Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sanshipat Sursagar

Viyogi Heri · 2011/08

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संतिम-सूरसागर (३) हरि सौ ठाकुर औरन सनोजेहि जेहि यिधि सेवक सुप पाये, तेहि विधि रासत तिनको । मुंखे यहु भोजन शु उदर को, हा तोय पट तन को लग्यो फिरत सुरभी ज्यां मुत सँग, उचित गमन गृह यनको । परम उदार चतुर चिंतामनि, कोरि फुधेर निधनको । राखन है जनकी परतिज्ञा, हाय पसारत कनको ॥ संकट परे तुरत उठि धावत, परम हमट निज मनको । दोटिक कर एफ नहिं माने, सुर महात. पन को॥३॥ (१) सापर दीनानाय ढरे । सोह कुलीन यो सुन्दर सोर, जिना करा करे । राजा कौन यही रायन त, गहिं गर्य गरे । रक म कौन मुसामाह ते पापु समान करे ॥ रूपय कौन कि. मीता में, जन्म वियोग भरे ॥ अधिक कुरुप फोन । . मिति की उपासना पाय गम कर मुरदासको सगुन पासमा भषांत भीमा भगशन की सीता वरन करने। -गामिनदास । तोम्बार पर। मुम्भीर की गो, जो मदत कर देती है। शिामयिका रामणि, Pामद रिमाओं को हर का प्रोट मिर करता है। परम्परपनि । पाकि-निजाण । मानिसले हैं। संz, दुरा। नग्न, विदरसार को मारने वाला। ४- कोरीत-प्रयं प्रयास गरेमगो, भटए। सा, और मनपाली, मुनरी मोटारे । मरेकन्याद किया, विनय-यापी ३ . पुषिजाते, परि पति पार परे। योगी कौन पड़ो शंकर ते, ताशी काम हरे॥ फोन धिरत अधिक नारद सो. निसि दिन नमत फिरे ॥ धन सु कौन जामिना , पन तई जात डर । सुदास भगत भजन दिन, फिर फिर उर सरं ॥४॥ (५) हरि जु के जनी ति कुराईमहाराज पिवर सुरनर मुनि, देगल रहे सजाई । निरभप राज ताहिको दोन्हाँ, लागत मन न जाह । काम मांध मद लोन मोह मिलि. भये चोर ते साह द विस्वास कियो सिंहासन, तापर येउयो भूप । हरि अनुपिन्त न सोभित सिर, राजत परम अनुप ॥ हरि पद-पंफाज मा प्रेम पत. ताही के रंग राते । मंत्री शान न अवसर पावै, मदत न वनै समाते । अर्थ धर्म दोऊ रहे यह खुरि. माल मंसिर नायो । दिनय दिवेक विचित्र पौरिया, समय न पायो भए महा लिधि भागे वादी, फर और उर लोने । रार वैगार दिनोदो, दिररि वाहिले फोने ।। फायर काल स्टूनहि बाई, जोइहि रीतिहिं जाने। सूरदास नर तो जाने के, गुरुप्रसाद पहिचान ॥ ५ ॥ मन तास । कामनालाबोलित किया. कितनी घर लाए : भगतामा । बार-शरीर । जाजरना है। xरंडपन सदार्ग । काम स्मए। जो काम होप मोहादि और समापी ग्ल भुग लेने ..हा नगरत समाप्त म बात है गे पिया। पाया करने पर शान मंशिन-पूरमागर हरि मी ठाकुर और मजाकोहि जेहि विधि मेवरः गुण पाये, हि विधिगपत तिनको । म व भोजन छ सरको,हानोर पटसन कोलम्यो फिरत सुरभी ज्या गुन मंग, उभिन गमन गृर यनको ॥ परम उदार चतुर मिनि, कोटि कुयर निधनको । गलत है जनकी परतिमा. हाय पमारत कनको । मंकट परे तुरन उठि धायत, परम सुमर नि मनको कोटिकवर एक नहि मान, सूर महाकृत- पत्रको जापर दीनानाय रे मोर कुलीन बहो मुन्दर मोर, जिनारमा कर राजा कौन बड़ी गयन न. गर्गदि गई गोकन मुदामाद ने ग्राममान को हर कोन TY मला ने जन्म लिंग मरे। अधिक पुन्य कोन Fireीनाममा मा PT 1 भादापनी गा समान भीर मान कीमीदावर करत. नाजाय। नाराय। पुमौन मनोगौ मा प्रवदित र देती है। नियम, * सिको गरबा प्रोट मिरवाता है। प.। पानी भरir,T. "मन्त्र की सारी त्या। Thttी-त्रय समारा। am काहि .

ঠিনবী दुपिता ने.रिपति पार करे। योगी कौन पड़ी संकर ने, साकार हरे। फोन शिरत अधिर. नारद सौ. निति दिन नगर तिरे पर जानित ते, परत जात उमपात भगवंत मान दिन. फिर फिर कर हरि . उनकी प्रतिमहाविपररगर मुनि, देना निरनप प नारिको दोहों, लागत मन न न मनातीगोद निति, मरे पोरते महलािस किया सिंहासन, तार देपो मारे धिमा लोभित तिर. रजत परन अनुपरे पद- पंत. नाही कराने गीतान न सरसर पालन साधन दोपह दुदिलो र नापिनय पिक विविधरिला, सरनमशसिटि भागेबादी पर रसोनार र दिनोददिर चाहिने पारोनि मान मरदास .

गति गंगा
For लोधी नीलिममा गुग गा माग
नामोनियमनकार दर तीन
rint नि.माना गांग नाम माकपट गति
प्रमाणे
मनिकमा
aur iamrahim मे यो मगनी
Arrar मा श्री महामा, मन र मद
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मंशिा गरमागर
पिनमत वा समानिधि, प्रथिनागी एलराल । मान
प्रभारी जाम्यो, गो मोह की तुम गर
minारण, भाग्न पान मुराशिमोह समुद्र
रबी मुगा गमा
(१२)
माजरने निकाल करनामा के,
प्ररमरीजननि दर लगन, गुरु अपरार
18 अगार निजाम मोपी
मापाटन करार
पर गुमाल गुगंत्र
गिनुाद मोहल गरि पल कमी
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महारजग्पना जात: पिता
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cretariet,गरपान
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१०
संक्षिप्त सूरसागर
(१५)
हरि ही सय पतितन पतिनेस । और न सर करिये को
दूजी, महामोह मम देसा पासा के सिंहासन थैय्यो, दम हुन
सिर तान्यो । अपजस अनि नक्रीय कहि टेखो, सर सिर
अापसमान्यो। मंत्री कामक्रोधनिज दोऊ, अपनी अपनीरीति।
दुविधादुन्द होत निसियासर,उपडावति विपरीति।मोदी लोम
खयास मोह के द्वारपाल अहकार यात अहं ममता है मेरी,
माया को अधिकार ॥ सेवक तुना भ्रमत रहल हित, रहत
न दिन विनाम । अनाचार सेवक सो मिलिक, करत घयाधन
काम पाजि मनोरथ गर्व मत्त गल, असत कुमति रप सुन ।
पारक मन यानत अधीरज, सदा दुष्ट मनि दूत ॥ गढ़ तजि गये
नरकपनि मोसो, दीने रहन कियार । सेना साथ पत भांतिन
की, कीन्दै पाए अपार ॥ निंदा जग उपहास करत मग, यंदी
उन जर गायन । हट अन्याय अधर्म सूर नित, नौन द्वार
यजायत।१५॥
तण । रि-गुणा । करजगे। पानीपरास । भीरा-
पान कापीटा
1-~-4 . मा-बारी । इनमः मनगः । नाव:
। हिरोय ।
मा1िAmT-अपन।41.शिकायत।
f=डा । मनागमनके अनामन्या. *1-। मात्र
4- मन-गाची 1 पारद्वाMiafm। नगर निगमगत।
Prarड चन्दीन यश इन सब भार प्रादिनीवनमा

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१४ संक्षिश सूरसागर (२२) आज जोइरिहिन सनगहाऊँ। तौलाजी गंगा जननी को, सांतनु सुत न कदाऊँ । स्यन्दन खंड महारथ संडा, कपि- ध्वज सहित दुलाऊँ । इती न करौं सपथ मुहिं हरि को, छत्रिय गतिहि न पाऊँ। पांडय दल सन्मुष है घाऊँ. सरिता रधिर पहाऊँ । सूरदास रनभूमि विजय विन, नियत न पोटि दिखाऊँ ॥ २२॥ (२३) हम भक्तन के भक्त हमारे । मुन अर्जुन परतिमा मेरी, यह प्रत ररत न टारे। भले काम लाज हिय धरित, पाई पयादे धा। ज₹ जहं भोर पर भक्तन पै, तह तह जाइ छुड़ाऊँ । जो मम मत सी वैर करत है, सो निज पेरी मेरा देखि पिचारि मत हित फारन, हशित ही रय तेरो जीने जती भक्त अपने को, हारे हारि विवाएँ । सूरदास मुनि भक्तः विरोधो, चक्र सदसन जारी ॥ २३ ॥ पून । राम्दानी । मापदामिति । मिनिम्मत, नहीं। पran विश्वास करना चाहिये। २२-त्र-पिपार । गा=गाडा । सानोनित कर साग्तनु- सी प्रारी राजा, निदान मेगा शो के साथ म्या: रिया पा, जिनसे वान बाग भीय मानर पुहुए पदम-रए । महारपसार गोटा जो महेना ही दश हमार योहायों से लड़ मरता है। पहा पन में पाराव है। कपिन-मन के रथ में हनुमान जी के चित्र बाडा झरा इतीनवनी। २१-जन-अ भतभत हो । पयादै पैदल दी । भीr=TE

विनय-यापी
(२४)
गोविंद कोपि चक्र कर लीन्हों। दांडियापनो प्रन याद
पति, जन को मापो कीन्हा रय ते उतरि अरनि धातुर
चले चरन अति घामनु संक्ति भूमार उतारन.चलत मप
अकुलार । कदुक बंगते उड़तपीत पट. मत पारिताला
वेदत्रोत त तोमा शन कृषि, धन वर्पत जनु लाल सुर
नभुजा समेत नस्तन देखि दिरंचि बन्यो। मानो भान सृष्टि
करिव को, संयुनान भन्यो । २॥
(२५)
मेरी प्रतिता रहे कि जाटात पारय कोचो है दम पर,
उत माग्न नटराजारयते उतरि चक्र धरिफर मनु नुनाहि
तन्नु भाये।ज्या कंदर ते निकति सिंह मुकि. गज यूथान
पर पाये। भारनिकट मोनाध विज्ञारी, परी तिलक पर दीटि।
किन हारता । मुदर्शनविन गान का भय चर।
भरोसा देना।
कोतिर कदापनियादा लोगों के म्दानी, भीरमा
हनदास भोन घमा । सानिधी दुर हैजादी में।
रनरी पोनस्पतीपार । धन।
मुनाशिविचार मनन और
कोरपोरत होगकिपड़ी काज अमर दोमहारतर नोनहाँ होने
है औरटेनी होने लगी है।
२५-पर-पा.पुर, मटुन । डाों
दरम् । पति-सन्हीं। मातारानी के पति, भी

मंक्षिप्त सूरसागर मीनल मांग की ज्याला, रिहँगिदीन्ही पाठि। जय जय अप चितामनि ग्यागी, मतनु मुन यो माग्दै । तुम पिन पेसो पीन दूगरो, जो मंगप्रन रात साधु माधु एरमरी सुरन में न लागि लगा जाग भन दोनों दिसि, कापर याचलाई यापटपील कीगन कर धरि चरपरन की पारनि, नदिपिमति पद यान ॥ रथ ने उतरि पानि आतुर है, पर की सामानों मिल ते निकम्मी, महामन ग बान। जिन माम मोप्रा गथ्यो, मेटघरकी कान । मोरं मा महाय हमारे, निाट माहान ॥ २६ ॥ अमगिती अट भट।गज का मुत पितु की गर्ग, दिन nिr मा दिन प्रशिरी माग की, नोर्ग आल न मरना हरिमान न मत मनामम, को ifferemia दोन पिलादीमाती wिafraut afr.frrn fमादी गनी .-thermart पर, समानी striti irani ..-irar पार कर Son: 1m 4.

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संक्षिप्त सूरसागर हुन पायो, मानदेय गई। कहा होत अयके पछताने, होनी मिर रिन । गुरदाम सेये न कृपानिधि, जो गुण सकता मई ॥२६॥ (३०) जग में जीयत ही की नातो । मन यिट्रे तनु धार होगी, र म बात पुष्पाता। मैं मेरी कपई नहि कीज, पोस पंग मुहाती।विश्य प्रगत रहन निमि धामर, गुग मीरी दुष माता मांय अट परि माया जोरी, पापुन कपो पाती। मुकाम दुधिर नदि गई, जो पायो मो जाती ॥ १० ॥ - भनि मावि विदि मरोवर जादादि सरोगर मा. बममा गादिना विक्रमादित्यल पंग निमंल, कंग मनिमलिया। मुनि मुना अयु. का, मिन्हें गुनि चुनि अनि मान मा मण, गा मध्य गमाहि । मिना HTTETrature भीमगिरना । ..-, Mr. T ने पंगा are in प a am 7 J 1 damanwor mortant

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मिथंड । मदन धनु मनो मर मधाने, देलि नाही निरतत मैनाकुटिल यच मुर तिलक रेखा,मीय मित मर श्री गोपान की छथि, हटि भरिमरि तेहि पानात २. छाडिसी विपरीति॥ींगभोगी वन भ्रम, मोदन माना गई,अंत न जायारिदियों करनी कमल को, कीमो नमो ईनापान राज्यों प्रेमनग्यो, मण्यो सहमता और पियोग नमदिगर,नीर गछपातादेनि जनताको गति न घटेन जान प्रति पया ही गनी, चहा गुमरमनेदांगो,अवननि गच्यो गगाधनिमसर पदमनी, मरमनमुल 3 नागदेखि अरनि र जात प्रेत के मंग। चितानचित फीशीभयो, त्योzint बेगनाruliamer वरद मोगरr:free २० गं.क्षेत सुरसागर निरग्निमांभा, पलक परन न देहि ॥ ३२ ॥ (३३) मना रे माधय मी करत काम प्रोध मद खान में मय कुमुमनिमिलि रम फर कमन ययाय नापस मुनि पानि मियम फी, चातक चित पारिशयन आमा सर पाकास । मह पदिनीय देखिये, पात stre रंग सोकवेद यजमानत दे माग । । करदामाद पर। 14- fre भार format । RT• THAT

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गं.क्षप्त मूासागर
नितिन मैन । कुटिल कच भुर निलक रेचा, मीम मिमी
मिष मदन घनु मनो मर गंधाने, देनि घन फोदंड "
मा भी गांगन की यि, हरि भरिभरि लोहि । प्रानपति की
निलिभा, पण परन न दाई । ३२॥
(३३)
मना रे माधय मी कर प्रीति । काम प्रोय मद लोम मोद
न.ग्राहिम विपनि भोगमांगीवनम्रम,गोदन मानतार।
मय यमुनि मिति रग की, कमल धाय श्राप ।। सुनि पामित
नियम की, यातक चिनयन पापिन पापा सब तुप
नई, अंत न वादियों करनी कमल की, कीना जल मो
न । मान गयो मन तामी, रायो साहि ममेर । मीन
वियोग नदि गोनी न यातादपि तु नाकी गतिर,
गतिन पटेदर जान पाया की गमी, बाद बदन
श्राम नरें यदि नीयदेवि, पान हिउर श्याम ।
गुमा मनेकांगी, भरनान गरी गगाधरमपान ग
पदमनी, माग गघि जरनि मारिकी,
पालन के मंगवितानचित फोटोमयो, रची र
mमारवंद वाहना, नयन म देश पाम । चोर में
पिके
Permisertatो का Fram निया
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२२ संक्षिप्त सूरसागर 1 तैसे घढ्यो अनंग 1 घूम यट्यो लोचन पस्यो, संसान सभ्यो संग ॥ जम जान्यो सय जग सुम्यो, यात्यो अजस अपार। थीच न फाह तय कियो,तनि काल्यो यार ॥ कह जानो कहया मुश्रो, ऐसे फुमति कुमोच । हरि सौं हेतु बिसारि के, सुप चाहत है नीच ॥ जो पे जिय लजा नहीं, कहा कहीं सौ धार । एकहु अंकन हरि भजे, रेसठ सूर गधार ॥ ३३ ॥ (३४) भक्तिः दिनु चैत गिराने हैहौ। पाउँ चारि सिर भंग गुंग मुप, तय फैसे गुन गैहो । चारि पहर दिन चरत फिरत यन, तऊ न पेट अथैहो । टूटे कंध सु फूटी नाकनि, की लौ धौ भुस सैही ॥ सादत जोतत लकुट याजिह, तय कह मंड दुरही। मीत घाम घन यिपति बहुत विधि, भार तरे मरि जैही ॥ हरि संतन को पहो न मानत, कियो आपनो पैहो । सूरदास मगयंत भजन यिनु, मिया जन्म गवैहौ ॥ ३४॥ (३५) पाँडि मन हरि विनुखन को संग। जिनके संग छुयुधि उपजत है, परत भजन में भंग ।। कहा होत पय पान फराये - प्यमिधारी। सम्यो-Tट गया। मुभयो-दिखाई दिया। बीचमा काँग कहाँ। मुग-प्रा । पारवरी मौत मे। हनुम । अकस्मशार । महात्मा मादाम ने यह पर बादशाह अकबर को मनाया था। १४-गिनेन्नमरे के तानो पी। कोनामयनक। नकुट-नाई बीयागी जागी। दरदो-रिपाओगे । तर=नाचे । गोविनाको ३४- विमुख मानिक । पनि पैदा होती है। भगदित मुरुग-im kोको। ग्वार-मा । माय-म्नान कराने में - -

धिनय-पाली
fornr गान मुशंग पद mergin
पारगारपोaurat
पातिकारि पतन
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संक्षिस मूरसागर
(३७)
गजन वितु जीयन अंग्रे प्रेत । मलिन मंद मनि डोलन घर
घर, इदर मरन के त । मुख फटु यचन नित्य प्रनि निदा,
मगुन गुजम सुन लेन । कयहँ पाप करे पावत धन, गालि
धृत न देन गुरु प्रालन मंतऽम सजन, जात न पय,
निना मंया नाद मगयंत धरन की, मयन नील को ग्रेना
क्या नहीं गुन गन मुलम हगि, माधय देव प्रचेतताकी
कहा वही सुनि गुरत, चूड़त कुटुंब समेत २७॥
जा दिन मंत पादुने प्रायन । नौग्य कोटि म्नान करे फा.
दामन नही पायता गेद नदो दिन दिन प्रति उनको, चान
मा चित मापन । मन पर फर्म और नहि जागत, मुमिरल
श्री मुनिगन निसायाद उपाधि दिन है. निमा विमल
अमगाराबंधन कमेटिन जे पहिल,मोजकादियदायता
गति र मादी अनुदिन, मर दरा
दाम या अन्म मरनत, तुगत परम ग
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मंसित गरमागर अति मुमोल मुर गापन ! यानी मुनि यनि एन लागे, हो मिस फरोबारन । पन्दन चर्चित मोम कीपर, यरसन एंदन सायन । चरन धोय धरनादक मानों, मांगु ने मनभावन । तीन पड़े थमुपा है। चाही. पानकुटी को सायन तनों का पिन ते माग्यो, बहुत रसा देई गायन । दाग प्रभु बोमि एने यलि, धबी पीठि पद पायन ॥४४॥ राजा इक पंडित पोरि तुम्हारी। चारों वेद पदे मुरमागर, है पामन यपुधारी अपर दुपद पशुभााझ अविगत अल्प अहारी। नगर सकत मरनारी मोड़, गरज ज्योतिपिमारी॥ सुनि सानंदयले यतिराजा, सादुति यज्ञविमारी। देलि म्परूप सकरा पणाहत, पीनी चरन जुहारी । चलिये चित्र जहाँ यक्षवेदी, यहुन फरी मनुहारी मांगी सोर दे तुरत हो, हीरा रतन भंडारी ॥ रखरए राजा यो गहि पहिये, दुपन लागे भारी ! ईंठ पंड दे यमुपा हमको, तहां रची धसारी शुभ कहो मुन हे पलिराजा, भूमि को दान निवासी विजन ४४. वामन-५१ गुल के थायर वादा मनुष्य पड़ो पर प्रिय भगवान के वामन अवतार से प्राशय है। मुष भाया पानी । पति खाया। क्लेरगर । चापोदाम्भाणों का मन पाश- परीपतों की दुटिया । गानादों को पान-पवित्र। ४५-राशाम्पातान पा पादानी राजा बलि । पौ। चारों बेरसर. यजु, माम और अधरंग। मुग भाग- पुरा-11 वाचन-ौना । वपु-शरीर । प्रदग्निा पारे जीव, जैसे मप विरानुष्य । बीपमझना । कृष्णाकृत के एमाप । . - 1

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संक्षिप्त सूरमांगर में, रघुपनि मुक्ति न कोसे। सूरजदाम चढ़ा प्रमु पाछे, रेनु पखारन दीजे ५१ ( २ ) सहि घों मनी यटोही कोहे । अद्भुत यधू लिये मैंगओ लत, देशन त्रिभुवन मोहैं । परम सुसील मुलच्छन ओरी. विधि को रखो न होई । काको अय उपना या दोजे, देहधां धौँ कोई ॥ इहि में को पति पिया तुम्हारी, पुरजन प धाई। राजिव नैन मैन की मूरति, सैनन माहिं बताई ॥ गयं सफल मिलि संग दृरि सौं, मन न फिरन पुरयासारवास स्वामी के पिलुरत, मरि भरि लेत उसाँस ॥१२॥ ( ५३ ) पंधू फरियो राज सँगारे। राजनीति अर गुरु की सेवा, गाइ विष प्रनिपारे । कौसल्या कैकयी सुमित्रा, दरसन साँझ सकारे। गुरु पसिष्ठ र मिलि सुमंत सौं, परमा हेतु विचारे। भरत गात सोनल है पायो, नैन उमगि सल धारे । सूरदास प्रभु दई पाँवरी, अवधपुरी पग धारे ॥ ५३॥ खानघर, पहा गौतमविकी श्री अहल्या मे अभिमार है । दार- लकड़ी। परमिप। रेणु-धून । पधारन दोनो लेन दीजिये। ५२-पटोही गहगोर, पथिक । उप-ची। नो नोडी। कारी किमकी । पुरजनिग की बिमा गनिन मैन कमल के पेमे बडे बड़े नेत्रा वाले 1 मेना। मैवन-पिथी में। सास-या। ५३-भाई गमजी भरत में सबा न पात है। प्रतिरक मनिपानन कात हुए। माझ मकार-माम और मया । परजायजा, निभाया। गुपन्न-पगगना दगाध का प्रधान म। गाना। पावरी-याका । 1 श्रीरामचरित (५४) राम धनुप घर सायफ साधे । सिय हित मृग पाछे उठि पाये, यसन पात दिग पाँध ।। नय धन नील सरोज यरन पपु, विपुल याद छत्री गुन काँधे । इन्दु पदन राजीव नैन पर, सील जटा सिव सम सिर याँधे । पालत मुजत सँहारत संतत, धेट अनेक प्रयधि पल श्राधे । सूर भजन महिमा दिखरायत, इमि अति सुगम चरन अपराध ॥ ५ ॥ ( ५५ ) सुनी अनुज दियन इतननि मिलि, जानतिमिया हरी। पातु एफ नंगन फी सहिदानी, मरी सटि परी॥ पाटि पारि छोरिल पानी पर. सति मुख प्रभा धरी । मृग मूसी ननन पो सोभा, जाति न गुम परी । चंपक परन घरन पारि पर- शनि, दाडिम पनन लरी ! गति मराल भर दिप शधर धि, अहि अनूप करी ॥ प्रति फरना रघुनाथ गुसाई, युग भर आत धरी । सूरदास प्रभु प्रिया प्रेम एस, निज महिमा दिसतरी।। ५५ ॥ ५४ार । प्राररियर सगमारामा चारी to reमाररदिपुर-नया! पदमा । गा। मनतरा। मिस NEAR नये में। ५४ाहिती माग ! | मmarth, tra, देरीरिक वापर। शिरीर।

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६.-यम-ज्ञा। नाना-नगे तो। विगी। मेंभार AP यरा भुजा संभारी। राता मेलि भंडारगर ससि, नम काण ज्यों फारों॥ जारीलंक दिसमस्तक,सुरसंकोच निवाया धीरघुनाथ मनाप चरन, उरतें भुजा उपारेरे चल स्वरूप दीठ, थोलत यचन बनेरो। चितवैकड़ा पान पार अगर यहेरो। तीनि लोकबिरपात पिसद उस, प्रलय नाम है मेरो॥ रेरे अंघ यीसह सोचन, परनिय हरन विकार्य। सूने भवन गवन त कोनों, सेस रेख नाहि टारी | अजहूँ को प, थोरपुनाय पियारी ॥ सस्ट परेच सरन पुकारा, हौ यह पनि आई, हरि को निज पद पाऊँ। संदित सूरसागर पुर, प्रान प्रहारों तेरो॥ गये ससक युगल यंधू यन, जान्दो सुने जो मेरो, आये निकट मुरारी । जनमुना ले चलि पानि छपी न पाऊँ। जन्मदि तें तापस पारामो, कैसे हित उपः ये दससोस ईस निर्मायल, फैसे चरन छुमाऊं ॥ ४ ॥ रघुपति जो न इन्द्रनित मारी। तो होई चरनन को चेगे, जोन प्रनिशा पागै ॥ जो दृढ़ दान जानि रे प्रभुजू. धर्म नि। माघया याड त् । १T | ' Part हिमा=गा|| = 7 । मुनर + HITE रात दिन भात, या गरजा - प्रानय | REEनव जी पा - 1 ६५- इन्दःf 14 मान मेलाद । म । पराल । नागTI 1 पसाबमा

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४० कहो कपि ग्यपति को सन्देम । कुमल वंधु सदिमन संशित सूरसागर यटापन पीर ॥ दसरय मरन हरन सीता को, रन धीरन की भीर । दूगी सूर सुमित्रा मुन यिनु, कौन घरा धीर ॥ ७ ॥ अयहीं कौन को मुख हेरी । रिपु सेना समूह अल उमड़े, काहि मंग ले फेरौ ॥ दुख समुद्र जिहि पार पार नहि, याने नाय चलाई। फेयटयारहों अथर्यायक, कौन आपदा आई। माहिन भरन मत्रुधन सुन्दर, जामा चित्त लगायो । योहि मई और को और भयो मधु को भायो ॥ में निज प्रान तजाँगो मुन कपि, नजिद आरकि सुनिको ही कहा विभोपन की गति, यह मोच जिय गुनिक । यार पार मिरल लछिमन को, निरपि गोद पर राव। मूरदास प्रभु दीन यवन याँ, हनूमान सौभाग ६ (६६ ) वैदेही, श्रीपनि मकन नाम॥ जिन ची मुम कुमलनाय की, मुनी मग्न पनीर । चिलन बटन दुम घर मिया को.. अमनिधि के तीर । यन में यमन निमाचर छल करि, हरी मिया मम मात । ना कारन मन्दिमन मा लाग्यो भय गम विनु म्रात। -4v=PTT(a) ग्याना समय प' या rinाना गम मिनार का गा-327 । ..-ATREका। गार वारपत्रा अब पात्र मदीर x irri Tal TH ऋचात्र

--
कन
-
.

