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Shriradharahashyaprakashika
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* श्रीराधारहस्यप्रकाशिका * नमः कृष्णाय माय निम्बायोनिरुद्रत आचार्याय चतुभ्यू परिम्पर्य- भवतिन ॥ पूर्वाचाय्यानह वन्दे मखीरूपधगन् स्वकीनी लिहतोऽप्युज्जन. लरम रमान्तरपर्वकान् ॥ २॥ एच. पांम्पर्गप्राप्तान गुप्तप्रकटभेदकान | नम- स्कोमि नानु मान प्रणिपत्य कुनाबलिः ॥ ३॥ श्रीभञ्च हितरूपा हव्यास हरिप्रियाम् | गोपालिका गुरुरूपां वन्देऽहं दृढभक्तिः ॥४ा श्रीराधा-पत्र कु. णऽस्ति गधायां कृष्ण एव च ॥ उभाम्यामकरूपाभ्यां प्रणमामि मुहुर्मुहुः ॥५॥ मनन हमदामन गधापादाम्बुजामवात । राधिकाया रहस्यश्च प्रादुर्भुतं रसा- स्पदम् ॥ ६ ॥ स्वीय.चार्यप्रमाणेन रसिकानां प्रमाणतः ॥ मयेदं संगृहीतं वै रसिकानां विनोदकृत ॥७॥ भाषा-चौपाई। राधाचरणकमल सुखदाई। हरिपदछबिजिनकरिअधिकाई।१।। जे पद वृन्दाविपिन विलासी।क्रीडत गम महासुखासी ॥२॥ गोपीगभ्रमरी जिन्है सवैं। श्रुति दामी है हिग्दय ल3 ॥३॥ सखीरूप धरि सेवत जे पद शिव सनक दिक शुकमुनिनारद ४ श्रीगंदवीके अनुजाई । जिन्हें मेय सुभगता पाई ॥५॥ श्रीभट श्रीहितुरूपा नाम । हरिव्यास हरिप्रिया अभिराम ॥६॥ गोपालिका सखी जेहि नाम | स्वामिनगुरु मेरी सुखधाम ॥७॥ वे पद मेरे हियमें धरे । धीजिय हियमें हैं. अरे ॥८॥ उन पद यश गाऊं अभिलाता।रोके रुकीन उमगी आसा ॥९॥ कविता नहीं नहीं पंडिताई। कैस तरिये आशा माई ॥१०॥ १श्रीभागवते दशमस्कन्ध-तामिबिधूनशाकाभिरिति, विरोचताधिकं तात पुरुषः प्रति.
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पूर्वगसिकनने मांगि मधुकरी। अपने ग्रन्थको झोगभग ॥११॥
श्रुति पुराणभागवत समेता | काव्य नाट्य रस ग्रन्थकता १२
सबके हैं उदाहरण या । क्रमंत.प्रमकी सीढी तामें ॥१३॥
हरि राधा रति जिनकेरी। तिनको है सम्पत्त की देरी ॥१४॥
जाति यवन रसखान वजीद । या ग्समें वेऊ भये सहीद ॥१५॥
हरीदास जो भौंह मरोरे। ताकी समता कौन टटोरे ॥१६॥
'राधारहस्यप्रकाशिका' नाम ग्रन्थ भयो सुन्दर अभिरामा१॥
मोसन वतीसोई मैं गाई।क्षमा करौ सब मार दिठाई ॥१॥
॥श्रीः॥ JAJEUR श्रीराधारहस्यप्रकाशित रहस्य क्रीडनं वीक्ष्य श्रुत्वा च पार्वतीरितम् ॥ वैशात्मानं वैश्चयित्वा शिया गोपीक श्वरोऽभवत् ॥ १॥ महाकौम-अमिपुत्रा महात्मानस्तपसा स्त्रीत्वमापिर रामतीरें चनगंद्योनि वासुदेवमजं विभुम् ।२। सुधर्माध्यबोधे-मुनयो ह्यभवन गोप्य शृङ्गार- रसलीढये ॥ कुमारास्तत्र विख्याता भगवच्छिष्यशेखराः ॥ ३ ॥ हरिणी हारिणी हीणां हरितेत्याहयान्तः । देवर्षयश्च विख्याताः कुमारशिष्यशेखरः ॥४॥ मुग्धा स्निग्धा विदग्धा चासंदिग्धा चेति संज्ञया ॥ पार्षदाश्चैवं विख्याता देवर्षिशिष्यशेखरा ॥५॥ राधिकाचामपावस्था रंगदेवीति संज्ञया । योगेंगा- व विख्याता पार्षदशिष्यशेखर्गः ॥६॥ मुदेवी चैव चित्रेति मुख्यसखींधु कीर्त्य- ते मख्यश्च कोटिशस्तीमा शिष्यप्रगियकादयः ॥७॥ भाषा-श्रीकृष्ण को एकान्त श्रीवृन्दावन में रासक्रीडा करते देखके और श्रीपार्वती के वचन सुनके अपनो वेश बंदल के श्रीमहादेवजी गोपी होते भयें सो गोपेश्वर प्रसिद्ध ॥...॥ कूर्मपुराण में अग्निके पुत्र महात्मा तप करके स्त्री भये जगत् के कारण वासुदेव अजन्मा विभुको भर्तार मानतेभये ॥३॥ सुधर्माध्वबोधर्म-श्रीहंस... भगवान, श्रेष्ठ शिष्य श्रीसनकादिकं मुनि शृङ्गार रस आखादन करते- के अर्थ. गोपी होते भये ॥३॥ हरिणी हारिणी हरिता हीणा, ये नाम हैं श्रीनारदजी भी अपने पार्षदों सहित सनकादि कनके मुख्य शिष्यः मुग्धा स्निग्धा विदग्धा असंदिग्धा-ये चार नाम से संखीरूपः श्रीराधा के निकट बिराजै है। श्रीराधाके वामभाग में निकट ही श्रीरंगदेवी नामकी, सखी नारदजीके श्रेष्ठशिष्य श्रीनिम्बार्कभंगवान् विराजें हैं।। ४-६ श्रीनिवासाचार्य योगेश सुदेवी, चित्रा नमिकी मुख्य संखी: विराजे हैं। उनके शिष्य पशिष्य रूपसे कोटिनसखी हैं:।।७।।
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(२)
शृङ्गाररसरूपांतो मुनिरूपमुदुर्लभाम् प्रवर्तयितुकामा सखोकमान्तर भृतः।।
भगवत्युत्तमश्लोके भवतीभिरनुत्तमा ॥ भक्तिः प्रवर्तिता लोक मुंनीनामपि दुर्ल-
भोते नचनात् ॥ कृष्णो हंसोऽनिरुदो निम्बार्क श्चेति चतुष्टयम् ॥ माद्याचाच्या
विदुः सन्तस्तच्छिष्या गोपिका मताः॥ निम्बार्का गोपिकास्तस्मानिम्बाति म
सङ्गताः ॥१०॥ कुमारा मुनिरूपेणे कलिलुप्तं कृते कृते ॥ विशदयन्ति शान्तं ते
सख्यात्मनोज्ज्वलं सदा ॥ ११ ॥ त्रेतायां तथा त्रेतायां दास्य देवर्षयो रसम् ॥
भवयन्ति ते नित्यं लिहन्ति रसमुज्ज्वलम् ॥१२॥ द्वापरे द्वापरे तदात्सय बै-
व पार्षदाः ॥ रंगदेवीस्वरूपेण सदोज्ज्वलरसंलिहः ॥ १३॥ योगेशाः प्रव-
संयन्ते सख्यरस कलौ युगे । मुदेवी चित्रकाकारैः सदोज्ज्वलरसंलिहः ॥१४॥
शृंगार रसको सखीरूप मुनिनको भी दुर्लभ है ताके प्रवर्त
करवेकों सखीरूप धारण करते. भये ।। || श्रीमद्भागवंत.
में लिख्यो है-उद्धवजी ने गोपिन से कहोकि महान उत्तम
जो तुम सो. तुमने उत्तमश्लोक भगवान् में उत्तमा भक्ति
प्रवर्ते करी सो मुनिनको भी दुलर्भ है॥९॥ श्रीकृष्ण
हंस अनिरुद्ध निम्बार्क ये चार आचार्य आदि सब सन्तं जाने
हैं तिनकी शिष्य सब गोपी हैं श्रीरंगदेवीजी जो निम्बार्क
तिनकी शिष्य निम्बार्की गोपी हैं निम्बार्का यह कथनमात्र
हैं ।। १० । मुनि श्रीसनकादिक सखीरूपसे उज्ज्वलरसं.
सेवन करते भी जब जब सत्ययुग आवै है तब तब कलि करके
शान्त रस जोलुप्त भयो,ताको प्रवन करें हैं ॥११॥ नारदजी.
नित्य उज्ज्वल रस सेवन करते भी जब जब त्रेता आवै तब
मंखयजनरूप दास्यरस प्रवर्त करें हैं॥१शा तैसे ही द्वापर
जब-जब आवै श्रीरंगदेवी उज्ज्वल रस सेवन करते भी
निम्बार्करूपसे प्रतिमा अर्चनरूप वात्सल्यरत प्रवर्त करें हैं।
॥१३॥ श्रीनिवास योगेश सुदेवी चित्रकाकारसे उज्ज्वल
रस सेवन करते भी, कलिमें विश्वासरूप से नामसंकीर्त-
नादि संख्यरस:प्रवर्त करें हैं.॥१४॥
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(३)
मख्यकस्पनीवित्वाचर्तुयुगाधिकारिणाम् । युगे युगऽधिकार व साथ-
पन्तः ममाहिताः ॥ १५ ॥ सखरूिपधरा नित्यमाखादयन्ति चोज्ज्वलम् ।
पारम्पर्यानुवृत्पव यथाधिकारमात्मनः ॥ १६ ॥ रसान्तरं भजेबाचं भावस्तु
रसमुज्जलम् । कृष्णहंसानिरुद्धाख्यं निम्बार्क प्रणिपत्य तम् । यस्य नाभाय.
पमि सपरिकरभावनाम् ॥ १७ ॥ एतावान योग आदिष्टो मच्छिष्यः सन-
कादिभिः । सर्वतो मन आकृष्यं मम्यद्धावेश्यते यथा ॥ १८ ॥ भक्तियोगः
प्रकर्तव्यो ध्यानरसाध्य आत्मनि । आधाचार्य हरि तस्मात्मपरिकरमास्मरेद'
॥१६॥ तत्रापि मानस्य यां विरक्तश्च सखी. मब ... अधिकारी नापरस्तु
विचार्यतामिति खयम् ॥ २० ॥
असंख्य कल्प पर्यन्त जीवन है. चारों युगमें अधि-
कारी युग युगमें अपने अधिकार को धर्म सावधान होकै
प्रवर्त करें हैं. और सखीरूप से- नित्य उज्ज्वल रस सेवन
करें हैं । परंपरा की अनुवृत्ति करके जैसो आत्मा को अ..
धिकार होय और रसों को बाहिर से भजें और भाव कर
के तो उज्ज्वल ही सेवन करें ॥ १५-१६ ॥ श्रीकृष्ण हंस
अनिरुद्ध निम्बार्क इनको दण्डवत् करके जाकी लाभ के
अर्थ सहित परिकरकी भावना को मैं प्राप्त होऊं ॥ १७ ॥
श्रीमद्भागवत में कहा कि मो कृष्ण के चेला सनकादिकन
ने इतनो ही योग अपने शिष्यों को उपदेश कियो कि सब
ओर से मन बँचकै साक्षात् मोमें लगावै ॥१८॥ यथावत्
लक्षण के अर्थ कृष्ण हंस अनिरुद्ध निम्बार्क आचार्य सूचन
किये भक्तियोग जो मन के विषय करे तो ताको साधन
ध्यान है, तासे आद्याचार्य हारको परिकर-सहित स्मरण
करै ॥ १९॥ तामें भी मानसी अर्चा की भावना जो विरक्त
कर तो तू सखी हो । सखीभाव बिना और अधिकारी
नहीं है खयं विचार ठेवः॥ २० ॥
-- (४). यामलें कृष्णस्तथा युग्मपूनाधिकारी स्यात्सखीभावार्थनिःस्पृहः ॥ २१ ॥ कुमारा:-ध्यानाऽधिकारोंऽशक्तस्य सर्वेषां तुच सर्वतः । राधाकृष्णपूनने वे सखीभावो हि सर्वकृत् ॥ २२ ॥ नारदा विचित्सेत 'सर्वसेवामुभयोः कृष्णरांधयोः । भवेत्सखीभावनों हि सर्वकर्मणि स प्रभुः ॥२शा भावयेद्रह आसीन: श्रीकृष्ण भाव्यवाहितः राधाकृष्णान्तसेवायामात्मानमधिकारिणम् ॥ २४ ॥ संभूय युवतीभावो भावनयैव मानसे । श्रीमत्योः कृष्णराधयोः परम धाम चिन न्तयेत् ॥ २५ ॥: कुमाराणां सखीतनुमाप्तिः कालिकातन्त्रके: जटिलोऽकुजैन, पूको धृताशीरित्याहान्तरैः । मानसाः कल्पनयान्ते छन्नास्तप्त्वा नजे तपः । मुनयः कृष्णपावस्था आमुः सखीवपुर्धराः ॥ २६ ॥ संमोहनतन्त्रे च-जटिलो नंजयूकश्च धृतायौरर्कुरेव च । चस्वारो मुनयो धन्या इहामुत्रार्थनिः स्पहाः २७. यामल में श्रीकृष्ण ने कह्यो कि युगलपूजा को अधि- कारी सबं अर्थ से निर्चाह सखीभाव से होय ॥ २१ ॥ कुमारनके वाक्य हैं-जीवको ध्यान में अधिकार नहीं ऐसे अशक सबभक्तों को सब ओर से राधाकृष्ण की पूजन में संखीभाव ही लब करबेवालो है ॥ २२ ॥ नारदजी ने भी कहो दोनों राधाकृष्ण की सब सेवा करै पर सखीभाववारों ही सब काम करिबे को समर्थ है ।। २३ ।। श्रीकृष्ण की भा- वना करनेवालों सावधान हो कै एकान्त में बैठिकै श्री राधाकृष्ण के निकट सेवाके विषय आत्मा को अधिकार भावना करै ॥ २४ ॥ फिर मानसमें भावना करके युवती- भावसे दोनों राधाकृष्णको स्वरूप चिन्तवन करै ।। १५ ।। कुमारन की संखीतनु की प्राप्ति कालिकांतन्त्र में लिखी हैं-जटिल, अकु, जजपक और धृताशीः ये हैं दूसरे नाम जिन के, ब्रह्माके मन से 'प्रगट 'ब्रज में तप करके सखी रूप से कृष्ण के निकट विरीज हैं ॥ २६
ॐवलनैवं भावेन प्रपन्ना वालंबीपतिम् । तेपुस्तै सलिले मॅग्ना जपुश्च मनुमुत्त-
मम् ॥ २८ ॥रमात्रयण पुटित स्मराद्यन्तं दक्षिरम् । दध्युश्च गाद-
भावेन वल्लीभित्रने वने ॥ २६ ॥ भ्रमन्तं नृत्यगीताधैर्मानयन्तं मनोभवम् ।
कल्पत्रगान्त ते नाता गोकुले शुभलक्षणाः ॥ ३०॥ इभास्ताः पुरतो. रम्या
उपविष्टा नतभ्रवः । वृन्दायूथे हि भावयेन्नारदं च सखतिनुम् ॥ ३१ ॥ गौत-
मागमे-यथानिगममप्यद्धा नारदः कृष्णलालसः। द्धार्दलालेसायुक्तो योषि-
स्वं गोकुले गतः ॥ ३२ ॥ पित्रा. शप्त उदासीनः परिभ्रमन. महीतले । दर्श-
यित्वात्मान योऽनः स्वीकता कृपया तया ॥ ३३ ॥
समोहन तन्त्र में जटिल, जंजपूक, धृताशी,अर्कु ये चारों
मुनि धन्य हैं या लोंक परलोक में नि:स्पृह केवल भाव करके
बल्लवीपति के प्रपन्न, जलमें तप करते भये. और उत्तम
मन्त्र जपत भये रिमांबीज तीन करके. संपुटितं स्मरादि
ताके अन्त में एसों देशाक्षर मन्त्र जपके गाढ भाव से
बल्लवीन के पति तिन के साथ जो वन वन में भ्रम नृत्य
गीतादिकन से मनोभव को मानै तिनको ध्यान करते भये
ऐसे श्रीकृष्ण को ध्यान कर तीन कल्पके अन्त में वे
लक्षण, गोकुल में प्रगद भये । श्रीकृष्ण के सामने सुन्दर
भौंह नीची किये विगजें हैं ॥ वृन्दा के यूथमें. नारदजी
की सखी मूर्ति ध्यान करै ।। २७-३१॥
सोई गौतम आगम में नारदजी कृष्ण मिलन की लाल:
सा में सुन्दर हृदय की अभिलाषा से गोकुल में स्त्री-भये
॥ ३२॥ पिता जो ब्रह्मा तिननै शाप दिये उदासीन पृथ्वी
पर डोलते रहैं । वृन्दाजी कृपा करके, अनायास दर्शन
है स्वीकार करलेती भयीं ॥ ३३ ॥
4 । नारदस्य - सख्यात्मता. श्रूयते च तथागमे वृन्दयानुगृहीतोऽस्मि पित्रा प्राप्तः परिभ्रमन्.॥ ३४ ॥ तदनुगतिमाश्रित्य मुग्धति विश्नुता सखी रंगदेवी तनु- चाख्या तावता. तपसाभवत् ॥ ३५ ॥ श्रीनारदजी को सखी होनो आगम में भी सुन्यो जाय है नारदजी ने कह्यो पिता के शाप से भ्रमौं जो मैं सो वृन्दाजी ने मोपर कृपा करी उनकी अनुगति से मेरो नाम मुग्धा भयो । श्रीसनकादिकन के सखीभाव में जो सन्देह करै तार्कोसमुझनो चाहियेकि श्रृंगार रस सर्व रसन में श्रेष्ठ है यहसब आचार्योंको सम्मत है । सखीभाव. सो है. जाके कामविकार न होय श्रीकृष्णके.साथ भी. सम्भोग तो का चलै चेष्टा संकल्प में भी न होय केवल. श्रीराधाकृष्ण की क्रीडादर्शन परिचर्या में तत्पर रहै सो निर्विकारता सनको दिकनकी प्रसिद्ध ही हैं । कंह जो कामसाधनसाध्य प्रेम शृङ्गाररस वारिनको लिख्यो है. सो काम कृष्णखरूपसे बढ्या श्रीकृष्ण ने बढ़ायो सो, भी उनके सुखमात्रके ता. त्पर्यवारो. है । साक्षात् मन्मथको मन मथन । करववाले श्रीकृष्ण, कोटिकाम लावण्य उनकी प्रिंया तिनके अंग में इन्द्र के भृत्य प्राकृत कामको प्रवेश कहाँ है। श्रीसनका दिक नारदजी विशेष अधिकारी कौन होयगो । गोपिन के दृढ महाभाव आदिके जो ये अधिकारी न होयगें तो और कौन है । सनकादिसंहिता में सम्प्रदायी आचार्यों की बा- णी में इनके सखीरूप लिखे हैं। विष्णुपुराण में लिख्यो हैं कि यह वासुदेव ही साक्षात् पुरुष है। और ब्रह्मा से लेक १-विष्णुपुराण स एव वासुदेवोऽयं साक्षात्पुरुष उच्यते । स्त्रीप्रायमितरत्सव जगद् ब्रह्मपुरः सरम् ॥ इति. ...P4 . (७) था संमोहनतन्त्र होतदर्थवयं क्रमात् । हविर्धानाभिधानस्तु चक्रमासीन्महामुनिः ॥३६॥ सोऽतप्यत तपः कष्ट निम्बकायकभोज़नः । आशुसिद्धिका मन्त्रं विश- त्यण च जप्तवान् ॥ ३७॥ अनन्तरं-मारवीज़ादग्न्यारूढं तदेव तु । मायातः. परितो व्योम इंसासापुष्टिचित्रकम् ॥ ३८ ॥ ततो दशाक्षरं पश्चान्नमायुक्त-: स्मरादिकम् । दश्यों वृन्दावने रम्ये माधवीमण्डपे प्रभुम् ॥ ३६ ॥ उत्तान- गायिन चारुपल्लवास्तरणोपरि । कयाचिदतिप्रेमान्धवल्लव्या रक्तनेत्रया ॥५०॥ बक्षोंजयुग्मेनाहत्य विपुलोरमस्थल मुहुः । स मुनिः सुबहून् देहाँस्त्यक्त्ता कल्पत्रयात्परम् .. ४१ ॥सारङ्गनाम्नो गोपस्य कन्याभूच्छुभलक्षणा । रङ्ग- देवीति विख्याता-निपुणा चित्रकर्मणि पस्या दन्तेषु दृश्यन्ते चित्रा अरुणवि- न्दवः ॥ ४२ ॥ श्रीनिवामा मुदेवोति ॥ १३ ॥ सब जगत् को स्त्रीपनो है। जो कोई कहै कि ये तादृश प्रेम के अधिकारी नहीं तो हंस भगवानने केवल सांख्य- . उपदेश कियों, सो नहीं तुमारे को.धर्म कहिवे को साक्षात् यज्ञपुरुष भगवान् मैं आयो हूं: इन वचन से (धर्म मेरी भाक्ति करनी है): तांसे भक्ति भी उदेशं करी ॥ पञ्चर- सात्मिका श्रीमद्भागवत सनकादिकनने शेषंजी से सुनी और श्रीनारदजी को सुनाई यह प्रसिद्ध है । हरिशरण यह नाम निरन्तर. रसनापर: विराजै वैकुंठ में नारायणदर्शन से जो सात्विक, उदय भये और पांच रस , हरिचरणकी तुलसी सौरभ से जैसे इनके हृदयमें आये सो आगे कहेंगे, इनके प्रेम और आचार्यताकी महिमा रत्नाञ्जलि' की भाषामें वर्णन करी है। नारदजी की योग्यता:प्रगट विख्यात है। श्रीनिम्बार्क भगवान को सखीपनो तैसे तप से जानो. 'संमोहनतन्त्र' में यह अर्थत्रय क्रमकरके है- हविर्धान' नाम के चक्र महामुनि नींबंकी छाल खाय के तप करते भये शीघ्र ही सिद्ध करवेवालो मन्त्र बीस अक्षरको जपैं, ताके ..
