Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Pakarn Ratnakar-anukmanika
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प्रस्तावना. श्रा पंचमकाल समाप्तिना अवसरे ठेला दुप्पसहनामा आचार्य थशे. तेमना नि णसुधी जिनधर्मरुप मानससरोवरना साधु, साध्वी, श्रावक तथा श्राविका ए चतु विध संघरूप चार थारा खुला रहेवा जोयेते. एवं परमेश्वरनु वचन ठे. कदाचित काल ना प्रवल प्रनावथी कोई समये कोई धारो न्यूनता पाम्या जेतुं थाय तोपण वाकीना चालु रहेला वीजा आराने प्रनावे समय पाम्याथी ते थारो पण सुधरी जाय वे. था समयमा पूर्वना समयना करतां घणी न्यूनता थई गएली दीवामां आवेठे. च तुर्विधसंघमां साधु तथा साध्वी तो क्वचितज दीवामांधावेठे थने श्रावक तथा श्राविकायो पण अल्प अस्तित्व ले. तेश्रोनी कपरज धर्मवृद्धि प्राधार राखे . धर्म वृदिशाननीत दिथी यायठे. माटे ज्ञान वृद्धि अवश्य करवीजोय. ज्ञाननी वृद्धि ज्ञानना साधनोनी वृद्धि ऊपर थाधार राखेठे. ज्ञाननां साधनो पूर्वाचार्य कृत ग्रंथोनो जीर्णोधार तथा य वलोकन, विद्यान्यास, उत्सुकता, धर्मप्रीति, अनिरुचि, तथा उद्योग प्रमुख . पूर्वाचार्योकृत ग्रंथोनो जीर्णोधार कसाथी ते समयना पंडितो, पांमित्य जाण्या मांधावे ; मनुष्योनी धर्मकपर केवी रुचि हती ते जणायठे. नूत कालथी ते था वर्तमान कालसुधी वचगालामा धर्म तथा वित्ता प्रमुखनी केटली अधिक न्यूनता थई रे ते दीनामां थावे. पूर्वाचार्यो यति श्रम वेती विद्यान्यास करी मोटा मोटा ग्रंथोनी रचना करता हता तेनो हेतु मात्र धर्मवृद्धि यथवा ज्ञानवृद्धि विना वीजो कोई द तो के गुं ते वात स्पष्ट देखाई थावे. ग्रंथनी रचना कस्यामां केवल परोपकार विना वीजो काई पण स्वार्थ होय के ? ते कलाय ते. पूर्व कालना करता हालना वखतमा विद्यान्यासनो उद्योग केटलो थधिक थथवा न्यून थयो ? ते जण थावे. इत्यादि क वीजा पण घणा हेतु दीगमां यावे. माटे अवश्य प्राचीन ग्रंथोनो जीर्णोद्धार करवो जोयेले. केमके, ए ज्ञानवृधिनु मुख्य साधन . जो पुरातन ग्रंथोनो जीर्णोक्षा र नही थाय, तो कालांतरे विछेद थई जवानो संनव . थने ते, थएखं हाल दीवामां यावे,जवों के दरिनसरिए चौट शे ने चुमालीश ग्रंथो करया , तेवधानो जीर्णोडा र नही थयाधी तेउमांना केटलाएक ग्रंथोनो हाल पत्तो पण मलतो नथी, एवा वी जा पण अनेक सुविहित थाचार्योना करेला ग्रंथोनोशोध मलीशकतो नथी तेनुं कारण पण एज वे. ते केटलुं लखिये! यद्यपि मारूं एम कहेवू नथी के थाज दिवससुधी को ए ग्रंथोनो जीर्णोधार कखोज नथी, मोटा राजाउ तथा सद्भुकारो वगरे घणा ज्ञान ३ नमारा करी गया ते अद्यापि विद्यमान , थने तेथीज हाल केटलाएक पुरातन अथोनु थापणने दर्शन थाय तथापि मात्र दर्शन करवायोज कोई वलगनु नयी,प ए योग्यरीते उपयोग करयाथी कार्यसिदि थवानो सनवठे जेम पूर्व धर्मानिमानी रा जा वगैराउए ज्ञान नमारा करयाचे तेम पाठल थयु नथी ए मोटी दिलगीरीनी बात ठे जो एवो चालज पडी गयो होत तो एके ग्रथ विछेद गयो न होत थने थाटली झाननी न्यूनता पण थई न होत जुवोके, देरासरनो जीणो-चार करवानो चाल पड़ी गयो तो तेनी सतति विच्छेद गएली देखाती नथी तेमज अथोविपे चाल पडवो जोये केमके अयोनो जीर्णोधार तो ज्ञाननी वृदिनु एक मुख्य कारण है हालना समयमा ग्रथोनो जीर्णोधार करवाना जेवा साधनोमनीयावे तेवां थाग ल कोई वरवते पण नहोतां पहेला प्रथम ग्रथोनो जीर्णोधार तालपत्र कपर थएलो देखायजे, ने त्यार पठी कागल ऊपर थयो ने ते अद्यापि सिरे परतु ते हस्तक्रिया विना यत्रादिकनी सहायताथी थएलो नथी ने हाल तो मुज्ञयत्रनी थति उलटस हायता मली थावे, तेनो उपयोग करवानु मूको दर्शने बालस करी वेशी रहेछ तो ग्रयो केम कायम रहेो ? हाल विद्यान्यास करीने नवा नवा ग्रथोनी रचना करवी तो एक कोरे रही, पण उतीशक्तिये पुरातन ग्रथोनी रक्षा करवानो यत्न नही कर तो थापरोज ज्ञानना विरोधी परशु केमके जे जेनी रक्षा करे नही ते तेनो विरोधी अथवा यहितकर होयठे ए साधारण नियम थापणी ऊपर लागु पडगे श्रावक नाईयो, पुरातन अथोनो जीर्णोधार करखाथी ते अथोनु अवलोकन थशे. प्रयाशविना केटलोएक विद्यान्यास थशे, रस उत्पन्न थईने ज्ञान सपादन करवानी थत करणमा उत्कठा थशे शुरू धर्म कपर प्रीति वधशे, अनिरुचि एट से पुन पुन ज्ञान मेजवानी श्वा यशे, थने उद्योग प्रमुख सर्व ज्ञाननां साधनोनो सहन प्राप्त यशे उद्योग ए सर्व पदार्थ मेलववानु थथवा वृद्धि करवानु मुख्य साधन , परतु थमस्ता उद्यमयीज काई थई शकतु नथी तेनी साथे इव्यनी पण सहायता जोयेठे इव्य जे ते सोपयोगी पदार्य ठे माटे इव्यवान पुरुपोए थव श्य ए काम ऊपर सद देवो जोयेठे केमके, तेउनी ए फरज के, जेम बने तेम ज्ञाननी वृद्धि करवी जोयेचे ते थाप्रमाणे - सारा सारा पमित्तोनी मारफते प्राचीन ग्रयो सुधारी लखाची थथवा उपावीने प्रसिद्ध करवा तेनो नाविक लोकोने थन्या स कराववो इत्यादिक शास्त्रोमा कह्या प्रमाणे सर्व प्रकारे ज्ञाननी क्षि करवी एवा हेतुयीज में था ग्रयो उपाववानु काम हाथमां लीयु के, परतु कोईनी सहायता विना स्वतंत्र मारी मरजी प्रमाणे दु ग्रयो उपावी शकु एवी मारीपाशे इव्यनी शक्ति नहीं .
10 . तोबाने लीधे या प्रकरण रताकर नामर्नु मोडं पुस्तक हामवानीबागमजमारास पी नापोनो मने मदत लेवी पड़ी. सारा जाग्यजोगे योग्र रोने मदत परामजी धावी. तेपो या पुस्तानो प्रपन नाग तमाप्त री ते गया जेट मातमां प्रति सो बने था वोजो नाग पण हमणा पूर्ण पयो से तेषी हुं मने स्तरुत्य तम . आ ग्रंथ प्रसिद्ध करवाने मुख्य मदत करनार शेव. केशवजी नायकडे. हरेल पदार्पने सम योग्यतावान वा अधिक योग्यतावान रक्षण करी शकेले एवं बहुधा दोडामा धावे. जेन ग्रीष्म ऋतुना तापची तत घएजा पर्वतने मेयज रक्षण करते. तेम ज्ञाननु रक्षण ते उनम योग्यतावान पुरुपयोग घई शकेले. यद्यपि सक्त चतुर्विध संघने ताननी रदा करवानो अधिकार दे. तथापि सर्वने तेवं सामर्थ्य होतुं नधी. माटे योग्यतावानज रक्षण करी शके वे. तेवी योग्यता कोई विरतानेज होय वे, मो. बाह्य सर्व लदन्यादि समृक्षितता धंतरनेविपे जिन वचन प्रधानरूप समू हि पण जोये . तेमांनी बाह्य समृद्धि तो घणाधोने होयडे तेम बतां जिनवचन अज्ञान होतुं नथी तो तेनाधी कोई पण एवं गुन रुत्य ध शस्तुं नथी. तेची बाह्य संपत्ति सहित प्रवचनान पण जोये वे. वाह्य उत्तम संपदा अने अंतर धर्म निष्टा ए उलट पुल्यानुबंधीपुल्यनुं फल बे. तेवु कोईएकनेज होय छे. एनुं प्रत्यद उ दाहरण था वर्तमान शितकरूप कालनेविषे श्रेष्ट केशवजी नायक के. केमके. एवी • योग्यतावान बीजो कोई पुरुप हाल दीगमां धावतो नघो. एषो बाह्य लदम्यादि सं पनियुक्त उतां थांतर धर्म सम्यक्त्व प्रदानरूप अत्युत्तम संपनिए फरीने पण युक्त . जेनेविपे पंच प्रतिरूप अंतराय मनोश्योपशम थाधुनिक सर्व संघ जनोना कोश , धिक दीवामां धावेठे : एमना जेई घातप नाम कर्म तो कोई नूपने पण कचित् उदय थपखं दृष्टि गोचर थशे! तेमजादेय नामकर्म. थंगोपांग नाम कर्म. यशः कीर्तिनाम कर्म, प्रमुख गुन प्ररुतिश्रोतुं एमणे एवो तो उत्कृष्टबंध करो के. तेवो हाल ददानरत्ता मां को बीजानेविपे क्षचित् दीवामां थावते एवा पुरुपने [ अशक्य होप? शने की कार्य करवाने समर्थन पाय! अर्थात् सर्व कार्य करवाने शक्तिमान . पूर्वे घगएला तं प्रति राजा तया वस्तुपाल तेजपालन्धने कुमारपात प्रमुख महत् प्रनाविक पुरुषोनी पते एमणे पण वर्तमान कालानुसार धर्म दीपनार्थ तथा समान दर्शनार्थ श्री महदेवा लयो तथा थंजन शलाका प्रमुख उत्तम धर्म रुत्यो करयां बे: ते बधाोधी पण थ . ..
त्युनम ज्ञानदिनी कता पूर्वक तश्यक गुम्योने अनिशय यात्रय दियेने, श्रये करी एमने पूर्वन्त धर्म हागन कुमारपार गजा प्रमुग्पनी पनिमा गाना न गयाय कितु तेमनी तुनना को नेगज ने श्राग्वाणमा का अतिगपोलि ममयो नही, पण निपक्षपात चुहियो पिचार कर जाउरे गव केगवजी नायर सर्व उपमाने योग्य ले के नहीं जुग के यमे अमित करगान श्राग्न करना था कसद सख्याक महत् चतुनोगात्मक पुस्तफना थानीय खर्चनरिपे वी कि धाश्रय थाप्योचे के जेथकी केटलाएक समयोग्नि पूर्व गीताया करी चित पर णोनु सुखरूप पुन जीर्णोधार पई शकशे माट एमन जेट नी उपमादये तेटली पोडी -- रामबहादूर वायुमादेव लदमोपति मिढनी उनपनि सिहजी शेव केशवजी नायकधिपे लखता था प्रसगे श्रीमक्युदाबाद निवासी स्वप्रति नूर समान, लदम्यादि वाह्य धमित समृद्धि युक, उनम यश कौनि नाम कमादयवान, झान मयुत्कवाधान अतिशय, प्रतापी स्वधर्म दीपर पूरात पकि अनिगजनीय, सर्व सघ तिलक नूत तथा श्रावक गुण साहित्यादि अपूर्व न्याकार नपिन रावत नूपत्तिदत्त पदक धारक बापुसाहेब लक्ष्मीपति सिहजी उत्रपनि मिहजो । प्रमाणेज योग्यतावान दोवाथी अधुना श्रनुपमेयन अवलोकन जस्टिस् थांव धि पीसारख्य नृपत्तिदन पदक धारक 3 TAIT) नात सपादन वहाधुराख्य नूपतिदन पदक धारक शेव लक्ष्मीपनिमिहजी उत्रपतिसिहर्जनिचि एक विफ धर्म दीपक पुस्पो आवक ममलनेधिषे हमेश उत्पन्नथता रहो, थने साधनोना क्षिरुप धर्मरुत्यो की रहो एवो थमारो थत करण पूर्वक याशिद ने पुर था ज्ञानक्षिक उत्तम सत्यने सारो थाश्रय धापनार प्रनाधिक पुरुषोनी पक्किम शोनित, थपेक्षा तथा उपेक्षा रहित, सारासार ग्राहक, परम रहस्यज्ञ, परोपकार तिमान, करुणा, दया, रूपा तथा शीतादि शुनगुण युक, श्री जीनगगपद कमनम रद साजसाय चमरायमान, महात्मा सदृश मुनीमहिमा सागरजी तथा सुमति माग जी, एमनो थत्यंत प्रार्थना पूर्वक थत्युपकार पुक्त नाम स्मरण यत्र गुथित करु श्री मुना श्रावक ममजमाना श्रेष्ट हरनम नरसिह, श्रेष्ट पेना गाई पदमली श्रेष्ट पक्षमान पुनसी, श्रेष्ठ नोजराज देसन, एमणे ज्ञान वृद्धि विषयक पोतानीमा उदारता दर्शवी चे माटे तेमना उपकार पूर्वक हु नाम गुथित करु दु नियुक्त साधु गुण नूषणासंरुत, ज्ञानवृद्धि कर्ता पुरुपरूप दोने मेघवृष्टि समान थत्यु ग्यतावानचन श्रवण श्रावान श्रावक जन मन काने परमामृत रहस्य पान कराव ए श्रीमक्युटावाट निवासी परम ज्ञान प्रसारोद्युक्त मतिमान स्वज्येष्ट 'नाता तुल्य ल क्ष्मी तथा गुण युक्त नूप उत्तक रायवाहादूर पद धारक वाबुसाहेव धनपति सिंहजी पत्रपति सिंहजी एमने पण पोतानी उत्कृष्ट ज्ञान वृक्षिक कत्यने सारी उदारता दर्शावी ठे तेथी तथा बीजो पण झान वृद्धिने अर्थे पुस्तक थकित करवानो हमेश उद्योग चालु राखेने तेथी अति सत्कार पूर्वक तथा मान्यता युक्त नामस्मरण गुंधित करुंडं. श्री मुंबईना श्रावक मंडलमांना शेठ परवत उधा, शेठ मूलजी देवजी, शेठ जादव जी परवत, सा. नोजराज नरपाल, तथा शेठ कीकानाई फूलचंद तथा शा. ठाकरसी - देवजी एथोए पण यथाश्रज्ञान प्रमाणे या ज्ञानवृधिना कत्यने थाश्रय थाप्यो तेथी तेथोनुं उपकार सहित नामस्मरण गुंथित करुं बुं. श्री थहमदावादना श्रावक मंगल माहेला शेठ दलपत नाई नगुनाई, तथा शेव मयालाई प्रेमानाई, एनी झाननी प्रशस्ति थवानेविप अति उत्कंठा जोईने मोटा थानार सहित नामस्मरण गुंथित करुं दु; श्री साणदवाला शेठ साकलचंद दुकमचंद तथा श्रीनरूचवाला शेत अनूपचंद मलु कचंद, एग्रोए पोतानी धर्मप्रनावना अधिक दर्शाववाने अर्थ ज्ञाननी वृद्धि थवा सारु जे उत्सुकता वतावी छे ते जोईने मोटा उपकार साये नामस्मरण गुंथित करुं हुं. श्री कह मुदराना रहेवाशी शेठ कस्तुरचंद सिंघजी पारेख एमनी यत धर्म प्री पनि मदिनयता तथा ज्ञानदिनी थतिशय चाहना जोईने मोटा थादर पूर्वक ा पु टा ए उन्लाथे नाम गुथित करूं . हिरण था मंगल मार्गमार्गित संवेगी साधु वर्य, यति विवेकी, ज्ञान पीयूष चुचुत्सुक नावट साधन नूत, महाराज श्री मूलचंजी तथा जवेर सागरजीना, नामस्मरण प्रेम पूर्वक ग्रंथित करुं दु. साधु मंगलमां साधु गुण संपन्न, ज्ञानरूप सूर्यना प्रकाशने यावरण करनारा जे नाना प्रकारना संशयो, कुतर्को, प, मान, यो तथा कुसंग प्रमुख वादल समूहरुप घनघटानो सम्यक प्रकारे विध्वंश करवाने वलवान पवन समान; धर्म तथा धर्माग झानादिकनो वृद्धि करवाने पूर्वना अत्युत्तम सुविहित शास्त्रपारग थाचार्यादि थार्य जन तुल स्या दाद सैलीना जाण बहुधा पंजावाख्य देश निवाशी संवेगी साधु श्री थात्माराम समान थात्मारामजी एमनु यति नावपूर्वक नामस्मरण गुंथित करुंढे.
