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Gherand Sanhita

Sharma,jagganath · 2012/08

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मतान्तर सिद्धासन- -- d सि दास सना

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पश्चिमनांनधासन
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शवासन
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मतान्नर
मद्रासन
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प्रयमपदमासन

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मसेन्द्रासन
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महावेध.

अथ घेरण्डसंहिता। एकदाचण्डकापालि गंवाघेरण्ड कुहिमम् । प्रणम्यविनयात्भक्तमा घेरण्डंपरिएछति ॥१॥ एक समय अहकामानि नामक कोई एक योग शिक्षामितापी, पेट नाम एक पहे भारी योगेश्वर को कुदी को गये और विनयपूर्वक भक्ति महिन प्रणाम करके घेरंड महाराज से पूछने लगे। क्या पूछते हैं, और घह क्या चाहते हैं तो नीचे वर्णन किया जाता है। घटस्ययोगयोगेश ! तत्वज्ञानस्थकारणम् । इदानींनोतुमिच्छामि योगीश्वर ! बदप्रभो ॥२॥ श्री घराहकापामिने कहा कि योगेश सत्यज्ञानका कारण घटस्थ (शरीरस्थ ) योग है से इस समय मेरो पन्छा उमक सुनेकी हुई है। हे योगेश्वर । प्रभो ! भाप रुपाकर उसे सुनाये ॥ तात्पर्य यह किसान दो प्रहार का होताई एक मामान्य नाम जो कि पशु पक्षी कोट भ्रमरादि को भी है जिरते कि पशु भी अपनी खाद्य बस्तु घाम भूमा छोडकर का पत्त्यान कभी नहीं खाता और पक्षी मादि भी गार के तिन नहीं भरती । और दूसरा विशेष जर यदी जिसमे कि अनन्त काम मुख म्यछन्दमा प्राप्त होने के उपाय मृतको। में कह शाये कि योग विद्या गरीर साक्षण का एक प्रधान है बिमा जारीर के स्त्र रहने से अमन्त कालिक सुरा सध्वन्दता लाग के भुशाप है। सन्ति ममे मतान्त्रिक मुार त्वदन्दमा लाभके पाय का जान स्वान कमाता है. यह शोर के भाinी मिचार का स्थिर करके चपापानि नाप सिक घटस्थ भात भरोस्य योगा सस्यमका कारण पेट मह घ पूधाम २ घेण्डमंहिता। V साधुसाधु महाबाहो! यस्मात्यं परिपछसि । कथयामि हि तेवत्स ! सावधानोऽवधारय ॥३॥ घेराह जी ने कहा हे महाबाहो । अर्थात् बाहुबलशालिन् क्षत्रियचंग भूपण जो तुमने मुझसे पूछा इसमे में तुमको साधुवाद अर्यात धन्यवाद करता हूं. हे पास ! में सुमसे कहता हूं. सावधान हो सुनो। तात्पर्य यह कि योगियों के पास भक्तर वेदी लोग साया जाया करते हैं जिनकी केवल पहिरू चिन्ता रहती है, अर्थात् धन, मिल. पुत्र पौत्र कुटुम्य प्रादि वृद्धि हो तपा दुनिया में मुयश फैले परन्तु यथार्थ भावी माल समालको चिन्ता करनेवाले योगियों के निकट अछुतही कम लोग जाते हैं, फिर उक्त धन पुत्रादि लालचियों को प्रकृति जान कर ऐसे योगी भी समस्य मिलते हैं जो ताकते रहते हैं कि कोई सोने की चि. | हिया फँसे तो चैन उहा, वे कृत्रिम योगी महाशय धएड कापालि सरीसे पुरुषों के प्रश्न को ऐसा मागे कहेंगे कि हमारे गुरू की भाज्ञा है कि किमी को मत बताना जिममे ऐमा जान पडता है मानो सय इन्हीं के हाथ में है पर वे ऐसे हैं जैसे हाथी के पेट का कैया । अयोत देखने में पूरा कुछ भी नहीं । पहिले तर ठगों को छोड योग विद्या के प्रा. मनेवाले योगी हो नहीं मिलते कदाचित् कोई मिलें भी तो उसके सीखने थाले दुर्लभ हैं । पदि देवास कोई मत्संगी मनुष्य उनके पास गये तो वे योगी महा. जय यहुत ही प्रसन्न होते है जैसे कि घेरंड महाराज ने यह कापालिका प्रन्न करने पर घन्पमाद दिया । इसमे हम यह भी यहांवर अपने पाठकों के सामान करते हैं कि जो लोग योगाम्यामी यो गृहस्थों के यहां मोज राते है और पूछने से या तो क्रोध करते हैं या कहते हैं हमारे गुरु की धाता बताने को नहीं है धन पाहियों को कभी न समादर कर अल्कि नहा रहो मुके दगड दिलाने का मन करे । पूर भीता ३ धेरण्डसंहिता। घेह महाराज ने जब प्रश्न का चण्डकापालि जो को पस्यबाद दिया तप हप के वेग में सब योग का और कपट का जो सच्चा फल है उससे कहने लगे। नास्तिमाया समंपापं, नास्तियोगात्परंबलं । नास्तिज्ञानात्परी वंधु न हकारात्परोरिपुः ॥४॥ माया मर्यात् ठा प्रपञ्च (जैसे कोई २ योगी लोग यह दिखाया करते हैं कि हम योग विद्या से रांगा की चांदी, तांयाका साना बनाया करते हैं, तथा मंत्र यन्त्र टोटका टामर के बेर से धन पुवादि दिया करते हैं पत्यादि भातें बना के लोगों के ठगा करते हैं) इसकी घराघर दूसरा पापं दुनियां में नहीं है । इन सय प्रपञ्च कत पापियों का अन्त अच्छा नहीं होता वे सदा श्राभ्यान्तरिक निर्बल रहते हैं अर्थात् हरते रहते हैं कि न जानें किस समय हमारे प्रपञ्च का फसाद सुल पड़े, इसके व्यपरीत सच्चाई का यन दिखाते हैं कि "नीतियोगात्वरंयलम्" योग के परे कोई भी सच्चा यल मनुष्य का नहीं है। फिर यह बात दिसके भरोसे है? इसपर कहते हैं कि "नास्तिज्ञानात्परोयंधुः" ज्ञान ही मनुष्य का बन्धु है अर्थात् सत् असत् का विवेक जो लोग करके कुछ काम करते हैं उनके कार्य पुष्ट होते हैं । सत् अमत् के विवेक होने पर भी बहुत मनुष्य के कार्य पुष्ट नहीं होते अर्थात् वे कार्य व्यपरीत दुखदाई हेाते | हैं इसपर कहते हैं कि "नाहङ्कारात्परोरिपुः" महङ्कार के परे कोई भी रिपु नहीं है जो कि सत् असत् वस्तु के भिवेक होने पर भी व्यपरीत फल है. तात्पर्य यह कि बहुत से कपटी मनुष्य और ही मतलम सोच के किमी महात्मा के पास जाते हैं पर वहां कुछ और ही प्रगट करते हैं इसी प्रकार महात्मा भी और ही मतलय ठाने बैठे रहते हैं परन्तु लोगों ४ घेण्डसहिता। को कुछ मोरही धोखा देते हैं । और उनके पाम कुछ ऐसे अज्ञानी मनुष्य जाते हैं जो यो हो स्लाम में फूल तठते हैं और वे अपने को मिद्ध सम औरो को निरे अगक समा बैठ जाते हैं उनके उस महकार से मागे और सुखोत्पादक विज्ञान की उन्नति नही होती बल्कि जो कुछ थोडा बना रहता है वह भी कच्चे के कारण भद्दा हो जाता है। इससे माह कार की परामर कोई भी दुश्मन दुनिया में नहीं है। इसके उप. रान्त घेरड जी कहते हैं ग्राहकार छोड के जिस वस्तु को सिद्ध किया चाई उसमें पास करै, इसपर दृष्टान्त देन है । अभ्यासात्कादिवर्णानि यथाशास्त्राणियोधयेत् । तथायोगसमासादर तत्वज्ञानंच लभ्यते ॥ ५॥ T" जैसे अभ्यास करते २ ककरादि धर्ण चीम्ह पहने लगते हैं और उनके परिचय के अनन्तर नाना प्रकार के शास्त्रो में घोध हो जाता है इमी प्रकार योगाभ्यास करते २ तत्वज्ञान (जो पहन कर पाये हैं) प्राप्त कर जाता है। तात्पर्य यह कि अहकारी मनुष्य का चित्त अभ्याम में कम लगता थे, यह अपनी गुरुनाईके भागे दूमरेके उपदेश पर कम बिश्वाम लाता हर दिग्नाई आ जाती है सा प्रकार को छोड़ कर और हिलाई फेो दूर यदायले अभ्यास में दृढ होने से योग शास्त्र का फल प्राप्त होता है । कयल कहने में नहीं ॥ इमके उपरान्त कहते है कि जय यह शरीर थोडे दिन बाद जरा उपाधि मे पनित हा नष्ट हो जायसी सय चाहे दिन के लिये पो इतनी सिधना करें कि सय प्रकार सामारिया साराम छोर के एकान्त मिजंग में बैठ पर शरीर को काट दें। दृष्टान्त देस ६॥

घेगडसहित।। ५ . *- सुकृतैर्दुष्कृतः कार्येर्जायते प्राणिनां घटः । घटादुत्पद्यते कर्म घटीयत्रं यथा भ्रमेत् ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वाधो भमते यद्वत् घटोयत्रं गवावशात् । तद्वतकर्म यशाजीवो भ्रमतेजन्ममृत्युभिः ॥७॥ भले और बुरे काम करने में प्राणियों का शरीर उत्पन्न होता है और उम शरीर से फिर कर्म तत्पन्न होते हैं जैसे कि घड़ी यत्र नलट पुनट कभी नीचे कभी कचे की ओर कला के बम है। घूमती है उसी प्रकार अत्तम मध्यम निरूप्ट की केबस है। वह जीव भी सन्म और मृत्यु फेर में पड़ा पूमा करता है । कहते हैं कि पदि जोत्र कर्म बम जन्म मृत्यु के फेर में पहा घूमा करता है तो फिर किस उपाय से वह मिट सक्ता है इस पर दृष्टात देते हैं । सामं कुम्भमिवाम्भस्यो जीर्यमागाः सदाघटः । योगानलेन संदहर घटशुद्धिं समाचरेत् ॥ ८॥ यह शरीर ऐसा गलायमान है जैसे कई घडे में जल भरने से वह घडा गन जाता है। परन्तु जब उसको प्राग में पकाय लेते हैं तब कभी नहीं गलला इसी प्रकार इस शरीर को योग रूपी आग से अच्छी तरह पकार के पछी करनी चाहिये । तात्पर्य यह कि यह शरीर मही से निर्मित करचे घों के समान मना है जैसे फच्चे घहे में पानी भरने पर जल का गुण व्याप्त होने से घट क्रश गल के फिर मट्टी में मिल जाता हैासी मझार पाच तत्वो मे बो शरीर में नीव पानी रूप है जब वह शुभाशुभ काम करता है तब पण जरा व्याधि उत्पत्र हाने में कुछ दिन बाद नष्ट हो जाता परन्तु जैसे घडे को आग में मच्छी तरह पकाय लेने पर सच में कोई जा. .

धेरगडमंहिता हरी चोट न पावे सो कमी नही नष्ट हो सत्ता च है हमारीघर्ष रखिये। इमी प्रकार योग रूपी आग से (अर्थात् योगाभ्याग करके) अच्छी तरह मे यदि देश को पक्की कर ले तो कभी न नष्ट हो सकता तक कि | कोई बाहरी आकस्मिक बाधा न मान पड़ेगी ॥ रस्से जो लोग जराम | रणादि से वारवार जन्म लेना नही चाहते तपा शरीर पुष्ट कर ऐहिक बिशुद्ध सुख भोग को आकाक्षा करने वालो को चाहिये कि योगाभ्यास में अपने शरीर को अवश्य विशुद्ध करें। इसके विशुद्ध करने से जब तक चहैं इस संसार में निर्मित हा विचरण करें या कहीं एक विशुद्ध स्थान में बैठे रहैं और जय इछा हो तघ समाधि के द्वारा परब्रह्म में लप हे। कर परम पुरुपार्थ मोक्ष पद प्राप्त कर लें। अपघा जप फिर इसका हे पर ब्रह्माश बन दिव्याति दिव्य शरीर धारण कर ससार रूपी दादाग्नि से जलते भुनते मनुष्यों का उद्धार करें और इसी प्रकार की योग क्रिया का संचार कर जीवनमुक्ति ज्ञान स्वरुप धने जे इच्छा हो करें करावें ॥इति॥ मय यह बात उपस्थिताई कि योग विद्या सीखने के पूर्व कौन २ सी सामग्री की आवश्यकता है जिसको संग्रह करके कोई माथक क्रम पूर्वक योगापास में प्रपत्त हो तम् पर प्रथम सात प्रकार के साधन अथ सप्तसाधनं । शोधनं दृढ़ताचैव स्थैर्य धैर्याच लाघवम् । प्रत्यक्षं च निलिप्तञ्च घठस्य सप्त साधनम् ॥3॥ घेर महाराज कहते हैं कि योगशिक्षा करने वाले के लिये शरीर के सात साधन हैं जैसे-१पन (देहको शुद्ध करना) २ दृढता (मयूमी) ३ स्थैर्य (एकममान सर्षदा देहकास्थिर रहना) ४ धैर्य (घबहाना नहीं) ५ धेरगडसंहिता । साधव ( हलकापन ) ६ प्रत्यक्ष ( शांख मादि इद्रियो से देखना, स्पर्श करना भादि ) निर्लिप्त ( सब बस्तु का व्यवहार करना परन्तु मम से अलग रहना) तात्पर्य यह कि शोधन दूढ़ता आदि सप्त साधन न करने से योगा. भ्यास में पहिले ता मनही नहीं लगता, यदि च किसी, खभाव मिद्ध योगाभ्यासी का मन भी लगाया तो फ्रम न रहने से बीच में कोई २ स्थ न ऐसा मान पदने का संयोग हे जाया करता है जिससे इधर उधर कुछ नहीं मृत पड़ता और विरक्तता आ जाती है बम सब कुछ मट्टी हो जाता है इस्से ये सप्त साधनही योग शास्त्र के मूल समझे जाते हैं यक्त योगी हमी से चीन्दे जाते है जो कि, सप्त साधन संपन्न है । अय सम साधन किस २ कर्म से और किस २ बस्तु से होते हैं उनका वर्णन पटकर्मणाशोधनच आसनेनमवेदृढम् । मुद्रयास्थिरताचैव प्रत्याहारेणधीरता ॥१०॥ प्राणायामालाघवञ्च ध्यानात्प्रत्यक्षमात्मनि । समाधिमानिर्लिप्तंच मुक्तिरेवनसंशयः ॥११॥ १ शोधन छ. कमी से होता है । २ भासनों से दृढता हेाती है. मुद्रानो से स्थिरता, प्रत्याहार से धैर्य । प्राणायाम से लाघव, ध्यान से अपने मात्मा में जो चाहै प्रत्यक्ष हो जाता है। मोपकार समाधि के द्वारा निर्लिप्तता अर्थात घासता रहित है। पाता है। इसीप्रकार सापनी मे अन्त में भषश्य मुक्ति हो जाती है इमर्मे संशय नहीं है । म उन स साधनो में प्रथम शोधन जो बटकमी से होता है उन पटकमी को द धेरण्डविता 4 -- अथ षट्कर्माणि ॥ धौति गणस्ता नेति लालिकी नाटकं तथा । कपालभातिश्चैतानि पटकर्माणि समाचरेत् ॥१२॥ जिन के कर्मों से शोधन होता है वे ये हैं जैसे- धीति २ वस्ति ३ नेसि ४ लोलिको ५ वाटा ६ कपालभाति । तात्पर्य यह कि इन छः कमी के द्वारा देह शुद्ध हो कर चेतनाकी चमत्कारी हो जाती है, यह शरीर मल से परिपूर्ण है, जिन २ मा में जिन २ नाहियो में रोमकूपों में पपेशियों में तया अस्थि बन्धना में जब मल लिपटा रहता है तब म शिथिल रहते हैं। नापियां शुद्ध चाल ने रहित दशी चलती हैं । गमकूपो में से भीतरी दुप वायु निकलने नहीं पाती बाहरी निमस्त, यायु घुसने नहीं पाती, धमहा फटा परदा रुस सान फोहर फुन्सो आदि से दूषित रहता है, इसी प्रकार पेशिया ठीक २ लचक भनक नहीं नहीं तथा अस्थि बन्धन भी हडियो को जब रहते है, यदि कमी शीघ्र गमनादि परिश्रम पहातो पीडा उत्पन्न होती है इत्यादि कारणो से शरीर के याह्याभ्यन्तरिक मल का शुद्ध होना बहुत हो मावश्यक है, इसी लिये शरीर के घायाभ्यन्तर मन शुद्ध करने के लिये गाभ्यामी लीग छधार्म निर्धारित कर लिये है । अधrn s' कई में धांति का पर्णन करते हैं । अथ धौतिः ॥ अन्ततिईन्तधौति हटौतिमूलशोधनम् । धौतिञ्चतुर्विधकृत्वा घटकुर्वन्ति निर्मलम् ॥१३॥ धोति चार प्रकार की है, अत धौति ( शरीर के भीतर साफ धैरगडसंहिता। . । - करना) २ दम्त धौति (दातों को साफ करना )३ इंदौति (हाय को साफ करना) ४ मलोधन ( नामिद्धि)स चार प्रकार की भौति में शरीर को निर्मल करना चाहिये। अन्तीतिः। यातसारं, बारिसारं, चन्हिसारं, वहिप्कृतम् । घटस्य निर्मलार्धाय अन्ततिश्चतुर्विधा ॥१४॥ धौति भी चार प्रकारी की है। १ वातसार (वायु रयागगा )२वारि सार (नरल स्पागना) ३ वन्हि सार (भागे कहेंगे) ४दिरात (यह भी मागे कहेगे) भय इन चारो में पहले बात सार का विधान कहते है। अथ वातसारः। काक चञ्चुबदास्येन पिवेद्वायुं शनैः शनैः । चालयेदुदरं पश्चाद्वर्त्मना रेचयेच्दछनैः ॥१५॥ अपने मुह को कौवे की टोट के समाग मनावे मात देना मोठी को सिकोट कर कौवे की टोट भी करे और धीरे २ वायु पाम कर के ऐद में उम वायु को चलाये फिरावे पश्चात् फिर धोरे २ उमी के। मुंहक द्वारा हरमी क्रिया को प्रातमार कहते हैं । मका पाल जे वैद्यन गाय से सम्बन्ध रसता है यह घेरपा महाराज कहर हैं। वातसारं परंगाप्यं देह निर्मल कारणम् । सरोग क्षयकर देहानल नियई कम् ॥६॥ यह परम गोप्य पातमार कर्म देव निर्मन कर मेवाना, मर्य रोग गा, और देह की अग्नि मदानयागा ॥ A गडहिता। तात्पर्य यह कि घरह जी कहते हैं हे दराड कापालि ! इस बातभार कम को योगी लोग परम गोप्य कहते हैं परन्तु इमने तुम से छिपाय नहीं रक्खा पोकि यदि छिपायेंगे तो हम कपटी योगी उहाँगे । क्योंकि हमासी धासना स स्वार्थ मापन की नहीं रही यह स्वार्थ साधक लोगही गाय कहके किमीसे नहीं बताते, यदि घेरत महाराजही यथार्थ गोप्य माने रहते तो क्यों दणकापालि से अटपट कह देते याने बिना मेया दहा के एकही दिन की बात चीत से कह चले ? इसे सिद्ध हुमा कि मरचे योगियों की ओर से यह योग विद्या गोप्य नहीं रहनी चाहिये परन्तु अधभेसरे स्वार्थ परायच योगियों को प्रकृति को दर्गाय के घेररह महात्मा ने हमकर, 'धातमारपरंगोप्य" मा बहा और मबं रोग क्षयकर इत्यादि मे साफ जाहिर है कि वैद्यक विद्या मे सम्बन्धरसता है। अथ वारिसारः। आकंटंपूरयेवारि वक्तेण च पिवेच्छनः । चालयेदरेणैव चौदरानेचयेदधः ॥ १७ ॥ मुख मे धीरे २ करट पर्यन्त भूध पानी पोवे फिर उसको दर में | पुराये फिराठे श्री. उमको अधे।मार्ग अपांत् गुदा द्वारा रेपन की, म का धारिमार कहते हैं। वारिसार प्ररंगोप्यं देह निर्मल कारकम् । साधयेत्तं प्रयत्नेन देव देहं प्रपद्यने ॥१८॥ धारिमार मी पहिन की तरह परामगोप्य कहा जाता है यह देह को मिल करनेवाला रमका पहेयर से माम करना चाहिये समके माधन मे देनदे प्राप्त होता परम माया तात्पर्य यह है कि यह क्रिया यसरी फटिग काट

घेरण्डसंहिता।
पट सब से नहीं हो सकी । बहुत से लोग ऐसे कठिन कार्य दो बार
दिन करके प्रानस्प बस ठोट देते हैं और फिर कहा करते है कि जटा
गपोड़ा है। इस प्रकार के लोगों ने एक ठपकारी बस्तु की महिमा मष्ट.
हातीने रस लिये सिवाय अधिकारी के नीर किमो के ट पद
नहीं बताना यह भी घेरया जी का गूढ तात्पर्य है परन्तु सभ किमी में
गोप्य नहीं है। यह पक्का मिद्धान्त है।
अथ अग्निसारः।
नाभिगन्धिं मेरुपृष्ठे शतबारं च कारयेत् ।
अग्निसारमियंधौति योगिनां योगसिद्धिदा ॥१९॥
उदरामयजं त्यक्ता- जठराग्निं विवर्द्धयेत् ॥२०॥
एपाधौतिः परागोप्या देवानामपि दुर्लभा ।
फेवलं धौति मात्रेण देवदेहो भवेद्भुवम् ॥२॥
नाभी की षिका मी बार मे पृष्ठ में संलग्न करे अपात् पेट को
मेमा खलाये कि नामी पुस कर जा पीट की रही में लग जाय करे।
यानमार पोति कही जाती है कि योगिकि योगकी सिद्धि
देनेवाली है। यह पेट के रोगों को दूर करके जठरागिन को बढ़ाती है
और यह भी पूर्वपत् परम गोप है और देवताओं को भी दुर्ममहे । मौर
कुछ करे पर नहीं परन्तु केवल सी घीति से देय देह नियर जाता
है। तात्पर्य यह किरोगो कभी नदी बागा ॥
अथ वहिष्कृत धौतिः।
काकीमुर्दा शोधयित्वा पूरयेदुदरं महत् ।
धारयेदर्द्ध यामन्तु चालयेदधो.वर्त्मना ॥२२॥
एपाधौतिः परागोप्यान प्रकाश्याकदाचन ॥२२॥

१२ घेरण्डमंहिता। पहिले कौवे की टोट के समान मुह कर के ऐसी बायु पान की जिसे उदर पूर्ण हो जावे फिर उसी बायु का उदर में आधे पहर तक रक्स पश्चात् गुदा के द्वारा वाहर झरे। यह भी धीति परम गे प्यहै इस को कमी किमी जैसे तैसे नहीं प्रकाश करना श्योंकि बिना दृढता क्रिया मधेगी नहीं झूठी कहके निन्दा करने लगेगा । परन्तु दृढ से तो अवश्य कहना ॥ अथ प्रक्षालनम्। नामिमग्नाजलेस्थित्वा शक्तिनाडींविसर्जयेत् । कराभ्यां क्षालयेन्नाडी यावन्मल विसर्जनम् ॥ तावत्प्रक्षाल्य नाडौं च उदरे वेशयेत् पुनः ॥२३॥ इदं प्रक्षालनं गोप्यं ठेवानामपि दुर्लभम् । केवलं धौति मात्रेण देव्देहो भवेध्रुवम् ॥२४॥ गाभी गावे ऐमे गहिरे जल में खड़ा हो के शक्ति नाडी अर्थात् पेट की चित्रली बही प्रतही को बाहर करके जब तक भन्न साफ न हो तप तक सूध चोवे बाद माफ होने के फिर पेट के भीतर पेठार ले यह प्रक्षालन मिधि गोपनीय है और देवतानो को को दुर्लभ है, केवल इस घोति से ही निश्चय देव देह हो जाता है । अथ वहिप्कृतधौति प्रयोगः । यामाई धारणे शक्ति यावन्न धारयेन्नरः । बहिष्टत महट्टीति स्तावञ्चय न जायते ॥२५॥ जय सक भापक माधे पहर तक श्याम रोकने की शक्ति प्राप्त कर से सम तक यह माद्वीति क्रिया का करना उचित नहीं है. क्योंकि गति धिमा गनिष्ट होने का डर रहता है। .

घेरण्डमहिना। । - । अथ दन्तधौतिः। दन्तमूलं जिहामूल रध्रजकर्ण युग्मयो । । कपालरध्रपञ्चैते दन्तधौतिबिधीयते ॥२६॥ दन्त धौति पाच प्रकार की है जैसे-१ दालो की जा को धोना, २ जिला की लड को धोना ३ | ४ कान के देनो छेदो के। घेरना, ५ सपा कपाल के रमको धाना । दन्तमूलधौतिः। खादिरेणरसेनाथ मृत्तिकयाचशुष्कया । मार्जयेद्दन्तमूलंच, यावकिल्विपमाहरेत ॥२०॥ खैर के रस से अथवा निशुद्ध भूखी मृत्तिका से दातो को जल को साफ करे और जब तक मैल म साफ है। तब तक कुल्ला करर फिर २ ॥ माफ करे। दन्तधौतिकाफल। दन्तमूल पराधौति योगिनां योग साधने । नित्यं कुर्यात्प्रभाते च दन्तरक्षाञ्चयोगवित ॥२८॥ दन्तम्लंघावनादि कार्येषु योगिनां मतम् । योगियो के योग साधन में दन्तमूल धोति अर्थात् दास का घोमा, भब से दप्तम कार्य है। इसे योग के जाननेवाले मनुष्य प्रतिदिन प्रात काल दातों की रक्षा को किया करें दन्तधाधन भपांत् दातूम मादि का बरना यागियो का मुख्य काम है। + - 171

१४
घागडम हिता।
तात्पर्य यह कि दातों से और मन से ऐसा भारी सम्बन्ध रहता
कि यदि दात में मैला रहता है तो उससे एक प्रकार की दुर्गन्धि पैदा
होती है जो मस्तिष्क में लग कर बुद्धि को भ्रष्ट फाडालती है, तथा
नाना प्रकार के रोग नत्यक कर गरीर को शिपिल कपडालती है. इसके
प्रत्यक्ष लक्षण यह है कि जब दातो के बीच में कोई कस्तु जैसे प्रामका
रेगा वगेरा है कभी अटक जाते तो जब तक नहीं निकलते स तक
जिट्टा यिकाल रहती है उसी पर लुरफुराया करती है । इस्से
और मन येचैन रहता है दूसरी बात यह कि योगाभ्यास से आयु की
। यदि हाती है अर्थात् योग बल से योगी लोग हजारो वर्ष जीते हैं की.
चन पर्यन्त इन्द्रिपा विनष्ट महासलिये समके रक्षाकी उपाय अवश्य
करनी चाहिये । सोमे दात की जड़ को योगी लोग साफ रखने की
क्रिया को योग साधन कह गये हैं। पास्तविक्ष मह क्रिया सय के लिये
नतम है और प्रारोग्यता का एक मा है।
जिहा शोधन।
अथातःसंप्रवक्ष्यामि जिहाशोधन कारणम् ।
जरामरण रोगादीन् नाशयेद्दीर्घलम्बिका ॥२९॥
घेर पड महाराज कहते हैं कि दन्त शयन के पद्यात् जिल्हा शोधन
कहते हैं। जिला के शोधन से जीभ लम्बी हो जाती है जिससे कि जरा
(युलाई मरण तपा और रोग मरो जाते हैं।
जिहा मूल धौतिः।
तर्जनीमध्यमानामा भगुलित्रय योगतः ।
वेशयेद्गल मध्येतु मार्जयेदम्बिकामूतं ।।
शनैः शनर्मार्जयित्वा कफदोपं निवारयेत् ॥३०॥

घेरण्डसंहिता । + 7 तर्जनी (अंगूठे के पास की अंगुली) मध्यमा (बीच की अगुप्ली) म मामिका (अँगूठे से चीथी) ये तीन अंगुलियोका गलेके मोतर प्रवेश करे और जिहा की नई तक बार २ घस्से लगा कर धीरे २ लो कुछ कफ का दोष हो उसे साफ करें। फिर इस्से कफ मात्र निकल जाता है। मार्जयेनवनीतेन , दोहयेच पुनः पुनः । तदयं लौहयन्त्रण कर्षयित्वा शनैःशनैः ॥३१॥ फिर नवनीत (नैनू ) को गिहा में लगा, कर रोज २ पार २ दुसे और फिर लाह के चिमटे से इसी जीभ का अग्र माग पकड के घोरे रोज सौंधा करै। नित्यं कुर्यात् प्रयत्नेन रबेरुदयकेस्तके।' एवंकृतेचनिल्येच लम्बिकादीर्घतांब्रजेत् ॥३२॥ प्रति दिन सूर्य के उदय और मस्त्र समपर्म यह धीति का अभ्यास करै यदि इसी प्रकार नित २ यह क्रिया की जाये तो जीभ लम्बी है। जावेगी। 7 । तात्पर्य यह कि मधुर कपाय आदि षटमेर का स्वाद, सभी जिहा के द्वारा अनुभव हेरता है, और उनका जो गुण ऐगुण है यह भी मारे आयु रस जीभ की शिराओ के द्वारा समस्त नाडिया में झट पट व्यास पाता है और यह रक्त में मिल कर या तो रागादि वत्पन्न करता है, पा मजा मास उत्पन्न कर के शरीरको मेटा कर देता है जिससे कि मनुष्य मारे मज्जा मासके चलने फिरनेको शमिमे मी विहीन हो निकम्मा मा हो जाता है । सो इस क्रिया के द्वारा नाम शिरा कठोर पड़ जाते है और जो कुछ मधुर धायादि रस खाता है वह कप: नाहियो में गमन न क मामाशय में ला थमता है और यह पित्त रस के सोm घेिण्डसहिता से पच कर क्रम मे सार भाग आकर्षक नारियो द्वारा समस्त शरीर में व्याप्त हेता है और वायु तथा मलका लेश उस रसके साथ नहीं जाता उस्से वह पुरुष बल पौरुष में उन मोटे मनुष्योंसे अधिक होता है और उसके प्राकहे रहते हैं । फुर्ती बनी रहती है। और सहसा रोगासे भय नहीं रहता। इसी लिये योगी लोग दीर्घ जीबी भी हो सक्त हैं और दूमरी बात यह है कि बिना नीम को लम्बा किये योगी लोग अमृत पान नहीं कर सके जिसकी क्रिया मागे कहेंगे। कर्ण धौतिः। तर्जन्यानामिकायोगान्मार्जयेत्तर्ण रंध्रयोः । नित्यमभ्यास योगेन नादान्तरं, प्रकाशयेत् ॥३३॥ तर्मनी और अनामिकाग्गुिणी के योग से कानो के दोनो छेदे। को प्रति दिन साफे करै त एक प्रकार का विशुद्ध नाद प्रगट हुमा करता है। m 1 भी तात्पर्य यह कि एक तो कर्ण में मल नहीं रह जाता जिस्से कि यधिरादि प्रथया कर्ण भूमादि रोग उत्पन्न होते हैं। दूसरी बात यह मन्यु के कुछ दिन पूर्व ही सो भव्यक्त नाद मुनाई पहता है पर पारिजात हा जाता है । जिस्से कि मनुष्य अपनी मृत्यु जान कर मत्तम कर्म उत्तम स्थान या उत्तम समय का भाप्रय ले पक्का है। कपाल रंधु शोधन। वृद्धाहुप्टेन दक्षेण मार्जयेट्टाल रंध्रकम् । पुवमभ्यास योगेन कफदोपंनिवारयेत् ॥३४॥ --