- स - - (८) यथा गोतमीयतन्त्रे-यंत्र यत्र स्थितियस्य राधाकृष्णावलोकने । तत्र तत्र मुखे स्थित्वां दासी भूत्वावलोकये ॥४४॥ देवादक्षिणतः पूर्व खगुरु स्थापयत्सु धीः । राधाकृष्णात्मक श्रीमान् राधाकृष्णस्वरूपिणम् ॥ ४५ ॥ प्रेमतत्वमय ) सुष्टु हेयरागविवर्जितम् । सखीरूपंधर यात्रा गुरुं पीठेऽवलोकयेतः ॥ ४६॥ पीछे काम बीज.अग्निं आरूढ को जप्यो । मायात परे. व्योम जो हंसासृक्पुष्टिचित्रक ताले परे दशाक्षरको मन्त्र नमः-युक्त स्मरादिकं जपते भये ॥ श्रीवृन्दावनके 'माधवीमण्डप में सुन्दर कोमल पल्लव के बिस्तरपर उत्ता- न सो जो प्रभु तिनको ध्यान करते भये कोई अति प्रेम की आंधी वल्लवी रक्त नेत्रवारी ताके वक्षोजयुग्म से वक्षः- स्थलं मिलाय रहें बारंबार सो भी ध्यान कियो । सो मुनि बहुत देहन को त्याग करके तीन कल्प के अन्त में सारंग नाम गोपके घर में श्रीरंगदेवी नामकी कन्या होते: भये । चित्रके कर्ममें बडी निपुण जिनके दांतनमें चित्र लाल विन्दुः दरसे हैं। बहुत देहनको त्याग करनी अर्थात भूमि वैकुण्ठमें निम्बादित्य चक्ररूपसे स्थापन करनो, तत्व यह है कि अवतारी श्रीसुदर्शन हैं, निम्बादित्य अवतार हैं, र- गदेवी आकृति है, चक्र ताप तिनके प्रतिबिम्ब हैं,॥ ३४-४२ पर्यन्त ॥ श्रीनिवास सुदेवी हैं ॥ ४ ॥ गौतमीय तन्त्र में कयो है कि राधाकृष्णके दर्शनकों जाकी जहां जहाँ स्थिति होयं तहां तहां. ठाढ़े होके सुखपूर्वक दासी होके दर्शन करें ॥ १४॥ सुबुद्धि पहिले भगवानके दाहिने अपने गुरु राधाकृष्णात्मक राधाकृष्णस्वरूप कों स्थापन करें गुरु प्रमतत्वमय राग द्वेष जिनके नहीं ऐसे सखीरूप को ध्यान करके योगपीठपर देखैः।। ४५-४६॥ . -- (.) अथ रसानां निष्पत्तिः। (श्रीमद्भागवते तृतीयस्कन्धे) तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्दकिझल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायु। अन्तर्गतः स्वविवरण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुपामपि चित्ततन्वोः । ५०॥ व्याख्या-कृष्णस्य दक्षिणे पादेऽङ्गुष्ठे मूलतलेऽतिते । रेखात्मकाऽरविन्दस्था तुलमी हरिवद्रमः ॥ ५१ ॥ उनकी कुपासे आप सखीरूप होय गुरुकी आज्ञा से बुद्धि- मान सखीरूपसे मण्डलमें प्रवेश होय ॥ १७ ॥..या ध्येयमण्डलमें प्रवेश होवेको याके सिवाय और साधन नहीं है तासे यां पदकी प्राप्ति की चाहनावारेको गुरुसेवा ही मुख्य है ॥ ४८॥ ऐसी दीक्षा बिना गुरुकी प्रसन्नता बिना या प्रकारके धर्म विना या प्रकार को कैसे. होय अर्थात् सखीरूप कैसे होय ॥ ४९ ॥ श्रीसनकादिकनके हृदयमें पहिले पांच रस आये उनको अपने और शिष्यन के द्वारा युग युगमें प्रवर्त करें और सखीरूप से उज्ज्वलं - रस सेवन करें। रसको प्रागट्य। सनकादिक वैकुण्ठ में गये । श्रीनारायण कमलनयन के चरणकमलके पराग की मिलीभयो तुलसीमकरन्द- वायु अपने विवर अर्थात् नासिका द्वारा सनकादिकनके अन्तर. हृदयमें गयी। अक्षरसेवी अर्थात् निर्गुणमें निष्ठा- वारिन के चित्त और शरीरको क्षोभ करती भयो । आठों सात्विक प्रगद होते भये ॥ ५० ॥ व्याख्या (भाषा.)-श्रीकृष्णके दहिने चरणके अंगूठा के मूलमें कमल की रेखा तामें चढी तुलसी हरिकी तरह इसरूप है ॥ ५१॥ .
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दैन्येन स्तनरागाभ्यां लालयन्तीश्वरं पतिम् । सापत्न्येन सपत्नी स्वां नहीं
कमलालये ॥ ५२ ॥ कुकुम कासंश्लिष्टं किजकत्वेन संस्थितम् । पत्स्त-
नरागसापत्न्यैमिश्रं यत्तुलसीमधु । तद्वायुपञ्चमस्तत्र गन्धवाइरससंग्रहः ॥ ५३॥
तत्र ज्ञानेकगम्यत्वात्पदः संसर्गतो रसः । ज्ञानकगम्यविज्ञानं भिन्नवच्छान्तम
न्वभूत् ॥ ५४॥ दैन्यानुवर्तितत्वेन कुचस्य पादजोपणे । संसर्गेण रसो यश्च
दैन्यैकसाध्यदास्यता ॥ ५५ ॥ किंजल्कत्वोमेक्षितस्य. कुंकुमस्य पदांजके ।
संलालनस्वरूपत्वात्कृपानुभावतास्य च ॥५६॥ संसर्गेण रसस्येतो रंगस्य
लालनात्मनः । कृपैकसाध्यवात्सल्यतया स्वादो विभिद्यते ॥ २७ ॥ हरेवृन्दा
प्रियास्तीत्याश्वासजन्यतयास्य च ॥ सापल्यस्यसमेंऽङ्गित्वात् संसर्गाच रसस्य
तुः ॥ विश्वाससाध्यसख्यत्वेनास्वादोऽभिवताङ्गवत ॥ ५८ ॥
दैन्य से लक्ष्मीजी ने चरण स्तनपर धरे और फिर
कुचकुंकुम से चरण को लालन कियोवाही कमल स्थान
में सपत्नी लक्ष्मीके साथ तुलसी सख्यले रहै ॥ ५२ ॥
कुंकुम कमल से मिल्यो सो किजल्क है । चरण, स्तन,
राग (कुंकुम) सपत्नी. इनसे मिली तुलसी ताकी वायु
पांच रसकी भरी है ॥ ५३ ॥ तामें चरण ज्ञानसे. जानो
जाय है, सो चरणकी सुगन्धि जो तुलसी में मिलके सन-
कादिकनके हृदय में पहुंची । सो शान्त रस अनुभव करा-
वती भयो ।। ५४ ॥.लक्ष्मीजीने दास्यताके दैन्यसे चरण
स्तनपर धरे सो स्तनकी सुगन्धिने दास्यरस अनुभव क-
रायो ॥ ५५ ॥ कुचकुंकुम से. चरण लालन कियो, कुं-
कुम की सुगंध सोई किंजल्कलालनरूप कृपा. ताके संसर्ग
से वात्सल्य रसको स्वाद भेद पावतो भयो॥.५६-५७ ।।
वृन्दा हरिकी प्यारी है ताके आश्वास से और. सपत्नी ल-
क्ष्मी ताके संग विराजवे से विश्वास करके साध्य सख्यरत
अनुभव होतो भयो ॥ ५॥
- (११) तुलसीगन्धहारित्वात् कामाक्तस्य नमस्वतः ॥ संसर्गेण संस्थात्र कामेडू- ग्योज्ज्लता पृथक् ॥५२॥ इत्यधिकुचकुङ्कुममापत्न्यवायवः क्रमात् ॥ शान्ता- दिकरसानां ते निदानं पञ्चकस्य ह ॥ १० ॥ तुलसीभक्तिरेवान श्रुत्युक्तरस- रूपिणी ॥ वृन्दाभक्तिः प्रियाशक्तिः सर्वजन्तुप्रकाशिनी इति श्रुतेः ॥६१ ॥ अथ श्रीनिम्बादित्यश्लोकंसहितश्रीहरिव्यासदेवस्य रत्नाजिलिटीका- तुलसी को सुगंधि ताकी उडावनवारी कामभरी वायु सो सनकादिकन के हृदयमें पहुंची तो उज्ज्वल रस अनुभव करा- वती भयी ॥ ५९॥ या प्रकार चरण कुचकुंकुम सापल्य वायु इनसे क्रमकरके शान्तादिक पांच रसनको वीज सनका- दिकन के हृदयमें आयके शिष्यन के द्वारा प्रगट भयो। श्रुति की उक्तिसे तुलसी ही रसरूपिणी भक्ति है। वृन्दाभक्ति प्यारी शक्ति सब जन्तुको प्रकाशकरने वारी है यह श्रुति है। ये आचार्य चारों युग में चार रस प्रवर्तकरें। उज्ज्वल स- ब सेवन करें। कोई या शृंगार रसमें प्राकृतपनो मिलाय के घृणा करें हैं उनकी अज्ञानता है । श्रीभागवत में राग अनु- राग पर्यन्त दास्य सख्य वात्सल्यवारे राखे। पटरानीमहाभा- व उन्मुखपर्यन्त राखी। महाभागवत शिरोमणि उद्धवजी रूढ महाभाववारी गोपिनकी चरणरज चाहतेभये । जैसे जहाज जलमें अपने रस्ता पर चलोजाय तो औरपासकी नौका सब कम्पायमान होजाय तैसे एक रुढभाववारी के आगे सब रसवारे चकित होजायं । शुकदेवजी नंगे परमहंस जो रासपंचाध्यायी को वर्णन करैं जाकी फलस्तुति परा भक्ति के देवेवारी काम रोग जल्दी दूर करवेवारी सो प्राकृत कैसे होय ६१ ।
। १२) व्याख्या-तत्रापास्यावीशष्टेष्टदेवतायुगुलस्वरूपमनुस्मेरात-- अङ्गे तु वामे वृषभानुजां मुदा विराजमानामनुरूपमौभगाम् । सखीसहस्रः परिसेवितां सदा स्मरेम देवीं सकलेटकामदाम् ॥ अनन्तानवद्यकल्याणगुणगणस्य श्रीकृष्णस्य वामा) श्रीवृषभानुनन्दिनी वयं स्मरेम, इत्यन्वयः । कोशी 'सकलेप्टकामदाम् अभीष्टफलदां 'देवी चोत- मानां सखीगणैः सेवनस्थानस्थिताभिः परमयूथेश्वरीमिः श्रीललितारंगदेव्या- दिभिः परिसविता' सर्वतः सेवमानां अतश्चाधिकतरं 'विराजमानाम् 'अनुरु- पसौभगाम्, इति अनुरूप सौभगं यस्याः ताम् । यथोक्तं श्रीभागवत्ते-तां रूपिणी श्रियमनन्यगति निरीक्ष्य या लीलया धृततनोरनुरूपरूपां भीतः स्मयन्नलक- कुण्डलनिष्ककण्ठयक्रोल्लतिस्मतसुधां हरिरावभापे" इति ॥ यहां पर्यंत आचार्यों के सखीरूप और रस प्रवर्ग करवेकी व्याख्या भयी अब श्रीराधिकाजी के स्वरूप की व्याख्या आरम्भ करें हैं तामें पहिले श्रीमनिम्बार्क . भगवान के श्लोकसहित श्रीयुत हरिव्यासदेवजी की रत्नांजलि' टीका की व्याख्या सोई कहें-उपास्य जो श्रीकृष्ण सोई इष्टदेवता तिनको युगलस्वरूप श्रीराधा तिन- को इस निरन्तर स्मरण करें हैं। समस्त दोष करके रहित अनन्त कल्याण गुणके समूह जो श्रीकृष्ण तिनके वायें अंगमें श्रीवृषभानुनन्दिनी को हम स्मरण करें हैं अर्थात् ध्यान करें हैं। वे श्रीराधा सकलइष्ट मनोरथ की दाता है। और देवी अर्थात् प्रकाशमाना हैं । सहस्रनाम अपरिमित असंख्यान त सखीन के समूह. अपने अपने सेवाके स्थान में स्थित पर यूथनकी ईश्वरी श्रीललिता रंगदेवी आदिक वे चारों और से सेवाकरे हैं ताले अधिकतर विराजमान हैं। और श्रीक- ठणके अनुरूप अर्थात् बराबर है सौभग जिनको सोई श्रीमा: गवतमें कहा है-हरिभगवान तारूपिणी श्री अनन्यगतिको - . (१३) अत्रायमाशयः अनपापिनी भगवती श्रीः साक्षादात्मनो होरिति श्री- भागवतोक्तः श्रियो नित्याविनाभावसंवन्धः सर्वसमतः । तत्र श्रियो द्वे रूपे श्रीश्च: लक्ष्मीश्चति । तथाहि श्रुतिः-श्रीश्च ते लक्ष्मीश्व पत्न्यावहोगने पार्श्व इति ।। गन्धः द्वागं दुराध नित्यपुष्टां करीषिणीम् ॥ ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहोपाव्हये श्रियमिति ॥ तत्र या श्रीमाषभानोस्तनया या चलक्ष्मी मारुक्मिण्यादिरूपा ॥ देवत्वे देवदेहेयं मानुषत्वे च मानुषी ॥ विष्णोदेहानुरूपां च करोत्येवात्मन- स्तंनुमिति वैष्णवोक्तेः ॥ १ ॥ यां यां तनुमुपादसे भगवान् हरिरीश्वरः ॥ तां तां श्रीरप्यवशेन भगवतोऽनपायिनीति श्रीनारदोक्तेश्च ॥ २ ॥ देख के जो लीला ही करके श्रीकृष्णके अनुरूप रूप धा- रण करें प्रीतिसे मुसक्यातीभयी अलकावलि मुखपर पड़ी कंठमें धुकधुकी मुख मंद मुसक्यान. की सुधा. से शोभाय- मान तिनसे बोले । आशय यह है कि भगवती श्री अनपा- यनी, हरिआत्माकी हैं यह भागवत में लिख्यो है। श्री को हरिको नित्यभाव संबंध सवको सम्मत है। तामें श्री के दो रूप हैं। एक श्री, दूसरी लक्ष्मी, सोई श्रुतिमें लिख्यो है-श्री और लक्ष्मी दो आपकी पत्नी हैं दिन रात आप के निकटवि- राजै हैं गंध के द्वारा कोई से धर्षण करवेमें नहीं आवै। नित्य पुष्ट करवेवाली हैं । सब भूतनकी ईश्वरी ऐसी श्रीको हम बु लायें हैं। तामें जो श्री सो वृषभानकी बेटी और जो लक्ष्मी सोश्रीरुक्मिण्यादिरूपा हैं। सोई वृहद्वैष्णवमें कहा है-जवं भगवान देवता होयं तब ये देवीदेह धारण करें । और जब विष्णु मनुष्यअवतार. लेवें तबः मानुषी होया या प्रकार विष्णु के देह अनुरूप आत्माकी मूर्ति करें हैं ॥ १ ॥ और श्रीनारदजी ने भी कह्यो है-जो जो मूर्ति भगवान हरि ईश्वर ग्रहण करें हैं श्री भी भगवान की अनपायिनी सोई सोई रूप अवश्य कर के धारण करें हैं ॥२ (१४) तवं श्रीराधिकाया सर्वस्वरूपश्रेष्ठय श्रुतिप्रामाण्यात् ॥ तथाहि श्रुतिः-राधया सहितो देवो माधवेन च राधिका ॥ योऽनयोंर्भेर्दै पश्यति सस्तेर्मुक्तो न भवतीति iशा वामाङ्गे सहिता देवी राधा वृन्दावनेश्वरीति कृष्णोपनिषदि ॥४॥परमागम- चूडामणौ श्रीनारदपंचरात्रे च ॥ हरेर तनू राधा राधा मन्मथसागरा ॥ राधापना. ख्या पमानामगाधा तत्र योगिनाम् ॥५॥ पुनस्तत्रैव ।। राधया सहितं कष्णं यः पूजयति.नित्यशः ॥ भवेदभक्तिभंगवति मुक्तिस्तस्य करे स्थितेति ॥ ६॥ श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवा उभौ भक्त्या संपूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसंपद इति ॥ ७ ॥ तासे श्रुति के प्रमाणते श्रीराधिका को सब स्वरूप से श्रेष्ठता है तामें श्रुति है श्रीराधाके सहित देवमाधव और माधवके सहित राधा विराजमान हैं जो इन दोनों में भेद देखै सो जन्ममरण से मुक्त नहीं होय ॥ ३ ॥ और कृष्णउपनिषद में भी कहो है-राधा वृन्दावनेश्वरी बाम अंग में विरा0 हैं ॥ ४ ॥ श्रेष्ठ आगमों के चडा- अणि 'श्रीनारदपञ्चरात्र में भी है-हरिको आधो अंग श्रीराधा हैं। सधा मनकी. संथन करवे वाली सागर है। पद्मानामकी जो जो लक्ष्मी हैं .तिन में पद्मानाम की श्रीराधा योगिनको भी अगाधा हैं ॥५॥ और भी तहां ही- श्रीराधा सहित कृष्णको जो नित्य पूजन करै है ताकी भगवान में भक्ति होय है और मुक्ति तो ताके हाथ में 'धरी है ॥ ६ ॥ श्रीमद्भागवत में-श्री और विष्णु ये दोनों वरके दाता हैं और मनोरथ के प्रकट करवेवाले हैं जो सब संपदाकी इच्छा होय तो भक्ति करके सम्यक प्रकार इनकी पूजा -- करै ।।७।। . .
(१५) ब्रह्मवैवर्ने च-लक्ष्मी वाणी च तत्रैव जनिष्यते महामते ॥ वृषभानोस्तु स- नगा राधा श्रीमविता किलेति ॥णा वृहद्गौतमीयतन्त्रे च-देवी कृष्णसमा मोक्ता राधिका परदेवता ॥ सर्वलक्ष्मीमयी खणंकान्तिः संमोहनी परा ॥॥ ब्रह्मसंहि- तायां च-यः कृष्णः सापि राधा च या राधा कृष्ण एव सः ॥ अनयोरन्तगदर्शी संसारान विमुच्यते इति ॥ १० ॥ सम्मोहनीतन्त्रे-तस्माज्ज्योतिरभूवधा राधा- माधवरूपमित्यादि. ॥ ११ ॥ अतश्च श्रीराधिकाया एवं श्रीरूपत्वेन श्रेष्ठत्व- मिति सिद्धम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मवैवर्त में लिख्यो है-हे महामते लक्ष्मी और बाणी ये दोनों तहां ही जन्म लेयगी और वृषभानुकी बेटी जो राधा हैं सो निश्चय करके श्री होयगी ॥ ८॥ वृहद्गौतमी- तंत्र में देवी श्रीराधिका कृष्ण समान वर्णन करी हैं । सब लक्ष्मीमयी स्वर्णकांति परा संमोहनी हैं ॥ ९ ॥ ब्रह्म- संहिता में-जो कृष्ण सोई निश्चय राधा हैं । जो राधा हैं सोई निश्चय कृष्ण हैं इन दोनों में जो अन्तर देखै सो संसार से नहीं छूटै ॥ १०॥ संमोहनतन्त्र में-तस्मात् कारणात् एक ज्योति राधामाधवरूपले दो प्रकार की भयी ॥ ११ ॥ याते श्रीराधिका ही को श्रीरूप करके श्रेष्ठता सिद्ध भयो यह श्रीमहरिव्यासदेव की व्याख्या समाप्त भयो । निज व्याख्या-कवित्त । 'श्यांमजूके वाम अङ्ग सोहै राग रंग भरी, अंग अंग छवि करै शोभाको सोहावनी, कृष्णके अनुरूप सौभग अनूप जाको, मुदा विराजमान चित्त मोद उपजावनी । सखी सहस्रनत सेवित है नित्य प्रति, महाभाव उदित हिये . प्रेमामृतस्रावनी, देवी वृषभानुजा सकल इष्ट कामदा, .
.' DAN. । वित हृदर सदा सो श्याम मन भावनी ।। विना श्रीराधा के अकेले श्रीकृष्ण के स्मरण अर्चन में शास्त्र अपराध वतावै है । 'संमोहनतन्त्र में शिवजी ने कहो कि गौर तेजके विना जो श्याम तेज को अर्चन, करै- ध्यान करें है । हे शिवे! सो पातकी होय । वाने ब्रह्महत्या, सुवर्ण चुरानो इत्यादि सब पाप करलिये जो दोनों श्याम गौर तेजमें भेद करै ।। श्रीनारदपञ्चरात्र में भी है-आदि में श्रीराधिका को उच्चारण करै । पीछे श्रीकृष्ण माधवकों उच्चारण करै। जो विपरीत करैगो तो निश्चय ब्रह्महत्या के. पाप को प्राप्त होयगो । श्रीकृष्ण जगत् के तात हैं। श्रीरा- धिका माता हैं पिता से सोगुनी श्रेष्ठ माता वन्दन पूजन करवे योग्य हैं। जिन श्रीराधा के चरणकमलनखर में महा- घरको रस श्रीवृन्दावन के वनमें परा प्रेमभक्ति ले लगावते भये और श्रीराधा को चबायो पान मधुसूदन चाखते भये श्रीकृष्ण श्रीराधा में कुछ भेद नहीं जैसे दूध और धवलपनमे भेद नहीं है । यह तो साधकन को विधि भयो । और रति- क भक्तन को तो श्रीराधा के विना कृष्णा व श्रीकृष्ण विना श्रीराधा के दर्शन-अर्चन-वन्दनादि सुखदायी नहीं है । किन्तु महान् दुःखदायी है। एक क्षण दोनों को इकले १-सम्मोहनतन्त्रं-' गौरतेजो बिना यस्तु श्यामतेजः समर्चयेत् । जपेद् यो ध्यायते वारि.स सत्पातकी शिने । सब्रह्महा सुरापी च' इत्यादि। २-'नारदपञ्चराने'-सादी समुच्चरेद्राधा पश्चात् कृष्णं च माधयम्। विपरीत यदि पठेद्ब्रह्महत्यां लभेद् वयम् ॥ श्रीकृष्णोऽस्ति जगतातो जगन्माता च राधिका। पितुः शतगुणा माता वन्द्या पूज्या गरीयसी' इति । ३-यत्पादनखरे रम्ये श्रीमद्घन्दावने वने । सुस्मितालक्तकरसं प्रेम्णा भक्त्या परा ददौ ॥ राधाया मुम्नताबूलं, चंवाद मधुसूदनः । द्वयोश्चक्ये न भेदश्च अन्धधाघल्पयोर्यया ।
(१७) . नहीं देख सकें । 'श्रीराधासुधानिधि' में लिख्यो है कि श्रीराधाकी दास्थता छोड के जो गोविन्द के संग की आ शाको यत्न करें हैं सो परिपूर्ण चन्द्रमा की पूर्णमासी बिना कांक्षा करें हैं । किं च श्यामसुन्दर को रति की प्रवाह- लहरी को बीज जो श्रीराधा तिन को नहीं जानते भये; वे महा-अमृत के समुद्र को प्राप्त भये पर एक बुंद ही मिली । तासें अवश्य युगलस्वरूप स्मरणीय है । और तत्त्वं करके श्रीकृष्णको जाननो सोई है जो शक्ति सहित जानै सो आह्लादिनी महाशक्ति जो सब शक्तिन में श्रेष्ठ ताकी सारभूत अर्थात् निज स्वरूप श्रीराधा है । यह तन्त्र में लिख्यो है-जो श्रीराधाको न जान्यो तो कृष्णको जान्यो ही नहीं। 'अब श्रीराधा के श्रीपने में और भी प्रमाण दिखा हैं । कुरुक्षेत्र की यात्रामें सोलह हजार एक सो कृष्णका- न्ता द्रोपदीजी से बोली कि हे साध्वि ! हम साम्राज्यादि भोग नहीं चाहैं। इन श्रीकृष्णकी चरणकमल की रज जो वृन्दावन की श्रीके कुचकुंकुमकरके युक्त जाकी पुलिन्दी गोचारण में चाहना करें ताको मस्तकपर धारण करें । यहां भी श्रीराधा को ही वर्णन किया । राधा वृन्दावने वने' .(१) श्रीराधासुधानिधी'-'राधादास्यमपास्य यः प्रयतते गोविन्दसङ्गाशया सोऽयं पूर्णसुधारुचेः परिचयं राकां बिना फाक्षति । किन्च श्यामरतिप्रवाहलहरी जि न ये तो विदुस्ते प्राप्यापि महामृताम्बुधिमहो विन्दुं परं प्राप्नुयुः ॥ (२) तन्त्रे-आहादिनी महाशक्तिः सर्वशक्तेर्वरीयसी । तत्सारभूतराधेयमिति तंन्त्र प्रतिष्ठता, (३)श्रीमद्भागवते दशमे,न वयं साध्धि साम्राज्य स्वाराज्यं भोज्यमप्युत । वैराज्य पारष्ठयं या आनन्त्यं वो हरेः पदम् ॥ कामयामह.एतस्य श्रीमत्पादरजः श्रियः। कु- चकुङ्कुमगन्धादयं मूनी घोढुं गदाभृत । पुलिन्द्या यदूचान्छन्ति' इत्यादि ।
। (१८) या न्यायं करके रुक्मिपी लक्ष्मी रूप तो उनमें है ही और उन्हीं - कृष्णकान्ता को अर्जुन लाये । और उद्धव- जीने श्रीभागवत सुनाय के वृन्दावन में श्रीराधाकृष्ण की प्राप्ति कराई । 'ब्रह्मसंहिता' में सब गपिनको श्रीरूप वर्णन किया है श्रीराधा को तो कहनो कहा । गोलोक में कान्ता जो गोपी सो श्री है । और परम पुरुप कृष्ण सो कान्त है । जैसे सब भगवत्स्वरूप और अवतार में ब्रजेन्द्र- नन्दन रासबिहारी की श्रेष्ठता है तैसे लक्ष्मी और गोपिन में श्रीराधा श्रेष्ठ है । काहे से कि सब शची भवानी आदि स्त्रीनमें रमा उत्तम है । और गोपी रमातमा हैं । श्री- राधा गोपीतमा प्रसिद्ध ही हैं । सो श्रीराधा श्रीकृष्ण की पट्टारूढ महिषी कान्तपर आज्ञा करवेवाली उन के वाम- अङ्ग में पत्नीस्थानीय विराज हैं । तिनको विशेषण 'देवी' अर्थात् द्योतमाना कोटिशरदपूर्णचन्द्र जिनके मुखचन्द्र के आगे लज्जा करें ऐसी, प्रकाशमाना श्रीकृष्ण के हृदय समुद्र की बढावनवारी प्रेमकी लहर लेवाबनवारी अथवा द्योतमाना नाम व्यापिनी सब चराचर में श्रीकृष्ण व्यापक तिनके सर्वांग में व्यपिनी श्रीराधा है। ब्रह्माण्ड पुराणमें सोई श्रीमुख से कृष्ण ने कहा है जिह्वा में राधा, स्तुतिमें राधा, हृदय में राधा, नेत्र में राधा सर्व अंग मैं व्यापिनी राधा, में राधा १-ब्रह्मसहितायाम् श्रियः कान्ताकान्तः परमपुश्पः कल्पतरवो, दुमा भूमिश्चिन्ता- माणिगणमयी तोयममृतम् । तथा गानं नाटयं गमनमपि शी प्रियसखीचिदानन्दं: ज्योति.परमपि तदास्वाद्यमपि च.॥, २-ब्रह्माण्डपुराणे जिला राधा स्तुती राधा ने राधा हदि स्थिता । संघोङ्गव्यापिनी' राधा राधवाराध्यते मया।
+ (१६) को आराधन करौ हो । कदाचित् कहो कि आत्माराम श्रीकृष्ण ऐसे कैसे कहें । ताके लिये स्कन्दपुराणकी ४ अध्याय के माहात्म्य में लिख्यो है कि आत्मा तिनकी श्रीराधा हैं तिन के साथ रमण-करव से ठीक आत्माराम यह रहस्य के वेत्ता जाने हैं वह्मसंहिता में है-तासे तुम रमारूप आत्मा करि के रमण करतेभये तासे श्रीराधिका शक्तिवाद भी नहीं हैं। और और शक्ति जो परिकर रूप आपकी है वामेंकुछ विरोध भी नहीं है सोई 'कृष्णयामल' में लिख्यो है-जो शक्ति सम्यक वर्णन करी है वे गोपीस्वरूप होके श्रीराधिका की सखी. बनके कृष्णचन्द्रकी उपासनाकरैं हैं । और जो कहूं कहूं इनको भी शक्तिपनो सुन्योजाय है सो आकृति की समानता से अभेद को अभिप्राय है । सो ही पराये मंतको उपन्यास करके सूद्धाम्नाय तन्त्र में श्रीराधिकाके स्तवराजमें वर्णन कियो है-कोई तुम को श्री कहैं, कोई कवीन्द्र गौरी कहैं, कोई परेशी कहैं । अब आधेमें अपना मत कहैं-तुम परात्पर ब्रह्म सनातन हो । तीन गुण करके लोकन को पोषण करो हो । सो ही तीन गुण 'बृहदंगौतमीय' में लिखे हैं । (१)स्कन्दपुराणे-'मात्मा तु राधिका तस्य तयैव रमणादसौ। आत्मारामतया चाप्तः प्राच्यते गूढवेदिभिः । (२)ब्रह्मसीहतायाम्-'तत्त्वमस्या भात्मना रमया रेमें। (३)कृष्णयामल-या:शक्तयः समाख्याता गोपीरूपेण ता:पुनः । सरव्यो भूत्वा राधिकायाः कृष्णचन्दूमुपासते। (४)मूर्धाम्नायतन्त्रे- चिच्छ्यिं त्वा कतिचिञ्चगौरी परें परंशी त्रुघते कवीन्द्राः । परात्परं ब्रह्म सनातनं त्वं गुणत्रयेणैव विमर्षि लोकम. इति। . - ( २० सत्व, तत्त्व, परत्व तीन गुण को मैं निश्चय करके हूं, तैसे त्रितत्वरूपिणी श्रीराधा हैं । यह भगवानने को तामें सत्व कार्य, तत्व कारण, परत्व तासे भी न्यारो, अथवा श्रीपनेसे तदेकआश्रय होके गौरीपने से अर्धाङ्गी होके परेशीपने से तादात्म्य होके शक्तिवाद के अभिमत जो तीन गुण तिनसे लोक नाम अवान्तर उपासक को पोप- ण करो हो । चौथो स्वरूप ब्रह्म तीनो में भेरो भयो है या न्याय करके परतें परे जो ब्रह्म सो ही तुम हो । ब्रह्मात्मांपर्यायीं तुम हो। यह आत्मा ब्रह्मश्रुति में सिद्ध है । तैसे ही अथर्वणि पुरुषबोधिनी के विषय बारह वन वर्णन के प्रस्ताव में श्रुति लिखी है-तिन परब्रह्म की आद्या प्रकृति अर्थात् आद्यस्वरूप (संसिद्धि व प्रकृति) ये दोनों स्वरूप स्वभाव निसर्ग कहेजायं हैं, यह अमरकोप में है। स्वरूप को आदिपनो और अविकारी (पनो) वर्णन कियो है। प्रकृतिशब्द जो शक्तिवाचक होय तो ताकी आया यासे विरुद्ध होय ध्यान करवे योग्य है। सो कौन है ! 'राधिका मेरे नाम करके भी आराधन करवे योग्य ताते उ- नको राधा नाम पड्यो'-यह कृष्णयामल के वचन हैं । १-वृहद्गीतमाये-'सत्त्वं तत्त्रं परत्त्वं च तत्वत्रयमहं किल । त्रितत्त्वरूपिणी सापि राधिका परदेवता'-इति सत्त्वं कार्गम्, तत्त्वं कारणम, परत्वं ततोऽपि भिन्नम् । २-स्वरूपतस्तु 'तुरीयं त्रिषु सन्ततम्' इत्यादि न्यायेन परादपि (परं) यद्ब्रह्म तदेव त्वम्, परस्यात्मेति ब्रह्मात्मनों पर्यायत्वम्-'अयमात्मा ब्रह्म'. इति श्रुतिसिद्धमितिसंक्षेपः ३-तथाथणि पुरुषत्रोधिन्यां द्वादशवनवर्णनप्रस्तायें-तस्याद्या प्रकृतिः राधिका, नित्या निर्गुणा सर्वालङ्कारशोभिता प्रसन्नाशेषलावण्यसुन्दरी भस्मादादीनां जन्मदात्री ४- ससिद्धिप्रकृती विमे,' 'स्वरूपञ्च स्वभावश्च निसर्गश्च'-इत्यमरः । ५-कृष्णयामले-आराध्या मम नाम्नापि विज्ञया तेन राधिका . . . ..
