Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Sarasvati Sirija
Front matter
वशानुक्रम विज्ञान
गभस्थ शिशु नरह या मादा,
यह क्से जान सकते ह? शिशु
किस माता पिता से उत्पन हुआ है,
इसकी क्या पहचान ह' गभ में
लडका लडकी क और लकी
लडके के रूप में बदल सकती है,
या नहीं? क्या सुरक्षित वीय
द्वारा बिना सभोग के भी सतानो
(पत्ति सम्भव ह या नहीं? एक
ही यक्ति का आधा अग पुरुष
का और आधा स्त्री का क्सि
प्रकार हो सकता है? इत्यादि
जत्यत विस्मयजनर
प्रश्नो के
विज्ञान सम्मत उत्तर इस पुस्ता
में दिय गय है। इसे पढ़न से मात
होगा कि नस्ल को सुनारन के
उपाया की खोज में आज का
विज्ञान कहा तर रापलार
जोर हिरा प्रकार गुदर गोरवण
हृष्ट पुष्ट तया दोघजीवी सताने
'उत्पन्न की जा सकती है।
सरस्वती-सिरीज़ नं०४२
वंशानुक्रम विज्ञान
शचीन्द्रनाथ सान्याज
-
इंडियन देस लिमिटेड
८ वशानुनम विज्ञान कैसे हुश्रा करती है, इन सब बातों के कोई नियम हे अयना नहीं १ जोर का जम कैसे हुआ करता है ? जम के पूर्व हम यह जान सक्ते हे अथवा नहीं कि लड़का पैदा होगा अथवा लडकी ? इसके भी कुछ नियम है अथवा नहीं ? हम अपने इच्छानुसार पुन प्रथवा कया को जन्म दे सस्ते हे अथवा नहीं । यदि पिता का रङ्ग साँवला और माता का गोरा हो, तो उनकी सन्तान के रङ्ग कैसे होंगे? शिशु क्सि माता पिता से उत्पन्न हुश्रा है, इसकी क्या पहचान है ? क्सि रोग को हम पूर्वजों से प्राप्त करते हे और क्सिको नहीं ? सिफलिस (गर्मी) की बीमारी हम पूर्वजा से प्राप्त करते हैं। पागलपन अथवा बहरापन किन रोतियो से वशजों में उत्पन्न होते हैं ? पुरुष के वीर्य म और स्त्री के शोणित मे क्या-क्या है ? लडी से लडया और लडके से लडकी अन सक्ती है अथवा नहीं? जैसे बगीचे का माली पौधों से पोज सग्रह करता है और फिर अपने इच्छानुसार उन बीजों से फिर पौधे उत्पन्न करता है, वैसे ही मनुष्यो का वीर्य भी समह करके रक्सा जा सस्ता है, अथवा नहीं ? पुरुष और खौ का सयोग हुए पिना भी यना को सहायता से सुरक्षित वीर्य द्वारा अभीप्सित सन्तान उत्पन की जा सस्ती है, अथवा नहीं? सन्ताा उत्पादन की शक्ति न रहने का क्या अर्थ है ? अनोपचार श्रत नश्तर द्वारा सन्तान उत्पादन की शक्ति नष्ट की जा सकती है, अथवा नहीं ? निकट सम्बन्धियों म विवाह का सम्मघहान स क्या हानि और लाभ हो सस्ता है? एक ही व्यक्ति का श्राधा "प्रङ्ग पुस्प का और श्राधा नारी का हो सस्ता है, अथवा नहीं? इत्यादि का ज्ञान यशानुक्रम विज्ञान से प्राप्त हो सकता है। एक विषय का ज्ञान प्राप्त करते समय दूसरे विषय के ज्ञान के साथ परिचित हो जाना धारश्या हा जाता है। इस प्रकार परिज्ञान से दूसरे विज्ञान की उत्पत्ति हावी रहती है। यशपरम्परा मे गुण - वशानुनम विज्ञान क्या है अनगुण कैसे सरमित होते हैं, इसरा पवा जिस विज्ञान से चलता है उमे 'शानुक्रम विज्ञान' कहते हैं। इस विज्ञान के सम्बध में पोज करते-करते अति श्रद्भुत और विस्मयकर यातों का पता चला है। इस छोटी मी पुस्तक में उन सब पाश्चर्यजनक वातों का परिचय देने की चेष्टा की जायगी। वशानुम्म विज्ञान को अाज अद्भुत उनति हुई है, किन्तु जन-साधारण को इस विषय में सुल भी ज्ञान प्राप्त नहीं है। घशानुकम विज्ञान का प्रयोजन और उसकी उत्पति- विज्ञान के आविष्कार के साथ सामाजिक प्रश्नों का अत्यन्त घनिष्ट सम्बन्ध है, किन्तु स्मि ज्ञान से समाज का क्तिना कल्याण होगा, असा कुछ भी क्ल्याण होगा या नहीं, इमो समझ लेना सर समय सहज बात नहीं है। ऐसी बहुत सी सूक्ष्म वैज्ञानिक बातों का आविष्कार हुआ है जिनके साथ सामाजिक अथरा व्यावहारिक जीरन का कोई सम्बन्ध पहले पहल नहीं जान पड़ा था। परन्तु समय बीतने पर नेसा गया कि यदि विज्ञान की रक्त सूक्ष्म बातो या अाविष्कार न हुआ होता, तो वर्तमान समय की अद्भुत व्यार- हारिक विज्ञान की बातें भी हमें देखने को न मिलतों। यदि सामा जिन लामालाभ को परवा न करके, केरल विशुद्ध ज्ञानान्वेपण की प्रेरणा से वैज्ञानिकगण विज्ञान को सोज न करते, तो अाज हमें रेटियो, वायरलस, सिनेमा आदि से परिचित होने का सौभाग्य प्राप्त न हुआ होता। ईथर नाम की क्सिी वस्तु का यथार्थ में अस्तित्व है अथवा नहीं, इस बात की सोज करते समय अत्यन्त विस्तृत पासश के सम्बन्ध में भी क्तिनी ही नगीन, विस्मयकर और रहस्यमय बातों के आविष्कार हुए हैं। इन्हीं प्राविधारों के परिणाम में धीरे धीरे रेटियो और वायरलेस के अद्भुत और विस्मयर व्यापार हमारे सामने आये हैं। इस प्रकार जब केवल शुद्ध ज्ञान के लिए ही ज्ञानान्वेषण किया जाता है पर उसके परि- -- । वशानुम्म विज्ञान णम में आगे चलकर समाज का भी क्ल्याण हुआ फरसा है। इस कारण विशुद्ध ज्ञान के साथ व्यावहारिक ज्ञान का नित्य और घनिष्ठ सम्बन्ध है। यद्यपि वशानुम्म विज्ञान के साथ सामाजिक और वशगत उन्नति अवनति का अत्यन्त घनिष्ठ सम्बध है, तथापि दूसरे अनेक वैज्ञानिक तत्त्वो की तरह, वशानुनम विज्ञान के पालोचनादि कार्य व्यावहारिक प्रयोजन की प्रेरणा से प्रारभ नहीं हुए थे। जीन विज्ञान के सम्बध में अनुसधान और गवेपणा करते समय ऐसे बहुत से तथ्यों का पता लगा, जिनके परिणाम में प्रमश जीव विज्ञान से स्वत न, कितु उसी को शासा के रूप मे, वशानुक्रम विज्ञान को उत्पत्ति हुई। श्राजाल वशानुक्रम विज्ञान की गिनती एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में होती है। वशानुक्रम के सम्बन्ध में एक साधारण सी धारणा मनुष्यो के मन में हजारों वर्षों से चली आ रही है। ससार की अनेक असभ्य जातियों से लेकर बडी-बडी प्राचीन सभ्य जातियों में भी, पशानुनम के सम्बंध मे, नाना प्रसार के व्यावहारिक ज्ञान प्रचलित हैं। आधुनिक समय के बडे-बडे पण्टितों ने नाना प्रकार की असभ्य और वर्वर जातियों की सामाजिक रीति-नीति के विषय में बहुत से अनुसधान पिये हैं। ऐसा करते समय इन जातियों के सला. रादिको के साथ परिचित होरर वे विस्मित हो गये हैं। उन जातियों में ऐसा भी रीति-नीतियों का प्रचलन है, जो अनेक अशों में श्रआधुनिक विज्ञान से अनुमोदित सममी जा सस्ता हैं | •देसिर -Man and His Superstitions P246 by Prof Carseth Read of the London University-second odition, 1925 वंशानुक्रम विज्ञान क्या है ईसा फैजम के छ सौ वर्ष पूर्व प्रीफ कवि थियामि ने यह फहर आक्षेप दिया था कि मनुष्य घोडों, गददो और भेडों के सम्बध में ता अच्छे वश की सोज इस समझ से करता है कि 'अच्छे से अच्छे को ही उत्पत्ति होना स्वाभाविक है, कितु एक अच्छे वंश का पिता अर्थ के लोभ में, कैमे अनायास हो, अपने पुन का विवाह एक बुरे वश की बुरी लड़की के साथ कर देता है। पार्टी जाति के धर्मशास्त्र के प्रणेता लाइसर्गम् ने भी दूसरा जातियों को रीति-नीति को देनार यह कहा था कि यह बड़े आश्चर्य को पात है कि अपनी गायो, भैसों के बारे में तो दूसरी जातियाँ उनकी नरुन पर प्रसर दृष्टि रखती हैं, परन्तु अपनी मजा की उन्नति के लिए, मनुप्य-वश के प्रति उनका कुछ भी ध्यान नहीं रहता। लाइसर्गस की प्रेरणा से स्पार्टी में विवाह के सम्बन्ध में घडे कडे नियम बनाये गये थे। उक्त नियमों का पालन कहाँ तर हुआ था, कहा नहीं जा सस्ता। विश्व विख्यात ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने भी वश गनगुण-दोपों के प्रति ध्यान रयते हुए, अपनी आदर्श समाज मगठन को क्ल्पना में, निगाह के सम्बन्ध में विशेष नियमों का उल्लेख दिया है। इसके दो हजार वर्ष पश्चात्, पानेला नामा एक प्रसिद्ध विद्वान् ने एक दूसरे श्रादश समाज के संगठन को क्ल्पना की थी। उसमें टहोने वशानुक्रम पर ध्यान रखते हुए, सतान और समाज की मगलरामना से, मनुष्यों को विाह पद्धति पो नियन्त्रित करने के लिए कहा है। भारतवर्ष में वशानुनम के सम्बन्ध में बहुत ही स्पष्ट धारणाएँ थीं, और उन्हीं के आधार पर भारतीय वर्ण-व्यवस्था की प्रतिष्ठा हुई था। इस वर्णव्यवस्था के पक्ष में पाश्चात्य समाज के घड़े से बड़े •देखिए -Engenics by AM Carr-Saundera P 22-23 १२ वंशानुक्रम विज्ञान पण्डित, दार्शनिक और वैज्ञानिकगण, जैसे कइजरलिंग, नीदशे, हाल्टेन आदि ने प्रति स्पष्ट शब्दों में श्रपनी सम्मति दी है। मनुष्य, संसार के सब प्रकार के ज्ञानार्जन का अभिनापी है, किन्तु न जाने क्सि माह के फेर मे पडकर वह अपने विषय म अधिक जानने के लिए विशेष इच्छुक नहा है। इस कारण हम देसते हैं कि पदार्थ विज्ञान की आज जितनी उन्नति हुई है, उतनी उन्नति जीव रिज्ञान अथवा मानस विज्ञान की नहीं हुई If मनुष्य होने पर भी हम मानव-तत्व और आत्मज्ञान के सम्बंध म स्तिने उदासीन हैं। ज्योतिष्क मण्डल में क्या हो रहा है, यह जानने के लिए हम परम ए.सुक हैं, रितु मानव-समाज में, वशानुनम के न रहने कारण विवाहपति, केवल न्यक्तिगत रुचि अभिरुषि के अनुमार नियन्त्रित हो रही है और इस कारण समाज की वैसी दुर्गति हो रही है, इसका हम पता भी नहीं है। गाय बैलों, घोडो और कुत्तों के वशों के बारे में तो पाश्चात्य समाज न जाने क्तिना ध्यान रसता है, किन्तु मानव परिवार के सम्म में, प्रीस सभ्यता के अभ्युदय के समय से लेकर आज तक, वह समाज नितान्त उदासीन रहा है। वशानुनम विज्ञान की प्राज बहुत उन्नति हुई है, कि तु वह येवल पुस्तयों में ही सीमित है, समाज के मङ्गल के लिए उसका प्रयोग श्राज भी नहीं के बराबर हुधा है। पर्याप्त ज्ञान • देखिर --The World in the faking herserling rhe wall to Poser jetzsche The Inequality of man by JBS Haldane भानिमादि। + We hare gained the mastery of almost everythma wbich exists on the surface of the eartt excepting 01184 elreg' denis Carell in tan the Unknown-1 2 lat edn1925- वशानुक्रम विज्ञान क्या है १३ अनेक पपिटतों की यह राय है कि प्रतिभावान पुरुषां के प्रभार से एथेस और स्पार्टी का पतन हुआ था। अव्यवस्थित विवाह पद्धति के कारण रोम के पारिवारिक जीवन में व्यभिचार का स्रोत प्रवाहित हुआ था, जिससे उसका भी पतन हुआ। निगाह पद्धति के अनियत्रित होने से पारिवारिक जीवन में व्यमि चार का विप प्रवेश करता है, और तत्र व्यक्तित्व के विकास का उपयुक्त अनमर नहीं रह जाता। इस प्रकार प्रतिमा के विनाश से समाज में उपयुक्त नेताओं का अभाव होने लगता है, और समाज का सर्वनाश अवश्यम्भावी हो जाता है। इस कारण वशानुम्म निजान के अनुसार विवाह पद्धति का नियन्त्रित होना अत्यावश्या है। वशानुक्रम के साथ शिक्षा का भी अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। इस विषय की प्राजक्ल पाश्चात्य देशा में बहुत ही गम्भीर रूप से चर्चा चल रही है। ईसाई समाज मे यह भ्रमात्मर धारणा फैली हुई है कि शिशु सर्वथा सस्कारशून्य होकर जम ग्रहण करता है। वशानुक्म विज्ञान में इसके विपरीत बहुत से प्रमाण प्राप्त होते हैं। कहा जाता है, हजरत मोहम्मद साहब से किसी ने पूछा था कि किस समय से बालर की शिक्षा प्रारम्भ होनी उचित है। इसके उत्तर मे उहोंने कहा था-उससे जम के कम से कम एक सौ वर्ष पूर्व से।' उस महापुरुष ने अपने उक्त वास्य द्वारा वशानुक्रम की बात को हो सूचित किया था। वासियो की धारणा में शिगु सस्कारयुक्त हार ही जन्म लेता है। उन सस्कारों के श्राधार पर ही शिशु का व्यक्तित्व बनता है। इस तत्त्व से परिचित न होने से यथार्थ शिक्षा-व्यवस्था का निमोण सभर नहा है। दुर्जन व्यक्ति, शिक्षा प्राप्त कर लेने पर समाज की और भी भयङ्कर क्षति कर सकता है। विद्या से अलकृत दुष्टजन का भी हमें त्यागना उचित है, जैसे मणि से भूपित होने पर भी सर्प हमारे लिए अत्यन्त भयङ्कर होता है। इस कारण विद्या- भारत- । वंशानुनम विज्ञान लयो की व्यवस्था मे छानों के गुण अवगुणो के प्रति दृष्टि रखना हमारे लिए परम कर्तव्य हो जाता है। इसी कारण सर प्रसार के विद्यार्जन करन का सनको समान अधिकार नहीं है, सन ब्राह्मणों को भी नहीं। भारतरर्प का यही प्राचीन निर्देश है। अर्थात् सन प्रकार के कार्यों के लिए अधिसरी का होना आवश्यक है। यही अधिकार भेद का रहस्य भारतीय सभ्यता की एक विशिष्टता है। जम ही हमे अधिकार प्रदान करता है। विवाह पद्वति के साथ जम का अविच्छेद्य सम्य च है। भारतीय वर्णव्यवस्था मे इसी लिए विवाह पद्धति पर नियन्त्रण पा विशेष रूप से निर्देश है। इसी कारण प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक श्री कैजरलिग ने कहा है कि संसार में फिर प्राचीन भारतीय वर्ण व्यवस्था का श्रादर्श घल प्राप्त करेगा। यह बात भी सत्य है कि जाम से प्राप्त अधिकारों को निरसित करने के लिए उपयुक्त शिक्षा और दीक्षा एवं अनुकूल वातावरण की परम आवश्यक्ता है। किंतु जम से यदि हम गुणों को प्राप्त नहीं करते हैं तो पारिवारिक वातावरण का ममाव हमारे ऊपर अधिक नहीं पड सरता। यदि स्वभार से ही हमारी पृथ्वी पदार्थों को अपनी ओर न स्वींचती होती, तो एक साधारण त्यौड़ी या चलाना भी कठिन हो जाता। अाजकल वैज्ञानिको मे इस प्रश्न पर तुमुल झगड़ा चल रहा है कि हमारे जीवन पर पारि पाश्विक वातावरण का अधिक प्रभाव है अथवा जन्मगत गुणों का। रितु बड़े से बड़े वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार करत हैं कि वश परम्परा से हम बहुत कुछ गुण अवगुणों को प्राप्त करत हैं और पारिपाश्विक वातावरण की अपेता उन गुणो का जीवन पर अधिक प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत दूसरे मी वैज्ञानिक हैं, • दपिर.-बंगला मासिक पत्र-साहित्य, शास, बंगला मन् १९९- मी शराबर राय का वशानुकम पर पर लस।
चशानुक्रम-विज्ञान क्या है जो या समझते हैं कि वशानुक्रम की अपेता जीर पर पारिपाश्विक वातावरण का अधिक प्रभाव पड़ता है। प्राच्य देशों म भी वश मर्यादा के प्रति यथार्थ प्रा शाई गई है। इंगलैंड के प्रसिद्ध कवि श्री न्यू० वी० इंट्स ने क्वीन्द्र वीद्रनाथ की गीतावलि की भूमिका में एक सुन्र प्रान्त का उन्लेख किया है,-"माच्य देशों में श्राप लोग यथार्थ म ही वश मर्यादा को अपुरण परना जानते हैं। उस दिन मुझे एक म्युजियम के फ्यूरेटर (अध्यक्ष) ने एक कृष्णाङ्ग व्यक्ति को दिपलाकर यह कहा था कि वह व्यक्ति, जो चीन देश की प्रदर्शनीय वस्तुयो को सजाकर रख रहा है, मिडो के एक प्रिय क्लागार यश का चौरहवाँ न्यपि, है। उक्त परिवार वश-परम्परा से उसी प्रसिद्ध जीववैज्ञानिक श्रीयुत जे० प्रार्थर टाम्सन महोत्य ने रहा है कि वशानुनम विज्ञान से सम्बन्ध स्पनेवाली समस्याएँ अन्य ममम्न वैज्ञानिक समस्याओं में मनुष्य ममान क लिए सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं । सामाजिक प्रयोजन के अतिरिक्त विशुद्ध ज्ञान की दृष्टि से भी, हमें वंशानुम्म विज्ञान मे बहुत ही चित्तार यातों का पता चलेगा। जैसे कृतिम टपाया से मजी और फूलों तथा फलों के पौग का अद्भुत विकास किया जा रहा है, वैसे हो प्राणियों में भी अपने इच्छानुसार नवीन प्रकार के नीरों की उत्पत्ति की चेष्टा Heredits so the Light of Recent Research by L Don creter pr 4950 116, Darsin & Todernp 101, भाधुनिक युग में भी बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का मत इसरे पक्ष में है। इससे विर मी कुछ अन्य बड़े-बड़े शानिर अपनी राय देते है, इस विषय पर आगे चलकर विरत रूप से आलोचना की जायगी। • Heredity by J A Thomson P I १६ वशानुक्रम विज्ञान की जा रही है। चूहे श्रादि पर इसरी परीक्षा प्रारम्भ हो गइ है और इस विषय में बहुत कुछ सफलता भी प्राप्त हुई है। वैज्ञानिकों का कथन है कि भविष्य में हम पेड पौधों की तरह मनुष्यों को भी हम अपनी इच्छा के अनुसार जम दे सकेंगे। यदि विशुद्ध ज्ञान की दृष्टि से विज्ञान की उनति नहीं होगी, तो विज्ञान से हमें सामाजिक लाभ भी प्रधिक न हो सकेगा। - दूसरा परिच्छेद डारविन, गैल्टन और मेन्डेल के आविष्कार डारपिन-बीसवीं सदी के पहले तक विज्ञान के आधार पर यशानुनम का ज्ञान प्रतिष्टित नहीं हो पाया था। इस बात को तो सभी जानते थे कि सन्तान पिता माता के सदृश होती है, और एक ही पिता माता की स तान आपस में देखने में एक दूसरी से बहुत कुछ मिलता-जुलती है। मनुष्य इस बात को मैक्डों वर्षों से जानता था कि कटहल के पेड से श्राम नहीं फनता और केले का पड लगाने से उससे लीची नहीं मिल सकती। मनुष्यों के बारे में भी ऐसा ही नियम लागू है, इस धारणा का भी मनुष्य अनादि काल से पोपण करता चला पाया है। "मा को पूत पिता को घोडा, बहुत नहीं तो थोडा थोडा" यह कहावत उक्त धारणा की पुष्टि करती है। स्न्तुि वैज्ञानिक रीति से इसरी अालोचना अभी पिछले दिनो से ही प्रारम्भ हुई है। विज्ञान के इतिहास में एफ. जे. गॉल (१७५८-१८२८) नामक एक डाक्टर ने, पहल तो पियना और याद को पेरिस म, अपने परीक्षागारों में स्नायु क सम्बन्ध में अनुमघान परते समय, 1. हारविन, गैल्टन, मेन्टेन के आविष्कार वशानुग्म के बारे में भी बहुत से वध्यो का आविष्कार दिया था। गॉल के वशानुक्रम सम्बपी श्रानिफार के कारण उन पर ईमाई समाज के पादरी अत्यन्त असंतुष्ट हो गये थे। इमा कारण यह था कि ईसाइयो के घारणानुसार जम के समय शिशु संस्कारशून्य होकर ही जन्म लेता है, और वशानुक्म विज्ञान के अनुसार वह सस्कार युक्त होकर जम ग्रहण करता है। श्राधुनिक विकासवाद अथवा विवर्तनवाद को भी मूल धार णा हिन्दुओं में बहुत समय से प्रचलित है, किन्तु पाश्चात्य समाज में ही उसका वैज्ञानिक रूप प्रस्ट हुआ है। वशानुक्रम विज्ञान भी पहले-पहल विकासाद को ही शासा के रूप में दिखाई दिया था। मैक्वें पशुपालर और बागवानी ने इस बात को समझ लिया था कि वलिष्ट सोड के औरस से उत्कृष्ट गाय का जन्म होता है, और फूल तथा फल के पापो से भी, नई नई शासायों के निकलने मे, नये प्रकार के फलों और फूलों के जन्म देनेवाल नवीन पात्रो का धानिर्भान होता है। वैज्ञानिक विकासवाद के पानिर्भार के पूर्व ही दार्शनिक और चिन्तनशील लग्यो ने सर्वप्रम विकासवाद के सिद्धान्त का प्रचार किया था, किन्तु सबसे पहले लामा और उसके बाद चार्स डारविन, धालेम और हरबर्ट स्पेन्मर ने, वर्तमान युग में वैज्ञानिक विकासवाद को जम दिया। इनमें से लामा की सोज और हार्विन के "श्रॉरिलिन श्राा सीमी" के सौजपूर्ण तथ्यों के श्राधार पर वशानुनम विज्ञान का वैज्ञानिर श्राधार प्रतिष्ठित हुश्रा है। वशानुनम को धारणा को छोटार वैज्ञानिक विकासमाद टिक नहीं सकता। सबसे पहले लामा ने ही वशानुक्रम के पार * देविर -Historr of Science, by wC D Dampler- Whetham Ip 214 291 वशानुनम विज्ञान । पर विकासवाद के एक युक्तिसङ्गत सिद्धान्त का निर्माण क्यिा था। लामा का जावनमाल ई० सन् १७४४ से १८२६ है और डारविन का जीवनकाल १८०६ से १८८२ है। डारग्नि के पहले ही लामा ने निकासपाद के सम्बध मे गोषणा प्रारम्भ कर दी थी। उहाने १८३० मे अपनी गरेपणाओं का परिणाम प्रकाशित करा दिया था। टारविन ने इसके बाद ही विकासपाद के सम्बन्ध में अपनी गवेपणा प्रारम्भ की थी। उस गवेषणा के परिणाम में एक नवीन ण्य प्रतिव्यापक वैज्ञानिक सिद्धान्त का उद्भव हुआ था। इस सिद्वात का अंगरेजी नाम है 'थियरी श्राफ झोल्यूशन', अर्थात् विकासवाद। इस विकासपाद ने वैज्ञानिक क्षेत्र में जैसा युगान्तर उपस्थित किया था, उसका वैसा ही अद्भुत प्रभाव सामाजिर और धामिक क्षेत्रों में भी देसा गया था। विकासवाद के इन मूल सिद्धान्तो को लेकर आज भी नाना प्रभार पी गवेपणाएँ हो रही हैं। नूतन का उद्भन कैसे होता है, इसकी वैज्ञानिक मीमांसा आज भी नहीं हो पाई है। सोवियट रूस में ऐसे भी एक वैज्ञानिक का आविर्मान हुआ है, जिसने डारनिन के निकासवाद को स्वीकार नहीं पिया है। इस पुस्तक में सिासमाद के सिद्धान्त के सम्बध में अधिक आलोचना न करते हुए हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि विकासमाद के सिलसिले में ही वशानुम्म दिनान की उत्पत्ति हुई। नूतन का श्राविर्भार कैसे होता है, इस प्रश्न ने एक और जैसे वैज्ञानिकों के मन को चञ्चल रिया है, वैसे ही जीर-राज्य में विभेदा की भी पैसे सष्टि हुई और उनका स्वरूप क्या है, इसके सम्पध में श्राज तक वैज्ञानिकों की सोज समाप्त नहीं हुई है। नगीन और विभेदों की सृष्टि के प्रश्नों के साथ ही वशानुक्रम विज्ञान का समय है। वंशानुक्रम विज्ञान के सम्बंध में इतन वैज्ञानिक प्रारिष्कार हो चुके हैं कि उहें विधिपूर्वक प्रम के अनुसार एकत्र करना या। नामाई उन्होंन दिया बाना নান सर शान्ता और ना डारविन, गैन्टन, मेन्डेल क श्राविकार और उनके तात्सयों को ठीक-ठीक समझ लेना श्राज अत्यन्त फठिन यात हो गई है। हम यह भी स्मरण रखना उचित है कि वैज्ञानिक क्षेत्र में किसी सिद्धान्त को हम अन्तिम निर्णय क रूप में नहीं प्रहण कर सकते। वशानुम्म विज्ञान के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सस्ती है। तथापि इस विज्ञान की इतनी उन्नति हुई है कि यदि सामाजिक क्षेत्र म इसा उपयुक्त प्रयोग हो ता समाज का प्रभूत कल्याण होगा। मौन्सिस् गैल्टन (१८२२-१९११)-डारपिन के पश्चात् उनके चचेरे भाई गैल्टन महोदय ने हो श्राधुनिक वशा नुक्रम विज्ञान को जन्म दिया। टाररिन के 'ऑरिजिन श्राप पीसोज' नामक प्रथ में, प्राणियों के मम्यध म जितनी वशा नुनम की बातें मिली, उन्हीं तथ्यों का प्रयोग गैल्टन ने मनुष्यों के सम्बध मे किया। विशप विशेष पराक्षाओं में छात्रा न जैस-जैसे नम्बर प्राप्त क्येि उनकी तुलना करके गेल्टन ने यह प्रमाणित किया कि जड़ पदार्थों की गति आदि, जैसे गणित शास्त्र के नियमा धीन रहती हैं, उसी प्रकार मनुष्यों की मानसिक शक्ति का विकास भी, गणितशास्त्र के नियमों से बँधा हुआ है। गैल्टन न यह प्रमाणित कर दिखाया है कि अधिकांश मनुष्यों की मानसिक शक्ति की गिनती मध्यम श्रेणी में है। यदि इस मध्यम श्रेणी के एक व्यक्ति की मानसिक शक्ति के साथ उसी समाज के एक प्रतिभावान व्यक्ति की मानसिक शक्ति की तुलना की जाय तो यह देसन में श्राता है कि साधारण व्यक्ति और प्रतिभावान व्यक्ति के पीच मानसिक शक्ति का जितना व्यवधान है, और इनके बीच जैसे प्रमश उच से उचतर शक्ति का विकास देसने म आता है उसी प्रकार, यह भी देखने में आता है कि उसी समाज के एक निष्टतम व्यक्ति की तुलना, एक मयम श्रेणी के व्यक्ति पी मानसिक शक्ति के साथ करने पर, इन दोनों में भी ठीक पहले - शानुक्म विज्ञान ही जैमा व्यवधान है। इन दोनों श्रेणियों के बीच, मानसिक शक्ति का हास भी ठीक पहले ही की तरह, धीरे धीरे मध्यम श्रेणी से निम्न श्रेणी में निम्न मे निम्नतर होता जाता है। इस प्रकार श्रेणी- विभाजन के लिए गैल्टन न प्रति दस लास मनुष्यों के बीच से केल दाई सौ व्यक्तियों को छॉटार उहें एक श्रेणी में टाल दिया था और उस श्रेणी के व्यक्ति का नाम 'एमिनेट', अर्थात् 'शक्ति- मान्' मानव रक्सा था। इस प्रकार दस लास मनुष्यों के बीच से एक विशिष्ट व्यक्ति को छॉटकर उसका नाम 'इलस्ट्रियस' अर्थात् प्रतिभानान् मानव रस्सा था। इस प्रकार नामकरण के पश्चात् उ होने यह दिखाया है कि मूढ-जड स्वभाव विशिष्ट मनुष्य के साथ एक ओर साधारण मनुष्य का जितना अतर है दूसरी ओर साधारण मनुष्य के साथ शक्तिमान मनुष्य का भी ठीक उतना ही अन्तर है। प्रामाणिक पुस्तको आदि की सहायता से प्रसिद्ध व्यक्तियों के जीवनचरितो को पढकर गैल्टन ने यह दिखाया है कि साधारण व्यक्तियों के निकट प्रात्मीय जनों में जितने शक्तिमानव्यक्ति मिन सस्ते हे उाको अपेक्षा शक्तिमान् व्यक्तियों के श्रात्मीय जना में बहुत अधिक प्रतिभारान् व्यक्ति मिलते हैं। उहोंने यह भी दिपाया है कि एक साधारण श्रेणी के व्यक्ति के पुत्र को अपेक्षा एक शक्तिमान व्यक्ति के पुत्र का प्रतिभावान व्यक्ति होना पाँच सौ गुना अधिक मम्भर है। उहोंने वशानुम्म के सम्मथ मे तीन पुस्तकें लिखी हैं। उनके दृष्टान्त का अनुसरण करके दूसरे वैज्ञानिकों ने वशानुग्म के सम्बध में पडी-बडी महत्वपूर्ण सोनें की हैं, और आज वशानुम्म विज्ञान नाना रूप से पारित होर फल देने की अपस्मा मे श्रा पहुँचा है। गैल्टन के सर नियमा की आलोचना यहाँ सम्मर नही है। यहाँ पर उनके केवल दो नियमों का उल्लस कर दना श्रावश्यक है। उनका एक नियम तो यह है कि सन्तान, अपन माता पिता मे, उनके श्राप पारे गुणों को प्राप्त करती है, ।
डाररिन, गल्टन, मेन्डेल के प्राधिकार ०१ पार अपने माता पिता के माता पिताओं से भी, चे उनी एक चौथा गुण प्रास करती हैं। इसी भाँति वे उनक भी माता पितामों से, उनके पाठ हिस्से गुण को प्राप्त करती है। इसी प्रकार गैन्टन के मनानुमा एक व्यक्ति अपने समाज का अनिच्छिन अङ्ग बना है। उनका दूसरा नियम यह है, यदि किमी समाज को उय, मध्यम और निम्न श्रेणी के व्यचियों क हिसान से विभाजित किया जाय, तो उच्च श्रेणी की सन्तान मध्यम श्रेणी के व्यक्ति के समीपवर्ती होर जन्म ल्ती है, और निन श्रेणी के व्यक्यिा की सन्तान मी मध्यम श्रेणी की लिस्टरती होकर जन्म लती हैं। हटान्त के तोर पर लम् पिता-माता को सन्तान, उनमे छोटे पद की होंगो, किन्तु मन्यम श्रेणी से ऊँची होंगी । इसी मार नाटे पिता-माता की मन्तान अपने पिता माता सेतो ऊँची होंगी, किन्तु मध्यम श्रेणी के व्यक्तियों से घाटी होगी। जिस समाज में अनियमित विवाह पद्धति का प्रचलन है, लम समाज में हा ये नियम अधिक लागू हैं। प्रेगर जोहन मेन्टेल-इस बात को समीन देसाहेगा कि एक ही पिता माना भी सन्तान देखने में, अनेकाश में, अपन पिता माता के महश ही होती है। किन्तु पिता-माता और उनी सन्तानो में जैसे एक माश्य है, वैसे उनकी आरति और प्रावियों म मिलता भी कम नहीं है। एक ही पिता-माता की प्रत्येक सन्तान देखने में ठीक एक सी नहीं होती है। पिता-माता और उनरी सन्ताना के बीच कुछ समानता और कुछ असमानता भी रहती है। कोई सन्तान प्राति और प्रकृति में हू-बहू पिता माता के अनुरूप नहीं होती। माता पिता और सन्नान में कितनी समना और श्रममना है एव एकही माता पिता की सन्तानों में भी परस्पर कितना सादृश्य है और कितना नहीं, इन सस श्रनुस धान करना ही वशानुक्रम ।
। यशानुक्रम विज्ञान विज्ञान का लक्ष्य है। गेल्टन को गवेपणा के परिणाम में हम इस बात का ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था कि वंश परम्परा के कम से, सन्तान माता पिता के गुण और अवगुणों की अधिकारी कैसे बनती है। प्रास्ट्रिया के एक सयासी, प्रेगर जोन मेन्टेल (Gregor John Mendel १८२२ १८८४) महोदय ने इस विषय पर पौधा को लेकर बहुत परीक्षाएँ का थीं। उनरी ८ साल की परीक्षा के परिणाम में बहुत से वैज्ञानिक तथ्या का आविष्कार हुआ है, और उन प्राविष्कारों के श्राधार पर वशानु मम का ज्ञान यथार्थ विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित हो पाया है। जिस समय डारविन अपनी सोज मे लगे थे और जिस समय उहोने १८६५ मे अपनी एक स्तिार प्रकाशित की थी, उसी समय मेन्डेल महोदय भी अपने आश्रम मे पौवों के वश के सम्बध मे परीक्षाएँ कर रहे थे। उन्हान परीक्षाश्रा का फल एक स्थानीय वैज्ञानिक समिति के पन म प्रकाशित किया था, परन्तु करीय चालीस साल तक इनरा पता ससार के दूसरे बडे-बडे वैज्ञानिका को न था। सन् १९०० में ह्यूगो डी० प्राइज, कारन्स और शेरमैक ने मेडेल के आविष्कार को ससार के सम्मुख उपस्थित किया। विलियम बैटेशन आदि दूसरे वैज्ञानिको को परीक्षाओं से मेडेल के आविष्कार की पुष्टि हुई। मे डेल का प्राविफार-थोडे शन्दोंम मे डेल के आविष्कार का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है-मेडेल ने बडे और छोटे मटर के पौधों को लेकर परीक्षा प्रारम्भ की। जर केवल एक प्रकार के मटर को अलग वोया गया तो उससे केवल एक ही प्रकार के मटर पैदा हुए। किन्तु जर दोना प्रगर के मटर एक साथ लगाये गये, ता उनमें से केवल यडे प्रकार के मटर के पौधे निरल, छोटे प्रकार के गायन हो गय। परन्तु जर पुन इम नये यड़े मटर को लगाया गया, तो देखा गया कि उनमें एक हारविन, गैन्टन, मेन्टेल के श्राविकार ०३ चौयाई छोटे मटर निकल पाये और तीन चौथाई बडे प्रकार के मटर निम्ने। ये एक चौयाई छोटे मटर के पौधे अलग लगाये गये तो उनमें मे सन बाटे ही मटर निरले, बड़ा मटर एक भी न निकला। उपर तीन चौथाई जो नये प्रकार के बडे मटर निरले थे उन्हें अलग लगाया गया तो उनमें मे फिर कुछ छोटे और कुल बडे मटर के पौधे निम्लें। इस प्रकार यह टेसा गया कि सरसे पहलेगले घडे मटर के पौधे लगाने मे उनमें से केवल पड़े के ही पौधे निमलते हैं और छोटेवाले मे छोट के, परन्तु इन दोनों प्रकार के पौधों में मंयोग होने पर, पहली पीढी में, एक प्रकार का पौधा गायन हो जाता है। श्रर इम पहली पीढी के बडे मटर से बाटे वडे दोनों प्रकार के पौधे निकलत है। किन्तु पहले प्रकार के पडे मटर से केवल एक ही प्रकार के बडे मटर निस्ले थे। इन विमिन प्रकार के पौधों की उत्पत्ति की सन्न्या पृष्ट-४ पर चित्र में सममाई गई है। म चिर से पाठ को पता चल जायगा वि मिश्रा हाने के पश्चात्, पहली पीढी में, छोटे मटर गायन हो जाते हैं और केवल एक ही प्रकार के घड़े मटर उगते हैं। परन्तु इस पहली पीढी के मटर के पीन म छोटे पौर्य के बीज दिपे हुए हैं। टम द्विषो हुई सत्ता को अंगरेजी मे Recessive Character कहते है और उसके बडेपन को अंगरेजी में Dominant Character कहते हैं। हम हिन्दी में इन दोनों लक्षणा को स्मश "सुप्र" और "व्यक्त" लक्षण कह सकते हैं। पहली पीढी क बड़े मटर मे इम 'व्यक्त लक्षण बडेपन और 'मुन' लनण छोटेपन को एकर पाते हैं। यह मिन्न वंश कहलायेगा। इस मिश्र वश के पौधों के आपस के सयोग से, जो दूसरी पीढी उत्पन होगी, उसमें एक चौथाई तो बड़े मटर निकलेंगे और एक चौथाई छोटे मटर। इन दोनों प्रकार के छोटे २ ।
पड़ा मटर x छोटा मटर
२४
बड़ा मटर
। बड़ा
छोटा
बड़ा
सय बढ़े
स छोटे
ब०
वशानुम्म विज्ञान
सब छोटे
सब बड़ा
सब बड़े
सर छोटे
२०. व.छो.