धेरण्डम हिता।
-
नाडीनिर्मलायाति दिव्यदृष्टिःप्रजायते ।
निदातेभोजनातेच दिनान्तेचदिनेदिने ॥३॥
दहिने हाथ के अगूठे के द्वारा प्रतिदिन सेाय के उठे तत्र मोशन
के अन्त में, तथा सूर्यास्त समय में, कपाल रन अर्थात् शिर के मोच में
जो गढ्ढा रहता है उसे जलही से साफ करै । इस प्रकार के अभ्यास मे
भीतरी कफ का दोष नष्ट हो जाता है । नाहिया निर्मन हे जाती है
और दिव्य दृष्टि होती है अर्थात् 'बहुत दूर तुक देखते की शक्ति बढ़
'जाती है," -
FFICE
111 हृदौतिः ( हृदय शोधन )। -
हृतित्रिविधांकुर्या इंडबमनवाससा ॥३६॥
हद्धति अर्थात् हृदय साफ करने को मिधि तीन प्रकार से है.१
दण्ड धौति २ बमन धौति, ३ पास धौति ।
रंभांदण्डं हरिद्राया चेत्रदण्डतथैवच ।
हृन्मध्येचालयित्वातु पुन प्रत्यारेच्नै ॥३॥
केला के बीच का भार भाग उनका दगा वा हरिदी के पेट का दग्नु
श्रयमा चीकने बेत का दगह बनाय के हृदय के बरेच धोरे २ मश करके
फिर धीरे २ बाहर किपा करें। इसी का नहीति कहते है।
दण्ड धौति।
कफपित्तथालेद रेचयेदूर्धयत्मना ।
दण्डधौनिषिधानेन हृद्रोग नाशयेदध्रुवम ॥३८॥

१८ घेरण्डमंहित।। इम दण्ड धीति के करने से, कफ पित्त तपा लेद (खखार) शादि विकारी मल मुह के द्वारा हृदय से निकाल बाहर होते हैं, जिसे कि हृदय के समस्त रोग निश्चय नष्ट हो जाते हैं। बमन धौति । भोजनांतपिवेद्वारि प्राकंठपूर्णितंसुधीः । ऊर्ध्वदृष्टिक्षणकृत्वा तज्जलंयमयेत्पुनः ॥ नित्यमभ्यासयोगेन कफपित्तनिवारयेत् ॥३९॥ बुद्धिमान पुरुप भोजन के अन्त में एट पर्यन्त जलपिये फिर थोड़ी देर तन्न ऊपर की भोर ताता रहे फिर थोड़ी देर के बाद उसी जल छ। धमन कर हालै कमी मन भौति कहते हैं । इस यमन भौति का प्रतिदिन याम करने में कफ और पित्त नष्ट हो जाते हैं। विवेचना । बमा करने में ऐसा अभ्याम फरै जिम्मे अन्न न गिरनेपा के वस्त न मान गिरे और भोलान्त से भागन के उपरान्त ही यमन नहीं करना सभके रहना ४ । ५ पटे बाद चाहिये तात्पर्य यह है कि साली पंट में धमग न करे। जय जल पीके भाकाग को मोर साके और यमी करने लगे. यदि जन न गिो । किञ्चिर भगुनी हानिकर गिराय । रमो प्रकार सम्पास करते २ किरापदी गिरने लगेगा। जय जल प्रोकर अपरंततम कुन १० मिनिटि इससे अधिक नदी भी घात शोच ले। त्यादिनार धेरगडस हिसा। वासधौतिः। चतुरहुल विस्तारं सूक्ष्मवस्त्रं शनैर्विशेत् । पुनः प्रत्याहरेदेतत् प्रोच्यते धौतिकर्मकम् ॥४०॥ चार अमुलका घोडा और कम से कम ५ वाय सम्या महीन पहा लेबर पोरे २ निगल जावे, और फिर नमको धीरे २ निकाल बाहर करे, रसी को बास धोलि कहते हैं । गुल्मज्वर प्लीहकुष्टं कफपित्तं विनश्यति । आरोग्यं वलपुष्टिञ्च भवेत्तस्य दिनेदिने ॥४॥ बास घोति अभ्यास करने से गुरुमरोग, लोहारोग कुष्टरोग, तथा कफ मार पित्त रोगों का नाश शता और अभ्यास करने वाले को आरोग्य बल पुष्टि ये सब शारीरक सुख दिन मिलते । तात्पर्य्य-जो नाना प्रकार के पदार्थ भोजन किये जाते हैं उनमें से एक प्रकार का पंञ्चायुक्त लार पैदा होता है जो थो दिन माद गावा हो कर नाहियो का मुख रोक लेता है। और मन रस शरीर संपारी नहीं हो का मल मूत्र के द्वारा निकल जाता है जिस अ रस से, शुक्र बनता है, जब अन रस शरीर मचारी नहीं होने पासा से शुक कम हो जाता है. इससे शरीर दुर्बल (कमार) हो जाता है, परन्तु इस घास भौति के द्वारा वह लार वा पच्छा राज र निकन बाहर होता है नाही मुख साफ रहता है, बस शुक की हि मायाम होती है और वह शुक्र पृष्ट होता है, जिससे शरीर में कास्ति बल मादि उपरोक्त समस्त प्रा. रोग्यता भी प्रापही माप प्राप्त होती है।

२० घेरण्डमर्माहता। 4 मूलशोधन। अपान करता तावद्यावन्मूलं न शोधयेत् । तस्मात्सर्व प्रयत्नेन मूल शोधनमाचरेत् ॥४२॥ जय तक मूल शोधन अर्थात् गुह्य द्वार माफ नहीं होता तब तक अपानवायुको प्रूरता अर्थात् कडापन बनारहता है । और गुह्यसे घायु कष्ट से निकलता है । इरसे सब प्रकार के यनसे मूल शोधग करना धित है । पीतमूलस्य दण्डेन मध्यमाङ्गुलिनापियो । यत्नेन क्षालयेत् गुह्यं वारिणाचं पुनपुनः॥४३॥ कच्ची हलदी की जट से पा मध्यमा अगुली से बार ३ यय सहित जरा द्वारा गुह्य द्वार साफ करना चाहिये वारयेत्कोप्टकाठिन्यमामाणि निवारयेत । कारणंकान्तिपुष्टयोश्च दीपनंवहिमण्डलम् ॥४४॥ मूल शोधन के द्वारा काष्ठ काटिन्य अर्थात् पेट के भीतर फडापन तथा भाग को अजीर्णता विनष्ट होती है मी प्रकार देश की काति गरीको पुस्ता और गठरामि की द्धि होती है । तत्पर्य-पात मे यायु प्रकृति के मनुष्य होते हैं जिनका कोठाहर दा फहरा रहता है और कान को गिमायत भगी रहतीद फिर पहातक होता थे क्षिकमी २ वायु मरन भी नहीं होता जिस नाम या अजीर्ण हो जाया करता है और अन्त में ज्या में भी पारित कर सदा कष्ट पाया करते हैं परन्तु ऐम मनुष्य एदि मन मा क्रिपा में शर गसिप किपा करे तो गप कष्ट गित हैं। पदा पर एक यात ॥ T २१ धेिरण्डसहिता । F 1 असभ्यता की भी कही जाती है पाठक गम क्षमा करेंगे। प्रस्तर ऐसभी मनुष्य देखे गये हैं कि जो योग विद्या मे भालसी होकर कष्ट के कारण कुकर्म द्वारा पोहादि निधारण किया करते हैं। अर्थात् गुदा मैथुन कराय के चैन का मार्ग निकाल लेते हैं। इस कर्म में ऐय्यास और मोटी ताद वाले धनी भक्तर होते हैं। देखिये यह कैसा अन्याय कार्य है। अन्याय के सिवाय उनकी अंतहियां इसी-कर्म से कमजोर हो जाती हैं और ट पट नर्क गामी भी हो जाते हैं। इसी निमित्त घेरह महा मुनि ने यह योग क्रिया निकाली है जिसमें रोग शांति और निर्मले बुद्धि मादि अनेक गुण हैं, जिनके यह उपरोक्त शिकायत हा वे अवश्य इस क्रियाको साधनकरें। अथ बस्ति प्रकरणम् 'जलवस्तिारशुष्कबस्तिर्वावस्तिःस्याद्विविधास्मृता', जलवस्ति जलेकुंर्याच्छुकवस्ति संदाक्षितौ ॥४५॥ वस्ति दो प्रकार की है-जल बस्ति और शुष्क यस्ति, जलवस्ति जल से, तथा शुष्क वस्ति स्थल में साधन करना चाहिये । जलवस्तिकीविधि ॥ नाभिमग्न 'जले पायें न्यस्तवानुत्कंटासनं । । प्राकुचन प्रसारज्ज, जलयस्तिं समाचरेत ६॥ मामी बूड जावे ऐसे जल में पैठ कर उत्कट भासन बैठ कर गुदादेश को सिकोडे भोर फैलावै ।मो को जलपस्ति कहते हैं । ( उत्कट प्रा. सन प्रासना के प्रकरण में देखो) वस्तिकाफल ॥ प्रमेहच्च उदावतं, क्रूरवायु निवारयेत् । भवेत्स्वच्छंद देहश्य, कामदेव समोमवेत् ॥४॥ . -- 11 २२ घेराइम हिता। दूसरी जन्न बस्ति के माधन से प्रमेह रोग उदायर्त रोग (१३ रोग हैं) क्रूर बायु (जो यही कठिनता से वायु छूटता हो) रोग नष्ट होते हैं, और साधक स्वच्छ शारीर ( देह काबू में रहै ) तथा कामदेव की भाति रूप- वान (देह में कान्ति आ जाती है ) हो जाता है । स्थल वस्ति वस्तिंपश्चिमोत्तानेन चालयित्वा शनैरधः । अश्विनी मुद्रंयापायु माकुञ्जयेत्प्रसारयेत् ॥४॥ स्थालही में पीठ की ओर बत्तान हैकर पहे और क्रमश गुह्य के द्वारा चलाये इसी प्रकार अश्विनी मुद्रा (भागे मुद्रा प्रकरण देखो) के द्वारा गुह्य को सिकोडे और फैलाये, ऐसा करने से स्थल बस्ति साधी जा सक्ती॥ फल॥ एवमभ्यास योगेन कोष्ठदोपं न विझते । विवर्द्धयेज्जाठराग्नि मामयातं विनाशयेत् ॥४९॥ सी प्रकार स्पल यमित साधना करने से होठ में दोप नहीं रह जात और उदर की भग्नि पट जाती, तथा मामयातरोग भी नष्ट हा जाता है। 7 - रति अति प्रकरणम् धेरराडसहित।। २३ + अथ नेतियोगः॥ बितस्तिमान सूक्ष्मसूत्र, नासानाले प्रवेशयेत् । मुखान्निर्गमयेत् पश्चात् प्रोच्यते नेतिकर्मकम् ॥५०॥ बीतामर का महीन हेरा माफ के सेदो में डालकर पो तले मुख की भोर निकाल लिया करें। इसको नेतिकर्म कहते है। फल ॥ साधनानेतिकर्माणि खेचरी सिद्ध माप्नुयात् । कफदोष विनश्यन्ति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥५॥ भेति कर्म साधन करने से खेचरी सिद्धि हो जाती है अर्थात् कफ दोष नष्ट हो जाता है और दिव्य दृष्टि हो जाती है । जिसे भाकाश की बहुत सी वस्तुएँ देख पाती है। तात्प-एक प्रकार का कफ नासिका में जमा करता है और जय वह बहुत जम जाता है तब उस कफ के रेशे बहते २ प्रास सहना पहूचते हैं, जिस्से कोयह माने लगता है और फिर वेही कफ के रेशे श्राख में फैल कर माहा बन छाय लेते हैं फिर मास उयों की त्यों धनी रहने पर भी नहीं देख पहता उमी माहा का अर्थात् कस के जाला का भास बनाने वाले नहन्त्री से गोद कर निकाल लेते हैं वह जाला मा- वृत भी हो जाता है अर्थात भाख भोगने वा धोन में नहीं फटता ग इंटता फिर यह योग इसका साफ नप कर हालाता है॥ लौलिको योग॥ अमन्तवेगेतुन्दञ्च भ्रामयेटुभपाश्वयोः । सरोगा विहन्तीह देहानल वियर्द्धनम् ॥५२॥ , . -- घेण्डसहिता। آره 7 - -- प्रति प्रधस्त वेग से पेट के दोनों बगल घुमावे, इसी का नाम ली निकी योग है यह योग सब प्रकार के रोगो को नष्ट करता है और देह की अग्नि को बढाता है अर्थात् क्षुधा बहुत लगती है, और जो भो जन किया जाता है वह पच जाता है। त्रोटक योग। निमेपोमेन्पक त्यक्त्वा सूक्ष्मलक्ष्य निरीक्षयेत् । यावदशूणि पतन्ति त्रोटक प्रोच्यते वुधैः॥५३॥ पन्नक का भाजमा यन्द करके किसी सूक्ष्म अस्तुको और जघ तक सामू न गिरें एक टक देयता रहे इसी को वोटक योग कहते हैं । फल। एवमभ्यास योगेन शाम्भवी जायते ध्रुवम् । नेत्र रोग विनश्यन्ति दिव्य दृष्टि प्रजायते ॥५४॥ मो प्रकार ोटक योग का भ्याम करने से शाम्भवी मुद्रा मिटु हो जाती अधांत एक टक गनिमेष देखने का अभ्याम यहा तक पत जाताीि जितमी देर तक धिना पान भाजे ताकते रहा। इसे TAमाही नहीं बल्कि मंत्र के समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं और दिव्य दृष्ट भी हो जाता है भपात पात मूत्म २ घस्तु भी देख पाने भगती॥ तात्पर्य-पा किसे पत्रमा सगामे मे छोटी पातु बी सी देख पाती भी प्रकार म सापामा भी कम है।

धेरण्डसंहिता 1
२५
am
-
कपाल भाति योग।
घातक्रमेणव्युत्क्रमेण शीतक्रमेणविशेषतः ।
भालभातित्रिधांकुर्यात् कफदोपंनिवारयेत् ॥५५
कशान भाति योग सीन प्रकार का है। बातमम मुतकम, तपा
शीतकम । इसके साधन से कफ के मंपूर्ण देष नए होते हैं ।
वातकम कपाल भाति।
ईड़यापूरयेद्वायुं रेचयेपिंगलांपुनः ।
पिंगलयापूरयेद्वा पुनश्चंद्रेशरेचयेत् ॥५६॥
ईश और अर्थात् नाक के प्राय छेद के द्वारा घायुको खोचके भरे और
पिंगला अर्थात् दहिने छेद से निकाले । एसीप्रकार दहिने छेद वायु
पूरण करें और फिर बायें वेद से निकाले ।
पूरकरेचकंकृत्वा बेगेननतुचालयेत् ।
एवमभ्यासयोगेन कफदापनिवारयेत् ॥५॥
जयपूर या चमकर भात् वाम सीधे और छह तय बल्द
माजी न करें कम से धीरे साफ इसी प्रकार प्रभ्याम योग करने का
देय भ्रमान नष्ट हो जाते हैं
व्युत्क्रमकपाल भाति।
नासाभ्यांजलमाप्य पुनर्यकत्रेशरेयेत् ।
पायंपायंयुतमेण श्लेप्मादोपंनिधारयेत् ॥८॥

घेरगडमंहिता।
दोनों माक छेदो गे जग को बाँध कर फिर मुह की राह में
गिराता लाये और मुष्ट की राह मे भी जल पी २ कर नाक को राह गिराधे
इसी को व्युतकम कपामा भाति कहते हैं । यह कफ के समस्त दोषों को
नष्ट करती है। यह क्रिया यहुत ही फठिग ३'और यहे 'अभ्यास से
मिद्ध हो मक्ती है, नहीं तो मुख से पानी पीकर मामिका से गिराना
और नाक से पीकर मुह से गिराना है।ई नहीं सक्ला । बल्कि पिया हमा
पानी पेट में घना जाता है इसलिये सावधानी से करना ।
शीतक्रम कपाल भाति।
शीत्कृत्वपीत्वानको नासानालविरेचयेत्।
एवमभ्यासयोगेन कामदेवसमोभवेत ॥५९॥
नजायंतंचवाईक्यं, जरा नैव प्रजायते ।
भवेत्स्वच्छन्ददेहश्व कफदोपनिवारयेत् ॥६॥
मुख रो शीत्कार कर ( सुरक कर ) पानी पौवे और उसे नाक के
छेदों से गिराय दे. इसको शीतकम कपाल भाति कहते हैं । इस प्रकार
योगाभास करने से मनुष्य कामदेव की तरह सुन्दर हो जाता है और
बुढाई तथा बुढ़ापे को निर्यलता नमो शरीर में कभी नहीं मा सक्ती।
फिर देह अपने काबू में रहती है और कफ के जितने दोष हैं सब नष्ट
हो जाते हैं।
इतिथी घेरडम हितायां घेरण्डचण्डकापास्ति सम्बाद
पट कर्म साधन नाम प्रथमोपदेशः ॥ १ ॥

धेरण्डसंहिता।
२७
अथ द्वितीयोपदेशः
अब आसनों की बिधि कहते हैं।
आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तवः ।
चतुरशीति लक्षाणि शिवेन कथितं पुरा ॥१॥
तेपांमध्ये विशिष्टानि पोडशोनं शतं कृतम् ।
तेपांमध्ये मत्यलोके द्वात्रिंशंदासनंशुभम् ॥२॥
घेरपच महाराज ने कहा कि पृथ्वी में जितने जीव जन्तु हैं उतनेही
भासन भी है। शास्त्रकारों ने औसत दर्जे चौरासी लाख सानि संख्या
ठहराया है इसी से प्रथम महादेव जी चौरासी लाख भासत पाहू मी
चुके हैं। परन्तु उनके बीच सौ सफा कम में अर्यात् चौरासी भासन
श्रेष्ट हैं। उनमें भी यह यती शासन मनुष्य लोफ के लिये शुभ है
| बाकी ५२ प्रायन देव लोक के लिये कहे गये हैं।
आसनों के भेद।
सिद्ध, पद्यं, तथा भई,मुक्त, बजञ्च स्वस्तिकम् ।
सिंह, च गोमुवं, वीरं, धनु, रासन मेवच ॥३॥
मृतं, गुप्तं,तथा मत्स्यं, मत्स्येन्द्रासन मेवच ।
गोरक्षं, पश्चिमोत्तानं, उत्कटं, सङ्कटं तथा ॥४॥
मयूर, कुक्कुट, कूर्म, तथा चौनान कूर्मकम् ।
उत्तान मण्डुकं, २, मण्डूक, गरुडं पम् ॥६॥

२८ घेरण्डमंहिता। . शलभं, मकर, उप्ट्र, भुजङ्गञ्च, योगासनम् । यात्रिंशदासनानितु, मर्त्यलोकेच सिद्धिदम् ॥६॥ सिद्धासन १ पद्मामन २ भद्रासन ३ मुहासन ४ यजामान ५ खति- कासम ६ सिंहासन ७ गोमुखासन ८ बोरासन र धनुरासन १० मुतामन ११ गुप्तासम १२ मत्स्यासन ९३ मत्स्पेन्द्रासन १४ गोरक्षामन १५ पश्चिमोत्ता- नामन १६ उत्कटासन १७ संकटामन १८ मयूरासन १९ कुक्कुटासन २२ फूर्मामन २१ उत्तान कूम कासम २२ उत्तान मगडू कामन २३ वृक्षासन २४ मकामन २५ गरुड़ासन २६ कृषभासन २७ शलभासन - मकरामन २ उष्ट्रासन ३० मुगङ्गासम ३१ योगासन ३२ ये बत्तीस प्रासन मनुष्य लोक लिये सिद्धि देने वाले हैं मांत् रोगादि निवारक तपा घल पुष्टि भादि बहुविध गुणकारक है । तात्पर्य-योगियो के मत से रोग दो प्रकार के होते हैं एकता का• पिछी देह में उत्पन्न होके इन्द्रियो के द्वारा मन को क्लेश पहुंचाते हैं दूसरे मानसिफ जो केवल माही में उत्पन्न हो के तमी मन को परम होग पहुंचाते हैं । योमियो ने यहे परिश्रम से यह प्रासन प्राणायाम भादि को "एक क्रिया व्यर्थ करी" निकाला है। पारने के सम्बन्ध में एक यात और भी बाहमा दे कि जो लोग अयसर देखा करते है शिध हुत से बाजीगर वगैरा भी यधुन मे सामान करते हैं और देह के टेर मां की घडी २ रियायें दिखाया करते हैं। यह भी शारीरक फायदा पहुंघाती। हमी से प्रशमर निरोग रहते हैं। परन्तु वे उस विद्या का तस्य नहीं जानते इमलिये उनके मानसिक लेश न दूर हो कर बल्कि और भी बढ़ते हैं। यानी, मेहि हप्तादिक देोप यढ़ के साधक को धष्ट मागों कर छामते हैं। यहां पर रो लिये जनाया जाता है घर की दृष्टि उस प्रकार म गावे॥

धेराड हिता। २६ 7 सिद्धासन ॥१॥ योनिस्थानकम मूलघटिकं सम्पीडययगुरुफेतरम् । मे सम्प्रणिधायसन्तुचिबुकं कृत्याहृदिस्थायिनम् ॥ स्थाणुःसंयमितेंद्रियोऽचल दृशा पश्यन्भुवोरन्तरम् । मोक्षचैत्रविधायतेफलकरं सिहासनंप्रोच्यते ॥ ७ ॥ जितेन्द्रिय सापक पैर की लह याने एड़ी की योनिस्पान ( MET मित्रयों की योनि हेाती है ऐसी कल्पना कर अर्थात् प्रायडकोश के नीचे ) में निहाये और फिर दूमरा गुरुफ अपर्याप्त एडी लि के संपर परे, फिर विधुक पानी डाठी को छाती में लगांवे फिर इन्द्रियों को साधकर अर्थात् एक ध्यान में वाध कर अचल दृष्टि यानी एकटकी लगा कर भौहो के बीच के स्थान की देसै । इसी प्रकार करने से सिद्धासन कहा जाता है और यह आसन मोक्ष फन या भग्वाम्य नोरोग प्रादि फल का देने याला ॥ तात्पर्य-मोक्ष यह कि गरीर नोरोग रहने से बुद्धि परती है बुद्धि बढ़ने से सत् ममत् का ज्ञान देता है, धम निहत हर जन्म मरणका छूट जाता है, अकाल मृत्यु से न मर कर काल मृत्यु से मर कर परमात्मा में लप हो जाता है। पदमासन ॥२॥ 'वामोरूपरिदक्षिणहिचरणं संस्थाप्ययामंतथा । दक्षोरुपरिपलिमेनविधिना कृत्वाकराभ्यांदृढम् ।। अंगुष्ठेहृदयनिधायचियुक्त नासाग्रमालोकयेत् । एतद्व्याधिविनाशकारणपरं पद्मासनंचोच्यते ॥८॥ दुःख है उमसे ३. घेराडसहिता। दहिगा पैर बाई जाप पर तपा धाया पैर दहिनी जाध पर रक्से और पीछू को भोर से दहिगे हाप से दहिने पैर के अंगूठे को तथा पायें हाथ से बायें पैर के अंगूठे को दृढता से पकरे । इसी प्रकार घिघुक ( छाडी) छातो पर रकार्य और मासिका का जन भाग देरी । इसी का नाम पद्मामन है । यह भामम ममस्त व्याधि बिनाश करने में श्रेष्ठ है। । भद्रासन॥३॥ गुल्फौचवपणस्याधो व्युत्क्रमणसमाहित. । पादागुष्टेकराभ्यांच धृत्वाचपृष्ठदेशतः ॥ ९ ॥ जालंधरंसमासादा नासाग्रमवलोकयेत् । भद्रासनंभवेदेतत् सर्वव्याधिविनाशकम् ॥१०॥ रोमी गुरफ अर्यास एडी आहकोश के नीचे बजट के रक्खे बाद पीठ की पोर में दोनों हाथो से देनी पैसो के अंगूठों को पकहे और जाल. घर धंध (बागे में देखें।) करके नामिका का अन्न भाग ध्यान करके देखें । हमी का नाम भद्रासन है और यह प्रासन सब प्रकार की उपाधिपा को नष्ट करता है॥ मुक्तासन॥४॥ 'पायुमूलेबामगुल्फ दलगुल्फतधोपरि । शिरोग्रोवासमंकायं मुक्तासनंतुसिद्धिदम् ॥११॥ याई पडी गुदा के जद में लगाये उसी के कपर दहिनी एडौ रक्व शिर और नाला समान भाग से रक्दै हिशो हुनने न पाये और सीधा परोर करके मेटे, प्रमो को मुशासन कहते ३ । यह शासन साधक को सय प्रकार की सिद्धि देने वाला । T धेरगड संहिता। . AL - 'बजासन ५। जंघाभ्यां बजवत् कृत्वा गुदपार्चे पदात्रुभौ । बजासनं भवेदेतत् योगिनां सिद्धि दायकम् ॥१२॥ दोनों जांघों को वेज़ के साकार कर के गुदा के दोनो तरफ दोनों | पैर मिहावे। इसी को बजासन कहते हैं .... यह आमन योगिया को सिद्धि प्रदान करता है। स्वस्तिकासन ६। जानोरन्तरे कृत्वा 'योगी पादतले उभे। ऋजुकायः समासीनः स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ॥१३॥ दाना 'जानु अर्थात् पिडुनी दाना जांघों के बीच करके दोनो चरण तल भी उसी मध्य में रक्ये और ऐठग्य वर कर सरल भाव शरीर करके बैठे । यो स्वस्तिकासन कहता है ॥ सिंहासन ७। गुल्आ च कृपणस्याधो व्युत्क्रमेणा तांगतः चितिमूलोभूमिसंस्थः कृत्वाच जानुनोपरि ॥१४॥ व्यक्ताव्यको जलंधं च, नासाथ मवलोकये। सिंहासनं भवेदेतत् सर्व व्यधि विनाशकम् ॥१६॥ दाना एठी अंहकोश के नीचे उलट पार परम्पर मिहाप से रक्खें भौर ऊपर की भोर मार कर ले सौ दाना पिदुलो भूगि मे लगाय दे सपा पिडुलियो के अपर मुख को सोन कर कयौ करक । गालघर यष घेरगडसंहिता (मागे देखो) के पाश्रय मामिका का अग्रभाग देश । सो को सिहा. सा कहते हैं। हमी भासन के द्वारा सब प्रकार की ध्याधि बिमष्ट होती है। । गोमुखासन ८॥ ܟ पादीच भमोसंस्थाप्य, पृष्ठपाइवें निवेशयेत् । स्थिरकायं समासाद्य, गोमुखं गोमुखाकृतिः ॥१६॥ दोनो पैरों को भूमि में स्थापन करके चोटके बगो में लगाये और स्थिर गरीर हेकर बैठे तो यह गेरमुख के साकार देख पहेगा, इसी का | नाग गामुसासन है। बीरासन ९। एक पाद मथैकस्मिन् विन्यसेदुरुसंस्थितम् । इतरस्मिन्स्तथा पश्चादीरासन मितीरितम् ॥१७॥ एशजपा के कपर एक पर रन के दूसरा पैर पीछे की ओर रखें पसी के घोरासन कहते हैं। धनुरासन १०। पसार्धपादों भुविदण्डरूपो, कराँचपृष्ठे धृतपादयुग्मम् । कृत्याधनुस्तुल्यपरिवर्तिताहम् जगादयोगीधनुरासनन्तत्१८ देना चरण भूताल में ममान भाय से दण्डा की तरह फैलाय दे देगा का पप्त पो भोर से ला कर दोनो पैरों को पी और देश को धनुष के साकार यनाये और उगटै पुग्नटै इसीको योगी डोग धनुरासन घेरण्डमपिता। + मृतासन ११ । उन्तान शववद्वामी, शयामन्तु सवासनम् । शवासन प्रमहरं, चित्तवित्रान्ति कारणम् ॥१९॥ मरे मनुष्य की तरह परातल में शयन करने ही मे मृतासम होता है इसको शवासन कहते हैं यह शासन श्रम को दिनद करता है और #िबीम का कारण है। गुप्तासन १२१ जानुनारन्तरे पादौ कृत्वापादौ च गोपयेत् । 'पादोपरिच सस्याप्य गुदं गुप्तासन विदुः ॥२०॥ दोनेा गुटुना के बीच में दोनो पात्रो को गुप्त भाव से रमई और | दोनो पावो पर गुदा की स्थापन करै । इसी को गुप्तामन करते हैं । मत्स्यासन १३। मुक्तपद्मासनं कृत्वा उत्तानशयनं चरेत् । कूर्पराभ्यांशिरोवेष्ठन, मत्स्यासनन्तु रोगहा ॥२॥ मुक्त पासन लगाय के हाथ के दोनो गुटुना में शिर को लपेटे और चित्त हाके पर जावे। इी को मत्स्यासन कहते हैं । यही भासन मनस्त रोगो का नाश करता है। पश्चिमोत्तान आसन १४ ॥ प्रसार्यपाटी विदगडर पौ, सन्यस्तमालश्चितियुग्ममध्ये । चनेनपादोचतीकराभ्यां, योगींद्रपीठपश्चिमोत्तानमाहुः२२ ५ ३४ घेरण्डमहिता । दाना पाय भूमि में दण्डा की तरह फैलाय दे और पत्र के सहित दोना पाय हाथों से पकहे और दागा जाघो के बीच अपने शिर को पैठारे, सी को योगीन्द्र लोग पश्चिमोत्तान भासन कहते हैं। मत्स्येन्द्रासन १५॥ उदरं पश्चिमाभासं कृत्वातिष्ठति यत्नतः । नम्रांग वामपादं हि, दक्षजानु परिन्यसेत् ॥२३॥ तत्र याम्यं कूर्परञ्च याम्यं करेच वक्तूकम् । भुवोर्मध्ये गतांदृष्टि पीठमात्स्येन्द्रमुच्यते ॥२४॥ पेटके। पीठको तरह करै अर्थात् पेटकुञा पहे और बाये पैरको नयाय के दाहिने पैर की जघा पर रक्से, इसी प्रकार उस धायें पैर पर दहिने पैर को एसी रयस । पर दहिने हाथ पर मुह के। रक्य और भौहों के मध्यरूल की देसे । इसको गत्स्येन्द्र सासम कहत हैं। गोरक्षासन १६। जानूर्वो रन्तरपादो उत्तानाव्यक्त संस्थिती। गुल्फोचाच्छाय हस्ताभ्यामुत्तानाभ्यां प्रयत्नता२६॥ कण्ठससोचनंदत्वा नासाग्र मवलोकयेत् । गोरक्षासनमित्याह योगिनांसिद्धिकारणम् ॥२६॥ होना साप और पिदुनिया के मध्य में दमी पैर सतान कर गुप्त भाव में को फिर देगा छापो मे दागा एकी मंद ठे। इसमें याद कठ का भकुचित नामिका I HIT भयाकन करे । मोर को साम । या योगिया की मिति देने वाला है।

धेरण्डसंहिता उत्कटासन ॥१७॥ अंगुष्ठाभ्यामवष्टभ्य घरांगुल्फेचखेगती। तत्रीपरिगुदंन्यस्य यिज्ञेयमुत्कटासनं ॥२७॥ पैर को दोनों अंगूढों के घाल से भूमि में स्थित होके दोनों एहियों की निरालम्ब के उठायदे और उन्हीं एरियों पर गुदा को रक्लै । पसी को उत्कटासन जागना चाहिये। सङ्कटासन ॥१॥ यामपादंचितेर्मूलं सन्यस्यधरणीतले। पाददण्डेनयाम्येन येष्टयेद्वामपादकम् ॥२८॥ जानुयुग्मेकरौयुग्म मेतत्तुसङ्कटासनं । भायां पैर और वायां गुडुना भूमि में लगाये और दहिने पैरसे बायां पर लपेट ले भार पिर दोनों लापों पर देशनों राय रक्से । सोही सकटापन कहते हैं। मयूरासन ॥१६॥ घरामवष्टभ्यकरयोस्तलाभ्यां, तत्कूपरेस्थापितनामि पार्श्वम् । उच्चासनादण्डवदुत्थितःखे मयूरमेतत्प्रयदन्ति- पीठम् ॥२९॥ दाप रे देशनों सों में भूमि को धारण करे फिर दाप की दोनों गाठियों को नामी के दोनों बालों में स्थापन करता मोर दोनों पैरों को कैलाप के अंधे भासत में दो की तरा प्राकारा में २ ठाये। पाही गपूर भान है.