(२१) अभेद विचार कर के कृष्ण शक्तिमान, राधिका शाके यह भी दूर किया ॥ नित्या अर्थात् तीन काल में एकस्वरूपा निर्गुण अर्थात् माया क गुण से रहित सर्वालङ्कार करके शोभित सव-शब्द संकोच को दूर करें हैं अर्थात् सात्विक व आ- निक अलङ्कार से शोभायमान प्रसन्ना समय लावण्यतास सुन्दरी हम सरीखन की जन्मदाता श्रुति भी है-जाके अंशांश के बहुत विष्णुरुद्रादिक होय हैं । अब शङ्का करे हैं कि-राधा भी ब्रह्म कृष्ण भी ब्रह्म दो कैसे होय ? । ताको समाधान पहिले कहि आये कि एक ज्योति रसिक भक्तन के सुख देवे को दो रूप से नायक नायिका प्रकट होते भये । परस्पर अपने अपने उचित गुण अङ्गनकार करते भये । प्रकाश-भदमें दोष नहीं है ॥ वे अलङ्कार 'मुक्ताचरित' अन्धमें श्रीरघुनाथ गोस्वामीने दिखाये हैं-महाभावस्वरूपा श्रीवृषभानु की बेटी सखीन को जो प्रणय सोही सुगन्धि को उबटनी तासे उद्वर्तित करुणामृत की लहरन से तारु- ण्यामृत की धारा तैं लावण्यामृनके जल से स्नान कगई भयी लज्जापट को वस्त्र पहिरे सौन्दर्य चन्दन से चर्चित श्यामल उज्ज्वल कस्तूरी से चित्रितकलेवर १ कम्प, २ पुल. क, ३ स्तम्भ, ४ स्वेद, ५ गद्गद, ६ रक्तता, ७ उन्माद, ८ जाड्य, ९ अश्रुइन नव रत्न करके अलङ्कार रचना को संयोग पायो. गुण अनेक सोही फूल तिनकी माला धारण करें. धीरपने को वस्त्र, ढक्यो जो मान सोही चोटी, सौभाग्य को तिलक, कृष्णनाम के कर्णफूल, रागके ताम्बूल से लाल होठ, -मस्यांशांशा मषो विष्णुरूद्रादयो भवन्ति इति श्रुतिः ।
प्यारे से लो कौटिल्य मोही कजल, प्रणय कोर की चोली, बन्धुगुप्ति के स्तन, नर्मभाव से निष्पन्द मन्द मग्ग्क्यान के कपूर से बसे भये घरमें गर्वक पल्यंक पर बैठी इत्यादिक ।। अब दूसरो विशेषण-वृषभानुजा-अथात वृषभान की बेटी श्रीवृषभानु व कीर्तिजीन अत्यन्त तपस्या करी तिन- पर कृपा करके तिनके घरमें पुत्री हाक प्रगट हाता भयीं । तन्त्रमें पुराणनमें जन्मकथा वहुत है अन्धविस्तार के भयले खोज नहीं कियो । 'राधासुधनिधि' में लियो कि जो कृपा करके वृषभानु के घर में प्रगट होती भयीं । वृषभानु, कीर्ति नित्य के माता पिता हैं उनको नप कग्नो लोकसंग्रहमात्र है। पहिले श्रीकृष्ण की तरह पोडश वर्ष किशोररूप को दर्शन दियो । फिर दम्पती के देखन उनकी रुचि अनुसार प्राकृत वालिका की तरह बैगई । आप के लोक में अवतार लेवे को प्रयोजन बहुते है सोही संक्षेप करके दिखावे हैं-राधासुधानिधि' में-जिन श्रीगधा के चरणकमल की रेणु की कणिका मस्तक पर धारण करिवेको अधिकार ब्रह्मा शिवादिक भी नहीं प्राप्त होते भये सो केवल गोपिन को एक भाव ताके आश्रय है अर्थात् गोपी होय तव मिलै । रास दर्शन कों शिवजी गोपीरूप भये तब मिली । अथवा गोपिन के आश्रय को भाव (प्रेम) की अनुगति से ताकी प्राप्ति है ऐसी भी प्रेम अमृत १-'राधासुधानिधी'-'या प्रादुरास्त कृपया वृषभानुगहे। २-'गधासुधानिधौ'-यत्पादाम्बुरुहकरंणुफाणकां सूना निधातुं नहि प्रापुब्रह्म- शिवादयेऽप्यधिगति गोप्यकभायाश्रयाः। सोऽपि प्रेमसुधारगावधिनिधी शापि साधारणभनाफालगतिकमेण पसिना हे दैव तुझ्यं नमः ॥
(२३)
की समुद्र भी श्रीराधा कालकी गति कम करके वलवान
अथात् जीवन के भाग्य बलवानता से भयीं जो कृपा
माधारणी होगई । लोक में राधा नास और उनकी
लीला सब मनुष्य सुखपूर्वक जानत भये । कृपा बिना
ऐमे अलभ्य लाभ नहीं मिलै तीस जीवन के देव नाम
भाग्य को दण्डवत है । अभिप्राय यह है कि ऊंच वृक्ष
छुवारे पर जो फल लगे और छोटे छोटे वालक चाहना
करें तो कोई रीति से नहीं मिलैं, हां जो भारी आंधी चल
जाय तो सम्भव है. तासे जाकी पदवी लक्ष्मी शुक सनक
आगम निगम मे दूर नो श्रीराधा कृपापरवश होके भूतलपर
प्राकृत मनुष्य की तरह प्रकट होती भयीं । उत्तम श्लोक
श्रीकृष्ण के गुण लीला जो मुक्त जन तृष्णारहित सनका-
दिकन को अति प्यारी और मुमुक्षूनको संसार रोग की
गोपधि और महाविपयिन को श्रवणादिक इन्द्रिय और
मनकी रमावनवारी सो बिना राधा के साहित्य नहीं होसके
मत्स्य, दागह, नृसिंह आदि भगवत अवतार लेके बारंबार
पृथ्वीपर धर्म स्थापन करें और अधर्म उच्चाटन करें । भक्त
जनन को दुःख दूर होय। गाय गाय के संसार समुद्र
तरै । पर शृङ्गार रसके उपासक रासलीला दान मान
दुलहिन दुलह के उपयोगी विहार शय्यादि निकुञ्जक्रीड़ा
के चातकवत तदैकजीवनभूत नरक खर्ग अपवर्ग निर्वाण
गतिपर्यंत को तिलाञ्जलि देनेवारे युगल किशोर रूप माधुरी
के रस में पगे नित्यप्रतिरूप माधुरी के आरोहिणी अवरोहिणी
करिवे में पलक समान काल अन्तर को युग वराबर समुहै
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(२५) उनको नृसिंहजीके महा आटोप भयंकर कगल डाड मु. खनेत्रादि से दैत्यनके वध के दर्शनमें कव सन्तोष होय, या वामन परशुराम के धरती नाप व क्षत्रियनिग्रह में का लाभ मिलै । या कारण से उन रसिकन की छा- ती विग्ह की गरमी से नरै ताके सारी करिवकों व नेत्रादि इन्द्रियन को अपूर्व सुखविधान करिवेज्ञों यही अठाईसवें मन्वन्तर अर्थात् वैवस्वत मन्वन्तर में जब पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीव्रजेन्द्रविहारी श्रीकृष्ण मधुरामण्डल अवतार लेते भये तो उन रसिकान के आंसू पों- छिकों और प्रीतम के साथ रसमयी लीला करिवेकों महाभावादि प्रेमकी सीढी जगत् में प्रज्ञा कग्वेिकों कलियुग के जीव महाकामी जिनको योगज्ञानको नास भी सुननो अञ्छो न लगै उनके चित्तको जैसे अनायार आकर्षण होय ताकेलिये आप श्रीगधा प्रगट होती भयो यद्यपि लीलारूप से सर्वदा श्रीकृष्ण के साथ हैं पर सी. शपूर्ण अब ही प्रादुर्भाव है । मानुषी आकृति से लोको अति माधुरी फैलै और अपनी जातिको जानके सबकों सब भाव से प्रीति होय ताते श्रीवृषभानु के घरमें भादों शुक्ल अष्टमी बुधवार में अनुराधा नक्षत्र में अवतार लेके प्रीतम श्रीकृष्ण के साथ वर्षभरमें जो लोकप्रसिद्ध होरी, दीपावली, वसन्त, श्रावण फूल बीनन, गसविलाल, जल- केलि, वनविहारादिकी ऐसी लीला करी कि शृङ्गार रस उज्ज्वल जो प्राकृत हाड चाम मांस के नायिका नायकमें खर्च करिव से अपनेको धिक्कारी मानतो हो ताको साफल्यता विधान करी । और कविन की वाणीपर जो
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सरस्वती ताको विश्रामस्थान भयो और श्रवणमात्र से
सब तत्पर होजाय सोही उपाय कियो । जीव कैसे बहिर्मु-
ख रहिजावै ताके लिये लीलायश को तुमल बांध दियो
और रासलीला की.तो आप ईश्वरी हैं। कार्तिक मास
में श्रीराधासहित दामोदर को अर्चन परम विधान है तो
ही पद्मपुराण में प्रमाण है-प्रातः उत्थापनमें लिखी है
हे राधे! उठो उठो निद्रा छोड़ो तुम रालेश्वरी हरिकी प्यारी
हो, महादेवी दामोदर की वल्लभा हो सोही कोई कविने
श्रीकृष्ण से कहो-
सवैया।
'सूकर द्वै कब रास रच्यो तुम बावन कै कब गोपी नचाई,
बै नरसिंह को हरिजू तुम कौनकि छतियन रेख लगाई।
कर तुम मीन द्वै केश सवारे कूर्म भये कब वेणु बजाई,
वृषभानुसुता प्रगटी जबतें तवतें तुम कैलिकलानिधि पाई।
अब तीसरो विशेषण कहैं 'मुदा विराजमाना' अथात्
हर्षपूर्वक विशेषेण राजमाना इन शब्दों से स्वतन्त्रता दरसे
है। खाधीन कान्ता है पराधीन कान्त है। और भी श्रील-.
क्ष्मी-जानकी-रुक्मिणी-स्वरूपभूता सच्चिदानन्द शक्ति
गभवान की पत्नीस्थानीय हैं । पर वे सब पतिव्रता भर्ता
के आधीन हैं श्रीराधा खाधानभर्तृका वश्यप्रेष्ठा हैं. ताले
श्रीकृष्ण को उनके चरणस्पर्श पीछे पीछे डोलनो, उनके
कटाक्षशर से मूर्छित होजानो, अधरामृत लेनो अनुचित
नहीं है । यामें अनेक शास्त्रके प्रमाण महानसिक भक्तनके
(२) 'पद्मपुराणे-'उत्तिष्ठति भो राधे स्पज निद्रां हरिप्रिये । रासेश्वरि महादेवि
श्रीदामोदरपल्लमें।
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(२६)
आचरण दिखावे हैं। कोई या रसमय प्रकरणके अनभिज्ञ
(न जानेनवाले) नाँक भौह सिकोड़ें ताको पहिले ही समा-
धान सुनलेव कि जब श्रीकृष्ण राधाकी आत्मा व श्रीराधा
श्रीकृष्ण की आत्मा हैं तो परस्पर नति अथवा कुछ करें
सब उचित है । दूसरे लोक में रीति हैकि जो कोई के सङ्ग
अत्यन्त उपकार कर और दूसरे से बने नहीं तो सर्वदा ताके
आधीन म्है । तासे महाभावस्वरूपा श्रीराधा को आपने ही
श्रीमुख से वर्णन करी है कि कृष्णप्रेममयी राधा में राधाको
आराधन करौं हो' उनके प्रेमके आगे श्रीकृष्ण बिकि गये हैं
सो आगे के प्रसंग में वर्णन करेंगे। श्रीराधिका को कृष्ण में
मदीयतामय भाव मधुस्नेह अर्थात् कृष्ण हमारौ है फिर मोल
बिके भयले जो कराया जाय सो अनुचित नहीं है सो आप ही
करें। तीसरे जैसे आत्माराम मुनि शुक सनकादिक जिनकी
जड चतन की ग्रन्थि न्यारी भयो, मायारहित भगवान में
अहेतुकी अर्थात् कामनाशून्य भक्ति करें हैं काहे से कि हरि
भगवान के गुण ऐसे ही हैं । तैसे आत्माराम भगवान् भी
श्रीराधा तो बहुत. बात है व्रजकिशोरीमात्रके गुण से
आकर्षित उनमें भक्ति करैं हैं । चौथा मुख्य प्रयोजन यह
है कि श्रीराधा कृष्णको यह अवतार शृङ्गार रस की अत्यन्त
पुष्टि करवे के लिये है। उज्ज्वल रसराज है सच्चिदानन्द
भगवत्वरूप है । श्रुतिमें भी है-रस निश्चय करके सो
१'ब्रह्माण्डपुराणे'-'राधा कृष्णामिफा नित्यं कृष्णो राधात्मको ध्रुवम्'-इति ।
२-'कृष्णप्रेममयी राधा राधधाराध्यते मया' इति।
३-'श्रीभागवते'-'आत्मारामाश्च सुनयो निग्रंन्धायोऽधुरुक्रमे । कुर्वन्त्यहेतुकि
भक्तिमित्थंभूतगुणों हरिः॥
४-श्रुतिः रसो वै सः रसं शेषाय लगमानन्दी भवति-पति,।
(२७) है' यह जीन रस को पाय के आनन्दी होय है ऐसे अप्रा. कृत रस की प्राकृत नायक नायिका से कब पूर्ति होगी । श्रीराधाकृष्णमें ही घटै है । और रसकी पुष्टि होवेमें नायिका की प्रधानता नायक की आधीनता अवश्य ही चाहिये । लोकमें भी रीति है कि विवाहांदिके समय दुल- हिन को जुवामें जितावनो, ताको जूंठो दुलह को खवावनो चरण छुआवनो, यह व्यवहार सबको सम्मत है । और रसिकन को तो प्राणतुल्य जीवनमूल है तासे श्रीराधा नायिकानमें मुकुटमणि, श्रीकृष्ण नायकशिरोमाण उनमें ही यथार्थ या भावकी शोभा है । भला श्रीकृष्णको ऐने आचरण में कुछ स्वरूपकी हानि अथवा अरुचि होय सो नहीं किन्तु भूषण है, और अति सुखदायी है । काहे से कि चारप्रकार के नायक धीरउदात्त आदिमें धीरललित नायक श्रीकृष्ण हैं । ताके. ये लक्षण हैं -विदग्ध होय, नई तरुणाई होय, परिहाममें निपुण होप, कोई प्रकार की चिन्ता न होय, 'धीरललित होय सो प्रायः करके प्यारी के वश होय है । प्यारी के वश होवेसे ही उत्तम नायकपनो सिद्ध होय है । अब प्रमाण या प्रकरण के भाषामें रसिकन के अनुभव बाणी की तो बड़ी धूमधाम की नदियां लहग- वें हैं तैसे ही संस्कृत के सद्ग्रन्थन में भी बहुत प्रमाण हैं दिङ्- मात्र देखो-रसोदधि' निष्पक्ष ग्रन्थ-सीत्कार संज्ञा से जाके अभिमुख होय और प्यारो निरन्तर जाके पीछे पीछे -विदग्धो नवतारुण्यः परिहासविशारदः । निश्चिन्तो ललितो. धीरेः प्रायः स्यात् प्रेयसीवश'। २-रसादधी'-'सीत्कारसंशाभिमुखो यस्याः सततं प्रियो भवेदनुगः । पश्यप्रेडा सोका नजरमणीमण्डनं यथा राधा' इति । .. " (२८) डोलै ताको नाम वश्यप्रेष्ठा (प्यारो जाके वश) ब्रजरम- णीन में जैसे राधा। पंद्यावली में-कमलनेत्र को दण्डवत्' वेणुबजैया विनोदीकों दण्डवत् और राधा अधरपान ख- भाववारे वनमालीकों दण्डवत् । गीतगोविन्द' में श्रीमुख वचन-मदन की अनल मेरे मानसकों निरन्तर जरावै है शीघ्र मधु अधर पान करावो । 'श्रीमद्भागवत' में कोई रास करते २ थक गई. कृष्ण पास में ठाडे कुण्डल की कान्ति से शोभायमान जो कपोल तिन से कपोल जो मिलायं रही चर्वित पान अपनो ताको भगवान देते भये किं ताको लेते भये । 'राधासुधानिधि, में-जिन श्रीराधाके कटाक्ष रूपी बान लगवे से श्रीकृष्ण के हाथ से वेणु गिरपड़ी,मुकुट खिसल गयो, मूर्छा होगई तिन श्रीराधा की रससे परि- चर्या कब करौंगी । श्रीमद्भागवत में-रात करतअन्तर्धान होके जब प्रगट भये तब 'एका नाम श्रीराधा मुख्या दोनों भौंहको जोड़के मानों कमान बनाई, प्रेमके कोप से विह्व- ल कटाक्ष को आक्षेप सोही बाण दांतन से होठ दाबे सोई चुटकी श्रीकृष्णपर मारती सरीखी देखती भयी और आप मिलवेको नहीं गई सोई हमारे पास आयके मिलै- गों ॥ सूरदासजी ने भी कह्यो है- ५-'पद्यावली-'नमो नलिननेत्राय वेणुवाद्यविनोदिने । राधाधरसुधापान शानिने बनमालिन' इति । २-गीतगोविन्दे'-'सपदि मदनानलो दहति मम मानसं देहि मुखकमलमधुपां- मम्' इति । ३-'श्रीमद्भागवते-कस्याश्चिन्नास्यविक्षिप्तकुण्डलविषमण्डितम् । गण्डं गाटे संदधत्याः प्रादात्ताम्बलचर्वितम् ॥ ४-,श्रीमद्भागवते' एका भ्रुटिमांवध्य मेमसंरम्भाविहला मन्तीपेक्षत्कटाक्षेपः संबध्दशनच्छदा .
..