व
...छो.
-
छो.
०००
- हारचिन, गैल्टन, मेन्डेल के श्राविकार और बडे मटरो को यदि अलग अलग बोया जाय तो इनमें से शुद्ध छोटे और बडे प्रकार के मटर के पौरे हमेशा निकलते रहगे। इन दोनों वशो को शुद्ध वश कह सकते हैं। इस दूसरी पीढी में एक चौथाई पडे और एक चौथाई छोटे मटरों के वशों को छोडकर वाती तो चौथाई अर्थात् आधे पौधे देखने में तो घटे प्रकार के हाग, परन्तु ये पौधे मिश्र वश के होगे और इनमें आपस के सयाग से फिर एक चौथाई वडे और एक चौथाइ छोटे शुद्ध वश के पौधे निस्लेंगे। बाकी आये पुन मिश्र वश के होंगे। इस नियम का मेन्टेल का नियम रहा जाता है। इसके अतिरिक्त दूसरे दृष्टान्त भी मिलते हैं, जैसे एक ही जाति के सफेद और लाल फूलों में सयोग होने से पहले गुलाबी फूल उत्पन होगा और इस मिश्र-गुलानी पल के श्रापस के सयोग से मेन्टेलियन नियमानुसार पुन सफेद, लाल और गुलानी फूल उत्पन्न होते रहेंगे। एक वासरा दृष्टान्त इस प्रकार है-माले और मुलायम लोमाले गिनी पिग* से सफेद और कड़े लोमवाले गिनी पिग का सयोग होने से, पहली पीढी म, काले क्था कडे वालगाले गिनी पिग उत्पन्न होते हैं और इन पहली पीढीनालों में परस्पर सयोग होने से नौ काले तथा क्डे लोमनाले, तीन काले और नरम लोमवाले, तीन सफेद और कड़े लोमराले एच एक सफे नरम लोमत्राला गिनी पिग उत्पन होता है। इस दृष्टान्त में कुछ नीन प्रकार के गिनी पिग उत्पन हुए, परन्तु ये देखने में ही नवीन है, यशर्थ में नहीं। इनमें केरल पहले के, अलग अलग गुणों के, पिभिन मम्मित्रण मात्र हैं। वश-वृद्धि के ये सब दृष्टान्त मैन्डल के नियमानुसार ही होते हैं। दन दृष्टान्तो से हमें यह जान पडता है कि जीव क पिमित गुण अलग अलग रूप से सन्तान में दिखाई पड़ते हैं। इन अलग अलग गुणों को अंगरेजी में 'मेन्टेलियन * Gainea Pig=चूहा जातीय एक सन्तु।
२६ वशानुम्म विज्ञान फैस्टम' कहत हैं। इहे हिन्दी में "गुण", "लक्षण" अथवा "उपकरण" कह सकते हैं। पौधों अथवा जीनों के ये "गुण' (factors) तत्र रूप से क्रियाशील रहते हैं। सम्मिश्रण होने पर भी ये रन न होकर वश परम्परा में मियाशील रहते हैं। वशानुसम विज्ञान में इस बात का अत्यन्त महत्त्व है। इन फैक्टर्स (लक्षणा) के विभिन्न रूप से मिश्रित होने पर अलग अलग जावा की उत्पत्ति होती है । विभिन्न गुण-युक्त श्री और पुरुष के सयोग से उनके विभिन्न "क्टर्स के नाना प्रकार के सम्मिश्रण होते हैं। टन फैक्टर्स की सग्या जितनी अधिक होगी, उनका सम्मिश्रण भी उतना ही जटिल होगा। इस जटिलता का एक उदाहरण यह है कि देखने में तो एक जीन गोरा है, किंतु उसरा यह गोरापन इ एक गुणो ( Factors) के सम्मिभित होने का परिणाम है। इसी प्रकार एक दूसरे जीन का गोरापन दूसरे गुणों के मिश्रित होने से ज्पन हुआ है। जब ऐमे दो जीवो का संयोग होगा तर उनकी सन्तान गारी नहीं भी हो सकती है। गोरेपन के अतिरिक्त दूसरे गुणों के सम्बध में भी यही नियम लागू है। यह तत्त्व कितना महत्व रखता है, इसका पता एक दुसरे शान्त से चनगा। एक प्रकार का गेहूँ है, जिसमे शान कोडे नही लगते। एक दूसरे प्रकार के गे, म भी वही गुण है पर तु वह मिन "पैक्टस' क सम्मिश्रण म बना है। किन्तु इन दो मार के गेहूँ के सम्मिश्रण मे जितने प्रकार के गेहूँ उत्पन्न होते हैं उनम से एक प्रेम प्रकार का भी गेहूँ होता है, जिसमें बहुत शीन कीडे लग जाते हैं। मेन्टेल क नियमानुसार फैक्टर्स के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण होने के कारण 'सुख' (Recessive) और 'व्यक्त (Dominant) लता के रहन से, ऐसे रिचित्र वशजों की उत्पत्ति होती है। - Hamari lleredits bs Bior Fischer und Lenz--Pp4547515161 डारविन, गैन्टन, मेडेल के आविष्कार ये नियम, पांघों और जन्तुओं की तरह, मनुष्यों को भी बहुत कुछ लागू है। मनुष्यों में कितने ऐसे 'गुण' (स्टर्स) हे जो नशों में प्रकट होते हैं, टमका पूरा पता अभी तक प्राप्त नहीं है, किंतु इनकी मस्या यत अधिक है। इसके उपगन्त 'सुम' ( Recessive) और 'व्यक्त' ( Dominant) लक्षणों के रहने के कारण यशानुनम की प्रक्रियाएँ अत्यन्त जटिल बन गई है। कभी ते 'सुम' ( Recessive) या 'व्यक्त' ( Dominant) लनण केरल स्त्री अयना केवल पुरुप वशज में ही प्रकट होता है, अथवा कुछ फैक्टर्स कहाँ कहीं मयुक्त रूप से ही प्राटिन होते हैं, स्वतन्त्र रूप से नहीं, एर कभी-कभी ऐसा भी होता है कि दो पैक्टर्स एक्न प्रस्ट नहीं होते। ऐसा देगा गया है कि पिता का रोग न वो पुत्र और न पुत्री में किन्तु पुत्री के सन्तानी में जाकर प्रस्ट हुआ। (इमे अंगरेजी में Sex-hnked characters or factors कहते हैं।) मेन्टेल के नियमों को छोडर दूमरे प्रकार से भी वशानुनम दृश्रा करता है, परतु उसके नियमो का अभी तक विशेष पता नहीं चला है। रितु किन प्रक्रियाओं मे माता पिता के गुण-अवगुण मन्तान में उत्पन्न होते हैं, इसमा यथेष्ट ज्ञान प्राप्त हो चुरा है। मेडेल का श्राविकार और कृषि प्रादि को उन्नति- मेडेल के नियमानुमार वशानुक्रम-विज्ञान के प्रयोग मे यूरोप, अमेरिका और जापान में गृह पालिन पशुत्रों और पेड-पौगों के श्रदमुत उन्नति हो रही है। हमारे देश में प्राय एक ही प्रकार के छोटे-छोटे बाल उत्पन होते हैं। अधिक से अधिक कुछ अपेनात बडे नैनीताली बालू भी हमें देगने को मिल जाते हैं किन्तु जापान और अमेरिका आदि देशों में इतने बडे-बड़े बालू उत्पन्न किये गये हैं कि एक एक बालू तौल में डेढ-डेढ पार से
वशानुक्रम विज्ञान
भी अधिक होते हैं, कुम्हडे एक एक मन कक के हुए हैं। उन
देशो में कोई ऐसी सजी नहा है कोई ऐसा फल नहीं है, अथवा
अण्डा, मुर्गी, दुम्बा, घरी आदि ऐसा कोई पालतू पशु या
पक्षी नहा है जिसकी मेन्डेलियन श्रादि गतिया के
अनुसार
प्रभूत उन्नति न की गई हो। गृहपालित पशु और सेती क
चारे मे तो वशानुक्म-विज्ञान का यूगेप आदि दशों मे अन्धा
प्रयोग होने लगा है, किन्तु मनुष्य-समाज के सम्बन्ध में अभी
तक इस विज्ञान का प्रयोग नहा के बराबर हुआ है। तथापि
आज पाश्चात्य देशों में और जापान में, बड़ी बड़ी वैज्ञानिक
समितियाँ बनी है जिनका कार्य वशानुक्रम विज्ञान के अनुमार
समाज का पुनरसङ्गठन करना है। किंतु भारतवर्ष म श्राज
भी इस रिपय पर गम्भीर रूप से विचार तक प्रारम्भ नहीं हुप्रा है।
मे डेलियन रीति के अनुसार कैसे पौधों की उन्नति की
जाती है, इसके कुछ दृष्टात यहाँ दिये जाते हैं। सेम के पौर
को ले लीजिए। जर इन पौधो की अच्छी सेना की जाती है,
जल वायु अनुकूा होती है एन राद का अच्छा प्रयोग
होता है, तर पौधों की अच्छी उनति होती है। किन्तु इन
पौधों से जो सेम उत्पन होती हैं वे सन एक सो नहीं होती।
उनमे छोटी बडी सब प्रकार की होती हैं। अब इन
सेमा म से बडीवडी सेमा के बीज को यदि अलग कर लिया
जाय ता यह देखा गया है रि इन बड़ी सेमे के वीजा से
जो नये पौधे निकलेंग, उनमे से भी पहल की तरह छोटी बडी
सेमे उत्पन्न होती हैं, चल पडी सेमे नहा उत्पन्न होता।
और यदि वेवत छोटी सेमा के बीज मी अलग तगाये जायें
तो उनमें स भी टीक पहले का तरह घाटो बड़ी सम उपन
हानी है। श्रर्थान् केवल टाड से पौधों की अधिर उन्नति
नहीं हो सस्ती।
टारविन, गैन्टन, मेटेल के श्राविकार एक दूसरा दृष्टान्त लीजिए। इंगलैंड में जो गेहूँ उत्पन्न होता है उसकी नस्ल अच्छी नहीं होती, कितु टमकी पैदावार अच्छी होती है। इसके विपरीत अमेरिका में जो गेहूँ उत्पन्न होता है वह इंगलेंट के गेहैं मे अच्छा होता है, कितु अमेरिका के गेहूँ की पैदावार इंगलैंड के गेहूँ मे कम होती है। affa (Biffen नामक एक वैज्ञानिक ने एक नवीन प्रकार का गेहूँ उत्पन्न करना चाहा, जिममें उपज तो अमेरिका के गे से अधिक हो किन्तु गुण में यह इंगलैंड के गेहूँ मे अच्छा, अमेरिका के गेहूँ की तरह हो। वीफेन ( Biffen) ने यह देखा कि अमेरिका के गेहूँ का जो अन्दापन है वह मेटेल की भाषा में टामिनन्ट अर्थात् 'व्यक्त' गुण-युक्त है। जर उन्होंने 'अँगरेजी और अमेरिका के गेहुओं का सयोग कगया तो उनमें से सर अमेरिका की तरह अन्वे गेहूँ उत्पन्न हुए और इसके बाद की पीडी में मेन्डेल के नियमानुसार एक और तीन के अनुपात में अन्द और जुरे दोनों प्रकार के गेहूँ उपन हुए। फिर इनमें से निर्वाचन करते करते एक नवीन प्रकार का गेहूँ उत्पन हुश्रा, जिमकी पावार तो इंगलैंड के गेहूँ की तरह हुई किन्तु गुण में वह अमेरिका के गे की तरह हुश्रा। इमके पार भी परीनाएं होती रहीं, और श्राजक्ल उनके परिणाम में इंगलैण्ड के गेहूँ की प्रभूत उन्नति हुई है। गहूँ के श्रन्चे होने को यह भी एक पहचान है कि उसमें कोडे जल्दी न लगें और वह श्रय किमी प्रकार से रोग-प्रस्त न हो जाय। इंगलैंड का गेहूँ जल्नी रोग प्रस्त हो जाता था, किन्तु रूम का एक प्रार का घुटका नाम का गेहूँ दम विषय में बहुत अच्छा है। इसमें जल्दी रोग नहीं पाडता है। वीन ने अंगरेजी गेहूँ के माथ रूम के इस घुटमा नाम के गे, का सयोग राया। फिर पूक्त प्रभार मे निर्वाचन के - वशानुनम विज्ञान परिणाम में उन्होंने ऐसा गेहूँ उत्पन किया है जो अमेरिका के गे, की तरह अन्छा होता है, इंगलैंड की तरह उसकी पैदावार अन्छी होती है एव रूस के गेहूँ की तरह वह जल्दी रोग प्रस्त नहीं होता। इसके अतिरिक्त यह गेहें जाड़े तथा वसन्त ऋतु मे पैदा रिया जा सकता है। कभी कभी ऐसा भी देखा गया है कि पौधा को रोगमुक्त करना असम्भव नहीं तो अत्यत कठिन कार्य अवश्य है। एक दूसरी तरकीय से पौदा की ऐसी उन्नति भी की जा सस्ती है, जिससे रोगप्रस्त ही न हो सके। अमेरिका में कुछ ऐसे गेहूँ उत्पन्न होते हैं, जिनमें शरद ऋतु में रोग उत्पन हो जाते हैं। इस रोग से मुक्त करने के लिए उन गेहुँओं का, देशस्न, तथाकथित असभ्य निवासियों द्वारा उत्पन दिये जानेगाते एक दूसरे प्रकार के गेहुँमा के साथ सयोग कराया गया। इसक परिणाम मे ऐसे गेहैं उत्पन हुए, जो शरद् ऋतु के दो एक सप्ताह पूर्व ही तैयार हो जान लगे। इस प्रकार वे गेहूँ शरद् ऋतु के रोग से मुक्त हो गये। सोवियट रूस में और भी कई विस्मयकर आविष्कार हुए वहाँ पर गेहूँ और राई मे सयोग करा के एक नवीन प्रकार का गै उत्पन्न क्यिा गया है। जिन प्रान्ता में पहले न गे, ही उत्पन्न हो सकता था और न राई ही उन प्रान्ती में अन इस नवीन प्रकार का गेहूँ यथारोति उत्पन्न हो सस्ता है। वहाँ पर इससे भी एक और आश्चर्य-जना पात हुई है। रूस मे एक प्रकार की घास पैदा होती है, जिसे काउच प्रास कहते हैं। प्रतिवर्ष यह घास अपने आप उगा करती है। जमीन के नीचे इसके बीज सदा के लिए रहते हैं। सानियट रूम के वैज्ञानिस ने इस घास के साथ गे का संयोग कराया है, जिमके परिणाम म पर रूम के एक विशेष मान्त म काउच प्रास की तरह गे भी प्रतिवर्ष अपने श्राप पैदा हा परता है। यह गेहूँ अभी बहुत अच्छे प्रभार का नहीं हुआ डारविन, गैस्टन, मेडेल के श्रानिप्पार है, कि तु इस पर अभी परीनाएँ हो रहा है। आशा की जाती है कि शीघ्र ही इसकी उन्नति हो जायगी। गेहूँ के अतिरिक्त भालू के सम्पध में भी रूस मे बहुत मी परीक्षा हो चुरी हैं और हो रही है। विगत १६वीं शताब्दी मे दक्षिण एव मन्य अमेरिका से दो प्रकार के बाद यूरोप म पहुँचे थे। इन दो प्रकार के पालुआ से ही नये नये आलू उत्पन्न होने लगे। रूम में आलू की उन्नति के लिए नाना प्रकार की परीक्षाएं होने लगी। इन परीक्षाश्रा का उद्देश्य ऐसे पाल उत्पन करना या जिनकी खूब पैदावार हो, जिन्हें बाजार में सबसे पहले पहुँचाया जा सके, ताकि अधिक से अधिक दाम वसूल हो सके जो देखने में न अधिक बडे ही हों और न अधिक छोटे, जिनकी गोलाई अण्डे की तरह हो और छिलका खून पतला हुश्रा परे, जिनका रंग सून साफ हो, जो साने में स्वादिष्ट हा जल्दी गल जाया करें और जिनमें जल्दी रोग न उत्पन्न हो सकें। किन्तु कुछ परीक्षाओ के वाद यह देया गया कि थोडी उन्नति होने के पश्चात् उन्नति रुक गई। तर दक्षिण और म य अमेरिका के पेरू बोलीविया, चिली, मैक्सिो, ग्वातेमाला आदि स्थानो से नगीन प्रकार के बाल लाने के लिए श्रादमी भेजे गये। इन प्रदेशो में ही पाल के प्रति प्रकृति देवी को विशेष कृपा थी। इन प्रदेशो से नाना प्रसार के आलू रूम मे लाये गये। इन नई नस्लों में अब रूस में नाना प्रकार के आलु उत्पन्न किये गये हैं। इन नवीन प्रकार के पालुआ मे अब जल्दी रोग नहा लग सक्ते, पाला में भी अब ये नष्ट नहीं होते हैं और ऐसे प्रान्तों में ये उत्पन्न किये जाने लगे हैं, जहाँ पर पहले पाल ना होते थे। यूरोप में गेहूँ का जैसा श्रादर है, वैसा ही आदर भारतवर्ष तथा अमेरिका में मुट्टा का भी है। हाइड्रालिसिस (Hydrolysis) नामक एक प्रक्रिया द्वारा मुझे से चीनी बनाई जाती है। मुट्टो में वंशानुक्रम विज्ञान शरान भी बनती है, शिल्प में व्यवहार योग्य स्पिरिट भी बनती है ओर इसके अतिरिक्त इससे दूसरे पदार्थ भी बनते हैं। मुके पेड से कागज तथा नाली रेशम आदि भी बनते हैं। इन सब कारण से अमेरिका में भुट्टों के बारे में भी बहुत सा परीक्षाएँ हुई है और उसमे वहाँ पर बहुत कुछ उनति की गई है। सोनियट रूस में गेहूँ के बारे म ऐसी उन्नति की गई है कि वहाँ पर जाडे की पसल मियों में और गर्मी की पसल जाडो में उत्पन्न की जा सकती है। उस देश मे जगला म एक प्रकार का पादा होता है, जिससे रवर निकलती है। रूस के वैज्ञानिका ने उस जगली पौधे को अपनी इच्छा के अनुसार लगाया है, और उमसे अच्छा रसर स्पन किया है। सन् '३९ के मार्च महीने म मास्को में इन वैज्ञानिका का एक सम्मेलन हुआ था। उस सम्मेलन म उपर्युक्त बातों पर बहुत प्रकाश डाला गया था। तीसरा परिच्छेद वंशानुक्रम की प्रक्रियाएँ जीव की उत्पत्ति-हमारे उपनिषद् के एक महावाक्य से संसार श्राज भली भाँति परिचित हो गया है--एको बहु स्याम । फ से ही बहुत हुआ है। एक तनिक से योन में, स्तिना विशाल वट वृक्ष उत्पन्न हो जाता है। एक से ही समस्त विचित्रता परिस्फुट होती हैं। समता से विपमता में, अव्यक्त से व्यत म जाने का ही नाम सष्टि है। यह परिदृश्यमान जगत् कितना वैचियपूर्ण है, किंतु इसका विकामा चातु से ही हुआ है। टम कारण स संसार म महस्रों विचिननामों के यीच कुछ माटरय चशानुस्म की प्रक्यिाएं ३३ मी दृष्टिगोचर होता है। इन निपमवाओं में सादृश्य को देखना ही ज्ञान विज्ञान का कार्य है। जीन विज्ञान से बाज यह पता चला है कि एक ही प्राणमस्तु विशिष्ट क्षुद्र काप से समस्त प्राणिनगत् की सष्टि हुई है। ससार म मनमे शुद्र प्राणों में एक ही कोप रहता है। मलेरिया, हैजा, प्लेग श्राति के रोग जिन जीनाणुश्री से उत्पन होते है उहे बैक्टीरिया कहते हैं। मभरत जीव-ससार में इनमे छोटे जीनों का अस्तित्व नटा है। एक ही कोप से इनकी देह धनती है। मे भी जीर है, जिनकीरह अनेक कोपा के सम्मिलन से बनती है। इन कोपा से विस्मयका वस्तु ससार में शायद दूसरी कार्ड न हो। प्राणशक्ति पी एक चूँद का जोर-काप कह मक्त है। कोप एक जीव त वस्तु है। मनुष्य-देह में कोटि-काटि काप वर्तमान हैं। मनुष्य-देह के कोप को मिनेमा के चित्रपट पर, उसकी प्रकृति को कई गुना बढार, दिनाया जा सस्ता है। उस समय न्सरी थाति मनुष्य से भी बढ़ जाती है और तर उस कोप क अन्तर्गत नाना प्रकार के अङ्ग-प्रत्यग के विचित्र मचालनों का हम स्पष्ट देख सकते हैं। मनुष्य के वीर्य की एक बूंद मे दम करोड कोप है। दन्त-मनन के एक लोटे से ट्य व पर की टोपी में जितना वीर्य पा सरना है उममें मौ करोड कोप रह मस्त है। अर पाठक अनुमान कर सकते हैं कि ये कोप कितने छोटे होत हैं। इन्हीं कोपो के ममूह से अङ्ग प्रयङ्ग बनने हैं। इन व्यक्तिगत कोपों की अपेक्षा कोपों के ममूह के बारे में वैज्ञानिक गए कहा अपि जानते हैं। जीव कोप से ही जीय की उत्पत्ति-जीर दो प्रकार के होते हैं-एर निमम देवल एक ही दोष रहता है और दूसरा निममें बहुत कोष रस्ते हैं। जोर की उत्पत्ति कोप से ही होती है। प्रधानत तीन प्रशर मे जीन की वशद्धि होती है। इस ३४ शानुस्म विज्ञान संसार में प्रथम जीव की उत्पत्ति कैसे हुई है, वैसे इस जड़ जगत म सबसे पहल माणशक्ति का स्फुरण हुश्रा है-यह एक अत्यन्त गूढ, रहस्यपूर्ण एवं जटिल वैज्ञानिक प्रश्न है। यह आधुनिक मिजान का एक विशेष अनुस धान का विषय है। हम यहाँ पर केवल इतना ही कह देना पर्याप्त समझते हैं कि आधुनिक विज्ञान के अनुसार, माण से ही प्राण की उत्पत्ति होती है--सा माना जाता है। और इस प्राणशक्ति का अन्तिम रूप जीवित जोय कोप में ही प्राप्त होता है। कभी तो एक-कोप निशिष्ठ जीव द्विसण्डित होकर दूसरा जौच धनता है और कभी बहु कोष विशिष्ट जीव से केवल एक हो कोप निफ्लकर उससे दूसरा जीव उत्पन होता है। कभी-कभी यहु-कोप विशिष्ट जीव देह मे कोपा का समूह अथना उसका एक विशेष अङ्ग देह मे थलग हो जाता है और उससे नवीन जीव की उत्पत्ति होती है। इसके अतिरिक्त कभी एक ही देह से दो कोप निकलते हैं और इन दोना कोपा के सम्मेलन में एक नरीन जोर की उत्पत्ति होती है। और कभी पभो दो जीना से एक एक कोप निकलकर सम्मिलित होते है और उसमे एक नगन जीव का जन्म होता है। अत म कही गह इस रीति में ही मैथुन के परिणाम म जीव को स्पति होती है। दूसरी गतियों में गिना मैथुन के ही जार की उत्पत्ति हो सकती है। जीर-वैज्ञानिस्गण कहते हैं कि जैसे और स्थाना म वैसे ही मारिण-जगत् में भी प्रभारभेद अर्थात् श्रेणीभेद का करना प्राय असम्मा है। विभिन भणियो एक दूसरी से इतने,पनिष्ट रूप से सम्बन्धित है कि एम श्रेणी को दूसरी श्रेणी से अलग करना अत्यन्त पठिन कार्य है, तथापि विषय को सममने के लिए श्रेणी विभाजन काशेिष धारश्यस्ता होती है। एफ-कोप विशिष्ट नीर की वंश-वृद्धि तीन प्रगर से हो मस्ती है-(१) शेप में दो टुरडे हो जान हैं और इस प्रकार
वशानुनम की प्रक्रिया
।
एक जीव क स्थान पर दो जीन उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार
पिता की दह से दो व्हों की उत्पत्ति होती है, और पिता के अस्तित्व
का अासान हो जाता है। जीव उत्पत्ति की इम रीति को अंगरेजी
में मिशन ( Fission ) कहते हैं। (२)पिता की देह पर एक
ननीन देह उगती है और फिर वह नवीन उटगत देह पितृ-देह से
अलग हो जाती है। हम दुसरी गति में पितृ-देह का अवसान
नहीं होता। जीन उत्पत्ति की इमरीति को अँगरेजी भाषा मे
बटिग ( Budding ) कहते हैं। टम गति में भी एक कोप
के ही दो टुक्डे हो जाने का दृष्टान्त मौजूद है। (३) एक कोप
सेही बहु कोषों की उत्पत्ति होने को सॉरप लेशन (Sporulation)
कहत है। इस रीति का एक और विशेष रूप भी दृष्टिगोचर
होता है। जर पितृ देह पर एक कोप निकलकर वह इसम अलग
नहीं हो जाता और पितृ-देह पर रहते हुए ही वह कोप अपना
नवीन जीवन प्रारम्भ करता है तब उम विचित्र जीव की कॉलानी
(Colony ) कहते हैं।
इन रीतियो म निना मैथुन के ही नतीन जीव की सृष्टि होती है,
किन्तु इस नियम का अपवाद देखा जाता है।
नहु योप पिशिष्ट जीव की शद्धि प्रानत दो प्रकार में
होती है--(१) देह का विमाजिव हो जाना—कमा नायक
कोप पितृ-नेह मे निकलर एक अलग जीव बनता है और
वहकोप, मामूहिर म्प मे पिनट में अदा
कोपा के मामूहिक रूप में ही देह क अहह .
सा अर्थ यह हुआ कि पितृत
जान
हाकर, स्वतन्त्र जीन बन जाता है। मnि
दृष्टिगोर नहीं होती। (२) ल मगर
परिणाम में ही जीव की स्थान है।
भी बहुत ही ग्हम्यपूर्ग धान पार ई.