३६ घेरण्डमंडिता। -" कुक्कुटासन-॥२०॥ hea - पद्मासनंसमासादा जानोरन्तरेकरी । कूपराभ्यांसमासीनो मञ्जस्य कुक्कुटासनम् ॥३०॥ पद्मासन में बैठकर दोनों जंघा और देगों पिंहुलों के भीधर्म हाय को पैठारे और-देनों हाथों की गाड़ियों पर मंच की तरह चट के बैठे इसी को कुक्कुटासन कहते हैं । कूर्मासन ॥२१॥ गुल्फोचपणस्याधो व्युत्क्रमेणसमाहिती। ऋजुकायशिरोग्रीवं कूर्मासनमितीरितं ॥३१॥ दोनों एड़ियों को अण्डकोप के नीचे सलटके रक्व । शिर और ग्रोवा रुपा देश को सीधे तौर पर रपये इसी को कूर्मासन कहते हैं।' उत्तान कूर्मासन ॥२२॥ कुक्कुटासनबन्धस्थं कराभ्याटतकन्धरम् । १. पीटकूर्मवत्तान मेतदुत्तानकूर्मकम् ॥३२॥,, पहिले कुफ्फुटामन बाध से फिर दोनो हाथो से काधा पकड़ के कापे की तरह उत्तान हो जाप, पछी फेो तत्तान फूर्मासन कहते हैं । उत्तान मण्डूकासन ॥२३॥ - मगडूकासनमध्यस्थ कूपराभ्यांतशिरः । एतभेकवदुत्तान मेतदुत्तानमगडकम् ॥३३॥ , धेरण्डसंहिता। । मंडूकासन में बैठकर कायों के दिनों शिर धारण कर उत्तान हो जावे। इसी का नाम है नतास मंटू वृक्षासन ॥२४॥ वामोरुमूलदेशेच-याम्ये पादौनिधास्तु । तिष्ठेत्तुवविद्भूमौ वृक्षासनमिदंबिदुः ॥३१॥ दहिना पांध घाई आपके मूल अर्थात जहमें रखे और समानभाय से शुक्ष की तरह रहा हो इसी का ज्ञापन जानना । मण्डूकासन र पादतलौरष्ठदेशे गुप्ठेद्वेचसंस्पृशेत् । जानुयुग्मंपुरस्कृत्य साधयेन्मडुकासनम् ॥३॥ दोनो पैर पीठ को भोर करके सनम दोनों अंगूठे परस्पर एक २ से भिडण्ये, तथा दोनों जांघ सामने की ओर से, इसी प्रकार मकामा . माधम करें। गरुडासन॥२६॥ जडोरुभ्योधरांपीडय स्थिरंकायोट्विजानुना । . जानूपरिकरंयुग्मं गरुडासनमुच्यते ॥३६॥ दोनो माधो से सपा देमो पिटुलियो में भूमि को दयावे और दोनेा पिंहुलियो पर दोनो हाप रयो । सोको समझाते हैं। - धेडमरिता। वृषासन ॥२७॥ याम्यगरफेपायुमूलं धामभागेपदेतरं । विपरोस्टशेदभूमि कृपासनमिदम्भवेत् ॥३॥ गुह्य द्वार वा दक्षिण एडी के अपर रख उसी के वाम भाग में बाथै पात्र को उलटा करके रमले भूमि के स्पर्श करे इसी की वृषासन कहते हैं । शलभासन ॥२८॥ अधास्यःशेतेकरयुग्म पक्षेमिभवष्टभ्य करयोस्त- लाभ्यां। पादीचशून्येच वितस्तिचौ म घदंतिपीठशल- भमुनींद्राः ॥३८॥ । नीचे मुह फरके शयन करे । पक्षस्थल में दानों कर स्थापन कर के दानों करतलों से मृत्तिका पका कर दोनों पैर शून्य भाग में बिललभर ऊंचे रारी सी का नाम रानभासन है। मकरासन ॥२९॥ 'अधास्यःशेते हृदयंनिधाय भूमीचपादौ चप्रसार्य- मागौ। शिरश्चहत्वाकरदण्डयुग्मे देहाग्निकारंमकारा- सनन्तत् ॥३॥ भूमि में पेटकुला पोट जावे और नीरे मुह करके छातीको भूमि में | Anाय से, और देशनों पैर मेलाप दे। फिर दोनों हाथों से शिर धारण करे । सोको मकरासन कहते हैं ।

38 धेरण्डसंहिता। उष्ट्रासन ३०। अघास्यःशेतेपदयुग्मव्यस्तं, एप्टेनिघायापितंकराभ्याम् । आकुश्चयेत्सम्यगुदरास्यगाद, उष्ट्रश्चपीठंयोगिनोवदन्ति ४० अपो बदन शयन करके दोनों पर नट के पीठ की भोर लाये। पीछे दोनों हाथों से रहीं पैरों को घर के मुह और पेट हुन भाव से सिकोड़ ले. इसी को उष्ट्रासन कहते हैं ।- भुजंगासन। अंगुष्टनाभि पर्यन्त मघो भूमौ बिनिन्यसेत् । करतताभ्यां घरांतृत्वा, उर्वशीर्ष फणीवहि ॥४॥ देहाग्नि बद्धते नित्यं, सर्व रोग बिनाशनम् । जागर्ति भुजगी देवी साधनात् भुजगासनम् ॥४२॥ पैर के अंगूठे में लेकर नामी पर्यन्त देश की नीधी धोरवाला भाग घरातल में अच्छी तरह स्थापन करके हाच के दोनों सलों ( पक्षों) से भूमि को अवलम्बन करै भोर सर्प के फन की भांति शिरभागको उठावे, पसी को भुजंगासन कहते हैं। फल।। इसके साधन में शरीर को अनि दिन २ बढ़ती जाती है। सात्पर्य भूख मच्छी तरह से लगती है, मन जो कुछ खाया जाता मच्छी तरह से परिपक्क हा कर शरीरको पुष्टि पहुंचाता है। इसी कारण रोग राशि अर्थात् जिसने रोग इस भामम साधन के पूर्व से हो सबको यह घेण्डसहिता नष्ट करता है। इसी सामन के अभ्यास करने से भुजगी देवी अर्थात् कुण्डलिनी शक्ति जाग उठती है। जिसका वृत्तान्त आगे लिखेंगे। योगासन । उत्तानौचरणो कृत्वा संस्थाप्य जानुनोपरि । आसनोपरि संस्थाप्य उत्तानं कर घुग्मकम् ॥४३॥ पूरकैवायुमाकृष्य नासाय मवलोकयेत् । योगासनं भवेदेतत् योगिनां योग साधने ॥४॥ दोनो पैरो का चित्त कर दोनेा नाघों के ऊपर सस्थापित कर के दोनेा कर सत्ताम भाव से आसन के कपर राखे, द्वारा घायु खींध कुम्भक करे अर्थात् जहाँ तक हो। मकै थाभे रहे और समय में मासिका का अग्रभाग अवलोकन करै । इमी को योगा. सन कहते हैं। योग माधन बिषय में यह प्रासम योगिया को अवश्य साधन करना चाहिये। इति घेगडहिसाया वतीयोपदेश ॥ २ ॥ बाद पूरक प्राणायामके उसी तृतीयोपदेशः अथ मुद्रा कथनम् (पर मुद्रा कहते है) महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयानं, जलंधरम् । मूलबन्ध महाबन्ध, महावेधश्च, खेचरी ॥१॥ , घेरण्डमंडिता। विपरीतकरी, योनि, वैजाणी, शक्तिधारिणी। ताड़ागी, मांडवीमुद्रा, शाम्भवी पञ्चधारणी ॥२॥ अश्विनी, पाशिनी, काकी,मातमीच,भुजङ्गिनी। पञ्चविंशति मुद्राणि, सिद्धदानीह योगिनाम् ॥३॥ घेरगड महाराज ने फिर कहा कि, पहिले ने। भुमहसन के कान में कुण्डलिनी शक्ति के जागने को दान कह भाये हैं उस फुहलिगी शक्ति के भागने में मुद्रा भी पाहिमे मिना मुद्रा फराह लिनी शक्ति सेई रहती है इसलिये पधीय प्रकार की मुद्रा है, उनके नाम ये हैं:- • अपामल में लिखा है कि गुरू के प्रमाद से यह सोई हुई कुपट- लिनी शक्ति जागती है अन्यथा नहीं, यह कुण्डलिनी शक्ति क्या है उसपर कहते हैं कि देहके अन्तर्गत जो६ च हैं उनमें कमानकी पखुरियांक नमान भांम पेशियां मापस में लकड़ी कमल में फूल की सरह मिकुही रइसी तपा जहां हड्डियों के बाद है वे भी "अस्थिवन्धन" नामक कठोर २ नसों से कहे रहते हैं, इससे शरीर में मांश या रक्त मना की प्र. धिकता होती है तो यह शरीर मन के बेग की ग्राम में नहीं रहता, जि- चाहिये उधर फेरिगे, जिधर चाहिये उधर भाइये, जिशा चाहिये घर गरेडिये, अथवा शीघ्रगति से बहको ठाइये बैठाइये. यह नहीं दो राक्ता । परन्तु जब देहको कुण्डलिनीशक्ति जाग नठतोहे से ये सब मन के अधीन हो जाते हैं, जिपर घाहिये फेरिये मराहिये उठाइये वै. ठापये, लम्प, सम्प, मोर, लिटिक सही फुर्ती ने हो भक्त हैं. वह कुराह- लिनी शक्ति यही है कि रग, नश, पेशो मादि को नकद बन्दी, उसका जागना यह है कि उन रग, नश, पेशियों की जकरबन्दी खुल जाये, यह सुलगाही उसफा गागना है।

४२ धेरगहमंहिता। A १ महामुद्रा. २ नभोमुद्रा ३ नहीयान, ४ जलम्धर, ५ मुल्यबन्ध, ६ महायन्ध, ७ महावेध, ८ रोत्ररी. विपरीतकरी, १० योनि, ११ बलोणी, १२ शशिधारिणी, १३ ताहागी, १४ मांडयी, १५ शाम्भवी, धारणा मुद्रा पांच प्रकार की है जैसे १ पार्थियोधारणा (१६) २ प्राम्भमी धारणा (२७) ३ धैश्वानी धारणा (१८) ४ थापयो धारणा (१८) ५ नमो. धारणा (२०) इसके बाद २१ अश्विनी, २२ पाशिनी, २३ काफी, २४ मातडी २५ भुगहिनी॥ मुद्रानां पदलं देवि, कथितं तव सन्निधौ । येनविज्ञात मात्रेण, सर्वसिद्धिः प्रजायते ॥४॥ गोपनीयं सयोन नदेयं यस्य कस्यचित् । प्रीतिदं योगिनां चैव, दुर्लभं मरुतामपि ॥५॥ श्री महादेय जी पार्यती जी से कहते हैं कि हे देवि ! तुम्हारे निकट सब मुद्रामो का नाम हमने कहा । इनके जान & ही मे सन्न , - लिखा है कि यह कुपलिनी शक्ति ब्रल रंध्र की ओर गोती है, तात्पर्य यह है कि वृदय क्षमन जिसको कलेजा कहत उससे सब नादियां निकल कर ममस्त शरीर में व्याप्त है और उनकी दीड म- स्तिष्क की ओर है, न्हा कहीं घटा लगता है तो यह नाहट विजुन्नी को शक्ति से भी शीघ्र मस्तिष्क में पहुंच कर मुख दुख बोध करती हैं। पानु जब तक उन रग, नश, नाही, पेशी आदि शरीर के टुकडे अलग २ शक्ति कारक गहों त तात मानसिक वृत्ति की स्थिति स्यापकता महीभाती और हमीसे पढ़ लिप कर जानहाने पर भी पित्त यति का निरोध जो योग या प्रथम लक्षण है नहीं प्राप्त होता। इसी लिये हठ योग द्वारा उस कुपलिनी शक्ति का गाना उचित है, इसे शासन मुद्रा मादि प्रयोग करना आवश्यक है।

धेरगड संहिता - प्रकार की सिद्धियां लाम होती हैं। ये मम विषय परम गोपनीय है । जिस किसी की कमी नहीं देना चाहिये ( पोंकि विमा प्रतिक्षा ये साधित हो नहीं सक्त, घश्चय बन देापित करेंगे, न वा पहेगा तो इस विद्या की झूठी कह कर दूढ प्रतिज्ञो का भी मन मडक्षाय देंगे, थोड़े दिन बाद यह विद्या लोप हो जायगी ) ये सघ मुद्रा योगियों को दी परम प्रीति देनेवाली हैं । यह मुद्दा देवताओं को भी दुर्लभ हैं। तात्पर्य यह कि जो कोई साधन करेगा उसी की सपत्ति है, दिबड़ो को कभी मयस्सर नहीं है। महा मुद्रा। पायुमूलंबामगुल्फे संपीडेदृढयत्नतः । याम्यपादप्रसाठांध करेतपदांगुलः ॥६॥ कंठसंकोच कृत्वा भुवोर्मध्यनिरीक्षयेत् । महामुद्राभिधामुद्रा कथ्यतेचैवसूरिभः ॥७॥ गुदा मूल को पाई एहीसे रूम मजबूती पो साथ दया और दहिने पैर को लाय दे। और हाथ से पैर की अंगुली घरे, फिर कंठ को मंकुचित करके भौहों के मध्य भाग को देरी । इसी को परिवत गण महामुद्रा नाम से पुकारते हैं । इसका फल। क्षयकासंगुदावर्त प्लीहाजीर्णज्वरन्तथा । नाशयेत्सर्वरोगाथ महामुद्रातिसेवनात् ॥८॥ उपरोस मामुद्रा को अधिक सेवन करने से अर्थात् अभ्यास करने मे, क्षय कास, (सयो की समी) गुदायत (गुदा के चारों ओर वाले व्रण) ४४ घेण्डमंहिता। लोहा ( पिलई ) जीर्ण ज्वर (पुगमा ज्वर ) तथा और २ सय प्रकार रोगो को यह महामुद्रा नाश करती है । नभोमुद्रा। यत्रयवस्थितेयोगी सर्वकार्य सर्वदा । ऊर्द्धजिहःस्थिरोभूत्वा धारयेत्पवनंसदा । नभोमुद्राभवेदेपा योगिनायोगनाशिनी ॥९॥ जय अम योगी किसी कार्य में लगे तय २ सर्बदा ही कपर की ओर जिहा करके कुम्भक द्वारा स्थिर हो पवन को धारण किया करे, यह अभ्यास गदा रखने से योगियों के समस्त रोग नष्ट हुमा करते हैं, इसी को नभी मुद्रा कहते हैं । तात्पर्य यह कि हर काम में हर प्रकार की गुण ऐगुणकारी हवा थापही गुण भौगुणकारी रही भाती है। यदि इस नभोमुद्रा का अभ्यास रहेगा तो झट पुम्भा के द्वारा, बाहर को हवा का प्राना धन्द करदेगा तर मलीन दुर्गन्धित तथा विकारी हया पेट के भीतर न जा सकेगी। गो को नत्पत्ति अकसर स्पा के माप जहरीले रेशो के पेट में पाने से हुमा करती है सा देशकाल देख तरसे तो बहुत ही बनाय हुआ रैगर । उड्डीयानबन्ध । उदरेपश्चिमंतानं नाभेरूद्धन्तुकारयेत् । उड्डीयानकुरुतेयत् तदविथातंमपाखग. ॥ उड्डीयानन्त्यसौवन्धो भृत्युमातङ्ग केशरी ॥१०॥ नाही का ऊपरी भाग और पश्चिम द्वार के सदर के मग भाव में सिकोहना चाहिये । भर्थात् सदर को मध्यम भागस्य गुह्यादि पर स्थित धेरण्डेसहिता। ४५ है, तात्पर्य यह मादी समूह को मामी के अपर सिकार के उठाना चाहिये, इसी को बड्डीपामय कहते हैं, यह सड्डीयानन्य सरयु के लिये मातंग और केशरी भाव से हैं. अर्थात् मृत्यु रूपी दापी को यह सिंह की तरह मारहालता मृत्यु इसके साधन से जल्द नहीं हो सकी। उड्डीयान बंध का विशेष फल । समग्रात्बन्धनात्ह्येतत् उड्डीयानंबिशिष्यते । उडीयानेसमभ्यस्तेमुक्ति स्वाभाविकीभवेत् ॥१॥ जिसने मुद्रा अन्य कहे गये हैं अब में यह उड्डीयान अन्ध विशेष भषांत उत्तम है।श उड्डीयान यन्त्र के प्रयास से. पापही भाप मुक्ति मास होती है, अर्थात् और बहुत मानसिक व्यापारों की भरवश्यकता नहीं रहती। तात्पर्य यह कि इसके साधन से सदसत् का ज्ञान स्वभाव बढ़ता शिव संहिता में इस मुद्रा का फान यह लिखा कि योगी इस को प्रतिदिन चार बार करता है उसके नामी का प्रवन शुद्ध हो जाता है। इसी प्रकार छः महीना अभ्यास करने से मृत्यु को जीत लेता है। भात् वपके तदर की प्रनि मम्वलित होती है और जो कुछ खाता है | यह सब भस्म हे से रस पानी (प्रसार की वृद्धि करता है और रोगों को नष्ट कर हालता है, फिर दत्तात्रयी जी की महिता में भी लिखा है कि जो लोग अत्यन्त युष्ढे हे गये है। और इस उड्डीयानसंध का अभ्यास करें तो युवा है। मुझे हैं और महीमा प्रतिदिन करने से मृत्यु को जीत सके हैं। इन सब पोग अन्य से साफ मालुम देता है कि वैद्यकशा से और योग शास्त्र से बहुतदी सम्बन्ध है. मी निमित हमारे भारतवर्ष ४६ घेगडमहिता का वैद्यक स्वाश सघ देश के वैद्यक से नत्तम था, परन्तु अब इस समय प्राग्नमी लोगों ने मप नष्ट करहाला, मिर्फ यिदेशी चिकित्सा के आधीन हो गये। जालंधर बंध। कराठसंकोचनंकृत्वा चिचुकंहृदयेन्यसेत् । जालन्धरेकृतेयंधे पोड़शाधारबन्धनम् ॥१२॥ जालन्धरंमहामुद्रा मृत्योश्चक्षयकारिणी । कण्ठ सद्बोधन करने हदय (छाती) पर घिधुक (हाढी) रसनेही से नालन्धर बघ कहा जाता है. इसके माधन कसे सोलह प्रकार के माघर बन्ध हुभ्रा करते हैं, और यह मृत्यु को भी नष्ट करहालता है । जालंधर बन्ध का फल । सिटुंजालन्धरंबंथं योगिनांसिद्धिदायकं । पण्मासमभ्यस्येत् योहिससिद्धोनात्रसंशयः ॥१३॥ यह जालंधर यंध स्वयं सिद्ध है। यह योगियो को सिद्धि देनेवाला युद्धिमान सः महीमा रमका अभ्याम करता है यह अयश्य सिद्ध हा जाता है, रममें समय नहीं है ति माहता में विवालिम गाउपर पंधको माग कर भाधक मोके द्वारा शरीरस्य महसूदन काल में अमन के नीचे की ओर मनार के पार कर मना रे मोर अगर पद अपांत् ऐमा पदपा भाता है । शप पर कि उदय में या देमा ? मृत्यु कभी नह। जिम, पद पपा में कम की तरह मीर तुम घेएडमंहिता। नसे पेशियां भी कमल दल की तरह हैं। वे पेशियां हजार से भी अधिक होगी। भामाशय से जब भोजन की वस्तु का रस रक्त अन के जाताहे तेर पहिले वहीं जमा होकर नादियों के द्वारा शरीर में ध्यास हेाता है, स मुद्रा से नाहियां तन कर पंच्छ छोह.सार भाग को ध्यास का रोग नष्ट करती है। सूलबन्ध । पार्णिनाधामपादस्य योनिमाञ्चयेत्ततः । नाभिग्रन्धिमेरुदण्डं सम्पीडंय यातःसुधीः ॥१४॥ मेद दक्षिा गुल्फेतु दृढ़यन्धं समाचरेत् । जराविनाशिनी मुद्रा, मूलबन्धो निगद्यते ॥१॥ थायें पैर की एडी से गुदा प्रदेश को मिका उमके बाद नाभी की अस्यि को मेरुदण्ड (कमर के पीछे की हड्डी) से दयावे और अपस्य को दहिने एही में मजदूत दया के रासें. इसी को मूलमन्ध कहते हैं। यह मुद्रा युढ़ाई को मप्ट कर हालती है। मूलबन्ध का फल। संसार सागरं तर्नु मभिलपति यः पुमान् । घिरलेपुगुप्तीभूत्वा, मुद्रामेनां समभ्यसेत् ॥१६॥ अभ्यासाटुंधनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेध्रुवम् । साढयेद्यत्नतत्तर्हि मौनी तु विजितालसः ॥१७॥ जो मनुष्य मेंमार सागर पार होने को पटा करें घे पिरम श्याम (निन ) में गुप्त भाष में इस मुद्रा का प्रयास करें। म मायके .

४८ + घेरण्डसंहिता। अभ्यास से निश्चय मरु सिद्धि ( वायु को बाथ) कर सक्ते हैं। इससे साधक आलस्य पोो परित्याग करके मोम हो यत्र पूर्वक इसको , साधा तात्पर्य यह है कि जब बायु काबू हो जायगा तब यह साधक जब पूरी तौर से बायु को गरीर में भर के कुम्भक प्राणायाम से अपने पौरुष को भी सधानन करेगा तो जहा इच्छा है। वहां उड़ सकता है। इसी साधना से बहुतेरे हाथ दो हाथ ऊंची जमीन से निराधार उठ जाया करते हैं। महाबन्ध। बाम पादस्य गुल्फेतु पायुमानं निरोधयेत् । दक्षपादेन तद्गल्फ सम्पोडय यत्नतः सुधीः ॥१८॥ शनैःशनैश्वालयेत्पाणिं योनिमाकुञ्चयेच्छनैः। जालंधरे धारयेत्प्राणं, महाबन्धोनिगाते ॥१९॥ याय गुरुफ (एको) से गुदा द्वार को रोक लेना और दहिगे पैर से पायें को दायते हुये पोरे २ गुह्य देश को चलाये और धीरे २ उसी गुह्य | देश को सिकाहे । और जालपर घम्ध जो कह आये हैं उसके द्वारा प्राण पायुको धारण करें। इसी को महायग्ध करते हैं। महावन्ध का फल । महायन्यः परोवन्धो जरामरण नाशनः । प्रसादादस्य अन्धस्य साधयेत्सर्व वांछितम् ॥२०॥ पद महापाप नागको मुद्रा संभ गुद्राभोमे श्रेष्ठ और जरा (युबाई) - धेरगडसंहिता। तया मरण नाश करने वाली है।म महायन्ध के प्रसाद से सब प्रकार बालित माधे सामने है। महावेध कथन। रूपयौवनलावण्यं नारीणांपुरुपंत्रिना। मूलबंधमहाबंधौ महावेधंजिनातथा ॥२१॥ महाबन्धं समासाच उड्डोनकुम्भकंचरेत् । महावेधःसमारख्याता योगिनांसिद्धिदायकः ॥२२॥ . के बिना नारियों का सुन्दर रूप, सयानो राधा माग्य (लोनाई) निष्फल रहती। भाही महावेध मुद्रा के बिगा मूमन मान्य सपा महामन्य भी किमी काम के नहीं रहते। पहिले महायंध मुद्रा कर फिर नहीयान यन्ध (जो कह पाये हैं। मुद्रा करके कुम्भक प्राणायाम मे वायु को निरोध करने ही से महायेध मुद्रा कही जाती है । इसी महा- बेघ के द्वारा योगी लोग मिद्धि घाम किया करते हैं। महावेध का फल। महाबन्धमूलबन्धी महावेधसमन्विती। प्रत्यहंकुरुतेयस्तु सयोगीयोगविनमः ॥२३॥ नमृत्युत्ताभयंत्तस्य नजरातस्यचिदने । • गोपनीयःप्रयत्नेन वेधोयंयोगिपुंगवः ॥४॥ जो भापक प्रतिदिन म महामेप के मरिन पर भीर मन का पापन किया करते हो योनिया में ताग विद्या जागे ५० घेरगडमंछिता। वाले कहे जामने हैं । मृत्यु और बुढ़ाई उनको कभी नहीं दबाय सकी यह मुद्रा परम गोपनीय है योगियों में श्रेष्ट जन इसको हर किसी से नहीं करते। खेचरी मुद्रा। जिहाधोनादीसंछिन्नां रसनांचालयेत्सदा । दाहयेन्नवनीतेन लौहयंत्रेणकर्पयेत् ॥२५॥ एवंनित्यंसमभ्यासाल्लम्बिका दीर्घतांव्रजेत् । यावद्गच्छेद्भुवोर्मध्ये तथागच्छतिखेचरी ॥२६॥ रसनांतालुमध्येतु शनैःशनैःप्रवेशयेत् । कपालकुहरेजिहा प्रविष्टाविपरीतगा ॥ भुवोर्मध्येगतादृष्टि मुंद्राभवतिखेचरी ॥७॥ nिg के नीचे मिहमूण और जिला हम दोनों को जो नाही जाई रहती है उसको काट देये और नित्यही निहा के मयं भाग निहार नीचे, सदा चलाया करे । और जीभ को नवनीत (मेनू) से दुहा करे और माहेको निष्ठा ठेखमी (निमहा) द्वारा सीना करे मी प्रकार प्रति- दिन करने मे, जीम लंधी हो जाती है । क्रम में प्रापास करते २ म प्रकार संजो करे जिस्म कि यह दोनों भौहों के बीच हुं | गाथे । फिर नमी भीम को कम से तन के योच ले जाना चाहिये। नामु प्रदेग गध्याय र.( गदा ) को कपाल कुहर कहते हैं । जी सोपान कार में हर कोमोर नट येशित करामों भौर का मध्ययन मोकन करे. हमको रोनरी मुद्रा करते हैं । जीभ घेरण्डसंहिता। खेचरी मुद्रा का फल । नचमूर्छा क्षुधाहप्णा नैवालस्यं प्रजायते । न च रोगो जरा मृत्यु देवदेहः स जायते ॥२८॥ जो मनुष्य इस रेचरी मुद्रा का साधन किया करते हैं उनको मूछो, सुधा, कृष्णा, कभी नहीं क्लेश दे सके, और न कभी नालस्स प्राधे, न रोग निकट श्रावै, और उनके समीप खुदाई, था मृत्यु कभी नहीं मा सत्ती, मोर वे देव देह हो जाते हैं। और भी:- नाग्निना दहाते गात्रं, न शोपयति मारुतः । न देहं लेदयन्त्यापो दंशयेन्त भुजंगमः ॥२९॥ जो खेपरी मुद्रा कामभ्यास करते हैं, उनको मरिन नहीं जलाय उत्ती, वायु उसको नहीं सुखाय सके । गाल उसके शरीर को धुलाय नहीं सके । तथा समन सर्प भी नहीं काट सक्त। विपरीतकरी मुद्रा। नाभिभूले यसेत्सूर्य स्तालुमूले च चन्द्रमाः । अमृतं ग्रसत्तेसृर्य स्ततोमृत्यु घशीनरः ॥३०॥ अर्वच गमयेत्सूर्य चन्द्रञ्च अध प्रानयेत् । विपरीतकरी मुद्रा सर्चतन्त्रेषु गोपिता ॥३॥ भूमौ शिरश्च संस्थाप्य करयुग्मं समाहितः । ऊर्ध्वपादःशिरोभूत्वा विपरीतकरीमता ॥३२॥ .

५२ घेराडसहिता । गाभि की जस में सूर्य (सूर्य गाड़ी) बास करते हैं और मुखो त। लुये की जह में चन्द्रमा (चन्द्र नाही) दे जब नीचे से सूर्य अपने तेत्र को सार्पण से देह स्थित अमृत की ग्राम कर लेते हैं, तब मनुष्य मृत्यु के बस हो जाता है। इस लिये ऊपर की ओर मूर्य को उठाना चाहिये और नीचे की मोर चन्द्रमा को ले भाना चाहिये । इसी का नाम विपरीतकरी मुद्रा जो सम तन्त्रों में गुप्त रखी गई है। इसकी क्रिया इस प्रकार है-भूमि में शिर की स्थापन करे और दोनों हायों से भूमि थाम कर पैरों को ऊपर की ओर उठाय के सीधा खड़ा करे और पूरया प्राणायाम से प्रायु सींघ कर कुम्भक के द्वारा जहा तक उष्दरा जाये ठहरे। इसी का विपरीतफरी मुद्रा कहते हैं । तात्पर्य-नाभि में एक नाही ऐमी है 'जिमको जठराग्नि उत्तेजक कहते हैं अर्थात् हदय के पास जो पित्तस्राय नाही? उससे बड़ा गरम २ पित्त योहा २ चोकर नमी मही के द्वारा जा कर भामाशप के मन को पकाता है और यहां से गरम निकल कर भान रस बाहक नाही के द्वारा समस्त शरीर में पहुंचता है. परन्तु जय पित्त रस अधिक प्रवाहित हो कर उस नारी में जाता है सच पित्त जापित हुअा कहा जाता है मत पित की इतनी अधिकाई जाती है कि शरीर के समस्त रह | को भरग कर हानता है और मन रम की शक्ति को दूषित करके अनेक प्रकार की पत्तिक व्याधिया उत्पन्न करता है. फिर तुम व्याधियों में म. मुष्य बहुत जल्द मर जाता है. इस क्रिया के निवारण के वास्ते यह विपरीतकरीमुद्रा कहा. यानी गिर नीचे करके उपरकी भोर पर लठाय के प्रति दिन घंटे ६० घंटे जदा तक ठहर म शिया करे तो यह पित्त रमना मधिकाई में नामि को नए वालो नाकी में जा बिकार सत्पन्न किया करता पद नहीं हाय, मांद यद वितरण लीय पदार्थ है, घरसहित) १३ . जल की गति नीचे की ओर से नीचे तालु नाही को ओर भाकर कफ को माडी जिसे चन्द्र नाही कहते हैं भाकर मिलेगा तो लोद (खिखार) बनके दन्तधायम आदि क्रियानो से निकल जाया करेगा, बस शरीर नोरोग रह कर दीर्घायु प्राप्त करेगा। नक्सर जब पित्त कोप करता है तब नाभि के पास टटोलने से भाग की तरह जलता है, मूत्र गरम और लाल होता है, तमाम बदन नीरस होकर पोहारता है, पैतिक तर हामे से दाह, (जलर) वृषा (प्यान) भादि तेजमय उपद्रव शरीर भर में हो जाते है योगी लॉग इन सा उपद्रयो से साफ बचे रहते हैं। विपरीतकरी मुद्रा का फल । मुद्रेयं साधयेन्नित्यं जरां मृत्यु च नाशयेत् । ससिद्धः सर्वलाकेपु प्रलयेपिान सीदति ॥३३॥ जगमुष्य इस मुद्राको प्रतिदिन साधन करता है, वह जरा (धुढाई) और मरपा से बचा रहता है, फिर वह सम लोको में सिद्ध हो जाता है भौर प्रताप होने पर भी अभय रहता है, नहीं माता, अथ योनि मुद्रा। सिद्धासनं समासादर कर्णचतुर्नसमुखम् । अंगुष्ठतर्जनीमध्यानामादिभिश्वसाधयेत् ॥३४॥ काकीभि. प्राणंसकृष्य अपाने योजयेत्ततः । पट्चक्राणिकमाझात्या हुं, इस., मनुनासुधीः॥३५॥ चैतन्य मानये देवी निंदिताया भुजगिनी ।