(२६)
चितई चपल नयन की कोर ॥
मनमथ बाण दुसह अनियारे,
निकसे फूट हिये बहि ओर ॥
कहुं मुरली कहुं मुकट मनोहर,
कहुं पट कहूं चन्द्रिका मोर ॥
मुरछि परे सुध देह बिसारी,
तरुण तमाल पवनके जोर ॥
प्रेम सलिल भीज्यो पीरो पट,
फट्यो निचोरत अचरा छोर ॥
इत्यादि ।
महामर्यादास्थापक श्रीमत्प्रभु निम्बार्क भगवान ने
'प्रातःस्तव' में लिख्यो है-प्रातःकाल वृषभानुकी सुताके
चरण कमल स्मरण करौं हों जिनको बसुन्दरीन के ने-
त्ररूपी भौरा चारों ओर सेवन करें। और व्रजेश (नन्द) के
बेटा हरि (श्रीकृष्ण) जो बहुत ही चतुर सो प्रेमसे आतुर
होके जिन चरण में सदा वन्दन करें। और राधाष्टक' में
वर्णन है-मुकुन्द को तुमने प्रेमडोरसे बांधलियो सो पतंग
जैसे डोरके वश तैसे तुझारे पीछे पीछे भ्रमैं है ॥ रसिकमु-
कुटमणि श्रीभट्टजी के युगलशतक को पद है-
राधेजूके चरण पलोटत मोहना ॥
नील कमल के दलन लपेटे,
अरुण कमलदल सोहना ।।
१-'प्रातः स्तव-प्रातः स्मरामि वृषभानुसुतापदाव्ज नेत्रालिभिः परिनुतं पूजसु-
दरीणाम् । प्रेमातुरेण हरिणा सुविशारदेन श्रीमद्वजेशतनयन सदाभिन्द्यम,
२-राधाष्टके-'मुकुन्दस्त्वया प्रेमडोरण बद्धःपतङ्गो यथा त्वामनुभ्राम्यमाणः ।
(३०) कबहुंक ल लै हगन लगावत; अलि धावत जिम गोहना। श्रीभट्टके प्रभु छबीली राधे, होत जगेते छोह ना अब सब प्रमाण से ऊपर साक्षात् भगवत् हाथके अक्षर सुनो-सब जगतमें विख्यात है कि श्रीजयदेवकृत 'गीत- गोविन्द' जैसो हरिको प्यारो है पण्डितन के समाजमें परी- क्षाके समय एक एक पत्रा श्रीजगन्नाथ की छाती से लग्यो पायो । मानके प्रसंग की अष्टपदी लिखते लिखते जब सीस चरणनपर धरनो लिखवे लगे तब लोकविश्वासके अर्थ आप न लिखके 'किंदुबिल्वग्राम' अपने निवासस्थान से गङ्गास्नान को चले गये। 'पद्मावती' जी पतिव्रता रसोई करके बाटदेखें । श्रीजगन्नाथजी जयदेवरूपसे प्रगट होके वा अष्टपदी में इतनो लिखगये-'कामगरलको खण्डन करवेवारो मेरे सीस को मण्डन पदपल्लव देव' पीछे रसोई पाय के चलेगये । पद्मावतीजी के प्रसाद लिये पीछे जय- देवजी आये समाचार समुझ के हर्ष विस्मयं को प्राप्त भये जब स्वतन्त्र ही लिखगये। अब विशेष का प्रमाण चाहिये। अब चौथो विशेषण श्रीकृष्ण के अनुरूप नाम बराबर है सौभग जिनको ऐश्वर्य, माधुर्य, रूप, गुण, लावण्य, सौन्द- र्य, सौकुमार्य सबमें श्रीकृष्ण के समान है। अथवा अनु- रूप को अर्थ उनके उचित-वे श्याम ये इयामा, जबकि एक ज्योति ही दो प्रकार की भई तब दोनों पुरुष होवेसे १- गीतगोविन्द स्मरगरल खण्डन मम शिरसि मण्डनं देहि पदपल्लघमुदारम् । उपलति मयि दक्षिणों मदनकदनानली हरतुमदुपाहितधिकारम् । इति ।
(३१) शोभा नहीं, दोनों स्त्री होवेसे सुख नहीं। तासे एक पुरुष एक स्त्री एक सांवरो एक गौरी एक पति एक पत्नी । ऐश्वर्य में एक देव एक देवीं । माधुर्य में एक गोप एक गोपी । नायक पनेके जो गुण जैसी आकृति जैसी लीला चाहिये उनने अपने स्वरूप में धरलिये। नायिकापने के सब गुण लक्षण उनने अपने स्वरूप में धरलिये। कोई जो शुकदेवजी के हृदयरहस्य नहीं जानै वे ऐसे कहैं हैं श्रीमद्भागवत' कृष्ण- लीलाप्रधान तामें श्रीराधा को नाम ही नहीं है सो ठीकही है । शुकदेवजी की रहस्य वस्तु परम इष्ट गोपनीय ताको. छिपावनो योग्य पर जैसे धनिक के पास अमोल मणि, सोनाहो ताको दुष्ट निकृष्ट चौरादिकन से छिपावनों भी चाहे पर अमूल्य वस्तु होवे को हर्ष आपही प्रगट करदेय है । झीने वस्त्र में ढकीहुई मणि जैसे गुप्त प्रगट दोनों रीति दिखावै 'तैसे कोई जन को राधा नाम गुण न दखैि और अधिकारी सष्ट देखलेय ! ऐसो शुकदेवजी को इन्द्रजाल है और भी रहस्य है कि दुलहिन को नाम पंचायत में न लियो जानो उक्ति से संज्ञा करी जानी यह रसपोषक है। यहां भी श्रीमदाचार्य ने राधा' नाम न लेके वृषभानु जा ही कह्यो । 'भक्तमाल' में मुख्य नाम लेवेके स्थल में श्रीनाभा गोस्वामी ने वृषभानुकुंवरि ही वर्णन कियो। अब रासलीला की 'श्रीभागवत' में परिपाटी मेरे नेत्रन से देखो जा समय वंशी बजाय के रासविहारी वनवारी ने अपनी प्राणप्यारी बुलाई और सब गौरी भौरी किशों- री वंशीशब्द सुधामादक से छकीभयी मोहिनीमन्त्र की -
और अन्य
(३२)
कीलीभयों लोकलाज धर्मसमाज को तिलजल प्रदान कर
चन्द्रमा की चांदनी को प्रकाश, जाती जुही फूलन को
विकास कानन अतिशय सुवास, शरद मास, यमुनाजी
की शीतल मन्द सुगन्ध पवन को चलन ऐसे श्रीवृन्दावन
में आय के प्राणपति के दर्शन किये पहिले परस्पर बोली
ठोली में बुद्धि चतुराई की राशि भई । फिर नृत्यआरम्भ
भयो । वैजयन्ती माला धारण करके जा.समय अपनो
श्रीअंग मरकत मणि सदृश प्यारी सुवर्ण गुटका सदृश
तिनको मण्डल वांधके श्रीवृन्दावन के प्रदेश को माला
पहिरावते भये । और सव को समान सुख देते भये । ता
समय श्रीराधा को उत्कर्ष न होवे से अनादर,
सर्वन को प्यारी की समानता से गर्व तासे मान भयों
(ता गोपी साधारण एक शेष करके 'तासाम्') गोपिन को
सौभाग्य को मद देख के, मानवती वृषभानुनन्दिनी कों
देखके तिनको मद दूर करिबेको प्यारी को प्रसन्न करने को
प्यारी को लेके गोपिन छोड़के अन्तर्धान होगये सोई
स्पष्ट 'गीतगोविन्द' में जयदेवजीने वर्णन कियो है-कसके
वैरी भी संसारवासनाकी शृङ्खला में बंधी भयो राधा को
हृदय में लेके अंतर्धान होते भये' फिर विरहव्याकुल. सब
१-श्रीभागवते-तासांतत्सभिगमदं वीक्ष्य मानं च केशवः प्रशमाय प्रसादाय
तत्रवान्तरधीयत । ताश्च सा चेत्येकशेषेण 'तास व्रजकिशोरीणां तस्या वृपभानु-
कुमार्याश्चेत्यर्थः तासां सौभगमदं प्रशमयितुं तां मानिनी प्रसादयितुम् ॥
२-गीतगोविन्दे-'कंसारिरपि संसारवासनावद्धलालसाम् । राधामाधाय हृदये
तत्याज ब्रजमुन्दरीः!
(३३) गोपी ढूंढती भयौं । वनके उद्देश में श्रीकृष्ण के चरण- चिह्न देखती भयीं । ताके परे वधूके चरणचिह्न से मिले भये- देखे । वे चरणचिह्न जैसे बायें चरणके अंगूठा के मूल में यव ? ताके नीचे चक्र २ ताके नीचे छत्र ३ ताके नीचे वलयं ४ बांके परे अँगूठा व तर्जनी की सन्धिसे लेके आधे चरण पर्यन्त ऊर्द्ध रेखा ५ बीचकी अङ्गुलिके नीचे कमल ६ ता- के नीचे पताका सहित ध्वजा ७ ताके नीचे वल्ली. फूल ९ कनिष्ठा के तले अंकुश १० एडीमें अर्द्ध चन्द्र ११ ये दाहि- ने चरणमें अँगूठा के मूलमें शङ्ख १ ताके नीचे गदा २ कनिष्ठाके नीचे वेदी ३ ताके तले कुण्डल ४ ताके नीचे शक्ति ५ तर्जनी अगुली तले पर्वत ६ पर्वतके नीचे रथ ७ एडीमें मत्स्य. ८ ये सब १९ चिह्नकी चरणरेखा देख दुःखि- त होके बोलती भयीं ये कौनके चरण चिह्न हैं जो नन्दके बेटांके कंधेपर प्रकोष्ठ धरकेगई जैसे हथिनी हाथीके संग । अब यहां तीन प्रकार के गोपीन के वाक्य हैं-पहिले सपक्षा अर्थात् राधाकी पक्षवारी, भगवान् हरि ईश्वर याही करके आराधित भये अथवा वशीभूत भये । जा कारण सबको छोड़के गोविन्द प्रसन्न होके ताको एकान्त में लेगये। अथवा विपक्षवारीन से संबोधन देके कहें हैं-हे अनयाः! अर्थात् नीति नहीं जानो भगवान हरि ईश्वर राधाको प्राप्त १-श्रीमद्भागवत-वध्वाः पदैः सुप्रतानि विलोक्यार्ताः समनुवन् । स्-श्रीमद्भागवते-कस्याः पदानि चैतानि याताया नन्दसूनुना । असन्यस्तप्रकोष्ठाया: करणोः फरिणाः यथा ॥ - ३-श्रीमद्भागवते-अनयाराधितो नूनं भगवान् हरिरीश्वरः । यन्नो विहाय गाधिन्दा प्रीतो या मनयद्रहः ॥ नूनम् अयं हरिः 'राधित राधाम इता-शफन्ध्वादित्वात पररूपम् । राधयति आराध्यते वा राधा। .. ..
. ष्ण से . (३४) भये आराधन करैं अथवा कृष्ण जा करके वाञ्छापूर्तिरूपः आराधना से आराधित भये तासे राधा नाम भयो । शुकदेवजी के मुख से युक्ति से नाम निकरो । 'ब्रह्मवैवर्त' में स्पष्टं लिखो है । 'राधासुधानिधि में या नामको विव- रण सुनो-जो श्रीराधा प्रौढ अनुराग क उत्सव से ब्रजके. मणि.प्यारेको आराधन करै । जाके आश्रयमात्र से श्रीक- सख्यभाव की उत्कण्ठा करनवारे सिद्ध होजायं। और सबके आराधन के अन्त में जो एक रसवती पर- मा सिद्धि सो श्रीराधा श्रुतिन की मस्तकशेखरलतानाम्नी मेरे ऊपर प्रसन्न होयं । या श्लोक में अनेक. विभक्ति रा- धानामकी हैं। राध,साध, धातु ससिद्धि के विषय हैं कृष्ण को आराधन करें वशी करें सो राधा यह प्रथमा विभक्ति, सखा जाके सकाशात से सिद्ध होय यह पञ्चमी, ज़ा क- रके हरि साराधन कियेगये यह तृतीया, जाके विषय सब सिद्धि यह सप्तमी विभक्ति वेदशिरोमङ्गल-भूषणापीड़ लताकूप. नाम की जो श्रुति तिनकी शेखर नाम स्वामिनी; सारस्वत कल्प में श्रुति गोपी भयीं और सब गोपीन की स्वामिनी श्रीराधा हैं । बजनवतरुणिकदम्ब मुकुटमणि राधा यह श्री हरवंश गोस्वामीने करो यह हरलाल व्यास- निर्गुण ब्रह्मको वाक्य से. १-'राधासुधानिधौ-या पा.राधयति प्रियं व्रजमाणि. प्रौढानुरागोत्सवैः संसि- ध्यन्ति यदाश्रयण हि परं गोविन्दसख्युत्सुकाः । यसिद्धिः परमा. पदेफरसवत्यास- धनान्ते न सा श्रीराधा श्रुतिमौलिशेखरलतानासनी मम प्रीयताम् ॥ राधसाध सं-: सिधौ धातुः अकर्मको दिवादिगणः राधयतिप्रियमिति राधा साधयति घशीफरो- ति वा प्रथमा, गोविन्दसख्युस्थुत्सुफा, यस्या राध्यन्ति सिध्यन्ति-पश्चमी रायतें 'अनया तृतीया' या परमा सिटि स्तदा राध्यति अस्यामिति सप्तम ।।.. की टीका है । जो श्रुति लगुण - (३५) प्रतिपादन करें सो मूर्तिमती होके श्रीराधा की चरणसेवा करें। और भी महिमा लिखी है-जो राधा-नाम जप कर- वेते.गोकुलपति आकर्षण होजाय, जा राधा-नाम के आ- गे समस्त पुरुषार्थ में तुच्छता घटै, जा नामको मन्त्र प्रा- तिस माधव आप जप, वे राधा नामके अद्भुत वर्णद्वय मेरे हृदय में स्फुरित होयं । और भी श्रीमुखके वाक्य हैं। राधा को रकार उच्चारण करै ताको उत्तम भक्तिं दैदेव और जब धकार उच्चारण करै तो सुनवेके लालचसे मैं पीछे पीछे डालों हों। यह राधा-नाम की महिमा कही ।। अव तटस्था नाम मध्यकी बोली-अहो आलियो ! ये गोविन्दके चरणकमलकी रेणु धन्य है जाको ब्रह्मा म- हादेव रमादेवी पाप दूर करवेको. मस्तकपर धरै ॥ विपक्षा बोली-ताके ये चरण हमको अतिक्षोभ करै हैं जो एकली गोपिन को भाग हरके अच्युत को अधरा- मृत एकान्त में भोग है । अब आगे शुकदेवजी गोपिन- के ही मुखसों सौभाग्य वर्णन करावें हैं। एक बोली- निश्चय करके अन्यत्र वधूके चरण -नहीं दीखें हैं । कोमल १-'राधासुधानिधौ-यज्जप्त सकृदेव गोकुलपतेराकर्षकै तत्क्षणायन प्रेमवतां समस्तपुरुषार्थेषु स्फुरतुच्छता । यन्नामाङ्कितमन्त्रजापनपरः प्रीत्या स्वयं माधवः श्रीकृष्णोऽपि तदद्भुतं स्फुरतुं मे राधेति वर्णद्वयम् ॥ इति । २-'ब्रह्मवैवर्ते-रा-शब्दं कुर्वते राधा ददानि भक्तिमुत्तमाम् । धा-मान्द कुर्वतः पश्चाद् व्रजामि श्रवणलोभित। ... ३-४श्रीमद्भागवते-'धन्यां अहो अमी आल्यो गोविन्दाध्यूब्जरेणवः । यान् ब्रम्हेशो रमादेवी दयुद्धयंघनुत्तये ॥ तत्रैव-'तस्या अमान नः क्षोभ कुर्वन्त्युच्चैः पदानि यत् । एकापहृत्य गोपीनां रहो मुङ्क्तेऽच्युताधरम् । .:५-न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या. नूनं तृणाकुरी- । खिद्यत्सुजाताडूम्रत लामुन्निन्ये प्रेयसी प्रिया ॥
। (३६) चरण तृण अङ्कुर करके खेदको प्राप्त भये, प्यारे ने अति- शय प्यारी को गोदलीनी। आग बोली-यहां प्यारे ने प्यारी अर्थ फूल बीने तासे एडी के नीचे चिन्ह नहीं हैं। यहां कामीने कामिनीके केश सँवारे और चोटीमें फूल गूंथे । यहां निश्चय बैठे हैं। अब शुकदेवजी कहैं-आत्माराम आ- त्मरत ताके संग अखण्डित विहार करते भये । 'रेमे' क्रिया आत्मनेपद है अपने सुखके अर्थ विहार कियो । यह एक रात्रिके उपलक्षण से सदा सदा को विहार है। फिर वे ईर्षाभरी गोपी बोली-का वही बडी प्रेमवारी है जो हमको छोड़के वाको संग लेगये । भगवान् प्यारीको अपनें में प्रेमकी अधिकता दिखायबेको विचार करते भये कि मेरे से भले ही घड़ी दो घड़ी को वियोग होजाय पर यह जताऊं कि हां तुम भी मेरे विरह में व्याकुल फिरोहो पर इनकी किंचित् वियोग में का दशा होय है या कौतुक के अर्थ प्यारीके नजर ओद होगये । वस्तुतः वहां ही रहे वियोग होते ही 'हा नाथ! हा रमानाथ! कहां हो कहां हो हे महाभुज! हे सखे! मोकों दर्शन देव' ऐसें कहिके मूञ्छि- त होगयी । वे गोपी ढूंढती भयी आई । प्यारीको गोदमें ले दशा देख अचम्भे में रह गई । फिर सब गोपिन को, विरहव्याकुल देखके आप प्रगट होके अपनो अपराध क्षमा करावते भये । कोई ऐसे शंका करें कि ऐसी प्यारी गोपि- १-अत्र प्रसूनावचयः प्रियार्थ-प्रेयसा कृतः । प्रपदाक्रमणे एते पश्यता सफले पदे। २-भागवत-फेशप्रसाधनं त्वन्न कामिन्याः कामिना कृतम् ।तानि चूडयता कान्ताव मुपविष्टामिह ध्रुवम् ॥ ३-तत्रैव रेमेन्तया चात्मरत आत्मारामोऽप्यस्खण्डितः । कामिनां दर्शयन्दैत्य स्त्रीणां चैव दुरात्मताम् ॥
(३७) न को छोडके अन्तर्धान होके कैसे कष्ट दियो और मथुरा कैसे गये । सो रोसमें अन्तर्धान होवे को यह कारण वर्ण- न किया और उनके प्रेमकी ध्वजा फहरायवे के अर्थ कि ऐसे कष्टमें भी मोको नहीं छोडै, उनको जितायके आप महाऋणी होते भये । और नित्य उनके पास रहिके भी आभासमात्र जो मथुरा गयेको विरह दिखायो सोभी यह ही प्रयोजन (कि) विरह भक्ति प्रकट करवे के लिये । इतनो श्रीराधाके सौभाग्य को चरित्र 'भागवत' में वर्णित है। शुकदेवजी श्रीराधा की सखी हैं । वे अपनी स्वामिनी को- चरित्र कैसे न 'वर्णन करें । 'समोहनी तन्त्र' में लिख्यो है- पहिले कल्पमें व्यासजी दीर्घतपा नाम के मुनि होते भये तिन के पुत्र को मुनि ने 'शुक' नाम धस्यो । काहे से कि जन्म लेते ही बालक जब उनको पढावे तो कृष्णनाम अङ्कित श्लोक स्पष्ट सुन्दर उच्चारण करें। यह आश्चर्य १-संमोहना तन्ने'-मुनिर्दीघतपा 'नाम व्यासोऽभूत्पूर्वकल्पके । तत्पुत्रः शुफ इत्याख्या लेभे मुनिवरैः कृताम् ॥ जातमात्रस्तु. यो वालैः पाठ्यमानस्तदाश्रमे । ध्यकमन्ववदत श्लोक कृष्णनामाडिन्तं शुभम् ॥ तदाश्चर्य समालोक्य सर्वे संजातवि स्मयाः। शुक इत्येव तं प्रोचुः शुवत्पठितं यतः ॥ सोऽपि चालो महाप्राशस्तदेवानु स्मरन्, पदम् । विहाय पितृमानादि कृष्णं ध्यात्वा धनं गतः ॥ स तत्र मानसर्दिव्यरुप चाररहर्निशम् । अनाहारोचयद् विष्णु, गोपरूपिणंमीश्वरम ॥ रमया पुरित मन्त्र जपनष्टादशाक्षरम् । दध्या परमभावने हरि- हेमतरोरधः सकल्पान्ते. तनुं त्यक्त्वा गोकुलेऽभून्महात्मनः उपनन्दस्य. दुहिता नीलोत्पलदलच्छविः । सेयं श्रीकृष्णदयिता पातशाट परिच्छदा ॥ रक्तचोलफया छन्ना शातकुंभघटस्तनीङ्ग- वधांनी रक्तसिन्दूरसागस्याघकुंठिनी ॥ कर्णकुण्डलनिर्भातगडदेशा शुभाननास्वर्ण, पंकजमालायां कुंकुमालिप्तसुस्तनी ॥ यस्या हस्ते.नवंशीयं दृश्यते हरिणार्विता ॥ वेणुवाद्यतिनिपुणा केशवस्यातितोषणी ॥ कृष्णेन चातितुष्टेन कदाचिग्रानपूरणे ॥ विन्यस्यां कम्बुकण्ठेऽस्या भाति गुजाधली शुभा ॥ . परोक्षे चापि कृष्णस्य कृष्णकान्तास्मरादिता सखीमिययन्तीमिर्गायन्ती सुस्वर स्ययम वर्तत्प्रियवेषेण वेषयित्वा वधूमिमाम् ॥वार चार चंगोविदं भावनालिग्य चुम्बति मियासी सर्वगोपीनां कृष्णस्याप्यतिवल्लमा । .. - -- (३८) देखके सवको विस्मय भयो । तोता की तरह पढ़ें तासे शुकनाल सव बोलते भये सो वालक महाबुद्धिमान वही पद को स्मरण करत कृष्ण को ध्यान करके माता पिताको छोड बनमें गयो । तहां सुन्दर दिव्य मानसी उपचार से विना भोजन दिन रात गोपरूप ईश्वर विष्णु को अर्चन करते भये । रमापुटित अष्टादशाक्षर मन्त्र जपके सुवर्ण के वृक्षके नीचे परम भावलें हरिको ध्यान करते भये । सो कल्पके अन्त में तन त्याग करके गोकुलके उपनन्द के घरमें तिनकी बेटी होते भये । नील कमलदल की छविवत् अङ्गकी कान्ति भयी तो यह श्रीकृष्णको प्यारी पीरी शाटी लालचोली पहिरे सुवर्ण के घट समान स्तन लाल सिन्दूर धा- रण करें कानन में कुण्डल कपोलन पर झाई जिनकी सोनेके कमल की माला पहिरे कुंकुमालित विराजे हैं। जाके हाथ में हरिने वसी दीनी वेणु बजायके हरिकों तो- पण करे, जब गान पूर्ण बैगयो तव कृष्णने अति प्यार से कण्ठ की गुजावली याके कण्ठ पहिराई सों प्रकासे हैं। कृष्ण जब पास न होय तव कृष्णकान्ता कामकी पीडित जब इनले गवावै तब सुन्दर स्वरसे कृष्णगुण गावैं और श्याम रूप के कारण से कृष्ण वेष सजायके इनको नचा और इनकों गोविन्द के सांवरे भाव करिके आलिङ्गन करें चुवन करें तासे ये सव गोपिन की प्यारी और कृष्णकी अतिवल्लभा हैं। अब पांचवों विशेषण सखीसहस्र नाम हजारन अ- नगिनती सब और से लदा सेवा करें तामें सहस्रपत्र को जामें विस्तार ऐसे कमलाकार वृन्दावन में अपने अधिका- र तें मुख्य सखीन को पृथक् २ दल दल में ध्यान करै । 4 (३६) वृन्दाभक्ति प्यारी शक्ति सव जन्तुकी प्रकाश करववारी ये श्रुति है-वृन्दाके भक्तिरूपतासे सब यूथन में रहनवारी ता- की उपकृति की गोचर हैं । पहिले पूर्व कर्णिका में श्रीलन लितादेवी राधिका की प्यारी सखी को चिन्तवन करै । विशोक शारदीकी बेटी गोरोचन की सी अङ्गन की कान्तिं मोरपंखवत् वस्त्र प्रसन्नमुख सन्धि केलिमें निपुण प्रखरा चारु बोलनवारी दिन रात हित की चाहनवारी बीड़ी की सेवा करें तिनको चिन्तवन करै इनकी आज्ञा उठावनवारी मुख्य सखी अपनी क्रियाके आश्रयवारी हैं तिनके नाम १ रत्नप्रभा, २ रतिकला, ३ शुभा, ४ भद्रसौरभा, ५ सुमु. खी, ६ मन्मथामोदा, ७ कलहसी, ८ कलापिनी, इनको, ध्यान करै ॥ १-'मुधर्माध्यबोधे- स्वाधिकारात्सखामुख्या ध्यायेदलेदले पृथक । सहस्रपत्रावस्तासे वृन्दावन कक्षाकृतौ ॥ वृन्दा भाक्तिः प्रियाशातः सर्व ज- न्तुमकाशिनी । इति श्रुतेश्च वृन्दाया भक्तिरूपतयाखिलाः । पारम्पश्चि- यूथस्थास्तदुपकृतिगोचराः ॥ विशोकशारदीपुत्री प्रखरां चाटुवादिनीम् ॥ गोरोचनरुक् चार्वाभां केकिपिच्छाभवाससम् । पुरःस्थितां प्रसन्नास्यां सन्धि- कोलिविशारदाम् ॥ अहर्निशं हितैषिणी ताम्बूलाधिक्रियायुताम् । चिन्तये ललितां देवीं राधिकायाः प्रियां सखीम् ॥ अस्याः सख्यश्च सन्धयाः पृथ- गाधक्रियाश्रिताः । रत्नप्रभा रतिकला शुभाथ भद्रसौरभा ॥ मुमुखी मन्म- थामोंदा कलहंसी कलापिनी । रमास्त्वष्टौ सखीमुख्या ललिताज्ञानुवर्तिनीः ।। पावनदक्षिणापुत्री कृष्णाप्रयाप्रियां सखीम् । मध्या तारावलीवस्त्रां विद्युद्गौरी वयःसमाम् ॥ सामदानैश्च भेदैश्च निपुणां स्निग्धमानसाम् । सूर्याराधनसा- मग्रीचित्रवस्त्राधिकारिणीम् ॥ राधासख्यस्फुरत्स्वास्यां विशाखां चिन्तयेत् सु- धाः । अस्याः सख्यस्तथा ध्येयाः पृथगाधिक्रियायुताः ॥ माधवी मालती चैव गन्धरेखाथ कुञ्जरी । हरिणी चपला चैव सुरभीच शुभानना ॥ विशाखा- नुगताह्यष्टौ मुख्याश्च यूथनायिकाः । मध्या प्राप्ततनूभूतां राधिकायाः प्रियां सखीम् ॥ नीलपद्यम्बरधरां चम्पवर्णां सुतिकामू । वादिकां चम्पकलतां पा. कक्रियधिकारिणीम् ॥ अस्याः सख्यस्तथा ध्येयाः पृथगधिक्रियाश्रयाः ॥ - .