४२
संक्षिप्त सूरसागर
फाप चक्र सिर पान | जमत सुमट जरत ज्यों दी मुम, लिनु
भाषा दिनु पान । सानिदिध उरिपाकासहि, गम पाडिन
मा लागो । मना नार रन सनधिरनित, उपजी है अति
प्राणी । उटि कयध भहरात भीत है,निसकत है अरि जागि!
किन गाल सच्या सो फाटत, चलत विसरि ले मागि।
रघुपति रिस पायक प्रचंड अनि, गीता स्यास समीर रायन
कुन ग्रह पृम्मकरन यन, सकल सुभट रनधीर भो भन्न
परनु थार न लागी, ज्यों ज्याला पट चोर। सूरदास प्रभु अपने
यादुपता, किया निमिर मय कीरा॥
।
।
.
हिमन ग्बी लामन माई। यह एनि हनूमान दुष पाये,
मोरेमोन जाई । ग्रामन एक दुतारात येटी, मनु पुनः
अपनाई । जमे रविकपन यन मीता,पिनु मारत दुरिजा।
से
उदग उमंग लामन, निसंकरपुराई । यिमान बटारि
जानकी. कोटि बदन छवि छाई । दमय कही दयाह मागी
गान किन निशाई। मिया गम से गले प्रयध
मुरपाम
प्रमा
43 retirefर, वह in Tr
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48
or moti ur-xi f-महामारी

श्रीरामचरित न ( ७२ ) बैठी जननि फरत सगुनाती । लदिमन राम मिले श्रव मोना, दो मोतक मोती॥ इतनीकहत मुकाग उहाँ ते, हरी दार उड़ि वैव्यो ! अंचल गाँउ दई दुख भाज्यो, मुख जो श्रानि उर पढ्यो । जो ला ही जीवा रे काना, सदा नाम तुव पिहाँ। दधि नोदन दोना भरि देहाँ.अरु माइनमें थपिहो । श्रव के डो परचो करि पाऊँ, अरु देखा भरि आँखें । सूरदास सोने के पानी, मढ़िहाँ चाँधार पाँच ॥ ७२ ॥ ( ७३ ) हमारो जन्म भूमि यह गाउँ । सुनहु ससानुग्रीव विमोपन, अवनि अयोध्या नाई। देखत यन उपवन सरिता सर, परम मनोहर ठा। अपनी प्रति लिये बोलत हो, में रदाउँ॥शाँद वासी अबलोकत हो, भ्रानंद उर न समाउँ। सूरदास जो विधि न सकोच, तो वैकुंड न जाउँ ।। ७३ ॥ ( ७४ ) राघव श्रायत श्रच माजा रिपु जीते साधे देव कानु॥ प्रभु कुसल यधू सीता सनेत । जस सकत देस आनंद देत ॥ ७२ागुनौतीान की मन : मोडपमूल्य । कामोश । योग लिया। औदन लाइनमेंट देना । परचो:- परीक्षा पानीपता पाने कौत का कर दूसरी राट पर पैर माता निर जनों कमान को बनाता है) ७३-तिम्रो पारे। टनिति-पमा । भरपुर पैरउ । सोधनुरोध कर। ।

नल मील द्वियिद कसरि गवच्छ । फपि कहे मुख्य मना
दादुर टन मोर। जय सने भरतपुर निकट भूपातय रच्यो
नगररचना अनूपप्रति प्रति गृद तोरन यमा धूपरामर
मकलगरवदलि जूपावधिहरदय फल फूलपान।
मादा मुनि निरखि पुलक मानद प्रमादा देखत प्रमुभी
अय दिय मूतन मामा ममान । जय जय जय मूरन सद
संक्षिम सूरसागर
कपि मोभित सकस अनेक संग । ज्यों पूरन समि सागर
तरंग । गुग्रीय विमोपन जाग्यांत । अंगद केदारमुपेन संत।
खान्य ।। जय कही पवनमुन विविध यात । तय उठी ममा मा
एवं गात ॥ ज्यों पायम ऋतु धन प्रथम घोर । जल जापा
का कनक धार तिय करत गान । मुनि भरे यंद पनि मा
महिमा अपार । मय बिमरि गये मन युधि विकार । अपार
दमाय गुल कमल मान । जय कुमुद जननि ममि प्रजा मान।
.
मान1311
देग्दो कपिणा मान ये माये । मम पायरी मीम पर
मार, अंगुरी रघुनाथ ना दोन मरी यी के वितुरे,
मान
TH=नारपटारा
17-14 13..
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11
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जग चिनने निसरन वीर जाइल
वाने पर ईलिन दिनान इरि
वनम्नमन करिमारे। आनंद नान सदन
नरगिल मनातल पल
बदनिय नैन न हो निजी सनिशान
रोन्दडल बुना पाकर पुकती.
निसिसिपापन रहेनन नुरा निररत
उवासन निपने
.
नमन इसन शान परे । दानधुनर कनक
करजुनमल नरे। मन नल का धुकर
कोपरेननुल पारने रिकार
करे किराल सनरताः दुरे ।
नवर सचिन दे.मुद मनहरे रस्त
पर रस न दुस. बनसान हर तरेत
मोइरन उनले रन परे:
दिनदिनु न महावार पर
रन परतएव पनि केराले नि
कन
-

पंदन माना याँधति डाले हार युवारत फिरति अष्ट मिधि अच। गलिन रंगीलो भीर मई तय॥ मुवान पान - मदीय पाये।नंदनंदमागर को घाया फंचन कलम मंग नगक । भागे मकल श्रमगल जग के।।डालत पालमन पन जीने मरे मवदियो मनके चीते। अति प्रानंदना व धेनु हिजन को दीने ॥ नंददार में जाचन प्रणे बगफिरि जाचकन कराये घर केटार कए प्रयो मायामाबधाई याने नरमहरपलेर मा. मनपा यानरमदानपान लेमियादव पल पार्न: मम्म मुलाशातRT मसनयानं हा मोर गाम महा ४ संशित भूरमागर कारन मंगिया चीनति ननिधि | गृह गृह में गोपी गापति दायन लमि । कमलन गदि पाये मानी ममि । उमंग प्रेम- माने । पर्यत मान ग्त के दोन ॥ काम धनुते नेक नपान मादामन मय गुण पाया 10॥ नाम रहा टार पली धंतु काले धाम पो गारो - datafa.fmunr ब ... कम म . , TN1 .. *P

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यात लीला देनाद कपचति ॥ नील एसन ननु सजल जलद मनु, दामिनि रवि मुदंड चलायति । चन्द ददन लट लकि दीली, नसनरत राहु पुरावति । गोरस मयत नाद क. उप- बन, किरिनि धुनि मुनि नरन रमापति । सुर स्थान अचरा रेराहे पान पसारी एलि देनरापति MEE दोटी रोटी गुड़ियाँ अंगुरिया दोरी चली नख ज्योति ती मानी जबर पर । सलिन जान ले हुनु मुकु पाउनी मृद मुनर किदिनी फलित दिएटर न दिन नशर पल पापिया रचिर पर। परोपिकमानी धार जनाभीनी पातर दामिनि मानो कोपारो पारिधर । र पपना पंड पता नहले पार को सशन ममि दिन्ड मुनि मनार राजन रंजित नगा তিন বিন সংগ্রাঘা মন চান নং ভে র ব ন ন ব ন ন না पनि गुधर शिलसिकिरिया बस दुपरान मन पर्ने सारेचन पर Exifirsttimes wrireaking : गा। जारे - नारंग नामितीन-front? मी.2 संक्षिप्त सूरसागर कीहत प्रात समय दोउ योर । माखन मांगत यातनमान, भारत यसोदा जननी तो अनि मय सामुग्न संकान, या कारह पस्यो तनु चीर । मना मरस्यति मंग उभे दिए रामण या मील केटीर ॥ सूर स्याम गही कबरी का मांग गही यलयीर । ताहन भतुलीनों अपनपनो, मान! लेत निर्वानि मी ॥३॥ बरनी चाल येर मुगरि । थकित जित नित अमर मुनि गन, नदालाल निहारि गमिर विग पयन गयो, दिमा दिक मारणमीम पर पार जदा मनु, पदिय प्रियुगरि। कि नलिन लगाट कमा, विंदु मोमाकारिता पदन किन निnिt में पति भए । मादा Mi मामी भी गम भाग, मोनिन । बाग का नामा * Pी REET केन । म विgar . मनोनिगर। - ... Ye Larti .. 1.r'1" ""

ཝཱ r , *༔ འུ fལཙམནཾ ༔ ༔ ༴ ཀ ཝ
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mrit Ramarutifyा Mobs सापत मरे, भूलना भूले । समनुर सगरीर पुन, पोन बनगई। गंमति गीथिरकन में क्या गिधा। िमसीन सेत्र में मुष निकमत, गयो तिमिर मिटि मामानीमपि भर नियुफेन कटिदाग दिया पद पापीयर पर र एनि, गय मखिममा एपर रही नसुधि सरीर ५८ संदिप्त पुरसागर जागिये प्रजराज कुर कमल कुसुम फूले । कुमाल समकाम, गायत नरनारी । एर स्याम मात उठी, अंकुर मात्र ममय उटि मोयन हरि को बदन पापी ना रदिन सकत देखन को प्रामुर, देन निमा के दस । धारी॥१६॥ / मति,पित किरन माह মালিস তে লাল গানিষি বাস যমd पार बार मोर मा यार न कमल मेनिन प्रीति यति माल, मदन ललितान र कोरिया TIE म नम गोw . TITrm rep पार Trt

यामला
गिन मनांक. किसनहीनदीप गलान हान शनि
IFE मारे । मगदुशानयन प्रसार माने गय भा पिसागर
पाम पारनिमिर नापनि रोजगार पोल्न प्रग मुम्बर
নিহত মানি ঘামনে সান সুনান ।
पादपंदी मुनि मन एन मागधगत विद
না। (ধনস ধন শেষে লু , মুখ
जन पाद Im निम्यारे । माना ग पार
ल मितपिल मुगुना गुनविदा
एतदप्रिय बाल आगनगर याद मागे माद
ferलप पावसार । त्यागं धन पर र निर्मद
अगरधारदार यति धनंद गगर मारे १८
(६ )
यादा कि पल मोल दो
ift.Sमतिपय ict fre
रे । कालोमो
सानुगार immगुमा।
१६AREER
irrora for
THer

पेलन चलिर याल गोविन्द । सखा नियधारे बुनापा, घोषवालवृन्दातृपित सयदरस कारन, चतुर गालादामा पाणियिनय पारिधर ही, रहु लोचन प्यामा वित चान कर उर, पाट नयन विमान अजिर पद मतिरिरात्रा मनन उपना पत प्रनिमग्न मनु, हम यगुधारनामन कंजा गर प्रभु की निगमिमामा गईसा प्रयगोसिए सिनियन मालला यन मेरे हाऊ, पायाराम ऐगमन ई नरकी मुग्तगुता॥यारिगटोपोगम, कीदारगमद्रगुरप्रमुग्न के. त्रिपदी गविनायुनागनास्या,मनपा ६० संक्षिप्त सुरसागर (१००) पचन सुने कपानिधि, चले मनोहर चाल । ललित सयुलर चंद पोर मानी, थकित विलोकि ॥ १० ॥ मि योले कान्दगि मेया, इतको किति पटा है . हात रानि मुनिए याने, कहत हंगत या मारमान जसमेंका। मीनप जग मादा, यपार पर धानियोपिा ri मरिग पो. TIMAM - . . " . 1

पाल लीला
धरियाराह रूप रिपु गातो. ले दिति दंत गाज । विष्ट रूप
अवतार धयो जय, सो प्रालादहि नाज। धरि सिह जय
सर पिदारगे, तहाँ न दस्यो ऊ || वामन रुप धयो पलि
पलि की नीगि पैड पसुधाज । थम जल नाम कमंडलु राख्यो,
दरमचरन परसाज॥ मालो सुनि पिनही अपरादि, कामधेनु
आजाफारस पार निम जब पीनी, तहाँ न देग हाऊ ॥
सूर्पना नारा मारी, वरदृपन घिमिराऊ। सिंधुसेतु
पोप्या पन जो, नहीं न देने हा ॥ राम रुप रापन जय
मालो, दस सिर धीस मुमाजाला जरार धार सय पीनी,
साहन इंग हाऊ ॥ नृपति भीमला युद्ध परम्पर. तहँ यह भाय
पताऊ । तुरत चीर है दृपा कियो धरि, ऐसे निभुवन राज ।
- यमुना तट धे पगपत, दहा सधन धन भाऊ । पंटि
पनाल माल गदिनाच्यां नान रोपाल। माटी फे मिल
पदन बिगायो, अव जननो घरपाइ । मुन भातर लोर.
- दिपायो, नप प्रतीन भाऊ । भानुभवतार घर सय,
गि मधानी र पो पो पर
HER RErrपर प्रसार ! RAST Frid
farte 14 रने में
सपना, गेगर पुरिगम
अतिरिदिला तिमी म र
Prel मा गर ।
निनी
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का हो..

अरन मारि यहाऊ । गुरदास प्रभु की यह लीला, . केवाल चरित अनूप निरविरहिनारि. अंगबैंग प्रति मप वियुरिअलक रही मुख पर,. विपिन मुमारादविजन चंद के यस,मधुरपल पहा उपमा थोरिनीला पर विच मोनि मारो बोरिएमग यालमुकुन्द की दृषि, परनिकाप मुग्मी परिन प पियाये। पपी कर चायतमान गमन नमपाधि पुकारामिदिरा था पनि दिनिमियट्रोग्य विम मनन गी: दिनि गायो संशित पूरसागर नित गाऊ ॥१०॥ परममि विन्दु मांई, मामान गा॥ १०२॥ मार मो मागी नंदनदम ! मंगममा टा ...-free-arti. ro इनर लांचन चारनामा, पम्म मदिर, बना। युगल माल अपति, योर किलो बना मान .. । more. ...~-rrrr. Agrit - 47

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बरिटल मने दरसन देव के नर ना
नदिन पर 131
(?)
नानाना निशारिन.निपत
वहन निसन न. नाईन नही
कनिसहरमनेननदर
सो बिरल बनने
परदचन्द्र काटनारमितान रर,
दुर
रसन्न नज.. लिप्त जन सुनदर
किन्नै जितनादरम्नुलन
निरत रात 12 :
ब. दुई निम्मत नंदन र दस देनन र?

संशिप्त गूरसागर मोमुख फहन म पनियाँ ।। जो रमनंद यसोदा विलमत, सा नहि लिभुपनियां । भोजन करि चयन पौन्दों, मांगत गूर उटनियाँ । १०६॥ (१०६) मी देखत यामति नेरे दोदा अबही माटी पार सुनिक रिम करि यदि पार, याँह पकरि ले आई। इक कर मोंभु गदि गादे करि, एक कर लोने सौटी। मारति है। तोहि अदि कन्हया, येग न उगली माटी । मज लरिका सर तेरे मागे, भूटी बहत पनाई । मेरे कह नहीं तू मानत दित रामो मुख पाई शापित प्रयाग पंड की महिमा, देपरायो मुम माही। सिंधु गुमेन नदी यन पर्वत, यकृत मा मन माही करने साँटि गिनि नहिं जानी, मुजा बाँहि अनु. लानी। मूर कई यमुमति मुम मुंदडु, थलि गइ सारंग पानी॥१०६॥ पएमनिया देखि भानि, प्रागे केले पिछानि, यदिया गति स्थाईवर और कोकिनेरी।अब मी में करी कानि, सदी दूध दी हानि, बाई जय जानि मानि कागद मनरो । - रावा। अनामिनिनियांजीकेदार में ली। परिपा । परियायरता है। १.रा. सी-470, दी। गनीमच पा सरिता -fran+frruitman, सला शही परियो सादि, देखतभुज भरे नारि हारी हाँ परति रति दिन दिन फो मेरो दिखिपत नहि भवन माम तसा निनिर सन्ति पत सौ तुकतु फिरतु महरि को मेरो । रस तनु दीट रही सोना नहि जाति यही मानी जल जनुन विव उगन पयुफेरो। उएनो दिन देउपाहि काहे तू इतनी रितार नहीं पडयात सानुऐसी विधि मेरो गोपी निरस्त सभार अनुमति को मार भूतो न प न पानि कोक हरोमन मन दिहलत शाल मसपात दुट सात जाने दो पास परित कान्तरी १०32 गोपाल दुरे हमारन गत । देखि सपो माना उपनी है, सार मनोहर जिलाधिोटसिदि विधि लजिरोनास्त न च९ दिति चियत है. चार मरान हादत ।। सुंदर र मान्न सीप अनि, राजद घागरामनी सरोडदिर परिसपिरिसित उर- निरिधिरि तपन हे ऊपर दे दघिमिन्दु । . पर Regmi मना.....

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मुख विदेधि दो नंदयगनिमरद निमि मधुमानित मनिमय मकर कुहन, ज्योति मग मग करनि । निधार नोद निवारिकम मंजुम लाल यन,गा तन मयुत नि, नमित करन RTIFT संक्षिप्त सूरसागर पम मुमृनाल जैमे, प्रात पंकज कोसाममित मुग्न पर भग गचित, मकुच में कारोस॥ फितिक गोरमा हानि जाने, परी अपमान । मूर मे बदन ऊपर, यारिये धन प्रान ॥११३॥ पशुपामा दरनि । ललितथी गोपालमोचन, लोग नीति मन यारिज विमपि विग्रम, परे परयम परनि मना पाये, तरन गति दोउसानि ॥ दुटिन पंजर मिलि मनु, कियां यादत लगन । यदन कांति मंना सोम मस्त गरम दानि ११३॥ ( हरि मुष देसि होनामिति से गुम्न एन पनि दीन । मनर मंगल पर पनि गत मा प्रतिमा पार r narr ... .. ८..