ज नाखवानी मे प्रतिज्ञा करेली ले तेने कोई दूपण यापशो नही केम के, हरेक ६ सवेगी साधु श्री नितीविजयजी महाराज एनो ज्ञान वृक्षि थर्ये सारो र होवाथी प्रथम नागनी पठे नामस्मरण गुथित करु , सवेगी साधु साध्य वस्तु साधनोयुक्त युक्त मतिमान जिनवचन समुश्मायी र वत ग्रहीत धर्माकाशस्थित जलष्टि वत् ज्ञान वृद्धि कर्ता, सवेगी साधु गु६ सम्या पदारथ, परम सुविहित सुसाधु ममल माल मोहीत, हानादि शुक्ष जिनघमाग प्रयत्नवान. श्री शाति सागरजी महाराजनु नामम्मरण गुथित करुनु, जन द वद्य थचल गहाचार्य नहारक श्रीविवेक सागर सरि, एमनु पूर्वनागर्न पठे नाम स्मरण गुथित रु तु, मनुष्य पुज पूज्य तप गठाधिपति नट्टारक श्री धरणेसरि, एमनु नाम स्मर गुथित करु हु, श्री दुकमचजी महाराजनु में प्रथम नागमा नाम स्मरण गुथन कर ले तमम थत्रे पण गुथित करु बु प्रवचन रहस्य ज्ञाता, कोविद मतिमान, यनुत चपल वक्तृत्वशक्तियुक्त, सरूपता गरवित् श्रीरूपसागरजीनु नाम स्मरण गुथित करु नु, शुक्ष वीतराग परुपित, जिनधर्म विभूति युक्त श्रीअहमदाबाद नगर निवास। सर्व श्रावक ममल नन नूप समान अत्यत लक्ष्मि सपत्निवान पूर्वज श्रेणि थागत श्रीमान उत्तम प्रधान सहवर्तमान तथा धर्मदीपक श्रेष्ट मयाना मानानु नामस्मरण पुन मथित करु डु वीजा पण जे जे सद्बुद्धिमान पुरुपोए धर्म प्रनावना दर्शावया निमिने स्वसामग नुसार ज्ञानदि हेतुथी जे उदारता दर्शायी तेथोना नामस्मरणार्थ पुस्तकना - नेरिपे गुथित थशे क्लमापना अपम नाग मध्ये मतिदोपथी तत्वानुबोध नामनो अथ जे पृष्ट ५३१ थी ५१ सुधीमा नारसयामा थाव्यु वे ते स्थानकासी रतनचदनो करेलो नता लखेनी प्रता तेवु न जणायाची नुनयाँ पाई गया पटला माटे दुसी सुविधान वाचको पार्छ पा क्षमा मांगु दु के अस्ति ग्रथना मुग्य पृष्टमा सुविहित गातार्य रचित ग्रथो प काम नूलथी घाय. ते दमा करवा योग्य ते ढुंढिया यद्यपि जिनधर्मी नामधरावना रा तो वे पण जाते मूर्खज होय रे तेथी ते जिनोक्त मार्गनी विपरीत परुपणा कर तादरता नथी एवात सर्व सुझ जनोने सम्मत माटे ते मूर्ख होवाथी गोतार्थ कहेवा य नही तेथी ए ग्रंथ अवश्य जैन सैलीथी विपरीतजवे एवं लाणी त्याग करवा यो ग्य : कोए सुविहित गीतार्थकत जाणीने वाचवो जणवो नही ए वात हूं श्री ना वनगरमां साधु श्री यात्मारामजी महाराजने मलवा गयो हतो त्यारे तेमणे मार पागे कही ए रतनचंद थानकवाली साये आत्मारामजी महाराजनो मलाप थयलो हतो इत्यादिक बदुवातो मे एमना मुखथी सांजलीने तेथी में घो पश्चात्ताप कसो पण पठी थाय गुं? माटे मूलथी मारी प्रतिज्ञामां में नूल कीधी तेनी मुनि श्री यात्माराम जी महाराजना उपकार सहित सर्व सानो पाशेयी दमापना मागं शा. नीमसिंह माणक. विनती. . -- समस्त जैन धर्म रागी. नाना ग्रंथ विचार बुनुत्सुक, जिनवचन पीयूपपान कर्ता, श रल चित्नवाला जनोने अनि प्रार्थना पूर्वक विनति करुं बुं के, जेम जननी अथवा जनक स्वपुत्रना दोपविपे रचमात्र विचार न करता मात्र गुणनुज ग्रहण करेठे. तेम था यंकित पुस्तकनेविपे कोने का टोप दृष्टिगोचर याय तो मज कपर रंचमात्र रोप कर वो नही केमके, सर्व प्रकारे निपता एक केवलीविना वीजा कोनविपे पण संनवे नही एटला माटेज पूर्वे थई गवता महत् थाचार्य प्रमुख श्रुतझान पारग थत्युल ट पंमितो पण स्वरचित ग्रंथोमां बुद्धि टोपनेविपे हमा मागी गयला टीठामा थावेने; त्यारे थाधुनिक साधारण जननी वात शुं कहेवी? था पुस्तकनुं शोधन करतां मति दोप थथवा दृष्टिदोष थवश्य दोठामा थावतो; ते जोर्डने रोप न करतां क्षमा करवी. केमके, वांचता थथवा सखतां नून थायज वे एवो नियम वे. एविपे जे गर्व करे ते मूर्ख कहेवाय. माटे ए विपेटुं सर्व सत्पुरुषोनो विनय कस्तुं के,थापनी हंनना चंचू जेवी मतिथी सारासार विचार पूर्वक जजरूप दोपर्नु निवारण करीने पयरूप गुणर्नु ग्रहण करवू. थने असत् पुरुषोनो पण अधिक विनय कर के. यापनी काकना चंच जेवी मतिवडे गुण तजीन दोपy ग्रहण करीने ते सम्मेथी प्रमिक करई G मोटो उपकार मानीश ? केमके, जो दोप दर्शावनार नही मले तो दोप दीगमा केम यावे? गुणग्राहकनी मारूप धमृत धाराथी यद्यपि गुणनी पुष्टी थायठे, तथापि दोष ग्राहकनी कुमतिरूप कुगर धाराथी बुद्धि विन्न निन्न थश्ने तेने थदोपता करवाविपे पण प्रयत्नमा प्रवृत्ति थायडे, तेथी तेनो पण उपकार मानवा योग्य ने माटे सर्व सक न तथा उष्ट पुरुपोनी विनति करु बु के, यथा स्वमति अनुसार गुणदोष विचार करीने क्षमादिक कर शा नीमसिद मायक प्रार्थना poto- 14 * १ था पुस्तक वाचनारा थने जणनारा प्रमुख सर्व जनोने यति नम्रतापूर्वक दु याचना करुनु के, था एमा अंतरवृत्तिजन्य दोपथी, बाह्यदृष्टि दोषथी जननी सैलीथी विपरीतता अथवा साशयिक दीठामां सर्व लखी लईने ते मने मोकलावी देवु, के जेथी ते परिहार करवामां आवे जेम के, प्रथम नागमा नाख मा अनुसुदरने अवधिज्ञान उत्पन्न भया पढ़ी थनत ता ते सर्व वात स्मरणमा गमा श्रावे त्या त्याथी लखा तो मने सूचना करवी एवी दुतमन र मान्यामा श्रावशे .
॥ श्री॥ प्रकरणरत्नाकर नामाच्य पुनकना बीजानाग माहेला ग्रंयोनी न्यूल विषयानुक्रमणिका प्रारंनः अंग नाम- 7 श्रीन्दगन्नति श्रीचरन मुनि गनित महिनन्नोत्र. : श्री नाराजीरन विविधतायवानुयं युक्त चतुर्विगनिजिनस्तुनि : श्रीनुनिमुंदरनरिक्त अध्यान्नकल्पद्रुमनामाग्रंयनी अनुक्रमणिका. ए . पए C अशिक्षा, ? नान्यापधारन्य बनाधिकार, २ बीम्मन्नमांचनानाननीगरिकार. पुत्रननवनांचनारयन्तीगरिनर ४ धनममद नवनानामविकार ५ इंद्रननवांचनान्यः पंचगंधिकार त्यावशनाप नानारयःपोधिकार विषयवसायवनान्यः नमनाजिर B =াধিকাছ লন শান্তিনিহিকা 7 দিনদিন ব্যাক্তিতা २८ बैंगन्योपदेशान्यांगनाधिकार , " धर्मविपशाच एकादगारिका देवगुन्यधिनानाया जानाधिकार १३ बनिनिहागिनातान योगाधिकार १४ भित्र्यालानिंगरंशातुनोविकार ५ नम्वृनिगिदांग्गाग्य पंचमाविकार १६ नानवताना पांडाधिकार 5--३ 28-- ४ ८- -- ..
२० अनुक्रमणिका. ४ श्री शीतलनाथाष्टक तक्लिनितारख्य इन चतुपादारति युक्त मस्कचा रचित श्री जिनस्तोत्र सग्रह, श्री कल्याणसागर सूरिकृत. - एर ५ श्री माणिक्य स्वामि स्तोत्र विविध पद्यरचनात्मक 15-ए ६ सूर्यपुरीय श्रीसनय जिनस्तोत्र वसत तिलकारम उन गुथित च तुर्थी विनतर्पत पद व ७ श्री सुविधि जिनस्तवन कुतविलंबित वृत्तव प्रत्येक पद सुविधि नाम युक्त ६ श्री शातिनाथ स्तोत्र पुतविलवितस्त्तव क्षितीया विनापत पद युक्त १३ ए श्री मातिजिनस्तोत्र विविध पद्यव सोधन पर्यंत थपिनक्कि दर्शक १ए-एए १० श्री अतरिद पार्श्वस्तोत्र इश्वना रन ब६ चतुर्थ पादारत्ति युक्त ११ श्री गाडिक पार्थाष्टक शार्दूलविक्रीडित वृत्त ब६ चतुर्थ पादा वृत्ति युक्त १२ श्री गाडि पार्श्वनाथस्तोत्र नानारल्यन ब.६ अनुत चमत्कृतियुक्त १३ श्री दादा पार्श्वनाथ स्तोत्र जारन बह चतुर्थ पादाति युक्त १५ श्री कनिकुम पार्वाष्टक वृत्त ब६ चतुर्थ पादर वृत्ति युक्त ra १५ श्री रावण पाटक वजाहत व६ चतुर्थ पादावृति युक्त १६ श्री गोहिपुर पार्व जिनम्तोत्र गायन पद्य व रमणीय राग 3 - (-१०५ १७ श्री पार्व जिन स्तोत्र तोटक इनबनविलीया विनतयार पदयुक्त १०-१५ १७ श्री मदुर पार्थस्तोत्र पुतविजवित वावद चतुर्थ पादारत्ति युक्त १५ श्री सत्यपुरीय महावीर स्तोत्र पुतविलवित इन व६ युष्मद प्रथमक वचन द्वितीय पुरुप थत् धातु वर्तमान काल दर्शक २५-१०६ " नव युष्मठ शद चतुर्थ कवचन वीतीय पुरुप नम् धातु एक वचन वर्तमान काल दर्शक २१ श्रीलोडश पार्श्वनाथ स्तोत्र अनुष्टुपटन व वितीय विनक्तिदर्शक. २२ श्री सेरीश पार्श्वनाथ स्तोत्र उपजाति वृत्तवन चतुर्थ पादारत्ति युक्त Ai---100 २० " m-100 .. . अनुक्रमणिका. ११ २३ श्री संजवनाथ स्तोत्र उपजाति वृत्त व६ चतुर्थ पादावृत्ति युक्त. ए.--१०ए २४ श्री सूक्त मुक्तावली केशरविमतरुत मालिनी प्रति वृत्त व १ धर्म पदार्थ वर्ग. ----११० २ अर्थ पदार्थ वर्ग ३५--११६ ३ काम पदार्थ वर्ग १२-१ए ४ मोद पदार्थ वर्ग ४३-१२१ २५ श्री शांतसुधारस ग्रंथ श्रीविनय विजय उपाध्यायजीरुत विविध गायनीयराग रचित पद्य व अनित्यादि दादा नावना तथा मैत्रादिचार नावना मती गोल नावना विपय काव्यचमकति युक्तः २३१-१२४ २६ चतुर्विंशति जिनस्तोत्र जिनप्रनसरिस्त उत्तव काव्य चमत्कृति युक्त ए-१७५ २७ धास्तिक तथा नास्तिक मति संवाद का नाम लुप्त विविध प्र भोत्तर युक्त गुर्जर नापा गद्यवह. १७७ २० सम्यक्त्वना सडसन बोलनी समाय श्रीयशो विजयजी उपाध्या यरूत गुर्जर नापा गायनीय विविध ढालरूप पद्यव.. ६--२१२ २ए शृंगार वैराग्य तरगिणी. सोमप्रनाचार्य विरचित नूतन काव्य च मत्कृति उपजात्याटि थनेक विध वृत्तारव्य पचव स्त्री शृंगार वर्णन मिशे वैराग्य दर्शक. ४५-२९७ . . विविधविपयिकस्तोत्र, जिनमनाचार्यकृत. है ५४३ ३० श्री वीरजिनस्तोत्रधार्यावृत्तव पर वर्ग परिहारक काव्य चातुर्ययुन २६-२४२ ३१ श्री गौतम स्तोत्र उपजात्याटि नव पामित्य युनः ३२ श्री नेमिजिनस्तोत्र थार्या प्रति विविध जातीय वृत्तवर थमि त चातुर्य क्रियाजुप्त २०-२४४ ३३ श्रीवर्धमान जिनस्तोत्र श्वजा प्रमुख विविध वृत्त नाम नेपा थे गनित काव्य पांमित्य सूचक U-780 ३४ श्री चतुर्विशनि जिनन्नोत्र इतविलंबित हन चतुर्य पादांगत सहा वर्णनिम्प यमक नामक अदाकार नेपादिगनिन अनुक्रमणिका. ज १२ २५ श्री पचकव्याणिकमय महावीरजिनस्तोत्र वृत्त व लाटानुप्रासा घनेक काव्य कलायुक्त २६-२४ए ३६ श्रीमत्र स्तोत्र अनुष्टप्वृत्त वह परम रहस्यार्य गर्जित मत्ररूप ३७ श्रीवर्धमानजिनस्तोत्र उपजातिवृत्तव-६ विविधानरुत गद लालित्ययुक्त ए-२५१ ३० श्री पार्श्वजिनस्तोत्र उपजाति वृत्त बक्ष प्रतिपद पचादर पुनरा वृत्ति रुप सिहावलोकन युक्त ३५ श्री पार्वजिनस्तोत्र उपजाति वृत्त ब६ पादात समचतुरदर पुन रावृत्तिरूप यमकालकार युक्त -२५२ ४० श्री नदीश्वर कप अनुष्टुप वृत्त व काव्यसरलत्व थर्थ गौरवयुक्त ४०-२५३ ४१ श्री शारदास्तोत्र उपजातिवृत्त बद कचित् समपाद पुनरावृत्ति कचित् विषमपाद पुनरावृत्तिरूप एक चतुदरूप यम कालकारयुक्त १३-२५४ ४२ श्री जिनसिहसूरिस्तोत्र उपजाति वृत्त व कचित् समपाद पुनरावृत्ति कचित् विषम पाद पुनरावृत्ति एक चतुपादरूप यमकाजकार युक्त ५३ श्री पच नमस्कृति स्तोत्र यनुष्टुप वृत्त वर यनुत थाशय युक्त ४४ श्री वीरस्तोत्र थनुष्टुप वृत्त बम प्रत्येक पये सम समपाद पुनरावृत्ति रूप यमकालकार युक्त ४५ श्री थादि जिनादि स्तोत्र अनुटुप् वृत्त ब६ प्रत्येक पद्ये सम स मपाद पुनरावृत्तिरूप यमकालकार युक्त ४६ श्री पार्थप्रातिहार्य स्तोत्र स्वागता वृत्त ब६ प्रत्येक पद्ये समसम पाद पुनरावृत्तिरूप यमकालकार युक्त ४७ श्री कल्याण पचक स्तोत्र वशस्थ वृत्त ब६ साधारण काव्य रचना युक्त ४८ श्रीगीर जिनस्तोत्र लक्ष्य प्रयोगमय उपजाति वृत्त ब६ व्याकर एना प्रयोगना मिगे नगवतना सण उक्ति युक्त भए श्री वीतराग स्तोत्र उपजाति वृत्त बद कचित् पादातगत कचित् पादातस्यले क्ष्यादि थक्रावृत्तिरूप यमकाजकार युक्त ५० श्रीचश्मनस्यामि म्तात्र यनुष्टुप वृत्त ब६ सम समपाद पुनगर तिरूप यमकानकार पुन ५१ श्रीकानदर स्तात्र थार्यादि हत्त व विविध नापा रचना चम १३-२५५ -- १३-२५७ २-२५० -२५ G-२६० --१६० अनुक्रमणिका. २३ कृति युक्त तथा संस्कृत. प्रारुत, मागधी. पैशाची, चूलिका पैशाची, शौरसेनी, तमसंस्कत ने अपनंग जिन्न निन्न यने मित्र कविनाम गर्न चा युक्त . ४०-२६३ ५२ श्री महावीरन्तोत्र विविध नव थत्युत्तम चित्रादि काव्य चम कति युक्त यथा प्रतिलोमानुलोमपाद. अनुलोम प्रतिलोम, श्रई प्रतिलोमानु लोम, अईनम. मुरजवंध, गोमूत्रिका. सर्व तो न. रथपट, चदरपाद, एकादरपाद, एकादरश्लोक, थसंयोग, दान्यां खड्ग संदानितक. मुसल, त्रिशूल, हल. धनु प्य, शर, शक्ति, अष्टदल कमल, पोडशदल कमल, स्तुत्यना मगर्न बाजपूर हर, कविकाव्य नामक चक्र, तथा चामरबंध. ५३ श्री जीरापन्निपार्श्वस्तोत्र स्वागतात्तव विपम पदांत समपदाद्य त्र्यधर पुनरावृत्तिरुप सिंहावलोक काव्ययुक्त १५-१६७ ५४ श्री फलवढि जिनस्तोत्र थार्यानव प्रत्येक पद्या चतुरदरा त्मक त्रयात्तिरूप यमकालंकारयुक्त ५५ श्री चश्मन स्वामिस्तोत्र माक्तिक दामादिवृत्तव पदनापा रच ना चमल्लति युक्त यथा संस्कृत, प्रारुत, शौरसेनी, मागधी, पशाचिक, चूलिका पैशाचिक, अपभ्रंश १२ ५६ श्री वर्षमान निर्वाण कल्याणक स्तोत्र स्वागतात्तव सर्वोत्कृष्ट -२७१ ५७ श्री थरनाथस्तोत्र पंचदश केवलाधर पद्यव थभुत रचना युक्त १४--२७२ ५७ आध्यात्म मतपरिवानाम ग्रंथनी स्थूलविपयानुक्रमणिका. २७३ --- - २६ए वर्णन युक्त १ए- श्राध्यात्मना चार प्रकार देखाडीने तेमा मात्र नाम अध्यात्मिजे दिगम्बर लोक तेमना मतनुं निवारण करता नावाध्यात्मनुं स्वरूप दर्शावतां तथा साधुने वस्त्र पात्र उपधिप्रमुख ते सिम ताना हेतु एवं अनेक दृष्टांतो सहीत प्रश्नोत्तररूपे सिद्धांतरी लिये प्रतिपाद्युठे तेने प्रसंगे ध्याननुं स्वरूप स्थविरकल्प जिनकल्प तथा अपवाद उत्सर्ग इत्यादि २७३ .
२० १४ अनुक्रमणिका. उत्रुष्ट अध्यात्मनी प्राप्ति थवानां कारणो निश्चय व्यवहार न यना वाद सहित मध्यस्थपणे प्रमाण वादी मत साची । उत्कृष्टयध्यात्मनी प्राप्ति दर्शावाने केवली कवलाहार अवश्य करे एवी स्थापना युक्तिपूर्वक सि दांत सेलिये बतावी केवली कवलाहार करता उतारूतरुत्यज ठे पट्कारकनु स्वरूप सिमना पन्नर नेद स्त्रीलिगे सिघता दिगम्बरी नथी मानता तेने दूपण ग्रयर्नु परम रहस्य ५ए श्री समयसार नाटक नामाख्य ग्रथनी स्थूल विषयानुक्रमणिका ३७५ ३१ ३३२ o - . १४५ ०६-३६३ श्री पार्श्वनाथ, सि-६ नगवान, साधु, थने सम्यकदृष्टीनी स्तुति, मिथ्यादृष्टि वर्णन, मगलाचरण,थात्मव्य वर्णन, प्रयगी रवता, कवीनुं साम्यर्थ, अथ महिमा, अनुनय लक्षण, तथा महिमा, पड्ड्व्य नव तत्व वर्णन, नाम माला,था ग्रथमा क हेवा लायक वादश धारना नाम,अथारननो मगलाचरणरूप नमस्कार, श्रात्म वर्णन, नगवाननी वाणीने नमस्कार १ जीवदार वर्णन २ थजीप दार अधिकार ३ करता क्रिया कर्मनो वार ४ पुन्य पाप एकवी कथन चतुर्थ चार ५ थध्यात्मना थधिकार सहित आश्रय कार ६ सरदार ११ निर्जरा वार ७ वध तत्वना धरना प्रवचनो अधिकार ए मोवार १० सर्व विहिवार ११ स्यावादनामा चारनी थतर्गत ग्रथमहिमा तथा नवरस ३५---३ ६१-१६ -५३० शत-- २५ . ४१-५३ ५२-५२ अनुक्रमणिका. वर्णन अने चतुर्दश नय इत्यादिक अनेक विषययुक्त १२ साध्य वस्तु अने साधक वस्तुना स्वरूपनो कार कवीअमृतचंद याचार्यनी आलोचना तथा बनारसी दासें जिन प्रतिमानी स्तुति करी तथा वणारसीदासनी पोतानीकथनी. चन्द गुणस्थानक स्वरूप तेमां चोथा गुणस्थानकमां क्षा विकादि सम्यस्त्वनो स्वरूप तथा पांचमा गुणस्थानकमा श्रावकनी एकादश प्रतिमानुं लक्षण ३० सम्यक्त्वस्वरूप स्तवग्रंथनी स्थूलविषयानुक्रमणिका. ए-प४४ . G-५४६ UII -- १ सूत्रकारनी गाथा तथा सम्यक्त्वप्राप्तिनी अगाउ जेवी जी वनीयवस्था होय तेनो विवरो २ सम्यक्त्व प्राप्तिनो उपाय ३ ग्रंथि जेटवानी रीत ४ अनिवृत्ति करणे गयो थको जीव जे कर्तव्य करे ते कर्तव्य ७ सम्यक्त्वना दनो विवरो ६ कारकादि सम्यक्त्वनां सदा 9 कर्म ग्रंथनी सलिये उपशम सम्यक्त्व प्रातिनो उपाय ७ पांच सम्यक्त्वनो काल । दश प्रकारनी रुचिरूप सम्यक्त्व १० सम्यक्त्वना सडसन नेद विशु व्यवहारथी ६१ पष्टीशतक नामक ग्रंथ नेमीचंड मारीस्त ए ग्रंथ शुद्ध मार्गानु सारीयोने नवा वांचवा तथा सानलवा लायक विचित्र उ पदेो करी युक्त वे. ६२ संयमश्रेणीनुं स्तवन पंमित उत्तम विजयजीरुत १३ लोकनाल वात्रिंशिका ६४ सम्यक्त विचारगर्जित महावीरजिन स्तवन. ५७७ एनए ए एए पए एए ६०१ ६०ए ちいい! ---- उपशमादिक सम्यक्त्वना ने सविस्तरपणे तथा सम्यक्त्व पामवा नो उपायथने यथा प्रवृत्यादिक त्रण करणतुं स्वरूप इत्यादि.