(४०) फिर पावनदाक्षणकी बेटी श्रीराधाकी प्यारी सखी विशा- खाजी सुमुखी अग्निदिशा की कणिका ( दक्षिण पूर्व ) में समान वयलः बिजलीसहश गौरी मध्या तारावली के वस्त्र साम दान भेद में निपुण स्निग्धमन सूर्य पूजा की साम- ग्री विचित्रवस्त्र नेवा को जिनको अधिकार तिनको चिन्तवन करै । इन की आठ सखी न्यारी.न्यारी क्रियावारी तिनको ध्यानकरै १ माधवी, २ मालती, ३ गन्धरेखा, ४ कुञ्जरी, ५ हरिणी, ६ चपला, ७ सुरभी, ८ शुभानना ये आठ हैं। फिर आप्ततनु की बेटी श्रीराधिकाकी प्यारी सखी नील वस्त्र पहिरें चपाको सो वर्ण सुन्दर द्युति: पाक नाम रसोई की अधिकारिणी सध्या दक्षिण कर्णिका में चंपकलता ति- नको ध्यान करै । इनकी ८ मुख्य सखी हैं १ कुरंगांक्षी, २ सुचरिता, ३ मणिकुण्डला, ४ मण्डिनी, ५ चन्द्रिका, ६ चन्द्रलत्तिका, ७ कटुकेक्षणी, ८ सुमंन्दिरा ये हैं । चौथी चाविषा की पुत्री कृष्णकी प्यारी सखी कोमल ज्योतिष शास्त्र, पशुविद्या में निपुण कुंकुमवत् अङ्गकी कान्ति सुव- १-कुरङ्गाक्षी सुचरिता तृतीया मणिकुण्डला । मण्डिनी चन्द्रिका चन्द्रगलतिका कटुकेक्षणी ॥ चम्पलतांनुगाः सप्त चाष्टमीय सुमान्दिरा । चौविषाचतुरसुता राधा- कृष्णप्रियां सखीम् ॥ मृन्दी ज्योतिष्पु 'शास्त्रेषु पशुविद्याविशारदाम् । कुङ्कुमाभव पुभ्रीजदुकूलकनकापमाम् ॥ पानकायसुसामलीगन्धतोयाधिफारिणीम् । लसन्ती राधिकापाव स्फुरन्ती सख्यविश्नुताम् ॥ चित्रां, राधालखी ध्यायेत् लस्मिता. हितं.. चिन्ताम् । अस्याः सख्यस्तथा ध्येयास्तवधिक्रियान्विता रिसालिका तिलफिनी, सौरसेनी सुगन्धिका रामिला कामनागर्या नागरी ,नागवणुका ) इमाश्चित्रानुगा ोष्टी विख्याता यूथपुड्गधाः । सुमलयजकपूरकुकुमाभा वरङ्गी वलयथालितह- स्तो पाण्डवस्त्रा सुकेशी । पठितसफलशास्त्रां साधुसङ्गीतविद्यारुचिरतनुसनीय कृष्णचन्द्रप्रियायाः । खलुजनफजनन्यौ. पुष्करः सुभ्रुवोऽस्या युगलरतहदों में धोदपिदमलाक्ष्याः । प्रखरवचनलीना पाणिवीणाप्रवीणा ह्यधिकृतिहितसिन्धुस्तुमा विद्याविचिन्या. . 1 (४१) तुल्य जिनके वस्त्र पान करिवेकी सामग्री सुगन्धित जलकी अधिकारिणी श्रीराधिकाके निकट में विराजमान विख्यात नेति कणिका दक्षिण पश्चिम में जो चित्रांसखी तिनको ध्यान करै । मन्द मुसक्यान युक्त युगलके हितकी चिन्तक उनकी ये आठ सखीहैं १ रसालिका, २तिलकिनी ३ सौरसनी, ४ सुगन्धिका, ५ रामिला, ६ कामनागरिया, ७ नागरी, ८ नागवेणुका । फिर पाश्चम कर्णिका में तुंगवि. द्याको चिन्तवन करै । चन्दन कंपूर कीसी सुगन्धि कुंकुमवत् अंग कड़ा हाथ में ऊजरे वस्त्र सुन्दर के सब शास्त्र संगीत विद्या जान कृष्णचन्द्रकी प्यारी सखी पुष्कर व सुभ्रू जिनके माता पिता युगल में हृदय की रति पंतरी कमर - कीली आ- अस्याः सख्यो विचिन्त्यांश्च पृथगधिक्रियाभृतः। तुङ्गविद्यानुगामुख्या मञ्जुमेधा सुमे. धिका ॥ स्वाधिकारात्प्रष्टत्मा सुमध्या मधुरेक्षणा । तनुमध्या मधुस्पन्दा गुणचूदा घराङ्गाहा ॥ बेलासागरतनया राधासखी सुशोभना । लहरसद्वद्गात्रा प्रेय स्पति- सुश्शावहा ॥ हरितालानिमः श्यामा दाडिमीपुष्पवांससा । फोकशास्त्रे वशीकर्तुशक्तिका कोशसाधिकाधिकाप्रियकृत् सख्याः सौभाग्ययन्त्रलेखिका । इन्दुलेखा यथा श्ये- याचामा प्रखरदूतिका । अस्याः सख्यस्तथा ध्येयाः पृथगधिक्रियावहां तुङ्गभद्रा रसो तुङ्गा गाववर्या सुमगंला ॥ चित्रलेखा विचित्रांगी मोदिनी मदिरालसायूथमुपा टकं शेयमिन्दुलेखानुकृत्यकृत् ॥ पाजिल्कवाभजपापुष्पाभवाससी.करुणा रंगमाराभ्या पितृभ्यांजन्मनीयषो। अनुलेखक्रियाभिक्षा निष्ठा सप्तभिर्दिनः ।राधिका कृष्णयोःप्रेष्ठातिष्ठतोरंफयालया ॥ राधाकृष्णास्यसंदृष्टिः कृष्णकटाक्षगोचरा वाम भाग स्थिता मध्या सिद्धिमौक्तिकल्पिका ॥ रंगदेवी रसदावा लसती राधिकातिके ॥ भस्याः सम्पराथाध्ययाः ॥ स्वाधिकारप्रहर्षिताः ॥ फलफठी 'शशिफला फमलामधुरेन्द्रिरा ॥ कंदर्पसुन्दरी कामतिका प्रेममंजरी ॥ यूथमुख्याष्टसख्य- स्ता रंगर्दव्यनुकृत्यकृत् ॥ सुदेवा रङ्गइन्यास्तु यमागाः सा फनायसा रूपादि- भिः समा स्वना तद्भातिभरकारिणी ॥ ज्येष्ठान्वयसीवंख्याता मृधुश्री राधिकासखी। शंफसारिफाप ठक्षा कन्दु काक्षेपभाजना । केशलस्थाजनादिभ्यः :शकुनाख्यान- वित्तमा । ध्येयाश्चास्याः सखीमुख्या: खाधिकाराकयाहताः कावरीचारुकवरी मञ्ज- केशी.सुफोशिका.। हारिहीरा महाहीरा हारकंठी मनोहरा । सुदेव्यनुगतामुख्या ह्यष्टी ता यूथ नायिकाः । एवं वृन्दादयः सर्गः कोटिशो यूथनायिका! ॥ वर्णाभरणभूपाढ्या ध्येया ह्यधिक्रियानुगाः । हरिणी हारिणी हाणा हरिताभिः स्नलगिरा ॥ ब्रह्मराने मुहर्त तु स्तूयमानी प्रियाप्रियो मुग्धा-स्निग्धा विदग्धाभिरसंदिग्धकया तथा।
. (४२) खें प्रखर पचन हाथ में वीणा बडी प्रवीन हितकी सिन्धु ऐसी तुङ्गविद्या को चिन्तवन करै । इनकी सखी अलग अलग अपनी क्रिया के आश्रय मुख्य मजुमेधा सुमेधिका इन को स्मरण करै। ताके परे अपने अधिकार में हर्षित मन सुमध्या मधुर चिन्तवन सूक्ष्म कमर मधुत्पन्द गुणन में श्रेष्ठ बाजूबन्ध पहिरे वेलासागर की बेटी श्रीराधाकी सखी सुशोभना स्नेह के रससे गात्रद्रवीभूत अतिशय प्यारी सुख देवे वारी हरितालको सो रंग सुंदरी अनार के फूलको सो रंग वस्त्रको कोकशास्त्र से वशी करवेकी शक्ति कोशकी साधिका वामा प्रखरदूतिका सौभाग्य यन्त्र की लिखनेवारी इन्दुलेखाजी को वायुकी दिशा पश्चिम उत्तर की कणिका में ध्यान करै । इनकी सखी पृथक क्रिया करवेवाली (को) ध्यान करें। १ तुगभद्रा, २ रसोत्तुंगा, ३ गाववार्या, ४ सुम- जन्ला, ५चित्रलेखा, ६ विचित्राङ्गी, ७ मंदिनी, मदिरालसा, ये आठ इनके यूथकी मुख्य हैं । तासे परे कमल के केसरा स- रीखा वर्ण, जपाके फूल सरीखे वस्त्र करुणा और सारंग तिन की बेटी अनुलेख क्रियाकी जाननवारी सात दिन श्रीराधि- काजी से छोटी श्रीराधा कृष्णकी अतिशय प्यारी जवदोनों अङ्कमाल करके बैठे तब राधाकृष्ण के मुखपर दृष्टि कृष्ण कटाक्षकी गोचर वामभागमे स्थित मध्या सिद्धमुक्ति अर्थात् प्रेमभाक्त की उपदेशक श्रीरंगदेवी उत्तरं कार्णका में रसकी बहावेवारी श्रीराधिकानिकट बिरानें हैं। इनकी सखी अपने अधिकार पर बिराजै वे ध्यान करवे योग्य हैं। १ कलकण्ठी, २ शशिकला, ३ कमला, ४ मधुरा,५इन्दिरा,६कन्दर्पसुन्दरी, ७ कामलतिका, प्रेममारी, ये आठ रंगदेवी के पीछे कृत्य करवेवाली हैं। तदनन्तर सुदेवीजी श्रीरंगदेवी की यमलवहिन रूपादिमें स्वसाक समान अतिशय कामके करवेवारी बाँके पीछे चलनवारी कोमल श्रीगधिका की सखी तोता मैना के पाठ की जाननवारी गेंद खेलकी पात्र केश सँवारे अंजनादि लगावै शकुनको बखान करनो अच्छोजानै उत्तर इन्द्र दिशा ईशान कर्णिका में तिनको चिन्तवन करै । इनकी सखी अपने अधिकारको काम करवेवारी ८हैं, १ कावरी, २ चारु- कवरी, ३ मंजुकेशी, ४ सुकेशिका, ५ हारिहीरां, ६महाहीरा, ७ हाराकण्ठी, ८ मनोहरा, ये यूथकी नायिका हैं। ऐसे ही वृन्दादिक कोटिन यूधन की नायिका वर्ण आभरण भूषणयुक्त ध्यान करवे योग्य हैं । हरिणी हारिणी हीणा हरिता इनकी स्खलित वाणीतासे रात्रिके ब्रह्ममुहूर्त में दोनों प्रिया प्रीतम की स्तुति करें हैं । मुग्धा स्निग्धा विदग्धा असंदिग्धा ये अश्रु भरे नेत्रनसे मुहूर्त भर गावे हैं इनको ध्यान करै । वृन्दा देवी वृन्दावन की शोभा निवेदन करके राधा कृष्णं को प्रसन्न करें हैं उनको ध्यान करै । वृन्दा देवीसे कमलके सोलह दलवारीन को वर्णन करहैं । यह वृन्दा देवी दक्षिण आग्नि कोणवारे : दलमें हैं फिर पावक़ दक्षिण दलमें चन्द्रावती जो कंप अंगसे नाना. प्ररकाके अद्भुत दर्शन करायके राधा सामाभी राधिकाकृष्णो गीयमानी मुहर्तकम् ॥ अथ कमलस्य षोटशदले ॥ मुइन वृन्दया देव्या वृन्दावननिवेदनः। ध्यायत्प्रसाधमानी श्रीराधाष्णोनि पिसती॥ चन्द्रावत्या मुहूतं तु विविधाद्भुतदर्शनैः। दृष्यमाणो सकम्पोङ्गया राधाकृष्णो मिचिन्तयत् ॥ मुहूर्ने चन्द्रया सख्या किसलयनगर्पणः । प्रेयस्या भूप्यमाणौ ता ध- रुणावितदेहया ॥ गोपाल्पा च मुहूतं तु चित्रपटातोभया । समाचलोफ्यमानी ध राधाकृष्णो फलार्पणः ॥ श्यामलयारुणापाझ्या पुष्पमालासमहणेः। मुहूर्तमय॑मानौ पराधाकृष्गी विचिन्तयेत् ॥ चन्द्रापल्या मुहूर्ताद्वै दक्षिणपार्श्वसंस्थया । ससख्या अपमानासचा समासानी प्रियाप्रियो । तथा सुभद्रया श्रीमत्या- मधुमत्या च हरि प्रियादिमिकमात् । सेवितो राधिकारुणी विभावयेदूधिभागशः ॥
(४४) कृष्णको हर्ष देवै उनको चिन्तवन करै । फिर वही पावक दक्षिण दलमें चन्द्रा सखी कोंपलन की माला अर्पण करके श्रीराधाकृष्णको भूषित करें सो.मुहूर्तभर चितवन करै । उनकी लाल देह है । फिर मुहूर्तभर चित्रपट जैसे अङ्कित होय तैसी कान्ति जिनके अंगकी ऐसी गोपालीजी दोनों श्रीराधाकृष्णको फल अर्पण करै और वे फलनके दर्शन करें तिनको दर्शन कर रहीं पूर्वाग्नेय दलमें उनको ध्यान करै, तहां ही पूर्वाग्नेय दलमें अरुण कटाक्षवारी श्यामला फूलमा- ला भेट करके मुहूर्तभर राधाकृष्ण को अर्चन करें सोध्यान करै । फिर पूर्वेशान दलमें चन्द्रावलीजी अपनी सखीन साहित बैठे जो राधाकृष्ण उनके दक्षिण निकटमें कंपायमा- न अंगसे ठाढी मुहूर्तभर उनको ध्यान करै । ऐसे ही सुभद्रा सखी को ईशान उत्तर दलमें ध्यान करै तथा रोहिणी धनि- ष्ठादिको स्मरण करैः । सुदेवी मुग्धादि पर्यन्त आठ दल की हैं, पीछे सोलह, दलवारी हैं श्रीमती मधुमती हरिप्रिया- दिक से कम करके सेंवित श्रीराधाकृष्ण तिनको ध्यान करें। यह संप्रदायसम्मत सिद्धान्त 'सुधर्माध्वबोध' के अनुसार लिखो गयो और इनके आश्रय की वनिता शत यूथप 'श्रीमद्भागवत में सहचरी मंजरी लिखी हैं इन सबके पांच प्रकार के भेद हैं-१सखी, २ नित्यसखी, ३ प्राणसखी, ४ 'प्रियसखी, ५. परमपेष्टा सखी, । जिनको कृष्णमें स्नेह सो सखी, जिनको श्रीराधिका स्नेह अधिक सो नित्य- सखी, और जो मुख्य सखीनमें स्नेह अधिक करें सो प्राण. सखी, और जो श्रीराधाके सारूप्य को प्राप्त भई सो प्रिय- सखी इनमें मुख्य श्रीललिता विशाखादि आठ वे परम (४५) प्रेष्ठं सखी इनको यद्यपि श्रीराधाकृष्णमें बरावर स्नेह है तव भी श्रीराधाको ही पक्षपात करें हैं । : अब ब्रज जो रासकी रात्रिकों सौ यूधन की पालन- वारी गोपी इकंछी भई उनको व्यौरा वर्णन करें हैं । 'गोपीन को श्रुतिरूपं जानो' ऋषिन की कन्या देवंतनकी कन्या जानो हे राजेन्द्र !। ये मानुषी नहीं हैं' यह पद्मपुराणमें लिखा है तामें गोपी जो नित्यसिद्धा हैं वे सदाकी प्यारी हैं। और सवं साधन करके सिद्ध भई तामें ऋषिकन्या में प्रमाण-पौने' उत्तरवण्ड में-पहिले महर्षि सब दण्डकारण्य के वासी सुन्दर श्रीरामचन्द्रको देखके भोग करिवेकी इच्छा करते भये । वे सब स्त्री होके गोकुलमें प्रगट होते भये । काम- भाव से हरिकों पायके संसार समुद्र से तरते भये तैसे ही श्रुतची 'बृहवामनपुगण में लिखा-कन्दर्प कोटिसे भी सुन्दर तुमको देखके हमारे मन कामिनीभावसे क्षोभकों प्राप्त भये जैसे तुझारे लोककी वासिनी तुझारे साथ विहार करें हैं सोई हमारे इच्छा है' ॥ नित्यसिद्धो गोपिनको कोई साधन नहीं है कात्यायनी पूजा केवल लोकसंग्रह हैं । इन सब में कोई मुग्धा (भोरी) हैं, कोई मध्या (बीचकी) हैं, कोई प्रगल्भा (ढीठ.) हैं। प्रेमके तारतम्यसे भी उत्तम .१८ पाझे-'गोव्यस्तु श्रुतयो क्षेयांऋषिजा गोपन्यका..,देषकंन्याश्च राजेन्द्र न .मानुष्यः कथंचन' इति । -पाने उत्तरखण्डे-पुरा महर्षयः सर्वे दण्डकारण्यवासिनः हटवा राम हरि 'तत्र भोक्तुमैच्छन् सुविग्रहम् .ते सर्व स्त्रीत्वमापन्नाः समुद्भूताश्च-गोकुले हरि संप्राप्य कामेन ततो.मुंकाभवार्णवात् इति ।. - हवामनकन्दर्पकोटिलावण्ये त्वयि दृष्टे मनासिनः । कामिनीभावमासाचं मरक्षुधान्यसंशयः ॥ यथा. वल्लाकवासिन्य कामतत्वेन गोपिकाः ।भिजन्ति रमणं मत्वा चिकीर्षाजनि नस्तथा ॥ 11 .
(४६) मध्यम कनिष्ठ तीन प्रकार की हैं । ये मोपी मनुष्यलोक में रहिके भी विष्टामूत्रपूरितदेहत्वचा चर्म केश डाढी मूछ. रोमादि मसाला वारी नहीं हैं। सच्चिदानन्दविग्रह हैं। भग- वान के साथ प्राकृतन की रमणयोग्यता कैसे होती। जिन- की देह में कुछ प्रकृति को अंश रह्यो वेणु बजायके जा समय वृन्दावनमें बुलाई उनको पतिनके रोकवसे देहत्याग लिखो है । कुजाको भी अप्राकृतपनो सिद्ध है । मथुराके बजारे में चन्दन लगाती समय मुक्ति के दाता मुकुन्दने स्पर्श करी तो पारस लोहकी तरह प्रमदोत्तमा नाम अप्राकृत देहवारी होगई जैसे ध्रुवजीको वही शरीर हिरण्यमय नाम अप्राकृत होजातो भयो और वाही शरीर से विष्णुलोक को गये । पर गोपिनको ध्रुव कुब्जा समान न समुझनो इनको विलक्षण प्रभाव है। श्रीमद्भागवत' में-लिख्यो. है कि तिनके माया के शोक सबधुइगये, तिनके साथ भगवान् अच्युत की अधिक शोभा होती भयो जैसे पुरुषकी शक्ति से शोभा होय । लक्ष्मीजी से स्वर्गकी स्त्रीनसे और सब से इनकी श्रेष्ठता है और इनको श्रीकृष्णमें ममतामय भाव है । कात्ययनी से प्रार्थना करी है कि हे कात्यायनी देवी ! नन्द के बेटा हमारे पति कर । वेणुगीत में श्रीकृष्ण को अध- रामृतः गोपजातिपने से अपनौ. बतायो, हैं-उनको आर्य अर्थात् नन्द सुसर के बेटा जानै । गोपिन को श्रीकृष्ण के १-२-३ 'श्रीमद्भागवते'-ताभिर्विधूतशोकाभिर्भगवानच्युतो वृतः । व्य रोचताधिकं तात. पुरुषः शक्तिभिर्पया । तत्रैव-नाय श्रियोग नितान्तरारीति- तत्रैव । कात्यायाने महामाय महायोगिन्यधीवरि । नन्दगासुतं देवि पति में कुरु ते नमः॥ .