वशानुनम विज्ञान जब पुरुप का वीर्य स्त्री के अण्ड मे प्रविष्ट होता है। ये पुस्प और स्त्री स्वतत्र रूप से जीवन निताते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि एक ही प्राणी मे पुरप का वीय और स्त्री का प्रएट दोनों उत्पन होते हैं। पौधो मे और निन्नस्तर के जीनों में ऐसे दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। कभी कभी ऐसा भी देसा गया है कि पुरुष के वीर्य के साथ सयुक्त न होकर भी स्त्री के अण्डे से ही जीव की उत्पत्ति होती है। इसे अंगरेजी में पार्थेनोजेनेसिस् ( Parthenogenesis ) कहते हैं। सबसे सरल आकार विशिष्ट जोर और पौधा में केवल एक ही कोप के अस्तित्व का प्रमाण मिलता है। किन्तु ऐसी भी वस्तुएँ हैं जिन्हें न पौधा ही कहा जा सस्ता है और न जतु ही। इन वस्तुप्रा को अंगरेजी मे प्रोटिस्टा (Protista) पहते हैं। ऐसा अनुमान पिया जाता है कि मोटिस्टा से ही उद्भिज और प्राणियों की उत्पत्ति हुई है, अर्थात् प्राणी और उद्भिजों में सीमा रेसा का साचना सम्भव नहीं। फोप का विभाजन और उसका परिणाम-कोप के निरास की एक सीमा है। उस सीमा ता पहुँचने पर कोप दो टुकडो में विभाजित हो जाता है। ये कोप के दो टुकडे फिर अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लते हैं। इस प्रकार एफ-काप विशिष्ट जीन से दूसरे जीन की उत्पत्ति होती है। यह दूसरा जीर अपने पिता के पूर्ण अनुरूप होता है। एक कोप के दा टुडे हो जाने की रीति भी बहुत ही रहस्यपूर्ण है। एक कोपर दो टुाडे होते समय उस दोष के अंतर्गत समस्त वस्तुएँ भी ठीक-ठीक दो हिस्सों म विभाजित हो जाती हैं। फिर वे आधी आधी वस्तुएँ पूर्णता का प्राप्त कर लेती हैं। कोप के श्रदर शदद जैमा एम तरल पदार्थ प्राप्त हाता है। एमे अंगरेजी में मोटोप्लारम (Protoplasm)
।
चशानुनम की प्रक्रिया
पहत हैं। शदद सदृश इस पदार्थ में एक और अण्डाकार
पदार्थ भासमान रहता है। इस भासमान अण्टासर पदार्थ
को उस कोप की 'नाभि" कह सस्त हैं। इसे अंगरेजी में
न्यूक्लियस (Nucleus) कहते हैं। इस नाभि के अन्दर एक
प्रकार क और पदार्थ प्राप्त होते हैं, जो सूत्र के सदृश होते हैं।
'नामि' के अन्दर ये जाल के समान एक दूसरे मे लिपटे पने
रहते हैं। इन पदार्थों को अंगरेजी में मॉमोमामम् ( Chromo
somes ) कहते हैं। इस सून-महश पदार्थ को हम हिन्दी
में वशसून पहेंगे। नाभि के अन्दर ये वंश-सूत्र (Chrom
osomes ) पानी सदृश एक तरल पदार्थ में भासमान रहते हैं।
कोप के निभाजन को अंगरेजी में मॉइटामिम् ( Mitosis)
कहते हैं। इम विभाजन के कई ए स्तर हैं। वास्तव में
कोप का निभाजन तेल की घार सहश अनिच्छिन एप एक
परिपूर्ण क्रिया है। किंतु सममने की सुविधा के लिए इस
रिया को निमिन स्तरों में टानकर हम इस क्रिया को पूर्ण रीति
से समझने की चेष्टा करते हैं । इसी प्रम स्थिति को
अंगरेजी में रेस्टिग फेन ( Resting Phase) कहते हैं और
हिंदी में हम इसे साधारण स्थिति कह सकते हैं। इस साधारण
स्थिति में न्यूक्लियस अर्गन् नाभि के अन्दर की वस्तुओं को
हम ठीक-ठीक देस नहीं पाते। इसके अन्दर जो लम्बे पोर
सूक्ष्म सून सदृश पदार्थ रहते हैं वे इस प्रकार एक दूसरे में
लिपटे रहते हैं कि उन सूनों को अनग अलग देखना असम्भव
सा है। जिम तरल पार्थ में ये सून भासमान रहते हैं,
उसमे ये मानो कोप की साधारण स्थिति में घुले रहते हैं।
जा इस कोष में कोई रङ्ग डाला जाता है, त यह देखने
में आया है कि न्यूलियस श्रर्थान् अभिके स्थान पर
अधिक रङ्ग एकत्र होता है। फिर जन क्सिी ऐसिड से
वशानुनम विज्ञान इस रङ्ग को साफ कर दिया जाता है तर कोप का और सन स्थान तो साफ हो जाता है, किन्तु 'नामि' अथवा न्यूहियस क स्थान में कुछ रङ्ग रह ही जाता है। नाभि और कोष म स्थित शहद सदश अर्ध-तरल पदार्थ के बीच एक सूक्ष्म पदा रहता है। यह पर्दा और इसके अन्तर्गत 'नाभि' के अन्दर स्थित पानी से तरल पदार्थ में रन नहीं टिस्ता। किंतु इम पानी-सदृश पदार्थ में, तेरते हुए, अपेक्षाकृत एक कठिन पदार्थ और इसके अतिरिक्त सूत्र-सदृश कुछ और पदार्थ हैं। इन सब पदार्थों में ही रङ्ग ठीक ठीक जमता है। ऐसिड के दने पर भी यह रह जाता नहीं। इन सूर-सदृश पदार्थों का मामैटिन (Chromatin) कहते हैं और नाभि के बीच क कठिन पदार्थ को यूक्लिश्रोलस् ( Neucleolus ) कहते हैं। सन कोपों में यूक्लिअोलस नहीं रहत हैं। इस नामि के बाहर म और पदार्थ रहता है जिसमा अँगरेजी नाम सेन्ट्रॉसाम (Centrosome) है। सेन्ट्रॉसोम भी मय फोपा म नहीं रहत । नन सर पदाथा के अतिरिक्त पोप म और भी पदार्थ रहत हैं, जिनका पूरा वर्णन यहाँ पर नहीं दिया जा सकता। रेस्टिङ्ग फेज श्रथात् साधारण स्थिति के बाद काप निभाजन की दूसरी स्थिति का अंगरेजी म प्राफेज ( Prophase) कहत है। हम अँगरेजी नाम इसनिए द रहे हैं कि इससे पाठकों का बाद म इस विषय पर बड़ी पुस्तक पढ़ने म सुविधा होगी। इन मर नामा और इनकी रिया से परिचित हा जान स पाठ का विषय के समान में बहुत प्रामानी होगी। इस द्वितीय स्थिति में नॉमासाम अर्थात् वश-सून स्पष्ट दिपाई दन तगत हैं और तब यह प्रनीत हाता है कि ये कामोसोम अर्थात् वंश-सून जोड़ जोड़े में हैं। इस एक-17 जोड़े के एक-एक रिसे को क्रोमैटिट्स (Chromatids) कहते हैं। द्विनीय स्थिति में ये यश-सून ।
वंशानुक्रम की प्रक्रियाएं मवीर्ण होने लगते हैं। छोटे होते-होते ये अपने वीसमें हिस्मे तक लम्बाई में दोटे हो जाते हैं। इस दूसरी स्थिति में एक-एक जोडा कॉमोमोम अर्थात् वश-सून अलग अलग रहते हैं और उनके दोनों भाग एक दूसरे से लिपटे दिपाई देते हैं। दम दूसरी स्थिति में य कॉमोसोम अर्थात् वश-मून कुएटलाकार रहते है । एक क्रॉमोमोम के दोनों भाग कैसे एक दूसरे से युक्त रहते हैं, अभी तर टममा रहस्योद्घाटन नहीं हो पाया है। कोई अश्य शक्ति मॉमोसोम के दोना मागों को एक दूसरे के माय सयुक्त रखती है। मॉमोमोम अर्थात् वंश सून के दोनों भाग एक दूसरे के बिलकुल अनुरूप होते हैं। कोप-विभाजन की दूमरी स्थिति में 'नामि' के वाहर स्थित सेन्द्रोसोम मी दो भागों में विभानित हो जाता है, और ये दोनों माग एक दूसरे से कुछ दूरी पर सिमा जाते हैं। कोप रिमानन की तृतीय स्थिति में क्रोमोसोम और भी छोटे और मोटे हो जाते हैं और इस बीच में मेट्रॉमोम के दोना भाग 'नामि' के दोनों तरफ ठीक एक दूसरे के मुसानले में श्रा जाते हैं। 'नामि' के इन दोनों स्थानों को, जहाँ पर सेट्रॉसोम के दोनों भाग एक दूसरे के मुतागले में श्रा जाते हैं पोल्म ( Poles ) कहत हैं। इस मुहर्च में 'नामि' और कोप के अन्दर के राम सहश अर्ध-तरल पदार्थ के बीच का पालन हो जाता है, तब मॉमोसोम कोप के अदर उम अर्ध-तरल पदार्थ में मासमान रहने लगता है। इन मा परिवर्तनों के साप-माथ कोप के अन्दर स्थित दूमरे पटायो म भी परिवर्तन होते रहत हैं। पाठक याद रक्सेंगे कि हम तीमरी स्थिति में सेन्ट्रॉमोम दो भागों में विभाजित होकर, एक दूसरे के मुखारने में, 'नाभि के दानों और पा जाते हैं। इन दोनों पोलों' में स्थित सेन्ट्रॉसीम के बीच के पार्थ इस तरह से सज जाते हैं, मानों किमी टोटी सी लण्डी के टुकड़े में सूत लपेटने मे बीच में फूल आया हो। ये पदार्थ टम समय रेशे मे निसलाई पदत ३ वंशानुक्रम विज्ञान है । इन दोनों पोनों के बीचोबीच के स्थान को इस्वेटर (Equator ) कहते हैं। कोप विभाजन की तृतीय स्थिति मे नॉमोसाम अर्थात् वश-सूत्र इक्वेटर के पास चले पाते हैं। इस तृतीय स्थिति को अंगरेजो म मेगफेन ( Meta phase) कहते हैं। कोप के विभाजन की चतुर्थ मिति को अनोफेन ( Ana phase) कहते हैं। इस स्थिति मे एस जाडा कॉमोसाम के दोनो भाग जो कि एक दूसरे के अनुरूप हाते हैं, दोनो पोलों की ओर चलने लगते हैं। इस प्रकार प्रत्येक पोल म एक एक जोडा कॉमोसोम के श्राधे आधे भाग एकत्र हो जात हैं। अर्थात् दोनों पोला में स्थित सेन्ट्रॉसोम के श्राधे आधे टुकडे प नाभि' अर्थात् न्यूक्लियस को तरह बन जाते हैं और उन नाभियो' में एक जोडा मिोसोम के श्राधे श्राधे कॉमोसोम आ जाने से एक कोप दो कोपों म परिणत होन लगता है कोप विभाजन की पाँची स्थिति को टेलोफेन (Telophase) कहते हैं। काप निमाजन को यह अतिम स्थिति है। इस स्यिा में 'नाभि' और कोप के अन्दर स्थित अर्ध-तरल पदार्थ के वीर फिर एक सूक्ष्म पर्दा बनता है, और श्राये प्राने नोमोसोम फिर अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लते हैं। यह अन्तिम स्थिति, कोप की पहली स्थिति की तरह, साधारण स्थिति म परिणत हो जाती है। एक जोडा मॉमोसोम का एक हिस्सा फिर से जोडा बन जाता है, इसम वैनानिरा में मनभेद है। किमी क्सिा का कहना है कि एक नाडे का आधा हिस्सा मॉमासाम काप म स्थित पदाथा से ही अपना जोडा बना लता है, और स्मिी क्सिी का यह अनुमान है कि एक हिस्मा कॉमासाम लम्बाई में दो टुडे म हा जाता है, और फिर ये टुकड़े अपनी पूर्णता का प्राप्त कर लते हैं। इस प्रवर एक कोप, द्विसण्डित होरर, दो कोपा में परिणत हो जाता है।
वशानुक्रम की प्रक्रियाएँ
४१
मोमैटिन
चूक्लियस्
कोष
से ट्रॉसोम
न्यूक्लियोलम
१-(क) और (स)-कोप की साधारण स्थिति ( Resting
phase )। कोप साधारण स्थिति से दूसरी स्थिति में
परिवत्तित होने को है
२ (ब)
Co
कामोमोम
२-(क) और (स)-कोप की दूसरी स्थिति-Prophase,
४२ वंशानुनम विज्ञान ३~-(क) और (A)-कोप की तीसरी स्थिति-Metaphase। इस स्थिति म यश सून' (Chromosomes) इक्वेटर (Equator ) मे आ गये हैं। 0 N R Tha ४-(क) और (स)-कोप की चौथी स्थिनि-Ana phaser इस स्थिति म द्विसपिटत सेदोसोम (Centrosome) की दोनों ओर मॉमासाम ( Chromosomes ) पनि हो रही है।
४३ वंशानुक्रम की प्रक्रियाए - ५-(क) और (स)-कोप विभाजन की पाँची स्थिति- न्युछियस के, केन्द्रविन्दु, नाभि के चारों ओर पर्दा बन रहा एप दो अलग कोप बन रहे हैं। ६ अतिम स्थिति–एक कोप से दो कोप वन गये हैं। इसी प्रकार, एक कोप निशिष्ट जीन का वशद्वि एप बहु कोप रिशिष्टजीवन्नेह की उत्पत्ति तथा उसका विकास एक कोप के द्विखण्डित होने पर और फिर उसकी पूर्ण परिणति हो जाने पर ही हुआ करता है । मनुष्य का जन्म किस प्रकार होता है-म पहले ही पता चुके हैं कि ऐसे बहुत से प्राणी हैं जिनका जन्म विना मैथुन के ही हुआ करता है। किन्तु मनुष्य का जम मैथुन से ही होता है। पुस्प देह नि मृत शुक्र के साथ स्त्री देह स्थित अण्ड के सम्मिश्रित होने पर ही सन्तान की उत्पत्ति होती है। पुम्प का शुक्र और स्त्री का श्रण्टकोप विशेष प्रकार के जीन-कोप हैं। जीव-देह से जीव देह की उत्पत्ति नहीं होती। जीव-देह में असत्य कोप है। ये जीव-वस्तु से पूर्ण हैं, जीवन्त हैं, किन्तु इन कोपा से जीन की उपत्ति नहीं होती। पुरुष के वीर्य में अथवा वंशानुक्रम विज्ञान स्त्री के अण्डकोप में जो कोप वर्तमान हैं, उहे अँगरेजी में जर्म सेल्स ( Germcells) अथना ग्याँ मेट (Gamete) कहते हैं। हिन्दी मे हम उह वीज कोप कहेंगे। पुरुष का शुभ अर्थात् वीज कोप जर स्त्री के टिम्नकोप अथवा टिवाणु ( Ovum) मे अनिष्ट होता है तभी जीन का जम होता है। हिंदुओं के वेद्या अन्य "भाव प्रश" मे अवश्य यह कहा गया है कि पुम्प के ससर्ग से रहित होकर भी स्त्री जीव को जम देसाती है। निन्न श्रेणी के जीवा में यह बात पाइ गई है, किन्तु मनुष्य के बारे में इसका कोई दृष्टात हमे उपलध नहीं है, यद्यपि ऐसा कहा गया है कि हजरत ईसा का तथा श्रीरामकृष्णदेव का जम पुरुप ससर्ग से नहीं हुआ था। साधारणतया एक समय म एक ही पु वीज-कोप स्त्री के टिम्वाणु म प्रवेश कर सस्ता है। पुरुष के शुभ में कोटि कोटि चीज कोप रहते हैं। इनमे से केवल एक ही वीज-कोप स्त्री के डिवाणु में, अर्थात् स्त्री धीज-योप मे, प्रवेश कर पाता है। एक पु-बीज कोप के, स्त्री के एक डिम्मकोप में प्रविष्ट हो जाने पर डिग्रकोप का बाहरी पर्दा इतना पठिन हो जाता है कि फिर उममे दूसरा j चीज-कोप प्रवेश नहा कर पाता। सभर है, पु-बीज कोपा में यह प्रतिद्वद्विता हो कि कौन थीज कोप मनसे पहल स्त्री के श्रएट कोप में प्रविष्ट होगा। ऐसा भी अनुमान होता है कि स्त्री का अएकोप भी पुरुष के बीज रोप को अपनी ओर प्रापित करता है। पुस्प के कोटि-कोटि चीनकोप स्त्री के श्रण्टरोप के चारों ओर तैरत रहते हैं। एक समय अण्डरोप का एक अश पुत्र स्फोत हो उठना है और उसमें केवल एक ही पुबीज कोप प्रवेश कर पाता है। लक्ष काटि पु-बीज कोपा की वापस की प्रतियोगिता में केवल एक ही पुं-बीज-योप सफलता को प्राप्त करता है, यानी सर यही आदरोष के चारों ओर तैरते-तैरते विनष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार जोर से ही जीव की उत्पत्ति होती है। किंतु पिता अथवा ।
वंशानुग्म की प्रक्रियाएँ माता का एक बिन्दु भी रक्त सतान को प्राप्त नहीं होता-बीज कोप से ही भ्रूण की उत्पत्ति होती है और एक भ्रूण कोप से ही जीव की पूरी देह बनती है। रितु बीज कोप पूर्ण देह को बनाकर भी स्वय पूर्ववत् देह से भिन और परिपूण रहता है। हमारे शानो में कहा गया है-पूर्णस्य पूर्णमादाय पूणमेवावशिष्यते । वीज-कोप इसका जीवन्त दृष्टात है। एक बीज कोप से वश परम्परागत अन त पुरुपा का जम होता रहता है, किन्तु वह वीज- कोप फिर भी पूर्ववत् हो वना रहता है। जीव उत्पत्ति से बढकर दुसरी कोई पाश्चर्यजनक घटना इस मसार में नहीं हो सकती । जैसे एक मशाल से दूमरी मशाल में अग्नि प्रचलित का जा सकती है, उसी प्रकार एक ही प्राणविन्दु से अनत जीवों का जन्म होता रहता है। स्खी का अण्टकोप अथवा अण्टाणु पुस्प के वीज-कोप से बहुत बडा होता है। जब पुरुप-बीज-कोप की 'नामि' अर्थात् न्यूठियस् स्त्री अण्टाणु की नाभि से युक्त होती है, तन भ्रूण- कोप का जन्म होता है। इस भ्रूण-योप को अंगरेजी में जाइगॉट (Zygot ) कहते हैं। यही जीव का जम है। एक भ्रूण कोप द्विरवरिटत होर दो कोपों में परिणत होता है। दो से चार और चार से चार हजार और चार हजार से कोटि-कोटि कोपों की सृष्टि होती है । किसी कोप-समूह से त्वचा यनती है, रिसी से हड्डी और किसी से चक्षु । इस प्रकार स्त्री और पुरुष के एक एक कोप के मिलने से एक नवीन कोप की उत्पत्ति होती है और इस एक नवीन कोप से जीव की परिपूर्ण देह एव पीज कोप बनते है । क्रॉमोसोम और जेनि-प्रत्येक जीव कोप में एक एक के द्र- निन्दु अथवा 'नामि' रहती है। इन केन्द्र बिन्दुश्री में, अर्थात् नाभियों में, कुछ सूत्राकार पदार्थ रहते हैं। कोप के विभाजित होने के पूर्व ये सून स्पष्ट रिसाई नहा दते। कोप के तरल पनार्थ में ये धुले से रहते हैं। इम घुली हुई अवस्था मे इहे क्रोमटिन इस प्रकार
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वशानुनम की प्रक्रियाएं
४७
(७)
+
NA
नामोमोम का विभाजन
पानापेचको अवस्था
(e)
एक कोष से दो रोपो की उत्पत्ति
स्थान पर स्त्री
अरटाणु रहते है
जरायु या थैली निसमें भ्रण' जम
लेता है और बच्चा मा के पेट में पर
वरिश पाता है
इस स्थान पर
के अण्डाग रहते हैं
की जद ऋतुमती अथात् रतस्वला
जाती है तब उसका अएगणु
जरायु की ओर चलना है
योनि-द्वार मे पुरुष यौनकोष
जरायु के भीतर से स्त्री अण्डाणु
वी और पाता है
४८ पेशानुनम विज्ञान . । कहते हैं। और कोप के विभाजित होते समय जब ये स्पष्ट दिसाई देने लगते हैं, तन इहे मॉमोसोम कहते हैं। इन प्रॉमोसोमा में और भी सूक्ष्म पदार्थ है, जिन्हें अंगरेजी में जेनि ( Gene ) करते हैं बहुसरया जेनियों के माला सदृश एक सूत्र में गुंथे रहन से माना एक एक प्रॉमोसाम बना है। ये सन वार्ते पहले ही बता दा इन सब बातो को ध्यान में रखते हुए अन हम आगे बढना होगा। प्रत्येक जाति के जीप-कोपा में, एक ही प्रकार के एन एक ही सरया मे, वश-सूत्र ( Chromosome) जोडे जोडे में रहते हैं। मनुष्य-मान के जीव-योषा मे प्रति अपना मे, चोनीस जोडे अर्थात् ४८ यश मून रहते हैं। एक प्रकार की मक्सी में केवल चार जोडे ही रहते हैं, और किसी रिसी जीव म ८०० जोडे अर्थात १६०० मॉमोसाम पाये गये हैं। एक जोडे कॉमोसाम का एक एक भाग उसके दूसरे भाग के बिलकुल अनुरूप होता है। इस अनुरूपता को अँगरेजी मे होमोलोगस् (Homolo gous) कहते हैं। जब कोप का विभाजन होता है, तर एक-एक कॉमोसोम लम्बाई म दो-दो टुझे में विभाजित हो जाता है। इन टुण्डों को अंगरेजी मे प्रोमैटिड्स् ( Chromatids ) कहते हैं। साधारण जीर फोप का इसी भाँति संगठन होता है। मितु वाज कोप का सङ्गठन कुर और प्रकार का होता है। योज-कोप में कॉमोसोम जोडे जोडे म नहीं रहते हैं। जैसे मनुष्य की देह के कोप में चौगस जोडे श्री १८ मॉमोसोम हैं, रितु मनुप्प के बीज-योप में ये २४ प्रोमोसोम, जोडे-जोड़े म न रहर, हर एक जोडे का एक एक कॉमोमोम, अलग अलग रूप में रहता है। इस कारण जर स्त्री और पुरप के योज-कोप सम्मिलित होत है, तरनी बीज कोर से २, र पुरुष बीज कोप से २४ मॉमोसाम, सम्मिलित होते हैं, और तर अण-कोप में, २४ जाड़े अर्थात् ४८ तामासाम बन जात हैं। देह के साधारण कोष में जितने प्रॉमासाम वशानाम की मस्यिाएं ४९ । रहव हैं उन्ह अँगरेजी म टिप्लॉयट ( Diplord ) कहते हैं। और वीन कोप के ( Gametes) मॉमोसोम को हेप्नायड ( Haploid ) कहत हैं। श्रर्थान् जब देह के साधारण कोप म प्रोमोसोम ( वश-सून) जोडे-जोड मे रहते हैं, तब वे टिप्लॉयड़ कहलाते हैं, और जब वे वीज-पोप म (Germcells अपना Gametes ) जोडे में न रहकर केवल एक एक के रूप में रहते हैं, तन हैप्लायड् कहलाते हैं। इस प्रकार मातृ और पितृकोपा से हेप्लॉयड मोमोसोम मिनकर डिप्लॉय ट्रॉमोसोम बन जाते हैं । इस प्रकार भ्रूण-कोप अर्थात् जाईगाट म स्त्री और पुरुप क समान समान वश-सून और उनक साथ-साथ उनके गुण भी चले पाते हैं। अर्थात् वश-सूत्र म, नोमोसोम्स म जा जेनि रहते हैं, उन्हीं के आधार पर माता पिता के गुण अवगुण सन्तान में चल पाते । इन गुणों को फैक्स ( Factors) कहते हैं। अर्थात् 'जेनि' और 'जैक्टस् समान पदार्थ हैं। 'जेनि' या "वश लक्षण-बीज"-प्रयेफ 'वश-सूत्र' में बहुत से दाने होते हैं, यही दाने पूर्वजों के गुण अवगुणों को वशजों में ले आते हैं। ऐमा अनुमान पिया जाता है कि एक एक दाना एक-एक गुण अवगुण का वाहक है। इन्हीं दानों को अगरेजी म जेनि ( Gene ) कहते हैं, हिन्दी में हम इहें 'लक्षण नाज' कह सस्ते हैं। इन्हीं 'जेनि' में ही वशगत लक्षण वर्तमान रहते हैं एक एक जेनि एक-एक लक्षण अथवा "स्टर" का वाहक पु एवं स्त्री, दोनों के वीज-कोपों में ही, जेनि समान रूप से रहते हैं। दोनो वीज कोपों के प्रत्येक 'वश-सूत्र' (Chromosome) में उक्त जेनि के संस्थान भी एक से ही होते हैं। अर्थात् स्त्री के वंश सुत्र' में जो जेनि जिस स्थान पर है, पुरुप के वश सुत्रम भी वही जेनि ठीक उसी स्थान पर है। इस प्रकार मनप्य के एक-एक लक्षण के लिए अलग अलग जेनि हैं, और किसी एक लक्षण क वंशानुनम विज्ञान लिए, स्त्री और पुरुष जेनि को मिलाकर, वीज कोप में दो जेनि रहते है। मनुष्य का प्रत्येक मानसिक तथा शारीरिक गुण अवगुण पितृ और मातृ जेनि द्वारा ही नियन्त्रित होता है। किन्तु यदि पितृ और माट लक्षण चीजों में (जेनि में) अतर रहता है, तो सन्तान म क्सिी एक जेनि का ही प्रभाव 'व्यक्त' होता है, दूसरे जेनि का प्रभाव 'सुप्त' रह जाता है, तथापि सुन रहने पर भी कोई भी जेनि एक्दम लुम नहीं होता। ये जेनि अर्थात् लक्षण नीज एक प्रकार से अमर है। मनुष्य अपने प्रत्येक गुण अथवा अवगुण के लिए, दो जेनि, अर्थान् लक्षण नीज, वहन करता है, किंतु वह अपनी सतान को केवल एक ही जेनि दे सकता है। दूसरा जेनि उसे अपनी माता की ओर से प्राप्त होता है। मान लीजिए "क" जेनि से सुन्दर दृष्टि-शक्ति उत्पन होती है, और उसी के जोड़े "" जेनि से दृष्टि शक्ति दुर्वल होती है। तब जिस व्यक्ति मे दो "क" जेनि रहेगे, अर्थात् पिता और माता, दोना व्यक्तियों से जो व्यक्ति दो "क' जेनिया को प्राप्त करेगा, उसी दृष्टि-शक्ति खूब तज होगी, और जिसमे दोनों जेनि "कहोगे उसरी दृष्टि शक्ति दुर्वल हो जायगी। और जिस व्यक्ति में "क" और "क" दोना जेनि रहेंगे उस व्यक्ति में एक जेनि का प्रभार व्यक्त होगा, दूसरे फा, 'सुभ रहेगा। फितु यह सुप्र प्रभार एक्दम मरता नहा, भविष्य में, अनुकूल परिस्थिति मे, व्यक्त हो सस्ता है। जिस जेनि से "घरल" रोग उत्पन्न होता है, वह वंश परम्परा में धरायर चला श्रा समता है, मितु फिर भी उम वंश में एक भी 'धरल' रोगी का जन्म कई पीढिया तर नहीं भी हो सस्ता, परतु 'धरल' रोग कावीन उस वंश म अश्य रह जाता है। जब माता पिता दोनों की ओर से ही 'धरल' रोग-वाहक दोनों जेनिया का सम्मितन होता है, ठर 'पाल' रोगयुक्त यक्ति का जम होता है। अर्थात् 'जेनि' का नाश पीढ़ियों तक नहीं होता। व्यक्ति थाहर वशानुक्रम की प्रक्रिया देखने में जैसा प्रतीत होता है, वास्तव में वह वैसा नहीं भी हो सस्ता, और वंश का गुण अथवा दोप पीढियो तक गुप्त नहीं होता। भारतीय वर्ण व्यवस्था पर विचार करते समय इस बात का ध्यान रखना अच्छा होगा। ल्यूकेमिया-अभी कुछ दिन पहले तक वैज्ञानिको को यह धारणा थी कि केवल जेनि द्वारा ही वश के लक्षण वंशजो मे आया करते हैं। कितु ल्यूकेमिया नामक एक रोग की चिकित्सा करते समय यह देखा गया कि जेनि के अतिरिक्त दूसरे उपाया से भी ल्यूकेमिया का रोग वंशजों मे उत्पन हो सकता है। इस रोग के कारण देह के जीन कोप रोग से थानान्त हो जाते हैं। मनुष्य के रक्त मे श्वेत एव लाल कोप रहते है। जन देह मे रक्त का बनना कम हो जाता है, तब उस रोग को एनिमिया (Anemia) कहते हैं। और जब रक्त मे लाल कोप कम होकर अंत कोप अत्यात अधिक हो जाते हैं, तब उसे ल्यूकेमिया कहते हैं। आधुनिक विज्ञान की सहायता से देह के विशेष विशेष अगा को देह से अलग करके जीवित रससा जा सकता है। ये अङ्ग- प्रत्यङ्ग कोपों के समूह हैं। इस प्रकार जव देह के विशेष विशेप अङ्ग देह से अलग रस्से जाते हैं तब वे केवल जीनित ही नहीं रहते प्रत्युत समय के अनुसार उनी वृद्धि भी होनी रहती है। किन्तु दह में रहते समय उनी वृद्धि की एक सीमा रहती है, मानो कहीं से समग्र देह पर क्सिी पा नियनण होता रहता है। जन देह का कोई विशेष श्रङ्ग अथवा कोपो का समूह उपर्युक्त नियन्त्रण के वाहर हो जाता है और उनकी अनियन्त्रित वृद्धि होती रहती है, तर वह अङ्ग रोगप्रस्त कहलाता है। इस प्रकार के रोग को अगरेजी में ट्यूमर ( Tumor ) कहते हैं। ल्यूकेमिया भी एक प्रकार का ट्य मर है। इस रोग की चिकित्सा करते समय यह जान पडा कि जेनि के अतिरिक्त दूसरे उपायों से भी यह रोग ।
वंशानुक्रम विज्ञान एक और जटिलता का उल्लेख यहाँ क्यिा जा रहा है। यह बात पहले हो बता दी जा चुकी है कि दो प्रकार के पौधों अथना जीवों के सम्मिश्रण से एक तीसरे प्रकार के पौधे अथवा जीर को उत्पत्ति होती है, जैसे सफेद और लाल पला के सम्मिश्रण से एक तीसरे गुलारी लाले पौधे को उत्पत्ति होती है और फिर इन गुलाबी फूलवाले पौधों से सफेद, लाल और गुलाबी मूलगले पौवे निम्लते रहते हैं। इस दृष्टात में गुलानी फूल को इटर मीडियट टाइप (Intermediate Type) अर्थात् म यवर्ती जाति कह सकते हैं। इस म यी जाति से जैसे उपयुक्त दृष्टान्त में मद, लाल और गुलाबी फूल के पौधे निरला लगे वैसे ही उम मध्यवती जाति से वक्त तीन प्रकार के पौधे अथवा जीवन रूपर होरर फेल एक जाति के अर्थात् मध्यरर्ती जाति के पार अथवा जीव उत्पन हो सकते हैं। श्री गुलारी फूल ये पौरे से गुलानी ही पल उत्पन होते रह, यह भी सम्भर है। मनुष्य जाति म इसका पम श्रदायात मिलना है। निग्रो जाति के काले-काले मनुप्यों के साथ जर यूरोपियना का सम्मिश्रण होता है, तो इसस एफ सीसरी जाति की उत्पत्ति होती है, जिसको अंगरेजी में मलेटोज कहते हैं। इन मनहोजों स एर होग के मनुष्य उत्पन्न होते रहते हैं। इन मलेदोनों के संबंध में यह यात भी पाई गई है कि कभी कमी इन लोगों में शुद्ध श्वेत रंग के एवं काले रंग के व्यक्ति भी उत्पन्न हुए हैं। यह बात भी सम्भव है, जब कई एक जेनि अब स्टर्स के मिलने से एक ही रंग की उत्पत्ति होती हो। जिन स्थाना पर एक जेनि से एक हा विशिष्टता की उत्पत्ति होती है, वहाँ तो वंशानुनम के व्यापार ३ नि सफलता बहुत सरल हो जाती है, किन्तु जद्दों पर कई एर जेनि मिलकर एक विशेषता को उत्पन्न करते हैं अथवा एक हो जेनि कई ।
वशानुनम की प्रक्रियाएं एक विशेषताओं को उत्पन करता है, वहाँ शानुनम का व्यापार अत्यन्त जटिल हो जाता है और कभी-कभी वह मध्य भी रह जाता है। एक जेनि से स्मिी एक विशेषता की उसत्ति के कुछ दृष्टान्त इस प्रकार हैंकभी भी एक रोग के कारण मनुष्यों के हाथ पैरों की उँगलियाँ थसाधारण रूप से छोरी बोटी उत्पन्न होती हैं। एक ही जेनि से ऐमा हुआ करता है। कभी-कभी मनुप्या के पैरों के निम्न माग घुटने से एडी तक टेढे हुआ करते हैं। इसके मूल मे भी एक ही जेनि विद्यमान है। इसके विपरीत मनुष्यों की रोप लिया की बनावट, प्रॉपरों का रङ्ग, दाँता की बनावट, देहा का रहा, मस्तिष्क का ढांचा प्रादि आदि बातें बहुत प्रकार की जेनियों के सम्मिलन पर निर्भर करती हैं। इस कारण इन सब निपयो में वशानुक्रम के व्यापार को मममना अत्यन्त कठिन वात होगई है।* इस स्थान पर एक और भी वात का उल्लेग्न कर देना ठीक होगा। वर्तमान सोरियट रूम म ऐसे बहुत से वैज्ञानिक है, जो मेटेल अथवा मोर्गन के प्राविष्कारों को स्वीकार नहीं करता। वे मेन्टेल के नियमों को श्राजाल हसी उडाने तगे हैं। उन वैतानिशे में 4केल, मिचुरिन और लाइमनको के नाम अधिक प्रसिद्ध है। ग्ल ( A J Frankel) कृषि विभाग के प्रधान है। इनके अतिरिक्त वैनिलाव (Vavilov) एर जेरनैक (Jerback) नामक दूसरे वैज्ञानिक मेन्टेल और मॉर्गन आदि के श्राविकारों का ससार के अन्य वैज्ञानिकों की भाँति स्वीकार करते हैं। सन् .देसिए -Human Heredity by Banr Fisher and Leng Pages 64, 65, 63 also, Heredits. Evgenics+ Social Progress by H O Pribles Pages 31, 33
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वंशानुनम विज्ञान
१९३९ के मार्च महीने में मामले में जो पैनानिका का सम्मेलन
हुआ था, उसम एसे भाडे लगे हुए थे, जिनम यह लिसा था--
'डानिन के झाडे के नीचे" ("Under the banner of
Daram"), सोरियट रूस के वैज्ञानिकगण इस प्रार
मे डेल की हंसी उडाते हैं,~एर थाप और तीन माँ की तरह
अथना एक माँ और तीन बाप की तरह। राजनीतिक उत्तेजना
की तरह वेज्ञानिक विपयो म भी सावियट रूस म वैज्ञानिको म
भी मेन्डेन और मॉर्गन के विरुद्ध विषम उत्तेजना फैली हुई है।
वहाँ के बहुत से नगीन वैज्ञानिक विश्वविद्यालयों से में डेल, मोर्गन
आदि का बहिष्कार करना चाहते हैं ।
लिंकेज तथा कपलिंग की प्रक्रियाएँ-प्रोमोसोम अर्थात्
वश सूर तथा जेनि अर्थात् वश लक्षण पोज आदि के सम्बन्ध में
मेल के नियम को ध्यान म रसने से वशानुक्रम में ज्ञान के
सम्बध की बहुत सी बातो को मममना सरल हो जाता है। गोरी
माता और काले पिता से सत्ताना के रङ्ग कैसे होगे, समार में दो
मनुष्य क्या हू-न- एक प्रभार के नहा होते हैं, रोग कैसे वशजा
में उत्पन्न हो सस्त है, लिंग भेद की उपत्ति में होती है, इत्यादि
विषयों को मममना श्रम सरल हो नायगा।
पशजा म परिवर्तन र तीन कारण हो सस्ते हैं-(१) एक
ही प्रकार के वंश-लक्षण चीज के रहत हुए भी दा व्यक्तियो म पारि
पाश्विक बावारण के कारण यह से परिवर्तन दिखाई द सरने
हैं। (२) मैथुन के कारण माता पिता से विभिन्न लक्षणयुक्त बीजों
उत्तराधिकारी होने के कारण वशनों में नाना प्रकार परिवर्तन
दिसाद देने हैं। रामूर ( Chromosome ) रा रा
ललय-धीज ( Genetबिभिन्न मगर से सम्मिभित होन
--रि-Jaarnsiot Hereditr apni 1980
वशानुनम की प्रस्यिाए मारण ये निभिननाएँ उत्पन्न होती हैं। (३) कभी कभी वश जवणवीज (Gene) में ही युद्ध अज्ञात कारण से परिवर्तन आ जाते हैं। तर वीज कोप में परिवतन हो जाने के कारण जीर कोप में परिवर्तन हो जाता है। इस प्रकार एक नवीन जाति की त्पत्ति हो जाती है। इन परिवर्तनों के अंगरजी नाम कम से ये हैं--(२) मॉडाषिकेशनस ( Modifications or para -variations), (२) कॉम्बिनेशनम (Combinations or mixovariations), (३) म्युटेशनम ( Mutations or idrovariations ) 1 मनुष्यों पर वशानुक्रम की परीक्षाएँ सम्भव नहा है, इस कारण पौधा तथा निन्न श्रेणी क कीट पतगों पर ही परीक्षाएँ हुई है। मनुष्यों की एक पीढी के गुजरने में प्रोसतन ३० माल लगते है। यशाम को सममने के लिए बोम-वीस, चालीत चालीस पीढ़ियों तक की परीक्षाओं की प्रावश्याता होची है, इस कारण तथा मनुष्यों में अपने इच्छानुसार पुरुषों और स्त्रियों में मयोग कराना सम्भव नहीं है, इस कारण भी वशानुनम क सम्बध में मनुष्यों पर परीक्षा मम्मत नहीं है। ऐसी स्थिति में एक प्रकार के फलों पर की मस्सिया का लेकर अमेरिका के प्रसिद्ध ज्ञानिक टी० एच० मॉर्गन महोदय ने लासी परीक्षाएँ की हैं। इन मक्सियों का वैज्ञानिक नाम डॉसोफीला (Droso phila) है। इन्हें पालना बहुच सरल काम है। थोड़े समय म इनके बहुत से बच्चे पैदा होते हैं। इनसे एक-एक पीढी पन्द्रह दिन म समाप्त हो जाती है। ड्रोमोफीला मेलानोगस्टार (Drosophila Melanogaster) नामक मस्पियों को गफ लासपीडियो का इतिहास मॉर्गन महोदय ने समद किया है। इनके वशजों में चार सौ प्रकार के मौलिक परिवर्तन अर्थान म्यूटेशन (Mutations) पाये गये हैं। इन मस्सियों में चार श्रेणियों के फेस्टर्स श्रमरा ।
वंशानुक्रम विज्ञान जेनि है और इनके कोपों में चार जोडे प्रोमोसोम अथवा वश-सून रहते हैं। ड्रॉसोफीला मिरलिस नामक उसी मस्ती की एक और जति में जो मॉमीपोम पाये गये है और उसी की एक तीसरी जाति 'डॉसोपीला अवस्क्युरा में पाँच जोडे मामासाम पाये गये हैं। इनमे जितने जोडे क्रोमोसोम हैं, उतने, ही यश-लक्षण-घोज के समूह भी अर्थात् जेनि के ममूह भी अपश्य हारे । अर्थात् जातियों की विभिनता प्रॉमोसोम के जोडा को सत्याओं के भेद पर निर्भर है। चार बार की सहस्रो प्रकार की परीक्षाओं के परिणाम में यह जान पड़ा है कि प्राणिया म तया मनुष्या में भी जिननी विभिन्नता दिखाई देती है, बनके मूल म सबसे बड़ा कारण शत शत प्रकार के वश-लक्षण बीज अर्थात् हरे डिटरी पैटर्स अथवा जेनियो के विभिन्न प्रकार के सम्मिश्रण हो हैं। इस सम्मिश्रण-जनित भेद के साथ मौलिक भेद प्रधान শূনফা নুন যা কয় । इसके पूर्व हमने यह समझाया है कि कैसे एक कोप विपरित हो जाता है और उमसे ही कोष बन जाते हैं। दो कोपा के यनत समय उनके वक्ष-सूत्र भी फैसे विभाजित होत हैं, इसे भी हमन समझा दिया है। इसके मम्मर में यहाँ पर मर और नरीन वातें बताई जा रही हैं। किसी भी जीप में जिवन चारिनिर तला दिसाइ देते हैं, उनके साथ उन जीवों के प्रॉमासामा का, अर्धा यश-सूत्रों का ए पिच्छेद्य सम्पप है। जैसे, जिम जानिय जीरम पाँच जोडे मोमोसोम रहते हैं, उस जाति के जीरम घार श्रेणी के चारिफि लक्षण पाये जायेंग। किन्तु मे डेल कमिद्धान्ता नुसार जार म जितन पैस्टर्स का हाना अर्थात् चारिनिर TAMI का होना सभा है, उसम उतने जोडे कॉमोसोमल नहीं पाप जाल। इस Rकार और भी बहुत-सी माता क मारण वैतानिकों Ear arत का अनमान किया है कि कोमोसोम के भी क्षुद्रातिशुद्र - वशानुक्रम की प्रस्यिाएं श्रश हैं जो कि माला के दानों की तरह एकत्र गुथे हुए रहते हैं। इन्हा बुद्राति सुद्र अशा को जेनि ( Gene) कहा गया है। एक कोप के दो कोपों म निमानित होते समय मॉमोसोम अपने क्षुद्रातिशुद्र श्रशों में टुकडे टुक्ड होरर निसर नहीं जात, वरन् नॉमोसोम शर्थान् वश-सून के जेनि अर्थात् वश-लक्षण-बीज सामूहिक रूप म सम्मिलित होत हैं। इस सामूहिक रूप स सम्मिश्रित होने को अँगरेजी में पलिग (Coupling) श्रथया लिकेन (Linkage) कहते हैं। निन नियात्रा से ऐमा होता है उन्हें अंगरेजी म सिगल नासिंग श्रोवर (Single Crossing Over), 2799 FTTH SITT ( Double Crossing Over ) na कहत हैं। नॉमोसोम के विभाजित होते समय जेनिया के सामूहिक रूप म सम्मिश्रित होने के कारण, माता पिता और उनसरी सन्तानों म कुन समता और फुल विषमता दोनों बातें आ जाती है। इस प्रासिङ्ग श्रोर की प्रक्रिया के कारण फुल वश-लक्षण एपरित रूप से विकसित होते हैं। जैसे गोरे रग के माय त्वचा का भी सूम होना प्राय देया गया है। हासोपीला म मार्गन महोदय की परीक्षाओं के परिणाम में कई सौ चारितिक लदण ( Mendelising Hereditary Factors) पाये गये हैं, निनम चार प्रकार के क्पनिङ्ग के दृष्टान्त पाये जात हैं। हॉमोपीला के वीज-कोप में केवल चार मॉमासाम हैं। निम ममय भ्रूण कोप से जीन कोप और वीज-कोपों की उत्पत्ति होती है, उमी समय लिरेज और पनिङ्ग आदि की प्रक्रियाएँ भी होती जाती है। इस लिन के कारण ही कभी-कभी ऐसा भी होता दसा गया है कि कोई-कोई रोग तो केवल पुरुप में ही दिखाई दते हैं और कोई योड केतनी म। इसके अतिरिक्त ऐमा भी होता है कि माता पिता के उर रोग लहकी द्वारा ही वशना म उपन होन है, पुत्र द्वारा नहीं। इसका भी उल्लेय पहले ही कर ६० वशानुनम विज्ञान दिया गया है। ऐसा होने का कारण लिकेज की प्रक्रिया में ही निहित है। हिमोफीलिया एक ऐसा रोग है, जिसमे एक बार देह के किसी स्थान के क्ट जाने पर रक्त का प्रवाह क्सिी प्रकार भी बन्द नहीं होता। ऐसे रोगी अधिक दिन जीवित नग रहते। जिस जेनि से यह रोग उत्पन्न होता है, उसके केवल एक के प्रभार से पुरुप मे ही यह रोग उत्पन होता है, स्त्री मे नहा। किन्तु इस प्रकार के दो जेनि के सम्मिश्रण से स्त्री में भी यह गेग उत्पन्न होता है। हिमोफीलिया रोग ग्रस्त व्यक्तिया यो लीडर्स भी कहते हैं। 'ब्लीडर्स' अपनी माताओ से ही इस रोग को प्राप्त होते हैं रितु ये माताएँ स्वय इस रोग से मुक्त रहती हैं। यह दोप कई पुश्त तक माता से कन्या एर उससे उसकी क्या श्रादि प्रम से सन्ताना मे संयमित होता रहता है, रितु कन्याएँ रोगग्रस्त न होर उनके लडके ही रोगी बनते रहते हैं। पिता से यह रोग पुन को प्राप्त होते कभी नहा देखा गया है। "लीटर्स' अपनी विवाह योग्य प्रायु को कदाचित् ही प्राप्त होते हैं। उसस पूर्व ही उनरी मृत्यु हो जाती है। आज तक यह रोग केवल पुरुपों म ही होते देखा गया है। जो नाडियाँ इम रोग को अपनी देह मे वहन करती हैं उहें 'कडक्टर्स' (Conductors) कहते हैं। यह गेग सर प्रदेशा में नहीं दिखाई देता। अमेरिका के सयुक्त राष्ट्र मे भी जब भी यह रोग दिसाइ दिया, तब यहा देग्रने में पाया कि जिन परिवारों में यह रोग उत्पन्न हुश्रा, उन परिवार का सम्बध युरोप से हो रहा 10 कहा जाता है, महागनी विक्टोरिया की दह म इस रोग का बीज था। . दसिर-Inman Hernity-P1 315347
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लिङ्गभेद का रहस्य
चौथा परिच्छेद
लिङ्गभेद का रहस्य
यौन प्रार्पण-पुरुष और नारी–मनुष्य-जम से बढकर
कोई दूसरी अविक रहस्यपूर्ण बान इम ससार में नहीं है।
इसके बाद ही अय विस्मयजनक वस्तु लिङ्गभेद का प्रश्न है।
पुरुष और नारी में जो रहस्यपूर्ण प्रभेद हैं, उनसे मनुष्य दङ्ग रह
जाता है। पुस्प और नारी के बीच इतना मोहक प्रार्पण
न जाने क्यो है। पुरुप नारी को जानता है, पहचानता है,
किन्तु उसके बारे मे मनुष्य के मन मे रहस्य की सीमा नहा है।
नारी भी पुस्प का साहचर्य पाने के लिए न जाने स्तिनी
उत्सुक रहती है । यौवन की उमगा में दुनिया की माया लिपी
हुई है। इसका बहुत फुट रहस्योद्घाटन आज होने लगा है।
कन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि एक रहस्य का उद्घाटन
होते ही दूसरा सामने श्रा जाता है। इस प्रकार ज्ञान के
सम्प्रसारण के साथ-साथ हमे, गम्भीर से गम्भीरतर रहस्या
का सामना करना पडता है। मनुष्य का जम तो एक विस्मय
कर वस्तु है ही, किन्तु यदि हम इस बात पर ध्यान दें कि ससार
मे पुरुषों और नारियों की सरया कैसे प्राय समान है, तो आश्चर्य
को सीमा नहा रहती। यदि पुरुषों से नारियो की सरया कही
अधिक हो जाय तो मनुष्य समाज में न जाने स्तिनी सलाली
मच जायगी। मनुष्य अभी तक अपने इच्छानुमार लडका अथवा
लडकी को जम नहा दे सस्ता है। किन्तु रिम कारण लड़का
होता है और किस कारण लडकी, इस रहस्य का कुछ पता चलने
लगा है और इमरी भी श्राशा होने लगी है कि भविष्य में
हम लड़का अथवा लडकी के जम पर नियन्त्रण कर सकेंगे
um
वशानुम्म विज्ञान किन्तु मसार मे लडके एव लडकियाँ प्राय समान संरया में क्यों जम लेती हैं, यह बात आज भी रहस्यावृत हो रह गई है। प्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने, ईसा के जाम से तीन सौ वर्ष पूर्व, यह कहा था कि स्त्री और पुरुष प्रारम्भ म एक ही व्यतित में समाये हुए थे, रितु देवता की मोधामि ने उह अलग अलग कर दिया था और तब से वे दोनो एक दुसरे क साथ पुन सम्मिलित होने के लिए चिरलालायित हैं। प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक अध्यापक क्यू न कहा है कि योन प्रार्पण की इससे अधिक सुदर व्यारया सम्भव नहीं। हमार देश के अति प्राचीन शास्र मनुस्मृति म भी कहा गया है कि विधाता ने अपनी देह को द्विधा विभक्त करके श्राधे श्रश से पुरप का एव दूसरे श्राधे अंश से स्त्री का सजन दिया है ।( मनु० ११३२) प्राणि जगत् म ऐसे बहुत से दृष्टान्त प्राप्त हैं जहाँ श्री और पुरप अलग अलग न रहकर एक ही व्यक्तित्व म समाये हुए रहते हैं। पौधों म भी इसके बहुत से दृष्टात मिलत हैं। घोघे ( earth worm) श्रादि कोटा में स्त्री और पुरुप अलग अलग नहीं होते। प्रत्येक घाया पुरुप और स्त्री दोना के ही लक्षण से युक्त होता है। युगरा को प्राप्त होते ही वे अपन अपने साथी को ढूंढते हे न दोनों ही एक दूसरे के गर्भ में सतानों को जन्म देते हैं। भोग के समय दोना ही पुरुष और श्री के रूप म व्यवहार करत हैं। और भी निम्न श्रेणी के जीवा म मैथुन के न होते हुए भी जीन की उपत्ति होती है, जैसे क्षुदतम् प्राणी "अमीना" श्रया रोग उत्पादर जीवाणु निह स्टीरिया" कहते हैं। ये एक कोप-विशिष्ट जीव होत हैं। दनरी पशाद्वि एक कोप दे द्विपरित हो जाने पर ही होती है। इन नीरा को न पुरुप ही या सस्त है और न कोही। मी प्रसार एक कोय विशिष्ट पर और मार का जीरजिमम । । ।
लिङ्गभेद का रहस्य निङ्गभेद का कोई लनण वर्तमान नहीं है। सन्तानोत्सान के ममय एक दृमरे के समीपरी होते हैं और तर उन दोनों के गौच जीवित पायो मे एक पुल मा बन जाता है। इस पुल के रास्ते से इन दोनों जीवा में उछ लेन-देन होता है और फिर ये एक दूमरे मे अलग हो जाते हैं। एक प्रकार की मनियाँ होती हैं, जिन्हें अंगरजी में कल शि (Cuttle fish ) कहते हैं । इनमें पुस्पा का वीर्य बानु के रूप में एक नगीन अङ्ग बनारर उसमें प्रविष्ट होता है। यह नीन बाहु तन जीव की देह से विन्टिन्न होकर पानी के नीचे घना जाता है और रास्ते में अपनी जाति की स्त्री के मिलतु ही उसकी देह में प्रविष्ट हो जाता है। एक प्रकार की झींगा मछली होती है जो पहले पहल तो पुस्प के रूप में रहती है और पाद को घी बन जाती है व कुर रिनों के पश्चान् फिर पुरुप बन जा सकती है। कुछ ऐसे भी जीर होते हैं जिनम म्नो और पुरुष दोनों के ही लक्षण वर्तमान रहते हैं और वे दूसरे जीर के सम्पर्क में न पाकर भी मन्तान को जम दे सकते हैं। के समर्ग मे न श्रार भी बात से प्राणी जीयों को जन्म ३ मकने हैं। जैसे मधु-मनिकायों में, वीर्य के मस्पर्श में न पार भी, अएटों से मनिकायों की उत्पत्ति होती है। प्रेमी चिडियाँ भी हैं जो पुरुप के सस्पर्श में न पाकर भी अण्डे देती हैं और उन अएटों से जीन उत्पन्न होते हैं। इस प्रक्रिया को अंगरेजी में पार्थनो जेनेमिस (Partheno Genesis) क्ह्ते हैं। इन सर दृष्टान्तों मे यही प्रतीत होता है कि वशद्धि के लिए पुम्प और स्त्री में यौन सम्पध होने की अनिवार्य श्रावश्यकता नहीं है। यौन सम्बन्ध होने से ही वशद्धि होती है, ऐमी भी यात नहा है। प्राणि जगत् में से भी दृष्टान्त हैं जहाँ दो जीरों के (प्रधानत एक-कोप-रिशिष्ट जीन पुरप ६४ वशानुक्रम विज्ञान मिलने से एक नवीन जीर की उत्पत्ति होती है। एदिनरा विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध अध्यापक क्यू महोदय ने ऊपर दिये गये धान्ता के आधार पर यह कहा है कि वशद्धि के लिए यौन आम्र्पण का होना अत्यावश्यक नहीं है। कुछ वैज्ञानिका का कहना है कि यौन धारर्पण के द्वारा प्रकृति जीवों की यशवृद्धि क्राती है। म्यू साहन इसका विरोध करते हैं। प्रसिद्ध प्राणि तत्त्व निद् एलगाडिस ( Alverdes) महोदय ने भी बहुत से दृष्टातों का उद्धरण करके यह दिखलाया है कि क्या सन्तानोत्पा दन के लिए ही प्राणिया में पुरुषों और त्रियों का प्रारर्पण नहा हुआ करता । 'यू' साह्य का कहना है कि यौन श्रार्पण क्या वस्तु है, इसका उत्तर विज्ञान आज नहीं दे सरता। (We do not know what sex is'-F A C Crew in an article on 'ser' in the 'outline of Modern Knowledge' ) जब रिना मैथुन के भी सन्तान को उत्पत्ति हो सकती है तो यौन पारर्पण को क्या पारश्यकता है? केरल पानद के लिए? नर के ससर्ग मे न पार भी मेढक के बच्चे उत्पन्न हुए हैं। किन्तु मनुष्य के सम्बप में ऐसा एप भी दृष्टान्त प्राप्त नहीं हुआ है। यद्यपि सुश्रुत नामा वैद्यक-प्रय म यह उल्लोब है कि पुरुष के मस्पर्श म न पार भी मातृगर्भ से मनुष्य का जम सम्भर है। चूहा के गर्भ की परीक्षा करने पर यह ज्ञात हुआ है कि मैथुन न होने पर भी गर्भस्य अण्डे से अण की उत्पत्ति हुई है, रितु यह भ्रूण अधिक दिन ता जीवित नहीं रह पाया । इससे इतना तो अनुमान अपरय रिया जा सझना है कि नर-वार्य के मस्पर्श में न पार भी चूहे की उत्पत्ति हो सस्ती है। # T_Sceial Life in the animal sorl!