७५४
-
७४
२६
अनुक्रमणिका
पाचसम्यक्त्वना स्थितिकालमानादिक तथा गुणगणा
उपशम श्रेणी तथा दपक श्रेणीनु स्वरूप
थात नेदे पुगज परावर्त
। काय स्थितिविचार
सप्तनगीनु स्वरूप
६५ पड्डव्य विचार नामाग्रथ चर्चकरूपे
189
।
श
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एक
७६
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तिमना पन्नर नेद तेमा दिगम्बरीमोना मत खमन पूर्वक स्त्री
लिगनी सिता बतावीने
थजीव इथ्य विचार तेमा दिगम्बरोनी चर्चा पूर्वक पुजन
इव्यनो विचार सिम करावे
चार प्रकारना अनाव
नय निक्षेप स्वरूप
मोद प्राप्तिनु क्रम
थात्म प्राप्ति विधि
सम्यक्त्वीना थाग्गुण
सम्यक्त्वी सोह वीजध्यावे तेनो थर्थ
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॥ अथ श्री महिम्नस्तोत्रप्रारंनः ॥ महिन्न. पारं ते परमसनमाना अपि विनो नवति स्तोतारः समवतृनिनूमो लमु दिताः ॥ यदिशद्यास्त्वां तजिनपजनत्या स्तवयतो ममाप्येप स्तोत्रे हरनिरप वाद. परिकरः ॥ १ ॥ स्वरूपं चिपं किमपि तदरूपं नगवत चतूरूपा ब्राह्मी यदि गदितुमीष्टे न जवतः ॥ ततः कस्य स्तुत्यं किमुपममिदं कस्य विषय पढे त्वांचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ २ ॥ यक्ष ॥ पदं शैवं केचित्परमम नपेक्षादयसुखं स्तुवति त्वा राज्यादिकपदकते मंदमतयः ॥ नवे तत्वार्थ रतिर तितरां नैव नवनः पदे वर्वाचीने पतति न मन कम्य न वच ॥३॥ गुणाना मानंत्यादविषयतया वाइमनसयो न शक्या तल रपि तव विधातुं स्तुतिरियम् ।। नवन्नामोचागत्पुनरपि ममतां निजगिरं पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनयुर्व्यिव तिता ॥ ४ ॥ यहा ॥ जटालंकारालस्तमथ वृपांक व नगवन् पुनानं विश्वं त्वां प्रथमजिन मत्वा किमु ततः ॥ जटां वृत्वा श्रिवा पमहमपि च्यात नमिदं पु नामीत्यर्थेऽस्मिन्पुरमथनबुर्व्यिवलिता ॥ ५ ॥ न कोपस्याटोपः स्वरिपुपु न च स्वे प्वपि तथा प्रगातिनी काताहिकपरिकर. कश्चिदिति ते ॥ त्रिलोयामालोक्याप्यह ह परमां प्रारनरमा विहंतुं व्याक्रोगी विदयत के जडधियः ॥ ६ ॥ शृवं कश्चि कती निखिलनुवनम्यापि न पुन विनित्यवेक सतनुरतनुवी स्ववगत ॥ स्वयं सिमेन्यस्मिंन्तव मतमनाप्तान् हतधिय कुतर्कोयं कश्चिन्मुरवरयति मोहाय जगत. ॥ ॥ विगुप्तरागाद्यैरपि नवनि कि सर्वविदहो विना वा सर्वज्ञ ननु जिन फिमाप्तो पि स च किम् ॥ त्वदन्योपि कापि त्रिजगति बताप्तम्वविषये यतोमंदास्त्वा प्रत्यमर वर संरत इमे ॥ ७॥ त्वमेवाईन् बुद्धो जगति परमेष्ठी च पुस्यो तमोलदम्या ना स्वान्विबुधगुरुरादीश्वर इति ॥ विनो नानादानि समविषममार्गेषु चरतां नृणामे कोगम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ ॥ प्रसादानं पुत्रा विश्वसुरवनानाज्यमनजन न के वा सेवातम्तव नवनवामृधिमगमन् ॥ तृणे बणे स्वर्ण पनि च सदृदः पु नरहो न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृना 'नमयनि ॥ १० ॥ नवन्ननादातिगर महिमेदावशसमुद्भवक्तिव्यन्या रणरणफितात करणत.॥यधीरप्युद्यक्तीमितजग दशक्यं स्तवमपि स्तुवन् जिन्हेमि त्वां न खजु ननु धृष्टा मुग्दरता ॥"नश स्या कन्याला नमिविनमिपनी जिनपते वकवामिलाकमकमनसंवान रनिया ।। प्रतादात्ने विद्याधरपतितति यत्सविनयं स्वयं तस्ये नान्या तव फिमनुवनिन फल ति ॥ १२ ॥ तदा विद्याः प्राप्य ध्रुवमन्यितविद्याधरमहा न्यय माउलीय प्रथमम -- -- तस्याचात्र प्रमितफलदैवाशियसुख न कस्याप्युनत्यै नवति शिरसस्त्वव्यानति । र्तव्यात्मा न हि वशिपु पथ्य परिजव ॥ १ ॥ प्रयुजान स्वामिन्स्वयमसिनगि । प्रनुधिय ॥२२ ॥ यदानो रत्नानां त्रयमखिलदोर्गत्यहरण निदान सपत्ते स्त्रिजुवनन धा क्रियाकष्टास्टष्टा थपि जिनप उष्टाशयतया ॥ त्वदाज्ञायज्ञायां नियतमहिताय । ए महिम्नस्तोत्र. थ वेतादयविजुताम् ॥ यदेती उस्सा यो सुग्नसराणामननता यिरायान्सनेत्रि पुरहर विस्फूतिमिदम् ॥ १३ ॥ श्रथागतयर्य मदनमवियामि च महामनिव सर्वकत्वमसमविनूतिश्च परित ॥ शिवासगभग सततमिति नो कम्य मनिन स्पि रायास्त्वनक्तस्त्रिपुरहर विस्फजितमिदम् ॥ १४ ॥ विवाहादी तुर्भपस्तो विन तिनव त्वया पारपर्यागतपरिचयान्मोहचरट ॥ तथा दुरं नष्ट कचिदपि ययात्र लकलाप्रतिष्टा त्वय्यासी यमुपचितो मुह्यति खन र निजी स्पार्नरत पिचरासोन्मघवता यदाऽपत्तस्यासिनमय सुस केवजरमाम् ॥ तदेतस्मिन्सा तब पदविनने समुचितं न कस्याप्पुन्नत्य नवति शिरसस्त्वय्यानति ॥ १६ ॥ मिनग या पूर्व दणमजगणत्त्वा नरतराट् सम पक्रेणाहो तदिह विषयाणां विपमता ॥ यद ॥ १७ ॥ प्रनो त्वत्पुत्रस्यातुलवलपतो बाहुबजिनस्तपस्तीत्र ताहरु शरदयविमानार पि रुतं ॥ निदान झानस्य ध्रुवमनवदाश्चर्यमथग किारोपि श्लाघ्यो पननयनम व्यसनिन ॥ १७ ॥ न सुत्रामा यत्र प्रनयति विधातापि न बिनु स वैकुछ कुठ किमपि न नवश्वानबदलम् ॥ जिगीषु स त्वामप्यपरसुरमहर्मतिरनृत् स्मर स्त्र पान्यसुमता कला पुसा स्त्रीणामपि च सकला मापतिरपि ॥ कुजातादीन्तात्ता न् कृणमपि नयन् शिक्षणविधी जगदायै व नटसि ननु वामय विजुता ॥२॥ प्रनो तेस्तै सारेरणुनिरखिलचामरवर रुतं रूपं सर्वोत्तमसुखगमगुष्टकमितम् ॥ त्वदगुष्टस्याये शुनति किज नांगारकश्वेत्यनेनेयोनेपं धृतमहिमदिव्य तव या ॥२१॥ प्रजा प्राज्य राज्य स्थविरजननी स्वस्य तनुजास्तपस्यन्नासत्तावपि च विहरबा दुवतिन ॥ उपेदिष्टा यात्तवतनृपसहस्राश्च चतुरो विधेये कीडत्यो न रखनु परतत्रा नानामनुदिनम् ॥ नवान् योगदमावपि विरचयमन्मथजये त्रयाणां रदाय त्रिपुर हर जागर्ति जगताम् ॥ २३ ॥ यथा पूर्व मुग्धास्तवसऽपदेशायुगलिन सदा सानि नीशाजनिपित सदाचारचतुरा ॥ तथा कस्क सप्रत्यपि न विशदेषु त्वदितश्रुती का बध्वा दृढपरिकर कर्मसु जन ॥ तस्त ब्रह्मनियमनिष्ठा बहुति व नपिना ध्रुव कर्तुं श्रक्षाविधुरमनिचाराय हि मरवा ॥ २५॥ मान्मुख्या नियतमधिमात्रानपि सदा स्वयस्थान शास्त्रीयान्नदधतितरां यस्य हतये ॥ अविघ्न त के युगादिदेवस्तुति. निघ्नन्नसमसमयस्तामसमृगं त्रसंतं ते ऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरनसः ॥ २६ ।। परिनाम्य क्लेशार्जितमपि सहस्रेण शरदा मदाश्विाजत्वं सपदि मरुदेव्यं तदपि चेत्॥ प्रनो निस्नेहं सा व्रतसमयसर्वावगणनादर्वति त्वामा वत वरद मुग्धा युवतयः ॥ २७ ॥ महानंदे यद्यप्यति जिन दवीयस्यपि पदे न रुष्टस्तुष्टश्च विन्नुवनजनेषु क चिटपि ॥ नवन्नाम स्वामिन्स्वमनसि महामंत्रमनिशं तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमलि ॥ २७ ॥ प्रनो प्राणायामान्यसनरसिकवानिजमनः समाधावाधाया खिलविपयतोदाणि युगपत् ।। तं प्रत्याहृत्य स्थिरनिहितनासायनयना दधत्यंत स्तत्वं किमपि यमिनस्तकिल नवान् ॥श्या सुरः खः कुंनस्त्रिदशसुरनिस्त्वं सुरम णिः पिता माता नाता विरपि सुहत्त्वं च सुगुरुः ॥ परात्मा ब्रह्मापि त्वमसि पर मं दैवतमतो न विद्मस्तत्तलं ध्यमिहहि यत्त्वं न नवति ॥ ३० ॥धकाराचर्वणे स्त्वयि परिणतान पंच परमेष्टिनः स्पष्टं पंचादरचनया नामिनिगढन् ॥ कलाना व्यक्तं किमपि परमब्रह्मविषयं समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गणात्योमिति पदम्॥३१॥ न रागाद्यैर्यस्तो न पुनरनुकंप्यो मटपरः रुपाजु स्त्वत्तोन्यो न जगति न तेन्यः पुनरतम्॥ स्वयं तैरत्याः किमितरसुरैश्चेति विमृशन् प्रियायास्मैधान्ने प्रविहतनमस्योस्मि नवते ॥३२ नमो नासताय क्वचिदपि विरक्ताय च नमो नमः संवुदाय प्रशमद मस्वाय च नमः ॥ नमः सर्वज्ञाय स्मरणपरतद्राय च नमोनमः सर्वस्मै ते तदि दमितिशर्वाय च नमः ॥ ३३॥ दलितरजसे शश्वद्विश्वार्चिताय नमोनमः प्रहततम से श्रीसर्वाधिपाय नमोनमः॥ जनहितकते तुन्यं सत्वाधिकाय नमोनम. प्रमहसि पदे निस्वगुण्ये शिवाय नमोनमः ॥३४॥ कुसुमवटुरिवाहं तछुतो किंचनाई रुतिनि रुरसि कंठे वा गुणत्वादधार्यम् ॥ जिनवर जिनहोत्कर्षतोकार्पमेवं वरट चरण्यास्ते वाक्यपुप्पोपहार ॥ ३५ ॥ प्रांशुश्रीतोमवंशेऽजनिपत मुनयोमौक्तिकानीव शुधास्ते प्वप्येकावली च प्रगुणगुणवती श्रीमटाचार्यपंक्तिः ॥ जीयाज्यं यदूनामिव गुरुज यवशव्हय श्रीमुनीस्तस्यामप्येप चिंतामणिसचिररुचिर्नायक कृष्णदेवः ॥ २६ ॥ निहितचरमपादं श्रीमहिम्नः स्तवस्य त्रिभुवनमहितस्य श्रीयुगाठीश्वरस्य ।। 'भ्रमरश्व सदा तत्पादपद्मोपजीवी रुचिरमलघुत्तः स्तोत्रमेतक्ष्यधत्त ॥ ३७॥ एवं शारदसो मसुंदरयशःस्तोमं युगादीश्वरं चतोनूजयचंमालिनिरनिष्टत्यान्वहं योगिनिः॥ज्ञानं प्राप्य विशालराजसदृशल्हादं समाधीयते मुक्त्यै मूनि रत्नशेखररमा ब्रह्मैकतेजो मयी ॥३७॥ इतिश्रीयुगादिदेवमहिम्नः स्तोत्रं संपूर्णम् ॥
स्तोन्न ॥ अय क्षमाकल्याणजीकृत चतुर्विशतिजिनम्तुनितारन ॥ शार्दूल विक्रीडितलंद ॥अथ रुपनस्तुति पारन ॥ समक्या नतमीनिमिर्जरवरनानि मुमोनिप्रना समिथारुणदीतिशोनिचरणांनोजाय सर्वदा ।। सर्वज्ञ पुरुपौनम मुर रितो धर्मार्थिना प्राणिना नूयाभूरिचिनृतये मुनिपति श्रीनानिम्नुर्जिन ॥१॥ मही धोपचिता सदैव दरतापीढप्रतापश्रियो येनाझानतमोरितानमगित रिविसमत प॥ श्रीशत्रुजयपूर्वशलशिरवर नास्पानियोनासयन् नव्यानोजहित स एप जयनु श्रीमारुदेवप्रनु ।शायोविज्ञानमयो जगत्रयगुरुयं सर्वलोकाश्रिता सिद्धियन वृतास मस्तजनता यस्मै नतितन्यते॥ यस्मान्मोहमतिर्गता मतिनुतायस्यय सेव्य वचो यस्मि विश्वगुणास्तमेव सुतरा घदे युगादीवर॥रायथ यजितम्नुति प्रारन ॥माजिनीउद । सकलसुखसमृदियम्य पादारविहे विलसति गुणरक्ता नक्तराजी नित्य ॥ विपना नमान्य शातमुज्ञनिरम्य स जयति जिनराजस्तुगतारगतीर्थ॥१॥प्रनवति किन नव्या यस्यनिर्व पनेन व्यपगतरितोय प्राप्तमोदप्रपंच निजवजितराम परिवदिवर्ग तमजितवरगोत्र तीर्थनाथ नमामि ॥ २॥ नरपतिजितशोर्वशरत्नाकरेड सुरपतिय तिमु ख्येनक्तिददै समय॑ ॥ दिनपतिरिव लोकेऽपास्तमोहायकारो जिनपतिरजितेश पातुमा पुण्यमूर्ति ॥३॥अथ सनसन्तुति ॥ स्वग्धरामद ॥ यतया सक्तचित्ता प्रदु रतरनवातिमुक्ता मनुष्या सजाता साधुनावोलसितनिजगुणान्वेपिण सद्यएवात श्रीमान्सनवेश प्रशमरसमयोविश्य विश्वोपको सो दिव्यदीप्ति परमपदस्त से व्यतां जव्यलोका ॥ १॥ शुक्लथ्यानोदकेनोज्वलमतिशयितस्व उनावानतेन स्वस्मादा हत्य वृन शिवपदनिगम कर्मपकप्रपचा नीर- दूरयित्वा प्रतिमुपगतोनिर्विकल्पसरू प सेव्यस्ता_धजोसो जगति जिनपतिर्वीतराग सदेव॥२॥ वादी विद्योतिरत्नप्रकर झ परिबाजते सर्वकाले यस्मिन्नि शेपदोपव्यपगमविशदे श्रीजितारेस्तनूजे ॥ उमा पो उष्टसल स्फुटगुणनिकर गुघुविधमादि कल्याणश्रीनिवास स नवतिवद तान्यर्चनीयो न केषां ॥२॥ यथ निनदनस्तुतिमारन ॥ पुतविलचितवद ॥ विश दशारदसोमसमानन कमजकोमलचारुरिलोचन ॥ युचिगुण सुतरामनिनदन य सुनिर्मजताचितनृपन ॥ १ ॥ जगति कांतहरीश्वरलानितकमसरोरुह कामरूपा निधे ॥मम समोहितसिद्धिविधायक त्वदपर फिमपीह न तये ॥ २॥ प्रवरसवर । वरनूपतेन्तनय नीतिविचक्षण ते पद ॥ शरणमस्तु जिनेश निरतर रुचिरनक्तिसुयुक्तिन तो मम ।। ३ ॥ अथ सुमतिस्तुति पारन ॥ इववाद || सुवर्णवर्णो हरिणासव U चतुर्विंशतिजिनस्तुति. णों मनोवनं मे सुमत्तिवलीयान् ॥गतस्ततोसुटकुदृष्टिरागडि नैव स्थितिरत्र कार्या ॥ १॥जिनेश्वरो मेयनरेंश्वनुर्यनोपमो गर्जति मानसे मे। यहो गुरुपद्धतागन ला म सो शमं नेप्यति तथएव ॥ १॥इत. सुदूर व्रज उष्टबुझे समं उरात्मीयपरिवदेन । सु 'बुद्धिमत्तानुमतिर्जिनेगो मनोरमः स्वातमितो मदीय ॥३॥अथ पद्मस्तुतिप्रारंना मुजंगप्रयातवेदः ॥ उदारमनामंडलेनीतमानः कृतात्यंतऽतिटोपापमानः ।। सुसी मागजश्रीपतिदेवदेव स्तदा मे मुदान्यचनीयस्त्वमेव ॥ १ ॥ यदीयं मनःपंकजनित्य मेव लयासंरुनं ध्येयरूपेण देव ।। प्रधानस्वरूपं तमेवातिपुण्यं जगन्नाथ जानामि लो के सुधन्यं ॥ ॥ अतो बोगपद्मप्रनानंदधाम स्मरामि प्रकामं तवैवांग नाम ॥ मनो वांछितार्थप्रदं योगिगम्यं यथा चक्रवाको रवे काम रम्यं ॥३॥अथ सुपार्श्वजिनस्तुतिमा रत्नः तोटकछंदः ॥ जयवंतमनंतगुणैनिनृतं दृथिवीसुतमनुतरूपनृतं ॥ निजवीर्य विनिर्जितकर्मवलं मुरकोटिसमाधितपत्कमलं ॥ १ ॥ निस्पाधिकनिर्मलसारख्यनि धिं परिवर्जितविश्वरंतविधि नववारिनिध. परपारमिमं परमोवलचेतनयोन्मिलितं शाकजातनुवर्णगरीरधरं गुनपानुपार्वजिनमवरम् ॥ विनयावनत. प्रणमामि सदा हृदयाजवतरितरप्रमुदा ॥ ३॥ अथ चंप्रनाजिनन्तुतिप्रारंनः ॥ वंशस्यदः।। थनंतकांतिप्रकरण चारुणा कलाविपेनाश्रितमात्मसाम्यतः॥ जिने चंइनन देवमुत्त मंनवंतमेवात्महिनं विनावये॥ १ ॥वदारचारित्रनिध जगत्प्रनो तवाननांनोजविलोक नेन मे ॥ व्यथा समतास्तमितोदिन सुखं यया तमिन्यादिवमर्वतेजसा ॥॥ सदैव संने वनतत्परे जने नवति सर्वेपि मुग सुदृष्टया तमग्रलोके समचित्तवृत्तिना त्वयैव संजा तमनोनमोग्न ने ॥३:यय विधिजिनन्तुतिमारन ॥ यतनितकालंदः ॥ विग्वानिवं द्यमकगकित्तपादपद्ममुग्रीवजात जिनपुगव मानिसमाजव्यात्मतारणपरोनमपानपा त्रमा तारयस्व नववाटिनियविरुपात् ॥ १ ॥ निशेपदापविगमोजयमोक्षमार्ग न व्याः अयंति नवढाश्रयतो मुनाइ ॥ संमवित सुरमणिबंदुधा जनानां विनाम नोनव ति कामितनिधिकारी 17 ॥ विहं रुपान्तनिधि सुविधे बयनूमत्वा नवंतमिनि विझप पामि तावत्।। देवाधिदेव तव दर्शनवनोदं शश्वभवामि लुबना नया विधेहि ॥३॥ थथ शीतलजिनस्तुनिमाग्न.माइलविक्रीडितलंद ॥कल्याणांकुरवने जनबर सी गिसंपत्कर विश्वव्यापिया रसापक नितं वयजीताधिन ।। नंडावृदिनमुभव ह ढरथदोणीपते.