। (१७) साथ. सदा सर्वदा नित्य विहारं है सोई ब्रह्माजीने अपनी संहिता में लिख्यो है-'आनन्दचिन्मय रसकी प्रतिभावित अपने रूपकी कला ऐसी गोपिन के साथ अपने गोलोक में गोविन्द आदि पुरुष निवास करैं हैं । चिन्तामणिसमूह के जहां घर लाखन कल्पवृक्ष जहां लगे गैय्यानको जहां पा- लन करै हजारन लक्ष्मीरूप गोपी जिनकी सेवा करें ऐसे आदिपुरुष गोविन्द को भजन करो, तासे गोपी नित्य प्रेय- सी है । प्रगट व्रजलीला में भी सुखावेश से श्रीशुकदेवजी ने गोपिन को श्रीकृष्ण रूप बतायो है और अधोक्षज की प्यारी तथा कृष्णवधू वर्णन करी है। प्रगट लीला.ही में संबन्ध ठीक है अप्रकट प्रकाशको तो कहनों कहा । 'श्रीमद्भागवत में भी-रमा के ईश व्रजसुन्दरिनके साथ ऐसे रमण करते भये जैसे बालकको अपने प्रतिबिम्ब में विभ्रम होय(तैसेही) भगवान् अपनी माधुरी गोपिन में धरके अनुभव करते भये गौतमीप तन्त्र के विषय अष्टादशाक्षर मन्त्र की व्याख्यामें वा-मन्त्र के द्रष्टा श्रीनारदजीने श्रीगोपाल को गोपालीपति वर्णन कियो यथा-गोपी को प्रकृति जानौं, जन तत्त्व समूह : १-२ 'ब्रह्म-सहितायाम्'-'आनन्दचिन्मयरसंप्रातभाविताभिस्ताभिर्य एवं निजरूपतया कलाभिः । गोलोक एवं निवसत्यखिलात्मभूतो गोविन्दमादि पुरुष तमहं भजामि । तत्रैव ! चिन्तामणि मकरसमसु कल्पवृक्षलक्षावृतेषु सुरमीर- भिपालयन्तम् । लक्ष्मीसहस्रशतसंभ्रमसेव- मान गोविन्दमादिपुरुषं तमहं मंजामि ॥ ३-श्रीमद्भागवते रासपश्चाध्याप्यामू-रेमे रमेशो वनमुन्दरीमियथार्भकः स्वप्रतिविम्बविभ्रमः॥ ४-यथा.गोपीति प्रकृति विद्याज्जनस्तत्वसमूहकः । अनयोराश्रयत्वेन कारण वेन चेश्वरः ॥ सान्द्रानन्दपरं ज्योतिर्वल्लभेन च कथ्यते।
-- (४८), हैं इन दोनों को आश्रय वं कारण तासे ईश्वर सान्द्रानन्द परम ज्यौति वल्लभ कोजाय है। अथवा गोपिनकों प्रकृति जानौ, जनताको अंशमण्डल है इन दोनों को वल्लभ स्वामी कृष्ण नाम को. ईश्वर होय । अनेक जन्मको सिद्ध. गोपी तिनके पति नन्दनन्दन त्रिलोकी के आनन्द बढावनवारे वर्णन किये हैं। अनेक जन्म गोपिनके कृष्ण अवतारवत् जाननौ । अनादि काल परम्परा से श्रुति पुराण मन्त्रादिमें गोपिन को अवतार वर्णन कियो है तापिनी में श्रुति भी है जो गैय्यानमें तिष्ठ जो गौपालन करै जो गोपन में, तिष्ठ जो सब वेदनमें तिष्ठै जाको सब वेद. गावै सो तुह्मारो स्वा- मी होय यह गोपीन प्रति दुर्वासाजी को आशीर्वाद है. !: युगां- न्तर में इन प्यारिनके गोत्रप्रवर्तक गोपन को वरदान भी है। श्रीविष्णु भगवान् ने पद्म पुराणके सृष्टिखण्ड में कह्यो -जब नंदादिक पृथ्वीके तलपर अवतार लेयगे तब तिनमें मैं बसौंगो, तुमारी कन्या सब मेरे साथ रमणःकरेंगी तामें- कुछ दोष रोष.मत्सरता न होयगी । या प्रकार गोपी श्रीक ष्ण की सर्व कालकी प्रेयसी हैं । तुलसी के अनुरदोय पत्ता होवेसे ही भगवानकी गिनीजायंगी । कोई अपने कल्याण १-अनेकजन्मसिद्धानां. गोपीनां पतिरेव वा । नन्दनन्दन इत्युक्तस्त्रिलोक्या नन्दवर्धन: ॥ २-'योऽसौ गोपेषु गोपेषु तिष्ठसि' योऽसौ गाः पालयति, योऽसौं गोपेषु तिष्ठति, योऽसौ वेदेषु तिष्ठति, योऽसौ स वेदैगीयते, स वो हि स्वामी योऽसौ भवति ।.. ३-'पाने सृष्टिखण्डे'-'यदा नन्दमभृतयः अवतार. घरातले । करिष्यन्ति तदा चाह.वसिष्ये नेषु मध्यतः । युष्माकं कन्यकाः सर्वा रमिप्यन्ते मया सह तत्र दोषो न भविता-नव रोषो न मंत्सरः' इति । ।
(४६) व सुख के लिये शालिग्राम के साथ विवाह कर देवै तो अतिसुन्दर. तैसे गोपी जानौ । गान्धर्व विवाह प्रसिद्ध है 'ब्रह्मवैवर्त पुराणादि में ब्रह्माको कियो सम्बन्ध है । रासमें ही सबके साथ मुख्य विवाह को रूपक बैगयो। 'श्रीमद्भागवत' में पतिव्रत धर्म जो श्रीकृष्ण महाराज ने उपदेश कियो सो कोई दण्डकारण्यवासी ऋषिन की तरह जो ब्रजमें पतिसम्बन्ध पायके रहती रहीं उनके उद्देश से है । और भी रहस्य है कि गोपिन को प्रेम उत्कर्ष ऐसी है कि कर्म व ज्ञानके फलकों तिलाञ्जलि देय तब पावै याके समा- धान में श्रीजीव गोस्वामी गौड़सम्प्रदाय के आचार्य ने. जो रहस्य 'वैष्णवतोषिणी' श्रीमद्भागवत की टीका में और 'गोपालचम्पू' में लिख्यो है सो संक्षेपसे लिखोजाय है श्रीमद्भागवत की रासपञ्चाध्यायी में शुकदेवजी ने कह्यो कि व्रजवासी श्रीकृष्ण में असूया नहीं करते भये काहे से कि योगमाया सचिदानन्द शक्ति तासे मोहे भये अपनी अ- पनी स्त्रीनकों अपने अपने निकट मानते भये । तात्पर्य यह है कि योगमायाने जिन को व्रजलीला में आदि से सहायताको अधिकार मिल्यो है विचित्र रसमय उल्लास भरी उत्कण्ठा बढ़ावनवारी भक्तन के सुख के निमित्त सब गोपिन के बिम्ब के प्रतिबिम्बरूप छाया संज्ञा जाते ऐक्य- ताको संभ्रम होय रचना करी, जिनके साथ गोपन के विवाह भये और उन्हीकों अपने निकद मानते भये और कृष्ण की प्यारीन के विवाहादि कृष्णपके साथ भये । वा १-'श्रीमद्भागवते-जासूयन खलु कृष्णय मोहितास्तस्य मायया । मन्यमान पार्श्वस्थान स्वान स्वानू दारा ब्रजीकसः ॥ इति ।
(५०) प्रकरण के उपलक्षणसे सब बजलीलामें यही सिद्धान्त है कि ब्रजवासिन के साथ प्रतिविम्ब रूपको सम्बन्ध भयो और बिम्वरूप सच्ची गोपी श्रीकृष्ण के साथ सब सम्बन्ध पावती भयो । कृष्ण की प्यारीन को और की शय्यापर प्रवेश होनो महान् अनर्थ होय । कोई छाया भी स्पर्श नहीं कर सके.जैसे रघुनाथजी की पत्नी सीताजी को रावण हरबेकी इच्छा करतो भयो तब जानकीजी अग्नि की शरणं गई। अग्नि मायातीता निर्माण करके सच्ची सीताजी अपने लोकमें लेगयो सो मायासीता रावण हर लेगयों । जवं श्रीरामचन्द्र, रावण मारचुके तव मायासीता अग्निमें प्रवेश भयो । अग्नि ताको जरायकै सीताजी रघुनाथजी को सम- पण करते भये। और समाचार कहि के अन्तधान होगये। ऐसे ही या ब्रजलीलामें योगमायाजी को कौतुक समझो। सो स्पष्ट ‘गोपालचम्पू के उत्तराई के ३१ व ३२ पूर्णमें 'पद्मपुराण' के गद्य अनुसार लिख्यों हैं। जब श्रीकृष्ण देत- वक्र के मारवेकों जो 'दतिहा' ग्राम मथुरा के पूर्व दो तीन कोसपर है तहां आये । और ताको मारके ब्रजवासी नंद , यशोदा सखा संखी तिनसे मिले। दो महीना प्रगट व्रज- में सबके साथ आनन्द करते भये फिर एक रूपसे 'दारुक' के साथ 'द्वारिका' में चले गये और दूसरे रूप से व्रजवा- सिन के साथ अप्रगट प्रकाश लीलामें विराजते भये । दो मास.जो प्रगट लीला रही ताके मध्य में जो समाचार भये ताको कहें हैं कि एक दिन श्रीयशोदा जी बोली कि हे. 'पूर्णमासी जी इन कृष्ण को विवाह गोपजातिमें होजाय तो
अच्छो है। 'पूर्णमासी' बोली कि सारिशालाधारण जो
वृपभानु आदिकी कन्या हैं उनको औरनकी: तरह मत
जानो. उनके विवाहादि जोस्वप्नतुल्य भये सो उन के प्रति-
विम्ब मायाकल्पित स्वरूपके हैं । यह सुनके वजरानी 'यशो-
दा' व ब्रजराजा प्रसन्न होके बोले कि यह बात कैसे जा-
नीज़ाय । पूर्णमासी बोली मेरे उपदेश से तुम प्रातःकाल
सव ब्रजवासी इकटे करो। फिर सव ब्रजवासी इकठे भये ।
पूर्णमासी भगवती देवी को ध्यान करती भयो । सो विष्णु
की माया आठ भुजावारी,चक्रादिक आयुध लेकै आकाश
पर चलवेवारे वाहन पर बैठी, देवता जाकी स्तुति करें
प्रकाशमान दर्शन देती भयी । और ऊंचो.मुख करकेवोली
सन्देह मत करो सन्देह मत करो' हे माता पिता वो मेरी
बनाई. भई दूसरी हैं जो ब्रजवासिन की शयनमें स्थित
भयीं । मैं इनकों जानों मेरी भैय्या श्रीकृष्ण की अङ्गी-
कार करी भयो इन में कुछ दोष नहीं है. मैंने ही पहिले
छायारूपा जानकी रावण को देके जनककी बेटी की रक्षा
करी'। फिर देवी दिशान में देख के अन्तर्धान होगई और
अपनी बनाई हुई..छायारूप: गोपी प्रगट लावती भयो । वे
प्रतिबिम्वरूपा बिम्वरूपा: श्रीराधादिकनको आत्मा जानौं ।
फिर देवी बोली इन सबको भेद देखो यह सुनके ब्रजेश्वरी
आदिक खयं देखती भयी। मणिकों और. काचकों जैसे
वणिक परीक्षा करे तैसे बिम्बप्रतिविम्ब की परीक्षा होती
भयी। फिर देवीने दोनों स्वरूप एक जगह करके दिखायें
तव दूर सूर्यकी मूर्ति ताकें निकट चन्द्रमा जैसे तैसे प्रतीति
.
. .(५२) होती भयो । फिरः उन सब के श्रीकृष्णके साथ विवाह होते भये । और श्रीराधाकृष्ण को विवाह तो बड़ी धूम धाम से होतो भयो। यह संक्षेप से प्रसंग समाप्त कियो फिर सोई प्रस्तुत प्रसंग को कहैं हैं । आगममें शतकोटि गोपी लिखी हैं तिन में तीस कोटि गोपी श्रेष्ठ हैं। उनमें भी १६ ह. जार स्कन्दपुराणके प्रमाणसे मुख्य यथा सोलह हजार गोपी सहां सन्यक प्रकार प्राप्त होती भयीं तामें परमात्मा जनार्दन श्रीकृष्ण हंस हैं तिनकी यह सोलह शक्ति वर्णन करी हैं। श्री कृष्ण चन्द्रमारूप हैं सोलह गोपी कलारूप हैं। एक एक के साथ हजार हजार न्यारी न्यारी सोलह हजार मुख्य हैं । तिन में भी हजार मुख्यतर हैं तिनमें आठ मुख्यतम इन सबंकी स्वामिनी श्रीराधा हैं । यद्यपि श्रीचन्द्रावली भी श्रीराधाकी अंश है बराबरी अनुचित है, तथापि गौड़सम्प्रदायी सिद्धा- न्तमें व्रजलीलाके सुखके लियेऔर सौतशाल केसुखके लिये श्रीचन्द्रभान की बेटी बड़ी बहिनन्यारी यूथेश्वरी मानी हैं जैसे श्रीकृष्णके सखा सब सर्वदा दास होके भी ब्रजलीला में कबहूँ कबहूं बराबरी करें और लड़प तैसें चन्द्रावलीकों जानौं । और दो चार जो खण्डमण्डल राजानहोय तो चक्रवर्तीकी शोभा कैसे होय श्रीराधा चन्द्रावली में श्रीकृष्णके प्रेमकी न्यून अधिकता दिखावे हैं एक दिन श्रीचन्द्रावली के कपो- १-प्रमदाशतोटिभिराकुलिते इत्यागमोक्तः । २-'स्फान्दे प्रभासखण्डे-'पोडशव सहस्राणि गोप्यस्तत्र समागताः । इस एव मतः कृष्णः परमात्मा जनार्दनः । तस्यैताः शक्तयो देवि! पोडशव प्रकीर्तिताः । चन्द्ररूपी मतः कृष्णः कलारूपास्तु ताः स्मृताः । सम्पूर्णमण्डला तासां मालिनी पोडशी फला। पोडशैय कलायास्तु गोपीकपा घराननाः ॥ एकैफशस्ताः समिन्नाः सहस्रेण पृथक पृथक् इति।
(५३) लन पर चन्दन से मञ्जरी अपने हाथ से श्रीकृष्णने लिख दीनी। वे गर्वकी भरी व्रजमें सखीन को अपनो सौभाग्य दिखायबेकों फिरवलगी। तव कोई श्रीराधाकी सखी बोली कि गर्व.मत करो कपोलतलपर श्रीकृष्णके हाथकी लिखी मंजरी प्रकाश होरही है सो हम जान हैं हमारी प्यारी श्रीराधा का ऐसे सौभाग्यकी भाजन नहीं हैं अर्थात् उन के मुखपर नहीं पत्ररचना करैं पर उनके मुखके पास हाथ लेनायवेसे प्रेमविवश होजायं हाथ कँपकँपाय जाय है, सोई हमारो वैरी है जो अन्तराय करै है। सोई श्रीहरिवंश गोस्वामीने कह्यो- सवैया (ई) "हठके मनमोहन हार रहें, भटुं हाथ जिवावन को तरसै। ‘कर कंपत बीचहीं छूटपड़े, कबहूंक अंसा मुखलों परसै ।। अब श्रीराधा व चन्द्रावलीको जो. कृष्णमें प्रेम.ताकी न्यून अधिकता दिखाएँ हैं । चन्द्रावली.प्रति श्रीललिता के वाक्य हैं हे चन्द्रावली! तुह्मारी बड़ी धीर बुद्धि है कि काली की दहमें हरिके गिर की कथा सावधान होंके कहवेलगी। हमारी सखी श्रीराधा के आगे जो कोई अन्य प्रसङ्ग में भी:जा कदम पर चढके हरि जलमें कूदे वाको नाम भी ले देय तो महा क्षुद्रहृदय की छाती कूटती रोयबे लगे है। सौतसाल जैसे- २-'पद्यावल्याम् अन्यापि किं सखिन भाजनमोहशीनां बैरी न चेदुभवीत वेपथु- रन्तरायः।मा गर्वमुदह कपोलतले चकास्ति श्रीकृष्णहस्तलिखिता फिलमञ्जरीति । २-चन्द्रावली प्रति श्रीललितावाक्यम त्वं धीरधी फणिहृदे हरिपगाथा निष्क- म्पमेव यदियं गदितुं प्रवृत्ता । तत्रानुषङ्गिकतयाप्युदिते कदम्बे वक्षः पिनष्टि- सविता तरला सखी मे॥ .
. एक दिन श्रीकृष्ण चन्द्रावलीके साथ. सोयरहे । स्वप्न में बर्रायबेलगे 'हे. राधे मैं तुमारे- अर्थ सोगंद ख़ाऊं कि तुम मेरे हृदय में हो। तुम मेरे बाहिर, तुमही आगे तुमही पीछे,"तुम गिरिमें, वनमें; तुमही भवनमें; रात्रिमें, यह जल्प सुनके. सेजपर चन्द्रावली मुखरलेती भयी. याते सब से उत्तमता श्रीराधिका को आईसोई श्रीकृष्ण ने कहो हे राधिके चाहे तुम कठोर होउ, चाहे कोमल होउ तुमही मेरी प्राण हो जैसे चकोरको चन्द्रलेखा विना गति नहीं है। ": अब श्रीकृष्ण व रांधा युगलकिशोर एक बरावरके भये । इन दोनों में कल्याण गुण सौन्दर्य माधुर्य चतुराई सौशी- ल्य वात्सल्य में कौन अधिक है सोई 'गोविन्दलीलामृत' में शुकसारिकाः अर्थात तोता मैना को संवाद है,। यह मत समुझियों कि साधारण पक्षी प्रामाणिक नहीं हैं इन वृन्दा- वनके पक्षीनको स्वरूप 'श्रीमद्भागवत' के वेणुगीत में लि- ख्यो है गोपी परस्पर बोली हे मा! प्रायः करके या वन के पक्षी मुनि हैं श्रीकृष्ण को देख के उनको बजायो वेणुशब्द वृक्ष की कोमल कोमल डारीपर बैठके और बोली अर्थात् १-सौतसाल 'ललितमाध-शपे तुभ्यं राधे.त्वमसि हृदये त्वं मम बहिस्त्वमने- पृष्ठत्वं त्वमिह भवने त्वं गिरिवने । इति स्वप्ने जल्प निशि निशमयन्ती मधुरिपोरभू- तल्प चन्दावलिरथ परावर्तितिमुत्री ! २-'विदग्धमाधवे' कृष्णवाक्यम्-'कठोरा पाथ मृद्री वा प्राणास्त्वमसि राधिके । आस्त नान्या चकोरस्य चन्दलेखा विना गतिः'। ३-'श्रीमद्भागवते'-प्रायो बताम्ब विहगा मुनयो घनेऽस्मिन् कृष्णं निरीक्ष्य तदुदितं फलवेणुगीतमः। आरुह्य ये गुमभुजान बचिरप्रधालान शृण्वन्ति मीलितहशो विगता- न्यवाच ॥ तत्रैव पञ्चदंशाध्याय 'नृत्यन्त्यमी शिखिन ईडय मुदा हरिण्यः कुर्वन्ति- गोप्य इव तव निरीक्षणेन । सूक्तच, फोफिलगणा ग्रहमागताय धन्या वनौकस इयान हि सतां निसर्गः॥
-- (५५) ब्रह्मवाद छोडके नेत्रं मूंदके सुने हैं। और भी तहां ही श्रीकृष्णने श्रीबलदेवजी से कही-या. वृन्दावनमें जो आप आये तो ये मोर प्रसन्न होक नाच रहे हैं । हरिणी बड़े हर्षसे गोपीन की तरह आपको देखें हैं.। और कोकिलान के समूह सूक्त अर्थात् स्तुति करें हैं। धन्य है. वृन्दावन के पक्षी पशुन का संतन को स्वभाव है तासे, इनक वचन महाप्रमाणीक हैं। तामें पहिले भैनी से तोता बोल्यो-जगत के मोहन करचे वाले । कृष्णकी विश्व उत्पन्न करवेकी कीर्ति विश्वकी रक्षा करो। हमारे कृष्णको सौन्दर्य कैसों है कि स्त्रीसमूह के धीरज को नाश करदेय हैं । लीला लक्ष्मी को स्तम्भन (जडिमा) कर देय है । पराक्रम ऐसों कि गिरिराज श्रेष्ठ गेंदे करिलियो। और भी निर्मल अमोल बहुगुण हैं । स्वभाव हमारे प्रभुको सबको रंजन करबेवारों है । तब मैना बोली कि हमारी श्रीराधिका की प्रेम प्रीति सुन्दर रूप और सुशील. पनो नाच गान चतु- राई और गुणनकी पङ्क्ति की सम्पत् व कविता ऐसी शोभा पावै, हैं कि जगत् के मनके मोहन करवे वारे श्रीकृष्णको भी चित्त चार है अर्थात् सब गुण में उनसे. श्रेष्ठ है । तामें पहिले प्रेम श्रीद्भागवत में सब गोपान के आगे, श्रीकृष्ण हाथ ::१-'गोविन्दलीलामृते शुफाक्यस-सौन्दर्य ललनालिधैर्यदलनं लीला रमास्तम्भि- मी. वीर्य कन्वुकनाद्विवर्यममला: पारे पराद्धी गुणाः । शीलं सर्वजनानुरञ्जनमहो यस्यायमस्मत्पभोर्विश्व विश्वजनीनकीतिरवताकृष्णो जगमोहनः॥ २-श्रीराधिकायाः प्रियतास्वरूपता-सुशीलता नर्तनगानचातुरी । गुणालिसम्पत्क- .षिताच राजते जगन्मनोमोहनचित्तमोहिनी ।। ३-श्रीमद्भागवते-न पारयेऽहं निरनद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्य विबुधायुषोऽपि वा। यामाभजन दुर्जरगेहश्रृङ्खला संवृश्चनः प्रतियातु साधुना ॥; .
(.५६) जोड़के बोले कि मेरो तुमारो संयोग निर्दोष मैं अपनी सुन्दर कृत्य से देवतान की आयुः भर ओ तुझारे किये भये उपकार को प्रतिउपकार करनो चाहौं तो भी तुमसे उरिण नहीं होऊं। जो तुम दुर्जर घरकी शृङ्खला छोड़के मोकों भजतीभयीं तासे मैं सदा तुह्मारों ऋणिया हौं। तुम अपनी ओरीसों मोको नि- ऋणी करो तो भले होऊ । जव गोपीनके आगे हार गये तो फिर उन सबकी स्वामिनी महाभावस्वरूपा को काह कहनो और सुन्दरताई के तो डंका बज रहे हैं और सुशील पनोताको नाम है कि नीच से भी छिद्ररहित हो के मिलै । अजामिल ने नारायण नाम मरती समय बेटाके मिससे लयो चार पार्षद ताकी रक्षाको आये आप नारायण नहीं आये। और एक भक्त पूर्वके रहिबेवारो पश्चिम में नोकरी करै हो सो अति- सुन्दर अपनी किशोरी स्त्रीको मरनो सुनके घरको चलोबीच में बरसाने की. सांकरी खोरमें विरहव्याकुल होके हाय कि- शोरी! हाय किशोरी! चिल्लायवेलग्यो ताके पास आप श्रीरा- धिका किशोरी जाय ठाढी भयो। तिनके दर्शन कर स्त्रीको भूलं के अंलिं. किशोरी होगये सो प्रसिद्ध हैं।.नाच गान में श्रील- लिताजी से ही आप हारगये तो श्रीराधिका को कहा कहनों। श्रीमद्भागवत में कोई एक अर्थात् श्रीललिता मुकुन्द करके सहित अर्थात् मुकुन्द गोड में आप मुख्य स्वर जाति कृष्ण की गाई भई से न्यारी उठावती भयी। तब श्रीकृष्ण भले भले कहिं प्रसन्न होके पूजा करते भये । और जब ध्रुताल विशेष में वाको गायो तब तो बहुत ही मान देते भये ! १-'श्रीमद्भागवते-फाचित्सम.मुकुन्देन स्वरजातीरमिश्रिताः। उनिन्ये पूजिता- स्तन प्रीयतां साधु साविति ॥ तदेव ध्रुवमुनिन्ये तस्यै मानं च बह्नदात् ।
(५७.) चातुरी एक दिन श्रीराधिका के महलमें आप श्रीकृष्ण आये और अङ्गुली से कपाट खोलबे. लगे । श्रीराधिका बोली कौन अङ्गुली से कपाट खुड़काव है। कृष्ण बोले माधो हूं। श्रीराधा बोली बसन्त हो तो. कोकिला को सुख देव । तब श्रीकृष्ण बोले चक्री हूं.। श्रीराधा बोली का कुंभार हो फिर कृष्ण बोले नहीं धरणीधर हूं । श्रीराधा बोली का सर्पन के राजा शेष-हो, कोई को काटोगे । कृष्ण बोले नहीं मैं सांपको मर्दन करववारो हूँ । श्रीराधा बोली. तो. गरुड़ हो । कृष्ण बोले मैं हरि हूं। श्रीराधा बोली बन्दर को यहां का काम है । ऐसे प्यारी के वचन से हारे हंसते.भये कॅष्ण तुह्मारी रक्षा करें । 'कविता पद्यावली' में एक दिन श्रीराधा के मान भयो । कृष्ण बोले हे राधे! तुम कुपिता (रिस भरी) हो । श्रीराधा बोली तुमही कुपितो अर्थात् पृथ्वी के पिता स्रष्टा हो । कृष्ण बोले तुम संब.जगत् की माता। श्रीराधा बोली तुमही सब जगत्के माता (नापबेवाले)। कृष्ण बोले हे देवि! तुम परिहास केलिकलह में अनन्त हो अर्थात् अन्त शून्य हो । श्रीराधा बोली तुमही अनन्त हो । यह मन्द मुसक्याते वल्लवसुन्दरी के वाक्ययुद्ध से पराजय से करतें शौरि श्रीकृष्ण ! तुह्मारी शोभा करों। फिर तोता १-'पद्यावल्याम' अगुल्या कः कपाट प्रहरति कुटिलों माधवः किं घसन्तो नो चक्री I कुलालो नहि धरणिधरल,किं.द्विजिह्वः फणीन्द्रः। नाई घोराहिमर्दी किमसि लगपतिनों हरित कि फीयो राधावाणीमिरित्यं प्रहेसितवदनः पातु पश्चक्रपाणिः ॥ -हरिहरस्थ-राध त्वं कुपिता त्वमेव कुपिता स्रष्टाति भूमेर्यतो माता त्वं जगतां स्वमेव जगतां माता न विज्ञोऽपरः । देवि त्वं परिहासफेलिफल जन्ता वर्मवस्यसो स्मेरो पल्लषसुन्दरमिवनम शौरिः श्रियं का क्रियान,,..