५४ घेण्डसंहिता। + जीवेन सहितां शक्तिं समुत्थाप्य करांबुजे ॥३६॥ । शक्तिमयः स्वयं भूत्वा परंशिवेन संगमम् । नानासुखं विहारं च, चिन्तयेत्परमं सुखम् ॥३०॥ शिवशक्तिसमायोगा देकान्तं भुविभावयेत् । प्रानन्दचस्वयंभूत्वा अहंब्रह्मति सम्भवेत् ॥३८॥ योनिमुद्रा परागोप्या देवानामपि दुर्लभा । सत्तुलाभ संसिद्धिः समाधिस्थः स एवहि ॥३१॥ प्रथम सिद्धासन (जो पहिले कह पाये है) से बैठे, फिर कान, मांस, नाक, मुंह ये चार द्वारों को अंगूठे.. सर्जनी, मध्यमा, अनामिका इन अं. | गुलियों मे दांप ले । अर्थात् कान के दोनों छेदों को दोनों अंगूठों से, दोनों मांखों को दोनों तर्जनी मे, दोनों नाक के छेदों को दोनों मध्यमा | से, मुख को दानों अनामिका से दायै । फिर काकी मुद्रा से प्राण वायु को माकर्षण करे और फिर से अपान वायु (अधोवायु) में मिलाय दे. उमफे बाद शरीरस्य जो छः हे उमका ध्यान करै अर्थात् यह कल्पना करे मामां हम उन्हें देख रहे हैं सभी समय में "" और "हंस" एन दो मंत्रों के द्वारा भुजंगिनी रूप कुण्डलिनी देवी को जगावै । तथा की वात्मा सहित महमहमिनी मसार कमल में उठाय के ले जाधे. मौर यह मापस प्रबार चिन्ता कर मानो "में शक्तिमय होकर शिव के माप प्रसंग में भामताते हुये परम भागन्द मोग और बिहार क. रता हूं ताकि योग से महों मानन्द भय ग्रन हूं" मी हो योनि मुद्रा कहते हैं, पर मुद्रा परम गोपनीय है यह देवतागभी दुलंग हेम मुद्रा का एक बार भी कई माधम atar साधनेवाला पुरुष गिद्ध जाता है, द्वारा पात हो जल्द समाधि प्राप्त । मृत्ती ५५ घेरण्डसंहिता। तात्पर्य यह कि-मनुष्य जिस वस्तु का क्याप जी लगा कर करे वही वस्तु उसके मनापत्ति में दृढ बद्ध हो जाती है. यदि यनुष्य गत दिन दुःख की कथा, दुख की बार्ता, दुःख की मालोचना दुःख चिन्ता करता रहे तो वह दुःख उसके तन मन में विधा रहता है. परतु पदि मनुष्य निरंतर मुख की ओर मन को लगाये रहै तो उस के समीप मदाही मुख रूपवान सा बना रहता है, इसीलिये योगी लोग दुःख को जगह भी सुख ही ध्यान किया करते हैं। योग शमत्र का यष्ट सिद्ध न्त है कि सुख दुःख समान मानना, परतु यह बात यिना अभ्यास नहीं हो सक्ती, घेरह महाराज ने सब मुद्राओं को शारीर दुःख निवृत्ति के लिये कहा है परन्तु समको मानसिक दु स निवृत्ति के लिये बताया है। श्र- क्याम करते २ जच इम प्रकार की शक्ति जावे कि चित्त वृत्ति जिस में लगाये उसी में चुभो रहे अन्यत्र न टलं तो ममाधि मिद्ध हो गई । बस सभ से बढ़ कर चित्त वृत्ति मिरोध के अभ्यास को बढ़ाने वाली यह योनि मुद्रा है। शिव संहिता आदि ग्रन्थों में इस योनि मुद्रा को दूसरे प्रकार से कहा है परंतु वह इस घेरंड महाराज को दर्शाई हुई योनि मुद्रा के तुरुप शीघ्र फलदायक नहीं है। वहां इस प्रकार लिखा है. पूरक योग से अपने मूलाधार पन्ना बायु के सहित पूरण करै वाद योनिस्थान (गुदा और लिंग के बीच के स्थान को योनि स्थान कहते हैं) को पैरो से सिकोड कर भगाकार बनाये। उसी समय में जम ब्रह्मयोनि में कामदेव को ध्यान कर, वह कामदेव जब पुष्प की तरह साम्न वर्ण कोटि सूर्य की तरह तेज, कोष्टि चन्द्रमाकी भाति शीतन है पद भी चिन्ता करे, फिर कपर परमाशक्ति को भी इसी मझार पान कर कि मानों शक्ति भनि शिखा की तरह, सूक्ष्म रूप, चैतन्य भाब हैं और वे परमात्मा के माहित एकत हो मिली हैं। इस प्रकार ध्यान फरना होगा फिर पाणायाम के बल से म्यूम्न, मूक्ष्म और कारण इन तीन प्रकार के गा. प्रथम मम घेरण्डसंहिता । - पषों से मुक्त जीवात्मा कुंटलिनी शक्ति के सहित सुपुना के छेद हो। ग्रा मार्ग में जाता है। शिर के मध्य में जो नीधे मुख कमल है उसको कर्णिका के भीतर कुण्डलिनी शक्ति परमात्मा के साथ सङ्गम में प्रासन हो रही है उसके संगम मे पाटल वर्ण (कुछ सफेदी लिये पीला) तेजवान् भानन्द मय अमृत की धारा बहती है। जीवात्मा योग बल से मूलाधार के ऊपर हे के उठ कर समौ बहते हुये अमृत को पान करता है । मी प्रकार फिर माप नीचे की तरफ निकल के मूलाधारमें स्थित ब्रह्मयानि में प्राकर प्रवेश करे। इसी प्रकार साधक जीवात्मा को ब्रह्मयोनि में निकाल पैठार रूपी प्राणायाम की मात्रा युक्त करै । इमी प्रकार प्राणा याम तीन बार करना चाहिये । मूलाधार पद्म में ब्रह्मयोनि में प्राप्त कुपहलिगो परमात्मा की प्रारम भूपिणी हो रही हैं। हमी प्रकार मिकाल | पेठा के बाद फिर भी यही जीवात्मा कालाग्नि आदि शिवात्मा ब्रह्म योनि में गय प्राप्त होता है, उसी प्रकार चिन्ता करे। हमी को यानि मुद्रा कहते हैं । यह मुद्रा जिसनी मुद्रा हैं सघ में प्रधान है । इसके प्रभाय मे साधक समस्त कर्म अच्छी तरह से मिद कर सका है। इन सत्र बातों का गून तात्पर्य यह है कि श्याम के रोकने के सहित मामसिक | वृत्ति को गिर तरफ लगाइये समी तरफ यह लग कर उसी प्रकार का पुग्न दुःन भनुभव करेगा। आप अपने मन को यदि पूरी तौर से म करपणा में लगायें कि हम नर्क फुण्ड में दुर्योये जा रहे हैं, हमें लोहे के सात भे में कोई शिपकाप रहा तो यही दुःस साक्षात् होगा, पदि इन्द्रामम पर बेटे देव गोक को मानाज भोग रहे हैं ऐसी कल्पना की. जियेगा तो वही मुग प्राप्त होगा। मी निमित्त माममिक स्थिति के प्रायाम के लिये इट योगी पर महाराज ने सत्ता समझा कर मो प्रिपा मिनी । - ऐसी धेरगड संहिता। ५७ योनिमुना का फल । ब्रह्महा भूणहा चैव सुरापी गुरुतल्यगः । एतैः पापैन लिप्येत योनिमुद्रा निबन्धनात् upon थानिपापानिघोराणि, उपपापानि यानिच । तानिसर्वाणिनश्यन्ति योनिमुद्रानिवन्धनात् ॥23॥ तस्मादभ्यसनं कुर्या दशदि मुक्तिसमिच्छति । जो जन योनिमुद्रा माधन करते है..यदि ब्रह्मपात भी पार चु हाँ वा याल घात कर चुके है। अपवा मुरा पान करते २ पिनाउफ हे गये हो, या गुरुपक्षी के साथ पापाचरण कर चुके हों तो भी इनके महापापो से लिप्त नहीं होते। और भी जो २ बड़े २ भयानक महा पाप हैं, या जिसने उप पाप हैं वे भी सब इस योनिमुद्रा के निबन्धन से नष्ट हो जाते हैं, इसमे यदि कोई मुक्ति की इध्या करें तो वह योनिमुद्रा का प्रयास जरूर करे। तात्यर्य-ब्रहपात मादि पाप से सूटने का जहां कहीं फन माता है यहां अक्सर लोग शङ्का कर बैठते हैं कि यह तो और भी पाप का यहाना उदरा यानी रेशर पाप करे भीर जर योनिमुद्रा आदि कर्म साधन करो तो मामी पाप नहीं लगेगा, यस मानो पाप करने के लिये एक अभय मार्ग ठहराया गया । विवेचना-देनों रूपरके श्लोक में लिया कि 'एत: पापिनलियित" अर्थात् धन पापो से लिप्त न हो । से निष्ट देने का क्या तात्य है? लिप्त कहते हैं जो किवात दिन मोमें नाच थाम मे लिपटा रहे, मात् राणा है. सन्तु मे शात पनि मुद्रा का अभ्यास करेगा यह कदाचित् ग्रह हत्या गुरु पत्री घेग्गडमंहिता। प्रसङ्ग मादि पापों में लिप्त अर्थात् मन बघ कर्म से रात दिन लगा भी हो तो इस प्रानन्द की क्रिया में लगने से फिर उसको घर के पापों के करने की फुरसत नहीं रह जावेगी। आप जानते हैं कि एक तुच्छ धात चौपड़ शतरंज का खेल है जिसमें कोई भी फल नहीं परन्तु जय मनुष्य का चित्त नघर लग जाता है तो रोटी खाना तक नहीं अच्छा लगता और यहां तक देखा गया है कि शाम खेलने बैठे मोर मधेरा होगया, सूर्य उदय हो पाये, निद्रा का सुस भस्मीभूत कर, प्रिय समागम में तिलाञ्जलि दे पी-बारा-यह छकरी कर रहे हैं, तो यदि योग की क्रिया में मन लग जाधे तो कहिये फिर यह लिप्तता जोकि दिन रात भयानक पापों की ओर तुझे ममाग दौता हुभा मन घिन्नाग नहीं पाता पा प्यों कर रह सकता है ? अर्थात् योनिमुद्रा के अद्भुत सुख की साधना से ये सब भूल नापेंगे और यह मूढ़ चित्त उन सब महा पापों से तथा उप पापों से प्रगापास बघ कर विशुद्धता लाभ करेगा, इसीसे श्लोक में एक पद लिखा है कि "योगि मुद्रा नियन्धनात्" अर्थात् योनिमुद्रा साधन पन्धन से। तात्पर्य यह कि यामिमुद्रा का साधन उसको बान्धे रहेगा कि सी प्रकार उक्त महापातक तथा उप पासकों के निकट नहीं जानेपधेिगा, इससे यह सिद्ध भया फि फा के लिसने वाले घेरगड महाराज ने मिथ्या मी लिया, ने गत माघग करेगा यह भयश्य मय पापों से मुक्त है। मिहि भाय को प्राप्त शेगा, अन्त में मुसि लाभ करेगा । घेरएव जी ने माफ किया है कि जो मुसि को ध्या करें अपात् यदि चाहे कि हमन पापों मे एटें येदी म मुद्रा का अभ्यास करें, तात्पर्य यह कि दूगरे से मदों हो सकेगा। बजोणीमुद्रा। घरामवष्टभ्यकरयोस्तालाभ्यां ऊ क्षिपेत्पादयुगंशिरःखे । शक्तिप्रवोधायचिरजीवनाय बजोणिमुद्रांमुनयावदन्ति ४२ ।

५६ घेरण्डहिता । 1 दोनों हाथों की गदेरी से परातल को पकड २ दामो पावों को ऊपर उठाय दे और उधर शिर भी आकाश में उठाय दे केवल हाथ के बल खदारहै, इसीको मुनिलोग घजीणोमुद्रा कहते हैं, इसके अभ्यास से शरीर की शक्ति (ताकत) बढ़ती है और बहुत दिन तक जो सका है। वजोणीमुद्रा का विशेष फल । प्रयंयोगोयोगश्रेष्ठो योगिनांमुक्तिकारणम् । प्रयंहितप्रदायोगी योगिनांसिटुंदायकः ॥४३॥ एतद्योगप्रसादेन विन्दुसिद्धिर्भवेदध्रुवम् । सिद्धेविन्दौमहायत्ने किनसिध्यतिमूतले ॥४४॥ भोगेनमहतायुक्तो यदिमुद्रांसमाचरेत् । तथापिसकलासिदि स्तस्यभवतिनिश्चितम् ॥४५॥ L । यह मुद्रा साधन रूप योग सब योगों से श्रेष्ठ है और योगियों के मुक्ति का कारण है. फिर यह योग अत्यन्त हित का देनेयाला है, तया योगियों को सब प्रकार सिद्धि दायक है। इसी योग के प्रसाद मे बिन्दु की सिद्धि हो जाती है अर्थात् इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर रक्षित कामदेव किसी प्रकार बूंदों के द्वारा नहीं कर सक्ता (रक्षित कामदेव भी मूत्र के सग, वा स्वप्नादि दोष से कभी कर जाता है वह इसके अभ्यास से बंधा रहता है) जब इस प्रकार के महा यन से बिन्दु सिद्ध हो जाता है अर्थात् शरीर में कामदेव बैंघ जाता है तब भूतल में कौनसी बात है तो सिद्ध न हो जाये ? अर्थात् सब सिद्धि प्राप्त हो सकी है प्योकि कामदेव ही शरीर का राजा है। जब शरीर में कान्ति मा जावेगी सब उसको देख कर लेग्गा का चित्त ६० घेरण्डसहिता। आकर्षित होगा, स्नेह के स्थान पर स्नेह, भय के स्थान पर भय, मनोरथ स्थान पर मनोरथ सिद्धि जान कर लोग वशीभूत हो जायेंगे । समस्त यढे २ मेगा से युक्त पुरुष भी यदि इस मुद्रा का भपास फरै तो सय प्रकार की सिद्धियां निश्चय करके उमको प्राप्त होती हैं। भर्यात् धनधान्य कुटुम्बादि नाना विभव रहते महात्मापन उसमें नहीं भा सक्ता, वह भी बहुत मी बातों को आकाक्षा से महा दरिद्र साधु सन्त फकीर वगैरा के मुह की ओर ताका करता है, सो इसके साधन है यह यात न होकर इससी भोर भी बड़े २ विभय धारी ताका करेंगे। शक्तिचालनी मुता। मूलाधारेत्रात्मशक्तिः कराडलीपरदेवता । शयितानुजगाकारा साईत्रिवलयान्विता ॥१६॥ यावत्सानिद्रितादेहे ताबज्जीव:पशुर्यथा । ज्ञानंनजायतेतावत् कोटियोगसमभ्यसेत् ॥४॥ मूलाधार में भारम शक्ति (परमात्मा की ताकत) अब से परे देवता कुण्डलिनी (जिसका धयान पीछे कर पाये ३) सर्प की तरह साढ़े तीन मटेफी गुंडरी थाधे मे। दी थे। जयनक पद देश में मोती रहती जीव की तरह मान बना रहता है, मत् अमात् कुछ भी नहीं जान पष्टता तय कर चाहे कोटि प्रकार योगायोग को कभी मुधा शाम महींपा। प्रति समे पशु भी पामो परपर नागेम मिनार माह मही पर तिमाही मात्र रहना पितु उमर रूपर ४ मा योनी न पर वाददाता परिमे पर नएको मालुम नहीं पड़ेगा कि पद या मेरी पण घरगड संहिता। पीठ पर जाने से कष्ट दायक होगा इसे लादनेवाले को इसारो से रोश भके बल्कि लाद देने पर जय नहीं चल सकेगा त यैठ जावेगा, मार खायगा, नाना प्रकार की दुर्दशा भोगेगा । उधर लादनेवाला भी निना उसकी गरुमाई की वेदना जान उसकी गरिमार सम के मारते २ एक बार ऐसा मारा कि वह पशु पर गया, मन्तमें रघर पर अपनी प्रज्ञानता दुःख पाय प्राया स्याग किया । घर वह लादने वाला मनुष्य भी भ- पने काम काली पशु से हाय धेर बैठा, निनको हानि किया और जयर पा हत्या का भागी हे। लेकि, निन्दित हुमा इत्यादि रौतिने दोनो अर्थात् पशु और मनुष्य बराबर नया दहरे विचार गति किसी में नहीं भाई । मह सब विवेश अब तक कुपहलिनी शक्ति साती रहती है | कभी नहीं होता, यदि वह जगी रहती है तो यह योगाभ्यास कर च है नहीं, यह कर दिखाने को शनि रहै चहै नहीं, पर यह सत् यह असत् ऐसा विज्ञान त उसके हृदय में अवश्य निरन्तर प्रचलित रहता है । उद्घाटयेकपाठ यथा कुचिकयाहठात् । कुण्डलिन्याप्रयोधेन ब्रह्मद्वारंप्रबोधयेत् ॥ecn इसी निमित कहा है कि जैसे ताले से अन्द, विधात को फुची से घट पद सघारके भीतर पेठा जाताहे इसी प्रकार कुपनलिमोके जागने पर मलद्वार अर्थात् मस्तिष्क (मगज) प्रभेद किया जा सका है अर्थात् चै- तन्य किया जा सका है कि जिसे सत् असत् का ज्ञान हो जाये। शक्तिचालिनी मद्रासी बिधि । नाभिसंवेष्टमत्रवेण नचनग्नावहिस्थितः । गोपनीयगृहेस्थित्वा शक्तिचालनमभ्यसेत् ॥१९॥ एक पत्र के द्वारा नाभि देश के लपेटके किसी गुप्स गृह में मैठकर घेरगडसंहिता शक्ति पालनी मुद्रा का अभ्यास करै, किन्तु नाम देले बहिर्भाग में इस योग का साधन झरना अधित नहीं है। अर्थात् यह योग नग्न हो है | गुप्त स्थान में करना चाहिये । वित्तस्तिप्रमितंदीर्घ विस्तारेचतुरंगुलं । मृदुलंधवलंसूक्ष्म बेष्ठनाम्बरलक्षणम् ॥५०॥ एवमम्बरयुक्तञ्च कटिसूत्रेणयोजयेत् । एक मिलस्त लम्बा और चार जंगुल चौड़ा कोमल और महीन सुफेद यस्त्र से नाभि को वेष्ठन कर (भपेटें) और फिर उसी वस्त्र को कटि सूत्र (करपनी) से बांधे ॥ : भस्मनागात्रसंलिप्तं सिद्धासनसमाचरेत् । नासाभ्यांप्राणमाकृप्य अपानेयोजयेवलात् ॥१॥ तावदाकुञ्चयेद्गुह्यं शनैरश्विनिमुद्रया। यावद्गच्छेत्सुपुन्नायां वायुःप्रकाशयेद्धठात् ॥५२॥ भस्म (राख) से गरीर को लेपन करे और सिद्धासन बांध कर बेटे, पिर नामिका के देगा छेदों में प्राण घायु को सींच के बल के सहित अपान यायु के साथ मिशाय दे. जब तक घायु सुपुम्ना नाडी के भीतर जाके प्रकाशित न हो तय तक अश्विनी मुद्रा के द्वारा पोरे २ गुह्य प्र. | देश को सिफाहे ॥ तदाबायुप्रयन्धेन कुम्भिकाच जङ्गिनी । यद्वश्वासस्तताभूत्वा ऊर्द्धमार्गप्रपद्यते ॥५३॥ इभी प्रकार निश्वास को रॉक के कुंभा प्राणायाग धारण करता

घेरयडमंहिता।
भुजङ्गाकार कुपडलिनी शक्ति जाग के ऊपर की ओर उठती है । अर्थात्
सहस्त्र दल कमल में परमात्मा के सहित मिल जाती है।
विनाशक्ते चालनेन योनिमुद्रा न लियति ।
मादौचालनमस्य योनिमुद्रां समभ्यसेत् ॥५४॥
बिना शक्ति चालिनी मुद्रा के अभ्यास किये योनि मुद्रा कभी सिद्ध
नहीं हो सक्ती इसे प्रथम स शक्ति पालिनी मुद्रा का अभ्यास कर ले
तय योनि मुद्रा अम्पास करै ।।
इति ते कथितं चण्डकापाले शक्तिचालनम् ।
गोपनीयं प्रयत्नेन दिनदिने समभ्यसेत् ॥५५॥
पैरा महाराज कहते हैं कि हे घराक्षापालि ! तुम्हारे मिशट यह
मुद्रा मैंने कही जिसका नाम शक्तिशालिनी है. यह मुद्रा मन से दिन २
अम्पास करना चाहिये और वह अभ्यास करना गुस माय से रहे सहसा
ममिद्ध न होने पावे॥
शक्तिचालिनीमद्रा का फल।
मुद्रयं परमागोप्या जरामरण नाशिनी ।
तस्मादभ्यसनंकुझिोगिभिःसिद्धिकांक्षिभिः ॥५६॥
यह मुद्रा परम गोप्य है (इसकी क्रिया गुप्स करनी चाहिये) इम
द्वारा खुदाई और मृत्यु दोनो नष्ट हो जाती है. हमीसे सिद्धि के चाइने
याले योगियों को इसका अभ्यास अवश्य करना चाहिये।
नित्यंयोभ्यसतेयोगी सिदिस्तस्यकोस्थिताः।
तस्वविग्रहसिद्धिस्याद्रोगाणां संक्षयोमवेत् ॥५॥

घेरण्डसंहिता । नो योगी इस मुद्रा को प्रतिदिम अम्पास करता है उसके हाथ में मिहिमा जाती है अर्थात् यह पूरा सिद्ध हो जाता है, और उसी को विग्रह मिद्धि होती है (विग्रह मिदि वह है जिसमें विशेष ग्रहण की शक्ति होती है प्रांत कोई कार्य कर झटपट पूरा हो जायगा) और उसके रोगाशि नष्ट हो जाते हैं। तड़ागी मुद्रा। उदरंपश्चिमोक्षानं कृत्वाचतड़ागाकृतिः । तड़ागीसा परामुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ॥५॥ पश्चिमोत्ताम अर्यात उत्तान होकर पड़े शौर पेट को तदाग (तलाम) की तरह गहिरा करे और कुंभक प्राणायाम करै रमी को तड़ागी मुद्रा कहते हैं। यह मुद्रा एक प्रधान गिनी जाती है, इसके द्वारा बुढ़ाई और मृत्यु जीती जा सक्ती है ॥ मांडूकी मुद्रा । मुखंतुमुद्रितं कृत्वा जिहाभूलं प्रचालयेत् । शनैर्घ्य सदेमृतं तन्मांडूको मुद्रिकां विदुः ॥९॥ मुंह को मृद ले और जिव्हा के मूल के लुबे के अपर की ओर चलाये मीर घारे २ सहस्त्र दर कमन निर्गत अमृत पान करै । रमी को भारको मुद्रा कहते है। मांडूकीमुद्रा का फल । वलितं पलित नेय जायते नित्ययौवनम् । नकेश जायतेपाको यः कुर्यानित्यमांडुकी ॥६०॥ . - धेरगडसंहिता। माहू की मुद्रा का नित्य अभ्यास जो काहे कर उसके शरीर में दलित (चमहे, की मिटन ) पलित (मांच गलकर इड्डो मात्र का रहना ) ये दो शरीर के शिपिल करनेवाले मायु के नाशक भागम नहीं भा सक्त और निरहही युप्रायस्या मी बनी रहती है, तथा शिर के बाान भी नहीं । शांभवी मद्रा। नेत्रांजनसमालोक्य आत्मारामंनिरीक्षयेत् । साभवेच्छांभवी मुद्रा सर्वत्तंपुगोपिता १६१॥ दोनों भैाहों के बीच में वाहनों भाहो कोही स्थिा दूधि से अत्र लोकन करके और मन को एक रस करके वही श्रारमा राम (परमात्मा) को देश (मानो मच्चिदानन्द यही बैठे हैं) इमो को शांभवी 'मुद्रा कहते यह सब तन्त्रों में गुप्त मानी गई है। शांभवी मुद्रा का फल वेदशासपुराणानि सामान्यगणिकाइव । इयन्तुशांभवीमुद्रा गुप्ताकुलवधूरिव ६२॥ ४ घेद, ६ शास्त्र (न्यायादि तथा धर्मशास्त्र) - पुराण ये सन जैसे (गपिका (वेश्या) लेग सध जगह प्रसिद्ध रहती हैं, किसी से , गुप्त नहीं रहती वैसेही सामान्य बस्तु में, परन्तु यह गाभवी कुण वधू बड़ी यन से सहसा किसी को दृष्टि में नहीं पहंतों वैसे ही जानिये ॥ सएचआदिनाथश्च सचनारायणःस्वयं । सचब्रह्मासृष्टिकारी योमुद्रांवेत्तिशांभवी ॥६॥ मुद्रा घेरण्डसहिता। जो मनुष्य इस शांभवी मुद्रा को जानता है वह नादिनाथ (सत्रका प्रथम स्वामी) है वही नारायण (जीव समूह की शक्ति) है, और वही जग रचने वाला ब्रह्मा भी है। सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं सत्यमूचेमहेश्वरः । शांभवायोविजानीयात् सचत्रह्मनचान्यथा ॥६॥ जो मनुष्य इस शांभधी मुद्रा को जानता है बही भूर्तिमान ब्रह्म है, इस बात को महादेय जी चीन यार (नियाचा) करके सत्य कहते हैं पसमें संशप महीं है पंचधारसा मुद्रा। कषिताशांभवोमुद्रा शृणुप्वपंचधारणां । धारणानिसमासाद्य किंनसियतिभूतले ॥६५॥ पेरपट गहाराज कहत शांभवी मुद्रा तो कर भाये अप चण्ड कापालि! तुम पधाराशा मुद्रा मुन। यह पवधारणा मुद्रा भी पांच प्रकार की है गिन पांचोके मात देने पर फिर भूतल में कौन ऐसी बात जामिन न ? अपांत् सम पुछ मिद्ध हो जाता है। अनननरदेहेन स्वर्गपुगमनागमम् । मनोगतिर्भवेत्तस्यं सेचरत्ननचान्यथा ॥६६॥ थे पांच प्रकार को पारणा मुद्रा सिद्ध होने पर रमो परदेश में (दि. गागर जीतनो) सगलेक में MIRL लामा हे माता है, और उप मा• घम करनेानीको मागति (नहे महान जाय) हो मती है. तपा गरपाय (माकाम में की गति) माती जाती ६ (पाच प्रार धेरण्डसंहिता। । की धारणा पहिले कह भाये हैं, जैसे-पार्धियो१, भाम्भसी २, घायवी ३. भाग्नेषी ४, प्राकाशी ५) पार्थिवीधारणा सुद्रा। यत्तत्वंहरितालदेशरचितं भौमंलकारान्वितं । वेशास्त्रकमलासनेनसहितं कृत्वादिस्थायिनं ॥ प्राणांस्त्रविनीयपंचघटिका चिंतान्वितांधारये। देपाशाम्भकरीभवेक्षितिजयं कुर्यादधोधारणा ॥६॥ पृथिवी तत्य का वर्णहरिसाल के समान पोता है, इस पृषिशीतल का बीज लकार है, इसका प्राकार चौकोना बराबर है. प्रत्सा इसके दे. वता हैं, योग के प्रभाव से उक्त सम यन्तु मों के सहित हृदय में ध्यान कर स्थापी करे, उसी समय में मायावायु को आकर्षण करके कुंभश के द्वारा पांच घडी (दो घंटे) चित्त न डुगने पावे धारण किये रहै, इसी स्तंमकरी (श्वाम उहरानेवाली) छिपा को पापियो धारणा कहते हैं, इसका दूसरा नाम अधोधारणा भी है, इसके पारस पारने से वर्षात म- भ्यान करने से पृथियो जीसी जा सती है, अर्थात् पृषियो सम्बन्धी कोई भी बाधा हो तो इसके धारक को कुछ भी गिन्न नहीं कर मतो ॥ पार्थिवीधारणामुद्रा का फल । पाधिबोधारणांमुद्रा याकरोतीनित्यिशः । मृत्युंजयःस्वयंसेपि ससिहोविचरेबुधि ॥६॥ मनुष्य प्रतिदिन ( रोज इस पापिषीधारणा मुद्राको करता वही निज मृत्युञ्जय हो जाता है, अपात् कभी गौ माता, और यही सिद्ध हो के पृधिशी में मिश्रण करता है।

८
घेरण्डसहिता।
में
आम्भसोधारणमद्रा।
शंखेन्दुप्रतिमञ्चकुन्दधवलं तत्वकिलालशुभ ।
तत्पीयूपवारबीजसहितं युक्तंसदाविष्णुना ॥
प्राणांस्तत्रविनीयपंचघटिकां चित्तान्बिताधारये।
देपादुःसहत्तापपापहरिणो स्यादाम्भसीधारणा॥६९॥
जन तत्व का वर्ण शस तथा चन्द्रमा की तुल्य यिमल और कुन्द
पुष्प तरह सज्जन है. और शोभन है, इसकी अगृत सज्ञा है और
धकार इसका बीज है, और विष्णु हमके देवता हैं, योग के प्रभाव से ,
हृदय के बीच उक्त जल तत्वं के ममुदाय का ध्यान करै श्रीर उमी ममय
प्रायायायु को सींच कर पाच घही चित्त स्पिर करके
कुभकमाणायाम
स्थिर है, इसोको जाम्भसो घारण मुद्रा कहते हैं, यही मुद्रा बढे २ दुमह
सापों का तथा पापो को नाश करती है ॥
आम्मसोमुद्रा का फल।
प्राम्भसीपरमांमद्रां योजानातिमयोगयित् ।
जलेचगंमोरेघोरे मरणंतस्यनाभवेत् ॥७०॥
• माधक इम गाभवी मुद्रा को जानता है वही योगयित् (योग
का जामगेवाना) है. यह यदि महा भयानक और गमीर (गहिरे) जान
में भी पद जाये तो ममका मरण नहीं हो मक्ता, अपांत् श्याम साधन
के प्रभाव में वह इस नदी का ।
इयंतुपरमामुद्रा गोपनीयाप्रयत्नतः ।
प्रकाशासिदिहानिः स्यात्सत्यंयमिचतत्वत ॥3॥

धेरण्डसंहिता राश मुद्रा। मही शांभवी मुद्रा परम श्रेष्ट है और यह यन्त्र के माहित गुप्त करने योग्य है, इसके प्रकाश से सिद्धि की हानि होती है, घेरयडजी कहते हैं ब.विचार करके सत्य कहता ई.॥ तात्पर्य यह कि यदि रसको करनेवाला सब जगह है कि हम इस प्रकार की क्रिया करते हैं. तो बहुत से लोग एस के करने की अभिलापा करके उसके पास भा|गे जिस्से उसके चित्त की एकाग्रता में विघ्न डालेंगे इससे गुप्त रीति से साधने करने पर कोई भी बाधा नही पहुंच सकेगी और कम से अभ्यास बढ़ जावेगा, परन्तु जो नितान्त हट्ट हो सके। मोखा चाहै उसके लिये गुप्त नहीं हो सकी, यही तात्पर्य घेरगढ महा. का आग्नेयी यन्नामिस्थितमिन्द्रगोपसदृशं,योत्रिकोणान्वितम् । तत्वतेज मयं प्रदीप्त मरुणं, रुद्रेणं यत्सिद्धिदम् ॥ प्राणांस्तत्र विनीयपंचघटिका, चितान्वितंधारये । देपाकाल भगोरभीति हरिणी, वैश्वानरोधारणा ॥७२॥ अमिनल कां स्थान नाभी स्वल है. इसका मर्णन्द्रगोप कौर ( बोरबहूटी) की तरह लाल है, रकार इसका पीन है, इसका आकार त्रिकोण और रुद्र हमके देवता हैं. पह तत्व सेश का पुञ्ज है यह दीस- मान ( काय करने वाला ) और सिद्धिं दायक है, योग चल से इस अग्नि तत्यक्ष नदप करांप के एकाय वित्त है। पांच घड़ी तक कुष्पक মা খায়ু কা কা ক্ষ। ভীক্ষা সাম মাল मुद्रा के सके मायाम करने में संमार का भय दूर हो पाता है, और अनि के द्वारा साधनको मृत्यु कभी नहीं है। सक्ती ॥ प्राणायाम ७० घग्गडमंहिता। आग्नेयी धारणा मुद्रा का फल । प्रदीप्ते ज्वलितेवन्ही पतितो यदि साधकः । एतन्मुद्रा प्रसादेन सजीवति न मृत्युमाक् ॥७३॥ यदि सापक सूच बरती हुई पायकाती प्राग में पह जावे तभी हम भाग्नेयीधारणा मुद्रा के प्रसाद से जीता रहेगा, कभी मृत्यु का भागी नहीं होगा। वायवोधारणा मुद्रा। यद्भिन्नांजनपुंज सनिभमिदं, धूमावभासंपरम् । तत्वंसत्यमयं यकारमहितं, यत्रेश्वरी देवता ॥ प्राणांस्तत्रविनीयपंचघटिकां चित्तान्त्रितांधारये। देपास्खेगमनंकरोतियमिनां, स्याद्वायवीधारणा ॥४॥ मायु सत्य का वर्ष घिसा हुमा अञ्जन (मुम्मा) तथा धुयें की ताह है, पकार का योग है और ईश्वर के देवता हैं, यह तत्व सत्य. गुग्ण मय है, योग के प्रभाय में इस यायु सत्य को सदिस करायके एकाप गित हो प्राण यापु को आकर्षण कर कुम्भक प्राणायाम के द्वार पार पडी पारण की, मी का नाम मापायी मुद्रा है, यह मुद्रा साधन करमे पाठक। पायु मे कभी मृत्यु नहीं हो सक्को, और साधक की शक्ति भाकाश जागामे की भी जाती है। वायवोधारणा मुद्रा का फल । इयतु परमा मुद्रा जरा मृत्यु विनाशिनी । बायुनामियते नापिसे च गति प्रदायिनी ॥m - घेण्डसहिता मुक्त, यह मुद्रा परम मष्ठ जरा ( वुढ़ाई ) और मरण इन दोनों को नष्ट कर हालती है और साधक बायु.के किमी प्रकार के कोप से नहीं सर और यह मुद्रा माकाश गमन की शक्ति को भी देनेवाली है ॥ सठायभक्तिहानाय नदेयायस्यकस्यचित् दत्तेचसिद्धिहानिः स्यात्सत्यंबन्मिचण्डते ॥६॥ घेरण्ड जी कहते हैं कि हे चहापालि ! इस मुद्रा की विधि सठ ( जो लोगों को ठगने के लिये चाहै ) को और भक्ति हीन (जो चाहे कि मिर्फ जाग कर आचरण न करें, लोगों को धोखा दे सिद्धाई फेना) को कभी नहीं बताना चाहिये, और भी जिस तिम को कभी नहीं देना चाहिये. यदि दे तो देने वाले की सिद्धि में हानि हेरती है, अर्थात् उन सठ श्रादि को कम्नई खुलने पर यथार्थ सिद्ध को भी लेाग सठ मादि समझ कर याचा काला करते हैं, घेरण्ड जी प्रतिज्ञा करते हैं कि हम यह तुम मे सत्य कहते हैं । अकाशी धारण मुद्रा। यत्सिन्धीवरशुद्धबारिसदृशं व्योमपरंमासितं । तत्वंदेवसदाशिवेनसहितं बीजंहकारान्वितं ॥ प्राणांस्तत्रविनीयपंचघटिकां चित्तान्वितांधारये,। देपामोक्षकपाटभेदनकरी कुर्यान्नभोधारणा ॥७॥ माकाशवत्य का वर्ण ममुद्र के विशुद्ध जल की तरह प्रकाशित होता है. सदाशिव इसके देवता हैं, हकार इसका धीर है. इसी आकाश सस्य को सदाशिष के सहित योग प्रभाव से उदित कर एकाग्र मन ही ध्यान कर गौर नमी समय माण वायु को खोंच कर कुम्भक प्राणापम में पांच ७२ घेरण्डसंहिता घही धारण किये रहै, पसी को प्राकांशी धारण कहते हैं, यह मुद्रा मोक्ष के किवाहों को खोल देती है, अर्थात् साधक शीघ्र मुक्ति हो जाता है। आकांशी धारण मुद्रा का फल । प्राकाशीधारणांमुद्रा योवेत्तिसैवयोगवित् । नमृत्युजीयतेतस्य प्रलयेनावसीदति ॥७॥ जो मनुष्य भाकाशी मुद्रा को जागता है वहीं निश्चय योग का नाननेवाला है, उसकी मृत्यु' भी किमी से नहीं होती और वह प्रलय होनेपर भी क्यों का त्यों बना रहता है। ये पंच धारण मुद्रा समाप्त हुई। अश्विनी मुद्रा। प्राकुंचयेद्गुद्वारं प्रकाशयेत् पुनःपुनः ।.. साभवेदश्विनीमुद्री शक्तिप्रबोधकारिणी ॥७९॥ भाक.फिर २ अपने गुह्य द्वार को सिकोड़े और के नाये इसी का माग अश्विनी मुद्रा है, यह मुद्री शक्ति (ताकत) को जगाने वाली है । अश्वनी मुद्रा का फल । अश्विनीपरमामुद्रा गुह्यरोगविनाशिनी । बलपुष्टिकरीचैव अकालमरणंहरेत् ॥८॥ पहश्रेष्ट अश्विनी मुदगुदा के 'जितने रोग संघको नठं करती पग और पुदि की यदाती मीर अकाल मृत्यु को भी हरठेती है। .