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संक्षित सूरसागर
समुरमुनि याला मान घर सकन सरासर, उडिरे को
कान्त सौ नापति क्यों हरिमात । ले ले कुट कठिन
अपने कर, परसनि कोमल गात ॥ देखि शुभाम् गिरत मैन
ने. मोमित है दरि जान । मुक्ता मनो धुवत छग पंजन, बोधि
पुटी न समात | उरनि डोग डोलत है इहि विधि, निरति
याँ, सेट
शलात ११॥
(११)
निरपि म्याम हलधर मुमुकाने 1 को याँध को छोराको
यह मदिमा येईमाने । उत्पति प्रलय करत
महम मुग समग पपाने। यमलारमन को तोरि उधारन
वाग्न-बान करत मन माने । ऋगुर सहारन मनदि ताव
पापन पनित कायन याने । सगास प्रभु भार मत के, अनि
हिन यमुमनिहाय पिकाने । ११ ॥
।
निगम माथि गोलार आरोदाम दरिद
को मोदी पहुदा उपाधरि गुन १
"-अप । पाप ग "
HTTAM frror

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?ܪܬܚܐ | ܐܝܺܪܝܺ ܚܰܣܺܝܢܳܐ ܐܚܝ̈ ܫܕܕ ܢܬ '
ܐܺܝܬ݂ ܠܺܝܬܐ ܬܚܘ̈ܝܬ. ܜ ܧܫ ܢܝܐ ܝܨܚܝܨܐ ܚܰܫܺܝܝܕ ܂ ܕ. ܐ ܫ ܫܺܝܬ݁
ܡܵܬܐ ܐܝܽܠܚܙܶ ܕܫܺܝܚܳܐ ܐ ܚܨܐ 3.,P ܥܳܝܪ ; ܝܰܙܫ ܨܪ ܕܡܨܝܚܵܐ'
ܗܶܝܲܪܬܵܐ ܚ̈ܠܰܝܺ ܩܨܠܚܺܝܶܝܬ݁ : ܐܬ: ܐܝܝܰܘ ;; ;.;
܀ ܐܫܝܵܐ ܐܨ ܫܠܺܝܚܳܐ ܐܰܚܳܐܐ ܝ ܐܺܝܣܪ ܝܨܶܐ ܐ ܐ ܐ ܐ 1
ܕ ܠܝܛ ܐܕܚܙܬ݁ ܨܶܛ ܝܵܕܵܝܵܚܳܐ ܐܺܝܬ ܢܚܐܕ ; ܕܝܺܨܶ ' ܐܪܺܫܚܶܢܳܐܝܰ ܚܶܐܺܝܳܐ
ܫܸܐ ܕܟܼܲܕ ܧܵܝܚܵܐ' ܐܕܵܐ ܚܵܝܵܐ ; ܐ ܝܺܨܶܝܶܐ ܫܶܨܶ' ! ܐܢܐ ܐܐܝܺܬܰ
ܠܶܝܺܫܺ ܬܐ ܨܝܳ

७२ . गिवडी मुख मुरली तिमि, चन्यो तिलक उर पंदन कुटिल धारत,मुगुर निकंदन। दाम ममुसुमम बखता संक्षिप्त सूरसागर मननि गुविचार फरनि देखत रचि पानी । यहि विधि पदनारविन्द यमुमति जिय भा। सूरदास मुख की राति कार्य परनिश्राव ॥ १२१ ॥ ( १२२ ) देखि मषी पनते तु पने मज यायत, मंदनंदना सीम मा मुल चंचल लोचन, निरखत अति घानंदन | कमल मय मानी पंजन, पंधे प्रार उडि फंदन । मत अधर यि दमन विगतन, अव गायत कलमदन । मुना मना लालमनि में पुट, धा मुकि वरयंदन । गोप येर गोल गो v मेति नेति श्रुति इंदन ॥ १२॥ ( १२३ ) मोमा कहत कई मदिया। अचात मनि प्रादर सोयन पुर, मनमाको पाया मजल मंघ धनम्याम गुमाया माहित दमन दामाल | मिणी मिगर तनु पातु विरामति, ११-जगी । गरि 1 पालिका या मगन है। १॥ या indian पागला HTTERTAIN. The mff mins Trt - -

२३
मटा मारे जाने और कान
लेडोन्टिी र
सरले. दादर 11
मा. सदरहर
-
दुन.
कई कारे!
देकर
कार दुर नग

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गरानिमगार
ए दिन, नाशि निलय पोल मनु मदिगि
पर पल, गि पाली प्रति सुन्दरना ॥ तुजा पर
हर पन १८, मानी मप मात फिरि पाई। मंद मंद
रामनी पन, दानिनि दुरि दुरि देत दिपा मोहित
Me नामा , अनुपम पनि दी सरनाई। माना
एग दिपललि, पालन पारन जोर पता १३८ ।
पनन ने साल भारतदी-
पनि दिनदहाल, पलटदा
rrer मनाइदा, कर पानपुर
Priनाग दल नतिर नि दिर
पनि म रवि कि
Franावट,
itter:
ifrrrrrrrrr:
rahmir
Pr
.
--
है

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गयाशिव-धंगारे
मी विच, ताकि तिलक की रेख यनाई।मनु मर्याद उनंगि
पिर पल, इगि चती अति सुन्दरताई। कुंचित फेस
बदेस पदन पर, माला मधुप मात फिरिभाई। मंद मंद
सात मनी धन, दामिनि दुरिदुरि देत दिपाई। सोभित
निस्ट नाला के, अनुपम अरनि पी मनाई। मानों
सुरंग पिपललि, चालन कारन चोर चलाई १३॥
( 135 )
रउनी मुल पनते धने पावत भारत मंद गद को तर
गने ! शाला दन्द दिनोद सायन, परतत तट धनु को
जाने विनत गोपी मला सामुदसप कप सुधा सोचनपुर
ने। पूरन कला उदित मनु उडपति, ती दिन विद
काकी पनि। तमिलय निति पिस्त एपि
मनमोहन की ननिमारन तातो पिरिधर,
पापस लि नागर नाकनि
२२८ नागपुर
सदर माननिय मदाने
है। परिवार । मोर गन्दा । मारा।
निमोदी-
-----
Wri 5.
-
RE:::..

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नपधिप-अंगार
(१४१)
नंदनंदन मुस देशी नाई।ग अंग विमान उये रवि.
पर तसि समरसलाई । जननीन कुरंगनंग पारिजपरति
संच पाई। बुति डत कुंडत विवि मकर मुग्लिसत सदन
सदा । पापोत कौर विम पर, दारिम फननि सुनाई।
दुरगारंग पाहन पर मुरतो. भाईदेत दोहाई मोहे पिरचर
दिप गिन, पोन विमान पसाई कुसमाबुलि परस्त मुर
मरमरदास यति बाई । १४१ ।
(१४२ )
देवि देखि आनंद पंद । वित्त मानधन धन, सोचन
शेर हो चं चहित कुंडत मंड मंडल, नगर लत्रित
हर में गिर नै। पुरन्स,
कमर
दर पर
दुरमाणितमान।
१४१-RRI-रान...... .
को दो दिदी ।
एरापन कसे दी है। और
#m E में होगी शिन, mat
में हो तो आपको कर ले जाने
में
होने
~

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नशिखधंगार ( १ ) देति तसो हरि ग अनूप । जानु अगत जुग अंघ विपन, को दरन यह रुप ॥ तट लपेटि दकि भपे आहे, एकबरन घर धारे। मन्दं नीत मनि पंन काम रवि, एक सपदि सुधारे । कब? तफुट ते ज्ञानू हरि लै, अपने सहज पक्षावता दासमान, करमाकप पारंवारतावत १४४ ( १ ) पटि तर पीत यसन सुदेत ।मन्? नव धन दामिनी तखि, रहोसाद सुवेत ! पनामनि मेखता राउत, समग त्यामत कंगननों हंस वितात पंगति, नारि यातक संग नभग काटे काइनी राजल, जलज केतरि संड। हर अनुसँग निसिनाधुरि नदन तनु पर्यो दंड ॥ १४ ॥ दरनी निरपि हरि प्रति गोड निरपि नर इंदु सागर के ना के सात साचोराल। रसी । तरि मोकारनामी, वनरकॉ। १४४-पनीर परिकर । मुमारे पन्ना सा पैर भर रहे है और हरे पर में करे हैं। कलरमापी - १४५- नरमर तरसमुन्दा परपापनादिकानि । इन्ट परिसामास पनी समानी रेकर मंजर को न्र दिया तो कारि- 1 । रुचिर रोमावली हरि फी, चारु उदर सुदेप । मना लिसेनी महि योग। कोऊ कहति अलिवात पंगति, जुरे एक संयोग। फोऊ कहति अहि काम पटयो, डसै जिनि यह का।स्थाम कहा ज्या छाजत । मनहुँ मेघ भीतर ससि की धति, कोरि १४६-तरुणी-मुन्दर नायिका । इन्दुन्देज का चन्दमा जिगणी जपा विशेष । मेवसारधनी। चाहिन्मुन्दा । नालाब, कुरसी अपनानाभि मे दी जाती है। बारिमनिछावर । मेनी-पाति, भरती। १४७-मागीमाविका परचि परत जानी जाती है। भेनी-प्रवीति । २४-यामतशोभित होती है। भृगु परम्भृगु मुनि की वान 7 संक्षिप्त सूरसागर भूती, कोउ चरन युग रंग कोउ निरखियपु रही थकिाकोड, निरखि के जुग जानु । कोऊ निरखि जुग जय सोमा, करति मन अनुमानु ॥ कोउ निरखि करि पोत कछनी, मेखला रवि कारि । कोउ निरसिदनामि की रवि, डारितन मन पारि। विराजत, यने एकहि भेप ॥ १४६ ॥ ( १४७ ) हरिमति अंग नागरि निरखि । इष्टि रोमावली पर रहि, परत नाहिं न परषि को कहत यह कामनी, कोउ कहत रोमावली की यि, सूर नाहि निवाहु ॥ १४७ ॥ (१४% ) रोमावली रेप अति राजत । सूक्ष्म मेप धूम की धारा, मधन ऊपर भ्राशत ॥ भृगुपद रेम म्याम उर मजनी, कहा नयों से दी जानी है । जानु-नितब । कटनी-कमर में कराने का एक मोरया । परिवार छोटे छोटे मारे। - ।

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संक्षिप्त सूरसागर अनंग । सूरदास कछु कहत न पाये, म गिरा गति पंग ॥ १५०॥ ( १५१ ) स्याम भुजा की सुंदरताई । यड़े विसाल जानु लो परसत, यक उपमा मन आई ॥ मनों भुजंग गगनते उत्तरत, अधमुम्ब रशो मुलाई । चंदन खोरि अनूपम राजत, सा पति कही न जाई ॥ रत्न जटित पहुंची,कर राजति, अंगुरी सुन्दर भारी । सूर मनों फनि सिरमनि सोभित, फन फन की धर्वि न्यारी ॥ १५१॥ ( १५२ ) पड़ो निठुर विधना यह देख्यो । जव त आजु नंद नंदन पयि, पार थार करि पेख्यो । नयभंगुरी पग जानु जंघ कटि, रवि कोन्हों निर्मान । हृदय था कर हस्त अग अंग, मुख पुनर थति यान ॥ अधर दसन रसना रस यानी, सवन नयन सक भाल । सूररोम प्रति लोचन देतो,देखत बने गुपाल ॥ १५२ ॥ परमित-माधीन, वश में । वारों-निदावर करती है। पग-सूनी, वाणी से वर्णन नहीं हो सकता है। १५१-जानु चुटने । परसत-ते हैं । अचमुम-नीचे की भोर मुंग किये हुए। मुनाईसकता हुआ। बौरि चंदन की रंधाएँ । पहुंचीदायी में पहनने का एक गहना। कनि शिरमणि मानिया कपी फर्ना पर रख रूपी मणिया शोभायमान हो रही है। १४-निटालटोर दया पेख्योदया। जानु पारम्परि । रोम रोम पति= में जितने घाब है, उतने ही नेत्र देन चाहिये थे। पारीमार पोस नखशिख-धंगार ११ . ( १५३ ) स्थाम कर मुरली प्रतिहि विराजत । परसत अधर सुधा- रस गटत, मधुर मधुर सुर वाजत ॥ लटकत मुकुट भौह पवि मटफत, नैन सैन अति छाजत । प्रोव नवाइ अटकि संसी पर, कोटि मदन छवि लाजत ॥ लोल कपोल झलक एंडत फी, यह उपमा कलु लागत । मानहुँ मकर सुधारस मोड़त, श्राप श्राप अनुरागत ॥ वृन्दावन विहरत नंद नंदन, काल सखा सँग सोहत । सूरदास प्रभु की छवि निरखत, सुर नर मुनि सब मोहत ॥ १५३ ॥ ( १५४ ) तय लगि सबै सयान रही । जव लगि नवल किसोरी मुरली, यदन समीर यही ॥ तय ही ला अभिमान चातुर्ग, पतिव्रत कुलदि चही । जय लगि नयन रंध मग मिलि के, नाहीं है यही । तय लगि तरुनी तरल चंचलता, बुधि यल सकुचि रही । सूरदास जय लगि यह धुनि उनि, नाहिंन परत काही ।। १५४॥ ( १५५ ) पंसी पन कान्द पजायत । पार सुनो प्रघननि मधुरे पुर, राग रागिनी ल्यायत ॥ सुर सुति तान पैंधान अमित १५३-गुगारा-शा के ऐसा भागंद। सौनकटाए । लामम- रोभित होता है। मामा गर । खोल-गुंदर पोहत पोलते हैं। ९५५--1ोद। पीआगामी... लिया।

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বিং in (१५७ ) मुरती त गुपालाई भावति । मुनरी सषी जदपि नैद मन, नाना भौति चावति ॥ राति एक पाई गढे करि, प्रति अधिकार जमावति । कोमल संग आपु माता गुरु, फाटि दी है मायति । सति साधीन सुजान कनौड़े, गिरिधर नारि नवावति । आपुन पौदि अपर सेल्या पर, फर पल्लव सन पद एतापति ॥ शुदी कुटित फोप नाता पुट, हम पर कोप पावति । सूर मरून जानि एकौ चिन, अधर सुतीत डोलावति ॥१५॥ (१५. ) अलकन की वि शाल कुल गावत । खंजन मीन मृगज शाजित भये, नैन नचापनि गतिहि न पावत ॥ मुल मुनुफानि १५:-नस पर भी निशाति-शा पालन कराती है। गिर राज्य शामिरेट्रो माति-पेशी पनाने के समर फार अगर ए रुड़े हैं। कनोई-रसाद । नाति-ममता करपाती है। परदे कर । माया रिसोने । निरिभर नारिओ पाररा एवं धत हर पी दंशो रूपी स्त्री। पुपाति-धोध कराती है। एवं......योलातिशी पनाते समोरको कुन कुन भो है पर दानी रपीको सम्माकिरहल पर शोषित हो गये, परन्तु वह लगा रोपारि हिलर कर दिया कि हम तुम पर देत हो । ती गाने में सिर सामाक्षि हो हिलता है। १५८-हार धी- पगारे सगे की। निममा | सीदों के वे जो पड़े ही घर हो । मा - । - . दमानितु दिप मदिया।गर उमगिमानन्द गुधानिधि, संशित सूरसागर मानि उर अंतर, अंबुज युधि उपजापन ॥ सकुचन म. विगमन या यि पर, अनुदिन जनम प्रयायत । पूल नहीं एमग म्यामा को, जयपि जलधर पायनापणन मनान दोन नहि हादक, अगिनि माप देवायत । मुस्तादाम पिपाकि दिलखि करि, अलि पलाक बनायत । पारा प्रमु ललित त्रिमंगी, मनमय मनहि लगायत ॥ १५ ॥ गो-दोहन ( १५६) मोदन करने वोहनि लीन्हीं गोपद यह जोरे । हाए धेनु थन यदन त्रिया ननु, धीर छाविष्टल हो । मानन रही ललित पर पीट, पाइन छवि न तोरे मनई निामिनिट कलानिधि, दुग्ध सिंधु के पार पंघट पर आर. मोल गि, गरि मुदित मुख मा । मन मरद ममि को मिल पामिनि, लियो घनघोर यादवविरहगति पिलमति मनो विलायम का.. का xit, गिमगर मा ram नाम पर बम पुरमा town frrtment । मित 't frat 1 from mom al. .. IN :-

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-गको MP: . ។ मोचन लोलत, हरि चिहि तुग। टानियम अचन पर फगये।गति गरायकम फिस्त्रिी,मन पर महनार्य । मानिनहार अलाजल मानी, सुमीत भार। मानन्द महावन मुख पर, अकुम पेमरिनारीगंगारपी मानिसी ना, नानिमाया प्रादेशिक अमा, उपमा पाये। घर पर मति निमा, मादी मानी होगनि stfrier- संक्षित रसागर घरगोलो पर लपाना कटि सीयर यमुना भागानद । गुट लटकि सामादि मटकि देखी कार की घटक मी अटक पनि लपट | प्रादी परनन ना माटरको ली पन माल कर,टेके गुम हार टदेवा मलाण परियार घट घट । सूरदाय मभ को यनिक देव गोली मात्र रानटरत निपटार मोरे की लपट॥ १६ ॥ भागरि गागरि लि पनिटपरहिवाये । प्रौगारका मुह माग, यकट भीर चला ॥ मग काम ना ग मामा, । मानाई गमलामोगामी, fruirr inert. - ramr 47.fi .m-rrrai. rodhian arrrrrrm

पालतीता
(१६५ )
मेरेमिदतीनिनिमारनहिं जाना,
लेको सनी हाच संरके सोने, परिजो
जमनी । पिर मुरबुज नसावे. परत पानी:
कर नमावि रन मात्र, रेस्पान मनोहर
लिस्तानी पारन.कसी जातिहरनी २६ ।
( १६५ )
पर रिपर पानी का कोई मौनता ह.
रोहन सोसार जिदिक सन
रंजन ने दोन दिले. तुम्ही सखि
मोर मोनो रतनामसानारंप
हतारो, र नो सानि पति और
से सस्तावित
सन १६५
Satire लाने के
Frtantrahmare
कर
Trtin
लिया है।
नि
-

व्याला पटा पन घोर घहरात प्रररात दररात
मर,मियरमागत मनुमाययावत मुगापार मरत
पागाrrenamurtT
निरखि पावर नये ग्याल गोपाल हरि गगन पेमेवारी
है.
পিয়গুলাে
गोवर्द्धन-धारण
मेयदल प्रथल प्र लोग देने। यकिन उनहाँ भो
मजा करत अति महायत चलत पहरात करि अंध काया।
घात भये नंदमय मदर यात भये यात मर नारि हरि करण
म लोग दिसायात तत उतपात नि मार
मर गायि ननुमान चालान भो न पर
जान कर प्रांगन मौन विकल हाले । मटि जानत
दगुरप्रभु को मानंद कालाही । १६६॥
माधि मेट गो मापक भी मा गोर
पनि, म मा म गिनु रंगोपन
-
-
माता METIMATTER
ter ATME
.
refinitNRAPE
.
ifram.मर

गायन धारा
EE
पर दुरा दुसाद नितारन सापक व मरदन पर
पद रिदारन, यशी दिनारान सर सुखदायका सरदात
हान्द गति हो, माझे नुमने सदासज्ञता १६ ॥
गो परीनेद नंदन पलमार । गिरिजनि परेर नजाने
र फोन महगो भोर दिनि भग्न नसोल पोरन, मेध
सगंभीर उन उनै परन्तु गिरिजपदधार मटित नीर ।
धदर से गिरिपरमानी पलतीर । चनकि.
पति भरला चरपति, खान परल मग घर पर
म उमदेव मनायत, जोर र ! समान
पल पल है दधि मधु मृत तोर गोली मारमा
बना रहे पुनहिल सतरा साहिरियो
पलाडो देहरा.
जगारो, काम
EmaiMRITr, F,
सोrrini
18-TATIrrrrrर
*T
-
mat.
-

।
उज्यारी, चंदन संग कुनास कोटि इन्द्र दिनदों में रांचे,
अरि प्रनतपाल फेगर कमलापति। एरा करा सोचन
अनन्य गति। श्रीगमचन्द्रराजीवनेनवर सरन शाशु धागी
मुम मंडन दी वदन वकवदन विदारनाथ गिर
मर निम्नाग्न ऋषि मघवान तारिका तारी परम
हात वचन निगलन। काली दमन केमिरर पानामा
मनिष्ट धनुर अनुपातन। घुपनि प्रबत पिनाकरिमंडन।
११-ाामारावाको गोदारकीय
पारेषण मेनेजर लिपाइलारीirism.
Enोगा श्रीगण को माता पान
संक्षित सुरसागर
विहार । पूरन प्रल सनातन घेई, में मूल्यो संसार । उनके
मागे चाही पूगा, यो मनि दीप प्रभास रवि भागे मोड
दिन में करें रिनाम । र यो उनदी को सुरपनि, मैं भूतों
तेहि भार १६॥
( १७०)
जय माधव गोविंद मुकुन्द हरि । कासिंधुप्त्यान कर
मारंगधर पनमाली बिटुल वामन यत । पाप पासो
मतदा । सरपन निसिरा सिर पत। बरन बिहार
।
अप, 14.ममा
...-Anurna
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हिवशारी। पद परति मुरतरी गारी पद रना हदय
A
गोवर्द्धन-धारप
स्पादित जनक सुता मनुरंजन | गोकुलपति गिरिधर गुन
सागरगोपी रमन रात रतिनागर। फल्नामय पापि कुल
दिनचरो पालि विराध फपट एग हारी। गुन गोप कन्या
इन पृन । दुएन दुप नधन हुस घुरन । रापन इन्भ फरन
विर देवन । तल्दर सात एफ सर पेपन । संत चूड़ चानूर
संहान्न । सा है मोहि रच्दा फारन पासिंधु गीय
दिनकारी। दरसन दे सपरी उसारी जे पद सदा शम्भु
नहि वारी । जे पद ति भवन प्रदिपारी ॥ जे पद पाहि फन
फरमान धारी। जे पद इन्दावनहिं दिहारी जे पद लस्टा
सरसंहारी। जे पद पांडद पर पशु धारी ॥ जे पद रस
गौतन नि तारी जे पदमटन के मुच पारी सूर दात
हरपावत ते पद । कर छपा अपने उन पर सद ॥ १७० ।।
(१७)
देखिपत दोज धन उन्नये । उतधन पालभरि यत्व इत,
रहकरोगभरे । उत सुर चार फाला प्रचंडस्त, तड़ित पोत
का कतार ।
यादव के पुर। सरला परत
हरे गला। समिनिता तासिकायतरारमा। तारपिता।
गिरने वाले । समानुर का, फेशी; देखो पद १२४ पाइन्नर का।
पर। रनि नागरोन में चनुर । धा । नाम के
-दिनको मुरि पाने से गन्दजी ने होमगर ने ।
कार गरन । रजन। मुरमा ।
निकालो पर १२ अन्तररथा fris

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गोपिका-सगन
गोपिका-लगन
पुती मंगसिंगार सवारतिापनीधि भागमोतिन की,
काम पर सिर धारति गोरे भात दिन्दु सेंदुर पर, टीका
पर जरा। यदन चन्द्रपर रवि तारापन, मानों उदित
सजा सुनगान तरिपनमनि भूपित. यह उपना नदि
मनपान रचिव पनाये. पारन नंद कुमार ॥ नाता
हर मुरासी सोना. पोर जादाडिन पान मुर
इयों नहि, फरदो भाईदास्त दसन रन
पनी तर, शिरू विटगारी पर सिल पैद
सन हासिक दुब पंचशी हारमोदिन ,
समन विमा संरला सरन पुरी हन पंदना पनि, त्र
लहान डोदतः दयटिस पद रामा, टन नन
एप की मारी। रात ददिर निसरी, नगर
पनिभा
पले ने सन 18
२.:------
-

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गोपिका-रूपन १०७ दिवस पहर घटिका पल, धृक धृक फहि विनु नंद कुमार । अरु धृक नवन कथा दिनु हरि के, धृक लोचन विनु रूप । रुदास प्रभु तुम पिनु घर पन, यौवन भीतर पूप ॥ ११ ॥ (१२) मन हरि सोतन धरहि चलावति । यौँ गज मत्त जाल अंकृत कर, घर गुल्जन मुधि नावति ॥ हरि रत रूप इहै मद बादत, डर डाखो जु महारत । गेह नेह यंधन पग तोलो, प्रेम सरोवर धावत ॥ रोमावती संड विचिकुव मनु, कुन्भस्थत परि पारत । तर स्थान हरि हरि सुनि जोवन गज दर्प नशारत ॥२२॥ ग्वालिनि प्रगटयो पूरन नेहु । दधि भाजन सिर पर धरे, पति गुपातहिं लेतु ॥ इन दीथिन निज पुर गली, जहाँ तहाँ हरि नाउँ । समुन्नाई समुात नहीं, तिल दै बिधयो गाउँ । कोन सुन का नयन, काजी सुरनिसकोवा कौन निडर डर सापु को, को उत्तम को पोचे । प्रेम पिये घर यानी, यतकत १८१-सानियांश। परिकाको । पुरानी धेरै कुएँ - १८-नी, जो हाथी के कानों में पहनी है। कुम्भम्पन:- ना. इन दी जाती है। गरिमा । म्नी - -2-गरमानर पाता। तर करा कर सकता है।

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गापिका-लगन । पानी सो गई हिन्द जामि प्रेम पंगुर जरि, सत पतार गई ! सानपरि लियर घर लौ, सप जन पार गई। पचन म मुगुरु पपलोनि. गुननिधि पुष्प नपरति परम भगुराग तोचि मुरा, सगी प्रमोद म ॥ मग सरुल मनोरथ पुग्न. सनर भार गई । दास र गिरिधर नागर, मिति रस ति॥१६॥ चिन राधा रानागर शोर । नएन वन एबि दो उपजत मनु. सनि मनुराग फोर ॥ सारस सर पवन को मान?, जिल मधुप सुन जोरपान, भियतन मानत, पलकन देन और लिव मनोरचनानि सफल ला, रजनि गरे पुनि भोर । र परस्परमीति निरंतर. दंपति चितवीर En (१६) यने हैं दिलान मलदल नेर । ता में चार दिना- पनि, दभाव नत समितेन ॥ बदन सरोज निकट मुंधित पच, मनई मधुर भाये मधु तैन । तितक तरनि ससि पहन १६-अनितारिजट सतपालादना निर का तर, माल, ति, नज, तमान, रसात न कर पान है। नेहा परिमोट कर । भरनटार पने । मान- गन्ने। पुजा मानद पाar नापा संक्षिप्त सूरसागर मकर कोलनि मलकत, सम सीकर के दागा मान मीन मन पदापि पर, रितु चार चितगादारिम दमन मर गनिमुमनि, मोद्दत मुर नर नाग, श्री गोपाल कर रख मर्ग, मूर मने मादाग। ऐसी सोमा सिंधु विडोक्तान पछुक हैसि, योलत मधुर मनोहर वैन । मदन नृपति को देख मदामद, युधि बल पसि न सकत उर चैन । सूरदास प्रभुदत दिनहि दिन, पठवत चरित चुनौती देन ॥ १४ ॥ ( २००) मोहन यदन शिलोकत अंपियन, उपजत है अनुराग । तानि नाप ततफन चकोर गति, पियत पियूष पंपग! सोयन नालन न राजन रति, पूरन मधुकर भाग। माना अलि पानंद मित, मकरंद पियत रति फाग भैयरि भाग महटी पर शुमकुम, चंदन विन्दु विभाग । चातर सोम सर पनु घन में, निरखत मन येराग ॥ कुंचित केस मयूर धन्द्रिय मंडल मुमन सुयाग । माग, मदन धनुष सरसाद वरपती पन दाग । अधायिय विसनि सुमनोहर, मोहन मुरली पगा। मान एथा पयोधि घेरि धन, पर वरपन लाग! कुंडल मार मिलि क्रीड़त, मोभित सरद दाग नासा विस अपियन माग।००॥ पाद बार । -भाग हागिरे। दान मे पर में प्रय। मुनौतीप। ...in मन त पर पदमपी समर । भरत ।

गोदिशा-सगन ( २०१) विचारहि चूक परी मैं जानी । राजु गोविंदहि देखि देखि है, इहै समुनि पदितानी रचि पनि सोवि संशारि सकत संरचनुर चतुरई जानी। परिन दई रोम रोननि प्रति, रत्नहि रजा नसानी। कहा करो अतितप नैना, उमनि वामन पानी। तर ममेरे सनार हा घाँ, दुधि पातना . पुची २०१॥ ( २०२ ) परित भई राधा जनारि। जोमन पान परति भव- रन.ते सन्तानी सत्यारित रतन अटित पग नभग दरी. नुपुर पनि का परन रतात । माद चरन कमज्ञ होमी, निश्यहि पात मरात: उगल व मरर.त पनि सोना. रिपरीति भौति सँवारे। सटिकादती ६नक हुदापति, पहिरे नंद दुलारे । दृदय दिता नात मोतिन देशाला स्मनुभन्द र हित गरिने दिल से दो है। शिरो मानिन , सब समोर पनीन की। इन शरद नगरनुत्तजिनालय । र । रबितर सनकीमा ति से दोनों है। ३०१-पिता हो। हो। रवि किमी मार से कार दुरदुल्ला । मनताई। रोन ले ले करने। -ननकी जान्ने : नी. डो, महा। रतारपुर । किनकी

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गोपिशा-तगन
मस्त गायन, चतत फरजु धर कुंडत तोल। सय पति
विनि प्रतिदिन दिराजन, नीलमनि मुजुर कपोत ॥ कुंचित
रेम सुगंध मुख मनु, उड़िाये मधुपन से होता र
हम नासिव मनोहरनुमान्त मनुराग अनात । २०४ ॥
(२०५ )
नंदनंदन प्रदायन पंई। यदुकुल ना बिपि द्वितिय
र माटे निमुन द । अर फुट ने दहरि पारिनिधि,
दिल मधुपुरो सद। देव संभु तात धरि धाने, गोमा
दद मामाची सदा तिथि पनुनति. मरद करत
नंदा जनमत करन, तन नजानिद ।
को जमीद परिवार गति, निरतिमे पनवंद ।
संन कला पोरस पर, उन परमानंद ॥ २०५::
विमलो हरियो मुन दार। नई दिडाइ दि.
बैगन, मति पो मन सार पनि पाटन
मार दी
- शेर
REF.
सास::-..

