यन्ते पदे पदे ।। १ ।। अव्यया इति अव्ययशनस्स नपुंसकलिङ्गत्यं "शलयंकुलयाव्यय कवियवदि" पुं० न० २४ । ३० इति लिगानुशासनवचनान् । अव्ययस्य ॥ ६०॥ [सि. १२७] अव्ययानां स्वादलप् स्यात् । म्यः प्रातरम्ति पश्य कृतमिति ।। ६० ॥ धीमीपप्यायनीकी विजयाशियोपाध्यायधीविनयविजयविरचिताया दमासुप्रप्रियायौ भन्ययानि रामपानि । सः अनीति योऽसि, म्यः पश्यति म्यगं पश्य, मानमिति स्वर्गेण पुनमित्यर्थः । एवं सर्वेषा. १५मध्यपानां मविभचिनोपानुल्यम्पना येति ॥ ६ ॥ - - २५ - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । आप्परे कार्याणि १८७ अ थ स्त्री प्र त्य याः - अथ लिङ्गविशेषज्ञानाय स्त्रीप्रत्ययाः प्रस्तूयन्ते । अथेति । अलिङ्गानामसङ्ख्यानां चाव्ययानां निरूपणादनु लिङ्गविशेषज्ञापनमुचितमिति तदर्थ ययेते इति भावः । अजादेः॥१॥ [सि० २।४।१६ ] एभ्यः स्त्रियामाप् स्यात् । अजा एडका कोकिला बाला शूद्रा ज्येष्ठा ॥१॥ अजा० । एभ्य इति अजादिभ्य, आवृत्त्या अजादीनामेव स्त्रियां वर्तमानेभ्य आप् प्रत्ययो भवति । वाधकवाधनार्थमनकारार्थं च वचनम् । अजा एडका अश्वा चटका मूपिका कोकिला; एभ्यो जातिल- क्षणस्य ङीप्रत्ययस्यापवाद आप् । वाला होडा पाका वत्सा मन्दा विलाता कन्या मध्या मुग्धा । विला- तेत्यन्ये न पठन्ति तेन बिलातीत्यपि, एभ्यो वयोलक्षणस्य । कनिष्टा ज्येष्टा मध्यमा; एभ्यो धवयोगल-१० क्षणस्य च । पूर्वापहाणा अपरापहाणा, निपाताण्णत्वम् , संग्रहाणा, परप्रहाणेत्यप्यन्ये; एपु टिल्लक्षणस्य । त्रीणि फलानि समाहृतानि त्रिफला-अत्र द्विगुलक्षणस्य । क्रुच्चा उष्णिहा देव विशा; एपु व्यञ्जनान्तत्वात् "आत्” (२।४।१८) इत्यनेनाप्राप्तेरजादिपाठः, कश्चिदेतेभ्यो विकल्पेनेच्छति, तन्मते क्रुङ् देवविट उष्णिक । अन्ये तु कुञ्चानालभेत, उष्णिहककुभौ देवविशश्च इति प्रयोगदर्शनात् अकारान्ता एवैत इति मन्यन्ते । “अजादेः” इत्यावृत्त्या पष्ठीसंबन्धः किम् ? अजादिसंबन्धिन्यामेव खियामभिधेयायां १५ यथास्यात्तेनेह न भवति–'पञ्चानामजानां समाहारः पञ्चाजी, दशाजी; अत्र हि समाहारः समासार्थः स्त्री । नासावजसंवन्धिनी । अत एव ज्ञापकादत्र स्त्रीप्रकरणे तदन्तादपि विधिर्भवति । तेन महाँश्चा- सावजश्चेति सामान्येन विग्रहे स्त्रीविवक्षायां महाजा परमाजेति सिद्धम् । एवमतिभवती अतिमहती अतिधीवरी अतिपीवरी परमशूद्रेत्यादि ॥ १॥ अथावन्तस्य रूपविशेषमाह- अस्यायत्तरिक्षपकादीनाम् ॥ २॥ [सि० २।४।१११] आवेव परो यसात्तसिन्ननित्क्याप्परे यदादिवर्जस्यात इत्स्यात् । पाचिका कारिका मद्रिका । यदादिवर्जनाधकासकाक्षिपकेत्यादौ नेत्वम् ।। २ ॥ । अनित्क्याप्पर इति अनित्प्रत्ययावयवे ककारे आप्परे इत्यर्थः । अस्येति किम् ? गोका नौका । अनित्तीत्येव-जीवका नन्दका । "आशिष्यकन्” (५।१७०) आशिपि गम्यायां धातोरकन् स्यात् । जीवतानन्दतादित्याशास्यमानाजीवका नन्दका अत्र नित्यान्नेत्वम् । अनित इति २५ पर्युदासेन |त्ययग्रहणादिह न भवति-शनोतीति शका । तका । आप्पर इत्येव-कारकः हारकः । आवेव यस्मादिति नियमः किम् ? वहुपरिव्राजका मथुरा, बहुमद्रका सेना; विभक्त्यन्तादयमाविति प्रतिषेधः । यदादिवर्जनादित्यादि-अत्र क्षिपकादयः । एवं "क्षिपका ध्रुवका धुवका लहका चरका चटका इष्टका एडका ऐरका करका अवका अलका दण्डका पिष्पका कन्यका मेनका द्वारका रेवका सेवका २९, १ मन्दाविलाते मध्यमवयसी स्त्रियो। २ नामग्रहणेन तदन्तस्येति न्यायादजाद्यन्तादापः प्राप्तिरेव नास्ति किमारत्तिन्या. ख्यानेनेत्याह-अत एवेलादि । ३ अथवा प्रत्खयपरिग्रहे नरिकामामिकति ज्ञापकी । ४ आयुधविशेषः । ५ आवपनविशेषा। ६ सविलासा स्त्री। ७ ऋषिः । ८ अजाविशेषः । ९ तृणम् । १० घनोपल: निलिमः। १३ अश्वत्यस्य फलम् । १४ गौरीमाता अप्सराश्च । १५ नगरी। । २० अस्या० ११ शेवाला :। १२ नगर्यो।

। १८८ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खो ज्ञहमलघु- धारका उपत्यका अधित्यकेत्यादि । वहुवचनमाकृतिगणार्थम् । अत्र च "इचापुंसोऽनिक्याप्परे" (२१४।१०७) आवेव परो यस्मान्न विभक्तिः स आप्परः । अपुंल्लिङ्गार्थाच्छब्दाद्विहितस्यापः स्थाने इकारो हवश्व वा भवतः । अनितो अनकारानुवन्धस्य प्रत्ययस्यावयवभूते कि ककारे आप्परे परतः । अल्पा सट्दा सट्विका, सट्वका सट्वाका । एवं परमसट्विका ३, प्रियसट्विका ३ । चकारो हस्वानुकर्षणार्थः, ५ तेनोभयविकल्पे त्रैरूप्यं सिद्धम् । अपुंस इति किम् ? सर्विका । न विद्यते खट्वा अस्या इति "गोश्वान्ते (२।४।९५) इत्यादिना हस्वत्वे स्त्रीपुंससाधारणात्पुनरापि अखट्वा, सैवाल्पा अखट्विका । तथा सवाम- तिक्रान्ता अतिसवा, सैवाल्पा अतिसट्विका । अत्रापुंस्काद्विहित आप न भवतीति न त्रैरूप्यम् । ड्यादी- दूतः के (२१४११०४) इत्यनेन तु हस्खे कृते अस्य यत्तदेत्यादिनेत्वमेव भवति । कश्चिचित्त्वपुंस्काद्वि- हित आवस्तीति भवत्येव त्रैरूप्यमित्याह न विद्यते सदा यस्याः सा अखट्किा अखट्सका अखट्दाका । १० अनिदिति किम् ? अनुकम्पिता दुर्गादेवीति कनि दुर्गका "डयादीदूतः के" इत्यनेन ह्रख एव भवति । फीति किम् ? सट्दाता मालाता । आप्पर इति किम् ? प्रियसवाकः पुरुषः । आवेव परो यस्मादिति बहुव्रीहिः किम् ? प्रियसवाकमतिक्रान्ता अतिप्रियसट्वाका-अत्र हि प्रथमं द्वितीया परा पश्चादाविति । आप इत्येव, मातृका ।। २ ॥ एतत्सर्व सङ्केपेणाह- कचिद्वा ॥३॥ १५ अनिक्कि परे क्वचिदापः स्थाने इहवौ वा । खट्विका, खट्वाका खट्वका ॥३॥ फचिदापः स्थाने इ ह्रस्वौ वेति । एवं कचिदापः स्थाने केवलं इकारो भवति, कचित्केवलं हस्यो घेत्यपि स पार्थः । यथा "खज्ञाजभस्त्राऽधातुत्ययकात्” (२।४।१०८) स्वज्ञाजभस्त्रेभ्योऽधातो- रत्यप्रत्ययस्य च यावयवौ यकारककारी ताभ्यां च परस्यापः स्थाने अनित्प्रत्ययावयवे ककारे आप्पर परतः इकारो वा भवति । कुत्सिता स्या ज्ञातिः स्विका स्वका । अखिका अस्वका । निःस्विका निःखका । २० बहुविका वहुसका । ज्ञातिधनारयायामसर्वादित्वादकभावे कप्रत्ययान्तः स्वशन्दः । ज्ञिका ज्ञका, अक्षिका अज्ञका, निर्तिका निर्तका, बहुज्ञिका बहुज्ञका, अजिका अजका, अनजिका अनजका, निर. जिरा निरजका, वहजिका वहजका । भरग्रहणं स्त्रीपुंससाधारणवृत्तेमहणार्थम् । अविद्यमाना भला यस्याः सा अभत्रा, सेवाल्पा अभस्त्रिका अभत्रका । एवं निर्भस्त्रिका २, बहुभस्त्रिका २, अतिभत्रिका २ । अत्र हि गोणस्य हस्यत्वे समासात् स्त्रीपुंससाधारणादाविति पूर्वेण न सिद्ध्यति । यदा त्वपुरश २५दाय विधीयते तदा पूर्वेण त्रैरूप्यमेव-भस्त्रिका भत्रका भलाका । न भरा अभया साल्पा चेत् अभ- खिका ३ । एवं परमभत्रिका ३ । यकार. इयिका इभ्यका, क्षत्रियिका क्षत्रियका, आर्यिका आर्यका । फकार पटफिका चटकका, मूपकिरा मूषकका, एलकिका एलकका । धातुत्यवर्जनं किम् ? सुनयिया सुग- यिका अशोकिका मुपाकिका दाक्षिणायिका पाश्चासिका इयिका अमायिका । आप इसेव-पुसिता वा आत्मा आत्मीया या सर्वादित्यादकि खका; अत एव "हंस तनो सन्निहितं चरन्तं मुनेर्मनोवृत्तिरि २०५ स्सिपायाम्" इति नैपर्धाये प्रयोगः प्रामादिकः । सांकाइये भया योपान्यलक्षणेऽकमि सांराश्यिका । एवं फापीस्यिया । इदिकं भजति हार्दिकिरा । अत्र "गोत्रक्षत्रियेभ्योऽकन् प्रायः" (६।३।२०६) इन्यकम् । एवं श्राफल्किा । सर्वोत्तरेण नित्यमिकारः। कथं यहपसिया पदपत्यका ? नाय त्याप्रत्ययः । "प्रत्ययाप्रत्ययोभमन्ययस्यैय महणम"। अथ शुक्रियत्न कथन विकल्पः ? सादेशम्य फम्पासिदत्वात्। एवं ३४"मेषसूतपुनयन्दारकस्य" (२१४१०९) आप इति निवृत्तं पृथग्योगान् । पपामन्तस्यानित्य एवरमा कपिर। २५नं पलभरन: अन्धविशेषः।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । आप्परे कार्याणि यावयवे ककारे आप्पर परे परत इकारादेशो वा भवति । द्विके ढके, एपिका एपका । केवलयोरेवानयो- विकल्पनेकारः । यदा तु न तु न एपा न के न एपका इत्यादि विग्रह कृते विभक्तेलपि सत्यां पुनः समासाद्विभक्ती तामाश्रित्य त्यदायत्वं तत आम् स च स्थानिवद्भावेन विग्रहकालभाविन्या विभक्तेः परो न तु कात् , तदा अनेयका अद्वके इत्यत्रेकारो न भवति । अस्विकेत्यादौ तु न चिभक्तेः पर आप , क्रिन्तु कादेव-सूतिका सूतका, पुत्रिका २ । वृन्दारिका २ । द्विशब्दसाहचर्चादेपेति सर्वादेः कृतत्रिका-५ रस्यैतदो निर्देशस्तेनेपेर्णकादिप्रत्ययान्तस्याविकृतस्यैतच्छब्दस्य च न भवति । इच्छतीति एपिका । एता एव एतिकाः । तथा “चौ वर्तिका” (२।४।११० ) वो शकुनाव भिवेये वर्तिकेतीत्वं वा निपात्यते । वर्तत इति णके वत्तिका वर्तका शकुनिः । वाविति किम् ? वर्तिका भागुरिः । लोकायतस्य व्याख्या- त्रीत्यर्थः । तथा "नवापः” (२।४।१०६) आपः कचि परे हस्खो वा भवति । प्रियखटकः प्रियख. टाकः, बहुमालकः वहुमालाकः । "न कचि” (२।४।१०५) यादीदूनः कचि प्रत्यये परे हस्खो न १० भवति । बहुकुमारीकः बहुकीलालपाकः बहुलक्ष्मीकः बहुब्रह्मवन्धूकः । खार्या क्रीतं खारीकम् , एवं काकणीकम् “खारीकाकणीभ्यः कच्” (६।४।१४) इति कच् । पूर्वसूत्रे क इति निरनुबन्ध कत्रि प्राप्तिरेव नास्तीत्याह न कचीति-न कचीति प्रतिषेधः पूर्वसूत्रे 'निरनुबन्धग्रहणे न सानुवन्धस्य' इति न्यायस्वाभावज्ञापनार्थः । तेन निपादकर्ता जातो नैपादकर्युकः, एवं झावरजम्बुक इत्यादाविकणि हवः सिद्धः । अनेन निपेवे प्राप्ते "नवापः" इति विकल्पसूत्रम् । एतत्सर्व "क्कचिदि"त्यादिना संक्षेपेण १५ सङ्गृहीतं ज्ञेयम् । किञ्च नरिका मामिका (२।४।११२) नरकशब्दस्य मामकशब्दस्य चाप्रत्यया- वयचे ककारे आप्परे परतोऽकारस्य इत्वं निपात्यते । नरान् कायतीति नरिका आतो डोऽह्वाबामः" (५।११७६) इति डः । ममेयं मामिका अनि ममकादेशः "कंवलमामक०” (२।४।२९) इत्यादिना संज्ञायां डीप्रत्ययस्य नियमादाप् । ककारस्याप्रत्ययसंबन्धित्वान् पूर्वणाप्राप्ने वचनम् ॥ ३ ॥ क्वचिन्नेत्वम् ॥४॥ तारका ज्योतिः ॥४॥ तारकेति । तत्र सूत्रम् "तारकावर्णकाष्टका ज्योतिस्तान्तवपितृदेवये” (२।४।११३) तारकादयः शब्दा यथासंख्यं ज्योतिरादिवर्थविकारादेशरहिता निपात्यन्ते । तरतर्णके तारकाज्योतिस्तच नक्षत्रं कनीनिका च । नक्षत्रमेवेत्यन्ये । अन्यत्र तारिका ।। वर्णयतीति णके वर्णका । तान्तवः प्रावरणवि- शेपः, अन्यत्र वर्णिका, भागुरी लोकायतस्य व्याख्यात्री ॥ अश्नोतेरोणादिके तककि अष्टका पितृदेवत्यं २५ कर्म, अन्यत्राष्टी द्रोणाः परिमाणमस्या इति के अष्टिका खारी । पितृदेवतार्थ कर्मति "देवतान्तात्तदर्थे" (७१।२२) इति ये पितृदेवत्यमिति सिद्धम् । एतदपि सर्व संक्षेपणाह क्वचिन्नेत्वमित्यादि ।। ४ ।। स्त्रियां नृतोऽस्वस्रादेडीः ॥ ५॥ [ सि० २१ ] स्वस्त्रादिवर्जानान्तादृदन्ताच स्त्रियां लीः स्यात् । राज्ञी । की ।। ५ ।। स्त्री डि-७-१ । न च ऋच नृत , तस्मात् नृतः ५-१ । वसा आदिर्यस्य स स्वादिः, न स्वादिः३० अस्वस्रादिः, तस्मात् अस्वस्रादि ५-१ । ङी १-१ राज्ञीति-श्रीप्रत्ययप्रकरणे तदन्तविवापिनत्वान अतिराज्ञी पूजितो राजा अतिराजा, स्त्री चेत् अतिराज्ञी, "पूजास्वते.” (७३।७२) इति समासान्न- निपेधः । एवमतितक्ष्णी अतिदण्डिनी अतिच्छत्रिणी अतिकी । वियामिति क्रिम् ? पञ्च सम नयः,३३ २ लोक आयतं लोकायतं १ वर्त्तयतीविणके 'अस्यायत्तत्०' इति इकारः। भागुरिर आचार्यः वाहुलकास्त्रीलिजः। नास्तिकशानम् । २० १९० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैगलघु- नान्तायाः संख्याया युष्मदस्मदोरिवालिङ्गत्वात् , अत एव नलोपेऽपि “आत्” (२।४।१ ) इत्यावपि न भवति । अस्वस्रादेरिति किम् ? स्वसा अतिस्वसा परमखसा दुहिता ननान्दा याता माता । तिस्रः चतस्रः-तिसृचतस्रादेशस्य विभत्त्यनन्तरनिमित्तत्वात् सन्निपातलक्षणत्वेन तद्विघातकत्याभावादेव डीनि- वृत्तौ सिद्धायां स्वखादिपु तयोः पाठः "सन्निपातलक्षणन्यायस्यानित्यत्वज्ञापनार्थस्तेनातिदध्या कन्ययेत्यादी ५विभक्तिनिमित्तेऽनादेशे सति डीः सिद्धो भवति । एवं यासेत्यादिष्वकारादेशे आवपि भवति ॥ ५ ॥ अधातूदितः ॥ ६॥ [सि० शा] अधातोरुदित ऋदितश्च स्त्रियां ङीः स्यात् । भवन्ती । पचन्ती ॥६॥ अधातू० । उच्च ऋच उदृत् , उदृत् इत् यस्य स उदित् , न धातुः अधातुः, अधातुश्चासौ उद- दिच अधातृहृदित, तस्मात् । अधातोरुदित इत्यादि-धातुवर्जितो य उदित् ऋदिच्च प्रत्ययोऽप्रत्ययो वा १० तदन्तानान्नः स्त्रियां वर्तमानात् डीप्रत्ययो भवति । उदित्-भातीति भवती भातेर्डवतुरिति । एवं गोमती यवमती प्रेयसी विदुषी । ऋदित्-पचन्ती दीव्यन्ती-अत्र शत्प्रत्ययः महती-माते "दुहिवहिमहि- पृपिभ्यः कतः" (उ० ८८४) इति कतृप्रत्ययः; एपु प्रत्यय उदित्तदन्तं नाम ॥ अतिभवती अतिमहती- अत्र नामाव्युत्पत्तिपक्षे भवत् महत् उदित् तदन्तं समासनाम । भवती महतीति तु व्यपदेशिवद्भावेन सदन्तम् । निर्गोमती अतिपुंसीत्यत्र प्रत्ययस्योदित्त्वाद्दोमदादिशब्दोऽप्युदित् तेन तदन्तं समासनाम । १५ अधाविति किम् ? सुकन् सुकंसौ, सुहिन् सुहिंसौ स्त्रियो, 'कसुकि गतिशातनयोः' 'हिसु तृहप हिंसायाम्' मुटु कंस्ते सुष्टु हिनस्तीति किपि रूपम् ॥ ६ ॥ अश्चः ॥७॥[सि० २।४।३] अञ्चन्तात् स्त्रियां ङी सात् । प्राची उदीची ॥७॥ अश्वः । प्राची उदीचीति-प्राश्चति उदश्चतीति कि "अञ्चोऽनायाम्" (४।२।४६) "अध प्रार २० दीर्घश्च” (२०१।१०४ ) "उदच उदीच्” (२।१।१०३) इत्यादिसूत्रैः सिद्ध्यति । एवं प्रतीची अपाची । "अक्षः" इति निर्देशात् अर्चायां नलोपाभावेऽपि डीसिद्धौ प्राची प्रत्याशील्गादि सिद्धयति । अच इति निर्देशे तु "अश्व प्रागि"तिवटुमनकारस्यैव डीः स्यादिति ॥ ७ ॥ गौरादिभ्यो मुख्यान् डीः॥ ८॥ [सि० २।४।१९ ] मुख्याद्वारादिगणात स्त्रियां डी: स्यात् ॥ ८॥ गौरा० । मुरयादिराधिकारोऽयम । गौरादयश्चैवम्-गौर शवल कल्माप सारङ्ग पिशङ्ग हरिण पाण्डुर अमर मुन्दर चिक्ल विष्कल पुष्कल निष्कल । गौरादीनां गुणवचनत्वेनाजातिवचनादात पाठः । यस्तु विश्लेति कालविशेषयाची आवन्तः स विगता कलेति भविष्यति । दास चेट विट भिक्षुर यन्धक पुत्र गायत्र आनन्द टैट कंटेट नेट एपामजातिवचनत्वादनाने पाठः । फाव्य शैव्य मत्स्य मनुष्य मुफय हय गवय ऋश्य टुणे ओकण । एषां जानियाचित्वेऽप्यष्टानां यान्तत्वात् गुणोकणयोर्निय. स्रीविषयत्वाप्राप्ते पाठः । मारिकि भोलिकि भोलिनि औद्राहमानि आलशि कालगि सौधर्म आयरण आरत; भौरिकि भोलिक्योः प्रोड्यादित्यात् शेपाणां त्यनिसन्तानां गुरूपान्त्यत्यान् प्ये प्राप्ते पाठः । एवं प्रयोऽपि नका.। मरः । पी। धीकरणादियारानन्तरं यादो पर्यन्तरन्धनम्य किया। - .

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । डीः १९१ कथं भौरिक्या भौलिक्या ? क्रौड्यादिपाठात्प्योऽपि । आपच्चिको राष्ट्रसरूपः क्षत्रियस्तस्यापत्यं स्त्री आपच्चिकीत्यत्र शकादित्वाद् ञ्यलोपेऽपि जातिवाचित्वात् डीभवति । एवं 'दोटी वरट नीट मूलाट पाट सृपाट पेट पट पटल पुट कुट फाण्टझ धातक केतक तर्कर शर्कार बदर कुवल लैवण बिल्व आमलक मालत वेतस अतस आढक केंदर कैदल गडूच वाकुच नाच माँच कुम्भ कुसुम्भ यूँप मे सूप ऍप करीर सल्लक बल्लक मल्लक मॉलक मेथें पिपल हरीतक कोशातक शैम तम सैंपव शृंङ्ग मुंङ्ग र पाण्ड५ लोहाँण्ड शैकण्ड पिण्ड मॅण्डर मैंण्डल यूँप सूंप सूप झूम मठ पिठेर कुर्द गूई सूई खार कोकण द्रोण अरीहण ओकण स ऑसन्द अलन्द कन्दल सलन्द देह देहल शप्कुल झव सूच मञ्जर अलज गण्डूज वैजयन्त शालूक उपरतसं सच्छेद; एपां नित्यस्त्रीविषयत्वादनाने पाठः । क्रोष्टु सरस् अन- योरनकारान्तत्वादप्राप्ते पाठः । अनवाही अनडुही । अतएव पाठादनडुह्झदस्य ड्यामुकारस्य पक्षे वा- शब्दादेशः सौ नित्यं नागमाभावश्च । प्रत्यवरोहिणी पृथिवी आग्रहायणी । सप्रत्ययपाठः पुंबद्भावनिपे-१० धार्थः । अनवाहीभार्यः । अनहीवृन्दारकेत्यादि तद्धितलोपेऽपि लुगभावार्थश्च । पञ्चानवाहिः दशा- नडुहिः आश्मरथ्यः । गोत्रयजन्तत्वात् डायन् मा भूत् ड्येव यथा स्यादित्यस्य पाठः । एहि पर्येहि । अनयोरिदन्तत्वात् विकल्पे प्राप्ते नित्यार्थः पाठः । वहुवचनमाकृतिगणार्थ, तेन नद मह भप प्लव चैर गरें तर गाँह देव ढूंद अराल दवड चण्ड उँमाभङ्ग हरीकणी बॅटर अधिकारी एपण करणे इति केचित् । इष्यते अन्विष्यते अनया दोप इति "इपोऽनिच्छायाम्” (५।३।११२) इत्यने सयेपणी वैद्यशलाका, करणादन्यत्रैपणा । अन्वेपणा । आवेव, तदन्येन मन्यन्ते । मुख्यादिति किम् ? वहुनदा भूमिः ।। ८ ।। १६ सुकोडेति-एवं कल्याणी क्रोडाऽस्याः कल्याणकोडा क्रोडशब्दः "कोडोऽके तिन्दुक फले" इति लिङ्गानुशास- १९४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- मृद्वी २ । लध्वी २ । यही २ । साध्वी २ । तन्वी २ । स्वरुरिति-क्रूरा मूर्या दर्पिष्ठा श्वेता वा स्त्री सररिति लघुन्यासे । गुणपरिभापामाह-सत्त्वे० इत्यादि अनुष्टुप् । सत्त्वं द्रव्यं तत्रैव निविशते तदेवाश्रयति यः स गुण इति सबन्धः । द्रव्यादपेत्यपगच्छति यथाम्नान्नीलता पीततायामुपजातायाम् । पृथग्जातिपु भिन्नजातीयेषु दृश्यते यथा नीलतान्ने दृष्टा तरुणणेषु दृश्यते । एतेन सर्वेण जातिगुणो न भवतीत्युक्तं ५भवति । आधेय उत्पाद्यो यथा कुसुमयोगाद्गन्धो वस्त्रे, यथा वाऽमिसंयोगाद् घटे रक्तता । अक्रियाजो नित्यस्तद्यथाकाशादिषु महत्त्वादिः । तदेवं गुणस्योत्पाद्यत्वानुत्पाद्यत्वप्रकारद्वयप्रदर्शनेनोत्पाद्यत्वैकप्रकारस्य कर्मणो व्यवच्छेदः । असत्त्वप्रकृतिः द्रव्यस्वभावरहितः । अनेन द्रव्यस्य व्यवच्छेदः ॥ १३ ॥ श्येतादिभ्यो वा ङीस्तयोगे तो नश्च ॥ १४ ॥ श्येनी श्येता । "क: पलितासितात" (२।४।३७) पलिनी । असिनी ॥ १४ ॥ १० श्येतादिभ्य इति-अत्र च इयतैतहरितभरतरोहितावर्णात्तो नश्च (२४३६) एभ्यः पञ्चभ्यो वर्णवाचिभ्यः नियां डीर्वा स्यात्तत्सनियोगे तकारस्य नो भवति । श्येनी श्येता श्वेतवर्णा । एनी एता करा शुभ्रा वा । हरिणी हरिता नीला । भरणी भरता पाटला धूसरा घृतवर्णा वा । रोहिणी रोहिता, लत्वे लोहिनी लोहिता रक्तवर्णा । चकारो नकारस्य डीसन्नियोगशिष्टतार्थः । "क." त इति च इति चानुवर्तते । पलितासिताभ्यां स्त्रियां डीर्वा भवति, तत्सन्नियोगे तकारस्य कादेशश्च । पलि. १५ तानि सन्त्यस्याः अभ्रादित्वादः डया पलिकी, वालगर्भिणी गौः। न सिनोतिस्म "गत्याकर्मकपिवभुजे. (५।१।११) असिनयन्तःपुरप्रेष्या ॥ १४ ॥ असहनविद्यमानपूर्वपदात्स्वाङ्गादकोडादिभ्यः ॥ १५॥ [१४।३८] सदादिवर्ज पूर्वपदं यस्य ततः क्रोडादिवर्जाददन्तात्स्वानात् स्त्रियां डीर्वा सात् । पीनस्तनी पीनस्तना । अतिकेशी अतिकेशा माला । सहादिवर्जनात् सहकेशा अकेशा विद्यमानकेशा । २० अक्रोडादिभ्यः इति किम् ? सुक्रोडा सुवाला । खागादिति किम् ? बहुशोफा, सुज्ञाना ॥ "अविकारोऽद्रवं मूर्त प्राणिस्थं वागमुच्यते । च्युतं च प्राणिनस्तत्तन्निभं च प्रतिमादिषु" ॥२॥१५॥ असह० । सहश्च नञ् च विद्यमानश्च सहनविद्यमानाः, न सहनविद्यमाना असहनविद्य- मानाः, ते पूर्वपद यस्य तत्तथा तस्मात् । न क्रोडादयः अक्रोडादयस्तेभ्यः। पीनस्तनीत्यादि-पीनी स्तनौ २५ यस्याः । केशानतिकान्ता अतिकेशी २ यूका । एवं स्वडी स्वडा वृश्चिकी, अडो नाम वृश्चिकाद्यवयवः । " १ उखाशब्दसानिध्यात्नील ज्ञायते, गोरिव समिन्द्रिय यस्या सा गोसा। कल्याणा गोसा यस्या इति । अवयव विशेषो जपनरूप । ? नवचनात् स्त्रीकीबलिङ्गम् । तथा कल्याणखुरा पीनगुदा एकशफा दीर्घवाला भव्यभाला सुगला सुभगा कल्याणी उसा स्फिग् यस्याः सा कल्याणोसा, कल्याणगोखा । बहुवचनमाकृतिगणार्थं तेन किशलयक्रा मृणालभुजेत्यादि । आदित्येव-परमशिखा । स्वाहपरिभाषामाह-अविकार इत्यादि श्लोकः । अविकार इति ३० किम् ? बहुशोफा । अद्रवमिति किम् ? बहुकफा । मूर्तमिति किम् ? वहुज्ञाना । प्राणिस्थमिति किम् । दीर्घमुसा शाला । च्युतं च प्राणिनस्तदिति किमर्थम् ? अप्राणिस्थादपि पूर्वोक्ताद्यथा स्यात्-बहुकेशी २ रध्या । तन्निभ च प्रतिमादिप्यपि किमर्थम् ? प्राणिस्थसदृशादपि पूर्वोक्ताद्यथा स्यात् पृथुमुखी पृथुमुसा प्रतिमा । कथं फ्ल्याणं पाणिपादमस्याः कल्याणपाणिपादेत्या न भवति ? स्वानसमुदायो हि न स्वाङ्गम् । ३. यहुस्वरत्वेन यक्ष्यमाणनियमवलाद्वा न भवति इति । द्विपादी त्रिपादीयन तु "द्विगो समाहारात प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । डीः १९५ (२१४।२२) इति विशेपविधानान्नित्यमेव डीभवति । अवाङ्गपूर्वपदादेवेच्छन्त्यन्ये-पाणी एव पादों यस्याः सा पाणिपादा, मुखमेव नासिका यस्याः सा मुखनासिका ॥ १५ ॥ नासिकोदरौष्ठजवादन्तकर्णशृङ्गाङ्गगात्रकण्ठात् ॥ १६ ॥ [ सि० २।४।३९] सहादिवर्जपूर्वपदेभ्यः एभ्यः स्वाङ्गेभ्यः स्त्रियां डीर्वा स्यात् । सुनासिकी सुनासिका । नियम- सूत्रमिदम् , तेनान्येभ्यो बहुस्वरेभ्यः संयोगोपान्त्येभ्यश्च डीन सात् । सुललाटा । सुपार्वा । “नख-५ मुखादनाग्नि वा” (२।४।४०) सुनखी सुनखा । सुमुखी सुमुखा । नानि तु शूर्पणखा । "पुच्छात्” (२।४।४१) तथा । दीर्घपुच्छी दीर्घपुच्छा । कवरादिपूर्वान्नित्यम्-क्रवरपुच्छी । "क्रीतात्करणादे:” (२४४४) अश्वक्रीती । "क्तादल्पे” (२।४।४५) अभ्रविलिप्ती घोरित्यादि । “सपन्यादौ” (२।४।५०) जीर्नोन्तादेशश्च । सपत्नी । एकपत्नी । “ऊढायाम्" (२।४५१) पनी । "पाणिगृहीतीति” (२४५२)। पतिवत्नी । अन्तर्वनी । एवं१० दृढपत्ती । दृहपतिः । ग्रामपत्नी ॥ १६ ॥ नासि० । सुनासिकीति शोभना नासिका यस्याः सा । एवं कृशोदरी २ । विम्बोष्टी २ । दीर्घजवी २ । समदन्ती २ । चारुकर्णी २ । तीक्ष्णशृङ्गी २ । मृदङ्गी २ । सुगात्री २ । स्निग्धकण्ठी २। सहादिवर्जनात्--सहनासिका अनासिका विद्यमाननासिका । तेनान्येभ्य इति-अस्य नियमार्थत्वात नासिकोदराभ्यामेव बहुस्वराभ्याम् , ओष्ठादिभ्य एव संयोगोपान्येभ्यो भवति; नान्येभ्यः, तेन पृथुजघना १५ सुललाटा दृढहृदया इत्यादी बहुखरान्न भवति, सुगुल्फा सुनेत्रा सुपार्श्वयादौ संयोगोपान्त्यान्न भवति । अङ्गगात्रकण्ठेभ्यो ङीप्रत्ययं नेच्छन्यन्ये । केचित्तु दीर्घजिह्वशब्दादपीच्छन्ति दीर्घजिह्वी २। "नख०' वेति-सहादिवर्जपूर्वपदाभ्यामाभ्यां स्त्रियां डीर्वा भवति, अनाम्नि । सुनखीति-एवं सूर्पनखी २ । अतिनखी २ । चन्द्रमुखी २ । अतिमुखी २ । शूर्पणखेति-एवं व्याघ्रणखा वज्रणखा गौरमुखा श्क्ष्णमुखा काल- मुखा; संज्ञाशब्दा एते न तु यौगिकाः । “पुच्छा०” तथेति-सहादिवर्जपूर्वपदात्स्वाङ्गात्पुच्छात् स्त्रियां २० डीवी स्यादित्यर्थः । दीर्घपुच्छीति दीर्घ पुच्छं यस्याः सा तथा । नासिकेत्यादिनियमादप्राप्तौ वचनम् । कवरादीति० "कवरमणिविषशरादेः” (२४१४२) कबरादित्पूर्वात्पुच्छात्त्रियां नित्यं डीभवति। कबरं कर्बुरं कुटिलं वा पुच्छमस्याः कबरपुच्छी । मणिः पुच्छेऽस्याः मणिपुच्छीत्यादि । एवं कवरादि- त्यत्रादिशब्दात् “पक्षाचोपमादेः” (२।४।४३) उपमानपूर्वात्पक्षशब्दात्पुच्छशब्दाच स्त्रियां डी- वति । उलूकस्येव पक्षावस्याः उलूकपक्षी झाला । उलूकस्येव पुच्छमस्याः उलूकपुच्छी सेना । "क्रीता०” २५ करणमादिरवययो यस्य तस्मात् क्रीतान्तानाम्नोऽकारान्तात् स्त्रियां ङीर्भवति । अश्वक्रीतीति-अश्वेन क्रीयते स्म अश्वक्रीती । एवं धनक्रीती वस्त्रक्रीती । विभत्त्युत्पत्तेः पूर्वमेव कृदन्तेन समासः । मनसा क्रीती । अलुप् । करणग्रहणं किम् ? सुक्रीता दुष्क्रीता । आदिग्रहणं क्रिम् ? अश्वेन क्रीता । न ह्यत्र करणं क्रीतान्तस्य नाम्न आदिरवयवो भवति, ऐक्रपद्याभावात् । कथं 'सा हि तस्य धनक्रीता प्राणे- भ्योऽपि गरीयसीति । धनं च सा क्रीता चेति कर्मधारयः । करणविवक्षायामपप्रयोग एव । केचित्तु ३० धनेन क्रीतेत्यत्रावन्तेनापि समासमिच्छन्ति, बहुलाधिकारात् ; तदाकारान्तत्वाभावान् डीने भवति । "क्ता” क्तप्रत्ययान्तान्नान्नः करणादेरल्पेऽर्थे स्त्रियां ङीर्भवति । अभ्रेत्यादि-अभ्रविलिप्यतेस्म अभ्र- विलिप्ती द्यौः । एवं सूपविलिप्ती स्थाली । अल्पाभ्रा अल्पसूपेत्यर्थः । अल्प इति किम् ? चन्दनानुलिप्ता स्त्री । अनल्पेन चन्दनेन लिप्तेत्यर्थः ।, इत्यादिकरणाच "स्वाङ्गादेरकृतमितजातप्रतिपन्नाहु- त्रीहे:” (२।४।४६) स्वाङ्गादेः कृतादिवर्जितात् कान्ताद् वहुव्रीहेः स्त्रियां डीभवति । शी मिन्ना-३५ " - ?

महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- वस्याः शवभिन्नी, अरुभिन्नी, केशविलूनी, गलककृत्ती । कृतादिवर्जन किम् ? दन्तकृता दन्तमिता दन्त- जाता दन्तप्रतिपन्ना । बहुव्रीहेरिति किम् ? हस्ताभ्यां पतिता हस्तपतिता [ "अनाच्छादजात्यादे- नवा" (२।४।४७) आच्छादवर्जिता या जातिस्तदादेः कृतादिवर्जितक्तान्ताद्वहुव्रीहेः स्त्रिया डीर्वा भवति । शाङ्गरो जग्धोऽनया शागरजग्धी शागरजग्धा, पलाण्डुभक्षिती पलाण्डुमक्षिता । अनाच्छा- ५देति किम् ' वस्त्रच्छन्ना वसनच्छन्ना । जात्यादेरिति किम् ? मासयाता, सवत्सरयाता, पूर्वेणापि न भवति-अस्वाङ्गादित्वात् । कृतादिवर्जन किम् ? कुण्डकृता पलाण्डुमिता वृक्षप्रतिपन्ना । क्तादित्येव-शाग- रप्रिया । "सप०" डीरित्यादि । सपत्यादिषु यः पतिशब्दस्तस्मात् स्त्रिया नित्यं डीभवति, नकारश्वा- न्तादेशः । समानः पतिरस्याः समानस्य पतिरिति वा सपत्नी । एवमेकपत्नी सती । वीरपत्नी पिण्डपत्नी भ्रातृपत्नी पुत्रपत्नी । षडेते सपन्यादयः । समुदायनिपातन समानस्य सभावार्थ पुर्वद्भावप्रतिषेधार्थ च । १० सपत्नीभार्यः । सपन्या अय सापनः । “ऊढा." । पत्नीति-पत्युः केवलादूढाया परिणीतायां स्त्रिया डीभवति, नकारश्चान्तादेशः । पत्नी । यजमानस्य पत्नी वृपलस्य पत्नी । ऊढायामिति किम् ? पति- रियं सङ्ग्रहीता भार्या चेत्यर्थः । "पाणि" इति शब्दः प्रकारार्थः । पाणिगृहीतीति प्रकाराः शब्दाः अढाया स्त्रियां डयन्ता निपात्यन्ते । पाणिर्गृहीतोऽस्याः पाणौ वा गृहीता पाणिगृहीती । एव करगृहीती पाण्यात्ती । करात्ती । ऊढायामिति किम् ? यस्या यथाकथचित्पाणिगृह्यते सा पाणिगृहीता । बहुप्रीहा- १५ वेवेच्छन्त्यन्ये ॥ पतिवत्नी अन्तर्वत्नीति-"पतिवन्यन्तर्वन्यौ भार्यागर्मिण्योः" (२१४५३) भार्या अविधवा स्त्री, तस्यामभिधेयाया पतिमच्छब्दाद् डीरस्य च पतिवत्नादेशः, तथा गर्भिण्या स्त्रिया- मभिधेयायामन्तर्वच्छब्दाद् डीरस्य चान्तर्वनादेशो निपात्यते । निपातनादेव च अधिकरणप्रधानादप्यन्तः शब्दान्मत्वर्थीयो मतुर्भवति । भार्येति किम् ? पतिमती पृथ्वी । गर्भिणीति किम् ? अन्तरस्या शालाया- मस्ति । एवमित्यादि-एवमिति सक्षेपद्योतने' । दृढपत्नीति-"पत्युनः" (२।४।४८) पत्यन्ताद्बहुव्रीहेः स्त्रिया २० डीर्वा भवति । तत्सन्नियोगेऽन्तस्य नकारादेशश्च । दृढः पतिरस्या दृढपत्नी दृढ़पतिः । एव स्थिरपत्नी स्थिरपतिः, स्थूलपत्नी स्थूलपतिः, वृद्धपत्नी वृद्धपतिः । मुख्यादित्येव-बहुस्थूलपतिः पुरी । अत्र हि पत्यन्तो बहुव्रीहिर्मुख्यो न भवति । यस्तु मुख्यः स पंत्यन्तो न भवति । ग्रामपत्नीति-"सादेः" (२।४।४९) सपूर्वपदात्पतिशब्दात् स्त्रिया डीर्वा भवति, अस्य च नकारोऽन्तादेशः । पूर्वेणैव सिद्धे पुनर्वचन बहुव्रीहिनिवृत्त्यर्थम् । ग्रामस्य पतिः स्त्री ग्रामपत्नी ग्रामपतिः । आशापत्नी आशापति । २५ अधिष्ठात्री पतिः अधिपत्नी अधिपतिः । ईषदूना पतिः बहुपत्नी बहुपतिः । सादेरिति किम् ? पतिरि- यम् । ग्रामस्य पतिरियम् । मुख्यादित्येव-अतिक्रान्ता पतिमतिपतिः । गौणादपीच्छन्त्यन्ये-अतिपत्नी २ । यदा तु पत्नीशब्दस्य पष्ठ्यन्तेन समासस्तदा राजपत्नी शूद्रुपत्नीत्यायेव भवति ॥ १६ ॥ जातेरयान्तनित्यस्त्रीशूद्रात् ॥ १७॥ [सि० शा५४] यान्तादिवर्जाजातियाचिनोऽदन्तात्खियां डीः स्यात् । आकृतिग्रहणा जातिर्लिङ्गानां च न सर्वभार । संकृदाख्यातनिर्लाह्या गोतं च चरणैः सह ॥३॥ १ धर्मादिषु पनीशब्दस्यापाठादित्यर्थ । १ परत स्त्री० (३।४९ ) जातिश्च ( ३।२।५१) इति प्राप्तस्य । ३ अनन्नि साक्षिक कामादितेन दारकर्मत्वे परिगृहीता } * भार्याया भन्या अप्रधानभूता भगिन्यादि । ५ स्थूला पतयो थासां ता स्थल, पतय इति कृते पयुन इति नविकल्पनात् वह स्थूपतयो यस्याम तायन बहुव्रीहिना बाधितत्वात् । ७ किं तर्हि ' स्थूलपत्य त । ८(अनु) गृह्यतेऽनेनेति आकृतिरवयवरचना ग्रहण यस्या । र लिङ्गाना सर्व सर्वल भजति लिङ्गसमुदाय या सर्व भजते। १० सकृदाख्याता सती नियमेन प्राद्या । - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । डीः १९७ कुकुटी । तटी। नाडायनी । कठी। यान्तादिवर्जनं किम् ? । क्षत्रिया । सट्वा शूद्रा । कचित् नित्यस्त्रीजातेरपि-ओदनपाकी । शङ्खपुष्पी । पूगफली । दर्भमूली । औषधिविशेपा एते ॥१७॥ जाते. योऽन्ते यस्य स यान्तः, नियं स्त्री नित्यत्री, यान्तश्च नित्यत्री च शूद्रश्च बान्तनित्यस्खीशुद्रम् , न यान्तनित्यस्त्रीशूद्रम् अयान्तनित्यत्रीशूद्रम् , तस्मात् । जातिवाचिन इति जातिः सामान्यमभिन्नबुद्धि- ध्वनिप्रसवनिवन्धनमर्थधर्मस्तत्र च कार्यासंभवात्तवाचिनो ग्रहणम् , सा च जातिनिधा, तथा च सम्प्र-५ दायः-आकृतिग्रहणेत्यादि-काचित्संस्थानव्यङ्ग्या, यथा गोत्वादिः। संकृदुपदेशव्यङ्ग्यत्वे सत्यत्रिलिङ्गान्या, यथा ब्राह्मणत्वादिः; अत्रिलिङ्गत्वं देवदत्तादेरप्यस्तीति सकृदुपदेशव्यङ्ग्यत्वे सतीत्युक्तम् । गोत्रचरण- लक्षणा च तृतीया । क्रमेणोदाहरणानि-कुक्कुटी इति प्रथमभेदोदाहरणम् । तटी इति द्वितीयभेदोदाहरणम् । नाडायनीति-नडस्यापत्यं वृद्धं स्त्री "नडादिभ्यः आयनण्” (६।१।५३) इति गोत्रलक्षणा जातिः । कठीति- कठेन प्रोक्तं वेदं वेत्त्यधीते वा "तेन प्रोक्ते" (६।३।१८१) अण् "कठादिभ्यो वेदे लुप्” (६।३।१८३) १० इति लुय्, चरणलक्षणा जातिः, इति तृतीयभेदोदाहरणम् । क्षत्रियति । एवं इभ्या वैश्या आर्या गवयी हवी मुकयी मनुपी मत्सी; ऋश्ची इति गौरादिपाठात् । अन्तग्रहणं साक्षात्प्रतिपत्त्यर्थम् , तेन वतण्डस्या- पत्यं पौत्रादि स्त्रीति यन्; तस्य लोपे स्थानिवद्भावेऽपि वतण्डीत्यत्र यान्तलक्षणः प्रतिपेधो न भवति । खट्वेति-एवं मक्षिका यूक्रा । कथं तर्हि द्रोणी कुटी । अत्र हि शब्दयोनियस्त्रीत्वाभावेऽपि द्रोणीकुटीजा- तेनित्यत्रीत्वात्प्रतिपेधः प्राप्नोति । नैवम् । गौरादिपाठाद्भविष्यति । शुद्रेति-कथं तर्हि महाशूद्री ऑभी-१५ रजातिः । नात्र शूद्रशब्दो जातिवाची किं तर्हि महाशूद्रशब्दः । यत्र तु शूद्रशब्द एव जातिवाची तत्र भवत्येव डीनिपेधः। महती चासौ शूद्रा च महाशूद्रेति । जातिलक्षणस्यैवायं प्रतिषेधो तेन धवयोगे भवत्येव शूद्रस्य भार्या शूद्री । आदित्येव-आखुः तित्तिरिः। मुख्यादित्येव-बहुशूकरा भूमिः, बहुब्राह्मणा शाला । कथं सुपर्णी ? सुपर्णशब्दस्यापि जातिवाचित्वात्तस्य च मुख्यत्वात् । क्वचित् इत्यादि ओदनपाकीति "पाक- कर्णपर्णवालान्तात्" ( २।४५५) पाकाद्यन्ताजातिवाचिनो नाम्नः स्त्रियां ङीर्भवति । ओदनस्येव २० पाकोऽस्याः ओदनपाकी । एवं क्षणे क्षणेन वा पाकोऽस्याः क्षणपाकी । मुद्गपर्णी सालपर्णी । आखुकर्णी शङ्कुकर्णी गौरिव वाला अस्या गोवाली । अश्ववाली ॥ शङ्खपुष्पीति "असत्काण्डप्रान्तशतकाञ्चः पुष्पात्” (२।४।५६) सदादिवर्जिताव्दपूर्वो यः पुष्पशब्दस्तदन्ताजातिवाचिनो नाम्नः स्त्रियां ङीर्भवति । शङ्खपुष्पी सुवर्णपुष्पी । सदादिप्रतिपेधः किम् ? सत्पुप्पा काण्डपुष्पा प्रान्तपुष्पा शतपुष्पा एकपुष्पा प्राक्- पुष्पा प्रत्यकपुष्पा । पूगफलीति "असम्भस्त्राजिनैकशणपिण्डात्फलात्” (२१४५७) समादि-२५ वर्जितझब्दपूर्वो यः फलशब्दस्तदन्ताजातिवाचिनो नान्नः स्त्रियां ङीर्भवति । दासीफली पूगफली दाडिम- फली । समादिप्रतिपेधः किम् ? संफला भनाफला अजिनफला । एकफला एकान्नेच्छन्त्यन्ये । झणफला पिण्डफला ॥ दर्भमूलीति "अनमो भूलात्” (२।४।५८) नवर्जितशब्दपूर्वो यो मूलशब्दस्तदन्ता- जातियाचिनो नान्नः बियां डीर्भवति । दर्भमूली शीर्पमूली । अनत्र इति किम् ? अमूला । ओषधिजाति- विशेपाणां संज्ञा एताः। आसां जातीनां नित्यन्त्रीरूपत्वाद्वचनम् । एतत्सर्व कचिदित्यादिना लेशेनाह ।।१७।३० धवाद्योगादपालकान्तात् ॥ १८॥ [सि० १०५९ पालकान्तवर्जात्संवन्धतः स्त्रीवृत्तेधवनानो डीः स्यात् । प्रष्ठस्य भार्या प्रष्टी । गणकी। अपाल- कान्तादिति किम् ? गोपालिका । *धवयोगोऽनुवर्तनीयः पञ्चमूच्याम् ॥ १८ ॥ १ उभयोरपि सम्बध्यते । २ वैश्यनेद एवानीरो गवाद्युपजीवी । ३ पर्णगन्दस्व जातिवं तस्य च कृते नमामेऽमुस- । ? मित्यभिप्रायः।

१९८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयंगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पालकोऽन्ते यस्य स पालकान्तः, न पालकान्तः अपालका-तस्तस्मात् । धवनाम्न इति धयो भर्ता । प्रष्ठी गणरीति-एव प्रवरी महामानी, कुमायाँ भवो भत्ता कौमारस्तस्य भार्या कौमारी । प्रष्टादयो हि शब्दा धववाचिनोऽपि योगात्सोऽयमित्यभेदोपचारेण भाया वर्तते । यदा तु "तस्येदमि"ति व्यतिरे. कविवक्षा तदा तद्वितो भवति । प्राप्ठी प्रावरी । धवादिति किम् ? परिसृष्टा प्रजाता प्रसूता। सर्वन ५विनि ठितगर्भेत्यर्थः । अस्त्यन योगस्तेन विना प्रसवाभावान्न तु धववाचि नाम । योगादिति किम् । देवदत्तो धवो, देवदत्ता भार्या स्वत एव न तद्योगात् । गोपालिकेति-गोपालकस्य भार्येत्यर्थः। आदित्येष *धव. सहिष्णोर्भायर्या सहिष्णुः । कथ ज्येष्ठस्य भार्या ज्येष्ठा, एव कनिष्ठा मध्यमा ? अजादिपाठात् । योग इत्यादि लाघवार्थमाह ॥ १८ ॥ पूतक्रतुवृषाकप्यग्निकुसितकुसिदादै च ॥ १९ ॥ [सि० २।४।६०] एभ्यः पञ्चभ्यो डीस्तयोगेऽन्तस्यैः । पूतक्रतोः स्त्री पूततायी ॥ १९ ॥ पूत० । पूताः क्रतवो येन सः पूतक्रतुः । वृपो धर्मः कपिर्वराहस्तादूप्यात्पुपोदरादित्वादीघे घृपा- कपिः, वृपं दानवमाकम्पितवान् वा वृपाकपिर्माधवः । कुसितकुसिदी कपी । ततः पञ्चानां द्वन्द्वः । ऐ चेत्यन्तादेशो न तु प्रत्ययः । “एयेऽनायी" (३।२१५२) इति सूरनिर्देशात् , नहि ऐकारस्य प्रत्य- यत्वे अग्नायीति भवति । एभ्यः पञ्चभ्य इति-धवनामभ्य इत्यर्थः । पूतकतायीति पूतकतोर्भार्या । १५एव वृपाकपायी अनायी कुसितायी कुसिदायी । योगादित्येव-पूता कतनो यया सा पूतऋतु । एक वृपाकपि म काचित् ॥ १९ ॥ मनोरौ च वा ॥ २०॥[सि० २।४।६१] मनोर्डीगा तद्योगे औरैश्च स्याताम् । मनायी । मनावी । मनुः ॥२०॥ मनो० । मनोर्डीवेति । वाशब्दः प्रथम विधेयतया प्रधानेन डीशब्देन योज्यते, न तु सन्नियोगशिष्ट- २० सादप्रधानेनान्तादेशेनेति । औरैश्चेति-चकार ऐकारस्यान्तादेशस्यानुकर्षणार्थस्तेन डीसन्नियोगे औकार ऐकारश्चान्तादेशौ क्रमेण स्यातामिति भावः ॥ २० ॥ वरुणेन्द्रभवशवरुद्रमृडादान्चान्तः ॥ २१॥ [सि० श४६२] एभ्यः पइभ्यो डीस्तद्योगे आन्चान्तः । वरुणानी । इन्द्राणी ॥ २१ ॥ घरु० । आन्चान्त इति । डीसन्नियोगे च आनन्त आगमो भवति । अन्तग्रहणाभावे आनपि पृथक २५ प्रत्ययः स्यात् । आदेशत्वे च "अनेकवर्णः सर्वस्य” (७।४।१०७) इति सर्वस्यादेशः स्यात् । इन्द्रा णीति । ण्व रद्राणी भवानी शर्वाणी मृडानी । कश्चित्वाहिताग्नेर्भार्या आहितान्यानी । एवं प्राजापत्यानी याणिजानीत्यादावपीच्छति । नत्वनागमेनैवेन्द्राणीत्यादि सिद्ध्यति इति किमानागमकरणेन, मानालाघव हि पुत्रोत्सवाय मन्यन्ते वैयाकरणाः । नैवम् किपथ प्रकृतिरेवाहेति किबन्तानामपीन्द्रादिशब्दाना पराभिप्रायेणानागमे इन्द्राणीत्यादि रूपाणि सिद्ध्यन्ति नयनागमे । तथाः श्रीसूरयो हैमवृहद्भुत्तौ । ३०"इन्द्रमाचष्टे इन्द् तद्भार्या इन्द्राणी एव मातुलानीत्यपर इति” ॥ २१ ॥ १ अन सोऽयमित्यभिसम्बधेन वृत्तिवेदितव्या । नद्ययमेवाभिसम्बन्धस्तस्वदमिति, किन्तु सोऽयमित्यपि । अमेदाय मेदस्य निवृत्तला। तद्धितानुपपत्ति । २ प्रऽस्पेयमिति मेदविवोय। परिसर्गप्रसको सम्बन्धनिमित्तौ न च तो पुमा समाचशाते । अन्ये लाहु-परिगर्गो दोहद उच्यते, तेन परिमष्टा परिसातदोहदेत्यर्थ । प्रजन प्रथम गर्भग्रहणम् , प्रावस्तु गर्भविनिईण्ठनम् । एतेच योपित एव सम्बन्धो न पुस । पुरुषसंयोगनिमिता एते न तद्वाचिन इत्यर्थे । - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । डी: १९९ ... ... --- मातुलाचार्योपाध्यायादा ॥ २२ ॥ [ सि०।४।६३] एभ्यस्त्रियो डीस्तद्योगे चानन्तो वा । मातुलानी मातुली । शुभ्नादि (२१३१९६) पाठान्न णत्वमिति आचार्यानी आचार्टी । उपाध्यायानी उपाध्यायी । “सूर्याइवतायां वा" (२।४।६४) डीस्तद्योगे चानन्तः । सूर्याणी सूर्या । "आर्यक्षत्रियाद्वा” (२४६६) आर्याणी आर्या । क्षत्रियाणी क्षत्रिया ॥ २२ ॥ मातु० । आचारुति नेच्छन्यन्ये । अन्ये तु मातुला-आचार्या-उपाध्यायेत्यपीच्छन्ति । तदर्थ डीरिति विकल्पनीयः । “सूर्या०" देवतायामिति किम् ? सूर्यस्यादित्यस्य मनुष्यस्य वा भार्या मानुपी सूरी । "सूर्यागस्त्ययोरीये च” (२२४१८९) इति य लोपः । सूर्याणीति नेच्छन्त्यन्ये । "आर्य” अत्र धवयोगो नानुवर्तते पञ्चसूत्र्याः समाप्तत्वात् । आर्यः, क्षत्रियः, पुमान् । श्री चेत्-आर्याणी आर्या, क्षत्रियाणी २ । धवयोगे तु विशेषविधानात्यूर्वेण निलं जीरेव-आर्यस्य भार्या आर्या, एवं क्षत्रियी ।१० धवयोगे एवायं विधिरिति कश्चित् तन्मते आर्यस्य, अत्रियस्य, भार्या आर्याणी २, क्षत्रियाणी २ । धवयोगादन्यत्र तु आर्या क्षत्रियेत्येव भवति ॥ २२ ॥ यवयवनारपयहिमाद्दोपलिप्युरुमहत्त्वे ॥ २३ ॥ [ सि० शा६५] एम्यश्चतुर्यो यथासयं दोपादौ गम्ये डीः स्यात् , डीयोगे चानन्तः। यवानां दोपो यवानी । यवनानां लिपिर्यवनानी । उरु अरण्यं अरण्यानी । महद्धिमं हिमानी । “यो डायन् च वा" १५ (२१४६७) गाायणी गार्गी { एवमन्यत्रापि यथायोगम् ।। २३ ।। यव० । दुष्टो यव इति-यवानां दोपकारि सहचरितं द्रव्यान्तरम् , रालक इत्यर्थः । अग्रसवधर्माणो चवा एवेत्यन्ये । यवनानीति-उक्तार्थत्वात् "तस्वेदम्” (६।३।१६० ) इत्यण न भवति तढिपत्रे डीविधानात् । उचिति-उम्महत्त्वयोरेकार्थत्वेऽपि पृथग ग्रहणं यथासंख्यार्थम् । लिपीति किम् ? बावनी वृत्तिः, यवनस्य भार्या चवनी । यवयवनारण्यहिमानां तु दोपाधभावे बीत्वमेव नास्तीति न प्रत्युदाद्वियते ।२० संज्ञायां तु भवत्येव-यवा अवना अरण्या हिमा नाम काचिन् । “यमो०" यप्रत्ययान्तात त्रियां डीभवति, डायन् चान्तो वा भवति । "श्रुतानुमितयोः श्रीतो विधिबलीयानि ति न्यायान् वाशब्दोऽन श्रुते । गाायणी पक्षे चलोपे गार्गी, एवं वात्सी वात्स्यायनी । अथोक्तोपं डीप्रकरणं महेपेण सह- हाति । *एवमित्यादि-यथायोगमिति सूत्रानुसारेण अन्यत्राप्युक्तोपे कचिन डायनसंनियुको डीः फचिन केवलं डीरेवमुक्तरीत्यानुसन्धयः । तथाहि-"लोहिनादिशकलान्तात्” (२।१।६८) लोहिना ३५ दिभ्यः शकलान्तेभ्यो यत्रन्तेभ्यः बियां डीर्भवति, तत्सनियोगे बायन्चान्तः । लोहित्यायनी । मांशि- त्यायनी कात्यायनी झाकल्यायनी । लोहितादिः शकलान्तो गर्गाद्यन्नर्गणः एकोनत्रिंशत्रपरिमिनः । "पावटाद्वा" (२१४६९) पकारान्तानान्नोऽवटादार यान्ताल्लियां दी भवति, नत्मन्नियोगे डायन्चान्तः । पीतिमाप्यायणी पातिमाप्या, शाराक्ष्यायी झार्कराक्ष्या । गाकक्ष्यायणी गौकश्या । आवट्यायनी आवट्या । एषु पृतिमापशर्कराक्षगोकक्षावटादेभ्यो “गादेर्यम्” ( ER) प्रति चञ् । “कौरव्यमाण्डूकासुरः" (21. ) भ्यः त्रियां शीर्भवति, तत्मन्नियोगे टायन्चान्तः। कारख्यायणी माण्टकायनी आमुरावणी । एषु "दुनादिकविकोदालाजादाळ्यः (1212:८)अनि में कौरव्यः, "पीलासाल्वामकादा" (६२।६८) इत्यणि माण्डकः बालादिभ्यो गान (11३.३३ १ पूर्व, मूनि तु गट एव । २ विहारकमानगवा प्रोजनम् । सामना संपन्धो नागिन प्रत्येक मल्लासतः, पाणी गरमाया। - -- २०० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिनिरचिते खोपज्ञहमलघु- इतानि आसूरिः । "इज इतः" (२४७१) इप्रत्ययान्तानान्न इकारान्तात् खियां डीभवति मुतगमेन निवृत्ततीनि सौतगमी । एवं मौनवित्ती । "सुतगमादेरि" (६२।८५) इति चातुरर्थिक इन् । इत इति किम् ? इलादेशात्प्यान्माभूत् । वराहस्यापत्यं पाराह्या, एवं वालाक्या कारीपगन्ध्या कौमु- दगन्ध्या । "नुर्जातः" (२४७२) नुर्मनुप्यस्य या जातिस्तद्वाचिन इकारान्तान्नान्नः बियां डी- ५र्भवति । अवन्तेः कुन्तेश्चापत्यमिति "दुनादि०" (६।१।११८) इति व्ये “कुन्त्यवन्तेः खियाम् (६।१।१२१) इति तस्य लोपे अवन्ती कुन्ती।दाक्षी। साक्षी । तैकायनी 'तिकादेरायनिम् (६।१।१०७)। ग्लुचुमायनी 'अदोरायनिः प्रायः' (६।१।११३) । इत इत्येव-विशोऽपत्यमित्यञ्, दरदोऽपत्यं "पुस्म- गध०" (६।१।११६) इत्यण "द्रेषणो०” (६।१।१२३) इत्युभयन प्रत्ययलोपे विद दरद् । अवन्तीयतेः विप् तस्य लोपे अवन्ती स्त्री । नुरिति किम् ? तित्तिरिः । जातेरिति किम् ? निष्का- १० शाम्निः कन्या।"वा पादः” (२।४।६) बहुनीहेस्तनिमित्तपादाब्दान्तात् खिया डीर्वा भवति । द्विपदी "यखरे पादः पदणिक्यघुटि" (२।१।१०२) इति पाच्छब्दस्य पदादेशः। द्विपात् । “अशिशो" (२१४१८ ) अस्माद्वहुजीहेः खिया डीभवति । अविद्यमानः शिरस्याः अशिश्वी । बहुबोहेरिसैव-न शिशुः अशिगुः । “सहयादेहायनाद्वयसि" (२।४।९) सहगदेयिनशब्दान्तानाम्नो बहुनीहे: स्त्रियां वयसि गम्यमाने डीभवति । विहायनी निहायणी चतुर्हायणी वडवा "चतुहायनस्य वयसि" १५(२१३२७४) इति णत्वम् । सहादेरिति किम् ? अतीतहायना । हायनादिति किम् ? द्विवर्षा कन्या । चयसीति रिम् ? द्विहायना निहायना चतुर्हायना शाला। कालकता प्राणिना शरीरावस्था वय इति गत्व- मपि न भवति । "दाम्नः" (४१०) एतदन्ताहुनीहेः स्त्रिया डीभवति । द्विदाम्नी त्रिदानी । "परिमाणात्तद्धितलुक्यविस्ताचितकम्बल्यात्" (२।४।२३) परितः सर्वतो मानं परिमाणम्, तय रूढिवशात् प्रस्थादि । यदाहुः "ऊर्द्धमान किलोन्मानम्, परिमाणं तु सर्वतः । आयामस्तु प्रमाण २० स्यात्, सहसा वाया तु सर्वतः" ॥१॥रितादिभ्यो यदन्यत्परिमाण तदन्ताहिगोरवारान्तात्तद्धिखलकि स्त्रिया टीर्भवति । द्वाभ्या कुडवाभ्या नीता "मूल्यैः प्रीते" (६।१।१५०) इति इकणि, "अनाम्यतिः गुप्' (६।४।१४१) इति तलुपि द्विवुडवी निकुडवी, शाहरी व्याडकी । परिमाणादिवि किम् ? पश्य- भिरश्वः मीना पञ्चाश्वा । तद्धितलुकीति रिस ? द्विपण्या "पणपामापाद्यः" (६।४।१४८) इति ! अयिमादेरिति रिम् ? द्विपिता याचिता द्विवम्बल्या 1 "काण्डात्प्रमाणादक्षेत्रे" (२।४।२४) २. प्रमागयाचिकाण्डशदादनविपयाहिगोतद्धितलुकि सति स्त्रिया डीयति । आयामः प्रमाणं । द्वे काण्डे प्रमागमम्या द्विपाण्डी रनुः । प्रमाणादिति निम' द्वाभ्या पाण्याभ्या नीता द्विपाण्डा शाटी । अक्षेत्र शी किम् ? द्वे पाण्डे प्रमागमस्या द्विमाण्डा क्षेत्रभक्तिः भक्तिप्रहण तद्धितार्थम्य स्त्रीत्वार्थम् । “पुरुपाद्वा" ( २५) प्रमाणवाचिपुरपटान्दान्ताहिगोसद्धितलुकि निया डी; भवति । द्वौ पुरपी प्रमाणमस्या द्विपुरषी द्विपुरग परिसा ! "इम्तिपुरपाद्वाऽम्" (७१।१४१), "द्विगोः साये च” (७।१।१४४) ३० इत्यो टुर । प्रमागादित्येव-द्वाभ्या पुरपाम्या फ्रीता द्विपुरुषा पटवा। "रेवतरोरिणाढ़े" (४।२६) रेयती रोहिणीभ्या नक्षनशब्दाभ्या प्रिया टर्भिवति । रेसी रोहिणी । यदापि "चितारेवतीरोहिण्याः रियाम्" ( ६।३।१०८ ) शी जागीयम्यानो लुरि सीप्रत्ययम्यापि लुग भयति तदापि नावाद या गुनग्नेन सीति । रेपत्या जाता रेवती, रोहिण्या जाना रोहिणी । म इति रिम् ? रेवता रोहिया रेपनीरमणोपः"रयती शुगरवती' ? यनान्दो मत्वर्थीयान्तोऽसि त दिपमो सीः । पय रोग पटुरोन" ? रोहिणाब्दः प्रन्यन्नरममि ततो जारिलक्षणो ही: । "नीला परमाण्यापध्योः" (२७) नीलगालातिनि औषधी गलियां हीमयति । नीलो गौः, नीरी - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे स्त्रीप्रत्ययाः । ज्यादयः 8770 २०१ वडवा । नीली ओपधीः । प्राण्यौपध्योरिति किम् ? नीला शाटी । "क्ताच नान्नि वा” (२।४।२८) नीलशब्दात् क्तान्ताच शब्दरूपात स्त्रियां ङीर्वा भवति, नाम्नि संज्ञायाम् । नीली नीला | प्रवृद्धा चासौ विलूना चेति प्रवृद्धवविलूनी प्रवृद्धविलूना । एतत्सर्वं एवमित्यादिना संक्षेपेणाह इति डीप्रकरणम् ॥२३॥ उतोऽप्राणिनश्चायुरज्वादिभ्य ऊङ् ॥ २४ ॥ [सि. २४७३ ] नृजातिवाचिनोऽप्राणिजातिवाचिनश्चोदन्तात् स्त्रियामूङ् स्यात्, न तु य्वन्ताद्रज्यादिभ्यश्च । ५ कुरूः । अलावूः । प्राणिजातिवर्जनादाखुः । युरज्यादिवर्जनादध्वर्युः स्त्री । रज्जुरित्यादौ नोः । "वाह्वन्तकद्रुकमण्डलो नि” (२।४।७४) । सुवाहूः । कद्रूः । कमण्डलः । नाम्नीत्येव- वृत्तवाहुः ॥२४॥ उतो० । कुरूरिति-एवं इक्ष्वाकूः ब्रह्मवन्धूः इति नृजात्युदाहरणम् । अलावूरिति-एवं कर्कन्धूः इत्य- प्राणिजात्युदाहरणम् । ब्रह्मा वन्धुरस्या इत्यत्रोङः पूर्व "शेषाद्वा” (७।३।१७५) इति कच्प्रत्ययः परोऽपि १० न भवति, तत्र बहुलाधिकारात् । उत इति किम् ? विट् । वधूः । अङि हि सति वधूमतिक्रान्ताऽतिव- धुरित्यत्र ह्रस्वत्वं स्यात् । यथातिब्रह्मवन्धुरित्यत्र ॥ आखुरिति-एवं कृकवाकुः । नृजातिवाचिन इत्यत्र जातिग्रहणात्-पटुः चिकीर्षुः स्त्रीत्यन्न नोङ् । अप्राणिनो जातिवाचिन इति ग्रहणात् काकुः स्वरभेदः, शङ्कः संख्याभेदः इत्यादौ नोड् । अध्वर्युः स्त्रीति चरणत्वाजातिः । रज्जुरिति-एवं हनुः । वहुवचनमाकृति- गणार्थम् । कथं तर्हि भीरु गतं निवर्त्तते इति । भीरुशव्दस्य हि जातिवाचित्वाजातिलक्षणस्योडोऽभावे सम्बो-१५ धने ओत्वं प्राप्नोति । नैवम् । ताच्छीलिकानां संज्ञाप्रकारत्वात् मनुष्यजातिवाचित्वादूङि ह्रस्वत्वं सिद्धम् । अन्ये त्वसूर्यपश्यरूपा त्वं किमु भीरुररायसे इतिप्रयोगदर्शनाजातिवचनत्वमनिच्छन्त अडं न मन्यन्ते । "वान्त०" वाहुशब्दान्तानाम्नः कद्रुकमण्डलुभ्यां च नाम्नि विपये स्त्रियामूङ्प्रत्ययो भवति । सुवाहूरिति एवं मद्रवाहूः भद्रबाहूः कद्रूः कमण्डलूः संज्ञा एताः । वृत्तवाहुरिति-वृत्तौ वाहू अस्या वृत्तवाहुः ॥२४॥ उपमानसहितसंहितसहशफवामलक्ष्मणायूरोः ॥ २५ ॥ [ सि० २।४।७५] २० उपमानवाचिभ्यः सहितादिभ्यश्च पड्भ्यः परस्य ऊरोः स्त्रियामूङ् स्यात् । रम्भोरुः । सहि- तोरूः । नारीसखीपाश्वश्रूः (२।४।७६ ) एते साधवः ॥ २५ ॥ उप० । ऊरोरिति-उपमानादिपूर्वपदेभ्यः परस्य ऊरोरित्यर्थः । रम्भोरुरिति-रम्भेवोरू यस्याः । एवं करभोरूः । नागनासोरूः । कदलीस्तम्भोरूः । सहितोरूरिति, एवं संहितोरूः शफोरूः वामोरूः लक्ष्म- णोरूः । उपमानाद्यादेरिति किम् ? वृत्तोरुः पीनोरुः । “नारी०” एते साधव इति एते शब्दाः स्त्रियां २५ ड्यन्ता ऊङन्ताञ्च निपात्यन्ते । नृनरयोङा नारादेशः, नारी । सखिशब्दात् सखान्दान बहुव्रीही, सखी । सह खेन वर्तते या सापि सखी । निपातनसामात् धवयोगेऽपि भवति-सत्युः स्त्री सखी । पशुशब्दादजातावूङ् पङ्गः । श्वशुराब्दाजातिलक्षणे धवयोगलक्षणे च ङीप्रत्यये प्राप्ने ऊ उफाराकार- योर्लोपश्च श्वश्रूः । श्वशुरशब्दस्य संज्ञात्वे तु श्वशुरा ॥ २५ ॥ यूनस्तिः ॥ २६ ॥ [२४७७] स्त्रियाम् । युवतिः। "अनार्षे वृद्धेऽणिनी बहुखरगुरूपान्त्यस्यान्तस्य प्यः (२।४।७८) कारीपगन्ध्या । देवदत्त्या इत्यादि ।॥ २६ ॥ इति धीमहोपाध्यायधीकीर्तिविजयगनिधियोपाध्यायधीविनयविनयानिनिरचिनायां हमलघुप्रक्रियामा सोप्रत्ययाधिकारः सनमः ॥ १अर्यस्यमिदं प्रानवासी विलनमा सरी दिति न कार्यम्, अन्यथा गायाभावात् गोवान्ताव गावात् पोर्न स्यात् । गोपधिविशेषः भरारमः संशागदा व्युत्पत्तिमानितम् । है० प्रा० पूर्वा० २१ 1 . . , ? २०२ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- यून० । युवनशब्दात् खियां तिः प्रत्ययो भवति, नकारान्तत्वाद् डीप्रत्यये प्राप्ते तदपवादो योगः। युवतिः । यूनीत्यपि कश्चित् , न तच्छिष्टसंमतम् । कथं युवती ? यौतेरौणादिककितिप्रत्ययान्तात् "इतो. उत्तयर्थात्' (२१४१३२) इति डीभविष्यति । मुख्यादित्येव-अतियूनी नियूनी । “अना." अना युद्धे विहितौ यावणिजौ प्रत्ययौ तदन्तस्य सतो वहुवरस्य गुरूपान्त्यस्य नानोऽन्त्यस्य ध्य इत्यादेशों ५भवति, स्त्रियाम् ; गुरुग्रहणादनेकव्यञ्जनव्यवधानेऽपि भवति । गुरुग्रहणं हि दीर्घपरिग्रहार्थं संयोगपं. रिग्रहार्थं च, अन्यथा दीर्घोपान्त्यस्येत्युच्येत । कारीपगन्ध्येति-करीपस्येव गन्धोऽस्य करीपगन्धिस्तस्याप पोत्रादि घी "डसोऽपत्ये" (६।१।२८) इति अण् , तस्य प्यादेशः । एवं कौमुदगन्ध्या। देवदत्त्येति- देवदत्तस्यापत्यं पौत्रादिः स्त्री "अत इन्" इतीम् , तस्य प्यादेशः । एवं वाराह्या वालाक्या । अना इति किम् ? वासिष्ठी विश्वामित्री । वृद्ध इति किम् ? वराहस्य प्रथमापत्यं स्त्री वाराही । अहिच्छने जावा १० आहिच्छत्री । एवं कान्यकुब्जी । अणिज इति किम् ? ऋतभागस्यापत्यं विदादित्वादन आर्चभागी । एव. माप्टिंपेपणी । बहुस्खर इति किम् ? दाक्षी प्लाक्षी। गुरूपान्त्यस्येति किम् ? औपगवी कापटवी । अणिमन्तस्य सतो बहुस्वरादिति विशेपणं किम् ? द्वारस्यापत्यं पौत्रादि स्त्री इतीनि दौवार्या । तथा उडुलोनोऽपत्य- मिति इमि "नोऽपदस्य तद्धिते” (७४।६१) इत्यन्त्यस्वरादिलोपे औडुलोम्या।सारलोम्या-अत्रेनः पूर्वम- यह्रखरत्वेऽगुरूपान्यत्वे च सत्यपीभि सति वहुस्वरत्वाद्गुरूपान्त्यत्वाच यथा स्यात् । नियामित्येव-मारी: १५पगन्धो वाराहिः पुमान् । मुख्यस्पेत्येव-बहवः कारीपगन्धा यस्यां सा बहुकारीपगन्धा । निर्वा राहिः । कथं सौधर्मी आयस्तूनी भोलिङ्गी आलम्वी आलच्ची कालची औद्रामाती ? गौरादिपाठात् । इत्यादिकरणाञ्च कुलाख्यानाम् (२१४१७९) पौणिक्या भौणिक्या मौसर्या गौत्या । युणिकभुणिकादयः फुलाख्याः । क्रौड्यादीनाम् (२१४१८० ) अबहुवरागुरूपान्यार्थोऽनन्तरापत्यार्थश्चारम्भः 1 नोडस्थापत्यं नौडिः स्त्री फ्रोड्या । लाड्या । क्रौडि लाडि व्याडि इत्यादि क्रौड्यादयः । "भोजसूतयोः क्षत्रिया. २० युवत्योः” (२४६८१) भोजसूतशब्दयोरन्सस्य क्षत्रियायुक्त्योरभिधेययोः स्त्रियां प्यादेशो भवति । भोज्या, भोजवंशजा क्षत्रिया । सूत्या प्राप्तयौवना मानुषीत्यर्थः । अन्ये तु सूतसंवन्धिनी युवतिः सूत्या न सर्वेत्याहुः । क्षत्रियायुक्त्योरिति किम् ? भोजा सूता ।। "देवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुनि काण्ठेविद्धा" (२१४१८२) एषामिगन्तानामन्तस्य स्त्रियां प्यादेशो या भवति । इमन्तमात्रनिदे- शात् पौत्रादौ प्राप्ते, प्रथमापत्ये लप्राप्ते विभापा । देवयझ्या देवयज्ञी, शौचिवृक्ष्या शोचिवृक्षी, सात्समध्या २५सात्यमुप्री, काण्ठेविद्धया काण्ठेविद्धी । इत्यादि सर्व इत्यादिकरणेन संगृहीतमिति ॥ २६ ।। यां शिप्योभद्रुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपाला मजः। तस्यां शासितसाधुशब्दसरणो स्वोपनसत्प्रक्रिया- वृत्तायव्ययनिर्णयोऽय विरतिं स्त्रीमत्ययवाभजत् ॥ १ ॥ । २९ । भारिपचारमापशिनि प्रापिपिलि सोपानति भोरिकि भौलिक परमलि शालस्थति कापिटाडि रोटि देवत्तिका दत इलादय इमन्ताः, पोपपत पैकरत पेटतपयन कपत एतदेशयात् टेय. पोपटक यति भापलस पस स्पानिमा बन्ये सब प्यस प्रसपतमिन्द्रो यो नेन्वि-बायः घोपपलेपः । बरबनमा रिगाम्।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाश कारकप्रक्रिया । कारकलक्षणम् २०३ नाम का नाम किया था भ्य ते - शब्दप्रक्रियानिरूपणानन्तरं कारकप्रक्रियां निरूपयितुमाह- क्रियाहेतुः कारकम् ॥ १॥ [सि० २।२१] क्रियाया हेतुः कारणं कादि कारकसंज्ञं भवति । तच द्रव्याणां स्वपराश्रयसमवेतक्रियानिर्वर्तकं सामर्थ्य शक्तिरित्याचक्षते । शक्तिश्च सहभूर्याबद्रव्यभाविनी च क्रियाकाल एवाभिव्यज्यते ।५ करोतीति कारकमिति अन्वर्थसंज्ञासमाश्रयणाचानाश्रितव्यापारस निमित्तत्वमात्रेण हेत्वादेः कारकसंज्ञा न भवति ॥१॥ अथेति० । तन्न कारकस्य लक्षणमाह-क्रियाया हेतुः कारणम् । क्रियास्वरूपं वक्ष्यते । कारकाव्दः कर्तृमानपर्यायः । कादीत्यत्र कर्तृशब्दस्तु कर्तृविशेषवचनस्तेन कादि कारकसंज्ञमिति विशेषण विशेष्यभाव उपपन्न इति । अन्यथा वृक्षो वृक्षसंज्ञ इतिवन् सोऽनुपपन्नः स्यादर्थस्याभेदादिति । कारक-१० शब्दाभिधेयं च द्रव्याणां स्वपराश्रयसमवेतक्रियानिवर्तकं सामर्थ्य शक्तिरित्याचक्षते । क्रिया हि द्विविधा-कर्तृस्था कर्तृसमवायिनी आसनगमनादिका; यथा चैत्र आस्ते । कर्मस्था च कर्मसमवायिनी पाकादिका; यथा ओदन पचतीत्यादि । अस्योपलक्षणत्वात् अन्योन्यमालिप्यत इत्युभयाश्रितापि । कारकेषु च कर्तृकर्मणी क्वचित् स्वाश्रयसमवेतक्रियाया निर्वर्त्तके कचित्पराश्रयसमवेतक्रियायाः, शेपाणि पराश्रय- समवेतक्रियानिवर्तकान्येव । द्रव्याणां च सामर्थ्यमेव कारकमिति नेयम् , द्रव्यस्य तु कारकत्वे प्रतिबन्ध-१५ कमन्त्रादिसन्निधानासन्निधानाभ्यां दहनादेर्दाहादिक्रियोत्पत्त्यनुत्पत्ती न स्याताम् । द्रव्यस्वरूपस्य सर्वदा विद्यमानत्वादुत्पत्तिरेव स्यात् , तस्माच्छक्तिरेव कारक्रमित्यास्थेयम् । शक्तिहिं द्रव्यस्य धर्मस्तस्य चतुष्टयी गतिः कश्चित्सहभूर्यावद्रव्यभावी च, यथा स्फटिकस्य शौक्ल्यम् । कश्चित्सहभूरयावद्रव्य- भावी, यथाऽपकघटस्य श्यामिका । कश्चिदसहभूर्यावद्रव्यभावी च, यथा तस्यैव घटस्य पाकजा रूपा- दयः । कश्चिदसहभूरयावद्रव्यभावी च, यथा मेपयोः संयोगः । तत्र शक्तिलक्षणस्तु द्रव्यधर्मः२० सहभूर्यावद्र्व्यभावी च । न चैवं सदा क्रियोत्पत्तिप्रसङ्ग इति वाच्यमभिव्यक्ताया एव तम्याः शक्तः क्रियाहेतुत्वात् । यथा केतक्यादिजलादीनां वर्पाद्यभिभूतस्य गन्धस्य तरणिकिरणसंपर्काभिव्यक्तस्य गन्धो- पलब्धिः क्रियाहेतुत्वम् , न चैतावता तस्यासत्त्वमुत्तरकालमभिव्यज्यमानत्वात् । न च तदैव तस्योत्पत्तिरि- त्यपि वाच्यम्-रविकरस्पर्शख गन्धोत्पत्ती सामर्थ्यानवधारणात् , सामर्थ्य वा जलान्तरेऽपि ततो गन्धो- त्पत्तिः स्यात्तस्मात् क्रियाकालाभिव्यक्तशक्तिः कारकमिति स्थितम् । ननु कथमत्र कारकशब्दः संज्ञा २५ क्रियाहेतुः संज्ञीति न पुनर्व्यत्यय ? इत्यत्रोच्यते । आचार्यव्यवहारात्संज्ञासिद्धिः, तद्यथा-लोके माता- पितरौ पुत्रस्य नाम कुरुतो देवदत्त इति, तयोराचारादन्येऽपि जानन्ति इयमस्य संक्षेति, एवमिहापि केचि- ब्याचक्षाणा आहुः कारकशब्दः संज्ञा, क्रियाहेतुः संज्ञी इति । अपरे कारकमित्युक्त्वाकर्तादीन्युदाहरन्ति, तेन मन्यामहे-यया प्रत्याय्यते सा संज्ञा, के प्रतीयन्ते ते संन्निन इति । यदपि संज्ञासंझिनोरसन्देहो वक्तव्य इत्युक्तं तदपि न-आचार्यव्यवहारे देवदत्तत्य सिद्धत्वान् । कारकादत्व हि प्रत्यायनशक्तिा-३० १ निवर्तकम् । २ कियार्थो धातुः इत्यत्र । ३ कारऋमिवि संज्ञाया भाग्यमानेनत दुनविभज्यनुपपत्या भाव्यमानभिग्या प्रथमया निर्देशः । ४ अय संक्षेति प्रहल कारकादयः शब्दाः पठितव्याः, अन्यथा कारकादयः संज्ञा दलेप सन्यालयीन स्यात्, अतः संसाधिकार इति वाच्यम्, तथा क्रियमागोऽपि संतामशिनोरनन्देहो वरचः ग्यमन्यया चारहाणेला वृहत्यासेऽधिकः पाठः। ।

२०४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- रयानेन प्रकाश्यते यथाऽकारादीनां वर्णत्वमिति । किञ्च अनाकृति. संज्ञा आकृतिमन्तः संज्ञिन इति लोकेऽपि वाकृतिमतो मांसपिण्डस्य देवदत्त इति सज्ञा क्रियते, आकृत्या हि साहचर्यभावो लक्ष्यते, तेनाय- मर्थः-कारकशब्द एकत्वात्संज्ञा, क्रियाहेतुशब्देन प्रत्यायितानां बहुत्वात् सज्ञित्वम् , लाघवार्थत्वात्संज्ञाकर- पस्य, तथा आवर्तिन्यः संज्ञा भवन्ति, कारकशब्दश्वावर्त्तते न क्रियाहेतुशब्दस्तद्यथा-देवदत्तशब्द आवर्तते ५न मांसपिण्ड इति, अथवा सतः कार्यिणः कार्येण भाव्यमिति पूर्वोच्चारितः संज्ञी, पश्चादुच्चारिता सज्ञेति । अथ क्रियाहेतुरिति सज्ञिनिर्देशः किमर्थः ? इत्यनोच्यते-अकारकस्य कारकसंज्ञा माभूदित्येवमर्थः, अन्यथा ग्रामस्य समीपादागच्छतीत्यकारकस्यापि ग्रामस्यापादानसंज्ञा प्रसज्येत; तथाहि-यो वृक्ष- शासायाः पतत्यसौ वृक्षादपि पतस्येवं यो ग्रामसमीपादागच्छति ग्रामादप्यसावागच्छतीसपाये प्रामस्था- वधिमत्वेनोपादानादपायो हि संश्लेषपूर्वकः, सश्लेपश्च सन्नसन्या बुद्ध्या कल्प्यते, स च समीपस्यैव विव- १०क्षितो न तु ग्रामस्य, यदा च ग्रामोऽपाययुक्तो भवति तदा स्यादेवापादानसंज्ञा यथा प्रामादागच्छतीति । एवं तर्हि वृक्षस्य पनं पतत्यनापादानसंज्ञा प्राप्नोति, ग्रामस्य समीपादित्यनापाययुक्तार्थान्तरसद्भावान्नास्ति ग्रामस्यापाययोग, इह त्वर्थान्तरस्यानिर्देशावृक्षस्यैवापाययुक्तत्वमिति । नैतदप्यस्ति । यतो नात्रापायो विवक्षितः, । कस्तर्हि ? संवन्धः-पर्णविशेषणत्वेन वृक्षस्य विवक्षितत्वात् । न चैवं पततीति प्रयोगानुप- पत्तिः, वृक्षमजहत्यपि पर्णे शाखाये भूमि स्पृशति वृक्षस्य पत्रं पततीति प्रयोगस्य दर्शनात्, सति १५वधौ गतिरपायो भवति नान्यथा, गतिविशेषत्वादपायस्य । यदा चापायो विवक्षितो भवति, भवति तदापादानसज्ञा-यथा वृक्षात्पर्ण पततीति । सबन्धस्तु तदा न विशेषितो भवति न ज्ञायते । ककस्य वा फुररस्य वा सवन्धविशेषस्य शब्देनासमर्पणात् , प्रत्यासत्त्या तु वृक्ष एव संबन्धित्वेन प्रतीयते इति तस्मादवध्यादय एव सज्ञिनो लप्स्यन्ते । सत्यम्, तथापि विशिष्टः संज्ञी निर्देष्टव्यः । यत् क्रियाया निर्वर्तकं साधकं तत्कारकसहं-भवतीति । ननु तथाप्यन विशेपानिर्देशात् क्रियानिमित्तमानस्यापि २० हेत्वादेः प्रसङ्ग इत्यत्रोच्यते-करोतीति चकारोऽवधारणे, अयमर्थः-कारक इति महती सज्ञाऽन्वर्या विज्ञायते-करोतीति कारकमिति साध्यत्वेन च क्रियैव शब्दाप्रतीयते, क्रियानिर्वर्तकस्यैय कारकसंज्ञा, कळदिसझा च प्रवर्त्तते; न हेलादेनिमित्तमात्रस्यानाश्रितव्यापारत्वेनानिवर्तकस्य 1 ननु यदि करोतीति कारकमित्याश्रीयते तदा स्तवैव कर्तृसंज्ञापत् कारकसंज्ञापि प्रामोति न तु करणादीनां परतत्रत्वेता- कर्तृकत्यात्ततश्च करणं फारकमधिकरणं कारकमिति न स्यात् ? नैप दोपः-प्रतिकारकं पचादीनां क्रिया- २५ भेदात्करणाधिकरणयोः कर्तृभावस्तथाह्यधिश्रयणोदकसेचनतण्डुलाबपनेधोपकर्पणक्रियाः कुर्वन् देवदत्तः पचतीत्युच्यते-अन तदा पचिर्वर्तते एतत्मधानस्य कर्तुः कर्तृत्वम् । द्रोणं पचति आढक पचतीति प्रहणप्रियायां स्थिरत्वादाक्रियासमास्तण्डुलानां धारणक्रियां च कुर्वती स्थाली पचतीत्युच्यते-अत्र तदा पचिर्वतते एतदधिकरणस्य कर्तृत्वम् । एधाः पचन्ति आविछिन्तेललन क्रियां कुर्वन्ति काठानि पचन्तीत्युच्यते अन तदा पचिर्वर्तते एतत्करणस्य कर्तृत्वम् । अनेकार्थत्वाच धातूनां सादाच नद्र- ३० पासङ्गात् फरणादिव्यापारे पचेर्युत्तिर्द्रष्टव्या। एवमन्यनापि सर्वेषां स्वव्यापारे स्वातध्यात्तदनुष्ठानद्वारेण प्रधानप्रियायामुपयोगान् फर्तृसनिघायपि स्वव्यापारस्यानिवर्तनात् पारतश्यावस्थायामप्यनिवृत्तं कार पत्त्यमित्यर्थः । ननु प यथा फरणाधिकरणयोः कर्तृत्वं निदर्शितम्, न तयाऽपादानादीनां निर्यते, ३३नापादाने प्रामे विपक्षिते भाम आगच्छत्तीति प्रयोगोऽस्ति । उच्यते-सर्वत्रैवात स्वातथ्यं पारतक्ष्य मास्थानेऽ। यस कियवे-नहींद लेनगियते यथा गोशापक फथित् सरिक्ष कणे या गृहीतोपदिशति-अय गोरिति मायमापो इसमस संहति । भववि पास सप्रजयसमादन्तरेणापि संहाप्रयोगम् लोकन्यवहारवरम या शि विमटीक प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कारकस्वरूपम् , नामार्थ प्रथमा २०५ च विवक्षितम् , तयोश्च स्वातन्त्र्यपारतन्त्र्ययोः पर्यायेण वचनम् , वचनाश्रया च संज्ञा भवति, यथा-बलाहकाद्विद्योतते वलाहके विद्योतते बलाहको विद्योतते विद्युत् । तथाहि बलाहकादिति निस्सरणा- द्विद्योतने द्युतिर्वर्त्तते पृथग्भावश्च विवक्षित इत्यपादानत्वम् । बलाहके इयत्र तु द्योतने द्युतिर्वर्तते वलाहके स्थित्वा ज्योतीरूपा विद्युद्विद्योतत इत्यर्थः । बलाहक इति च विद्युतो बलाहकस्याभेदविवक्षायां प्रयोगः । ग्राम आगच्छतीत्यर्थान्तरावगमादपादानन्यापारानवगमात्प्रयोगाभावः । एवं ब्राह्मणाय५ ददातीत्यर्थ ब्राह्मणो दृढ़ातीति प्रयोगाभावः । शब्दशक्तिस्वाभाव्याचापादानसम्प्रदानव्यापारे धातुर्न वर्तते । वस्तुतस्त्वपादानस्यावधिभावेनावस्थानं व्यापारोऽसि संग्रदानस्याप्यनुमननादिलक्षणः । प्रती- यमानोऽपि च व्यापारः कारकव्यपदेशनिवन्धनं यथा-प्रविश पिण्डीमिति । स्वव्यापारमन्तरेण प्रधान- क्रियायामुपयोगाभावान् । ननु सर्वत्रात्र स्वातन्त्र्यं पारतत्र्यं चास्ति, तत्र प्रधानत्वात्कर्तृसंव प्राप्नोति । अथ परत्वादपादानादयः, तथाह्यपादानादीनामवकाशो यदा स्वातन्यं नास्ति कर्तृसंज्ञाया१० अवकाशः । देवदत्तः पचतीत्युभयप्राप्ती चापादानादयः । तन्न । सर्वत्र स्वातव्यस्य सद्भावान्नास्ति कर्तृ- संज्ञाविनिर्मुक्तोऽपादानादि संज्ञानामवकाशः । अत्रोच्यते-उद्भूतस्वातत्र्यविवक्षायां कर्तृसंज्ञा, उद्भूत- पारतत्र्यविवक्षायां तु न्यग्भावात्सदपि स्वातव्यं स्वयं न प्रयुक्ते, यथा राजसन्निधौ तदनुपयोगि स्वकार्यम- मात्या नारभन्ते, तस्मात्सर्वत्र स्वातन्त्र्यपारतव्यसद्भावेऽपि पर्यायेणैवौं वचनम् , तदाश्रया च संज्ञेत्य- दोपः। ननु संभवनक्रियां धारणाक्रियां च कुर्वती स्थाली स्वतन्त्रेत्युक्तम् , केदानी परतत्रा, न चाप्रक्षालने १५ परिवर्त्तने च पारतव्यमिति वाच्यम् , न हि प्रक्षालनपरिवर्त्तने करिप्यतीति स्थाल्युपादीयते, किन्तु संभवनधारणक्रिये करिप्यतीति प्रक्षालनाद्यभावेऽपि पाकनिष्पादात्तेपां तत्रानङ्गत्वान् । एवं तहि स्थालीस्थे यन्ने कथ्यमाने स्थाली स्वतत्रा, कर्तृस्थे यत्ने परतन्त्रेति । ननु च भोः कर्तृस्थेऽपि यत्ने कथ्यमाने स्थाली संभवनधारणक्रिये करोति तत्र स्वतत्रा, केदानी परतत्रेति ? एवं तहिं प्रधानेन समवाये स्थाली परतत्रा, व्यवाये स्वतत्रा, यथामात्यानां राज्ञा सह समवाये पारतव्यं व्यवाये स्वातन्त्र्यमिति । कारकेयु २० हि कर्तुः प्राधान्यं कर्ता च तिवादिनाभिहितशक्तिकः प्रथमामहतीति प्रथमं प्रथमां निरूपयति॥१॥ नाम्नः प्रथमैकद्विवहौ ॥ २॥ [सि० २१२॥३१ ] स्वार्थद्रव्यलिङ्गसङ्ख्याशक्तिलक्षणोऽसमग्रः समग्रो वा पञ्चको नामार्थस्तसिन्नेकद्विवहौ वर्तमा- नानाम्नो यथासङ्ख्यं सौजस्लक्षणा प्रथमा सात् । डित्थः गौः शुक्लः कारकः दण्डी इति प्रथमा ॥२॥ कर्मादिशक्तिपु द्वितीयादिविभक्तीनां विधास्यमानत्वादिह विशेपानभिधानाच परिशिष्टेऽर्थमाने प्रथ-२५ मेति विज्ञायते । ततश्च द्वितीयादिविनिर्मुक्तं स्वार्थादिपञ्चकमर्थमात्रं नामार्थ इत्यभिप्रेत्याह-वार्थेत्यादि- स्वार्थादिपञ्चकस्य क्रमेण स्वरूपमेवाहुः । स्वार्थ इति-स्वस्यैवार्थः स्वार्थो यतः शब्दस्यार्थ प्रवृत्तिः, शब्द- प्रवृत्तिनिमित्तं इति थावत् । स च स्वरूप-जाति-गुण-क्रिया-द्रव्य-संवन्धादिरूपत्वत- लादिप्रत्ययाभिधेयो भावो विशेषणं गुणोऽसाधारणोऽर्थ इति व्याख्यायते । यदाहि स्वरूपान्तरानुपादानः शब्दः स्वाभिधेये प्रवर्तते, तदा सोऽयमित्यभिसंबन्धेन शब्दरूप-३० विशिष्टस्यैवार्थस्य प्रतीतेः शन्दस्वरूपमेव स्वार्थो विशेष्यं तु द्रव्यं यथा डित्थ इत्यादि । जाति- रनुवृत्तिप्रत्ययहेतुः यथा गौरित्यादि । अत्र जातिविशिष्टस्य द्रव्यस्य प्रतीतेर्जातिः स्वार्थः । गुणः शुक्लादिः, शुक्लः पट इत्यादौ गुणविशिष्टस्य द्रव्यस्य प्रतीतेर्गुणः स्वार्थः । कारक इत्यादौ तु क्रियाविशिष्ट- द्रव्यावभासना किया स्वार्थः, क्रियाविशिष्टः संवन्धो वा । द्रव्यमपि यदा द्रव्यान्तरस्य विशेपणभूतं भवति-यष्टीः प्रवेशय, कुन्तान् प्रवेशयेति, तदा यट्यादिद्रव्यं विशेषणभावापन्नं स्वार्थो द्रव्यान्तर ३५ - - २०६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- विशेष्यभावापन्नं पुरुषादि तु द्रव्यम् । कचित्संबन्धोऽपि स्वार्थः, यन सबन्धनिमित्तः प्रत्ययो यथा दण्डी विपाणी-अन हि दण्डविपाणयोः संवन्धः स्वार्थः । आदिशब्दादाजपुरुपादावप्युन्नेयमित्युदाहरति-- गर्गाः पञ्चाला इति । एतावानन विशेषो यष्ट्यादावुपचाराद्रव्यान्तरप्रतीतिरत्र तु प्रत्ययलुपेति इति स्वार्थलक्षणम् । अथ द्रव्यलक्षणमुच्यते यत्पुनरिदंतदित्यादिना वस्तूपलक्षणेन सर्वनामा व्यप- ५दिश्यते, स्वार्थेना स्वरूपादिलक्षणेन विशेषणीभूतेन व्यवच्छिद्यते इति । स्वार्थस्य व्यवच्छेद्य वक्ष्यमाणल- क्षणानां लिङ्गसमाशत्तीनां प्रागुक्तानां च स्वरूपादीनामाश्रयः सत्त्वभूतं तद्रव्यं विशेष्यमिति व्याख्यायते- यथा इयं जातिः, अयं गुणः, इदं कर्मेति । अथ लिङ्गस्य लक्षणमुच्यते यदर्थे शब्दाभिधेये घटादौ सदसद्वा शब्दत एवावसीयते, येन च हेतुभूतेन ड्यावादिना शब्दस्य संस्कारः क्रियते, तत्त्री पुमान नपुंसकमिति लिगम्-यथा खट्वा नदी युवतिरिति । अथ सङ्ख्याया लक्षणमुच्यते-यस्यामेकवचन- १० द्विवचनबहुवचनानि भवन्ति, सा भेदप्रतिपत्तिहेतुरेकत्वादिका सङ्ख्या, तया हि पदार्थाना भेदः प्रवीयते, भेदपरिगणनलक्षणत्वात्तस्याः । ननु एक इत्यादौ नामार्थव्यतिरेकेणान्येपामेकत्वादीनां विशेषणभूताना- मभावादेक इत्यादौ प्रथमाया अभावः प्राप्नोति ? अत्रोच्यते-एकत्वादिष्वपि व्यतिरिक्ता एकत्यादयः सन्ति, यथा शतमित्यर प्रवृत्तिनिमित्तं शतसङ्ख्यान्याऽन्या च विभक्तिवाच्या नामार्थशतैकत्वसया । तथैक इत्यनापि निमित्तविभक्तिवाच्ये द्वे एकत्वे, तन तदभिधानाय प्रथमा भविष्यति । तथाहुः- १५ "निमित्तमेकमियन विभच्या नाभिधीयते । तद्वतस्तु यदेकत्वं विभक्तिस्तन वर्तते" ॥ १ ॥ एवं शत्या. श्रयेणैकत्वादिभेदेन प्रथमोक्ता । अभेदेऽपि दोपाभावः-यत उभयवचना एते द्रव्यं चाहुर्गुणं च । तर गुणोपसर्जनं द्रव्यमभिधीयते नाम्ना, द्रव्योपसर्जनस्तु गुणो विभक्क्या, यथा शौक्ल्यमिति गुणोपसर्जन- द्रव्याभिधायिनः, शुक्छशब्दाव्योपसर्जने तस्मिन्नेव गुणे भावप्रत्ययः । तदेवं यस्मिन् द्रव्ये स्थित एक- स्वादिगुणस्तस्य द्रव्यस्यानुक्ता एकत्वादयः, प्राधान्येन तदभिधानाय प्रथमा भविष्यति । अथवा साया- २० नामपरप्रधाना सवयेयमनया विशेष्यम् । यदि च प्रथमा न स्यात् , सङ्ख्येयमविशेपितं स्यात् । फेवलस्य नाग्नः प्रयोगाभावात्प्रथमाया अभावे एकादिशब्दानुयारणात्, अथवा प्रत्ययपरैव प्रकृतिः प्रयोज्या न पेचला इत्येवंरूपात्समयाद्भविष्यति । अन्या अपि कस्मान्न भवन्ति इति न वाच्यम् कर्मादीनामभावान, पर्मादिप्वेय द्वितीयादीनां नियतत्वात् । तर्हि पष्ठी प्राप्नोति, कर्मायभावो हि शेषः ' अशेपत्वान्न भवि• प्यति, उपयुक्तादन्यो हि शेपो नामार्थस्य च प्रथमाविधावुपयोगात्तस्य चाव्यतिरिक्तस्येह सद्भावात् वर्ष- २५ नव्यतिकरप्रसङ्गो नास्ति, सामर्थ्याव्यवस्थासिद्धः । एक इत्यत्रैकमेवैक्त्वं तच नामार्थेनाभिहितमित्यप्राप्ता प्रथमा समययन प्राप्यते तन, तथा समयश्च पालितो भवति, एकत्यानुगुणञ्चान्यग्राभिधाने दृष्टसामथ्र्य पचनं भवति तथा कर्तव्यम् इति सहगलक्षणम् । अथ शक्तिलक्षमुणच्यते-रयातकृत्तदि- तप्रत्ययसमासैरनुत्तायां यस्यां द्वितीयाद्या विभक्त्यः पाठी च भवन्ति सा स्वपराश्रयाश्रितक्रियोत्पत्ति. हेतुः पारफरूपा पिया फारपूर्वसवन्धादिरूपा च शक्तिः । तत्र कर्तृकर्मशती स्वाभयगतत्रियोत्पति- ३० देतुभूते अपि, अन्यास्तु फरणादिशक्तयः पराश्रयगतप्रियोत्पत्तिहेतुभूता एव । सा पास्यातादिभिरणा शपिरमात्रमिति यक्ष्यते, अर्थमा घोपचरितमपि अध्यारोपितमित्यर्थः, अध्यारोपश्चातम्मितदिति प्रन्ययः, स प सहचरणादिभिर्निमित्तादनेफ्धा भिद्यते-'सहचरणस्थानतादर्थ्यवृत्तमानधरण- सामीप्यपोगसाधनाधिपत्येभ्यः कुन्तादिष्वतावेऽपि तदुपचारः । प्रमेणोदाहर मानि यया साहचर्यात्-कुन्ताः प्रविशन्ति, छनिणो गच्छन्ति । स्थानात मश्याः कोशन्ति, गिरि. दसते । तादात्-इन्द्रः स्यूणा, प्रदीपो मल्लिरा । वृत्तात्-यमोऽयं राजा, पुरोऽयं राजा. ३६मानात्-अस्यो प्रीहिः, सारी गुदाः । धरणात्-तुरा चन्दनम् । सामीप्यात्-मातट गया।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । नामार्थे प्रथमा २०७ योगात्-रक्तः कम्बलः । साधनात्-अन्नं प्राणाः, आयुर्घतम् । आधिपत्यात्-ग्रामाधिपति- अमिः । अलिङ्गमप्यर्थमात्रम् त्वम् अहम् पञ्च कति, एपामलिङ्गलं च नन्ता सङ्ख्या डतिर्युप्मद- स्मञ्च स्युरलिङ्गका इत्यनुशासनात् । अलिङ्गसङ्ख्यमप्यर्थमात्रम्-उच्चैः नीचैः स्वः प्रातः, सर्वलि. गसङ्ख्यास्वेकरूपत्वादुचैःप्रभृतीनामर्थमात्रं विशिष्टलिङ्गसङ्ख्याभ्यामयोगादालिङ्गसङ्ख्यमित्यर्थः । शक्तिप्र- धानमपि-यतः यत्र यथा यदा, तसादिभ्योऽपादानादिशक्तीनां प्रतीयमानत्वाद्यत इत्यादेरर्थमात्रं५ शक्तिप्रधानं भवति । द्योत्यमपि-प्रपचति प्रतिष्टते प्रतीक्षते प्रतिपालयति, प्राद्युपसर्गाणां क्रियार्थद्यो- तकत्वादन्यथोपसर्गत्वाभावात्तदर्थमात्रं द्योत्यमेवेति । स्वरूपमात्रमपि-अध्यागच्छति पर्यागच्छति प्रलम्बते निपिञ्चति-सोपसर्गानुपसर्गधात्वर्थस्याध्यादिभिर्वैशिष्ट्याप्रतीतेः, आगच्छतीत्यादिक्रियापदार्थ एव तदर्थ इत्यर्थः । तदयं वस्तुसङ्केपः-त्याद्यन्तपदसामानाधिकरण्ये प्रथमेति । यत्रापि त्याद्यन्तं पदं न श्रूयते वृक्षः प्लक्ष इति, तत्रापि गम्यते यदाह “यत्रान्यक्रियापदं न श्रूयते तत्रास्तिर्भवन्तीपरः १० प्रयुज्यते, भवन्तीशब्देन पूर्वाचार्यप्रसिद्ध्या वर्तमानाऽभिधीयते। नन्वर्थमाने प्रथमेत्युक्तम् , मात्रग्रहणस्य चाधिकार्थव्यवच्छेदकत्वाद्वीरपुरुप इत्यादी सामानाधिकरण्यात्यदार्थमात्राद्विशेषणविशेप्यभावस्याधिकस्य प्रतीतेः प्रथमा न प्राप्नोति, समासविधानमपि प्रथमोत्पत्तलिङ्गं न भवति वीरपुरुपमानयेति द्वितीया- धन्तानामपि समाससम्भवात् इति प्रथमा विधेया। नैष दोपः-आधिक्यस्य वाक्यार्थत्वाद्वीरनाम्नोऽन- पेक्षितशब्दान्तरार्थसंसर्गोपहितविशेपणभावात् स्वार्थमात्रनिष्टात् प्रथमा विधीयते, एवं पुरुपशब्दादपि, १५ पश्चात्त्वाकांक्षादिवशेन विशेषणविशेष्यभावावगतिरुपजायमाना बहिरङ्गत्वादन्तरङ्गपदसंस्कारं पूर्वप्रवृत्तं वाधितुं न शक्नोतीति सिद्धा प्रथमेति । अथवा त्यादिकृत्तद्धितसमासैरभिहितायां कादिशक्तौ प्रथमे- त्युक्तम्, ततश्च वीरपुरुप इत्यत्रार्थाधिक्येऽप्यभिहितत्वमात्राश्रयात्प्रथमेति । कश्चित्सङ्ख्याकर्मादीन्विभक्तिवाच्यानभ्युपगच्छति त्रिको नामार्थ इति । कश्चित्सवयैव विभक्तिवाच्या चतुष्को नामार्थ इति । कश्चित्पुनः पञ्चाप्यर्थी नामवाच्या, विभक्तयस्तु द्योतिकाः सङ्ख्याकर्मादीनां, खी २० प्रत्ययाश्च लिङ्गस्येति प्रतिपन्नः । तत्र वार्तिककारश्लोकवार्तिककारयोः पञ्चक एव नामार्थ इति दर्शनमुभाभ्यां नियमार्थस्यापगमात्। भाष्यकारोऽप्यनेकदर्शनोपन्यासेऽपि पञ्चकेनैव नामार्थेन व्यवह- रति-यदाह-"पञ्चक एव नामार्थोऽनेनाश्रित" इति युक्तिरप्यस्यामेव कल्पनायां दृश्यते । सङ्ख्याकर्मादयो हि नामबाच्यस्य द्रव्यस्य धर्मः स्वार्थोपसर्जनश्च शब्दो द्रव्य एव वर्त्तते द्रव्येणैवानयननयनादिव्यवहार- स्तन द्रव्यवाचिना शब्देन द्रव्यधर्माणामभ्यन्तरीकरणमिति । नायुक्तमेतन्नामार्थत्वेन पञ्चानामभिसन्धान २५ विभक्तयः स्त्रीप्रत्ययाश्च द्योतका विशेष्यवृत्तित्वस्येति सर्वोऽप्ययं हैमवृहन्न्यासस्याभिप्रायः । वैयाकरणभूषणसारेऽप्युक्तम्- "एकं द्विकं त्रिकं चाथ चतुष्कं पञ्चकं तथा । नामार्थ इति सर्वेऽमी पक्षाः शास्त्रे निरूपिताः" ॥१॥ एकम् जातिः, लाघवेन तस्या एव वाच्यत्वौचित्यात् , अनेकव्यक्तीनां वाच्यत्वे गौरवात् । द्विकमिति- जातिव्यक्ती इत्यर्थः । त्रिकमिति-जातिव्यक्तिलिङ्गानीत्यर्थः । चतुर्थम्-सङ्ख्यासहितं त्रिकमित्यर्थः । पञ्च-३० कम्-कारकसहितं चतुष्कमित्यर्थः । विष्णुमुच्चाये(यें ?)त्यादावर्थोचारणासम्भवेन विना शब्दविपयं शाब्दबोधासङ्गतिश्चेति सोऽपि प्रातिपदिकार्थ इति षोढापि कचित् प्रातिपदिकार्थ इत्याह- "शब्दोऽपि यदि भेदेन विवक्षा स्यात्तदा तथा । नोचेच्छ्रोत्रादिभिः सिद्धोऽप्यसावर्थेऽवभासते" ॥१॥ यद्यनुकार्यानुकरणयोर्भेदविवक्षा तदा शब्दोऽपि प्रातिपदिकार्थः, यदि न भेदविवक्षा तदा श्रोत्रादिभि- रुपस्थितोऽप्यर्थवद्भासते । अपिहेतो, उपस्थितत्वाद्भासते इत्यर्थः । अयं भावः-अनुकार्यानुकरणयोर्भेदेऽ.३५ - . ३ २०८ महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- नुकार्यस्य पदानुपस्थितत्वात् तत्सिद्धये शक्तिरुपेया। अभेदे प्रत्यक्ष विपयस्य हेतुत्वात् । स्वप्रत्यक्षरूपां पदजन्योपस्थितिमादाय शाव्दविपयतोपपत्तिरिति । यद्यप्यतिप्रसङ्गवारणाय वृत्तिजन्यपदोपस्थितिरेव हेतु- स्तथाप्यनाश्रयतया वृत्तिमत्त्वस्य सत्त्वान्नानुपपत्तिः । निरूपकताश्रयान्यतरसवन्धेन वृत्तिमत एव शाब्द- योधविपयत्व कल्प्यते इत्यनवद्यम् । सबन्धस्योभयनिरूप्यत्वात् , पदार्थस्येव तद्वोधकत्वेन स्वस्यापि ५ज्ञानसंभवाचेति । उक्त च वाक्यपदीये- "ग्राह्यत्व ग्राहकत्वं च द्वे शक्ती तेजसो यथा । तथैव सर्वशब्दानामेते पृथगवस्थिते" ॥१॥ इत्यादि । कारकपरीक्षायां तु "प्रातिपदिकार्थ-लिङ्गपरिमाणवचनमाने प्रथमा" इति, मानशब्दः प्रत्येक मभिसवद्ध्यते । तर प्रातिपदिकार्थसत्ता अद्वैतवादिनामेतद्दर्शनम् तथा चाहु:-"सत्ता नाम काचिद- नादिनिधनरूपा नित्यतया व्यवस्थिता सर्वशब्दरभिधीयते" इति तदुक्तम्- १० "संवन्धिभेदात्सत्तैव भिद्यमाना गवादियु । जातिरित्युच्यते तस्यां, सर्वे शब्दा व्यवस्थिताः" ॥ १॥ "प्राप्तकर्मविशेषेपु, क्रिया सैवाभिधीयते । क्रमरूपस्य सहारे सा सत्त्वमिति चेष्यते" ॥ २॥ "अतस्ता प्रातिपदिकार्थ, धात्वर्थ सप्रचक्षते । सा नित्या सा महानात्मा, तामाहुस्त्वतलादयः॥ ३ ॥" यद्येवमभावगशविपाणादिशब्देभ्यः प्रथमा न प्राप्नोति तेपामभाववाचकत्वेन सत्ताया अभावात्, नष्टो घटो भविष्यति, घट इत्यादौ तु प्रथमा न स्यात् नष्टानुत्पन्नयोः सत्ताया अभावात् , तथाङ्कुरो १५जायते इत्यादी प्रथमा न स्यात्ततो जन्माभावात् । अत्रोच्यते-नेह वस्तुसत्ताभिहिता, कि तर्हि ? अभिधेयसत्ता, अभिधेयभूतस्यार्थस्य विद्यमानता सा चाभावशशविपाणादीनामपि विद्यते । तथा चोक्त न्यासकारण-अभावोऽप्यभिधेयो भवत्येव, अन्यथा अभावादिवचनमनुच्चारणीयं स्यात् । नह्यनर्थक वचः प्रयोगमर्हति,अस्ति चाभावशब्दाना प्रयोगस्ततो निश्चीयतेऽभावोऽप्यभिधीयत इति । यतोभूतभविष्य- दत्यन्तासद्वाचाभिधेयसत्ता न व्यभिचरति । भाष्यकारेणाप्युक्तम्-सत्तापदार्थो न व्यभिचरतीति । ननु जातिगुणक्रियाश दाना गोशुक्लपाचकादीना जात्याद्यपेक्षा द्रव्ये वृत्तिरर्थान्तरसापेक्षतया तद्वाचि. शब्देभ्यः प्रथमा न प्राप्नोतीत्यत्रोच्यते-जात्यादिविशिष्ट एवार्थो जात्यादिशब्दरभिधीयत इति जायादि- विशिष्ट एव तेपामर्थो नार्थान्तर जात्यादय इति तदर्थापरित्यागात् प्रथमप्रवृत्तौ यन्निमित्तमपेक्षते तत्त- स्वार्थ एष नार्थान्तरम्, यत्पुनः पचिदर्थे वर्तित्वा पुनरर्थान्तरे वर्तितु निमित्तेनोपादीयते तदर्थान्तर- मिह द्रष्टव्यम् । यद्येव गौर्वाहीकः सिंहो माणवक इत्यत्र गोसिंहशब्दो स्वार्थे वर्तित्वा पुनरर्थान्तरे वर्तते २५ इत्यस्यार्धान्तरापेक्षातः प्रथमया न भवितव्यम् , क्रिश्च स्थाणुर्या पुरुपो वेति विकल्यातिरिक्तः प्रातिपदिकार्य, गोरिय गवय इत्यनुमानातिरिक्त, वृक्षश्च वृक्षश्चेति समुच्चयातिरिक्त , नीलमुत्पल, कष्ट श्रितः, शपुन्या सण्डः, कुरेराय पलिः, पाद्भय, राज्ञः पुरपः, अक्षेषु शौण्ड इत्यादिषु विशेपणविशेष्यभावातिरित: प्रातिपदियार्थ इति प्रथमा न प्राप्नोति । किश्च वाक्यमेव समासवृत्तीति सर्वन समासेन विशिष्ट एया- धोऽभिधीयते इति समासात्मयमा न प्राप्नोति। विच कृदन्ततद्धितयोः सनन्धामिधानमिति सबन्धातिरिक्त २०इति कृदन्सातद्धितान्ताय प्रधमा च प्राप्नोति । किश्च देवदत्तः पचति, ओदनः पन्यते इति पर्नुपर्मा- तिरिक्तः प्रतिपदिकार्य इति प्रथमा न प्राप्नोतीत्यनोच्यते यतार्थेऽन्वयव्यतिरेकाम्या यस्य शक्तिरयधारिता स तस्यार्थसत्र वृक्षः पृथं पृझेणेत्यादिषु सर्वेषु विभक्ष्यर्थेषु फलमूलस्कन्धरूपोऽर्थ उपात्तसाक्षाकर्मा दिविशेपितः सर्यविभत्तयर्यान्वयी प्रातिपदिकार्थोऽन्वयव्यतिरेकाभ्या सिद्धस्तन्मात्रं गृहीत्या प्रथम प्रयमा पर्तव्या, अत उत्तरपालं सिद्धं पदं पदान्तरेण सयन्धमुपैति पदान्तरसयन्याचदन्यदाधिक्यमुपजायते ३५नामी पदार्पः किन्तु नामपदायवस्थाया पूर्वममतीतोऽर्थः पदान्तरसन्निधानादुसरकालमयगम्यमानत्याना २० .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । नामार्थे प्रथमा २०९ क्यार्थ इत्यवधार्यते । न च तत्रार्थे प्रथमा-पूर्वमेवान्वयिनि प्रातिपदिकार्थे प्रथमाया उत्पन्नत्वात् कुनोद्यसङ्कर एकप्रहारेणैव निरस्तस्तथा चोक्तम्- "केवलेन पदेनाओं यावानेवाभिधीयते । व्यवस्था तावतोऽर्थस्य तदाहुरभिधायकम्" ॥ १ ॥ "सम्बन्चे सति यत्त्वन्यदाधिक्यमुपजायते । वाक्यार्थमेव तं प्राहुरनेकपदसंश्रयम्" ।। २ ।। समासकृत्तद्धितान्तेपु यद्यपि पदान्तरप्रयोगो नास्ति तथापि तत्र विशेपविशिष्ट एवार्थो विभक्त्यर्था-५ न्वयी तस्य तावानेवार्थः प्रातिपदिकार्थो नातिरिक्तः, यो यमर्थं न व्यभिचरति स तस्य प्रातिपदिकार्थः । तथा चोक्तं भाष्यकृता-'अन्वयी प्रातिपदिकार्थ इति' । नन्वेवं यद्यन्वयी प्रातिपदिकार्थस्तदासौ सर्वेपु विभत्त्यर्थेषु विद्यते इत्यङ्गीकर्तव्यम् , कथं नामान्यथान्वयी स्यात् , एवं चान्वयिनो वस्तुमात्रस्य प्रातिपदिकार्थस्य प्रत्यासन्नत्वात्तन्मात्राश्रयाऽन्तरङ्गा प्रथमा, द्वितीयादयस्तु कारकविभक्तयः क्रियापदापेक्ष- त्वेन बहिरङ्गाः, कटं करोति-क्रटेन कृतमित्यादौ यावदेव करोत्यादिपदं न प्रयुज्यते तावदेव कटशब्दा-१० दन्तरङ्गत्वात्प्रथमयैव भवितव्यमित्यन्तरङ्गत्वात्प्रथमया सकलो विपयो व्याप्तः, केदानी द्वितीयादिभि- र्भाव्यमित्यत्रोच्यते-लोकप्रयुक्तानां शब्दानामिदमन्वाख्यानम् , लोके च बाक्यमेव प्रयुज्यते, तस्य सम्पू- र्णार्थप्रतिपादकत्वेन निराकासतयाऽर्थक्रियार्थिनां प्रवृत्तिहेतुत्वात् ; वाक्याचापोद्धृत्य पदमन्त्राख्यायते, तेन कर्मादिपु कारकेष्वनभिहितेपु द्वितीयादयः कर्त्तव्याः, अभिहितेपु कर्मादिपु प्रथमेति । एवं विभक्तीनां विपयविभागः । अत एवोक्तं भाष्यकृता-अभिहितो योऽर्थः स सम्पन्नः प्रातिपदिकार्थ इति । एवं च नाम्नः प्रथमेति सूत्रावयवो व्याख्यातः। किंविशिष्टान्नान इत्याह-एकद्विवहाविति-एकत्वद्वित्वबहुत्वविशिष्टेऽर्थे वर्तमानादित्यर्थः । मर्यादाभिविधावितिवदेकद्विवहाविति कर्मधारयात् सप्तमी । अर्थवच्छन्द्ररूपं नाम, अर्थश्च द्विविधः- जातिव्यं च । तत्र जाते मार्थत्वे तस्या एकत्वद्वित्वबहुत्वासम्भवात्तत्सहचरितद्रव्यगतं द्वित्त्वं बहुत्वं वाश्रयणीयम् , ततश्च वृक्ष इत्यत्रापि अवयवगतबहुत्वसद्भावाबहुवचनप्रसङ्गः । अस्तु तर्हि द्रव्यं २० नामार्थस्तत्रावेयगतमेव वहुत्वमाश्रीयते, वृक्षशब्दस्य त्ववयवी बाच्यो नत्ववयवा इति वहुत्वाप्रसङ्गः आकृतिपक्षेऽप्यदोपः-प्रत्यासत्त्या तदाधारद्रव्यगतं द्वित्वं बहुत्वं वाश्रीयते नत्ववयवगतम् , जातेरवयवेव- नाश्रितत्वात् ; दारा इत्यादौ त्ववयवावयविनोरभेदविवक्षया बहुत्वमाकृत्याधारगतमेवेति बहुवचनं वाच्यम् । ननु-द्रव्येऽपि नामार्थे विशेपाभावादर्थशब्दस्य वस्तुपर्यायस्यापि सम्भवाद्वृक्षः पन इत्यत्रापि बहुवचनप्रसङ्गः-वहवस्तेऽर्था मूलस्कन्धपत्रादिरूपत्वात्तस्येति चेत् ? नैवम् । स्कन्धशाग्याफलपलाशादि-२५ रूपेणानेकत्वेऽपि न वृक्षादिस्वरूपं तथाचष्टे इति न तस्य सा सस्या इति बहुवचनं न भवतीति सूक्तं एकत्व द्वित्वबहुत्वविशिष्टेऽर्थे वर्त्तमानादिति । यद्येवमेकद्विवहाविति प्रकृत्यर्थविशेपणत्वात्कः प्रत्ययार्थस्त एवेति त्रूमः । अनिर्दिष्टार्थाः प्रत्ययाः स्वार्थे न भवन्तीति, तथाहि-पञ्चको नामार्थः दधि दधि पश्य पयः पयो रजति वासो वासश्छादयतीत्यादी विभक्तिश्रवणमन्तरेणापि पञ्चाप्याः स्वार्थादयः प्रती- यन्ते । विभक्तयस्तु कचिद् द्योतकत्वेनापेक्षन्ते, तत्सिद्धमेतत्कर्माद्येकार्थसमवेन एवैकत्वादी एकद्विवहु-३० वचनानि भवन्ति नत्ववयवगते । यद्येवं स तर्हि तथा निर्देशः कर्त्तव्यः, नयन्तरेण भावप्रत्ययं गुण- प्रधानो निर्देशो भवति, ततश्चेयेके मन्यन्ते तदेके मन्यन्ते इत्येकवचनं प्राप्नोति, यतो नामार्थ एकत्व- मप्यत्रास्ति बहुत्वं, न च एकद्विवहावित्पन्न च विशेपानुपादानाद्यावान कबिदेकशब्दवाच्योऽर्थग्नस्य ग्रहणेन बाच्चं तत्रैकवचनप्रसङ्गः । अथान परत्वादहुवचनमेवेति, एवं तर्हि बहुगेदनो बहुः नृप इति विमो- पानुपादानाद्वैपुल्यरूपस्यापि बहुत्वस्व ग्रहणाबहुवचनप्रसन्नः । नैप दोपः । अन्तरेणापि भावप्रत्ययं गुणन्य ३', है. प्रमा० पूर्वा० २७ - - १ २१० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- गुणविशेषक वेनोपादानाद्गुणगुणिनोरभेदोपचारात्सामानाधिकरण्याद्गुणप्रधाननिर्देशस्य सम्भवाद्यथा पटः शुक्ल इति । यदा गुणिनां गुणो व्यपदिश्यते पटस्य शुक्ल इति, तदा स्वप्रधानो गुणो भवतीति द्रव्ये व्यतिरेकविभक्तिः पष्ठी, आधारविवक्षायां तु सप्तम्यपि । यथा कर्मणि या सयेति-कर्मादिभिरेक्त्या दीनां विशेपणाद्विनापि भावप्रत्ययं गुणं प्रधाननिर्देशप्रतीतिरिति । यद्येवं बहुत्वस्यैकत्वात्सर्वदा वहाविति ५भाव्यं, कथं बहुपु बहुवचनमिति प्रयोगः १ उच्यते । आभयगतं बहुत्वं गुणे आरोप्य निर्देशाददोपः । तथा इसके मन्यन्ते इत्यनान्यार्थवृत्तिग्रहणादेकवचनप्रसङ्गोऽपि न वान्यः, एकशब्दस्यान्यासहाय- सहाप्रथमाल्पप्रधानसाधारणार्थवृत्तित्वेनानेकार्थवृत्तित्वात् , बहुशब्दश्च विपुलार्थवृत्तिरपि, तत एकद्वि- पहावित्पन सहयावृत्तिना द्विशब्देन साहचर्यादेकबहुशब्दावपि तदर्थवृत्ती । प्रसिद्ध्या त्वसङ्खयेयार्थत्वमप्ये. कादीनामष्टादशान्तानामुच्यते "आदशभ्यः सङ्ख्या सवयेये वर्त्तते” इति, अन्यथा होकयोर्द्विवचनैकवचने १० इति समुदायस्य व्यर्थत्वाद्वहुवचनप्रसङ्गः । द्वित्वैकत्ववृत्तित्वे त्वेकद्विशब्दयोर्द्विवचनमुपपन्नं भवति । ननु लौकिकादेव प्रयोगादेकत्वादिषु एकवचनादीनां व्यवस्था भविष्यति किमर्थमेकद्विवहाविति । उच्यते । सामान्येन विधानादृष्टविरुद्धप्रयोगाच नियमार्थमिदम् , तथाहि-सक्ष्यानिर्देशमन्तरेण सामान्ये नाममानात् स्यादयो विधीयन्ते, धातुमात्राच त्याद्यः । अथ शास्त्रेऽनुपात्तोऽयर्थः प्रयोगादेव व्यवस्था- प्यते, यतः स्यादयस्तावत्स्वार्थे विधीयमानाः पञ्चको नामार्थ इति द्वित्वे दर्शने सहयायां सिद्धाः, १५ सयाविशेपारगतिस्तु लोकासिद्धा, त्यादयोऽपि कर्तृकर्मणोर्बिधीयमानाः स्वभावतः सहाप्रयुक्तयोरेव तयोर्वाचका भविष्यन्ति, सहयाविशेपश्च प्रयोगदर्शनादवगम्यते, एतदप्यसाधीयः, दृश्यते सल्यपि लोके विप्रयोगः-तद्यथा अक्षीणि दर्शनीयानि, पादा मे सुकुमारतरा इति, द्वित्वेऽपि लोके वहुवचनं दृश्यते इति व्यतिकरः प्रामोति, अव्यतिक्रश्चेप्यते, तच्चान्तरेण यत्नं न सिद्ध्यतीति नियमामिदम् , सूरिभिः "एफद्विवहाविति च सङ्घरनिवृत्त्यर्थमिति । न चैवं ब्राह्मणाः सङ्घ इत्यत्र ब्राह्मणसङ्घरूप २० स्वार्थस्य ब्राह्मणरूपेण बहुत्वात्सङ्घ रूपेण चैकरवात्सयाद्वययोगाद्वचनव्यतिकरप्रसङ्ग इति वाच्यम्, भिन्नपदयाच्यत्वेन भिन्नार्थत्वाचयोः । नहि ब्राह्मणरूपेण सङ्घपद तमर्थमाचष्टे, सहरूपेण ब्राह्मणपदं भिन्न ण्य पदार्थस्तदेक्त्य पदद्वयगम्य वाक्यार्थ इति शब्दार्थभेदान्नेतरसया नेतरस्येति न वचनव्यति. परः । नाम्न इति रिम् ? निरर्थकाद्वर्णाद्धातुवाझ्याभ्यां च मा भूत् । ननु चान्ययेभ्य एकत्वाद्यभावादनेन प्रथमा न प्राप्नोति । सत्यम् । लुम्विधानातु विभक्तीनां विधियते, तदन्तर्गतत्वाच प्रथमाया अपि, २५ तस्य फ्लम्-अथो स्वस्ते गृहम्, अथो स्वस्तय गृहमित्यादिपु "सपूर्वात्प्रथमान्ताद्वा" ( २२११३२) इति विभापया ते मे आदेशो पदसज्ञा घ, "अध्ययस्य" (३२२७) इत्यत्र यक्ष्यते एकद्वियहावित्यादि अर्थे वर्तमानान्नान एषद्विवहाँ यथासक्यं विभक्तिविधानादिति ॥ २ ॥ आमद्ये ॥३॥ [सि० २।२।३२] सम्बोधनाईनानः प्रथमा सात् । हे देन ॥३॥ आम० । प्रसिद्धतत्सम्यन्धस्य विमप्याग्व्यातुमभिमुखीकरणमामप्रणम् , तद्विपय आमण्यमग्निन् अर्थे वर्तमानानाम्न एकद्वियही यथासायं प्रथमाविभक्ति यति । अत्र प्रसिद्धतत्सम्बन्धस्पेति-प्रसिद्ध मन आमपणादेन सह यान्ययाचफ्भावलक्षणः सम्बन्धो यस्य वत्तथा तम्येत्यर्थः, शेपं सनम् । नन्याममणविषयम्य देवदतादेः सत्सभूनम्यामध्यम्यरत्यादिसालायोगातद्वाचिनो नाम्नः प्रयमा भवि. यति सिमर्थमिदमारभ्यते डी। अमोन्यते आमदयपदं हि प्रियाया विशेषणं भवति-हे देवदत प्रता- ३५म्पदनिति, जपाभिमुसीधनदेवदत्त विशिष्टा मन्या प्रतीयते । यदाह हरि:-आमनितं पदं ययता तथोकं प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । आमन्ये प्रथमा । कर्मलक्षणम् २११ क्रियाया विशेपकम् । व्रजामि देवदत्तेति निघातोऽन प्रतीयते ॥१॥ ततश्च देवदत्तादेः क्रियाविशेषणात् कर्माद्यतिरिक्तामन्त्रणसम्बन्चे शेपरूपे वर्तमानाद्गीणात्प्रथमापवादः पटी प्राप्नोति, तदाधनार्थमिदमिति भावः । आमत्र्य इति क्रिम् ? राजा भव-अत्र राजा न आमत्र्यः किन्तु स एव विधीयते इति पूर्वेणैव प्रथमा ॥ ३ ॥ अथ कर्तृकारकस्य तृतीयाप्रकरणे वक्ष्यमाणस्वरूपत्वेन क्रमप्राप्तस्य कर्मकारकस्य स्वरूपं निरूपयितुं प्रथमं तस्य लक्षणमाह- कर्तृाप्यं कर्म ॥ ४ ॥ [सि० २।२।३ ] का क्रियया यद्विशेपेणाप्तुमिष्यते तत्कारकं व्याप्यं कर्म च स्यात् । तत्रेधा-निर्वयं विकार्य प्राप्यं च । यदसज्जायते तन्निर्वय॑म् । यत्रावस्थान्तरं क्रियते तद्विकार्यम् । यत्सदेव प्राप्यते तत्प्राप्यम् । पुनरेके विधा-इष्टमनिष्टमुदासीनं च । मुख्यगौणभेदात्तद्विथा ॥ ४ ॥ कर्तुः । कर्तुरिति "कृत्यस्य वा” (२।२।८८) "कर्तरि" (२।२।८६) इति वा पष्टी सा च सम्बन्धि-१० शब्दत्वादनुपान्तामपि कर्तृसम्बन्धिनी क्रियामुपस्थापयतीत्याह-को क्रिययेत्यादि । कर्ता च क्रियां विना न किञ्चिदाप्तुं शक्नोति इति सामर्थ्यात् क्रिया करणभावेनावतिष्ठते, ततोऽयमर्थः-पच्यादिकया क्रियया यद्विशेषेणाप्नुमिष्यते का तत्कारकं कर्मति । एपणाङ्गे च प्रापणे आप्नोतिर्वर्त्तते इति प्रकृतिप्रत्ययार्थी वितत्य व्याचष्टे-आप्नुमिप्यते इति । किमर्थं क्रियया तदाप्नुमिप्यते ? निर्वर्तयितुं गुणान्तराण्यापादयितुं विपयीकर्तुं वा; अत एव निर्वर्त्य विकार्य प्राप्यं चेति त्रेधा तदुच्यते । १५ करणादिकारकाणां प्राप्तीच्छाविपयत्वेऽपि न विशिष्टेच्छाविपयत्वं कर्मसिद्धथै तेपामुपादानात्ततः साधूक्तं विशेपेणाप्नुमिष्यत इति । पाणिनेरप्ययमेवाभिप्रायः-तथाहि "कर्तुरीप्सिततमं कर्म" [पा० ११४।४९] कर्तुः क्रियया आनु- मिष्टतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्यात् । कर्तुः किम् ? मापेप्वश्वं वनाति-कर्मण ईप्सिता मापा, न कर्तुः । तमप्ग्रहणं किम् ? पयसा ओदनं भुङ्क्ते-अत्र सत्यपि पयसो भुजिक्रियायां प्रकृष्टोपकारकत्वे इंसायां २० प्रकाभावः । "तथायुक्तं चानीप्सितम्" [पा० १।४।५०] ईप्सिततमवत् क्रियया युक्तमनी- प्सितमपि कारकं कर्मसंज्ञं स्यात् । ग्रामं गच्छंस्तुणं स्पृशति । ओदनं भुञ्जानो विषमत्ति ।" अत्र वैयाकरणभूपणसारकारः प्राह-"तच कर्तुरीप्सिततमम् , क्रियाजन्यफलाश्रय इत्यर्थः, क्रिया- जन्यफलवत्त्वेन कर्मण एव कर्तुरीप्सिततमत्वात् , तथा युक्तं चानीप्सितमित्यादिसङ्ग्रहाचैवमेव युक्तम्- ईप्सितानीप्सितत्वयोः शाब्दबोधे भानाभावेन संज्ञायामेव तदुपयोगः, न तु वाच्यकोटी तत्प्रवेशः ।२५ तथा च क्रियायाः फलस्य च धातुनैव लाभादनन्यलभ्य आश्रय एवार्थः । तत्त्वं चाखण्डशक्तिरूपमव- च्छेदकम् । ओदनं पचतील विल्लित्त्याश्रयत्वात्कर्मता, घटं करोतीत्यत्रोत्पत्त्याश्रयत्वान् उत्पत्ती- त्वर्थत्वात् । जानातील्यावरणभङ्गरूपज्ञानधात्वर्थफलाश्रयत्वात् । अतीतानागतादिपरोक्षस्थलेऽपि ज्ञान- जन्यस्य तस्यावश्यकत्वात, अन्यथा यथापूर्व न जानामीत्यापत्तेः । अतीतादेराश्रयता च विषयतया ज्ञानाश्रयताया नैयायिकानामित्र सत्कार्यत्वादसिद्धान्ताद्वोपपद्यत इति । उक्तं च- "तिरोभावाभ्युपगमे भावानां सैव नास्तिता । लन्धक्रमे तिरोभावे नश्यतीति प्रतीयते" ॥ १ ॥ १ कर्नुरिलत्र प्रथमव्याख्याने व्याप्येवन्य कृत्प्रत्ययान्तस्य योगे "कृस्यस्य वा" इति कर्तरि पष्टी । ननु यदा देतीविवं व्याख्यानं कर्तुं फर्म व्याप्यमिति क्रियते, तदा कर्मणा योगे कर्तृशब्दान् फेन रोग पटी प्रावतिष्ट ? उच्यते । रापा दनादर इति कृत्वा कर्मशब्द औपादिकपवनान्तोऽपि कृदन्नः, तयोगे "कनरि" इति पटी। .. ?

-- २१२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- इति । ननु चैत्रो ग्रामं गच्छतीयन ग्रामस्येव चैनस्यापि क्रियाजन्यग्रामसयोगरूपफलानयत्वात्कर्म- तापत्तौ, चैनश्चैनं गच्छतीत्यापत्तिः, प्रयागतः काशीं गच्छति चैत्रे प्रयागं गच्छतीत्यापत्तिश्च । क्रियाजन्य- संयोगस्य काश्यामिव विभागस्य प्रयागेऽपि सत्त्वात् इति चेत् १ न । ग्रामस्येव चैत्रस्यापि फलाश्रयत्वेऽपि तदीयकर्तृसज्ञया कर्मसज्ञाया वाधेन चैनश्चैत्रमिति प्रयोगासम्भवात् , द्वितीयोत्पत्तौ संज्ञाया एव निया- ५मकत्वादन्यथा गमयति कृष्णं गोकुलमित्यत्रेव पाचयति कृष्णेनेत्यनापि कृष्णपदात् द्वितीयापत्तेः । शाब्द- वोधश्चैनश्चैत्रमित्यन स्यादिति चेत् ? न-तथा व्युत्पन्नानामिष्टापत्तेः । उच्यता वा प्रकारतासम्बन्धेन धात्वर्थफलविशेष्यकवोध प्रति धात्वर्थव्यापारानधिकरणाश्रयोपस्थितिहेतुरिति कार्यकारणभावान्तरम् । प्रकृते चैत्रस्य व्यापारानधिकरणत्वाभावान दोपः । प्रयागस्य कर्मत्वं तु सम्भावितमपि न । समभि- व्याहृतधात्वर्थफलशालित्यस्यैव कियाजन्येत्यनेन विवक्षणस्य उक्तप्रायत्वात् । नैयायिकास्वाद्यदोषवार- १० णाय परसमवेतत्वं द्वितीयवारणाय धात्वर्थतावच्छेदकत्वं फले विशेषणं द्वितीयावाच्यमित्युपाददते । परसमवेतत्वं धात्वर्थक्रियायामन्वेति, तथैव कार्यकारणभावान्तरकल्पनात् । परत्वं च द्वितीयया स्वप्रकृत्यर्थापेक्षया बोध्यते । तथा च, चैत्रस्तण्डुल पचतीत्यादौ तण्डुलान्यसमवेतव्यापारजन्यधात्व- र्थतावच्छेदकविक्लित्तिशालित्वात्तण्डुलस्य कर्मता, शाब्दवोधस्तु तण्डुलसमवेतधात्वर्थतावच्छेदकविछि- त्यनुकूलतण्डुलान्यसमवेतक्रियाजनककृतिमाश्चैन इत्याहुः [तन्न रोचयामहे, परसमवेतत्वादेगौरवेणा- १५चाच्यत्वात् । अतिप्रसङ्गः कि द्वितीयायाः, शाब्दबोधस्य वा नाद्यः-तावद्वाच्यकथनेऽपि तत्तादव- स्थ्यात् । गमयति कृष्ण गोप इति द्वितीयापत्तेः । तण्डुल पचति चैन इतिवत्, तण्डुल पच्यते स्वय- मेवेत्यापत्तेश्च । विष्ठित्त्यनुकूलतण्डुलान्यसमवेतामिसयोगरूपधात्वर्थाश्रयत्वात् । शाब्दयोधातिप्रसङ्गो- ऽप्युत्तरीयैव निरस्तः। परसमवेतत्वस्य शक्यत्वेऽपि परत्वस्य परसमवेतत्त्वस्य च इष्टान्वयलाभायानेकशः कार्यकारणभावाभ्युपगमे गौरवान्तरत्वादिति स्पष्टं भूपणे" ] तत्कारपमित्यादि । ननु व्याप्यशब्दस्य सज्ञात्वेनानुपात्तात् कथं "व्याप्ते क्तेनः" (२।२।९९) इत्यादौ व्याप्यशब्देन व्यवहारः ? उच्यते । कस्यचिद्व्याप्य प्रसिद्धम् , कस्यचित्कर्मेति । तत्र यद्यस्य प्रसिद्धं तस्य तदनुवादेनाप्रसिद्ध लक्षणेन विधीयते । 'प्रसिद्धस्यानुवादेनाप्रसिद्धस्य विधानं हि लक्षणार्थः', तेन यत्कर्म की क्रियते तयाप्यसझं भवतीत्यपि सूनार्थः । एवं च कर्मणो लक्षणमुत्त्वा भेदान्निरूपपितुमाह- तत्रेधेति-यदिति पेचिदसत उत्पत्तिनिवृत्तिमाचक्षते, सत एवाभिव्यक्तिमन्ये, व्याकरणस्य चार्थव्य- वस्थायामव्यापारात् शब्दव्युत्पादन एवं प्रवृत्तत्वादुभयमप्याह-तत्र असजायते इति प्रथमः पक्षा- सतो भवनायोगादसदेव काय भवतीत्यर्थः । जन्मना प्रकाश्यते इति द्वितीयः पक्षः-असतः शशविषा- णस्पेव सतो गगनस्येव निर्वर्तनायोगात् प्रकाश एव जन्मेत्यर्थः । एतनिर्णयश्च ग्रन्थान्तरादयसेयः । अनोदाहरणम्-क्टं करोति, पुत्र प्रसूते इति । क्टगता निष्पत्तिमनुतिष्ठन् कट निवर्तयतीत्यर्थः । तथोक "सती वाऽविद्यमाना या प्रकृतिः परिणामिनी । यम्य नाश्रीयते तस्य निर्वय॑त्वं प्रचक्षते ॥" अम्पायमर्थ:-अविदामाना प्रकृतिर्यस्य निर्वय॑त्वं यथा संयोगविभागो जनय इति सयोगविभागौ न यस्याभित्मतेर्षियारावित्यविमानप्रतियत्वाग्निर्वय॑त्वन्तयोः सती या प्रकृतिः परिणामिनी यस नाभीयते तस्य निर्पयत्यम्, यथा फटं फ्रोति-फटस्य यद्यपि पाशा प्रकृतिभूताः सन्ति तथापि यदा न विपश्यन्ते सदा फटम्प निर्ययलम्, यदा तु विवक्ष्यन्ते सदा विकार्यपर्मता पटस्पेति तु कारक: ३५परीक्षायाम् । योनि प्रत्युच्छेदेन गुणान्तरापानेन या विमानमेय यदयस्थान्तर नीयते तहिकार्य ३ - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कर्मलक्षणं भेदाश्च २१३ विकार्यते विकृति नीयते इति व्युत्पत्तेः । तहिविधम्-तत्र प्रकृत्युच्छेदेन यथा-काष्टं दहति; नह्यत्र काष्ट. मसदेव जन्यते, तस्य कारणान्तरेभ्यः प्रागेवोत्पन्नत्वादुत्पन्नं तु केवलं भस्माख्यामवस्थामापद्यत इति । प्रकृत्युच्छेदमन्तरेणापि गुणान्तराधानेन यथा काण्डं लुनाति-अत्र काण्डशब्देन तत्कारणीभूता वीरणा उच्यन्ते । वीरणशब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य वीरणस्वरूपस्य काण्डलक्षणविकारावस्थायामपि भावात् । काण्ड- लक्षणविकारोत्पादनेन वीरणान् विकरोतीत्यर्थः । यत्सदेवेति-यत्र क्रियाकृतो विशेपो निर्वृत्तिविकारलक्षणो५ नास्ति तत्प्राप्यम्-यथा आदिलं पश्यति, ग्रामं गच्छति । नहि शिगमिक्रियाभ्यां व्याप्यमानयोरादित्य- ग्रामयोः प्राप्तेरन्यः कश्चिद्विशेषो लभ्यत इति प्राप्यमेतत् । नन्ववान्तरव्यापारशालिन एव कारकत्वं यथा कर्तुश्छिदिक्रियायां दृढमुष्टिनिःपीडनादिरवान्तरव्यापारः, नानपेक्षितदृढमुष्टिनिःपीडनो जाल्मकरस्थः कुठारः काष्टच्छिदायै प्रभवति । तत्रास्य कर्मणः कीदृशोऽवान्तरव्यापार इत्यत्रोच्यते-अस्य तु त्रिविध- स्थापीत्यादि-नह्यनिर्वर्त्तमानं शशविपाणमिव निर्वर्तयितुं शक्यं तस्मान्निर्वय॑स्य निर्वृत्त्यनुकूलत्वमवान्तर-१० व्यापारः । एवं विकृतिमनुपगच्छतो वज्रस्येव विकार्यत्वायोगाद्विकार्यस्य विकृत्यभिमुखत्वं व्यापारः । तथा आभासायोग्यस्य परमाण्वादेरिवाभास्यत्व विरहाद्वयाप्यस्याभासगमनं व्यापार इति । एतेन निर्वादिकर्मणां क्रियाजन्यत्वे क्रियाहेतुत्वलक्षणं कारकत्वं न घटते; नहि जन्यो जनकस्य हेतुतामर्हति पुत्रः पितुरिव । तथोक्तम्- "निर्वत्यै कारकं नैव क्रिया तस्य हि साधिका । विकार्यमप्यभावेन विरुद्धं नैव कारकम्” ॥ १ ॥१५ प्राप्यत्वात्पूर्विकाऽवस्था न सा कर्म बुधैर्मता । प्राप्यावस्था क्रिया साध्या साधनत्वात्साधनं नहि" ॥ २ ॥ न च क्रियातः समुत्पद्य पश्चाक्रियां प्रति कारकं भवति । यथोक्तम्- "आत्मलाभे हि भावानां कारणापेक्षिता भवेत् । लब्धात्मनां स्वकार्येपु प्रवृत्तिः स्वयमेव हि" ॥३॥ इति वाच्यम् , यद्विकाराणान्तरादुत्पद्य कार्यान्तरमारभते तत्रेदं वक्तुं शक्यम् , अन तु क्रियया २० आत्मतां लभमानं क्रियाया एव कारकमित्येकविपयत्वे न तथा वक्तुं शक्यम् । किञ्च क्रियाधीनं कर्म कर्माधीना क्रियेति कर्माभावे क्रियाभावः क्रियाभावे कर्माभाव इति द्वयोरप्यभाव इतरेतराश्रयत्वं च । कर्म क्रियामपेक्षते क्रिया च कर्मेति इत्यादि यदुच्यते तन्निरस्तम्, क्रियाजन्यत्वेऽपि निर्वादीनां यथोक्तस्वस्वव्यापारापेक्षया कारकत्वाव्याहतेः । तथोक्तम्- "स्वव्यापारेषु कर्तृत्वं सर्वत्रैवास्ति कारके । व्यापारभेदापेक्षायां करणत्वादिसम्भवः ॥ १ ॥ २५ यदुत्पद्यते तदुत्पाद्यते इत्युत्पत्तिक्रियाकर्तृभूतस्य कर्मत्वमिति दिक् । पुनरेकैकं विधेति-यदवातुं क्रियाऽऽरभ्यते तदिष्टं कटादि, यद्दिष्टं प्राप्यते तदनिष्टं, यथा विपत्ति । यत्र नेच्छा नच द्वेपस्तदनुभयमुदासीनमिति यावत्, यथा ग्रामं गच्छंस्तृणं स्मृशति । नन्वनिष्टोदासी- नयोः कर्मणोः, कळ यद्विशेपेणाप्नुमिप्यते इति लक्षणमव्याप्तम् , यदपि युक्तं चानीप्लिवमपीति परेणोक्तं तदपि मियोऽव्याप्तमननुगमात् । अनोच्यते । कर्चाप्यमित्वस्य क्रियाजन्यफलानयत्वे तात्पर्यम् , ततश्च मियाजन्यफलाश्रयत्नं कर्मणो लक्षणं सर्वत्रानुगतमिति न कोऽपि दोष इति । एवं चात्र नवधा कर्मोक्तम् । भूपणसारे तु सप्तविधमुक्तम्-- "निर्वयं च विकार्य च प्राप्यं चेति त्रिधा मतम् । तमिततमं कर्म चतुर्कीन्यत्तु फन्धिनमः ॥१६॥ "औदासीन्येन यत्माप्यं यच कर्तुरनीप्सितम् । संशान्तररनाल्यानं यद्यपाप्यन्यपूर्वकम् ॥ २॥ ३४ मनुनये च यत्तेते, भिक्षिस्तु याच्यायामेवेयनयोर्भद । नन्वेवमपि याचेरेवोपादान व्यस्तेनैव याच्या- २१४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- इति चास्यपदीयात् । "यदसज्जायते सद्वा जन्मना यत्प्रकाश्यते । तन्नित्यं विकार्य तु द्वेधा कर्म व्यवस्थितम्" ॥३॥ "प्रकृत्युच्छेदसम्भूत किञ्चित्काष्ठादिभस्मवत् । किञ्चिद्गुणान्तरोत्सत्त्या सुवर्णादिविकारवत्" ॥ ४ ॥ "क्रियाकृतविशेषाणा सिद्धिर्यन न गम्यते । दर्शनादनुमानाद्वा तत्प्राप्यमिति कथ्यते" ॥५॥ ५ इति च तनवोक्तम् । अनुमानादिति यथा चैनं रोपयतीत्या रोपलक्षणस्य विकारस्यादर्शनेऽपि मुखवैवादिकार्यानुमे- यत्वाद्विकार्यत्वमिति । क्रमेणोदाहरणानि-"घट करोतीत्याद्यम् । काष्ठ भस्म करोतीति सुवर्ण कुण्डल करोतीति च द्वितीयम् । घट पश्यतीति तृतीयम् । ग्राम गच्छन् तृण स्पृशतीत्युदासीनम् । विष मुझे इति द्वेष्यम् । गा दोग्धीति सज्ञान्तरैरनाख्यातम् । क्रूरमभिक्रुद्ध्यतीत्यन्यपूर्वकमिति ।" १० मुख्यगौणभेदादिति-तत्कर्म प्रधानेतरभेदाहिभेदम् , तच द्विकर्मकेषु धातुपु दुहि-भिक्षि-रुधि-प्रच्छि- चिंग-गक्-शास्वर्थेपु, याचि-जयतिप्रभृतिषु च भवति । तत्र 'दुहीक क्षरणे' 'त्रु गतौ' 'क्षर सचलने' इति दुह्यर्थाः । यथा गा दोग्धि पयः, गा स्रावयति पयः, गा क्षारयति पयः, दुहेरन्त- भूतण्यर्थत्वेन द्विकर्मकत्वम्-गौ. कर्नी, पय कर्म मुञ्चति, ता मोचयतीत्यर्थ । सुक्षरयोस्तु साक्षाणण्यन्त त्वादेव द्विकर्मकत्वम् । वक्ष्यमाण “गतिवोधा०" (२।२।५) इत्यत्र वहुवचनादन्येपामपि अणिकर्तुः १५ कर्मत्वं युक्तम् । नान नियमः प्रवर्त्तते इति । एवमप्रेऽपि यथायोग भाव्यम् । 'भिक्षि यान्नायाम्' 'डुयाग याच्मायाम्' 'मृगणि अन्वेपणे' अदन्त प्रपूर्वः 'अर्थणि उपयाचने' इति याच्मार्था -यथा पौरव गा भिक्षते, याचनापूर्व गा दापयति वियोजयति वेत्यर्थः । याच्यमानश्वाय हृष्टो म्लानो या भवतीति, इद विकार्य कर्म । एव पौरव गा याचते, चैत्र शत मृगयते, चैत्र शतं प्रार्थयते । रुधूम्पी आवरणे रुध्यर्थः, गामवरुणद्धि ब्रजम् । व्रज सेवमाना सेवयतीत्यर्थ । 'प्रच्छत् झीप्सायाम् 'चुदा २० सञ्चोदने' इति प्रच्छार्थी छात्र पन्थान पृच्छति, छान वाक्य चोदयति । अवपूर्वः 'चिंग्ट चयन पृक्षमपचिनोति फलानि । 'बुंग्क व्यक्ताया वाचि' शिष्य धर्म बूते । अनुपूर्वः 'शासूक् अनुशिष्टों शिष्य धर्ममनुशास्ति । याचि प्रागुक्तः, किन्त्वनुनयार्थोऽयमन ज्ञेय -बुद्ध याचते शमावस्थाम्' अघि नीत याचते विनयम् । ननु भिक्षियाच्योरेकार्थत्वात्कथ द्वयोरुपादानमित्यत्रोच्यते-याचिर्हि याभाया- २५नुनययोरभिधानात् । अस्त्येवत्, किन्त्वेव यथा याच्मार्था धातवो गृह्यन्ते, एवमनुनया अपि गृहोरन्, अब पुनर्भिक्षिमहणात् याच्मार्थाना सर्वेपा ग्रहणम्, याचिग्रहणात्तु तस्यैवानुनयार्थस्येति । 'जि जये 'दण्डण् दण्डनिपातने' 'कृषीत् विलेसने' 'दुर करणे' 'मन्थर विलोडने 'गींग प्रापणे 'हर हरण 'मुपम् तेथे 'वहीं प्रापणे' 'प्रहरीर उपादाने' 'दुपीए पा' इत्येकादश जयतिप्रभृतयः-यया गर्गान शत जयति, गर्गान् शत दण्डयति, मोचयतीत्यर्थ । प्राम शाखा फर्पति, योनयतीयर्थः । पाशान् के ३० परोति, पाशान् विपरिणमनयन् पट फ्रोतीत्यर्थ । अमृतमम्नुनिधि मभाति, वियोजयतीत्यर्थ । अनी माम नयति, प्रापयतीत्यर्थ । ग्राम भार हरति, चियोनयति प्रापयति या । उपसरजमश्य मुगाति, उपसर' पुरषो देशविशेपो या, नत्र जातस मुख्याति यायतीत्यर्थ । ग्राम भार यहति, प्रापयतीत्यर्थ , हातानीय शन गृहाति, सानयतीत्यर्थ । तण्डलानोदन पचति, तण्डुलान् विष्टेदयन् वियुर्वन् ओदन फ्रोतीत्यर्थः । एतग सयं धातूनामनेार्यत्वादुपपद्यते । एप प ण्यन्तानामन्तर्भूतण्यांना प धागा ३५दिएमपत्य साविशी तरयम् ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कर्ममेदलक्षणम् २१५ ननु मुख्यगौणभेदान कर्मणो द्वैविध्यमुक्तम् , नत्र मुख्यगौणयोः किं लक्षणमित्यन्त्रोच्यते--अत्र वध क्रिया आरभ्यते, तत्पयःप्रभृति मुख्यं कर्म तसिद्धये तु यदन्यत् क्रियया व्याप्यते गवादि, तद्वोणम् । चदा तु पयोऽर्था प्रवृत्ति विवक्ष्यते, तदा मुख्यासान्निध्याद्वारेख मुख्यता-यथाश्चर्यो गवां दोह इति । नन्वेवं गवादेः परार्थत्वात् क्रियायोगाभावाव्याप्यत्वात् कर्मसंज्ञा न सिद्ध्यति, किन्तु गां दोग्धि क्षारयति पयः इत्यत्र गोः पय आदत्ते इत्यादपादानत्वं प्राप्नोति । एवं पौरवं गां भिक्षते इयत्र५ पौरवानां जिघृक्षते इत्यादपादानत्वम् , गामवरुणद्धि ब्रजमिति बजे गां स्थापयतीत्यर्थाद्रजस्य स्थान- क्रियापेक्षया आधारत्वं प्रतीयते, छात्रं पन्थानं पृच्छतीत्यत्रापि छात्रान्मार्गोपदेशं जिवृक्षते इत्यादपादा- नत्वम्, वृक्षमवचिनोति फलानीत्यत्रापि वृक्षात्फलान्यावृत्ते इत्यपादानत्वं प्राप्नोति, शिष्यं धर्म वृत इत्यादौ तु धर्मेण वचनानुशासनकर्मणा शिष्यस्याभिप्रेयमाणत्वात्सम्प्रदानत्वं प्राप्नोति, एवं गर्गान् शतं जयतीत्यादावपि गर्गेभ्यः शतम् , ग्रामात्र शाखां गृहातीलपादानत्वं प्राप्नोतीत्यत्रोच्यते-अवधित्वाचवित्र-१० क्षायां क्रियानिमित्तभावमात्रेण तव्याप्यत्वस्य विवक्षितत्वात् “कर्तृाप्यं कर्म" (२।२।३) इति कर्म- संज्ञा सुखेन सिद्ध्यति । अवधित्वादिविवक्षायां तु भवत्येवापादानादित्वम् , गोदाग्धि पयः इत्यादि । ननु गां दोन्धि पयः इत्यस्यायमर्थः-चौः परस्त्यजति, चैत्रो गवा पयस्त्याजयति, तत्र प्रयोत्कृच्यापारे- णाप्यमानत्वाद्गोः कर्मत्वम् , न तु दोहादिनेति । नैतदस्ति । यथा ण्यन्तेषु धातुपु क्रियाविष्टः प्रयुज्यते इति प्रतीतिः-यथा पचन्तं प्रयुके पाचयति, नैवमिह, निष्क्रियस्यापि गवादेोहनयनादिपु विनियोगान् ।१५ ननु ओदनं पचतीति लोके शास्त्रे च प्रयुज्यते, तत्रौदनः पच्चेतेति द्रव्यान्तरमभिनिर्वर्त्ततेत्यर्थः स्यात् , ओदनशब्दस्य तण्डुलविकारविशेपवचनत्वात , पचेश्च विक्लित्त्युपसर्जनविश्लेदवचनत्वात् , निवृचस्यौदनस्य विश्लेदान्तरकरणं स्यात्, नचेत्थं लोके प्रतीतिरस्ति । नैप दोपः । तादर्थ्यात्ताच्छब्धं भविष्यति, ओदनार्थास्तण्डुला ओदन इति गौणार्थाश्रयेणैव सर्वलोकस्य प्रयोगदर्शनादिदं न नोदनीयम् , मुख्यस्यै- चोदनस्य पुनर्विक्लित्तिकारके कस्मादयं प्रयोगो न भवतीति । ओदनविकारविशेपप्रतिपादनाय च गौणार्थ-२० परिग्रहः । तण्डुलान् पचतीत्युक्ते विकारान्तरमपि प्रतीयते इति । अथ कथं भविष्यति ?-तण्डुलानो- दनं पचति, आहोस्वित्तण्डुलानामोदनं पचति इत्युभयथा प्रयोगदर्शनात् प्रकृतिविकृयोः साक्षाढुपादाना- त्तादात्ताच्छन्द्यानुपपत्त्या विश्लेदनवचने पचौ तण्डुलानामोदनं पचतीति प्रयोगाभावप्रसगात् । उच्यते । उभयथापि भवितव्यमिह तावत्तण्डुलानोदनं पचतीति व्यर्थः पचिस्तण्डलान्पचति ओदनं निर्वतयति । अत्र हि विश्लेदनोपसर्जने निर्वर्त्तने पचिर्वर्त्तते । तण्डुलान् विछेदन्नोदनं निर्वर्त्तयति । तत्रोपसर्जनविछे-२५ दनक्रियापेक्षं तण्डुलानां कर्मत्वम् , प्रधानभूतनिवर्त्तनापेक्षं त्वोदनस्य । तण्डुलानामोदनं पचतीत्यत्रापि ब्यर्थः पचिः, विकारयोगे पष्टी । तण्डुलविकारमोदनं निवर्त्तयतीति । अत्र तण्डुलानां सम्बन्धिनं विकारमोदनं विश्चित्त्या निर्वर्त्तयतीत्यर्थः । मा च विष्ठित्तिः सामर्थ्यात्तण्डुलानामेव विज्ञायते इन्युभय- मपि समञ्जसम् । अथ द्विकर्मकेषु दुहादिधातुपु कर्मणि तिवादय उत्पद्यमानाः प्रधानाप्रधानाभ्यां भिन्नकश्मनेकं कर्म युगपदभिधातुमसमर्थाः, किं प्रधाने कर्मण्युत्पद्यन्ते, अथ गुणकर्मणीति ? तत्र ३० प्रधानामधानसन्निधौ प्रधानाभिधानन्यैव न्यान्यत्वमिति केचिन् , नदयुक्तम्-दुद्दादीनां अप्रधानकर्मण्येव त्यादिकृत्यखला इति, गोवुद्यते दुग्धा दोघा वा पय इति । अचमर्थः यतः पयोऽर्थी प्रथमं गत्रि प्रवर्तते ततोऽन्तरगत्वा धादिषु गुणकर्मणि तिवादयो भवन्ति । उक्तं च- "गुणकर्मणि लादिविधिः" पूर्व गुणकर्मणा भवति चोगात् । मुन्यं कर्मप्रेप्नुर्बलाद्च्चे च चतते पार ॥ १ ॥ - -रियम्, न स्वमतिपरिकल्पनान ज्यायसीत्युभयत्र पर्यायेण सिद्धः कर्मजः प्रत्यय इति कर्मजप्रत्ययेनेर २१६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु- तस्मात् शुद्धस्य दुहेर्भवति गवा पूर्वमेव सम्बन्धः। गोदुहिना पयसस्तु प्रोक्तस्तस्माल्लादयस्तस्मिन्निति ॥ २॥" गोर्दुह्यते-दुहेः "तत्साप्यानाप्यात्कर्मभावे कृत्यक्तसलाश्च" ( ३।३।२१) इति कर्मण्यात्मनेपदेन क्यः शिति' (३।४७०) इति क्यसहितेन गुणकर्मणाऽभिहितत्वम् । एवं याच्यते पौरवः कम्बलम्, ५अवरुध्यते गां व्रजः, पृच्छयते धर्ममाचार्यः, भिक्षते गां चैत्रः, अवचीयते वृक्षः फलानि, उच्यते शिष्यो धर्मम् , शिष्यते शिष्यो धर्मम् , जीयते शतं चैत्रः, गर्गाः शतं दण्डयन्ताम् , "येनापविद्धस- लिलः स्फुटनागसद्मा, देवासुरैरमृतमम्बुनिधिर्ममन्थे । व्यावर्तनैरहिपतेरयमाहिताङ्कः, खं व्यालिसन्निय विभाति स मन्दराद्रिः" ॥ १॥ इति किरातपञ्चमसर्गे त्रिंशत्तमं पद्यमित्यादि । नीवहिहरतिप्रभृतीनां तु प्रधाने फर्मणि कर्मजः प्रत्ययो भवति । नीयते नेता नेतव्या ग्राममजा, १० अजादेः प्राधान्यानेतुश्च तत्रैव पूर्व क्रियाप्रवर्तनादन्तरगत्वाच्च तत्रैव प्रधाने कर्मजः प्रत्यय इति । अत्र केचिदाहुः-नामी नयत्यादयो द्विकर्मका अन्यकर्मकत्वात् । अजां नयति ग्रामम्-अजां गृहीत्या ग्राम यातीति घनार्थः, नयतिस्तु प्राप्तिमात्रवाची; गम्यमानक्रियापेक्षयापि कर्मत्वं दृश्यते यथा प्रविश पिण्डीमिति भक्षणक्रियापेक्षयेति । एतच्चायुक्तम्-अजा नीयते ग्राममित्यत्र कर्मण्युत्पद्यमानेनात्मनेपदेनाजा कर्मणोऽभिधानं न प्राप्नोति, गृहातेरजा कर्म न नयतेरिति, तस्मादन्यकर्मत्वमजाया नैटव्यम् । एवं १५ उहते भारो प्रामं, हियते कुम्भो ग्राम, कृष्यते ग्रामं शाखा इति गत्यर्थानामकर्मकाणां च णिगन्तानां प्रधान एव कर्मणि अणिगवस्थायां कर्तृभूते कर्मणीति यावत् कर्मजः प्रत्ययो भवति, प्राधान्यं च तस्य "गतियोधाहारार्थ०" (२२२।५) इति कर्मसंज्ञाया विधीयमानत्वेन कृत्रिमत्वात् कर्तुः प्रथमप्रचि. विपयत्वाच-यथा गमयति मैत्रं ग्रामम् , गम्यते गमितो गम्यो वा मैत्रो ग्रामम् चैत्रेण, आसयति मास मैत्रम्, आस्यते मासं मैत्रश्चैत्रेण, । अन्यस्त्वप्रधानेऽपीच्छति-गम्यते मैत्रं प्रामश्चैत्रेण, आस्यते मासो २० मैत्रं चैत्रेण । योधाहारार्थशब्दकर्मकाणां तु णिगन्तानामुभयत्र-बोधयति शिष्यं धर्म, बोध्यते शिष्यो धर्म, योध्यते शिष्यं धर्म इति वा, भोजयत्यतिथिमोदनं भोज्यतेऽतिथिरोदनं भोज्यतेऽतिथिमोदन इति पाठयति शिप्यं प्रन्यं, पाठ्यते शिष्यो ग्रन्थं, पाठ्यते शिष्यं ग्रन्थ इति वा । अत्रायमाशयः- वोधयति शिष्यं धर्ममित्यादापनियतो गुणप्रधानभावः; तथाहि-वाक्यस्य धर्मप्रतिपादनपरत्वे धर्मस्य प्राधान्यम्, शिष्यादेर्गुणभावः; शिष्यादिसंस्कारपरायां तु प्रवृत्ती, शिष्यादेः प्राधान्यम्, धर्मस्य गुण- २५भावः; तथा अर्थस्य शब्देन प्रतिपाद्यत्वाच्छब्दस्य प्राधान्यं प्रमाणयन्तोऽभिधाव्यापारेण प्रयोकृव्यापा- रस्य प्राधान्यात्प्रयोज्यस्यैव कर्मणः प्राधान्यम् , गुणभूतप्रयोज्यव्यापारकर्मणस्तु गुणभावः, परत्वादर्थस्यैव प्राधान्यमाचार्याः समर्थयन्त, आर्थेन तु न्यायेन प्रयोज्यव्यापारस्य प्राधान्यम्, तदर्थत्वात्प्रयोजकव्यापारस्य, तत्प्राधान्याच तत्कर्मणोऽपि प्राधान्यमिति विवदन्ते आचार्याः । स्मृति- - घा, शब्दस्वार्थ- ३० कर्मणोऽभिहितत्वात्सर्यन फर्मगि द्वितीया न भवति । यन हि तिवादिभिः कर्मादय उच्यन्ते, तर गया. दिशब्दः स्वार्याव्यतिरिक्तऽर्थमान एवेति प्रथमेव ततो युक्ता, न द्वितीयादयः, कर्मादौ वृत्त्यभावादिति । अथ फर्मुाप्यं कर्मेसन क रिति किम् ?1 मापेप्पश्वं वभातीय वनातिक्रियया अश्वः की यथा विशेषेणा- २३ मुमिप्यते तथा भक्षणादिमियया प्रतीयमानयाधेन मापा इत्यसति कर्तृग्रहणे कर्मणाश्वेन व्याप्यमाणाना• पस्तन्तर विशेषगार्नु कवेिच्छति, नान्यत्तदधौनकरणादिकमिति मन्यमानस प्रश्नमिदं पृच्छति यर्मणोऽपि निमित्त पदामिप्यते तसपि कर्मसमा सादिवि मन्यमान. प्रलाचटे माषेविति ।

। , प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कर्मसंज्ञाविधानम् २१७ मपि मापाणामधिकरणसंज्ञां वाधित्वा कर्मसंज्ञा स्यात्कर्तृग्रहणात्तु न भवतीत्यर्थः । नन्वेवमपि कर्तुर्गुणत्वा- द्गुणे च सङ्ख्याया विवक्षणाद्वाभ्यां कर्तृभ्यां बहुभिर्वा यद्विशेषेणाप्नुमिष्यते तस्य कर्मसंज्ञा न स्यात् । नैप दोपः । कारकान्तरव्याप्यस्य कर्मसंज्ञाप्रसङ्गनिवारणपरत्वात् , शास्त्रस्य च लक्ष्यसंस्कारत्वात् , कर्तुर्गुण- स्यापि सङ्ख्या न विवक्ष्यते । सङ्ख्याया अविवक्षणाच प्रधानस्यानियमेन विस्फारः । यथेह कटं करोति, कटौ करोति, कटान् करोतीति कर्मसंज्ञा भवति, तथेहापि भवति–कटं कुरुतः, कटं कुर्वन्तीति । व्याप्यं ५ च कर्मसंज्ञया संश्रियमाणत्वात् प्रधानमिति तस्य सङ्ख्या न विवक्ष्यते इत्येतस्य चार्थस्य ज्ञापकमेकशेय- सूत्रे एकग्रहणमिति । किञ्च वीति किमिति-पयसा ओदनं भुङ्क्ते-अत्र करणस्य मा भूत् । अयं भावः- कर्तुः साध्यत्वात् क्रिया पूर्वमाप्तुमिष्टा, कर्म तु तत्फलत्वेन, ततश्च क्रियाया आप्तुमिष्टाया विशेपणं फलम् । पयसा ओदनं मुझे इत्यत्र तु पयसः संस्कारकत्वादोदनस्य संस्कार्यस्यैव विशेपेणाप्नुमिष्टत्वमिति तस्यैव कर्मत्वं न पयसः करणस्य । नन्वेवं तहिं यदा कश्चित्कञ्चिदामन्त्रयते-सिद्धं भुज्यतामिति, स आह-१० प्रभूतं भुक्तवानस्मि, आमन्त्रयमाण आह-दधि खलु भविष्यति, पयः खलु भविश्यति । आमन्यमाण आह-इन्ना खलु भुञ्जीय, पयसा खलु भुञ्जीयः । अत्र चान्वयव्यतिरेकाभ्यां दधिपयसोरेव विशेपेणा- प्यत्वात्कर्मसंज्ञा प्राप्नोति, नत्वोदनस्येति ? उच्यते । तस्याप्योदन एवानुमिष्टः, दधिपयसोस्तु संस्कारक- त्वात्करणभावः । गुणेषु झुपकारकेपु केवलेपु नादरः, किं तर्हि ? तत्संस्कृते ओदनादी, तद्यथा-भुञ्जी- यामोदनम् , यदि मृदुविशदः स्यादिति । यद्यत्र मार्दवमाने आदरः स्यात् , पङ्कमपि भक्षयेत् , वैश-१५ द्यमात्रादरे तु सिकता अपि । एवमिहापि दध्यादिगुणमोदनं भुञ्जीयेत्यदोपः । कर्मव्यायप्रदेशाः "कर्मणोऽण्” ( ५।१।७२) "व्याप्याचेवात्” (५।४।७१) इत्यादयः । एवं च कर्मकारके युक्तेर्दिग्मानमत्र निर्णीतम् । श्रीसिद्धहेमतत्त्वप्रकाशिकान्यासमनुमूल्य ॥ १ ॥ अथ विनेयजनानुग्रहाय अकर्मकाणां सकर्मकतायां गत्यर्थादीनामेककर्मकाणां च द्विकर्मक- तायां सूत्रपद्धतिर्लिख्यते- "वा कर्मकाणामणिकर्ता णो” (२।२।४ ) अकर्मकाणां धानूनामणिगवस्थायां यः कर्ता स णिगि सति कर्म वा स्यात् । ननु द्विधाऽकर्माणः-सकर्मकाणोऽप्यविवक्षितकर्माणः, सर्वथाऽविद्यमान- कर्माणश्चेति । तत्केयामिह ग्रहणमित्यत्रोच्यते-उत्तरसूत्रे नित्यग्रहणादनाविवक्षितकर्माण एव प्राधाः । यथा पचति चैत्रः, पाचयति चैत्रं चैत्रेण वा । नन्वोदनं पचतीत्यादिप्रयोगदर्शनान् कथं पचादीनामविवक्षि- तकर्मत्वमित्यत्रोच्यते--शब्दप्रयोगस्य परार्थत्वात्परेण च किं करोतीति व्यापारमात्रम्य जिनासितत्वादन्य-२५ थोन्मत्तत्वप्रसङ्गात्प्रतिपादयितुस्तावन्मात्रस्यैव विवक्षितत्वादादासीन्यमात्रनिवृत्तिपरनया प्रयोगाच्छन्देन कर्मणोऽसमर्पणादविवक्षितकर्मत्वम् । यदाह- "धातोरर्थान्तरे वृत्तेर्धात्वर्थेनोपसङ्ग्रहान् । प्रसिद्धरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया ॥ १ ॥ धातोरान्तरे वृत्तिद्विधा । एका स्वाभाविकी, धातनामनेकार्थत्वात् यथा-भारं यहनीन्यत्र नकर्म- कोऽपि वहतिर्नदी बहतीवत्राकर्मकः । द्वितीया चोपसर्गसन्निधिकृना-चयोच्छति सूर्य उन्नत्र गमिरक-३० र्मकः, 'जीव प्राणधारणे' इति धात्वर्थन कर्मण उपसझन्हान् चैत्रो जीवतीयत्र जीवतिरकर्मकः, प्रसिद्ध- यथा-गर्जति दशरदिन वर्पतीत्यत्र जलस्य कर्मणः प्रसिद्धत्वादकर्मकत्यमिति । “गतियोघाहाराटाब्द- कर्मनित्याकर्मणामनीग्वाद्यदिहागन्दायकान्दाम्" (२५) गनिदेशान्तरमारियों ने ते गत्याः; बोधो मानमानं नहिशेषत्रा, सोऽयों येषां ते बोधार्या:; आहारो भोजनम, नोऽयों ते आहारार्थाः; शब्दः कर्न क्रियान्यायं च येप ते दमाणः; नानि कर्म पां ने कानः नि-३५ १. प्रा. पू. २८ २१८ प्रतिपे- कर्ममहणं साधनकर्मपरिग्रहार्थम्, तेन शृणोति विजानाति उपलभते इत्येपामपि सिद्ध्यति; शृणोत्सादयो हि उपलब्धिरूपेऽर्थे वर्तमानाः शन्तक्रिया न भवन्ति, शब्दसाधनकर्माणस्तु भवन्ति, तद्विपयत्वेनेय महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते वोपनहैमलघु- मकर्माणो नित्याकर्माणः, सर्वथाऽविद्यमानव्याप्या इत्यर्थः; नीसाद्यदिद्वयतिशब्दायतिक्रन्दिवर्जितानां गत्यर्थबोधार्थाहारार्थानां शब्दकर्मणां नित्याकर्मणां च धातूनामणिगवस्थायां यः कर्त्ता स णौ सनि फर्म स्यान् । गत्यर्थ.-च्छति मैत्रो ग्रामम् , गमयति मैत्रं प्रामम् , याति मैत्रो मामम्, चापयति मैत्रं प्रामम् ; देशान्तरप्राप्तेरन्यत्र न भवति--स्त्रियं गमयति मैत्रेण चैत्रः, भजनार्थोऽत्र गमिः ॥ ५सामान्यवोधार्थ. युध्यते शिपयो धर्मम् , बोधयति गुरुः शिष्यं धर्मम् , जानाति शिष्यो धर्मम् , ज्ञापयति गुरुः शिष्यं धर्मम् । एवम् उपलम्भयति अवगमयतीत्यादि । विशेपयोधार्थ.-पश्यति रूपतर्कः कापणम्, दर्शयति रूपतर्क कापणं वणिरु; एवम् प्रापयति मैत्रमुत्पलम् , सहयति मैत्रं वस्त्रम्, श्रावयति शिष्यं धर्मम् , स्मारयति शिष्यं धर्मम् , अध्यापयति शिष्यं शास्त्रम् । अन्ये तु योधविशेपास्य दृशेरेवेञ्छन्ति नान्येपाम्-तन्मते जिघ्रत्युत्पलं चैत्रः, प्रापयत्युत्पलं १०चत्रेण मैत्रः; एवं सर्शयति चत्रेण वस्त्रम्, श्रावयति धर्म शिप्येण इत्यादी प्रयोज्यकर्तरि तृतीयैव भवति ॥ आहारार्थ.-मुळे वटुरोदनम्, भोजयति वटुमोदनम् , अनाति बटुर्भक्तम्, आशयति पटुं भक्तम् ॥ गन्दक्रिय.-जल्पति मैत्रो द्रव्यम् , जल्पयति मैत्रं द्रव्यम् । एवम् आलापयति नि मैत्रम्, सम्भापयति मैत्रं भार्याम् । शब्दव्याप्य.-शृणोति शब्दं मैत्रः, श्रावयति शब्दं मैत्रम्, अर्धाते वटुर्वेदम्, अध्यापयति बटुं वेदम् । एवम् जल्पयति मित्रं वाक्यम्, विज्ञापयति गुरुं वाक्यम्, १५ उपसम्भयति शिष्यं विद्याम् ।। ननु शब्दकर्मेत्यनेनैकप्रयत्नेनोभयाग्रहणाद्वाक्यभेदप्रसगात्कथं शब्दक्रिय- शब्दकर्मकाणामुभयेपां परिग्रहः ? उच्यते-द्वयत्यादीनां त्रयाणां शब्दक्रियत्वेन प्राम्यभावान्, धवैयर्यप्रसगात्, कर्मशब्दस्य क्रियावचनता । हयत्यादयो हि धातवः साध्यमानावस्यं क्रियारूपं शब्दमभिदधतीति शब्दक्रियत्यादतिप्रसङ्गे सति प्रतिषेधो विधीयते । शब्दायतेश्च शब्दं करोतीति क्यहि शब्दक्रियालक्षणस्य कर्मणोऽन्तर्भावात्कर्मान्तरायोगाच्चाकर्मकत्यादपि संज्ञाप्रसङ्ग इति । एवम् जत्पति- २० विलपत्याभापतीनां जल्पयति देवदत्तमित्या शब्दनक्रियावृत्तीनां शब्दनक्रियाग्रहणे सिद्ध्यति । देवदत्वं जस्पतीत्यादीनां शब्दकर्मत्वाभावात् । एवं च कर्मग्रहणानर्थक्यं गतियोधाहारशब्दार्थेति कृते सिद्ध्यतीति प्रयोगान् । एवं जल्पत्यादीनामपि शोकादिद्रव्यविशेषकर्मणां साधनकर्मपरिमहादेव सिद्धिः न चैप २५ युद्धपर्यता, योधशब्देन योधसामान्याश्रयणपक्षे वेत्त्यादयो मानमात्रप्रवचना बुद्ध्यर्याः । विज्ञानान्युपर- भत इत्येतो यद्यप्युपलब्धिमानपचनी तथापि प्रयोजकव्यापारविवक्षायां करणादिवशायदा शन्दादि- विपयामेवोपलब्धि प्रत्याययतस्तदा साधनकर्मयचनासिद्धयति नत्वन्यथेत्युभयार्थोऽत्र कर्मशब्दः; न च वास्यभेदः श्वेतो धावतीतिवन् । नित्याकर्मक.-आस्ते मैत्रः, आसयति मैत्रं चैत्रः, शेते मैत्रः, शायपति मैन पत्रः; नित्यग्रहणं पूर्वनाविवक्षितकर्मपरिग्रहणार्यमन्यया विभागो न ज्ञायेत । कालाध्यमावदेव ३० सर्वेऽपि धातवः सकर्मका एवेत्यन्यकर्मापेक्षया नियामका वेदितव्याः । गत्यादीनामिति विम्। पपत्योदनं पेत्रः, पापयत्योदनं चैनेण मैत्रः । अगिकतेसेय-गमयति चेत्रो मंत्रम्, गमयति धैग मैनं जिनदत्तः । नपत्यादिवर्जनं किम् ? नयतेः प्रापणोत्सर्जनप्राप्त्यर्यत्वेन गत्यर्थतम्- अग्र प्रापनीया उपसर्जने सासौ प्राप्तिश्चेति विपदः, साधनोराहार्यत्वम्, हाशब्दायक्रन्दा च शब्द फर्मत्यम्, तत एषां पर्मतं प्रासं प्रतिषिस्यते । यथा नयनि भारं चैत्रः, नाययति भारं चनेगा सादः यत्यपूर्व मैग, आदयति ओदनं मंग्रेण; शाययति पंत्र मण; शब्दाययति चत्रं मग्रेश, पन्दयति ३६ मि मप्रेण । फर्मसंज्ञाप्रतिषेधात्स्यव्यागराभयं कर्तृत्वमेव पणाम्येषनादिना प्रयोगफन्यागरण । तमपरः प्रयुके ।

व्याप्य- । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कर्मसंज्ञाविधानम् णिगन्तवाच्येनाणिकर्तुाष्यत्वात्कर्मसंज्ञा सिद्धैव, नियमार्थ तु वचनम्, प्रयोजकन्यापारेण मानस्य गत्यर्थादिसम्बन्धिन एव प्रयोज्यकर्तुः कर्मसंज्ञा भवति, तेनान्यधातुसम्बन्धिनः कर्तृत्वमेव भवति । तथोक्तम्- "द्वैकर्म्यहेतुरहिते णिगन्तधातौ द्विकर्तृता तत्र । उक्तः प्रयोजकः स्यात् कर्त्तानुक्तः प्रयोज्यस्तु” ॥१॥ यथा "भव्यैः कथं तदपि नाशयसे शरीरम्” । एतच्च कर्चुक्तौ, कर्मोक्तौ तु कर्मणि उक्तत्वम् । कोंस्तु५ द्वयोरप्यनुक्तत्वं यथा “जाप्यतेऽन्तर्द्विपस्तीर्थकृता भव्यजनवजैः” इति । "भक्षेहिसायाम्" ( २।२।६) भक्षेः खार्थिकण्यन्तस्य हिंसार्थस्याणिकर्ता णौ सति कर्मसंज्ञो भवति । भक्षयन्ति सस्पं वलीवर्दास्तान् प्रयुझे भक्षयति सस्यं वलीवन्मैित्रः । उक्ते च कर्मणि भक्ष्यन्ते यवं वलीवः, भक्ष्यते यवो बलीवन्मित्रेणेति वा । वनस्पतीनां प्रसवप्ररोहादिमत्त्वेन चेतनत्वात्तद्विशेयस्य सस्वस्थ प्राण- विप्रयोगस्तद्भक्षणात् , स्वाम्युपघातो वाऽत्र हिंसेति भक्षेहिँसार्थता । हिंसायामिति किम् ? भक्षयति पिण्डी १० शिशुस्तं प्रयुके भक्षयति पिण्डी शिशुना । भक्षयति राजद्रव्यं नियुक्तेन । भक्षयति पुत्रान् गार्या- भक्ष्यतिरनाक्रोशे । आहारार्थत्वात्प्राप्ते नियमार्थं वचनम् । "वहेः प्रवेयः” (२।२।७ ) प्रवीयते प्राजनक्रियया व्याप्यते यः स प्रवेयः, नियन्तुः सारथेः प्रयोजयितुर्व्यापारस्य कर्मेत्यर्थः । वहेरणि- कर्ता प्रवेयो णौ कर्मसंज्ञो भवति । वहन्ति वलीवी भारम् , तन्नियन्ता प्रयुक्ते वाहयति भारं वली- वान, वाहयिता भारस्य वलीवान , वाहयिता वलीवर्दानां भारम् , वाह्यन्ते भारं वलीवाः, १५ प्रवेय इति किम ? वाहयति भारं मैत्रेण नात्र मैत्रो वलीवदिवन् प्रवेयः । वहतिः प्राप्त्यर्थो यथा- वहन्ति वलीवर्दा देशान्तरं प्राप्नुवन्तीति । प्रापणार्थो यथा, ग्राम भार वहन्ति वलीवर्दाः-ग्रामं प्राप- यन्तीति । अत्रापि प्रापणोपसर्जनप्राप्तिरस्येव । अकर्मको यथा, वहति नदी; तत्र प्राप्तेर्गतिरूपत्वात्प्राप्त्यर्थ- स्याकर्मकस्य च गत्यादिसूत्रेण सिद्धत्वान्नियमार्थमिदम्-वहेः प्रवेय एव कर्ता णौ कर्म भवति नान्य इति । यदापि वहेरविवक्षितकर्मत्वं तदापि “वा कर्मणाम०" (२।२।४) इति विकल्पात्पक्षेऽप्राप्तिरिति २० विध्यर्थमिदम् । न चैवं विधौ सति नियमो नोपपद्यते इति वाच्यम् । आवृत्त्योभयार्थपरिग्रह इति । "हृकोर्नवा” (२।२१८) हरतेः करोतेश्चाणिकर्ता णौ कर्मसंज्ञो वा भवति । प्राप्ते चाप्राप्ते च विकल्पः । प्राप्ते यथा-विहरति देशं गुरुर्विहारयति देशं गुरुं गुरुणा वा । एवमाहारयत्योदनं वालं वालेन वा । विकुर्वते सैन्धवाः, विकारयति सैन्धवान् सैन्धवैरिति वा । विकुरुते स्वरं क्रोष्टा, विकारयति स्वरं क्रोष्टारं क्रोष्टुना वा । अत्र गत्याहारार्थनित्याकर्मकशब्दकर्मकत्वेन यथासङ्ख्यं प्राप्तिः । अप्राप्ते-हरति द्रव्यं मैत्रः, २५ हारयति द्रव्यं मैत्रं मैत्रेण वा । करोति कटं चैत्रः, कारयति कटं चैत्रं चैत्रेण वा । अत्र हरतिश्चौर्यार्थी न प्रापणार्थ इत्यप्राप्तिः । प्रापणार्थे तु प्राप्ते विभापा-कारयिता कटस्य देवदत्तं देवदत्तेन वा । कारयिता कटं देवदत्तस्य देवदन्तेन वा । अत्र च "वैकत्र द्वयोः” (२।२।८५) इति वक्ष्यमाणसूत्रेण प्रथमप्रयोगे कटलक्षणे कर्मणि पष्टी देवदत्तलक्षणे कर्मणि तु कर्मसंज्ञया द्वितीया, तदभावे कर्तृत्वविहिता वक्ष्यमाणेन "द्विहेतोरख्यणकस्य" वा (२१२१८७) इति सूत्रेण वैकल्पिकी तृतीया । द्वितीयप्रयोगे देवदत्तलक्षणे ३० कर्मणि पष्टी, कर्मसंज्ञाऽभावे प्राग्वत्तृतीया, कटलक्षणे कर्मणि तु वैकत्रेति 'कर्मणि कृतः” (२।२।८३) इति प्राप्रपष्टीविकल्पात् पष्टीविमुक्तपक्षे द्वितीया । तथोक्तं लघुन्यासे-प्रथमप्रयोगे देवदत्त- शब्दात् , द्वितीयप्रयोगे तु कटशव्दा" कत्र द्वयोः” इत्यनेन प्रामपष्टी विकल्पाद् द्वितीया । तद्विमुक्तकर्मणि "कर्मणि कृतः" इत्यनेन पष्टी । यद्यत्र "वैकत्र द्वयोः" इत्यनेन पष्टीप्रवृत्तिः स्यान्न विकल्पस्तदा द्वितीये कर्मणि "कर्मणि कृतः" इत्यनेन नित्यं पष्ठी स्यात् । कर्तृप्रधानदेवदत्तशब्दातु "द्विहेतोरन्यणकल वा" ३५ - २२० स्वादयोध्यते-त्यादिछत्तद्धितसमासरभिहितलाहोरशारयोरभिहितेऽर्थे शब्दप्रयोगायोगात् । यो पट महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- इत्यनेन प्राप्तकर्तृपष्ठीविकल्पात् तृतीया। "वैकत्र द्वयोः" इत्यस्य "द्विहेतोख्यणकस्य वा” इत्यस्य च प्र. त्युदाहरणं तु कारयिता कटस्य देवदत्तस्य, कटं देवदत्तस्य वेति गम्यमपि ज्ञेयम् । अत्र तु निष्प्रयोजनत्वान्न दर्शितमिति । तदेवमत्र कारयितेत्यादिप्रयोगद्वयेन वैकत्रेति सूत्रस्य पष्ठीविकल्पपक्षो दर्शितः, एतत्सूरस्य वृत्तौ तु प्रवृत्तिपक्षो दर्शितोऽस्ति, तथाहि-प्रथममेकस्मिन्कर्मणि विकल्पेन पष्ठी, द्वितीयकर्मणि "कर्मणि ५कृतः" इति नित्यं पष्ठी; पक्षे तु द्वयोरपि कर्मणोः पष्ठी, तथा च तत्रोदाहृतम्-अजाया नेता सुघ्नम् , अजाया नेता खुन्नस्य, । अथवा अजां नेता त्रुघ्नस्य, अजाया नेता सुघ्नस्य इति प्रवृत्तिपक्षः । विकल्प- पक्षे तु प्रथममेकस्मिन्कर्मणि पष्ठी, द्वितीयकर्मणि द्वितीया । पक्षेऽपि व्यत्ययेनैकत्र कर्मणि पष्ठी, द्वितीये द्वितीया तथैव कारयिता कटस्वेत्यादि दर्शितम्। "दृश्यभिवदोरात्मने" (२।२।९) दृशेरभिपूर्वस्य पदतेश्चात्मनेपदविपयेऽणिकर्ता णी सति कर्मसज्ञो वा भवति । पश्यन्ति राजानं भृत्यास्तान राजैवानु- १० फूलाचरणेन प्रयुङ्क्ते-दर्शयते राजा भृत्यान् भृत्यैर्वा । अभिवदति गुरु शिष्यः, अभिवादयति गुरुः शिष्यं शिष्येण वा। उभयत्रापि "अणिकर्मणिकर्तृकात्" (३।३।८८) इत्यात्मनेपदत्वम् अथया अभिवदति गुरु शिष्यः, तं मैत्रः प्रयुङ्क्ते-अभिवादयते गुरुं शिष्यं शिष्येण वा मैत्रः। “परिमुहायमायस." (३।३।९४) इत्यात्मनेपदविपयत्यम् । एवं दर्शयमानो राजा भृत्यान् भृत्यैर्वा । अभिवादयमानो गुरुः शिष्यं शिष्येण पा । अथया अभिवादयमानो गुरु शिष्यं शिष्येण वा मैत्रः । आत्मन इति किम् ? पश्यति रूपतर्कः १५पार्षापणम् , दर्शयति रूपतकं कार्षापणम्; अभिवदति गुरुं शिष्यः, अभिवादयति गुरु शिष्येण । दृशेर्योधार्थत्वेन नियं कर्मत्वे प्राप्तेऽभिवदेस्तु नियमप्राप्ते विकल्पः । यदा त्यभिवदिर्न प्रमाणार्थः, किन्तु शब्दनियस्तदा अभिवादयति गुरु शिष्यं मैत्र इति नित्यं प्राप्त विभापेति । 'पदिण भापणे' इत्यस्य णिजन्तस्यापि वर्णिगीच्छन्त्येके । अभिवादयति गुरुदेवदत्तम् , तस्मिन्नाशिपं प्रयुक्त इत्यर्थः । अभि- यादयते गुरु देवदत्तः गुरुणेति या, आत्मन्याशिष प्रयोजयतीत्यर्थः । जिगन्तस्यापीति कश्चित्- २० अभिवदति गुरुः स्वयमाशिपम् , तं शिष्यः प्रयुङ्क्ते-अभिवादयति गुरुमाशिपं शिष्यः, तं मैनः प्रयुङ्क्ते. अभिवादयते गुरुमाशिष शिष्यं शिष्येण वा मैत्रः । नामधातोरभिवादयतेरपीच्छन्त्यन्ये । एतत्सर्व "कर्तुाप्यं फर्म' इत्यनेन सदृहीतं ज्ञेयम् । अथ कर्मणो विभक्तिमाह- कर्मणि ॥४॥[सि० २।२।४०] द्वितीया सात् । कटं करोति । काष्ठं दहति । ग्रामं गच्छति । राज्यं प्रामोति । विपमति । २५ग्राम गच्छंस्तृणं स्पृशति ॥४॥ पर्म • सष्टम् । फटं परोतीति नित्यं कर्म, काष्ठं दहतीति विमार्यम्, प्रामं गच्छतीति प्राप्यम् । एवं राग्यं प्रामोतीति इष्टम्, विषमत्तीत्यनिष्टम् , सृणं रपृशतीत्युदासीनम् । ननु क्रियते पटः, फटः, शतेन प्रीतः शायः पटः, आरूढः कपियं स आरूढपिसररित्यादिपु कर्मसु द्वितीया पुतो न - यूना २०परोपी भीममुहार दर्शनीयमिति भीष्मादिगुणविशिष्टस्स फटम्प फरोनिग्रियया व्याप्यत्वाकर्मत्यम्, तर फटसमायोत्पनया द्वितीययाभिहितमिति भीष्मादिभ्यो द्वितीया न प्रामोति, यया पृतः पटो भीम उदारो दर्शनीय इति परोतेः सप्रन्ययेनेति । नेयम् । भीष्मत्वादियुक्तस्य पटम्प सम्बन्धि पर्मत्वं प्रति पाराम, नर ज्ञाशिन्दाः मम्मयिनोऽपि गुणान् प्रतिपादयितुं शक इति तत्मविपादनाय यया भीमा- २४सियमयोगो भपनि सया दिसीयापि सेभ्यो भविष्यति । नहि सामान्ययाचिन: एटसमानुत्पपमाना ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकमक्रिया । कर्मणि द्वितीया २२१ द्वितीया भीमादीनामनियताधाराणां गुणानां कर्मत्वमभिधातुं शक्नोति । यदि वा कटोऽपि कर्म भीष्मा- दयोऽपि । यथैव ह्ययं कटं करोत्येवं तद्गतान् भीष्मादीनपि । तत्र यद्यत्करोतिना व्यामिष्टं तत्सर्वं द्रव्यं गुणश्च कर्मेति सर्वेषां पृथक्कर्मत्वे प्रत्येकं द्वितीया पश्चात्त्वेकवाक्यतया विशेषणविशेष्यभाव इति । यदि वा द्रव्यस्य क्रियासु साक्षादुपयोगादस्तु कटस्यैव कर्मत्वम् , भीष्मादीनां तु न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्येति नियमादविभक्तिकानामप्रयोगार्हत्वादेकविभक्तिमन्तरेण च सामानाधिकरण्यविशेषणत्वायो-५ गाद्यथेश्वरसुहृदां स्वयं निर्द्धनत्वेऽपि तदेकयोगक्षेमत्वात्तद्धनेनैव फलभाक्त्रं भवति । एवमकर्मणामपि कटकर्मत्वेनैव द्वितीया भविष्यति । कृतः कटो भीष्म उदारो दर्शनीय इत्यत्र तु करोतेरुत्पद्यमानः क्तो यस्य यस्य तया क्रियया सम्बन्धस्तस्य तस्य साकल्येन कर्मत्वमभिदधातीति कचिदपि द्वितीया न स्यात् । कथं तर्हि कृतं पश्य, आहृतमाहर, की क्रियते, दात्रेण लुनाति, दानीयाय ददाति, भीमाद्विभेति, प्रासादे प्रसीदति, शयने शेते इत्यादिपु क्तादिभिरभिहितेपु कर्मादिषु द्वितीयादयः स्युः । उच्यते--१० कर्मादिसामान्यं कृद्भिरभिहितम् , तंत्राप्यभिहितः सोऽर्थोऽन्तर्भूतो नामार्थः सम्पन्न इति कर्मादिशक्तियुक्तं द्रव्यमेतदन्तः शब्दैरभिधीयते यथेदं कर्मेदं करणमिति । तंत्र यासौ स्वरूपकालभिन्नायां क्रियायां संव्यापारतया कर्मादिरूपता तदभिधानाय यथायथं द्वितीयादयो भवन्ति । यत्र पुनरेकद्रव्याधारा प्रधानाप्रधानक्रियाविपयानेका शक्तिः स्यात्तत्र प्रधानक्रियाविपयायां शक्तौ प्रत्ययैरभिहितायामप्रधान- क्रियाविषया शक्तिः प्रधानशक्तयनुरोधादाभिहितवत् प्रकाशमाना विभक्त्युत्पत्ती निमित्तं न भवति । १५ यथौदनः पत्तवा मुज्यते चैत्रेणेति भावाभिधायिना त्त्वाप्रत्ययेन ओदनाधिकरणाप्रधानपचिक्रियाविषया कर्मशक्तिरनभिहितापि प्रधानभुजिक्रियाविपयात्मनेपदेनाभिहितेति तद्वत् प्रकाशमाना द्वितीयोत्पत्ती निमित्तं न स्यात्-यथा च ग्रामो गन्तुमिप्यते चैत्रेणेति ग्रामस्य प्रधानेपिक्रियाविपयां कर्मशक्तिमात्मने- पदेनाभिदधताऽप्रधानगमिक्रियाविपयापि कर्मशक्तिरुपभुक्तेति तदभिधानाय द्वितीयाचतुथ्यों न भवत इति । इह च "गौणत्वं क्रियापेक्षं तेनाजां नयति ग्राममित्यादौ ग्रामाद्यपेक्षयाजादेः प्रधानत्वेऽपि २० गौणत्वं न विहन्यत इति । इह तु कृतपूर्वी कटम्, भुक्तपूर्वी ओदनम् , व्याकरणं सूत्रयतीत्यादौ यः कृतादिभिः कटादेरभिसम्बन्धः स प्रत्ययेऽर्थान्तराभिधायिन्युत्पन्ने कृतादीनामुपसर्जनत्वान्निवर्त्तते । वृत्तेः परार्थाभिधायित्वात् क्रियया तु सह सम्बन्धोऽस्तीति द्वितीया स्यात् । अयमर्थः-क्रियावता तद्धितादिप्रत्ययवाच्येन कटादिः सम्बद्ध्यमानस्तत् क्रियया व्याप्यते इति कर्मत्वम् । व्याकरणस्य सूत्राणि करोतीति णिच्-अत्र प्रत्ययोत्पत्तौ सूत्रव्याकरणयोः सम्वन्धो निवर्त्तते, अस्ति च व्याकरणेन करो-२५ तेरभिसम्बन्ध इति द्वितीया स्यात् प्रक्रियागतविभागाश्रयणेन चेदमुच्यते परमार्थतो धात्वन्तरं सूत्रिः । "सूत्रण क्रियावचने” इति । अथ कर्मसंज्ञायां प्रसिद्धप्रयोगोपयोगीनि कतिचित्सूत्राणि कण्ठतो निर्दिशति-२८ .. १ नहि भीष्मादीनां कट एवाधारः किन्वन्येऽपि । २ नापदं प्रयुञ्जीतेति न्यायात् । ३ अलब्धलाभो योगः; लब्धपरिरक्षणं क्षेमः तस्य देवदत्तादेर्यावको योगक्षेमौ तयोर्भावः । ४ करणादिक्रियामात्रयोग्यमिलथैः । ५ सामान्यकर्माभिधानेऽपि । ६ तत्राभिहितोऽपि कश्चिन्नान्तर्भवति, यथा राज्ञः पुरुप इत्यत्र वाक्ये । ७ कर्मादिशक्तियुक्त द्रव्ये । ८ कृताहतेल्लादिक्रियापेक्षया पश्याहरेत्यादिका क्रिया भिन्ना । ९ कारकलेनेत्यर्थः । १० या यस्य स्खा इत्यर्थः । ११ एकस्मिन् वाक्ये युगपदनेकप्रधान- क्रियाणामसम्भवात्प्रधानाप्रधान क्रियाविपयेवानेका शक्तिरिति तक्रियापेक्षया शक्तरपि गुणप्रधानभावो भवतीयत आह-प्रधान- शल्य० । १२ उदाहरणान्तरम् । १३ ननु गौणानाम्नः कर्मणि द्वितीयेत्युक्तम् अजां नयति ग्राममित्यादी तु ग्रामाद्यपेक्षया अजादेः प्रधानवान्न ततो द्वितीया प्राप्नोतीत्साह इह चेति । १४ आख्यातपदेनासमानाधिकरणं गौणमिति गौणवत्स द्वयोरपि कर्मणोर्भावात् क्रियापेक्षं गौणलमाश्रितम् । १५ तेन गौणखादजाशब्दादपि द्वितीया सिद्धा ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकमक्रिया । कर्मसंज्ञाविधानम् २२३ सन्तापयति रोग इत्यत्र कर्मसंज्ञाविकल्पो न भवति । कर्तरीति किम् ? चैत्रं रुजयत्यत्याने वात:-अन्न योऽत्यशनरूपो भावो न स कर्ता यस्तु वातरूपः कर्त्ता स द्रव्यं, न भावः । भाव इति किम् ? मैत्रं रुजति श्लेष्मा, अत्र श्लेष्मा द्रव्यं, न तु भावः ॥ लिण्यतेमनि “मन्” (उणा० ९११) श्लेष्मा, रोगो व्याधि- रामयः शिरोऽतिरित्यादयो भावरूपाः कत्र इति । अत्र सूत्रे व्यथितप्योर्गत्यादिसूत्रेण अणिऋतुः कर्म- त्वम् । “जास.” हिंसायामिति 'सपिसजसवर्हण हिंसायाम्' 'जसण ताडने' इति चुरादी गृह्येते न५ च 'जसूच मोक्षणे' इति देवादिकस्तस्य हिंसार्थत्वाभावात् । चौरस्येति-एवं चौरस्योनास्यते चौर उज्जा- स्यते चत्रेण । तथा 'नटण् अवस्यन्दने' इत्ययमपि चुरादिर्न तु 'णट नृत्तौ' इति भ्वादिः । चौरस्य चौरं वा उन्नाटयति । स्लथनथथलथहिंसार्था' इति घटादौ चौरस्योत्नाथयति चौरमुत्कथयति । 'पीप्लंप संचूर्णने' चौरस्य चौरं वा पिनष्टि । ननु जसनटकथेति धातवः पठ्यन्ते, ततोऽत्र जासनाटका- थेत्याकारः किमर्थः ? ण्यन्तनिर्देशः, तहि जासिनाटिकाथीति भवितव्यमिति । अत्रोच्यते-अत्राकारेण न१० जस्यादिधातुमात्रं निर्दिश्यतेऽपि तु यदेपामाकारवद्रूपं तदुच्यते तेन यत्र प्रयोगे एपां धातूनामाकारस्तत्रैवायं विधिर्नान्यत्र, तेनेह न भवति-दस्युमुदजीजसत् अनीनटत् उदचिक्रथत् । जसेर्नटेश्च चुरादित्वात् णिच् उत्कथति कश्चित्तमन्यः प्रयुङ्क्ते इति "प्रयोक्तृव्यापारे णिग्” (३।४।२०) "णिति” (४।३१५० ) इति तस्य वृद्धिस्ततोऽद्यतन्यादि, "णिश्रिद्रुघुकमः कर्तरि ङः" (३।४।५८) इति उस्ततः 'उपान्त्यस्यासमानलो- पिशास्वृदितो डे' (४।२।३५) इति ह्रस्वस्ततो द्विर्वचनादिः । अत्र जासेत्याद्याकारवद्रूपं नास्तीति नायं १५ विकल्पः । अथ चौरस्योत्नाथयतीति कथमाकारः, घटादित्वात् “घटादेहखो दीर्घस्तु वा भिणम्परे" (४।२।२४) इति हस्खेनैव भवितव्यमिति क्राति रूपाभावे तदनुकरणमपि सूत्रेऽनुपपन्नमिति । अत्रोच्यते- सूत्रे क्रायेत्युपादानाद्विज्ञायते-सत्यपि घटादित्वे अस्ति णिगि क्रथेराकारोऽन्यथास्यानुपपत्तेः, न च णिगं विनास्य कर्मास्यकर्मकत्वात्स च यद्याकारः सर्वत्र स्यात्तदा घटादित्वमनर्थकमिति कर्माभाव एव हस्त्रो न भवति, कर्मत्वे तु ह्रस्वत्वमेव-चौरमुत्क्रथयतीति । हिंसायामिति किम् ?. चौरं बन्धनाज्जासयति-२० मोचयतीत्यर्थः । नटं नाटयति-नर्तयतीत्यर्थः । अंभावकर्तृकाथं वचनम् ॥ ६ ॥ निप्रेभ्यो नः ॥७॥ [सि० २।२।१५] समस्तव्यस्तविपर्यस्ताभ्यां निप्राभ्यां परस्य हन्तेर्व्याप्यं कर्म वा स्यात् । चौरस्य चौरं वा निप्रहन्ति निहन्ति प्रहन्ति प्रणिहन्ति इत्यादि । “अधेः शीस्थास आधारः” (२।२। २०) कर्म नित्यं स्यात् । ग्राममधिशेते अधितिष्ठति अध्यास्ते ॥ ७ ॥ नि ० । समस्तेत्यादि-अयं चार्थो वहुवचनाल्लभ्यते । सर्वत्र वहुवचनमधिकारार्थसंसूचनार्थमित्येप न्यायोऽत्र व्याकरणे द्रष्टव्य इति । चौरस्येत्यादि-एवं चौराणां निग्रहण्यते राज्ञा इति भावे, चौरा निग्रह- ण्यन्ते राज्ञा इति कर्मणि प्रयोगः । *इत्यादिकरणाच "कृगः प्रतियत्ने” (२।२।१२) पुनर्यनः प्रतियत्नः । सतो गुणान्तराधानाय अपायपरिहाराय वा समीहा । अयं भावः-प्रभमं तावदर्थस्यात्मला- भाय यत्नो भवति, ततो लब्धात्मनोऽधिकान् गुणानुत्पादयितुं परिपूर्णगुणस्य वा तावदवंस्थान्तं (ताद-३० १ कायिर्घटादिह्यते नतु 'क्रय अर्दिण् हिंसायाम्' इति योजादिक इति वैयाकरणानां मतम्, धातुपारायणकारस्तु उपल- क्षणलात् चाजादिकोऽपि । ननु यथा घटादेहत्रः पक्षे निषिध्यते तथा दस्युमदलीजसदित्यादी 'उपान्त्यस्यः' इत्यस्यापि किं न निषेधः ? सत्यम् , यस्मिन् प्राप्त एवेतिन्यायात् घटादेरियस्यैव निषेधः । २ ननु हिंसाया रुजारूपत्त्रात् 'रुजार्थस्य' इत्यने- नेव कर्मविकल्पो भविष्यति किमनेनेति; अथ जासनाटकाचेत्याकारश्रवणार्थमिदं सूत्रं विधीयते, तदा पिप्ग्रहणमनर्थक स्यात्तस्मात्पूर्वणैव सिद्धमिलाह-अभा० । २५ रुग्यते रोगेण, अपथ्याशिनो रुज्यन्ते रोगेण । अन्न कर्मत्वाभावे "तत्साप्यानाप्यादिति०" (३३।२१) ३२रजाति किम् ? "एति जीवन्तमानन्दः" । बरिसन्तापिवर्जनं किम् ? आशुनं ज्वरयति, अत्याशिनं २२२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- स्मृत्यर्थदयेशः ॥ ५॥ [सि० २।२।११] एपां व्याप्यस कर्मत्वं वा, कर्मत्वे द्वितीयाऽन्यथा पष्ठी । मातरं स्मरति मातुः सरति । मातुः सर्यते, माता सर्यते । सर्पिपो दयते । सर्पिर्दयते । लोकानामीटे । लोकानीष्टे । "नाथ" (२।२।१०)। तथा सर्पि थते । सर्पिपो नाथते ॥५॥ स्मृत्य० । स्मृतिः स्मरणमों येषां ते स्मृत्यर्थास्तेषां दयतेरीशश्च व्याप्यं कर्म वा भवति । कर्मत्वे इत्यादि-ननु कर्माविवक्षायां पक्षे मापाणामनीयादित्यादिवत् शेपषष्ठी सिद्धव तकिमनेन ? सत्यम्, किन्तु "पष्ठ्ययनाच्छेपे" (३।११७६) इत्यत्र अयत्नजे शेषे पष्ठ्याः समासो वक्ष्यते । ततो मातुः स्मृतमित्यादौ समासो मा भूदित्यनेन प्रकारेण यत्नाच्छेपो विधीयते, नियमार्थं च; तेनैपां धातूनां कर्मैव शेषरूपेण विवक्ष्यते न कारकान्तरं तेन मात्रा स्मृतम्, मनसा स्मृतमित्यादौ कर्तृकरणयोः शेषविवक्षा- १०ऽभावात्पष्ठी न भवति-माता स्मर्यते इति-एवं मातुः स्मर्त्तव्यम् , माता स्मर्त्तव्या, मातुः स्मृतम् , माता स्मृता, मातुः सुस्मरम्, माता सुस्मरा । मातुः स्मृतः पुत्रः, अकर्मकत्वे कर्तरि क्तः । माता स्मृता पुत्रेण । स्मृत्यर्थग्रहणात् मातुरध्येति मातरध्येति 'इंक् स्मरणे'ऽधिपूर्वः इडिकावध्युपसर्ग न व्यभि- चरतः । 'ध्य चिन्तायाम्' मातुर्ध्यायति, मातरं ध्यायति । मातुरुत्कण्ठते, मातरमुत्कण्ठते-इत्यादि उत्पूर्वः 'कछुइ शोके' इति धातुः । 'दयि दानादौ' 'ईशिक् ऐश्वर्ये' सर्पिषो दयते सर्पिर्दयते ददाती- १५त्यर्थः । "नाथः" तथेति-आत्मनेपदविषयस्य नाथतेाप्यं कर्म वा स्यादित्यर्थः; आत्मनेपदविपयत्वं चास्य उपतापैश्वर्याशीर्याचनलक्षणार्थचतुष्टये वर्तमानस्यापि "आशिपि नाथः" ( ३१३१३६) इति वचनादाशिष्येवेति तत्रैवाऽयं विधिः । सर्पिपो नाथमानः, सर्पि थमानः सर्पियो नाथिष्यमाणः । सर्पि थिप्यमाणः । सर्पियो नाथ्यते सर्पि थ्यते । आत्मन इत्येव-पुत्रमुपनाथति पाठाय उपयाचत इत्यर्थः ॥ ५॥ रुजाऽर्थस्याऽज्वरिसन्तापेर्भावे कर्तरि ॥६॥[सि० २।२।१३ ] ज्वरिसन्तापिवर्जपीडार्थधातूनामपि व्याप्यं कर्म चा, भावे कर्तरि सति । चौरस चौर वा रुजति रोगः । “जासनाटकाथपिपो हिंसायाम् (२२२२१४) चौरस्य चौर वोजा- सयति ॥६॥ रुजा० । 'रुजॉत् भङ्गे' इत्यस्माद्भिदादित्वादडि रुजा पीडा साऽर्थो यस्येति । भावे इति-साध्यरू- २५पस्य भावस्य कर्तृत्वानुपपत्तेः सामान्यशब्दोऽपि भावशब्दः सिद्धरूपे भावे वर्तते । चौरस्येति-'धुरण लेये' इसस्याणिजन्तस्य भिदाद्यडि चुरा सा शीलमस्य चौरः "अड्याछत्रादेर" (६।४।६०) इत्यभि वृद्धिः, रुजतीति "पदरुजविशस्पृशो पन्” (५।३।१६) घनि रोगः । एवमपध्याशिना भावे आत्मनेपदम् , कर्मसंज्ञायां तु कर्मणि । चौरस्य रुग्ण रोगेण अत्र मत्वाभावे लीये " ३० (५।३।१२३) इति भावे क्तः। चौरो रुग्णो रोगो-अन्नं कर्मसंज्ञायां कर्मणि क्तः । रुजार्थग्रहणात् 'अमण रोगे पौरस्य चौरं या आमयति । एवं 'व्यथिए भयचलनयोः' व्यथयति पीडण् गहने' पीडयति ! . २० १मपारेषु नियु, सपतीकरोतील. । २ सपि भूयादित्याशाले । ३ सामन्येन चिन्तनार्थ उत्तोऽपि स्मृपादृष्ट्र भूतस्यास्य विष्टि चिन्तने वर्तमानो गाते; एवंविधान अध्येसादयोऽपि गाने, न मनसा परिकल्पितचिन्तनाथन सनीसानो म्युसराः। .

.. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कर्मसंज्ञाविधानम् २२३ सन्तापयति रोग इत्यत्र कर्मसंज्ञाविकल्पो न भवति । कर्तरीति किम् ? चैत्रं रुजयत्यत्याने वातः-अत्र योऽत्यशानरूपो भावो न स कर्त्ता यन्तु वातरूपः कर्त्ता स द्रव्यं, न भावः । भाव इति क्रिम् ? मत्रं रुजति श्रेष्मा, अत्र शेप्मा द्रव्यं, न तु भावः ॥ शिष्यतेर्मनि “मन्” (उणा० ९११) श्लेष्मा, रोगो व्याधि- रामयः शिरोऽतिरित्यादयो भावरूपाः कर्त्तार इति । अत्र सूत्रे व्यथितप्योर्गत्यादिसूत्रेण अणिकर्तुः कर्म- त्वम् । “जास०” हिंसायामिति 'सपिसजसबर्हण हिंसायाम्' 'जसण ताडने' इति चुरादी गृह्येते न५ च 'जसूच् मोक्षणे' इति देवादिकस्तस्य हिंसार्थत्वाभावात् । चीरस्येति-एवं चौरस्योज्जास्यते चौर उज्जा- स्यते चत्रेण । तथा 'नटण अवस्यन्दने' इत्ययमपि चुरादिर्न तु 'णट नृत्ती' इति भ्वादिः । चौरस्य चौरं वा उन्नाटयति । 'नथकथक्रंथक्थहिंसार्थी' इति घटादी चौरस्योत्नाथयति चौरमुत्कथयति । 'पीप्लंप संचूर्णने' चीरस्य चौरं वा पिनष्टि । ननु जसनटक्रयेति धातवः पठ्यन्ते, ततोऽत्र जासनाटका- थेत्याकारः किमर्थः ? ण्यन्तनिर्देशः, तहि जासिनाटिकाधीति भवितव्यमिति । अत्रोच्यते-अत्राकारेण न १० जस्यादिधातुमात्रं निर्दिश्यतेऽपि तु यदेपामाकारवद्रूपं तदुच्यते तेन यत्र प्रयोगे एपां धातूनामाकारस्तत्रैवायं विधिर्नान्यत्र, तेनेह न भवति-दस्युमुदजीजसत् अनीनटत् उदाचिक्रथत् । जसेर्नटेश्च चुरादित्वात् णिच् उत्कथति कश्चित्तमन्यः प्रयुते इति "प्रयोक्तव्यापारे णिग्” (३।४।२०) "णिति" (४।३।५० ) इति तस्य वृद्धिस्ततोऽद्यतन्यादि, "णिश्रिद्रु कमः कर्तरि ङः” (३।४।५८) इति ङस्ततः 'उपान्त्यस्यासमानलो- पिशास्वृदितो .' (४।२।३५) इति ह्रस्वस्ततो द्विर्वचनादिः । अत्र जासेत्याद्याकारवद्रूपं नास्तीति नायं १५ विकल्पः । अथ चौरस्योत्क्राथयतीति कथमाकारः, घटादित्वात् “घटादेईखो दीर्घस्तु वा बिणम्परे" (४।२।२४) इति ह्रस्वेनैव भवितव्यमिति क्राथेति रूपाभावे तदनुकरणमपि सूत्रेऽनुपपन्नमिति । अत्रोच्यते- सूत्रे क्रार्थत्युपादानाद्विज्ञायते सत्यपि घटादित्वे अस्ति णिगि क्रथेराकारोऽन्यथास्यानुपपत्तेः, न च णिगं विनास्य कर्मास्त्यकर्मकत्वात्स च यद्याकारः सर्वत्र स्वात्तदा घटादित्वमनर्थकमिति कर्माभाव एव हस्त्रो न भवति, कर्मत्वे तु ह्रस्वत्वमेव-चौरमुत्क्रथयतीति । हिंसायामिति किम् ? चौरं वन्धनाजासयति-२० मोचयतीत्यर्थः । नटं नाटयति-नर्तयतीत्यर्थः । अंभावकर्तृकार्थ वचनम् ॥ ६ ॥ निप्रेभ्यो नः ॥७॥ [सि० २।२।१५] समस्तव्यस्तविपर्यस्ताभ्यां निप्राभ्यां परस हन्तेर्व्याप्यं कर्म वा स्यात् । चौरस्य चौरं वा निप्रहन्ति निहन्ति प्रहन्ति प्रणिहन्ति *इत्यादि । "अधेः शीस्थास आधारः” (२।२। २०) कर्म नित्यं स्यात् । ग्राममधिशेते अधितिष्ठति अध्यास्ते ।। ७ ॥ निप्रे० । समस्तेत्यादि-अयं चार्थो वहुवचनाल्लभ्यते । सर्वत्र बहुवचनमधिकारार्थसंसूचनार्थमित्येप न्यायोऽत्र व्याकरणे द्रष्टव्य इति । चौरस्येत्यादि-एवं चौराणां निप्रहण्यते राज्ञा इति भावे, चौरा निप्रह- ण्यन्ते राज्ञा इति कर्मणि प्रयोगः । *इत्यादिकरणाच "कृगः प्रतियत्ने” (२।२।१२) पुनर्यनः प्रतियत्नः । सतो गुणान्तराधानाय अपायपरिहाराय वा समीहा । अयं भावः-प्रथमं तावदर्थस्यात्मला- भाय यनो भवति, ततो लब्धात्मनोऽधिकान गुणानुत्पादयितुं परिपूर्णगुणस्य वा तावदवंस्थान्तं (ताद-३० १ क्राथिर्धटादिह्यते नतु 'क्रय अर्दिण् हिंसायाम्' इति योजादिक इति वैयाकरणानां मतम्, धातुपारायणकारंतु उपल- क्षणखात् योजादिकोऽपि । ननु यथा घटादेहवः पक्षे निषिध्यते तथा दस्युमदजीजसदित्यादी 'उपान्त्यस्य.' इत्यस्यापि किं न निषेधः ? सत्यम् , यस्मिन् प्राप्त एवेतिन्यायात् घटादेरित्यस्यैव निषेधः। २ ननु हिंसाया रुजारूपत्वात् 'रुजार्थस्यः' इत्यने- नेव कर्मविकल्यो भविष्यति किमनेनेति; अथ जासनाटकायेत्याकारश्रवणार्थमिदं सूत्रं विधीयते, तदा पिप्ग्रहणमनर्थक स्यात्तस्मात्पूर्वेणैव सिद्धमिलाह-अमा० । । २५ - - - - - २५'टा गतिनिवृत्ती' 'आसिम् उपवेशने' इत्येषा धातूनामाधारस्य कर्मल नित्य स्यादित्यर्थः । प्राममधिशेते २२४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविनयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- घस्थ्य) रक्षितुं यो यत्नः स प्रतियत्नस्तस्मिन्वर्तमानस्य करोतेाप्यं कर्म या स्यात् । एंधोदकस्योपस्कुरते, एधोदक्मुपस्कुरुते । शतपत्रस्योपस्कुरुते, शतपनमुपस्कुरते । "उपाद्भूपासमवायप्रतियत्नविकारवाक्या. ध्याहारे" (४।४।९२) इति स्सट् । प्रतियन इति किम् ? कटं करोति । व्याप्यमित्येव-एघोदकस्योप- सुन्ते । बुद्ध्या करणस्य मा भूत् । “विनिमेयद्यूतपणं पणिव्यवहोः" (१२।१६) विनिमेय. ५नेयनिक्योऽर्थः, रातपणो द्यूतजेयम् । पणतेय॑वपूर्वस्य च हरतेाप्यो विनिमेयगतपणौ वा कर्मससी भवतः । शतस्य पैणायति शत पणायति । दशाना व्यवहरति दश व्यवहरति । क्रयविक्रये द्यूतपणत्वे वा तद्विनियुझे इत्यर्थः । विनिमेयद्यूतपणमिति किम् ' साधून पणायति सोतीत्यर्थः । शलाका व्यवहरति विगणयन् गोपायतीत्यर्थः, अनेकार्थत्वाद्धातूनाम् । वचनभेदो यथासङ्ख्यनिवृत्त्यर्थः । “उपसर्गा- दिवः” (२।२।१७) उपसर्गात्परस्य दिवो व्याप्यो विनिमेयद्यूतपणौ वा कर्मसज्ञौ भववः । शतस १० प्रदीन्यति शत प्रदीव्यति । "न" (२१२।१८) विनिमेयद्यूतपणौ दिवो व्याप्यो कर्मसज्ञौ न भवतः ! उपसर्गपूर्वस्य विकल्पविधानादनुपसर्गस्याय निषेधः । शतस्य दीव्यति । निपिद्धे च कर्मणि "शेपे" (२।२।८१) इति पष्टयेव भवति । शतस्य दीव्यते, शतस्य द्यूतम् , शतस्य देवितव्यम् , शतस्य सुदेषम् इत्यादी भावे आत्मनेपदकृत्यक्तसलः सिद्धाः । शतस्य द्यूतो मैन इत्यन कतरि क्तः । विनिमेयद्यतपणमि- येव-जिन दीव्यति-स्तोतीत्यर्थः । भूमि दीव्यति-सन्धिना विजिगीपते-समर्थेन सह सन्धि कृत्वाऽ. १५न्येपा भूमिं विजिगीपत इत्यर्थः । सन्धिपणोऽत्र, न छूतपणः । द्यूत दीव्यति, अक्षान् दीव्यति । अत्र प्रिया तत्साधन च व्याप्य न तु पणः । “करणं च" (१२।१९) दीव्यतेः करण कर्मसज्ञ घकाराकरणसज्ञ च भवति, कर्मक्रणसज्ञे युगपद्धजतीत्यर्थः । अक्षान् दीव्यति, अक्षाणा देवनम् , अक्षा दीव्यन्ते, अक्षा देवितन्या, अक्षाः सुदेवाः, अक्षदेवः, अक्षा द्यूताश्चैत्रेण-एपु कर्मत्वे द्वितीयाप- ध्यात्मनेपदतव्यसरणतप्रत्ययास्तन्निमित्ताः सिद्धाः । अक्षेर्दीव्यति, अभैर्देवनम् , अक्षैर्दीव्यते, अझै- २०देवितव्यम् , अक्षैः मुदेव मैत्रेण, अतं चैत्रेण, अक्षा देवनाः-एपु करणत्वेन तृतीयानटी, भावे आत्म- नेपदादयश्च सिद्धाः, आत्मनेपदादिभिश्चोक्त्योः कर्मक्रणयोद्वितीयाषष्ठीतृतीया यथायोग न भवन्ति । परण वेत्येव सिद्धे चकारः सज्ञाद्वयसमावेशार्थः, तेन अक्षैर्देवयते मैनचैनेण इत्यत्र करणत्वात्तृतीया भवति, कर्मत्याय गत्यादिसूण नित्यार्मरक्षणमणिकर्तुः कर्मत्वम्, देवयतेश्च "अणिगिप्राणिक" (३३३३१०७) इत्यादिनामिक्लक्षणं परस्मैपद न भवति। "अ" अधेः सम्नद्धाना 'शी स्वप्ने इति, एव प्रामस्याधिशयनम् , प्रामोऽधिशायितः, प्राममधितिष्ठति, प्राममध्याले । अपेरिति किम् ? शयने दोते, गृहे तिष्ठति, पटे आस्ते । आधार इति किम् ? ग्रामोऽधिशयितो मैनेण, पीरुपेणाधितिष्ठति । पररणे न भवतः ॥ अकर्मका अपि हि धातवः सोपसर्गाः सर्मका भवन्तीति सिद्ध सर्मकत्व- २९माधारवाधनाथं तु यचनम् ॥ ७ ॥ १ एपाप उदासी च "अशनिपवाद"। (111३६) इलैक्वम् । २ अभूत सन् निवर्य कोऽय। या । परमारत में करोति, समपि पिचर्यमेव कर्म न प्रतियन । उपपूर्वस्व करोते प्रतियनविषय वान् स मनेर सोपपूर्वमेर। भेदहरवपि उपर्य एवं दर्शिन । ३ प्रतिप्रद साकिनारया नाना प्रहगमिति सौ पोयुगापि पगारद 'मेरे (४२) इस राति समारोदानात् आमनेपद प्रयय न्यायोऽनित्व । यार समागमुरेस गति इति परमेव प्रतीयते । करस कमायामामायो विधीयमानायां निरयांदयो धर्म न मिल अगम्ना। ५पर भरनु र या, सरस्य तु मर्पयोगेषु मदितव्यम्, न युगपरिवाशम्-अमदेवपते पत्र गरभत्र मान देते त्यपि प्रयोग भवति। न च रिपेऽपि माय गविष्यतीति पाम्यन् रिम मनिरता। 'गपन 1 प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । कर्मसंज्ञाविधानम् २२५ उपान्वध्याङ्वसः ॥ ८॥ [ सि० २२२२२१] एभ्यो बसतेराधारोऽप्येवम् । ग्राममुपवसति ।। ८॥ उपा० । एभ्य इत्यादि-उप-अनु-अधि-आभिर्विशिष्टस्य वसतेर्य आधारः स कर्मसंज्ञो भवतीति । ग्राममुपवसतीति-एवं ग्राममुपोपितः ग्रामस्योपवसनम् , ग्राम उपोप्यते । एवं ग्राममनुवसति अधिव- सति आवसति । अन्वादिसाहचर्यादुपस्य स्थानार्थस्यैव ग्रहणं नाशननिवृत्त्यर्थस्य; तेन पामे उपबसति ५ भोजननिवृत्तिं करोतीत्यत्र न भवति । अदाधनदायोरनदादेरेव ग्रहणमिति वस्तेन भवति ॥ ८ ॥ वाऽभिनिविशः॥९॥[सि० २२२२२२] अभि-निपूर्वस्य विश आधारः कर्म वा स्यात् । व्यवस्थितविभाषेयम् , तेन क्वचित्कर्मसंज्ञा कचिदाधारसंज्ञाऽपि । ग्राममभिनिविशते । कल्याणे अभिनिविशते । “कालावभावदेशं वा कर्म चाकर्मणाम्” (२।२।२३) मासमास्ते । मास आस्यते । "क्रियाविशेषणात्” (२।२।१० ४१)। द्वितीया । क्रियाव्ययविशेपणे इत्यस्य क्लीवत्वम् । स्तोकं पचति । सुखं स्थाता ॥ ९ ॥ वाऽभि० । अभिनीति-अभिपूर्वो निः अभिनिः । अभि-निरुपसर्गसमुदायः पूर्वो यस्य ताशस्य । विश इति 'विशंत् प्रवेशने' इत्यस्य धातोः । व्यवस्थितेति-नात्र वाशब्दो विकल्पार्थो येन समकक्षतया द्वितीयासप्तम्यो स्याताम् , किन्तु प्रयोगव्यवस्थाये इति । तत्रेयं व्यवस्था-अभि-निपूर्वस्य विशेरस्ति समु- दायार्थोऽवयवार्थश्च, तत्र यत्रावयवार्थानुगमस्तत्र कर्मभावः, ग्राममभिनिविझते इति-अत्र हि ग्राममा-१५ भिमुख्येन निविशत इति प्रतीयते । यत्र तु समुदायार्थ एव, नावयवार्थस्तत्राधिकरणभावः; यथा कल्या. णेऽभिनिविशते । एतेपां शब्दानामेतेप्वभिनिविष्टानाम् । एवमर्थेऽभिनिविष्ट इति-अत्र हि धातूपसर्गसमु- दायेन मनस एकाग्रता तात्पर्यमुच्यते । यथा ग्रामे उपवसतीति भोजनत्यागः । या या संज्ञा यस्मिन्य- स्मिन्संज्ञिन्यभिनिविझते, इत्यत्र च संज्ञानां विपयेणाव्यभिचारः । “काला.” अनितिपरिमाणायाः क्रियायाः परिच्छेदिका निर्जातपरिमाणा क्रिया कालः, स च मुहूर्त्तादिः । अध्वा गमनाह क्षेत्रं क्रोशादिः, २० तेनाध्वशब्दाभिधेयस्याध्वनः कर्मसंज्ञा न भवति । नासावध्वविशेपः क्रोशयोजनादिवद्गमनमर्हति ( यद्वा अर्थप्रधानोऽयं निर्देशः तेन कालावभावदेशानां साक्षात्प्रयोगे न भवति अपि तु तदर्थप्रतिपादकझब्द- प्रयोगे) भावः-क्रिया, घनादिवाच्या, सिद्धताख्या गोदोहादिर्न तु साध्यमाना । देशो जनपदग्रामनदी- पर्वतादिः (आदिशब्दात्खेटकर्वटमडम्बादिह्यते ) अकर्मकाणां धातूनां प्रयोगे कालादिराधारः कर्मसंज्ञो वा भवति अकर्म च । यत्रापि पक्षे कर्मसंज्ञा तत्राकर्मसंज्ञापि भवतीत्यर्थः।मास आस्यते इति आत्मनेपदेन २५ कर्मणोऽभिहितत्वान्मासात् प्रथमा, तत्रापि गौणाधिकारात् "कालाध्वनोाप्तौ (२।२।४२) इत्यनेनापि द्वितीया न भवति । एवं सर्वत्र । एवं दिवसं शेते, दिवसः शय्यते इति कालः । अध्वा-क्रोशं स्वपिति क्रोशः सुप्यते । भावः-गोदोहमास्ते गोदोह आस्यते । ओदनपाकं शेते ओदनपाकः शय्यते । अत्र गोदोहनपाकादीनां सत्यपि क्रियारूपत्वेन कालत्वे मासादय एव तद्वाचित्वेन लोके प्रसिद्धाः, न तु गोदोहार्दय इति भावस्य पृथगुपादानम् । देश:-कुरूनास्ते कुरव आस्यन्ते, ग्रामं वसति ग्राम उप्यते । ३० अविवक्षितकर्माणः सकर्मका अप्यकर्मकाः मासं पचति मासः पच्यते, क्रोशमधीते क्रोशोऽधीयते, ओदनपाकं पठति ओदनपाकः पठ्यते, कुरून् पठति कुरवः पठ्यन्ते, पक्षे रात्रौ सुप्यते, गोदोहे आस्ते, ३२ १ शब्दशक्तिप्रामाण्यात् अन्वादिपूर्वो वसतिः स्थानार्थमाचष्टे । २ स्थानार्थद्योतकवादुपशब्दोऽपि स्थानार्थः । सामीप्यक्र. आधारः । यदा तु गोदोहविशिष्टः कालो विवक्ष्यते, तदा नैमित्तिकोऽपि । एवमोदनपाक इत्यत्रापि । है. प्रका० पूर्वा० २९ , ३ अत्र रानावधीतं दिवसे २२६ 'महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- ओदनपाके स्वपिति, पञ्चालेषु वसति, ग्रामे वसति, प्रामे वासः, ग्रामे वासी । तथा भुक्तम् । कालाध्वभावदेशमिति किम् ? प्रासादे आस्ते, शय्याया शेते । अकर्म चेति किम् ? मासमास्यते ? -- क्रोशं सुप्यते, अत्र कर्मणि सति भावे आत्मनेपद न स्यात् सकर्मकत्वादिति । कर्मण्यात्मनेपदे तु तेनेवा- भिहितत्वात् कर्मणो द्वितीया न स्यात् । नाभिहिते कर्मणि व्याप्तावपि द्वितीयेष्यते, ततः कर्मसंज्ञा अकर्म- ५संज्ञा च युगपद्रवत इति भावः, ततश्च गोदोहमासित इद गोदोहमासितं गोदोह आस्यते कुरून् सुप्यते एषु "तत्साप्यानाप्यादिति” ( ३।३।२१) गत्यर्थाकर्मकपिबमुजेः" (५।१।११) इति "अद्यर्थावाधारे" (५।१।१२) इति भावे कर्तर्याधारे च यथायथमात्मनेपदको सिद्धौ । अकर्मकाणामिति किम् । राजावु- देशोऽधीतः । कथ पचत्योदन मासम्, भक्षयति धानाः मोशम्, पिवति पयो गोदोहम्, भजति सुस कुरून्,-द्विकर्मकत्वात् "कर्चाप्य कर्म" (२।२।३) इत्येव भविष्यति । अन्ये तु सकर्मकाणामकर्मकाणा १० प्रयोगे कालाध्वभावानामत्यन्तसयोगे सति नित्य कर्मत्वमिच्छन्ति । मासमास्ते, दिवसं पचत्योदनम्, त्याद्यादयोऽपि-आपले मासा, सुप्यते मासः, आशितो मासः, शयितो मास:, शयित: मोश क्रोशं पठति वेदम्, गोश स्वपिति, गोदोहमास्ते, गोदोहं पचत्योदनम्, अनेन कर्मसज्ञायां कर्मणि न तु मासमधीते इत्यादौ क्रियायोगे-अत्यन्तसयोगादन्यत्र तु रात्रौ शेते अध्वनि स्थित इत्यादावाधार- १५ त्वमेव । "क्रिया." करोतेर्भावे कर्मणि वा शप्रत्यये क्रियापूर्वात् । 'शिप्लंप् विशेपणे इत्यतो विशिष्यतेऽवरिष्यतेऽनेनेति करणेऽनदि विशेषण धात्वर्थः । क्रिया परिणामपरिस्पन्दवर्तनालक्षणा त्रिधा तमा यदिशेपणमवच्छेदकं ततो द्वितीया भवतीति । ननु च रूपाशुपाधिवक्रिया द्रव्यस्यैवोपा. धिा, न थोपाधेरुपाध्यन्तरसम्भवः, 'निगुणा गुणाः निया च' इति वचनात्, पदार्थम्य या स्वरूपमिदमीरा यहिशिष्टेन वाचनाभिधीयमानो असत्त्वरूपः सत्त्वरूपतयापि प्रकाशते, ३० तदुचम्- कथं त्रियाया विशेषण- सम्भा? सत्यमेतत् । किन्तु सजातीयस्य द्रव्योपाघेरपेक्षयोत्कर्षो दृश्यते-यथा शुक्लः शुष्ठतर शुक्लतम Pात रूपरसादीना कला इति प्रविभागप्रचयापचयाभ्यामुत्कर्पापकर्पवृत्तित्वं स्यान्न तूपाध्यन्तरयोगात् । तदाहुस्तत्त्वविदः- "भवेहिगुणमाधुर्यमनन्तगुणकाल कम् । द्रव्य पतुर्गुणोद्भूतगन्धमात्रफलादिकम्” ॥ १ ॥ यथा च रूपादीनां तथा क्रियाणामपि परस्परापेक्षया विशेषसम्भवे शोभनं पचतीत्येवं विशेषण- योगा स्यात्कथमन्यथा पापच्यते पचतितरामित्यादी तासामेकरूपत्वाद्यडादिप्रत्ययविधिः स्यात्। ननु चास- २५त्त्वभूता निया तदुपाधिरतु सुतरामसत्त्वभूतस्तत्स्थ सत्स्याभिधायिना नाम्ना प्रतिपाद्यते इति ? उच्यते- धातुप्रकृतिवाच्याऽसत्त्वभूतेय क्रिया यथा क्रियाशब्देन नामरूपेण सत्त्वरूपापन्ना प्रतिपाद्यते, तथा पोपाधिरपि सत्त्यापन्नः शोभनादिशब्देनेत्यदोषः । कथं पुनरसत्त्वभूतोऽर्थः सत्त्वरूपेण प्रकाश्यते इति चेत ? खपाचकप्रकाशयलादिति घूमः । स्वशक्तिरिय वाचकाना यदसत्त्वं सत्त्वरूपतया प्रकाशयति, प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । द्वितीयाविधानम् २२७ च कारकचक्रनिःपाद्यत्वात्कर्मरूपता नातिकामति । ततो यथा भीममुदारं दृश्यं करोतीत्यादौ कटादि- कर्मविशेपणतया भीष्मादिशब्देभ्यो द्वितीया, तथा मन्दमञ्चति साधुर्गच्छति इत्यादी कर्मत्वास्त्रियावि- शेषणापि भविष्यति, किमनेन सूत्रेण इति ? अन्रोच्यते-द्वितीयार्थमिदं सूत्रम्, न कर्मसंज्ञार्थम्, तेन कृयोगे कर्मनिमित्ता पष्टी न भवति । अयमर्थः-यदीदं न स्यात्तदा यथौदनस्य पक्तत्यादौ कृदन्त- कर्मवादोदनादिशब्दात्कर्मणि पष्ठी, एवं ओदनस्य शोभनं पत्तेत्यादी शोभनझदादपि स्यात् । नासा-५ विष्टा शिष्टासम्मतत्वात् ; यथा मन्दं गन्ता ग्रामायेत्यादी चतुर्थी चानिष्टा स्यादिति । नन्वस्तु प्रथमा, प्रथमाद्वितीयैकवचनरूपं प्रत्यविशेष इत्युक्तत्वाद्दोपाभावात् । नैवम् , प्रथमाविधाने अथो पचति शोभनं ते भार्येत्यादौ ते मे विधानं "सपूर्वात्प्रथमान्ताद्वा" (२।१।३२) इत्यन्वादेशे विकल्पितं स्यान्नित्यं चेष्यते इति प्रथमाविधिर्नेष्ट इत्येतत्सर्वं मनसिकृत्याह-द्वितीयेति । तत्राप्यसत्त्वात्मिकायाः क्रियाया विशेषणत्वेन सहयाद्ययोगादौत्सर्गिकद्वितीयाया एकवचनमेव च भवति ॥ ९ ॥ उत्कृष्टेऽनूपेन ॥ १०॥ (सि० २।२।३९) उत्कृष्टार्थादनूपाभ्यां युक्तागौणानाम्नो द्वितीया भवति । अनुसिद्धसेनं कवयः । उपहेमचन्द्र वैयाकरणाः । तेषु तो उत्कृष्टौ इत्यर्थः ॥ १० ॥ "उत्कृष्ट०” उत्कृष्टशब्दो हीनापेक्षः तेन हीनोत्कृष्टसम्बन्धेऽनुना द्योये द्वितीया विधीयते । उत्पूर्वात् कृपतेः कर्मणि क्ते यद्भाव इति सप्तम्यामुत्कृष्टे इति । अनुसिद्धसेनं कवय इति-सिद्धसेनक्रविनिर्दिष्टस्य १५ हीनोत्कृष्टसम्बन्धस्यापेक्षणक्रियाजनितत्त्वमनुना ख्याप्यते, यथात्र सिद्धसेनमुत्कृष्टमनूद्य कवीनां हीनत्ववि- धाने दत्तमुदाहरणम् , तथा कवीन् हीनाननूद्य सिद्धसेनस्योत्कृष्टत्वेऽप्युदाहरणं द्रष्टव्यम् । यथानुकवीन सिद्धसेन इति । तथा चाह-तेषु तो उत्कृष्टौ इति ताभ्यामन्ये कवयो वैयाकरणाच हीना इति यावत् । सिंहावलोकनन्यायेन पूर्वोक्तस्य इत्यादिशब्दस्यात्रानुवृत्त्यान्यस्याप्यव्ययस्य योगे द्वितीया स्यात् , तथाहि-"लक्षणवीप्स्येत्यम्भूतेष्वभिना" (२।२।३६ ) लक्ष्यते दयते येन तल्लक्षणम्-चिह्नम् । २० अवयवशः समुदायस्य क्रियादिना साकल्येन प्राप्तीच्छा वीप्सा, तत्कर्म वीप्स्यम् । केनचिद्विवक्षितेन विशे- पेण भाव इत्थंभावस्तद्विपय इत्थम्भूतः । एष्वर्थेषु वर्तमानादभिना युक्ताद्गौणान्नानो द्वितीया भवति । वृक्षमभिविद्योततें विद्युत्-अत्र वृक्षो लक्षणम् , विद्योतमाना विद्युत् लक्ष्यम् , अनयोश्च लक्ष्यलक्षणभावः सम्बन्धोऽभिना द्योत्यते । अत्र सम्बन्धस्य द्विष्टतया विद्युतोऽभिना योगेऽपि गौणादिति वंचनात् प्रधा- नत्वात्ततो न द्वितीया । वृक्षं वृक्षमभिसेंकः, एकैकस्य वृक्षस्य सेक इत्यर्थः । अत्र सेकेन वृक्षाणां२५ वीप्स्यमानानां सेंकं प्रति यस्तेषां साध्यसाधनभावलक्षणः सम्बन्धः सोऽभिना द्योत्यते । वीप्सा तु द्विर्वचनद्योत्यैव । अन्ये तु वीप्सावीप्स्यमानयोंः सम्बन्धो द्विर्वचनेनैव द्योत्यते नत्वभिना इति सम्ब- न्धमद्योतयतापि तेन योगे वचनाहितीयेति । साधुदेवदत्तो मातरमभि-मातृविपयें साधुत्वप्रकार प्राप्त इत्यर्थः । अत्र मातुर्देवदत्तस्य साधुभावं प्रति विपयता-देवदत्त इत्थम्प्रकारं मातृविपये प्राप्त इत्यर्थः । योऽसौ मातुरित्थम्भावनाप्त्या विषयविपयिभावलक्षणः सम्बन्धः सोऽभिना द्योत्यत इति "भागिनि ३० च प्रतिपर्यनुभिः" (२।२।३७) स्वीक्रियमाणोंऽशो भागस्तत्स्वामी भागी तत्र लक्षणादिपु चार्थे पु वर्तमानात् प्रति-परि-अनुभिर्युक्ताद्गौणानाम्नो द्वितीया स्यात् । भागिनि-यदत्र मां प्रति मां परि मामनु स्यात् , योऽत्र मम भाग आभवति स दीयतामित्यर्थः । लक्षणे-वृक्षं प्रति वृक्षं परि वृक्षमनु विद्योतते विद्युत् । वीप्स्ये-वृक्षं वृक्षं प्रति वृक्षं वृक्षं परि वृक्षं वृक्षमनुसेचनम् । इत्थम्भूते-साधुमैत्रो मातरं प्रति ३४ १ वृक्ष प्राप्य विद्योतत इति प्राप्तिक्रियाजनित इति शेषः ।

- - त्रियान्ययविशेषणे" (है० लिगा०) इति लिङ्गकारिफायपना- २२६ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- ओदनपाके स्वपिति, पञ्चालेपु वसति, ग्रामे वसति, ग्रामे वासः, ग्रामे वासी । तथा रानावधीतं दिवसे भुक्तम् । कालाध्यभावदेशमिति किम् ? प्रासादे आस्ते, शय्यायां शेते । अकर्म चेति किम् ? मासमास्यते कोशं सुप्यते, अत्र कर्मणि सति भावे आत्मनेपदं न स्यात् सकर्मकत्वादिति । कर्मण्यात्मनेपदे तु तेनैवा- मिहितत्वात् कर्मणो द्वितीया न स्यात् । नाभिहिते कर्मणि व्याप्तावपि द्वितीयेप्यते, ततः कर्मसंज्ञा अकर्म- ५संज्ञा च युगपद्भवत इति भावः, ततश्च गोदोहमासितः इदं गोदोहमासितं गोदोह आस्यते कुरून सुप्यते एषु "तत्सायानाप्यादिति" (३।३।२१) "गत्यर्थाकर्मकपिवमुजेः” (५।१।११) इति "अद्यर्थाचाधारें" (५।१।१२) इति भावे कर्तर्याधारे च यथायथमात्मनेपदक्तौ सिद्धौ । अकर्मकाणामिति किम् ? रागावु- देशोऽधीतः । कथं पचत्योदनं मासम् , भक्षयति धानाः क्रोशम्, पिवति पयो गोदोहम् , भजति सुखं फुरुन् ,-द्विकर्मकत्वात् "कर्तुळप्यं कर्म" (२।२।३) इत्येव भविष्यति । अन्ये तु सकर्मकाणामकर्मकाणां १०प प्रयोगे कालाध्वभावानामत्यन्तसंयोगे सति नित्यं कर्मत्वमिच्छन्ति । मासमास्ते, दिवसं पचत्योदनम्, मोशं पठति वेदम्, फ्रोशं स्वपिति, गोदोहमास्ते, गोदोहं पचत्योदनम् ; अनेन फर्मसंज्ञायां कर्मणि त्याचादयोऽपि-आस्यते मासः, सुप्यते मासः, आशितो मासः, शयितो मास:, शयितः कोश इत्यादि । फालाध्वनोाप्ताविति च मासं गुडधानाः, क्रोशं कुटिला नदीत्यादौ गुणद्रव्ययोगे एवेच्छन्ति, न तु मासमधीते इत्यादौ क्रियायोगे-अत्यन्तसंयोगादन्यत्र तु रात्रौ शेते अध्वनि स्थित इत्यादावाधार- १५ त्वमेव । "क्रिया" करोतेर्भावे कर्मणि वा शप्रत्यये क्रियापूर्वात् । 'शिष्लंप् विशेपणे इत्यतो विशिष्यतेऽवच्छिद्यतेऽनेनेति करणेऽनटि विशेपणं धात्वर्थः । क्रिया परिणामपरिस्पन्दवर्तनालक्षणा विधा तस्या यद्विशेषणमवच्छेदकं ततो द्वितीया भवतीति । ननु च रूपाशुपाधिवस्त्रिया द्रव्यस्यैवोपा- पिः, न घोपाघेरुपाध्यन्तरसम्भवः, 'निर्गुणा गुणाः क्रिया च' इति वचनात् , कथं क्रियाया विशेषण- सम्भवः ? सत्यमेतत् । किन्तु सजातीयस्य द्रव्योपाधेरपेक्षयोत्को दृश्यते-यथा शुक्लः शुक्लतरः शुलतम २० इति रूपरसादीनां कला इति प्रविभागप्रचयापचयाभ्यामुत्कर्षापकर्पवृत्तित्वं स्थान तूपाध्यन्तरयोगान् । तदाहुस्तत्त्यविदः- "भवेहिगुणमाधुर्यमनन्तगुणकालरुम् । द्रव्यं चतुर्गुणोद्भूतगन्धमात्रफलादिकम्” ॥ १॥ यथा प रूपादीनां तथा क्रियाणामपि परस्परापेक्षया विशेपसम्भवे शोभनं पचतीत्येवं विशेषण- योगः स्यात्कयमन्यया पापच्यते पचतितरामित्यादी तासामेकरूपत्वाद्यडादिप्रत्ययविधिः स्यात्। ननु चास- २५त्वभूता किया तदुपाधिस्तु सुतरामसत्त्वभूतस्तत्कथं सत्वाभिधायिना नाम्ना प्रतिपाद्यते इति ? उच्यते- भानुप्रकृतियाच्याऽसत्त्वभूतेय क्रिया यया कियाशब्देन नामरूपेण सत्त्वरूपापन्ना प्रतिपाद्यते, तथा पोपाधिरपि सत्यापन्नः शोभनादिशब्देनेयदोपः । कथं पुनरसत्त्वभूतोऽर्थः सत्त्वरूपेण प्रकाश्यते इति घेन् ? स्वपापपप्रभाशयलादिति प्रमः । स्वशक्तिरिय वाचकानां यदसत्त्वं सत्त्वरूपतया प्रकाशयति, पदार्थम्य पा सम्पमिदमीशं यद्विशिष्टेन पापनाभिधीयमानो असत्वरूपः सत्त्वरूपतयापि प्रकाशते; ३० सदुपम्- "प्यपदेशे पदार्थानागन्या ससौपपारिकी । सर्यावस्थामु सर्षेपामात्मरूपनिदर्शनी ॥ १॥" "एटिकादि पया द्रव्यं भिन्नरूपैम्पाप्रयः । स्वशतियोगात्सम्बद्ध साप्येणेय गम्यते" ॥२॥ मपुंमपन्यमेकत्यं पक्रियाविशेषणानाममिहिनं सत्र माग्नः प्रथमः" (२२२२३१) इति सूत्रेण सामान्येन ३५विदिता ययाऽप्यपेभ्यतया क्रियाविशेषणादपि प्रयमा मविष्यति । अन्पे त्याः-धात्यर्थः क्रिया सा A प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । द्वितीयांविधानम् २२७ च कारकचक्रनिःपाद्यत्वात्कर्मरूपतां नातिकामति । ततो यथा भीप्ममुदारं वश्यं करोतीत्यादौ कटादि- कर्मविशेपणतया भीष्मादिशब्देभ्यो द्वितीया, तथा मन्दमञ्चति साधुर्गच्छति इत्यादी कर्मत्वास्क्रियावि- शेपणादापि भविष्यति, किमनेन सूत्रेण इति ? अत्रोच्यते-द्वितीयार्थमिदं सूत्रम् , न कर्मसंज्ञार्थम् , तेन कृयोगे कर्मनिमित्ता पष्ठी न भवति । अयमर्थः-यदीदं न स्यात्तदा यथौदनस्य पत्तेत्यादौ कृदन्त- कर्मत्वादोदनादिशब्दात्कर्मणि पष्ठी, एवं ओदनस्य शोभनं पत्तेत्यादौ शोभनझब्दादपि स्यात् । नासा-५ विष्टा शिष्टासम्मतत्वात् ; यथा मन्दं गन्ता प्रामायेत्यादौ चतुर्थी चानिष्टा स्यादिति । नन्वस्तु प्रथमा, प्रथमाद्वितीयकवचनरूपं प्रत्यविशेष इत्युक्तत्वाद्दोपाभावात् । नैवम् , प्रथमाविधाने अथो पचति शोभनं ते भार्येत्यादौ ते मे विधानं "सपूर्वात्प्रथमान्ताद्वा" (२।१।३२) इत्यन्वादेशे विकल्पितं स्यान्नित्यं चेष्यते इति प्रथमाविधिर्नेष्ट इत्येतत्सर्वं मनसिकृत्याह-द्वितीयेति । तत्राप्यसत्त्वात्मिकायाः क्रियाया विशेषणत्वेन सह्याद्ययोगादौत्सर्गिकद्वितीयाया एकवचनमेव च भवति ॥ ९ ॥ उत्कृप्टेऽनूपेन ॥ १०॥ (सि० २।२।३९) उत्कृष्टार्थादनूपाभ्यां युक्तागौणान्नानो द्वितीया भवति । अनुसिद्धसेनं कवयः । उपहेमचन्द्र वैयाकरणाः । तेषु तो उत्कृष्टौ इत्यर्थः ॥ १० ॥ "उत्कृष्ट०” उत्कृष्टशब्दो हीनापेक्षः तेन हीनोत्कृष्टसम्बन्धेऽनुना द्योये द्वितीया विधीयते । उत्पूर्वात् कृपतेः कर्मणि क्ते यद्भाव इति सप्तभ्यामुत्कृष्टे इति । अनुसिद्धसेनं कवय इति-सिद्धसेनकविनिर्दिष्टस्य १५ हीनोत्कृष्टसम्वन्धस्यापेक्षणक्रियाजनितत्वमनुना ख्याप्यते, यथान सिद्धसेनमुत्कृष्टमनूद्य कवीनां हीनत्ववि- धाने दत्तमुदाहरणम् , तथा कवीन हीनाननूद्य सिद्धसेनस्योत्कृष्टत्वेऽप्युदाहरणं द्रष्टव्यम् । यथानुकवीन सिद्धसेन इति । तथा चाह-तेपु तो उत्कृष्टौ इति ताभ्यामन्ये कवयो वैयाकरणाश्च हीना इति यावत् । सिंहावलोकनन्यायेन पूर्वोक्तस्य इत्यादिशब्दस्यात्रानुवृत्त्यान्यस्याप्यव्ययस्य योगे द्वितीया स्यात् , तथाहि-"लक्षणवीप्स्येत्थम्भूतेष्वभिना” (२।२।३६) लक्ष्यते दयते येन तल्लक्षणम्-चिह्नम् । २० अवयवशः समुदायस्य क्रियादिना साकल्येन प्राप्तीच्छा वीप्सा, तत्कर्म वीप्स्यम् । केनचिद्विवक्षितेन विशे- पेण भाव इत्थंभावस्तद्विपय इत्यम्भूतः । एष्वर्थेषु वर्तमानादभिना युक्ताद्गौणान्नानो द्वितीया भवति । वृक्षमभिविद्योतते विद्युत्-अत्र वृक्षो लक्षणम् , विद्योतमाना विद्युत् लक्ष्यम् , अनयोश्च लक्ष्यलक्षणभावः सम्बन्धोऽभिना द्योत्यते । अत्र सम्बन्धस्य द्विष्टतया विद्युतोऽभिना योगेऽपि गौणादिति वंचनात् प्रधा- नत्वात्ततो न द्वितीया । वृक्षं वृक्षमभिसेकः, एकैकस्य वृक्षस्य सेक इत्यर्थः । अत्र सेकेन वृक्षाणां२५ वीप्स्यमानानां सेकं प्रति यस्तेषां साध्यसाधनभावलक्षणः सम्बन्धः सोऽभिना द्योत्यते । वीप्सा तु द्विर्वचनद्योत्यैव । अन्ये तु वीप्सावीप्स्यमानयोः सम्बन्धो द्विर्वचनेनैव धोत्यते नत्वभिना इति सम्ब- न्धमद्योतयतापि तेन योगे वचनाद्वितीयेति । साधुर्देवदत्तो मातरमभि-मातृविषयें साधुत्वप्रकार प्राप्त इत्यर्थः । अत्र मातुर्देवदत्तस्य साधुभावं प्रति विषयता-देवदत्त इत्थम्प्रकारं मातृविपये प्राप्त इत्यर्थः । योऽसौ मातुरित्थम्भावप्राप्त्या विषयविपयिभावलक्षणः सम्बन्धः सोऽभिना द्योत्यत इति "भागिनि३० च प्रतिपर्यनुभिः” (२।२।३७) स्वीक्रियमाणोंऽशो भागस्तत्स्वामी भागी तत्र लक्षणादिषु चार्थे पु वर्तमानात् प्रति-परि-अनुभिर्युक्तागौणान्नानो द्वितीया स्यात् । भागिनि-यन्त्र मां प्रति मां परि मामनु स्यात् , योऽत्र मम भाग आभवति स दीयतामित्यर्थः । लक्षणे-वृक्षं प्रति वृक्षं परि वृक्षमनु विद्योतते विद्युत् । वीप्त्ये-वृक्षं वृक्षं प्रति वृक्षं वृक्षं परि वृक्षं वृक्षमनुसेचनम् । इत्थम्भूते-साधुमैत्रो मातरं प्रति ३४ १वृक्षं प्राप्य विद्योतत इति प्राप्तिक्रियाजनित इति शेषः ।

२२८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- मातरं परि मातरमनु । "हेतुसहार्थेऽनुना” ( २१२१३८) हेतुर्द्विधा-जनको ज्ञापकच, तत्र ज्ञापन कस्य लक्षणत्वात् तत्र पूर्वसूत्रेणैव द्वितीया सिद्धेति जनक एवेह गृह्यते । सहार्थस्तुल्ययोगो विद्यमानता च तस्य च सहार्थस्य तुल्ययोगादेर्योऽसौ विषय आश्रयः पर्वतादिरर्थः सोऽप्युपचारात्सहार्यशब्दवाच्यः । तयोर्वर्तमानाद्गौणान्नानो द्वितीया स्यात् । जिनजन्मोत्सवमन्वागच्छन् सुरा:--अन जिनजन्मोत्सयो हेतुः, ५सुरागमनं हेतुमत् , तन्न जिनजन्मोत्सवस्य हेतुभावः सुरागमनापेक्षः, सोऽनुना द्योत्यते, तेन हेतुने. त्यर्थः । अत्र "हेतुकर्तृकरणेत्थम्भूतलक्षणे” (२।२।४४) इति प्राप्ता तृतीयां चाधित्वा द्वितीया भव- तीत्यर्थः । नदीमन्यवसिता सेना--अन नद्यायाः सहभावः सोऽनुना द्योत्यते; "सहार्थे' (२०४५) इति प्राप्तां तृतीयां बाधित्यानेन द्वितीया । अन्ये तु तृतीयार्थमात्र इच्छन्ति-पर्वतमन्ववसिता सेना, पर्वतेन क; करणेन वा कृतान्तेत्यर्थः । अवपूर्वस्य सिनोतेः कर्मणि ते अवसितेति रूपम् । अत्र कर्तृता १० करणभावो या तृतीयार्थ इति तृतीयापवादोऽयं योगः ॥ १० ॥ गौणात्समयानिकषाहाधिगन्तरान्तरेणातियेनतेनर्द्वितीया ॥ ११ ॥ सि०२२२३३] क्रियान्वयि मुख्यम् , परं गौणम् । समयादिभिर्नयभिर्युक्तागौणानाम्नो द्वितीया स्यात् । ममया ग्रामम् । निकपा गिरि नदी । हा मैत्रं व्याधिः । घिर जाल्मम् । अन्तरा निप, नीलं च विदेहाः । १५ अन्तरेण धर्म क सुखम् । अति वृद्धं कुरून् बलम् । येन पश्चिमां गतस्तेन पश्चिमां नीतः ॥११॥ "गौणा." । मुख्यमुपकार्य यदर्थमन्यदुपादीयते यस्याल्यातपदेन सामानाधिकरण्यम् , ततोऽन्यत्त- स्योपकारकं यत्तदर्थ तद्विशेषण यस्याख्यातपदेनासामानाधिकरण्यम् , तद्गौणमित्यभिप्रेत्याह-क्रियान्वयी- त्यादि-समया प्राममित्यादि-अन समयेत्यादिसमीपवचनस्य ग्रामादिविशेषणं नद्यादिविशेष्यमित्युभयो- रपि युक्तत्वम् । तर नद्यादिविशेष्यमस्तीत्याद्यारयातपदेन समानाधिकरणं मुख्यम् , प्रामादिपदं तु न २० तथेति गौणमिति ततो द्वितीया । सर्वत्र सम्बन्धपष्टयां प्राप्तायां द्वितीयाविधानम् । हा मैनमिति- अत्र शोच्यता देवदत्तस्स हाशब्देन द्योत्यते । व्याधिरिति-वर्धते इति शेषः । धिग् जाल्मम्-अन्न जाल्मस्य निन्द्यता । अन्तरेति-निपधनीलयोर्मध्ये विदेहा इत्यर्थः, मध्यशब्दस्य सप्तम्यन्तस्य यादृशोऽर्थस्तादृशोऽ- न्तराशब्दस्यापि-उद्भूताधारशक्तिकोऽयमित्यर्थः ।। अन्तरेणशब्दस्य त्वेको दर्शितोऽर्थोऽपरो विनावे- त्याह-अन्तरेणेति । समयादिसाहचर्यादेतौ निपातौ । नत्यन्तराशब्दः स्त्रियामावन्तः, न चान्तरेणशब्द- २५स्तृतीयान्त इति; तेनान्तरायां पुरि वसति, कि तयोरन्तरेण ज्ञातेनेत्यन द्वितीया न भवति ॥ हा तात धिगजाल्म हा सुभ्र इत्यादावामन्यतया विवक्षा न हादियुक्तत्वेनेति न भवति ॥ एवमतिवृद्धं कुरून बलम् । पुर्वतिक्रमेण वृद्धमित्यर्थः । येन पश्चिमां गतः तेन पश्चिमां नीतः । बहुवचनादन्येनापि युत्ता- द्भवति-बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित् । धातुसम्बन्धोऽत्र प्रतिस्तेन भागिनि च प्रतिपर्यनुभिरिति न सिद्ध्यतीति ॥ ११ ॥ द्वित्वेऽधोऽभ्युपरिभिः॥ १२॥ [सि० २२२२३४] द्विरुक्तरेभिर्युक्ताद्वितीया स्यात् । अधोऽधो ग्रामम् । अध्यधि ग्रामम् । उपर्युपरि ग्राम ग्रामाः। द्वित्व इति किम् ? अधो गृहस्य ॥ १२ ॥ पद्विवे" अधःभूतयः यतद्विचनाः समीपवना एव, अन्यन द्वित्याभावात् । यस तत्सामीप्यं ३४मामादेसवः सम्बन्धे पष्ठयां प्राप्तायामयं योगः । अधोऽध इत्यादि-सर्वन सामीप्येऽधोऽध्युपरिदेसरुवा -- - .. काला० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । द्वितीयादिविधानम् । कर्तृलक्षणम् २२९ कालंकृता वा प्रत्यासंत्तिः सामीप्यं तस्मिन् विवक्षिते एतानि द्विरुच्यन्ते इति सूत्रेण द्विवचनम् । अयो गृहस्वेति-उत्तरार्थमात्रमत्र विवक्षितं न सामीप्यमिति द्वित्वाभावाद्वितीयासावे पाटी ॥ १२ ॥ सर्वोभयाभिपरिणा तसा ॥ १३ ॥ [सि० २।२।३५] मर्यादिभिश्चतुर्भिस्तसन्तैर्युक्ताद् द्वितीया सात् । सर्वतो ग्राम बनानि ॥ १३ ॥ 'सर्वो०" । तसन्तरिति-तसेति सर्वादिविशेषणत्वाद् "विशेषणमन्तः” (७४।११३) इति न्याया-५ तदन्तप्रतिपत्तिरिति सर्वतो ग्राममित्यादि । एवमुभयतो ग्राममभितो प्रामं परितो ग्राममिति 1. सर्वत उभयत इति सप्तम्यन्तात् "आद्यादिभ्य” (७१२।८४) इति तसुः । अभिपरिझदाभ्यां पर्यभः सर्वोभये" (७२।८३) इति तसुः । आभिमुख्यवृत्तिरपि तसन्नप्रतिरूपकोऽभितः झब्दोऽस्ति, सोऽपीह गृह्यते, ततस्तद्योगेऽपि षष्टी मा भूदिति षष्ट्यपवादोऽचं योगः ॥ १३ ॥ कालावनोाप्तौ ॥ १४ ॥ [सि० २२२४२] द्वितीया । व्याप्तिनरन्तर्यम् । मासमधीते । क्रोशं गिरिः ॥ १४ ॥। इति द्वितीया । निरन्तर्यमिति-स्वसम्बन्धिना द्रव्यगुणक्रियारूपेणात्यन्तसंयोग इति यावत् । मास- मधीते इति-कालस्य क्रियया व्यापाविद्मुदाहरणम् , द्रव्येण व्याप्ती तु मासं गुडधाना इति, गुणेन व्याप्ती मासं कल्याणीति । कोशं गिरिरिति-अध्यनो द्रव्येण व्याप्ताबुदाहरणम्, गुणेन व्याप्ती कोशं कुटिला नीति, क्रियया व्यामो कोशमधीते इति । कालाधनोरिति क्रिम् ? स्थाल्यां पचति । व्यापाविति किम् ? १५ मासस्य मासे वा व्यहं गुडधानाः । भावादपीच्छन्त्यन्ये चोदोहं वक्रः । पट्याः सप्तम्या वायमपवादः ॥ १४ ॥ अत्रापवादमाह सिद्धौ तृतीया ॥ १५॥ [ सि० २।२२४३] मासेनावश्यकमधीतम् । सिद्धाविति किम् ? मासमधीतो नत्वाचारोऽनेन गृहीतः ॥ १५ ॥ "सिद्धी" । सिद्धी क्रियाफलनिष्पत्ती चोलायां कालाध्यवाचिनो नान्नस्तृतीया स्यात् । मासमधीत २० इति-अत्र व्यानिमात्रं गम्यते न सिद्धिरिति । द्वितीयापवादोऽयं योगः ।। १६ ॥ खतन्त्रः कर्ता ॥ १६॥ [सि० २।२।२] क्रियासिद्धी प्रकृप्टो यः स कर्ता स्यात् । तथाहुः- निप्पत्तिमात्रे कर्तुत्वं सर्वत्रवास्ति कारके । व्यापारभेदापेक्षायां करणत्वादिसम्भवः ॥१॥ फलार्थी यः स्वतन्त्रः सन्फलायारभने क्रियाम् । नियोक्ता परतत्राणां स कर्ता नाम कारकम् ॥२॥ चेत्रेण कृतम् । यत्तु चैत्रः कटं करोतीत्यादी प्रथमा सा उक्तत्वात् । आख्यातकृत्प्रत्यये- नोक्ते हि सर्वत्र कारके प्रथमा । यथा घटः क्रियते । नानीयं चूर्णम् । दानीयो मुनिः । भवा- नको व्याघ्रः। गुडाधानी स्थाली ॥ १६ ॥ "स्वतन्त्रः” खतन्त्रशब्दो खडिवचनः समासप्रतिल्पकः प्रधानार्थः । स्वाब्द आत्मवचनतनशब्दः प्रधानार्यः । स्वतन्त्रमलेति तु पदयटनामात्रमिति । अस्सागुणभावेन धातुना व्यापार उच्यते न बनन इति तात्पर्यम् । एतत्सर्व मनसिकृयाह-क्रियासिद्धी स्वप्रधान इत्यादि । ननु सामग्रीतः क्रियोत्सादात्म- ३३ + महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- र्वेषां तत्र साम्यान कस्यचित् प्राधान्यं सम्भावयाम इत्यत्रोच्यते सर्वेषां साधनानां कर्ता प्रवर्तयिता भवति, तदीनप्रवृत्तिनिवृत्तिकत्वात्तस्य च प्रागन्यतः शक्तिलाभात् प्रतिनिध्यदर्शनात् करणाद्यभावेऽ- प्यास्ते शेते इत्यादी केलस्य कर्तुर्दर्शनात् कर्तरहितानां करणादीनामदर्शनात्प्राधान्यम् कर्तुरिति । यद्वा सर्वेपां साधारणक्रियायां कर्तृत्वमवान्तरव्यापारविवक्षायां तु करणादिरूपत्वम् । यथा मातापित्रोप- ५त्योत्पादने कर्तृत्वम् , तदविवक्षायां तु अयमस्यामियमस्मादा जनयतीत्यधिकरणत्वमपादानत्वं च व्यक- तिष्ठते । एवं च स्वातव्यपारतत्र्ययोर्विरोधाभावात्करणं कारकमित्यादिविशेपणविशेष्यमांवोऽपि । कर्तृ- संज्ञा तु करणाद्यवस्थायां न भवति, "स्वतन्त्रः कर्ता" (२१२१२) इत्यत्र कारकत्वादेव स्वातव्ये लब्धे पुनः स्वतश्रुतिनियमार्था; तेन स्वातत्यमेव यस्य तस्य कर्तृसंज्ञा न तु पारतक्ष्यसहितस्वातव्ययुक्तस । कारकसंज्ञा तु वस्तुस्थित्याविद्यमानमुद्भूतत्वेनाविवक्षितमपि स्वातत्यमाश्रित्य करणादीनां विधानसामर्थ्यात् १० प्रवर्तते । यन च शक्तीना निमित्तनिमित्तिभावेन युगपद्विवक्षा तन संज्ञानां विप्रतिपैध उच्यते-यथा धनुपा विध्यतीति विनाऽपायविवक्षया धनुपः साधकतमत्वाभावात् संज्ञाद्वयप्रसङ्गे परः "पढ़ें" (७४।१११) इत्पन परग्रहणस्येष्टवाचित्वात्कचित्पूर्वमिति करणसज्ञा,--एवमसिनिछनत्ति इति सत्येव साधकतमत्वे स्वातश्यस्य विवक्षितत्वात् कर्तृसज्ञा, तदा तु तेण्यादीनां करणत्वम् । तैपण्यादीनां तु कर्तृत्वविवक्षायामात्मनः करणत्वम् । तेण्यमेव हि वस्तुस्थित्यैकमपि विवक्षावशात्कर्तृत्वेन करणत्वेन १५वेधावतिष्ठते इति कर्तृत्वं करणत्वस्यावाधफमिति ॥ एवं स्थाली पचतीति अधिकरणरूपायाः स्थाल्या: स्वातस्यविवक्षया कर्तृत्वम् । किञ्च प्रेपितः करोतीत्या प्रयोज्यावस्थायामपि स्वातन्त्र्यस्याहाने कर्तृत्व- मस्त्येव ।। अस्य च कर्तुरधिश्रयणादयः पचिक्रियायामवान्तरव्यापारा वर्तन्ते । एतान् कुर्वन् देवदत्तः पंचतीत्युच्यते । एपु तदा पचिर्वर्त्तते इति भावः । प्रयोजकोऽपि स्वतन्त्रत्वात्कव पचन्तं मैनं प्रयुके पाचयति मैत्रेण पत्रः । ननु अत्र मैत्रेणेया कर्तृतृतीया न प्राप्नोति अस्वतत्रत्वात् , यथा कर्तृसन्निधौ २० करणादीनां स्वातल्याभावस्तथा प्रयोजकसन्निधौ प्रयोज्यस्थापीति । नैप दोपः, प्रयोजकसन्निधानेऽपि प्रयोज्यस्य करणादिकारकविनियोगादिना क्रियासिद्धी स्वातव्यसद्भावाद् , यदि तु प्रयोज्यस्य स्यातव्यं म स्थानवासी साधनान्तरविनियोगादिना मियां कुर्यात् । यहन्दिरतमति:- "य: प्रियो फर्मवस्था फुरुते मुरयभावतः । अप्रयुक्तः प्रयुक्तो वा स का नाम कारकम्" ॥ १ ॥ भाष्यकृताप्युक्तम्---नहि कश्चित् परोऽनुगृहीतव्य इति प्रवर्तते, सर्व इमे स्वभूत्यर्थ यतन्त इति १५प्रेपितोऽयसो स्वार्थदर्शनादिच्छाया सत्या क्रियां करोति, तददर्शनान करोतीति खत एवेति । ना पादू प्रयोग्यस्य स्वव्यापार प्रवर्तनात् सातवयमिति सिस्यति तृतीया, प्रेपकाले तु कथम् । तत्र पव्यापाराप्रवर्तनात्मवृत्ती च प्रेपवैयात्स्यातव्यं नासि, स्वतन्त्रस्य प्रयोजकः प्रयोक्तेति तब्यापार निगू मसात् । नेप दोषः । तस्य स्वतप्रत्यादृष्टसामर्थः सम्भावितसामयों या क्रियायां स्वातव्येण समा- दिव एवं नियोग्यशब्देनोच्यते । नन्वेरस सातव्य पारतक्यं च प्रतिपितम्, प्रयोजकसन्निधौ पारत- ३० कोण स्यातघ्यस्य विरहनत्याधोगपद्यानुपपत्तिः । उच्यते । एकापेक्षया विरोधोऽत्र प्रेमापेक्षया पारतायं परणापेक्षया प स्यातध्यमित्यविरोधः । यद्येवं नदीयूल पवतीत्यादी स्यातच्याभावात्यर्तृत्वाभावा, सधादि-शनव्यं नाम परिदृष्टसामग्रंकारपप्रयोपत्वं पेवनच्यापारो नाचेतनस पूलादेः सम्भवति । उन्यते । सामान्येन पव्यापारे पदं निप्पाय पश्चात्पदान्तरयोगा, नान्तर पदसंरकार यहिरणः पदान्तरसम्यन्यो घायते । तत्त्यं तत्त्वप्रियारत्वं पाठादी पापाचनुपलव्यापारवस्यप्रतिसन्धाने फॉप. ३६दप्रयोगाभापार पनाविभागारिना मिद्भगनशधि फेज पाना हनन्दन सिखस्स कर्यपदस साल - -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । करणसंज्ञाविधानम् । तृतीयाविधानम् २३१ न्यत्वबोधनाश, अचेतने कर्तृपदप्रयोगस्तु गौण इत्याद्याहुः । निष्पत्तिमात्रे इत्यादिकारिकाद्वयं व्याख्यातार्थम् । चैत्रेण कृतमिति इदं कार्यमिति शेयः । अत्र "कर्तृतृतीयाया आश्रयोऽर्थः-तथाहि-स्वतन्त्रः कर्ता, स्वातव्यं च धात्वर्थव्यापाराश्रयत्वम् , 'धातुनोक्तक्रिये नित्यं कारके कर्तृतेष्यते' इति वाक्यपदीयात् ; अत एव यदा यदीयो व्यापारो धातुनाभिधीयते तदा स कर्तेति । स्थाली पचति, अग्निः पचति, एधांसि पचन्ति, तण्डुलः पच्यते स्वयमेवेत्यादि सङ्गच्छते” इति भूषणे । इदं कार्यजननानुकूलस्य व्यापारा-५ अयश्चैत्र इति भावः । यत्तु चैत्र इत्यादि स्पष्टम् । घटः क्रियते इत्यादिपु कर्मादिशक्तीनामुक्तत्वात्तद- भिधायिन्यो द्वितीयादिविभक्तयो न स्युः । अर्थप्रत्यायनाय लोके शब्दः प्रयुज्यते, सचार्थो यदा शब्दान्तरेण प्रतिपादितः स्यात्तदा प्रयोजनाभावाच्छब्दान्तरप्रयोगेण न भाव्यम्, अक्षिनिकोचत्वादिभिरप्यधिगतेऽर्थे 'शब्दो नःप्रयुज्यते; किं पुनः शब्दान्तरप्रतिपादिते यथा चित्रगुरित्यत्र बहुव्रीहिणोक्तार्थत्वान्मत्वर्थीयो न भवतीति ।। १६ ॥ साधकतमं करणम् ॥ १७॥ [सि० २।२।२४ ] क्रियात्वेनाव्यवधानेन विवक्षितं क्रियासिद्धौ प्रकृष्टोपकारकं करणं स्यात् । दानेन लभते भोगम् ॥१७॥ "साधक०" तमवर्थः प्रकर्पः स चाव्यवधानेन फलजनकव्यापारवत्ता ताशव्यापारवत्कारणं प्रधा- नोपकारकं तच्च विवक्षयेत्यभिप्रेत्याह-क्रियासिद्धावित्यादि-ननु सामग्र्यधीना हि क्रियासिद्धिरेकस्याप्यभावे १५ न भवति, तदस्यामनेकसाध्यायां कोऽस्य प्रकर्पो येन करणं साधकतमं स्थानान्यानि ? अत्रोच्यते । अव्यवधानेन विवक्षितमिति-अयं भावः-वस्तुवृत्त्या साधकतमस्य सम्भवो नास्ति यव्यापारसामनन्तर्येण तु क्रियासिद्धिर्विवक्ष्यते तस्य कल्पनया साधकतमस्येयं संज्ञा, युक्तं चैतत् , एवं हि नैयत्येन किञ्चि- त्करणम् ; तथाहि-काष्ठैः पचतीति काष्ठानि करणम्, काष्ठसम्बन्धज्वलनलक्षणव्यापारसामनन्तर्येण पचिक्रियासिद्धेविवक्षितत्वात् । कदाचित्स्थाल्या पचतीति स्थालीव्यापारसम्भवेन धारणलक्षणसामनन्त-२१ येण पचिक्रियासिद्धौ विवक्षितायां स्थाली करणं यदाह- "क्रियायाः परिनिप्पत्तिर्यद्व्यापारादनन्तरम् । विवक्ष्यते यदा यत्र करणत्वं तदा स्मृतम्" ॥१॥ "वस्तुतस्तदनिर्देश्यं नहि वस्तु व्यवस्थितम् । स्थाल्या पच्यत इत्येषा विवक्षा दृश्यते यतः" ॥२॥ अत्र च तमग्रहणात् अपादानादिसंज्ञाविधौ तरतमयोगो नास्ति इति ज्ञेयम् । तेन कुशूलात्पचति गङ्गायां घोपः प्रतिवसतीति व्यवहितोपचरितयोरप्यपादानत्वमधिकरणत्वं च भवति । अन्यं च कार-२५ कान्तरापेक्षया प्रकर्पो न स्वकक्षायां तेनैकस्यां क्रियायामनेकमपि करणं भवति । नावा नदीस्रोतसा व्रजति, रथेन पन्था दीपिकया याति, सूपेन सर्पिपा लवणेन पाणिना ओदनं भुझे इति । तार्किकास्तु कारकान्तरेऽचरितार्थत्वे सति क्रियाहेतुत्वं करणत्वं कारकान्तरनिष्टव्यापारद्वारा क्रियाहेतुभावः सत्य- न्तार्थः कर्तृकर्मणोः कुठारादिकरणनिष्टव्यापारद्वारा छिदादिहेतुत्वान्नातिप्रसङ्ग इत्याहुः ।। १७ ।। हेतुकर्तृकरणेस्थम्भूतलक्षणे ॥ १८॥ [सि० २।२।४४ ] एषु चतुर्पु तृतीया स्यात् । तत्र फलसाधनयोग्यो हेतुः । दानेन लभते भोगान् धनेन कुलम् । चैत्रेण कृतम् । दात्रेण लुनाति । *किञ्चित्प्रकारमापन्नस्य चिह्न इत्थम्भूतलक्षणं कमण्डलुना छात्रं -लक्षये, कमण्डलुना छात्रमुद्राक्षीत् ॥ १८ ॥ ३३ . . ३. गर्दीन्यन सहेय दशभिः पुनः सतीति शक्यं प्रतिपत्तुम् तल्कि तुल्ययोगाद्विद्यमानतायाः पृथग्रहणेन ? २३२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु-- "हेतु." हेत्वादीन व्याचष्टे-तत्रेत्यादि । फलं कार्यम् , तस्य साधनं निष्पादन कारणमिति यावत् तत्र योग्यः सामान्यतो दृष्टसामर्थ्यः, योग्यग्रहणमन्तरेण तु फलसाधन इत्युच्यमाने यः फलं साधयति क्रियाविष्टसन प्रतिपत्तिः स्यात् , योग्यग्रहणे तु योग्यतामात्रप्रतिपत्तावकुर्वन्नपि तत्फलं हेतुरिति हेतुत्वं फलसाधनयोग्यत्वं तेन रूपेण पदार्थों हेतुरुच्यते इति हेतुतृतीयया, तत्र तस्य योग्यतामानं द्योत्यते ५तथा च धनादीनि कुलमकुर्वन्त्यपि योग्यतामात्रेण तृतीयामुत्पादयन्ति । यत्रापि क्रिया दृश्यते अन्नेन वसतीति तत्रापि क्रियायामन्नादेर्योग्यतामात्रविवक्षयैव हेतुतृतीया, प्रकृष्यमाणव्यापारविवक्षायां तु करणे तृतीयेति । द्रव्यादिसाधारणं च हेतुत्वं करणत्वं तु क्रियामानविपयं व्यापारनियतं च । दण्डेन घटः पुण्येन दृष्टो जिनः । फलमपीह हेतुः अध्ययनेन वसति । तथोक्तम्-निर्व्यापारमपि हेतुत्यं भवति; करणत्वं तु क्रियायां एवं व्यापारवद्भवतीत्यनयोर्विशेप इति कौमुद्याम् । दानेनेति अत्र १० भोगलाभे दानस्य शुभकर्मोपार्जनद्वारा हेतुत्वमिति शुभकर्मोपार्जनमवान्तरव्यापारः । काष्ठानां पचि- क्रियायां ज्वलनमिव अवान्तरव्यापारशालिन एव कारकत्यादिति । *किञ्चित्० सामान्यस्य भेदको धर्मः प्रकारो यथा-मनुष्यसामान्यस्य भेदकछात्रत्यादिको धर्म इति । इमं कश्चित्प्रकारं भूत आपन्न इत्यम्भूतः स लक्ष्यते येन तदित्यम्भूतलक्षणम् , यथा छात्रत्वादिकं प्रकारमापन्नस्य मनुष्यस्वेत्यर्थः, कम- ण्डल्लादिलक्षणं ततस्तृतीयेति कमण्डलुनेत्युदाहरणम् । ननु कमण्डल्वादिलक्षणस्य हेतुत्वमप्यस्तीति १५तहारेणैव तृतीया भविष्यतीत्यत्रोच्यते-न तावच्छात्रादिस्वरूप लक्षणाधीनमिति न तस्य लक्षणं हेतुः, छानादिप्रतीतेस्तु तद्धेतुः न चेह तत्प्रतीतिः केनचिदभिधीयते । सूत्रेण त्वनेन तृतीया विधीयमाना लक्षणमवद्योतयतीति युत्तोऽस्यारम्भ इति । एवं जटाभिस्तापसः जटाज्ञाप्यतापसत्वविशिष्टस्तापस इति । चूल्या परिव्राजकः । सहार्थ इत्येव सिद्धौ लक्ष्यलक्षणभावे पष्ठी मा भूदिति वचनम् । यत्तु धान्येनार्थी मासेन पूर्वः मासेनायरः असिना कलहः याचा निपुणः गुडेन मिश्रः आचारेण लक्ष्णः माषेणोनः २० मापेण न्यूनः मासेन विकलः पुंसानुजः शङ्खलया सण्डः गिरिणा काणः इत्यादौ तृतीया सा तु हेतो कृता, भवत्यादिगम्यमानक्रियापेक्षया कर्तरि करणेवेति ज्ञेयम् ॥ १८ ॥ सहार्थे ॥ १९॥[सि० २२२१४५] सहार्थस्तुल्ययोगो विद्यमानता च । तसिन्गम्यमाने नाम्नस्तृतीया स्यात् । पुत्रेण सहागतः स्थूलो गोमान् । एकेनापि मुपुत्रेण सिंही सपिति निर्भरम् । सहेव दशमिः पुत्रैर्भार वहति गर्दमी ॥१॥ १९ ॥ "सहा." सहम्य साब्दम्यार्थः सहाथः तुल्यः साधारणोऽप्रधानस्य प्रधानेन क्रियादिना या सम्पन्धः स तुल्ययोगः । विद्यमानता सत्ता । तम्मिन् गम्यमाने इति शब्दादर्थाद्वेति शेषः । ननु प विद्यमानतायामपि तुल्ययोगोऽम्येव सत्तया सहोभयोः सम्बन्धात् सहेव दशभिः पुनर्भार बहति . उच्यते । विवक्षितयोगाभावात्महब दशभिरित्यत्र वहनमानं विवक्षितं तद्गर्दभ्या एव न तत्पुत्राणाम्। तेषां तु विमानतेय विभिना-दशभिः पुनः विद्यमानेरपि भारं यहतीति विवक्षितत्वात् । पुत्रेण सहागन इन्यवागमनप्रियया पितापुत्रयोस्तुल्ययोगः, पुत्रेण मा स्थल इसन स्थौल्येन गुणेन, पुन साद गोमानिन्यत्र र गोभिद्रव्येश । एवं शिष्येण सह प्राह्मण इत्या जायेति । सर्वनात यद्यप्युभयोः २५ मिपाहियोगमयान्यागत इत्यादिशब्देनाभिधीयमानः रियादियुतः पेनचित्प्रयोजनेन मुग्यतया विष.

- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । तृतीयाविधानम् क्षितः पित्रादिरभिधायां प्रधानमितरदप्रधानं तत्र षष्ट्यां प्राप्तायां तृतीया । "सहाथै" (२।२।४५) इत्यत्रार्थग्रहणात्सहशब्दाप्रयोगेऽपि तदर्थसद्भावे तृतीया भवति, तदप्रयोगे तदर्थसद्भावो द्विधा भवति- पर्यायशब्दप्रयोगादर्थप्रकरणादेश्च तदर्थप्रतिपः। तत्र पुत्रेण समं सार्द्ध साकममा युगपदिति पर्यायशब्द- प्रयोगे । अर्थप्रकरणादेस्तदर्थावगमे तु पुत्रेणागतः वृद्धो युनेत्यादि, सुखेनास्ते, दुःखेन जीवति, कष्टेन कामति, अनायासेन करोतीत्यादौ आस्यादिक्रियादिभिः सह सुखादेः सहार्थोऽस्ति । क्रियाविशेषणत्व-५ विवक्षायां द्वितीयैव सुखमास्ते, दुःखं जीवतीत्यादि । गौणादित्येव-"सहोभौ चरतो धर्मम्" अनोभयो- रपि प्राधान्येन क्रियायोगान्मुख्यत्वमिति । चैत्रमैत्राभ्यां सह कृतमिति तु कर्तर्येव तृतीया ।। १९ ।। य दैस्तद्वदाख्या ॥ २०॥ [सि० २।२।४६ ] यस्स भेदिनो भेदैः प्रकारैस्तद्वतोऽर्थस्य प्रसिद्धिः स्यात् ततस्तृतीया स्यात् । अक्ष्णा काणः । प्रकृत्या दर्शनीयः । आख्येति प्रसिद्धिपरिग्रहार्थम् । तेनाक्ष्णा दीर्घ इति न स्यात् ॥ २० ॥ "यद्धे०" यस्येत्यादिभेदिनः काणत्वादिविशेषवतो यस्याक्ष्यादेरवयवस्य भेदैविशेषैः काणत्वादिभि- स्तद्वतोऽक्ष्यादिमतश्चैत्रादेरर्थस्य काणोऽयमित्यादिप्रसिद्धिः स्यात्ततस्तृतीया स्यादिति भावः। अक्षणा काण इति। एवं पादेन खञ्जः, हस्तेन कुणिः, शिरसा खल्वाटः, प्रकृत्या दर्शनीयः । प्रायेण वैयाकरण: प्रायेणेति स्वभावेन । गोत्रेण काश्यपः, जात्या ब्राह्मणः, जात्या सुशीलः, स्वभावेनोदारः, निसर्गेण प्राज्ञः, वर्णेन गौरः, स्पर्शेन शीतः, वचनेन मृदुः, रसेन खादुः, मुखेन सरूपः, उरसा विशालः, वाहुभ्यां १५ दृढः । सर्वत्र पुरुषस्तद्वान् सम्बध्यते । ननु प्रकृत्या दर्शनीयः प्रायेण वैयाकरण इति युक्तः प्रयोगः, दर्शनीयत्वं प्राकृतमन्यच्च वैयाकरणत्वं च प्रायिकमन्यच्च स्यात्तत्रेतरव्युदासाथ प्रकृत्या प्रायेणेति चाs- र्थवत् । काणादिस्त्वक्ष्यादिमिरेव भवतीत्यव्यभिचारेण प्रतीतेरक्ष्यादीनां प्रयोग एवायुक्तः क तृतीया स्यादिति । अत्रोच्यते । लोकोऽत्र पर्यनुयोक्तव्यो योऽर्थवतोऽनर्थकतामनपेक्ष्य प्रतीतेऽपि शब्दान् प्रयुङ्क्ते, लोके च न सर्व एव सूक्ष्मेक्षिकया शब्दान् प्रयुते, यस्त्वेवं समीक्ष्यते स न प्रयुते । तत्रापि चोपचरि-२० तार्थनिवृत्तिरक्ष्णेत्यादिप्रयोगे प्रयोजनम्-सत्यमयं काणो नतूपचारत इति । कृतभवत्यादिक्रियाध्याहारेण कर्तृकरणयोस्तृतीया सिद्धैव, सम्बन्धषष्ठीनिवृत्त्यर्थं तु वचनम् ॥ २० ॥ कृतायैः॥२१॥[सि. शश४७] एमिनिपेधार्थैर्युक्तात्तृतीया स्यात् । कृतं तेन । किं गतेन ॥ २१ ॥ इति तृतीया । "कृता०” कृतम् भवतु अलम् किम् ; एवं प्रकाराः कृतादयो निषेधार्थाः। नतु गर्गादिगणवत्सन्निविष्टाः२५ केचन । निषेधार्थवृत्तित्वं च कृतादीनामनेकार्थत्वाल्लक्षणातो वा स्यात् । किं गतेनेति-नायं प्रश्ने कि शब्दः, किं तर्हि ? निषेधे; यद्वा प्रश्नार्थवृत्तिरेवायं प्रक्रमात्तु निषेधप्रतीतिः सामर्थ्याक्षिप्ता लक्षणया नतु शाब्दीति युक्ततरः पक्षः । अत्र प्रागुतत्यादिशब्दानुवर्तनात् "काले भान्नवाऽऽधारे" (२।२।४८) काले वर्तमानान्नक्षत्रवाचिनो गौणान्नान्नः आधारे तृतीया वा स्यात् । पुष्येण चन्द्रयुक्तेन युक्तः कालः पुष्यः "चन्द्रयुक्तात्काले लुप्त्वप्रयुक्ते" (६।२।६) इत्यण् तल्लुप् च ।३० पुष्येण पुण्ये वा पायसमभीयात् । काल इति किम् ? पुष्येऽर्कः । स्थाल्या पच्यत इत्यादिवदाधारस्य करणविवक्षायां तृतीया सिद्ध्यति, सम्बन्धविवक्षायां तु पप्टी मा भूदिति वचनम् । "प्रसितो- त्सुकाववद्धः” (२।२।४९) एतैर्युक्तादाधारे वर्तमानाद्गौणान्नान्नस्तृतीया स्यात् । केशः केशेपु ३३ १ चैकृतम् । है. प्रका० पूर्वा० ३० ..

"कर्मा." कर्मणेत्यादि । अयं भाव:-कर्मणा व्याप्येन क्रियया वा करणभूतेन कत्रों यमभिप्रेयते २३४ महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु- सिना, प्रकण सितो पद्धः पिंग्ट बन्धने' इत्यस्य रूपम्, नित्यप्रसक्त इत्यर्थः । गृहेण गृहे या उत्सुकः, केशैः केशेषु वाऽववद्धः । अवबद्धोत्सुकशब्दसाहचर्यात् क्रियार्थ एव प्रसितशब्दोऽत्र ग्राह्यः । “व्याप्ये द्विद्रोणादिभ्यो वीप्सायाम्" (२२२१५० ) व्याप्ये वर्तमानेभ्यो विद्रो. णादिभ्यो चीप्सायां वा तृतीया भवति । द्विद्रोणेन धान्यं क्रीणाति द्विद्रोणं द्विद्रोणं क्रीणाति ५तृतीया वीप्सायां विहितेति रतीया, तस्य द्विवचनं न भवति; द्वितीया तु कर्मणि विहिता न चीप्साया- मतस्तदन्तस्य द्विवचनं भवति । द्विद्रोणादयः प्रयोगगम्याः । आदिशब्दस्य प्रकारार्थत्वात् येभ्यो वीप्सायां प्रयोगे तृतीया दृश्यते ते द्विद्रोणादयः, न तु गर्गादिवत्सन्निविष्टा इति । "समोजोस्मृती वा" (२१२१५१) अस्मृतौ वर्तमानस्य सम्पूर्वस्य जानातेर्यध्याप्यं तत्र वर्तमानाद्गौणानाम्नः तृतीया वा स्यात् । मात्रा सञ्जानीते मातरं सञ्जानीते "सम्प्रतेरस्मृतौ” (३१३१६९) इत्यात्मनेपदम् । सम १० इति किम् ? मातरं जानाति । ज्ञ इति किम् ? मातरं संवेत्ति । अस्मृताविति किम् ? मातरं सञ्जानाति मातुः सञ्जानाति-स्मरतीत्यर्थः । व्याप्ये इति किम् ? मातरं स्वरेण सञ्जानाति । करणे विकल्पो न भवति ।मातुः संज्ञातेति कृतिपरत्वात् पष्ठी। "दामः सम्प्रदानेऽधम्ये आत्मने च" (२।२।५२) सम्पूर्वस्य दामः सम्प्रदानेऽधम्र्येऽधर्मरूपै वर्तमानानाम्नस्तृतीया स्यात्तत्सन्नियोगे च दामः आत्म- नेपदं भवति । दास्या सम्प्रयच्छते, कामुकः सन् द्रव्यं दास्यै ददातीत्यर्थः । दाम इति किम् ? दास्यै १५सन्ददाति । सम्प्रदान इति किम् ? द्रव्यं वृपल्या सम्प्रयच्छते इत्यन्न कर्मणि तृतीया मा भूत् । अधर्म्य इति किम् ? पढ्य सम्प्रयच्छति । सम इत्येव-दास्यै प्रयच्छति-इह सम्पूर्वस्य दामः प्रशब्दव्यवधा- नमन्चरेण प्रयोगाभापात्तव्यवधानेऽपि भवति । तदुक्तं हैमवृहन्यासे-नहि सब्यवधानमन्तरेण सम्पू. पस्य दामः संयच्छतीति प्रयोगो यत्र त्वस्ति तत्र यमेरेव; एवं च येन नाव्यवधानं तेन व्यवहितेऽपीति वचनप्रामाण्यात्प्रशब्देन व्यवधानमाश्रीयत इति । कौमुद्यां तु अशिष्टव्यवहारे दाणः प्रयोगे चतुर्थ्यर्थे २० तृतीया-दास्या संयच्छते कामुकः, धर्मे तु भार्यायै संयच्छति इत्युक्तम् ।। २१ ।। कर्माभिप्रेयः सम्प्रदानम् ॥ २२ ॥ [सि० २।२।२५] फर्मणा व्याप्येन क्रियया वा योऽमिसम्बध्यते स सम्प्रदानं सात् । “चतुर्थी" (२२२५३) सम्प्रदाने । देवाय पलिं दत्ते ! राज्ञे कार्यमाचष्टे । पत्ये शेते । “स्टाप्यं वा" (२२२२२६) सम्प्रदानम् । साधुभ्यः साधून् वा स्पृहयति । (क्रुदुहेासूयार्थयोंगे यं प्रति कोपर २५(२२२७)स सम्प्रदानम् ) मैत्राय क्रुध्यति । गुह्यति ॥ २२ ॥ ? - अमानुप्रहादिकाम्यया यमभिसम्बनाति स फर्माभिप्रेयः सम्प्रदानकारकं स्यात् । ननु फर्मणः कथं कर पत्यम् ? उच्यते । क्रियाभेदात् यथा देवाय बलिं दत्ते इत्यादी ददातिना हामिष्टत्वाद्वस्यादिरयः फर्म, तेन देवादिरभिसम्बध्यते इत्यभिसम्बन्धेन साधकतमत्वात्करणम् , यथा निपीयमानेन मधुना मर ३० इति । अयान्तरल्यापारयत एव कारकत्वादस्यावान्तरल्यापाराः अनिराकरणं प्रेरणमनुमतिश्च वान स्यागादो फारफलं लभते । यथा देवाय पलिम्, द्विजाय गाम्, याचकायार्थ दत्ते । अत्र देवो पलिफर्मकं दानमनिराकुपन्, विनय गोकर्मकं दानमनुमन्यमानः, याचकादियार्थादिकर्मफे दाने प्रेरणा पुरंतर निमित्वं भवति । योषम्- "अनिराकरणाकतुंरत्यागाई फर्मणप्सितम् । प्रेरणानुमतिभ्यां या टमते सम्प्रदानताम् ॥१॥ ३५ एवं राणे कार्यमापष्टे अत्र पार्यकर्मफमापशाणमनुमन्यमानो अनिराकुर्वन् या राजा सम्पदान प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । सम्प्रदानखरूपम् । चतुर्थीविधानम् २३५ भवति । एवं क्रियया करणभूतया कर्ता यमभिसम्बध्नाति सोऽपि सम्प्रदानं भवति । यथा पत्ये शेते इत्युपसर्पणाझे शयने शक्तिर्वर्त्तते, अत्रापि शयनक्रियामनिराकुर्वन् अनुमन्यमानो वा पतिः सम्प्रदान भवति । एवं श्राद्धाय निगृह्णते-नास्तिकत्वान्निन्दति । युद्धाय सन्नह्यते सन्नहनाङ्गे निश्चये सन्नहिर्वर्त्तते सन्नहनपूर्वकं निश्चयं करोतीत्यर्थः, न कर्त्तव्यमनेनैव सिद्धत्वात् । अत्र कर्मग्रणेनैव तत्रेण क्रियापि गृहीता क्रियां हि लोके कर्मेत्युपचरन्ति, कां क्रियां करिष्यति किं कर्म करिष्यसीति । एवमपि कृत्रिमा-५ कृत्रिमयोः कृत्रिमे सम्प्रत्ययो भवतीति न प्राप्नोति । नैवम् । क्रियापि हि कृत्रिमं कर्म । तथापि न सिद्ध्यति पत्ये शेते इत्यादी क्रियान्तरानुपादानात, एकस्या एव क्रियायाः कर्मकरणभावस्यैकदात्मन्येव विरोधात् । किश्च कर्तुर्व्याप्यं कर्मेत्युच्यते कथं च नाम क्रिया क्रियाया व्याप्या स्यादिति । अत्रोच्यते । क्रियापि सन्दर्शनप्रार्थनाध्यवसायादिक्रियाभिरवश्यं पूर्वभाविनीभिराप्नुमिष्टत्वात्कर्म भवति । तथाहि- प्रेक्षापूर्वकारी बुद्ध्या कञ्चिदर्थं पश्यति; सन्दृष्टे प्रार्थना, प्रार्थनायामध्यवसायः, अध्यवसाये आरम्भः,१० आरम्भे निवृत्तिः, निवृत्तौ फलावाप्तिरित्येवं क्रियापि कृत्रिमं कर्मेति प्रतीयमानक्रियापेक्षस्यापि प्रविश पिण्डीमित्यादाविव कारकत्वाव्याहतेः । नन्वेवं ग्रामं गच्छतीत्यादी ग्रामादेरपि क्रियामिसम्बद्ध्यमानस्य सम्प्रदानसंज्ञाप्रसङ्गः । नैप दोपः । यदा सन्दर्शनादयो धात्वर्थाद्भेदेन विवक्ष्यन्ते, तदा तेपां प्राप्तकर्म- भावया क्रियया यदभिसम्बद्ध्यते तस्येयं सम्प्रदानसंज्ञा, अत्र तु भेदस्याविवक्षितत्वाद्गम्यर्थत्वात्सन्दर्शना- दीनां गमिवाच्यतैव । गमनं ह्यत्र विततविततमन्तर्भूतसन्दर्शनादिकं विवक्षितम् , तत्कथमात्मन एवात्मना १५ व्याप्यमानता स्यात् , सा च भेदाभेदविवक्षा प्रयोगदर्शनवशेन नियतविपयैवाश्रीयते इति प्रयोगासङ्करः । कर्माभिप्रेय इत्यत्र केवलस्य ईयतेर्गमनं वाच्यमित्यभिग्रहणं विशिष्टसम्बन्धप्रतिपत्त्यर्थम् विशिष्टश्च सम्बन्धः कर्तुः श्रद्धानुग्रहापायापगमादिकामनाजनितस्ततो रजकस्य वस्त्रं ददाति, नतः पृष्ठं ददाति, राज्ञो दण्डं ददातीत्यादी वस्त्रादिकर्मणा रजकादीनामभिसम्बध्यमानत्वेऽपि सम्प्रदानसंज्ञा न भवति । वाताय चक्षुर्ददाति, छात्राय चपेटां ददाति इत्यादौ तु श्रद्धादिजनितसम्बन्धस्य विद्यमानत्वाद्भवति । यत्तु कैश्चिद-२० न्वर्थसंज्ञाविज्ञानाददातिक्रियाविपयैव सम्प्रदानसंज्ञेत्यभ्युपगतं दानं च स्वत्वनिवृत्तिः परस्वत्वापत्तिपर्यन्तेति प्रत्यज्ञायि; तदुभयमपि न युक्तम् ; अन्यत्रापि भाष्यकारेण संज्ञाया अभ्युपगमात्तथा स्वत्वनिवृत्त्यभावे- ऽपि ददातेः प्रयोगस्य दर्शनाद्यथा न पापाय मतिं दद्यात् । खण्डिकोपाध्यायस्तस्मै चपेटां ददाति चेति । “चतुर्थी" । सोदाहरणं सूत्रं सुगमम् । "स्पृहे०” स्पृहयतीति अनादन्तत्वात्स्पृहेरकारलो- पस्य "खरस्य परे प्राग्विधौ” (७।४।११०) इति स्थानिवद्भावाल्लघूपान्त्यगुणाभावः । अत्र हि साध्वादेः२५ कर्तुः स्पृहादिक्रियाव्याप्यत्वान्नित्यं कर्मसंज्ञायां प्राप्तायां पक्षे सम्प्रदानसंज्ञा विधीयते, तस्यां च धातोरकर्मकत्वाद्भावे आत्मनेपदादयः कर्तरि च क्तः सिद्ध्यति, पुष्पेभ्यः स्पृह्यते मैत्रेण पुष्पेभ्यः स्पृहयितव्यम् , पुष्पेभ्यः सुस्पृहम् , पुष्पेभ्यः स्पृहयिता मैत्र इति । "ढ०” 'क्रुधंच कोपे' 'दुहीच जिघांसायाम्' 'सूर्य-ईय-ईमे-ईर्ष्यार्थाः' असूयेति 'असुः सौत्रः कण्वादिर्यगन्तः' ॥ क्रोधोऽमर्पः, द्रोहोऽपचिकीर्पा, परसम्पत्तौ चेतसो व्यारोप ईर्ष्या, गुणेषु दोपाविष्करणमसूया, एतदर्थ-३० र्धातुभिर्योगे यं प्रति कोपः स सम्प्रदानम् । मैत्राय कुध्यतीत्यत्रार्थग्रहणात् कुप्यति रुप्यतीत्यादि । द्रुह्यतीत्यत्रापचिकीर्पति अपकरोतीत्यादि । ईर्ण्यतीत्यत्र सूयति ईयतीत्यादि । यं प्रतीति किम् ? यस्मि- नित्युच्यमाने कर्तुरपि सम्प्रदानसंज्ञा स्यात्-मैत्रेण कुध्यते । कोप इति किम् ? शिष्यस्य कुप्यति विन- थार्थम् । ननु कोपाद्रोहादयो भिन्नखभावाव्याख्यातास्तत्कथं तदर्थानां यं प्रति कोप इति सामान्येनेत- द्विशेषणं घटते ? यं प्रति द्रोहो यं प्रतीा यं प्रत्यसूयेत्येव घटते । नेप दोपः । क्रोधस्तावत्कोप एव, द्रोहादयोऽपि द्विप्रकाराः केचित्कोपहेतुकाः केचिद्वस्त्वन्तरहेतुकास्तत्रेह पूर्वेषां ग्रहणं यथा स्यादुत्तरेषां ३६ २३६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- मा भूदिति यं प्रति कोप इति सामान्येन विशेषणमुपात्तमन्यथाऽव्यभिचाराभावादिदमनुपादेयं स्यात् । कोपशब्दोऽपि द्विप्रकारोऽत्र परिगृहीतो मुख्याओं गौणार्थश्च । गौणार्थत्वं च तस्य कार्य कारणोपचारात् फोपकार्यद्रोहाद्यर्थवृत्तित्वात् । सामान्यविवक्षया चैकवचनम् । एवं च भार्यामीर्च्यतीति कोपकारणिकाया ईर्ष्याया भार्यायामसम्भवान्न प्रवर्तते सम्प्रदानसज्ञा । अन हि परकर्तृकदर्शननिमित्ता भार्यायामीा- ५मैनामन्योऽद्राक्षीदिति । तथा शिष्यस्य कुप्यतीत्यादिषु पूर्वोत्तरोदाहरणेषु क्रोधादीनामकोपप्रभवत्वात्स. म्प्रदानसंज्ञाभावः । अत्रापि सम्प्रदानसंज्ञया कर्मसंज्ञाया बाधितत्वाद्भावे आत्मनेपदादयः कर्तरि क्तच सिद्ध्यति । मैत्रायेय॑ते चैत्रेण मैत्रायेषितव्यं मैत्राय दुरीय मैत्राययितश्चैत्रः । एवमसूय्यते असूयि. तव्यम्, दूरसूयम् , असूयितश्चैत्रः । चौरस्य द्विपन्नित्यन द्विपेः क्रुधाद्यर्थत्वाचौरस्य कथं सम्प्रदान- संज्ञान भवति ? उच्यते-अप्रीत्यर्थत्वात् , अयमर्थ:-अत्रानभिनन्दने द्विपिर्वतते यथौषधं द्वेष्टीति ॥२२॥ नोपसर्गाकुद्रुहा ॥ २३ ॥ [ सि० २।२।२८ ] सोपसर्गाभ्यां दुहिभ्यां योगे तु न । मैत्रमभिक्रुध्यति ।। २३ ।। "नोप०" यद्यप्येतावनुपसर्गावकर्मको तथापि सोपसर्गौ सकर्मको भवतः । मैत्रमभिक्रुभ्यति मैत्र- मभिगम्याभिमुखीकृत्य वा कुद्ध्यति इति । अकर्मका अपि हि धातवः सोपसर्गारसकर्मका भवन्तीत्यत्र "फर्मणि" (२१२२४०) इति द्वितीया ॥ २३ ॥ तादयें ॥ २४ ॥ [सि० २।२।५४ ] तसै इदमिति गम्यमाने चतुर्थी स्यात् । यूपाय दारु । रन्धनाय स्थाली ।। २४ ॥ "ताद" किश्चिद्वस्तु सम्पादयितुं यप्रवृत्तं तत्तदर्थम्, तस्य भावे तादर्थे सम्बन्धविशेपे धोये गोणान्नानः यध्यपवादश्चतुर्थी स्यात् । यूपायेति एवं कुण्डलाय हिरण्यम् । तादर्ये इति वृत्तद्धितसमा- सेषु सम्बन्धाभिधानं भावप्रत्ययेनेति समवायिकारणनिमित्तकारणसाधारः कार्यकारणभावश्चतुर्थ्या २० पोध्यते । तत्र यूपादेर्वादिकं समवायिकारणम् , रन्धनादे। स्थाल्यादिकं निमित्तकारणमिति । ननु तस्मै इदं तदर्थमिति सत्यां चतुर्थ्या समासः, सति च समासे तदुपादाने चतुर्थीविधानमितीतरेतराभ- यादप्रसिद्धिनिर्देशस्येति । उच्यते । आचार्यप्रवृत्तिपियति भवत्यर्थशब्दयोगेन चतुर्थीति, यदयं तादर्य इत्यर्यशब्देन समासं शास्ति । पष्टी समासो वा, सम्बन्धसामान्यविवक्षायामस्त्येव पष्ठी, यथा गुरोरिद गुर्वर्यमिति ॥ २४ ॥ रुचिकृप्यर्थधारिभिः प्रेयविकारोत्तमणेषु ॥ २५॥[सि० २२२१५५] रुच्यः कृप्यर्धारिणा च योगे यथास प्रेयविकारोचमणेभ्यश्चतुर्थी साद । मैत्राय रोचते धर्मः । मूनाय कल्पते ययागः । चैत्राय शतं धारयति ॥ २५ ॥ "रुचि०" च्यधैरिति रुचिसमानाः, कृप्यर्थैरिति कृषिसमानार्थः । यथासायमिति रुच्ययः प्रेये मीयमाणे मीणाते: "4 एशातः” (५१२२८) इति कर्मणि यप्रत्यये रूपम् । चैत्राय रोचते धर्म इति ३० रुपि अभिप्रीत्यांच' एवं 'यदि आबादने माय स्वदते दधि तस्याभिलापमुत्पादयतीत्यर्थः । प्रेय. सम्यन्यादमिलापार्यस्य रुपेर्महणादिह न भवति-ममैतद्रोचते, तव फयमिति प्रतिमातीत्यर्थः । कर्य ३२रोपते मम पुतं सह मुट्रैरिति । सम्बन्धविवक्षायामियं पष्ठी अत्र सत्यपि प्रेयत्वे प्रेयता न विवक्षिता, १ मनु कोष कोप पवेति मेदभावात् कप पोर्वोपर्यम् । उच्यते । प्रथमामनुगा कोपावरमा द्वितीया योद्तो बित समानीयपनामाथिस नानुपित.कुम्पतीलेचते हवदोष । - - 1 -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । चतुर्थीविधानम् २३७ किन्तु क्रियासम्बन्धमानं विवक्षितमिति न चतुर्थी । कृप्यर्थैर्विकारे-मूत्राय कल्पते यवागूः । अर्थग्रहणात् उच्चाराय सम्पद्यते यत्रान्नम् , तद्विकाररूपमापद्यते इत्यर्थः । गौणादित्येव-मूत्रमिदं सम्पद्यते यवागू, अत्र विकारविकारिणोरभेदविवक्षया विकारः प्रधानमेवेति मूत्रस्य क्रियान्वयित्वाद्गौणत्वाभावः । मूत्रं सम्पद्यते यवाग्वा इत्यपायविवक्षायां पञ्चमी, यवाग्वा अपगच्छदिदं मूत्रं सम्पद्यतेत्यपायविवक्षा ।। 'धृत स्थाने' ध्रियते तिष्ठति स्वरूपान्न प्रच्यवते इत्यर्थः, ततो ध्रियमाणं प्रयुङ्क्ते इति णिगि धारिस्ततो५ धारिणा धातुना योगे उत्तमणे धनिके चतुर्थी "अधमर्णो ग्राहकः स्यादुत्तमर्णस्तु दायक” इति । इत्यादिशब्दानुवर्तनात् । “प्रत्याउः श्रुवार्थिनि" ( २।२।५६) प्रत्याङ्भ्यां परेण शृणोतिना युक्तादर्थिनि वर्तमानागौणान्नाम्नश्चतुर्थी स्यात् । द्विजाय गां प्रतिशृणोति याचितोऽयाचितो वा, प्रतिजा- नीते इत्यर्थः । “प्रत्यनोगुणा ख्यातरि" (२।२१५७) प्रत्यनुभ्यां परेण गृणातिना योगे आख्यातरि वर्तमानागौणान्नान्नश्चतुर्थी स्यात् । आचार्याय प्रतिगृणाति अनुगृणाति । आचार्योक्तमनुवदति प्रशंसन्तं १० वा प्रोत्साहयतीत्यर्थः । प्रत्यनोरिति किम् ? आचार्य गुणाति, आचष्टे इत्यर्थः । अनाचार्यमाचक्षमाण- मिति प्रतिपत्तव्यमन्यथा व्यङ्गविकलत्वं स्यात् । “यद्वीक्ष्ये राधीक्षी” (२।२।५८) वीक्ष्यं सन्दे- हपूर्वकं निरूपणीयमघटमनिष्टानिष्टफलं पुण्यपापरूपमप्रत्यक्षं पराभिप्रायादिकं वा तस्यैव निरूपणाई- त्वात्, 'राधंच वृद्धौ' 'ईक्षि दर्शनाङ्कयोः' यत्सम्बन्धिनि वीक्ष्ये राधीक्षी वर्तते तस्मिन्वर्तमानागौणा- नाम्नः सामर्थ्यात् राधीक्षीभ्यामेव युक्ताचतुर्थी स्यात् । मैत्राय राध्यति ईक्ष्यते, तस्य दैवं पर्यालोचयती-१५ त्यर्थः । खीभ्य ईक्ष्यते-स्त्रीणामभिप्रायः कीदृश इति विमतिपूर्वकं निरूपयतीत्यर्थः । "ईक्षितव्यं पर- स्त्रीभ्यः स्वधर्मो रक्षसामयम् । सङ्घद्ध्यसि मृपा किं त्वं दिक्षुमा मृगेक्षणे” इति भट्टिकाव्ये परस्त्री- णामभिप्राये सन्देहादीक्षितव्यं किमेवं करोपि नवेति तद्रक्षसां कुलधर्मो न दोषः । देवे एवेक्ष्ये इच्छ- न्येके स्त्रीभ्य ईक्ष्यते इत्यादौ न मन्यन्ते । राधीक्ष्यर्थधातुयोगेऽपीच्छन्त्येके-मैत्राय राधयति साधयति पश्यति जानीते इति चोदाहरन्ति । यद्हणं किम् ? मैत्रस्य शुभाशुभमीक्षते-शुभाशुभान्मा भूत् । मैत्रातु २० राधीक्षीभ्यां योगादेव न भवति । एवं तर्हि मैत्राय राध्यतीत्यादावपि सम्बन्धाभावान्न स्यात् । ने। तत्र मैत्रेणैव सह राधीक्ष्योः सम्बन्धो विवक्षितोऽन्यस्याश्रुतत्वात् । वीक्ष्यग्रहणं किम् ? मैत्रमीक्षते । राधी- क्ष्यर्थविषयाद्विप्रष्टव्यादिच्छत्यन्यः, लाभाय राध्यति राधयति साधयति ईक्षते पश्यति ॥ २५ ॥ उत्पातेन ज्ञाप्ये ॥ २६ ॥[सि० २।२।५९] उत्पात आकसिकं निमित्तम् , तेन ज्ञाप्याच्चतुर्थी स्यात् । वाताय कपिला विद्युत् ॥ २६ ॥ २५ "उत्पा०" वातायेति० "वाताय कपिला विद्युत्, आतपायातिलोहिनी । पीता वर्षाय विज्ञेया दुर्भिक्षाय सिता स्मृता" ॥ १ ॥ उत्पात इति किम् ? राज्ञ इदं च्छत्रमायातं विद्धि राजानम्, नात्र छत्रमुत्पातः, उत्पातो हि नाम शुभाशुभसूचकः कादाचित्को महाभूतपरिणाम उच्यते इति राज्ञश्चतुर्थी न भवति ज्ञाप्यज्ञापकसम्वन्धविवक्षया पष्ठ्यपवादो योगः। 3 E २९ १ अधमलाद्याचमाने महत्त्वादयाचमानेऽपि केनाप्याकारादिना खाभिलापं समर्पयति द्विजादी ओमिति तस्य प्रतिजानीते प्रतिपद्यते अभ्युपगच्छतीत्यर्थः । २ विविधा विशेषानुलम्भादेकस्मिन्वस्तुनि सादृश्यादिनिमित्तादनेकपक्षालम्बनानवधारणात्मिका मतिर्विमतिः संदेहज्ञानमिति यावत् , तत्पूर्वकं निरूपणीयं वीक्ष्यम् विप्रश्नविषय (विचारविपयो देवादिलाभालाभादिर्वा ) इति यावत् , तद्विपया क्रियाऽपि पर्यालोचनादिका वीक्ष्यम् । ३ शुभाशुभम् । ४ नलभिप्रायादौ । ५ शाकटायनाः । ६ चान्द्राः । राधिरपरपठितथुरादिर्णिगन्तो वा, साधिर्णिगन्त । ७ रनमतिवद्धः।

२३८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते स्वोपज्ञहैमलघु- इत्यादिग्रहणात् "श्लाघहस्थाशपा प्रयोज्ये" ( २।२।६०) ज्ञाप्ये इत्यनुवर्त्तते, श्लाघङ् कत्थने' 'हु अपनयने' 'ठां गतिनिवृत्तौ' 'शपी आक्रोशे' । श्लाघादिभिर्युक्ताद् ज्ञाप्ये प्रयोज्येऽर्थे वर्त- मानागौणानाम्नश्चतुर्थी स्यात् । मैत्राय श्लाघते मैत्रायात्मानं परं वा श्लाघ्यं कथयति । मैत्राय हुते ह्रोतव्यं किञ्चिन्मैत्रं ज्ञापयति । मैत्राय तिष्ठते "ज्ञीप्सास्थेये" (३।३।६४) इत्यात्मनेपदम्, स्थानेनात्मानं ५ज्ञापयति प्रकाशयतीति । मैत्राय शपते "शप उपलम्भने" (३।३।३५) इत्यात्मनेपदम् । वाचा मात्रा- दिशरीरस्पर्शनेन नाहं जाने न मया कृतमिति मैत्रं ज्ञापयति प्रकाशयतीति । श्लाघाह्नवस्थानशपथान कुर्वाण आत्मानं परं या ज्ञाप्यं जानन्तं मैत्रं प्रयोजयतीत्यर्थः । प्रयोज्य इति किम् ? मैत्रायात्मानं लाघते । अत्र ह्यात्मा ज्ञाप्यप्रयोज्यो न भवति, जानातेः कर्मत्वादिति प्रयोज्यग्रहणात्ततो न चतुर्थी । मैत्राय शतं हुते, शते न चतुर्थी । केचित्तु द्विकर्मकोऽयं ज्ञापिस्तत्र केचिद्यस्मै आख्यायते तं ज्ञाप्यं सम्प्र- १० दानत्वेन प्रतिपन्नाः । केचिद्य आख्यायते तमिति । "तुमोऽर्थे भाववचनात्" (२।२।६१) क्रियायां क्रियार्थायामुपपदे तुम् वक्ष्यते, तस्यार्थे ये भाववाचिनो घनादयः प्रत्यया विधास्यन्ते तदन्तागौणा- नाम्नः स्वार्थे चतुर्थी स्यात् । पाकाय व्रजति, इज्यायै व्रजति, पक्तुं यष्टुं वा व्रजति इत्यर्थः । तादर्थ्यस्य प्रत्ययेनैवोक्तत्यात् चतुर्थी प्राप्नोतीति शेपपष्टी, हेतुहेतुमद्भावविवक्षायां वा हेतुतृतीया स्यादिति चतुर्थ्यर्थ वचनम् ।। २६॥ गम्यस्याप्ये ॥ २७॥ [सि० २२२१६२] यसार्थो गम्यते न च शब्दः प्रयुज्यते तस तुमो व्याप्याचतुर्थी स्यात् । फलेभ्यो बजति । गम्यस्येति किम् ? फलान्याहतु याति ॥ २७ ॥ "गम्य०” गम्यस्य तुम इति किम् ? प्रविश पिण्डी द्वारम्, अत्र भक्षय विधेहीति च गम्यम् । वास्येपु वाक्येकदेशा अप्यर्थतः प्रकरणाच्छब्दान्तरसन्निधेर्वाऽवगमिततदर्थाःसाधव इष्यन्ते । यदुक्तम्- २० वाक्येपु वाम्यैकदेशा वर्तन्ते पदेपु पदैकदेशाः। तत्र प्रविशेगुहं कर्म पिण्ड्यपि । पिण्डीद्वारे तु भक्षयति पिदधात्योर्गम्यमानयोयाप्ये न तु गम्यस्य तुमो व्याप्ये इत्यत्र चतुर्थी न भवतीति ।। २७ ।। गतेनवाऽनाते ॥ २८॥ [सि० २२२२६३] गतिः पादविहरणम् , तस्या आप्यादप्राप्ताचतुर्थी वा स्यात् । ग्रामं ग्रामाय या याति ॥२८॥ "गते." गतिशब्दस्य ज्ञानाद्यर्थत्वेऽप्यनाप्त इति वचनात्पादविहरणरूपैव गतिशते, ज्ञानादिव्याप्य: २५ स्यानातत्वासम्भवादित्याह-गतिः पादविहरणमिति । एवं नियं गच्छतीयन मैथुनार्था गतिः, मनसा गच्छतीत्या ज्ञानार्थत्यत चतुर्थी न भवति । आप्ये इत्येव-प्रामादागच्छति । अनाप्त इति किम् । पन्थानं गच्छति । कृयोगे तु परत्वात्पष्ठयेव प्रामस्य गन्ता । द्वितीयवेत्यन्ये प्रामं गन्ता । पतुर्थी २८ चेन्यन्ये । प्रम गन्ता । प्रामाय गन्तेति ॥ २८ ॥ १ शम्दोऽर्धवानप्रयुज्यमान प्रयुज्यमानध भवति । अप्रयुज्यमानचार्यप्रकरणशब्दान्तरसमिधानः प्रतीयमानार्थः सच गम्य इत्युच्यते। २ ननु पार्थ प्रजतीति तादर्थ्य एवं चतुर्थी भविष्यति किमनेन ? उच्यते-प्रज्यायाः फलाहरणार्यतायाँ शिमोऽसि न तु पत्यर्थतायामिति न विध्यति । ३ सारसङ्गहकारादयः, ते हि 'गत्यकर्मनि द्वितीयाचनुथ्यो' इति सूोग वी द्वितीयायां प्रामायां तदपवादो वैकल्पिकी चतुर्थ्यारभ्यते इति पने द्वितीया सिद्धयेवि द्वितीयाप्रहणात् प्रामं गन्तुलन पृत पमी अपवादभूनामपि पटी याधिया द्वितीयेव भवति, चनु तु पाट्या परसदाप्यत एवेति मन्यन्ते । । उसल लग मन्यते दिनीयाविषय इयं कल्पिकी चतुरिभ्यते, द्वितीयायाधापयादाऊतोऽपि विषय उपनत पनि तषिये पो चतुर्थी प्रातन एव। ५ एतेषु च यमम्मदभिमतः पीपक्षपारस पि सम्मतः । कथं हि धन्दामा myi युटिपठेन शक्यं ब्यास्थापयितुम् । यत्र तत्पदा तणय तद व मोदकमिति साधुः, उष्ण च तापानीयं मेहं प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकपक्रिया । चतुर्थीविधानम् २३९ मन्यस्याऽनावादिभ्योऽतिकुत्सने ॥ २९ ॥ [सि० २।२।६४.] अत्यन्तं कुत्सायां गम्यायां मन्यतेप्प्याच्चतुर्थी वा स्यात् । न त्वां तृणाय तृणं वा मन्ये । नावादिगणान्नैवम् । न त्वां नावमन्नं काकं शुकं शृगालं वा मन्ये । 'हितसुखाभ्याम् २।२।६५)। योगे वा चतुर्थी । चैत्राय चैत्रस्य वा हितं सुखम् । आशिषि गम्यायां हितसुख- भद्रायुष्यक्षेमार्थाथैोंगे वा चतुर्थी हितं पथ्यं सुखं भद्रं आयुष्यं क्षेमं कल्याणं अर्थः कार्य५ जीवेभ्यो जीवानां वा भूयात् ॥ २९ ॥ "मन्य.” अतीव कुत्स्यते येनेत्यतिकुत्सनं तस्मिन्मनतेराप्ये वर्तमानाचतुर्थी स्यादिति सङ्केपेणाह- अत्यन्तं कुत्सायामित्यादि, न त्वां नावमित्यादि, नावान्नयोरपि परप्रणेयताऽनायासोच्छेद्यतादिभिरति- कुत्सनत्वं भवति, परमनावादिभ्य इति वचनात् चतुर्थी न भवति । नावादयो लक्ष्यदर्शनेनानुसतव्याः। मन्यस्येति किम् ? न त्वा तृणं चिन्तयामि । श्यनिर्देशः किम् ? न त्वा तृणं मन्ये । कुत्सन इति किम् ? न १० त्वां रत्नं मन्ये वादपि अधिकं मन्ये इति प्रशंसा । कुत्स्यतेऽनेनेति करणाश्रयणं किम् ? न त्वा तृणाय .मन्य इति युष्मदो न भवति । अतिग्रहणं किम् ? त्वां तृणं मन्ये, सुवर्णं तृणं मन्ये, अन नबप्रयोगाभावे साम्यमात्रं प्रतीयते नत्वतिकुत्सा । कुत्सामानेऽपीच्छन्त्येके-तृणाय त्वां मन्ये । तृणाय मन्यमानः सर्वान् । हरिमपि अमंसत तृणाय । न त्वां तृणस्य मन्तेति कृयोगे पैरत्वात्पष्ठी । चतुर्थ्यपीति कश्चित्-न तव बुसाय दुसस्य मन्ता । न चैत्रस्य शुने मन्ता, न चैत्रस्य शुनो मन्तेति । उक्तकर्मणि तु न त्वं बुसो १५ मन्यसे मया । न चैत्रः श्वा मन्यते मयेत्यादौ प्रथमैव । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । “हित०" सूत्रं स्पष्टम् । आशिषीति अत्र सूत्रम्-"तद्भद्रायुष्यक्षेमार्थार्थेनाशिषि" (२।२।६६) इति । तदिति हितसुखयोः परामर्शः, अर्थशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते; हिताद्यर्थे युक्ताद्गौणान्नाम्न आशिपि गम्यायां चतुर्थी वा स्यादिति भावः । तथैवोदाहरति-हितं पथ्यमित्यादि । आशिपीति किम् ? आयुष्यं प्राणिनां घृतम् । तत्त्वाख्याने न भवति । भद्रक्षेमार्थयोरन्यत्रैकार्थत्वेऽपि क्षेममापदोऽभावः भद्रं सम्प-२० दुत्कर्पमित्यर्थभेदाहितयोपादानम्-हितसुखाभ्यां पूर्वण विकल्पः सिद्ध एव तदर्थार्थं तु तद्रहणम् । तर्हि प्रागप्यर्थग्रहणमस्तु । सत्यम् । तदर्थानामाशिपि नियमार्थमिदम् । इत्यादिग्रहणात् “परिक्रयणे” (२।२।६७) परिक्रीयते नियतकालं स्वीक्रियते येन तत्परिक्रयणं वेतनादि आदिशब्दाद्भाटकादिपरिग्रहः । तस्मिन् वर्तमानागौणानाम्नश्चतुर्थी वा स्यात् । शताय परि- क्रीतः, शतेन परिक्रीतः। सम्भोगाय परिक्रीतः 'कर्ताऽस्मि तव नाप्रिय मिति भट्टिकाव्ये । सम्भोगेन वा शतादिना नियतकालं स्वीकृत इत्यर्थः । परीति किम् ? शतेन क्रीणाति, क्रयस्यात्र करणं न परिक्रयस्य ।२६ च उष्णपानीयमिति कालदृष्टोऽपशब्दः । तापसश्चायं कुमारश्च तापसकुमार इति साधुः । तापसी चेयं कुमारी च तापस- कुमारीति अचिकित्स्योऽपशब्दः । पानीयोष्ण कुमारतापसी चेति साधुरेव । १ शुकः पाठितो भणति वं तदपि न। २ अथ नावान्नयोरत्यन्तोपकारकलात्कथमतिकुत्सनलं गम्यते इत्याह ना० । आदि- शब्दादचेतनखविनश्वरलादिग्रहः । ४ युप्मदोऽपि मन्यव्याप्यत्वात्पक्षे चतुर्थी प्राप्नोतीत्याह कुत्स्य० । ५ कर्मणि कृत इत्यनेन तृणशब्दात् नित्यं पष्टी, युष्मच्छन्दात्तु वैकत्रद्वयोः इति पष्टी विकल्पाद्वितीया । यदा तु युध्मदग्रतः कर्मणि कृतः इत्यनेन नित्यं षष्टी तदा तृणशब्दाद्वैकत्र द्वयोरित्यनेन विकल्पेन पष्टी तद्विकल्पे चतुर्थ्यपि । न तव तृणाय मन्ता तृणस्य मन्ता तृणं मन्तेति वा । ६ अजितयशोवादी दुर्गसिंहश्च कर्मणि कृतः इत्यनेन पष्टी प्राप्तौ, वैकत्र द्वयोरित्यस्य तु पक्षे सिद्धव । विशेपणविशेष्यभावेन उभयमपि कर्म उक्तम् यथा कटः क्रियन्ते वीरणानि । ८ स्वीकारो ह्यात्मसात्करणं परिक्रय उच्यते, परिशब्दोऽत्र प्रत्यासत्तिं द्योतयति यथा परिसहस्रा गाव इति सहस्रप्रत्यासन्नाः सम्भाव्य परिसहसा गाव उच्यन्ते; एवमत्रापि क्रयप्रत्यासन्नोऽल्पकालो वेतनादिना स्वीकारः परिक्रय उच्यते । तत्र यत्करणं परिक्रयक्रियायां साधकतम वेतनादि तत्करण- व्युत्पत्त्या परिक्रय उच्यते । .. .. ७ अन २४० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- फरणाश्रयणं किम् ? शताय परिक्रीतो मासम्-मासाय मा भूत् ॥ करणाश्रयणं विना परिक्रीयतेऽस्मि- निति अनया व्युत्पत्त्या मासादपि स्याचतुर्थी ।। २९ ।। शक्तार्थवषड्नमःस्वस्तिखाहाखधाभिः ॥ ३०॥ [सि० २।२।६८] एभियोगे नित्यं चतुर्थी । शक्तः प्रभुर्वा मल्लो मल्लाय । वपडनये । नमोऽर्हद्रयः। स्वस्ति ५प्रजाभ्यः । स्वाहेन्द्राय । स्वधा पितृभ्यः ॥ ३०॥ इति चतुर्थी। "शका." शकापडादिभिश्च युक्तागोणान्नाम्नश्चतुर्थी नित्यं स्यादिति-नमोऽहंन्य इति-तृतीयया योगाभिधानादिह न भवति-नमो जिनानामायतनेभ्यः, नान जिनानां नमसा योगः नमस्खति जिनानित्यत्रापि नमस्वधातुना योगो ने नमसा, अत्र हि नमस्यधातुरर्थवानतु तदेकदेशो नमःशब्द इति, अथवा पदान्तरसम्बन्धानपेक्षणादन्तरगया कारकविभक्या द्वितीययोपपदविभक्तिश्चतुर्थी वहिरका वाध्यते १० "उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिबलीयसी" इति न्यायात् । ननु कारकविभक्तिरपि क्रियापदापेक्षिणीति कथमन्तरङ्गा स्यात् ? नेपदोपः । कारकस्य क्रियामानसम्बन्धाव्यभिचारात्वरूपान्तर्गतैय सापेक्षा, विशि- प्रक्रियापदश्रयणेन तु सेवापेक्षा नियम्यत इति, उपपदार्थापेक्षा तूपपदविभक्तिः प्रकृतेर्नानो न स्वार्था- भिधेयान्तर्गतेति । नन्वेवं स्वयम्मुवे नमस्कृत्येत्पन्न कथं चतुर्थीत्यत्रोच्यते-नानेनात्र चतुर्थी किन्तु नमस्कृतिलक्षणया क्रिययाभिप्रेयमाणत्वात्सम्प्रदाने चतुर्थी, सम्प्रदानत्याविवक्षायां स्वयम्भुवं नमस्कृत्येति १५द्वितीयेवेति ॥ ३० ॥ अपायेऽवधिरपादानम् ॥ ३१॥[सि० २२१२९] अपायो विश्लेपः । “पञ्चम्यपादाने" (२०६९) वृक्षात्पत्रं पतति । व्याघ्राद्विमेति । पापाचगुप्सते । धर्मात्प्रमाद्यति । चौराद्रक्षति । शृगाच्छरो जायते । हिमवतो गङ्गा प्रभवति । कार्तिक्या आग्रहायणी मासे । यषेभ्यो गां रक्षति । उपाध्यायादन्तर्धत्ते । वलम्याः शत्रुञ्जपः २० पद् योजनानि । माथुराः सौम्य आढ्याः ॥३१॥ ." अपायो विशेष इति विश्लेपो विभागस्तजनकक्रियापि । तथा तत्र यदयधिभूतं विश्लेष- जनकक्रियानानि तदपादानं भवति, वद्विश्लेषहेतुक्रियानाश्रयत्वे सति विश्लेपाश्रयत्वमिति फलितम् । पृभापणं पततीत्या पर्णस्यापादानत्यनिरासाय सत्सन्तम् । धावतोऽश्वात्यवतीत्यत्राश्वस्य क्रियाश्रयत्वाद्वि- पहेविति । फुझ्यात्पततोऽश्वात्पतीत्यवाश्वस्य फुट्यविश्लेषजनकक्रियाश्रयत्वेऽपि पुरुषविश्रीपजनकरिया- २५ प्रयत्वादपादानत्वम् । फुड्यस्य पावविशेषजनकक्रियानाश्रयत्वादश्वापेक्षयापादानत्यमिति । नन्वेषमुभय- पर्मजविभागस्थले विभागम्यैश्यात्तविशेषजनकक्रियानाश्रयत्वाभायात्परस्परस्मादपसरत इति न स्यादित्य घोच्यते-आश्रयभेदेनापसरणं भिद्यते तत्रैकतरस्यापसरणेऽन्यस्यापादानत्वम्, नतु प्रवेशादन्यवरापस- रणपियानाप्रयत्यादुभयोरपि वद्विशेपहेतुक्रियानाधयत्यमस्वीति भयवि परस्परस्सापादानत्यमिति । यदर्षि श्रीर्तिभिरक्तम्-मायधिकं गमनमपायसर ययधिभूतमपायेनानाधिष्ठितं तदपादानमिति सस्या २०ययमेयाभिप्राय:-गमनसम्देन विशेषम्यवोत्तत्यान् अपायेनानाधिष्ठितमिति विपजनकक्रियानाभितनि- सायद पानिनीयसूत्रम्-"अपाये भुयमपादानमिति" तम्याप्ययमेवाभिप्राय: अपायविषयं यदपि- ३२ पनवंभपापयुटे गलगमन पतन्यपतनं नदिइयं वाचम्य विद्यत एवेति । तयो वाक्यप्रदीपे nisrivia Ex का, सपा सरकार म परिचीत क मापत्रक मागम् । कोऽय! भने। VARitr शिपमपि hik पटे-मानपत्र पारस दुगारगरसहाय वर कर्मी की निर्ममा मर्मत Rel "अपा० अत्र प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । अपादानखरूपम् । पञ्चमीविधानम् २४१ अपाये यदुदासीनं चलं वा यदि वाचलम् । ध्रुवमेवातदावेशात्तदापादानमुच्यते" ॥ १ ॥ "पततो ध्रुव एवाश्वो यस्मादश्वात्पतत्यसो । तस्याप्यश्वस्य पतने कुड्यादि ध्रुवमुच्यते” ॥२॥ "उभावप्यध्रुवौ मेपो यद्यप्युभयकर्मके । विभागे प्रविभक्ते तु क्रिये तत्र व्यवस्थिते" ॥ ३ ॥ "मेपान्तरक्रियापेक्षमवधित्वं पृथक् पृथक् । मेपयोः स्वक्रियापेक्षं कर्तृत्वं च पृथक् पृथक् ॥४॥ अपाये विश्लेपहेतुक्रियायामुदासीनमनाश्रयः अतदावेशात्तक्रियानाश्रयत्वादिति । नन्वेवं प्रामान्न ५ गच्छतीत्यत्र कथमपादानसंज्ञा ? आगमनलक्षणस्यापायस्याभावात् । नैप दोपः । अन्न ह्यपादानसंज्ञायां जातायां पञ्चान्निपेधेन सम्बन्धः । अन्यथा निपेधविपयाप्रतिपादनात् । तथापादानसाधना गमनक्रिया- प्रतिपेद्भुमिष्टा, यदि चादावेव प्रतिपेधसम्बन्धः स्यात् तदा गमनाभावात्तदसम्बन्धस्य ग्रामस्यापादान- संज्ञा न स्यात् । ततश्च या प्रतिपेध्यापादानसाधना गमनक्रिया प्रतिपेधस्य विपयः सा न शक्यते प्रद- शयितुं न चाप्रदर्शितविषयः प्रतिपेधः प्रयुज्यते, तस्मात्पूर्वमपादानसंज्ञा भवति । ग्रामावधिकागमना-१० भाववान् ग्रामान्न गच्छतीत्यस्वार्थः । तच्च त्रिविधम् । तथोक्तम्- "निर्दिष्टविपयं किञ्चित् उपात्तविपयं तथा । अपेक्षितक्रियं चेति त्रिधापादानमुच्यते” ॥ १ ॥ इति वाक्यप्रदीपे । यत्र साक्षाद्धातुनाऽपायलक्षणो विपयो निर्दिष्टस्तनिर्दिष्टविपयम्-यथा प्रामादा- गच्छति, यत्र तु धातुर्धात्वन्तरार्थाङ्ग स्वार्थमाह तदुपात्तविपयम् , यथा वलाहकाद्विद्योतते विद्युत्- निस्सरणाङ्गे विद्योतने विद्युतिर्वर्तते । यथा च कुसूलात्पचति-अत्राप्यादानाङ्गे पाके पचति-१५ वर्त्तते । यत्र तु क्रियावाचिपदं न श्रूयते केवलं यत्र क्रिया प्रतीयते तदपेक्षितक्रियम् , यथा कुतो भवान् पाटलीपुत्रादत्रागत इति क्रियापदमध्याहृतान्वयः कार्य इति । "पश्च०" वृक्षादित्यादि-विश्लेपश्चात्र कायसंसर्गपूर्वको बुद्धिसंसर्गपूर्वकश्चेति द्विविधोऽपि ग्राह्यः; “साधकतमं करणम्” (२।२।२४) इत्यत्र तमग्रहणेन गौणग्रहणस्यापि ज्ञापितत्वात् । तत्र कायसंसर्गपूर्वको यथा-वृक्षात्पत्रं पतति, एवं ग्रामादा- गच्छति, गिरेरवरोहति, सार्थाद्धीनः धावतोऽश्वात्पतति, पततो देवदत्ताद्धावत्यश्वः, मेपान्मेपोऽपसर्पती-२० त्यादि । वुद्धिसंसर्गपूर्वको यथा-व्याघ्रादित्यादि-व्यानं कष्टहेतुं बुद्ध्या प्राप्य तस्मान्निवर्त्तते इति, एवं पापाजुगुप्सते, धर्मात्प्रमाद्यति, अधर्माद्विरमति । निवृत्त्यङ्गेपु जुगुप्साविरामप्रमादेष्वेते धातवो वर्त्तन्ते, अध्ययनात्पराजयते, अध्ययनमसहमानस्ततो निवर्त्तते । चौराद्रक्षतीति मैनं चौरोऽद्राक्षीदिति बुद्ध्या चौरेण संयोज्य ततो निवर्त्तयति । शृङ्गादित्यादि-उक्तं च गोपुराणे “गोलोमाजायते दूर्वा, गोमयावृश्चिकः स्मृतः । गोदोहागोरसं प्राहुर्गोशृङ्गाटुच्यते शरः" ॥ १ ॥ एवं वीजादकुरो जायते । अत्र शृङ्गादिभ्यः २५ शरादयः स्फुटमेव निष्क्रामन्तीति कायसंसर्गपूर्वोऽत्र विश्लेपः । यत्तु नात्यन्ताय निष्कामन्ति तत्सन्तत- त्वादन्यान्यप्रादुर्भावाद्वेति । हिमवत इत्यादि-अत्राप्यापः सङ्क्रामन्तीति साक्षात् संसर्गपूर्व एव विश्लेपः, अन्यान्यप्रादुर्भावाच्च नात्यन्तमपक्रामन्तीति । कार्तिक्या इत्यादि-ततः प्रभृति मासे गते भवतीत्यपायः स्फुट एव । यवेभ्य इत्यादि-इहापि गोयवसंसर्गवुद्ध्या समीक्ष्यान्यतरविनाशं पश्यन् यवेभ्यो गां निव- यति, एवं कूपादन्धं निपेधयति । उपाध्यायादित्यादि-मा मामुपाध्यायोऽद्राक्षीदिति तिरोभवति इत्य-३० पायः । वलभ्या इत्यादि-वलभ्या निःसृत्य गतानि योजनानि गतेपु वा तेपु भवतीत्यर्थः, स्फुट एवात्रा- पायः गते गम्येऽध्वनोन्ते नैकार्थ्य वा” (२।२।१०७) इति प्रयोगसिद्धिः । माथुरा इत्यादि- "धुद्ध्या समीहितैकत्वान् पञ्चालान् कुरुभिर्यथा । वुद्ध्या विभजते वक्ता तदापायः प्रतीयते" ॥ १ ॥ चैत्रान्मैत्रः पटुः, अयमस्मादधिक ऊनः । अत्र मैत्रादयः पुंस्त्वादिना संसृष्टाः पटुत्वादिना धर्मेण सतो विभक्ताः प्रतीयन्ते इति । एवं रूपं रसात्पृथक् इत्यादि-सर्वत्राप्यपायविवक्षा, विवक्षान्तरे त्वपादान-३५ है. प्रका० पू० ३१ , । २४२ महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते सोपज्ञहैमलघु- स्वाभावे यथायोग विभक्तयो भवन्ति । बलाहके विद्योतते बलाहकं विद्योतते । अधर्म जुगुप्सते । चौर- भयम् । चौविभेति चौरेपु विभेति चौराणां विभेति । भोजने पराजयते । यवेषु गां वारयति । शुद्धे शरो जायत इति ॥३१॥ आङाऽवधौ ॥ ३२॥सि० २२७०] ५ अवधिर्मर्यादामिविधिश्च । तद्वत्तेराडा युक्तात्पश्चमी स्यात् । आ खुनामुष्टो मेषः ॥३२॥ "आडा." अवधिर्मर्यादेति-प्रवृत्तस्य यत्र निरोधः सा मर्यादेति । अभिविधिश्चेति । मर्यादाविशेप एवाभिविधिः-मर्यादाभूतमेव यदा क्रियया व्याप्यते तदाभिविधिरिति । आ सुभादिति-सुन्नमभि- व्याप्य मर्यादीकृत्य वा घृष्ठो मेघ इत्यर्थः ॥ ३२ ॥ पर्यपाभ्यां वयं ॥ ३३ ॥ [ सि०२२२२७१] आभ्यां युक्ताद्वर्जनीयात्पञ्चमी सात् । परिसाकेतात् अपसाकेतादृष्टो मेघः ।। ३३ ॥ "पर्य" । वयंवर्जकभावसम्बन्धः पर्यपाभ्यां द्योत्यते इति सम्बन्धपष्ठ्यां प्राप्तायामनेन पञ्चमी विधीयते इति । परिसाकेतादिति-अन "वाक्यस्य परिवर्जने" (७४८८) वाक्यस्यावययो यः परिशब्दोन पदस्य, स वर्जने वर्तमानो या द्विः स्यादिति परि परिसाकेतादित्यपि प्रयोगः स्यादिति ॥३३॥ यतः प्रतिनिधिप्रतिदाने प्रतिना ॥ ३४ ॥ [सि० १२१७२ ] १५ प्रतिनिधिमुख्यसदृशोऽर्थः, प्रतिदानं गृहीतस विशोधनम् , ते यतः सातां ततः प्रतिना योगे पञ्चमी स्यात् । प्रद्युम्नो वासुदेवात्प्रति । तिलेभ्यः प्रति मापान प्रयच्छति । “गम्ययपः कर्माधारे" (२।२।७४) । पञ्चमी । गृहादासनात्प्रेक्षते । गम्येति किम् ? प्रासादमारुह्यासने उपविश्य मुझे। "स्तोकाल्पकृच्छूकतिपयादसत्वे करणे" (२२२७९)। पञ्चमी वा । स्तोकेन स्तोकान्मुक्त: ।। ३४ ।। "यतः” । मुख्यो यः कचित्कार्ये रूढसम्बन्धो यथार्जुनः शत्रुञ्जये, तस्यासन्निधाने यसत्कार्ये तहुया नियुज्यते स प्रतिनिधि तथा चाह-मुख्यसदृशोऽर्थ इति । गृहीतस्य विशोधनमिति-तुल्यना. तीयेनातुल्यजातीयेन येति शेषः । ते यतः स्यातामिति-यत इति यच्छब्दान्मुख्यपूर्वदत्तप्रतिपादकादम्यरूप यपः फर्माधार इति कर्मणि पञ्चमी; यमपेक्ष्य प्रतिनिधिप्रतिदाने भवतस्ततः पञ्चमी स्यात् । प्रद्युम्नस्य घासुदेवप्रतिनिधित्वाद्वासुदेवात्पञ्चमी । एवमभयः श्रेणिकतः प्रति; "प्रतिना पश्चम्या:" (७१२१८७ ) २५इति तमः । तिलमणमपेक्ष्य मापाणां प्रतिदानमिति तिलशब्दात्पञ्चमी । अत्रादिशब्दग्रहणात् "आख्यातर्युपयोगे" (२१२१७३) आरयाता प्रतिपादयिता तत्र यर्तमा. नाद्रीणानाम्नः पश्चमी स्यान्, उपयोगे नियमपूर्वकविद्यामहणे । नियमो विद्यामहणार्थ गुरुशुश्रूपादि शिष्यवृत्तं प्यायते न तूपयोगगानम् ; यत उपयोगमात्रं नटापि तस्मादपि स्यात्पञ्चमी । उपाध्यायाः दर्धाते । उपयोग इति किम् ? नटस्य। दारतं मोतीति स्यादेय । २० --- । F4 प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । पञ्चमीविधानम् व्युत्पत्त्या सत्त्वमुच्यते, सत्त्वादन्यदसत्त्वम् । नतु किं तदित्यत्रोच्यते अनन्तपर्यायात्मके हि द्रव्ये प्रव- र्तमानः शब्दः कञ्चिदेव स्वभावमुपादाय प्रवर्त्तते, तत्र चोऽसौ द्रव्ये स्तोकादिकशब्दप्रवृत्तिनिमित्तभूतः पर्यायभेदः स गुणिद्रव्ये परार्थतया प्रतीयमानत्वादसत्त्वम् , तेनैव वा रूपेणाभिधीयमानं द्रव्यादि, तस्मिन् करणे वर्तमानेभ्यः स्तोकादिभ्यः पञ्चमी वा स्यात् । स्तोकेन स्तोकान्मुक्तो राहुणा शशीति, राहुप्रासे शशिनि स्तोकं प्रस्तं स्तोकमग्रस्तमभूदिति भावः । तथाहुः-"स्तोकस्य चाभिनिवृत्तेरनिवृत्तेच तस्य वा ।५ प्रसिद्धि करणत्वस्य स्तोकादीनां प्रचक्षते” ॥ १ ॥ इति पूर्वाचार्यप्रसिद्ध्यात्र करणत्वमन्यथा स्तोकादी- नामसत्ववाचितया क्रियासाधकतमत्वाभावात् करणत्वं न सम्भवतीति । करण इति किम् ? क्रियावि- शेयणान्मा भूत्-स्तोकं चलति । इह च स्तोकादीनामसत्त्ववाचित्वाद्वित्वबहुत्वासम्भवे एकवचनमेव । एवमल्पादल्पेन कृच्छ्रात्कृच्छ्रेण कतिपयात् कतिपयेन मुक्तः । असत्त्व इति किम् ? स्तोकेन विपेण हतः, अल्पेन मधुना मत्तः, कृच्छ्रेण भोजनेन निविण्णः । विपादिद्रव्यसामानाधिकरण्यादन्न सत्व-१० वृत्तितेति ॥ ३४ ॥ प्रभृत्यन्यार्थदिक्शन्दवहिरारादितरैः ॥ ३५॥ [सि० २।२७५] एभिर्योगेऽपि पञ्चमी । ततः प्रभृति । ग्रीष्मादारभ्य । अन्यो मिन्नो मैत्रात् । ग्रामात्याम् वसति । पश्चिमो रामाकृष्णः । बहिामात् । आराद्रामात् ॥ ३५ ॥ इति पञ्चमी । "प्रभृ०" एभिर्यागे इति प्रभृत्यर्थैरन्यार्थैदिग्झन्दैहिस्-आरात्-इतर-इत्येतेश्च शब्दैर्युतान्द्रोणान्नान्नः १५ पञ्चमी स्यान् । अन्यो भिन्नो मैत्रादिति-एवमर्थान्तरं घटात् , व्यतिरिक्त पटात् , विलक्षणोऽश्वात् , पृथग् जनात् , हिरुक गाादित्यादि । दिक्झब्देति-दिशि वाचकत्वेन दृष्टाः शब्दा दिकशब्दाः, न तु दिशि वर्तमाना एव, तेन दिग्वाचिशब्दस्य देशे काले आदिशब्दात् भावे द्रव्ये च वृत्तावपि तद्योगे पञ्चमी, एतदर्थमेव शब्दझब्दोऽपादानम् । देशे यथा-पूर्व उज्जयिन्या गोनर्दः । काले यथा--पूर्वो ग्रीष्मावसन्तः । द्रव्ये यथा-पश्चिमो रामात् कृष्णः । ग्रामात् प्राग वसतीति प्रपूर्वादश्चतेः किप्, नतः प्राची दिन्, प्रा२० देशः कालो वेति । "दिगशब्दादिगदेशकालेपु प्रथमापञ्चमीसप्तम्याः” (७२।११३) इति धाप्रत्ययः, "अदूरे एनः” (७२।१२२) इत्यनेन एनप्रत्ययो वा, तस्य "लुबच्चेः” (७२।१२३) इति लुब् । गम्यमानेनापि च दिक्दाब्देन भवति, क्रोशालक्ष्यं विध्यते, परेणेति गम्यते । "क्रमणि' (३।४।२) (कमेः) परो (णिङ्) भवतीति गम्यते । बहिस्-वहिर्कामान् । आरादित्यव्ययं दूरसमीपयोर्वाचकं तेन तद्योगे पञ्चमी । वक्ष्यमाणत्यारादर्थैरिति विकल्पस्यापवादोऽयम् । आरात् ग्रामान् क्षेत्रम् , आरा-२५ न्मैत्रात्पीठम् । इतराब्दो द्वयोरुपलक्षितयोरन्यतरवचनस्तेनान्यार्थाद्भिद्यते-इतरत्रात्तस्ल द्वितीयो मैत्र इत्यर्थः । अत्रादिशब्दोपादानात् “ऋणाद्धेतोः" (२।२।७६) फलसाधनयोग्यपदार्थों हेतुः, हेतुभूनं ग्रहणं तद्वाचिनो गौणान्नान्नः पञ्चमी स्यात्, तृतीयापवादः । झताहहः । अत्रोत्तमायायमर्णन धार्यमाणं शतं बन्धनस्यानाविष्टव्यापारतया निमित्तभूतं लौकिको हेतुस्ततस्तृतीयायाधिकानेन पदमी ३० विधीयते । हेतोरिति किम ? झतेन वद्धः, झतेन बन्धितः, दातेन चत्रेण वन्धितः । आये झतमृणं बन्ध- कत्वेन विवक्षिननिति कर्तरि तृतीया, द्वितीचे शनं अन्धकमन्यन्त्र गिक्रियाकर्तुः प्रयोज्यत्वेन विव- क्षितमिति प्रयोज्यकर्तरि तृतीया, तृतीये झतं गिगर्यकर्तृत्वेन विवक्षितं चैत्रस्य प्रश्नकर्तुः प्रयोजकमिति ३३ १ बरमधः-अन्य इति प्रति विलक्षणोऽयं उच्चते, इतर ति दृश्यमान प्रतियोगीयर्थः । - - महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- प्रयोजककर्तरि तृतीयेति । हेतुर्हि फलसाधनयोग्यतामात्रेण विनापि क्रियां हेतुराख्यायते कळदिकारक चन व्यापारमन्तरेणेति कादिभ्योऽन्य एव हेतुरत एव "हेतुकर्तृकरणे.” (२२४४) इति सूत्रे हेतोः पृथगुपादानमिति । "गुणादस्त्रियां न वा” (२।२।७७) द्रव्याश्रितः पर्यायो गुणः, भस्त्रियां वर्तमानाद्धेतुभूतगुणवाचिनो गौणानामः पञ्चमी वा स्यात् । जाड्याजाव्येन बद्धः, ज्ञानात् ५ज्ञानेय या मुक्तः । गुणादिति किम् ? धनेन कुलम्, द्रव्यं धनं हि न गुणः । अस्त्रियामिति किम् ? बुद्ध्या मुक्तः, विद्यया यशः । अस्त्यत्राग्निधूमात् इत्यादौ नान्यादेधूमादिर्हेतुः किन्त्वमिज्ञानस्य । कथं तर्हि पञ्चमी ? "गम्ययपः कर्माधारे" ( २।२।७४) इति भविष्यति । धूमादिकमुपलभ्याप्तिः प्रतिपत्तव्य इति धनार्थः । ज्ञानहेतुत्वविवक्षायां हेतुलक्षणा तृतीया धूमेनामिरिति । "आरादथैः” (२१२१७८) आरादित्यव्ययं दूरान्तिकयोः साधारण्येन वर्तते, तन्त्रेणोभयग्रहणम् । एकप्रयत्नेनानेककार्यसाधकं १० शाखं तमम् । ततश्च दूराथूरन्तिकाथैश्च शब्दैर्युक्ताद्गौणानाम्नः पञ्चमी वा स्यात् । दूरं विप्रकृष्टमसन्निहितं प्रामात् प्रामस्य । अन्तिकमभ्यासं सन्निकृष्टं सन्निहितं प्रामात् ग्रामस्य । आराच्छन्दयोगे तु प्रभृत्यादि- सूत्रेण नित्यमेव पञ्चमी । अन्ये त्वसत्त्ववचनैरेवारादथैरिच्छन्ति । आदिग्रहणात् "अज्ञाने ज्ञः पष्ठी” (२१२१८०) ज्ञानादन्यत्रार्थे वर्तमानस्य जानाते: सम्ब. धिनि करणे वर्तमानागौणानाम्नः पष्ठी स्यात् । सर्पिपो जानीते, सार्पिपा करणभूतेन प्रवर्त्तते इत्यर्थः । १५अनेकार्थत्वाद्धातूनां प्रवृत्ती जानातिरत्र वर्त्तते, तत्र च सपिरादि प्रवृत्तेः साधकतम भोजनादिवस्तु- प्रवृत्तेविपयः । अत एवाकर्मकत्वात् "ज्ञः" (३।३।८२) इत्यात्मनेपदम् , अथवा सपिपि रत्तो विरत्तो वा चित्तभ्रान्त्या सर्वमेवोदकादि सर्पिष्टया प्रतिपद्यते इत्यर्थः; इति मिथ्याज्ञानवचनोऽत्र जानातिः, मिथ्याज्ञानं पाज्ञानमेव ज्ञानकार्याकरणात् । करण इति किम् ? तैलं सर्पिपो जानाति, तैलं सप्पीरूपतया प्रतिपद्यते । अब तेलात्कर्मणः यष्टी न स्यात् सर्पिपस्तु करणाद्भवत्येवेति तृतीयापवादो योगः ॥ ३५ ॥ क्रियाश्रयस्याधारोऽधिकरणम् ॥ ३६॥ [सि० २।२।३०] क्रियाश्रयस्य कर्तुः कर्मणो वाऽऽधारोऽधिकरणं स्यात् । तच चैपयिकौपश्लेषिकाभिव्यापक- सामीप्यकनैमित्तिकौपचारिकमेदार पोदा । "सप्तम्यधिकरणे" (२२२२९५)। दिवि देवाः । फटे आस्ते । तिलेपु तैलम् । वटे गावः । युद्धे सनह्यते । अगुल्यग्रे करी ॥ ३६ ॥ "क्रिया०" । क्रियाया आश्रयः क्रियासम्पादक इत्यर्थः । स च कर्ता कर्म च । क्रिया हि द्विविधा- २५फर्तृस्था फर्चसमयायिनी, फर्मस्था कर्मसमवायिनी च, ते तां जनयन्ती तस्या आश्रयो भवतम एतन्मनसिकृत्याह-क्रियाश्रयम्येत्यादि-नन्येवं क्रियाश्रयोपकारकत्वालियासिद्धो व्यापाराभावात्स्यमय फारकत्यमित्यत्रोच्यते-क्रियाश्रयधारणद्वारेण क्रियासिद्धायुपकारकत्वात्कारकत्वमित्यदोपः । तदुक्तं याफ्यमदीपे-- "कफर्मव्यवहितामसाक्षाद्वारयत् क्रियाम् । उपलियासिद्धौ, शास्त्रेऽधिकरणं स्मृतम् ॥ १॥ अधिपरणभेदानाह-तरीत्यादि-पोटेति मम्बन्धः । वेपयिकेति अनन्यत्रमायो विषय:-यया पनुरा दीनां रूपादयो विषयाले हि सम विसीयन्ते नान्यत्र भयन्तीत्युच्यन्ते । एवं देवादीनामन्यन प्रपत्य भाषारिपादयो विषया इति । 'तम्मे योगादेः शते (६४१९४) इति इणि वैषयिफम्, यया रिवि देया शी, एवं नमामि भारयाः, मुषि मनुष्याः, पाताले पनगाः । औपरोपियति एकदेशमासंयोग उपोषः "अभ्यारमादिय" (६३१८) इतीपण , यथा फदे आम्ने इति पदादेयदत्तादिनदेशमाप्रसंयो- ६५गर मम्मयाग एवं पप शेते, शाग्गयां टम्यते, गृहे तिष्ठतीत्यादि । अभिव्यापफेति यम्पायेग ૧૦ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । अधिकरणखरूपम् । सप्तमीविधानम् २४५ समस्तावयवसम्बन्धस्तदभिव्यापकं तद्ध्याधेयेनाभिव्याप्यते आधेयं वाभिव्याप्नोतीति ऋद् "बहुलम्" (५।१।२) इति कर्मण्यपि णः, यथा तिलेपु तैलमिति अत्र तिलाद्यवयवास्तैलाद्यवयवान् व्याप्यावतिष्ठन्ते, तैलाद्यवयवा वा तिलाद्यवयवानिति । एवं दनि सर्पिः । एतत्समवायसम्बन्धन अनवयवस्थापि गोत्वादेर्व्यक्त्याद्यवयवान् व्याप्यावतिष्ठमानस्त्र व्यत्यादिरभिव्यापक एवाधारः-यथा गवि गोत्वम् , तन्तुपु पट इति । क्रियाया अश्रवणेऽपि प्रतीयमानक्रियापेक्ष आधारः यदाधेयसन्निधिमात्रेण ५ क्रियाहेतुस्तत्सामीप्यकमिति-'भेषजादित्वात् स्वार्थिकष्ट्य ततो 'यावादित्वात्कः' यथा वटे गाव इति । एवं गङ्गायां घोपः, कूपे गर्गकुलम् , वन्धुष्वास्ते, गुरौ वसति । नन्वाश्रय आधारो भवति, आश्रयश्च संयोगसमवायाभ्याम् , नचावस्थितिक्रियाश्रयेण घोपादिना गङ्गादेः संयोगसमवायो स्तः । नैप दोपः । यदायत्ता हि यस्य स्थितिः स विनापि संयोगसमवायौ तस्याश्रयो भवति-यथा राजाधीन- स्थितिकः पुरुपो विनापि संयोगसमवायौ तस्याश्रयो पुरुष इति लोके व्यपदिश्यते । योपादीनां च १० गङ्गाद्यायत्ता स्थितिरिति सन्निधिमात्रेण क्रियाहेतुत्वाद्युक्तो गवादीनामाश्रयभावः, यदा तु गङ्गादिशब्देन तत्समीपदेश एवाभिधीयते तदीपलेपिक एवाधार इति । नैमित्तिकेति-'विनयादित्वात्स्वार्थिक इकण' यथा युद्धे सन्नह्यत इति-अत्र हि सन्नहनादीनां युद्धादिनिमित्तादीनां विवक्षितत्वात् युद्धादिनैमित्तिक आधारो भवति, सन्नहनादयस्त्वन्यत्रापि केनचिनिमित्तेन भवन्तीति न युद्धादिपयिकः । एवं तु झरदि पुष्यन्ति सप्तच्छदाः, आतपे लाम्यति, छायायामाश्वसिति ॥ अन्यत्रावस्थितस्यान्यत्राध्यारोप उपचारसत्र १५ भव औपचारिकमध्यात्मादित्वादिकण यथाङ्गुल्यने करीति-अत्र ह्यन्यत्र स्थितस्य करिणः केनापि प्रयो- जनादिनामुल्यो आरोप्यमाणस्याङ्गुल्यग्रमोपश्लेपिकाद्भिन्न औपचारिक आधारो भवति । यदा त्वद्गुल्य- प्रादिशब्देनोपचारादाबेयाधिष्ठितो देश एवोच्यते तदा ओपलेपिक एवाधारोऽत एवाहुः- "आधारत्रिविधो ज्ञेयः कटाकाशतिलादिपु । औपश्लेपिको वैपयिकोऽभिव्यापक एव च" ॥ १ ॥ "सप्तम्य०" सोदाहरणं सूत्रं स्पष्टम् ॥ ३६ ।। स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैः ॥ ३७॥ [ सि० २।२।९८] एभिर्योगे वा सप्तमी । गवां गोपु वा स्वामी ॥ ३७॥ "स्वामी०" । एभिरिति-एभिर्युक्तागोणान्नान्नः सप्तमी वा स्यान्, पक्षे शेषयष्टी । गवां गोयु बा स्वामीति-एवमीश्वरोऽधिपतिः । पर्यायोपादानात् पर्यायान्तरयोगेन न भवति-प्रामन्य पति रिन्यादी पष्टयेव स्यात् । एवं साक्षी प्रतिभूरित्यत्रापि-"प्रतिभूमिः श्रियः कीर्ती धर्म नीतेश्च साक्षिभिः । हानेर गुरोः प्रसूतैर्नु दायादायि मत्रिभिः" (३ सर्गे ६१ वृत्त) इति ब्याश्रयकाव्ये । मरिभिराचि आगनं नृपान्तिके महामतित्वात् शुक्रे गुरोः प्रसूतैर्नु अपत्यरिव, यद्वा शुक्रन्य गुगेत्र दायादरिय गोत्रिमिरि- वेत्यर्थः । सप्तम्यथं वचनम् । ।

२४६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- पष्ठीति । "कुशलायुक्तेनासेवायाम्" (२२२।९७) कुशलो निपुणः, आयुक्तो व्यापृतः; आभ्यां युक्तादाधारे वर्तमानागोगान्नानः सममी वा स्यात्, आसेवायां तात्पर्ये गम्ये । कुशलो विद्याग्रहणे, आयुक्तस्तपश्चरणे; पक्षेऽधिकरणाविवक्षायां शेषपष्टी-कुशलो विद्याग्रहणस्य, आयुक्तस्तपश्वरणस्य । आसे. यायामिति किम् ? कुशलचित्रकर्मणि न च करोति । आयुक्तो गौः शकटे, आकृष्य युक्त इत्यर्थः । ५ आधारत्याविवक्षयेय विकल्प सिद्धेऽनासेवायामाधाराविवक्षानिवृत्त्यर्थं वचनम् ॥ ३७ ॥ व्याप्ये केनः॥ ३८॥ [सि० २२२२९९] ताद् य इन् तदन्तस्य व्याप्ये सप्तमी नित्यं सात् । व्याकरणेऽधीती ॥ ३८॥ "व्याप्ये०” । काद्य इन् इत्यादि--"इष्टादेः” (७।१।१६८) इति सूत्रेण इष्टादिभ्यः कान्तेभ्य इष्टमनेनेत्यायथें तद्धित इन् वक्ष्यते । तदन्तस्य व्याप्ये वर्तमानागौणानाम्नः सप्तमी स्यात् । अधीतं १० व्याकरणमनेनेति वाक्यावस्थायामभिधायाधीतीति वृत्त्योक्तेनाभिहिते कर्मणि प्रत्ययार्थकत्केण च धात्व- धेन व्याप्यमाने कृतपूर्वी कटमित्यादाविव द्वितीयायां प्राप्तायां तदपवादः सप्तमी । यथैव ह्यधीती व्याकरणे इत्यन कर्मणोऽधिकरणत्वेन विवक्षितत्वात्सप्तमी प्रवर्तते तथा कृतपूर्वी कटमित्यादावपि प्रवर्त्तत तस्माद्विवक्षाप्रविभागायेदं सूत्रम् । केनः कर्मविषयेऽधिकरणविवक्षा नान्यत्रेति ॥ ३८ ॥ तद्युक्ते हेतौ ॥ ३९ ॥ [सि० २।२।१००] १५ कर्मसम्बन्धाद्धेतौ सप्तमी स्यात् । चर्मणि दीपिन हन्ति, दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् । केशेषु चमरी हन्ति, सीनि पुष्पलको हतः।।५।। असाधुसाधुनिपुणयोगेऽपि सप्तमी । अमाधुमैत्रो मातरि । प्रत्यादियोगे तु न । साधुमत्रो मातरं प्रति ।। ३९ ।। "ता." । हेतोरिति हेतुर्निमित्तकारणमिति । चर्मणीत्यादि, द्वीपिनमिति-अभिधानद्वीपिनाविति प्रति. २० पदपाठापुंष्टीयलिगोऽकारान्तः । सीग्नि पुष्पलक इति-पुष्पं लातीति डेऽज्ञाताद्यर्थविवक्षायां के प घुप्पलकः अत्रानेकार्थः पुष्पलमस्तु कीलके कृपणे गन्धमृगे च । सीमाशब्दस्तु मर्यादायामानायान्मुकेऽपि ततोऽम्य द्विधा व्याख्या-पृषणार्थमरण्यविडालो हतो मर्यादार्थ कीलको वेति हेतुतृतीयापवादोऽयम् । असाध्यित्यादिना सूत्रद्वयस्य सपमाह-तथाहि-"अप्रत्यादायसाधुना' (२१२।१०१) असाधु, शब्दयुगाद्रीणानामः प्रसादिप्रयोगाभावे सप्तमी स्यात् । प्रति-परि-अनु एते प्रत्यादयः । "साधुना" २५ (२२२१०२) अगपि तथैय, परं निपुणशब्दयोगेऽर्चायां विधानादनचीयां तु व्यावृत्तसत्त्याख्यानेऽयं विधिरिति । "निपुणेन चार्चायाम्” (२१२११०३) अर्चायां गम्यायां निपुणेन साधुना प योगे सप्तमी । यष्टपपयारः । मातरि निपुणः, साधुः । अर्यायामिति किम् ? निपुणः साधुमत्रो मातुः-- मातेपेनं निपुणं माधुं मन्यते इत्यर्थः । अप्रत्यादाविन्येव-निपुणः साधुमत्रो मानरं प्रतीत्यादि । आदिशदापपंणान् "म्बंशेऽधिना" (२२११०४) से इशितव्ये ईने च स्यामिनि वर्तमानाद- भिना युगात्मप्तमी । अधिः म्यम्यानिमम्यन्धं पोतयति । तत्र म्यम्यामियाचिनीयद्रोणत्येन विवक्ष्यते ३१ म्याशिनि अधिगगयेषु धेशियः अभिनिगे, मगधाः । पष्टापयादोऽयम् । "उपेनाधिकिनि" ৭নং ষ + ম পর জানুযনাম ৪ মা। বন না মা। १TTITyririt लोमरल । अपना पुरा मा निशि पर गनपिग्मीमममिंग पोलिमरपुमरियम्। .

- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रियो । सप्तमीविधान २४७ (२।२।१०५) उपेन युक्तादधिक्रिनि वर्तमानान्गौणान्नान्नः सप्तमी स्यात् । उपोऽधिकाधिकिसम्बन्ध द्योतयति । उप खायां द्रोणः-द्रोणोऽधिकः खार्या इत्यर्थः; उप निष्के कार्षापणः-कार्यापणोऽधिको निष्क- स्येत्यर्थः । उपेनेति किम् ? खार्या उपरि द्रोणः । अधिकिनीति किम् ? अधिके मा भूत् तेन उप द्रोणे खारीति न भवति ॥ ३९ ॥ यद्भावो भावलक्षणम् ॥४०॥ [सि० २।२।१०६] भावः क्रिया। यस्य भावेनान्यो भावो लक्ष्यते ततः सप्तमी सात् । गोपु दुह्यमानासु गतः ॥४०॥ "यद्भावो०” । प्रसिद्धं लक्षणं अप्रसिद्धं लक्ष्यम् । भावः क्रियेत्यादि-यस्य क्रिययाऽन्या क्रिया लक्ष्यते तस्मिन्क्रियावति वर्तमानानौणानाम्नः सप्तमी स्यात् । गोपु दुबमानासु गतः दुग्धास्वागतः-अत्र कालतः प्रसिद्धेन गवां दोहेन भावेनान्यस्य गमनमप्रसिद्धं लक्ष्यते । गम्यमानेनापि भावेन भावलक्षणे भवति- आम्रपु कलायमात्रेपु गतः, अत्र जातेविति गम्यते । यत्र क्रियाणां कारकत्वं तद्विपर्ययो वा यथा१० ऋद्धेपु भुञ्जानेपु दरिद्रा आसते, ऋद्धेष्वासीनेषु दरिद्रा भुञ्जते । यत्र च क्रियानर्हाणामकारकत्वं तद्वि- पर्ययो वा यथा दरिद्रेष्वासीनेषु ऋद्धा भुञ्जते, दरिद्रेषु भुञ्जानेपु ऋद्धा आसते तत्राप्यनेनैव सप्तमी । तच भावलक्षणं त्रिविधं भवति–तथाहुः-'कर्तरि कर्मणि भावे त्रिविधं तद्भावलक्षणं तत्र । साप्यानाप्यकधातु- प्रयोगतः कर्तरि द्विविधम् ॥ १॥ यथा सूर्योऽभ्युदयं गच्छति कजेपु विकसत्सु रात्रिरगात् इति कर्त्तरि, भावलक्षणम् ; रविणा क्रियमाणेऽहन्युदीयमाने च याति तमः इति कर्मणि कर्तरि भावे च १५ भावलक्षणमित्यादि वाक्यप्रकाशतो ज्ञेयम् । भाव इति क्रिम् ? यो जटाभिस्तस्य भोजनम् अत्र न भावो भावस्य लक्षणमपि तु द्रव्यम् । भावलक्षणमिति किम् ? यस्य भोजनं स मैत्रः । तृतीयापवादो योग इत्थम्भूतलक्षणेऽर्थे । आदिशब्दोपादानात् “गते गम्येऽध्वनोऽन्ते नैकार्थ्यं वा” (२।२।१०७) कुतश्चिदवधे- विवक्षितस्याध्वनोऽवसानमन्तः, यद्भावो भावलक्षणम् , तस्याध्वनोऽध्यवाचिशब्दस्याध्वन एवान्ते-२० नान्तवाचिना सहैक्याथ सामानाधिकरण्यं वा भवति । तद्विभक्तिस्तस्माद्भवतीत्यर्थः । गते गतझब्दे गम्ये, शब्दतोऽप्रयुज्यमाने इत्यर्थः । गवीधुमतः साझाश्यं चत्वारि योजनानि-चतुर्यु योजनेषु गतेयु भवतीत्यर्थः; पक्षे पूर्वेण सप्तमी-गवीधुमतः साकाश्यं चतुर्यु योजनेषु । ननु अन्तेन सहाध्वनोऽभेदोप- चारात् सिद्धमेवैकार्थ्यं क्रिमनेन ? सत्यम् । कार्तिक्या आग्रहायणी मासे इत्यादि कालेऽप्येवं मा भूदिति वचनम् ॥ ४० ॥ षष्ठी वाऽनादरे ॥४१॥ [सि० २।२।१०८ ] अनादरे गम्ये भावलक्षणा पष्ठी वा, पक्षे सप्तमी । रुदतो लोकस्य रुदति लोके वा प्रबजितः॥४१॥ "पष्ठी" । रुदतीत्यादि-रुदन्तं लोकमनात्य प्राब्राजीदित्यर्थः ॥ ४१ ।। सप्तमी चाविभागे निर्धारणे ॥ ४२ ॥ [सि० २।२।१०९] समुदायादेकदेशस्य जातिगुणक्रियादिभिरविभागे पृथक्करणेऽप्येवम् । क्षत्रियो नृणां नृप वा ३० शरः । कृष्णा गवां गोषु वा बहुक्षीरा ॥४२॥ इति सप्तमी । "सप्त" जालादिभिः समुदायात् बुद्धया पृथकारणमेव निर्धारणम् , तन्मिन् गन्ये पष्टीति नानी च स्यात् । अविभागे इति- निर्यमाणस्यैकदेदान्य समुदायेन सह कयाचिक्ये शब्दागन्यमाने । क्षत्रिय ३३ १ साधुर्मुलो राश इतियनिष्काधिकदादेन सह सम्बन्धाभावात् 'मरिकन भूयसन्' इत्यनेन निराशाम पानी । २५ १० २५ (२२१०२) अनापि तथैव, पर निपुणशब्दयोगेऽर्चायां विधानादन या तु व्यावृत्तेस्तत्त्वाख्यानेऽयं २४६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पष्टीति । "कुशलायुक्तेनासेवायाम्" (२।२।९७) कुशलो निपुणः, आयुक्तो व्यापूतः; आभ्यां युक्तादाधारे वर्तमानागौणान्नानः सप्तमी वा स्यात्, आसेवायां तात्पर्ये गम्ये । कुशलो विद्यामहणे, आयुक्तस्तपश्चरणे, पक्षेऽधिकरणाविवक्षायां शेषपष्टी-कुशलो विद्याग्रहणस्य, आयुक्तस्तपश्चरणस्य । आसे. वायामिति किम् ? कुशलचित्रकर्मणि न च करोति । आयुक्तो गौः शकटे, आकृष्य युक्त इत्यर्थः । ५आधारत्वाविवक्षयैव विकल्पे सिद्धेऽनासेवायामाधाराविवक्षानिवृत्यर्थं वचनम् ॥ ३७ ।। व्याप्ये केनः ॥ ३८ ॥ [सि० २।२१९९] ताद् य इन् तदन्तस्य व्याप्ये सप्तमी नित्यं स्यात् । व्याकरणेऽधीती ॥ ३८ ॥ "व्याप्ये." । क्ताद्य इन्' इत्यादि-"इप्टादेः" ( ७१।१६८) इति सूत्रेण इष्टादिभ्यः क्तान्तेभ्य इष्टमनेनेत्याद्यर्थे तद्धित इन् वक्ष्यते । तदन्तस्य व्याप्ये वर्तमानागौणान्नाम्नः सप्तमी स्यात् । अधीतं व्याकरणमनेनेति वाक्यावस्थायामभिधायाधीतीति वृत्त्योक्तेनाभिहिते कर्मणि प्रत्ययार्थकटेकेण च धात्व- धेन व्याप्यमाने कृतपूर्वी कटामित्वादाविव द्वितीयायां प्राप्तायां तदपवादः सप्तमी । यथैव ह्यधीती व्याकरणे इत्यन कर्मणोऽधिकरणत्वेन विवक्षितत्वात्सप्तमी प्रवर्तते तथा कृतपूर्वी कटमित्यादावपि प्रवर्तेत तस्माद्विवक्षाप्रविभागायेदं सूरम् । तेनः कर्मविषयेऽधिकरणविवक्षा नान्यत्रेति ॥ ३८ ।। तद्युक्ते हेतौ ॥ ३९॥ [सि० २।२।१००] १५ कर्मसम्बन्धाद्धेतौ सप्तमी स्यात् । चर्मणि द्वीपिनं हन्ति, दन्तयोर्हन्ति कुञ्जरम् । केशेपु चमरी हन्ति, सीनि पुष्पलको हतः ।।५।। असाधुसाधुनिपुणयोगेऽपि सप्तमी । असाधुमैत्रो मातरि । प्रत्यादियोगे तु न । साधुमैत्रो मातरं प्रति ॥ ३९ ॥ "तशु०" हेतोरिति हेतुर्निमित्तकारणमिति । चर्मणीत्यादि, द्वीपिनमिति-अभिधानद्वीपिनाविति प्रति- २० पदपाठात्पुंग्लीयलिङ्गोऽकारान्तः । सीनि पुष्पलक इति-युष्मं लातीति डेऽज्ञाताद्यर्थविवक्षाया के च ऍप्पलकः अनानेकार्थः पुष्पलवस्तु कीलके कृपणे गन्धमृगे च । सीमाशब्दस्तु मर्यादायामाम्नायान्मुकेऽपि ततोऽस्य द्विधा व्याख्या-पणार्थमरण्यविडालो हतो मर्यादार्थ कीलको वेति हेतुतृतीयापवादोऽयम् । असाध्वियादिना सूत्रद्वयस्य सद्वेपमाह-तथाहि-"अप्रत्यादावसाधुना" (२।२।१०१) असाधु, शब्दयुत्तागौणानाम्नः प्रत्यादिप्रयोगाभावे सप्तमी स्यात् । प्रति-परि-अनु एते प्रत्यादयः । “साधुना" विधिरिति । "निपुणेन चार्चायाम्” (२।२।१०३) अर्चायां गम्यायां निपुणेन साधुना च योगे सप्तमी । पष्टयपवादः । मातरि निपुणः, साधुः । अर्चायामिति किम् ? निपुणः साधुर्मेनो मातु:- मातेवेनं निपुणं साधु मन्यते इत्यर्थः । अप्रत्यादावित्येव-निपुणः साधुर्मंनो मातर प्रतीत्यादि । आदिसध्दार्पणात् "वेशेऽधिना" (२१२।१०४) खे ईशितव्ये ईशे च स्वामिनि घर्तमानाद- धिना युगात्सप्तमी । अधिः स्वस्वामिसम्यन्धं द्योतयति । तत्र स्वस्वामिवाचिनोर्य द्रोणत्येन विवक्ष्यते ३१ सतः स्यादिति अधिमगधेषु श्रेणियः अधिणिरे मगधाः । पष्टयपवादोऽयम् । “उपेनाधिकिनि" प्रलयार्थ , प्रयया पा यम्य पर्यस्य अध्ययनलक्षणम्य स तपाठन व्याप्यमाने व्याकरण इति । १ पुष मानधिको सहगो मारित । अपवा पुषय मीमादिका निक्षित पाग स फेनधिसीमावामिना सो लिए भी मुश्मितान्यगरिप्पफारम् ।

.. प्रक्रियावृतिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । सप्तमीविधान, २४७ (२।२।१०५) उपेन युक्तादधिकिनि वर्तमानाद्गौणान्नान्नः सप्तमी स्यात् । उपोऽधिकाधिकिसम्बन्ध द्योतयति । उप खायाँ द्रोणः-द्रोणोऽधिकः खार्या इत्यर्थः; उप निष्के कार्षापणः-कार्षापणोऽधिको निष्क- स्वेत्यर्थः । उपेनेति किम् ? खार्या उपरि द्रोणः । अधिकिनीति किम् ? अधिके मा भूत् तेन उप द्रोणे खारीति न भवति ।। ३९ ॥ यद्भावो भावलक्षणम् ॥ ४०॥ [सि० २।२।१०६] भावः क्रिया । यस्य भावेनान्यो भावो लक्ष्यते ततः सप्तमी स्यात् । गोपु दुह्यमानासु गतः ॥४०॥ "यद्भावो.” । प्रसिद्धं लक्षणं अप्रसिद्धं लक्ष्यम् । भावः क्रियेत्यादि-यस्य क्रिययाऽन्या क्रिया लक्ष्यते तस्मिन्क्रियावति वर्तमानाद्गौणान्नाम्नः सप्तमी स्यात् । गोपु दुह्यमानासु गतः दुग्धास्वागतः-अत्र कालतः प्रसिद्धेन गवां दोहेन भावेनान्यस्य गमनमप्रसिद्धं लक्ष्यते । गम्यमानेनापि भावेन भावलक्षणे भवति- आनेपु कलायमात्रेपु गतः, अत्र जातेष्विति गम्यते । यत्र क्रियार्हाणां कारकत्वं तद्विपर्ययो वा यथा १० ऋद्धेपु भुञ्जानेपु दरिद्रा आसते, ऋद्धेष्वासीनेषु दरिद्रा भुञ्जते । यत्र च क्रियानर्हाणामकारकत्वं तद्वि- पर्ययो वा यथा दरिद्रेवासीनेपु ऋद्धा भुञ्जते, दरिद्रेपु भुञ्जानेपु ऋद्धा आसते तत्राप्यनेनैव सप्तमी । तच भावलक्षणं त्रिविधं भवति-तथाहुः-'कर्तरि कर्मणि भावे त्रिविधं तद्भावलक्षणं तत्र । साप्यानाप्यकधातु- प्रयोगतः कर्तरि द्विविधम् ॥ १॥ यथा सूर्योऽभ्युदयं गच्छति कजेपु विकसत्सु रात्रिरगात् इति कर्त्तरि, भावलक्षणम् ; रविणा क्रियमाणेऽहन्युदीयमाने च याति तमः इति कर्मणि कर्तरि भावे च १५ भावलक्षणमित्यादि वाक्यप्रकाशतो ज्ञेयम् । भाव इति किम् ? यो जटाभिस्तस्य भोजनम् अत्र न भावो भावस्य लक्षणमपि तु द्रव्यम् । भावलक्षणमिति किम् ? यस्य भोजनं स मैत्रः । तृतीयापवादो योग इत्थम्भूतलक्षणेऽर्थे । आदिशब्दोपादानात् “गते गम्येऽध्वनोऽन्ते नैकार्थ्यं वा” (२।२।१०७) कुतश्चिदवधे- विवक्षितस्याध्वनोऽवसानमन्तः, यद्भावो भावलक्षणम्, तस्याध्वनोऽध्यवाचिझब्दस्याध्वन एवान्ते-२० नान्तवाचिना सहेक्याथ सामानाधिकरण्यं वा भवति । तद्विभक्तिस्तस्माद्भवतीत्यर्थः । गते गतझन्दे गम्ये, शब्दतोऽप्रयुज्यमाने इत्यर्थः । गवीधुमतः साङ्काश्यं चत्वारि योजनानि-चतुर्यु योजनेपु गतेपु भवतीत्यर्थः; पक्षे पूर्वेण सप्तमी-गवीधुमतः साङ्काश्यं चतुर्पु योजनेपु । ननु अन्तेन सहाध्वनोऽभेदोप- चारात् सिद्धमेवैकार्थ्यं किमनेन ? सत्यम् । कार्तिक्या आग्रहायणी मासे इत्यादि कालेऽप्येवं मा भूदिति वचनम् ॥ ४० ॥ षष्ठी वाऽनादरे ॥४१॥ [सि० २।२।१०८] अनादरे गम्ये भावलक्षणा पष्ठी वा, पक्षे सप्तमी । रुदतो लोकस्य रुदति लोके या प्रबजितः॥४१॥ "पष्ठी" । रुदतीत्यादि-रुदन्तं लोकमनाहत्य प्रावाजीदित्यर्थः ॥ ४१ ।। सप्तमी चाविभागे निर्धारणे ॥ ४२॥ [सि० २०२।१०९ समुदायादेकदेशस्य जातिगुणक्रियादिभिरविभागे पृथकरणेऽप्येवम् । क्षत्रियो नृणां नृषु वा ३० शूरः । कृष्णा गवां गोपु वा बहुक्षीरा ॥ ४२ ॥ इति सप्तमी। "सप्त" जात्यादिभिः समुदायान् बुद्ध्या पृथकरणमेव निर्झरणम् , तम्मिन गम्ये पष्टीति मममी च स्यात् । अविभागे इति-निर्यिमाणत्यैकदेशस्य समुदायेन सह कथञ्चिदक्ये अन्दानन्यमाने । अप्रिय ३३ १ साधु लो रान इतिपभिसाधिशलेन सर सन्बन्धाभावात् 'अधिकन भूगन' इत्यनेन मिसान्दान पानी । २५ २४८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- इति जात्या निर्धारणम् , कृष्णेति गुणेन, धावन्तो गच्छतां गच्छत्सु वा शीघ्रतमा इति क्रियानिर्धारणम् । अविभागे इति किम् ? पञ्चालाः कुरुभ्यः सम्पन्नलमाः, मैत्रश्चैत्रात्पटुः अन हि शब्दाढ़ेद एष प्रतीयते नतु कथञ्चिदैक्यमिति न भवति । पञ्चमीवाधनाथ वचनम् । अन्ये तामपीच्छन्ति-गोभ्यः कृष्णा सम्पन्नक्षीरतमा । अत्रादिशब्दात् “क्रियामध्येऽध्वकाले पञ्चमी च" ( २।२।११०) क्रिययोर्मध्ये योऽध्या कालश्च तस्मिन् वर्तमानागौणान्नान्नः पञ्चमी सप्तमी च स्यात् । इहस्थोऽयमिध्वासः क्रोशात् क्रोशे वा लक्ष्यं विध्यति । इह धानुष्कावस्थानमिपुमोक्षो वैका क्रिया, लक्ष्यव्यधश्च द्वितीया, तन्मध्ये क्रोशोऽध्या । अद्य भुक्त्वा मुनि_हात् भोक्ता; अत्र द्वयोर्भुक्तिक्रिययोर्मध्ये व्यहः काल इति । “अधिकेन भूयसस्ते" (२।२।१११) अधिरूढ इत्यर्थेऽधिकशब्दो निपात्यते । अधिरूढ इति च कर्तरि कर्मणि वा को १० भवति । तत्र यदा कर्तरि तदाधिक इत्यनेनाल्पीयानित्युच्यते, यदा तु कर्मणि तदा भूयान् । तत्र सामादल्पीयोवाचिनाधिकशब्देन युक्ताद्भूयोवाचिनो गौणानाम्नः सप्तमीपञ्चम्यौ स्याताम् । अधिको द्रोणा खायां खार्या वा ॥ ४२ ॥ शेपे ॥४३॥ [ सि० २।२।८१] कर्मादिभ्योऽन्यस्तदविवक्षारूपः स्वस्वामिभावादिः सम्बन्धः शेषस्तत्र यष्ठी खात् । राज्ञः १५ पुरुषः । उपगोरपत्यम् । माषाणामनीयात् ।। ४३ ॥ शेपे शेपशब्दस्यानेकार्थत्वेऽपि केपुचिदर्थेपूपयुक्तेपु केपुचिच्चानुपयुक्तेपु उपादीयमानोऽत्र शेपशब्द उपयुक्तेतरवचन इत्याह-कर्मादिभ्योऽन्य इति । ते हि पूर्वमुपयुक्तानामार्थस्य प्रथमाविपयत्याकर्मादि- भ्योऽन्यः सम्बन्ध एवावतिष्ठते इति सामर्थ्यात्सम्बन्धे पष्ठी भवति । ननु यथा नीलोत्पलमित्यत्र नीलमिति नामार्थादप्रच्युतं विशेष्यसामानाधिकरण्येन प्रयोगात्ततोऽतः प्रथमैच भवति न पष्ठी विशेपण- २० विशेष्यभावस्य नामार्थव्यतिरिक्तस्य वाक्यार्थत्वात् । यदुक्तं भाप्ये-आधिक्यस्य वाक्यार्थत्वादिति, तथा राज्ञः पुरुष इत्यत्रापि सम्बन्धस्य वाक्यार्थत्वात्पष्ठी न प्राप्नोति ? नैप दोपः । राज्ञ इति पदं सम्य- धित्वेन विवक्षितत्वात्प्रयुक्तमित्यतः सम्बन्धे पष्ठी कृता, एतच्च भाष्य एव निर्णीतमित्यास्ताम् । स्यादेतदत्र द्वयीकल्पना नामार्थस्य कदाचित्प्रयोक्तृविवक्षया क्रियाभिसम्बन्धः कदाचित्स्यनिष्ठ एव यदा सावक्रियाभिसम्बन्धस्तदा कर्मादिशक्तीनां सम्भवो यथा वृक्षं पश्येसत्र इशिक्रियाविशेषात्कर्मत्वम्, २५ यदा तु स्वनिष्ठोऽव्यतिरिक्त एव तदा प्रथमाया विषयो नचापरो नामार्थोऽस्ति यन्न कर्मादिविशेषव्यति रिसत्यमिति का शेपो नामावतिष्ठते यत्रेयं पष्ठी स्यादित्याशयाह-क्रियाकारकपूर्वक इति । अयमों राज्ञः पुरुष इत्यत्र योऽयं राजपुरुपयोः सम्बन्धो नायं कारणान्तरनरपेक्ष्येणाकरमादुपजायते, अपि त्वन्त भूतत्रियाकारकसम्बन्धनिवन्धनः; यतः पुरुपो योगक्षेमकामो राजानमुपसर्पति, राजापि तममिलपित. धनदानादिना विभर्ति; क्रियान्तरं वा प्रकल्पनीयम् । ततो राज्ञोऽसौ सम्बन्धीभूत् इति राज्ञः पुरुष इति । ३० एतशानेकान्तिकमियाह-तदविवक्षारूप इति कर्माद्यविवक्षारूप इत्यर्थः, यतः कारकाणां कर्मादीनाम- वियक्षायां सामान्यकारकविवक्षायामेव फेवलायां सम्बन्धस्य प्रादुर्भावात्कारकशेप इति व्यवड़ियते; अत एय द्विविधोऽसौ-धूयमाणफ्रियोऽश्रूयमाणक्रियश्च; वथाहुः- "सम्बन्धः पारफेभ्योऽन्यः, क्रियाकारफपूर्वकः । ध्रुतायाधुवायां या क्रियायां सोऽभिधीयते" ॥१॥ सन राज्ञः पुगर इत्यादी क्रियापारकपूर्यकोऽयमाणक्रियः स्वस्वामिभावादिसम्वन्धः । मायामामभी- ३५यारितादो सु यूयमाणक्रियो यतोऽत्र सदपि कर्मत्वाद्यविवक्षितत्याविरोपणविदोप्यभाव एवं प्रतिपाद्यते प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकपक्रिया । पष्ठीविधानम् २४९ मापसम्बन्ध्यशनमिति । ननु क्रियामन्तरेण सम्बन्धाभावात्तत्र च कर्मादेरवश्यम्भावात्कथं तस्याविवक्षे- त्युच्यते-भवति सतोऽप्यविवक्षा-यथानुदरा कन्या, अलोमिका एडकेति । ननु सम्बन्धस्य द्विष्ठत्वाद्राज्ञः पुरुप इत्यत्र राजशब्दादुत्पन्नया पट्या राजगतपुरुपसम्बन्धाभिधानेऽपि पुरुपगतराजसम्बन्धाभिधानाय पुरुपशब्दादपि पष्टी प्राप्नोतीत्यत्रोच्यते-द्विष्टोऽप्यसावेक एव, य एव राज्ञि स एव पुरुपे नान्यस्तै केन द्वावपि सम्बद्धौ; एकत्वाच तस्यैकस्मादेवोत्पन्नया पठ्या प्रत्यायितत्वाद्वितीयसम्बन्धिनो नाहति भवितुम् ,५ तत्रापि गौणाधिकारादप्रधानादेव भवति । नन्वेवं प्रधानात्प्रतिपिद्धायामपि पट्यां नामार्थमात्रे विधीय- मानायाः प्रथमाया अप्राप्तिः सम्बन्धस्त्राधिकस्य भावात् । नैष दोषः, अधिकस्य वाक्यार्थत्वमित्युक्त- त्वात् । रान इति-सन्निधाने हि पुरुपस्य सम्बन्धित्वं प्रतीयते नान्यथा । पुरुपनाम तु स्वार्थमाने वर्त्तते इति प्रथमा सिध्यति । यद्येवं पुरुपशब्दसन्निधाने एव राज्ञः पुरुपसम्बन्धित्वावगमो नान्यथाऽतो राजशब्दादपि प्रथमाप्रसङ्गः। नैप दोषः।रान इति केवले पदे उच्चार्यमाणे सम्बन्धित्वमनियतप्रतियोगि-१० राम्रो गम्यते यस्माद्राजा परोपकारित्वेन विवक्षितो न स्वनिष्टत्वेन पुरुपस्य तु राजशब्दमन्तरेण सोऽर्थी न प्रतीयते इति वाक्यार्थः । अस्त्यत्र कारणं राजशब्दाद्धि भवान् पष्टीमुचारयति अत्र हि पुरुपशव्दादु- चारितात् गम्यते सोऽर्थ इति । ननु नैतेनैवं भवितव्यम्-नहि शब्दस्य भावाभावाभ्यामर्थस्य भावाभावी क्रियेते; किं तर्हि ? अर्थस्य प्रतिपादयिपाविषयीकरणाकरणाभ्यां शब्दस्योचारणानुच्चारणलक्षणो, तत्र परोपकारित्वेन राज्ञो विवक्षितत्वात्पष्टी भवति पुरुपस्य तूपकार्यत्वेन स्वनिष्टतया विवक्षितत्वात्प्रथमा । ११५ तदुक्तं हरिणा- "द्विष्ठोऽप्यसौ परार्थत्वाद्गुणेषु व्यतिरिच्यते । तत्राभिधीयमानश्च प्रधानेऽप्युपयुज्यते” ॥ १ ॥ तस्मादर्थरूपमेवैतदेवंजातीयकं येनात्रान्तरेणापि पुरुपशब्दप्रयोगं राजनि सोऽर्थो गम्यत इति । किं पुनस्तत्स्वामित्वम् ? समासकृत्तद्धितेपु भावप्रत्ययेन सम्बन्धाभिधानमिति वचनात् स्वस्वामिभावसम्बन्ध इत्यर्थः । स्वामित्वं च स्वसापेक्षमित्यनियतं स्वमपेक्ष्य रानः सम्बन्धाश्रयः पष्टयुत्पद्यते पुम्पझब्दसन्निधौ २० तु स्वविशेषप्रतिपत्तिरिति । ननु यथैवं राजनि स्वकृतं स्वामित्वमेवं पुन्पेऽपि राजकृतं स्वत्वमिति ततः पष्टी प्राप्नोति ? उच्यते-राज्ञः पुरुप इति गुणप्रधानभावेनार्थट्टयमवस्थितम् , तत्र सम्बन्धो गुणे पद न्यस्य द्विष्ठत्वात् प्रधानमपि स्पृशति, गुणश्च प्रधानोपकाराय प्रवृत्ती रूपान्तरमाश्रयति, प्रधानं तु स्वनिष्टमेव न रूपान्तरं भजत इति । प्राधान्यं तु पुम्पादेगत्तरपदस्य क्रियापदसामानाधिकरण्यात् , बदा तु पुरुषो राजानं प्रति गुणत्वं प्रतिपद्यते तदा पुरुषस्य राजेति भवत्येव । राज्ञः पुन्पस्य कम्बल इत्यत्र २५ तु राजापेक्षया पुरुपस्य प्राधान्येऽपि कम्बलापेक्ष्या गौणत्वाद्भवति । स्वखामिभावादिरित्यत्रादिशब्दात उपगोरपत्यमित्यत्र जन्यजनकभावः सम्बन्धः, पशोः पाद इत्यत्रावयवावयविभावः, वृक्षस्य शाखा इत्यत्राधाराधेयभावः, क्षीरस्य विकार इति प्रकृतिविकृतिभावः, गवां समूह इति समूहसमूहिभावः, कुम्भस्य समीपमिति समीपसमीपिभावः, पृथिव्याः स्वामीति पाल्यपालकभावः, मापाणामनीयादिति भोज्यभोजकभावः, सुभापितस्य शिक्षते इति शिक्षणशिक्षणीवभावः, नटन्य शृणोतीति श्रवणश्रवणा-३० वधिभावः, वृक्षस्य पण पनतीति पतनपतनावधिभावः, न ते सुखत्य जानते इति मानक्षेयभावः, अन्नन्य नो देहीति दानदेयभावः, अक्षाणां दीव्यतीति देवनानभावः, मनः पृष्टं ददातीति प्रहार्यप्रह- रणभावः, महतां विभापते इति विभाप्यविभापणभावसन्यन्ध इत्यादयः सम्बन्धाः स्वयं शेयाः । प्रय- मापवादोऽयं योगः ॥४३॥ है. पूर्वा०३२ - णिगन्तभिदेस्तु भेदायितुं पर्यायः । भेदिका चैनस्य मैत्रस्य काप्टानाम्-अन द्वयोरपि को: "कर्तरीति" २५० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- कर्मणि कृतः कर्तरि च ॥४४॥ कृदन्तस्य कर्तृकर्मणोः पष्ठी स्यात् । अपां स्रष्टा । भवत *आसिका । कचिद्वा । विचित्रा सूत्राणां कृतिराचार्यस्थाचार्येण वा ॥४४॥ "कर्मणि कृतः" (२।२।८३ ) *"कर्तरि" ( २।२।८६)। सूत्रद्वयं स्पष्टम् । प्रथमसूत्रे अपां ५स्रष्टेति-एवं पुरां भेत्ता, वर्षशतस्य पूरकः, पुत्रपौत्राणां दर्शकः, यवानां लावकः, ओदनस्य भोजकः, विश्वस्य ज्ञाता, तीर्थस्य कर्ता, उदकस्य पिवः, ग्रामस्य गमनम्, गवां दोहः । कर्मणीति किम् ? शस्त्रेण भेत्ता । क्रियाविशेषणस्यापि कर्मत्वाभावान भवति-स्तोकं पचति । कृत इति किम् ? कटं करोति, कृतपूर्वीकटमित्यादि, त्यादितद्धितयोः कर्मणि मा भूत् । कथमर्थस्य त्यागीति, विषयाणां जयी, वीराणां प्रसविनीति ? एपां मत्वर्थीयेनन्तानां कर्मणि कथं पष्ठीत्याक्षेपः। परिहारस्तु अत्र ताच्छीलिकयोर्षिणिनोः १० कर्मेति भवतीति द्वितीयापवादोऽयम् । कचिद्वेति "द्विषो वाऽतृशः" (२।२।८४) अशप्रत्यया- न्तस्य द्विपः कर्मणि पष्ठी वा स्यात् । चौरस्य चौरं द्विपन् । तन्नादिसूत्रेण प्रतिपेधे प्राप्ते विकल्पोऽयम् । "वैकत्र द्वयोः" ( २।२१८५) द्विकर्मकेषु धातुपु द्वयोः कर्मणोरेकत्र पष्ठी वा स्यात् । अन्यत्र पूर्वण नित्यमेव । अजाया नेता सुघ्नम् । अजाया नेता सुघ्नस्य । अथवा अजां नेता सुनस्य । अजाया नेता सुनस्य । पयसो दोहको गाम् । पयसो दोहको गोः । यदि वा गोर्दोहकः पयः, गोदोहकः पयसः । अन्ये तु १५ नीवह्यादीनां द्विकर्मकाणां गौणे कर्मणि, दुहादीनां तु प्रधाने विकल्पमिच्छन्ति । उभयत्रापि नित्यमेवेत्यन्ये । *द्वितीयसूत्रे कृदन्तस्य कर्तरि पष्ठी स्यात् , तृतीयापवादः । *आसिकेति-आसितुं पर्याय आसिका । एवं भवतः शायिका, भवतोऽग्रगामिका । शयितुं पर्यायः, अग्रे गन्तुं पर्याय इति “पर्यायार्हणोत्पत्ती च णकः (५।३।१२०)। भवतः स्वापः । भवत आसना-आसनं आसनाणिवेत्त्यासभन्थघट्टयन्दरनः" । (५।३।१११) कृत इत्येव-त्वया शय्यते। कचिद्वेति वचनात् “द्विहेतोरख्यणकस्य वा” (२।२।८५) २० रुयधिकारविहिताभ्यामकारणकाभ्यामन्यस्य द्वयोः कर्तृकर्मषष्ठयोः प्राप्तिहेतोः कृतः कर्तरि पष्ठी वा स्यात् । नित्यप्राप्ते विभापेयम् । विचित्रेति-एवं साधु शब्दानामनुशासनमाचार्यस्याचार्येण या । साधु सलु पयसः पानं मैत्रस्य मैत्रेण वा । गम्यमानेऽपि कर्मणि भवति--'अन्तौ येनादर्शनमिच्छति' यस्या- दर्शनमिच्छतीति वा, आत्मनः कर्मतापन्नस्येति गम्यते । पञ्चमीविधायकं पाणिनीयं सूत्रमिदम् । अस्य पायमधः-अन्ती अन्तर्द्धिविपये आत्मनः कर्मतापन्नस्य येनोपाध्यायादिना कर्तृभूतेन यददर्शनं तदि- २५ च्छतीत्यर्थः । द्विहेतोरित्येकवचन निर्देशात् आश्चर्यमोदनस्य पाकोऽतिधीनां च प्रादुर्भाव इति, भिन्नतो; पर्तृकर्मपष्ठीहेतुत्यमति न भवति । अरूयणकस्येति किम् ? चिकीर्पा मैत्रस्य काव्यानाम्- चिकी मंसिप्रत्ययात्” (५।३।१०५) इति अप्रत्ययः । भेदिका चैत्रस्य काठानाम् , भेत्तुं पर्यायो भेदिका, पाठयेय न तु द्विहेतोरिति तृतीया णफवर्जनात्, णकसूनं च "पर्यायोऽईणोत्पत्तौ च णक" इति । ३० फर्जरीसेव-साधु सल्विदं शब्दानामनुशासनमाचार्यस्याचार्येण येत्या शब्दशब्दाकर्मणि विकल्पो ग स्यात् । अन्ये तु पशल्प्रत्यययोतिहेत्वोः कर्मण्येय पष्ठीमिच्छन्ति न कर्तरि आश्चर्य इन्द्रियाणां जयो यूना ॥४४॥ कृत्यस्य वा ॥४५॥ [सि०२३२२८८] घ्यण्तन्यानीयपक्यपः कृत्याः । एषां करि पष्ठी वा सात् । त्वया तय कार्य कर्तव्य ३५करणीयं देयं कृत्यम् ॥ ४५ ॥ चिकीर्पण । ५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । पष्ठीविधाननिषेधौ २५१ "कृत्य०" कर्तरीयेव-गेयो बटुर्गाथानाम् । गायतीति गेयः "भव्यगेयजन्य.” (५।११७) इत्यादिना निपातः । प्रवचनीयो गुरुः शास्त्रस्य-प्रवक्तीति "प्रवचनीयादयः (५।१।८) इति निपातः । अनायं विशेष:-"नोभयोर्हेतोः” (२।२।८९) उभयोः कर्तृकर्मणोः पष्ठीहेतोः कृत्यस्य सम्ब- धिनोरुभयोरेव पष्टी न स्यात् । नेतव्या ग्राममजा मैत्रेण । उभयोhतोरिति क्रिम् ? एकैकहेतोर्मा भूत्- उपस्थापनीयः पुत्रः पितुः । उपस्थापनीयः पिता पुत्रस्येति ॥ ४५ ॥ रिरिष्टात्स्तादस्तादसतसाता ॥ ४६॥ [सि० २२८२] एभिः सप्तभिर्योगे पष्ठी स्यात् । गृहस्सोपरि उपरिष्टात् परस्तात् पुरस्तात् पुरः दक्षिणत उत्तराद्वा ॥४६॥ "रिरि०”। उपरीत्यादिप्रयोगस्थितानाम् "ऊ द्रिरिष्ठातावुपश्चास्य" (७/२।११४) इति--"परावरा- स्तात्” (७१२।११६) इति "पूर्वावराधरेभ्योऽसस्तातौ पुरवधश्चैपाम्” (७।२।११५) इति "दक्षिणोत्तरा-१० चातस्” (७।२।११७) इति "अधरापराचात्” (७।२।११८) इत्यादिभिर्विहितानां प्रत्ययानां रिरिष्टा- दित्याद्यनुकरणम् । गृहस्योपरीति-ऊर्द्धशब्दस्य दिग्देशकालार्थस्य ऊर्बोदित्यनेनोपभावः-एवं पूर्वावराध- राणां "पूर्वावराधरेभ्यो०” इति यथाक्रमं पुर् अव अध् इति पश्चादित्यपरशब्दस्य पश्चादेशः । पञ्चम्य- पवादो योगः ॥ ४६॥ तृन्नुदन्ताव्ययक्वखानातृश्शतृङिणकच्खलर्थस्य ॥४७॥ [सि० २।२।९०] १५ एप दशानां कृतां कर्मकों पष्ठी न स्यात् । वदिता धर्मम् । विश्वं जिष्णुः । कटं कृत्वा । ओदनं भोक्तुं याति । अन्नं पेचिवान् । कटं चक्राणः । अधीयंस्तत्त्वार्थम् । कटं कुर्वन् । कष्टं सासहिः । कटं कारको याति । सुकरो धर्मः । सुज्ञानं तत्त्वं भवता ॥४७॥ "तृन्नु । वदितेति-'तृन् शीलधर्मसाधुपु' (५।२।२७) इति तन् जिष्णुरिति-एवं कन्यामलङ्करिष्णुः, शरान् क्षिप्नुः, अन्नं बुभुक्षः, देवान् वन्दासः, धारुर्वत्सो मातरम् , श्रद्धालुतत्त्वम्-ओदनं भोक्तु- २० मिति एवं पयः पायं ब्रजति । आनेति उत्सृष्टानुवन्धग्रहणात् कानझानानशां ग्रहणम् । कटं चक्राण इति कानः; एवं वचनमनूचानः । मलयं पवमानः पवते इति पवमानः "पृयजःशानः" (५।२।२३) कतीह कवचमुद्वमानाः, कतीह शत्रून्निन्नानाः, कतीह वपुर्भूपयमाणाः, त्रिष्वपि "वयःशक्तिशाले" (५।२।२४) इति शानः । आनश्-ओदनं पचमानः, मैत्रेण पच्यमानः, कटं करिष्यमाणः । अधीचन्निति- "धारीङोऽकृच्छ्रेऽतृश्” (५।२।२५) । कष्टं सासहिरिति "डीः सासहिवावहिचाचलिपापतिः'२५ (५।२।३८) "सलिचक्रिजज्ञिदाधिनेमिः" (५।२।३९) एवं कटं चक्रिः, दधिश्चित्तम् । कटं कारको यातीति "क्रियायां क्रियार्थायां तुम्-णकच्-भविष्यन्ती” (५।३।१३) इति चिनिर्देशात् णकल न भवति-वर्पशतस्य पूरकः । सुकरो धर्म इति-"दुःस्वीपतः कृच्छ्राकृच्छ्रार्थान् खल्” (५।३।१३९)। मुन्नानं तत्त्वमिति-"शासियुधिशिपिमृपातोऽनः" (५।३।१४१)। इत्यादिशब्दोपादानान् "क्तयोरसदाधारे" (२।२।९१) सतो वर्तमानादाधाराधान्यन्मिन्नर्थ ३० विहितौ यो क्तो क्तक्तवतू तयोः कर्मकोंः पष्टी न स्यात् । कटः कृनो मैत्रेण, कटं कृतवान्मत्रः । अस- दाधार इति किम् ? राज्ञा ज्ञातः, बुद्धः, मतः, इष्टः, पूजितः-ज्ञानेच्छा;दिसूत्रण वर्तमाने चः । कथं शीलितो मैत्रेण रक्षितश्चैत्रेण ? भूतेऽयं क्तः, वर्तमानताप्रतीतिन्नु प्रकरणादिनेति । अन्ये नु माने- च्छार्यार्थात् बीच्छील्यादिभ्योऽतीते क्तं नेच्छन्ति, तन्मतेऽपशब्दावेती। आधारे-इदनोदनल मुताम् , ३४ - १ ૨૨ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- सत्तूनां पीतम् , इदमहेः प्रसृतम्, इदमेपामासितम्, "अद्यर्थाचाधारे” (५।१।१२) इति क्तः । "वा क्लीये" (२।२।९२) लीवे यो विहितः क्तस्तस्य कर्तरि पष्ठी वा स्यात् । छानस्य छान्नेण या हसितम्, मयूरस्य मयूरेण वा नृत्तम्, कोकिलस्य कोकिलेन वा व्याहृतम्, इहाहेः मृप्तम् , इहाहिना सृप्तम् । लीव इति किम् ? चैत्रेण कृतम् "क्तक्तवतू" (५।१।१७४ ) इति भावेऽत्र क्तः । पूर्वण प्रति- ५पेघे प्राप्त विकल्पोऽयम् । “अकमेरुकस्य" ( २१२१९३) कमेरन्यस्य उम्प्रत्ययान्तस्य कर्मणि पष्ठी न स्यात् । आगामुकं वाराणसी रक्ष आहुः । भोगानभिलापुकः । अकमेरिति किम् ? दास्याः कामुकः । "एण्यणेन" (२२९४) एष्यदर्थे ऋणे च विहितस्येनः कर्मणि षष्ठी न स्यात्,-इन इति इन् णिनोर्महणम् । ग्रामं गमी औणादिक इन् । ग्राममागामी औणादिको णिन् । शतं दायी ददातीत्येवं- शीलो "णिन्चावश्यकाधमण्ये" (५४३६) इति गिन् । एवं कारी मेऽसि कटम्, हारी मेऽसि १० भारम् । एप्यहणेन इति किम् ? अवश्यवारी कटस्य, साधुदायी वित्तस्य, यदा त्ययमावश्यके णिन् एयरकाले भवति, तदा एष्यहणेन इति पष्ठीनिषेधे द्वितीयैव-तथा च प्रयोग:-"भव लघु युताकान्तः सन्ध्यामुपास्व तपोऽमल, त्वरयति कथं सन्ध्येयं त्वां न नाम निशानुजा । युतिपतिरथावश्यंकारी दिनो- दयमासिता, हरिपतिहरित्पूर्णभ्रूणायिता कियतः क्षणान" । इति नैषधीये सर्गे १९ वृत्तं २२ ॥४७॥ पृथनाना पञ्चमी च ॥४८॥[सि० १२१११३ ] १५ आभ्यां योगे तृतीयापञ्चम्यौ स्याताम् । पृथग मैत्रान्मैत्रेण । अनुमानहेतोरप्येवम्- शब्दोऽनित्यः कृतकत्वेन कृतकत्वाद्वा ॥४८॥ "पृथ०" । यदा पृथग्नानाशब्दावन्यार्थी तदा "प्रभृत्यादि.” ( २१२१७५) सूत्रेण पञ्चमी सिद्धेय सृतीयवानेन विधीयते, यदात्वसहायार्थों तदा पञ्चमीविधानार्थमपीदम् ॥४८॥ ऋते द्वितीया च ॥ १९॥ [सि० २२२२११४] तेयोगे द्वितीयापञ्चम्यौ साताम् । ऋते धर्म धर्माद्वा कुतः सुखम् ॥४१॥ "ऋते." ते इत्येतदव्ययं वर्जनार्थम् । यद्यपि पाणिन्यादिभिते योगे द्वितीया नोका तथापि शिष्टैः प्रयुक्ता; तथाहि- "चित्रं यथाश्रयमृते स्थाण्यादिभ्यो विना यथा च्छाया । तहाद्विना विशेयैन तिष्ठति निराश्रय लिगम् ॥ १॥ विना ते तृतीया च ॥५०॥[सि० २२२२११५] विनायोगे द्वितीयापञ्चमीत्तीयाः स्युः । विना पापं पापात् पापेन सुसं सात् ॥ ५० ॥ "विना०" । ते इति द्वितीयापश्चम्यावित्यर्थः । पाणिन्यादयो द्वितीयां नेच्छन्ति ॥ ५० ॥ तुल्यार्थस्तृतीयापष्टयो ॥५१॥ [सि० २२२२११६ ] माना तुल्पा मातुस्तुल्यः ॥५१ ।। "तुन्या." अर्थप्रहणं पर्यायार्यम्-तेन माता सरसः मातुः सरसः सदृक्षः सम इत्याद्यपि भवति । अपना नाति कृष्णम्येत्यादी स्वयं विधिर्न स्वान्, तुलोपमादयो हि शब्दाः सादृश्ययाचरा न तु सरः १२पारपा इति । गौमाधिगमप गौरिय गयो यथा गोसया गयय इत्यादी न भवति । तृतीयामविनय or प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । विविधविभक्तिविधानम् २५३ पष्टीविधानं सप्तमीबाधनार्थम् । तेन गवां तुल्यः स्वामी, गोभिस्तुल्य: स्वामीत्पन्न "स्वामीश्वर." (२।२।९८) इत्यादिना सप्तमी न भवति ।। ५१ ॥ द्वितीयाषष्ट्यावेनेनाऽनञ्चेः॥ ५२ ॥ [सि० २२२२११७] पूर्वेण ग्रामं ग्रामस्य । अनञ्चेरिति किम् । प्राग् ग्रामात् ।। ५२ ।। "द्विती०” । एनप्रत्ययान्तेन युक्ताद्गीणान्नानो द्वितीयापष्टयौ स्यातां न चेत्सोऽञ्चेः परो विहितो५ भवति । पूर्वेणेति-प्रामाद्दूरा पूर्वा इति "अदूरे एनः” (७।२।१२२) इत्येनप्रत्ययः । प्राग् ग्रामा- दिति-"लुबञ्चेः” (७।२।१२३) इत्येनप्रत्ययस्य लुब् । अनन्वेरिति प्रतिपेधाहितीयापष्टयोरभावात् "प्रभृत्यन्यार्थदिक्शन्देति” ग्रामात्पञ्चमी ।। ५२ ।। हेत्वर्थस्तृतीयाद्याः ॥ ५३॥ [सि० २२२११८] हेत्वोंगे तृतीयाद्याः सर्वा विभक्तयः स्युः । धनेन हेतुना । धनाय हेतवे । धनाद्धेतोः । १० धनस्य हेतोः। धने हेतौ वसति । एवं निमित्तादिभिरपि ॥ ५३॥ "हेत्व०" । हेतुनिमित्तं कारणमिति पर्यायाः। हेत्वथैर्युतात्प्रत्यासत्तेस्तैरेव समानाधिकरणागौणान्नान्न- स्तृतीयाद्याः सर्वा विभक्तयः स्युः । अयं भावः-हेत्वथैर्युक्तादसर्वादेरनेन तृतीयाद्याः पञ्च विभक्तयो, भवन्ति, उत्तरसूत्रेण हेत्वथैर्युक्तात्सर्वादेः सर्वाः सप्तापि विभक्तय इति ।। ५३ ॥ सर्वादेः सर्वाः ॥ ५४॥ [सि० २२२२११९] १५ हेत्वथैर्युक्तात्सर्वादेः सर्वा विभक्तयः स्युः । को हेतुः । के हेतुम् । केन हेतुना । कसै हेतवे। कसाढेत्तोः । कस्य हेतोः। कस्सिन हेतौ याति ॥ ५४॥ "सर्वा०" । को हेतुरित्यादि । प्रथमां नेच्छन्त्येके द्वितीयामपरे । इत्यादिशब्दात् "असत्वाराद- दाङसिङ्यम्” (२।२।१२०) सत्त्वं द्रव्यम्, ततोऽन्यदसत्त्वम् , आरादूरान्तिकयोस्तत्रेणो- भयोग्रहणम् । असत्त्ववाचिनो दूरार्थादन्तिकार्थाच टा उसि डि अम् इत्येते प्रत्यया भवन्ति । गौणा-२० दिति निवृत्तम् । दूरेण ग्रामस्य ग्रामाद्वा, दूराद्रामस्य प्रामाद्वा, दूरे ग्रामस्य ग्रामाद्वा, दूर ग्रामस्य ग्रामाद्वा वसति । इदंतदिति सर्वनामप्रत्यवमर्शयोग्यार्थाभिधायकत्वेऽप्येतेषां धर्ममात्रेण प्रयोगादसत्त्वरूपार्थाभि- धायित्वं न विरुध्यते । एवं विप्रकृष्टेन विप्रकृष्टात् विप्रकृष्टे विप्रकृष्टं प्रामस्य ग्रामाद्वा तिष्ठति । अन्तिकार्य- अन्तिकेन अन्तिकात् अन्तिके अन्तिकं ग्रामस्य ग्रामाद्वसति । अभ्यासेन अभ्यासात् अभ्यासे अभ्यास प्रामस्य प्रामाद्वा । ग्रामशब्दात् आरादथैरिति विकल्पेन पञ्चमी, पझे "शेपे" (२१२१८१) इति पष्टी।२५ केचिंदारादर्थैः पञ्चम्यन्तैर्युतात्पञ्चमी नेच्छन्ति, तेन दूरात् अन्तिकात् ग्रामस्येत्येव भवति न तत्सर्व- सम्मतम् । पञ्चम्या अपि दर्शनात्---- "दूरादावसथान्मूत्रम् दूरात्पादावसेचनम् । दूराच भाव्यं दस्युभ्यो दुराध कुपितागुरोः" ॥ १ ॥ इति । असत्त्व इति किम् ? दूरः पन्थाः, अन्तिकः पन्थाः अत्र सस्ववाचित्वाद्दरान्तिकार्यापि टादयो न भवन्ति, किन्तु यथावं प्रथमादच इति ॥ ५४ ।। १ विभफिसम्बन्धलात्तरित्तानिवः । अत्र हि टारीनि वचनान्युपातानि, न तृतीयाद्या विनयः ।

२५४ महामहोपध्यिायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु--- -- अविशेपणे द्वौ चास्मदः ॥ ५५ ॥ [सिं० २२।१२२] विशेषणरहितसासदो द्वापैकश्चार्थो बहुवदा स्यात् । आवां ब्रूवः । अहं ब्रवीमि । वयं घूमः। विशेषणे तु आवां गाग्यौं वः । अहं चैत्रो नवीमीति यथाप्राप्तम् ॥ ५५ ॥ "अवि०" । नन्वेकसयाकप्रत्यगात्मकवचनत्वादस्मदः कथं द्वावौँ स्यातामिति !. नैप दोपः। ५आत्मत्वं यदा परत्रोपचर्यते-अयं मे द्वितीय आत्मा अमेव वाऽयमिति, त्वं चाहं चावामित्यैकशेपो चा, तदा परस्याप्यस्मदर्थोपपत्तेरुपपन्नमस्मदर्थस्य द्वित्वमिति । आवां गाग्यौँ इत्यादि; एवमहं पण्डितो प्रवीमीति । अत्र गोत्रं धर्मान्तरं संज्ञा? चास्मदर्थस्य भेदकत्वेन उपादीयते इति सविशेषणत्वान्न भवति । ननु "नाट्ये च दक्षा वयम् । त्वं राजा वयमप्युपासितगुरुपज्ञाभिमानोन्नताः" इत्यादौ कथं सवि. शेपणस्य बहुपद्भायो दृश्यते इति ? अनोच्यते । यदनूद्यमानमवच्छेदकं तद्विशेषणं दक्षत्वादिकं च १० विधीयमानं नानूयमानमिति नैवंविधो विषयः प्रतिपेधस्य । एकानेकस्य भावस्यात्मनोऽनेकखभावविव- क्षायां पहुवचनं सिद्धमेव । सविशेषणे निषेधार्थ तु वचनम्-अयं भावः-एकोऽप्यात्मा यथैकत्वेनानु- भूयते तथा द्रष्टा श्रोता मन्तेत्यादि नानात्वेनापि । नोकान्तेनैकत्वेनानेकत्वेन वेतरविनिर्मुकेन प्रतिपत्ति- रति । तत्रैकत्वेन द्वित्वेन बहुत्वेन च तस्मिन् विवक्षिते एकद्विवहुवचनानि भवन्ति । यथा युष्मदर्थे 'गुरौ चैकस्मिन्नपि बहुवचनं प्रयुज्यते । यूयं भ्रूथ, भवन्तो युवन्ति इति; एवं चास्मदर्थस्यापि बहुवचने १५सिखें सविशेपणे तस्मिन् विवक्षिते द्वयोरेकन च बहुस्वविवक्षानिपेधार्थ पचनमिति । इत्यादिशब्दात् “फल्गुनीमोष्ठपदस्य भै" (२।२।१२३ ) फल्गुनीशब्दस्य प्रोष्ठपदाशब्दस्य च भे नक्षन्ने वर्तमानस्य द्वायों बहुवा स्याताम् । कदा पूर्व फाल्गुन्यौ, कदा पूर्वाः फाल्गुन्यः। कदा पूर्वे प्रोष्ठपदे,. कदा पूर्वाः प्रोष्ठपदाः । आभ्यां नक्षनाभ्यां चन्द्रयुक्ताभ्यां युक्तः काल इत्यर्थः ।"चन्द्रयुक्ती- काले लुस्वप्रयुक्ते" (६।२।६) इति सिद्धिः । उदिते पूर्व फाल्गुन्यो, उदिताः पूर्वाः फाल्गुन्यः ! उदिते २० पूर्वे प्रोष्ठपदे, उदिताः पूर्वाः प्रोष्ठपदाः, योतिर्विशेष इत्यर्थः । भ इति किम् ? फल्गुनीषु जाते फल्गुन्यौ माणविके । द्वावित्येव-तेनेकस्मिन् ज्योतिपि न भवति-दृश्यते फल्गुनी । एकवचनान्त: प्रयोग एय नास्तीत्यन्ये । शब्दपरनिर्देशात्पर्यापस्य मा भूत्-अद्य पूर्वे भद्रपदे ॥ ५५ ॥ जात्याख्यायां नवैकोऽसइयो बहुवत् ॥ ५६ ॥ [ सि० २२६१२१ ] सहाविशेषणरहितो जातिशब्द एकवच बहुवच या स्यात् । सम्पन्नो यवः । सम्पन्ना यवा। २५सलाविशेषणे तु एको प्रीहिः सम्पन: सुभिक्षं करोतीत्येकत्वमेव ।। ५६ ॥ "जात्या." जायतेऽनया मिन्नेवभिन्नायभिधानप्रत्ययाविति जातिः सामान्यम् । जातेराख्यायामभि- पाने एकोऽर्यो जातिलक्षणोऽसय सयायाचिविशेषणरहितो यदुवा स्यादित्यर्थः । जाति मायमेरो सदभिधाने एकवयनमेय प्राप्तमत इदमारभ्यते । अथ च यदुवदित्यतिदेशेन पहुपद्भायो जात्ययस्य ! ननु जातिशब्दस्य तयात्ये हि सम्पन्ना यया इसन यवशन्दादेव जातिशब्दाबदुवचनं स्थान सम्पन २० सदाद्विरोपगात् । जात्पर्पस तु पटुवा सम्पन्नादिविशेषणान्यपि सामानाधिकरण्यायवादिरादो- पास जात्यर्थे पर्नन्ते इति सेभ्योऽपि यदुत्वामय पदुपयनमुपपन्नमिति । जातिग्रहणं किम् ? पैः- पहच्छाम्दयामायं जावियाची, जातिदि शपलपपलानेव्यजिषु गोगौरित्याधनुत्तिप्रत्ययहेतुसामा म्पम् । यदि प पाटपुमाराधयस्थाभेदेपनुपर्तमान पेयमेवादिक जातिगच्येत सदा न जाति: यदि मापोऽसीवि जाविरुणमन मारिति । आस्यामहणं किम् ? पाश्यपप्रतिपतिः पाश्यपा-भप- .