(५८) बोल्यो हे शारिक (मैना) बंसीधारी जगत् को नारीको चि- तहारी गोपनारीनके संग बिहारी मदन मोहन उत्कर्ष करके बरतो । मैना बोली हां जब श्रीराधा संग, बिराजमान हैं तब मदनमोहन हैं और जब श्रीराधा न होयं तो विश्वमोह- न भी होके स्वयं मदनसे मोहित होजाय । या प्रकार सबसे गुणन में श्रेष्ठ श्रीराधा हैं। अब छठवों विशेषण सकल इष्ट काम अर्थात् सब वाञ्छित कामकी दाता श्रीराधा अथवा सकल के मध्यमें प्यारों काम नाम मनोरथ सो कौन है कि श्रीकृष्ण तिनकी दाता श्रीराधिका के उपासकन को श्रीकृष्णकी प्राप्ति सहजही होजाय है अथवा जितने इष्टं वस्तु हैं और जितने इष्ट हैं उनकोभी काम नाम वाञ्छित ऐसो प्रेम ताकी दात्री प्रसिद्ध श्रीराधा हैं । बिना प्रेम हरिकों मिलबो भी अच्छी नहीं । असुरनको भी मिलतेरहे तासे कृष्ण नहीं चाहिये, प्रेम चाहिये । महाभावस्वरूप श्रीराधा और रूढ महाभांववासी सब गोपी हैं । ये सब प्रेमके विलास हैं आचार्यने 'दशश्लोकी' के ग्रन्थ में प्रेमविशेष लक्षण पर्यन्त समाप्त कियो । काहेसे कि प्रेमको ही कोई अधिकारी नहीं है । आगे रागस्नेह आदिककी का चरचा है । सो केवल साधकन के उद्देशसे कह्यो और जब श्रीवृषभानुजा और उनकी सहस्र अपरिमित सखीनको नाम वामें आयो तो महाभा- १-वंशीधरी जगनारीचित्तहारीस शारिफे 'विहारी गोपनारीभिर्जीयान्मंदन- मोइनः॥ शारिकावाक्यम-रांधा सहें यंदा भाति तदा मदनमोहनः । अन्यथा विश्वमो. होऽपि स्वयं मदन मोहितः॥...
(५) वपर्यन्त प्रेमके विलास विराजैही हैं । परोक्ष भगवान् को प्यारो तासे परोक्ष रख्यो । कार्यसे कारण को अनुमान होय है । कारण में कार्य भरोही है । गोपीनको श्रीकृष्ण में रूंढभाव श्रीउद्धवजी ने वर्णन कियो हैं कि ये गोपवधू पृथ्वीके ऊपरं परमं सफलजन्मा हैं जिनको अखिल आत्म गोविन्द में रूढ भाव हैं, जा रूढ भाव की बड़ेबड़े मुनि और हम व मुमुक्षु चाहना करें हैं। अनन्त की कथामें जाको रस आगयों ताको ब्राह्मण व ब्रह्मा के जन्म से का प्रयोजन नीच भी होय तब भी कृतार्थ है । गोपी तत्सुखी अर्थात् कृष्ण के सुखमें जिन को सुख जैसे द्वारिका की पटरानी तत्सुखी व स्वसुखी दोनों हैं और कुब्जा केवल स्वसुखी है । गोपिनको काम भी प्रेम- पार्ययो हैं सोही लिख्यो है तन्त्र में प्रेमही गोपीन को काम है यह प्रथा.प्राप्त होती भयी यात उद्धवादिक भी या काम की चाहना करें हैं जो भगवान के अति प्यारे हैं जो गोपी कामि- नी होती तो श्रीकृष्ण उनको अपनो निर्दोष संयोग नं बताते और उन में रूढ भाव कैसे होतो । तत्सुखीको लक्षणः 'गोपीगीत' में वर्णन कियो है गोपी बोली हे कृष्ण जो तुझारे चरण कमल सुन्दर कोमल तिनकों अपने कठोर स्तनपर धरबको बहुत चाहैं हैं पर कोमल चरण १-श्रीमद्भागवतें'-एताः परं तनुभृनो भुवि गोपवध्वो गोविन्द एवमखिलात्मनि- मंदसावीः बिछान्ति यद्भवाभियो मुनयो धयश्च किं ब्रह्मजन्मभिरनन्तकारसस्य । ३-तन्त्र' प्रेमेव गोपरामाणां काम इत्यगमत्थाम् । इत्युद्धवादयोऽपि तंदु वाञ्छन्ति भगवप्रियाः ३-भीमद्भागवते'-पत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषु-भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटासि तदव्यथते. न किखित्कादिमिर्धमति धीभवदायुषा नः ॥ - में चोट न लगजाय तासे डरमैं हैं .धीरे २ धरै हैं तिन च- रणन से तुम बनमें फिरो हो तो का कुशकंकणादिक से व्यथा न पावते होयंगें! हमारी जीवनरूप आयु तुमही हो तासे हम दुखपावें हैं। रति प्रेम, स्नेह प्रणय, रागनुराग, भाव ये प्रेमके ही विलास साहित्यदर्पणादि प्राचीन ग्रन्थन में लिखे हैं, उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं । इनको विस्तारपूर्वक विवरण श्रीरूप गोस्वामी ने 'उज्ज्वलनीलमणि' ग्रन्थ में कियो है संक्षेप आशय लेके या ग्रन्थ में दिखाये हैं। और उदाहरण भी अपनी बुद्धिपूर्वक लिखे जाय हैं । जैसेः- रति बीज प्रणय खांड प्रेम ईख = राग शर्करा स्नेह रस = अनुराग अनुराग = सिता(मिश्री) महाभाव = सितोपला(ओला) इन.गोपिन में रति आदिक और साधकन कीसी नहीं हैं किन्तु महा भाव सहित हैं । अनेक जन्म को रूंढ भाव कृष्णमें भरो है अवतार समय प्रथम दर्शन में लोक शि- क्षा को रति सदंश प्रतीति होय है । जाको जितना प्रेम जा जातिको श्रीकृष्ण में उदय होय है तामें श्रीकृष्णको भी उतनों ही वाही जाति को (प्रेम) उदय होय है. । रूढ भावको लक्षण रासपश्चाध्यायी में जब अन्तर्धान भये तब प्यारी श्रीकृष्णकी चाल ,मन्द मुसल्यान भाषण आदिके विषय प्रतिरूढ मूर्ति होजाती भयीं। और सो कृष्णः हमही हैं ऐसे.निवेदन करती भयीं। अभेद ब्रह्मज्ञान की शङ्का न होय ताके लिये दो विशेषण हैं । तदात्मिका' नाम तिनमें १-तत्रैव-गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादषु प्रियाः प्रियस्य प्रतिमूर्तयः । असावह वैयंत्यपलास्तदामिका न्यवेक्षुिः कृष्णविहारविनमा । मान गुड़ - - (६१) मन तदाकार होगयो और तिनके विहारमें विभ्रम होगयो तहां ही और भी कह्यो मैं कृष्ण हूं मेरी ललित गति देखो तहां भी 'तन्मनाः' विशेषण है। अभिप्राय यह है कि सा. मान्य भूतको जापर आवेश होजाय सोई अपने को छोड़के भूतरूप होके बोलै,इनने ध्यानकर मनलगाय नन्दपूतको पूर्ण आवेश अपने मन ऊपर करलियो तो कृष्णरूप होके बोले तो का आश्चर्य है । तासे कृष्णरूप होके कृष्णलीला को अनु- करण करती भयीं। सौ इनके भावकी रूढता तीन प्रकार मन वाणी कायाकी है तामें मनकी तदाकारता जैसे 'गीतगोविन्द में मधुरिपु मैंही हूं ऐसी भावनाको स्वभाव पड़गयो । वाणी क्री तदाकारता जैसे. 'सूरदासजी ने वर्णन करी "माई कोई लेवरी गोपालहि । दधिको नाम श्यामरस सुन्दर, बिसर गयो ब्रजवालहि" इत्यादि। और भी “चोली चीर हार हीर मांगत, मुखनिकरत श्याम है। और कायाकी तदाकारता उन.को अनुकरण करनो सो श्रीमद्भागवत' में सब लीला, करनो प्रसिद्ध ही है । जब अंत्यन्त रूढ दशा होय तब कृष्णरूप ही होजाय । जब कुछ शिथिलता होय तब विरह व्याकुल वृक्षादिकन से पूछती फिरैः । तामें पूर्व संस्कार से अथवा सुनवेते. दर्शन करके बड़ी प्रीति से कृष्णमें मन लगजाय ताको नाम रति है। जैसे पद्यावली में हे.सखि मैं जमुना किनारे के एक रस्तापर जाती रही, तहां एक जल- घर (बादर) कान्तिकी श्याम मूर्ति अकस्मात देखी। दृगभंगी १-'श्रीमद्भगवते'-कृष्णोऽहं पश्यत गति ललितामिति तन्मना। २-'गीतगोविन्दे'-मुहुरवलोफितमण्डनलीला.मधुरिपुरहामेति भावनशीला ॥ ३-'पद्यावल्पाम'-अकस्मादकस्मिन् पथि सनि मया यामुनतटं ब्रजन्त्या होऽय नवजलधरश्यामलतनुः । स हरभङ्ग्या किंवाऽकुरुतेन तु जाने तत इदं मनो मे ज्यालोले कचन गृहकृत्ये न बलते ॥
(६२)
से जाने काह कियो तो. यह मैं नहीं जानों तब से मेरो
मन ऐसो चञ्चल भयो कि घरके काममें लगै नहीं ।। विघ्न
कैसे भी प्राप्त होय पर प्रीति घटै नहीं ताको नाम प्रेम है
सो रासपञ्चाध्यायी में प्रसिद्ध है । जव गोपिन को वेणु
बजायके बुलाई और वे सब धर्म छोड़ के श्रीकृष्णके पास
चली तब उनके पति भैय्या बंधूनने रोकी पर गोविन्दने
मन हर लियो नहीं लौटती भयीं प्रेम बहुत बढ़े तव चित्त
द्रवीभूत होयं अर्थात् पिघलै ताको नाम स्नेह है । सो स्नेह
दो प्रकारको घृतस्नेह, मधुस्नेह । तामें घृतस्नेह चन्द्रावली
आदिमें तदीयतामय नाम हम उनकी हैं भावान्तर से मिल
कर सुरस होय जैसे धी मिश्री आदि से सुरस होंय सोई
उज्ज्वल नीलमणि' में जो श्रीकृष्णको दूरसे देखके उठ
आदरपूर्वक आलिङ्गन करें, जो पवित्र पूर्ण बड़े स्नेह से उन
कों वशीकर और श्रीकृष्ण की कलि की वर्षा से मिश्रीके
ओला के तरह घुलजाय ऐसी हमारी सखी चन्द्रावली के
साथ कौन उपमा देवेयोग्य है यह पद्माने कह्यो आदर गौ-
स्वता से होय है सो दोनों के आश्रय है। मधुस्नेह मदीय
तामय नाम प्यारो हमारो है। आदरशून्य आपही माधुर्य
को भरो नाना रस जामें भरे जैसे मधु और काहू से मिल
१-'श्रीमद्भागवते-ता वार्यमाणाः पतिभिः पितामातबन्धुभिः । गोविन्दाप.
हतारमानोन न्यवर्तन्त मोहिताः।
'उज्ज्वलनालमणी'-अभ्युत्थाय विदुरतो मधुमिदा यालिप्यते सादर या स्नेहन
वशीकरोति गुरुणा पावित्र्यपूर्णेने तम् । क्षिप्र याति सितोपलेव विलयं त्वत्केलिवृष्टया
च या युक्ता इन्त कयोपमातुमपि सा चद्गावली मे सखी॥
(६३) वेंकी अपेक्षा नहीं सो श्रीगधा है। श्रीकृष्ण बोले हे सुबलं! स्नेहरूप माधुर्यसार से श्रीराधा बनी है। सुधामयी जैसे प्रति- मा ताकी न्यायघन होके भी भावरूप गरमी से पिघलजाय है। सो राधानाम व धाम कोई प्रसंगमें भी मेरे कानके छंदमें प्राप्त होय तो जाकी उपमा नहीं ऐसी निविड आन- न्दमयी होय तत्क्षण सब जगत् को भूल जाऊं। . अब मान वर्णन करे हैं जब स्नेह अधिक हो तव कोई कारण से अथवा विना कारण से जो कुटिलता ताको नाम मान है । नायक नायिका के आलिंगन चुम्व- नादि को विरोधीमान है । चन्द्रावलि आदि में उदात्त अर्था- त् सरलपने को मान है कबहूं सरलपनो वामता की गंध लिये रहे श्रीराधाको ललितकौटिल्य मानहै सो जैसे कार- ण से “पद्मावली” में-झूठी. वकवाद मत करो चुपहोजाव बहुत दिननसे कामी तुमको जानोहौं । जाके इन चरण नख के विलास रागबाहुल्य से तुह्मारो हृदयपद प्राप्त भयो है ताही प्यारी के पास खुले मैदान जावो मो सदा की सूधीसाधी कुटिलता जानौं नहीं मेरेसे तुम्हारो का काम हैं। अकारण मान जैसे भगवत रसिकने कह्यो । अपराध नहीं पिय. को कछु भूल तू गई । प्रतिबि देख आपनों सखि पीठ क्यों दई । “और भी" पिया उर मुकुर निहार १-उज्ज्वले कृष्णवाक्यम्-राधास्नेहमयेन हन्त रचिता माधुर्यसारेण सा सौधाव प्रतिमा धनाप्युरुगुणर्भावोमणा विगुता ॥ यन्नामन्यपि धामनि श्रवणयाति प्रसङ्गेन मै सान्द्रानन्दमयी भवत्यनुपमा सद्यो मगदूधिस्मृतिः। २-'पद्यावल्यां' कृतं मिथ्या जल्पविर में विदितं कामुक चिरात प्रिया तामेवोच्चरम सर यदी यै नखपदेविलासैश्च प्राप्तं तव हदि पदं रागबहुलैर्मया ते किं कृत्यं ध्रुव- 'मारिला चार पपया।
अपनपो निभ्रम विकलं मानयुत भारी । चिबुक चारु
प्रलोय प्रबोधिन निज प्रतिबिम्ब जनाय निहोरी ।।
"अब प्रणय कहै हैं कान्त की देहादि के साथ अपने देहादि
को ऐक्य भावनामय जामें संभ्रमनहीं ताको प्रणय कहैं ।
यही प्रणय जो विनय को भरो होय तो मैत्र प्रणय कयों
जाय और जामें भय नहीं प्यारे को अपने वश कर राखे
तो संख्य प्रणय होय तामें मैत्रप्रणय रासपंचाध्यायी में,
कोई श्रीकृष्ण को करकमल हर्ष से अपनी अञ्जलि में
लेती भई । कोई तिनकी भुजा चन्दन चर्चित कंधे पर
धरती भई । संख्य प्रणय यथा श्रीकृष्ण की जानुपर नि.
तम्ब धरे, उनके वक्षस्थल पर अपने वक्षोज धरे, मुखपर
मुख, उनकीभुजा अपनी तकिया करी, अपनी भुजा उनके
कंठ लपेटी, ऐसे प्यारी सोई, जागी नहीं । अति विश्वास में
भी कहूं मान होय है, यथा 'रासंचाध्यायी' में-तोके अंतर
वन के उद्देश जाय के गर्व से केशवते बोलती भई मैं चल
नहीं सकौं जहाँ तुम्हारो मन होय ले चलो ॥ प्रणय के
'उत्कर्ष से जब दुःखभी चित्त में सुख रूप से अनुभव हो ताको
राग कहैं । जैसे 'प्रेमपत्तन में भयंकरग्रीष्म की ऋतुमें
संताप बहुत शून्य रासतापर दोनों प्रिया प्रीतमं बात कररहे
..-१-'श्रीमद्भागवते काचिंतकराम्बुजं शौरेजगृहेऽम्जालि ना मुदा ॥ फाचित धार:
'तद्वानुमंशे चन्दन कपितं ।
२ कृष्णस्य जानुपरतन्त्रितसान्नितम्बा वक्षास्थले धृतकुचा वदर्पितास्याः कण्डे
निवोशितभुजास्यभुजोपंधाना कान्ता नहींङ्गितिःमनागपि लन्धबोधा।
३-श्रीमद्भगवते-ततो गत्वा वनादृशं दृप्ता केशवमनवीत ॥ न पारयेऽहं चलितु
४-प्रेमपत्तने-भीमग्रीष्मऋतु संतापशून्यरथ्यान्तरस्थयोः ॥ अन्योन्यालापसुखिनो
धुनीश्चन्द्रायते रवि
नयमा यत्रते मनः।
(६५) दोनों संलाप में सुखी ऐसे भये कि सूर्य की किरण चन्द्रसी शीतल है गई । राग दो प्रकार को एक नीलिमा, एक रक्तिमा या रागमें कवहूं घटवे की संभावना नहीं है जो वाहिर में अतिशय प्रकाशमान होके आत्मलग्न भावकोआ- वरण करे ताको नीलिमा कहैं यह राग कबहू नष्ट नहीं होय और काहू की अपेक्षा नहीं करे और जो अपनी कान्तिद्वारा सदाही वढतो जाय जाकी भावको आवरण न होय तो रक्तिमा राग बोल्योजाय है सो श्रीराधाकी सखी श्रीललि- ता रगंदेवी आदि में है ताही के अन्तर्गत मसिहा राग है सो श्रीरापाको है। नील राग बहुत काल को साध्य श्याम राग बोल्यो जांय है सो भद्रादि में है । मंजिष्ठा राग को विशेष धर्म यह है कि आवरणशून्य है श्यामलादि में भी रक्तिमा राग है पर कुसुम्भी है यह कुछ दूसरे की अपेक्षा करै है इन सब में मंजिष्ठा रागवारी श्रीराधा को उदाह- रण दिखावे हैं सब सखीन ने श्रीराधाको बहुत सिखायो कि तुम मान करके अपनो गौरव बढाओ मनको उपराम करलेव कितनी ही श्रीकृष्ण विनय करें मत मानो लोही श्रीराधाने कियो पर जब अत्यन्त व्याकुल भई, तब बोली, विरह की श्वासे सो मुख को जरावें हैं और हृदय को नि- मूल करके मथन करें हैं, निद्रा आवे नहीं, प्यारे को मुख दीखे नहीं, रातदिन रोवें हैं, अंग सब सूखें हैं, चरण में पड़े जो प्यारो ताको त्याग दियो हे सखियो! तामें कौन गुण १-पद्यावल्यां-नि:श्वासाघदनं दहन्ति हृदयं निर्मूलमुन्मथ्यते निद्रा नैति न दृश्यते प्रियमुलं रात्रिंदिवा रुद्यते । अङ्गं शोष मुपैति पादपतितः प्रेयांस्तथोपेक्षितः सख्यः किं गुणमाकलय्य दयिते मानं वयं कारिताः॥
- देखके तुमने मोसे. मान करायो, सदा अनुभव करने में भी जो प्यारों नयो नयो लगै ताको नाम अनुराग है सो 'दानकेलिंकौमदी' में. जैसे गोवर्द्धन की दानघाटी में श्रीकृष्ण के दर्शन करके बोली हे सखि ! हरि वारम्बार हमारे नेत्रपथ में आये हैं पर पहिले. कबहूं ऐसी माधुरी नहीं देखी एक अंग के एकदेश में जो माधुरी है ताके लवमान आस्वादन करवे को ये नेत्र समर्थ नहीं हैं पर- स्पर को वशीभाव ताको प्रेमवैचित्र्यः कहैं । ताके होवे से बिना प्राण जातिमें भी जन्म होवेकी लालसा होय है। और सदा वियोग की स्फूर्ति रहै तामें विना प्राण जातिमें जन्म की लालसा, 'दानकेलिकौमदी' में ललिता से श्रीराधा बोली हे कशोदार ! हम बांस जांति में जन्म लेचेको तप करेंगी सब जातिसे बांस श्रेष्ठ है कारण यह कि यह मुरली बहुत. तपस्या के फल से मुरारि के बिम्बाधरमाधुर्य को आस्वादन करै है। संयोग में भी वियोग की स्फूर्ति जैसे भगवत रसिक ने कह्यो अश्वरात मिलवे को निलदिन मि- लेहु रहत मानौं कबहुं मिलेना, 'राधासुधानिधि' में प्यारे के गोद में बैठी भी हा मोहन ! अकस्मात् ऐसो मधुर प्रलाप विधान करें श्यामसुन्दर के अनुराग में देख विह्वल अंग १-'दानमलिपीमुद्या-प्रपन्नः पन्थानं हरिरसकदे तन्नयनयोरपूर्बोऽयं पूर्व क्वचिदपि न हटो मधुरिमा । प्रतीफेऽप्येफस्य स्फुरति मुहुरङ्गस्य सखि या प्रियस्त- स्या : पातुं लवमपि समर्था न हगियम् ।। २-'दाननेलिफौमुद्या-तपस्यामः क्षामोदरि घरयितुं वेणुषु जनुर्वरेण्यं मन्यथाः सखि तदखिलानां सुजनुषाम् । तपस्तोमेनोधैर्यदि- यमुररीकृत्य मुरली मुरायतेर्विम्याधरमधुरिमाणं रसयति ॥३-राधासुधानिधौ,-अङ्का- स्थितेऽपि दयिते फिमपि प्रलापं हा मोहनेति मधुरं विदधत्यकस्मात् । श्यामानुराग- मदविह्वलमोहनाजी श्यामा मणिर्जयति कापि निकुझसीमिन ॥
(६७) जिनके ऐसी निकुंजसीलि श्यामा मणि कोई उत्कर्ष से वि- राजे हैं भाव की पराकाष्ठा अर्थात् जहां ताई वढ सके तांको नाम महाभाव है सोरूढ व अधिरूढ दो भेदको है।जा समय श्रीकृष्ण के सुखमें भी पीड़ाकी शंकाले महान दुख होय नि- मेषमात्र काल बिना दर्शन सहो न जाय सब विस्मरण हो- 'जाय ताको रूढभाव कहें तामें पलक बरावर काल बिना दर्शन सद्यो न जाय सो दशमस्कन्ध में गोपी बहुत कालसे बांछा करती जिनके दर्शन के विघ्न में पलक बनायवे वारे को गारी देती तिन श्रीकृष्ण को पाय के नेत्रबारा हदय में ले जाय के सब आलिंगन करके तिनके भावकों प्राप्त होती भई जो योगिन को दुर्लभ अथवा तिनके नित्य पास रहिबेवारी रुक्मिणी को दुर्लभ है । मुख में भी पीड़ा की शंका सो 'यत्ते सुजात चरणांबुरुह' में कहि आये। मोह के बिना सवको भूलनो जैसे एकादश में उन गोपीन ने मोम ऐसी बुद्धि बांधी कि अपनी आत्मा तथा विश्व को नहीं जानती भई जैसे समाधिमें मुनि को अनुसंधान नहीं रहे और समुद्र के जल में जैसे नदी प्रवेश होय ता रीति से मोको प्राप्त- होती भई यह श्रीकृष्ण ने उद्धवजीते कहो या रूढ सहा भाव से क्षण कल्प बरावर कल्प क्षण बराबर होय एकादश में उद्धव से भगवान के वाक्य कि मो प्रेष्ठ-के गोचर के स- १-श्रमिद्भागवते-निमेपासधता यथा-गोप्यश्च कृष्णमुपलभ्यचिराभीष्टं यत्प्रेक्षण हशि तु पक्ष्मकृतं शपन्ति ॥ हगभिईदीकृतमलं परिरभ्य सर्वास्तद्भावमापुरपि नित्य- युजां दुरापम् । २-एकादशे-ता नाविदन्मन्यनुपङ्गबद्धधियः स्वमात्मानमदतथेदम् ॥ यथा समाधी मुनयोऽधितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे । ३-तत्रैव-तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नाता मयैव वृन्दावनगोचरेण । क्षणार्द्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां होना मया कल्पसमा वभुः ॥