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.
१२५
संशिश गूरसागर
( २१५ )
देगिरी देखि कंदल लोल । चार घननि परिस
मला ललित कोल ॥ धान मंडल गुगामापर,
मन भरो मोर। मकर क्रीड़न गुप्त पगट,
मेन मीन भुषगिनी गुन, नागिका पन यीव । मण
निपत मामा, लमति गनवी मुपविण
मान, युपनि स्लोगन ग्रंग। विशुरि धन से माना,
लनिगा म्याम तुम छवि अमृतान, गो पाम ,
मूर प्रभु की निरनिगामा प्रजननि बहभाग! २५॥
()
हरि गुण निरपनि नागरि नाशिकमन माता
पान गरा, गान्ति पारित पारिसमनि गाम
गम, भाट माती प्रारिहार मागरिजाकात
काम गम विदा पाट कोटि जान
म पनि गत वारिसन मना सन को भार
रपंच पमारि विमा मागही
में मागिन र अधिक मात्र नि म
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गोपिशा-लगन
१२७
पर मुख नृदु येनु । मतिविरासतिपदन विधुपर, सुरभि
न रेन परन र कपोल नासा, परम सुंदर नैन ।
परत इंदन गंडमंटल. मन निर्तत मैन । कुटिल फच नू
टिकरमा, सीस सिखि श्रीपंड। मनु मदन धतु सर
माने, गि धन कोदंड ॥ र धौगोपाल को छपि, टि
रिमरितेत । मानपति की निरवि सोमा, पतक परन
मदत ॥
.
-
(२६)
हमारे सामलाल हो । न घिसाल हो, माही तेरी
हार नुट टोसनि मुम मुरती कतमंद । मों
नियमिधिनाचत धानंद ॥ मकरारत पहुंडल छवि
र मान कपोला र मुमुकिन विच मधुर मधुर
दर पाल चितानि मनोहर राजति भुवनंग । धनुष यान
रस रोन पोतिनंग ॥ यदन सुधा को सरोवर
पर पारिज गुपती भूगिनी रवि तिनके फल
तर पनि निरस्त दामिनि पुति लजार । चमकि
मनों घनमें दुरि सार । चरन फमत भरलंदित
लागि पन्निवीन दुर र लसपोर
Nritालमारा । जिस पर कार ।
-
गुर।
-~~ र 7 उपरी भानमार

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और सफेदी पर समस: सरस्वती, यमुना और गंगा पीला, Exam । दामिनार (फे दाने)। तिपन निरवारिरि -शिकार गिरानामगरमी गोपिका-लगन ( २२४ ) मनु मधुकर पद फमत लुभान्यो । चिरा घफोर चन्द्र नख एटायो, एटक पल न मुलान्यो । दिन ही फाहे गये उठि मोते, जात नहीं में जान्यो । अव देशो तन में ये नाही, कहा जिपहिं धी मान्योतय ते फेरि तके नहि मोतन, नवचरनन लि मान्यो । सूरदास घे पापु सारथी, पर पेदन गहिं धन पापा, न प्रगट, धरै धनहि छिपार । महानग स्याम दिनादि । पुर सखी सुजान राधा, परस्पर मुस- प्रगट टान्दो ॥२२४॥ ( २२५ ) राधा परन निर्मल नारि । पहति ही मन फर्मना फरि, त्य दुविधा टारि ॥ स्पाम की एक तुही जान्यो, दुराचरनी और जैसे घट पूरन न डोले, प्रधादुलो उग डौर ॥ धनी पायो, मगटि फैसे जाइ । कति हो यह पात तो सी, पद ॥२५॥ नपा पाल पारा निपार करती है। मुशरपंचालिपगा। १३४-रागेको माग एममा मे होती है। रार पतसरं पाए । terior

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१४७ गोपिका-लगन परे। सनि प्रकाश विभास देल है, निफसत पुनि तह इन । मुरल्याम अंबुज फर परनान, जद तह भ्रमि भ्रमि पटत ॥२५॥ ( २५२ ) मेरे नैन कुरंग भये। जोवन यनते निति चते ए, मुरली नाद रए ॥ रूप प्याध कुंडस दुति ज्याला, किंपिन घटा सु घोरा प्याकुल है एकहि टक देखत, गुरुजन तजि संतोष ॥ भौह कमान नैन सर साधनि, मारनि चितवनि धार ॥ ठौर रहे तहि दरत तूर थे, मई हँसनि सर धार ॥ २५२ ।। ( २५३ ) रोम रोम नैन गयेरी। ज्यों जलधर पर्वत पर परखत, दद है भारनि ददेरी । ज्यों मधुकर रस कमल पान फरि, माने तजि उन्मत्त भवेरी ॥ ज्यों कांचरी भुसंगन तजही, फिरि ने तक जु गये तु गरी ॥ ऐसी दसा भरी इन की, स्याम समें मगन रपरी। सूरदास प्रभु अगनित सोभा, ना जानौं केहि भंग एरी ॥ २५३ ॥ २५१----ौरे । पन-पहुन सी । स्म-पराग । महारा . तरात। २५२-- गुरंग-हिरण । नादाद । ररेग गये, मस्त हो गरे । पोकिनिनारमनी पोल ! सतोरई । पार मुंदर। २५३-जनपरोप । मानि-झरनों से । पोचुरो गुदी । मुनापारपे-रहे, रंग । गस्ति-मनुग्न ।

संक्षिप्त सूरसागर ( २५६ ) लोचन मये स्याम यस कहा करी माई। जितही । घरात नित, पापु जात घाईरी । मुसुकनि दे मोल लिये किये गट चेरी । जोर जोर ये कहत फरत, रहतसारसोरी! उनकी परतीति स्याम, मानत नहि अजहूँ । अलकनिरज याँघि धरे, भाजे जि कपहूँ । मन से इन उनहि दियो, दर सदा सँग हो । सूर स्याम रूप रासि, रीमे या रंग ही Per ( २५० ) मैना भये घर के चोर । सेत नदि का बने इन सी, देखि धषि मये भोर ॥ नहीं त्यागत नहीं मागत, रुप आगमकाम। अलक होरनि बाँघि रामे, सजी उनकी ग्राम में परम करि यरजि धारी, निदरि निकसे देरि । सूर स्याम धार राधे, अगधि घेरि ॥ २५०॥ ( २५१ ) लोवन मयेरी मेरे। लोक लालदन धनवेली ताज मातुर है गईरे । स्याम प रस पारित लोचन, सहा लार लुधरे । लपटे सटकि पराग पिलोदानि, मपुर सोम गम्य । निम्निाना पागगोरे पार २४६-तिवन । मुमानि मेयुगकार मे।मानित । मापामार-मादाम। - ४.-भाने मात्र पारिका । निनादा

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गोपिका-रूगन २४७ रे सनि माय पिनास देख, निस्सत पुनि लई । रस्तानबुज पर चरनगि, सई त मिनि ला ॥२५॥ ( २५२ ) मेरे नैन पुरंग भये। जोपनपनते निति चते ए, मुरती दका रूप माध फुल टुति याता, सिरिन गटानु पर पाकुन काहि टक देखत, गुरु जन तजि संतोष । माह मान न सरसाधनि, मारनिचितवनि कार ॥ टौर रहेनहि ररत र सनि सर धार । ९५२ ॥ ( २५३ ) रोग रोगन गरी । यो जलधर पर्वत पर परतत. हिनिदरी लोन्धुरर रस पामत पान पारि, भोज उन्मत्त भरी। ज्यों पाचरी भुगन तजही, फिरि मग तु गरी । ऐसी दसा भरोइन फो, स्वाम कपमान परी। दात प्रभु सन्ति सोना, ना जानों । M दरेग एरी: २५३ ॥ रे। परन सी । रनर । FIR २५२- जुलनामा सन्न हो गई। दिनी । तो । चर: कार। -भार। झालिमान से Frहे. कात्तिक । युगे।

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रास्तोता
१४६
तर जति भारत । तमतिमतिरकत गति या.
घर परहि विशारत । अधिपत फुत भनिनान रोपरत.
जनहिनिशरत । निदरे विरह समूह स्थान जंग, पेखि
नई पारत नित मुभा कुन्त साहस करि. पुनि
पुन मुलाई भारत । हर स्वाप मन मुकि माकुत. टरत
नारसदारत। २५६१
रासलीला
( २५७ )
रात रमले नाई परनिशा। कहाँ देती बुद्धि कहाँ
रमन तहो, करारह चित्त जिप मन भुतादे जो कहा
बन माने जोका दिन नहीं पा रतहि पाते।
नारी मशिन भान नहीं, नावही माहि भार पड़
साईनिज पह ज्ञान पहचान है, दरत दंपति
मन सार गाई। हेमांगी मार दार नुन के नैन दोउ.
हे नित्य नरदेह पाई २५
सुनो. गुरु पदो परोलित राक्ष । गोपिन परम त हरि
का है। जोवर है। मे। कर। परब
-
मसराम हनुमान
२३८-गमन ः
र चिन्ता
प

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सौराधिका
१५६
(२३२)
मन परल मानपि मारत । परन पान उपना पर
तांची, ता गुग यो प्रपात सुन्दर पर मन पदी सोमा,
पालकमल कारवायत और गरिमापसानों, इतना
को गुन गायत । साम मास सन पर पानी. सदन सुनत
रुप पारन । स्वास प्रभु सात संगाती, जानी जाति
जबास्त:२९२
( २७३ )
सनि मोरन, तेरीमान प्रियाला परमी नंद कुमार । सो
नादि अंत मेरो गुन, नागर यह उपकार ॥ इन्द्रमुखी
मी ए.दिव, चंदन तिता सितार ।मनु पेनी भुवंगिनि
का मुल: २ सन्नी र दर के और दादरा
ऐले यु पार के निकर रपे हुंड और
विरार-१, १ प्रतिकिक र र रम।
= Ex-मा: दतिय किया मुर कपल,
११ पारकर और कर कर. इनसे जुने ४८
१२ र २: मुम मुरली हो २ भारितारे. निगे।
समोर चिम्-१. + २०१२ मने रेमे और। रास्नि पजों
सोनार राशिको 3- नर
मेकी दर पति को मिली । मोर
-
8ोना 25 - ..
ET

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ग्रीवधिमा पनि
(२७५ )
साहराधिश रावत ने पारन नदिन
मुख एपिउनानन पायो मतपती मनिपारि
हो. सादिव मेंदुर दिन्नु मायामा पूनी चन्द्रगल चढ़ि,
सारे गरमन सी धापत झापी कानन ही पारीमति राजति,
मन मइन रस वा घड़ापो । माई नाग डीनि भनिनाये,
मरिसाहाग दो दातना शनि मौहमति सोचन,
पैतारे रस मुकुनाइन पापो।मानों गगनि मनीमान भरि,
पियन न यो दाई टरफादो सयर दसन रसना कोक्ति
माँ विनिर जाति दिव विदुर लगा । मन देखि रमि
समत नहालत, सापरभृगी सायरु सापो दि स्थान
सुगंध संचारी, गकी पर नगरको पनायो।मानों दीपक
उदित भरन, तिनिर साचि सरलागत सो भूगन
मुहारलित सदरन पर मना मिले शानिज सुहानाला
पर मौदूतो दर्पन देसरायो । २७ ।
तिसरा मौरीर सके निर पर रदस
और नो हरर रिचार बार
२३४-नानाभूति नाकार
जोगी। तोशामा दिर, राह दिन
जि (ति) डोली र सका। गो और रा ।
मोतिरेर, सोशीने शासन,
* गार्ड में सीन है। जिनमोरों का पी
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२८
सोधेिया पत्नः
ऐसार मुहानाने निधनि, पनि नाता नजनारि। गुरुं भृगुस
पिच मौन हो, सति सनोपहचारिदिता सुमग जराइ
नमुनामनिवृति देत मगर भोपनमपते. सति
नसत तन्त र सुदर मुधर कपोत हो, रहे मोर भरिपूर
कंचन संपुरदै पता. मानहुँ भरे तिहरा चिनुन विडीना जद
दियो, नोनन घोले सात निश्तो अति सति कुंज ते, मनई
सानि परमात जिहिमालपनपाटिका, निस्ततिभानिमार।
मधुर काह पन दाडि है, चलत संग तपटार जहाँ डहां टू
पर तहाँ वहाँ मनसायाति धान निद है रहै, तन
मन तेरे हाय : देति पदन के रूप को. मोहन रहो तुमार।
करतो चोरलो. टिन इत उतसा तोहे स्थान
सोहे सली. पदी निरंतर मोति । न तन मन धन स्थान ,
तै हरि पार जोति । मदनमोहन त् यत सदै, सत प्रदान
नैदानादात गावै सदा, कोरनि रितद दिला
कारक । मोन्माद, सुंदर । रिसर मेल-रेन
र र ६. च दें। बा र कतार
निगरे का राम हिट हन्दन,
र परेरे। गुरबारात, हि ई न को
सपुर मरि से दो है। दी, हिसके गले प
में से है। और, रिक र रंग की
नगर में से की है। रिसर में पहले का एक
कार
मोकोमोसोमनादातर।
-

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भोपास दन
सावरतरिता से नया मी पर पिपति
नुवनिता शिवमाननादि सागरते, उत्तटी नुन तर
पिने समय को सुज्ञतार कहाँ धान ।
दाल दान्नि हितकरी, हरिहर की जोतराकार
निति तिरतिरोननियमित पडो 30
m
111
पालक पनी ममल कित्ता । न तिस तुंहर बिह
इलमपीपरनुज र बुमी,
पर कुल को नमन कप देखिसत माना. नवरे
रस निन्द पास न लिपित मदत,
बनमोना टन हंत हंड पर सरट बँच
लेते दिसतनयं पर विस्तार नम
मानकर दंड कान लि. सैन समाहित जोर
टेन्टमा तिरिदिपति र योरोसर
range
.

मिक्षित-मुरसागर । ( २७8 ) महिंदुरत हरि विगतो परस। उपजत मनको भनि मार, अपरन रंग नैनन को भरस । अंचल उडत अधिक दपि पागनि, नग्न रेषा उर बनी परस । मनु जसपर तर बाल कलानिधि, कवर प्रगति दुरि देत पास ॥ पितुरी मालक एवंम देखियत, मालत मिटि तिलक सरसागर जी भेडन पोलते, मी कहि घातको नतम ॥ २४ ॥ (२०) देखी नवोमनी र अयला उड़ति अधिक पवि नपति, मनई उदित ममि दुति दुनिया पर । मोमा बदा कति पन मायहि :निधि निषि नैननि मन पावति। कागति पार दमो दिसि मेलनि, लिय सनी लिन पदापनि एनि घरननि नमाम काति हो, निगम मेनि पर सबनि गीरी मानो विगुरिन प्रदन गायो से सरम मची मोतिन माल मुनि.मन पानि, हरि हरि हरिक्षि भाशा 1 मन air गार निवारन, बने म निरानिकलापमांगों -पाम, पपm trari पर mपरम मंदसामोरे merifa सा, शिमला मेमानी? v.figratmगाला . . ....MARFAmit घोधिशा वन काहि मोतो, हो जानति मनमरन पराये।सूरदास मनु मिलन अगट भयो, पिय को परसु कैसे दुरत दुराये ॥ २० ॥ है फर ओरि तेति उनलाई । सोमा कहत वनति नाई मोपे, काजु सजो पिप संगहु ते काई । सोइ भाभा पुनि फेरि फयति है, विधि कापुन रवि रचित मनाई मानहुँ कुनु- दिन कनक मेरे चढ़ि, सति सन्तुरा मृदु सहित तिचाई। सोभित विकुर तलाट पदनपर, कुंचित कुटित तक निउ. । नाग यथ् मनु स्मो कोसते. ते मधुपान सनर है आई। कि मुकि परति प्रेन मदनाती, उनैगि उनैगि तन देत दिवाई। स्वास प्रभु सखी सपानी, चुटुरिनि देत तपाई सति पाई ॥२१॥ ( २८२) संजन नैन सुरंग रत माते। वितर चार दिनत उग संचल, पत पिंजरा नसमाते । यते कहूं तोरपात कही सखि, ना ही दमा । रटनी -न्दा। सनातन, रिसर । निकनंद गिरता है। निगः । २८१-सागरिरको भर दो हार निदा करा नानदी ।। पति हेमोगा को है. मान चिन ईसी । विगतको र मिति इनकी करना है, ने नर बर माझा जाता है। सोमवार पर। २०३--- । ते कोरलो भार को गद - --

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धीराधिका वर्णन पोर हारे। दोड पसलिये दीप काभाना, किये जात उजियारे। मुरली नाइ सुनत कटु धोरज, जिय जानत चुचुकारे। सूर- दास प्रनु रीकि रसिक पिय, उमगि प्रान धन पारे॥२-७ ( २८०) राधे, तेरे नैन विधारी यान ।यो मार ज्यों मुरदिपर घर, प्योंगरिराने मान । सग पर फमल कमल पर फेवलि, फेदति पर हरि ठान । हरि पर सर सरवर पर फलसा, फलता पर ससि मान ॥ ससि पर चिय दोफिला ता विच, कार परत अनुमान ! यीच पीच दामिनि दुति उपजाति, मधुप जूय समान ॥ तू नागरि सब गुननि उजागदि पून कला निधानासान तोदरसन कारन, प्याकुल परेघजान ॥२॥ पथे, हरि रिपु क्यों न दिपावति । मेल्मुनापति ताके पति www पुटिकास पर विशेष । चुचकारे पार से टहरा खेका । धारे निधारका -पाचारी, यी ! , पोपरपरले सेयोप होता है, कि भाज हंस के समान है। कार जान से मारीमती रिद्धि उधों से पता दी है। हरि सिंह, परिसं ना दी गहै। सर: नाभि से हा दोन है। लसानों से अपना दोनी है। शनि पुरसिमरा पल, परों से सादगा। पोलिमारी से समा हो गया है। शारदा, नासिका से अपना दी गयी है । दानिनि रनिरत्तो को चमन, दानों में जमा दो ग्ला है। पुर जूष-नारों के झंड, बालों से पता दी है। ,

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भीराधिका वर्णन १७३ ( २६१) राधे, हरि रिपु क्यों न दुरावति । सारंग सुत पाइन की सोना,सारंग सुत न पनापति n सैत सुता पति ताफे मुत पति, ता. सुताई मनावति । हरि पादनके मीत ताउ पति, सा पति तोहि घुलावति ॥ राफापति नदि कियो उदय मुनि, या समये नहि मायति । यियिधि पिलास अनंद रसिफ सुख, सूर स्थान तेरे गुन गावति ॥ २६१ ॥ ( २६२ ) राधे, या मैं फहा तिहारो। मुफहि मकर रानु हाटफ येनी, सो पगडंग फारो ॥ गति मराल फेहरि करि कदली, जुगल अंघ अनुहारो। नैन कुरंग यचन कोफिल के, नाता सुफ पद गारो। सिद्धम अधर दसन दाडिम कान, फरो न तुम निरवारो। सूरदास प्रभु त्रिभुवन पति को, पफो न उनहि उवाय॥ २१२॥ ६+६=१२ । गहरभर । नौ र सात गार । भी रंग समाति, हए । रंग येन । १६१-हरि रिपु-विभाका गा मात् मान । सग...... सोमानलरा पुत्र दना, तिसका पाहन मृगः मृगो ने जैसे शोभा पात नेत्र । सारग सुत न पनातिदीप का पुरानो रही लगाती मन:मिनरी का पति पति । यी । म तिमझा पुत्र शनि. निको गति भन्द अर्थात कुनातिना #. निमा किन गरनिन पनि हात तुझे ।। --- । पग-प. नुमा । पुरे या, तिसरा । । संशित गुरसाई ( २६३) राधे, अनि मान की। यह कहि हरि परितात गति मन, पाष पार पन्यो । पहिली मानी कथा यतायो, भर निष भंग धन्यो । तर दिसामना पुगुनि शनि, रिगुपन शिव हमी । मोहे प्रार. महामदमाते, गुरमुख भगत मन्यो। मिगन महिल गमेत महामुनि, को ग्राम रोहानन की दति निजि गर गिय पर ज्योहान गयो। जेदि जागो जग काम शुमाधी, मेरे घट जात जनग ॥ २३॥ हिंडोता (१४) नी मा भूला गोएयर । गंग गया परम एलानमान पान र म बनके मनोहर, गत पुस। नारि itी पाम शुगर, निराजित अनग पटसीलिमालमत, भूममा गमन वति मानिस नी Pritfrम पियरगा काम मरमर मीनम, fairmir मीरापानमार पनि, पाय अमुना मोर ग मोर iran. . frrr fairmiMATTA artimes HI-Kore-starammar