लिङ्गामेट का रहस्य जिन एककोप विशिष्ट जोगों में केवल द्विपरिटत होत नवीन जीर की उत्पत्ति होती है, उनमें भी यह देया गया है कि कुल दिनों के पश्चात् एस कोप मे दो कोपा का होना धीरे धीरे कम होना जाता है। तर फिर दो जीव मम्मिलित होते है और हम प्रसार उनमे द्विसण्टिव होन की शक्ति पूर्ववत् फिर था जानी है। इस दृष्टान्त को यथार्थ मान लेने में यह स्वीकार करना पढना है कि जीन की उत्पत्ति के लिए मैथुन का भी प्रयोनन है। किन्तु मयू साहन पहते है कि उपर दिये गये दृष्टान्त में कुछ भ्रम है। उपयुक्त श्राहार के न पान से ही उक्त जीव में द्विम्वटित हान की शक्ति क्म हो जाती थी। इमो विपरीत मैथुन के परिणाम में जीन की उत्पत्ति नहीं भी हो सकती। मनुष्य में भी ऐमी अवस्था पाती है। जन स्त्रियों में रजस्वला होने की शक्ति रम हो जाती है तब मैथुन में आनन्द प्राप्त होने पर भी सन्तान की उत्पत्ति नहीं होती। अर्थात् कप साहब के मतानुसार सन्तानोत्पादन के साथ यौन-सयोग श्रयवा यौन श्रार्पण का कोई सम्बन्ध नहीं है। किन्तु क्या यह नहीं कहा जा सकता कि जीव की मोनति के साय-साथ उनमें पुरुष और स्त्री के भेदों को भी उत्पत्ति होती है ? एक मे वहु होना ही तो विकाम का नियम है। दम कारण मैथुन मे ही जीरों की उपत्ति होना उच्चतर विकास का ही लनण हो सकता है। एक अमीना' से दृमरे 'अमीना' के उत्पन होने पर कोट पिचित्रता नहीं दिमाई देती, किन्तु दो जीनों के मैगुन मे उपन जीवा में नाना प्रकार की विचित्रताएँ दिग्पाद देती हैं। वह तो एक प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य है । एक मे बहुत का होना ही तो मृष्टि है। मधु-मस्पियों अपने बच्चो के श्राद्दार का नियन्त्रण करके अपने इच्छानुमार खी अथवा पुरुष अपवा नमक नीर उत्पन्न कर सकती हैं, परन्तु इम वीसनी शवानी में मी मनुष्य अपने इन्द्रा २ शम्म निशान रागार सारा अथवा राहारीमा जम नहीं ६ साता। स्त्री गर्भाय नमतिया यह लहसा होगा अथा लडकी इस गाने मनुष्य में उसस्ता का अन्त नहीं है। परतु माग भी विशाल इस RH का निर्णय नहीं कर पाया है। AJइसर सम्बध मे पद का अाज हमें अवश्य है। इस सम्यन्ध में सबसे पहती मात हमे यह प्राप्त हुई है कि पुरप के वीर्य में दो प्रकार के कोप हैं। एक प्रकार के कोप से पुन उत्पन्न होते हैं और दूसरे प्रकार के कोप से पन्या उपन्न होती हैं। मनुष्यमान के जीव कोष म २४ जोड़े यश-सून रहत है। इन २४ जोडों म २३ जोडे तो पुरुष और स्त्री म एक-स ही होत है, कितु चौबीसमें जोड़े म एक विशेष अन्तर दिराइ दता । पुरुष के जीव शेप में इस चौनीसवें जोडे यश-सून ( Chromosame ) में से एक यश सून अन्य ममस्त यश सूनों से कुछ छाटा होता है। अर्थात् कुल ४८ वश-सूना में सनी क ४८ और पुरुष क ४७ वश सून एक प्रकार के हो हाते हैं रितु पुरुपका अडतानोसाँ वश सून कुत्र छोटा और मिन होता है। इस छोटे से पुवंश सून के कारण ही की और पुरुष म इतने प्रभे- उपन होते हैं। प्राधुनिक विज्ञान में इस पु यश सून का नाम 'Y' (वाई) रस्सा गया है। पाश्चात्य देशों की समस्त भाषाओं म इमरा नाम y' हो रस्सा गया है। इस कारण हम भी इसका नाम 'y' रखना ही उचित होगा। दृसरे यश-सूनों का नाम 'र' (म) रमया गया है । अयो। प्रत्या म्मी की देह मे काल 'x' प्रोमामाम यश-मूत्र रहत । अर्थात् ४ नोमोसोम मे, वश-सूत्र क् जोडे स, खी की देह वनती है और < y कामासाम से, यश-मूत्र के जाइ से, पुरुप की दा चनती है। इस प्रकार पुस्प के घीन शेप म, वीर्य म । प्रसर के कोर रात है। एक म देशल (स) मामामाम यशमन लिङ्गभेद का रहस्य ६७ ३ है, दूसरे में काल y (वाई) मॉमोसोम वंश सूत्र रहते हैं। -न्तु स्त्री के वीर-कोप में केवल एक ही प्रकार के कोप होते हैं, लिनम कान 'x' (एक्स्) प्रोमोसोम वश-सूत्र रहते हैं। पुमप 'और नी के 'x' (एस) क्रॉमोसोम वश सून एक ही प्रकार के होते है। यह बात पहले ही बता दी गई है कि वीज कोपा में वश-सून, कॉमोमोम, जोडे-जोडे में न रहकर प्रत्येक जोडे के एक एक वेश सूत्र रहते हैं। मनुष्य की देह के साधारण कोपों म तो २४ जावे अर्थात् ४८ अॉमोसोम रहते हैं, किन्तु उसके बीज कोपो मे पथरा १ क्रॉमोसोम रहते हैं, २४ जोडे नहीं। इस कारण स्त्री के अण्डो में, (अर्थान् बीन-कोपों मे) केवल x (एक्स्) कॉमोसोम मितेंगे, किन्तु पुरुष के वीर्य मे, वीज-कोपों में कुछ x और पुछ y मॉमोसोम मिलेंगे। पुस्प के वीर्य में अर्थात् बाज कोपों में और y मॉमोसोम रिशिष्ट कोप समान-समान रहते हैं। एक समय निक्ले हुए पुम्प के वीर्य मे लगभग बीस से पचास करोड तक चीज कोप अर्थात् अणुप्रमाण प्राणी रहते हैं। इन वीज-कोपों में प्राधे x क्रॉमोसोमनाले होते हैं, और बाकी आधे yॉमोसामवाले। आधुनिक विज्ञान के अनुसार केवल एक ही पु-बीज-कोप एक ही स्त्री अण्डकोष अथवा अण्डाणु में प्रविष्ट हो पाता है। स्त्री के रजस्वला होने के समय उसके टिम्बाशय से केवल एक ही अएकोप अथवा अण्टाणु मुक्त होता है और जरायु की ओर बढ़ता है। रास्ते में पु-धीनकोपों से मिल जाने पर पुरप का भी केवल एक ही कोप उस अण्डे में प्रवेश कर पाता है। ये सब बातें पहले ही बता दी गई है। पाठको की मुविधा के लिए उहें फिर यहाँ दुहराया जा रहा है। इन सरदातों को ध्यान में रसने से पाठक अनायास ही यह समझ सकेंग कि यदि स्त्री के अण्डे में पु-बीन-कोप के एक्स् क्रॉमोसोम वहन करनेवाला फेोप प्रविष्ट होता है, तो अण कन्या होता है । क्योंकि नी
वशानुनम विज्ञान
होता है कि गर्भ धारण के समय ही भ्रूण का लिड्न निश्चित
हो जाता है।
जिम जोडे मॉमोसोम म पुरुप और स्त्री मे भेद पाया जाता
है, उस जोडे क्रॉमोसोम को सेक्स मामोसोम्स (Ser chromo
somes ) कहते हैं, अाशिष्ट कामोमोम को ऑटोसोम्स (anto
somes) कहत है। संक्स कॉमोसोम्स में एक x होता है,
दूसरा y बाई।
-
लडरियों की अपेक्षा लडके अधिक जम लेते है--
ममार मे देसा गया है कि लडफिया की अपेक्षा लडरे अधिक
मरया मे जम लेते हैं। जन पुरुप के वीर्य मे x और
मॉमोसोम बराबर-बराबर रहते हैं तब लडरियों की अपेक्षा लड़के
क्यो अधिक जन्म लेते हैं ? इस प्रश्न का भी श्राज तक निर्णय
नहा हो पाया है। एक और पात यह भी पाई गई है कि
गर्भावस्था मे ही यदि बहुत से पुए नए न हो जात तो
संसार में स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों की सरया कही अधिक हो
जाती। वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्भ धारण के समय लहरों
की सरया लडक्यिों की अपेक्षा प्रतिशत २० से ५० तक अधिर
होती है। सम्भर है इस गणना म पुर भ्रम हो, तथावि
इसमें कोई सन्देह नहीं कि लड़क्यिो की अपेक्षा लडके अधिक
जन्म लेते हैं।
तीन मास की अवस्था के भ्रूण के निङ्ग-लनए पहचाने
जा सरने हे। जितने भ्रूण नट हो जाते हैं, उनको परीक्षा
करने पर यह जाना गया है कि पुलक्षण विशिष्ट नट अणों
भी सर या वी-लक्षण विशिष्ट नष्ट भ्रूणों की अपेक्षा दुगुनी
होनी है। इससे यह अनुमान रिया जाता है कि लड़रियों की
अपेक्षा लडकों में जीवनी शक्ति कम होती है। माधारण व्यक्ति
की यह धारणा है कि लडक्यिों लडा से दुर्चल होती है, किन्तु
-
लिङ्गभेद का रहस्य ज्ञानिका के मतानुसार लडक्यिो से अधिक दुर्वल लडके होते हैं। तीन मास की अवस्था में जितने गर्म नष्ट होते हैं, उनकी रीक्षा करने पर यह ज्ञात हुश्रा है कि उक्त नष्ट भ्रूणों में यदि क ऋण स्त्री-लक्षण विशिष्ट होता है तो चार पुरप-लक्षण विशिष्ट ने हैं। चतुर्थ मास की अवस्था मे नष्ट भ्रूणा की परीक्षा रने पर देखा गया है कि स्त्री-लनण युक्त भ्रूणों की अपेक्षा पुरुप तण युक्त भ्रूणा की सन्या दुगनी होती है। पञ्चम मास । स्त्री की सप्या यदि १०० होती है तो पुरुप की सरया १४५ तिी है। नवें मास में स्त्री की सप्या १०० होती है तो पुम्प सरया १४० होती है। इस प्रकार जन्म के पूर्व, लडकियाँ लडझा से अधिक जीवनी क्ति सम्पन्न होती हैं। जाम के पश्चात् भी समयानुसार त्रया की अपेक्षा पुरपों की अधिन मरया में मृत्यु होती रहती ।। इंगलैण्ड में ८० वर्ष की अवस्था में पुरुषों और स्त्रियों की तुलना करने पर बात हुआ है कि बियाँ पुस्पा की अपेक्षा गनी पाई जाती हैं। जीवित बच्चों के जन्म की परीक्षा करने पर देखा गया है के प्रतिशत लडरियो के माथ १०३ लडके जन्म लेते हैं। ऐमा भी अनुमान किया जाता है कि माता का स्वास्थ्य अन्छा होने मे अधिक सम्भावना यही रहती है कि या लडका हो। परन्तु हमें स्मरण रखना चाहिए कि विज्ञान अभी तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाया है। यहाँ पर एक और रहस्यपूर्ण यात का उल्लेस कर देना उचित होगा। यह तो प्रमाणित हो चुका है कि पुरुप के वार्य में दो प्रकार के बीज कोप है- --एफ जिनमे y प्रॉमोसोम रहते हैं, दूसरे जिनमे x क्रॉमोसोम रहते हैं। श्रर यह यशानक्रम विज्ञान चेष्टा हो रही है कि पुस्प के बीज कोपो को अलग से जीवित रक्सा जाय और उनमे से y और १ मॉमोसोमपाले वीज कोपा को भी अलग कर लिया जाय। ये वीज कोप फिर समय और सुविधा के अनुसार स्त्री के गर्भाशय मे डाले जा सस्ते हैं। इस प्रकार अपने इच्छानुसार लडका अथना लडकी को हम जाम दे सकते हैं। ये सत्र काल्पनिक बातें नहा हैं। श्राजाल विदेशो मे इन सब बातों की परीक्षाएं हो रही हैं। इसके अतिरिक्त एक और भी विस्मयर घात की परीक्षा हो रही है। चूहो पर इसकी परीक्षा हुई है। मादा चूहों के गर्भ से गर्भाशय अर्थात् जरायु को निकालकर अलग जीनित रक्सा जाता है, और नर चूहों से वीर्य को लेकर भी अलग जीवित रक्सा जाता है। गर्भ रहने के बाद भी माना चूहे के पेट से पचा समेत गर्भाशय को बाहर निसलर अलग जारित रसने की चेष्टा हो रही है। सन् १९०१ ई. म वैज्ञानिक 'हीप' (Heape) महोदय एक मादा गरगोश के पेट से पचा समेत गर्भाशय को दूसरी मादा गरगोश के पेट मे डालने म समर्थ हुए थ सन् १९२५ ३० मे प्रसिद्ध वैज्ञानिक हानडेन' ( Haldane महोदय ने चुहिया के पेट से था समेत गर्भाशय वाहर निराला दस दिन तर जीवित रक्सा था। गर्भाशय में बच्चे के लिए पयुक्त आहार पहुँचाना एक भारी समस्या है। इस समस्य के हल हो जाने पर माँ के पेट से बाहर रहत हुए ही जैसे गर्भाशय से जीवित चूहे फा निक्लना सम्भव है, इसी प्रकार मनुष्या म भी माँ के पेट से गर्भाशय को अलग निसलर स्वतन रूप से अपन इन्दानुसार क्या पैला करने की प्राश वैनानिकगण प्राज करने लगे हैं। जैसे श्राज म मुर्गी के एई को यत्र म रमझर पन्चे पैदा का लेते हैं, उसी प्रकार भविष्य वैज्ञानिस्गण पुम्प पे वीर्य पो अलग सग्रह करके और स्त्री ये लिङ्गभेद का रहस्य पेट से जरायु को अलग निकालार, मुर्गी के अण्डो की तरह मनुष्यों के यचों को भी, यन्त्र की सहायता से उत्पन पिया करेंगे। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक परिभाषा में (Eetogenesis) एस्टोने मिस कहत हैं। श्राजक्ल यूनाइटेट् स्टेट्स श्राफ अमेरिका में ऐसे गुप्त स्थान हैं, जहाँ पुम्प का वीर्य-सग्रह किया जाता है एष प्रयोजनानुसार स्त्री क गर्भ में उसे टाला जा सस्ता है। कालेज के चुने हुए ग्रेजुएट युवकों मे वीर्य सप्रह किया जाता है। इनके नाम अथवा परिचय गुम रक्मे जाते हैं। मान लीजिए कि पुरुप के दोप से प्रो के सन्तान न हो रही हो तो उस दशा में पूर्वाक्त गुप्त स्थान मे चुने हुए मुन्दर, विद्वान्, स्वस्थ युवक के वीर्य से स्त्री को गर्भाधान किया जा सकता है। न्यूयार्क में ऐसा ही एक गुम समान है। गृहपालिठ पशु श्रादि के बारे में अन उक्त वात केल परीक्षा गारा में ही सीमित नहीं है। पाकल पशुओं पर इस विज्ञान फा यथेष्ट प्रयोग होने लगा है। अन्ये अच्छे चुने हुए सॉों से वीर्य सह परके उमे रेप्रिज्ञारेटरा में ( Refrigerators= जहाँ ताप की मात्रा इन्वानुमार कायम रक्सी जा सकती है) ममालपर ससा जाता है और अावश्यकतानुसार चुनी हुई गाय की गर्भवती किया जाता है। थोरप और अमेरिका के बहुत से प्रदेशा मे इस रिनान का प्रयोग होने लगा है। दक्षिण अमेरिका से चुने हुए साडों का वीर्य हनाई जहाज द्वारा युनाइटेड म्टेटम भार अमेरिका में लाया जाने लगा है। इस प्रसर वृत्रिम - • सिए--Daedalus or Serence and the Future by J B S Haldagº gerentb edihea Pp 63 and 64 वंशानुम्म विज्ञान गर्भावान की प्रक्यिा को वैज्ञानिक भाषा में श्रॉयटेलेजेनेसिस (Eutelegenesis ) कहते हैं।* अर्द्धनारीसर -प्राधा पुरुष और आधा नारी-प्राय समाचारपत्रों में सर दपती है कि एक युवती की दह म पुरुप के लदण दिसाइ देने तगे और बाद को चिक्सिालय म यत्रो पचार (चीर फाड) के पश्चात् वह पुरुप बन गइ। इमी प्रकार ऐसे भी दृशान्त प्राप्त है जहाँ लडका लडकी के रूप म परिवर्तित हो गया है। इसके अतिरिक्त बहुता ने यह भी देखा होगा कि कभी-कभी पुरंप की देह में नारी के चिह्न निससित होते हैं, जैमे-क्सिी पिसी पुरुष के स्तन युवतिया की तरह उन एन फीत होते हैं। इसी प्रकार कभी भी युवतियों के भी मूछे निम्ल श्राती हैं। पाठकों को यह सुनार आश्चर्य होगा कि वर्तमान समय में ऐसे मनुष्य भी हैं, जिनमे पुरुप और स्त्री दोनों के ततण एक ही माय उपस्थित हैं। स्त्रीत्व और पुरुपर लक्षण, पुष्प और नी दोना में ही पाये जाते हैं। क्सिी म कोई ततण परिपूण म्प मे प्रस्फुटित होता है और किमी अन्य मे दूसरे लनण अधिक प्रस्फुटित होत हैं। पुरुप की देह में स्तन के स्पष्ट चिद वर्तमान हैं, किन्तु ये स्तन का काम नहीं देते । वियों म भी पुरुष का लिङ्ग सूक्ष्म रूप से वर्तमान है, निसा अंगरेजी नाम हाइटॉरिस (clitoris) है। कभी-कभी स्त्रिया म त्रीव के लग्ण तो अर्द्ध परिस्फुट होर ही रह जाते हैं और माथ ही पुरष के लक्षण भी उनमे मूक्ष्म . दसिर-ion and Heredits-by Amram Scbeinfeld P300391 लिगभेद का रहस्य 'प से पाये जाते हैं। इस रिपय पर जॉन हप्किन्स् विश्वविद्यालय 949197 CACAT5 (Hugh Hampton Young) होदय ने विस्तृत विवरणयुक्त एक पुस्तक लिसी है। उनका हना है कि उनके पास बीस ऐसे स्पष्ट दृष्टात हैं, जिनके बारे में ह निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि उनका देह म पुरुप पौर नारी दोनों के चिह्न वर्तमान हैं। उनमें स्त्री के अण्डाणु और रप के अण्डकोष ( Both Ovaries and Testicles) निों एकत्र पाये गये हैं। इसके अतिरिक्त दूसरे अपेक्षाकृत अधिक ऐमे दृष्टात मिलते ', जहाँ एक ही व्यक्ति मे या तो स्त्री के अण्डाणु (स्त्री वोज कोप, नो अण्डे के रूप में होते हैं) अथवा पुरुष के अण्ड-कोप Testicles ) पाये गये हैं, किन्तु उस व्यक्ति मे वाह्यत नर और माता दोनों के ही लक्षण एक साथ विकसित होते दिसाई ते हैं, जिनमें से केवल एक लक्षण तो दुसरे लक्षण से अधिक परिस्फुट होने देखा गया है। उन अधिक परिस्फुट लक्षणा के कारण हम उसे लडका अथवा लडकी कहते हैं। परीक्षाओ के परिणाम म ऐसा अनुमान किया जाता है कि प्रति सहस्र मनुष्यो मे से एक मनुष्य म उपर्युक्त उभय लक्षण एकत्र दिसाई देते हैं। अर्थात् जन्म के समय वशानुक्रम के नियमानुसार कोई व्यक्ति तो यथार्थ म पुरुप अथवा नारी होकर ही जम लेता है जिसम फेवल स्त्री अण्टाणु अथवा पु अणु-कोप रहत है, किन्तु अयथार्थ वाद्य लक्षणों के कारण श्रम पश ऐसा समझा जाता है कि वह लडमा है प्रथया लडी है। ऐसे दृष्टात आजाल मिलने लगे है जहां पर एक विशेष युवती सेल कूद में अत्यधिक पार- दशिता दिसाती है, किन्तु सहसा उसी की देह में ऐसे लक्षण दिसाई देने लगते हैं, जिनके कारण चिस्सिालय में जाकर उसे आपरेशन फ्राना पड़ता है और चिकित्सालय से निकलकर वह युवती युवक ७६ वशानुक्रम विज्ञान बन जाती है। उसकी देह मे स्त्री के लक्षण अपरिस्फुट एर अपूर्ण थे। उन चिह्नो को चिकित्सक की सहायता स क्टवा डाला गया था। विज्ञान की परिभापा में यह नहीं कहा जा सस्ता कि कोड एक व्यक्ति परिपूर्ण रूप से पुरुषत्व प्रथना स्त्रीत्व के लक्षणों से युक्त होता है। किमी मे तो पुरुप बनने की और क्सिी म स्त्री यनने का सम्भावना प्रबल रहती है। संभव है भ्रूण के विकसित होने समय, सृष्टि प्रवाह को जारी रसने क लिए, प्रति देवी अपने रहस्यमय उपायों से सिसी को तो पुरप बना देती है और किसी को । घगा। एक धार्मिक सम्प्रदाय का नाम सहजिया' सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के मतानुसार प्रत्येक पुरुष में नारीत्व के भार भी हैं और प्रत्येक नारी में भी पुरुषत्व के मात्र हैं। पुरुप म पुरपत्य का भार प्रल है, इसलिए वह पुरुष है और नारी में नारीत्व का भाव प्रत है, इसलिए वह नाग है। वे पुरुष क थारे वाम श्रङ्ग को नारी स्वभाव निशिष्ट मानत हैं और स्त्री के दक्षिण थग को पुरुप स्वभार विशिष्ट। यह प्राय देसा गया है सिमी का वाम स्तन दक्षिण स्तन से अधिक परिपुष्ट होता है। पुरुप का भी दक्षिण अङ्ग वाम श्रग से प्राय अधिक घनिष्ट एवं कर्मठ होता है। हिन्दुओं के पौराणिक प्रया म मा सष्टि कम के समय में अमैथुनी सृष्टि का उन्लप क्यिा गया है। न्याय-कुमुमाशीम भी हम बात का उल्लस है। हिन्दुओं क देवाधिदेव महादेव शिव को प्रनारावर कहा गया है। इसम श्राग्यात्मिा तात्रय भी है और पार्थिव दृष्टि से भी इमसा एक तात्पर्य यह है कि सृष्टि चन्द्वात्मक है । प्रत्येक वस्तु म दोनों भाव एकत्र रहत हैं। करिता एक मार क प्रल होन मे उस वस्तु का, उस प्रयन भार के नाम के आधार पर, यह नाम पड़ता है। इन दोनों मावों के पारस्परिक 1 लिङ्गभेद का रहस्य विकास के अनन्त भेद हैं। आधुनिक विज्ञान से भी यह पता चलता है कि स्त्री और पुरुषत्व के विकास म भी अनत निभेट हैं। जहाँ यह भेट अति सूक्ष्म है वहाँ स्थूलत कोई भेद दिखाई नहीं देता, किन्तु जहाँ भेद अधिक हो जाता है नहाँ स्थूल दृष्टि से भी हम उसे देख पाते हैं। नशानुम्म पिनान के अनुसार स्त्री और पुरुष के लिङ्ग-भेद के विषय में बहुत बातें जानने योग्य हैं। हम इस बात से अवश्य परिचित हो गये हैं कि प्रधानत 'जेनि' के द्वारा ही वश के लक्षण वशजों में आते हैं। हमने यह भी देसा है कि पु-जीवकोप में x, y कॉमोसाम रहते हैं, और स्त्री जीप-कोप में केवल x, x कॉमोसोम रहते हैं। फितु इस नियम के प्रतिवाद भी पाये गये हैं। जिन जेनियों के द्वारा स्त्रीत्व और पुरुपक के लक्षण विकसित होते हैं, वे केवल x अथवा केवल ए मॉमोसोम मे ही सीमित नहीं रहते। और y कॉमोसोम म केवल स्त्रीत्व अथवा केवल पुरपत्व के वश-लक्षण-बीज अर्थात् 'जेनि' ही नहीं रहते, प्रत्युत उनमे दूसरे अनेक प्रकार के लक्षणों के उत्पन्न करनेवाले 'जेनि' भी रहते हैं। इसी प्रकार दूसरे कॉमोसोमों में भी स्त्री और पुरुष के लक्षण उत्पन्न करनेवाले जेनि भी रहते हैं अर्थात् केवल x अथवा केवल ए मॉमोसोम द्वाग ही लिङ्ग-भेद की उत्पत्ति नहीं होती है। लिङ्ग भेद की उत्पत्ति के लिए समस्त क्रॉमोसोमों के सर जेनियों का सम्मिलित प्रभार काम करता है। इसके पूर्व "लिउकेमिया" नामक रोग के सम्बध में इस विषय पर चर्चा की गई थी। लिङ्ग-मेट के सम्बन्ध में भी वही वात लागू है। x और Y क्रोमोसोम में ऐसे 'जेनि' अवश्य हैं, जिनके अधिनायकत्ल में, भ्रूण मे लिग के लतण विकसित होते हैं। परन्तु लिङ्ग-लक्षण के रिसमित होने में और भी रहस्य की बातें छिपी हुई हैं। भ्रूण में प्रथम अवस्था में दो अति सूक्ष्म प्रन्थियाँ
७८
वंशानुक्रम विज्ञान
रहती है। माथमिक अवस्था मे ये न नो स्त्री क डिम्वाणु की तरह
होती हैं और न पुरुप के अएट-कोप की तरह । विमित होत
समय भ्रूण को यदि पुरुष बनना है तो वे सूक्ष्म अग्थियाँ पुरप के
अएड कोप धन जाती है, और उनसे जो रस निक्ला करता है उसके
प्रभार से पुरुष के दूसरे लिङ्ग लक्षण निमसित होने लगते हैं। और
यदि भ्रूण को स्त्री बनना है तो उक्त प्रथियों स्त्री के डिमाणु यन
जाती है और उनसे दूसरे प्रसार के रस निर्गत होते हैं। इन
यियों के साथ दो नल युक्त रहत हैं। इनम से एक का नाम
"मुजरियन्" (Mullerian) और दूसरे का नाम है "क्लपियन"
(Wolfian ) डस्ट अथवा नल। जय भ्रूण मे स्त्री लिङ्ग र
लक्षण चिरमित होते हैं तर 'मुलेरियन्' ल जगयु आदिम
परिणत हो जाता है तथा 'चलस्थिन्' नल शुप्पप्राय हा जाता है
और जर भ्रूण में पुलिग से ताण रिमित हान तगते है नर
'मुलेरियन्' मन पिरसित न होस मुरमाय रह जाता है
'यलस्यिन्' नल पुरप का वीयवाही नल बन जाता है। स्त्री म
'परियन्' मन शुप्पप्राय रह जाते हैं।
उपर घनाइ गद प्रयियों का पारिभापित नाम गोनट्स
या सेक्स तारस् (Gonads or Ses Glands) है।
निङ्ग-भेद के पन होने म पहत र श्रया प्रोमोसोम का
प्रभाव रहता है। ये प्रभार वशानुनम नियमानुसार प्राप्त होत
है। इमो माय साय गहनेट्स्' के रसमाह का भी अत्यन्त
मत्व पूर्ण प्रभार लिङ्ग-म- के कारण के रूप म बत्तमान है।
र सम्स ग्लाएटम् के रसप्रवाह के साथ x अथवा y प्रोमो
माम का मामलाय रहता है तर सामारि रूप से पुरप अपना
म्ही नत्पन्न होती है, अन्यमा नाना प्रकार की विचिरतारा जपान
होती है। 'मम्म नाराट्म्' में जो रम निरसता है, उसका पारि
भाषिक नाम सम्म हम्मानम है।
m
७९ - who एव लिगामे का रहस्य सेक्स हरमोन्म-'मेक्स लाण्ट्स' का रस एफ विस्मय की वस्तु है। यदि किमा मुग के अएटकोप निकाल लिये जाते हैं, तो मुग का चौग्ना बन्द हा जाता है। उसके मस्तर पर कारङ्गीन मामपिएट गुम होने लगता है और उसरा रङ्ग फीका पड जाता है। किन्तु यति उस मुर्ग पो देह में दूमरे मुर्ग के जोरिन अण्ट कोप रप लिये जाते है तो वह फिर पूर्ववत् पाँग देने लगता उममें दूसरे पुरुषच के लनण निमार्ट टने लगते हैं। यदि किसी मादाचूने के पेट मे श्रएटाणुश्रा को निगल लिया जाता है, तो रसम मोद्दीपना नहीं रह जाती र पह नर को पास नहीं पाने देती। फिन्तु यनि उम चूहे को देह म स्त्री-प्रएटाणु फा रस अर्थात् स्त्री हॉरमोन इन्जेस्ट ( Inject) कर दिया जाता है तो उसम फिर पूर्वयन् कामोटोपना होने लगती है, फिर वह नर चूह के पास पाने दती है श्रादि, प्रान्।ि हमी प्रकार जर पिसी पुरुप दी देह से अएटकाप निगल लिये जाते हैं और सम यति मी 'हॉरमेन' उननेक्ट क्यिा जाता है तो उम पुम्प का लिङ्ग शुष्प और छोटा होन लगता है। इसके साथ-माय समी नह में स्त्रियो क मे स्तन विसमित हाने लगते हैं और यह बच्चा को दूध पिला सकता है। स्त्री को देह से भी जर श्रएटाणु निगल प्रिये जान हैं, पर उसकी देह म पु 'हॉरमोन्' इननेस्ट किया जाता है ता उसक स्तन शुर होने लगत है और उसका क्लाइटारिस पुरुष लिङ्ग की तरह निरसित होन तगता है। (क्लाइटारिस का परिचय हम पृष्ठ ७८ मरे आये हैं।) जीप की दह में जो कोप है उनम पुरप अपना स्त्री, दोना लनणा के निरसित हाने की यरार-बराबर मम्भावनाएँ रहती हैं। 'सम्म हॉरमोन' क प्रभाव से स्त्री या पुरुप के लक्षणा में उनका परिवत्तन हो सस्ता है।
। वंशानुक्रम विज्ञान अधिक है। गेल्टन महोदय ने यह भी कहा है कि वैज्ञानिकों के कुलों म मातृकुल का प्रभान ही सतान पर अधिक पडा है। उहाने यह दिखाया है कि बडे बडे वैज्ञानिकों की ४३ माताश्री म मे ८ माताए ऐसी था जो उनके पिताओ से अधिक गुणशालिनी था। आधुनिक विज्ञान के अनुसार इस बात का समर्थन होता है। स्त्री पुस्पा म जो प्रभेद है, वे भी वंश परम्परा से प्राप्त जेनि के श्रावार पर ही होते हैं। उब यश लक्षण ऐसे हैं, जो कन्या द्वारा हो सममित होते हैं। कन्या म दो x (एक्स ) मॉमोसाम रहते हे अर्थात् शगत लनणा के पुनापेक्षा क्या म अधिन समित होने की सम्भावना रहता है । पुन में तो केवल एक मॉमोसीम रहता है, दृमरा नॉमोसोम होता है। बुर से भी वंश लक्षण होते है जो पुनो द्वारा ही वशजाम सममित होत है। पुरुषों में प्रकृति पर विजय प्राप्त करा की निरोप शक्ति रहती है। युद्ध एवं शिकार म पुरुष स्त्रिया की अपेना अधिक शक्ति का परिचय देता है। स्त्रियों को मुग्ध करना भी पुरुप काही काम है। प्रति के नियमानुसार मतान प्रनिपातन का भार पुम्पा की अपना त्रियों पर अधिक पडा है। स्त्री को अपना पुरुष को हामी अपिर वारषित करती है। वो सोच समझार, जान बूमकर पुरुषों को अपनी ओर श्रापित नहा करती। पुरुष 4 सानिध्य में स्त्री लना से विवश हो जाती है, किन्तु उममी निश्शता से एक विचित्र श्रार्पण का अनुभव होता है। पुरष क सम्बन्ध में बी का श्राचरण सराव से भरा हुआ होता है किन्तु उस समय के कारण ही पुरुप के मन मन्त्री के प्रति पर सम्मोदन को सष्टि होती है। प्रिया और पुरुषों के व्यवहारों म ना विशेष अन्तर है, उसक कारण प्राय पर गलनादमी होनी है। कभी तो पुरुग पर और कभी स्त्रिया पर यह लान्छन लगाया जाता है कि दनी तो समान से हो दुष्ट प्रति होती है। के मन - ८७ । लिङ्गभेट का रहस्य कमी तो यह कहना पडता है कि सनातन पुग्प स्त्री को श्रावपिन करता है और कभी यह सि सनातन नारी पुरुप को थामपित करती है। यथार्थ में बात यह है कि वियों और पुरुषों की प्रतिया में एक व्यवधान अवश्य है और वह स्वामाविक ही है। उट जर्मन पण्टिता की राय म त्रियों का स्वभाव पुम्पों मे अनेर वाता म श्रेष्ट है । उनी राय में पुम्पों की अपेक्षा स्त्रियों क्म भ्रष्टा ग्व क्म मगडाल होती हैं। किमी घटना क घट जान क पश्चान् म्री में उममा प्रमार पुम्पों की अपेक्षा अधिक स्थायी एव अधिक गम्भीर होता है। सो पुम्पों की श्रपदा कला कौशल में अधिक दक्ष होती है किन्तु विज्ञान तथा गणित में पुरप बी की अपेना अधिक दन होग है। राजनीति म स्त्री की उतनी रुचि नहीं रहती जितनी धामिक धाता में रहती है। सन्तान प्रविपालन मत्री की स्वाभाविक रचि पुरों से कहीं अधिक रहती है उद्विवृत्ति की परीक्षाओं में समायस्क लडके और लड़कियां एक सा ही मफल होती है। किन्तु इस स्थान पर हमें यह स्मरण ग्मना उचित है सियाल्यावस्था एन किशोरावस्था में लडक्यिों लडको की अपेक्षा अधिक परिपक्व दृश्रा करती हैं। बाल्यावस्या से शिोगवस्था में लड़कों और लडक्यिा के समाव और बुद्धि वृत्तियों म बहुत अन्तर बढ जाता है। किन्तु पण्टिव एल. एम. टरमैन की परीक्षाओं में लडरियों की अपेक्षा लडके बुद्धिवृत्ति में अधिक प्रसर प्रमाणित हुए थे। लडको की अपेक्षा लडकियो म मानसिक एव शारीरिक विकास अधिक शीघ्र होता है। किन्तु स्कूलों एवं विश्वविद्यालयों के छात्र तया छात्राएँ समान रूप से ही पर्गनोत्तीर्ण होती हैं। क्मी-कमी इन परीक्षामा में लडकों की अपेक्षा लड़कियाँ अधिक सफलता दिग्गती हैं। उनकी अति उग्चल सफलता को देखकर यह आशा रत्पन होती है कि भविष्य जीवन में ये लड़कियों न जान कितनी रनति करेंगी, किन्तु ६ ८८ हा वंशानुनम विज्ञान सासारिक जीवन की उलझनो मे पड़कर उनकी प्रतिभा न जान कहाँ लुम हो जाती है। पर्यवेक्षण शक्ति एवं स्मृति-शक्ति म नागे पुरुप से पिछड़ी हुई नहा है, जितु साहित्य के क्षेत्र म प्रामा नवीन की सृष्टि म साधारणतया नारी पुरुष की अपेक्षा अधिक दक्षता का परिचय नहा दे पाई है। सम्भवत इसमा कारण यह नहा है कि नारी की मानसिक शक्ति पुरुप से कम है, वरन् इसस यह कारण है कि नारी की अभिनचि पुरुप से भिन है। नारी की प्रेरणा पुरुष की 'प्रपा भित दिशा की पार प्रवाहित होती है। साधारणतया नारी पुरुप भी अपना अधिक हठ समाली हाती है। मितु उमकी जिद पुरुप का हिट से भिन्न प्रकार की होती है। नारी सुदगे एवं प्रिया हान की 'अभि नापिणी होती है पुरुष पत्ता का अभिमान करता है, उस मन म शक्तिमान् शान की दुराशा रहती है। पुरप दूसरों पर श्रारमण करन मे जिना उगम का अनुभव करता है या कष्ट सदन कम तनी ही शामा रगती है। प्रकृति का अध्यर्थ प्रेरणा मे नागे पुरप का मुना देती रहती है, और उसी के श्रमार निय रण से नारी म ततिया के जामनगली पाती है। इसी कारण पुरुप बसता सत्तनियो की रचि अभिरचिया पर स्त्री का ध्यान समारता है। स्त्री मी वामना रामनाएँ पुरुष और मतान मततियां पर 'पर लम्रित रहती है। पारिवारिक जीवन मन्त्री का विशप स्थrn होता है और उस अपरिमनिय कारण पुरुष की अपेक्षा नारी श्रमिक सहानुभूति-मम्पन्न होती है। पराइ पीर की अनुभूति नाम पुग्प की अपेक्षा पदा अधिक रहती है। रितु ग्मी सहानुभूति गृह परिवार फ मीण परे म ही अधिस रत्ति पाती है। यदि मा न हाता ता नागे पारिवारिक जीवन प पर म थलग निम्न जान की गम्भीर मम्भावना रहती। नारी का स्नहार्पण पति और सन्तान की धार सीमित रहता है। पनि म ।