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे कारकप्रक्रिया । अर्थान्तरविधानम् २५५ त्ययं जातिशब्दो नत्वनेन जातिराख्यायते किं तर्हि ? तत्प्रतिकृतिः । एक इत्येकसङ्ख्याक इत्यर्थः। लौकिक्या भेदपरिगणनरूपया सङ्ख्यया जातिलक्षणोऽर्थोऽसावेकः, न तु वैशेपिकाभिप्रेतगुणपदार्थस- गृहीतया, सा हि गुणत्वाव्य एव समवेता न पदार्थान्तरे; ततश्चैकग्रहणात्सम्पन्नौ ब्रीहियवौ इत्यादी न बहुवद्भावः । अत्र हि द्वयोर्जात्योराख्या नत्वेकस्या इति । "मगधेषु स्तनौ पीनो कलिङ्गेप्यक्षिणी शुभे" इत्यादावपि सव्येतरत्वलक्षणावान्तरजातिद्वयोपाधियोगादेकत्वं नास्तीति वहुवद्भावो न स्यात् ।'५ जातिमात्रविवक्षायां भवत्येव-मगधेपु स्तनाः पीनाः इति । सङ्ख्याविशेषणे वित्यादि । अत्र एके ब्रीयः सुभिदं कुर्वन्तीति न भवति ॥ ५६ ॥ गुरावेकश्च ॥ ५७॥ [सि० २२१२४ ] गुरौ गौरवाहे द्वावेकश्वार्थो बहुवद्वा स्यात् । युवां गुरू । यूयं गुरवः । एप मे पिता । एते मे पितरः ।। ५७॥ इति श्रीमहोपाध्यायधीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायश्रीविनय विजयगणिविरचितायां हैमलघुप्रक्रियायां कारकप्रक्रिया समाप्ता । "गुरा०" | गौरवाहे इति गौरवार्थे वर्तमानस्य शब्दस्येत्यर्थः । एप मे पितेत्यादि-नन्वेकस्मिन्नेव पितरि कथमेकत्वं बहुत्वं च, किञ्च एकस्मिन्नपि जलकणे बहुवचनान्तोऽपशब्दः प्रयुज्यते, एकस्यामपि योपिति पुंल्लिङ्गो वहुवचनान्तश्च दारशब्दः, वर्षा इत्येकस्मिन्नपि ऋतौ स्त्रीलिङ्गो बहुवचनान्तः । एक- स्मिन्नपि गृहे बहुवचनान्तः पुंलिङ्गो गृहशब्दः, पश्चाला जनपद इत्येकस्मिन्नपि बहुत्वैकत्वानुपपत्तिः । १५ नह्येक एवार्थ एकोऽनेकश्च भवति, विरोधात्कथञ्चित्तथाभावे तुभयमप्युभयसबायोगि स्यान्न चैतदिप्यते । एवं गोदी ग्राम इति द्वित्वैकत्वनियमायोगः । खलतिकं वनानीत्येकवचनान्तेन बहुवचनाभिधानमनु- पपन्नं, हरीतक्यः फलानीति स्त्रीनपुंसकलिङ्गायोगः, पञ्चालमथुरे इत्यनुत्तरपदस्य देशवृत्तेर्बहुविपयस्य बहुवद्भावप्रतिषेधानुपपत्तिः । एवं चञ्चाभिरूपो मनुष्य इत्यादावपि चञ्चादिलिङ्गता स्यादित्यादि सर्व कथं समञ्जसं भवतीत्यत्रोच्यते-सर्वलिङ्गसहये वस्तुनि स्याद्वादमनुपतति, मुख्योपचरितार्थानुपातिनि २० च शब्दात्मनि रूढितस्तत्तल्लिङ्गसध्योपादानव्यवस्थानुसर्त्तव्येति । अयं भावः-सर्वाणि त्रीण्यपि लिदानि सर्वाश्चैकत्वद्वित्वबहुत्वलक्षणाः सया एकस्मिन्नेव वस्तुनि सन्ति, तथाहि-वस्त्वर्थो मात्रेतिशब्दाः सर्वत्रवस्तुतत्त्वे घटवस्तु घटार्थो घटमात्रेति प्रवर्त्तन्ते इति लिगानि दृश्यन्ते । गुणगुणिद्रव्यपर्यायावय- वावयविरूपे वस्तुनि घट इत्यभेदविवक्षायामेकत्वसाध्या,-गुणगुणिनी द्रव्यपर्यायावयवावयविनी घटो नककमात्र इति द्वित्वसवा, गुणपर्यायावयवानां बहुत्वात्तभेद विवक्षायां गुणाश्च गुणी गुणिनो घटा इति २५ बहुत्वसहाया । न चैतदेकस्मिन्नपि वस्तुनि स्याद्वादानुपातिनि विरुद्धम् । स्वादित्यनेकान्तद्योतकमव्ययं ततश्च कथञ्चिदिति बादः स्याद्वादः तथाहि स एवायं मंत्र इत्याजन्ममरणमविच्छेदः प्रतीयते, नन्न भेदमानं वस्तु । वालोऽयं न युवा, युवायं न बालः; सुमोऽयं नोस्थितः, उत्थिनोऽयं न सुम इति विच्छेदश्च प्रतीयते तन्नाभेदमात्रम् ; न च तयोर्भेद एव, मैत्रो वालो मैत्रो युवेत्येकत्येन प्रतिभालनाहौरव इतिवदति- भासाभावादेकान्तेन चाभेदेऽन्यतरविलोपः, तथा च भेदाभेदप्रतिभालायोगो नचान्यतरम्य निध्यायनि-३० तराविशेपात्तस्मादन्तरालावस्यं वस्तु, तदेतत्स्याहादानुत्पातीति नानानेकरूपना विनयने । नदेवं माना- समभाव्यनेकभेदात्मक यन्तुनि सर्यमुपपद्यते, तेन आपः दारा इत्यादिषु गुगपर्यायायययभेदोगदाना- इलुनामर्याद बहुत्योपपत्तिः । एवं पत्राला प्रति यन्तुगतियामायादवयवहारण प्रयन्ते । जनता पति समुदायद्वारेण । एवं गोदी प्रामन्यादायप्येकानेरुसमायोरपत्तिः । वयः पलानीति लिह-३४ - . २५६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- भेदश्च सर्वलिङ्गवाद्वस्तुनः । पश्चालमथुरे इति पञ्चालादीनां बहुत्वविषयाणां समासे उत्तरपदादन्यत्र समुदायाभिधानं नत्ववयवाभिधानमिति बहुत्वाभावः । नियतविषयाश्च शब्दशक्तयो भवन्ति, यथा राज्ञः पुरुष इति वाक्ये राजशब्दो विशेपणादियोगिनमर्थमाचष्टे, वृत्तौ तु तद्विलक्षणं राजपुरुप इति । चञ्चा- भिरूपो मनुष्य इति सादृश्यान्मनुष्यवृत्तेश्च तद्रूपं यत्नविशेषणयोगि ! पञ्चालादिशब्दानां च क्षत्रियाद्य- ५वृत्तीनामपि सोऽयमित्यभिसम्बन्धादुपचाराजनपदाधर्थेऽपि वृत्तिरित्युक्तं मुख्योपचारितार्थानुपातिनी- सादि । अन च रूदिः प्रमाणम्, रूढिश्व शिष्टव्यवहारप्रसिद्धिरिति ॥ ५७ ॥ यां शिष्योऽद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः पीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ स्वोपज्ञसत्प्रक्रिया- १० वृत्तौ सम्प्रति कारकप्रकरणं सम्पूर्णतामासदत् ॥ १ ॥ t+ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । लक्षणमधिकारश्च २५७ 2 ... थ स मा सो नि ते , "नाम० अथेति-कारकप्रक्रियायां यथाविधि नानां विभक्तयो विहिताः, अथ तेषां मिथः समासंकथन युक्तमित्यत आह-अथ समासो निरूप्यते इति । नाम नाम्नैकार्थे समासो बहुलम् ॥ १॥[सि० ३।१।१८] नाम नाम्ना सहकार्ये सामर्थ्यविशेपे सति समासो बहुलं स्यात् । लक्षणं चेदमधिकारश्च,५ तेन बहुव्रीह्यादिसंज्ञाऽभावे यत्रैकार्थता तत्रानेनैव समासः-विस्पष्टपटुः । स च पोढा-बहुव्रीहिः १ अव्ययीभावः २ तत्पुरुपः ३ कर्मधारयो ४ द्विगुः ५ द्वन्द्वश्च ६ । तत्र बहुव्रीहिरन्यपदार्थ- प्रधानः । अव्ययीभावः पूर्वपदार्थप्रधानः । द्विगु-तत्पुरुपौ परपदार्थप्रधानौ । द्वन्द्वकर्मधारयौ चोभयपदार्थप्रधानौ । तस्य क्रियाभिसम्बन्धात् ऐकपद्यादिकं च समासप्रयोजनम् । समर्थः पदसमुदायो विग्रहो वाक्यमिति च ॥१॥ । नाम नाम्नेत्यादि, अयं भावः-नाम नाना सह ऐकायें एकार्थीभादे सति समाससंज्ञ बहुलं भवतीति । सामर्थ्यविशेपे इति–स च सामर्थ्यविशेषः पृथगर्थानां पदानां कंचित्परस्सरव्य- पेक्षालक्षणं सामर्थ्यमनुभूय भवति-यथा, राज्ञः पुरुपो राजपुरूपः, नीलं च तदुत्पलं च नीलोत्पलम् ।। कैचिदननुभूयैव भवति यथा, उपकुम्भम् , कुम्भकारः । वाक्यान्तरेण त्वर्थः प्रदश्यते-कुम्भस्य समीप कुम्भं करोतीति । कचिन्न भवत्येव यथा, छात्राणां पञ्चमः रामो जामदग्न्य इति । विस्पष्टं पटुः १५ विस्पष्टपटुः, विचित्रं कटुकः विचित्रकटुकः । एवं विविक्तकपायः व्यक्तलवणः सम्पन्नमधुरः पट्पन्लः निपुणपण्डितः कुशलदक्षः चपलवत्सलः इत्यादिपु गुणविशेषणस्य गुणवचनेन समासः || काष्टा- परं प्रकर्पमध्यायकः काप्टाध्यायकः । दारुणमध्यायकः दाम्गाध्यायकः । अमातापुत्रमध्यायकः अमातापुत्राध्यायकः, निष्टुरमध्यायक इत्यर्थः । वेशं सुभगमध्यायकः वेशाध्यायकः । एवमनाज्ञाता- ध्यायकः अयुताध्यायकः अद्भुताध्यायकः भृशाऽध्यायकः घोराध्यायकः परमान्यायकः स्वध्यायकः २० अत्यध्यायकः इत्यादियु क्रियाविशेषणम्य क्रियावता समासः ॥ तथा सर्वश्चर्मणा कृतः सार्वचर्मीणो रथः, अद्य श्री वा विज्ञायते अद्यश्वीना गौः, दशभिरेकादश गृहाति दर्शकादशिकः, ऊर्ध्वं मुहूर्नाद्रव- मौर्ध्वमोहूर्तिकम् , एवमीचंदेहिकम् , और्वन्दमिकम् , कृतः पूर्व फटोऽनेन कृतपूर्वी कटम् , भुतपूर्वी . ओदनम् , गतपूर्वी प्राममित्यादिपु तद्धितार्थे समासः ॥ तथा कन्ये श्व, दम्पती इव, वाससी इव, इत्यादिष्विवेनालुप्समासः । ऐकपद्यं च समासफलम ; तथोनं सिद्धान्तकौमुद्याम्-"इयेन मनासो विभत्यलोपश्य-जीमूतस्येव" । अत्र मनोरमा-"इचेनति अयमपि समानः पूर्ववन् फाचित्य एच, २६ २५८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- तेन जीमूतस्येवेत्यादौ तैत्तिरीयाणां पृथक्पदत्वेन पाठः । “उद्वाहुरिव वामन" इत्यादौ व्यस्तप्रयोगश्च सङ्गच्छते इति” । तथा भूतः पूर्वं भूतपूर्वः, एवं दृष्टपूर्वः श्रुतपूर्वः । सर्वेषु चैपु विशेषसंज्ञाप्राप्तावनेनैव समासः । वहुलमिति शिष्टप्रयोगानुसरणार्थम् । नामेति किम् ? चरन्ति गावो धनमस्य । नाम्नेति किम् ? चैत्रः पचति । बहुलवचनादेवं कचिदनामापि समस्यते-भात्यकोऽत्र भात्यकं नमः, नभसा सामानाधि- ५करण्यं समासफलम् । क्वचिदनानापि-अनुव्यचलत् , अनुप्रावर्पत्, यद् व्यकरोत् , यत् परियन्ति । अन नित्यसन्ध्यादिसमासफलम् । समासस्य च नामत्वेऽपि सहायात्यादिभिरेवोक्तत्वान्न स्यादयो भवन्ति । पैदत्वार्थमुत्पन्नस्य वर प्रथमैकवचनस्य याद्यन्वार्थप्राधान्यानपुंसकत्वे लोपो भवति । अत्र मनोरमा- एतदपि योगविभागस्येष्टसिद्ध्यर्थत्वादेव लभ्यते छन्दस्येवेति एतच्च सम्प्रदानसंज्ञासूत्रे पदमार्या स्पष्टम् । यदि हि लोकेऽपि स्यात्तर्हि अभिप्रैतीत्यादौ समासात् स्यादयः स्युः । पचतिकल्पमित्यादौ तद्धितान्ता- १० यथा । न च लिङ्गसर्वनामनपुंसकताभ्युपगमेन निर्वाहः, यत्प्रकुरुते इत्यादी हस्खापत्तेः प्रकुरिन्नित्यन नलोपापत्तेश्चेति । समासप्रदेशा:-"चौटौती समासे” ( १।२।१७) इत्यादयः । समासभेदानाह-स च पोति-तत्पुरुषविशेषः कर्मधारयस्तद्विशेषो द्विगुरिति विवक्षायां चतुर्दापि । इयं च भेदसया प्रायिकी एतदतिरिक्तानामपि पूर्वोक्तयुक्त्या नाम नाम्नेति समासविधानात् । यद्वैवं समासभेदानाहुः- सुपां सुपा तिडा नाना धातुनाऽथ तिडां तिडा। सुबन्तेनेति विज्ञेयः समासः पविधो बुधैः” ॥१॥ १५, • सुपा राजपुरुपः, तिहा पर्यभूपयत् , नाम्ना कुम्भकारः, धातुना कटप्रूः न जसतीत्यजस्त्रम् , तिका तिङा-पिवत राहताऽखादतमोदता । तिडां सुपा-कृधि विचक्षणमिति यस्यां क्रियायां सा कंधिविच- क्षणा । एहीडादयोऽन्यपदार्थे इति-मयूरव्यंसकादिपाठात्समासः । पण्णामपि नामान्याह-बहुव्रीहि- रित्यादि । पण्णामपि प्रधानपदार्थव्यवस्थामाह-तत्र बहुव्रीहिरित्यादि । एतदपि प्रायिक सूपप्रति उन्मत्त- गङ्गमित्याचव्ययीभावे, अतिमालादौ ससुरपे, द्वित्रा इत्यादि बहुश्रीहौ, दन्तोष्टमित्यादि द्वन्द्वे चाभावात्। २० पूर्वपदादिप्राधान्ये हेतुमाह, तस्येत्यादि-क्रियान्वयि प्रधानमिति वचनात् । समासप्रयोजनमाह-एक- पद्यादिकमिति । आदिशब्दादैकस्वयं तच्च वेदेऽधिकृतम् । समासप्राग्भाविनो वाक्यस्य लक्षणं संज्ञा घाइ-समर्थ इत्यादि । अयं भावः-समासैकशेपकृत्तद्धितक्यनाद्यन्तधातुरूपाः पञ्च वृत्तयः । परार्था- भिधानं मृत्तिः, वृत्त्यर्थावबोधकं वाक्यं विग्रहः । स द्विधा-लौकिकोऽलौकिकश्च । परिनिष्ठितत्वात्साधु- लौकिका, प्रयोगानोऽसाधुरलौकिकः । यथा राज्ञः पुरुषः-राजन् अस् पुरुषस् इति । अविग्रहो २५ नित्यसमासः अस्यपदविग्रहो वेति ॥ १ ॥ आरूढाः १-३ पुरुषा १-३ यमिति वाक्ये- यथोडेशे निर्देश इति प्रथमं बहुव्रीहिसमासप्रक्रियामाह-आरूढा इत्यादि- एकार्थ चानेकं च ॥२॥[सि० ३११२२] एकमनेकं चैकार्थ समानाधिकरणं नाम, अव्ययं च, नाना, द्वितीयाघन्तान्यपदस्साथै, सम- ३० स्यते । स च पहुव्रीहिः ।।२।। एकपात् 'रुखोऽपदे या' इति हसविकल्पाप्रातनि यसादि भवतील. १२ भन्ये साहु -एको दावित्यादिवदुष्य देवादिकुमारलाद केल्या प्रकृतेः प्रयोगामागदाव्यमान प्रथमैकवचनेन तस्य च 'दीपज्या' इत्यनेन लम् उरवि तन्मरामनायाह पदलायमिति । ३ लायन्तस्य साध्यापप्रधानलादसरववाघिसम् असवं च सामान्यम्। पनसकम् तत 'भनतो ल'। 'अनतो বাগান प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । बहुव्रीहिः । २५९ एका." । एकः समानोऽर्थोऽधिकरणं यस्य तदेकार्थ समानाधिकरणमित्यर्थः॥ २॥ अनोप. योगिसूत्रमाह- ऐकायें ॥३॥ [सि० २२८] ऐकार्थ्यमैकपद्यं तनिमित्तस्य स्यादेर्लुम् स्वात् । अत एव लुम्विधानात् नाम नाम्नेत्युक्तावपि . स्थाधन्तानां समासः (अव्ययेभ्यः स्यादयोऽनुमीयन्ते इति वृहद्वृत्तौ)। 'उक्तार्थानामप्रयोगः'५ इति यच्छब्दाप्रयोगे *आरूढपुरुपो गिरिः । अयं चान्यपदार्थप्राधान्यात्तत्सम्बन्धिनीलिङ्गसङ्ख्या- विभक्तीरनुसरति । कृतानि पुण्यानि येन सः कृतपुण्यः । एवं दत्तदानो बीतदुःखो बहुधनोऽ- नन्तज्ञानः । अनेकं च-आरूढवहुपुरुपो गिरिः। अव्ययं खल्वपि । उच्चैर्मुखः ॥३॥ ऐका." । एकार्थस्य भाव ऐकार्थ्यम् । आरूढाः पुरुपा यम् । इदं हि लौकिकं वाक्यम् , अलौकिके . वाक्ये तु-आरूढ अस् पुरुप अस् इति स्थिते विभक्तिलोपे आरूढपुरुष इति । एवं पुत्रमिच्छति १० पुत्रीयति पुत्रकाम्यति, कुम्भं करोतीति कुम्भकारः, उपगोरपत्यमौपगवः-एषु पुत्र अम् य, पुत्र अम् काम्य, कुम्भ अम् कार, उपगु अस् अ इति स्थिते ऐकायें सति तन्निमित्तस्य स्यादेलप् । ऐकार्थ्य इति निमित्तसप्तमीविज्ञानादेकार्योत्तरकालस्य न भवति चित्रगुः । ऐकार्थ्य इति किम् ? चित्रा गानो यस्येत्यादि वाक्ये न भवति ॥ *आरूढपुरुषो गिरिरिति द्वितीयाबहुव्रीहिः । एवं कृतपुण्य इत्यादयस्तृती- यादिवत्रीहयो ज्ञेयाः । अनेकं चेति-अनेकमपि समानाधिकरणं नाम नाम्ना द्वितीयाद्यन्तान्यपद-१५ स्यार्थे समस्यते, स च समासो बहुव्रीहिर्यथा-आरूढा वहवः पुरुषा यं स आरूढवहुपुरुषो गिरिः । एवं ऊढ़ा वहवो रथा येन स ऊढवहुरथोऽनड्वान् । शोभनाः सूक्ष्मजटाः केशा यस्य स सुसूक्ष्मजटकेशः । शोभनं नतमजिनं वासोऽस्य सुनताजिनवासाः । सञ्जातान्यन्तेपु शितानि रन्ध्राण्यस्मिन्-समन्तशिति- रन्ध्रः । पञ्च गावो धनमस्य पञ्चगवधनः । पञ्च नावः प्रिया अस्य पञ्चनावप्रियः । नामनानेति विव- क्षितसङ्ख्यत्वादनेकस्य समासो न स्यादित्यनेकग्रहणम् । अव्ययं खल्वपि-उचैर्मुखमस्योर्मुखः, एवं २० नीचैर्मुखः; अन्तरङ्गमस्यान्तरङ्गः, एवं वहिरङ्गः, कत्तुं कामोऽस्य कर्तुकामः, एवं हर्तुमनाः । व्यधिकर- णत्वाव्ययस्य न प्राप्नोतीत्यव्ययाकर्पणार्थश्चकारः । सामानाधिकरण्ये त्वेकार्थमित्यनेनापि सिद्ध्यति-अस्ति क्षीरमस्या अस्तिक्षीरा गौः। क्रियावचनत्वे वस्त्यादीनां नाम नाम्नेत्यादिनैव सिद्धम् । ऐकार्यग्रहणं किम् ? पञ्चभिर्भुक्तमस्य । द्वितीयाद्यन्यार्थ इत्येव-वृष्टे मेघे गतः । यथा मे माता तथा मे पिता । सुनातं भोः । इह कस्मान्न भवति, वृष्टे मेघे गतं पश्य-बहिरङ्गाऽत्र द्वितीयान्ततेति । शब्दे कार्यासम्भवादर्थे लन्चे २५ यदर्थग्रहणम् , तदन्यपदार्थस्य या लिङ्गसङ्ख्याविभक्तयस्ता यथा स्युरित्येवमर्थम् । बहुलाधिकारात्-राज- न्वती भूरनेन, प्राग्ग्रामो अस्मात् , पञ्च भुक्तवन्तोऽस्येत्यादिपु न भवति ॥ ३ ॥ उष्ट्रमुखादयः॥४॥ [सि० ३।१।२३ ] एते बहुव्रीहिसमासा निपात्यन्ते । उष्ट्रस्य मुखमिव मुखं यस्य स उष्ट्रमुखः । वृपस्कन्धः ॥ ४ ॥ "उष्ट्र०" वृपस्कन्ध इव स्कन्धोऽस्य स वृपस्कन्धः । एवमिभकुम्भाविव स्तनी यस्याः सेभकुम्भ-३० तनी । एवं नागनासोलः, हरिणामी, हंसगमना, चन्द्रमुखी, कमलबदना, विम्बोष्टी, चक्रनितम्वा । पितुरिव स्थानमस्य पितृस्थानः । पितरीव स्थानीयमस्मिन् पितृस्थानीय इत्यादि । अत्रोपमानमुपमेयेन ३२ १ समासेऽपि विमतः सम्भव इति । २ ऐकार्यस्य च पूर्वकालवाचिन्येव विभकिनिमित्तं तस्यामकार्यस्य मावान्, तर कालभाविन्यास्तु विमरेकार्थमेव निमित्तम् , सचक्रपये तस्याः सम्भवादिति ।

१० २६० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु- सामान्ययाचिना च सह समस्यते । उपमेयसरूपस्य चोपमानपदस्य यथासम्भवं लोपः । कण्ठे स्थिता इत्यलुप्समासस्ततः कण्ठे स्थिताः काला यस्य स कण्ठेकाल:, एवमुरसि स्थितानि लोमान्यस्योरसि. लोमा, एवमुद्रमणिः, वहेगडुरित्यादिपु सप्तमीपूर्वपदं समानाधिकरणं समस्यते उत्तरपदस्य च लोपः। व्यधिकरणो वा कण्ठेकालादिषु बहुव्रीहिः । केशसङ्घातचूडाऽस्य केशचूडः, सुवर्णविकारोऽलङ्कारोऽस्य ५सुवर्णालङ्कार इत्यादिपु सद्भातविकारापेक्षया पष्ट्या समस्तं सामानाधिकरण्यं समस्यते, उत्तरपदलोपश्च ।। वेशसवावचूडः, सुवर्णविकारालङ्कारः इत्यप्यन्यः ॥ तथा प्रपतितानि पर्णान्यस्य प्रपर्णः प्रपतितपर्णः, प्रपलाशः प्रपतितपलाशः, उद्रश्मिः उद्गतरश्मिरित्यादिपु प्रादिपूर्वं धातुजं पदं समस्यते, तस्य च विक- स्पेन लोपः । तथा अविद्यमानः पुत्रोऽस्य अपुनः अविद्यमानपुत्र इत्यादिषु नपूर्वमस्त्यर्थपदं समस्यते, तस्य च या लोपः । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् ॥ ४ ॥ बहुव्रीहिविशेषमाह-- सहस्तेन ॥५॥[सि० ३३१०२४] तेनेति तृतीयान्तेन सहशब्दोऽन्यपदार्थे समस्यते ॥५॥ "सह.” । तेनेति अयं भावः-तुल्ययोगे विद्यमानार्थे च वर्तमानं सह इत्येतनाम तृतीयान्तेन नाना अन्यपदार्थे समस्यते, स समासो बहुव्रीहिसंज्ञो भवति ॥ ५ ॥ अनोपयोगिसूत्रमाह- सहस्य सोऽन्यार्थे ॥६॥[सि० २११४३] १५ बहुधीही सहस्य सो या सात् । सपुत्रः सहपुत्रो वा गतः *कचिन्नित्यम्-सरसा दूर्वा । सामिः कपोतः । सद्रोणा खारी । विचिन्न-स्वस्ति गुरवे सहशिष्याय ॥६॥ "सहस्य." । आगत इति अत्र तुल्ययोगे सहशब्दः आगमनक्रियया पितापुत्रयोरुभयोरपि योगात् । विद्यमानार्थे-सह कर्मणा वर्तते सकर्मकः, विद्यमानताऽत्र सहार्थो न तु तुल्ययोगः । सह इति किम् ? साद्धं सना अमा पुत्रेणागतः । बहुलाधिकाराद्विद्यमानार्थ कचिन्न भवति-सहेव दशभिः पुत्रैर्भार वहति २० गर्दमी । सहैव धनेन भिक्षा भ्रमति । प्रथमान्तान्यपदार्थ आरम्भः सहस्तेनेति सूत्रे । अन्यार्थ इति किम् । सह कृत्वा सह युवा सहकारी सहजः। *कचिदित्यादि-"नानि" ( ३।२।१४४) अन्यार्थे समासे उत्तरपदे सहदाब्दस्य सादेशो नित्यं भवति, संज्ञायां विपसरसा दूति एवं सहाश्वत्थेन वर्तते साश्वत्यं, सपलाशं सशिंशिप वनम् । एवंनामानि यनानि । अन्यार्थे इत्येव-सह परतीति सहचरः कुरण्टकः ! सह दीव्यति सहदेवः कुरुः । सामिरित्यादि । अत्र सूत्रम्-"अदृश्याधिके" (३२२१४५) अदृश्यं २५परोक्षम् । अधिकमधिरूढम् । तद्वाचिनोरुत्तरपदयोरन्याथै समासे सहस्राब्दस्य नित्यं सादेशो भवति । वन अदृश्ये-सामिः कपोतः, सपिशाचा यात्या । अधिके सद्रोणा सारी, समापः कार्यापणः । किचिन्नेति अप्रसूनम्-"नाशिष्यगोवत्सहले" (३।२।१४८) आशिपि गम्यायां गवादिवर्जिते उत्तरपदे परे सहशब्दस्स साद्देशो न भयति ! अगोवत्सहले इति किम् ? स्वस्ति भयते सगये सहगये, सवत्साय सह- यत्साय, सहलाय सहहलाय । एतत्सर्व *फचिदित्यादिना सद्धेपणाह ॥६॥ पुनरपि पहुनीहिविशेषमाह- दिशो रुढ्यान्तराले ॥७॥[सि० ३३१०२५] दक्षिणसाः पूर्वस्वाथ पदन्तरालं सा दक्षिणपूर्वा दिक् । सर्वादयोऽयादी इति पुंरदारः । *इत्यादयोऽपि यानीहिममासा ज्ञेयाः । यत्र प्रधानसैकदेशो विशेपणतया ज्ञायते स तद्रुम- ३३राविज्ञान:सिम्यों की यस स तम्बकर्णः॥७॥ पारतपपिनवम्पानादिना होसः । - .

२६१ . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । बहुव्रीहिः दिशो०” । रून्या दिशः सम्बन्धिनाम रूल्यैव दिशः सम्बन्धिना नान्नाऽन्तराले अन्यपदार्थेड- भिधेये समस्यते, स समासो वहुव्रीहिसंज्ञो भवति । दक्षिणपूर्वा दिगिति एवं पूर्वोत्तरा, उत्तरपश्चिमा, दक्षिणपश्चिमा। "सर्वादयोऽस्यादी" (३।२।६१) इति-सूत्रमिदम् ; अस्थायमर्थः-सर्वादिर्गणः परतः स्त्री पुंवत्स्यात् , अस्यादौ स्यादिपरश्चेन्न स्यात् । स्यादिवर्जनात् प्रत्यये पदे च परे भवति । सर्वासां प्रियः सर्वप्रियः, भवत्याः पुत्रो भवत्पुत्रः, एकस्याः क्षीरम् एकक्षीरम् , एकस्या आगतम् एकरूप्यम् , एक-५ मयम्, तया प्रकृत्या तथा तेन प्रकारेणेत्यर्थः । स्त्रीत्वव्यक्त्यर्थमेवं निर्देशः (अथ चात्र पुंवद्भावः किमर्थः समजनि ? उच्यते-अत्र पुंवद्भावे सति स्त्रियामाप् न भवति । एवं यथा तदेत्यादि) एवं यथा । तस्यां वेलायां तदा । एवं यदा कदा सर्वदा अन्यदा तहि यहिं कर्हि । सर्वामिच्छति सर्वकाम्यति, भव- काम्यति, एककाम्यति । परत्वात्प्रतिपेधविपयेऽपि-सर्वा प्रियाऽस्य सर्वप्रियः ( सर्वादय इति किम् ? कन्यापुरम् कुमारीवासः । कन्याशब्दो व्याकरणे कन्य इति पुमानपि प्रसिद्ध इत्यत्र सूत्रसाफल्यम् ) १० अस्वादाविति किम् ? सर्वस्यै दक्षिणपूर्वस्यै । वहुवचनं व्याप्त्यर्थम् , तेन भूतपूर्वसर्वादेरपि-दक्षि- णोत्तरपूर्वाणाम् , "न सर्वादिः” (१।४।१२) इति सर्वादित्वाभावः ॥ कथं पश्चिमदक्षिणा, पश्चिमोत्तरा कथम् , कर्मधारयोऽयम्, बहुव्रीहौ हि सर्वनाम्नः पूर्वनिपातः स्यात् । रूढिग्रहणं यौगिकनिवृत्त्यर्थं तेन ऐन्द्रयाश्च कौवेर्याश्च दिशोर्यदन्तरालं इति वाक्यमेव- *इत्यादयोऽपीति इत्यत्रादिशब्दात् “आसन्नादूराधिकाध्यादिपूरणं द्वितीयाद्यन्या-१५ थे" (३।१।२०) आसन्नादीनि चत्वारि अर्धशब्दपूर्वपदं च पूरणप्रत्ययान्तं नाम सङ्ख्यावाचिना नाम्नै- कार्य समस्यते, द्वितीयाद्यन्तस्यान्यस्य पदस्यार्थे सहयेयरूपेऽभिधेये, स च समासो बहुव्रीहिसंज्ञो भवति । आसन्ना दश दशत्वं येभ्यो येपां वा ते आसन्नदशाः-नवैकादश वा । एवमासन्नविंशाः-एकोनविंश- तिरेकविंशतिर्वा, एवमदूरदशा अदूरविंशा । अधिका दश येभ्यो येषु वा ते अधिकदशा एकादशादयः । अधिकत्वं च दशानामेकाद्यपेक्षम् । अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः । एवमधिकविंशा एक-२० विंशत्यादयः । अद्ध्यर्दा विंशतिर्येपां ते अद्ध्यर्द्धविंशाः, त्रिंशदित्यर्थः । एवमद्ध्यर्द्धत्रिंशाः । अर्द्धपञ्चमा विंशतयो येपां ते अर्द्धपञ्चमविंशाः, नवतिरित्यर्थः । एवमर्द्धचतुर्थविंशाः, सप्ततिरित्यर्थः । अर्द्धतृतीय- विंशाः, पञ्चाशदित्यर्थः "अव्ययम्” (३।१।२१) अव्ययं नाम सङ्ख्यावाचिना नाम्नैकार्य समस्यते, द्वितीयान्ताद्यन्यार्थे सङ्ख्ययेऽभिधेये, स च समासो वहुव्रीहिसंज्ञो भवति । उप समीपे दश येषां ते उपदशाः-नवैकादश वा । एवमुपविंशाः, उपत्रिंशाः, उपचत्वारिंशाः । पुनरपि बहुव्रीहिविशेपमाह-२५ यत्रेत्यादि निगदसिद्धम् ।। ७ ॥ अथ बहुव्रीही पूर्वपदव्यवस्थामाह- विशेषणं सर्वादिसङ्ख्यं बहुव्रीहौ ॥ ८॥ [सि० ३।१।१५० ] विशेषणं सर्वादिकं सङ्ख्यावाचि च बहुव्रीहौ प्राक् स्यात् । गौणस्य गोशब्दस्य ड्यावन्तस्य चान्तस्थस्य ह्रस्वो वक्तव्यः । चित्रगुः । सर्वशुक्ल: । द्विकृष्णः ॥ ८॥ "विशेपण." चित्रगुरिति-चित्रा गावोऽस्येत्यत्र चित्रस्य विशेपणत्वात् पूर्वनिपातः । अत्र कार्य- विशेपं लेशेनाहौणस्येत्यादि, ड्याद्यन्तस्येति--ड्यन्तस्यावन्तस्य अङन्तस्येत्यर्थः-अत्रायं सूत्रसम्प्रदायः "गोश्चान्ते हस्त्रोऽनंशिसमासेयो वहुव्रीही” (२।४।९६) गौणस्याक्किपो गोशब्दस्य डयाद्य- न्तस्य च नानोऽन्ते वर्तमानस्य हस्खो भवति, न चेदसावनंशिसमासान्त ईयस्वन्तबहुव्रीयन्तो वा ३३ १ कल्याणी प्रियेत्यादी 'नाप्रियादी' (३।२।५३) इत्यादि प्रतिषेधः सावकाशः । भवत्पुत्र इत्यादी लयं विधिः । सर्वा प्रियाऽस्य सर्वप्रिय इत्यादी तूभयप्राप्ती द्वयोरन्यत्र सावकाशले परसादनेन पुंवद्भावः । ३० - . " कालवाचिभ्यः सुखादिशब्ददशकाच बहुव्रीही क्तान्तं वा पूर्व निपतति । जाति-शाङ्गरो जग्धोऽनयेति २६२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- भवति । एवं पञ्चभिर्गोभिः क्रीतः पञ्चगुः, कोशाम्ब्या निर्गतो निःकोशाम्बिः, खट्वामतिक्रान्तोऽतिखट्वः, अतिब्रह्मवन्धुः, प्रियवामोरुः । गौणस्येयेव-सुगौः, किंगौः, राजकुमारी, नक्षत्रमाला, परमब्रह्मवन्धू । अकिप इत्येव-गामिच्छति क्यन् गव्यतीति किप् गौः ततः प्रिया गौरस्य प्रियगौः । कुमारीमिच्छति क्यन् , किप् ततः, कुमारी, ततः प्रियश्चासौ कुमारी च प्रियकुमारी चैत्रः । गोश्चेति किम् ? अतितश्रीः, ५अतिलक्ष्मीः, अतिश्रीः, अतिभ्रूः । अन्त इति किम् ? गोकुलम् , कुमारीप्रियः, कन्यापुरम्-अन्न गोशब्दो डयाद्यन्तं च समासाथै न्यग्भूत वाद्गौणम् । अनंशिसमासेयो बहुव्रीहाविति किम् ? अर्द्ध पिप्पल्याः अर्द्धपिप्पली, बह्वयः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसीपुरुपः ॥ सर्वशुक्ल इति सर्व शुक्लमस्य सर्वशुक्ल:-अत्र सर्वादित्वात्सर्वशब्दस्य पूर्वनिपातः । द्विकृष्ण इति-द्वौ कृष्णावस्य द्विकृष्णम् , चतुर्हस्वः, पञ्चदीर्घः, पडुनतः, सप्तरक्तः, उन्नतरक्तशब्दौ न तान्तावपि तु गुणशब्दौ तेन स्पर्द्ध क्तलक्षणः पूर्वनिपातो न १० भवति-शब्दस्पर्द्ध परत्वात् सर्वादिसययोः सह्याया एष पूर्वनिपातः । त्र्यन्यः, द्वियुष्मत्का, व्यस्मत्कः। उभयोस्तु सर्वादित्वे पट्टे परस्य पूर्वनिपातः-द्व्यन्यः । बहुव्रीहाविति किम् ? उपसर्व प्रथमोक्तं प्रा (३।१।१४८) इत्यनियमे प्राप्ते नियमार्थ वचनम् । सर्वादिसययोर्विशेषणत्वेऽपि पृथग्वचनं शब्द- परस्य स्पर्द्धार्थम् ॥ ८॥ ताः ॥ ९॥[सि० ३३११५१] १५ क्तान्तं नाम बहुव्रीहौ प्राक् स्यात् । कृतकटः । *कचिदा । शाङ्गरजग्धी जग्धशागरा । मासयाता यातमासा । जातसुखा सुखजाता । आहितामिः अश्याहितः। A उद्यतासिः अस्युद्यतः “प्रियः" (३।२।१५७)। प्राग्वा । गुडप्रियः, प्रियगुडः ॥९॥ क्ताः । कृतकट इति-कृतः कटो येन सः तथा । क्तान्तस्य विशेषणत्वात्पूर्वेण सिद्ध्यति, विशेष्याथ तु वचनम् । फटे कृतमनेन कृतकटः । स्पर्द्ध परत्वार्थ च कृतभव्यकटः । वहुवचनं व्याप्त्यर्थं तेन २० कृतप्रिय इत्यत्रापि परेणापि स्पर्द्ध क्तान्तस्यैव पूर्वनिपातः । *क्वचिद्वेति कचिद्बहुव्रीही समासे क्तान्तं वा पूर्व निपतति । अत्रेयं सूत्रपद्धतिः "जातिकालसुखादेवा" (३।१।१५२) जातिवाचिभ्यः . व्यक्तिविव- सुखादयो विमहे "अनाच्छादजात्यादेर्नवा" (२।४।४७) इति क्तान्ताद् डीविकल्पे शागरजग्धी शागरजग्धा । क्तान्तस्य पूर्वनिपातपक्षे तु जग्धशागरा । जातिविशेपवचनोऽयम् । कटकृतः कृतकटः, २५क्षायां तु "क्ताः" इत्यनेन कृतकट इत्यायेव भवति । काल.-भासयाता । यातमासा । दश-सुसयाता यातसुसा दुःसहीना हीनदुःसा । सुख दुःख तृप्त कृच्छ्र अस्र अलीक करुण कृपण सोढ प्रतीप इति सुखादिः ॥ १० ॥ अिग्याहित इति "आहिताग्न्यादिपु" (३।१।१५३) आहितान्यादिपु पहुचीहिसमासेपु कान्तं वा पूर्व निपतति । आहितोऽमिर्येन स आहितामिः, अध्या- हितः । एवं जातपुत्रः २, जातदन्तः २, जातश्मश्रुः २, पीततेलः २, पीतघृतः २, पीतमद्यः २, पीतविपः २, ऊढभार्यः २, गतार्यः २, च्छिन्नशीपः २ । बहुवचनमापतिगणार्य तेन पीवधिः ३१धिपीन इत्यादयोऽपि भवन्ति । A अस्युद्यत इति "प्रहरणात्" (३।१।१५४ ) प्रहरणवाचिन १ अस्वाय तात्पर्यायः-अल्पसरलारसयाशब्दस्य पूर्वप्रयोग प्राप्त लक्षणातिक्रमेण विशेषणं सर्वादिसल्यमिति निर्देश: दापरताय तेन तत्र सहयति साशत चोमयोः प्रसादापोरन्या सावकाशलात परसात सपेति पूर्वप्रयोगो भवति २ गामान्येऽपि रावादित पाठारेशया य. परः सर्वादिसेन भाव्यम् । महाशब्दस्य तु सर्वादिले सादिते च पूर्वनिपात एक एमे पायोपदानात् । ३ ननु रादिगमाभ्यामारधेऽपि यमाहावन्यपदार्थस्य प्राधान्यातस र विशेष्यतादेतयोविशेषण- ताद्विसपाहणेनेय भपिम्पति, रिमय पगुगदाननिखारा !

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । बहुव्रीहिः २६३ शरदात् चान्तं बहुव्रीही पूर्व निपतति । उद्यतोऽसिरनेन उद्यतासिः अस्युद्यतः, कलितपहरणः प्रहरण. कलितः, आकृष्टधन्वा धनुराकृष्टः, उद्यतमुसलः मुसलोद्यतः । "प्रियः । स्पष्टम् ।। ९ ।। न सप्तमीन्द्वादिभ्यश्च ॥ १०॥ [सि० ३।११५५] इन्द्रादिभ्यः प्रहरणार्थाच सप्तम्यन्तं बहुव्रीहौ प्राग् न स्यात् । इन्दुमौलिः । चक्रपाणिः । "गड़ादिभ्यः” (३२१११५६)। वा । कण्ठेगड्डः । गडकण्ठः ॥ १० ॥ "न स.” इन्दुमौलिरिति इन्दुौलौ यस्य स इन्दुमौलिः । एवं शशिशेखरः, पद्मनाभः, पद्महस्तः, शङ्खपाणिः, दर्भपवित्रपाणिः पद्मपाणिरित्यादि । प्रहरणात्-चक्रं पाणी यस्य स चक्रपाणि:-एवं असि- पाणिः शूलपाणिः शाहपाणिः धनुःपाणिः धनुर्हस्तः पाशहस्तः खड्गहस्तः वज्रहस्तः वज्रपाणिः । बहु- लाधिकारात् पाणिवत्रः हस्तवन इत्यत्र पूर्वनिपातोऽपि । वहुवचनं प्रयोगानुसरणार्थम् , एवमुत्तरत्रापि । "गड्वा०” कण्ठेगडुरिति-एवं शिरसि गडुः गडुशिराः, शिरस्यरुः अरुःशिराः, मध्ये गुरुः गुरु-१० मध्यः, अन्ते गुरु: गुर्वन्तः, । व्यवस्थितविभापया बहेगडुरियेव भवति ॥ १० ॥ अथ वहुव्रीही पूर्वपदस्य कार्यविशेषमाह- परतः स्त्रीपुंवत्स्येकार्थेऽनूङ् ॥ ११॥ [सि० ३२१४९] परतो विशेष्यवशास्त्रीलिङ्गः स्त्रीवृत्तावेकार्थे उत्तरपदे परे पुंवत्स्यात् न तूङन्तः । दर्शनीया भार्या यस्य सः दर्शनीयभार्यः । परत इति किम् ? द्रुणीभार्यः । स्येकार्थ इति किम् ? गृहिणी-१५ नेत्राः । अनूडिति किम् ? करभोरूभार्यः ॥ ११ ॥ 'परत:०" । दर्शनीयभार्य इति-गुणवृत्तेराश्रयाद्वचनलिङ्गे' इति वचनात् दर्शनीयाशब्दः परतः स्त्री, एवं पटुभार्यः, कल्याणभार्यः, शोभनभार्यः । एनी भार्या यस्य स एनभार्यः । युवतिर्जाया यस्य स युवजानिः । कर्मधारयेपि-कल्याणी चासौ पञ्चमी च कल्याणपञ्चमी, पदी च मृद्री च पट्वी- मृड्यौ ते भार्य यस्य स पट्वीमृदुभार्यः । अन्न द्वन्द्वपदानां परस्परार्थसङ्कमात् व्यर्थस्य मृदुशब्दस्य व्यर्थेन २० भार्याशब्देन सामानाधिकरण्यमिति पुंवद्भावः । पूर्वस्य तु व्यवधानान्न भवति । अनूङिति किम् ? ब्रह्मवन्धूभार्यः । अनूङिति प्रसज्यप्रतिपेधात् , इडविडोऽपत्यं स्त्री "राष्ट्रक्षत्रियात्सरूपात्०” (६।१।११४) इत्यम् "द्रेरनऽणोऽप्राच्यभर्गादेः" (६।१।१२३) इति तस्य लुप् इडविड् सा चासौ भार्या च ऐडविडमा- येत्यादिपु "पुंवत्कर्मधारये (३।२।५७) इत्यनेन पुंवद्भावः, नत्वनेन-स्वाङ्गाद् ङीर्जातिश्चेति निषेधात् । पर्युदासे हि ऊसदशप्रत्ययान्तस्यैव पुंवद्भावः स्यादिति ॥ नन्वनूङिति निपेधोऽत्र सूत्रे किमुच्यते १२५ "नाप्रियादौ” (३।२।५३) इत्यादी निपेधाधिकारे एव युक्तः । सत्यम् । यद्यत्रैवं न कुर्यात्तत्रैव ऊङिति सूत्रान्तरं विदध्यात्ततो यथा नाप्रियादीनां निपेधानां "पुंवत्कर्मधारये" (३।२।५७) इति प्रतिप्रसव उक्तस्तथाऽस्यापि स वाधकः स्यात् , स मा भूदियेवमर्थमनूडिति वचनमत्र युक्तम् ॥ गुणीभार्य इति-द्रोण्यादिशब्दानां नित्यस्त्रीत्वान परतः स्त्रीत्वम् , एवं द्रोण्यादिशब्दानामपि । एवं कुटीमार्यः, पात्री- भार्यः। ननु कुटपात्रशब्दावन्यलिङ्गावपि स्तस्तत्कथमाविष्टलिङ्गत्वम् ? सत्यम् , कुटशब्दो गेहे पात्रशब्दस्तु ३० भाजने वर्तमानः स्त्रीलिङ्ग एव कैश्चिद्भुक्तस्तदभिप्रायेणेदमुच्यते इति । ननु द्रोण्यादीनां त्रयाणामाविष्ट- लिङ्गानां पुंवद्भावे किं स्यादित्याशङ्कायामाह-अत्र पुंवद्भावे शब्दतः प्रत्यासन्ना द्रोणकुटपानशब्दाः प्रामुयुः द्रुणीभार्यः वरदाभार्यः वडवाभार्यः । ननु द्रुणशब्दस्य वृश्चिकवाचकस्य 'वृश्चिको गुणः आल्यालिः' इति वचनात्पुंस्त्वमपि दृश्यते तत्कथं नित्यत्रीत्वम् ? सत्यम् । न तद्वैयाकरणसम्मतं कित्त्वऽभिधानकाराणा-३८ भक्ति इति पोडाकः प्रियादिगणः । वामेत्यप्यन्ये प्रियायामः । कथं दृढभक्तिरिति-इदं भचिरसे ર૬૪ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमर- 'मेय । ननु दुण्यादीनां त्रयाणामाविष्टलिङ्गानां पुंलिङ्ग प्रयोगादर्शनात्पुंवद्भावे किं स्यादित्यत्रोच्यते अन्न पुंवद्भावेऽर्थतः प्रत्यासन्नाः फूर्महंसाधशब्दाः प्रामुयुः । परतः स्त्रीत्यत्र स्त्रीति किम् ? प्रामणि कुलं दृष्टि- रस्य ग्रामणिदृष्टि:-अत्र ग्रामणिशब्दस्य परतो नपुंसकस्य पुंस्त्वं मा भूत् । गृहिणीनेत्रा इति-नेत्रमिय नेत्रम्, गृहिणीनेनं येपां ते तथा; अत्र यद्यपि नेत्रशब्दो गृहिणीशब्देन सहकार्थोऽस्ति, तथापि नासौ ५स्त्रीवृत्तिरिति । कल्याण्याः माता कल्याणीमातेत्यत्र स्त्रीवृत्तावुत्तरपदे सत्यपि नैकार्थ्यमिति ॥ ११ ॥ अत्र पुंवद्भावस्य विधिसूत्राणि चत्वारि सन्ति । तेष्वेकमिदमुक्तम् , त्रीणि च तद्विते पूरणप्रत्ययाधिकारे वक्ष्यन्ते । अतः परं चत्वारि पुंवद्भावप्रतिपेधसूत्राणि निरूप्यन्ते- खानान्डीऑतिश्चामानिनि ॥ १२ ॥ [ सि० ३२२२५६] खागायो डीस्तदन्तो जातिवाची च परतः स्त्रीपुंवन्न स्यात् । दीर्घकेशीभार्यः । शूद्राभार्यः । १० कठीभार्यः । अमानिनीति किम् ? दीर्घकेशमानिनी । कचिदन्यत्राप्येवम्-कल्याणीपञ्चमा रात्रयः । कल्याणीप्रियः । मद्रिकाभार्यः । कारिकामार्यः। द्वितीयाभार्यः । दत्ताभार्यः॥१२॥ "स्वाहा." । स्वाङ्गादित्यादि स्पष्टम् । अमानिनीति-मानिनि शब्दे चोत्तरपदे पुंवद्भावनिपेधो न भवति । दीर्घकेशमानिनी कठमानिनी । जातिवाचित्वेऽपि "आकृतिग्रहणान्जातिः, अत्रिलिगा च यान्विता । आजन्मनाशमर्थानां सामान्यमपरे विदुः" ॥ १ ॥ अत्र प्रथमजातिलक्षणानुसारेण कुमारी- १५ भार्यः किशोरीभार्यः इति भवति, द्वितीयलक्षणानुसारेण तु कुमारभार्य किशोरभार्य इति भवति, नहि फुमारत्वाद्युत्पत्तेः प्रभृत्याविनाशमनुवर्चते, दीर्घकेशीभार्य इति दीर्घाः केशाः यस्याः सा तथा "असह- नविद्यमान०” (२।४।३८) इत्यादिना डीः । कठीभार्य इति 'गोत्रं च घरणैः सहेति' कठीशब्दस्य जातियाचित्यम् । कचिदन्यन्नाप्येयमिति-बहुवीह्यादौ पूर्वपदस्य पुंबद्भावो न भवतीत्यर्थः । कल्याणी. त्यादि-अनेयं सूबवीयी-"नाप्रियादी" (३।२।५३) पूरण्यप्प्रत्ययान्ते ठयेकार्थे उत्तरपदे प्रियादी २०५ परे परतः खी पुंपन्न भवति । कल्याणी पञ्चमी रात्रिर्यासां ताः कल्याणीपश्चमा रात्रयः, "पूर- णीभ्यस्तत्प्राधान्येऽ” (७३।१३०) पूरणप्रत्ययान्तः स्त्रीलिङ्गशब्दः पूरणी, तदन्ताद्वहुप्रीहेर समासान्तो भवति, वत्प्राधान्ये-तस्याः पूरण्याः प्राधान्ये । समासेनाभिधीयमानो ह्यर्थः प्रधान भवति । अत्र रामयः समासार्थस्तासु पञ्चम्यपि रात्रित्वेनानुप्रविष्टेति प्रधानम् । कल्याणीप्रिय इति- फल्याणी प्रिया यस्य स तया, एवं भव्याप्रियः प्रियासुभगः कल्याणीदुर्भगः ॥ प्रिया मनोशा २५फल्याणी मुभगा दुर्भगा स्या क्षान्ता कान्ता वामना समा सचिया चपला याला तनया दुहित येयमस्लीपूर्वपदस्य विवक्षितत्वात् । मद्रिकामार्य इत्यादि अब सूत्रम् "तद्धिताककोपान्त्यपूर प्याख्या" (३२५४) तद्धितप्रत्ययस्याऽप्रत्ययस्य च यः कः स उपान्यो यासां वासदितार- फोपान्याः, पूरणीप्रत्ययान्ता आल्याः संशाः वदूपाश्च परतः खियः पुंवन्न भवन्ति । वद्धितक-मदिरा ३० भार्यः पृनिफामार्य: "पृजिमद्रादेशात्कः" (६३३८) इति च भवार्य कः । लाक्षिकीमार्यः ।। अफ-पारियामार्यः ।। पूरणी-द्वितीयामार्यः पद्ममीमाः ॥ आल्या-दत्तामार्यः ॥ क्यामानिपितद्धिते परेऽप्यासा परतः सीणां पुंपनायो न भवति । मद्रिकायते पृजिका वेश्या । एवं पायिकायते पापिका- मानिनी पापियाफला । पदमीयते पाटीमानिनी द्वितीयाक्सा | दत्तायते दजामानिनी दत्तास्ता । "तद्धितः स्वरदिहेतुरररायिकारे" (३२१५५) सरस्थानीयाया पुसेयों हेतुतद्धितो रताः २५तिकारापान्यप्राय पिदितसदन्तः परतः स्त्रीलिङ्गः पुंयन्न भपति । माधुरीमार्यः । मायुरीदेश्या ।

- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । बहुव्रीहिः नादेवीचरी । सांतङ्गमीयते । स्रोन्नीमानिनी । तद्धित इति किम् ? कुम्भकारी भार्याऽस्य स कुम्भका- रभावः । वृद्धिहेतुरिति किम् ? अर्द्धप्रस्थे भवा अर्द्धप्रस्थी सा भार्याऽस्य, अद्धप्रस्थभार्यः । *"अा- परिमाणस्याऽनतो वा त्वादेः" (७।४।२०) इति आदिखरस्य वृद्धिविकल्पे आर्द्धप्रस्थीत्सपि । *अर्द्धात्परिमाणवेति सूत्रस्थायमर्यः-अर्द्धशब्दात्परस्य परिमाणवाचिनः कुडवादेः शन्दरूपस्य मिति तद्धिते परे स्वरेष्वादेः स्वरस्थानतोऽकाररहितस्य वृद्धिर्भवति, वा त्वादे:-परिमाणात्पूर्वस्य त्वाब्दस्य ५ वा भवति । अर्द्धकुडवेन क्रीतं अर्द्धकौडविकम् आर्द्धकौडविकम् । अनत इति क्रिम् ? अर्द्धग्रस्थिकम् .. आर्द्धप्रस्थिक्रम्-आदिविकल्प उत्तरपदवृद्ध्यनपेक्ष इति भवस्येव । अतः प्रतिषेधादाकारस्य वृद्धिर्भव- येव । अर्द्धखार्या भवा अर्द्धखारीकः । कः पुनरत्र विशेषः सत्यामसत्यां वा वृद्धा ? | उच्यते । अर्द्धवारी भार्याऽस्य अर्घखारीभार्य इति । यद्यत्र वृद्धिप्रतिपेयः स्यात्तदायं तद्धितो न वृद्धिहेतुरिति पुंवद्भावप्रतिषेधो न स्याद्यथा अर्द्धप्रस्थभार्य इति । स्वरेति किम् ? वैयाकरणभावः । अन्ये तु वृद्धिमानहेतोगितस्तद्धितस्य १० पुंवत्प्रतिपेधमिच्छन्ति-तन्मते वैयाकरणीभार्यः । अरक्तविकार इति किम् ? कपायेन रक्ता कापायी, सा वृहतिकाऽस्य कापायवृहतिकः । लोहस्य विकारो लौही, लोही ईपाऽस्य लोहेपः ॥ १२ ॥ अथ बहुव्रीहिसमासे समासप्रत्ययप्रकरणं सङ्केपेणाह- टडापसन्कचितः ॥ १३ ॥ . सप्तैते समासान्तास्तद्धिता बहुव्रीहेः स्युः । पङ्कजाक्षीत्यादि ॥ १३ ॥ टडापेत्यादि-टश्च डच अप् च अस् च अन् च कच् च इत् च टडापसन्कचितः । सप्तैते इत्यादि स्पष्टम् । तद्धिता इति-एते समासान्ताः प्रत्ययास्तद्धितीया भवन्तीति ज्ञेयम् । पङ्कजाक्षीति-पङ्कजमिव अक्षिणी यस्याः सा तथा । अत्र पङ्कज अक्षि इति स्थिते- सक्थ्यक्ष्णः स्वाङ्गे (७३।१२६) स्वाङ्गबाची यः सक्थिशब्दोऽक्षिशब्दश्च तदन्ताबहुव्रीहेष्टः समासान्तो भवति ॥ १३ ॥ अत्रोप-२० योगिसूत्रमाह- अवर्णेवर्णस्य ॥ १४ ॥सि०७४।६८] अपदस्यानयोस्तद्धिते परे लुक् स्यात् । टित्प्रत्ययान्तानां स्त्रियां डीः । पङ्कजाक्षी स्त्री ॥१४॥ "अवणे. । अवर्णश्च इवर्णश्व अवर्णेवर्णम्, तस्य । अनयोरिति-अवर्णेवर्णयोः । अपदस्येति किम् ? शुक्लतमः ऊर्णायुः अत्र "नामसिय्यञ्जने” (११११२१) इति पदसंज्ञा । तद्धित इत्येव-२५ वृक्षः, अन्योः । टित्प्रत्ययान्तानामिति-"अणयेकण्ननट्टिताम्" (२।४।२०) इति डीः । पङ्क- जाली । एवं गौरं सक्थ्यस्या गौरसक्थी । स्वाङ्ग इति किम् ? दीर्घसक्थि शकटम् , स्थूलाझिरिनुः । टसमासान्तस्य शेपसूत्राण्येवम्-"वहुव्रीहेकाष्टे.टः” (७३।१२५) अमुल्यन्ताद्वहुव्रीहेः काप्टे वर्तमानाट्टः समासान्तो भवति । हे अमुली यस्य तत् ब्यङ्गुलम्, व्यङ्गुलम् , चतुरङ्गुलम् , पञ्चाङ्गुलम् अङ्गुलीसहशावयवं धान्यकण्टकादीनां विक्षेपणकाप्टमुच्यते । अङ्गुलिशब्दादयं विधिः । अङ्गुलीशब्दात्तु ३० द्वावमुलीसदृशावयवौ यस्य, ब्यङ्गुलीकं दारुरित्यायेव भवति ॥ "द्वित्रेनों वा” (७३।१२७) द्विमूर्द्धः द्विमूर्द्धा, त्रिमूर्द्धः त्रिमूर्द्धा, द्विमूर्धी नी । इति दप्रकरणम् ।। १४ ॥ ड इति-डः १ समासान्तविधेरनित्यत्वात् "अक्ष्णोऽप्राण्यग्ने" (५३१८५) इत्यनेनापि न भवति । है. प्रका० पूर्वा० ३४ .. - " ३३ 1 - २६६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- सुज्वार्थे सहया सहयेये सङ्ख्यया बहुव्रीहिः ॥ १५ ॥ [सि०३।१।१९) पारविफल्पार्धपोः सङ्ख्या सक्षया बहुव्रीहिः स्यात्, सङ्ख्येयार्थे । "प्रमाणीसङ्ख्या : (७३।१२८) द्विर्दश द्विदशा घटाः । द्वौ वा त्रयो वा द्विवाः पञ्चपाः ॥१५॥ "सुज्वा०" सुचोऽर्थो घारः, वाऽर्थो विकल्पः संशयो वा । सुज्वाथें वर्तमानं सहयावाचि नाम ५सद्धयेये वर्तमानेन सहयायाचिना नाना सहकार्ये समाससंक्षं बहुप्रीहिसंमं च भवति । "प्रमाणी" प्रमाणीदाब्दान्तात् सहपावाचिदान्दान्ताच बहुव्रीहेर्डः समासान्तो भवति । स्वी प्रमाणी येषां ते वीप्र. माणाः फुटुम्बिनः । साया, द्विदशा द्वित्रा इत्यादि । एवं निर्दश त्रिदशाः, द्विविशतितिर्विशालिविंशति- निविंशः । सुविकलार्थयोः समासेनेवाभिहितत्वादप्रयोगः । प्रमाणशब्देन सिद्धे कजभावार्थ प्रमाणी- । शब्दमहणम् । समान्तस्य प्रतिपदोक्तस्य बहुप्रीहेहणादिह न भवति । अत्रिः, प्रियपश्चाना । १० "सुप्रातसुश्वसुदिवशारिकुक्षचतुरश्रेणीपदाजपदप्रोष्ठपदभद्रपदम्" (७३।१२९) एते नव बहुव्रीयो इप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । शोभनं कर्म प्रातरस्य सुप्रातः पुमान् । शोभनं कर्म श्वोऽस्य सुश्वः । शोभनं कर्म दिवास्य सुदिवः । शाररिव कुक्षिरस्य शारिकुक्षः । तस्रोऽभयोऽस्य चतुरः । एण्या व पादावस्य एणीपदः । एवमजपदः । प्रोष्ठपदः-प्रोष्ठो गौः । भद्री पादावस्य भद्रपदः । निपातनात् पायो विपयव्यवस्था च भवति । इति डप्रकरणम् ॥ १५ ॥ अए । अन सूत्राणि-"पूरणीभ्यखाधान्येऽप्" (७।३।१३०) व्याख्यातं चेदं प्राक्- नसुव्युपत्रेश्चतुरः ॥ १६ ॥ [सि० ७१२१३१] अचतुराः । सुचतुराः । विचतुराः । उपचतुराः त्रिचतुराः । "नाभेर्नानि" (३३१३४) पद्मनाभः । "नमसुदुयः सक्तिसक्त्यिहलेवा" (७३।१३६ ) । सञ्जनं सक्तिः । असक्तः असक्तिः॥१६॥ "न" । अविद्यमानानि अदृश्यानि वा चत्वारि यस्य सोऽचतुरः । एवं मुचतुरः विचतुरः । चत्वारः समीपे येपां ते उपरायो पा प्रत्यारो का निचतुरा: । "नामे" पदं नाभी यस स पया । एवं ऊर्णनाभः, हेमनामः, यमनामा, हिरण्यनामः, । नानि इति किम् ? सरोजनामिः । एवं "अन्तर्प हि लोन्नः" (७३.१३२) अन्तर्लोमान्यस्य अन्तर्लोमः । एवं घहिलोमः "मानेतु (३३३१३३) मानक्षत्रवाचिनः परो यो नेतृशब्दसदन्ताहुनीहेरप् समासान्तो भवति । मृगो २५ नेता यासा मा मृगनया राज्यः । नेत्रशदेनेव सिद्ध नेशदात् क मा भूदिति पचनम् । “नन- पहो यो माणवचरणे" (७३।१३५) न विद्यन्ते ऋषोऽस्य अनृचो माणयः । एवं महप- शरणः । "न" नमादिभ्यो ये सध्यादयस्वदन्वादमीहेरम् समासान्तो पा भयति । असरू इति रिम् १ 'पंजी सो, सानं सहिः । अविधमाना सक्तिरस असक्तः, पो अससिः। एवं मुसः २, पुस २, महल, २, मुहटा २, दुईल: २। इससशब्दाभ्यां सिद्धे फजमायायं परनम् , १० तेन न विपसे टमस महटक इत्यादि न मयति । सक्पिशब्दानेच्छन्त्यन्ये । पपनभेदो ययासहर निरपर्यः । इत्यप् समासान्तप्रकरणम्-- "भजाया अम्' (सिक ३३१३७) "प्रजा." नमादयोऽनुपरन्ते । नमादिभ्या परो या शमशारा दशरवानी रस्ममासान्तो भयति ॥ १६ ॥ अन्नोपोमिसूत्रमार- " -- . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । बहुत्रीहिः २६७ नजत् ॥ १७॥ [सि० ३।२।१२५] उत्तरपदे परे नञः अ: स्यात् । अप्रजाः सुप्रजाः ॥ १७ ॥ "नबत्" स्पष्टम् । अप्रजा इति अविद्यमानाः प्रजा अस्य अप्रजाः । अप्रजसौ । अस्प्रत्ययान्तानां सुवचसूशब्दवद्रूपाणि ॥ १७ ॥ मन्दाल्पाच मेधायाः ॥ १८॥ [सि० ७।३।१३८] नादिभ्यस्त्रिभ्यो मन्दाल्पाभ्यां च मेधाया अस । अमेधाः। मन्दमेधाः। अल्पमेधाः॥१८॥ "मन्दा०" अमेधा इति-एवं सुमेधाः दुर्मेधाः मन्दमेधाः । इत्यल्समासान्तः ॥ १८ ॥ द्विपदाधर्मादन् ॥ १९ ॥ [ सि० ७३३३१४१] "समानस्य धर्मादिषु" (३।२।१४९) धर्मादावुत्तरपदे समानस्य सः । सधर्मा ॥ १९ ।। "द्विप०"। धर्मशब्दान्ताहिपदाबहुव्रीहेरन् समासान्तो भवति । अत्रोपयोगिसूत्रमाह "समा०"१० सधर्मेति-समानो धर्मोऽस्य सधर्मा, तथा समानो वा धर्मः सधर्मः । एवं समाना जातिरस्य सजातीयः । समानं नामास्य सनामा, समानं नाम सनाम इति वा । धर्म जातीय नाम गोत्र रूप स्थान वर्ण वयस् वचन ज्योतिस् जनपद रात्रि नाभि वन्धु पक्ष गन्ध पिण्ड देश कर लोहित कुक्षि वेणि इति द्वाविंशतिः धर्मादयः । (धर्मादिपु वचनान्तेपु नवसु) विकल्पमिच्छन्येके-कल्याणधर्मा कल्याणधर्मकः । द्विपदादिति किम् ? परमः स्वो धर्मोऽस्य परमस्वधर्मः । इह कस्मान्न भवति परमः १५ स्वधर्मोऽस्य परमस्वधर्मः ? प्रत्यासत्तेविपदस्य वहुव्रीहेर्यदि धर्म एवोत्तरपदं भवति तदा स्थान् इतीह न भवति । एवं "सुहरिततृणसोमाजम्भात्” (७।३।१४२) । जम्भशब्दोऽभ्यवहार्यवचनो दंष्ट्रा- वचनो वा । "दाढिका दंष्ट्रिका दाढा दंष्ट्रा जम्भो” इति अभिधानचिन्तामणिः । "जम्भः स्याहान- वान्तरे..."दन्तभोजनयो"रिति अनेकार्थः । स्वादिपूर्वो यो जम्भशब्दस्तदन्ताद्वहुव्रीहेरन् समासान्तो भवति-शोभनो जम्भो जम्भा वास्य सुजम्मा, हरितजम्मा तृणजम्भा, दंष्ट्रापक्षे तृणमिव जम्भोऽस्य तृण-२० जम्भा एवं सोमजम्भा । स्वादिभ्य इति क्रिम् ? चारजम्भः पतितजम्भः । “दक्षिणेाव्याघयोगे" (७३।१४३ ) । ईम्म वहु वणं वा दक्षिणमङ्गमीर्ममस्य दक्षिणेर्मा मृगः-व्यद्भुकामस्य व्याधस्य दक्षिणं भाग वहूकृत्य व्यधनानुकूलं स्थितो व्यावेन वा दक्षिणभागे कृतव्रण एवमुच्यते । व्याधयोग इति किम् ? दक्षिणेम शकटम् , दक्षिणेमः पशुः । इत्यन्समासान्तः ॥ १९ ॥ इनः कच् ॥ २० ॥[सि० ७।३।१७०] बहुदण्डिका सेना । "ऋन्नित्यदितः” (७१३३१७१) । बहुकर्डको बहुनदीको पहुवधूको देशः । “द्ध्युरःसर्पिमधूपानच्छाले” (७।३।१७२)। प्रियदधिकः । व्यूढोरस्कः । “पुम- नहुन्नोपयोलक्षम्या एकत्वे” (७३।१७३)। प्रियपुंस्कः । “नमोर्थात्" (७३।१७४)। अनर्थकं वचः । "शेपाढा" (७३।१७५) । बहुसदकः बहुखट्वः । *कचिन्न-बहुश्रेयान् बहुश्रेयसी ॥२०॥ "इन०" इन्नन्ताबहुव्रीहेः लियां कच् स्यात् । पहित्यादि-बहवो दण्डिनोऽन्यां सा तथा "अनिनन- मिन्ग्रहणान्यर्धवतानर्थकेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्तीति” मिनाद्यन्तानामपि भवति-यहुम्यामिका यहु- वाग्मिका पुरी । लियामियेव-बहुदण्डिको राजा । चकारो "न क”ि (२२४१०५) शनि विशेष-३३ - २६८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- णार्थः । “झन्नि" । "स्त्रीदूतः" (१।४।२९) इति सूनेण येभ्यो डितां नित्य दैदासाद्यादेशा भवन्ति ते नित्यदितः । ऋकारान्तानित्यदिदन्ताच बहुवीहेः कच् स्यात् । “ध्यु०" ध्यादिपटान्ता- द्वहुव्रीहेः कच् स्यात् । व्यूढोरस्क इति-एवं प्रियसर्पिष्कः प्रियमधुकः प्रियोपानकः प्रियशालिकः। "पुम" एकत्वविपये एतत्पश्चकान्ताद्वहुव्रीहे: कच् स्यात् । प्रियपुंस्क इति-एवं प्रियानडुत्कः प्रियनौका ५प्रियपयस्कः प्रियलक्ष्मीकः । एकत्व इति किम् ? द्विपुमान् द्विपुंस्कः । केचिल्लक्ष्मीशब्दाहित्वबहुत्वयो. रपि नित्यं कचमिच्छन्ति । अपरे तुल्ययोगेऽपि-सलक्ष्मीको विनाशित इति 1 "नमो०" नत्रः परो योऽर्थशब्दस्तदन्ताबहुव्रीहे: कच् स्यात् । न विद्यतेऽर्थोऽस्य अनर्थकं वचः । नम इति किम् ? अपार्थम् अपार्थकम् । "शेपा०" यस्माद्वहुव्रीहेः समासान्तप्रत्ययः आदेशो वा न विहितः स शेपस्तस्मात्कच् स्यात्, वा ॥ अस्यापवादमाह-*कचिन्नेत्यादि । अनायं विवेक:-"न नाग्नि" (७।३।१७६) । सज्ञाया १० कच् न स्यात् । बहुदेवदत्तः, एवंनामा ग्रामः । विश्वदेवः, पद्मश्रीः, एवनामानौ स्त्रीपुंसौ । “ईयसोः" (७३।१७७) । ईयस्वन्ताबहुव्रीहेः कच् न स्यात् । बहुश्रेयानिति । लिङ्गविशिष्टस्यापि महणात् बहवः श्रेयांसो बतयः श्रेयस्यो वा यस्याः सा बहुश्रेयसी । एव बहुप्रेयसी । “सहात्तुल्ययोगे" (७३।१७८)। तुल्ययोगार्थसहशब्दादेवहुव्रीहे: कच् न स्यात् । तुल्ययोगो वर्तिपदार्थस्य पुनादेव॒त्त्य- थेन पिनादिना सह क्रियागुणजातिद्रव्यैः साधारणः सम्बन्धो यथा सपुत्र आगतः। तुल्ययोग इति किम् ? १५सह विद्यमानानि लोमान्यस्य सलोमकः । सपक्षकः । “भ्रातुः स्तुतौ” (७३।१७९) । शोभनो भाताऽस्य सुभ्राता । स्तुताविति किम् ? मूर्सभ्रातृकः । "नाडीतन्त्रीभ्यां वाङ्गे" (७।३।१८०)। स्वाङ्गे यो नाडीतश्रीशब्दौ तदन्तात्समासात् कच् न स्यात् । बहुनाडिः कायः । बहुतश्री प्रीवा । तभी धमनी, याद्यन्ताभावान हवः । स्वाङ्ग इति किम् ? बहुनाडीकः स्तम्बः । बहुतनीका वीणा । "निष्प्रवाणिः" (७३।१८१) अन कजभावो निपात्यते । प्रोयतेऽस्यामिति प्रवाणी, तन्तुयायशलाका, २० सा निर्गतास्मादिति निःप्रपाणिः पटः कम्बलो वा । तबादचिरोद्धृत इत्यर्थः । गोश्चान्ते इस्ख०' । इत्यादिना हस्यः । ऊयतेऽस्यामिति वानिः । प्रभृता वानिः प्रवाणिः । सा निर्गता तन्तुभ्योऽस्येति निष्प- वाणिः सदश इत्येके । “सुभ्वादिभ्यः" (७।३।१८२) । एभ्यः कच् न स्यात् । सुभ्रूः लेखाभूः इलाकाः कोमलोः परोहः फीरो: । जातिषचनत्यादूदन्ता एते । एवं हि आमध्ये सौ हखो भवति । एतत्सर्व *कचिन्नेति सङ्घपेणाह । इति कच्समासान्तः ॥ २० ॥ सुप्रत्युत्सुरभेर्गन्धादिगुणे ॥ २१॥ [सि० ७.३३१४४] स्वादिपूर्वाद्गन्धादित्स्यात् । सुगन्धि द्रव्यम् । “वाऽऽगन्ती" (३२१४५)। सुगन्धिः सुगन्धो या कायः । “पाल्पे" (३३२१४६) । सूपगन्धि सूपगन्धं या भोजनम् “योपमानात्" (७३।१४७) । पनगन्धि पद्मगन्धं वा मुखम् । बहुचीही पादादीनां पात्प्रभृतयः आदेशाः समासान्ताः स्युः॥ २१ ॥ "सुपू०" । गन्धादिति-गन्धशब्दान्तादहुप्रीहेरित्यर्थः । शेपं स्पष्टम् । “वागं०" खादिचतुष्टयापर आगन्ती आहार्ये गुणे वर्तमानो यो गन्धशब्दस्तदन्ताबहुग्रीहेरित्स्यात् । काय इति-कायस्य स्वाभा- विषमुगन्धित्याभावात्तस्यागन्तुत्वम् । “पा०" अल्पेऽर्थे यो गन्धशब्दस्तदन्ताद्बहुप्रीहेरित् वा सात ३३सूपगन्धीति-सूपस्य गन्धो मात्राऽस्मिन् सूपगन्धि-अल्पसूपमित्यर्थः । असमानाधिकरण्येऽमि उपमुसाः १ समवे तु 'सहानुपायोगे' इति निषेधारका न भाति । २ वर्तन्ते पूर्वोत्तरपदान्यन् विदि वृत्तेवाइ' यति समा सखस पदानि रामपं.। - - ५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । बहुव्रीहिः २६९ दित्वात्समासः । “चोप०” उपमानात्परो यो गन्धशब्दस्तदन्ताहहुव्रीहेरिन् स्यात् । पद्मगन्धीति-पद्म- मिव गन्धो यस्य स तथा । इतीत्समासान्तः॥ २१ ॥ अथ बहुव्रीही आदेशान् समासान्तान् सझेपतो वक्तुमुपक्रमते-बहुव्रीहा- वित्यादि। पात्पादस्याहस्त्यादेः ॥ २२ ॥ [ सि० ७।३।१४८] हस्त्यादिवर्जादुपमानात्पादस्य पात् , अघुट्टरादौ, पदादेशश्चास्य । व्याघ्रपात् । व्याघ्रपदः पश्य । हस्त्यादिनिषेधात् हस्तिपादः। “सुसङ्ख्यात्” (७।३।१५०)। सुपात् द्विपात् । “वयसि" (७।३।१५१)। दन्तस्य दतः । ऋकारो नोऽन्तार्थः । सुदन् द्विदन् वालः । “वाग्रान्तशुद्धशुभ्र- वृपवराहाहिमूपिकशिखरात्” (७३।१५४) । कुन्दाग्रदन् कुन्दाग्रदन्तः । शुद्धदन् शुद्ध- दन्तः । "धनुपो धन्वन्” (७३।१५८) । शार्ङ्गधन्वा । “वा नान्नि" (७३।१५९) ।१० पुष्पधन्वा । पुष्पधनुः । “जायाया जानिः” (७३।१६४)। भूजानिः । “स्त्रियामूध- सोऽन्” (७।३।१६९)। कुण्डोत्री गौः ॥ २२ ॥ इति बहुव्रीहिः । "पात्पा.” अघुट्स्वरादाविति-अत्र सूत्रम्, “यस्वरे पादः पदणिक्यघुटि' (२।१।१०२ णिक्यघुट्वर्जे यादौ स्वरादौ च प्रत्यये पादस्य पद् स्यात् । व्याघ्रपादोऽपत्यं वैयाघ्रपद्यः । व्याघ्रपदः पश्य । अणिक्यघुटीति किम् ? व्याघ्रपादमाचष्टे व्याघ्रपादयति । व्याघ्रपादमिच्छति व्याघ्रपाद्यति ।१५ व्याघ्रपादौ । हस्त्यादीत्यादि-हस्तिन् अश्व कटोल कटोलक कण्डोल कण्डोलक गण्डोल गण्डोलक गडोल गडोलक गण्ड महेला दासी गणिका कुसूलं कपोल जाल अज १८ इति अष्टादशको हस्त्यादिः । "कुम्भपद्यादिः” (७।३।१४९) । कुम्भपद्यादयः शब्दाः कृतपात्समासान्ता ड्यन्ता एव बहुव्रीहयो निपात्यन्ते । कुम्भपदी जालपदी एकपदी शतपदीयादि । “सु०”। सुपूर्वस्य सङ्ख्यापूर्वस्य च पाद- शब्दस्य वहुव्रीही पादित्ययमादेशः समासान्तः स्यात् । “वयसि । सुपूर्वस्य सङ्ख्यापूर्वस्य च दन्त-२० शब्दस्य वहुव्रीही वयसि गम्यमाने दतृ इत्ययमादेशः समासान्तः स्यात् । “वाग्रां०" । अग्रान्तेभ्यः शुद्धादिभ्यः सप्तभ्यश्च परस्य दन्तशब्दस्य वहुव्रीहौ दतृ इत्यादेशः स्यात् । अत्रेदं ज्ञेयम्-"स्त्रियांनान्नि” (७।३।१५२)। नित्यम् । अयोदती फालदती परशुदती-एवंनामा काचित् । “श्यावाऽरोकाद्वा” (७।३।१५३) । संज्ञायाम् । श्यावाः कपिशाः, अरोका निश्छिद्रा निर्दीप्तयो वा दन्ता अस्य श्यावदन् श्यावदन्तः, अरोकदन् अरोकदन्तः । पात्प्रभृतय इत्यत्र २५ प्रभृतिग्रहणाच जुज्ञादयोऽप्यादेशाः सूचिताः । तथाहि "सम्प्राजानोर्जुज्ञौ” (७३।१५५)। सङ्गते जानुनी अस्य संजुः संज्ञः । प्रगते प्रवृद्धे प्रणते प्रकृष्टे वा जानुनी अस्य प्रक्षुः प्रज्ञः । “वोद्धात्" (७।३।१५६) । ऊर्ध्वः ऊर्ध्वज्ञः ऊर्वजानुः । “सुहृदुर्हन् मित्रामित्रे” (७।३।१५७) । मित्रे सख्यौ अमित्रे शत्रावभिधेये एतौ निपात्येते । मित्रामिन इति किम् ? सुहृदयो मुनिः, दुहृदयो व्याधः "खरखुरान्नासिकाया नस्” (७३।१६०) । खरा खरस्येव नासिकाऽस्य खरणाः । खुर इव ३० नासिका यस्य खुरणाः । “अस्थूलाच नसः” (७।३।१६१)। स्थूलवर्जितात्पूर्वपदात् खरखुराभ्यां च नासिकाया नसः स्यात् , नान्नि । द्रुणसः खरणसः खुरणसः । अस्थूलादिति किम् ? स्थूलनासिकः । "उपसर्गात्” (७१३५१६२) । उपसर्गग्रहणं प्रादीनामुपलक्षणम् , मासिकाशब्दस्याक्रियार्थत्वेन तं प्रत्युपसर्गत्वायोगात् । “यत्रोपसर्गत्वं न सम्भवति तत्रोपसर्गशब्देन प्रादयो लक्ष्यन्ते न तु सम्भवत्यु-३४

"प्रथमोतं." । सष्टम् । स्त्रीपु अधीति सप्तम्यर्थस्यैवार घोतकोऽधिः । स्त्रीपु अधि इत्यलौकिक
२७०
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु-
पसर्गत्वे" इति म्यायात, अस्मात्परस्य नासिकाशब्दस्य बहुवीही नस इत्ययमादेशो भवति । प्रगता
प्रवृद्धा या नासिकाऽस्य प्रणसं मुखं "नसस्य' (२१३१६५) इति ण। । उन्नता उद्गता वा नासिकाऽस्य
उन्नसं मुखम् । असंज्ञार्थं वचनम् । “वे खुनग्रम्” (७३३१६३) । विशब्दादुपसर्गात्परस्य
नासिकाशब्दस्य बहुव्रीहौ एते आदेशाः स्युः । विगता नासिकाऽस्य विखुः विनः विनः । उपसर्गादि.
५त्येव-वे पक्षिण इव नासिकाऽस्य विनासिकः । “व्युदः काकुदस्य लुक" (७।३।१६५) । आभ्यां
परस्यास्य बहुव्रीही लुगन्तादेशो भवति । विगतं काकुदं ताल्वस्य विकाकुद् उत्काकुत् । “पूर्णादा"
(७।३।१६६) । पूर्णकाकुद् पूर्णकाकुदः । “ककुदस्यावस्थायाम्” (७३।१६७)। अवस्था वयः,
फकुदं घृपस्कन्धम् , कूटम्, ककुदशब्दस्य बहुव्रीही अवस्थायां गम्यमानायां लुग समासान्तो भवति । न
सञ्जातं ककुदमस्य असञ्जातककुद्-वालः । पूर्णककुद्-युवा । स्थूलककुद्-बलवान् । यष्टिककुद्-नाति-
१० स्थूलो नातिशः। सन्नककुद्-कृशः। पन्नककुद्-वृद्धः । अवस्थायामिति किम् ? श्वेतककुदः । ककुच्छब्दे-
मैव सिद्धे ककुदशब्दस्यास्मिन् विपये प्रयोगनिवृत्त्यर्थं वचनम् “त्रिककुद गिरौं” (७।३।१६८)!
निपात्यते । त्रीणि ककुदानि तदाकाराणि शिसराण्यस्य स तथा । निपातनं गिरिविशेषप्रतिपत्त्यर्थ
तेनान्यस्मिन् गिरौ विककुद इत्येव । “धनु" "वा ना." "जाया०" इति सूत्रत्रयं स्पष्ठम् ।
"स्त्रियां" । स्त्रियां वर्तमानस्य अधस्शब्दस्य बहुबीही नकारादेशः समासान्तो भवति ॥ २२ ॥
इति बहुव्रीहिः ।
'अथाव्ययीभावं निरूपयति'
विभक्तिसमीपसमृद्धिव्युद्धयर्थाभावात्ययासम्प्रतिपश्चाक्रमख्यातियुगप-
सक्सम्पत्साकल्यान्तेऽव्ययम् ॥ २३ ॥ [सि० ३३१३९]
एप्पर्थेषु वर्तमानमव्ययं नाम्ना सह पूर्वपदार्थे वाच्ये नित्यं समासोऽव्ययीभावः सात् ।
२० विभक्तिः-विभत्त्यर्थः कारकम् । स्त्रीपु अघि इति विग्रहे ॥ २३ ॥
"विभक्ति." एप्पर्थेविति विभत्त्यादिपु अन्तपर्यन्तेषु पञ्चदशवर्थेषु इत्यर्थः ॥ २३ ॥
प्रसङ्गात्सर्वत्रापि समासप्रकरणे पूर्वपदव्यवस्थामाह-
प्रथमोक्तं प्राक् ॥ २४ ॥ [सि०३११४८]
अत्रं समासप्रकरणे प्रथमान्तेन सूत्रे यनिर्दिष्टं तत्मार सात् इत्यव्ययस्य पूर्वभाव,
२५ "ऐकायें" (३२२८) इति विभक्तिलोपः । अधिस्त्रि इति भवति ॥ २४ ॥
"द्वन्द्वकत्याव्ययीभावी" इत्यव्ययीभावस्स क्लीयत्वात् हस्वत्वम् । नामसंज्ञायां सादिः।
१५
विप्रयास्यम् । अत्र निपातेनाभिहितेऽप्यधिकरणे वचनसामर्थ्यात्सप्तमीति कौमुद्याम् । न्यासे -
अनाधिशब्दस्य शुमानेकार्यवृत्तेराधाररूपविभक्त्यर्थवृत्ति प्रकाशयितुमुत्ताधारस्यापि सप्तम्यन्तेन
३० स्त्रीशब्देन समास इति ॥ २४ ॥ अधिखि इत्यान्द्वकत्वेत्यादिलिदानुशासनवचनात् छीयत्वे हस्सत्वे
सागुत्पत्तो प सूत्रम् ।
अनतो लुप् ॥ २५॥ [सि० श६]
३३ अदन्तावाप्पपीमावस्य सादेर्लप् स्यात् । अधिनि गृहकार्यम् ॥ २५ ॥

- "अम" प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । अव्ययीभावः २७१ "अन." स्पष्टम् । अधिस्त्रि गृहकार्यमिति विभत्तयर्थेऽव्ययीभावः ॥ २६ ॥ अथ समीपार्थेऽ. व्ययीभावमाह-तत्र कुम्भस्य समीपमिति विग्रहे प्राग्वत् उपकुम्भ इति जाते स्याद्युत्पत्तौ सूत्रम् । अमव्ययीभावस्यातोऽपञ्चम्याः ॥ २६ ॥ [सि० ३।२।२] अदन्तस्याव्ययीभावस्य स्यादेरम् स्यात् , न तु पञ्चम्या: । उपकुम्भमस्ति, पश्य, देहि, देशः । उपकुम्भादानय । “वा तृतीयायाः" (३।२।३)। उपकुम्भं उपकुम्भेन कृतम् । “सप्तम्या५ वा" (३।२।४)। उपकुम्भं उपकुम्भे निधेहि ॥ मद्राणां समृद्धिः सुमद्रम् ॥ विगता ऋद्धि- य॒द्धिः । यवनानां व्यद्धिर्दुर्यवनम् ॥ अर्थाभावो धर्मिणोऽसत्त्वम् । मक्षिकाणामभावो निर्मक्षि- कम् ।। अत्ययोऽतीतत्त्वम् । वर्षाणामत्ययोऽतिवर्षम् ।। असम्प्रति इति वर्तमानकाले उपभोगाद्य- भावः । कम्बलस्थासम्प्रति अतिकम्बलम् ॥ रथस्य पश्चादनु रथं याति ॥ ज्येष्ठस्य क्रमेणानुज्येष्ठं प्रविशन्तु ॥ भद्रवाहोः ख्यातिरिति भद्रबाहु अहो भद्रबाहु ॥ चक्रेण युगपत् सचक्र धेहि । १० "अकालेऽव्ययीभावे” (३।२।१४६) सहस्य सः ॥ व्रतेन सदृक् सव्रतम् ॥ ब्रह्मणः सम्पत् सब्रह्म साधूनाम् ॥ तृणैः सह सकलं सतृणं भुते ॥ पिण्डेपणापर्यन्तमिति सपिण्डेपणमधीते । अत्र सर्वत्राव्ययार्थप्राधान्यमित्यादि प्राग्वत् ॥ २६ ॥ स्पष्टम् । तृतीयायां विशेपमाह-सूत्रम् "वा०” स्पष्टम् । सप्तम्यां विशेपसूत्रम् "सप्त" । उपकुम्भमित्यादि-अस्तीत्यादिक्रियापदैः प्रथमाद्यन्तत्वमव्ययीभावे दर्शितम् । समीपार्थ-१५ ग्रहणात् समया ग्रामम् , निकषा लङ्काम् । आराद्वनादित्यत्र तु नाव्ययीभावः । अभितः-परितः-अन्यारा- दिति द्वितीयापञ्चम्योर्विधानसामादिति कौमुद्याम् । श्रीहेमसूरिभिस्तु नेदमुदाहृतम् । समया-निकषायोगेऽपि द्वितीयाविधानसामर्थ्यस्य जागरूकत्वादिति । इति समीपार्थेऽव्ययी- भावः। अथ शेषेष्वर्थेषु क्रमेणाव्ययीभावानाह-समृद्धिरिति । सम् इत्याधिक्ये ऋद्धे- राधिक्यमित्यर्थः । व्यद्धिरिति ऋद्धेरभाव इत्यर्थः । अत्र दुर्यवनमित्यादौ यवनादेरुत्तरपदार्थस्य यो २० धर्मः ऋद्धिलक्षणस्तस्याभावो, नतूत्तरपदार्थस्य धर्मिण इत्यर्थाभावात् भिद्यते, तत्र हि निर्मक्षिकमित्यादौ धर्मिण एवाभाव इति धर्मिणोऽसत्त्वमिति । अन धर्मिणो मक्षिकादेरनुत्पत्तिरेव, नतु सतोऽभाव इत्यर्थाऽभावोऽत्ययाद्विशिष्यते । अत्ययो हि सतोऽतिक्रान्तकालसम्बन्धिनी सत्तैवोच्यते, न साम्प्रति- कवस्त्वभाव इत्यर्थाभावाद्भिद्यते । ननुं च वर्षाणामत्ययो नाम वर्षाणामभाव एव, प्रध्वंसाभावो हि सः, तत्रार्थाभाव इत्येव सिद्धे किमर्थमत्ययग्रहणमित्यत्रोच्यते-अर्थाभाव इति । धर्मिणोऽसद्भावमात्रमुच्यते; २५ यथा निर्मक्षिकमिति मक्षिका भूत्वा वा माभूवन्नभूत्वा वा परमधुना तास्तत्र सर्वथा न सन्तीयेताव- न्मानं प्रतीयते नतु प्राक् पश्चाद्वेति विशेपः । अत्ययस्तु सत एवातिक्रान्तत्वमिति । असम्प्रतीति- सम्प्रतीत्यव्ययमिदानीमित्यर्थे– “साम्प्रतमधुनेदानी सम्प्रत्येतहि” इति अभिधानचिन्तामणिवच- नात् । वाहुलकादसमर्थसमासोऽयम्-यथाऽसूर्यम्पश्या इत्यत्र सूर्यमपि न पश्यन्तीति परपुरुषाविलोकिन्यो ज्ञायन्तेऽन्यथा सूर्य तु पश्यन्येवेत्यसमर्थपदत्वम् , एवमत्राप्यसम्प्रतीति न सम्प्रतिकालो निपिध्यते किन्तु ३० सम्प्रतिकाले उपभोग इति । अतिकम्बलमिति, कम्बलस्योपभोगं प्रति नायं काल इत्यर्थः । एवं निद्रा सम्प्रति न युज्यते इत्यतिनिद्रम् इति । अनुरथमिति ननु पश्चादित्यव्ययस्यापि पश्चादर्थत्वाव्यभिचारान्नित्यसमा- सत्वाच्च रथस्य पञ्चादिति वाक्यं न प्राप्नोतीत्यत्रोच्यते-पश्चाच्छब्दस्य तु नायं समासः, ततः पश्चात् संस्यते इति भाष्ये प्रयोगादिति कौमुद्याम् ।न्यासे तु "सर्वपश्चादादयः” ( ३।११८०) इति वचना- त्पश्चाच्छब्दस्याव्ययीभावसमासविपये नाव्ययत्वम्, तथात्वे हस्याव्ययीभावप्राप्ती तत्पुरुपो न स्यात् । ३५ -- २७२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- न हि गतिकन्यतत्पुरुषः" (३१११४२) इयतोऽन्य इत्यधिकारादन्य इत्यस्य च पहुबीधादिलक्ष- परहित इत्यर्थात् । ज्येष्ठस्येति, मेणेति-क्रम आनुपूर्व्यम् । ख्यातिरिति स्यातिः शब्दप्रथा इति । भद्र- वाहिति-एवं तद्रवाहु अहो भद्रबाहु भद्रबाहुशब्दस्य लोके प्रकाश इत्यर्थः इति । तत् अहो इत्येषां चादित्वादसत्त्ववृत्तित्वेऽपि अन ख्यातियाचित्वाद्वृत्तिविपये सत्त्ववृत्तित्वम् । निष्कौशाम्बिरतिसट्दः ५प्रकटो विकट इत्यादिवृत्तिविषये तथादर्शनात्ततश्च भद्रवाहोः ख्यातिरिति स्वरूपपरेण पष्ठचन्तेन भद्र- बाहुशब्देन ख्यात्यर्थानामिति प्रभृतीनां समास इति । चक्रेण युगपदिति-युगपत् एककालार्थः । सचक्रं घेहीति चत्रेण सहकरालं चाणि वा युगपद्धेहीत्यर्थः । शब्दशक्तिस्वाभाव्याचान्यपदार्थप्रधानोऽयम् , योगपद्यार्थों हयमव्ययीभावः । अनोपयोगिसूत्रम्-"अका.” । अयं भावः-सहशब्दस्याऽकाल. चाचिन्युत्तरपदेऽव्ययीभाव समासे सादेशो भवति । अकाल इति किम् ? सपूर्वाह शेते साकल्येऽयम. १०च्ययीभावः । अनायं विशेप:-"ग्रन्थाते" (३।२।१४७) । ग्रन्थान्तवाचिन्युत्तरपदेऽव्ययीभाव सहस्त्र सः स्यात् । क्लामन्तं कृत्वा सकलज्योतिपमधीते । एवं सकाष्ठं समुहूर्तम् । कलादिशब्दाः कालविशेष- चाचिनोऽपि तत्सहचारिपु ग्रन्थेषु वर्तन्ते इति ग्रन्थान्तयाचित्वमुत्तरपद्स्य अन्त इत्यव्ययीभावः । यालार्थ आरम्भः । सवतमिति व्रतस्य सहशामित्यर्थः । एवं सशीलं सदेवदत्तमित्यादि । ब्रह्मणः सम्पदिति सम्पत् सिद्धिः । सिद्धिरात्मभावनिप्पत्तिः, समृद्धिस्तु ऋद्धेराधिक्यमित्यनयोमिथो विशेपः । साधूना १५ सप्रोति, सम्पनं ब्रह्मेत्यर्थः । एवं सवृत्तं मुनीनाम्, सक्षमिक्ष्याकूणाम् । सतृणमिति तृणमप्यपरित्यज्य मुके। अन न विश्चित्त्यजतीति साकल्ये तात्पर्य न तु तृणभक्षणे इति । प्राग्वदसमर्थसमासोऽयम् । अन्ते इति अन्तः समातिः । पिण्डेपणेति दशवकालिकश्रुतस्कन्धस्य पञ्चममध्ययनम् । तत्पर्यन्तमधीते, न तु सक्लान्यमिति । तथाः श्रीसूरयः-अब समाप्तिरसक्लेऽप्यध्ययने प्रतीयते इति साफल्येऽ- नन्तर्भावः । पूर्वपदार्थ इत्येव-समृद्धा मद्राः सुमद्राः । अव्ययमित्येव-समीपं कुम्भस्य ।। २६ ॥ योग्यतावीप्सार्थाऽनतिवृत्तिसादृश्ये ॥ २७॥[सि० १४०] एतदर्थानामव्ययानामव्ययीभाषः साद । रूपस्य योग्यमनुरूपम् । अर्थमर्थ प्रति प्रत्यर्थ समीक्ष्यते । शक्तिमनतिकम्य यथाशक्ति दत्ते । शीलर सारश्यमिति सनीलमनयोः ॥२७ ।। "योग्यता" । एतदर्थानामिति एते चत्वारोऽर्था येषामिति । अनुरूपमिति-अनानुयोग्यतायाम् । प्रार्थमिति -अन्न प्रति चीप्सायाम् , समासेन वीप्साया उक्तत्वान्न सनिमित्ता द्विात्तिः । "भागिनि प २५ प्रतिपर्यनुमिः" (२१२१३७ ) इति द्वितीयाविधानादर वाक्यमपि भवति । वास्ये तु लक्षणायने. पार्थसम्भवाहिरुतिमन्तरेण वीप्सा न प्रतीयते इति "वीप्सायाम्” (७४।८०) इत्यनेन द्विर्भायः । यीप्मा घ एयरसाहायुताना यहूना सजातीयानामर्थानां साकल्येन प्रत्येक नियया गुणेन द्रव्येण जाया या युगपत् प्रयोगामुमिच्छा, तस्यां यद्वर्तते शन्दरूपं तहिमच्यते । वीप्सा च स्वायन्तेप्रेय भयतीति तेगमेय द्विचनम्-पृशं वृक्षं सिधति, मामो मामो रमणीयः, गृहेऽश्वाः, योद्धा २ क्षत्रिय ३० इत्यादि । यथाशतीति-यथाशन्दो अत्र अर्थानतिवृत्ती, अर्थानतिवृत्ति पदार्थानविनमः । पदमुरारपर शपयारिरूपं सम्पामामायं तम्यानविक्रमशी नाम विन्यामविशेष इति प्रमानेदः । मूर्तस्थाने. पम्म पदार्यप नियतदेशापेशं व्ययस्थापन पिन्यामः, स एव विशेषः । पूर्वस्ये सहाहणेनेर सिक 'द सायमहणं मुन्यमाश्यपरिमहणार्यम्, सरगदो दि धर्मियाचीति पत्रम्य सग स मैत्र इनारि मामानाधिपरण्यमेप मा । मायालु धर्मयाचीति, ६ साटरमाणे अंग्रम्प २५ माश्यं स पेयमेप्रम्पेरी पैयधिपरण्यमपि मिस्सी ॥ २७ ॥ - पेन- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । अव्ययीभावः २७३ यथाऽथा ॥ २८॥ [सि० ३११४१] थाप्रत्ययरहितमव्युत्पन्नं यथेत्यव्ययं नाम्ना समस्यते । यथारूपं चेटते । अथेति किम् ? यथा चैत्रस्तथा मैत्रः ॥२८॥ "यथा०" थाप्रत्ययेत्यादि-अयं भावः-द्वौ यथाशब्दो; एकस्तावत् थाप्रत्ययरहितमव्युत्पन्नमव्ययम् , अन्यस्तु थाप्रत्ययान्तं व्युत्पन्नमव्ययम् । तत्राव्युत्पन्नस्य यथेत्यव्ययस्य योग्यतादिप्वनेनाव्ययीभावः५ स्याद्यथारूपं चेष्टते रूपस्य योग्यमित्यर्थः । यथावृद्धमर्चय-वीप्सेयम् , ये ये वृद्धास्तानित्यर्थः । नन्वत्र क्रमोऽपि प्रतीयते--उच्यते, प्रतीयतां क्रमो वीप्सापि तु प्रतीयते, नोकोऽनेकार्थी न स्यात् । यथासूत्रं चेष्टते-सूत्रानतिवृत्त्येत्यर्थः । एतच्च "योग्यतावीप्सा.” (३।१।४०) इत्यादिसूत्रेण सिद्ध्यत्येव, परन्त्वस्य सादृश्ये समासप्रतिषेधार्थ वचनमत एवायमव्युत्पन्नः सादृश्ये नास्तीति प्रतीयते, व्युत्पन्नस्य थाप्रत्यया- न्तस्य यथाशब्दस्य "विभक्तिसमीप०” (३।११३९) इत्यादिसूत्रेण सहगर्थे "योग्यतावीप्सा.” इत्यादि-१० सूत्रेण वा सादृश्यार्थे प्राप्तोऽव्ययीभावोऽथेत्यनेन निपिध्यते । तथाहुः श्रीसूरयः-पूर्वेणैव सिद्धे सादृश्ये प्रतिपेधार्थ वचनमिति । ननु यथा चैत्रस्तथा मैत्र इत्यादौ चैत्रसदृशो मैत्र इत्यर्थ एव प्रतीयते इति सहगर्थ एवायं न तु सादृश्यार्थ इति क्रिमुक्तं सादृश्ये प्रतिपेधार्थमित्यत्रोच्यते-सादृश्योपाधिकत्वा- सहगपि सादृश्यशब्देनोच्यते इति यथा चैत्र इत्यादि । “प्रकारे था” (७।२।१०२)। सप्तम्या इति निवृत्तम् । यथासम्भवं विभक्तिसामान्यस्य भिद्यमानस्य भेदान्तरानुप्रवृत्ती भेदः प्रकारसस्मिन् १५ वर्तमानात् किमब्यादिसर्वाद्यऽवैपुल्यवहोः थाप्रत्ययो भवति । सर्वण प्रकारेण सर्वथा । एवं यथा तथा उभयथा अन्यथा अपरथा इतरथा; बहोस्तु परत्वाद्धा भवतीत्यादि । अयं च थाप्रत्ययान्तो यथाशब्दः केवलः सादृश्ये । तथोक्तमलङ्कारचूडामणी-उपमावाचका इव-वा-यथाशब्दाः । अत्रोदाहरणं "क्षणं कामज्वरोच्छित्त्यै भूयः सन्तापवृद्धये । वियोगिनामभूचान्द्री चन्द्रिका चन्दनं यथा" ।। १ ।। सथायं प्रकृतार्थी प्रदर्शने यथालङ्कारचूडामणौ-सा उपमा वाक्ये वृत्तौ च भवति । वाक्ये यथाशब्दः २० प्रस्तुतार्थो प्रदर्शने प्रयुक्तः किं च तथाशब्दसमभिव्याहृतोऽयं सादृश्ये यथा चैत्रस्तथा मैत्र इति । अयमुपेक्षायाम्-यथातथा वा तद्भूयादनेनाप्रस्तुतेन किम् ? अयमविचारितभापणेऽपि यथातथा जलति वालिशोऽयमिति । सत्येऽप्ययम्-ऋतं तथ्यं यथातथमित्यादि । सर्वपामप्येपां थाप्रत्ययान्तत्वादेव न समासस्ततः सुसूचितमाचार्यः यथाऽथेति । कौमुद्यां तु "यथाऽसादृश्ये" असादृश्ये एवं यथाशब्दः समस्यते इत्युक्तमिति ज्ञेयम् ॥ २८ ॥ यावदियत्वे ॥ २९ ॥[सि० ३।१।३१] इयत्त्वे गम्ये यावदिति समस्यते । यावन्त्यमत्राणि तावन्त इति यावदमत्रं श्राद्धान् भोजय ॥ २९ ॥ "याव" इयं परिणाममेपामिवन्तः "इदं कि.मोऽनुरितिय चान्य' (१९१५८) गि सिद्धिः । इयतां परिच्छिन्नमामानामियनो वा परिच्छिन्नपरिमाणम भार व्ययम , नम्मिन गमन १३० यावन्त्यमबाणीत्यत्र विज्ञाननापरिमागरगनायन इति श्राद्धपरिमाणित गम्यने । यानीदनी यावदोदनम . चावानवकागो चावदवकाममिन्यत्रावच्छिन्नपरिमाणनोदनादिना मालपग्मिानमवसायो । चावदित्यव्यगमनन्य च गृाते । अन्यमेवेन्यन्ये । नत्रानध्य बनाया गनगी " (७१११११५) :नि सावादिना अनुमत्संचन नि । माया गावदमान.३५ १०मा० ..

२५पाचिना समस्यते । अनुवनमिति-अनोरव्ययत्वाद् "विभक्तिसमीप०" (३।११३९) इत्यादिनेव नेत्यम्य निवृत्यर्यमिति श्रीसूरयः । पाणिनीयादयस्तु अत्रापि लमणेनेत्यनुवर्चनीयं समीपसमापिनो. दयः" तिष्ठहुमतयः ममासराब्दा अध्ययीभावसंज्ञा भवन्ति । यथायोगमन्यपदार्थ पूर्वपदार्य २७४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- व्ययपझे तु यावन्त्यमत्राणीति । पूर्वार्थ(पूर्वपदार्थ ?)प्रधानत्वाव्ययत्वे सिः, अनव्यये तु जस् समा- सात् । ततोऽम्भावः । इयत्त्व इति किम् ? यावद्दत्तं तावद्भुक्तं कियद्दत्तं कियद्भुक्तमिति नावधारयति अत एवान तापदित्युपादीयते । समासे तु उक्तार्थत्वान्न तत्प्रयोगः ॥ २९ ॥ पर्यपावहिरच पञ्चम्या ॥ ३० ॥ [सि० ३।११३२] ५ पर्यादीनि पञ्च पञ्चम्यन्तेन समस्यन्ते । परित्रिगर्तेभ्यः परित्रिगर्तम् । एवमपत्रिगर्तम् । यहि मम् । आयामम् । प्राग्राम पृष्टो मेघः ॥३०॥ "पर्य" परित्रिगत मिति-"पर्यपाभ्यां वज्ये" (२२२१७१) इति पञ्चमी ततोऽनेन समासः । एवमपनिगतेभ्यः अपत्रिगतम् । विगतं नाम नगरं वर्जयित्वा वृष्टो मेघ इत्यर्थः ।। आमाम इति- "आडावधौ ( २।२१७०) इति पञ्चमी, आमामात्, ततोऽनेन समासः । बहिाममिति-"प्रभृत्वन्या- १० दिक्झाब्दयहिरारादितरैः” (२।२१७५ ) इति पञ्चमी, यहिामात्ततोऽनेन समासः 1 पर्यादिसाहच- र्यात् अञ्चतिरिह धा एनलुबन्तोऽव्ययं गृह्यते प्राग्ग्रामात् प्राग्ग्राममिति । एवं प्रत्यग्ग्रामात् प्रत्यग्प्रामम् । अपारमामात् । अपाग्मामम् । उद्ग्ग्रामात् उदग्ग्रामं वृष्टो मेघः । अव्ययग्रहणादिह न भवति-पाक प्रामात् चैत्रः । पञ्चम्येति किम् ? परिक्षं विद्योतते विद्युत् ॥ ३० ॥ लक्षणेनाभिप्रत्याभिमुख्ये ॥ ३१ ॥ [सि० ३३१३३ ] १५ आमिमुख्ये वर्तमानौ अभिप्रती चिबवाचिना समस्येते । अभ्यग्नि प्रत्यग्नि शलभाः पतन्ति । "देयेऽनुः" (३।१।३४) । अनुगङ्गं काशी । “समीपे” (२०३५) । अनुवनमशनिर्गता "तिष्ठग्वित्यादयः" (३६१२३६)। साधरः। तिष्ठतुः कालः ॥ ३१ ॥ "लक्षणे०" । अभ्यनीति-"भागिनि च प्रतिपर्यनुभिः" (२।२।३७) इति द्वितीयायामनेन समासः । अभि अग्निं अभ्यमि । प्रति अनि प्रत्यग्नि शलभाः पतन्तीति-अनामिना शलभपातो लक्ष्यते इत्यग्नि- २० लक्षणं भवति, तस्य चाभिप्रतिभ्यामाभिमुख्यं द्योयते । लक्षणेनेति किम् ? घुम्नं प्रतिगतः, प्रतिनिवृत्त्य मुनमेवाभिमुखं गत इत्यर्थः । "दैय॑ऽनु:" देध्ये आयामविपये यल्लक्षणं तद्वाचिनाऽनुः समसते ! अनुगद्गां दीर्घा अनुगनं काशी-गगाया लक्षणभूताया दयेण काश्या देयं लक्ष्यते । देचे इति किम् ? वृक्षमनु विद्योतते विद्युत्-अत्र वृक्षो विद्योतनस्य लक्षणं न तु देयस्य । लक्षणेनेति रिम् ? लक्ष्येण काश्यादिना अनोः समासो मा भूदिति 1 "समीपे" समीपेऽर्थे वर्तमानोऽनुः समीपि. समासे सिद्धे विकल्पाचं वचनं, तेन याक्यमपि भवति-अनुवनस्याशनिर्गता । पृथग्यचनम् टाणे- दृश्यलक्षणमायोऽनुना द्योत्सते । धनमामीप्यगताया अशनेनं लक्षणमित्याहुः "तिष्ठदग्वित्याः १० पाभिधेये । तिष्ठन्ति गायो यग्मिन्याले गर्भप्रणाय दोहाय या यत्सेभ्यो नियामाय जलपानायं पा स पालः । एयं पद्दन्ति गारो यग्मिन स पालो यहदुः । इणः शरि "हिणोरप्वि०" (४।३।१५) इति यत्वे या आयसो गायो यग्मिन् स पाल: आयतीगयम् । अन पूर्वपदस्य पुंबदायाभायः समा सान्त निपातना-एते अन्यपदार्थ पाले ॥ तथा गले यया यस्मिन् स पाला सलेययम् । सो २४घुमम्-निपातनासतम्या अनुप । एवं नययम् । ल्यमानयवम् । एवं पूनयवं पूयमानस्यम्, गहतयां प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । अव्ययीभावः २७५ संह्रियमाणयवम्, संहृतबुसं संह्रियमाणबुसम्-एते प्रथमैकवचनान्ता एवाऽन्यपदार्थे । काले देशेऽपी- त्यन्ये-तेन खलेयवं पश्य, खलेयवेन कृतमित्यादयः प्रयोगा असाधवः (द्वितीयाद्यन्ता इति शेपः)। द्वितीयादिविभक्त्यन्ता अप्येते साधव इत्यन्ये | 'नाभेरधः' अधोनाभं निपातनादत्समासान्तः । पूर्व- पदार्थप्रधानोऽयं तथा 'समत्वं भूमेः' समभूमि, एवं समपदाति, पक्षे पूर्वपदस्य मान्तत्वमपि निपा- त्यते समभूमि । समंपदाति । एतौ देशकालभावेष्वन्यपदार्थेष्वित्यन्ये; उत्तरपदार्थप्राधान्ये तु समा५ भूमिः समभूमिः, समपदातिरिति कर्मधारय एव । तथा शोभनत्वं समस्य शोभनत्वं समायाः शोभना समा यत्र सुपमम् , एवं विपमं दुःपमं निष्पमं अपरसमम् , उत्तरपदार्थप्राधान्ये तु तत्पुरुप एव । शोभना समा सुपमा, शोभने समे सुपमे । समशब्देनाव्ययीभाव इत्यन्ये । तथा समाया आयतीत्वं आयती समा, यत्र आयतीसमेति वा आयतीसमम् । एवं पापसमं पुण्यसमम् । समशब्देन तृतीयास- मास इत्यन्ये । आयत्या समम् आयतीसमम् एवं पापसमं पुण्यसमम् । तथा प्रगतत्वं प्रकृष्टत्वं वाह्नः प्राहं १० निपातनादह्लादेशः एवं प्ररथम् प्रमृगम् प्रदक्षिणम् । अन्यत्र प्रगता मृगा अस्मात् प्रमृगो देशः । देशेऽप्यन्ये । उत्तरपदार्थप्राधान्ये तु तत्पुरुप एव । प्राहः प्ररथः प्रमृगः प्रदक्षिणा । तथा एकत्वम- न्तस्य एकोऽन्त इति वा एकान्तम् , देशेऽन्यपदार्थेऽपीत्यन्ये, एवं प्रान्तं समपक्षं समानतीर्थ समानतीरम्, तथा सम्प्रत्यसम्प्रत्यप्रदक्षिणानि यथासङ्ख्यं वर्तमानावर्त्तमानवामेपु, तथा युद्धे इजन्तं च केशाकेशि दण्डादण्डि द्विदण्डि द्विमुशलि । तिष्ठद्गु इत्यत्रेतिशब्दः स्वरूपपरिग्रहार्थस्तेनेह समासान्तरं न भवति ।१५ परमं तिष्टद्गु, तिष्टगु प्रियमस्य इति वाक्यमेव भवति । अत एव प्रदक्षिणसम्प्रतिभ्यां सह नसमासेन सिद्धावप्रदक्षिणासम्प्रत्योः पाठः। इजन्तस्य तिष्ठन्वादिपाठः "इच् युद्धे” (७।३।७४) इत्यनेन इज- न्तस्य समासान्तरप्रतिपेधार्थः, द्विदण्ड्यादेरव्ययाभावार्थश्च । अन्ये तु परपदेनैव समासं प्रतिपेधन्ति, तन्मते परमतिष्ठतु आतिप्टद्गु जपन्सन्ध्याम् इत्यादयोऽपि साधवः । तिष्टद्ग्रवादिराकृतिगणस्तेन प्रसव्यं अपसव्यं यत्प्रभृति तत्प्रभृति इतःप्रभृति इत्यादि सिद्धम् ॥ ३१ ॥ नित्यं प्रतिनाऽल्पे ॥३२॥[सि०३।११३७] अल्पेऽर्थे वर्तमानेन प्रतिना नित्यं समस्यते, सोऽव्ययीभावः स्यात् । शाकस्साल्पत्वं शाक- प्रति ॥ ३२॥ "नियं०” शाकप्रतीति । एवं सूपस्य मात्रा सूपप्रति । पूर्वपदार्थे इत्यधिकारेप्यसम्भवादत्रोत्तरपदार्थ- प्रधान एवायं समासः । अथवाव्ययानां दोपामन्यमहर्दिवामन्यारात्रिरितिवद्वृत्तिविपचे सत्त्वप्रधा-२५ नत्वदर्शनान्मात्रावति प्रतिशब्दस्य वृत्तेरविरोधादल्पः सूप इति विग्रहः । इत्यादिरित्यत्रादिशब्दसामर्थ्यात् “सङ्खयाक्षशलाकं परिणा द्यूतेऽन्यथावृत्तौ” (३।११३८)। सहयावाचिनाम अक्षशलाके च द्यूतविपयेऽन्यथावर्त्तने परिणा समस्यन्ते, तथा चैषां कर्तृत्वात्तृतीया- न्तत्वमक्षशलाकयोस्त्वेकवचनान्तयोरेवेष्यते । पञ्चिका नाम द्यूतं पञ्चभिरक्षैः शलाकादिभिर्वा भवति तत्र यदा सर्वे उत्ताना अवाचो वा पतन्ति तदा पातयितुर्जयः, अन्यथापाते पराजयः । एकेनाक्षेण ३० शलाकयाऽन्यथावृत्तं एकपरि, द्विपरि, त्रिपरि, यावचतुःपरि । पञ्चसु त्वेकरूपेषु जय एव भवतीति पञ्चपरीति न भवति । अक्षण शलाकया वेदं तथावृत्तं यथापूर्व जये अक्षपरि झलाकापरि । केचि- समविपमाते सममित्युक्ते यदा विपमं भवति, तदाक्षपरि झलाकापरीति प्रयुज्यन इत्याहुः । अन्ये पूर्व पदमाहूतं तन पतितमिष्टं सिद्धम् , पुनस्तदाहूतं यदा न पतति तदायं प्रयोगोऽअपरिहालाकापरी- याहुः । “नदीभिर्नान्नि" (३।१।२७ ) । नदीवाचिभिर्नामभिनाम संजायामन्यपदार्थ समलते । ३५ २० - - २७६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलघु- उन्मत्ता गहा यत्र स उन्मत्तगड़ें देशः, एवं लोहितगङ्गं तूष्णीङ्गङ्गं शनैगङ्गम् इमानि देशनामानि । नीभिरिति बहुवचननिर्देशानदीविशेषाणां तत्स्वरूपस्य च ग्रहणम् । उत्तरसूत्रे पञ्चनदमित्यत्र स्वरूप- महणाध पर्यायाणां स्रोतस्विनी-निम्नगा-सिन्धुप्रभृतीनां च ग्रहः । नानीति किम् ? शीघ्रगड्गो देशः । "वंश्येन पूर्वाध” (३२११२९)। विद्यया जन्मना या प्राणिनामेकलक्षणः सन्तानो वंशस्तन भयो ५वंश्यः । स इहाद्यः कारणपुरुपो गृह्यते, तद्वाचिना नाम्ना सध्यावाचि नाम समस्यते, पूर्वपद- स्वाऽभिधेयेऽव्ययीभावश्च समासो भवति । एको मुनिवेश्य एकमुनि व्याकरणस्य । द्वौ मुनी वंश्यो द्विमुनि व्याकरणस्त्र । विद्यया तद्वतामभेदविवक्षायां द्विमुनिव्याकरणमित्यादि सामानाधिकरण्यं भवति । सप्त काशयो वश्या राज्यस्य सप्तकाशि राज्यस्य । पूर्वार्थे इति किम् ? द्वौ मुनी वंशावस्य द्विमुनिक व्याकरणमित्याद्यन्यपदार्थे बहुव्रीहिरेव । अन्ये तु पूर्वार्थ इति विशेषं नेच्छन्ति, तन्मते एकश्चासौ १० मुनिश्चेति कर्मधारयप्रसङ्गे, द्वौ मुनी समावृताविति द्विगुप्रसङ्गे, एको मुनिर्वइयोऽस्येति बहुव्रीहिप्रसङ्गे धाव्ययीभाव एव स्यादिति । एतत्सर्वं इत्यादिशब्दात् प्राह्यम् ।। ३२ ।। पारमध्येऽन्तः षष्ठ्या वा ॥ ३३ ॥ [सि० ३३११३०] एपां चतुणों पष्टयन्तेन सहाव्ययीभावो वा स्यात् । गङ्गायाः पारे पारेगङ्गम् । मध्येगङ्गम् । अग्रेषणम् । अन्तर्गिरि । निपातनादेत्वम् । पक्षे गङ्गापारम् ॥ ३३ ॥ १५ “पारे " निपातनादेत्वमिति-आद्यानां त्रयाणां पक्षे गङ्गापारमिति वावचनात् पक्षे पष्ठीसमास इत्यर्थः ।। ३३ ।। *तत्रादायमिथस्तेनप्रहृत्येति सरूपेण युद्धेऽव्ययीभावः ॥३४॥ [सि० ३३१।२६] सप्तम्यन्तं मिथ आदायेति तृतीयान्तं च मिथः प्रहृत्येति युद्धे वाच्ये सरूपेण नानाध्ययी- भारः सात् ॥ ३४॥ "वना०" सष्टम् ।। ३४ ।। इच् युद्धे ॥ ३५ ॥ [सि० ७।३।७४ ] युद्धे यः समासस्तसादिग् समासान्तः स्यात् ।। ३५ ।। "इच्०" स्पष्टम् ॥ ३५ ॥ इच्यखरे दीर्घ आच ।। ३६ ॥ [सि० ३।२।७२] २५ इजन्तेऽसरादायुचरपदे पूर्वपदस्स दीर्घत्वमाच साताम् । केशेषु केशेषु मियो गृहीत्वा कृतं युद्ध केयाफेशि । मुष्टिभिर्मुष्टिभिमियः प्रहत्य कृतं युद्धं मुष्टीमुष्टि । मुष्टामुष्टि । अखर इति किम् । अस्ससि ।। ३६ ॥ "च्य०" । मुटामुष्टीति, एवं घाट्याइवि पाहापाइवि । दीर्घत्यात्वयोरकारान्तादन्यत्र विशेषः । दीपमाहपर्यादात्वमपि स्वरान्तानामेप भवति । दोोपि धनुर्धनुपि अन्यसीति-गपमिविपपीत्यादि । ३० वति तेनी प रिम् ? येशांश येशांथ गृहीत्या पृतं युद्धम् । मुग्मं प मुग्मं च प्रहत्य कृवं युद्धन् । आदादेवि मायेति विम् ? पेशेषु फेशेषु प स्थित्या फ्तं युद्धम् पनिभ्याम् । केगशब्देना नीमा: एपन्ते । दण्टेश्च दण्टेभागन्य छनं युद्धमताभ्याम् । मिय दवि मियान्यविशार: किम ? फेरोष पेशेषु । दीपायुस्मनेन एका सफेशोभ्यश्च मुण्ट रवि मियो नाति : मापेगी किम् ? हो पाद प गुदी या २० -- - ५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । अव्ययीभावः २७७ कृतं युद्धम् । युद्ध इति किम् । हस्ते च हस्ते च गृहीत्वा कृतं सख्यम् । युद्ध इति विपयनिर्देशायुद्धोपाधि- कायामन्यस्यामपि क्रियायां भवति यथा माघे "रोपावेशादाभिमुख्येन कोचिन् पाणिग्राहं रंहसैवोप- यातौ । हित्वा हेतीर्मल्लवन्मुष्टिघातन्नन्तौ बाहूबाहवि व्यामृजेताम्" ॥ १ ॥ बाह्रोश्च २ मिथो गृहीत्वा व्यासङ्गं कृतवन्तौ इत्यर्थः । क्रियाव्यतिहारे आत्मनेपदम् ह्यस्तनीआताम् ।। ३६ ।। अथाव्ययीभावात्समासान्तविधिं दर्शयति- प्रतिपरोऽनोरव्ययीभावात् ॥ ३७॥ [सि०७३१८७] प्रत्यादिपूर्वादक्ष्यन्तादव्ययीभावादत् स्यात् । प्रत्यक्षम् । परोक्षम् । अन्वक्षम् ॥ ३७ ।। "प्रति०” । प्रत्यक्षमिति–अक्षिणी प्रति प्रत्यक्षम् , "अवर्णवर्णस्य” (७४/६८) इतीकारलोपः । परोक्षमिति परसमानार्थः परस्झब्दोऽव्ययम् अक्ष्योः परः परोऽक्षम् अययेऽव्ययीभावः । अन्वक्ष- मिति-अक्ष्णोः समीपमन्वक्षम् । कथं प्रत्यक्षोऽर्थः परोक्षः काल इत्यादेरव्ययीभावस्य सत्त्ववचनता ? १० अभ्रादेराकृतिगणत्वादप्रत्ययेन भविष्यति । अवशब्देनेन्द्रियपर्यायेण सिद्धे प्रत्यादिपरस्यानिशब्दस्या- व्ययीभावे प्रयोगो मा भूदिति वचनम् ॥ ३७ ॥ अनः ॥ ३८॥ [सि०७३।८८] अन्नन्तादव्ययीभावादत् स्यात् ।। ३८ ॥ नोऽपदस्य तद्धिते ॥ ३९ ॥ (सि० ७।४।६१) नकारान्तस्यापदस्य तद्धिते परेऽन्त्यस्वरादे-१५ लक् । उपराजम् ॥ ३९ ॥ "नपुंसकाद्वा” ॥४०॥ (सि० ७।३।८९) उपचर्मम् उपचर्म ॥४०॥ सूत्रत्रयं स्पष्टम् । "गिरिनदीपौर्णमास्याग्रहायण्यपञ्चमवाद्वा” ॥ ४१ ॥ (सि० ७।३।९०) अन्त- गिरम् अन्तर्गिरि । उपसमिधम् उपसमित् ॥ ४१ ॥ "गिरि०" अपञ्चमवाद्वेति-पञ्चमरहिता ये वास्तदन्तादिति । एवं उपनदं उपनदि ।२० उपपौर्णमासं उपपौर्णमासि । उपाग्रहायणं उपायहायणि । अपञ्चमवा. उपमुचम् उपचुक् । अधि- स्रज अधिनक । उपैडविडं उपैडविट् । प्रतिमरुतं प्रतिमरुत् । उपपदं उपपद् । उपककुभम , उपककुब् ॥ ११ ॥ सङ्ख्या समाहारे ॥ ४२ ॥ [सि० ३.११२८] नदीभिरित्यव्ययीभावे "सङ्घयाया नदीगोदावरीभ्याम्” (७१३९१)। अन् स्यात् । २५ पञ्च नद्यः पञ्चनदम् । द्विगोदावरम् । "शरदादेः” (७३।९२)। प्रतिशरदम् । “जराया जरस च” (७३।९३)। उपजरसम् । “सरजमोपानानुगवम्” (७/१९४)। एते- ऽदन्ता अव्ययीभावा निपात्याः ॥ ४२ ॥ इत्यत्र्ययीभावः । "साया" सद्धवावाचि नाम नदीवाचिभिर्नामभिन्समन्यते, समादारे गम्यमाने, सलमानोऽय- यीभावः स्यात् । द्वयोर्यमुनयोः समाहारो हियमुनम् । एवम् निगम , पचनदम , ममगोदावरम-३० अत्राव्यर्याभावे समासान्तोऽम्भावश्च सिद्धो भवति । अन्ये तु पूर्वपदप्राधान्य ऽव्ययीभावः गोदा- वरीणां नप्तत्वं समगोदावरम, समाहारे नु मागोदावरीति हिगुग्वेन्याहुः । "सया मागा चिनः परी यो नदीगोदावरीशब्दी तदन्नादव्ययीभायादन नमानान्नः न्यान् । पठानदमिति- नदी- ग्रहण निसार्थम् । "शर०" भारद् यद् नद् यद् कियद् हिम्क दिमयन अनद मदन (अदर?)३४ २७८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते सोपज्ञहैमलघु- अनस् मनस् विपाश् दिश् दृश् विश् उपानत् अनडुह् चतुर् दिव् १९ इति एकोनविंशतिकः शरदादिः । अत्रापश्चमवर्गान्त्यपाठो नित्यार्थः । “जरा" । जराशब्दान्तादव्ययीभावादसमान्तस्तत्सन्नियोगे च जराशब्दस्य जरसादेशः । “सर०" सह रजसा सरजसमभ्यवहरति-साकल्येऽव्ययीभावः । शुनः समीपे उपशुनं तिष्ठति-अन्न निपातनाद्वस्योत्वम् । गामन्वायतं अनुगवं "दैर्येऽनुः" (३।१३४) इत्य- ५व्ययीभावः, देादन्यत्र न भवति-गवां पश्वादनुगु यानम् ॥ ४२ ॥ +7 इत्यव्ययीभावः । अथ तत्पुरुपं निरूपयति-- प्रात्यवपरिनिरादयो गतकान्तकुष्टग्लानक्लान्ताद्यर्थाः प्रथमाचन्तैः ॥ ४३॥ [सि० ३११४७] १० प्रादयो गताद्यर्थाः प्रथमान्तैरत्यादयः कान्ताद्यर्था द्वितीयान्तैरयादयः क्रुटाधास्तृतीयान्तैः पर्यादयो ग्लानाद्यर्थाचतुर्थ्यन्तैर्निरादयः क्लान्ताद्याः पञ्चम्यन्तैर्नित्यं समस्यन्ते, स तत्पुरुषः । प्रगतः प्रकटो वा आचार्यः प्राचार्यः । गौणस ड्यावन्तस्थान्तस्थस्य हस्खः । अतिक्रान्तः खरा- मतिखट्दः । अबक्रुष्टः कोकिलयाऽवकोकिलः । परिग्लानोऽध्ययनाय पर्यध्ययनः । निर्गत: कौशाम्ब्याः निष्कौशाम्बिः । “अव्ययं प्रवृद्धादिभिः" (३२११४८)1 समस्यते । पुनः प्रवृद्धं १५वाहिः ॥४३॥ "प्रात्य." प्राचार्य इति एवं सङ्गतोऽर्थः समर्थः । विरुद्धः पक्षो विपक्षः । प्रत्यर्थी पक्षः प्रति- पक्षः । प्रतिवद्धं वचः प्रतिवचः ॥ अतिसद इति-एवं उद्गतो वेला उद्वेलः । प्रतिगतोऽक्षं प्रत्यक्षः । अनुगतः प्रतिगतो वा लोमानि अनुलोमः प्रतिलोमः । अभिप्रपन्नो मुसमभिमुसः ॥ अवकोकिल इति-एवं परिणद्धो वीरुद्भिः परिवीरुत् । अनुगतमर्थेन अन्वर्थ नाम । सङ्गतमक्षेण समक्षं वस्तु । एवं २० सङ्गतमर्थेन समथं पदम् , विमुक्तमर्थेन व्यथं वचः ॥ पर्यध्ययन इति-एवं उद्युक्तः सङ्कामाय उत्सद्दामः । शक्तः कुमार्यै अलकुमारिः । शक्तः पुरुपेभ्योऽलम्पुरुपीणः ॥ निष्कौशाम्धिरिति-एवं अपगतः शासायाः अपशायः । अन्तर्गतोऽहुल्या अन्तरडलो नसः । उत्लान्ता कुलात् उत्कुला कुलटा । एवं उद्वेल: समुद्रः । उच्छास्त्रं वचः । उत्सूत्रो न्यायः। उन्हलः कलभः । अपगतमर्थात् अपार्थ वयः। अपक्रम कार्यमित्यादि । बहुलाधिकारात् पष्ठयन्तेनापि अन्तर्गतो गार्यस्य अन्तर्गायैः । सप्तम्यन्तेनापि-प्रतिग. २५तमुरसि प्रत्युरसम् । (गताप इति किम् ? वृक्षं प्रति विद्योतते विद्युत् । साधुर्देवदत्तो मातरं प्रति अन्य इत्येव-प्राचार्यको देशः । पदयमाणे "गतिकन्यसत्पुरुषः" (३।११४२) इति तत्पुरुषलक्षणसूत्रे अन्य इन्यम्य हि अन्यो बहुप्रीह्यादिलक्षणरहितस्तत्पुरुषो भवति इत्यर्थः ॥ पहुवचनमाकविगणार्थम् । "अव्प." । पुनरुत्म्यूनं याप्तः, । पुनर्निजीतो रथः, पुनरुक्तं वचः, पुनर्नवं ययः, पुनःसृतं पयः, म्पतिः, अन्तर्भूतः, प्रातःसवनं, उगोषः, नीचर्गतं अघस्पदम् , अनद्वापुरुषः, प्रायश्चित्तम्, सद्यस्त्रीः, ३० प्रामृत्तम , पुराकम्पः, शायसम्, श्वोवमीयसं इति प्रवृद्धादयः । यदुवचनमातिगणार्थम् ॥ ४३ ।। ङस्युक्तं कृता ॥४४॥ [सि० ३३१०४९] कृत्प्रत्ययविधायकसूत्रे बसन्तनासोक्तं कृदन्तेन नाना नित्यं समस्यते । कुम्मं करोतीति ३३कुम्मकार: ! "कर्मणोऽम्" (५।११७२) इत्यम् । "गतिकारकडस्युक्तानां कृदन्तर्विमत्स्युत्पचे पाने पदमिर वार्ग न रापमा तम्याप्मययत्। २ भनिर्णयोऽना न पुषमा न पियामे. योगी पालक पनी उपोन भ? मनता संशयितः पुरर यशयः पुरशे या।

.. .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २७९ प्रागेव समासः"। "तृतीयोक्तं नवा” (३१११५०)। मूलकेनोपदंशं मूलकोपदंशं भुते। पार्श्वयोः पार्थाभ्यां वोपपीडं पार्थोपपीडं शेते ॥४४॥ *यथायोगं द्वितीयाद्यन्तं नाम प्रथमान्तेन समस्यते, स द्वितीयादितत्पुरुप इति वक्तव्यम् । धर्मप्राप्तः । मदपटुः । आत्मकृतम् । यूपदारु । गोहितम् । वृकभयम् । राजपुरुषः पानशौण्ड: "सिंहायैः पूजायाम्" (३३११८९) । सप्तम्यन्तं समस्यते । समरसिंहः, भूमिवासवः । “काकायैः क्षेपे"५ (३।१२९०)। तीर्थकाका तीर्थवा इत्यादि। "इस्यु०” विभत्त्युत्पत्तेः प्रागेव समास इति-तेन चर्मन् टा क्रीत इत्यादी कच्छ अम् प इत्यादी च' समासे सत्यकारान्तत्वात् डीः सिद्धः । चर्मक्रीती कच्छपी इत्यादि । यदि पुनर्विभक्त्यन्तैः कृदन्तः समासः स्यात्तदान्तरङ्गत्वाद्विभक्तेः प्रागेवापः प्राप्तावकारान्तत्वाभावान् डीन स्यात् । तथा मापान वापिन् इत्यादौ समासे नकारस्थानन्तत्वात् "वोत्तरपदान्तनस्यादे." (२।३।७५) इति णत्वम् सिद्धम् । १८ मापवापिणी । विभक्त्यन्तेन तु समासेऽन्तरङ्गत्वाद्विभक्तेः प्रागेव डीप्राप्ती नकारस्यान्त्यत्वाण्णत्वं न स्यात् । पूर्वपदस्य च विभक्त्यन्तत्वनियमात् चर्मक्रीतीत्यादिपु पदकाय नकारलोपादिकं सिद्धम् । "तृतीय०” । “दशेस्तृतीयया” ( ५।४७३ ) इत्यारभ्य यत् तृतीयोक्तं नाम, तत् कृता नाना, वा समस्यते । वाशब्दो नित्यसमासनिवृत्त्यर्थः । तेन वाक्यमपि भवति ॥ ४४ ॥ सद्धेपेण तत्पुरुषसमासप्रकरणं सङ्ग्रहीतुकामः फकिकामाह । * यथायोगमित्यादि । तत्र सूत्राणि १५ चैवम् । “द्वितीया खट्टा क्षेपे” (३।११५९) । द्वितीयान्तं खट्वा इत्येतनाम क्तान्तेन समस्यते । क्षेपः समासार्थो न वाक्येन गम्यते इति नित्य एवायं समासः । खदारुढो जाल्मः-उत्पथपस्थित एवमुच्यते ॥ "काल:” (३।११६०) । द्वितीयान्तं कालवाचि क्तान्तेन समस्यते । रात्रिमधिस्टाः रात्र्यधिरूढाः । अत्र्याप्त्यर्थ आरम्भः ॥ "व्याप्तौ०" (३।१।६१ ) । गुणक्रियाद्रव्यरत्यन्नसंयोगो व्याप्तिः । व्याप्ती या द्वितीया तदन्तं कालवाचि नाम व्यापकवाचिना नान्ना नमन्यते । मुहत्तं सुगं २० मुहूर्त्तसुखम् ।। "श्रितादिभिः" (३।१।६२)। द्वितीयान्तं श्रिनादिभिः समन्यते । धर्म श्रितो धर्म- श्रितः । श्रित अतीत पतित गत अत्यस्त ग्राम आपन्न गमित आगागिन इति नत्र धिनादयः । बहुव- चनमाकृतिगणार्थम् । तेन ओदनबुभुक्षुः । हितागंसुः । तत्त्वबुभुन्सुः । सुवेच्चरित्यादि निहम् ।। "प्राप्ता- पन्नी तयाच" (३।१।६३)। प्रामापन्नी सामान प्रथमान्नी तथा द्वितीयान्तेन नमम्यते । नत्मनियोगो चानयोरन्तन्य अकारो भवति । प्रामा जीविकां प्रामजीविका । आपना जीविकां आपन्नजीविका । अनु२५ वचनं त्रीलिङ्गार्थम् , प्रामापनयोः प्रथमोनत्वात्पूर्वनिपानार्थ वचनम । विनादिन्यागानयोलिनीगाया अपि प्रथमोक्तत्वाजीविकाप्राप्तो जीविकापन्न इत्यपि भवति ।। "ईपगुणवचनः" (३।११६४) गुगे वर्तित्वा तद्योगा। गुणिनि वर्तन्ते, ते गुणवचनान्तरीपदिति ममन्यते । पद पिालः परितः ।। इति हितीयानपुन्यः ॥ "तृतीया तत्कृतः" (३।११६५ ) । सुनीयान्नं नागुणवना मगम्यने । ला ला पण शालारण्यत्रः । एवं गिरिकाः । मदपटुः । भारः । पनुमसुमिः । समानी पानापन- भूत पनि गलगन्दी न प्रयुज्यने । गुगवनन्गिन्यान गुमानिना ममागे न भी- पाटयम : वापि नमामो भयनीनि पधिन ।। "चननाम् (11)। गायत्री तनाथन नगनुमादेन नगन्यते । न नाशनम: ननो माग ::: १५.ITTE...'' ।

। - २८० महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- चतस्रति किम् ? अर्द्धन कृताश्चत्वारो द्रोणाः ॥ “ऊनार्थपूर्वाद्यः" (३१६६७)। तृतीयान्तमूनाथैः पूर्वाद्यश्व समस्यते । माषेणोन मापोनम् , एव मापविफलम् । मासेन पूर्वः मासपूर्वः, एवं मासायरः । पूर्व अवर सहा सम कलह निपुण मिश्र शुक्ष्ण इत्यष्टौ पूर्वाद्याः । आकृतिगणोऽयम् , तेन धान्येनार्यः धान्यार्थः । आत्मना पञ्चमः । आत्मना पष्ठः । आत्मनः पूरण इत्यलुक्समासः । मापेणाधिकं माषा- ५धिकम् कापणम् , भ्राता तुल्यः भ्रातृतुल्यः । एकेन द्रव्यत्वम् एकद्रव्यत्वम् इत्यादि सिद्धम् । पूर्वादि- योगे यथायोग हेत्वादी तृतीया ॥ "कारकं कृता” (३१२६८)। कारकवाचि तृतीयान्त सामर्थ्यात् पर्तृकरणरूप कुदन्तेन समस्यते । कर्तृ-आत्मना कृतम् आत्मकृतम् । "कृत् सगतिकारकस्यापि" (७४।११७) विरोपणम् । चैत्रेण नसनिर्भिन्नः चैत्रनसनिर्भिन्नः । एव सुजनसुलभः । दुर्जनदुर्लभः । अरिदुर्जयः । करण-परशुना च्छिन्नः परशुच्छिन्नः । एव नसनिर्भिन्नः। पादप्रहारः । पादाभ्या हियते १०पादहारकः । तलाहतिः । शस्त्रप्रहतिः । बहुलाधिकारात् स्तुतिनिन्दार्थताया प्रायेण कृत्यैः समास कर्तृ. काकपेया नदी-एव पूर्णेयर्थः । श्वलेह्यः कूपः-एवमासन्नोदक इत्यर्थः । कुक्कुटसम्पात्या प्रामा- एवमासना इत्यर्थः । करण. कण्टकसञ्जेय ओदनः-एवनाम विशद इत्यर्थः । वाष्पच्छेद्यानि तणानि- एपनाम मृदूनीत्यर्थः । अन्यत्रापि चुसोपेन्ध्यम् तृणोपेन्ध्यम् -तेजसोऽल्पताख्यायते । घनघाय.- पृच्छ्रसाध्यत्वमुच्यते । कारकमिति किम् ? विद्ययोपितः । अनेनोपितः । तेन हेतुनेत्यर्थः । (पुत्रेण १५ गतः छाणागत', तेने सहेत्यर्थः । कृतेति किम् ? गोभिर्वपावान, धान्येन धनवान्, बहुलाधि- पारादेव क्तनतुना क्लया तव्यानीयाभ्या च न भवति । दारेण लूनवान् , परशुना छिन्नवान् , दारेण हत्या, परशुना छित्त्या, काकै. पातव्यः, श्वभिलेंढव्यः ।) "नविंशत्यादिनैकोऽच्चान्तः" (३।१६६९) तृतीयान्त एक्शन्दो नविंशत्यादिना समस्यते । एकशदस्य चादन्तो भवति । एकान- विंशतिः । पक्षे एकाद् नविंशतिः । एवम् एकानविंशत् इत्यादि । नविंशत्यादिनेति निर्देशात् "नमत्" २०( ३।२।१२५) (इति नमोऽत् ) न भवति । इति तृतीयातत्पुरुपः । "चतुर्थी प्रकृत्या" (३२११७०)।प्रकृतिः परिणामिशरणम् , चतुर्यन्त विकृतियाचि प्रतिवाचिना समस्यते । यूपाय दार यूपदारु । प्रकृत्येति किम् ? रन्धनाय स्थाली । मूनाय सम्पद्यते यवागूरित्यादौ तु विकारस्याप्रधानस्य सम्पद्यते इत्यादि रियासापेक्षत्वात् न भवति ॥ “हितादिभिः" (७३।७१) पतुर्थ्यन्त हितादिभिः समस्यते । गोभ्यो हित गोहितम् । हित सुस रक्षित पलि इति पत्यारो २५ हितादयः । आकृतिगणश्वायम् । रोन अश्वपासः, श्वश्रूसुरा, श्वभूसुरम् , हसिविधानम् , धर्मनियम, धर्मनिज्ञासा, नाट्यशाला, आत्मनेपदम्, परस्मैपदम् इत्यादि सिद्धम् । इत्यप्रत्ययान्त चेह पयते- देवदेयम् । इह न भवति-बामणाय दातव्यम् ॥ इति चतुर्थीतत्पुरुपः । "पञ्चमी भयाः" (३११७३) । पञ्चम्यन्त भयाधेः समस्यते । पाद्य यूरभयम् । भय भीन भीति भी भीर भीलुर निर्गत जुगुप्स अपेत अपोत मुक्त पतित अपरस्त इति त्रयोदश भयादयः । ३० आरतिगणवायम् , तेन द्वीपान्तरानीतः, स्थानभ्रष्टः, तात्पर, तपर इति सिद्धम् । पहाधिकारा द६ न मयी-प्रामादात्पतिः ॥"नासत्त्ये" (३१४) असत्ये यतमाना या पशमी, तदन्त १२ नाग पन्तेन समम्यते । मोपान्मुक्तः । मोगल्पा" (२७९) इति पञ्चमी, ततोऽनेन नत्र नुि मरम्पाम् । २५ पम्प माठिन्य प्रतियते । एशिया परमरीयामा एभरे पार पम् । पनीपप्रग भिन्दनार दिया। पानीनामा ममापमय पर रोमानदार। ५ निसारेगारगमदार पयती परिप परन् । - .. --- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २८१ समासः । दूरादागतः "आरादथैः” (२।२।७८) इति पञ्चमी, ततोऽनेन समासः । सर्वत्र "असत्त्वे उसेः” (३।२।१०) इत्यलुप्समासे तद्धिताद्युत्पत्तिः फलम् । स्तोकान्मुक्तिरित्यादि । इति पञ्चमीतत्पुरुषः। "पष्टययत्नाच्छेषे” (३।११७६) उक्तकारकव्यतिरिक्तः शेषस्तत्र तदन्तं नाम नाम्ना समस्यते। अयत्नात्, न चेत्स शेपो "नाथः” (२।२।१०) इत्यादिर्यवाद्भवति । राज्ञः पुरुपः रानपुरुषः । ऋद्धस्य राज्ञः पुरुष इत्यादौ सापेक्षत्वात्समासो न भवति । देवदत्तस्य गुरुकुलम् , जिनदत्तस्य दास-५ भार्येत्यादौ तु सापेक्षत्वेऽपि गमकत्वाद्भवति । अयत्नादिति किम् ? सपिंपो नाथितम् । मातुः स्मृतम् । "कृति" (३।११७७)। "कर्मणि कृतः” ( २।२।८३) इति “कतरि" (२२२६८६) इति च सूत्राभ्यां या पप्टी, तदन्तं नाम नाम्ना समस्यते । गणधरोक्तिः। इध्मबचनः । “याजकादिभिः" (३।११७८)। एभिः पठ्यन्तं समस्यते । ब्राह्मणानां याजकः ब्राह्मणयाजकः । एवं गुरुपूजकः । याजक पूजक परि- चारक परिवेयक स्नापक अध्यापक आच्छादक उन्मादक उद्वर्त्तक होतृ भर्तृ इति एकादश याजकादयः ।१० आकृतिगणोऽयम् । तेन तुल्यार्थी अपि-गुरुसाः गुरुसमः । तथा अन्यत्कारकम् विश्वगोप्ता, तीर्थकर्ता तत्प्रयोजको हेतुश्च, जनिकर्तुः प्रकृतिः इत्यादि सिद्धं भवति । “पत्तिरथौ गणकेन" (३।११७९) । पत्तिगणकः रथगणकः। “अकेन क्रीडाजीवे” (३११३८१) । आजीवो जीविका, क्रीडायामाजीवे च गम्यमाने पष्ठ्यन्तमकप्रत्ययान्तेन समस्यते । शालभञ्जिका-क्रीडायाः संज्ञा, दन्तलेखकः-दन्तलेखनमस्या- जीवः । क्रीडाजीवौ वाक्येन न गम्यते इति नित्यसमासा एते "कर्मजा तृचा च" (३.११८३) इति १५ प्रतिपेधै प्राप्ते सूत्रत्रयम् । कचित्पष्टीतत्पुरुपे पूर्वपदस्य पुंवद्भावो वा स्यात् । तथाहि-"मृगक्षीरादिषु वा" ( ३।२।६२)। एतेपु समासशब्देपु परतः बीलिङ्गमनेकार्थे अख्येकार्थे चोत्तरपदे पुंचवा स्यात् । मृग्याः क्षीरं मृगक्षीरं मृगीक्षीरं, मृगपदम् मृगीपदम्, मृगशावः मृगीशावः, कुक्कुटाण्डं कुक्कुव्यण्डम् , मयूराण्डं मयूर्यण्डम् , काकाण्डं काक्यण्डम् , काकशावः काकीशावः । मृगक्षीरादयः प्रयोगतोऽनुस- तव्याः । पुत्रीलिङ्गपूर्वपदभेदेन समासविवक्षायां सूत्रानारम्भे मंगक्षीरादयो न सिद्ध्यन्ति । इति पष्टी-२० तत्पुरुपः । "सप्तमी शौण्डाद्यैः” (३।११८८)। सप्तम्यन्तं शौण्डाद्यैः समस्यते । पाने प्रसक्तः शौण्डः पानशौण्डः मद्यपः । अक्षेपु प्रसक्तः शौण्ड इव अक्षशौण्डः, शौण्डशब्द इह गौणो व्यसनिनि वर्तते, वृत्तौ प्रसक्तिक्रियाया अन्तर्भावादप्रयोगः । शौण्ड धूर्त कितव व्याल सव्य, आयस व्यान एतौ अलसासक्तपर्यायौ । सवीण, दक्षिणपर्यायोऽयम् । अन्तर् अधीन पटु पण्डित कुशल चपल निपुण सिद्ध २५ शुष्क पक्क बन्ध इत्येकोनविंशतिः शौण्डादयः । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् , तेन शिरःशेखरः, हस्तकटकः, आपातरमणीयः, अवसानविरसः, पृथिवीविदितः, पृथिवीप्रणतः, अन्तेगुरुः, मध्येगुरुः, गलेवो- पकः(?) त्वचिसारः, ऋणेऽधमः अधमर्णः, ऋणे उत्तमः उत्तमर्णः, राजदन्तादित्वात्परनिपातः इत्यादि सिद्धम् । "सिंहा." (३।११८९) । समरसिंह इति समरे सिंह इवेति उपमयात्र पूजा गम्यते । एवं कलियुधिष्ठिरः । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । “काका०” (३।११९०) । तीर्थकाक इति तीर्थे ३० काक इव उपमयाऽत्र क्षेपो गम्यते । एवं तीर्थध्वाङ्घः तीर्थवायसः तीर्थवकः तीर्थश्वा तीर्थसारमेयः तीर्थकुकुटः तीर्थशृगालः । यथा काकादिस्तीर्थफलसजानन्न चिरस्थायी भवति एवं यः कार्याण्यारभ्य तेवनिर्वाहकः सोऽनवस्थित एवमुच्यते । वहुवचनं प्राग्वत्- ३३ - १ ननु मृगस्य पदं मृगपदम् , मृग्याः पदं मृगीपदमिति कृते सेत्स्यति किमर्थमिदमिलाशङ्का । २ आदिशब्दात् मयूराण्ड- मित्यादि । एतच मृग्याः क्षीरमिति कृते दृष्टव्यम् । है. प्रका० पूर्वा० ३६ । (३।१।९१) इति क्षेपे गम्ये एते सप्तमीतत्पुरुषा निपात्यन्ते । पाने एव समिता इति पानशब्देन पाने समितानां पुत्र इत्यादिपु समासो न भवति । निपावनात् सप्तम्या अलुप्। बहुवचनमाकृविगणार्यम् । २८२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- इलादिशब्दाच "क्तेन" (३१११९२) सप्तम्यन्तं क्तान्तेन समस्यते, क्षेपे गम्यमाने । भस्मनि हुवम् , प्रवाहे मूत्रितम्, उदके विशीर्णम् ; निष्फलं कृतमेवमुच्यते । अवतप्ते नकुलस्थितम् कार्येप्वनस्थि- तत्वमुच्यते, सर्वत्रोपमानेन क्षेपो गम्यते नित्यसमासाश्चैते । “तत्राहोरात्रांशम्" (३।१।९३) पृथग्योगात् क्षेप इति निवृत्तम्, तत्रेत्येतत्सप्तम्यन्तं नाम अहरवयवा रान्यवयवाश्च सप्तम्यन्ताः ५कान्तेन समस्यन्ते । तत्र फुतं तत्र भुक्तम् । पूर्वाहे कृतं पूर्वाहकृतम् । एवमपराहकृतं पूर्वरात्रकृतम्, तद्धिताद्युत्पत्तिः समासफलम्-तात्रकृतिः । “नाम्नि" (३१११९४) संज्ञाविपये सप्तम्यन्तं नाम नाम्ना समस्यते । अरण्ये तिलका, पूर्वाहे स्फोटकाः । “कृयेनावश्यके" (३११।९५) सप्तम्यन्तं नाम "य एचातः" (५।१२२८) इति ऋद्यप्रत्ययान्तेन समस्यते, अवश्यम्भावे गम्यमाने । मासे अवश्यं देयं मासदेयम् । य इति किम् ? मासे स्तुत्यः, मासे दातव्या भिक्षा, संवत्सरकर्त्तव्यमिति तु बहुलाधिकारात् । १० आवश्यक इति किम् ? मासे देया भिक्षा इति सप्तमीतत्पुरुषः । अत्र विशेपमाह । तदर्थार्थेन ॥४५॥[सि० १११७२] चतुर्थ्यर्थेनार्थशब्देन चतुर्थ्यन्तं समस्यते । पूजार्था स्रग्। "परः शतादिः (२२७५)। पञ्चमीतत्पुरुपाः । “सर्वपश्चादादयः" (३११८०)। पष्ठीतत्पुरुषाः (पात्रेसमितेत्यादयथ) सप्तमीतत्पुरुषा निपात्याः । (यनजपष्ठयन्तं न समस्यते) सर्पिपो नाथितम् ॥ ४५ ॥ "तद०" पूजार्था सगिति । डेऽर्थो वाच्यवदिति वाच्यलिङ्गता तेन उदकार्थो घटः, पिनर्थ पयः इत्यादि । नित्यसमासश्चायं चतुर्यैव तदर्थस्योक्तत्वादर्थशब्दाप्रयोगे वाक्यासम्भवात् समासस्तु पपनाद्भवति । तदर्येत्यर्थविशेषणं किम् ? पित्रेऽर्थः तदर्थ धनमित्यर्थः । “पर शतादिः" इत्यादि-शतात्परे-पर-शताः, सहस्रात्परे परःसहस्राः, लक्षालक्षाया था परे परोलक्षाः । परशब्दस्य पूर्वनिपातः सकारागमश्च । निपातनात् परशब्दसमानार्यः परः शब्दः सकारान्तोऽस्तीत्यन्ये । “सर्व. २०पश्चादादयः" इति सर्वेषां पश्चात्पदं वर्तते । सर्वचिरं जीवति । तदुपरिष्टाद्रुक्मं निदधाति । अव्ययप्रतिपेधापवादोऽयम् । बहुवचनं शिष्टप्रयोगानुसरणार्थम् । "गुणान्तरेण तरलोपश्चेति वकव्यम् । वरयन्तं यद्गुणवाचि तेन सह समासः 'न निर्धारण' इति 'पूरणगुण' इति च निषेधस्य प्रतिप्रसवोऽयम् । सर्वेषां श्वेववरः सर्वश्वेतः, सर्वेषां महत्तरः सर्वमहान्” इति कौमुद्याम् । “पात्रेसमितेत्यादयः" २५पात्रसहपारि भोजनं लक्ष्यते, ततो भोजन एव समिता मिलिताः सन्ति न कार्यान्तरे इत्यवधारणात् क्षेपो गम्यते । एवं गेहे नर्दी गेहे शूर इत्यादि । इतिशब्दः समासान्तरनिवृत्त्यर्थस्तेन परमाः पाने समिवाः १५ अथ पष्टीसमासनिषेधमाह-"पष्ठययनाच्छेशे" (३।११७५) । यनजेत्यादि-यस्या विधानाय सूचान्वरफरणं सा यमना पष्टी तदन्तं नाम न समस्यते । सर्पियो नायितमिति-"मायः" (२।२।१०) ३० इति सूत्रेण व्याप्ये पष्ठी । एवं मातुः स्मृतम् सर्पिपो दयितं मातुरीशिवम् "स्मृत्यर्थदयेशः" (२।२।११) इति पाटी । पपोदफस्योपस्कृतम् "गः प्रतियो" (२०१२) इति पष्ठी । चौरस्प रुग्णं "हजार्थ- स्थाऽभ्यरिसन्तापेभाये फरि" (२२२११३) इति पाठी | चौरस्योजासित "जासनाटकायपियो हिंसायाम् (२।२।१४) इति पष्ठी । यमजशेपपष्टयन्तामिति किम् ? गोस्वामी पृथिवीश्वर इत्यादी ३४ समासो भवत्सेप "स्यामीश्वरा०" (२१२।९८) इत्यादिसूनस्य निसं पष्ठीमाती सप्तमीविधानार्थत्यान् ।

१५ प्रक्रियावृत्तिरूपै श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २८३ सदस्य भद्रं भूयादित्यादौ त्वाशिपि पट्याः समासो न भवति, असामर्थ्यादनभिधानाहा नहि सङ्घभद्र भूयादित्युक्ते सङ्घस्य भद्रं भूयादिति प्रतीयते किन्तु सङ्घसम्बन्धि भद्रं कस्यचिद्भूयादिति प्रतीयते ॥४५॥ न कर्तरि ॥ ४६॥ [सि. १८२] कर्तृजपष्ठयन्तमकान्तेन न समस्यते । तब शायिका ।। ४६ ॥ "न क०" । तव शायिकेति शयितुं पर्यायः शायिका "पर्यायाहर्णोत्पत्तौ च णकः" (५।३।१२०)५ इति णकः ॥ ४६॥ कर्मजा तृचा च ॥४७॥ [सि० ३११८३ ] कर्मजपष्ठयन्तमकान्तेन तृजन्तेन च न समस्यते । भक्तस्स भोजकः । अपां स्रष्टा । "तृती- याम्” (३।१।८४)। कर्तरि । आश्चर्यो गवां दोहोऽअगोपेन ॥ ४७ ।। "कर्म" । कर्मजपष्ठ्यन्तमिति-कर्तरीत्यनुवर्तते तबाकस्य विशेषणम् , कर्मणि विहिता पष्ठी १० कर्मजा, तदन्तं नाम कर्त्तरि विहितो योऽकप्रत्ययस्तदन्तेन तृजन्तेन च न समस्यते । कर्मजेति किम् ? सम्बन्धषष्ठ्याः प्रतिषेधो मा भूत् । गुणो गुणिविशेषकः, गुणिनः सम्बन्धी विशेषक इत्यर्थः । कथं भूभत वज्रभ" इति ? भर्तृशब्दो यः पतिपर्यायस्तेन सम्बन्धपष्ठ्या, याजकादिपाठात्कर्मपष्ठ्या वाऽयं समासः । क्रियाशब्दस्य तु तत्राग्रहणादनेन प्रतिषेधः । भुवो भर्त्ता वज्रस्य भ" । "तृती." कर्तरीति-कर्तरि या तृतीया तस्यां सत्यां कर्मजा पष्ठी न समस्यते इत्यर्थः ॥ ४७ ।। तृप्तार्थपूरणाव्ययाऽतृश्शत्रानशा ॥४८॥ [सि० ३।११८५] एभिः पभिः सह पष्ठयन्तं न समस्यते । फलानां तृप्तः। तीर्थकृतां पोडशः। राज्ञः साक्षात् । रामस द्विपन् । चैत्रस्य पचन् । मैत्रस पचमानः। "ज्ञानेच्छाार्थाधारक्तेन" (३११८६)। राज्ञा ज्ञातः इष्टः पूजितः । इदमेषां यातम् । “अस्वस्थगुणैः" (३३११८७)। पटस शुक्लः । काकस्य कार्यम् ॥४८॥ "तृप्ता" । सुगमम् । “ज्ञाने" । "ज्ञानेच्छा!र्थाब्बीच्छील्यादिभ्यः कः” (५।२।९२) इति सूत्रेण ज्ञानेच्छार्चार्थेभ्यो वर्तमाने विहितो यः क्तो यश्च "अद्यर्थाचाधारे" (५।१।१२) इति सूत्रेणा- धारे विहितः क्तस्तदन्तेन पष्ठ्यन्तं न समस्यते । “अस्व०"। ये गुणाः स्वात्मन्येवावतिष्ठन्ते न द्रव्ये ते स्वस्थास्तत्प्रतिपेपेनास्वस्थगुणवाचिभिर्नामभिः सह पष्ठ्यन्तं न समस्यते । पटस्य शुल:-अनार्यात्प्रक- रणाद्वाऽपेक्ष्यस्य वर्णादेनिाने योऽयं शुक्लादिः स पटादेरिति सामोपपत्तेः समासः प्राप्नोतीति प्रति-२५ पिध्यते । तथा पटस्य शोलयं गुडस्य माधुर्यमत्र पूर्वत्र च शुक्लादेर्गुणस्य शुलः पट इत्यादी द्रव्येऽपि वृत्तिदर्शनादस्वास्थ्यमस्त्येव । शौम्यशब्दश्च यद्यपि शुक्रवत्साक्षात्पटे न वर्त्तते तथापि भूतपूर्वगत्या द्रव्य- वृत्तिरित्यस्याप्यस्वस्थत्वम् । गुणाचेह लोकप्रसिद्धा रूपरसगन्धस्पर्शा अभिप्रेतास्तत्तद्विशेपैरेवायं प्रतिषेध- तेन यनगौरवं बुद्धिकौशलं करणपाटवं भेरीशब्दो गौशब्दमित्यादौ प्रतिपेयो न भवति । अस्वस्थ- गुणैरिति किम् ? घटवर्णः कन्यारूपं कपित्थरसः चन्दनगन्धः स्तनस्पर्शः । बहुलाधिकारात् कण्टकस्य ३० तेदण्यम् वृपलस्य धाष्टर्यमित्यादिषु समासो न भवति, चन्दनसौरभ्यमित्यादिषु च भवतीति ॥ ४८ ॥ नञ् ॥ ४९.॥ [सि०३११५१] नन् नाम्ना सह समरसते, स तत्पुरुषः २० ३३ ब्राह्मणभिन्न इत्यादि शाब्दबोध एवेत्याहुस्तन्मतेऽस इत्यादेरतिसर्व इत्यादि समकक्षत्वात्सर्वनामसज्ञाकार्य २८४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- द्वौ नौ प्रकृतौ लोके पर्युदासप्रसज्यको । पर्युदासः सदृग्ग्राही प्रसज्यस्तु निषेधकृत् ॥१॥ तदन्यतद्विरुद्धादयो नमोऽर्थाः । “नमत्" (३।२।१२५) । असाधुः । “त्यादौ क्षेपे" (३२२२१२६)। नञः । स्यात् अपचसि त्वं जाल्म ॥ ४९ ॥ "न०” । द्वौ नबावित्यादि कारिकाया अयं भावः-निवर्त्यमानतद्भाव उत्तरपदार्थः पर्युदासे नम्- समासार्थः, स चतुर्दा-तत्सदृशः १ तद्विरुद्धः २ तदन्यः ३ तदभाव ४ श्च । अब्राह्मणः अशुक्ल इति तत्सदृशः क्षत्रियादिः पीतादिश्च प्रतीयते १ । अधर्मः असित इति तद्विरोधी पाप्मा कृष्णश्च प्रतीयते २ । अनमिरवायुरिति ताभ्यामन्यः प्रतीयते ३ । अवचनमवीक्षणमिति तदभावः प्रतीयते ४ । उत्तरपदार्थस्य तद्भावनिवृत्तिस्तु अर्थत एव नतु शब्दतः, तेनासः अतस्मिन् इत्यादी उत्तरपदप्राधान्यात्सर्वादिकार्य १० गणकार्य च सिद्धं भवति--यथा अत्वन्त्वं सम्पद्यते त्वद्भवतीत्यन युष्मदर्थस्य गौणत्वेन प्रथमनिकेऽपि शब्दमानानयात्त्वादेशो भवति। नन्वस्योत्तरपदार्थप्राधान्येन तल्लिङ्गसङ्ख्यत्वे सति कथं किरातादौ "भव- न्यनेके जलधेरिवोर्मय" इत्यादिप्रयोगे बहुवचनम् ' असाधव एवेशाः शब्दाः इति श्रीसूरिपादाः । कश्चिदेकशब्दस्यान्यार्थस्यैकशेपादेके इति साधयित्वा पश्चान्नसमास मन्यन्ते । अध्यारोपितैकत्वानां प्रकृत्यर्थतया तत्र वास्तववहुत्वाभिप्राय बहुवचनम्, यद्वा समुदायबहुत्वे बहुवचनं रथोऽश्वो गजश्च १५प्रत्येकमनेकस्ततः अनेकश्चानेकश्चानेकश्वेत्येकशेष इति” तु मनोरमायाम् । प्रसज्यप्रतिषेधे तु नम् पदा- न्तरेण सम्बध्यते इत्युत्तरपदं वाक्य इव स्वार्थ एव वर्तते, तनासामर्थेऽपि यथाभिधानं वाहुल- कात्समासः । सूर्यमपि न पश्यन्त्यसूर्यम्पश्या राजदाराः, पुनर्न गीयन्ते अपुनर्गेयाः श्लोकाः, श्राद्धं न मुझेऽश्राद्धभोजी, वत्सेभ्यो न हितोऽवत्सीयः, वध नाहतीत्यनावध्यो ब्राह्मण इत्यादि । अन्यत्र तु नास्तीत्यादायसामर्थ्यादेव न समासः । अन्य इत्येव-न विद्यन्ते मक्षिका अत्यमक्षिकाकः, मक्षिकाणाम- २० भावोऽमक्षिकम् , अन्यपदार्थप्राधान्ये बहुव्रीहिः, पूर्वपदार्थप्राधान्येऽव्ययीभावः, उत्तरपदार्थप्राधान्ये वसुरुप इति विवेकः। "तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता । अप्राशस्त्यं विरोधश्च नबर्थाः पट् प्रकीर्तिताः" ॥१॥ अब्राह्मणः, अपापं, अनश्वः, अनुदरा कन्या, अपशवोऽन्ये गोभ्यः, अधर्म इति क्रमेणोदाहरणानीति । तथा आरोपितत्व नया द्योत्यते आरोपमानविषयत्व तु ससर्गः । तथा च अब्राह्मणशब्दादारोपितो २५ ब्राह्मण इति बोधे अर्थाद् ब्राह्मणभिन्न इति पर्यवस्थति, अत एवानुपसर्जनत्वादतस्मिन्नित्यादौ सर्वनाम- कार्य सिद्ध्यति । तत्पुरुषस्यौत्सर्गिकमुत्तरपदार्थप्राधान्यमप्येव सति निर्याधम् । “मीमांसकादयस्त गणकार्य च न स्यात्” इत्यादि मनोरमायाम् । "त्यादौ”। याद्यन्ते पदे परतः क्षेपे गम्ये न अकारो भवति । "अ मो नो नाः प्रतिषेधे” इत्यकारेण निषेधार्थेन सिद्धौ, क्षेपे नमः श्रवणवारणामर्थ- ३० समासार्थ च वचनम् ।। ४९ ॥ अन् खरे ॥ ५० ॥ [सि० ३२।१२९] खरादौ परे नमोऽन् स्यात् । अनार्यः ॥ *नखनासत्यादयो निपात्याः (अत्र “नखादयः" (३।२।१२८) इति सूतं ज्ञेयम् )॥५०॥ "अन्" । अन् इति स्वरूपनिर्देशात् नलोपो द्वित्य च न भवति । "नख०" नास्य समस्तीति ३५नसः । सत्सु साधुः सत्यः, न सत्यः असत्या, न असत्यः, नासत्यौ अश्विनीपुत्रौ । आदिशल्दात् न घटो , प्रक्रियावृत्तिरूपें श्रीहेमप्रकाशे संमासप्रक्रिया। तत्पुरुषः २८५ न भ्राजते इति नभ्रात् । न न मुञ्चतीति नमुचिः । न न कुलमस्य नकुलः । सर्वत्र पृपोदरादित्वादेकल नबो लोपः, यद्वा न भ्राजते इति नभ्राट् इत्येकेनैव नया रूपाणि ॥ न पुमान्न नीति नपुंसकम् , अत एव निपातनात् स्त्रीपुंसयोः पुंसकादेशः ॥ न झीये न झरति वा नक्षत्रम् । न कामति न क्रीणाति वा नक्रः । नास्मिन्नंदुः खमस्ति नाकं । एवं नग्नः, नागः, नभागः नाराचः नापितः नमेरुः ननन्दा, नान्तरेण भवति नान्तरीयकम् । नाचिकेतः । आकृतिगणत्वाच नास्तिकः नमः नारङ्गमित्यादयो५ द्रष्टव्याः । तथा "नगोऽप्राणिनि वा” (३१२।१२७) । न गच्छतीति नगः अगो वा गिरिः। अप्राणिनीति क्रिम् ? अगो वृपलः शीतेन ॥ ५० ॥ दुनिन्दाकृच्छ्रे ॥ ५१ ॥ [लि० ३३१४३ ] एतन्निन्दाकृच्छ्रवृत्तिनाम्ना समस्यते । दुर्जनः दुप्कृतम् । “सुः पूजायाम्" (३।१।४४)। सुजनः ॥ ५१॥ १० "दु०” । निन्दितो जनो दुर्जनः । कृच्छ्रेण कृतम् दुप्कृतम् ॥ “सुः०”। स्पष्टम् ॥ ४९ ।। अतिरतिक्रमे च ॥ ५२ ॥ [सि० ३।११४५] अतिरतिक्रमेऽर्चायां च समस्यते । अतिस्तुत्यः अतिराजा । "आङल्पे" (३।११४६)। आकडारः। “पूर्वापराधरोत्तरमभिन्नेनांशिना" (३।११५२)। समस्यते । पूर्वकायः। “समें- ऽशेऽधं न वा” (३।११५४)। अर्धपिप्पली पिप्पल्यर्धम् । “जरत्यादिभिः” (३।११५५)। अप्य? १५ वा समस्यते । अर्धजरती जरत्यर्थः । "सायाह्नादयः” (३।१।५३)। साधवः ।। ५२ ॥ "अति०" । अतिस्तुयेति-अतिक्रमेण स्तुत्वेत्यर्थः । शोभनो राजातिराजेत्यर्थः । "आ०"। ईप- कडारः आकडारः । “पूर्वा"। अंश एकदेशस्तद्वानंशी । पूर्वादयोऽशवाचिनोऽशिना समस्यन्ते न चेत्सोऽशी भिन्नः प्रतीयते । पूर्वः कायस्य पूर्वकायः । एवमपरकायः अधरकायः उत्तरकावः । पूर्वा- दिग्रहणं क्रिम् ? दक्षिणं कायस्य । अभिन्नेनेति किम् ? पूर्व छात्राणामामन्त्रयस्त्र, बहुवचनातेदप्रतीतिः छात्रानां सम्बन्धिनं कस्मादपि छात्रात्पूर्वमित्यर्थः । प्रसज्यप्रतिषेधः किम् ? पूर्व पाणिपादत्य अत्र समा- हारस्यैकत्वेऽपि पाणिः पाद इति भेदप्रतीतेनं भवति । पूर्वग्राम इत्यादौ तु न ग्रामझब्दालासादादिभेद- प्रतीतिः । अंशिनेति किम् ? पूर्वो नाभेः कायस्य-अत्र नाभेर्यः पूर्वो भागः स कायस्यावयव इत्यर्थः । नाभेरिति दिग्योगलक्षणा पञ्चमी । अत्र पूर्वस्त्र भागस्य नाभिरवधिनत्वेकदेशिनी अतो नाभ्या सह समासो नेत्यर्थः । कायेन तु स्यादेव । पूर्वकायो नाभेरिति । "समें०”। समेंऽशे वर्तमानमर्द्धमभिन्ने-२५ नाशिना समस्यते । अर्द्धपिप्पलीति–परलिङ्गो द्वन्द्वोऽशीति लिङ्गानुशासनात् त्रीत्वम् । पक्षे पिप्पल्यर्द्धमिति तुल्यभागेऽर्द्धमिति नपुंसकत्वम् । समेंऽश इति किम् ? ग्रामार्द्धः, अत्र अर्द्धसुदर्शनेति पुंस्त्वम् । अर्द्ध च सा पिप्पली चेति कर्मधारयेणैव सिद्धे भेदविवक्षायां पक्षे पैष्टीसमासवाधनाथ अद्धं पिप्पलीनामिति असमांशे चाश्चासौ ग्रामश्चेति कर्मधारयनिपेधार्थ वचनम् । कयम पिप्पल्य इति ? अद्धं पिप्पल्या इत्यभिन्नेन समासे सत्येकशेपात्, अर्द्धराशिरित्यत्र राशेरभेदप्रतिभासाद्भविष्यति । अत्र समेंशेऽर्द्धशब्द ३० आविष्टलिङ्गो नपुंसकलिङ्गः, असमासे तु पुंल्लिङ्गः । अन्ये त्वसमांझे वायलिगामेनमाहुरसमांश एव च पष्टीसमासम्, समांशे तु नित्यमंशितत्पुरुपमिच्छन्ति । अर्द्धपिप्पलीत्यादावर्द्धशब्दस्य प्रथमोतत्वात्नाग्नि-३२ १ अयमधः-सूत्राभावे नेदानेदविवनायां प्रयोगद्वयं सिद्ध्यति । सूत्रम्ली तु नेदविवशयामेव पक्षे पटोगमानं याधिला प्रयोगद्वयं सिद्धम् । अन्यथा नेदे पष्टीसमास एवं स्यात् । २ पिप्पत्यादयस्यांशिनोऽनेकद्रव्यसभावलादभिनयानमाला- भावः । पष्टीसमासलु भवत्येते पिप्पत्यर्द्धमिति । प्रकरणादिना यहुवस्याप्यन्तर्गतबहुवचनान्तस्यापि प्रतिरविरुद्धा । . - २० ।

२८६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पातः । “जर०" अझै जरत्या अर्द्धजरती । तत्तुल्यमर्द्धजरतीयम् “काकतालीयादयः" (७१।११७) इति सिद्धिः । एवमर्द्धवैशसं अो वैशसस्य-अर्द्धमरणमित्यर्थः । अझैक्तम विलोकितमित्यादि । पक्षे तु जरत्यर्द्ध इत्याद्यपि भवति । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । असमांशार्थोऽयमारम्भः। "साया०"। एतेऽ. शितत्पुरुषाः साधवः स्युः । सायमह्नः सायाह्नः, मध्यमह्नः मध्याह्नः, मध्यं दिनस्य मध्यंदिनम् , मध्यं ५रात्रेः मध्यरात्रः, "उपारताः पश्चिमरानगोचरादपारयन्तः पतितुं जवेन गाम् । तमुत्सुकाश्चरवेक्षणो- न्मुखं गर्वा गणाः प्रस्तुतपीवरोधसः" ॥ १॥ इति किरातार्जुनीये । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । पूर्व पञ्चाला:, उत्तरे पञ्चाला इतिवत्समुदायवाचिनामंशेऽपि प्रवृत्तिदर्शनासामानाधिकरण्ये सति कर्म- धारयेणैव सिद्धम् । पूर्वश्चासौ कायश्च पूर्वकायः । सायं च तदहश्च सायाह्नः इति । तत्पुरुपविधानं तु "पूर्वापर०” (३।१।१०३) इति सूनेऽत्र सूने च अह्नः सायं कायस्य पूर्वमिति पष्ठीसमासबाधनार्थम् । १० अनादिशब्दानुवृत्तेः "द्वित्रिचतुःपूरणाग्रादयः" (३।११५६)। पूरणप्रत्ययान्ता ब्यादयोऽप्राद- यश्चांशवाचिनो भिन्नेनांशिना वा समस्यन्ते । द्वितीयं भिक्षाया द्वितीयभिक्षा । एवं तृतीयभिक्षा । चतु- र्थभिक्षा । तुर्य भिक्षा । तुरीयभिक्षा । अयं हस्तस्याग्रहस्तः । एवं तलपादः । पक्षे भिक्षाद्वितीयं हस्तामा मित्यादि । नित्याधिकाराभावाद्वाक्यसिद्धावष्यत्र वानुवृत्तेनिषिद्धोऽपि पूरणेन पष्ठीसमासो भवति। "कालो द्विगौ च मेयैः" (३।११५७) । कालवाचि नामैकवचनान्तं द्विगौ च विषये वर्तमान मेयवाचिना १५समस्यते । मासो जातस्य मासजातः । द्विगौ-एको मासो जातस्य एकमासजातः । द्वे अहनी सुप्तस्य व्यहसुप्तः । कथं व्यहजातः ? समाहारद्विगोर्जातेन काल इत्यंशेन समासः । यद्यप्यन जातादि कालस्य विशेषणं तथापि शब्दशक्तिस्वाभाव्यात्समासो जातादिप्रधानस्तेन समासे तदीयं लिङ्गादिकं भवति । काल इति चैकवचनं द्विगोरेन्या प्रयोजकम् , तेन मासौ मासा वा जातस्येत्यत्र न भवति । द्विगौ तु (द्वौ प्रयो वा मासा जातस्य द्विमासजातः त्रिमासजात इत्यपि ) भवति । द्विगुग्रहणं त्रिपदसमासार्थम् , २० अन्यथा नाम नाम्नेत्यनुवृत्तेढयोरेव स्यात् । मेयैरिति किम् ? मासश्चैत्रस्य, जातादेरेव हि मेयत्वम्, जन्मादेः प्रभृति जातादिसम्बन्धित्वेनैवादित्यगतिपरिच्छेदान्न द्रव्यमानस्य । क्तान्तेनैव मेयेन प्रायेणायं समासस्तेन मासो गच्छत इत्यादौ समासो न भवति । पष्ठीसमासापवादोऽय योगः । “स्वयंसामी तेन" (३३११५८) । एते अव्यये क्तान्तेन समस्येते । स्वय धौतौ पादौ, धौत इति कर्मकर्तरि वा तः, यतः करणशक्तेः कर्तृशक्तेर्वा वाचकः स्वयंशब्दः, स्वयमात्मनेत्यर्थः-अत्र करणे कर्तरि वा २५मृतीया । सामिकृतं अर्द्धमित्यर्थः । “सामिघटिता मुक्तानुमन्दाकिनीति" नैषधीये । ऐकपद्य तद्धिता. द्युत्पत्तिश्च समासप्रयोजनम्-स्वार्यधौतिः सामिकृतिः ॥ ५२ ॥ गतिकन्यस्तत्पुरुषः॥ ५३॥ [सि० ३११४२] गतिसंज्ञाः कु इत्यव्ययं च नाम्ना समस्यते । समासोळेऽन्यो बहुव्रीडादिलक्षणरहितस्तत्पुरुषः स्यात् । ऊरीकृत्य । प्रणम्य । कुत्सितो ब्राह्मणः कुनाह्मणः । नित्यसमासोऽयमविग्रहोऽस्वपदविन- ३० हश्व नित्यसमासः स्यात् ॥५३ ॥ "गति." । कु इत्यव्ययं पापाल्पयोर्वर्त्तते । प्रागुक्ता गतिसंज्ञकाः कुश्च नाना सह नियं समस्यन्ते, ३२ समासस्तत्पुरुपसज्ञो भवति । ऊरीकृत्य । कुत्सितो ब्राह्मणः कुब्राह्मणः । अव्ययमियेव-कुर्विशाला, १ मनु सायमोऽव्ययत्वात् 'तृप्त' इत्यादिना पष्ठीसमासस्स निषेधेन प्राप्तिरेव नास्ति, किमुच्यते षष्ठीसमासवाधनार्थमिति । उच्यते । यदाकारान्त सायंशब्दोऽनव्यय नपुसकलिङ्गस्तदा प्रामोति । २ अन्यत्र चरितार्थमित्यर्थ , द्विगौ तु द्विवचनान्त: मपि समस्यते इति भाव. । ३ अन न मासथैनस परिच्छेदकलेन सम्बन्धी किं तूत्सवास्पदलेनान्यन वा प्रकारेणेति । - । ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २८७ पृथ्वीत्यर्थः । तत्पुरुपस्य सामान्यतो लक्षणमाह-अन्य इति वहुव्रीह्यादिलक्षणरहित इत्यर्थः । तेन कुत्सिताः पुरुषा यस्य स कुपुरुपकः, अनान्यपदार्थप्राधान्याद्वहुव्रीहिरेव (बहुव्रीहित्वात्कच् भवति)। तत्पुरुषप्रदेशाः "गोस्तत्पुरुषात्" (७३।१०५) इत्यादयः । अथात्रादेशविशेपानाह- "कोः कत्तत्पुरुषे" (३।२।१३०)। स्वरादौ परे । कदन्नम् । “स्थवदे” (३।२।१३१)१५ तथा । कद्रथ: । कद्वदः । "कोः०" । तत्पुरुप इति किम् ? कुत्सिता उष्ट्रा अस्मिन् कूष्ट्रो देशः । स्वरादावित्येव-कुब्राह्मणः । "रथ० । कुत्सितो रथः कुत्सितो रथोऽस्येति वा कद्रथः । वदतीति वदः "अच्” (५।११४९) कुत्सितो वदः, कुत्सितो वदोऽस्येति वा कद्वदः । तत्पुरुष एवेच्छन्त्येके । अन्यत्र कुरथो राजा कुवदो मूर्खः । एवं "तृणे जाती” (३।२।१३२) । कुत्सितं तृणमस्याः कत्तॄणा नाम रौहिपाख्या १० तृणजातिः । जाताविति किम् ? कुत्सितानि तृणानि कुतृणानि । “कत्रि” (३।२।१३३)। कुशब्दस्य किंशब्दस्य वा त्रिशब्दे उत्तरपदे कदादेशो निपात्यते । कुत्सितास्त्रयः के वा त्रयः कत्रयः । कुत्सितात्रयः के वा त्रयोऽस्य कत्रिः । किमो नेच्छन्त्येके किन्त्रयः ।। ५३ ।। काऽक्षपथोः॥ ५४॥[सि० ३३२११३४] अनयोः परयोः कोः का स्यात् । काक्षः। कापथम् । “पुरुषे वा” (३२२।१३५)। कापुरुषः १५ कुपुरुपः ॥ ५४॥ "काक्ष० । अक्षशब्दस्याकारान्तस्य कृतसमासान्तस्य च ग्रहणम् । कुत्सितो अक्षः पाशकादिः काक्षः, कुत्सितमक्षमिन्द्रियं काक्षम् , कुत्सितोऽक्षोऽस्य काक्षो रथः । कुत्सितमक्षमक्षि वाऽस्य काक्षः । कुत्सितः पन्थाः कापथम् पथः सङ्ख्याव्ययेति नपुंसकत्वम् । अमरो गौडश्च पुंस्त्वमाह-व्यध्वौ विपथकापथौ इति । कुत्सितः पन्था अस्मिन् कापथो देशः । साकोऽपि भवति । ककु कुत्सितोऽक्षः२० काक्षः । पथिन्निर्देशात्तत्पर्यायेऽव्युत्पन्ने पथशब्दे न भवति ।-कुत्सितः पथः कुपथः (न तु कुपथम् )। कुपथं वनम् । अनीपदर्थं वचनम् । “पुरुषे०” कुत्सितः पुरुपः, कुत्सिताः पुरुषा अस्मिन्निति विग्रहे वा कापुरुषः, कुपुरुपो ग्रामः । अनीपदर्थे विकल्पः । ईपदर्थे तूत्तरेण नित्यमेव । तत्रापि विकल्प एवेति कश्चित् ॥ ५४ ॥ अल्पे ॥ ५५॥ [सि० ३।२।१३६ ] ईपदर्थस्य कोः का सात् । काच्छम् ॥ ५५ ॥ "अ" 1 कु ईपदच्छे काच्छम् । स्वरादावपि परत्वात् कादेश एव न तु कदादेशः ॥ ५५ ।। काकवी चोष्णे ॥ ५६ ॥[सि० १२११३७] ईपदर्थस्य कोरुष्णे परे का कवौ वा स्याताम् । कोप्णम् । कवोणम् । कदुष्णम् ॥ ५६ ॥ "का." । कु ईपत् कुत्सितं वोणं कवोष्णं कोणम् । पक्षे यथाप्राप्तमिति । तत्पुरुपे कदुष्णम् । बहुव्रीही तु कदादेशो न भवति । कूष्णो देशः । अन्यस्तु अनावपीच्छति-कामिः कवाग्निः कदाग्निः ॥५६॥ ३१ " २८८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- मयूरख्यंसकेत्यादयः ॥ ५७॥ [सि० ३३११११६ ] एते तत्पुरुषाः समासा निपात्यन्ते । मयूरव्यंसकः । एहीडं वर्तते । अनीतपिवता क्रिया । एहिरेयाहिरा । कुरुकटो वक्ता । गतप्रत्यागतम् । शाकपार्थिवः । त्रिभागः ॥५७ ॥ "मयू०" मयूरव्यंसक इति-विगतावंसावस्य व्यंसस्ततुल्यो व्यंसकस्तादृशो मयूरः । व्यसयति ५या छलयति यः स व्यंसकः । लुब्धकानां मयूरो गृहीतशिक्षो योऽन्यान् वन्यान् छलयति तद्रूपेण लोकस्यापि वश्चकः धूर्त इत्यर्थः ( एवं छात्रव्यंसकः, मुण्डश्चासौ कम्योजश्च कम्बोजमुण्डः, एवं यवन- मुण्डः, व्यंसका चासौ मयूरी च मयूरव्यंसका कर्मधारयलक्षणः पुंवद्भावः।) एतेपु विशेष्यस्य पूर्व- निपातो निपातनात् । एहीडाद्योऽन्यपदार्थे एहि इडे खि इति जल्पो यस्मिन्कर्मणि काले या तत् एहीड- मिति (एहि यवैरिति जल्पो यन्न कर्मणि काले वा तदेहियवं वर्तते । एतौ निपातनानपुंसको) एहि १० वाणिजेति जल्पो यस्यां क्रियायां सा एहिवाणिजा । ( एवं एहिवाणिजा, अपेहिवाणिजा, एहिवागता, अपेहिवागता, एहिद्वितीया, अपेहिद्वितीया, एहिप्रघसा, अपेहिप्रघसा, एहिविघसा, अपेहिविघसा, एहिप्रकसा, अपेहिप्रकसा, प्राहेकटमिति जल्पो यस्यां सा प्राहेकटा किया, एवं प्राहेकर्दमा, प्राहेकपर्दा, उद्धम चूडे उद्धम चूडामिति वा जल्पो यस्यां सोद्धमचूडा क्रिया, आहार चेलमिति यस्यां सा आहारचेला किया, एपमाहरवसना, आहारवितता, कृन्धि विचक्षणेति कृन्धि विचक्षणमिति वा यस्यां सा कृन्धि- १५विचक्षणा क्रिया, भिन्धि लवणमिति यस्यां सा भिन्धिलवणा, एवं पचलवणा, उद्धरोत्सृजेति जल्पो यस्यां सोद्धरोत्सृजा, एवमुद्धरावसृजा, उद्धमविधमा, उद्वपनिवपा, उत्पतनिपता, उत्पचनिपचा, कृन्धि विक्षिणीहीति विक्षणु इति वा यस्यां सा कृन्धिविक्षणा, उन्मृजावमृजेति यस्यां सोन्मजावमजा, अत एव निपातनादिहैव च मृजे) शो भवति । (आख्यातमाख्यातेन सातत्ये) आख्यातमाख्यातेन सातत्ये इति शाकटायनसूत्रम् । अनीतपिबतेति-अनीतपिवतेति सातत्येनोच्यते यस्यां सा किया। (एवं अनीतपचता । २० खादतमोदता, पचतभृजता, लुनीतपुनीता, सादाचामा, आहरनिवपा, आयपनिष्किरा, पचमकूला, इह द्वितीयेति यस्यां क्रियायां सेह द्वितीया, एवमिहपञ्चमी, अद्यद्वितीया, अद्यपञ्चमी ) तथा एहिरे याहिरेति यस्यां क्रियायां सैहियाहिरा । एवं एहिरेगच्छरा, अहो अहं पुरुप इति यस्यां सा अहोपुरुपिका । अहं पूर्व इति यस्यां सा अहम्पूर्विका । एचमहम्प्रथमिका । अहमहमिति यस्यां सा अहमहमिका विकृतं प्रकृतं च यस्यां सा विप्रका, (विचप्रका?) निश्चितं च प्रचितं च यस्यां सा निश्चप्रचा । या इच्छा यस्यां सा यहच्छा। २५ एषु सर्वेषु क्रियैवान्यपदार्थस्तत्प्राधान्याचाप । कुरुकटो वक्तेति कुरुकटमित्यभीक्ष्णं य आह स कुरुकटो वक्ता । 'ह्यन्तं स्वकर्मणा बहुलमाभीक्ष्ण्ये कर्तरि समासाभिधेये' । एवं जहिजोडमियभीक्ष्णं य आह स जहिजोडः, (एवमुजहिजोडः, जोडो दासः । जहिस्तम्बः, उन्नहिस्सम्यः, कुरुकटः, बहुलवचनान्न च भवति, पचौदनमित्यभीक्ष्णमाह, स्नात्वा कालीभूतः स्नात्वाकालकः, एवं पीत्वास्थिरकः, भुक्त्वासुहितः, प्रोष्य विप्रयुक्तो भूत्वा पापीयानिःस्नेहो भवति स प्रोष्यपापीयान् , उत्पत्याकाशे भूत्या या पाकलापाण्डुर्भवति ३० सोत्पत्यपाकला, निपल्स भूमौ निपतिता रोहिणी या रक्ता भवति सा निपत्यरोहिणी, निपद्य निषण्णा सती श्यामा जाता निपद्यश्यामा, निपण्णा श्यामा जाता निषण्णश्यामा ।)। उदक चावाक् चेति उचितं चाव: चिसं चेति या उच्चावचम् । उच्चैश्च नीचैश्च उचितं च निचित चेति वा उच्चनीचम् । आचितं चोपचितं च आचौपचम् । आचितं चावचितं च आचोवचम् । आचितं च पराचितं च अर्वाक् च परस्ताचेति वा आचपराचम् । निश्चितं च प्रचितं च निश्चअचम् । निकुषितं च निस्त्वचितं च निश्चत्वचम् । न भवति ३५ किश्चन न कचिटुपयुज्यते इयकिञ्चनम् । नास्य कुतो भयमस्तीत्यकुतोभयम् ।। तथा अन्तरशब्दो - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाश समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २८९ भिन्नवाची मानं कात्त्येऽवधारणे अन्तरमात्रशब्दाभ्यां सह नित्यसमास अन्यो राजा राजान्तरं चिदेव चिन्मात्रमिति मनोरमायाम् ।। गतप्रत्यागतादय इति-गतं च तत्प्रत्यागतं च गतप्रत्यागतम् । एवं यातानुयातम् (महान् ऋयोऽल्पः ऋयिका ऋयावयवयोगात् ऋचः, ऋविकावयवयोगात् ऋयिका, ऋयचासो ऋयिका च क्रयक्रयिका समुद्रायः । एवं पुटापुटिका, फलाफलिका, मानोन्मानिका, एषु व्यवस्थित्तपूर्वोत्तरपदसमासः ।) झाकपार्थिव इति-झाकप्रियः शाकभोजी झाकप्रधानो वा५ पार्थिवः पृथोरपलं झाकपार्थिवः पृथिव्या ईश्वरः पार्थिव इति वा तेन शाकपार्थिवः (अतपवन- सौश्रुतः, सुश्रुतोऽपत्यं सौश्रुतः कुतपसौश्रुतः । अजापण्यस्तौल्बलिः अजातोल्वलिः) । म यष्टिग्रहरणो मौद्गल्यो चष्टिमौद्गल्यः, परशुरामः, घृतप्रधाना रोदिः धृतरोटिः, एवम् ओदनपाणिनिः, आणिमाण्डव्यः, वलाकाकौशिकः, विदर्भीकौण्डिण्यः । सहस्रवाहुरर्जुनः सहस्रार्जुनः ! व्यत्यत्रा विद्या त्रिविद्या । एकाविका दश एकादश । एवं द्वादश पोडश । एकविंशतिः द्वाविंशतिः ११० एकेनाधिकं शतं एकातम् द्विशतम् । दध्युपसिक्त ओदनः दध्योदनः, एवं धृतोदनः । गुटमित्रा धाना गुडधानाः, एवं तिलपृथुकाः । अश्वयुक्तो रथो अश्वरयः, एवं गजरथः । घृतपूर्णो वटो घृतघटः । अत्र शाकपार्थिवादिपु प्रियादेरुत्तरपदस्य लोपः । त्रिभाग इति तृतीयो भागनिभागः । एवं व्यंशः । पञ्- भागः पदंशः । त्रिदिवं तृतीयदिवम्, त्रिविष्टपं तृतीअविष्टपम् इत्यादिपु पूरणप्रत्ययस्य वा लुग् भवति (तथा सर्वेषां श्वेततरः सर्वश्वेतः, एवं सर्वमहान् अत्र गुणेन तरवन्तेन निर्धारणपष्टीसमासस्तरब्लो-१२ पश्च । एवमविहितलक्षणस्तत्पुरुपो मयूरव्यंसकादिपु द्रष्टव्यः) यचेह लक्षणेनानुपन्नं तत्सर्वं निपातना- सिद्धम् । इतिशब्दः स्वरूपावधारणार्थः तेन परमो मयूरव्यंसक इति समासान्तरं न भवति । उत्त- रपदेन भवत्येवेत्यन्ये । मयूरव्यंसकप्रिय इत्यादि । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । तेन विस्पष्टम्पटुः विस्सष्ठ- पटुः । पुना राजा पुनाराजः । एवं पुनर्गवः । पादाभ्यां ह्रियते इति पादहारकः । गले चोप्यते इति गलेचोपकः । सायन्दोहः, प्रातर्दोहः, पुनर्दोहः, सायमाशः, प्रातराशः इत्यादयो द्रष्टव्याः । अथात्र लुगादेशादिकमाह- समासे यथायोगं लुग्दीर्घहस्वादिकं वाच्यम् । मांस्पाका मांसपाकः । समासे इत्यादि । मांस्साक इति "मांसस्यानधनि पचि नवा" (३।२।१४१) । मांसशब्द- स्यानडन्ते वजन्ते पचावुत्तरपदे लुग् वाऽऽदेशो भवति । मांसस्य पचनं मांस्पचर्न मांसपचनम् । मांस्प- चनी २ । अनड्यनीति किम् ? मांसपतिः। पचाविति किम् ? मांसदाहः । “कृत्येऽवश्यमो लुक" २५ (३।२११३८) । अवश्यकार्यम् , एवं स्तुत्यं देयं कर्त्तव्यं करणीयम् । कृत्य इति किम् ? अवश्यंलावकः । "समस्ततहिते वा” (३।२।१३९) । सततं सन्ततम्, सन्तन्यतेस्म संहितम् सहितम् , सन्धीय- तेस्म ! "धागः” (१५) इति हिः । “तुमश्च मनः कामे" (३।२।१४०) । भोक्तुं मनोऽस्य भोक्तुमनाः । गन्तुं कामोऽस्य गन्तुकामः । सम्यग् मनोऽस्य समनाः । एवं सकामः । "ते लुग्वा" (३।२।१०८)। नामविपये ये पूर्वोत्तरपदे ते लुग् वा भवतः । देवदत्तः-देवः, दत्तः । सत्यभामा-३० सत्या, भामा । देवदत्तवाचिनश्च देवझब्दस्य शब्दसान्येऽपि प्रकरणादेरर्थनिश्चयः । "हविष्यष्टनः कपाले" (३।२।७३ ) । हविष्यभिधेयेऽष्टनाब्दस्य कपाले उत्तरपदे दीर्घोऽन्तादेशो भवति । अष्टसु कपालेपु संस्कृतं अष्टाकपालं हविः । “गवि युक्त" (३।२।७४) । अष्टौ गावो युक्ता अस्मिन्निति ३३ १ निपालन्ते गम्यन्तेऽनुत्पाप्यविहितान्यपि लक्षणान्यन्मिन्निति निपातनं सुने लक्ष्यस्य सरूपेणोपादाननिति । पूर्वपदस्योत्तरपदस्य वा लोपे यः समुदायमनुवर्तते देवादिशब्दः स देवदत्ताद्यर्थेन च विदयार्थेन च समान इति कथं निश्चयों साति, भयं देवदतार्य एव, न तु विदयार्थ इलाह-टेलादि-मन्दानां निमार्यानां मान्येऽपि नुत्लानि । है. अस्त्र पूर्वा० ३७ २० २९० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- त्रिपदे बहुव्रीही कृते उत्तरपदे परे द्वयोर्द्विगुः । “गोस्तत्पुरुषात्” (७३।१०५) इत्यसमासान्तस्तत्र दीर्घत्वेन युक्तार्थसम्प्रत्ययाद्गतार्थत्वायुक्तशब्दस्य निवृत्तिः । अष्टागवं शकटम् । "नान्नि" (३२२७५)। अष्टौ पदान्यत्र अष्टापदः कैलाशः । अष्टापदं सुवर्णम् , अष्टसु लोहेषु पदं प्रतिष्ठा यस्येति । "कोटर- मिश्रकसिनकपुरगसारिकस्य वणे" ( ३१२१७६)। कोटरावणम् । "पूर्वपदस्थानाम्यगा" ५(२॥३१६४) इति णत्वे सिद्धे अत्र वणनिर्देशो नियमार्थस्ततो दीर्घसन्नियोग एवं पूर्वपदस्थादिति वनस्य णत्वमन्यन्न तु कुवेरवनमित्यादौ संज्ञायामपि णत्वं न भवति । “अञ्जनादीनां गिरौं" (३२२१७७) । अञ्जनागिरिः । अञ्जन भाञ्जन किंशुक किंशुलुक साल्व लोहित कुकुट समूण नल पिङ्गल इति दशकोऽञ्जनादिः । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । "ऋपी विश्वस्य मित्रे" (३।२१७९) विश्वामित्रः । “नरे" ( ३१२१८०) । विश्वे नरा अस्य विश्वानरो नाम कश्चित् । वसु. १०राटो” (३१२१८१)। पृथग्योगान्नानीति निवृत्तम् । विश्वं वस्त्रस्य विश्वावमुः, विश्वस्मिन् राजते इति च विश्वाराट् । राडिति विकृतनिर्देशादिह न भवति-विश्वराजौ । "स्वामिचिहस्याऽविष्टाऽटपञ्च- भिन्नछिन्नछिद्रश्रुवस्वस्तिकस्य कर्णे" (३।२।८४) । स्वामी चिह्नयते येन तत् स्वामिचिह्नम्, तद्वाचिनो विष्टादिवर्जस्य कर्णे उत्तरपदे दीर्घः स्यात् । दानं चिह्न कर्णे यस्य स दानाकर्णः पशुः । विष्टादिवर्जनं किम् । विष्टकर्णः, अष्टकर्णः । “गतिकारकस्य नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहि- १५ तनौ कौ" (३१२१८५) । गतिसंज्ञस्य कारकवाचिनश्च नह्यादिषु सप्तसु कियन्तेपु उत्तरपदेषु परेषु दीर्घोऽन्तादेशो भवति । उपनाति उपनाते वा उपानत्, परीणत् । वृत्-नीवृत् उपावृत् । वृप्-प्रावृद् परीवृट् । व्यध्-श्वावित् मर्मावित् । रुच-नीरुक् अतीरुक अभीरुक् ।। सह-तुरासद् तुरेर्जुहोत्यादिपाठात्- तुतोति'नाम्युपान्त्य.” (५१११५४) इति कः । तुरं सहति तुरासट् । तुरासाडिति तु छान्दसः । अभिधानचिन्तामणौ तु तुरं त्वरितं साहयत्यभिभवत्यरीन् (तुरं वेगं सहते वा) पृषोदरादित्वात् तुरा- २० पाद् । (अरणमृतिः पीडा तां सहते ) ऋतीषट् भीरुष्ठानादित्वात् पत्वम् । जलापट् ॥ तन्-परीतत् । "गमा कौ" (४।२।५८) इति न लोपः ॥ गतिकारकस्येति किम् ? पटुरुक् तिग्मरुक तीव्ररुक् श्वेतरुक् कमलरुक् । केचित्तु रुजाविच्छन्ति न रुचौ । तेन रुचिरज्योर्मतभेदेन विकल्पः सिद्धः । रुज्-निरुक् नीरुक् । रुच्-अतीरुक् अतिरुक् । काविति किम् ? उपनद्धम् विततम् । इह क्रिग्रहणादन्यत्र धातुग्रहणे तदादिविधिलभ्यते । तेनायस्कृतम् अयस्कार इत्यादौ सकारः सिद्धो भवति । अन्यथा हयस्कृदित्यत्रैय २५ स्यात् । “घञ्युपसर्गस्य बहुलम्" ( ३१२१८६) । धनन्त उत्तरपदे परे उपसर्गस्य बहुलं दीर्घोs. न्तादेशो भवति । नीक्लेदः नीमेदः नीमार्गः नीवारः प्रावारः नीशारः । कचिन्न भवति-निपादः विषादः प्रतापः प्रभावः प्रहारः । कचिद्विकल्पः-प्रतीवेशः प्रतिवेशः, प्रतीबोधः प्रतिबोधः, परीणामः परिणामः, प्रतिहारः प्रतीहारः, प्रतीकारः प्रतिकारः, अतीसारः अतिसारः, वीसपः विसर्पः । कचिद्विपयभेदेन- प्रासादो गृहम्, प्रसादोऽन्यः । प्राकारो यमः, प्रकारोऽन्यः । अपामार्गः ओषधिः, अपमार्गोऽन्यः । ३० नीहारो हिमम् , निहारोऽन्यः । परीरोधो मृगावरोधः, परिरोधोऽन्यः । परीहारो देशानुमहः परिहा- रोऽन्यः । वीतंसः पक्षिवन्धनम्, वितंसोऽन्यः । उपसर्गस्येति किम् ? चन्दनसारः, खदिरसारः, मार्ग- मतिक्रान्तः अतिमार्गः। घबीति किम् ? अवसायः अवहारः-प्रत्ययोऽयम् । बहुलवचनादनुपसर्गस्यापि अभ्यपि च भवति । दक्षिणापथः उत्तरापथः । यचिद्विकल्पः अन्धतमः अन्धातमः । अन्धतमर्स अन्धातमसम् । कचिद्विपयभेदैन-अधीदन्तः अधीकर्णः अधीकण्ठ अधीपादः, एते आधिक्ये । अन्यत्र अधिदन्त इत्यादि भवति । कविदनुत्तरपदेऽपि विकल्प:-पूरुपः पुरुषः, नारका नरकः, सादनं सद ३६नम् । अतिशायनम् अतिशयनम् । काशशब्दे च घनन्ते विकल्पः-नीकाशः निकाशः, प्रतीकाशः प्रवि. ? ? - - " ? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशै समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २९१ काशः, अजन्ते तूत्तरो विधिः । नामिनः काशे" (३२६८७) । नाम्यन्तस्त्रोपसर्गस्य "अच्" (५।११४९) इत्यजन्ते काशशब्दे उत्तरपदे परे दीर्घोऽन्तादेशो भवति । निकाशते निकाश्यत इति वा नीकाशः, वीकाशः, अनूकाशः, प्रतीकाशः । बहुलाधिकारान्निकाश इत्यपि । नामिन इति क्रिम् ? प्रका- शत इति प्रकाशः । "चितेः कचि” (३।२।८३)। चितिशब्दस्य कचि प्रत्यये दीर्चः स्यात् । एका चितिरस्मिन् एकचितीकः । द्विचितीकः । त्रिचितीकः । “अपील्वादेवहे" (३।२।८९) । वहतीति ५ वहम् । “अच्” इत्यच् । ऋपीणां वहं ऋपीवहम् । मुनीवहम् , कपीवहम् , एवं नामानि नगराणि । घान्ते तु ऋषीवह इत्यादि । अपील्वादेरिति क्रिम् ? पीलुवहम् दारुवहम् चारुवहम् । "शुन (३।२।९०) । श्वन इत्यस्योत्तरपदे दीर्घः । शुनो दन्तः श्वादन्तः । श्वाकर्णः (श्वाकर्दः, श्वाकूर्दः, श्वावहम् । वहुलाधिकारात् क्वचिद्विकल्पः श्वापुच्छम् श्वपुच्छम् । क्वचिद्विषयान्तरे-शुनः पदमित्र पदमस्य श्वापदं व्याघ्रादि । कचिन्न-श्वफल्कः (कल्पः ?)। कचित्समासे पूर्वपदस्य हस्खत्वं स्यात् । "वेदूतोऽनव्ययम्वृदीच्डीयुवः पदे” (२।४।९८) । ईकारोकारयोरुत्तरपदे परे ह्रखो वा स्यात् । नचेत्ताव्ययौ वृतौ ईज्पी डीरूपी इयुवस्थानी च भवतः । लक्ष्मिपुत्रः लक्ष्मीपुत्रः । ग्राम- णिपुत्रः २ । ब्रह्मवन्धुपुत्रः २ । खलपुपुत्रः २ । ईदूत इति किम् ? खट्वापादः, गोकुलम् । अव्ययादि- वर्जनं किम् ? अव्यय. काण्डीभूतम् ऊरीकृत्य । य्वृत्. इन्द्रं हयतीति "असरूपोऽपवादे." (५।१।१६) इत्यणपवादे, विपि “यजादिवचेः क्रिति" (४।१।७९) इति वृति, 'दीर्घमवोऽन्त्यम्" (४।१।१०३) इति दीर्घ इन्द्रहूपुत्रः । ईच्. कारीपगन्धीपुत्रः । डी. गार्गीपुत्रः । इयुब्. श्रीकुलम भ्रूकुलम् यवक्रीकुलम् कटप्रूकुलम् । उत्तरपद इति किम् ? अग्नी पश्य, पटू पश्य । “ड्यापो बहुलं नाम्नि" (२।४।९९)। ड्यावन्तस्य उत्तरपदे वहुलं ह्रस्वः स्यात् , नाम्नि विपये। भरणिगुप्तः रोहिणि- मित्रः महित्रातः शिलवहम् शिलप्रस्थम् । क्वचिद्विकल्प:-रेवतिमित्रः रेवतीमित्रः । पृथिविदत्तः २ १२० पृथिविगुप्तः २ । गङ्गमहः गङ्गामहः । गङ्गदेवी २ । शिंशपस्थलम् २ । कचिन्न भवति-फल्गुनीमित्रः, नान्दीमुखम् , नान्दीतूर्यम् , नान्दीकरः, नान्दीघोपः, महीफलम् , महीकरः, महाविद्यालः, लोमकागृहम् , लोमकाखण्डः, लेपिकागृहम , लेपिकाखण्डः, गङ्गाद्वारम् । झ्याप इति किम् ? श्रीपुरम् । “भ्रुवोऽच कुंसकुट्योः” (२।४।१०१) । भ्रूशब्दस्यानयोरुत्तरपदयोर्हस्खोऽकारश्च स्थान् । भ्रुकुंसः भ्रकुंसः । भ्रुनु (?) भ्रूपरः कुंसो नटः स्त्रीवेशधारकः । भ्रुकुटिः भ्रकुटिः । भ्रुकुंसभृकुटिशब्दावपि इच्छन्त्यन्ये ।२५ "मालेपीकेष्टकस्यान्तेऽपि भारितूलचिते" (२।४।१०२)। मालाप्रभृतीनां त्रयाणां केवलाना- मन्ते वर्तमानानां च भारिप्रभृतिषु त्रिपूत्तरपदेपु हस्त्रः स्यात् , यथासायम् । मालां बिभर्तीत्यवंशीलो मालभारी । उत्पलमालभारी । मालभारिणी उत्पलमालभारिणी । इपीकतृलम मुझेपीकन्दम् । इष्ट- कचितम् पकेटकचितम् । इदमेवान्तग्रहणं नापकम्-ग्रहणयता नाना न तदन्तविधिरिति । तेन दिग्ध- पादोपहतः सौत्रनाडीरित्यादी पदादेशायनणप्रभृतयो न स्युः । “गोण्या मेये" (२११०३) १३० गोणीशब्दस्य मानवाचिन उपचारान्मेये वर्तमानन्य हवः स्यान् । गोण्या मिनो गोनिः । "व्यादी. दतः के" (२।४।१०४) डीप्रत्ययस्याकारेकारोकाराणां च के प्रत्यये हस्वः न्यान । कुमारिका पट्विका सोमपकः कीलालपकः । सोमपिका कीलालपिका लक्ष्मिका तत्रिका वधुका यवागुका नाश्मन्युका । टीग्रहणं पुंवद्राववाधनार्थम् । सोमपिकेन्यादी इन्वस्थ, दारादिकत्यादी च पिति पुंबावन्य मावकाश-३४ , १ अन या दोऽजलो पन्तसगडे, काम बिगेपो पाया। २ गगनागिन्यायपि मरने।

1 - २९२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते सोपज्ञहैमलधु- त्वात्पट्टिकेत्यादौ चोभयमाप्तौ परत्वात्पुंषद्भावे पट्विकेत्यादि न सिद्धयतीति डीग्रहणम् , वद्धि निरवकाशत्वा- सुंवद्भावं वाधते । काकः पाक इत्यादौ तु "प्रत्ययाप्रत्यययोः प्रत्ययस्यैव ग्रहणम्" इति न्यायान्न स्यात् । अथानादेशविशेपमाह- उदकादेरुदादिर्यथायोगम् । उदधिः । उदकुम्भः उदककुम्भः । उदविन्दुः उदकविन्दुः । ५लवणोदः। *द्वीपम् । अिनूपः । उदकादेरित्यादि, अदधिरिति-"उदकस्योदः पेपन्धिवासवाहने" (३।२।१०४)। उदकेन पिनष्टि उदपेपं पिनष्टि तगरम् । उदकं धीयतेऽस्मिन्निति उदृधिर्घटः । उदकस्य वास उवासः । एवं उद्वाहनः । अनामार्थ वचनम् । नाम्न्युत्तरेणैव सिद्धम् । “वैकव्यञ्जने पूर्ये" (३।२।१०५)। पूरयितव्यवाचिन्यसंयुक्तव्यञ्जनादावुत्तरपदे तथा । उदकुम्भः उदककुम्भ इति । व्यञ्जन इति किम् ? १० उदकामन्त्रम् । एक इति किम् ? उदकस्थालम् । पूर्य इति किम् ? उदकपर्वतः । “मन्यौदन-सक्तु- विन्दु-वज्र-भार-हार-वीवध-गाहे वा" (३।२।१०६)। उदमन्थः उदकमन्थ इत्यादि । 'मुक्ता- फलद्युतिमुपैति ननूदविन्दुः । अपूर्यार्थो यत्नः । “नान्युत्तरपदस्य च" (३।२।१०७)। चकारात् पूर्वपदस्य । उदमेघो नाम, यस्यौदधिः सुतः । उदपानं निपानम् । उदधिः समुद्रः । उत्तरपदस्य लयणोदः, क्षीरोदः, कालोदः, एते समुद्राः । लोहितोदा क्षीरोदा नाम नदी 1 अच्छोदम्, सितोदम् , १५अरुणोदम् , लोहितोदम्, एवन्नामानि सरांसि । *द्वीपमिति-"यन्तरनवर्णोपसर्गादप ईप्" (३२२।१०९) । द्विधा गता आपोऽस्मिन्निति । द्वीपम् । एवमन्तरीपम्, नीपम् , प्रतीपम् , समीपम् , अन्वीपम् वीपम् । "अनोर्देशे उप" (३।२।११०)।अनुगता आपो अस्मिन् अनूपो देशः।देश इति किम् ? अन्वीपं वनम् । कथं कूपः, सूपः, यूपः ? पृषोदरादित्वात् । "हृदयस्य हल्लासलेखाण्ये" ( ३२२१९४) 1लासलेखयोरणि ये च प्रत्यये हृदयस्य हृदादेशः । हृदयस्य लासो हल्लासः, हृदयं लिसतीति २० हल्लेखः । अण् सन्निधानाल्लेखशब्दोऽणन्तो गृह्यते, तेन घमन्ते न भवति । हृदयस्य लेसो हृदयलेसः । अण्. हृदयस्येदं हाईम्, सौहाईम् दौहार्दम् । य. हृदयस्य प्रियो हृद्यः । हृदये भवं हृदयाय हितं हृद्यम्। "पदः पादस्याज्यातिगोपहते" (३।२।९५)। आज्यादिपूत्तरपदेपु पादस्य पद इत्यादेशो भवति । पादाभ्यामजति अतति वेत्योणादिके इणि पदाजिः पदातिः । अत एव निर्देशादजेर्वी न भवति । पादाभ्यां गच्छति पदगः । "नानो गमः" (५।१११३१) इति डः । पादाभ्यामुपहतः पदोपहतः । २५पदशब्देनैव सिद्धौ आज्यादिषु पादप्रयोगनिवृत्त्यर्थं वचनम् । “हिमहतिकापिये पद्" (३।२।९६)। हिमादिपूत्तरपदेषु पादस्य पदित्यादेशः । पादयोहिम पद्धिमम् । पादाभ्यां हतिः पद्धतिः । पादौ कपती- सेवंशीलः,पुनः २ पादौ कपति, पादाभ्यां साधु कपतीति पत्कापी। य. पादौ विध्यन्ति पद्याः शर्कराः। पादयोर्भवाः पद्याः पांसयः । पादाभ्यां हितं पद्यं धृतम् । कथं पादार्थमुदकं पायम् ? “पाद्याव्य" (७।१।२३) इति निपातनात् । “ऋचः शसि" (३।२।९७) । ऋचः सम्वन्धिनः पादस्य शस्- ३०प्रत्यये पदादेशः स्यात् । पादं पादं गायत्र्याः शंसति पच्छो गायत्री शंसति । "शब्दनिष्कघोप- मिश्रे वा" (३९८) । पादयोः शब्दः पच्छन्दः, पादशब्दः । पन्निष्कः २ । पद्घोपः २ । पादाभ्यां मिश्रः पन्मिनः पादमिश्रः । “नस नासिकायास्त: क्षुद्रे" (३।२६९९) । तस्प्रत्यये मुझे चोत्तरपदै नासिकाया नसियादेशः स्यात् । नस्तः, नः क्षुद्रः । "दिकशब्दात्तीरस्य तार (३।२।१४२) । वा। दक्षिणस्या दिशो दक्षिणस्य वा देशस्य तीरं दक्षिणतारम् २ ॥ दिकशब्दादिति २५किम् ? गडातीरम् इत्यादि सर्वमुदकादेरियादिना सहीतं ज्ञेयम् ।

.. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया। तत्पुरुषः २९३ अथान "प्रथमोक्तं प्राक्” (३।१।१४८) इत्यस्यापवादमाह- "राजदन्तादिषु" (३२२१४९)। प्राङ्गिपातार्हपदस्य विपर्ययः । दन्तानां राजा राजदन्तः। "राज" | राजदन्त इति अत्र "पष्ठी.” (३।१७६) इति प्रथमोक्तत्वेन दन्तस्य पूर्वनिपाते प्राप्ते- ऽनेन विपर्ययः । ऋणेऽधमः अत्र "सप्तमी" (३।११८८) इति प्रथमोक्तत्वेन ऋणस्य प्राग्निपाते प्राप्ते विपर्ययः । एवमुत्तमणः । दारजारौ । दारशब्द एकवचनान्तोऽप्यस्ति । अत्रानियमे दारशब्दस्वैव५ प्राग्निपातः । दारार्थों विष्वक्सेनार्जुनौ शूद्रायौँ विषयेन्द्रियाणि प्राणिगजाश्वौ अवन्त्यश्मका:-अनार्यादीनां स्वराद्यदन्तत्वात् , उलूखलमुशले तण्डुलकिण्वे-अत्र मुशलकिण्वयोरल्पस्वरत्वात् ; चित्रास्वाती-माणविके, केशश्मशू, पुत्रपशू शिरोजानू शिरोविजू, विजुः कृकाटिका । भार्यापती पुत्रपती स्वसृपती जायापती जम्पती दम्पती, इत्यादौ खात्यादीनामिदुदन्तत्वात्साग्निपाते प्राप्ते विपर्ययः । गणपाठाजायाशब्दस्य जम्भावो दम्भावश्च वा निपात्यते । नरनारायणौ सोमारुद्रौ कुवेरकेशबी उमामहेश्वरौ काकमयूरो, इत्यादाव-१० य॑त्वान्नारायणादीनाम् ; पाण्डुधृतराष्ट्री विष्णुवासवी, इत्यत्र धृतराष्ट्रवासवयोज्येष्ठभ्रातृत्वात्प्राग्निपाते प्राप्ते विपर्ययः । वहुवचनमाकृतिगणार्थम् । तेन कचिद्विकल्पः-पुरुपोत्तमः उत्तमपुरुपः, मध्यगृहम् गृहमध्यम् , अधरबिम्बम् विम्बाधरः । ओष्ठविम्बः विम्यौप्टः इत्यादि । अथात्र समासान्तविधिमाह.. तत्पुरुषादतट्समासान्तौ यथायोगं वक्तव्यौ । “ऋक्तःपथ्यपोऽत्” (७।३।७६ ) । राज्ञः १५ पू: राजपुरम् । मोक्षस्य पन्थाः मोक्षपथः। तत्पुरुपादित्यादि, तत्पुरुपादित्युपलक्षणम् , यथासम्भवमन्यसमासादाययमत्समासान्तो भवति । तथाहि-"ऋक्पू०” । ऋच्-पुर्-पथिन् अप् एतदन्तात्समासादत्समासान्तः स्थान । ऋचोऽर्द्धमर्द्धर्चः । ऋचः समीपमुपर्चम् । उच्चारितर्चः । श्रियाः पू: श्रीवासौ पूश्चेति वा श्रीपुरम् त्रिपुरम् स्फीतपुरो देशः । पथिन्. जलथलः उपपथम् प्रतिपथम् । विशालपथं नगरम् । अप्. द्विर्गता आपोऽस्मिन् द्वीपम समीपम् २० प्रतीपम् । बह्वपं तडागम् । पुरपथशब्दाभ्यां सिद्धेऽस्मिन् विपये पुरथिन्शब्दप्रयोगनिवृत्त्यर्थं वचनम् (समासान्तविपये व्यञ्जनान्तयोः प्रयोगो न भवतीत्यर्थः) । "धुरोऽनक्षस्य” (७३।७७ ) । धुर- न्तात्समासादत्, अनक्षस्येति सा चेद्धरक्षसम्बन्धिनी न भवति । राज्यधुरा द्विधुरी निधुरी उपधुरम् महाधुरम् शकटम् । अनक्षस्येति किम् ? अक्षधूः, दृढधूरक्षः । “सङ्ख्यापाण्डूदकृष्णाद्भूमेः" (७३।७८)। द्वयोर्भूम्योः समाहारो द्विभूमम । द्वे भूमी अस्य द्विभूमः प्रासादः । पाण्डुर्भूमिः पाण्डु-२५ भूमम् , पाण्डुभूमो देशः । उदीची भूमिरुदगभूमम्, उदग्भूमो देशः । कृष्णा भूमिः कृष्णभूमम् , कृष्ण- भूमो देशः । भूमोऽसहयात एकार्थ इति पाण्डुभूमादेर्नपुंसकत्वम् । सह्यादिभ्य इति किम् ? सर्वभूमिः । "उपसर्गाध्वनः” (७।३७९)। प्रगतमध्वानं प्राचं शकटम् , प्राध्यो रथः । “समवान्धात्त- मसः” (७३८०)। सन्ततं तमः सन्ततं तमसा सन्ततं तमोऽस्मिन्निति वा सन्तमसम् । अवहीनं तमोऽवहीनं तमसा अवहीनं तमोऽस्मिन्निति वा अवतमसम् । अन्धं करोतीत्यन्धम् , अन्धं च तत्तमत्र,३० अन्धंतमोऽस्मिन्निति वाऽन्धतमसम् । अन्धश्च तमश्च अन्धतमसमन्धतमसे इति वा । "तप्तान्ववा- द्रहसः” (७।३।८१) । (तप्तं) तप्ताय इवानधिगम्यं रहसमरहसम् । तप्तं रहोऽन्येति नमरहमः 1३२ १ तिमृणां पुरां समाहारः । उत्तरपदस्यादन्तलाभावात् नीलाभावः । किन्तु अन्यनु गर्वा नपुंसकः । २ लहारकने तन्नार्धद्वारकम् , तेन महाधुरं शकटमिति सिद्धम् । ३ द्वयोधुरोः समाहारः निमगां धुगं समाहारः । अन्वनु मा नपुंगक इति वचने सत्यपि तहुतमिति स्त्रीले 'द्विगोः' इति ।

. " "ब्रह्म + २९४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- अनुगतं रहोऽनुगतं रहसा वाऽनुरहसम् । अनुगतं रहोऽस्येत्यनुरहसः । अवहीन रहोऽवहीन रहसा वाऽररहसम् । अवहीनं रहोऽस्पेत्यवरहसः । “प्रत्यन्ववात्सामलोन" (७३।८२)। प्रतिगतं साम प्रतिसामम् । प्रतिगतं सामान्य प्रतिसामः । एवमनुसामम्, अनुसामः । अवसामम् , अवसामः। प्रतिलोमम्, प्रतिलोमः । अनुलोमम् , अनुलोमः । अवलोमम् , अवलोमः । ५ कतिचित्प्रसिद्धप्रयोगाम् साक्षानिर्देष्टुमाह- ब्रह्म हस्तिराजपल्यावर्चसः : (७३८३)। ब्रह्मवर्चसम् । 1 ब्रह्मणो वर्च: ब्रह्मवर्चसम् , पर्चस्तेजो बलं वा । पल्यं कटकृतं पलालपर्तिकृतं वा धान्य- भाजनम् हस्तिविधा था । कथं विपिमान राजवर्चसीति ? समासान्तविधेरनित्यत्वात् । एतय "क्यूः पथ्यपोऽदिति” निर्देशासिद्धम् । “प्रतेरुरसः सप्तम्या:" (७३१८४)। प्रतेः परो य १० उरःशब्दः सप्तम्यन्तस्तदन्तात्समासादत् समासान्तः स्यात् । उरसि वर्तते प्रत्युरसम् , विभत्त्यर्थे - व्ययीभावः । उरसि प्रतिष्ठितं प्रत्युरसम् "प्रात्यव०” (३।१।४७) इत्यादिना तत्पुरुषः। (सप्तम्या इति किम् ? प्रतिगतमुरः, उरः प्रति वा प्रत्युरः) । “अक्षणोऽप्राण्यङ्गे" (७३।८५)। लवणस्याक्षि लवणमक्षीवेति चा लवणाक्षम् , पुष्कराक्षम्, गवाक्षः, रुद्राक्षम् । महिपाक्षो गुग्गुलः । *कयराक्षमश्वानां मुखपच्छादनं वहुच्छिद्रकम् । अप्राण्यङ्ग इति किम् ? अजाक्षि उपाक्षि वामाक्षि । “सङ्कटाभ्याम्" १५ ( ७१३।८६) । सङ्गतमक्ष्या समीपमक्ष्णो वा समक्षम् । 'कटे पर्यावरणयोः' कटति वर्पति मदललं सवति कटः, करिगण्डः । कटस्याक्षि कटाक्षः, प्राण्यगाथं वचनम् । इत्यत्समासान्तप्रकरणम् ॥५७॥ अथ अट्समासान्तं निर्देष्टुमाह- गोस्तत्पुरुपात् ॥ ५८॥ [सि० ७।३।१०५] गवान्तात्तत्पुरुषादट् स्यात् । सुरगवी । “राजन्सखेः" (७३।१०६)। देवराजः राज. २०सरसः ।। ५८ ॥ "गो." गोश-दान्तात्तत्पुरुपादलुकोऽट् समासान्तः स्यात् । सुराणां गौः सुरगवी, दित्वात् स्त्रियां डी: । फर्मधारयद्विगुसमासयोरपि तत्पुरुषसंज्ञत्वात् पुमांश्चासौ गौश्च पुगवः, स्त्रीगवी, पञ्चगवम् । सत्पुरपादिति किम् ? चित्रगुः । अलुक इत्येव । पञ्चभिर्गोभिः क्रीतः पञ्चगुः । "राज" | अलुक इति निवृत्तम् । देवानां राजा देवराजः । एवं महांश्चासो राजा च महाराजः ! अतिक्रान्तो राजानम. २५ तिराउः, अतिराजी । पश्चानां राज्ञां समाहारः पञ्चराजी । पञ्चभी राजभिः क्रीतः पञ्चराजः । ससि. राशः ससा राजससः । एवं महांश्वासो ससा च महाससः, अतिससः अविसखी । राजनिति नान्त- निर्देगदगारान्ते न भवति । मद्राणां राज्ञी मदराशी । ससीशब्दावटि सत्यसति वा न रूपभेदः । एयं "राष्ट्रास्याद्ररमणः” (७३।१०७) । सुराष्ट्रषु महा सुराष्ट्रनमः, सौराष्ट्रको प्रारणः इत्यर्थः । "यमयन्तिमनः काशिनमः । राष्ट्रारयादिति निम् ? देवनझा नारदः । कुमहद्यांचा" (७।३।१०८) पापो प्रा फुलदा पुत्रमः । महानझो महाब्रह्मा । पापो महांश्च प्रामण एवमुच्यते । "ग्रामकोटा- ३१तक्षण" (७३।१०९) । प्रामम्य तक्षा मामतक्षः प्रामसाधारण इत्यर्थः । पुटी शाला तसां भयः मनमानी पादरि राति नीयत मुकदमाये मरागीवि प्रजोतीलागा। २ गतीशस . सम्मापि पानां गनीना गम हार ही काय व हम इदन्तादेशाद भयान, तथा व परममिति, तथा राशीमतिमन ती गगीदादरमा भरि गोपन्ती मगिरेगद प्रोत्सव, तथा पगनां गाणी इसपि कृठे अटिभर मनिरपोतदानसा पमा सम्पम्, समयदपि समेतहेतुकमभ्यूदम् । (पन!) -- । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः २९५ कौट; कौटस्तक्षा कौटतक्षः स्वतन्त्रः स्वापणे शालायां यः कर्म करोति । “गोष्टातेः शुनः" (७।३।११०)। गोप्टे श्वा गोष्ठश्वः, अतिक्रान्तः श्वानं अतिश्वो वराहः अतिजवन इत्यर्थः । अतिश्वः सेवकः सुष्टु स्वामिभक्त इत्यर्थः । अतिश्वी सेवा अतिनीचेत्यर्थः । “प्राणिन उपमानात्” (७।३।१११)। प्राणिवाचिन उपमानात्परो यः श्वनशब्दस्तदन्तात्तत्पुरुपादट् स्यात् । व्याघ्र इव व्याघः सचासौ श्वा च व्याघ्रश्वः । "उपमेयं व्याघ्राद्यैः साम्यानुक्तौ” (३।१।१०२) इति समासः । अत एव वचनात् ५ श्वनशब्दस्य परनिपातः । मयूरव्यंसकादित्वाद्वा समासः । प्राणिन उपमानादिति पूर्वपदविज्ञानादिह न भवति । वानरः श्वेव वानरश्वा । प्राणिन इति किम् ? फलकमिव श्वा फलकश्वा । उपमानग्रहणं किम् देवदत्तश्वा । प्राणी उपमानभूतो यः श्वशब्दस्तदन्तात्तत्पुरुषादिच्छन्त्येके व्याघ्रः श्वेव व्याघ्रश्वः । तन्मते वानरश्वेत्यत्र समासान्तविधेरनित्यत्वान्न न भवति । "अप्राणिनि' (७।३।११२) । अप्रा- णिनि वर्तते य उपमानवाची श्वनशब्दस्तदन्तात्तत्पुरुपादट् स्यात् । श्वेव श्वा आकर्पश्चासौ श्वा च १० आकर्पश्वः । एवं फलकश्वः शकटश्वः । पूर्वसूत्रे उपमानादिति पूर्वपदस्य विशेषणं इह तु शुनः । अप्रा- णिनि वर्तते य उपमानवाची श्वनशब्दस्तदन्तादिति । अप्राणिनीति किम् ? वानरः श्वेव वानरश्वा । उपमानादित्येव-आकर्षे श्वा आकर्पश्वा । कुर्कुरवच्छारेऽपि श्वन्शब्दो रूढो नोपमानम् । तत्राप्युपमानादेव वर्त्तत इत्येके । तन्मते आकर्पश्व इत्येव भवति । केचित्तूपमानादिति नापेक्षन्ते तन्मते आकर्पश्व इत्येव भवति । अन्ये तूपमानादप्राणिनीत्येकमेव योगमारभन्ते तन्मते व्याघ्रश्व इत्यादि न भवति । “पूर्वो-१५ त्तरमृगाच सक्नः” (७३।११३)। पूर्व सक्थि सक्नः पूर्व वा पूर्वसक्थम् , एवमुत्तरसक्थम् । मृगस्य सक्थि मृगसक्थम् । चशब्दादुपमानात् फलकमिव फलकम् । फलकं च तत् सक्थि च फल- कसक्थम् व्याघ्राश्वादिवत्समासः । पूर्वशब्दान्नेच्छन्येके । कुक्कुटादपि इच्छन्त्यन्ये । कुक्कुटसक्थम् । "उरसोऽग्रे” (७।३।११४)। अगं मुखं प्रधानं वा तत्र वर्तमानो य उरस्शव्दस्तदन्तात्तत्पुरुपाट् स्यात् । अश्वाश्च ते उरच अश्वोरसं दृश्यते, सेनाया अश्वा मुखमित्यर्थः । एवं हस्त्युरसम् रथोरसम् ।२० "सरोऽनोऽश्माज्यसो जातिनान्नोः” (७।३।११५)। एतच्चतुरन्तात्तत्पुरुपादट् स्यात् । यथा- सम्भवं जातावभिधेयायाम् , नाम्नि च विपये । जातसरसम् मण्डूकसरसम् एवं नाम्नी सरसी । महा- नसम् । स्थूलाश्मः अमृताश्मः कनकाश्मः; अश्मजातिविशेपा एते । पिण्डाश्मः संज्ञा जातिर्वा । काला- यसम् लोहितायसम् तीक्ष्णायसम् ; अयोजातिविशेपा एते । लोहितायसमिति नामेत्येके ।। ५८ ॥ कांश्चित् प्रयोगान् साक्षादर्शयितुमाह- २५ अह्नः ॥ ५९॥[सि०७३।११६] असादट् । देवाहः । पुण्याहम् । “सहयातादहश्च वा” (७३।११७) । सङ्ख्यातमहः सङ्ख्या- तालः सङ्ख्याताहः । “सर्वांशसङ्ख्याव्ययात्” (७।३।११८)। सर्वमहः सर्वाह्नः। पूर्वाह्नः । द्वयो- रहोर्भवो यहः पटः । अत्यही कथा । सङ्ख्यातैकपुण्यवर्षादीर्घाच रात्रेरत्” (७।३।११९)। सङ्ख्यातरात्रः । सर्वरात्रः । अर्धरात्रः॥ ५९॥ "अहः” । अस्मादिति अहन्शब्दान्तात्तत्पुरुषादट् समासान्तः स्यादित्यर्थः । देवानामहः देवाहः । परवल्लिङ्गत्वे प्राप्ते "अहनिर्वृहकलहा” इति पुंस्त्वम् । पुण्यं च तदहश्च पुण्याहम् । "पुण्याहदेही" इति पुनपुंसकत्वम् । “सहया" । अह्रादेशार्थ वचनम् । अट् तु पूर्वेणैव सिद्धः । चकार उत्तरत्रा- हादेशस्याट्सन्नियोगशिष्टत्वार्थः । अन्यथा ह्यटोपवादोऽहादेशो विज्ञायेत, तथा च स्त्रियां डीन स्यात् । ३४ १ 'अतोऽहस्य' इति 'सङ्ख्यासायवे०' इति च ज्ञापकान प्रत्ययशङ्का । ज .