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भी चमौन्द
তখন ভলি নননন-বিলে
चोपडा निरनमालकिन
क्षेत्रात काम हिमालते. दथिन Tax
विधु हिरे वितु शिष तिवंडो तिर मलित जात।
धारको धरनी, सानुन पहात
श्रीकृष्ण-सौन्दर्य
। ३०० )
मोरल दवा कापने राजन रचिर देतरी। ददन
मकर सानिमन मदुधरवाने देतरी र धनुष
सरपान पति, भात तिन मनु पानरी । भोर होन
कार को किस उरथ धान रोमानिन जड़ित
मनोहर दुस, राजत खेत कपोतरी। पालिन्दी में रवि
तिमिल, चंचल पवन राडोनरी सुमन नालिसा मुसा
सोनित मसात के होल।शु मुन माना समत
निस साल.घनकि दोतरन पर पुनित
कोडरर करड़ेगड़े कई
-
-
नहरको पार करने बने हैं। दि रिसर
-
मात्र हैं।
सिलिकति परम
३. स्वाचिरार-दर और
- देशमा वारपार।

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छप्प सौन्दर्य
( ३०१ )
सोइ मुख नंद भाग्य ते पायो । जो मुख ब्रह्मादिक को
नाही, सोह सुख यमुमति गोद खिलायो । सोह सुख सुरभी
पच्छ वृन्दावन, सोइ सुख ग्वालन टेरि मुनायो। सोइ सुख
यमुना कूल कदम चढ़ि, कोपकियो काली गहि ल्यायो । सुन
ही सुख डोलत कुंजन में, सब मुसनिधि वन तँ ग्रज प्रायो।
सूरदास प्रभु मुखसागर अति, सोइ सुख सेप सहस मुख
.
गायो। २०१॥
( ३०२ )
जागिये गोपाल लाल ग्वाल द्वार ठाढ़े। रैनि अंधकार
गयो, चन्द्रमा मलीन भयो, तारागन देखियत नहिं तरनि
किरनि यात्।। मुकुलित भये फमल जाल, गुंज करतभृङ्गमाल,
प्रफुलित यन पुटुप डार कुमुदिनि कुंभिलानी । गंधर्व गुन गान
फरत, स्नान दान नेम धरत, हरत सफल पाप यदत वित्र
घेद पानी ॥ योलत नन्द चार यार, देखें मुस तुव कुमार, गाइन
भई बड़ी यार ग्रन्दावन सैये। जननी कहत उठो स्याम,
पादुिलियाँ र मंद-पोरे पोरे । सुद-दायी । भभिराम-सुंदर ।
प्रमायाम-राधान्य
३०१-मुरुम्दानंद । मुरभीमाया कदम-कदम्बका दर। पाली-
व्य नाग जो यमुना में रहना था। देग पद ११६ को अन्नकया।
1-गोपाल गए। रएि। फिरवि पाई-बदर हुधा ।
नम्ति ।
गुंज गुंजार । पुहुप-मूल । बदत= उधारर

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धी रुत-सौन्दर्य
१.३
( ३०४ )
यीले मुरलो नेकु बजाउलि पलि जात सपा यह
फदि पाहि, अधर सुधारस प्राउ॥ दुर्लभ जन्म दुर्तम मन्दावन
दुर्लभ प्रेम तरंग । ना जानिये पद्धरि रुव है है, स्वाम तुम्हारो,
संग ॥ विनती करहि सुदल पोदामा, सुनहु स्याम दै फान ।
जा रस को सनकादि सुभादिक, फरत समर मुनि ध्यान ॥ फय
पुनि गोप भेप प्रज धन्हिी, फिरिदी सुरभिन साथ । कय तुम
घाद हानि के हो, हो गोकुल के नाच ॥ अपनी अपनी फाँध
फमरिया, न्यालन ई उसाइ । सौर दिवाइ नंद यावा की, रहे
सस्त गहि पार ।। सुनि सुनि दोन गिरा मुरतीधर, चितए.
मुरा मुलुकाइ । गुन गंभीर गोपात मुरलि फर, लोन्ही तपहि
उटार ॥ धरि कर धेनु अघर मन मोहन, रियो मधुर ध्वनि
गान । मोहे सफल जीत यल है, नुनि पारणे तन मान ।
चपल भयन प्रकुटी नासा पुर. अगि सुन्दर मुप पैन । मान
नन्यभार दिसावत, गति लिये नायक मैन । घमस्त मोर
चन्द्रिका माये, फुचित ऋतक भात । मान? कमल कोस
रस चायत, उड़ि पाये शति माला कुंजलाल कपोलन
मतस्त, ऐसी सोमा देत । मानटुं सुधासिंधु मेंढ़न, मकर
पान को हेत ॥ उपनावत मावत मति सुन्दर, अनाघात के
नाल । सरयस दियो मदन मोहन फो, निरपि रुप ग्वाल ।।
सोमित ती जरनन पर, स्वासा पवन भारि मनहुँ
१४-पनी मन्दर ! (हम) वरिकर । भीरमा
स्या के सामों के नाम । मनस्थिर सरकार को दर.
पसभापत कर जाते हैं। इनके नाम सन,

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मी सन्दर्य रिपुर विभूतियां पनुगमन, एस.पमा स्पिनरपर पमल हगन पर टी,पारगो पर अभिमान . परमीपति सिरी, उर लिए गए गुन गानो नो मी गैरमाल साहिलो, हामी गल निम का एप.मरा पोटि भागेन विधि भयो पस प्रसंग! न मी सका दिमान पि.. गोपी मन मानस रंस । धारांटनाप उर पासिनि, पादति आ पद रंग । नायो मुरा सुयनय सिंहामन, परि सी पार ऐन । घर मा पीएस त सानो, नहीं सिपाहता। सदापि ना या नंदगुपन को, पाही सी मनुराग ॥ ३०५ ॥ (३०६ ) गटयर भेष धर प्रजायत । मोर मुकुट मकरास्त कुंटस, फुटित मलय मुग पर पि पायत ॥ सापटी यिष्ट नति पंचत, पर एषि पर उपमा फ धापत । धनुप देति रामन विवि सरपत, उडिन सस्त रठिये पलायत । अधर अनूप मुरति सर पूरत, गौरी राग अतापि दजायत । सुरभी इन्द्र गोर पालश सँग, गायत शनि सानन्द यदायत॥ पनक पार-पान । frritafar frg मा पार से पहले दिने मदीप मागे । परीक्षा पाने । ने पापा मार्ग Evince rar पर 1-ग पा-मा। नाम-कारात मरा दन ! गागना हा मम ना?

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মহামন २८ पर दोउ भरा। उनतें पदे और नदि फोलइहि सर देत एईया। सूर स्याम सन्नुत सारे,तेसपवनचलपा ३० भी नर नंदन मूलत टोल । फन संभ जराद पटुली, रूगे रतन मनोत ॥ सुभग सरत सुदेत डॉडी, रची विशना गोल। मनोहरपति सुर समा ते. पई दियो दिडोत सहि पति कई कंपति. विहति सपति डरोट। भिदतपति सजि चड़ि विमानन, निरसिदै दै सोता थके मुख मा कहि न भाये, सक्त मरा इन मोल ।सपी नव सत साजि तीन्, कस्त मधुरे योत ॥ यस्यो रति पति देव यह पुषि, इन्द्र भयो मन मोला तर यह सुख गोप गोपी, पियत अमृत पतात ॥३०६ ॥ सगुरा गमन ( ३२० ) माह दे चरन देखिही जाइ । जे पद अमल प्रिया भी उर से, नैक न सके मुतार । जे पद कमत सरत गति दुर्लभ, मैं २९ । सरकार राति सदा । पर - २०१-डोम, सि । -रान । सरनोभी, CF सी। गुरे-तुराई। मातिबोरसती है । दिरा दिन्न । RIN । सरनुच: सौ मदर. नि परमे व पारित है. इस मुल साने गुड़ है। चारोगा कार । भोप ११.-मन

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मयुरा मन पारी । हम पातक तुमको कहा तिष, फळे तुमहि ते भात । सूर हदय धोरज अवधारी, काहे कोविलक्षात ॥१२॥ ( १३ ) यह मुनि गिरो घरनि कि माता । कहा पर टगोपे साई, तिर जात दोउ नाता। विरथ समयकी हरत तकुटिया, पाप पुर डर नाहीं । कलू नका तुनको है याने, सो सोधौ मन मादौ नाम सुनत अचर तुम्हारो, कर भरे हो सार । तर नंद घरनी अति प्याकुत, सेहि रैनि विहार । ३१३॥ विदुरे श्री प्रजराज प्राइन नैनन ते परतीति गई। उडिनई हरि संग तवाहिते, है न गई सति स्याम मई । रूप रलिक तासची कहारत, तो करनी कदुर्च न नई। साँचे र कुरित ए तोवन, पया मैन यि दौनि तई। अब काहे उन मोचत सोचत, सनो गये ते त्त नई । सूरदास याही ते उड़ भर. इन पतन होगा ३१४॥ ११. मोर-मोह। परोसते है । जन-पास। तिरोनरी हो या पुसी होती हो। ११३-रिजनों का कर। सिपमा । गुरिन्दरी, मारामार मोकार रोताका सदा ११५ करदोनिमावति, रिमा पन कोपर- पापले मारा। पर गोली कुन्तीदान निरनी की ज। परिसर की नगा।

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मथुरागमन पाजत । अति संभ्रम अंचल चंचल गति, धामनि घजा विराजतं । अंच अटन पर धान कीवि, सीसनिमानों फूली। फनक पालल पुच प्रगट देसियत, भानंद पाक भूली। विमुन फटाक्षि पदी परदा यि, लाल रंध की रेख । मनहुँ तुम्हारे दरसन कारन, भूले नैन निमेष ॥ चित दे अवलोकहु नंदनंदन, पुरी परम रुचि रूप। सूरदास प्रभु कंस नारि के, दोहु यहां के भूप ॥ ३१७ ॥ ( ३९८ ) देवि री भानु नैन भरि हरि जू के रथ की सोभा। योग यन्य जप तप तोरय प्रत, फोजत है जेहि लोभा ॥ चार चक्र मनि पचित मनोहर, चंचल चमर पताका । स्वेत व मनु ससि प्राची दिति, उदय कियो निलि राका ॥ धन तन स्याम सुदेस पौत पट, सोल मुकुट उर माला । अनु दामिनि धन रवि तारागन. प्रगट एकही काला ॥ उपजति छवि फरनधर संग मिलि. उनियत सन्द प्रसंसा । मानहुँ अरुन फमल- मंडल में, कंडत है फतहसा! मदन गोपाल देसियत है सद, अब से लोक विसारी। पैठे हैं नुफलक सुत गोकुल, लेन जो पहा सिधारी। यानंदित चित जननि तात हिट, कृष्ण मिलन जिय भाए । सूरदास यदुकुल हित फारन, थय माधौ मधुपुरि में पाए ॥ ३२॥ पपात, घंटा। प्रगट पर। विशुनगा। पटरि-टिकापची देकर जड़ी। २१८-कोला करते हैं। चामपि । मार्श-पूर्व । गरा-रात्रि

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ম্যাগান देखोरी भावत वै दोजा मनि कंचन की रासि ललित पति, यह उपमा नहि कोड़ा फैधों प्रात मान सरवर तें, उड़ि याये दोउ हंस । इन को फपट कर मधुरा पति, तो है है नियंस ॥ जिनके सुने फरत पुरपारय, तेरे हैं ये के और । सूर निरखि यह रूप माधुरी, नारि फरति मन दौर ॥ ३२ ॥ ( ३२२ ) भिखो चानूर सौ नंद सुत यौधि फटि, पीत पट फॅट रंग रेनु राज। द्विरद दंत कर फलित घर भेप नटवर ललित, मल्ल उर सलि तल ताल वा ॥ पीन भुज लोन जे लच्छि रेजित हदय, नील धन सीत तनु तुझ छाती। देर रहिं भेप अति मेम नर नारि सव. यदति तजि भीर रति रीति माती ॥ मत मातंग यल अंग दंमोति (१) दल फादनी लाल गज माल सोई । कमल दल नैन मृदु पैन पंदित यद्ग, देति मुरलोक नरलोफ मोहै । याहु सौ पाहु उर जानु सौ जानु फी, चरन सौं चरन धरि प्रगट पेलें । धमक दै घुघरनि भोर भय बंधुजन, सुभट पद मानि धरि घरनि मेल चित्त सौ चित्त साइन-नन का रूदन निस में ताल के पेड़ लगे थे। ३२१-दोरकर पलराम । मयुरापनि अपुरा पा राना स । विवशमार नारा । माधुर्ग-मुंदरता । ३२२-किर पा । चापूर-सड़ेस मटका नान यो पर १३० की इलाक्पा । नदमुल । फेररमर कसने का कपड़ा। 'वरदापी. न शकुनियापी हाथी, जिसे कर परामने मार राना

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गोपिका-विरह वे गये पराइ । मागध स्त करत सबस्तुति, जै जै जै ध्याद- परादा शुग जुग विद इहे चलि प्रायो, भये पलि के द्वारे प्रतिहार । सूरदास प्रनु अउ अविनासी, मदन हेतु लेत सरतार॥३२॥ ( ३२५ ) मयुरा दिन दिन अधिक विराज तेज प्रताप राइ केशौ को, वोनि सोक पर गाई । कोटिक तौरय पग पर जाके, मधु विधात विराज करि अस्नान प्रात यनुना को, जियत मरत में भाजे । श्रोचिटुत विपुल विनोद बिहारनि, मज को रतियोहा। सूरदार सेना नहीं को, कइन मुनत गिरिराज । ३२५॥ गोपिका-विरह यसोदा फान्द कान्ह के यूझै । टिन गई तिहारी चारी, फैसे मारग स्मै । इक तनु जरो जात दिन देखे, शव नुन दोने साशो। पराइ गरेमा गरे पापा के रहने वाले भार दिसतारारफार देतो पर ४६ को मनरूपा जन्मा। ३३५-पापमोना देती है। द केसीसरदार जो सर में घोड़नाधिरति दातिब देव का नशा मयुरा में कोपर काबा प्रनिह मन्दिर पानिले पढे औरंगने तेड़ा। विमानपुरा मुना जी के CE INT का नारा दिरार का मारः "जिसे मान जी के गुरुवहावापुर से मीकर निक सतारे। यह पद भी स्मी हरिदाम से मनाया है।

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गोपिशा-विरह प्रजमाती। पले देहु मेरो लाड़ ततो, पारों ऐसी हाँसी। मती करी पंसादिश मादे सर सर काज किये। अब इन मेपन फोन कराय, मरिमरिलेत हिये । खान पान परिधान राजमुय, जो दोउ कोटि तड़ावै । तदपि सर मेरो पारो पन्या, मास्न हो सयु पारं ॥ ३ ॥ (३३० ) परे कुंभर पान्द दिन सय कर, वैसरि धोरहे। को उठि मत होत से मापन, को कर गहै। स्ने भवन पसोदा सुन ए, गुन गुनि सूल सहै। दिन उटि घेत दोघर पारिनि, उरएन कोउ न कई । जो मन में आनंद हो तो मो. मुनि मदत न गदै । सदास स्वामी दिनु गोकुन्त, फाँटीन ( ३६६ ) परत गुगल के पते। यह प्रीतनसामोवि निरंतर है ना घरय पते: धीरज मयन परी चलि की, तो परत मले। घर चलत रेनगन , तिरि दिन यंस : मंस चढत मेरी तपन देगे, न अंग सिप्तमन पनि योनी परिले हो, सदरमित एस. न पते परभान घरम्नु, असते सात पते । ३३१ तर ८३३०॥ -ौनी। कोर, नास जलपुर-t. - -writer :

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गोपिका-विरह जाइ निरखि मम छाया मजे, मैं दौरि पफरे धार । पछि फर मुख लिए कनियाँ, तब गई रिसि मागि । यह सुरति जिय जाति नाही, रहो पाती लागि । जिनि घरनि यह मुख विलोक्यो, ते लगत अब खान । सूर यिन प्रजनाय देखे, रहत पापी प्रान। ३३४॥ ( ३३५ ) हरि सी प्रीतम क्यों विसराहि । मिलन दृरि मन बसत चन्द्र पर, चित चकोर पछिताहि ॥ जल में रहदि जलहि तें उपजदि, जलही विन मिलाहि । जल तजि हंस धुमै मुक्ता फल, मोन कहाँ उडि जादि । सोइ गोकुल गोवर्द्धन सोई, सोर किन फरदि अब चाहि । प्रगट न प्रीति कर परदेसी, मुज फेदि देस समाहि । धरनी दुखित देखि यादर नति, वर्ग ऋतु घरपादि । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन विन, दुख पयाँ हत्य समाहि ॥ ३३॥ ( ३३६ ) सली इन नैनन ते पन हारे। विनही पातु परपत निसि. घासर, सदा मलिन दोउ तारे ॥ ऊरघ स्वास समोर तेज अति, सुख अनेक हम दारे। दिसन सदन फरि पसे पचन ३३४-यापारिर कमी। प्रशन भोजन । नरनीदमापन । दुरिसर । नियां गोद । घरनिगरों में। १५४-पीना हो । दाहिरसा। ११६-नारायण की पुनतिन बाप रामदायग, ER!

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गोपिका-विरह जाने पाहू के जिप की, दिन दिन होत नासूरदास स्वामी ले विद्धदेतागे प्रेम मई । ३३८ । ( ३३६ ) उपमा नैननि एक रही। सरिजन कहत कहत सय आये, सुधि करि नाहि काही । कहि चोर विधु मुख दिन जीवत, मैचर नहीं उडिजात । हरि मुख कमत कोल विधुरे तें. दोले फत टहरात ॥ अधा धित माधा है आये, मृग सम फ्यों न पतात भाजि जाहि बन सघन स्थान में,जहाँ न कोडघाता संजन मनरंजन न होहिं ए, कम नहीं अकुलात। पंच पसारि न हो पता गति. हरि समीप मुफलात प्रेम न होहि कोन विधि कहिये, ही तनु आइत । सूरदात नीनता फलू इक, जत मरिकन दौड़त ॥ ३३६ ॥ ( ३५० ) सुपने हरिलाये है रितशी नोंद जो सौति भई रिपु मो, सहिनसकी रति तितज जो जागो तो फोहनाही, रोके रहदिन हितशी तय फिरि जरनि नई नरा सिखतें, दिया पाति जनु निorin परती दता पतटि तीनी है, त्वचा सबकि तनु पिलीय कैले सहि जाति हमारी, गति लित। ३१०॥ १RE-भाले हैं । मुलगते हैं। माताजी की २४. सति कोवित रार, सरकार की। दिनकोडरर की हिरासतमा रोपर। नित पर करे।

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२०३ गोरिशादिप मिल सिंधु को, राटि यार ना हो।ऐसे पुर कमल मोचन दिनु, मन माद सनत हगाय हो । ३४३ ॥ । मनि यो प्रीति के फंग पर सादर संत देवि मन माना, पेचे प्रान हा या पतंग का कुकरम कीन्हों, जीप को त्यान ।पने मरिये तेन सरत है, पावक पैठि सरे । पातु भय सादि परत निपाते, फेतिक न घर। सारंगमुनत नादरस भोयो, मरिये तेन रे । जैसे चकोर चन्द्र को चाइति, जल पिन मान मरै । सूरदास प्रभु साँपों मिलिये, तो पाहु का न सरे ( ३५५ ) प्रीति पारि काह मुज न लयो । प्रीति पतंग करी दीपक साँ, आमान दहोअलिनुत प्रीति करी जलसुत सौं, संपति हाय गद्यो! सारंग प्रीति करी जो नाद साँ, सन्मुख पार सोहम जो प्रीति करी माधौ साँ, चलत न कर क्यो। सरदास मनु यिनु दुप दूनो, नैननि नार यहो ॥ ३४ ॥ १४५दा सगेस-मुरा । मल सोनार ३४४-मार, शानभाने पर सोमिनुपर, पिनेर । सारंगापारन का सरे: सकारमपर भार! रोग । जमुनामर । सपनि पार सरपसमा ! सागपा। सायोनार ।

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संपति है कति देशमन यतत चतुरंग चन् नम, पानी है पुर से पोलत मोर सैतन आदि पहि, गण्डत तर हारे । मनु सदना पर कितन, मान परत सुस्त गत गगन गवंद गुंडरत, भर दादुर शितभार । हरदात मनुअपने मी, पाईन करत संभार ३५-4 (३५६ ) धि पन गरजट नर उन देतनि । को हरि हरपि रन्द हदि परजे. कधी शादुर सारे पनि : विधी उन देसनि पान मन पाई, घरनिन इंदप्रयेलनि । चातक मोर कोरिता उरिपन पकिन पधे पित्तपनि । शिधा उहि देश यात नाई माति, सामति सविन सुसनि । हरदास नु पथिक न वासाद, पासों का संदेसनि : ३५ (३५० ) महयनस्थान फी नुहारि।उनासापेसाबरतेसजनी, दैषि कप की शारिन्द्र धनुप मानों पीत एसन दृषि, दानिाने दतन दिवारि । नु यग पति माल मोतिन की, २१और रिस। पूरानाती। पुल पर- प्पी डा. पोर र दुट सेवा। सन्त । एमा। रिक पर? कि मारने र का शो चारापा, सही र मो का मसी - REATE : न रो।

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मोपिका-विरह हात । वैनु परयहु विधि यजावन, गोप तिचई पास ॥ बार कुंडत सोल लसित, मुकमल थिमस पिसात । मुदिन ध्य जब देखयो यन, बहुत याल पितात ॥ यार पारस विर- हेनी अति, विरह याकुल होति । यात येग विलो तज्यों लि, दीन दीपक ज्योति । सुनि सँदेस हमार हिरदे, सूर करि परतीति । दरस है दुप दूरि फी, प्रेम की यह रीति॥३५॥ ( ३५२ ) भाना माई सयन इह है भावत । र पहि देस नंद नंदन फई, कोउ न समौ जनाश्त ॥ धरत न यनै नव पत्र र फल, पिझ यसंत नहिं गायत । मुदित न सर सरोज अलि गुंजत, पवन पराग उड़ावत । पावस विविध वरन पर पादर, उडि नहि अंदर दावत । चातक मोर चोर सोर करि दामिनि रुप दुपवत ॥ हम पर सस्त कोप फरि सनी, हटि करि चलहि यदावत । सूर स्याम पर पीर न जानत, पत सर्व महारत ॥ ३५२॥ 1 हमारे माई, मोरवा दैर परे। धन गत यरज्यो नहिं घोरिदार का , कचनार । करदोजमरी । पुरित । टिमिनी करने योन्य । प्रतिनियुट सर । नु-पसे । बार- गि । सिरगमार। ३५२- मामा सस्ता है। स्म-समय तु . कोज RTETर निधिको है। इन। -

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शिक्षित मनु
मंतित गरमागर
कमा या कारे । चालत न थप गहन थिर रेल,
जारे नौदन मान उदधि पग को भी
कमद कटोरहि देनि नमीम जगपी को, गान'
औरहि । ज्यों अलहीन मीन तनु जानि, पेगी गान
वादि । गदाग प्रभु यानि मिलाप मान मानता
सहि॥
(३५)
माया ननुहि कही कहा । गुनी समोर
एम पिन, यो विमविर tatrn turtal
सन पानी, मीम गारदिदाताहिक
न, हा सगुन मिमी दुगामिाग free मा
किती दिनहा । म प्रीतम frint
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पण टोगो को मांगलिको,nire
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पाई ऐसा गान
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पार पट.irnaKE उपाए । पुनमा पार
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मापन एक पायम गंगगापिन, सुध
चालान ! विधि frri रिटरन कमया करत
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अलकिन ग्राम गुगम al', गुमान कर
हरी माग दिन प्रतिनिगिनानिmir
गि गागागा
( ३.३ )
गलको काम मगानी नातं । गझिम पाल
भात, दी जान महिता ॥ नदिने आनि अग्नि
मती गम भी गमागार ताने मग, मागे को
पराग मिर त गुगमा, मोजा परहार
Prit, मिरि गुना trulete
लिपिमा नाति न FMaftar
नी, तीन मit ATHI
mafr. ा म पु onth 14.
उच्य का न गमन
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Prams पर.
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1. माया गुम मरोगगुपन
में पानी न पिया देत मान
को मार माना गुर देगे।
मिलST न रोदर रथ
देशनगर, AM , माउ र नु में रिका,
नग्नी मुमदानी:
पुरे रो त म ।
सहारे भाई
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12. RT REETर पर है।
३१. गो मार fre
F} कार में ..? . . किमा
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संक्षित सूरसागर ३१५-रिहरिपाका, कर्म मे। पाm अकुलात । हसि उपॅगसुत वचन योले, कहा हरि पदिनात मदा हित यह रहत नाही, सकल मिथ्या जात । मुर अनुय सुनहु मोसों, एकही सौगात ॥ ३६७ ॥ ऊधो, तुम यह निह जानो। मन यच क्रम मैं तुमहि पर पत, ग्रज को तुरत पलानी ॥ पुग्न ब्रह्म अलग अरिनाम ताके नुमहो शाता । रेख नानि कुल नाहीं नाके नाही माता ॥ यह मत दे गोपिन यो भाव, बिग न मन में भाग मूर मुरत नुम जार कही यह, ब्रह्म बिना नहि प्रासति ॥३६६ ( ३६ ) सुन सवा, दित प्रान मेरे नाहिने मम नाहि । कमईक उञ्चन कीजो, अजयधुनने मोहि त्यागि मने जिन दोहों. ११ गोपकुमारि मालोक्य सामीप्य ना, मागपित अंग रही सानो चितामी, मंधि नहीं तनु भान । मोर उपदेसह जो, हाई पद निर्धान और भय क । दो दो अनदास। पुर गा चराही है, फेरि यम । पारा,३६६ गु-हानिमा एकही सोग farera मामनिमलिय। --रनामोर, निगमे मीर मामा मीरा मोर, निममें मोर परमामा भुरचार

मान नंद नंगा नदी
निन ITR IN E' पर i k Tr. भघि ििरप
पिधान । तं पर : प.प. पानि मार ॥ पान
कोटि प्राय ...यार गरि भारारि माग
पारिधि पर.frrfarinam नटि पारि पोदए
गचि. शलाकानिधान । पाटि पारित गपन, पाटा
मोटिरः पान || मान पटकार उदार उर, अतिसय पायो
निमान र शा. गदा परे पर, पदुम धानिधान ॥रान
गनु परपीन पीपि. पर दाग यमान । मनः नयन नील
धन में गठित ऐनः मान ॥ गन रमिर गुण मिलि म.
अधर पारती पानगर पंग समदिन, पो या का
धान ।। ६.५ ॥
जधा, पो गयी ए नैननि । सुमिरि गुमिरि गुन धिर
तपर मुनत नुम्बार धनानि ॥ प. जु मनोहर पदनान्तु को,
२१४-गुरा, तर तागत रहिस। पाकि-
उदा. समान नाप ।
असन। पोरर साये-
नितिन I RIP DATर पा पाग पहाता । परमार
चौडा ur Tarun हितचिनी । म प ।
*:-नि-नो नृपान: ॥ प्यान ।
....-पति
.
"

मनित गरमागर
रन नान न बनोसा कारन
सामाग्गम पानी
.
ना
.