घग्गडमर्माहता। पाशिनी मुद्रा। - कराठे रष्ठे क्षिपेत्यादौ पाशवं दृढ़ अन्धने । साएव पाशिनीमुद्रा शक्ति प्रबोध कारिणी ॥८॥ देतो पाव पण्ड ( गरदन ) को पीठ, हामा कर जैसे पाश (रस्से) से मापा जाता है मादी दर (मजबूती मे) बाथै, यही पाशिनी मुद्रा कही जाती है, यह भी शक्ति (तारत) जगाने हानी है। पाशिनी मुद्रा का फल। पाशिनी महतीमुद्रा बल पुष्टि विधागिनी । साधनीया प्रयत्नेन साधः सिद्धिकांक्षिभिः ॥८॥२ यह पाशिमी एक बही भारी . यह घल और पुष्टि देनेला बहानेवाली है, मिद्धि के चाहनेवाले साधका लाग इसका अवश्य बहे यत्र से साधन करें। काको अद्रा। काक चंचुवदास्येन पिछेद्वायं शनैः शनैः । काको मुद्रा भदपा सब रोग विनाशिनी ॥८॥ सपने मुंह को काय की टोट को नार नाय धरि २ बायु पान को रमी का माम काकी गुदा थे। यह सुन प्रकार के २गो को नष्ट ६३ता है। ~ काकीमुद्रा परामुद्रा र तरेपु गोपिना । मस्या प्रसाद मानेगा कावजीरोगा भवेत "gu ७४ घेरण्डसहिता। यह काकी मुद्रा बहुत उत्तम है और सब तन्त्रो में गोपनीयहे. इस के प्रसाद मात्र से मनुष्य काफ की तरह रोग रहित हो जाता है। मातङ्गिनीमद्रा। कण्ठमग्नेजलेस्थित्वा नासाभ्यांजलमाहरेत् । मुखानिगमयेत्पश्चात् पुनर्वक्त्रेण चाहरेत् ॥८४॥ नासाभ्यां रेचयेत्पश्चात् कुर्यादेवं पुनः पुनः । मातङ्गिनी परामुद्रा जरा मृत्यु पिनाशिनी ॥८॥ गला पर्यन्त जल में खड़ा हेर फर पहिले नाक से जल को खींचके मुख से गिराय दे, रि मुख से भी नल को खींच के पीछे नाक के देना वेदो से सहाय दे. इसी प्रकार मार २ सींचे और फेंके, इसी का, नाम मातलिनी मुद्रा है। यह मुद्रा जरा ( युढ़ाई ) और मृत्यु को नष्ट कर हालती है। मातङ्गिनी मुद्रा का फल । बिरले निर्जने देशे स्थित्वा चैकान.मानसः । कुर्यान्मातगिनी मुद्रां मातङ्गइव जायते ॥८॥ साधक निर्जन स्थानमें स्थित है। एकाग्र चित्त करो इस भातहिनी मुद्रा की साधे तो मातङ्ग (हापौ) की तरह यली हो जाये ॥ यत्रयत्र स्थितो योगी सुखमत्यन्त मश्नुते । तस्मात्सर्व प्रयत्न साधयेन्मुद्रिकां परां ॥८७॥ रस मुद्राके साधन करनेवाला येांगी जहा जहाँ स्थित रहेगा, वहीं P

घेरण्डसरिता
७५
से प्रपत्र करके
4
वही अत्यन्त सुष का भोगी होगा, इस लिये सब तरह
इस श्रेष्ठ मुद्रा का साधन करना चाहिये ।
भुजंगिनी मुद्रा।
यकत्रंकिजित्सुप्रसार्य चानिलंगलयापिवेत्।
साभवेद्गुजगीमुद्रा-जरामृत्युविनाशिनी वाटा
मुंद को किञ्चित् (पोटामा फेलाय के गोद्वारा वायु पानको
गया में वायु का पाकर जोर से लगे ) इसी को साङ्गिनी मुद्रा कहते
हैं। पह जरा (मुद्राः) को नष्ट,फरती EPF ., ........
भुजंगिनी मुद्रा का फल।
यावउदरेरोगामजीर्णादिविशेषताना
तत्सर्वनाशयेदाशु यन्त्रमुद्राभुजंगिनी ॥९९।। - ;
उदर (पेट) में जिसने रागहों, विशेषकर अजीर होतो ममों
यस पद पर भुहिनी मुद्रा मष्ट कर डालतीतात्पर्य यावि
जहां कही ऐमा मौका भाngहे कि कोई दया नहीं कर चहा,
या किमी प्रकार की क्षमता नहीं कि पेट को पीडा मादि रोग नष्ट हो
मंडा पारी रहा है यहां हम मुद्रा के करने में मयप तुत
रोग न हो मार है, पर मुद्रा यहुन मह २. निमोहमी मनाम
भी नहीं किया यह भी मावधान हक करे तो फायदा पहुंन भता.
अब समस्त मुंद्राओंका फल कहते हैं।
इदंन्तुमुद्रापटले कंपितंचंहकपाले ।
यल्लभंसर्वसिटाना जरामरणनाशनम् ॥१०॥

घेरण्ड मंहिता। निकट घेरण्ड मुनि जी कहते हैं कि हे घण्डकपालि ! मैंने तुम्हारे | यह मुद्रा पटल (मुद्रामो की गिनती और बिधि आदि ) कहा यह पटल समस्त सिट्ठों का मिय है और जरामरण को नष्ट करनेवाला है। सठायभक्तिहीनाव नदेयंयस्यकस्यचित् गोपनीयंप्रयत्नेन दुर्लभमरुतामपि ॥११॥ । सठ हो और भक्ति हीन हो उसको ये सब मुद्रा कभी नही देमा चाहिये, और जिस तिस को भी देना उचित नही है इसको यन्त्र से गुप्त रखना चाहिये, ये सब मुद्रा देयतो को भी दुर्लभ हैं । ऋजुवेशांतचित्ताय गुरुभक्तिपरायच । कुलीनायप्रदातव्यं भोगमुक्तिप्रदायकम् ॥१२॥ ये गर्व मुद्रा भोग और मुक्ति दोनों देनेवाली हैं इससे ऐसे विधार से लोगों को बताना चाहिये जोकि ऋजु (कोमल सुभाव) हो, जो शान्त चित्त ( धनुलता रपिस ) हो जो गुरु भक्ति पर ( उपदेष्टा के धधन को मामने वाले ) हों, और यो कुमीन ( जिनको अपने नामी पुरुखो की बदनामी के हरसे समको उत्तम लीक पर चले जाने में दृढता हे) उन्हीं को देना चाहिये । तात्पर्य यह कि कोमल नित नहीं है और सिद्ध हो गया तो सिवाय ससार को कष्ट देने के और कुछ भी नाम कार्य नहीं | करेगा यदि चञ्चल हुआ तो नमको हुन आमन मुद्रादि से सिद्धिही नहीं प्राप्त होगी, यदि उपदेष्टा के पचन को न मानने वाला हुआ तो भी फिया, चटपटाग करने से कुछ भी मिद हासिल नहीं होगी, और यदि अपने नामी पुगो को बदमासी के माही हरैगा तो वह बडे २ भयानक अत्याचार करके माजी पोज देगा ऐसे २ लेगो । स योग विद्या का चत मा चरादा फलदापक देता है अर्थात् भोग वस्तु धेरगडसंहिता - क्रिया से ग्रहण करेंगे परन्तु मुक्ति जो परम पुरुषाई उसको नहीं प्राप्त कर सकेंगे, मी निमित्त मघ जगह "नदातव्य नदातव्य" कहा है। मुद्राणां पटल तत्सर्व व्याधि बिनाशनम् । नित्यमभ्यास शीलस्य, जठराग्निविवर्द्धनम् ॥१३॥ या मुद्रा पटल मय व्याधि को नष्ट भरने वाला है, और जो मित्य प्रयास करता है उसके लठर की अग्नि सूब पढ़ाती है। तस्य नोजायतेमृत्यु नास्य जरादिकं तथा। नाग्निजल भयंतस्य वायोरपि कुतोभयम् ॥१४॥ जो मनुष्य मुद्गा साधन करते हैं उनको न मरयु न थुदाई. मादि. न भाग, न पानी, न बापु यह मध कभी नहीं भय पहुंचते हैं। कासःश्वास प्लीहकुष्ठं श्लेप्न रागाश्चविंशतिः । मुद्राणां साधनाञ्चव, विनश्यन्ति न संशयः ९शा मुद्रा साधन करने में काम (सामी) वाम (दमा) मीहा (विल) इष्ट (द) तथा पीप प्रकार के श्लेमा (-) रोग नष्ट हो जाते हैं। यहुनाकिमि हेक्तेिन सारं वच्मि पचण्डते । नास्तिमुद्रासमकिञ्चित् सिद्धिदक्षितिमण्डले ॥१६॥ मेरसह महाराज कहते हैं, है चपागनि! तुम्हारे मिण्ट बहुत जाने से पारिन्तु सार थान में पता किस नमसमें मुरा के समान साई भी पशु मिद्ध देने वाली नहीं है। इति घेण्डमहितायां घेगड चाकपाल सम्बत्दै घटस्त्रयाग प्रक्षामा मुद्रा प्रयोगानाम तायापदेगः ॥ ३ ॥ .. , Ric ति.. ७% घेण्डम हिसा। | Hian II अथ चतुर्थोपदेशः। अयातः संप्रवक्ष्यामि प्रत्याहारक मतमम् । यस्यविज्ञानमात्रेण कामादि रिपनाशनम् ॥१॥ HFFIFFIFEST घोष महाराज कहते है कि हे घएछ कपालि ! कथनके अनन्तर मुत्तम योग कहते हैं, इसके विशेष जान मात्र से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर्या ये छ: रिपु जो प्राणियों को इस संमार में मतीय रहते बिनहि जाते हैं - कत II: तस्ततो नियम्येत दात्मन्येवं शनयेत् ॥२॥ Iri.REFPE- ArrPTET जिस विषय में चित्त चञ्चल हो के भ्रमण कर, प्रत्याहार के द्वारा उस विषय से मन को "निवृत्त (लोटा) करके अपने वश में लाना चाहिये sara :::: P पुरस्कार तिरष्कार, सुश्राव्य भावमायकम् । Em) मनस्तस्मोनियम्येत दात्मन्येव धर्शनयेत् ॥३॥ Him SHETTY में मनको कभी नहीं कमाना चाहिय, मोकार समाव्य ( कानको हे पुरष्कार ( भादर.) परे तिरष्कार -निरादर ) किसी जति धारी शब्द हो, श्राव्या कानी अप्रिय हो, किसी में जन का 7 फंपाये, तात्पर्य यह, कि गीतादि सुन कर या स्तुति घाद दिनाकर बहुत सुण मन को भुलाय नहीं देना और न भयानक चिधार तथा निन्दा, याद श्रादि सुनकर निकल हो जामा, म प्रत्या हार योग का सही साधन है कि मम सबों में मन का निवृत्त कर "मन यो में गर्मी, अपार सुनना भष पर 'मन को एक रस स्थिर रखमा " -- घेण्डसंहित।। OE -- सुगन्धीधापिटुर्गन्धो घ्राणेपुजायतमनः । तस्मात् प्रत्याहरेदेतदात्मत्येवदर्शनयेत् ॥४॥ *है मुगन्ध हेर, चहै दुर्गन्ध मेदि घाण (मूंघने ) में भाये और मन वार २ घाद तो मन को यहां से लौटार को अपने वश में करले मधुराकतिक्तादि रसेगामियदोमनः । तस्मात्प्रत्यारेदे दात्मन्येवमशनयेत, IND भी मधुर (गोठा) ही, चहै अन्न (पर) है कि तोता) हो, चहे कपाय (घाकम), घ हे कटु (बहुमा ) , पढे लवण (लोना) हो. यदि मन इन छः रमों की ओर दौड़े तो घर से लोटारा मनको मामा के वश में लाने का अभ्यास कर इसी का नामे प्रत्याहार इति शी घरंण्डमहितायां धागा चगंडकंपालि सम्वाद प्रत्याहार प्रयोगोनाम चतुर्थोपदेशः समातNETE TE 'FTATO ॥ अथ पंचमोपदेशः । ... अथातःसंप्रवक्ष्यामि प्राणायामस्ययविधिम् । यस्यसाधनमात्रेण देवतुल्योभवेवरः ॥१॥ घरद महाराज पंपरपाग्नि में करने शिम मयादार करके मम ममता प्राणायाम की विधि में करने भाधन करतेधी मनुष्य देषना के समान दे जाता है। प्रादौत्यानंतयाकार मिताहारंतवापरम् ।। नाड़ोशुढुिंचतत्पश्चात्यांणायामंचसाधयेत् ॥२॥ . . " म C. घेरामहिता । -- प्राणायाम साधन करने के पहिले माधम काने का स्थान ठीक करना चाहिये फिर सभी प्रकार समय भी नियत करना चाहिये। फिर उसके बाद मिताहार (एक प्रमाण से मदा भोजन करमा) साधन करना चाहिये । फिर मुझे बाद माही शुद्धि करनी चाहिये । ये चार बातें प्राणायाम के साधको को अवश्य माध लेना चाहिये । स्थान निर्णय। दूरदेशेतधारण्ये राजधान्यांजनांतिके । योगारभनकुर्वीत कुतेनसिद्धिदोभवेत् ॥३॥ ममुष्य यस्ती से दूर, तथा धन में भी राजधानी (राजा के रहने की नगरी) में, अहुत जमा के समीप । इन स्थानों में योगारम (प्राणायाम साधन) कभी नहीं करना चाहिये, करे तो सिद्धि कमी न हो। अविश्वासंदूरदेशे अरण्येरक्षिवर्जितम् । लोकारण्येप्रकाशश्च तरमात्त्रीणिविवर्जयेत् ॥४॥ यदि दूर देश में जाकर योग माधन फर तो वहा किसी का विश्वास नहीं कि कौन योगी की ठीक २ रक्षा करेंगा । यदि धन में योगाभ्यास करे तो यहा भी कोई रक्षक नहीं मिम्न मर्को यदि पात मे मनुष्यो के बीच योग साधन करे तो सब प्रगट रहेगा जिस्से लेग देखन आया करेंगे और उसे गर स्थिर नहीं हम पागा । इसीलिये ये तीन अघश्य धर्जित है । राजधानी के विशेष पाजत लिथ ही शिया की सहा जहा तक बवाय मकै पचावे परन्तु यदि राजधानी ही का रहने वास्ता मनुष्य योगाम्याम करे तो यह कहा ना ना : प्योंकि धर दूर देश भो यजित कर पाये हैं स राजधानी का मनुष्य यदि योगाभ्याम करे तो राजधानी विशेष जित नहीं। अर्जित करने का कारण यह है - .

Ca घर गडमति।। प्राणायाम साधन करने के पहले साधग काने का स्थान ठीक करना चाहिये फिर मी प्रकार समय भी नियत करना चाहिये । पिर ससके बाद मिताहार (एक प्रमाण से सदा भोजन परमा) साधन करना चाहिये । फिर अपने बाद नाड़ी शुदि करनी चाहिये। ये चार बात मावायाम साधको को अवश्य साध लेना चाहिये ॥ । । . स्थान निर्णया दूरदेशेतधारराये राजधान्यांजनांतिके । योगारंभनकुर्वीत अतेनसिद्धिदोभवेत् ॥३॥ मनुप्प बस्ती से दूर, तथा धन में भी राजधानी (राजा के गाने की नगरी) में, बहुत जमा के समीप । इन स्थानों में मौगारम ( प्राणाया' साधन ) कभी नहीं करना चाहिये, करे ता सिद्धि कमी न हो। प्रविश्यासंदूरदेशे अरण्येरक्षिवर्जितम । लोकारराचेप्रकाशश्च तस्मात्त्री णिविवर्जयेत् । यदि दूर देश में जाकर योग साधन करता वहा किसी का हि नहीं कि कौन योगी सी ठीक २ रक्षा करेंगा । यदि घर में ये करत पहा भी कोई रक्ष नहीं मिल भी पदि बात में म बीच येोग साधन फरें तो सब प्रगट रहेगा जिससे लोग देर करेंगे और उस्से गन्द स्थिर नही जग पावेगा। इसीलिये ये al वर्जिश राजधानीको विशेष बातलिय ही पिया जहा तक बधाय मकै यधाचे परन्तु यदि यात्री की कार मनुष्य योगाम्याम करे वा यता मा परेकि उघ भी बर्जित कर आये है. स राजशनी का मनुष्य यदि योगा ता राजधानी विशेष जित नही जित करने का कार .

घेरण्ड सहिता। -२ काल निर्णय। हेमन्तेशिशिरग्रीमे वर्षायांचतौतथा। योगारम्भनकुर्वति कृलेयोगोहिरोगदः ॥८॥ . हेमन्त ऋतु, शिशिर मातु, ग्रीप्य शतु और वर्षामत, इनमें योगा- रम्भ कभी नही करना चाहिये, यदि करें तो वह योग...रोग सा देने | वाला जायगा ॥ बसन्तेशरदिप्रोक्तं योगारम्भसमाचरेत । तथायोगीभवेत्सिद्वी रोगान्मुक्तोभवेध्रुवम् ॥९॥ वसन्त ऋतु और शरद ऋतु में योगारम्भ करनेको मुनियोंने लिखा हे रस्ते सन्हीं दो ऋतुओ में योगारम्भ करना चाहिये, इनमें करने से योगी सिद्ध हो जाता है और रोगों से भी निश्चय मुक्त हो जाता है। चैत्रादिफाल्गुणान्तेच माघादिफाल्गुणान्तिके । द्वौदौमासौऋतुभोगी अनुभावश्चतुश्चतुः ॥३०॥ चैत्र के महीना से लेकर फाल्गुण के अन्त तक चतु तथा माघ मार को प्रादि करके दूसरे वर्ष के फाल्गुण तक चौदा महीने के भी छ: अतु बाधी गई हैं। इस प्रकार देश २ मास की एक २ ऋतु-तमा दो मास और दश दिन की ऋतु भनुमव की जाती हैं। वसन्तश्चैत्रवैशाखौ ज्येष्ठापादश्वनीप्मको । बश्चिावणभाद्राभ्यां शरदाश्विनकार्तिकी ॥१॥ चैत और वैशाख ये दो महीना पसन्त चतुको जाते हैं, जेट और आषाढ़ ये ग्रीष्म ऋतु, सावन और मादो ये कुमार और कार्तिक ८४ घेरण्डमंहिता। ये शरद . अगन और पूस ये हेमन्त, माघ और फागुन ये शिशिर ऋतु कहे जाते हैं। अनुभावंप्रवक्ष्यामि ऋतुनाञ्चयथोदितं । माघादिभाघवान्तेषु वसन्तानुभवश्चतुः ॥३२॥ चैत्रादिचापाढान्तञ्च निदाद्यानुभवश्यतुः । पापाढादिचाश्विनान्तः प्रापानुभवश्चतुः ॥१३॥ भाद्रादिमार्गशीर्यान्तं शरदोनुभवश्चतुः । कार्तिकादिमाघमासान्तं हेमन्तानुभवातुः ॥१४॥ मार्गादिचतुरोमासान् शिशिरानुभवम्बिदुः । पेरपड जी धपकापालि से कहते है कि जिन २ महीनों में जा २ अतु अनुमय से जानी जाती हैं यामी लक्षणोसे मिलती है उनका कहते है, जैसे:-माप मे अंगास तक चार महीना यमन्त ऋतु अनुभव होती है, फिर उसी के भीतर और उसके बाहर जैसे चैत थे भाषाढ़ पर्यन्त चार महीना ग्रीन ऋतु अनुभघ होती है, उसी तरह भाषाढमे ले कुमार प- प्यन्त चार महीना वर्षा ऋतु अनुभव होती है, तथा भादेमि लेकर प्रग- इन पर्यन्त शरद ऋतु भा अनुभव होता है, कातिक से लेकर माघ तक हेमन्त ऋतुमा अनुभव देता है. अगहन मेलेर फागुगत चारमहीना गीत श्यतु का अनुभव होता है, हमी प्रकार अनुभव की ऋतु पाहिये, भीर नन्हीं के हिवाघ मे योगारम्भ करना उचित है ॥ बसन्तेवापिशरदि योगारम्भःसमाचरेत् । सदायोगोभयेत्सिद्धो बिनायारोनकथ्यते ॥१५॥ जामना

धारासंहिता।
Cy
पसको
बसन्त अपक्ष शरद रितु में योगारम्भ कर तो शिना परिश्रम योग
बिद्धता जावेगा यह मागियों के द्वारा कहा गया है ।
मिताहार !
मिताहारंविनायस्तु यागोरम्भन्तुकारयेत् ।
नानारोगोमवेनस्य किञ्चिद्योगोनसिद्ध्यति ॥१६॥
जो मनुष्य मित अर्थात एक तील बांध कर भोजन नहीं करता और
योगारम्भ करता है. वह नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित होता है और
भी योग विद्या का लाभ नहीं होता।
वात्पर्य भोजन को साधना प्रधान योग है, मोअनही से देह प्रति
| मलित होता है और भोजन की गाड़ी हुई है बहुत जल्द मनुष मर
| भी आता है, इसलिये पेपर महाराम ने भोजन सम भाव रसने के
| দি বু সিনাৰ স্বা মুখে তায়া ব্লা র মামাশা জিয়া
आहे व तो मिताहार का माधना अवश्य करे परन्तु .बिना योग
माटी सपने शरीर को निरोग रक्षा का भी मिशार करें तो
पासमझी योगियों से मत गुणा उत्तम रोंगे, बाई त मायके देख
लेकिन एक वर्ष मिताहार करता सरे को ध्यान में बाती
पा नहीं हम दृढ़ता से कहते हैं कि मिताहार को बराबर भीरबाई
भी गरी रक्षा के लिये उपयोगी और नोमिने मिताहार'मही
किया था कादि श्रीपध बार पर ताश निरोगता नहीं जानी जमा
मिमिपा ने भक्तो से भाग्य पारनेवाले पुरुष मिक्षबार
अवश्य
शाल्यन्नंयरपिंडंबा गोधूमपिंडकंतया ।
मुद्गमापचणकादि शुभ्रंचतूपर्मितं ॥१७॥

घेण्डसहिता। जो कोई योग साधन लिया था ये शाम्नी (उत्तम धान के) घायल धा यश पिड (जय पिसान की रोटी वा सेतुमा) तथा गाई की रोटी, और मूंग अथवा नई वा चना भादि की दाल, जो सूब साफ और भूसी रहित भोजन ॥ पटोलंपनसंमानं कल्लोलंचशुकाशकं । द्राटिकांकर्कटीरम्भां दुम्बरीकंटकंटकं ॥१८॥ परवर, कटहर, मान (भई की तरह बड़े पत्ते का होता है और उसकी जड़ बडे की तरह बड़ी लम्बी होती है) कक्कोल ( रैला ) बेर, करज फॅकरी, केला, गूनर, कॅटोली चौराई आदि का साग, इत्यादि . बस्तु खाधे॥ भामरम्भा बालरम्भां रम्भादण्डंच मूलकम् । वार्ताकी मूलकंऋद्धिं योगी भक्षण माचरेत् ॥१९॥ काचे केले की तरकारी, केले की वतिया (जो फूलो में लगी है।) बेला बा दरड (बीच का नरम गधीमा) केला की जड़, भाटा, मूली, इन सम की तरकारी योगी खावे॥ वाल शार्क काल शाकं तथा पटोल पत्रकम् । पञ्चशाकं प्रशंसीयादास्तुकं दिलमोचिकां ॥२०॥ पाल गामात कामान का भी प्रचलित माग, काम शाक धांत जिम ममप में भागमा करना , स्टेशन पत्र मापांस पर पर पती का माग (यह पाने में होता है परन्तु सथ से ज्यादा निगमोर मात २ अभ्यास परने पर मया भी लगने लगता २) पyमा का पारा और रिस भाग ये पार राग योगियों सिमरानी॥

घेरयमपिता। सुदं सुमधुरं स्निग्धं उदरार्द्ध विवर्जितम् । भुज्यते .सुरसंप्रीत्या मिताहार मिमंविदुः ॥२३॥ शुद्ध अर्थात साफ, सुन्दर मधुर (जो खाने में मिठाय) स्निग्ध (जिसमें सखाई न हो) सरस (जिफा रस खराब न लगे) ऐसे भोजन को योगी लोग वही मौविसे मेोजन करें और वह भोजन धाधा पेट खाचे श्राधा खाली रक्लें । इसी हो मिताहार कहते है । तात्पर्य--प्राधा पेट साने की विधि से बहुत से मरमुक्त योगा- म्यासी लोग यह सोचेंगे कि हम माघापर जाकर कैसे बचेंगे: इनको यह धीरज दिया जाता है कि जम शुद्ध सुररा और स्निग्ध आदि पदार्थ मोति से सावेंगे और सिम आधाही पेट सावेंगे तो यह मासन माणा- सामादिक क्रियाओ से मारपद पचकर प्राण पोयक रस उत्पन्न करना, यह रस जब नाहियो में दौड र शरीर में पाप्त जावेगाता थोड़े दो देर के बाद सन्तोष लाभ होगा। रिज्यों ररोज ३ इसी प्रकार | साधे पेट साने का अभ्यास बढ़ेगा त्यो २ सन्तोष भी बढ़ता जायेगा और उसका गुग मी घडता जावेगा। यदि मन पूरा पेट खाया जाता है तो यह भासन प्राणायाम सादि क्रियाशी के रगड अम्माशय को कष्ट पहुचाता है और झटपट माना के नीचे पंसफर तय की से मल हो कर निकल जाता है उस्ले पासपोषक नस पैमा नहीं उत्पन्न होने पाता, पास यही मिताहार का मोशन है हिनादि साधे वह उत्तमता से पच जावे, उस्ते विकार रस पैदा न करके शरीर के। भारोग्य रक्ड। भन्नेन पूरयेदई तोये नतु तृतीयकम् । उदरस्य तुरीयांश संरक्षेद्वायु चारणे ॥२२॥ पेट का मापा भाग 4 भोजन से पूरा करना चाहिये, तीमा घेरण्डसहिता। भाग जल पीकर पूरण करना चाहिये, इसी प्रकार उदर का धीचा भाग वायु चलाने फिराने के लिये छोड़ रखना चाहिये। कट्ठम्ल ठवणंतिक्तं भृष्टञ्च दघितक्रकम् । शाकोत्कटं तथा मयं तालञ्च पनसन्तथा ॥२३॥ कुलस्थं मसरं पाण्डु, कुष्मांडं शाकदण्डकम् । तुम्वीकोल कापित्यञ्च, कंटविल्वंपलाशकम् ॥२४॥ कदम्बं जम्बीरं विम्बं लकचं लशुनं विषम् । कामरझं पियालञ्च हिशाल्मलिके मुकम् ।। योगारम्भे वर्जयेत पथस्त्री वन्हि सेवनम् ॥२६॥ कटु (कर्) मन्त्र (खटाई) लवण (मानखरा, नमकीन) तिक्त (सीता) ये चार प्रकार के रस युक्त पदार्थ योगरम्भ में छेद देना चाहिये, भृष्ट (भूजा धधना) दही, मट्ठा, घृणित या सराय शाग, मदिरा, ताड़ फल तपा उसका रस, पक्का कटहर, कुलत्य (कुरथी की दाल) ममूर की दाल, पहारा नामक फल, कुम्हसा, मां साठे या अरुई भादि के पुग्ने, लीकी, येर, कैपा, जिस घेल में कांटा हों, पलाश, कदम्य के फल, जम्मोरीनोंयू. कुंदुरू. लकर (लाइमुन) मृणाल (फमन को उठी) कमरख, प्याज होग, शेमा कलमु (गोभी) योगासन में ये भी सय द्रभ्य भीम में वर्जितमी प्रकार पथ का चलना, स्त्री प्रस तथा तापना मादि भी यजित ॥. तात्पप्पं पास योगाभ्यामुत क्रिया प्रारम्भ की जायणी तय गरीर को ये सथ यस्तुये रोग पार कर देगा पान्तु मम योगाभ्याम पामा मामी योगी पद्धका जायगा तपती बार भी मस्तु भाजम पाmot उमदा मिरदी करेंगी मलिक एरए यस्तु भागका पाय ६१ घेरण्डसंहिता। के समय घी साथ पी तात्पर्य यहां पर एक शंका यह होती है कि २६ श्लोक में नैनू घी दूध इन पदार्थों का निषेध किया है कि योगारंभ में न खावे भोर यहां पर घी दूध रोज र पहिले सेवन करके तत्र प्राणायाम करै । यह कैसे सतत हो सता? यहां पर विवेचना करना चाहिये कि वहां ६ श्लोक में योगारंभ को निपेष किया है. कुछ साधन हो जाने पर निषेध नहीं किया। परंतु यहा जो घी दूध की विधि है यह इस तात्मय से है कि जब साधन करते २ कुछ प्राणायाम को शक्ति जम जावे तय इसी के सेवन का मी क्रम से अभ्यास कर परन्तु कम से कम मारंभ से एक पक्ष यानी चन्द्रमा की जब तक दूसरी प्रकृति न मावे तय तक नमी प्रकार जैसे कि लेक में लिखा है साधन कर, वाद ज १ पक्ष बीत जाये तय फिर फ्रम से घी दूध मेयम करे, और वहीं तक बड़ावे जहां तक कि अजीर्ण न हो । यस पूर्व निषेध और विधि संगत हो गये। इसी प्रकार जहां विधि निषेध पाये जायें यहां के समम संगत करलेना चाहिये, क्योंकि समय एकसा सदा नदी रहता, तथा पात्र भी सम एकसे नहीं होते, इसी तरह स्थान सब एक समान नहीं रहते. विवेधमा से काम करना भी योग शास्त्र एक प्रधागा है। यदि विवेचना मे चूका तr पप योग मही हे बाता है, इसे विवेचना को सूप साधना चाहिये । विचार करो कि पहिले प्रत्याहार प्रकरण लिसमाये है कि भोग्य सुमो से मन सो निवृत्त करना चहिये, परन्तु यह भी लिखा है कि अमुह २ बस्तु योगी लोग भयश्य भोजन करें, तो यहां पर यह पिवेचना तो जरूर है कि मन को नितिही प्रपान पोफिदा कहीं देय प्रयोग से मावश्यकीय बस्तु न मिली वहां सम विपा कराया नष्ट भया दिन? ही स्थलों में प्रत्याहार जाम में माते हैं कि भायश्यकीय पात भौर स्थान भेद भी ६० घेरण्डसंहिता । पच काठिन्यं दुरितं पूतिमुष्णं पर्युपितं तथा । अतिशीतंचातिचोयं भक्ष्यं योगी विवर्जयेत् ॥२९॥ जो द्रव्य कठिनता युक्त हे, जिससे भोजन से पाप उत्पन्न है, सह दुर्गन्ध युक हुये हों, अधिक गरम हो, वा अधिक ठटाहा, बामी | हो, अति उग्र (अधिक तेगी लिये हो) ऐसे पदार्थों को योगी लोग कभी भोजन न करें। प्रातःस्नानोपवासादि कायक्लेश विधि विना । एकाहारं निराहारं, यामान्ते च नकारयेत् ॥३०॥ जम योगारम करे तय प्रातःस्नान नहीं करना चाहिये । उपधासादि शरीर के क्लेश देने वाले फर्म नहीं करने चाहिये। एक ही यार भेजन परगा यह भी गहीं करना चाहिये, या कुछ नहीं खाना यह भी गयी, फरमा चाहिये, और एक प्रहर तक निराहार रहना अधिक नहीं, ता. त्पर्य यह कि पूर्वोक्त उत्तम पदार्थों में से कुछ घौदा प्रयश्य एक २ प्रहर पाद लिया करे॥ एवंविधि विधानेन प्राणायाम समाचरेत् । भारंभप्रयमेकुर्यात् क्षीराज्यं नित्य भोजनम् ॥३१॥ मध्यादेचेव सायान्दे भोजनद्वय माचरेत् ॥ भी प्रकार की विधि में मांसायाम साधन कारमा पाहिये । माता- पाम करणे हे पहिले राग २ दूध और पी संयम करना चाहिये । पार मध्याय (दुपदरी) में सपा सायकाल में गहों एमपी में योगी सांग माना .