२९६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "सर्वां"। सर्वशब्दादेश एकदेशस्तद्वाचिभ्यः सयावाचिभ्योऽव्ययेभ्यश्च परो योऽहनशब्दस्तदन्ती- तत्पुरुषाट् स्यात्तस्य चाहन्ाब्दस्याहादेशः । अंश. पूर्वमहः पूर्वाह्नः । एवं मध्याह्नः सायातः । "अर्द्ध- सुदर्शनदेवनमह्ना" इति पुंस्त्वम् । सया. व्यह्नः पट इति । अव्यय. अतिकान्ताऽहः अत्यही कथा । "सङ्घया.” । सङ्ख्याता रात्रिः सङ्ख्यातरात्रः । एवमेकरात्रः पुण्यरात्रः । वर्षाणां रात्रिर्वर्षारात्रः ५दीर्घरातः । चकारात् सर्वाशसङ्ख्याव्ययेभ्योऽपि-सर्वरात्रः । अंश. पूर्वरात्रः अपररात्रः अर्द्धरामा द्वितीयरात्रः । सया. द्वयो राज्योः समाहारो द्विरात्रः "सिचयनिकाय्यरात्रवृत्रा" इति पुंस्त्वम् परवल्लिङ्गत्वापवादः । द्वयो राज्योर्भवो द्विरात्रः पटः, द्विरात्रा कथा, द्विरात्रप्रियः, द्विराप्रजातः । अव्यय. अविरात्रः अतिरात्रा कथा । पूर्वसूत्रात् सह्यानुवृत्तावपि इह सूत्रे एकग्रहणं ज्ञापयति यत् "सर्वांशसयाव्यये"त्यत्र सहयाशब्देनैकस्य ग्रहणं नास्ति । तत एकमहः एकाहम्' इत्येव भवति । अटि १० प्रकृतेऽद्विधानं स्त्रियां डयभावार्थम् ॥ ५९ ॥ पुरुषायुपद्विस्तावत्रिस्तावम् ॥ ६॥ [सि०७३।१२०] एतेऽदन्तास्तत्पुरुषाः साधवः ॥ ६॥ "पुरु०" । पुरुपस्यायुः पुरुपायुपम्, द्विस्तावती द्विस्तावा, त्रिस्तावती त्रिस्तावा वैदिः । वेद्यामनयोः प्रयोगः । अतीशब्दलोपो निपातनात् । प्रकृतो यावती वैदिस्तावती द्विगुणा त्रिगुणा या विकृतौ । १५प्रकृतिविकृती यागविशेषौ । अन्यत्रापि दृश्यते द्विस्तावनिस्तावोऽग्निः ! "श्वसो वसीयसः" (७।३।१२१) । श्वसः परो यो वसीयस्शब्दस्तदन्तात्तत्पुरुपादत् स्यात् । वसुमच्छन्दादीयसौ, मतो- रन्यस्वरादिलोपे, वसीयस् । शोमनं वसीयः श्वोवसीयसं कल्याणम् । "निसश्च श्रेयस." (७।३।१२२)। निश्चितं श्रेयो निःश्रेयसं निर्वाणम् , शोमनं श्रेयः श्वश्रेयसम् । अथ डसमासान्तं सझेपत आह- कचित्तत्पुरुषात् डः। न दश अदशाः । कचिन्न-किंराजा, सुसखा ॥ इति तत्पुरुषः। कचिदित्यादि । अत्रैवं सूत्रपद्धतिः । “नत्रऽव्ययात्सङ्ख्याया डः” (७३।१२३)। न दस अदशाः । अनवाः । न्यूना दश न्यूना नवेत्यर्थः, नपूर्वोऽयम् वैकल्ये दृश्यते । अव्यय. निर्गद- त्रिंशतोऽगुलेभ्यो निस्त्रिंशः सद्गः । निस्त्रिंश इव क्रूरकर्मा निस्त्रिंशः सलः । त्रिंशतो निर्गतानि निस्सिं: शान्यहानि । एवं निश्चत्वारिंशानि निष्पञ्चाशानि । नत्रव्ययादिति किम् ? गोत्रिंशत् । नभाहणं २५ "नञ्तत्पुरुपात्" इति निषेधे प्राप्त प्रतिप्रसवार्थम् । सहयाया इति किम् ? निःशकृत् । तत्पुरुषादित्येव- न विद्यन्ते प्रयो यस्य स अत्रिः । सुत्रिः । निर्गतात्रिंशदस्य नित्रिंशत् डित्वमन्यस्वरादिलोपार्यम् । "सहयाव्ययादगुले.” (७३।१२४)। द्वयोरगुल्योः समाहारो ब्यहुलम्, व्यगुलम् । द्वे अहुली प्रमाणमस्य 'मात्रट्' वस्य लुप् ततः समासान्तः, व्यङ्गुलम् व्यङ्गुलम् । बहुलप्रियः व्यहुलप्रियः । निरगुलम् अत्यङ्गुलम् । तत्पुरुषादित्येव-उपाङ्गुलि, पञ्चाङ्गुलिहस्तः । कथं आत्मागुलमित्यादि । ३० अनुलशन्दः प्रमाणयाची प्रकृत्यन्तरम् । हस्तामुलैः षड्गुणितेश्चतुर्भिरित्यादिप्रयोगान् । अथ समासान्तनिपेघमाह । फचिनेत्यादि-किंराजेति "न किमः क्षेपे" (७३७०)। निन्दायां यः किम्हान्दतस्मात्परे ये ऋगादयो यानुपादाय समासान्तो विहितस्तदन्तात्समासादयोक्तः समासान्तो न भवति । सिंधूर्या न पया गुर्वी । किंराजा यो न रक्षति । सिया योऽभिट्ठायति । ३४ पिगीयों न यहति । का पुत्सिता धूरस्य किन्धः शकटः । के फुत्सिते अक्षिणी अस्प किमक्षिाक्षणः । २० - अव्यय.

२९७ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः । तत्पुरुषः कर्मधारयश्च किम इति क्रिम् ? कुराजः । क्षेप इति किम् ? केपां राजा किंराजः । “नञ्तत्पुरुपात्” (७।३७१)। न यथाविहितः समासान्तः । न ऋक् अनृक् । अराजा असखा अपन्थाः । अपथमिति तु पथशब्दस्य- यथा कुपथम् । तत्पुरुपादिति किम् ? न विद्यते धूरस्य अधुरं शकटम् । सुसखेति-"पूजावतेः प्राकटात्” (७३।७२) पूजायां यौ स्वती ताभ्यां परे ये ऋगादयस्तदन्तात्समासात् "वहुव्रीहेः काप्टे टः” (७३।१२५) इति टप्रत्ययात्माग् यः समासान्तः स न स्यात् । शोभना धूः सुधूः १५ अतिधूः । सुराजा । अतिराजा । सुधू अतिधूः शकटम् । सुसखा अतिसखा । सुगौः अतिगौः । पूजाग्रहणं क्रिम् ? अतिक्रान्तो राजानमतिराजः । प्राक्टादिति किम् ? स्वङ्गुलम् अत्यङ्गुलम् काष्ठम् । "यहोर्ड:" (७।३।७३) डप्रसङ्गो यत्र ततो वह्वन्तात्समासान्तो डः कञ्च न स्यात् । आसन्ना वहवो येषां ते आसन्नबहवः उपबहवः । "प्रमाणीसङ्ख्याड्डः" (७।३।१२८) इति डः समासान्तो न भवति । वहोरिति किम् ? द्वित्राः, उपदशाः । ड इति किम् ? प्रिया बहवोऽस्य प्रियवह्वकः ॥ ६० ॥ ( इति तत्पुरुषः ।।* विशेषणं विशेष्येणैकार्थ कर्मधारयश्च ॥ ६१ ॥ [सि० ३१११९६ ] एकार्थ विशेषणवाचि विशेष्यवाचिना समस्यते स तत्पुरुषः कर्मधारयश्च स्यात् । नीलं च तदुत्पलं च नीलोत्पलम् । श्वेतगवी । एकार्थमिति किम् ? वृद्धस्योक्षा वृद्धोक्षा ।। ६१ ॥ "विशे०" एकार्थमिति-भिन्नप्रवृत्तिनिमित्तयोः शब्दयोरेकस्मिन्नर्थे वृत्तिरैकार्थ्यम् , सामानाधिकर-१५ ण्यमिति यावत् । तद्वदेकार्थम् । विशेषणवाचीति-विशिष्यतेऽनेकप्रकारं वस्तु प्रकारान्तरेभ्यो व्यवच्छि- द्यतेऽनेनेति विशेषणम् , विशेष्यवाचिनेति-व्यवच्छेद्यम् विशेप्यमिति । श्वेतगवीति-श्वेता चासौ गौञ्च अस्य तत्पुरुपसंज्ञत्वात् "गोस्तत्पुरुपात्” (७।३।१०५) इत्यट् समासान्तः । विशेपणविशेष्ययोः सम्ब- न्धिशब्दत्वादेकतरोपादाने व द्वये लन्धे द्वयोरुपादानं परस्परमुभयोर्व्यवच्छेद्यव्यवच्छेदकत्वे समासो यथा स्यादित्येवमर्थम् । यथा नीलोत्पलमित्यत्र नीलशब्देन रक्तोत्पलादिकं व्यवच्छिद्यते । उत्पलशब्देन २० नीलपटादिकं व्यवच्छिद्यते इति । ततश्च तक्षकः सर्पः लोहितस्तक्षक इत्यादी समासो न भवति । नासर्पोऽन्यवर्णो वा तक्षकोऽस्ति । कथं तर्हि आम्रवृक्ष इति ? आम्रशब्दस्य वटादिवृक्षव्यवच्छेदक- त्वेऽपि वृक्षशब्दस्य व्यवच्छेद्याभावात् , नावृक्षः आम्रः कश्चिदस्ति ? अत्रोच्यते-नाम्रादयो वृक्षविशे- पवचना एव किन्तु तत्फलादिवचना अपि । तत आम्रफलादिव्यवच्छेदकत्वेन वृक्षशब्दस्यापि व्यवच्छे- दकत्वम् । एवं तक्षकाहिः शेषाहिः इत्यादयोऽपि भवन्ति । यदि वाऽऽम्राणां फलानां सम्बन्धी वृक्षः २५ आम्रवृक्ष इति पष्टीसमासः ।। नन्वेवमुभयोमिथो व्यवच्छेदकत्वे उत्पलस्यापि विशेपणत्वेन उत्पलनील इत्यपि स्यात् । नैवम् । व्यवच्छेदकत्वाविशेपेऽपि अग्रधानस्यैव प्रधानेन समासः । प्राधान्यं च द्रव्य- शब्दानामेव-द्रव्यस्यैव साक्षाक्रियाभिसम्बन्धात् । यद्यप्युत्पलादिशब्दा जातिशब्दास्तथाप्युत्पत्तेः प्रभृ- त्याविनाशात् द्रव्येण जातेरभिसम्बन्धात् द्रव्यशब्दा उच्यन्ते । गुणक्रिययोस्तु तथा द्रव्येण सम्बन्धाऽ-२९ १ 'आसन्नादूर', इति सः, 'बहुगणं मेदे' इति संख्यावद्भावात् 'प्रमाणीसंख्याड्डः' इति उप्रत्ययः प्राप्नोति, तस्मिन्निपिद्धे 'शेषाद्वा' इति कञ्च प्राप्नोति, उभयस्यापि सामान्यनायं प्रतिषेध इत्युभयमपि न भवति । २ 'अव्ययम्' इति समासः । ३ 'एकार्थ चानेकं च' इति सामान्यसमासः, ततः 'प्रमाणीसंख्याड्डः' इत्यत्र प्रतिपदोक्तबहुव्रीहेर्ग्रहणात् वहोवैपुल्यार्थलेन वा संख्यालाभावे डः समासान्तो न भवति किन्तु कच् । ४ एकः साधारणोऽयों द्रव्यलक्षणस्तदतदात्मको यस्य तदेकार्थ तस्य भावः । ५ नीलादि अन्याश्रितवादप्रधानमुत्पलं तु तस्याश्रयत्वात् प्रधानम्, उत्पलं हि द्रव्यरूपलात् क्रियासिद्धये साक्षादुप. युज्यमानं प्राधान्येन विवक्ष्यते, नीलस्तु गुणवात् द्रज्यव्यवधानेन क्रियायामुपयोगादुत्पलस्य विशेषणं संपद्यते इति । ६ ननु प्राधान्यं च द्रव्यशब्दानामित्युक्तमुत्पलादयतु जातिशब्दात्तत्कयमित्याह-यद्यपीति । है. प्रका० पूर्वा० ३८ . इत्यादिनैव सिद्ध "स्प?" परमिति सूत्रनिदेशे परस्य पूर्वनिपातार्थम् । अद्रव्यवाचिनोरनियमे पूर्वनिपातनियमार्थ पचनम् । एकवीर इत्यादि तु बहुलाधिकारात् । सुधाकरस्त्याह । यधप्ये- फवीर इति सिष्टप्रयुक्तस्तथापि शिष्टप्रयोगात् साक्षात् स्मृतिरेव बलीयसीयसाधुरेवायमिति । २९८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- भावात् न तन्निमित्ताः शब्दा द्रव्यशब्दा इति नीलोत्पलमित्याद्येव भवति, नतूपलनीलादीति ॥ यस्तु गुणादिशब्दानामेव समासस्तनोभयोरपि पदयोरप्रधानत्वात्कामचारेण पूर्वापरनिपातः । सञ्जकुण्टः कुण्टसञ्जः शुक्लकृष्णः कृष्णशुक्ल इति । एवं क्रियाशब्दद्रव्यशब्दयोरपि-याचकपाचकः पाचकयाचका, धन्विदण्डी दण्डिधन्वीत्यादि । पूर्वा चासावुत्तरा च पूर्वोत्तरा उत्तरपूर्वेत्यादि । वृद्धोक्षेति-अत्र कर्मधारये ५तु समासान्तः स्यात् । चकारस्तत्पुरुपकर्मधारयसंज्ञासमावेशार्थः । कर्मधारयप्रदेशाः "कडारादयः कर्मधारये" (३।१।१५८) इत्यादयः ।। ६१ ॥ पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलम् ॥ १२ ॥ [सि० ३१९७] पूर्वः कालो यस्य तद्वाचि एकादीनि चैकार्थानि नाम्ना समस्यन्ते । पूर्व स्नातः पश्चादनुलिप्तः वातानुलिप्तः । एकशाटीत्यादि ॥६२॥ "पूर्व०" पूर्वः कालो यस्येति स पूर्वकालः । पदार्थसम्बन्धिशब्दत्वादपरकालेन पदार्थेन समस्यते । स्नातानुलिप्त इति । एवं लिप्तवासितः, पूर्व कृष्टा पश्चान्मतीकृता कृष्टमतीकृता भूमिः । मतं लोष्टमईन- काष्ठम् , मतमस्या अस्तीति मतिनी क्षेत्रभूमिः, अमतिनी मतिनीकृतेति च्वौ पुंवद्भावे दीर्घत्वे च मती. कृता । च्छिन्नप्ररूढो वृक्षः । एकशाटीति-एका शाटी एकशाटी, एवं एकपर्यः, एकचौरः, एकधनुर्धरः एकशब्दः सयाऽन्याऽसहायाऽद्वितीयेषु वर्तते इति । सर्वशब्दो द्रव्यावयवप्रकारगुणानां कात्स्न्ये वर्तते । १५सर्वशैलाः, सर्वरात्रः, सर्वान्नम् , सर्वशुक्लः, जरद्वः, पुराणवैयाकरणः, नवोदकम् , नवोक्तिः, केवलम- सहायं ज्ञानं केवलज्ञानम् , केवलजरत् , केवलपुराणम् । पूर्वेणैव सिद्धे पुनर्वचनं "स्पर्द्ध" (७।४।११९) परम् इति पूर्वनिपातस्य विषयदर्शनार्थम् , पूर्वापरकालवाचिनोरद्रव्यशब्दत्वादनियमे प्राप्ते पूर्वकालवाचिन एव पूर्वनिपातार्थं च । इत्यादिकरणाच "दिगधिकं संज्ञातद्धितोत्तरपदे" (३।११९८) । दिग्वाचि अधिकमित्येतच २० नामैकार्थ परेण नाम्ना सह समस्यते, संज्ञायां तद्धिते च प्रत्यये विपयभूते उत्तरपदे च परतः । दक्षिणाः कोशला दक्षिणकोशलाः, उत्तरकोशलाः, एवन्नामानो जनपदाः । संज्ञायां नित्यसमासः, नहि पाक्येन संज्ञा गम्यते । पूर्वोत्तरविभागप्रदर्शनार्थं तु विग्रहवाक्यम् । तद्धिते-दक्षिणस्यां शालायां भवो दक्षिणशालः, उत्तरशालः । अधिकं सल्वपि-अधिकया पाट्या क्रीतोऽधिकां पष्टिं भूतो भावी वा कपाष्टिकः । अयमपि नित्यसमासः, नहि तद्धिते वाक्यमस्ति । उत्तरपदे-दक्षिणे(गो?) गौर्यनमस्य दक्षि- २५ णगवधनः, पूर्वगवी प्रियः । अत्र तत्पुरुपलक्षणः समासान्तः । उत्तरपदेऽपि नित्यसमासः । त्रयाणामे फार्धाभावे एवोत्तरपदसम्भवात्तत्र च द्वयोर्यपेक्षाभावात् । “विशेषणं विशेष्येण" इत्येव सिद्ध नियमा वचनम् । दिगधिकं संज्ञादिष्वेव समस्यते, नान्यत्रेति । दक्षिणा गावोऽस्य सन्ति दक्षिणगुः इत्यादी सन्तीत्येतद्नपेक्षयान्तरङ्गत्वेन बहुव्रीहिभावादुक्तार्थत्वेन मत्त्यर्थीयतद्धितीयविषयभाव एप नास्तीत्यनेन समासो न भवति । “पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीरम्" (३।१।१०३) ३०पूर्वादीनि नव परेण नाम्ना समस्यन्ते । पूर्वपुरुपः वीरपुरुषः । "विशेषणं विशेष्येण." (३।१।९६) आधि- 1 4 "श्रेण्यादि कृताध्य" (३।१।१०४) श्रेण्यादि नामपायं कृतायः समसते, व्यर्थे गम्यः ३५माने।अप्रैणयः श्रेणयः कृताः श्रेणिछवाः श्रेणिमताः अणिमिताः श्रेणिभूताः।ळ्यर्थे समासेनाऽभिधेयेऽयं प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः कर्मधारयश्च २९९ समासः । साक्षात् च्यन्तानां तु गत्यादिसूत्रेण नित्यसमास एव । श्रेणि, अक, पूग, कुन्दुम, कन्दुम, राशि, निचय, विशिष्ट, निर्द्धन, कृपण, इन्द्र, देव, मुण्ड, भूत, श्रमण, वदान्य, अध्यायक, अध्यापक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, पटु, पण्डित, कुशल, चपल, निपुण २५ इति श्रेण्यादयः पञ्चविंशतिः। अत्र अनूका ऊकाः कृताः ऊककृता राशिस्थानीकृता इत्यर्थः । कन्दुमः कान्दविकः, निचयः समूहो गन्ध- द्रव्यं च ॥ कृत, मत, मित, भूत, उप्त, उक्त, समाज्ञात, समाख्यात, समानात, सम्भावित, अवधारित,५ अवकल्पित, निराकृत, उपकृत, अपाकृत, अपकृत, कलित, उदाहृत, उदीरित, उदित, दृष्ट, विश्रुत, विहित, निरूपित, आसीन, आस्थित, अववद्ध २७ इति कृतादयः सप्तविंशतिः । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । यत्र सामर्थ्यं नास्ति तत्रेति शब्दाध्याहारो द्रष्टव्यः । अनिर्द्धना निर्द्धना इत्युपकृता निर्द्धनोपकृताः, अचप- लाञ्चपला इत्यपाकृताश्चपलापाकृताः । (अभूता भूता इति निराकृताः)। श्रेणिकृताः इत्यादौ क्रियाकारक- सम्बन्धमानं न विशेपणविशेष्यभाव इति वचनम् । "क्तं नमादिभिन्नैः” (३।१।१०५) नना-१० दयो नप्रकारास्तैरेव भिन्नैर्नामभिः सह क्तान्तं नामैकार्थं सामर्थ्यादऽनञ् समस्यते । कृतं च तदकृतं च कृताकृतम् , एवं भुक्ताभुक्तम् । इटः क्तावयत्वाद्विकारस्य त्वेकदेशविकृतस्यानन्यत्वान्न भेदकत्वम् । तेन क्लिष्टाक्लिशितम् । आदिग्रहणात् कृतापकृतम् भुक्तविभुक्तम् पीतावपीतम् । नत्रादिभिरेव भिन्नै रित्यवधा- रणेन कृतं चाविहितं चेति प्रकृतिभेदे, कृतं चाकर्त्तव्यं चेति प्रत्ययभेदे, गतश्च प्राप्तोऽगतश्चाज्ञात इत्य- र्थभेदे, सिद्धं चामुक्तं चेति प्रकृत्यर्थयोर्भेदे च न स्यात् । "सेट् नानिटा” (३।१।१०६) । सेट् १५ तान्तं नमादिभिन्नेनानिटा न समस्यते । पूर्वस्यापवादः । क्लिशितमक्लिष्टम् । इट्ग्रहणमर्थभेदाहेतोर्वि- कारस्योपलक्षणम् । तेन शिताशातं छिताच्छितमित्यादि न भवति । कथं विनावित्तम् त्राणात्रातम् "क्तादेशोऽपि” (२।१।६१) इति परे समासे नत्वस्यासत्त्वाद्भविष्यति । “कतरकतमौ जाति- प्रश्ने” (३।१।१०९) समस्येते । कतरश्चासौ कठश्च कतरकठः । कतमकठः । जातिप्रश्न इति किम् ? गुणक्रियाद्रव्यप्रश्ने न भवति । कतरः शुक्लो, गन्ता, कुण्डली । “पोटायुवतिस्तोककतिपयगृष्टि-२० धेनुवशावेहष्कयणीप्रवक्तृश्रोत्रियाध्यायकधूर्तप्रशंसारूढर्जातिः" (३।१।१११) । जातिवाचि नाम पोटादिभित्रयोदशभिः प्रशंसारूडैश्च सह समस्यते । इभ्या च सा पोटा च इभ्य- पोटा । पोटा पुरुपवेपधारिणी स्त्री, गर्भ एव दास्यं प्राप्ता वा, स्त्री नृलक्षणा वा, भुजिष्यदासी वा । इभ्ययुवतिः । अग्निश्चासौ स्तोकं च अग्निस्तोकम् , दधिकतिपयम् , गौश्वासौ गृष्टिश्च गोगृष्टिः, सकृत् प्रसूतिका । गौश्चासौ धेनुश्च गोधेनुः, धेनुर्नवप्रसूता । गोवशा, वशा वन्ध्या । गोवेहत् , वेहद्गर्भधा-२५ तिनी । गोवष्कयिणी, वक्रयेण वृद्धवत्सेन या दुह्यते प्रौढवत्सा वष्कयिणी । कठप्रवक्ता, प्रवक्ता उपा- ध्यायः । कठश्रोत्रियः, श्रोत्रियश्छन्दोध्यायी । कठाध्यायकः, अध्यायकोऽध्येता। मृगधूर्त “निन्धं कुत्सनैर० (३।१।१००) इत्यत्र शब्दप्रवृत्तिनिमित्तकुत्सायां समासः । इह तु तदाश्रयाकुत्सायामिति धूर्तग्रहणम् । प्रशंसायां रूढा मतल्लिकादयः आविष्टलिङ्गास्तैः समासः । गौश्चासौ मतल्लिका च गोमत- ल्लिका । "स्युरुत्तरपदे व्याघ्रपुङ्गवर्पभकुञ्जराः। सिंहशार्दूलनागाद्यास्तल्लजश्च मतल्लिका ।। मचर्चिका प्रकाण्डो ३० द्वौ प्रशस्यार्थप्रकाशकाः” । तातपादाः, आर्यमिश्राः, केशपाशः, केशहस्तः, अंसभित्तिः, वक्षःस्थलम् , कपोलपाली, उरःकपाटः, स्तनतटम् । रूढग्रहणादिह न भवति-गौः रमणीया । रमणीयादयो हि रम- णीयत्वादिगुणमादाय प्रशंसायां वर्तमाना न रूढा इति विशेष्यस्य जातेः पूर्वनिपातार्थं वचनम् "चतुष्पाद गर्भिण्या” (३।१।११२) । चतुष्पाद्वादिजातिस्तद्वाचि नाम गर्भिणीनाम्ना सम- स्यते । गौश्चासौ गर्भिणी च गोगर्भिणी । “युवा खलतिपलितजरद्वलिनैः” ( ३।११११३) १३५ १ तेन सविकारमविकारेण न समस्यते इत्यपि सिद्धम् ।

- . .. ३०० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- युवन इत्येतन्नाम खलत्यादिभिः समस्यते । युवा चासौ खलतिश्च युवखलतिः, युवपलितः, युवजरन् , युववलिनः । वलयोऽस्य सन्ति वलिनः "अङ्गादित्वात्" नः । नामग्रहणे लिगविशिष्टस्यापि ग्रहणमिति युवतिश्चासौ खलतिश्च युवखलतिः । पूर्वनिपातार्थं वचनम् । “कृत्यतुल्याख्यमजात्या"। (३२१२११४)। कृत्यप्रत्ययान्तं तुल्याख्यं तुल्यपर्यायं च नाम अजात्या अजातिवाचिनाम्ना सह सम- ५स्यते । भोज्यं च तदुष्णं च भोज्योष्णम् । भोज्यलवणम् । तुल्याख्यः; तुल्यश्वेतः, तुल्यसन् , सदृश- श्वेतः, सदृशमहान् । अजात्येति किम् ? भोज्य ओदनः । तुल्यो वैश्यः । कथं शीतपानीयम् ? पानी- यशब्दोऽयमौणादिको जलवाची, तस्यायं विशेपणसमासः । जात्या समासस्याजातेः पूर्वत्वस्य च प्रतिपे- धार्थं वचनम् । “कुमारः श्रमणादिना" (३।१।११५) । कुमार इत्येतनाम श्रमणादिना नान्ना समस्यते । कुमारी चासौ श्रमणा च कुमारश्रमणा । श्रमणा, प्रव्रजिता, कुलटा, गर्भिणी, तापसी, १०वन्धकी, दासी, एते सप्त स्त्रीलिङ्गा एव । अध्यायक, अभिरूपक, पटु, मृदु, पण्डित, कुशल, चपल, निपुण । येऽन स्त्रीलिङ्गास्तैः सह स्त्रीलिङ्गः एव कुमारशब्दः समस्यते । शेषैस्तूभयलिङ्गः । (नामग्रहणे लिगविशिष्टस्यापि ग्रहणमिति हि न्यायः) श्रमणादीनां स्त्रीलिङ्गानां पाठात् पुंल्लिङ्गैः पूर्वनिपाते काम- चारः । कुमारश्रमणः, तापसकुमारः । कुमारशब्दस्य पूर्वनिपातनियमार्थं वचनम् । एतत्सर्वमादिशब्देन सगृहीतं बोद्धव्यम् ॥ ६२ ॥ अथ कियत्कण्ठत आह । निन्यं कुत्सनैरपापाद्यैः ॥ ६३॥ [सि० ३३१०१००] निन्धं निन्दावाचिभिः समस्यते, स समासस्तत्पुरुषसंज्ञः कर्मधारयसंज्ञश्च स्यात् । तार्किकख- सूची । अपापाद्यैरिति किम् ? पापमुनिः । हतविधिः ॥ ६३ ॥ "निन्यं." । तार्किकससूचीति-तार्किकश्चासौ ससूची च तार्किकससूची, यः पृष्टः सन्निःप्रतिभ- त्यात्वं सूचयति स एवमुच्यते । तार्किकससूचिरित्यन्ये । एवं मीमासकदुर्दुरूढः, दुर्दुरूढो नास्तिकः । २०क्षनियभीरुः, भिक्षुविटः, मुनिखेटः, ब्राह्मणचेलः, ब्राह्मणब्रुवः, राक्षसहतकः, ब्राह्मणजाल्मः, तापसा- पसदः, काण्डीरकाण्डस्पृष्टः, ग्राम्यधृष्टः, मुनिधूतः, कविचौरः, आरक्षितस्करः, पापण्डिचण्डालः । निन्द्यमिति किम् ? वैयाकरणश्चौरः । प्रत्यासत्तेनिन्द्यशब्दनिवृत्तिनिमित्तकुत्सायामयं समास इष्यते, न चान चौर्येण वैयाकरणत्व कुत्स्यते किन्तु तदाश्रय द्रव्यम् । वैयाकरणत्वं तु तदुपलक्षणमानम् । तेनान विशेषणसमास एव चौरवैयाकरणः ॥ ६३ ।। उपमान सामान्यैः ॥ ६४॥ [सि० ३११११०१] उपमानाचि उपमानोपमेयसाधारणधर्मवाचिभिः समसते, स तत्पुरुषः कर्मधारयश्च स्यात् । शस्वीर श्यामा शस्त्रीश्यामा ॥६४॥ "उप०" । शस्त्रीय श्यामेत्यर्थकथनम् । समासस्तु शस्त्रीव शस्त्री, शस्त्री चासो श्यामा च शस्त्री- श्यामेति । "विशेषणं विशेष्येण०" (३।११८६) इत्येव समासे, उपमानोपमेययोः साधारणधर्म- प्रतीत्यन्यथानुपपत्त्येव पूर्वनिपाते च सिद्धे, उपमान सामान्यैरेवेति नियमाथं यचनम् । तेनामिर्माणवक १इत्यादी विशेषणसमासोऽपि न भवति ॥ ६४ ॥ १ हिसन्दोऽत्र यस्माद, ययं नामप्रहणपरिभाषयैव स्त्रीलिऽपि समासस्य खिलात किमर्थ प्रीरिङ्गानां श्रमणाना - २५ पाठबाद।

, , प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । तत्पुरुषः कर्मधारयश्च ३०१ उपमेयं व्याघ्राद्यैः साम्यातुक्तौ ॥ ६५ ॥ [सि० ३।१।१०२ ] उपमेयवाचि उपमानवाचिभिर्व्याघ्राद्यैः साधारणधर्मानुक्तौ समस्यते, स तत्पुरुषः कर्मधारयश्च । पुरुषो व्याघ्र इव पुरुषव्याघ्रः । साम्योक्तौ तु पुरुषो व्याघ्र इत्र शूर इत्यत्र न स्यात् ।। ६५ ।। "उपमेयं" । साधारणधर्मानुक्ताविति-न चेटुपमानोपमेययोः साधारणधर्मवाची शब्दः प्रयुज्यते । व्यात्र इव व्यावः पुरुषः, स चासौ व्याघ्रश्च पुरुपव्याघ्रः । राज्ञी चासो व्यानी च राजव्यात्री, ५ कर्मधारयात्पुंवद्भावः । न स्यादिति-इदमेव प्रतिपेधवचनं ज्ञापकम्-प्रधानस्य सापेक्षत्वेऽपि समासो भवति । तेन राजपुरुपो दर्शनीय इत्यादि सिद्धम् । व्याव, सिंह, ऋपभ, वृषभ, महिप, चन्दन, वृक, वराह, हस्तिन् , कुञ्जर, रुरु, पृपत, पुण्डरीक, पलाविका पक्षिणीविशेषः, कुञ्चा, (क्रुचा ?), एते पोडश (पञ्चदश?) व्याघ्रादयः । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । तेन वाग्वजः मुखपद्मम् पाणिपल्लवम् करकिसलयम् वदनेन्दुः पार्थिवचन्द्रः वानरश्वा कुचकुम्भः स्तनकलश इत्यादयोऽपि १० भवन्ति । उपमान सामान्यैरेवेत्यनेन विशेपणसमासे प्रतिपिद्धे समासविधानार्थं वचनम् ॥ ६५ ।। सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टं पूजायाम् ॥ ६६ ॥ [सि० ३।१।१०७ ] पूजायां गम्यायामेतानि पञ्च पूज्यवाचिभिः समस्यन्ते, स तत्पुरुषः कर्मधारयश्च ।। ६६ ।। "सन्म०” ॥ ६६ ॥ अनोपयोगिसूत्रमाह । जातीयैकार्थेऽच्वेः॥ ३७॥[सि० ३२२७०] महतोऽच्च्यन्तस्य जातीयरि प्रत्यये एकार्थे च पदे परे डाः सात् । महाजातीयः । महाराजः ॥६७॥ "जाती०" । महान् प्रकारोऽस्य महाजातीयः । “प्रकारे जातीय” (७१२।७५ ) एकार्थे-महान् भागोऽस्य महाभागः । महायशाः । महती चासौ देवी च महादेवी । महती कीर्तिरस्य महाकीर्तिः। महान्तमात्मानं मन्यते महामानी । एवं महम्मन्यः । खशि डा ह्रस्वत्वे मोऽन्तः । अच्वेरिति किम् ? २० अमहान महान भूतो महद्भूतश्चन्द्रमाः । अमहती महतीभूता महद्भूता कन्या । पूजायामिति क्रिम् ? सन् घटः, विद्यमान इत्यर्थः । कथं महोदधिः, वैपुल्यं ह्यत्र गृह्यते न पूजा ? बहुलाधिकाराद्भवति । पूजायामेवेति नियमार्थं वचनम् , पूर्वनिपातव्यवस्थार्थ च । तेन सच्छुक्ल इत्यादौ खञ्जकुण्टादिवनिय- मेन पूर्वनिपातो न भवति । परमजरन् महावीरः परममहान् इत्यादौ च "स्पर्द्ध” (७।४।११९) परमिति यथापरं पूर्वनिपातश्च सिद्धो भवति । अत्रामी विशेपाः "महतः करघासविशिष्टे डाः” (३।२।६८)। करादिपु त्रिपूत्तरपदेपु महतो डा वा स्यात् । वैयधिकरण्ये इयं विभापा, सामानाधिकरण्ये "सन्महत०" (३।१।१०७) इति नित्य एव विधिः । महतः करो महाकरः महत्करः । कर एव वा कारः महाकारः २ । महाघास: २। महाविशिष्टः २ । "स्त्रियाम्" (३।२।६९)। स्त्रियां वर्तमानस्य महतः करादिपु त्रिपु नित्यं डाः स्यात् । महत्याः करः महाकरः, महाघासः महाविशिष्ठः । “न पुम्बन्निधे” (३१२१७१)। महतः३० पुंवन्निषेधविपये डा न स्यात् । महती प्रियाऽस्य महतीप्रियः, महतीमनोज्ञः । "रिति" (३।२।५८)। परतः रुयनूङ् रितिप्रत्यये जातीये देशीये च पुंवत् स्यात् । पसी प्रकारोऽस्याः पटुजातीया । ईपदपरि- समाप्ता पची पटुदेशीया ॥ ६७ ।। १५ ? तु ३३ 8770 ३०२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलपु- वृन्दारकनागकुञ्जरैः॥ ६८॥ [सि० ३३१११०८] एमिः सह पूज्यवाचि समस्यते । मुनिवृन्दारकः । “किम् क्षेपे" (३१११११०)। समस्यते । क्षेपार्धात्किमः पूजार्थाभ्यां खतिभ्यां नञ्तत्पुरुपाच यथायोगं समासान्तनिषेधो वक्तव्यः । किंराजा । किंगौः ॥ ६८।। "वृन्दा०"। "किंक्षेपे" इति सूत्रद्वयं सुगमम् ॥ ६८ ॥ अथान समासान्तविधिमाह । जातमहद्वृद्धादुक्ष्णः कर्मधारयात् ॥ ६९ ॥ [सि०७।३।९५] कर्मधारये एभ्य उक्ष्णोऽत्स्यात् । जातोक्षः ॥ ६९ ॥ "जात." । जातोक्ष इति-एवं 'महोक्षः स्यादुक्षतरः, वृद्धोक्षस्तु जरद्वः' । कर्मधारय इति किम् । १. वृद्धस्योक्षा वृद्धोक्षा ।। ६९ ॥ अथान पुंवद्भावविधिमाह । पुंवत्कर्मधारये ॥७०॥ [सि०३२।५७] अनूङ्परतः स्त्री स्येकार्थे उत्तरपदे पुंवत्स्यात् । कल्याणी चासौ प्रिया च कल्याण- प्रिया ॥ ७० ॥ इति कर्मधारयः। "व."-कल्याणप्रियेति एवं कल्याणमनोज्ञा । योऽपि "नाप्रियादौ” (३।२।५३) इत्यादी १५पुंवद्भावनिपेधस्तमपि वाधित्वात्र पुंचद्भावो भवति । तथाहि "तद्धिताककोपान्त्यपूरण्याख्याः' ( ३।२।५४) इत्युक्तं तत्रापि भवति--मद्रिका चासौ भायर्या च मद्रिकभार्या । लाक्षिकवृहतिका, पाचक्वृन्दारिका, पञ्चमवृन्दारिका, दत्तवृन्दारिका । "तद्धितः स्वरवृद्धिहेतुररक्तविकारे" (३१२१५५) इत्युक्तम् , तत्रापि भवति-माधुरी चासौ वृन्दारिका च माथुरवृन्दारिका । "स्वागान्डीऑतिश्चाऽमानिनि" ( ३।२।५६) इत्युक्तं तत्रापि भवति-चन्द्रमुखी चासौ वृन्दारिका च चन्द्रमुखपृन्दारिका, दीर्पकेश- २० वृन्दारिका, कठपृन्दारिका यहचवृन्दारिमा ) सर्वत्र जातिलक्षणडीवायको वृन्दारिकाशदे जातित्वादाप, "येपसूतपुत्रन्दारकस्य" (२२४११०९) इति विकल्पेनेत्वम् । “वतण्डात्" (६३११४५) १ यतण्ड, शब्दादागिरसे युद्धेऽपत्यविशेपे यह स्यात् । वतण्डस्यापत्यं वातण्डयः, स्त्रीत्वे यतण्डी । "स्त्रियां लुप्" (६।१६४६) वतण्टान्दादागिरसेऽपत्यविशेषे वृद्ध स्त्रियां यडो लुप् भवति । वतण्डी चासी वृन्दारिका प यातण्डयन्दारिका । गर्गस्यापत्यं गायः स्त्री चेमार्गी, सा चासौ वृन्दारिका च गाग्र्यवृन्दारिका। कपोत- २५पाक एर कपोतपाक्यः, स्त्री चेन् कपोतपाशा, कपोतं पचति अण् अत्राणलक्षणं जातिनिमित्तं वा डीप्रत्यय पाधित्ला "अजादेः" (२१४।१६) इत्याप कापोतपाका चासो वृन्दारिका च यापोतपाक्यवृन्दारिका। पुशम्यापत्यं पौधायन्यः । “कुमादेर्मायन्या" (६११४७)। पुञ्जादिभ्यो सन्तेभ्यो युद्धेऽपत्येऽर्थे मायन्य: म्यान् । नीतीशायनी । "स्त्रीयहुप्यायनम्” (६।११४८) । पुञ्जादिभ्यो डसन्तेभ्यो यात्यरिशिष्टे वृद्ध नियां या यहुत्वेऽपि आयनम् स्यात् । कोशायनी चासो वृन्दारिका प फौधायन्य- ३० पृन्दारिपा। अहम्यापत्यानि अग्नाः "पुरुमगध." (६।१।११६) इत्यण "महुप्यन्त्रियाम्" (६।१।१२४) सीना (1) मिप आवाय सा पृन्दारियाच अद्गहन्दारिकाः। गर्गयन्दारितः। इविष्ट प्रदरद ३२ उशिन् एते जनपदसब्दाः क्षत्रिययाचिनः, एभ्योऽपत्यप्रत्ययस्य खियां टुपि, पिट् पासी एन्दारिश प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । द्विगुः चेत्यादि विग्रहे ऐडविडवृन्दारिका । पार्थवृन्दारिका, दारवृन्दारिका, औशिजवृन्दारकेति भवति । परतः स्त्रीत्वे च खट्वावृन्दारिका । अनूङियेव-ब्रह्मवन्धूवृन्दारिका ॥ ७० ॥ (इति कर्मधारयः। अथ द्विगुसमासमाह। सङ्ख्या समाहारे च द्विगुश्चानास्न्ययम् ॥ ७१॥ [ सि०३।११९९] सङ्घयावाचि परेण नाम्ना समस्यते, संज्ञातद्धितयोपिये उत्तरपदे च परे समाहारार्थे च, स समासस्तत्पुरुषसंज्ञः कर्मधारयसंज्ञश्च सात् । अयमेव चासंज्ञायां द्विगुसंज्ञश्च भवति । सप्तर्पयः । द्वैमातुरः। पञ्चगवधनः। संज्ञादिपु नित्यसमासः । समाहारे तु वाक्यमपि भवति ।।७।। "सङ्ख्या०" । सप्तर्पय इति । समुदायेपु वृत्ताः शब्दा अवयवेष्वपि वर्तन्ते इति वहुसङ्ख्याकाम्राद्य- भिधायकाः पञ्चाम्रादिशब्दा एकस्मिन्नप्याम्रादौ प्रयुज्यन्ते इति फलित एकः पञ्चाम्रः । उदितात्रयः१० सप्तर्पय इति ॥ ७१ ॥ द्विगोः समाहारात् ॥ ७२ ॥ [सि० २।४।२२ ] समाहाराविगोरदन्तास्त्रियां ङीः स्यात् । पञ्च ग्रामाः समाहृताः पञ्चग्रामी । “पानादिगणान्त इकाराधन्तश्च समाहारद्विगुर्नपुंसकम्" द्विपात्रम् । चतुर्मासम् । त्रिभुवनम् । चतुष्पथम् । त्रिगुप्ति । “अन्नन्ताबन्तान्तो वा नपुंसकम्" ।। ७२ ॥ "द्विगो०” । स्पष्टम् । पात्रादीति-द्विपथम् । त्रिपथम् । चतुर्युगम् । त्रिपुरम् । भाष्ये तु त्रिपुरी- त्युक्तम् । पात्रादयः शिष्टप्रयोगगम्याः ॥ ७२ ॥ अन्न समासान्तविधिमाह । द्विगोरन्नहोऽट् ॥ ७३ ॥ [सि०७३।९९] अन्नन्तादहन्नन्ताच समाहारद्विगोरट् स्यात् । “नोऽपदस्स०" इति । पञ्चराजी पञ्चराजम् । बहः २० इत्यादि । पञ्चमाली पञ्चमालम् । त्रिसन्ध्यमिति तु क्लीवम् । त्रिफलेति च रूढितः ॥ ७३ ॥ इति द्विगुः। "द्विगो०" । यह इति, द्वयोरहोः समाहारो ब्यहः । “अनीनाट्यहोऽतः” (७४।६६) ईन-अत्-अटू-वर्जिते तद्धिते परे पदस्थाह्रोऽकारस्य लुक् स्यादित्यटि उपान्त्यलोपनिपेधे, “नोऽपदस्य.' (७।४।६१) इत्यन्त्यस्वरादिलोपे व्यह इति । "द्विगुरन्नावन्तान्तो वान्यस्तु सर्वो नपुंसक" इति २५ स्त्रीनपुंसकत्वे प्राप्ते "अहनियूहकलहा” इति लिङ्गानुशासनलक्षणेन पुंस्त्वम् । अन्नन्तत्वेनैव सिद्धे अह्र इदमविधानं समाहारे "सर्वांशसहयाव्ययात्” (७।३।११८) इति परस्याप्यटो बाधनार्थम् । तस्मिन् हि सत्यहादेशः स्यात् । एवं चहः, पञ्चाहः, सप्ताहः, । "द्वित्रेरायुपः” (७।३।१००)। द्वित्रिभ्यां परो य आयुशब्दस्तदन्तात्समाहारे द्विगोरट् स्यात् । ब्यायुपम् । समाहार इत्येव । ब्यायुः व्यायुः प्रियः । "वाञ्जलेरलका" (७।३।१०१)। द्वित्रिभ्यां परो योऽञ्जलिस्तदन्ताहिगोरवा स्यान , ने चेत्स द्विगु-३० स्तद्धितलुगन्तो भवति । द्वयोरजल्योः समाहारो ब्यञ्जलम् बञ्जलि, व्यञ्जलम् व्यन्जलि । अलुक इति किम् ? द्वाभ्यामञ्जलिभ्यां क्रीतो ब्यञ्जलिर्घटः । “खार्या वा” (७।३।१०२)। पृथग् योगान् द्विवे- रिति निवृत्तम् । खारीशब्दान्ताद्विगोरलुकोऽट् समासान्तो वा भवति । द्विखारम्, पक्षे छीब इनि ३३ १५ - -- महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- हस्खत्वे द्विसोरि । केचिदन्न पुंस्त्वमपीच्छन्ति, तन्मते "गोश्चान्ते.” (२।४।९६) इत्यादिना हखत्वे द्विसारिः । स्त्रीत्वमध्यन्ये तन्मते पूर्ववत् ह्रस्वत्वे "इतोऽत्त्यर्थात्” (२।४।३२) इति उयां द्विसारी । एवं पञ्चसारम् पश्चसारी । तद्धितविषये उत्तरपदे च परे द्विगुसंज्ञायां द्वाभ्यामञ्जलिभ्यामागतं व्यञ्जल- मयम् व्यञ्जलिमयम् । द्वावञ्जली प्रियौ यस्य ब्यञ्जलप्रियः व्यञ्जलिप्रियः । पञ्चखाररूप्यम् पञ्चसारी- ५रूप्यम् । पञ्चसारधनः पश्चखारीधनः । इत्यादि सर्वमित्यादिशब्देन सङ्गृहीतं ज्ञेयम् ।। ७३ ॥ इति द्विगुः। अथ द्वन्द्वसमासमाह। चार्थे द्वन्द्वः सहोतो ॥७४ ॥[सि० १११११७] नाम नाना सह चार्थे समस्यते, सहोक्तिविपये सति, स समासो द्वन्द्वः स्यात् । समुच्चया- १०न्याचयेतरेतरयोगसमाहाराचार्थाः । तत्रैकस्मिन् व्यादीनां क्रियाकारकद्रव्यगुणानां तुल्यकक्षतया ढौकनं समुच्चयः-चैत्रः पचति पठति चेति । गुणमुख्यभावेनैकस्मिन् यादीनां क्रियादीनां ढौक- नमन्वाचय:-बटो भिक्षामट गां चानय इत्येतयोः सहोत्यभावान्न समासः । परस्परसापेक्षाणां द्रव्याणां क्रियां प्रति दौकनमितरेतरयोगसमाहारौ । तत्रोद्भुतावयवमेद इतरेतरयोगोऽत एवा- त्रावयवद्वित्वबहुत्वापेक्षया द्विवचनबहुवचने । चैत्रश्च मैत्रश्च चैत्रमैत्रौ पश्यतः । चैत्रमैत्रदत्ताः १५पश्यन्ति । न्यग्भूतावयवभेदस्तु समाहारोऽतस्तत्रैकवचनमेव । धवखदिरपलाशम् ॥ ७४ ॥ चार्थे० । नाम नाम्नेत्यनुवर्तमानेऽपि "लध्वक्षरा." (३।१।१६०) इत्यादि सूत्रे एकमणाद्वहूनामपि द्वन्द्वो भवति । तद्ध्यनेकस्य पूर्वनिपातप्रसक्तावेकस्य पूर्वनिपातनियमार्थम् , द्वयोश्च द्वन्द्वेऽनेकस्य पूर्वनि- पातप्रसगाभायादेकमहणमनर्थकं स्यादिति । ततो बहूनां द्वन्द्वे होतृपोतनेष्टोद्गातारः । द्वयोर्द्वयोर्द्वन्द्वे हि होता पोता नेष्टोद्गातार इत्येव स्यात् । चार्थ इति किम् ? ग्रामो प्रामो रमणीयः अत्र वीप्सायां २० सहोक्तिसद्भावेऽपि चार्थाभायाहन्द्वाभावः । सहोक्ताविति किम् ? प्लक्षश्च न्यग्रोधश्च वीक्ष्यताम्-अन प्रत्येकं क्रियया सम्बन्ध इति सहोत्यभावः। सञ्जश्चासौ कुण्टश्चेत्यादि कर्मधारयविपयेऽपि न सहोक्तिः । विशेप्यस्येव प्राधान्यात् ; सहोक्तिस्तु द्वयोर्द्धर्मयोद्धर्मिणोर्वा भिन्नयोः प्राधान्ये सति सम्भवतीति । का पुनरियं सहोक्तिः ? यर्तिपदैः प्रत्येकं तदर्थानां (पदार्थानां ) युगपदभिधानं सा सहोक्तिः । धन्यः ग्रोधावियन हि लक्षोऽपि व्यर्थो न्यग्रोधोऽपि व्यर्थः । प्लक्षश्च न्यग्रोधश्चेति वाक्येऽपि चकारेणायमेवार्थः २५ कथ्यते । ननु प्लनन्यग्रोधावितिशब्दक्रमात् क्रमवदर्थानुगमाननाने कस्याभिधानं सम्भवतीति चेत् ? न । एवं हि द्विवचनबहुवचनानुपपत्तिः । यतः प्लक्षशब्दः सार्थको निवृत्तोऽन्यो न्यग्रोधशब्द उपस्थित- सन न्यग्रोधार्थप्रतिपत्तिकाले यदि प्लश्नावगतिर्न स्यात्तदा न्यग्रोधशब्दादेकार्थत्वादेकवचनं स्यादेव, शराशपलाशा इत्यादिवहुवचनेऽपि । ततश्च द्विवचनान्यथानुपपत्त्या भन्यग्रोधावियादाकोऽनेका. भिधायीत्यभ्युपगन्तव्यम् । नन्वेवं तर्हि क्थं प्रभश्च न्यग्रोधश्चेत्येकवचनान्तयोर्वाक्यं वृत्ती प्रदर्शितम्, ३० द्विवचनान्तयोास्यम् । सत्यम् । लौकिकमेतद्वास्यम् , न प्रक्रियायाक्यम् । यदा तु परस्परशक्तयन- पेशेन द्वन्द्वो भविष्यतीत्यभिधित्सयातिपाहिकशरीरस्थानीयं यास्यं क्रियते, तदा सल्बलौकिकं समीपग: तपदान्तरयस्तुरचितं द्विषचनान्तयोर्याक्यं क्रियते ॥ यद्भाष्यम्, सति प्रदर्शयितव्ये वरमेय पाश्य धयों प यदिरो घेति । अलौविस्त्याग वृत्तौ न प्रदर्शितम् । न घेवं लभन्यप्रोधयोकिद्वयफ्ल्पनेना- नेकार्थत्वादहुवचनं प्रामोतीति याच्यम् । यतो नार पत्यारोऽर्थाः । किं तर्हि १ द्वादेवाधौं यपाभ्यागे- ३५ यानेकः शन्दो व्यर्थम्नाभ्यामपरोऽपि । नहि द्वाभ्यां लक्षाभ्यामविभपनो आतरी चतुर्लभी भवतः ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । द्वन्द्वः ३०५ समुदायरूपो हि द्वन्द्वार्थः प्रत्यवयवमवयविवत्प्रतिसक्रान्तो यथा वनविटपिपु वनमिति । नन्वेवं लौकिकात्प्रयोगाच्छब्दानामर्थावधारणं तत्र यथा घटशब्दः पटायं न प्रत्यायति, तथा प्लक्षन्यग्रोधशब्दो परस्परार्थप्रत्यायको न युक्तौ । नैवम् । वृत्तिविषये ह्येकैकस्य द्वावर्थाविति खार्थावेतौ, लोकप्रसिद्ध्या त्वर्थान्तराभिधायित्वमुच्यते । ननु परस्परसन्निधानेन यहयोः सामर्थ्यमभिहितं तदन्यतरविगमेऽपि न हीयते । वह्निविगमेऽपि वह्निसम्पादितपाकजरूपादिवदिति लक्षणोक्तत्वान्यग्रोधस्याप्रयोगः प्राप्नोति १५ नैवम् । न्यग्रोधार्थस्य प्लक्षेणानुक्तत्वान्न्यग्रोधशब्दप्रयोगः । उक्तं ह्येतत्-द्वन्द्वावयवानामेवानेकार्थाभि- धायित्वं न केवलानां यथा वह्निसन्निधावेव तानं द्रवरूपं भवति, न तु तन्निवृत्तावेवमिहापि सहभूता- वेवान्योन्यार्थमाहतुर्नतु पृथग्भूतौ भारोद्वाहकवत्सहभूतानां परस्परशक्त्याविर्भावादिति, ततश्च प्लक्षस्य न्यग्रोधस्य चानेकार्थत्वे यद्यपि वहुत्वं प्राप्तम् , तथापि द्वन्द्वावयवत्वेन वाह्यमतो गौणं न तु मुख्यमिति न बहुवचनमिति । नन्वस्तु यथाकथञ्चित्सहोक्तिः, समाहारे तु सा न सम्भवति, तस्यैकत्वात्सहो-१० क्तेश्च भेदनिवन्धनत्वादित्यत्रोच्यते-समाहारो हि सङ्घातः । स च संहन्यमानानां धर्मः, संहन्यमा- नाश्च सहोच्यमाना एव न पृथगुच्यमाना इति तत्रापि सहोक्तिसम्भव इत्यदोपः। उत्तरपदेन समुदायेन वा यद्वतिपदार्थानां युगपदभिधानं सा सहोक्तिरित्यन्ये । वर्तिपदार्थानामेव सह क्रियादिसम्बन्धस्य यद्वाक्येनाभिधानं सा सहोक्तिरित्यपरे । चार्था इति चकारद्योत्या अर्था इत्यर्थः । तत्रैकस्मिन्नित्यादि अयमर्थः अर्थः क्रियाकारकद्रव्यरूपः, एकमर्थं प्रति ब्यादीनां क्रियाकारकद्रव्यगुणानां तुल्यबलानाम-१५ विरोधिनामनियतक्रमयोगपद्यानामात्मरूपभेदेन चीयमानता समुच्चयः । शीतोष्णादीनां च विरोधितया, वाल्ययौवनादीनां नियतकमतया, रूपरसादीनां नियतयोगपद्यतया च न चीयमानताऽतो गौणमुख्य- भावेनातुल्यवलानामपि न तथेति । ततश्चैकस्मिन् कारके अनेकक्रियाणाम् १ एकस्यां क्रियायामनेककार- काणां २ एकस्मिन् द्रव्येऽनेककारकाणां ३ एकस्मिन् कारकेऽनेकद्रव्याणां ४ एकस्मिन् धर्मिण्यनेक- धर्माणां ढौकनं समुच्चय ५ इति । यथाक्रममेषामुदाहरणानि-चैत्रः पचति पठति च १ चैत्रो मैत्रश्च पचति २० २। राज्ञो गौश्चाश्वश्च ३ । राज्ञो ब्राह्मणस्य च गौः ४ । शुक्लश्वायं कृष्णश्च, नीलं च तदुत्पलं चेति ५ । चशब्दमन्तरेणापि समुच्चयः सम्भवति यथा, "अहरहर्नयमानो गामश्वं पुरुपं पशुम् । वैवस्वतो न तृप्यति सुराया इव दुर्मदी ॥१॥" गुणमुख्यभावेनेति-अयमत्रार्थः-गुणप्रधानभावमात्रविशिष्ठः समुच्चय एवान्वाचयः यथा “रुधां स्वराच्छ्नो न लुक् च" (३।४।८२) इति-अत्र विधीयमानं नं नलोपोऽपेक्षते । यत्र भस्तत्र नलोपो यथा 'भजोंप् आमर्दने' भनक्ति । भस्तु नलोपं नापेक्षते तदभावेऽपि प्रवर्त्तते २५ यथा युनक्तीति । वटो भिक्षामटेत्यादि-स हि भिक्षां तावदटति यदि च गां पश्यति तदा तामप्यान- यति । ततो भिक्षाटनस्य मुख्यत्वं गवानयनस्य च गौणत्वमिति । द्विवचने बहुवचने इति-नन्वेकविंशति- रित्यादिसङ्ख्याद्वन्द्वो यद्यवयवप्रधानस्तदैकविंशतिरिति द्विवचनम् , द्वाविंशतिरिति बहुवचनं प्राप्नोति यदि च समुदायप्रधानस्तदा नपुंसकत्वं स्थादित्यत्रोच्यते । एकविंशतिर्वाविंशतिरित्यादि सहयाद्वन्द्वः समुदायसहयैकत्वानुरोधेन विंशत्यादिवत्सङ्ग्येयमाचष्टे इतीतरेतरयोगेऽप्येकवचनान्तो भवति । समा-३० हारेऽपि च "आशताइन्ढे" इति लक्षणात्स्त्रीलिङ्गो भवति । सहयाद्वन्द्वादन्यत्र तु एको देवदत्ताय दीयतां विंशतिश्चैत्रायेति एकविंशती अनयोर्देहि । एवं निशचत्वारिंशती पष्टीसप्तत्यशीतयः इत्यादी द्विवचनबहुवचनान्तता ॥ ७४ ॥ समानामर्थनकः शेषः॥७५॥[सि०३।१।११८] तुल्यार्थानां द्वन्द्व एकः शिष्यतेऽन्ये निवर्तन्ते । चक्रश्च कुटिलश्च वक्रो, कुटिलो वा ।। ७५ ॥३५ है. प्रका० पूर्वा० ३९ ।

- ३०६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "समा०" । एकः शिष्यते इति-तत्र विशेषानुपादानात्पर्यायेण शेषो भवति । समानामिति बहु- वचनमतन्त्रम्, तेन वहूनां द्वयोरपि चैकः शिष्यते । सितश्च शुक्लश्च श्वेतश्च सिताः शुक्लाः श्वेता वा । इहैकशेपे पटपक्षाः सम्भवन्ति, तर प्रत्येकमेव विभको परतो विभक्तिपरित्यागेन नामैकशेपः स्यात् १ । अथवा सविभक्तिकानां वृक्षस् वृक्षस् वृक्षस् इति स्थिते एकस्य वृक्षस् इत्यस्य शेषः अन्ये निवर्तन्ते ५२ । अथ वृक्षश्च ३ इति द्वन्द्वे कृते सत्येकस्य वृक्ष इत्यस्य शेपः (अपरे निवर्तन्ते) ३ । अथवा विभ- तिमनुत्पाद्यैव नाममात्रेण वृक्ष वृक्षेत्येवविधानामेव शेषः कार्यः । ततो विभक्तिः ४ । अथवा सहोतो वृक्षश्च वृक्षश्चेति द्वन्द्वे प्राप्ते एकशेपः ५ । अथवा नामसमुदायस्यैवार्थवत्त्वान्नामसज्ञाया द्विवचना- धुत्पत्तौ एकशेपः ६ । इति पट् पक्षाः ॥ तत्राद्य पक्षत्रय सावधकमिति तत्परिहारेणेतरत्पक्षत्रयमिहा- श्रीयते। (यथा हि) तत्र प्रथमे पक्षे, नामैकशेपेऽनेकविभक्तिश्रवण स्यादिति दोषः । द्वितीये, विभचय- १०न्तस्य लोपे कृते विभक्तभ्रातृधनन्यायेन शिष्यमाणस्य निवर्तमानपदसङ्ख्यासम्बन्धेऽपि विभत्यन्तत्या- द्विवचनबहुवचनानुपपत्तिः स्यात्ततश्च वृक्ष इति नित्यमेव स्यादिति दोपः । तृतीये तु समासान्तदोषा, तथाहि-ऋक् च ऋक् चेति द्वन्द्वे तत एकशेपे "चवर्गदपहः” (७३१९८) इति समासान्तः स्यादिति प्रथमपक्षनयं दुष्टम् ।। इतरपक्षनये तु न कश्चिद्दोषस्तथाहि-वृक्ष वृक्ष इति स्थिताना नाम्नां विभक्तिमनु साथैवैकशेपप्रवृत्तिरिति प्रथमः पक्षः । तुल्यकाल नामानि यदा 'विवधवैवधिकन्यायेन परस्परशक्त्यनु- १५प्रवेशादभिधेयमाहुस्तदा द्वन्द्वकशेपाविष्टाविति द्विवचन बहुवचन चोपपन्नमिति द्वितीयः । नामसमुदा- यस्यैवार्थवत्त्वान्नामत्वाद्विभक्त्युत्पत्तिरिति तृतीयः ॥ एव पक्षनयेऽपि प्राप्तो द्वन्द्वोऽनेनापोद्यते इति द्वन्द्वापपादोऽयं योगः ॥ ७५ ।। स्यादावसङ्घयेयः॥ ७६ ॥ [सि०३।१।११९] सर्वस्यादिपु तुल्यरूपाणां भिन्नार्थानामप्येकशेषः सात् , सङ्ख्येयवाचिशब्दं वर्जयित्वा । २० अक्षश्व अक्षश्च अक्षय अक्षाः। शकटागपाशकविभीतकाः ॥७६ ॥ "स्यादा०" । सर्वस्यादिपु तुल्यरूपाणामिति-माता च जननी, माता च धान्यस्य, मातमातरौ । अन होकस्य मातरावन्यस्य मातारावियौकारे रूप भिद्यते इति नैकशेप. । अन्ये तु यस्मिन स्यादौ ये श दा- तुल्यरूपा भवन्ति तस्मिन् स्यादौ तेपा स्याद्यन्तरे विरूपाणामप्येकशेपो भवति, तेन मातृभ्या मातृभिः मातृभ्यः मानोः मात्पु इत्याद्यपि भवतीत्याहुः । अपरे त्वनापि वहुवचने ताभिस्तैरित्याद्यनुप्रयोगवैषम्यान २५ भवितव्यमेकशेपेण, द्विवचनेन तु ताभ्या तयोरित्यनुप्रयोगसाम्याद्भवितव्यमेवेत्याहुः । सहोयवाचिशन वर्जयित्वेति-एकश्च एकश्च, द्वौ च द्वौ च, इत्यादी द्वन्द्वोऽपि न स्यादनभिधानात् । सङ्ख्येयेति कर्मनि- देशात्सायानवाचिनो भवत्येव । विंशतिश्च विंशतिश्च विंशती । द्वन्द्वापवादोऽय विधिस्तेनाकृतद्वन्द्वाना- मेकशेपे वार घ, वार च, वाची इत्यादि सिद्धमन्यथा द्वन्दै कृते परत्वात्समासान्ते कृते वैरूप्यावे. फोपो न स्यात् ।। ७६ ॥ त्यदादिः ॥७७॥ [सि० ३३१११२०] अन्येन सहोक्तौ त्यदादिः शिष्यते । मिथः सहोक्तौ तु यथापरम् । स च चैत्रश्च ती । सच ३श्यश्व यौ॥७७॥ १ भारोप टम्यायेन इति मुनिवरघुन्याछे ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । द्वन्द्वः ३०७ "सदा"। मिथ इति-यदादीनां मिथः सहोक्तौ तु यद्यपीठे परं तत्तदेवैकं शिष्यते । स च यश्च यो इति । एवं यश्च एषश्च एतौ । स च त्वं च युवाम् । त्वं च भवांश्च भवन्तौ । अहं च कश्च को । अहं च स च त्वं च वयम् । बहुलाधिकारात् कचित्पूर्वमपि शिष्यते । स च यश्च तौ । अयं च एप च इमौ । त्वं च भवांश्व युवाम् । त्यैदादेः कृतैकशेषस्य स्त्रीपुन्नपुंसकलिङ्गानां युगपत्प्रयोगायोगात्पर्या- यप्राप्ती शिष्यमाणलिङ्गप्राप्तौ वा स्त्रीपुन्नपुंसकलिङ्गानां 'सहवचने स्यात्पर मिति यथापरमेव लिङ्गं ५ भवति । सा च चैत्रश्च तौ । स च देवदत्ता च तौ-अत्र स्त्रीपुंसलिङ्गयोः परं पुंल्लिङ्गमेव भवति । सा च कुण्डे च तानि-अन्न खीनपुंसकयोः परं नपुंसकमेव भवति । स च कुण्डं च ते । तच्च चैत्रश्च ते-अत्र पुन्नपुंसकयोः परं नपुंसकमेव भवति । कथं स च कुक्कुटः सा च मयूरी ते कुक्कुटम- यूर्यो ? उच्यते-"परलिङ्गो द्वन्द्वोऽशीति" समासार्थस्य लिङ्गातिदेशात्तद्विशेपणस्य त्यदादेरपि तल्लिङ्गतैव न्याय्येति ॥ ७७ ॥ भ्रातृपुत्राः स्वस्मृदुहितृभिः ॥ ७८॥ [सि० ३।१११२१ ] स्वस्त्रादिभिः सहोक्तौ भ्रात्रादिः शिष्यते । भ्राता च वसा च भ्रातरौ । पुत्रश्च दुहिता च पुत्रौ । "श्वशुरः श्वश्रूभ्यां वा” (३।१।१२३)। शिष्यते । श्वशुरौ श्वश्रूश्वशुरौ । “पिता मात्रा वा” (३।१।१२२)। तथा । पितरौ ॥ ७८ ॥ पक्षे- "भ्रातृ०"। बहुवचनं पर्यायार्थम् । सोदर्यश्च स्वसा च सोदयौँ । भ्राता च भगिनी च भ्रातरौ । १५ सुतश्च दुहिता च सुतौ । भ्राता च भ्राता च भ्रातरौ, भ्राता च स्वसा च भ्रातरावित्युभयप्रतिपत्तावपि प्रकरणादिना विशेपावगतिः । "श्वशु०” (३।१।१२३)। श्वश्रूभ्यामिति द्विवचनं जातौ धवयोगे च वर्तमानयोः श्वश्वोः परिग्रहार्थम् । तेन जातौ तन्मात्रभेदे "पुरुपः स्त्रिया" (३।१।१२६) इति नित्यविधिन भवति । "पिता" । तथेति । मातृशब्देन सहोक्तौ पितृशब्द एकः शिष्यते मातु- रय॑त्वात् पूर्वनिपातः ॥ ७८ ॥ मातरपितरं वा ॥ ७९ ॥[सि० ३२४७] मातृपित्रोर्द्वन्द्वे ऋतोऽरो वा निपात्यः । मातरपितरौ ॥ ७९ ॥ पक्षे- आ द्वन्द्वे ॥ ८०॥ [सि० ३।२।३९] ऋता द्वन्द्वे विद्यायोनिसम्बन्धे पूर्वपदस्य आः स्यात् । होतापोतारौ । मातापितरौ । “पुत्रे" (३।२।४०)। पितापुत्रौ मातापुत्रौ होतापुत्रौ ॥ ८० ॥ २० १ न केवलं तावत् स्पर्द्ध यत्परं तच्छिश्यत इति क्वचिन्च पूर्वमपीत्यर्थः । २ शिप्यमाणस्य लिलानुशासने लिङ्गस्य चिन्तायां कृतायामपि विस्मरणशीलं प्रति स्मारयितुमाह-त्यदादेः कृतकशेपस्येत्यादि । ३ यदि लिझानां सहविवक्षायां परमेव लि भवति कथं ते कुकुटमयूर्यो इति स्त्रीलिङ्गतेत्याशवार्थः।-उच्यत इत्यादिनात्र परिहारमाह-अयमों द्वन्द्वस्य परलिगलात् खदादेश्वात्र द्वन्द्वशेपसात् द्वन्द्वलिङ्गतैव द्रष्टव्या, द्वन्द्वाभावे तु सहोती ती फुटो मयूरीति चार्थे गम्ये ती कुमुटो मयूरी चेत्येक- योगे तो कुकुटश्च मयूरी चेति चकारद्वययोगे च भवति त्रीपुनपुंसकानामिति वचनात् । ४ तबाद पिपल्या इति अर्धकथनम् , तत् पिपल्यर्द्ध सा च अर्धपिप्पलीयपि कृते (समानामर्थे )-इति क्लीवे स्त्रियां च न विशिप्यते दिगम्बरममाधिवत् , ततश्च स्वाप्पी अर्धपिप्पल्या स्वादुनी पिप्पल्यर्द्ध इति युक्त उदाहरणे पिप्पल्यर्दस्य अर्धपिप्पल्याश्च शेषलाभावे तद्विशेषणाना- मेकशेपे तु नपुंसकलिहरीव स्त्रीनपुंसकानां सहेति भणनात् ।

, - ३०८ महामहोपाध्यायश्नीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "मातर"1"आ द्व०"। पक्षे इति-एकशेषविकल्पे द्वन्द्वप्राप्तौ वैकल्पिक सूत्रद्वयं सुगमम् । पितरौ, मातापितरौ, मातरपितरौ, इति रूपत्रयम् ॥ "पुत्रे" । अस्य सूत्रस्यायं भावः-पुत्रशब्दे उत्तरपदे परे द्वन्द्व विद्यायोनिसम्बन्धे सति प्रवर्त्तमानानामृकारान्तानामाकारोऽन्तादेशो भवति । अन्न प्रसङ्गाहन्द्वे पूर्वपदस्यात्वादिकं सद्देपेण दर्शयति- ५ देवताद्वन्द्वे पूर्वपदस्सात्वादिकं वक्तव्यम् । सूर्याचन्द्रमसौ । *अग्नीपोमौ । देवताद्वन्द्वे इत्यादि-अनैवं सूधपद्धतिः-"वेदसहश्रुताऽवायुदेवतानाम्" (३।२।४१) । घेदे सहश्रुतानां वायुवर्जदेवताना द्वन्द्वे पूर्वपदस्यात्वं स्यात् । सूर्याचन्द्रमसाविति-एवं इन्द्रासोमो, इन्द्रा- वरुणो, इन्द्रापूपणो, इन्द्राबृहस्पती, शुनासीरी, अमामारुती, अमेन्द्रौ, अमाविष्णू, सोमारुद्रौ, मिना- परुणौ । सहेति किम् ? विष्णुशकौ । श्रुतेति किम् ? चन्द्रसूर्यो एतौ वेदे शब्दान्तरेण विद्येते चन्द्रसूर्य- १० इत्यादिशब्दैस्तु न श्रुतौ । वायुवर्जनं किम् ? अग्निवायू वाय्वनी ॥ *अग्नीपोमो इति-"ई: पोमवरु', णेऽग्ने" (३।२।४२) । पोमेति निर्देशादीकारसन्नियोगे पत्वं निपात्यते । एवं अग्नीवरुणौ । “इद्धि- मत्यविष्णौ” (३।२।४३) । विष्णुवर्जिते वृद्धिमत्युत्तरपदे देवताद्वन्द्वेऽग्निरिकारोऽन्तादेशो भवति । ईकाराकारयोरपवादः । अग्नीपोमो देवतास्य अग्निपोमं कर्म । “देवतानामात्वादी (७।४।२८)। देवतार्थानां शब्दानामात्यादौ विपये णिति तद्धिते परे पूर्वोत्तरपदयोरादिस्वरवृद्धिः स्यात् । "वेदसह- १५श्रुताऽजायुदेवतानाम्" (३२१४१) इत्यत आरभ्य "उपासोपसः" (३।२।४६) इति यावदात्वादयः इत्युभयपदवृद्धिः । वृद्धिमतीति किम् ? अग्नीवरुणो-"आतो नेन्द्रवरुणस्य" (७४।२९)। आकारान्तात्पूर्वपदात्परस्य इन्द्रशब्दस्य वरणशब्दस्य चोत्तरपदस्य खरेष्वादेः स्वरस्य वृद्धिर्न भवति । इति वृद्धिनिषेधादयं वरुणशब्दो वृद्धिमान्न भवति । *अविष्णाविति किम् ? अनाविष्णू देवताऽस्य अमा- वैष्णवं चरुं निर्वपेत । "दिवो द्यावा" (३।२।४४) । योश्च भूमिश्च द्यावाभूमी, द्यावाक्षने, २० धावाक्ष्मे । द्यावानते नक्तशब्दोऽकारान्तोऽप्यस्यनव्ययम् । "दिवस दिवः पृथिव्यां वा" (३।४५) । दिवशब्दस्य पृथिव्यामुत्तरपदे दिवस् दिवः इत्येतावादेशौ या भवतः । दिवस्पृथिव्यो, घायाधिन्यो दिवःथिव्यौ । दिव इति विसर्गान्तस्य निर्देशादिवसिति सकारस्य रुत्वं न भवति । "उपासोपसः” (३।२।४६) । देवताद्वन्द्वे उत्तरपदे परे उपसूशब्दस्य उपासा इत्ययमादेशो भयति । उपश्च सूर्यश्च उपासासूर्यम् । उपासानक्तम् । उपासानक्ते । केचित्तु सूर्यशब्दस्यापीच्छन्ति- २५ सूर्यच सोमश्च उपासासोमौ । प्रभातवाचक उपसान्दो द्विखरसन्तत्वानपुंसकलिङ्गः, सन्ध्यावाचक्नु "अलाघु जम्बूदुरपः" इति वचनात् स्त्रीष्टीवलिङ्गः। अधात्रैकशेपप्रकरणे उक्तशेपोऽयम् "वृद्धो यूना तन्मानभेदे" (३।१।१२४) । वृद्धः पौत्रादिरपत्यम् , युवा जीवद्वेश्यादिः। यूना सहोतो वृद्धवाच्येकः शिष्यते, तन्मात्र एव चे दो विशेषो भवति (न चेत्प्रकृतिभेदोऽर्थभेदो यान्यो ३० भवतीत्यर्थः) । गायेय गार्यायणश्य गाग्यो । तन्मात्रभेद इति किम् ? गार्ययात्यायनी, अन प्रति- रन्या। भागवितिभागवित्तिको 'भागविनितार्णविन्दवाशापेयान्निन्दायामिषण वा” (६।१११०५) सोपीरेषु वृद्ध पर्तमानेभ्य एभ्यो यून्यपत्ये इकण या स्यात् । निन्दायां गम्यायाम् । अत्र फुत्सा सौवीर. २३ देशत्वं पान्योऽर्थः । "स्त्री पुंवच" (३।१।१२५) युद्धस्त्रीवाची युक्वाचिना सहोतो एकः शिष्यते । नन्यत्र कहां किमर्थम् , सीलदोच्यता तना सीवाचिनो युचवाचिना पुंसा एकशेष स्त्रीपुनराशन मिलव पुस्त भविपछि । नप याच्यं युवापिनो यदा खातं तदा कि भविष्यतीति । अयुवेतिगणनात् षीयाचिनो सुबलसंशया भभार।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । द्वन्द्वः । एकशेषः । समाहारः ३०९ पुंवत्पुंल्लिङ्गा चेयं भवति । यर्थः पुमर्थों भवतीत्यर्थः तन्मात्रभेदे । गार्गी च गाायणश्च गाग्र्यो, गार्गी च गाायणौ च गर्गाः । अत्र पुंवद्भावात् डीनिवृत्तौ यङो लुप् । गर्गानिति "शसोऽता सञ्च नः पुंसि" (१।४।४९) इति नत्वं च । इमौ गार्यावित्यनुप्रयोगस्यापि पुंस्त्वम् । “पुरुषः स्त्रिया” (३।१।१२६)। पुरुषशब्दोऽयं प्राणिनि पुंसि रूढः । स्त्रीवाचिना सहोक्तौ पुरुपवाची एकः शिष्यते । तन्मात्रभेदे स्त्रीपुरुष- मात्रश्चेद्भेदो भवति । ब्राह्मणश्च ब्राह्मणी च ब्राह्मणौ । गौश्चायं गौश्वेयं इमौ गावौ । तन्मात्र भेद इत्येव-५ हंसश्च वरटा च हंसवरटे, अत्र प्रकृतिभेदः। इन्द्रेन्द्राण्यौ, अत्र धवलक्षणोऽर्थभेदः, । कलभहस्तिन्यौ अत्र प्रकृत्यर्थयोर्भेदः । अन्ये तु तन्मात्रभेदाधिके प्रकृतिभेदे एवैकशेपं नेच्छन्ति, अर्थभेदे विच्छन्त्येव- इन्द्रश्चन्द्राणी च इन्द्रौ । एवं पूर्वसूत्रेऽपि भागवित्तिश्च भागवित्तिकश्च भागवित्ती । “ग्राम्याशिशुद्वि- शफसचे स्त्री प्रायः" (३।१।१२७ ) ग्राम्या अशिशवो ये द्विशफा द्विखुरा अर्थात्पशवस्तेषां सद्धे स्त्रीपुरुपाणां सहोत्तौ प्रायः स्त्रीवाच्येकः शिष्यते । स्त्रीपुरुपमात्रश्चेद्भेदः, । पूर्वेण पुरुषशेपे प्राप्ते स्त्रीशेषार्थ १० वचनम् । गावश्च स्त्रियः गावश्च पुरुपा इमा गावः । ग्राम्येति किम् ? आरण्यानां मा भूत् । रुरवश्वेमे रुरवश्वेमाः इमे रुरवः । अशिशुग्रहणं किम् ? वत्साश्वेमे वत्साश्चेमा इमे वत्साः । द्विशफेति किम् ? अश्वाश्वेमेऽश्वाश्चेमा इमेऽश्वाः । सङ्घग्रहणं किम् ? गौश्वायं गौश्चेयं इमौ गावौ । प्राय इति किम् ? उष्ट्राश्च उष्ट्रयश्च उष्ट्राः, छागाश्च छाग्यश्च छागाः, व्यावृत्तौ सर्वत्र पूर्वेण पुरुपशेष एव भवति । तन्मात्र- भेद इत्येव-गोवलीवर्दम् । "क्लीवमन्येनैकं च वा” (३।१।१२८ ) क्लीवं नपुंसकं नामान्येना-१५ क्लीवेन सहोक्तावेकं शिष्यते । तन्मात्रभेदे-क्लीवाक्लीवमात्र एव चद्भेदो भवति । तच्च शिष्यमाणमेकमेकार्थ वा । अर्थस्यैकत्वे तद्विशेपणानामपि तथा भावः । शुक्लं च वखं शुक्लश्च कम्बलः तदिदं शुक्लं ते इमे शुक्ले वा । शुक्लं च वस्त्रं शुक्लश्च कम्बलः शुक्ला च शाटी तदिदं शुक्लं तानीमानि शुक्लानि वा । क्लीवग्रहणं किम् ? स्त्रीपुंसयोरपि शेषः स्यात्-क्लीवग्रहणमन्तरेण यथा क्लीवस्याक्लीवेन सहोक्तावेकशेषस्तथा स्त्रीपुंस- योरपि स्त्रीपुंसाभ्यां सह वचने स्यात् । अन्येनेति किम् ? शुक्लं च शुक्लं च शुक्ले । “स्यादावसङ्ख्येयः” २० (३।१।११९) इत्येकशेपः । अनेन त्वेकशेपे विकल्पेनैकार्थत्वं प्रसज्येत । तन्मात्रभेद इत्येव । हिम च हिमानी हिमान्यौ । अत्रार्थभेदोऽस्ति इति नैकशेपः । इत्येकशेषप्रकरणम् ॥ ७९ ॥ ८० ।। अथ समाहारद्वन्द्वपकरणं सझेपेण दर्शयति- पशुव्यञ्जनानाम् ॥ ८१॥ [सि०३।१।१३२] एपां स्वैर्द्वन्द्व एकार्थो वा स्यात् । गोमहिपम् । गोमहिपौ । दधिघृतम् दधिधृते । “तरुतृण-२५ धान्यमृगपक्षिणां वहुत्वे” (३३१११३३)। वैकार्थता । धवन्यग्रोधम् , धवन्यग्रोधाः । कुश- काशम् , कुशकाशाः । तिलमापम् २ । शशैणम् २ । हंसशुकम् २ । “सेनाङ्गक्षुद्रजन्तूनाम्" (३।१।१३४) बहुत्वे नित्यमेकार्थता । अश्वरथम् । यूकालिक्षम् । “प्राणितूर्याङ्गाणाम्" (३।१।१३७) जातिवैरवतां "नित्यवैरस्य" (३।१।१४१) इत्यनेन च तथा । हस्तपादम् । मार्दङ्गि-२९ नापि युववाचिनो नपुंसकलं वाच्यम् , आपत्यतद्धितस्य स्त्रीपुंस्त्वस्यैवोकत्वात् , ततः पुंस्त्रस्य सिद्धत्वात् पुंवग्रहणमतिरिच्यते। न । स्त्रीपुनपुंसकानामित्यस्य प्रायस्त्यदादिविषय एव प्रवर्त्तनात्तन प्रायिकत्वात् नियमार्थ वचनम् । किच अरुणाचार्येण अपत्य- प्रत्ययान्तानामाश्रयलिङ्गलमुक्तम् , ततश्च गार्गी च गार्यायणं चेत्यपि कृते तन्मतेऽपि पुंस्त्वं यथा स्यात् । १ स्त्रीलक्षणोऽर्थो यस्य शब्दस्य स पुमर्थः, यद्वा शब्दस्येति वृत्तावध्याहर्त्तव्यम् । तस्य सम्बन्धी स्त्रीलक्षणोऽर्थः पुमर्थः । अर्थग्रहणाच विशेषणानामपि पुंस्त्वं सिद्धम् । शव्दस्यैव पुंस्खे विशेषणानां न स्यात् । गाावित्यत्र पुंवद्भावेनानुप्रयोगे विशेषः । शोभनौ गाग्यौं । २ अत्र वृद्धो यूनेति नानुवर्तते अघटनात् , तदनुवृत्तौ हि वृद्धः पुरुषो यूना युवसंज्ञया स्त्रियेति स्यात् , न चैतदस्ति, अस्त्रीति वचनात् स्त्रिया युवसंज्ञाया अभावात इति सामान्येनाह-स्त्रीवाचिनेत्यादि । ? ? .

महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- कपाणविकम् । अहिनकुलम् । “गवाश्वादिः” (३२१११४४) गवाश्वमित्यादि । “न दधिपय आदिः" (३३२१४५)1 दधिपयसी । “सयाने” (३।१।१४६) तथा । दश गोमहिपाः ॥८॥ "पशु०" एपां स्वैरिति-पशवः प्रतीताः । येनानादे रसो व्यज्यते तद्दधिघृतशाकसूपादि व्यञ्ज- नम् । पशुत्वेन व्यञ्जनत्वेन मिथः स्वत्वम् । "तरु०" धवेत्यादीनि क्रमेण तरुतृणादीनामुदाहरणानि । ५"सेनां" क्षुद्रजन्तूनामिति- क्षुद्रो दरिद्रे कृपणे निकृप्टेऽल्पनृशंसयोः” इत्यनेकार्थवचनात् । अल्पपरिमाणा जन्तवः क्षुद्रजन्तवः । तथोक्तम्- "क्षुद्रजन्तुरनस्थि स्यादथवा क्षुद् एव यः । शतं वा प्रसूतियेपी केचिदानकुलादपि" ॥ १॥ "क्षुद्रजन्तुरक्ङ्कालो, येपा खं नास्ति शोणितम् । नाचलियत्सहस्रेण केचिदानकुलादपि ॥ २ ॥ बहुत्व इति किम् ? अश्वरयो, यूकालिले । “प्राणिताहाणाम्” इत्यादि । अश्वरथमित्यादीनि २० प्रमेणोदाहरणानि । जातिधरवतामुदाहरणं तु अहिनकुलमिति । पशुविकल्पः पक्षिविकल्पश्चानेन घाध्यते । अश्वमहिपम्, काकोलूकम् । अन्ये तु वैर एवाभिधेये समाहारमिच्छन्ति-श्वावराहं वेर- मिति । वैरिपु यथाप्राप्तम् । दक्षिणाद्वामगमनं प्रशस्तम् । श्वशृगालयोरिति (विद्यते लोक औत्पत्तिको (जन्मप्रभवः) विरोधो यथा मार्जारमूपिक्योः) अत्यादिवरणाय "पुष्यार्थाने पुनर्वसुः" (३।१।१२९)। पुष्यार्थाच्छन्दाढ़े नक्षत्रे वर्तमाना- १५सरो भ एव वर्तमानः पुनर्वसुशव्दः सहोक्तौ गम्यायां सामर्थ्यात् व्यर्थः सन्नेकार्थो भवति । उदिती पुष्यपुनर्वसू । अन्यथा हि पुनर्वसुशन्दस्य ब्यर्थत्वाद्वहुवचनं स्यात् । अर्थग्रहणं पर्यायार्थम्-तिष्यपुन- पसू । समाहारे तु पुष्यपुनर्यमु । एकत्वानेकत्वयोर्विशेपो नास्तीति । भ इति किम् ? पुप्यपुनर्वसवो माणवकाः । “विरोधिनामद्रव्याणां नवा द्वन्द्वः स्वैः" (३।१।१३०)। अद्रव्याणां गुणादीनां विरोधिनां सर्द्वन्द्व एकार्थों या भवति । सुसदु.सम् सुसदुःसे । विरोधिनामिति किम् ? रूपरसगन्धः २० स्पर्शाः । अद्रव्याणामिति पिम् ' मुखदुःसाविमौ ग्रामी, अनोपचारात् सुसदुःसशब्दो द्रव्ये वत्तेते । द्रव्यं पान गुणाश्रयो द्रव्यमिति तार्किकप्रसिद्धं गृह्यते न तु वैयाकरणप्रसिद्धम् इदंतदित्यादिलक्षणम्, तस्मिंस्तु गृह्यमाणे सुखदुःसादीनामपि द्रव्यत्वप्रसङ्गः । छायातपमिति न भवति-तयोव्यत्वादिति । खेरिति रिम् ? बुद्धिसुखदुःसानि । अत्र सुखदुःसे विरोधिनी, बुद्धिस्त्वविरोधिनी । समाहारे पार्थे एफ्त्वस्य इतरेतरयोगे पानेक्त्यस्य सिद्धत्वाद्विकल्प सिद्धे, सर्वमिदं विकल्पानुममणं नियमार्थम् । २५ विरोधिनामेवाद्रव्याणामेव स्पेरेवेति । तथा च प्रत्युदाहरणे इतरेतरयोग एव । "अश्ववडवपूर्वा- पराघरोत्तराः" (३।१११३१) । एते त्रयो द्वन्द्वा या ए भवन्ति, स्वः । अश्वश्च यडया घ अश्ववटवम् अश्वपढयो । अश्वरहवेति निर्देशादेवेतरेतरयोगे हस्थत निपात्यते । पशुविकल्पेनैव सिद्धे पश्वषयमहणं तत्पर्यायनिवृत्त्यर्थम्-इयवटवेति । स्पेरियेय-अजाश्वययाः । प्राग्वत् (समाहारेतरेतर: रक्षणार न्याया) विकल्पे सिद्धे पूर्वापरादिप्रहणं पदान्तरनिवृत्त्यर्थम्, तेन पूर्वपश्चिमी दक्षिणाप ३०६त्यादी पिपल्लो न भवति । “फलस्य जाती" (३।१।१३५) । पलयाचिनो बहुत्वे यर्तमानानां जाती वियगया सैईन्द्र एपार्यो भवति । पदराणि पामलानि प चदरामलाम् । जाताविति रिम् ? व्यक्तिपरत्वे मा भून्-एनाीि पदरामटयानि तिष्ठन्ति । यते इयेय-यदरामलरे । ३४"अमाणिपन्यादेः" (३६१३१३६) । बहुत्व ही निवृत्तम्, पूर्वयोगारम्भार । प्राणिभ्यः सम्मापा उभपसपि विशेषगम् । २ सय यगो वायदा समय, समापि प प्रायुसरण मासम् । परिवेन मोनेव निशा। -- -- - ? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । द्वन्द्वः । समाहारः ३११ पश्वादि सूत्रोक्तेभ्यश्च येऽन्ये द्रव्यभूताः पदार्थास्तेपां जातौ वर्तमानानां स्वैर्द्वन्द्व एकार्थो भवति । आरा च शस्त्री च आराशस्त्रि । जातिविवक्षायामयं विधिर्व्यक्तिविवक्षायां तु यथाप्राप्तम्-आरा- शस्त्रि आराशख्याविमे ॥ प्राणिपश्वादिवर्जनं किम् ? ब्राह्मणक्षत्रियविद्शूद्राः ब्राह्मणक्षत्रियविट्शू- द्रम् । गोमहिपम् गोमहिपौ । दधिघृते दधिधृतम् । प्लक्षन्यग्रोधौ २, कुशकाशौ २, व्रीहियवौ २, रुरुपतौ २, हंसचक्रवाको २, अश्वरथौ २ । अप्राणीति किम् ? प्राणिनो द्रव्यस्य पर्युदासेनाप्राणिनोऽपि ५ द्रव्यस्य ग्रहणादिह न भवति-रूपरसगन्धस्पर्शाः । उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि । स्वैरियेव । पदरशृगालौ । यत्राप्राणीतिवचनात्प्राप्तिस्तत्र पश्वादिसूत्रोक्ता व्यञ्जनादयो ग्राह्याः, न तु पशवस्तत्राप्राणी- त्यनेनैव निषेधसिद्धेः । "चरणस्य स्थणोऽद्यतन्यामनुवादे" (३।१।१३८)। शाखाध्ययननिमि. तकव्यपदेशभाजो द्विजन्मानश्चरणाः कठादयः । प्रमाणान्तरप्रतिपन्नस्यार्थस्य शब्देन सङ्कीर्तनमनुवादः। यज्ञकर्मणि 'शंसितानुशंसनमित्येके। अनुकरणमित्यपरे । अद्यतन्यां परभूतायां यौ स्थेणौ तयोः अनुकथने १० कर्तृत्वेन सम्वन्धिनो ये चरणास्तद्वाचिनां शब्दानां खैर्द्वन्द्वोऽनुवादविपये एकएकार्थो भवति । प्रत्यष्ठात्क- ठकालापम् , उदगात्कठकौथुमम् , प्रत्यष्ठान्मौदपैष्पलादम् । एपामुदयप्रतिष्ठे कश्चिदनुवदति । चरणस्येति किम् ? उद्गुस्तार्किकवैयाकरणाः । स्थेण इति किम् ? अगमन् कठकालापाः । अद्यतन्यामिति किम् ? अतिष्ठन् कठकालापाः । अनुवाद इति किम् ? उद्गुः कठकालापाः-अप्रसिद्धं कथयति । अन्ये तु स्थेणोऽद्यतनीप्रयोगाद्नु पश्चाद्वादश्चरणद्वन्द्वस्येत्यनुवादस्तत्रेच्छन्ति । तन्मते इह न भवति । कठका-१५ लापाः प्रत्याः । गौणमुख्ययोरिति न्यायान्मुख्यः कर्ता प्रथमान्तो लभ्यते । तेन भावे प्रत्यष्ठायिकठका- लापाभ्यामिति स्यान्न तु समाहारः । “अक्लीयेऽध्वर्युक्रतो” (३।१।१३९) । अध्वर्यवो यजुर्वेद- विदः, तेषां वेदोऽप्यध्वर्युस्तत्र विहिताः क्रतवोऽश्वमेधादयोऽध्वर्युक्रतवः । ससोमको यागः क्रतुः । अध्वर्यु- क्रतुवाचिनां शब्दानां खैर्द्वन्द्व एकार्थो भवति, अल्लीवे-क्लीवे चेदध्वर्युक्रतुवाची शब्दो न भवति । अर्कश्च अश्वमेधश्च अश्विमेधम् । अर्कादयः पुंल्लिङ्गाः । अक्लीवग्रहणं किम् १ गवामयनादित्यानामयने । २० पँसज्यप्रतिषेधः किम् ? । राजसूयं च वाजपेयं च राजसूयवाजपेये । इमौ ऋतू पुंल्लिङ्गावपि स्त इति पर्युदासाश्रयणेऽत्रापि स्यात् । अध्वर्युग्रहणं किम् ? इपुवनौ उद्भिद्वलभिदौ । इष्वादयः सामवेदे विहिताः । ऋतुग्रहणं किम् ? दर्शपौर्णमासौ। “निकटपाठस्य” (३।१।१४०)। निकटः पाठो येपा- मध्येतॄणां ते निकटपाठास्तद्वाचिना द्वन्द्व एकार्थो भवति, स्वैः । पदमधीते पदकः, एवं क्रमकः । पद- कश्च क्रमकश्च पदकक्रमकम् । पदानन्तरं क्रमकस्य पाठात्पाठयोनिकटत्वम् । “नदीदेशपुरां विलि-२५ ङ्गानाम्" (३।१।१४२)। विविधलिङ्गानां नदीदेशपुराभिधायिनां स्वैर्द्वन्द्व एकार्थो भवति । उध्यश्च इरावती च उध्येरावति । नदीविशेषो नद' इत्यभेदोपचारान्मिथः स्वत्वम् । देश. कुरवश्च कुरुक्षेत्रं च कुरुकुरुक्षेत्रम् । पुर. मथुरापाटलीपुत्रम् । विलिङ्गानामिति किम् ? गङ्गायमुने मद्रकेकयाः मथुरातक्ष- शिले । “पात्र्यशूद्रस्य” (३।१।१४३) । यैर्भुक्ते पात्रं संस्कारेण भस्मोद्वर्त्तनादिना, “शुद्ध्यति भस्मना कांस्यम् , ताम्रमम्लेन शुद्ध्यति', इत्यादि मन्वादिशास्त्रोक्तेन शुद्ध्यति ते पाच्याः । पात्र्यशूद्रवाचिनां३० खैर्द्वन्द्व एकार्थो भवति । तक्षायस्कारम् , रजकतन्तुवायम्, किष्किन्धगन्धिकम्, शक्यवनम् एते चत्वार आर्यावर्तीद्वाह्या म्लेच्छभेदाः । द्विविधा हि पाव्यशूद्रा आर्यावर्त्तान्तर्गतास्तद्वाह्यान्च । तदन्तर्ग- तानां तक्षादीनां तदन्तर्गतैरयस्कारादिभिः स्वत्वम् , तद्वाह्यानां तद्वाखैरिति । पात्र्येति किम् ? जनगम-३३ १ शब्दात्प्रमाणादन्यत्प्रत्यक्षादि प्रमाणान्तरं तेन प्रतिपन्नम् । २ शंसितस्य कयितस्यानुशंसनम् । ३ पूर्वकृतस्य पश्चात् , साह- करणं क्रिया। ४ क्लीवे चेदध्वर्युक्रतुवाची न भवतीति यः प्रसज्यप्रतिषेधो वृत्तौ दर्शितः स किमर्थः, प्रसज्यो हि नञ् क्रियया संबध्यते, इतरस्तु नाना । - -- श्येन वा, महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- चुपसाः, नीतेभ्यो जनगमादिभ्यस्वर्णिकाः खं पानं प्रयच्छन्ति । तैर्भुक्ते पात्रस्य संस्कारेणाशुद्ध- रिति । शुद्रग्रहणं किम् ? ब्राह्मणक्षत्रियविशः । “गवा.” ( ३११११४४) अयं द्वन्द्व एकाथों भवति । गौश्चाश्वश्च गवाश्वम् , गवैडकम् अजाविकम् अजैडकम् कुजवामनम् कुजकैरातम् कुञ्जकैरातकम् पुत्रपौत्रम् । निस्वैराभाषपक्षे श्वचाण्डालम् । निसवरपक्षे तु "नित्यवरस्य" (३२११४१) इति सिद्ध- ५मेव । खीकुमारम् , दासीमाणवकम् , शाटीपच्छिफम् , (पच्छिका छाजिकेति प्रसिद्धा) उष्ट्रसरम् । उष्ट्राशम् भूवशकृत् , मूत्रपुरीपम्, यकृन्मेदः, मांसशोणितम् , दर्भशरम्, दर्भपूतीकम् , अर्जुनपुरुपम् , तृणोलपम्।। कुडीकुडम्-कुडत बाल्ये, "नान्युपान्त्य०" (५।११५४) इति के "वयस्यनन्त्ये" (२।४।२१) इति डयां कुडी घाला, कुडो वालः । दासीदासम्, भागवतीभागवतम् त्रिष्वेतेपु "पुरुषः स्त्रिया" (३।१११२६) इत्येकशेपो न भवति-निपावनात् ॥ गवाश्वादिपु यथोचारितरूपग्रह्णादन्यन नायं विधिः । गोऽश्वौ १० गोऽश्वम् । गोअश्वौ गोअश्वम् "वात्सऽसन्धिः” (११२।३१) "स्वरे चाऽनक्षे” (१।२।२९) इत्याभ्यां रूप्ये द्वयोः पशुविमापैव । इति आदिशब्दसद्गृहीतं सर्व समाहारद्वन्द्वप्रकरणं ज्ञेयम् । अथात्र अपवादमाह ) "न दधि०" (३।१।१४५) दधिपयःप्रभृतिर्द्वन्द्व एकार्थो न भवति । दधि च पयश्च दधिपयसी। सर्पिर्मधुनी । मधुसर्पिपी । हरिवासवौ । ब्रह्मप्रजापती, ब्रह्मणो व्यतिरिक्तश्चतुर्दश- विधः प्रजापतिः । शिक्वैश्रवणौ । स्कन्दविशाखौ, विनायकः स्वामी कार्तिकेयश्च । परिजाकौशिकी; १५ आधा नदी, द्वितीयः पर्वतः । प्रवर्गापसदौ । आद्यावसाने । सूर्याचन्द्रमसौ । मित्रावरुणो । अमीपोमौ । सोमारुद्रो । नारदपर्वतो, ऋपी । खण्डामौं, देवताविशेपौ । नरनारायणौ । रामलक्ष्मणौ । भीमार्जुनौ । कम्बलाश्वतरौ । मातापितरौ । पितापुत्रौ । श्रद्धामेधे । शुक्लकृष्णे । इध्मावहिंपी, पूर्वस्य दीर्घत्वं निपात- नात् । ऋक्सामे । वाड्मनसे । अत्र ऋग्सामर्यजुप०” (७३९७) इत्यादिना अकारान्तत्वम् । याज्यानुवाक्ये । दीक्षातपसी । श्रद्धातपसी । श्रुततपसी।मेघातपसी । अध्ययनतपसी । उलूसलमुसले । २० अत्रायेषु निपु व्यञ्जनविकल्पे, शुकणे इत्यत्र "विरोधिनामद्रव्याणाम्०" (३।१।१३०) इति विकल्पे, . इध्मावहिंपी उल्लूसलमुसले इत्यत्र "अप्राणिपश्चादेः” (३३१११३६) इति नियमेकत्वे, शेपेषु च "चार्थे द्वन्द्वः सहोक्ती" (३११११७) इत्युभयस्मिन् प्राप्ते प्रतिषेधोऽयम् । चण्डालमृतपादयश्चात्र द्रष्टव्याः । "सङ्घयाने" ( ३३१११४६) इयत्तापरिच्छेदः सहानम्, पर्चिपदार्थानां सहलाने गम्ये द्वन्द्व एव एकाों न भवति । यथा दश गोमहिपाः । एतापन्ति दधिधृतानि । वह्वः प्लक्षन्यप्रोधाः । २५ दश इस्त्यश्वाः । शतं यूकालिक्षाः । तावन्ति बदरामलकानि । यहवः पाणिपादाः । कति माईगिकपा. माविकाः । उदगुर्दशेमे कठसालापाः । द्वावश्विमेधी । द्वादशपदकामकाः । द्वो गगाझोणो। पास तक्षायस्वाराः । इयन्तो गवाधाः । अत्रायं विशेप:-"वान्तिके" (३३१३१४७) पर्तिपदार्थानां समानस्यान्तिके समीपे गम्यमाने छन्द्र एकार्यों या भवति । उपगता दश यस्य येषां या उपदहा गोमहिपम् , उपदशा गोमहिपाः । उप- ३० दरोभ्यो गोमदिपेभ्यः । द्वन्द्वार्थस्यैकत्यात्तदनुप्रयोगस्यापि यहुत्रीहेरेकवचनान्तत्वम् । यदा तु दाना समीपमुपदशमित्यव्ययीभायसदा उपदां गोमहिपायेति भवति ।। ८१ ॥ अथ द्वन्द्वसमासे समासान्तविधिमाह । चवर्गदपहः समाहारे ।। ८२॥[सि० ७।३।९०] एतदन्दात्समाहारद्वन्दादत्वात् । वारवचम् । सम्पतिपदम् । वास्त्विपम् । छनोपानहम् ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । द्वन्द्वः *स्त्रीपुंसौ । वामनसे । अहोरात्रः। रात्रिन्दिवम् । नक्तन्दिवम् । अक्षिध्रुवम् । दारगव- मित्यादयोऽदन्ता द्वन्द्वा: साधवः ॥ ८२ ॥ "चवर्ग०" वाक् च त्वक् च वाक्त्वचम् । एवं श्रीस्रजम् । वाग्विनुषम् , गोगोदुहम् ॥ अथात्र समा- सान्तविधि सङ्केपेण सङ्ग्रहाति। *त्रीपुंसौ इति-अत्र सूत्रम् "स्त्रियाः पुंसो द्वन्द्वाच” (७।३।९६)। स्त्रीशब्दात्परो या पुम्सशब्दस्तदन्ताहन्द्वात्कर्मधारयाचात्समासान्तो भवति । स्त्रीपुंसम् , श्रीपुंसौ,५ स्त्रीपुंसाः। कर्मधारयात्-स्त्री चासौ पुमांश्च स्त्रीपुंसः, शिखण्डी । स्त्रीपुंसं विद्धि राक्षसम् ॥ विा- नसे इत्यादि-अत्र सूत्रम् "ऋकसामय॑जुषधेन्वनडहवाझनसाऽहोरात्ररानिन्दिवनक्त- न्दिवाऽहर्दिवोर्वष्ठीवपदष्ठीवाऽक्षिध्रुवदारगवम्” (७।३।९७) । ऋक्सामादयो द्वन्द्वा अ-प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । ऋक् च साम च ऋक्सामे । ऋक् च यजुश्च ऋग्यजुषम् ॥ धेनुश्च अनवांश्च धेन्वनडुहाँ, धेन्वनडुहाः, असमासार्थं धेन्वनडुहग्रहणम् , समाहारे तु "चवर्गदपह.” इत्यादिनैव १० सिद्धम् ॥ वाक् च मनश्च वाड्मनसे । अहश्च रात्रिश्च अहोरात्रः, 'रात्रवृत्रा' इति पुंस्त्वम् । रात्रिश्च दिवा च रानिन्दिवम् , रात्रिन्दिवानि पश्यति, निपातनात् पूर्वपदस्य मोऽन्तः । नक्तं च दिवा च नक्तन्दिवम् अत्रापि मोऽन्तः । अहश्च दिवा च अहर्दिवम् , पर्याययोरपि वीप्सायां द्वन्द्वो निपातनात्, अहरहरित्यर्थः, रात्रिपर्यायोऽन्यतर इयेके, अहर्निशमित्यर्थः ॥ अरू च अप्ठीवन्तौ च र्वष्ठीवम्-निपातनादन्त्य- स्वरादिलोपः ॥ पादौ चाष्टीवन्तौ च पदष्ठीवम्-अत्र पद्भावश्च ॥ अक्षिणी च भ्रुवौ च अक्षिध्रुवम् । १५ दाराश्च गावश्च दारगवम् , अत्र निपातनातू ध्रुव उवादेशोऽक्षिदारशब्दयोश्च पूर्वनिपातः ।। ८२ ॥ अथ द्वन्द्वे पूर्वपदनियमं दर्शयति । लध्वक्षराऽसखीदुत्वराद्यदल्पखराय॑मेकम् ॥ ८३॥ [सि० ३।११६० ] लध्वक्षरं सखिवर्जेकारोकारान्तं खराधकारान्तमल्पस्वरं पूज्यवाचि चैकं द्वन्द्वे प्राक् - स्यात् । करशीर्षम् । पतिसुतौ । वायुतोयम् । अस्त्रशस्त्रम् । प्लक्षन्यग्रोधम् । श्रद्धामधे ।। ८३ ।। "लघ्व०" । सखिवर्जनादनानियमः । सुतसखायौ । सखिसुतौ ॥ असखीदुल्लध्वक्षरयोः "स्प?" (७४।११९) परमेव-श्रीहियवौ । असखीदुदित्यैकपद्यादिदुतोः स्पर्द्ध कामचारः-पतिवसू । वसु- पती । स्वराद्यकारान्तमिति स्वराद्यदन्तलध्वक्षरयोः स्पर्द्ध परमेव उष्ट्रखरम् । अल्पखरमिति लघ्वक्षरा- ल्पस्वरयोः स्पढे परमेव-वागर्थौ, धवाश्वकर्णौ । श्रद्धामेधे इति-अर्थप्राहिणी श्रद्धा, शब्दग्राहिणी मेघेति श्रद्धायाः पूज्यत्वम् । अत्रापि स्पर्द्ध दीक्षातपसी । श्रद्धातपसी । मेधातपसी अत्र तपसो लध्वक्षरत्वेऽपि२५ दीक्षाश्रद्धामेधानां वहूपकारकत्वान्मूलभूतत्वाच पूज्यत्वम् । मातापितरौ-गर्भधारणपोपणादिना मातुः पूज्यत्वम् । वधूवरौ-विवाहस्य स्त्रीप्रधानत्वाद्वध्वाः पूज्यत्वम् । लघ्वादिग्रहणं किम् ? कुकुटमयूरौ मयू- कुकुटौ ॥ एकमिति किम् ? युगपदनेकस्य पूर्वनिपाते एकस्यैव यथाप्राप्तं पूर्वनिपातः । शेषाणां तु काम- चार इति प्रदर्शनार्थम्-शङ्खदुन्दुभिवीणाः । वीणादुन्दुभिशङ्खाः । शङ्खवीणादुन्दुभयः, “प्राणितूर्याङ्गा- णाम्” (३।१।१३७) इति वहुवचनं कचिदेकत्वविरनित्यत्वार्थम् , तेनात्रैकत्वाभावः । अन दुन्दु-३० भिशब्दादिदन्तादल्पस्वरत्वेन परयोः शङ्खवीणाशब्दयोः युगपत्पूर्वनिपातप्राप्तावेकग्रहणादेकस्यैव क्रमेण पूर्वनिपातः ॥ एवं अश्वरथेन्द्राः इन्द्राश्वरथाः इन्द्ररथाश्वाः । एकस्यैवेत्युक्तेऽपि दुन्दुभिरथादीनां न पूर्वनिपातः-शब्दस्पर्द्धपरत्वात् न भवति ॥ ८३ ॥ है. प्रका० पूर्वा० ४० n- २० .. ।

" - महामहोपाध्यायश्रीनिनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- मासवर्णभ्रात्रऽनुपूर्वम् ॥ ८४ ॥ [ सि० ३।१।१६१ ] एतद्वाचि द्वन्द्वे यथाक्रमं प्राक् सात् । तुल्यस्वराणां भर्तनामप्येवम् ("भातुल्यवरम्" (३।११६२) इत्यनेन) फाल्गुनचैत्रौ । ब्राह्मणक्षत्रियौ । रामकृष्णौ । ज्येष्ठामूले । ग्रीष्मवर्षाः । "सलयास मासे” (३२११६३)। द्वित्राः ॥ धर्मार्थादिष्वनियमः ("धर्मार्थादिपु द्वन्द्वे" ५(२१११५९) इत्यनेन) धर्मार्थों अर्थधौं । शब्दार्थों अर्थशब्दौ ॥ ८४ ॥ + इति द्वन्द्वः "मास." । सष्टम् । तुल्यस्वराणामिति वार्तिकं स्पष्टम् । तुल्यस्वराणां भर्तनामित्युक्तेः पुष्यपुनर्वसू प्रौप्मवसन्ते इत्यादौ यथाप्राप्तम् । “सङ्ख्याः” । सर्वा सहया प्रथमोक्तेत्यनियमे प्राप्ते आनुपूर्व्याः सहयायाः पूर्वनिपातार्थं वचनम् । समासमात्रे सङ्ख्यावाचिनामानुपूयं पूर्व निपतति । बहुव्रीहो-द्वौ १० या भयो वा द्विनाः । त्रिचतुराः, पञ्चपाः। द्विगौ-द्वे शते समाहृते द्विशती । "अनवकृत्यवमर्पयो० (पा० ३।३।१४५) इति पाणिनीयसूत्रेण स्वराद्यदन्तस्य प्रामिपातानित्यत्वज्ञापकात् हरिहरौ शुचीनौ इत्या- दयः प्रयोगाः साधव इति कृष्णपण्डिताभिप्रायः। द्वन्द्वे, एकश्च दश च एकादश । “धर्मा०" धर्मार्थादौ द्वन्द्वसमासेऽप्राप्तपूर्वनिपातं वा पूर्व निपतति । एवं आद्यन्तौ अन्तादी । अग्मेन्द्रौ इन्द्रामी। चन्द्रार्को अर्कचन्द्रौ । अश्वत्थकपित्थो कपित्याश्वत्थौ, इत्यादिषु स्वराद्यदन्तत्वान्नित्यं पूर्वनिपाते प्राप्ते, १५ सर्पिर्मधुनी, मधुसर्पिपी । गुणवृद्धी वृद्धिगुणौ । दीर्घलघू लघुदी! । चन्द्रराहू राहुचन्द्रौ, इत्यादिषु इदुदन्तत्वान्नित्यं पूर्वनिपाते प्राप्ते; तप:श्रुते, श्रुततपसी । द्रोणभीष्मी, भीष्मद्रोणौ । इत्यादिध्वय॑त्वा- नित्यं पूर्वनिपाते प्राप्ते, शकन्मूत्रम् मूत्रसकृत् । कुशकाशम् काशकुशम् । करभरासमौ रासभकरभी, इत्यादिपु लघ्वक्षरत्वात्पूर्वनिपाते प्राप्ते, समीरणामी अग्निसमीरणौ । आदित्यचन्द्रौ चन्द्रादित्यौ। पाणि- नीयरीढीयाः रौढीयपाणिनीयाः । रूढस्यापत्यं रौढिस्तस्य छात्रा रौढीयाः । जित्याविपूयविनीयाः विपू- २० यविनीयजित्याः इत्यादिस्वल्पखरत्वान्नित्यं पूर्वनिपाते प्राप्त; ब्राह्मणक्षत्रियविद्शूद्राः शूद्रविदक्षत्रियविप्राः । भीमसेनार्जुनौ अर्जुनभीमसेनौ । देवापिशन्तनू शन्तनुदेवापी इति वर्गभ्रातृलक्षणेऽनुपूर्व निपाते प्राप्ते, विफसार्थ कपनम् । बहुपानमातिगणाम् , तेन वसन्तीको प्रीभवसन्ती । शुक्राची शुचिशुनो इत्यादयोऽपि द्रष्टव्याः । इति द्वन्द्वः ॥ ८४ ।। अथ समासप्रकरणे आदेशविशेषान्निरूपयति । एकादश-पोडश-पोडत्-पोढा-पड्ढा ॥ ५॥ [सि० ३२२२९१ ] एते साधवः । पद् दन्ता यस पोडन् ॥ ८५ ॥ "एका." । एषोत्तरा दश, एकं च दश च वा एकादश-अत्र पूर्वपदस दीर्घः ॥ पडुत्तरा दश, पट् प दस प या पोटश-अत्र पपोऽन्तस्योत्वम् , उत्तरपदकारस्य च डकारः॥पड् दन्ता अस पोडन्- पत्र दन्तशब्दस्य दतादेशे दस्य डत्वं पपोऽन्तस्योत्वं च । एवं पोदन्ती पोडन्तः । त्रियां तु पोडती, ३० अन्ये तु दनादेशे ते पोडनिति नकारान्तं (स्वमते तु नकारान्तो निपातः) शब्दान्तरं राजनसब्दयनि- पातपन्ति । ततश्च पोडानमिच्छतीति क्यनि नकारलोपे इत्वे च पोडीयतीति सिद्धयतीति मन्यन्ते ।। पशिः प्रकारैः पोटा पट्टा, अन पामत्यये पपोऽन्तस पोत्वम् धपारस्य तु निसं उत्यम् । यत्तु पह घेति रूपम् न वत् पाप्रत्यये, किन्तु पढ् दधाति धयति या इति "आदो डोऽतावामः" (५।१६७६) तिरे ते खियामपि च भवति । निपातस्य चेष्टविपयत्याग्रोवढत्येन भवतः ॥ ८५ ॥ -- १ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे समासप्रक्रिया । आदेशविशेषाः ३१५ द्विन्यष्टानां द्वात्रयोऽष्टाः प्राक् शतादनशीति- बहुव्रीहौ ॥ ८६ ॥ [सि० ३।२।९२ ] शतात्प्राक् सजवायामुत्तरपदे परे यादीनां द्वादय आदेशाः स्युः। न त्वशीती, बहुव्रीहिविपये च । द्वादश । त्रयोविंशतिः । अष्टात्रिंशत् । “चत्वारिंशदादौ वा” (३२२९३)। द्वाचत्वा- रिंशत् द्विचत्वारिंशत् । अनशीतिवहुव्रीहाविति किम् ? बशीतिः। द्वित्राः । *अन्याद्दोन्तोऽ-५ थादिषु वा । अन्यदर्थः अन्यार्थः ॥ ८६ ॥ "द्वित्र्य" । व्यादय आदेशा इति-द्विशब्दस्य द्वा इत्यादेशः-द्वादश, द्वाविंशतिः, द्वात्रिंशत् । त्रिशब्दस्य त्रयस् इत्यादेशः-त्रयोदश त्रयोविंशतिः त्रयस्त्रिंशत् । अष्टशब्दस्य अष्टा इत्यादेश:- अष्टादश अष्टाविंशतिः अष्टात्रिंशत् । “चत्वा०” द्वित्र्यष्टानां प्राक् शताञ्चत्वारिंशदादौ सङ्ख्यायामुत्तर- पदे ध्यादय आदेशा वा भवन्ति । त्रयश्चत्वारिंशत् त्रिचत्वारिंशत् । अष्टाचत्वारिंशत् अष्टचत्वारिंशत् ।१० एवं द्विपञ्चाशत् द्वापञ्चाशत् इत्यादि । *अन्यादोऽन्त इत्यादि । अत्र सूत्रम् “अषष्ठीतृतीयाद- न्याद्दोऽर्थे” (३।२।११९)। अपठ्यन्तादतृतीयान्ताचान्यशब्दादर्थशब्द उत्तरपदे दोऽन्तो वा भवति । अन्योऽर्थों (अन्यश्चासावर्थश्व ) अन्योऽर्थोऽस्येति वा अन्यदर्थः अन्यार्थः । अन्यस्मै इदं अन्यदर्थं अन्यार्थम् । अन्यस्मिन्नर्थः अन्यदर्थः अन्यार्थः । अषष्ठीतृतीयादिति किम् ? अन्यस्यार्थः अन्यार्थः । अन्येनार्थः अन्यार्थः । अर्थादिष्वित्यत्रादिशब्दस्यायमर्थः-"आशीराशाऽऽस्थिताऽऽस्थोत्सु-१५ कोतिरागे" (३।२।१२०)। वेति निवृत्तम् , पृथग्योगात् । आशी:प्रभृतिषु सप्तसूत्तरपदेषु अषष्ठी- तृतीयान्तादन्यशब्दादोऽन्तो नित्यं भवति । अन्या आशीः अन्यदाशीः । अन्या आशा अन्यदाशा । अन्यमास्थितः अन्यदास्थितः । अन्या आस्था अन्यदास्था । अन्यस्मिन् उत्सुकः अन्यदुत्सुकः । अन्या ऊतिः अन्यदूतिः । अन्यत्र रागः अन्यद्रागः । अपष्टीतृतीयादित्येव-अन्यस्याशीः अन्याशीः । अन्येनास्थितः अन्यास्थितः । इत्यादिशब्दाच "इय कारके" (३।२।१२१)। पृथग्योगादपष्ठीतृतीयादिति निवृत्तम् । अन्यश- व्दादीये प्रत्यये कारके चोत्तरपदे दोऽन्तो भवति । अन्यस्यायमन्यदीयः । गहादित्वादीयः ("गहाऽऽ- दिभ्यः" ६३१६३) अन्यस्मै हितमन्यदीयम् । अन्यस्यान्येन वा कारकः अन्यत्कारकः, अन्यत्कारिका । अन्यः कारकः अन्यत्कारकः, अन्यत्कारिका ॥ ८६ ॥ परस्पराऽन्योऽन्येतरेतरस्याम् स्यादेर्वाऽपुंसि ॥ ८७॥ [सि० ३२१] एपामपुंसि सादेराम् वा स्यात् । स्त्रियो कुले वा परस्परां परस्परं भोजयतः । स्त्रीभिः कुलैर्वा परस्परां परस्परेण भोज्यते । पुंसि तु नराः परस्परं पश्यन्ति । त्रयोऽप्यमी क्रियाव्यतिहार- विपया एकत्वपुंस्त्ववृत्तय इत एव सूत्रनिर्देशात्साधवः ॥ ८७ ॥ "परस्प०" । पूर्वमन्योऽन्येतरेतरशब्दयोर्द्वन्द्वः, पश्चात्परस्परेण, अन्यथा अन्योन्यशब्दस्य स्वराद्य- दन्तत्वादल्पस्वरत्वाच्च पूर्वनिपातः स्यात् । स्त्रियौ कुले इत्यादि-भुते परस्परः कर्ता तं भुञ्जानं सख्यौ ३० प्रयुजाते । “गतिवोधाहारार्थ.” (२।२।५) इत्यणिकर्तुः परस्परस्य कर्मत्वम् , विधानसामर्थ्यात् "अवर्ण- स्यामः साम्” (१।४।१५) इति न भवति ॥ परस्परां परस्परेणेति-अत्र करणार्थे सहार्थे वा यदा ३२ १ पूर्वपदस्य साक्षादेव निर्देशात् प्राक् शतादित्यवधेरनशीतिपदासाशीतेः सङ्ख्यायाः प्रविषेधात् सङ्ख्यारूपस्यैवोत्तरपदस्य २५ ग्रहणम्।

३१६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- तृतीया तदैको णिम् । यथा भुते जनस्तं भुञ्जानं सख्यः प्रयुञ्जते इति णिग् । केन सह केन कृत्वा वा पर- परेणेति । यदा तु कर्तरि तृतीया तदा णिग्द्वयं, कथम् ? भुले जनस्तं भुञ्जानं परस्परः प्रयुक्त णिग् तं परस्परं भोजयन्तं सख्यः प्रयुञ्जते इति द्वितीयो णिम् । ततः कर्तरि तृतीयेति । इत्थमनुक्तस्यापि जन- स्यात्र कर्तृत्वं बोध्यम् । अन्यथा “गतिबोधे"त्यादिना परस्परस्य कर्मत्वमेव स्यात् । अथवा प्रथमैकव- ५चनस्यायमाम्भावः । आमभावपक्षे आभिः सखीभिः परस्परो भोज्यते इत्यादि द्रष्टव्यम् । एवं इमाः सख्यः कुलानि वा परस्परां परस्परस्मै वा प्रयच्छन्ति । परस्परां परस्परस्माद्वा विशन्ति । परस्परां परस्प- रस्य वा स्मरन्ति । परस्परां परस्परस्मिन्वा स्निह्यन्ति । एवमन्योन्यां अन्योन्यम् । इतरेतरामितरेतर वा भोजय इत्यादि । अपरोऽर्थः-परस्परादीनामपुंसि प्रयुज्यमानानां सम्बन्धिनः स्यादेरमादेशो वा भवति । आभिः सखीभिः कुलैर्वा परस्परं परसरेण वा भोज्यते, परस्परं परस्परस्मै वा दीयते । अन्योऽर्थ:- १० परसरादीनां पुंसि प्रयुज्यमानानां सम्बन्धिनः स्यादेरम्वा भवति । एभिनेरैः परस्परं परस्परेण या भोज्यते । परस्परं परस्परस्मै वा दीयते । एवं च खीनपुंसकयोरमामौ द्वावादेशौ वा भवत इति त्रैरूप्यम् । एवमेकैको, अद्वन्द्वमित्यादि। एकैक इति-अत्र सूत्रम्-"प्लुप् चादावेकस्य स्यादेः” (७४।८१) । एकशब्दस्य वीप्सायां द्विरुक्तस्यादौ वर्तते य एकशब्दस्तत्सम्बन्धिनः स्यादेः प्लुप् भवति । पित्करणं पुंबद्भावार्थम्, अत एवात- १५द्धितेऽपि (लुपि) पुंवद्भावः । एकैकः, एकैका, एकैकस्याः, एक एका, एक एकस्याः । अत्र विरामस्य विव. क्षितत्वात् पुंवद्भावे (सति न) सन्धिः, यथा अग्रे अप्रे सूक्ष्माः, यथा वा ऋक् ऋक् इति । आदि- पदस्य स्यादेः प्लुप्युत्तरेणाभेदाश्रयणे स्यायन्तत्यात् "सर्वादयोऽस्यादौ" (३।२।६१) इति पुंवद्रावो न प्राप्नोतीति लुपः पित्त्वं विधीयते । चकार उत्तरम प्लद्विवचनयोः समुच्चयार्थः । इह तु द्विर्षचनं सूरक्रमे वीप्सायां पूर्वेणैव सिद्धम् । प्लुन्मानं विधीयते । आदाविति किम् ? उत्तरोक्तौ मा भूत् । *द्वन्द्व- २० मिति, अन सूत्राण्येवम्-"द्वन्द्वं वा” (७।४।८२) । द्वन्द्वमिति वीप्सायां द्विरुक्तस्य द्विशब्दस्यादी स्थादेः प्लुप्, इकारस्याम्भावः, उत्तरत्रेकारस्यात्वं स्यादेश्वाम्भावो वा निपात्यते । द्वन्द्वं तिष्ठतः, द्वौ द्वौ तिष्ठतः । नरकपटलान्यधोऽधो द्वन्द्वं हीनानि, द्वाभ्यां द्वाभ्यां हीनानि । द्वन्द्वं युद्धं वर्तते, द्वयोर्द्वयोयुद्धं वर्तते । द्वन्द्वं कृतम्, द्वाभ्यां द्वाभ्यां कृतम् । द्वन्द्व स्थितम् , द्वयोर्द्वयोः स्थितम् । "रहस्यमर्यादो- क्तिव्युत्क्रान्तियज्ञपात्रप्रयोगे" (१४८३) । वीप्सायामिति निवृत्तम् । द्वन्द्वमिति द्विशब्दस्य २५ द्विर्षचनं शेषं पूर्ववत् रहस्यादिपु गम्यमानेषु निपात्यते । रहस्से-द्वन्द्वं मन्यन्ते, रहस्यं मन्त्रयन्ते इत्यर्थः । मर्यादोक्ती-आचतुरं हीमे पशयो द्वन्द्वं मिथुनायन्ते-माता पुत्रेण पौनेण प्रपौत्रेण तत्पुत्रेण च मैथुन यातीत्यर्थः । व्युत्क्रान्तिभेदः-द्वन्द्वं व्युत्क्रान्ता द्वैराश्येन भिन्ना इत्यर्थः । द्वन्द्वं यज्ञपानागि प्रयुनति द्वे द्वे प्रयुनक्ति इत्यर्थः । (रहस्यादिष्विति किम् ? द्वौ तिष्ठतः) । उक्तिमहणं शब्दोपात्तायां मर्यादायां यथा स्यात् , प्रकरणादिगम्यायां मा भूत् ।। द्वन्द्वः-समासः, फलहश्च । द्वन्द्वम्-युद्धम्, युग्मं च । ३० द्वन्द्वानि सहते-दुःसानीत्यर्थः । अत्र द्वन्द्व इति शब्दान्तरम् । “लोकज्ञातेऽत्यन्तसाहचर्ये (७४।८४.) । (लोकज्ञातेऽत्यन्तसाहचर्ये चोये द्विशब्दस्य पूर्ववत् द्वन्द्वमिति निपात्यते) । इन्हें नारदपर्यंतो । द्वन्द्वं रामलक्ष्मणौ । द्वन्द्वं बलदेववासुदेवी । द्वन्द्वं स्कन्दविशासौ । द्वन्द्व शिववैश्रवणौ । लोकशात इति किम् ? द्वौ पैनमैत्रौ । असन्तसाहचर्य इति रिम् ? दो युधिष्ठिरार्जुनी । द्वन्द्वमिति च ३४ सूचनयेऽपि द्वन्द्वं नपुंसक वेदितव्यमनुप्रयोगस्स नपुंसफरवार्यम् । १मा चात्र स्वादेलंग निहते. 'सदियोऽसादो' इति बनायो भविष्यति कि पिस्वविधानेनेत्साशा। -- - है प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । विभक्तीनामलोपः अथ समासप्रकरणे यथायोगं विभक्तीनामलुपं सङ्केपेण निर्देष्टुमाह- समासे क्वचित्स्यादीनामलुप् स्यात् । समासे इत्यादि-अथात्र सङ्केपेण सूत्राणि दर्शयति- "न नाम्येकवरात्खित्युत्तरपदेऽमः" (३२।९)। स्त्री स्त्रियं वात्मानं मन्यते स्त्रीम्मन्यः स्त्रियम्मन्यः ॥ "ओजोऽनःसहोऽम्भस्तमस्तपसष्टः" (३।२।१२)। ओजसाकृतम् ॥५ "आत्मनः पूरणे" (३।२।१४)। आत्मना चतुर्थः ॥ “पराऽऽत्मभ्यां डे:” (३।२।१०७)। नानि । परस्मैपदम् । आत्मनेपदम् ॥ असत्त्वे उसेः” (३।२।१०)। स्तोकान्मुक्तः ॥ “षष्ठयाः क्षेपे” (३१२।३०)। चौरस्य कुलम् ॥ "पुत्रे वा” (३।२।३१) । दासाः पुत्रः दासीपुत्रः ॥ “पश्यद्वाग्दिशो हरयुक्तिदण्डे" (३।२।३२)। पश्यतो हरः ॥ “अद- सोऽकसायनणोः” (३६२१३३)। अमुष्यपुत्रस्य भाव आमुष्यपुत्रिका । अमुष्यापत्यमामु-१० प्यायणः ॥ "देवानां प्रियः" (३।२।३४)। इत्यादि । “अध्यञ्जनात्सप्तम्या बहुलम्" (३।२।१८)। नाम्नि । अरण्ये तिलकाः । युधिष्ठिरः ॥ अमूर्द्धमस्तकात्स्वाङ्गादकामें (३२।२२)। कण्ठेकालः । उरसिलोमा ॥ *"कचिद्वा” मनसिजा मनोजः । सरसिज सरोजम् ॥ वाचस्पत्यादयो निपात्याः। "नना०" । समासारम्भकमन्त्यपदमुत्तरपदम् , नाम्यन्तादेकस्वरात्पूर्वपदात्परस्यामः खित्प्रत्ययान्ते १५ उत्तरपदे परे लुब् भवति । स्त्रीम्मन्य इति “वाम् शसि” (२।११५५) इति वेय् । एवं श्रियम्मन्यः ध्रुवम्मन्यः नरम्मन्यः रायम्मन्यः गाम्मन्यः नावम्मन्यः । अथ श्रियमात्मानं मन्यते, श्रियम्मन्यं कुलमित्यत्र नपुंसकलक्षणोऽमो लोपः कस्मान्न भवति ? उच्यते-श्रीशब्दस्यात्मसमानाधिकरणस्य नपुंसके वृत्त्यभावादाविष्ट्रलिङ्गत्वाच न भवति । अन्ये त्वाहुः यथा प्रष्ठादयः शब्दा धवयोगास्त्रियां वर्तमानाः स्वलिङ्गं विहाय स्त्रीलिङ्गमुपाददते, तथा श्रीशब्दः कुले वर्तमानः स्खलिङ्गपरित्यागेन वर्त्तते; ततो२० नपुंसकलक्षणं ह्रस्वत्व-ममो लुप् च भवति-श्रिमन्यं कुलमिति । न चायं नपुंसकलक्षणस्य लोपस्या- पवादः किन्त्वैकार्थ्यलक्षणस्योत्तरपदग्रहणात्तत उत्तरपदे विधीयमानोऽयमपवाद उत्तरपदे एंव प्राप्तस्य लोपस्य वाधक इति भावः । "ओजो०"।ट इति तृतीयैकवचनस्य । ओजसा कृतमिति एवं अखंसा सहसा अम्भसा तमसा तपसा कृतं प्राप्तमित्यादिपु "कारकं कृता” (३।१।६८) इति समासोऽनेनालुय् च । कथं 'सततनैशतमोवृतमन्यतः' इति किरातार्जुनीये पञ्चमसर्गे पद्यम् ? उच्यते-यत्र पूर्वपदी-२५ भूतस्तमःशब्दस्तत्रायं निषेधः, यत्र तु पदान्तरेण समस्तस्तत्र न प्रतिपेधः । “पुञ्जनुषोऽनुजान्धे" (३।२।१३)। पुंसाऽनुजः । जनुपान्धः-अविकृताक्षो जायन्ध उच्यते । अन्ये तु जतुशब्दात्तकारश्रुते- रिच्छन्ति । "आत्म०"। पूरणे इति-पूरणप्रत्ययान्ते उत्तरपदे परे । आत्मना चतुर्थ इति । ननु कथं "जनार्दनस्त्वात्मचतुर्थ एवे"ति ? उच्यते-आत्मा चतुर्थोऽस्येति बहुव्रीहिरयम् । एवं "मनसश्वाऽऽज्ञा- यिनि" ( ३।२।१५) । मनःशब्दादात्मशब्दाच, आज्ञायिन्युत्तरपदे । मनसाज्ञातुं शीलमस्येति मन-३० साज्ञायी । एवं आत्मनाशायी || आत्मनो नेच्छन्येके । “नानि” (३।२।१६) । मनसः परस्य टावचनस्योत्तरपदे परे संज्ञायां विपये लुब् न भवति । मनसादेवी, मनसागुमा, मनसादत्ता, मनसास- गन्ता । एवन्नामा काचित् । इति तृतीया । “परा०” परस्मैपदमिति-एवमात्मनेपदम् । परस्मैभाषा, आत्मनेभापा । "तादयें" (२।२।५४) चतुर्थी । हितादित्वात् ["हितादिभिः” (३।११७१)] समासः । नाम्नीत्येव-परहितम् । कथं परहितो नाम कश्चित ? नेयमनादिसंज्ञा । इति चतुर्थी ।३५ ?

३१८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "असत्त्वे."। अद्रव्ये विहितो यो उसिस्तस्योत्तरपदे परे लुब् न भवति । स्तोकान्मुक्त इति । "स्तोकाल्पकृच्छ्रकतिपयादसत्त्वे करणे” (२।२।७९) इति पञ्चमी । एवमल्पान्मुक्तः, कृच्छ्रान्मुक्तः, कतिपयान्मुक्तः, अन्तिकादागतः, अभ्यासादागतः, दूरादागतः, विदूरादागतः, विप्रकृष्टादागतः । "आरा- दथैः" (२१२१७८) इति पञ्चमी । "क्तेनासत्त्वै" (३।११७४) इति समासः, सर्वत्रानेनालुप् । असत्त्व ५ इति किम् ? स्तोकभयम् । एवं "ब्राह्मणाच्छंसी" (३।२।११) अयमेवं निपात्यते । ब्रह्मणा प्रोत्तो अन्थो ब्राह्मणं 'ब्राह्मणं श्रुताविति नपुंसकम्' ब्राह्मणान्थादादाय शंसति ब्राह्मणाच्छंसी, ब्राह्मणाच्छंसिनी, ब्राह्मणाच्छंसिनः । रूढिवशाद् ऋत्विग्विशेषः उच्यते । आदानाङ्गे शंसने शंसिरित्युपात्तविपयमेतद- पादानम्, यथा कुसूलात्पचति । निपातनस्येष्टविपयत्वात्विग्विशेपादन्यत्र लुब् भवति-ब्राह्मणशंसिनी स्त्री । इति पञ्चमी । “पष्ठया:०" । क्षेप इति किम् ? चौरकुलम् तत्त्वाख्यानमेतन्न क्षेपः । १०"पुत्रे"। पुत्रशब्दे उत्तरपदे इति ॥ “पश्य०" । पश्यतो हर इति-अनादरे षष्ठीयम् । पश्यन्त- मनादृत्य हरते इत्यर्थः । एवं वाचोयुक्तिः दिशोदण्डः, सम्बन्धपष्ठयौ । “अद०” । अकस्प्रत्यय- विपये उत्तरपदे आयनणप्रत्यये च इति भावः । आमुष्यपुत्रिकेति-चौरात् "चौरादेः" ( ७११६७३) इत्यकन् । “चौराद्यमनोज्ञाद्यकम्" इति स्त्रीक्लीवत्वात् आमुष्यपुत्रकमित्यपि । “देव." । देवप्रिय इति तु एकरवद्वित्वयोर्वहुव्रीहौ वा भवति । १५ इत्यादिशब्दाच "शेपपुच्छलाङ्गलेषु नाम्नि शुनः" (३।२।३५) शुनः शेपमिव शेपमस्य शुनाशेपः । एवं शुनःपुच्छः । शुनो लाङ्गुलः । "मेहनं शेपशेपसी" इति वचनात् शेपःशब्दः सकारान्तोऽप्यस्ति, इह त्वकारान्तो माह्यः । अन्ये तु सिंहस्य शेपं इत्यादावीच्छन्ति । तन्मतसङ्ग्रहार्थ बहुवचनम् अनान्यपि विध्यर्थम् । “ऋतां विद्यायोनिसम्बन्धे” ( ३।२।३७) । ऋकारान्तानां शब्दानां विद्याकृते योनिकृते च सम्बन्धे निमित्ते सति प्रवर्तमानानां सम्बन्धिन्याः पष्ठ्या विद्यायोनि- २० सम्बन्ध एव निमित्ते सति प्रवर्त्तमाने उत्तरपदे परे लग् न भवति । होतुः पुत्रः । होतुरन्तेयासी । पितुः पुनः । पितुरन्तेवासी । ऋतामिति किम् ? आचार्यपुत्रः । मातुलान्तेवासी । “खस्पत्योर्वा" (३।२।३८)। होतुः स्वसा होतृस्वसा । पितुःप्वसा, पितुः स्वसा, पितृप्वसा । मातुः वसा, मातु: प्वसा, मातृष्यसा । अनेनालुब्बिकल्पे "मातृपितुः स्वसुः” (२।३।१८) । आभ्यां परस्य स्वसूस म्यन्धिनः सकारस्य पो वा भवति "अलपि वा" (२१३२१९) । अलुपि समासे पो वा भवति इति २५पत्वविकल्पे त्रैरुप्यम् । दुहितुः पतिः दुहितपतिः । स्वसुः पतिः स्वसृपतिः । ननान्दुः पतिः ननान्दपतिः। इति पष्ठी । “अद्यः” युधिष्ठिरेति-एवं गविष्ठिरः । “गवियुधेः स्थिरस्य" (२।३।२५) इति पत्वम् । अत एव निर्देशादलुप् । “अमूर्द्ध०" । कण्ठेकालः । एवमुदरेमणिः । वहेगडुः । पुतेयलिः उरसिलोमा । शिरसिशिसः । अमूर्द्धमतकादिति किम् ? मूर्द्धशिसः मस्तकशिसः । (खागादिति किम् ? अक्षशोण्डः । मुसपुरुपा शाला)।अकाम इति किम् ? मुसकामः । अव्यञ्जनादित्येव-अहुलिनणः । ३० पूर्वोक इत्यादिशब्दोऽत्रापि सम्बध्यते ततश्च "यन्धे पनि नया" (३।२।२३)। घमन्ते यन्ध- शब्दे उत्तरपदेऽयअनात्सप्तम्या या अलुप् । स्वाद्गादस्याङ्गायायं विकल्पः । हतेयन्धः हस्तमन्यः । पमेयन्धः पक्रान्धः । पीति किम् ? अजन्ते मा भूत् । बनातीति घन्धः । अव्यञ्जनादित्येष-गुप्ति- पन्धः पारायन्धः । “कालात्तनतरतमकाले (३।२।२४) । अव्यञ्जनान्तात्कालवाचिनः सप्तम्या ३४ सनतरतमप्रन्ययेपु पालसन्दे पोत्तरपदे परे याऽलुप् । पूर्वाहेतनः पूर्वाहतनः । अपराहेतनः अपराह- प्रारन्योऽपि चव रोशे शेयः । पराप्स निशानुशागने पुतिमुकंपान्ततात्, अत्रन नपुंरात पिन्सम् । - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । विभक्तीनामलोपः ३१९ तनः । पूर्वाहेतराम् , पूर्वाहतरे। विवक्षावशात् द्वयोः प्रकृष्टे विभज्ये वा तर "योर्विभज्ये च तरप्" (७।३।६) । यत्र सप्तम्या अलुप् , तत्र प्रथमा–सप्तम्यर्थस्य सप्तम्येवोक्तत्वात् ; यत्र तु सप्तम्या लुप् , तत्र सप्तम्यर्थप्रतिपादनार्थ सप्तमी पुनर्दीयते । एवं पूर्वाहेतमा पूर्वाहतमे । पूर्वाहेकाले पूर्वाहकाले । यद्यपि पूर्वाह्नः कालं न व्यभिचरति, तथापि वाहुलकात् समासो यथा, पृथिवीद्रव्यमिति, अथवा पूर्वाहे यः कालस्तस्मिन्निति वैयधिकरण्ये वा समासः। अत्र सूत्रे कालग्रहणसामर्थ्याद्वा । एवमपराहेकाल इत्यादि ।५ अद्यञ्जनादियेव-रात्रितरायाम् । उत्तरपदाधिकारे प्रत्ययग्रहणे प्रत्ययमात्रस्य ग्रहणं न तदन्तस्य-"नवा खित्कृदन्ते रात्रेः" (३।२।११७) इत्यत्रान्तग्रहणात्तेनात्र तनतरतमानां स्वरूपेणैव ग्रहणम् । "शयवासि- वासेष्वकालात्" (३।२।२५) । अकालवाचिनोऽद्व्यञ्जनान्ताच्छब्दात्परस्याः शयादिपूत्तरपदेपु सप्तम्या वा लुब् न स्यात् । विलेशयः विलशयः । अन्तेवासी अन्तवासी । ग्रामेवासः ग्रामवासः । वाहुलकात् मनसिशयः कुशेशयमिति नित्यमलुप् । हृच्छयः, चित्तशयः इत्यत्र नियं लुप् । अकालादिति१० किम् ? पूर्वाहशयः । अव्यञ्जनादित्येव-भूमिशयः । “वर्पक्षरवराप्सर शरोरोमनसो जे" (३।२।२६) । एभ्योऽष्टाभ्यो उत्तरपदे सप्तम्या अलुप् वा । वजः वर्पजः । क्षरेजः क्षरजः । वरेजः वरजः । अप्सुजम् अन्जम् । सरसिजम् सरोजम् । शरेजः झरजः । उरसिजः उरोजः । मनसिजः मनोजः । “धुप्रावृड्वर्षाशरत्कालात्" (३।२।२७) । दिवप्रभृतिभ्यः पञ्चभ्यो जे उत्तरपदे सप्तम्या नित्यमलुप् । दिविजः । प्रावृपिजः । वर्षासुजः । शरदिजः । कालेजः । “अपो ययोनिमतिचरे” १५ (३।२।२८)। अपशब्दात्सप्तम्या यप्रत्यये योनिमतिचरेषु चोत्तरपदेपु सप्तम्या अलुप् स्यात् । अप्सु भवः अप्सव्यः, "दिगादि०” (६।३।१२४) त्वाद्यः । अप्सुयोनिः । अप्सुमतिः । अप्सुचरः । “नेन्- सिद्धस्थे” (३।२।२९)। इन्प्रत्ययान्ते सिद्धस्थयोश्चोत्तरपदयोः सप्तम्या अलुप् न, लुवेवेत्यर्थः । स्थण्डिलशायी । साङ्काश्यसिद्धः । समस्थः । “प्राकारस्य व्यञ्जने” (३।२।१९)। राजलभ्यो रक्षा- निर्वेशः कारः । प्राचां देशे यः कारस्तस्य नान्नि संज्ञायां गम्यायामव्यञ्जनात्परस्याः सप्तम्या व्यञ्जना-२० दावुत्तरपदे लुब् न । मुकुटे मुकुटे कार्पापणो दातव्यः, मुकुटेकापणः । एवं स्तूपेशाणः । पदिमापकाः समिधिमायकः । वृत्ती वीप्साया दानस्य चान्तर्भावः । व्यञ्जन इति किम् ? अविकटे अविकटे उरणो देयः-अविकटोरणः । अविकटोऽविसमूहः । अव्यञ्जनादियेव-नध्यां नध्यां दोहो देयो नधी- दोहः । अव्यञ्जनादियेव सिद्धे नियमार्थोऽयं योगः । त्रिविधश्चात्र नियमः-प्राचामेव, कारस्यैव नानि, व्यञ्जनादावेवोत्तरपद इति । "तत्पुरुपे कृति” (३।२।२०) । नाम्नीति निवृत्तम् । अब्य-२५ ञ्जनात्परस्याः कृदन्ते उत्तरपदे सप्तम्या लुन् न । स्तम्बे रमते स्तम्वेरमः । एवं कर्णेजपः । गेहेनर्दी । गेहेक्ष्वेडी । पानेसमिताः । प्रवाहेमूत्रितम् । उदकेविशीर्णम् । अवतप्तेनकुलस्थितम् । व्यञ्जन. भस्म- निहुतम् ।। वाहुलकात् क्वचिदन्यतोऽपियोपुचरः । कचिन्निपेधो न भवति-मद्रचरः ॥ कत्रिद्विकल्प:- खेचरः खचरः । वनेचरः वनचरः । पकेरुहम् पङ्करुहम् । सरसि रुहम् सरोरुहम् । दिविपत् द्युसत् ।। कचिदन्यवदेव-हृदयं स्पृशतीति हृदिस्पृक् , द्वितीयार्थेऽत्र सप्तमी । एवं दिविस्पृक् । “मध्यान्ता-३० द्गुरौं” (३।२।२१) । मध्ये गुरुः अन्तेगुरुः । मध्यगुरुः अन्तगुरुः इत्यप्यन्ये । एतत्सर्वं मनसिकृत्याह- कचिद्वेत्यादि । इति सप्तमी ॥ वाचस्पत्यादय इति । अत्र सूत्रम्-"वाचस्पतिवास्तोष्पति- दिवस्पतिदिवोदासम्” ( ३।२।३६) । एते पष्टीलुवभावे निपात्यन्ते, नाम्नि विषये । अत्र पत्वं सत्वं च निपातनात् । वाचस्पतिः सुरगुरुः । वास्तोप्पतिर्दिवस्पतिश्च शक्रः । दिवोदासनामा च कश्चित् । * इत्यलप्समासप्रकरणम् * - - - । ३२० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते स्वोपंजहमलघु- अध समासे पत्वणत्वादिकं सझेपेण निरूपयति । समासे फचित्सकारनकारयोः पत्वणत्वे वक्तव्ये-मातृप्वसा, पितृष्वसा, निष्णः निष्णातः, नदीप्णः, "प्रष्टोऽग्रगे" (२२३२३२)। प्रसोऽन्यः ॥ "निर्दुः सुवेः समसूते." (२२३२५६)।पः । निःपमः। दुःपमा । सुपमा ॥ "भ्रातुष्पुत्र-कस्कादयः” (२२२१४)। ५एते साधवः॥"निष्प्रागेऽन्तःखदिरकार्याम्रशरेक्षुप्लक्षपीयूक्षाभ्यो वनस्य (२१३२६६)। नो ण् । निर्वणम् । प्रवणम् । समासे फचिदित्यादि मातृष्वसा पितृप्वसेति-मातृपितुः स्वसुः" (२१३१८) इति पत्वम् । निष्ण इति-"निनद्याः लातेः कौशले" (२।३।२०) निनदीभ्यां परस्य नातेः सस्य पः स्यान्नै- पुण्ये गम्ये । निष्णो निष्णातः कटकरणे । नदीष्णो नदीष्णातः-प्रतरणे; कुशल इत्यर्थः । नद्याः १० लातस्य नेच्छन्त्येके ॥ "समासेऽग्नेः स्तुतः” (२।३।१६) अमिष्टुत् अग्निष्टुतौ ॥ "ज्योतिरा- युभ्यां च स्तोमस्य” (२।३।१७) । ज्योतिष्टोमः । अग्निष्टोमः ॥ "प्रते. लातस्य सूत्रे" (२।३।२१)। विशेषानुपादानाचोर्णादिसूत्रं व्याकरणादिसूत्रं च गृह्यते । प्रतिष्णातं सूत्रम्-ऊर्णादिसूत्रं क्षालनेन शुद्धम् । व्याकरणादिसूत्रं त्वतिव्यात्यादिदोपाभावेन शुद्धमित्यर्थः ॥ "लानस्य नाम्नि" (२।३।२२) प्रतेः परस्य नानस्य समासे प: स्यात् , सूत्रविपये, नाम्नि । प्रतिष्णानं सूत्रमित्यर्थः । १५ नानीति किम् ? प्रतिस्तानमन्यत् ॥ "वे: स्त्रः" (२।३।२३)। वेः परस्य स्तृणातेः सस्य पत्वम्, নারি विपये । विष्टरो वृक्षः । विष्टरमासनम् । विष्टारपक्तिश्छन्दः । विष्टारवृहतीच्छन्दः । नाम्नीत्येव-विस्तरो यचसाम्। विस्तारः पटस्य ॥"अभिनिःटानः" (२।३।२४)।अभिनिस्शब्दात्परः तानशब्दः समासे कृतपत्वो निपात्यते, नाम्नि । अभिनिष्टानो वर्ण:-विसर्जनीयस्यैपा संज्ञा, वर्णमात्रस्येत्यन्ये । नानी- येव । अभिनिस्तन्यते अभिनिस्तानो मृदगः ॥ “गवियुधेः स्थिरस्य" (२१३१२५) । गविष्ठिरः युधि- २०ष्ठिरः ॥ "एत्यका" (२।३।२६) । ककारवर्जितानाम्यन्तस्थाकवर्गात्परस्य सस्य एत्येकारे पो भवति, नाम्नि । हरिषेणः । श्रीपेणः । वायुपेणः । मातृपेणः । एतीति किम् ? हरिसिंहः । अफ इति किम् । विष्यसेनः । नाम्यन्तस्थाकवर्गादिति किम् ? सर्वसेनः ॥ "भादितो वा" (२।३।२७) । इदन्ता- प्रक्षनयाचिनः परम्य सस्य एकारे परे समासे पो वा स्यात् , नानि । रोहिणिपेणः रोहिणिसेना, रेवति. पेणः रेवतिसेनः । भरणिपेणः भरणिसेनः । "डयापो बहुलं नान्नि” (२४९९) इति हवः । इत २५ इति किम् ? पुनर्वसुपेणः । अत्र पूर्वेण नित्यमेव ॥ "विकुशमिपरेः स्थलस्य" (२।३।२८) । नानीति निवृत्तम् । विगतम्, वीनां पक्षिणां वा स्थलं विष्ठलम् । कुत्सितं कोः पृथिव्याः स्वलं कुष्टलम् । शमीनां स्पलं शामिष्ठलम् । "डयापो यहुल"मिति हवः । सूत्रे हस्पनिर्देशादीर्घान्न स्यात्-शमीस्थलम् दीर्घादप्येके ॥ परिगत स्थलं परिष्ठलम् । एभ्य इति किम् ? भूमिस्थलम् ॥ "कपेगों" (२।३।२९) । स्थलम्प सम्म पः । गोमिहापत्यसन्ततेः प्रवचयिता-यन्नाम्नापत्यसन्तवियपदिश्यते सोऽभिधीयते । २०फपिष्ठलो गोत्रप्रयतयिता यस्य कापिष्ठलिः पुरः । “गोम्याऽम्बसव्यापद्वित्रिभूम्यनि- शेफुशाफगुमझिपुलियर्हिःपरमेदिवः स्यस्य" (२।३।३०)। एभ्योऽष्टादशभ्यः परस्य स्पस सः पत्यम् । गोष्ठः । अम्याठः, "स्यापो पदुल"मिति इस्सत्ये अम्यष्ठः । लिष्टनिर्देशानुमाभ्यामति भपति आम्यप्तः । सव्ययः । अपठः । द्विष्ठः । विष्ठः । भूमिष्ठः । अमिष्ठः । शेकुष्ठः । साष्ठः एष्ठः । अनुष्टः । मधिष्ठः । पुविधः । पहिष्टः । परमेष्ठः । दिविष्ठः । अत एव निर्देशात्माम्या ३५भनुम् । "तपुरपे पति" (३३२०२०) इति तु "ने सिद्धम्य" (३।२।२९) इति प्रतिषेधान नोपविष्ठो - स प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । पत्वप्रकरणम् ३२१ "निर्दुःसोः सेधसन्धिसानाम्” (२।३।३१) निःपेथः दुःपेधः सुपेथः । निःपन्धिः दुःपन्धिः सुपन्धिः । निःपाम दुःपाम् सुपाम । "भीरुष्टानादयः” (२।३।३३ ) एते समासे कृत- पत्वा निपात्यन्ते । भीरूणां स्थानं भीस्टानम् । अङ्गुलीनां सङ्गोऽङ्गुलिपङ्गः । अङ्गुलिपङ्गा यवागुः । भीष्टान, अङ्गुलिपङ्ग, सव्येष्ट, परमेष्टिन् , सुष्टु, दुष्टु, अपष्टु, वनिष्टु, गौरिपक्थ, प्रतिष्णिका नौचे- पिका, दुन्दुभिपेवण, इति भीरुष्टानादयो द्वादश । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् ॥ "हृस्वान्नाम्नस्ति" ( २।३।३४ ) नानो विहिते तकारादौ प्रत्यये हस्वान्नामिन उत्तरस्य सस्य पो भवति; तल्-त्व-तस-य- तय-तरप्-नमपः सप्तते प्रयोजयन्ति । सर्पिष्टा, यजुष्टा । सर्पिष्ट्वम् , यजुष्टम् । सर्पिष्टः यजुष्टः । निष्ट्यः, चतुष्टयम् । सर्पिष्टरम् , वपुष्टरम् । सर्पिष्टमम् वपुष्टमम् । “असिद्धं वहिरङ्गमन्तरङ्गे” इति प्लुतत्वस्या- सिद्धत्वादिहापि भवति । सर्पि ३ ट्व । चतु ३ टय । ह्रस्वादिति किम् ? गीस्त्वं धूस्त्वम् । इत्यादि सर्व कचिदित्यादिना सहवाक्येन सङ्गृहीतं ज्ञेयम् । “प्रष्टो” (२।३।३२) अग्रेसरेऽभिधेये प्रष्टः । १० प्रस्थोऽन्यः । निर्दु० (२।३।५६) निःपम इत्यादि । एवं विषमः । निःपूतिः । सुपूतिः । सैमसूति- नामग्रहणाद्धातोरूप्ये च न भवति । निःसमति, दुःसमति, सुसमति, विसमति, निःसूतं, (इत्यादि) "भ्रातु०” (२।३।१४ ) भ्रातुप्पुत्र इति "ऋतां विद्यायोनिसम्बन्धे” (३।२।३७) इति पष्ठ्या अलुप् । सप्पिकुण्डिका, धनुप्कपालम्, बहिप्पूल, यजुप्पात्राणाम् । “देसुसोऽपेक्षायाम्” (२ ३१११) इति पत्वे सिद्धेऽपि समस्तार्थमिह पाठः । परमसर्पिष्कुण्डिका परमधनुष्कपालम् परमवहिप्पूलः परमयजु-१५ पात्रम् । अन्ये त्वेषां समस्तानां पत्वं न मन्यन्ते । एते पञ्च भ्रातुष्पुत्रादयः । कस्क इति वीप्सायां द्विवचनम् । कुतः कुत आगतः कौतस्कुतः, "तत आगते” (६।३।१४९) इत्यग् । शुनस्कर्णः “पष्ठ्याः क्षेपे” (३।२।३०) इत्यलुप् । सद्यस्काल:-बहुव्रीहिरसमासो वा, सद्यः क्रयणं सद्यस्क्रीः तत्र भवः साद्यस्कः । एवं भास्करः अहस्करः । अयस्काण्डः । तमस्काण्डः । अयस्कान्त । अयस्कुण्ड । मेदस्पिण्ड एते चतुर्दश कस्कादयः । वहुवचनमाकृतिगणार्थम् , तेन यथादर्शनमन्येपि भवन्ति । सर्वत्र नामिनः २० परस्य रेफस्य पत्वमन्यत्र सत्वं द्रष्टव्यम् । एवं कस्कादिवदवस्करादयोऽप्यत्र ज्ञेयाः । तथाहि “वर्चस्कादिष्यवस्करादयः” (३।२।४८) अवकीर्यते अवस्करो अन्नमलम् । तत्सम्बन्धात्तद्देशोऽप्यवस्करः, अवकरोऽन्यः । अपस्करो रथाङ्गे (अपकरोऽन्यः । कुत्सिता तुम्बुरुः) कुस्तुम्बुरुरौपधिजातो, तत्फलानि कुस्तुम्बुरूणि (अन्यत्र कुस्तुम्बु- रुस्तिन्दुकवृक्षः।) परस्परा अवरस्परा वा क्रियासातत्ये, अवरस्पराः सार्था गच्छन्ति-सततं गच्छ- न्तीत्यर्थः । (अन्यत्रावरपराः सार्था गच्छन्ति, अवरे च अपरे च सकृदेव गच्छन्तीत्यर्थः) आस्पदं २६ १ समेति सह मया वर्तत इति समः, गोश्चान्ते-। निर्गतो निश्चितो वा समात् , सम इति समतीति प्रयोगकदेशः पम- टमेलजन्तस्य च भवति, सूतीलादिकस्य इक्रिश्तिव-इति स्तिव्यपि भवति, सूतिसूयतिमुवतीनां त्यन्तानां च, तत्र 'अवः स्वपः' इत्यनेन पृथग्योगान्नानोरेव ग्रहणम् न धालोरिलाह-नान्नोर्ग्रहणादिति, नामग्रहणे च लिगविशिष्टस्यापि तेन सुषमा इत्यादि, धालोरेवेच्छन्तीत्युक्ला कथं निःपूतमिलायुदाहृतम् , सत्यम् , क्तप्रत्ययात्प्रागेव सूतेरुपसर्गेग योगाद्भविष्यति । २ गणपाठादण , अन्यथा वेहामात्र-इति सच् स्यात् किच तसन्तस्य प्रथमान्तलेन तत इति पञ्चम्यन्ताद्विधीयमानो न प्राप्नोति, केचित्त्वपञ्चम्यन्तादपि अणमिच्छन्ति, ततस्तन्मतेन तत आगतेन इत्यनेन वाऽण, ननु द्वित्वे कुत एकपदवाभावात्कथं तत आगते इत्यऽण, सत्यम्, भूतपूर्वकन्यायाद्भविष्यति । ३ अहः किरति लिहायचिति कार्यम् , कृगस्तु 'अतः कृकमि०' इति सिद्धमेव । ४ कन इत्यस्य रूपं कामयतेस्तु 'अतः कृकमि०' इति सिद्धमेव कामयतेर्वा समस्तार्थमिह पाठः, तेन परमाय- सान्त इलपि भवति । ५ यद्येवं कः कः कुत्र न बुधुरायितधुरिघोरो पुरेत्सूकर इत्यादि कथं, यतस्तत्रापि कस्क इति स्यात् । सत्यम् । परमताभिप्रायेण, ते हि भ्रातुष्पुन इति सूत्रं संविविवो विदधति, ततो विरामे विवक्षिते सति 'न संविः' इत्यस्य प्रवृत्तेन सलम् । है. प्रा. पूर्वा० ४१ । ३२२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्रतिष्ठायाम् । प्रतिष्ठा स्थानमात्मयापनापदम् ( अन्यत्र आ ईपत् पदमापदाद्वा आपदम् ) आश्चर्यमद्भुते (आश्चर्य नीला द्यौः अन्यन आश्चर्य कर्म शोभनम् ) प्रतिष्कशः सहाये पुरोयायिनि दूते वा, माम- मध्ये प्रवेक्ष्यामि भव मे त्वं प्रतिष्कशः (अन्यत्र कशां प्रति गतः प्रतिकशोऽश्वः)। प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृपो (प्रगतं कण्व पापमस्मादिति प्रस्कपः, हरिश्चन्द्र इवाहादको यः स हरिश्चन्द्रः, ऋपेरन्यन प्रकण्वो देशः ५हरिचन्द्रो माणवकः) । मस्करो वेणुदण्डयोः, मा क्रियते प्रतिषिध्यतेऽनेनेति मस्करः, मकरशब्दस्य चाऽव्युत्पन्नस्य मस्र इति रूपम् , (अन्यत्र मकरो ग्राहः)। मस्करी परिव्राजके, माकरणशीलो मस्करी, स ह्याह मा कृपत कर्माणि शान्तिर्वः श्रेयसीति, मस्करिनशब्दस्य वा रूपम् (अन्यत्र मकरीति, समुद्रः)। कास्तीराजस्तुन्दे नगरे (ईपत्तीरमजस्येव तुन्दमस्येति व्युत्पत्तिमानम् , कास्तीरमजस्तुन्दं च नगरम् अन्यत्र कातीरम् , अजतुन्दम् ) । कारस्करो वृक्षे (कार करोति किल कारस्करो वृक्षः कारकरोऽन्यः । १० वनस्पतिः पुष्पं विना फलमति वृक्षे । सबै हरितकायो वनस्पतिरित्यन्ये (वनपतिरन्यः) । पारस्करो देशे (पारं करोति पारस्करो देशः पारकरोऽन्यः) । करस्करो गिरिवृक्षयोः, करं करोतीति करस्करो नाम गिरिः । क्रस्करो वृक्षः (करकरोऽन्यः)। रथस्सा (नद्या रथं पाति पिवति वा रथस्पा) नाम नदी (रथपाऽन्या)। (क्रिप्फुरुः प्रहरणे कस्य कुरुः) किष्फुरुर्नाम प्रहरणं (किमो मकारस्य पकारादेशः)। विप्ः प्रमाणे (किमपीपत्परिमेया कुर्भूमिरस्य किष्कुः ) हस्तो वितस्तिर्वा, (कि करोतीति वा किटकुः, १५फ्रोतेईप्रत्ययः, किमो मकारस्य पकारादेशः), कार्य करोतीति वा किष्कुः (डप्रत्ययः कार्यशब्दस्य च किभावः)। (किनिन्ध इति गुहापर्वतयोः । किमप्यन्तर्दधाति ) किष्किन्धा नाम गुहा (रिमो द्विर्वचनं पूर्वस्य च मकारस्य पकारः। कि कि दधाति ) किष्किन्धः पर्वतः एषु किमो द्वित्वादिकं निपातनम् । आस्कथं नगरे, (आहृताः कथा अस्मिन्नित्यास्कथं नाम नगरम् ॥ तस्करचौरे-तत्करोति ) तरसरश्चोरः॥ वृहस्पतिर्देवतायाम् (बृहता पतिः बृहन् पतिरिति वा बृहस्पतिः, उभयन तकारस्य सकारः, २० अन्यन तत्करः बृहत्पतिः)। प्रायश्चित्तप्रायश्चित्ती अतीचारशोधने प्रकणैत्यागच्छत्यस्मादाचारधर्म इति मायो मुनिलोकः, चिन्त्यते स्माते इति चित्तम् , चित्तिश्च व्रतम् , प्रायश्चित्त चिन्तितं किल्लिपविशुद्धये प्राय- चित्तमतिचारशोधनम् आलोचनप्रतिक्रमणादि । एवं प्रायश्चित्तिः, पक्षे विसर्जनीयपूर्वः शकार इत्यन्ये (प्रायःश्चित्तम्) मायःश्चित्तिः। अन्ये तु प्रायणं प्रायः-परलोकगमनं भोजनत्यागो या, तस्य चित्तं प्रायश्चित प्रायधित्तिरित्यपि मन्यन्ते ॥ शपुली पृताने (शप्पुलशब्दाद्वौरादित्वात् डी:, कृतान्नादन्यत्र शकुली २५ मत्स्यविशेपः) । गोप्पदं गोसेविते प्रमाणे च-यन गायः पद्यन्ते स गोभिः सेवितो प्रामसमीपादि- देश उच्यते, प्रमाणे ( गोप्पदपूर पृष्टो देवः) गोप्पदमा क्षेत्रम् , ( अत्र गोः पदम्) (अन्यस्पेयत्ता परिच्छेत्तुमुपादीयमानं प्रमाणं भवति, अन्यत्र गोपदम् ॥ अगोप्पदं सेवारहिते-न विद्यते गोः पदं येषु तान्यगोप्पदान्यरण्यानि, अगोप्पदेपरण्येषु विश्वासमुपजग्मिवान् ।। ननु गोप्पदप्रतिषेधादगोप- दमिनी सिरपति ? सत्यम् । किन्तु यन गया प्रसङ्गो न ताभिः सेवितस्तव स्यात् ; यथा यत्र गुटगुण- ३० प्रसनः स ण्याशुप्त इति भवति, नात्माकागादि, यत्र तु गवामयन्तासम्भवस्तत्र न स्यात् । तत्रापि यया पाहियेयमर्थ निपातनम् । न विशते गोः पदं यति विपदवटुग्रीहिविपक्षाया रूपान्तरनिवृत्त्यर्थम् ) ! पायचनमातिगणार्थम् , तेनारोवचपरोपरादयोऽपि दृष्टया । एषु सर्वेषु व्युत्पत्तिव्याहत्यादि ईमपृरवसेयम् । इति पत्यप्रकरणम् । "निया." ( १३.६६ ) । निर्षण प्रवणमित्यादि । यमप्रेरणम् "पारेमध्येऽऽन्त. पष्टया या ६५ ( ३३१३० ) अन्यव्यर्याभायमलनियोगे च पूर्वपदस्य यम । अन्नयंगम् गहिरवणम् मा(शाल irrནད། वियोरन्तरे निवेशवम् ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे समासप्रक्रिया । णत्वप्रकरणम् ३२३ वृक्षवनं )वणम् वचनसामर्थ्याच्छकारव्यवधानेऽपि भवति । आम्रवणम् , शरवणम् , इक्षुवणम् , लक्षवणम् , पीयुक्षावणम् । पीयुक्षाशब्दोऽव्युत्पन्न आवन्तो द्राक्षापर्यायः ॥ ८७ ।। द्वित्रिस्वरौषधिवृक्षभ्यो न वाऽनिरिकादिभ्यः ॥ ८८॥ [सि० २।३।६७ ] द्वित्रिखरेभ्य इरिकादिवर्जेभ्यश्चौपधिवृक्षवाचिभ्यः परस्य वनस्स नस्य णो वा स्यात् । दूर्वावणं दूर्वावनम् । नीवारवणं नीवारवनम् । "गिरिनद्यादीनाम्” (२३२६८) । वा । गिरिणदी५ गिरिनदी । #एवं क्षीरपाणं क्षीरपानम् । व्रिीहिवापिणौ व्रीहिवापिनौ । “ग्रामाग्रान्नियः” (२३७१)। ग्रामणीः॥ ८८ ॥ "द्वित्रि०" दूर्वावणमिति-एवं मूर्वावणम् २, ब्रीहिवणम् २, मापवणं मापवनमित्यादि द्विस्वरौपध्यु- दाहरणम् । कोद्रवणम् २, प्रियङ्गुवणम् २, इत्यादि त्रिस्वरौपध्युदाहरणम् , धान्यानामापधिजातीयत्वात् । शिवणम् २, दारुवणम् २, इत्यादि द्विस्वरवृक्षोदाहरणम् । करीरवणम् २, शिरीषवणम् -२, बदरी-१, वणम् २, इत्यादि त्रिस्वरवृक्षोदाहरणम् । "ओपध्यः फलपाकान्ता लतागुल्माश्च वीरुधः । फली वनस्पति यो वृक्षाः पुष्पफलोपगाः” ॥ १ ॥ इति यद्यपि भेदोऽस्ति तथाप्यतिबहुत्वार्थबहुवचनवला- वृक्षग्रहणे वनस्पतीनामपि ग्रहणं भवति । अत एव च यथासङ्ख्यमपि न । तथा संज्ञायामसंज्ञायां च भवति । द्वित्रिस्वरेति किम् ? देवदारुवनम् । इरिकादिवर्जनं किम् ? इरिकावनम् । इरिका, गिरिका, तिमिर, चीरिका, [ क्षीर हरि ] कर्मीर, सप्तकोऽयमिरिकादिराकृतिगणः । इरिकादिविशेपवर्जनाद्विशे-१५ पाणामेवेह विधिस्तेनेह न भवति । द्रुवनम् , वृक्षवनम् । "गिरि०" सूत्रम् स्पष्टम् । *एवं क्षीरपाण- मिति “पानस्य भावकरणे" (२।३।६९) पूर्वपदस्थेभ्यो रपृवर्णेभ्यः परस्य भावे करणे च यः पानशब्दस्तत्सम्बन्धिनो नकारस्य णो वा भवति । क्षीरपाणम् २, वर्त्तते । करणे क्षीरपाणं २, भाज- नम् । कपायपाणः २ कंसः । भावकरण इति किम् ? क्षीरं पीयतेऽस्मिन्निति क्षीरपानो घोपः । एवं "देशे” (२।३।७०)। (योगविभागानवेति निवृत्तम् )। पीयत इति पानम् । क्षीरं पानमेपां क्षीरपाणा २० उशीनराः । सुरापाणाः प्राच्याः। “वाह्याद्वाहनस्य” (२।३।७२)। वोढव्यं वाह्यम् । उह्यतेऽनेनेति वहनम् । प्रज्ञादित्वात्स्वार्थिकोऽण् । अतो वा निपातनादुपान्त्यदीर्घत्वम् । इक्षुवाहणम् । शरवाहणम् । वाह्यादिति क्रिम् ? सुरवाहनम् । सम्बन्धमात्रमत्र विवक्षितम् । नरवाहन:-नात्र वाह्यात्परं वाहनम् , किं तर्हि वाहनात ? । "अतोऽहस्य” (२।३।७३)। पूर्वाह्नः । अपराहः । अत इति क्रिम् ? निरह्नः पुरह्नः । “चतुस्नेहायनस्य वयसि” (२।३।७४) चतुर्हायणी त्रिहायणी वत्सा । वयसीति २५ किम् ? चतुर्हायना शाला । कालकृता प्राणिनामवस्था हि वयः । ङीरपि वयस्येव भवति । त्रिीहिवा- पिणाविति” । “वोत्तरपदान्तनस्यादेरयुवपक्काहः” (२।३।७५) पूर्वपदस्थाद्रपृवर्णात् परस्यो- त्तरपदान्तभूतस्य तथा नागमस्य स्यादेश्च नकारस्य णो वा भवति, न चेत्स नकारो युवन्-पक्क-अहन्- शब्दसम्बन्धी भवति । उत्तरपदान्त. ब्रीहिवापिणी २ कुले । नागम, श्रीहिवापाणि २, मापवापाणि २, कुलानि । 'इबु व्याप्ती इत्यस्यानटि प्रेण्वनम् २ । 'हिवु प्रीणने' 'पिवु सेचने' इत्यनयोः शतरि प्रहिण्वन् ३० प्रहिन्वन् । प्रपिण्वन् २। हिवोरेव शस्तन्याम्-प्राहिण्वन् प्राहिन्वन् । बहुलवचनादनाम्नापि समासः । समासे हि पूर्वोत्तरपदव्यवहारः । पुरुपश्च वारि च पुरुपवारिणी इत्यत्र तु परमपि विकल्पं वाधित्वा अन्तरङ्गत्वादेकपदाश्रितं (रपृवर्णादित्यादिना नियं) णत्वं स्यात् । स्यादि. त्रीहिवापेण २ । व्रीहिवा-३३ १ मुद्रितबृहद्वृत्ती कमरि खीर इति शब्दी स्तः । - ?

। ३२४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पाणाम् । ग्रीहिवापान मापवापानित्यत्र वनन्त्यस्येत्यधिकारान्न भवति । उत्तरपदेति किम् ? गर्गाणां भगो गर्गभगः । सोऽस्यास्तीति समासपदादिन् गर्गभागिणी-अत्रोत्तरपदस्यान्तो नकारो न भवतीति विकल्पो न भवति । एकपदस्थत्वाच मातृभोगीण इत्यादिवन्नित्यमेव णत्वं भवति । अन्तादिग्रहणं किम् ? गर्गाणां भगिनी गर्गभगिनी । एवं दाक्षिभगिनी । अन्न न नकारोऽन्तः, किन्तु डीप्रत्ययः । यद्य व्रीहिवापिणी ५इत्यत्र नकारस्योत्तरपदान्तत्वाभावाद्विकल्पो न प्राप्नोत्यत्रोच्यते-गतिकारकोपपदानां कृद्भिः समास- वचनं प्रारु प्रत्ययोत्पत्तेरिति न्यायात् प्रागेव स्त्रीप्रत्ययादन्तरगत्वादश्वक्रीतीत्यादावकारान्तेनेव फ्रीत- शब्देन नकारान्तेन वापिन्शब्देनोपपदसमासः, पश्चात् स्त्रीमत्ययः । विभक्त्यन्तत्वाभावेऽपि च रूढत्या- दुत्तरपदत्वम् । ततश्योत्तरपदस्यान्तो नकार इति णत्यविकल्पो भवति । अयुवपकाह इति किम् ? आर्ययूना, प्रपकानि, दीर्घाही शरत् । दीर्घाहा निदाघेन । त्र्यहनि । “सह्यासायवेरहस्साहन डौ का" १० (१।४।५०) इत्यह्रस्याहनादेशः । अलचटतवर्गशसान्तर इत्येव-गर्दभवाहिनौ । “पूर्वपदस्थाना- म्यगः" ( २१३१६४) । पूर्वपदस्थाद्रपृवर्णादगकारान्तात्परस्य सामर्थ्यादुत्तरपदस्थस्य नकारस्य परार आदेशो भवति, नाम्नि संज्ञायां विषये । गुणसः, सरणसः, सरणा, शूर्पणसा, चन्द्रणसा, वार्धाणसः, हरियाणः, पुष्पणन्दी, श्रीणन्दी स्त्री । नानीति किम् ? मेपनासिकः चर्मनासिकः । अग इति किम् ? प्ररगयनम् । एकस्मिन्नेव पदे इति पूर्वसूत्रे विज्ञानादुत्तरपदस्थस्य समासे न प्राप्नोतीति वचनम् । कथं १५ देवदारुवनं फुरवनमित्यादी संज्ञायां णत्वं न भवति ? । उच्यते-"कोटर मिश्रकसिध्रापुरगसारिक्स्य वणे" (३६२१७६) इति णत्वनिपातनस्य नियमार्थत्वात्संज्ञायां कोटरादिभ्य एव वनस्य णत्वं नान्येभ्य इति । "नसस्य" (२।३।६५)। पूर्वपदस्थाद्रादेः परस्य नसस्य णत्वं स्यात् । प्रगता प्रवृद्धा वा नासिरा यस्य स प्रणसः, निर्णसम् प्रणसम् मुखमिति णत्वाकरणम् । इत्यादि सर्व कचिदित्यादिवचनेन सहीत योद्धव्यम् । "ग्रामा०” (२३३१७१)। सूत्रं स्पष्टम् ॥ ८८॥ पृपोदरादयः॥ ८९ ॥ [सि० ३२२१५५] साधवः ।।८९॥ इति महोपाध्यायश्रीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायधीविनयविजयगणिविरनितायां हैमलघुप्रक्रियाया समागप्रकिया समाप्ता । पोदर इत्येवंप्रकाराः शब्दाः समासे विहितलोपागमवर्णविकाराः शिष्टैः प्रयुज्यमानाः साघको भवन्ति । पृपदुदरमुदरेवाऽस्य पृपोदरः । पृपत उदरं पृपोदरम् । पृपत उद्वानं पोद्वानम् । प्रपत २५ उद्वार पोद्धारम् । अत्र तकारस्य लोपो निपात्यते । जीवनस्य जलस्य मूतः पुटवन्धः जीमूतः अत्र घनस्य लोपः । यारिणो बाहको बलाहकः, अत्र पूर्वपदस्य वः उत्तरपदादेश लादेशः । आध्यायन्ति तमित्यादयः, अन ध्यस्य दयादेशः । कृच्छ्रेण दास्यते नास्यते दभ्यते च सलि दुयो, दासो, नासो, दम्भ, इति या दूडाशः दूणाशः दृढभः । दुष्टं ध्यायति दूदयः । एषु पूर्वपदस्य दुमो दूभावः, उत्तरपदादेश टत्यणत्यटलढत्यानि दम्भेनटोपश्च । महा रीतीति मयूरः, रोतेरच्यन्तलोपो महीशब्दस्य मयूभाषः। महां ३० शेते महिपः, अन पूर्वपदस सत्र शस्य व पत्तम् । पिशितमभाति पिशापः, अत्र पिशितम्य पिमादेशः अभातेः शम्य च पादेशः । शयानां शयनं श्मशानम् , पूर्वपदम्य इमादेशः एत्तरपदम्य घशानादेशः! भुपन्तोऽम्यां मौदन्ति विपरीदन्ति यमी, अन ट्यत्ययः पूर्वपदम्य पृभाषः । उर्ध्वयं विलं पाम्य उद्य उरलम् या, अन पूर्यपदन्य उदमायः उभावश्च, उत्तरपदम्य सलादेशः । दिवि धायर्या और vi दियोकमः, अप्रासगगमः । श इय तिष्ठति अवयः, पपिरिय निधी यपयोऽम्मिनिष्ठन्ति इति या ५परिया, दधिष्ठिी दधिस्था, महां निष्ठी महित्यः, एषु विष्टतः मारम्प सरः । मुटः २० प्रक्रियाबृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाश समासप्रक्रिया । पृषोदरादयः ३२५ लाति मुहुर्मुहुर्लसतीति वा मुसलम् , अत्र मुहुःशब्दस्य मुभावः, स्वनझब्दस्य च सभावः, पक्षान्तरे लसयोर्विपर्ययश्च । अवौं कर्णावस्येत्युलुकः, अत्रोर्बाब्दस्योलादेशः कर्णशब्दस्य उकादेशश्च । मेहनस्य खं तस्य माला मेखला, अत्र मेहनखे शब्दे हनशब्दस्य मालाशब्दे च माशब्दस्य लोपः। को जीर्यति कुञ्जरः, अत्र कुशब्दान्मोऽन्तः । आश्वस्य विपमस्ति आशीविपः, अत्राशुशब्दस्याशीभावः; यदाप्याशिपि दंष्ट्रायां विषमस्येति तदाप्यनेन निपातनम् । वलं वर्द्धयति बलीवर्दः, अत्र वलस्येकारोऽन्तादेशो, वर्द्ध धकारस्य५ च दकारः । मनस ईष्टे मनीपी, अत्र मनसोऽन्यस्वरादिलोपः ईशः झल्य च पः । बिलं दारचति विडालः, अत्र बिलशब्दस्य ललोपः, उत्तराब्दस्य च डालादेशः । मृदमालीयते : मृणालः, अत्र मृदो दकारस्य णकारः । असृगालीयते डः सृगालः, अनादेर्लोपः । असृग्गलति वा सृगालः, अत्रामृज आद्यन्तलोपः । पुरो दाश्यते पुरोडाशः, अत्रोत्तरपदादेर्डत्वम् । अश्वस्याम्बा बडबा, अनावस्थ शो लोपः, ड् चान्तः, अम्बाशब्दे च मो लोपः । शकस्य अन्धुः शकन्धुः, अत्र पूर्वपदान्तस्योत्तरपदादेर्वा १० लोपः । एवं कन्धुः । अटतीयच अटा, कुलानामटा कुलटा । अव् अवाक् अन्त्यिस्मिन्निति बाहुल- कात् "पुन्नान्नि घः” (५।३।१३०) इति घः, अवटः । हिनस्तीति सिंहः, अत्र सकारहकारयोविपर्ययः । कृतकेन शलति ककलाशः; अब तकारस्य लोपः, झकारलकारयोविपर्ययः । भ्रमन् रौति डः भ्रमरः, अत्र नलोपः । एवम्प्रकाराः शिष्टः प्रयुक्ताः पृपोदरादयः। मयूरमहिपादीनामुणादी व्युत्पादिता- नामपीह व्युत्पादनमनेकधा शब्दव्युत्पत्तिज्ञापनार्थम् । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । तेन मुहूर्तम् औरग्वधो १५ अश्वत्थाम "निर्लयनीत्यादयोऽपि द्रष्टव्याः ॥ "वर्णागमो वर्णविपर्ययश्च द्वौ चापरौ वर्णविकारनाशौ । धातोदितिशयेन योगस्तदुच्यते पञ्चविधं निरुक्तम् ॥ १ ॥ ८९ ।। यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहर्मणे राजश्रीतनयो व्यवत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणी खोपनसत्प्रक्रिया- वृत्तावद्य समास एप विवृतः सम्पूर्णतामाश्रयत् ॥ १ ॥ , १ वा हलादिः' इति णः । कृकं लासयतीति ये व्युत्पादयन्ति तन्मते दन्यसकारः । २ मुहुरित्तिन्म 'गलर्थः' इति चः प्रत्ययः । ३ आरात् वध्यते 'स्वादिभ्यः कः' तस्य गः । ४ अव इव तिष्टतीति मन् । ५ निलीयतेऽस्या अनट् । ६ स प्रसिद्धोऽर्थन्तदर्थः शब्दलक्षणस्तस्यातिशयो माधुर्यादिन्तेन योगः यथा मयूर इति । अत्र हि रौतेरवर्णार्थस्यातिशयेन योगः ।

ऐं नमः प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः ३२७ अथ तद्विता निरूप्यन्ते ॥ । प्रणम्य परमब्रह्मस्वरूपं ज्योतिरान्तरम् । खोपज्ञप्रक्रियावृत्तौ तद्धिते किञ्चिदुच्यते ॥ १ ॥ अथ-क्रमप्राप्तं तद्धितं निरूपयितुमाह । तद्धितोऽणादिः ॥१॥[सि० ६.११] *वक्ष्यमाणाः प्रत्ययास्तद्धितसंज्ञाः स्युः । “वाद्यात्" (६।१।११) "प्राजितादण्" (६।१।१३) इत्याद्यधिकृतम् । उपगोरपत्यम् अनन्तरं वृद्धं चेति वाक्ये ॥१॥ "तद्धि०” । तस्मै लौकिकवैदिकशब्दसन्दर्भाय, ताभ्यः प्रकृतिवृत्तिभ्यो वा हितः । आचं मतं जैनेन्द्रस्य, द्वितीयमुत्पलस्य; “हितादिभिः" (३।११७१) इति समासः । *वक्ष्यमाणाः प्रत्यया इत्यत्र अणादय इति शेपः । "वाद्या०" । वा इति आद्यादिति द्वयमधिकृतं ज्ञेयम् । तत्र वाऽधिकारात् १० (इत अव) वक्ष्यमाणाः प्रत्यया विकल्प्यन्ते । तेन पक्षे वाक्यं समासश्च भवति । उपगोरपत्यमुपग्व- मिति-उत्सर्गरूपस्तु तद्धितोऽपवादविपये "पीलासाल्वामण्डूकाद्वा” (६।१।६८) इत्यादौ वाग्रहणान्न भवति । आद्यादित्यधिकारात्सूत्रे यदादी निर्दिष्टं तस्मात्प्रत्ययो भवति । तेन “सास्य.” (६।२।९८) इत्यधिकारे "देवता" (६।२।१०१) इत्यादौ सेति प्रकृतिरस्येति प्रत्ययार्थो व्यवस्थितो भवति । इन्द्रो देवताऽस्य ऐन्द्रो मन्त्र इति । “प्राग्” । तद्धितचतुर्थपादस्यादौ "तेनजितजयद्दीव्यत्खनत्सु" १५ (६।४।२) इति द्वितीयसूत्रे यज्जितशब्दसङ्कीर्तनं तस्मात्प्राक् सम्पूर्ण पादत्रयं यावद्येऽपत्यादयोऽर्था- स्तेष्वपवादविपयं विहायाण अधिकृतो भवति । णकारो वृद्ध्यर्थः । अधिकारः परिभापाविधिर्वायमिति । इत्यादिकरणाच "धनादेः पत्युः” (६।१।१४) धनादेर्गणात्परो यः पतिशब्दस्तदन्तात्प्राजिती- येऽर्थेऽण्प्रत्ययो वा भवति । धनपतेरपत्यं तत्र भवस्तत आगतो वा धानपतः । आश्वपतः । राष्ट्रपते- रिदं राष्ट्रपतम् ।, धन अश्व, गज, शत, गण, कुल, गृह, पशु, धर्म, धन्वन् , सेना, सभा, क्षेत्र, २० (अति ? ) अधि, राष्ट्र, धान्य, प्राण इति सप्तदशको धनादिः । केचिद् गृहसेनाशब्दो न पठन्ति । तन्मते गार्हपत्यं सैनापत्यमित्युत्तरेण व्य एव । पत्युत्तरपदलक्षणस्य यस्य, राष्ट्रादित्रये 'दोरीयः" (६।३।३२ ) इति ईयस्य चापवादोऽयम् ॥ “अनिदम्यणपवादे च दित्यदित्यादित्ययमपत्यु- त्तरपदाच्यः” (६।१।१५)। दिति-अदिति-आदित्य-यमझन्देभ्यः पत्युत्तरपदाच प्रागजितीये- ऽर्थ इदमर्थवर्जितेऽपत्यादावर्थे योऽणोऽपवादः प्रत्ययस्तद्विपये च यः स्यात् । दितेरपत्यं दितिर्देवतास्य २५ वा दैत्यः । एवं अदितेरादित्यः । आदित्यस्य आदित्यः । यमस्य याम्यः । पत्युत्तरपद. बृहस्पतेर- पत्यं वृहस्पतिर्देवतास्य वा बार्हस्पत्यः । एवं प्राजापत्यः । अणपवादे च यमस्यापत्यं याम्यः-अत्र पर- त्वात् "अत इम्” (६।१।३१) स्यात् । बनस्पतीनां समूहो वानस्पत्यम्-अत्राचित्तलक्षण इका स्थान् । ननु व्योऽप्यणपवाद इञादयोऽपि, तत्र यदीत्रादयो बाधन्ते तदा ब्योऽनयकाझः न्यादितीत्रा-१९ १ नन्वत्र यथा वक्ष्यमाणतद्धिनप्रलयानां विकल्पनात्पक्षे वाक्यसमासा दयेते, नया कथमपवादग्र्चयानां विकलाने पक्ष नोत्सर्गप्रत्यय इल्याह-उल० । २ माद्यादिति बिना तु अन्येति प्रकृतिदेवतार्थ इत्यपि न्यन् । ३ ननु योऽत्र परिमापाधिगर- योर्भदः, उच्यते, परिभाषा हि एकदेशस्थय नकलं गाम्नमभिज्वलन्नी व्यवहितेऽपि अनन्नरोत्तराती मनमाना न प्रनिरन. शशिभवति, अधिकारस्तु नदीस्रोतोरपतथा अनन्तर एव प्रवर्तते न व्याहिते, विविरपि युज्यते एन यनः प्रारजनायडया: तेपामिह बुज्या सहलय्य निर्देशात् , तेनाननव सर्वप्वथैव विधीयते, अनः पक्षत्रयस्यदोष इति । ?

-- ३२८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- दीन् ब्यो वाधिप्यते, किमणपवादग्रहणेनेत्यनोच्यते । अन प्राजितीयस्याणोऽन्योऽपवादो नास्ति । दित्यदित्यादौ, तर व्यः सावकाश इति । याम्यवानस्येत्यादावुभयप्राप्तौ परत्वादिनादिरेव स्यात् । अण- पवादे चेति वचनात्तुल्य एव स्यादिति । अणग्रहणं किम् ? असत्याग्रहणे केवलमपवादे चेत्युक्ते स्वापवादविपयेऽपि स्वसमावेशः स्यात्तथा च, वास्तोप्पतिर्देवतास्या इति वाक्ये "देवता" ५(६।२।१०१) इत्यणपवादोऽनेन व्यः प्रातस्तदपवादो "द्यावापृथिवी०" (६२।१०८) इति यस्तस्याप्यपवादोयं पत्युत्तरपदलक्षणो ज्यः स्यात्ततश्च "तद्धितः स्वरवृद्धिहेतुः०" ( ३।२।५५) इत्यादिना पुंवद्भावनिपेधाद्वास्तोप्पत्या भार्य इति स्यात् । अणग्रहणे तु अणपवादे एव व्यस्य प्राप्तिन तु व्यस्यापयादेऽपीति । "द्यावापृथिवी.” इति ये सति वास्तोष्पत्याभार्य इति स्यादिष्टं चैतदिति । अनिदमीति रिम् ? अदितेरपत्यमादित्यस्तस्येदमादितीयम् । "तद्धितयस्वर.” (२।४।९२) इति य- १० लुप् । अन इदमर्थे अणपवादे "दोरीय" (६।३।३२) एव न तुल्यः । भ्य इसन अकारस्य वृद्धिः। "मिर्दापादणिजोः" (६।१।१४०) इति च प्रयोजनम् । तचैवम्-यमस्य वृद्धमपत्यं याम्यतस्य युवापत्यं 'अत इम्' तस्य "भिदादिणियोः” इति लोपे याम्यः पिता पुत्रश्चेति । “यहिपष्टीकण् च" (६।१।१६)। यहिपश दात् प्रागजितीयेऽर्थे टीकण्व्यश्च स्यात्। वहिर्जातो वाहीकः बाह्यः, "प्रायोऽव्ययस्य" (७४६५) इत्यन्यवरादिलोपः, टकारोडयर्थः, वाहीकी । वाहीक इति जातेऽर्थे, भवे तु "यने व्यः" १५ (६।३।१३४) इत्यधिकारे "गम्भीरपञ्चजन०" (६।३।१३५) इति व्य एव स्यान्न टीकण् । ज्योऽप्यन जात एव, भवे तु सिद्ध एष । "कल्यग्नरयण्" (६।१।१७)। आभ्यामेयः स्यात् । इतः सूनादा- रभ्य "देवाद्यम् च" (६।१।२१) इति सूत्रान्तपट्सून्या प्राजितीयेऽर्थेऽनिदम्यणपवादे चेति द्वयमनुवर्त्तनीयम् । कलिर्देवतास्य, कलौ भव, कलिना दृष्टं साम, कलेरिद कालेयम् , एवमानेयम् । अण- पवादे प. क्लेरागतं कालेयमानेयमन "नृहेतुभ्यो रूप्यमयटी वा” (६।३।१५६) इति रूप्यमयटो २० स्याताम् । अन्ये तु जितात्परेप्पपि प्रापतीयेपर्थेपु एयणमिच्छन्ति । कलये हितं कालेयम्, आने- यम् । क्लेनिमित्तमुत्तात. सयोगो वा कालेयः, आमेयः । “पृथिव्या भाज्" (६।१।१८)। पृथिव्या भवः पार्थिवः बात्रोः स्त्रिया विशेपः । पार्थिवा पार्थिवी । अणपवादे च. पृथिव्या अपत्य पार्थिवः । अन एयण् स्यात् । डी बहुपु लुप, सदादिप्पणिति प्रयोजनमन्विधानस्य । "उत्सादेरम्" (६।१।१९) उत्सम्येदमौत्समौदपानम् । अणपवादे च. उत्सस्यापत्यमौत्सः, औदपानः । अनात इञ् २५ प्रामोनि, उत्सो निर्झरः । "उत्सः सवः प्रस्खयणमिति वचनात्" । तस्यापत्यं तु गाहेयादिवत् । तरण्या अपत्यं तारुणः, नाटुनः । अत्र "डयायूहः" (६।११७०) इत्येयण प्राप्नोति । पञ्चालेषु भवः पाचाला- अत्र "ईनोऽ" (६।३।४१) इत्यधिगरे “बहुविपयेभ्यः" (६।३।४५) इत्यकम् प्राप्नोति । युरो- रपयं पौरव्य इति व्यविधी पुरशन्दोपादानस्यानवकाशत्याद्भवति । राष्ट्रभत्रियवाचकम्य दुनादीत्यादिना प्रामणयाचश्म्य तु "युदेन्यः" (६।११००) इति व्यः । कोरप इति त्वपत्यम्यापीदमर्यविवक्षाया भयनि । उत्तरन यापयशन्दम्य समासे प्रतिपेधादुत्साद्यन्तम्यापीह प्रत्ययः । तेन गोधेनुभ्या आत ३१गोपनयम्, "अगर धेनु०" (२४) इनि योचरपदद्धिः, अन्यथा मन्यमयटी स्याताम् । उम, १ तिप्प, दक्षा प्रयदविधानस मामिपुर गरी सामान दायित्यनेने न Mirrori-पिया माया तिमानानि FREER ! "rrrr:'-मने पिाय । मातापिति । पृथियो भने अमो सरि पृपिस्ती oren frarat TR:'-साम्ये 'नमारिजाये -दी मा दयभार सम्माधर 'रान पोर- - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः ३२९ उदपान, विकर, विनद, महानद, महानस, महाप्राण, महाप्रयाण, तरुण, तलुन, धेनु, पङ्क्ति, जगती, वृहती, त्रिष्टुभ् , अनुष्टुभ् , जनपद, भरत, उशीनर, ग्रीष्म, अच्छन्दसि, पीलुकुण, उदस्थान, देशे, वृपद्, अंशें, वृपदंश इत्यन्ये । अच्छन्दसीत्यादयोऽर्थविशेषनिर्देशार्थाः सप्तम्यन्ताः । भल्लकीय, रथन्तर, मध्यन्दिन, बृहत् , महिमन् , मिहदित्यपि केचित् , सत्वच्छदी मत्वन्तः । सत्वतोऽपत्यं तत्र भवो वा सात्वतः । अन्ये तु नागममिच्छन्ति सात्वन्तः । कुरु, पञ्चाल, इन्द्रावसान, उष्णिह्, ककुभ् अकारान्तावेतावित्यन्ये १५ सुवर्ण, हंसपथ, वर्द्धमान, इत्युत्सादिः एकचत्वारिंशत्परिमाणः। “वष्कयादसमासे” (६।१।२०)। वष्कते गोर्दूरं "गयहृदयादयः” (उ० ३७०) वष्कतेऽल्पक्षीरतां अच् पृषोदरादित्वात् पत्वम् । "आतो डो०” (५।१७६) इति डे "ड्यापो बहुलं नानि" (२।४।९९) इति हवे वष्कयस्तस्यापत्यं वाप्कयः । समासे तु इनेव. सुवाष्कयिः । “देवाद्यञ्च" (६।१।२१) चकारानपि । देवस्येदं देवादागतं वा दैव्यम् दैवम् । यवन्दाअन्ताच डयां दैवी वाक् । “यत्रो डायन् च वा” ( २।४।६७) १० इति डायनि दैव्यायनीत्यपि । केचित्तु प्रत्ययमिच्छन्ति, तन्मते दैव्या । "अ: स्थान:” (६३११२२) स्थामन्शब्दात् प्राजितीयेऽर्थे अः प्रत्ययः स्यात् । अश्व इव तिष्ठति “मन्वन्क्वनिप्०” (५।१।१४७) पृपोदरादित्वात्सस्य तः इष्टिवशात्तदन्तविधिः । अश्वस्येव स्थाम यस्येति बहुव्रीहिरिति केचित् । अश्व- स्थानोऽपत्यं आश्वत्थामः "नोऽपदस्य तद्धिते” (७४।६१ ) इत्यन्तस्वरादिलुक् । "लोनोऽपत्येषु" (६।१।२३)। अः स्यात् । उडुलोन्नोऽपत्यानि उडुलोमाः । उडुलोमैः । अपत्येष्विति बहुवचनादेकस्मि-१५ नपत्ये द्वयोश्च वादित्वादिओव-औडुलोमिना। "द्विगोरनपत्ये यस्त्ररादेलवद्विः" (६।१।२४)। अपत्यार्थ विनान्यस्मिन् प्रागजितीयेऽर्थे उत्पन्नस्य द्विगोः परस्य यकारादेः स्वरादेश्च प्रत्ययस्य सकृल्लुम्भ- वति, न तु द्विः । द्वयो रथयोरिध्या वायं वोढा द्विरथः "रथात्सादेश्च वोढ़ऽङ्गे" (६।३।१७५) इति यः, तस्य लुप् । पञ्चसु कपालेपु पञ्चकपाल्यां वा संस्कृतः पञ्चकपालः । पश्वेन्द्राण्यः पञ्चेन्द्राणि वा देवताऽस्य पञ्चेन्द्रः । चतुरोनुयोगान् चतुरनुयोगं वाऽधीते चतुरनुयोगः । एवं त्रिवेदः, एण्वणो लुप् । २० द्विगोरिति किम् ? पौर्वशाल:-पूर्वा चासौ शाला च । तत्र "भवे" (६।३।१२३) ऽण् । यदा तु पूर्वस्यां शालायां भवः, तदा "दिक्पूर्वादनाम्नः" (६।३।२३) इति णः । “विगधिकम्०” (३।१।९८ ) इति , समासश्च । व्यवयवा विद्या त्रिविद्या तामधीते त्रैविद्यः, नायं द्विगुरिति । अनपत्य इति किम् ? द्वैमातुरः। पाञ्चनापितिः । यस्वरादेरिति किम् ? पञ्चभ्यो गर्गेभ्य आगतं पञ्चगर्गमयम् । अद्विरिति किम् ? पञ्चसु कपालेपु संस्कृतं पञ्चकपालं, तस्येदं पाञ्चकपालम् । एवं त्रैवेदम् । प्राग्जितादित्येव-द्वौ रथी वहति २५ द्विरथ्यः । “वहति०” (७।१।२) इत्यादिना यः, तस्य लुब् न भवति ।। "प्रागवतः स्त्रीपुंसान- ल" (६।१।२५)। प्राग्वतो येऽर्थास्तेष्वनिदम्यणपवादे च स्त्रीशब्दात् पुंसशब्दाच यथासङ्ग्यं नब्- नब्प्रत्ययौ भवतः । स्त्रिया अपत्यं स्त्रीणां समूहः स्त्रीपु भवं बैणम् । एवं पौनसम् । स्त्रीणामियं श्रेणी: एवं पौस्त्री । स्त्रीणां निमित्तं संयोग उत्पातो वा स्त्रैणः । पौनः । स्त्रीभ्यो हितं बैणम् । पौनम् । प्रागंवत इति किम् ? स्त्रिया अहँ कृत्यं स्त्रिया तुल्यं वर्तत इति वा स्त्रीवत् । बकारो मित्कार्यार्थः ।।३० "त्वे वा” (६१।२६)। त्वे विपये भावे इति यावत् एतौ नब्ननौ वा स्याताम् । स्त्रिया भावः स्त्रैणम् , स्त्रीत्वम् , स्त्रीता । पौंस्नम्, पुंस्त्वम् , पुंस्ता । पुनर्वाग्रहणं प्रत्ययविकल्पार्थम् ॥ "गोखरे यः" (६।१।२७) । गोशब्दात् स्वरादितद्धितप्रसङ्गे यः प्रत्ययो भवति । गोरपयं गवि भवं गोरिदं गन्यम् । गौर्देवताऽस्य, गवा चरति, गव्यः । स्वर इति किम् ? गोभ्यो हेतुभ्य आगतं गोरूप्यम् । गोमयम् ।। "गोबोत्तरपदाद्गोत्रादिवाजिह्वाकात्यहरितकात्यात्" (६।१।१२)। गोत्रमपत्यम् । गोत्र- प्रत्ययान्तमुत्तरपदं यस्य तस्मात्समुदायात् गोत्रप्रत्ययान्तं यदुत्तरपदं तस्मादिय वक्ष्यमाणः प्रत्ययो ३६ है. प्रका० पूर्वा० ४२ ? म - "पृद्धिः०" स्यरेपियति व्यञ्जनापेक्षाभ्युदासार्थम् । तेन स्वरापेक्षया य आदिस्वरसस पृद्धिमंव- ३३० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- भवति, जिताकासहरितकासौ वर्जयित्वेति । यथेह ईयो भवति-चारायणीयाः, पाणिनीयाः, जैमि. नीयाः, रोटीयाः; तथा कम्बलचारायणीयाः, ओदनपाणिनीयाः, कडारजैमिनीयाः, घृतरौढीया इत्यादा- वपि भवति । यथा वेहान् भवति--शाकलाः, काण्वाः, दाक्षाः, पानागाराः; तथा प्रेहिशालाः, पैग- लकाण्याः, कापिलदाक्षाः, क्षैरपानागाराः, इत्यत्रापि भवति । अजिह्वाकात्यहरितकात्यादिति किम् ? ५यह ईयो भवति, कायस्य छात्रा कातीयाः, तथा इह न भवति-जिहाचपलः कात्यो जिताकात्य- सस्येमे छात्रा जैहाकासाः । हारितकात्याः ॥१॥ उपगोरपत्यम् अनन्तरं वृद्धं चेति वाक्ये । उपगोरपत्यमित्यादि, अत्र सूत्रम् । ङसोऽपत्ये ॥२॥[सि०६१।२८] पाठ्यन्तानाम्नोऽपत्येऽर्थे *यथाभिहितमणादयः स्युः ॥२॥ "उसो." इसमहणस्य पष्ठथुपलक्षणत्वात्पष्ठी लभ्यते । यथाभिहितमिति-उपगोरपत्यं औप- गयः । धानपतः । दैत्यः । औत्सः । खैणः । पौंस्नः । अपत्य इत्यपत्यमानं विवक्षितं, न लिङ्गसहयादि तेन द्वयोर्वहुपु स्त्रीलिङ्गादौ च भवति । औपगवौ । औपगयाः । औपगचीत्यादि । उस इति किम् ? : देवदत्तेऽपत्यम् । अपत्ये इति किम् ? भानोरयं भानवीयः तस्येदम्' (६।३।१६०) इत्येवाणादिसिद्धाव- १५ पत्यविवक्षायां तेदपवाद्याधनार्थ वचनम् । तेन भानोरपत्यं भानयः अत्र "दोरीयः" (६३३३२) इतीयो न भवति । कम्बल उपगोरपत्यं दत्तस्यत्र तु असामर्थ्यान्न भवति ॥ २ ॥ आद्यात् ॥ ३॥[सि०६।१।२९] अपत्यार्थप्रत्यया आयात्परमप्रकृतेरेव स्युः। "ऐकायें" (२८) इति विभक्तिलपि उपगु अण् इति स्थिते, णकारो वृद्ध्यर्थः ॥३॥ "आधा०" परमप्रकृतेरेवेति-पौत्राद्यपत्यं सर्व पूर्वजानामापरमप्रकृतेः पारम्पर्येण सम्बन्धादपस भवति । तन्न तेस्तैः सम्बन्धविवक्षायामनन्तरवृद्धयुवभ्योऽपि प्रत्ययः प्राप्नोतीति नियमार्थमारम्भः । उपगोरपत्यमनन्तरं द्धं या ओपगया, तस्याप्योपगवः, औपगवेरप्यौपायः; गर्गस्यापत्यं पौत्रादि गार्ग्यः, गार्गेरपि गार्यः । गार्यस्यापि गायः, गाायणस्यापि गार्यः । अनन्तरादयोऽपि परम• प्रकृतिरूपेणैचापत्ये प्रत्ययमुत्सादयन्ति ।। ३ ।। वृद्धिः स्वरेवादेणिति तद्धिते ॥ ४॥ सि०७४।१] मिति णिति च तद्धिते परे प्रकृतेरायखरस पृद्धिः स्यात् । औपगवः ॥ ४ ॥ 1 - । २० सीति । अनायं विशेष:-"केकयमिनयुप्रलयस्य यादेरिय च” (७४।२) एषां प्रयाणामादि, सरस गृतियादेश दादरूपस्य इयादेशो भवति । फेयस्यापर कैफेया । “रामग्रियात." (६१११४) इत्यम् । मिश्र यातीति "पीमूगमित्रः" (उगा. ७४१) इति सूत्रेण किदुप्रत्यये मित्रयुः मित्रपत्सलः । मित्रयोर्मापः मैग्रेयिफया टापते "गोप्रचरण." (१७५) इत्यादिनाकम् । तस तमिलोरदो यो दोपर सरियस मापनामन्यया मुसमपनियामपि ईय एक सा समसमान्तगोरिलस कम्पटेन एम्बन्धितासम्बन्धिावेनासं मान्नयः पमर्पः ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकार: प्रलयादागतं पालेयं हिमम् । "तत आगते" (६।३।१४९) इत्यण । “देविकाशिंशपादीघे- सनश्रेयसस्तत्प्राप्तावाः” (७४३) एपां चतुर्णामादिस्वरस्य वृद्धिप्रसङ्गे आकार आदेशो भवति । देविकायां भवं दाविकमुदकम् । देविकाकूले भवा दाविकाकूला: शालयः । पूर्वदेविका नाम प्राच्यग्रामस्तत्र भवः पूर्वदाविकः, अत्र "प्राग्ग्रामाणाम्” (७४।१७) इत्युत्तरपदवृद्धिमाप्तिः ।। शिंशपाया विकारः शांशपः स्तम्भः। शिशपास्थले भवाः शांशपास्थलाः शालयः। पूर्वशिंशपा नाम प्राच्य-५ ग्रामस्तत्र भवः पूर्वशांशपः ॥ दीर्घसने भवं दार्पसत्रम् ॥ श्रेयोऽधिकृत्य कृतं श्रायसं द्वादशाङ्गम् ॥ तत्प्रा- साविति किमर्थम् ? सुदेविकायां भवः सौदेविक इत्यत्र निषेधार्थम् , पूर्वोत्तरपदानामपि यथा स्यादि- त्येवमर्थ च, अन्यथा हि केवलानामेव स्यात् ॥ "वहीनरस्यैत्” (७।४।४) अस्य णिति तद्धिते परे आदिस्वरस्य ऐः स्यात् । वहीनरस्यापत्यं वैहीनरिः । वहीनरस्येदं वैहीनरम् । विहीनरस्य वृद्ध्या सिद्ध्यति, वहीनरस्य वाहीनरिर्मा भूदिति वचनम् । “प्रोष्ठभद्राजाते" (७४।१३) पदस्येति अनु-१० वर्त्तते । आभ्यां परस्य पदशब्दस्य आदिस्वरस्य जातार्थे विहिते णिति तद्धिते परे वृद्धिः स्यात् । प्रोष्ठपदासु जातः प्रोष्टपादा, भद्रपादो माणवकः । जात इति किम् ? प्रोष्ठपदासु भवः प्रौष्ठपदो मेघः। अर्ध्वमौहूर्तिक इति “सप्तमी चोर्ध्वमौहूर्तिके” (५।४।३०) इति निपातनात् । गुरुलाघवमिति गुरो- ाधवम् गुरुश्च गुरुत्वं लाघवं चेति वा । संहतपारार्थ्यमिति, संहते पारार्थ्यमिति सिद्धमतो नार्थ उत्तरपद- वृद्धयेति । "अंशाहतोः” (७४।१४)। अंशवाचिनः शब्दात्परस्य ऋतुवाचिन उत्तरपदस्यादिस्वरस्य १५ रिणति तद्धिते वृद्धिः स्यात् । पूर्वासु वासु भवः पूर्ववार्पिकः “वर्षाकालेभ्य" (६।३।८०) इतीकण् । पूर्वशारदः, अपरनैदाघः, पूर्वहैमनः; ऋत्वण । अंशादिति किम् ? पूर्वासु ऋत्वन्तरैर्व्यवहितासु वासु भवः पौर्ववर्पिकः । “सुसर्वाद्रिाष्ट्रस्य" (७।४।१५)। उत्तरपदस्यादिस्वरवृद्धिः, ब्णिति । सुपा- ञ्चालकः । सर्वपाश्चालकः । अर्द्धपाञ्चालकः । सुमागधकः । सर्वमागधकः । "बहुविपयेभ्यः" (६।३।४५) इत्यकन् । “अमद्रस्य दिशः” (७४।१६)। दिग्वाचिनः परस्य राष्ट्रवाचिशब्दस्य २० मद्रशब्दवर्जितस्य उत्तरपदस्यादिवरवृद्धिः, णिति तद्धिते । पूर्वपाञ्चालकः । अपरपाञ्चालकः । अम- द्रस्येति किम् ? पौर्वमद्रः । दिश इति किम् ? पूर्वं पञ्चालानां पूर्वपञ्चालाः, अंशिसमासः; तेपु भवः पौर्वपञ्चालकः । अवयववृत्तेरपि पूर्वशब्दस्य दिशि दृष्टत्वेन दिक्शब्दत्वात्तदन्तविधी सति "बहुवि- पयेभ्यः" इत्यकञ् । ये एकत्वस्य दिक्शब्दत्वं नेच्छन्ति, तन्मते तदन्तविध्यभावेऽणेव-पौर्वपञ्चालः । "प्राग्ग्रामाणाम्” (७।४।१७) । प्राग्देशग्रामवाचिनां योऽवयवो दिग्वाची ततः परस्यावयवस्य २५ दिशः परेपां च प्राग्रामवाचिनां णिति तद्धिते परे आदिस्वरस्य वृद्धिः स्यात् । पूर्वकृष्णमृत्तिका नाम प्राक्षु ग्रामस्तत्र भवः पूर्वकार्ष्णमृत्तिकः । एवमपरकार्णमृत्तिकः । पूर्वेपु कामशमी नाम प्राग्ग्रामस्तत्र भवः पूर्वेपुकामशमः । एवमपरेपुकामशमः । बहुवचनात् ग्रामग्रहणेन नगरमपि गृपते । पूर्वस्मिन कन्यकुब्जे भवः पूर्वकान्यकुब्जः । अपरकान्यकुजः । एवं पूर्वपाटलिपुत्रकः । प्रागग्रहणं किम् ? देव- दत्तं नाम वाहीकग्रामः, पूर्वस्मिन् देवदत्ते भवः पौर्वदेवदत्तः । आपरदेवदत्तः । “सहयाधिकाभ्यां ३० वर्पस्याऽभाविनि" (७४।१८) । सवयावाचिनोऽधिकाब्दाच परस्य वर्पशब्दस्य णिति तद्धिते आदिस्वरस्य वृद्धिः स्यात्, न चेत्स तद्वितो भावीत्यर्थे विहितः स्यात् । द्वाभ्यां वाभ्यां निवृत्तो भूनो- ऽधीष्टो, द्वे वर्षे भूतो वा द्विवार्पिकः । त्रिवार्पिकः । अधिकवार्षिकः । अभाविनीति किम् ? द्वे वर्ष भावि देवर्पिकं वर्पिक धान्यम् । द्वाभ्यां वर्षाभ्यां भृतोऽधीष्टो वा कर्म करिष्यति द्विवार्पिको मनुष्य इति । अधीष्टभृतयोः प्रत्ययो न भाविनीति निधो न भवति । गन्यते रात्र भविष्यत्ता न तु प्रत्ययाः । "मानसंवत्सरस्याऽशाणलिजस्याऽनाम्नि" (१९) 1 मीयते परिच्छिद्यते येन तनमान ३६ ३३२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- परिमाणादि । सहयाया अधिकशब्दाच परस्य शाणकुलिजवर्जितस्य मानपाचिनः संवत्सरशब्दस्य च णिति तद्धिते आदिस्वरस्य वृद्धिः स्यात्, अनाम्नि असंज्ञिविपये । सयाधिकाभ्यां मानसंवत्सरस्य वचनभेदाप्न यथासायम् । द्वौ कुडवो प्रयोजनमस्स द्विकौडविका । अधिककौडविकः । द्वाभ्यां सुवर्णाभ्यां प्रीवं द्विसौपर्णिकं, त्रिसौवर्णिकं, अधिकसौवर्णिकम् । द्वाभ्यां पष्टिभ्यां निवृत्तो द्वाभ्यां ५पष्टिभ्यां भृतोऽधीष्टो वा द्वैपष्टीभूतो भावी वा द्विपाष्टिकः । त्रिपाष्टिकः । द्विसाप्ततिकः । निसाप्त- तिकः । अधिकसाप्ततिकः । द्विपट्यादिशददाः सहयेये काले वर्तन्ते इति कालाधिकारविहितं प्रत्यय. मुत्सादयन्ति । द्वाभ्यां नवतिभ्यां क्रीतमिति "मूल्यैः क्रीते" (६।४।१५०) इति इकण् तस्य "अनान्यद्विः प्लुप्" (६४।१४१) इति लुपि द्विनवति द्रव्यम् , तेन द्वौ च नवतिश्च द्विनवति- स्सया घा मीतं द्विनावतिकं निनावतिकं संवत्सरः । द्वाभ्यां संवत्सराभ्यां निवृत्तो भृतोऽधीष्टो वा, द्वी १० संवत्सरी, भूतो भावी वा द्विसांवत्सरिकः । निसांवत्सरिकः । संवत्सरप्रणात्कालो मानग्रहणेन न गृह्यते । तेन द्वसमिकः । समिकः । द्वैराशिक: । त्रैराशिकः । अशाणकुलिजस्येति किम् ? द्वाभ्या शाणाभ्यां मीत वैशाणम् । त्रैशाणम् । द्वे कुलिजे पचति सम्भवत्यवहरति च द्वैकुलिजिकः । त्रैकुलि- जिकः । अनानीति किम् ? पश्चलोहिन्यः परिमाणमस्य पाञ्चलोहितिकम् । पाञ्चकलायिकम् । तद्धिता- न्तमिदं परिमाणविशेपस्य नाम । “अर्द्धात्परिमाणस्याऽनतो वा त्वादेः" (७४।२०)। अर्द्ध- ३५शब्दात्परस्य परिमाणवाचिनः फुडवादेः शब्दरूपस्य णिति तद्धिते आदेः स्वरस्थानतोऽकाररहितस्य पृद्धिः स्यात् । परिमाणात्पूर्वस्य त्वर्द्धशब्दस्य वा भवति । अर्द्धकुडवेन क्रीतं अर्द्धकौडविकम् , आर्द्धकौड- विषम् । अर्द्धमौष्टिकम् , आर्द्धमौष्टिकम् । अर्द्धद्रौणिकम् आद्रौणिकम् । परिमाणस्येति किम् ? अर्द्ध- पोशः प्रयोजनमस्य आर्द्धकौशिकम् । अनत इति किम् ? अर्द्धप्रस्थिकम् , आर्द्धप्रस्थिकम् । अर्द्धकंसिपम् आर्द्धसिकम् । अर्द्धचमसिकम् , आर्द्धचमसिकम् । आदिविकल्प उत्तरपदवृद्ध्यनपेक्ष इति भवत्येव । २० अतः प्रतिपेधादाकारस्य वृद्धिर्भवत्येव । अर्द्धखायाँ भवः अर्द्धसारी । कः पुनरत विशेषः सत्सा असत्यां वा वृद्धौ ? उच्यते-अर्द्धसारी भार्या यस्य अर्द्धसारीभार्य इति । यद्यन वृद्धिप्रतिपेधः स्यादयं तद्धितो न वृद्धिहेतुरिति पुंवद्भावप्रतिषेधो न स्याद्यथा अर्द्धप्रस्थे भवा अर्द्धप्रस्थी । सा भार्या अस्स अर्सप्रस्वभार्य इति । "माद्वाह्णस्यैये" (७४।२१)। वा त्वादेरिति वर्त्तते । प्रशब्दात्सरस्य याहण. शप्दस्य एये मिति तद्धिते परे आदिस्वरस्य वृद्धिः स्यात्, प्रशब्दस्य तु या । प्रवाहयति प्रवाहणः, २५ प्रवाहणस्यापत्यं प्रवाहणेयः प्रावाहणेयः "शुभ्रादित्वात्" (६।११७३) एयण । अनाप्युत्तरपद्धेः प्राग- मेव प्रयोजनम् । तेन प्रवाहणेयीभार्य इति पुयभावप्रतिषेधो भवति । "एयस्य" (७।४।२२)। एयप्रत्ययान्तावयवात्मशब्दात्परस्य पाहणस्य णिति तद्धिते आदिवरस्य वृद्धिः स्यात्, इस या। प्रवाहणेयस्यापर युवा प्रवाहणेयिः, प्रावाहणेयिः । प्रवाहणेयस्येदं सहावि तस्य भावो पा प्रयाणेयकम्, प्रावाहणेयपम् । पासवद्धितनिमित्ता पृद्धिरेयाश्रयेण विकल्पनाशक्या याधितुमिति ३० सूत्रारम्भा । "नमा क्षेत्रज्ञेश्वरकुशलचपलनिपुणशुचेः" (७४।२३)! नमः परेषां क्षेत्र गादीनां पण्णां प्रत्ययययाना णिति तद्धिते आदिस्सरस पृद्धिः स्यात् आदेतु नमो या । अक्षेत्र स्पदं पक्षेत्रसम्, आक्षेत्रशम् । अक्षेनतस्य भावः पर्म या अक्षेत्रश्यम्, आक्षेत्रदयम् । राजादित्यान टया । एषमनेश्वरम् , पानेश्वरम् । अनेश्वर्यम् , आनेश्वर्यम् । अयुशलस्येदं अकौशलम्, आकौशलम् । एवमपापलमापापलम् । भनेपुणमानपुणम् । न शुचिरशुचिसस्येदं अमोघमासौपम् । न विद्यते घनिरपेति या अशुचिमस्य भावः धर्म पा अशोपमाशोपम् । क्षेत्रशासघपलनिपुणानां नम्पूर्वा- ३६णामपि युपारिपाठारणमिच्छन्त्यये । मापयातध्यगिति समासात्मसयः । अयापारम्पमिति प्रसपा- आदेस्तु प्रश- - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३३३ म्तेन समासः । एवमाययापुर्यमयाथापुर्यम् । यथा आचतुर्यमचातुर्यमिति । यथातथा यथापुरा इत्य- खण्डमव्ययं वा "नाम नाना०” (३।१।१६) इति वा समासो "यथाऽधा" (३।११४१) इत्य- व्ययीभावो घा अकारान्तः । “जङ्गलधेनुवलजस्योत्तरपदस्य तु वा" (४।२४) । एतदु- त्तरपदानां झब्दानां पूर्वपदस्य णिति तद्धिते आदिवरस्य नियं वृद्धिः स्वादुत्तरपदस्य त्वादिस्वरस्य वृद्धिर्वा स्यात् । कुरुजङ्गलेषु भवः कौरुजङ्गलः, कौरजाङ्गलः । वैश्ववेनवः, 'वैश्वधेनवः । सौवर्णवलजः,५ सौवर्णवालजः । "सारवेक्ष्वाकमैत्रेयभ्रौणहत्यधैवत्यहिरण्मयम्” (७।४।३०)। एतेऽगादि- प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । सरवां भवं सारवमुदकम् । सरयूशब्दस्याणप्रत्ययेऽयित्यस्य लोपः । इक्ष्वा- कोरपत्यमैक्ष्वाकः राष्ट्रक्षत्रिया( ६।१।११४ )दिनाब् इक्ष्वाकोरिदं ऐक्ष्वाकम् । इक्ष्वाकुझब्दख अभि अणि च उकारलोपः । मित्रयोरपत्यं मैत्रेया-मित्रयुशब्दस्य गृष्ट्यादित्वात् (६।१८४) एयमि युलोपः । भ्रूणनो भावः कर्म वा भ्रीणहत्यम् । धीनो भावः कर्म वा धैवत्यम् । अत्र व्यणि नकारस्य १० तकारः । हिरण्यस्य विकारो हिरण्यमयम् । अत्र मयटि यशब्दलोपः । *औपगव इति-एवं कापटवः । वाभ्रव्यः । माण्डव्यः । शाकं व्यन्दारुपिचव्यः कर्पासः । वाहविः । औपविन्दविः । अपदस्येति किम् ? पटुतरः । इति वृद्धिप्रकरणम् ॥ ४ ॥ अथ कार्यशेपमाह । अस्वयम्भुवोऽव् ॥ ५॥ [सि०७४।७० ] स्वयम्भूव|वर्णस्सापदस्स तद्विते परेऽव् स्यात् । औपगवः । अस्वयम्भुव इति किम् ११५ स्वायम्भुवः ॥ ५॥ "अस्वयं०" । सूत्रं स्पष्टम् ॥ ५ ॥ अणञयेकणूननटिताम् ॥ ६॥ [सि० २।४।२० ] एतदन्तानां स्त्रियां डीः स्यात् । आँपगवी । “नोऽपदस्य तद्धिते" (४६१) इत्यन्त्यम्वरादि- लकि, मैधावः ॥ ६॥ "अण्०" अण् च अञ् च एयश्च इकण च न च सञ् च टिन् च तेपाम्, पनदन्तानामिति- अणादिप्रत्ययानां योऽकारम्नदन्तान्नान्नः प्रत्यासत्तेतेपामेव चाणादीनां वाच्यायां त्रियां वर्तमानाद हीः स्यात् । औपगवीति-एवं तपोऽस्या अस्तीति तापसी । कुम्भकारी । काण्टलावी यानि "फर्म- णोऽण्" (५।११७२) इति क्रियायां क्रियार्थायामण् । अञ्-उत्सम्यापत्यं आत्मी । चिदन्यापन्यं पौत्री वैदी । एय इति निरनुवन्ध निर्देशः सामान्यग्रहणार्थनेन एयण-यच-पयनां ग्रहणम १२५ एयण-गुपया अपयं सौंपर्णयी । वैनतेयी । एयच-, शिलायान्नुन्या शिलेची । पयत्र-तालेयी । "शिलाया एयग" (७१।११३) इति । इकण्-अर्दीव्यति आभिकी । प्रन्येन कृता प्राधिकरी ।। न-पणी ।। लञ्-पौनी ॥ टित्-जानुन्नी । जानुद्वयनी । पानी । हर्या । प्रर्या । प्रन्ययना- हचर्यादागमटिनो न भवति, पटिना विद्या, । शुनीन्धर्यात्यादी तु धानोष्टिकरणन्यानन्यायवाद दिनोऽपि भवति । अणादीनां पष्टीनिर्देशनापारन्य विशेषणं किम् ? पाणिनिना प्रोग. पाणिनीयम् । "नीर", प्रत्यः । नम्य "प्रोक्तान' (२।१३९) नि लोपे पाणिनीया कन्येनि सीधा मा मृग । मयाममा सरेवाणादिभिः निया विशेषणं किम ? गाननेन प्रोगा नीनिर्माननी । तामीले नाम- शिनि टोपे "पादे०" (२४९५) यादिना मीलोरे दीया न पान | गीतमा सन्मान ३ । -- १ दरम' र ग'!