सामागील (E) मरनी लोगन पाली गगनि. गड उहि हि जात शो पर दियोग पाल, आनि गति धारामान योग फिनिसान विना दरसन स्थान मदिनमा कपाट पर ६, उनपर भार । सानि गुन स्यों सानिधी सहूँ, जिमि मनिगन फोट ॥ प्रयन मुनि आर रान हरि को, रहन मन हरि मान । ति रममा नान र रटि. कंट रि गुनगान ॥ तुप दिया मुहाग नको. तो म ए लेत । सूरदास प्रभुपिना देयं, नन चन न देन ॥ २६॥ ( ४०० ) सार्ग मथुरा में हंस । अर ( अधो सजनी, जानत नौ स॥ पदोउ नीर पर निरपारत, নো स्वायो कस । इनके पुल ऐसी पलि साई, सदा उजागर पंस ॥ सदन कृपा परी मज भाये, जानि मापनों पर। सूर एसान सुनापत अपलनि, सुनत होत मति नंस ॥१०॥ (४०१ ) मानो दोउ एकदि मतै भये । ऊधी भरु मगर यधिक १६-पोत-अपर नि मोती । रसना-fire ५.ना, फंसाना । मोर शीर रित:- और सारिप पाते हैं, कि हुए रथ को करले माप करते हैं। पापोमामा नागाशिE IN HINE | - 1 -

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अमरगीत
२२६
(२६)
मधुकर मुनौलोवन यात । रोकिराखो संग अंगनि, तर
उडि उड़ि जात जो कपोत दियोग व्याकुत, जाति है तजि
धानात योग फिरिन बायत, विना दरलन स्थान।
मौदि नदन पार पट , उनै चूंघट प्रोट । स्वाति नुत
ज्यों जाति की तहूँ, निति मनिगन फोटनबन मुनि अस
एत हरि को, रहत मन हरि मान । रहति रसना
नाम रटि रटि, कंठ करि गुनगान ॥ रुदुक दियो महाग
इनको, तो सचे ए लेव । दात प्रनु दिना देने, नैन चैन
न देत ३६
( ४०० )
सारी मथुरा में त ।वै अर एजयो सनी,
भारत नीके प्रेस ए दो नार सौर निवारत, इनहि
यथायो कत । इनके कुत ऐतो चति आई, सदा उजागर
पंसा बन रुपा करी प्रजापे, आनि प्रापनो त।
र मुसान मुनारत अपलनि, सुनत होत मतिभ्रंस, ४०००
(१०९)
मानों दोड एकहि मते भरे लियो घर अकूर यधिक
२६६-पोतमत्तर । पति मोलो। रतन
१.नसताना र कार निरररररथ
रिते है, तिरपोजल लेकर मरने है।
भारमा रगलराल्दि।।

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भ्रमरगीत २३१ . मति, भले ठौर. पहिचानि कराई ॥ मीठी कथा फटुक सी लागति, उपजत है उपदेस खराई । उलटेन्याउ सूर के प्रभु फे, घहे जात माँगत उतराई॥४०३ ॥ (१०४ ) शान विना फछुवै मुख नाहाँ । घट घट ध्यागफ दार अग्नि ज्यों, सदा बस उर माहौँ। निगुन छाडि सगुन को दोरति, सोचि कही किदि वाही। तत्व भजी त्या निकट न छूटे, ज्यों तनु के सँग हाही ॥ तिन के पदो फौन जस पायो, जे श्रय लौंधवगाही। सूरदास ऐसे कर लागत, ज्यों शापि फीन्द पाहीं ॥ ४०४॥ ( ४०५ ) ऊधो, तुम अपनो जतन करी। हित की फहत कुहित की लागत, दहां ये काज अरो॥ जार करी उपचार प्रापना, हाँ जु देत सिख नीती। फालुवै फहत फछु फाहि नहिं शावत, ध्वनि देखत नहिं नीकी । साधु होद ताहि उत्तर दी, तुन सोमानी हारि। यह जिय जानि नंदनंदन तुम, इहाँ पठाये ढारि॥ ४०१-पग दूसरे की। भात हिसांसो जाती । भारति-दुर । गगनगे। ४०४-- -शुद्ध भी। पर घर-बार शरीर में । दार-कही। लिगुंत=विगुग से रदित मन । सगुर-दिव्यगुण मुक्त प्रन्न । तर=निए पर पी भारना। ४०५----पड़े हो । उपचार शिविरसा, इलाम । टारिस्टर पर, भन्ली से । गहौ-प: शे।दोहो-गोनो । किनकी नहीं।

Tr.
गरम
TIT
*
TRAT
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.
-
77

पुरा नै डर है नरनारे नई मी. पेरचन
पानातीइन पाडते. उनहारिकाजी
समानन्दरतिर ने सदिमाता
सदर रन नैननि, हनन प्रतिदिन डोट
कोरेन्द्रविधिविधा मौजा सुननमान के
जनन्दिरिंदर
क.मदसा निकाचे टापदे पद निरि
मान...दिलाने जलदुरनानी
नमितानि बिर मारयन्ट है।
विन। ननदुर की है. मंटन निकर
एर । उदहा वन रेलो. तिनका
मारासनिम्र निवासदेते।
कडे पनि काम परवाही
-
+

यनित मग्मागर
,
11
.
पाइन, मनाना कागी घटा देसि पादरी,
नि । गगना पति को रिपु व्याप, दधि
नपद गुनत ही, चितरण
1. ६ का ना नाना, से मय पनाहन
१ रहेके धसज्ञ ससान।
ग होहधारतापाम
'वन धावत 1101
.
.4
लिमि दिन मैन र
नक न परत
'पना भारति पाई
ही रहन
.' मन में, पुनि
11. एटेमा

मिथ्या भेप में कहां सोमत्य माना, निगुन दानास । पंच
माटी, तरी घोहिया दे। निर्गन%
पर
गा
पदत, मानारयार
समद ॥ दान दादिम दल कटुस नियोगको मुर
मेह । गुन परिमादिर साँवर, को निगुनति निद ११
( ४१४ )
कंधोimir.
धरो
गयी.
सिर
गोपी सुना हरि सन्देस । पाशी पूरन मा गायो, निगुन
॥
अप गुन सरन देवी, जगत ऐमो भास ॥ ज्ञान दिनु नर
E
.
निद । परत घरी
7. आयुग
।।
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नगर गीत दिए हुन दाननि । ये माधय ए मधुप र पहिदु९ में नारिन कोड पटि मातनि ! ४२४ ॥ (१२५ ) अदपि में परनै उतन परे । तदपि नपुर, हरि मिया जानि है, काटु न मान हर : सौरन युन सुमनन से निज घर, नंतन संज घरे । सन्मुग सपति दरस सति सजनी, निदिई न रंग जरे मधुकर नार फोकिला चातक, मुनि मुनि लयन नरे। सादर निरति रतिपति ग, नेकन पल परे। नितिदिन खत नंद नंदन को, उरलें दिन न यो। शनि आतुर गुन सहित चन् तजि, कंगन सरसंचिरे । जानन नाहि छीन गुन पहि नन. जाने सप दिडरे। सूरदास सकुचन भापति को. सुभदन यल रिसरे । १५ ।। ( ४२६ ) दिरही पाहता पा समारै । अपने गंग परी हरि पग में परियो नही निवारे ॥ नैनन तें विदुरी नौहे नम, ससि अवह ननु गारे । रोमते विहुरी फमत फंड भये, सिंधु भये करते हैं। रम गति देन है। सरकार हो । पतिका-विराम को। राजनि-देने वालों । पाततिकतरर पूरा करने में। १३५-रि शिरकारी स्वसानितिकार- रेर । मकोड । विरेरिडे. विहिरीत हो । For: फोर से। भापति- नमोनि. र मगरान पनि भगवान के पोकोमा -

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नगर गीत मीन भीत भीजत तनु.गिरि फर क्यों न धरी ॥ फर फलन दर्पन ले दंपो, हि अति अनस मरी। क्यों जीहि सुयोग मुनि सूरज. विरहिनि विरद भरी ॥ ४॥ ( ४२६ ) उधो, एमहिं पाहा सनुनायटु । पनु पंछी सुरभी ब्रज की सय, देखि पवन मुनि भाव ॥ तृन न चरत गोपिकत न दुत पय. इंद्रत वन पन सोल । शति कोक्ति दे धादि विहंगम, गील भयानक योत। यमुन गई, तन स्याम स्थान दिनु ध चीन से रोगी । तबर पर पसन न समारत, विरह चनये यानी गोकुल फेसप लाग दुमित हैं, नीर विना ज्या मोन । सूरदास मभुमान न टूटत. याधि पास में लोन ॥ २६ ॥ ( १३० ) रूधी, ना हम विरदिनि ना तुम दास । फइन सुनन घर मान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास ॥ पिरती मीन मरे गरा विधुरे, हौडिजीयन फीत । दात भाव गरि सजत पपीहा. पर सहि रहत पिपास ॥ पंकज परम पंक में विहरत, विधि किया नीर निरास । राजिव रवि को दोष न मानत, १२६-गुरमीय । विहंगमगी। भौन-हरे हुए। धौन-धुर्वा । सभारत-नरों में पत्ते नहीं है। अधिक जाने पारित समर ५३०-सारीर । मजा-भागो। घर-चाहे । राजिनामल । स्वामीरपस, पेपरवाह । पिपतम पारे राम मकर राम मनाने पर दसरथ ने मान त्याग दिये। "बनवास

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भ्रमरगीत । . नम परत पचारी अन्तर धो देखन फो, कारन रूप मुरामन बुधि चित महंकार दतेन्द्रिय, प्रेरक रथ मन भारी । ताऊ का वियोग विचारत, ये प्रयला अजनारी ॥ जाको सो रूपमन रचे, तो अपयस कार लो। आसन যন শ্বাল আলা, মন মানে হল ॥ দল মাছ প্রায় दल निर्मल, शत्रपाजार अपाती। विकुटी संगम प्रसद्वार मिदि, या निति है धनमालो एकादस गीता श्रुति साखी, जिहि विधि मुनि समुन्नाये 1 ते संदेस धीमुख गोपिन को, रहन्धुप जनाये । ४३६ ॥ (४३) मधुकर, यादि पचन फत पोले । मापुन चपत चपल के संगी, भरत चहूँ दिति डोते। इन सातानि को कौन पत्यह, अंतर पटनले । कंचन र कपूर कटुसरी, एशहि संग क्यों तो अपनी सीमहि दिखापत, मति भूतहु यदु শ, কত । । মনে, রসা। min | Kareकि सुगर, मुर रास से माने से । मन्दिर और चन्दिर: पग से । ने 7 । नार- कतार मार का T रिमाल का in Ents । Forrrrrr .. and प्रो

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मगर गीत ज्या रेरि निरन्तर, हातनि दुग्दै आइ । दौति पद जिमि पर : पानिश मुख, परन दिपहि है जादा एनी फेती तुमरी उनको, पाहत यनार पगार । सूरदास दिगंपरपुरते, रजक कहा पोसार ॥४८॥ (४) अयो, नुम हो अति बड़भागी । भरस रहत सनेह तगात, नाहिन मन अनुरागी । पुरानि पात रहन जल भोनर, सा रस देह न दागी । ज्यों जल माह तेल की गागरि, पैंद न नाको लागी प्रीति नदी मह पांच न योखो, यष्टि न रूप परागी। सूरदास बना हम भोगे. गुपचैटो ज्यों पानी ॥ ४॥ (५०) हमते रि फायहं न दास । रात रितार पिचार घर रस, पर्गे विसरत प्रवास ॥ तुमसों प्रेम कथा को कहियो, मनई पारियो घास । यहिरो तान स्वाद कहा जाने, गंगो खात मिटाल । सुनरी सखो यहुरि हरि ऐहै, यह मुख पदै विलास । सूरदास जयो, हमको भय, भये तेरहो मास ॥४०॥ ( ४११) मधुकर नुमहाँ त्याम सखाई। पालागी यह दोप यफसियो, ४४६-परन । तगालेभामा से। पुरइनिपान-कार का पना । दागोमाग मा । बोली-डोशा पाणीसगो, नी । गुरची गुड की नागीरिता ४५: -भार=निरपेर, पेपरवाह । विद्यामनिटाई। पारिरिरि। नहा कामगरमास (पुरमोत्तम मास ) सहित एक दर्ज।

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(४:)
परदे माग र दिपार गन्न
मागिता सुमन मार्गल पल में
मुमार्ग प्रा मार पर देगा न निशन होग
मेरो मापन र मन
तिगे। मदिनाति
पासना गति
শনি
अधिनानी पदे मित मनरिमन मम
सनुमरिंदे ।।दुर संयमुना प्रसाना । मुति पर धरनी
पानावरे मधुर, संपर भनिगा। यह मदेम कत है
बननरन में मदा दिरा । नटयर भै मदाहर
। तर रिसान परे पृन्दायन । विन गोरी रिच कान्ह
समारानि सापोहोम निगरन । दलिमोति लागे
मिर नारन भग्नील जो दिन दिन गाय । ममानंद परमार
पाय ! मर पाग को सपा पहा । मुल भरि गोली उन पाई।
साँचोको जोजिहि विधि धाये।सा भारी हिप भरि
(४)
मनुकर, तनी कहर जा । शनि जनसात भांरतुन
दिनु. परम दुतागे गार । जल सन् घरसति दोउ पनि
125-TRT मानगर, नारा निर
REETो सरकारन
पर 1 me :मनका पर
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गदा

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छप्प-उद्धवन्सग्रह
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पाते नुनहु तो स्थान सुनासोपे उगो जलनिधि तरंग
शें, तामें थाह न पा कौन कौन को उत्तर दीजे, ताते
नायो भगा। मारे सिर पदिया पारे, पंथा काहि उदा॥
एक पहिये की फूटी, दौरत पहिर तरा। सूर सरल
पट दरसन दे हैं, वारहरी पढाऊँ४६६ ॥
(४६ )
काहिये में न पलूसक राखी । युधिदिशेश उनमान मापने,
मुन्न भाई सो भाषी हाँ मरि एक कहाँ पहरक में, वै दिन
माम अनेक । हारिमानि उठि चल्यो दीन है, घाँडि प्रापनी
टेक ॥ ही पायौ कत फोने काडे, सइ भूख जो अयानो ।
तुमहि भाषा तिन यातन के. यहाँ जाए तो जानो धी मुख
की सिसई मन्यो (?) कत. ते सयां कहानी । एक हो तो
उत्तर दो, तर नु मुटी मानी । ४६७ ॥
-
मजउन दुखित शनि ननु छान रदनाफदश चित्र चातक,
स्थानयन तन सीन : नाहि पलटत पसन भूपन. रमन दीपक
६. रो रो र निभाने
Cr करे परे हो गये . दिने कार को विं.
- हा रस हिल. मर
है।
र, विचार।
TERRASS-.
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कृप्प-उदय-संवाद २६३ उनहि देखि जो प्रायो। सफत निगम सिद्धान्त जन्म कर, इन माहि सहज मुनायो । नहि ति सेप महेस प्रजापति, जो रस गोपिन गायो। कथा गंग लागी मोहि तेरी, उहि सिसिंधु उमहायो । नुन्हरी प्रमथ कथा तुम जानौं, हमें र नाथ यिसरायो । सूर स्यामसुंदर इह मुनि मुनि, नैनन नीर वहायो॥ ४७०॥ (४२) ऊयो, माहि प्रम विसरत नाहौं । गृन्दावन गोकुल तन मायत. मयन हनन को हाही ॥ प्रात समय माता जनुमति धन. नंद देखि मुल पायत । माखन रोटी दशो सजायो, अनि दिन माय स्वायत ॥ गोपी ग्याल पाल सँग खेलत, सय दिन हसन सिरात । सूरदास धनि धनि ब्रजवासी, जिनसी हसत प्रजनाय॥४१॥ ( ४७२ ) देखरी श्राजु नैन भरि हरियू के रस को सामा। जोग जाग जप तप तोरथ प्रत, फोजन है जेहि लामा । चार चन मनि सचित मनोहर, चंचल चमर पतासा। स्वेत सुध मनु ससि प्राची दिसि, उदै फियो निनि राश ॥ धन नन स्याम मुदेन पीन पट, सोस मुकुट उर नाला । अनु दामिनि घन रपि तारा गन, प्रगट एकाही फला। उपजत यि कर घर सप मिलि, मुनिपत सन्द प्रसंसा । मान? सासन कमल ..-5-अत: महासरियो। ४.१-रार (forN मिन- मारे "-म-प्रोन -

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.
जानत हग रस रीति । ती मला राजमुना पति, हरि ।
है सिनुपातहि जाति । जो राजा कौतुक चति माये.ते नुन
निरति कहत हैं पात । परत न पतक चार चन्द्रसो, सय
सोक्त लोचन सकुतात मनताको नीती जग जीवन. सुंदर
पर यमुदेव कुमार ।नदास जारे डिपती, परिन्दि
तमोपहार : ese
(5)
मोच मारन र उति देख दीन दयालु प्रायो। निरनि
मोचन मनन मोचन. परि फल पांदोमो पाया। मुन्न भइ
प्रसादी, जानतर.विधि देरियायो । पदि सपन पर
एन पी एपि, परनि दोनों पर इनायो ।
पो.निरलि मंगलबार पानी न पाति प्रामान,
रनन मन न रहातोसानि ही मज नाप डिवी,
पिलोकोकोनमलायो।मान पुनपान न दि जानि
महिनामटारे एम मट एमाल, विदुर के.
घरमा । मुदित है गरि मंदिर, जोरिरह
लिपिनगर तेहि दिन दर 2. अनु.संगी शिक्षा
महामार गुनने मालामाल होना
रिहार:
-गा।
Pr.
- in Tri।।
rrierrar
st - 1

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नार-माह
दरसन दै निस्तारा । सूरदास सर तजि हरि भजिये, जय फव
फर उधारा॥ess
(४७)
हरि की लीला देपि नारद चरत भये । मन यह करत
'विचार गोमती तर गये ॥ अलप निरंजन निधिकार अच्युत
अविनाली। सेचत जाहि मदेस संप सुर माया दासी धर्म
स्थापन हेतु पुनि धारगे नर अवतार । ताको पुत्र कलश साँ,
महि संभवत पियार हरि के पोटश सहस रहाँ पनिवर्ता
नारी । सय सौहरियो हैन सबै हरि की पारी ॥ जाके
गृह र नारि , नादि फलद नित होरि विहार फेहि
विधि फरल, नन देगा जो हारापति शापि पैट भयन हरि
इलायो । आगारिनारि सहित चरनन सिर नायो।
सिंचालन पटारिक, धाय चरन नार। परनोदप सिर
धरि कोपपा करी प्रापिता तर नारदसि पासो, मुनी
विनुबन पति राई । तुम देपन के. देश देत ही माहिं पढ़ाई
विधि माम संपत नौ में पपुरा हि माहि पल तुन
परमादेपना. दाम अपनाatre प्रापि गरेनहाँ
देगे पदुई। पर दोगन नारि परत दासी संपगाई !
एपिरोलिएनारिरिपो मन्मान । उनै नारद
उपपले. परि ऐसा गुनाना डा गृह में आरं म्मान
1.mmon fri.fre:
राग - -
.mirar mer arret Gre
rarior arrr re. inse

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समामा-ररित
सुदाना-चरित
( .
पहिन मनिपनि लिन द्वारा
मार्ग, हेनरिक पदुपरि सो जार मार मा
गुन्दर पति पर मुग्नता उनमारने
कारमारे पन्न, रान हरपाल पाहिलात पर
सनिधि, शिमुमता। ना देर शालन
को भागा मनात
inाश सोरन सरोदने.
तर मनर दिन. YEL
-
दुनिने गाव एमरन
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Sr.rt ने मने मित्र
PRO: रवि ,
..:-Sahar-मार
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१. स्पर
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सुदामा चरित रजनी, मात्र चारी यामा। कोपन हदय पचन नरिमार्ग, मामवर घाम ताद सगीरदा परसन माम नुन पाना । मुरदास मनु फोज मिलन जस, गायन पुर मरनामा॥४२॥ पदमा मन्दिर देखि ली। सीस धुनै दोज कर माई पलरमांच पोटाही प्रिया नाजी सोव, ऊँचे चग्न मन मादला धिनुश्न पं. नापर, पर पदो डान पिलांना मरी ममया, को पानि परलं । पदारनुपरिपालीला, मापद रि: तालिल पाती। हमे परेमुरल इन पि. एस एस एल एमादी । गनि सुन्दर मनि- ---- torrmerii free Frtretar Priminar for remoria ritterrrrn in rearn ri- RET Receirr rrrr.