पुरुष और स्त्री का पारस्परिक शाकपण मन मे माया मोह उत्पन काने में ही स्त्री का कृतित्व है । पुस्प स्त्री की अपेक्षा अधिक स्वार्थपर एवं अपने अश्किमा रहने का अभ्यस्त है। निम्नार्य शुद्धि से प्रेरित हो काम करना एर केनल ज्ञान प्राप्ति के तिरा नाना पण करने का दृष्टात मनुष्यों में भी दुलभ है। उपर का विवरण जर्मन वनानिश क मतानुसार दिया गया है। उक्त विवरण से जर्मन पण्टितो की मानसिक गति का परिचय मिलता है। निस्सन्देह त्रियों और पुरपो की प्रकृति म यथेष्ट अतर है। इसका यह अर्थ नहा कि पुस्प नारी की अपेक्षा श्रेष्ट है। इसका केवल इतना ही तात्पर्य है कि बी एय पुन्प के त्रभिन हैं। अपने अपने क्षेत्र म पुरप श्रथा की मपान है । स्त्री की प्रवृत्तियाँ मीमित क्षेत्र में अत्यत गम्भीर हुमा करती है, पुम्प की प्रवृत्तियाँ व्यापक रूप से नियाशील रहती है, इस कारण साधारणतया पुरुप की भावना कामना स्त्री की अपेना कम गम्भीर हुश्रा करती है। किन्तु किसी एक विषय पर मन हा जाास स्त्रियों अथवा पुरपो में कोई विशेष अन्तर नहीं रहता है। म्री भी जिस विषय पर मन से तग जायगी, उस विषय मे वह पुम्प की अपेक्षा कम नक्षता नहीं दियायेगी। । । पाँचवाँ परिच्छेद पुरप और स्त्री का पारस्परिक ग्राफर्पण योन मोह पार श्रारण-यागमूना म पन्थान पर यह कहा गया है कि बुद्ध प्रीपधिया के प्रयोग से भी समाधि की प्रस्था प्राप्त की जा सस्ती है। अर्थात् मानसिक स्यिाओं र परिणाम मेनिस अनस्था को हम प्राप्त कर सरने हैं, उसी यव स्था को हम औषधियो के प्रयोग से भी प्राप्त कर सकते हैं।
यशानुक्रम विज्ञान भारतीय अध्यात्मवाद के दृष्टिकोण से मानसिक प्रिया भी जडवाद के सिद्धान्त पर प्रतिष्ठित है, अर्थात् मानसिक सत्ता भी जड जगन् की ही पर्यायभुक्त है। श्राधुनिक वैज्ञानिमा मे तथा पाश्चात्य दशा के जनसाधारण में भी आजाल जड़वाद तथा अध्यात्मवाद को लेकर एक द्वन्द्व चल रहा है। कुछ वैज्ञानिक केरल जड विज्ञान के प्राचार पर ही समस्त समस्याश्रा की मीमांसा करना चाहते हैं। थोर दूसरे वैज्ञानिक जइयाद ये अतिरिक्त मानसिक सत्ता के आधार पर भी वैज्ञानिस प्रश्ना की श्रालोचना और मीमांसा करना चाहत हैं। इन दुसरी अणा के वैज्ञानिमा य मतानुसार मानमिर सत्ता, जड सत्ता स क अलग रस्तु है। इनरी राय म मानसिक सत्ता एवं चतय एक ही हैं। जहादिया न ओर परीक्षा के आधार पर यह मिद कर दिखाया है कि रासायनिम न्या + प्रभार स मानसिक प्रगति यनती निगडती है। श्रत उनरा कहना है कि मानसिर सत्ता भी जड़ वस्तुग्रा का ही परिणाम है। श्री और पुरप एक दूसर ये प्रति जैसे प्राचरण करत हैं, बी पुग्प क प्रति और पुग्प स्त्री के प्रति निस प्रकार धारपिन होते रहते हैं, उनो मूल म भी दहस्थित प्रथिया के रमाबाह का ही अव्यर्थ प्रभाव है। मनुष्य तथा प्रय प्राणिया की दाम दो प्ररार की प्रथियों रहती है, एक ता पुरप क अण्टाप और विया ये टिम्याणु जैमी प्रन्थियां, दूसरी प्रकार को प्रश्थिया को अंगरेजी में 'टस्टलम् ग्लेएटस्' (Duetless Glands ) अर्थात्, नन विहीन प्रन्थियो कहते हैं । त्रियों और पुरुषा को चारिनिर तथा मानमिर प्रथनियों इन अथिया के मिरिय प्रकार के रम प्राह पर यात कुत्र निर्भर है। यति स्त्री की देह से अण्टाणु निगल लिये जायें तो पुरष क पवित्री का समस्त श्रार्पण हया हा जायगा।
और स्त्री का पारस्परिक श्राक्पण ९१ जिस यौन पारर्पण के अाधार पर ससार के श्रेष्ठ उपन्यास और काव्य रचे गये हैं, असाधारण प्रतिभावान् क्लाकार के निपुण तृलिकाघात से जिम अदमुत चित्राला का विकास हुआ है और मगीन को अपूर्व मूर्चना की दृष्टि हुई है, वह प्रार्पण तभी सम्भव हुआ है जब मनुष्य देह म प्रन्थियों से स्वाभाविक रूप में रस प्रवाह हुआ है। त्रियो और पुरुषा में परस्पर आर्पण का रहस्य इन प्रथियो से रम निर्गमन में ही छिपा हुआ है। चूहों पर परीक्षा कर देखा गया है कि जब चुहियों के पेट से अण्डाणु निकाल लिये जाते हैं तब वे चूहों को पास नहा श्राने देती। रितु यदि फिर उनी देह में श्रएटाणु अथवा उसका रस प्रवेश कराया जाता है, तो वे फिर चुहियो का सा आचरण करने लगती हैं, चूहों को पास आने देती है और उनसे भोग करने को प्रस्तुत हो जाती हैं। अण्टाणु और अण्डकोपों को छोडकर जो दूसरी श्रेणी की प्रन्थियों हैं, उना भी प्रभाव कुछ कम नहीं है। यदि क्मिी पुरुष की देह से मस्तिष्क के नीचे की 'पिटुझ्टॉरी' प्रन्थि निकाल ली जाय तो पुरुप के अण्डकोप भी शुफप्राय हो जायेंगे, और इम कारण पुरुष में सब प्रसार के यौन लक्षण लुभप्राय हो जायेंगे। तर उसके मन में स्त्री के प्रति क्सिी प्रकार का श्रावण नहीं रह जायगा। यति फिर उसकी देह म पिटुइटॉग' प्रन्थि का रस प्रवेश कराया जाय तो पुन वह व्यक्ति पुरपोचित आचरण करने लगेगा। स्त्रियों के लिए भी ये ही बातें लागू हैं। अर्थात् "गोनाटस" अथवा "सेक्स ग्लैण्डस्" का कार्य "डस्टलेस ग्लैण्ड्स" के रस प्राह पर निर्भर रहता है। यदि किसी व्यक्ति में 'पिटुइटोरी" ग्रन्थि अपूर्ण रह गई हो, अथवा किसी कारण उससे रसप्रवाह न होता हो तो उस न्यक्ति के "सेम्स ग्नैएम् ' भी रियाशील नहा होंगे।
वंशानुनम निज्ञान
यदि यौवनावस्था के पूर्व ही रिसी प्राणी की दह में 'पिटुइटोरी'
प्रन्धि का ग्स मरेश कराया जाय ता अपनी अपस्या के पूर्व ही
उसीह में यौग्नोचित लक्षण विकसित होने लगेंगे, पीक
अण्डाणु अपन समय के पूर्व ही पुष्ट हा गायेंग, पुरुष का लिङ्ग भी
यौवन के पूर्व ही अपनी पूर्ण प्रसस्या को प्राप्त हो जायगा।
इस विषय म एक और यात पर ध्यान रखना 'पानश्या है।
त्री और पुरुप, दोनो के ही 'पिटुटोरी' प्रन्थिया प रस एक
भी प्रकार के होते हैं। केवल बात यह है कि पटुइटॉग यि
म रस निर्गमन न हो पा सम्म ग्तैएम् भी शियाशात नन
होते हैं। इस कारण यौन प्राण पर विविध प्रकार र
यान प्रारर्पण में मृत म दोना प्रकार की प्रथियों का ममान
प्रभार रहता है।
वैदानिशाण मनुष्य नह की श्री प्रकार की प्रयियों से रस
मह परन म समर्थ हैं और उनम गमायनिर विपण
परसे परीक्षामागे म उक्त श्रना प्रारद रस प्रस्तुत करत म भी
समर्थ हुए है। हमालियों का कहना है कि मानसिा सा जा
उगान से काइ स्तन र रहस्यमय यस्तु नत है। मानसिम
प्राति दह का ही एक विसर प्रथया शिराम है। श्रथापिटु दोग
प्रथि के रस निर्गमन पर ही मागमता का भी विकास है।
मनुष्य का मन थया उमरी मानमिक निया भी प्रथियों से रम
निर्गमन पर प्रसारित है-किन्तु पिटुन्टोगगट यारम निर्गमा
भी मानमिर इन्टा पर मानमिररचि अभिरचि परकम निभा
ना रहना । जवानी रहत है कि काम, माध, लोभ मोह, भय
मैटनादि मभी मानसिा दिया। प्रथियों में ग्म निगमा पर
श्रवलम्बित है। मी कसा-माथ या यान भी अन्य त मय
•शर--Sctence tathe MakingtyGerata leart)
पुरुप और स्त्री का पारस्परिक श्रादर्पण है कि उन ग्लैण्ड्स की क्रियाएँ भी व्यक्ति की इच्छा पर कम निर्भर नहा करती। मैथुन के परिणाम मे भी अन्थियों की प्रति वननी निगडती रहती है। प्रयियों के ग्म प्रवाह के माथ वशानुम्म विज्ञान का बहुत घनिष्ट सम्बन्ध है। नेचरल सिलेक्शन अथवा श्रय क्सिी प्रकार की न्याख्या से इस समस्या का कोई समाधान नही हाता है कि मा प्रसार के प्राणियों में क्यों एक ही विशेष श्रयस्था मे यौवनीचित लक्षण निनाई देत हैं। कुछ वैज्ञानिका का कहना है कि मैथुन की अवस्था मे देह की प्रन्थियों में भी परिवर्तन होते हैं और उनके प्रभान से जीन सोप तथा चीज शेप दोनो में ही परिवर्तन हा आते हैं। इसी कारण मनुष्यों की एक विशेष अवस्था में ही यौन लनण निरसित होने लगते हैं। इस बात म अभी वैज्ञानिस में यर्थष्ट्र मतभेद है। इस विषय की आलोचना दूसरे परिस्ठेद में विस्तृत रूप से की जायगी। मैथुन के समय मैथुन के कारण जीन देह मे विशेष परिवर्तन होते हैं, इसमे मन्देह नहीं और इम वात म मतभेद भी नहीं है। मतभेद इस बात मे है कि उ7 परिवर्तना के कारण बीज कोपों में भी परिवत्तेन होते हैं अथमा नहीं। यथार्थ वात यह है कि व्यक्ति का श्राचरण, उसका व्यनिल, आदि फेवल एक ही तत्व पर अवलम्बित नहीं हैं। व्यक्ति के ससार, उसमी कामना वासना इच्या अभिरुचि, सहजात सस्कार आदि का निर्माण न केवल जेनि पर निर्भर है, न थियो के रस प्रवाह पर। इस ससार म कोई भी वस्तु ऐमी नही है जो केवल जड हो अथवा करत चेतन हो। यह विश्व जड चेतनात्मक है। मनुष्य के श्राचरण सोपरि सहजात सस्कारों पर निर्भर है। सहजात सरकार यहाँ मे आते हैं कैसे उत्पन्न होते हैं, इनस यथार्थ उत्तर विज्ञान आज भी नहा दे पाया है। वशानुक्रम विज्ञान से हा प्रश्नों पर कुछ प्रकाश अवश्य पडता है, रितु पूर्व वशानुक्रम विज्ञान का रहस्य रहस्यावृत हो रह जाता है। विभिन्न प्रकार की प्रथियों से नाना प्रभार के रस निर्गत होते रहते हैं। उनके प्रभाव से मानसिक क्रियाएँ एव विकास होते रहत है। इसी प्रकार मानसिक चेष्टाया के परिणाम म भी प्रन्थियों से रम निर्गमन होता है। विशेष विशेष जेनि के कारण मनुष्य म विशेष विशेष गुण विकसित होत हे। उनक ही कारण देह म नाना प्रकार की प्रथियां भी उत्पन्न होती हैं। फिर फेवल एक एक जेनि के ही आधार पर वश-लक्षण नहीं उत्पन होते। सम्पूर्ण जेनि के सम्मिलित प्रभार से ही जोर-देह बनती है। पिटुइटॉरी' श्रादि प्रन्थियों में प्रभाव मे शारीरिक और मानसिक प्रकृति का विकास होता है और मानसिक और शारीरिक क्रियाओ क परिणाम म थियो म मी परिवर्तन होते रहत हैं। अध्यात्मवाद के अनुमार एक ही तत्व के दो विभिन्न प्रकार के निरास होते हैं, एक विकरात म जड का प्राधान्य रहता है, दूसरे प्रकार के विकास म चैतन्य का प्राधान्य रहता है। इस सिद्वान्त अनुसार यदि वैज्ञानिक मनों की मीमांसा एसान की जाय तभी यथार्थ ज्ञान का उदय होगा पर सरकार के दिग्द्ध अनिरुद्ध प्रभा का समाधान सम्मन होगा। छठा परिच्छेद सन्तान का पित्त कैम निर्यारित हो ? विगत महायुद्ध के अरमर पर नाना देशा के सैनिकों की हा से रक्त लकर परीक्षा की गयी। इन परीक्षाओं के परिणाम में यह झाव हुआ था जि माधारण ससार के मनुप्या म चार प्रकार के रक्त हैं। गहरी चोट पहुँचन क कारण प्रथा अरिक कट जाने के कारण या अन्य किमी कारण यदि मन्दान का पितृत्व कैम निरित हो गगो को नेह से अधिक मात्रा में रक्तस्राव हो जाय तो दृमी रह से रम रोगी की देह में रक्त पहुँचाया जाता है। पहले पल इस प्रकार रस के लेन-देन के कारण की तो रोगी बच गया है और क्मो उसी मृत्यु भी हो गई है। ऐसे दो विपरीन परिणामों के कारण अनुमधान करत समय इस बात का पता चला कि मनुष्यों को धमनिया में प्रधानत चार प्रकार के रक्क पवाहित होते हैं। यदि दा यत्तियों के रफ एक ही प्रकार के हो वा एक का रक्त दूमरे की देद में अनायास ही प्रवानि फगरा जा मरता है। इसमें कोई शमा की बात नहीं है। इस प्रकार के रक्त प्रवाह मे रोगी की उनति ही होती है, हानि नहीं होती। कि तु यनि दो यपियों के रक्त दा मित्र प्रकार के होते हैं, तो एक का रक्त दूसरे की देह में सञ्चालित कराने से रागो की मृतु हो जाती है, क्योंकि उक्त दो प्रकार के रक्त एकत्र सम्मिभित होने से जम जाते हैं, रक्त का प्रवाह रुक जाता है और रोगी की मृत्यु हो जाती है। चशानुक्रम के नियमानुसार उक्त चार प्रकार के मनुष्यों के पशा में भी चार प्रकार के रक्त पाये जाते है। पिता और मन्तान म एक ही प्रकार के रक का होना श्रापश्या है। माता और पिता के दोनों प्रकार के रक्ता का सन्तानों में सम्मण मेहेल के नियमानुसार होगा। वैज्ञानिक मोज के परिणाम म या जाना गया है कि केवल तीन प्रसर के जेनि के प्रभार में चार प्रकार के रक्त उत्पन्न होते हैं। इन वान जेनियों के नाम प, घी और यो रस्त्ये गये हैं। साधारण व्यक्ति के समान क लिए. इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि उच. तीन प्रकार क जेनियों में रक्त में प्रधानत तीन प्रकार की वस्तुएँ उत्पन होती है। m जेनि से एक प्रकार का पदाव उपन होता है, निसरा नाम टिजेन ए" (Antigen A) कसा जा सकता है। बी
९६
वशानुक्रम विज्ञान
जेनि से "एन्टिजेन वी" (Antigen B) उत्पन होता है। श्रा
जेनि से रिसी प्रसार का "एन्टिजेन" उत्पन्न नहीं हाता है।
ओ जेनि में जो पदार्थ उत्पन्न होते हैं वे अधिक सीन नहा होत ।
हम अपने माता पिता से अपने अपने रक्त के लिए दो दो जेनि
प्राप्त करत है, अर्थान् + माता से और दूसरा पिता से। टमलिग
हमारी देह में जेनि निम्न प्रकार के जोड म प्राप्त हाग-AA
BB, 'अथवा 00, अयथा मिश्रित जोदे, जैस-AB AO
प्रथा BO ( जन A और B दोना जेनि एकत्र रहत हैं, सर
गाना के गुण ममान रूप से प्रनल राते हैं। रितु 0 जेनि का
भार A अथवा B क साथ रहने स स्पष्ट नहीं होता है
A0 मे A का और 10 म B का प्रभान प्रल रहता है।
इम प्रहार पिता-माता से प्राप्त जेनि के आधार पर मनुष्य क
रक्त चार प्रसार के बन जाते हैं, सबितिक चिहा म इमा
सिद्धान्त को व्यक्त करने पर इस समगना सहज हो जायगा।
A+A'अथरा A+ 0 स जा क बनेगा, उमम केराटिजन
" नामर पदार्थ प्रधानता को प्राप्त होगा। इमा प्रसार
B+ B प्रथा B+0जेतिय मिभित होन पर जा रतना
उसमे केरल पाटिजेपी" पदाथ ही प्रधानत रहेगा| AB म
नाना पदार्थ ममान रप से रहा। 0+0 म फे। 0 प्रार
की वस्तुएँ रहेगी। अर्थात्-
A+ A या A+0=A प्रशा या im, B+ B या
B0%DB मरारका, A+ BAB प्रकार का मा
0+0-0 सरकारन। 'AB' रक्त म यAिRT
का श्रथना B प्रसारका श्यामसर का ति मागित
रिया जाय तो कोड हानि नहा होगा। रितु 0, A अथवा
प्रकार के रक्त में 'AB IN मिभित करन पर हानि होगा।
क्यामि AB और 0 मे, 'AB' और 4 म 'AB'
मतान का पितृत्व की निगरित हा और B में निमित्ताएं हैं। टमी प्रकार 0 प्रकार के रकम पवल 'A' श्रमा कपल B अथवा 'AB' प्रसार करत मिनित होन पर भी रक्त म जायगा। किन्तु 0 प्रकार का रक्त अन्य प्रकार क रत्ता में अनायाम ही मिश्रित किया ना सस्ता है। श्रपान- AB' में A या Bअपरा0 प्रकार करत मित्रित किये जा मस्ते हैं,-टममें गेड हानि नही होगी। किन्तु 0, A अथवा B प्रकार के रक्त में 'AB' रत्त नहीं मिलाया जा ममता है रक्त म भी अन्य प्रकार क रन नहीं मिनार जा सस्त। किन्तु 0 रत-अन्य प्रकार के रक्त में अनायाम मिश्रित किया जा सकता है। मनुप्यों में चार प्रकार करत होन क कारण माधार एवया एक के साथ दूसरे क मिश्रित होन पर हानि की मम्मानना रहती है। एम की देह से अन्य की देह म रक्त मञ्चालित करते समय इन मा याता पर ध्यान रपना श्रारभ्या है। मनुष्यों म चार प्रकार क रत्त होत है, टमके अनुमचान के पूर यह एक विस्मय की बात थी शिकभी तो रक्त सञ्चालन स लाभ हुभा और कभी हानि हुइ। श्राज टम समस्या का हा हो गया है जैसे पाली निगाली माता के गर्म से निहालानी कन्या का जम मम्मन हाता है, वैसे ही माता पिता श्रथमा स तान के रकम भी अन्नर होना सम्मर है। रिसी स तान के पितृत्व का निर्णय करते समय उपर यताये गये सिद्धान्तों का प्रयोग पिया जाता है। अमेरिका संयुक्त राष्ट्र के न्यायालयों में रक्त परीक्षा के उपर्युक्त मिद्वान्ता को स्वीकार किया गया है। 'यू पाट हेरटिटी" नामा पुस्तक यशानुम्म विज्ञान म अमेरिया के न्यायायों के पुछ दृष्टान्त दिय गये हैं। उन मे एक rत का उलस इस स्थान पर दिया जाता है। अमेरिका की एक युवती वहाँ के एक गएय-मान्य व्यक्ति के विरुद्ध अदालत में यह अभियोग लाई थी कि उक्त व्यक्ति मेरे साथ विवाह करने का वादा किया था एव उसके ओरस से मेरे सन्तान उत्पन हुई है। इस कारण मुझे क्षतिपूर्ति स्वरूप इतने रुपये दिये जायें। न्यायाधीश ने अमेरिका के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. रूफस ई. स्टेट्सन को उक्त युक्ती और उसकी सन्तान के रक्तों की परीक्षा करने को कहा। परीक्षा के परिणाम मे पता चला कि युवती का रफ 0 प्रकार का था और उसके स तान का रक्त A मार का था। इसका तात्पर्य यह था कि माता की ओर से सन्तान को केवल प्रसार का जेनि प्राप्त हो सकता था। इस कारण उक्त सन्तान को पिता की ओर से हो A प्रकार का जेनि प्राप्त होना सम्मन था। इस प्रकार पिता का जेनि (जिन जेनिया से रक्त की प्रति घनी है) B प्रसर या ना हो सस्ता या, क्योंकि सन्तान को 'A' जेनि माप्त हुआ था। इस युक्ति के अनुसार पिता का रक्त 'A' अथवा 'ABY प्रकार का ही हो सस्ता था । डा० सेट्सन साहय न उक्त पिता के रक्त की परीक्षा करके देखा कि उसरा रक्त '0' प्रकार का था।- श्रर इसमे कोइ सन्देह नहीं रहा कि उक्त सन्तान का यह पिता नहीं था। अगलन ने भी हास्टर के मतानुमार यही राय दी। A, B और 0 जेनियों के अतिरिक रक की प्रति और गौण जेनियों मे मी यनी है। उन दो जेनिया के नाम 'N' और 'N' जेनि रम्प गये हैं। अयान A, B, AB, और 0 प्रकार क रक्त के अतिरिक्त MM अथवा NN श्रथा MN गुण भी राम मिलते हैं। एक देह से दृमरी देह में रस-मञ्चालन के लिए I और N का किमी प्रसर का प्रभाव परलक्षित होता है, किन्तु सन्तान का पितृत्व कैसे निर्धारित हो = सन्तान के पितृत्व निर्णय करने के लिए और N के होने का महत्त्व है। इन परीक्षाओं के परिणाम मे वैज्ञानिा केवल इतना ही कह सकता है कि अमुक व्यक्ति अमुक स तान का पिता नहा हो सकता, किन्तु इसके विपरीत यह बात निश्चयात्म रूप से कभी कहो नहीं जा सकती मि अमुक व्यक्ति अमुक सन्तानका पिता अवश्य है। विज्ञान इतना ही कह सस्ता है कि अमुक व्यक्ति अमुक सन्तान का पिता हो सकता है। अर्थात् पिता मे जिस श्रेणी का रक्त है, उस श्रेणी के रक्ताले और भी मैक्डों व्यक्ति संमार में हैं। श्राधुनिक विज्ञान के अनुसार पितृत्व के विरोध में ही प्रमाण उपस्थित रिये जा सक्ते हैं उसके पक्ष में निश्चयात्मक प्रमाण नहीं दिये जा सस्ते। M और N प्रमाण के अनुसार एक और दृष्टान्त “You and Heredity" प्रथ में दिया गया है। एक दिनाहित स्त्री ने अदालत में यह दावा किया कि मेरी सतान मेरे प्रेमी की है, मेरे पति की नहीं है। उसके पति ने दाना किया कि सन्तान मेरी है। A, B, AB और 0 श्रेणियों के रक्त के प्रमाणानुसार यह देखा गया था कि पति उक्त सन्तान का पिता हो सकता है। किंतु पति के और सन्तान के दुर्भाग्यवश M और N प्रमाणानुमार यह सिद्ध हुआ कि पति उक्त सन्तान का पिता नहीं हो सकता था। पितृत्व निर्धारण की परीक्षाओ में एक और कठिनाइ पा पड़ती है, सन्तान का रक्त परीक्षा के लिए परिपुष्ट होन में एक पूरा वर्ष अथना उससे भी अधिक समय लगता है। किन्तु जन्म के थोडे दिनों के अन्दर ही पितृत्व निर्धारण के लिए बना मे रक्त की परीक्षा की आवश्यक्ता होती है।
२०० वंशानुक्रम विज्ञान ऊपर दिये गये सिद्वान्तो को सक्षित, स्पष्ट और सरल व्याप्या नीचे दी जाती है, पति चन्चे का पिता नहीं है। यदि बच्चे के रसकी श्रेणी और स्त्री के रहवीश्रणा पति ये रत की श्रेणी निम्न प्रकार की हो निम्न प्रकार की दो निम्न प्रकार की हो श्रेणी चाई किमी मो श्रेया का हो, AB भणी AB श्रेणी चाहे किसी भी श्रेणी का हो, 0 श्रेणी A श्रेणी 0 अपरा B श्रेणी 0 अथवा घेणी Bणी अथवा A श्रणो 0 अथा A भणी एर गौर मार प्रमाणानुमार पति बच्चे का पिता ना मरता है। यदि बच्चे के रक्त म गौण लक्षण निम्न प्रकार का हो और स्त्री के रकम गौण लक्षा निम्न प्रकारका पति ने रकम गौण नक्षण निम्न प्रकार का हो 1 N N चाहे जिस प्रकार का हो चाह जिस प्रकार का हो N M MIN N MN M M पीर्य त्पादन की शक्ति --मनातन वीज कोप १०१ इमा , सातवॉ परिच्छेद वीर्य उत्सादन की शक्ति- सनातन चौज-कोप स्त्री व एटाणु म पुरुप के पौर्य मे केवल एक वीज कोप के प्रवेश करा १६ जीन का देह पाती है। भ्रूण रूपी एक जीप-योप के प्रमश रिभाजित होने पर जीव देर का रिकाम होता है। परिचय हम मान हो चुका है। र भ्रूण साप मे महम्र कोपा की उपत्ति होती है। ये मर कोप श्रमा जीन कोप, धीरे पोरे एफ एफ, पिरोप कार्योपयोगी, माम पशी, अम्धि, मन्ना भाटि पिभित्र प्रहों के रूप में बनने जात है। मितु युद्ध कोप राग रह जाते हैं। देह के बनन-बनाने में ये काइ कार्य नहीं करत । देह के पिनष्ट होने पर भले ही य नष्ट हो जायें, अन्यथा इनका नाश नहीं होता। इहा सपा में वोर्य अथवा वीज-शेप बनते हैं और ये पुन सन्ततियों में पहुँच जाते हैं। इस प्रकार इन बीन शोषण का कभी भी नाश नहा होता। हिमाप से ये अग्निाशी हैं। जन्म के समय मे हा गाना के एटसोपा म ये विशेष कोष्ट रहत हैं, जिसे फैशारावस्था के बाद यौवनावस्था मे वीर्य उत्पन होता है। निम प्रसार केरल एफ कोप से ही लासा कोप उत्पन्न होत हैं उसी प्रकार कुछ बीज रोपा म ही लाग्ना वीज सोप उत्पन होत है। यह न ठ सरना है कि क्या मनुप्य देह में वीर्य उत्पारन की शक्ति सीमित है अपमानहीं ? माधारण रीति से यह कहा जा मरना है कि मनुष्य में वीर्य उत्पादन की शक्ति सीमित नक्ष है। केवल एक धार के वार्यपात मे गौम कराह मे लेकर पचास करोड वीज पोप निम्नते हैं। फिर भी जिन सपो से ये उत्पन होत हे, वें पूर्वमन् ही रियाशील एवं शक्तिशाली रह जाते हैं। जब- ।
।
१०२
वंशानुक्रम विज्ञान
देह नीरोग एवं सस्थ वनो रहती है, उस समय तक वीर्य उत्पादन
की शक्ति मनुष्य मे रहती है।
कि तु खी के अण्डाणुआ की सरया सीमित है। जाम से ही
कन्या की देह मे एक सीमित सरया के अपरिपक्व अण्डाणु रहते
हैं। स्त्री के बीज कोप अण्टाणुश्रा में परिवत्तित हो जात हैं।
यौवनावस्था में प्राय २८ दिन म केवल एक अण्डाणु ऋतु के समय
निकलता है। प्राय ३५ वर्ष तक स्त्री के अण्डाणु निक्लने रहते
है। उसके पश्चात् स्त्री के लिए ऋतुकात पर हो जाता है।
अण्डाणु यौवनावस्था मे ही परिपक्व होते हैं रितु अण्डाणु के
भीतर के वश सूनों में (Chromosomes ) मॉमासाम म कोई
परिवर्तन नहीं होता।
सन्तान के वीर्य अथरा अएटाणु म जो वश-सून (Chromo
somes) रहत हैं वे पिता माता के यश सूना के ही जीवित अंश हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि पति स्वयं स्त्री के गर्भ म
प्रवेश करता है और तर सन्तान की उत्पत्ति होती है। पिता और
माता अपने अपने पिता माताश्रा से जो वश सून प्राप्त करत हैं
उहाँ के श्रशा को वे अपनी मन्तानो को रत है। इस प्रसार जीवनी
शक्ति का प्रवाह न जान किस अतीत युग मे चना पा रहा है।
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श्राठवाँ परिच्छेद
थायु और वश
माधारण रोवि मे यह कहा जा सरना है सि स्मिी रिसी वश में
मनुष्य अधिक दिन जीवित रहत है और किमी किमी वंश म
आयु थोड़ी होती है। माधारण व्यक्ति की यह धारणा
कुद मीमा तक मय है।
मनुष्य की
और पश नाना वायु कुछ डाक्टरों की राय तो यह है कि मनुष्य की श्रायु जम के समय ही निदिष्ट हो जाती है। भविष्य म, यदि अस्मात् किसी दुर्घटना के कारण, गाडी के नीचे दरार अथा छत से नीचे गिरकर, अथवा साँप के काट लेने से मृत्यु नहा होती है तो रिसी बीमारी के कारण अथवा साधारणतया व्यक्ति की मृत्यु एक निदिष्ट समय पर ही होगी। किसी भी उपाय से न तो किसी को प्रायु बढाई जा सकती है और न घटाई जा मस्ती है। जम के समय पिता, पितामह, माता, मातामह, पितामही, मातामही आदि से क्श सूनो के द्वारा वश के जो गुण अवगुण प्राप्त होते हैं, उन्ही के आधार पर आयु धनती है। पर्गिमित आहार और बिहार के कारण स्वास्थ्य मुदर धन सस्ता है, भधार के रोगो से बच सस्ते हैं, किन्तु आयु नहा वढ सस्ती । इमा प्रकार दुराचरण से स्वास्थ्य निगड़ सकता है, रोगी वन साते हैं, तथापि श्रायु नहीं घट जायगी। इसका कारण यह है कि वशगत गुण अवगुणों के कारण हम जिस जीवनी-शक्ति के उत्तराधिकारी बनते हैं, उसी के आधार पर हमारी आयु भी बनती है। बाहरी कारणों से उसमे कोई अन्तर नहीं पड सकता। इस समार में, जीवित वस्तुआ मे, वृक्षो से अधिक और किसी की भी श्रायु नहीं होती। वृक्षों में भी अलग अलग वश-लक्षण होते हैं। पेड पौधों की आयु में भी नाना प्रकार के तारतम्य होते हैं। कोई पौधा केवल एक वर्ष में ही मर जाता है, कोई एक ऋतु में समाप्त हो जाता है और कोई वृक्ष बहुत वर्षों तक जीवित रहता है। आस्ट्रेलिया में एक प्रकार का वृक्ष है, जिसकी आयु वत्तमान समय मे १५,००० वर्ष हो चुकी है। इस श्रेणी के वृक्षों का नाम मैमोजामिया' है। भूमि और जल-वायु आदि विविध कारणों से भी । वृक्षों की श्रायु कुछ सीमा तक घटती बढती है, वृक्षों पर उन सयों 1 का प्रभाव भी कुछ कम नहीं है, किन्तु वृक्षों की प्रकृति में भी कुछ वशानुक्रम विज्ञान तत्त्व है, जिसके कारण कुछ वृक्षा की आयु अधिक होती है और कुन की कम! एफ हो जल वायु और एक ही भूमि में विभिन्न जाति के वृक्ष रिभिन समय तक जीवित रहते हैं। अर्थात् वृक्षों म भी वशगत धारा वर्तमान है। वन्य जतुओं में भी चशगत धारा के हिसार से कोई तो अधिक दिन तक जीवित रहता है और कोई थोडे दिनो तक । वन्य जतुओ को हर घडी नाना प्रकार के सकटों का सामना करना पड़ता है, तथापि साधारणतया निमितभेणो के जोगों की आयु कम अधिक होती है। यदि हारिया की ठीक-ठीक सेवा की जाय और उहे यत पूर रस्सा जाय तो वेन से सौ वर्ष तक जोरित रह मरते हैं। अश्व की आयु साधारणतया ४५ वर्ष तक की होती है, कुत्ते और दिल्ली वीस वर्ष तक जीवित रहते हैं, येल तीस वर्ष तक जीवित रहते हैं। उपनिपदा में मनुष्य की आयु का प्रमाण १०० वर्ष तक कहा गया है। किन्तु महाभारत और पुराणा में मनुष्यों की थायु सहस्र वर्ष तक यताई गई है। ईसाइयों की धर्मपुरतक 'वाचा' में भी प्राचीन काल के मनुष्यों की आयु प्राय सहन वर्ष ही नवाइ गर है। किन्तु क्मिी रिसो का कहना है रि विश्व यापी महाप्लापन के पूर्व वर्ष की गणना नापन के बाद की गणना से मिन भी। वाईरल' में ही मूसा श्रादि कुछ व्यक्यिो यी आयु १०० से १८० वर्ष तक यताई गई है। आधुनिक समय म कमी भी ऐमा सुनने म आया है कि अनुर व्यक्ति की आयु १०५ वर्ष की पया १८० वर्ष की है। एमे स्टालों का छोडकर नानिक रौनि से बीमा कम्पनियों में जा गराना होती है, उनमे यह ज्ञात हुआ है कि वर्तमान समय में अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र में प्रतिाल व्यक्तियों में केवल एक व्यक्ति १०० वर्ष जारित रहता है। रितु श्रीसतन अमेरिका क ।
प्रायु और नश मनुप्यों की श्रायु पुस्प के लिए ६० वर्ष एव खो के लिए ६४ वर्ष की है। इसक प्रतिक्षिक रिशेप विशेष वश में मनुष्यों की आयु मिन-भिन प्रकार की है। इस बात को देसार यह धारणा उत्पन हुई है कि मनुष्यों की आयु भी वश परम्परा से प्राप्त जेनि के श्राधार पर कम या अधिक होती है। इस नित्य परिवर्तनशीन ससार में कोई भी वस्तु अपरिवर्तित अवस्था में नहीं रह सकती। विश्वप्रति की भाँति, मनुष्य समाज मे और ससार को निमिन जातिया म भी धीरे धीरे नाना प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं। १०० वर्ष पूर्व जापान की विशषता के बारे म सिरो क्या पता था। इसी प्रकार भाज से १०० वर्ष बाद भी न जाने कौन थला श्रममा ज्ञान जाति समार के रङ्गमञ्च पर अपनी श्रभावनीय विशेषता का परिचय द समगी। मनुप्य-समाज में नाना प्रकार के परिवर्तना के साथ-साथ मनुष्यों के पासुराल में भी परिवर्तन दिखाई देते हैं। विगत १८वीं शतादी में, यूरोप में, मनुष्य की आयु श्रीसतन ३५ अर्य तर को हाती थी। ई. सन् १९०१ में यह ५० वर्ष तक पहुँच गह थी। श्राज, श्रीमतन, मनुष्य को आयु अमेरिका में .. वर्ष की होती है। चिकित्माविज्ञान की उन्नति के कारण डिथिरिया और पुरा मोसी प्रानि रोगा से प्रर१०० म ८० बच्चे व जाते हैं। ताऊन, हैजा आदि बीमारियों से भी पहले की अपेक्षा आजकल कम श्रादमी मरते हैं। इस प्रकार पूर्वापा अाजकल अधिक मनुष्य जीवित रहते हैं, किन्तु व्यक्तियों की प्रायु इन सब बातों से अधिक यही नहीं। केवल वचा के लिए ही यह कहा जा सस्ता है कि आधुनिक युग में उनके बचे रहने की पाशा पहले से बढ़ गई है। मनुप्या की मृयु कैसे और क्या होती है, इसका ज्ञान श्रमी तर विज्ञान को प्राप्त नहीं है। किसी वैज्ञानिक का कहना है