६१ घेरण्डसंहिता। तात्पर्य-यहां पर एक शंका यह होती है कि २६ श्लोक में नैनू घी दूध इन पदार्थों का निषेध किया है कि योगारंभ में न खावे और यहां रोज २ पहिले सेवन करके तन प्राणायाम करै । यह कैसे | सङ्गत हो सका है? के समय घी पी यहां पर विवेचना करना चाहिये कि वहां ६ श्लेषक में योगारंभ को निपेष किया है, कुछ साधन हो जाने पर निषेध नहीं किया। परंतु यहां जो पी दूध की विधि है वह इस वात्मय से है कि जब साधन करते २ कुछ प्राणायाम की शकिजम जावे तब इसी के के सेवन का भी कम से अभ्यास करै परन्तु कम से कम भारंभ से एक पक्ष यानी चन्द्रमा की जय ता दूसरी प्रति न मावे तव | उसी प्रकार जैसे कि लोक में लिखा है साधन कर, वाद जब पक्ष बीत जावे तय फिर क्रम से घी दूध सेवन करै, और वहीं तक वडावे जहां तक शि अजीर्ण न हो। वस पूर्व निषेध और विधि संगत हो गये । इसी प्रकार जहां २ विधि निषेध पाये जायें यहां समय |पाव और स्थान भेद से संगत करलेना चाहिये, क्योंकि समय एकसा सदा नहीं रहता, तथा पात्र भी सब एकसे नहीं होते, इसी तरह स्थान भी सब एक समान नहीं रहते, विवेचना से काम करना भी योग शास्त्र का एक प्रधान मा है। यदि विवेचना से चूका तो सब योग मही हे जाता है, इस्से विवेचना को सूप साधना चाहिये ।। विचार करो कि पहिले प्रत्याहार प्रकरण में लिखमाये हैं कि भोग्य | बस्तुभों से मन को निवृत्त करना चहिये, परन्तु यह भी लिखा है कि अमुच २ यस्तु योगी लोग अवश्य भोजन करें, तो यहां पर यह विवेचना करनी जरूर है कि मन को नितिही प्रधान है क्योंकि जहां कहीं देव सयोग से प्रावश्यकीय वस्तु न मिली वहां सम किया कराया गाद भपा कि नहीं?म्ही स्थलों में प्रत्याहार काम में आते हैं कि आवश्यकीय . .

દર घेरण्डमंचिता। . बस्तु न मिलने पर भी जो कार्य विधेय हैं वे कर लिये जायें, उनके स्थान में योगी लोग अपनी शक्ति से दूसरे उपस्थित पदार्थो को युक्त कर ठे मौर घही गुण उत्पन्न करलें । कैसे ? भायना से, भावना दृढ़ होने से जैसे भृङ्गी दूसरे कीड़े को अपना स्वरूप बनाय लेती है वैसेही योगी लोग भी एक यस्तु के स्थान में दूसरी वस्तु का गुण उत्पन्न करते हैं। यदि यह न हुमा त योग की क्रिया ध्यान धारणा सब झूठी है । से नहीं यह बहुत काल से भारतवर्ष में निश्चय है कि ध्यान से ध्येय बस्तु सिंच जाती है, जैसे कि फोटो में दूरस्य यस्तु के अवयव सिंच जाते हैं, माजकल के यारोप वासी पिज्ञानी लोग भी इस योग विद्या की तारीफ इसी शक्ति के प्रभाव से करते हैं, इससे भय से उत्तम शक्ति का बढ़ाना हो विधि निषेध का कार्य है। अथ नाडीशुद्धि। कुशासनेमृगाजिने ठयाघ्राजिनेचकम्बले । स्पृलासनेसमासीनः प्राङ्मुखोयाप्युदङ्मुखः ॥ नाडीशुद्धिंसमासाद्य प्राणायामंतमभ्यसेत् ॥३२॥ जय माणायाम साधन करने लगे तय पहिले मादी शुद्धि करले तो ठीक होगा नहीं कभी ठीक नहीं होगा, सो उसका विधान यह है कि | मपम फुगा के भासन में, या मृगछाला पर, या याचम्यर पर मपक्षा कम्यान पर धैठे, यह कोई भान हो मोटा हो यानी गुप्तगुल हो पूर्व मुख हो येठे या उत्तर मुख होके । नाडीशुद्धिंकथंकुऱ्या वाड़ीशुद्विस्सुकीदृशी।? तत्सर्वत्रोतुमिच्छामि तद्वदस्वदयानिधे ! ॥३३॥ पापानिदते भये हि दयानिधि ! नापी शुदि किस FIC .

१३ घेरगड सहिता। करनी चाहिये और नाडी शुद्धि किस तरह की है वह सब हमसे कहे। हमारी इच्छा इसके सुनने को बहुत ही हुई है ॥ मालाकुला सुनाड़ीपु मारुतो नैवगच्छति । प्राणायामः कथंसिध्येत्तत्वज्ञानं कथंभवेत् ॥ तस्मादादौनाडीशुद्धिं प्राणायाम ततेोभ्यसेत् ॥३४॥ घेररह महाराज ने कहा कि माला की भाति गुथीं हुई नाडिया के भीतर घायु अच्छी तरह पैट के गममागमन नहीं कर सकता, इससे मा- शायाम कैसे सिद्ध हो सकता है ? मोर तत्वज्ञान भी कैसे प्राप्त सकता है " मी धारण पहिले नाही शुद्धि करके वध प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिये ॥ नाडी शुद्धिर्द्विधा प्रोक्ता समनुर्निर्मनुस्तथा । घोजेनसमनु कुर्यानिर्मनुं धौत कर्मणा ॥३५॥ नाही शुद्धि दो प्रकार से होती है, ९ समनु, २ निर्मनु, इनमें बोज मन्त्र के द्वारा जो नाडी शुद्ध की जावे उसके समनु तथा घोति कर्म के द्वारा जो नाडी शुद्ध की जाये उसको निर्मनु माही शुद्धि कहते हैं । धौतकर्म पुराप्रोक्त पट् कर्म साधने यथा । टणुप्वसमनुपण्ड ! नाडीशुद्धिर्यथाभवेत् ॥३६॥ हे व यशपालि ! पटक साधन के समय में पहले ही पौतिकर्म कह भाये हैं, अब जिस प्रकार "समनु" माही शुद्धि है ससको कहते हैं तुन मुने।।

६४
घेण्डसहिता।
उपविश्यासने योगी पद्मासनं समाचरेत् ।
गुदि न्यासनं कुर्याद्यथैव गुरुभापितम् ॥
नाडीशुद्धिं प्रकर्वीत प्राणायामबिशुद्धये ॥३७॥
प्रथम येगी पद्माभन बाध कर गामन पर बैठे, फिर गुरु प्रादि
न्यास कर उसी के अनन्तर जैसे गुरू ने सिखाया है। उसी के अनुसार
प्राणायाम साधन के लिये नाही शुद्धि करै ।
वायुवाजं ततेा ध्यात्वा, धूम्रवर्णं सतेजसम् ।
चन्द्रेण पूरयेद्वायु वीज पोडशकैः सुधीः ॥३८॥
चतुःपष्टया मात्रयां च, कुभके नैवधारयेत् ।
द्वात्रिंशन्मात्रया बायु सूर्यनाडयाच रेचयेत् ॥३९॥
भासन, गुरु-यास के उपरान्त वायु बीग (य, यह वायु बीज ) का
ध्यान धूम्र वर्ण और तेजके सहित करै, फिर बुद्धिमान साधक उसी बायु
| वीज को पोहरा (१६) मात्रा अर्थात् सोलह बार अप करते हुये नाक के
पाए छेद से बायु को पूरण करै फिर चौमठ मात्रा की संख्यासे कुम्भक
प्राणायाम (दोनो नाक के छेद और मुह बन्द किये) धारण करै, इसी
प्रकार बत्तीस मात्रा बायु वोज का जप करते हुये नाक के दहिने छेद
छेर कर रेचक (वायु को निकालना) प्राणायाम करें ।।
नाभिमूलाद्वन्हिमुत्थाप्य ध्यायेत्तेजोवनीयुतम् ।
वन्हिवीज पोड़शेन सूर्यनाडयाच पूरयेत् ॥१०॥
चतु.पष्टयाच मात्रया कुम्भकेनैव धारयेत् ।
द्वात्रिशन्मात्रयावायु शशिनामाच रेचयेत् ॥४॥

५ घेरण्ड महिला। - नाभि मूल अग्नि तत्व का स्थान है। योग के प्रभाव मे उसी भाभी मूल से अग्नि सत्व को प्रगट कर उठावे और पृथिवी सत्य को उसी अग्नि तत्व में सयुक्त करते हुये ध्यान करै । अनन्तर सोलह मात्रा अग्नि भोज (र यह अग्नि बीज है) का जप करते २ नाम दहिने छेद से वायु पूरण करे। इसी प्रकार चौसठमाता (र) जपते हुपे कुम्भक प्राणा- | याम करे ( सब द्वार मदे वायु धारण किये रहै ) फिर मत्तीस मात्रा (र) जपते २ नाक के बाए छेद से वायु को त्याग करें। नासाग्रेशशरग्वित्रं ध्यात्वाज्योत्लासमन्वितम् । ठं, बीजपोडशेनैव ईडयापूरयेन्मरुत् ॥४२॥ चतुपष्टवामात्रयाच 'व' योजनेवधारयेत् । अमृतप्लावितध्यात्वा नाड़ीधीतंविभावयेत् ॥ लकारेणद्वात्रिशेन दृढभाव्यंविरेचयेत् ॥१३॥ उसके बाद नासिका के अग्र भाग में, किरणो के सहित चन्द्र निम्न का ध्यान करते हुये ( ठं) यह बीज सोलह मात्रा जप करते २ नाक के बाए छेद से वायु पूरण करें, फिर जल बीज (व) इसको पीमठ माना जपते हुये साम्रा नाही में (भोवर हृदय की नाडी) कुम्भक योग से वायु धारण कर, बाद ऐसा ध्यान कर मानो नाक के अग्रभाग स्थित चन्द्रबिध से अमृत की धारा यह रही है उसी के द्वारा शरीर की जितनी नाती है सब घोई जा रही है. इसीप्रकार ध्यान करते २ पृथिवी मीज ( लम को यत्तीस धार नप करते हुये नाक के दहिने छेद से वायु का रेधन ( त्याग) करें। एवविधांनाडीशुद्धिं कृत्वानार्डीविशोधयेत् । दृढ़ीमूत्वासनंकृत्वा प्राणायामसमाचरेत् ॥४॥ ।

६६
घरण्डसहिता।
पसी प्रकार नेदी शुद्धि कर्म के द्वारा नाहियों को शुद्ध करके दूढ़
भाय हो भासन में बैठ कर प्राणायाम का अभ्यास करें।
सहितःसूर्यभेदश्व उज्जायीशीतलीतथा ।
भस्त्रिकाभ्रामरोमूर्छा केवलीचाष्टकुभिकाः ॥४५॥
कुम्भक प्राणायाम आठ प्रकार का है, जैसे-१ सहि, २ सूर्यमेद, ३
उज्जायी, ४ शीतलो, ५ भक्तिका, ६ चामरी, मूळ, एवं केवनी ।।
सहितोद्विविधाप्रोक्तः प्राणायामंसमाचरेत् ।
सग वीर्य्यमुच्चार्य निर्गर्भावीजबर्जितः ॥४६॥
सहित नामक कुस्मक प्राणायाम दो प्रकार है, १ सगर्भ, तथा २
निगर्भ, जिए कुम्भक में बीजमन्त्र उच्चारण करके साधना की जावे उसी
सगर्भ कहते हैं और जिसमें बीजमन्त्र बर्जित र उसको निगम करते हैं।
प्राणायामंसगर्भच प्रथमंकययामिते ।
सुखासनेचोपविश्य प्राङ्मुखोयाप्युटङ्मुखः ॥
ध्यायेद्विधिरजोगुण्यं रक्तवर्णमवर्णकम् ॥2॥
परंह जी ने पढकापालि से कहा कि सगर्भ प्राणायाम किस प्रकार
नाधा करना चाहिये नसको पहिले तुमसे कहते हैं। यह यह है कि-
मुबामन (भाराम के प्रासन) पर पूर्व मुख मा उत्तर मुसहर बैठे और
उला को ऐमा ध्यान कर मानों. यह रक्त वर्ण है और मकार स्वर वर्ण
के रूप है । तपा रजो गुण विशिष्ट है ।
ईडयापूरयेद्वायं मात्रयापोडशैःसुधाः ।
पूरकांतेफुम्भकाचे कर्त्तव्यस्तृड्डीयानकः ॥४८॥

६७
घेरण्ड संहिता।
ध्यान के अनन्तर बुद्धिमान साधक, (अ) यह वीज मत्र सोलह यार
जपनामा नाक के पाए छेद से बायु पूरण करें। उमी समय कुम्भक्षके
भागे और पूरक के अन्त में प्रथम उहीयानयन्ध जो पोछे का भाये है
भाचरण करना चाहिये ॥
सत्वमयं हरिंध्यात्वा उकारं कृष्णवर्णकम् ।
चतुःपष्टनाच मात्रया कुम्भके नैव धारयेत् ॥४९॥
उसके अनन्तर सत्व गुणा संयुक्त उकार स्वरूपो. कृष्ण पर्ण विष्णुमा
ध्यान करता हुभा (5) इस थी को मिठ । मात्रा जाप द्वारा कुम्भ
| मासायाम में यागु धारण करे ।
तमोमयं शिवंध्यात्वा प्रकारं शुक्लवर्णकम् ।
द्वानिशन्मानया चैव रेचयेद्विधिना पुनः ॥५०॥
खि म नन्तर तमोगुपयुक्त महार व्यानरूपी प्रवेशपर्ण शिव
का ध्यान करता मा (म) बीज से बत्तीस मात्रा जप के द्वारा उस
परित बायु को नाम के दहिने छेद से रेचन करै ।।
पुनःपिंगलयापूर्य कुम्भकेनैव धारयेत् ।
ईड़या रेचयेत्पश्चात्तद्वीजेन क्रमेणतु ॥ १ ॥
उसके जन्तर सिर भी तक प्रकारसे तलिखित समस्त वीजको यथा
सत्या (जेपी संख्या का माये हैं) अप के द्वारा दहिनी नासिका से छेद
यायु पूरा कर कुम्भ योग से उसी प्रकार धारण करके बाद फिर भी
वाम नासा छिद्र से रेधन करें ।
अनुलोम विलोमेन बारंबारं च साधयेत्
पूरकान्ते कुम्भकान्तं धृतनासा पुटद्वयम् ॥
फनिष्ठानामिकांगुष्ठः तर्जनीमध्यमांविना ॥५२॥

घरगडमंहिता ।
इसी प्रकार पुनः ३ अनुलोम विलोम (याए ने सीधे दहिने से छोटे
और दहिने से सीचे बांए से धी) के द्वारा प्रापायाम साधन करें ।
यायु पूरक
फे शेष से लेकर कुम्भ में शेप पर्य्यन्त तनी शोर मध्यमा
को छोड़ कर यानिष्ठा, अनामिका और मुछ धे तीन माहुनिया द्वारा
गागापुट घरना चाहिये । अर्थात जिस समय पूरक प्राणायाम से घायु
जीधे उस समय दहिने नासा के छेद को गूठे से दाये रदै भीर माएं
उर से सीधे । जय कुम्भस प्राणायाग से वायु को रोके तय नाक के
पाएं छेद को कनिष्ठा और तर्जनी धर दो अलियों से दाये भीर घर
थेंगूठे को भी दाये रहे और मुह भी धन्द रप । और जय दक्षिी छेद
से यायु सीधे त पहिले पाए छेद की क्षनिष्ठा और अनामिका से दाये
रहे चोर कुंभक में अगूटा भी दपिने छेद में दधाये ।
प्राणायामं निर्गर्भ बिना वीजेन जायते ।
एकादि शतपर्यन्तं पूर कुम्भक रेचनम् ॥५३॥
निगं प्राणायाम जो दूसरी बिधि आए आये हैं यह यिगा योज
गन्त्र ही किया जाता थे, पूरक्ष, कुभय, रेचक ये ती मायायाम अग
सहित साधन करने में एक से लेकर सो पर्यन्त माना ।
उत्तमा विंशतिर्मात्रा पोडशीमात्रामध्यमा ।
अधमाद्वादशीमात्रा प्राणायानारिखधास्मृताः॥५॥
मादा
धनुमार मासापामतीम प्रकारकी है, जिनमें बीच माया
की स्थिति थप उत्तम, जिसमें मात ए माया या मध्यन, जिसमें मारप
मात्रा रियति या नपम ।
प्रथमाज्जायते धर्म मेरुकं पञ्च मध्यमात् ।
उत्तमाच मित्यागजिविध मिडिलक्षणम् ॥५५॥

६६ घेरण्ड संहिसा। वायु अघम मानावाली प्राणायाम माधन करने से देह में पसीना भाता है, मध्यम मात्रा को प्राणायाम मे मेरु ( पीठ से कमर तक ) कांपने कगता है, अर्थात् एक नाही गुदा से लेकर मसाक पर्यन्त दराठाकार है मरने पर कांपने लगती , उत्तन मात्रा की प्राणायाम से देष | भूमि से उठ के सून्य में धलीजाती है. तीन प्रकार प्राणायाम की सिद्धि के येही तीन चिन्ह दे कि पसीना माघे, देश कांप, और देव भामाश उठ गावे, इन चिन्हों के बिना माणापाम में सिद्धि प्राप्त नहीं हुई पही जानना पाहिये। विवेचना-प्राणायाम में जो चौस, सलह, बार, ये तीन संख्या बांधी गई हैं उनमा तात्पर्य यह है कि मेरा यीश में पोलह पूरक कुम्भश, बत्तीस रेचफ हैं, इसी प्रकार बीस मात्रा पाली में बीम पूरक, अस्सी रेकच, चालीस हिसाब से हप्तमा जानना चाहिये, पसी प्रकार सेोलह पूरक शिठ कुम्भ, धत्तीम रेचक के हिसान से मध्यमा, वधा पारद पूरा मातालीस कुम्भक और धीयोस रेधा से अपमा . चौमठ जाननी चाहिये। माणायामातखेचरत्वं प्राणायामाद्रीगनाशनम् । प्राणायामाद्वोधयेच्छक्तिं प्राणायामान्मनेान्मनः ।। आनंदोजायतेचित्ते प्राणायामीसुखीभवेत् ॥५६॥, प्राणायाम साधन करगे से खेचात्य हि ( माफाश में जाने की (तारत ) होती , मायायाम से रोग नष्ट होते हैं, प्राणायाम से परम गक्ति भाग उठती है. तथा प्राणायाम से दिव्य जान लाभ देता है मपात | एक नयीन युदि उत्पन्न होती है, फिर मासायाम चित्त में मापही भाप भानन्द प्राप्त माता है. और प्राणायाम साधग करनेयाता पुरुप पर प्रकार मुखी हो जाता है ।

घेण्डसंहिता। अपना भी शरीर - तात्पर्य-जाष्टियों में .जे वायु भरा रहता है यह बिना परिचालन फ्रिया के गुम्न साधे एक रस बना रहता है जब कोई और दूसरे प्रकार का यायु नमझे भीतर जा पैठा और उस यायु में मिलगया तो द पट नाना विकार उत्पन्न करके रोग राशि प्रगट करता है, विशेष का वायु के धिकार अधिक उत्पन्न देते हैं । परन्तु प्राणायाम से नया वायु नाहियों में पैठता है. पुराना गुम्न सधा हुना यायु निकालता रहता है रस्ते विकारी भी वायु प्रर्यात रिक्षारी यस्तु चायु में जाकर नारियों में पेट रस में मिल कर भी सपना नसर नही पहुंचा मका पोकि नाहिया व्यायाम कमरत ) ने मैगी रहती है, पुष्ट है। जाती है, उनके भीतर विकार निर्यिकार बराचार गुण करता है । इसी निमित योगी लोग दीर्घायु और मुखी रखते हैं। अथ सूर्यभेद कुम्भक। कथितं सहितं कुंभ सूर्यभेदनकटणु । पूरयेत्तूर्यनाड्या च यथाशक्तिबहिर्मगत् ॥५॥ धारयेद्वहुयत्नेन कुम्भकेन जलंधरैः। यावत्त्वेदोनसकेशाभ्यां तावत्कुर्वतुझुम्भकम् ॥५८॥ पेपर महाराज ने पपरसपालि से कदा शि, अहित मामन भेद मे पहिला कुंम मापा नसमा मिचरण ते पद पाये भय मूर्य भेद माम मरा कुरामन का विवरण सुने । पहिले पालघर पंध नामद गुद्रा धारण कर माक के दरिने उद मे जितनी शक्ति वायु भींच कर पाए नरें। फिर परे पय माहित नमती पर योग से ite, rat नए सौर पाली में पसीगा न भाये तब तक गियर र 2/22- घेरण्डसंहिता। पायु, शरीर प्रायोपानः समानश्चादानव्यायौ तथैवच । नागः कूर्मश्चतकरी देवदत्तो धनन्जयः ॥९॥ माण अपान, समान, व्यान, दान, ये पांच प्रकार के के भीतर रहते है। तथा नाग, कूर्म, सफर, देवदत्त, धनञ्जय, ये पाप मसारले वायु शरीर के बाहर भाग में रहते हैं। हृदिपाया बहेनित्यं अपाना गुदमयडले । समाना नाभिदेशेतु उदानः कराठ मध्यमः ॥६०॥ व्यानाव्याप्य शरोरेतु, प्रधानाः पञ्च वायवः । प्राणायाःपञ्चविख्याता नांगाददाःपञबायकः॥६॥ माण नामक या पदय में, घपान कुदा देश में, समान नामी में उदान फट में, एमी प्रकार घ्यान गामक यायु समस्त शरीर में व्याप्त है। घर पहता रहता है। ये प्रधान प्राध प्रकार के यार हैं। न हार, देवदा, पनप, ये पाप बाहर पाले यायु प्रधान है। नेपामपिच पचानां स्थानान्यपि बदाम्यहं । उद्गारेनाग प्रास्यातः कूर्मरतून्मीलनेस्मृतः॥१२॥ कृकरः शुकृते शेयो देवदत्तो विजुम्भणे। . नहाति मृतेक्षापि सर्वव्यापी धनञ्जयः ॥३३॥ ये गंग प्रकार या भिम जिम स्थान में प्रवाहित होते हैं या एम करते ३ मुना, नाग नाम वायु यह मार लेने में माता २. फर्म नामक यायु समूदने सेनने में मात पलक गाम में नाम यायु में चाहिएको में देवदा नामक गायु असुयाना में तपा भाग, .

घेण्डश्तिा। ॥ यहता थे. मौर धनवप नामक घायु मरण होने पर भी मृतक देश (ताश) में भी जायना रहता दे, शिम द्वारा लाश का फूलना पचकना आदि बहुत से वायु कार्य देख पाते हैं। नागोयहाति चैतन्यं, कूर्मश्चैव निमेपणम् । क्षुद कृफरश्चैव जुम्भणं चतुर्थेनतु भवेटुनजयाच्छब्दं क्षणमात्रं न निःसरेत् ॥६४॥ पांच प्रकारको घायु उनसे पांघ प्रचारफे शारीरक कार्य देने जैसे -नाग नाम यायु जी टिकार में रहता है यह चैतन्यता ग्रहण करता ऐ भर्यात् भोजन किया हुमा मन भामाशय में पहुंच कर जय तक ठोक पपने परिपाक के स्थान पर नहीं पहुंचता तब तक एक प्रकार का नशा उत्पन किये रहता थे जिस्से कुछ मानसिक स्वाभाविक पित पिकसि रहती थे, परन्तु जय एकार जाती है व यह भामाशयस्य भन्न नपने परिपक्क स्थानपर पहुंच कर माराम देता है और फिर मान- सिक कार्य उत्तमता से हो सकते हैं. इसी मिमित झार के वायु गुर धैतन्यता सम्पादकहा जाता है। फूर्म नामप यायु जो पलक भागने में रहता या पलक भांजने में a wiलों का भाराम मिलता है ऐसे कार्य सम्पादन करता है, मेनों में एक प्रकार का रस पता शिस्ले मेघ मदा तर रहते ६ भीर दम् वरावट से किसी प्रकार का मत उस नेप्रको पुतली पर नहीं पैट सत्ता, पदि नेत्र में सरायटन से रुपाईले कारण परमार को दी धम्म मादि पुरानो भलीम है। भाये और कुछ भी न देन पर पान धर्म नाम पायु प्रमाय मे पलक तुपा करतो ता ने से पधाया पातासमेतरापट नमी ा ली और गण आदि भी पुतणी से टकर नही मत। पेग मागी भी

घाड मेशिता
-
माजी
गोर में घायु
पुष्टता मुद्रादि के द्वारा है। सकती है कि पलमान मांजने से नेत्रने माधि
दिपता प्राप्त देश बैो शांभयो मुद्दा प्राटि में पद पाये हैं. परन्तु
पिना
कुछ नेत्र की रक्षा के यह कमी कूर्म वायु का गुण है।
कृपार मास प्रायु तुधा और कृप्या ग्रहण करता है, अर्थात् डीश
भागे से एक प्रकार का आयु बाहर से आकर बड़े वेग से निकलता है
हमसे भामागंयका स्थित पचा हुआ भन्न प्रल बहुतही शोध नीचे भैतड़ियों
में घस जाता और भामाशय का भाग खाली हो जाता और उसे
भामाशय पूर्ण होने के लिये गारिपा उद्यत होती है वही क्षुधा वडा
दी जाती है, जान्न की कमी से क्षुधा और जन की कीसे वृष्या हाती
है, ये क्षार्य इसी कार नाश वायु को द्वारा सम्पादित देते हैं ।
देवदा नामफ यायु से सपा कार्य हुगा करते हैं अपोत जय
की गति शिपिल से जाशी तय एक, प्रकार का पासस
माता उस भानस में मानिस यत्ति मी शिपिन हो जाती है. तय
उप शिपिन वायु की गति को सघन करने के लिये धाहर से रम देष
| गामक यायु को मुरसेनाप से माफपंण किया जाता है मोर पिर
ये के लोश जतावसे मत जागते रा यो नहों सय am
मारान मिलता रहता है, परन्तु शापाम से इसकी भी पायरयता
नहीं रखी यह भी माल पश सोई॥
धनतर घायु जोमदा बीर में रहता किसी समय मनो
माला रासे मद का माना करता, त् पहे माने
पद वपन्न करले, शब्द दत्पन होने के कारण दो द्रव्यमा गमे एमाग
भोर दिया है, यह सयोग और पिग में प्रकारादि सर भीर
रादि संप्रन में ताarai नादि में प्रगट हे पहिले उदय से
आप उठा पर देग घट भालोनम पा लगता है तय भकार
Arrarar site ww विसार मोर और भति

१०४ घेरण्डसंहिता। संकोच भाव से प्रगट हेाते हैं, इससे स्वरों को विद्युत प्रयत्न के वर्ण को है. इसी प्रकार पहिले कठ नली के तर उपर भाग का सयोग करके पीछे वेग से यियोग करने पर कवर्ग वाले मर्ग प्रगट होते है, इसी से उसको स्पर्श कहते हैं. दोनेा हायों को बेग से एक २ के साथ सोग करने से ताली बजतीहे, इत्यादि कार्य जितने वाले है ये समधनाथ नामक वायु के हैं. मुख्य पात यद हे कि बायु एक ही है परन्तु कार्य भेदसे अपने २ स्थान पर पृथक् २ नाम धारण किये हैं ॥ सर्वते सूर्य भिन्ना नाभिमूलात्समुद्धरेत् । ईडया रेचयेत्पश्चादुधैर्यणाखण्डवेगतः ॥६॥ पुनःसूर्येणचाकृप्य कुम्भयित्वा यथा विधि । रेचयित्वा साधयेत्तु क्रमेण च पुनः पुनः ॥६६॥ पहिले ५७-५८ श्लोक में कह पाये हैं शिमूर्य की नाड़ी (नाम से दीने छेद) से यार को भायु को यघा शक्ति खींच के जालंधर बंध के परित कुंभक में धारण करे सो इस कभफ के समय कथित १० प्रकार के माणादि समस्त मायु के भेदो की, मूयं नाही (नाक के दहिने छेद) से भाग २ करके सीधे हुये , धारण र जैसा कि पहिले पह पाये हैं फिजय तक गए शोर पाले में पसीना न आये पामे से भीर उधर समान नामक पाय को उठाये, उसके मनन्तर धीरता के गार यो थेग से (पीच में रुके नदी) नाक के पाए छेद रेचन करें। मी प्रकार फिर भी उमो मूर्य नारी (दहिने छेद) से पासर्पण करके कुष्मक करे और लेभे कराये येमाही रेपग कर। इसी प्रकार पार पार का मामी के मूगं भेद मा पा ३॥ नाभी मून में .