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।
अत्यंत विरह
२७३
परन, दोन मुस निहारे। मम तन पथ रज लागो, पोत पर
लौं झारे । सुखद सेज धातन दोन्हों, सुहाथ पाय पखा।
हरि हित हर गगधरे, पद जल सिरदार ॥ कहि कहि गुरु
गेह फया, सकल दुल निवार। न्याय निरव सूरदास,
पर सब पार ॥४-६॥
अत्यंत विरह
(४)
नैना भये अनाय हमारे। मदनगोपाल यहाँ ते सजनी,
सुनियत दूरि सिधारे॥ वै हरि जल हम मीन यापुरी, फैसे
जिवहिं निनारे। हम चातक चकोर स्यामधन, यदन सुधा-
निधि प्यारे । मधुरन यसत थास दरसन को, जो नैन मग
गरे। सूरजस्याम करी पिय ऐसी.मृतकहु ते पुनि मारे
( ४ )
हो कैसे के दरसन पाऊँ। मुना पथिक रहि देस द्वारका,
जो तुम्हरे सँग पाऊँ । बाहिर भोर यहुत भूपन को, वूमन
vet-संपारश करे। रास्त करने हैं। पोल।
गोगन-गना पार पाने है। रति । पसल-पान या जल,
दिया के पारोका जल, गदा । गुरु मेर कमाग पर १८१ ।
४-नी-समी । न । राग-रागे । दिनाना।
भतापोश । मानिषि-मन्मना । पुनपुग । गायकर ।
-मार-मोड । स्त-दते हुए . को समिनिस्पति
"जार लिंग रसिकालो कपाले त । भरेपर पर का।
-

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भी पलरामसागमन ,
• सगुन दरे। सतु पसंत वाम पाली, उसदे पात नये ।
परति तोति मा मापुन ते, सदन सिगार ठरे। सूरदास
प्रमु मिनाह का करि, भाषिष्ट डि गरे१०
( १ )
होरदातर ही कारनहाने। तरी सामुन जननिजसोदा,
हटि गोपात पटायो । वहा मरो जो लोग कहत हैं, देवकि
माना जादो। मान पान परिधान सबै मुल,
डायो । इतो हमारो राज द्वारका, नो जी फ न भायो।
सद इस सुरति होति उहि रिल को, पिलुर याज्यों धागे।
सद हार कुरक्षेत्र में आये, सो में उन्हें सुनायो । ४१
( २ )
माधव. या लगि है जग जोजतु । जाते हरि सौमन पुरा.
नन. पटुरि नपरि पाउनु । है रवि राष्टु भयो रिपुमति
गचि, विधि संयोग यनायो । उहि उपकार धाज यहि भीतर,
हरि दामन सनुपायो । कहाँ यहि यदुनाथ सिंधु तट, कई
तेही लाड़
-
vie-र उडनचर फागना है, सबर का टड़ना पारे के
माने का मन करता है। मोहित । सनगर तेही से। हुमत
परों को स्ना कर पानते । ति गरेको यो।
-मोनोगमा परिभान-सपनोइननः । मेरे।
रिपुरिटाइम पर राजा बन E Eार सदाका के
-
४६२-जानतुनाम
मनपार पडा है म
की FIR द मान सरका से सुरक्षा साना

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मिताल ( ४ ) चूक परी मौन जानो, मिस स्थान पानागाहा परिदसति हुन धरि परि लोगनिजननि टरारी चरन गही गादेपरि फरमा, पुनि पुनि सौस दुमाऊँरी। मुख लित फिरि धरनि निहारू, एम गधि उपसारी मिली पाप घसाय भुजनि भरि, उर को रुपनि घुभारी। मुर स्थान पराध दमय, यह पाहि पाहि जमुनाऊँरी ReEEn ( ४६९) मोसन कौन कुटिल बस कामा । जिन तनु दियो नाति पिमरायो, पैसो नौन हरानी ॥ भरि मरि उदर विषय को धावी. जसे नकर प्रानो । हरि जन लोड़ि हरो पिमुख्न को, निमिदिन फरत गुलानी ॥ पापो कौन बड़ो हे मातें, सप पति- नन में नामो । र परित शो ठौर फहाँ है, मुनि श्रीपति म्यानी n ९॥ ( ५०० ) मुभा, चनु वा यन को रस लांडे। सायन पर नाम अम- रन स. धन पान भरि पो को तेरो पुत्र पिता र सानो, NEE परिनिराका करारामा मम्मी मेरिट v६६-का-विर सर मुरा, मोर रिहास। सानो गने गरा। पी पनि उनी के पति मिशन। ..--गुमाएर से मौत का भला-गोरोस । -- माईहीं।

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सिद्धान्त । ( ५०३ ) तुम मेरो राग लाज हरो। तुम जानत सय अन्तरजामी, रनी कतुन करी ॥ गुन मात विसरत नाही, पल दिन रोघरी । सय अपंच की पोट यांधिकार, अपने सीस धरी। रा सुत धन मोह लिये ही, सुधि युधि सय यिसरी । सूर तित को येगि उधारो, अप मेरी नार भरी ॥ ५०३ ॥ ( ५०४ ) जा दिन मन पंधी उडि जैहैं । ता दिन तेरे तन तरुवर के, वि पान भरि जैहैं ।। घर के कहे घेगि ही कादो, भून भये नाउ हैं । जा प्रीतम सां प्रीति घनेरो, सोज देखि डरैहै । हि वह ताल कहाँ यह सोभा, देखत धूरि उड़े हैं । भाइ बंधु रु पुष्टुम्य फीला. सुमिरि सुमिरि पहित ॥ पिग गोपाल आउ नहि अपनी, जनु अपजन रहि हैं। सो सूरज दुर्लभ धन को. सत संगति में पैहें ॥५०५॥ ( ५०५ ) रे मन जन्म, पदारथ जात । शिरे मिलन यहरि फर है, यो तरुवर के पात ॥ सभिपात फफ फंठ विरोधी, रसना टी पात । प्रान लिये जम जात भूद मति, देखत जननी ५.१-सरलोसरकर्मी प्रपंच-सात अंगात । पोर-गरी। पर भरो-नोरन पूर्ण पाप मप हो गए। ..-सी-पक्षी, मारा। नर । पीना परिवार । ५०५-पानिपात-रियो : ri। पौरपाल, मयं। इत- धर बरता है।

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सिद्धान्त ( ५०% ) धीहरि रस कहूं तो सहिए । गये सोच का नई यानंद, ऐसी मारल गदिए । कोमल पवन दीनता सप म. महा मनंदित रहिए । पाद विवाद हर्ष मानुरता, तो दर जिर सहिए। ऐसी जो आप या मन में, यह मुख पाहं लो दिए । अएनिधि नवनिधि र प्रनु, पहुँच जो पषु पाहिए: ५०० (५०६ ) जामों सनस्वरूप नहि सूमना नौली मृगमद नामिदिमागे, मित साल पन मन सोही मुम मलिन मंद मनि देखत दपन माहितातिमा मेटिरे कारन, पचत पवारन पर तेल तूल पायर पुट भरि घरि, पनै न बिना प्रशासत । परत नार दोपही परिम, पासपी मन नानत । दाम पा पति सारे दिनु.सय दिन गने सले।ा जाने दिन पर सोमहिना, घनपन रितु देखे । ५०६ अभी न मोगनिबाद सन सनरम प.. रो. माता रिफर माद : निन्दता मला ना. --- ......। 2.-:.-giarre- . ... Ri.५ र Free-.

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सिद्धान्त
न। अनुनाम्बुिमरम्पनि भाय । गोदावरी दिलंब नस्सा
परपनो को पाना नहाँ । सूर हरि कथा दो जहां : १६:
श्री कृष्णार्पणमस्तु
म
--.
- ده لسه میانه بئ هل شفة منتو حشم پس
د بن سنباده خانم ها
بدیه هدود ما دیدن منذ بد

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महात्मा सूरदास
अंस
उनकी कविता
परिचय

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महात्मा सूरदात
दिर, नुगम, परन, पनि ति भागे।
परति-रिवार, पं. दुपारी
नलिलिसिरिनिरा भाती।
म. प.गुपदेनसनी
दिर गुनि कोरवी, गुर पानि परे।
भीमा - कोन न. नील ग्रो:
मामा मदन दो परिवर नदारदापोरे होते हुए भी
पनि आर कार मान नहीं कर
Pा स्पिनर माद नहर पुल मिलना
Is Earrizटर
बना मानन्दा
TAITE STEPTrn:
Hot Dr.
Rar

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महाला सरदात इसके रचना-काल में नको अवस्था ६७ वर्ष की थी । श्रय देखना चाहिये कि उस समय कौनसा संवत्सर था विचार फरने पर मालूम होना है कि यह अन्य सं० १६०० के लगभग रचा गया होगा, पयोंकि इसके कुछ ही समय पहले साहित्य- लहरी नामक अन्य यन चुका था। साहित्यतहरी में सूरसागरके फुद्ध सुटक दृष्टिक पदों का संग्रह किया गया है । इस अन्यके रचनाताल के विग्य में महात्माजी सयं लिखत है : मुनि पुनि रमन रत सेतु। को लिसि. मुश्र मेश्न पे नन्द नन्दन नाम दैहीन विनिता यार। न्न नन्दन जनमकान मुग II नाप राम जोग, निशारिमा नजीन । मन्द नन्दन दान दिन, माहिद-नाग कार ॥ इस पदका अर्थ यह है- मिमि म म ह रही गल. मनगटratri संचन निकालनी गनिम को THE ने म 205 रिमानी होता है म०६० मे वर निशान देने पर इनका जन्न फाल सं ०१८ मिद ज्ञाता है । इन

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महान्ना मूरदास
सात दिन रूपं का भगवान ने इसे करें से निकाता। इस
प्रलंग पर यह पद दिया गया है :-
"पणे पार का मुनी मार।
मदरे दिन भार जति सिर पर
दिक जब दे रही निमु मनु जागर।
की मुमति चाहत मनुमान दमाइ ।
इनमा रप देखो रेलि गया ।
मग्न करना सिन्धु माली मानु नुसार म
पर दरदन दिनर ने मनुके है मास
परिदल दिजिर किमार मामा :
देखना चाहिये कि उपर्युक्त पद कहाँ तक प्रामाण्य है ।
'प्रश्न दधिन दिन कुल' से मरहट्टी का प्राशर निस्तता है,
जिनत होना उस समय असंभव है। अतः यही ठोक जंचता
है कि महाराष्ट्रों के अभ्युदय के सन्य किसी दास नामी
मार ने यह पद बना कर इन के पथ में मिला दिया होगा।
सूरदास यया सात मायः अन्धे का भी लिया जाता है.
जो नितान्त अलंगत है। इस अनुमान से सैकड़ों मुरदास
हो गये जो प्रायः संजड़ो र चिमटा के स्तर में पद यना पना
पर गारा करते हैं। इन सब अन्धे तूरदालों के अंधेरे में
लोगों ने हमारंभापामारकर हरदात को भी छिपा रस्त्र है,
और इन लोगों के पदों को इन महाला के रचे ही समनते है
जिस इमोन सामान का बलर है।

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महाला सूरदास गज घाट पर पधारे। सूदासजीके किसी सेवकने इनको महा- प्रभुजीने बागमनको खबर दी। हरदास प्राचार्यजीके दर्श- नार्य पहाँ गये। इनको देखकर घाचार्यजी परन प्रसा हुए সাংহ শাবান নষ্টা মোমলান বা ঘৰ -- होरि.मर पनिननको नारा मिरारोमरोमानशेखापर। तो कोनी, सातो सिपा। ke frस भी निकले, घोर पनिर पुगः । निरहन ते मर कोरर रे दर पर मिरा, दुसरी और mieोनार यार, करे पर मारा। करन पर रस्सी.सील: लोलित सारे मुकिरिन महो। गरेमा पनि रहो। और नी:- समर तिर रोश। पवित्र सरकार, रानी राना Miरसि।

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महात्मा सूरदास
इस पर कैसा उस भक्तिभार और प्रत्य-उत्कण्ठा
प्रस्ट होता है। दास जी का मानस हत्त उस दिव्य सरो.
परको उड़ाही चाहना है, जहाँ जाने से किसी पस्तु के प्राप्त
पन्ने की नहीं रहती और फिर जहाँ से सौटना भी
नहीं होना।
अन्न सुन्दास डो को महास्नु पतनाचार्य रचित मुदी-
पिनो को पूरा पोध होगा भार फिर यान्सल्य रस का निम्न
निकित पद गाकर सुनाया-
* हमारास ली।
यह पदमन धीमहामनुको पहुन हो मना र
सूडान को सपने साथ नपाट मे गोकुन ने गरे।
गोकुद में भगवान सी मातीता पर मगदान जीने पर
दिन।
पुरनगर. :
समेर ददि ।
गदमदनTriye
.

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महामासादाम
पान पान माना।
पास रखy. Irri
..
मगर परम पनि रmपर पार ।
माह frri भो, लिला बाम !
पानामा पार्टी मुसी, रंगे पनि पुषी।
तुति दे, गुण पानी ॥
पेनिस ला मी, काप पार।
एग माम हरि भजे, रं र गर्गेगा.
इस पदम राम्य,संत-महिमा.भागवत धर्मा पर घनाधिका-
रियों के प्रति निरपेक्षता फा पड़ाही उत्तम चित्र वींचा।
बादशाह ने इनपी भगपदीय अनन्यता एवं जगतमी निरपेक्षता
की परीक्षा लेने को फिर भी सपना यश पणन फरने फो कहा।
मुग्दासजी ने तय यह पद गाया :-
नादिन रो मन मेरो।
नन्द नन्दन भन डामे, भारिप कम और।
परत पिपरत दिवस जागत, मुन्न सोश्न रानि ।
दर नवा पदन मुनि, मिनु न त टत नाति ।।
मान पा भनेर ज्यो. लगा लोभ विचार ।
का राशि पेन पुग्न-पर न रिन्द समाप ।।
• पर न पडा है। गारमें का पई कान मार पपागा भरा

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महात्मा दास धन नादासजी ! इस चौपड़के नेतने में निमन्देह माया मोह का चौपट हो सस्ता है और साधु-सहन द्वारा श्रीहरि सरगति मिल सकती है। इस सेन महार जीत दोनों परा. पर है। बाद में एक स्थान पर लिखा है कि धोनापारा में एक दिन सातापजी ने धोनवनीत विराजी भागे 'प्रेर- पह-पारनन्' सादि संस्कृत अटपदो को ऐसी वात्सल्य- रसासदिमें निनन्न हो कर गान किया किधीनदानुजी का उपरभान न रहा । इसके अनन्तर सपने इसी भार पर स्वरचित पद प्रेमपूर्वक गारे । उनमें से एक यह है:- ग्लोदा हरि मुना। जिप दर पर गाद का मारे। मेरे तार को भारनिरि, सोनाते मुगई। द को न दी सों, तोशे पान्ह पुन: कपरक निरस्त है कार पर सोर तिौर रहकर सीरता वनर जारि जमुनि नपुरे मारें। को मुबार र मुनि दर सोमानित पते। सदासदाने वात्सल्य रस का जो कि वसनीय सन्मदाय का उपासनामार है. जिस उत्तमता से पनि किया है वैसा कदाचित् ही रित्तो देश और कात में कित्ती करिने किया हो। जिस समय महात्मा सूरदास म्पनी प्रताकिक प्रतिमा

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महात्मा सूरदास ३०७ चाहता है, जिसे जो उपदेश लेना हो सो शीघ्र सूरदास के समीप जाये और भक्ति रहत्य को पूंछे।" कुछ काल पीछे धोगसाईसी भी कतिपय शिष्यों सहित पारासौली गये। जैसा गुसाईजो का सूरदासजी पर हार्दिक स्लेह था, वैसी ही सूर. दासजी को उन पर सची भक्ति यो। दोनों महात्माओं के मिलने पर, विशेषतः अन्त समय पर, क्या दशा हुई होगी! महात्मा सूरदास जो अस्वस्थ हो रहे थे। उनके नेत्रों से अविरल माधुधार लगी थी और मुख पर एक अद्भुत प्रेम- प्रमा प्रकाशित हो रही थी । गुमार जी के दर्शन पाकर थाप यह पद गदगद कंठ से फादने लगे:- परि दहि पनि दो कुंदरि गतिमंद मुश्न नामो पनि मानी। दैनि पर तुर पता निरोगनि प्रीति की नि होता है पानी । बैजु पाल तर पना पत पा. मो मो सर 0 गति जानी। से दुनिया मान वे मामा दा निम नि रचि र बानी । पुपति की सारी निगो की दसा सुनाती । मा मुगएपगे, मग मानी। महामासी की सिम उपासना का यह माय है! रसिक माउत्तीमगित सुर के हदय सागर में तीन सा मरस रस पटक रहा है : पालमपार समय मापुर का मानस हम् वि.स मस्य-परसापर हो रहा हैरामास रानी धित 'नयनिज मुख पुंज में हरियंसौ ररिदासी जहां याली

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महात्मा सूरदास
पर कि कोई जन्मान्ध (विशेषतः एक पहुँचा दुमा अन्या)
पेमा "मनोरम पनि फर हो नहीं सकता, हम सहमत नहीं।
मान लीजिये कि सूरदास जन्मान्ध ही थे, तो क्या अघटित
घटना घटा देने वाले म भगवद् भक्त यो जगत के निमूद
रहस्य अपगत नहीं हो सकने ? साधारणतः भी जो पस्नु इन
सोगों को नहीं दिला देनी, उसे एप. भाषुक कवि पट में
देश लेना।याल प्राचारी यानी रामदास, मान देय नया
जन्मांध नाभा जी ने अपने अन्यों में पर मत्र से मनोहर
राव नामों का पट पान किया हैतो क्या उन लोगों ने

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महात्मा सूरदास
पर पि फोई जन्मान्ध (विशेषतः एक पहुँचा हुभा अन्या)
ऐसा "मनोरम वर्णन" कर ही नहीं सकता, हम सहमत नहीं।
मान लीजिये फि सरदास जन्मान्ध ही थे, तो क्या अघटित
घटना घटा देने पाले म भगपद् भक्त को जगत के निगढ़
रहस्य अवगत नहीं हो सकते ? साधारणतः भी जो पस्तु हम
लोगों को नहीं दिखाई देतो, उसे एफ भावुक फचि घट से
देन लेता है । याल प्रहमचारी स्वामी रामदास, शान देय तथा
जन्मांध नाभा जी ने अपने प्रन्यों में यत्र तत्र फैसे मनोहर
हाव भावों का यथए घर्णन किया है, तो क्या उन लोगों ने
यह मार लीला प्रत्यक्ष अनुभव फी थी ? हम लोगों की
चर्म चमुधों में और कवि फी पैनी एष्टि विशेषतः महात्मा के
दिव्य-नेत्रों में पड़ा अंतर रहता है । अस्तु ।
चौरासी वार्ता में इनके जन्मान्ध होने की फोई फथा नहीं
लिखी है। किसी किसी का यह भी कहना है कि सूरदास जी
फिसी मुन्दर युवती पर काम मोहित हो गये और फिर पीछे
से नेत्रों का विषय समझ कर उस रसीसेपचन मांग कर कहा,
कि 'न मेरे दोनों नेत्र दो मुइयों से फोड़ डाल उसने ऐसा
ही किया और मुग्दासजो उसी दिन से अन्धे हो गये। शायद
यह कल्पना भक्तयर विल्यमगल के धाख्यान से उठाई गई है।
हिन्दी नवरत में लिखा है, 'यह यात सत्य जपती। समय कि
दी का विशप पा इस कारण धौराप्ती पार्ता में यद म लिया गया। रसी

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महान्मा सूरदास
गया है कि एक व्यक्ति को पाते दुसरे प्यक्ति के साथ जोड़
दी जाती है, जिसका फल यह होता है कि उसका पास्तविक
परित बिलकुल ही हिप जाता है और सर्वसाधारण में उसफा
- उलटा प्रभाव पड़ने लगता है। इसका उदाहरण हमाग
चरित-नायकः दी है। पिल्व मंगल, मदन मोदन एवं अन्याय
सूरदास नाम के भक्त और फाधि अएमाप के प्रसिद्ध सूरदास
समझ लिये गये है। मुमेरपूर निघासी पं० रघुवंस शर्मा ने तो
। सूरदास जी को एक प्रकार से शफयर के दरवार का नौकर ही
मान रफ्वाई. जो पात संडीला निवासी सूरदास मदन मोहन
के सम्बन्ध की है।
कविता-काल
सौर काल कय से प्रारम्भ होता है यह विचारणीय है
सूरदास जी ने मय पहले नल दमयन्ती नाम का काव्य
लिसा था जो अय अप्राप्य है । सभव है इससे भी पहले यह
महागज बन्द लिखत हो। म काव्य के रचने के अनन्तर श्राप
धी महाप्रभु जी वं शिष्य हो गये और उन्हीं के प्राज्ञा से श्री
मद्भागवत का इल्या भाग हन्द-यस किया । मशालाम पद
लिख चुफने पर मर मारावली लिपी गई थी और इसमें कुल
पदले शायद साहित्य लहरी सकलित की गयी हो । इन प्रम्धी
का रचना काल सबन । ६० के लगभग है अर्थात् इस समय
इन महागज की अयम्धा ६ वर्ष की थी। इतनं भारी सूरसागर
-

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पापी कविता Frat milit, बादाय Ir ranet र पादनमा पाrm riमा पार Increa ir remurramirmimi Riomin Mamtariant TM मेंm पर amirsimilr ri ० पाय परपा tirit, in TRIMI-AR. TR६२ : garimarily sanा. पम्पदाम भी terine feri sum या सग भाभी का प्रमाणापा उस प्रमाका अनी उदा किया। आभार पानी मुंगो देरीपाद में गुरदारनी का जनर एपं माल १०' १५६.१९५२ मामा rm दिपाय मी वायु २८ पाप जपानी पटना । माधारणतः मी पदि ८० पर्प फ गगमग या मान ली जाय नोकर पारंगत गही पयोपिनी शधिक पप-गंगा तिनंपारी की धारा अपश्य ही पान पीना चाहिये। सरदाम जी की फपिता पारियल काम न पियापर महात्मा गलास में पा लिणा গা, মিনা নিয়ে বের হয় খ্রিয়া না যা ঘিখি भारतीय पारी पदि हिन्दी का पाल्मीपिएपं पद- प्पास करें. नी अतिशयोनिन दांगी, पयोकि इनकी लपन

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सुन्दासजी की पपिता
माना ।सन्तु. पर देखना चाहिये कि तो ने जिनने
निशिसार उनने में कान माल पर पान
यन्नि लिलियों का पता है:-
रसारापत्ती
}
प्राय
३- साहित्य-सररी
-
Y-यालो
६-नत दमयन्ती
केटा ताटालागार में नही रिवंशीका नाम
पीपक भार पुस्तक लिखा है। पद-संप्रह, दशम संधीचा
का लाला. यह सीन अन्य रोड में इनके और मिले है
पद्धत संभव है कि अन्य नशे न हो। हरिबंश टीका शिला
का हो सस्ती है. रहे पद संहादि, मो भो
मंपादन भेद से विवाद-रहित नहीं। एक गत् सागर में
हो पर प्रया नाम की कई पुल संकलित कर तो गया
ली। साहित्य-लहरी और स-सारापता भी नो ऐसे ही
संद है। अस्तु ।
हम यह परते हो लिख चुके है रिगो दाद पर भामहा.
अनुत्री कानुनार नरदातजी ने धीमद्भागवत का उल्या
भागवर करना आम किया था महामभुजी मुरदासजी की
मानारदेन पर इने मागर र कर पुग्ने ८
इमापनपन पाना सामागर रस्ता

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सूरदासजी फी फपिता रिचार प्रेस, का किन्तु जांच करने पर यात फुद पद निकाल दिये गये और र का संग्रह कर मसागर संकलित किया गया। जो हो, इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रन्य में सालक्ष पद । इस निय पहम प्रकाशित प्रतिनों पर ही आलोचना करले। इस अन्य के दो संतरण निकले है। एक तो लखनऊ के नरल- और दूसरा বর্ণব पाबू राधाइपद्वारा सम्पादित वेश्वर प्रेस का। लरानवाली प्रति में सरदार तया अन्य कवियों पद शाप दिये गये हैं, यद्यपि अधिक पद- संशा हरदास की हो रफ्तीगई है। मालूम नहीं इस 'खिचड़ी' नाम नागर ही क्यों रस्ता गया ? जो हो, इस संक- एप से भी हम को बड़ा ताम हुआ, क्योंकि सब से पहले इस सुनार प्रन्यका थोड़ापटुत हिन्दी-संसार में प्रकाशित करने का सौनाम से ही मिला। दसरा संस्करण जो वन्पर से निकला है पटुन कुछ सन्तोषजना है। इसी पद-संस्था ४१३६ है। भादि साराबतो दी हुई है, जो सागर की सूची फही ला सकता है। इसके छन्द कुछ शिथित से समझ पड़ते हैं। कुद छपने की और कुद लिखने व संशोधन की गलतियां, प्रति में यब तक यहुत मिलेगी। स्वर्गीय यापू साहब को, अन्य का भूक तरु देखने को नहीं मिला । और अन्य प्रकाशित हो गया। इसमें के अधिकांश पद तो निःसन्देह हर त हो है. किन्तु कुछ पद ऐसे भी हैं जिनकी रचनाशैती से प्रकट " . इस