दनं श्रीमत्तृरतविरेजिनवरं वं मनु गीतला॥ विश्वासानविद्य इतिक्षिपदवीहेतुमा दयनव्यानां वरननिरक्तमनतां चनः मुलासयन् निल्यानं दमयप्रतिइसमय. तत्तलोख्याश्रयो इटानिष्टतमःप्रणागतरपिज स्तोत्र ल ॥२॥ समक्या त्रिदशेश्वर रुतनुतिन स्वगुणारुति सकल्याणसमद्युति शुन मति कल्याणरुत्सगति ॥ श्रीवत्साकसमन्वितस्विनुवनत्राणे गृहीतव्रतो नूयानक्ति नृता सदेप्टवरद श्रीशीतलस्तीर्थरुत् ॥ ३॥ अथ श्रेयासजिनस्तुतिप्रारन ॥ हरिणी बद ॥ चिरपरिचितागाढव्याप्ता सुदिपराङ्मुखी निजबलपरिस्फुदिना समयतया ममाव्यपगतवती दूरउटा स्वनिष्टकुदृष्टिता थपचितसहा सद्योनूवा यदीयसुदृष्टित १ निरुपमसुखश्रेणीहेतुर्निरामतपुर्दशा झुचितरगुणग्रामावासोनिसर्गमहोचला। हृदय कमले प्राता सुतत्वरुचिर्मम विदलितनवनातिर्यस्याप्यजस्रमनुस्मृते ॥ ॥उपरु तिमतिर्दाने दको निरस्तजगक्ष्यथ समुचितरुतिर्विज्ञानाप्रकाशितसत्पथ ॥नपगण गुरोविमोवंशे प्रनाकरसन्निन सनवतु मम श्रेयासेन प्रबोधसमृक्ष्ये।ाथथ वासुपू ज्यस्तुतिप्रारन ॥ रथोखताबद ॥ पूर्णचकमनीयदीधिति नाजमानसुखमनुतमि या।शातदृष्टिमनिरामचेष्टितं शिष्टजतुपरिवेष्टितं पर॥१॥नष्टउष्टमतिनियमीश्वर सस्मर हिरिहनूरिनिनिक्षीणमोहसमयादनतरा प्रापि सत्यपरमात्मरुपता ॥२॥ पार्थिवे शवसुपूज्यवेश्मनि प्राप्तपुण्यजनुपं जगत्प्रनु ॥वासुपूज्यपरमेटिन विश के स्मरति नहि तं विपश्चित ॥॥ श्रथ विमलजिनस्तुतिप्रारन ॥मदाकाताउद ॥ससारेस्मिन्महतिम हिमामेयमानदिरूप त्वां सर्वज्ञ सकलसुरुतिश्रेणिससेव्यमान ॥ दृष्ट्वा सम्यग्विमलसद सम्झानधाम प्रधान सप्राप्तोद प्रशमसुखदा सनृतानदवीचिं॥१॥येतु स्वामिन् कुमति पिहितस्फारसद्दोधमूढा सौम्याकारां प्रतिकृतिमपि प्रक्ष्यते विश्वपूज्यां।पोभूते कलु पितमनोरनय स्यु प्रकाम मन्ये तेषां गतगुनदृशां का गति विनीति ॥२॥ श्यामा सूनो प्रतिदिनमनुस्मृत्य विज्ञानिवाक्य हित्वानार्य कुमतिवचन ये चवि प्राणनाज ॥पू पानदोनसितहृदयास्त्वा समाराधयति श्लाघ्याचारा प्ररुतिसुनगा सति धन्या स्तए व॥३॥यथ धनतस्तुतिपारन ॥ स्त्रग्विणीद ॥यस्य नव्यात्मनो दिव्यचेतोगृहे सर्वदा नितचिंतामणिद्योतते।याति दूरसतस्तस्य उष्ठापदो विश्वविज्ञान वित्त नवेदक्ष्यार यस्तु सर्वज्ञरूप स्वरूपस्थिन वीक्ष्यसमावत सिहसेनात्मजायभुतामोदसदोहसपूरि तोमन्यतेधन्यमात्मीयनेत्रश्य ॥॥ सोपवर्गानुगामिस्वनावोज्ज्वला व्यूढमिथ्यात्ववि शवणे तत्परा बधुरात्माऽनुनूतिप्रकाशोद्यतां राधसम्यक्त्वसपत्तिमालबते ॥ ३ ॥ यु ग्म॥थयधर्मस्तुतिप्रारन ॥ कामक्रीडावद ॥ नास्वज्ञान क्षात्मान धर्मशान स धान शक्यापुक्क दोपोन्मुक्त तत्वासक्त सनताशश्वष्ठांतं कीा कांत ध्वस्तध्यात वि श्राम हितावेश सत्यादेश श्रीधर्मग वदध्व॥१॥नि शेपार्यप्राइकर्ता सिधेनी ससा उनीवानां दूरेहत्ती दोनोवा सस्मत्ती समतेच्योमुक्तता विश्वत्राता निर्माता स्तुत्यो चतुर्विशतिजिनस्तुति. नत्या वाचोयुक्त्या चेतोवृत्त्या ध्येयात्मा॥॥सम्यग्दग्निःसादात्दृष्टोमो हास्टष्टो कृष्ट स्त्रोतोग्रामः संपज्ज्येष्ट.साधुश्रेष्ट. सत्प्रेप्टः॥श्रमायुक्तस्वातर्जुष्टो नित्यंतुष्टोनि स्त्याज्यो नवश्रीवजांको नष्टातको नि शंकः॥३॥ युग्म॥अथ शांतिजिनस्तुतिप्रारंना तविलंबितउंटः॥ विपुल निर्मलकीर्तिनरान्वितोजयति निर्जरनाथनमस्रुतः । लघु विनिर्जितमोहधराधिपो जगति यः प्रनुशांतिजिनाधिपः॥१॥ विहितशांतसुधारसमज नं निखिलर्जयदोपविवर्जित ॥परमपुण्यवतांनजनीयतां गतमनंतगुणै सहित सतां ॥शतमचिरात्मजमीशमनीश्वरं नविकपद्मविवोधदिनेश्वरं। महिमधाम नजामि जग अये वरमनुत्तरसिदिसमृध्ये॥ ३॥ त्रिनिर्विोपकं ॥ थथ कुंथुजिनस्तुतिप्रारनागी तपक्षतिमाह ।। जयजय कुंथुजिनोत्तमसत्तम तत्वनिधान धर्मजनोज्वलमानसमानस हंससमान ॥ज्ञानाबादकमुख्यमहोतकर्मविमुक्त विषमविपयपरिनोगविरक्त शुनाश ययुक्त॥१॥जयजय विश्वजनीन मुनिव्रजमान्य विगु६ चेतन चारुचरित्रपवित्रितलोक विबुद्ध निरुपममेरुमहीधरधीर निरतरमेव गर्वविवर्जितसर्वसुपर्वविनिर्मितसेव ॥२॥ जयजय सूरनरेश्वर नंदनचंदनकल्प वासक विश्वविनावविनाशक वीतविकल्प ॥ नि मलकेवलबोधविलोकितलोकालोक प्राउजूतमहोटयनिर्वृतिनित्यविशोक ॥ ३ ॥थ यारजिनस्तुतिप्रारंनः ॥ रामगिरिरागण गीयते ॥ दिव्यगुणधारक नव्यजनतारकं रितमतिवारकं सुरुतिकातं ॥ जिनविषमसायकं सर्वसुखदायकं जगति जिननायकं रमशांतं दि०॥१॥स्वगुणपर्यायतमीजतं व्याहत विगतपरनावपरिणतिमखंड।सर्व मोगविस्तारपारगत प्राप्तपरमात्मरूपं प्रचंड ॥ २॥ दि० ॥ साधुदर्शनवृतं नाविकै उत ॥ प्रातिहार्याप्टकोनासमानं ॥ सततमुक्तिप्रदं सर्वदा पूजिताशिवमपरसार्वनी पानं ॥३॥थथ मलिस्तुतिप्रारनः ।। कुनसमुन्नव संमटाकर सगुणवरहेमविजि नदेव जयजय विश्वपते। कत्यालल्यविवेकिता जिनसमुचिता हे त्वयि जागर्ति जि ॥शनित्यानंदप्रकाशिका ब्रमनाशिका हे तव गुनदृष्टिरनीश जाशदिनि निधे सशुपानिधे हे वर्जितसर्वविकार ज०॥ ४ ॥ निजनिरुपाधिकसंपदा शो हा हे निर्मलधर्मधुरीण ॥ ५ ॥१॥अथ मुनिसुव्रतस्तुति पारनः॥यथान्या है. ॥ उत्तमचेतनधर्मसमजगत्पते॥ नित्यानित्यपदार्थनिचयविलसन्मते॥नि जितमोहमदोनटनूपते ॥ श्रीपद्मातनुजात सुजातहरिद्युते ॥१॥ श्रीमुनिसु गक सङाना कतसगुरुशुनवाक्यसुधारसमकानाः हे प्रणमंति नवंतमनंतसु केवलमुज्वलनावमखंडमनिंदित ॥ २॥ तेनिःसंशयमेव जगत्रयवंदि प्रति सुदृष्टयानंदिताः।।सत्यं स्वोचितमेव यतः किल कामांस
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॥ श्रीसर्वज्ञायनमोनमः॥ अधश्री मुनिसुंदरसूरिकृत अध्यात्मकल्पद्रुमो वालावबोधसदितः प्रारभ्यते ॥ प्रथम अर्थकानुं मंगलाचरण । श्रीशंखेश्वरपार्श्वेशं प्रणतानीटदायकं ॥ प्रणमामि परमप्रेम्णा सर्वानीप्सितसिझ्य॥१॥ सर्व सर्वनापानिः र्सवसंसत्प्रबोधकं ॥ सर्वसत्वदितं वंदे वर्धमानजिनेश्वरं ॥३॥ अध्यात्मकल्पद्रुमसंज्ञकस्य शास्त्रस्य संविज्ञहितावदस्य ॥ वार्मनिरप्रोढमतिप्रतुष्टये वालाववोधां विदधे वित्ति ॥ ३ ॥ हवेग्रंथनेयादि ग्रंथकार प्रथमस्थापनानुं सूत्रकहे। अयायं श्रीमान् शांतनामा रसाधिराजः सकलागमादि सुशास्त्रार्णवोपनिपभूतसुधारसायमान ऐहिकामुमिका नंतानंदसंदोत्साधनतया पारमार्थिकोपदेश्यतया सर्वरस सारभूतत्वाच शांतरसनावनात्माध्यात्मकल्पद्रुमानिया नग्रंथांतरग्रंथननिपुणेन पयसंदण भाव्यते ॥ थर्थ ॥ पूर्वश्री मुनिसुंदरसूरिय त्रिदशतगिणी गुर्वावली प्रमुख ग्रंथकी ते बारपठी घाययकीयो तेनणीवहां ययगदयायो तेमाटे ययकहेतां एटलायकी थनंतर जनगालननेविपे प्रत्यक्ष शांतनामाजे रसाधिगज ग्नजे । श्रृंगार हा स्य ३ करुणा गणवीर ६ नयानक ओजन्म अनुत ए शांत एनवमध्येच धिराजके० शिरोमणी तेढुं मुनिदररि पदके काव्यतेहनों संदजग्चना नेणेकरी ने जाव्यतेके विचारो एटनेपूर्वमनमांधपोते तेशाध्यबंध प्रगटकरीकर के हेवोते रसाधिराज श्री मोद पिपीतवी ते फलजेहनु एडवा वनीकबोने नामफा १० अध्यात्मकल्पम. बागमजे श्रीजिनेश्वरप्रणीत सिक्षात तेयादेदेऽने सकलजे सुशास्त्रकहेता धर्मशा स्त्र रूपो थर्णवजे समुइ तेहनु उपनिपतके० सारनूत एहयो सुधारसायमा नके अमृतरसतुल्य हवेअन्यशृगारादिक रसतजीने केवलगातरसनेज शायातना ववु तेहनोहेतुकहेते एकतोऐहिकामुप्मिकके इहलोकसबंधी थने थामुमिकके परलोकसबधी जेधनतयानदनो सदोहके समूह तेनुसाधन तेहेतुयेकरीने वाली बीजोहेतुकहे परमार्थिकजे मोक्षार्थ तेहनाजेजाणनार तेहनेतपदेशदेवायोग्यए टलेमोक्षार्थनारपदेशकजे तीर्थकर गणधरादिक तेयाशांतरसनोज उपदेशकरे तेणेक रीने चलीत्रीजोहेतुकहेजे जेयाशांतरसते सर्वरसनेविपे सारनूतने तेहेतुथकी हवे पद्यसदर्नकहे तेकेहेले शातरसनावनास्वरूप थध्यात्मकल्पाम एहवेनामेजेग्रथ विशेप तेहनु प्रयनजेरचना तेहेनेविपे निपुण मनशछित थध्यात्मशान थापा ने कम्पनीपेठेसमर्थ तेमाटेथायथनुनाम अध्यात्मकप म जाणवु जयश्रीरातरारीणा लेने येन प्रशातित ॥ त श्रीवीरजिन नखारस शातो विनाव्यत॥।॥ नेदक प्र थर्य ॥ हवेग्रथनेथा ययकर्ता मगलाचरणकहे जेणेप्रशातितके शामिदि तरसथी क्रोध मान माया लोन राग देप ए नए बतरगशत्रु तेश लक्ष्मीपामी एहवाते श्रीवीरजिनप्रते दुमुनिसुदरसूरि नमस्कारकरीने देवदेवमेवस नाबुबु एटले समुचितेप्टदेवताने नमस्कारलक्षण यथारनेमगथ्वी सर्वमगलनिधो हदि यस्मिन् सगते निरुपम सुखमेरि सुरनरेश मुक्तिशर्म च वशीनवति जान त बुधा नजत शातरसेज्ञाशास्तम थर्थ ॥ हवेशातरसनु महात्म्यकहे। बुधाके हेविवेकीजनो तमें था सर्वमाग अनुं निधान एहवोजे शातनामारसाधिराज तेप्रतेनजो केमके एशातरस जेनारुद यमांधाव्यो तेप्राणी अनुपम सर्वार्थसिध्यादिकनाजेसुख तेप्रतेपामे बलोजे रुदयमा थावेयके जेमोदसुखतेपण शग्के तत्काल थोडाफालमाज वशथाय ॥ ५ ॥ समतैकलीनचित्तो ललनापत्यस्वदेदममतामुक् ॥ विप यकपायाद्यवश शास्त्रगुणे दयितचेतस्क ॥३॥वैरा ग्यशुधर्मा देवादिसतलविहिरतिधारी ॥ सवरवान् शुनरत्ति साम्यरहस्य जज शिवार्यिन् ॥४॥ प्रसादमादित रस तेने समताधिकार. १ थर्थ ॥ हवे साम्योपदेशयोग पुरुपनाविशेपण क्षारकरीने ग्रंयकर्ता ग्रंथमध्येक हेवाना सोल धारकहे। हेमोक्षार्थिपुरुपतुं साम्परहस्यजे समतानुसार तेप्रतेनज तेकहेवोथश्नेनज जे एकतो समतासाथै लीनचित्तकरीने एटलेएपहेलु बारपण कयुं वली वीजु सलनाजे स्त्रीनीममतामोचनबार त्रीजुं अपत्यजे पुत्राटिकसंततिनी ममतामोचनबार चोथु स्वके धननीममतामोचन क्षार पांचमुं देह तेहनीममतायेंर हितयको एटलेपांचमुं देहममतामोचन क्षार तुं विषयजे शब्दाटिकनोनिग्रहकरवो सातमु कपायजे कोधादिक तेनोनिग्रहकरवो इहां आदिशब्दवी राग देप प्रमानादि क तेदुने अवश्यके आधीननही एहवोथकोरहे तथा शास्त्रजे जैनागम तेहना गुणजे हेयोपाटेयादिक तेणेकरीने दम्पुटेचित्तजेणे एटलेशास्त्रगुणते थाउमुंहार थनेचित्तदमननामे नवमुंभार वली वैरागेंकरीने शुइनिर्दोपत्रे धर्मजेहवं एमांदस मुं वैराग्य क्षार श्रने ग्यारमुं शुरूधर्मनामाधार तथा देवजेश्रीअरिहंत गुरुजेस आधु थनेकेवलिप्रपीतधर्म एत्रण तत्वनो जाणथयीने एटले ए देवादिकस्वरूपनाज्ञा रिमुंभार तथा विरतिजे पंचावनुंविरमण तेहद्धारकथको एतेरसुविरति नाहार वली संवरजेसत्तावननेर्दे आश्रवनिरोधरुप तेणेकरीसहित तेचनट वार थने शुनउत्तम वृत्तिके थावरणारेजेहनी एहवोथको तुंसाम्परहस्य हां गुनतिनामापन्नरमुंहारथयुं अनेसोलमुं साम्यरहस्यनामाचार अप्स्वानासोलारना नामवेश्लोकेकरीकह्या ॥ ३४ ॥ इति पोडशाधिकारे शास्त्रोपदेशपदसंग्रहो यथा चित्तवालक माल्यादी रजस्त्रं नावनोपधी. ॥ यत्त्वां उर्ध्याननूता न उलयंति उलान्वियः ॥ ५॥ अर्थ ।। हवेप्रथम समताना अधिकारबाश्री उपदेशकहेले हेचित्तरूपीयावाल कतुं सदाय नावनाजे अनित्याटिकवार तथामैत्र्यादिकचार तेरूपणीयापधीप्रतें वां मोसनही केमकेएनावनाने नठांमवाथी शोगुणथायवे तेकहे जेथकीतादगम्तना जोनाराजे थानराशादियान तेरूपीया नृतपिशाचते तुजनेठसकरीशकोनही॥५ यदिश्याथैः सकलेः सुखं स्यानरेंश्चक्रित्रिदशाधिपानां ॥ तहिंदवत्येव पुरोदि साम्यसुधांबुधेस्तेन तमाध्यिस्व ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ दवेएननावना ते समताविना नहोय तेकवे सपला इंडियार्थेजे शद रूप रस गंध अनेस्पर्श तेणेकरीने राजाचक्रवर्ती थनेत्रिदशाधिपकहेतां इंश स .. ।
अध्यात्मकल्पाम. तेहनेजेसुखहोय तेसर्वसुख समतारूपीयुंजे सुधांधुधिकहेता अमृतममुश्चे तेश्रा गल बिजबरावरदेखाय एटलेससारिकसुख सबसुमतीने वितुय थनेसमतानु सुखदेते समुश्तुस तेमाटेमोदार्थिजीवते समतारूपीया सुगासमुइनेयादरे॥६॥ अदृष्टवैचित्र्यवशाजगजने विचित्रकर्माशयवाधिमस्युले ॥ उदासत्तिस्थितचित्तत्तय सुख नजते यतय हतार्तय ॥३॥ अर्थ ॥ हवेसमताथादखानु फलाहे जगतजे त्रिभुवनतेमां जनजे देवमनु प्यादि तेमव्ययतीजेनिग्रंथ तेजसुखीया तेजगतजनकदेवाने तेकहेने थदृष्टजेपूर्वक तकर्म तेहनुविचित्रजे नानारूपपणु तेहनावशयकी नानाविधकर्मना विपाकथी स सारीजीवना मननोयनिप्राय तथावचन यनेकायानीचेष्टापण नानाविधळे तेणेकरी व्याकुल हवेयतीकहेवाटे उदासवृत्तिजे लानालान सुखड ख अने प्रिययप्रिय तेने विषेसमानवृत्तिवे तथाजेनी चित्तवृत्ति स्थितरहीने वलीजेनीमर्वचिताक्ष्यपामीने 19 विश्वजंतुपु यदि दणमेक साम्यतो नजसि मानस मैत्री ॥ तत्सुख परममत्र परत्राप्यनुपे न यदनूतव जातु॥॥ थर्थ ॥ वलीसमतानु विशेषफलकहेले हेचित्त जोतु समतायकरीने सर्वजीवने विपे एकणमात्रपण मैत्रिता चिन्तवेतो तु पूर्वेससारमात्रमणकरता कोश्वखतपा म्योनथी एवा श्लोक अने परलोकमापण परमउलटसुरवप्रतेपार्मे ॥ ७ ॥ न यस्य मित्र न च कोपि शत्रुनिज परो वापि न कश्चनास्ते॥ न चेजियार्थेपु रमेत चेत कपायमुक्तं परम स योगी ॥५॥ थर्थ ॥ हवेएसमताने योग्यजीवकोणदोय तेकहेले जेहनेको मित्रनधी तथा कोशनुपणनथी तेमजजेदने पोतानु तथापारकुकांश्नथी चलीजेहनु चिन कपाप रहितयको इघियायजे शब्दादिविषय तेनविये रमेनही तेप्राणापरमयोगवतहोय एटले ते समतावतजाएयो । ए॥ नजस्व मैत्री जगदगिराशिपु प्रमोदमात्मन् गुणिषु खपत ॥ नवार्तिदीने कपारस सदाऽप्युदासत्ति खलु निर्गुणेष्वपि ॥१७॥ थर्थ ॥ हवेसमताप्राव्याना कारण उपदेशेने देजीव जगतना अंगीके जेजीवते हनीराशिकहेता समूहनेविषे एटसेसामान्यथकीसर्वजीवनेविपे मैत्रिताप्रत्येनजसके थादरीने वजीसमतप्रकारे जेको ज्ञानादिकगुणयुक्तहोय तेहनदिप प्रमोदप्रत्येनाज
समताधिकार.