१०५ घेरगडमंहिता। सूर्यभेद कुम्भक का फल। कुम्भकःसूर्यभेदस्तु जरामृत्युविनाशकः । बोधयेत्कुंडलीशक्तिं देहानलविबईनः ॥ इतितेकथितंचण्ड सूर्यभेदनमुत्तमम् ॥६॥ यह मूर्यभेद नामक कुम्भक जरा (बुढाई) मरण इन मा को नष्ट रता है। इसके साधन से कुगडलिनी शक्ति जाग उठती है भोर देशको मग्नि धदनाती है अर्थात् क्षुधा लगती और भोमन किपा पदार्थ पर जाता॥ तात्पर्य-गरीर सचारी जितने प्रकार के वायु गिनाय प्राये हैं और मिनसे कार्य दिपाय धाये हैं ये यदि अपने २ कार्य को ठीक परिमाण से दिया करें तो शरीर निरोग रहता है और यदि अधिक प्रमाण से या अस्त्र प्रमाण से करें तो रोग वृद्धि के चारय हैं तथा मानसिक शक्ति को पटाप के उन्हीं व्यापारों की ओर भाये रहते है। जैसे हदय का बहुत जल्द २ धकधकामा, माणको प्रधिकता है, ऐसादी वायुका अधिक यूटगा सपान के कार्य की अधिकता है, पेट का फूिनमा समान वायु बार्य श्री प्रधिकता , स्वास का मधिन घलना (दमा) मादि प्रदान के कार्य की अधिकता है. इसीप्रकार शरीर की पीड़ा व्याग से कार्य की प्राधि- ता है. गरूद २ पलकों का फिरमा कूर्म के कार्य को भधिकता है. क्षुधा वया का गधिक है।गा पा हिपकी का यहना कभर के कार्य को भघि. पता है. जमुहाई का अधिक ना देवरस के कार्य की अधिकता, वासद में कर्फशता होगा भादि धनंच के कार्य को अधिरतावा इम मनों को न्यूनता, यानी हद कम पाप, मयाम नही, पेट में मुटे. भांम न में मा दुः। म मा येत्यादिमीरोगों के लिए ६. तपा मार बम बरेवा वायु सूट

घेरण्डसंहिता
न मावे, पलक्ष न फिरें या कम फिरै हुधा तृप्ता न लगें या कम लगें,
जमुहान साचे, वा कम भावे शब्द उच्चारश न किया जाय वा स्वर मद
हो जाय इत्यादि भी रोगो के प्रकार हैं. इनसे शरीर दुखी रहता है, मन
विफल रहता, तथा मानसिक शक्ति की उत्तेजना जाती रहती है, बुद्धि
विषम हो जाती है, स्मृति नष्ट हो जाती है इत्यादि नाना प्रकार की
शांति प्राजाती है। योगाभ्यास से जैसे कि सूर्यभेद कुम्भक कह पाये
इससे तन सय प्राणादि वायू के कार्य अपने साधीन (काबू) में रहते है
चढे घटाये घई यढ़ावे, घहे बन्द करदे, चहै ठीक २ हेने दे स्पादि ।
मुख्य बात यह है कि जय इन वायु के कार्यों से कोई कष्ट प्राप्त हो तब
उक्त कुम्भक में शांत कर सका है. जैसे फिसांनी या हिचकी होने लगी
तो यह कुम्भफ करने से ट बंद हो सकी है, इसकी परीक्षा भी की
गई है. इमी निमित्त यह योगशस्त्र सय प्रकार के रोगों की एक मात्र
दिव्य श्रीषच हे अपने शरीरही में सदा यतमान दे ही दूंढ़ने की
जरूरत नहीं रहेगी। इससे योग विद्या में मनुष्यों को प्रष चित्त लगा.
ना चाहिये।
उज्जाययी कुंभक ।
नासाभ्यांबायुमाकृप्य वायुंवक्तेणधारयेत् ।
हृद्गलाभ्यांसमाप्य मुखमध्येचधारयेत् ॥६॥
याहरी यापु को नाक से दोमो वेदो मे गीच कर मुह में धारण
.पा शरीर के भीतर को वायु को भी हदप और गले के घेग गोर
दपाय से सीध कर मुरा में नमो.पायु पो साप मिलाप दे जो कि पहिले
पादर में शौच कर भरी गयं पी॥
मुखप्रक्षाल्यसयेदा कुर्याज्जालंधरंततः ।
आशक्तिम्भकंकृत्वा धारयेदविरोधतः ॥६९॥

মনি। को जब बाहरी भीतरी दोनों वायु मुख में एकर सरतम अपर से मुह घीय डाले और सम्यक् बन्दनादि करके जालन्धर बन्ध नामक मुद्रा सा- चरण करे। और जहां तक शनि रहै कुम्भा प्राणायाम के योग से यायु में धारण किये रहे परन्तु कोई विधान पढ़ने पाये बाद मुखही में रेचन करे। इसी सो बनायो कुम्भक कहते हैं । उज्जाय्यी कम्मक का फल । उज्जायीकुम्भकंकृत्वा सर्वकार्याणिसाधयेत् । न भवेत्कफ रोगं च क्रूरवायुरजीर्णकम् ॥७०॥ आमवातं क्षयंकासं ज्वरप्लीहा न विदाते । जरामृत्यु विनाशायचोज्नायीं साधयेवरः ॥७॥ उन्नायो नाम कुम्म को करके सय कार्य साधन करना चाहिये। इम कुम्भ के करने में कर के रोग नहीं होते। यूर वायु ( ख वायु का विकार) यासं, मामवाल, क्षयी, समो, ज्यर, सीदा, ये सय रोग भी नहीं सताते । जो मनुष्य का मृत्यु को बिनष्ट किया पाद यह ६५ उन्नायी को अवश्य साधन पारे । शीतली कुम्भका जिहया वायुमाप्य उदरे पूरयेच्छनैः क्षपंचकुंभकं कृत्वा नासाभ्यां रेचयेत्पुनः ॥७२॥ जिहा द्वारा यायु पंचकर यांत जो मोठा के पाहर गिलास के गोदावर लिशित साम रयर शिसे वायु भीतर की भोर गाँधे हैं.आये। HREEE म आयु की धीरे २ ४६ - १०८ घेरण्डसंहिता। । भीतर पूरण करे और जब शक्ति भर वायु खींच ले तब कुछ थोड़े ही फाल तक कुम्भक करे और फिर नाक के दोनों छेदों में रेचन कर दे यहां पर यह विवेचना भी रो कि पहिले ही से नाशिक्षा के दोनों छेदों के मूद ले त जिहा से वायु खोचे ? या नाक के छेद सुले रहैं तय खीचे ? तो ऐमी दशा पर यह निश्चय रखना चाहिये कि यह शीतली कुंभन दोनों प्रकार से श सक्ता है और दोनों प्रकार की माधना से गुण दायक हो सकता है परंतु पिना नाशिमा दवाये पर उत्तम है। शोतलो कुम्भक का फल । सर्वदा साधयेदोगी शीतली कुंभकं शुभम् । अजीर्ण कफ पित्तंचं नवतस्य प्रजायते ॥७३॥ योगी सर्वदा प्रति मय काल में जहां कहीं रहे इस शुभकारी गोतनी कुम्मक को साधन करे। :स्से अजीर्ण, कफ रोग, पित्त विकार, ये कभी नहीं नम साधक को सताय सके । भस्त्रिका कुम्भक। भस्त्रेव लौहकाराणां यथा क्रमेण संभ्रमेत् । तथावायुंच नासाभ्यामुभाभ्यांचालयेच्छनैः॥४॥ जिम महार लोहार को धींकमी मार २ उठ २३ या खीचती है तपी प्रकार नाम के दोनों रंगों में धीरे २ यायु को यार २ गाँध मोर मदर में पूर्ण.. एयंविंशति यारच हत्या कुर्याच्च कुम्भकम् । तदन्ने घालयद्वार्य पूर्वाक्तच. यथाििध ॥५॥ .

घेरण्डमंहिता। त्रिचारं साधयेदेनं भस्त्रिका कुंभकंसुधीः । नचराग नचल शमारोग्यंच दिनेदिने ७६ ॥ इसी प्रकार जैसा कि पहिले वह माये हैं योस बार वायु खोचकर फिर कभक कार जब इंभ शक्ति भर पूरा हेर जाय तब उसी प्रकार जैसा भि पहिले पानी की तरह चींचने को प्राये. उपो नाक छेदों मे वीम बार के मोकामे रेचन करें। इसी प्रकार अम भमित्रका कुंभक को | बुद्धिमाग नर तीन बार साधन करैत बमोन रोग हो . कोई केश है। और दिन २ प्रारोग्यता प्राप्त होगी ।। भामरो कुम्भक। अर्द्धरात्रिगते योगी जन्तूनां शब्दबर्जिते । कीपिधायहस्ताभ्यां कुर्यात्पूरककुंभकम् ॥७॥ जय धामी रात पीत जावे तय योगी एकान्त स्थान में आप, जहां कि किमी जीव जन्तु का शब्द न सुन पहता हो, वहां बैठ कर दोनों हायों में कान मंद डे और पूरक तपा कुंभक प्राणायाम करे ।। शृणुयाद्दक्षिणे कणे नादमन्तर्गतं शुभम् । मयमंझिजि नादञ्च, वंशोनादं ततः परम् ॥२८॥ मेधार भमरी, घंटा कांस्यं ततः परम् । तुरी मेरी मृदङ्गादि निनादानक दुन्दुभिः ॥५॥ जय प्रोक्त विधि में योगी कुंभक करेगा तब उसको ध्यान दे कर दहिने कान में मुनगा चाहिये. कम समय गरीnainite नाद है या गाई पहा, परिश्रीगु पद गुन पड़ेगा पिर पड़ी देर घेण्डमंहिता। में वंशी का मा शब्द मुन पड़ेगा, उमझे उपरान्त मेघों की सी गर्जन मु. नाई देगा, उसके उपरान्त झा का शब्द सुन पड़ेगा, फिर भ्रमरी कासा गुन्गुनाना सुन पड़ेगा, नसके बाद घटा का सा नाद सा सुन पड़ेगा, उस फे बाद मजीराका शब्द शुनपढ़ेगा, फिर तुरूही का मा नाद, फिर भेरी (नरसिंहा) फिर मृदा फिर नगाड़े का सा शब्द सुन पड़ेगा। एवंनानाविधंनादं जायने नित्यमभ्यसात् । अमाहतस्यशब्दस्य तस्यशब्दस्य याध्वनिः ॥८॥ ध्वनेरन्तर्गतंज्योतिज्योतिरन्तर्गतमनः । तन्मनोविलयंयाति तद्विष्णोः परमंपदम् ॥ एवंभ्रामरी संसिद्धः समाधिसिद्धिमाप्नुयात् ॥८॥ उक्त नाना प्रकार के नाद तभी उत्पन्न होगे जब कोई मनुप्य प्रति दिन अभ्यास करे, अन्यथा चाहे कि एकही दिनमें सुन पड़े से नहीं । उस समाहत (जिमको किसी ने नही किया बापही होता है) उमकी "द्भुत ध्वनि उस ध्वनि के अन्तर्गत एक प्रकार की ज्योति उत्पन्न होती है, उस उयोति के अन्तर्गत मन है. उसमें लए हो जाता है, वही यिष्णु का परम पद है, इसी प्रकार भ्रामरी कुम्भक सिद्ध हो जाने पर समाधि सिद्ध ६ जाती थे। तात्पर्य --अब साधक धागरी कुम्भक के योग से मांख मूद कर हृदय के मध्य में जो द्वादश दल कमल है उसको देरीगा भीर उस भगा- 87 नाद की अद्भुत ध्यान मुगा तय मन अयश्य एकाप होगा। इस ममप भारा के मूदने पर भीतर एक प्रकार की दृष्टि उत्पन्न होती है " दृष्टि में एक प्रकारको ज्योति मानुन पढ़ती है। यही ज्योति पिशु का पर पद। भास् एमी समस्या से गौर एवार की मुख्यायस्या धे हिस।। यानी अप . कुछ भी फर्क नहीं है योगी लोग उस अवस्था की इसी गरीर में बात कर परमानन्द ना किया नि एक एका पदार्थ के विका घर स्वभावही में जा मान होता है । जैसा कुछ ध्वनि में मन एमाण होला है वैसा किसी विषय में नहीं । इसी मिमित कहा है कि:- "जपादष्टगुणध्यानं ध्यानादष्टगुणंतपः । तपसाऽष्टगुणं गानंगानात्परतरंनहि" ॥ मे पाठगुमा मन ध्यान में लगता है और ध्यान आठ गुना तप में क्योकि तप गन्द्रिय दोगों को एकत्र कर देता है ध्यान जल्द पमता हो । तप से भाठगुना गान में पोकि अयण शति सब तरफ से मन को खींच लेती है। गान पर कोई भी यस्तु नहीं है को मन एकाय कर सके हत्यादि । मुख्य बात यह है कि योग विद्या का सार समाधि यह समाधि इम भ्रामरी नामक कुंपक से बहुत जल्द मिल हो तो ॥ मच्छर्श कुमक। सुखेनकुम्भकंवत्वा मनश्वभुधारतरम् । संत्यज्यविषयान्सर्यान् मनोमू सुखप्रदम् ॥ मात्मनिमनोयोगा दानंदीजायतेध्रुवं ॥२॥ मयम र यो सहित पूर्ण कथित मिधाम से कुम्भ राणापाक और मन की दृष्टि के द्वारा भादों के योध में लगा दे। और मित विषय, रूप, रस, गन्ध, स्वां यद मादि इ.सय में मन को तिर । मास के मध्य में भामा पुर नागर दिदर स्वेत कमल है नया में घेगडमंहिता। मन । संयुक्त करै । और मन मुख प्रद मूर्छित की भांति हे। जावे । और मन में योग से परमात्मा में लय हो जाय इस्से निश्चय भानन्द प्राप्त होता है ॥ केवलो कम्भक। हंकारेणबहिर्याति सः कारेणधिशेत्पुनः । पट्शतानिदिवाराती सहस्राण्येकविंशतिः ॥ अजपानामगायत्री जीवोजपतिसर्वदा ॥८३a स्वास वायु जब भीतर से बाहर निकलता है तय (ह) यह अक्षर नच्चरित देता है । और जब स्वाम भीतर की ओर खींचत ३ तन (स.) यह अक्षर उच्चारित होता है। ये दोनों प्रक्षरों का समूह एफार हजार छः मी २१६०० दिन रात में उच्चारित होता है अर्थात् दिन रात में इतने स्वास चलते हैं। इन देशनों अक्षरों का विचार तंत्रकारों ने यह किया हे कि (ह) शिव । (मः) गक्ति है । तथा (हंमः) और (माह) दोनों पद एकही यस्तु हैं । इस्स इसका भजपा गायत्री कहते हैं (आप ही भाप निकलने से अजपा है) से जोब इमको मदानी जपता रहता है । मूलाधारेयथा हंसस्तथाहिहृदिपंकजे । तथानासापुटद्वंद्वे त्रिविधंसङ्गमागमम् ॥८॥ मूलाधार अर्थात् लिङ्ग और गुदा ले मध्य भाग में हदय पदा अर्थात भमाहत नामक कान में, तथा भास के दोनों छेद अर्थात् ईसा और पिङ्गला नाड़ी में इन तीनों स्थानों से (हंमः) सूप अजपा का जप हुआ करता है । अपांत् इन तीनों स्थानों से स्थान पाय का nearn wur परता है। .

११३ धेरण्डसंहिता षण्णवत्यंगुलीमानं शरीरं कर्मरूपकम् । देहाबहिर्गताबायुः स्वभावोद्वादशांगुलिः ॥८॥ गायनेपोशांगुल्यो भोजनविशतिस्तथा। चतुर्विंशांगुली प्रस्थः निद्रायां त्रिशदंगुलिः ॥ मैथुनेपनिशदुर व्यायामेचततोऽधिकम् ॥८६॥ और शास्त्रों के हिसाब से मनुष्य का देश ८४ अंगुन का प्रमाण, अर्थात् माढ़े तीन हाय लम्बा है, परन्तु योग प्रस्त्र के हिमायने मनुष्य शरीर ६ छानये मङ्गुल का है। इस भेद का कारस यह है कि नीर शास्त्र सार सड़े मनुष्य की बराबर एक दण्ड खड़ाकर नापते हैं तो ठीक ठमी की शरीर से से होगा, परन्तु योग शास्त्रयाले पैर के अंगूठे दो यल मनुष्य को खडा घर के डोरे से नापते है और वह होरा नाक के ऊपर होकर ब्रह्मरंध्र में लगाते है जिस्से १२ चंगुल और भी बढ़ जाता है। इस्ले छानबे अंगुन का मनुष्य शरीर है। इसी लिये दि. | शेषरा दिया है कि (कर्म सक) वर्धात् अंगूठे ने ले ब्रह्मरघ्र तक फर्म रूपक शरीर है और केवल नाप वाला ते ४ अंगुन ३ ॥ प्रय गरीर से बायु को भी योग शास्त्र उतना ही लम्बा मानते हैं मितना लम्या कि शरीर । यानी ६ अंगुन पनि शरीर के अभ्य. न्तर वाना कम स्वर बायु । वदी वायु जय देव के बाहर स्थाना- विक श्वास प्रश्वाम द्वारा होता है तथ इनकी दो शरीर से बाहर बारह १२ भंगुल की होती है। यानी मुंग या माया मपान से नय पापही पाप मायु निकलता है तब के बन्न १२ अंगुल तक माता रे जय गान किया जाताहे तब कुछ देग अधिक देताहे रस्ते वह नायु मोन अंगुन तर जाता है। भोजन में नमीटर पेठता है तब भीतर से घायु दयाव के कारण वोमं अंगुम तक शरीर के बारर प्राता घेरण्डसंहिता। है। इसी प्रकार पंच (रास्ता) घलने में चोयीभ २४ अंगुन बाहर जाता है पोंकि परिश्रम से बायु का वेग बढ़ता है तो बाहर की गति भी बढ़ जाती है निद्रा में तीस अगुन तर याहर जाता है पोकि उस म- भय मानसिक व्यापार जो वायु के व्यापार को कुन य'भे रहते हैं वे शिथिल रहते हैं और वायु का माना जाना बेरोंक रहता है । मैयुन में छत्तीस सगुन शरीर से बाहर वायु जाता है, क्योंकि उसमें शरीर को समस्त नापिया का वायु कपित हो कर झोंक से निकलता है। मुख्य करके वीर्य पतन में इसका स्वरूप प्रत्यक्ष होता है। और व्यापाम, यानी कसरत, या दौड़ना, या कोई काम वेग से या मेहनत से करने पर उस्से भी अधिक्ष यायु शरीर से बाहर निकल के जाता है और यही उसका स्वरूप कहा जाता है। स्वभावेऽस्यगतेयूँने परमायुःप्रवर्द्धते । प्रायुःक्षयोऽधिकेप्रोक्तो मारुतेचान्तराद्ते ॥८७॥ स्थामायिक स्वास वायु का परिमाण केवल १२ बाहर सगुन बाहर गति में कह पाये है, सो यदि उस्से कम गति किसी प्रकार शरीर से याएर गमन में होय तो परमायु (उार) बढ़ाती है और यदि स्वाभा- यित घायु को गति उस्से (१२ अंगुल से) अधिक हो जाय तो वायु उप शती है। . पियेगा.-सामाविक वायु का पटना चिन्ता, व्याधि, शोक, मादि के समाय मे भानन्द युक्त शरीर में होता है और उसका बढ़ना नहीं चिन्ता, य्यापि श मावि में होता है. सो वायु को ठीक रसमे पाम परिमाण से याहर निकलने के लिये पगास्थनी भायश्यकता । उधर गाम, भनिन, पन्य, मिद्रा, मधुम, मायाम म म वायु बढ़ • गा । सममे भी भायु पाठ में हानि पशुपती है, पान्तु पदि गागा बोये मय का परिमाय म.शायरल किये जायें और

घेरण्ड संहिता
कुम्भक अधिक बढ़ाप दिया जाये तो आयु के पक्ष हानि न पहुंचेगी, या
भोजन को छोड़ मिलकुल न किये जावे तो और भी सत्तस है। फिर पूरा
| कुम्मा पदि भरमकै अर्थात् शत, सहस्र, वा असंख्य वर्ष तक स्वास रोक
सके तो भोजन को भी शाई आवश्यकता नहीं रहेगी। रहा गात उसमें
एचपि वायु शरीर में अधिक प्रभास निकलती है तो भी उसका एक
हमरा गुरा यह है कि नित्य के पास से कट गली मादि को नालिया
की प्रजाती हैं इससे बाहर की जो विकारी वायु प्रतिक्षण पैठ कर
व्याधि चत्पान करती है वह नहीं वहाने पाती, वही प्रायः छन र के
निश्चला करती है. और यदि विशुद्ध ध्यास शाम का उपदेश विषयक गान
होता है तो वित्त को परमानन्द प्रदान करता है।
पायाम के मिपम में भी यही बात है कि अभ्यास से नाली, पेशी,
हड्डी सब पुष्ट होती है और विचारी वायु का असर नहीं देता, परन्तु
दस मायाम के प्रसग भी इसी योग के रीति से देना चाहिये, नहीं तो
पहिले तर नाही भादि मुष्ट होती हैं किन्तु जहां बोसा भी मिrt
भीतर पहुंच के रक्त में मिला तहां तुरन्त मायु सय करता है। इससे
पूर्वोतमासनों की रीति से दी जापाम दीक है अन्यथा शरीर का
माणवायु नष्ट हो जाता है।
तस्मात्प्राणेस्थितेदेहे मरणंनवजायते ।
वायुनाघठसम्यन्ये भवेत्केपलकुम्भकम् ॥८॥
लिस्स यह सिद्धान्त है शि जय मापवायु देश में वित रहता
aषता मरणामही हेाता । इसीलिये शोर रक्षा के सम्बन्ध में उस
| प्राणवायु के द्वारा केवल कुम्भही मुख है।
जावज्जीवाजपेन्ममन्त्र मजपासख्यकेवलं ।
अझायधिसख्या विधमधलीकृते ॥१५॥

घेरण्डसंहिता। 1 अतएवहिकर्तव्यः केवलीकुम्भकोनरै. । केवलीचाजपासख्या द्विगुणाचमनोन्मनी ॥९॥ मनुप्प अब तक जीता रहे तब तक जैमी संख्या विहिन है उसी प्रकार अजपा मन्त्र जपे देह के भीतर प्राणवायु के समागम सेही कंवली कुम्भा माधित होता है, इंसने मनुप्यों का देवली कुम्भक अवश्य करना चाहिये । फेवलो कुम्भन में मजपा की मरया पदि दूगी करके अपै तो यह भनपा मग को दिन २ उन्मन अर्थात् अंधे भाव को पहुंचाती है । नासाभ्यांबायुमाकृप्य केवलकुम्भकंचरेत् । एकादिचतुःपष्टं धारयेत्त्रयमेदिने ॥११॥ नाक के दोनों वेदों में वायु को माघ को केवल कुंग का मान पर और उच्च दुभान नगय पछिठे दिन पूर्वोक्त अजपा मत्रको मस्या एम से लेकर न तक पीनट बार पूर्ण नातयता धारण किये रहे। केवलीमष्टधाकुर्या चामेयामंदिनदिने । प्रायवापञ्चधार्या यथातत्याकथयामिते ॥१२॥ प्रकार से व्यती कुम्भक फो प्रतिदिन भाठ पहर में पाठ यार करना चाहिये. अपया प्रतिदिन पांच यार साधन फरे। या घेरा भी गिप्प मे कहते हैं. जेघा कि तुम इम कहते है प्रानमध्यान्हसायान्हे मध्यरात्रिचतुर्थके । प्रिसंध्यमययाकुयो ससमानेदिनेदिने ॥१३॥ प्रातःग्न. मध्यात. मात, मध्यराति तथा रात्रिप भाग में। भपया पर भी न होम सातीनों मंध्या में शायर भाग .t. पानिदिन हम्मे कभी न पू ।

धेरक संहिता।
पञ्चवारंदिनेवृद्धिारकंचदिनेतथा ।
अजपापरिमाणंच यावत्तिद्विःप्रजायते ॥९॥
मम तर यह केवली कुम्भक सिद्ध न हो लेप तप तक प्रति दिन
या का परिमाण एक यार भषा पांच गार कम से बढ़ात जागा
प्राणायामकेवलीच तदावदतियोगवित् ।
कम्भककेवलीसिद्धौ किनसिद्धादिभूतले ॥६५॥
ME साधक देवली कुमक साधन कर लेता है वय वह यगचित
अपार योग विद्या का जानने वाला. कहा जाता है। केयली कुम्भक
सिद्ध होने में भूतन में ऐसी कोई यस्तु नहीं थाकी रहती जो सिद्ध न
भाय र कंपनी कुमक को भयश्य माधन करना तचित है।
इतिघाघेरण्डसहितायां घरगड वाडकापाति सम्वादे
घटख योगप्रकारको मायायाम प्रयोगा नाम
पञ्चमीपर्दगः ॥ ५॥
षष्ठोपदेशः।
प्रय ध्यान योगः।
स्थूलंज्योतिस्तथासूम ध्यानस्यनिविघयिदुः।
स्थूलमूत्तिमयप्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयंतचा॥
सूत्मविन्टुमचंग्रहह्म कुण्डलीपरदेवता ॥१॥

१२८ घेराडसहिता। । घेरसह महाराज प्राणायाम की विधि कहकर ध्यानयोगका प्रकरण कहते हैं उसमें ध्यान तीन प्रकार वर्णन करते है, १ स्धूनध्यान, २ ज्योनिर्यान, तपा ३ मूक्ष्म ध्यान, तिनमें धून ध्यान मूर्तिमय होता है भीत जिस देवता की मूर्ति में साधी रुचि हो वा गुरु की मूर्ति का चिन्तवन । निमुकेद्वारा तेजोमय ब्रह्म प्रपया प्रतिमा ध्यान डिया पाय उसको तेजोमय ध्यान कहते हैं। इसी प्रकार जिम ध्यान के द्वारा विंदमय ब्रह्म तथा कुपहलिनी शक्ति का दर्शन मास होता है उसको मूक्ष्म ध्यान कहते हैं। स्थूलं ध्यान की विधि। स्वकीयहृदयेध्यावेत्.सुधासागरमुत्तमम् । तन्मध्यरत्नद्वीपन्तु सुरत्नवालुकामयम् ॥२॥ साधक मासन माघ के दोनो नेव मृदसर अपने हृदय के मध्य में ऐसी चिन्ता कर मानो परमातम ममत भरा मागर वर्तमान है। और तुमी ममुद्र के मध्य में एक रवमय दीप विराजमान है। उसी रखमय द्वीप में रख रूपो थान की राशि धारोमोर ली है और पूर्व शोभा पढाय दी है। चतुर्दिनुनीपतरुवंहपुप्पसमन्वितः । नोपोपयनसंकूले वेष्ठितंपरिसाइव ॥३॥ म रख द्वीप के चारो मोर नोय के यच यहुता पुष्पों के सहित | मिसनमान से। उस नीयले पन की शोभा माना पिते की! सारे ऐमी मानुस सी। माटनीमल्लिकाजाती केशरश्चंपकैस्तथा । पारिजातःस्वटपौगंन्यामादितदिङ्मुसः ॥४॥ .

धागड महिता।
११६
उस नौध वृक्ष के दारो मोर मामती, छेनी, जूही, केशर, चम्पक,
परिजात, स्थान पर कर रहे हैं तथा उनकी मुगन्धि से दशादिशा
तन्मध्येसंस्मरेद्योगी कल्पवृक्षमनाहरम् ।
चतुःशाखाचतुर्वेद नित्यपुप्पफलान्वितम् ॥५॥
इसके अनन्तर योगी इसी रख द्वीप के मध्य में एक माह करूप
| वक्ष में धार शाखा (डात) भाग वेदों को ध्यान बलमे स्थापन कर, उम
गरे वेदमाई हाली में नित्य पुष्प (गिन्त नैमित्तक काम्य कर्म) और शुभ
कर्म के फल को प्रगटा लपी फल युक्त ध्यान करे ।
भ्रमराकोकिलास्तत्र गुंजन्तिनिगदन्तिच ।
ध्यावेत्तत्रस्थिरीभूत्वा महामाणिक्यमण्डपम् ॥६॥
उमी वेद मई शाखा के पुष्पों में समर कोकिल (भम परायण
साधुमज्जन) गूंज रहे हैं (पढ़ पढ़ाय रहे हैं) और निगगित (परस्पर उप-
देय) कर रहे हैं। सिमी वृक्ष के नीचे स्थिर भायमे ध्यान कर मानो
एक बड़ा भारी मागे का मयहप बना है मौर शोभा बढ़ाय रहा है।
तन्मध्येतुस्मरेद्योगी पर्यंकसुमनोहरम्
तत्रेष्ठदेवतांध्यांबद्यवयानगुमभापितम् ॥२॥
फिर इस मयय के मध्य में योगी २६ स्मरण र मात एक मा.
सदिय रब मय पलंग मिला कि उस पल कपर इष्ट देवता
का ध्यान कर मार गुरू ने दा॥
यस्यदेवस्ययपं यथाभूपण वाहनम् ।
तद्रूपध्यायतनित्यं स्यूलध्यानमिदविदुः ॥८॥

१२० घेरण्डमंहिता । . जिस देवता का जैसा रूप हो वैसाही भूषण और माहन यह भर | तद्रूप नित्यही ध्यान करे। इसी को स्थूल ध्यान कहते हैं । तात्पर्यः-पहिले जो धारो वेद शाखा वर्णन किया है इसे यह साफ जाहिर होता है कि योगियों के धेदिक मार्ग का प्रचार अधिक करना उचित है क्योंकि ध्यान नोटि में उसी का रूपक बांधा है ॥ प्रकारांतर स्थूल ध्यान। राहसारेमहापदने कर्णिकायांविचिन्तयेत् । विलग्नसहितंप- द्वादशैर्दलसंयुतम् ॥९॥ प्रय दुमरी भांति का स्यूम ध्यान वर्णन करते हैं । ब्रह्म में महनार मामक एक सहस्त्र दल कमल है. तहां योगी भी रूप मे ध्यान करे कि उस महा पद्म की परियों के योच जो कलि का है उसमें भी एषा द्वादश दल कमल ॥ शुरुवर्णमहातेजो द्वादशै:जभाषितम् । ह सक्षम ल व र यूं, ह स ख फें यथाक्रमम् ॥१०॥ पर दाग दाल कमान स्वेत पर्श और तेज में पक रहा है. भार नमो कमल के द्वादश दमो में कम से मागे लिखे भक्षर घोच करके येठारे । यपा:-ह. भ. प. म. सा. ध, र, यु. ४. छ, ख. फं। येही थोत्राक्षा तन्मध्येकर्णिकायांतुं नकथादिरेवाप्रयम् । हल व कोणसयुक्तं, प्रणवंतत्रवर्तते ॥१॥ मी हाय ६१ कम गध्य में लिपुरमीच ग.