-- ३३४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपशहैमलघु- प्राणोकारो न तु तदभिधेया स्त्री प्रत्यया । यभिधेया तु कन्यालक्षणा स्त्री प्रत्ययाय न तस्सा- फारोऽस्तीति । यथा बहुकुम्भकारा नगरी बहुकुरुचरा इत्यादि । मैधाव इति-मेधाविनोऽपत्यं मेधावः। एवं मायावः । औडुलोमिः । शारलोमिः । आमिशर्मिः । द्वयोरहोः समाहारो व्यहः । हस्तिनां समूहो हास्तिकम् । अपदस्येत्येव । मेधाविरूप्यम् । मेधाविमयम् । ५ अत्र इत्यादिशब्दानुवृत्तेः "कलापिकुथुमिततलिजाजलिलाङ्गलिशिखण्डिशिलालि- सब्रह्मचारिपीठसप्पिसूकरसभसुपर्वणः” (७४।६२) । एपामेफादशानां तद्धितेऽन्त्यस्वरा- देर्लुक् स्यात् । अन ये इन्नन्तास्तेपामनपत्य इति, शिसण्डिपीठसर्पिणोरपत्येऽपि "संयोगादिनः" (1 ४५३) इति, सूकरसझसुपर्वणोस्तु "अणि" (७४।५२) इति निषेधे प्राप्ते लुग्वयनम् । कलापिना प्रोक्तम् वेदमधीयत इति कालापाः । कौथुमाः । तैतली जाजली लागली चाचार्याः । तत्कृतो अन्योऽ- १० प्युपचारात्तच्छच्दैनोच्यते । तमधीयते तैतलाः । जाजलाः 1 लाजलाः । शिखण्डिन इमेऽपत्यानि वा शैसण्टाः । शिलालिनः शैलालाः । सब्रह्मचारिणः साब्रह्मचाराः। पीठसर्पिणः पैठसाः । सूकर- सझनः सौकरसद्माः । सुपर्वणः सौपर्वाः ॥ ६ ॥ अत्रापवादमाह अणि ॥७॥ [सि०७४।५२ ] अन्नन्तसाण्यन्त्यखरादे ग् न स्यात् । सौत्वनः ॥ ७ ॥ "अणि." सौवन इति-सुत्वनोऽपत्यं सौत्वनः । एवं याज्वनः । साम देवताऽस्य सामनः । वैमनः । सन्दिष्टं कर्म कार्मणम् । पर्वणि भवः पार्वणः । अणीति किम् ? कर्म शीलमस्य काम।। "अडूया. छनादेरम्" (६।४।६०) । कर्मणे शक्तं कार्मुकम् । "योगकर्मभ्यां योकनौ" (६४९५) इत्युकम् । इत्यादिशब्दोपादानाच "दण्डिहस्तिनोरायने" (७४४५) । अन्त्यस्वरादेर्लक् न स्यात् । "नोऽपदस्य." (७४।६१) इति प्राप्ती प्रतिषेधः । दण्डिनोऽपत्यं दाण्डिनायनः । हातिनायनः । २० नडाद्या (६।११५३) यनण् । आयन इति किम् ? दण्डिनां समूहो दाण्डम् । हास्तिकम् । “चाशिन आयनी" (७४४६) । वाशिनोऽपत्यं पाशिनायनिः । "अवृद्धादोर्नवा" (६।१।११०) इत्या. यनिन् । “एये जिम्माशिनः" (७।४।४७) । निझाशिनोऽपत्यं जैमाशिनेयः । शुभ्रादित्वात् (६।११७३) एयण् । “इकण्यधर्वणः" (४४९) । अथर्याणं येत्त्यधीते वा आथर्यगिकः । न्यायादित्यादिफ्ण् । “यूनोऽ” (७४।५०)। यूनो भावः यौवनिका । पौरादित्वात् (१९७३) २५ असंम् । अक इति किम् ? युवा प्रयोजनमस्य यौविकम् । “संयोगादिनः" (७४।५३) । संयो. गात्सरो य इन् तदन्तस्याणि परेऽन्यखरादेलुंग न स्यात् । शद्विनोऽपत्यं शादिनः । चाफ्रिणः । पामिणः । साग्विणः । माद्रिणः । भाद्रिणः । संयोगादिति किम् ? मेधावः । अणीत्येव-प्राकारमर्दिनोऽपर्स प्रापारमादिः यालादित्यात् (६२३२) अकम् । "अनपसे" इत्युत्तरेण सिद्धत्वादपत्यार्योऽयमारम्भः । "गाधिविदधिशिपणिगणिनः" (७४।५४ ) | वथा । गायिनोऽपत्यं गाधिनः । पदाधिनः । ३० केशिनः । पाणिनः । गाणिनः । "अनपत्ये" (५५) । इनन्तस्यापर्य विनान्यस्मिन्नर्थे योऽश् यग्मिन् परेऽन्यस्वादेर्टस् न स्यात् । साटिनं वर्तते साहौटिनम् । सांगविणम् । सामार्जिनम् । गर्मिगीनां समूहको गामिणम् मिक्षादित्यात् (६।२।१०) अण् । गुणिन इदं गोणिनम् । स्रग्विण इदं साग्यिणम् । पनपत्र इपि किम् ? मैधायः । अणीत्येव । गर्भिणां समूहो गार्भम् । दण्डिनां दाण्डम् । परिणा भारम् । "धारिभ्योऽ” (१।२२२६) स्यम् । “उक्ष्णो लक" (४१५६) । पनपतेऽन २५परे । म ओझं परम् । अपसे श्येप । उगोऽसमाना "ब्रह्मणः" (४५७)। - -- - - ? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३३५ अनपत्येऽणि अन्यखरादे क् स्यात् । ब्रह्मण इदं ब्राह्ममत्रम् । ब्राह्मो मन्त्रः । योगविभाग उत्तरार्थः । "जातौ” (७४।५८)। ब्रह्मण इयं ब्राह्मी औपधिः । पूर्वेण सिद्धे अनपत्य एवेति 'नियमार्थ वचनम् । तेनोत्तरसूत्रेणापत्ये लुग् न भवति । ब्रह्मणोऽपत्यं ब्राह्मणः । जाताविति किम् ? ब्रह्म- णोऽपत्यं ब्राह्मो नारदः । “अवर्मणो मनोऽपत्ये" (७४।५९)। वर्मन्शब्दवर्जितस्य मन्नन्त- स्यार्पत्यार्थेऽणि अन्त्यस्वरादेर्लुक् स्यात् । सुपान्नोऽपत्यं सौपामः । माद्रसामः । अवर्मण इति किम् १५ चाक्रवर्मणः । न इति किम् ? सौत्वनः । अपत्य इति किम् ? चर्मणा छन्नः चार्मणो रथः । "तेन छन्ने रथे” (६।२।१३१) इत्यण् । “हितनाम्नो वा” (७४।६०)। अपत्येऽणि अन्त्य- खरादे छ वा भवति । हितनानोऽपत्यं हैतनामः, हैतनामनः । अपत्य इत्येव हैतनामनः । "उक्ष्यो लुक्” इत्यत आरभ्य सर्वेऽणीत्यस्यापवादाः ॥ ७ ॥ अत इञ् ॥ ८॥[सि० ६१३१] अदन्तात्पष्टचन्तादपत्ये इञ् स्यात् । अकारो वृद्ध्यर्थः । "अवर्णेवर्णस्य" (७४६८) इत्यल्छकि दक्षिः॥८॥ "अत०" । दाक्षिरिति-अणोऽपवादः । एवं अस्यापत्यं इः । अत इति किम् ? शुभं यातीति, कीलालं पिवतीति, शुभंयुः कीलालपाः । तस्यापत्यं शौभंयः कैलालपः । केचित्तु आभ्यामणमपि नेच्छन्ति । कथं, "प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ?” "तस्येदम्” ( ६।३।१६०) इति विवक्षायामण् । १५ अपत्यविवक्षायां तु दाशरथिरियेव भवति । अथ काकबकशुकादेः कस्मादिम् न स्यात् ? उच्यते- जात्यैवापत्यार्थस्य पौत्रादेरनन्तरस्य चाभिहितत्वात् । यत्र त्वर्थप्रकरणादेविशेपप्रतीतिरस्ति, तत्र भवत्येव- "कुतश्चरति मायूरिः केन कौपिञ्जलिः कृशः" । एतेन काक्यादिभ्य एयणादयोऽपि व्याख्याताः । कथं तर्हि क्रौञ्चः कौकिलः गौधेरः चाटकर इति ? जातिशब्दा एवैते यथाकथञ्चिद्ध्युत्पाद्यन्ते । यथा क्षत्रं क्षत्रियः राजा राजन्यः मनुः मनुष्यः मानुप इति । अनभिधानाच शतसर्ववृद्धकारकराजपुरुष-२० माथुरकुररादिभ्यो न भवति ॥ ८ ॥ वाहादिभ्यो गोत्रे ॥९॥ [सि० ६१॥३२] खापत्यसन्तानस्य स्वव्यपदेशहेतुर्य आयपुरुषस्तदपत्यं गोत्रम् । बाहादिभ्यो गोत्रे इञ् सात् । बाहविः । *कचिदिनि स्लुक । भूयसामपत्यं भौयिः आम्भिः ॥९॥ "वाहा०" आद्यपुरुप इति । ऋपिरनृपि वेति शेपः । गोत्र इति गोत्रापत्येऽर्थ इत्यर्थः । अन-२५ कारान्तार्थो वाधकबाधनार्थश्वारम्भः । वाहोरपयं वाहविः । एवं औपवाकविः । नैवाकविः औदश्चिः। इहोदश्चितिपैलादिपु चोदश्चीति सनकारस्य पाठादन यामपि नलोपाभावः । गोत्र इति किम ? योऽ. धत्वे वाहुर्नाम , तस्यापत्यं वाहवः । सम्भवापेरं च गोत्रग्रहणम्, तेन पञ्चानामपन्यं पाश्चिः नामिः आष्टिः इत्यादि । बाहु, उपवाकु, निवाकु, वटाकु, चटाकु, उपविन्दु, चाटाकु, कला, ककन्दा, चूटा, बलाका, जया, छगला, भगला, लगहा, ध्रुवका, धुवका, मूपिका, मुभिना, दुर्मिमा ३० वृकलादिभ्यो यथासम्भवमेयणो भानुपीनामलमणस्य चाणोऽपवादोऽयमित्र । युधिष्टिर, अर्जुन, राग, सर्पण, कृष्ण, गद, प्रद्युम्न, सा(शा?)न्य, सत्सक, शूर, असुर, अजीगत, मध्यन्दिन, पषु प्याय- णोऽपवादः । सुधावत्, स्वधावन्, पुष्करसद्, अनुदरत, अननद, पान, मनन् , अन, देग-३३ १व्यक्षिवाचिन मागोससे मानव माना। वापरणे मामाभी।

१५ ३३४ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- प्राणोऽकारो न तु तदभिधेया स्त्री प्रत्ययाही । यदभिधेया तु कन्यालक्षणा स्त्री प्रत्ययाहा न तस्या- फारोऽस्तीति । तथा यहुकुम्भकारा नगरी बहुकुरुचरा इत्यादि । मैधाव इति-मेधाविनोऽपसं मैधावः। एवं मायावः। औडुलोमिः । शारलोमिः । आग्निशर्मिः । द्वयोरहोः समाहारो व्यहः । हस्तिनां समूहो हास्तिकम् । अपदस्येत्येव । मेधाविरूप्यम् । मेघाविमयम् । ५ अन इत्यादिशब्दानुवृत्तेः “कलापिकुथुमिततलिजाजलिलाझलिशिखण्डिशिलालि- सब्रह्मचारिपीठसपिसूकरसभसुपर्वणः” (७४।६२)। एपामेकादशानां तद्धितेऽन्त्यखरा- देर्लुक् स्यात् । अन ये इन्नन्तास्तेपामनपत्य इति, शिखण्डिपीठसर्पिणोरपसेऽपि "संयोगादिनः" ( ४१५३) इति, सूकरसझसुपर्वणोस्तु "अणि" (७१४१५२) इति निपेधे प्राप्ते लुग्वयनम् । कलापिना प्रोक्तम् वेदमधीयत इति कालापा: । कौथुमाः । तैतली जाजली लागली चाचार्याः । तत्कृतो ग्रन्थोऽ- १० प्युपचारात्तच्छब्देनोच्यते । तमधीयते तैतलाः । जाजलाः । लाङ्गलाः । शिखण्डिन इमेऽपत्यानि वा शैसण्डाः । शिलालिनः शैलालाः। सब्रह्मचारिणः साम्राचाराः । पीठसर्पिणः पैठसर्पाः । सूकर- सझनः सौकरसद्माः । सुपर्वणः सौपर्वाः ॥ ६॥ अनापवादमाह । अणि ॥७॥ [सि०७४।५२] अन्नन्तस्याण्यन्त्यखरादे ग् न स्यात् । सौत्वनः ॥७॥ "अणि " सौत्वन इति सुत्वनोऽपत्यं सौत्वनः । एवं याज्वनः । साम देवताऽस्य सामनः । वैमनः । सन्दिष्ट कर्म कार्मणम् । पर्वणि भवः पार्षणः । अणीति किम् ? कर्म शीलमस्य कार्म: । "अस्था- छनादेर" (६।४।६०) । कर्मणे शक्तं कार्मुकम् । “योगकर्मभ्यां योकनौ" (६४९५) इत्युकम् । इत्यादिशब्दोपादानाच "दण्डिहस्तिनोरायने" (७४।४५) । अन्त्यस्वरादे क् न स्यात् । "नोऽपदस्प०" (७४।६१) इति प्राप्ती प्रतिषेधः । दण्डिनोऽपत्यं दाण्डिनायनः । हास्तिनापनः । २० नडाचा (६।११५३) यनण् । आयन इति किम् ? दण्डिनां समूहो दाण्डम् । हास्तिकम् । “याशिन आयनो" (७४।४६) वाशिनोऽपत्यं वाशिनायनिः । “अवृद्धाहोर्नवा" (६।१।११०) इत्या- यनिन् । “एये जिम्माशिन" (७४।४७) । जिह्माशिनोऽपत्यं जैमाशिनेयः । शुभ्रादित्याए (६।१।७३) एयण् । "इकण्यथर्वणः" (७४|४९) । अथर्वाणं वेत्त्यधीते या आधणियः । न्यायादित्यादिक्ण् । “यूनोझे" (७४।५०)। यूनो भावः योवनिका । चौरादित्वात् (७।११७३) २५ अपम् । अफ इति निम् ? युवा प्रयोजनमस्य यौविकम् । “संयोगादिनः" (७४५३) । सयो- गात्परो य इन् तदन्तस्याणि परेऽन्यवरादेलुंग न स्यात् । शद्धिनोऽपत्यं शादिनः । पाक्रिणः । याशिणः! साग्विणः । माद्रिणः । भाद्रिणः । सयोगादिति किम् ? मेधावः । अणीत्येव-प्रसारमर्दिनोऽपत्यं प्रापारमादिः याहादित्वात् (६।१।३०) अकम् । "अनपसे" इत्युत्तरेण सिद्धत्वादपत्यार्थोऽयमारम्भः । "गाथिविदधिकेशिपणिगणिनः" (५४) । तया । गायिनोऽपत्यं गाधिनः । वैदथिन । २०पेशिनः । पाणिनः । गागिनः । "अनपत्ये" (४५५) । इनन्दस्वापस विनान्यस्मिन्नर्थे योग ग्मिन् परेऽन्त्यस्सादेर्ट न स्यात् । साटिनं पते साहौटिनम् । साराविणम् । सामार्जिनम् । गर्भिणीनां समूहो गार्भिणम् भिक्षादित्वात् (६।२।१०) अण् । गुपिन इदं गौणिनम् । नग्विण वं साग्पिणम् ! अनपत्य इति किम् ? मेघायः । अणीत्येव । गर्भिणां समूहो गार्भम् । दण्डिनां दाग्डम् । परि पारम् । "धादिभ्योऽ" (६।२।२६) इत्यम् । “उक्ष्णो लक" (७४५६) । अनपत्येधी १५परे । उक्ष्ण र भोकं पदम् । अनपसे इत्येप । उक्ष्योऽपत्यमोक्ष्यः । "ब्रह्मणः" (५५) -- -- १० ? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३३५ अनपत्येऽणि अन्त्यस्वरादेलक स्यात् । ब्रह्मण इदं ब्राह्ममखम् । ब्राह्मो मन्त्रः । योगविभाग उत्तरार्थः । "जातो" (७१४१५८) । ब्रह्मण इयं ब्राह्मी औपधिः । पूर्वेण सिद्धे अनपत्य एवेति नियमार्थ वचनम् । तेनोत्तरसूत्रेणापत्ये लुग् न भवति । ब्रह्मणोऽपत्यं ब्राह्मणः । जाताविति किम् ? ब्रह्म- णोऽपत्यं ब्राह्मो नारदः । "अवर्मणो मनोऽपत्ये” (७।४।५९) । वर्मन्शब्दवर्जितस्य मन्नन्त- स्यापत्यार्थेऽणि अन्य स्वरादे क् स्यात् । सुपान्नोऽपत्र सौंपामः । माद्रसामः । अवर्मण इति क्रिम् १५ चाक्रवर्मणः । न इति किम् ? सौत्वनः । अपत्य इति किम् ? चर्मणा छन्नः चार्मणो रथः । "तेन छन्ने रथे" (६।२।१३१) इत्यण् । “हितनानो वा” (७४।६०)। अपत्येऽणि अन्त्य- खरादेर्लक् वा भवति । हितनानोऽपत्यं हैतनामः, हैतनामनः । अपत्य इत्येव-हैतनामनः । "उक्ष्यो लुक्" इत्यत आरभ्य सर्वेऽणीत्यस्यापवादाः ॥ ७ ॥ अत इञ् ॥ ८॥[सि० ६।१।३१] अदन्तात्पुष्टयन्तादपत्ये इब् सात् । अकारो वृद्ध्यर्थः । "अवर्णेवर्णस" (७४।६८) इत्यल्लुकि दक्षिः॥८॥ "अत." । दाक्षिरिति-अणोऽपवादः । एवं अस्यापत्यं इः । अत इति किम् ? शुभं यातीति, कीलालं पिवतीति, शुभंयुः कीलालपाः । तस्यापत्यं शौभयः कैलालपः । केचित्तु आभ्यामणमपि नेच्छन्ति । कथं, "प्रदीयतां दाशरथाय मैथिली ?” "तस्येदम्" ( ६।३।१६०) इति विवक्षायामण् । १५ अपत्यविवक्षायां तु दाशरथिरियेव भवति । अथ काकवकशुकादेः कस्मादिब् न स्यात् ? उच्यते- जायेवापत्यार्थस्य पौत्रादेरनन्तरस्य चाभिहितत्वात् । यत्र त्वर्थप्रकरणादेविशेपप्रतीतिरस्ति, तत्र भवत्येव- "कुतञ्चरति मायूरिः केन कौपिञ्जलिः कृशः” । एतेन काक्यादिभ्य एयणादयोऽपि व्याख्याताः । कथं तर्हि क्रौञ्चः कौकिलः गौधेरः चाटकर इति ? जातिशब्दा एवैते यथाकथञ्चिद्युत्पाद्यन्ते । यथा क्षत्रं क्षत्रियः राजा राजन्यः मनुः मनुप्यः मानुप इति । अनभिधानाच झतसर्ववृद्धकारकराजपुस्य-२० माथुरकुररादिभ्यो न भवति ॥ ८ ॥ वाह्वादिभ्यो गोत्रे ॥९॥[सि०६।१।३२] खापत्यसन्तानस्य स्वव्यपदेशहेतुर्य आयपुरुपस्तदपत्यं गोत्रम् । वाहादिभ्यो गोत्रे इस् स्यात् । वाहविः । *कचिदिनि स्लुक् । भूयसामपत्यं भौयिः आम्भिः ॥९॥ "वाहा०" आद्यपुरुप इति । ऋपिरनृपि वेति शेषः । गोत्र इति गोत्रापयेऽर्थे इत्यर्थः । अन-२१५ कारान्तार्यो वाधकवाधनार्थश्वारम्भः । वाहोरपत्यं वाहविः । एवं औपवाकविः । नेवाकविः औदश्चिः। इहोदश्चितिपैलादिपु चोदश्चीति सनकारस्य पाठादन_यामपि नलोपाभावः । गोत्र इति किम ? योऽ. धत्वे वाहुर्नाम तस्यापत्यं वाहवः । सम्भवापेक्षं च गोत्रग्रहणम् , तेन पञ्चानामपत्यं पाश्चिः नामिः आष्टिः इत्यादि । बाहु, उपवाकु, निवाकु, वटाकु, चटाकु, उपविन्दु, चाटाकु, कला, कमला, चूटा, वलाका, जता, छगला, भगला, लगहा, ध्रुवका, धुवका, मूपिका, सुमिना, दुर्मिग ३० फलादिभ्यो यथासम्भवमेयणो मानुपीनामलमणस्य चाणोऽपवादोऽयमि । युधिष्टिर, अर्जुन, राग, सर्पण, कृष्ण, गद, प्रान्न, सा(शा?)म्य, सत्सक, शूर, अनुर, अजीगतं, मध्यन्दिन, एषु प्याग- णोऽपवादः । सुधावन, स्वधावत्, पुरसद्, अनुहरन, अननुह, पचन , मान, अष्टन, हेम-३३ १व्यायाचिन महानोर मालति मायुसरेन सोपत्र । रामासर गुमास ।

शालङ्कयो- ३३६ महामहोपाध्यायंश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- धन्विन् , मापशिरोविन , शुद्धलतोदिन, सरनादिन, प्राकारमर्दिन्, नगरमर्दिन्, इन्द्रशमन् , भद्र- शर्मन्, अमिशर्मन् , देवशर्मन्, (उपदश्च ?) उदञ्च, उदञ्चु, कुनामन् , सुनामन्, सुदामन, शिरस् , लोमन् , एतौ तदन्तौ । हस्तिशिरसोऽपत्यं हास्तिशीपिः । औडुलौमिः (शारलोमिः) इति चाहादयोऽष्टापश्चाशत् । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । तेन सख्युरपत्यं साखिः । संवेशिनः सांवेशिः। ५ उदकस्य औददिकः । औदालकिः । वाल्मीकिः । आरुणिः इत्यादि सिद्धम् । शिवादेश्च प्रारु ये कारान्ता विदादयस्तेभ्य ऋष्यणं वाधित्वा उक्तार्थादन्यत्रानेनैवेञ् । "विदादेवृद्धे" (६२४१) ऽञ् वक्ष्यते । विस्थापत्यमनन्तरं चैदिः और्विः । एवं "गर्गादेर्य" (६१।४२) गार्गि: वासिः । "कुञ्जादेर्मायन्य" (६२४७) कौञ्जिः । "अश्वादेः" (६११४९) आयनन् आश्विः आर्किः । "नडादिभ्य आयन" (६११५३) नाडिः मौलिः अनकारान्तेभ्यस्त्वणेव । औपमन्यवः । जामदग्नः । १० सौमनसः । भास्मः । लैगवः । शारद्वतः ।। इतः प्रभृति गोन इत्यधिकारात् गोत्रे सम्भवति ततोऽन्यत्र प्रतिपेधः । अन इत्यादिशब्दोपादानात् “वर्मणोऽचक्रात्" (६।१।३३) । चकशब्दवर्जितात्परो यो वर्मन्- शब्दस्तदन्तादपत्येऽर्थे इन् स्यात् । इन्द्रवर्मणोऽपय ऐन्द्रवर्मिः । अचक्रादिति किम् ? चाक्रवर्मणः । "अजादिभ्यो धेनोः" (६।१।३४) । अपये इञ् । आजघेनविः । पाकघेनविः । अजादयः १५ प्रयोगतोऽनुसनव्याः । “ब्राह्मणादा" (६।१।३५) । ब्राह्मणधेनविः, ब्राह्मणधेनवः । दिपाडियाडवलि" (६१॥३७) । एतेऽपत्ये इमन्ता निपात्यन्ते । शलङ्कोरपत्यं शालङ्किः । उद- कस्यादिः । पण्णां पाडिः । वाचं वदति वाग्वादस्तस्यापत्यं वावलिः-अत्र वाचोऽन्तस्य उत्वं वलभाव- श्योत्तरपदस्य । एवं सर्वत्र निपातनादिष्टसिद्धिः । *कचिदित्यादि अन सूत्रम्-"भूयासम्भूयो:- म्भोऽमितौजसः सूलक च्" (६।११३६) । एभ्यश्चतुभ्योऽपत्ये इन्, सलोपश्चैपाम् । भूय- २० सोऽपत्यं भौयिः । एवं साम्भूयिः । आम्भिः । आमितौजिः ॥ ९ ॥ व्यासवरुटसुधातृनिपाद विम्बचण्डालादन्तस्य चाक् ॥ १०॥ [सि० ११३८] एभ्योऽपत्ये इअन्तस्य चार ॥१०॥ "ठ्यास." स्पष्टम् ॥ १० ॥ अनोपयोगिसूनम् ।- खः पदान्तात्प्रागैदौत् ॥ ११॥ [सि०७४।५] २५ मिति तद्धिते परे यो यौ पदान्तौ ताम्यां प्रागदौती सातामिति यकाराद्विश्लपितस्य पकारस्सैकारागमः । वैयासकिः ॥११॥ "०" गिणतीत्यादि । भिति णिति च तद्धिते परे इयर्णोवर्णयोर्वृद्धिप्रसने तयोरेव स्थाने यौ यपारवपारी पदान्ती, ताभ्यां प्रागेदोतो स्यातामिति यफारात्यागैयार आगमः, ओकार १०इति । यथा च्यापरणं घेत्त्यधीते या वैयाकरणः । नैयायियः । नयासियः । व्यसने मवं येयसनम् । सागर्म पेत्त्पपीते या सौवागमिषः । स्वश्वसापर सौवश्विः । पूर्पश्यलिन्दो नाम प्राग्प्रामसत्र मयः पूर्वप्रेयरिन्दः । परत्यानित्यत्याग पृद्धः प्रागेय सपंगानेनेदोती ।य इति किम् ? सोपणेय: । पदान्ता- शिी रिम् ? यन इमे यातायात्राः । यत इतीगा समन्वं रुपम् । पृद्धिप्रामाविलेय-दाभ्यधिः । ३vमाध्यधिः । अदुतोरनादित्यादिनामिनास्ति । प्राध्यामीतिभ्यां नियुत्तो द्वाभ्यामशीतिभ्यामधीष्टो ययाराथ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३३७ भृतो वा द्वे अशीतीभूतो भावी वा व्याशीतिकः व्याशीतिकः । अत्रापि "मानसंवत्सरस्याशाणकुलि- जस्थाऽनानि” (७।४।१९) इत्युत्तरपदवृद्धौ यकारस्थानिन इकारस्य वृद्धिप्राप्तिर्नास्ति । प्राप्तिश्चाकृते यत्ववत्वे इति वेदितव्यम् । कृते हीवर्णोवर्णयोरभावान्नास्ति प्राप्तिः । वृद्ध्यपवादश्चैदौदागमः । तेन तद्धितस्य स्वरवृद्धिहेतुत्वाभावात्पुंवद्भावप्रतिपेयो न भवति । वैयाकरणभार्यः । सौवश्वभार्यः । वैयासकिरिति-एवं वारुटक्रिः । सौधातकिः । नैपादकिः । वैम्बकिः । चाण्डालकिः ॥ ११ ॥ पुनर्भूपुत्रदुहितननान्दुरनन्तरेऽञ् ॥ १२॥ [सि० ६॥१॥३९] एभ्योऽनन्तरेऽपत्येऽञ् स्यात् । पौनर्भवः । पौत्रः। दौहित्रः । नानान्द्रः । पौत्री ॥ १२ "पुन०” । अञो मित्करणमुत्तरार्थमत्र सूत्रे तु अनि च अणि च नास्ति विशेषः । नन्वस्त्येव विशेष:-अभि हि “यबमोऽश्यापर्ण०” (६।१।१२६) इत्यादिनाऽनो बहुपु लुप् स्यात् । यथा वैदः वैदौ विदाः इति, तथा सङ्घाद्यर्थेषु "सङ्घघोषाङ्क०" (६।३।१७२) इत्यादिनानः परोऽण् स्यात्-१० यथा वैदमिति; अणि तु तदुभयमपि न भवति यथौपगवाः, औपगवकमिति । तथा पुत्रशब्दादब्- प्रत्ययान्तात्ततोऽप्यपत्यविवक्षायां "अत इ" (६।११३१) इतीनि "भिदादिणिोः" (६।१।१४० इति तस्य लुपि पौत्र इति स्यात् । यथा वैदः पिता, वैदः पुत्रः । अणि तु "द्विस्वरादणः" (६।१।१०९) इत्यायनिन् स्यात् । यथा का यणिरिति । उच्यते । पुनर्बाद्यपत्यस्यागोत्रत्वाद्गोत्राधि- कारविहिता लुप् सवाद्यण च न भविष्यति । पौत्रशब्दाचावृद्धप्रत्ययान्तत्वादयणि च इञ् आयनि १५ च न भविष्यति इति विशेपाभाव एव । केचित्तु पुनर्व इति लुपमप्युदाहरन्ति । तेषां पुनर्भूरिति गोनं तत्रेहाप्यस्ति विशेप इति । अनादिशब्दानुसन्धानात् "परस्त्रियाः परशुश्वाऽसावये” (६।१।४०) । परस्त्रीशब्दादन- न्तरेऽपत्येऽञ् स्यात्, परशुभावश्चास्य, चेत्पुरुपेण सह तस्या वर्णो ब्राह्मणत्वादिः समानो न स्यात् । परा पुरुषाद्भिन्नवर्णा स्त्री परस्त्री । तस्या अनन्तरापत्यं पारशवः । असावर्ण्य इति किम् ? परस्य २० स्त्री परस्त्री, तस्या अनन्तरापत्यं पारस्त्रैणेयः ॥ १२ ॥ विदादेवृद्धे ॥ १३ ॥ [सि० १४१ ] अन् । बहुत्वे चास्त्रियामस लुप् ॥ १३ ॥ "विदा०" वहुत्वे चेत्यादि-अत्र सूत्रम्, "यजनोऽश्यापर्णान्तगोपवनादेः” (६।१।१२६)। यवन्तस्यानन्तस्य च बहुत्वविशिष्टे गोत्रेऽर्थे वर्तमानस्य यजना तयोरस्त्रियां लुप् स्यात्, २५ गोपवनादिभ्यः श्यापर्णान्तेभ्यो विहितौ वर्जयित्वा । गोपवनादयोऽष्टौ श्यापर्णान्ता विद्वादिषु पच्यन्ते । तेभ्यो वहुत्वेऽपि प्रत्ययलुब् न भवतीत्यर्थः, गौपवनाः । केचित्तु मठर-राजम-अवतान-अन्व- श्यामाकाव्दानपि गोपवनादिपु पठन्ति-माठरा इत्यादि । वैदस्य वैद्योपित्यानि विदा इत्यत्र लिनि लुप्ते अनन्तं बहुष्विति लुप् । बिदानामपत्यं वैदः वैदी इत्यत्र विनि लुोऽनन्तं न बहुष्विति न लुप् । इञ्प्रत्ययविषयेऽप्यनो लुग् न भवति-"न प्राजितीये.” (६।१।१३५) इति निषेधात् । विदा- नामपत्यं बहवो माणवका बिदा इत्यत्र चावन्तं बहुविति भवसेव । काश्यपप्रतिकृतयः काश्यपाः ३१ १ एषु "निवृत्ते” इत्यादिभिरिकण, अनाशीतिशब्दो दिवसार्धमासमासादेः कालस्य समां बूते शनि काले वर्तमानता- दशीतिशब्दान् "कालमत्परिजय्य" इति कालाधिकारविहितस्तेन 'हवाद्यः' इति तृतीयान्ताधिवरे निवृत' इत्यादि सूवनियुत्ता- वर्य दकम् । २ वैयाकरण इत्यादिपु चोः स्थानिनोरिवणेवर्णयोवृद्धिप्रसनः । है. प्रा. पूर्वा० ४३ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खौपज्ञहैमलघु- इत्यत्र यद्यपि प्रत्ययो गोने उत्पन्नस्तथापि तदन्तं नेदानी गोत्रे बहुत्वे, क तर्हि ? प्रतिकृतिष्विति र न भवति । अखियामित्येव-गायः, वैद्यः स्त्रियः। पञ्चभिर्गार्गीभिः क्रीतः पश्चगर्ग: पदः इत्य विकणो लुपः पित्त्वात्पुंवद्भावेन स्त्रीत्वनिवृचे प् । गोत्र इत्येव-औत्साश्छात्राः "उत्सादेर (६।१।१९) । पौनर्भवाः पौत्रा, दौहित्रा, नानान्द्राः "पुनर्भूपुत्र." (६।११३९) इत्यादिना ५पारशवाः "परखियाः परशुश्वासावण्ये" (६३११४०) इत्यञ् ॥ कथं प्रियो गाग्यों गाग या येषां ते प्रियगाव् इति ? अत्र हि यअन्तस्य बहुविपयत्वात् लुप्पाप्नोति । नैवम् नात्र यमन बहुपु किं तर्हि समासः । स च "प्रत्ययः प्रकृत्यादेः" (७४।११५) इति नियमाद्यबन्तो न भवति प्रिया गर्गा यस्य स प्रियगर्ग इत्यत्र तु यजन्तस्य बहुत्वाद्भवत्येवेति ॥ "कौण्डिन्यागस्त्ययोः कुपित नागस्ती च" (६१११२७) । कौण्डिन्य आगस्त्य इत्येतयोबहुत्वविशिष्टे गोत्रेऽर्थे वर्तमानयोर्यत्रो. १० णश्चाऽस्त्रियां लुप् स्यात्, तयोश्च कुण्डिनी-अगस्त्यशब्दयोः कुण्डिन--अगस्ति इत्यादेशौ स्याताम् आगस्त्यशब्दस्य ऋष्यणन्तत्वाधनौ न सम्भवतः । कुण्डिन्या अपत्यं गर्गादित्वाद्यन् । अत पर निर्देशात् पुंवद्भावाभावः-कौण्डिन्यः । कौण्डिन्यो । कुण्डिनाः ।। आगस्त्यः । आगस्त्यौ । अगस्तयः । प्रत्ययलोपं कृत्वादेशकरणमगस्तीनामिमे आगस्तीया इत्येवमर्थम् । प्रत्ययान्तादेशे हि कृते अगस्ति शब्दस्यादेरकारस्थाभावात् "वृद्धिर्यस्य स्वरेष्वादिः" (६।१।८) इत्यप्राप्तौ दुसंज्ञाऽभावात्-"दोरीया १५(६।३।३२) इति न स्यात् । प्रत्ययलुब्विधानात्तु ईयप्रत्यये भाविनि "न प्राग्जितीये." (६३१११३५ इति निषेधात् प्रत्ययलुप् न स्यात्, ततश्च आगस्तीया इति सिद्ध्यति । कुण्डिन्यामविशेषः । प्रत्ययान्ता देशे हि फुण्डिनशब्दाददुसंज्ञकात् "तस्वेदम्" (६।३।१६०) इत्यण् स्यात् । प्रत्ययस्य तु लुपि " माग्जितीय." इति निषेधात् सत्यामपि दुसंज्ञायामीयापवादः शकलावित्वादनेव स्यात्तत उभयथापि कुण्डिनानामिमे कौण्डिना इत्येव स्यादिति ॥ १३ ॥ प्रसङ्गागतवृद्धापत्यस्य लक्षणमाह। पौत्रादि वृद्धम् ॥ १४॥ [सि०६०२] परमप्रकृतेर्यत्पौत्राद्यपत्यं तदृद्ध स्यात् । विदस्य वृद्धमपत्यं वैदः और्वः ॥ १४ ।। "पौत्रा०" स्पष्टम् । विदा इति । एवं काश्यपः काश्यपी कश्यपाः । अथेन्द्रहुः सप्तमः काश्यपानां भारद्वाजानां कत्तमोऽसीत्यत्र बहुपु लुप् करमान भवति ? नायम किन्त्यस्येदमित्यण् । सर्वेषामपि हि पितरोऽभेदोपचारात् कश्यपाः । यथा बभ्रुः मण्डः लमक इति । युद्ध इति किम् ? विदस्यानन्तरम- पत्यं वैदिः । निद उर्व कश्यप कुशिक भैरद्वाज उपमन्यु किलात कीदर्भ विश्वानर #ष्टिपेण १० त- २६भाग, हर्यश्व, प्रियक, पियक, अपस्तम्भ, कुवाचर पूवाचर शरद्वत् (शुनक) सुभग, धेनु २० उत्सा- १ मप्र कश्यपसतानापेक्षया बहुवचनं न तु भ्रातृवर्गापेक्षया । भय गण.-२ विन्दत्सवयवी भवति खगोत्रे 'निन्दन एम' इति या विद. 1 ३ उर्वति अष्टप्रकार में उपः । ४ कशामर्हति कश्यः, अनया व्युत्पत्या पुरुष एव लभ्यते न मर्य, ग, पुरुषो मयोगाकशायोग्यः भतस्तदेव शायोग्यम् पश्यं पिबति कश्यप.पुश्यात सत्तमम 'कुशिक-इवि साधुः । ५ यज पर्नगती वा मरन्तं याजयति भरद्वाज. । ६ उपगतो मन्यु बहुमीहिर्वा उपमन्युः । । किरतीति 'नाम्युः पान्त्य'-इति के फिलसमतति किरातस्य स्थाने या रिल्यतः १८ कस्य भार्या की क्या दर्भ र पवित्रः कीदर्भ १९ विश्वे नरा षय विश्वानर । १. ऋटयः सेनायाम् ऋवित् सेना वा यस्य ऋषिणः । ११ तेन सत्सेन भागो भागधेयं यस्य अतः भागः । ११ हरयो नीलपर्णा वा यस हर्यश्व । १३ प्रिय र प्रियक । १M कायति या पियति उष्णं पानीयादि कोचक-वि पि ५ अपसभाति पार कर्म अपलम. सितं यान्ति विच् , पुवा नयाँ पार्टन भरवि पायात वावरत। १५ बाहुलबहीर्घते वाचारः । १८ शरद उपकारमतयाऽस्सास्ति शरदत् । १९ शुनति परमा गति पररे'-वि 'नाम्युपान्स'-दति के शुन ए शुनकः । २. धीयते मसासरवमिति धेनुः । २० ? R. 13 .

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३३९ दिषु घेनुशब्दः सद्यःप्रसूतगव्यादिवाचकः । अयमृषिवचनः । अश्व, शङ्ख, गोपवन १ शि २ विन्दु ३ ताजम ४ अश्वावतान ५ श्यामाकं ६ श्यामाक ७ इँयापर्ण ८१३० हरित किन्दास, वैस्यस्क, अकलुश, वध्योग, विष्णुवृद्ध, वृष्णिवृद्ध, 'प्रतिवोध, स्थीतर ४० रन्तर गविष्ठिर गविष्ठिल निषाद, शैवर, मैंठर, संदाकु, पुंदाकु ४८ केचिदेतौ हरितादेः प्राक् पठन्ति । तन्मते "हरितादेरब" (६।११५५) इत्यायनण न भवति । मठरशब्दो गोपवैनादावपि अबो लुक्भावार्थम् केचित्पठन्ति १५ अन्य तु मठरात् यकारादिवमिच्छन्ति-मायः माठौँ । वहुवबो लुपि सन्नियोगशिष्टत्वाद्यस्यापि निवृत्तिरिति मठराः । अष्टचत्वारिंशद्विदादयस्तेष्वष्टौ गोपवनादयः श्यापर्णान्ताः ॥ १४ ॥ गर्गादेयं ॥ १५॥ [सि० ६११४२] बुद्धे । गायः ॥१५॥ "गर्गा.” वृद्धे इति किम् ? अनन्तरापये गार्गिः । गोत्र इत्येव-ार्गो नाम कश्चित्तस्यापत्यं वृद्धं १० गार्गि: । ननु मनोरत्र पाठालोहितादित्वात् स्त्रियां नित्यं डायनि ब्यां च मानव्यायनीति स्यात् तत्कथं मानवी प्रजेत्युच्यते-अपत्यसामान्यविवक्षायां "ङसोऽपत्ये” ( ६।१।२८) इत्यण् । कथमनन्तरो रामो जामदग्न्यः व्यासः पाराशर्यः ? पुत्रेऽपि पौत्रादिकार्यकरणात्तथोच्यते । अनन्तरापत्यविवक्षायां जाम- दग्निः । पाराशरिः । कथं पाराशरः ? "तस्येदम्” ( ६।३।१६० ) इति विवक्षायाम् । गर्ग, वत्स, वाज, अज, संस्कृति, संकृति व्याघ्रपात्, विभृत् , पितृवध् , प्राचीनयोग, पुलस्ति, रेभ, अग्निवेश, शङ्ख १५ शट । धूम अवद, नमस, चमस, धनञ्जय, (वृक्ष), विश्वावसु जरमाण, कुरुकत, अनडुङ्, लोहित, संशित, वक्र ? वभ्र, वभ्लु, मुण्डु, मञ्ज, मखु, शस्थु, शङ्ख, लतु, लिगु, गृहल, जिगीपु, मनु, तन्तु, मनुतन्तु, मनायी । अणेयणोः प्राप्तावस्य पाठः । पुंवद्भावस्तु "कौण्डिन्यागस्त्ययोः०" (६।१। १२७ ) इति कौण्डिन्यनिर्देशादनित्य इति न भवति । सूनु, स्रुव, कच्छक, ऋक्ष, रुक्ष, हम, तरुक्ष, तलुक्ष, तण्डैिन् , वतण्ड, कपि, कत, शकल, कण्व, वामरथ, गोकक्ष, कुँण्डिनी, यज्ञवल्क पर्णवल्क, २० अभयजात, विरोहित, पगण, रहोगण, शण्डिल, मुद्गर, मुद्गल, मुसर, मुसल, पराशर, जस्तूकर्ण, मन्द्रित अश्मरथ, शर्कराक्ष, पूतिमाप, स्थूर, स्थूरा, अरराका, पिङ्ग, पिङ्गल, कृष्ण, गोलन्द, उलूक, तितिभ भिष, भिपज, भिष्णज, भण्डित, भडित, दल्भ, चिकित, देवहू इन्द्रह, यज्ञहू, एकलू,२३ १ गोपानुपवनति वनुते वा गोपवनः। २ शेरते गुणा अन शिनोति वा शिग्रु। ३ वेत्तीलेवंशीलो 'विन्द्विच्छु' विन्दुः । ४ तां लक्ष्मी जमति ताजमः । ५ अश्वानवतनोति अश्वावतानः । ६ इयायतेः 'मवाक०' इति श्यामाकः । ७ श्यायन्ते श्याः श्यायां वसती गतानां पर्णयति आदीकरोति देशनया श्यापर्णः । ८ 'हृस्या-' इति हरितः। ९ किमपि दासते किंदासः । १० वसिमस्यति-"मीणशलि-' इति के वस्यस्कः। ११ अर्कमपि रुशति तेजसा अर्कलुशः। १२ वधमर्हन्ति वध्यास्तान् उमति 'मूलविभूज-' इति के वध्योगः । १३ विष्णुवत् वृष्णिवद्वा वृद्धः विष्णुवृद्धः । १४ वृष्णिवृद्धः । १५ प्रतिबोधयति प्रतियोधः। १६ रथ्या तरति रथीतरः । १७ 'भृवृजि-' इति खे रवंतरः । १८ निपीदन्ति गुणा अनेति निपादः । १९ 'ऋच्छिचटि-' इत्यरे शवरः । २० मठरः । २१ 'सृपृभ्यां दाकुक्' सुदाकुः । २२ पृदाकुः । इति विदादयः ॥ २३ न केवलं हरितादी। २४ गिरति वदति निरवद्यमिति 'गम्यमि-' इति 'मावावद्यमि-' इति च गसी गर्गः । २५ विदं विभर्ति पितरं वनाति विप विदभृत पितृवध् । २६ लक्षणं रूक्षः । २७ तरून् क्षयति तरुक्षः । २८ अवश्यं तण्टते तण्डी । २९ प्रसे वामरथः । ३० गोरिव कक्षो भक्ष्यः पानी वा अस्य गोकक्षः । ३१ अवश्यं कुण्डते कुण्डिनी । ३२ यज्ञे वल्कोऽस्य यज्ञवल्कः । ३३ प्रसे, अभयः, जायते त्म, जातः, चसे अभयजातः । ३४ विशेषेण रोहति 'हस्या' इति विरोहितः । ३५ वृपान् गणयति पगणः । ३६ रहो गणयति रहोगणः । ३७ परावृत्त्या शृणाति पराशरः । ३८ मन्द्रो गम्भीरः शब्दः सोऽस्यास्ति तदस्य-' इतीतः । ३९ अश्मयद्रथोऽस्य अश्मरथः । ४० शर्करावत् अक्षिणी यस्य 'सक्थ्यणः-' शर्करामः । ४१ पूतयो मापा यस्य पूतिगापः । ४२ अरा अराकाराणि भक्ष्याणि राति 'भीणशलि-' इति अरराका । ४३ 'स्फुलिकति' इति पिसः । ४४ गां टुनाति 'कुमुद-' इति गोलन्दः गोलाया मुनत्ति साति वा । ४५ त्तनाति 'जल'-इति तितिम्मः। ४६ भिपिः सीत्रः के भिषः ।

५ ३४० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पिप्पलू, पलू, हल, पफल, बृहदग्नि, जमदग्नि, सुलामिन, कुटीगु, उक्थ, कुदल, पणक, चुलुक, कर्कट, अलापिन्, सुवर्ण, सुलाभिन्, इति गर्गादिः । नवोत्तरं शतं ? गर्गादयस्तेष्वेकोनत्रिंशत् लोहि- तादयः शकलान्ताः । बहुत्वे चेत्यादि, गर्गा इत्युदाहरणम् ॥ १५ ॥ व्यञ्जनात्तद्धितस्य ॥ १६॥ [सि. २४८८] व्यञ्जनात्परस तद्धितस्य यो ड्या लुक स्यात् । गार्गी ॥ "कुञ्जादे अन्यः" (६११४७) युद्धे । कौञ्जायन्यः ॥ "स्त्रीबहुष्वायनम्" (६।११४८)। वृद्धे। कौञ्जायनी कौञ्जायनाः ॥ "अश्वादेः" (६।११४९) आयनञ् । वृद्धे । आश्वायनः ॥ "नडादिभ्य आयनण" (६११५३)। वृद्धे । नाडायणः ॥१६॥ "व्यञ्ज०” स्पष्टम् । यमो विशेपास्त्वेवम्-"मधुवभ्रो ह्मणकौशिके" (६११४३) वृद्धा. १० पये इति ज्ञेयम् । माधव्यो ब्राह्मणः, माधवोऽन्यः । बाभ्रव्यः कौशिकः, पानवोऽन्यः । बोर्ग- दिपाठाद्यनि सिद्ध कौशिके नियमार्थ वचनम् । गर्गादिपाठस्तु लोहितादिकार्यार्थः । तेन वाभ्रव्या- यणीति निलं डायन् । केचित्वकौशिकेऽपि लोहितादिपाठात् यजमिच्छन्ति, तन्मतेनेदं यविधानं यभ्रोलोंहितादेहिष्करणार्थम् , तेन कौशिके यमि सति लोहितादि कार्य न भवति । तथा च स्त्रियां डायन्या भवति । बाभ्रवी वाभ्रव्यायणी च कौशिकी ॥ "कपिवोधादागिरसे" (६११४४)। १५ फरपत्यं युद्धमानिरसा काप्यः । एवं योध्यः । अन्यः कापेयः बौधिः ॥ कपिशब्दो गर्गादिषु पठ्यते, तस्येहोपादानं नियमार्थम् । अगिरस एव यन्, नान्यत्रेति । लोहितादिकार्यार्थश्च गणपाठ', काप्यायनी । मधुबोधयोस्तु यजन्तयोरुभयम्-माधवी माधव्यायनी । बौधी बौध्यायनी ॥ "वत- ण्डात्" (६३११४५)। तथा । वतण्डस्यापत्यं वृद्धमादिरसः वातण्ड्यः । आहिरसादन्यत्र गर्गादिशिवादिपाठाद्यम् अण् च भवतः । वातण्ड्यः वातण्डः । गर्गादिपाठादेव यनि सिद्धे २० वचनमागिरसे शिवायण्वाधनार्थम् । शिवादिपाठोऽप्यस्य वृद्ध एवाण्विधानार्थः । अन्यत्र हि ऋपित्यादेवाण सिद्धः ॥ "स्त्रियां लुप्" (६।११४६) अनन्तरसूत्रोक्तस्य यनः । वतण्डस्यापत्यं युद्धं स्त्री आङ्गिरसी यतण्डी। जातिलक्षणो डीः । अनागिरसे तु शिवादिपाठाद्वातण्डी, लोहितादिपाठा- द्वातण्ड्यायनी ॥ "कुमा०" वृद्ध इति किम् ? अनन्तरापर कौञ्जिः । कुञ्ज, प्रन, गण, भस्मन्, लोमन् , लौमायन्य । वदन्वादेवेति केचित् । औडुलीमायन्यः । शट, अयं गर्गादिष्वपि । शाक, २५शुण्डा, शुभा, विपाश् अयं शिवादिष्वपि । स्कन्ध, स्कम्भ, शङ्ख अयं गर्गादाववादी विदादौ च ! इति पुआदिः एकादश कुखादयः ॥ "स्त्री०" । कुञ्जादिभ्यो डसन्तेभ्यो यहुत्वविशिष्टे युद्धे स्त्रियां पायदुत्वेऽपि आयनञ् स्यात् । कुञ्जस्यापदं स्त्री कौमायनी । फुञ्जस्यापत्यानि कोजायनाः । “अन्धा" वृद्ध इत्येव-आश्विः । गोन इत्येय-अधो नाम कश्चित्तस्थापत्यं वृद्ध आश्विः । अश्व, शहाजन, उत्स, प्रीप्म, अर्जुन, वैल्य, अश्मन्, विद, फुट, पुट, स्फुट, रोहिण, सर्जुल, सर्जूर, सल, ३० पियर, भदिल, मटिल, (भडिल ) भण्टिल, २० भटक, भडित, भण्डित, प्रादृत, राम, उद क्षान्ध, पीव, रामोद, रामोदक्ष, अन्धमीय ३० फाश, फाण, गोल, आत, गोलाह, अर्क, सन, अर्फसन, शुन, पन, ४० पत, पद, पत्र, कुल, प्रीया, भविष्ठा, पावित, पवित्रा (पावित्र) पविन्दा गोगिन् ५० श्याम, धूम, धूम्र, वस्त्र, याग्मिन्, विश्वानर, विश्वतर, घत, सनस, सन, ६० सदा ३४जद, गद, जाट, अई (अर्थ) वीक्ष, विराम्प, विशाल, गिरि, पपल, गिरिचपल, ७० पुप, दासक, १पती साधुसनाधि पस्ट । २ र नावि पहलू । फलानि लनावि पोदण्दिलाद पप्पन । ? -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारस ३४१ चुपदासक, धाय्या, धन्य, धर्म्य, पुंसिजात, शूद्रक, सुमनस् , दुर्भनस्, ८० . आतत्र, उत्सातव, क्रितव, किव, शिव, खिव, खिप, खदिर, आनडुह्य, ८९ आनडुयायन इति यजन्तादाचनणापि सिद्ध्यति, प्राग्जितीयस्वरादौ तु "यूनि लुप्” (६।१।१३७) इति नियलुवर्थमत्योपादानम् । इत्यश्वादिः । एकोन्नवतिरश्वादयः । अत्र योऽश्वादिवृद्धकाण्डेऽन्यत्रापि पठितस्तस्य सोपि स्यात् । यथा अश्वशब्दस्य विदादिपाठादबू । इहागनन् । आश्वः । आश्वायनः ।। शसस्य विदादित्वादन् । गर्गादि-५ त्वाद्यन् । कुञ्जादित्वात् मानन्यः । इहायनम् । शाङ्खः । शायः । झाडायन्यः । शायायनः ।। जनस्य नादित्वादायनण् । इहायनन् । तत्र यूनि प्रत्यये विधेयेऽयं विशेषः । जानायनिः, जानायनो युवा ।। उत्सग्रीष्मयोरुत्सादिषु पाठोऽनन्तरार्थोऽनपत्यार्थश्च । इह तु वृद्धेऽयमेव यथा स्यादित्येवमर्थः । औत्सा- यनः । श्रेष्मायणः ॥ अर्जुनशब्दस्य वाहादिपु पाठोऽनन्तरार्थः । वृद्ध त्वयमेव आर्जुनायनः ॥ वैल्येति विलिशब्दो ब्यान्तस्ततो यूनि प्रत्ययः । वैल्यायनो युवा ॥ १० आयनविशेपास्त्वेवं "शपभरद्वाजादात्रेये” (६।११५०) वृद्धे । शापायनः । भारद्वा- जायनः आत्रेयश्चेत् । आत्रेय इति किम् ? अन्यः शापिः । भारद्वाजः भारद्वाजी विदादौ । “भर्गा- गते" (६।१।५१) । वृद्धे । भार्गायनः गर्तश्चेत् । अन्यो भार्गिः । “आत्रेयाद्भारद्वाजे" (६।११५२) आत्रेयाबृद्धप्रत्ययान्ताद्भारद्वाजे यून्यपत्ये आयनञ् स्यात् । आत्रेयायणो भारद्वाजो युवा । आत्रेयोऽन्यः । "बिदार्पात्" (६।१।१४०) इतीमो लुप् । “नडा०" । नडस्य वृद्धापत्यं नाडा-१५ यनः । वृद्ध इत्येव-अनन्तरापत्यं नाडिः । नड, चर, वक, मुख, इतिक, इतिश, उपक, लमक, सप्तल, (सत्तल ) सत्वल, १० व्याज, (वाज), व्यतिकेत्येके । प्राण, नर, सायक, दाश, मित्र, दाशमित्र, द्वीपा, द्वीप, पिङ्गर, २० पिङ्गल, किङ्कर, किङ्कल, कातर, काथल, काश्यप, काश्य, नाव्य, अज, अमुष्य, ३० लिगु, चित्र, अमित्र, कुमार, लोह, स्तम्ब, स्तम्भ, अग्र, शिंशपा, तृण, ४० शकट, मिकट, मिमत, सुमत, जन, ऋच् , इन्ध, ऋगिन्ध, मित, जनन्धर, जलन्धर, ५० युगन्धर, हंसक, २० दण्डिन् , हस्तिन् , पञ्चाल, चमसिन् , सुकृत्य, स्थिरक, ब्राह्मण, चटक, ६० अश्वल, खरप, बदर, शोण, दण्डम, छाग, दुर्ग, अलोह, आलोह, कामुक (कामक) ब्रह्मदत्त, उदुम्बर, सण, लङ्क, केकर, (ककर) नाव्य, आलाह, ऋग, घृपगण, ८० अध्वर, वालिश, दण्डप, ८३ इति नडादयत्यशीतिः । वहुवचनमाकृतिगणार्थम् ॥ १६ ॥ अमुण्यशब्दो यो नडादिपु पठितस्तत्य निप्पत्तिमाह- अदसोऽकसायनणोः॥ १७॥ [सि० ३३३३] अकजन्ते उत्तरपदे आयनणि चादसः पठ्या अलुप सात् । अमुप्यापत्यं आमुप्यायणः॥१७॥ "अदसो०" स्पष्टम् ।। १७ ।। यञिञः॥१८॥ [लि० ६११५९ ] वृद्धे यो यनिजी ततो युन्यपत्ये आयनण् सात् ॥ १८॥ "यभिः" निगदसिद्धम् । अय प्रसद्भागवल युवापत्यस्य लक्षणनाइ ।। १८ ।। १ अन्यथा 'यापनगानिमोः' इति विकल्यः यत् । २ आयनिग्रो निनात् 'निदादागिनो:' खनन मूत्युसमेलो लुभपति नापनमः ।

आदिशब्दोपसदृहीता आयनण्यिशेपास्त्वेवम् । “हरितादेरजः" (६।११५५) । पिदाधन्तर्गणो ३४२ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपशहैमलधु- वंश्यज्यायोभ्रात्रोर्जीवति प्रपौत्राद्यस्त्री युवा ॥ १९॥ [सि०६।१।३] पित्रादि: खहेतुश्यो; वंश्ये, ज्येष्ठभ्रातरि च जीवति प्रपौत्राद्यपत्यं स्त्रीवर्ज युवा स्यात् । *समानसप्तमपुरुपे च वयःस्थानाधिके जीवति जीवद् वा ॥ १९ ।। "वश्य." वंश्य इति-वशे भवो वश्यस्तस्मिन् , ज्येष्ठभ्रातरीति ज्येष्ठो अयोऽधिकः एकपिटक, ५एकमातृको वा भ्राता तस्मिन् । प्रपौत्राधपत्यमिति-प्रपौत्रः पौत्रापत्य परमप्रकृतेश्चतुर्थः, अयम:- खीवर्जितं प्रपौनाद्यपत्य वंश्यज्येष्ठनानोर्मध्ये एकस्मिञ्जीवति युवसज्ञ स्यात् । यथा गाायण. । वात्स्यायनः । वश्यज्यायोधात्रोरिति किम् ? अन्यस्मिञ्जीवति गार्यः । ज्यायोमहणं किम् ? कनीयसि प्रातरि जीवति गायः । जीवतीति किम् ? मृते तस्मिन् गार्यः । प्रपौत्रादीति किम् ? यौत्री गायः । अनीति किम् ? गार्गी । जीवतीयकरचननिर्देशः पृथगनिमित्तत्वद्योतनार्थः । अत्र सोपेण विशेष- १० माह--*समानेत्यादि, अन सूत्रम्-"सपिण्डेवयास्थानाधिके जीवद्वा" (६१२४) । ययोरेकः पूर्व सप्तमः पुरुपस्तावन्योऽन्यस्य सपिण्डौ । वयो यौवनादि । स्थान पिता पुत्र इत्यादि । परमप्रकृतेः स्त्रीवर्ज जीवत् प्रपौत्राद्यपत्य वय स्थानाभ्या द्वाभ्यामप्यधिक सपिण्डे जीवति जीवदेव युवसज्ञ वा स्यात् । पितृव्ये पितामहस्य भ्रातरि वा वयोऽधिके जीवति जीवदार्गस्यापत्य गायः गाायणो वा । सपिण्ड इति किम् ? मातुलादौ जीवति गार्य. । वय स्थानाधिक इति किम् ? द्वाभ्यामन्यतरेण वा १५न्यूने गार्यः । लघौ भ्रातृव्ये (पितृव्यजे) द्वाभ्यां न्यूनत्वम्, लघौ पितृव्येऽन्यतरेण न्यूनत्वम् । जीवदिति किम् ? मृतो गार्यः । सपिण्डो न वश्यो न भ्रातेति वचनम् । अनादिशब्दग्रहणात् “युववृद्धं कुत्साचे वा” (६।१।५) । युवा च वृद्ध चापत्य यथासम कुत्सायाम_या च विषये युवसज्ञ वा भवति । यून कुत्साया पक्षे युवत्व निवर्त्यते, तत्र युद्धप्रत्यये- नाभिधान भवति । गार्यस्थापत्य युवा कुत्सितो गायः गार्यायणो वा जाल्म'-गुर्वायत्तो भूत्वा २० स्वतम्रो यः स एवमुच्यते । फुत्साया अन्यत्र गाायण एव । वृद्धस्य चा या पक्षे युवत्व प्राप्यते- तत्र युवप्रत्ययेनाभिधान भवति, गर्गस्यापत्य वृद्धमर्षितम् , तत्रभवान् गाायणः गाग्र्यो या । अर्चाया अन्यन गार्य एव । अस्त्रीत्येवमार्गस्यापत्य पौनादि स्त्री गार्गी ॥ १९ ॥ अथ युवापत्यार्थप्रत्ययस्य प्रकृतिमाह ।---- वृद्धाश्रूनि ॥ २० ॥ [ सि० ॥१॥३०] २५ यून्यपत्ये या प्रत्ययः स आधादृद्धप्रत्ययान्तात् स्यात् । गर्गस्य वृद्धापत्यं गायेस्तस युवा- पत्यं गाायणः । दाक्षायणः ॥२०॥ "वृद्धा" । स्पष्टम् । .. हरितादि । हरितादिभ्यो युद्धविहिवाश्प्रत्ययान्तेभ्यो यून्यपत्ये आयनम् स्यात् । हारितस्यापत्य युवा ३० हारिवायन: । हरितादेरिति किम् ? पैदस्यापत्य युवा पैद. अनेनो लुप् । अन इति किम् ? हरित. स्थापत्य गृद्ध हारिवः । मोष्टशलङ्कोलक च" (६।११५६) । आभ्या युद्धे आयन, अनयोरन्त्यस लुर । गोप्टरपत्य प्रौष्टायन । शालझायनः । “दर्भकृष्णाग्निशर्मरणशरद्वच्छुनकादाग्रायण ब्राह्मणवार्पगण्यवाशिष्ठभार्गववात्स्ये" ( ६५७)दर्भादिभ्यः पड्भ्यः आप्रयणादिषु पदर ३४ वृक्षापत्ये आपना स्वात् । दर्भखापत्यमामायणधेत दार्भायण, दारिन्यः । मायनो मासण.

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः काष्णिरन्यः।आग्निझमायणो वागण्यः आग्निशमिरन्यः।राणायनो वाशिष्टः, राणिरन्यासारद्वतायनों भार्गवः, शारद्वतोऽन्यः । शौनकायनो वात्स्यः, शौनकोऽन्यः । शरद्वच्छुनको विदादी ॥ "जीवन्त- पर्वताद्वा” (६।११५८) । जैवन्तायनः, जैवन्तिः । पार्वतायनः पार्वतिः ॥ "द्रोणाद्वा" (६।११५९)। योगविभागाद्वृद्ध इति निवृत्तम् । द्रोणशब्दस्यापत्यमाने आयनण् वा स्यात् । द्रोणायन: द्रौणिः ॥ २०॥ शिवादेरण ॥ २१॥ [सि० ६।१।६०] इनोऽपवादः । आधिकारादपत्ये इत्यनुवर्तनीयम् । शैवः । प्रौष्ठः ॥ "ऋपिवृष्ण्यन्धक- कुरुभ्यः” (६।११६१)। अण् । वासिष्ठः । वासुदेवः । श्वाफल्कः । नाकुलः ॥२१॥ "शिवा०" गोत्रापत्यानन्तरापत्यवृद्धापत्ययुवापत्याधिकारस्य निवृत्तत्वादतः परमपत्यप्रत्ययाधिकार- समाप्तिं यावद्ये प्रत्यया विधास्यन्ते, तेऽपयसामान्य ज्ञेयास्तथा चाह आऽधिकारादित्यादि शिव, प्रौष्ट, १० प्रौष्टिक, वण्ड, (वण्ट, वृ० वृत्तौ ) जम्ब, जम्भ, ककुभ, कुथार, अनभिम्लान, ककुस्थ १० कोहड, कहूय, रोध, पिलधर, वतण्ड, तृण, कर्ण, क्षीरहद, जलह्रद, परिपिक, शिलिन्द, २० गोपिल (फि० वृ० वृत्ती) गोहिल, कपिलक, जटिलक, वधिरक, मस्जिरक, वृष्णिक, खञ्जार, खजाल, ३० रेख, लेख, आलेखन, कंग्र, वर्त्तन, ऋक्ष, वतनदं विकट पिटाक वृक्षाक (१० वृ० वृत्ती) ४० नभाक, ऊर्ण- नाभ, सुपिष्ट, पिष्टकर्णक, पर्णक, मसुरकर्ण, मसूरकर्ण, खडूरक, गण्डेरक (गडेरक-वृ०वृत्ती) ५० यस्क, १५ लह्य, द्रुह्य, अयस्थूण, भलन्द, भलन्दन, विरूप, विरूपाक्ष, भूरि, सन्धि, ६० भूमि, मुनि, कुञ्चा, कोकिला, इला, सपत्नी, जरस्कार, उत्केया, काय्या, सुरोहिका, ७० पीटीनासा, महिनी, आर्यश्वेता, ऋष्टिपेण, गङ्गा, पाण्डु, विपाश् , तक्षन्, इति शिवादयः एकोनाशीतिः । अन आविरूपाक्षादिनोऽप- वादः। भूर्यादीनामा आर्यश्वेताया एयणः, ऋष्टिपेणस्य सेनान्तस्य (?) सेनान्तब्येयोः। विदादिपाठावृद्धेऽ- बेव, तदन्ताच यूनि "अत इच्” (६।१।३१), तस्य "निदादणित्रोः" (६।१।१४०) इति लुपि, २० आप्टिंपेणः पिता, आष्टिंपेणः पुत्रः । तथा ऋष्टिपेणस्थापत्यं वृद्धं वहवः विदाद्यञ् । तस्य "यनमो." (६।१।१२६) इत्यादिना लुपि, ऋष्टिपेणाः ॥ पाण्डुपाठः शुभ्राद्येयणा, गगापाठस्तिकाद्यामिना च समावेशार्थः । तेन पाण्डोāरुप्यं गङ्गायाश्च त्रैरूप्यं सिद्धम् । पाण्डवः, पाण्डवेयः, गानः, गानायनिः । गायः ॥ विपापाठः कुत्रादिलक्षणेन बायन्येन समावेशार्थः । वैपाशः वैपाशायन्यः ॥ तक्षन्पाठः फुर्वादिव्येन समावेशार्थः । ताक्ष्णः ताक्षण्यः ॥ "ऋपि०" ऋपयो लौकिका वसिष्टादयः अपत्ययोगात १२५ वृष्णयोऽन्धकाः । कुरवश्च प्रसिद्धा वंशाख्याः (वंशनिमित्ता आख्या अभिधानं येपां ते) क्षत्रियाः । ऋष्यादिवाचिभ्योऽपयेऽण् स्यात्, (इञोऽपवादः) । वासिष्टः इति-एवं वैचामैत्रः, गौतमः, एते अपयः ॥ वासुदेव इति-एवं आनिरुद्धः । वानः । प्रातिवाहनः । ओदारः, एते पृष्णयः ॥ श्वाफलक इति-एवं रान्ध्रसः चैत्रकः एते अन्धकाः ।। नाकुल इति-एवं माहदेवः दीःशासनः दोर्योधनः पने पुरयः । अश्यादिभ्यन्तु परत्वादेवण ब्येनी च भवनः । आत्रेयः जानसेन्यः । जानसेनिः । औपमेन्यः1३० आपसेनिः । वैवसेन्यः । वैवरसेनिः भैमसेन्यः, भैमसेनिः । दीधिनिरिति तु नियामन्दवान दुःखेन युध्यते इति । चौधिष्टिरिः आर्जुनिरिति तु बालादित्वादिजेव ॥ २१ ॥ एषु फेयानिपिवाचिनां बहुत्वेऽलियामपत्यार्यन्य लय भवतीति । तत्र मुत्रनाद ---- - ३४४ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- भृग्वतिरस्कुत्सवसिष्ठगोतमाऽत्रेः ॥ २२ ॥ [सि०६।१।१२८ ] एभ्यः षड्भ्यो बहुत्वे गोत्रार्थप्रत्ययस्सास्त्रियां लुप् स्यात् । भृगवः । वसिष्ठाः । त्रियस्तु पासिष्ठ्या ॥२२॥ "भृग्व०" | भृगव इति । एवमगिरसाः 1 फुत्साः [ वसिष्ठाः । गोतमाः । अत्रयः। वहुत्व इति ५किम् ? भार्गवः भार्गवौ । आङ्गिरसः आङ्गिरसौ । कौत्सः कौत्सौ । वासिष्ठः वासिष्ठौ । गौतमः गौतमौ । आत्रेयः आनेयौ । गोनार्थप्रत्ययस्येति किम् ? भार्गवारछात्राः । अखियामिति क्रिम् १ स्त्रियस्तु भार्गव्यः । आशिरस्यः । कौत्स्यः । वासिष्ठ्यः । गौतम्यः । आत्रेय्यः ।। भृग्वादीन् यस्कादिष्वपठित्वेद वचनम् "येकेषु पठ्यास्तत्पुरुपे यवादेवी" (६।४।१३४) इत्येवमर्थमन्यथा भृगुफुलं भार्गवकुलमिति ने सिद्धयेत् । १० अनादिशब्दानुसन्धानात् “यस्कादेर्गोत्रे" (६१।१२५) वहुत्वविशिष्टे गोत्रेऽर्थे वर्तमानस्य यस्कादेर्यः स प्रत्ययस्तस्याखियां लुप् स्यात् । यास्कः । यास्कौ ! यस्काः । नियास्तु यास्क्यः । यस्क- स्थापत्यानि यस्कास्तत्प्रतिकृतयो यास्का इत्यन गोने उत्पन्नस्यापि प्रत्ययस्य नेदानी तदन्त प्रतिकृतिषु वर्तमानं गोत्र इति न भवति । यस्क ला द्रुह्य अयस्थूण तृणकर्ण भलन्दन ६ एभ्यः पड्भ्यः शिवा- घणो लुप् । सरप अरमान्नडाद्यायनणः । भडिल भण्डिल भडित भण्डित ४ एभ्योऽश्वाचायनमः। १५सदामत्त, कम्बलहार, पर्णाढक, कर्णाढक, पिण्डीजङ्घ, वकसक्थ रक्षोमुस, जष्ट्वारथ, उत्काश, कदुमन्य, फदुकमन्य, विषपुट निकप (किपकः) कपक, उपरिमेखल, फडम, कश, पटाक क्रोष्टुपाद, क्रोष्टुमाय, शीर्षमाय, स्थगल, पदक, वर्मक, २३ एभ्योऽत इन्सः । पुष्करसद् अस्माद्बाहादीमः । विधि, कुद्रि, अजवस्ति, मिनयु, एभ्यो गृष्टायेयनः । इति यस्कादयः एकोनचत्वारिंशत् । “प्रारभरते बहुख. रादिनः" (६२१२९) बहुवरानानो य इञ्प्रत्ययस्तदन्तस्य बहुत्वविशिष्टेऽर्थे प्राग्गोने भरत- २० गोने घ वर्तमानस्य यः स प्रत्ययस्तस्यानियां लुप् स्यात् । क्षरकलम्भिः झरकलम्भी, क्षीरफलम्भाः। एवं पन्नागाराः । मन्थरपेणाः । एष्वत इन् । भरत. यौधिष्ठिरिः, यौधिष्ठिरी, युधिष्ठिराः । एवम- र्जुनाः । उद्दालकाः । एभ्यो वाहादीलः । प्राग्भरत इति किम् ? बालाकया हास्तिदासयः । कथ तोल्वलयः तेल्वलयः तेल्वकय इत्यादिपु लुप् न भवति ? उच्यते यस्कादिपु पुष्करच्छन्दपाठात् । अस्य हि पहुस्वरत्वादनेनैवेभ्लोपे सिद्ध तदर्थोऽयं यस्कादिपाठो ज्ञापयति-तौल्बल्यादीनामिमो लप २५न भवतीति । भरताः प्राच्या एव । तेपा पृथगुपादान प्रारमहणेनामहणार्थम् । तेन यौधिष्ठिरिः पिता योधिष्ठिरायणः पुत्र इत्या, "प्राच्ये मोऽतौल्वल्यादे!" (६।१११४३) इति लन् न भवति । अपरे स्वागुः-मागमणं भरतविशेषणम् । क्षीरफलम्भादयो वेश्याः प्राग्भरताः । युधिष्ठिरादयो रामान उदग्भरताः, तत्र प्रागपहणादुदीच्यभरतेषु राजसु लुन् न भवति । योधिष्ठिरयः । आर्जुनयः । भरत. महणातु प्राच्येषु राजसु न भवति-मारसम्बन्धयः । भागवित्तयः । बहुवराविति किम् ? २० पोप्पयः । फाशयः । याशयः । इन इति किम् ? शान्तनवाः । “योपकादेः" (६।१।१३०)। एभ्यो मदुत्वविशिष्टे गोने वर्तमानेभ्यो यः स प्रत्ययसस्वास्त्रिया वा लुप् स्यात् । उपका औपरायनाः। मनियामिति किम् ? औपकायिन्यः खियः । उपक, लगक, आभ्या नडाचायनणो लुप् । भ्रष्टक, परि. २३एल, कृष्णानिन, फष्णमुन्दर, पिङ्गला, कृष्णपिङ्गलक, पलशीकण्ठ, दामकण्ठ, जतुक, पनक, मदाप, १मगोपलमा वा कमश् । मार्गपस भार्गवयोर्वा पुम् । २ तदाऽयमादिलान्, तर हि यमायुफम् । तलप 'यामोसा'लारभ्य ये बहुते तर धेश एवदितमोरपि । चैत्यः।

. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३४५ अपजग्ध, अडारक, वटारक, प्रतिलोम, अनुलोम, प्रतान, अनुपद, अभिहित, अनभिहित, खारीजङ्घ, कझकृत्न, झलाथल, कमन्दक, कमन्तक, कवन्तक, पिञ्जलक, अडड्डुक, अवव्वक, पतञ्जल, पदञ्जल, पर्णक, वर्णक, ऋटेरित, एभ्योऽत इयः । कुपीतक-अत्र काश्यपेऽर्थे "विकर्णकुपीतकात्काश्यपे" (६।१।७५ ) इत्येयणः, अन्यत्रेयः । लेखाभ्रू अत्र शुभ्राद्येयणः । पिष्ट, सुपिष्ट, मसुरकर्ण, कर्णक, पर्णक, जटिलक, वधिरक, एभ्यः शिवाद्यणः । कठेलिति पतञ्जलि खरीखन एभ्य औत्सर्गिकाणः १५ इत्युपकादिः । “तिककितवादी द्वन्द्वे" (६।१।१३१) । एपा द्वन्द्ववृत्तीनां वहुपु गोत्रापत्येपु वर्त्त- मानेपु तकायनि-कैतवायनीत्यादीनां यः सप्रत्ययस्तस्यास्त्रियां लुप् स्यात् । तैकायनश्च कैतवायनश्च तिक- कितवाः तिकाद्यायनिनो लुम् ॥ औजयश्च काकुभाश्च उचककुभाः। उन्जादिनः ककुभाच्छिवाद्यणः ।। औरझायनश्च लाङ्कटयश्च उरझलङ्कटाः । उरशात्तिकाद्यायनिनः । लङ्कटादिनः ॥ अग्निवेशाश्च दाशेरक- यश्च अग्निवेशदशेरकाः । शण्डिलाश्च काशकृत्तयश्च शण्डिलकाशकृत्स्नाः । अग्निवेशशण्डिलाभ्यां गर्गा-१० दियत्रः । दशेरकझाकृत्स्नाभ्यां तु 'अत इञः' । “वान्येन" (६।१।१३३) इति यत्रो लुबिकल्पे प्राप्ते नित्यार्थः पाठः ॥ औपकायनाश्च लामकायनाच उपकलमकाः, अत्र नडाद्यायनणः ॥ भ्राष्टकयश्च कापि- टलयश्च भ्रष्टककपिष्टलाः । कार्णाजिनयश्च कार्णसुन्दरयश्च कृष्णाजिनकृष्णसुन्दराः । वायरयश्च भाण्डीरथयश्च वसरभण्डीरथाः । पाहकयश्च नारकयश्च पहकनरकाः । वाकनखयश्च स्वागुदपरिण- द्वयश्च वकनखस्वगुदपरिणद्धाः । अन्येपां वाकनखयश्च स्वागुदयश्च परिणद्धयश्चेति त्रिपदो द्वन्द्वः । (ता) १५ लायश्च शान्तमुखयश्च (ता)लाङ्कशान्तमुखाः एषु सर्वेपु "अत इत्रः" उपकलमक'-भ्रष्टककपिष्टल, कृष्णाजिनकृष्णसुन्दर, इत्येपामुपकादिष्वद्वन्द्वार्थः पाठः । द्वन्द्वे त्वयमेव नित्यो विधिः ॥ इति तिक- कितवादयो द्वादश ॥ “ोकेषु पष्ठयास्तत्पुरुपे यनादेवा" (६।१।१३४) । पष्ठीतत्पुरुपे यत्पदं तस्याः पष्ट्या विपये द्वयोरेकस्मिंश्च वर्त्तते, तस्य यः स यबादिः प्रत्ययस्तस्य तथा वा लुब् भवति, यथा पूर्वम् । गाय॑स्य गार्ययोर्वा कुलं गर्गकुलं गार्यकुलम् । विदकुलं वैदकुलम् । अगस्तिकुलं आग-२० स्त्यकुलम् । भृगुकुलं भार्गवकुलम् । ब्येकेप्विति क्रिम् ? गर्गाणां कुलं गर्गकुलम् । पठ्या इति किम् ? गाय हितं परमगार्यः । पठ्या इति तत्पुरुपस्य विशेपणेन प्रतिपदोक्तस्यैव पष्ठीतत्पुरुषस्य परिग्रहादिह न भवति । गाय॑स्य गार्ययोन्तिर्गतः अन्तर्गाग्यः "प्रात्यव०” (३।१।४७) इत्यादिना समासः । ब्बेकेबित्यस्य पष्ठ्या इति विशेषणं किम् ? देवदत्तस्य गायः देवदत्तगार्ग्यः देवदत्तगाग्यौँ । तत्पुरुप इति किम् ? गाय॑स्य समीपमुपगार्ग्यम् । यादेरिति किम् ? आङ्गकुलं यास्ककुलम् । “न प्रागजितीये २५ स्वरे" (६।१।१३५) । गोत्र इति वर्त्तते । गोने उत्पन्नस्य वहुपु या लुवुक्ता सा प्राजितीयेऽर्थे यो विधीयते स्वरादिस्तद्धितस्तस्मिन्विपयभूते न भवति । गर्गाणां छात्राः गार्गीयाः । वात्सीयाः । आत्रेयीयाः । आगस्तीयाः । खारपायणीयाः । हारितीयाः । प्राजितीये इति किम् ? अत्रिभ्यो हितः अत्रीयः । अगस्तीयः । गर्गीयः । वत्सीयः । स्वर इति किम् ? गर्गभ्य आगतं गर्गमयम् । गर्गरूप्यम् । विदानामपत्यं युवा वैदः वैदौ इत्यत्र तु इनि विषयभूतेऽनेन प्रतिपेधः । इमस्तु लुपि सत्यामचन्तं न ३० बहुपु वर्तत इति लुपः प्राप्तिरेव नास्ति । यत्र त्वस्ति तत्र भवत्येव । बिदानामपत्यानि विदाः । अथेह कस्मान्न भवति ? अत्रीणां भरद्वाजानां च विवाहः अत्रिभरद्वाजिका । वसिष्ठकश्यपिका । भृग्वाङ्गिर- सिका । कुत्सकुशिक्रिकेति । उच्यते । प्रत्यासत्तेर्यस्य प्रत्ययस्य लुप् प्रतिपिध्यते । तल्लोपिप्रत्ययान्तादेव (स लोपी प्रत्ययोऽन्ते यस्य तस्मादित्यर्थः) विधीयमाने स्वरादौ प्रतिषेधः । अत्र तु द्वन्द्वाद्विधीयते । न तल्लोपिप्रत्ययान्तादिति प्रतिषेधो न भवति । "गर्गभार्गबिका" (६।१।१३६) इत्युत्तरसूत्रं वा नियमार्थ व्याख्यायते । गर्गभार्गविकाया अन्यत्र द्वन्द्वे वृद्धे यूनि वा प्रतिपेधो न भवति । गोत्र ३६ है. प्रका० पूर्वा० ४४ ..

३४६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- इत्येव-कुवल्याः फलं कुवलं तस्येदं कौवलम् ॥ "गर्गभार्गविका" (६।१११३६) । अस्मान्द्वा. नागजितीये विवाहे योऽकल्प्रत्ययस्तस्मिन्नणो लुप्रतिषेधो निपात्यते । गर्गाणां वृद्धानां भृगूणां वृद्धानां यूनां च विवाहः गर्गभार्गविका । अत्रिभरद्वाजिकादिवदप्राप्तः प्रतिषेधो निपात्यते ॥ “यूनि लुप्" (६।१११३७) यून्यपत्ये विहितस्य प्रत्ययस्य प्रागजितीयेऽर्थे स्वरादौ प्रत्यये विपयभूते अनुत्पन्न एव ५लुबू भवति । लुपि सत्यां यो यतः प्राप्नोति स तत उत्पद्यते । पण्टाहतस्यापत्यं पाण्टाहतिस्तस्थापत्यं युवा पाण्टाहृतः । "पाण्टाहृतिमिमताण्णश्च" (६।१।१०४) इति णः । तस्य छात्रा इति प्राजितीये स्वरादी चिकीर्पिते णस्य लुप् । तत इअन्तं प्रकृतिरूपं सम्पन्नमिति । "वृद्धेऽनः" ( ६३२८) इत्यम् भवति । पाण्टाहृताः ॥ भगवित्तस्यापत्यं भागवित्तिः । तस्यापत्यं युवा भागवित्तिकः । "भागवित्ति- ताणविन्दव०" (६।१।१०५) इत्यादिना इकण् । तस्य छात्रा इति पूर्ववदिकणि निवृत्तेऽन्- २०भागवित्ताः ॥ वृपस्यापयं वार्ष्यायणिस्तस्यापत्यं युवा वार्ष्यायणीयः "सौयामायनि.” (६।१।१०६) इत्यादिना ईयः । तस्य छात्रा इति पूर्ववदीयस्य लुपि "दोरीयः” (६।३।३२) इतीयः वार्ष्या- यणीयाः ॥ कपिञ्जलादस्यापत्यं कापिञ्जलादिस्तस्यापत्यं युवा कापिअलाद्यः । कुर्वादित्वात् व्यः । तस्य छात्राः पूर्ववत् । न्यस्य लुपि "वृद्धेऽनः" इत्यञ् । कापिञ्जलादाः ॥ ग्लुचुकस्यापत्यं ग्लुचुरा यनिः, तस्यापर युवा ग्लोचुकायनः । औत्सर्गिकोऽण् । तस्य छात्रा इति पूर्ववत् अणो लुपि पुनः १५शैपिकोऽणेव भवति-गलौचुकायनाः ॥ स्वर इत्येव-पाण्टाहृतमयम् । वार्ष्यायणीयरूप्यम् । प्रागजितीय इत्येव-भागवित्तिकाय हितं भागवित्तिकीयम् ॥ "वायनणायनिमोः" (६।१।१३८) अनयो\- न्यपसे विहितयोः प्राजितीये स्वरादी प्रत्यये विषयभूते लुब् वा स्यात् । गर्गस्थापत्यं गार्यस्तस्य युवापत्यं गाायणः “यभिम" (६।११५४ ) इत्यायनण् । तस्य छात्रा गार्गीया गाायणीया था। "दोरीयः" ( ६।३।३२) इतीयः ॥ चिकस्यापयं चैकिः तस्य युवापत्यं चैवायनः । तस्य छानाः २० पैकीयाः पेक्षायनीया वा ॥ आयनिषः सल्यपि होतुरपत्य होवस्तस्थापत्यं युवा होत्रायणिः "द्विस्व- रादणः” (६।११०९) इत्यायनिन् । तस्य छात्रा हौत्रीया हौत्रायणीया वा । "दोरीयः" इतीयः ।। आयनणो णित उपादानात् पितः पूर्वेण नित्यमेव लुप् । अत्रेरपत्यमानेयस्तस्यापत्यं भारद्वाजो युवा आत्रेयायणः । "आत्रेयाद्भारद्वाजे" (६।१।५२) इत्यायनम् । तस्य छात्रा आत्रेयीयाः ॥ "द्रीनो पा" (६।१।१३९) । (प्राग्जितीये स्वर इति निवृत्तम्)। दिसंज्ञो य इन् वदन्तात्परस्य युवप्रत्ययस्य लया २५ स्यात् । उदुम्बरस्यापत्यमोदुम्यरिः । 'साल्यांश०' (६।१।११७) इत्यादिनन् । तस्य युवापत्यं औदु. म्यरिः औदुम्बरायणो या । "यनिनः" इत्यायनण् ॥ द्रिग्रहणं किम् ? दाक्षेरपत्यं दाक्षायणः ।। इन इति किम् ? अद्गस्यापत्यमाङ्गः "पुरुमगध०" (६।१।११६) इत्यण । तस्यापत्यमिति "द्विखरा- दणः" ( ६।१।१०९) इत्यायनिन् । तस्य "अग्राह्मणात्" (६।१।१४१) इति नियं लुप् । आ. पिता आगः पुत्रः ॥ अमाक्षणादिति नित्यं लुप्प्राप्ती विकल्पोऽयम् । ३० (६।१।१४०)। मित् आप॑श्च योऽपत्यप्रत्ययस्तदन्तात्परस्य युवप्रत्ययस्य 'अण इमच लुन् भवति । पचनभेदापयासाऽभायः । मिता, तिकस्यापलं सेकायनिः "तिकादेरायनिम्" (६।१।१०७) तस्याः पसमात्मर्गिकोऽग् । राम्य लुप् सेफायनिः पिता पायनिः पुनः ॥ विदम्यापत्यं यदः । यिदादित्यादम् । ३३ सम्यापन "अव०" (६३१६३१) इतीम् सम्य गुर। थैदः पिता, यदः पुत्रः ॥ पुरोरपत्यं पौरख्यः १ मत सदस्य र भन्यगन्दा धान नेय गायनित पवेगेव सिरे संग पुर्यात्, नन्वायनर मादीन पपंया हाथीहए, गुम्दा तदा पन्ना मसूद प्ररिषदीये सराव प्रदो हना जो मोटीवेद कमर मशी! गम्, यदेत सातमा गनि उपियमा पुर्यार। ॥ - "मिदादणिमोः" प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३४७ "कुर्वादेर्व्यः” (६।१।१००) कौरव्यस्थापत्यम् "अत इम्” तस्य लुप् । कौरव्यः पिता, कौरव्यः पुत्रः ॥ तिकादिषु और शशब्दसाहचर्यात् कौरव्यशब्दः क्षत्रियगोत्रवृत्तिविज्ञायते, अयं तु ब्राह्मणगोत्र- त्तिरित्यत आयनिञ् न भवति ॥ आर्यात्-, वासिष्टः पिता, वासिष्ठः पुत्रः । वैश्वामित्रः पिता, वैश्वामित्रः पुत्रः । ऋष्यणन्तादिञ् तस्य लुप् ॥ आत्रेयः पिता, आत्रेयः पुत्रः "इतोऽनियः" (६।१।७२) इत्येयण- न्तादिन् तस्य लुप् ।। भिदादिति क्रिम् ? औपगवः पिता, औपगविः पुत्रः, औत्सर्गिकाणन्तादिन् ।५ कौहडः कौहडिः पुत्रः शिवाद्यणन्तादि । अणिमोरिति किम् ? दाक्षेरपत्यं दाक्षायणः ॥ "अब्राह्म- णात्” (६।१।१४१) अस्माद्वृद्धप्रत्ययान्ताधूनि विहितस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । अङ्गस्यापत्यमाङ्गः "पुरुमगध०" इत्यादिनाण् तस्यापत्यं द्विस्वरादणः' (६।१।१०९) इत्यायनिन् , तस्य लुप् । आङ्गः पिता पुत्रश्च ।। एवं सौह्मः पिता पुत्रश्च ।। मगधस्यापत्यं मागधः। "पुरुमगध०” इत्यण् । तस्यापत्यम् "अत इब्” (६।१।३१) तस्य लुप् । मागधः पिता पुत्रश्च ॥ एवं कालिङ्गः, शौरमसः पिता पुत्रश्च । तथा १० नाकुलः । साहदेवः । वासुदेवः आनिरुद्धः । रान्ध्रसः । श्वाफल्कः पिता पुत्रश्च । एभ्यः "ऋपिवृष्ण्य- न्धककुरुभ्यः" (६।१।६१) इत्यण् । तत इबो लुप् ॥ भाण्डीजाडियः । कार्णखारिः। मायूरिः। कापि- जलिः पिता पुत्रश्च-अत्र "अत इब्” इतीब् । तत आयनणो लुप् ॥ श्वशुर्यः, कुलीनः पिता पुत्रश्च । अत्रेको लुप् ॥ अब्राह्मणादिति किम् ? गायः पिता गार्यायणः पुत्रः । “पैलादेः” (६।१।१४२) एभ्यो यूनि विहितस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । ब्राह्मणार्थमप्राच्याथ वचनम् । पीलायाः अपत्यं पैलः । १५ "पीलासाल्वामण्डूकाद्वा” (६।११६८) इत्यण । तस्यापत्यं "द्विखरादणः” इत्यायनिञ् । तस्य लुप् । पैलः पिता पुत्रश्च ॥ शलङ्कोरपत्यं शालङ्किः । “शालयीदि०" (६।११३७) इत्यादि निपातनात्तस्यापत्यं "यभित्र" (६।११५४ ) इत्यायनण् । तस्य लुप् । शालङ्किः पिता पुत्रश्च ॥ पैल, शालकि, सात्यकि, सात्यकामि, औदन्यि, औदञ्चि, औदमन्जि, औदब्रजि, औदभृञ्जि, औदमेषि, औदशुद्धि, औदकशुद्धि, देवस्थानि, पैङ्गलौदयनि, राणि, राहक्षिति, भौलङ्गि, औद्गाहमानि, औजिहानि, औजहानि, इति पैला-२० दयो विंशतिः । “प्राच्येञोऽतौल्बल्यादेः” (६।१।१४३) प्राच्यगोत्रे य इब् तदन्तात् तौल्बल्यादिवर्जिताचून्यपत्ये विहितस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । ब्राह्मणार्थं वचनम् । पान्नागारिः । मान्थ- रपेणिः क्षैरकलम्भिः पिता पुत्रश्च । अत्र सर्वत्रात इञ् । ततो "यभिब” इत्यायनण् तस्य लुप् । प्राच्य- ग्रहणं किम् ? दाक्षिः पिता । दाक्षायणः पुत्रः । इत्र इति किम् ? राघवः पिता । राघविः पुत्रः । तौल्वल्यादिवर्जनं किम् ? तौल्वलिः पिता । तौल्बलायनः पुत्रः । तैल्वलिः पिता । तैल्बलायनः पुत्रः । २५ दालीपिः पिता । दालीपायनः पुत्रः । अत्र दिलीपशब्दस्यात एव निपातनादिनि वृद्धिराकारः । अपरे दलीप इति प्रकृत्यन्तरमाहुः ॥ तौल्वलि तैल्वलि तेल्वकि धारणि रामणि दालीपि दैवोति देवमति दैवयनि प्राटाहति प्रादाहति चाफड(?)कि आसुरि पौष्करसादि आनुराहति आनुति नैमिश्रि नैमिश्लि नैमिशि आशि, वान्धकि, (वाद्धकि, ?) यासि, आसिनासि, आसिवाद्धकि, चौंकि, पौप्पि, आहिंसि, वैरकि, वैलकि, वैशीति वैहति वैकर्णि, वार्कलि, कारेणुपालि, इति तौल्बल्यादिः । "अपत्यार्थप्रत्ययांनां वहुत्वादिविशेपिणाम् । इत्युक्तं लुप्प्रकरणमेवं शब्दोपजीवनात्” ॥ १ ॥ २२ ॥ अणो विशेषमाह । सङ्ख्यासम्भद्रान्मातुर्मातुर्च ॥ २३ ॥ [सि० ६।११६६ ] सङ्ख्यात्सम्भद्राभ्यां च परस मातुरण मातुरादेशश्च । पाण्मातुरः । साम्मातुरः ॥ २३ ॥ २४ ? ३० ३४८ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलधु- "सहया." । सङ्ख्या च सम् च भद्रश्च सहयासम्भद्रं तस्मात् अण् सिद्ध एव, आदेशार्थ वचनम् । शेपं स्पष्टम् । १५ अनादिशब्दससर्गात् "कन्यात्रिवेण्याः कनीनत्रिवणं च" (६१११६२) आभ्यामण इमा- यादेशौ च । कन्याया अपत्यं कानीनो व्यासः, कर्णश्च । त्रिवेण्या अपत्य त्रैवणः, एयणोऽपवादः । ५"शुङ्गाभ्याम्भारद्वाजे" (६।१।६३)। शुगस्य शुगाया था अपत्यं शौङ्गो भारद्वाजः। शौगिः शौङ्गेयश्चान्यः । नामग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणमिति सिद्धे परत्वात् "द्विस्वरादनद्याः" (६।१९७१) इत्येयण प्राप्नोतीति वाधनार्थम् । द्विवचनेन स्त्रीलिङ्गः शुङ्गाशब्द उपादीयते । "विकर्णच्छगलाद्वा- त्स्यात्रेये" (६।११६४) वैकर्णो वात्स्यः, वैकर्णिरन्यः । छागल आत्रेयः, छागलिरन्यः । "णश्च विश्रवसो विश्लुक् च वा” (६।१६६५) विश्रवसोऽण् । तद्योगे णकारोऽन्तादेशो णसन्नियोगे १० विश्लोपश्चास्य वा स्यात् । विश्रवसोऽपत्य वैश्रवणः । विप्लुकि तु रावणः । आदेशार्थं वचनम् ॥२३॥ अनन्तरमुपयोक्ष्यमाणां दुसंज्ञां क्षेपेणाह । वृद्धिर्यस्य स्वरेष्वादिः ॥ २४ ॥ [सि० ६।१।८] यस्यादिस्वरो वृद्धिसंज्ञः स्यात् , स दुः स्यात् ॥ "त्यदादिः" (६।११७)। तथा । त्यदादयो दुःसंज्ञाः स्युः ॥ “संज्ञा दुर्वा" (६।१।६)। देवदत्तीयाः । दैवदत्ताः ॥ २४ ॥ "वृद्धि०" वृद्धिसज्ञ इति-यथा आम्रगुप्तायनि । "अवृद्धाद्दोर्नवा" (६।१।११०) इत्यायनिः । आम्वष्ट्यः “दुनादि०” (६।१।११८) इति व्यः । शालीयः, आपभीयः, एनिकायनीयः, औपग- वीयः, "दोरीयः" (६।३।३२) इतीय ॥ "त्यदा" । सर्वाद्यन्तर्गतस्त्यदादिर्गणः तथेति-दुसज्ञ इत्यर्थः । यथा तदीय यदीय "दोरीयः" इतीयः ॥ "संज्ञा०" । सज्ञा सव्यवहाराय हठान्नियुज्यते सा दुसज्ञा वा स्यात् । देवदत्तीया देवदत्ताः । अनादिशब्दसम्बन्धात् “एदोद्देश एवेयादौ" (६।१९)। देश एव वर्तमानस्य यस्यादिः स्वर एकार ओकारो वा स्यात् , स ईयादौ प्रत्यये विधातव्ये दुः स्यात् । सैपुरिका सैपुरिकी । स्कौनगरिका कौन- गरिवी । सेपुर, स्कोनगर च वाहीकमामौ । सिन्वन्तीति विच् गुणः । सयां पुर सेपुरम् । तत्र भवा "व्यादिभ्यो णिकेको" (६।३।३४) इत्यधिकारे “वाहीपु प्रामात्” (६।३।३६) इति णिक इकण्या ।। देश इति किम् ? 'देवयाचकं नन्द्यध्ययनम् । एवकाराद्देशेऽन्यत्र च वर्त्तमानस्य न स्यात् । प्रोड नाम २५ उदग्ग्रामः । देवदत्त नाम बाहीकग्रामस्तन भवः क्रौडः देवदत्तः, अन न णिकेकणौ। कोडशब्दः स्वाङ्गेऽपि वर्त्तते । देवदत्तः पुंस्यपि नियाशब्दश्चेति । ईयादाविति किम् ? आयनियादौ न स्यात् । सेपुरस्थः पुरषोऽप्युपचारात्सेपुरतस्यापत्य सैपुरायणिः । वृद्धादायनिन (न च यक्तव्यं देशे एव न वर्तत इति मुग्याभिधेयापेक्षया देशे एव वर्तते इत्युक्तमन्यथा उपचारेण स्वार्थ त्यजन्त्येव) । "प्राग्देशे" (६।१।१०) अस्मिन्यतमानस्य यस्यादिस्वर एकार ओकारो वा स्यात् , स ईयादौ विधातव्ये दुः खान्। ३०२ः पुनः प्राग्देशः ? पूर्वोत्तरेण वहन्या ईशानतो नती गच्छन्याः शरावतीनद्याः यः पूर्वतो दक्षिणतो या भवति स प्राग्देशः, यस्तु पश्चिमत उत्तरतो या स उदछ । यदाहु:-"प्रागुदी विभजते हमः ३२क्षीरोदये यथा । विदुपा शन्दससिद्धये सा यः पायाच्छरावती" ॥१॥ एणीपचने भवः गणीपचनीय । १ देवान् यति माहुरकान् गा । देवराचन कृत प्रोत या Ti'तेन प्रास' या अ । अवश्य न रतीति निमा या' इति न् । नन्दिनोऽप्ययन नन्दन्ति भन्यप्राणिनोऽनया नन्दी चारारभ्ययन च इति था। २० ५ प्रक्रियावृत्तिरूपं श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः गोनीयः । भोजकटीयः । कोशवृक्षीयः । गोमयहृदीयः । एकचक्रकः । क्रोड नाम प्राग्ग्रामस्तत्र भवः क्रोडीयः । देवदत्तं नाम प्राग्ग्रामस्तस्य काश्यादिपाठात् णिकेकणौ । देवदत्तिका, दैवदत्तिकी । पूर्वसूत्रे देशग्रहणम् एवकारेण सम्बद्धमिति पुनरिह देशग्रहणम् । देश एवेति नियमनिवृत्त्यर्थं वचनम् । इति दुसंज्ञाप्रकरणम् ॥ २४ ॥ अथ प्रकृतम् अदोनदीमानुषीनाम्नः ॥ २५॥ [सि० ६११६७ ] दुसंज्ञवर्जान्नदीनाम्नो मानुपीनाम्नश्चापत्ये अण् स्यात् । यामुनः । देवदत्तः ॥ २५ ॥ "अदो” । यामुन इति । यमुनाया अपत्यं यामुनः प्रणेता । ऐरावत उध्यः । वैतस्तः पलाल- शिराः । नार्मदो नीलः । अथ मानुपी, देवदत्त इति-एवं सौदर्शनः । सौतारः । स्वायम्प्रभः । अदोरिति किम् ? चान्द्रभागेयः । वासवदत्तेयः । नदीमानुषीग्रहणं किम् ? सुपाः सुपर्णाया वाऽपत्यं १० सौपर्णेयः। विनताया वैनतेयः । देव्यावेते इत्येके । पक्षिणावित्यन्ये । नामग्रहणं किम् ? शौभनेयः । शोभनाशब्दो नद्यां मानुष्यां च वर्त्तते न तु नामत्वेन । एयणोऽपवादो योगः । आदिशब्दात् । “पीलासाल्वामण्डूकाद्वा” (६।१।६८)। पैलः पैलेयः । साल्वः साल्वेयः । माण्डूकः माण्डूकिः । पीलासाल्वाभ्यां द्विस्वरैयणि मण्डूकादिनि प्राप्ते वचनम् । वाग्रहणं मण्डूकस्य ईबर्थम् ॥ "दितेश्चैयण वा” (६।१।६९) दितिशब्दान्मण्डूकशब्दाचापत्ये एयण वा स्यात् । दैतेयः १५ दैत्यः । माण्डूकेयः माण्डूकिः । चकारो मण्डूकार्थः । पीलासाल्वाभ्यां पण्विकल्पादेवेयण सिद्धः । मण्डूके रूप्यं सिद्धमेव । वाग्रहणं दितेार्थम् । "इतोऽनियः” (६।११७२ ) इत्येव दितेरेयणि सिद्धे, "अनिदम्यणपवादे च०” (६।१।१५) इत्यनेन तस्य बाधायां प्रतिप्रसवार्थं वचनम् ॥ २५ ॥ ड्याप्त्यूङः ॥ २६ ॥ [सि० ६।१७०] एभ्यश्चतुर्थ्य एयण स्यात् । सौपर्णेयः । त्रैशलेयः । यौवतेयः । *कद्रूपाण्डूवर्जीवर्णस्य २० एये लुग् वक्तव्या-कामण्डलेयः । द्विखरनद्यर्थात्तु नैयण-सैप्रः ॥ २६ ॥ "न्या० । ङी च आप च तिश्च ऊङ् च ङयापत्यूङ तस्मात् । ऊंडन्तस्य विशेपमाह । “अकद्रूपाण्ड्वोरुवर्णेस्यैये” (७४।६९) कश्च पाण्डूश्च कंदू- पाण्ड्वौ । न कद्रूपाण्ड्वौ अकद्रूपाण्ड्वौ तयोः, वेदाः प्रमाणमित्या दिवद्वैधिकरण्येऽपि विशेपणविशेष्यभावः । *कद्रूपाण्डूवर्जस्योवर्णान्तस्य एये तद्धिते परे लुक् स्यात् । कमण्डल्वा अपत्यं कामण्डलेय इति । एवं २५ मद्रवाटा माद्रवाहेयः । शितिवाह्वाः, शैतिवाहेयः । जम्ब्वा जाम्वेयः । लेखाभ्रवः लैखाभ्रेयः । अन्न परत्वादुवादेशो वाध्यते । अकद्रूपाण्ड्वोरिति किम् ? काद्रवेयः । पाण्डवेयः (उवर्णस्येति किम् ? वैमा- त्रेयः। एय इति किम् ? माण्डव्यः) ।। द्विस्वरेत्यादि । अत्र सूत्रम् “द्विस्वरादनद्याः (६।११७१)। द्विस्वरात् ड्यापत्यूङन्तादनदीवाचिनोऽपत्ये एयण् स्यात् । दात्तेयः । गौप्तेयः । अनद्या इति किम् ?२९ १ वाहीकेषु बाधकः 'कखोपान्त्य' इतीयः। २ ननु प्राचीति क्रियताम् , देशाधिकारे सति किं पुनर्देशग्रहणेनेत्याह- एवकारेण सम्बद्धमिति तदनुवृत्तावेवकारोऽप्यनुवर्तेत तन्निवृत्त्यर्थं पुनर्ग्रहणमित्यर्थः ३ ननु प्राचीतिसूत्रकरणसामर्थ्यादेवकार- रहित एव देश इत्यनुवतिष्यते । यदि ह्येवकार संवद्धं देश इत्यनुवर्तिप्यते तदा प्राचीवेदपि न कुर्यात् पूर्वेण सामान्येन सिद्ध- वात् । सत्यम् । प्राचीतिकृते सूत्रसामर्थ्यात् प्राचिकालेऽपि दुसंज्ञा स्यादित्यप्याशङ्का स्यादिति देशग्रहणम् । पूर्वसूत्रे सामान्ये देशे दुसंज्ञा, सामान्यमध्ये विशेषो त्रुडित एव, ततः किं वचनेनेत्याह-देश एवेति । ४ अन्यथा वाग्रहणं विनापि युत्तरेण चानुकृष्टेभ्य एभ्यनिभ्योऽप्येयण् । अनेन खण् भवति । मण्डूकात्तु कथमपीन् न स्यात् ।

३५० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- सेप्र इति डयापत्यूड इसस्थापवादः । “अदोर्नदीमानुपी०” (६११६७) इति तस्यापवादोऽयमिति । एवं सीताया अपत्यं सैतः । सन्ध्यायाः सान्ध्यः । वेणाया वैणः । रेवाया रैवः । शुद्धायाः शौद्धः । फुलायाः कौल: 1 मह्या माहः । सीतादयो नद्यः ॥ २६ ॥ इतोऽनिञः॥ २७॥ [सि०६।१।७२] ५ इन्वर्जेदन्ताविखरादेयण स्यात् , अपत्ये । नामेयः । “शुभ्रादिभ्यः" (६।११७३)। एयण । शौभ्रेयः । गाङ्गेयः ॥ २७ ॥ "इतो०" । नाभेय इति । एवमनेरात्रेयः । अहेराहेयः । दुलेदोलेयः । वलेलेयः । निघे चेयः । इत इति किम् ? दाक्षिः । अनिन इति किम् ? दाक्षायणः । द्विस्वरादित्येव-मरीचेरपत्यं मारीचः । कथमजबस्तेरपसमाजवस्तेयः, शकन्धेः शाकन्धेयः, परिघेः पारिधेयः, शकुनेः शाकुनेयः, १० रातिधेय इति ? शुधादित्वानविष्यति । "शुभ्रा०" यथायोगमित्रादीनामपवादः । शौभ्रेयः । शुभ्र, विष्टपुर, विष्टपर, ब्रह्मकृत, शतद्वार, शताहार, शालाथल, (शालायल ?) टीक, शालूक, १० फुक- लाश, प्रवाहण, भाण, भारत, भारम, कुंदत्त, कर्पूर, इतर, अन्यतर, आलीढ, २० सुदत्त, सुदृक्ष, तुद, अकशाप, वादन, शतल, शकल, (शक ) शवल, सडूर कुझम्ब ३० शुक्र, विन, वीज, अश्व, वीजाश्व, अजिर, मवक्र, मखण्डु, मकष्टु, मघष्णु, ४० मृकण्डु, मृकण्डु, जिलाशिन् अजयस्ति, १५शकन्धि, परिधि, अणीचि, कणीचि, शकुनि, अतिथि, ५० अनुदृष्टि, शलाकाभ्रू, लेसाधू, रोहिणी, रुक्मिणी, किकशा, विवशा, गन्धपिङ्गला, पडोन्मत्ता, कुमारिका ६० कुवेरिका, अम्बिका, अशोका, श्वन् , गङ्गा, पाण्डु, विमान, विधया, कद्, गोधा, ७० सुदामन् सुनामन् ७२ इति शुभ्रादयो द्वासप्ततिः ७२ । मवक्रान्तानामियोऽपवाद एयण, मसण्ड्वादीनां विमानन्तानामणः, विधवाया एरणः, कद्भूगोधयोश्चतुष्पादे यनः । सुदामन्सुनानोरिमा शुभ्रस्य तु ज्येन समावेशार्थः पाठः । बहु- २० वचनमाकृतिगणार्थम् । अत्र विशेपास्त्वेवम् ।। "श्यामलक्षणाद्वासिष्ठे" (६।१९७४) । श्यामेयो वाशिष्ठः, श्यामा- यनोऽन्यः । अश्वादित्वात् वृद्ध आयनम् , अवृद्धे तु श्यामिः 1 लाक्षणेयो वासिष्ठः, लाक्षणिरन्यः ।। "विकर्णकुपीतकात्काश्यपे" (६।११७५ ) बैंकर्णेयः काश्यपः, वैकणिरन्यः । कोपीतकेया काश्यपः, कोपीतकिरन्यः ॥ "भ्रुवो ध्रुव च" (६।११७६) भ्रयोऽपत्यं धौवेयः ॥ २७ ।। कल्याणादेरिन् चान्तस्य ॥ २८॥ [सि० ६१७७] एम्य एपण स्यात् , अन्तस्य चेन् । काल्याणिनेयः । *कचिदुभयपदवृद्धिः । सौमागि- नेयः । पारढणेयः । “कुलटाया वा" (६।११७८) अन्तस्येन् । कौलटिनेयः कोलटेयः । "चणकापणेरः स्त्रियां तु लुप्" (६।११७९) । तस्य । चाटकरः घटका ॥ २८ ॥ पस्या० । पल्याणादिभ्योऽपत्ये एयणप्रत्ययः, इन पान्तस्यादेशः स्यान् । कल्याणी, मुभगा, दुर्भगा, ३० यन्धकी, जरती, यलीवरी, ज्येष्ठा, फनिष्टा, मध्यमा, परन्त्री, अनुदृष्टि, अनुसृष्टि, इति फ्ल्यागादयो द्वादश । पररुयन्तानां "ग्याप्त्यूनः" (६।११७० ) इति, अनुदृष्टेः गुनारित्यादेयण सिद्ध एव, इना: देश एवं विधीयते । अनुसृष्टेरमयम् । *फचिदित्यादि । अत्र सूनपद्धतिरेयम्-"हड्गसिन्धोः" (७१।२५) एतदन्तानां विणति पद्धिते पूर्वपदोत्तरपदस पादेः स्वरम्य वृद्धिः स्थान् । मुला २४ मुदयस या इदं भाषः पर्म या "वस्वेदम्" (६।३१६० ) इसनि । युवाद्यगि या सौहाम्, एवं प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३५१ दोहाईम् ॥ सुहृदो भावः कर्म वा राजादित्वात् व्यणि सौहार्यम् । दौहार्यम् । बहुलाधिकारान्मित्रामि- त्रार्थयोः सुहृदुहृच्छब्दयोः सौहृदं दौदिमित्यपि स्यात् । सुभगस्य भावः सौभाग्यम् । दौर्भाग्यम् । सुभगाया अपत्यं सौभागिनेयः । दौर्भागिनेयः । एकपदत्वाण्णत्वम् । सक्तुप्रधानाः सिन्धवस्तेषु भवः साक्तुसैन्धवः । पानसैन्धवः लावणसैन्धवः माहासैन्धवः । सौरसैन्धवः । कच्छादित्वादण् । तंत्र तदन्तविधेरपीष्टत्वात् । “प्राचां नगरस्य” (७४।२६)प्राचां देशे वर्तमानस्य नगरान्तस्य शब्दस्य५ ञ्णिति तद्धिते उभयपदवृद्धिः स्यात् । सुमनगरे भवः सौमनागरः । पौण्डनागरः । वात्र (वाजु. (ब्राज) बृ. वृत्ती) नागरः । वैराटनागरः । गैरिनागरः । प्राचामिति किम् ? उदीचां माडनगरः । "अनुशतिकादीनाम्” (७४।२७) । एषां गिति तद्धिते उभयपदवृद्धिः स्यात् । अनुशतिक- स्वेदमानुशातिकम् । अनुशतिकस्यापत्यमानुशातिकिः । अनुशतिक, अनुहोड, अनुसंवत्सर, अनुसंवरण, अनुरहत् , अगारवेणु, असिहत्या, अस्यहत्या, अस्यहेति, (अश्वि(स्य) हल) अस्यहेतु, अनिषाद, १० अवेनु, कुरुपत, (कुरुरुत ? ) कुरुपञ्चाल, अधिदेव, अधिभूत, इहलोक, परलोक, सर्वलोक, सर्व- पुरुप, सर्वभूमि, वध्योग, प्रयोग, अभिगम, परखी, पुष्करसद्, उदकशुद्ध, सूत्रनड, चतुर्विद्या, शातकुम्भ, सुखशयन, इत्यनुशतिकादयश्चतुस्त्रिंशत् ३४ । आकृतिगणोऽयम् । तेन राजपौरुष्यादय- ट्यणन्ता अत्रैव पठ्यन्ते । राजपारुण्यम् । पारिमाण्डल्यम् । प्रातिभाव्यम् । सार्ववैद्यम् । प्रत्ययान्तरे त्वादेरेव वृद्धिः । राजपुरुषायणिः (अवृद्धात् इत्यायनिब्) "देवतानामात्वादो" (७।४।२८) १५ देवतार्थशब्दानामात्वादी विषये मिति तद्धिते उभयपदवृद्धिः स्यात् । अग्निश्च विष्णुश्च देवता अस्य आग्नावैष्णवं सूक्तम् । ऐन्द्रापाणं हविः । आग्निमारुतं कर्म । आग्नीवारुणीमनवाहीमालभेत । आत्वा- दाविति किम् ? स्कन्दविशाखयोरिदं स्कान्दविशाखम् । ब्राह्मप्रजापत्यम् । “वेदसहश्रुतावायुदेवतानाम्" (२२।४१) इत्यत आरभ्य "उपासोपस” (३।२।४६) इति यावदात्वादयः । “आतो नेन्द्र- वरुणस्य” (७।४।२९) आकारान्तात्पूर्वपदात्परस्य इन्द्रस्य वरुणस्य त्वादिखरवृद्धिर्न स्यात् ।२० अग्निश्च इन्द्रश्च अग्नेन्द्रौ । तौ देवता अस्य आग्नेन्द्रं सूक्तम् । सौमेन्द्रं हविः । ऐन्द्रावरुणम् । मैत्रा- वरुणं हविः । आत इति किम् ? आग्नीवारुणम् । “ई: पोमवरुणेऽग्ने" ( ३।२।४२) इतीकारः उत्तरपदस्येत्येव-ऐन्द्राग्नम् एकादश कपालं पुरोडाशं निर्वपेत् । ननु चेन्द्रस्याद्यः स्वरः सन्धिकार्येण हियतेऽपरो "अवर्णेऽवर्णस्य” (७४।६८) इत्यनेन, ततोऽस्वर एवेन्द्रशब्दस्ततः किं प्रतिपेवेन । सत्यम् । किन्त्वनेनैतत् ज्ञाप्यते-"वहिरङ्गमपि पूर्व पूर्वोत्तरपदयोः कार्य भवति पश्चात्सन्धिकार्यम्”, २५ तेन पूर्वेषु कामशम इत्यादि सिद्धं भवति । अन्यथात्र यदि पूर्व सन्धिः स्यात्तदा इकारे सन्धिनाढते प्राग्ग्रामाणामित्युत्तरपदवृद्धिप्राप्तौ पुकारसम्बन्धिन उकारस्य वृद्धिः स्यादिति ॥ "कुलटा०” । आवन्तत्वादेयण सिद्धः, आदेशार्थं वचनम् । अत एवादेशस्यैव विकल्पो नत्वेयणः । या तु कुला- न्यटन्ती शीलं भिनत्ति ततः परत्वात् क्षुद्रालक्षण एरणेव-कौलटेर इति । कौलटेरोऽसतीसुतः । "स तु कोलटिनेयः स्याद्यो भिक्षुकसतीसुतः । द्वावप्येतौ कौलटेयो.” इत्यभिधानचिन्तामणौ ।३० "चटका" । चटकादपत्यमाने गैरः प्रत्ययः स्यात् । त्रियां त्वपये विहितस्य गैरस्य लुप् । लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणात् चटकस्य चटकाया वा अपयं पुमान् चाटकरः, स्त्री तु चटका । चटकेति ३२ , १ ननु सुहृदुईच्छन्दयोमित्रामित्रार्थयोरिति विशेषगं किमर्थ मित्रामिनाथयोरेव सुहृदुहृद्रूपसमासान्तविधानेनाव्यभि- चारात् । सत्यम् । सुहृदयदुईदयशब्दयोः क्रूराक्रूरार्थयोर्यदा 'तस्येदम्' इलणि 'हृदयस्य हल्लास.' इलनेन हृदादेशस्तदापि मुहृदुहृच्छब्दो स्त इति तद्यवच्छेदार्थ मित्रामित्रार्थयोरित्युक्तम् । १ न केवलं सिन्धु इत्यस्य केवलस्य कच्छादी पाटात् केवला. त्प्रत्ययः किंतु सिध्वन्वेति पाठात्तदन्तादपीत्यर्थः ।

१० ३५२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- जातिशब्दोऽस्त्येव, स्त्रियामपत्ये प्रत्ययाश्रवणार्थ लुब्वचनम् । अस्त्रियामित्येव सिद्धे प्रत्ययान्तरवाधनार्थ गैरविधानम् ॥ २८ ॥ क्षुद्राभ्य एरण वा ॥ २९॥ [सि०६१८०] अङ्गहीना व्यभिचारिण्यो वा स्त्रियः क्षुद्रास्ताभ्य एरण या स्यात् । काणेरः काणेयः । दासेरः ५दासेयः । नाटेरः नाटेयः ॥ "गोधाया दुष्टे णारश्च" (६।११८१) गौधारः गौधेरः । अदुष्टे तु गौधेयः । “भ्रातुर्व्यः' (६।१।८८) भ्रातृव्यः ॥ २९ ॥ "क्षुद्रा०" । व्यभिचारिण्य इति-अनियतपुंस्का इत्यर्थः । नाटेय इति-एवं कईनाया अपत्यं काई- नेरः काईनेयः ॥ “गोधा." । णारश्चेति चकारादेरण् । गोधाया दुष्टमपत्यं गौधारः गौधेरः योऽहिना गोधायां जन्यते ।। गौधेयोऽन्यः-शुभ्रादित्वादेयण् । इत्यादिशब्दानुवृत्तेः "जण्टपण्टात्" (६।१४८२)। आभ्यामपत्ये णारः। जाण्टारः । पाण्टारः । कौमुद्यां तु अनयोः स्थाने जडपण्डशब्दो दृश्यते । जडस्यापत्यं जाडारः । पण्डस्यापत्यं पाण्डारः । केचित्तु पक्षस्यापत्यं पाक्षार इत्यपीच्छन्ति ॥ "चतुष्पाद एयम्” (६।११८३) । अपत्ये । अणादीनाम- पवादः । कमण्डल्या अपत्यं कामण्डलेयः । कमण्डलुशब्दश्चतुष्पाजातिविशेषे । शितिबाहाः शैतिगा- हेयः । मद्रयाहा मानवाहेयः । जम्बा, जाम्बेयः । शवलायाः शावलेयः। बहुलाया वाहुलेयः । सुरभेः १५ सौरभेयः ॥ "गृष्टयादेः" (६।११८४) एभ्य एयञ् , अपत्ये 1 गृष्टेरपत्यं गायः । चतुष्पाद्वाचिनो गृष्टिशब्दात्पूर्वेणैव सिद्धे अचतुष्पादार्थमुपादानम् । गृष्टि, हृष्टि, हलि, वालि, विधि, कुद्रि, अजयस्ति, मित्रयु इति गृष्ट्यादयोऽष्टौ । बकारस्य मित्कार्यार्थत्वान्मित्रयुशब्दस्यानेन एयभि "सारवैश्वा०" (७४।३०) इति अयुलोपे ततोऽत इनि'ति इमि तस्य "निदादणिनोः” (६३१२१४०) इति लुपि मैत्रेयः पिता, मैत्रेयः पुत्र इति ॥ “वाडवेयो वृषे" (६३११८५)। वृपो यो गर्भे वीज निपिञ्चति । २० वडवाया वृपो वाडवेयः । अपयेऽणेव-बाडवः । निपातनमेयणेयोरुभयोरपि पे व्यवस्थापनार्थम् । अन्यथाऽन्यतरोऽपये प्रसज्येत ॥ "रेवत्यादेरिकण्” (६।११८६)। अपसे । रैवतिकः । आध. पालिकः । रेवती, अश्वपाली, मणिपाली, द्वारपाली, वृकवश्चिन् , वृकग्राह, कर्णमाह, दण्डपाह, पु- टाभ, इति रेवत्यादयो नव । द्वारपाल्यन्तानामेयणोऽपवादः । यदि मानुपीनाम तदाऽणोपि । वृकव- शिनोऽणः शेपाणामिनः ॥ "वृद्धस्त्रियाः क्षेपे णश्च" (६।११८७) वृद्धप्रत्ययान्तात्स्त्रीयाचिनः २५शब्दादपये णः प्रत्ययो भवति । चकारादिकण् । क्षेपे गम्यमाने-पितुरसंविज्ञाने मात्रा व्यपदेशोऽप- सम्य क्षेपः । गार्या अपत्यं युवा गार्गः गार्गिको या जाल्मः । "वृद्धायूनि” (६।१।३० ) इति यूनीमा प्रत्ययो । युद्धप्रदणं किम् ? कारिफेयो जाल्मः । खिया इति किम् ? औपगवि ल्मः । क्षेपे इति किम् ? गार्गेयो माणयकः । मातुः संविज्ञानार्थमिदमुच्यते ॥ "भ्रातु." । भ्रातुरपत्यं भ्रातृव्यः । यत्तु शगुरपि धान्य उच्यते स उपचारात् । एकद्रव्याभिलापश्योपचारनिमित्तम् ।। २९ ।। ईयः स्वसुश्च ॥ ३०॥[सि०६।१८९] मातुः म्यमुच ईयः । भ्रात्रीयः स्वसीयः॥३०॥ ईय." । भातुरपन्नं भ्रात्रीयः । स्वमुरपन्यं सम्पीयः ॥ ३० ॥ गतिशयमा इसधिकारे यदि क्येित तया चतुपास इत्यधिकारे सेवा समादित्यर्थः । - ३० ३२ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३५३ मातृपित्रादेर्डेयणीयणौ ॥ ३१॥ [सि० ६।१।९०] मा पितृपूर्वावसुरेतौ साताम् । मातृप्वसेयः माष्वतीयः । पैतृष्वसेयः पैतृष्वस्त्रीयः । "श्वशुराद्यः" (६।११९१) श्वशुर्यः ॥ ३१ ॥ "मातृ०" । वचनभेदान्न यथासङ्ख्यम् । मातृपित्रादेः स्वतन्तस्य ग्रहणादिह न भवति । परममातृ- ध्वसुरपत्यम् । परमपितृष्वसुरपत्यम् । मातृपितृशब्दयोकारान्तयोनिर्देशादिह न भवति । मातुःस्वस्रः५ मातुःण्वस्रः । पैतुःस्वस्रः पैतुःप्वनः । अत्र "अलुपि वा” (२।३।१९) इति विकल्पेन पत्वम् । "श्वशु०” । श्वशुरस्यापत्यं श्वशुर्यः । “सम्बन्धिनां सम्बन्धे” (७।४।१२१) इति इह न भवति- श्वशुरो नाम कश्चित्तस्यापत्यं श्वाशुरिः । अयं श्वशुरशन्दो द्वितालव्य इति श्रीवल्लभ- कृताभिधानचिन्तामणिवृत्तौ, मध्यदन्त्य इत्यूष्मप्रभेदनाममालायाम् ॥ ३१ ।। जातौ राज्ञः ॥ ३२॥ [ सि० ६११९२] राज्ञोऽपत्ये यः स्यात् । जातौ गम्यमानायाम् ॥ ३२ ॥ "जातो." राजन् य इति स्थिते ॥ ३२ ॥ सूत्रम्- अनोऽट्ये ये ॥ ३३ ॥ [सि०७४।५१] अन्नन्तस्य व्यवर्जे यादौ तद्धिते परेऽन्त्यस्वरादेर्लुग् न स्यात् । राजन्यः, क्षत्रियजातिश्चेत् । "क्षत्रादियः” (६।१।९३) । तथा । क्षत्रियः । “मनोर्याणी षश्चान्तः” (६।१।९४)। जातौ । १५ मनुष्याः मानुषाः । "माणवः कुत्सायाम्” (६।१।९५) । मनोरपत्यं मूढं माणवः॥३३॥ "अनो०" राजन्य इति । एवं सामनि साधुः सामन्यः । एवं वेमन्यः । मूर्द्धनि भवो मूर्द्धन्यः । अट्य इति किम् ? राज्ञो भावः कर्म वा राज्यम् । अट्य इति पर्युदासनमा सानुवन्धव्यवर्जनादन्य- स्मिन् सानुबन्धयेऽपि प्रतिषेधो भवति । तक्ष्णोऽपत्यं ताक्षण्यः (कुर्वादित्वात् भ्यः) । अन इति किम् ? छत्रिपु साधुः छत्र्यः । क्षत्रियजातिश्चेदिति-अन्यराज्ञोऽपत्यं राजन इति । "क्षत्रा०” १२० तथेति-जातौ गम्यायामित्यर्थः । क्षत्रस्यापत्यं क्षत्रियस्तजातीयश्चेत् , क्षात्रिरन्यः । "मनो०"। यश्च अण् च याणौ । एतत्सन्नियोगे मनुशब्दस्य पकारोऽन्तो भवति । मनोरपत्यानि मनुष्याः, मानुपा इति । जाताविति किम् ? मानवः । मानवाः (मानवीः प्रजाः पश्य ) अत्र हि अपत्यमानं विवक्षितं न जातिस्तेन पोऽन्तो न भवति । वृद्धापत्य विवक्षायां तु लोहितादित्वाद्यञ्-मानव्यः । मानव्यौ । मनवः । मानव्यायनी । मनुष्यमानुपादाभ्यां सत्यसति चापत्येऽर्थेऽनभिधानादपसे पुनरन्यः प्रत्ययो न२५ भवति । "माण." मनुशब्दादौत्सर्गिकेऽणि कुत्सायां गम्यायां नकारस्य णकारो निपात्यते ॥ ३३ ॥ कुलादीनः ॥ ३४ ॥[सि० ६।१।९६] कुलान्तात् केवलाच कुलादपत्ये ईनः । बहुकुलीनः; कुलीनः । “यैयकनावसमासे वा" (६।११९७) । कुल्यः, कोलेयका, कुलीनः । समासे तु आल्यकुलीनः । “दुष्कुलादेयण वा" ६।११९८)। दौष्कुलेयः दुष्कुलीनः । “महाकुलाद्वाजीनौ” (६।१।९९) माहाकुलः ।३० माहाकुलीनः । महाकुलीनः । “कुर्वादेर्व्यः” (६।१।१००) कौरव्याः । शाकव्याः॥ ३४ ॥ "कुला०" उत्तरसूत्रे समासे प्रतिपेधादिह कुलान्तः, केवलश्च गृह्यते । कुलीन इति-एवं ईपदपरि- समाप्तं कुलं वहुकुलम् तस्यापत्यं बहुकुलीनः । एपु 'अत इञः' (६।११३१) "अदोरायनिः प्रायः" ३३ है. प्रका० पूर्वा० ४५ - ३५४ महामहोपाध्यायश्नीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- (६।१।११३) इत्यस्य चापवादः । (आठ्यकुलीनः राजकुलीन:-अन "अवृद्धाहोर्नवा (६।११११०) इत्यायनिमोऽत इब"श्च)। "येय." यश्च एयकञ् च यैयकौं । केवलात्कुलशब्दात्कुलान्ताच एतौ वा स्याताम्, न चेत्कुलशब्दः समासे वर्त्तते । ताभ्यां मुक्ते ईनश्च । कुल्य इत्यादि-एवं फुला- न्तादपि यहुकुल्यः, याहुकुलेयकः, वहुकुलीनः आठ्यकुलीन इति । अत्र "अवृद्धाहोर्नवा" इत्यायनित्रः ५"अत इन"श्चापवादः । पूर्वसूत्रेण औत्सर्गिक ईन एव । “दुष्कु०" । पक्षे औत्सर्गिक ईनः । "महा०" । अञ्च ईनश्च अनीनौ । महेत्याकारनिर्देशान्महतां कुलं महत्कुलम् , तस्यापत्यं महत्कुलीन इत्यत्र ईन एव । “कुर्वा" । कौरव्य इति । अक्षत्रियवचनस्येह कुरोर्ग्रहणम् । क्षत्रियवचनात्तु "दुनादिकुर्वित्कोझलाजादाभ्यः” (६।१।११८) इति व्यः । अयं चानयोपिशेषः-तस्य द्रिसंज्ञत्वादहुपु लुप् , कुरवः, अस्य तु द्रिसंज्ञाया अभावात्कौरव्याः, ततो यूनि तिकादिपाठादायनिन् , कौरव्यायणिः । १० अस्माच "अत इम्" तस्य "बिदार्पादणियोः" (६।१११४०) इति लुप् । कौरव्यः । कुरुशब्दश्च तिकादिप्वपि पठ्यते । कौरवायणिः । उत्साद्यञ् तु व्यायनिभ्यां च वाधितः । फुरुशब्दादपये न भवति । (शङ्ख,) शाङ्कव्य इति-बहुषु शाकव्याः इति । स्त्री शाकव्या । लोहितादिपाठात् पौत्रादौ यत्रि शाकव्यः । बहुपु लुप् शङ्कवः । स्त्री शाकव्यायनी ।। कुरु, शङ्कु, किन्धु, शोकभू, पथकारिन् , मति- मत् , पितृमत् , पितृमन्तु, वाच् , हन्तु, १० हृदिक, शलाका, कालाका, ऐरका, पदका, सैदाका, १५ फेशिनी मेति, कवि, 'हन्ति, पिण्डी, २० ऐन्द्रजालि, धानुनि, रीजकि, दोमोप्णीपि, गाणकारि, कैशोरि, कोपिञ्जलादि, गर्गर, हेनू, मजूप, ३० अविमारक, अजमारक, फद्दक, फैट, ईंटल, अर, दभ्र, सूर्पणाय, यावनाय, श्यावरथ ४० श्याप्रथ, श्यायप्रथ, श्यापत्र, श्यापुत्र, सत्यंकार, वलभीकार, कर्णकार, पथिकार बृहतीकार वान्तवृक्ष ५० आवृक्ष, मूढ, शाक, इन, रथकार, नापित, तक्षन्, शुभ्र ५८ इति कुर्लादयोऽष्टापश्चाशत् । अत्र हनन्तानां सामान्याणो हृदिकस्य तु वृष्ण्यणोऽपवादो २०व्यः । शलाकादीनां केशिन्यन्तानामेयणः । मानुपीनामत्वेऽणोऽपि । केशिनीशब्दस्य स्त्रीलिङ्गपाठादेव पुंवद्भायो न भवति । कैशिन्यैः । पुंवद्भावे तु कैश्य इति स्यात् । पुंलिङ्गनिवृत्त्यर्थस्तु स पाठो न भवति । "गाधिविदधिकेशिपणिगणिनः” (७४।५४) इत्यपत्येऽण्यन्त्यस्वरादेलप्रतिषेधात् । फेशिन्- शब्दाद्धि ब्यविधानेऽण् न सम्भवत्येय । मतिकविहन्तिपिण्डीनामेयणः । ऐन्द्रजाल्यादीनां कापिअला- घन्तानामायनणः । गर्गरादीनामिनः । तक्षशब्दस्य शिवाचणा समावेशार्थः पाठः, शुभ्रस्मैयणा ।। इत्यादिशब्दोपादानात् “सम्राजःक्षत्रिये" (६।१।१०१)। अपत्ये व्यः। सनाजोऽपत्यं सामान्यः २६ क्षत्रियश्चेत् , अन्यत्राणेव-साम्राजः । अन्ये साम्राजिरित्याहुस्तत्र सम्राट् चाहादिपु द्रष्टव्यः । “सेना- १ शकानामधुरिव पृषोदरादित्वात् भलोपः । २ शाकेभ्यो भवति । ३ पन्यानं करोति । ४ मतिरस्याति । ५ पितर मन्तः विप्रियं यस्य ।। पचीखेवंशीलः । ७ हन्ति तृन् । ८ कालमकति । १ ईरयति 'कीयक'-इति । १. 'पीपर' इति पद न मिदादयः सदाभाति । शान्ति मन्यते । १४ बाते मम्मतिः । १५ वयात् हन्ति । १६ पिते भय् गोरादिलात् पो पिणी । १७ इन्हें अलति तस्थापन ! " धनो. राशेर्मातः तः । १९ विराजते त.। २० दामयुफमुनीषं यस गणान् करोति त । २२ किशोरस्पर परम् । २१ पिनयनादते स. २४ गर्ग राति । २५ हन्ति पुन'- इति । २ सतिपति' इति मएषः । २७ भी मला मार: २८ का २९ नाम्य-तिविपित फुटस: । 'ऋपनि । १२ पूर्ण मा कार्ममोऽम् । ॥ सावं पिलं नयति । दयावारियो यस । सायन्ते सा. गागुम प्रपते । दावा मिलने प्रपते । सो गतर पत्रं पुयो यम। १४ मलं बलभी कांपत्यानं पहली करोति। ३५ भशंपण यम्माम् । ३५ मुसीम्म। १७ ते भाराभदितम् ॥ नापिनायनिरिति पानर मातानियापर । १४ पिया घुरनारे तीस, थिो अपवर्षम्यति ससस स्थानियान 'नोपदस-कीर गतीस असम.-रेचिन् एम्बयान अन्तरादिभोऽनसारपसम्म य. - पपते -- मक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३५५ न्तकारुलक्ष्मणादिञ्च" (६।१।१०२)। चकारात् ज्योऽपि । सेनान्त. हारिपेणिः हारिपेण्यः । कारु. तान्तुवायिः तान्तुवाय्यः । तौन्नवायिः तौनवाय्यः । वार्द्धक्रिः वार्द्धक्यः । कौम्भकारिः कौम्भ- कार्यः । रथकारनापिततक्षभ्यो ञ्य एव, कुर्वादिपाठात् । कुर्वादौ जातिवाचिन एव पाठाद्रथकारादिन- पीति (एके)॥ लक्ष्मण. लाक्ष्मणिः लाक्ष्मण्यः । ऋपिवृष्ण्यन्धककुरुभ्यः” (६।१।६१) अण् , ज्याप्त्यू- उन्तेभ्यस्त्वेयण , परत्वादाभ्यां बाध्यते ॥ जातसेनिः जातसेन्यः । वैष्वक्सेनिः वैष्वक्सेन्यः । औग्रसेनिः५ औग्रसेन्यः । तन्तुवाय्या अपत्यं तान्तुवायिः तान्तुवाय्य इत्यादि । “सुयाम्नः सौवीरेष्वायनिञ्" (६।१।१०३)। सौवीरदेशे योऽर्थस्तस्मिन् वर्तमानात् सुयानोऽपत्ये आयनिन् स्यात् । सौयामायनिः । सौवीरेभ्योऽन्यत्र सौयामः । “पाण्टाहृतिमिमताण्णश्च" (६।१।१०४ ) । इयन्ताभ्यां पाण्टा- हृतिशब्दान्मिमतशब्दाच सौवीरवर्तिभ्यामाभ्यामण आयनिञ् च स्याताम् । पाण्टाहृतेरपत्यं युवा सौवीरगोत्रः पाण्टाहृतः । पाण्टाहृतायनिर्वा ॥ मिमतस्य मैमतः मैमतायनिर्वा ॥ सौवीरेष्वित्येव-१० पाण्टाहृतायनः “यभिमः” (६।११५४) इति आयनण् । मैमतायनः । अत्र नडादित्वात् अनन्तरो मैमतिः । "भागवित्तितार्णविन्दवाऽकशापेयान्निन्दायामिकण्वा” (६।१।१०५) । सौवीरेपु वृद्धे वर्तमानेभ्य एभ्यो यून्यपये इकण्वा स्यात् , निन्दायां गम्यायाम् । भागवित्तेरपत्यं युवा निन्दितः भागवित्तिकः भागवित्तायनो वा जाल्मः । तार्णविन्दविकः तार्णविन्दविर्वा । आकशापेयिकः आकशापेयिर्वा । निन्दायामिति किम् ? अन्यत्र भागवित्तायनः तार्णविन्दविः आकशापेयिरित्येव भवति ।१५ "सौयामायनियामुन्दायनिवाायणेरीयश्च वा” (६।१।१०६) । एभ्य आयनिन- न्तेभ्यः सौवीरेषु वृद्धे वर्तमानेभ्यो यून्यपये ईयश्चकारादिकण् च प्रत्ययो वा स्यात् , ताभ्यां मुक्तेऽण्- प्रत्ययः । निन्दायां गम्यायाम् । सुयानोऽपत्यं सौयामायनिस्तस्यापत्यं युवा निन्दितः सौयामायनीयः सौयामायनिकः सौयामायनिर्वा अणो लुप् । यमुन्दस्यापर यामुन्दायनिस्तिकादित्वादायनिन् । तस्यापत्यं युवा निन्दितः यामुन्दायनीयः । यामुन्दायनिकः यामुन्दायनिर्वा । वृषस्यापत्यं वार्ष्या-२० यणिः "दगुकोशल.” (६।१।१०८) इत्यादिसूत्रेण यकारादिरायनिन् । तस्य वार्ष्यायणीयः वार्ष्या- यणिकः वार्ष्यायणिर्वा । कश्चित्त्वन्येभ्योऽपीच्छति । तैकायनेरपयं युवा तैकायनीयः ॥ निन्दा- -अन्यत्र सौयामायनिः यामुन्दायनिः वार्ष्यायणियुवा अणेव । “भिदा दणिोः" (६।१।१४०) इति तस्य लुप् ॥ “तिकादेरायनिञ्” (६।१।१०७) इनादेरपवादः । तैकायनिः । तिक, कितव, संज्ञा, बाल, शिखा (वालशिख ?) उरश, शाट्य, सैन्धव, यमुन्द, रूप्य, १० पूर्णिक २५ ग्राम्य, नील, अमित्र, गोकक्ष्य, कुरु, देवर, देवर, (धेवर) धैवर । २० । देवरथ, तैतिल, शैलाल, औरश, कौरव्य, भौरिकि, भौलिकि, चौपयत, चैतयत, चैटयत, ३० शैकयत, क्षैकयत (क्षैतयत?) ध्वाज, वत, ध्वाजवत, चन्द्रमस्, शुभ, श्रुभ, गङ्ग, गङ्गा, वरेण्य, ४० वन्ध्या विम्बा, अरद्ध, अरद्धा, आरद्ध, वह्यका, खल्य, लोमका, उदन्य, यज्ञ, ५० नीड, आरथ्य, लव, भीत, उतथ्य, सुयामन् , उखा, खल्वका, शल्यका, जाजल, ६० वसु, उरस् , ६२ इति तिकादयो द्वापष्टिः ॥ शाट्य-३० शब्दो यजन्तो व्यणन्तो वा । झाट्यायनिः ॥ यजन्तादायनणेवेत्येके । शाट्यायनः ॥ औरशशब्देन क्षत्रियप्रत्ययान्तेन साहचर्यात् कौरव्यशब्दः क्षत्रियप्रत्ययान्त एवेह गृह्यते, अन्यस्मादिबेव । तस्य च "भिदादिणियोः” (६।१।१४०) इति लुप् । कौरव्यः पिता, कौरव्यः पुत्रः । आयनिवस्तु "अब्राह्मणात्” (६।१११४१) इति प्राप्तापि लुप् न भवति, विधानसामर्थ्यात् । नहीच आयनिमो वा लुपि कश्चिद्विशेषः । कौरव्यः पिता । कौरव्यायणिः पुत्रः ॥ "दगुकोशलकर्मारच्छागवृषा- द्यादिः” (६।१।१०८) । एभ्यः पञ्चभ्योऽपत्ये यकारादिरायनिञ् स्यात् । दागव्यायनिः । कौशल्या-३६ विजयिः । अदोरिति किम् ? औपगविः ।रामदत्तिः । रामदत्तायनिः पिता पुत्रश्च । आयनिमन्तादणो ३५६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- यनिः। जनपदसमानशब्दात् क्षत्रियात् "दुनादि०" (६।१।११८) इत्यादिना ज्य एव-कौशल्य इति । कार्मार्यायणिः । छाग्यायनिः । वार्ष्यायणिः । "द्विस्वरादण:" (६।१।१०९)। द्विस्वरादणन्ताद- पत्ये आयनिञ् स्यात् । कर्तुरपत्यं कार्नस्तस्य काळयणिः, हर्तुळियणिः, पोतुः पौत्रायणिः, । औत्स. र्गिकोऽण् । यास्कायनिः, शिवाद्यण् । द्विस्वरादिति किम् ? औपगविः (अण इति किम् ? दाक्षेः दाक्षा- ५यणः । प्लाक्षेः प्लाक्षायणः) । वृद्धादेवायं विधिः । अवृद्धात्तूत्तरेण विकल्पः । अङ्गानां राजा आगस्तस्य आङ्गिः आह्नायनिर्वा । “अवृद्धाहोर्नवा" (६।१।११०) अवृद्धवाचिनो दुसंज्ञकादपत्ये आय. निञ् वा स्यात् । आनगुप्तायनिः । आम्रगुप्तिः । पञ्चालानां राजा पाञ्चालस्तस्यापत्यं पाञ्चालायनिः । पाश्चालिः । नापितस्यापत्यं नापितायनिः । नापित्यः । पक्षे नापितस्ये नास्ति तदाधनाथ हि कुर्वादिषु तस्य पाठः । अवृद्धादिति किम् ? दाक्षेर्दाक्षायणः । दोरिति किम् ? अकम्पनस्यापत्यमाकम्पनिः । १० "पुत्रान्तात्" ( ६।१११११) पुत्रशब्दान्ताहुसंज्ञकादपत्ये आयनि-प्रत्ययो वा स्यात् । गार्गीपुत्रा- यणिः । गार्गीपुत्रिः । पूर्वेणायनिधि सिद्धे वचनमिदमुत्तरसूत्रप्राप्तकागमाभावार्थम् । उत्तरेण च काग- मोऽपि । ततो गार्गीपुत्रकायणिरिति तृतीयरूपं स्यात् । “चर्मिवर्मिगारेटकार्कट्यकाकलंकावा. किनाच कश्चान्तोऽन्त्यखरात्" (६।१।११२) एभ्यः सप्तभ्यः पुत्रान्ताच दुसंज्ञकादपये आय- निञ् वा स्यात् । तत्सन्नियोगे चैपां कान्तः स्यात् । चार्मिकायणिः चार्मिणः । वार्मिकायणिः वार्मिणः । १५"संयोगादिनः" (७।४।५३) इति प्रतिपेधादणि अन्त्यस्वरादिलोपो न स्यात् । गारेटकायनिः गारेटिः । कर्कटस्थापत्यं कार्कट्यस्तस्यापत्यं कार्कट्यकायनिः कार्कट्यायनः । यदा त्वव्युत्पन्नः कार्कट्यशब्दस्तदा पक्षे इलेव कार्कटियः । काफकायनिः काकिः । लाझाकायनिः लालेयः । लकशब्द केचिदकारान्तमि- प्छन्ति; तन्मते लाझायनि: लातिः । वाकिनकायनिः वाकिनिः । पुत्रान्तादोः, गार्गीपुत्रकायणिः गार्गीपुत्रिः । ककारस्यान्यवरात्परतो विधानं चर्मिवर्मिणो नकारलोपार्थम् । यद्येवं परादिरेव क्रिय- २० ताम् । तथा सति प्रत्ययस्य व्यञ्जनादित्वात्पुंवद्भावो न सिद्धयेत् । चर्मिण्या अपत्यं धार्मिकायणिः । "अदोरायनिः प्रायः" (६।१।११३ ) अदुसंज्ञकादपये आयनिःप्रत्ययो वा स्यात्, प्रायः । ग्लुचुकायनिः ग्लौचुकिः । अहिचुम्बकायनिः आहिचुम्बकिः । त्रिपृष्ठायनिः । त्रैपुष्टिः । श्रीविजयायनिः । । २५ लुप् । प्रायोग्रहणात् कचिन्न स्यात् । दाक्षिः प्लाक्षिः ॥ ३४ ॥ राष्ट्रक्षत्रियात्सरूपाद्राजापत्ये दिरञ् ॥ ३५॥ [ सि० ६।१।११४ ] राष्ट्रक्षत्रियसरूपाच्छन्दाद्राष्ट्रार्थाद्राजार्थे क्षत्रियार्थाचापत्येऽञ् सात, स च द्रिसंज्ञः ॥३५॥ "राष्ट्र०" । अत्र विकल्पो नास्ति (अपत्येऽनुवर्तमाने राजनीयधिकारस्य भणनात्) ॥ ३५ ॥ बहुम्वस्त्रियाम् ॥ ३६ ॥ [ सि० ६।१।१२४ ] पहुत्वे च दूरस्त्रियां लुरु । विदेहानां राजानोऽपत्यानि वा विदेहाः । त्रियस्तु पैदेशः । ३० सरूपादिति किम् ? । सौराष्ट्रको राजा । एवं दाशरथिः ॥ ३६ ।। "यहु." । बहुप्यिति यन्तस्य विशेपणं न निमित्तम । तत्र हि पञ्चालानां निवास: पसालनिवासः इत्यादौ । पचाल अम् आम् निवास इति स्थितेऽन्तरगानपि विधीन् यहिरङ्गा लुप् थाधते इति ३३पहुवचनस लुपि दुर्छ न स्यात् । विदेहा इति-एवमेक्षा ऐवारी सायः । पायोल: पाधागे - . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अपत्यप्रत्ययाधिकारः ३५७ पञ्चालाः । सौराष्ट्रक इति-अयं केवलं राष्ट्रवाची । न तु क्षत्रियस्वरूपः । एवं दाशरथिरिति । अयं हि केवलक्षत्रियवाची नतु राष्ट्रस्वरूपः । आदिशब्दात् "गान्धारिसाल्वेयाभ्याम्” (६।१।११५ ) गान्धारिसाल्वेयशब्दौ इयणन्ती सरूपौ राष्ट्रक्षत्रियवचनौ । ताभ्यां प्राग्वत् द्रिसंज्ञोऽञ् स्यात् । दुलक्षणस्य यस्यापवादः (वचनभेदो यथासङ्ख्यनिवृत्त्यर्थः) गान्धारीणां राजा गान्धारे राज्ञोऽपत्यं वा गान्धारः । गान्धारौ । गान्धारयः ।५ वहुष्वनो लुप् । एवं साल्वेयः । साल्वेयौ । साल्वेयाः । एकत्वद्वित्वयोस्त्वपत्यार्थविवक्षायां "अब्राह्म- णात्” (६।१।१४१) इति लुप् न स्यात् , विधानसामर्थ्यात् । अन्यथा ब्यविधावेवानयोः प्रतिषेधः क्रियेत, तथा च पूर्वेणैवाऽञ् सिद्ध्यति ॥ ३६ ॥ पुरुमगधकलिङ्गशूरमसद्विखरादण ॥ ३७॥ [सि० ६॥१॥११६] पुर्वादिभ्यो द्विखरेभ्यश्वाण द्रिः स्यात् । पौरवः । आङ्गो राजाऽपत्यं वा ॥ ३७ ॥ "पुरु०" । पौरव इति । पुरोरपत्यं पौरवः । पुरवः । मगधानां राजा मगधस्यापत्यं वा मागधः । मगधाः । एवं कालिङ्गः कलिङ्गाः । शौरमसः शूरमसाः । द्विस्वर. आङ्गः अङ्गाः । एवं वाङ्गः वङ्गाः । सौमः सुझाः । पौण्डूः पुण्ड्राः । दारदः दरदः । द्विस्वरत्वेनैव सिद्धे पुरुग्रहणमराष्ट्रसरूपार्थम् । अस्ति राजा पुरुर्नाम न तु राष्ट्रम् । तस्यौत्सर्गिकेणैवाणा सिद्धे बहुषु लुवर्थमिदमण्विधानम् । अबैव सिद्धे अविधानं सङ्घाद्यण्वाधनार्थम् । तेनाकम् भवति । पौरवकं मागधकं कालिङ्गकम् , शौरमसकम् , १५ आङ्गकम् , वाङ्गकम् । अबन्ताद्धि गोत्रात् "-अञ्यबिनः” (६।३।१७२) इत्यण् वाधकः स्यात् । आदिशब्दात् “साल्वांशप्रत्यग्रथकलकूटाऽमकादि” (६।१।११७) साल्वा नाम जन- पदस्तदंशेभ्यः प्रत्यग्रथादिभ्यश्च इनिभ्यः सरूपेभ्यो यथाई राजन्यपत्ये दिरिब् स्यात् । उदुम्वराणां राजा उदुम्वरस्यापत्यं वा औदुम्बरिः । “उदुम्बरास्तिलखला मदॆकारा युगन्धराः । मुंलिङ्गाः शरदण्डाश्च साल्यांशा इति कीर्तिताः ॥ १ ॥ अजमीढाजकुन्दबुधास्तूदुम्बरादिविशेषाः, तेऽपि साल्वांशा एव । २० प्रत्यग्रथादिग्रहणमसाल्वांशार्थम् ॥ ३७॥ दुनादिकुर्विकोशलाऽऽजादायः ॥ ३८॥ [सि०६।१।११८] दुसंज्ञेभ्यो नादेः कुरोरिदन्तेभ्यः कोशलाऽऽजादाभ्यां च द्रियः सात् । आम्बष्ठयो राजाऽ- पत्यं वा । एवं नैषध्यः कौरव्यः आवन्त्यः कौशल्यः आजाद्यः॥"पाण्डोर्य” (६।११११९) पाण्ड्यः ॥ "शकादिभ्यो द्रेल” (६।१।१२०)। शकः । यवनः ॥ ३८ ॥ २५ *(इत्यपत्यप्रत्ययाधिकारः ।) "दुना०" आम्बष्ठानां राजा आम्बष्ठस्यापत्यं वा आम्वष्ठ्यः, आम्बष्ठाः । सौवीराणां सौवीरस्य वा सौवीर्यः सौवीराः । काम्बव्यः काम्बवाः । दाwः दार्वाः । द्विस्वरलक्षणोऽण् परत्वादनेन वाध्यते । एवं दुसंज्ञकाः ॥ निपधानां निपधस्य वा नैपध्यः निपधाः । नैचक्यः निचकाः । नेप्यः नीपाः इत्यादि नादयः । कुरूणां कुरोर्वा कौरव्यः कुरवः । अवन्तीनामवन्तेर्वा आवन्यः अवन्तयः । कौन्त्यः कुन्तयः । वासात्यः वसातयः । चेद्यः चेदयः । काश्यः काशयः इत्यादि इदन्ताः 1 कोशलानां कोश-३१ १ ननु गान्धार इत्यत्र लवभावे फलमस्ति यतो लुप्ते गान्धारिरिति स्यात् , स्थिते तु गान्धारः; साल्वेय इत्यत्र तु किं फलम् ? उच्यते । अत्रालुपि सङ्घादिविवक्षायामण् लुपि तु 'गोत्राददण्ड'-इत्यकञ् स्यात् । २ ननु दुलक्षणग्यस्य बाधनेन विधानमिदं चरितार्थमिति कुतो विधानसामादित्युक्तमित्याह अन्य० । ३ अगान्धारिसाल्वेयदुनादिकुर्वितकोशलाऽऽजादाय इसनया युक्त्या प्रतिषेधे कृते राष्ट्रक्षत्रियादित्यनेना- भविष्यतीत्यर्थः । - ३५८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- लस्य या कौशल्यः कोशलाः । अजादीनामजादस्य वा आजाद्यः आजादाः । एभ्य इति किम् ? कुमारी नाम जनपदः, क्षत्रिया च; ततो राजन्यपत्ये वाव-कौमारः। "पाण्डो."पाण्डुशब्दात्सरूपाय- थाई राजापत्ये द्रियण् स्यात् , पाण्डूनां राजा पाण्डोरपत्यं वा पाण्ड्यः पाण्ड्यौ पाण्डवः । कथं पाण्डवाः यस्य दासाः ? तस्य क्षत्रियस्य राष्ट्रसरूपस्य य ईश्यो जनपदो यश्च तस्य क्षत्रियसरूपस ५राष्ट्रस्य ईशिता । क्षत्रियः स एव गृह्यते प्रत्यासत्तेः, अत्र तु कुरवो जनपदस्तस्य राजा पाण्डुरिति शिवा- घण् भवति । डकारोऽन्यस्वरादिलोपार्थः, णकारो वृद्धिनिमित्तपुंवद्भावप्रतिषेधार्थः पाण्ड्याभार्यः। "शकादि०" शक इत्यादि-एवं जतः कम्बोजः चोलः केरलः आधारयः विधारयः उपधारयः अपधारयः मुरलः ससः । शकादयः प्रयोगगम्याः । इत्यादिशब्दप्रहणात् “कुन्त्यवन्तेः स्त्रियाम्" (६।१।१२१)। आभ्यां परस्य द्रेय॑स्य लुप् स्यात्, १० स्त्रियामभिधेयायाम् । कुन्तेरपत्यं स्त्री कुन्ती, एवमवन्ती । स्त्रियामिति किम् ? कौन्त्यः आवन्त्यः । प्रकृतस्य ट्रेलविज्ञानात् स्वार्थिकस्य ब्यटोऽद्रिसंज्ञकस्य लुप् न स्यात्-कौन्ती । "कुरोर्वी" (६।१।१२२)। कुरोः परस्य द्रेय॑स्य स्त्रियां या लुप् स्यात् । कुरोरपत्यं स्त्री कुरूः, कौरव्यायणी "कौरव्यमाण्डूका. सुरेः" (२१४७०) इति डायन् ॥ "द्रेरऽनणोऽप्राच्यभर्गादेः" (६।१।१२३) प्राच्यान् भर्गा- दीश्च वर्जयित्वाऽन्यस्मात्परस्यानोऽणश्च द्रेः स्त्रियां लुप् स्यात् । अञ्, शूरसेनस्यापत्यं स्त्री शूरसेनी । १५एवमप्राच्या ॥ अण्. मद्री, दरद्, मत्सी । द्रेरिति किम् ? औत्सी औपगवी । द्रावनुवर्तमाने पुनर्द्रिप्र. हणं भिन्नप्रकरणस्यापि दुर्लुवर्थम्-पर्शः, रक्षाः, असुरी । पशु, रक्षस् , असुर, राष्ट्र इति राष्ट्रसरूपक्ष- त्रियवाचिनः । एपामपत्यं सद्धः स्त्रीत्वविशिष्टो विवक्षितः इत्यत्रणोः "शकादिभ्यो दुर्लप्” इति लुपि पुनः पादिलक्षणः स्वार्थिकोऽण, तस्यापि नियामनेन लुप् । अत्रण इति किम् ? औदुम्भरी-सालांश- त्यादिम् । अप्राच्यभगादेरिति किम् ? पाञ्चाली वैदेही पैप्पली मागधी कालिङ्गी वैदर्भी आजी यानी २० सीसी पौण्ड्री शौरमसी । पञ्चालादयः प्राच्या राष्ट्रसरूपाः क्षत्रियाः । भर्गादि. भार्गी। भर्ग, करूप, फलश, केकय, कश्मीर, साल्व, सुस्थाल, उरश, यौधेय, शौकेय, शौभ्रेय, धाय, धार्तेय, ज्यावानेय, विगत, भरत, उशीनर, इति भर्गादिः । यौधेयादिज्यावानेयान्तानां स्वार्थिकस्यानो ट्रेलप्रतिपिध्यते । यौधेयीनां सङ्घादि यौधेयमिति सहाद्यणर्थम् । लुपि हि सत्यामत्रत्वाभावात् सङ्घायण न स्यात् । प्रकृतस्य त्वनः प्रसङ्गाभावान्न प्रतिषेधः । भरतोशीनरशब्दावुत्सादिषु पठ्येते, तयोरिहोपादानात्सत्य- २५प्यणपयादे चेयस्मिन् उत्सायनं याधित्वा द्रिसंज्ञक एवाम् भवतीति ज्ञाप्यते, तेन भरताना राजानो भरता उशीनराणां उशीनरा इति राशि विहितस्यात्रो “बहुप्यसियाम्" इति लुप् सिद्धा भवति । उत्सा: परतु द्रिसंशाया अभावान स्थान् । नापि “यनमो." (६३११२६) इत्यादिना प्राप्तिः, राज्ञामगोतवान् । इत्यपत्यप्रत्ययानामधिकारः समर्थितः । मूले तु यणिकामानं गृत्ती किमपि विस्तृतः ॥ ३८॥ १० पितृमातुर्व्यडुलं भ्रातरि ॥३९॥ [सि० ६।२।६२] आभ्यां यथासत्सं प्रातरि पठ्ठलो साताम् । पितृव्यः । मातुलः ॥ ३९ ॥ "पित." । सूर्य सष्टम ।। ३९ ॥ भयम-गदियात्रियपोरेशदाता भकी, सदानी भनि। ३२ - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः ३५९ पित्रो महट् ॥ ४० ॥ [सि० ६२।६३ ] पितृमातृभ्यां मातापित्रोमिहट् स्यात् । पितामहः पितामही । मातामहः मातामही॥४०॥ "पित्रो०" माता च पिता च पितरो तयोः पित्रोः । पितामह इति-पितुः पिता पितामहः । पितु. माता पितामही । मातुः पिता मातामहः । मातुर्माता मातामही ॥ ४० ॥ रागाहो रक्ते ॥४१॥[सि०६।२१ ] येन कुसुम्भादिना वस्त्रादि रज्यते स रागस्तस्साट्टान्ताद्रक्तमित्यर्थेऽण् स्यात् । कुसुम्भेन रक्तं कौसुम्भं वस्त्रम् । “लाक्षारोचनादिक" (६।२।२) लाक्षिकः, रौचनिकः पटः ॥ ४१ ।। "शगा."। येनेत्यादि-शुक्लस्य वर्णान्तरापादनमिह रज्जेरर्थः । टान्तादिति तृतीयान्तादित्यर्थः । कौसुम्भ- मिति-एवं काषायम् कौमुमम् माञ्जिप्टम् हारिद्रम् माहारजनम् । वाऽधिकारात् पक्षे वाक्यं समासश्च भवति- कुसुम्भेन रक्तम् , कुसुम्भरक्तमित्यादि । रागशब्देन प्रसिद्धा एव कुसुम्भादयो रागा गृह्यन्ते, तेनेह न १० भवति-कृष्णेन रक्तम् , लोहितेन पीतेन रक्तमिति; एते हि वर्णा द्रव्यवृत्तयो न तु रागाख्याः । कथं कापायौ गईभस्य को, हारिद्रौ कुक्कुटस्य पादाविति ? कापायाविव कापायौँ हारिद्राविव हारिद्रौ इत्यु- पमानोपमेयभावेन तद्गुणाध्यारोपाद्भविष्यति । "लाक्षा०" । अणोऽपवाद इकण् । इत्यादिशब्दसम्बन्धात् "शकलकर्दमाद्वा” (६।२।३)। आभ्यां रागविशेषवाचिभ्यां टान्ताभ्यां रक्तार्थे इकण् वा स्यात् । शाकलिकं शाकलम् । कार्दमिकं कार्दमम् । “नीलपीतादकम्" (६।२।४)।१५ आभ्यां रागविशेषवाचिभ्यां रक्तार्थ यथासङ्ख्यम् अ क इत्येतौ स्याताम् । नीलेन, लिङ्गविशिष्टग्रहणात् नील्या वा रक्तं नीलम् । पीतेन रक्तं पीतकम् । केचित्तु पीतकशब्दादप्यप्रत्ययमिच्छन्ति, पीतकेन कुसुम्भप्रथमनिर्यासेन रक्तं पीतकम् । गुणवचनत्वात् केन च सिद्धेऽणपवादार्थ वचनम् । "उदित- गुरो द्युक्तेन्दे" (६।२।५) उदितो गुरुयस्मिन् भे नक्षत्रे तद्वाचिनस्तृतीयान्तायुक्तेऽर्थे यथा- विहितः प्रत्ययः स्यात् , स चेद्युक्तोऽर्थोऽब्दः संवत्सरः स्यात् । पुष्येण उदितगुरुणा युक्तं वर्ष पौषम् ,२० अत्र च "तिष्यपुष्ययो णि" (२।४।९०) । तस्य नक्षत्रस्य सम्बन्ध्यण भाण् , यो भादित्यु- ल्लेखेन विधीयते । तिष्यपुष्ययोर्यकारस्य भाणि परतो लुक् स्यात् । एवं तैषं वर्षम् , पौषं तैपमहः, पोपी तैपी रात्रिः । "चन्द्रयुक्तात्काले लुप्त्वप्रयुक्ते” (६।२।६) । चन्द्रेण युक्तं यन्नक्षत्रं तद्वाचिन- स्तृतीयान्तायुक्तेऽर्थे यथाविहितः प्रत्ययः स्यात् (चेयुक्तोऽर्थः कालो भवति ), अप्रयुक्ते तु कालवाचके शब्दे तस्य लुप् स्यात् । पुष्येण चन्द्रयुक्तेन युक्तमहः पौपमहः पौपः कालः । लुम्बऽप्रयुक्ते अद्य पुष्यः १२५ पुष्ये पायसमनीयात् । "द्वन्द्वादीयः” (६।२।७) । चन्द्रयुक्तं यन्नक्षत्रं तहन्द्वात्तृतीयान्तायुक्त काले ईयः स्यात् । राधानुराधाभिश्चन्द्रयुक्ताभिर्युक्तं राधानुराधीयमहः । अद्य राधानुराधीयम् । एवं तिष्य- पुनर्वसवीया रात्रिः । अद्य तिष्यपुनर्वसवीयम् । "श्रवणाऽश्वत्थान्नान्यः” (६।२१८) आभ्यां चन्द्रयुक्तनक्षत्रवाचिभ्यां तृतीयान्ताभ्यां युक्ते काले अकारः प्रत्ययः स्यात् , नाम्नि, प्रत्ययान्तं चेत्का- लविशेषस्य नाम स्यात् । श्रवणेन चन्द्रयुक्तेन युक्ता श्रवणा रात्रिः । अश्वत्था पौर्णमासी । सत्यप्य-३० न्वर्थयोगे न कालमात्रमेवोच्यते, अपि तु कालविशेप एवेति नामत्वम् (नानीति किम् ? श्रावणमह इत्यादि ।)॥४१॥ १ उपलक्षणमिदमन्येपामपि वर्णानां वर्णान्तरापादनमिह रखैरथः । २ ट इत्येकदेशेन समुदायोपलक्षणत्वात्तृतीया लभ्यते । ३ द्रव्यपु कुसुम्भादिपु वृत्तिर्येषां द्रव्याश्रयी गुण इति कृला । ४ रज्यनेऽनेनेति रागशब्दव्युत्पत्तेरघटनात् । ५ अत्र अद्येय- स्याधारमेव न सामानाधिकरण्यम् । ६ इदं सूत्रं विनापि नीलपीतगुणयोगान्नीलं पीत च. पीतात्तु खार्थिकेन कुत्सितार्थेन वा कपा पीतकमिति च सेत्स्यतीखागदा। २२ P ३६० महामहोपाध्यायश्नीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- षष्ठ्याः समूहे ॥ ४२ ॥ [सि० दा९] पष्ट्यन्तात्समूहेऽणादयः स्युः । चापम् । “भिक्षादेः” (६।२।१०) भैक्षं गार्भिणम् । *गोत्रोक्षादिभ्योऽकञ्-औपगवकम् । औक्षकम् । "िकेदाराण्ण्याकौ” कैदार्य केदार- कम् । "कवचिहस्त्यचित्ताचेकण्” (६।२।१४) कावचिकम् । हास्तिकम् । आपूपिकम् । ५कैदारिकम् । "ब्राह्मणमाणववाडवाद्यः” (६।२।१६) ब्राह्मण्यम् "गणिकाया ण्य" (६।२।१७) गाणिक्यम् । "केशाद्वा" (६।२।१८) कैश्यं कैशिकम् । “चाऽश्वादीयः" (६२।१९) अश्वीयं आश्वम् । “पाद् डण्” (६।२।२०) पशूनां समूहः पार्श्वम् ॥ ४२ ॥ "पष्ठया." । गोनादिभ्योऽकञ् वक्ष्यते, अचित्तादिकण प्रतिपदं वक्ष्यते केदाराण्ण्यश्चेत्येवमादयः । ततोऽन्यदिहोदाहरणं द्रष्टव्यम् । चापाणां समूहः चापम् । एवं काकं याकं शौकं भैक्षुकं वाडवम् । १० वनस्पतीनां समूहो वानस्पत्यम् खैणम् पौलम् । पञ्चानां कुमारीणां समूहः पञ्चकुमारीयन तु समूहः समाहार एव, स च समासार्थः, समासेनैव च गत इति तद्धितो नोत्पद्यते । यद्युत्पद्येत को दोषः स्यात् ? उत्पन्नस्यापि ह्यस्य "द्विगोरनपये यस्वरादे बद्विः” ( ६।१।२४) इति लुपा भवितव्यं तथा चाविशेषः । नैवम् । "डयादेौणस्य." (२।४।९५) इत्यादिना डीनिवृत्तिः स्यात् "तस्येदम्” (६। ३।१६०) इत्येवाणादिसिद्धौ समूहविवक्षायां तैदपवादबाधनार्थो योगः | "भिक्षा" । भिक्ष- १५ शब्दोऽकारान्तोऽपीत्येके । भिक्षा, गर्भिणी, युवति, क्षेत्र, करीप, अङ्गार, चर्मन्, वर्मन् , चर्मिन् , धर्मिन् , पद्धति, सहस्र, अथर्वन, दक्षिणा, खण्डिक, युग, परत्रा, युगवरत्रा, हल, बन्ध, हलाबन्ध (ली. ल. १) औलुक्य इति भिक्षादयो द्वाविंशतिः । भिक्षादीनामचित्तकणो बाधनार्थ वचनम्, औलुक्यशब्दस्य गोत्राको बाधनार्थः पाठः, युपतेरण सिद्ध एव पुंवद्भावयाधनार्थस्तु पाठक, तु युवतिशब्दं न पठन्ति तन्मते पुंवद्भावे सति युवतीनां समूहो यौवनमित्येव भवति । "मुरूपमति- २० नेपथ्यं कलाकुशलयौवनम् । यस्य पुण्यकृतः प्रेष्यं सफलं तस्य यौवनम्" ॥१॥ आदिशब्दात् "क्षुद्रकमालवात्सेनानाम्नि" (६।२।११) क्षुद्रकमालवशब्दात्समूहेऽर्थेऽण् स्यात् । क्षुद्रकाश्च मालयाश्च क्षुद्रकमालवास्तेषां समूहः क्षौद्रकामालची, एवं नामा काचित्सेना । गोत्राक- बाधनार्थ वचनम् । समूहाधिकारे हि तैदन्तस्यापि ग्रहणम्-"धेनोरनमः" (६।२।१५) इति प्रतिपे. धात्। *गोत्रेत्यादि-गोत्रोक्षयत्सोष्ट्रवृद्धाऽजोरभ्रमनुष्यराजराजन्यराजपुत्रादकर" २५(६।२।१२) गोजप्रत्ययान्तेभ्य उक्षादिभ्यो दशभ्यश्च समूहे कञ् स्यात् । औपगवकमिति एवं गार्गक वात्स तद्धितयखरेऽनाति” (२४९२) इति यलुक । गार्यायणकं वात्स्यायनकम् । औक्षक- मिति-एवं वात्सक औष्ट्रकं वार्द्धकं आजक औरनक मानुष्यक राजकं राजन्यकं तद्धितयखरेऽना ती"ति यलोपे प्राप्ते सूत्रम्-"न राजन्यमनुष्ययोरके" (२४१९४) अनयोर्यकारस्य अके परे लुग् न स्यात् । राजपुत्रकम् । । "केदा" [अन "केदारापण्यश्च" (६।२।१३) इति सूरम् ] ३० अचित्तेफणोऽपवादः । “कव०" । क्यचिन् हस्तिन इत्येताभ्यां अचित्तान, चानुकृष्टात् वेदाराध समूहे. इक्ण् स्यात् । लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणात् हस्तिनां हस्तिनीनां वा समूहो हासिकम् । २२ फेदारामेवं रूप्यम्। १ वपश्यचिप्रमृतय प्रतिपदोफलात् फेदारापण्यरेत्यादिपु दृष्टव्या इति गोत्रादकम्' इत्यत्र न ठसा । २ द्वयोरप्येअर्थ- ३ तदितलक ससामिति शेष । ४ ईयारी नामित्यर्थ । खाद' इति न्यायान् समुदायस्यागोगलात क्षोदकमालवमिति न वियेत् । अन्ये +- सरसगर एवं समाहार इत्यर्ष । ५अन्यथा प्रयय प्रा.

. . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । सामूहिकप्रत्ययाधिकार आदिशब्दात् “धेनोरनञः” (६।२।१५) धेनुशब्दात् समूहे ईकण् स्यात् , न चेत्स नत्रः परः स्यात् । धेनूनां समूहो धैनुकम् । अनत्र इति-अधेनूनां समूह आधेनवम्-उत्सादित्वादन् । अनम इति निपेधेन तदन्तविधेापितत्वात् ब्राह्मणराजन्यकं वानरहस्तिकं गौधेनुकम् । “ब्राह्म" ब्राह्मणानां समूहो ब्राह्मण्यम् । एवं माणव्यं वाडव्यम् । “गणि०" गणिकानां समूहो गाणिक्यम् । ब्राह्मणादीनां यवचनं पुंवद्भावार्थम्-ब्राह्मणाः प्रकृता अस्यां यात्रायां "तयोः समूहवच बहुपु” (७३१३) इति ५ यः प्रत्ययः । ब्राह्मण्या यात्रा यस्य स ब्राह्मण्ययात्रः । वाडव्ययात्रः । ण्ये हि पुंवद्भावो न स्यात्, यथा गाणिक्यायात्रः । "केशा०” पक्षे अचित्तलक्षण इकण् । “वाऽश्वा०" पक्षे औत्सर्गिकोऽण आश्वम् । “पा” पशुशव्दात् समूहे वण् स्यात् । अचित्तेऽकणोपवादः । डित्त्वादन्यवरादिलोपः। आदिशब्दात् “ईनोह्नः क्रतो” (६।२।२१) अहन्शब्दात्समूहे क्रतो वाच्ये ईनः स्यात् , अहां समूहः अहीनः क्रतुः । क्रताविति किम् ? आह्नमन्यत् श्वादिपाठादञ् । "पृष्ठाद्यः” (६।२।२२)१० समूहे ऋतौ वाच्ये पृष्ठानां समूहः पृष्ठयः ऋतुः । पृष्ठशब्दोऽहःपर्यायः । रथन्तरादि सामपर्याय इत्यन्ये । क्रतावियेव-पार्टिकम् । “चरणाद्धर्मवत्" ( ६।२।२३) चरणं कठकालापादि तस्माद्यथा धर्मे प्रत्ययाः स्युः, तथा समूहेऽपि । वत् सर्वसादृश्यार्थस्तेन यकाभ्यः प्रकृतिभ्यो यः प्रत्ययो यथा धर्म स्यात्ताभ्यः स प्रत्ययस्तथैवेहापि स्यादिति । यथा कठानां धर्मः काठकम्, कालापकं छान्दोग्यं औक्थिक्यं वाढच्यं आथर्वणिकम् । तथा समूहेऽपि काठकमित्यादि ॥ ४२ ॥ १२ गोरथवाताबल्कव्यलूलम् ॥४३॥ [सि० ६।२।२४ ] एभ्यस्त्रिभ्य एते त्रयः स्युः । लित्प्रत्ययान्तानां स्त्रीत्वम्-गोत्रा, रथकट्या । वातूलः ॥४३॥ "गोर०" । लित्प्रत्ययान्तानामिति “लिन्मिन्यनिण्यणिरुयुक्ता” इति लिङ्गानुशासनवचनात् । एत- त्प्रत्ययान्तानां स्त्रीत्वम् । तत्र लित्प्रत्ययान्ता यथा. गोत्रा । मिप्रत्ययान्ता यथा. सूर्मि:-स्थूणा, अयःप्रतिमा च, वर्मिः वल्मीककृमिः । निप्रत्ययान्ता यथा. वेनिः-व्याधिः, केशरचनादि च । सोनिः सवनम् ।२० अनिप्रत्ययान्ता यथा. अटनिर्धेनुः, प्रान्तः । कटनिः-शैलमेखला । धमनिः शिरा। णिप्रत्ययान्ता यथा. वाणिः-व्यूतिः, मूलं च । निश्रेणिः-अधिरोहणी, खर्जुरी च । अणिप्रत्ययान्ता यथा. सरणिः-पन्थाः, श्रेणिश्च । प्रहणिः-कोष्ठस्थानम् , रोगविशेषश्च । करणिः सादृश्यम् । ख्युक्ताः क्तिक्यपशप्रभृतय इति । वातूल इति अलप्रत्ययस्य लित्वाभावान्न स्त्रीत्वम् ॥ ४३ ॥ पाशादेश्च ल्यः॥४४॥ [सि०६।२।२५] गवादिभ्यः पाशादेश्च ल्यः सात् ॥ ४४ ॥ "पाशा" । पाशादिभ्यो गोरथवातशब्देभ्यश्च समूहे ल्यः स्यात् ॥ ४४ ॥ व्यक्ये ॥४५॥ [सि० ११२।२५] ओदौतोः क्यवर्जे यादौ प्रत्ययेऽवावौ स्याताम् । गव्या वात्या पाश्या । "श्वादिभ्योऽम्" (६।२।२६) शौवम् । "खलादिभ्यो लिन्” (६२।२७)। खलिनी ऊकिनी । “ग्रामजन ३० अन्धुगजसहायात्तलू” (६२।२८) ग्रामता ॥४५॥ ( इति सामूहिकाः । "श्यक्ये” । अक्य इति किम् ? उपोयत औयत । पाश्येति-पाश तृण खल धूम अङ्गार पोटगल पिटक पिटाक शकट हल नल वन इति पाशादयो द्वादश १२ । भिक्षादिपाठादगारहलशब्दाभ्यामणपि-३४ है. प्रका० पूर्वा० ४६ २५ - " ३६२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- आहारं हालं । लकारः स्त्रीत्वार्थः । "श्वादि०" शुनां समूहः शौवम् । एवं अहामाह्रम्, चक्रिणां चाकम् , दण्डिनां दाण्डम् । अणेव सिद्ध "नोऽपदस्य." (७४६१) इत्यन्त्यस्वरादिलोपार्थमन्वच. नम्, अणपवाद्याधनाथं च । श्वादयः प्रयोगगम्याः । “ग्राम०" सूत्र स्पष्टम् । आदिशब्दात् "पुरु- पात्कृतहितवधविकारे चैयम्" (६।२।२९) । पुरुपशब्दात् कृतादिषु चतुरर्थेषु, चकारात्समूहे ५च एयञ् स्यात् । कृतादौ यथाई विभक्तियोगः । पुरुपेण कृतः पौरुपेयो ग्रन्थः, पुरुपाय हितं पोस्पे- यमईच्छासनम्, पुरुपस्य वधो विकारो वा पौरुपेयः, पुरुषाणां समूहः पौरुपेयम् ॥ ४५ ॥ विकारे ॥ ४६॥[सि० २।३०] पट्यन्ताद्विकारेऽणादयः स्युः ॥ ४६ ॥ "विका०" । द्रव्यस्यावस्थान्तरं विकारः ॥ ४६ ॥ वाऽश्मनो विकारे ॥४७॥ [सि०७४।६३] विकारार्थे तद्धितेऽश्मनोऽन्त्यस्वरादेर्वा लुक् । आश्मनः आश्मः । "पुजतोः पोऽन्त" (६।२।३३) त्रापुपं जातुपम् । “पयोद्रोर्यः" (६।२।३५) पयसं द्रव्यम् । “एकस्वरात्" (६।२।४८) मयट् । मृन्मयम् । “गोः पुरीपे" (६।२।५०) गोमयम् । "अपो यञ्चा (६।२।५६) आप्यं अम्मयम् ॥ ४७॥ "वाऽश्म० । स्पष्टम् । एवं भस्मनो विकारो भास्मनः । मृत्तिकाया मार्तिकः । अर्द्धस्य आर्द्धः । हलस्य हालः । सीरस्य सैरः । वेदीनां वैदः । वृजीनां पार्जः । त्रिगर्तानां गतः । रंहूनां रांहवः "तस्पेदम्” ( ६३३१६०) इत्येवाणादिसिद्धावर्द्धादियु विकारेणापयादयाधनाथं वचनम् । आदिशब्दात् "तालाद्धनुपि" (६२।३२)। विकारेऽण् । दुलक्षणस्य मयटोऽपवादः । तालस विकारः सालं धनुः । धनुपीति किम् ? तालमयं काण्डम् । “पु०" सूत्रं स्पष्टम् । “पयो" पय- २० सोऽणोपवादः । द्रोरेक्स्वरमयटः । पयसो विकारः पयस्यम् । द्रोारणो विकारो द्रव्यम् । आदिशब्दात् "शम्या ल" (६२१३४) शमीशब्दाद्विकारेऽवयवे घाण, तत्सन्नियोगे चास्य लोऽन्तः । शम्या विकारोऽवपयो वा शामीलं भस्म, शामीली शासा । "उष्टादकम्" (६।२।३६) विकारेऽवयवे च । उष्ट्रस्य उघूया या विकारोऽवयवो वा औष्ट्रकं मांसम्, औष्ट्रिका जसा । “उमो- र्णाद्वा" (६।२।३७) विकारावयययोरकञ् । उमा अवसी, तस्या विकारोऽवययो वा ओमकम् २५ ओमम् । र्णाया विकारः ओर्णकः, और्णः कम्बलः । “एण्या एयम्" (६।२।३८) विकारावयः पयो । भणोऽपवादः । ऐणेयं मांसम् , ऐणेयी जवा । स्त्रीलिङ्गनिर्देशान् पुहिङ्गादणेय-ऐणं मांसम् । ऐणी जहा । "कौशेयम्" (६।२।३९) कोशशब्दात् विकारे एयञ् निपात्यते । कोशस विराः पौरोयं ययं सूत्रं या । निपातनं रूट्यर्थम् , तेन पचनाभ्यामन्या भस्मादौ न स्यात् । “परश व्यापलुफ प" (६।२।४०) परशरे इदं परशव्यम् , तस्माद्विकारेऽण् स्यात, यकारस घ ह। २० परसव्यसायसो विकारः पारसायम् । अण् सिद्ध एव, यलुगयं वचनम् । यमहणेन च ससरयकारलोपा म्यान्, तेनोत्तरसूत्रे "स्परस्स परे प्राविधी" (१९१०) इत्यस्यानुपस्थानापलोपे "अवर्णेपर्गव (१६८) इतीकारलोप: म्यान् । "कसीयाभ्यः" (हारा४१) फंसाय इदं फंसीयम्, "परि- पामिनि तदर्थे (११५४) इति यः। सीयशब्दादिकारे या स्यात्, योगे प लुरु च । फंसीयस '४ विकार: पालम् । "हेमाङन्माने" (४२) हेमवासिन्दात् माने पियारे पाये।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । वैकारिकप्रत्ययाधिकारः ३६३ - स्यात् । दुमयटोऽपवादः । हाटकस्य विकारो हाटको निष्कः । हैमो निष्क इत्यत्र परत्वाद्धेमादिलक्ष- णोऽव । अर्थग्रहणं स्वरूपविधिव्युदासार्थम् । मान इति किम् ? हाटकमयी यष्ठिः । “द्रोर्वयः" (६२।४३) मानविकारे । यस्यापवादः । द्रोविकारो द्रुवयं मानम् । "तुलाद्यैः पौतवं मानं द्रुवयं कुड- वादिभिः" इति अभिधानचिन्तामणौ । “मानात्क्रीतवत् (६।२।४४) । मीयते परिच्छि- द्यते येन तन्मानं इयत्ता परिच्छित्तिहेतुः सङ्ख्यादिरुच्यते । मानवाचिनः शब्दाद्विकारे क्रीतवत्प्रत्यय-५ विधिः स्यात् । यथा शतेन क्रीतं शत्यं शतिकम् , तथा झतस्य विकारः शत्यः शतिकः । एवं साहस्रः नष्किकः । वत् सर्वविधिसाश्यार्थः, तेन लुवादिकस्यापि अतिदेशो भवति-द्विशतः त्रिशतः द्विस- हस्रः द्विसाहस्रः द्विनिष्कः द्विनैष्किकः । “हेमादिभ्योऽञ्” (६।२।४५) एभ्यो यथायोगं विका- रेऽवयवे च नित्यमञ् स्यात् । हेनो विकारो हैमं शरासनम् । हैमी यष्टिः । हेमन् , रजत, उदुम्बर, नीबुदार, रोहीतक, विभीतक, कण्डकार, गवीधुका, पाटली, श्यामाक, वाहिण, इति हेमादय एका-१० दश । बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । हेनोऽण्याधनार्थं अब्वचनम् , अणि हि सति "अणि" (७।४।५२) इत्यन्त्यस्वरादेर्लुग्न स्यात् । पाटलीश्यामाकवार्हिणानां दुलक्षणस्य, शेषाणां तु वैकल्पि- कस्य मयटो वाधनार्थम् । “एक०” एकस्वरान्नानो यथासम्भवं भक्ष्याच्छादनवर्जिते विकारेऽवयवे च नित्यं मयट् स्यान् । मृन्मयमिति-एवं वाङ्मयं त्वङ्मयं सुङ्मयं गीर्मयं धूर्मयम् । “गो०" गोः पुरी. धम् गोमयम् । यद्यपि पुरीषं विकारतया न प्रसिद्धं तथापि दोपधातुमलमूलं शरीरमिति विवक्षायां १५ 'तात्स्थ्यात्तद्वदुपचार' इति गोः पुरीपं पयश्च विकारो भवति । एकस्वरादित्येव सिद्धे पुरीये नियमार्थ वचनम् । “अपो०" अपां विकारः आप्यं अम्मयम् । एकस्वरमयटोऽपवादः ॥ ४ ॥ ह्योगोदोहादीनञ् हियङ्गुश्चास्य ॥४८॥ [सि० ६।५५ ] ह्योगोदोहशब्दाद्विकारे नाम्नीनन्, प्रकृतेहियगुरादेशश्च स्यात् । हैयङ्गवीनम्-नवनीतं घृतं वा॥४८॥ "योगो०" । सूत्रं स्पष्टम् ।। ४८ ।। प्राण्यौषधिवृक्षेभ्योऽवयवे च ॥४९॥ [सि०६।२।३१] एभ्यो विकारेऽवयवे चाणादयः स्युः । कापोतं सक्थि मांसं वा । दौर्व बैल्वं काण्डं भस या ॥४९॥ "प्राण्यौ०" । एभ्योऽवयवे विकारे च यथाहं प्रत्ययाः स्युः । तत्र कापोतं सक्थीति प्राणिनोऽवयवे,२५ मांसमिति च विकारे । दौवं काण्डमिति औपधेरवयवे, भस्मेति च विकारे । वैल्वं काण्डमिति वृक्ष- स्यावयवे, भस्मेति च विकारे । प्राणिनश्चेतनावन्तः, औषधयः फलपाकान्ताः, वृक्षाः पुष्पवन्तः फल- वन्तश्च । वृक्षविशेषत्वात् वनस्पतिवीरुधामपि वृक्षग्रहणेन ग्रहणम् , प्राणिग्रहणेनैव चेतनावत्त्वेन वृक्षोप- धिग्रहणे सिद्धे तदुपादानमिह शास्त्रे प्राणिग्रहणेन त्रसा एव गृह्यन्ते, न च स्थावरा, इति नापनार्थम् ॥ ४९ ।। अभक्ष्याच्छादने वा मयट॥५०॥[सि० ६।४६] भक्ष्याच्छादनवज यथाहँ विकारावयवयोर्मयड्वा । भसमयं भासनम् । निषेधे-मौद्गः सूपः । कार्पासः पटः । "लुबहुलं पुष्पमूले" (६।२।५७) “फले" (६।२।५८) वैकारिकस्य । मल्लिका पुष्पम् । विदारी मूलम् । आमलफलमित्यादि । *( इति वैकारिकाः २० AU , महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "अभक्ष्या० | *निषेध इति-भक्ष्याच्छादनयोरित्यर्थः । भक्ष्याच्छादनयोर्मयडभावपक्षे च "वालानुपि" (६।२।३२) इत्यादिको विधिः सावकाशः । अयं च भस्ममयमित्यादौ । तत्रोभयप्राप्ती परत्वादनेन मयट् भवति–तालमयं धनुः । वपुमयं जतुमयं शमीमयं पयोमयं द्रुमयं उष्ट्रमयं उमामय ऊर्णामयं एणीमयं कोशमयं परशव्यमयं कंसीमयम् । एके तु तालाद्धनुपि द्रोः प्राणिवाचिभ्याच ५मयट नेच्छन्ति । आदिशब्दसंसर्गात् "शरदर्भकूदीतृणसोमबल्वजात्" (६।२।४७) । एभ्यः पड्भ्योऽभ- क्ष्याच्छादनवर्जविकारावयवयोर्मयट् स्यात् । शरमयम् । “दोरप्राणिनः" (६।२।४९) । दुसंज्ञ- कादप्राणिवाचिनो यथायोगं भक्ष्याच्छादनवर्जविकारावयवयोर्मयट् स्यात् । अणोऽपवादः । आम्रमयं सालमयं शाकमयं काशमयं तन्मयं यन्मयम् । अप्राणिन इति किम् ? श्वाविधी विकारोऽवयवो वा १० शौयाविधम् , श्वाविन्मयम् । चापं चापमयम् । "व्रीहेः पुरोडाशे" (६।२।५१)। नित्यं मयट् । अणोऽपवादः । प्रीहिमयः पुरोडाशः । पुरोडाश इति किम् ? ड्रहः ओदनः, त्रैहं भस्म । "तिलय- पादनानि" (६।२।५२) आभ्यां विकारावयवयोर्मयट् स्यात्, अनाम्नि । अणोऽपवादः । तिलमयम् यवमयम् । अनानीति किम् ? तैलम् । यवानां विकारो यावः स एव यावकः । "पिष्टात्" (६।२।५३) । विकारे मयट, अनाम्नि । अणोऽपवादः । पिष्टमयम् । "नाग्नि का" (६।२।५४)। १५पिष्टशब्दान्नानि विकारे कः स्यात् । पिष्टस्य विकारः पिष्टिका । "लुब्बहुलं पुष्पमूले" इति- अस्थायमर्थः-विकारावयवयोविहितस्य प्रत्ययस्य पुष्पे मूले विकारतयाऽवयवतया विवक्षिते वहुलं लुप् स्यात् । मल्लिकेति-मल्लिकाया विकारोऽवयवो वा पुष्पं मल्लिका । एवं यूधिका नयमालिका मालती; एष्यणो मयटो या लुपि "डयादेगौणस्याफिपस्तद्धितलुक्यगोणीसूच्योः" (२।४।९५) । यादेः प्रत्ययस्य गौणस्याकिनन्तस्य तद्धितलुकि लुग् भवति, गोणीसूचीसम्बन्धिनस्तु न स्यात् । पञ्च- २० फुमार्यो देवताऽस्य पञ्चकुमारः, पञ्चभिर्धीवरीभिः फ्रीतः पश्चधीवा, पश्चेद्राण्यो देवताऽस्य पश्चन्द्रः, पश्चाग्निः एषु डीनिवृत्ती तत्सन्नियोगशिष्टयोरागमादेशयोरपि निवृत्तिः । द्वे स्त्रियो देवतेऽस्य अणू "दिगोरनपत्ये" (६।१२२४) इति लुप् द्विखः । पञ्चभिर्युवतिभिः फ्रीतः पञ्चयुवा एवं पञ्च- सट्ः, पश्चससः । यदा सखिशब्दात् डयां पश्चभिः सखीभिः क्रीतः इति वाक्ये इकणो लोपेऽनेन डीनिवृशितदा "राजन्सखेः" (७३।१०६) इति समासान्तः, यदा तु ससशब्दात्तदा गनि २५ पृतो सिद्धमेव । द्विपगुः । कुपल्या विकारः फलं कुबलम् । एवं पदरम् आमलकम् । इयादेरिति रिम् । पश्चभिः प्रेयोभिः क्रीतः पञ्चप्रेयान् । गौणस्येति किम् ? अवन्तेरपयं स्त्री अवन्ती, एवं फुन्ती; "मुन्य पन्तेः स्त्रियाम्" (६३१११२१) इत्यपत्यप्रत्ययलुप् । पुरू:-अत्र हि तद्धितलुकि कृते जाती इयूटा वित्यगौणत्वम् । अकिप इति किम् ? फुमारीमिच्छति फुमारीयतीति किप्, तस्य लोपे कुमारी । पन्नकुमार्यो देवताऽस्य पनफुमारी, एवं पश्येन्द्राणी पञ्चयुवती । तद्वितलुकीति किम् ? ओपगयीत्वम् । ३० फर्य हरीतक्याः फलं (विकारो पा) हरीती, एवं कोशातकी; अत्र लुयन्तस्य नीत्यात् पुनौरा- दिलक्षणो सीः । अगोणीसूच्योरिति रिम् ? पञ्चभिर्गोणीभिः फ्रीतः पञ्चगोणिः । एवं पञ्चसूचिः ॥ इति बीप्रत्ययनियूसी लुयन्तस्य स्त्रीत्वात्पुनः स्त्रीप्रत्ययः जातेजातिः। पाटल्याः पाटलाया या पाटलं पाटला पार पदाहु:-पुप्पे ठोपेऽपि पाटला । पाटलीत्यपि । कुन्दम् सिन्दुयारम् कदम्यम् परवीरम् अशोषम् पम्पपम् पर्णिकारम् कोविदारम् । विदायाँ मूलं विदारीति-एवं अंगुमती, (गृहती,) हरिद्रा मापदी ३५मुस्ता । करिम भवति-यरपस पुरुषागि यारणानि । एरण्डस्य मूलानि ऐरण्डानि । पिल्वस पैस्यानि - ।

.. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । वैकारिकाः । चातुरर्थिकाः ३६५ कचिद्विकल्प:-शिरीपस्य पुष्पाणि शिरीयाणि, शरीपाणि । हीवरस्य मूलानि ह्रीराणि, हैवेराणि । कचित्पुप्पमूलाभ्यामन्यत्रापि भवति-आमलकस्य विकारो वृक्षः आमलकी । बदरी । बीहे विकारः स्तम्बो व्रीहिः । “फले" इत्यस्यायमर्थ:-विकारेऽवयवे वा फले विवक्षिते प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । आम- लकमिति-आमलक्या विकारोऽवयवो वा फलमामलकम् । एवं बर्या बदरं, कुवत्याः कुवलम्, भल्हा. तक्या भल्लातकम् , ब्रीहिः यवः मुन्नः मापः गोधूमः निष्यावः तिलः कुलत्यः हरीतकी पिप्पली कोशातकी ५ श्वेतपाकी अर्जुनपाकी कर्कटी नखरल(ज?)नी झष्कण्डी दण्डी दोडी दाडी पथ्या अम्लिका चिच्चा द्राक्षा ध्रुक्षा ध्वाड्डा मृट्ठीका कणा बला एला झाला काला गर्गरिका कण्टकारिका शेफालिका ओपधिः फर्कारः । हरितक्यादिभ्यो लुपि प्रकृतिलिङ्गमेव । तत्र पूर्वस्य स्त्रीप्रत्ययस्य लुपि पुनः स एव स्त्रीप्रत्ययः । यद्यप्यामलकादीनि प्रकृत्यन्तराणि सन्ति, तथाप्यामलक्यादिभ्यः प्रत्ययश्रुतिनिवृत्त्यर्थ वचनम् । अंत्रायं विशेप:-"प्लक्षादेरण" (६।२।५९) । फले विकारेऽवयवे च विवक्षिते । विधानसा-१० मांचास्य लुप् न स्यात् । प्लाक्षं फलम् एवं नैयग्रोधम् । प्लन, न्यग्रोध, अश्वत्थ, इगुदी, वेणु, वृहती, सगु, सकु, कतु इति नवकः प्लक्षादिः । "जम्वा वा” (६।२।६०) । जम्बूझब्दाद्विकारेऽवयवे घा फले विवक्षिते अण्प्रत्ययो वा स्यात् । पक्षे यथाप्राप्तं प्रत्ययस्तस्य च लुप् । जन्या विकारोऽवयवो घा फलं जाम्बवम्, पक्षे जम्बूः जम्बु । लुपि स्त्रीनपुंसकते । “न द्विरद्रुवयगोमयफलात्" (६२।६१)। द्रुवयं गोमयं फलं च वर्जयित्वाऽन्यस्मान्नान्नो विकारावयवयोदिः प्रत्ययो न स्यात् । १५ कपोतस्य विकारोऽवयवो वा कापोतः, कापोतस्य विकारोऽवयत्रो वेति "दोरप्राणिनः" (६।२।४९) इति मयट् न भवति । एवं वैल्यः ऐणेयः शामीलः औष्ट्रकः कांस्यः पारशवः । अठ्ठययगोमयफलादिति किम् ? द्रौवयं खण्डम् । गौमयं भस्म । कापित्थो रसः । कथं कपोतस्य मांसं कापोतम् तस्य विकारः कापोतो रसः, पलाशस्यावयवः पालाशी शाखा, तस्याऽवयवः पालाशी समित् इति ? विकारेऽपि प्रकृतिशब्दो वर्त्तते-मुद्गः शालीन् मुझे मुद्गविकारैः शालिविकारानिति गम्यते । गोभिः सन्नद्धो२० चंहतिगोविकारेश्चर्मभिरिति गम्यते । अवयवेऽप्यवयविझदो वर्त्तते-पूर्व पञ्चालाः, उत्तरे पञ्चालाः । प्रामो दग्धः पटो दग्ध इति । तत्र विकारवृत्तेः प्रकृतिशब्दादवयववृत्तेरवयविझदाच प्रत्ययो भवति । विकारविकारोऽपि वा विकार एवं; अवयवावयवोऽध्यवयव इति । "अवेर्दुग्धे सोढदूसमरीसम्" (६१२१६४) । अविशब्दाङग्वेऽर्थे सोढादयस्त्रयः प्रत्ययाः स्युः । अविसोढं अबिदूसं अविमरीसम् । इति वैकारिकाः प्रत्ययाः। तदत्रास्ति १ तेषां निवासः २ तसादुरभवं ३ तेन निर्वृनं ४ चेत्यर्थचतुष्टयेऽणादयो मतुत्र यथार्ह देशे नाम्नि च वक्तव्याः । औदुम्बरं १ शैवं २ वैदिशं पुरं ३ कौशाम्बी पुरी ४ ॥ * उदुम्बरावती मिधुमान् ॥ "नडकुमुदवेतसमहिपाद्वित्" (६२६७४) । मनुः । नवान् कुमुद्वान् ॥ "नडशादाद् डुलः" (वा२।७५) नद्दलम् , शाहलम् ॥ ५० ॥ -> प्रति चातुधिसः ॥+:- नत्रास्तीत्यादिचातुरर्थिकप्रत्ययसद्धेपतन "तदवास्ति' (६२१७० ) तदिनि प्रथमानाप्रति समस्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यान, प्रथमान्तं चेदनीति स्थान । अत्रापि ति करणो विप्रार्थोऽनु- तेन प्रसिद्धे नाग्नि मूनादा चार्थे भवति; अन एवं योभयप्रानी पगति मन्यधागोऽनन? ३० चर्तन एव, पोन प्रति सतरंदा पनी प्रसाद विरदिमागेनीलः । २riing::::।

३३नंगा ।। भगीरथेन निर्पत्ता भागीरथी, भैमरथी, जाह्नवी, सोयालवी । अमत्त्वन्तान्येय भागीरम्यादीनि ३६६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- बाध्यते। औदुम्बरमिति-उदुम्बरा अस्मिन् देशे सन्ति औदुम्बरं पुरम् । औदुम्बरो देशो पर्वतोवा॥तेपी निवासः, तस्माददूरभवमिति-अत्र सूत्रम् "निवासादूरभवे इति देशे नानि" (६।२।६९) पष्ट्यन्तात् नाम्नो निवास अदूरभय इत्यनयोरर्थयोर्यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । प्रत्ययान्तं. चेद्देशस्य नाम स्यात् । इति शब्दो विवक्षार्थः, तेनानुवृत्ते व्यवहारमनुपतिते नाम्नि ज्ञेयं न सङ्गीते । निवसन्त्यस्मिन्निति ५निवासः। शैवमिति-शिवीनां निवासः शैबं पुरम् । वैदिशमिति-विदिशाया नगर्या अदूरभवं वैदिशं नग. रम् । वैदिशो जनपदः । एवं वरणा च असिञ्च, एवंनान्यौ नद्यौ तयोरदूरभवा वाराणसी पुरी । श्रीहि- मत्या प्रैहिमतम् । यवमत्या यावमतम् । इह केचिदगानां निवासः अङ्गाः । वगाः, कलिङ्गाः, सुहाः, मगधाः, पुण्ड्राः, कुरवः, पश्चालाः, मत्स्याः । वरणानामदूरभवं वरणानाम नगरम् । शृङ्गशाल्मलीनों रङ्गशाल्मयो प्रामः । गोदयोह्रदयोगोंदौ ग्रामः । आलन्यायनपर्णानां आलन्यायनपर्णा प्रामाः । १० शफण्ड्याः शफण्डी, जालपदाया जालपदा, मथुराया मथुरा, उजयन्या उज्जयनी, गयानां गया, उर- शाया उरशा, तक्षशिलायास्तक्षशिला, कटुवदर्याः कटुबदरी । सलतिकस्य सलतिकं वनानीत्यादिपु प्रत्ययमुत्पाद्य लुपमारभन्ते, सत्यां च लुपि प्रकृतिवल्लिङ्गवचने च मन्यन्ते । तदयुक्तम् । अत्र हि प्रकृति- मात्रमेय देशनाम न प्रत्ययान्तम् , प्रत्ययान्तस्य च देशनामत्वे प्रत्ययो विधीयते इति न भवति । तस्य निवास इत्यादिविवक्षायां तु वाक्यमेव । प्रत्ययाभावाच लुबपि न वक्तव्या । अङ्गवरणादीनां च १५क्षत्रियवृक्षाविवजनपदनगरादौ स्वत एव वृत्तिन प्रत्ययमयोगात्, लिङ्गसहयोपादानं च स्वगतमेवेति ।। तेन निर्वृत्तं चेति अत्र सूत्रम् "तेन निवृत्ते च" (६।२।७१) तेनेति तृतीयान्तानिवृत्तमित्य- स्मिन्नर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात्, देशे नाम्नि । यदा अकर्मका अपि धातवः सोपसर्गाः सकर्मका भयन्तीति फर्मणि निर्वृत्तशब्दो व्युत्पाद्यते, तदा तेनेति कर्तरि करणे वा तृतीया । यदा त्यकर्मकविव- क्षया कर्तरि निर्वृत्तशब्दस्तदा हेतो तृतीया । कौशाम्वीति-कुशाम्वेन निर्वृत्ता कौशाम्बी । एवं कफन्दे- २०न काकन्दी । मकन्देन माकन्दी । सगरैः सागरः । सहस्रेण निर्वृत्ता साहस्री परिखा । चकारश्चतुर्णा योगानामुत्तरत्रानुवृत्त्यर्थः, तेनोत्तरे प्रत्यया यथायोगं चतुर्वर्थेषु देशे नानि च भवन्ति । *उदुम्बराव- तीति-अत्र सूत्रम् “नयां मतुः" (६।२।७२) नद्यां देशे नाम्नि चातुरर्थिको मतुः स्यात् । अणो- ऽपवादः । उदुम्यरा अस्यां सन्ति उदुम्बरावती नदी । एवं मशकावती वीरणावती पुष्करायती इक्षुमती अमरावती श्ववती दुमयती शरावती इरावती "अनजिरादिवहुवरशरादीनां २५मतौ" (३२२।७८) अजिरादिवर्जितबहुस्वराणां शरादीनां च मतो दीर्घः स्यात् । बहुवर. उदु: म्यरावतीयादि शरादि. शरावतीत्यादि । एवं वंशावती । शुचीमति "नोादिभ्यः" (२।१।९९) इति वत्याभावः । वार्दावानामगिरिः । वेटीयानामगिरिः । शर, वंश, शुचि, कुश, धूम, अहि, फपि, मुनि, मणि, चाद, वेट इत्येकादश शरादयः । बहुवचनमारुतिगणार्यम् तेन पीयती मृगावती पना पती यातायती भोगावतीत्यादि सिद्धम् । पहुसरशारादीनामिति निम् ? प्रीहिमती इक्षुमती दुमती ३० मधुमती । यहुस्वरस्यानजिरादिविशेषणं किम् ? अजिरवती, सदिरयती, स्थविरवती, पुलिनयती, मल. यवती, हंसकारण्डयती, चक्रधारवती, पक्याफयती पत्रस्येय यापो याम् यस्य स चक्रवार अलङ्कारयती, साइयती, हिरण्यपती, अजिरादिराकृतिगणः । नाम्नीत्येव-वलययती यन्या शरवती 1 १ का प्री प्रलयमन्तरेण देशनाम इलयः । २ समतमेव याह। ३ वरददादीति 'आतो.' इति । मन मेपा. सन्तत्र मापद.वि मनु । ४ पेटम्ति पक्षिमि. मेटा वृक्षात रान्सत्र ।

यूप, १५ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । चातुरर्थिकप्रत्ययाधिकारः ३६७ नदीनामानीति मतुर्न भवति । मधुमानिति-अन्न सूत्रम् "मध्वादेः" (६।२।७३)। एभ्यश्चातुर र्थिको मतुर्देशे नानि । अणोऽपवादः । अनद्यर्थ आरम्भः । एवं विसवान् स्थाणुमान् । मधु, विस, स्थाणु, ऋपि, इक्षु, वेणु, कर्कन्धु, कर्कन्धू, शमी, करीर, हिम, किसर, सार्पण, रुवत् , पार्दा, कीशरु, इष्टका, पार्दाकी, शरु, शुक्ति, आसुति, स्तुत्या, आसन्दी, शकली, वेट, पीडा, अक्षशिल, अक्षशिला, तक्षशिला, आमिपी इति मध्वादिः । “नड"। (६।२।७४) सूत्रं स्पष्टम् । नड्वान् कुमुद्वान् इति-५ एवं वेतवान् । महिष्मान देशः, तत्र भवा माहिष्मती नगरी । डित्त्वमन्यस्वरादिलोपार्थम् । “नड०" (६।२।७५) आभ्यां डिवलः प्रत्ययः स्यात् । मत्वणाद्यपवादः । आदिशब्दोपादानात् "शिखाया:" (६।२।७६) अस्मात् वल: स्यात् , चातुरर्थिको देशे नाम्नि । अणोऽपवादः । पृथग्योगाडिदिति निवृत्तम् । शिखावलं नाम नगरम् । मतुप्रकरणे शिखाया वलचं वक्ष्यति तत् अदेशार्थ वचनम् । "शिरीषादिकको” (६।२।७७ ) । शिरीपाणाम-१० दूरभवो ग्रामः शिरीपिकः, शैरीपकः । "शर्कराया इकणीयाऽण् च” (६।२।७८) । शर्क- राशब्दात् इकण ईय. अण्. चकारात् इक. कण, इत्येते पञ्च प्रत्यया भवन्ति । शर्करा अस्मिन्देशे सन्ति शार्करिकः शर्करीयः शार्करः शर्करिकः शार्करकः । शिरीपाः शर्करा इति प्रत्यययोगमन्तरेणापि देशे वृत्तिरिति पूर्ववत्प्रत्ययो न भवति । "रोऽश्मादेः” (६।२।७९) । अश्मरः, यूपरः । अश्मन् , ऊप, गूथ, (यूथ ? ), मीन, गुद, दर्भ, कूट, गुहा, वृन्द, नग, कण्ड, गह, कन्द, पामन् , इत्य- इमादयोऽष्टादश । "प्रेक्षादेरिन्" (६।२।८०) प्रेक्षी, फलकी । प्रेक्षा, फलका, बन्धुका, धुवका, ध्रुवका, क्षिपका, कूप, पू (पु?) क, धू (धु ) क, इक्कट, कङ्कट, सङ्कट, मह, गर्त्त, न्यग्रोध, परि- वाप, यवाप, हिरण्य इति प्रेक्षादयोऽष्टादश । "तृणादेः सलू” (६।२।८१) । तृणसा नदसा । तृण, नद, जन, पर्ण, वर्ण, अर्णसू, वरण, विल, तुस, वन, पुल, इति तृणादय एकादश । "काशादेरिल:” (६।२।८२)। काशिलम् वाशिलम् । काश, वाश, अश्वत्थ, पलाश, पीयुक्षा, २० पाश, विश, तृण, नल, वन, नलवन कर्दम, कर्पूर, वर्वर ववूल (वर्तुल ?), शीपाल, कण्टक, गुहा, कपित्थ इति काझादय एकोनविंशतिः । “अरीहणादेरकण्” ( ६।२।८३) । आरोहणकम् । अरीहण, खण्डु, खण्डू, द्रुघण, किरण, खदिर, भगल, भलन्दन, उलुन्द, खावुरायण, १० खापुरायण खानुरायण, कौष्टायन, कौद्रायण, भाखायण, गर्त्तायन, रैवत, रायस्पोष, विपथ, विपाश, २० उद्दण्ड, उदञ्चन, ऐडायन, जाम्बवत, जाम्बवत् , शिंशपा, वीरण, धौमतायन, यज्ञदत्त, सुयज्ञ ३०२५ बधिर, बिल्व, जम्बू, साम्बुरायण, सौशायन, सौमायन, शाण्डिल्यायन, श्वित्रायणि, साम्वरायण, कश ४० कृत्स्न, सुदर्शन ४२ इत्यरीहणादयो द्विचत्वारिंशत् । “सुपन्ध्यादेमंः' (६।२।८४)।२७ १ 'कृष्यादिभ्यो वलच्' । २ न वाच्यं सामान्येनोत्तरेण देशेऽप्यदेशेपि भविप्यतीति यतोऽत्राणोपवाद इत्युक्तम् । ततश्चा- देशे तस्य चरितार्थत्वात् देशे "निवासादूरभवे" इत्यादयः स्युः। ३ नन्वेवंविधान्यपि देशनामानि दृश्यन्ते तदर्थ प्रत्ययलुप् वक्तव्यत्याशङ्का । ४ सुपन्थ्यादिर्विचार्यते । शोभनः पन्थाः सुपन्थाः सुपन्थिन् गणपाठात् वले मुवन्थिन् । महाशते अबू सहाशः । कं सुखं पीलति कम्पीलः । मुष्ट पिपत्ति 'खरेभ्य इ.' सुपरिः । 'यूसुक'-इति यूपः । 'गम्यामि-' इति 'उसनव'- इति वा अङ्गः । नाथति अच् नाथः । कूटति 'नाम्युपान्य-' इति के कुटः । कुट्यति अचि कूटः । माद्यन्तं प्रयुक्ते माद्यते म मादितः । मार्जनं मर्शनं मर्पणं वा मृष्टिः । 'अगपुलाभ्याम्'-इति अगस्यः तस्यापत्य-मृष्यण् आगस्थः । शूरयतेऽच् शूरः । विरमति 'पुतपित्त'-इति यद्वा विरमतीति औणादिके तृप्रत्यये विरन्तरमाचटे निजि विरन्तयति । अचि विरन्तः । विकरोति भचि विशिष्टौ करी यस्य वा विकरः। नसते 'नसिवति' इति नासिका। प्रगदवीत्येवंशील: प्रगदी। मां गदतीत्येवंगील: 'टयापो बहुलं नान्नि' इति हखे मगदी । कटिं ददाति पाति वाति वा कटिदः । कटिपः । कटिवः । चुदण् 'द्वार'-इति चूदारः 'अग्य- गि-' इति मदारः। मृजुमजशब्दे । मजति अग्यमि' इति बहुववनादार-इति षा मजारः । कमेः 'कोविद'-पति कोविदारः ।। - - । -- ३६पुरग, पुरुगा (पुरगा, पूरपा), २० मुस, धूम, धूप, विनत, आविनत, विपूरपी (पियूच्या)। - टोमफ, रोमा, शयल, शियल, फूट यतुल (पघुल ?), पूगर, शूकर, धूर, पूर, सटा, सनात, ३६८ महामहोपाध्यायधीविनय विजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- सौपन्ध्यं सौवन्थ्यम् । सुपथिन्शब्दस्यात एव निपातनात्-पकारात्परो नागमः, पस्यं च वा वकारः । साझाश्यम् काम्पील्यम् । सुपन्थिन् , सुवन्थिन्, सङ्काश, कम्पील, सुपरि, यूप, अश्मन् , अश्व, अङ्ग, नाथ, १० (कुण्ट ?), कुट, कूट, मादित, मृष्टि, आगस्य, शूर, विरन्त, विकर, नासिका, प्रगदिन् , २० मगदिन् , कटिद, कटिप, कटिव, चूदार, मदार, मजार, कोविदार, कश्मीर, शूरसेन, ३० ५कुम्भ, सीर, सुर, कसमल, अंस, नासा, रोमन, लोमन्, तीर्थ, पुलिन, ४० मलिन, अगस्ति, सुपथिन्, दश, नल, सकर्ण, कलिव, सडिव, गडिव, ४९ इति सुपन्ध्यादय एकोनपञ्चाशत् ॥ "सुतगमादेरिम्' (६।२।८५) । सौतगमिः, मौनिवृत्तिः । सुतगम, मुनिवित्त, विप्रवित्त, महावित्त महापुत्र शुक्रश्वेत, विन, श्वन् , अर्जुन, १० अजिर, गदिक, वीज, वापा, वीजवापा, कर्ण १६ इति सुतद्गमादयः पोडश । “धलादेर्यः" (६।२।८६) 1 बल्यं, पुल्यं, वल, पुल, मुल, उल, १० पुल, दुल, नल, दल, उरल, लकुल, वन, इति बलादय एकादश । “अहरादिभ्योऽम्" (६।२।८७) आरं लौमं तेन निर्वृत्तमित्यर्थेऽहःशब्दादेशे नाम्नि विहितोऽयमञ्, विशेषविहितत्वानिवृत्त इति सामान्यविहितस्य कालेकणोऽपवादः । अन् , लोमन् , वेमन्, गगा, इत्यहरादिराकृतिगणः । 'सख्यादेरेयण" (६।२।८८)। साखेयः, साखिदत्तेयः । सखि, सखिदत्त, दत्त, अमि, अग्निदत्त, पादत्त(स्त १), वायुदत्ता, गोपि(फि?)ल, भल्ल, भल्लि, पाल, चक्र, १० चक्रवाक, छगल, अशोक, १५सीरक, सरक, वीर, सरस, समल, रोह, २० तमाल, कदल, करवीर, कुसी(शी ?), रक, सुरसा, सरम, सप्तल (सपूल'), २७ इति सख्यादयः सप्तविंशतिः । "पन्ध्यादेरायन" (६२१८९)। पान्थायन:-पथिन्शब्दस्य प्रत्यययोगे पकारात्परो नागमोऽत एव निपातनात् । पाक्षा- यणः । तौपायणः । पथिन् , पक्ष, तुप, अण्डक, घलिक, पाक, चिन, चित्रा, अतिश्व, पुम्भ १०, सीरक, रोमन्, लोमन् , लोमक, हंसक, सकर्ण, सकर्णक, सरक, सहक, सरस, २० समल, अंशुक, २० फुण्ड, यमल, पिल, हस्त, हस्तिन् सिंहक २८ इति पन्ध्यादयोऽष्टाविंशतिः । “कर्णादेरायनिम्" (६।२।९०)। कार्णायनिः, वासिष्ठायनिः । कर्ण, वसिष्ठ, अर्क, लुस, (अर्कलुस ?) द्रुपद, आनडा, पाश्चजन्य, स्फिग्, स्फिज, कुलिश, आफ्नीकुम्भ, जित्वन् , जित्य, जैन, अण्डीवत् , जीवन्त इति वर्णादयः सप्तदश । “उत्करादेरीयः" (६।२।९१)। उत्तरीयः सवरीयः । उत्कर, सहर सम्पर, सम्पल, सफर, सम्फल, सम्पुल, पिप्पल, मूल, पिप्पलमूल, १० अर्क, पिप्पलमूल, १० अर्क, अश्मन , सुवर्ण, २५ सुपर्ण, पर्ण, सुपर्णपर्ण, हिरण्यपर्ण, इडा, अजिर, इडाजिर, २० अग्नि, तिक, कितव, आतप, अनेक, पलाश तिक कितप, वातपान, एकपलाश, अनेक्पलाश, ३० अंशक, त्रैवण, पिचुक, अश्वत्थ, पारा, (क्षु ?)द्रा, काशकु(क्षु?)द्रा, भत्रा, विशाल, शाला, ४० अरण्य, अजिन, अरण्याजिन, जन्यन मक आजान (आर्जन ?) सण्डाजिन, चल्यण, उत्लोश, क्षान्ध, ५० सण्ड, सदिर, सूर्पणाय, श्यापनाय, नेयाक्य, नितान्त, वृक्ष, नितान्तवृक्ष, आईवृक्ष, ६० इन्द्रयक्ष, ३० पातागर, विजिगीपा, संस्रव, रोहिद्गत, नीवापक, अणक, ७. विशात (निशांत ?) सलाजित (सल, जिन ? ) पैरागक, अवरोहित, जन्य, इन्द्रयम, गर्त इति उत्तारादयोऽष्टसप्ततिः । "नडादेः कीया" (६।२।९२) नाटकीयः । नट, प्लम, पिल्ल, येणु, पेन, वेतस, नि, वक्षन इक्षुराध, पोत, शुध, घुमाशब्दस्सात एव गणपाठ समिति नहादय एकादश । "कृशाश्वा देरीपण" (६।२।९३) पार्शीया आरिटीया , अरिष्ट, अरिष्य, पेप्य, विशाल, रोमर, ? अमिवृक्ष, मप्रणाई, अरोहण प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । चातुर्थिकाः । राष्ट्राधिकारः , अयस्ः, सायस् , इरस् , अरुझ (उरस् ?) ३० अरुष्य, ऐरास, ईर, आस, मुद्गल, मोगल, मौद्गल्य, सुवर्चल, प्रतर, अजिन, ४० अभिजन, अवनत, विकुट्याङ्कुश, पराशर ४४ इति कृशाश्वादयश्चतुश्चत्वारिंशत् । "ऋश्यादेः कः” (६।२।९४) । ऋश्यकः, न्यग्रोधकः । ऋश्य, न्यग्रोध, शर, निलीन, निवात, विनद्ध, सित, शित, नद्ध, निनद्ध, १० परिगूढ, उपगूढ, उत्तर, अश्मन् , उत्तराश्मन् , स्थूल, बाहु, स्थूलवाहु, खदिर, अरपु २० अरंडु, (अरटु ?), अनडुह,५ परिवंश, खडु (खण्ड), वीरण, कर्दम, शर्करा, निवन्ध, अशनि, खण्ड, ३ दण्ड, वेणु, परिवृत्त, वेश्मन् , अंशु ३५ इति ऋश्यादयः पञ्चत्रिंशत् ॥ “वराहादेः कण्” (६।२।९५) वाराहकम् पालाशकम् । वराह, पलाश, विनद्ध, निवद्ध, स्थूल, वाहु, स्थूलवाहु, खदिर, विदग्ध, विजग्ध, (विभग्न ? ) विभक्त, पिनद्ध, निमग्न, इति वराहादयस्त्रयोदश ॥ "कुमुदादेरिकः” ( ६।२।९६) कुमुदिकम् इक्कटिकम् वल्वजिकम् । केचिदमुं न पठन्ति वास्वजः । कुमुद, इक्कट, निर्यास, कङ्कट, १० सङ्कट, गर्त, परिवाप, यवाप, कूप, विकत, १० वल्वज, अश्वत्थ, न्यग्रोध, वीज, दशा, (शाल्मलि, मुनि, स्थल, ? ) ग्राम, इति कुमुदादयः पोडश । “अश्वत्थादेरिक" (६।२।९७ ) आश्वस्थिकम् , कौमुदिकम् । अश्वत्थ, कुमुद, गोमठ, रथकार, दाश, ग्राम, घास, कुन्द, शाल्मलि, मुनि, स्थल, मुनिस्थल, कुट, मुचुकर्ण, मुचुकूर्णि, कुण्डल, शुचिकर्ण इत्यश्वत्थादयः सप्तदश । इतिकरणाद्यथा- दर्शनं प्रत्ययव्यवस्थायामर्थप्रकृत्युपादानं प्रपञ्चार्थम् । १५ "इत्येवं दर्शिताः केचित् प्रत्ययाश्चातुरर्थिकाः । देशे नाम्नीति सर्वत्रानुसन्धेयं बुधैरिह" ॥१॥ "राष्ट्रेऽनङ्गादिभ्यः” ( ६।२।६५) राष्ट्रं जनपदः । पष्ठ्यन्तादङ्गादिवर्जान्नान्नो राष्ट्रेऽभिधेये यथाविहितमण स्यात् । शिवीनां राष्ट्रं शैवम् । उपुष्टानां औपुष्टम् गान्धारीणां गान्धारम् । अनङ्गादिभ्य इति किम् ? अङ्गानां वङ्गानां राष्ट्रमिति वाक्यमेव । अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, पुण्डू (पुष्ट ?) इत्यादयः प्रयोगगम्याः केचित्त्वङ्गादिनिषेधं नेच्छन्ति अङ्गानां राष्ट्र आङ्गं वाङ्गमित्यादि "निवासादुरभवे.”२० (६।२।६९) इत्यत्र निवास इत्यभिधानादीशितव्ये राष्ट्रेऽयं विधिः । उभयथा हि राष्ट्रसम्बन्धः स्यात् । राजन्यादिभ्योऽकम्" (६।२।६६) । राष्ट्रवाच्ये, अणपवादोऽयम् । राजन्यानां राष्ट्रं राजन्यकम् । राजन्य, दैवयात (तव ? ), देवयात, आवृत आवा(त्री ?) तक, वात्रवं(व ?), शालकायन, वाभ्रव्य, जालन्धरायण, जानन्धरायण, १० कौन्ताल, आत्मकामेय, अम्बरीपुत्र, अम्ब. रीयपुत्र, वैल्वन (बैल्ववन ?), शैलूप (शैलूषज ? उदुम्बर, औदुम्बर, तैतल, सम्प्रिय, २०२५ दाक्षि, अर्णनाभ, ऊर्णनाभि, आर्जुनायन, विराट, मालव, त्रिगर्त २७ इति राजन्यादयः सप्तविंशतिः बहुवचनमाकृतिगणार्थम् । “वसातेवा' (६।२।६७) । वसातीनां राष्ट्र वासातकं वासातम् । "भौरिक्यैषुकार्यादेविधभक्तम्” (६।२।६८) । भौरिक्यादेविधः प्रत्ययः ऐपुकार्यादेश्च भक्तः प्रत्ययः स्याद्राष्ट्रे वाच्ये । अणोऽपवादः । भौरिकीणां राष्ट्रं भौरिकिविधं स्वभावानपुंसकता । भौरिकि, भौलिकि, चौपयत, चौदयत, चौटयत, चैकयत, सैकयत, क्षैतयत, काणेय, वालिकाज्य, वाणिजक ३० इति भौरिक्यादय एकादश ११ ऐपुकारीणां राष्ट्रं ऐपुकारिभक्तम् । ऐपुकारि, सारस्या( सा ? )यन चान्द्रायण, ताायण, ब्याक्षायण, व्याक्ष्यायण, औलायन, सौवीर, दासमित्रि, दासमित्रायण, १० (सौ )द्रकायण, शयंड, शाण्ड, शायाण्ड, शायण्डायन, खादायन, गौलुकायन, विश्व, विश्वधेनव (वैश्वधेनव ), वैश्वमाणव, २० वैश्वदेव (तुण्ड, देव ?), तुण्डदेव, शायाण्डि(ण्डी ?), शायण्डि- (ण्डी ?), वायौविद, २७ इत्यैपुकार्यादयः सप्तविंशतिः । ( इति राष्ट्राधिकारः । है. प्रका० पूर्वा० ४७ ? ? .