१३
बनुमोदनाकर तथानबके संसारनी वार्निजपीडा तेणेकरीहीनके खितपाणिने
विपेरूपारसपतनज वली निनिर्गुण पाणीनेविपेपण वदालनिप्रतेनज॥१०॥
मंत्री परस्मिन् हितधी. समये नवेप्रमीदो गुणपढपातः॥
कृपा नवाः प्रतिकर्तुमीहोपेत्ता च माध्यस्थ्यमवायदोपे ॥११॥
अर्थ ॥ हवेएमंत्र्यादि चारेनावना स्वरूपकहे। नमन्तपोतायी व्यतिरिक्तजेवी
जाजीव तेनेविपेजे हितचिंतववानीबुद्धि तेनमंत्री कहियें तथागुणीजे ज्ञानाधिकरण
वंत तेहनोपदपातजे प्रशंसा तेदनेप्रमौकहिये तथानवाथिजे जन्ममरणादिकतं
तानाश ख प्रतिकारकरवानीवांचा कोऽयज्ञानीजीवने पापयकीनिवत्तीववानेयये प्र
तिवायदेवो तेनेकपाकहिये जैमीवीरस्वामी शूलपापीयद चमकोगिरतर्पप्रने
धपराधउपरपण रुपाकीपी. वीजग्राणीचवार्यदोपहतां वारतांयकापण टोपनेन
वन तथावारवायोग्यपपनहोय एहवोदोपवंत पुस्प तेनेविपे मध्यमनावें रागोष
रहितपणे समनारहवं तेउपेदानावनाकहियें ॥११॥
तयाचोक्तं तुर्यपोडशकापरहितचिंता मैत्री परशःखनिवारिणी तथा
करुणा ॥ परमुखतुष्टिर्मुदिता परदोयोपेतणमुपेक्षा ॥ १२ ॥
श्रये ॥ तेमजवलीकर श्रीहरिनश्सरिये चोथापोडदशकमध्ये जे परनेहितचिंत
वर्तमंत्री तथापरनाउ खने निवारणकरवानीनावना तेरणा अनपरनुमुखजे तम
तादिरूप तदेखीने तंतोपपामवो ते मुहिताके० प्रमोदजावना कहि थने परनार
देखी उबेखवु उनात रहंदूं तनेउपदानावना कहियें ॥ १ ॥
तयाच योगशास्त्रे ॥माकापीकोपि पापानि मा चानूकोपि छः
खितः ॥ मुच्यतां जगदप्येषां मतिमंत्री निगयते ॥ १३ ॥
अर्थ ॥ वतीयोगशान्त्रमध्येपण श्रीहमचंदवृत्यिकाने के कोपापमकरो को
इवीथायोमां तथाजगतनर्व कर्मयीमुकायो एवीजमनितंने मैत्रीकाहिये ॥ १३॥
अपाताशेपदोपाणां वस्तुतत्वावलोकिनां ॥ गुणे
पु पक्तपातो यः स प्रमोदः प्रकीर्तितः ॥ २४ ॥
अर्थ ॥ सकतदोपरहिन तथा वस्तुनत्व खनाव यने परनाव तया भव्य गुण
पर्यापनाजाण एवाजेगुणवंत तथाउपतपयकी नामान्यपणेपण जंगुणवंतहोय
तेहना गुणनविर्षे पक्षपात तेनंप्रमोदनावनाकहियें ॥ १५ ॥
१४ अध्यात्मकरपजुम. दीनेष्वार्तेपु नीतेपु याचमानेपु जीवितं ॥ प्रती कारपराबुद्धि कारुण्यमनिधीयते ॥ २५ ॥ थर्थ ॥ वलीदीन असमर्थ बनेबानपीडायत तथा नयेंकरी थाकुल थनेत्री वितव्यनेयाचतां एवाप्राणिने विपेजे प्रतिकारकहेता ख निवारवानीधि राखवी तेने कारुण्यके० करुणानावना कहिये ॥ १५ ॥ क्रूरकर्मसु नि शंकं देवतागुरुनिदिपु ॥ आ मशंसिपु योपेक्षा तन्माध्यस्थ्यमुदीरित ॥२६॥ अर्थ ।। तथा शकारहित क्रूरकर्मनाकरनार थने देवगुरुनानिदक पोतानीप्रशं सानाकरनार एवाअधमपुरुपनेविपेजे उपेक्षा तेमध्यस्थनावनाकहियें ॥ १६ ॥ चेतनेतरगतेष्वखिलेपु स्पर्शरूपरवगंधरसेपु साम्यमे ॥ ति यदा तव चेत पाणिंग शिवसुख हि तदात्मन् ॥२॥ थर्य ॥ हवेवली मूलसूत्रकार समताथादरवाथी मोहनी सुजनताकहेडे हेथा स्मन् जेवारे ताहालंचित्त अखिलके समयचेतनजे अनुकम स्त्री देह स्त्रीकटाद कोकिलनाद कस्तुरी पशुमासप्रमुख तथाश्तरजे थचेतनपदार्थ अनुक्रमें शय्या थानरणघरेणादिक कर्पूर वीणा शर्कराप्रमुख तेसंबधी जेस्पर्श रूप रबकेश द गध रस तेहनेविपेतु साम्यताके. अष्टानिष्टनेवि समवृत्तिप्रपामशे तेवारेंज नि |करीने मुक्तिसुखते ताहरेहस्तगतथाशे ॥ १७॥ के गुणास्तव यत स्तुतिमिवस्यभुत किमया मदवान् यत् ॥ कैगता नरकनी सुकृतैस्ते कि जित पिटपतिर्यचिंत ॥१७॥ थर्थ ॥ हवेथात्माजे स्तुतिनेवाले तेनोमदनिवारवाने कहे हेयत्माथीदार्य) ये गानीर्य दान शील तप नावना उपशमादिक जेगुण तेमाहलाताहरामा श्यागुण दे केजेदने माटेतु स्तुतिकहेता लोकनामुग्ने पोतानाप्रशसा करावयावाब तपावती तेंवसाधुयात्रीने राज्यादिमहकिनेप्रतिबोध अथवासर्वशाखप्रवीणता जगतप पुगप्रधानपए इत्यादिक अथवाभावकथाश्रीने जीवार विवप्रतिष्टा सघपतिपए थमारपड़ह इत्पादिक अनुतके थाचर्यकारी कार्यश्यांकीधा केजेनाथी मद पतपाय तथा कयासुरुतेकरी ताहारीनरफनीबाग अथवा पितृपतिजे यम तेणे समताधिकार. तेजित्यो जेमाटतुंधचिंतकहेतां निश्चितयकोरहेने. एटले स्तुतिनीवांना मदक थने निश्चितरहेए तने युक्तनची ॥ १७ ॥ गुणस्तयों गुणिनां परेपा माक्रोशनिंदादिभिरामनश्च ॥ मनःसमं शीलति मोदतवा खिबेत च व्यत्ययतःस वेत्ता॥रणा श्रये ॥ हवेजेवेत्तापगुंते शांतरसनुकारण एमकहे जेप्राणी परके० धन्यजेगुए वंतपुस्पदीय तेनारगन्तवजे गुणवर्णन अनेयात्मनःकहतां पोतानाधाकोशजे गा लप्रमुख तयानिंदादिक साननीने पोतार्नुमन समपरिणामेराखे पण अमर्पधरेनही उलटो मोदनेकहतां हर्षपामे अनेएमविचारेजे गुणवंतना गुणस्तववाजवटे तया हेयात्मातुं निर्गणटो माटे निंदानेजयोग्यतो एमप्रमोदधरे तथाव्यत्ययकहतां उ परकह्याधीविपरीतजे बीजागुणवंतपुस्पना आक्रोगकण निंदातांनजीवनेपोतानी प्रशंसादिकलांनतीने खंदपामे जेएएवागुणवंतपुरुपनी निंदाकांकरे तथामाहारामां तोरणनयो तेमठताएछुकहे। एमचिंतवे तहनेवेत्ताके ज्ञानीकहियें ॥ १५ ॥ न वेत्सि शत्रून् सुहृश्य नैव दितादिते स्वं न परं च जंतोः॥ः खं विपन् वांसि शर्मचैत निदानमूढः कयमाप्स्यसीट।श्॥ अर्थ हवेयथायने नहीजाणनारजीवनुं मूढपणुंकहेठे हेजीव तुंशत्रूजेरागाटिक तथामित्रजेवपशमादिक तेहनेनयोजाणतो तथाहितसंवरादिक बने यहितजेथा प्रवादिक तथावलीम्बनावजे ज्ञानदर्शनादिक श्रनेपरनावजे मिथ्यात्वरागादिक तेहने थीयोलखतो वली खजेपरितहादिक तेहयोउनग्योडे यनेगर्मजे इहलोकतथा लोकादिकनुंमुख तेनेवाठे तेवार तुं एसुखनुं निदानजे कारण तेह तो मूढकेए जाणतो तेमठतां गीरीतेवांवित पदार्यप्रतपामीश एटलेसुखमूल निदानते तं वे तेविनाइटखनी प्रातिनयाय ॥ १०॥ कृतीदि सबै परिणामरम्यं विचार्य गएदाति चिरस्थितीद ॥ नवांतरे ऽनंतसुखाप्तये तदात्मन्किमाचारमिमं जहासि ॥२॥ ये ॥ हवेजाणपणानु फलदेखाटीने उपदेशे सतीजमाह्योपुरुपहोच तेतोस जे वस्तुपरिणामेरम्य तथासुखदाहोय यनेचिरस्थितिकहेता घोकालर चारकरीने तेवस्तुनेतेग्रहणकरे तोहंधात्मा नवांतरेयनंतलख चापवाने याजेडानादिक चारपदार्य तेनेतुंकंमत्यजेजे एवारंवस्तुपरिणामेरम्य थने के एटलेपणाकालसुधी रहेएवीवे माटेतेतुलनेत्यजवीघटेनही ।
| के तेना तेतेथाफारनागायकी ते लिप्यमय जेचित्रितपुतला तथाप्रत्यक्षदृश्यमानजे । २६ अध्यात्मकल्पडम निज परोवेति कृतो विनागो रागादिनिस्ते त्वरय स्तवात्मन् ॥ चतुर्गतिलेश विधानतस्त प्रमाणयन्नस्यरिनिर्मित कि ॥२२॥ थर्थ ॥ हवेत्रात्मा रागादिकने वशयको पोतानुयने पारकुलेखेने तेयाश्रीउपर शेठे हेयात्मा निजकहेता स्वजन कलत्र पुत्रादिक यथया परजेशत्रुप्रमुख एवोदि नागजे नेदकरीजाणयो तेनेदसर्वरागादिकनु करेलु माटेताहरे जेप्राणीसाथै राग ले तेहनेतु स्वजनकरीजाणेने यनेजेनाथीपने तेनेशत्रुफरीजाणेने पणतेरागादिक तो चारगतिनाक्लेश कष्टनाकरनार ताराशत्रने तोथरिनिर्मितके तेशत्रुनुजनीपना व्यु जेनेद तेने शुप्रमाणकरेठे एटलेरागपनावशथी निजपराविनागकरवुतेजूनोठे अनादिरात्मा न निज परोवा कस्यापि कश्चिन्न रिपु सुहृक्षा ।। स्थिरा न देहाकृतयोणवश्च तथापि साम्य किमुपैपि नेपु॥३॥ यर्थ ॥ हवेसर्ववस्तुनी थनित्यतादेखामी यात्मानेसमतानो प्रेरणाकरे हेया त्मा तुयादिरहितो अनेकोश्नेको पोतानु तथापारकुनी वलीकोश्नोकोशत्रुथ नेमित्रपणनथी वतीहेयात्मन् देहजे पुरुष स्त्रीयादिकनुशरीर तेथाकारपरिणाभ्या एवायपुरुहेता पुजन तेपणस्थिरनथी केमके पक्षणप्रत्ये उपचयके गुनाश नादिक थवस्थापालटेने तेमठतां हेत्रात्मा श्रादेहाकारजे पुजनतेनेविपे तुकेम सा म्यताकहेता रागदेपरहिततापणु नथीपामतो देथात्मा तुतोयनादीले थनेएदेहाती तो थस्थिर माटेसमतानेयादर ॥ २३ ॥ यया विदा लेप्यमया न तत्वा त्सुखाय मातापिटपुत्रदारा ॥ तथा परेपीद विशीर्णतत्तदा कारमेतहि सम समग्र ॥२४॥ थर्य ॥ वलीएजयर्थ हटकरेठे थाससारमांजेम लेपमयकहेता चित्रादिलिखित जे माता पिता पुत्र दारा कमत्रहोय ते तत्वथकी विचारीजोतां विवेकीपुरुपने सुखदार नहोय एटलेतेहने देखाग्विकीसुखमानेनही तेमथपरेकेबीजापणजे साक्षातदृश्य मान माता पिता पुत्र कलत्रादिक तेपणतत्वयको विवेकीने मुखदाश्नयाय केम मातापितादिक तेसरसरखायाय माटेतेनेरिपे ममत्वकर तैमिय्याले ॥२५॥ जानति कामानिखिला ससझा अर्थ नरा कर्म च केपि धर्म ॥ जैन च केचिद् गुरुदेवशुध केचित् शिव केपि च केपि साम्याश्य समताधिकार. अर्थ ।। हवेसमताना धरनारप्राणियोडाहोय तेकहे। संसारमा समयसंडाधार क जीवमात्र तेकामकहेतां शब्दादिकविषयजाणेठे एटले कामनार्थी सर्वजीव तेसर्वमनुष्य अर्थकहेतां धनउपार्जन तथाकर्मकहेतांकाम एवेपदार्थजाणेठे केमके मनुष्यना कामनोगते धननेवाधीन तेमांवलीकोऽकमनुप्यते सामान्ययकी मिथ्या दृष्ट्याटिक धर्मनेजाणेने वलीतेमांपएकोऽफज जैनधर्मनेजाऐ वत्तीतेमांपण को एकविरलाज शुक्ष अष्टादशदोपरहितदेव तथागुरु सुविहितसुसाधु एवोजैनधर्मजा ठे वलीतेमांपण शिवजेमोक्षार्थ तेहनेतोकोश्कज जाणे वलीतेमांपणसमताना जाणतो कोकविरलाजवे एटले ए सर्वधीअधिक तेसमताना जाणनेकह्यो॥ २५॥ स्निह्यति तावधि निजानिजेपु पश्यंति यावन्निजमर्थमेभ्यः॥ मानवेत्रापि समीक्ष्य रीति स्वार्थे न कः प्रेत्य हिते यतेत ॥२६॥ अर्थ ॥ हवेस्वजनना संबंधते केवलस्वार्थनिष्टित तेदेखाडेने निश्चयथी निजके पोतानास्त्रीपुत्रादिकतेसद्ध निजके पोताना पतितादिक स्वजननेविपेतिहां लगेंस्नेह धरें जिहां लगें ते स्वजनयी पोतानुयर्थ जे नरण पोपणादिक यतुंदेखे तिहांलगें स्नेह धरेठे एम प्रत्ययानवनेविपेपण स्वजनादिकनी एरीत तेजोऽने प्रेत्यके परलोक नेविपे हितकारी एवोस्वार्थजे अत्मार्थ संयमादिक तेहनेविपे कोणज्यमनक।।२६॥ स्वप्नेजजालादिपुयघटाप्त रोपश्च तोपश्च मुदा पदार्थैः ॥ तथा नवेऽस्मिन् विपयेः समस्तैरेवं विनाव्यात्मलयेऽवधेहि॥॥ अर्थ ॥ हवेजेरागपधरवो तेफोगट एमदेखाडे जेमस्वप्न तयाजालादिक विपे पाम्याजे श्रशुन तथा गुनपदार्थ तेणेकरीने रोपकहेतांप अने तोपकहेतां हर्षकरवो ते मुधाके निरर्थकठे एटले जेमस्वप्न इंजालाटिकना पदार्थोथी अर्थति विकाश्नथी तेमनवमांपण यशुजतया गुनविपयेंकरीने रोषयनेतोपकरवो तेमुधारे एमविचारीने हेयात्मातुं अात्मसमाधिनेविपे यवधेहिके सावधानरहे ॥ २७ ॥ एप मे जनयिता जननीयं बंधवः पुनरिमे स्वजनाश्च ॥ अव्यमेतदिति जातममखो नैव पश्यसि कृतांनवशत्वाना नोधनैः परिजने स्वजनैर्वा देवतेः परिचितैरपि मंत्रैः॥ रहतेऽत्र खलु कापि कृतांतानो विनावयसि मूढ किमेवाशा अर्थ ॥ हवेवेकाव्यमां जीवने मृत्युनु थाधीनपणुं देखावे हेयात्मा यामाह
अध्यात्मकल्पधुम.
रोपिता यामाहरीमाता थास्वजन श्राव्य एम ममत्वमा मनथयोथकोतु स्वकहे
तापोतेज यमनेवशपड्यु नथीदेखतोवतो ॥ २ ॥ तोहेमूढ़ एससारनेपिपे निय
येकरीने धनतयापरिजन सेवकादिक तथा स्वजन पुत्र कलत्रादिक वलिदेवता त
या परिचितकहेता विधिथीउपाा जेमत्रतेणेसर्वेमलीनेपण रुतातजेमृत्यु तेथी
कोप्राणोरखायनही एवुहेमूखंतु केमविचारतोनी ॥ २५ ॥
तैनवेपि यददो सुखमिव स्तस्य साधनतया प्रतिनाते ॥मुह्य
सि प्रतिकल विपयेपु प्रीतिमपि न तु साम्यसतते ॥ ३० ॥
थर्थ ॥ यहोयात्मा जेमाटेतुससारमापण तेतिजेधनादिक तेणेकरीने सु
खांठतो तो समयसमयपिपे विषयमा मोहपामेठे पणतेधनादिक कहेवा तेतुज
नेसुख साधन तयाके कारणपणे प्रतिनास्यां पणतेपनादिक तोसुखनाकार
एनथी मात्रतने एमनाम्याठे जे ए सुखनासाधन तेथी तु समताना सतत्वखरू
पनेपिपे प्रीतिनथापामतु ॥ ३०॥
अर्यतोयुग्म ॥ कि कपाय कलुप कुरुपे स्व केपु चिन्ननु मनोरिधि
यात्मन् ॥ तेपिते दि जनकादिकरूपैरिटता दधुरनतनवेषु ॥३२॥
थर्थ ॥ होम्यजनादिकनु अनेकातिकपणु देखामेने निश्चयथको हेयात्मा कोश
कप्राणीनेविपे थरिधियाफदेता एमाहाराशत्रुठे एवीसुधेकरी पोतानुमन कमायेंकरीक
सुपिताकरे केमके तेप्राणीपण ताहरा पिता मातादिकस्वरुफरीने अनता नवमा
यनतासगपणोने धरताहया तेमाटेतेयोने केरल शत्रुकरीजाणवु तेमिय्याठे ॥३१॥
याच शोचसि गता किमिमेमे स्नेहला पति धिया विधुरात्मा।
तेनयेपु निहतस्त्वमनतेप्येव तेपि निहता नवता च ॥ ३२ ॥
थर्थ ॥ हरे जे स्वजन तेजशत्रुडे एवुदेखाडे हेयात्मातु एमाहारो स्नेहवत
सजन फ़िहागपो एपीनुधिये पिधुरात्माके 5 ग्व्याकुलयको मुवागयाजेसज
नादिक तेप्रत्येशाचरे एमजेहनो शोककर तेजस्वजनादिक तुजनेयनतानवनेवि
पेहप्पोने वजीतेपण तेहनेथनतानग्नेचिपे हण्याने तेटतामाटे वजनयुधियेंजे से
हराग्यबु तेपणमिय्याने ॥ ३२ ॥
त्रातुन शक्या नवउ खतो ये त्वया न ये तामपि पातुमीशा ॥
ममतमेतेपु दधत् मुधात्मन् पटेपदे कि शुचमेपि मूढ ॥ ३३ ॥
स्त्रीममलमोचनाधिकार.