घेरण्डमंहिता। य, ये तीन वर्ण, तीन रेखा और ह, ल, ये तीन वर्ण सोनागों में मिले हुये हैं, तथा मध्य भाग में प्रणव अर्थात् ओंकार विद्यमान है। नादविन्दुमयंपीठं ध्यायेत्तत्रमनोहरम् । तत्रोपरिहंसयुग्मं पादुकातत्रवर्तते ॥३२॥ योगी मप्रकार ध्यान करें मानों वहा नादबिन्दु मय एक मनोहर पोदा पिछा है, उनके अपर पहन का हा विराजमान है और यही | एक जोड़ी पादुका ( सहाहूं ) भी धरे है । ध्यायेत्तत्रगुरुन्देवं द्विभुजंचत्रिलोचनम् । श्वेताम्बरधरन्देवं शुकगन्धानुलेपनम् ॥३३॥ तहाही दो भुजा युक्त और लोग मेत्र मुझ गुरुदेय का ध्यान पर गौर उन गुरुदेव का अस्त्र श्वेत, दिश्य रूप, और भागों शुभम्रणं गाय शरीर में लपन शिये है। तात्पर्य~यहा पर गुरु को द्विभुज काह के त्रिनेत्र इसलिये कहा है कि गुरूपियशानी देना चादिय, उस सामान्य मंत्री की मछ। विधान नेत्र भी या विशेष नेत्र रहता ६ जिममें सद्भत प्रत्यत ६ral ६ आजकल जो लोग मोटो बुद्धिवालों को गुरु करते हैं यह टीम शस गुप्पमयमाल्यं रक्तशक्तिसमन्वितम् । एवंविधगुरुध्यानात स्थूल ब्यानप्रसाध्यति ॥११॥ धौर यह भी ध्यान करे नानी गुन मी ग्यास पुष्यों की माला पभिने रक्त पर्व की शक्ति के मति विराजमान प्रकार गुफ ध्याग करने में पूरा ध्यान साधित माता 4

१२२
घेरण्डमंचिता।
.
से
तात्पर्य-रक्त शक्ति समन्धित इसलिये कहा है कि गुम में किसी
प्रकार की दिलाई नहेर, रक्त वर्ण का गुण तेजस्वी योधमा ३ ॥
अथ ज्योतिर्सान।
कथितंस्थूलध्यानन्तु तेजोध्यानंशृणुष्वमे ।
यहचानेनयोगसिदि रात्मप्रत्यक्षमेवच ॥११॥
घेरणा महाराज.में कहा. हे पाखकापालि! हमने तुम
ध्याम यहा भय सेज याम से हैं तमे मुगो, जिम ध्यागसे योग सिसु
आता हे मोर भारमा भी प्रत्यक्ष दा जाता है । अर्थात् कार्य कारण
मगट हो जाता ॥
मूलाधारेकुण्डलिनी भुजगाकाररूपिणी ।
जीवात्मातिपतितत्र प्रदीपकलिकारुतिः॥१६॥
ध्यायेत्तेजोमयंब्रह्म तेजोध्यानंपरात्परं ॥
मूलाधार भात् गुप देश और लिज मूल के मध्य त्याग , कुपण
लिपी शक्ति भुजा (स) के भाकार में विराजमाम है, उसी पान
दोप शिखा की तरह जीवात्मा भी विराजमार उसी स्थान में ज्योति
छपी ग्रह का या रगा चाहिये। सोका तो याम या ज्योतिष्यांग
जाते हैं. यह ध्यान योगी परात्पर रे॥
प्रकारांतर ज्योतिर्ध्यान।
भुयोर्मध्येमनायेच यत्तेजःप्रणयात्मकम् ।
ध्यायेनालायलोयुक्त तेजोपानंतदेयहि ॥१७॥

घेरण्डसहिता। पर प्रहार योनिध्यान कपर फह भाये अब दूसरे प्रकार का ज्योतिर्ध्यान या कि दोनी मोड़ो के बीप, सया मन के कपर (मान- सिंग क्रिया के भी ऊचे दर्जे पर) भी ठोकार मप, शिखा माला समन्वित याति वर्तमान रहती है उसी ज्योति बलशान से ध्यान करै । इस से भी लेनाध्याम बा ज्योतिध्यान करते है। तात्पर्य - योगी गोमो चीप मन लगाकर ध्यान करते wীয় মর্যয় দা সুন্নাত জৰ গাৱ নয় বধু গলা ক্ষায় বা ময় को ही देता है. फिर कुछ काल में प्रणय गन में रहता है सही पर सोमपोशाता है. ना उस मव्य की दृष्टि और प्रणय को पिना मे मा को जपी गति के HIIT में प्रतिभात होता वही ज्योति शाम है. इसके पान से मनुष्य के शरीर में कोई भी विकार नही रह ते निर्मल मन भी प्राप्त होता है। अथ सूक्षम ध्यानम् । तेजोध्यानंश्रुतंचण्ड सूक्ष्मध्यानंबदाम्यहम् । बहुभाग्यशादास्य कुण्डली जागृताभवेत् ॥१८॥ घेरपा महाराज कहते हैं दे पापान्ति । तुमने तेयान सुना अब हम दुनमे सूक्ष्म ध्यान कहले ई बद भी मुने । जिस मनुष्य को कुण्डलिनी शागती है वह यशही भाग्यधान है। प्रात्मन सहयोगेन नेत्ररधाद्विनिर्गता। विहरेगाजमार्गच च लत्वाचदृश्यते ॥१९॥ यह कुगलिनी शक्ति जप की किसी प्रकार भाग्य बस जागती है तब भी या नेत्री के छेदों से निकल कर मामा के साथ मिल के राज

१२४
घेण्डसहिता।
मार्ग में विहार करने लगती है और ऐसी पञ्चागता धारण करती है कि
फभी किसी प्रकार भी नही देस पहतो ॥
शाम्भवी मुद्रयायोगी ध्यानयोगेनसिध्यति ।
सूक्ष्मध्यानमिदगोप्य देवानामपिदुर्लभम् ॥२०॥
जय कुपडगिती पू; विधियो ने कदाचित् जागे और चञ्चन हे।
राम मार्ग में घिरे तय चोगो उसे पूत्रांत शाम्भवी मुद्रा के योग मे
ध्यान धरे तो तुरन्त मिद के पान में माजावेगी । यह मूक्ष्म ध्यान
परम गोप्य दे और देयतामो को भी दुर्लभ है ।
तात्पर्य--पीछे लिस पाये है कि महग्निनी शक्ति शरीर महता
फा प्रपका और उनका नागना उता विनाश हो शरीर का भात्मा
यश में देता है। माय अनेक योगी तोग शरीरको वश में लार भी
योग विद्या के महान २ कार्य नहीं करते पर नेत्र इन्द्रिय के द्वारा चित्र
पिचित पदार्थो के देखने में रागी २ फिरते और गृहस्थी का गाल
घामत । इमोसे कहा है कि उसने पपुलता से होगी जन उसले रुप
के घिर गदी करमाले, भयात् गरीर के यम देने का कार्य नहीं प्रगट
फार माने, उपी के अभ्याम लिये, जिससे कि शरीर वीभूत देने के
उपरात याले कार्य योगी नाग किया करें शामयी मुद्राने येग में सिद्धि
दांपा है । अपांत् फिर मागेर प्रपपार न कर सो मारोग थे।
फर या दीर्घायु मादि कार्य दिगाम दे कि युग युगातर तक योगियो
एस्पिति योग गायों में शिणी थे। परन्तु यह भय यही दृन युति में
.
स्थूलध्यानाच्छ्तगुणं तेनाध्यानं यज्ञते ।
तेजोध्यानालज्ञगुण, गूमधानपरात्परम् ॥२३॥

धेरगडसंहिसा। १२५ भूल ध्यान से सौगुना अधिक तेजो ध्यान कहा जाता है और at पान में लाख गुना अधिक सूक्ष्म ध्यान है तथा यह ध्यान परे से भी पा है। पड़ महाराज ने इतितेकथितगड ध्यानयोगसदुर्लभम् । प्रारनासाक्षानुभवेदास्मात्तस्माध्यानविशिष्यते॥२२॥ कहा कि हे चकापालि ! हमने तुगमे इस सु- दुर्लग ध्यान योगका ब्योरा कहा, मिस्से शि आत्मा भाक्षात् कार होता है। और इसी कारणा ध्यान योग सब प्रकार के योगो से विशेष है ।। इतिश्रो धेण्ड विवायां घेरण्ड , चण्ड कापाणि सम्बादे, घटस्थांगे, सप्तम साधन, ध्यानयागे। नाम घछोपदेशः ॥ ६ ॥ । अथ सप्तमोपदेशः। समाधि योग । रामाविश्वपरयोग बहुभाग्येनलभ्यते । गुरापामसादेन प्राप्यतेगुरुभक्तिः ॥१॥ पेगह माहा ने चराहकापानि से कहा कि मुन्न योगो मे परे म. माधि येग परन्तु यह बहुत ही पडो भाग्य से प्राप्त दाता है। माधि योग गुरु की गति करने पर प्रब गुरसन्न होते है हम उगपी कृपा से प्राप्त ता दे अन्यथा गाहों। घर १२६ घेण्डसंरिता। विद्याप्रतीति.स्वगुरुप्रतीतिरात्मप्रतातिर्मनसःप्रबोधः । दिनदिने यस्यभवेत्सयोगी सुशोभनाभ्यासमुपैतिसनः २ जिम मनुष्य की प्रतीति विद्या (योग घिद्या) में , अपने गुरू प्रतीति है और अपने मामा में प्रतीति, सपा मन का प्रयाध (दृढ़ विश्वास ) है वेही योगी दिन २ मति मुन्दर अभ्यास की गई। सो बहुत जल्द प्राप्त होते हैं। घटादभिन्मनाकृत्वा ऐक्यंकृत्वापरात्मनि । समाधिंतद्विजानीयान्मुक्तसज्ञोदशादिभिः ॥३॥ शरीर से मन कोमलग करके सबमे परे जो परमात्माई उसमें ए. बता कर दे.सीको समाधि जानना चाहिये, पर भवस्था सघ प्रहार की दगा भादि मयस्थानों से मुह संशक है। तात्पर्य-इसके पूर्व दूसरे लोक, विद्या विषय प्रतीति सहसाये है उसका मुख्य तात्पर्य यह है कि किसी विद्या की साधना यदि किया पारे भीर उममें प्रतीति नरेत पास में शितकभी नहीं लगेगा। ग पिये प्रथम या भावश्यक है कि विद्या विषय प्रनीति लावे, वि भामु विद्या के जो भदुत र कार्य वर्णन किये गये ६ वे माधनसे अवश्य मफेगे । यदि पहिलेही या उपेक्षा हो गई शिव गोर मानी है तो को किया ठीक ही नहीं सकेगी। दूसरी मास गुरु में प्रतीति मरान विद्या मित्राने याले में यिश्याम रहमा चाहिये, यदि पहिलेको मे पर वृद्धि उत्पादन लिपर कुछ नहीं मिलाय सकेगा तो मीलिये पनि हो जाये कि मिलाने या की परीक्षा घर छे तब का गुर करे तात्पर्य यह नि परीक्षा लो मे पाद उपमें मप्रतीति दो लोहिये। तीसरी बात माम प्रतीति सत् सपने पित में पग १ मिमुकाम हम नही पगा। ऐगा चित घेरगडसंहिता १२५ में माने से कोई भी कार्य नही हो सके यही कारण है कि भाभ भारत बासी गया किसी विद्या को नहीं मत्तम रीति से प्राप्त कर मुक्त, सत्र में पूजा गरी सो कारण योग विद्या भी लुप्त होगी, साधक को ऐसा नहीं करना चाहिये। अंगरेज लेगा में यह दूर है कि कोई शक्त कोई नई विद्या की प्रगरता करमा पार करता है और यह सका ठीक सत्य नहीं हासिल कर सका तो उसके पुत्र पौत्राति फाई (पुरुष तक चारते नहीं कोई न कोय प्राप्त करके सष करते है । दूता स समय रेल सार, एही मादि के अद्भुत र व्यापार हम गो को दिखाय इससे अपने पित्त की कमी नहीं दाना चाहिये। चौथी बात मन का प्रयोधपोत समझदासी भी अवश्य दानी चाहिये नही और की जगह तील बायगा। ये बात जिसमें नहीं का प्रयास दिन दिन धरता और सनी को सिद्धि प्राप्त इसी ६॥ मागे समाधि का जो रापण कदाकिशोर से मना भित्र करके परमल में मिलाय दे उसका तात्पर्य यह है कि जो प्राय सुख दुख आदि शरीर के धर्म प्राप्त कर मन को माहादित और व्यषित करते हैं, उनके माम प्रयाध (जान को हरता) से यह समझ ले भाग केवल शरीर को लिये सुख दुख में मन को नही । जैसे कि भगुली में फेोश हुमा त मम की दृववा से न फोडे की पोसाको सिफ अगुणों ही में समाना मन से उसे लगान ना. ऐसा भश्चर देखने में भी माता है कि यह प्रधान मनुष्य के शरी में कोई पोरा दुई ता भारे घिसाइट के माप दुखी और कुल कुटुम्ब देखा परेको भय को ध्यया पहुचाता है लेकिन बहुत से दुर्मन मनुष्य को देखा गया है कि वे उसे भी अधिक पोशित होने पर भी अपने दुखी कुल कुटुम्मियों की धीरज देकर इनकी पहर को शामिया काते है। ऐमी भयभर में विशेष मान के प्रयोग की जरूरत है जिससे मन को शरीर से पप

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घेरण्डमंहिता।
समझ कर परमात्मा में लगावे । अर्थात् शरीर इन्द्रिय इनके कार्य है।
रहैं. ननमें शुभाशुम का ध्यान मात्र रहे, पर माने मन उसमे दूर है यह
भावना ग्यो । यस यही समाधि है। यह समाधि बहुत ही कठिन
माधन है । बड़े र योगारद पुरुषों के ठन मन में छू नहीं जाता और
साधारण मनुष्यों में ईश्वर की कृपा से स्वभाव ही मिदु देखा जाता है,
ठमी को गन्मान्तर का साधन कहते हैं। परन्तु जो कोई इसका साधन
दृढ़ता से करेगा अवश्य फल प्राप्त कर सता हे स्से परे दूमरा भानन्द
और मुह मनुष्य के लिये कोई भी नहीं है। इस्से इस प्रयश्य साधन
करना चाहिये ।
अहंब्रह्मनचान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहनशोकभाक् ।
सच्चिदानन्दरूपोऽहं. नित्यमुकस्वभाववान् ॥४॥
ना माधक सप्र मापन यास कर चुका हो गौर समाधि
माधन किया चाहे या अपने मन को इम ज्ञान को भोर सदा माये
कि. में प्रल हूं दूमारा कुछ नहीं। और निघप करके पन हूं किन्तु ।
ममस्त व्याधि जनक गोक हुभा करते हैं तमका भागी में नहीं हूं. कंबल
शरीर है । मैं तो फेवा मत (तीन काल में एक भमाम) चित् (मत् भ•
पत् का मानने याला घेतन्य) घानन्द रूप (मुरादुर विगत ममम ए
भीमा) मय ययनों में नित्य ही छूटा हुमा भपने अमली भारों में युक्त
(यसामगानी) हूं एमी हो भायमा सदा दित्त में रक्त ।
प्रय समाधि के कई भेद हैं उनका वर्णन
करते हैं; यथाः--
शभिव्याचैवसेना भ्रामायोनिमुद्रया।
ध्यानंनादरसानंदं टयसिद्धिश्चतुर्विधा ॥३॥

संहिता १२६ पञ्चधाभक्तियोगेन मनोमूचिपविधा । "पविधीयंराजयोगः प्रत्येकमवधारय ॥६॥ समाधि योग छ प्रकार से है जैसे-१ ध्यास योग ममाधि । २ नाद योग समाधि, ३ रमानन्द योग समाधि, लय मिद्धि योग समाधि, ५ भक्तियोग समाधि ६ रागयोग समाधि। ये प्रकार की समाधियों को प्रकार की मुद्राभो से साधन करना चाहिये । सामयी मुद्रा से ध्यान { ममाधि, सेघरो मुद्रा से नादयोग प्रमाधि, भ्रामरो नाम कुम्भक के वेग से चान्दयोग समाधि, योनिमुद्रा के पोग से लय समाधि, भक्ति सवलय पूर्व भक्ति योग समाधि, सी प्रकार मनो भूळ मामा कुम्लक के योग से सजायाग समाधि का साधन करना चाहिये ।। ध्यानयोग समाधि। शांभवीमुद्रिकांकृत्वा प्रात्मप्रत्यक्षमानयेत् । बिंदुब्रह्मसकृदृष्टा मनस्तत्रनियोजयेत् ॥७॥ प्रपल शाभयमुद्रा का अनुष्ठान करके तध भामा प्रत्यक्ष भनन्तर बिन्दु मम ब्रल हा एक बार दर्शन करके यहीं मम को | नियुक्त करे। स्वमध्येकुरुचात्मानं आत्ममध्येचखंकुरु । प्रात्मानंखमयंदृष्टा नफिचिदपिवाधते ॥ सदानन्दमयोभूत्वा समाधिस्योभवेन्नरः ॥८॥ तर शिर स्थित प्रहलेकमय भाग मे मध्य में अपने जीवा. |मा को स्थापन कर और मा प्रकार अपने जीवात्मा के मन में शिर स्थित बलेकमय भाकाश.करी स्थापन करे, पचात् घपो जीवात्मा १७ . घेरण्डसंहिता। को आकाश में देख के वह पुरुप किसी वस्तु से किञ्चित् भी बद्ध न हो और सदानन्द मय हे। के समाधि में स्थित हो जाये इसी को भाम योग समाधि कहते हैं। नादयोग समाधि। साधनातखेचरीमुद्रा रसनार्द्धगतासदा । तदासमाधिसिद्धःस्या द्वित्वासाधारणक्रियां ॥९॥ खेचरी मुद्रा साधन के द्वारा जीभ को ऊपर की ओर जानेवाली फार रपसे, अर्थात् तलुवे के गड्ढे में जो अमृत कूप विद्यमान है उसी में जीभ को सयुक्त करना होगा ।म क्रिया के द्वारा समाधि सिद्ध हे। जाती हे और जितनी साधारण क्रियायें हैं सब को छोड़ दे इसका नाद मोग समाधि कहते हैं । रसानन्दयोग समाधि । अनिलंमन्दवेगेन भ्रामरीकम्भकंचरेत् । मन्दमन्दरेचयेद्वायुं भृगनादंततेाभवेत् ॥१०॥ धामरी नाम कुम्भक का मन नि करके, धीरे धीरे हलके घेग से नाम यायु को परित्याग कर, हम योग के मापन करने से देह के भीतर भ्रमर की ध्यमि के समान नाद मुन पड़ता है । अन्तःस्थंभ्रमरोनादं श्रुत्वातत्रमनोनयेत् । समाधिर्जायतेतन प्रानन्दःरोहमित्यतः ॥११॥ जप गरीवर अमरीका माद मने तय यहीं बहा मन परता ।

घरगडसंहिता। और अपने मन को लगाम दे, तब उस समय समाधि प्राप्त होती है भोर तुष्ट समय के भासन्द से 'सह' (यही ब्रह्म मैं हूं) यह भाग उत्पन्न हेता है, इसीको नादयेर समाधि करते है। लयसिद्धि समाधि। योनिमुद्रांसमासाद्य स्वयंशक्तिमयोमवेत् । सुङ्गाररसेनेत्र विहरेत्परमात्मनि ॥३२॥ भानन्दमयःसमूत्वा ऐक्यंब्रह्मणिसम्भवेत्। प्रहनोतिवाद्वैतं समाधिस्तेनजायते ॥१३॥ योगी पुष्प मम योगिमुद्रा का अनुमान करके सपनेको लिमय मान लेवे, अर्थात् अपनेक मत्री और पामेश्वर पुरुपवरूप अनुभवकर अमन्तर मनही मन में ऐसी भावना कर माने पुरुष स्वरूप परमात्मा के माथ सो स्वरूप प्राप शृङ्गार रस सम्बन्धी विहार कर रहे है। उसके अनन्तर यह भी अनुभव करना गा माने या बिहार के जो परमानन्द र उत्पन हुआ है उनी रस ने मै निशान हो के परमल के सहित अभिक्ष भाव में प्रयाय में सम्मिलित हुमा हू। इसी योग के द्वारा "मैं ही ब्रल पी अद्वितीय हूं। ऐसे विज्ञान का मञ्चार होता है, इसी समाधि को लय सिद्धि समाधि कहते हैं । शा:--पक्ष प्रा पुरुष अपने स्त्री अनुभव को यह बात विचार काटि में भट्टी सी मालुम पाती है। फिर इस समय की नवीन शिक्षा की कसौटी में और भी महा निषिद्ध अँधेगी। परन्तु चेरयड म- हाराज ने मनुष्यों को विषय बासना को मध्या तर जान सग FY मास का मासिकार किया है। समाधि प्रकार की असो निमित दिखाया कि मनुष्यो को ति मत प्रकार को होती है। कोई

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घेगडसंहिता ।
सद्दाह स्वभाष सदा वीर रस में मत्त रहते हैं २ कोई शांत स्वभा
सदा भजन पूना में रत रहते हैं। ३ कोई उदामीम स्वभाव सदा स
तरह के माया से दूरी बने रहते हैं उन्हें कुछ भी नहीं सुहाता ।
कोई ऐसे भी पुरुष हेाते हैं कि उनको स्त्री संसर्ग, स्त्री चिन्ता स्त्री ।
पव समझना, यही भच्छा लगता है । ५ कोई पुरुष ऐसे होते हैं कि उन'
साथ घोड़ा भी सपकार करें तो वे उसकी बदली भाताद में तन अप
किये रहते हैं। ६ कोई ऐसे पुरुय होते हैं जो मदा न्यायमें रत रहते ।
न्याय हो के लिये शरीर तक परित्याग कर देते हैं। इन छ: प्रकार
पुरुप ध उक्त छः प्रकार की समाधि साधन में लगेंगे तब उनके व
प्रकार के बसाय से : प्रकार की क्रियाओं का अभ्यास होगा और
जिसमें जिम स्वाध को अधिकता.शगी अर्थात् स्वभाव की अनोपंत
से कमी २ जो हानि हुमा करती है, जैसे मर्यादा में अधिक वीर रस
वाले ने कदाधिन फुल कुटुम्य माता पिता के साप मारता चरितार
किपा । शांत रस वाले ने भायश्यक कार्य छोर भजन पूजन में चार
पिताय दिया। उदामीन वाले ने शारीरक व्योहारों में हाथ धोया ।
स्त्री प्रेमी ने माम्य तर्फ न बचाया । शत पुरुप ने किसी पूतं हे मस
को मियेक सो दिया।
न्याय परायण ने पाय मुजको न समास सो
में तम मपंग किया । इत्यादि फुयापार मही प्राप्त हो सकेंगे। विशेष
पात गहां पर पा स्माए रहे कि जय स्त्री परायण पुरुष ईश्वर के मु.
नियम स्त्रो भाय का अभ्याम् tir ar मी या प्रकृति पोरे २
पदम पर दूमी मोर जायेगी। यह मी निमित्त या योग इस
भांति मिला॥
भक्तियोगं समाधि।
स्वसोय हृदये. ध्याये विटदेव स्वरूपकम् ।
चिन्तपेभक्तियोगेन परमाहाद पूर्वकम् ॥१४॥

घेरण्डमहिता । १३३ प्रानन्दायुपुलकेन दशाभावःप्रजायते । समाधिःसम्भवेत्तेन सम्भवेच्चमनोमनी ॥१॥ विशुद्ध भक्ति और परम माहाद के सहित अपने हृदय में अपने इष्ट देव के स्वरूप का ध्यान करे और मानन्द के भान यई, तथा रोमांच हो और बेहोसी भागा। स्से जो समाधि अर्थात् मन की एकाग्रता हाती है उस्से मनान्मनी अर्थात् मन का खुलासापन हो जाता है इसी को भक्तियोग समाधि कहते है ॥ - राजयोग समाधि। मनामूछौंसमासाद्य मनग्यात्मनियोजयेत् । 'परमात्मनःसमायोगात् समाधिसमवाप्नुयात् ॥१६॥ मथम मनेा मूर्ना नामक कुम्भक का नुहान करके मन को पा. मात्मा के सहित मिलाय देसी प्रकार परमात्मा के समाग से समाधि माप्त होती है। जो हो राजयोग समाधि कहते हैं । समाधि योग का महात्म । इतितेकथितंचण्ड समाधिमुक्तिलक्षणम् । राजयोगःसमाधिः स्यादेकात्मन्येवसाधनं । उन्मनीसहजावस्था सर्वचैकात्मयाचकाः ॥१७॥ परपा महाराज कहते हैं कि चाकावालि ! मैंने तुम मे हम समाधि मोगका कहा जा मुक्ति का लक्षण है। अद्य मुख्य बात यह बताई कि राजयोग, समाधि है, चाहे मी पाहे समावस्या . 1 धेरगडसंहिता। के कोई भी योग हो मग एकही प्रारमा के बाप है मौर मब का माधन प्रारमा की एकाग्रता है अर्थात एक रस ध्यान का लगाना है। जलेबिष्णुःस्थलेबिष्णुः विष्णुःपर्वतमस्तके । ज्वालमालाकलेविष्णुः सर्वविष्णुमयंजगत् ॥३८॥ ऐमा कोई स्थान नहीं है जहां विष्णु परमात्मा न हों। जल में विष्णु हैं, घर में विष्णु हैं । पर्वत के मस्तक पर घिष्णु हैं । अग्नि की राशि में भी विष्णु हैं, यह सम्पूर्ण जगत् विष्णु भय है । अर्थात् कोई पदार्थ विष्णु से भिन्न नही है । भचराःखेचराश्वामी यावन्तोजीवजन्तवः । वृक्षगुल्मलताबल्ली तृणाझाबारिपर्वताः ॥ सर्यब्रह्मविजानीयात् सर्वपश्यत्तिचात्मनि ॥१९॥ भूपर मर्यात पृच्चिपर विधरन करनेवाले जीव खेचर अर्थात् माकाश में चलनेवाले जीव । और भी जो ये सब जीव जंतु देख पढ़ते हैं। तथा बढे २ वृक्ष, छोटे २ पौधे लता, माली (एक हाल वाले लबे छा) वृष आदि समस्त घाम, पानी, पहाड रन सघों के ब्रह्म जानना शाहिये और सौर सत्रों को अपने प्रारमा में देखना चाहिये। प्रात्माघटस्थचैतन्य मद्वैतं शाश्वतंपरं । घटाद्विभिन्नताज्ञात्वा बीतरागोविधासनः ॥२०॥ पसी शरीर स्थित नाजीवांधमा है वह चैतन्य और अदितीय है (एकदो घाटु व्यापा) मह निरन्तर रहता है कभी नाश को नहीं प्राप्त शेमा । तथा सय पदामे पर है। हम गरीर में अलग मानने को में शोनराग ( बन्धन से मुक्त) और पामना रहित भाय प्राप्त होता है । . .

घेराइसहिता। १३५ एवंविधः समाधिःस्यात् सर्वसहल्पवर्जितः । स्वदेहे पुत्र दारादि बांधवेषु धनादिषु ॥ सर्वेषु निर्ममोभूत्वा समाधि समवाप्नुयात् ॥२१॥ जैसा कि कह आये इसी प्रकार समाधि साधन करना चाहिये, इस समाधि के साधन में सब प्रकार के सङ्कल्पो को छोइ हुना चाहिये । किस विषयमा सङ्कएप छेहना चाहिये. इसपर कहते है कि अपनी देह के विषय में, पुत्र दारा भादि के विषय में, वायू बाधने और पन भादि के विषय में, तथा सम पदा से मसा छाइभर मुमाधिका माप्त ka । तत्वंलयामृतं गोप्यं शिवोक्तं विधितानिच । वाशांसंक्षेपमादाय कधितं मुक्तिलक्षणम् ॥२२॥ पद तत्व लपामुत है मर्यात ईश्वर में लय है जीवन मरण ही पर है। के मोक्ष प्रामि का समय है, इसी महादेव जी ने यहुत प्रकार से बदर है, परन्तु इमने उन सबो में से मक्षेप लेकर कहा, कहा यही प्रधान मुक्ति का लक्षण है। इतिते कथितं चण्ड' ! समाधि दुर्लभःपर । पज्ञात्वा न पुनर्जन्म जायते भूमिमण्डले ॥२३॥ धेरपट महाराग ने कहा हे धमकापालि। हमने तुमसे दुर्लभ श्रीर सय मेग में पर समाधि को समर कहा बस, Taमाहो पात, शिस सजानने में भूमि मारनमें मिल जन्म नहीं शतामयात् सन्म मर यन्धन से मुक्ति हो जाता।

घेरगडमश्तिा। उपसंहार ॥ योग विद्या और वैद्यक शास्त्र में कुछ भी फर्क नहीं है, पयोंकि पाठकों के मादि से अन्त नो पम घेरगत महिता के सहिताके माधना का विधार भनीमाति विदित हो गया होगा कि शारीरक आधार (सन• दुरुस्ती) ही इसमें प्रधान साधम है। इसी प्रकार वैद्यकमें भी शारीरक प्राचार की व्यवस्था सर्वज वर्तमान है, फिर प्रध पाप कह सके हैं कि ये ग और वैद्यक से कोई भी फर्क नहीं रहा । अन्त में मुक्ति भी दोनों शास्त्रों का धन सिद्धान्त है, में वैद्यक का सिद्धान्त "धर्मार्थकाममेक्षिा• णामारोग्यंमूलमुनमम्" अन्त में मोक्ष पद दिया, सुमी प्रकार एस योग में भी हर जगह आरोग्यता दर्शाय के मात में समाधि साधन का फल शिखा दे कि "न पुनर्जन्म मजायते" बस इसी निमित हमने अपने हम भारोग्यदर्पण के चतुथं सपा में इस अनूपम योगविद्या साधम दिखाय के अपने पाठकों को परिश्रम दिया कि वे भाप इन साधनेासे फायदा नठा और समार का भी पक्षार परस्पर कथोपकथन से करें, मस हमारा भी परिश्रम सफम्न है । इति ॥ घेरण्ड सहिता योगशास्त्र की भाषा टीका समाप्त । .

घेरण्डसंहिता का सूचीपत्र। पृष्ठ विषय भामाधन पटकम्म पृष्ठ । विषय ६ वातक्रम कपालभाति व्युत्क्रम कपालभाति शीतकम कपालभाति श्रासन विधि सिद्धासन १० पद्मासन ११ भद्रासन ११ मुक्तासन १२ यजासन १२ | स्वस्तिकासन, ३१ सिंहासन १३ गोमुखामन ३२ ३२ अन्तरधीतिः बातसर: यारिमार: | अनिमार वरिष्कृतधौति मक्षालनम बहिष्कृतधोतिः प्रयोग दन्तपोति दन्त मूलधीति दन्तधोति का फल जिहाशोधन हामनधोति कर्णधोति कपालरंध्रशोधन हत्यशोधन दापोति बमनधोति पिवेचना यामधोति ནུས་ན་ बस्ति प्रकरणम् जनयस्ति की विधि यस्ति का फल स्थम्नस्ति नितियोग लोलिको योग फोटक याग १३ बोरासन १४ धनुरासन १४. मृतासन १६ गुप्तामन १६ मत्स्यासन पश्चिमोत्तानासन मत्स्येन्द्रासन गरक्षामन १७ १८ १८ उत्कटासन १. सङ्कटासन २. मयूर मन २२ कुधकुटामा २१ कामम २१ / उत्तानफूमापन नत्तानमयडूकासन २३] यक्ष सन २३ मंडकामन २४ गाहामम २३। वृपामम ३६ ३८ . पालभाति योग बिषय पृष्ठ | विषय पृष्ट शलभामम ७५ मकरामन 5 ३८ भुजगिनी मुद्रा ३८ चतुर्थोपदेश । ३ प्रत्याहार कथन पञ्चमोपदेश । प्राणायाम विधि स्थान निर्याग ४३ काल निर्णय ४० वासन भुजगामन योगासन मुद्राकथनम् । महामुद्रा नभीमुद्रा उड्डीयानवन्ध जालघरबन्ध ५९ 23 २ ४४ मिताहार ४४ नापी शुद्धि ४६ | मूर्यभेद कुम्भक ४७ | उज्जापी कुम्भक ४० शीतली कुम्भक Yeभस्त्रिका कुम्भक ५० भ्रामरी कुम्भक ५९ मा कुम्भक ५३ केवली कुम्भक १०१ १०८ मनवन्ध महाबन्ध महावेध खेचरी मुद्रा विपरीति करी मुद्रा | येनिमुद्रा योनिमुद्रा का फल बजोगी मुद्रा योगी मुद्रा का विशेष फन गतिघालिनी मुद्रा सपागी मुद्रा गहु की मुद्रा शामधी मुद्रा पवधारमा मुद्रा प्राधिवाधारमा मुद्रा श्रीम्भमीधारण मुद्रा भाग्नेगी मद्रा बापचीपार मद्रा धारण मुद्रा १० १२२ १२२ पष्टोपदेश । ५८ अथ ध्यान योग ६० स्थूल ध्यान की विधि प्रकाशar स्थून ध्यान ज्योतिान प्रकारातर ज्योतिध्योग हा मूक्ष्म ध्यान सप्तमोपदेश। ६८ माधि योग ६ समाधि के कई भेद 9. ध्यान योग समाधि '७१ | रसानन्द योग समाधि २ नादयोग ममाधि ०३/ लय मिद्वि गणाधि २४ पतित योग समाधि ७४/राम ममाधि १२० गायनी मुद्रा पागमी मुद्रा काकीदा मासगिनी

Gherand Sanhita

Author
Sharma,jagganath
Title
Gherand Sanhita
File name
Gherand Sanhita
Text
OCR done
Citation
1899
Published
2012/08
Publisher
Prayag.,dharmik Yantralay
Language
Sanskrit
Pages
157
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311622
Barcode
99999990320491.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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VMLT id
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