वशनुस्म विज्ञान
कि मनुष्य देह मे कोई काई अंग सडने लगता है । दूसरे
वैज्ञानिको का कहना है कि हमारी धमनियों में रक्त माह की
शक्ति कम हो जाती है और उनमें दूसरे प्रकार के भी परिवर्तन
हो जाते हैं इसी मे मनुष्य की मृयु हो जाती है। ऐसे भी
वेज्ञानिक है जा कहते हैं कि देह की प्रपियो की शक्ति तुम
हो जाने के कारण मनुष्या की मृत्यु हो जाती है। तु
वशानुनम विज्ञान के अनुसार यह मत सबसे प्रगल माना जाता
है कि वश परम्परा से प्राप्त र कारण ही मनुष्यों की
आयु जम के समय से ही निदिष्ट १ ज नी है। सम्भार है,
विशेष विशेष जेनि कारण, देह में विशेष विशेष गरी एक
नियत समय पर क्ष्य को प्राप्त होत हो। हदय यन्न का नियन्त्रण,
सम्भव है, किसी एक जेनि द्वारा होता हो, श्रापमा परी
क सम्मिहित प्रभाय स देह रूपी यत्र विशेष विशेष ग्रा
साब निर्यात होत हो।
चैनिका ने मनुष्यवहाश्रित और विशेष शिप जैन की
पहचान पर ती है। उसम ऐस भी जनि है, जिना कारण
मनुष्यों की मृत्यु हो सकती है। पेड़ पौधे और ज सुनो में
भी ऐमे जेनि राप्त हुए हैं। स भी जेनि है, जिस कारण
गरिरथा में ही प्रथा जमर थाई लिना करा. जीन
की मृत्यु हो जाती है। मेरोस परिवार मान्दम है, जिस पर
अत्यल्प समय के प्रदरही मर जात है। निन निम्न श्रेणी के
प्राणियों का कर वशानुनम के सम्बधम परीक्षा की जाती है,
उनमे मे मृयुवाही थना नि का पता चला है। किन्तु मनुष्यों
मेंम प्रसार के प्राए-नाशर योडे जेनि का ही पता चला है।
इम प्रसार के और भी जैनिकी सोजाजता हो रही है। कमा
कमी मा देखा गया है मिस्त्री गर्भधारण का अनुभर करती है,
किन्तु थोड ही दिना में मालूम हाता है कि यह गर्भपती नहीं हुई थी।
श्रायु और वश २०७ ऐसे अपमग पर नानिमगण अनुमान करते हैं कि नी यथा में गर्भवती हुई थी, किन्तु मृउबदनारी जेनि के कारण इस गर्म ग नाश हो गया। जेनि के कारण ही कमी भी गर्म- पात भी हो जाता है। निम जेनि के कारण मृयु हो साती है वह जेनि स्मिी भी र म श्रोले नहीं रह सकता। अथवा यो कहना और भी उचित होगा कि किमी एक जेनि के कारण प्राणी की मृतु नहीं हो सकती। पमा होना समय हा नदी, क्योरि निम जेनि के कारण मृत्यु हो मम्नी है, वह जेनि उत्तराधिकार के सूत्र में बच्चे म या ही नहीं सकता। भ्रण म अात ही तो वह भ्रूण का नष्ट कर गा। इस कारण या अनुमान किया जाता है कि मृयु-बहन पारी जनि थकनार्या नदी हाते। ताश्रममा उममे पिर अनि मामूहिक रूप में कायारी हा मस्त हैं। ऐसे रिपाक्त जनि म म एक श ता पिता का पार से और दूमरे को माता की श्रार मे सन्तान प्राप्त कर मस्ती है। एक प्रकार कराग में वनों की अंगुशियाँ नहीं ५ यरानर रहती हैं। अनुमान पिया जाता है कि का परम्परा में प्राप्त जेनि के प्रमान मे ही ऐमा हाता है। वैज्ञानिका के निस्ट पर ऐमा दृष्टान्त उपस्थित है, दा निस्ट श्रात्मीय, चचेरे भाई-वाना के मम्निनन से एक ऐसा कन्या का जम हुमाया, निसके न पैर को एक मी उँगनी थी और न हाय की। दार्प की पानु म इम लडकी की मृयु हो गई थी। हीमा फिला एक और प्रकार की बीमारी है। टम गा में एक बार रक्क त्रान श्रारम्भ होजान मे फिर रक्त का निकनना बन्द नहा हो सकता, पौर रोगी को मृयु अनिवार्य हो जाती है। इस रोग की भी उत्पत्ति वश परम्परा में प्राप्त जेनि के कारण ही होती है। इस गेग के मूल म भी तो जेनि ही कियाशील रहत हैं। "हीमोफिला" गेग-युक्त कोई भी व्यक्ति अधिक दिन जीवित नहीं रह सम्वा ।
१०८ । 1 वंशानुभम विज्ञान यदि कुछ जेनि के कारण गर्भावस्था में, अथवा शिशु अवस्य- मे या बाल्यावस्था मे जीव की मृत्यु हो सकती है, तो ऐसे भी जेनि हो सकते हैं जिनके कारण किसी दूसरे नियत समय पर, अधिक अवस्था मे मनुष्य की मृत्यु होती हो। अभी तक वैज्ञानिक रीति से इस सिद्धान्त की पुष्टि नहीं हुई है। किन्तु वश के हिसा से यह देखा गया है कि किसी क्मिी घर में लोगो की आयु कम होती है और किसी किसी मे अविर । उत्तराधिसर-सून से जेनि- को पाना ही इसका कारण है। अमेरिका और यूरोप श्रादि देशो में बीमा कम्पनिया ने साडी परिवारों की परीक्षाएं की हैं। उन पगलाया के आधार पर यह यहा जा सकता है कि मनुष्या की प्रायु दीर्घ और अल्प होना यशगत है। बीमायम्पनिया का पन्ना है कि जिस व्यक्ति में माता पिता अधिक दिन जीवित रहे, उस व्यक्ति को श्रायु अधिर होने की सम्भावना है। जिस वश मे माता पिता थरिक दिन जीवित रहत है हम वश म बीस वर्षवाले यक्ति कोषित रहने की आशा अन्य वश की अपेक्षा कम से कम ढाई वर्ष अधिक की जा सकती है। जिस वंश में माता पिता व ता जीवित रहें उम यश के ३० वर्ष के व्यक्तियों में से प्रनिशन २६ ६, ८० थप तक जीवित रह सरने है। और जिस वंश में माता पिता ६० वप तक जीवित रहें, सम वश मे, प्रतिशत २०३ व्यक्तियों की ३० वर्ष की अवस्था में यह बाशा की जा सकती है रि८० वर्ष तर जीवित रहेंगा हास्टर रेमात पर्न महोदय ने यदुन-मी परी की है। धनी हद राय यह है रिश परम्परा से प्राप्त जेनिश्राधार पर ही मनुष्यों को प्रातु कही दी होती है और कही अल्प। a. पन ने यह दावा है मालाग १० अथरा 10 वर्ष तक जीवित है, ऐसे १०० यनिया म म ८७ के मावा अथरा माता आयु और वश १०९ पिता, दोनों की आयु दीर्घ थी। उनमें से ऐसे बहुत से व्यक्ति थे, जिनकी मातामही, पितामह श्रादि पूर्वजगण अधिक आयु. वाले व्यक्ति थे। इसमें कोई सन्देह नहा कि पारिपार्श्विक वातावरण का प्रमाव भी मनुष्यो पर कम नहीं है। गरीन घरों में वचों की मृत्यु वनिस्तत अमीर घरों के अधिक होती है। इस स्थान पर एक और रहस्यपूर्ण बात का स्मरण रसना अच्छा होगा। साधारणतया लोग यह समझते हैं कि स्त्री की अपेक्षा पुरुप अधिक शक्तिशाली है। किन्तु वास्तविक क्षेत्र में स्त्री पुरुष की अपेक्षा अविक जीवित रहती है। ई० सन् १९३५ को गणना के हिसार से अमेरिका की Metropolitan Life Insurance Co ने निम्नलिखित हिसार लगाया था- जीवन की श्राशा (यूरोपियनों के लिए) क्सि श्रायु में पुरुप जीने की थाशा स्त्री जीने की आशा कर सकता है कर सस्ती है और भी ३८ वर्ष और भी ४१ वर्ष ३२ वर्ष २२ वर्ष ६० वप १५ वर्ष १६ वर्ष ९ वर्ष ५ वर्ष ५६ वर्ष वैज्ञानिकगण इस सोज में लगे हुए हैं कि हम मृत्यु से वैसे यच सरते हैं। इसी सम्पर्क में आयु के सम्बन्ध में भी सोज हो रही है। बहुत से वैज्ञानिक यह आशा कर रहे हैं कि मनुष्यों की आयु १२० वर्ष तक वढाई जा सरनी है। मेचनि ३० वर्ष ४० वर्ष ५० वर्ष २९ वर्ष " २४ वर्ष " ७० वर्ष ८० वर्ष २०२५ "
११४
यशानुस्म विज्ञान
मनुष्य समभार कई एक जेनि के सम्मिति प्रभार से बनता है।
माता पिता से हम जिस चरित्र को प्राप्त करते हैं उस चरित्र
पा पूर्ण विकास, वातावरण अनुकूल न होने पर, नहीं होता।
वंशानुनम की धारा से हम जिस स्वभाव के उत्तराधिकारी हात है,
उसा अर्थ यह है कि विशेष विशेष परिस्थितियों म हम विशेष
विशेष रूप से प्राचरण करते हैं। जेनि के कारण जो स्वभार
बनता है, वह भी विशेष पिशेप वातावरण में हो पनप साता है।
रशानुस्म के नियमानुसार पालक मेधानी र तीक्ष्ण बुद्धि
सम्प न हो सकता है, कि तु अनुशा शिक्षा एन उपयुक्त असर
माप्त न होने पर उस बालक उनति सम्भव नहां होती।
मनुष्य चरित्र के विरसिमें वशानुनम स प्राप्त समार
मन होता है, अयना उपयुक्त सामाजिा पातामा म, शिरा
दौरा पाने के कारण, यातागरण का प्रभार मत होता है। इस
Rोकर थाज भी वेज्ञाशि जात् म तुभुत सपा
है। यह प्रश्न वैसा ही है जैमा यह प्रश्रमिनीज प्रा है प्रया
भूमि, जा, वायु, ताप प्रादि यदि पारिपाधिस या मिनु या
माया है, यानि एक प्रभार ममग या जाना है।
मनुष्य का चरित वश पाम्पा ग प्राप्त जेनि पापिाधि
वानाररण इनके ही गम्मिा मे पाता है
पमिद्व वैवारि मायुन जे. ना० एस. हालइन महोदय दो
माननीतारण के पारम्परिप्रसार कामममाया
हैदरा क ग क नाम दादा ( Red Fife)
दनिट एय (Hybrid H) है। ये दोने प्रकार के गे!
इच रार और दोदरच भूमि के यरवान पर राय जाने
है, तब
रामा काग माम अधिक स्पन हाता है।
जर इन भनी गेटुवा या दो इच और छ च भूमि के अन्तर म
लगाया जाता है, तब हा माना गया की उपज परार पायर
वंश और वातावरण
११५
होती है। जर इन दोनों के बीच का अंतर और मा अधिक
होता है, तर हाटनिड एच ( Hybrid H ) की पैदावार रेड
पाटम मे अविर हो जाती है । प्रयोन् यातामरण एर वश
दोना के ही प्रमान मि र पौधो, जतुओं अथना मनुष्यों के स्वभार
वनते हैं। मप्रतियाँ पानी में ही जीवित रह मानी है, पानी में
ही उनका तैरना होता है और पानी मे ही उनसरी जीवन जीना ममाप्त
हाती है । इस कारण (मछलियों के प्रसद्ग में) वशानुनम का प्रभाव
पानी म ही परिलदित हो सकता है, पानी के बाहर नहा।
यह मन ज्यये है कि मछलियाँ अथवा पानी इनमें से कौन अधिर
महत्त्व का है।
समाजन्यमस्या से सम्बधित प्रश्नों को मीमामा करते समय
यह प्रश्न स्वत ही उन्य होता है कि वश परम्पग से प्राप्त गुण
अगुणों का प्रभाव मनुष्य पर कहाँ तक पढ़ता है
। क्या मनुष्य
अपनी चेष्टा पर इन्दा के अनुसार अपनी शारीरिक और
मानमिर उनति कर सरना है अथवा नहा ? गरीन घरो की
सन्तानों की शारीरिक और मानमिन उन्नति अमीर घरा की
मन्तानो को अपेक्षा प्रमण्य कम होगी। अब त यह है कि
क्या दरिद नालो की कम उन्नति होना वश के कारण है अया
पारिपाश्विर वातावरण के कारण । इसका निर्णय करना बहुत कठिन
है। पाताल के शिनालया में दरिद्र एन श्रर्थशाली सभी
घरों के लडके पढने आते हैं। मितु गरीन घर के लडकों के लिए
अपनी पढाई मे उनति करना सहज बात नहीं है। इंगलैण्ड
श्रादि देशों में इस विषय के अनेक तथ्य साह दिये गये हैं, जिनमे
द अनुमान होता है कि दरिद घर के लडके प्राय अधिक
.सिर-Serence for Citizen by Iancelot Hoghen
P1063
११६ वशानुनम विज्ञान - मेधानी नहा होते। फितु यह कैसे कहा जाय कि वश के कारण ही ऐसा होता है, दरिद्रता एवं पारिपाश्विक वातावरण के कारण नहीं ? इसी प्रकार भारतीय वर्णव्यवस्था भी वश के श्राधार पर अक्लम्बित है। यह व्यवस्था भी आधुनिक विज्ञान के अनुसार समर्थन योग्य है अथरा नहीं, आदि आदि प्रश्नों की मीमांसा वशानुक्रम विज्ञान से प्राप्त हो सकती है। इसलिए यह प्रश्न बहुत महत्त्व का है कि वातावरण अथवा वश के प्रभाव म से कौन अधिक महत्व रखता है। कुछ बातों में तो यह अत्यन्त सष्ट है कि वश परम्परा से प्राप्त गुण अवगुणो का प्रभाव अर्थात् वीज-कोपा का प्रभाव वातावरण से अधिक महत्त्व रखता है। एक दृष्टात लीजिए,- सफेद चुहिया के पेट से यदि सब अण्डाणु निकाल लिये जायें पौर उसम काली चुहिया के अण्डाणु रस दिये जायें तो सोद चुहियों के बच्चे सव के सर काले ही हागे, सफेद नहीं। याचे पैदा हो जाने के बाद ही, दूसरे के अगनाणु चुहिया पेट में रस दिये जाने हैं और वे अण्डाणु दूसरे के पेट म रहत हुए भी पूर्ववत् क्रियाशीत रहते हैं। इतने भिन वातावरण म रहते हुए भी यीनकोप अथार अण्टाणु अपने सभार को नहीं छोड़त। इसी प्रकार यदि माद गुलाब ५ फूल की डाल लात गुलाय के पोधो में तगा दी जाती है तो उस लाल गुजाय र पौधे से साद गुलान के फूल ही निकनेंगे, ला 7 नहीं। चूहा पी भाति दूमरे प्राणियों के पेट से भी प्राणु निकालकर परीक्षा की गद है। इन मर परीनाया के परिणाम में यह निश्चयात्मर म्प से निम्ति हो जाता है कि पीनापा पर पारिपारिस पातारा सकार प्रभार नहीं पता। रिम्न श्रेणी के जीरों में पेड़-पौधों पर और भी बना प्रकार की परीना हुई हैं, और उन मर परीक्षाओं के परिणाम म यह प्रमाणित हुवा है कि माधारणतया वंश और वातावरण ११७ चीजकोषों पर वातावरण का प्रमार नहीं पड़ता।* निम्न श्रेणी के जीवों और पौधों का लेकर जैसी परीक्षाएं हुई है, वैसी परीक्षा मनुष्यों पर करना सम्मत नहीं है। किन्तु जो नियम पेट पौधों के लिए एव निम्न श्रेणी के जोगों के लिए लागू हैं, वे नियम मनुष्यों के लिए भी लागू होंगे ऐमा समझना युक्ति-सगत एव स्वाभाविक है। प्राणियों पर वातावरण का भी यथेट प्रमान पडता है, इसमे कोई सन्ह नहीं। यदि मगठिन एन व्यापक रूप से शिक्षा सी व्यवस्था की जाय एव रिद्र तरा अर्यशाली घरों के लड़कों तथा लक्यिा के लिए ममान रूप से रहने और साने पीने की व्यवस्था की जोय, तर यह पता बनेगा कि यश के हिसाब से रितने वाला प्रपर बुद्धिवाले निकलते हैं और क्तिने नहीं। सोरियट रूम में इसकी परीक्षा हुई है और यह ज्ञात हुआ है कि प्रारतिक कारणा से वशग३ गुण अवगुणों के उत्तराधिकारी होन के कारण व्यक्ति व्यक्ति में बहुत अन्तर है। किन्तु सामाजिक क्षेत्र में इस सिद्धान्त का प्रयोग करते समय बहुत सामधान होने की आवश्यकता है। वशगत गुण अवगुणों के हिमान से कहीं भी समाज की व्यवस्था नहीं हुई है। भारतीय वर्णव्यवस्था के याधुनिक रूप में न जाने कितनी त्रुटियों श्रा गई हैं। हमारे समाज में भी थाज गुणी व्यक्तियों के लिए उपयुक्त स्थान नहीं है। वटुत से वेज्ञानिा इस मन के अधिक पक्षपाती है कि वश की श्रपेना शिक्षा-दीक्षा और पारिपारि वातावरण का अधिर महर है। उनका कहना है कि मामानिक वातावरण और शिक्षा-दीना के कारण सभी मनुष्य उपयुक्त रूप से शिक्षित किये जा सकते हैं। • देखिए-Human Heredity by Baur Fischer & Lonz- P 39
११८
वंशानुक्म विज्ञान
चे यश के फेर में पडना नहीं चाहत। वे लोग वैनानिक दृष्टि से
इस बात की खोज कर रहे हैं कि यश के हिसान स, समान रूप
से मानसिक शशि यादिवे उत्तराधिकारी होने पर भी, पारिमार्थिक
वातावरण के कारण मनुष्यो में विभिन्न शक्तिया का पुरा
सम्भव होता है। यमज सतान को तर श्रान भी परीक्षा
यमन स तान दो प्रकार की होता है। जब एक ही स्त्री प्राणु
मे एक ए वीजरोप प्रवेश करता है तो कभी कभी एक ही भए
दोश्रणा में परिणत हो जाता है और तर दो बच्चे एक साथ जग
लेते है। ऐसे यचा पो मनोग्ल दिवस' (Monor al Tyins
कहते हैं। एक दूसरे प्रसर र यमन स तान होत है,-जरा
"प्राणुत्रो म दो पुचीज कोप राग अलग प्रमेश परत हे तर
दो बच्चे एक ही पेट स तो जम लेते हैं, रितु उनरा सिम
दो भाइया की तरह होता है। ऐसी यमज सन्ताना को मेटेर
दिवस ( Fraternal Tyans ) त है।
मनोगत अथवा 'प्राईडॉदरत' ( Identical ) दरग
एक ही लक्षणोंवार हाते है, प्रेटर्नत दिवस ही लिया विशिष्ट
हो भी साते हैं और नी भी हो सकते । थे, दाना राय
प्रथवा दाना तरियाँ या एक लाथौर उससी साथी एक
लडरी भी हो सकती है।
यंशानुनम की दृष्टि स अर्थात् वशगत गुण अवगुणा 4
उत्तराधिकारी होन की दृष्टि से मना दिवस माना ही
व्यक्ति के दो शरीर हा। प्रेटर्नल दिनस माना दा भाग्यो श्रया
दो बहनो अथवा र भाइ और एक यहन न अपाना, एक
ही साय माँ के पेट में जम लिया हो। माद माई श्रमा माइ
पहनों में जो अन्तर रहता है, ठीक वैसा ही अचर प्रेटर्नल
ट्विन्स में भी रहता है।
বহ খীৰ স্বাৱাৰ ११९ मनोरल टियन्म के विभिन अङ्ग प्रत्यङ्गों में अत्यन्त पाश्चर्य जनक माध्य रहता है। प्रेटर्नल दिवस में उतना माश्य नहीं रहता। मनापल दिनन्म में निम्नलिसित पियो पर अत्यन्त सादृश्य रहता है-(१) लिङ्ग एक ही प्रकार का होगा, (२) रक भी एक प्रकार का ही होगा, (३) रक्त का दबार ( Blood Pressure ) एफ होगा, (४) नाडी की गनि एव श्वास प्रश्वास यो गति भी एक प्रकार की होगी, (५) आँप का रङ्गय दृष्टि शक्ति र प्रकार की होगी, (६) देह का रन, बालों का रङ्ग एन याता में यदि कोई चा हो तो वे सर एक प्रकार के होंगे, (७) थेली, पैर के तलवे एव गलियों का ढांचा एक सा होगा। (८) उनरी लम्बाइ, वजन, मस्तक का ढाँचा, एवं मुपडे की बनावट एक सी होती है। प्रेटलि ट्विन्स में उक्त प्रभार का कोई माश्य नहीं होता। वैज्ञानिकगण, 'मनोरल' एव फ्रेटनल' दिनम के बारे में रत्ती-रत्ती बातो पर ध्यान देते हैं। वे जानना चाहत हैं कि यदि 'मनोवल दिनन्स बचपन से ही अलग अलग रम लिये जात हैं, तो उनमें किसी प्रकार को चरित्रगत रिमित्रता उत्पन्न होती है अथरा नहीं। यदि मनोपल टियम के चरित्र अलग अलग रको जाने पर अलग अलग रूप से विकसित होते हैं, तो यह मममा जायगा कि वश में वातावरण का प्रभार प्रा है। और यदि उनके अलग अलग से जाने पर भी उनरे चरित्र पा विराम एष प्रकार में ही होता है तो यह मानना पडेगा कि पारिपाश्विक पावावरण की अपेक्षा वंश का प्रभार ही प्रश्न होता है। इसी प्रकार प्रेटनल ट्विन्स के एक साथ लालिज पालित होने पर यदि दनी चरित्र का विकास एप सा घे हाता है, तो वश पी अपेक्षा वातावरण का ही प्राधान्य माना जायगा। । ८ १२० वंशानुनम विज्ञान यह देखा गया है कि एक ही परिवार में लालित पालित होने पर भी भाई भाई के चरित्र में जितना सादृश्य रहता है, टर्नल ट्विन्स के परस्पर के चरित्र में उनसे अधिक सादृश्य होता है। किन्तु मनोवल ट्विन्स में यह सारश्य प्रेटर्नल दिवस की अपेक्षा कहीं अधिक रहता है। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि जन्म के समय मनोवल ट्विन्स मे से एक मृत अवस्था में माँ के पेट से निमलता है। यदि मनोनल अर्थात् प्राइडेटिक्ल दिनस यथार्थ म साग रूप से एक ही होते तो जाम के समय दोनों ही मृत अवस्था में जम लेने अथवा दोनों ही स्वस्थ अवस्था में। इस कारण यह अनुमान किया जाता है कि मनापल दिवस भी सर्वान रूप से एक प्रकार के नहीं होते एवं माँ के पेट में भी वे सहरूप, एक ही वातावरण मे, नहीं वृद्धि प्राप्त करते हैं। मनोरल टिमस अथोत् प्राइडेन्टिस्ल दिवस म परस्पर जो अतर रहता है. उसके भी कारण है। अण-काप के विग्यगिटन होने के समय पर भी यह विभिन्नता निर्भर करती है। यदि भ्रूण कोप के बनते हो कप का विभाजन हो जाता है, तब दाना यमेज सन्तानों में यथार्य म यहुत बड़ी समता रहती है, माना रही जीर दोनों दहाँ म जीवन धारण करता दा। किन्तु यदि भ्रूण की देह पनने में कुछ समय योन गया हा पदाक दक्षिण श्रीर वाम श्रद्धा का यनना प्रारम्भ हा गया था, तर मथस्था म भूगा क द्विग्रहित हाने पर क्षिण भाग से उत्पन्न यया हमर याचे से कुछ अधिक पुष्ट हागा एर वह दूसर यच्चे सपुर पहल ही जम ल माता है, इम प्ररार यमज मन्तानी म से प्रयम या दूसरे म वजन में भी कुछ अधिर मारी होगा। इमी कारण यमज मनाना में आ यमा प्रथम जम लगा, यह परवर्ती जीवन में दुमरे म शारीरिक और मानसिक गुणा म मो अरिफ परिपुष्ट होगा।
वश और वातावरण दर्पए म अपने मुख को देसवे ममय हम अपने मुग्य शिप विशेष लक्षणों को अपने प्रतिनिम्त्र में निम प्रकार देख पाते है, उमी प्रकार कमी-कमी मनोवल यमन सन्तानो में ममान समान ला दर्पण के प्रतिविम्व जैसे बन जाते हैं। अर्थात् जो लन्ण 4 के दक्षिण अह्न में दिखाई देगा, वही लक्षण दूसरे के वाम श्रङ्ग में दिखाई देगा। अति प्राथमिक अवस्या में भ्रूण के पिमाजिव होते समय यदि विमानन अपूर्ण रह जाता है तो नाना मसर के विचित्र रीति से जुड़े हुए यमन मन्तान जम लेते हैं। कभी एक ही देह में दो मस्तक बन जाते हैं, अथवा एक देह में चार हाय चार पैर निकल पाते हैं। मारणतया मिमी सिमां वश मे यमज सन्तान अधिक जन्म लेते हैं, अर्थान् यमज मन्तान का होना वशगत लक्षण है। यूरोप में और अमेरिका के युक्त राष्ट्र में प्रति ९० मे एक यमज मन्तान जन्म लेती है और जापान में प्रति १६० मे १ यमज सन्तान होती है। माता की आयु अधिक होने पर ही टर्नल टिचन्म या जम सम्भव होता है। कभी कभी सिो किसी माता के एक साथ तान-सीन अच्चे भी जम लेते हैं। कभी तो एर ही अगदाणु से तीनो जन्म लते हैं, और कभी कभी दो श्राणुओं से तीन के जम होते हैं, जिनमें दो तो मनोवल अर्थात श्राइडेटिाल दियन्म होते हैं और तीसरा 'फ्रटर्नल ट्विन होता है। ऐमा अनुमान किया जाता है कि प्रति ८,००० जम में एक धार बीन यमज सतानों का जन्म होता है। पदाचित् एक माय चार सतानों का भी जम होता देया गया है। प्राय ७.१,००० जन्म में एक बार चार सन्तान का एक साथ जन्म होता है। ये सर आँकड़े यूराप के ही हैं। सन् १९३४ की मई में अमेरिका में ५ रहने एक माथ उत्पन्न हुई थी। इन पाँची को लेटर वैज्ञानिक रीति से अत्यन्त सावधानी
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वशानुम्म विज्ञान
के साथ परीक्षाएँ को गई हैं, उनके परस्पर के व्यवहार के प्रति
अत्यन्त ध्यान रक्सा गया है और उनके प्रत्येक आचरण का
निरीक्षण किया गया है।
उा पाँच यमज लडक्यिों में जो सबसे पड़ी थी वह और
सब पहनो के साथ बहुत ही प्रेम से मिलती-जुलती थी। पढने
लिसने में, बुद्धि विवेचना में वह सबसे होशियार थी, किन्तु सेल
फूद् के समय वह दूसरी बहनों को सबसे अधिक मौका देतो
थी। दूसरी बहन हर बात मे अपने को ही श्रागे रगती
थी। वह चाहती थी कि सर बहनें मेरी ओर तारती रह ।
तीसरी बह्न भोली भाला अपन में मस्त तडकी थी। उसे यह
परवा नहीं थी कि कौन सेल-यूद मे सनसे आग बढ श्राती है,
और मुझे अधिक मारा मिलता है अथवा न।। चौथी या के
बारे में कुछ पहना पठिन था, क्योकि वह कभी कुछ और कभी कुछ
परती थी। पाँचवीं यहिन सरसे कमजोर एवं अपटु थी। हर
बात मे उसे सहायता की श्रावश्यक्ता थी। उसी पी गहन
हर घटी उसरी सहायता के लिए उसके पास सोडगड श्राती
थी। जेनि के हिसाब स इन पॉों राइरियों की देह म गरी
प्रकार के जेनि थे, कि तु यारतविक जग में ये पाँचों पर दूसरी
मे स्तिनी भिन्न थी। म्म हटात से य' भी अनुमा7 करना
श्रस्वाभाविक नहीं है कि जेनि क श्राधार पर ही व्यक्तित्व र किाम
पा समस्त रहस्य नट्याटित नहीं हाता है। श्राधुरि पिान
पूर्वजम का मानना नहीं । मम्भव है, भविष्य म मानना पड़े।
पूधात पाच यहन क मिरा मग यमज सताना पा र
भी मग प्रसर को पर्गा हुइ हैं। एक मनारा यमन
सतानां क जम ५ थोडे दा दिनों से अपनर माता पिता
पी मृतु हा गइ । उनके निस्ट श्रात्मीयां म से प ने
ग्न यमन लगियो म मे " का पाI, दूसरी या दूमर न
।
. वश और वातावरण १२३ पाला। सबसे पहले तो परीक्षा करके यह देख लिया गया कि ये यमज लडरियाँ मनोरल विन्स हैं अथवा नहीं। फिर कुछ वों के पश्चात् वे लडकियाँ एक्न हुई तर उनको जुद्वि की परीक्षा की गइ। उनके खून और कालेज की परीक्षायों क फनों की तुलना की गई। इस प्रकार यह देखा गया कि विभिन्न वातावरण के कारण दोनो बहनो में कुछ कुछ अन्तर हो गया है। अर्थात् वैज्ञानिमा के मतानुमार उपर्युक्त दृष्टात से यह मिद्व हुअा कि वशगत जेनि की अपेक्षा वातावरण अधिक प्रश्न है। मितु इन दोनों लडक्यिो के चरिना मे जो अतर पाया गया यह बहुत अधिक न था। यह बात सत्य है कि दोनो गडरियाँ दा प्रसार के वातावरणों में लालित पालित हुई थी, एक दूसरी से अधिक पीडित हो गई थी, एक लडरी के साथ एक परिवार का व्यवहार अच्छा नहीं हुआ था, श्रादि, आदि कारणा से उनकी प्रतियों में अवश्य कुछ अन्तर हो गया था।- इस दृष्टान्त से एक और प्रश्न उदित होता है। ऊपर के दृष्टान्त से हमने काल प्तना ही जान पाया कि दो लडरियों, वंशपरम्परा से प्राप्त गुण अवगुणा की उत्तराधिकारी ममान रूप से होने पर भी, विभिन्न वातावरण में उनके परस्पर के चरित्र और स्वभाव कुछ मिन मिन हो गये। यह भिनता भी अधिक नहीं थी। मितु हमारे सम्मुम सबसे महत्त्व का प्रश्न तो यह है कि यदि वश के हिसार मेदा यक्ति समान रूप से बुद्धिमान् एवं मान सिक तथा चारिनिस स्वभाव में भी समान न हो तो क्या उनमे से मन्द बुद्विनाला व्यक्ति, शिना-दीक्षा और पारिपार्श्विक वाता वरण के प्रभार से, दूमरे व्यक्ति क, जो स्वाभाविक रूप से अधिक बुद्धिमान था, वगर हो सस्ता है। अर्थात् वशगत विभिन्नताएँ रहते हुए भी क्या पारिपार्श्विक वातावरण के कारण, उपयुक्त शिक्षा-दीक्षा के कारण, मन्द बुद्वियाला, रस्समार विशिष्ट व्यक्ति - १२४ वंशानुनम विज्ञान बुद्धिमान् एव दयालु-सभाव विशिष्ट बन जायगा? यह बात सत्य है कि यमज सन्तानो को लेकर परीक्षा करने से एक बडी सुविधा यह रहती है कि ये दोनो वश के हिसाब से तो एक प्रकार के ही गुण-सम्पन्न होगे, किन्तु इस वात म तो कोई सन्देह ही नहा कि यशगत उत्तराधिकार-सून से हम जिन गुण अर गुणे को, जिस स्वभाव को प्राप्त होते हैं वे एक विशिष्ट वातावरण के लिए ही सत्य एव कार्यकारी हैं, सर्वावस्था में समान रूप से सत्य नहीं हो सस्ते। अध्यापक न्यूमैन ( Professor Nes man) महादय बहुत सी यमज सन्तानों की परीक्षा करके इन निर्णया पर पहुँचे हैं- आइडेन्टिक्ल दिवस के चरित्र मे अर्थात् उनके समान, उनकी बुद्धि उनके शारीरिक गठन आदि श्रादि पिपया म इतनी अधिक समानता होती है कि पल यातावरण के आधार पर यह सम्भर नहीं। मनोपरा ट्विन्स, अर्थात् एक "प्रण्टाणु मे उत्पर दो यमन सतान यदि अलग अलग रहकर भिन्न भिन यातारण म लालित पालित होते हैं, तो भी उनका पारस्परिक मन बासे टनल दिवस के पारस्परिक पारिनारिक मेला की अपता कहाँ अपित होता है जो एक ही परिवार मे,एक ही वातावरण में तापित मालित होते हैं। इस कारण य अनुमान पिया ना मना है के वंश परम्परा से प्राप्त गुण अगुण र पारए मनुष्य । घरिघ्र बहुत कुछ बनता है। इस माथ-माय या भी स्मरण ग्पना नावश्यक है कि पाटिरल निमम निती शागरिक समता ., सन्नी ममता मानमिक अया माधारण व्यक्तित्व र चार म दी है। मनेष म अध्यापक न्यूमैन का कहना है-शारीरिक मम्मच में वादापाण की अपना शराप्रमार अधिक ता है, किंतु व्यरिए की सुद्धि क रिमित होन म श फी ग वातावरए या प्रभार अधिर मान होता है। शिमा - वश और वातावरण १०५ दीक्षा क बारे में वातावरण का प्रभाव और भी प्रभावशाली होता है, और व्यक्तित्व एव साधारण समाव के निरसित होने में पारिपाश्विक वातावरण का प्रभाव सर्वापेक्षा प्ररल प्रमाणित हुआ है। अध्यापक जे. लैंग ने भी यमज स तानों को लेकर परीक्षाएँ की है। उनकी परीक्षा का फल दूसरो से कही भिन्न है। अध्यापक लेंग न ऐसे दृटात उपस्थित किये हैं, जिनसे यह अन्यर्थ रूप से प्रमाणित होता है कि यश के श्राधार पर हम जिन प्रवृत्तियों के उत्तराधिकारी होत हैं, उनके कारण हमारा जीवन मानों पहले से ही एक बंधे हुए रास्ते पर चलन के लिए विवश रहता है। अध्यापक लेंग ने अपनी परीक्षाओं के फान 'प्राइम एज डेस्टिनी' (Crimes Destiny ) नामक पुस्तक में लिग्ने हैं। उक्त पुस्तक में से एक दृष्टान्त का उल्लेख यहाँ पर किया. जाता है। एक परिवार मे दो यमज लडक्यिों का जम हुथा। कितु घटनाचक्र के फेर मे पडकर उन दोनो लडक्यिों में से एक ने स्कूल और कालेज की शिक्षा पाई, एव वाद को उसे स्कूल में पढाने का काम मिल गया। दूसरी लडकी को उपयुक्त शिक्षा नहीं प्राप्त हुई, एव अल्पशिक्षित होकर वह किसी कारमाने में काम करने लग गई। युट दिनों के पश्चात् सहसा एक दिन दोनों लड़क्यिों दोनों अलग अलग जगहों से अपना अपना काम छोडकर चली आई। दोनों ने ही अपने अपने ऊपरवाले अम्मरों से झगड़ा करके नौकरियों छोड दी थी। इससे भी श्राश्चर्य की बात यह थी कि दोनो ने ही ठीक एक ही समय में नौकरियां छोडी थीं। उन दोनों लडरियों के जीवन में इसी प्रकार और भी घटनाएँ हुई, जिनके कारण हमे यह स्वीकार करना हो पडेगा कि यशगत गुण अवगुणो के कारण हमारा जोवन पहले से ही एक निर्धारित रास्ते पर चलने के लिए थोडा बहुत विश रहता है। पारिपारिक वातावरण एवं शिक्षा दीक्षा
वशानुस्म विज्ञान
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देना है कि उनके जेनि म दाई परिवर्तन नहीं हुआ। स्त्री-जा
को मद्य पिलाकर देखा गया कि उनके बच्चे भ्रूण अवस्था में ही-
अधिकाश विनष्ट हो गये, किन्तु जो जीरित रहे वे दूसरे पक्षों से
अधिक बलिष्ठ हुए . कि तु पण्डित हम ने जो परीक्षाएँ को है.