रए
अर्थ ।। हवेकोकोक्ने राखवासमर्थनयी एबुंदेखाडेने नवके० संसारनाउ खथ
की जेप्राणीने तुं राखीसक्योनही अनेतेपण नव.खथीनुजने राखीगच्यानही तो
जेनवःवथो राखवानेसमर्थनथी तेवारेहेमूखंधात्मा स्वजनादिकनेविपे मुधाकेन्फो
कटममत्वकरतोयको पगेपगेंगुशोकपामेने माटेशोकतनीने समतानेनन ॥ ३३ ॥
सचेतनाः पुजलपिंडजीवा अर्याः परे चाणुमया ध्येपि ॥
दधल्यनंतान् परिणामनावान् तत्तेयु कस्वति रागरोपो॥३४॥
अर्थ ॥ हवेजोवना पुजनसाथे नानाविध परिणाम तेकहे। पुजनपिंडके पुन
लनो समूदजेदेहलवण तेहनेाश्रीनेरह्या एवाजे सचेतनके चेतनाधारक सर्व
जीव अथवा अणुमयाके पुजतमयजे वीजा अचेतन अर्यके० पदार्थ एटलेशरी
रचारकजीव थने पुगत एवेपण अनंतागमे परिणामनावके पर्यायप्रत्यधरेवे तोते
जीवधनेपुशननेविपे रागअनेरोपकरवाने कोणयोग्य याय निपुणपुरुपे तेउपर राग
रोपकरवो युक्तनथ॥३४॥ इतिश्रीअध्यात्मकल्पमे साम्योपदेशारख्यः प्रथमोधिकार;
अयस्त्रियः।। मुह्यसि प्रणयचासगिरासु प्रीतितः प्रणयिनीपु कृतिन्
किं॥किन वेत्सि पततां नववा तानृणां खलु शिलागलवधाः॥२॥
चास्थिमजांचवमानमांसामेध्यायशुच्यस्थिरपुजलानां ॥ स्त्री
देवपिंडाकृतिसंरियतेपु स्कंधेपु किं पश्यसि रम्यमात्मन् ॥५॥
अर्थ ॥ हवेवीजायधिकारमा स्त्रीयोनोममत्व त्यजवायाश्री उपदेशधापेले हेरु
तिन् प्रणयचारुके स्नेहेकरीमनोहर गिराके वाणीजेहनी एहवी प्रणयिनीके
स्त्रीयोनेविपे प्रेमेकरीने मुंमोहपामेने पण एमकानथीजाणतोजे नववा के सं
सारसमुश्मा पडतापुरुषनागलामा स्त्रीश्रोते गिलाउँबांधेठे ॥ १ ॥ हवेएस्त्रीयोना
शरीरर्नु अपवित्रपणुंकहे। हेयात्मन् चामडी दाम चरबी आंत्री पांसली मेद
सविर मांस विष्टा तथा प्रादिशब्दयी मूत्र कफ श्लेप्माटिक एहवाअपवित्र बने
अस्थिरके० पाविनाशिक जे पुगत तेहना स्कंधके समूहवी वन्यो जेस्त्रीनुशरी
र तेहनी पिमाळतिक सांई सुघटयाकार तेरुसंस्थितरह्यावे तेमां संतुंमनोहर
पणुंदेखे। एटलेएसर्व अपवित्र यस्थिर पुगतनो पिंम तेमोकांसारनथी ॥ २ ॥
विलोक्य दूरस्थममेध्यमल्पं जुगुप्ससे मोटितनासिकस्वं ॥
नृतेपु तेनेव विमूढयोपावपुप्यु तल्किं कुरुपेऽनिलापं ॥ ३ ॥
३० अध्यात्मकल्पडम. श्रर्थ ।। वलीतेहिजकहे देवात्मन् थपके० श्रोमुकपण थमेव्यके० विष्ठादि कदेखीने मोटितनासिकाके नाकमचकोडीनेतुं जुगुप्ससेके० गडाफरेचे ताहे मूर्ख विष्टादिकेजनया एहपाजे स्त्रियोनाशरीर तेहने विपे सुं श्रनिनापकरेठे ॥३॥ अमेध्यमासात्रवसात्मकानि नारीशरीराणि निपेवमाणा ॥ इदाप्यपत्यजविणादिचिंतातापान परत्रेप्रतिगतीच॥ ४॥ थर्थ ॥ हवेएस्त्रीयोनाशरीरते इहलोके अने परलोकेपण उखदायीने तेकहेते थमेध्यजे विष्टादिक ते मांस रुधिर मेद तेथीजवनेला तन्मय एहवाजे स्त्रीयोनाश रीर तेहने सेवनाराजेपुरुप तेइहलोकेपण अपत्यके० सतानपुत्रादिक तथा प्रविण के धनइत्यादिकनी चितानासतापप्रतें पामेवे थने परलोकेपण दुर्गतिप्रतेपामेवे। अगेपु येपु परिमुह्यसि कामिनीना चेत प्रमीट विश च क्षणमतरेपा ।। सम्यक् समीदय विरमाशुचिपिडके न्यस्तेन्यश्च शुच्यशुचिवस्तुविचारमिवत् ॥ ५ ॥ थर्थ ॥ वलीस्त्रीनादेहनी थपवित्रताकहे चित्तनीप्रसन्नतायेंकरीनेजे स्त्रीश्रीनाथ गनेविपे मोहपामेठे तेहनेकहियेये जे तु तेमाएकणमात्र प्रवेशकरी एटलेसूक्ष्मद टीकरी तेनुसम्यकप्रकारे स्वरूपविचारी ने पवित्र थने थपवित्र एवेवस्तुनावि चारने चांगतुथको होयतो जेजे स्त्रीनायगळे तेतेसर्व अपवित्रतानाज पिमके० ढग लाठे तेहथीतु विरमके ० रागत्यजीने थलगोरहे ॥ ५ ॥ विमुह्यसि स्मेरदृश सुमुख्या मुखेदाणादीन्यनिवीदमाण ॥ समीदसे नो नरकेपुतेपु मोहोमवा नाविकदर्थनास्ता ॥६॥ अर्थ ॥ हवेस्त्रीनायंगनिरीक्षण तथानोगनुफलकहे। हेयात्मातु सु मुखीकेच इमुग्वी तथास्मेरके विकसित नेत्रजेदुना एहतीस्त्रीयोनामुख तथाईहणजेनेत्र था दिशब्दथी स्तन जयादिक तेहनाउपर सरागपणेजोतोयको मोहपामेठे पणजे महाऽ समपनरक तेगुनेपिप तथाविध मोहथकी उपनीयो एहवी नारिके० श्रा गामिककदर्यनाजे महापीडाथो तेप्रतेतुकेमविचारतोनथी ॥ ६ ॥ अमेध्यनस्त्राबहुरधनिर्यन्मलाविलोद्यत्कृमिजालकीर्णा ॥ चापल्यमायान्तवचिका स्त्री सस्कारमीद्वान्नरकाय नुक्का।।७ थर्थ ॥ वजीतेहिजकहेते निष्ठादिकनरीकी नसाके० धमणीसारखी तथाध --
अपत्यममवमोचनाधिकार.
जालके समूह
पारध्रजे वारेवार तेहथीनिकलता मलके० विष्टामूत्रश्लेप्मादिक तेणेकरी थावि
लके मनिन तथा उद्यतके उपजता कमिजे योनीमाहेला सूक्ष्मजीव तेहना
तेणेकरी कीर्णके०
। व्याप्त वली चपलपणुं तथा कपटाइपणुं अने
अनृतके असत्यवचन तेणेकरी वचिकाके० पुरुपनेठगनारी एहवीजेस्त्री तेसंस्कार
जे जन्मांतरनोतंबंध तेहनावशयकी अथवा संस्कारजे स्नान तिलक आचरणादिक
तेही उपनोजेमोह तेहनावशेकरी नोगवीयकी नरकायके एनरकनीदेवावालीथाय
निमिविपकंदली गतदरी व्याघ्री निराव्हो मदाव्या
धिर्मयुरकारणश्च ललनाऽनभ्रा च वजाशनिः॥ बंधु
स्नेविघातसादसमृपावादादिसंतापनःप्रत्यदापि च
रादसीति विरुदैः ख्याताऽऽगमे त्यज्यतां ॥ ७ ॥
अर्थ ॥ वलीपणस्त्रीज त्यज_कहे। श्रीसिक्षातमां स्त्रीनेएहवे विरुदेकरीवखा
णीने तेमाटेस्त्रीनेत्यजवी तेकिहांकिहांविरुदेंत्यजवी तेविरुदोनानामकहेठे एस्त्रीतेनू
मिविना विपनी कंदालीके नवाथंकुरनीतीखा तथा कंदरीजेगुंफाथीरहितयकीपण
वावणमरिखी। वलीको नामविनापण महारोगरूप वली अकारणके अपथ्य
सेवन अजीर्णादिक कारणोविनाज मृत्युके० मरणतुल्यठे वली अनवाटलरहितते
वनसरिखी वीजली अने बंधुके स्वजननो स्नेह तेहनो विघातके ० नाशकरनारी
ठे तथा साहसके० चविचारितकार्यनुकर, असत्यबोलवु वली आदिशब्दथी अदत्त
घब्रह्म परिग्रहादिक तेसंबंधी संतापनो नूके० उत्पतिनोस्थानकडे वली प्रत्यद
साक्षात् रादासीपणजाणवी एरीतें एसर्वस्त्रीना एहवा अशुन बिस्दजाणीने विवेकी
पुरुपने स्त्रीसंबंधी ममत्वत्यजवू ।। ७ ।। इतिश्रीअध्यात्मकल्पमे स्त्रीममत्वमोचनो
नाम इतीयो ऽधिकार संपूर्णः ॥
अयापल्याधिकारः॥मानूरपल्यान्यवलोकमानो मुदाकुलो मोदनुपारि
णा यत्॥चिक्तिप्सया नारकचारके स्मिन् दृढं निवछो निगडैरमीनिः॥१॥
श्रर्थ ॥ हवेत्रीजाअधिकार पुत्रादिक, ममत्वमुकवायाश्री उपढेशकहेठे तेमा
प्रथम संतानउपरें मोहकरवूनही तेकहेने हेयात्मातुं अपत्यजेपुत्रपुत्रीप्रमुख तेने
जोतोथको मुदाके हर्पयाकुलथाइस केमके मोहराजारूप शत्रु नरकरूपजे चा
रकके बंदीखानु तिहां चिदिप्साके घालवानीश्ताधपत्यरूप निगडके० विमिये
दृढकरीने तुजने वांध्योरे ॥ १ ॥
|| कारनाथाय यउक्त इवीएजोगिमले हवतिवें दियाउ जे जीवा ।। कोयदोवतिन्निव
नेअपत्यजेपुत्रपुत्रादिक तेहनाउपर रागकेमनपजेठे केमके एकजस्थानकनाउपना
तेक्रमी अनेयपत्य तेबेदुबराबर ॥ ५ ॥हवे अपत्यथकी कापणस्वार्थसिदिनी
थाशारास्ववी जूतीवेतेदेखाडे हेयात्मातुथपत्यनपर स्नेहकरीसनही शाहेतुमाटेके
पणसदेहरे केमफेजोपुत्रादिकसाथें वैरानुबधी सवधहोयतो तेथकी उपकारकमया
य श्रेणीकयने कोणीराजानीपरें तेमाटेस्नेहनु धरवुतेफोकटरे ॥॥इतिश्रीप्रध्या
२
अध्यात्मकल्पम
आजीवित जीव नवातरेपि वा शल्यान्यपत्यानिन वेल्मिकि हति॥
चलाचलेयविविधातिदानतोऽनिग निदन्येत समापिरात्मन ॥२॥
थर्थ ॥ दवेवपमानतरेकरी सताननु पुखदाऽपहुंदेवाहेने यात्मा मानव
मां जावजीवलगे तथा नयांतरे परनरेपण अपत्यजे सतानते गयो शनाप
बे एमत्ताहरादपमा केमनीजाणतो जेवल्पापुपवत सतानादिक तेशोरुप
पीडाबापेठे थने दीर्घायुषवतजे अपत्यते लग्नादिश्व्यव्ययप्रमुग्य विविधमानी
पीडाथापेने तथा नरणपोपणादिकनी चिता पजेधानि तेहनउपजाफरीने थर
निशके निरतर हेयात्माताहरी समाधी सुस्थताने दन्येतो हणीने ॥ २॥
कुदौ युवल्या कमयो विचित्रा अप्यत्रशुक्रप्रनवा नवति ॥
न तेषु तस्या न दि तत्पतेश्च रागस्ततोऽय किमपत्यकेषु
॥ ३ ॥ त्राणाशक्तेरापदि संवधानत्यतोमियोऽगवता ॥
सदेदाचापकृतेर्माऽपत्येपु स्निदो जीव ॥ ४ ॥
अर्थ ॥ वलीतेहीजकहेठे स्त्रीनीकुखने विपे अवजेस्त्रीनीयोनीनुरक्त श्रने शुक्रने
पुरुपवीर्य तेहनासयोगथीउपना एहवाफमाजे बेश्यादिकजी तेपणविचित्र
तेस्त्री तथानार बेहुने किनिश्चय TIANस्नेहन होतुश्व
यापदाजे मरणरोगादिक भावेथके जेयपत्यते त्राणके राखयानेसमर्थनथी तथाव
लीपरस्परेप्राणीने सबधनु यनित्य कारणकेनानाभकारना सबध माटे उपकारना
।
,
त्मक.प मे पुत्रममत्वमोचनास्पस्तृतीयोऽधिकारसमाप्त ॥
अथधनाधिकार ॥या सुखोपकृतिकवधिया ख मेलयन्नसि रमा
ममतानाक् ॥पाप्मनोधिकरणखत एता हेतयो टटति ससृतिपात॥१॥
धनममतमोचनाधिकार. अर्थ ॥ हवेचोथायाधिकारें धननीममत्वमूकवाधात्री उपदेशयापेठे तिहांपहेलु धनधी सुरवतथाउपकार नयाय तेकहे। हेजीवतुं ममत्वने नजतोयको एममाने जे एलक्ष्मी ते मने तथामहागकुटुंबने सुखकारीयासे तथा दिनाटिकनो उपकारकरवा ने कामयावशे एहवीवुड़ियजे रमाके लक्ष्मीनेमेलवेने तेएलब्धीतोकर्मादानादिक सावद्यव्यापारने करवेकरी अधिकरणपणाथकी पाप्मन के पापनीजहेतुने तेमाटे संततिपातजे संसारमांत्रमणकरबुं तेप्रजापे एहवी तेनणी लक्ष्मीयकी सुख तथा उपकारनीवांठाते फोकट ॥ १ ॥ यानि विधामप्युपकारकाणि सप्पोजरादिप्वपि गतिश्च ।। शक्या च नापन्मरणामयाद्या हंतुं धनेप्वेपुक एव मोदः॥५॥ अर्थ ॥ दवेधनयको अनर्थनीपरपरायाय तकहने जेधनते विषांके० शत्रुनेपण उपयोगीयाय एटलेधनना संचयकरनारने हणीनेज शत्रुबलवंतयाय थनेतेहना धननेज जोगवे वली जेधननेतंच्यायका उंदिरइत्यादिकनीगतिमासयाय केमके धन नोलोनीजीव धननीमूत्रायमरीन तेवनउपरें सर्प तया उंदिर इत्यादिकथवी यवत रे वलीले धनकरीमरण तयारोगल्यादिक आपदायोतेपण सुनुमचक्रवर्तिप्रमुखनी परेंनिवारीगकायनही तोएहवायननेविषे मोहतेगीकरवी ॥ १ ॥ ममत्वमात्रेण मनःप्रसादः सुखं धनरल्पकमल्पकालं ॥ आरंनपापः मुचिरं तु खं स्यादुर्गती दारुणमित्यवेदि॥३॥ अर्थ ॥ हवएपनयकीसवयोमुचे अने उखया'वं तक केमकं धनेकरी केव लममन्वना जन्मनोज प्रसादचाय कारणक महागपाशंधन एमातवीचिंतवी ने धननोजोनिमारती वर्षपामेले पणतेधनेकरी नुसतो प्रश्पकाल लेटामात्र योदा कालजर्गेजदोय पणतंहना अतिनिमिनक याग्ननापापेन गनिनेवि दारू एके कतिपु.खहोपज एवू नवनंदगजाने दृष्टांत यवेदिक. जाण ॥ ३ ॥ जव्यम्तवात्मा धनसाधनो न धमापि मारंनतया निशुः ।। नि.संगतात्मा त्वतिशुझियोगा न्नुक्तिश्रियं यति नन्वपि॥४॥ धर्थ ॥ वैधनविना व्यन्नवरूपधर्मनार तमाटेधनडपाजवु एव॒विचारपण निभंघकी जोता अयुनते तदन्याडेने धननापियें एहवंयनवात्माक० व्य तलाप जिनहुवन विप्रतिष्ठा दानमानादिक धर्मकरती ने मानकर RINMA ४ अध्यात्मकल्पमुम. व्यारजसहितपणेकरीने यतिनिर्मलनथी पणमात्रस्वर्गादिकगतिनाहेतु माटेतेप मैनेपण मुक्तिनुपरपरा कारणजाणवुनही अने नि सगतारूपजे धर्मते यतिगुक्के निर्मलता निरवद्यतानायोगथी तेहिजनवमापण मोक्षरूप लक्ष्मीने थापे ॥ ४ ॥ क्षेत्रवास्तुधनधान्यगवाश्मलिते सनिधिनिस्तनुन्नाजा॥ क्लेशपापनरकान्यधिक स्यात् को गणो यदि न धर्मनियोग ॥५॥ अर्थ ॥ हवेघणुपरिग्रहते पापनुमूल तेकहे। देव क्यारडाप्रमुख तथावस्तुते घरप्रमुख धनधान्य गायो थवइत्यादिक तथानिधिजे नमारतेणेसहित एहवोपरि ग्रहमेलवेथकेपण जो एक धर्मनियोगके० जिनविवादिक शातदेत्रमा ववरायन ही तो तेवारे तेपरिग्रहथकी क्लेश पाप अने नरक एत्रणविना अन्यधिक व्यति रेकबीजोशोगुणहोय एटले परिग्रहथकी अनुक्रमे कष्ट पाप बने नरक एत्रणवा नाजथाय पणबीजोगुणकोश्नथाय ॥ ५॥ आरनैनरितो निमज्जति यत प्राणीजवानोनिधाचीहते कुनृपादय श्व पुरुपा येन उलाहाधितु॥ चिताव्याकुलताकृतेश्च दरते यो धर्म कर्मस्मृति विझा नूरि परिग्रह त्यजत त नोग्य परै प्रायश ॥६॥ थर्थ ॥ हवेपरिग्रहथकी इहलोके तथा परलोके दुखथायतेकहे जेपरिग्रहमे सववाथकी प्राणी थारनेके धारनेनखुथको ससारसमुश्माबुडे वलीतेपरिग्रहकरी पुष्टराजा तयायादिशब्दथी मत्रीप्रमुख अधिकारीयो यनेचौरादिक तेपुरुपने उल्ले करी बाधितुके० पीडयानेवाठेठे केमकेबदुधनवत उपरखोटोपण गुनाहनो धारोप करीनेदमारे वजीपरियहनी चिताये व्याकुजताने करवेकरीने धर्मकर्मस्मृतिके धर्मकार्यनु सनाजवु तेहनोहरणकरीलिये माटेहेविवेकीजनो एधनते प्रायेवादुल | तायें परनाजनोगमायारे एटले एकेसच्योहोय यनेबीजोनोगवे एहवोजेए नरिके घणुपरिग्रहतेहने त्यजो बामो यउक्त कोटिकासचितधान्य मक्षिकासचितमधु ॥ रूप ऐ सचित वित्त परैरैगोपनुज्यते॥१॥जेमयोगिय घणाकटेकरी सिदिनारसनो सग्रह कयो थने वलनिपूरमा राकाशेवनानोगमायाव्यो तेमकोश्नुसच्युधन कोनोगवे ॥ क्षेत्रेपु नो वपसि यत्सदपि स्वमेतद्यातासि तत्परनवे किमिद गृहीत्वा ॥ तस्यार्जनादिजनिताघचयार्जिताते भावीकय नरक खनराञ्च मोद थर्थ ।। दवेथर्थातरफहीने सातवेत्र धनयावखानु उपदेशकहेले हेधनवत जे तु उपोतार्नुम्बके० धन तेहनेसातदेवनेविपे नथीवावरतुतो एधननेतुसु परनवेसा .