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.
सूरदासजोशी सविता
शिरोस साशित मति से हिन्दी-संसारको फन
लाम नरिसा. प्योंकि पदि पर प्रति भी शाचित न को
मानो तो नर था कि एक दिनों बाद इस महारथि का नाम
। मोन मुनाई पड़ना : इसोप्रति के अनुसार सूरसागर का
मंदिन दिग्दर्शन कराया जाता है।
प्रशम्कन्धोसी पदमरता-
.
हनीय
កញ៉ា
.
चम
"
१
H
R
१४
1
মদ মা ঠিখাব
निसन्धों की रचना. दरमस्कन्ध को दोड़ पर और
सन्धों में सरस और सारगर्मित है। इनमें

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मुरदासजी पापिना
मीन पहा पदर शिरा
जिमने भगवान का पोवृष-पान कर लिया, उसे फिर
कारं वन्नु मात करने की रक्षा नहीं रहती। उसके मनी
मांसारिक सुख तुन्द्र है-
मंगकर यर्ते मा।
जैसी माद को पड़ो, शिरिमाल ।
मनि. सी को पारनी चाहिये । भटि रहित मनु तद्
--
मानि रिलिग हो।
।
..
माम मान्न नजर रिनु नि हो ।
नगरदन जीव का जीवन ऐसा है-
भनर चिनु कर मार ।
पर बिल के ममा रदत स्मि ।
मंत अश्या हरि मनाशी महिमा जानना तथा उनका भागत
मागन करना पड़े भाग्य से मिलता है-
मदिन मन पारने कारन ।
Tri. मार का कत्र मे दामन पात्र
परि-विमुन्न भनुप्य का मुन्य देखना और उमर नाथ दान
चर्चा का उद्याना दिलकुल फिजून है-

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मुरादास पिता होल्दिने। सररररर रदरिकार-दिनों से मेल मिला दिया है- नर हो । भमान औरती नदी पर लो। मी- समाही महिका गुर समोर माधिकार दिनमाज याजसे मान रहा है. देपिन- पापी एन गुर। सरोल्स:शिरकार : गरनार पान.दिममार। भारपस्नो पार, परत गार पर दर पर भोजरातिमिलात। पापा बमो. तोर निराति माल. रिला काटेरा, अज पर मुधि नी काल । मुमार को सरकार । माया का दल पल पेसा गोल कर रख दिया है- महानवमो. मामा, मरिपरि की रात मदता पर भोरिदै लै पर पुरा मिला। माया का रूपक गाय के साथ भी सामोपात किया है-

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सूरदासजी की कविता
३३१
सानु हो एक एरपरि ररिहो।
महों कै. तुम ही मापर, पुन भरोम परिहों ।
हो तो पतित गात पोदिन को, पति निम्नति ।
रो टपरि गचन सान हो, नुम्रै रिद दिनु पग्दिी ।
फत अपनी परनीत भसारत, में पासो हरि होग।
मर परित तब ही लै बरि , अब हमि हा पीरा।।
देखा ? दिठा हो तो ऐसी । यातो भगवान ही रहेंगे, या
मन्त हो । अब तो हज़रत को अपना भक्त पार लगाना ही
होगा, नहीं तो यिना विरद हो जायंगे और मुफ्त में परतीति
भी चली जायगी । दोजिए, साहव ! पान पा थोड़ा हार भो
स्वीकार कीजिये!
मोहि प्रभु, मुमसरों होड़ परी।
ना जाना परिहौ जु कहा नुन, नागर नवरा
हुनी निती जितनी मति गारं, सो मैं सबै करी ।
पारहुगे फार मो महि तारन को जिरा जर पती॥
.
मो को मुक्त विचारत प्यारे, पडत पदर परी ।
भगमे तुम्है पसीना है, कति यह जरनि की।
होड़ तो लगा दी, पर न जाने क्या नतीज़ा निकलेगा ?
यह भी याद रतिए, ऐसा पतित भो न निलंगा, घड़ी पहर में
यहाँ के पापों के जमाखर्च की जांच न हो सकेगी। मेहनत के

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सूरदायी सरिना
HERErrorir, पीर ।
म rem. परिपा
मरर माना पा गदेश भी एमजीरिये-
-
पर
mifinan.
HTTनि गुE it. निसरसम्म
पर दुग भुपम ।
गुनको पहरा-
REE TER सिसि. र नशा
सातिमा, पिर
মিথ বা ধ ন থ য মনী-~-
farya Raार।
रालि पनि सदा, Anitari
गर
पापियामि म पर सर ।
EARTहायात हसत मनु. रामिनि पारक भार ।
गतिनिधि भीना शिता
वराति भरत मि-पनीर ।
मंघमाण . मारने को रामधारयलिश करते
करते

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परदानजी की पारिता
-
मद फरिरी
मादि-शिमा-भासितारोवनी द्वारा पनि शिपा है हमारे मित्र
सरवर पं० रामनरेशजी रिपाठी ने भंगार के सम्बंध में
निसाशि-
“हिन्दी शामिलों में भंगारी कवियों की संवा सय में
अधिक है। इनमें युछ तो यलुन उश कोटि के हैं, उन्होंने
इवर के सौदर्य पर पड़ौ ललित पिता की है.
ने वहां कहीं प्रतंग पर धंगार फा परन किया है. उसने
विराक्ष मनोरमान सभा को सोता दिखाई पड़ती
है। वे सदाचार की सीमा के सादर नहीं गये हैं। किन्तु तिर
से पैर तर अंगार में रेप पदिय ने सदाचार को मात
नार्य है। उन्होंने गायक नायिका भेद को कविता का सप से
धान अंग पना टाला है।" इत्यादि।
पाला में पान भी ऐसी ही है। भंगार फे गुल आदर्श
को पदि इन परियों ने समझ लिया होता. तो उसी कोट
मरनारे साहित्य को इतनी गहरी चोट न पनाते ! रनको यह
मानने को भी तयार नहीं किये "अंगार में सिर से पैर तक
हके हुए थे। अपना तो दृग् है, उन्होंने उससा दर्शन की
नहीं किया था। जिसमें वे ये ये याहार रहे हैं. वाहै परिल
विश्य हुंड, सरलीन शिक्षारसागर । भंगार तो इसने कोसों
दूर है। यह रत राज संसार शेरू दनाने वाला है । कुल
कोर शैली (साना .

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ܕ ܂ ܟ݁ܣܶ ܐܢܤ. ܐ.ܪܶܝ ܦܘܠ ܐ ܠܐ ܐܐ | ܬ ܕ ܝ ܚܟܬܝ ܀܀ ܀ ܐ ܛܸܐ ܕ. ܬ܀ ܢܐܝܚ ܐܨ܆ ܝܼܕ݂ ܝܺܢ. ܬܪܬ ܐ ܐܐ: ܝܝܙܝܕܙܕ ܃ ܪ ܀܀ ܬܕ ܕܐ ܐܐܐ ܪ ܕܪܓܪܪܕ "::..܀܀ ܀ ܀ ܀ܪܽܨܳܝܝ ܬܐ ܐܝܬ ܐ؛ ܀ ܀ ܝܙ ;: ܝܺܐ , ., ܐܬܛܙܛ ܕܐܫ ܪܙܝܕ ܪܐܝ ܪܐ ܪܚܕ ܕ݁ܝܶ ܀ ܐܶܢܳܐ ܬ݁ܶܬ݂ ܙܫ Erra ; ܫ ?t܊ -i rܕ܀ ܕܐ ܕܙ ?; ; ܕܕ (ܕ ܀ ܙܕ ܨ ** ܕܟ ܢ ;;; sܘ ܐܘ ܝ ܕ ܕ :::-:: :ܫ. -: ܟ ܀ -r' - ܕtis : ܕܕܨ ܨܐܨ ܨܕܨ ܃ ܃ ܃ܝܼܲ : ܟ ܀* ; ; ;r f : fv Fi : : :: ܕܫܕ ܕ ܕܟ ܀ ;;qux v : 1c* ff .; : cr ; -yr ' ܕ:"gr ܕܕܐܙܨ |: ܕܕܨܕܕ ; ܝܺܕܨܨܨ ܐ. ܂»;ܨ ܀ ܨܟ -- ;»ܕܼ ܕܼ ܕܸܕܼ ܃ ܃ ܕ cx .rcx ; : ff ;; ;; ܕܕܨ :: 1 ܊܇܇ ܕܕ ܕ ....ܟܕ :* ܚ: ܚ : ܨ ܃ ܊ ܝܼܚܕܼ ܃ rܗ ܀,r :; xr ' sq ; f ܟ ?;€ rrrrܕܕܕܚܕ ܕxq3 .;; ; ܕ:ܕܼ ܕܼ ܕܼ܃ ܃ ܕܕܕ ܕܕܕ ;;;;;;;;ܙ | ܨܕ݂ܺ.; ܀ -r fxܕܕ ** fr ;; - ;; m : gg܀

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सूरदासजी की कविता
मिज मन्त्र पहना हान है, दास दंपति भवन सार मा ।
र पानी पार पार प्रभु तर कं, नैन दोड रहे र देह पारे ।
अप नेत्रों की दिटाई देखिये---
देर भन देखें सं लाता
पर करत रंग भरे एक इकर निमिप नाद स्वागत ॥
इन पर रट मनोन महामुरा, इन सोभा गुन अन्ति मागत ॥
पने पैर पर मन गों, दहि नई एस. भूलि नहिं मात ॥
समानुस
सो साधान सजि, इत समाह भंग अंग अनुरागन ।
स्ने र मुभा १ लोचन, अधिको अधिक स्थान मुल पार ।।
नत्रों पर उपमाएँ और रूपक सूरदास जी ने उसे बुध
रिकारे हैं, उन्हें देख कर मन मुग्ध हो जाता है, बुद्धि पंगु हो
जाता है। नेत्र ऐसे चोटे विनय पर सैकड़ो रद लिख डालना
ऐसे से शदि का काम नहीं है । और फिर प्रत्येक पद में कुछ
कुछ अनूडी स्म भी दिखाई पड़ती है। सूरदात जो नेत्र के
से ही जौहरी थे, जैसे मन के कविवर देव।
सूरसागर में नम शिख-भंगार कई स्थानों पर लिया है।
समें एक पद कर है। किले लि, रिसे न लिन ! बुद्धि
करा रही है। फिर भी इस विण्य का एक रधि कटर, पद
मेरो रिना नहीं रहा जाता । दाग के उपरोधिका जी
नन-शिल फैसा सांगोपांग लिया है-
।
है
।

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सूरदासजी की कविता
हम है। प्रेमपतका में जोर-परमात्मा फी एकरूपता
इमकार संभव है। यहाँ से मायाद परास्त हो लौट जाता
है। इसी दशा में गोपियाँ, भो मलागवत के अनुसार, "हम्मोड
इम्सोहरं पारने लगती हैं।
सूरदास जी ने अनेकानेक तीताएं लिपी हैं। तोगसाधर्य
करने होंगे कि प्राचीन संस्कृत प्रन्यों में इन लोलायों की लेश
मात्र भी चर्चा नहीं है । सूरदास ने कहाँ से यह मनगढन्त
नद सो ? भगवान अनादि और अनंत हैं ! उनको लीलाएँ भी
अनंत है । जब भक पर भगवर-कृपा हो जाती है, उसे दिव्य.
मे मिल जाते हैं. तव वह उनकी अनंतता का रहस्य समझ
माना है। रक्षा पर नवीनता और चमन्कार दिखायी देते
है. उन्हों नयीनताओं के अनुभव को वह अपनी रचना द्वारा
नंसार के सामने रखता है। अधिकारी जीव उस रचना से
धानंद लूटते हैं. अनधिकारी चकर में पड़कर भटकते फिरते हैं।
दास जो अंतरंग भक्त थे। उन्हें अंतरंग-रहस्य अवगत हो
चुका था। इसी कारण से उन्होंने धीरुमा भगवान को
अनेक प्रमात तीतायों का वर्णन कर डाला । दमयेरनादि
दौताओं का भी यड़ा ही मनोहर पर्रन किया गया है। इन
संगों के सम्बन्ध में हमारो लेखनी शिथिल है, असमर्थ
है । यह विषय अनुभव करने का है, मालोचनाका नहीं।
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सूरदासजी कोपविता पतः गोपियों के केलि कुंडा में, दिरह का पूरी सामान्य जम गया । जर तफ श्रीकृष्ण मथुरा में रहे, तबतक तोग्रजवासियों को कुछ न कुछ धीरज बंधा ही रहा, किन्तु जब यह सुना कि जरासंध के उपद्रवों के मारे सारे यादव नथुत छोड़ द्वारका में जायते हैं, तर सब को निराशाका ठिकाना नरहगोपियों के रसिक ने तो निपट अनाव होगद- नैना भये पनप हमारे। मदन गुणाल वह ते सजनी, मुनिपत दुरि तिपारे। वैजल सर हम मौत कापुरी, पैते जितिनारे । बन पाता और स्थान ६न, बदन मानिमिरे॥ पवन बसत भास दरसन की कोई वैन महार। सूरज काम करो रिप ऐसी, मृतरह से पुनि कारे। दारका जाने के पहते, ताप ने अपने अनन्य सा परम मानो उद्धव को गोपिरो को सांत्वना देने से किए प्रश भेजा पा। उद्धव को अपने ज्ञान का बड़ा गर्व वाभिगवान ने गोरियों के द्वारा उनका सारा गर्न सर्व कर दिया। ज्ञान का पोया तट करमपुरा लौट प्राये। इतना ही नहीं. प्रेममा गोषिकाओं से गुरु मंत्र भी तेनिया हानी उद्धव मोगा। सय ने पहते उद्धव ने पारंजा योगदान करता बान शरावान. समाधि आदि क्षेचा नियोग र मारियो . सिजाने लगे . वे भवनको गमों में जानेवारीधी. .।ौं-

३६४
सूरदासजी की कविता
।
अयो, हम न भोग मिचैरे।
जेहि उपम मिले हरि इम को, सो त नेम पतये ।
मुक्ति रहौ घर पै। आपने, निरगुन मुन दुख पैरे।
निदि सिर केम कुमुम मरि दै. लेदि किमि भत्तम पत्र ।
गानि जानि सब मगन भये है, भापुन मापु लवैये ।
मूरदास पषु मुनत न वा निधि, बहु कि या इन ये ।
तथा-
अयो, योग योग हम नाहीं।
अपना सार मान कहा जाने, कैसे ध्यान धगहों ।
है ये मदन नैन कहत है, दरि मूरति जा माहीं।
ऐसी कथा कपट को मधुर, इमतें सुनी न जाही।
भवन चीर भह जटा पाव, ये दुम कौन समाहीं ।
चंदन तनि अंग मात्र पतारत, रि मनान मति दाहों।
योगी भरमत जैहि लगि भने, सो तो है भा माहीं ।
मरदास ते न्यारे न पर दिन, ग्यों घट तें परिवादी ।
गोपियाँ सीख पुकी थीं राजयोग, उद्धय बताने लगे हर
योग । प्रासकल वे विशेष योग-विये-का साधन कर रही
थी। इस समय शुद्र योग का मूल्य ही परा? ये श्री कृष्ण
चराचर जगत में देश रही थीं। भगयान की मर्य व्यापकता
का अनुभव कर रही थी । सर्वोच भति परमविरहा
सनि में ही है । उदय तो यहुत ही निम्न श्रेणी के अधि-

सूरदासजी की कविता
पाने थे। मान को प्रेम के मागे दाल न गत सकी। उसी समय
उड़ता उड़ना कहीं से एक मारा गया। गोपियों ने भ्रमर पर
लर करते हुए उब और कप्त को संकड़ों टेढो सीधा यातें
मुनाडालो। इसमसको "ननर-गीत" कहते हैं । अष्टछाप के
फरिधीनंददास जी ने नमर गीत में सारा व्यवहार और परमाय
शह डाला है । शुकमान और तर्क को भक्ति के आगे खूब
पदाड़ा है। योग के दांत पट्टे पर दिये हैं। निराकार और
निरा ब्राम चिलाने वाले नारस शानियों का मुह टेढा फर
दिया है । वेदान्तं का निवौड़ ऐसी विचित्रता और उत्तमता
से भर दिया है कि दांतों उंगली दयानी पड़ती है । निगुप
उपासना के सम्बन्ध में गोपियों कहता है-
कहां लो को बहुत पड़ाई।
भी गाय मन प्रगम भोर मनसो नहां न नाई।
जा रूप न रंग परन ब. नाहिन संगति मला सहा ।
ला निगुन को नेर निरंतः, क्यों निगे माई।
नत्र बिन तरंग नीति किन लेखन, पिन िगई।
समान में नहिं क्वजह है. मो. कानि मुनाई।
कर पुनि रहयो माधुगेन, अंग भंग सम्वाई।
पर स्थान मन दन लोन, सम्दाम भुदाई।
भकिदर्शन के इस अकाट्य सिद्धान्त को सुनकर उतर
चुप हो गये। योग न जाने कहाँ चंपत हो गया। आँखों से

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हरदासजी की सरिता
३६०
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माल गरम जमुनि तद देखि मुख पात
माखन सेतो दको सजालो, अनि हिन साप रापास्त ।
गोमासँग रोहत, सरदिन शत विरात ।
सूरदास पनि पनि मनातो. जिनतों हत्त नाथ ॥
सैर. इतना तो फह दिया कि ब्रज विसरतो नहीं है। क्या
कम दात है?
जाती ह. स्दा, मेरे जीन पान ।
इन्नै न ने पिसारिहो, नंद कवा को भान ॥
मजदासी भी तुम्ई न भूलेंगे ! तुम्हारा इनका परस्पर
सम्बन्ध रहेगा। धन्य सवालियो!
नमसीत के बाद सूरदास जी ने कथा के फन के लिर
सनदी परिणय, द्वारका वर्णन, मुरामा-चरित धादि पर भी
दलिते हैं. परन्तु जो सूखी और अनूठापन उन के प्रत्र
सम्बन्यो पदों में है. यह द्वारका को राजती में नहीं।
सूरदास जी मधासो नदनंदन के उपासक थे. द्वारका वासी
वासुदेव के नहीं। कानिन्दील की वंशो-ध्वनि उन्हें प्यारी
गनो धो. द्वारशगज प्रसाद और राज दरयार नहीं।
मुकुट ह उनके नेत्रो में भूलता था, म.जमुकुट नहीं ।
वर
मा.मजोरतम के नहीं। यह
पहन में मुख मानते थे, हराइन
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संक्षिप्त सूरसागर अन्तर्कथाएं

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सारामाशा कादवामन भगवान मिग मांगने
कसे विष्णु दूत भी उसी समय भाउटे । अव फोन ले
अन्तर्कथाएँ
पद-"हरि दिनु को काम न.भाशे [गझिा]
गणिका
मिता नाम की एक वेश्या थी । यह काशी में रहती
यो।इसके पास एक तोता था। उसे नित्य राम राम पढ़ाया
मनोयो। नाम सारण व्यर्थ नहीं जाता। 'भाष कुमाव अनव
सह । नाम जपत मंगल दिस दसह ।" इसी नामस्मरण
प्रभाव से, जय यह मरी तव यमदूत उसे लेने आ पहुंचे।
--
काय ? निदान विष्णुदत यह कह फर उसे स्वर्ग ले गये कि
মিল ম স ম নাম ভ্রথা , য য ব কী
विकारित है।
पद ४४-४५--'द्वारे टाढ़े है द्विज वामन कान-परि]
वामन वलि
राजा बलि विरोचन के पुत्र तथा भक्षावर प्रहाद के पौत्र
पायह परम वैष्णव थे। अपने प्रज्ञांड परान से इंद्र को
की परास्त कर दिया था । देवता बड़े दुर्गा हो रहे थे। कश्यप
माति को खो देवनानी की माता दिनि के गर्भ में भगवान
रिश ने देवनालों के दुःत इर करने के लिए अवतार लिए।
संनिने राजा नि । यज्ञ करने के बाद या कर

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रा
२.
वाराह-हिरण्यान
कति उमदिति ननदो महा
कानपुर दुर.जिनके नाम रिमा रहिर
सारे दोनों ही बड़े पराकनी। देवताचे नाना
निधारमगावधन है देश की रक्षा
न! उन पर रहावर रहा विहिरराक्ष की को
जनाजाना तमासान दिनेदारह मस्तार
ने र उस दुक किया और
प्रसार कर दिया।
हिरण्यकश्यप.प्रहाद. नृसिंह
बिगर कार. कपानि का पुत्र नपा हिमा
मामाई दाहिया तो वामनानमार हो चुके
सं.यह बाधा हिल्सकलपाइनने शिशु ने भाई
हादला चुमाने के लिए कर रस्ता को ! मला मेयर पर
मंगाशिनुमसे मारा जाऊँ न पगु में और न देव.
मासे हो, इसी प्रकार जल में और दिन में
तर मिल गया एस फिर क्या बनाने की मनाना
.
इस वार पुष थे मर र मसाद ! उन्म
नेहो नाइजी हावादश ने भगङ्गलहोगधे देगा
में दान दिलाने की यदुन कुल वंहा की, पर प्रहार

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अन्तयार
मंगोषिकायमचली आयी।
रासनमा किरि
गार रामरतेना है. इसतिर सोने दुर का मस्तक
गरपाने पुनार गार का हल कर लिया। उमदग्नि
मोरेता पति की महादेव कर रो रो कर अनं
और पुत्र परशुराम पुजारनेन्दगी कोन वार परशुरामको
Fयापन परगनने दिनामिवार मुन्द्र
परके विनिवरदंगाला हालिया।
बस्न मनानकसर उन नसप्रिया दिर
मन र.२८ । ने
मानामा दादर
भाग: नः पुनः
: भी
पर
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अन्याएं
४०
युर आदि का सनन पड़े सांप मर जाय. पर
को न टूटे। देश व पाण्डवों ने राजसूय यह भारन्म की
Rमें जरासन्ध का जीनना भी आवश्यक था। श्री रत
नीम और अर्जुन साधुओं का पैर धारण कर अपतन्य के
मास गये। उसले तीनों ने युद्ध-भिदा मांगी। यह समनन गया
के मलित साधु हैं। हम और अझुनको तो नई सनम
र छोड़ दिया, नौम से लड़ने का समय मा मीन के हाय
ম সার বা ঘা ভূ র ন ম বায়ী কা নি ভয়-
अन्य ने शरागार में बन्द कर दिया था, मुद कर दिया।
पद ४-मधिगनि गति जानी न प []
नृग
राजा नृग मादर्शदानी था। यह नित्य एक फगर गाय
को देता था। अति दान में एक दिन व्यतिकम होने में
९१ मार के शाप से राजा को विपरपरा (निरनिट) की
पोनि धारण कर सरवों वर्ष अंघ रूप में बात करना पड़ा।
भी इस्प ने इस कुएं से निकाल कर गप-शिनु कर दिया।
पद-"ऐसी मोवि श दनि आमदार
संदीपन
संदीपन नाम के एक द मार्ग विद्वान उन में रहने
से । पारन होटलको नदि की। सैकड़ों शिया

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Sanshipat Sursagar

Author
Viyogi Heri
Title
Sanshipat Sursagar
File name
Sanshipat Sursagar
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2011/08
Publisher
Delhi,manohar Press
Language
Sanskrit
Pages
352
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313874
Barcode
99999990311258.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
E4cnrPlCpVN
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