उनसे यह ज्ञात होता है कि जर बहुत दिनां मे चूहों को मद्य
पिलाया जाता है और उनसे ऐसी चुहियों के साथ जोडा लगाया
जाता है जिन्हे शराब नहीं पिलाई गई है तो चुहियों की अपेक्षा
नूहे अधिक जम लते हैं, किन्तु जय चूहा और चुहियों दोना का
ही अत्यधिक मात्रा में शराब पिलाई जाती है तर उनी सन्तान को
बहुत प्राघात पहुँचता है, भ्रूणावस्था में ही बहुता की मृत्यु हो
जाती है और जो सन्तान जन्म लता भी है वे दूमरा की श्पदा
दुवल होती हैं और कभी कभी क्लिोग भी होती हैं। रितु
इस स्थान पर एक बात का स्मरण रखना अयत पारश्या है।
इन परीक्षाथा म चूहा चुहियों को जिस अत्यधिक मात्रा में शगनी
धनाया जाता है मनुष्य में सनी शराब पीनेवाले म भी यक्ति
का मिलना कठिन है। इस प्रकार अत्यधिक मा क प्रभारी
जेनि म परिवर्ती उत्पन हात है। इस परिवर्तन का जी
लिए कल्याणरारी भो नगें समम मस्त । जेनि के गम
प्रकार परिवत्तित हा जाने का पारिभाषिक शा म म्यूटेशन
(Afutation) कहते हैं ।। आग पनार म्यूटेशन क या ग
विस्तृत प्रातापना की जायगी।
इम धाम पर रीर दान
या तय कर देना श्रापश्या है। रम यान या काद भी बना
नि अस्वीकार न कर मरना रियक्तियो म दा रफ जनि
रहमान है, एक टॅमिनार (Dominant) अपाया, श्रीर
--
-दे"TR-You Herediry [38
+ TI Flatca ller hats Ip? 99
विकासपाट में इडा-शक्ति का प्रभाव दूसरा रिसेसिब ( Recessive) अर्थात् सुम। निस शारीरिक श्रावेष्टन में एक प्रकार का जेनि क्रियाशील रह मरता है, उमा आवेष्टन में, दूमरे प्रकार का जेनि मी, अव्यक्त, किन्तु जीवित एस अविकृत रूप से रह सस्ता है। श्वेत शरीखाल जीर की देह में कृष्ण वर्ण उत्पन्न करननाला जेनि वषां तक रहने पर मी उममे कोई परिवर्तन उत्पन नहीं होता। म्यूटेशन और विकासवाद-विकामवाद की थ्योरी में, नवीन की उत्पत्ति कैसे होती है, इस प्रश्न का अत्यन्त महत्व है। किन्तु इस प्रश्न का उत्तर श्राज तक प्राप्त नहीं सुश्रा है। अन्यापक मरगन् और अध्यापक मूलर महोदयों न 'एक्स रे पानि किरण के आघात से जेनि में नाना प्रकार के परिचर्चन टपन किर हैं। प्राय सभी श्राधुनिर वैज्ञानिक म्यूटेशन क श्राधार पर विकामनात की व्यास्या करना चाहते हैं। मास के श्रनिति एक और प्रकार की किरणें हैं, निनका पारिभाषिक नाम 'कॉममिक है। ये शिरणे कहा से आती है, इसका श्रान भी निर्णय नहीं हो पाया है। ये किरण समतन मूमि को अपना पहाड़ा में एव श्राश के म स्तरों में अधिक वन प म निपचित होती है। हवाई जहाजों पर केन पर की मक्रियया को श्राकारा म १३ मीन उपर ले जाया गया था। उस उच्च श्राका म, ममुद्र के स्तर की अपेना पाँचगुना अधिक म्यूटेशन होता है।- किन्तु अनेर वैनानिक म्यूटेशन के आधार पर निकामगाद की व्याग्या समाल ना मममते। टमका प्रथम कारण यह है कि म्यूटेशन मे, अधिश समय, प्राणिया का विराम नहीं हो सस्ता, अधिकांश ममय म्यूटेशन के कारण विकलाङ्ग प्राणिया की उत्पत्ति होती है, जीवन-मग्राम में वे विजयी नहीं हो सकते । कदाचित् सहना में एकाध वार म्यूटेशन के परिणाम में उच्चतर जीर की उत्पनि होती हो। किन्तु इम उच्चतर जीप से अपनी ९ वशानुक्रम विज्ञान श्रेणो के जीव की उत्पत्ति कैसे हो? कारण विवाह के परिणाम में इस उच्चतर जीर का वश निम्न दिशा की ओर अप • पतित हो सकता है। अधिकाश समय म्यूटेशन के कारण जीर देह में जेनि का संख्या पूर्वापेक्षा कम हो जाती हैं। विस कारण म्यूटेशन उत्पन होते हैं, इसका अभी तक कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। प्रकृति में अकस्मात् म्यूटेशन उत्पन्न हो जाते हैं। म्यूटेशन प्राय तीन प्रकार के होते हैं,-(१) फैक्टर म्यूटेशन उसे कहते हैं, जहाँ कॉमोसोम के जेनि में परिवत्तन उत्पन्न हो जाते हैं। (२) दूसरे प्रकार के परिवर्तन, नॉमोसोमो क दुगुन अथवा तीन गुने हो जाने के कारण उत्पन होते हैं। (३) तीसरे प्रकार का म्युटेशन वह है, जहां विभिन क्रोमोसोमा के जेनि में बहुत प्रभार के लेन-देन हो जात है, इस प्रकार के परिवर्तन की रीति को कम्नि नेशन, अर्थात् विभिन प्रकार के सम्मिश्रण एर म्यूटेशन के बीच का एक प्रकार कहा जा सकता है। इन तीनों प्रकार के म्यूरेशनाम से प्रथम प्रकार का म्यूटेशन, जिसके कारण प्रति म यथार्थ नमीन की ग्पत्ति होती है, जी की ममोनति के लिए अधिकांश समय हानिकारक ही होता है। जो हो, अधिकाश वैतानिर यह मममने हैं कि विरामपाद पी व्याया का म्यूटेशन के अाधार पर ही सम्मर है, अ यथा नपीन की में उत्पत्ति होती है, इस समस्या की मीमांसा सम्मर नहीं। ह्युगो टो० नाम ने ही सर्वप्रथम म्यूटेशन के सिद्धान्त का न्याग्या की थी। इसके पूर्व पगिटत वाइजमैन ने इस मिद्वान्त का प्रचार दिया था कि योन-योष म, अर्थात् जमनाम म, याहगे कारण मे कोई परिवर्तन नही हो मस्ता। इनके विपरीत इ० हल्ल्यू. मैग्नाइट, ई० एम० रसेल, हरन्यूर मैग्टगन आदि दूसरे बडे-बडे वैज्ञानिक इम सिद्धान्त क पतपादी 1 विकासवाद में इच्छा शक्ति का प्रभाव हैं कि जीव, अपने जीवनकाल में, अपनी इच्छा और चेष्टा के कारण अपनी देह में ऐसे परिवर्तन ला सकता है कि उसके सन्तान भी उन परिवर्तनों के उत्तराधिकारी यन सस्ते हैं। याइनमैन महोदय ने अपने पक्ष के समर्थन में दो प्रकार की युक्तियाँ उपस्थित की थी। उनकी एक युक्ति यह थी कि अभ्यास के कारण देह मे अर्थात् जीर कोपों में जो परिवर्तन उपस्थित होते हैं, वे फिर किस प्रकार वीजापों में (अर्थान् जर्मप्लाज्म में) भी समामित पिये जा सस्ते हैं ? अर्थात् जीव-कोपों के परिवर्तनों से कैसे बीज कोपों में भी परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, इसका कोई लक्षण अथवा परिचय हमें प्राप्त नहीं है। उनकी दूसरी बात यह थी कि चूहों की पूँछ फाट काटकर, ३० पीढियों में भी, उन्होंने चूहों में छोटी मूंछवाले चूहा को उत्पन नहीं कर पाया। मैनाइड इसके उत्तर में यह कहत हैं कि पूँछ काट लेने से प्राणी में कोई अभ्यास तो बनता नहीं। जर किसी नगीन परिस्थिति में, अपनी चेष्टाओं के कारण, प्राणी में कोई नवीन अभ्यास उत्पन होता है, तो उमी अभ्यास के कारण ही जीन के बीज-कोषों में परिवर्तन उत्पन्न हो सकता है, अयथा नहीं। इसी प्रकार सुनत करने की प्रथा से भी पिसी अभ्यास की उत्पत्ति नहीं होती है। उक्त प्रथा के कारण मनुष्यों को किसी प्रकार का नवीन अभ्यास डालने की कोई प्रार श्यस्वा नहीं होती है। इस कारण वाइजमैन की परीक्षा से यह प्रमाणित नहीं होता है कि नपीन परिस्थितियों म, अभिनव उद्यम के मारण, नगीन अभ्यास के परिणाम म, मनुष्य के बीज कोपों में भी परिवर्तन उत्पन्न हो जाते हैं यह सिद्वान्त भ्रमात्मक है। वाइजमैन की प्रथम युक्ति के उत्तर म मैकलाइड महोदय कहते हैं कि माता पिता से प्राप्त मामासामों से कैसे जीव के अंग प्रत्यग बनते हैं, इसका भी ज्ञान श्राज में प्राप्त नहा है, यद्यपि मोमासामे से ही जीव-दह का प्रत्येक श्रग प्रयग बनता है, इसम कोइ सन्देह नहीं है। , १३८ वंशानुक्म विज्ञान मैक्ग्राइड आदि वैज्ञानिकों की राय मे, म्यूटेशन के सिद्वान्त से भी विकासवाद अर्थात् मोन्नतिवाद की व्याख्या युक्ति सगर नहीं प्रतीत होती है। इन वैज्ञानिकों का कहना है कि म्यूटेशन तो रोग से ही उत्पन्न होता है। मैक्नाइड श्रादि वैज्ञानिसको राय मे ह्यूगो टी० ग्राइस की परीक्षाएँ गुटि पूर्ण है। यनियर नाम के वैज्ञानिक ने अपनी नवीन परीक्षाओं के आधार पर यह प्रमाणित करने की चेष्टा की है कि आभ्यतरिक दुर्यलता के कारण कभी-कभी बीजकोपो मे भी दुर्वलता उत्पन्न होती है । इसी दुर्वलता के कारण धीज कोपो में भी परिवर्तन उत्पन्न हो जात हैं। ऐसे परिवर्तन को ही म्यूटेशन कहा जाता है। म्यूटेशन के कारण जीव की उन्नति न होर अधिकांश समय उसकी अवनति ही होती है। घटुनर्प यापी परीक्षाओं के आधार पर रनियर उक्त सिद्धात पर पहुंचे हैं। अमी ये परीक्षाएं समाप्त नहीं हुई हैं। इस बात को तो सभी वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि म्यूटेशन के कारण अधिकांश समय प्राणी की अवनति होती है। अर्थात् म्यूटेशन उन्नति का लक्षण नहीं है। लामार्फ, डारविन श्रानि पुर पहले के गाना एवं वत्तमा। काल के जीरित वैज्ञानिक-मैक्डुगरा, मेरमाइड, ३० एस० सिल श्रानि इस पक्ष का समर्थन परत है कि जीन, अपन जीवनकाल में, अपनी चेष्टा एव अभ्याम के कारण अपने योज-योपा में परिवर्तन ला सकते हैं, जितु ये परिवर्तन इतो स म प अल्प होत है कि इनके प्रभार के स्पष्ट रूप मे प्राटित होन में फद पीदियों लग जती हैं। इस कारण साधारणतया यही कहना पड़ता है कि वातावरण के कारण जीप म जो स्थायी परिवर्तन उत्पन्न होता है, एमी अपना पूजा से प्राप्त जेनि के आधार पर वंशानुनम की धागका ही मनुष्यों में अति प्रभार है। व्यवहार में, यानाचरण का अपना वशानुनम का ही प्रभाव, मनुष्य पर अधिक पेय पढ़ना है। एक वैज्ञानिक के मतान्मार मनुष्य पर शिक्षा दीना, सामाजिक रीति । 7.
वशानुक्रम और स्वास्थ्य १३९ नीति, जलरायु श्रादि पारिपार्श्विक वातावरण का प्रभाव प्रतिशत दम (१०) पौरवशानुक्रम की धारा का प्रमावप्रतिशवन रे (९०) हाता है। अन्यरिक मद्यपान स भी पीनसोपों में परिवर्तन रत्पन हो जाता है और उससे वश की योगति होती है। अत्यधिक मय पायियो की मन्तान साधारणतया रोगी, मूर्म आदि होती है। त्रियों पर मद्यपान का और भावुरा प्रभाव पड़ता है। वारहवाँ परिच्छेद वशानुक्रम और स्वास्थ्य जीवित और जड वस्तु म यहा अन्तर है कि जीवित वस्तु अपन पारिपाश्विक वातावरण स, अपन जीवनगारण के अनुकून रस और पदार्य संग्रह करती रहती है, एर प्रतिकून वातावरण से घचती रहती है। जड़ पदार्थ म इस प्रकार वातावरण के साथ उमका न कोई सघर्ष होता है और न काई लन-देन। फलत पारिपार्धिक वातावरण के साथ जीव का निस दिन लेन-देन ममाप्त हो जाता है, उस दिन उसको मृत्यु हो जाती है। जोव के लिए पूर्ण रूप से स्वन्त्र हाने का अर्थ है, पारिपाधिक वातावरण क साथ उसका परिपूर्ण सामश्वस्य स्थापित होना। इस सामसस्य में जितनी कमी रह जाती है, जीव के पूर्ण रूप से स्वस्थ होन म भी उतनी कमी रह जाती है। इस दृष्टि से काई भी एक व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्य नहीं है, कारण पारिपाश्विक वाता वरण के साथ किसी जाव का परिपूर्ण सामखस्य नहीं है। कोई जाव, इस दृष्टि से, दूसरे जीव से अधिक स्वस्थ है, और कुछ अन्य जावों से कम! इस सिद्धान्त के अनुसार, जीव विज्ञान की दृष्टि से, स्वारस्य एवं रोग में कोई विमाजक रेसा गौचना कठिन है जिस समय जीप के साथ पारिपार्थिक वातावरण का सामखस्य स्थापित नहीं हो पाता है और जीप के लिए प्राण धारण करना १४० वंशानुक्म विज्ञान कठिन हो जाता है, उस समय कहा जाता है कि जीर रोग प्रस्त हो गया है। जीवन धारण के लिए कुछ साधारण-सी असुविधा हो जाने को रोग नहीं कहा जायगा। यथा-यदि हम फूला के रङ्ग को ठीक-ठीक पहचान नहीं पाते तो उससे जीवनधारण करने में विशेष कठिनाई नहीं होती है। इस कारण इसे दोष कह सकते हैं। किन्तु इसे रोग कहना ठीक नहीं होगा। सर्वप्रथम एक रूस के वैज्ञानिक न ई० सन् १८९५ मे स्वास्थ्य के विषय में स्पष्ट रूप से पारिपाश्विक वाता वरण के साथ सामसस्य की बात कही थी। किंतु इस सामजस्य का अर्थ जीवित रहना और अच्छी तरह जीवित रहना होगा। स्वास्थ्य का एक और भी तात्पर्य है। पिसी व्यक्ति म यदि सन्तान उत्पादन की शक्ति न रहे तो उस व्यक्ति को सभी रोगी कहेगे। फितु सन्तान उत्पादन करने की शक्ति न रहने से जीवन धारण करने में कोई कठिनाई नहा होती, इस कारण एक जर्मन वैज्ञानिक का कहना है कि जीवित रहने का अर्थ फेवल व्यक्ति के लिए न सममपर जाति के लिए सममना उचित है। प्रकृति म भी व्यक्ति से जाति का ही अधिक महत्व है। गर्भयत्रणा से पीड़ित होकर जय नारी शय्याशायी होती है, तब उसे कोई भी रोगी नहीं समझता। जाति के जीवित रहने के निए नारी को यह गम यत्रणा सार्थक हो जाती है। श-वृद्धि से ही जातीय जीवन की रक्षा होती है। तेरहवाँ परिच्छेद वशानुक्रम और रोग व्यक्ति के साधारण स्वास्थ्य के लिए बहुसरया जेनि का मम्मिलित प्रभाव क्रियाशील रहता है। मितु किमी रोग को उपत्ति के लिए धमी-कभी एक जेनि का ही प्रभार दिग्पाइ देता है। अनेर परीक्षाओं के परिणाम में यह निश्चय हो पाया है कि कुछ रोग तो हम माता पिता से प्राप्त करते हैं, और कुछ नहीं ।
वगानुनम और गंग 122 जो रोग हम माता-पिता से प्राप्त करता है, यह दो वंगत गंग का सकते हैं, दृमर रोगों को नीं। ऐमा भी होता है कि माता पिता से हम या गा को मार न होकर, रोगी होने की टुरवा को पार करना है। अपने अनु धूल वातावरण में तो वह गेग परिस्फुट हा पडता है, अचमा व प्रस्ट नहीं होता। यनि हमार पिदा को पति की बीमारी हा तो यह आवश्यक नहीं है कि हमे भी अर्थात् हमारे मार-पिनाम मे किमी न किसी का भी वह बीमार्ग हो। फेवन इतना होगा कृत के कारण अथवा सर्दी क या शरीर के टुल हा नाने के कारण, हममें से किमी को वह गेग हो जाय। प्रतिदिन की परीना क परि गाम में हमें यह बात होता जाता है कि कौन में रोग हम माता. पिता अथवा यश-परम्परा से प्राप्त हान है, और कान में नहीं। उपश हम कभी वश-सून स प्राप्त नहीं करते। इमनार म माधारण व्यक्ति की धारणा एकम भ्रमाम है। होता यह है कि यदि माता या पिता सपश-राग में पीड़ित हो और उम पीड़ित अवस्था म ही गर्म का सञ्चार हो, दर न क कारण यन्चे में भी उपदश रोग की रपत्ति हो सस्ती है, अन्यथा नदी। गर्मी का रोग अच्टा हो जाने पर यदि गम की उत्पत्ति होती है तय कापि बच्चे में गर्मी का रोग नहीं दियाई देगा। यदि यह रोग वंश-परम्परा म उत्पन्न होनराना होता तो अन्द्र हा गाने पर भी मनुष्य को समान में यह रोग उत्पन हो सकता। मिन्तु मा नहीं होता। वशगत रोग और छत के कारण जो रोग नत्पन्न होते हैं, उनम यथष्ट अन्तर है । यदि उपरागग का टोफ ममय पर उपयुक्त चिकित्सा हो एप इस रोग की हत म बचने के उपाया का ठीक ठीक प्रयोग होतो दो-तीन पीढियां का यह गेगमा फे निए दूर हो जा सकता है। किन्तु वरागत रोगा का दुर करना अत्यन्त कठिन काय है। वशगव रोगा के मूल म तो रिंगप किंगष वशानुक्रम विज्ञान कठिन हो जाता है, उस समय कहा जाता है कि जीर रोग प्रस्त हो गया है। जीवन धारण के लिए कुछ साधारण सी असुविधा हो जाने को रोग नहीं कहा जायगा। यथा-यदि हम फूला के रङ्ग को ठीक-ठीक पहचान नहीं पाते तो उससे जीवनधारण करने में विशेष कठिनाई नहीं होती है। इस कारण इसे दोप कह सकते हैं। रितु इसे रोग कहना ठीक नहीं होगा। सर्वप्रथम एक रूस के वैज्ञानिक न इ० सन् १८९५ मे स्वास्थ्य के विषय मे स्पष्ट रूप से पारिपाश्विक वाता वरण के साथ सामवस्य की बात कही थी। किन्तु इस सामवस्य का अर्थ जीवित रहना और अच्छी तरह जीवित रहना होगा। स्वास्थ्य का एक और भी तात्पर्य है। किसी व्यक्ति में यदि सतान उत्पादन की शक्ति न रहे तो उस व्यक्ति को सभी रोगी पहेंगे। कि तु सन्तान उत्पादन करने की शक्ति न रहने से जीवन धारण करने में कोई कठिनाई नदा होती, इस कारण एक जर्मन वैज्ञानिक का कहना है कि जीवित रहने का अर्थ केवल व्यक्ति के लिए न सममपर जाति के लिए सममना उचित है। प्रकृति में भी व्यक्ति से जाति का ही अधिक महत्त्व है। गर्भय नणा से पीड़ित होकर जब नारी शय्याशायी होती है, तय से कोइ भी रोगी नहीं सममता। जाति के जीवित रहने के लिए नारी की यह गभ-यन्त्रणा मार्थक हो जाती है। श-वृद्धि से ही जातीय जीवन की रक्षा होती है। तेरहवाँ परिच्छेद वशानुक्रम और रोग व्यक्ति के साधारण स्वास्थ्य कनिए यहुसन्या जेनि का मम्मिलित प्रभार क्रियाशील रहता है। रितु किमी रोग को उपत्ति के निए कमी-कमी एम जेनि काही प्रभार दिग्पाद देता है। अनेर परीक्षाओं के परिणाम में यह निश्चय हो पाया है कि बुद रोग तो हम माता पिता में प्राप्त करते हैं, और युद्ध नहीं।
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१४२ वंशानुनम विज्ञान जेनि क्रियाशील होते हैं। इन रोगों से बचने के लिए सिराह पद्धति पर विशेष रूप से नियत्रण की श्रापश्यस्ता है। इस कारण कौन से रोग वशगत हैं और कौन से नहीं, इसका ज्ञान होना अत्यन्त पारश्यक है। वो से इस विषय पर परीक्षाएं हुई हैं और श्रन बहुत रोगो के विषय मे अच्छा ज्ञान प्राप्त हो चुका है। एलविनिज्म अर्थात् धरल रोग वशगत हुश्रा करता है । सात सौ घरों फेयश-वृक्ष बनाये गये हैं, जिनमें धरल रोग उत्पन्न हुए थे। धनल रोग "सुम-लक्षण" विशिष्ट है। पाठको कोयाद होगा कि सुम (Rece ssive) एव व्यक्त (Dominant) लक्षण किसे कहते हैं। जय किसी व्यक्ति की देह में दो भिन प्रकार के जेनि उपस्थित रहते हैं, जिनमे एक दूसरे के विपरीत लक्षण रहते हैं तर एक लवण तो व्यक्त होता है और दूसरा सुन रह जाता है। किन्तु यह सुन लक्षण मरता नहीं, कई पीढ़ियों के बाद भी, अपने अनुरूप दूसरे जेनि के साथ सम्मिलित होते ही व्यक्त हो जाता है। धाल रोग भी रिसैसिन अर्थात् सुम-लक्षण नाहक जेनि के कारण उत्पन्न होता है। जिस वंश मे किसी सुलतप वीज वहन करनेवाले जेनि के कारण पिसी रोग की उत्पत्ति होती हो, उस वंश म यदि निस्ट श्रात्मीया म विवाह होता रहे तो दो रिसेमिन जेनि के एकत्र हो जाने की यहुत मम्भावना हो जाती है। और दो ग्सेिसिव जेनि के एकत्र होने से ही रोग व्यक्त हो जाता है। इस कारण साधारणतया निस्ट श्रात्मीयों में विवाह करना कदापि उचित नहीं है। एलरिनिरन् अर्थात् धनल-रोग-युक्त वंशा के वशक्षादि को परीक्षा करने पर यह ज्ञात हुआ है कि अविश समय उन वंशों म निस्ट यात्मीयों में विगह हुए थे। एक ऐसे यशवृत के अनुमार यह देखा गया हिए चाचा ने अपनी मतीजी से निगह कर लिया था। उसके चरा म छ सताना म दाता रोग मुक्त थे, फितु चार घरल रोग युक थे। उमी वंश म दो चचेरे भाई-बहिनों न पिराह कर निया वशानुनम और रोग १४३ था। ननके तीन सन्तानों में से एक घरल-रोग-विशिष्ट था। उसी वश में दूमरे लोगा ने आपस म बिवाह नहीं क्यिा था। उनकी सन्तानों में एक भी मन्तान पाल राग-विशिष्ट नहीं थी। निकट-दृष्टिरोग (Short sightedness ) वशानुक्रम से उत्पन्न होता है । चनु के एक और रोग श्रास्टिगमैटिग्म ( Astig. mation ) की उपत्ति भी वशानुक्रम के अनुसार होती है। एक वंश में तो यह रोग पाँच पुरतों तक उत्पन होता गया। समार के विभिन स्थानो म मनुष्य सिमित श्रासार विशिष्ट होत हैं। रितु मनुष्य देह के साधारण अवयवो में थोडा-बहुत अन्तर हाने पर भी बुर विशेष हानि नहीं होती। हाँ, यदि चसु के पाभ्यन्तरिक अशों में थोडा-सा भी श्रन्तर रत्पन हो जाता है तो दृष्टि-शक्ति में भी अत्यन्त गम्मीर टोप उत्सन हो जाते हैं। इम कारण यदि ससार की दा विभिन्न जातियों के स्त्री पुरुपों म मिनाह होता है, तो निकट दृष्टिरोग की उत्पत्ति हा साती है। जैसे निकट सम्बन्धियों में विवाह होने से वश म रोगो की उत्पत्ति हो सकती है, उसी प्रकार दा विमिन जातियों क स्त्री पुरुषों म विवाह होने से भी रोगो की टत्पत्ति हो मस्ती है। एक दूसरे प्रकार का च का रोग चार परिवारों में होते देया गया। अनुमन्धान परने पर यह पता चना कि सात पीढी पहल इन परिवारों के एक ही पूर्वज को यह रोग था, अर्थात सात पुश्त तक रोग के वीज रिसी परिवार में वश परम्परा स चने या सरते हैं। इसका यह भी तात्पर्य है कि अन्छे और बुरे क वीन, सात पुरव वक तो अवश्य ही जीवित रह सकते हैं, यद्यपि उनका व्यक होना पारि. पाश्विक वातावरण और दूसरे जेनि के साथ सम्बन्ध स्थापित होने पर निर्भर करता है। प्राचीन हिन्दुओं को यह ज्ञान कैसे प्राप्त हुश्रा-यह स्वतन्त्र प्रश्न है। कितु इमम काई सन्देह नहीं कि हिन्दुओं की वए-व्यवस्था का प्राधार यशानुक्रम-विज्ञान हो ।
वशानुक्रम विज्ञान हिन्दुओं के धारणानुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य श्रादि वर्गों के लक्षण कई पीढियो तक अभिव्यक्त न होने पर भी नष्ट नहीं होते। आधुनिक विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है। इस प्रकार का अाधुनिक विज्ञान का प्राचीन विज्ञान से मेरा होना एक श्राक स्मिक घटना नहीं है ।-मोतियाबिद भी एक और चधुरोग है जो वशानुमम से उत्पन्न होता है। मोतियापिद के उत्पन होने की अवस्था भी प्रत्येक परिवार के लिए चुछ निश्चित सी रहती है। किसी क्सिी परिवार में बाल्यावस्था में ही यह रोग उत्पन्न होते देखा गया है। दूसरे परिवारों में यौवनावस्था के प्रारम्भ होते ही यह रोग उत्पन होता है। कुछ परिवारों में मध्यवयस में ही यह रोग उत्पन्न होते देखा गया है। इस सम्मघम एक और रहस्यपूर्ण यात का पता चला है। किमी परिवार में ऐसा होते देखा गया है कि एक पुश्त में तो मोतियापिद पृद्धावस्था में उत्पन्न हुश्रा, दूसरी पुश्त मे यह रोग ४० वर्ष की आयु में उत्पन्न हुश्रा, तीसरी पुश्त मे ३० वर्ष की आयु में, ४ थी पुरत में यह रोग वर्ष की आयु में उत्पन्न हुआ एर ५३/ पुश्त में, जाम के थोड़े ही दिनों के अन्दर यह रोग होते दया गया। एक वैज्ञा निक ने उपर्युक्त वंश पो वैज्ञानिकों के सम्मुग्य उपस्थिन किया था। वैज्ञानिको मे इस विषय को रोकर यथेष्ट पालोचना हुए यो। कुर वैज्ञानिकों की धारणा थी कि उक्त यशट्टा के संग्रह करने में कुछ दोष रह गया है। पर ब्रिटिश वैमातिए १० नेट्ल शिप महोदय ने एक परिवार या वंशयन संग्रह किया था, जिसम रखौंधी की बीमारी ९ पुश्त तक होती गइ थी। उक्त परिवार म २११६ व्यक्तियों म मे १३५ को रामी हुद थी। पर और विरिण प्रकार का रोग होता है, जिसमें दिन में अया अविरतीय प्रकाश में तो निगराई नहीं देता रितु घाँदनी गत मे रिमाइग्ना है। इम गेग में रोगी व्यक्ति को ग्न का कोड मान नहीं होता है। ।
यशानुनम और रोग १४५ इसे दिवाधता (Day Blindness) कहते हैं। एक वश में चचेरे भाई बहिनों में विवाह होने के परिणाम-स्वरूप चार सन्तानों मे तीन मन्तानों को यह रोग हो गया था। यह रोग भी वश- गत होता है। इससे ज्ञात होगा कि निस्ट सम्बधियों में विवाह परमा रितना भयावह है। गस भी वशगत है। यह अनेक कारणों से उत्पन्न होता है। फभी-कभी मरतक के चर्म से अत्यधिक तैल पदार्थ निम्लता है और उसके पश्चात् घाल गिरने लग जाते हैं। कभी-कभी मस्तक में अत्यधिक प्यास हो जाने के पश्चात् वाल गिरने लग जाते हैं और गखापन उत्पन्न हो जाता है। गजापन स्त्री की अपेक्षा पुरुप में अधिक उत्पन होता है। यह भी कहा जाता है कि नपुंसकों को यह रोग नहीं होता। कैन्सर-इस रोग के नाम को सुनते ही मन में एक प्रातङ्क की सष्टि होती है। 'केसर' रोग को समझने के लिए हम फिर कोप विभाजन के प्रति ध्यान देना पडेगा। हमने यह देखा है कि एक कोप से ही सहस्र कोपो की उत्पत्ति होती है और उन कोपों से धीरे धारे हमारी देह बनती है। हमने यह भी देगा है कि अमेरिका के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलेक्सिस रेल ने कैसे जानदेह से एक एक अङ्गको निकाल कर उमे काँच ये वोनलों म जीवित रस्सा है। रेल महोदय ने यह प्रमाणित कर दिया है फि जीव देश के कोप, देह से अलग होरर न केरल जीवित ही रह सस्ते हैं, वरन् श्राहार मिलने पर एस उपयुक्त वातावरण में को जाने से थे जीवित रहने के साथ-साथ पृद्वि भी करते हैं। उनके जीवित रहने की एव धृद्धि प्राप्त होने की सीमा भी नहीं है। किंतु जीर देह मे रहते समय चे कोप अनियमित रूप से वृद्धि प्राप्त नहीं परते। प्रयोजनानुसार वे एक सीमा तक ही वृद्धि प्राप्त करते हैं। इस नियत्रण काफेन्द्र कहाँ है और ऐसे यह नियन्त्रण होता है, ये सन १५० वशानुनम विज्ञान श्रेणी के कुछ परिवार रहते हैं। उन परिवारों की उहाँ अच्छी तरह खोज की। उहें पता चला कि १८ वीं शताब्दी में दो सगे भाइयों ने दो बदचलन लडरियों से निराह कर लिया था। इस परिवार का नाम 'ज्युक्स' परिवार था। इस परिवार मे आपस मे ही विवाह होते थे। इस कारण इस परिवार की और भी दुर्गति हुई। क्रमश इस परिवार के व्यक्ति वाहर से भी निगाह करने लगे। ई० सन् १८१६ म ज्युक्स परिवार के सम्बध मे पुन अनुसधान हुआ। इस अनुसधान के परिणाम में देग गया कि ज्युक्स परिवार मे कुछ उनति हुई है। 'क्लीकॉक' और 'ज्युक्स' परिवारों पर पारिपाश्विक वातावरण फा गहरा प्रभाव पड़ा था। ऐसा होना स्वाभाविक ही था। समाज मे ऐसा ही हुआ करता है। हमारे समाज की प्रत्येर श्रेणी अपने अपने वातावरण में ही काम-काज करती रहती है। कल्लीकॉक और ज्युस्स परिवारों म सैक्डों व्यक्ति उत्पन हुए थे। घे सर के सर निष्ट प्रवृत्तिनाले थे। यह स्वाभाविक ही था कि उन परिवार के व्यक्ति दुष्ट यातावरण म ही जीवन यापन करेंगे। से दुष्ट वातावरण में पैसे किमी का स्वमान सुधर सकता है ? सोलवा परिच्छेद स्टेरिलाइजेशन किसे कहते हैं ? वंशानुक्रमविज्ञान से पृषि-कार्य के सम्बध में जितना राम श्रा है, तुना लाम ममाम्यवस्था में नहीं हुअा। पाश्चात्य देशों में काक पिय पर कुए जोर दिया जाने लगा है। ममाज म जो व्यक्ति रोगप्रम्न है, न सतान उत्पादन करने में गेहा जा रहा है। एक ओर तो मतनि निगेष पाशा पलाया जा रहा है, दूमरी और सग्लिादडेशन द्वारा मन्तानोत्पान की शक्ति को स्टेरिलाइजेशन किसे कहते हैं १५१ नष्ट किया जा रहा है। स्टेरिलाइसेशन से काम वासना के उपभोग में कोई बाधा नहा पडती। जिस नाली से पुरुष का वीर्य बाहर निमलता है, उस नाली को अनोपचार द्वारा काटकर उसके मुख को बाँध दिया जाता है। खियों में स्टेरिलाइजेशन करना कुछ कठिन कार्य है । त्रियों के लिए नामि के नीचे के भाग को चीरना पड़ता है, और तन जिन नालियों से अएटाणु जरायु में श्राते हैं उन नालियों को काटकर उनके मुसों को बाँध दिया जाता है। इस प्रकार गर्भाधान तो वन्द हो जाता है, किन्तु कामोपभोग में कोई वाधा नहीं पड़ती। आज से ४० वर्ष पूर्व अमेरिका के एक जेल के डाक्टर ने, इण्टियाना नाम: शहर मे, सर्वप्रथम स्टेरिलाइजेशन का कार्य प्रारम्भ किया था। उहोंने कैदियों को राय से उहें स्टेरिलाइज क्यिा था। थोडे ही दिनों के अंदर मानसिक रोगग्रस्त व्यक्तियों को भी स्टैरिलाइज करना प्रारम्भ हो गया एव सन् १९०७ ई० में केनीफोर्निया एवं इण्डियाना प्रान्तों में स्टेरिलाइजेशन के सम्बध में नियम बन गये। श्राज-क्ल अमेरिका के २६ प्रान्तों में इस सम्बघ फानून बन गये हैं। इस कानून के अनुमार वहाँ पर ०७,००० व्यक्तियों को स्टेरिलाइज क्यिा गया है। इनमें प्रतिशत ६० स्त्रियाँ हैं। इमा प्रयोग सतरनाक है । जहाँ पर रोग प्रत्यक्ष है एव जिनके रोगासेसमाजकाहानि पहुँच सकती है, उन रोगियों को तो स्टेरिलाइन करने से समाज का कल्याण है, अन्यथा यदि राज्य के अधिकारीगण मनमाने तौर से स्टेरिलाइज काना प्रारम्भ कर दें तो इसमे समाज की हानि है। अमेरिका के 'कानसास' प्रात में लडकियों की एक सस्था से अधिकारीवर्ग अस तुष्ट हो गये थे, और कोर में आकर उन्होंन उस संस्था की समस्त लडपियों को 'स्टेरिलाइज' कर दिया या। इस प्रक्रिया का दुरुपयोग होने की यथेष्ट श्राशट्टा है। यौन रोग समाज के लिए हानिकारक है, और कौन नहीं, इमकी भी मीमासा होना सहज यात नहीं है। 9A
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वंशानुनम विज्ञान
सत्रहवाँ परिच्छेद
चशानुक्रम और समाज की उन्नति
सामाजिक उन्नति समाज के श्रेष्ठ पुरुपा पर जितनी निर्भर करती
है, उतनी और किसी बात पर नहीं। यदि किसी समाज में
श्रेष्ट पुरप कम होते जाय, तो समाज की अवनति अवश्यम्भारी
है। वर्तमान समय मे यूरोप और अमेरिका मे शिक्षित और
अर घरानो मे सन्तानो की उत्पत्ति धीरे धीरे कम होती जा रही है
और जिा परिवारों में शिक्षा की उन्नति नहीं हो पाई है, जिन
परिवारों को हम साधारणतया निम्न श्रेणी के सममले हैं उनम
सतानों की सरया धीरे धीरे पत्ती जा रही है। प्रसिद्ध अंगरेज
जीवज्ञानिर श्री जे. पी० एस० हॉल्डेन महोदय का मत है कि
जिन समाजा म साधारण परिवारों की अपेक्षा शिक्षित और
उस घाना में कम सन्तान उत्पन्न होता है, वे समाज निश्चित
रूप मे अवनति की ओर मुक्त है।
बहुतों की यह धारणा है कि ममय क अनुसार समाज की
जन-सरया का पाना र स्वाभाविक यात है, रितु विचार
करने पर यह यात मय नहीं मालूम पडती। यह यात मयो
चिदिन है कि आधुनिर युग म संमार की जन-माया और
विशेषकर गनेन्द्र श्रादि की जन मन्या म अद्भुत पृद्धि हुन
है। किन्तु दम जन-माया की वृद्धि विगत शनादी म जिस गति
मे हुई है, इसके पूर्व वैमी नदो दु थी। मन् १८०१ ६० से
१८६१ ता साठ वर्ष म इंगनगट को जा-मंग्या दुगुनी में
भी थपिक हो गई। फिन्तु :० मन् १०६६ की जन-माया ,
दुगुनी होने में अगर चार सो सात लग गय थ। सन् १५१५
ट में इंगले को जन-संध्या १०६५ या जन-मरया म
दुगुना हुई थी, किन्तु आन की स्थिति की पर्गना करन पर एमा
वशानुनम और समाज की उन्नति १५३ प्रतीत होता है कि निस्ट भविष्य में इँगनैण्ड की जन-सस्या घट जायगी, वढेगी नहीं। एक मत के अनुसार मन् २०३५ ई० तक इंगलैण्ट और वेल्म की जन सख्या अाज से एक दमाँ भाग घट जायगी। अगले पृष्ट में दिये हुए चित्र में विगत ६०० वपा की जन-सग्या की वृद्धि आदि का कम दिसाया गया है तथा अगले १०० माल में वह जन-मरया स्तिनी गिर जायगी, इसका भी चित्र दिया गया है। इस बीच यदि उपयुक्त रीति से ममाज का सुधार न क्यिा गया, तो जन संरया की यह अपनति अवश्यम्भागी है। जैसे इंगलेण्ड की जन सरया की अमनति की श्राशङ्का की जा रही है, वैसे ही यूरोप और अमेरिका के युक्तराष्ट्र के विभिन प्रदेशों की अवस्था भी समान रूप से प्राशकापूर्ण है। यूरोप आनि देशा मे निस्ट भविष्य में जन मल्या द्रुत गति मे कम हो जायगो, इम यात को सुनकर साधारण व्यक्ति कुछ आश्चर्य में पड़ जाता है। कारण, वह देयता है कि प्रति वर्षे जन-मरया वृद्धि पा रही है, फिर निकट भविष्य में यह गिर कैसे जायगी। किन्तु विशेपना के इस अनुमान के मूल म जो कारण हैं उनमें स कुछ कारणों का परिचय यग लिया जाता है। जम और मृत्यु के अनुपात की गणना इस प्रकार होती है - जम अनुपात का अर्थ है, प्रति सहन व्यक्ति म स्तिने जन्म होते है। इसी प्रकार मृत्यु अनुपात का अर्थ है, प्रति सहस्र व्यक्तियों में प्रति वर्ष स्तिनी मृत्यु होती हैं। अपदन आँकडो पर ध्यान नीजिए । सन् १८९१ ई० मे इंगलैण्ड और वेन्स के जम का अनु पात ३०५ था और मन् १९०१ में यह १९९ हो गया था। उहा तीस वपा में इंगएट और येल्म को जन-मरया दो रोड नने लाग्य से तीन करोड अस्मी लास हो गई थी। इन याँकडो से यह जान पड़ता है कि एक ओर तो जन्म का अनुपात घट गया और दूसरी ओर जन-सरया यद गई। इसके अति १५४ वंशानुम्म विज्ञान रिक्त उसी समय इंगलैण्ड और वेल्स के बहुत से व्यक्ति निदेशो में भी चले गये थे। इस कारण भी जन्म की सग्या ROMARunni याम- - १०लायम २००५:- सन् १०६६ ईस्वी से लेकर २०३५ तक इंगलैण्ड और येन्स की जन-सग्या में परिवतन का अनुमान । (एच. सा. विवी थे मय से) युद्ध और घट गई होगी तयापि इन प्रदेशों या जन-साया य गर्द। इसका कारण यह है कि पर और जैसे जम अनुपात घट गया, उमी प्रकार मृयु अनुपात भी घट गया। श्मिी एक व म जम अनुपात और मृयु अनुपान के अन्तर में की जम-सत्या में वृद्धि और कमी होती रहती है। यतमान ममय में इंगलैण्ट में जम अनुपान मृयु अनुपात से अधिक है, समान वशानुक्रम और समाज की उनति १५५ तथा विशेपानगए क्या यह अनुमान करते हैं रि निस्ट भविष्य में इंगलैण्ट की जन-मग्या घट जायेगी? इम वात में एक रहस्य है। यदि श्राज पूर्वापेक्षा लडकियाँ समाज में कम हो जाये तो अवश्य ही निम्ट भविष्य में मन्तान को देने के उपयुक्त स्त्रियों भी कम हो जायेंगी, और इस प्रकार जन-सग्या भी घट जायगी। इस कारण केवल जन्म और मृत्यु के अनुपात से ही भविष्य में जन-सरया घटेगी श्रथना नहीं, यह कहना बहुत कठिन है। किमी समाज में जन मरया घट रही है श्रथा वढ रही है या वह सरया समान रूप में स्थित है, यह जानन के लिए हमें यह जानना परम पारश्यक है कि वर्तमान समय में प्रति नारी के गर्भ मे कितनी ऐसी लड़कियाँ जन्म ले रही है, जो कि भविष्य में माता होने के उपयुक्त होंगी। यूगेप श्रादि देशों में जम अनुपात के घट जाने का एक कारण तो यह है कि इन देशों में पानाल सन्तति रोिध के मायनों का अधिक प्रयोग होने लगा है। दूसग कारण यह है कि बहुत देशा मे भ्रूण हत्याएँ की जा रही हैं। इसके अतिरिक्त कुल और भी कारण अपश्य होंगे, जिनमे उन देशों के मनुष्यो में वश-वृद्धि की शक्ति भी कम हाने लगी है, रितु जम अनुपात के म्म होने का मनसे बडा कारण तो इच्छापूर्वक जन्म निरोध ही है। निम्नांकित चित्र में इस बात को तिमाया गया है कि शिक्षित समाज मे, जिममे जम-निरोध की रीतियों का ज्ञान अधिक फैला हुआ है, जम अनुपात दुमरी अशिक्षित श्रेणियों से कम है। अशिक्षित श्रेणिो में जम-निरोध का ज्ञान अधिक नहीं फैला है। इसक अतिरिक्त पृष्ठ १५६ के चित्र से एफ और पात पर भी ध्यान प्रारष्ट होगा। वह यह सि कपडे की मिलों में जो औरतें काम करती हैं, उनमें भी दूसरों की अपेना लम श्रनुपाव कम है।
वंशानुक्म विज्ञान
जर्मनी में विश्व विद्यालयों के प्रोफेसरों के प्रति घर में तीन से
भी कम स तानें पाई जाती हैं, रितु उस देश में किसानों के प्रति
उपरावाले
कारीगर
सानो में काम
करनेवान मजदूर
कपडे की मितों म
काम करनेवान मजदूर
१००
.