ददममत्वमोचनाधिकार. प थेले जनाले एटलेदमाणातोतु लोननावशयकी धननंसुमागें खरचतोनयी पणते धन परनवतादर्गनाये नाजधाचे बलीनेधनना उपार्जनकग्बाथी उपमुंजे अय के पापनों चयके० समूह तथा अर्जितके उपजाव्यो एदबाजे नरकतंबंधी व तंदनी नरके नाग्नेद। मो० तृटवुतेकेमथागे ॥ ७ ॥ इति श्रीअध्यात्मकरूप द्रुमे धनममत्वमोचनोनामचतुर्थाधिकारः समाप्त । अथ देवाधिकार॥पप्णामि देवमघान्यचितवं स्तवोपकारं कमयं विधा म्यनि॥ कर्माणि कुर्वन्नितिचितयायति जगंलयं वंचयते हि धूर्तराट् ॥१॥ अर्थ ॥ दबंपाचप्राधिकारें शरीरबाश्रयी ममत्वमूकवो तेकहे तेमाप्रयम पा परीने देहतूंपोपणकावुनही तकहे। हेयात्मातु अयके० पापने अणविचारतोय कोदहने पुजानिक पोखठे ते या देह नुजने सुंउपकारकरजे बनी चायतिके या वताकालनी चिंताचितवी हिमादिककर्मकरतोयकोप्रवर्तनागे एहोजेताहरोदेहते यूनानोराजावे सर्वजगतने वचयतेक उगेठे तोतुपापकरीनेडहने पुष्टकरेठेपण एदे हतेधारवग्तुजनेतगसे वेहदेहीजारो ॥ १ ॥ कागदावनुविधाशुचितादिदःग्वा निर्गतुमिवति जडोपिदि तहिनिया। तिप्तम्तनोधिकतरे वपपि स्वकर्मवातेन तदृढयितुं यतसे किमात्मन्॥॥ थर्थ ।। हवएशरीरते कागयहथीपणनुमोठे तेदेग्वाडेने हेयात्माजेप्राणी जड के० मुर्खहोय तेपण कारागृह वंदीरवानुं जमां बहुविध अशुचिता अपवित्रता आदि शब्दयो लुथा तृपा बध बंधनादिड खहोय एहवाकारागृहने नेटी खात्रादिकपाडी ने नीकलवावांटने तोतुजन स्वक० पोतानाकर्मने समूहें तेकारायहथीयधिकुंएह बुजे उपुकं शरीररूपवंटीखानु नेमावाल्योतोएहवाकारागृह सरिखोजे ताहारो देहतहने दृढकरवानेज सुंन्द्यमको कमके काराग्रहनु बंधनतोथोडं पणदेह वंधनतो जावजीवसुधी तयापरलोकेपणहोय तेमाटेहबंधन अधिकजाणवु ॥२॥ चेमंसीरमवितुं परलोकःरवनीत्या नतो न कुझपे किमु पुण्यमेवाशक्यं न रदिनुमिदं दिन .वनीति. पुण्यं विना तयमुपेति च वत्रिणोपि॥३॥ अर्थ ।। दवेपरनवनाउ खथी बाहोताथको घणुजीववानेव्य/जे देहनेपोपेचे तेने कहे। हेयात्मालोतु याशरीरने परलोकतंबंधी5 ग्यनावीफैकरी अवितुके राखवावां वेने तोतुंपुष्य नपार्जन कमनयीकरतो केमकं पुण्यकरी एशरीर खनालययकी रखा यनही एमतोकाऽनथी एटलेशरीरने सुखनानययी राववानेपण पुण्यजसमर्थने ८ २६ गडा कुतरा इत्यादिकजीग्ने नदवायोग्य धने प्राणगयापछि तत्काल नस्मथयो। अध्यात्मकल्पम धनेवलीपुण्यविनानु तो वनिजे तेहगरीरपण नाशपामेले तेमाटेजोपरलोर उखथीवीहेवेतो तुपुण्यकर ॥ ३ ॥ देहे चिमुह्य कुरुपे किमघन वेसि देवस्थ एव नजसे नवयु खजाल । लोदाश्रितोदि सहते घनघातमग्निर्वाधा न तेस्य च ननोवदनाश्रयत्वे॥४ अर्थ ॥ दवेजेशरीरनुजेतुपोपणफरेने तेशरीरमारह्योथकोज तु सपामे एहयु | | देखाडे किनवेत्सिके० हेात्मातु देहने विपे मोहपामिने पापकर थनेतेदेहमा रह्योषकोज नवा रखना समूहप्रतेपामेले तेकेमनीजाणतो एतोनिश्रेयकी साह नेवाश्रीत मध्यंजेअग्नि तेजेम घणा घणोना प्रहारोनेसहनकरेने तेमतुजने तथा ए शरीररूप अभिनेपण ननवत्के थाकाशनीपरे धनाश्रयत्वेके० निरालवपणुकरेता बाधाके० पीडानहोय एटलेलोहाश्रित यमीनीपरे तुपणदेहाश्रितयको 5 खपामेने उष्ट कर्मविपाकनूपतिवश कायान्हय कर्मकृत् वध्वा कर्मगुणैर्हपी कचपकै पीतप्रमादासव ॥ कृत्वा नारकचारकापचित वा प्राज्य चाशु उल गतेति स्वहिताय सयमनर त वाढ्याल्प ददत् ॥५॥ थर्थ ।। होदेहकर्मफरनु उपमानकहे हेयात्मा एउष्ट निर्दय एहवोदेहनामे क मकरके ० राजसेवक तेतुनने कर्मरूप घणाबधनेवांधीने नरकरुप बदिखाना सब धीश्रापठानो उचितयोगएडवोकरी पलताकीने उतावलोजतोरहसे एफर्मकरक हेबुवेके कर्मविपासनामाजेराजा तेहनोवशनि एटलेकर्मविपाकराजाये एहने खोडे माटेदेजी ते पीजे इश्यितेरुप चकजे मद्यपाननापात्र त्रणेकरी पर चविधप्रमादरूप थाश्रवनामामय पीछे एडवोजाणीनेतु पोतानाहितनेयर्थ तेकर्म करजे शरीरतेहने थोडपणयहार दोपरहितयापीने सयमरूपनारवहरावके जेथ कोताहरा थात्मानी सिध्थिाय ॥ ५ ॥ यत शुचीन्यप्यशुचीनवति म्याकुलात् काकशुनादिनदयात् ॥ जगनाबिनो नस्मतया ततोऽगात्मासादिपिडास्वदित गृहाण॥६॥ शूर्प ॥ होण्याचिदेहथी वीजापदार्थपण थपवित्रथाय तेक शुचिके० प वित्रजेवन्तु एहवारखोरखामप्रमुग्य तेपण एशरीरनासगी अपवित्रथाय तेमाटेएश रीरकहेयुचे तेक्हेवेकमिजे उदरप्रमुखनाजी तेणेकरीयाकुलके व्याप्त तथा का विपयप्रमादत्यागाधिकार. श राखथनारखे वली मांसादिकनुपिंमते एहवाए असारशरीरथकीतो जे स्वहितके श्रात्मानेहितकारकएदवा संयमाटिकतेप्रतेनेने श्रात्मसाधनकर ॥ ६ ॥ परोपकारोस्ति तपो जपो वा विनश्वरायस्य फलं न देदात् ॥ सनाटकाढल्पदिनाप्तगेदमृत्पिम्मूढः फलमश्नुतेकिं ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ वलीयुक्तिविशेपे देहवें सफलकरदुंकहे जे पुरुपने एविनागशील एहवं जेटेह तेथकी परोपकार तथा तप जप प्रमुखनथाय तोतेपुरुप नाडेराखेj थोडा दिवसमधिपाम्युं एहजेघर तेसरियो एमाटीनापिमरुप देहउपरमूढळतो शोफ लपामें जेमनाडामुंघरते वापरियेतोजशासै नहिकांजेनाइंवरचियते व्यर्थजाय अनेवली पाखरपोतानुंपण तेघरथायनही तेमएदेहनेपण अहारादिकनाड्यापीने पोप्युंथको तपजपादिककरी वावरीये तोजसफलथाय नदिकांनिःफलजाणवू ॥७॥ मृत्पिडरूपेण विनश्वरेण जुगुप्सनीयेन गढालयेन ।। देहेन चेदात्मदितं सुसाधं धर्मान्नकिं तद्यतसेऽत्रमूढ ॥७॥ धर्थ ।। वलीतेहिजकहे जेमाटीनामिसरिखं विनागीयाचारवत तथाऽगंवा करवायोग्य अनेरोगर्नु यालयके घर एहवोजेदेह तेणेकरीने धर्मकरवाथी आ त्मदितसाधतुं तुजनेसुलनठे तोहेमूर्व अत्महितसाधवाने केमउद्यमकरतोनथी माटे असारनूतदेहथी सारनूतथात्मानो हितसाधवाने सर्वथाउद्यमकरवु ॥ ७ ॥ इतिश्री अध्यात्मकल्पमेदेह ममत्वमोचनानामे पांचमोअधिकारसंपूर्णथयो. अत्यल्पकल्पितसुखाय किमिज्यिाथै स्वं मुह्यसि प्रतिपदं प्रचुरप्रमादः॥ एते तिपति गढ्न नवनीमकहे जंतून यत्र सुलनाशिवमार्गदृष्टिः ॥२॥ अपूर्वकयुजेदेदनिग्रहकरवुतेकांश विपयनीममतामूकवासीवाय यतुंनथी मा टेहवेतन्यधिकारें विषयप्रमाद न्यजवायाश्रयी उपदेशेने तिहां प्रथम इपियार्यन मो हत्यजq तेकहेठे हेयात्मातुं घणुजप्रमाटवतथको पण अतिशयेंकरी अल्पकेन्यो हुंपणकल्पनामात्र जेसुरवतेपण परमार्थयोतो.खजवे पणतेसुरवकरीमान्युं एहवु जेसुख तेहनाथर्थे प्रतिपदके तामेतामे इंडियार्थजे शब्द रुप रस गंध स्पर्श तेणेक री संमुंजायने एइंडियार्थते जंतुके प्राणीने गहनके अपार एहवोसंसाररूपजे नी मके रोड़ करके अटवीतेमां क्षिपतीके० धालेवे वलात्कारें तेमा प्रवेशकरावे जिहां शिवके। मुक्तिमार्ग दृष्टिदर्शनतेजीवने सुजननथी जेमकोश्बीजोपण गह नवनहोयतोतेमांहें शिवके निरूपव्यमार्ग, जेदर्शनते उर्लनहोय तेनीपरेंजा त अध्यात्मकरपद्यम णवु ॥ १ ॥ इहांप्रमावना पाचप्रकार तथा धावप्रकारनी गाथाकहेडे मन विषय कपाया निदाधिकहाय पचमीनणिया । एए पच पमाया जिव पाउंति ससारे॥१॥ तथाधावप्रकार कहेठे पमाउयमुर्णिदीही नपिउथग्नेय ॥यनाण ससक चेव।। मिजानाण तहेवय॥ १ ॥रागो दोसो मनसो धम्ममिय यशायरो। जोगाण उप्पणि हाण ॥ थम्हावलियः ॥ २ ॥ आपातरम्ये परिणाम खे सखे कथ चपयिक रतोसि॥जमो पि कार्य रचयन् हितार्थी करोति विक्ष्न् यज्दर्कतर्क ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ हवेससारिकसुखते प्रथमतोमुखदायी पण परिणामे सदायी तेकहेछे हेचतुरथात्मातु आपातके तत्कालमात्रतो रम्यमनोहर पणपरिणाम के विपाककाले महाखदारूप एहवा विषयसवधी सुखमा सुराच्योगों केमके पोतानाहितने वाचनार एहवीजे जडके० मूर्वप्राणीहोय तेपण कोइकार्यकरतो उदर्कके जेयागामिककालनुफल तेहनु तर्कके विचार करीने परिणामे अहितका रीहोयतेने त्यजेजे तोतुचतुरता परिणामे खदायी एहवाजे विपयादिक तेप्रते केमथाचरे एथाचरवा तुजने योग्यनथी ॥ २ ॥ यदिपियार्थरिद गर्मविदवद्यदर्णवस्व शिवग परत्र च ॥ तयो मियोस्ति प्रतिपक्षता कृतिन् विशेपदृष्ट्यान्यतरताण तत् ॥३॥ अर्थ ॥ हवेससारिकसुखनी अल्पतादेखाडे देचतुरथात्मा इहलोकनेविषे ३ पियाजे शब्दादिक तेणेकरीने वेध्युजे तुमसुख थनेवलीजे परलोके थर्णवकेस मुइसरिखु स्व शिवगके० देवलोफ थनेमुक्तिसबधीजेसुरप तेसुरखने मिथ के० मा होमा प्रतिपक्षता एटलेशत्रुनाव केमके जिहायिार्थनुसखो तिहामुक्तिसुरख नयी थनेजिहा मुक्तिसुखवेतिहा इझ्यिार्थसुखनथी तेमाटे विशेपदृष्टियेकरी तेबेहुर्मा जेहनेतुरुडोजाणे तेहने ग्रहणकर ॥ ३ ॥ नुक्ते कथ नारकतिर्यगादि दुखानिदेहीत्यवधेहि शास्त्रै ॥ निवर्तते ते विपयेपु तृष्णा विनेपि पापप्रचयाच्च येन ॥ ४ ॥ थर्थ ॥ होते हिजविशेप देखाडेने देशात्मा देशवतप्राणी नरकतिर्यंचगतीमा ख केाप्रकारेनागोठे एटजुतु शास्त्रमाथी जोऽने यवधेहि निश्चयकर तोतुजने निर्भयको विषयनेविपे तृमानौनिवर्नियासे थनेपापना सचवाथकीतुबीहेतोरहिश स्त्रीममलमोचनाधिकार. शए गर्नवासनरकादिवेदना पश्यतोनवरतं श्रुतेक्षणैः ॥ नो कपायविपयेपु मानसं लिप्यते बुध विचिंतयेति ताः॥५॥ धर्थ ॥ वलीतेहीजकहे। हेपंमितप्राणी अनवरतंके निरंतर श्रुतजे शाम्बतेरू पीईकणके नेत्रेकरीनेग वास तयानरक श्रादिशब्दथी निगोट एकेडियाटिक तेसं बंधीवेदनाप्रतेंजोता थका ताहरू मानसके० चित्तते कपाय तथा विपयनेवि नो फ्लिप्यतेके० अशक्तनयाय एहेतुमाटे पूर्वेतिवेदनाउने सम्यकरीतेविचारीसतो ता हसचिन विषयकपायथको किचितमात्र उदिननथाय ॥ ५ ॥ वधस्य चोरस्य यथा पशोवी संप्राप्यमाणस्य पदं वधस्य ।। शनैःशनैरेति मृतिः समीपं तथाखिलस्येति कयं प्रमादः॥६॥ अर्थ ॥ वलीमृत्युनयदेखामी प्रमादत्यजवान प्रतिवोधकरे जेमवधकरवाने का ट्या एहवाजे चोरतथा वोकडाप्रमुखजेपशु तेहनेवधनास्थानके लजतां जेमजेमव धना स्थानकतरफ पगलानरे तेमतेमथोडेथोडे मृत्युपएनजीकथावे तेहनीपरे स वप्राणीयोन थोडे थोडे घडी पहोर दिवस मास वर्षादिकने जावेकरी मृत्युढुकडो यावे तेकारणमाटे यात्मानाहितसाधननेविपे विलंबकेमकरिये अर्थात् प्रमादत्य जीने सर्वथाधर्मनेविपे तत्परथावु ॥ ६ ॥ विनेपि जंतो यदिउ.रवराशे स्तदिडियार्थपुरति कृथा मा । तनवं नश्यति शर्म याक् नाशे च तस्य ध्रुवमेव पुःखं ।। ७ ।। अर्थ ॥ हवेमुग्वनो शीवके तुरतनागप[देखाडीने जीवनेप्रतिबोधकरते हेजी वजोतु खनालमूहथकी बीहे तो इंझ्यिार्थजे गदाग्तेिदनेविपे रतिकेरागकेमक रेते केमकेश्यिार्थयोउपजे शर्मके० सुखतेडागके० उतावलोज नादापामेळे यनेते हनानाशपति 5 खतो धृवके निश्चत चिरकाललगें निश्चित जेमप्रकाशनेयंते थंध कार निश्वेथकीहोय तेमसुखनेचंते 5 खपणनिधेयकीजहोय ॥ ७ ॥ मृतः किमु प्रेतपतिरामया गता दयं कि नरकाश्च मुडिताः ।। ध्रुवा. किमायुर्धनदेवबंधव. सकौतुको यपियर्विमुह्यसि॥॥ थर्थ ॥ वलीप्रकारानरेजीवने सुखनाप्रतिबंधकदेखाटेने हेयात्मा प्रेतपतिजे यममृत्युलदाण तेनुंमुत्रों के जतोरह्यो तथाष्टकारी धामयक० रोग यह रो गाणं कोडी दवत्ति पंचव लकियाडमही॥ नवनवश्मदस्ताईचसयाव पण्याजी
मदीश तेमाटेमुग्धजे यजाणलोकनाफहेजा जे कुवचन गालप्रमुख इत्यादिकतुवकार |
गोनेवाम्ने पुननएजेपोतानु पुण्यरूपीयुधन तेनेक्रोधीगुहणे एटलेयल्पकारण
३०
अध्यात्मकरूपमा
१५६एएएए खासे सासे जरे दाहे कुविसूले नगदरे॥ अरसा यजीर्ण टीहि |
मुहमूले अरोयए ॥ १ ॥ श्रग्वेियण का थकणवाधाजलोयरे ॥ कुडे एमाश्वा रा
गा पीजयति सरीरिण॥ २ ॥ एसोलरोग महोटाकह्याने तेदेहनेयाश्रीजन्ह्याने त
सुक्ष्यपाम्या तथासातनरक तेहनावारणातेसु मुश्तिाके ढंकाणा बंधथया तथा
थायुप धन देह अनेस्वजनजे वधुतेसु ध्रुवके निश्चलगाग्वता जेमाटेतु सानु
कके सहर्पवतयको चिपयनेविपे मोहपामेठे एटलेमृत्यु रोग यने नरक एत्रण |
जयतो विद्यमान अने थायु धन देह वजन एतोअस्थिरने तोतुम्नहर्पपणुते गा
कारणथोपरे तेकाइसमजातुनथी॥ ७ ॥
विमोह्यसे कि विषयप्रमाटे भ्रमात्सुखस्यायति खराये ॥
तगमुक्तस्य हि यत्सुख ते गतोपम चायतिमुक्तिद तत् ॥९॥
यथादविषयसुखते निदान खरूप तेकही जीवने प्रतिबो मेने हेयात्मातुने
विपयनेप्रमामिलीने निदान सुखराशीके खनासमूह तेहने सुखनाघ्रमथकी वि
मोह्यसेके मोहपमाडेले एटलेषु खनासमूहने विपे सुखनीवातियें जेतुमोहपामेने
तेमात्र विषयप्रमादना वशथकीजपामे एनावार्य तेमाटे गईमुक्तके नारहि
त एहयोयकोनुजने उपशमलक्ष्णरुप गतोपमके अनुपमसुखते थायतिक० नि
दानमुक्तिनुदातार तेमाटे तृप्लारहित निरिहतासुखनेथादर ए इतिश्रीअ यात्मा प
मे पियावशतोपदेश पष्टोधिकार ॥ ए॥
अय कपया ॥रे जीव सेदिय सदिप्यसि च व्ययास्ता स्त्व
नारकादि पुपरानवनू कपाये ॥ मुग्धोदितै कुवचनादि
निरप्य त कि क्रोधान्निनसि निजपुष्पवन उराप ॥१॥
अर्थ ।। हरेसातमेंयधिकारे कपायादिक त्यजवाथाश्री उपदेशकरेठे त्याप्रथम
कपायनुफजम्हेने हेजीतु कपायजे कोधादिकतना हेतुथी नरकादिननेवि पराजय
जेपीडा तेदनो नाजन थको ते माहा सह वेदनायो सहनकरी अनेवनीपण
माटे कापरीने उननजे पुण्यरूप धनतेनेहरेचे तेमाटेकपायनकरवु ॥ १ ॥