३७० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलघु- "सास्य पौर्णमासी" (६।२।९८) इति शब्दो नान्नीति चानुवर्त्तते, देशे इति निवृत्तम् । प्रथ. मान्तापौर्णमासीवाचिशब्दादस्पेति षष्ठ्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात्, प्रत्ययान्तं चेन्नाम स्यात् । इति शब्दो विवक्षार्थस्तेन मासार्द्धमासयोरेव संवत्सरपर्वणोः प्रत्ययः। संवत्सरेऽप्यन्ये । अस्येत्सवययावयवि. सम्यन्धे पष्ठी । पोपी पौर्णमासी अस्य पापो मासोऽर्द्धमासो था । एवं माघः, वैशाखः, आपाढा ५ इति । नाम्नीत्येव-पोपी पौर्णमासी अस्य पश्चरात्रस्य (दशरात्रस्य भृतकमासस्य वा) इति याक्यमेव । पोर्णमासीति-पूर्णो माचन्द्रोऽस्यामस्तीति "पूर्णमासोऽण्” (७१२।५५) इत्यम् । पूर्णमास इयमिति वा "तस्येदम्" (६।३।१६०) इत्यण् पूर्णो मा मासो वाऽस्यां पूर्णमासा वा युक्तेति अत एव निपातना. दण् । “आग्रहायण्यश्वत्थादिक" (६।२।९९) । आप्रहायणी मार्गशीर्षी पौर्णमासी । अस आमहायणिको मासोऽर्द्धमासो या, मार्गशीर्ष इत्यर्थः । अश्वत्था आश्वयुजी पौर्णमासी । अस्य आध• १० त्थिको मासोऽर्द्धमासो वा आश्विनमास इत्यर्थः । अन्ये तु अश्वत्थशब्दमप्रत्ययान्तं पौर्णमास्यामपि पुंलिङ्ग- मिच्छन्ति-अश्वत्थः पौर्णमासी । “चैत्रीकार्तिकीफाल्गुनीश्रवणाद्वा" (६।२।१००) । इकण् । पक्षे औत्सागकोऽण् । चैत्री पौर्णमासी अस्य चैत्रिकश्चैत्रो वा मासोऽर्द्धमासो वा । एवं कार्चिक्याः कार्तिकिकः कार्तिकः; फाल्गुन्याः फाल्गुनिकः फाल्गुनः; श्रवणायाः श्रावणिकः श्रावणः ॥ ५० ॥ - इति मासप्रकरणम् । १५ देवता ॥ ५१ ॥ [सि०६।२।१०१] देववार्थात्प्रथमान्तात् पठ्यर्थेऽणादयः स्युः । जिनो देवता असेति जैनः ॥५१॥ "देव." । सूत्रं स्पष्टम् । अवायं विशेष:-"पैङ्गाक्षीपुत्रादेरीयः" (६।१।१०२) । पैगाक्षीपुत्रो देवताऽस्य पैगाक्षी- पुत्रीयं हविः । तार्णविन्दवो देवतास्य ताणबिन्दवीयं हविः । एवं पगीपुत्रीयम् । पैगाक्षीपुत्रादया २० प्रयोगगम्याः । “शुकादियः" (६।१।१०३) शुक्रो देवतास्य शुक्रियोऽध्यायः । "शतरुद्राती" (६।२।१०४)। ईय-इयो प्रत्ययावित्यर्थः । शतसया रुद्राः शतरुद्राले देवताऽस्य शतगद्रीयं शत. रुद्रियम् । शतं रुद्रा देवता अस्पेति द्विगायपि विधानसामर्थ्याटुप् न भवति । "अपोनपादपा. अपातस्तु चातः" (६।२।१०५) ! आभ्यां ईय-इयो प्रत्ययो स्तः, तत्सग्नियोगे पानयोरारछन्दस ह आदेश: स्यात् । अपोनपात् देवताम्य अपोनवीयं अपोनप्नियं अपाननीयं अपाननियम् । २५"महेन्द्राद्वा" (६।२।१०६) । ईय-इयो । महेन्द्रो देववाऽस्य महेन्द्रीयं महेन्द्रियम्, पझेऽ मादेशम् । “कसोमाद व्य" (६२।१०७) । अणोऽपयादः 1 टकारो उपर्थः । कः प्रजापवि. देयताऽम्प यायं हविः । कार्या इष्टिः । काशब्द प्रति णित्त्वस्य वैयादालोपो न स्यात् । सोमो देवता. ऽस्य सौम्य सूक्तं, हविः । सौमी ऋए । “यायाधियीशुनासीरानीपोममरत्वद्वास्तोप्प तिगृहमेघादीययो" (६२।१०८) । एभ्यः पयः एतौ प्रत्ययो नः । गौश्च पृथिवी पगापा ३० पृपिट्यो, से देयते अन्य घायायिवीयं चायाधिव्यं हयिः । शुनच पायुः, गीय्यादित्यः, गुना: सीरी; यो देयता अम्प गुनासीरीय गुनासीर्यम् । "अन्ये वैफमेय गुनासीरमिति इन्द्रस गुणमा तभा पावलापन:-इन्दो या गुनासीर इति ।मत्रवर्णश-दन्नं गुनासीरमम्मिन् यो हयामः" इति मनोरमापाम् । अप्रिय सोमधामीरोमो धो देयता अम्प अनीपोमीयं अप्रीरोग्यम् । मलार गणरम्प यस पर्वमूगोमाग एपारदममा महिमा पुनः भिभिष्म पुनरिटयोयो हो । विका तमोरनापार । ममामय परिसोरलरमतो मारमानदेन भपति मरमराम। - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । देवतार्थावधिकाराः देवता अस्य मरुत्वतीयं मरुत्वत्यम् । वास्तोप्पतिः शक्रः, "वाचस्पतिवास्तोष्पति दिवस्पतिदिवोदासम्" (३१२॥३६) इत्यलुप्समासः । वास्तोष्पतिर्देवतास्य वास्तोष्पतीयम् वास्तोष्पत्यम् । गृहमेधशब्दोऽका- रान्तः । गृहमेधो देवता अस्य गृहमेधीयं गृहमेध्यम् ॥ "वाय्वृतुपित्रुपसो यः” (६।२।१०९)। अणोऽपवादः । वायुर्देवताऽस्य वायव्यम् । एवं ऋतव्यम् पितृव्यम् , उमा देवतास्य उपस्यम् । "उपस्- शब्दः स्त्रीलिङ्गो दिवो दुहितरं देवतां वक्ति" इति मनोरमायाम् ॥ "महाराजप्रोष्ठपदादिकण्"५ (६।२।११०)। आभ्यामिकण् स्यात् । अणोऽपवादः । महाराजो देवताऽस्य माहाराजिकः, माहारा-. जिकी । प्रौप्टपदिकः प्रौष्ठपदिकी । “कालाद्भववत्" (६।२।१११) । कालविशेषवाचिभ्यो यथा भवेऽर्थे प्रत्यया वक्ष्यन्ते तथा साऽस्य देवतेत्यर्थेऽपि स्युः । वत्सर्वसादृश्यार्थः, तेन याभ्यः प्रकृतिभ्यो येन विशेषेण ये प्रत्यया भवन्ति, तथैव ते इहापि भवन्ति । यथा मासे भवं मासिकं सांवत्सरिक हेमनं वासन्तं प्रावृपेण्यम् , तथा मासो देवताऽस्य मासिकमित्यादि तथैव ॥ "आदेश्छन्दसः१० प्रगाथे" (६।२।११२) (सेति प्रकृतिरस्येति प्रत्ययार्थश्वानुवर्तते । तयोर्यथाक्रम विशेषणे आदेश्छ- न्दस इति प्रगाथे इति च ) सेति प्रथमान्तादादिभूताच्छन्दसोऽत्येति षष्ठ्यर्थे प्रगाथेऽभिधेये यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । यत्र द्वे ऋचौ प्रग्रन्थनेन (प्रकृष्टरचनाविशेपेण ) प्रकर्पगानेन वा (उच्चारविशेपेणे- यर्थः) तिस्रः क्रियन्ते स मत्रविशेपः प्रगाथः । पतिरादिरस्य प्रगाथस्य पाङ्कः प्रगाथः । एवमानुष्टुभः, जागतः ।। "योद्धृप्रयोजनाद्युद्धे” (६।२।११३) । प्रथमान्ताद्योद्धृवाचिनः प्रयोजनवाचिनश्च १५ अस्येति पष्ठ्यर्थे युद्धेऽभिधेये यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । विद्याधरा योद्धारोऽस्य युद्धस्य वैद्याधरं युद्धम् ॥ प्रवृत्तिसाध्यं फलं प्रयोजनम् । सुभद्रा प्रयोजनमस्य सौभद्रमेवं सौतारं युद्धम् । अत्र सुभ- द्रादिशब्दस्तत्प्राप्तौ वर्चते इति प्रयोजनम् । (योद्धृप्रयोजनादिति किम् ? मासोऽस्य युद्धस्य । युद्ध इति किम् ? सुभद्राप्रयोजनमस्य वैरस्य ) ॥ "भावघञोऽस्यां णः” (६।२।११४) । भावे यो घञ् तद्- न्तादस्यामिति स्त्रीलिङ्गे सप्तम्यर्थे णः स्यात् । प्रपातोऽस्यां तिथौ वर्त्तते इति प्रपाता । एवं दाण्डघाता,२० मौसलपाता भूमिः । स्त्रीलिङ्गग्रहणादिह न भवति-दण्डपातोऽस्मिन्दिवसे । इति करणानुवृत्तेः क्वचिन्न भवति-द्रोणपाकोऽस्यां स्थाल्याम् । केवलाच्च भावे घअन्तान भवति ॥ "श्यैनम्पाता-तैलम्पाता' (६।२।११५) श्येनतिलशब्दयोर्भावघबन्ते पातशब्दे परे मो न्तो निपात्यते, प्रत्ययस्तु पूर्वेणैव सिद्धः । श्येनपातोऽस्यां वर्तते श्यैनम्पाता । तिलपातोऽस्यां वर्त्तते तैलम्पाता तिथिः क्रियाभूमिः क्रीडा वा ॥ "प्रहरणात्क्रीडायां णः” (६।२।११६) । (दण्डं ) प्रहरणमस्यां क्रीडायां दाण्डा । एवं मौष्टा २५ पादा क्रीडा । यत्राद्रोहेण घातप्रतिघातौ स्यातां सा क्रीडा। "भावघयोऽस्यां णः” इत्यनन्तरो णो नानुवर्त्तते, क्रीडाया अर्थान्तरत्वात् । यथा "श्रवणाश्वत्थानाभ्यः" (६२।८) इत्यत्रोपात्तोऽप्रत्ययः "पठ्याः समूहे" (६।२।९) इत्यत्र नानुवर्तते । (अन्यथा "भावघमोऽस्यां णः" इत्यतोऽधिकारा- यातेनैव सिद्ध्यति) ततो यथाविहितं प्रत्ययः स्यादिति वचनादणेव स्यादितीह पुनर्णग्रहणम् ।। ५१ ।। तद्वेत्त्यधीते ॥ ५२ ॥ [सि० ६।२।११७ ] द्वितीयान्ताद्वेत्यधीते वेत्यर्थयोरणादयः स्युः । वैयाकरणः ॥ "न्यायादेरिकण्: (६।२।११८) नैयायिकः ॥ ५२ ॥ "तद्वे." | वैयाकरण इति एवं मौहूर्तः, औत्पातः, नैमित्तः । केचित्तु मुहूर्तनिमित्तशब्दौ न्यायादी पठन्ति तन्मते मौहूर्तिकः, नैमित्तिकः । छन्दोऽधीते छान्दसः । नैरुक्तः । घटं वेत्ति पटं वेत्तीत्यादा- वनभिधानान भवति । केचित्तु वेदनाऽध्ययनयोरेकविषयतायामेवेच्छन्ति; तन्मते अमिष्टोमं यज्ञं ३५ ३० - . २५कारो निपात्यते-लोकायतं वेत्त्यधीते वा लोकायितिक: । लोकायतिका इति तु न्यायादिपाठासिद्धम् ।। यो होतं या पीना अम्मिमितिका सवीतमारुपानम् । यवान् मीणातीति यवकीममधिाख रुतमारस्पानं 'ममो. ૨૭૨ महामहोपाध्याय विनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- वेत्तीत्यादावपि प्रत्ययो न स्यात् । "न्याया" । न्याय, न्यास, लोकायित, पुनरुक्त, परिपद् चर्चा, फ्रमेतर, लक्षण, संहिता, पदे, पद, क्रम, सङ्घट, सवटा, वृत्ति, सङ्घह, आयुर्वेद, गण, गुण, खागम, इतिहास, पुराण, भारत, ब्रह्माण्ड, आख्यान, द्विपदा, ज्योतिष, गणित, अनिस्त, 'लक्ष्य, लक्षण, अनुलक्ष्य, सुलक्ष्य, वसन्त, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, प्रथम, चरम, प्रथमगुण, चर- मगुण, अनुगुण, अथर्वन् , आथर्वण, इति न्यायादयः ४५ पञ्चचत्वारिंशत् । ५ अत्रादिशब्दसंसर्गात् “पदकल्पलक्षणान्तकत्वाख्यानाख्यायिकात्" (६।२।११९)। पदकल्पलक्षणान्तेभ्यः क्रत्याख्यानाख्यायिकावाचिभ्यश्च वेत्त्यधीते वैत्यर्थे इकण् स्यात् । पदान्त. पौर्व- पदिकः, औत्तरपदिकः, आनुपादिकः; बहुप्रत्ययपूर्वात्पदशब्दान्न भवसनभिधानात् । कल्पान्त. मात्र- कल्पिकः, पैतृकल्पिकः, पाराशरकल्पिकः, श्राद्धकल्पिकः । लक्षणान्त. गौलक्षणिकः, आश्वलक्षणिकः, हास्तिलक्षणिकः, आनुलक्षणिकः, सौलक्षणिकः लाक्षणिक इति न्यायादित्वात् सिद्धम् । ऋतु. आमि- १० टोमिकः, वाजपेयिकः, ज्यौतिष्टोमिका, राजसूयिकः । आख्यान. अभिनयन् गायन पठति यदेको प्रान्थिकस्तदाख्यानम् ( आख्यानशब्दस्य न्यायादिपाठादेव इकसिद्ध इत्यर्थप्रधानोऽयम् । एतत्साह चर्याच क्रत्वादीनामप्यर्थप्रधानानां प्रहः ) 1 यावक्रीतिकः, यावनिकः प्रैयङ्गविकः, प्रैयङ्गुकः, आवि- मारिकः । आख्यायिका. वृहत्कथेति बृहदुण्ढिकायाम् । वासवदत्तिकः सौमनोहारिकः ॥ "अक- ल्पात्सूत्रात्" (६।२।१२०) । कल्पशब्दवर्जितात्परो यः सूत्रशब्दस्तदन्तादिकण् स्यात् । वार्तिक- १५ सूत्रिकः (वार्तिसूत्रिकः ?), सावहसूत्रिकः । अकल्पादिति किम् ? सौत्रः । काल्पसौत्रः ॥ "अघ- मक्षत्रत्रिसंसर्गाङ्गाद्विद्यायाः" (६।२।१२१) । धर्मादिवर्जितात्परो यो विद्याशब्दस्तदन्तादि- फण् स्यात् । वायसविधिकः, सार्पविधिकः । अधर्मादेरिति किम् ? वैद्यः । धार्मविद्यः, क्षात्रविद्या, ध्यवयवा विद्या विविद्या, तां चेत्त्यऽधीते वा त्रैविद्यः-अत्र त्रिविद्याशब्दस्य कर्मधारयस्यैव प्रहणं न द्विगो:; तत्र लुपि सत्यामणिकणोर्विशेपाभावात् , त्रिविद्यः, सांसर्गविद्यः, आनविद्यः ॥ "याज्ञिको २० क्विकलौकायितिकम्” (६।२।१२२) । एते निपात्यन्ते । यज्ञशब्दात् याज्ञिक्यशब्दाधेकण् इक्यलोपश्च, यज्ञं याज्ञिक्यं वा वेत्त्यधीते या याज्ञिकः ॥ उक्थशब्दः केचिदेव सामसु रूढः । यश- यज्ञीयात् परेण यानि गीयन्ते न च तेषु वर्तमानात्प्रत्यय इष्यते किं तर्हि तयाख्याने ऑस्थिक्ये उपचारेण पर्तमानात् उक्थमधीते ओक्थिकः; औथिक्यमधीते इत्यर्थः । औक्थिक्यशब्दातु प्रत्ययो न भवत्य- नभिधानात् । तस्मादपीच्छन्त्येके । औक्थिक्यमधीते औक्थिकः ॥ लोकायतशब्दादिकण् यकाराकारस्य "अनुब्राह्मणादिन्" (६।२।१२३) । ब्रह्मणा प्रोक्तो प्रन्यो ब्राह्मणम् , ब्राह्मणसदृशो प्रन्योऽनु- माझणम्, सहगर्थेऽव्ययीभावः । तद्वेत्यधीते याऽनुब्राह्मणी, अनुब्राह्मणिनौ । मत्वर्थीयेनैवेना सिद्धे अनभिधानाग इक्स्याप्रवृत्तावण्याधनार्थगिनो विधानम् । “शतपष्टेः पथ इकट्" (६।२।१२४)! आभ्यां परस्य पधिन्शब्दस्य इकट् स्यात् । शतपथिका, शतपथिकी । पष्टिपथिकः पष्टिपथिकी । ३०"पदोत्तरपदेभ्य इका" (१२५) । पशब्द उत्तरपदं यस्य तस्मात्पदशब्दात्पदोत्तर: पदशब्दाश घेत्त्यधीते चेत्यर्थे इकः स्यात् । पूर्वपदिकः, उत्तरपदिकः । पूर्वपदिका, उत्तरपदिया। पदिकः, पदिया । पदोत्तरपदिकः, पदोत्तरपदिका । बहुवचनं सर्वभगपरिमार्थम् । २४शिक्षामीमांसासानोऽका" (६।२।१२६) । एभ्यः पञ्चभ्योऽकः स्यात् । पदं येत्यपीते या विस खसी पापम् , तमतत्यपीवे येतीशी याफिक । २ कम्पादित पदासम पूर्वादाभावे म मावि । .. "पदक्रम- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । तद्वेत्त्यधीते इत्यधिकारः ३७३ पदकः । एवं क्रमकः, शिक्षकः, मीमांसकः, सामकः । उपनिपच्छब्दादपीच्छति कश्चित्-उप- निपदकः । के सति शिक्षाका शिक्षिका शिक्षका । मीमांसाका मीमांसिका मीमांसकेति "इचापुंसोऽनि- क्याप्परे” (२।४।१०७) । इति रूपत्रयं स्यात् । शिक्षिका मीमांसिकेति चेप्यते तदर्थमकवचनम् ।। "ससर्वपूर्वाल्लुप्” (६।२।१२७) । सपूर्वात्सर्वपूर्वाच्च वेत्त्यधीते वेत्यर्थे विहितस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । सवार्त्तिकमधीते सवार्तिकः । ससङ्ग्रहः-अणो लुप् । सकल्पः, अनेकणः । सर्ववेदः, सर्वतत्रः-५ अत्राणः । सर्वविद्यः-अत्रेकणः । कथं द्विवेदः पञ्चव्याकरण इति ? "द्विगोरनपत्ये यस्वरादे वद्विः" (६।१।२४) इति लुपि भविष्यति ॥ "सङ्ख्याकात्सूत्रे” (६।२।१२८) । सङ्ख्यायाः परो यः का प्रत्ययो विहितस्तदन्तात्सूत्रे वर्तमानान्नाम्नो वेत्त्यधीते वेत्यर्थे उत्पन्नस्य प्रत्ययस्य लुब् भवति । अप्रो- तार्थ आरम्भः (अन्यथोत्तरेणैव सिद्ध्यति ) । अष्टावध्यायाः परिमाणमस्य अष्टकं सूत्रम् । तद्विदन्त्य- धीयते वा अष्टकाः पाणिनीयाः । आपिशलीयाः । त्रिकाः काशकृत्स्नाः। दशका उमाखातीयाः। द्वादशका आर्हताः । सङ्ख्याग्रहणं किम् ? माहावार्तिकाः-महद्वार्तिकस्य सूत्रं विदन्यधीयते वा माहावार्तिकाः । कालापकाः । कादिति किम् ? चतुष्टयं सूत्रमधीयते चातुष्टयाः ॥ “प्रोक्तात्” (६।२।१२९) प्रोक्तार्थ- विहितः प्रत्यय उपचारात्प्रोक्त इत्युच्यते, तदन्तानाम्नो वेत्त्यधीते वेत्यर्थे उत्पन्नस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । गोतमेन प्रोक्तं गौतमम् , तद्वेत्त्यधीते वा गौतमः । सुधर्मेण सुधर्मणा वा प्रोक्तं सौधर्मम् , सौधर्मणं वा; तद् वेत्त्यधीते सौधर्मः सौधर्मणः "द्विपदाद्धर्मादन्” (७।३।१४१) इत्यस्यैकेषां मते विकल्पः ॥१५ एवं भाद्रवाहवः पाणिनीयः आपिशलः । अन्यत्र प्रत्ययस्य लुप्यलुपि अविशेपेऽपि स्त्रियां विशेप:-- गौतमा सौधर्मा सौधर्मणा स्त्री अणो लुप्यणन्तत्वाभावाद् डीन भवति । अत्र हि यस्यां स्त्रियां योऽ. विहितः स लुप्तः, यश्च विद्यते तस्य न सा स्त्री ॥ "वेदेन्ब्राह्मणमत्रैव” (६।२।१३०) । प्रोक्तप्रत्ययान्तं वेदवाचि इन्नन्तं च ब्राह्मणवाचि भवति । अत्रैव वेत्त्यधीते वेत्येतद्विपय एव प्रयुज्यते, तेन स्वातन्त्र्यमुपाध्यन्तरयोगो वाक्यं च निवर्त्तते, वेत्त्यधीते वेत्यर्थरहितं न प्रयुज्यते इति स्वातन्त्र्य-२० निवृत्तिः । कठेन प्रोक्तं शोभनं वेदं विदन्यधीयते वेति विशेषणान्तरयोगोऽपि न स्यात् इत्यर्थः । वेद. कठेन प्रोक्तं वेदं विदन्त्यधीयते वा कठाः । एवं कलापिना कालापिना कलापेन कालापाः । मौदेन मौदाः । पैष्पलादः ततो "मौदादिभ्यः” (६।३।१८२) इतीयापवादोऽण् । ऋम्भिराभाति ऋगाभः, पृपोदरादित्वाद्गस्य चत्वे ऋचाभः, ततः प्रोक्ते शौनकादित्वाणिन् तदन्तादणो लुप् आर्चाभिनः । भाल्ल- विना भाल्लविनः । शाट्यायनिना शाट्यायनेन शाट्यायनिनः । ऐतरेयेण ऐतरेयिणः । भल्लवशब्दादिब-२५ न्तात्प्रोक्तार्थे पूर्ववण्णिनादयः । शटशब्दात् गर्गादियजन्तात् तिकाद्यायनिब् । एके त्वयबन्तं तिकादौ. पठन्ति, तन्मते "यभित्रः" (६।१।५४) इत्यायनणि पूर्ववत् शौनकादित्वाणिनादौ शाट्यायनिनः । इतरस्यापत्यं शुभ्रादित्वादेयणि ऐतरेयः, ततः पूर्ववण्णिनादौ ऐतरेयिणः । इन्ग्रहणं किम् ? याज्ञवल्क्येन प्रोक्तानि ब्राह्मणानि याज्ञवल्क्यानि "शकलादेर्यञः” (६।३।२७) इत्यञ् । सौलाभेन सौलाभानि "मौदादिभ्य" इत्यण् । याज्ञवल्क्यादीनि ब्राह्मणानीत्यनिनन्तस्य वेद इति नियमो निवर्त्तते । ब्राह्मण- मिति किम् ? पिङ्गेन प्रोक्तः पैङ्गी कल्पः । ब्राह्मणं वेद एव, तत्र वेद इत्येव सिद्धे अनिनन्तस्य नियम- निवृत्त्यर्थमिन्द्राह्मणग्रहणम् ॥ प्रोक्तानुवर्तनं किमर्थम् ? ऋचः यजूंपि सामानि मन्त्राः वेदः। ऋगादयः शब्दा वेदवाचिनो भवन्ति, नतु प्रोक्तप्रत्ययान्ता इति । यदि प्रोक्तग्रहणं नानुवर्तेत तत्रापि वेत्त्यधीते वेत्येतद्विपय एवेति प्रयोगनियमः प्रसज्येत, ततश्च ऋचस्तिष्ठन्तीत्यादि वक्तुं न लभ्येत ।। आरम्भसाम- र्थ्यात् अवधारणे सिद्धे उभयावधारणार्थमेवकारः । प्रोक्तप्रत्ययान्तस्यात्रैव वृत्तिर्नान्यत्र, तथात्र वृत्तिरेय न केवलस्य प्रोक्तप्रत्ययान्तस्यावस्थानम्, अन्यत्र त्वनियमात्कचित्स्वातयं भवति-अर्हता प्रोक्तं आहेत ३६ - ३० ?

. २५ गारो निपात्यते-लोकायतं वेत्त्यधीते या लोकायितिकः । लोकायतिका इति तु न्यायादिपाठात्सिद्धम् ।। महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- वेत्तीत्यादावपि प्रत्ययो न स्यात् । "न्याया०" । न्याय, न्यास, लोकायित, पुनरुक्त, परिपद चर्चा, क्रमेतर, लक्षण, संहिता, पदे, पद, क्रम, सङ्कट, सङ्कटा, वृत्ति, सवह, आयुर्वेद, गण, गुण, स्वागम, इतिहास, पुराण, भारत, ब्रह्माण्ड, आख्यान, द्विपदा, ज्योतिप, गणित, अनिस्त, लक्ष्य, लक्षण, अनुलक्ष्य, सुलक्ष्य, वसन्त, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, प्रथम, चरम, प्रथमगुण, चर- मगुण, अनुगुण, अथर्वन्, आथर्वण, इति न्यायादयः ४५ पञ्चचत्वारिंशत् । ५ अत्रादिशब्दसंसर्गात् “पदकल्पलक्षणान्तक्रत्वाख्यानाख्यायिकात्" (६।२।११९)। पदकल्पलक्षणान्तेभ्यः क्रत्वाख्यानाख्यायिकावाचिभ्यश्च वेत्त्यधीते वेत्यर्थे इकण् स्यात् । पदान्त. पौर्व- पदिकः, औत्तरपदिकः, आनुपादिकः; बहुप्रत्ययपूर्वात्पदशब्दान्न भवत्यनभिधानात् । कल्पान्त. माह- कस्पिकः, पैतृकल्पिकः, पाराशरकल्पिकः, श्राद्धकल्पिकः । लक्षणान्त. गौलक्षणिकः, आश्वलक्षणिकः, हासिलक्षणिकः, आनुलक्षणिकः, सौलक्षणिकः लाक्षणिक इति न्यायादित्वात् सिद्धम् । ऋतु. आमि- १० टोमिकः, वाजपेयिकः, ज्यौतिष्टोमिकः, राजसूयिकः । आख्यान, अभिनयन् गायन पठति यदेको प्रान्धिकस्तदाख्यानम् (आख्यानशब्दस्य न्यायादिपाठादेव इकसिद्ध इत्यर्थप्रधानोऽयम् । एतत्साह पर्याच प्रत्यादीनामप्यर्थप्रधानानां ग्रहः ) 1 यावक्रीतिकः, यावक्रिकः प्रेयङ्गविकः, प्रेयगुका, आवि. मारिकः । आख्यायिका. बृहत्कथेति वृहदुण्डिकायाम् । वासवदत्तिकः सौमनोहारिकः ॥ "अक ल्पात्सूत्रात्" (६।२।१२०)। कल्पशब्दवर्जितात्परो यः सूत्रशब्दस्तदन्तादिकण् स्यात् । वार्तिक- १५सूत्रिकः (वार्तिसूत्रिकः ?), सावहसूत्रिकः । अकल्पादिति किम् ? सौत्रः । फाल्पसौत्रः ॥ “अध. मक्षत्रिसंसर्गाङ्गाविद्याया" (६२११२१) | धर्मादिवर्जितात्परो यो विद्याशब्दस्तदन्तादि- पण् स्यात् । वायसविधिकः, सार्पविधिकः । अधर्मादेरिति किम् ? वैद्यः । धार्मविद्यः, क्षारविद्यः, त्र्यवयवा विद्या निविद्या, तां वेत्त्यऽधीते या विद्यः-अत्र त्रिविद्याशब्दस्य कर्मधारयस्यैव प्रहणं न द्विगोः; तत्र लुपि सत्यामणिकणोविशेषाभावात् , त्रिविद्यः, सांसर्गविद्यः, आहुविधः ॥ "याज्ञिको २० विधकलौकायितिकम्" (६।२।१२२) । एते निपात्यन्ते । यज्ञशब्दात् याज्ञिक्यशब्दाधेकण् इक्यलोपश्च, यज्ञ याज्ञिक्यं या वेत्त्यधीते वा याज्ञिकः ॥ उक्थशब्दः फेचिदेव सामसु रूढः । यी यशीयात् परेण यानि गीयन्ते न च तेषु वर्तमानात्प्रत्यय इष्यते किं तर्हि तव्याख्याने ऑस्थिक्ये उपचारेण पर्तमानात् उक्थमधीते ओक्थिकः; औक्थिक्यमधीते इत्यर्थः । औक्थिक्यशब्दातु प्रत्ययो न भवत्य- नभिधानात् । तस्मादपीच्छन्त्येके । औक्थिक्यमधीते औक्थिकः । लोकायतशब्दादिकम् यकाराकारम्य "अनुव्रात्मणादिन्” (६।२।१२३) । ब्रह्मणा प्रोक्तो प्रन्यो ब्राह्मणम्, प्राह्मणसदृशो प्रन्योऽनु- माह्मणम्, सहगर्थेऽव्ययीभावः । तद्वत्त्यधीते वाऽनुनामी, अनुप्रामाणिनी । मत्त्वयिनैवेना सिद्ध अनभिधानाग इपस्याप्रवृत्तायण्याधनामिनो विधानम् । "शतपष्टेः पध इकट" (६।२।१२४)! आभ्यां परम्प पधिनशब्दस्य इकट् स्यात् । शतपथिका, शतपथिकी । पष्टिपधिका; पष्टिपथिती । ३० "पदोत्तरपदेभ्य इक" (६।२।१२५) । पदशन्द उत्तरपदं यस्य तस्मात्पदशब्दात्पदोतर. पदरादाय येत्यधीते येन्यर्थे इकः म्यात् । पूर्वपदिकः, उत्तरपदिकः । पूर्वपदिका, उत्तरपदिए। परिकः, परिया। पदोत्तरपरिफः, पदोत्तरपदिका । पहुययनं सर्पमतपरिमार्यम् । “पदाम: १४ शिक्षामीमांसामानोऽ" (E२।१२६) । भ्यः पम्योऽमस्यात् । पदं त्यधीते या योगी का अम्मिमिति का सीमापानम् । दान मानीकि समागमपिपलमापन भनेर सिली पाय, हसदेरी पेमेसी पाकिता भापति परामम पूर्वादाम रे म मा । - । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः। तद्वेत्त्यधीते इत्यधिकारः ३७३ पदकः । एवं क्रमकः, शिक्षकः, मीमांसकः, सामकः । उपनियच्छब्दादपीच्छति कश्चित्-उप- निषदकः । के सति शिक्षाका शिक्षिका शिक्षका । मीमांसाका मीमांसिका मीमांसकेति "इच्चापुंसोऽनि- - क्याप्परे" (२।४।१०७) । इति रूपत्रयं स्यात् । शिक्षिका मीमांसिकेति चेप्यते तदर्थमकवचनम् ।। "ससर्वपूर्वाल्लुप्” (६।२।१२७) । सपूर्वात्सर्वपूर्वाञ्च वेत्त्वधीते चेत्यर्थे विहितस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । सवार्त्तिकमधीते सवार्तिकः । ससङ्ग्रहः-अणो लुप्। सकल्पः, अत्रेकणः । सर्ववेदः, सर्वतत्रः-५ अत्राणः । सर्वविद्यः-अत्रेकणः । कथं द्विवेदः पञ्चव्याकरण इति ? "द्विगोरनप यस्वरादे बद्विः" (६।१।२४) इति लुपि भविष्यति ।। “सङ्ख्याकात्सूत्रे" (६।२।१२८) । सङ्ख्यायाः परो यः कः प्रत्ययो विहितस्तदन्तात्सूत्रे वर्तमानान्नान्नो वेत्त्यधीते वेत्यर्थे उत्पन्नस्य प्रत्ययस्य लुब् भवति । अप्रो. क्तार्थ आरम्भः (अन्यथोत्तरेणैव सिद्ध्यति ) । अष्टावध्यायाः परिमाणमस्य अष्टकं सूत्रम् । तद्विदन्त्य- धीयते वा अष्टकाः पाणिनीयाः । आपिशलीयाः । त्रिकाः काशकृत्ताः। दाका उमाखातीयाः। द्वादशाका आर्हताः । सवयाग्रहणं किम् ? माहावार्तिकाः-महद्वार्तिकस्य सूत्रं विदन्त्यधीयते वा माहावार्तिकाः । कालापकाः । कादिति किम् ? चतुष्टयं सूत्रमधीयते चातुष्टयाः ॥ "प्रोक्तात्" (६।२।१२९) प्रोक्तार्थ- विहितः प्रत्यय उपचारात्प्रोक्त इत्युच्यते, तदन्तान्नान्नो वेत्त्यधीते वेत्यर्थे उत्पन्नस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यान् । गोतमेन प्रोक्तं गौतमम् , तद्वेत्त्यधीते वा गौतमः । सुधर्मेण सुधर्मणा वा प्रोक्तं सौधर्मम, सौधर्मणं वा; तद् वेत्त्यधीते सौधर्मः सौधर्मणः "द्विपदाद्धर्मादन्” (७।३।१४१) इत्यस्यैकपा मते विकल्पः ११५ एवं भाद्रवाहवः पाणिनीयः आपिशलः । अन्यत्र प्रत्ययस्य लुप्यलुपि अविशेपेऽपि नियां विशेष:- गौतमा सौधर्मा सौधर्मणा श्री अणो लुप्यणन्तत्वाभावाद् डीन भवति । अत्र हि यस्यां त्रियां योऽ. विहितः स लुमः, यश्च विद्यते तस्य न सा ली ॥ "वेदेन्बाह्मणमत्रव" (६।२।१३०) । प्रोक्तप्रत्ययान्तं वेदवाचि इन्नन्तं च ब्राह्मणवाचि भवति । अत्रैव वेत्त्यधीते वेत्येतद्विपय एव प्रयुज्यते, तेन स्वातत्र्यमुपाध्यन्तरयोगो वाक्यं च निवर्त्तते, वेत्त्वधीते वेत्यर्थरहितं न प्रयुज्यते इति स्वातन्य-२० निवृत्तिः । कठेन प्रोक्तं झोभनं वेदं विदन्त्यधीयते वेति विशेषणान्तरयोगोऽपि न स्यान् इत्यर्थः । वेद. कठेन प्रोक्तं वेदं विदन्त्यधीयते वा कठाः । एवं कलापिना कालापिना कलापेन कालापाः । मादेन मौदाः । पप्पलादः ततो "मौदादिभ्यः" (६।३।१८२) इतीयापवादोऽग् । ऋम्भिराभाति ऋगाभः, पृषोदरादित्वाद्गस्य चत्वे ऋचाभः, ततः प्रोक्ते शौनकादित्वाणिन् तदन्तादणो लुप आर्चाभिनः । भाद- बिना भाल्डविनः । शाट्यायनिना झाट्यायनेन शाव्यायनिनः । ऐतरेयेण ऐनरयिणः । भल्लवझब्दादित्र-२५ न्तात्प्रोक्तार्थे पूर्ववण्णिनादयः । झटशब्दान् गर्गादियान्तात् तिकाद्यायनि । एक त्वयानं तिकादी. पठन्ति, तन्मते "यनिमः" (६।११५४) इत्यायनणि पूर्ववन् शौनकादित्वागिनादी पाट्यायनिनः । इतरस्यापत्यं शुभ्रादित्वादेयणि ऐतरेयः, ततः पूर्ववण्णिनादी ऐतरेयिणः । इनग्रहणं क्रिम ? बागवल्क्येन प्रोक्तानि ब्राह्मणानि याज्ञवल्क्यानि "शकलादेयत्रः" (६।३।२७) इत्यत्र । नौलाभेन सोलामानि "मीदादिभ्य' इत्यण । यानवल्ल्यादीनि ब्राह्मणानीट्यनिनन्तन्य वेद इति नियमो नियन्ते । ग्रामग- मिति किम् ? पिनेन प्रोक्तः पैगी कल्यः । ब्रामणं वेद एव, तत्र वेद इन्वेव सिन्द अनिनन्नन्य नियम- निवृत्त्यर्थमितामणग्रहणम् ।। प्रोजानुवर्तनं किमर्थम् ? यः यपि नामानि मनाः चंदः । गादनः शब्दा वैदवाचिनो भवन्ति, ननु प्रोक्तप्रत्ययान्ता इति । यदि प्रोतामागं नानुवर्नन नदवाति मीन वेरीतहिपय एवेति प्रयोगनियमः प्रसज्येत, तनन प्रचम्निष्टन्तीत्यादि वर्ग न लभ्यन | आग्नासान- ान अवधारणे सिद्ध भयावधारणायमेवकारः । प्रोन्नप्रन्ययान्नन्याय निनान्यत्र, गयान नभिग्य न फेवलम्ब प्रोगप्रत्ययान्नन्यावस्थानम्, अन्यत्र त्यनियमात्कचिभ्यानगर भयनि-आईना आन ३६ । -

१०
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु-
शास्त्रम् । कचिदुपाध्यन्तरयोगः-आर्हतं महत्सुविहितमिति । कचिद्वाक्यम्-आर्हतमधीते । कचिवृत्तिः-
आहेत इति-अर्हता प्रोक्तं "तेन प्रोक्ते" (६।३।१८१) इत्यण् आर्हतं वेत्त्यधीते वाण तस्य लुप् । इह
पुनर्नियमाधुगपदेव विग्रहः-कठेन प्रोक्तमधीयते फठा इति ।
इति तद्वत्यधीते इत्यधिकार । ६२
"तेन छन्ने रथे" (६।२।१३१) । तृतीयान्तात् छन्ने रथेऽभिधेये यथाभिहितं प्रत्यय: स्यात्,
वस्त्रेण छनो रथो पास्त्रः । एवं काम्बलः, चार्मणः, द्वैपेन चर्मणा द्वैपः, वैयाघेण वैयाघ्रः, व्याघ्रस्य
विकारः "प्राण्यौषधि०" (६।२।३१) इत्यण , इदमर्थे त्वीयः स्यात् । छन्नः समन्ताद्वेष्टित उच्यते,
तेन पुत्रैः परिवृतो रथ इत्यत्र न भवति । "पाण्डुकम्बलादिन" (६२।१३२) पाण्डुकम्बलेन
छन्नः पाण्डुकम्बली रथः ।
ते इति छन्नरथाधिकार ।
"दृष्टे सान्नि नाम्नि" (६२।१३३)। तृतीयान्तादृष्टं सामेत्यस्मिन्नर्थे यथाविहितं प्रत्यय
स्यात्, प्रत्ययान्तं चेत्साम्नो नाम स्यात् । कुञ्चेन दृष्टं साम क्रौञ्चम् । मृगीयुणा मार्गीयवम् । एवं
मायूरम्, तैत्तिरम्, वासिष्ठम्, वैश्वामित्रम्, कालेयम्, आमेयम् । एवन्नामानि सामानि ।।
"गोत्रादकवत्" (६।२।१३४) । गोत्रवाचिनस्तृतीयान्तादृष्टं सामेत्यर्थे अङ्कवत् प्रत्ययः स्यात्,
१५ यथा तस्यायमङ्क इत्यत्रेदमर्थे प्रत्ययः स्यात्तथा दृष्टं सामेत्यर्थेऽपि । औपगवेन दृष्ट साम औपगवकम् ।
कापार्टवकम् । अङ्क इति विशेषोपादानेऽपि तस्येदमित्यर्थमात्रं परिगृह्यते ॥ "वामदेवाद्यः"
(६।२।१३५) वामदेवेन दृष्टं साम वामदेव्यम् ॥ "डिद्वाऽण्” (६।२।१३६) दृष्टं सामेत्यर्थे
योऽण विहितः स डिद्वा भवति । उशनसा दृष्टं साम औशनसम्, औशनम् । "वा जाते द्विः"
(६।२।१३७) । जात इत्यर्थे योऽण् द्विर्विहितः उत्सर्गतः प्राप्तोऽपवादेन बाधितः सन् पुनर्विहितः स
२० डिवा स्यात् । शतभिपजि जातः शतभिपः शातभिपजः । शतं भिषजोऽस्याः शतभिपजा चन्द्रयुक्तया
युक्तः कालोऽण् , "चन्द्रयुक्तात्काले." (६।२।६) इत्यणो लुप् 'जाते' (६।३।९८) इत्यणो धाधरो
"यर्पाकालेभ्यः" (६।३।१८०) इकण , पुनस्तद्वाधको "भर्नुसन्ध्यादेरण" (६।३।८९) । केचित्तु
द्विस्विमिच्छन्ति, तन्मते द्विर्डित्वात् द्विरन्यवरादिलोपे शातभ इत्यपि स्यात् । एवं पूर्वसूत्रेऽपि ।
औत्सम् (शं) साम । एवं च योगदयेऽपि त्रैरूप्यम् ।
इति दृष्टसामाधिकार ।*
"तत्रोद्धृते पात्रेभ्यः" (६।२।१३८ ) । तोति सप्तम्यन्तास्पारवाचिन उद्धृत इत्यर्ये यथा-
विहितं प्रत्ययः स्यात् । शरावे' उद्धृतः ओदनः शारावः । मालकः । कार्परः । बहुवचनं पात्रविदो-
पपरिप्रहार्थम् । “स्थण्डिलात् शेते व्रती" (६१३९) । अस्मात्सप्तम्यन्ताच्छेते इत्यर्थे यथा-
विहित प्रत्ययः स्यात् । योऽसौ शेते स चेद् प्रती स्यान् । तर शयननतोऽन्यत्र शयनानिवृत्त इत्यर्थः ।
३०स्थाण्डिलं चत्वरम्, तत्रैव शेते स्थाण्डिलो भिक्षुः "स्थाण्डिलः स्थण्डिलशायी या शेते सण्डिले प्रवान"
इत्यभिधानचिन्तामणी ।। ५२ ॥
संस्कृते भक्ष्ये ॥ ५३॥ [सि० ६२१४०]
सासम्पन्तादेमिनर्थेऽणादयः स्युः । प्राष्ट्राः अपूपाः । "शूलोवाया" (६।२।१४१)
मूल्यम् उस्यम् । "क्षीरादेपण" (६।२।१४२) क्षयी ययागः ॥ ५३॥

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । संस्कृते भक्ष्ये इत्याद्याः शेपे इत्यधिकारश्च ३७५ "संस्कृ०" । संस्कृत इति प्रत्ययार्थस्तस्य भक्ष्य इति विशेषणम्, सप्तम्यन्तात् अस्मिन्नर्थे इति संस्कृते भक्ष्वेऽर्थेऽणादय इति यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । सत उत्कर्षाधानं संस्कारः । भ्राष्ट्र संस्कृता भ्राष्ट्राः अपूपाः । "शूलो." । शूले संस्कृतं शूल्यं मांसम् । उखायां संस्कृतं उख्यमन्नम् । "क्षीरा"। क्षीरे संस्कृता झरेयी । आदिशब्दात् "दन इकण्" ( ६१२११४३) । दन्नि संस्कृतं दाधिकम् । इकणधिकारे "संस्कृते" ५ (६।४।३) इति वक्ष्यमाणसूत्रेण न सिद्ध्यतीत्येतद्विधानम्-दध्ना हि तत्संस्कृतम् , यस्य दधिकृतमेवोत्कर्पा- धानम् । इह दधि तु केवलमाधारभूतम् , द्रव्यान्तरेण तु लवणादिना संस्कारः क्रियते । “वोदश्वित" (६।२२१४४) । उदकेन श्वयतीति उदश्वित् । अत एव निर्देशात् य्वृदभावः । “रसायनमथा‘म्बू- दश्वित् श्वेतं समोदकम्” इति अस्मादिकण वा । उदश्चिति संस्कृतं औदश्वित्कम् , औदश्वितम् । "कचित्” (६।२।१४५) । अपत्यादिभ्योऽन्यत्राप्यर्थे कचिद्यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । चक्षुपा १० गृह्यते चाक्षुष रूपम् । श्रावणः शब्दः । रासनो रसः । हपदि पिष्टा दार्पदाः सक्तवः । उलुखले क्षुण्ण औलूखलो यावकः । चतुर्दश्यां दृश्यते चातुर्दशं रक्षः । चतुर्भिरुह्यते चातुरं शकटम् । अश्वसह्यते आश्वो रथः । सम्प्रति युज्यते साम्प्रतम् , साम्प्रतः । "शेषे" (६।३।१) इत्यधिकृत्य वक्ष्यमाणेपु "नद्यादेरेयण्” (६।३।२) इत्यादिसूत्रेषु एयण- प्रभृतयः प्रत्ययाः शेषेष्वर्थेषु वक्ष्यन्ते, ततः प्रथमं वालानां सुखावबोधाय शेषसंज्ञान् कतिचिदर्थान १५ सङ्केपेण निर्दिशति ॥ ५३ ।। तत्र कृतलव्धक्रीतसम्भूते ॥५४॥ [सि० ६।३।९४ ] सप्तम्यन्तादेष्वर्थेप्त्रणादयः एयणादयश्च प्रत्ययाः स्युः । सौनः । दिश्यः मूर्धन्यः । "मध्यादिनण्णेया मोऽन्तश्च” (६।३।१२६ ) माध्यन्दिनः । माध्यमः । मध्यमीयः । "वर्गान्तात्" (६।३।१२८) ईयः कवर्गीयः । “अशब्दवर्गादीनयेयाः" भरतवाणः । २० भरतवर्यः । भरतवर्गीयः ॥ ५४ ॥ "तत्र कृतलब्धकीतसम्भूते" अणादय एयणादयश्च सविशेषणा अनुवर्तन्ते । तत्रेति-समन्यन्तात्कृता- दिपु चतुर्वर्थेषु यथायोगमणादय एयणादयश्च प्रत्ययाः स्युः । यदन्येनोत्पादितं तत्कृतम् , यत्प्रतिग्रहादिना प्राप्तं तल्लब्धम् , यन्मूल्येन स्वीकृतं तत्नीतम् , यत्सम्भाव्यते सम्माति वा तत्सम्भूतम् । मथुरायां कृवो लब्धः क्रीतः सम्भूतो वा माथुरः पट:-अत्राण् । औत्स:-उत्साद्यञ् । बाह्यः वाहीकः "वहिपष्टीकण २५ च" (६।१।१६) । नादेयः-नद्यादित्वादेयण् । राष्ट्रियः-"राष्ट्रादियः” (६।३।३) ॥ ५४ ॥ कुशले ॥ ५५ ॥ [सि० ६३९५] अस्मिन्न समन्यन्ताद्यथाविहितमणादय एयणादयश्च स्युः । मथुरायां मुझलो माधुरः । "पंधोका" (६।३।९६) । सप्तम्यन्तात्पयिनशब्दान् कुशलेऽर्थेऽकः न्यान् । अणोऽपवादः । पपि . पुशलः पथकः । “कोऽइमादेः" (६३९७) । सप्तन्यन्तेभ्योऽश्मादिभ्यः फुलालेऽर्थेऽकः न्यान् । अणादेरपवादः । अश्मनि कुशलः अश्मकः । अश्मादय उपचारात्तद्विपयायां कियायां वर्तमानाः ३६ १ उत्पत्तिष्टानं सम्भावना, तम्रोलयते तत्र पटते इल्पः । २ प्रमानानविरेनेगावतिष्ठते । ३ मम्मन्वय रमरमटी मादिल मति कर्तरि सः, इतरे तु पन्त तम्यवान रमगि छः ।

३७६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलघु- प्रत्ययमुत्पादयन्ति, तत्रैव कुशलार्थयोगात् । प्रत्ययान्तरकरणमिकारोकारान्तशब्दार्थम् , अन्यथा तेव- ऽनिष्ट, रूपं स्यात्, अश्मन् , अशनि, आकर्प, त्सरु, पिशाच, पिचण्ड, पाद, शकुनि, निचय, हाद, हाद इत्यश्मादय एकादश ॥ ५५ ॥ जाते ॥ ५६॥ [सि०६।३।९०] ५ सप्तम्यन्ताजातेऽर्थे यथाविहितमणादय एयणादयश्च स्युः । मथुरायां जातो माथुर:-अण् । औत्स:-अम् । बाह्यः बाहीक-यटीकणौ । कालेयः आमेयः-"कल्यग्नेरेयण" (६।१।१७) व श्रेणः, पोस्नः । तथा नद्यां जातो नादेयः राष्ट्रियः इत्यादि । स्वयमुत्पत्तिर्जातस्यार्थ, इति कृतादिभ्यो भेदः। सप्तम्यन्तत्वं प्रकृतिविशेषणं शेषाधिकारे सर्वत्रानुवर्तनीयम् । "प्रावृप इकः" ( ६।३।९९)। एण्यस्यापवादः-प्रापि जातः प्रावृषिकः । "नानि शरदो- १०ऽकम्" (६।३।१००)। मत्वणोऽपवादः । शरदि जाताः शारदकाः दर्भाः, मुगाः । दर्भ-मुद्गविशे- पाणामियं संझा । “सिन्ध्वऽपकारात्काऽणो" (६।३।१०१) । सिन्धौ जातः सिन्धुका सैन्धयः । अपकरे कचवरे जातः अपकरकः आपकरः । नाम्नीत्यधिकारः "कालेद्देये ऋणे" (६।३।११३ ) इति सूत्र यावत् । अन्ये तु नाम्नीत्यधिकार नेच्छन्ति । "पूर्वाहाऽपराह्नाऽऽीमू- लमदोषावस्करादकः" (६।३।१०२) । जातेऽर्थे । इकणादेरपवादः । पूर्वाहे जातः पूर्वाहकः । १५ अपराहकः । अप्रेकण्तनटोरपवादः ॥ आर्द्रकः मूलकः-अन भाणः । प्रदोषका अनेकणणोः । अव: स्करकः-अनौत्सर्गिकाणः । नाम्नीत्येव-पौर्वाह्नकम् , पूर्वाहेतनम् , अपराहिकम् , अपराहेतनम् । आर्द्र मौलं प्रादोपिकं मादोप आपस्करम् । केनैव सिद्धे अकविधानं आम्रिकेत्येवमर्थम्, अन्यथा सट्वाका खट्विका सट्वेति वत् के रूपनयं स्यात् । “पथः पन्थ च" (६।३।१०३) । पथिन्शब्दात्सप्त. म्यन्ताजातेऽर्थेऽका स्वादस्य च पन्थादेशः । अणोऽपवादः । पथि जातः पन्थकः । "अश्च वाऽमा- २० धास्थायाः" (६।३।१०४)। अमावास्याशब्दात्सप्तम्यन्ताजातेऽर्थे अकारोऽकश्च प्रत्ययौ भवतः, नाग्नि । सन्ध्याधणोऽपवादः । अमावास्याया जातः अमावास्यः, अमावास्यकः । नाम्नीत्येव-आमा. यास्यः । "श्रविष्ठाऽपाढादीयण च" (६।३।१०५) । चकारादीयण-अश्व, प्रत्ययौ स्याताम्, नानि । भाणोऽपयादः । श्रविष्ठा धनिष्ठाः, ताभिश्चन्द्रयुक्ताभिर्युक्तः कालस्तासु जातः श्राविष्ठीया, भविष्ठः । एषमपाढायामपाढयोरपाढासु या जातः आषाढीयः अपाढः । अणमपीच्छन्त्यन्ये । २५ "फल्गुन्याष्टः" (६।३।१०६) । नाम्नि । भाणोऽपवादः । फल्गुन्योर्जातः फल्गुन, फल्गुनी स्त्री । अणमपीच्छन्त्यन्ये-फाल्गुनः टकारो इयर्थः । “बहुलाऽनुराधापुष्यार्थपुनर्वसुहस्तथि- शाग्वाम्बातेल" (६।३।१०७) । एभ्यः सप्तभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यः परस्य भाषणो जातेऽर्थे उप स्यात्, नाग्नि । यहुलाः कृत्तिकाः, ताभिश्चन्द्रयुत्ताभिर्युक्तः कालो बहुलास्तासु जातो यहुल:- अगाणो लुपि "इपादेगौणस्य." (रा४।९५) इत्यादिना आपोऽपि लुर । एपमनुराधामु अनुराधः! ३०"पन्युपसर्गस यहुलम्" (३१२१८६) इति दी आनुराधासासु अनुराधः । पुष्यार्थ-पुप्ये पुष्या। विष्यः । सिस्थः । पुनर्पसो पुनर्यमुः ॥ हस्ते हसः । विशाखायां विशासः । स्वाती स्वातिः। "चित्रा ३२रेयतीरोहिण्याः नियाम्" (६।३।१०८) नाम्नि । चित्रायां जाता चिया पुत्री । रेवत्यां रैयती । 'मनु पोऽ' लोकनेर साप्पसिस्भिपिपति करणेनेति । २'अवर्णवर्गस' इति प्रसार ३ मुतार हो जपनपरि। - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । जाताद्यर्थाः ३७७ रोहिण्यां रोहिणी. त्रिवामिति, किम् ?,चैत्रः । रैवतः । रोहिणः । पुंस्येपां विकल्प इत्येके तन्मते चित्रः रेवतः रोहिण इत्यपि भवति । “बहुलमन्येभ्यः” (६।३।१०९) । अविष्टादिभ्यो येऽन्ये नक्षत्रशब्दास्तेभ्यः परस्य भाऽणो जातेऽर्थे बहुलं लुप् स्यात् , नान्नि । अभिजिति जातः अभिजिन् , आभिजितः । अश्वयुजि--अश्वयुक् आश्वयुजः । शतभिपजि-शतभिषक् झातभिषजः । शातभियो “वा जाते द्विः" (६२।१३७ ) इति विकल्पेनाणो डित्त्वादन्त्य स्वरादिलोपे झातभ इत्यपि । कृनिकानु-५ कृत्तिकः कार्तिकः । मृगशिरसि-मृगशिराः मार्गशीर्पः । एषु वा लोपः ॥ क्वचिन्नित्यम्-अश्विनीपु जातः अश्विनः, अश्विनी । राधः, राधा । श्रवणः, श्रवणा । उत्तरः, उत्तरा । कचिन्न भवति-मघाम माघः । अश्वत्थे आश्वत्थः । प्रोष्टपदामु प्रोष्टपादः । भद्रपादः । “प्रोष्ठभद्रान्नाते" (७४।१३) इत्यु- तरपदवृद्धिः ॥ "स्थानान्तगोशालखरशालात्" (६।३।११०) । गोस्थाने जातो गोस्थानः । अश्वस्थाने जातः अश्वस्थानः । गोशाले गोशालः । खरझाले खरझालः । लिङ्गविशिष्टम्यापि ग्रहणान् १० गोस्थान्यां गोस्थानः । गोशालायां गोशालः । खरशालः । “ड्यादेगौणन्य०" इति न्त्रीप्रत्ययस्यापि लुप् ।। "वत्सशालाद्वा” (६।३।१११) । वत्सझालः, वात्सझालः ॥ "सोदयसमानोदया। (६३११२) । एतौ निपात्यो । समानोदरे जातः सोदयः, समानोदयः । निपातनात्पक्षे समानस्य सभावः, तत एव जातार्थमात्रत्वेऽपि भ्रातृष्वेवाभिधानं न कृमिमलादिपु । नान्नीत्यधिकाराद्वा ।। ५६ ।। इति जाताधप्रकरणम् । भवे ॥ ५.७ ॥ [सि० ६३३१२३ ] सतम्यन्तादस्मिन्नर्थ यथाविहितमणादय एयणादयश्च स्युः । मना भवत्यों गृह्यते, न जन्म, जान इत्यनेन गनार्थत्वात् । यथा सुन्ने भवः स्त्रीन इति त्रुघ्नं सन् वर्तमान इत्यर्थः । एवं आत्मः, नादेवः, राष्ट्रियः, पारावारीणः, ग्राम्यः, ग्रामीणः ।। "विल्वकीयादेरीयस्य" (२।४।९३) । नटादिषु विल्यादयः पठ्यन्ते तेषु कीयप्रत्ययान्तानामिह निर्दशः । बिल्वकीयादीनां दशानामवयवम्ब ईयम्य २० तद्वितयस्वरे लुक् त्यात्, बिल्याः वेणयो वेत्राणि वेतमाः अयन्नक्षाण दृक्षवः काष्टानि कपोनाः क्रुखाः सन्त्यस्यामिति "नडाऽऽदेः कीयः" (६।२।५२), "तन आत" (२।४।१८) इत्याप बिल्वकीयाया नद्यस्तासु भवा इति भवार्येऽणि अनेन ईयलोप वैल्यकाः वणुकाः वैत्रकाः चैतमकाः काः ताक्षकाः गेक्षकाः काष्टकाः कापोतकाः मीञ्चकाः ॥ ५५ ॥ दिगादिदेहांशाधः ॥ ५८॥ [सि० ६३३१२४ ] भवे । दिश्यः । मृर्द्धन्यः ।। ५८ ॥

३७८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- ऽन्वयस्तर भवो वंश्यः । एवमनुवंश्यः ॥ "नाभ्युदकात्" (६।३।१२५) उदा रजस्वला खी। नानीति किम् ? औदको मत्स्यः । "मध्यादिनपणेया मोऽन्तश्च" (६३।१२६) माध्यन्दिनः माध्यमः । मध्यमीयः । "वर्गान्तात्" (६।३।१२८)। ईयः । कवर्गीयः । *अशब्दवर्गादीनयेयाः । भरतवर्गीणः । ५भरतवर्यः । भरतवर्गीयः ॥ "मध्या०" मध्यशब्दात् दिनण्, ण, ईय, एते त्रयः प्रत्यया भवेऽर्थे स्युः, तद्योगे मागमञ्च स्यात् । क्रमेणोदाहरणानि-मध्ये भवो माध्यन्दिनः, माध्यमः, मध्यमीय इति । अन्ये तु दिन णित नेच्छन्ति-मध्यन्दिनः ।। "जिह्वामूलाऽडलेश्चयः" (६।३।१२७) । जिह्वामूले भवो जिह्वामूलीयः । अङ्गुलीयः । चकारेण मध्यशब्दानुकर्पणं मागमाभावार्थम्-मध्यीयः ॥ "वर्गा"। वर्गान्तादित्येताव. १० सून स्पष्टम् । ईय इति वृत्त्यशः । कवर्गीयः पवर्गीयो वर्णः ॥ *अशब्दवर्गेत्यादि अन सूत्रम्-"ईनयो चाशब्दे" (६।३।१०९) वर्गशब्दान्तात्सप्तम्यन्ताद्भवेऽर्थे ईन य इत्येतौ चकारादीयश्च प्रत्ययाः स्युः, अशब्दे-नचेत् भवार्थः शब्दो भवति । भरतवर्गीण इत्यादि । अशब्द इति किम् ? अकवर्गीयः । इत्यादिशब्दानुवर्तनात् "दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यहेरेयण" (६।३।१३०) अणादीनामपवादः । हतौ चर्मसल्वाया भव दातेय जलम् । कुक्षौ देहाशे भवः कौक्षेयो व्याधिः । देशार्थादपि परत्वादय- १५मेव न धूमाधकम् , खङ्गेऽप्ययमेव न तु कुलकुक्ष्यायेयकम् तस्य भवादन्यन जातादावर्थे चरितार्थत्वात् । असि कौक्षेयमुद्यम्य । कलश्या मन्थन्या भव कालशेय तकम् । वस्तौ पुरीपनिर्गमरन्धे भवं वास्तेय पुरीपम् । अहौ भयमाहेय विपम् ।। "आस्तेयम्" । (६।३।१३१) । अस्तिशब्दात्तियन्तप्रतिरूप: काव्ययानविद्यमानपर्यायात्तत्र भवे एयण निपात्यते । अमृगशब्दस्य चास्यादेशश्च । अस्ति-धने 'या' विद्यमाने या असृजि वा भवमास्तेयम् ॥ "ग्रीवातोऽण् च" (६।३।१३२) । ग्रीवाशब्दावेऽर्थेऽण २० चकारादेयः स्याताम् । देहाशयापवादः । ग्रीवाया प्रीवासु भय वेयम् । प्रीवाशब्दो यदा शिरोधम नीवचनस्तदा तासा (बहुत्वान् ) बहुवचनम् ।। "चतुर्मासान्नानि" (६।३।१३३) अण् । चतुर्मासेषु भपा चातुर्मासी । आपाढी कार्तिकी फाल्गुनी च पौर्णमासी भण्यते । अन विधानसामर्थ्यात् "द्विगो. रनपत्ये०" (६।१।२४) इति प्रत्ययलुप् न स्यात् । नानीति किम् ? चतुर्मासेषु भवः चतुर्मासः-अत्र "घर्षापालेभ्यः" (६३६८०) इतीकण, तस्य लुप्॥ “यज्ञ ज्यो" (६३।१३४) । चतुर्मासशब्दात्तर २५भवे यझे न्यः स्यात् । चतुर्पु मासेषु भवानि चातुर्मास्यानि यज्ञकर्माणि ॥ "गम्भीरपञ्चजनयहि- देवात्" (६।३।१३५) । भवे व्यः स्यात् । अणाद्यपवादः । गम्भीरे भवो गाम्भीर्यः पाश्चतन्यः । पायः । देव्यः । भवादन्यत्र गाम्भीरः । पाञ्चजनः, द्विगौ त्वणो लुपि पञ्चजनः । याहीरः । देवः । ननु “यहिपष्टीकण प" (६।१।१६) इति सूत्रेण अस्य प्रागजितीयेऽर्थे सिद्धिः, भवार्थोऽपि प्राजितीय एवेत्सा यदिःशब्दमहणं व्यर्थमिति चेत् ? नैवम्-तत्र टीक्ण्साहचर्यात् ज्योऽपि भवार्थयर्जित एवं ३० मानितीयेऽर्थे स्यादिति भवार्थेऽपि व्यविधानाथं यहिर्महणम्, । टीपणश्च भयावर्जनं समते स्पष्टमेव, तत्र सूत्रे भयेऽर्थेऽपि यादीफ इति इत्येये' इति वचना, तथा देवा यज्ञ" (६।१।२१) इति सूत्रेण यमेय प्राजितीयान सिद्धे अत्र देवप्रहणं खीलिङ्गरूपविशेषार्थम् । तथाहि "देयाद् या" इति सूत्रेण यममोव्यायनीति यनि अभि घ देवीति रूपद्वयं सात् । मतान्तरेण भवर्तिते प्रागनिती. येऽर्षे न्यस्यापि विधानान् देच्या इत्यपि, भयायें त्वनेन सूत्रेण ज्यविधानात् देव्या इसेय न तु ३५यनीत्यादि | "परिमुखाऽऽदेरव्ययीभावात्" (३६) परिमुख इत्यादिभ्योऽन्यपीमा - देण्या- . प प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । भवाद्यर्थीः ३७९ वेभ्यस्तत्र भवे ज्यः स्यात् । अणोऽपवादः । परितः सर्वतो भवं मुखं परिमुखम् । अत एव वचनादव्य- यीभावः । वर्जनार्थो वा परिः-मुखात् परि परिमुखम् , “पर्यपाङ्वर्ये” (३।११३२) इत्यनेनाव्ययी- भावः । परिमुखे भवः पारिमुख्यः । परिहनु. तत्र भवः पारिहनव्यः । पर्योप्ठयः । परिमुखादेरिति किम् ? औपकूलम् , औपशाखम् , औपकुम्भम् , औपखलम्, आनुकुम्भम् , आनुकूलम् , आनुखलम् । अव्ययीभावादिति किम् ? परिग्लानो मुखाय परिमुखस्तत्र भवः पारिमुखः । परिमुख, परिहनु,५ पर्योष्ठ, पर्युल्खल, परिरथ, परिसिर, परिसीर, उपसीर, अनुसीर, उपस्थूण १०, उपस्थूल, उपक- पाल, उपकलाप, अनुपथ, अनुगङ्ग, अनुतिल, अनुशीत, अनुमाप, अनुयव, अनुयूप, २० अनुवंश, अनुपद, २२ इति परिमुखादयो द्वाविंशतिः । अनुवंशादिगादित्वाद्योऽपि-अनुवंश्यः । “अन्त:- पूर्वादिकण्” (६।३।१३७ ) । अन्तःशब्दपूर्वादव्ययीभावाद्भवे इकण् स्यात् । अणोऽपवादः । अगारस्यान्तः अन्तरगारम् , तत्र भव आन्तरगारिकः, आन्तर्गेहिकः, आन्तश्मिकः, आन्तःपुरिकः,१० अव्ययीभावादित्येव-अन्तर्गतमगारस्य, अन्तःस्थं वा अगारं अन्तरगारम् , तत्र भवमान्तरगारम् , आन्तःपुरम्, आन्तःकरणम् ॥ “पर्यऽनोामात्" (६।३।१३८) । पर्यनुपूर्वग्रामशब्दान्तादव्य- यीभावाद्भवे इक्रण स्यात् । अणोऽपवादः । ग्रामात्परि परिग्रामम् , ग्रामस्य समीपमनुग्रामम् , तत्र भवः पारिवामिकः, आनुग्रामिकः । अव्ययीभावादित्येव-परितो ग्रामः परिग्रामस्तत्र भवः पारिग्रामः ॥ "उपाजानुनीविकर्णात्प्रायेण” (६।३।१३९ उपपूर्वजान्वादिशब्दान्तादव्ययीभावादिकण् १५ स्यात् , प्रायेण । तत्र भवे (-यस्तत्र वाहुल्येन भवति, अन्यत्र च कदाचिद्भवति तस्मिन्नित्यर्थः)। जानुनः समीपमुपजानु, प्रायेणोपजानु भवति, अन्यत्र कदाचित् , औपजानुकः सेवकः । एवं (औपजानुकं शाटकम् , ) औपनीविकं ग्रीवादाम, कार्पापणं वा । औपकर्णिकः सूचकः । प्रायेणेति किम् ? नित्यम्भवे मा भूत्-औपजानवं मांसम् (औपजानवं गडु, ) जानुशब्दो देहावयवो नोपजानुशब्द इति दिगादि- देहाशादिति यो न स्यात् ।। "रूढावन्तःपुरादिकः” (६।३।१४०) । एकपुरुषपरिग्रहे स्त्रीसमुदाये,२० उपचारात्तन्निवासेऽपि रूढावन्तःपुरशब्दादिकः स्यात् । अन्तःपुरे भवा अन्तःपुरिका स्त्री । रूढाविति किम् ? पुरस्यान्तर्गतम् अन्तःपुरम् । यथान्तरङ्गुलो नख इति । तत्र भवः आन्तःपुरः । पुरस्यान्तरन्त:- पुरमिति अव्ययीभावादिकण् स्यात् , आन्तःपुरिक इति ॥ “कर्णललाटात्कल्” ( ६।३।१४१)। रूढी-प्रकृतिप्रत्ययसमुदायश्चेत् कचिद्रूढो भवति । कर्णिका कर्णाभरणविशेषः, पद्माद्यवयवश्च । लला- टिका-ललाटमण्डनम् । रूढावित्येव-कणे भवं कर्ण्यम् , ललाट्यम् ; दिगादिदेहाशाद्यः । लकारः२५ स्त्रीत्वार्थः । ( इति भवार्थप्रकरणम् । "तस्य व्याख्याने च ग्रन्थात्" (६।३।१४२) ग्रन्थः शब्दसन्दर्भः । स व्याख्यायते (अवयवाः कथ्यते) येन तव्याख्यानम् । तस्येति पष्ठ्यन्ताव्याख्यानेऽर्थे तत्रेति सप्तम्यन्ताच भवेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । चकारस्तत्र भवे इत्यस्यानुकर्षणार्थः । वाक्यार्थसमीपस्थश्चकारः । पूर्व-३० वाक्यार्थ समुच्चिनोति । कृतां व्याख्यानं कृत्सु भवं वा कार्तम् । अत्र सूत्रे युगपदुभयोस्तस्य व्याख्याने तन्न भवे चेत्यर्थयोरुपादानं वक्ष्यमाणः सकलोऽप्यपवादविधिरनयोरर्थयोर्यथा स्यादियेवमर्थम् । ननु ३२ १ पुरस्य शरीरस्य अन्तर्गतं चित्तस्थं गृहस्य वाऽन्तर्गतम्। २ रूढाविति वचनात् अव्ययीभावादिति निवृत्तम् , अव्ययी- भावे रूढेरसम्भवात् । अन्तःपुरमिति पत्र राज्ञोऽन्तःपुरमिति राज्ञः स्त्रीवर्ग उच्यते नासावव्ययीभावार्थो भवति । अव्ययीभावो हि पूर्वपदार्थप्रधानोऽन्तरर्थप्रधान इति पूर्वेणेकणेव भवतीति । ३ कर्णे भवेति भवार्थसु व्युत्पत्तिमानम्, पयायवयवस कणे अभावात् ।

-- पौरोडाशिकः, पौरोडाशिका, पौरोडाशिकी ॥ "छन्दसो यः” (६।३।१४७) । द्विखरेकणोऽप- ३८० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- च तस्य व्याख्यानेऽर्थे "तस्येदम् (६।३।१६०) इत्यनेनैव प्रत्ययविधिः सिद्धा, चकारानुकूष्टे तत्र भवेऽप्यर्थे पूर्वमेव प्रत्ययविधिरुक्तस्तत्किमनयोयुगपदुपादानम् ? उच्यते-वक्ष्यमाणः सकलोऽप्यप- चादविधिरनयोरर्थयोर्यथा स्यादित्येवमर्थम्-उत्तरेणैकयोगत्वे चानुकृष्टत्वात्तत्र भव इत्यस्य ततः परं मानुवृत्तिः स्यात्, योगविभागे विहानुवृत्तिरनार्थंकेति द्वयोरुत्तरत्रानुवृत्तिर्भवति । उदाहरणोपन्यासस्त्व - ५वादमानम् । यचोक्तम्-तस्य व्याख्यानेऽर्थे "तस्येदमि"सनेनैव प्रत्ययसिद्धिस्तदपि न । तथा सति इद- मर्थोल्लेखानां भूयस्त्वादानियमः स्यादिति ॥ "प्रायो बहुखरादिकण्” (६३३१४३) । बहु- खराद्वन्थवाधिनस्तस्य व्याख्याने तत्र भवे चार्थे प्राय इकण स्यात् । अणादेरपवादः । पत्वणत्वयोा- ख्यानम् , तत्र भवं वा, पात्वणत्विकम् । एवं नातानतिकम् ; उदात्ताऽनुदात्तयोरेते नतानतसंज्ञे । आत्मनेपदपरस्मैपदिकम् । आव्ययीभावतत्पुरुपिकम् । नामाख्यातिकम् । आख्यातिकम् , ब्राह्मणिकम् , प्राथमिकम् , आध्वरिकम् , । पोरेश्वरणिकम्-प्रायश्चित्तटीका । प्रायोवचनात् कचित् न भवति–सांहि- तम् प्रातिपदिकीयम् ॥ "ऋद्विखरयागेभ्या" (६३११४४) ऋच् इत्येतस्मात् ऋकारान्तात् द्विस्वराद्यागशब्देभ्यश्च ग्रन्थवाचिभ्यस्तस्य व्याख्याने तत्र भवे चार्थे इकण् स्यात् । अणादेरपवादः । चां व्याख्यानमृक्षु भवं वा आर्चिकम् । ऋकारान्त. चतुर्पु होतृपु भव इत्यणो लुपि चतुर्होता प्रन्थः, तस्य व्याख्यानं तन भवं वा चातुर्होट्टकम् , एवं पाश्चहोतकम् । द्विस्वर. आङ्गिकम्, पौर्विकम् , १५सौत्रिकम् , तार्किकम् , नामिकम् । याग. आमिष्टोमिकम् , राजसूयिकम् , वाजपेयिकम् , पाकयज्ञिकम्, नावयज्ञिकम् , पाश्चौदनिकम् , दाशौदनिकम् । ऋकारान्तयागयोहणं पूर्वस्यैव प्रपञ्चः । यागेभ्य इति पहुवचनं ससोमकानामग्निष्टोमादीनामसोमकानां पञ्चौदनादीनां च परिग्रहार्थम् ॥ "ऋपेरध्याय" (६१३१४५) ऋपिशब्देभ्यो प्रन्थवाचिभ्यस्तस्य व्याख्याने तत्र भवे चाध्यायेऽर्थे इकण् स्यात् । वसि- एस्य अन्थस्य व्याख्यानस्तत्र भयो वासिष्टिकोऽध्यायः । वैश्वामित्रिकोऽध्यायः । अध्याय इति किम् ? २० वसिष्ठस्य व्याख्यानी, तत्र भया वासिष्ठी ऋक् । “प्रायो बहुवरादि"ति प्रायोग्रहणादप्राप्तिकल्पनाया विध्यर्थम् , प्राप्तिकल्पनायामध्याय एवेति नियमार्थ वचनम् ॥ “पुरोडाशपौरोडाशादिकेकटौ” (६।३।१४६) आभ्यामनयोरर्थयोरेतौ स्याताम् । अणीययोरिकणो यापवादः । पुरोडाशादणोऽप. वादः । पौरोडाशशब्दातु "दोरीयः” (६।३।३२) इति प्राप्तस्य ईयस्यापवादः । इकप्राप्तिकल्पनायां तूभयोरपि इकणोऽपवादः । वचनभेदात्तु यथासङ्ख्याऽभावः । इकेकटोः स्रियां विशेषः-पुरोडाशाः २५ पिष्टपिण्डातैः सह चरितो मत्रः पुरोडाशस्तस्य व्याख्यानस्तत्र भवो वा पुरोडाशिकः पुरोडाशिका, पुरोडाशिकी; पुरोडाशानामयं तत्र भवो वा पौरोडाशस्तत्संस्कारको मन्त्रस्तस्य व्याख्यानस्तत्र भवो वा - पादः। छन्दसो व्याख्यानस्तत्र भवो या छन्दस्यः ॥ "शिक्षादेवाण" (६।३।१४८) । इकणोऽप- पादः । शिक्षाया व्याख्यानस्तत्र भवो वा शैक्ष: आर्गयनः । छन्दस्. छान्दसः। एवं छन्दसो द्वैरूप्यम् । ३० अण्महणमीयवाधनार्थम्, अन्यथानागोऽप्रणे योऽन्येन वाधितो न प्राप्नोतीति न्यायापायो बहुवरा• दितीकणा वाधितो वास्तुविद्यादिशब्देभ्यो "दोरीय" इतीय एव स्यात् नत्वऽण् । नयायः । वास्तुवियः । ३२ शिक्षा, ऋगयन, पद, व्याख्यान, पदव्यारयान, छन्दोव्याख्यान, छन्दोमान, छन्दोभाष छन्दोविचिति १ नतोऽनुदाप्त , अनतस्तूदातोऽस्पस्वरयामतस्य पूर्वनिपातः । २ पुरो विपाककालादर्वाक् चर्यवे पुरश्चरणम् 'भुमिपल्ला दिभ्यः प्रायश्चित्तम्तरप्रतिपादको अन्योऽपि । गन्तानां योगवाचिना च द्विखरणा विखरेयंशेन, बहुसराणा । 'प्रायो बहुसरात्' इति नियति, एकखणस्तु न सम्भवन्लेव तस्किमर्थमित्याह पूप्रायो पहुखरात् इसस्पेसर्थः । रिसाहनर्यात प्रन्योऽपि तयोच्यते । ५ प्रायोमणस यादृच्छिकलात् ।

. S. - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । भवाधीः ३८१ छन्दोविचिती १० छन्दोविजिति, न्याय, पुनरुक्त, निरुक्त, व्याकरण, निगम, (निगमन ?) वास्तुविद्या, अङ्गविद्या, क्षत्रविद्या, (त्रिविद्या, विद्या ?), उत्पात, २० उत्पाद, संवत्सर, मुहूर्त, निमित्त, उपनिषद्, ऋपि, यज्ञ, चर्चा, क्रमेतर, सक्ष्ण, ३० इति शिक्षादयस्त्रिंशत् । बहुवराणामदुसंनकानामुपादानम् प्रायोग्रहणस्यैव प्रपञ्चः । दुसंज्ञकानां तु ईयबाधनार्थमित्युक्तमेव ॥ ५८ ।। इति भवार्थानुगतम् तस्य व्याख्यानप्रकरणम् । तत आगते ततः प्रभवति ॥ ५९ ॥ अनयोरर्थयोः पञ्चम्यन्तादणादयः स्युः । माथुरः पान्यः । हैमवती गङ्गा ॥ ५९॥ "तत आगते" (६।३।१४९) तत इति पञ्चन्यन्तादागतेऽर्थ यथाविहितमणादय एयणादयश्च स्युः । सुन्नादागतः स्रोन्नः । एवं माथुरः, औत्सः, गव्यः, दैत्यः, बाह्यः, कालेयः, आग्नेयः, णः, पौलः, नादेवः, राष्ट्रियः, ग्रामीणः, ग्राम्यः । मुख्यापादानपरिग्रहात त्रुनादागच्छन् वृक्षमूलादागतः १० इत्यत्र वृक्षमूलादमुख्यादपादानान्न स्वात् । आदिशब्दसंसर्गान "विद्यायोनिसम्बन्धादक" (६।३।१५० ) । विद्याकृतो योनिकृतत्र सम्बन्धो येषां तद्वाचिभ्यः पञ्चम्यन्तेभ्य आगतेऽर्थेऽकञ् स्यात् । अणोऽपवादः । ईयं तु परत्वात् बाधते । विद्यासम्बन्धः-आचार्यादागतमाचार्यकम् । औपाध्यायकम् , शेयकम् , आविजकम (आन्ते- वासकम् ) । योनिसम्बन्ध. पैतामहकम् , मातामहकम् , पैतृव्यकम् , मातुलकम् । "पितुर्यो वा"१५ (६३।१५१) इकणोऽपवादः । पितुरागतं पित्र्यम , "ऋतो रस्तद्विते” (१२२।२६) इति रत्वम् । "ऋत इकण्” (६।३।१५२) ऋकारान्ताद्विद्यायोनिसम्बन्धवाचिन आगतेऽर्थे इकण् स्यात् । अक- बोऽपवादः । होतुरागतं होतकम् , पैतृकम्, प्राशास्तकम् (शास्तृकम ) । योनिसन्बन्ध. माकम् , भ्रातृकम , स्वासूकम् , दौहितृकम् , जामातृकम , नानान्तकम् । मातुरागता मातृकी विद्या इक्रशन्तत्वाद् डीप्रत्ययः । सर्वत्र च 'ऋवर्गोवर्णदोसिसुसझश्वदकस्मात्त इकस्येतो लुस् (७।४।७१) इतीकण इकारन्स २० लुक् । "आयस्थानात्" (६।३।१५३) । स्वामिग्राह्यो भाग आयः, स यस्मिन्नुत्पद्यते तदाऽऽय- स्थानम् । तद्वाचिन आगतेऽर्थ इकण् स्वान् । अणोऽपवादः । ईचं तु परत्वान वाधते । एत्य तरन्यन्मि- नित्यातरो नदीतीर्थम, तत आगतं आतरिकम , शाल्कझालिकम् , आपणिकम , दीवारिकम । आयस्थान- त्वेनाप्रसिद्धादपि तादूप्येण विवक्षिताद्भवति कश्चिन-त्रानिकः । “शुण्डिकादेरण" (६३ १५४) इकणादेरपवादः । अण्ग्रहणं विस्पष्टार्थम् , यदि घनेनान्यावस्थानादिकम् तीर्थाद्धृमाधकञ् पर्ण-२५ कृकणाभ्यां चयः स्वाहचनमिदमनर्थकं स्यात् । न चोदपानादिहाभ्यणि वा विशेषोऽस्तीति । यदा तु शुण्डिकार्दानि सर्वाण्यावस्थानान्येव, नदा अंकनीयबाधनार्थम् । शुण्डः, गुण्डा मुग, ननो गत्यर्थीये शुण्डिकः शुण्डिका वा सुरापणः सुगविकर्या चोच्यते । तत आगनं शाण्टिकम, श्रीदपानम , कार- णम् । शुण्डिका, उदपान, पर्ण, कृकण, उलप, तृग, तीर्थ, स्खण्डिल, उपल, उदक, भूमि, पिल, इति शुण्टिकादयो द्वाददा । "गोत्रादकवत्" (३१३६१५५ ) । गोत्रयाचिनः शब्दादागने अन्न- - १ ननु जयन्मानं न क्रियते तदानी 'कानयाना-'यादिभिरकादयः पन्ना-बहीनि। मर. गीपा प्रत्ययानां गिनन् । निशानन्तरम् गाने । अनावमा पनि गोगा करणार । तम्मन् विटामिति नभम् । ३ असम:-. फमः परमान्यामिति न देगादि माननीय नाम्यान्मारती वि. मनीची मानः । नमामिक्षा बगेका नया मामला।

३८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिंते खोपज्ञहैमलघु- वत्प्रत्ययः स्यात् । यथा भवति विदानामङ्क: बैदः । गार्गः, दाक्षः, इति "सहयोपाउंङ्क०" (६।३।१७२) इत्यादिनाण्, तथेहापि विदेभ्य आगतं वैदम्, गार्गम् , दाक्षम् । अङ्कग्रहणेन "तस्येदम्" (६।३।१६०) इत्यर्थसामान्य लक्ष्यते, तेनाऽकलोऽप्यतिदेशः । अन्यथा सद्धाद्यण एव स्यात् । तेन यथा भवति औपगवकः कापटवकः नाडायनकः गाायणकः इति "गोत्राददण्ड." (६३।१६९) इत्यादिनाक, ५तथेहापि ओपगवेभ्य आगत औपगवकः । कापटवकः । नाडायनकः । गाायणकः । एवं "रैवति- काऽऽदेरीयः" (६।३।१७०)। रैवतिकेभ्य आगतं रैवतिकीयम् । "कौपिक्षलहास्तिपदादण्" (६।३।१७१) कोपिञ्जलादागतं कौपिञ्जलं हास्तिपदम् । "हेतुभ्यो रूप्यमयटौ वा" (६३२१५६) नृवाचिभ्यो हेतुवाचिभ्यश्च आगतेऽर्थे एतौ स्याताम् । पक्षे यथाप्राप्तम् । वचनभेदाद्यथासयाऽभावः । हेतुः कारणम्, नृग्रहणमहेत्वर्थम् । देवदत्तादागतं देवदत्तरूप्यम् , देवदत्तमयम् ; पक्षे देवदत्तम् । १० अत्रापादानपञ्चमी । हेतुः कारणम् , समादागतं समरूप्यम् सममयम् ; पक्षे गहादिपाठादीयः समी. यम् । पापमयम् पक्षे "दोरीयः" (६३१३२) पापीयम् । अत्र हेतौ पञ्चमी । टकारो ड्यर्थः-सम. मयी । बहुवचनं स्वरूपव्युदासार्थम् । *( इति तत आगते इत्यधिकारः ॥ अथ ततः प्रभवत्यधिकारः। १५ तत्र "प्रभवति" (६।३।१५७) इति सूत्रम् । अनयोरर्थयोरित्यादि स्पष्टम् । अत्रायमर्थः-पञ्च. म्यन्तात्प्रथम प्रकाशमानेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । प्रथममुपलभ्यमानता प्रभवः । अन्ये प्रभवति जायमान इत्याहुः । “जाते" (६।३।९८) इति भूते सप्तम्यन्तात्प्रत्ययः, अत्र तु पञ्चम्यन्ताद्वर्तमान इति विशेषः । हेमवती गड़ेति-हिमवतः प्रभवति प्रथममुपलभ्यते इति । एवं दारदीसिन्धुः । काश्मी- रीवितस्ता । काश्मीरशब्दाद् "बहुविषयेभ्यः" (६३।४५) इत्यकोऽपवादः कच्छायण । अनादिशब्दोपादानात् । “वैडूर्यः" (६।३।१५८) विडूरशब्दात्प्रभवत्यथें व्यो निपात्यते । निहरात्प्रभवति वैडूर्यो मणिः । विडूरमामे ह्ययं संस्क्रियमाणो मणितया ततः प्रथमं प्रभवति । धाल- घायात्तु पर्वतात्प्रभवनसौ न मणिः किन्तु पापाणः । यदा तु जायमानतार्थः प्रभवशब्दस्तदा वालवाय- शब्दम्य व्यतत्सन्नियोगे विदूरादेशश्च निपात्यते । वालवायपर्याय एव वा विदूरशब्दः । प्रतिनियत- विपयाश्च रूढय इति वैयाकरणानामेव [विदूरशब्दस्य वालवाये ] प्रसिद्धिः [ नान्येपाम् ] 1 यया २५ जित्वरीशब्दस्य पाराणस्यां वणिजामेव । घालवायशब्दातु चालवायशब्दातु ईयप्रत्ययोऽनभिधानान्न भवति । "त्यदादेर्मय" (६।३।१५९) । प्रभवत्यर्थे तन्मयं तन्मयी ॥ ५९॥ - इति तत प्रभवति इत्यधिकार. ॥ 8- तस्येदम् ॥ ६०॥ [सि०६३।१६०] पष्ठ्यन्तादम्मिन्नर्थेऽणादयः स्युः । आपम् ।। ६० ॥ तस्मादित्यादि पटवादिदम याविहितमणादय एयणादयश्च स्युः । आप. गिति-ऋषीणागिदमार्पम् । एवं सोमम् । माधुरम्, देयम्, पाईरपत्यम्, पालेयम्, पौत्सम् , श्रेणम् , पालम्, गव्यम्, नादेयम्, राष्ट्रियम् । पारीणः, भायनीयः, श्यामगीयः, पाट- दीपुप्रयः प्रारारः । ६ वनमिधानाप्न भवति-देवदवसातरः, प्रामस्य समीपम्, विशतेरयपत्र PRः, शतम दौ, मदमस्य पश, सस्पेति पटपर्यमापनिदमिति पटपर्यसम्पन्धिमा प वियक्षितम् । २५पदन्यहिसालापत्यशपरोक्षस्यादिकं सदावियाशितम् । ३० आमेयम्, . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । तस्येदमित्यर्थः ३८३ अनादिशब्दानुसन्धानात् "हलसीरादिकण्” (६।३।१६१) । अणोऽपवादः । हलस्त्रेदं हालि- कम् । एवं सरिकम् । “समिध आधाने टेन्य" (६३।१६२) । आधीयते समिन् येन तदाधा- नम् । अणोऽपवादः। टकारो ड्यर्थः । समिधामाधानो मन्त्रः सामिधेन्यो मन्त्रः । सामिवेनी ऋछ । पञ्चदश सामिवेन्यः । “विवाहे द्वन्द्वादकल्” (६।३।१६३) । अणोऽपवादः । लकारः स्त्रीत्वार्थः । अत्रिभरद्वाजानां विवाहः अन्निभरद्वाजिका । वसिष्टकाश्यपिका । भृग्वाङ्गिरसिका 1५ कुत्सकुशिकिका । गर्गभार्गविका । कुरुवृष्णिका । कुरुकाशिका । "अदेवासुराऽऽदिभ्यो वैरे" (६३।१६४) । देवासुरादिवर्जिताहन्द्वाद्वैरे इदमर्थेऽकल् स्यात् । अणोऽपवादः । ईयं तु परत्वादा. धते । बाभ्रवशालकायनानामिदं वैरं बाभ्रवशालकायनिका.। काकोकिका, श्वावराहिका, श्वशृगालिका, अहिनकुलिका । अदेवासुरादिभ्य इति क्रिम् ? दैवासुरम् , राक्षोऽसुरम् , । देवासुरादयः प्रयोगगम्याः । "नटान्नृत्ते ज्यः” (६।३।१६५) । नटानामिदं नृत्तं नाट्यम् । “छन्दोगौक्त्थिकयाज्ञिक-१० बढचाच धर्माऽऽन्नायसङ्घ” (६।३।१६६) । छन्दोगादिभ्यश्चतुर्यो नटाच धर्मादी इमर्थ व्यः स्यात् । छन्दोगानां धर्म आनायः सद्यो वा छान्दोग्यम् । ऑक्त्थिक्यम् । याज्ञिक्यम् । वाढच्यम् । नाट्यम् । “आथर्वणिकादणिक लुक् च" (६।३।१६७) । अस्मादिदमर्थेऽण् इकलोपश्चास्य । अथर्वणा प्रोक्तं वेदं वेत्त्यधीते वा आथर्वणिकः न्यायादित्वादिकम् , अतएव निपातनाद्गणपाठसामर्थ्याद्वा प्रोक्ताल्लुब् न भवति । आथर्वणिकानां धर्म आन्नायः सङ्घो वा आथर्वणः । चरणाकनि प्राने वचनम् । १५ "चरणादकम्” (६।३।१६८)। चरणशब्दो वेदशाखावचनस्तद्योगात्तद्ध्यायिषु वर्त्तते, चरण- वाचिनो धर्मादौ इदमर्थेऽकञ् स्यात् । अणोऽपवादः । ईयं तु परत्वाद्वायते । कठानां धर्म आन्नावः सो वा काठकः । चरकानां चारककः । कालापानां कालापकः । पप्पलादानां पैप्पलादकः । मौदानां मोदकः । आर्चाभिनामार्चाभकः । वाजसनेयिनां वाजसनेयकः । “गोत्राददण्डमाणवशिष्य" (६३।१६९) । गोत्रवाचिनो दण्डादिवर्जिते इदमर्थेऽकञ् स्यात् । अणोऽपवादः । ईयात्री तु पर-२० वाद्वाधते । औपगवकम् , कापटवकम् , दाक्षकम् , प्लाक्षकम् , गार्गकम् , गाायणकम (ग्लीचुकाय. नकम् , म्लौचुकायनकम् ) अदण्डमाणवशिष्य इति क्रिम् ? काव्यखेमे काण्वाः-दण्डमाणवाः, शिप्या वा । एवं गौकक्षाः "शकलादेर्यत्रः” (६।३।२७) इत्यञ् । दाक्षेरिमे दाक्षाः प्लाक्षाः माह्काः "वृद्धेऽत्रः" (६।३।२८) इत्यञ् । दण्डप्रधाना माणवाः दण्डमाणवाः, आश्रमिणां रक्षापरिचर- णार्थाः । शिष्या अध्ययनार्थी अन्तेवासिनः । रैवतिकादेरीयः" (६:३।१७०) । अन्माहोत्रबा-२५ चिन इदमर्थे ईयः स्यात् । वतिकीयं शकटम् । वतिकीयः सदादिः । रैवतिकीया दण्डमाणव- शिप्याः । गौरग्रीवीयं शकटम् । गौरग्रीवीयः सवादिः । गौरग्रीवीया दण्डमाणवशिष्याः ।। रेवतिक, गौरग्रीवि, स्वापिशिष्य, मधन्वि (क्षमति इति मुद्रितबृहद्वृत्ती), आदमेषि, औदवाहि, बंजवापि, इति रैवतिकादयः सप्त । "कौपिञ्जलहास्तिपदादण्" (६।३।१७१) । आभ्यां गोत्रवाचिभ्या- मिदमर्थेऽण् । अकलादेरपवादः । कुपिखलस्यापत्यं कापिखलः । इस्तिपादस्यापत्यं हास्तिपादः ।३० अतो निपातनादेवाण पादस्य च पद्भावः । तयोरिदं कौपिचलं हास्तिपदं दाफटम् । कोपिचन्दा हास्तिपदा दण्डमाणवशिप्याः । ननु यथाविहितमित्यम् सिद्ध एब, न चेयः प्राप्नोति, नदी हि रैवतिकादाचवों पध्येयाताम् , तथा अकत्रः प्रामी वचनमनर्थकं स्यात् तथाप्यत्राणप्रहणाभावे दण्टमा- णवशिष्येप्वकमर्थमेतत्स्यात्तत्र ह्यकञ् प्रतिपिटु इति । णित्वं व्यर्थ पुंबद्भावार्थ च-कॉपिजली न्यूयः । हास्तिपदी स्थूणः । “सङ्घघोपाऽकलक्षणेऽभ्यनिनः" (६।३।१७२) अनन्नाद्यन्नादिय- न्ताप गोत्रवाचिनः "तस्येदम्" इत्यर्थे सक्कादावग् स्यात् । अकलोऽपवादः। अत्र. त्रिदानामयं वदः मही३६ .

। ३८४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- घोषाको वा, वेदं लक्षणम् । यञ्. गर्गाणामयं गार्गः सङ्घादिः, गार्ग लक्षणम् । इञ् दाक्षीणामयं दाक्षः सहादिः, दाक्षं लक्षणम् (गोत्रादित्येव-सौतङ्गमीयः सङ्घादि) सङ्घादिष्विति किम् ? बिंदानां गृहम् । अभ्यचिन इति किम् ? औपगवकः सदादिः । लक्षणं लक्ष्यपास्यैव खम्, 'यथा 'शिसादि, अङ्कस्तु स्वामिकृतं गवादिस्थं स्वस्तिकादि चिह्न नतु गवादीनां स्वमेवेति लक्षणाङ्कयो दः । "शाकलादका ५च" ( ६३।१७३) । शाकलशब्दात्सवादाविदमर्थेऽण् अकञ् वा स्यात् । शाकल्येन प्रोक्तं विदन्त्य धीयते वा शाकलास्तेषां सङ्घादिः शाकल: शाकलकः । शाकलं शाकलकं लक्षणम् । “गृहेग्नीधो रण धश्च" (६।३।१७४) । अमी ऋत्विग्विशेषस्तस्मादिदमथें गृहे रण स्यात् , अन्तस्य च तृतीय. वाधनाथ धादेशः । अग्नीध इदमानीभ्रं गृहम् । “रथात्साऽऽदेश्च वोदऽङ्गे" (६।३।१७५) निय- मसूत्रमेतत् । रथात्केवलात्सपूर्वाय पष्ठयन्तादिदमर्थे यः प्रत्ययः स रथस्य वोढरि रथाङ्गे एव च स्यात् । १० रथस्यायं वोढा रथ्योऽश्वः । रथस्येदं रथ्यं चक्रम् , रथ्यं युगम् । सादि. द्वयो रथयोर्वोढा द्विरथः, त्रिरथः, "द्विगोरनपत्ये यस्व०” (६।१।२४ ) इत्यादिना यलुप् । अन्ये तु स्वरादेरेव लुपमिच्छन्ति, सन्मते द्विरथ्यः त्रिरथ्यः । परमरथस्येदं परमरथ्यम् । (उत्तमरथ्यम् । आश्वरथं चक्रम् ) । ब्रोङ्ग एवेति नियमादन्यन्न वाक्यमेव, न प्रत्ययः, रथस्येदं स्थानम् । "य" (६।३।१७६)। रथात्केवलात्सादेश्व इदमर्थे यः स्यात् । अणादेरपवादः । रथस्यायं वोढा रथ्यः । द्वयो रथयोर्वोढा द्विरथः । निरथः। १५रण्यम् , परमरथ्यम्, काष्ठरथ्यं चक्रम् । “पत्रपूर्वादऽ” (६।३।१७७) पत्रं वाहनम् । तत्यू- द्रियादिदमर्थेऽञ् स्यात् । यापवादः । अश्वरथस्येदं आश्वरथं चक्रम् 1 "वाहनात्” (६।३। १७८) । याहनवाचिन इदमर्थेऽञ् स्यात् । अणाद्यपवादः । उष्ट्रस्यायं औष्ट्रः । रासभो हास्तो रथः । "वाह्यपथ्युपकरणे" (६।३।१७९) । नियमसूत्रमिदम् । वाहनाद्योऽयं प्रत्यय उक्तः स बाये पधि उपकरण एव चेदमर्थे स्यान्नान्यत्र । अश्वस्यायमाश्वो रथः । आश्वः पन्थाः । आश्वं पन्ययनम् । २० आश्वी कशा । याह्यपध्युपकरण एवेति नियमादन्यत्र वाक्यमेव, न प्रत्ययः, अश्वानां घासः । “वहे. स्तुरिश्वाऽऽदिः” (६।३।१८०) । वहेः परो यस्तृचस्तृनो वा तृशब्दस्तदन्तादिदमर्थेऽप्रत्ययस्त- शब्दस्य घादिरिकारः स्यात् । संवोदुः सारथेरिदं सीवहिनम् ॥ ६० ॥ तेन प्रोक्ते [सि० ६३।१८१] उपज्ञाते [सि० ६३१९१] कृते ॥ ६१ ॥ [सि०६।३।१९२] तृतीयान्तादेवणादयः स्युः । भाद्रयाहवं शास्त्रम् । विनोपदेशमादी जातं उपजातम् ॥६१॥ "तेन.", उप०, कृते, इति सूत्रयं स्पष्टम् । तृतीयान्तादिवृत्तिश्च कण्ट्या । तत्र प्रकर्षण व्याया बमध्यापितं या प्रोक्तम्, न तु कृतम्, तत्र कृत इत्येव गतत्वाचास्मिन्नधे सृतीयान्तानानो यथाविहित. मणादय एयगादयश्च स्युः । भाद्रवाहवं शास्त्रमिति-एवं भाद्रयाहयानि उत्सराध्ययनानि गणधरप्रत्येक्यु ३० दादिभिः कृतानि तेन व्याख्यातानीत्यर्थः । याज्ञवल्क्येन याज्ञवल्क्यानि ब्राह्मणानि । पाणिनिना पानि १ प्रत्ययस्तूतरेणैव । तक एव योगः कियेताम् ? नैवम् । रथारसादेन यो य इति कृते विधिसून स्यान, ताप यो लस म्यामो रपम्मेदं स्थाननिधि भण् प्राप्येत । नियमे पाक्यमेव । २ आदिशानदारीयश्ययो, ये राममती, ध्ये औष्ट्रपतनिधि प्रयमिति । ३ यदि पूर्वेण सह एक योग फुयातना पाहनव चिनो पशुपकरणे ममेकन्या यथार: मेर सार, पयोगे तु नियमार्यम् । ४ मात्र परे दसरागमे काव्य सामग, नरागमे या मनोस । २५ - ।

- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः। प्रोक्ताधिकारः नीयम् । आपिशलिना आपिझलम् । काशकृत्लिना काशकृत्स्नम् । उझनसा औशनसम् । बृहस्स- तिना वार्हस्पत्यम्। अत्रादिशब्दसन्निधानात् "मौदाऽऽदिभ्यः (६।३।१८२)। एभ्यस्तेन प्रोक्ते यथाविहितं प्रत्ययः, सचापवादैर्वाधितोऽणेव-अपवादस्यैव भावे वचनानर्थक्यात् । मौदेन प्रोक्तं वेदं विदन्यधीयते वा मौदाः "वेदेन्द्राह्मणमव" (६।२।१३०) इति नियमादत्र वेदिबध्येतृविपय एवाण । एवं५ पैष्प्लाढाः, जाजलाः । माथुरेण प्रोता माथुरी वृत्तिः । सोलभानि ब्राह्मणानि । मौदादयः प्रयोगगम्याः ।। "कठाऽऽदिभ्यो वेदे लुप्” (६।३।१८३) स चेत्सोक्तो वेदः स्यात् । कठेन प्रोक्तं वेदं विदन्त्यधी- यते वा कठाः । चरकाः । कर्कराः । वेनुकण्ठाः । गोगडाः । "वेदेन् ब्राह्मणमत्रवे"ति नियमाववित्र- ध्येत्रोरेव विपये प्रत्ययस्य लुप् । वेद इति किम् ? चरकेण प्रोक्ता श्लोकाचारकाः। चरको वैशम्पायनः । कठादयः प्रयोगगम्याः ॥ "तित्तिरिवरतन्तुखण्डिकोखादीयण" (६।३।१८४) । वेदे १० प्रोक्तार्थे । तित्तिरिणा प्रोक्तं वेदं विदन्यधीयते वा तैत्तिरीयाः । वारतन्तवीयाः । खाण्डिकीयाः । औखीयाः । अत्रापि "वेदेन् ब्राह्मणमत्रवे"त्युपतिष्ठते । “छगलिनो णेयिन्” (६।३।१८५) प्रोक्ने वेदे । अणोऽपवादः । छगलिना प्रोक्तं वेदं विदन्ति अधीयते वा छागलेयिनः ॥ "शौनकाऽऽदिभ्यो णिन्” (६।३।१८६)। प्रोक्ते वेदे । अणा पवादः । शौनकेन प्रोक्तं वेदं विदन्त्यधीयते वा शौन- किनः । वेद इत्येव-शौनकीया शिक्षा । शौनक, शारिव, वाजसनेय, झापेय ( काकेय ?), झाफेय, १५ शाप्पेय, शाप्फेय(ल्फेय ?), स्कन्ध, स्कम्भ, देवदर्श, १० रजुभार, रजुतार, रक्षुकण्ठ दामकण्ठ, कठ, शाठ, कुशाठ, कुशाप, कुशायन, आश्वपचम, तलवकार, २१ पुरुपांझ (म ?)क, परुषांश (म ?)क, हरिद्र, तुम्बन, उपल (उपलप ?), आलम्बि, पलिङ्ग, कमल, ऋचाभ, आरुणि, ३० ताण्ड्या, (ताण्ड्य ?) झ्यामायन, खादायन, कपायतल, न्तम्भ, ३६ इति शौनकादयः पञ्चत्रिंशत् (?) आकृति- गणोऽयम्, तेन भाल्लविना प्रोक्तं ब्राझणं विदन्त्यधीयते वा भाविनः । शाट्यायनिनः । ऐतरेविणः २० इत्यादि सिद्धम् । ब्राह्मणमपि वेद एव । “मन्नब्राह्मणं हि वेदः" ।। "पुराणे कल्पे" (६।३।१८७) तृतीयान्तात्प्रोक्तेऽर्थे णिन्प्रत्ययः स्यात् । अणाद्यपवादः । स चेत्रोक्तः पुराणः कल्पः स्यात् । पिङ्गेन. प्रोक्तः कल्पः पुराणः पैङ्गीकल्पः । तृणपिङ्गेन तार्णपिङ्गी कल्पः । अन्णपराजेन आगणपराजी कल्पः । येऽपि पैङ्गिनं कल्पं विदन्त्यधीयते वा तेऽपि पैङ्गिनः, आझणपराजिनः । प्रोक्ताद्धि लुबुक्तंव । पुराण इति किम् ? आश्मरथः कल्पः । आश्मरथ्येन प्रोक्तः कल्प उत्तरकल्पेभ्य आरातीय इति श्रूयते ॥२५ "काश्यपकोशिकाद्वेदवच" (६।३।१८८) । आभ्यां प्रोक्त पुराणे कल्पे गिन स्यान् । ईयाप- वादः । देववशास्मिन् कायं स्यात् । काश्यपेन प्रोक्तं पुराणं कल्पं विदन्यधीयते या काश्यपिनः । कोशिकेन कौशिकिनः । काश्यपिनां धर्म आत्रायः सहो वा काश्यपकः । फॉगिकिनां कोशिककः । घेदवशेत्यतिदेवाटू "वदेन् मामणमत्रवे"ति वेदिबध्येविषयना "चरणादक" (६।३।१६८) इन्यकञ् च भवति । कल्प इत्येव-काश्यपीया मंहिता । पुराण इत्येव-दानीलनेन गोत्रमान ३० प्रोत्तः फल्पः काश्यपीयः । वेदयत्यतिदेशार्थ वचनम (पुराणे की इत्यनेनैव मिदन्यान ) । "शिलालिपाराशर्यान्नटभिक्षुसूत्रे" (६१३११८९) । शिन्टालिन-पागाई लेनाभ्यां प्रोगे, नटसूने मिसूत्रे च गिन् स्वान् । अगञपयादः । (शिलादिनगन्धानेन प्रोग, पागगर्यानु परदाद- यंत्रः) । वेदयपानिन फायं म्यान । नटानामध्ययनं नदमूत्रम । भिक्षणामप्यननं मित्रम। निया लिना प्रोफ नटसूत्रं विदन्त्यधीयते टोलालिनो नटाः । पाराशरंग प्रो. मिडनून पिदन्त्य पदे पा ३५ ६.स. पू. ४९ ? ? %3D - - - छन्दसा इच्छया कृतः छन्दस्यः, न तु प्रवचनेन गायत्र्यादिना वा । नानीत्यधिकारादभिषेयव्यवस्था। ३८६ महामहोपान्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलघु- पाराशरिणो भिक्षवः । शैलालिनां धर्म आम्नायः सङ्घो वा शैलालकम् । पाराशरकम् । अतिदेशाद्वेदिव. ध्येतूविषयता चरणादकञ् च स्यात् ॥ “कृशाश्वकर्मन्दादिन" (६।३।१९०) । नटभिक्षुसूत्रे, अणोऽपवादः । वेदवच्च कार्यम् । कृशाश्वेन प्रोक्त नटसूत्रं विदन्त्यधीयते वा कृशाश्विनो नटाः । कर्मन्देन प्रोक्तं भिक्षुसूत्रं विदन्त्यधीयते वा कर्मन्दिनो भिक्षवः । अतिदेशादकश्य-काश्विकं कार्मन्दकम् । ५ नटसूत्रे कापिलेयशब्दादपीच्छन्त्येके-कापिलेयिनो नटाः । कापिलेयक आम्नायः । - इति प्रोत्साधिकारः ॥*- "उपज्ञाते" (६।३।१९१)। इति । विनोपदेशमित्यादि स्पष्टम्-यथा भद्रयाहुणोपज्ञातं भाद्रया. इवं शास्त्रम् । एवं पाणिनेन पाणिनिना वोपज्ञातं पाणिनीयम् ॥ "कृते" (६।३.१९२) । इति । तृती. यान्तात्कृते उत्पादितेऽर्थे यथाविहितमणादयः स्युः । यथा शिवेन कृतो ग्रन्थः शैवः । वाररुचानि १० वाक्यानि । जलुकेन जलूकया या कृता जालूकाः श्लोकाः । जालुकिना जालुकाः शोकाः-अत्र "वृद्धेऽमः" (६।३।२८) इत्यञ् । सिद्वसेनीयः स्तवः । इष्टकाभिः कृतः प्रासाद ऐष्टकः । नारदेन कृतं नारदीयं गीतम् । मनसा कृता मानसी कन्या । तक्ष्णा कृतः प्रासाद इत्यादावनभिधानान भवति । कृते ग्रन्थ एवेच्छन्त्यन्ये । आदिशब्दसन्निधापिता विशेपास्त्वेवम्-"नाग्नि मक्षिकादिभ्यः" (६।३।१९३) कृतेऽर्थे १५यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । मक्षिकाभिः कृत माक्षिकं मधु । सरपामिः सारघम् । गर्मुद्भिर्गापेतम् । नाम्नीति किम् ? मक्षिकाभिः कृतं शकृत् । वातपैः कृतं वातपमित्यवाणन्तं नाम, नेयान्तमितीयो न स्यात् । मक्षिका, सरघा, गर्मुत्, नर्मुका, पुत्तिका, क्षुद्रा, भ्रमर, वटर, वातप, इति मक्षिकादयः प्रयोगगम्याः ॥ “कुलालाऽऽदेरकम्” (६।३।१९४) कृते नाम्नि । कुलालेन कृतं कोलालकम् । वारुटकम् । नाम्नीत्यभिधेयनियमाथं तेन घटघटीशरावोदश्चनान्ये(ये?)व भाण्डं कौलालकम् , २० न यत्किश्चित्कुलालकृतम् । शूर्पाद्येव (आदिशब्देन पिटकपटलिकापिच्छिकायेव) भाण्डं पारुटकं नान्यत् । एवमन्यत्राप्यभिधेयनियमः । कुलाल, बरुट, कार, निपाद, चण्डाल, सेना, सिल्भ, देवराजन्, देवराज, परिषद्, वधू, रू(भ)द्र, अनडुङ्, ब्रह्मन्, कुम्भकार, अश्वपाक, रुद्र (करु ?) इति कुलालादयः सप्तदश ॥ “सर्वचर्मण ईनेनौ” (६।३।१९५) नाम्नीत्यधिकारादभिधेयनि- यमः । सर्वश्चर्मणा कृतः सर्वचर्मीणः सार्वचर्मीणः-अत्र सर्वशब्दस्य कृतापेक्षस्य धर्मशब्देनायोगेऽपि २५ "नाम नाग्ने०" (३।१।१८) इति समासः ।। "उरसो याऽणी" (६।३।१८६) नानि । उरसा कृतः उरस्यः औरसः ॥ "छन्दस्यः" (६।३।१९७) छन्दस्शब्दात् कृतेऽर्थे यो निपात्यते । नानि । निपातनात् फचिदन्यत्रापि भवति-ओं भावयेति चतुरक्षरम् । अस्तु श्रीपडिति चतुरक्षरम् । येयजा- मह इति पञ्चाक्षरम् । यजेति व्यक्षरम् । व्यक्षरो वपद्कारः । एप सप्तदशाक्षरः छन्दस्यो यज्ञमनु ३० विहितः-अत्र स्वायें यः । यथानुष्टुनादिरक्षरसमूहश्छन्दसधैषां सप्तदशानामक्षराणां समूहः छन्दस उच्यते ॥ "अमोऽधिकृत्य ग्रन्थे" (६३१९८) । द्वितीयान्तादधिकृय प्रन्ये यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । अधिकृत्य प्रस्तुत्य उदिश्येत्यर्थः । तदपेक्षा द्वितीया । सुभद्रामधिकृत्य कृतो प्रन्या सौभद्रः । सुतारा सौतारः । भीमरयमधिकृत्य छताख्यायिका भमरची । कथं यासवदत्तामधित्य ताण्यायिका पासपदत्ता, उर्वशी, सुमनोहरा, पलिवन्धन, सीताहरणमिति ? उपचाराद्वन्ये ताउम्प ३५भविष्यति ॥ "ज्योतिपम्" (६३२१९९) । निपातोऽयम् । ज्योतींप्यधिकृय छतो प्रन्यो ज्योति. - धे .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । कृताधिकाराः ३८७ पम् ।। "शिशुक्रन्दाऽऽदिभ्य ईयः" (६।३।२००) । शिशुक्रन्दमधिकृत्य कृतो अन्धः शिशुक्र- न्दीयः । यमसभीयः । इन्द्रजननीयः। प्रद्युम्नप्रत्यागमनीयः । प्रद्युम्नोदयनीयः। सीताहरणीयः । सीता- न्वेपणीयः । (शिशुक्रन्दादयः) प्रयोगतोऽनुसतव्याः। शिशुक्रन्दशब्दात्केचिन्नेच्छन्ति-ौशुक्रन्दम् । "द्वन्द्वात्प्रायः” (६।२।२०१) द्वन्द्वसमासादमोऽधिकृत्य ग्रन्थे प्राय ईयः स्यात् । अणोऽपवादः । वाक्यपदीयम् । द्रव्यपर्यायीयम् । शब्दार्थसम्बन्धीयम् । श्येनकपोतीयम् । प्राय इति किम् ? दैवासुरम् ।। राक्षोसुरम् , गौणमुख्यम् ॥ ६१ ॥ । इति कृताधिकारः ॥ ६९ "साधुपुष्प्यत्पच्यमाने" ६।३।११७, “उत्ते" ६।३।११८ ॥ ६२ ॥ सप्तम्यन्तात्कालार्थादेष्यणादयः स्युः । शिशिरे साधु शैशिरं तैलम् । वसन्ते पुष्प्यन्ति पच्यन्ते उप्ता वा वासन्त्यो लताः ॥ ६२ ॥ *कृतादयः सप्तदशार्थाः शेषसंज्ञाः। दिमात्रमेतत् । "साधु०" "उप्ते" सप्तम्यन्तादित्यादि-अणादय इति यथाविहितमणादय एयणादयश्च स्युरिति भावः । शैशिरं तैलमिति-एवं हेमन्ते साधु हैमनमनुलेपनं हेमन्तं हैमन्तिकम् । शरदि पच्यन्ते शारदाः शालयः । शैशिरा मुद्गाः । शरद्युप्ताः शारदा यवाः । हेमन्ते हेमनाः । ग्रेप्माः । नैदाघाः ।। अत्रायं विशेषः-"आश्वयुज्या अकञ्” (६।३।११९) । आश्वयुजीशब्दादुमेऽर्थेऽकञ् स्यात् । १५ इकणोऽपवादः । अश्विनीभिश्चन्द्रयुक्ताभिर्युक्ता आश्वयुजी पौर्णमासी । अश्विनीपर्यायोऽश्वयुक्झाब्दः । आश्वयुज्यां कौमुद्यामुप्ता आश्वयुजका मापाः ॥ "ग्रीष्मवसन्ताद्वा” (६।३।१२०) । उप्तेऽर्थेऽकन । ऋत्वणोऽपवादः । श्रेष्मकं ग्रैम वासन्तकं वासन्तं धान्यम् । *कृतादय इत्यादि, दिग्मात्रमेतत् इति-एते सप्तदश त्वर्थाः प्रायः काव्यादिपु बहुप्रयुज्यमानतया प्रसिद्धा इति पृथग्नामग्राहं दर्शिताः । अन्येऽपि शेषार्थाः सन्ति । तथाहि "व्याहरति मृगे” (६।३।१२१) । सप्तम्यन्तात्कालवाचिनो व्याहरत्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् , व्याहरंश्चेन्मृगो भवति । निशायां व्याहरति नैशिकः नैशः शृगालः "निशाप्रदोपात्" (६।३१८३) इति इकण्वा । + इति व्याहरतीलाधिकारः ॥ १॥ "जयिनि च" (६३।१२२) जयः प्रसहनमभ्यासः, सोऽस्यास्तीति जयी । सप्तम्यन्तात्काल-२५ वाचिनो जयिनि वाच्ये यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । निशासहचरितमध्ययनं निझा, तत्र जयी साभ्यासः नंशिकः नेशः । प्रादोपिकः प्रादोपः । वासन्तः । वार्षिकः । केवलकालविययस्य जयस्या- योगानिशादिसहचरिताध्ययनादिवृत्तयो निशादयः शब्दाः प्रत्ययमुत्पादयन्ति । चकारः कालादित्यनु- कर्पणार्थः, तेन चानुकृष्टत्वान्नोत्तरत्रानुवर्त्तते । पति जयीलाधिकारः ॥ २ ॥ "अभिनिष्कामति द्वारे" (६।३।२०२)। द्वितीयान्ताभिनिष्कामत्यभिनिर्गच्छत्यर्थ यथा- विहितं प्रत्ययः स्यात् , तदभिनिष्कामहारं भवति । चुन्नमभिनिष्क्रामवि फन्यफुजद्वारं नानम् माथुरं मादेयं राष्ट्रियम् । फरणभूतस्यापि द्वारस्याभिनिष्क्रमणक्रियायां स्वातश्यविवक्षा, यथा साध्वसिन्छिन- प्तीति । रचनावहिर्भावे या निष्कामिः, यथा गृहको गो निष्कान्नः (रचनाया बहिनिर्गन इत्ययः)। इति अभिनिकामनीवयाधिकारः ॥ ३ ॥ २० , ? महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपंज्ञहैमलघु- "गच्छति पथि दूते" (६।३।२०३) । द्वितीयान्ताहच्छत्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । सुनं गच्छति स्रोतः चेत्पन्था दूतो वा स्यात् । मथुरां गच्छति माथुरः पन्था दूतो वा । एवं नादेय, राष्ट्रियः । पथिस्थेषु गच्छत्सु तद्धेतुः पन्था अपि गच्छतीत्युच्यते, मथुरादिप्राप्तिा पथो गमनम् । पधि-दूत इति किम् ? सुनं गच्छति साधुः । पाटलीपुत्रं गच्छति नौः, पण्य, वणिग् वा । भी इति गच्छतीत्यर्याधिकार ॥ ४ ॥ "भजति" (६।३।१०४) द्वितीयान्ताद्भजत्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययो भवति । सुघ्नं भजति सौनः । माथुरः । नादेयः । राष्ट्रियः ॥ "महाराजादिकण्" (६।३।२०५)। महाराज भजति माहाराजिक; । “अचित्ताददेशकालात्" (६।३।२०६) देशकालवर्जितं यदचित्तमचेतनं ततो भजत्यर्थे इकण् स्यात् । अणादेर्वाधकः । अपूपान् भजति आपूपिकः । शाकुलिकः । मौदकिका । १० पायसिकः । अचित्तादिति किम् ? दैवदत्तः। अदेशकालादिति किम् ? सौनः । हैमनः ॥ “वासुदेवा- ऽर्जुनादकः" (६।३।२०७) । ईयाकोरपवादः । वासुदेवं भजति वासुदेवकः । यदा वासुदेव- शब्दोऽक्षत्रियवचनः सज्ञाशब्दस्तदोत्तरेणाकञ् न प्राप्नोति किन्तु "दोरीया" (६।३।३२) इतीयः स्वादिति तगृह्णम्-अर्जुनं भजति अर्जुनकः, क्षत्रियत्वादुत्तरेणाकञ् स्यादिति अर्जुनग्रहणम् । केनैव सिद्धे अकविधानं वासुदेवी भजति वासुदेवकः, अर्जुनीमर्जुनक इत्येवमर्थम् (कप्रत्यये 'ड्यादीदूतः के इति १५ हस्वत्व स्यात् , अकप्रत्यये तु 'जातिश्च०' (३।२१५१) इति पुंवद्भवति) । "गोत्रक्षत्रियेभ्योऽकम् मायः” ( ६१३३२०८)। अणाद्यपवादः । गोन. ग्लुचुकायनिं भजति ग्लौचुकायनकः । औपगषकः । दाक्षकः । गार्गकः । गाग्र्यायणकः । क्षत्रियम् नाकुलकः । साहदेवकः । दोर्योधनकः । दौःशासनकः । बहुवचनं क्षत्रियविशेपपरिग्रहार्थम् । प्राय इति किम् ? पणिनोऽपत्यं पाणिनस्तं भजति पाणिनीयः । पौरवीयः । “सरूपाद् द्रेः सर्व राष्ट्रवत्" (६।३।२०९) । "राष्ट्रभत्रियात्सरूपाद्राजापत्ये २० दिर" (६३११११४) इति प्रस्तुत्य सरूपाद्यो द्रिःप्रत्यय उक्तस्तदन्तस्य द्वितीयान्तस्य भजत्यर्थे सर्व प्रकृतिः प्रत्ययश्च राष्ट्रवद्भवति । राष्ट्रवाचिनी या प्रकृतिपूजिप्रमुसा ततश्च यः प्रत्ययो "निमद्रादेशात्का" ( ६।३।३८) इत्यादिना विहितस्तदुभय वार्य इत्यादेः सरूपस्य द्रिप्रत्ययान्तस्य भजतीत्यस्मिन्विषये भवतीत्यर्थः । याज्य वाग्यो जीन् या भजति वृजिकः । माद्रं माद्री मद्रान्वा भजति मद्रकः । अन्न का प्रत्ययः ।। पाण्डवं पाण्ड्यो पाण्डून् वा भजति पाण्डवका, आङ्गका, पाकः, पाञ्चालक', २५ औदुम्नरकः, तैलसलका, अन "बहुविषयेभ्यः" ( ६।३।४५) इत्सकम् ॥ कौरवकः कौरवः, न्धरकः यौगन्धरः, अन "युरुयुगन्धराद्वा" (६।३।५३) इति वाकम् ॥ ऐनाकः । अत्र न्त्याचाऽण्” (६३५६) इत्यग् ॥ सरूपादिति किम् ? पोरवीयम्-अन पुरू राजा अनुसण्डो जना पद इति न सारूप्यम् , अत एव पुरुमगधेसादी द्विस्वरत्वेऽष सिद्ध पुरुषहणमसरूपापं कृतम् । रिति किम् ? पश्यालान् प्राह्मणान् भजति पाञ्चाल:-अत्र "यहुविषयेभ्यः" इत्यक न भवति । सर्वमहणं १० प्रत्यऽतिदेशार्थ पच पार्यमाद्रपाण्ड्यकारव्याः प्रयोजयन्ति, अन्यनाऽविशेषात् । पति मजस्तीत्यर्षाधिकार ॥५॥4- "टस्तुल्यदिशि" (६।३।२१०).। सहार्यतृतीयान्तातुल्यदिश्यय यथाविहितं प्रत्ययः २३सान् । मुल्या दिग् यस्य स तुल्यदिग् । मुदामा एकदिन सोदानी विपुत् । यस्यां रिशि गिरिससा तन वृजिक मा पब इति नियम अन्यथा पारम्पक इन्यादी यकारशुतिः म्यार । म वय तस्सियसरी पनि अनपसाब र यय 1 लादेशिया एतरम्, गावता आपन्तक इलाशयस्येव मिशेर । भनपलताबस व सिवे पल्मेपासमार। । देहकः, योग- "कोपा- -

.
१०
प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । तुल्यदिगांद्यधिकाराः
३८९
विद्युदित्यर्थः । त्रिककुदा एकदिन त्रैककुदी लङ्का । "यश्चोरस:" (६।३।२१२) चकारात्तसिः ।
उरसा एकदिक उरस्तः उरस्यः ।
भः इति तुल्यदिगर्याधिकारः ॥ ६॥
"कालाद्देये ऋणे" (६।३।११३) । तत्रेति वर्तते । तत्रेति सप्तन्यन्तात्कालबिशेपवाचिनो
देयेऽर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात्, यद्देयं तहणं चेत्स्यात् । नान्नीति निवृत्तम् । मासे देवमणं मासिकम् ,५
आमासिकम् , सांवत्सरिकम् , मासादिके गते देवमित्यर्थः । ऋण इति किम् ? मासे देया भिक्षा
(स्वातौ देयं स्वस्तिवाचनम् )॥"कलाप्यश्वत्थयवसोमाव्यासैपमसोऽकः" (६।३।११४)।
एभ्यः पञ्चभ्यः कालवाचिभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यो देये ऋणेऽकः स्यात् । ईकणादेरपवादः । यस्मिन्काले
मयूराः केदारा इक्षवः कलापिनो भवन्ति, स कालस्तत्साहचर्याकलापी, तत्र देवमृणं कलापकम् । यस्मि-
कालेऽश्वत्थाः फलन्ति स कालोऽश्वत्थफलसहचरितोऽश्वत्थतन देयमश्वस्थकम् । यस्मिन् काले
भवति तत्र देयं यवचुसकम् । उमा व्यस्यन्ते (विक्षिप्यन्ते) यत्र स काल उमाव्यासस्तन देयं उमाल्या-
सकम् । ऐपमोऽस्मिन् संवत्सरे देयमृणमैपमकम् । “ग्रीष्माऽवरसमादक" (६।३।११५)।
आभ्यां कालबाचिभ्यां सप्तम्यन्ताभ्यां देये ऋणेऽकञ् स्यान् । अणिकणोरपवादः । नकारो वृद्धयर्थः ।
ग्रीप्मे देयं गृष्मकम् । अवरासमा अवरसमा, समाया अवरत्वमित्यवरसमं वा । तत्रावरसमकं अपर-
समादपीच्छन्त्येके-आपरसमकम् ॥ "संवत्सराऽऽग्रहायण्या इकण च” (६।३।११६) ११५
आभ्यां देये ऋणे इकण चकारादकञ् च प्रत्ययो भवतः । अणिकणोरपवादः । संवत्सराद्धि फले,
पर्वणि च ऋणेऽण् प्राप्नोति । संवत्सरे देयमृणं फलं पर्व वा सांवत्सरिकं सांवत्सरकम् । आमहायणिकं
आग्रहायणकम् । वेत्यकृत्वा इकण चेति विधानं "संवत्सरात्फलपर्वणोः" (६।३।९०) इत्यण्वाधनार्थम् ।
इति देवमाणाधिकारः ॥ ७ ॥
"सेनिवासादस्य" (६।३।२१३ ) प्रथमान्तात्पष्टयर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । यत्प्रथ-२०
मान्तं निवासश्चेत्स भवति । निवसन्यस्मिन्निति निवासो देशे उच्यते । त्रुनो निवासोऽसबीनः ।
माथुरः । नादेयः । राष्ट्रियः ।
इति निवासाधिकारः॥ ८ ॥

३९० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयेगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- दीयण" (६।२२१७) । सलातुर आभिजनो निवासोऽस सालातुरीयः पाणिनिः ॥ “तूदीवर्मत्या एयण" (६।३।२१८)। आभ्यामाभिजननिवासार्थाभ्यामस्येत्यर्थे एयण् स्यात् । तूदी वर्मती आभिजनो निवासोऽस्य तौदेयः पार्मतेयः । “गिरेरीयोऽस्त्राऽऽजीवे" (६।३।२१९) । गिरिर्य आभिजनो निवासस्तदभिधायिनः प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थे ईयः स्यात् , अस्त्राजीवीत्यभिधेये । हृदोलः पर्वतः आभिजनो ५निवासोऽस्याऽनाजीयस्य हगोलीयः । भोजकटीयः । रोहितगिरीयः । अन्धश्मीयः । गिरेरिति किम् ? साझाश्यकोऽस्त्राजीवः "प्रस्थपुरे" (६।३।४२) इत्यादिनाकञ् । अस्त्राजीव इति किम् ? ऋक्षोदः पर्वतः आभिजनो नियासोऽस्य आझेदो ब्राह्मणः । पृथुः पर्वतः आभिजनो निवासोऽस्य पार्थवः । इत्याभिजनाधिकारः ॥ ९ ॥ कृतादयः सप्तदश व्याहरत्यादयो नव । एवं सङ्कलिताः सर्वे शेपार्थाः विंशतिः सपद् ॥ १ ॥ १० "नद्यादेरेय" (६।३।२) । शेपे । नद्या कृतादिर्नादेयः । वानेयः । “राष्ट्रादियः" (६२३)। राष्ट्रियः । शेपे इत्यधिकारादनुवर्तनीयम् ।। “दूरादेत्यः" (६४)दिरेत्यः ।। "उत्तरादाह" (६३१५) औचराहः ॥ "पारावारादीन" (६३६) पारावारीणः ॥ "व्यस्तव्यत्यस्तात्" (६७)। अपि । पारीणः । अवारीणः । अवारपारीणः । *अलगामी- त्यर्थेऽप्येवम्-पारमलङ्गामी, पारीण इत्यादि । “धुप्रागपागुदक्मतीचो यः" (६।३१८)। १५दिव्यं प्राच्यमपाच्यमुदीच्यं प्रतीच्यम् ।। "ग्रामादीनच" (६३९)। ग्रामीणः ग्राम्यः ।। "नद्या" । शेपे इति । अधिकारोऽयम् । अपत्यादिभ्यः संस्कृतभक्ष्यपर्यन्तेभ्योऽन्योऽर्थः शेपः । वक्ष्यमाणशेपार्थान्तर्गते "तस्येदम्" (६।३।१६०) इत्यर्थे एयणादयो विधास्यन्ते । तस्येदविशेपाना- पत्यसमूहादयस्ततस्तेष्वपि वक्ष्यमाणा एयणादयो मा भूवनिति शेषाधिकारः क्रियते । किञ्च सर्वेषु प्राग्जितात् कृतादिपु वक्ष्यमाणाः प्रत्ययाः यथा स्युरनन्तरेणैवार्थनिर्देशेन कृतार्थता मा विज्ञायीति साक- २०ल्या शेपवचनम् । नादेय इति-एवं माहेयः यानेयः । वन्य इति तु "साधौ' (५।१११५५) यः। शेष इति किम् ? नदीनां समूहो नादिकम् । नदी, मही, वाराणसी, श्रावस्ती, कौशाम्बी, पनकौशाम्बी, वन. वासी, काराफरी, सादिरी, पूर्वनगर, पूर्वनगरी, पुर, वन, गिरि, (पुर् ?) वनगिरि, पूर्वनगिरि, पाया, माया, माल्वा, दार्ग, सेतकी, सैतवी, इति नद्यादयः पञ्चविंशतिः (१)। इतः प्रभृति प्रकृतिविशेषोपादानमात्रेण प्रत्यया विधास्यन्ते कृतादयोऽर्था विभक्तयश्वोक्ता एवेति । २५"राष्ट्रा०” शेपे इति-प्राग्जितीये शेपेऽर्थे इत्यर्थः । राष्ट्रे कृतः (?) फ्रीतः फुालो जातो भवो या राष्ट्रियः । शेष इत्येव-राष्ट्रस्यापत्यं राष्ट्रिः । “दूरा." । स्पष्टम् । "उत्त०" औत्तराह इति-औत्तरा स्त्री चेत् । औत्तराहीति उत्तराहिशब्दाद् भवेऽर्थेऽणि । "पारा" अवारः समुद्रः तस्य पारं परतटं राजदन्तादित्वात्पारावारः । पारावारे कृतादिः पारावारीणः । "व्यस्त० व्यस्लादिति पारसदान अयारशब्दाय । व्यत्यतादिति पर्यस्तात् अवारपारशब्दादित्यर्थः । *अलगामिनीत्यादि प्रकृतिप्रत्ययाविशे- पान् अशेपार्थेऽपि लाघयायाऽत्र निरूपितः । अत्र सूत्रम्-पारावारं व्यस्तव्यत्यस्तं च" (३३१०१) ३१पारावारसदारसमसाम्यसाव्यत्यस्ताय निर्देशादेय द्वितीयान्तादलगामिन्यर्थे ईनः स्थान् । पारीण इति- भिस सूत्रस्थानोपन्यासकार सम्यान शायते-सम्पारसः। १ एयणाश्यप सम्पमित्र विहिनावापापत्सममा सिनि मन्ति सदिशेस तेथाम् । १ पससमूहादिए भन्योपयुस्याका न केवलमपसारिए एपगाना निलये रपिर. किरते, पापमपुत्रादिषु भसेनि पामर्थपर्यन्त गाना प्राधेसाह-.! भरम.- समितिकार तसाधकीतादिप्य एपमानो प्रश्नमाहिदाय मानिन भविष्पदी राहामा भूरिसर्थः । + - • .. . - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । शेषेऽर्थे ३११ एवं पारावारमलङ्गामी पारावारीणः इत्यादि । “धुप्राग्०” द्योश्च प्राक् च उदक च प्रत्यक् - च; तस्मात् दिवशब्दात् प्रागादिभ्यश्चाव्ययानव्ययेभ्यः शेपेऽर्थे यः स्यात् । प्राचि प्राग् वा भवं प्राच्यम् । एवमपाच्यमुदीच्यं प्रतीच्यम् । दिग्देशवृत्तेः प्रागादेरयं यः, कालवृत्तेस्त्वव्ययात्परत्वात् "सायं०” (६॥ ३१८७) इत्यादिना तनट् । अनव्ययात्तु "वांकालेभ्यः" ( ६।३१८०) इति इकण् । प्राक्तनं प्राचि- कमित्यादि । "ग्रामा०” चकारात् यः । ईनमो नकारः "तद्धितः स्वरवृद्धिहेतु.” ( ३।२।५५) ५ इति पुंवद्भावनिपेधार्थः । ग्रामीणा भार्या यस्य स ग्रामीणाभार्य इति ।। ६२ ।। कड्यादेश्चैयकञ् ॥ ६३ ॥ [ सि० ६॥३३१०] कच्यादिभ्यो ग्रामाचैयकञ् । कात्रेयकः । ग्रामेयकः। “दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यण्” (६।३। १३) दाक्षिणात्यः । पाश्चात्यः। पौरस्त्यः ॥ ६३ ॥ "कत्र्या०"।कत्रि, पुष्कर, पुष्पल, पौदन, उम्पि, उम्भि, औम्भि, कुम्भी, कुण्डिना, नगर, १० महिष्मती, वर्मती, चर्मण्वती इति कत्र्यादयत्रयोदश । नगरशब्दो महिष्मत्यादिसाहचर्यात्संज्ञायामे- यकनमुत्पादयति, अन्यत्राणमेव । अत्रादिशब्दसंसर्गात् "कुण्ड्यादिभ्यो यलुक च" (६।३।११) । एभ्य एयकम् , तत्सन्नि- योगे चैपां यलुक स्यात् । कौण्डेयकः । कोणेयकः । कुण्ड्या, कुण्या, उपण्या, ( उक्ष्या ), भाण्ड्या, ग्रामकुण्ड्या, तृण्या, वन्या, पल्या, पुल्या, मुल्या, इति कुण्ड्यादयो दश । “कुलकुक्षिग्रीवा-१५ च्छाऽस्यलङ्कारे” (६।३।१२) कुल्यादिभ्यस्त्रिभ्यः श्वादिविशिष्टेऽर्थे एयकम् स्यात् । अणोऽप- वादः । कुले शुद्धान्वये भवो जातो वा कॉलेयकः श्वा, कौलोऽन्यः । कौक्षेयकोऽसिः यः कवकुक्षि- निजीर्णेनायसाकृतः, कौक्षोऽन्यः । प्रैवेयकोऽलङ्कारः ग्रेवोऽन्यः । “दक्षिणा” अणोऽपवादः । दाक्षिणात्य इति-दक्षिणा दिक् तस्यां भवो दाक्षिणात्यः; अथवा दक्षिणस्यां वसति "वा दक्षिणात् प्रथ- मासप्तम्या आ” (७।२।११९) इत्याप्रत्यये दक्षिणा, तत्र भवो दाक्षिणात्यः । पश्चात्पुरःशाब्दमाह-२० चर्यादक्षिणा इति दिक्शब्दोऽव्ययं वा गृह्यते, तेनेह न भवति-दक्षिणायां भवानि दाक्षिणानि जुहोति- अत्र दक्षिणाशब्दो गवादिवचनः । अव्ययादेवेच्छन्त्यन्ये । अनव्ययस्य दिग्वाचिनो दक्षिणाशब्दस्य दाक्षिणात्य इत्यत्र पुंवद्भावस्तु "कौण्डिन्याऽगस्त्ययोः कुण्डिनाऽगस्ती च" (६।१।१२७) इति सूत्रनिर्दे- शेन पुंवद्धावस्यानित्यत्वज्ञापनादिति "नृपः पुरस्थावगृहीतवमा( 'पुरस्थैः प्रतिबद्धवा' इति निर्णयसा. गरमुद्रिते ) पश्चात्तनैः कै(क ?)श्चन नुद्यमानः । यत्रस्थसिद्धार्थपदाभिपेकं लब्ध्वाप्यसिद्धार्थममन्यत २५ स्वम्" ॥ १ ॥ ॥ इति नैपधीये दशमसर्गे पद्यं ६ अन पश्चात्तनैरिति प्रयोगः प्रामादिकः । अत्रादिशब्दात् "वहयूदिपर्दिकापिश्याष्टायनण्” (६।३।१४) । वाल्दायनी । औदायनी औायनः । पार्दायनः पार्दायनी । कापिशायनं मधु, कापिझायनी द्राक्षा । वल्हीति ऊप्मोपान्त्यः । केचिदन्न वकार दीर्घान्तं पठन्ति ॥"रङ्कोःप्राणिनि वा” (६।३।१५)। रायायणः, पक्षेऽण् राग्यो गौः । प्राणिनीति किम् ? राकवः कम्बलः । मनुप्ये तु प्राणिन्यपि कच्छादिपाठान् "कच्छाऽऽदे-३० नॅनस्थे" (६।३५५) इति परत्वादकमेव रायको मनुष्यः ।। ६३ ।। केहामात्रतसस्त्यच् ॥ ६४ ॥ [सि०६।३।१६] केहामाभ्यस्ततस्प्रत्ययान्तेभ्यश्च त्यच सात् । कत्या, हत्या, अमात्या, कृयत्यः, यतस्त्यः॥६॥३३ ३९२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "कहा." "साकं सत्रा समं सार्द्धममा सहेति" वचनात् अमा सह भवः अमात्यः । आविदशब्दा- दपि कश्चित् आविष्टयः । चकारस्त्यण्त्यचोः सामान्यग्रहणाविघातार्थः, अन्यथा निरनुबन्धग्रहणे न सानु- बन्धकस्येत्युपस्थाने अस्यैवैकस्य त्यस्य ग्रहणे त्यणश्चाग्रहणे "स्वज्ञाऽजभनाऽधातुत्ययकात्" (२।४।१०८) इति सूत्रेण दाक्षिणायिका इहत्यिकेत्युभयोरपि स्यात् (त्या)त्यचो. स्त्रियामापः स्थाने इत्वविकल्प- ५निषेधान्नित्यमित्वं न स्यादिति । आदिशब्दोपादानात् "नर्धवे" (६।३।१७) । निशब्दात् ध्रुवेऽर्थे त्यच् स्यात् । नित्यं ध्रुवम् । "निसो गते" (६३३१८) निसूशब्दाद्गतेऽर्थे त्यच् स्यात् । निर्गतो वर्णाश्रमाभ्यां निष्ट्यश्चण्डालः । "ऐपमो ह्यः श्वसो वा” (६।३।१९) । त्यच् । ऐपमस्त्यम् पक्षे । "ऐपमो०” एभ्यः कालार्थेभ्यस्तनट् स्यात् । ऐपमस्तनम् । यस्त्वं ह्यस्तनम् । *श्वस्यं १०श्वस्तनम् ॥ ६४ ॥ सायंचिरंपाढेप्रगेऽव्ययात् ॥६५॥ [सि० ६३८८] "सायं." सायं चिरं प्राहे प्रगे इत्येतेभ्योऽव्ययेभ्यश्च कालवाचिभ्यः शेपेऽर्थे सनट् स्यात् । साये भवं सायन्तनम्, चिरे भवं चिरन्तनम् , अत एव निर्देशान्मान्तत्वं निपात्यते । प्राहेतनम्, प्रगे- तनम् , अनयोरेकारान्तत्वम् । अव्यय. दिवातनम् , दोपातनम् , नक्तन्तनम् , पुनस्तनम् , प्रातस्तनम्। १५प्राक्तनम् । कालेभ्य इत्येव-स्वर्भवं सौवम् । सायश्चिरंपाद्देप्रगे इत्यव्ययेभ्योऽव्ययादित्येय सिद्धे साय- चिरपालप्रमशरदेभ्यस्तनविधानं कालेकण्यापनार्थम् । *श्वस्त्यमिति "श्वसस्तादिः" (६१३१८४}। इति तिकणपि (तादिरिकम् ) भवति, तेन त्रैरूप्यम्-श्वस्त्यं श्वस्तनं शौवस्तिकम् । अत्रादिशब्दसंसर्गात् "कन्थाया इकण्" (६।३।२०)। शेपे । कान्थिकः । कन्था प्राम- विशेषः ॥ "वर्णावकम्" (६।३।२१) वणुर्नाम हृदः, तम्य समीपे देशोऽपि वर्गुस्तन या कन्या २० ततः शेपेऽर्थेऽकञ् स्यात् । इकणोऽपवादः । कान्थकः । “रूप्योत्तरपदारण्यात् णः" (६१३१२२) यूकरूपये भवः यार्करूयः पार्करुपया । शैवरक्यम् । आरण्या सुमनस, पशयः । माणिरूप्ये जातो माणिरूप्यक इत्यत्र दुसंज्ञत्वेन परत्वात् "प्रस्थपुर०" (६।३।४३) इत्यादिना न्योपा. न्यलक्षणोऽकोय । अन्तमहणेनैव सिद्ध उत्तरपदग्रहणं बहुप्रत्ययपूर्वनिवृत्त्यर्थम्-बाहुरूप्यो । "दिक- पूर्वादनाम्नः" (६।३।२३) । असंज्ञाविपयादिक्पूर्वाच्छेपेऽर्थे णः स्यात् । अणोऽपवादः । पौर्वशालः २५पौवंशाला । आपरशालः आपरशाला । अनाम्न इति किम् ? पूर्वेपु कामशमी नाम प्रामस्तस्यां भवः पूर्वेपुकामशमः । “मद्रादन" (६३०२४) । मद्रान्तादिक्पूर्वाच्छेपेर्थेऽन् स्यात् । पूर्वेषु मद्रेषु भषः पौर्यमद्रः, पौर्यमद्री । बहुत्ये "बहुविषयेभ्यः” (६।३।४५) इत्यकन् प्राप्तस्तदपवादे "जिमद्रा- देशात्कः” (६॥३॥३८) इति के प्राप्तेऽवचनम् । केवलादेव मद्रादकम्फविधिरिति चेत्तहदिमेप ज्ञापम् "मुसर्टिदिक्शन्देभ्यो जनपदस्पति तदन्तविधेः" तेन सुपाचालको, सर्वपाचालकः, असे ३० पानाला, पूर्वपाशालफा, अपरपाञ्चालकः, सुमागधकः, सर्वमागधकः, मुनिकः, समुद्रक इत्यारि सिद्धम् । "उदग्मामायकल्लोना" (६३२५) । याफटोमः । उदग्नामादिवि विम् अन्यस्मादणेय याटप्लोमनः । गोष्ठीतकीनकेतीगोमतीशूरसेनवाहीकरोमकपटघरात" (६।३।२६) 1 एभ्योऽष्टाभ्योऽ सात् । गौधः कः ताभ्यो बाहीमामलमणयोनियेपणो. १४ स्क्याकोपासलक्षणलेयस पापयादः । गोमत-अमिनीलमणलाकमः । शौरसेना-अत्र राना - ? - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । शेषेऽर्थे करः । वाहीका रौमकः-अत्र ढुलक्षणेयस्य । पाटबरः अत्र रोपान्त्यलक्षणस्याक्रमः । एके तु गोष्ठी स्थाने गोष्टी तैकीस्थाने तैकी नैवीं च पठन्ति ॥ "शकलादेयमः” (६।३।२७)। यअन्तेभ्य एभ्योऽञ् स्यात् । ईयस्यापवादः । गर्गाद्यन्तर्गणः शकलादिः । शकलस्यापत्यं वृद्धं शाकल्यस्तस्य छात्राः शाकलाः । एवं काण्वाः, गौकक्षाः, वामरथाः । यत्र इति किम् ? शकलो देवताऽस्य शाकलस्तस्येदं शाकलीयम् । कण्वादागतः काण्वस्तस्य छात्रा काण्वीयाः । “वृद्धेऽञः” (६।३।२८) । वृद्धे य५ इञ्चिहितस्तदन्तादञ् स्यात् । ईग्रस्यापवादः । दक्षय वृद्धापत्यं दाक्षिः, तस्य छात्राः दाक्षाः । वृद्धति क्रिम् ? सुतङ्गमेन निर्वृत्ता सौतङ्गमी नगरी, तस्यां भवः सौतङ्गमीयः । शालथेरपत्यं युवा शालङ्किः "यभिमः” (६।१।५४) इत्यायनणः पैलादिपाठाल्लुप् , तस्य छात्राः शालङ्का इत्यत्र आयनणि लुप्ते यद्यपीयन्तं यूनि वर्त्तते तथापि इन वृद्धे इत्यत्रेव भवति । "न द्विखरात्प्राग्भरतात्" (६।३।२९) । प्राच्यगोत्रवाचिनो भरतगोत्रवाचिनश्च नानो वृद्धेचन्ताहिस्वराद न स्यात् । पूर्वेण १० प्राप्त प्रतिषेधः । प्राचः चैतीयाः । पौष्पीयाः । चिङ्कपुष्पशब्दावावन्तावपि तत्र वाहादित्वादि । भर- तात्. काशकाशीयाः वाशवाशीयाः। द्विस्वरादिति किम् ? पानागारे छात्राः पानागाराः। मान्थरपेणाः । प्राग्भरतादिति किम् ? दाक्षाः, प्लाझाः । प्राग्ग्रहणे भरतग्रहणं न स्यादिति स्वशब्देन ग्रहणम् । "भवतोरिकणीयसौ” (६।३।३०)। किचिदिकस्सेतो लुक्-भावत्कम् । भवदीयम् । "परजनराज्ञोऽकीयः” (६।३।३१) परकीयः । राजकीयः । “दोरीयः” (६।३।३२) १५ देवदत्तीयः । तदीयः पाणिनीयम् । *ईयेऽन्यादोन्तः अन्यदीयम् । इकण् ईयस् एतौ प्रत्ययौ ईयापवादौ । ईयसः सकारो "नाम सिदय्व्यञ्जने" (१११।२१) इति पदत्वार्थः । भवतो ऋकारान्तस्य ग्रहणाच्छन्तान्न भवति । भवत इदं भाव-.. कम् । किचिदित्यादि अत्र सूत्रम् "ऋवर्णोवर्णदोसिसुसशश्वदकस्मात्त इकस्येतो लुक्" (७४७१) ऋवर्णान्तादुवर्णान्तादोस्शब्दादिसन्तादुसन्तात् शश्वदकस्मार्जात्तकारान्ताच परस्य इक-२० प्रत्ययसम्वन्धिन इकारस्य लुक् स्यात् । यथा मातुरागतं मातृकं, पैतृकं "ऋत इकण्” (६।३।१५२)। निपादकष्वा भवः नैपादकऍकः, शावरजम्बुकः "उवर्णादिकण्” (६।३१३९) । दोर्ध्या तरति दौष्कः । इस. सर्पिः पण्यमस्य साप्पिष्कः, बार्हिष्कः । उस्. धनुः प्रहरणमस्त्र धानुष्का, बाजुम्कः । उदश्विता संस्कृत ओदन औदश्वित्कः । शकृता संसृष्टः शाकृत्कः । शश्वदकस्मात्प्रतिपेधात् शश्वद्भवं झाश्चतिकं "वर्षाकालेभ्यः" (६।३।८०) इतीकण् । आकस्मिकं अध्यात्मा (६।३१८७) दित्वादिकण । प्रत्यययोरि-२५ सुसोर्ग्रहणादिह न भवति-आशिपा चरति आशिपिकः । वसेः किए उम् , उपा चरति ऑपिकः । मथितं पण्यमस्य माथितिकः इत्यत्रापि तान्तत्वस्य लाक्षणिकत्वान्न भवति । भावत्कमिति-भवतो भवत्या वा इदं भावत्वं भावत्की भवदीया । "परजन०” एभ्यः शेपेऽर्थे अकीयः स्यात् । अकारः पुंवद्भावार्थः । राज्ञ इदं राजकीयः, "जातिश्च णि तद्धितयखरे" (३।२१५१) इति पुंबद्भावः- परकीयः । जानकीयः । स्वकीयं देवकीयमिति तु स्वकदेवकयोर्गहादित्यासिद्धम् । ये तु स्वदेवशब्दा- भ्यामकीयमिच्छन्ति तेपां स्वस्येदं सौवम् , देवमायुः, देवी वागित्यादि न सिद्धयति । "दोरी०"३१ १ वाहीकशब्दस्य पुरुपवाचिनो 'दोरीयः' इत्यस्य देशवाचिनतु कसोपान्त्यस्यापवादः तदुमयमपि दुननणस्येत्यनेन बिष्ट- निर्देशेन सहीतम् । यत उभाभ्यामपि दुसंज्ञायां विधानात् । रोमकन्य तु 'कसोपान्त्य' इलस्यय । यतन्तस्य पुरुषवाचिनो दुसंज्ञा न प्राप्नोति । देशवाचिनतु 'प्रान्देशे०' इति दुसंज्ञा । २ 'वृद्धानि' इत्यत्र यूनोऽपि वृद्धसंजाकार्यदर्शनादन दन्नम्य वृद्धेऽपि वर्तनमिलाश्रयणे औपगवस्यापत्वं युवा आपगवित्तस्य छात्रा श्रीपगीयाः । एवं पाणिनीमा इत्यादावपि स्यात् । मतो मुख्यत्सादृद्धे एवेति व्याख्येयम् । है. प्रका. पूर्वा०५० "भवतो" , - ३९४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- अणऽपवादः । देवदत्तीय इति "संज्ञा दुर्वा" (६११६) इति दुसंज्ञा, तदीय इति "त्यदादिः" (६) १७) इति दुसंज्ञा, पाणिनीयमिति "वृद्धिर्यस्य स्वरेष्वादिः" (६।१८) इति दुसंज्ञा । एवं एणीप- चनीयः, गोनर्दीयः, भोजकटीयः "प्राग्देशे" (६।१।१०) इति दुसंज्ञा । कथं श्रीमदीयमिति । प्रमाद एवायं दुसंज्ञाभावात् । *ईयेत्यादि-"ईयकारके" ( ३।२।१२१) इति सूत्रेण दोऽन्तः । अत्रादिशब्दसान्निध्यात् "उष्णादिभ्यः कालात्” (६३३३३३) । उष्णकालीयः, बहुवचनं प्रयो- गानुसरणार्थम् । "व्यादिभ्यो णिकेकणौ” (६।३।३४)। व्यादिभ्यः परो यः कालशब्दस्तदन्तादेतो स्याताम् । उभयोः स्त्रियां विशेपः-वैकालिकः, वैकालिका, वैकालिकी । आनुकालिकः, आनुकालिका आनुकालिकी । ऐदकालिकः ३ । धौमकालिकः ३ । आपत्कालिकः ३ । साम्पत्कालिकः ३ । कोप- कालिकः ३ । क्रोधकालिकः ३ । और्ध्वकालिकः ३ । पौर्वकालिकः ३ । तात्कालिकः ३ । क्रौरका. १०लिकः ३ । व्यादयः प्रयोगगम्याः ॥ "काश्यादेः" (६१३१३५)। शिकेकणौ । दोरिति वर्तते । काशिकः, काशिका, काशिकी । चैदिकः३ । दोरित्येव-देवदत्तं नाम वाहीकग्रामस्तत्र जातो देवदत्ता देवदत्तशब्दस्य प्राग्देशे एव दुसंज्ञा, न वाहीकेष्विति न भवति; नाप्युत्तरेण तत्रापि दोरित्यनुवर्तनात् । प्रागपामेपु तु काश्यादित्वाद्भवत्येव-दैवदत्तिका देवदत्तिकी । येपां तु काश्यादीनां दुसंज्ञा न भवति तेपां पाठसामाद्भवति । चेदीशब्दसाहचर्याच काशिशब्दो जनपद एव वर्तमान इमौ प्रत्ययावुत्पाद- १५यति नान्यत्र-काशीयाः छात्राः । काशि, चेदि, देवदत्त, सांयाति, सांवाह, अच्युत, मोदमान, श्वकुलाल १० शफुलाद, हस्तिर्पूको, नाम, हिरण्य, करण, हैहिरण्य, करणे, सिन्धुमित्र, सधमित्र, अरिन्दम, दाशमित्र, दासमिन २० छागमित्र, दासप्राम, शीवावतान, गोवाशन, गौवासन, तारगि, भारगि, युवराज, उपराज, देवराज, ३० इति काश्यादयस्त्रिंशत् ॥ "वाहीकेपु ग्रामात्" (६।३६३६) । णिकेकणो । कारन्तपिका, कारन्तपिका कारन्तपिकी । शाकलिकः ३ । मान्यविकः ३ । २० आरात्कः ३ । सैपुरकः ३ । स्कोनगरिक: "एदोद्देश एपेयादो" (६।११९) इति दुसंज्ञा । नापित- पास्तुफ इत्यत्र "उवर्णादिकण्" इतीकण् । वातानुप्रस्थकः, नान्दीपुरकः, कौकुटीवहकः, दासरूप्यका इत्येषु "प्रस्थपुरवहान्तयोपान्यधन्वार्थात्" (६।३।४३) इति परत्वादकन् । सोसुकीय इत्यत्र कोपा- न्सलभण ईयोऽपवादाय भवति (कथं मांझीयम् ? माझं नाम वाहीकावधिरन्यदीयो प्रामो न याहीक- माम इत्येके, अन्ये तु दश द्वादश वा प्रामा विशिष्टसन्निवेशावस्थाना मौनं नामेति प्रामसमूह एवायं न २५प्रामः, नापि राष्ट्रम् ; येन राष्ट्रलक्षणोऽकञ् स्यात् इति मन्यन्ते । दोरियेव-देवदत्तं नाम वाहीकमामः वन जातो देवदत्तः) । "योशीनरेपु" (६।३।३७) उशीनरेपु जनपदेषु यो प्रामसद्वाचिनो दुसंझरा- च्छेपेऽर्थे गिफेकणी या स्याताम् । आहजालिका, आहजालिका आहजालिकी । सौदर्शनिकः ३ । पो आजालीयः, सौदर्शनीयः ॥ "जिमद्राद्देशात्कः" (६।३।३८) देशयाचिभ्यामाभ्यां शेषेऽर्थे कः सात् । राष्ट्राफमोऽपवादः। दोरिति निवृत्तम् । निकः मद्रकः (सुसद्धिदिक्शन्देभ्यो जनपदयाचिनः प्रत्ययो भपति तय मद्रात् दिकपूर्वपदात् 'मद्राद' (६।३।२४) इत्यम् विहितः शेषपूर्वपदारपर्य भपति ) मुमद्रकः सर्पमद्रकः अर्द्धमद्रकः मुनिकः सर्वपृनिक: अजिकः पूर्वनिकः अपरनिरः । देशारिति किम् ? मनुष्यवृत्र्याजः, माद्रः ॥ "उवर्णादिक" (६।३।३९) । उपर्णान्तादेस- पापिन इफम् स्यात् । अणोऽपयादः । परत्यादीयनिफेफणोऽपि पाधते । शयरजम्यां भपः परः रजम्मुकः । नेपाल पुंफः । दाक्षिपपुंफ: । शाक्षिफपुकः । नापिकयासुदीपभामसप्त भयो नारितपा: सुकः । परशु प्राग्पामसमानुपरेण भपति-आप(ग्री ?)वमायो भयः आप(मी १)वमायका । ३६नि बेहपफ, इति परत्यायोपान्त्यलक्षणो राष्ट्ररक्षणमाफम् । ऐश्त्याक इत्यत्र न फोपान्सला- -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः। शेपेऽर्थे ३९५ णोऽण् । उवर्णादिति क्रिम् ? देवदत्तः । देशादित्येव-पटोश्छात्राः पाटवाः ॥ "दोरेव प्राच" (६।३।४०) शरावत्याः प्राच्यां दिशि प्राग्देशः । तद्वाचिन उवर्णान्ताद्दुसंज्ञकादेव इक्रग् स्यात् । आपाढजम्नां भवः आपाढजम्बुकः । नापितवास्तुकः । पूर्वेण सिद्धे नियमार्थमिदं तेनेह न भवति- मल्लवास्तु प्रागग्रामः माल्लवास्तवः । एवकार इष्टावधारणार्थः-दोः प्राच एवेति नियमो मा भूत् ॥ "ईतोऽकम्” (६श४१) ईकारान्तात् प्राग्देशवाचिनो दुसंज्ञकादकम् स्यात् । ईयापवादः १५ काकन्यां भवः काकन्दकः । प्राच इति किम् ? दात्तामित्र्यां भवः दात्तामै( मि ? )त्रीयः ।। "रोपान्त्यात्” (६।३।४२) प्राग्देशवाचिनो दुसंज्ञकाद्रेफोपान्त्यादकञ् स्यात् । ईयापवादः । पाट- लिपुत्रकः । ऐकचक्रकः ॥ "प्रस्थपुरवहान्तयोपान्त्यधन्वार्थात्” (६१३१४३)। दोर्देशादिति च वर्तते । एभ्योऽकञ् स्यात् । धन्वन्शब्दो मरुदेशवाची । प्रस्थान्त. मालाप्रस्थकः, झोणप्रस्थकः, काञ्चीप्रस्थकः, वातानुप्रस्थकः, वाणप्रस्थकः । पुरान्त. नान्दीपुरकः । कान्तीपुरकः (वातीपुरकः ? ) १० वहान्त. पैलुवहकः, फाल्गुनीवहकः, कौकुटीवहकः, कौकुचीवहकः । योपान्त्य. साङ्काश्यः, काम्पी- ल्यकः, माणिरूप्यकः, दासरूप्यकः, आत्रीतमायवकः । धन्ववाची. पारधन्वा, आपारधन्वा, 'नान्नि' (३।१।९४) इति सः "अब्यञ्जनात्" (३।२।१८) इति सप्तम्यलुप् । पारधन्वनि भवः पारेधन्वकः। आ ईपत्पारं आपारं "आङल्पे” (३।११४६) इति सः । आपारेधन्वेति पूर्ववत् । आपारेधन्वकः । ऐरावतकः । सुप्रचष्टे डे सुप्रख्येन निवृत्त इत्यणि सौप्रख्ये भवः सौप्रख्यीयः इति तु गहादित्वात् । १५ एवं कामप्रस्थीयः । पुरग्रहणमप्राच्यार्थम् । प्राच्याद्धि रोपान्त्यत्वेनैव सिद्धम् , अत एवेह प्राच इति नानुवर्तते । ईयबाधनार्थं वचनम् ॥ "राष्ट्रेभ्यः” (६।३।४४) । देशेभ्यो दुसंज्ञकेभ्योऽकञ् स्यात् । ईयापवादः-अभिसारे भवः अभिसारकः । आदर्श भवः आदर्शकः । औपुष्टश्यामायने राष्ट्रावधी अपि राष्ट्रे । औपुष्टे औपुष्टकः श्यामायनकः । वहुवचनमकनः प्रकृतिबहुत्वं द्योतयदपवादविपयेऽपि प्रापणा- र्थम् , तेनेहापि भवति-आभिसागरगर्त्तकः; अत्र गर्नोत्तरपदलक्षण ईयो न भवति । राष्ट्रसमुदायो न २० राष्ट्रप्रणेन गृह्यत इतीह न भवति-काशिकौशलीयः ॥ "बहुविपयेभ्यः” (६।३।४५) दोरिति निवृत्तम् (योगविभागात्) । अतः परं दोरदोश्च विधानम् । देशादिति तु वर्त्तते । राष्ट्रेभ्यो देशेभ्यो वहुत्व- विपयेभ्योऽकञ् स्यात् । अणाद्यपवादः । अङ्गेपु जातः आङ्गकः । वाङ्गकः । दार्वकः । काम्बकः । जिलुपु जैह्रवकः । आजमीढकः । आजकुन्दकः । कालजरकः । वैकुलिकः । विपयग्रहणमनन्यत्र भावार्थम् , एतेन य एकत्वद्वित्वयोरपि वर्त्तते ततो मा भूत् । वर्तनी च वर्तनी च वर्तनी च वर्त्तन्यः; तासु २५ भवो वार्त्तनः । बहुवचनमपवादविषयेऽपि प्रापणार्थम्-त्रिगर्तेपु त्रैगर्चकः ( अत्र गर्नोत्तरपदलक्षण ईयो वाध्यते) ॥ "धूमादेः” (६।३।४६)। एभ्यो देशवाचिभ्योऽकञ् स्यात् । अणाद्यपवादः । धौमकः । धूम, पढण्ड, पडाण्ड, अवतण्ड, तण्डक, वतण्डव, शशादन, अर्जुन, आर्जुनाव, दाण्डायन, स्थली १० (दाण्डायनस्थली) मानकस्थली, आनकस्थली, माहकस्थली, मद्रकस्थली, मापकस्थली, घोपकस्थली, राजस्थली, अदृस्थली, मानस्थली, माणवकस्थली, राजगृह, सत्रासाह, सानासाह, भक्ष्यादी, भक्ष्यली, ३० भक्ष्याली, भद्राली, मद्रकुल, अंजीकुल, ब्याहाव, ३० व्याहाव, द्वियाहाव विवाहाव, संस्कीय, धर्वड, गर्त्य(त?) वर्च, शकुन्ति, विनाड, इमकान्त, ४० विदेह, आनर्त्त, वादूर, खाद्दर, माठर, पाठेय, पाथेय, घोप, घोपमित्र, शिष्य, ५० वणिय, पल्ली, अराज्ञी, आराज्ञी, धाराही, धार्तराष्ट्री, धार्तराष्ट्र, अवया, तीर्थकुक्षि, समुद्रकुक्षि, द्वीप, अन्तरीप, ६० अरुण, उज्जयनी, दक्षिणापथ, साकेत, ६४ इति धूमादयः चतुःषष्टिः । दाण्डायनस्थलीत्यादीनां दुसंज्ञकानामीकारान्तानां वा दूरग्याङ्करमाट- राणां च पाठोऽप्राच्यार्यः । प्राच्यानां त्वीद्रोपान्यलक्षणोऽकञ् सिद्ध एव । विदेहानयो राष्ट्रेऽक ३६ - .

, महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपशहैमलघु- सिद्ध एव । सामर्थ्यादेशार्थः पाठः । विदेहानामानानां च क्षत्रियाणामिदं पैदेहकम् । आनर्तकम् । पाठेयपाथेययोयोपान्त्यत्वादकञ् सिद्धोऽदेशार्थः पाठः। पठेः पठाया वाऽपत्य पाठेयः तस्येदं पाठेयकम् ।। "सौवीरेषु कूलात्" (६१३।४७) अकञ् । सौवीरदेशवाचिनः कुलशब्दादकम् स्यात् । कौलक: सौवीरेषु, कोलोऽन्यत्र ॥ "समुद्रान्नुनावोः" (६।३।४८) अकञ् । सामुद्रको मनुष्यः । सामुद्रिका ५ नौः । नृनावोरिति किम् ? सामुद्र लवणम् ॥ “अरण्यात्पथिन्यायाऽध्यायेभनरविहारे" (६।३१५१) आरण्यकः पन्थाः, न्यायोऽध्याय इभो नरो विहारो वा । पथ्यादाविति किम् । आरण्याः सुमनसः । “गोमये वा” (६३१५२) आरण्यका गोमयाः, आरण्यानि गोमयानि । केचित्तु हस्तिन्यामपि विकल्पमिच्छन्ति-आरण्यिका आरण्या हस्तिनी । एके तु नरवर्ज पूर्वसूत्रे विक- ल्पमाहुः-आरण्यः आरण्यकः पन्थाः इत्यादि । “कुरुयुगन्धराद्वा” (६।३।५३) । आभ्या देश- १०वाचिभ्यामकञ् स्यात् । कुरुपु भवः कौरवकः कौरवः, युगन्धरेषु यौगन्धरकः यौगन्धरः । राष्ट्रश- ब्दावेतौ वहुविषयौ च, तर युगन्धरात् "बहुविषयेभ्यः" इति नित्यमकनि प्राप्ते विकल्पः, कुरोस्त्व- कञः कच्छाद्यणा बाधितस्य प्रतिप्रसवार्थ वचनम् । तथा च विकल्पः सिद्ध एव, युगन्धरार्था तु विभापा । नृनृस्थयोस्तु कुरोः परत्वादकत्रेव-कौरवको मनुष्यः, कौरवकमस्य हसितम् ॥ "साल्वा. गोयवाग्वपत्ती" (६।३।५४) । साल्वाद्देशवाचिनो गवि यवाग्वा पत्तिवर्जिते मनुष्ये च शेपेऽर्थेऽ- १५ कञ् स्यात् । साल्वको गौः । साल्विका यवागूः । साल्वको मनुष्यः । गोयवाग्वपत्ताविति किम् ? साल्वा ब्रीहयः, साल्वः पत्तिः । राष्ट्रेभ्योऽकभि कच्छायणा बाधिते गोयवागूाहणं प्रतिप्रसवार्थम् , अपत्तीति पत्तिप्रतिषेधात्तत्सदृशे मनुष्ये विधिः, तत्र चोत्तरेण सिद्ध एवाकभि नरि नियमार्थमपत्ति- ग्रहणम् । एवं च गोयवाग्वोः पत्तिवर्जिते च मनुष्ये मनुष्यस्थे च हसितादौ साल्वकः, अन्यन साल्व इति स्थितम् । अयं च विभागः सैल्वशब्दस्यादोरपि ज्ञेयः ॥ "कच्छाऽऽदेस्थे" (६।३।५५) २० फच्छादिभ्यो देशवाचिभ्यो नरि मनुष्ये नृस्थे च शेषेऽर्थेऽकञ् स्यात् । अणोऽपवादः ( कोपान्त्याच इति सामान्येन प्राप्तस्य ) । काच्छको मनुष्यः । काच्छकमस्य हसितं स्मित जल्पितमीक्षितम् । काच्छिका चूला । सैन्धवको मनुष्यः, सैन्धवकमस्य हसितम्, सैन्धविका चूला । नृनृस्थ इति किम् ? काच्छो गौः, सैन्धवं लवणम् , कच्छ, सिन्धु, वर्ण, मधुमत् , कम्बोज, साल्व, कुरु, अनुपण्ड, अनूपण्ड कश्मीर, १० विजापक, द्वीप, अनूप, अजवाह, कुलूत, रङ्कु, गन्धार, साल्वेय, यौधेय, सस्थाल, २० सिन्ध्वन्त, २१ २५इति कच्छादय एकविंशतिः । कच्छादयो ये बहुविपया राष्ट्रशब्दास्तेभ्यो "बहुविपयेभ्य" (६।३।४५) इत्यक सिद्ध एव, उत्तरेण त्वणा वाधो मा भूदिति पुनर्विधीयते । वर्णसिन्धुभ्याम् "उवर्णादिकण्" १६॥३॥३९) इतीकणि तदपवादे कच्छाद्यगि, कुरोः "कुरुयुगन्धराद्वा" (६।३।५३ ) इति विकल्पे, विजापकस्य कोपान्यलक्षणेऽणि प्राप्तेऽविधिः । अपरे कच्छमपि बहुविषयं राष्ट्रशब्दमाहुस्तदा पूर्वोक्त- मैव पाठफलम् ॥ "कोपान्त्याचाऽण्" (६:३१५६) देशादित्येव वर्तते, न ननस्थ इति 1 कोपान्त्या- त्कच्छादेश्य देशवाचिनः शेपेऽर्थेऽण् स्यात् । इकणकमोरपवादः । कोपान्त्य. ऋपिका जनपदः तेषु जात ३१आर्पिकः । महिपकेपु माहिपकः । अश्मवेषु आश्मकः । इक्ष्याकुपु ऐक्ष्वाकः । कच्छादि. काग्छ, नरि साल्वशब्दात् ययम् भवति, तदा अपत्तावेव न पत्तौ । २ ननु गोयवाग्वपत्तावित्युच्यमाने मनुष्यस्थ कथं न सभ्यते, नहि मनुष्यस्थ प्रहासादिौर्यवागूरपत्तिर्वा भवति, न च पत्तैरन्यमात्रमपत्ति , भपि तु मनुष्योऽन्यथा साल्ला मोहय इत्यत्राप्यकम् प्राप्नोति, तथा च गोयवागूप्रहणमनर्थक स्यात्तत्राप्यपत्ताविसैव सिद्ध । उच्यते । अपत्तिमदणं 'कम देनस्थै' इसकमि सिद्ध अपात्त्यर्थं क्रियते न तु विध्यर्थम्, तेन या अपत्तो मनुष्ये भवति तपा मनुष्यस्थेऽपि, तित प्रत्ययसन्यावर्तितत्वात् । ३ उपलक्षणखादेकदेशविकृतस्यानन्यताद्वारा उवर्णादिकण्' 'बहुविषयेभ्य' इत्नयोः । 1 -- , , प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः। शेषेऽर्थे ३९७ - सैन्धवः, वार्णवः । अथांणग्रहणं किमर्थम् ? योह्यन्येन बाधितो न प्राप्नोति तदर्थमिदं स्यात् स चाणेच, = नचानन्तरोऽकमेव स्यादित्याशङ्कनीयम् , एवं हि पूर्वक्रमकम्विधानमऽनर्थकं स्यात् । नैवम् । असत्यण्- - ग्रहणे इक्ष्वाकोरुवर्णलक्षण इकण् स्यात् , स हि ततो राष्ट्राकञा वाधितः ॥ "गौत्तरपदादीयः” - (६।३।५७) अणोऽपवादः । श्वाविद्गत्तुि वाहीकग्रामलक्षणो णिकेकणौ परत्वाद्वाधते । श्वाविद्गत भवः श्वाविद्गीयः । वृकगीयः, गालगीयः, रोहिद्गीयः । आभिसारगर्तकः त्रैगर्तक इत्यत्राकञ्५ "राष्ट्रेभ्यः” (६।३।४४) "बहुविपयेभ्यः" इति बहुवचनसामर्थ्याद्भवतीत्युक्तम् । उत्तरपदग्रहणं बहुप्रत्ययपूर्वनिरासार्थम् बाहुगतः । “कटपूर्वात्प्राचः” (६।३।५८) प्राच इति प्रान्देशवाचिन ईयः स्यात् । अणोऽपवादः । कटनगरीयः, कटग्रामीयः, कटघोपीयः, कटवर्तकीयः, कटपल्वलीयः । प्राच इति किम् ? काटनगरः । “कखोपान्त्यकन्थापलदनगरग्रामहृदोत्तरपदाहोः” (६॥ ३२५९) । ककारखकारोपान्त्यात् कन्थायुत्तरपदाच देशवाचिनो दुसंज्ञकादीयः स्यात् । बाधक वाध-१० नार्थ आरम्भः । कोपान्त्यात्कोपान्यलक्षणे णिप्राप्ते आरीहणकीयः, द्रौघणकीयः, आश्वस्थिकीयः, शाल्मलिकीयः, सौपुकीयः, आष्टकीयः ब्राह्मणकीयः वालकीयः । खोपान्यात्. वाहीकग्रामलक्षणयो- णिकेकणोः, कौटशिखीयः, (माहिशिखीयः, ) अयोमुखीयः । कन्थापलदोत्तरपदान्तयोरेव, दाक्षिक- न्थीयः, माहकिकन्थीयः, दाक्षिपलदीयः, माहकिपलदीयः । नगरोत्तरपदाद्रोपान्यलक्षणेऽकनि. दाक्षि- नगरीयः माहकिनगरीयः । ग्रामह्रदोत्तरपदात् णिकेकणोरेव, दाक्षिग्रामीयः, माहकिग्रामीयः, दाक्षिह्र-१५ दीयः, माहकिह्रदीयः । दोरिति किम् ? आर्पिकः माडनगरः ॥ "पर्वतात्” ( ६।३।६० ) ईयः । अणोऽपवादः । पर्वतीयो राजा, पुमान् ॥ "अनरे वा” (६।३१६१) । पर्वतीयानि पार्वतानि फलानि । अनर इति किम् ? पर्वतीयो मनुष्यः । “पर्णकृकणाद्भारद्वाजात्" (६।३।६२) । भारद्वाजदेशवाचिभ्यामाभ्यामीयः स्यात् । अणोऽपवादः । पर्णीयः, कृकणीयः । भारद्वाजादिति किम् ? पाणः कार्कणः ॥ "गहादिभ्यः” (६।३।६३ ) । देशादिति वर्त्तते, तद्गहादीनां यथासम्भवं विशेप-२० णम् । यथासम्भवं देशवाचिभ्यो गहादिभ्य ईयः स्यात् । गहीयः, अन्तःस्थीयः । गह, अन्तःस्थ, अन्तःस्था, सम, विपम, उत्तम, अङ्ग, मगध, शुक्लपद, पूर्वपक्ष, १० अपरपक्ष, कृष्णशकुन, अधमशाख, उत्तमशाख, समानशाख, एकशाख, समानग्राम, एकग्राम, एकवृक्ष, एकपलाश, २० इयग्र, दन्तान, इण्वनीक, अवस्यन्द, कामप्रस्थ, सौप्रख्य, खाडायनि, काठेरणि काठेरिणि, लावेरणि, लावेरिणि, लावीरणि, शैशिरि, शौङ्गि, शौङ्गिशैशिरि, आसुरि, आहिंसि, आमित्रि व्याडि, ४० भौङ्गि, भौर्जि, २५ (भौजि?), आध्यश्वि, आश्वस्थि, औद्राहमानि, औपविन्दवि, आग्निशमि, (देवशामि,) श्रीति, वाटारकि, वाल्मीकि, ५० क्षेमधृस्त्रि, उत्तर, अन्तर, मुखतस्, पार्वतस् , एकतस्, अनन्तर, आनृशंसि, सादि, सौमित्रि, ६० परपक्ष, स्वक, देवक इति गहादयत्रिपष्टिः । बहुवचनमाकृतिगणा- र्थम् ॥ "पृथिवीमध्यान्मध्यमश्चास्य” (६।३।६४) । पृथिवीमध्यशब्दाहेशवाचिन ईयः स्यान् , मध्यमादेशश्चास्य । पृथिवीमध्ये जातो भवो वा मध्यमीयः ॥ "निवासाचरणेऽ" (६।२६५)३० पृथिवीमध्यानिवासभूतदेशवाचिनश्चरणे निवस्तरि शेपेऽर्थेऽण् स्यात् ; मध्यमादेशश्चास्य । पृथिवीमध्यं निवास एपां चरणानां माध्यमाञ्चरणः । त्रयः प्राच्यालय उदीच्यालयो माध्यमाः । निवालादिति ३२ - १ 'प्राग्जितात्' इति प्राप्तोऽन्येनाकमादिना बाधिन इत्यर्थः । २ यदि हि तन्ने अन्यत्र वागंना स्यात् नहा कि पूर्व- सूत्रेण । अनेनैव कच्चादिकोपान्त्याग इलेवं रूपेण नितान् । ३ यन सागरिकाप्यनेनाकना बाध्यमानो नियने एन, ततय मोऽप्यनेन स्यादिति । ४ 'दोरीयः' इति ईयस्य ये यायकाः कोपान्सामेलेपनादयनेपां पाचनं वानदोऽयमार- भ्यत इत्यर्थः । एतदेव कोपान्लादित्यादिना सष्टयन्त्रदाहरति ।

।
-
३९८
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु-
किम् ? पृथिवीमध्यादागतो मध्यमीयः कठः। चरण इति किम् ? पृथिवीमध्यं निवासोऽस्य मध्यमीयः
शूद्रः ॥ "वेणुकादिभ्य ईयण" (६।३।६६) । यथायोगं देशवाचिभ्यः । वैणुकीयः, चैत्रकीयः,
औत्तरपदीयः, औत्तरीयः, औत्तरकीयः, प्रास्थीयः, माध्यमकीयः, प्रास्थकीयः, माध्यमिकीयः, नैपुण-
कीयः । बहुवचनं प्रयोगानुसरणार्थम् ।
५ "वा युष्मदस्मदोऽजीनत्रौ युष्माकास्माको चास्यैकत्वे तु तबकममकम्” (६॥३॥
६७)। यौष्माकः यौष्माकी स्त्री । यौष्माकीणः यौष्माकीणा । युष्मदीयः ॥ आसाकः आसा-
कीनः असदीयः ॥ तावकम् , मामकम् , तावकीनम् , मामकीनम्, त्वदीयम् , मदीयम् ।
"वा युष्मदस्मदो" (देशादिति निवृत्तम् ) अनयोः शेपेऽर्थे एतौ प्रत्ययौ युष्माक अस्माक
इत्येतो चानयोरादेशौ स्याताम् , एकत्वे च तवकममकावादेशौ । आदेशौ प्रति यथासहरं नास्तिवच-
१० नभेदात् । युष्माकमयं युवयोर्वा यौष्माकः यौष्माकी स्त्रीति "अणयेकग्नब्लटिताम्” (२।४।२०)
इति लीः । एवं यौप्माकीणः । अस्माकमयं अस्माकः, आस्माकीनः । एकत्वे तु तवायं तावकः ताव-
कीनः, ममायं मामकः मामकीनः । स्त्री तु तावकी तावकीना, मामकी मामकीना । पक्षे त्यदादित्वेन
दुसंज्ञत्यादीयः-युप्मदीयः, स्वदीयः ।
अत्रादिशब्दात् "द्वीपादनुसमुद्रं पयः" (६।३।६८) । समुद्रसमीपे यो द्वीपस्तद्वाचिनो ण्यः
१५ स्यात् । कच्छाद्यऽकवऽणोरपवादः । द्वैप्यो मनुष्यः, द्वैप्यमस्य हसितम् । अनुसमुद्रमिति किम् ? अनु.
नदि यो द्वीपस्तस्मात्-द्वैपको व्यासः,
द्वैपकमस्य हसितं द्वैपम् ॥ "अर्द्धाद्यः" (६।३।६१) अर्ध्वम् ।।
"सपूर्वादिकण्” (६।३७०) सपूर्वपदादर्द्धशब्दादिकण् स्यात् । पोष्फरार्द्धिकः, वैजयार्द्धिकः, घाले-
याचिका, गौतमाद्धिकः, क्षेत्राद्धिकः, यौवनार्द्धिकः ॥ "दिकपूर्वात्तौ" (६।३।७१) । दिपूर्वपदाद-
ईशब्दात्ती य-इकणप्रत्ययौ स्याताम् । पूर्वार्ध्यम् पौर्वाधिकम् । दक्षिणाय॑म् दाक्षिणार्दिकम् । पश्चाय॑म्
२० पाश्चार्द्धिकम् ॥ "ग्रामराष्ट्रांऽशादणिकणो” (६।३।७२ ) पामराष्ट्रकदेशवाचिनोऽर्द्धशब्दादिर
पूर्वादण्-इकण् इत्येतो प्रत्ययों स्याताम् । यापवादो । ग्रामस्य राष्ट्रस्य वा पूर्वार्द्धं भवः पौर्वाद्धः पौर्वा-
विकः । दाक्षिणार्द्धः दाक्षिणार्द्धिकः ॥ "परावराऽधमोत्तमादेयः" (६।३।७३ ) एतत्पूर्वपदा•
दशिदाधः स्यात् । इकणोऽपवादः । पराद्धर्यम्, अवरायम् , अधमाद्धर्षम्, उत्तमाद्धपम् । परा-
परयोदिक्दाघ्दत्वेऽपि परत्यादयमेव यः (न केवलं परापरयोर्यथाक्रमं शव्यधर्मार्ययोरनेन प्रत्यय
२५श्त्यपेरर्यः) ॥ ६५ ॥
अमोन्ताऽवोऽधसः॥ ६६ ॥ [सि० ६३७४]
अन्तादयसपस्म्यां चामः स्यात् ।। ६६॥
"अमो." अमस्याफारादित्यमयोपसोऽन्त्यस्वरादिलोपार्थम् ॥ ६६ ॥
प्रायोऽव्ययस्य ॥ ६७ ॥ [सि०७४।६५]
३० सद्धिते परेऽव्ययस्यान्त्यखरादेः प्रायो छन् । अन्तमः अधमः॥"पश्चादायन्ताग्रादिमः
(६।३१७५) परिमः ॥"मध्यान्मः" (६३७६) मध्यम अध्यात्माऽदिभ्य इकण"
३२(६।३।७८) आध्यात्मिकम् । आधिदैविकम् ॥ ६७ ॥

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । शेपेऽर्थे ३९९ "प्रायो"। अव्ययस्यापदसंज्ञकस्य तद्धिते परेऽन्त्यखरादेः प्रायो लुप् भवति । यथा स्वर्भवः सौवः । बहिर्जातो वाह्यः, वाहीकः । सायम्प्रातिकः । पौनःपुनिकः । "वर्पाकालेभ्यः" (६।३।८०) इतीकण् । अनभिधानादव्यग्रलक्षणस्तनट् न भवति-पौनःपुन्यम् । उपरिष्टादागतः औपरिष्टः । परत आगतः पारतः । एकैकश्यम् । प्रायोग्रहणं प्रयोगानुसरणार्थम् तेनेह न भवति-औरातीयः, आवतिकः, शाश्वतः, पार्थक्यम् । अपदस्थेत्येव-कंयुः शंयुः अहंयुः । “पश्चादा०” पश्चिम इति-एवमादिमः५ अन्तिमः अग्रिमः । आद्यन्ताभ्यां भवादन्यत्रार्थ विधिः, भवे तु परत्वादिगादिय एव । "मध्या." मध्यम इति-भवे दिनणादय उक्तास्ततोऽन्यत्र शेपेऽयं विधिः। अत्रायं विशेपः-"मध्ये उत्कर्षाऽपकर्पयोरः” (६।३।७७ ) उत्कर्षापकर्पयोर्मध्ये वर्तमाना- न्मध्यशब्दाच्छेपेऽर्थे अप्रत्ययः स्यात् । मापवादः । नात्युत्कृष्टो नात्यपकृष्टो मध्यपरिणामो मध्यो वैया- करणः । मध्या गुणाः । मध्या स्त्री । नातिदीर्घ नातिहखं मध्यप्रमाणं मध्यं काष्टम् । नातिस्थूलो नाति-१० कृशो मध्यः कायः । यद्यपि मध्यशब्दो मध्यपरिणामवत्तिन्यपि वर्तते तथाप्यवस्थावस्थावतोः स्याद्वा- दाद्भेदविवक्षायामवस्थावाचिप्रकृतेरवस्थावति प्रत्ययार्थे पूर्वेण मो मा भूदिति वचनम् । “अध्या०"। अध्यात्म भवं आध्यात्मिकम् । अधिदेवे भवं आधिदैविकम् । एवमाधिभौतिकम् । अनुशतिकादित्वा- दनयोरुभयपदवृद्धिः । औदमिकः औदेहिकः औद्धन्दमिकः औज़न्देहिकः-अतएव पाठादूर्ध्वस्य दमदेहयो; मोऽन्तः । केचिदूर्ध्वदमोर्ध्वदेहझब्दावनुशतिकादिपु पठन्त उभयपदवृद्धिमिच्छन्ति-और्ध्व-१५ दामिकः, औदैहिकः । ऊर्ध्वमौहूर्तिकः-अत्र "सप्तमी चोर्ध्वमौहूतिके" (५।३।१२) इति ज्ञापकादुत्तर- पदस्यैव वृद्धिः 1 अकस्माद्धेतुशून्यः कालः तत्र भवमाकस्मिकम् । अमुप्मिन् परलोके भवमामुष्मिकम् । एवमामुत्रिकम् । पारत्रिकम् । इह भवमैहिकम् । शैपिकम् । पाठसामर्थ्यात्सप्तम्या अलुप् । अध्या- त्मादयः प्रयोगगम्याः ।। ६७ ।। समानपूर्वलोकोत्तरपदात् ॥ ६८ ॥ [ सि० ६।३१७९) समानपूर्वपदेभ्यो लोकोत्तरपदेभ्यश्चेकण स्यात् । सामानग्रामिकः पारलौकिकः ॥ ६८ ॥ "समान०" समान ग्रामे कृतो भवो वा सामानग्रामिकः । सामानदेशिकः । इहलोके तो भवो वा ऐहलौकिकः । पारलौकिकः । सार्वलौकिकः । योगद्वयेऽपि भवार्थ एव प्रत्यय इत्यन्ये ।। ६८ ॥ वर्षाकालेभ्यः ॥ ६९॥ [सि० ६३८० ] वर्षाशब्दात्कालविशेपाचेकण् स्यात् । वार्पिकः मासिकः । *फचिढा-निशिका नंगः२५ "चिरपरुत्परारेस्नः" (६३८५) वा चिरनं चिरन्तनमित्यादि । “पुरो नः" (६३१८६) पुराणं पुरातनम् । “पूर्वाहाऽपराहात्तन" ( ६।३२८७ ) या । सप्तम्या अलुप्-पूर्वाष्ट्रवनः । पार्वाहिकः । “भर्तुसन्ध्याऽऽढेरण" (६।३।८९) आश्विनः ग्रेप्मः सान्ध्यः ॥ ६९ ।। २० २८ १ सयाध्ययममुदायोऽव्ययन गेन गते पति गनिरन, अति मनदिन्नन्यसमा भर्ना, rz-! २ एकमेकं ददाति एवान्दस्वागन्नस वीमाया दिल टावर'-यमी सपि या tar पशी भावः । : भगायें होगमः । 'टेन' 'गहुँगा! ४ मा मपातपायपि ममामलेनोच्या दागिन्यादा।

.- महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "व०" अणपवादः । दोरीयमपि परत्वाद्वाधते । वासु भवो वार्षिक: "कतोवृद्धिमद्विधावय- वेभ्यः" इति न्यायसूत्रम्-ऋतोर्जिणत्प्रत्ययस्तदवयवादे झलन्तादपि स्यात्-पूर्ववार्षिक: अपरवार्षिक: "अंशाहतोः” (७४।१४) इत्युत्तरपदवृद्धिः । एवममुत्तरजापि । मासिक इति-वर्षाग्रहणमृत्वण्- याधनार्थम् । कालशब्दः कालविशेषवाची-भर्तुसन्ध्यादेरियन सन्ध्यादिग्रहणात् । स्वरूपग्रहणे हि ५काललक्षणेकण्वाधक सन्ध्यादिग्रहणमनर्थक स्यात् । वहुवचनं तु यथाकथंचित्कालवृत्तिभ्यः प्रत्यय. प्रापणार्थम् (निशासहचरितमध्ययन निशा, प्रदोपसहचरित प्रदोपः, तन जयी नैशिकः प्रादोपिकः) कदम्बपुष्पसहचरितः कालः कदम्बपुष्पम् । ब्रीहिपलालसहचरितः कालो ब्रीहिपलालम् , तर देय. मृणं कादम्पपुष्पिकं ब्रैहिपलालिकम् ।। कालशब्दाच्च कालार्थादकालार्थाच कालतः । अकालादपि काला- थोत् कालेभ्य इति “यो विधिः" ॥ १ ॥ एवं "शरदः श्राद्ध कर्मणि" (६।३।८१) । ऋत्व. १०णोऽपवादः । शारदिकं श्राद्ध कर्म पितृकार्यम् । श्राद्धे कर्मणीति किम् ? शारदं विरेचनम् । * कचि. द्वेति-"नवा रोगातपे" (६।३।८२) । त्वणोऽपवादः । शारदिकः शारदो रोगः, आतपो वा। रोगातप इति किम् ? शारदं दधि ॥ नैशिक इति-"निशाप्रदोपात्" (६।३१८३) । निशासह- चरितमध्ययनं निशा, प्रदोपसहचरितमध्ययन प्रदोपस्तन जयी नैशिकः नैशः प्रादोपिकः प्रादोषः ॥ "चिर" एभ्यः कालवाचिभ्यः शेपेऽर्थे नः स्यात् । चिरे भवं चिरत्नम् , एवं परुद्भवं परुन्नम्, परा- १५रित्नम् । पक्षे चिरतनं परत्तनं परारितनमिति । परुत्परारिभ्यां विकल्प नेच्छन्त्यन्ये । परारेस्ने रिलोप इत्यैके-परानः । केचित्परुत्परार्योस्तनख्यन्यस्वरात्परं म्वागममिच्छन्ति-परन्तनम्, परारितनम् । "पुरो०" पुराशब्दात्कालवाचिनोऽव्ययाच्छेपेऽर्थे नः स्यात् । पुरा भवं पुराणम् पुरातनमिति ॥ "पूर्वा" "चर्पाकालेभ्य" इति नित्यमिकणि प्राप्ते विकल्पः, तेन पक्षे सोऽपि भवति "अतोऽहस्य" (२।३१७३) इति णत्वम्, पूर्वाहे भवो जातो या पूर्वाहेतनः पूर्वाहतनः । एवमपराह्तनः अपराहतनः । “काला. २० तन०" (३।२।२४) इत्यादिना वा सप्तम्या अलुप् । पूर्वाहे जयी पूर्वाहतनः अपराहतन:-अनजयिनि याच्ये तत्र व्यवस्थितविभाषाविज्ञानात् नित्य सप्तम्या लुप् । पक्षे पौर्वाहिकः आपराहिकः । टकारो डियर्थः-पूर्वाहतनी अपराहेतनी । “भर्नु” भं नक्षनम् , तद्वाचिभ्य ऋतुवाचिभ्यः सन्ध्यादिभ्यश्च कालवाचिभ्योऽण् स्यात् । इक्णोऽपवादः । पुष्येण चन्द्रयुक्तेन युक्तः कालः पुप्यः, पुप्ये भवः पोपः । एवं तपः, आश्विनः, रोहिणः, स्वाती सौवातः । ऋतु. प्रैप्मः, शेशिरः, चासन्ता, २५ मद्विधाविति-पूर्वप्रेप्मः, अपरशशिरः, "अशाहतोः” (७४.१४) इत्युत्तरपदवृद्धिः । सन्ध्यादिः. सान्ध्यः, सान्धिलः, आमावास्यः । एकदेश विकृतस्यानन्यत्वादमावस्याशब्दादपि भवति-आमा पस्सः । अण्महण स्थाति-राधा-आर्द्रा-पौर्णमासीभ्य ईययाधनार्थम् । यथाविहितमित्युच्यमाने "दोरीयः" (६।३।३२) इति ईयः प्राप्नोति । पालेभ्य इत्येव-स्वातेरिदमुदयस्थानं स्वातीयम् । एन राधीयम्, आर्दीयम् । सन्ध्या, सन्धियेला, अमावास्या, प्रयोदशी, चतुर्दशी, पञ्चदशी, पौर्णमासी, प्रतिपद्, शश्वत्, इति सन्ध्यादयो नय । "वर्णोवर्णात्” (७१) इति सूत्राश्वत्प्रतिपेपार- ३१वच्छन्दादियणपि शाश्वतं शाश्वतिकम् । -, पूर्वाध ता पांथ 'पूर्वापरप्रथम'-इति समाम । पूर्यासु वर्षामु भव इति तदितविधये 'दिगधिकम्'-दत्यनेन वा । पूर्वसमिति 'पूर्वापराघर' सादिना तत्पुरो या अंगारतो युनावशेषविहितवारपरलायनेन दिपूर- ही दाम्पते । २ इन्चत विदेष । मागदपेशया कायदोऽपि धारयशेषशाची, सेन लिमयपि । । यसमा गुरया मुलाया था ये पाले वर्तते इत्पम् । ४ यादव यदा कापीय काले वर्तते गुगारदेववा पनामार का प्रलयो मपति यपदर्शिदात् कदम्बपुष्पाद । ५ परेभ्य इत्यशेन यो विगितमी ऋतोद्धि- - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । शेपेऽर्थे । जिताधर्थाः ४०१ - आदिशब्दात् "संवत्सरात्फलपर्वणोः" (६।३।९०) अस्मात्फले पर्वणि च शेपेऽर्थेऽण् स्यात् । सांवत्सरं फलं पर्व वा । फलपर्वणोरिति किम् ? सांवत्सरिकं श्राद्धम् ।। ६९ ।। हेमन्ताद्वा तो लुक् च ॥ ७० ॥ [सि० ६।३।९१] असाद्वाण तद्योगे तलुक् च वा । हैमनं हैमन्तं हैमन्तिकम् ॥ "प्रावृष एण्यः" (६।३।९२) शेपे । प्रावृषेण्यः । *जाते विका-प्रापिकः ॥ ७० ॥ * पूर्णः शेषाधिकारः। अणोऽप्यवधिः पूर्ण "हेम"। हेमन्तशब्दाहतुवाचिनः शेपेऽर्थेऽण् वा स्यात् , तद्योगे च तकारस्य लुप् वा स्यात् , नित्यमृत्वणिप्राप्ते विभापेयम् , तथा च त्रैरूप्यम्, तदन्तविधिना पूर्वहेमनम्, "अंशाहतोः" (७४।१४) इत्युत्तरपदवृद्धिः । "प्रावृ०" । ऋत्वणोऽपवादः । प्रापि भवः प्रावृपेण्यः । *जाते त्विक इति-परत्वादिति शेषः । एण्य इति प्रत्यये मूर्धन्यो णकारो 'निनिमित्तकः प्रावृपेण्ययतीति क्विपि १० प्रावृषेण इति मूर्द्धन्यार्थः। अत्रायं विशेष:-"स्थामाजिनान्ताल्लुप्” (६।३।९३) । स्थामन्शब्दान्तादजिनान्ताञ्च परस्य शैपिकस्य प्रत्ययस्य लुप् स्यात् । अश्वत्थामनि जातो भवो वा अश्वत्थामा "अः स्थानः” (६।१।२२) इति प्राजितीयेऽर्थे उत्पन्नस्य अप्रत्ययस्यानेन लुप् स्यात् । ततश्च "नोऽपदस्य." (७।४।६१) इत्यन्य- स्वरादिलुप न भवति सिंहाजिने जातो भवो वा सिंहाजिनः, उलाजिनः, वृकाजिनः । भवार्थस्यैव लुप-१५ मिच्छन्त्यन्ये, तन्मते अश्वत्थाम्नोऽयं तत आगतो वा आश्वत्थामः । एवं सैंहाजिनः, वार्काजिन इत्यादी . . प्रत्ययलुप् न भवति । शेपार्था दर्शिताः पूर्व येऽत्र तत्र कृतादयः । सप्रत्ययाः प्रकृतयस्तेपामेता निरूपिताः ॥ १ ॥ तथा चाह पूर्णः शेषाधिकार इति, अणोऽप्यवधिः पूर्ण इति । *जितादिष्वर्थेषु यथायोगमिकणादयो वक्तव्याः । अर्जित आक्षिकः । दना संस्कृतं संसृष्टं २० वा दाधिकम् । उडुपेन तरति औडुपिकः नाविकः । हस्तिना चरति हास्तिकः । वेतनेन जीवति वैतनिका ऋयिकः । मीनान् हन्ति मैनिकः । परदारान् गच्छति पारदारिका । सुनातं पृच्छति सौनातिकः । प्रभूतं ब्रूते प्राभूतिकः । सेनां समवैति सैनिकः । धर्म चरति धार्मिकः । आध- मिकः । अपूपाः पण्यमस्य आपूपिकः । नृत्तं शिल्पमस नार्तिक । असिःप्रहरणमस्स आसिकः। (नास्तिकास्तिकादयो निपात्याः) अथ इकण अधिकरिष्यते, वक्ष्यमाणार्थेपु अपवाद मुक्त्वा इकण भवतीत्यर्थः । इकणर्थान् संक्षेपे- णाह-*जितादिष्विति । आक्षिक इति-अन सूत्रम् “तेन जितजयद्दीव्यत्खनत्सु" (६४२)। तेनेति तृतीयान्ताजिताद्यर्थचतुष्टये इकण स्यात् । अर्जितः अक्षर्जयति अभैर्दीव्यति आक्षिकः, शाला- किकः । अभ्या खनति आधिकः, कौडालिकः, अभ्री काष्टमयी तीक्ष्णाम्रा 1 "अभ्रिस्तु काप्टकुदाल: इति कोपः । इह तेनेति करणे तृतीया शेया, तेन हेतुकर्नादितृतीयान्तादिकम् न स्यात्-देवदत्तेन जितं ३० धनेन जितमिति । अभ्या खननगुल्या खनति-अत्र मुख्यः करणभावोऽध्या एव नाहुलेरियलिशब्दान भवति । जयदादिषु त्रिपु कालो ने विवक्षितः जिते तु विवक्षितः । बहुवचनं पृथगर्यताविभज्यर्थम् ।। ३२ १ नतु 'रपूवर्ण'-इलनेन मूर्धन्यार्थ इति । अन्यथा नलोपडपे परे कार्य 'गरम' इति पतम्यामास्वादन्यता 'रषर्ग- इत्यप्रकृती 'नानो नोऽनहः' इति नलोपेऽनिटं स्पं सात् । २ फर्ता व विवलितोऽन एव जयद्ददगे सत्सपि फर्मन्पपि पर है. प्रच० पूर्वा० ५१ 4 ५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- तेनेति सृतीयान्तादिति-तृतीयान्ता प्रकृति: "तं प्रत्यनोलोंमेपकूलात्" (क्षा२८) इति सूत्रं यावत् अनुवर्तनीया । दाधिकमिति । "संस्कृते" (६।४।३)। इकण् । सत उत्कर्षाधानं संस्कारः । दना संस्कृतं दाधिकम् । उपाध्यायेन संस्कृतः औपाध्यायिकः शिष्यः । विद्यया संस्कृतो वैधिकः । अत्रायमपवादः-"कुलत्थकोपान्त्यादण्" (६४४)। कुलत्यैः संस्कृतं कौलत्थम् । अन्ये तु सकाराकान्तथकारान्तकुलस्थशब्दात्प्रत्ययं मन्यन्ते-कौलस्थः । कोपान्त्य. तित्तिरिकेण तित्तिरीकाभिर्वा संस्कृतं तैत्तिरीकम् । दुर्दुरूकेण दाईस्कम् । मण्डूकेन माण्डूकम् । अन्ये तु कवर्गोपान्त्यादपीच्छन्ति- मौद्गम् , सौरघम् । “संसृष्टे" (५।४।५) ऽप्येवम् । मिश्रणमात्रं संसर्ग इति पूर्वोक्तासंस्कृतानेदः । दना संसृष्टं दाधिकम् । शाहवेरिकम् । पैप्पलिकम् । वैपिका मिक्षा । आशुचिकमन्नम् । अत्र विशेषाः- १० "लवणादः" (६४) । लवणेन संसृष्टो लवणः सूपः (शाकः, लवणा यवागू)। लवणशब्दो द्रव्यवाची गुणवाची च । तत्र द्रव्यवाची प्रत्ययं प्रयोजयति न गुणवाची, गुणेन विश्लेषपूर्वकस्य संस- र्गस्यासंभवात् || "चूर्णमुद्गाभ्यामिनणी" (६४७) । चूर्णैः संसृष्टापूर्णिनोऽपूपाः, मुद्र संसृष्टा मौद्गी यवागूः ॥ "व्यञ्जनेभ्य उपसिक्ते" (६४८) व्यञ्जनशब्दो रूढितः सूपादौ वर्तते । उपसिक्तमिति यद्भोजनार्थमुपादीयते भोज्यादि तदुच्यते न स्थाल्यादि । सूपेनोपसिक्तः सौपिको, १५ दाधिक ओदनः । घार्तिकं तैलिक शाकम् । व्यञ्जनेभ्य इति किम् ? उदकेनोपसिक्तः ओदनः । उप- सिक्के इति किम् ? सूपेन संसृष्टा स्थाली । उपसिक्तं संसृष्टमेव तत्र "संसृष्टे" इत्येव सिद्ध नियमार्थ वचनम्-व्यञ्जनैस्संसृष्टे उप॑सिक्त एव उपसिक्के च व्यञ्जनैरेव । बहुवचनं स्वरूपविधेर्निरासार्थम् ।। औडुपिक इति-"तरति" (६४९) । तृतीयान्तादस्मिन्नर्थे इकण् स्यात् । काण्डप्लविकः (शार- पविकः गौरपुच्छिका ॥ “नौद्विस्वरादिकः" (६।४।१०)। नौशब्दाहिस्वराय नाम्नस्तृतीयान्ता- २० त्तरत्यर्थे इकः प्रत्ययो भवति । नाविकः । द्विस्वर. घटिकः, प्लविकः दृतिकः बाहुकः बाहुका । हास्तिक इति-"चरति' (६।४।११) तृतीयान्तादस्मिन्नर्थे इकण् । चरतिरिह गत्यों भक्ष्यर्थश्व गृह्यते । गत्यर्थ. शाकटिकः, घाण्टिकः, आकर्षिक: आकर्षः सुवर्णनिकपोपल औषधपेपणपापाणश्च । भक्ष्यर्य. दना घरति दाधिका शाहवेरिकः । आदिशब्दात् "पदेरिकद" (६।४।१२) तृतीयान्तेभ्यः एभ्यश्चरत्यर्थे इकट् स्यात् । पर्पण २५चरति पर्पिकः पपिंकी । पर्य, (अश्व, ?) अश्वत्थ, रथ, अर्ध्य, व्याल, व्यास, इति पादयः पट् !! "पदिका" (६।४।१३) पादशब्दात्तेन चरत्यर्थे इकट् स्यात, अस्य पद्भावश्च निपात्यते । पादाभ्यां परति पदिकः ॥ "श्चगणाद्वा" (६४।१४) अस्मादिकट् स्यात् , या । श्वगणेन चरति श्वगणिका, स्वगगिकी; पक्षे इकण्-श्वागणिका; एपु द्वारादेः (७४।६) इति वकारात् प्रागौकारे प्राप्तेऽपवादसूत्रम्- स्वादेरिति (७४।१०) श्वन शब्द आदिरवययो यस्य तस्य श्वादेर्नान्न इति इकारादी ब्णिवि तद्धिते ३० परे यः प्रागीकारो न भवति । श्वभत्रस्यापत्यं श्वामखिः । श्वाशीपिः, श्वार्दष्ट्रिः । एवं श्वागणिका, प्रलमार्य जितप्रहणम् । भयमय -जयतीत्युक्त जयति जेष्यवि भजेयोदिति लभ्यते कि जितग्रहणेन । उच्यते । भूते कर्मन्यपि पाच्ये ययास्पादित्येवमर्पम् । विवक्षित इति अतीतः कालः । १ सरपाभिः हवं 'नाग्नि मक्षिधाभ्यः' इत्यग् । सारपेन मधुना संस्कृतः । १ पत्र संसृष्टः धादिमश्यं विवक्षितम् । भन्यथा 'व्यसनेभ्य उपसि' इति नियमः स्यात् । । मामानमोज्या पानावनापामभलादतोऽनियमः । ४ सुरेन समय स्थाडीलनुपतिले संसटे प्रलयो म मक्तीति प्रलयाच्यवस्था ५ दानोपसिक मोदन पुरधामना भवटीवि प्रतिव्यवस्था । 1 प्रक्रियावृतिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । चरत्याधर्थाः ४०३ श्वायूथिकः । आदिग्रहणं किम् ? श्वभिश्चरति शौविकः । इतीति किम् ?' श्वहानस्येदं शौवहानम्, शौवभवम् । श्वदंष्ट्राया विकारः शौवदंष्ट्रो मणिः । “इना' (७४।११) श्वादेरिन्प्रत्ययान्तस्य णिति तद्धिते परे वकारात्प्रागौकारो न भवति । श्वाभस्त्रेरिदं श्वाभस्त्रम् , श्वाकर्णम् । इकारादौ निमित्ते उच्यमानः पूर्वण प्रतिपेध इनन्तस्य प्रत्ययान्तरे न भवतीति वचनम् । “पदस्यानिति वा" (७१४.१२) पदशब्दान्तस्य श्वादेरिकारादिवर्जिते णिति तद्धिते वकारात्मागोकारो वा भवति ।५ शुन इव पदमस्य श्वापदम् , तस्य विकारः श्वापदं शौवापदम् । अनितीति क्रिम् ? श्वापदेन चरति श्वापदिकः । श्वनशब्दस्य द्वारादिपु पाठात्तत्र तदादिविधेापितत्वान्नित्यमौकारागमे प्राप्ते विकल्पः । चैतनिक-इति "वेतनादेर्जीवति” (६।४।१५) एभ्यस्तृतीयान्तेभ्यो जीवत्यर्थे इकण् स्यात् । वेतन, वाह, अर्द्धवाह, धनुस् , दण्ड, धनुर्दण्ड, जाल, वेश, उपवेश, प्रेषण १० भृति, उपवेश, उपस्था, उपास्ति, उपस्थान, सुख, शय्या, सुखशय्या, शक्ति, उपनिपद् .२० उपनिजस्तस्पिज (?) उपरिजन, १० स्फिज, स्फिग, वाल, पुतचाल, उपदेश, पाद, उपहस्त २८ इति वेतनादयोऽष्टाविंशतिः । ऋयिक इति-"व्यस्ताच क्रयविक्रयादिकः” (६।४।१६)। क्रयविक्रयशब्दात्समस्ताव्यस्ताच्च तेन जीव- त्यर्थे इकः स्यात् । क्रयविक्रयेण जीवति क्रयविक्रयिकः । एवं ऋयिकः, विक्रयिकः ॥ अनादिशब्दसंनिधानात् “वरलात्” (६।४।१७) । अस्मात्तेन जीवत्यर्थे इकः स्यात् । वस्त्रं मूल्यम् , तेन जीवति वस्निकः ॥ "आयुधादीयश्च” (६।४।१८) । चकारादिकः । आयुधेन १५ जीवति आयुधीयः आयुधिकः आयुधिका । आयुधादिकेकणोः स्त्रियां विशेपः । ( नन्वायुधादीयो वेति क्रियतां पक्षे इकणापि सेत्स्यतीत्याशङ्का) } "जातादीन" (६।४।१९) वातशब्दात्तेन जीवत्यर्थे ईनञ् स्यात् । नानाजातीया अनियतवृत्तयः शरीरायासजीविनः संघा वातास्तत्साहचर्यात्तत्कापि जातं तेन जीवति (वातीनः ।) 'वातीनाः सङ्घजीविनः' इत्यभिधानचिन्तामणौ । बकारो वृद्ध्यर्थ- स्तेन "तद्धितः स्वरवृद्धि०” (३।२।५५) इत्यादिना पुंवद्भावो न स्यात्-त्रातीनाभार्यः । मैनिक२० इति-"पक्षिमत्स्यमृगार्थाद् नति” (६।४।३१) । द्वितीयान्तेभ्य एभ्यो नत्यर्थे इकण् स्यात् । पक्षिणो हन्ति पाक्षिकः । मासिकः, मार्गिकः । अर्थग्रहणात्पर्यायेभ्यो विशेपेभ्यश्च भवति-शाकुनिकः, मायूरिकः, तैत्तिरिकः, मैनिकः, शाफरिकः, शाकुलिकः, हारिणिकः, सौकरिकः । अथ अजिह्मान् हन्ति अनिमिषान् हन्तीत्यत्र कस्मान्न भवति ? नैतन्मत्स्येत्यस्य स्वरूपं (मत्स्यशब्दोऽयं न भवति) न विशेषो नं पर्यायः, अपि त्वसाधारणं विशेषणं यथा जिह्मगा भुजगाः, अनिमिपा देवा इति । “परिपन्था-२५ त्तिष्ठति च" (६।४।३२) । अस्माद्वितीयान्तात्तिष्ठति न्नति चार्थे इकण स्यात् । परिपन्थं तिष्ठति हन्ति वा पारिपन्थिकञ्चौरः, अत एव निर्देशात्परिपथशब्दस्य इकणोऽन्यत्रापि परिपन्थादेशः, तेन परिपन्थं गच्छति पश्यतीत्याद्यपि भवति। "परिपथात्” (६।४।३३)। अस्माहितीयान्तात्तिष्ठत्यर्थे इकण् स्यात् । परि वर्जने सर्वतोभावे वा। पथः परि सर्वतः पन्थानं परिपथं तिष्ठति पारिपथिकः-पन्थानं वर्जयित्वा व्याप्य वा तिष्ठतीत्यर्थः । “अवृद्धेहाति गये” (६।४।३४)। द्वितीयान्ताद्वृद्धिशब्दागृहात्यर्थे इकण स्यात् । यो गृहाति स चेदन्यायेन ग्रहणाद्यः स्यात् । द्विगुणं गृहाति द्वैगुणिकः । गुणिकः ।। वृधुपी ३१ १ यः किल पर्यायशब्दः स व्युत्पत्तिमन्तरेणापि तावन्तमर्थं गमयत्ययं तु व्युत्पत्त्यपेक्ष एव गमयति । २ यत्रापि अजि- मादिशब्देभ्यो मत्स्यादिप्रतीतिस्तत्राप्यसाधारणविशेषणत्वेनैव न पर्यायत्वेन । ३ पथः परिशब्दो वर्जनार्थस्तदा 'पर्यपाभ्यां वर्ये' इति पञ्चमी 'पर्यपावहि०' इति समासः । यदा तु परितः पन्थानमिति सर्वतोऽर्थः परिः, तदा 'सर्वोभयाभिपरिणा तसा' इति द्वितीया । सूत्रसामर्थ्यादव्ययीभावः 'ऋक्तपथ्यऽपोत्' । ४ प्रयुक्तं धनं पुदणावीवि प्रयुकधनपोपी तस्य पृषोदरा- दिखात धुपीशन्द आदेशः ।

महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- पृद्धिं गृहाति वा पिकः । अल्पं दत्त्वा प्रभूतं गृह्णन् अन्यायकारी निन्धते । अवृद्धेरिति किम् ? वृद्धि गृहातीति वाक्यमेव । गर्य इति किम् ? दत्तं गृहाति ॥ "कुसीदादिकट्" (६।४।३५) । कुसीदं पृद्धिस्तदर्थ द्रव्यमपि कुसीदम्, तं गृहातीति कुसी दिकः । कुसीदिकी-टकारो डयर्थः ॥ "दशैका- दशादिकश्च" (६४।३६) । द्वितीयान्ताद्दशैकादशशब्दागी गृहात्यर्थे इकञ्चकारादिकट् च ५स्याताम् । दशभिरेकादश दशैकादशाः, तान् गृहाति दशैकादशिका, दशैकादशिका दशैकादशिकी । अत एव निपातनादऽकारान्तस्वम्, तच्च वाक्ये प्रयोगार्थम् दशैकादशान गृह्णाति । अन्ये दशैकादश गृहातीति विगृहन्ति, तदपि 'अबाधकान्यपि निपातनानि भवन्तीति' न्यायादुपपद्यते । "अर्थपदपदो- त्तरपदललामप्रतिकण्ठात्" (६।४।३७) । गर्य इति निवृत्तम् । अर्थात्, पदात्, पदशब्द उत्तरपदं यस्य तस्मात् ललामप्रतिकण्ठाभ्यां च गृह्णात्यर्थे इकण् स्यात् । अयं गृहाति आर्थिकः । १०पादिकः । पौर्वपदिकः, औत्तरपदिकः । लालामिकः । प्रातिकण्ठिकः । अव्ययीभावसमासाश्रयणादिह न भवति-प्रतिगतः कण्ठं प्रतिकण्ठस्तं गृहाति । उत्तरपदग्रहणात् बहुप्रत्ययपूर्वान्न भवति-बहुपदं गृहाति । पारदारिक इति-"परदारादिभ्यो गच्छति" (६४।३८) । एभ्यो द्वितीयान्तेभ्यो गच्छत्यर्थे इकण् स्यात् । परदारान् गच्छति पारदारिकः । एवं गौरदारिका, गौरतल्पिकः । सभर्तृकां गच्छति साभर्तृकः, भ्रातृजायिकः । परदारादयः प्रयोगगम्याः॥"प्रतिपथादिकश्च" (६।४।३९) । चकाराद्य १५थाप्राप्त इकण्। पन्थानं पन्थानं प्रति पथोऽभिमुखमिति वा प्रतिपथम् , तद्गच्छति प्रतिपथिकः प्रातिपथिको वा ॥ "मायोत्तरपदपदव्याकन्दाद्धावति" (६४४०)। माथोत्तरपदात् पदव्याक्रन्दाभ्या द्वितीयान्तेभ्यो धावत्यर्थे इकण स्यात् । दण्डमाथं धावति दाण्डमाथिकः । माथशब्दः पथिपर्यायः । दण्ड इव माथो दण्डमाथः [मथ्यते अवगाह्यते पादैः घमि माथः । दण्ड इव माथ "उपमान सामा न्यैरे"वेति नियमादप्राप्तोऽपि 'मयूरव्यंसक' इति सः] ऋजुमार्ग उच्यते । पदवी धावति पादविकः ! २० आऊन्दति यत्र स देश आक्रन्दः, आक्रन्द्यत इति वा आक्रन्दः आर्तायनं शरणमुच्यते । आक्रन्दं धावति आक्रन्दिकः । उत्तरपदग्रहणादहुप्रत्ययपूर्वान्न भवति-बाहुमायं धावति । "पश्चात्यनुप- दात्" (६४१४१) । पश्चादर्थे वर्चमानादनुपदशब्दाद्धावत्यर्थे इकण् स्यात् । पदस्य पश्चादनुपदम्। अनुपदं धावति आनुपदिकः-प्रत्त्यासत्त्या धावतीत्यर्थः ॥ सौलातिक इति-"सुलातादिभ्यः पृच्छति" (६४४२) 1 एभ्यो द्वितीयान्तेभ्यः पृच्छत्यर्थे इकण् स्यात् । सुनातं पृच्छति सौना- २५तिकः । सौसरात्रिकः, सौसशायनिकः, सौख्यशाय्यिकः । सुनातादयः प्रयोगगम्याः । प्राभूतिक इति-"प्रभूतादिभ्यो ब्रुवति" (६।४।४३) । एभ्यो द्वितीयान्तेभ्यो अवसथै इकण स्वात् । प्रभूतं ब्रूते प्राभूतिकः । पार्याप्तिकः, वैपुलिका, वैचित्रिकः, नैपुणिकः । क्रियाविशेषणादयमिष्यते, सेनेह न भवति-प्रभूतमर्थ छूते पर्याप्तमयं ब्रूते इति । कचिदक्रियाविशेषणादपि-स्वर्गमनं द्यूते सौवर्ग- मनिकः । स्वागतिकः । सौवस्तिकः [स्वस्तीति बूते व्युत्पत्तिपो 'स्वः पदान्तात्' इति, अव्युत्पत्तिपः ३०तु 'द्वारादेः' इत्यौत् ] प्रभूतादयः प्रयोगगम्याः । "माशब्द इत्यादिभ्यः" (६।४।४४) । इति दान्दो पाम्यपरामर्शार्थः । गा शब्द इति घूते माशब्दिका मा शब्दः क्रियतामिति मूत इत्यर्थः । कार्यः शब्द इति ते कार्यशब्दिकः । नित्यः शब्द इति छूते नैत्यशन्दिकः । माशब्द इत्यादयः प्रयोगगम्याः । पाझ्यात्प्रत्ययविधानार्थ पचनम् [पूर्वेण हि पदात्प्रत्यय इत्यर्थः] । “शान्दिकदार्दुरिकलालाटि- फकोफुटिकम्" (६४।४५) । एते यथास्वं प्रसिद्धेऽर्थे इवणन्ता निपात्यन्ते । शनं करोति शाब्दिकः (यः कविच्छन्नं करोति न स सर्वः शान्दिकः किं तहि ) यशवं जानाति वैयाकरणास २६एपाविनष्टं शमशारयन् शाग्दिक उच्यते । दरो पटो पादियं सत्र मादित्रं कुर्वन् पारिक - प्रक्रियावृतिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । यथासं प्रसिद्धार्थाः ४०५ उच्यते । ललाटं पश्यति लालाटिका ललाटदर्शनेन दूरावस्थानं लक्ष्यते तेनं च कार्येष्वनुपस्थानम् । यः सेवको दृष्टं स्वामिनो ललाटमिति दूरतो याति नतु कार्ये उपतिष्ठते स एवमुच्यते । ललाटमेव वा कोपप्रसादलक्षणाय यः पश्यति स एवमिति । कुक्कुटीशब्देन कुक्कटीपातो लक्ष्यते, तेन च देशत्यारपता । चो हि भिक्षुरविक्षिप्तदृष्टिः पादविक्षेपदेशे चक्षुः संयम्य पुरो युगमात्रदेशप्रेक्षी गच्छति स एवमुच्यते । यो वा तथाविधमात्मानमतथाविधोऽपि संदर्शयति सोऽपि कौकुटिकः । दाम्भिकचेष्टा वा मिथ्या५ शौचादिः कुक्कुटी, तामाचरन् कौकुटिकः । हृदयावयवो वा कुकुटी तां पश्यति कौकुटिको भिक्षुः, निभृत इत्यर्थः । तदेतत्सर्व निपातनाल्लभ्यते ॥ सैनिक इति-"समूहात्समवेते" (६।४।४६) द्वितीयान्तेभ्यः समूहवाचिभ्यः समवेते तादात्म्यात्तदेकदेशीभूतेऽर्थे इकण् स्यात् .! समूहं समवैति सामूहिकः । सामाजिकः, सांसदिकः, सामवायिक; गौष्ठिकः । तदेकदेशीभावमनुभवन्नेवमुच्यते । समवेत्यापगते तु समवेतशब्दो न वर्त्तते यथा सुप्तोत्थिते सुप्तशब्द इति तत्र न भवति ॥ “पर्षदो पयः" १० (६।४।४७)। समवेते । पर्पदं समवैति पार्पद्यः । परिपच्छन्दादपीच्छन्त्यन्ये ॥ "सेनाया वा" (६।४।४८) सेनाशब्दाहितीयान्तात्समवेतेऽर्थे ण्यः स्यात् । सेनां समवैति सैन्यः-पक्षे "समूहार्यात्स- मवेते” इतीकण सैनिकः । सेनैव सैन्यमिति भेषजादित्वात्स्वार्थे व्यण् । धार्मिक-इति "धर्माधर्मा- चरति” (६।४।४९) । आभ्यां द्वितीयान्ताभ्यां चरत्यर्थे इकण् स्यात् । चरतिस्तात्पर्येणानुष्ठाने । धर्म चरति धार्मिकः । आधर्मिकः ।। १५ आदिशब्दात् “षष्ठया धम्य" (६।४।५०) । पष्ट्यन्ताद्धयेऽर्थे इकण् स्यात् । धर्मो न्यायोऽनु- वृत्त आचारस्तस्मादनपेतं धर्म्यम् । शुल्कशालाया धम्यं शोल्कशालिकम् । आपणिकम् , गौल्मिकम् , आतरिकम् । "ऋन्नरादेरण" (६४५१) । ऋकारान्तेभ्यो नरादिभ्यश्च पष्ठ्यन्तेभ्यो धर्येऽर्थ अण् स्यात् । नुर्धय॑ नारम् । स्त्रियां नारी । मातुर्मात्रम् । पितुः पैत्रम् । शास्तुः शास्त्रम् । विकर्तुर्वेक- प्रम् । होतुर्होत्रम् । पोतुः पौत्रम् । उद्गातुः औद्रात्रम् । नरादि. नरस्य धन्यं नारम्, स्त्रियां नारी । २० नृशब्देनैव रूपद्वये सिद्धे नरशब्दादिकण माभूदिति तद्ब्रहणम् । महिण्या माहिपम् । नर, महिपी, प्रजावती, प्रजापति, विलेपिका, प्रलेपिका, अनुलेपिका, वर्णक, पेपिका, (वर्णकपेपिका ।) मणिपाली, पुरोहित, अनुचारक, अनुवाक, यजमान, होतृयजमान, १५ इति नरादयः पञ्चदश । "विभा- जयित विशसितुर्णाङ्लुक् च" (६।४।५२) आभ्यां पष्ठ्यन्ताभ्यां धर्थेऽर्थे अण् स्यात्, तत्संनियोगे च विभाजयितुर्णिलुक् , विशासितुश्चेड् लुक् स्यात् । विभाजयितुर्धम्यं वैभाजित्रम् , विझ-२५ सितुर्वैशस्त्रम् ॥ "अवक्रये" (६४५३) येनेच्छानियमितेन द्रव्येण कियन्तमपि कालमापणाद्य- वक्रीयते सोऽवक्रयो ( भोगनिवेशो) भाटकमिति । पष्ठ्यन्तादवक्रयेऽर्थे इकण् स्यात् । आपणत्यावक्रयः आपणिकः । आतरिकः । लोकपीडया धर्मातिक्रमेणाप्यवक्रयो भवतीत्ययं धाद्भिद्यते । आपू. पिक इति-"तदस्य पपयम्" (६।४।५४) तदिति प्रथमान्तादस्वेति पट्यर्थे इकण् न्यान् , प्रथमान्तं चेत्पण्यं विक्रेयं भवति । पण्यार्थी वृत्तावन्तर्भूत इति पण्यशब्दस्याप्रयोगः । एवं मौदकिकः, शायु-३० लिकः लावणिकः ॥ "किशरादेरिकद्र" (६४५५) । एभ्यस्तदस्य पण्यमित्यस्मिन्नर्थे इकद्र स्यात् । किशरः पण्यमख किशरिकः । किशरिकी । किशर, तगर, स्वगर, उशीर, हरिद्रा, (हन्दु,)३२ १ फैश्विदन्न प्रलवलोपाकृतः ततः समते कथमित्याह-सम० । २ विपूर्वो भजन , ततो गिन् नृन् विमानयिन् । ३ नन्वन एड्लोप एव विधीयतां किं गिलोपेन, विमाजवि इन्यत्रापि इट्लोपे निचा सखरले पैमाजिनिति मिति ? नेयम् । मिली पाभावे गुनः स्यात्ततोऽनिष्टं रूपं स्यात् । निलोपे तु इटो धानुताभावात् गुमो न मरतीति विमति । ४ मुच्यते इति भोगो गृहादि, निविंश्यते भनेन व्यसनाद पनि निर्देशः, ततः पठीसमासः । -- - । महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचितें खोपज्ञहमलघु- हरिद्रुपी, गुग्गुलु, गुग्गुल, नलद, इति किशरादयो गन्धद्रव्यविशेषवचनाः । “शलालुनो वा" (६५६) । अस्माद्गन्धविशेपवाचिन इकट् वा । शलालु पण्यमस्य शलालुकः, शलालुकी । परे इकण्-शालालुकी ॥ नार्तिक इति-"शिल्पम्" (६४५७) । तदस्येति वर्तते । प्रथमान्तात् षष्ठ्यर्थे इकण् स्यात् , प्रथमान्तं चेच्छिल्प स्यात् । एवं गीत गैतिकः, वादन वादनिकः । मृदगो मृदङ्ग- ५वादन शिल्पमस्य मार्दङ्गिकः । एव पाणविकः, मौरजिकः, वैणिकः । मृदङ्गादिशब्दा वादनार्थवृत्तय. प्रत्ययमुत्पादयन्ति ने द्रव्यवृत्तयः । उत्पादनार्थवृत्तिभ्यस्त्वनभिधानान्न भवति, अत एव कुम्भकारा. दायभिधेये मैंदगकरणादिभ्य एव प्रत्ययः । मृदङ्गकरणं शिल्पमस्य मार्दगकरणिकः, वैणाकरणिक ! मृदङ्गवादनादिभ्योऽप्यनभिधानान्न भवति । शिल्पार्थों वृत्तावन्तर्भूत इति शिल्पशब्दस्याप्रयोगः ॥ "मड्डुकझझराद्वाऽण्" ( ६।४।५८)। मड्डुकवादनं शिल्पमस्य माडुकः । झाझरः । पर इकण माड्डकिका, झाझरिकः ॥ "शीलम्" (६।४।५९) । प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थे इकण स्यात्, प्रथ. मान्त चेच्छील स्यात् । अपूपा अपूपभक्षण शीलमस्य आपूपिकः । ताम्बूलिकः । परुषवचन शीलमस्य पारुषिकः । एवमानोशिकः ॥ मृदङ्गादिवदपूपादयः शब्दाः क्रियावृत्तयः प्रत्ययमुत्पादयन्ति । शीलार्थों वृत्तावन्तर्भूत इति शीलशब्दस्याप्रयोगः ॥ “अस्थाच्छन्त्रादेरम्” (६।४।६०) अड्प्रत्ययान्ता- त्तिष्ठतेश्छनादिभ्यश्च तस्य शीलमित्यर्थेऽम् स्यात् । आस्था शीलमस्य आस्थः 1 सास्थः, आवस्थ, १५सामास्थः, वैयवस्थः, नैष्ठः, वैष्ठः, "उपसर्गादातः" (५।३।११०) इत्यड् । आन्तस्थः भिदादित्वा- दड् । छत्रादि. छन्न शीलमस्य छात्रः । छत्रशब्देन गुरुकार्येष्ववहितस्य शिष्यस्य छत्रक्रियातुल्या गुरु- च्छिद्राच्छादनाऽपायरक्षणाविका क्रियोच्यते । उपचारात् शिष्यो हि छत्रवद्गुरुछिद्रावरणादिप्रवृत्त छात्र इत्युच्यते । अभ्यासापेक्षाऽपि क्रिया शीलमित्युच्यते, यथा शीलिता विद्या इति । चुराशीलः चौरः । तपाशीलस्तापस. ! कर्मशीलः कार्मः । स्त्रियाम्-छात्री चौरी तापसी ॥ छत्र, चुरा, तपस्, कर्मन् , २० शिक्षा, चुंक्षा, चिक्षा, भक्षा, भिक्षा, तितिक्षा, १० बुभुक्षा, विश्वधा, उदस्थान, उपस्थान, पुरोडा, कृपि, मन्द्र, सत्य, अमृत, विशिख, २० विशिखा, प्ररोह, २२ इति छत्रादयो द्वाविंशतिः २२ । "तूष्णीकः" (६।४।६१)। निपातोऽयम् । तूष्णीभावः शीलमस्य तूष्णीक -क.प्रत्ययो मकार- लोपश्च निपातनात् ॥ असिक इति-"प्रहरणम्" (६।४।६२)। प्रथमान्तात्पष्ठ्यर्थे इकण् स्यात्, प्रथमान्त चेत्प्रहरण स्यात् । एव प्रासिकः, चाक्रिकः, मौष्टिकः, धानुष्कः, मौद्गरिका, मौसलिक. । २५"चरती"यन व्यापारसाधनात्प्रत्ययो यथाश्वेन चरति । शिल्पमित्यन तु विज्ञानातिशये यथा नृत्त शिल्पमस्येति । अनेन तु व्यापाराभावेऽपि परिज्ञानमाने प्रत्ययः॥ अनाय विशेष.-"परश्वधाद्वाऽण्" (६४।६३) । परश्वधः प्रहरणमस्य पारश्वधः, पझे इकण- २८ पारश्वधिकः ॥ "शक्तियप्टेटीकण्" (६४६४) । शक्तिः प्रहरणमस्य शाक्तीक', शाफीकी । १ आदिशब्दात् व्याकरणकरणादि शिल्पमस्येति वैयाकरणिग्रदय । २ द्रव्यस्य शिल्पायोगात्तद्विषयाया क्रियाया शिल्पत मति वादनार्थवृत्तय इयुक्तम् । ३ केपुचिद्रामेषु गृन्मया मदता भवन्ति, तेषु कुम्भकारदुपत्ति । न तु मृदशादिशन्दादि स्वः। ५ भङ् चासो स्थाच । एत्रम् आदिर्यस्य, अस्थाथ छयादिश्च तस्मात् । अन्तमध्ये स्थान भिदायक 'अयये उग्वा' इति रोप । अन्तस्थान वा मतस्था शीलमस्य । शी हि प्राणिनी खभाव, छात्रस तु न स्वभाव इत्यारागोजम् । ७ घुक्षि सोत्रो निर्मलीकरणे चुक्षा शोचम् । ८ चिक्षेति-केचित् शिक्षीयस्य स्थाने चिनीति पठति । घालत चिक्षि । निशा शिक्षेत्पर्ष । ९ व्यापाथरणरूप साध्यते येन तस्मात्, अयमर्थ -चरल व्यापार साधयमेव शन्द प्रलयमा • प्रहरणस्य हि व्यपार परप्रहरणरूप , तस्याभावेऽपि प्रहरणाभावेऽपीयर्य । विज्ञानातिशयम प्रहारचक्षय तदभाषेऽपि त मापीलधं । " ना टिकनिति मात्रालघु प्रलयो विधीयताम् , एवमपि ते साकीनादय से सन्ति । म याम्यम् 'भवर्गेरास-इलस प्रसङ्ग , यतष्टकारी हि व्यर्थ । सहारा सिम इसधिकस्य टकारस्तर पर यति।

, प्रक्रियांवृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । प्रहरणाद्ययीः याट्रीक याष्टीकी । शाक्तिक इति तु शच्या ‘जीवतीति वेतनादितीकण ॥ "वेष्ट्यादिभ्यः" (६४/६५)! एभ्यष्टीकण वाः। पक्षे "प्रहरण"मितीकण । इष्टिः प्रहरणमस्य ऐटींकः ऐटीकी; पक्ष ऐष्टिकः । ईपा प्रहरणमस्य ऐपीको ३ । एवं कम्पनं प्रहरणमस्य काम्पनीको ३ । अम्भः- प्रहरणमस्य आम्भसीकः ३ । दण्डः प्रहरणमस्य दाण्डीका ३ । इष्ट्यादयः प्रयोगगम्याः ॥ नास्तिकास्तिकादय इति [अन सूत्रम्-"नास्तिकास्तिकदैष्टिकम्” (६।४।६६)] निपातनं रूड्यर्थम् , ! नास्ति ५ परलोकः पुण्यं पापमिति वा मतिरस्य नास्तिकः । अस्ति परलोकादिकमिति मतिरस्य आस्तिकः । नास्त्यस्तिशब्दौ तिवादिप्रतिरूपके अन्यये (तयोश्च परतः प्रथमैकवचनम् ) । निपातनादेव वा तदिति प्रथमाधिकारेऽपि आख्यातानास्तीति पदसमुदायाच प्रत्ययः । आदिशब्दात् दैष्टिकमिति-दिष्टं देवं तत्प्रमाणमिति मतिरस्य, दिष्टा वा प्रमाणानुपातिनी मतिरस्य दैटिकः ॥ आदिशंब्दसंसर्गात् "वृत्तोऽपपाटोऽनुयोगे" (६।४।६७ ) । प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थे इकण् स्यात् , १० प्रथमान्तं चेदनुयोगविपये वृत्तोऽपपाठो भवति । अनुयोगः परीक्षा । एकमन्यदपपाठोऽनुयोगे वृत्त- मस्य ऐकान्यिकः । द्वैयन्यिकः, वैयन्यिकः । सयान्यशब्दयोस्तद्धिते विषयभूते समासस्ततस्तद्धितः । वृत्तोऽपपाठोऽनुयोग इत्यस्य तु वृत्तावन्त वादप्रयोगः । अन्यत्वं चापपाठस्य सम्यक्पाठापेक्षम् । वृत्त इति किम् ? वर्तमाने वर्त्यति च न भवति । अपपाठ इति क्रिम् ? एकमन्यदस्य दुःखमनुयोगे वृत्तम् । जयोऽस्यानुयोगे वृत्तः । अनुयोग इति किम् ? स्वैराध्ययने माभूत् । अन्ये त्वपपाठादन्यत्राप्यध्ययन-१५ माने प्रत्ययमिच्छन्ति-एक रूपमध्ययने वृत्तमस्य ऐकरूपिकः । ऐकग्रन्थिकः ॥ "बहुस्तरपूर्वा- दिकः” (६।४।६८) । तथा । एकादशान्यपपाठरूपाण्यऽनुयोगेऽस्य वृत्तानि एकदशान्यिकः । एवं द्वादशान्यिकः। एकादशान्यिका ली। अत्राप्यन्ये पूर्ववदन्यत्रापीच्छन्ति-द्वादशरूपाण्यध्ययनेऽस्य वृत्तानि द्वादशरूपिकः ॥ "भक्ष्यं हितमस्मै" (६।४।६९) प्रथमान्ताचतुर्थ्यर्थ इकण् स्यात् , प्रथमान्तं चेद्भक्ष्यं हितं भवति । अपूपा भक्ष्यं हितमस्मै आपूपिकः । हितार्थो भक्षणक्रियावृत्तावन्तर्भवति ||२० "नियुक्तं दीयते” (६।४।७०) प्रथमान्ताचतुर्थ्यर्थे इकण् स्यात् , प्रथमान्तं चेन्नियुक्तमव्यभिचा. रेण निलं वा दीयते । अग्रभोजनमस्मै नियुक्तं दीयते आप्रभोजनिकः आग्रफलिकः, मासिकः, आपू- पिकः, ग्रामिकः, आग्रहारिकः । अस्मै इत्येव-रजकस्य वन्नं नित्यं दीयते ॥ "श्राणामांसौदनादिको वा" (६।४।७१) । आभ्यामुक्तार्थे इको वा स्यात् । श्राणा नियुक्तमस्मै दीयते श्राणिकः पथ्याशी, आणिका ! पक्षे इकण आणिकी । एवं मांसौदनिकः, मांसौदनिका, इकणपि-मांसोदनिकी । इके-२५ कणोः स्त्रियां विशेपः । अन्ये त्विकं नेच्छन्ति ॥ "भक्तौदनाद्वाणिकटू" (६।४।७२ ) । आभ्यां यथासंख्यमण्इकट्प्रत्ययौ स्याताम् , तस्मै नियुक्तं दीयते इति विपये । भक्तमस्मै नियुक्तं दीयते भाक्तः। ओदनिकः ओदनिकी । पक्षे इकण भाक्तिकः औदनिकः ॥ ओदनशब्दादिकणं नेच्छन्यन्ये ।। "नव- यज्ञादयोऽस्मिन् वर्तन्ते" (६।४७३.) । प्रथमान्तेभ्य एभ्यो वर्त्तन्ते इत्युपाधिभ्यः सप्तम्यर्थे इकण् स्यात् । नव यज्ञा अस्मिन् वर्तन्ते नावयक्षिकः । पाकयनिकः । नवयज्ञादयः प्रयोगगम्याः ॥७०||३० भावादिमः ॥७१॥ [सि०६१।२१] भावप्रत्ययान्तानिवृत्ते इम: स्यात् । सेकिमं फलम् ॥ ७१ ॥ "भावा०" सेकिममिति सेकेन निवृत्तमिति । एवं पाक्रिमं त्यागिमं रोगिमं फुट्टिमं संमूटिमम् । ३३ यत् 'भवर्गवर्णस्य'-इति इलोपं याधिला 'सनामाना'-दति हीन टिमगि रुतेऽपि शालीचादयो भवन्ति । परनुनरत्र भाममसीफ इति सिम्यम् ककरणम् ।

१०८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु-
अगादिशब्दात् “निर्वृत्तेक्षतादेः" (६४।२०) । तृतीयान्तेभ्य एभ्यो निवृत्त इंकण
स्यात् । अक्षयूतेन निवृत्तमाक्षयूतिकं वैरम् । जातामहतिकम् । अक्षयूत, जयामहत, जापहृत,
जवाप्रहार, पादखेद, पादखेदन, कण्टकमर्द, कण्टकमद्देन, शर्करामईन, गत, आगत, गतागत, यात,
उपयात, यातोपयात, गतानुगत, अनुगत, इत्यक्षातादयः सप्तदश ॥ “याचितापमित्यात्कण्"
५(६।४।२२)। आभ्यां नियुत्ते कण स्यात् । याचितेन याञ्चया निवृत्तं याचितकम् । अपमित्येति यवन्तम्,
अपमित्य प्रतिदानेन निर्वृत्तमापमित्यकम् ॥ "हरत्युत्सङ्गादेः” (६।४।२३)। तृतीयान्तेभ्य एभ्यो
हरत्यर्थे इकण् स्यात् । उत्सङ्गेन हरति औत्सङ्गिकः । उत्सङ्ग उत्तुप, (त्रुप,१) (उड्डुप, १) उडुप, उत्पुत,
उत्पुट, पिटक, पिटाक, इत्युत्सद्गादयोऽष्टौ । “भस्त्रादेरिक" (६।४।२४) । एभ्यस्तृतीयान्तेभ्यो
हरत्यर्थे इकट् स्यात् । भस्त्रिका, भखिकी । भत्रा, भरट, भरण, शीर्षभार, शीर्वभार, अङ्गभार,
१० अङ्गेभार, अंसभार, असेभार, इति भस्वादयो नव । “विवधवीवधाद्धा” (६२५) । इकट्,
हरत्यर्थे । विवधेन वीवधेन वा हरति विवधिकः विवधिकी, वीवधिक: वीवधिकी । पक्षे इकण-वैव-
धिकः । विवधवीवधशब्दो समानार्थों पथि पर्याहारे च वर्तते ।। "कुटिलिकाया अण" (६१४॥
२६) । अस्मात्तृतीयान्तात् हरत्यर्थेऽण् स्यात् । कुटिलिकाशब्देनावमा लोहादिमयी अङ्गारकर्षणी
यष्टिवा कुटिला गतिर्वा पलालोटक्षेपणोऽवको दण्डो वा परिव्राजकोपकरणविशेषो वा चौराणां नोय.
१५हाद्यारोहणार्थ दामामबद्ध आयसोऽांकुशो वोच्यते । कुटिलिकया हरत्यनारान् कौटिलिका कारः।
तया हरति व्याचं कौटिलिको मृगः । तया हरति पलालं कौटिलिकः कर्षकः । तया हरति पुष्पाणि
कौटिलिकः परिव्राजकः । तया हरति नावं कौटिलिकश्चौरः ॥ "ओजःसहोमसो वर्तते"
(६४२७) । एभ्यस्तृतीयान्तेभ्यो वर्त्तते इत्यर्थे इकण स्यात् । वृत्तिरात्मयापना चेष्टा वा । ओजसा
घलेन पर्तते औजसिकः । सहसा प्रहसनेन पराभिभवेन वा साहसिकः । अम्भसा जलेन आम्भ-
२० सिफः ॥ "तं प्रत्यनोर्लोमेपकूलात्" (६।४।२८)। (तेनेति निवृत्तम् ) प्रत्यनुभ्यां परो यो
लोमशब्द ईपशब्दः कूलशब्दश्च तदन्ताहितीयान्ताद्वर्त्तते इत्यर्थे इकण् स्यात् । प्रतिलोमं अनुलोम,
प्रतीप अन्वीपं, प्रतिकूल अनुकूलं, वर्तते इति प्रातिलोमिकः आनुलोमिकः, प्रातीपिकः आन्वीपिका,
प्रातिकूलिकः आनुकूलिकः । अकर्मकस्यापि वृत्तयोंगे प्रतिलोमादेः क्रियाविशेषणत्वाद्वितीयान्तत्वम् ।।
"परेर्मुखपात्" (६४।२९) परिपूर्वो यो मुखशब्दः पार्श्वशब्दश्च तदन्तात् क्रियाविशेषणात्
१५ वर्तते इत्यर्थे इकण् स्यात् । परिर्वर्जने सर्वतोभावे पा । स्वामिनो मुसं वर्जयित्वा वर्तमानोऽथवा
यतो यतः स्वामिमुसं ततस्ततो वर्तमानः पारिमुखिकः सेवकः । एवं पारिपार्श्विकः ॥ "रक्षदुञ्छतो."
(६।४।३०)। द्वितीयान्तादनयोरर्ययोरिक्ण स्यात् । समाज रक्षति सामाजिकः । सामवायिकः,
नागरिकः । पदराण्युन्छति उपिनोति वादरिकः ।। दौवारिक इति-"तत्र नियुक्ते" (६४
७४) । सप्तम्यन्तानियुक्तेऽर्थे इकण् स्यात् , नियुक्तोऽधिकृतो व्यापारित इत्यर्थः । प्रागुक्तस्य नियुक्त-
३० मिन्यस क्रियाविशेषणरूपसाव्यभिचारो नित्यमिति चाया, प्रकृत्यर्थविशेपणं पायं प्रत्ययार्थधायं रियुक्तः
इति । गुलशालायां नियुका शोकशालिका । आपणिका । आवरिका । आक्षपाटलिक इति ॥१॥
द्वारादेः ॥ ७२॥ [सि०७४।६]
एपो यो प्रागैदीतो स्याताम् । द्वारे नियुक्तो दौवारिका । निकटे पसति नकटिक' ।
समाने वीर्ये पसति सतीया । पन्यानं याति पविक पाया। नितिमाहिक
२५मित्यादि ॥७२॥

। प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । नियुक्ताद्यर्थाः ४०९ "द्वारा”। अयमर्थः-एपां द्वारादीनां यो यची तयोः समीपस्य स्वरेप्वादेः स्वरस्य तत्माप्तौ वृद्धि- प्रसङ्गे ताभ्यामेव प्राक् ऐद्रौतौ स्याताम् , मिणति तद्धिते परे । स्वरमधिकृत्य कृतो ग्रन्थः सौवरः। स्वर्भवः सौवः प्रायोऽव्ययस्य" (७४/६५) इत्यन्यस्वरादिलोपः ।। स्वस्तीत्साह सौवस्तिकः, अव्युत्पन्नोऽयम् । सुपूर्वस्य तु पूर्वेणैव सिद्धम् ।। एवमग्रेऽपि स्वादुमृद्रोऽपयं सौवादुमृदः । व्यल्कसे भवो वैयल्कसः । श्वो भवः शावस्तिकः ॥श्वस्तादिः" (६।३।८३) इति तिकण् । जुन इदं शौवनं मांसम् । स्फ्यकृतस्या-५ पत्यं स्फैयकृतः, ऋष्यण् । स्वस्येदं सौवम् । स्वाध्यायेन जयति साँवाध्यायिकः "तेन जित०" (६४२) इत्यादिनेकण् । स्त्रग्रामे भवः साँवग्रामिक:-अध्यात्मादित्वादिकण् 'वादेः' इति प्रतिपेधाद्वारादिपूर्वाणा- मपि भवति-द्वारपालस्यापत्यं दीवारपालिः "अत इच्” (६।११३१)। द्वारपाल्याः अपत्यं दीवार- पालिकः "रेवत्यादेरिकण्” (६।१।८६) । स्वराध्याये भवः सौवराध्यायिकः । स्वर्गमनमाह सौवर्ग- मनिकः, प्रभूतादित्वादिकण् । श्वादंष्ट्रायां भवः शौवादंष्ट्रो मणिः । शौवभन्नः (बोः समीपस्य वृद्धिप्राप्ता-१० विति विज्ञानात् वैयल्कस इत्यत्र वकारात्प्रागीकारो न भवति) । स्वपाठेनैव सिद्धे स्वाध्यायस्वग्राम- पाठात् स्वापतेयं स्वाजन्यमित्यादौ न भवति । द्वार, स्वर, स्वर्, स्वस्ति, स्वादुमृद्, व्यल्कस, श्वस्, श्वन , स्फ्यकृत, स्व, स्वाध्याय, स्वग्राम, इति द्वारादयो द्वादश ॥ "न्यग्रोधस्य केवलस्य" (४७) तथा । न्यग्रोधस्य विकारो नैयग्रोधो दण्डः । नैयग्रोधः कयायः । केवलस्येति किम् ? न्यग्रोधमूले भवाः न्यग्रोधमूलाः शालयः । इदमपि (न केवलं वादेः' इति निषेधः किन्तु केवलग्रहणमपीत्यर्थः) १५ द्वारादीनां तदादिविवेापकम् । न्यग्रोहतीति न्यग्रोध इति व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम् । केवलस्यैवेति अव्युत्पत्तिपक्षे विध्यर्थं वचनम् ।। "न्यकोवा” (७/१८) । न्यहोरिदं नैवङ्कवं न्यायम् । "न अस्वाङ्गादेः” (७४।९) अप्रत्ययान्तस्य स्वाङ्गादेच मिति तद्धिते परे बः प्रागंदौती न स्याताम् । ब-व्यावक्रोशी व्यावलेखी व्यावचर्ची व्यावहासी व्यात्युक्षी, "व्यतिहारेऽनीहादिभ्यो नः' (५।३। ११६) इति बः, ततो "नित्यं अभितोऽण्” (७३।५८) इत्यण । स्वाङ्गादि, स्वङ्गस्यापलं स्वाङ्गिः ।२० गतमित्याह स्वागतिकः । स्वध्वरेण चरति स्वाध्यरिकः । व्यवहारेण चरति व्यावहारिकः । व्यायामः प्रयोजनमस्याः व्यायामिकी विद्या । खंग, व्यंग, व्यड, स्वागत, स्वध्वर, व्यवहार, व्यायाम इति स्वाङ्गादयः सप्त ॥ अथ प्रकृतम् "अगारान्तादिकः” (६४१७५) । तत्र नियुक्तेऽर्थे । देवागारे , नियुक्तो देवागारिकः, देवागारिका । एवं भाण्डागारिकः २, आयुधागारिकः २, कोष्टागारिकः, कोप्टागारिका ।।२५ "अदेशकालादध्यायिनि" (६४७६ ) । अध्ययनस्य प्रतिषिद्धी यो देशकाली तद्वाचिनः सप्तम्यन्ताध्यायिन्यर्थे इकण् स्यात् । अदेझा. अशुचावण्याची आशुचिकः । इमझानेऽध्यायी इमाशा- निकः । इमाशानाभ्यासिकः । अकाल. सानिध्यकः । उल्कापातिकः । आनध्यायिकः ।। नकटिक इति "निकटादिपु वसति" (६।४।७७ ) । एभ्योऽस्मिन्नर्थ इकण् स्यात्, निकटे वसति नकटिकः । आरण्यकेन भिक्षुणा ग्रामात्कोशे वस्तव्यमिति यस्य झानितो वासः स एवोच्यते, तदर्थ एव च तत्रे-३० त्यधिकारे सप्तमीनिर्देशः । वृक्षमूले वार्भमूलिकः, श्माशानिकः, आभ्यवकाशिका, आवसधिकः । निक- टादयः प्रयोगगम्याः । १ अपनर्थः यदा व्युलतिपक्ष आधीयते तदा न्यशब्दसाधनकले या निमब्दात् प्रयना नदपेश्या निर्मपन्धिन .. रस्य पदान्तवत् तत्स्थान प्रादुर्भावात् , यस्यापि पदान्तले 'प्यः पदान्नान्' इत्यनेनैवेदागमे निदे गनीदं सूर्य नियमान् । भव्युत्पत्तिपक्षे तु यस्यापदान्तलान् यः पदान्तात्' इति न सिम्यतीति विपर्यम् । है. प्रा० पूर्वा० ५२ "नित्यं णः पन्धश्च" (६४८९) त्यमिति प्रत्ययाविशेषणम् । अस्माहितीयान्तानित्य यातील ४१० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- अन्न विशेषः "सतीयः" (६।४।७८) निपातोऽयम्, समाने तीयें वसति सतीय: । तीमिह गुरुरुच्यते ॥ "प्रस्तारसंस्थानतदन्तकठिनान्तेभ्यो व्यवहरति" (६४७९) । प्रस्तार- सस्थान इत्येताभ्यां एसदन्ताभ्यां कठिनान्ताच व्यवहरत्यर्थे इकण् स्यात् । व्यवहरतिरिह क्रियातस्वे प्रियाया अविपरीतस्वभावे-यथा लौकिको व्यवहार इति । प्रस्तारे व्यवहरति प्रास्तारिकः, सास्थानिकः । ५तदन्त कांस्यप्रस्तारिकः, लौहप्रस्तारिकः, गौसस्थानिकः, आश्वसस्थानिकः । कठिनान्त. वांशकठिनिक' वाईकठिनिकः । कठिन तापसभाजनं पीठ वा । बहुवचन कठिनान्तेति स्वरूपमहणव्युदासाथ रूद्ध्यर्थ च (रूढिश्च तापसभाजनेत्यादि तेन कठिने कठोरे न) । प्रस्तारसस्थानतदन्तेभ्यो नेच्छन्त्यन्ये ॥ "सङ्ख्यादेचाहंदलुचः" (६४।८०)। आ अर्हदोदित ऊर्ध्व या प्रकृतिरुपादास्यते तस्या पेवलायास्तदन्तायाश्च सख्यापूर्वीया पक्ष्यमाणः प्रत्ययः स्यादिति ज्ञेयम् । न चेत्सा लुगन्ता स्यात् । १० चन्द्रायणं चरति चान्द्रायणिकः । द्वे चन्द्रायणे चरति द्वैचन्द्रायणिकः । सयादेरिति किम् ' परमपारा- यणमधीते । (चकारः केवलार्थः)। आईदित्यत्राकारोऽभिविधौ, तेनाईदर्थेऽपि भवति-द्वे सहले द्विसहस्र पाईति द्विसाहस्रः। अलुच इति किम् ? द्वाभ्यां शूर्पाभ्यां क्रीतं द्विशूर्पम् अत्र "शूर्पाद्वान्” (६।४।१३५) इत्यम् "अनाम्यद्विाप्लुप्" (६।४।१४१) इति लुप् । द्विशूर्पण क्रीतं द्विशौर्पिक । पुनरपि शूर्पाद्वा- मियम् न भवति ॥ "गोदानादीनां ब्रह्मचर्ये" (६४८१) । एभ्यः षष्ठ्यन्तेभ्यो ब्रह्मचर्ये १५इकण् स्यात् । गोदानस्य ब्रह्मचर्य गौदानिकम् (आदित्यव्रतानामादित्यनतिकम् । महानानीना माहा- नाग्निकम् ) । येभ्योऽस्मिन्नर्थे इकण दृश्यते, ते गोदानादयः प्रयोगगम्याः॥ "चन्द्रायणं च चरति" (६।४।८०) चन्द्रायणशब्दाहितीयान्तागोदानादिभ्यश्च द्वितीयान्तेभ्यश्चरतीत्यर्थे इकण स्यात् । चन्द्रायण घरति चान्द्रायणिकः । गौदानिकः । महानाग्यो ऋचस्तत्साहचर्यात्तासा प्रतमपि महानाम्या, महा- नाम्नीनत घरति माहानाम्निकः ।। "देवव्रतादीन डिन्" (६।४।८३) । एभ्यो (निर्देशादेव ) द्विती- २० यान्तेभ्यश्चरत्यर्थे डिन् स्यात् । देवव्रत चरति देवव्रती। महाप्रती । एते प्रयोगगम्याः । डित्करण उत्तरत्र सफलम्॥ "डकश्चाष्टाचत्वारिंशतं वाणाम्" (६।४।८४)। वर्षसयन्धिनोऽष्टाचत्वारिंशच्छन्दा- द्रतवृत्तेद्वितीयान्ताचरतीत्यर्थे डकडिनो स्याताम् । अष्टाचत्वारिंशद्वर्षसहित प्रतमष्टचत्वारिंशत्, तचरति अष्टाचत्वारिंशकः । अष्टचत्वारिंशी । "चातुर्मास्यं तो य लुक च" (६४८५) अस्मागतपते- द्वितीयान्ताथरत्यर्थे डफडिनो स्याता, यलोपश्च स्यात् । पतुर्यु मासेषु भवानि “यो व्यः" (६।३।१३४) २५ इति ब्ये धातुर्मास्यानि नाम यज्ञाः, तत्सहचरितानि प्रतानि परति चातुर्मासपः पातुर्मासी ॥ क्रोश. योजनपूर्वाच्छतायोजनाचाऽभिगमाहे" (६।४।८६) प्रोशपूर्वायोजनपूर्वाच शतायोजनाए (निर्देशादेव) पञ्चम्यन्तादभिगमाहेऽर्थे इकण स्यात् । मोशशतादभिगमनमर्हति प्रौशशतिको मुनि । एवं योजनशतिकः योजनिकः । “तद्यात्येभ्यः" (६४/८७) । द्वितीयान्तेभ्य एभ्यो यातीत्यर्थे इषण, मोशशत याति प्रौशशतिको दृतः । एव योजनातिका योजनिकः । पधिक इति-"पथ इकद" ३० (६।४।८८) अस्माहितीयान्तावातीत्यर्थे इकट् स्यात् । पन्यानं याति पथिकः, पधियी । द्वौ पन्यानी याति द्विपथिकः । फटमयत्या इफट्ययन परत्वासमासान्ते कृतेऽपि यया स्यादित्सवमर्थम् ॥ पान्ध इति- - ॥ । ३३: स्यात् , पन्यादेशधास्य । नित्यं पन्यान याति पान्य., पान्यासीहो पन्थानो याति द्वैपन्या, देपन्या १ महानिरयमस्ति विनिमये-पात पाहात शतस्य यारत इति । अलि विशदे यथा परदारे पर इति मतिविप पा रास पाहतास किया-मार ति । मत्र किया समण प्रजान्तरविररीतखापरिपात प्रतिपरयम् ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । यातीत्याद्यर्थाः ४११ आदिशब्दोपादानात् “शङ्कत्तरकान्ताराजवारिस्थलजङ्गलादेस्तेनाहते च” (६४ ९०) । एतत्सप्तपूर्वात्तृतीयान्तात्पथिन्शब्दादाहृते याति चार्थे इकण् स्यात् । शपथैनाहृतो याति वा शानुपथिकः । एवं औत्तरपधिकः, कान्तारपथिकः, आजपथिकः, वारिपथिकः, स्थालपथिकः, जाङ्गलपथिकः ॥ "स्थलादेमधुकमरिचेऽण्" (६।४।९१) । स्थलपूर्वात्पचिन्नन्तात्तृतीयान्तादा- हृतेऽर्थेऽण् स्यात्, तच्चेदाहृतं मधुकं मरिचं वा स्यात् । स्थालपथम् , अन्यत् स्थालपथिकम् । “तुराय-५ णपारायणं यजमानाऽधीयाने" (६।४।९२) । आभ्यां द्वितीयान्ताभ्यामनयोरर्थयोरिकण् स्यात् । तुरायणं नाम यज्ञस्तं यजते तौरायणिकः । पारायणमधीते पारायणिकः । "संशयं प्राप्त ज्ञेये" (६।४।९३)। द्वितीयान्तादस्मात्प्राप्ते इकण् स्यात्, स चेत्प्राप्तोऽर्थो ज्ञेयः स्यात् । संशयं प्राप्तः सांशयिकः । सांशयिकोऽयमूवो न जाने स्थाणुरुत पुरुषो वेति । ज्ञेय इति किम् ? संशयितरि माभूत-सोऽपि संशयं प्राप्तो भवति, तस्य तत्र भावात् ॥ "तस्मै योगादेः शक्ते” (६।४।९४ ) ११० एभ्यश्चतुर्थ्यन्तेभ्यः शक्तेऽर्थे इकण् स्यात् । योगाय शक्तः यौगिकः । योग, सन्ताप, सन्नाह, सझनम, संयोग, संपराय, सङ्घात, सम्पाद, सम्पादन, सङ्कम, १० सम्पेप, संवेश, सम्मोहन, निष्पेप, निःसर्ग, निर्घोष, निसर्ग, विसर्ग, उपसर्ग, प्रवास, २० उपवास, सक्तु, मांस, ओदन, मांसौदन, सक्तुमांसौदन, २६ इति योगादयः पड्विंशतिः ॥ “योगकर्मभ्यां योऽकनौ" (६।४।९५) । आभ्यां चतुर्थ्य- न्ताभ्यां शक्तेऽर्थे यथाक्रम एतौ स्याताम् । योगाय शक्तो योग्यः । कर्मणे शक्तं कार्मुकम् । एवं १५ योगशब्दस्य द्वैरूप्यम् ॥ “यज्ञानां दक्षिणायाम्" (६।४।९६) । एभ्यः षष्ट्यन्तेभ्योऽस्मिन्नर्थे इकण् स्यात् । यज्ञकर्मकृतां वेतनादानं दक्षिणा । अग्निष्टोमस्य दक्षिणा आग्निष्टोमिकी । वाजपेयिकी, राज- सूयिकी, नावयज्ञिकी, पाञ्चौदनिकी, ऐकादशाहिकी, द्वादशाहिकी, द्वैवाजकोपेयिकी । बहुवचनं स्वरूप- विधिव्युदासार्थम् ।। "तेषु देये” (६।४।९७) । सप्तम्यन्तेभ्यो यज्ञेभ्यो देये इकण् स्यात् । अग्निष्टोमे देयं आग्निष्टोमिकं भक्तम् ॥ "काले कार्ये च भववत्” (६।४।९८)। सप्तम्यन्तात्कालवाचिनो २० देये कार्ये च भववत्प्रत्ययाः स्युः । वत्सर्वसादृश्यार्थः, ततो याभ्यः प्रकृतिभ्यो येन विशेषेण भवेऽर्थे प्रत्ययाः स्युस्ताभ्यस्तेन विशेषेण देये कार्ये चार्थे त एव प्रत्ययाः स्युः । यथा वर्षासु भवं वार्पिकम् , मासिकम् , नैशं नैशिकम् , चिरनं चिरन्तनम् , हेमन्तं हेमनम् । एवं वर्षासु देयं कार्य या वार्पिकमि- त्यादि । प्रत्ययस्य भावोऽत्रातिदिश्यते नाभाव इति द्विगोः परस्य लुप् न भवति । द्वयोर्मासयोर्दयं कार्य वा द्वैमासिकम् ।। "व्युष्टादिष्वण्" (६।४।९९) । एभ्यः सप्तम्यन्तेभ्यो देये कार्ये चार्थेऽण् २५ स्यात् । व्युष्टे देयं कार्यं वा वैयुष्ठम् , नैत्यम् । व्युष्टसाहचर्यान्नित्यशब्दः कालवाची गृह्यते, ततः "कालाध्वनोः" (२।२।४२) इति सप्तम्यपवादेन द्वितीया, नित्यं देयं कार्य चेति द्वितीयान्तादेव प्रत्ययः । अन्ये तु सप्तम्यन्तादपीच्छन्ति-निये विपुवति पड्भिश्चराचरैः मुहूत्तैरनाक्रम्यमाणे देयं कार्य वा नैत्यम् । न्युष्ट, नित्य, निष्क्रमण, प्रवेशन, तीर्थ, संग्राम, संघात, अग्निपद, पीलुमूल, प्रवास, उपवास, इति व्युष्टादय एकादश । बहुवचनादाकृतिगणोऽयम् ॥ “यथाकथाचाण्णः" (६४२० १००) । यथाकथाचशब्दोऽव्ययसमुदायोऽनादरेणेत्यर्थे, तस्माद्देचे कार्य णः स्यात् । यथाकथाच दीयते याथाकथाचम् । याथाकथाचा दक्षिणा ॥ "तेन हस्ताद्यः" (६।४।१०१) तृतीयान्तान् हस्तात् देये कार्ये चार्थे यः स्यात् । हस्तेन देयं कार्य वा हस्त्यम् ॥ "शोभमाने" (६४।१०२) तृतीयान्तादस्मिन् अर्थे इकण् स्यात् । कर्णवेष्टकाभ्यां शोभते कार्णवेष्टकिकं मुखम् । असमर्यनमसमा- सोऽप्यन स्यात्-कर्णवेष्टकाभ्यां न शोभते अकार्णवेष्टकिकम् ।। "कर्मवेपाद्यः" (६४४११०३) । आभ्यां तृतीयान्ताभ्यामुक्तेऽर्थ यः स्यात् । फर्मणा झोभते कार्मण्यं शार्यम् । वेपेश शोभते वेप्यो नटः । ३६ ४१२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्राग्वन्नमसमासोऽपि-अकर्मण्यः, अवेष्यः । केचिद्वेषस्थाने वेशं पठन्ति-वेश्या नर्तकी ॥ "काला- परिजय्यलभ्यकार्यसुकरे" (६४।१०४) । तृतीयान्तात्कालविशेषादेपु चतुःष्वर्थेषु इकण् स्यात् । तत्र परितो जेतुं शक्य परिजय्यम् । शक्ते कृत्यः, लभ्यकार्ययोः शक्तेऽहे वा । अकृच्छ्रेण क्रियते यत्तत्सुकरम् । मासेन परिजय्यो मासिको व्याधिः । मासेन लभ्यो मासिकः पटः । मासेन कार्य ५मासिक चान्द्रायणम् । मासेन सुकरो मासिकः प्रासादः॥ "आहिकमिति"-"निवृत्ते" (६४ा १०५)।तृतीयान्तात्कालाग्निवृत्तेऽर्थे इकण् स्यात् । अह्ना निर्वृत्तं आह्निकम् । एव मासिक सावत्सरिकम् । इत्यादिशब्दनिर्देशाच्च "तं भाविभूते" (६।४।१०६) । द्वितीयान्तात्कालाद्भाविनि भूते चार्थे इकण् स्यात् । स्वसत्ता व्याप्स्यमानः कालो भावी, व्याप्तो भूतः । मास भावी मासिकः उत्सवः । मास भूतो मासिको व्याधिः ॥ "तस्मै भृताधीष्टे च" (६।४।१०७) । तार्थ्यचतुर्थ्यन्ताका- १० लान् भृतेऽधीष्टे चार्थे इकण स्यात् । भृतो वेतनेन क्रीतः । अधीष्टः सत्कृत्य व्यापारितः । मासाय भृतः मासिकः किङ्करः-मास कर्मणे भृत इत्यर्थः । मासाय अधीष्टः मासिक उपाध्यायः-मासमध्ययना- याधीष्ट इत्यर्थः । एव वार्षिक इत्यादि । चकारोऽनन्तरोक्तसूत्रत्रयस्याप्युत्तरनानुवृत्त्यर्थः ॥ "पण्मासा- दवयसि ण्येकौ" (६।४।१०८)। अस्मादवयसि गम्येऽनन्तरोक्तसूत्रनयविपये ण्येको स्याताम् । पशि- मौसैनिर्वृत्तः, पण्मासान भावी, भूतो वा, पड्भ्यो मासेभ्यो भृतोऽधीष्टो वा, पाण्मास्यः, पाण्मा- १५ सिकः । अवयसीति किम् ? पण्मासान् भूतः पण्मास्य:-"पण्मासाद्ययणिकण्” (६।४।११५) इति यः ॥ "समाया ईनः" (६४.१०९) । समाशब्दानिर्वृत्ताद्यर्थपञ्चकविपये ईनः स्यात् । समया निर्वृत्तः, समा भूतो भावी वा, समायै भृतोऽधीष्टो वा समीनः । “रान्यहः संवत्सराच द्विगोर्वा" (६।४।११०)। राज्यादिनयान्तात्समासान्ताच्च द्विगोनिवृत्तादिपञ्चकविपये ईनो या स्यात् । द्वाभ्या रात्रिभ्या नियुत्तो वे रानी भूतो भावी वा, द्वाभ्यां रात्रिभ्या भृतोऽधीष्टो वा द्विरात्रीणः । एवं २० व्यहीनः, द्विसवत्सरीणः, द्विसमीनः । पक्षे इकण-द्वैरात्रिकः, द्वैयहिकः ॥ द्वैयहिक इति तु ब्यहश- ब्दात् समाहारद्विगोरिकणि भवति । द्विसावत्सरिक:-"मानसवत्सर०" (७४।१९) इत्यादिनोत्तर- पदवृद्धिः । द्वैसमिकः । राज्यन्तादहरन्ताच परमपि समासान्त बाधित्वाऽनवकाशत्वादीन एव भवति, तथा च समासान्तसन्नियोगे उच्यमानः “सर्वाशसङ्ख्याव्ययात्" (७३।११८) इत्यहादेशो न भवति । समासान्तापूर्वेण निसे प्राप्त शेपेभ्योऽआप्ते विकल्पः ॥ “वदश्च वा" (६४।१११) । २५ कालवाचिवर्पशब्दान्ताहिगोः प्रागुक्तपश्चकविपयेऽकारश्चकारादीनश्च वा स्यात्, पक्षे इकण् । एव भैरूप्यम् । द्वाभ्या वर्षाभ्या निवृत्तो द्वौ वर्षी वे वर्षे वा भूतो भावी वा, द्वाभ्या वर्षाभ्या भृतोऽधीष्टो या द्विवर्षः, द्विवणिः, द्विवार्पिकः "सल्याधिकाभ्या वर्पस्याभाविनि" (७४।१८) इत्युत्तरपद पृद्धिः । भाविनि तु प्रतिषेधान् द्वैवार्षिक: ॥ "प्राणिनि भूते" (६।४।११२) कालवाचिवर्षश- ब्दान्ताहिगोभूते अः स्यात् , स चेद्भूतः प्राणी स्यात् । द्वे वर्षे भूतो द्विवर्षों दारकः । त्रिवर्षो धत्सः । ३० प्राणिनीति किम् ? द्विवर्पः, द्विवर्षीणः, द्विवार्षिकः सरकः । भूत इति किम् ? शेषेपर्येषु पूर्वेण विश्ल ण्य । एवमुत्तरेष्वपि त्रिपु पूर्वेण विकल्पे प्राप्त नित्यार्थो विधिः । “मासाद्वयसि यः" (६४. ११३) । मासान्ताविगोभूतेऽर्थे यः स्यात्, वयसि गम्ये । द्वो मासी भूतो दिमासः । ययसीति किम् । २३वैमासिको व्याधिः । "ईनच" (६४११४) । द्विगोरिति निवृत्त योगविभागात् । माससन्दात १ रात्रिसदार 'समातेक'-इत्यनेन प्रप्तम्, भातु 'साश' इत्यनेन । २ अन्यया पश्यन्ताहरन्टाभावान भाति । एसेसरि मोतिष्ये, पानामनिसवत् । ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । भूताद्यर्थाः ४१३ " " भूतेऽर्थे ईन चंकाराद्यश्च स्यात् , वयंसि गम्ये । मासं भूतो मासीनो मास्यो दारकः । अकारो वृद्धिहेतुत्वेन पुंवद्भावाभावार्थ:-मासीना स्वसाऽस्य मासीनास्त्रसृकः । “षण्मासाद्ययणिक” (६।४।११५)। अस्माद्भूतेऽर्थे एते स्युः, वयसि गम्ये । पण्मासात् भूतः पण्मास्यः । “सोऽस्य ब्रह्मचर्यतद्वतो. (६।४।११६) प्रथमान्तात्कालवाचिनः पष्ठ्यर्थे इकण् स्यात् , तच्चेद्ब्रह्मचर्य ब्रह्मचारी वा स्यात् । मासोऽस्य ब्रह्मचर्यस्य मासिकं ब्रह्मचर्यम् । आर्द्धमासिकम् , सांवत्सरिकम् । मासोऽस्य ब्रह्मचारिणो मासिको५ ब्रह्मचारी (मासं ब्रह्मचर्यमस्येत्यर्थः) "प्रयोजनम्” (६।४।११७) । प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थे इकण् स्यात् , तच्चेत्प्रयोजनं स्यात् । प्रयोजनं प्रयोजकं प्रवर्तकं जनकमुत्पादकम् । जिनमहः प्रयोजनमस्य जैनमहिकम् , दैपोत्सविकं गानम् । “एकागाराचौरे" (६।४।११८) । एकमगारं प्रयोजनमस्य ऐका- गारिकश्चौरः, ऐकागारिकी । चौरे नियमनात् एकागारं प्रयोजनमस्य भिक्षोरिति वाक्यमेव ।। "चूडा. दिभ्योऽ" (६।४।११९)। प्रागुक्तार्थे । चूडा प्रयोजनमस्य चौडं श्राद्धम् (चूला चौलम् । उपनयनम् १० औपनयनम् । श्रद्धा श्राद्धम् ) । एते प्रयोगगम्याः । “विशाखाषाढान्मन्थदण्डे" (६।४।१२०)। आभ्यामुक्तार्थेऽण् स्यात्, यथाक्रम मन्थे दण्डे चाभिधेये । मन्थो विलोडनं दण्डो वा, विशाखा प्रयोजनमस्य वैशाखो मन्थः । आपाढा आपाढे आपाढाः प्रयोजनमस्य आपाढो दण्डः ॥ "उत्था- पनादेरीयः” (६।४।१२१) यथोक्तार्थे । उत्थापनं प्रयोजनमस्य उत्थापनीयः । उत्थापन, उपस्था- पन, अनुप्रवचन, अनुवाचन, अनुवदन, अनुवादन, अनुपान, अनुवासन, आरम्भण, समारम्भण, १५ इत्युत्थापनादयो दश ॥ "विशिरुहिपदिपूरिसमापेरनात्सपूर्वपदात्” (६।४।१२२) । अन- प्रत्ययान्तेभ्य एभ्यः पञ्चभ्यः सपूर्वपदेभ्यो यथोक्तार्थे ईयः स्यात् । गृहप्रवेशनं प्रयोजनमस्य गृहप्रवे- शनीयं गानमुत्सवादिकं वा, एवं संवेशनीयम् । प्रासादारोहणीयम् , आरोहणीयम् , अश्वप्रपदनीयम्, प्रपापूरणीयम् , अङ्गसमीपनीयम् , व्याकरणसमीपनीयम् ।। “स्वर्गस्वस्तिवाचनादिभ्यो यलुपो" (६।४।१२३) । स्वर्गादिभ्यः स्वस्तिवाचनादिभ्यश्चोक्तार्थे यथासङ्ख्यं यप्रत्ययो लुप् च स्याताम् । स्वर्गः२० प्रयोजनमस्य स्वय॑म् , यशस्यम् , आयुष्यम्, काम्यम्, धन्यम् , म्यम्, धन्यम् , स्वस्तिवाचनादिभ्य इकणो लुप्- स्वस्तिवाचन प्रयोजनमस्य स्वस्तिवाचनम् , शान्तिवाचनम्, । एते उभयेऽपि प्रयोगगम्याः । गणद्व- योपादानाद्वचनभेदेऽपि यथासङ्खयम् ॥ "समयात्प्राप्तः” (६।४।१२४) । सोऽस्येत्यनुवर्त्तते । अस्मात्प्रथमान्तात्पष्ठ्यर्थे इकण् स्यात् । स चेत्प्रथमान्तः प्राप्तः स्यात् । समयः प्राप्तोऽस्य सामयिक कार्यम् , उपनतकालमित्यर्थः ॥ "ऋत्वादिभ्योऽण" (६।४।१२५) । उक्तार्थे । ऋतुः प्राप्तोऽस्य २५ आर्तवं पुष्पम् । उपवस्ता प्राप्तोऽस्य औपवत्रम् [ उपोपितपारणके यद्भक्ष्यद्रव्यं तदीपवन्नम् । यद्वै- दिकम्-'मापाण्मधुमसूरांश्च वर्जयेदौपवनके पुरुपस्तूपवस्ता] । एते प्रयोगगम्याः ॥ "कालाद्यः" (६।४।१२६) । उक्तार्थे । कालः प्राप्तोऽस्य काल्यो मेघः ॥ "दीर्घः" (६।४।१२७) । स चेत्कालो दीर्घः स्यात्तदास्मादुक्तार्थे इकण् स्यात् । दीर्घः कालोऽस्य कालिकमृणम् । कालिकी संपन् । योगविभा- गादधिकृत इकण् ॥ "आकालिकमिकश्चाद्यन्ते" (६४१२८) । इकान्तमिकणान्तं चैतग्निपा-३० त्यते । आकालशब्दाद्भवत्यर्थे एतौ स्यातामित्यर्थः । आदिरेव यद्यन्तः स्यात् यस्मिन्काले यत्प्रवृत्तमन- ध्यायादि, तस्मिन्नेव काले प्रत्यावृत्ते यदि तदुपरमेत । उत्पत्तिक्षण एव वा यद्विनश्यति तस्यादिरेवान्तः स्यात् । आकालं भवति आकालिकोऽनध्यायः-पूर्वद्युर्यस्मिन्काले तृतीये चतुर्थे वा चामे प्रवृत्तः, पुनर- परेयुरपि आ तस्मात्कालाद्भवन्नाकालिकोऽनध्याय उच्यते (आकालिका आकालिकी वा वृष्टिः) । इकेकणोः स्त्रियां विशेषः । आकालिका आकालिकी वा विद्युन्-आजन्मकालमेव भवन्ती जन्मानन्तर- विनाशिनीत्यर्थः । एवं देवाप्चादिरेवान्तो भवति । निपातनमादायन्ते चति द्वन्द्वनिवृत्त्यर्यम्, अचत्रा ३६ - E . - ११४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- निपातनस्पेष्टविषयत्वादाचन्तयोर्वर्तमानात्समानकालाप्रथमान्तात्पष्ध्यर्थे इकेको, अस्स चाकालादेशः समानकालावाद्यन्तावस्याऽकालिकोऽध्यायः । आकालिकी आकालिका विद्युत् । समानकालता चाय- न्तयोः प्राग्वद्वेदितव्या ।। ७२ ।। मूल्यैः क्रीते ॥ ७३ ॥ [ सि० ६४१५० ] ५ मूल्यार्थाद्वान्तात्क्रीतेऽर्थे इकणादयः स्युः । प्रास्थिकम् ।। ७३ ।। "मूल्यैः०" । पदान्तादिति तृतीयान्तादित्यर्थः । प्रस्थेन क्रीतं प्रास्थिक इति-एवं सप्तत्या साप्ततिकं आशीतिकं नैष्किकं पाणिकं पादिकं त्रिंशकं विंशकं शवं शतिकम् । मूल्यैरिति किम् ? देवदत्तेन क्रीतम्, पाणिना क्रीतम् ।वृत्तौ सयाविशेपानवगमाहिवचनबहुवचनान्तान भवति-प्रस्थाभ्यां प्रथैर्वा क्रीतमिति । यन तु सहयाविशेषायगमे प्रमाणमस्ति तत्र भवत्येव-द्वाभ्यां क्रीतं द्विकम्, द्वाभ्यां प्रस्थाभ्यां क्रीतं १.द्विप्रस्थम् , यथा वा मुद्रैः क्रीतं मौद्रिकम् , मापिकम् । नटेकेन मुद्देन मापेण वा क्रया सम्भवति ॥ आदिशब्दोपादानात् "तस्य वापे" (६४१५१)। पष्ठ्यन्ताद्वापेऽर्थे यथाविधि कणादयः स्युः । उप्यतेऽस्मिन्निति पापः क्षेत्रम्, प्रस्थस्य वापः प्रास्थिकम् , द्रौणिकम् , मौद्रिकम् , शत्यम् , शतिकम्, सारीकम् । “वातपित्तश्लेष्मसन्निपाताच्छमनकोपने" (६४१५२) । एभ्यः षष्ठ्यन्तेभ्यः शमने कोपने चार्थे इकण स्यात् । शाम्यति येन तच्छमनम् , कुप्यति येन वत्कोपनम्, वातस्य शमनं १५ कोपनं वा वातिकम् । पैत्तिकं श्लैष्मिकं सान्निपातिकम् । पथ्यमपथ्यं वा द्रव्यायेवमभिधीयते, प्रकर. णातु विशेषगतिः । “हेतौ संयोगोत्पाते" (६४१५३) पष्ठयन्ताद्धतावर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् , योऽसौ हेतुः स चेत् संयोग उत्पातो वा स्यात् । हेतुनिमित्तम् , सयोगः संबन्धः । प्राणिनां शुभाशुभसूचको महाभूतपरिणाम उत्पातः । शतस्य हेतुरीश्वरसंयोगः शत्यः, शतिकः, साहस्रः । सोममणस्य हेतुरुत्पातः सौमप्रहणिको भूमिकम्पः । सामामिकमिन्द्रधनुः । सौभिक्षिकः परिवेपः । २० शतस्य हेतुर्दक्षिणाक्षिस्पन्दनं शत्य शतिफम् । साहस्रम् । “पुत्रायेयो" (६।४।१५४ ) पुत्रस्य हेतुः संयोग उत्पातो वा पुज्यः, पुत्रीयः । "द्विखरब्रह्मवर्चसाद्योऽसयापरिमाणाचादेः' (६१४१५५)। सयापरिमाणावादिवर्जाद्विस्वरात्राम्लो ब्रह्मवर्चसशब्दाच पध्यन्ताद्धतावर्षे यः स्यात्, स चेहेतुः संयोग उत्पातो या स्यात् । इकणादीनामपवादः । धनस्य हेतुः संयोग उत्पातो वा धन्यः । यशस्यः, आयुष्यः, यात्या विद्युत् । ब्रह्मवर्चसस्य हेतुः संयोग उत्पातो वा ब्रह्मवर्चस्यः । कथं गोतुः २५संयोग उत्पावो या गव्यः द्विस्वराभावात् ? उच्यते "गोः स्वरे यः" (६।१।२७) इति भवति । प्रसवर्चसग्रहणमद्विस्वरार्यम् । सद्ध्यादिवर्जनं किम् ? पश्चानां हेतुः संयोग उत्पातो वा पदकः । प्रास्थिकः । सारीकः । "ऊर्ध्व मानं किलोन्मानं परिमाणं तु सर्वतः । आयामस्तु प्रमाणं स्यात् साहा पाहा तु सर्वतः" ॥ १॥ एवं आश्विकः, गाणिकः । अश्व, गण, यसु, वन, ऊर्णा, उमा, मन्ना, यर्षा, (अश्मन् ? ) इत्यश्वादयोऽष्टौ ॥ "पृथिवीसर्वभूमरीशज्ञातयोवाम् ( ६।४।१५६) । ३० आभ्यां पाटपन्ताभ्यां ईशशातयोरर्थयोतस्य हेतुः सयोग उत्पात इत्यस्मिन् विपये थान स्यात् । ईशः स्गमी । पृथिव्या ईशः पार्थियः, सर्वभूमेः सार्यमोमः, सर्वभूमेनुशतिकादित्यादुमयपतिः । पिया सातः पार्थिवः कर्तरि पठीसयन्धविवक्षायां वा । एवं सार्वभौमः । पृथिव्या हेतुः सयोग उ पातो पा पार्थियः । एवं सार्वभौमः । ईशसाठयोरिति द्विवचनं हेतुविशेषणत्वाशययच्छेदार्थम् । (हेतुविशेषणत्ये संयोग उत्पाद ईशात्पर्षचतुष्पं विज्ञायते तदेतुः संयोग उत्पान ईशे ज्ञातो ३५मा मयतीन्पर्यः सान्) । "लोकसर्वलोकात् नाते" (६४१५७)। औत्सर्गिक इकार वान् । -- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । ज्ञाताचीः ४१५ लोकस्य ज्ञातः लौकिकः । एवं सार्वलौकिकः । अनुशतिकादित्वादुभयपदवृद्धिः n "तदत्रास्मै वा वृद्ध्यायलाभोपदाशुक्लं देयम्" ( ६।४११५८ ) । प्रथमान्तात्सप्तम्यर्थे चतुर्थ्यर्थे वा यथाविहितं प्रत्ययः स्यात्, यत्प्रथमान्तं तचेत् वृद्ध्यादिकं स्यात् ॥ तत्र अधमर्णेनोत्तमय गृहीतधनातिरिक्तं देयं वृद्धिः । प्रामादिपु स्वामिग्राह्यो भाग आयः । पटादीनामुपादानमूल्यातिरिक्तं प्राप्तं द्रव्यं लाभः । उपदा उत्कोचः, लंच उत्कोट इति यावत् । वणिजां रक्षानिर्देशो राजभागः शुक्लम् ।। पञ्चास्मिन् शते ५ वृद्धिः पञ्चकं शतम् । पञ्चास्मिन् ग्रामे आयः पञ्चको ग्रामः । पञ्चास्मिन् पटे लाभः पञ्चकः पटः। पश्चास्मिन् व्यवहारे उपदा पञ्चको व्यवहारः । पञ्चास्मिन् शते शुक्ल पञ्चकं शतम् । एवं शत्यं शति- कम् ।। पश्चास्मै देवदत्ताय वृद्ध्यादिकं देयं पञ्चको देवदत्तः । एवं शत्यः शतिकः साहस्रः प्रास्थिकः ।। वृद्धयादिग्रहणं किम् ? पञ्च मूल्यमस्मिन्नस्मै वा दीयते ॥ “पूरणा दिकः” (६।४।१५९) पूरण- प्रत्ययान्तादर्द्धशब्दाच प्रथमान्तादस्मिन्नस्मै वा दीयते इत्यर्थयोरिकः प्रत्ययः स्यात् , यत्प्रथमान्तं तद्-१० ध्यादि चेद्भवति । इकणिकटोरपवादः (पूरणप्रत्ययान्तेभ्य पूर्वेणेकण् , अर्द्धात्तु 'कंसार्द्धात्' इतीकट)। द्वितीयमस्मिन्नस्मै वा वृद्ध्यादिकं देयं द्वितीयिकः । तृतीयिकः, पश्चिक, पष्टिकः अर्द्ध. अर्द्धिकः, आर्टिका स्त्री । अर्द्धशब्दो रूपकार्द्ध रूढः ॥ "भागाद्यको" (६४।१६०) । तथैव । इकणोऽप- वादौ । भागोऽस्मिन्नस्मै वा वृद्ध्यादीनामन्यतमं देयं भाग्यः, भागिकः, भागिका स्त्री । भागशब्दोऽपि रूपकार्द्धस्य वाचकः ॥ "तं पचति द्रोणाद्वाऽ” (६।४।१६१) । द्वितीयान्ताद्रोणशब्दात्पचत्य-१५ थेऽञ् वा स्यात् , पक्षे इकण् । द्रोणं पचति द्रौणः, द्रौणिकः, द्रौणी, द्रौणिकी, स्थाली गृहिणी वा। द्वौ द्रोणी पचति द्विद्रोणी "अनाम्यद्विः प्लुप्' (६।४।१४१) इत्यविकणोल्प् । “सम्भवदवह- रतोश्च" (६।४।१६२)। द्वितीयान्तात्पचत्यर्थे सम्भवदवहरतोश्वार्थयोर्यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । तत्राधेयस्य प्रमाणानतिरेकेण धारणं सम्भवः, अतिरेकेणावहारः । प्रस्थं पचति सम्भवति अवहरति वा प्रास्थिकः कटाहः । प्रास्थिकी स्थाली । एवं खारीकः । सम्भवतिरकर्मकः सकर्मकश्च सम्भवति, तत्र २० सकर्मक इह ग्राह्यः-सम्भवत्यवगृहातीत्यर्थः । चकारः पचतः सम्भवदवहरतोः समुच्चयार्थस्तेनोत्तर- त्रार्थत्रयस्यानुवृत्तिः ।। "पाम्राचिताढकादीनो वा” (६।४।१६३) । एभ्यो द्वितीयान्तेभ्यः पचत्सम्भवदवहरत्स्वर्थेपु ईनः स्यात्-पात्रं पचति सम्भवति अवहरति वा पात्रीणः । पक्षे इकण- पात्रिकः । पात्रीणा । पात्रिकी स्थाली । आचितीना आचितिकी । आढकीना आढकिकी । पात्रादयन- योऽपि परिमाणवाचिनः शब्दाः ॥ "द्विगोरीनेकटौ वा” (६।४।१६४) पात्राद्यन्ताहिगोह्निती-२५ यान्तात्पचदाद्यर्थत्रये इनेकटी वा स्याताम् । पक्षे इकण, तस्य च "अनाम्यद्विः प्लुप्” (६।४।१४१) इति लुप्, नानयोर्विधानसामर्थ्यात् । द्वे पात्रे पचति सम्भवत्यवहरति वा द्विपात्रीणः द्विपात्रिका द्विपात्रः; द्विपात्रीणा द्विपात्रिकी द्विपात्री । व्याचितीना याचितिका ब्याचिता । आचितान्तात् डीन भवति-अविस्ताचितकम्बल्यादिति प्रतिपेधात्-ब्याढकीना, व्याढकिकी, व्याढकी । टकारो ड्यर्थः । "कुलिजाद्वा लुप् च” (६।४।१६५) । कुलिजान्ताहिगोर्द्वितीयान्तात्पचदाद्यर्थत्रये ईनेकटौ वा ३० स्याताम् ; पक्षे 'इकण , तस्य लुप् वा स्यात् । तेन चातूरूप्यं सम्पद्यते । द्वे कुलिजे पचति सम्भवत्यव- हरति वा द्विकुलिजीना, द्विकुलिजिकी; पक्षे द्विकुलिजी, द्वैकुलिजिकी । लुपि "परिमाणे०” (२।३१२३) इत्यादिना डीः । अन्ये तु लुप् विकल्पं न मन्यन्ते, तन्मते त्रैरूप्यमेव ॥ "वंशादेर्भाराद्धरद्वह-३३ १ यथा प्रस्थोऽत्र सम्भवति माति नातिरिच्यत इति अकर्मकः । प्रस्थमयं सम्भवत्सवगृह्णाति, न निर्वमति नातिरेचयतीति चमकः । २ नजाकणाषः, क्रेन नानाथमिस्सस्सामवत्तिः ।

शतिका, ४१६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- दावहत्सु" (६।४।१६६)। वंशादिभ्यः परो यो भारशब्दस्तदन्ताहितीयान्तानाम्नो हरति वहति आवहति चार्थे यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । वंशभारं हरति वहति आवहति वा वांशभारिकः ।। अप- रोऽर्थः-भारभूतेभ्यो वंशेभ्यो हरदादिष्वर्थेषु यथाविहितं प्रत्ययाः स्युः । भारभूतान्वंशान्हरति वहति आवहति वा वांशिकः । कौटिकः । वाल्वजिकः ॥ भारादिति किम् ? एक वंशं हरति । हरतिर्देशा- ५न्तरप्रापणे चौर्ये वा, वहतिरुक्षिप्यधारणे, आवहतिरुपादने । वंश, कुट, कुटज, वल्वज, मूल, स्थूणा, अक्ष, अश्मन् , इक्षु, खट्दा, लक्ष्ण, इति वंशादय एकादश ॥ "द्रव्यवस्लात्केकम्" (६।४।१६७) द्रव्यवस्नाभ्यां द्वितीयान्ताभ्यां वहदादिषु विष्वर्थेषु यथासङ्ख्यं केको प्रत्ययौ स्याताम् । द्रव्यं हरति वहति आवहति वा द्रव्यकः । एवं वस्निकः ॥ "सोऽस्य भृतिवलांशम्" (६।४।१६८) । स इति प्रथमान्तादस्येति षष्ठ्यर्थे यथाविहितमिकणादयः स्युर्यत्प्रथमान्तं तच्चेद् भृतिर्वस्नमंशो वा भवति । १० तन भृतिवेतनम्, वस्नो नियतकालक्रयमूल्यम् , अंशो भागः । पञ्चास्य भृतिः पञ्चकः कर्मकरः । पञ्चास्य वस्त्रं पञ्चकः पटः । पञ्चास्यांशाः पञ्चकं नगरम् ॥ एवं सप्तकः, अष्टकः, शत्या, साहस्रः, प्रास्थिकः ॥ ७३ ॥ मानम् ॥ ७४ ॥[ सि० ६३३१६९ ] अमात्प्रथमान्तात्पध्यर्थे इकणादयः स्युः । द्रोणो मानमस्य द्रौणिको राशिः ॥ ७४ ॥ १५ "मानम्" अस्मादिति मानवाचिनः । मीयते येन तन्मानं प्रस्थद्रोणादि, संख्यापि च । द्रोणो मान• मस्य द्रौणिको राशिरिति-एवं प्रास्थिकः, खारीकः, खारीशतिकः खारीसाहसिकः । वर्षशतं वर्षसहस्रं मानमस्य वार्पशतिको वार्षसाहस्रिको देवदत्तः । पञ्च लोहितानि पञ्च लोहिन्यो वा मानमस्य पाश्च• लोहिनिकम् , पाश्चकलायिकम् , अनयोः सज्ञाशब्दत्वात् “अनाम्यद्विः प्लुब्०" (६।४।१४१) इति लुब् न भवति । मासो वर्ष मानमस्येत्यादौ तु प्रत्ययो न स्यात्-मानमहणेन कालस्याग्रहणात्तदपि २० "मानसंवत्सरस्स०" (७४।१९) इत्यादी मानग्रहणे सत्यपि संवत्सरग्रहणात् ॥ अत्रादिशब्दग्रहणात् “जीवितस्य सन्” ( ६।४।१७०) । जीवितस्य यन्मानं ततः प्रागुक्तार्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात्, स च सन्, तस्य "अनान्यद्विाप्लुबि"ति लुप् प्राप्ता न भवतीत्यर्थः । पष्टिर्जीवितमानमस्य पाष्टिकः । साप्ततिकः, वार्षशतिकः, वासाहतिकः । द्वे पष्टी जीवितमानमस्य द्विपाष्टिकः, त्रिषाष्टिका, द्विवार्पशतिकः, द्विवार्पसाहनिकः । वृत्तौ वर्षशब्दलोपात्पध्यादयो जीवितमान २५ भवति-यथा शतायुर्वं पुरुप इति । प्रास्थिक इत्यादौ ब्रीह्यादय एव मेयास्त एव प्रत्ययार्थोऽत्र तु जीवित मेयम्, पुरुपस्तु प्रत्ययार्थ इति "मानमिति" सूत्रेण न सिद्ध्यतीति वचनं लुबभावार्थ च ॥ "सहयायाः सङ्घसूत्रपाठे" (६।४।१७१) । सहावाचिनः प्रथमान्तादस्य मानमित्यर्थे यथा- विहितं प्रत्ययः स्यात्, यत्तदस्येति निर्दिष्टम् , तथेत्सवः सूत्रं पाठो वा स्यात् । सङ्घः प्राणिनां समूहः । सूत्रं शास्त्रमन्थः । पाठोऽधीतिरध्ययनम् । पञ्च गावो मानमस्य पञ्चकः सतः । सप्तकः ॥ अष्टावध्याया ३० मानमस्य अष्टकं पाणिनीय सूत्रम् । दशकं वैयाघ्रपदीयम् । शतकं निदानम् । अष्टौ रूपाणि यारा मान- मस्याष्टकः पाठोऽधीत:-"सायाडते." (६४।१३०) इति कः। सवादाविति किम् ? पञ्च पर्णा मानः मस्य पन्नतयं पदम् । इदं न सहो न सूत्रं न पाठ इति को न भवति, अपि तु सयडेय । एवं चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः, पञ्चादीनां साहयेयानामवययतया सहादेमीनत्वान्मानमित्यनेनय सिध्यति, परत्वात तपद प्राप्नोति, तदाघनाथ वचनम् । न पातिप्रसङ्ग सद्दे याच्ये क एवेति ] अभेदरूपारने ३५सहादी तयटो पापनामिदम् । भेवरूपापने तु तयडेव-प्रतुष्टये प्राक्षणक्षत्रियविशुद्रा इति । , , प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः। मानाद्यर्थाः ४१७ स्याहादातु भेदाभेदसम्भव इति ॥ "नान्नि" (६।४।१७२) । सहयावाचिनस्तदस्य मानमित्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् , समुदायश्चेन्नाम भवति । पञ्चेति सङ्ख्या मानमेपां पञ्चकाः शकुनयः । त्रिकाः शालकायनाः । सप्तका ब्रह्मवृक्षाः । अष्टका राजर्षयः । योगविभागात्संज्ञायां पञ्चैव पञ्चकास्त्रय एव त्रिका इति स्वार्थ एव वा प्रत्ययः स्यात् ॥ ७४ ॥ विंशत्यादयः ॥ ७५॥ [सि० ६४।१७३] एते निपात्यन्ते । द्वौ दशती मानमेपां विंशतिः । एवं त्रिंशदादयः । “पञ्चदशद्वर्गे" वा (६४।१७५)। पञ्चद्दशत्पश्चको दशको वा वर्गः ।। ७५ ।। "विंश०" । एते निपात्यन्ते इति-नाम्नि विपये, तदस्य मानमित्यर्थे इति शेपः । विंशतिरिति सहये- यविवक्षया विंशतिर्घटाः, सङ्ख्यान विवक्षया विंशतिर्घटानामिति । द्वेर्दशदर्थे विम्भावः शतिश्च प्रत्ययः । एवं त्रिंशदादय इति-त्रयो दशतो मानमेपां सद्ध्येयानामस्य वा सङ्ख्यानस्य त्रिंशत् । एवं सर्वत्र ज्ञेयम् । १० "आ दशभ्यः सया सहयेय एव, विंशतेः प्रभृति च सङ्ख्या सङ्घयेये सङ्ख्याने चेति त्रेनिम्भावः शञ्चप्रत्ययः । चतुरश्चत्वारिम्भावः शच्चप्रत्ययः-चत्वारो दशतो मानमेपामिति चत्वारिंशत् । पञ्चन आत्वं च, पञ्च दशतो मानमेपां पञ्चाशत् । पपस्तिः पप् च, पट् दशतो मानमेपां पष्टिः । सप्तनस्तिः सप्त दशतो मानमेपां सप्ततिः । अष्टनोऽशीश्व, अष्ट दशतो मानमेषामशीतिः । नवनस्तिः, नव दशतो मानमेपां नवतिः । दशनः शभावस्तश्च प्रत्ययः, दश दशतो मानमेपां सङ्ख्येयानामस्य वा सङ्ख्यानस्य शतं १५ घटा घटानां वा । एवं दश शतानि मानमेषां सङ्ख्येयानामस्य वा सङ्घयानस्य सहस्रम् । एवं दशसहस्रा. ण्ययुतम् । दशायुतानि नियुतम् । दश नियुतानि प्रयुतम् । दश प्रयुतान्यऽर्बुदम् । दशार्बुदानि न्यर्बुदम् । बहुवचनाल्लक्षकोटिखर्वनिखर्वादयो भवन्ति [ दशायुतानि लक्षम् , दश प्रयुतानि कोटिः, दशाज्ञानि खर्वम् , दश वर्वाणि निखर्वम् , ] । यत्र लक्षणेनानुपपन्नं तत्सर्व निपातनात् सिद्धम् । लिङ्गसङ्ख्यानियमश्च विशत्याद्याशतादिति सिद्धः ॥ अत्रादिशब्दोपादानात् "चॅशं चात्वारिंशम्” (६।४।१७४ ) नान्नि विपये एतौ डण्प्रत्य- यान्तौ निपात्येते । त्रिंशदध्याया मानमेषां त्रैशानि, चात्वारिंशानि कानिचिदेव ब्राह्मणान्युच्यन्ते। "पञ्च' तदस्य मानमित्यस्मिन्विपये वर्गे अभिधेये डत्प्रत्ययान्तौ तौ वा निपात्येते, पक्षे को भवति । पञ्च मान- मस्य पञ्चत् पञ्चको वा वर्गः । एवं दशत् दशको वा वर्गः ॥ आदिशब्दात् “स्तोमे डट् (६।४।१७६) सहयावाचिनः प्रथमान्तात्तदस्य मानमिति विपये २५ स्तोमेऽभिधेये डट् स्यात् । ऋगादीनां समूहः स्तोमः । पञ्चदश ऋचो मानमस्य पञ्चदशः स्तोमः । एवं पञ्चविंशः । त्रिंशः । पञ्चदशी पङ्गिः । डकारोऽन्त्यस्वरादिलोपार्थः । टकारो ड्यर्थः॥ ७५ ॥ तमहति ॥ ७६ ॥ [सि० ६।४।१७७] द्वितीयान्तादहत्यर्थे इकणादयः स्युः । विषमर्हति वैपिकः । नित्यं *छेदमर्हति छैदिकः । विरागस्य विरङ्गादेशे विरङ्गिकः । “(दण्डादेयः)" (६।४।१७८) । दण्डमहतीति दण्ड्यः । ३० अर्थ्यः। क्रीतादयश्चत्वार आहेदर्थाः-"त्रिंशद्विशतेर्डकोऽसंज्ञायामाहदथें" (६४।१२९) त्रिंशता क्रीतो यावत्रिंशतमर्हति त्रिंशकः । “विंशतेस्तेर्डिति” (७४।६७) । लुक् । विंशका पटः॥ ७६॥ है. प्रका० पूर्वा० ५३ २० my , मामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचितें सौंपज्ञहैमलघु- "तम०" 1 वैपिक इति-एवं श्वैतच्छत्रिका, वाखिकः, वास्त्रयुगिकः । भोजनमर्हति पानमहतीत्या- दापनभिधानान्न भवति । *छेदमित्यादि "छेदादेर्नित्यम्" (६४।१८२) । नित्यमित्यर्हतीत्यस्य विशेषणम् । एभ्यो द्वितीयान्तेभ्यो नित्यमहत्यर्थे यथाविहितं प्रत्ययः स्यात् । छैदिक इति-एवं भैदिकः । छेद, भेद, द्रोह, दोह, नर्त, गोनत, कर्प, विकर्ष, प्रकर्प, विप्रकर्ष, प्रयोग, (विप्रयोग?) सम्प्रयोग, ५प्रेक्षण, संप्रयोगप्रेक्षण (१) संप्रश्न, विप्रश्न, इति छेदादयः पोडश॥ विरगिक इति-"विरागाद्विरङ्गश्च" (६।४।१८३ ) अस्माद्वितीयान्तान्नित्यमहत्यर्थे इकण, विरङ्गादेशश्च । नित्यं विरागमहति वैरगिक इति ।। "शीर्पच्छेदाद्यो वा" (६४।१८४) । शीर्पच्छेद नियमहति शीर्पच्छेद्यः शेर्पच्छेदिकः ॥ "दण्डा." एभ्यो द्वितीयान्तेभ्योऽहत्यर्थे यः स्यात् । दण्ड्यः । आदिशब्दात् “यज्ञादियः" (६।४।१७९) । अस्मादर्हत्यर्थे इयः स्यात् । यज्ञमर्हति यज्ञियो १० देशः, यजमानो वा । यज्ञो नाम क्रियासमुदायः, कश्चित्तदभिव्यगयं चाऽपूर्वम् । (वा पूर्वम् ? ) इत्याहुः । "पात्रात्तौ" (६।४।१८०) । ताविति य इय प्रत्ययौ । पात्रमर्हति पान्यः पात्रियः । “दक्षिणाक- डगरस्थालीविलादीययो" (६।४।१८१) । एभ्यनिभ्योऽहत्यर्थे एतौ स्याताम् । दक्षिणामर्हति दक्षिणीयो दक्षिण्यो गुरुः । कडगरीयः कडङ्गों गौः, कडगरं मापादिकाष्ठम् ।स्थालीविलीयाः स्यालीवि. ल्यास्तण्डुलाः, पाकाहा॑ इत्यर्थः । "शालीनकौपीनाविजीनम्” (६।४।१८५)। एते त्रयोऽहत्यर्थे १५ ईनन्प्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । शालाप्रवेशनमर्हति, ईनन् , प्रवेशनशब्दस्य च लुरु, शालीनोऽधृष्टपर्यायः । कूपप्रवेशनमर्हति कौपीनः, कौपीनशब्दः पापकर्मणि गोपनीयपायूपस्थे तदापरणे च चीवरसण्डे वर्त्तते [उपस्थशब्देन सर्ववस्तूनां मध्यभागोऽभिधीयते इति गुह्यप्रतिपत्त्यर्थं गोपनीयग्रहणम् ] | ऋत्विा- ब्दात् ऋत्विकर्मशब्दाद्वा ईन, कर्मशब्दलोपश्च निपात्यः, ऋत्विजमर्हति आत्यिजीनो यजमानः ऋत्वि- फार्हति आर्पिजीन:-ऋत्विगेव । *क्रीतादयश्चत्वार इति–उपलक्षणमात्रमेतत् , अन्यथा तेन "मूल्यैः २० फ्रीते" (६।४।१५०) इत्यस्मादारभ्य "तमहती"ति सूत्रं यावत् येऽर्थाः "तस्य वापे" (६।४। १५१) "तं पचतिद्रोणा०" (६।४।१६१) इत्यादयते सर्वेऽप्याईदर्था ज्ञेयाः । प्रकृतिप्रत्ययविभचयादि- नियमस्तु यथासूनं ज्ञेयः । "त्रिंश" आभ्यामाईदर्थे डकः स्यात् , कापवादः । असक्षायामिति किम् ? निशकम् ॥ "विंश"। सूत्रं स्पष्टम् ।। ७६ ॥ सहयाडतेश्चाशत्तिप्टेः कः ॥ ७७ ॥ [सि०६४।१३०] २५ शदन्तत्यन्तध्यन्तपर्जसझयाया उतैत्रिंशद्विशतिभ्यां चाईदर्थे कः स्यात् । द्विकं शिकं विंश- तिक कतिकं यावत्कम् । *डतेः पृथग्रहणं त्यन्तप्राप्त निषेधपरिहाराय । अशत्तिरिति किम् ? चात्वारिंशत्कम् । साप्ततिकम् । पाष्टिकम् । “सहस्रशतमानादण" (६१३६)। आईदथें । साहसः। शातमानः ॥ ७७॥ "सामा०" । द्वाभ्यां त्रिंशता विशत्या फतिभिर्यावद्भिः प्रीतं द्विमित्यादि । कतियायतोः, "हत्यतु ३० सालायत्" ( १।१।३९) इति साहात्यम , *हतेः पृथग्रहणमित्युपलक्षणम्, तेन अपत्तिष्टेरिति प्रतिपेपे प्राप्ते दतिशिद्विशतीनामुपादानमित्यपि शेयमा पात्यारिंशत्कमिति एवं पाश्वाशलम, सामतिकम् इति-आचातिरं, नापति, पाष्टिकम् ।। आदिसन्दात् "शतात्केवलादतस्मिन्येको" (६४।१३१) । अलादेती सातार, २४लिन्-स घेदयों परनुनः प्रन्यादभिभो न भयनि । तेन क्रीन शयं शातिरम् । फैसलादिति रिन् ? अब ४१९ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः 1 आईदीः- युत्तरशतं द्विशतम् । तेन क्रीतं द्विशतकम् । सङ्ख्यादेश्वार्हदलुच इति प्राप्नोति । अतस्मिन्निति किम् ? शतं मानमस्य शतकं स्तोत्रम्-अत्रहि प्रकृत्यर्थ एव श्लोकाध्यायशतं प्रत्ययान्तेनाभिधीयते इति, अन्यस्मिंस्तु झते भवत्येव-शतेन क्रीतं शाटकशतं शयं शतिकम् ॥ “वातोरिका" (६।४।१३२)। अत्वन्तसङ्ख्याया आदर्थे इकः स्यात्, वा । यावता क्रीतं यावतिकं यावत्कम् । तावतिक तावत्कम् । विधानसामर्थ्या- नेकरलोपः । “कार्षापणादिकट् प्रतिश्चास्य वा” (६।४।१३३ ) । आदर्थे अस्मादिकट , अस्य च कापणस्य प्रति इत्यादेशो वा स्यात् । कार्पापणिकं कार्पापणिकी, प्रतिकम् प्रतिकी । चकार आदेशस्य प्रत्ययसन्नियोगशिष्टत्वार्थः, अत एव द्विगोर्खपि प्रकृत्यादेशो न स्यात्-द्विकार्पापणम् । अस्येति स्थानिप्रतिपत्त्यर्थम् , अन्यथा प्रतिः प्रत्ययान्तरं विज्ञायेत । टकारो ड्यर्थः । “अात्पलकंसक- र्षात्” (६।४।१३४) । अर्द्धपूर्वात्पलादित्रयादाईदर्थे इकट् स्यात् । अर्द्धपलिकं अर्द्धपलिकी, अर्द्धकं- सिकं २, अर्द्धकर्षिकं २ ॥ "कंसात्” (६।४।१३५) । आभ्यामाईदर्थे इकट् स्यात् । कंसिकं १० कंसिकी, अर्द्धिकं २ । “सहस्र०” । अबमकृत्वाविधानं "नवाण" (६।४।१४२) इत्येवमर्थम् । अत्र विशेपास्त्वेवम् । “सूर्पाद्वाऽ” (६।४।१३७) । आईदर्थे । इकणोऽपवादः । शोप्पं शौर्पिकम् । शूर्पण मानविशेषेण क्रीतमित्यर्थः । “वसनात्” (६।४।१३८) । अस्मादञ् स्यात् । वसनेन क्रीतं वासनम् । “विंशतिकात्" (६।४।१३९) । प्राग्वत् । विंशतिर्मानमस्य विंशतिकम् , तेन क्रीतं वैशतिकम् । योगविभाग उत्तरार्थः ।। "दिगोरीन:” (६।४।१४०) विंशतिकान्ताहिगो-१५ राहदर्थे ईनः स्यात् । अनोऽपवादः । विधानसामर्थ्यादस्य लुप् न स्यात् । द्वाभ्यां विंशतिकाभ्यां क्रीतं द्विविंशतिकीनम् । अध्यर्द्धन विंशतिकेन क्रीतं अध्यर्द्धविंशतिकीनम् । अर्द्धपञ्चमेन विंशतिकेन क्रीतं अर्द्धपञ्चमविंशतिकीनम् । अध्यौद्धपञ्चमशब्दयोः सङ्ख्यावद्भावेनात्र द्विगुप्राप्तिस्तत्र च सूत्रपद्धतिरेवम्-“कसमासेऽध्यर्द्ध" (१।११४१)। कप्रत्यये समासे च विधेये अध्यर्द्धशब्दः सङ्ख्यावत् स्यात् । अध्यर्द्धन क्रीतं अध्यर्द्धकम् २० "सङ्ख्याडतेः०" इति कः । अध्यर्द्धन सूर्पण क्रीतं अध्यर्द्धसूर्पम्-अत्र सङ्ख्यापूर्वत्वेन द्विगुत्वे "अनान्यद्विः प्लुप्” (६।४।१४१) इतीकणो लुप् । कसमास इति किम् ? सङ्घादिप्रत्ययविधौ न भवति ॥ "अर्द्ध- पूर्वपदः पूरण" ( ११११४२) । समास एव पूर्वपदोत्तरपदव्यवस्था, ततोऽर्द्धपूर्वपदः पूरणप्रत्य- यान्तः शब्दः के प्रत्यये समासे च विधातव्ये सङ्ख्यावत्स्यात् । अर्द्धपञ्चमकम् अर्द्धपञ्चमसूर्पम् ॥७७॥ अनाम्याद्विः प्लुप् ॥ ७८ ॥ [सि० ६।४।१४१] द्विगोराहदर्थे जातस्य प्रत्ययस्य प्लुप् स्यात् , न तु द्विः, अनाम्नि । द्वाभ्यां कंसाभ्यां क्रीतो द्विकंसः ॥ ७८ ॥ ( इत्याहदावधिः । "अना०" । द्विकंस इति द्वाभ्यां कंसाभ्यां द्विकंस्या वा क्रीतो द्विकंसः एवं त्रिकंसः अध्यर्द्धकंस: अर्द्धपश्चमकंसः द्विसूर्पः । अद्विरिति किम् ?. द्वाभ्यां सूप्पीभ्यां क्रीतं द्विसूर्पम् अन् लुप्, द्विसूण ३० क्रीतं द्विसौर्पिकमत्रेकणो क्रीते लुब् न स्यात् । अनानीति किम् ? पञ्च लोहिन्यः परिमाणमस्य पाश्च- लोहितिकम् "जातिश्च णि.” (३।२।५१) इत्यादिना पुंवद्भावः । पञ्च कलायाः परिमाणमस्य पाञ्च- कालायिकम् । परिमाणविशेषनाम्नी एते, अत एव "मानसंवत्सर०” (७४।१९) इत्यादिना नोत्तर- पदवृद्धिः। लुपः पित्त्वात् पञ्चभिर्गीिभिः. क्रीतः पञ्चगर्ग , इत्यनेकणो लुपि "क्यमानिमित्त द्धिते" ३४ C : २५ , ४२० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- (३।२।५०) इति पुंवद्भावः । सहयान्ताहिगोलपं नेच्छन्त्येके-द्वाभ्यां पष्टिभ्यां क्रीतं द्विपाष्टिकम् त्रिपाष्टिकमिति ॥ अत्र विशेपास्त्वेवम्-"नवाण:" (६।४।१४२)। द्विगोः परस्याईदर्थस्याणः पिल्लुप् वा स्यादतिः। द्वाभ्यां सहस्राभ्यां नीतं द्विसहस्रं द्विसाहस्रम् । अण इति किम् ? हौ द्रोणौ पचति द्विद्रोण: "तं पचति ५द्रोणाद्वाऽन्” (६।४।१६१) इत्यम् , तस्य "अनान्यद्विः प्लुप्” इति नित्यं लुप्॥ "सुवर्णकार्षाप- णात्' (६।४।१४३) । तदन्ताहिगोराहदर्थविहितप्रत्ययस्य प्राग्वल्लुब् वा स्यात् , न तु द्विः । द्वाभ्यां सुवर्णाभ्यां क्रीतं द्विसुवर्ण द्विसौवर्णिकम् । द्विकार्षापणिकम् , द्विप्रतिकम् , द्विकार्षापणम् । "द्वित्रि. बहोर्निष्कविस्तात्" (६।४।१४४ ) । एभ्यः परौ यो निष्कविस्तौ तदन्ताद्विगोराईदर्थे उत्पन्नस्य प्रत्ययस्य लुप् वा स्यात् , न त्वद्विः । द्विनिष्कं द्विनैष्किकम्, त्रिनिष्कं निष्किकम् , बहुनिष्कं यहु- १० नैष्किकम् । द्विविस्तं द्विवैस्तिकम्, त्रिविस्तं त्रिवस्तिकम् बहुविस्तं बहुवैस्तिकम् ॥ "शताया" (६४१४५)। शतान्ताहिगोराईदर्थे यो वा स्यात् ; पक्षे सञ्जयालक्षणः कस्तस्य लुप् स्यादस्य तु विधानसामर्थ्यान्न स्यात् । द्वाभ्यां शताभ्यां क्रीतं द्विशत्यं द्विशतम्, अध्यर्द्धशत्यं अध्यर्द्धशतम् , अर्द्ध- पाठशत्यं अर्द्धपष्ठशतम् ॥ "शाणात्" (६।४।१४६) शाणान्ताहिगोराईदर्थे यो वा स्यात्, पझे इकण तस्य लुप् । अस्य तु विधानसामर्थ्यान्न । पञ्चशाणम् । योगविभाग उत्तरार्थः ॥ "विण्यादेर्या १५ऽण् पा" (६।४।१४७) द्वित्रिपूर्वो यः शाणशब्दस्तदन्ताहिगोराईदर्थे याणौ वा स्याताम् , याग्रह णमुत्तरत्र वानिवृत्त्यर्थम् । द्वाभ्यां शाणाभ्यां फ्रीतं द्विशाण्यं द्वैशाणम् , पक्षे इकण् तस्य लुप्-द्विशाणम्, एवं त्रैरूप्यम् ॥ "पणपादमापाद्यः" (६४।१४८) एतदन्ताहिगोराईदर्थे यः स्याद्विधानसाम• च्चास्य न लुप् । द्वाभ्यां पणाभ्यां क्रीतं द्विपण्यम्, द्विपाद्यम् , द्विमाध्यम् । माषपणसाहचर्यात्पाद परिमाणं गृह्यते, न प्राण्यगम्, तेन "हिमहतिकापिये पद्" (३।२।९६) इति पद्भावो न भवति- २० तत्र प्राण्यद्गस्यैव प्रहणात् । यद्वा पादसम्बन्धी यकारस्तत्र गृह्यते, अयं तु द्विगुसम्बन्धीति न भवति ।। "खारीकाकणीभ्यः कच्” (६।४।१४९) एतदन्ताहिगोर्यहुवचनात्केवलाभ्यां सारीफाफीभ्यां पाईदर्थे कच् स्याद्विधानसामर्थ्याचास्य न लुप् । द्वाभ्यां सारीभ्यां क्रीतं द्विसारीकम् द्विकाकणीकम् । सार्या फ्रीतं सारीकं काकणीकम् । चकारो "न कचि" (२१४१०५) इति प्रतिषेधार्थः ॥ ७८ ॥ प्रत्ययस्येवमिकणोऽधिकारः पूर्णतामितः । यप्रत्ययोऽयाधिकृतो विशेपविषयं विना ॥ १ ॥ वहति रथयुगमासङ्गात् ॥ ७९ ॥ [सि० ७.१२ ] एभ्यो द्वितीयान्तेभ्यो वहत्यर्थे यः स्यात् । रथं वहति रथ्यः ॥ "धुरो यैयण" (७१।३)। धुर्यः धौरेयः ।। "यामाद्यादेरीनः" (अश) यामधुरीणः ॥"हलसीरादिकण्” (७।१।६) हालिका सरिकः ॥ "शकटादण्” (७१११) शाकटः ॥ हृद्यधर्म्यपद्यादयः साधवः ।। "नौविषेण तार्यवध्ये” (७१२) । नाल्या नदी । विष्यः शत्रुः ॥ "न्यायादिनपेते" ३०(७।१।१३)। यः । न्यायादनपेतं न्याय्यम् । अर्यम् ॥ ७९ ॥ "यह०" रव्य इति एवं द्वौ रयो यहति द्विरथ्यः, युगं यहति युग्यः, फालविशेष युगं यहति मनुष्य इरादो स्यनभिधानान भवति । "कुप्यभिद्या" (पा१।३९) दिनिपातनादेय युग्य इति सिद्ध इदमयंविषक्षयामण्यापनार्य युगपदणम्, यो हि युगं यहति स युगसंयन्धी भयतीति । प्रसन्यते इति ३५मासमा, पत्साना दमनशाले पत्याएं स्कन्धे भासग्यते वदानि स प्रारामः । पत्यन्यायसहाराग - , प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । वहतीत्याधर्थाः ४२१ प्रासङ्गमिति तद्वहतीत्यनानभिधानान्न भवति । ननु यो रथं वहति स रथस्य वोढा भवति, तत्र "रथा- त्सादेश्च वोढुङ्गे" (६।३।१७५) "यः" (६।३।१७६) इत्येव सिद्धम् , तत्कि रथग्रहणेन ? सत्यमलुवर्थ तु तस्य ग्रहणम् , तेन हि ये विधीयमाने "द्विगोरनपसे यस्वरादे बहिः” (६१२४) इति लुपा भवितव्यम्-द्वयो रथयोर्वोढा द्विरथः । अनेन तु विधीयमाने न भवति-अप्रागजितीयत्वात् । एवं च द्विगौ रूपद्वयं भवति ॥ "धुरो०” द्वितीयान्ता शब्दावहत्यर्थे यैयणौ स्याताम् । एयण वेत्यकृत्वा५ यग्रहणमिदमर्थविवक्षायां वहत्यर्थेऽण्वाधनार्थम् । यो हि यति स तस्य संवन्धी भवतीति । कश्चित्तु यट्-एयकणावपीच्छति, तन्मते धुर्यः । स्त्रियां टित्वात् ङीः-धुरी । धौरेयकः ॥ "वामा." वामादिपूर्वाद्भुरन्ताहितीयान्ताद्वहत्यर्थे ईनः स्यात् । वामा धूर्वामधुरा, समासान्तादाप्; तां वहति वामधुरीणः । सर्वधुरीणः, उत्तरधुरीणः, दक्षिणधुरीणः । वामादयः प्रयोगगम्याः । सर्वधुर्य इत्यत्र यप्रत्ययोऽपीति कश्चित् । धुरीण इति केवलादपीन इत्यन्यः ॥ अनायं विशेष: "अश्चैकादेः” १० (७४५)। एकादेधुरन्ताद्वहत्यर्थे अः स्यात् , चकारादीनश्च । एका एकस्य वा धूः एकधुरा । एक- धूरस्मिन्नेकधुरम् , तां तद्वा वहति एकधुरः एकधुरीणः ॥ "हल०” द्वितीयान्ताद्वहत्यर्थे इति वर्तते । हलं वहति हालिकः । एवं सैरिकः ॥ "शक.” शकटं वहति शाकटो गौः । ननु च "तस्येदम्" (६१३।१६० ) इति शकटादण् "हलसीरादिकण्" इति हलसीराभ्यामिकण च सिद्ध एव, यो हि यद्वहति स तस्य संवन्धीति ? सत्यम्-रथवदेव तदन्तार्थमुपादानम् , तेनात्रापि द्विगौ द्वैरूप्यं भवति-१५ द्वयोः शकटयोः हलयोः सीरयोर्वा वोढा द्विशकटः द्विहलः द्विसीरः । द्वे शकटे हले सीरे वा वहति द्वैशकटः द्वैहलिकः द्वैसीरिकः । अन्ये तु शकटहलसीरेभ्य इदमर्थविवक्षायां प्रत्ययमिच्छन्ति, न वहत्यर्थे; तन्मते द्विशकट इत्येव भवति । हलसीराभ्यां तु तदन्तविधि नेच्छन्त्येव । अत्रादिशब्दसंसर्गात् "विध्यत्यऽनन्येन" (७११८)। द्वितीयान्ताद्विध्यत्यर्थे यः स्यात्, स चेद्विध्यन्नात्मनोऽनन्येन करणेन विध्यति । पादौ विध्यन्ति पद्याः शर्कराः । अरव्याः कण्टकाः । उरस्या २० वाताः । अनन्येनेति क्रिम् ? चौरं विध्यति चैत्रः-अत्र हि चैत्रश्चौरं विध्यन् धनुरादिना विध्यति । शर्करादयस्तु न करणेन विध्यन्ति । यच्च मुखतैक्ष्ण्यादिकरणम् , तत्तेपामात्मनो नान्यत् ॥ "धन- गणाल्लब्धरि" (७१।९) 1 आभ्यां द्वितीयान्ताभ्यां लब्धयर्थे यः स्यात् । धनं लब्धा धन्यः, गणं लब्धा गण्यः । लब्धेति तृन्नन्तम् ॥ "णोऽन्नात्” (७।१।१०) प्रागवत् । अन्नं लब्धा आन्नः ।। *हृद्यपद्यादयः साधव इति-"हृद्यपद्यतुल्यमूल्यवश्यपथ्यवयस्यधेनुष्यागार्हपत्यजन्य-२५ धर्म्यम्” (७।१।११) । एते शब्दा यथास्वमर्थविशेपेपु यान्ता निपात्यन्ते । हृदयात्पष्ट्यन्ताप्रियेऽर्थे बन्धने वशीकरणमत्रे च हृद्य इति निपात्यते, हृदयस्य ग्रियो यो देश इति, हृदयस्य बन्धनो हृद्यो वशीकरणमत्रः, "हृदयस्य हृल्लासलेखाण्ये” ( ३।२।९४) इति हृदादेशः, निपातनस्य रुढ्यर्थत्वात् हृदयस्य प्रियः पुत्र इत्यादौ न स्यात् । पदशब्दात्प्रथमान्तात् दृश्यत्वोपाधिकादस्मिन्निति सप्तम्यर्थे यः स्यात्, पदमस्मिन् दृश्यं पद्यः कर्दमः-नातिद्रवो नातिशुष्को यत्र प्रतिविम्बोत्पत्त्या पदं दृश्यते । तुला-३०. शब्दात्सम्मितेऽर्थे यः स्यात् । तुलया सम्मितं तुल्यं भाण्डम् ; निपातनं रूढ्यर्थम् , तेन न तुलासम्मित एवोच्यते किन्तु सदृशार्थोऽपि तुल्यशब्दः-गिरिणा तुल्यो हस्ती ।। मूलात्प्रथमान्तात्षष्ठ्यर्थे यः स्यात् , तञ्च यात्पाटनयोग्यं भवति, मूलमेपामुत्पाट्यं मूल्या मुद्गाः । तृतीयान्ताचानाम्ये समे च-मूलेनानाम्य मूल्यम् , मूलं पटाद्युत्पत्तिकारणम् , तेनानाम्यं यत्तत्पटादेर्विक्रयात्प्राप्यते सुवर्णादि तन्मूल्यम् , मूलेन समो मूल्यः पटः, उपादानेन समानफल इत्यर्थः । वशशब्दाद्वितीयान्ताद्गतेऽर्थे यः स्यात्, वशगन्तो ३५ . . यः, १२२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते.खोपनहैमलघु- चश्यो गौविधेयः, इच्छानुवर्तीति यावत् ; निपातनं सुव्यर्थं तेनेह न भवति-वशङ्गतः इच्छो प्राप्तः; अभिप्रेतं गत इत्यर्थः । पधिन्शब्दादनपेते यः, पथोऽनपेतं पथ्यं ओदनादि, निपातनादिह न भवति- पथोऽनपेतं शकटादि । वयःशब्दात्तृतीयान्तात्तुल्येऽर्थे यः, वयसा तुल्यो वयस्यः ससा; निपातनादिह न भवति-वयसा तुल्यः शत्रुः । धेनुशब्दाद्विशिष्टायां धेनौ यः पोऽन्तश्च धेनुष्या, या गोमता अगोपालायाधमणेन चोत्तमय आ ऋणप्रदानादोहार्थं धेनुर्दीयते सा धेनुरेव धेनुष्या; पीतदुग्घेति यस्याः प्रसिद्धिः 'पीतदुग्धा धेनुष्ये'ति वचनात् । गृहपतिशब्दात्तृतीयान्तात्संयुक्तेऽर्थे व्यः, गृहपतिना संयुक्तो गाईपत्योऽग्निविशेपः, निपातनादन्यत्र न भवति । जनीशब्दाद्वधूवाचिनो द्वितीयान्ताद्वहत्सु अभिधेयेपु जनशब्दाच पष्ठ्यन्ताजल्पेऽर्थे यः, जनीं वहन्ति जन्याः, जामातुर्षयस्याः, जनस्य जल्पो जन्यः; निपातनादन्यत्र न भवति । धर्मशब्दातृतीयान्तात्प्राप्येऽर्थे पञ्चम्यन्ताच्चानपेते धर्मण १० प्राप्यं धर्म्यम् ; धर्मादनपेतं च धर्म्यम् , यद्धर्ममनुवर्तते । “नौवि०" | आभ्यां तृतीयान्ताभ्या- मनयोरर्थयोर्यः स्यात् । नावा नार्या नाव्या नदी । विषेण वध्यो विध्यः शत्रुरिति ॥ "न्याय" आभ्यां पञ्चम्यन्ताभ्यामनपेतेऽर्थ यः स्यात् ॥ आदिशब्दात् “मतमदस्य करणे" (७।१।१४) आभ्यां पष्ठ्यन्ताभ्यां करणेऽर्थे यः स्यात् । इष्टं साम्यं ज्ञानं मतिर्वा मतशब्देनोच्यते । मतस्य करणं मत्यम् । मदस्य करणं मद्यम् ॥ ७९ ॥ तत्र साधौ ॥ ८०॥[सि०७।१।१५] सप्तम्यन्तात्साधौ यः स्यात् । सभ्यः ॥ “पर्पदो एयणी" (७१।१८)। साधौ । पार्षयः पार्पदः । पारिपद्यः पारिपदः ॥ "सर्वजनाण्ण्येनौ" (७१२१९) । साधौ । सार्वजन्यः सार्वजनीनः । *पथ्यादेरेयण्-पाथेयम् । आतिथेयी ॥ "ण्योतिथेः” (७।१।२४)। आति- थ्यम् ॥ ८०॥ "तत्र" | साधुः प्रवीणो योग्य उपकारको वा । सभ्य इति-एवं सामान्यः, कर्मण्यः, शरण्य इत्यादि । अत्रेदं ज्ञेयम्-"तद्धितयस्वरऽनाति" (२।४।९२) व्यञ्जनात्परस्यापत्यस्य यस्य यकारा दावाकारादिवर्जितखरादौ च तद्धिते लुरु स्यात् । गाग्र्ये साधुर्गार्यः । गार्यस्यापत्यं गार्गीयः । अनातीति किम् ? गार्यायणः ॥ "प" पर्पदि साधुः पार्पद्यः, पार्पदः ॥ परिपदोऽपीच्छन्त्यन्ये- पारिषद्यः पारिपदः ॥ "सर्व०” स्पष्टम् ॥ आदिशब्दात् "प्रतिजनादेरीनम्" (७१।२०)। २५प्रतिजने साधुः प्रतिजनीनः । इदंयुगे साधुः ऐदंयुगीनः । प्रतिजन, अनुजन, विश्वजन, पाञ्चजन, महाजन, इदंयुग, सयुग, समयुग, परयुग, परकुल, परस्यकुल, अमुप्यकुल, इति प्रतिजनादयो द्वादश ॥ "कथादेरिकण" (७।१।२१) । काथिकः । कथा, विकथा, विश्वरुथा, संकथा, वितण्डा, जनेवाद, जनवाद, जनोवाद, भृशोवाद, जनभृशोवाद, पृत्ति, संप्रह, गुण, गण, आयुर्वेद, गुड, फुल्माप, गुल्मास, इक्षु सक्तु, वेणु, अपूप, मांसौदन, मांस, ओदन, संघात, संवाद, प्रयास, ३० निवास, उपयास, इति फयादयोऽष्टाविंशतिः । *पथ्यादेरिति-"पध्यतिथिवसतिस्खपतेरेयण" (७१।१६) । एभ्यः साधौ एयण् स्यात् । पघि साधौ पाथेयम् , आतिथेयम्, पासतेयम् । स्वापतेयम् । आतिथेयी रात्रिः ॥ एवं "भक्ताण:" (७१।१७) । भक्त साधुः भाक्तः शालि।। - इति सावधिकारः । १८ ३६ ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । तदर्थीद्यर्थाः ४२३ , आदिशब्दात् “देवतान्तात्तदर्थे” (१।२२) । अर्थाचतुर्थ्यन्ताधः प्रत्ययः । अग्निदेवतायै इदं अग्निदेवत्यम् । देवता नाम देयस्य हविरादेः प्रतिगृहीता स्वामी संप्रदानमुच्यते । “पाद्यायै (७१।२३)। एतौ निपात्यौ । पादार्थमुदकं पाद्यम्-निपातनात्पादस्य पद्भावः । अर्थो मूल्यं पूजनं वा; अर्घार्थ रत्नमय॑म् ॥ "ण्यो०" अतिथ्यर्थमातिथ्यम् । *( इति तदर्थाधिकारः । "सादेश्चातदः" (७१।२५) । अधिकारसूत्रमेतत् , इत आरभ्य "तद्” (७१।५०) इति सूत्रम् यावद्योऽवधिः स केवलस्य सादेश्च ज्ञेयः ।। "हलस्य कर्षे” (७।१।२६) । पष्ठ्यन्तात्केवला- सादेश्च हलात्कऽर्थे यः स्यात् । हलस्य को हल्या हल्यो वा । द्वयोहिल्या, परमहल्या, बहु- हल्यः । यत्र हलं कृष्टं (गतमित्यर्थः) सं मार्गः कर्पः । कृप्यत इति कर्पः क्षेत्रमित्यन्ये ॥ "सीतया सङ्गते” (७१।२७) । सीत्यम् । द्वाभ्यां सीताभ्यां द्विसीत्यम् ।, “गोदारणं हलमीपासीते तद्दण्ड-१० पद्धती" इति वचनात् सीतानाम हलपद्धतिः । एवं यप्रत्ययस्यात्राधिकारः पूर्णतां गतः । ईयोऽथाधिकृतो ज्ञेयो विशेषविषयं विना ॥ १ ॥ स चाधिकार ईयस्य आतदोऽर्थेषु भाव्यताम् । तस्मै हिते, तदर्थे चेत्यादयस्ते तु वस्तुतः ॥ २ ॥ "हविरन्नभेदापूपादेयों वा” (७।१।२९)। हविर्भेदेभ्योऽपूपादिभ्यश्चातदर्थेपु यो वा स्यात् । ईयापवादः । हविर्भेद. आमिक्षायै इदं दधि आमिक्ष्यमामिक्षीयम् । पुरोडाशाय इमे पुरोडाश्याः१५ पुरोडाशीयास्तंडुलाः । हविस्शब्दात्तु परत्वाद्युगादिपाठान्नित्यमेव यः । अन्नभेद. ओदनाय इमे ओदन्या ओदनीयास्तण्डुलाः । कृसरायै कृसर्याः कृसरीयाः, सुरायै सुर्याः सुरीयाः । अपूपादि. अपू- पायेदमपूप्यमपूपीयम् । सादेश्चेयधिकारात्तदन्तादपि-यवापूप्यं यवापूपीयम् । उवर्णान्तातु हविरन्नभेदा- त्परत्वान्नित्यमेव यः-चरव्यास्तंडुलाः, सक्तव्या धानाः । अपूप, तण्डुल, ओदन, पृथुक, अभ्यूष, अभ्योप, अवोप, किण्व, मुसल, कटक, १० शकट, कर्णवेष्टक, ईगल, इल्लर, (इल्वल ?) इल्ल (?)२० लक (?) स्थूणा, यूप, सूप, दीप, प्रदीप, २० अश्वपत्र (आश्वपत्र ?) २२ इत्यपूपायो द्वाविंशतिः (२० ?) अपूपादिपु येऽन्नभेदा अपूपादयस्तेषां केनचिदाकारसादृश्येनाऽर्थान्तरवृत्तौ प्रत्ययार्थमुपा- दानम् , केचित्तु अपूपादिपठितान्नभेव्यतिरिक्तानामन्नभेदानां तदन्तविधिं नेच्छन्ति । यवसुरीयम् , यो न भवति ॥ “उवर्णयुगादेयः' (७।१।३०) । ईयापवादः । शङ्कवे इदं शङ्कव्यं दारु । पिचव्यः कर्पासः । परशव्यमयः । युगाय हितं युगाथं युगोऽस्य स्यादिति वा युग्यम् । हविष्यम् । सादेश्वेत्यधि-२५ कारात् सुयुग्यम् । युग, हविस्, अष्टका, वर्हिस्, मेधा, मुच् , वीज, कूप, क्षर, अक्षर, खद, स्खद, विष, दाश, खर, असुर, दर, अध्वन् , गो, १९ इति युगादय एकोनविंशतिः । “गोः स्वरे यः” (६।१।२७) इति सिद्धे गोग्रहणं तदन्तार्थम्-सुगव्यम् । इदं यग्रहणं बाधकबाधनार्थम्-सनङ्गवे इदं सनङ्गव्यं चर्म, अत्र, हि परत्वात् “चर्मण्यम्” (७।१।४५) प्राप्नोति ।। "नाभेनभ्चाऽदेहांशात्" (७१।३१)। नाभ्यै नाभये वा हितं नभ्यमञ्जनम् । नभ्योऽक्षः । नाभये इदं नभ्यं दारु । अरकमध्यवर्ती अक्ष- धारणश्चक्रावयवो नाभिस्तदर्थ नभ्यम् । यत्तु अरकगण्डरहितं चक्रमेककाष्ठं (पापाणानयनशकटस्य-३१ . ܝ ܀ -१ आमिश्रितं क्षीरं कालिकेन यस्यां सा आमिश्रितक्षीरा, गतार्थवात्किाञ्जिकंशब्दस्य लोपः। पृषोदरादित्वादमिक्षादेशः। २ अपूपाकारं चर्माद्यपूपमित्येवम् । ३ कोऽर्थः । ये अपूपादिपु पठिता ‘अन्नभेदास्तेषां तदन्तानां विधिर्भवति । अन्नभेदवा- चिना तु अपूपादिष्वपठितीनां तदन्तविधिन भवतीत्यर्थः ।

"पश्च० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । हितार्थाद्याः ४२५ " पञ्चादिपराज्जनात्कर्मधारये वर्तमानात्तस्मै हिते ईनः स्यात् । पञ्चजनेभ्यः पञ्चजनाय हितः पञ्चजनीनः । रथकारपञ्चमस्य चातुर्वर्णस्य पञ्चजन इति संज्ञाः “संख्या समाहारे" (३३१०२८) इति कर्मधारयः । कर्मधारय इति किम् ? पञ्चानां जनः पञ्चजनस्तस्मै हितः पञ्चजनीय इत्यादि ।। अन्नायं विशेष:-"महत्सर्वादिक" (७१।४२ ) आभ्यां परो यो जनशब्दस्तदन्तात्कर्मधारये हिते इकण् स्यात् । महते जनाय हितः माहाजनिकः । सर्वस्मै जनाय हितः सार्वजनिकः । पूर्वेण५ ईनोऽपीत्यस्य द्वैरूप्यम् ॥ "सर्वा०"। स्पष्टम् । “येऽवणे" (३।२।१००)। नासिकाशब्दस्य चे प्रत्यये परे वर्णादन्यस्मिन्नभिधेये नसियादेशः स्यात् । नासिकाचे हितं तत्र भवं वा नस्यम् । च इति किम् ? नासिक्यं नगरम् । चातुरथिकोऽयम् व्यः । निरनुवन्धग्रहणे हि न सानुबन्धग्रहणमिति । अवर्ण इति क्रिम् ? नासिक्यो वर्णः ॥ "शिरसः शीपन्" ( ३।२।१०१) ये प्रत्यये परे । शिरसि भवः शीर्पण्यः स्वरः । शिरसे हितं शीर्पण्यं तेलम् । य इत्येव-शिरस्तः निरनुवन्धग्रहणात् शिर इच्छति १० शिरस्वतीत्यत्र न भवति, शिरस इति चादेशेन संवध्यते, न प्रत्यवेन, तेन हास्तिशीर्पिरित्यादी समास- संबन्धिन्यपि तद्धिते उत्तरसूत्रेण शीर्षादेशो भवति ॥ "केशे वा" (३।२।१०२) केशविपये ये परे शिरसः शीर्पन्वा । शीर्पण्याः शिरस्या वा केशाः ॥ इल्वलास्तु मृगशीर्पस्य शिरस्त्यास्तारका इति प्रयोगदर्शनात् केचित् केझादन्यत्रापि विकल्पमिच्छन्ति, शाखादियप्रत्यये चादेशं नेच्छन्ति-शिरस- स्तुल्यः शिरस्त्रः "शाखादेः” (७।१।११४) ॥ "शीर्षः स्वरे तद्धिते" (३।२।१०३) । स्वरादौ १५ तद्धिते परे शिरसः शीर्प इत्यादेशो भवति । हस्तिशिरसोऽपत्यं हास्तिशीर्पिः । मृगशिरसा चन्द्रयुक्तेन युक्ता मार्गशीर्षी पौर्णमासी । स्थूलशिरस इदं स्थौलशर्पम् । शिरसि कृतं शर्पम् , शिरसा तरति शर्पिकः । स्वर इति किम् ? शिरस्कल्पः । तद्धित इति किम् ? शिरसे शीर्पशब्दः प्रकृयन्तरमस्ति शीर्पच्छेद्यं परिच्छिद्येति प्रयोगात् , अनेनैव सिद्धे उक्तविपये शिरसः प्रयोगनिवृत्त्यर्थं वचनम् । * इति हितार्थप्रत्ययाधिकारः संपूर्णश्चेति मंगलम् 12 अत्रेत्यादिशब्दसंबन्धात् "परिणामिनि तदर्थ” (७।१।४४) । तद्भावः परिणामः, सोऽस्यास्ति (इति) परिणामि द्रव्यमुच्यते । चतुर्थ्यन्तात्तदर्थे चतुर्थ्यन्तार्थार्थे परिणामिनि द्रव्ये कारणेऽभिधेचे यथा- धिकृतं प्रत्ययः स्यात् । अङ्गारेभ्य इमानि अङ्गारीयाणि काष्टानि-अङ्गारार्थानीत्यर्थः । एवं प्राकारीयाः इष्टकाः, शङ्कव्यं दारु, आमिथ्यमामिक्षीयं दधीत्यादि । परिणामिनीति किम् ? उदकाय कूपः । तदर्थे इति क्रिम् ? मूत्राय यवागूः । यवाग्वादि मूत्रतया परिणमति न तु तदर्थम् । अथवा तदर्थे इति२५ चतुर्थीविशेषणम् (पूर्व हि तदर्थे इति परिणामिशब्दस्य विशेषणम् ) तदर्थे या चतुर्थी तदन्तात्प्रत्ययः, इह तु संपद्यतौ चतुर्थीति न भवति । तस्मै इत्येव-सक्तूनां धानाः, धानानां यवाः, अत्र सत्यपि तादयें संवन्धमात्रविवक्षायां पष्टी-यथा गुरोरिदं गुर्वर्थमिति, भवति च सतोऽप्यविवक्षाऽनुदरा कन्ये- त्यादिवत् ।। "चर्मण्यम्” (७।१।४५) । प्रागुक्तार्थे । वर्धावेदं वाई चर्म । एवं वरत्रायै वारत्रम् । हलवन्वाय हालवन्धम् । सनङ्गव्यमित्यत्र "उवर्णयुगादेः०” (७१।३०) इति य एव, सनमुश्चर्मवि-३० कारः ॥ "ऋपभोपानहायः” (७१।४६) उक्तार्थे । ऋषमायायमार्पभ्यो वत्सः । औपानह्यो मुञ्जः। औपाना काष्ठम् । औपाना चर्मेति चर्मण्यपि परिणामिनि परत्वादयमेव ।। "छदिवलेरेय" (७।१।४७) उक्तार्थे । छदिपे इमानि छादिपेयाणि तृणानि । वलये इमे बालेयास्तण्डुलाः । चर्मण्यपि परत्वादयमेव-च्छादिपेयं चर्म ॥ “परिखाऽस्य स्यात्” (७।१।४८) परिखाशब्दान्निर्देशादेव प्रथमान्तादत्त्येति पट्यर्थे परिणामिन्येयण् स्यात्, या सा परिखा सा चेत्स्यादिति योग्यतत्रा सम्भाव्यते । ३५ है. प्रका० पूर्वा० ५४ २० - १ १२४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- रहडू इति प्रसिद्धस्य ) तत्र न नाभिरिति तदर्थे नभ्यमित्युपचारात् । नभ्यो वृक्ष इत्यादी नाभ्यय ताच्छन्द्यानभ्यत्वम् इन्द्रार्थस्थूणावत् । अदेहाशादिति किम् ? नाभ्यं तैलमत्र नभादेशो न भवति, यस्तु "प्राण्य.” (७।११३७) इत्यादिना स्यात् । “न् चोधसः" (७१।३२) । उपसो यः स्यानकार• श्वान्तादेशः । ईयापवादः । ऊधसे इद ऊधन्यम् । “शुनो चश्चोदूत्” (७।१।३३) । श्वनशब्दात ५यः स्यात् , वकारश्च उकार ऊकाररूपो भवति । अभेदनिर्देशः सर्वोदेशार्थः । शुने हित शुन्यम् , शून्यम् । नाभ्यादीनां युगादिपाठेऽपि शक्यो यः प्रत्ययः, आदेशार्थास्तु योगाः । “कम्बलान्नानि" (७।११३४) ईयापवादो यः । कम्बलोऽस्य स्यात् कम्बल्य परिमाणम्, ऊोपलशसमुच्यते, अशीति- शतमित्यन्ये, पट्पष्टिशतमित्यपरे । नानीति किम् ' कम्बलीया ऊर्णाः ।। ८० ॥ तस्मै हिते ॥ ८१ ॥[सि०७।१।३५] १० चतुर्थ्यन्ताद्धिते ईयः सात् । वत्सीयः । *प्राण्यङ्गादिभ्यो यः-दन्त्यम् ॥ ८१ ॥ "तस्मै०" हित उपकारकः । वत्सीय इति-एव मात्रीयः, करभीयः, पिनीयः, आमिक्ष्यः आमि- क्षीयः, ओदन्यः ओदनीयः, अपूप्यः अपूपीयः, हविष्यः, युग्यः, वत्सेभ्यो न हितः अवत्सीयः । विशेपश्चान-"न राजाचार्यब्राह्मणवृष्णा" (७१।३६) । पन्शब्दस्य पष्टयेकवचने कृष्ण इति । एभ्यो हितार्थप्रत्ययो न स्यात् । राज्ञे हितः, एवमाचार्याय ब्राह्मणाय वृष्णे हित इति वाक्यमेव १५स्यात् ।। *प्राण्यङ्गादिभ्य इति-"प्राण्यगरथखलतिलयववृषव्रह्ममापाद्यः" (७।१।३७), प्राण्यङ्गेभ्यो रथादिभ्यश्च सप्तभ्यश्चतुर्थ्यन्तेभ्यो हितेऽर्थे यः स्यात् । दन्तेभ्यो हित दन्त्यम् । एव चक्षुष्यम् । रथाय हिता रथ्या भूमिः । सल्यमनिरक्षणम् । तिल्यो वायुः । यव्यस्तुपारः । वृष्य क्षीर- पाणम् । ब्रह्मण्यो देशः । माप्यो पातः । सादेश्चेत्यधिकारात् राजदन्त्यम् । आदिशब्दात् "अव्यजात् ध्यप्" (७११३८) अविभ्यो हितमविथ्यम् । अजेभ्यो हितमज- २०ध्यम् । पकारः पुषद्भावार्थः । अजाभ्यो हिता अजध्या (पित्करणसामर्थ्यात् 'स्वागान्डी०' इत्यनेन निपिद्धोऽपि 'क्यमानिः' इत्यनेन पुंबद्भावः) यूतिः । “चरकमाणवादीनम्" (७।१।३९) । घरपेभ्यो हितः चारकीणः । माणवीनः ।। ८१ ॥ भोगोत्तरपदात्मभ्यामीनः ॥ ८॥ [सि०७।१।४०] भोगोचरपर्दम्य आत्मनयहिते ईनः स्यात् । मातभोगीणः॥"ईनेऽध्यात्मनो (जा४।४८) २५अन्त्यखरादेर्छन् न साव-आत्मनीनः ॥ ८२ ॥ "भोगो." मातृभोगाय हितो मातृभोगीणः । एर पितृभोगीणः ॥ प्रामणिभोगीनः । सेनानि- भोगीनः । आचार्यभोगीनः । शुभ्नादिषु पाठान णत्वम् । “ईन." "नोऽपदस्य तद्धिते” (७४।६१) इति प्राप्तोऽन्त्यम्बरादिलोपोऽनेन निपिद्धयते । आत्मने हितः आत्मनीनः ॥ ८॥ पञ्चसर्वविश्वाजनात्कर्मधारये ॥ ८३॥ [सि०७।१।११] पश्चादिपूर्वाअनान्चात्तर्मधारयाद्विते ईनः सात् । पञ्चजनीनः। विश्वजनीनः ॥ "सर्वाणो या" (७१।४३) । सात सनीयः ।। ८३ ॥ इति रिताधिकारः॥ कण्य ॥ -- " प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । हितार्थाद्याः ४२५ "पञ्चक पश्यादिपराज्जनात्कर्मधारये वर्तमानात्तस्मै हिते ईनः स्यात् । पञ्चजनेभ्यः पञ्चजनाय हितः पञ्चजनीनः । रथकारपञ्चमस्य चातुर्वर्णस्य पश्चजन इति संज्ञाः “संख्या समाहारे" (३।१।२८) इति कर्मधारयः । कर्मधारय इति किम् ? पञ्चानां जनः पञ्चजनस्तस्मै हितः पञ्चजनीय इत्यादि । अत्रायं विशेष:-"महत्सर्वादिकण" (७।१।४२ ) आभ्यां परो यो जनशब्दस्तदन्ताकर्मधारये हिते इकण स्यात् । महते जनाय हितः माहाजनिकः । सर्वस्मै जनाय हितः सार्वजनिकः । पूर्वेण ५ ईनोऽपीत्यस्य द्वैरूप्यम् ॥ "सर्वा०"। स्पष्टम् । “येऽवणे' (३।२।१००)। नासिकाशब्दस्य ये प्रत्यये परे वर्णादन्यस्मिन्नभिधेये नसित्यादेशः स्यात् । नासिकायै हितं तत्र भवं वा नस्यम् । य इति किम् ? नासिक्यं नगरम् । चातुरर्थिकोऽयम् व्यः । निरनुवन्धग्रहणे हि न सानुबन्धग्रहणमिति । अवर्ण इति किम् ? नासिक्यो वर्णः ॥ "शिरसः शीर्षन्” (३।२।१०१) ये प्रत्यये परे । शिरसि भवः शीर्पण्यः स्वरः । शिरसे हितं शीर्पण्यं तैलम् । य इत्येव-शिरस्तः निरनुवन्धग्रहणात् शिर इच्छति १० शिरस्यतीत्यत्र न भवति, शिरस इति चादेशेन संवध्यते, न प्रत्ययेन, तेन हास्तिशीपिरित्यादौ समास- संबन्धिन्यपि तद्धिते उत्तरसूत्रेण शीपदेशो भवति ॥ "केशे वा” ( ३।२।१०२) केशविपये ये परे शिरसः शीर्पन्वा । शीर्पण्याः शिरस्या वा केशाः ॥ इल्बलास्तु मृगशीर्पस्य शिरस्त्यास्तारका इति प्रयोगदर्शनात् केचित् केशादन्यत्रापि विकल्पमिच्छन्ति, शाखादियप्रत्यये चादेशं नेच्छन्ति-शिरस- स्तुल्यः शिरस्यः “शाखादेर्यः” (७।१।११४) । "शीर्षः स्वरे तद्धिते" (३।२।१०३) । स्वरादौ १५ तद्धिते परे शिरसः शीर्प इत्यादेशो भवति । हस्तिशिरसोऽपत्यं हास्तिशीपिः । मृगशिरसा चन्द्रयुक्तेन युक्ता मार्गशीर्षी पौर्णमासी । स्थूलशिरस इदं स्थौलशेर्पम् । शिरसि कृतं शैषम् , शिरसा तरति शैर्पिकः । स्वर इति किम् ? शिरस्कल्पः । तद्धित इति किम् ? शिरसे शीर्पशब्दः प्रकृत्यन्तरमस्ति शीर्पच्छेद्यं परिच्छिद्येति प्रयोगात् , अनेनैव सिद्धे उक्तविपये शिरसः प्रयोगनिवृत्त्यर्थं वचनम् । *(इति हितार्थप्रत्ययाधिकारः संपूर्णश्चेति मंगलम् । अत्रेत्यादिशब्दसंबन्धात् “परिणामिनि तदर्थे” (७।१।४४) । तद्भावः परिणामः, सोऽस्यास्ति (इति) परिणामि द्रव्यमुच्यते । चतुर्थ्यन्तात्तदर्थे चतुर्थ्यन्तार्थार्थे परिणामिनि द्रव्ये कारणेऽभिधेये यथा- धिकृतं प्रत्ययः स्यात् । अङ्गारेभ्य इमानि अङ्गारीयाणि काष्ठानि-अङ्गारार्थानीत्यर्थः । एवं प्राकारीयाः इष्टकाः, शङ्कव्यं दारु, आमिक्ष्यमामिक्षीयं द्धीत्यादि । परिणामिनीति किम् ? उदकाय कूपः । तदर्थे इति किम् ? मूत्राय यवागूः । यवाग्वादि मूत्रतया परिणमति न तु तदर्थम् । अथवा तदर्थे इति२५ चतुर्थीविशेषणम् (पूर्व हि तदर्थे इति परिणामिशब्दस्य विशेषणम् ) तदर्थे या चतुर्थी तदन्तात्प्रत्ययः, इह तु संपद्यतौ चतुर्थीति न भवति । तस्मै इत्येव-सक्तूनां धानाः, धानानां यवाः, अत्र सत्यपि तादर्थे संवन्धमात्रविवक्षायां पष्ठी-यथा गुरोरिदं गुर्वर्थमिति, भवति च सतोऽप्यविवक्षाऽनुदरा कन्ये- त्यादिवत् ।। "चर्मण्यञ्” (७१।४५) । प्रागुक्तार्थे । वर्धायेदं वार्द्र चर्म । एवं वरत्रायै वारत्रम् । हलवन्धाय हालवन्धम् । सनङ्गव्यमित्यत्र "उवर्णयुगादेः०” (७१।३०) इति य एव, सनमुश्चर्मवि-३० कारः ॥ "ऋषभोपानहायः” (७१।४६) उक्तार्थे । ऋपभायायमार्पभ्यो वत्सः । औपानह्यो मुञ्जः । औपाना काष्ठम् । औपाना चर्मेति चर्मण्यपि परिणामिनि परत्वादयमेव ॥ "छदिवलेरेय" (७।१।४७) उक्तार्थे । छदिपे इमानि छादिपेयाणि तृणानि । वलये इमे वालेयास्तण्डुलाः । चर्मण्यपि परत्वादयमेव-च्छादिपेयं चर्म ॥ “परिखाऽस्य स्यात्” (७।१।४८) परिखाशब्दान्निर्देशादेव प्रथमान्तादस्येति षष्ठ्यर्थे परिणामिन्येयण् स्यात् , या सा परिखा सा चेत्स्यादिति योग्यतया सम्भाव्यते । ३५ है. प्रका० पूर्वा० ५४ २० , १५ ४२६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- परिसा आसामिष्टकानां स्यादिति पारिखेय्य इष्टकाः । स्यादिति संभावने सप्तमी-इष्टकानां बहुत्वेन संभाव्यते, एतत् परिसाऽऽसां स्यादिति ॥ "अन च” (७२४९) प्रथमान्तात्परिवाशब्दात्सप्तम्यर्षे एयण स्यात् , सा चेत्सरिखा स्यादिति संभाव्यते । परिखाऽस्यां स्यादिति संभाविता पारिखेयी भूमिः । योगविभागात्परिणामिनीत्यत्र नानुवर्तते । चकार उत्तरसूत्रे पष्ठ्यर्थे परिणामिनि स्यादिति संभाविते; ५सप्तम्यर्थे चापरिणामिनि स्यादित्येवं संभाविते यथाधिकृतं प्रत्ययः स्यादित्यर्थद्वयानुवृत्त्यर्थः ।। "त" (७।१५०) प्रथमान्तात्परिणामिनि षष्ठ्यर्थे सप्तम्यर्थे च यथाधिकृतं प्रत्ययः स्यात्, प्रथमान्त चेत्सं- भावितं स्यात् । प्राकार आसामिष्टकानां स्यात् प्राकारीया इष्टकाः । प्रासादीयं दारु । परशन्यमयः । प्रासादोऽस्मिन्देशे स्यात् प्रासादीयो देशः । प्रासादीया भूमिः ॥ ८३ ॥ राईयस्य पूर्णोऽवधि । १० अपत्यादिपूक्तार्थेषु "प्राग्वतः स्त्रीपुंसान्नञ् लम्" (६०२५)। स्त्रैणं पौलम् । "प्राग्य०" प्राग्यतो येऽर्थास्तेष्वनिम्यणपवादे च आभ्यामेतौ स्याताम् । स्त्रिया अपत्यं स्त्रैणः, पौरखः । स्त्रीणां समूहः णम् , पौस्नम् । स्त्रीपु भवं स्त्रैणम् , पौंसम् । स्त्रीणामियं स्त्रैणी, पौंसी । स्त्रीणां निमित्तं संयोग उत्पातो वा स्त्रैणः, पौंस्लः । स्त्रीभ्यो हितं स्वैगम् , पौलम् । प्राग्यत इति किम् ? स्त्रिया अहं कृत्यम् , स्त्रिया तुल्यं वर्तत इति स्त्रीवत्, पुंवत् । भकारो मित्कार्यार्थः ।। त्वे वा ॥८४॥[सि० ६३०२६] त्वविपये त्वेतौ वा । स्त्रैणं स्त्रीत्वम् । पौंस्नं पुंस्त्वम् ॥ ८४ ॥ "त्व." ! त्वविषय इति वक्ष्यमाणस्वरूपे भावे इत्यर्थः । त्रिया भावः बैणम् , । पुंसो भावः पौस्नं पुंस्त्वम् । किश्च "त्वे" (२।४।१००)। ड्यावन्तस्य त्वे प्रत्यये परे बहुलं हवः स्यात् । रोहिण्या भावो रोहिणित्वं रोहिणीत्वम् । अजत्वं अजात्वं वा ॥ ८४ ॥ भावे त्वतल् ॥ ८५॥ [सि०७।११५५] पष्ठयन्ताद्भावेऽभिधेये त्वतलौ साताम् । शन्दप्रवृत्तिनिमित्तं भावः । गोत्वं गोता ।। ८५ ॥ "भावे०" । भवतोऽस्मादभिधानप्रत्ययाविति भावः, शब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तं द्रव्यसंसर्गी भेदको गुणः । यदाहु:-“यस्य गुणस्य हि भावाव्ये शब्दनिवेशस्तदभिधाने त्वतलाविति," तत्र "जाति- गुणाजातिगुणे, समासकृत्तद्धितात्तु संबन्धे । डिस्थादेः स्खे रूपे, त्वतलादीनां विधिर्भवति ॥ १॥ तन २५जातिवचनेभ्यो जातो. गोः शब्दस्य भावो गोत्वं गोता-अन गोशब्दजातिर्भावः । गोरर्थस्य भावो गोत्वं गोता-अत्र गवार्थजातिर्भावः । शुक्लस्य गुणस्य भायः शुक्लत्व शुक्लतेत्या शुक्छगुणजातिः । एवं रूपत्वरसत्वमित्यादिषु रूपादिगुणजातिः । कत्वं सत्वमिति भिन्नवर्णव्यक्तिसमवेता जातिः ! कवर्गवं चयर्गत्वमिति ककारादिवर्गव्यक्तिसमवेता जातिः संहतिः ।। गुणशब्देभ्यो गुणे शुक्लस्य भावः शुष्टत्वं शुष्टता-अन शुष्ठो गुणो भावः । एवं शुलतरत्वं शुक्लतमत्वमिति स एव प्रकृष्टः । अणुत्वं महत्त्वमिति परिमाणलक्षणो गुणः । एक्त्वं द्वित्वमिति सहगलक्षणो गुणः । पृथत्वं नानात्वमिति भेदलक्षणः । ३९ उथैस्त्वं नीचेस्त्यमित्युच्छयादिलक्षणः । वृत्तौ पृथगादिशब्दाः पृथग्भूताद्यर्थे सत्त्वे वर्तते इति प्रत्ययः, १यपपि पूर्व सनं पचासद इति क्रमस्तपापि सरावदन्तवादभिधानम्य 'लप्पक्षर.' पूर्वनिपात एवम ह । मन पृपगादिशन्दानामव्ययानामसत्ववधियात्स्यमत्र मावप्रत्यय , नमसरवादसत्वे मलय , मायो प्रसत्वरूप इसारा । २० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । भावार्थाः ४२७ विग्रहस्तु पृथग्भूतस्य भाव इत्यादि । पवादयोऽपि गुणा .एवेति पटुत्वं मृदुत्वं तीक्ष्णत्वमित्यादिवपि गुणो भावः । समासात्संवन्धे भावप्रत्ययः. राजपुरुपत्वं चित्रगुत्वमत्र स्वस्वामिसंवन्धो भावः । कृतेऽपि संवन्धे भावप्रत्ययः. पाचकत्वं कार्यत्वमित्यादौ क्रियाकारकसंवन्धो भावः । तद्धितात्संवन्धे. औपगवत्वं दण्डित्वं विपाणित्वम्-अनोपगुदण्डादिसंबन्धः । डित्थादेः स्वरूपे. डिस्थादेस्तु यदृच्छा- शब्दादन्यस्य प्रवृत्तिनिमित्तस्यासम्भवात्तस्मिन्नेव स्वरूपे डिस्थादिशब्दवाच्यतया अध्यवसितभेदेऽव्यति-५ रिक्तेऽपि व्यतिरिक्त इव व्दिप्रत्ययवलात् बुद्ध्यावगृहीते धर्मे प्रत्ययः । डित्थस्य भावः डित्थत्वम् , डवित्थत्वम् । एवं गोजाते वो गोत्वं गोतेति गोशब्दस्य स्वरूपम् । शुक्लजाते वः शुक्लत्वं शुक्छतेति शुक्ल- शब्दस्य स्वरूपम् । गवादयो हि यदा जातिमात्रवाचिनस्तदा तेपां शब्दस्वरूपमेव प्रवृत्तिनिमित्तम् , तथा ह्यर्थजातौ शब्दार्थयोरभेदेन शब्दस्वरूपमध्यवस्यते, यो गोशब्दः स एवार्थ इति । एवं देवदत्तत्वं चन्द्रत्वं सूर्यत्वं दिक्त्वं आकाशत्वं अभावत्वमिति स्वरूपमेवोच्यते । एके तु यहच्छाशब्देपु शब्दस्वरूपं १० संज्ञासंज्ञिसंवन्धो वा प्रवृत्तिनिमित्तमिति मन्यन्ते । अन्ये तु डित्थत्वं देवदत्तत्वमिति वयोऽवस्थाभेद- भिन्नव्यक्तिसमवेतं सामान्यम्, चन्द्रत्वं सूर्यत्वमिति कालावस्थाभेदभिन्नव्यक्तिसमवेतसामान्यम् , दिक्त्वमाकाशत्वमभावत्वमिति उपचरितभेदव्यक्तिसमवेतं सामान्यं प्रत्ययार्थ इति वदन्तोऽत्रापि जातिमेव त्वतलादिप्रत्ययप्रवृत्तिनिमित्तमभिदधति । यचापि समासकृत्तद्धितेपु भावप्रत्ययेन संवन्धाभि- धानम्, तदपि रूट्यभिन्नरूपाव्यभिचरितसंवन्धेभ्योऽन्यत्र-गौरखरत्वम्, लोहितशालित्वम्, सप्त-१५ पर्णत्वम् , धवखदिरत्वमित्यादिभ्यः समासेभ्यः; कुम्भकारत्वं तन्तुवायत्वं पङ्कजत्वमित्यादिभ्यः कृभ्यः, हस्तित्वं मानुपत्वं क्षत्रियत्वं राजन्यत्वमित्यादिभ्यस्तद्धितेभ्यश्च भावप्रत्ययो रूड्या जातिमभिधत्ते, एप जातिवाचित्वेनैव रूढत्वात् । एवमन्येष्वप्येतादृशेषु । अभिन्नरूपास्तु तद्धितान्ता एव लुत्रादिभिः सम्भवन्ति,र्गत्वं पञ्चालत्वमिति-अत्र गर्गादयः शब्दा यजनो पि यद्यपि तद्धितान्तास्तथापि मूल- प्रकृत्या सह संहविवक्षायाभिन्नरूपत्वात् प्रत्ययोत्पत्तिहेतुः संवन्धो न्यग्भूत इत्यभिन्नशब्दाभिधेयतैव २० १ डित्यादेस्तस्मिन्नेव स्वरूपे धर्म प्रत्ययो भवति । कथंभूतात् डित्यादेर्यदृच्छाशव्दादत एवान्यस्य प्रवृत्तिनिमित्तस्यासंभवात् । २ ननु यदि स्वरूप एव प्रत्ययो भवति तर्हि डिस्थस्य भाव इति वाक्ये भावशब्दोपादानं न प्राप्नोति, यतो डिस्थशब्देनापि स्वरूपमभिधीयते, भावशब्देनापि तदेवोच्यते तत्कथं भावशब्दोपादानमित्याह-अध्यवसितभेदे, कोऽर्थोऽध्यवसित आरोपितो मेदो यस्य स्वरूपस्य तदध्यवसितभेदं तत्र कया डित्यशब्दवाच्यतया डित्थशब्देन वाच्यलेन कोऽर्थो डित्थशब्दस्य यदेव स्वरूप प्रवृत्तिनिमित्तं तदेवाश्रित्य डित्यशब्दः प्रवृत्त इत्यर्थः, ततो डित्थशब्दवाच्यतया कृला अध्यवसितमेदे आरोपितमेदे, कोऽर्थः स्वरूपमेव विशेष्यं विशेषणं चात्र यतो भावो वर्तत इति विशेषणं कस्य डित्यस्य । इदं च विशेष्यम् । नहि डित्थशब्दाव्यति- रिक्तं किश्चिद्भावशब्देनाभिधीयते, अपि तर्हि तदेव परमध्यवसितमेदात्तदेव विशेप्यं विशेषणं च भवति । ३ किं विशिष्टे - ध्यवसितमेदे० ० क इव यथा शिलापुत्रकस्य शरीरमित्यत्राव्यतिरिक्तऽपि वस्तुनि व्यतिरिक्त प्रत्ययो जायते तथाऽत्रापि । ४ पर कस्मादित्याह-श० बुद्ध्यावगृहीते शब्देन कृला प्रत्ययो ज्ञानं तद्वलात् । ५ अत्रैव प्रस्तावे गोजतेर्भावो गोतं गोतेति गोश- ब्दस्य स्वरूपमित्युत्ताम् । ततश्च गो० कोऽर्थो गोजातेः खरूपमिति हि किलावार्थः ।' ६ ननु गोशब्दस्य स्वरूपमित्युक्तम् गोजातेः खरूपमिति कथं लभ्यत इत्याह-श० जातिलक्षणोऽर्थस्ततो जातिलक्षणेनाथन गोशब्दस्यामेदः, य एव गोशब्दः स एव जातिलक्षणोऽर्थ इति, अत एव शब्दस्वरूपं प्रवृत्तिनिमित्तं कोऽर्थी गोशब्दस्य स्वरूपं जातिस्तदेव प्रवृत्तिनिमित्तम् । ७ नित्यमेकमनेकवृत्तिसामान्यमित्यनेकवृत्तित्वज्ञापनायाह-व० वयो बाल्ययौवनवार्धकलक्षणमिति, मान्धकार्यलम्बकर्णादयो भेदा अवस्थाः, एवमुत्तरेषु भावना कार्या । ८ आकाशदिशोरेकत्वादुपचार आश्रीयते । ९ आदिशब्दादुपचारो गृह्यते, अदा गर्गशब्देन गर्ग उपचारात्तदपत्यानि वा अभिधीयन्ते तदापि भावप्रत्ययान्तस्य जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तम् । ननु उपचारे आश्रिते समासकृत्तद्धितात्तु सम्बन्ध इति लक्षणस्य प्रवृत्तिरेव नास्ति, तत्कथमादिशब्देनोपचारो गृह्यते । यतस्तद्धितप्रत्यया- न्तोऽपि तदा गर्गशब्दो नास्ति । उच्यते । तद्धितप्रत्ययान्तत्वं योग्यता व्याख्यातव्यं ततो योग्यतयाऽत्राप्यस्ति । १० युग- पद्विवक्षायामित्यर्थः । सा च कथमित्युच्यते गर्गशब्देनापि सोऽप्यभिधीयते, गर्गस्यापत्यानि गर्गाश्चैत्यनया विवक्षया, स एवेतिकृत्वाऽभिन्नखरूपत्वम् । ।

.. ४२८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- भावप्रत्ययात्रतीयते न संवन्धः । अथ पञ्चालशब्दायुगपदपत्यजनपदाभिधायिनो भावप्रत्ययेन किमभिधीयते ? प्रवृत्तिनिमित्तसंघातः यथा धवखदिरत्वमिति जातिसंहतिः । एतेनाऽक्षत्वं पादत्वं मापत्वमित्यादीन्यपि व्याख्यातानि । अव्यभिचरितसंबन्धास्तु प्रायः कृत्स्वेव भवन्ति । सतो भावः सत्त्वम् सत्ता विद्यमानता । अत्र हि जातावेव भावप्रत्ययः, न हि सद्वस्तु सत्तासंबन्धस्य व्यभिचरतीति ५सत्तासंवन्धानपेक्षणान संवन्धे; पाचक इत्यादौ तु संवन्धस्य कादाचित्कत्वात्तदपेक्षः पाचकादिशब्दः स्वार्थमभिधत्ते इति ततः संवन्धे प्रत्ययो युक्तस्तस्मात्सत्सु विद्यमानेषु च पदार्थेपु नित्यसमवायिनी शब्द- प्रवृत्तिः सत्त्व भावप्रत्ययवाच्या, न तु सत्सत्तयोः संबन्धः कश्चिदिति । ततः स्थितमेतत् रूढ्या- दिभ्योऽन्यत्रैव कृत्तद्धितसमासेपु सम्बन्धाभिधानं त्वप्रत्ययेनेति । "त्वे वा" (६।१।२६) इति वच. नात्स्त्रीपुंसाभ्यां पक्षे ननबावपि भवतः स्त्रीत्वं स्त्रीता स्त्रैणम् । पुंस्त्वं पुंस्ता पौंसमिति । तल्प्रत्यये १० लकारः स्त्रीत्वार्थः । त्वान्तं तु "आत्वात्वादिः समूहज” इति वचनान्नपुंसकम् ॥ अत्राधिकारसूत्रं स्वेयम्-"प्राक्त्वादगडुलादेः" (७१।५६) (त्वतलित्यनुवर्तते) "ब्रह्मणस्त्वः” (७।११७७) इति सूत्रे यस्त्वशब्दस्तस्मात्प्रारु च त्वतलावधिकृतौ ज्ञेयौ, गडुलादीन वर्जयित्वा । अपवादैः समावे- शार्थः कर्मणि विधानार्थश्चाधिकारः । अगडुलादेरिति किम् ? गाडुल्यम् , कामंडलवम् । एतेषु च त्वतलौ नानुवर्तते । गडुल विशस्त दायाद वालिश संवादिन वहुभापिन् शीर्पघातिन् शीर्षाघातिन् कमण्डलु; १५इति गडुलादयो नय । एषु कमण्डलोः "स्वर्णालध्यादेः” (७११६९) इत्यण, शेपेभ्यस्तु राजा- देराकृतिगणत्वात् ट्यण् । गडुलादेरपि केचिदिच्छन्ति-गडुलत्वं गडुलता ।। ८५ ॥ नञ्तत्पुरुपादबुधादेः॥ ८६ ॥ [सि०७।११५७] अबुधादिवर्जादसावतलावेव स्याताम् । अशुक्लत्वं अशुक्लता । अबुधादेरिति किम् ? आयुष्य आचतुर्यम् । *"पृथ्वादेरिमन्वा” (७१।५८)। भावे ॥ पृथु-मृदु-भृश-कृश-दृढ-परिघटस २० प्रतो र इमनि णीष्ठेयस्सु च परेपु ॥८६॥ "नञ् । अबुधादीत्यादि, अयं भावः-बुधाद्यन्तवर्जात् नञ्तत्पुरुपात् त्यतली स्याताम् । प्राचया दयमप्यभिकारः ट्यणादियाधनार्थ क्षेय इति । अशुक्छत्वमशुलतेत्यादौ वर्णलक्षणट्यण्वाधया त्वतला. वेय । अशोळ्यमकार्यमिति ट्यणन्तेन समासः, समासात्तु ट्यणि नमो वृद्धिः प्रसज्यते । एयमपति- त्वमपतिवा-अत्र पत्यन्तलक्षणट्यण्याघः । अनाधिपत्यमगाणपत्यमिति प्रत्ययान्तेन समासः । अरा. २५ जत्वमराजता-अन्न राजान्तलक्षणट्यण्वाधः । अनाधिराज्यम् , अयौवराज्यमिति तु प्राग्वत् । अमू: सत्वममूर्सता-अत्र गुणागलक्षणट्यण्वाधः । अमौर्यमजाध्यमिति प्राग्वत् । अस्थविरत्वमस्थविरता- अत्र पयोलक्षणाभ्याघः । अस्थावरमिति प्राग्वत् । अहायनत्वमहायनता-अत्र हायनान्तलक्षणा- पाधः । पहायनमिति प्राग्वत् । अपटुत्वं अपटुता अत्र य्वर्णलक्षणानाधः । अपाठयमलाप २९ मिति प्राग्यत् । अरमणीयत्वमरमणीयता-अत्र योपान्यलक्षणाकञ्वाधः । अरामीयकमकामनी- १ युगपदमिधायिलं च क्थमित्युच्यते पचालस्यापत्यानि पयालाः, द्वितीयपचालशन्दनु प्रत्ययरहितो जनपदवाची, ततः पचाराध पधाराधेलेकशेपे । कृते युगपदभिधानं भवति । पान्देनेन्द्रियपाशयिभीतकारीन्युः ध्यन्ते । पादयन्देन चरणपिरणश्यकचतुर्याशप्रसन्तपर्वताः, मापशन पायविशेषदशगुणविशेषा उच्यन्ते, स्त एकरोचे समलपः । ननु यथा पपगरिरत्वमिति यन्त उत्तमनचान जातिसंहानिर्वाघ्या कथं भवति, यतः मममास्टिार सम्बन्ध त य एवं प्रतिनिमोनियमन शव्यम्, ततो द्वन्द्वेऽपि गम्यन्यो नाभिधीयते भिन्तु आतिसंहतिरेयोप्यते । ४ 'प्राचनः सीमासम् मम्' इलसादप्रतनेन सूप्रेसर्थः ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । भावकर्मार्थाः ४२९ यकमिति प्राग्वत् प्रत्ययान्तेन समासः । नञ्तत्पुरुषादिति किम् ? न विद्यते पतिरस्य अपति मस्तस्य भावः कर्म वा आपत्यमाराज्यमाहायनमारमणीयकमित्येव स्यात् । बुधायन्तातु नञ्तत्पुरुपादत् ट्यणादयः स्युः । तथा चाह-अवुधस्य भावः कर्म वा आबुद्ध्यमाचतुर्यम् । बुध, चतुर, संगत, लवण, वडक, तरस, (चण्ड, कतु, रस ?) लस, यथा, तथा, यथातथ १० यथापुर, ईश्वर, क्षेत्रज्ञ, संवादिन् , संवेशिन् , संभापिन् , वहुभाषिन् , शीर्षघातिन् , समस्थ, विपमस्थ, २० पुरस्थ, परमस्थ,५ मध्यस्थ, मध्यमस्थ दुःपुरुप, कापुरुप, विशाल, २७ इति बुधादयः सप्तविंशतिः । एभ्यो नञ्तत्पुरु- पेभ्यो राजादित्वात् ट्यण् । गडुलविशस्तदायादानामपि पाठं केचिदिच्छन्ति । अन्ये तु वुधादीनामष्टा- नामेव प्रतिपेधमिच्छन्ति । एषामेव च विकल्पमपरे । अथ व्यणन्तानां वुधादीनां नसमासः स्यात् (न वा ? ) बुधस्य भावः कर्म वा बौध्यम् , न बौध्यमबौध्यमिति भवतीत्येके । नेत्येके ॥ "त्वते गुणः" (३।२।५९)। परतः त्यनूगुणवचनशब्दस्त्वत इत्येतयोः पुंवद्भवति । पढ्वया भावः-१० पटुत्वमिति । एवमेन्या भाव एतत्वम् २, श्येन्या श्येतत्वं २ । त्वत इति किम् ? पट्वीरूप्यं पट्वीमयम् । गुण इति किम् ? कठीत्वं कठीता, दत्तात्वं दत्ताता, कर्तीत्वं कर्बीता केचित्तु जातिसंज्ञावर्जितस्य विशेषणमात्रस्य पुंवद्भावमिच्छन्ति-पाचिकायाः भावः पाचकत्वं २ । मद्रिकाया मद्रिकत्वं २ । गुणद्वारेण गुणिनि वर्तमानो गुणवचनो गृह्यते, गुणमात्रवृत्तेरस्त्रीलिङ्गत्वात्पुंवद्भावाप्राप्ते अनुकूलं वर्तते "तं प्रत्यनोलोम०" (६।४।२८) इति इकण् , तत आनुकूलिक्या भाव आनुकूलित्वं २ । आझिक्या १५ आक्षिकत्वं २ । द्वितीयाया द्वितीयत्वं २ । पञ्चम्याः पञ्चमत्वं २ । माथुर्याः माथुरत्वम् २ । सौग्न्याः सौग्नत्वं २ । चन्द्रमुख्याश्चन्द्रमुखत्वं २ । सुकेश्याः सुकेशत्वं २ । “सैन्याः श्रियामनुपभोगनिरर्थकत्व- मिथ्यापवादममृजन्वननिम्नगानाम्" । तथा रसवत्या धूमवत्त्वम् , भुवस्तृणवत्त्वम्, शालाया दण्डि- त्वमित्यादौ पुंवद्भावः । तलि युक्त्या "देवात्तल (७२।१६२) इति तलि देव एव देवतेत्यत्र नामग्रह- णेति न्यायादेवीशब्दादपि तलि देवतेति सिद्धम् । ऐश्वर्यादिगुणाभिधायकत्वादेवीशब्दोऽपि गुणव-२० चनः । जातिवाचित्वे तु देव्येव देवीता, देव्या भावो देवीत्वम् । “पृथ्वा०” प्राक्त्वादित्यधिकाराच त्वतलौ । वावचनाद्यश्चाणादिः प्राप्नोति, सोऽपि भवति । अत्रोपयोगि सूत्रम् , "पृथुमृदुभृशकृश- दृढपरिवृढस्य ऋतो र" (७४।३९) स्पष्टम् ॥ ८६ ॥ पुनरपि प्रकृतोपयोगिसूत्रम् । त्र्यन्त्यस्वरादेः ॥ ८७॥[सि०७४।४३] तुरन्त्यस्वरादेश्चमनि ण्यादौ च लुक् स्यात् । प्रथिमा ॥ ८७ ॥ "घ्यन्य०” तुरिति तृप्रत्ययस्य अन्त्यस्वरादेवावयवस्य इमनि णीष्ठेयसुपु च लुग् भवति । कर्तृम. न्तमाचष्टे करयति, करिष्ठः, करीयान् । करिमाचष्टे करयति । मातयति भ्रातयतीत्यत्र त्वनर्थकत्वात् (अनर्थकत्वं चास्याव्युत्पन्नत्वात् , तृप्रत्ययश्च वर्णानुपूर्वी विज्ञानार्थः ) तृशब्दस्य न भवति । प्रकृते तु पृथोर्भावः प्रथिमेति सिद्धम् । एवं पटिमा, लघिमा । विमनसो भावो विमनिमा । सन्मनसो भावः सन्मनिमा । ढादित्वादिमन् । विन्मतो पि अनेकखरस्यान्यवरादेलृपं विकल्पेनेच्छन्येके, लुगभा-३० वपक्षे णौ गुणं चेच्छन्ति । पयस्विनमाचष्टे पययति, पयसयति, पयिष्ठः पयसिष्ठः, पयीयान् पयसी- यान् । वसुमन्तमाचष्टे वसयति, वसिष्टः, वसविष्ठः, वसीयान् , वसवीयान् । अत्र विशेषोऽयम्- "नैकवरस्य” (७४।४४) एकस्वरस्य योऽन्यस्वरादिरवयवस्तस्य इमनि ण्यादी लुक् न स्यात् । स्रजयति सजिष्ठः सजीयान् । अथ "पृथ्वादेरिमन्त्रा" (७।११५८) इत्यत्र निर्दिष्टाः पृथ्वादयश्चमे- पृथु, मृदु, पटु, महि, तनु, लघु, वहु, साधु, आशु, उरु, १० गुरु, खण्डु, पाण्ड, (बहुल, ३५ २५

-
महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु-
चण्ड, सण्ड, १ ) अकिञ्चन, वाल, होड, पाक, वत्स, मन्द, स्वादु, २० मजु, वृप, कृदु (कटु
कृ? ! ) ह्रख, दीर्घ क्षिप्र, प्रिय, महत्, अणु, ३० चारु, वक्र, वृद्ध, काल, तृप्त, (हप्र) इति
पृथ्वादयः पञ्चत्रिंशत् (१)॥ ८७ ॥ अव प्रत्ययान्तरमाह-
स्वर्णाल्लघ्वादेः ॥ ८८ ॥ [ सि० ७११६९]
५ लघुरादिः समीपे येपाम् इ-उ-प्रवर्णानां तदन्तेभ्यो भावे कर्मणि चाण् स्यात् । पार्थिवम् ।
त्वतलूरूपे चाधिकारादनुवर्तनीये । पृथुत्वम् । पृथुता । प्रदिमा । मार्दवम् ॥ ८८ ।।
"०" । लघुरादिः समीपे इति-अत्र आदिग्रहण समीपमानार्थ तेन तितउ इत्यनाव्यवहिते
शुच्यादौ चैकवर्णव्यवहिते लघुनि भवति । कर्मणि चेति-"पतिराजान्त.” (७।११६०) इति सूत्रात्
कर्मणि चेत्यनुवर्तते । ततोऽयमण्प्रत्ययः कर्मणि भावे चेत्यर्थद्वये स्यादिति । पृथोर्भावः कर्म वा
१० पार्थवमिति सिद्धम् ॥ त्वतरूपे चेत्यादि स्पष्टम् । इउमवर्णातानामुदाहरणान्येवम्-शुर्भावः कर्म या
शौच शुचित्व शुचिता । शकुनेः शाकुन मुनेर्मोन सम्मतेः साम्मतम् । कवर्भावः कर्म वा काव्यमिति
तु राजादिपाठात् । नसरजन्या नाखरजन हरीतक्या हारीतकम् । तितउनस्तैतव पटोः पाटव लघोर्लाघव
वध्वा वाधव पितुः पैनम् । केचित्तु कृशानोः कार्यानव अरत्नेरारत्न आरातेरारातमित्यादिध्वपीच्छन्ति,
तन्मतसग्रहार्थं लघ्वादेरिति प्रकृतेविशेषण न वृवर्णस्येति व्याख्येयम् । तन्मते साम्मतमिति न
१५भवति ॥ ८८॥
अथेमनि प्रत्यये केपांचिदादेशविशेपानभिधातुमाह ।
प्रियस्थिरस्फिरोरुगुरुबहुलतृप्रदीर्घवृद्धवृन्दारकस्येमनि च प्रास्थास्फावर-
गरवहनपद्राघवर्षवृन्दम् ॥ ८९ ॥ [सि०७४।३८]
प्रियादीनां दशानां यथासम्भवमिमनि णीष्ठेयसुपु च प्रादयो दशादेशा भवन्ति । प्रियस्य
२८ भावः प्रेमा प्रियत्वम् प्रियता । स्थेमा २, स्फेमा २, परिमा २, गरिमा २, बंहिमा २, अपिमा
२, द्राधिमा २, वर्पिमा २, पृन्दिमा २॥ ८९ ।।
"प्रियः” । सून कण्ठ्यम् , वृत्तिश्च स्पष्टा । स्थेमेत्यादौ द्विकेनाकेन लतलूरूपे सर्वत्रानुवर्तनीये,
स्थिरत्व स्थिरतेत्यादि ॥ अत्र स्फिरशब्दस्यावर्णत्वादपृथ्वादित्वाददृढादित्वाच नेमन्प्रत्ययः, ततश्च
स्फिरत्वं रिफरता विस्तीर्णत्वमित्यर्थः । णीष्ठेयसुषु तु स्फादेशे स्फापयति स्फेष्ठः स्फेयान् ॥ 'स्थविरपि-
२५ ठिरस्फिराजिरादयः” (उणा० ४१७) । एते किदिरप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते, स्फायतेर्डिञ्च स्फिरः स्फारः
पृद्धिश्च । 'तृपौच प्रीतौ' च तृप्रम्-मेघान्तधर्म आज्य काष्ठ पाप दुःस च । 'ऋज्यजि०' (उणा
३८८) । इत्यादिना किद्रःप्रत्ययान्तोऽयं सिद्ध्यति ।। ८९॥
भूलकचेवर्णस्य ॥ ९० ॥ [सि० ७४४१]
बहोरीयसाविग्नि च भूः स्यालुक् चानयोरिवर्णस । (भूयान्) भूमा ॥ ९० ॥
३० "०" सयत्तिक सून स्पष्टम् । भूमेति-बहुत बहुतेत्यप्यनुवर्तनीयम् ॥ ९० ॥

। प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः। भावकर्मार्थाः ४३१ स्थूलदूरयुववक्षिप्रक्षुद्रस्यान्तस्थादेर्गुणश्च नामिनः ॥ ९१ ॥[ सि० ७४|४२] एषां षण्णामिनि ण्यादौ चान्तस्थादेवयवस्य लुग, नामिनश्च गुणः । स्थविमा २, दविमा २, हसिमा २, क्षेपिमा २, क्षोदिमा २ ॥९१॥ "स्थूल०" सूत्रवृत्ती स्पष्टे ।। ९१ ॥ पुनरपि भावेऽर्थे प्रत्ययान्तरमाह- वर्णदृढादिभ्यष्ट्यण च वा ॥ ९२ ॥ [सि० ७।१।५९ ] वर्णविशेषेभ्यो दृढादिभ्यश्च भावे यण इमन् च वा । शौक्लयं शुक्लिमा २ । दाढ्य द्रढिमा २॥९२॥ "वर्ण०" । वर्णविशेपेभ्य इति-वर्णविशेषाः शुक्लादयः । इमन्च वेति-वावचनाद्यश्चाण प्राप्नोति, सोऽपि भवति । अधिकारप्राप्तौ च त्वतलौ । ततो स्वृवर्णान्तस्य पाश्चरूप्यम् । शितेर्भावः शैत्यं, शितिमा, १० शितित्वं शितिता, शैतम् । ट्यणष्टित्वं ड्यर्थम् , तेन आर्हन्त्यमित्यत्र ड्यां आर्हन्ती । एवमौचिती, याथाकामी, सामग्री, शैली, पारिख्याती, आनुपूर्वी । दृढ, वृढ, परिवृढ, कृश, भृश, चुक्र, शुक्र, आम्र, ताम्र, अम्ल १० लवण, शीत, उष्ण, तृष्णा, जड, बधिर, मूक, मूर्ख, पण्डित, मधुर, २० वियात, विलात, विमनस् , विशारद, विमति, सम्मति, सम्मनस्, २७ इति दृढादयः सप्तविंशतिः । बहुवचनादाकृतिगणोऽयम् तेन स्थैर्य स्थेमेत्याद्यपि सिद्धम् ।। ९२ ॥ पतिराजान्तगुणागराजादिभ्यः कर्मणि च ॥ ९३ ॥ [ सि०७।१।६०] पत्यन्तेभ्यो राजान्तेभ्यो गुणः प्रवृत्तिनिमित्तं येपां तेभ्यो राजादिभ्यश्च भावे कर्मणि च व्यण स्यात् । अधिपतेर्भावः कर्म वा आधिपत्यम् २, आधिराज्यं २, मौढ्यं २, राज्यं २, काव्यं २, सौभाग्यं २ । भावे कर्मणि च इत्यनुवर्त्तनीयमधिकारात् ॥ ९३ ॥ "पति." गुणः प्रवृत्तिनिमित्तमिति-[व्याश्रयी गुणः, गुणोऽङ्गं निमित्तं येपां प्रवृत्तौ ते गुणागाः ]. गुणद्वारेण ये गुणिनि वर्तन्ते न तु गुणवचना एवेति । राजन्, कवि, ब्राह्मण, माणव, दण्डमाणव, वाडव, चौर, धूर्त, औराधय, विराधय, उपराधय, अपिराधय, अनृशंस, कुशल, चपल, निपुण, पिशुन, चौक्ष, सुस्थ, विश्वस्त, २० विफल, विशस्य, पुरोहित, ग्रामिक, खण्डिक, दण्डिक, कर्मिक, चर्मिक, वर्मिक, शिलिक, ३० सूतक, अजिनिक, अजनिक, अन्नलिक, छत्रिक, सूचक, सुहित, वाल, मन्द, होड ४० राजादयश्चत्वारिंशत् ४० बहुवचनादाकृतिगणः ॥ ९३ ।। १५ २५ १ द्रव्याणामेवाश्रय एवास्यास्तीति, ततो द्रव्यमेवाश्रयो यस्येति जाते~वच्छेदः । अयं चैवकारोऽन्ययोगं व्यवच्छेदयति । नहि जातिव्यमेवाश्रयति, किंतु गुणमपि इति जातिगुणो न भवति । आश्रय एवेति किमुक्तं भवति, केवलो गुणो न भवति किन्तु द्रव्यमेवाश्रयति, अनेन चायोगव्यवच्छेदः, तेनोत्क्षेपणावक्षेपणेति या तार्किकाणां क्रियी, तस्यापि गुणसंज्ञा न भवति, यत्तस्या आश्रय एव नास्ति । २ नहि मूढो गुणोऽपि भण्यते किन्तु मोहगुणद्वारेण गुणिन्येव वर्तते । अतो गुणोऽ प्रवृत्ति- निमित्तमस्यापि विद्यते इति गुणाः, न तु गुणवचनाः । गुणवचना हि पूर्व गुणे पश्चाद् गुणिनि वर्तन्ते, एतावना पानी व्युदासः। ३ आपूर्वाद्राधेः ण्यन्तादत एव निपातनात् शः, एवमुत्तरत्रयेऽपि । ४ नृन् गंसत्य, तनो नया योगः । ५ चुक्षा शीलमस्य 'अस्था'-इत्यम् । ।

४३२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- अर्हतस्तोन्त् च ॥ ९ ॥[सि०७।१।६१ ] असात् व्यण, तस्य न्तादेशः । आर्हन्त्यं २ । “सहायाद्वा” (७४।६२) । व्यण् । साहा- व्यम् ॥ ९४॥ "अहं." । अरिहननात् रजोहननात् रहस्याभावाच अर्हन पृपोदरावित्वात् ; यद्वा चतुस्त्रिंशतमति- ५शयान सुरेन्द्रादिकृता पूजा चाहतीत्यर्हन् । आर्हन्त्यमार्हन्ती अर्हत्त्वमहत्ता । "टयण कनटो कचित्" इति लिङ्गानुशासनवचनात् ट्यणप्रत्ययान्तं नाम लक्ष्यानुसारेण स्त्रीलीवलिङ्गम् *औचित्य औचिती, याथाकाम्य याथाकामी, वैदग्ध्यं वैदग्धी, मैत्र्य मैनी, आनुपूयं आनुपूर्वी, चातुर्य चातुरी, सामघ्य सामग्री । टित्त्वात् डीः, "व्यञ्जनात्तद्धितस्य" (२।४।८८) इति यलुरु । "सहा." ॥ ९४ ॥ वा. वचनात् पक्षे सूत्रमाह । योपान्त्याद्गुरूपोत्तमादसुप्रख्यादकञ् ॥ ९५॥ [ सि० ७।१।७२ ] व्यादीनामन्त्यमुत्तमं तत्समीपमुपोत्तमं तद्गुरुर्यस्य तसाद्योपान्त्यात्सुप्रख्यवर्जादकञ् स्यात् । साहायकं २ । रामणीयकं २ । “चौरादेः” (७।११७३)। अकञ् । चौरिका चौरकं चौर्यम् । "सखिवणिगदूताद्यः" (७१।६३) सख्यं २ । वणिज्या वाणिज्यम् २ । दूत्यं दौत्यं २। स्तेनान्न लुक च” (७।१६६४)। स्तेनाद्यो वा न लुक ये । स्तेयं स्तैन्यं २ । “कपिज्ञातेरेय" १५(७११६५) कापेयम् । “प्राणिजातिवयोर्थादन्” (७११६६)। आव २ । कौमारं २ ॥ "युवादेरण" (७११६७)। यौवनं २ । स्थाविरं २ । “पुरुषहृदयादसमासे” (७।११७७) अण् । पौरुपम् २ ॥ ९५॥ "योपा०" तद्गुरुर्यस्येति गुरुग्रहणादनेकव्यञ्जनव्यवधानेऽपि भवति । आचार्यकम् । गुरुग्रहण हि दीर्घपरिग्रहार्थं सयोगपरिग्रहार्थ च । रामणीयकमिति-एव दार्शनीयकम् २ । पानीयक २ । औपा- २०ध्यायक । अत्र सर्वन द्विकेनाङ्केन त्वतलूरूपे अनुवर्तनीये। सुप्रख्यवर्जनात् सौप्रख्यम् २, गुणाङ्गत्वात् ट्यण् । सूत्रम् “चौरा०” । एभ्यो भावे कर्मणि चाऽकब् स्यात् । चौरस्य भावः कर्म वा चौरिका चौरकम् २ । धौर्तिका धौर्तकम् । मानोज्ञकम् । प्रेयरूपकम् । चौर, धूर्त, युवन, प्राम, पुन, (ग्रामपुर) ग्रामसाण्ड, ग्रामसण्ड, ग्रामकुमार, प्रामकुल, प्रामकुलाल, १० आमुष्यपुत्र, अमु- व्यकुल, शरपत्र, शारपत्र, मनोज्ञ, प्रियरूप, अदोरूप, अभिरूप, बहुल, मेधाविन्, २० कल्याण, २५आढ्य, सुकुमार, छान्दस, छात्र, श्रोत्रिय, विश्वदेव, ग्रामिक, कुलपुत्र, सारपुत्र, ३० वृद्ध, अव- श्यम्, '३२ इति चौरादयो द्वारिंशत् । अन मनोज्ञादीनामकलताना नपुसकत्वमेव । पूर्वेषा तु "चौराद्यमनोज्ञाद्यकभिति' स्त्रीनपुसकते 1 चौर्य धौयं ग्रामिक्यमिति राजादित्वात् ट्यणपि ॥ "द्वन्द्वाल्लित्" (७१।७४) द्वन्द्वसमासान्तस्य भावे कर्मणि चाकञ् स्यात् (स च लित्, त्वतलौ च ) लित्करण स्त्रीत्वार्थम् । गोपालपशुपालाना भावः कर्म वा गोपालपशुपालिका, शैष्योपाध्या- ३० यिका, कौत्सकुशिकिका, विश्व पक्षी, ना च नरः, वित्रो वः कर्म वा वैत्रिका, जर "वर्णाक्ष- ध्यादेः” (७११६९) इत्यणि प्राप्ते परत्वादकञ् । एव भारतबाहुबलिका, गोपालपशुपालत्व गोपालप- ३२शुपालता । "गोत्रचरणात् श्लाघात्याकारणास्यवगमे" (७१२७५) आभ्या श्लाधादिपु - ४ - - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । भावकर्मार्थाः ४३३ विषयभूतेपु भावे कर्मणि च लिदकब् स्यात् । श्लाघा विकथनम् , अत्याकारः पराधिक्षेपः, विषयभावः पुनः श्लाघादीनां क्रियारूपाणां भावकर्मणी प्रति साध्यत्वात् । गोत्रमपत्यं प्रवराध्यायपॅठितं च । चरणं शाखानिमित्तं कठादि । गाय॑स्य भावः कर्म वा गार्गिका, एवं काठिका; तया श्लाघते, विकस्थते, अत्याकुरुते, परं अधिक्षिपति; गार्गिकां काठिकां प्राप्तवान् , अधिगतवान्, एवमर- गतवान् , ज्ञातवान्, गार्ग्यत्वेन गार्ग्यतया श्लाघते इत्यादि । “होत्राभ्य ईयः" (७११७६)५ होत्राशब्द नविग् ( विशेष )वचनः । ऋत्विग्विशेषवाचिभ्यो भावे कर्मणि च ईयः स्यात् । मैत्रावरुणस्य भावः कर्म वा मैत्रावरुणीयं मैत्रावरुणलं २ । अग्नीधः अग्नीधीयं २ । नेप्टर्ने- ष्टीयं २ । पोतुः पौत्रीयं २ । ब्राह्मणाच्छंसिनो ब्राह्मणाच्छंसीयं २ । हूयते आभिरिति होत्रा, ऋच इत्येके । तान्येवोदाहरणानि । मैत्रावरुणादयस्तु ऋग्वचनाः । बहुवचनं स्वरूपविधिव्युदा- सार्थम् ॥ "ब्रह्मणस्त्वः” (७१७७) ऋत्विग्वाचिनोऽस्माद्भावे कर्मणि च त्वः स्यात् । १० ईयोपवादः । ब्रह्मणो भावः कर्म वा ब्रह्मत्वम् । होत्राधिकारात् ब्राह्मणपर्यायाजातिवाचिनोऽस्मात- लपि-ब्रह्मत्वं ब्रह्मता । "सखि०" "मृगव्यचव्ये च वणिज्यवीयेति लिङ्गानुशासनवचनात् वणिज्या वणिज्यमिति स्त्रीनपुंसकत्वम् । एवं दूत्या दूत्यम् । राजादेराकृतिगणत्वात् व्यणि वाणिज्यं दौत्यम् ।। "स्ते०" ये इति-नलुक् च यप्रत्यये पर एव भवति नान्यत्र । स्तेनत्वं स्तेनता । राजादिदर्शनात् व्यणपि स्तैन्यमिति । "कपि०” कापेयमिति-एवं ज्ञातेर्भावः कर्म वा ज्ञातेयं २ । कैंपेरिकारान्त-१५ त्वात् "वृवर्णात्" इत्यणि प्राप्ते ज्ञातेश्च प्राणिजातित्वादनि प्राप्ते वचनम् । “प्राणि." आश्वसिति- एवं द्वीपिनो द्वैपं हस्तिनो हास्तं अनि "नोऽपदस्थ.” (७४।६१) इत्यन्यस्वरादिलुप् । कौमारमिति- एवं कैशोरं शावं वारं कालभम् । प्राणिग्रहणात् तृणत्वमित्यादौ, जातिग्रहणात् देवदत्तत्वमित्यादावञ् न स्यात् ॥ "युवा०” लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणात् यूनो युवतेर्भावः कर्म वा यौवनम् , चौरादिपाठा- द्यौवनिकेत्यपि भवति । युवन् , स्थविर, यजमान, कुतुक, श्रमण, श्रमणक, श्रवण, कमण्डलुक, कुस्त्री, २० दुःस्त्री, १० सुत्री, सुहृदय, दुहृदय, सुहृत्, दुईत्, सुभ्रान्, दुर्धा, वृपल, परिव्राजक, सब्रह्म- चारिन् , २० अनृशंस, चपल, कुशल, निपुण, पिशुन, कुतूहल, क्षेत्रज्ञ, उद्गात, उन्नेतृ, प्रशास्त, ३० प्रतिह, होत, पोत, भ्रातृ, भर्तृ, रथगणक, पत्तिगणक, सुष्टु, दुष्टु, अध्वर्यु, ४० कर्तृ, मिथुन, कुली- न, सहस् ; (सहस्र ?) कण्डक, कितव, इति युवादयः पट्चत्वारिंशत् ४६ । स्थविरश्रमणपिशुन- निपुणकुशलचपल-अनृशंसेभ्यो राजादिदर्शनात् ट्यणपि भवति । स्थावयं श्रामण्यमित्यादि । पूर्वत्राणि द्वैपादि न सिद्ध्यति अणीत्यन्त्यस्वरलोपनिषेधात् , इह त्वनि यौवनादि न सिद्ध्यति अन्त्यस्वरादिलोप-२६ १ न विशेषणेषु यतो विशेषणानि न घटन्ते, कुत इति चेत् ? उच्यते-भाव इति शब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तमिह गृह्यते । गार्गिका इत्यादिषु न श्लाघादयः प्रवृत्तिनिमित्तान्यपि तर्हि गर्गलमिति । क्रम इति च क्रिया गृह्यते, अतः क्रिया क्रियाविशेषणं न संभवतीति श्लाघादिषु विषयभूतेविति व्याख्यातम् । २ भावकर्मभ्यां कर्तृभ्यां श्लाघादयो यत्र साध्यन्ते इति तात्पर्यम् । विषयभाव इत्यादिना श्लाघादीनां भावकर्मणी प्रति विषयमाह, एपां च भावकर्मणी प्रति विषयलं भाषकर्ममाध्यलात्, क्रिया- रूपलाच तेषां भावकर्मणी प्रति साध्यसमुपपद्यत एव, भावकर्मणोः सत्त्वात्मनोस्तत्र कारकलोपपत्तेरिति लाघादीनां कारके भावे कर्मणि च प्रत्यय इत्यर्थः, अयमर्थः- श्लाघाद्या हि क्रियाः, ताश्च कारकैरेव साध्याः, कारकाणि चात्र भावकर्मरूपाण्येवेति तैः साध्यसम् । ३ प्रवरमाचं गोत्रं तस्याध्यायस्तत्र पठितं यद्गोत्रं तदप्यभिधीयते, एतेन किमुक्तं भवति, द्विविधमिह गोत्रं गृह्यते, तेन मित्रयोर्भावः कर्म वेति कृते मैत्रयिकेल्यत्र प्रयोजनम् । ४ स्त्रीलिमोऽपि सन् ऋलिजः प्राह । ५ ईयेत्युपलक्षणं तलोऽप्ययमपवादः । अन्यथा इयस्यैव प्रतिपेधे ब्रह्मणो नेति सूत्रं कुर्यात् । ६ न केवलं 'भावे लतल' इत्यनेन वः किन्तु तलपि, अयमर्थः-ऋलिगवचनस्य ब्राह्मणवचनस्य च लप्रत्ययः समानः, तेन जातिवचनस्य तलपि भवतीत्यर्थः । उपलक्षणं चेदं तेन ब्रह्मणो भावः कर्म वा प्राणिजात्यनि ब्राह्यमित्यपि ॥ ७ यद्यपि कपिशब्दस्य प्राणिजातिलं तथापि विशेपलात् 'स्वर्ण.' इत्यणि प्राप्ते । है. प्रका० पूर्वा० ५५ ४३४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्राप्ते इत्यमणोरुपादानम् । “हायनान्तात्” (७।१।६८) हायनान्तेभ्यो भावे कर्मणि चाण् स्यात् । द्वैहायन २ । त्रैहायन २ । अत्रावयोवचनत्वात् "चतुस्नेहायनस्य वयसि" (२॥३।७४ ) इति णत्व न भवति । वयसि तु पूर्वेणाय्-त्रैहायन चातुर्हायणम् । “पुरु०" (७१११७० ) स्पष्टम् ॥ १५ ॥ अत्रो. पयोगि सूत्रमाह। १ हृदयस्य हल्लासलेखाण्ये ॥ ९६ ॥ [ सि. ३१२२९४ ] लासादिषु हृदयस्य हृत्स्यात् । हार्दम् २ । समासे तु सुपुरुषत्वम् परमहृदयत्वम् ॥ ९६ ॥ +( इति भावकर्माधिकार । "हृद०" लासश्च लेखा च अण् च यश्च लासलेखाण्य तस्मिन् । एषु हृदयस्य हद् स्यात् । असमास इति किम् ? परमपोरुषम् , परमहार्दमित्यादि मा भूत , अत एव निषेधात्सापेक्षादपि भावप्रत्ययो विज्ञा- १० यते, तेन काकस्य कार्ण्यम् , बलाकाया शौक्लयमित्यादि सिद्धम् । पौरुपमिति प्राणिजात्ययपि सिद्धम् , समासविषये प्रतिपेधार्थ पुरुषोपादानम् । आदिशब्दात् "श्रोत्रियाद्यलक् च" (७।१।७१) श्रोत्रियस्य भाव कर्म वा श्रौनम् श्रोत्रियत्वम् । इतिशब्द समाप्तौ । भावकर्माधिकार समाप्त इति ।।९६॥ शाकटादयो यधार्ह क्षेत्रे वाच्याः । इक्षुशाकटं शाकशाकिनम् । ब्रैहेयम् । मौद्गीनम् । यव्यं यवक्यं पष्टिक्यम् ॥ "पील्वादेः कुणः पाके" (१८७) ॥ “कर्णादेर्मूले जाहः १५(७११८८) ॥ “पक्षात्तिः” (७११८९) । मूले ॥ "हिमादेलः सहे” (७१।९०) । "वलवातादूल" (७१२९१) ॥ "शीतोष्णतमादालरसहे" (७१२९२)। तृप्नं दुःखम् ।। शाकटादय इत्यादि । अत्र सूत्रम् "शाकटशाकिनी क्षेत्रे" (७११७८) । तस्येति वर्तते । क्षेत्र धान्याद्युत्पत्तिभूमि । षष्ट्यन्ताक्षेत्रेऽर्थे एतौ स्याताम् । इक्षणा क्षेत्र इक्षुशाकटम् , शाकाना क्षेत्र शाक- शाकिनम् ॥ त्रैहेयमिति-"बीहिशालेरेयण्” (१९८०)। भैहेयम् । शालेयम् ॥ मौद्गीनमिति- २० "धान्येभ्य ईन” (७१।७९)। कौलथीनम् , मौद्गीनम् । यव्यमिति-"यवयवकपष्टिकाद्यः" (७।११८१)। यवक्यमिति-यव विशेषा एव यवका । षष्टिरात्रेण पच्यमाना ब्रीहय' पष्टिका , एव निर्देशात् एभ्यस्त्रिभ्य क्षेत्रेऽर्थे यो वा पक्षे ईनन । “वाणुमाषात्" (७॥११८२) । पक्षे इनन् । अणूना क्षेत्रमणव्यम् , आणयीनम् । माष्य माषीणम् ॥ "वोमाभङ्गातिलात्” (७।१।८३)। उमा अतसी, भगा शणम् , द्वे अपि धान्ये । एव उम्य औमीनम् । भङ्गय भाङ्गीनम् । तिल्य तैलीनम् । - इति क्षेनप्रकरणम् । र अत्रादिशब्दात् "अलावाश्च कटो रजसि" (७।१।८४) । षष्ठ्यन्तात् अलावूशब्दात् उमादि-. भ्यश्च रजस्यर्थे कटः प्रत्यय स्यात् । अलावा रज अलाबूकटम् , उमाकटम, भङ्गाकटम्, तिलकटम् ॥ "अहा गम्येऽश्वादीन" (७।११८५) षष्ठ्य तादश्वादेकेनाहा गम्येऽर्थे ईनन् स्यात् । अश्वस्यैकेनाहा गम्य , आश्वीनोऽभ्या ॥ "कुलाजल्पे" (७११८६) । ईनन् । कुलस्य जल्प कौलीनम् ॥"पील्वा, ३० देरिति पटसूत्री स्पष्टा । पीलूना पाक• पीलुकुण । पीलु, कर्कन्धु, शमी, करीर, बदर, कुवल, अश्वत्थ, सदिर, इति पील्वादयोऽष्टौ ॥ कर्णादेरिति-कर्णस्य मूल कर्णजाहम् । कर्ण, अक्षि, आस्य, यफ, नख, मुख, केश, दन्त, ओष्ठ , भ्रू, १० शग, पाद, गुल्फ, पुष्प, फल, १५ इति कर्णादय पञ्चदश ॥ पक्षस्य मूल पक्षति हिमस्य सह हिम सहमान हिमेलु । वलस्य सह बल सहमान ३४ बलूल । एव वातूल, । शीतस्यासह शीतमसमान शीतालु , एवमुष्णालु तृपालुः ॥ अत . HA * प्रक्रियाबृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । व्याप्नोतीत्याद्यर्थाः ४३५ आदिशब्दात् “यथामुखसम्मुखादीनस्तदृश्यतेऽस्मिन्” (७१।९३) आभ्यां प्रथमान्ताभ्यां सप्तम्यर्थे ईनः स्यात् , प्रथमान्तं चेदृश्यते इति भवति । यथामुखं दृश्यतेऽस्मिन् यथामुखीन: आद- शादिः । मुखस्य सहशोऽर्थो यथामुखं प्रतिबिम्बमुच्यते, अत एव निपातनात् “यथाऽथा" (३।१।४१) इति प्रतिपेघेऽप्यव्ययीभावः । समं मुखं सम्मुखं समं मुखमस्यानेन वा सम्मुखं प्रतिबिम्बमेव, अत एव निपातनात् समशब्दस्यान्तलोपः । सम्मुखं दृश्यतेऽस्मिन्निति सम्मुखीनः यथामुखीनः सीताया ५ इति । सम्मुखीनो हि जयो रन्ध्रप्रहारिणामिति तु उपमानात् । सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रशरावं व्याप्नोति ॥ ९७॥ [सि०७१।९४ ] सर्वशब्दपूर्वेभ्य एभ्यः पड्भ्यो व्यामोतीत्यर्थे ईनः स्यात् । सर्वपथीनो रथः । सर्वाङ्गीणं शम् । सर्वकर्माणो ना । सर्वपत्रीणो यन्ता । सर्वपात्रीणं सर्वशरावीणं घृतम् । *अलङ्गामिन्यध्व- नोऽमन्ताद्येनौ वाच्यौ-अध्वन्यः अध्वनीनः सिमांसमीनसाप्तपदीनादयः साधवः।।१० कचित्वार्थे ईन:-अपडक्षीणो मन्त्रः । अलङ्कमाणोऽलम्पुरुषीणो ना ॥ ९७ ॥ "सर्वा०” । एभ्यः पड्भ्यः इति-द्वितीयान्तेभ्य इति शेषः । सर्वपथं व्याप्नोति सर्वपधीनः । सर्व- पथान् व्याप्नोति सर्वपथीनमुद्रकम् । सर्वाणि कर्माणि व्याप्नोति सर्वकर्मीणो ना पुमान् । यन्ता सारथिः। आदिशब्दात् "आप्रपदम्” (७।१।९५) । प्रगतं पदं प्रपदं पदाग्रमित्यर्थः । अथवा प्रवृद्धं पदं प्रपदम् । पदस्योपरिष्टात् संस्था खलुको गुल्फ इति यावत् । आङ् मर्यादायामभिविधौ वा । आ प्रपदात् १५ आप्रपदम्, “पर्यपाङ्” (३।१।३२) इत्यादिनाव्ययीभावः । अस्माद्वितीयान्ताव्याप्नोतीत्यर्थे ईनः स्यात् । आप्रपदं व्याप्नोति न तदतिवर्तते यः स आप्रपदीनः पट:-अनेन पटस्य प्रमाणमाख्यायते ।। "अनुपदं वद्धा" (७।१।९६) । द्वितीयान्तादनुपदशब्दाबद्धा इत्यर्थे ईनः स्यात् । अनुपदं वद्धा अनुपदीना उपानत्-पदप्रमाणेत्यर्थः । अनुपदमिति "दैर्थेऽनुः" (३।११३४) इत्यव्ययीभावः ।। "अयानयं नेयः” (७।१।९७ ) अस्माहितीयान्तान्नेय इत्यर्थे ईनः स्यात् । अयानयं नेयः अयान-२० यीनः शारः-फलकशिरसि स्थितः उच्यते । अयः प्रदक्षिणं गमनम् , अनयः प्रसव्यं वामम् । शारि द्यूते. हि केचिच्छाराः प्रदक्षिणं गच्छन्ति केचित्प्रसव्यम् , तेपां गतिरयसहितोऽनयोऽयानय इत्यु- च्यते । यस्मिन् परशारः पदानामप्रवेशः तदुभयं नेयः अयानयीन इति रूढिः । अथवा अयः शुभं दैवम् , अनयो अशुभम् , शुभादैवादपवर्त्ततेऽशुभं देवं यस्मिन् कर्मणि तदयानयं शान्तिकर्म चतुःशर- ‘णप्रतिपत्तिरनाघातघोपणं देवगुरुपूजा तपो दानं ब्रह्मचर्यादिनियमस्तद्यो नेयः कारयितव्यः सोऽयान-२५ श्रीन ईश्वर इति ॥ "सर्वान्नमनि" (७११९८) सर्वप्रकारमन्नं सन्निं तदत्ति सर्वान्नीनः भिक्षुः । नियमरहितः । सर्वशब्दः सकारकाये ॥ परोवरीणपरम्परीणपुत्रपौत्रीणम्” (७।१।९९)। एते त्रयोऽनुभवत्यर्थे ईनप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । परावरशब्दाद्वितीयान्तादीनः अवरशब्दाकारस्योत्वं निपातनात् ; परांश्चावराँश्वानुभवति परोवरीणः । पारोवर्यमित्यत्रातीतक्रमवाचि परोवरमिति शब्दान्तरमिति "सूरयः । यदि प्रत्ययसन्नियोगे ओत्वम् , तत्कथमत्र तदभावे इत्याशङ्का ] | "कथं पारोवर्यवदिति ३० १ पदं लक्ष्यीकृत्यायतं वन्धनमिति क्रियाविशेषणलात् द्वितीया मेदोपचाराद् वद्धत्युच्यते । २ कर्मणि द्वितीया । यद्यपि नेयशब्देन कर्माभिधीयते, तथापि अयानयशव्दाद्वितीया भवत्येव-द्विकर्मकत्वात् । गार इत्येतदेव हि कर्माभिहितं नेतरत् । दक्षिणगमने वामगमने च परशारा बाधिता भवन्ति । तस्मिन् परशारः कर्तृभिः पदानां गृहकाणां कर्मभूतानां वगारर्वद्ध- लात् अप्रवेशः । ४ प्रदक्षिणाप्रसन्यगामी च शारो नीयमानो न मर्वोऽयानयीन इत्युच्यते, अपि तु कश्चिदेवेति । अयमर्थः- यत्र फलके असैदीव्यन्ति, तस्य यच्छिरोभूतं स्थानं कितवानां प्रसिद्धम् , तत्रस्थ एव शारोऽयानयीनः । " H * । ' N १३६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- असाधुरेवायम् । खप्रत्ययसन्नियोगेनैर परोवरेति निपातनात्” इति सिद्धान्तकौमुद्याम् । परपरतर. शब्दादीन', परम्परभावश्च, परान् परतराश्वानुनवति परम्परीणः । मन्त्रिपरम्परा मन भिनत्तीत्यत्र पर- म्पराशब्दस्त्वावन्तो वाहुल्यार्थ. प्रकृत्यन्तरम् । पुनाश्च पौनांश्चानुभवति पुनपौत्रीणः । “यथाकामा. नुकामात्यन्तं गामिनि" (७।१।१००)। एभ्यस्त्रिभ्यो द्वितीयान्तेभ्यो गामिन्यर्थे ईनः स्यात् । ५यथाकाम गामी यथाकामीनः । एवमनुफामीनः यथेच्छगामीत्यर्थः । अत्यन्तं गामी अत्यन्तीना -भृश गन्तेत्यर्थः ॥ “पारावारं व्यस्तव्यत्यस्तं च” (७।१।१०१)। समस्तव्यस्तव्यत्यस्ताहितीयान्तात्पा- रावारशब्दानुगामिन्यर्थे ईन. स्यात् । पारावार गामी पारावारीणः, पारीणः, अवारीणः, अवारपारीणः ।। "अनुग्वलम्" (७।१।१०२) अस्माद्वितीयान्तादलङ्गामिन्यर्थे ईनः स्यात् । गना पश्चादनुगु ॥ "विभक्तिसमीप०” ( ३।११३९) इत्यादिनाव्ययीभानः अनुगु ( तद् ) अल पर्याप्तं गामी अनुगवीनो १० गोपालकः ॥ *अलमित्यादि फकिका स्पष्टा । अब सूत्रम्-“अध्वानं येनौ” (७१।१०३). द्वितीयान्तादध्वन्शब्दात् अलङ्गामिन्यर्थे एतौ स्याताम् । अध्यानमलङ्गामी अध्यन्यः, अध्वनीनः "ईनेऽध्यात्मनोः” (७४।४८) इत्यन्यस्वराघलुक् । आदिशब्दात् "अभ्यमित्रमीयश्च” (७१।१०४) अस्माद्वितीयान्तादीयश्वकारायेनौ च स्युः । अमिनस्याभिमुसमभ्यमिन तदलङ्गामी अभ्यमित्रीयः अभ्यमित्र्यः अभ्यमितीणः ॥ सिमास- १५ मीनेत्यादि "समांसमीनाद्यश्वीनाद्यप्रातीनागवीनसाप्तपदीनम्" (७१।१०५) । एष्यन्त्य ईनन्प्रत्ययान्तः, शेपा ईनप्रत्ययान्ता निपात्यन्ते । समासमीनेति समा समामिति वीप्साद्विती. यान्तात्समुदायाद्गर्भ धारयतीत्यर्थे ईन , पूर्वपदविभक्तेश्चालुप् । समा समा गर्भ धारयति समासमीना गौ, समामिति “कालाधनोर्व्याप्तौ” ( २।२।४२ ) इति द्वितीया । अन्ये समाया समाया. गर्भ विमुञ्चति समासमीनेति पूर्वपदस्य यलोपः, शेपविभक्त्यावयवस्यालुक्, उत्तरपदस्य च विभक्तेलृक् २० व्याप्त्यभावाचाधिकरणे सप्तमीत्याहु. । समासमीना तु सा, या प्रतिवर्ष विजायते । प्रयोगोऽपि-"समा- समीना रसवत्युदारा समासमीना रसधेनवश्व । पुरन्दरस्याविषयो यदि स्यात्पुरन्दरस्यापि पद न किञ्चित्' ॥ १ ॥ सप्रत्ययानुत्पत्तौ यलोपो वा वक्तव्यः समा विजायते समाया समाया इति सिद्धान्तकौमुद्याम् । अद्यश्व शब्दयोर्वार्थे समास., विजनिष्यमाणेऽर्थे विजननस्य प्रत्यासत्तौ गम्या- यामौन । अद्य श्वो वा विजनिष्यमाणा अद्यर्थीना गौ -आसन्नप्रसवेत्यर्थः । अन्ये तु प्रत्यासत्त- २५ गम्याया भविष्यत्यऽर्थे प्रत्ययमाहु -अद्यश्वो वा भविष्यति अद्यश्वीनो लाम । एवमद्यप्रात शब्दादीन:- अद्यप्रातीना गौः, अद्यमातीनो लामः । आगोप्रतिदानशब्दात्कारिण्यर्थे ईन , प्रतिदानस्य च लुक, आगोप्रतिदान कारी आगवीनः कर्मकर:-गवा भृतो य आ तस्या गोः प्रत्यर्पणाकर्म करोति.स आगवीनः । रूढिश दोऽय यत्किंश्चिदादाय आ तस्य प्रतिदानात् कर्मकर एवमुच्यते इत्येके । अन्ये तु आ गो प्राप्ते. कर्मकारी आगवीन इत्याहुः ॥ सप्तपदशब्दात्ततीयान्तादवाप्येऽर्थे ईनन्, यदयाप्य ३० तत्सरय ससा वा यदि स्यात् , सप्तभिः पदैरवाप्य साप्तपदीन संख्या, साप्तपदीन ससान चि. स्वार्थे इत्यादि, अत्र सूत्रम्-"अपडक्षाशितंग्वलङ्कर्मालम्पुरुपादीनः” (७।१।१०६)। एभ्य- श्वतुर्थ्यः स्वार्थे ईनः स्यात् । अविद्यमानानि पडक्षीण्यस्मिन् अपडमीणो मत्र., ३।१२६) इति टान्तादीन । द्वाभ्या क्रियते इत्यर्थः ॥ (अपडशीणा कीडा-द्वाभ्यां साध्यते इत्यर्थ ) अपडक्षीण कन्दुकः येन द्वौ क्रीडतः ॥ अदृश्यानि पहीण्यम्य अपडभीणश्चैत्रः, पितुः पितामहस्य ३५ पुत्रस्य चाद्रष्टोच्यते ॥ इन्द्रियपर्यायो वाऽमशः अविद्यमानानि पहाण्यस्यापदक्षीणोऽमनस्को १ ननु समाया क्य व्याप्तिरेक्देशे एव गर्भप्रहणात् । सत्यम् । अवयवे समुदायोपचारात् । विनायते -- "सक्थ्यक्षण""(1 4 .