(६८) मयमें गोपिन को जोजो कल्प वराबर रात्रि क्षणमात्र भई रही सोही वृन्दाबन में सामान्य रात्रि मेरे बिना कल्प समान होती भई। जा समय कोटि ब्रह्माण्ड के सुख हरि के दर्शनादि सुख लेशके बराबर न होय और विरह लेश के बराबर कोटि ब्रह्माण्ड की पीड़ा न होय ताको अधिरूढमहाभाव कहैं, जैसे शिववाक्य एक दिन श्री पार्वती श्रीराधा को, प्रेम पराक्रम पूछनेलगी शिवजी बोले लोक से न्यागें जो वैकुण्ठ व कोटि ब्रह्माण्ड के जो और दुख तीनकाल भूत, भविष्यत, वर्तमान के जो दोनों अलग अलग इकठे होयं तो भी श्रीराधाकी प्रेम परिपाटी से उत्पन्न भये जो सुख दुख ताको समुद्र वाकी बून्द को नहीं प्राप्त होय । यह अधिरूढ दो प्रकारको है मोदन और मादन मोदन जब उदय होय तब कृष्ण और उन- की प्रेयसीन को महाक्षोल वचमत्कार होय सुदीप्त सात्त्विक के विकार दिखाई पड़ें सो श्री राधिका और उनके यूथ में है अन्य- न नहीं यही मोदन बड़े वियोग की दशामें मोहन होय जाके उदय होवे में श्रीकृष्ण को पटरानी आलिगंन करें तवभी ताप मूर्छा होय .श्री राधिका के विरह में ब्रह्माण्ड को क्षोभ करावं तरुलता को रोदन करावै सो केवल वृन्दावने- श्वरी के यूथ में अन्यत्र नहीं लो उमापतिधरने “पद्यावाल" में लिख्यो है मथुरा से कोई एक सन्यासिनी आशीर्वाद देके ललितादिक की सभा में बोली जाकी रत्ननकी छाया १-अथ शिववाक्य-लोमातीतमजान्डलोटिगमपि त्रैकालिकं यत्सुखं दुःन चति पृथग् यदि स्फुटप्नुभे ते गच्छतः कुटताम् । नेवाश्यासतुलां शिवे ! तदपि तत्कटद्वयं राधिकाप्रेमाद्यत्सुम्नदुःखसिन्धुभवयोर्षिन्देत विन्दोरपि ॥ २-पद्यावल्यां-रत्नछायाः च्छुस्तिजलधौ मान्दरे द्वारिकाया रुक्मिण्यापि प्रबलपुलकोद्भेदमालिङ्गितस्य । विश्व मायान्ममृगयमुनातीरवामीनुले राधाकेलीभरपरिमलध्यानमूर्छा मुरारेः ॥
से जलनिधि जो समुद्र कर्बुरित नाम ऊजरो कारो भयो ऐसे द्वारिका के मन्दिर में रुक्मिणीजी जिन श्रीकृष्ण को आलिंगन करें और पुलक अंगमें होय ताही समय यमुना के किनारे कुंजसंबन्धी श्रीराधाकी केलि परिमल ध्यान करते २ श्रीकृष्ण को मूर्छा उपस्थित भई सो विश्व की रक्षा करे। श्रीराधाको भी विरह दुख अद्भुत है सो सूरदास ने वर्णन कियो दुहू दिश को दुख दुःसह विरहनी कैसे करजोसहैं जव राधा तब माधव माधव राधामाधो रटत रहे । गोपिन कों मरे परभी अपने शरीर के पांचभूत की श्रीकृष्ण संगकी तृष्णा रहे सो 'पद्यावली' में-जो हमारो शरीर मृत्युकों प्ताप्त होय और पांचभूत अपने २ अंश में प्रवेश होयं तो शिरसे दण्डवत् करके विधाता को हम यह बर मांगें कि हमारे शरीर को जल तिनकी बावरी में मिले और ज्योति तिनके मुख देखबेके दर्पण में और उनके आंगन के आ- काशमें आकाश और उनके चरण चलवे के मार्ग में माटी और उनके पंखा के पवन में पवन मिलै सो कृष्णमय तन मन सूरदासजी ने वर्णन कियो गोपिन ने कही- ऊधो जो कोई या तन हि फेर बनावै तऊन नन्द नंदन तज मधुकर और कछूमन आवै ।। या तनकी कोई त्वचा काढके सुन्दर दुन्दुभि साजै । : विविध उतंग तान रंग से श्याम श्याम कहि बाजै ॥ . . या तनकी कोई करैः किंगरी और नसन के तार । १-तत्रैव-पञ्चत्वं तनुरेतु भूननिवहाः स्वाशे विशन्तु स्फुटं धानारं प्रणिपत्य इन्त शिरसा तत्रापि याचे घरं तद्वापौषु पयस्तदायमुकरे ज्योतिस्तदीया ङ्गणे व्योस्नि व्योम तदीयवर्त्मनि घरातत्ताल वृन्तऽनिल ॥ .. . -1 - -
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(७०)
आठौं जाम मधुर ध्वनि निकतै सुन्दर श्याम मुरार ॥
निकलें प्राण होय तन मिट्टी द्रुम लागे तिहँ ठाम ।
सूरदास शाखा फल पत्री लेत उठै हरि नाम ||
मादत केवल कृपभान नन्दिनी में है सोही वृत्ति भेदले
दिव्युन्माद होय ताके उदय होवे से उद्घर्णा प्रेममयी प्रलाप
देखी जाय और अनन्त भाव उठे ता समय वनमाला ते
ईर्षा पुलिन्दी की बडाई तमाल स्पर्श करे जो मालती ताको
सौभाग्य वर्णन यह सब होय सो अनिर्वचनीय अवस्था
है । तामें प्रलाप के दप्त जल्प भ्रमरगीत में लिखे हैं तो
भ्रममयी अवस्था है। तीव्र जो अन्तिम उत्कंठा ताले जा
समय जो उन्मत्तता प्यारे की संगम की होय सोई वकै जैसे
लब गोपी उद्धवसे कृष्ण की वात पूछ्वेलगी कोई एक
प्यारे को संगम ध्यान करत भौरा को देखके मानों कृष्ण
ने हमको मनायवे को दूत भेजो तालों वाली अथवा प्यारी
के प्रलाप सुनवे को कृष्ण ही भौंरारूप धरके आये इन
जल्पों का क्रम नहीं है जैसे हे कपटी के बन्धु ! हमारे
चरण मत छूवे । एक बार अधरामृत मोहनी प्याय के
हमें दोनों लोकसे भ्रष्ट करी। हे छै पांवके वा देखेभारे
को हमारे आगे क्यों गावै । स्वर्ग पातल पृथ्वी में वा
कपट मुस्क्यान वारे को कौन स्त्री दुर्लभ है मेरे चरण पर
माथो मत धरै तेरी मान मनावेकी चाटुकारी जानो हो ।
वा कारे ने बधिक की तरह बाल वानर मारो, बलि बांध्यो,
शूर्पणखा विरूप करी तासे हम कारे के संग से धाई।
१-श्रीभागवते-फाचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायती ततसङ्गम् ॥ प्रियप्रस्थापितं दृतं
पल्पयत्यदसनवीत् ॥
. .७१) वाकी कथा एक. बार सुनवेवारो नष्ट होजाय हमने तो वाको संग कियो कैसे न नष्ट होय । कपटी के बचन हमने श्रद्धा करके सच्चे जाने । हे प्यारे के सखा फेर आयो प्यारे ने भज्यो मांग का मांगे है ॥ मधुपुरी में आर्यपुत्र अब हैं पिताको घरको बन्धु गोपन को स्मरण करे है अगरं सुगंधी की भुजा कबहूं माथेपर धरेंगे यह दिङमात्र दिखायो। अब इतनो और विचार है कि प्रेमी तीन प्रकारके एक कृष्ण में प्रेम विशेष करें श्रीराधा में उनसे कम, दूसरे युग- लकिशोर में समान, तीसरे श्रीराधा चरण प्रधान वारे । तामें श्रीराधा चरण प्रधानवारे रसिकन ने श्रेष्ठ बताये हैं, राधासु- धानिधि में लिख्यो है कि वृषभानुजी जो ब्रज में श्रेष्ठ तिनकी पुत्री श्रीराधा प्रणय रसको मूर्ति उनकी दास्यता जो हमको मिल जाय तो हमको धर्म करवसे का और देवता समूहसे का प्रयोजन और ब्रह्मासे का और महा- देवजीसे का और श्याम सुन्दर के मिलबको' यत्न का करनो सो आपही आ जायगे । श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु में श्रीरूप गोस्वामी ने लिख्यो है कि सुहृद जो श्रीराधिका तिनमें ललितादिक मुख्य सखीन की जैसी रती ताको आश्रय लेके अर्थात् जैसे श्रीललितादिकन कीरति श्रीकृष्ण से श्रीराधा में विशेष है ऐसे कोई भक्त विशेष की सति श्रीराधा में कृष्ण रति के समान होय अथवा ऊना नाम कम होय तो ताको संचारी कहैं। और जो श्रीकृष्ण से. १-'राधासुधानिधों-रहादास्यं तस्याः किमपि वृषभानोब्रजवरीयसः पुयाः पूर्णप्रणयरसमुर्तर्यदि लमे । तदा नः किं धर्मं किमु सुरगणैः किञ्चविधिना किमी- शेन श्यामाप्रयामिलनयनरपि च किम् ॥
(७२) श्रीराधा में अधिक होय और निरन्तर अभिनिवेश अर्थात् रांधानाम रूप कीर्तन ध्यान द्वारा बढती चली जाय तो मधुर नाम के रस में संचारी होके भी पहिले से श्रेष्ठ है या रति को भावोल्लास नाम है संस्कृत के श्लोकन से या प्रकरण में बहुत प्रमाण दिखाये भाषामें भी जैसे श्रीहरिवंश गोस्वामी राधा चरण प्रधान हृदय अति सुदृढ उपासी व्यासजी मोह श्याम को डेर नहीं श्यामा छूट तन आशा तेरी विहारन देवजी हम बेपरवाह विहारन के रसिका वतंस ने स्वप्न में युगुल किशोरके दर्शन किये श्रीराधा कृष्ण से बोली ये तुम्हारे रसिक आये यह बात सुनके वे महान दुखित भये और अन्नजल नहीं कियो श्रीजी ने हमको अपने रसिक क्यों न बताये--जब सखी सहस्रन से सेवित यह विशेषण श्रीराधाको है श्रीकृष्ण को नहीं तव अवश्य सखी राधा चरण प्रधान चहिये । सो वेराधा चरण प्रधान वारे दो प्रकार के एक तो श्रीकृष्ण को श्रवण कीर्तन अर्चनादिक से प्रसन्न करके राधा चरण में प्रीति मांगवारे, दूसरे श्रीवृषभानु पुरादि ग्राम में जन्स पायके श्रीराधिका के साथ भैय्या बहिनादि सम्बन्ध पायके उनकी सेवा करें और हमारी प्राणेश्वरी के कान्त हैं उनके नाते से श्रीकृष्णकी भी सेवा करें स्वतन्त्र कुछ सम्बन्ध नहीं । तामें पहिले को प्रमाण श्रीराधासुधानिधि में जो गोविन्द की कथामृत रस के हृदमें चित्त मेरो डूचो होय तिनके गुण कीर्तनार्चन विभू: १- भक्तिरसामृतासन्धौ-संचारी स्यात्स मोनाधाकृष्णरत्या सुतिः । मधिका पुष्यमाणा चंद्भावाल्याम इतीर्यते ॥२-राधासुधानिधा-यद्गोविन्दकथासुधारसहदे चेतो ममा जृम्भृत यद्वा तद्गुण कीर्तनाचनविभूपाचदिने प्रपितम् : यद्यत्पीतिरकारि तप्रियशनेप्यात्यन्ति की तेन में गोपन्द्रात्मजजीवनप्रणायनाश्रीगोधका तुष्यतुं ।'
(७३) षादि करके दिन प्राप्त कियो होय और जो जो उनके प्रिय जननमें मैंने अत्यन्त की प्रीति करी होय तो श्रीनन्दके बेटा की जीवन प्रणय वारी श्रीराधिका मोपर प्रसन्न होय, दूसरी विवाहादि समय में वृषभानु घरकी नित्य परिचारिका दायजे में गई वे नित्य दासी । अब श्रीराधाचरणप्रधान वारेन को विभावादि वर्णन करें हैं । प्रीति जामें आस्वादन करी जाय ताको नाम विभाव है सो विभाव दो प्रकार को आलम्बन, उद्दीपन, तामें आलम्बन दो प्रकार को विषयरूप, 'आंधाररूप.तामें विषयरूप कृष्णसहित श्रीराधा आधाररूप श्रीललितादिक सखी तामें श्रीराधाको स्वरूप जैसे राधा- सुधानिधि' में गोरे अंगमें कोमलता, मन्दमुसक्यान में- मधुरता,नेत्रनके अंचल में दीर्घता, वक्षोजमें गरिमा, मध्यांग में सूक्ष्मता, चालमें मन्दता, नितंबमें पुष्टता, भ्रुकुटि में कुटिलता, विम्बाधर में लालिमा, हे राधे तुम्हारे हृदय में कृष्ण रसकी जडिमा सो मेरे ध्यान के गोचर हैं । यद्यपिश्री- राधाके अंग आपहीभूषण रूप हैं उनको भूषण की अपेक्षा नहीं "लोही 'विदग्धमाधव' में कहा है मंद मुसक्यान की कांति की भंगी ही हार है फिर और हार-पहिराय के पिसे को पीसनो है। हे राधे! तुमको मंडन से का प्रयोजन अगं सोही प्रकाशमान हो तथापि भूषणन की साफल्य और रसिकन के हृदय १-राधासुधानिधी'-गौराङ्गे म्रदिमा स्मिते मधुरिमा नेत्राञ्चले द्राधिमा वक्षो- ले. गरिमा तथैव तनिमा मध्ये गती मन्दिमा । श्रोण्यां च प्रथिमा भ्रुवोः कुटिलिमा बिम्बाधरे शोणिमा श्रीराधे हदि तेरसेन जडिमा ध्यानऽस्तु मे गोचरः। २-विदग्धमाधवें-हारश्च स्मितकान्तिभङ्गिभिरलं पिष्ठान्नपेषीकृतः किं राधे. तव मण्डनेन नितरांमगरात,धोतिता ॥
(७४) सुखके अर्थ भूषण भी धारण करे तामें पहिले सोलह श्रृंगार, स्नान किये भई,नासा के आगे जाग्रन्माण,नीलपंट, सूत्रिणी (नीवी),वेणीवधी, चन्द्रिकासहित अगं चर्चित, चिकुर में फूल गुहे, माला पहिरे, कमल हाथमें, मुंख में पान, चिबुक में कस्तूरी की विन्दु, चिकुर में गुच्छा, नेत्रमें कजेल, सुचित्र मकरीपत्र,चरणमें महावर,तिलक लैंगे, इन सोलह आकल्प से श्रीराधा प्रकाश पावे । बारह भूषण वर्णन करें हैं, दिव्या चूडाकी मणीन्द्र, सोनेके रचे दो कुण्डल, नितम्ब में कांची, गरे में धुकधुकी, सूक्ष्म चक्राकार कौनके छेद में शलाका, दो हाथ में. चूणीघटा, कंठ में भूषा, जर्मिका (अंगूठी), तारा- नकोहार, कोटि रत्न लगे ऐसे कटक भुजा में, चरण में नूपुर, पदकी अंगुरी में विछियों से बडी छवि, वारह तंत्र करके जैसे सूर्य तैसे बारह भूषण से श्रीराधा प्रकाश पावें हैं आश्रयरूप श्रीललिता.विशाखादि सखी सहचरी मंजरी विशेष करके अपनी यूथेश्वरी श्रीरंगदेवीजी तिनको वणर्न है चरण दोमें शब्दायमान नूपुर हंसी. की. चाल चंचल (१)-अथ षोडशशृङ्गाग:-स्नाता नासाग्रजानन्मणिरसितपटा सूत्रिणी बद्धवेणी सातसा चीचंताङ्गी कुसुमितचिकुरा स्रग्विणी पद्महस्ता । ताम्बूलास्योरुविन्दुः स्तवकितचिकुरा फजलाक्षी सचित्रा राधालतोज्ज्वलाञिः स्फुरति तिलफिनी पोडशाकल्पिनीयम् ॥ (२)-अथ द्वादश भूषणानि-दिव्यश्चूडामणीन्द्रः पुरटविरचितो कुण्डलद्वन्द्वकाञ्ची काश्चक्री शलाकायुगवलयघटाकण्ठभूषोर्मिकान। हारास्ता रानुकारा भुजकटकतुं- लोकटयो रत्नक्लुप्तास्तुङ्गा पादाङ्गुलीयच्छविरति.रविभिभूपिता भाति राधा । (३)-श्रीरंगदेवीस्वरूपम्-सिझन्नूपुरपादपद्मयुगला हंसीगति विभ्रती चंञ्चत्खन- . नमञ्जुलोचनयुगां पानोल्लसत्कन्धराम् । शुभ्रतकाश्चनफडणद्युतिमिलत्पाणी चल- चामरं कुर्वाणां हरिराधिकोपरि सदा श्रीरङ्गदेवीं भजे ॥
(७५) मनोहर खंजन से दोनों नेत्र पुष्ट कंधा स्वच्छ कंचन के कंकण तिनकी कांति हाथ से मिलती भई ता हाथ में चमर श्रीराधा कृष्ण पर कर रही ऐसी श्रीरंगदेवी को मैं भजन करौं ! जिनके दर्शन से श्रीराधाको स्मरण हो जाय वे उद्दीपन जैसे अलंकार-मधुमती वीणा तडित् सुवर्ण, धाम- श्रीवरषानु राधाकुंडादि, लीला-रास मान हिंडोला होरी सांझी इत्यादिः श्रीराधाके प्रेम में श्रीकृष्ण और भक्त नृत्य गीत लोटन तन मोटन आदि करें सो अनुभाव हैं ये भाव को बोधन करावें हैं, यथा गीतगोविन्दे- राधावदनविलोकनविकसितविविधविकारविभङ्गम् । जलनिधिमिव विधुमण्डलदर्शनतरलिततुङ्गन्तरङ्गम् ॥ अर्थ-जैसे गीतगोविन्द में श्रीराधा मुख दर्शन से श्रीकृष्ण को नाना प्रकार के विकार खिलते भये जैसे समुद्र की पूर्णचन्द्र मण्डलदेखके लहरें ऊंची होय हैं । लालास्राव यथा तंत्रे-बदतः कृष्णराधांगसौन्दर्या माधुरीरसं भावांक्रांतहृदयस्य लालास्राव वक्रतः । अर्थ-लालास्राव अर्थात् श्रीकृष्ण महाराज श्रीराधा के अंगकी माधुरी को रसं जो कहबे लगे तो भाव से हृदय दब गयो मुखसे लालस्राव होबे लंग्यों जो चित्त को क्षोभ करावै वे सात्त्विक जैसे स्तंभ स्वेद रोमांच वेपथु स्वरभंग वैवर्ण्य अश्रु पुलका ये आठ हैं। यथा गीतगोविन्दे- सा मां द्रक्ष्यति वक्ष्यतिस्म च कथां प्रत्यङ्गमालिङ्गानः । ..
(७६) प्रीति यास्यतिरंस्यते सखि समागत्येति संचिन्तयन् ।। स त्वां पश्यति वेपते पुलकयत्यानन्दति स्विद्यति । प्रत्युद्गच्छति मूर्च्छति स्थिरतमः पुजे निकुञ्ज प्रियः ।। अर्थ-जेसै गीतगोविन्द में सखी श्रीराधा से बोली कि कृष्ण तुमको चितवन करें हैं कि प्यारी मोकों देखेंगी कामकथा करेंगी प्रत्यंग.आलिंगन करबे से प्रीति को प्राप्त होयगी और आयके. रमण करेंगी. ऐसे चिन्ता में भरे तुम्हारो दर्शन ध्यान में करें हैं कम्पायमान होय हैं पुलकित होय हैं आनन्दित होय हैं खेदयुक्त होय हैं उठ ठाढे होय हैं मूच्छित होय हैं महा अन्धेरी कुंजमें या रीति से व्याकुल हैं । अन्यदपि तत्रैव- प्रीति वस्तनुतां हरिः कुवलयापीडेन साई रणे। राधापीनपयोधरस्मरणकृत्कुम्भेन सम्भेदवान् ॥ यत्र स्विद्यति मीलतिक्षणमथ क्षिप्ते हिपे तत्क्षणात् । कंसस्यास्माभिर्जितजितमिति व्यामोहकोलाहलः।। अर्थ-गीतगोविन्द में कंसके कुवलिया पीड,हाथी के साथ संग्राम में श्रीकृष्ण को वाको कुम्भ देख के श्रीराधा के पीन पयोधर की याद आय गई तो पसीना हो आयो नेत्र मून्द लिये ता समय कस के पक्षवारिन को जीतो जीतो यह कोला- हल होतो भयो जब हाथीमार दियोतब शोक को कोलाहल . होत भयो सो कृष्ण तुम पर प्रीति विस्तार करो। व्यभिचारी यथा तंत्र- ध्रुवौ लिपन्नगुलिके च चालयन् विमर्शपूर्व सुबलो व्यतर्कय. तू । अयं हरिक्तिन मे समर्थितोन वेक्षते नर्मरलार्द्रया इंशा ।।
(७७)
राधाधरास्वादमदौघसंप्लुतो नत्वन्यथेयं विकृतिविभाव्यते।
अर्थ-व्यभिचारी यथा तंत्र में तर्क यथा बिचार-भौंह क्षेपन
करके अंगुली चलाय के बिचारपूर्वक सुबल तर्कना करतो
भयो कि मैं प्रार्थना भी करों तब भी ये श्रीकृष्ण न मो से
बोलें न नर्मरस की गोली दृष्टि से मोकों देखें मैं जानूं हूं
कि राधा के अधर आस्वाद को जो मद तामें डूबे हैं और
रीति से ऐसो विकार नहीं होय । ऐसें व्यभिचारी के निर्वेद
हर्षगर्वादिक भी समझलेने।
॥दोहा॥
श्रीहरिव्यासी पदकमल, दृढ हिरदय में धार ।
गुरु की कृपा मनाय के, कियो अर्थ विस्तार ॥
सब रसिकन की हाट ले, कणा कणा चुनलाय ।
हंसदासं अहमित भयो, निज दूकान लगाय॥
श्रीराधाको यश कहों, लाख भांत अभिलाष ।
उलटो सीधो जो बन्यो, हंसदास दियो भाष ॥
नहिं विद्या नहिं चतुरई, नहिं कविता की वास ।
क्षमहिं दिठाई रसिक जन, जान आपनो दास ॥
इति श्रीहंसदास संगृहीत,
राधारहस्य प्रकाशिका,
श्रीवृषभानपुर, बिलास गढस्थान ।
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२८ ॥ शुद्धाशुद्धि पत्र ॥ पृष्ठको अंक पंक्ति अशुद्धि शुद्धि १ ७ (संस्कृत भाषा) मनेन हंदासन मत्तेन हंसदासेन २२ टिप्पनी श्लोक २ सोपि सापि २१ बुद्धवार सोमवार २५ गभवान भगवान टिप्पनी में श्लोक रहिगया घेणुः फरान्निपत्तितं स्खलितं शिस्त्रण्डे भ्रष्टं च पीतवसनं पुरुषस्य तस्य । यस्याःफटाक्षशरमूछिननन्दसूनोः तं राधिकाचरणरणुमहं स्मरामि ॥ २६ ग्रान मान वर्तयन् नर्तयेत् वल्लमा वल्लभा २. विस्तासे विस्तार ९ इमा १६ पद्याम्बर पट्टाम्बर जन्मनायषी जन्मनीयुषी रंकवालया रंकमालया ध्यया ध्येया चिन्तवन चितवन ४२ ४ गोकुलं गोकुले गोपेषु गोपेषु गोषु ७४ टिप्पनी २ श्लोक काश्चक्री निष्काश्चक्री ७५ २२(संस्कृत भाषा) यथा गीतगोविन्दे सात्त्विक यथा गीतगोविन्दे दोहों के ऊपर रहिगया मधुराभावोल्ला- सरतिस्थायी है ३ ७७
मजsoval
जेलप्रेस जयपुर.
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