११०
२००
सन् १९२१ ईस्वी में प्रति सहस ५५ यप से कम भायुवाले विवाहित
मनुष्यों के नियमित जम अनुपात का चित्र। यहाँ ५
पेशेवाले का चित्र दिया गया है। (एच. सी.
विरी के मय से लिया गया।)
घर मे से भी अधिक साताने माप्त होती हैं। सोरियट कम
में घडे बडे मताओं के घरा में मामूली मदुरा के घरों से कम
सताने हैं। इन सब-शों के औषड़ी को परीक्षा परन पर यह
स्पष्ट हो जाता है मिश्रेिणियों को हम पान उस श्रेणी मममत
हैं, मन प्रेरिया में, निम्न श्रेणी को अपना यम सता सन्न हा
रही हैं। यूरोप और अमरिका के पास दो प्रदेश स्टॉकहा म
और मेरील में हम विपरीत दृष्टात मात्र होन हैं। पीटा
राजधानी टाम में जम निराध के मध्यम इतना प्रचार
हुआ है और वहा मामान और शिना-मम्बधी इतने सुधार
वशानुनम और समाज की उनति हुए हैं कि वहाँ गरीब घरों में उच्च श्रेणी के घरवालों की अपेना क्म सन्ताने उत्पन हो रही है। ब्रेजील के एक प्रान्त का नाम है मिनास जीराइस (Minas Geraes): इस प्रान्त के प्रसिद्व दैनिक पत्र में एक परिवार के विषय में बहुत ही मनोरजक वात छपी थी। सेन्डॉर मोटेस्टो नामक व्यक्ति के ३३ वप के विवाहित जीवन मे २३ सन्तान उत्पन्न हुई थीं। उसका विवाहित जीवन २५ मई सन् १९३९ को ३३ साल ११ महीना और १३ दिन का था। उनकी सन्तानों में उन्नीस लडके और चौदह लडक्यिों थीं। इस सवाद के छपने पर मिनास जीरास म बहुत चहल पहल मची थी, किन्तु वहाँ पर अच्छे अच्छे घरानो में साधारण तौर पर बारह से चौदह लडके अक्सर जन्म लेते हैं। जॉन वी० मिफिग नामक एक पपिटत ने ग्रेजील और चीन की जन-संध्या के सम्बन्ध में सोज की है। इस सम्बंध में उनके दो लेग्य, एक चीन और दूसरा प्रेज़ील के सम्बन्ध मे सन् १९२६ और १६४० के 'जनरल ऑफ हेरे डिटी' म छपे हैं। उनकी सोज का साराश यह है-अमेरिका के युक्त राष्ट्र के उन श्रेणी के परिवारों की अपेक्षा नेजील के उच्च श्रेणी के परिवारों में अधिक सन्ताने उत्पन हो रही हैं। वहाँ के गरार घरों में उच्च श्रेणी के घरो की अपेक्षा क्म सन्तान जोषित रहती हैं। चीन में भी यही यात पाई गई है। वहाँ भी उन श्रेणी के घरों में निम्न श्रेणी की अपेक्षा अधिक सन्तान जन्म लेती हैं जिन्दा रहती है। अर्थात् चीन और प्रेज़ील म निम्न श्रेणी की अपेक्षा उघ श्रेणी मे जन्म मरया दिन ब दिन बढती जा रही रही है। कहा जाता है कि ससार भर म चीन की ही स्त्रियों के सबसे अधिक मताने उत्पन्न होती हैं, किन्तु प्रिफिग साहय की सोज से यह ज्ञात हुआ है कि प्रेजोल की माताएँ ही सबसे अधिक सतानों को जम देती है। प्रेजील की जनसरया भी रिन य
यशानुनम विज्ञान
दिन सूब वढ रही है। सन् १९०० ई० म बेजोल को जन माया
एक करोड सत्तर लास थी। सन् १९२० में यह सरया तीन
करोड तक पहुँच गई और १९४० मे चार करोड अस्सी लास
हो गई है। ग्रिफिग के अनुसार, अमेरिका के युक्त राष्ट्र में, उध
श्रेणी के परिवारा में, दिन व दिन कम सन्तान उत्पन्न होने लगी
हैं। फितु निम्न श्रेणी के परिवार में, उस श्रेणी अपेक्षा डेद
गुने से भी अधिक सताने उत्पन्न हो रही हैं।
अमेरिका के युक्त राष्ट्र म जम अनुपात पिछले दम वर्षा म
प्रतिशत २५ के अनुपात से गिर गया है। पिछल पोरवां
के अन्दर सन् १९३९ ई० म अमेरिका के युक्त राष्ट्र में दस तथा
दस से कम उम्र के बचा की संरया सोलह लास कम हा गइ
है। अमेरिका क गृह युद्ध के बाद वहाँ की प्रत्येक स्त्री माय
पाठ मन्तानों की माता हाती थी और प्राज यह दा सन्ताना मे
श्रधिक यी माता नहीं हा रही है। विशेषज्ञा का कहना है कि
किसी समाज की जन-सरया ज्यों की त्यों रमन कतिपय
दम्मती के कम से कम तीन सताना काहाना आरश्यक है।
किन्तु अमेरिका के दम्पती आज तीन से भी कम सन्ताना क
जमाता हैं। पहल का अमेरिका के युक्त राष्ट्र के बड़े-बड़े
शहप म हो जन-मस्या कम दान लगी थी, परन्तु अरमामा में
भी यह सस्या कम हान तगी ।। गाँना म भी यह या
गया है कि शितित और धनी परिवागम ही जन्म-सन्या यम
हो रही है। य दम्पने म या रहा है कि शिराय माय-माथ
जम अनुपात भी घट रहा है। पिटन अस्मी से यह
रंग ना रहा है हनुण्टा क परिवाराम, उन लोगा की अपना
मिन्होंने कॉलिज की शिना न प्राप्त की है, म सन्ताने अपना
हो रही है। इमरा एक कारण ता यह है कि यहन माँ कानन
को शिला मान लड़कियों शादी ही नहीं करता, दुमग यात या है
। वशानुक्म और समाज की स्नति १५९ कि शिक्षित व्यक्ति, पुरुष और स्त्री दोनों ही जान धूमकर वश निरोध करवं, अपनी सन्तानों की सख्या कम कर रहे हैं। ऐमा गया गया है कि अमेरिका के बड़े-बड़े गये और अन्ट अन्द्र वाद्य-यत्वा के बजानेपाल रत्तीम परिवारों म ३७ लटक रत्पन हुए हैं। वहाँ के सी विवादित पुस्तक लेसों के काल हेढ सो सवाने उत्पन हुइ हैं। इनम ग्यारह लेखिका भी है, जिनके कुल मिनासर १० सन्तान है इसके कारण ये है कि शिानत-जन, अधिक सन्तान व जन- जननी नहीं होना चाहते हैं, इससे एक ओर. के जन्म निगध व रह है और दूसरी ओर स्त्रियों बहुत सप्या म गर्भ गिरा देती हैं। टा० डेरिक टोसिगन अमेरिका क गर्भपात के सम्मघर बहुत सोन का है। उनका कहना है कि अमेरिका के युक्तराष्ट्र म प्रति वर्ष मात लाम्य नाग्यिाँ गर्भ गिराया करती हैं। इसरा यह अर्थ होता है कि तीन गर्भवती नारियों म मे एक मार्ग गर्भ गिग दिया करती है। इनमे मे प्रतिशत -५ या ३० नारियों राग के कारण गर्भ गिराती है। यूरोप और अमेरिका में रोग के कारण गर्भ का गिराना गैरकानूनी नहीं है। प्रतिशत ६० से ६९ नारियाँ गुमरीति म गर्भ गिराया करती है। इसमें श्राधे गर्म तो डाक्टग की सहायता से गिराये जाते हैं, और श्राप याही अनाडियों के हाथ गिराये जात है। गुम रीति स गर्भ गिराये जाने के कारण अमेरिका में प्रति वर्ष आठ हजार नारियों की मृत्यु होती है। टा० टोसिग क कथनानुसार प्रति नरे गर्भपात विवाहित स्त्रियां ही राती हैं, जिनकी आयु ५ मे २५ वक की होती है। हात की अपेक्षा शहरों में दून गर्भपात हुश्रा करत हैं। गत महायुद्ध के याद "वनिम" नगरी म गुप्त रूप से गर्भ गिराने की साया युद्ध के पहले मे ५ गुनी घट गई है। न्यूयार्क मिटी म प्रति वर्ष ८० हजार नारियाँ गुम रूप से गर्भपात कराती हैं। सन १९१९ ३० की गणना
१६०
वंशानुनम पिनान
से यह मालूम हुआ था कि यूनाइटेड स्टेट्स श्राम अमेरिका म प्रति
वप गुप्त रीति से १०,००,००० नारियाँ गर्भपात कराती हैं।
साधारणतया जिन शिक्षित परिवारो की आमदनी कम है,
उनमें ही क्म सन्ताने ज म तेती हैं। यदि राष्ट्र की भोर से वधा
के पालन पोपण क लिए उन परिवारा को सहायता मिले, तो जम
की साया में वृद्धि हो सस्ती है।
सन् १९३९ ३० मे न्यूयार्क सिटी में क्रीम तीस हजार नारियाँ
अध्यापन का काम करती थी। उनमें प्रतिशत चालीस मे पैतालीस
नारिया अविवाहिता थीं। कुछ दिन पहले तक उस प्रदेश के
कानून के अनुसार अध्यापिकाओं के लिए निगह करना मना था,
किन्तु पर इस कानून म परिवर्तन हो गया है। जिम समय
श्रध्यापिकायों के लिए विवाह करना मना था, उस समय अभ्यापि
काओं को छ सौ से रोकर बारह सौ डातर ता मामिर वेतन
मिलता था। धीरे धीरे यह वेतन १, ६०८ हार से लर ३,३३९
टालर तर हो गया है। धुव मना श्रेणी की अध्यापिकानों में
निरा यह वेतन और भी अधिक हो गया है।
समाज की जन-मान्या के बटान के विषय म विभिन्न राष्ट्रा की
अलग अलग नानियाँ हैं। जर्मनी, "टनी और रूम गष्ट म जन
सग्या के यटाने की नीति यदती जा रही है। मोरियट रूम म
जन-मान्या म्बर यट रही है। मम्मरत इममा एक कारण यह
कि वन पर निया क निए बहुत-मी आर्थिक मुरियाग हैं। यहाँ
पर स्त्रियो को माता यनने में अपित रिक्ने ठानी पड़ता।
है
+R-Bantropcy of Marriage by F Calrerton
IIM 117
वशानुनम विज्ञान और समाजव्यवस्था १६१ अठारहवाँ परिच्छेद वशानुक्रम-विज्ञान और समाज व्यवस्था प्रसिद्ध जर्मन पपिटत स्पेंगलर महोदय ने कहा है कि जातीय सभ्यताओं की भी उत्पत्ति,दिरास, कौमारावस्था, यौवन, जरा और मृत्यु प्रादि व्यक्तियों की तरह होती हैं। भारतीयों के धारणानुसार जातियो की मृत्यु अनिवार्य नहीं है। व्यक्तियों के सम्बन्ध मेजैसे जम, मृत्यु, कौमार और यौवनावस्था होती हैं और फिर उसका जम एन उमरी वृद्धि होती रहती है, वैसे ही जाति की भी चम्मत् उन्नति, अवनति, जन्म, विकास, कौमार, यौवन एव जरावस्थाएं होती रहती हैं। यह बात भी सत्य है कि जिसमा जम होता है, उसकी मृत्यु भी होती है। किन्तु राष्ट्रीय उत्थान और पतन के बारे में भारतीया की धारणा यह है कि राष्ट्रीय जीवन में इन उत्थान पतनों के युग हुश्रा करत हैं। अर्थात् जातीय जीवन मे परिवत्तन चावत् हुश्रा करते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकोंम बहुतेरे विद्वान भारतीय मत के अनुयायी बनते जा रहे हैं। जर्मनी के तीन प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिकों ने मिलकर वशा- नुक्रम-रिधान पर एक प्रामाणिक प्रन्य लिसा है। उस प्रन्थ का नाम है ह्युमन हेरेडिटी (Human Heredity) 1 अंगरेजी भापा मे इस प्रन्थ से बढकर मानव-समाज से सम्बन्ध रग्पनेनाला वशानुनम विज्ञान पर दूसरा कोई अन्य नहीं है। उन तीन सर्वमान्य पण्टितो 4 नाम हैं, डास्टर अरवीन वापर, टास्टर अयेजिन शिर एव टास्टर प्रिट्ज़ लेंज। सक्त पण्डितों का कहना है कि अनियन्त्रित विवाह प्रथा के कारण एवं समाज की उन श्रेणियों में, निम्न श्रेणी की अपेक्षा, वशद्धि कम होने के कारण श्राधुनिक सभ्य समाजों की अधोगति प्रारम्भ हो गई है। आधुनिर पाश्चात्य समाज के घड़े-बड़े शिदिन व्यक्तियों में भी यह धारणा बैठ गई। कि विवाह एक व्यक्गित व्यापार है। आधुनिर रूस म देशानुक्रम विज्ञान चार्टाण्ड रसेल, वी० एफ कैलपार्टन, स्मालहाउसेन आदि पण्डितों की राय म निकाह रचना अब कोई प्रयोजन नहीं समझा जाना है। अपने को प्रगतिशील कहनेगले व्यक्ति आर्थिक एवं श्रयाय राष्ट्रीय व्यापार म तो समाज का नियन्त्रण परम प्रापश्यक समझने है, किन्तु विवाह के सम्बध में ये कैसे अनायास ही निश्चिन्त होर उदासीन रहने हैं। आधुनिक वशानुक्रम विज्ञान के साथ माना समाज व्यस्था का कोई सम्बध ही नहीं है। प्रति में स्वाभाविक रीति तो यह है कि दुल जीर जीरन समाम मे टिक नहीं पात। उन्ह साथी नहीं मिल पाता। इस मार माकृतिक निर्वाचन परिणाम म दुर्यलो और पीड़िता का लोप होता जाता है, एक तारध्यान, कर्म २ अय प्रकार में योग्य प्राणिया की वशमारा बनी रहती है। किंतु माना समाज मे ऐसा नहा हो पाता। गृहपातिन पशुश्रा में भी हम अपनी अभिरुचि के अनुसार अच्दै प्राणियों को चुन लते हैं और rat के वश की वृद्धि होने देते हैं। इस प्रसार निर्वाचन क परिणाम मेहम विशेष विशेष श्रोणिया की यशधारा के पायम रव मस्त है, प्रवान्दित मागियों की वशद्धि का राकार प्राणिया कामपि विभाजन अपनी इन्दा ये अनुमार कर सकते हैं। यदि 'म्युटेशन' के कारण रिसीवंशम रोगप्रस्तश्रयमा अन्य किसी प्रकार क श्रानियत जीर की उत्पत्ति होती है तो उसरी यशद्धि को हम गेक सात है। किन्तु प्राधुनिर मनुष्य-समाज म किमी प्रकार या नियंत्रण नर्ग है। अनियनित विवाह के फलस्वरूप, मनुष्य समाज म नाना प्रसार के जेनिक अनियमित मम्मिए से वाञ्छनीय श्रगानीय भार रिशिष्ट नाना प्रकार क मनुष्या जमहल रहन है। इसके उपरान्त समाज अष्टनिया की साने निम्न श्रेणी के रविश की अपना कम हात लगाई। इस कारण समाज म जा परिस्थिति सनहानगी है, यह समानक वशानुरूम-विज्ञान और समानत्यवस्था लिए कल्याणकारी नहीं है। गृ पानित कुत्तों की हम अबा म अच्छी नम्लें बना रह हैं, किन्तु मानव-वंश क लिए हम उटामान रहत हैं। यदि स्मिी श्रादर्श के अनुमार मानव समान म भी विशप विशप प्रोगियों का नत्पत्ति की चेष्टा की जाय ता जाताय दानति का माग अत्यन्त प्रशस्त हो जाय। जाव विज्ञान और वशानुस्म-विज्ञान के अनुसार वशोनति के प्रति ध्यान म्यने से बाज-काप क अमरत्व की तरह जाति भी मदा जाणवन्त बना रह सम्वी है। सम्यताया का विकास समाजक अष्ठ पुरषों द्वारा ही हुआ है। वंशानुक्रम विनान आधार पर ममान का व्यवस्था करने पर समान में श्रेष्ट पुरुषों के जम क्रम और ननकी सस्याओं का अपन इच्छानुसार नियन्त्रण करना सम्भव है। श्राज ससार के प्रत्येक समाज में उच्च श्रेया क विद्वान्, चरित्रवान् और मघावा पुरुषों की सचाने, साधारण व्यक्ति एक विशेष पर निन्न श्रेणियों को सतानों की अपेक्षा घहुत कम हान लगी है। जाताय अवनति का यह एप प्रपल लन्ण है। आधुनिक विज्ञान 4 अनुमार यह बात माननी पड़ेगी कि वंशानुक्रम समाप्त अच्छे- पुर सस्तारा के कारण प्रत्येक समान के व्यक्तियों में घहुत विभिन्नता है। इन विभिनताधा के श्राधार पर समान-व्यवस्था हाना चाहिए और यह भी दखना नचित है कि समाज म अर मस्कारवाल व्यक्ति अधिक से अधिक उत्पन्न हों। यह दया गया है कि उनत पुरया के मस्तिष्म दूसरे पुरपा से अधिक भारा हात हैं। यूराप, चीन, जापान श्रादि सभ्य देशा कीमत दर्जे के व्यक्ति का मस्तिष्क निमा तथा आस्ट्रेलिया अमय मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक भारी हाता है। किसी एक जाति में भी रच कोटि के विद्वान् एव बुद्धिमान व्यजियां क मन्दिर, अन्य साधारण व्यक्ति के मस्तिष्क की अपेक्षा अधिक मागे होत हैं। इसमें भी कोई सदेह नहीं कि बुद्धि पर विचार- १६२ यशानुक्रम विज्ञान चाण्ड रसेल, वी० एफ० कैलपार्टन, स्मालहाउसेन आदि पण्डितो की राय मे निगाह-बधन का अब कोई प्रयोजन नहीं समझा जाता है। अपने को प्रगतिशील कहनेवाले व्यक्ति आर्थिक ण्य अयाय राष्ट्रीय व्यापार में तो समाज का नियानण परम आवश्यक समझने हैं, कितु विवाह के सम्बध मे वे कैसे अनायास ही निश्चिन्त होकर उदासीन रहते हैं। आधुनिक वशानुनम विज्ञान के साथ माना समाज व्यवस्था का कोई सम्बन्ध ही नहीं है। प्रकृति में साभाविक रीति तो यह है कि दुर्बल जीन जीवन समाम मे टिक नहीं पात । उह साथी नहीं मिल पाता। इस प्रकार प्राकृतिक निर्वाचन परिणाम मे दुर्यला और पीड़िता का लोप होता जाता है, एप सारथ्यान, धर्मठ व अय प्रकार से योग्य प्राणिया की वंशारा बनी रहती है। किंतु मानन समाज में ऐसा नहीं हो पाता। गृहपालित पशुपा म भी हम अपनी अभिरुचि के अनुमार अच्छे प्राणियों को चुन लत हैं और उहाँ के वश की वृद्धि होन देते हैं। इस प्रकार निर्वाचन के परिणाम मे हम विशेष विशेष प्रोणिया यी यशधारा का फायम रस मरने हैं अगान्द्रित प्राणिया की वंशवृद्वि का रोसर प्राणिया का रिष विभाजन अपनी इन्दा के अनुमार कर सकते हैं । यदि 'म्युटेशन' के कारण रिसीवंशम रोगप्रस्त अथवा अन्य पिसी प्रकार प श्रमान्द्रित जीर की उत्पत्ति होती है तो उमसी वशद्धि को हम गे सरत हैं। फितु आधुनिर मनुष्य-समान म स्मिी प्रकार का नियंत्रण न है। अनियरित दिपाद के फनम्बम्प, मनुष्य ममाज म नाना प्रकार के जेनि क अनियमित मम्मिश्रण से वाचनीय अान्दनीय समार विशिष्ट नाना प्रकार क मनुष्या जम हाते गते है। इस उपगल ममाज प श्रेष्ठ यत्तिया को सतान निम्न मैगी के व्यक्तिया की अपना रम हाने तो है। म कारण ममाज में जा परिस्थिति उत्पन्न होन लगी है, वह ममान क 1 वशानुक्म विज्ञान और समाज-व्यवस्था लिए फ्ल्याणकारी नहीं है। गृह पालित कुत्तों की हम अच्ची स अच्छी नस्लें बना रहे हैं, किन्तु मानव-वश के लिए हम उतासीन रहते हैं। यदि किसी पार्श के अनुसार मानर समान में भी विशेष विशेप अणियों की उत्पत्ति की चेष्टा की जाय तो जातीय उन्नति का माग अत्यत प्रशस्त हो जाय । जीव विज्ञान और वशानुनम विज्ञान के अनुसार वशोन्नति के प्रति ध्यान गरने से वीज कोप के अमरत्व की तरह जाति भी सता प्राणवन्त बनी रह सकती है। सभ्यतायो का विकास समाज के श्रेष्ठ पुम्पों द्वारा ही हुआ है। वंशानुक्रम विज्ञान के आधार पर समाज की व्यवस्था करने पर समाज में श्रेष्ठ पुरुषों के जम कम और उनकी सख्याओं का अपने इच्छानुसार नियन्त्रण करना सम्भव है। श्राज ससार के प्रत्येक समाज में उच्च श्रेणी के विद्वान् , चरित्रवान् और मेधापी पुरुषों की स तानें, साधारण व्यक्ति एप विशेप कर निम्न श्रेणियों की स तानों की अपेक्षा बहुत कम होने लगी है। जातीय अमनति का यह एक प्रल लक्षण है। आधुनिक विज्ञान क अनुसार यह बात माननी पडेगी कि वशानुक्रम मे प्राप्त अन्टे- बुरे संस्कारों के कारण प्रत्येक समाज के व्यक्तियों में बहुत विभिनताएं हैं। इन निमि नताश्रा के आधार पर समाज व्यवस्था होनी चाहिए और यह भी देसना उचित है कि समाज में अच्छे सकारवाले व्यक्ति अधिक से अधिक उत्पन्न हा। यह देखा गया है कि उन्नत पुरुषों के मस्तिष्क दूसरे पुस्पा से अधिक भारी होते हैं। यूरोप, चीन, जापान श्रादि सभ्य देशा फे श्रीमत दर्जे के व्यक्ति का मस्तिप्प निग्रो तथा आस्ट्रेलिया के असभ्य मनुष्यों की अपेक्षा कहीं अधिक भारी होता है। स्सिो एक जाति में भी उन पोटि के विद्वान् एव बुद्धिमान व्यक्यिों के मस्तिाक, अय साधारण व्यक्ति के मस्तिष्क की अपेक्षा अधिक भारी होते हैं। इसमें भी कोई सदेह नहीं कि बुद्धि एव विचार- वंशानुक्रमरिज्ञान १६४ शक्ति हम वश परम्परा से प्राप्त करते हैं। जीनन म उपयुक्त अपसर एव अवकाश पाने पर उक्त प्रवृत्तियों पनपती हैं। वंशानुग्म के नियमानुसार, विवाह पद्धति के नियत्रण से, "प्रन्द्र सरकार युक्त व्यक्तियों का अधिक से अधिक संख्या में जाम देना सम्भन है। ऐसा न करने से समाज म अन्ये पुरुपी की सरया धीरे धीरे कम हो जायगी और इस प्रकार समाज का पतन अवश्यम्मानी हो जायगा। पाश्चात्य देशा म सबसे पहले सन् १९२२ ई. म स्वीडेन म वशानुनम विज्ञान के आधार पर जातीय उन्नति की व्यास्था परन के लिए एक सस्था प्रायम हुइ थी। प्रमिद्ध मोनानिक विलियम मैदुगल महोदय ने, १९२९ इ० म जापान सम्राट के पास एक पत्र भेजा था, जिमम अहान अत्यन्त श्रामह के साथ मम स्पर्शी भाषा मे वंश विज्ञान के आधार पर एक प्रस्ताव भेजे थे। जापान में भी वश विज्ञान के श्राधार पर समाजन्यस्था क मम्यघम वैज्ञानि की एक समिति बनी है, जिसका नाम है, प्रेण्ड युनिर पीमिल। पाश्चात्य देशा के बहुत से राष्ट्रा म तिराह पर निया ना करने के लिए नियम पा रहा है। रोगी व्यक्तियों का विगद करने से रोक्ने की पेटा हो रही है। हिदुश्रा को वर्ण यवस्था की पार पार पात्य देशा कपडे बड़े पगिरना तथा वैनानि का ध्यान बाट हान गा है। प्रमिद्ध वैज्ञानिा भी जे. वो एम. हॉलडेन महादय ने ता य पाहा का मादम किया है कि अगन । मौ वप के अला यूरोप म भी दुिश्रा की तरह रणभ्यरम्या स्थापित हो जायगी। यंशानुक्म विमान क प्राचार पर ममाज-न्यसम्या कमररमम विज्ञान शामा पन हुहै। इमरा अंगरंजी गाम 'यूनिगम' है। ममानभ्याम्या पर इस विमान का बैमा प्रभार पड़ माना है, दमका पूर्ण परिचय यूनिाम शास्त्र म मात्र हा सरना है। यह शानुनम-विज्ञान और समाजव्यवस्था नवीन शास्त्र अभी धन हो रहा है। मानव-जीवन का आदर्श क्या होना उचित है, इसका निर्णय हुए मिना समाजशास्त्र का निर्माण होना व्यर्थ है। वैज्ञानिकगण आज इम यात को स्वीकार परन लगे हैं कि बुद्धिवृत्ति की अपेक्षा मानव-जीवन पर हृदय धृत्ति का बहुत अधिक प्रमार है। बुद्धिमान होने से ही मानर का कल्याण सम्भव नहीं, मानर को अन्या भी होना पड़ेगा। फुरसत के समय मनुष्य क्सि प्रसार जीवन रितायेगा, उसके यामोद प्रमोद पिस हा के होगे किस रीति से शिक्षा पाने पर उमका जीवन सार्थक होगा, इन सब बातो का निर्णय कौन करेगा थौर कैसे होगा? समान से प्रार्थिक विषमता को दूर करना एक बडा भारी कार्य है, इसमे कोइ सन्ह नहा, किन्तु केरल श्रार्थिक विषमता के दूर होने से ही मनुष्य अच्छे होने लगेंगे इसका क्या निश्चय है ? ससार भर का दरिद्र शोषितो यही कल्पना कर रहा है कि कैसे वह भी ससार के पैसेपाल व्यक्तियों की तरह हो सकेगा। ससार के पैसेपाल व्यक्ति का ही श्रादर्श उसका आदर्श हो रहा है। मितु यथार्थ दृष्टि मे ममा के पैसे वाले व्यक्तियों के जीवन तो उद्देश्य होन ही होते हैं। प्राज माना के लिए एक नगीन सामाजिक और चैयक्तिक आदर्श की नितान्त श्रावश्यक्ता है। इस नवीन, दार्शनिक भावनाओं से उद्भासित, मानव कल्याण की कामना से अनुमाणित वैयक्तिक और सामा जिक श्रादर्श के सहारे यशानुम्म विज्ञान के आधार पर नवीन रूप से समाजव्यवस्था की आरश्यकता है। धर्मशास्त्र से ही जीवन का श्रादर्श बनेगा और वशानुक्रम विनान के अाधार पर ही नवीन समाज की व्यवस्था होगी।