4 । . प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । खार्थाद्यर्थाः ४३७ विना विचारेण प्रवर्तत इत्यर्यः । आशिता गायोऽस्मिन् आशितङ्गु अस्मादेव निपातनात् पूर्वपदस्य मोन्तः, तत ईनः, आशितङ्गवीनमरण्यम् । अलं कर्मणे अलं पुरुषाय "प्रायवपरि०" (३।१।४७) : इत्यादिना समासः, तत ईनः । राजाधीनमिति तु शौण्डादित्वात्सप्तमीसमासः । अस्ति चाधीनशब्दः 'अस्मास्वधीनं किमु निःस्पृहाणाम्' इति प्रयोगात् (वाक्यं हि वक्तर्यधीनं भवति इति, तदेतत्प्रयोक्तर्यधीनं भवतीति) ॥ ९७ ॥ ५ अदिस्त्रियां वाञ्चः ॥९८ ॥ [सि० ७।१।१०७ ] अश्चन्तात्स्वार्थे ईनो वा स्यात् । प्राचीनं प्राक् । प्राचीना प्राची शाखा । अदिस्त्रियामिति 'किम् ? प्राची दिक् ।। ९८ ।। "अदि०” । अञ्चन्तात्स्वार्थे ईनः स्यात्, न चेत् स दिशि स्त्रियां वर्तते । प्राचीनं प्रागिति एवं प्रत्यक् प्रतीचीनम् , उदक् उदीचीनम् , अवाक् अवाचीनम् , सम्यङ् समीचीनः । प्राची दिगिति-अत्र १० दिगग्रहणं किम् ? प्राचीना शाखा, अवाचीना ब्राह्मणी । स्त्रीग्रहणं किम् ? प्राक् प्राचीनं रमणीयम् । दिश्यपि लुवन्तं स्वभावात् नपुंसकम् । “वाद्यात्” (६।१।११) इति विकल्पे, लब्बे वाग्रहणं पूर्वत्र नित्यार्थम् ॥ ९८॥ इति ईनप्रत्ययाधिकारः। तस्य तुल्ये कः संज्ञाप्रतिकृत्योः ॥ ९९ ॥ [सि० ७१।१०८] पष्ठ्यन्तात्तुल्येऽर्थेऽनयोर्गम्ययोः कः स्यात् । अश्वकः ॥ "शाखादेर्यः” (७१।११४) शाख्यः। मुख्यः। “कुशाग्रादीयः” (७।१।११८)। कुशाग्रीया मतिः॥"कालतालीयादयः" (७१११११७)। तुल्ये साधवः । *विप्रभृतिभ्यः शालशङ्कटादयः । विशालं विशङ्कटम् ॥९९ ।। "तस्य० । अयोर्गम्ययोरिति, संज्ञायां प्रतिकृतौ वा गम्यायामित्यर्थः । अश्वस्य तुल्यः अश्वकः । उष्ट्रकः । अश्वादिसदृशस्य संज्ञा एताः । प्रतिकृतिः काष्टादिमयं प्रतिच्छन्दकम् । अश्वकं रूपम् , २० 'अश्विका प्रतिमा (अश्वकानि रूपाणि । तुल्य इति किम् ? इन्द्रदेवः । एवन्नामा कश्चित् । नात्र साह- श्यम् । संज्ञाप्रतिकृत्योरिति किम् ? गोस्तुल्यो गव्यः ) । संज्ञाग्रहणमप्रतिकृत्यर्थम् । एके वाहुः-तुल्य. माने प्रत्ययः-शिव इव शिवकः । - अत्रायं विशेप:-"न नृपूजार्थध्वजचित्रे" (७।१।१०९) । नरि मनुष्ये पूजार्थे ध्वजे चित्रे च चित्रकर्मणि अभिधेये को न स्यात् । तत्र सोऽयमित्येवाभिसम्बन्धः । संज्ञाप्रकृत्योरिति यथासम्भवं२५ प्राप्ते प्रतिपेधोऽयम् । नृ. चञ्चा-तृणमयः पुरुषः, यः क्षेत्ररक्षणाय क्रियते । चञ्चातुल्यः पुरुषः चञ्चा । एवं वर्धिका, खरकुटी । पूजार्थ. अर्हन्, शिवः, स्कन्दः, पूजनार्थाः प्रतिकृतय उच्यन्ते । ध्वज.२७ १ प्रसज्योऽयं नव् दिग्लक्षणा स्त्री चेन्न भवतीति नतु अदिग्लक्षणायां स्त्रियामिति पर्युदासस्तेन पुंक्लीवयोरपि भवति । ननु दिशः स्त्रीत्वमव्यभिचारि तकिमत्र स्त्रीग्रहणेनेल्लाह स्त्रीग्रहणमिति । स्त्रीलिङ्गरहितायां दिश्यश्चत्यन्तवाच्यायां प्रत्युदाहरति प्राक्- • प्राचीनं रमणीयमित्यादि । २ प्रागिति धालुयन्तम् । अव्ययवाल्लिङ्गायोग्यं, प्राचीनं च स्वार्थिकान्तत्वात् तद्वत् , तथापि खभावा- नपुंसकम् । अन्यथा अमेदे अलिङ्गलम् मेदे तु स्त्रीलिङ्गतं स्यात् । ३ 'अपडक्ष'-इत्यत्र सूत्रे वाक्यं वलौकिकम् । ४ एव- नामानः पशुविशेषाः, न तु प्रतिविम्बानि । ५ पट्यन्तादभेदे इन्द्रदेवस्य सम्बन्धी इन्द्रदेवः । इन्द्रदेव इत्युक्तेऽपि संज्ञा प्रती. यत इति न व्यङ्गविकलता । ६ नहि गोक इति कप्रत्ययान्तेन संज्ञा प्रतीयते । ७ निपेधे सतीत्यर्थः । ८ चचातुल्यः पुरुषोऽमे. दोपचारेण चम्चा । अतश्चञ्चापुरुष इत्यादी सामानाधिकरण्यम् । तथा चान्येरिव प्रत्ययस्य लुन् न वक्तव्या । ९ मनग्ये संज्ञायां पूजा दिपु प्रतिकृती प्राप्तिः । - - . ४३८ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपजहैमलधु- गरुडः, सिंहः, तालः, एते ध्वजाः । चिन. दुर्योधनः, भीमसेनः, एते चित्राणि ॥ "अपण्ये जीवने" (७।१।११०) जीवन्त्यनेनेति जीवनम् , पण्य विक्रेतव्यम्, ततोऽपण्ये जीवने को न स्यात्। वासुदेवः शिवः स्कन्दः, देवलकानां जीविकार्थाः प्रतिकृतयः । अपण्य इति किम् ? हस्तिकान् विक्री- णीते । जीवन इति किम् ? क्रीडने निषेधो मा भूत्-हस्तिकः ॥ "देवपथादिभ्यः" (७१११११) ५एभ्यः सज्ञाप्रतिकृत्योः को न स्यात् । देवपथस्य तुल्यः देवपथः । देवपथ, हसपथ, अजपथ, चारि- पथ, राजपथ, शतपथ, शङ्खपथ, (स्थलपथ) सिन्धुपथ, उध्रप्रीवा, वामरज्जु, (हस ?) हस्त, इन्द्र, दण्ड, (पथ्य' ) पुष्प, मत्स्य १६ इति देवपथादयः पोडश । वहुवचनमाकृतिगणार्थम् । पूर्वयोगा- वस्यैव प्रपञ्चः ॥ "वस्तेरेयम्" (७११११२) तस्य तुल्ये । सज्ञाप्रतिकृयोरिति तु निवृत्तम् (प्रत्य- यान्तरोपादानात् ) । वस्तेस्तुल्या वास्तेयी प्रणाली ॥ "शिलाया एयच" (७१।११३) । चकारा- १० देयमपि । शिलायास्तुल्यं शिलेय दधि शिलेयी इष्टका । शैलेयं दधि शैलेयी इष्टका । एयञ्च इत्यन चकार "अणयेकण्” (२।४।२०) इति एयस्य सामान्यग्रहणाविघातार्थ. अन्यथा ह्यस्यैव स्यात् । अन्ये तु द्रव्यशब्दवद् (यथा द्रोभव्ये इति तुल्यार्थे ये द्रव्यशब्दो नियत लिङ्गमाह, एव शिलेयमिति ।) यजन्त स्त्रियां नास्तीत्याहुः ॥ "शाखा" । एभ्यस्तस्य तुल्ये यः स्यात् । पुरुषस्कन्धस्य वृक्षस्कन्धस्य वा तिर्यक् प्रसृतमग शाखेत्युच्यते । (तद्यथा शासा पार्शयता तथा) कुलस्य यः पा यतोऽगभूत' १५स शासायास्तुल्यः शाख्यः । मुख्यः, जघन्यः । शाखा, मुख, जघन, स्कन्द, स्कन्ध, मेघ, शृङ्ग, चरण, शरण, उरस् , शिरस् , अग्र, इति शाखादयो द्वादश १२ ॥ "द्रोभव्ये” (७।१।११५)। यः । विशिष्टेष्टपरिणामेन भवतीति भव्यमभिप्रेतानामर्थाना पानम् । द्रोस्तुल्यः द्रव्यमयमाणवकः । द्रव्यं कार्षापणम् , यथा दु अग्रन्थि अजिह्म दारु उपकल्प्यमान विशिष्टेष्टरूप भवति, तथा माणव- कोऽपि विनीयमानो विद्यालक्ष्म्यादिभाजन भवतीति द्रव्यमुच्यते । कार्षापणमपि विनियुज्यमानं २० विशिष्टमाल्याापभोगफलं भवतीति द्रव्यमुच्यते । दुरिव द्रव्य राजपुत्रः । यथा द्रुमः पुष्पफलादि- भिरर्थिनः कृतार्थयति एवमन्योऽपि यः सोऽपि द्रव्यमुच्यते । भव्य इति किम् ? द्रुतुल्यो न चेत- यते ।। "कुशा०" कुशाग्रस्य तुल्य कुशाग्रीय शस्त्रम् । तदाकारत्वात् । कुशाग्रीया मति. तीक्ष्णत्वात् ॥ "काक." एते ईयप्रत्ययान्तास्तस्य तुल्ये निपात्यन्ते । काकश्च तालश्च काकतालम् , यथा कथंचिद्र- जतः काकस्य निपतता तालेनातर्कितोपस्थितश्चित्रीयमाणसयोगो लक्षणयोच्यते, तत्तुल्य काकुताली- २५यम् । एव खलतिबिल्वीयम्, अन्धकश्च वर्तिका च अन्धकवर्तिकम्-अबान्धकस्य वर्तिकाया उपर्य- तर्कितः पादन्यास उच्यते । अन्धकस्य बाहूल्क्षेपे वर्तिकायाः करेनिलयन वा तत्तुल्यमन्धकवर्तकी- यम् । अजया पादेनावकिरत्यात्मवधाय कृपाणस्य दर्शनमजाकपाणम्, तत्तुल्यमजाकपाणीयम् । एवं- विधचिनीकरणविषयाः काकवालीयादयः । निपातन रूघ्यर्थम् । वहुवचनादन्येऽपि अर्द्धजरतीयघुणाक्ष- रीयादयो ज्ञेयाः ॥ "शर्करादेरण" (७१११११८) तुल्ये । शर्करायास्तुल्य शार्कर दधि-मधुरत्वात् । ३०शार्करी मृत्तिका-कठिनत्वात् । शर्करः, कपालिका, कम्बाप्टिका (कम्माष्टिका) गोपुच्छ, गोलोमन्, पुण्डरीक, शतपत्र, नराची, नकुल, सिकता, कपाटिका इति शर्करादय एकादश ।। अनादिशब्दस्मरणात् "अः सपल्या:" (७१११११९) तुल्ये । सपढ्यास्तुल्यः सपन्नः ।। "एकशालाया इकः” (७।१।१२०) । तुल्ये। एफैशालायास्तुल्यमेकशालिकम् । “गोण्यादेश्चे- कण्” (७।१।१२१) । गोण्यादिभ्य एकशालायाश्च तुल्ये इकण् स्यात् । गोण्यारतुल्य गौणिकम् । एक- ३५शालाया ऐकशालिकम् । गोणी, अहुली, भरुजा, बभ्रु, वल्गु, मण्डर, मण्डल, शकुली, हरि, मण्ड 4 + प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । तस्य तुल्येत्याद्यर्थाः १० कपि, भरु, खल, उदश्चित् , तरस्, कुलिश, मुनि, रुरु; १८ इति गोण्यादयोऽष्टादश | "कर्क- लोहिताहीकण च” (७१।१२२) आभ्यां तुल्ये टीकण् स्यात् , चकारादिकण च । शुक्लोऽश्वः कर्कः । तस्य तुल्यः कार्कीकः कार्किकः । लोहितीकः लौहितिकः । स्फटिकादिः । अलोहितवर्णोऽप्युपा- श्रयवशाधस्तथावभासते स एवमुच्यते । टकारो ड्यर्थः-कार्कीकी, लौहितीकी ॥ * इति तस्य तुल्यप्रकरणम् ।* *विप्रभृतिभ्य इति, अत्र सूत्रपद्धतिरेवम्-। 'वेर्विस्तृते शालशङ्कटौ” (७।१।१२३) विशालः, विशङ्कटः, विस्तृत इत्यर्थः ।। "कट? (७।१।१२४) वेरित्यनुवर्तते । विकटः-विस्तृत एव ।। "सम्प्रोन्नेः सङ्कीर्णप्रकाशाधिकसमीपे” (७।१।१२५)। एभ्यश्चतुर्थ्य एषु चतुःष्वर्थेषु कटप्र- त्ययः स्यात् । सङ्कटः । प्रकटः । उत्कटः । निकटः ॥ "अचात्कुटारश्चावनते” (७।१।१२६) अवशब्दावनतेऽर्थे कुटारश्वकारात्.कटश्च प्रत्ययः स्यात् । अवकुटारः, अवकुट:; अवनत इत्यर्थः ।।१० "नासानतितद्वतोष्टीटनाटभ्रटम्” (७१।१२७ ) । अवशब्दानासानतौ तद्वति च वाच्ये एते त्रयः प्रत्ययाः स्युः । नासानतौ । नासाया नमनं अवटीटं अवनादं अवभ्रटम् । सा नासा नतिर्विद्यते यस्मिन् स तद्वान् नासा पुरुपः । अपकृष्टो वार्थः-तत्र अवटीटा अवनाटा अवभ्रटा नासा । अव- टीटः अवनाटः अवभ्रटः पुरुपः । अवटीटं अवनादं अवभ्रटं ब्रह्मदेयम् । अपकृष्टमपि हि वस्तु या लोको नासिका नामयति ॥ "नेरिनपिटकाश्चिक्चिचिकश्चास्य” (७।१।१२८) ११५ निशब्दानासानतौ तद्वति चाभिधेये एते त्रयः प्रत्ययाः स्युस्तत्सन्नियोगे च नेर्यथासङ्ग्यं चिक्-चि-चिक् इत्येते आदेशाः स्युः । चिकिनं चिपिटं चिकम् , नासिकानमनम् । चिकिना चिपिटा चिक्का नासिका । चिकिनः चिपिटः चिक्कः पुरुषः । वहुवचनं रूढ्यर्थम् । तेनाप्रकृष्टेऽर्थे ब्रह्मदेयलक्षणे चिकितमित्यादयो न भवन्ति ॥ "विडबिरीसौ नीरन्ध्रे च” (७१।१२९) निझब्दानीरन्धेऽर्थे नासिकानतितद्वतोच एतौ स्याताम् । निविडा निविरीसाः केशाः नीरन्ध्रा इत्यर्थः ।। निविडं निबिरीसं वस्त्रम् । नासिकाया २० नमनं (शब्दान्तरेण निशब्दस्यार्थकथनम् ) निविडं निविरीसम् । निविडा निविरीसा नासिका । निविडो निविरीसो मैत्रः । विधानसामर्थ्यात्पत्वं न भवति ॥ "क्लिन्नालश्चक्षुपि चिल् पिलू चुल् चास्य" (७१।१३० ) क्लिन्नशब्दाचक्षुपि वाच्ये लः स्यात् , अस्य चैते त्रय आदेशाः स्युः । चिल्लं पिल्लं चुलं चक्षुः । तद्योगात् पुरुपोऽपि चिल्लः पिल्लः चुल्लः । “उपत्यकाधिलके" (७।१।१३१) उपाधिश- ब्दाभ्यां पर्वतस्यासन्नायामधिरूढायां च भूमौ त्यको निपात्यते । उपत्यका अधित्यका क्षिपकादित्वादि-२५ खाभावः । स्वभावतः स्त्रीलिङ्गावेतौ । पुंल्लिङ्गावपीति कश्चित्-उपत्यको देशः, अधित्यकः पन्थाः । निपातनं . रूढ्यर्थम् ।। "अवे सङ्घातविस्तारे कटपटम्” (७।१।१३२) पंष्ट्यन्तादविशब्दादर- थासङ्ख्यं सवाते विस्तारे चार्थ कटपटी स्याताम् । अवीनां सदातः अविकटः । अवीनां विस्तार! अविपटः । सङ्घाते सामूहिकानां विस्तारे ऐदमर्थिकानां चापवादः ॥ “पशुभ्यः स्याने गोष्टः" (७।१।१३३) पष्ठ्यन्तेभ्यः पशुनामभ्यः स्थाने वाच्चे गोष्टः प्रत्ययः स्यात् । गवां स्थानं गोगोप्टन ३० अश्वगोष्टम् ॥ "द्वित्वे गोयुगः” (७१।२-३४ ) पशुभ्य इति वर्त्तते । द्वित्वेऽर्थ गोयुगः प्रत्ययः स्यात् । गवोदित्वं गोगोयुगम् , अश्वगोयुगम् ।। "पट्त्वे पड्गवः” (७/१।१३५) । प्रत्यय इति शेयः । अश्वानां पट्वं अश्वपड्गवम् ।। त्रयोऽपि प्रयोगा इदमापवादाः ॥ "तिलादिभ्यः रहे तैल" (७१।१३६) एभ्यः पष्ठ्यन्तेभ्यः स्नेहऽर्थ तेलप्रत्ययः म्यान । तिलाना हो विकारनिन्द तेलम् । सर्पपतलं इगुदीतलं एरण्डतै लम् ।। "तत्र घटते कर्मणष्टः" (७।१।१६५) नाम्य- न्तात्कर्मन् शब्दात् घटते इत्यर्थ ठः स्यात् । कर्मणि घटने कर्मठः ।। ९९ ।। ३ , , महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतः॥ १०॥ [सि० ७।१।१३८] एभ्यः सजातार्थेभ्यः पठ्यर्थे इतः स्यात् । तारकाः सजाता अस्य तारकितं नमः । पुष्पितः तरुः ॥ १० ॥ "तद०" एभ्य इति प्रथमान्तेभ्य इति ज्ञेयम् । यत्प्रथमान्तं सञ्जातं चेत्तद्भवति । पुष्पाणि सञ्जाता- ५न्यस्य पुष्पित इति । तारका, पुष्प, कर्णक, जीप, मून, पुरीष, निष्क्रमण, उच्चार, विचार, प्रचार, १० आराल, कुड्मल, कुसुम, मुकुल, चकुल, स्तयक, पल्लव, किशलय, वेश, वेग, २० निद्रा, तेन्द्रा, श्रद्धा, बुभुक्षा, पिपासा, अभ्र, श्वभ्र, रोग, अङ्गारक, अङ्गार, ३०, पर्णक, द्रोह, सुस, दुःख, उत्कण्ठा, भर, तरङ्ग, व्याधि, व्रण, कण्डूक, ४० कण्टक, मञ्जरी, कोरक, अङ्कुर, हस्तक, पुलक, रोमाञ्च, हर्ष, उत्कर्प, गर्व, ५० कल्लोल, शृङ्गार, अन्धकार, कन्दल, शैवल, १० कुतूहल, कुवलय, कलङ्क, कजल, कईम, ६० सीमन्त, राग, क्षुध् , तृप्, जर, गर, दोह, शास्त्र, पण्डा, मुकुर, ७० मुद्रा, गध, फल, तिलक, चन्द्रक, इति तारकादयः पञ्चसप्ततिः ॥ बहुव- चनमाकृतिगणार्थम् ॥ अनार्य विशेष:-"गर्भादप्राणिनि" (७।१।१३९) । गर्भशब्दात्तदस्य सञ्जातमित्यर्थे इतः स्यात्, स चेत् षष्ठ्यर्थः प्राणी न स्यात् । गर्भः सञ्जातोऽस्य गर्भितो ब्रीहिः । अप्राणिनीति किम् ? गर्भ: १५ सञ्जातोऽस्या दास्या इति वाक्यमेव ॥ १०० ॥ प्रमाणान्मात्रट् ॥ १०१ ॥ [सि०७।१।१४०] "प्रमाणान्मात्रट्" (७।१।१४०) षष्ठ्यर्थे )। आयामः प्रमाणम् । जानु प्रमाणमय जानु- मात्रं जलम् । तावन्मात्री भूः ॥१०१ ॥ "प्रमा०" प्रथमान्तात्प्रमाणवाचिनः षष्ठ्यर्थे मात्रट् स्यात् । आयाम इति आयाम मानं प्रमाण २० तहिविधम्-ऊर्ध्वमान तिर्यग्मानं च । तत्राद्यं जानुमान जलमिति । एव जानुमानी खातेत्यपि । द्वितीय रज्जुमात्री भूमिरिति । टकारो डयर्थः ॥ १०१ ॥ वोर्द्ध दनवयसट् ॥ १०२ ॥ [ सि० ७११११४२] ऊर्ध्वप्रमाणादेतौ वा । जानुदनं जानुद्वयसं जानुमात्रं जलम् । "हस्तिपुरुषाद्वाण" (७१२१४१) प्रमाणे ॥ १०२ ॥ २५ “योर्द्ध०" सूत्रं स्पष्टम् । “हस्ति०" याग्रहणमण्मानटोरवाधनार्थम्, तेन पुरुषहस्तिनोश्चातूरूप्यं सिद्धम् ॥ १०२ ॥ अनोपयोगिसूनम् । संयोगादिनः ॥ १०३ ॥ [सि०७४।५३ ] संयोगात्परस्पेनोऽण्यन्त्यस्वरादेर्लुग् न स्यात् । हास्तिनम् ॥ हस्तिमात्र हस्तिदनं हस्तिद्वयसम् । पौरुपं३॥ “इदं किमोऽतुरिय-किय्-चास्य" (७१।१४८) माने । इदं मानमस्येयान किया ३० पटः । “यत्तदेतदो डावादिः" (७१२१४९) । अतुः । यावान् तावान् एतावान् ।। १०३।। "सयो." स्पष्टम् ।। अत्र विशेषाश्चैवम्-"मानादसंशये लुप्" (७।१११४३) प्रमाणादिति वर्त्तते । य शब्दो ३३हलवितस्त्यादिवत्साक्षादेव मानवाची न तु रस्वादिवलक्षणया तन्मानम्, तस्मात्प्रमाणवाचिनः प्रस्तु- -- प्रक्रियांवृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । मानाद्यर्थाः ४४१ तस्य मात्रादेरसंशये गम्यमाने लुप् स्यात् । हस्तः प्रमाणमन्य हस्तः । वितस्तिः पटः ॥ शमश्चतुर्विंशति- रमुलानि । असंशय इति किम् ? शमः प्रमाणमस्थ स्वात् शममात्रम् । केचित्तु मानमात्रान्मात्रटं तस्यासंशये लुविकल्पं चेच्छन्ति-प्रस्थः प्रस्थमात्रो वा श्रीहिः; हस्तो हस्तमानं वा काष्ठम् । पलं पलमानं वा सुवर्णम् । शतं शतमात्रा वा वृपाः ॥ "द्वियोः संशये च” (७।१।१४४ )। माना- दिति वर्त्तते । तेन च मीयतेऽनेनेति मानमिति प्रमाणं परिमाणमुन्मानमुपचरितमनुपचरितं सया ५ चेह गृह्यते "ऊर्ध्व मानं किलोन्मानं परिमाणं तु सर्वतः । आयामस्तु प्रमाणं स्यात्, सङ्ख्या बाया तु सर्वतः" ।। १ ।। ततश्च भानान्ताहिगोरसंशचे च प्रस्तुतप्रत्ययस्य लुप् स्यात् । द्वौ शमौ प्रमाणमस्य स्यादिति वा द्विशमः । द्विहस्तः, द्विकाण्डा क्षेत्रभक्तिः । द्विकाण्डी रजुः-"काण्डात्प्रमाणादक्षेत्रे" (२।४।२४) इति प्रत्ययलुपि डीः । “पुरुपाद्वा" (२।४।२५) इति विकल्पेन डीः द्विपुरुषी द्विपु- रुपा खाता । द्विहस्तिनी त्रिहस्तिनी । एवं द्वौ प्रस्थौ मानमस्य स्यादिति वा द्विग्रस्थः । एवं द्विपलम् , १० द्विशतः । अन्ये तु रूढप्रमाणान्तादेव द्विगोरिच्छन्ति, तन्मते द्विप्रस्थमानं द्विपलमात्रं द्विशतमात्रं स्यादित्यादौ लुब् न स्यात् । आदिशब्दात् "मानद (७।१।१४५)। मानात् संशय इति वर्तते । प्रस्थो मानमस्य स्यात् प्रस्थमात्रं धान्यम् , प्रस्थमात्रा ब्रीहयः। कुडवमानम् , पलमात्रम् , पञ्चमात्राः, दिष्टिमात्रम् । मात्रदन्न- द्वयसानि नामान्यपि सन्ति, अनुवन्धासञ्जनार्थं तु प्रत्ययविधानम् ; तेन च खियां विशेपः । "शन्-१५ शदिशः” (७।१।१४६) । एभ्यो मानवृत्तिभ्यः संशये गम्ये मात्रट् स्यात् । डिनोऽपवादः । दश मानमेषां स्यात् दशमात्राः । त्रिंशन्मात्राः, विंशतिमात्राः ॥ "डिन्” (७।१।१४७) । संशय इति निवृत्तम् । सङ्ख्यामानवृत्तेः प्रागुक्तशनादित्रयात् डिन् स्यात् । पञ्चदशाहोरात्रा मानमस्य पञ्चदशी पक्षः । पञ्चदशिनौ, पञ्चदाशिनः पक्षाः । एवं त्रिंशी मासः त्रिंशिनौ त्रिंशिनः । त्रयस्त्रिंशिनो देववि- शेपाः । विशिनो भवनेन्द्राः ॥ "इदं०" प्रथमान्तादिदमशब्दाकिम्शब्दाच पष्ट्यर्थे मेचे अतुः स्यात् ।२० उकारो दीर्घत्वाद्यर्थ इत् । तत्सन्नियोगे चानयोरिय्-किय् इत्यादेशौ स्याताम् ॥ “यत्त०" अत्र डावा- दिरित्येतदन्तं सूत्रम् , अतुरियेतावान् वृत्त्यंशः । तस्य च यदादिभ्यस्त्रिभ्यः प्रथमान्तेभ्यः पष्टय मेये डावादिरतुः स्यादित्यर्थः । यावानिति यत्प्रमाणमत्य यावान् । ननु मात्रडादयोऽपि दृश्यन्ते, इदं प्रमाणमस्य इदमानं किंमात्रं यन्मात्रं तन्मात्रं एतन्मात्रं यनं यहयसं इत्यादि । सत्यम् । स्वविपये मानविशेपे प्रमाणे मात्रडादयो भवन्त्येव, मानसामान्ये तु अतुरेवेति विभागः ॥ १०३ ॥ यत्तत्किनः सङ्ख्याया डतिर्वा ॥ १०४ ॥ [सि० ७।१।१५० ] सध्यारूपमानवाचिभ्यः एभ्यः सङ्येये डतिर्वा स्यात् । यति यावन्तः । तति तावन्तः । कति कियन्तः ॥१०४॥ 'यत्त" । वेति-पक्षे यथाविहितोऽतुः । या साया मानमेषां यति चावन्तः । मानादिति साहाया विशेषणं किम् ? क्षेपे मा भूत । का सरला एपां दशानाम् ॥ १०४ ।। अवयवात्तयट् ॥ १०५ ॥ [सि० ७।१।१५१ ] अवयववृत्तेः सयादवयविनि तयट् स्वात् । पञ्च अवयवा अस्य पञ्चनयो यमः । चतुष्टयी गतिः ।। "द्वित्रिभ्यामयड़ वा” (७।१।१५२ ) । अवयवे । हवं हिनयम् । अयं वित- यम् ।। १०५ ॥ HET. नी. ... । ३० २३ । ४२ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज़हमलघु- "अव." "द्वित्रि०" सूत्रद्वयं स्पष्टम् । किन्तु अवयवा अवयविनि सम्बद्धा इति सामाद- प्रत्ययार्थ इति विज्ञायते । त्रयाणि पानानि यथा तथा पिबेदित्यन तु देशकालादिभेदेन समुदा- धानाद्बहुवचनम् । द्वये पदार्था जीवा अजीवाश्चेत्यत्र तु जीवाजीवतया द्वैराश्योपादानाद्बहूनामपि ग्यवौ भवतः । कथमुभयो मणिः, उभये देवमनुष्याः, उभयी दृष्टिरिति । उभयशब्दः सर्वादिपूभ- ते पठ्यमानः शब्दान्तरमेव विशेयम् । तथा चास्य "नेमार्द्ध” (१।४।१०) इत्यादिना जस इकार पो न स्यात् ।। नादिशब्दसंसर्गात् "द्यादेर्गुणान्मूल्यक्रेये मयट्" (७११।१५३) । यादेः सयाशब्दा- त्तेः प्रथमान्तात्यष्ट्यर्थे मयट् स्यात् , स चेत्सयाशब्दो मूल्ये क्रेये वा वर्तते । यवानां द्वौ गुणौ मस्योदश्चितः क्रेयस्य द्विमयमुश्वित् यवानाम् । एवं त्रिमयं चतुर्मयम् ॥ उदश्वितो द्वौ गुणौ वेषां यवानां द्विमया यवा उदश्वितः । एवं त्रिमयाः चतुर्मयाः । द्वधादिपदस्य सापेक्षस्यापि नित्य- झत्वेन गमकत्वाद्वृत्तिः ॥ अथवा मूल्यक्रेय इति प्रत्ययार्थविशेषणम् , ध्यादेः सङ्ख्याशब्दाद्गुण- प्रथमान्तात्षष्ठ्यर्थे मयट् स्यात्, स चेत्षष्ठ्यर्थो मूल्यं क्रेयं वा भवति । द्वौ गुणावेषां मूल्यभूतानां नामुदश्वितः द्विमया यवा उश्वितो मूल्यम् । द्वौ गुणावस्योदश्वितः क्रेयभूतस्य द्विमयमुश्विद्यवानां -त्रिमयं चतुर्मयम् । अधिकं तत्सहयमस्मिन् शतसहस्रे शतिशद्दशान्ताया डः॥ १०६ ॥ [सि० ७।१।१५४] शतिशद्दन्तायाः सङ्ख्यायास्तच्छतादिसख्यं वस्त्वधिकमित्यर्थे शतसहस्रयोर्डः स्यात् । विंशति- नानामधिकास्मिन्निति विंशं त्रिंशं द्वादशं योजनशतं योजनसहस्रं वा ॥ १०६ ॥ "अधि." । तच्छतादिसङ्ख्यं वस्त्वधिकमिति किम् ? विशतिर्दण्डानां अधिका अस्मिन् योजनशते-- शतादिसायं वस्तु योजनात्मकं अधिकं तु दण्डात्मकमिति न भवति । तत्सयमिति च यदेव पायते शतसहस्रादिना योजनादिकं तनातीयमेव यद्यधिकं स्यात्तदा भवतीत्यर्थः ॥ १०६ ॥ सङ्ख्यापूरणे डट् ॥ १०७ ॥ [सि० ७।१११५५] सङ्ख्या पूर्यते येन तसिन्नर्थे सङ्ख्याया डट् स्यात् । द्वादशानां सङ्ख्यापूरणः द्वादशः । “विंश. देर्वा तमट्” (११११५६) । पूरणे । विंशतितमः । सहस्रतमः । शततमः । “पष्टयादेर- यादेः" (७१।१५८)। तमट् । पष्टितमः । सङ्ख्यादेस्तु डट् । द्विसप्ततः ॥ १०७ ॥ "सङ्ख्या समाया इति सहयावाचिशब्दात् पूरणोक्तिसामर्थ्यात् पष्ठ्यन्तात्मत्ययो विज्ञायते । श इति । प्रत्ययस्य टित्वात् त्रियां द्वादशी तिथिः । “विंश.” वावचनात् पक्षे डट् । विंशति- ; विंश इति । स्त्रियां विंशतितमी विंशी स्त्री। विंशत्यादयश्च अष्टपञ्चाशत्पर्यन्ता ज्ञेयाः-अष्टपश्चाशतः पापूरणः अष्टपञ्चाशत्तमः अष्टपश्चाशः ॥ "शतादिमासाईमाससंवत्सरात्" (७१॥ ७) । शतादिभ्यः सयाशब्देभ्यः मासादिभ्यश्च त्रिभ्यः पूरणे तमट् स्यात् । शतस्य पूरणं शत- । एकशततमः ॥ पष्टयादेरित्येव सिद्धे शतादिग्रहणं सङ्ख्याद्यर्थम् , ततोऽयमपि डिद्विकल्पापवादः।। ट्या" नास्ति साया आदिरवयवो येषां तेभ्यः पश्यादिभ्यः पूरणे तमट् स्यात्, विकल्पाप- :: । पष्टितम इत्यादि । एवं सप्ततितमः, अशीतितमः, नवतितमः । असयादेरिति किम् ? एकप. मिः, एकपष्टः । विशत्यादेरिति विकल्प एव ॥ १०७ ।। ॥ ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । सद्यापूरणार्थाः ४१३ नो मट् ॥ १०८॥ [सि०७।११५९] नान्तायाः सङ्ख्यायाः पूरणे मट् स्यात् । पञ्चमः । सङ्ख्यादेस्तु डः । पोडशः ॥ १०८ ॥ "नो मट्। अससयादेर्नान्तायाः सहयायाः पूरणे मट् स्यात् । डटोऽपवादः ॥ १०८ ॥ पित्तिथट् बहुगणपूगसङ्घात् ॥ १०९ ॥ [सि० ७।१।१६० ] एभ्यस्तिथटू स्यात् ।। "अतोरिथद" (७१२१६१)। पूरणे । तौ च पितौ । बहुतिथः ॥१०९॥५ "पित्तिः" । "बहुगणं भेदे" (१।१।४०) इति बहुगणयोः सवयात्वम् , पूगसङ्घयोस्तु न । ततोऽत्र सक्ष्याविशेषणं यथासम्भवं ज्ञेयम् । वहूनां सहयापूरणो वहुतिथः । एवं गणस्य सङ्ख्यापूरणः गणतियः, पूगतिथः, सङ्घतिथः । “अतो." सूत्रं स्पष्टम् । एतयोः पित्त्वे फलं दर्शयति ।। १०९ ।। क्यङमानिपित्तद्धिते ॥ ११०॥[सि० ३२१५०] एषु त्रिष्वनू परतः स्त्री पुंवत्स्यात् । बह्वीनां सङ्ख्यापूरणी बहुतिथी । *यावतिथः । याव-१० तिथी । “पट्कतिकतिपयात् थट्” (७१११६२) । पूरणे । पष्ठः कतिथः कतिपयथः । "चतुरः" (७१।१६३)। थट् । चतुर्थः । “येयो चलुक् च” (७।१।१६४)। चतुरः । तुर्यः । तुरीयः। "द्वेस्तीयः” (७।१।१६५)। द्वितीयः ॥ ११० ॥ "क्य०" एयु त्रिप्विति क्यङि प्रत्यये, मानिनिझब्दे चोत्तरपदे, पिति तद्धिते च प्रत्यये, परतः स्त्रीलिङ्गशब्दोऽनूङ् पुंवद्भवति । क्रमेणोदाहरणानि-क्यङ्, श्येनीवाचरति श्येतायते । मानिन्. दर्शनीयां १५ मन्यते दर्शनीयमानी अयमस्याः, दर्शनीयमानिनीयमस्याः, मानिन्ग्रहणमस्त्युत्तरपदार्थमसमानाधिकर- णार्थ च । दर्शनीयामात्मानं मन्यते दर्शनीयमानिनीति तु सामानाधिकरण्ये पूर्वेणैव भवति । अथ पित्तद्धिताः; ध्यप्. अजायै हितं अंजथ्यं यूथम् ; पित्तिथट्. वह्वीनां पूरणी बहुतिथी चरट्. भूतपूर्वा- पट्वी पटुचरी; पित्तस्. वहीभ्यो बहुतः; त्रप्. वह्वीपु वहुत्र; प्रशस्. वह्वीभ्यो देहि बहुशो देहि; पाशप्. निन्द्या दर्शनीया दर्शनीयपाशा; तमप्तरपौ; इयमासामतिशयेन पक्का पक्कतमा, इयमनयोरतिशयेन २० पक्का पक्कतरा; रूपप. प्रशस्ता दर्शनीया दर्शनीयरूपा; कल्पप्. ईपदसमाप्ता दर्शनीया दर्शनीयकल्पा; देश्यप्. दर्शनीयदेश्या; कप्. कुत्सिता (ह्रस्वा ) दर्शनीया दर्शनीयका; कुत्सिता दरत् दारदिका; कथं पट्विका मृद्विका "ड्यादीदूतः के” (२।४।१०४) इत्यत्र ङीग्रहणं पुंवद्भाववाधनार्थमित्युक्तम् , तेनात्र हस्त्रो भवति । पञ्चभिर्गार्गीभिर्गाायणीभिर्वा क्रीतः पञ्चगर्ग:-अत्रेकणो"ऽनान्यद्विः प्लुप्" (६।४। १४७) इति लुपः पित्त्वात्पुंस्त्वम् ।। अत्रादिशब्दोपादानात् "जातिश्च णितद्धितयखरे” ( ३।२।५१)। अन्या परतः स्त्रीजातिश्च णिप्रत्यये यकारादौ स्वरादौ च तद्धिते विषयभूते उत्पत्स्यमाने तद्विवक्षायामेव पुंवद्भवति; अनूङ् । णि. पट्वीमाचष्टे पँटयति एवमेतयति लघयति । तद्धितय. एन्यां साधुः एत्यः, श्येत्यः, एन्या भाव २८ १ अत्र 'खाद्गाद् डीर्जातिश्च'. इति निपेघेऽपि पित्करणात् पुंवद्भावः । २ अत्रासन्देहार्थमिकारो न कृतः, तथाहि किमत्र पुंवद्भावे सति 'अस्यायत्तत्क्षिपकादीनाम्' इत्यनेन इकारः, यद्वाऽकृतेऽपि पुंवद्भावे 'स्वज्ञाजभना-' इत्यनेनाप एव स्थाने, इति पुंवद्भावाभावयोर्न विशेषप्रतीतिः स्यात् । ३ दरदां राज्ञी 'पुरुमगध'-इत्यण् । यदा खपत्यार्थेऽण् , तदा ‘खानाद बी' इति गोत्रं चरणः सहेति जातित्वे पुंवद्भावप्रतिषेधः स्यात् । अयेशे वाक्ये कृतेऽणू न प्राप्नोति, यतो रात्यभिधेये उक्तः । अत्र तु स्त्रीलविशिष्टेऽस्तीति न प्राप्नोति । उच्यते । नामग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापीति । ४ णिजि पुंवद्भावे 'नामिनोऽकलि- हलेः' इति वृद्धौ अन्त्यखरादिलोपे । यद्यत्र वृद्धिमकृत्वैव उकारस्यैव लोपं विदध्यात् ततोऽपीपटदिलादी समानलोपा- दित्वं न स्यात् ॥ .

महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिनिरचिते खोपज्ञहैमलघु- ऐयम् , शैत्यम् । तद्धितस्वर. भवत्या इदं भावत्कम् , भवदीयम् , इयमासामतिशयेन पट्वी पटिष्टा पटी- यसी ।। जातितद्धितय. । दरदोऽपत्य स्त्री अण् लुप् दरद् तस्या साधुः दारद्यः (एवम् , औशिज्यः) पुंव. द्भावादणो लुब् निवर्तते । तद्धितस्वर. गाायण्याः कुत्सितमपत्य गार्यः, गार्गिकः । हस्तिनीनां समूहो हास्तिकम् । जातिग्रहण जातिलक्षणप्रतिषेधनिवृत्त्यर्थम् , सति तस्मिंश्चकारोऽन्यार्थः । जाति. परतः ५स्त्री अन्या च परतः स्त्री पुंवद्भवतीत्यर्थः । अकृते हि चकारे जातेरेव पुंवद्भावः स्यात् । कथं यौवतम् । भिक्षादौ युवतीति स्त्रीलिङ्गपाठात् । कौण्डिन्य इति तु "कौण्डिण्यागस्त्ययोः ” (६।१।१२७) इति निर्देशेन पुंवद्भावस्यानित्यत्वात् । अत एव च मानाय्य इत्यनापि न भवति । सापत्न इत्यपि "सप- त्यादौ" (२।४।५०) इति सूने सपत्नीति समुदायनिपातनात् , अत एव सपत्नीभार्य इत्यत्रापि न भवति (संपनस्यायं सापत्न इति वा भविष्यति ) । तद्धितस्वर इति विपयसप्तम्याश्रयणं किम् ? पढ्दया भावः १० पाटवम , अन प्रत्ययोत्पत्तेः पूर्वमेव पुंवद्भावे लघ्वादित्वात् "वर्णालध्वादेः” (७१।६९) इत्यण् भवति । परसप्तमीसमाश्रयणे तु पट्वीशब्दस्य लघ्वादित्वाभावादण् न स्यादिति ॥ "एयेऽनायी" (३॥ २।५२) पुत्स्यात् । अमायया अपत्यं आग्नेयः "कल्यमेरेयण” (६.१११७) । अग्नायी देवताऽस्य आमेयः स्थालीपाकः । पूर्वेण सिद्धे नियमार्थमिदम् , तेन श्यैनेयः, रौहिणेयः, इत्यादौ पूर्वेणापि पुवद्भावो न स्यात् ॥ *यायतिथ इति यावतां यावतीनां सङ्ख्यापूरणः यावतिथः "यत्तदेतदो डावादिः” (७१। १५ १४९) अतुरित्यतुप्रत्ययः ।। “पटू.” एभ्यरिभ्यः पूरणे थट् स च पित् । पण्णां पूरणः पष्ठः षष्टी। कतीनां पूरणः कतिथः कतिथी । कतिपयाना वीणा पूरणी कतिपयथी “पष्टी वाऽनादरे" (२।। १०८) "चतुर्थी" (२।२।५३) इत्यादिना सूननिर्देशात् थटि "नामसिदय्व्यञ्जने" ( १२२२१) इति पदत्वं न भवति ॥ "चतु०" (चतुर्णा पूरणः चतुर्थः) चतसृणां समापूरणी चतुर्थी । योगवि- भाग उत्तरार्थः । “येयौ०" । चलुक् इति-चतुर्शब्दस्येत्यर्थः ॥ "देस्तीयः” । (७।१।१६५)। द्वितीयः ॥ 'त्रेस्तु च” (७१।१६६)। वेस्तीयस्तत्व चास्य । तृतीयः॥ "द्वेस्त०" ०"। द्वे अपि सूने स्पष्टे ॥ ११० ॥ पूर्वमनेन सादेश्चन् ॥ १११ ॥ [ सि० ७।१।१६७ ] द्वितीयान्तात्सपूर्वात् केरलाच पूर्वशब्दातृतीयार्थे इन् स्यात् । कृतं पूर्वमनेन कृतपूर्वी कटम् । २५पीतपूर्वी पयः ॥ १११ ।। - २० 1 १ 'बाहढादिभ्य ' व्यार। • यशक वष्टि न्याय वशे फित् इज् 'नशेरयलि' प्वृत्, उशिजोऽपस 'पुरुषमगध'- इच 'दरग'-रोप । उशिजि गाधु । ३ 'पद्धस्त्रिया क्षेपे पेरणी' तन पुवत्त्वे 'तद्धिनयवरेऽना' इति योर । ४ गर्गादिलाद् यमि, पुपदाचे तु 'नोऽपदस्य'-इत्सन्यवरादिलोपे काण्ड्य इति स्यात् । ५ अलवादेवेत्यर्थ ६ मनोर्भार्या 'मनोरो च या' सी ऐच । मनाय्या अपत्य गर्गादेयम्' मानाय । ७ सपन्या अपत्य 'शिशरण' सारन । ननु मनायी. शादम्प गर्गादिपाठात् स्वयमेव ग भविष्यति, यथा यौवतमित्यन भिक्षादिपायनीलिजय युवतिशब्दम्य पुवावो न पति एवममापि । उच्यते । गर्गादिगणेऽणे TO पाठ इति तनाप्युक्तम्, तता पुरझार प्राप्नोति स मा भूदिति यारिटन्यानिशान ब्रावो न भान त्युपम् । ८ गानन्दा गपल्यानुल्य 'म सपाया 'न औणादिको वा । एभत्र पनि पुपसावमतोल । १० गिनियमनु न भाति प्रति प्राधिकरेऽऽस्याप्यनेये इत्य करण । अव या अमेय चपातनार । विपरीतीियगे हि भन्न प्ये हित 'तम हित' इतीये 'जाति' इत्यनेनापि पुत् न स्यात्, तनपाम पीय इति स्वत; स्थिते समीय इलेव भाति । ११ दिम्परादनद्या'। १२ 'पात्यूल' इति एयण् ।

४४५ १० . प्रक्रियागतरूप श्राहमप्रकाश नाद्धताः । प्रथमान्तानृतीयार्थाद्याः "पूर्व०” द्वितीयान्तादिति, अत्रायमभिप्राय:-पूर्वमिति क्रियाविशेपणानिर्देशादेव द्वितीयान्तात्केव- लात्सादेः सपूर्वाचानेनेति तृतीयार्थे कर्तरि इन् स्यात् । केवलात्. पूर्वमनेन पूर्वी, पूर्विणो, पूर्विणः । अनेनेति कर्तृपदं कृतं भुक्तभित्यादिकां काञ्चित् क्रियामपेक्षते, क्रियां विना कर्तुरभावात् ; विशेषावग- मस्तु अर्थात्प्रकरणाच्छब्दान्तरसन्निवेर्वा स्यात् । पूर्वी कटम् , पूर्वी ओदनम् , पूर्वी पयः । सादेः. कृतं पूर्वमनेन कृतपूर्वी कटं भुक्तं पूर्वमनेन भुक्तपूर्वी ओदनम् , पीतं पूर्वमनेन पीनपूर्वी पयः, कृतपूर्वा-५ दिसमासात्प्रत्ययः क्तान्तं येनैव समानाधिकरणम् , तस्यैव कर्मतां वक्ति; न च वृत्तौ क्तान्तं कटादिना समानाधिकरणमिति कटादिगतं कर्मानुक्तमित्यतो द्वितीया ॥ १११ ॥ इप्टादेः ॥ ११२ ॥ [सि०७।१।१६८] एभ्यः प्रथमान्तेभ्यस्तृतीयाणे कर्तरि इन् स्यात् । इष्टो यज्ञोऽनेन इष्टी यज्ञे । अधीतस्त- कर्कोऽनेन अधीती तर्के ॥ ११२ ।। "इष्टा०" । इष्टी यज्ञे इत्यादौ "व्याप्ये तेनः” ( २।२।९९) इति कर्मणि सप्तमी । इष्ट, पूर्त उपपादित, उपसादित, उपासित, निगदित, परिगदित, निकटित, सङ्कलित; परिकलित, १० संरक्षित, परिरक्षित, अर्चित, अगणित, अवगणित, अवकीर्ण, अवमुक्त, आयुक्त, गृहीत, अधीत, २० आम्नात, श्रुत, आसेवित, अवधारित, अवकल्पित, (कृत ? ) निराकृत, उपकृत, उपाकृत, अनुयुक्त, ३० अनुगुणित, अनुगणित, (गणित ? ) परिगणित, अनुपठित, निपठित, पठित, व्याकुलित, उट्ट-१५ हीत, कथित, ४० निकथित, निपादित, इति इष्टादयो द्विचत्वारिंशत् ॥ ४२ ॥ अनादिशब्दसंसर्गात् "श्राद्धमद्यभुक्तमिकेनौ” (७।१।१६९) । प्रथमान्तात् श्राद्धशब्दादद्य- भुक्तमित्युपाधिकात्तृतीयार्थे कर्तरि इक इन् इत्येतौ स्याताम् । श्राद्धशब्दः कर्मवाची तत्साधने द्रव्ये वर्तित्वा प्रत्ययमुत्पादयति-श्राद्धमनेनाद्य भुक्तं आद्धिकः, श्राद्धी । अद्यग्रहणादय भुक्ते श्राद्धे श्वश्राद्धिकः, श्राद्धी इति न भवति ॥ "अनुपद्यन्वेष्टा” (७।१।१७०) । अनुपदीति इन्नन्तं निपात्यते, अन्वेष्टा २० चेत्प्रत्ययार्थः स्यात्, अनुपदमन्वेष्टा अनुपदी गवाम् ॥ "दाण्डाजिनिकायःशूलिकपार्श्वकम्" (७१।१७१) । एपु आद्यौ द्वौ इकण्प्रत्ययान्तौ, तृतीयश्च कप्रत्ययान्तो निपात्यते; यो मिथ्याव्रती पर- प्रसादार्थ दण्डाजिनमुपादायार्थानन्विच्छति स दाम्भिको दाण्डाजिनिक उच्यते । निपातनं रूढ्यर्थम् , तेन शैवभागवतादौ न भवति ॥ तीक्ष्ण उपायो यः शूलसाम्यादयःशूलम् , तेनान्वेष्टा आयःशूलिकः । यो मृदुनोपायेनान्वेष्टव्यानर्थान् तीक्ष्णोपायेनान्विच्छति रामसिकः स एवमुच्यते ॥ केचिदाभ्यामिक-२५ मेवाहुः-दण्डाजिनिकः दण्डाजिनिका । अयःशूलिकः अयःशुलिका ॥ पार्श्वमनृजुरुपायो लञ्चादिस्तेना- न्वेष्टा पार्श्विकः । ऋजूपायेनान्वेष्टव्यानर्थाननृजुनोपायेन योऽन्विच्छति स पार्श्वक उच्यते । यस्तु रानः पार्श्वनार्थानन्विच्छति स राजपुरुपस्तत्र न भवति ॥ "क्षेत्रेऽन्यस्मिन्नाश्ये इयः” (७।१।१७२) । अन्योपाधिकात् क्षेत्रात् नाश्ये इयः स्यात् । क्षेत्रियो व्याधिः-अन्यस्मिन् क्षेत्रे जन्मान्तरझरीरे नाश्योऽसाध्य इत्यर्थः । क्षेत्रियं विपम् , तद्धि स्वशरीरादन्यस्मिन्क्षेत्रे परझरीरे सङ्क्रमय्य किंचिन्नाश्यं ३० (चिकित्स्य ) भवति । क्षेत्रियानि तृणानि. तानि हि सस्यक्षेत्रेऽन्यस्मिन्नुत्पन्नानि नाश्यान्युत्पाद्यानि भवन्ति । क्षेत्रियः पारदारिकः स हि अन्यस्मिन् क्षेत्रे परदारेषु वर्त्तमानो नाश्यो निग्राह्यो भवति; दाराः क्षेत्रम् ॥ "छन्दोऽधीते श्रोत्रश्च वा” (७।१।१७३) । द्वितीयान्तान् छन्दस्शब्दात् अधीते इत्यर्थे इयस्तद्योगे चास्य श्रोत्रादेशः स्यात् ॥ छन्दोऽधीते श्रोत्रियः, पक्षे "तद्वेत्त्यधीते" (६।२।११७) इत्यण् छान्दसः ॥ "इन्द्रियम्” (७१।१७४) । इन्द्रशब्दादियः प्रत्ययो निपात्यते । निपातनं रुड्य-३५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- र्थम् , तेन यथायोगमर्थकल्पना-इन्द्र आत्मा तस्य लिङ्गं इन्द्रियं चक्षुराद्युच्यते; तेन हि करणेनात्मा- नुमीयते नाकर्तृकं करणमिति । इन्द्रेण दृष्टमिन्द्रियम्-आत्मा हि चक्षुरादीनि दृष्ट्वा स्वविषयं नियुक्ते । इन्द्रेण सृष्टमिन्द्रियम्-आत्मकृतेन हि शुभाशुभेन कर्मणा तथाविधविपयोपभोगायास्य चक्षुरादीनि भवन्ति । इन्द्रेण जुष्टमिन्द्रियम् , तद्वारेणास्य विज्ञानोत्पादानात् । इन्द्रेण दत्तमिन्द्रियम् , विपयग्रहणाय ५विषयेभ्यः समर्पणात् । इन्द्रस्यावरणक्षयोपशमसाधनमिन्द्रियम् । एवं सति सम्भवेऽन्यापि व्युत्पत्तिः कार्या ॥ ११२ ॥ तेन वित्ते चञ्चुचणौ ॥ ११३ ॥ [सि० ७।१।१७५] तृतीयान्तात् ख्याते एतौ साताम् । विद्याचक्षुः । केशचणः ॥ ११३ ॥ "तेन." विद्याचञ्चुरिति विद्यया विख्यातः । अत्राप्यादिशब्दसान्निध्यात् कप्रत्ययप्रकरणं सन्निधीयते; तथाहि-"पूरणाद्वन्धस्य ग्राहके को लक्चाऽस्य" (७१।१७६) । तृतीयान्तात्पूरणप्रत्ययान्ताद्वन्थस्य ग्राहकेऽर्थे कः स्यात् , तत्स- नियोगे च पूरणप्रत्ययस्य लुक् । द्वितीयेन रूपेण अन्धस्य ग्राहकः द्विकः । त्रिका, चतुष्कः, पञ्चकः, पट्को वैयाकरणः । ग्रन्थस्येति किम् ? पञ्चमेन दिनेन शत्रूणां ग्राहकः ॥ "ग्रहणाद्वा” (७११॥ १७७) । ग्रन्थस्येति पूरणादिति च वर्तते । गृह्यतेऽनेनेति ग्रहणं रूपादि । ग्रन्थस्य ग्रहणाद्रहणे वर्तमा. १५नात् पूरणप्रत्ययान्तानाम्नः कः प्रत्ययः स्यात्, स्वार्थे प्रकृत्यर्थे एवार्थान्तरानिर्देशात् , तत्सन्नियोगे च पूरणप्रत्ययस्य वा लुक् ॥ वेति लुकैव सम्बद्ध्यते न प्रत्ययेन । पक्षे प्रत्ययानुत्पत्तेमहाविभापयैव सिद्ध- त्वात् ॥ द्वितीयमेव द्विकं ग्रन्थग्रहणमस्य, द्वितीयकं ग्रन्थग्रहणमस्य । एवं त्रिकं व्याकरणस्य ग्रहणम् , तृतीयकं व्याकरणस्य ग्रहणम् । चतुष्कं चतुर्थकम् , पञ्चकं पञ्चमकम् । ग्रन्थस्येत्येव-द्वितीयं ग्रहणं धान्यस्य ॥ "सस्थाद्गुणात्परिजाते" (७।१।१७८)। गुणवाचिनस्तृतीयान्तात्सस्यशब्दात् परिजा- २० तेऽर्थे कः स्यात् । परिः सर्वतो भावे; जनिः सम्पत्तौ । सस्येन परिजातः सस्यकः शालि:-यः सर्वतो गुणैः सम्पन्नो न यस्य किश्चिदपि वैगुण्यमस्ति स एवमुच्यते । एवं सस्यको देशः, सस्यको वत्सा, सस्यकं सीधु । सस्यको मणिः-रूढिशब्दश्चायं मणिविषये [गुणेन परिजातोऽस्तु वा, मा वा, समुदाः यप्रसिद्ध्या तु मणिविशेषस्य संज्ञा ] । सस्यका खड्गः-सर्वतः, सारेण सम्बद्धः । गुणादिति किम् ? धान्यषचनान्मा भूत्-सस्येन परिजातं क्षेत्रम् ॥ “धनहिरण्ये कामे" (७।१।१७९) । आभ्यां सप्त- २५ म्यन्ताभ्यां कामेऽभिलापेऽर्थे कः स्यात् । धने कामो धनकश्चैत्रस्य । हिरण्यको मैत्रस्य ॥ "वाङ्गेषु सक्ते" (७१।१८०)। सप्तम्यन्तेभ्यः स्वागवाचिभ्यः सक्ते तत्परेऽर्थे कः स्यात् । केशेपु सक्तः केशकः । नखकः । दन्तकः ॥ केशादिरचनायां प्रसक्त एवमुच्यते । बहुवचनात्स्वाङ्गसमुदायादपि-केश- नखकः । “उदरे विकणायूने” (७।१।१८१) । उदरशब्दात्सप्तम्यन्तारसक्तेऽर्थे इकण् स्यात्, सक्तश्चेदायूनः स्यात् । उदरे सक्त औदरिकः आयूनः, अविजिगीपुर्यो बुभुक्षयायंत पीड्यते । औद- ३० रिकी स्त्री । तुशब्दः सर्वसूत्रशेपतामस्य कथयति तेन काधिकारो न वाध्यते ॥ “अंशं हारिणि" (७११११८२) । द्वितीयान्तादंशशब्दात् हारिण्यर्थे कः स्यात् । अंशं हारी अंशको दायादः । हारीत्याव- श्यके णिन् [अवश्यं हरिष्यति णिन् । 'एष्यणेनः' इति पछ्या निषेधः । शीलार्थे तु पष्ठी स्यात् ] ॥ "तन्त्रादधिरोद्धृते” (७।१।१८३) । तथा । तत्रापटवानोपकरणाचिरोत्तीर्ण: तप्रकः पट:- प्रत्यम इत्यर्थः ॥ "ब्राह्मणान्नान्नि" (७१।१८४) । तथा । सदाचारब्राह्मणेभ्योऽचिरोद्धृतस्तदा- ३५नीमेव पृथकृतो ब्राह्मणको नाम देशः । तत्रायुधजीविनः काण्डस्पृष्टा नाम ब्राह्मणा भवन्ति । आयुध- ४४७ प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अचिरोद्धृताद्यर्थाः जीवी ब्राह्मण एव ब्राह्मणक इत्यन्ये ।। "उणात्” (७।१।१८५)। अचिरोद्धृतेऽर्थे कः स्यात् । उष्णा- दग्नेरचिरोद्धृता उष्णिका यवागृः । अल्पान्ना पेया विलेपिकेति यावत् ॥ उष्णकुण्डान्निःसृता नदीति केचित् ॥ "शीताच कारिणि” (७१।१८६) । शीतादुष्णाच द्वितीयान्तात्कारिण्यर्थ कः स्यात् , नाम्नि । शीतं मन्दं करोति शीतकोऽलसः । उष्णं क्षिप्रं करोति उष्णको दक्षः; नानीत्यनुवृत्तेः शीतो- प्णशब्दाविह मान्यशीघ्रवचनी गृह्येते, न स्पर्शवचनौ । क्रियाविशेषणाहितीया, कारीत्यावश्यके णिन् ॥५ "अधेरारूढे” (७१।१८७) । अधिशब्दादासढेऽर्थ वर्तमानात् स्वार्थे कः स्यात् । आरूढः शब्दः कर्तरि कर्मणि च क्तप्रत्यये सिद्धः । तत्र यदा कर्तरि तदा अधिको द्रोणः खार्याः खार्यामिति च भवति "अधिकेन भूयसस्ते" (२।२।१११) पञ्चमीसप्तम्यौ । यदा तु कर्मणि तदा तु अधिका खारी द्रोणेनेति भवति "तृतीयाल्पीयसः" (२।२।११२) ॥ "अनोः कमितरि” (७।१।१८८) । कः स्यात् , समुदायेन चेत्कमिता गम्यते । अनुकामयते अनुकः ॥ "अभेरीश्च वा” (७।१।१८९)।१० अभिशब्दात्का, ईकारश्चास्य वा स्यात् , समुदायेन चेत्कमिता गम्यते। अभिकामयते अभीकः अभिकः । "सोऽस्य मुख्यः” (७।१।१९०)। प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थे कः स्यात् , यत्प्रथमान्तं स चेन्मुख्यः (प्रधान ग्रामणीः ) स्यात् । देवदत्तो मुख्योऽस्य देवदत्तकः सङ्घः । जिनदत्तो मुख्य एपां जिनदत्तकाः ।। "शृङ्खलका करभे” (७।१।१९१) । निपात्यते । शृङ्खलं बन्धनमस्य शृङ्खलकः करभशिशुः करभाणां काष्ठमयं पावन्धनं शृङ्खलम् । वयःशब्दश्वायम् , शुङ्गलं भवतु वा मा भूत् ॥ "उदुत्सो-१५ रुन्मनसि" (७।१।१९२) । उद् उत्सु इयेताभ्यामुन्मनसि अभिधेये कः स्यात् । उद्गतं मनोऽस्य उत्कः । उत्सु गतं मनोऽस्य उत्सुकः । “उत्कस्तूत्सुक उन्मना” इति कोपवचनात् ॥ "कालहेतुफ- लाद्रोगे" (७१।१९३) स इति प्रथमान्तेभ्यः कालविशेपवाचिभ्यो हेतुवाचिभ्यः फलवाचि- भ्यश्च पष्ठ्यर्थश्चेद्रोगः स्यात् । द्वितीयो दिवसोऽस्याविर्भावाय द्वितीयकस्तृतीयको ज्वरः । सततः कालो- ऽस्य सततको ज्वरः । हेतु. विपपुष्पं हेतुरस्य विपपुष्पकः । काशपुष्पकः । पर्वतको रोगः ॥ फल.२० शीतं फलं कार्यमस्य शीतक उष्णको ज्वरः ।। "प्रायोऽन्नमस्मिन्नान्नि" (७।१।१९४)। प्रथमान्ता- त्सप्तम्यर्थे नाम्नि विषये कः स्यात् , प्रथमान्तं चेदन्नं प्रायः प्रायेण भवति । प्रायशब्दोऽत्राऽन्नसमाना- धिकरणो नियतलिङ्गसङ्ख्यः । प्रायोऽकृत्नवहुत्वम् । गुडापूपाः प्रायेण प्रायो वाऽन्नमस्यां गुडापूपिका पौर्णमासी ॥ "कुल्मासादण्” (७१।१९५) उक्तार्थे । कुल्मासाः प्रायेण प्रायो वान्नमस्यां कौल्मासी पौर्णमासी । कुल्माप इति मूर्द्धन्योपान्त्योऽप्यस्ति ॥ "वटकादिन्” (७१।१९६)२५ उक्तार्थे । वटकिनी पौर्णमासी । “साक्षाद् द्रष्टा" (७।१।१९७) । साक्षाच्छब्दादृष्टेयस्मिन्नर्थे इन् स्यात्, नाम्नि । साक्षाद्रष्टा साक्षी । साक्षिणा, साक्षिणः ।। "प्रायोऽव्ययस्य" (४६५) इत्यन्त्य- स्वरादिलोपः ॥ ११३ ॥ अथ मत्वर्थीयाधिकारो निरूप्यते । तदस्याऽस्त्यस्मिन्निति मतुः ॥ ११४ ॥ [सि०७।२।१] प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थे सप्तम्यर्थे वा मतुः सात् । प्रथमान्तं चेदस्तीत्युच्यते । गावोऽस्य सन्ति गोमान् ।। ११४ ॥ १ अतः कारणानिर्देशादेव पञ्चम्यन्तेभ्य इति न लभ्यते । ननु कालस्यापि रोगकारणवाद्धेनुग्रहणेनैव तद्ब्रहणे सिद्धे किं कालग्रहणेन ! न । अन्यतो भवतोऽपि रोगस्यायमस्य काल इति रोगाधिकरणभूतस्य कालस्यासम्बन्धिले विज्ञायमानेऽपि यथा स्यादित्येवमर्थम् । २ अनव्ययं पुंल्लिङ्ग एकवचनान्तोऽदन्तश्च पूर्वस्तु सान्तोऽव्ययखादलिङ्गश्च । ३० ૩૨ ४४८ १ महागहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- "तद०" गोमानिति पष्ठ्यर्थोदाहरणम्, सप्तम्यर्थोदाहरणं तु वृक्षा अस्मिन् सन्ति वृक्षवान् पर्वत इति । अस्ति धनमस्यास्ति अस्तिमान् , स्वस्ति आरोग्यमस्यास्ति स्वस्तिमान् । अनास्तिस्वस्ती अव्ययो धनारोग्यवचनौ अस्तीति च सामान्याभिधायि । विशेपास्तेश्च सामान्यास्तिना सामानाधिकरण्यमुपपद्यत एव । तदस्यास्तीत्या वर्तमानकालग्रहणाद्वर्तमानसत्ताया प्रत्ययो न भूतभविष्यत्सत्तायाम् , तेन ५गावोऽस्यासन भवितार इत्यन न मतु । ननु कथ तर्हि गोमानासीन् गोमान् भवितेत्या गवाग्रे मतुः अगापि गावोऽस्यासन गावोऽस्यास्य भवितार इत्यर्थस्यैव प्रतीयमानत्वात् । अवम् । गोमानासीदित्यादौ गावोऽस्य सन्तीत्येतादृशोऽयमासीदिति गोमत्सत्ताया भूतभविष्यत्कालता, गोसत्ताया तु वर्तमानकालतो- क्तिरेव । ननु तर्हि गोसत्ताया भूतभविष्यत्कालताप्रतीतिः कथमिति चेत् ? "धातोः सवन्धे प्रत्यया' (५१४१४१) इति ग्रहणात् चिना गावोऽस्य स चित्रगुः शबलगुरियन बहुव्रीहिणैव मत्वर्थस्योक्तत्वा- १० न्मतुर्भवति । एव पूर्वशाल• अपरशाल• पञ्चगुः दशगुरित्यनाप्यस्तीति पदस्यापेक्ष तद्धितद्विगु द्वैमातुर इत्यादा सावकाश बाधित्वास्तिपदनिरपेक्षत्वादन्तरङ्गेण बहुव्रीहिणैव भवता उतार्थत्वान्मतुर्न भवति । तदस्यास्त्यस्मिन्नितीत्यत्रेतिशब्दो विवक्षार्थस्तेन "भूमनिन्दाप्रशसासु नित्ययोगेऽतिशायने । ससर्गेति विवक्षाया प्रायो मत्वादयो मताः" ॥ १ ॥ भूम्नि गोमान्, यवमान । निन्दायाम् शङ्खोदकी, ककुदावर्ती । प्रशसायाम् रूपवती शीलवती कन्या। नित्ययोगे क्षीरिणो वृक्षाः । अतिशायने, बलवा. १५न्मल्ल । ससर्गे दण्डी छत्री । प्रायिकमेतद्भूमादिदर्शनम् , सत्तामानेऽपि प्रत्यया दृश्यन्ते-व्याघ्रवान् पर्वतः, स्पर्शा दिवन्तः पुद्गलाः, गन्धवती पृथिवीत्यादि । मत्वर्थीयान्मत्वर्थीयः सरूपो न स्यात्-गोम- न्तोऽन सन्तीत्यन मतुर्न स्यात् । दण्डिका अन सन्तीत्यन इको न स्यात् । विरूपस्तु भवत्येव-दण्डि- मती शाला, हस्तिमती उपत्यका । विरूपो मत्वर्थीय. समानाया वृत्तौ न भवति । दण्ड एपामस्तीति दण्डिका• दण्डिन. । दण्डिका दण्डिन अस्य सन्ति दण्डिनोऽस्य सन्तीति इन्मतू न भवतः । “शैपि- २० काच्चैपिको नेप्ट , सरूप प्रत्ययः कचित् । सँमानवृत्तौ मत्वर्थान्मत्वर्थीयोऽपि नेष्यते" ॥ १॥ कचि- दिति समानायामसमानाया च वृत्तौ यथा शालाया भवः शालीयः इत्यन पुनः शालीये भयः शाली- यस्याय वेति ईयो न भवति । विरूपस्तु भवति-अहिच्छत्रे भवः आहिच्छनस्तन भव आहिच्छ- २३नीयः । तथा असज्ञाभूतात् कर्मधारयान्मत्वर्थीयो न भवति । वीरपुरुषा अस्मिन् प्रामे सन्ति वीरपुरु- . यदा अस्तिशब्दो धनार्थस्तदाऽस्तिमानित्युपपद्यते 1 यदा तु विद्यमानार्थस्तदा क्थ द्वयोरेकार्थ वादित्याह-सा० अस्तीति क्रियापद सामान्यानाधायि सामान्येनास्तिवमानप्रतिपादनात् प्रकृतिभूतस्य लव्ययस्य विशेषाभिधायित्व विद्यमानवरूपविशे पस्याभिधानात् । २ यद्यपि सूने लिङ्ग सङ्ख्या कालश्चातन्त्राणि तथापीह सूने वर्तमानालस्यैव प्राधान्यमस्तीतिपदोपादानाद न्यथा किमनेन । न खलु पदार सत्ता व्यभिचरति तत सत्ताया निसर्गसिद्धाया य पुनरस्तीतिग्रहण तद्वर्तमानकालार्थम् । ३ अनेन सूनेणायथाकालमपि प्रत्यया भवतीत्यर्थ । तेन प्रययस्य वर्तमानकालत्वेपि भूतभविष्य कालतावगम । ४ शवलश दाद्वर्णवाचिनो गौरादिलात् ड्या शबल्यो गावोऽस्य सन्तायेव कार्यम् । यदा तु शब शब्दो गवि वर्तते तदा गौरादित्वाभा- वादपि सति तद्धिताकापात्य-' इत्यनेन आख्याद्वारेण पुवत्वनिषेधात् शबला गुरिल्लेव स्यात् । ५ शङ्खोदकरकुदावत्तौ द्वे अपि अश्वस्यापल्क्षणे। ६ अन एषामस्येति च उभयनापि पन्या सद्भावात् समाना वृत्ति । पूर्वाद्धे यरसरूप इति पद तदुत्तराद्धऽपि योज्यम् ततोऽयमर्थ - न केवल सरूपो मलथायो मल यात्समानवृत्तो न भवति, मल योऽपीत्यत्रापिशब्दा द्विरूपोऽपि इति । विषमवृत्ती रारूपो मवर्थीयो न भवतीति तु कारिकाया न सजगृहे । अथवा पूर्वार्धात्सरूप इति नाधिकियवे कि तु मलथीयोपि नेष्यत इति सामान्येन भणनात् सस्पो विरूपश्च नेष्यत इत्यव व्याख्यायते । अपिशब्दस्तु शैषिकापेक्षया समुचये व्याख्येय । ८ द्विविध कर्मधारय -सज्ञाभूतोऽसज्ञाभूतश्च । तत्र सशाभूतो य समुदायप्रसिध्या प्रवर्तते यथा गौरस रादय । असज्ञाभूतो योऽजयवायोगेन प्रवर्तते न पृथक्समुदायप्रसिद्ध्या यथा वीरपुरुष दि । ९ उपलक्षणमिद यत्कर्मधात रया मत्वर्थीयो न भवतीति । यावता नन्त पुरुषादपि बहुवीहिणैव भाव्यम्-यथा अघोपा इति । अन हि न सोऽस्यास्तीति कृते वहुबीहिरेख न मतु । यन सथविशेषो मलायेनाभिधीयते तन ननतत्पुरुषादप्यसो भवति यथा नर . घोषोऽघोष .

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । मतुप्रत्ययान्ताः ४१२ पको ग्रामः-अत्र बहुव्रीहिरेव । संज्ञायास्तु भवत्येव-गौरखरवदरण्यम् , कृष्णसर्पवान्वल्मीकः, लोहि- तशालिमान् ग्रामः । ऐकगविकः सर्वधनीयादिकं तु "एकादेः कर्मधारयात्” (७।२।५८) इत्याचारम्भ- सामर्थ्याद्भवति [अत्राप्यसंज्ञाभूतः कर्मधारयोऽस्तीत्यभिप्रायः ] । तथा गुणे गुणिनि च ये गुणशब्दा वर्तन्ते तेभ्यो मत्वर्थीयो न भवति, शुल्लो वर्णोऽस्यास्ति शुक्लः । तिक्तो रसोऽस्यास्ति तिक्तः । प्रत्ययं विनाप्येपां तदभिधानसामर्थ्यात् । चे तु गुणमात्रचाचिनस्तेभ्यो भवत्येव-रूपवान् रसवान् शोल्यवान ५ कापर्ण्यवान् । इति ।। ११४ ॥ अनोपयोगिसूत्रम्- मावर्णान्तोपान्त्यापञ्चमवर्गात्मतोर्मों वः ॥ ११५॥ [सि० २।१।९४] मावों प्रत्येकमन्तोपान्त्यौ यस्य तस्मात्पश्चमवर्जवर्गान्ताच मतोर्मो वः सात् । किमत्रा- स्तीति किंवान् । वृक्षवान् ॥ ११५ ॥ "माव० " मच अवर्णश्च मावो, अन्तश्च उपान्त्यश्च अन्तोपान्यौ, (मावौँ अन्तोपान्यौ ) १० यस्य स मावर्णान्तोपान्त्यः, नास्ति पञ्चमो यस्मिन् स अपञ्चमः, अपञ्चमश्चासौ वर्गश्च अपञ्चमवर्गः, अपञ्चमवर्गोऽन्ते यस्य स अपञ्चमवर्गान्तः, मावर्णान्तोपान्त्यश्च अपञ्चमवर्गान्तश्च मावर्णान्तोपान्या- पञ्चमवर्ग तस्मात् । तथा च स्पष्टयति-मावर्गों प्रत्येकमित्यादि । मकारान्तात्. किंवान् इदंवान् शंवान् । मकारोपान्त्यात्. झमीवान लक्ष्मीवान् ।। अवर्णान्तात्. वृक्षवान् मालावान् । अवर्णोपान्त्यात. अहर्वान् सुगुण्वान् पयस्त्रान् भास्वान् ॥ अपञ्चमवर्गान्तात्. मरुत्वान् विद्युत्वान् उदश्वित्वान् समिद्वान् ।१५ मावर्णान्तेत्यादि क्रिम् ? अग्निमान् वायुमान् नृमान् । नृमतोऽपत्यं नार्मत इत्यत्र तु वृद्धर्बहिरङ्गत्वान्न स्यात् [ तद्धितापेक्षत्वेन वृद्धिर्बहिरङ्गा, तदनपेक्षं तु वत्वमन्तरङ्गमिति ] ॥ ११५ ॥ अनापवादमाह । नोादिभ्यः ॥ ११६ ॥ [सि० २१११९९] एभ्यो मतोर्मो वो न स्यात् । ऊर्मिमान् । उदन्वान् जलाधारे ॥ ११६ ॥ "नोा.” (२।११९९) अम्मि दल्मि भूमि तिमि क्रिमि (५) एभ्यो मोपान्यत्वात्प्राप्ते, यवकुच्चा २० (द्राक्षा १) ध्वांक्षा वासा (४) एभ्योऽवर्णान्तत्वात्प्राप्ते, हरित् गरुत् , ध्वजित् ककुद् (४) एभ्योऽपञ्च- मवर्गान्तत्वात्प्राप्ते, ज्योतिष्मती महिष्मान् गोमती क्रान्तिमती शिन्त्रिमती हरिमती (बासमती इक्षु- मती ?) चारुमती वन्धुमती मधुमती विन्दुमती इन्दुमती ठुमती वसुमती अंशुमती श्रुमती हनूमान सानुमती भानुमती ॥ १८ ॥ एभ्यो "नाग्नि" (२।४।१२) इति प्राप्ते प्रतिपेधः । अादय एक- त्रिंशत् । वहुवचनमाकृतिगणार्थम् , तेन सति निमित्त यस्य मतोर्वत्वं न दृश्यते स अादिपु द्रष्टव्यः ।२५ उदन्वान जलाधारे चेति; अत्र सूत्रम्-"उदन्वानन्धौ च” (२।१।९७) । आपो धीयन्तेऽस्मिन्निति अधिः । अन्धो नाम्नि चायं निपातः । उदन्वान् घटो मेघः-यत्रोदकं धीयते स एवमुच्यते । उद- न्वान् समुद्रः । उदन्वान् ऋपिर्यस्य औदन्वतः पुत्रः । उदन्वान् आश्रमः, अन्यत्र उदकवान् घटः । अत्र घटस्य उदकसम्बन्धमानं विवक्षितं न दधातीत्यर्थः ।। ११६ ॥ वन्ति चक्राणीति । अत्र हि नस्तन्पुरुषेण चक्रेप्वरकाभावः सामान्येनोयते । मलीयेन लत्यन्तं मूलतोऽप्यरकाभाव इति यावत् । तथा यद्यप्यसंज्ञाभूतात्कर्मधारयान्मत्वर्थीयो न भवतीत्युक्तम् , तथापि प्रायेण दृश्यते-यथा बिस किसलयच्छेदपाथेय- वन्त इति । अत्र हि त्रिसकिसलयच्छेदाश्च ते पायेयं चेति कर्मधारये सति मतुरिति वल्लभेन निश्चिक्ये ॥ है. प्रका० पूर्वा० ५७ ४५० ५ । - महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहैमलघु- राजन्वान् सुराज्ञि ॥ ११७ ॥[ सि. २।१९८] सुराजकेऽर्थे राजन्वान् । *संज्ञायां चिर्मण्यत्यादयश्च साधवः । “नावादेरिका" (७१२॥३) नाविकः । ॐ मत्वन्तं च रूपं सर्वाधिकारादनुवर्तनीयम् । नौमान । “शिग्वादिभ्य इन" (७रा४)। शिखी, माली । “ब्रीह्यादिभ्यस्तौ” (७/२५)। बीहिका, ग्रीही ॥११७ ।। "राज" सुराजकेऽर्थे इति, शोभनो राजा यस्य तस्मिन्नभिधेये इत्यर्थः । राजन्वती पृथ्वी । राज- न्वत्यः प्रजाः । अन्यन राजवान देशः ॥ *संज्ञायामिति-"नान्नि" (२।१।९५)। सज्ञाया विपये मतोर्मकारस्य वकारः स्यात् । अहीवती कपीवती मणीवती मुनीवती ऋपीवती एता नद्यः "नद्या मतुः” (६।२।७२) इति चातुरर्थिको मतुः । आसन्दीवान् ग्रामः ॥ चिर्मण्यत्यादयश्चेति "चर्म- पवत्यष्ठीवत्चक्रीवत्कक्षीवद्रुमण्वत्" (२।१।९६) इति सूत्रम्-अन चर्मनशब्दस्य मतौ १० चर्मण्वती नाम नदी-अत्र नलोपाभावो णत्व च निपातनात् । एवमन्यनापि ज्ञेयम् ॥ अस्थिशब्दस्य अष्ठीभावः अष्ठीवान् जट्वोरुसन्धिः । चक्रशब्दस्य चक्रीवान् खरः । कक्ष्या [ कक्षे भवा कक्षाय हिता या कक्षे साधुर्वा 'दिगादिदेहाशायः' इत्यादिभिर्ये कक्ष्या ब्रह्मणः सादृश्यमुद्योगश्चेत्यर्थः ] शब्दस्य कक्षीवान्नाम ऋषिः । लवणशब्दस्य रुमण्भावः रुमण्वान् नाम पर्वतः । अन्ये तु रुमन्निति प्रकृत्यन्तर मन्यन्ते । "नावा" नौरस्यास्मिन् वाऽस्तीति नाविकः, नौमान् । कुमारिकः कुमारीमान् । यव- १५खदिकः यवखदावान् । नौकुमारीभ्यामिन केचिदाहुः-नावी कुमारी । नौ, कुमारी, यवखदा, सभा- करण, इति नावादयः पद (१)॥ मत्वन्त चेत्यादि, अन सूत्रम्-"आयात्” (७।२।२) "गुणा- दिभ्यो यः” (७।२।५३) "रूपात्प्रशस्ताहतात्” (७।२।५४) इत्येतद्यप्रत्ययावधि याः प्रकृतयो निर्देक्ष्यन्ते ताभ्यो मतुः स्याद्यथोक्तार्थे । आयादित्यभिविधावाड् । अपवादैर्बाधो मा भूदिति वचनम् , तेन यथाभिधानमुत्तरत्र मतुरपि भवति । “शिखा." शिखा, शाला, माला, मेखला, शाखा, २० वीणा, सज्ञा, वडवा, अष्टका, बलाका, १० पताका, कर्मन्, वर्मन् , चर्मन्, वल, उत्साह, उदास, उद्भास, उल, मुल, २० मूल, आयाम, व्यायाम, प्रयाम, आरोह, अवरोह, परिणाह, शृङ्ग, वृन्द, गदा, ३० निचुल, मुकुल, कुल (कूल १) फल, अल, मान, मनीषा, व्रत, धन्वन् , चूडा, ४० केका, दया, सूना, घृणा, करुणा, जरा, आयास, स्तवक, उपयाम, उद्यम, ५० । इति शिखादय: पश्चाशत् । बहुवचनादाकृतिगणः । केचित्तु वडवा अष्टका कर्मन् वर्मन् चर्मन् इत्येतेभ्य इकम- २५पीच्छन्ति । "ब्रीह्या" तौ इति-इकेनौ इत्यर्थः । ब्रीहयोऽस्यास्मिन्या सन्ति-व्रीहिक , व्रीही श्रीहिमान् । मायिकः मायी मायावान् मायावी । ब्रीह्यादयः प्रयोगगम्याः ॥ ११७ ॥ अतोऽनेकखरात् ॥ ११८॥ [ सि० ७।२६] अदन्तादनेकखरादिकेनौ स्याताम् । धनिकः धनी । *इलेनाण्णशनरादयो यथायोगं मत्वर्थे वाच्या-तुन्दिलः फेनिला शृङ्गिणः ज्योत्स्नी माज्ञः श्राद्धः लोमशः पामनः मधुरम् ३० मरुत्तः॥ ११८॥ ते बनयो शिखादौ पाठमिच्छन्ति । २ खदन भिदाय यवाना खदा यवखदा यवाभ्योप । ३ आकुमारीमानित्यादिप्रयो गेषु यथाक्रम 'नावादेरिक' त्रीधादिभ्यस्ती 'अतोऽनेकम्वरात्' 'अशिरसोऽशीर्षश्च' 'चलवातदन्तललागदूल तोल ' 'सिध्मादिक्षुद्रज तुरुग्भ्य ' 'गो' 'गुणादिभ्यो य ' इत्यादि सूत्रविहितप्रत्ययविषये पक्षे आयादित्यनेन मतुर्विधीयते । ४ 'कालाबटा'-इत्यादिमि कैश्चित्सूरथविशेषे प्रत्ययोऽभिहित , स च मतुना न गम्यते इति तदर्थप्रतिपादनाय तत्सून विहित एवं प्रलयो भवति न तु मतुरित्याशय । ५ ते खेतान् ब्रीह्यादौ पठन्ति । , 'प्रायजादा ? .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । मत्वर्थीयाः ४५१ "अतो." धनिकः धनी (धनवान् ) । एवं दण्डिकः दण्डी (दण्डवान्) । छत्रिक: छत्री (छत्र- वान्) । अत इति किम् ? खट्दावान् मालावान् । अनेकस्वरादिति किम् ? खवान् । स्ववान् । अभि- धानार्थस्येति शब्दस्यानुवृत्तेः कृदन्तादिकेनौ न भवतः-राप्यवान् हव्यवान् । एवं लाप्य, लव्य, कृत्य, भृत्य, कारक, हारक, कुम्भकार, धान्य, माय, हिंस्र, ईश्वर, पाक, स्नेह एभ्यो मतुरेव नविकेनौ । कार्य, हार्य, गृह, दात्र, पात्र, भोग, तर, विजय, संयम, स्थान; एभ्यो भवतः कार्यिका कार्यात्यादि ।५ व्यात्र, सिंह, वृक्ष, प्लक्ष, द्रव्य, क्रव्य, सस्य, धान्य, माल्य, पुण्य, सत्य, अपत्य, धन इत्यादि- नातिशब्देभ्यो मतुरेव; नत्विकेनौ । व्याघ्रवानित्यादि । कचिद्भवतः तण्डुलिकः तण्डुली, कर्पटिकः कर्पटी ॥ धनादुत्तमणे भवतः-धनिकः धनी । सप्तम्यर्थे न भवतः-दण्डोऽस्मिन्नस्ति दण्डवद्गृहम् , वीरवान् ग्राम इति मतुरेव । कचिद्भवतः-खलिनी शाद्वलिनी भूमिः । रसरूपगन्धस्पर्शशब्दस्नेहेभ्यो गुंणवाचिभ्यो न भवतः । कचिद्भवतः-रसिको नटः, रसी इक्षुः । रूपिको दारकः, रूपिणी स्त्री १० [रूपिष्ववधेः । पिसमवायाचाक्षुपाणि ] । स्पर्शिको वायुः, गन्धिकः, गन्धी । तत्सर्वं शिष्टप्रयोगानु- सरणार्थेन इतिशब्देन सिद्धम् ॥ अत्रायं विशेप:-"अशिरसोऽशीर्षश्च" (७२।७) । अस्मादिकेनौ मतुश्च स्युस्तत्सन्नियोगेऽस्या- यमादेशश्च स्यात् । अशीर्पिकः अशीर्षी अशीर्पवान् । इकेनोः "शीर्पः खरे तद्धिते" (३।२।१०३) इति शीर्षादेशो विद्यते एव, मतौ त्वशिरसोऽशीर्पादेशोऽनेन विधीयते ॥ "अर्थार्थान्ताद्भावात्"१५ (७१२।८) । भाववाचिनोऽर्थशब्दादर्थान्ताच शब्दान्मत्वर्थे इकेनौ स्याताम् । नियमार्थमिदम् , उभयथा चायं नियमो वाक्यभेदेन क्रियते-भाववाचिन एवेतौ, भाववाचिनश्चैतावेवेति । 'अर्थणि उपयाचने' अर्थनमर्थः सोऽस्यास्तीत्यर्थिकः, अर्थी; याचकः । प्रतीपमर्थनं प्रत्यर्थः, सोऽस्यास्तीति प्रत्यर्थिकः, प्रत्यर्थी । इकेनावेवेति नियमादतो मतुर्न स्यात् । भावादेवेति नियमाव्यवाचिनोऽस्मान्मतुरेव नैतौ । अर्थो हिरण्यादिरस्तीत्यर्थवान् ।। अथाल्पमतिशिष्यानुग्रहाय मत्वर्थीयप्रत्ययान् फक्किकया सङ्ग्रहाति-*इलेत्यादि-इलश्च इनश्च अण् च णश्च शश्च नश्च रश्च इलेनाण्णशनरमादिर्यपां ते इलेनाण्णशनरादय इति । अत्र द्वन्द्वान्ते श्रूय- माणः शब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते इति न्यायादादिशब्दः प्रत्येकं योज्यते इलादय इनादय इत्यादि । तत्र इलप्रत्यये सूत्रपद्धतिरेवम्-"ब्रीद्यर्थतुन्दादेरिलश्च” (७।२।९) । मत्वर्थे इति सर्वत्र ज्ञेयम् । मतुश्च सर्वत्र ज्ञेयः ।। अत्र चकारादिकेनौ । ब्रीह्यर्थ. कलमिलः कलमिकः कलमी कलमवान् । शालिल: २५ शालिकः शाली शालिमान् । ब्रीहिशब्दस्य ब्रीह्यर्थत्वेऽपि पूर्वत्रोपादानादिलो न स्यात्, अन्यथा तत्रोपा- दानमनर्थकं स्यात् । स्यादित्येके । व्रीहिलः । तुन्दादि. तुन्दिलः तुन्दिकः तुन्दी तुन्दवान् । तुन्द उदर पिचण्ड यव ग्रह पङ्क गुहा कला काक इति तुन्दादयो नव । मूले तु तुन्दिल इत्युदाहरणं दिग्मात्रमे- वमन्यत्रापि सर्वत्र ज्ञेयम् ॥ "स्वाङ्गाद्विवृद्धात्ते” (७१२।१०)। ते इति अनन्तरोक्ता इल-इक-इन्- प्रत्यया मतुश्च स्युः । विवृद्धौ महान्तौ कर्णावस्य स्त:-कर्णिलः कर्णिकः कर्णी कर्णवान् । ओष्ठिल: ओष्टिकः ओष्ठी ओष्टवान् । विवृद्धादिति किम् ? अन्यत्रेलो न स्यादतोऽनेकखरादितीकेन्मतव एव स्युः।। "वृन्दादारका" (७।२।११) । वृन्दारकः वृन्दवान् । शिखादित्वाद्वृन्दी ॥ "शृङ्गात्” (७।२।१२)।३२ २० ३० १ अत्र स्वामित्वाविवक्षणात् 'स्वामिन्नीशे' इति न मिन् । २ यदा तु कस्यचिद्रूपं रस इत्यादि नाम भवति तदा भवत्येव । ३ सयापरिमाणानि पृथक्वं संयोगविभागौ कर्म च रूपिसमवायाचाक्षुपाणीति । ४ त्रीह्यादिभ्यस्तावित्यत्र । ननु तर्हि अर्थग्रहणाभावेऽपि त्रीहिशब्दोपादानेऽपि वीयर्थग्रहणे लन्धे किमर्थग्रहणेन । न । प्रतिपत्तिगौरवनिरासार्थवादर्थप्रहणस्य ।

१५२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपनहेमलघु- तथा । शृङ्गारकः, शृङ्गवान् । शिसादित्वात् शृङ्गी ॥ इनैति. "फलयहींचनः" (७२।१३) । फलमहर्हाभ्यां शृगाच इनः स्यात् । फलिनः फलवान् , एवं वर्हिणः २ । गृङ्गिणः २ । शिसादित्वात् फली वहीं ॥ आदिशब्दात् “मलादीमसश्च" (७।२।१४)। चकारादिनोऽपि । मलीमसः मलिनः मल- चान् ॥ अणिति. "ज्योत्नादिभ्योऽ" (७१२।३४) । ज्योत्स्ना अस्मिन्नस्ति ज्योत्स्नः पक्षः ५ज्योत्स्नी रातिः । तामिस्राणि गुहामुसानि । वैसो व्याधिः । वैपादिकं कुष्ठम् । कौतुपं गृहम् । पौण्डलो युवा । तापसः पासण्डी । साहस्रो देवदत्तः । मतौ ज्योत्स्नावानित्यादि । तापस इति रूढि. शब्दो रूढिविपये च मतुन स्यात् । कुण्डली सहस्री चेति शिसादित्वात् । ज्योत्स्नादयः प्रयोगगन्याः॥ "सिकनाशर्करात्” (७।२।३५) । आभ्यामण मतुश्च । सैकतः सिक्तावान् । शार्करः २ ॥ "इलव देशे" (७१२१३६) । चकारादण मतुश्च । सिकतिलः सैकतः सिकतावान् देशः । शर्करिलः शारः २ देशः । सिकता शर्करा देश इसभेदोपचारात् ॥ आदिशब्दात् “धुद्रोर्मः” (७।२।३७)। गु इति दिवः कृतोकारस्य निर्देशः । द्रुशब्द उकारान्तोऽहःपर्यायः प्रकृत्यन्तरं वा । आभ्यां मः स्यात् । घोषुर्गाऽस्यास्मिन्यातीति गुमः । दूणि दारूण्यस्यास्मिन्या सन्तीति द्रुमः । अनयो रूढिशब्दत्वान्मतुन स्यात्, अन्यत्र मतुरेय-धुमान द्वमान् ॥ “काण्डाण्डभाण्डादीरः" (७।२।३८) 1 काण्डीरः २। आण्डीरः २ । भाण्डीरः २ । आण्डौ मुष्की ।। णश्चेति-"प्रज्ञाश्रद्धा वृत्तेर्णः” (७।२।३३)। १५ प्राज्ञः प्रज्ञावान् , खी तु प्राज्ञा । श्राद्धा, आर्चा, वार्ता । प्राज्ञीति तु स्वार्थिकाणन्तात् डीः ॥ शेति- "लोमपिच्छादेः शेलम्" (२०२८) । लोमादिभ्यः पिच्छादिभ्यश्च यथासङ्घयं श-इल इत्येतो स्याताम् । लोमशः . । पिच्छिलः २ । उरसिलः २ । लोमन् , रोमन, य, वल्गु, हरि, कपि, मुनि, गिरि, ऊर, कर्क, इति लोमादयो दश ॥ पिच्छ, उरस्, धुवा, ध्रुवका, पक्ष, चूर्ण । इति पिच्छादयः पट् ॥ नेति-"नोऽङ्गादेः" (७।२।२९) । अगान्यस्याः सन्तीत्यगना, रूढि- २०शब्दोऽयम् , कल्याणाही स्त्री उच्यते । अन्यत्र अङ्गवती ।। अङ्ग, पामन्, वामन्, हेमन् , श्लेष्मन्, सामन् , यर्मन् , शाकिन् , पलालिन् , पलाशिन् , उप्मन् , क्दु, पलि, इत्यगादयत्रयोदश ॥ योग- विभाग उत्तरार्थः ॥ "शाकीपलालीदवा हखश्च” (७२।३०) । एभ्यो नस्तत्सन्नियोगे घेपी हम्पोऽन्तादेशः । महन्गरम् शाफ्समूहो वा शारी । महत्पलाल पलालशोदो या पलाली । द मान घई नाम च्याधिः । शारिनः शारीमान् । पलालिनः पलालीमान् । दणः दर्द्रमान । पेचित्तु शाप. २५लाल्योहस्सत्यं नेटन्ति-शानः पलालीनः ॥ "विष्यचो विपुच" ( ७।२।३१) । अस्मात् ना, अस्स प पिपु इत्ययमादेशः स्यात् । विपु अश्वतीति विश्वग् । विग्यचो रश्मयो विप्नग्नतानि पास सन्तीति विपुणः सूर्यो यायुर्ग। विपुमानो निपातो नानात्वे वर्त्तते । विपगियसण्डमव्ययं या। मकार- सन्नियोगे आदेदारिधानान्गतो विपनानिति । विपुमानहोरा विभाग इति तु विपुर्नाम मुहूर्तसरमा यति । रेति-"मध्यादिभ्यो र" (७२।२६) 1 मधुरो रसः । अत्र गधुशन्दः स्यादुत्वे गुगले २० गुणसामान्य वर्तते । मधुर मधु । मधुर भीरमा गुणे भाद्रादिद्रव्यवृत्तेस्तु मतुरेय । इविशम्दानुकृते: मधुमान् पट इति । ण्यं गं महसण्ठवियरमम्याम्नीनि सरः गर्दभः, अन्यः पवान् । ण्यं मपंचारि गुणं सर्पम्मिन् पतव्येऽम्याग्नीनि मुग्ररो याचालः । पुजारम्य मः पुनरी हमी, पुसब्दोऽत्र हनुः पर्याय: । नगर पुरम् । उपर क्षेत्रम् । गुप्परः पशुः । शुपिर शुषिमकाष्ठम् । परः पद्मान् । पाण्डुरः पाग्दुमान् । पागुरः पाशुमान् । मभादयः प्रयोगगम्याः ॥ आदिशा "कृप्यादिभ्यो पल" (७२।२७) । शीयर: युटुम्मी, पृषिग्रम । आमुतीया, पन्या, आमुनिगान । १६परिपपटः २ । पपंदनः । परिरहना पछिटनिययः । परिपन रखनडा गी । रजम्यान मामः। । - - - -- , - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । मत्वर्थीयाः ४५३ केचित्तु रजस्वलो देशः, रजस्वला भूमिः, रजस्वान् , रजस्वतीति सर्वत्राविशेपेण वृत्तिमिच्छन्ति । दन्तावलो नाम राजा हस्ती च । शिखावलं नगरम् । शिखाबलो मयूरः । शिखावला स्थूणा । दन्तवान् शिखावानन्यः । पितृवलः पितृमान् । एवं मातृवलः, भ्रातृवलः, उत्साहवलः, पुत्रवलः, उत्सङ्गवलः ॥ "बलच्यपित्रादेः” ( ३।२।८२) । वलच्प्रत्यये पित्रादिवर्जितानां खरान्तानां दीर्घः स्यात् । आसुतिः सुरा, सा अस्यास्तीत्यासूतीवलः । अपित्रादेरिति-पित्रादयश्चत्वारः । पितृवल इत्यादि । चकारः५ किम् ? उत्तरपदे मा भूत्-कायवलं नागवलम् । प्रत्ययाप्रत्यययोरिति न्यायस्त्वनित्यत्वान्नोपतिष्ठते । कृप्या- दयः प्रयोगगम्याः ॥ मरुत्त इति–अथात्र सूत्रम् "मरुत्पर्वणस्तः” (७।२।१५) इति । मरुत्तः पर्वतः । मतो मरुत्वान् पर्ववान् ।। ११८ ॥ ननु मरुत्वानित्यत्र "धुटस्तृतीयः" (२।११७६) इति तस्य दत्वं कुतो न स्यादित्यत आह--- नस्तं मत्वर्थे ॥ ११९ ॥ [सि० १११।२३] सान्तं तान्तं च नाम मत्वर्थे परे पदं न स्यात् । मरुत्वान् । “चलवातदन्तललाटादूल" (७।२।१९)। वलूलः ॥ “प्राण्यङ्गादातो ल” (७।२।२०)। चूडालः ॥ "सिध्मादिक्षुद्र- जन्तुरुग्भ्यः” (७।२।२१) । अपि । सिध्मलः । यूकालः । मूर्छालः ॥ "प्रज्ञापर्णोदकफेना- ल्लेलौ" (७२।२२)। प्रज्ञाला प्रज्ञिलः ॥ “वाच आलाटौं” (७/२।२४) । क्षेपे । वाचालः वाचाटः॥ "ग्मिन्” (७।२।२५)। वाचः । वाग्मी ॥ "लक्ष्म्या अनः” (७।२।३२)।१५ लक्ष्मणः ॥ “कच्छ्वा डरः” (७।२।३९) कच्छुरः ॥ "दन्तादुन्नतात्” (७।२।४०)। उन्नता दन्ता अस्य सन्ति दन्तुरः ।। "कृपाहृदयादालुः” (७२।४२)। कृपालुः ॥ ११९ ॥ "नस्तं०” सूत्रं स्पष्टम् । ततः पदत्वाभावान्नात्र तकारस्य दकारः । आदिशब्दोपादानात् "वलि- वटितुण्डेर्भः" (७२।१६) । वलिभः; अङ्गादित्वान्ने वलिनः । वटिभः; तुण्डिभः; सिध्मादित्वाल्ले तुण्डिलः (मतुश्च-वलिवान् ) प्रवृद्धा नाभिस्तुण्डिः । “ऊर्णाहंशुभमो युस्” (७।२।१७) । युस्-२० प्रत्यये पर ऊर्णादिशब्दस्य "नाम सिदय्” (१११।२१) इति पदसंज्ञायां "अवर्णेवर्णस्य” (७।४। ६८) इत्याकारलोपो न भवति तत्रापदस्येत्युक्तत्वात् ऊर्णायु:-उरभ्रः । अहंयु अहंकारी । शुभंयुः कल्या- णबुद्धिः ॥ "कंशंभ्यां युस्तियस्तुतवभम्” (७।२।१८) कंशंभ्यामेते सप्त प्रत्ययाः स्युः । कंयुः शंयुः, कन्तिः, शन्तिः, कंयः शंयः, कन्तुः शन्तुः, कन्तः शन्तः, कंवः शंवः, कम्भः शम्भः, युस्-यसोः सकारो "नामसिदय्व्यञ्जने” (१।१।२१) इति पदत्वार्थस्तेन "तौ मुमौ व्यञ्जने स्वौ” ( १।३।१४) २५ इत्यनुस्वारानुनासिको सिद्धौ-कंयुः कय्युः । अथ वालोपकाराय प्रसिद्धप्रयोगापवादकानि कतिचित् सूत्राणि साक्षानिर्दिशति ॥ "वल०" सूत्रं स्पष्टम् ॥ प्राण्यं आकारान्तात्प्राण्यङ्गन्वाचिनो लः स्यात् । चूडाल इति । एवं जालः शिखालः । प्राण्यङ्गादिति किम् ? शिखावान् प्रदीपः । अङ्गग्रहणं किम् ? इच्छावान् । कर्णिकाल इत्यत्र कर्णिकाशब्दः प्राण्यङ्गस्यैव वाचक इत्याहुः [न तु कर्णाभरण- स्येत्यर्थः] । “सिध्मा०” सिध्मादेर्गणात् क्षुद्रजन्तुवाचिभ्यो रुग्वाचिभ्यश्च लः स्यात् । सिध्मानि ३० त्वकुष्ठाण्यस्य सन्ति सिध्मलः । एवं वर्मलः अङ्गादित्वान्ने वर्मनः । पा#धमनीशब्दो दीर्वान्तावेव पठ्यते--पामलः धमनीलः । ह्रस्वान्ताभ्यां तु मतुरेव पाणिमान् धमनिमान् । यूकाल इति–एवं मक्षिकालः । आ नकुलात् क्षुद्रजन्तुः । रुग्भ्य इति बहुवचनं स्वरूपनिषेधार्थम्-मूर्छाल इति, एवं विचर्चिकालः । सिध्म वर्मन् गडु तुण्डि मणि नाभि वीज़ निष्पाद निष्पद् निष्प ॥ १० ॥ पांशु हनु ३४ ४५४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- - पशु पार्णी धमनी सक्तु मांस पत्र वात पित्त ॥ २० ॥ श्लेष्मन् पार्श्व कर्ण सक्थि स्नेह शीत कृष्ण श्याम पिङ्ग पक्ष्मन् ॥ ३० ॥ पृथु मृदु मञ्ज बटु कण्डू ॥ ३५ ॥ इति सिध्मादयः पश्चत्रिंशत् । कथं वत्सलः स्नेहवान अंसलो बलवान् ? नान कश्चित् वत्साद्यर्थोऽस्तीति पेशेलकुशलादिवदेतो व्युत्पादनीयौ, सिध्मादिपु वा पठनीयौ । “प्रज्ञा०" (७।२।२२) सूत्रं स्पष्टम् । “वाच:" ग्मिनोऽपवादोऽयम् , ५क्षेपे इति यो निस्सार बहु भाषते स एवं क्षिप्यते । मतुना क्षेपो न गम्यते इति क्षेपे मतुर्न भवति ॥ एवं "कालाजटाघाटात् क्षेपे” (७१२।२३)। लेलौ स्याताम् । कालालः कालिलः इम डोपान्यं केचित्पठन्ति-काडालः काडिलः ॥ जटालः जटिलः । घाटाल: घाटिलः । क्षेमे मतुर्न स्यात्-अन्यन कालावान् ॥ "ग्मिन्" गकारः "प्रत्यये च” (१।३।२) इत्यनुनासिकनिवृत्त्यर्थः ॥ "लक्ष्म्या." "अवर्णेवर्णस्य” (७४.६८) इतीकारलोपे लक्ष्मणः । मती लक्ष्मीयान् । “कच्छ्वा." १० "दन्ता०” सूनद्वयं स्पष्टम् ॥ "कृपा.” । विकल्पानुवृत्त्या कृपालुः कृपावान् । हृदयालुः हृदयिकः हृदयी हृदयवान् ॥ आदिशब्दात् "केशाद्वः” (७२।४३)। केशवः केशिकः केशी केशवान् । केशव इति रूढिशब्दोऽपि विष्णुवाची । मण्यादिभ्यः" (७२।४४) । एभ्यो वः स्यात् । योगवि- भागाद्वेति निवृत्तम् । मणिवः मणिमान् , सिध्मादिपाठान्मणिलः । हिरण्यवः हिरण्यवान विम्बावम् , कुररावम् , कुरवारम्, “घन्युपसर्गस्य बहुलम्" (३।२।८६) इति बाहुलकाद् दीर्घः । राजीवं इष्ट- १५ कावम्, गाण्डिवम् , (गाण्डीवम् ), अजकावम् , बिम्बावमित्यादयो रूढिशब्दास्तर मतुर्न स्यात् । अन्यत्र तु स्यादेव-बिम्बवानित्यादि । मणि, हिरण्य, बिम्ब, फुरर, कुरव, राजी, इष्टका, गाण्डि, गाण्डी, अजका, इति मण्यादयः प्रयोगगम्याः ॥ ११९ ॥ अभ्रादिभ्यः॥ १२०॥ [सि० ७१२१४६] एभ्यो मत्वर्थे अ. स्यात् । अभ्रं नमः । अर्शसो मैत्रः ॥ १२० ॥ "अभ्रा०" । अभ्राण्यस्मिन्सन्ति अभ्रं नभः अशांस्यऽस्य सन्ति अर्शसो मैत्रः । एवमुरसः उर. खान् । अभ्र अर्शस् उरस् उरभ्र (?) तुन्द चतुर पलित जटा घाटा कम ॥१०॥ काम वेला (बल ?) घटा आम्ल लवण ॥ १५ ॥ इत्यभ्रादयः पञ्चदश । वहुवचनादाकृतिगणः ॥ आदिशब्दात "हीनात्वाङ्गादः" (७।२।४५) । सण्डः कर्णोऽस्यास्ति कर्णः । छिन्ना नासिकास्यास्ति नासिकः । हीनादिति किम् ? अन्यत्र कर्णवानित्यायेव स्यात् ॥ १२० ॥ अस्तपोमायामेधास्रजो विन् ॥ १२१ ॥ [ सि०७।२।४७] असन्तात्तपःप्रभृतिभ्यश्च विन् स्यात् । वर्चस्वी, तपस्वी । मायावी, बीह्यादित्वान्मायिका, मायी । मेधावी । “मेधारथानवरः" (४१)। मेधिरः रथिरः रथिकः॥ स्रग्वी ॥१२१॥ "अस्०" असन्तत्वेनैव सिद्धे तपसो ग्रहणं ज्योत्स्नायणा बायो मा भूदित्यर्थम् । “मेधाः” । आभ्यामिरः स्यात् । नवेत्युक्तेर्यथाप्राप्तमिकेनो मतुश्च । मेधिरः मेधावान् । विनपि-मेधावी । रधिः ३०रथिका रथी रथवान् । स्रग्वी स्रग्वान् ॥ १२१ ।। २० ? १ यथा पेशं गति पुश लाति इत्येवमनयोर्युपतिरेवं वसलासयोरपि । औणादिको वा मनोजमेधाविवाचिनी । २ न काल यस केशा सन्ति सराव , किन्तु विपुरपि ।

प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । मत्वर्थीयाः ४५५ आमयादीर्घश्च ॥ १२२ ॥ [ सि० ७।२।४८ ] असाद्विन्प्रत्ययः सात् , दीर्घश्वास । आमयावी ॥ "खान्मिन्नीशे" (७।२।४९)। दीर्घश्च । स्वामी । “गोः” (७२।५०)। गोमी । 'ऊर्जा विन्वलावस् चान्तः" (७।२।५१) । ऊर्जस्वी ऊर्जस्वला ऊर्वान् ॥ १२२ ॥ "आम०"। सूत्रं स्पष्टम् । “स्वा०” ईशे इति ईशे वाच्ये । स्वमस्यास्तीति खामी, अन्यस्तु स्ववान् ।।५ "गोः" । अस्मात् मिन् स्यात् । तथा च कोप:-"गोमान् गोमी गवीश्वरे" । पूज्य एव मिनमिच्छ- न्त्यन्ये । “ऊर्जी०” उझब्दात् विन्–बल इसेतो स्याताम् , तत्सन्नियोगे चास्त्र अस् अन्तो भवति । ऊर्जस्वी ऊर्जस्खलः, मतुश्च ऊर्गवान् । ऊर्जखानिति तु ऊर्जयतेरऽत्प्रत्ययान्तस्य मतों रूपम् । आदि- शब्दात् "तमिस्रार्णवज्योत्स्ना" (७।२।९२) । एते निपात्याः । तमस्शब्दात् रः, उपान्त्य- स्वेत्वं च-तमोऽत्रास्ति तमिस्रा रात्रिः । तमिस्रं तमःसमूहः । तमिस्रा गुहा । अर्णसो वः, अन्त्य-१० लोपश्च-अर्णवः समुद्रः । ज्योतिस्झब्दात् नप्रत्यय उपान्त्यलोपश्च-ज्योत्ना चन्द्रप्रभा, अन्यत्र ज्योतिष्मती रात्रिः, निपातनस्येप्टविषयत्वात् ।। "गुणादिभ्यो यः” (७२।५३) । गुण्यः पुमान् , हिम्यः पर्वतः; मती गुणवान् हिमवानिति । गुणीति तु शिखादित्वात् । गुणादयः प्रयोगगन्याः ।। "रूपात्प्रशस्ताहतात्” (७।२।५४) । प्रशस्तोपाधिकादाहतोपाधिकाच रूपात् वः स्यात् । प्रशस्तं रूपमस्वास्ति रूप्यो गौः । आहतं रूपमस्यास्ति रूप्यः कार्पापणः । निघातिकाताडनाहीनारादिपु १५ यद्रूपमुत्पद्यते तदाहतं सप्यम्, अन्यत्र रूपवान् । प्रशंसायां मतुरपि-रूपवती बी । आहते तु न, इतिशब्दानुवृत्तेः रूपिणी कन्या । रूपिको दारकः इति ब्रीह्यादित्वाद्भवति । आवादित्यस्य पूर्णोऽवधिः, अतः परं मतुर्नास्ति ।। "पूर्णमासोऽ” (७।२।५५) । पूर्णमाःशब्दान्मत्वर्थेऽण् स्यात् । पूर्णो माश्व- न्द्रोऽस्यामस्ति पौर्णमासी ॥ अतः समासान्मत्वर्थीयान् दर्शयति ॥ १२२ ।। सर्वादेरिन् ॥ १२३ ॥ [सि० ७।२२५९ ] सर्वादेरदन्तात्कर्मधारयादिन् सात् । सर्वधनी ॥ १२३ ॥ "सर्वा०" । सूत्रं स्पष्टम् । सर्वधनीति सर्व धनं तदस्यास्ति सर्वधनी । एवं सर्वबीजी सर्वकेशी नटः । आदिशब्दाद् "गोपूर्वादत इक" (७/२१५६) । मत्वादीनामपवादः । गौदा तिकः गौमदग्निकः । अत इति किम् ? गोविंशतिमान् । केचित्तु गवादेरनकारान्तादपीच्छन्ति-वां समूहो गोत्रा ला विध-२५ तेऽस्य गोत्रिकः । गावो वयांसि चास्य सन्ति गौवयसिकः ॥ "निप्कादः शतमन्नान" (७१२१५७) । नेकदातिकः नेप्कसहन्त्रिकः । निष्कादेरिति किम् ? सती, सहनी । आदिमानान, सुवर्णनिष्कशतमस्यास्तीत्यत्र न भवति ॥ "एकादेः कर्मधारयात्" (७१२१५८ ) । रु । को गारेकगवः सोऽस्वायंकगविकः । ऐकानिकः । ऐकसहन्त्रिकः ॥ कर्नधाग्यादिति सिम ? पकन्य गारेकगवः सोऽन्यास्तीत्यत्र न भवेन् । अन इत्येव-एकविझनिरन्थालीन्यत्र न म्यान । पदव्ययवादिनि ३० तु एकेन तु व्ययत्त्वमिति नमाने भवति [ ऊनार्थपूर्वागः (१९६५) न्यनेन ] || "प्राणि- स्थादम्बाकावन्द्वमगनिन्द्यात्" (७१२६६०) । प्राणिन्योऽन्यायाची अागलो यो नः ममानो३२ नमन Are... लन्न कांगनिशन प्रोगगनाउनेगरियनमा २० - ५ 1 ४५६ महामहोपाध्यायनीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- यश्च रुग्वाची निन्द्यवाची च शब्दस्तस्मान्मत्वर्थे इन् स्यात् । "सर्वादेरिन्” इति सूत्रात् इन् अनुवर्तते । द्वन्द्व, कटकवलयिनी शङ्खनूपुरिणी । रुक्. कुष्ठी, किलासी । निन्द्य. ककुदावर्ती, काकतालुकी । प्राणि- स्थादिति किम् ? पुष्पफलवान वृक्षः । अस्वाङ्गादिति किम् ? स्तनकेशवती । अत इत्येव-चित्रकललाटि. कावती । "अतोऽनेकस्वरात्" (७२।६) इत्येव सिद्धे इकादियाधनार्थ वचनम् ॥ १२३ ॥ वातातीसारपिशाचात् कश्चान्तः ॥ १२४॥ [सि० ७।२।६१ ] एभ्यस्त्रिभ्य इन कोऽन्तश्च । वातकी ॥ १२४ ॥ ॥ इति मत्वर्थीयाः॥ "वाता." । वातो रोगोऽस्यास्तीति वातकी । एवमतीसारकी पिशाचकी ।.वातातीसारयोः पूर्वे- गेन् सिद्ध एव कार्थ वचनम् । पिशाचस्य तूभयार्थम् ॥ “पूरणाद्वयसि” (७।२।६२) । पूरणप्रत्य- यान्ताद्वयसि गम्ये इन्नेव स्यात् । पञ्चमो मासः संवत्सरो वाऽस्यास्तीति पञ्चमी बालकः । दशमी करभः ।। १०"सुखादेः” (७।२।६३) । एभ्यो मत्वर्थे इन्नेव स्यात् । सुखी । दुःखी । सुख, दुःख, तृप्र, कृच्छ्र, अस्र, अलीक, कृपण, सोढ, प्रतीप, प्रणय, (हस्त ?) हल, अत्र, कक्ष, शील, इत्येके । इति सुखादयश्चतुर्दश ॥ १४ ॥ "मालायाः क्षेपे” (७२।६४) । इन्नेव । माली । क्षेप इति किम् ? मालावान् । मालाशब्दः शिखादिस्ततः क्षेपे मतुनिवृत्त्यर्थं वचनम् ॥ "धर्मशीलवर्णान्तात्" (७।२।६५) । इन्नेव । मुनिधर्मी । यतिशीली । ब्राह्मणवर्णी । “बाहादेवलात्” (७२।६६)। १५ वाहु-उरुपूर्वात् वलान्तात् इन्नेव । वाहुवली । उरुबली ॥ "मन्माजादेर्नान्नि" (७।२।६७)। मन्नन्तेभ्यो मान्तेभ्योऽन्जादिभ्यश्च मत्वर्थे इन्नेव स्यात् , नाम्नि । मन्नन्त. दामिनी सामिनी प्रथिमिनी महिमिनी धर्मिणी कर्मिणी । मान्त. प्रथमिनी भामिनी कामिनी यामिनी सोमिनी । अब्जादि. अग्जिनी, कमलिनी । अन्ज कमल सरोरुह सरोज अम्भोज राजीव अरविन्द पङ्कज पुटक नालीक मृणाल विस (तामरस) । यवास इत्यजादयत्रयोदश ॥ १३ ॥ "हस्तदन्तकराज्जातो" २० (७१२।६८)। एभ्यो मत्यर्थे इन्नेव, जातौ वाच्यायाम् । हस्ती दन्ती करी । जाताविति किम् ? अन्यत्र हस्तवान् ॥ "वर्णाद्रह्मचारिणि" (७२।६९) । इन् । वर्णशब्दो ब्रह्मचर्यपर्यायः, सोऽस्यास्ति वर्णी ब्रह्मचारीत्यर्थः । अन्ये तु वर्णशब्दो ब्राह्मणादिवर्णवचनः, तत्र ब्रह्मचारीसनेन शूद्रव्यवच्छेदः क्रियते इति मन्यन्ते । तेन त्रैवर्णिको वर्णीत्युच्यते । स हि विद्यामहणार्थमुपनीतो ब्रह्म चरति न शूद्र इति ॥ "पुष्करादेशे” (७२।७०) एभ्यो देशेऽभिधेये इन्नेव । पुष्करिणी । पद्मिनी ॥ पुष्कर २५पद्म उत्पल तमाल कुमुद कैरव नल कपित्त्य विस मृणाल ॥ १०॥ कर्दम शालूक विवई करीप शिरीप यवास ययाप यव माप हिरण्य ॥ २० ॥ तट तरङ्ग कल्लोल ।। २३ ॥ इति पुष्करायनयोविंशतिः।। कुमुदती सरसी । कुमुद्वान् हृदः । नवान् नवलमिति तु "नडकुमुद०" (६।२।७४) इत्यादिना चातु रधिकेन मतुना भवितव्यम् ॥ "सूक्तसानोरीयः” (७१२।७१) । सूक्ते सामनि चाभिधेये मत्वर्थे ईयः स्यात् । मत्वादीनामपवादः । अच्छावार शब्दोऽत्र सूक्तेऽस्ति अच्छावाकीयम्, मैत्रायणीयम् । ३० सान्नि. यज्ञायज्ञीयम् , असनापिपासीयम्, वारतन्तवीयम् साम । अस्सवामीयम्, कयानचित्रीय सामेत्यादौ सूक्तसामस्थानामनुकार्याणामसण्डा एवास्यवामादयोऽनुकरणशब्दाः, नात्र विभक्तिरिति लुम् न भवति, अत एव प्रथमान्ततापि न विरद्धयते । सूक्तसाम्नी अन्यविशेपो ॥ “लुब्याध्या. ३३ यानुवाके" (७२।७२) । अध्याये अनुवारे चामिये य ईयतम्य लुब्या म्यान्, अत एव लुब्ध - १ यत एवामी भगा भनुम्रपामा अत एव तेनेशानुमनार्थेनार्ययसभामले सनि प्रथमान्तप्यविरुदेवेसर्पः ।

- १० VvN प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । मत्वर्थीयाद्याः १५७ चनादध्यायानुवाकयोरीयोऽनुमीयते । एतावपि ग्रन्थविशेषौ । गर्दभाण्डशब्दोऽस्मिन्नध्यायेऽनुवाके वास्ति इति गर्दभाण्डो गर्दभाण्डीयोऽध्यायोऽनुवाको वा । एवं दीर्घजीवितः दीर्घजीवितीयः । द्रुमपुष्पः द्रुम- पुष्पीयः ॥ "विमुक्तादेरण” (७।२।७३) । अध्यायानुवाकयोर्वाच्ययोः । विमुक्तशब्दोऽस्मिन्नऽध्या- येऽनुवाके वास्ति वैमुक्तः । विमुक्त देवासुर रक्षोसुर उपसद् उपसद परिसारक (सदसत् ?) वसु मरुत् सत्वत् सत्वन्तु ॥ १०॥ दशाई वयस् हविर्भान महित्री (अस्यहत्य ?) सोमापूपन् इडा इला अग्नाविष्णू५ उर्वशी ॥ २०॥ दशार्ण, वसुमन्तु पत्नीवन्तु वर्हवन्तु वृत्रहन् पतत्रिन् ॥ ३० ॥ सुपर्ण ॥३१॥ इति विमुक्कादय एकत्रिंशत् ॥ "घोषदादेरक" (७।२।७४) । तयोर्वाच्ययोः । घोपत्शब्दोऽस्मिन्नस्ति घोपदकः । घोपद् गोषद् इपेत्वा मातरिश्वन देवस्यत्वा पत्वा देवीराप कृष्णोस्य खरेष्ठा ।। १० ।। देविंधिया रक्षोहण अञ्जन प्रतूर्त उशान कृशानु सहस्रशीर्पन्, वाचस्पति, स्वाहा, प्राण ॥ २० ।। इति घोपादयो विंशतिः ॥ इति मत्वर्थीया इति ॥ १२४ ॥ मत्वर्थीयप्रत्ययानां दिग्मात्रमिति दर्शितम् । तत्त्वप्रकाशिकादिभ्यो विशेपः शेप उह्यताम् ।। अथ मयट्प्रत्ययं सर्वोपेण निर्दिशति । *प्राचुर्यप्राधान्यादिषु यथार्ह मयदाच्या-अपूपमयं पर्व ॥ "प्रकारे जातीयर" (७२।७५)। महानातीयः॥"भूतपूर्वे प्चरट्” (७।२।७८)। पूर्व भूतो भूतपूर्वः। भूतपूर्वा । आढ्या आढ्य- चरी ॥ "निन्द्ये पाशप्” (७३।४)। छान्दसपाशः ॥ "प्रकृष्टे तम” (७३।५) । १५ अयमेपां प्रकृष्टः शुक्लः शुक्लतमः। *प्राचुर्यप्राधान्येत्यादि, अत्रैवं सूत्रपद्धतिः-"प्रकृते मयट्” (७।३।१) । प्राचुर्येण प्राधान्येन वा कृतं प्रकृतम् , प्रकृतेऽर्थे वर्त्तमानान्नाम्नः स्वार्थे मयट् स्यात् । अन्नं प्रकृतं अन्नमयम् घृतमयम् । टकारो ड्यर्थः । यवागूमयी । अतिवर्त्तन्तेऽपि स्वार्थिकाः प्रकृतिलिङ्गवचनानीति यवागूः प्रकृता यवागमयम् एवमुत्तरत्रापि । अपूपाः प्रकृता आपूपिकम् अपूपमयम् ।। "अस्मिन्” (७३।२)। प्रकृतेऽर्थे वर्तमा-२० नान्नानोऽस्मिन्निति सप्तम्यर्थे मयट् स्यात् । अन्नं प्रकृतमस्मिन् अन्नमयं भोजनम् । अपूपमयं पर्व । वटकमयी यात्रा ॥ "तयोः समूहवच बहुषु” (७३।३) । तयोरिति प्रकृते इति अस्मिन् इति चेति पूर्वोक्तयोर्द्वयोर्वहुपु वर्तमानान्नाम्नः समूहवत्प्रत्ययो भवति, चकारान्मयट् स्यात् । अपूपाः प्रकृता अस्मिन् आपूपिकम् अपूपमयं पर्व, मौदकिकी मोदकमयी पूजा, "कवचिहस्त्यचित्ताचेकण" (६।२।१४) । धेनुकम् धेनुमयम् "धेनोरननः" (६।२।१५) । गणिकाः प्रकृता अस्यां यात्रायां २५ गाणिक्या गणिकामयी-"गणिकाया ण्यः" (६।२।१७) । अश्वीया अश्वमयी यात्रा "वाऽश्वादीयः" (६।२।१९)॥ "प्रकारे." तदस्येत्यनुवर्त्तते । प्रथमान्तात्पष्ट्यर्थ जातीयर स्यात् । यत्तत्प्रथमान्तं स चेत्प्रकारो भवति । सामान्यस्य भिद्यमानस्य यो विशेपो विशेषान्तरानुप्रवृत्तः स प्रकारः। पटुः प्रका- रोऽस्य पटुजातीयः । नानाभूतः प्रकारोऽस्य नानाजातीयः । एवंप्रकारोऽस्य एवंजातीयः । अन्लेति पष्टयर्थे विधानात्प्रकारवति जातीय विज्ञायते । ततः प्रकारमानवाचिप्रथमान्तादपि जातीयर भयति-३० यथाजातीयः कथंजातीयः । रित्करणं 'रिति (३।२।५८)इत्यत्र विशेपणार्यम् । महाजातीय इति महान् प्रकारोऽल "जातीयैकार्थेऽच्चेः" ( ३२२।७०) इति टाप्रत्यये रूपसिद्धिः ॥ अनायं चिशेषः-३२ १ पहाडमयमित्यादिषु युजमनादेर्नपुंसकलान् प्रलपत्यापि तमेव तिरिति । पानीदि युफमेय प्राय दीया प्रत्ययस्य सार्थिकस्य तव लियो पत्तः, यवागूमपमिति तयुकम्-पामयंस नीत्यात सारिस प्रलपस्यापि सरनं. पुंसकत्वायोगादित्यारा। है. प्रा. पूर्वा० ५८ -- -- । महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "कोण्यादे (२७६) । उतार्थे । जातीयरोऽपयादः । अणुः प्रकारोऽस्म अणुकः पटः एवं स्थूलक: पटः । अणुका मापाः; स्थूलका मापाः । मापकं हिरण्यम् । अणु स्थूल माप इषु इक्षु वाद्य तिल फाल तिलकाल पत्र ॥ १० ॥ मूल (पत्रमूल, पर्णमूल ?) कुमारीपुत्र कुमारीश्वशुर मणि बृहत् चश्चत् इन्द्र (1) एरण्ड पुण्डू ॥ १९॥ इत्यऽण्यादय एकोनविंशतिः ॥ "जीर्णगोमूत्रावदातसुराय- ५वकृष्णाच्छाल्याच्छादनसुराहिव्रीहितिले” (७२।७७ ) । जीर्णादिभ्यः पड्भ्यो यथाक्रम शाल्यादि पड्त्सु वाच्येषु प्रकारे कः स्यात् । जीर्णः प्रकार एषां जीर्णकाः शालयः । गोमूत्रप्रकार गोमूनकं गोमूत्रवर्णमाच्छादनम् । अवदातप्रकारा अवदातिका सुरा । सुराप्रकारः सुरावर्णः सुरकोऽहिः । यपप्रकारा यवका प्रीयः । कृष्णप्रकाराः कृष्णकास्तिलाः ॥ "भूत" । अतः परं प्रायः खाधिका प्रयास्तत्रोपाधिः प्रकृतेर्विज्ञेयः स प्रत्ययस्य चोयो भवति । टकारो ज्यर्थः । पकारः पुंवद्भावार्थ- १० स्तथा चोदाहरति-आत्यचरीति । भूतशब्दो वर्तमानेऽप्यस्ति, पूर्वशब्दो दिगादावपीति । अतिक्रान्त- कालप्रतिपत्त्यर्थमुभयोरुपादानं । प्रत्यासत्तेः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य भूतपूर्वत्वेऽयं प्रत्यय इतीह न भवति. अर्जुनो माहिष्मत्यां भूतपूर्व इति ॥ अनायं विशेष:-"गोष्ठादीन” (७१२७९) । उक्तार्थे । गोष्टो भूतपूर्वो गोष्ठीनो देशः 1 "गोस्थानं गोष्ठमेतत्तु गोष्ठीनं भूतपूर्वकम्” इति कोपः । “पष्ठया रूप्य-च रट्" (१२।८०)। पष्ट्यन्ताद्भूतपूर्वेऽर्थे एतौ स्याताम् । भूतपूर्व इतीह प्रत्ययार्थः । देवदत्तस्य भूतपूर्वो १५ देवदत्तरूप्यो गौः । देवदत्तचरः ॥ चरटियन पकारटकारौ पुंवद्भावडीप्रत्ययार्थी-देवदत्तचरी गौः ॥ "निन्ये"। स्वार्थे इति सर्वत्र ज्ञेयम् । निन्द्यः छान्दसः छान्दसपाशः । प्रत्यासत्तेः शब्दप्रवृत्तिनिमि- कुत्सायामयमिप्यते, तेनेह न भवति–वैयाकरणश्चौरः, नह्यत्र चौर्येण वैयाकरणत्वं कुत्स्यते किं वर्हि शीलमिति । 'पकारः पुंवद्भावार्थः । कुत्सिता कुमारी कुमारपाशा । अथेह वयोवचनत्वापुनीं: पस्मान्न भवति ? उच्यते-कुमारादयो हि योक्चना न कुमारपाशादयः । निन्दावचना हि ते इति २० न भवति ।। "प्रकृ०" । प्रकृष्टे इति प्रकर्षवत्यर्थे वर्तमानानाम्नस्तमप् स्यात् । प्रकर्षोऽतिशयः, स प गुणक्रिययोरेव न जातिद्रव्ययोः । शुलतम इति-सर्वे इमे शुक्ला अयमेषां प्रकृष्टः शुचतमः । एवं भादयवमः, कारक्तमः । जातिद्रव्यवाचिभ्योऽपि गुणक्रियाप्रकर्पविवक्षायां स्यात् । गोरयं यः सैंसम्न- हनः शकटं वहति-गोतमोऽयं यः सुलक्षणः शकटं सीरं च वहति । गोतमेयं या समां समां विजायते बीवत्सा प । व्यान्तरसमवायिना च प्रफष्टेन गुणेन कृत्वा प्रकृष्टे द्रव्ये तद्वतः प्रत्ययो भवति । अतिशयेन सूक्ष्माणि यखाण्यस्य सूक्ष्मवत्रतमः । प्रकर्षप्रत्ययान्ताच प्रकर्पस्यापि प्रकर्षविवक्षायां प्रत्ययः २६ स्यात् । यथा युधिष्ठिरः श्रेष्ठतमः पुरूणाम् । यन्तात्तु तरपू न स्यादनभिधानात् । तथा यथा पूर्व- १ अर्थकथनमिदम् , पाक्यं तु गोमून प्रकारोऽस्येत्यैवं कार्यम् । एवमवदातप्रकारेत्यादिष्यपि क्षेयम् । १ तत्र ते सापिंप्रत्ययेषु प्रशान्तेषु उपाधिर्विशेषणं भूतपूर्वादिप्रकृतेरेव सकाशादवसीयते थेवलं प्रत्ययेन योल्यते न सूच्यते । पर हि मार्जुनस्यस्यार्जुनशम्दाभिधेयस्य भूतपूर्वयम् नहि अर्जुनो माहिमलयामनन भूतपूर्व इत्या विवक्षा, अपि तु राज ने सत्र न भवति । । प्रसस्तु पूर्वस्प्रेणव शि. सर्वविभत्यन्त। ५ देवदताया भूतपूर्वा, असशासग्दोऽयमन्यप 'तदिताकर-हति निषेध. स्यात् । ननु पापः प्रलयस सार्थ उत्पम, मारपासादयोऽपि गयोपचना इति मनोति । सुखम् । यत्र फेवलायोवाचित सवनी, गौणमुध्योरिति न्याया मारपाशादयतु निन्दाविष्टिवयोवाचिन शी! मम्मद इलयः । ८ मा 'धरापमा लापारसमतियातसयोप्सायां दिसम् । ती पण या या सपा, रापयुच्यमाने सह पनि यसमा पास इति संशयः साद, निरासा बीवरसेल्युम् । .. देश पाव दम्यादन्याय पनदि, सब समापी यो TT TREागावयाद, परमार प्रकर्ष इत्यर्थः । १२ रोपलानि 'दुनाद'-दवि या दुनियाम्' इति त गयोः रामनरयोमध्ये प्रा तर तिरिम घटीशियम् । १४ भाभिमानारिलयं ।

-- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः। आतिशायिकप्रत्ययाः १५९ पदातिशये पूर्वपदावहुव्रीहेर्वा आतिशायिकः प्रत्ययः स्यात्-सूक्ष्मतमवत्रः सूक्ष्मवत्रतमो वेति । उत्तरप- दातिशये तु उत्तरपदादेव बह्वाट्यकतम इति । वहव आध्यतमा यत्र बह्वाड्यतमकः । केचित्तु पूर्वपदा- तिशयेऽपि बहुव्रीहेरेव प्रत्ययमिच्छन्ति-द्वयोः प्र तरपो विधानावहूनां प्रकऽयं विधिः । ननु कथं तर्हि आढ्यं नगरं आढ्यतमोऽयम् नगरे इति ? अत्रोच्यते-एकस्मिन्नपि निर्दिष्टे समुदाये तदन्तर्गताव- यवान्तरापेक्षयां प्रकर्षे भवति । पकारः पुंवद्भावार्थः । शुक्लतमा शाटी ॥ अत्रायं विशेष:-"वान्त-५ मान्तितमान्तितोऽन्तियान्तिपत्” (७।४।३१) । एते पञ्च तमवादिप्रत्ययान्ता वा निपात्यन्ते । अयमेषामतिशयेनान्तिकः अन्तमः, पक्षे अन्तिकतमः । अत्रान्तिकशब्दस्य तमप्प्रत्यये तिकशब्दलोपो "नोऽप्रशानोऽनुस्वारानुनासिको च पूर्वस्याधुट्परे” (११३१८) इति सँकाराभावश्च निपात्यते-अयमेपा- मतिशयेनान्तिकः अन्तितमः-अत्र कलोपः, पक्षे अन्तिकतमः । अन्तिकादागच्छति अन्तित आग- च्छति-अनापादानलक्षणे तसौ कशब्दलोपः, पक्षे अन्तिकतः । अन्तिके साधुः अन्तियः अत्र यप्रत्यये १० कलोपः, इकारस्य च लोपाभावः, पक्षे अन्तिक्यः । अन्तिके सीदति अन्तिपत् अत्र सदिति विवन्ते कलोपः, सस्य पत्वञ्च; पक्षे अन्तिकसद् । अत्र सूत्रम् । द्वयोर्विभज्ये च तरप् ॥ १२५॥ [सि०७३६] द्वयोर्मध्ये प्रकृष्टे विभज्ये च तरप् स्यात् । इयं पसी, इयं पट्टी, इयमनयोः प्रकृष्टा पट्ट्टी पटु- तरा । सौलेभ्यो माथुरा आट्यतराः॥"कचित्” (७३।७) । स्वार्थे यथालक्ष्यं तरप् । अभिन्न-१५ तरकम् ।। १२५॥ "द्वयो.” द्वयोरिति-द्वयोस्तद्गुणयोरर्थयोर्मध्ये यः प्रकृष्टस्तस्मिन्त्रिपये विभज्ये विभक्तव्ये च प्रकृ?ऽधे वर्तमानान्नान्नस्तरप् स्यात् , तमपोऽपवादः, पकारः पुंवद्भावार्थः, तथाचोदाहरति-पटुतरेति । एवं पाचक- तरः प्राग्वन् । गोतरो यः शकटं सीरं च वहति, गोतरा या समांसमां विजायते स्त्रीवत्सा च । दन्ताश्च औष्टौ च दन्तौष्ठम् , दन्तोष्ठस्य दन्ताः स्निग्धतराः-अत्र यद्यपि विग्रहे बहुत्वं प्रतीयते तथापि समाहा-२० रेऽवयवौ स्वार्थमात्रं दन्तत्वादिलक्षणमऽभेदैकत्वसङ्ख्यायोग्युपाददाते न सङ्ख्याभेदमिति द्वयोरेव प्रकर्षः। यदा पुनरितरेतरयोगस्तदा वह्वर्थप्रकर्प इति तमवेव भवति । अस्माकं च देवदत्तस्य च देवदत्तोऽभिरूपतरः- अनास्माकमित्येकस्यैव "अविशेपणे द्वौ चास्मदः” (२।२।१२२) इति वहुवद्भावः । परुद्भवान्पटुरासीत् पटुंतर ऐपमः-अत्रैकस्यापि पर्यायार्पणया द्वित्वमिति द्वयोरेव प्रकर्षः । स्रोनेभ्यो माथुरा आध्यतरा इति विभज्ये प्रकृष्टे उदाहरणम् । स्रोनेपु माथुराणामप्रवेशाद्विभागः, विभज्यत्व च विशेषणमप्याव्याद्यर्थः२५ अंकृष्टं विभज्यं भवति ततः प्रत्ययः । साङ्काश्यकानां पाटलिपुत्रकाणां च पाटलिपुत्रका आध्यतमा इत्यत्र राश्यपेक्षया द्वित्वेऽपिशब्देन बहुत्वोपादानात्तरप् न स्यात् । विभज्यग्रहणमद्वित्वार्थम् ॥"कचित्" अभिन्नमेव अभिन्नतरकम् । एवं उच्चैरेवोच्चस्तराम् । कचिद्रहणं शिष्टप्रयोगानुसरणार्थम् ।। १२५ ।। १प्रयोगे वहुव्रीहिज्ञापनाय कच् दर्शितः । २ तन्मवे सूक्ष्मतमबन्ना इति प्रयोगो न भवति । ३ यदि यहूनां प्रकऽचं विधिस्तईि प्रधानतमोऽयं प्राम इत्यत्र प्रामपुरुपयोईयोः प्रकर्षे न प्राप्नोतीति कयमयः, उत्तरं तु युगममेव । ४ 'नामनिदय्- व्यजने' इति पदलात्सकारः प्राप्तः । ५ स विवक्षितः समानो गुगो ययोरिति विग्रहः । ६ न विद्यते नेदो यस्याः सा अनेदा, अमेदा चासावेकलसह्या च । यथोपधिरताः सर्वे मधुन्याहितशचयः । अविमागेन वर्तन्ते तां सध्या तादृशी विदुः ॥ १॥ चत्रेण चैत्राभ्यां चैत्रैर्वा भूयत इत्यत्र या सह्या सा अभेदकलसति । ७ पर्यायेषु पटुपद्धतरादिषु भयंस्य विशेषस्य चैत्रा. देरर्पणा टोकनम् । ८ प्रकपद्वारेण विमज्यद्वारेणापि न भवति, पट्यन्तपदाभ्यां सनुदायस्याभिन्नस्यैव प्रतिपादनाद, न सुत्राप्यपायप्रतिपादिका पचम्पत्ति अपि तु चकारेणाविभागः प्रतीयते । ९ ननु द्वयोरिन्युळेऽपि अत्र न भविष्यति विभज्यप्रणेनेत्याह वि०-विमज्ये इलसति द्वयोरेव प्रकृटे स्यात् । ततवाससपि हि द्वित्वे विनये यथासादित्येवमयम् । - २८ ४६० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- किन्त्यायेऽव्ययादसत्त्वे तयोरन्तस्याम् ॥ १२६ ॥ [सि० ७३३८] किमस्त्यायन्तादेदन्तादव्ययाच परयोस्तमप्तरपोरन्तस्थाम् सात्, न चेत्तौ सत्वे द्रव्ये वर्तते । किन्तमाम्, किन्तराम् । अयमेषां प्रकृष्टं पचति पचतितमाम् । अयमनयोः प्रकृष्टं पचति पचति- तराम् । पूर्वाह्नेतराम् २ । अतितराम् २ भुते । असत्वे किम् ? किन्तरं दारु ॥ १२६ ॥ "किन्त्या०” किन्तरामिति-इदमनयोरतिशयेन किंपचति किन्तरां पचति । किन्तमामिति- इदमेपामतिशयेन किपचति कितमां पचति । अयमनयोरिति-अस्मादेव वचनात्त्याद्यन्तादपि व्यर्थप्रकर्षे तरप बह्वर्थप्रकर्षे च तमप् भवति । पूर्वाहेतरामिति-द्विकेन तमप्प्रत्ययरूपम् । एवमपराहेतराम् २ । प्राहेतराम् २ । प्रगेतराम् २ । अग्रेतराम् २ । अप्रेशब्दोऽपि कालवाची । एग्रहणात्काले सत्त्वेऽप्याम् भवति नान्यस्मादेदन्ताभायात् । अथवा विभक्त्यर्थो न द्रव्यम् । तत्प्रकर्षेऽत्र तरप्तमपौ । शोभनो १० देशब्दो यस्य स सुहेतर इत्यत्रानभिधानान्न भवति । क्रियाशब्देभ्यश्च. जयतीति विचि जे, जेतर इत्यादि । अव्यय. अभितरामिति-एवमतितरां २ । सुतरा २। नितरां २ । उच्चस्तराम् २ । किन्तरं दार्विति-एवं उच्चैस्तर २ । उत्तरः । उत्तमः ॥ १२६ ॥ गुणाङ्गाद्वेष्ठेयसू ॥ १२७ ॥ [सि०७३।९] गुणप्रवृत्तिहेतुकात्तमप्तरपोर्विषये यथासङ्ख्यमेतौ वा साताम् । अयमेपां प्रकृष्टः पटुः पटिष्ठः १५पटुतमः । अयमनयोः प्रकृष्टः पटुः पटीयान् पटुतरः । “प्रशस्यस्य श्र" (७४३४)। पीष्ठेयस्सु । प्रकृष्टः प्रशस्यः श्रेष्ठः श्रेयान् ॥ *वृद्धप्रशस्वयोर्व्यः । ज्येष्ठः ॥ “ज्यायान्" (७॥४॥३६) अयमीयसौ साधुः ॥ “अल्पयूनोः कन्वाः" (४।३३) । कनिष्ठः २ अल्पिष्ठः २ यविष्ठः २ ॥ "याढान्तिकयोः साधनेदो” (७।४।३७) । ण्यादिषु प्रकृष्टो बाढः साधिष्ठः साधीयान् । प्रकृष्टोऽन्तिको नेदिष्ठः नेदीयान् ॥कप्रियस्थिरेत्यादिना प्रियादीनां प्राधादेशे २० प्रकृष्टः प्रियः प्रेष्ठः प्रेयान् । स्थेष्ठः स्थेयान् । “यहोर्णीष्ठे भूय" (७४।४०)। भूयिष्ठः । ईयसौ ।। "भूलकचेवर्णस्य" (४४१) । भूयान् । स्थूिलद्रेत्यादिना स्थूलादीनामन्तस्थादिलोपे नामिनो गुणे च स्थविष्ठः स्थवीयान् । दविष्ठः दवीयान् ॥ "विन्मतोर्णीष्ठेयसी लप" (७४।३२)। प्रकृष्टः स्रग्वी स्रजिष्ठः । एवं त्वचिष्ठः ॥ १२७ ॥ "गुणा" । गुणप्रवृत्तिहेतुकादिति-यः शब्दो गुणमभिधाय द्रव्ये वर्तते तस्मादित्यर्थः । यथा- २५ सारमेती इति-इष्टेयसू । तमवर्थे इष्ठः, तरवर्थे च ईयसुः; पक्षे यथाप्राप्त तरप्तमपावपि, तथैवोदा- हरति-अयमेपामित्यादि । एवं लघिष्ठः लघुतमः लघीयान् लघुतरः । एवं गरिठः २ । गरीयान् २। विभज्यार्थतरविपयेऽपि माथुरेभ्यः पाटलिपुनकाः पटीयांसः पटुतराः । गुणाहणं किम् ? गोतमः गोतरः पाचकतमः पाचकतरः-अन जातिरियागत्वान भवति । अङ्गग्रहणं किम् ? गुरुवमम् । शुष्ठतर रूपम्-अन हि गुण एव वृत्तिर्न तदुपसर्जने [स गुण उपसर्जनं यत्र तन] द्रव्ये इति न भवति । ईयसोरकार उदित्कार्यार्थ:-पटीयसी ॥ "प्रशस्याणीटेयसुपु इति-णो प्रशस्समाचष्टे ३१ श्रयति श्रेष्ठः इति, अयमेपा प्रकृष्टः प्रशस्यः श्रेष्ठः अयमनयोः प्रपृष्टः प्रशस्यः श्रेयान् । *घृद्धप्रसव • १ नामप्रस्तावान लादेष प्रशते रूप' इति वचनाच नाग्न एव प्रामुत इत्याशय । २ यद्यपि पूर्वाोSUE इति कारः सरदमत्र मामा , तपापि विमव्यों माधिकरणसिन या भाषेयपरवत्रा इति तस्सा भरवातन प्रलय इति । - प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । आतिशायिकाद्यर्थाः ४६१ योज्यं इति, अत्र सूत्रम्--"वृद्धस्य च ज्यः” (७।४।३५) । णीप्टेयसुपु ॥ "ज्या०" । अयमीयसौ साधुरिति-पूर्वसूत्रे विहितात् ज्यादेशात्परस्य ईयसोरीकारस्याकारादेशो निपात्यते अयमनयोरतिशयेन प्रशस्यो वृद्धो वा ज्यायान् , ज्यायसी ॥ "अल्प० । अनयोर्णीष्ठेयसुपु कन्वा स्यात् । अल्पं युवानं वा आचष्टे कनयति अयमेपामनयोरतिशयेनाल्पो युवा वा कनिष्ठः कनीयान् ; पक्षे अल्पयति अल्पिष्टः अल्पीयान् , यवयति यविष्टः यवीयान् ।। "वाढा." णौ । वाढं अन्तिकं वा आचष्टे साधयति, नेद-५ यति । *इमन्प्रत्ययाधिकारे सूत्राणामुक्तत्वादत्र स्मरयति *प्रियेत्यादि वात्तिकम्-प्रेष्ठः प्रेयान् इति णौ प्रापयति । एवं स्थिरस्य स्थापयति स्थेष्ठः स्थेयान् । स्फिरस्य स्फाययति स्फेप्टः स्फेयान् । उरोवर, उरु- माचष्टे वरयति, प्रकृष्ट उरुर्वरिष्टो वरीयान् । गुरोर्गर, गरयति गरिष्ठः गरीयान् । वहुलस्य वंह, बह- यति बंहिष्टः वंहीयान् । तृप्रस्य त्रप्, अपयति ब्रपिष्टः पीयान् । दीर्घस्य द्राघ, द्राघयति द्राधिष्ठः द्राधीयान् । वृद्धस्य वर्ष, वर्पयति वर्षिष्टः वर्षीयान् । वृन्दारकस्य वृन्द, वृन्दयति वृन्दिष्ठः वृन्दीयान् ।१० वरादीनामकार उच्चारणार्थः । कश्चित्तु करोत्यर्थे णौ प्राद्यादेशं नेच्छति तन्मते प्रिययति स्थिरयतीत्यादि ।। "पृथुमृदु" इत्यादि वार्तिकम् [पृष्ठ ४२८ पति १९] प्रकृष्टः पृथुः प्रथिष्ठः प्रथीयान् । एवं प्रदयति म्रदिष्ठः म्रदीयान् । भ्रशयति भ्रशिष्टः भ्रशीयान् । क्रशयति ऋशिष्टः ऋशीयान् । द्रढयति ढिष्ठः द्रढी- यान् । परिवढयति परिवढिष्ठः परिवढीयान् । केचित्तु वृढशब्दस्यापीच्छन्ति वढिमा वढिष्टः ब्रढीयान् ।। "वहो” वहुशब्दस्य णीप्टयोः परयोः भूय् इत्ययमादेशः स्यात् , भूभावापवादः । वहुमाचष्टे भूययति १५ प्रकृष्टो बहुभूयिष्ठः । वहोराख्यानं भूयनम् । णौ केचिद्विकल्पमाहुः-भूययति भूयनम् , पक्षे वहयति वहनम् । वहोर्णी भाविति कश्चित्-भावयति ॥ ईयसावित्यादि-अत्र सूत्रम् "भूलक्चेवर्णस्य" (७४।४१) अस्वार्थः-बहुशब्दस्य ईयसाविमनि च परे भू इत्यादेशो भवति, अनयोश्चेवर्णस्य लुग् भवति-भूयान भूयांसौ भूयांसः भू ऊ इत्यूकारप्रश्पादवादेशो न भवति । इवर्णस्येति किम् ? सर्वस्य मा भूत् "स्थूलदूर०” (७४|४२) इत्यादि कण्व्यम् । स्थविष्टः इत्यादि-णौ तु स्थवयति । दव-२० यतीति एवं यवयति यविष्टः यवीयान् । ह्रसयति हसिष्ठः ह्रसीयान् । क्षेपयति क्षेपिष्टः क्षेपीयान् । क्षोदिष्टः क्षोदीयान् । उत्तरेण "यन्त्यस्वरादेः” (७।४।४३) अन्यस्वरलोपेऽनेनार्थादन्तस्थाया लोपे सिद्धेऽन्तस्थादेरिति वचनं येन नाप्राप्ते इति न्यायेनान्यस्वरलोपं वाधित्वाऽनेनान्तस्थाया लोपो मा भूदित्येवमर्थम् ॥ "विन्म०" णौ । स्रग्विणमाचष्टे खजयति । स्रजिष्ट इति-अयमेपां नग्विणां प्रकृष्टः सम्वी स्रजिष्ठः । अयमनयोरतिशयेन स्रग्वी सजीयान् । एवं त्वग्वन्तमाचष्टे त्वचयति, अयमेपां२५ प्रकृष्टस्त्वग्वान् त्वचिष्टः । अयमनयोरतिशयेन त्वग्वान् त्वचीयान् । अत एव वचनादगुणागादपीप्टे- यसू । निर्दिश्यमानत्वात्प्रत्ययमात्रस्व लुप् । एवं कर्तृमन्तमाचष्टे इति णी "त्र्यन्त्यस्वरादेः” (१४४३) इति तृप्रत्ययलोपे अनेन मतुलोपे करयति अयमेपामतिशयेन कर्तृमान् करिष्टः करीयान् ॥ १२७ ।। - इलातिशायिकप्रत्ययप्रकरणम् । त्यादेश्च प्रशस्ते रूपप् ॥ १२८ ॥ [ सि० ७।३।१०] त्याद्यन्तानाम्नश्च प्रशस्ते रूपप् स्यात्, पचतिरूपम् वैयाकरणरूपः ॥ *तरवादिपु कचिद हस्वपुंवद्भावी या वक्तव्यौ-पचन्तितरां पचत्तरां पचन्तीतराम् ॥ १२८ ।। "यादे." प्रशस्ते इति-प्रशतेऽर्थे वर्तमानादित्यर्थः । पचतिरूपमिति एवं पचनोल्पम् , पचन्नित- पम् । त्याधन्तानां क्रियाप्रधानत्वात्तत्याच साध्यत्वेन लिजन्सालाभ्यामयोगान् कान्लन्यौलनिगमेत वचनं नपुंसकलिमं च भवति । वैयाकरणरूप इति प्रहते प्रवृत्तिनिनिचत्य समान, परिपूर्णता या ३५ - ॥ - ४६२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलधु- प्राशस्त्यं तेनानापि स्यात्-वृपलरूपोऽयमपि पलाण्डुना सुरां पिवेत् । दस्युरूपोऽयमप्यक्ष्णोरञ्जनं हरेत् । पटुतमरूपः। पटुतररूपः। पकारः पुंवद्भावार्थ:-दर्शनीयरूपा ॥ *तरवादिष्विति अत्र सूत्रम्-"ऋदुदि- त्तरतमरूपकल्पनुवचेलगोत्रमतहते वा हखश्च (३।२।६३)। ऋदित् उदिञ्च परतः स्त्रीलिङ्ग- सरादिषु प्रत्ययेपु, छुवादिपु च रुयेकार्थेपु हखाऽन्तः पुंवञ्च वा स्यात् । पचन्तितरा पचत्तरा पचन्तीतरा। ५पचन्तितमा पचत्तमा पचन्तीतमा । श्रेयसितमा श्रेयस्तमा श्रेयसीतमा । विदुपितमा विद्वत्तमा विदुषी. तमा || रूप. पचन्तिरूपा ३ । सर्वत्र हस्वपुंवद्भावोभयाभावैश्वैरूप्यं ज्ञेयम्-श्रेयसिरूपा ३ । विदुपि. रूपा ३ ॥ कल्प. पचन्तिकल्पा ३ । श्रेयसिकल्पा ३ । विदुपिकल्पा ३ । पचन्ती चासौ ब्रुवा च पचन्तिबुवा ३ । विदुपिब्रुवा ३ । चेलट्, 'चेलत् वसने चेलति गुणानिति लिहायच् , दिवचनं व्यर्थम् । पचन्ती चासौ चेली च पचन्तिचेली ३ । श्रेयसिचेली ३ । विदुषिचेली ३ ॥ अहं पचा- १० मीत्येवं रूपां गां नायते इति गोत्रा "आतो ड." (५।१७६) इति डः । पचन्ती चासौ गोत्रा च पचन्तिगोत्रा ३ । श्रेयसिगोत्रा ३ । विदुपिगोत्रा ३ । मत. मन्यतेः सत्यर्थे "ज्ञानेच्छा०” (५।२।९२) इत्यादिना क्तः, पचन्ती चासौ मता च पचन्तिमता ३ । श्रेयसिमता ३ । विदुषिमता । विद्वन्मता विदुषीमता । हत. पचन्ती चासौ हता च पचन्तिहता ३ । श्रेयसिहता ३ । विदुपिहता ३ । एव. मन्ये ऋदुदितो ज्ञेयाः-सुदतिसरा सुदत्तरा सुदतीतरेत्यादि । बुवादयः कुत्साशब्दाः "निन्धं कुत्सनै." १५(३।१११००) इति समासः । ऋदुदिदिति किम् ? कुमारितरा किशोरितमा। "यः" इति सूत्रेण हवः । एकार्थे इत्येव-पचन्या हता पचन्तीहता । तरवादिष्विति किम् ? पचन्तीपाशा । विद्वद्वन्दा. रिका ॥ "या" (३।२।६४)। डयन्तस्य परतः स्त्रीलिङ्गस्य तरादिपु चतुर्यु प्रत्ययेषु बुवादिषु पञ्च- सूत्तरपदेप्वेकार्थेपु हस्वः स्यात् । गौरितरा गौरितमा । नर्तकिरूपा । कुमारिकल्पा । ब्राझणिब्रुवा । गार्गिचेली । ब्राह्मणिगोत्रा । गार्गिगोता । गार्गिमता । गौरिहता । दर्शनीयतरा, विद्वद्वृन्दारिकेत्यादौ २० पुंवद्भावः सावकाशः, नर्तकिरूपेत्यादौ तु कोपान्त्यत्वात्पुंवद्भावप्रतिषेधादयं विधिः, गौरितरेत्यादौ तूभयमाप्तौ "स्पर्द्ध" (७४।११९) पर इति परत्वायमेव विधिर्यथाप्राप्तं पुंवद्भावं बाधते । इय इति किम् ? मद्रिकातरा । परतः खिया इत्येव-बदरीतरा आमलकीतरा । "नवैफस्वराणाम्" (३।२।६६) इत्युत्तरत्र वचनादनेकखरस्येवायं विधिः ।। भोगवद्गौरिमतो नि" (३।२।६५)। संज्ञायो वर्तमानयोरनयोहाँप्रत्ययस्य तरादिपु, त्रुवादिपु च हवः स्यात् । भोगवतितमा । गौरिम. २५तिनुवा । नाम्नीति किम् ? भोगायतितरा ३-प्राग्वत्रैरुप्यम् ॥ "नवैकस्वराणाम्" (३।२।६६)। पहुवचनात्परतः स्त्रीति निवृत्तम् । सामान्येन तु विधानम् । रूयेकार्थे इत्यनुवर्तते । एकस्वरस्य इयन्तस्य तरादिपु, ध्रुवादिपु चोत्तरपदेपु रुयेकार्थेपु हस्यो वा स्यात् । नितरा स्रोतरा । ज्ञस्य भार्या शी, शितमा शीतमा । अस्यापत्यं स्त्री ई, इरूपा ईरूपा । कस्य भार्या की, किकल्पा कीकल्पा । शिवना झीया । इचेली ईचेली । किगोता कीगोत्रा । त्रिमता स्त्रीमता । निहता स्त्रीहता 1 एकखराणामिति ३० किम् ? फुटीतमा । डय इत्येष-श्रीतरा श्रीतमा । एकार्थ इत्येव सिया हता स्त्रीहता । नित्यदितामनेर- स्वराणामपीच्छन्त्येफे, तन्मते आमलकितरा पदरितरा फुलिरूपा लक्ष्मिकल्पा तधितरेत्याद्यपि भवति । "ऊड:" (२०६७) । अन्तस्य तरादिपु, गुवादिपु पोत्तरपदेषु रुयेकार्थेषु या हसः स्यात् । प्रम- पन्धुतरा प्रमयन्धूतरा । पामोरुतरा यामोरूतरा । मद्रयाहुरूपा मद्रयारूपा । कमण्डलुकमा फमण्डलूकल्पा । पपुवा फद्र युया । पहुचेली पर्चेली । श्वश्रुगोगा श्वश्रूगोत्रा । बुरुमता पुरूमता । मीरहता भीरुहता । एकार्थ इत्येय-मीवी हता मीरुदता ॥ पटुतमरूपा पटुतररूपः । पकार ३६ थुपमापार्या-दर्शनीयरूपा ॥ १२८ ॥ - - - + - , ५ ? प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । किञ्चिदूनार्थाः ४६३ अतमवादेरीषदसमाप्ते कल्पप् देश्यप् देशीयर् ॥ १२९॥ [सि०७।३।११] तमवाद्यन्तंवर्जात्यावन्तानाम्नश्च किञ्चिद्नेऽमी त्रयः स्युः । पचतिकल्पं पचतिदेश्यं पचति- देशीयम् । पटुकल्पा पटुदेश्या पटुदेशीया ॥ “नान्नः प्राग्वहुर्वा” (७।३।१२) । किश्चिदूने । बहुपटुः, पटुकल्पः । *कुत्सिताल्पाज्ञातादिपु यथाकवादयो वाच्याः। अश्वकः। अनुकम्पायां पुत्रक एहकि ॥ "एकादाकिन् चाऽसहाये” (७३।२७) एकाकी एककः ॥ १२९ ॥ अत० । किञ्चिदूने इति-पदार्थानां सम्पूर्णता समाप्तिः, सा किश्चिदूना ईपदसमाप्तिस्तद्विशिष्टेऽर्थे वर्तमानात्त्याद्यन्तानाम्नश्चामी त्रयः प्रत्ययाः स्युः । पचतिकल्पमित्यादि-एवं पचतः कल्पं ३ । पचन्ति- कल्पं ३ । पक्ष्यतिकल्पं ३ । अपाक्षीत्कल्पं ३ । पूर्ववन्नपुंसकत्वैकत्वे । इदमेव त्यादिग्रहणं ज्ञापकम् , शेपस्तद्धितो नान एव भवतीति । पटुकल्पेति-ईपदसमाप्ता पवी पटुकल्पा ३, प्रत्ययस्य पित्त्वात् पुंव. द्भावः । एवं कारककल्पः ३ । कृतकल्प भुक्तदेश्यं पीतदेशीयम् । ईपदसमाप्तो गुडो गुडकल्पा द्राक्षा १० ३ । चन्द्रकल्पं मुखम् , तैलकल्पा प्रसन्ना । गुडादिधर्माणां माधुर्यादीनां द्राक्षादिप्वीदसमाप्तत्वेनेपदस- माता द्राक्षादय एवमुच्यन्ते । कल्पवाद्यन्तमुपमेये वर्तमानमुपमेयलिङ्गसवयम् । बहुप्रत्ययपूर्व तु प्रकृतिलिङ्गसङ्ख्यम् । स्वभावात् शब्दशक्तिरेपा यदुत स्वार्थिकाः केचित्प्रकृतिलिङ्गान्यतिवर्तन्ते, यथा कुटीरः शुण्डारः शमीरुः शमीरः दैवतं औपयिकं औषधं वाचिकमिति । केचित्तु नातिवर्त्तन्ते-यावकः मणिकः वृहतिका मृत्तिका कासूतरी गोणीतरी व्यावक्रोशी व्यावहासीति । अतमबादेरिति किम् ? यदा १५ प्रकादिविशिष्टस्येपदसमाप्तिविवक्षा भवति, तदा तमवादिभ्यः कल्पवादयः प्राप्नुवन्यतस्ते मा भूवन् । यदा त्वीपदसमाप्तस्य प्रकर्षादयो विवक्ष्यन्ते, तदा कल्पवाद्यन्तेभ्यस्तमवादयो भवन्त्येव । पटुकल्प- तमः ३ । पकारौ पुंवद्भावायौँ । दर्शनीयकल्पा । केचिद्देश्यं पितं नेच्छन्ति, तन्मते दर्शनीया देश्येयेव भवति । देशीयरिति रेफो "रिति” ( ३।२।५८) इत्यत्र विशेषणार्थः-पञ्चमदेशीया ॥ "नाम्नः" किञ्चिदूने इति-ईपदसमाप्तेऽर्थे वर्तमानान्नान्नो बहुप्रत्ययः स्यात्, स च प्राक् पुरस्तादेव न परस्तात् । २० वहुपटुरिति-एवं वहुभुक्तम् , वहुपीतम्, वहुगुडा द्राक्षा, वहुतैलं प्रसन्ना, बहुपयो यवागूः, वहुचन्द्रो मुखम्, नामग्रहणं त्याद्यन्तनिवृत्त्यर्थम् , याद्यन्तेषु सावकाशाः कल्पवादयो बहुना मा बाधिपतेति वा- वचनम्, तेन पक्षे तेऽपि भवन्ति । अत्र विशेपश्चायम्-"न तमवादिः कपोऽच्छिन्नादिभ्यः" (७३.१३)। छिन्नादीन्वर्जयित्वान्यस्माद्यः कप्प्रत्ययस्तदन्तात्तमवादिन स्यात् । एपामनयोयिं प्रकृष्टः पटुक इत्येव । प्रकर्षादिमतः कुत्सितत्वादिविवक्षायां तमवाद्यन्तेभ्यः कप् भवत्येव-प्रकृष्टः पटुः २५ कुत्सितः पटुतमकः। (अयमनयोः) पटुतरकः । पटुकल्पकः । पटुदेश्यकः । पटुदेशीयकः । अच्छिन्नादिभ्य इति किम् ? कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वा च्छिन्नछिन्नकः । प्रकृष्टः च्छिन्नकः च्छिन्नकतमः । छिन्नकतरः छिन्नकरूपः । छिन्नककल्पः ३ । छिन्नादयः प्रयोगगम्याः ॥ "अनत्यन्ते" (७।३।१४)। अनत्यन्तेऽर्थे यः कप तदन्तात्तमवादिर्न त्यात् । छिन्नाद्ययं वचनम् । अनत्यन्तं छिन्नं छिन्नकम् । भिन्नकम् । प्रकृष्टं छिन्न भिन्नकमित्येव । यदा तु प्रकर्पवतोऽनत्यन्तविशिष्टविवक्षा, तदा तमवाद्यन्तान ३० "क्तात्तमवादेश्वाऽनत्यन्ते" ( ७३५६) इति कप भवत्येव । छिन्नकतमकं भिन्नरूतमकम् । अथ कवादिस्वार्थिकप्रत्ययप्रकरणं सहेपेण सहाति-कुलितेत्यादि वार्निकम् । अथात्र सूत्राणि- "प्राग्नित्यात्कप” (७३।२८) नित्यान्दलहीत्तनात् प्राग येऽर्थातपु योन्येषु फपप्रत्ययोऽधिहलो शेयः । (कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वा अश्वः अश्वकः । गर्दभः) । पकारः पुंपनायायः । कुत्सिता रहा- रदिका । प्रार नित्यादित्यवभ्यर्थम्, अन्ययापवादयाधितो नोत्तरमानुवर्त्तत । परदोऽपि भानुयले ।।३५ ।

-- महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहमलघु- प्राशस्त्यं तेनानापि स्यात्-वृपलरूपोऽयमपि पलाण्डुना सुरां पिवेत् । दस्युरूपोऽयमप्यक्ष्णोरजनं हरेत् । पटुतमरूपः। पटुतररूपः। पकारः पुंवद्भावार्थः-दर्शनीयरूपा ॥ त्तरवादिष्विति अत्र सूत्रम्-"ऋदुदि- तरतमरूपकल्पब्रुवचेलगोत्रमतहते वा हखश्च (३।२।६३)। ऋदित् उदिञ्च परतः स्त्रीलिङ्ग- स्तरादिपु प्रत्ययेपु, बुवादिषु च रुयेकार्थेषु हस्वाऽन्तः पुंवच्च वा स्यात् । पचन्तितरा पचत्तरा पचन्तीतरा। ५पचन्तितमा पचत्तमा पचन्तीतमा । श्रेयसितमा श्रेयस्तमा श्रेयसीतमा । विदुपितमा विद्वत्तमा विदुपी- तमा ॥ रूप. पचन्तिरूपा ३ । सर्वत्र हस्वपुंवद्भावोभयाभावैरूप्यं ज्ञेयम्-श्रेयसिरूपा ३ । विदुषि- रूपा ३ ॥ कल्प. पचन्तिकल्पा ३ । श्रेयसिकल्पा ३ । विदुपिकल्पा ३ । पचन्ती चासो ब्रुया च पचन्तिब्रुवा ३ । विदुपिनुया ३ । चेलट्, 'चेलत् वसने' चेलति गुणानिति लिहायच्, टिवचनं व्यर्थम् । पचन्ती चासौ चेली च पचन्तिचेली ३ । श्रेयसिचेली ३ । विदुपिचेली ३ ॥ अहं पचा- १० मीत्येवं रूपां गां त्रायते इति गोत्रा "आतो ड." (५।११७६) इति डः । पचन्ती चासौ गोना च पचन्तिगोत्रा ३१ श्रेयसिगोना ३ । विदुषिगोत्रा ३ । मत. मन्यतेः सत्यर्थे "ज्ञानेच्छा०" (५।२।९२) इत्यादिना क्तः, पचन्ती चासौ मता च पचन्तिमता ३ । श्रेयसिमता ३ । विदुषिमता । विद्वन्मता विदुपीमता । हत. पचन्ती चासौ हता च पचन्तिहता ३ । श्रेयसिहता ३ । विदुपिहता ३ । एव- मन्ये ऋदुदितो ज्ञेया:-सुदतितरा सुदत्तरा सुदतीतरेत्यादि । बुवादयः कुत्साशब्दा: "निन्यं फुत्सनैः १५(३।१।१००) इति समासः । ऋदुदिदिति किम् ? कुमारितरा किशोरितमा। "यः" इति सूण हस्वः । एकार्थे इत्येव-पचन्या हता पचन्तीहता । तरवादिष्विति किम् ? पचन्तीपाशा । विद्वद्वन्दा- रिका ॥ "डयः" (३।२।६४) । डयन्तस्य परतः स्त्रीलिङ्गस्य तरादिषु चतुर्पु प्रत्ययेषु ब्रुवादिषु पञ्च- सूत्तरपदेष्वेकार्थेपु ह्रस्वः स्यात् । गौरितरा गौरितमा । नर्तकिरूपा । कुमारिकल्पा । ब्राह्मणिब्रुवा । गार्गिचेली । ब्राह्मणिगोगा । गार्गिगोत्रा । गार्गिमता । गौरिहता । दर्शनीयतरा, विद्वद्वन्दारिकेत्यादौ २० गुंबद्भावः सावकाशः, नर्तकिरूपेत्यादौ तु कोपान्त्यत्वात्पुंवद्भावप्रतिपेधादयं विधिः, गौरितरेत्यादौ तूभयप्राप्तौ "स्पर्द्ध" (७।४।११९) पर इति परत्वादयमेव विधिर्यथाप्राप्तं पुंवद्भावं बाधते । इय इति किम् ? मद्रिकातरा । परतः खिया इत्येव-बदरीतरा आमलकीतरा । "नवैकखराणाम" (३।२।६६) इत्युत्तरत्र वचनादनेकखरस्यैवायं विधिः ॥ भोगवद्गौरिमतो नि" (३।२।६५)। सज्ञायां वर्तमानयोरनयोप्रित्ययस्य तरादि', ब्रुवादिपु च हवः स्यात् । भोगवतितमा । गौरिम• २५ तिनुवा । नाम्नीति किम् ? भोगावतितरा ३-प्राग्वत्रैरूप्यम् ॥"नवैकस्वराणाम्" (३।२।६६) । बहुवचनात्परतः स्त्रीति निवृत्तम् । सामान्येन तु विधानम् । भयेकार्थे इत्यनुवर्तते । एकखरस्य उपन्तस्य तरादिषु, ब्रुवादिपु चोत्तरपदेषु रुयेकार्थेषु हस्खो वा स्यात् । नितरा नीतरा । ज्ञस्य भार्या शी, ज्ञितमा शीतमा । अस्थापत्यं स्त्री ई, इरूपा ईरूपा । कस्य भार्या की, किकल्पा कीकल्पा । हिब्रुवा ज्ञीब्रुवा । इचेली ईचेली। किगोता कीगोना । त्रिमता स्त्रीमता । निहता स्रीहता । एकस्वराणामिति ३० किम् ? फुटीतमा । डय इत्येव-श्रीतरा श्रीतमा । एकार्थ इत्येव स्त्रिया हता स्रीहता । नित्यदितामनेक- स्वराणामपीच्छन्त्येके, तन्मते आमलकितरा बदरितरा कुलिरूपा लक्ष्मिकल्पा तबितरेत्याद्यपि भवति । "ऊड:" (३२।६७) । ऊडन्तस्य तरादिपु, ब्रुवादिषु चोत्तरपदेपु रुयेकार्थेषु वा हवः स्यात् । ब्रह्म- पन्धुतरा ब्रह्मरन्धूतरा । वामोरतरा वामोरूतरा । मद्रवाहुरूपा मद्रवाहूरुपा । कमण्डलुकल्पा कमण्डलूाल्पा । क्[ब्रुवा कछुवा । पहुचेली पर्चेली । श्वश्रुगोना श्वश्रूगोना । कुरुमता कुरूमता । मीरहता मीरुहता । एफार्थ इत्येव-मीर्वा हता मीरूइता ॥ पटुतमरूपः पटुतररूपः । पकार ३६पापा:-दर्शनीयरूपा ॥ १२८ ॥ - . ५ - तात्तमवादेश्वाऽनत्यन्ते" (७।३।५६) इति कप् भवत्येव । छिन्नकतमकं भिन्नकतमकम् । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । किञ्चिदूनार्थाः ४६३ अतमबादेरीषदसमाप्ते कल्पप् देश्यप् देशीयर् ॥ १२९॥ [सि०७३।११] तमवाद्यन्तवर्जात्याद्यन्तानाम्नश्च किञ्चिदूनेऽमी त्रयः स्युः । पचतिकल्पं पचतिदेश्यं पचति- देशीयम् । पटुकल्पा पटुदेश्या पटुदेशीया ॥"नाम्नः प्राग्बहुर्वा" (७३।१२)। किश्चिदूने । वहुपद्धः, पटुकल्पः । *कुत्सिताल्पाज्ञातादिपु यथार्ह कवादयो वाच्याः । अश्वकः। अनुकम्पायां पुत्रक एहकि ॥ "एकादाकिन् चाऽसहाये” (७।३।२७) एकाकी एककः ॥ १२९ ।। अत० । किञ्चिदूने इति-पदार्थानां सम्पूर्णता समाप्तिः, सा किञ्चिदूना ईपदसमाप्तिस्तद्विशिष्टेऽर्थे वर्तमानात्त्याद्यन्तानाम्नश्चामी त्रयः प्रत्ययाः स्युः । पचतिकल्पमित्यादि-एवं पचतः कल्पं ३ । पचन्ति- कल्पं ३ । पक्ष्यतिकल्पं ३ । अपाक्षीत्कल्पं ३ । पूर्ववन्नपुंसकत्वैकत्वे । इदमेव त्यादिग्रहणं ज्ञापकम् , शेपस्तद्धितो नाम्न एव भवतीति । पटुकल्पेति-ईपदसमाप्ता पट्टी पटुकल्पा ३, प्रत्ययस्य पित्त्वात् पुंव- दावः । एवं कारककल्पः ३ । कृतकल्पं भुक्तदेश्यं पीतदेशीयम् । ईपदसमाप्तो गुडो गुडकल्पा द्राक्षा १० ३ । चन्द्रकल्पं मुखम् , तैलकल्पा प्रसन्ना । गुडादिधर्माणां माधुर्यादीनां द्राक्षादिप्वीदसमाप्तत्वेनेपदस- माप्ता द्राक्षादय एवमुच्यन्ते । कल्पवाद्यन्तमुपमेये वर्तमानमुपमेयलिङ्गसवयम् । बहुप्रत्ययपूर्व तु प्रकृतिलिङ्गसङ्ख्यम् । स्वभावात् शब्दशक्तिरेपा यदुत स्वार्थिकाः केचित्प्रकृतिलिङ्गान्यतिवर्तन्ते, यथा कुटीरः शुण्डारः शमीरुः शमीरः दैवतं औपयिक औषधं वाचिकमिति । केचित्तु नातिवर्त्तन्ते-यावकः मणिकः बृहतिका मृत्तिका कासूतरी गोणीतरी व्यावक्रोशी व्यावहासीति । अतमवादेरिति किम् ? यदा १५ प्रकादिविशिष्टस्येपदसमाप्तिविवक्षा भवति, तदा तमवादिभ्यः कल्पवादयः प्राप्नुवन्यतस्ते मा भूवन् । यदा त्वीपसमाप्तस्य प्रकर्षादयो विवक्ष्यन्ते, तदा कल्पवाद्यन्तेभ्यस्तमवादयो भवन्त्येव । पटुकल्प- तमः ३ । पकारौ पुंवद्भावार्थों । दर्शनीयकल्पा । केचिद्देश्यं पितं नेच्छन्ति, तन्मते दर्शनीया देश्येयेव भवति । देशीयरिति रेफो "रिति” ( ३।२।५८) इत्यत्र विशेषणार्थः-पञ्चमदेशीया ॥ "नाम्न" किञ्चिदूने इति-ईपदसमाप्तेऽर्थे वर्तमानान्नानो वहुप्रत्ययः स्यात् , स च प्राक् पुरस्तादेव न परस्तात् । २० वहुपटुरिति-एवं बहुभुक्तम्, वहुपीतम् , बहुगुडा द्राक्षा, बहुतैलं प्रसन्ना, बहुपयो यवागूः, वहुचन्द्रो मुखम् , नामग्रहणं त्याद्यन्तनिवृत्त्यर्थम् , त्याद्यन्तेषु सावकाशाः कल्पवादयो बहुना मा वाधिपतेति वा- वचनम् , तेन पक्षे तेऽपि भवन्ति । अत्र विशेपश्चायम्-"न तमवादिः कपोऽच्छिन्नादिभ्यः" (७३।१३) । छिन्नादीन्वर्जयित्वान्यस्माद्यः कप्प्रत्ययस्तदन्तात्तमवादिन स्यात् । एपामनयोर्वायं प्रकृष्टः पटुक इत्येव । प्रकर्षादिमतः कुत्सितत्वादिविवक्षायां तमवाद्यन्तेभ्यः कप भवत्येव-प्रकृष्टः पटुः २५ कुत्सितः पटुतमकः । (अयमनयोः) पटुतरकः । पटुकल्पकः । पटुदेश्यकः । पटुदेशीयकः । अच्छिन्नादिभ्य इति किम् ? कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वा च्छिन्नछिन्नकः । प्रकृष्टः च्छिन्नकः च्छिन्नकतमः । छिन्नकतरः छिन्नकरूपः । छिनककल्पः ३ । छिन्नादयः प्रयोगगम्याः ॥ "अनत्यन्ते” (७।३।१४) । अनत्यन्तेऽर्थे यः कप तदन्तात्मवादिन स्यात् । छिन्नाद्यर्थं वचनम् । अनत्यन्तं छिन्नं छिन्नकम् । भिन्नकम् । प्रकृष्टं छिन्न भिन्नकमित्येव । यदा तु प्रकर्षवतोऽनत्वन्तविशिष्टविवक्षा, तदा तमवाद्यन्ताम् ३० । अथ कवादिस्वार्थिकप्रत्ययप्रकरणं सट्टे पेण सङ्ग्रहाति-कुत्सितेत्यादि वानिकम् । अथात्र सूत्राणि- "माग्नित्यात्क" (NRC) नित्यशब्दसीर्तनात् प्राग येऽर्थानेषु घोत्येषु फपप्रत्ययोऽधितो शेयः । (कुत्सितोऽल्पोऽक्षातो वा अश्वा अवकः । गर्दकः) । पकारः पुंवलावार्थः । कुल्सिना दादा- रदिका । प्राग नित्यादित्यवध्यर्थम्, अन्ययापवादयापितो नोत्तरानुवर्तत । परतोऽपि मानुयते ॥ ३५ १६२ महामहोपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- प्राशस्त्यं तेनानापि स्यात्-वृपलरूपोऽयमपि पलाण्डुना सुरा पिवेत् । दस्युरूपोऽयमप्यण पटुतमरूपः। पटुतररूपः। पकारः पुंवद्भावार्थ:-दर्शनीयरूपा ॥ *तरबादिष्विति अत्र सूत्रा त्तरतमरूपकल्पब्रुवचेलगोत्रमतहते वा इखश्च (३।२।६३)। मदित् उदिच प स्तरादिपु प्रत्ययेपु, ब्रुवादिषु च रुयेकार्थेषु हस्खाऽन्तः पुवञ्च वा स्यात् । पचन्तितरा पचत्तर ५पचन्तितमा पचत्तमा पचन्तीतमा । श्रेयसितमा श्रेयस्तमा श्रेयसीतमा । विदुपितमा वि' तमा ॥ रूप पचन्तिरूपा ३ । सर्वत्र हवपुवद्भावोभयाभावैरूप्यं ज्ञेयम्-श्रेयसिरूप रूपा ३ ॥ कल्प. पचन्तिकल्पा ३ । श्रेयसिकल्पा ३ । विदुपिकल्पा ३ । पचन्ती पचन्तिब्रुवा ३ । विदुपिछवा ३ । चेलट् 'चेलत् वसने' चेलति गुणानिति लिहा ड्यर्थम् । पचन्ती चासौ चेली च पचन्तिचेली ३ । श्रेयसिचेली ३ । विदुपिचेली १० मीत्येव रूपा गां त्रायते इति गोना "आतो ड." (५।११७६) इति डः। पचन्ती पचन्तिगोगा ३ । श्रेयसिगोगा ३ । विदुपिगोना ३ । मत. मन्यतेः सत्यर्थे "ज्ञानेच्छा इत्यादिना क्तः, पचन्ती चासौ मता च पचन्तिमता ३ । श्रेयसिमता ३ । विदुर्षि विदुषीमता । हत. पचन्ती चासौ हता च पचन्तिहता ३ । श्रेयसिहता ३ । विदा मन्ये ऋदुदितो ज्ञेयाः-सुदतिसरा सुदत्तरा सुदतीतरेत्यादि । बुवादयः कुत्साशब्दाः ।। १५(३।१।१००) इति समासः । ऋदुदिदिति किम् ? कुमारितरा किशोरितमा । " हस्वः । एकार्थे इत्येव-पचन्त्या हता पचन्तीहता । तरवादिष्विति किम् ? पचन्ती, रिका ॥ "डयः" (३।२।६४)। डयन्तस्य परतः स्त्रीलिङ्गस्य तरादिषु चतुर्पु प्रत्य, सूत्तरपदेष्वेकार्थेषु हवः स्यात् । गौरितरा गौरितमा । नर्तकिरूपा । कुमारिकल्पा, गार्गिचेली । ब्राह्मणिगोना । गार्गिगोत्रा । गार्गिमता । गौरिहता । दर्शनीयतरा, २० पुंवद्भावः सावकाशः, नर्तकिरूपेत्यादौ तु कोपान्त्यत्वात्पुवद्भावप्रतिषेधादय वि तूभयप्राप्ती "पद्धे” (७१४|११९) पर इति परत्वादयमेव विधिर्यथाप्राप्तं पुंवर इति किम् ? मद्रिकातरा । परतः खिया इत्येव-बदरीतरा आमलकीतरा (३।२।६६) इत्युत्तर वचनादनेकस्वरस्यैवायं विधिः ॥ भोगवद्गौरिमतो , सज्ञाया वर्तमानयोरनयो प्रत्ययस्य तरादिपु, ब्रुवादिषु च हस्यः स्यात् । में २५ तिब्रुवा । नानीति किम् ? भोगावतितरा ३-प्राग्वत्रैरूप्यम् ॥ "नवैकखराप पहुवचनात्परतः स्त्रीति निवृत्तम् । सामान्येन तु विधानम् । रुयेकार्थे ड्यन्तस्य तरादिषु, ब्रुवादिपु चोत्तरपदेपु क्येकार्थेषु हलो वा स्यात् । स्त्रित झी, शितमा ज्ञीतमा । अस्यापत्यं स्त्री ई, इरूपा ईरूपा । कस्य भार्या ज्ञीब्रुवा । इचेली ईचेली । किगोगा कीगोना । त्रिमता स्त्रीमता । बिह ३० किम् ? फुटीतमा । इय इत्येव-श्रीतरा भीतमा । एकार्थ इत्येव स्त्रिया । स्वराणामपीच्छन्येके, तन्मते आमलकितरा घरितरा कुलिरूपा लक्ष्मि "ऊड:" (३।२।६७)। ऊडन्तस्य तरादिपु, ब्रुवादिपु चोत्तरपदेपु रु पन्धुतरा ब्रह्मरन्धूतरा । वामोरतरा वामोरूतरा । मद्रबाहुरूपा * कमण्डलूरल्पा । क्युवा कवुया । पहुचेली पशूचेली । श्वश्रुगोत्रा मीरुहता भीरुहता । एफार्थ इत्येव-मीर्वा हता मीरुहता ॥ ३६ पुंषावार्थ:-दर्शनीयरूपा ॥ १२८ ॥ - । ।

४६४ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- "कुत्सिताल्पाज्ञाते" (७।३।३३) । कुत्सितं निन्दितम् , अल्पं महलतियोगि, अज्ञातं प्रकृत्यु- पात्तधर्मव्यतिरेकेण केनचित्स्वत्वादिना धर्मेणानिश्चितम् , सर्वथा त्वज्ञाते प्रयोगायोगात् । अश्वक इति- कुत्सितोऽल्पोऽज्ञातो वाऽश्वोऽश्वकः । कुत्सादीनां भेदोपपत्तेः कुत्सादिभ्योऽपि कुत्सितादौ प्रत्ययः स्यात्- कुत्सितकः अल्पकः अज्ञातकः प्रकृष्टतर इत्यादौ प्रकर्पभेदे तरवादिवत् ॥ अनुकम्पायामिति, अत्र ५सूत्रम्-"अनुकम्पातयुक्तनीयोः" (७।३।३४) । अनुकम्पा कारुण्येन परस्यानुग्रहः । तया युक्ता नीतिः सामादिप्रयोगस्तत्रानुकम्पायां सामदामे एव, न भेददण्डौ; तयोरनुकम्पाया अयोगात् । अनुक- म्पायां तयुक्तायां नीतौ च गम्यायां यथायोगं कवादयः स्युः । अनुकम्पा तन्नीतिश्च प्रयोक्तृधर्मों शेयौ । पुत्रकः, वालकः, वत्सकः, बुभुक्षितकः, ज्वरितकः, शनकैः, तूष्णीकाम् , स्वपितकि, स्वपिपकि, जल्प- सकि, एहकि । अनुकम्पमान एवं प्रयुके पुत्रक एहकि उत्सङ्गे उपविश, कर्दमकेनासि दिग्धकः, कण्ट- १० कस्ते लग्नकः, वत्सक तूष्णीकां तिष्ठ, ओदनं भोज्यसे हन्त, ते गुडकाः हन्त, ते धानकाः अद्धकि, अन उपविश असि तिष्ठ ओदनं भोक्ष्यसे हन्त ते इत्येतेष्वनभिधानान्न भवति । यत्र त्वनभिधानं तत्र भवति । नक त्वकं पुत्रकं पश्यसकि । असको काकको वृक्षके उच्चकैः प्रणिलीयते । अनुकम्पायां प्रत्या- सत्तेरनुकम्प्यमानादेव स्यात्, नान्यस्मादुत्सद्भादेस्ततोऽपि यथा स्यादिति तयुक्तनीतिग्रहणम् ॥ आदिश- दात् “अजातेनाम्नो बहुवरादियेकेलं वा” (७३६३५) । तद्युक्तनीताविति न वर्तते । १५अनुकम्प्यादेव प्रत्ययविधानात् । बहुस्वरान्मनुष्यनानोऽनुकम्पायां गम्यायां इय-इक-इल इत्येते प्रत्ययाः स्युः । अजाते:-न चेन्मनुष्यनाम जातिशब्दो भवति । अनुकम्पितो देवदत्तो देवियः देविकः देविलः । पावचनात् कपि. देवदत्तकः । अजातेरिति किम् ? महिषकः वराहकः शरभकः सूकरकः, गर्दभकः, एते जातिशब्दा मनुष्यनामानि च । अजातेरिति प्रायिको निपेध इत्यन्ये । व्यानिलः सिंहिलः इति हि दृश्यते । तन्मते बहुवरादित्यपि प्रायिकम् ॥ "वोपादेरडाको च” (७।३।३६)। उपपूर्वादजातिरू- २० पान्मनुष्यनाम्नो बहुखरादनुकम्पायामड-अक, चकारात्मागुक्तात्रयश्चेति पश्च स्युः । अनुकम्पित उप- :: न्द्रदत्त उपडः उपकः उपियः उपिकः उपिलः । वावचनात् पक्षे कवपि-उपेन्द्रदत्तकः ।। "वों- वर्णात् स्वरादेरादेलक प्रकृत्या च" (७।३।३७)। ऋवर्णान्तादुवर्णान्ताच परस्यानुकम्पायां विहि- तस्य स्वरादेः प्रत्ययस्यादेर्लक् स्यात् , तच ऋवर्णोवर्णान्तं लुकि प्रकृत्या तिष्ठति, न विकारमापद्यते । अनुकम्पितो मातृदत्तः मातृयः मातृका मातृलः । एवं पितृयः पितृलः पितृकः । अनुकम्पितो वायु- २५ दत्तः वायुयः वायुकः वायुलः । प्रकृतिभावाद्रेफाऽवादेशौ ['ऋतो रस्तद्धिते' (१।२।२६)]इति, अपदान्ते वर्तमानस्य "अस्वयम्भुवो" (७४।७० ) इति च न स्याताम् ॥ "लुक्युत्तरपदस्य कप्न" (४।३।३८)। ननाम्नो यदुत्तरं पदं तस्य "ते लुग्या" (३।२।१०८) इति लुकि सति ततः कम्प्रत्ययः स्यात् । अनुकम्पायां गम्यायाम् । कवादीनामपवादः-देवदत्तो देवः-अत्र ते लुग्वेत्युत्तरपदलोपः । अनुकम्पितो देखो देवकः । पकारः पुंवद्भावार्थः । नकार "इचापुंसोऽनिक्याप्परे" (२।४।१०७) इत्पन्न ३० पर्युदासार्थः-अनुकम्पिता देवी देवका-अत्र कप्नि सति पित्त्वात्पुंवद्भावे नित्त्वादाप्परेऽपि ककारे इत्वं न भवति । उत्तरपदस्पेति किम् ? देवदत्ता दत्ता-अत्र " लुग्वेति” पूर्वपदस्य लुक् । अनुकम्पिता दत्ता दत्तिका-पूर्वेण फप् ॥ लुक चाऽजिनान्तात्" (७३॥३९) । अजिनशब्दान्तानानोऽनुकम्पायां फम्, तत्सपियोगे उत्तरपदस्य व लुक् स्यात् । अनुकम्पितो व्याघ्राजिनो व्याप्रमहाजिनो या नाम मनुष्यो व्यामका । एवं सिंहका शरभकः । अनुकम्पिता व्यामाजिना व्याघ्रमहाजिना या व्याघ्रका, "आवो नेन्द्रपरुणस्य" (७४।२९) इति ज्ञापकादकृतसन्धेरैवोत्तरपदस्य लुक् ॥"पड्वजैकखरपूर्व- ३६पदस्य खरे” (७३४० ) पशब्दवर्जमेकखरं पूर्वपदं यस तत्सम्बन्धिन उत्तरपदस्यानुकम्पायां .. प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । अनुकम्पाद्यर्थाः ४६५ विहिते स्वरादौ प्रत्यये लुक् स्यात् , उत्तरसूत्रस्यापवादः । अनुकम्पितो वागाशीर्वाग्दत्तो वागाशीर्दत्तो वा वाचियः, वाचिकः वाचिलः । पड्व कस्वरपूर्वपदस्येति किम् ? अनुकम्पित उपेन्द्रदत्त उपडः०, उत्तरेण लुक् । षड्वर्जेति किम् ? अनुकम्पितः पडङ्गुलिः पडियः पडिकः पडिल:-अनोत्तरेण द्विती- यस्वरादूर्ध्व लोपः । तथा च "अवर्णवर्णस्य” (७।४।६८) इत्यल्लुचः स्थानिवद्भावात्पदत्वस्यानिवृत्ते- स्तृतीयत्वं न निवर्त्तते । पड्वर्जनादेव च पदत्वे सन्धिविधावप्यल्लुकः स्थानित्वनिषेधो न भवति ।५ स्वर इति किम् ? वागाशीकः ॥ "द्वितीयात्स्वरादूर्द्धम्” (७३।४१) । अनुकम्पायां विहिते खरादौ प्रत्यये परतः प्रकृतेर्द्धितीयात् स्वरादूद्धं शब्दस्वरूपस्य लुक् स्यात् । अनुकम्पितो देवदत्तो देविकः देवियः देविलः । एवं उपडः ५ । पितृयः ३ । वायुयः ३ । अर्द्धग्रहणं सर्वलोपार्थम् ।। "सन्ध्य- क्षरात्तेन” (७।३।४२)। अनुकम्पायां विहिते स्वरादौ प्रत्यये परतः प्रकृतेर्द्वितीयात्सन्ध्यक्षररूपात्स्व. रादूर्दू शब्दस्य तेन द्वितीयेन सन्ध्यक्षरेण सह लुक् स्यात् । अनुकम्पितः कुवेरदत्तः कुवियः कुविकः १० कुविलः । अनुकम्पितः कहोडः कहियः कहिकः कहिलः । एवं लहोडः लहियः ३ । कपोतरोमा कपियः ३ । अमोघः अमोघदत्तः अमोघजिता वा अमियः ३ । सन्ध्यक्षरादिति किम् ? अनुकम्पितो गुरुदत्तः गुरुयः गुरुकः गुरुलः ॥ शेवलाद्यादेस्तृतीयात्” (७।३।४३)। शेवलादिपूर्वपदस्य नृनान्नोऽनुकम्पाविहिते स्वरादौ प्रत्यये परे तृतीयात्स्वरादूद्ध लुक् स्यात् । अनुकम्पितः शेवलदत्तः शेवलियः शेवलिकः शेवलिलः । एवं सुपरिदत्तः सुपरियः ३ । विशालदत्तो विशालियः ३ । वरुण-१५ दत्तो वरुणियः ३ । अर्यमदत्तः अर्यमियः ३ । अत्राप्यकृतसन्धेरेव लोपः-शेवलेन्द्रदत्तोऽनुकम्पितः शेवलिक इति यथा स्यात् , शेवयिक इति मा भूत् ॥ केचित्तु विशाखिल कुमारिल इत्यत्रापीच्छन्ति । "कचित्तुर्यात्' (७।३।४४ ) यथालक्ष्यम्, अनुकम्पितो बृहस्पतिदत्तः बृहस्पतिशर्मा वा वृहस्प- तियः ३ । एवं प्रजापतियः ३ । अकृतसन्वेरेव लुगिति प्रजापत्याशीर्दत्तोऽनुकम्पितः प्रजापतिक इत्येव स्यान्न तु प्रजापत्यिक इति । कचिद्रहणादिह न स्यात्-अनुकम्पित उपेन्द्रदत्तः उपडः उपकः २०. उपियः ॥ “पूर्वपदस्य वा” (७।३।४५) अनुकम्पाविहिते स्वरादी प्रत्यये पूर्वपदस्य लुग्वा स्यात् । अनुकम्पितो देवदत्तः दत्तियः ३ । वावचनाद्यथाप्राप्तं देवियः ३ । “द्वितीयात्स्वरादूर्द्धम्” (७।३१४१) इति लुक् ।। "हस्खे” (७।३।४६) 'दीर्घप्रतियोगि ह्रस्वम्, हस्खेऽर्थे वर्तमानाच्छब्दरूपाद्यथायोगं कवा- दयः स्युः । हवः पटः पटकः । ह्रस्वं पचति पचतिकः । ह्रस्वकालयोगाक्रिया हस्खेत्युच्यते । हखाः सर्वे सर्वके । विश्वके, उच्चकैः, नीचकैः, तूष्णीकाम् । संज्ञायामपि ह्रखत्वयोगात् कप् , स हव इत्ये-२५ सिद्धः : । वंशकः, वेणुकः, नरकः, ललका, वरकः ॥ "कुटीशुण्डाद्रः" (७३।४७ ) हस्खे । कपोऽपवादः । हस्खा कुटी कुटीरः, शुण्डारः । केचित्तु कुटीस्थाने कुदीं पठन्ति कुदीरः ॥ "शम्या रुरौ” (७३।४८) तथा । ह्रस्वा शमी शमीरुः शमीरः ॥ "कुत्वा हुपः” (७३।४९) फुतूझ- ब्दाद्भस्खे डुपः स्यात् । हस्वा कुतूः कुतुपः । कुतूश्चर्ममयं स्नेहपात्रं "कुतुपत्तु तदल्पकम्” इति कोपः ॥ "कासूगोणीभ्यां तर" (७३।५० ) उत्तार्थ स्यात् । हत्वा फालः कास्तरी, गोणीनरी ।३० पुंल्लिङ्गमपि दृश्यते-कासूतरः गोणीतरः । कासूः शक्तिर्नामायुधम् । गोणी धान्यावपनम् ॥ "वत्सो- क्षाश्वर्पभाद् हासे पित्” (७३।५१) शब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य त्वार्थस्य हासे गन्ये एभ्यश्चतुर्य- स्तरट् स्यात् , स च पित् । हसितो वत्सो वत्सतरः । वत्सः प्रथमवयस्को गोलन्स हासो द्वितीय- वयःप्राप्तिः । हसित उमा उक्षतरः, उक्षा द्वितीयवयास्तरणतस्य हासस्तृतीयपयःप्राप्तिः । सितो-३४ १ लोहादिकं हसं च महय मन्भपतीति महाप्रति योगीति 'मरे' इति न मिष्यति । २ हि संकायां फायर बिपी तेऽपि हवलोपाधिकायां संसायानिति व्याख्यानयन्तीवि संज्ञायामप्पनेनेच कर निद इत्यर्थः । है. प्रा. पूर्वा० ५९ " - - ४६६ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहेमलघु- वोऽश्वतरः, अश्वेनाश्वायां जातोऽश्वस्तस्य हासो गर्दभपितृकता । आशुगमनाद्वाश्वस्तस्य हासो गमने मन्दता । सर्वथाऽश्वतरशब्दो जातिशब्दः । हसित झपभ ऋषभतरः, ऋषभोऽनवान वलीयान तस्य हासो भारवहने मन्दशक्तिता । प्रत्यासत्तेः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तस्य हासे भवति, इह मा भूत्-कशो वत्सो वत्सतर इति । पित्करणं पुंवद्भावार्थम् , ह्रसिता घत्सा वत्सतरी ॥ "यावादिभ्यः का" ५(७३।१५)। स्वार्थे । याव एव यावकः । याव मणि अवि अस्थि लान पात्र पीत स्तब्ध ज्ञात अज्ञात १० पुण्य नित्य सत्वत् दशाई वयस् चन्द्र जानु भूत भिक्षु ॥ १९ ॥ इति यावादय एकोनविंशति बहुवचनादाकृतिगणः, तेनाभिन्नतरकं वहुतरकमित्यादि सिद्धम् ॥ "कुमारीकीडनेयसो.' (७।३।१६)। कुमारीणां यानि क्रीडनानि तद्वाचिभ्य ईयसुप्रत्ययान्तेभ्यश्च स्वार्थे कः स्यात् । कन्दुरेव कन्दुकः, उत्कण्टकः । श्रेयानेच श्रेयस्कः ज्यायस्कः ॥ "लोहितान्मणो” (७३।१७) । कः । १० लोहित एव लोहितको मणिः । लिगविशिष्टस्यापि ग्रहणात् लोहिन्येव लोहिनिका मणिः । लोहितैष लोहितिका मणिः । मणेविशेषणमेतदियेके । नामधेयमित्यन्ये । वाधिकारान्न भवत्यपि-लोहितो मणिः । मणाविति किम् ? लोहिता गौः ।। "रक्तानित्यवर्णयोः" (७।३।१८) । लाक्षादिना रक्ते अनित्ये च वर्णे वर्तमानालोहितशब्दात्कः स्यात् । रक्ते-लोहित एव लोहितकः पटः । लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणात् लोहिनिका लोहितिका शाटी ॥ अनित्यवणे. लोहितकमक्षि कोपेन, लोहिनिका २ कन्या कोपेन । वाधि- १५ कारान भवत्यपि लोहिता लोहिनी वा कन्या कोपेन । नित्योऽपि रक्तो वर्णोऽस्ति यथा कृमिरागादिरक्त पट इति रक्तग्रहणम् । अनित्यग्रहणं किम् ? लोहितः, इन्द्रगोपकः । सत्येवाश्रयद्रव्ये योऽपयाति स इहानित्य उच्यते; अन्यथा रक्तग्रहणस्याऽनर्थक्यात् । वर्णग्रहणं द्रव्यनिवृत्त्यर्थम् । असति वर्णग्रहणे स्त्रीणामात्तवे द्रव्ये स्यात् । तद्धि सत्सेवाश्रये स्त्रियों कदाचिन्न भवति [ लोहितशब्दवाच्यं च ॥ "कालात्” (७।३।१९) । उक्तार्थयोः कः । कजलादिना रक्तः काल एव कालकः पटः । अनित्य- २० वर्णे. कालकं मुखं वैलक्ष्येण । वाधिकारान्न भवत्यपि-कालः पटः, कालं मुखम् ॥ "शीतोष्णा- हती” (७३।२०)। कः । शीत एव शीतकः; उष्णक ऋतुः । ऋताविति किम् ? शीतो धायुः ।। "लूनवियातात्पशौ” (७३।२१) । कः । लून एव लूनको वियातको धृष्टः पशुः । पशाविति किम् ? लूनो यकः, वियातो पटुः । विहानशब्दादपीच्छन्त्येके-विहानकः पशुः, विहान एवान्यत्र ॥ "लाताद्वेदसमाप्ती". (७३।२२) । कः । वेदं समाप्य स्नातः स्नातको द्विजः, अन्यत्र तीर्थे २५ स्नातः ॥ "तनुपुत्राणुवृहतीशुन्यात् सूत्रकृत्रिमनिपुणाच्छादनरिक्ते" (७१३।२३)। एभ्यः पञ्चभ्य एषु पञ्चवर्थेषु वर्तमानेभ्यः स्वार्थे कः स्यात् । तनुकं सूत्रम्, भङ्गादिमयं कल्पादि च । कृत्रिमः पुत्रः पुत्रकः काष्ठादिमयः । निपुणो निष्णातोऽणुः अणुकः । बृहतिका आच्छादनविशेषः, प्रत्ययमन्तरेणार्थानवगमानित्य एवायं विधिः । धनप्रज्ञादिना शून्य एव शून्यको रिक्तश्चेत्, अन्यत्र शुने हितं शुन्यम् । अन्ये तु सूत्रादयोऽर्थाः प्रत्ययं विना न प्रतीयन्ते इति तद्विपये तन्वादिभ्यो नित्य ३०एच प्रत्ययविधिरिति मन्यन्ते । एवं पूर्वसूत्रेऽपि || "भागेऽष्टमाजः (७३।२४) । अष्टम एव आष्टमो भागः, अन्यत्र अष्टम एव ॥ "पष्ठात्” (७३।२५) तथा । पष्ठ एव पाठो भागः । अन्यत्र पष्ठ एव ॥ "माने कश्च" (७३।२६)। मीयते येन तन्मानम्, तस्मिन् माने भागे वर्तमानात् पठशब्दात्कन्चकारात् बश्च प्रत्ययः स्यात्, या । पष्ठ एव पष्ठकः पाटो भागः, मानं चेत् । मान ३४ इति किम् ? पाठो भागोऽन्यः ॥ "एका" (७।३।२७) । असहायार्थवाचिन एकशब्दादाकिन्, - . १ इन्द्रगोपकामाचे लोहितलनिवृत्तावपि नानियतमपि । २ आच्छादनरूपस्यार्थस्यानवगमात् ।

? १० प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहेमप्रकाशे तद्धिताः । असहायार्थाद्याः ४६७ चकारात् कश्च स्यात् । एक एव एकाकी एककः । असहाय इति किम् ? एके आचार्याः । एको हो बरः ॥ १२९ ।। त्यादिसर्वादेः स्वरेष्वन्त्यात्पूर्वोऽक् ॥ १३०॥ [सि० ७।३।२९ ] त्याद्यन्तात्सदेश्चान्त्यस्वरात्पूर्वोऽक् स्यात् , कुत्सितादिपु । पचतकि, सर्वके इति ॥ १३०॥ "त्यादि.” अन्त्यस्वरादिति, अयमर्थः-त्याद्यन्तस्य सर्वादीनां च स्वरेयु स्वराणां मध्ये योऽन्त्यः५ स्वरः तस्मात्पूर्वोऽक् स्यात् । “प्राग्नित्यात्कपो"(७३।३८)ऽपवादोऽचमक् । कुत्सितमल्पज्ञातं वा पचति पचतकि । एवं पचतकः पचन्तकि । कुत्सिताल्पाज्ञाताः सर्वे सर्वके, एवं विश्वके । सर्वकस्मै । यकत्पिता । तकत्पिता । त्वकात्पिता । मकत्पिता ॥ परमसर्वके. तदन्तस्यापि सर्वादित्वात् ।। स्वरेष्व- न्यादिति क्रिम् ? त्याद्यन्तात्सादेव पूर्व मा भून् । पूर्व इति किम् ? परो मा भून् ॥ १३० ॥ युष्मदस्मदोऽसोभादिस्यादेः ॥ १३१ ॥ [सि० ७।३।३०] सकारादि-ओकारादि-भकारादिवर्जितस्यायन्तयोर्युष्मदसदोरन्त्यस्वरादेः पूर्वोऽक् स्यात् । त्वयका मयका । सकारादिवर्जनात्-युष्मकासु असकासु, युवकयोः आवकयोः, युवकाभ्याम् आपकाभ्याम् ॥ १३१ ॥ "युष्म०" सकारादीत्यादि, युष्मदस्मदोः स्वरेष्वन्यात्पूर्वस्यापवादः । त्वयका मयकेति-एवं त्वयकि मयकि, युष्माककं अस्साककम् , परमत्वयका परममयका । युष्मदस्मद इति किम् ? तकया, १५ यकया, सर्वकेण, इमकेन, भवकन्तों, भवकन्तः । केचिद्भवच्छब्दस्यापि स्याद्यन्तस्लान्यवरात् पूर्वम- कमिच्छन्ति; तन्मते भवतका भवतके भवतकीयपि भवति । सकारादिवर्जनादिति, सकारादि-ओका- रादि-भकारादि-स्याद्यन्तयोस्तु युष्मदस्मदोरेवान्यवरात्पूर्वोऽक् स्यादित्यर्थः । युप्मकास्त्रिति-एवमस्स- कासु, युवकयोः आवकयोः, युवकाभ्यामावकाभ्याम् , युष्मकाभिः अस्मकाभिः ॥ १३१ ।। अव्ययस्य कोद् च ॥ १३२ ॥ [सि० ७।३।३१ ] अस्यान्त्यस्वरात्पूर्वोऽक् , तद्योगे कोद् च । कुत्सिताधुचैरुचकैः । धिक् धकिद् । “वैकाद्- द्वयोर्निर्धार्य डतरः” (७३।५२)। एकतर एकको वा भवतोः कठः पटुः ।। १३२ ।। "अव्य.” अस्येति-प्राङ्नित्याद्येऽर्थास्तेषु द्योयेष्वव्ययस्यान्यवरात्पूर्वमक् स्वात्तत्सन्नियोगे यत्कका- रान्तमव्ययं तस्य दकारोऽन्तादेशो भवति । कपोऽपवादः । कुत्सितादीति, कुत्सितमल्पमज्ञातं वोच्चैः उच्चकैः । एवं नीचैस् नीचकैः । धिक् धकिदिति । एवं हिरुक् हिरकुद् । पृथक् पृथकद् । चकारोऽन्वा-२५ चये, तेन सर्वस्याव्ययस्याक् भवति । ककारान्तस्य त्वक् दोऽन्तादेशश्च । योगविभागस्त्यादेदेशाभा- वार्थः । 'शकुंट शक्तौ' यङ्लुप् दिव् , अशाशक्; अकि अशाशकक् ॥ आदिशब्दात् “तृष्णी- काम्” (७३।३२) । तूप्णीमोऽव्ययस्य मकारात्पूर्व का इत्यागमो निपात्यते प्राङ् नित्यान् । अकोऽप- वादः । कुत्सितमल्पमज्ञातं वा तूष्णीं तूष्णीकामास्ते । "वैका०" । समुदायादेकदेशो जातिगुणक्रिया- संज्ञाद्रव्यनिष्कृष्य बुद्ध्या पृथक्रियमाणो निर्झर्यः । द्वयोर्मध्ये निर्येऽर्थे वर्तमानादेकशब्दान् इतरो३० वा स्यात् । कठः पटुरिति-एवं गन्ता देवदत्तो दण्डीति क्रमेण जातिगुणक्रियासंज्ञाद्रव्यर्बुड्या पृथक्क्रि- यमाणोदाहरणानि । वावचनमगर्थम् , तथा च उदाहतम् ; एकक इति–महावाधिकारान्न भवत्यपि । एको भवतोः कठः पटुरिति । द्वयोरिति क्रिम् ? एकोऽस्मिन् ग्रामे प्रधानम् । निर्झर्य इति किम् ? एकोऽनयोामयोः स्वामी ॥ १३२ ।। २० - - ५ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- यत्तत्किमन्यात् ॥ १३३ ॥ [सि० ७।३।५३ ] एभ्यो द्वयोरेकस्मिनिर्धार्ये इतरः स्यात् । यतरो भवतोः कठादिस्ततर आगच्छेत् ॥ १३३ ।। "यत्त." महावाधिकारात्प्रत्ययो न भवत्यपि-यो भवतोः पटुः स आगच्छतु । द्वयोरित्येव-योऽस्मि- न्मामे प्रधानं स आगच्छतु । निर्धाय इत्येव-योऽनयोामयोः स्वामी स आगच्छतु ।। १३३ ।। बहूनां प्रश्ने डतमश्च वा ॥ १३४ ॥ [ सि० ७३५४ ] यदादिभ्यो बहूनां मध्ये निर्धार्यार्थेभ्यः प्रश्ने उतमो डतरश्च वा स्यात् । यतमो यतरो घा भवतां कठादिस्ततमस्ततरो वा यातु । एवं कतमः कतरः । अन्यतमः अन्यतरः । पक्षे यको यो वेत्यादि ॥ "वैकात्” (७३।५५) । तमप्तथा-एकतमः एककः एको वा भवतां कठादिः । "प्रायोऽतोयसट्मानद" (७।२।१५५)। स्वार्थे-यावदेव यावद्वयसम् । यावन्मात्रम् ॥१३४॥ "बहू०" । कतम इति, प्रमाणान्तरात्प्रतिपत्तौ बहूनामप्रयोगेऽपि भवति-यथा बहुष्यासीनेपु कश्चि- कश्चित् पूच्छति कतमो देवदत्तः ? अन्यतम इति । "शुचिवल्कवीतवपुरन्यतमस्तिमिरच्छिदामिव गिरी भवत ।" इति किरातार्जुनीये । वृद्धस्तु व्याधितो या राजा मातृबन्धुकुल्यगुणवत्सामन्तानामन्यत- मेन क्षेत्रे वीजमुत्पादयेत् । वावचनमगर्थम्, तथैवाह-पक्षे यको यो वेत्यादि । अन्नादिशब्दात् यको भवतां कठादिः सक आगच्छतु । अन्यक एपां कालापः । किमस्तु साकः कादेश उक्तः । महावाधिका- १५ रात्प्रत्ययो न भवत्यपि-यो भवतां कठादिः स आगच्छतु । बहूनामिति किम् ? योऽस्मिन् प्रामे कठः स आगच्छतु । प्रश्न इति किम् ? क्षेपे मा भूत्-को भवतां कठादिः, कुत्सित इत्यर्थः । प्रभग्रहणं किमो विशेषणम् , नान्यस्य, असम्भवात् । अन्ये त्याहुः-यत्तत्किंभ्यो जातावेव इतमः, उतरस्तु बहूनां निर्धार्ये किम एव, न यत्तद्भयाम् , स च जातावेव, अन्यशब्दादपि बहुविषये डतम एव न तु डतरः, डतर- डतमौ च निर्झर्येऽन्यशब्दात् नित्यावेव नाक्, नापि केवलस्य प्रयोगः । एके त्वविशेषणेत्यनाभिधानम- २० नुसतव्यम् । “वैका." इतमस्तथेति-एकशब्दादहूनामेकस्मिन्निार्येऽर्थे वर्तमानात् डतमो वा स्यात्। एकतमो भवतां कठादिरिति, कठः पटुर्गन्ता देवदत्तो दण्डी । वावचनादक्-एककः । महावाधिका- रान्न भवत्यपि-एको भवतां कठः । पृथग्योगो डतरनिवृत्त्यर्थः ।। आदिशब्दससर्गात् "क्तात्तमया देवानत्यन्ते” (७३५६) । क्तान्तात्केवलात्तमबाद्यन्ताच्चानत्यन्तेऽर्थे वर्तमानात्कप् स्यात् । क्रियायाः खेनाश्रयेण साकल्येनानभिसंबन्धोऽनत्यन्तता । अनत्यन्तं भिन्न भिन्नकम् , छिन्नकम् , भिन्निका घटी, २५ छिनिका रज्जुः, तमबाद्यन्तात् क्तात्, अनत्यन्तं भिन्नतमं भिन्नतमकम् , एवं भिन्नतरकम्, कल्पकम् , तमवाद्यन्तेपु क्तान्तता नास्तीति तमबादिग्रहणम् । असमासस्तमबादेरित्यत्रापि तादि- त्यस्य सम्बन्धार्थस्तेनेह न भवति-अनत्यन्तं शुद्धं शुलतमम् ॥ "न सामिवचने" (१३३५७)। सामि अर्द्धः । सामिवचने उपपदे अनत्यन्तेऽर्थे वर्तमानात् कान्तात् केवलात्तमवाचन्ताच कपून स्यात् । सामि अनत्यन्तं भिन्नम् । एवं कृतं भुक्तं पीतं भिन्नतमं भिन्नतरम् । वचनग्रहणं पर्यायार्थम्, ३० अर्द्धमनत्यन्तं भिन्नम् , एवं नेमं शकलमित्यादि । अन्ये तु समास एवोदाहरन्ति-सामिकृतं अर्द्धकृत- मिति । ननु साम्यादिभिरेवानत्यन्तताया अभिहितत्वादुक्तार्थत्वेन कप न प्राप्नोतीति व्यर्थः प्रतिषेधः । उच्यते । साम्यादिभिः समुच्चयविषयक्रियाया एवानसन्तता प्रतीयते न स्वविपये, तबानत्यन्तविव- क्षायां कम प्राप्नोतीति प्रतिषेधवचनम् ॥ "नित्यं जमिनोऽण" (७१३१५८)। ममिन इत्येत्प्रत्यया. ३४न्तात् स्वार्थे नित्यमण् स्यात् । नित्यग्रहणान्महाविभाषा निवृत्ता । व्यानकोशी व्यावलेखी व्यावहासी भिन्न- प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । स्वार्थाः वर्तते । जिन्. सादौटिनं सांराविणम् । साम्मार्जिनम् । “विसारिणो मत्स्ये" (७।३।५९)। स्वार्थेऽण् । विसरतीति विसारी-ग्रहादित्वात् णिन् मत्स्यश्चेत् , वैसारिणः । मत्स्य इति किम् , विसारी देवदत्तः ॥ “पूगादमुख्यकाञ्यो द्रिः" (७।३।६०)। नानाजातीया अनियतवृत्तयोऽर्थकामप्र- धानाः सङ्घाः पूगास्तद्वाचिनः खार्थे व्यः स्यात् , स च द्रिसंज्ञः, न चेत्पूगवाचिनाम "सोऽस्य मुख्य" (७।१।१९०) इति विहितं कप्प्रत्ययान्तं भवति-लोहध्वजाः पूगाः । लौहध्वज्यः लौहध्वन्यौ लोह-५ ध्वजाः। शैव्यः शैव्यो शिवयः । वातक्यः वातक्यौ वातकाः। द्रित्वात् "वहुध्वस्त्रियाम्” (६।१।१२४) लुप् । अमुख्यकादिति किम् ? देवदत्तो मुख्योऽस्य देवदत्तकः पूगः॥"वातादस्त्रियाम्” (७।३।६१)। नानाजातीया अनियतवृत्तयः शरीरायासजीविनः सङ्घा वाताः । जातजीविनोऽस्त्रियां वर्तमानात् खार्थे व्यः स्यात् , स च द्रिः । कापोतपाक्यः कापोतपाक्यो कपोतपाकाः । अस्त्रियामिति किम् ? कपोतपाका व्रीहिमता स्त्री ॥ "शस्त्रजीविसङ्घायड़ वा” (७३।६२) । शस्त्रजीविनां यः सङ्घस्तद्वाचिनः १० खार्थे ज्यड् वा स्यात् , स च द्रिः । शवराः शस्त्रजीविसङ्घः, शावर्यः शाव? शवराः । पौलिन्यः पौलिन्द्यौ पुलिन्दाः । कुन्तेरपत्यं वहवो माणवकाः कुन्तयः, ते शस्त्रजीविसङ्घः, कौन्त्यः कौन्यौ कुन्तयः। पक्षे शवरः पुलिन्दः । शस्त्रजीविग्रहणं किम् ? मल्लाः सङ्घः । मल्लः मल्लौ मल्लाः । सङ्घादिति किम् ? सम्राट् । वागुरः वागुरौ वागुराः । नैते श्रेणिवद्धा इति न सङ्घः । टकारो ड्यर्थः-शावरी पौलिन्दी कौन्ती ॥ “वाहीकेष्वब्राह्मणराजन्येभ्यः” (७।३।६३)। वाहीकेपु यः शस्त्रजीविसङ्घो ब्राह्म-१५ णराजन्यवर्जितस्तद्वाचिनः स्वार्थे नित्यं ज्यट् स्यात् , स च द्रिः । कुण्डीविशाः शस्त्रजीविसङ्घः, कौण्डी- विश्यः कौण्डीविश्यौ कुण्डीविशाः । क्षौद्रक्यः क्षौद्रक्यौ क्षुद्रकाः । मालव्यः मालव्यो मालवाः । वाहीके- ध्विति किम् ? शवरः शवरौ, पुलिन्दः पुलिन्दौ । अब्राह्मणराजन्येभ्य इति किम् ? गौपालिः गौपाली; शालकायनः शालकायनौ, राजन्यः राजन्यौ, काम्बव्यः काम्बव्यौ । स्त्रियां राजन्या काम्बव्या । ब्यटि तु ङी: स्यात् । ब्राह्मणप्रतिपेधे ब्राह्मणविशेपप्रतिषेधः, नहि ब्राह्मणशब्दवाच्यो वाहीकेषु शस्त्रजीविस-२० छोऽस्ति । राजन्ये तु स्वरूपस्य विशेपस्य च प्रतिपेधः तदर्थमेव बहुवचनम् ॥ "वृकाट्टेण्य" (७।३१६४)। अस्माच्छखजीविसङ्घदयं स्यात् स्वार्थे, स च द्रिः । वार्केण्यः वार्केण्यौ वृकाः । टकारो ङयर्थः-वाणी स्त्री । शस्त्रजीविसङ्घादित्येव-कामक्रोधौ मनुष्याणां खादितारौ वृकाविव । वाहीकत्वे नित्यं अवाहीकत्वे तु विकल्पेन ब्यटि प्राप्ते वचनम् । एवमुत्तरसूत्रत्रयमपि ॥ “यौधेयादेर" (७।३।६५) । एभ्यः शस्त्रजीविसवाचिभ्योऽब् स्यात् , स च द्रिः । युधाया अपत्यं वहवः कुमारास्ते २५ शस्त्रजीविसङ्घः, यौधेयः यौधेयौ यौधेयाः । एवं शौभ्रेयः शौक्रेयः धार्तेयः ज्यावनेयः । अव्वचनं "सङ्घघोषाङ्कलक्षणेऽज्यभिब" (६।३।१७२) इत्यणर्थम् , तेन यौधेयस्य सङ्घादियॊधेय इति भवति । ननु यौधेयादयः सञ्चवचनाः कथं गोत्रं भवन्ति । उच्यते । भर्गाद्यन्तर्गणो यौधेयादिस्तत्र येऽपत्यप्रत्य- यान्तास्ते गोत्रं भवन्ति औपगवादिवत् । अपत्यं हि गोत्रमपत्यप्रत्ययान्ताच स्वार्थिकोऽप्यपत्यग्रहणेन गृह्यते । अत्र चेदमेवाब्वचनं लिङ्गम् ॥ "पोदेरण्” (७३।६६ ) । प्राग्वत् । पर्शोरपत्यं बहवो माणवकाः पर्शवः-द्विस्वरत्वादण लुप् , ते शस्त्रजीविसङ्घः; पार्शवः पार्शवी पर्शवः । राक्षसः राक्षसों रक्षांसि । स्त्रियां तु "दूरवणोऽप्राच्यभर्गादेः” ( ६।१।१२३) इति लुप् पशुः । अणो लुपि "उतो (२।४७३ ) इत्यूङ् । पशु रक्षस् असुर वहिक वयस् मरुत् सत्त्वन् सत्त्वन्तु, दशाई, पिशाच, अशनि, कार्षापण इति पादयो द्वादश ॥ १२ ॥ "दामन्यादेरीयः” (७३।६७) । प्राग्वत् । दमनस्यापत्यं वहवः कुमारास्ते शास्त्रजीविसङ्घः, दामनीयः दामनीयौ दामनयः । औलपीयः औलपीयौ औलपयः । दामनि औलपि औपलि वैजवापि औदकि आच्युतन्ति काकन्दि काकन्दकि ३६ प्राणिन०" + ४७० महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते खोपज्ञहैमलघु- फकुन्दि काकुन्दकि ॥ १० ॥ शत्रुन्तपि सार्वसेनि बिन्दु तुलभा मौञ्जायन औदमेघि औपविन्दि सावि- श्रीपुत्र (कौण्ठोपरथ कौण्डोपरथ ?) कौण्ठारथ ॥२०॥ दाण्डकि क्रौष्टकि जालमानि जारमाणि ब्रह्मगुप्त ब्राह्मगुप्त जानकि इति दामन्यादयः सप्तदश ॥ "श्रुमच्छमीवच्छिखावच्छालाव- दूर्णावद्विदभृदभिजितो गोत्रेऽणो य” (७।३।६८) । शस्त्रजीविसवादिति निवृत्तम् । एभ्यः सप्तभ्यो गोत्रेभ्यो गोने योऽण् , तदन्तेभ्यः स्वार्थे यञ् स्यात्, स च द्रिः । श्रुमतोऽपत्यमग् तदन्ता- घ- -श्रीमत्युः श्रीमत्यौ श्रीमताः । श्रीमच्छब्दादपि केचिदिच्छन्ति-श्रमत्यः त्रैमत्यौ त्रैमताः । शामीवत्यः २ शामीवताः । शैसावत्यः २ शैखावताः । शालावत्यः २ शालावताः । और्णावत्यः २ और्णावताः । वैदभृत्यः २ चैदभृताः । आभिजित्यः २ आभिजिताः । गोत्रग्रहणं किम् ? श्रुमत इदं श्रीमतम् । आभिजितो मुहूर्तः । अपत्यप्रत्ययान्तात्स्वार्थिकोऽपत्य एव वर्त्तते इति तदाश्रयः प्रत्ययो भवति । १० श्रीमत्यस्यापत्यं युवा श्रीमत्यायनः; अत्र "यमित्रः" (६।११५४ ) इत्यायनण् । श्रीमत्यस्यायं श्रीमतकः "गोत्राददण्ड०" (६।३।१६९) इत्यादिनाकम् । श्रीमतानां समूहः श्रीमतकम्-गोत्रोक्ष०" (६।२।१२) इत्यादिनाकञ् । श्रीमत्यस्य सङ्घादि श्रीमतम्-अत्र "सङ्घघोषाकलक्षणेऽभ्यभिः" (६।३३१७२) इत्यम् ।। "प्रायो०" (७२।१५५) । अतुप्रत्ययान्तात् स्वार्थे एतौ स्याताम् । यावन्मात्रमिति--एवं तावहयसम् , तावन्मात्रम्, एतावहयसम्, एतावन्मात्रम्, क्रियट्ठयसम्, कियन्मात्रम् । प्रायोग्रहणं १५प्रयोगानुसरणार्थम् ।। १३४ ॥ तीयाट्टीकण न विद्या चेत् ॥ १३५॥ [सि० ७।२।१५३] तीयान्तात् स्वार्थे टीकण् वा स्यात् । द्वैतीयीकं तार्तीयीकी । विद्या तु द्वितीया । “वर्णाऽ- व्ययात्स्वरूपे कारः" (७१२११५६)। ककारः ॥ "रादेफा" (७२।१५७) । रेफः ।। "नामरूपभागाद्धयः" (७।२।१५८) नामधेयम् ॥ "देवात्तल” (७।२।१६२) । देवता ॥ "भेपजादिभ्यष्ट्यण्" (७/२।१६४)। भैपज्यम् ।। "प्रज्ञादिभ्योऽण्” (७/२।१६५) प्राज्ञः वाणिजः ॥ “पाच इकण्" (७१२२१६८) । सन्दिष्टे । वाचिकम् । "उपायाद्रवश्व" (७१२।१७०) *उपायादिकम् , हस्पश्चास्य । औपयिकम् । “विनयादिभ्यः” (७।२।१६९) । इकण वा भवति । वैनयिकम् । इति तद्धितदिग्मात्रम् ॥ १३५ ॥ ॥ इति श्रीमहोपाध्यायनीकीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्यायधीविनयविजयगणिविरचितायां हैमलघुप्रक्रियाया प्रथमवृत्तिः समाप्ता॥ ॥ हेमलघुप्रक्रियाव्याकरणे पूर्वार्द्ध समाप्तम् ।। "तीया०" । द्वितीयमेव द्वैतीयीक कुलम् । तृतीयैव तार्तीयीकी शादी । एवं द्वतीयीकः पुमान् । तीयान्तस्य यदि विद्याभिधेया भवति तदायं न स्यान्, तथा चाह -विद्या तु स्पर्पः । णकारो वृद्ध्यर्थः । मुसतीयः पार्वतीय इत्यादी तीयस्थानर्थकत्वान्न स्यादिति ।। आदिशब्दात ३०"निष्फले तिलास्पिक्षपेजो" (७।३।१५४)। निष्फलस्तिलस्तिलपिक्षः तिलपेजः । "वर्णा" वर्णभ्योऽव्ययेभ्यश्च स्वरूपावृत्तिभ्यः स्वार्थे कारः प्रत्ययो भवति । अकारः इकारः ककारः खकारः। फवारादिप्पफार उभारणार्थ: । अन्यय. ॐकार: स्वाहाकारः स्वधाकारः वपट्कारः हन्तकारः नम- स्कारः धकारः इतिकारः हुद्वारः फुन्कारः पूत्कारः सीतारः सूतारः । ननु यथा हुवतिः शतिः २५ मुत्यून सीत्कृतमिति भवन्ति, तथा पारशब्देन घनन्तेन समासे ओशरादयो भविष्यन्ति । सत्यम् । २० २५ द्वितीयेति । टकारो । प्रक्रियावृत्तिरूपे श्रीहैमप्रकाशे तद्धिताः । स्वार्थाः किंतु ओङ्कारमुच्चारयति वपट्कारमभिधत्ते हुङ्कारं करोतीत्यादि न सिद्ध्यति । स्वरूप इति किम् ? | विष्णुः, इ. कामः, कः ब्रह्मा, खं आकाशम् , ब्रह्म; वपडिन्द्राय, स्वाहा अग्नये, स्वधा पितृभ्यः, इत्यर्थपरतायां न भवति । प्रायोऽनुवृत्तेरन्यत्रापि भवति–मन एव मनस्कारः, अहमेवाहङ्कारः । “रा." र-शब्दात स्वरूपे स्वार्थे एफः, प्रायो वचनाद्रकार इत्यपि ॥ आदिशब्दात् “मादिभ्यो यः" (७।२।१५९) । स्वार्थे । मर्त एव मर्त्यः । सूर एव सूर्यः । एवं क्षेभ्यः, यविष्यः, भाग्यम् अपराध्यम् ५ रव्यम् लव्यम् । मादयः प्रयोगगम्याः ॥ "नवादीनतननं च नू चास्य” ( ७।२।१६०)। नवशब्दात् स्वार्थे ईन-तन-नाः चकाराद्यश्च प्रत्यया वा स्युस्तत्सन्नियोगे च नवशब्दस्य नू इत्यादेशः स्यात् । नवमेव नवीनं नूतनं नूनं नव्यम् ॥ "प्रात्पुराणे लश्च” (७।२।१६१) । प्रशब्दात्पुराणेऽर्थे वर्तमानात् स्वार्थे नः स्यात् , चकारादीन-तन-नाश्च । प्रगतं कालेनेति प्रशब्देन पुराणमुच्यते । प्रणं प्रीणं प्रतनं प्रत्नम् ॥ "नाम०” नामन्-रूप-भाग इत्येतेभ्यः स्वार्थे धेयः स्यात्-नामैव नामधेयम्, रूपमेव १० रूपधेयम् , भाग एव भागधेयम् ॥ "देवात्तल्" (७।२।१६२) । स्वार्थे । देव एव देवता, लित्करणं त्यर्थम् ॥ "भेष०" भेषजमेव भैपज्यम् । अनन्त एव आनन्त्यम् । आवसथ एव आवसथ्यम् । इतिह एव ऐतिह्यम् , इतिहेति निपातसमुदाय उपदेशपारम्पर्ये वर्त्तते । चत्वार एव वर्णाश्चातुर्वर्ण्यम् , चातुरा- श्रम्यम् । चत्वारो वेदाश्चतस्रो विद्या वा चातुर्वेद्यम् , एवं त्रैवैद्यम् । अनुशतिकादित्वादुभयपदवृद्धिः- त्रैलोक्यं ऐकभाव्यं द्वैभाव्यं त्रैभाव्यं आन्यभाव्यं सार्ववैद्यं पाड्गुण्यं सार्वलोक्यम् । शीलमेव शैलीय-१५ माचार्यस्य । भैपज्यानन्त्यावसथ्यैतिह्यशब्दा यदि स्त्रियां स्युस्तदाजादिपु द्रष्टव्याः । भैपजादयः शिष्ट- प्रयोगगम्याः।। "प्रज्ञा०”। प्रज्ञ इत्यादिभ्यः स्वार्थेऽण् स्यात् । प्रजानातीति प्रज्ञः, प्रज्ञ एव प्राज्ञः । प्राज्ञी कन्या । प्रज्ञास्या अस्तीति णे प्राज्ञा कन्या । वणिगेव वाणिजः । प्रज्ञ वणिज उशिज् प्रत्यक्ष विद्वस् विदत् विदन्त द्विद्वत् पोडत् विद्या मनस् ॥ १० ॥ जुह्वत् चिकीर्पत् (चिकीर्पति ?) वसु मरुत् (वसुमत् ?) सत्त्वस् सत्त्वंतु (सन्वतु ?) सर्व दशाह कुब्ज वयस् ॥ २० ॥ रक्षस् असुर शत्रु चोर योध चक्षुस् २० पिशाच अशनि कर्पापण देवता ॥ ३० ॥ वन्धु अनुजा वर अनुपुक् चतुष्प्रास्य रक्षोन वियात विकृत विकृति व्याकृत वरिवस्कृत ॥ ४०॥ अग्रायण अग्रहायण संपतन मधुप द्विता चण्डाल गायत्री उष्णिह अनुष्टुभ् बृहती पङ्गि ५० ॥ त्रिष्टुभ् जगती ॥ ५२ ॥ इति प्रज्ञादयो द्विपञ्चाशत् ।। वहुवचनादाकृति- गणः-तेनाग्नीधी आग्नीध्रा वा शाला । साधारणी साधारणा वा भूमिरित्यादि सिद्धम् ॥ आदिशब्दात् "श्रोत्रौषधिकृष्णाच्छरीरभेषजमृगे” (७।२।१६६ ) । श्रोत्रादिभ्यस्त्रिभ्यः शरीरादिष्वर्थेपु २५ वर्तमानेभ्यः स्वार्थेऽण् वा स्यात् । श्रोत्राच्छरीरे-श्रोत्रमेव श्रीनं शरीरम् , श्रोत्रमन्यत् । ओपधेर्भपजे ओपधिरेव औषधं भेषजम् , ओपधिरेवान्या । कृष्णान्मृगे. कृष्ण एव कार्णो मृगः कृष्ण एवान्यः ।। "कर्मणः सन्दिप्टे” (७।२।१६७ ) अन्येनान्योऽन्यस्मै यदाह त्वयेदं कर्त्तव्यमिति तत्सन्दिष्टं कर्म, कर्मैव कार्मणं करोति, सन्दिष्टं कर्म करोतीत्यर्थः । वशीकरणमपि वृद्धपरम्परोपदेशात् क्रियते इति कार्मणमुच्यते । सन्दिष्ट इति क्रिम् ? कर्म करोति । सत्यपि महावाधिकारे विशिष्टोऽर्थः प्रत्ययम-३० न्तरेण न प्रतीयत इत्यस्मिन्विपये नित्य एव प्रत्ययः ।। "वाच०" । सन्दिष्टे इति-अन्येनान्योऽन्यस्मै यामाह सा सन्दिष्टा वाक् , वागेव वाचिकम् । अत्रापि पूर्ववन्नियो विधिः ॥ "उपा०” । अस्मादिकण् तत्सन्नियोगे चास्य ह्रस्वः । उपाय एव औपयिकम् ॥ "विनया०"। स्वार्थे । विनय एव वैनयिकम् । विनय समय समाय कथञ्चित् अकस्मात् उपचार व्यवहार समाचार सम्प्रदान समुत्कर्ष ॥ १० ॥ संगति सङ्ग्राम समूह विशेप अव्यय अत्यय अनुगादिन् इति विनयादयः सप्तदा ॥ १७ ।। बहुवच- नादाकृतिगणः ॥ "मृदस्तिका” (७।२।१७१) । मृच्छन्दात् स्वार्थे तिकः स्यात् । मृदेन मृत्तिका ।।३६ 4 ४७२ महामहोपाध्यायश्रीविनयविजयगणिविरंचिते खोपज्ञहैमलघु- "सनी प्रशस्तै" (७।२।१७२) । प्रशस्तेऽर्थे वर्तमानान्मृच्छब्दात् सनौ वा स्याताम् । रूपप्रत्यया- पवादः । प्रशस्ता मृत् मृत्सा मृत्स्ना । केचिद्रूपमिच्छन्ति प्रशस्ता मृद् मृद्रूपा ॥ 'स्वार्थिकाः प्रत्ययाः केचिदेवं लेशेन दर्शिताः । लभते तद्धितस्यान्तं कश्छेकोऽप्युदधेरिव ॥ १॥ अत्र च प्रन्थकारो 'विनयादिभ्य' इति सूत्रनिर्देशेन विनयस्य सर्वगुणप्रधानत्वान्महामङ्गलं खनाम- ५सङ्केतितं च विनयशब्दं निर्दिशन तद्धितस्य, तत्समाप्तिसमाप्तायाः प्रथमवृत्तेश्च पर्यन्तमङ्गलं प्रक्रियाम- न्थस्य..च मध्यमङ्गलं रचितवान् । तच शास्त्रस्य स्थैर्याद्यर्थम्-तथाहुः-श्रीजिनभद्रगणिक्षमाश्रमण- पूज्या विशेषावश्यकाऽपरपर्याये महाभाष्ये । तं मंगलमाईए मझे पज्जतए अ सत्थरस । पढमं सत्थत्थाविग्धपारगमणाय निद्दिटुं ॥ १ ॥ तस्सेवय थेरत्थं मज्झिमयं अन्तिमंपि तस्सेव । अव्वोच्छितिनिमित्तं सिस्सपसिरसाइवंसस्स ॥२॥ प्रथममङ्गलं तावच्छास्त्रार्थस्याविनेन पारगमनाय, शास्त्रस्य स्थैर्यार्थ मध्यमङ्गलम् निर्दिष्टम् , शिष्यप्र- शिष्यादिवशे शास्त्रार्थस्याव्यवच्छेदनिमित्तं चरममङ्गलमिति । तच्च वक्ष्यते इति ॥ १३५ ॥ यां शिष्योद्भुतकीर्तिकीर्तिविजयश्रीवाचकाहमणे राजश्रीतनयो व्यधत्त विनयः श्रीतेजपालात्मजः । तस्यां शासितसाधुशब्दसरणौ स्वोपज्ञसत्प्रक्रिया- वृत्तौ तद्धित एप सद्धितपटुः सम्पूर्णतामाश्रयत् ॥ १ ॥ श्रीरस्तु ॥ ॥ सम्पादककृता प्रशस्तिः ॥ म विजयन्तु तपोगच्छनभोमणयः श्रीविजयदानसूरीन्द्राः ॥ आत्मारामेतिख्याताना विजयानन्दसूरीणाम् । पञ्चनददेशजन्मा चारित्रविजयोऽन्तिषत् ॥ १॥ यो गुरुचर्यारसिकश्चारित्रगुणभूषितः । ऋजुतादिगुणख्यातो निस्पृहानां शिरोमणिः ॥ २ ॥ द्वायप्यम् गुरुशिष्यो भूतपूर्वकढूण्डकौ । शुद्धं धर्म प्रपेदाते संविज्ञगुरुसन्निधौ ॥ ३ ॥ इतव-जोपसनस्य सत्पुत्रो नवलाकुक्षिसफः । अचलदासाभिधानः, चाणोदग्रामभूषणः ॥ ४ ॥ चारित्रविजयर्षीणां पार्थं दीक्षा ललौ मुदा । श्रीजामनगरे रम्ये सौराष्ट्र मुखमण्डने ॥ ५॥ यस दृष्टिः सुधावृष्टिः सर्वकार्यपसाधिनी । अमीविजयनामानं नमामि तं गुरुं मुदा ॥ ६ ॥ मरुदेशोद्भवेनापि येन मेघायितं सदा । धर्मोपदेशधाराभिस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ ७ ॥ पापाणसदृशं शिष्यं द्रव्यदेवं विधाय माम् । प्राप्तः स्वर्गिपदं पाल्यां यस्तसै गुरवे नमः॥८॥ साधिकवर्षमात्रेऽपि अन्य स्वास्थ प्रकाशनम् । यत्प्रभावेन सम्पूर्णम् , तं गुरुं हि नमेन कः ॥९॥ वृद्धस्तपती गीतार्थों मुनिगणमुशासकः । विजयतु सिद्धिसूरीन्द्रो मम सुप्रतिदायकः ॥१०॥ मोहमय्यां लालबागे श्रीमत्वार्थप्रसादतः । प्रारब्ध पूर्तिमगमत् मोतिशाहस मन्दिरे ॥ ११ ॥ पापमदेवाधिष्ठिते मायखलाशुमस्थले । उपधानपूय॑वसरे पर्धिजन्मसुमासरे ॥ १२ ॥ गुगर्भक्तिभाषमरितो लाममाणिक्यसत्कृतः । मुनिसमुदयो विजयते गुरुगौरयशंसकः ॥ १३ ॥ पंन्यासमोतिविनया मूलचन्द्रप्रशिष्यकाः । तेषां शिष्यः सुसानिष्यः श्रीसुमतिविजयामिधः ॥ १४ ॥ मोहनहीरालाली संघवीजीवानगीनको । यथायोगमकुर्यन, साहाय्यमपि भारकाः ॥ १५ ॥ विरचितेयं प्रशस्तिः पंन्यामपदधारिणा । क्षमाविजयगणिना सम्पूर्तिहर्पसूचिका ॥ १६ ॥ १ पाली (मारया) र प्रातःस्मरणीयश्री विजयदान सूरीश्वरराज्ये पूनमचन्द गोमाजीशनिवासियारापिठे वि. संवत् १९९२ । ३ पोसदि दशमी।४-५-६ विममोत्तरपदा मम सदीयाः। -८ विजयोतरपदी मम प्रिप्यो। ९ श्रीमुक्तिविरुयापिनः ।

Hemprakash Mahavyakarnam (purvardham) Part-i

Author
Vijaygani
Title
Hemprakash Mahavyakarnam (purvardham) Part-i
File name
Hemprakash Mahavyakarnam (purvardham) Part-i
Text
OCR done
Citation
1937
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,shah Hiralal Somchand
Language
Sanskrit
Pages
569
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313410
Barcode
99999990322100.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
DxmulRL2I9q
Download PDF

Hemprakash Mahavyakarnam (purvardham) Part-i