कपायल्यागाधिकार. ३१ - परानिनूता यदि मानमुक्ति स्ततस्तपोखंडमतः शिवं च ॥ मानातिवचनानिनिश्च तपाढयस्तन्नरकादि.खं ॥५॥ वैरांदियात्रेति विचार्य लानालानी कृतिन्नानवसंनविन्यां ॥ तपोऽथवा मानमवानिनूतावितास्ति नूनं दि गतिधैिव॥३॥ युग्म। अर्थ ॥ हवेमानमुकवानुं अनेरारखवानुं फलकहे। हेयात्मा परजेवन्यजनतथी अनिनूतिके अपमान याक्रोगादिकउपजेयके मानजेअहंकार तेनेमुकीयाप जेणे करीअखंमतपथी मोक्षप्राप्तियाय अनेरवचनादिकेकरी जोमानयादरीगतो तपनी यथाय तेतपक्ष्ययके नरकादिक खथा तयायालोकेपण वैर धनहानि मनमा दिक खथाने माटेहेनिपुण्यात्मा एमपूर्वोक्तप्रकारे मानमुक्याथीनान अनंम्गन आदल्याथीअलानने एवेवातोविवारीने धानवके एकनवसंबंधिनीअनिन्नतिनं नव तेउपजेठतेपण तपनेराख अथवामाननेराख केमकेएकार्यमां वैजउपाय: तेमांधनिनतिनुंतो एकजनवनु खते यनेमानकस्याथीतो तपक्ष्यधागे नवा नवेड ख तेमाटेमानत्यजीन तपनेराख एवेकाव्यनोअथएको ?' श्रुत्वा कोशान् यो मुदा पूरितः स्यात् लोप्टाद्यैर्यश्यानो या प्राणांतेप्यन्यदोपं न पश्यत्येप श्रेयो जागल तब अर्थ ॥ हवेकपायतयाथी मुक्तिफल तेकह। जेयोगीनाम: सानलीने आनदपामी विचारंजे एगाजिद्यनिधय मेंअनंनिबार बी वलीजेलोह पापाणादिक हणायोथकोपणजेनुं रोमांदिन चितवेजे आजमाहरे विजोपनिर्जराय: एमजाणी वीजा दोप तथाअवगुणनदग्वे पणपोतानोजदोपदेव पटवारी याथीगुनयोगवंत तेउतावलोज श्रेयजेमोद तनंग ) : कोगुणस्तव कढा च कपार्य निर्मम कि न पश्यसि च दोपममीप अर्थ । हवंयुक्तियंकरी कपायमां गृPrem दिक नेणेतुजनेकोश्वारे कोऽपरणगुणका लीयालोकतंताप थनेपरलोक नाटाला: यीदेखतोतुं जे तुंनिधितथको I 1 owner - -war E-MP- - - थर्थ ॥ बजीएपरिसह सहेगाथाश्रीज उपदेशेने हेयात्मातु थोडीपण परनीकर) | वती पापकरीने तेहना प्रतिमारने वाले एटले पूर्वजन्मातरना पापरिपाकथकीय अध्यात्मकल्पडम. यत्कपायजनित तव सोस्य यकपायपरिहाणि नरति ॥ तधिशेपमधवतजुटर्क सविनाव्य जज धीर विशिष्ट ॥६॥ अथवलीप्रकारातरे कपायत्यजवु उपदेशेठे हेयात्मा तुजनेकपाययी उपनुनेस ख थनेकपायना परित्यागथी उपनुजेसुख एबेनुचिोपजे यषिकपणु तथा चटर्ककैः निदानो विपाकजेफल तेसम्यक प्रकारे विचारीने पठे हेवीग्पमित एमाजेतुजने विशि टउत्तमजाणवामायावे तेनेतुआदरयगोकारफर ॥ ६ ॥ सुखेन साध्या तपसा प्रति यथातथा नैव तु मानमुक्ति । आया न दत्तेपि शिव परा तु निदर्शनाहादुलबले प्रदत्ते।।७।। सम्यग विचार्येति विहाय मान रदन् उरापाणि तपांसि यत्नात्।। मुदा मनीपी सहतेऽनिनूती शूर कमायामपिनीचजाति ॥ol थर्थहवेतपकरवाथी मानत्यागनी कुप्फरता देखाडे हेयात्मा जेम तपनीय नितेसुखेसाध्यने तेममानमुक्तिजे माननुत्यजवु तेसुखेसाध्यनयी तो याद्याके पहेन कहीजे तपप्रवृत्तितेमुक्तियापया समर्थनथो यने बीजोजेमानमुक्ति सेयद्यपि साध्यने तोपणते मुक्तियापाने समर्थने बाहुबलनेटष्टातें जेमबाहुवलने मानमुक्तिविना मात्र तपयकीज केवलज्ञान उपनुनही अनेमानमुक्य तेवार तत्कालज्ञानउपनु एवुसम्या विचारीने मानत्यजीनेयत्ने करीऽनन एहचोजेतप तेनेराखतोयको कमानेविषे गर एवोजे मनीपी० पमित ते नीच जननो करेलो अनिनति जेपरानव तेनेपण मुता के हर्पकरीनेसहेठे ॥ ७॥ ७॥ एवेकाव्यनोथर्थएको परानिनूल्याल्पिकयापि कुप्यस्यघेरपीमा प्रतिकर्तुमिचन् ॥ न स्मितिर्यड्नरकादिकेषु तास्तरनतास्त्वतुला नवित्री ॥५॥ शानिनामजपाशाातिनाकारणासनविनायतुन मोहोटी एवि नवित्रीकहेता पीडाथागे एवुकानयोजाणतो ।। ए ॥
। कपायत्यागाधिकार. धत्से कृतिन् यद्यपकारकेपु क्रोधं ततो घेारिपट्टएव ॥ अथोपकारिप्वपि तभवातिकृत्कर्महन्मित्रवदिपित्सु ॥ १० ॥ अर्थ ॥हवेक्रोधकरवो तेंवरीनेज वियुक्तठे तैकहे। देपंमितात्मा जोतुं अपकार शत्रुनेविपे- क्रोधधरेठेतो तेनेबटसेताहरा अंतरंगनाजे क्रोध मान माया लो राग अनेदेष मलीठशत्रुठे तेहनेविपेज क्रोधधर केमकेएशत्रुथी वोजोको तुमन वधारेजुःखटाइनथी अथवा उपकारक मित्रनेविपे जोतुंक्रोधधरतोनधी तेवारतुं से सारमा अर्तिकारी एहवाशानावर्णादिक कर्म तेनोहरणकरनाराजे उपसर्गादिकना करनार शत्रु तेनाउपसर्गनेकरवेकरी बाह्यरष्टियेंतोते ताहराशत्रूठे पणकर्मदयकर वामां अनेपरलोकना अनंतसुखनीप्राप्तिकरवामां साह्यकारीथया माटे तत्वदृष्टि जोता अत्यंतरपणे तेभित्रनावेज परिणम्या तेथी उपसर्गकारकशत्रुने तत्वदृष्टी मित्रतुल्य जोड्ने तेभित्रने विपे क्रोधनधरयो एनावार्थठे ॥ १० ॥ अधीत्यनुटानतपःशमाद्यान् धर्मान् विचित्रान् विदधत्समायान् ।। न लप्स्यसे तत्फलमात्मदेहल्लेशाधिकं तांश्च नवांतरेपु ॥ ११ ॥ अर्थ ॥ हवेमायात्यजवा याश्रीउपदेशेठे हेयमातुंअधीतिकेजण तथाथ तुष्टानजे क्रियायावश्यकादिक तथातपउपशमादिक नानाविधधर्म ते मायाके कपटसहित करतोथको मात्र पोतानादेहने कष्टजधापेवे पणतेथी व्यतिरिकके वीफलकांश नवांतरनेविपे पामीतनही वली नवांतरनेविपे तेधर्मनेपथपामीसन ही कैमकेमायावीने बोधीपामवी नहोय ॥ ११ ॥ सुखाय धत्से यदि लोनमात्मनो ज्ञानादिरत्नत्रितये विधेहि तत् ॥ उखाय चेत्र परत्र वा कृतिन् परिग्रहे तहदिरांतरेपि च ॥ १३ ॥ अर्थ ॥ हवेलोनत्यजवाथाश्री उपदेशकरेठे हेयात्माजोतुं पोतानासुखनेय थे लोनकरे तोझानादिक जे ज्ञानदर्शनधनेचारित्र एव्रणरत्ननेविपे लोनकर बी जीवनधान्यादिक असारवस्तुथी काहिसुखनथाय माटेहेचतुरयात्मा तुंचालोके पुरखनेथ] बाह्यथाधनधान्यादिक यने यंतरंगथी क्रोधमानादिक परिग्रहनेविपे लोन करिसनही ।। १२॥ करोपि यत्प्रेत्य हिताय किंचित्कदाचिदल्पं सुकृतं कथंचित् ।। माजीहरस्तन्मदमत्सरायेविना च तन्मी नरकातिथिः ॥ १३ ॥ अथवेजीवने मुरुतराखवाथाश्रयी उपदेशेवे देयात्मा कोकाले कथंचित्ध ५ ३४ अध्यात्मकल्पडम स्टेक्ने कारएक थपके० थोपणसुरूत जेदानादिक तथातपसयमादिकते प्रेन्यो परजोना हितनेययकरे। तेमुरुतने मद मत्सर क्रोध लोनादिके करीने दामिनही थनेवनी तेसुस्तविना सातनरकनो अतिथि परोणो पशनही एटले तेमुम्त म्योपाथी नरकगतियशे तेमाटे मदमत्सरादिकने निवारीनेसुरुतराखजे॥१३ पुरापि पापै पतितोसि ससृतो दधासि रे कि गुणिमत्सर पुन ॥ न वैस्मि कि चोरजले निपात्यसे नियत्र्यसे शृंखलया च सर्वत ॥१४॥ अारजीमन्मरत्यजवायाश्री उपदेशेठे हेयात्मातु पूर्वेपण पापेकरीने ससारमा पदसावे घनानीगुणातने पि शुमत्सरघरे एमकानथीजाणतोजे एमत्सरतोस जने पौगंगाध पापियुं जेमा जलने एहता ससाररूपीया समुश्मानांखेने मनानी तासगने निकांयित कर्मरूप सांफलेकरीवधि ॥ १४ ॥ कटेन धमा सपशो मिलत्यय दायं कपायैर्युगपत्प्रयाति च ॥ अनित्रपनाजितमजुन तत किमझदी दारयसे ननस्वता॥१५॥ बदायामाने फटें उपजितधर्म रासवानो उपदेशकहे देयात्मातुधर्मनु एकल गनमाण रोगन गरयार फेजेयकीताहरी कपायरीने युगपत समकाने सानो गगिन कोरेगते पवाज क्यपामे तेमाटेहेमूख घणाउद्यमे उपा र यन सुपण ते गपुपरीने वाऽतिवेदे गुहारी जायने एटलेसुवर्णरस यापुरे नापानी परेंतपायोजनम तेनेकपायरुपयापुये हरातेयुक्तनयी ॥१५ गनपनि सुहृद कलपीनवति धर्मा यशासि नि चिता यामीनरतिस्निह्यति नै पितरोपि च बार वाथ सोफध्येपि पिढी नविना कपाये ॥१६॥ वाहवागययो ट्याश्यायगुणयायचे तेरहते ममारीजीपने कपाकी ने मित्रपार वीरमर तपदानादिर मेनायाय वलीचिरकालनोसनोपा ने कमायाय वीमातापिता तयाबीनजनादिक तेपण स्नेह नगर नेमकान मी याना यनेपातारपण यापदायाय ॥१६॥ पिलानरसम्मिविद्या श्रीतपोस्निग्णप्रननाये ॥ कि मद वहमि वन्मि न मृदानतरा खनृगलापरचम पर होनीने मदनिवारवाया पदेना दयामानु रुप जानक पान froहीर दान भयं नयायादिनदयी जानि परिवार भीम कपावत्यागाधिकार. ३५ दिर इत्यादिके करीने मद अहंकार मुंबहे? देमक्यनंतिवार पोताना अतिगये लापरपणानुजे व तेकेमनयी विचारतो ? तुपोतेंज अनंतिवार कुरूप लानरहि त होनकुल निर्वल मूर्ख टरिडी तपकरयाने यशक्त रुपण दात किंकर एहवो अपतस्यो हतो त्यापणसर्वयातें हीनपणुं श्रनुनव्यु तोयानाहां गुमटकरे। ॥१७॥ विना कपायाननवात्तिराशि नवेनवे देव च तेषु सत्सु ॥ मूलं दि संसारतरोः कपायास्ततान् विदायेव मुखी नवात्मन् ॥१॥ थर्थ ॥ वलीफरीने कपायनुत्यजज श्ढे हेयात्मासंसारमा कपायविना संसार संबंधीनी धानिनोसमूह होयजनहीं थनेतेकपायेंकरी विद्यमानते नवार्तिनीराशि होयज केमके संसाररुपीया वृक्षनुमूल तेकपायजते. माटेतेकपायनेवांमीनेसुरखीया. शांतिसुरखनेपामः ॥ १७॥ समीदय तिर्यड्नरकादिवेदनाः श्रुतेदणेईमजुरापतां तथा ।। प्रमोदसे यक्षिपयैः सकौतुकै स्ततस्तवात्मन् विफलैव चेतना॥२६॥ थर्थ ॥ हवेजेविषयने त्यजीशक्तीनथी तेप्राणीने शास्त्रनस्यो तेपणयफलने ते थाश्रीकहे। हेयात्मा श्रुतजेसिक्षांत तेनेजोवेकरीने तिर्वच नरक प्रमुखनी वेदनाने तथासर्वझनापित धर्मर्नुउर्लनपणुंठे एमतेसम्यक्प्रकारेंजाणीने पणजोतुं कौतुकस हितथको विषयमांराचेवे तेवारें ताहारो चेतनाजे ज्ञानदृष्टि तेनिस्फल केमके तुन रकादिकना खने जाणतोठतोपण उर्जनधर्मपामिने धर्मकरतोनयी ॥ १५ ॥ चौरेस्तथा कर्मकरेदीते उष्टैः स्वमात्रेप्युपतप्यसे त्वं ॥ पुटै. प्रमाटेस्तनुभिश्च पुण्यधनं न किवेत्स्यसि लुव्यमानं ॥ २० ॥ थर्थ ॥ हवेधर्मरूपधन तेलुटानुनथी तेथाश्रीजीवने उपदेशकहेते हेयात्माचोर लोको तथा उष्टकुनदणकर्मकर जेटासादिकतेणे स्वमात्रके मात्रबाह्यधनने अप दखाठतां तुंपरितापकरेचे पणपोतानापोया एवाजेप्रमाद तथा तनुके शरीर तेणेचो रनीपे खुट्यु एहजे ताहरूं पुस्यरूप धन तेसर्वगुंटाइजायचे माटेतेहनी रक्षाकर केजेथीतुं नवांतरेंसुखीयाय ॥ २० ॥ मृत्योः कोपि न रतितो न जगतो दारिद्र्यमुत्रासितं रोगास्तेनन्पादि जा न च नियोनिर्णाशिताः पोडश विध्यस्ता नरका न नापि सुखिता धर्मस्त्रिलोकी सदा तत्कोनाम गुणोमदश्च विनुता का तेस्तुतीला च कार
म्यो तेवितव्य तेपपूजनन एमझदापणजे सितिजाणीने प्रमादरहितन
३६
अध्यात्मकल्पप.
थर्थ ॥ वतीयात्माने गुणरहितपणुदेखाडी मदांमया उपदेशकरे हेथात्मा
जोतें मृत्युनामुखथी कोमाणीराख्योनथी तथा जगतजेविश्वतेनु दारिइनाशपमो
उघुनथी वलीसोलेरोगजे कासादिक तथाराजायने चोरप्रमुखनालय तेनाशपमाड्या |
नयी वलीसातजेनरक तेपणनिवाखानथी तथाधर्मकरीने त्रिभुवनने सदासुखीकीधुन
चीन्यादिकगुणमाहेलो एकगुणजोताहरामानथी तेवारताहारोगुणतेस्यो, अनेते
रिना मदतेश्यो, तथा विजुताके० मोहोटाऽतेशी, तथास्तुति प्रगसानीपाना तेप
एगी, एटलेपूर्वोक्त तथाविध कोश्गुणजोताहरामाहोयतो मदकरवोपणघटेने पण
तेरिना तोजेमदकरयोतेसर्व निर्थकडे तेमाटे मदमत्सरादिकत्यजवा २१ इतिश्री
थध्यात्मकरूपमेविषयकपायाद्यवशताधिकार सप्तम सपूर्णम्म ॥
अयशास्त्रापानित्योपदेश ॥शिलातलाने हदिते वहति विशति सिधात
रसा न चात ॥यटन नो जीवदयार्जता ते न नावनाकूरततिश्च लन्या॥१॥
चये ॥ दवेथाठमेंथधिकारे शास्त्रगुणकेहे त्याप्रथमउपमानेशिक्षातरेचिननुक
विणपणुदेखादे देवारमाशिलाना तलियासरखा ताहराहदयमा सिझतिरुपिया
रसाहेने पणतेयीतारोथत करण लिगारेनेदातोनथी केमकेएहृदयमा जीवदया रूप
जीरोमनता तथानापनाजे अनित्यत्वादिक तेरूपीयायकूरनी श्रेणी देरवाती न
घी कोमजली जेम जवाहनेयोग यातापामे तात्या अनेकय कुरादिप्रगटे
तेमयाननमिक्षिाजीरने सिक्षातनायोगथी हृदयमा कोमलताथाय तथानावनात्र
मुग्प शुनपरिणामपणउपजे थनेहरसिदिकजीपने तोए शिलातलनुदृष्टांतजाणवू
यस्यागमानोदरसैन धौत प्रमादपक स कथ शिवेच्नु ॥
रसायनेर्यस्य गदा कृता नो सुउलन जीवितमस्य नून ॥ ॥
यावेतनि विशेरी सिमांतनुं माहात्म्यकोठे प्राणिने थागमजेसिकांत
तेस्पोरा मेग्नेमिक्री प्रमादम्पीयों पकजेचरी तेपोवाणोनथी तेवाप्राणिमुक्ति
गने एटने जेने मिनिजाणवायीपण प्रमादमट्योनही तेप्राणिपत्रे इयापी
मादहिनया मुनिपान मा मिशताधिक बोजोको प्रमाद परिहारना
दापनको तेसरदृष्टानाने जेपुम्पने रसायनजेपारदादिक तेथीपण रोगपन
पप तांतेनेसामजी पसीज पुलंन ॥२॥
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॥
शास्त्रगुणाधिकार.
अधीतिनोर्चादिकृते जिनागमः प्रमादिनो ऽर्गतिपापतेर्मुधा
ज्योतिर्विमूढस्य दि दीपपातिनो गुणाय कस्मै शलनस्य चहाप॥३॥
थर्थ । दवेजेपुरुपतिमांतनणिनेपण प्रमादवंतचे तोतेहनणव्यावेते कहे
वे जेपुस्पप्रमादवंत सर्वथा उर्गतिनोपडनार तेथर्चादिके केवलपूजासत्कारादिक
नेनथै सिक्षांतनणे एवोहोयतेहनु नएयु मुधाके निष्फलजाण, तेउपर दृष्टां
तकहे ज्योतिके प्रकाशंकरीनेज मुंफाणोथकोटीवामांजपडे एवोजे गलनके
पतंग तेहनांच एजेनेत्र तेकेवागुणनाअर्थहोय एतोउलटाअवगुणकारीजथाय तेमन
मादिनीवरुपजे पतंगते अर्चासत्कारादिक ज्योतिमा मुंफाणोथको उर्गतिरूप दीप
ज्वालामांपडेने त्यांतिक्षातरूपचकुतेकाईकामनयावे सामोमोदकारीयाय ॥ ३ ॥
मोदंते वहुतर्कतर्कणचणाः केचिजयादिनां काव्यैः केचन कल्पि
तार्थघटनैस्तुष्टाः कविख्यातितः ॥ ज्योतिर्नाटकनीतिलतणधनुर्वे
दादिशास्त्रैःपरे ब्रूम.प्रेत्य दिते तु कर्मणि जडान कुदंनरीनेव तान्॥४॥
अर्थ ॥ हवेतत्वज्ञानविना घणुंनस्योपण व्यर्थवे तेदेखाडे केटलाएकपुस्प घ
णातर्कजेप्रमाण प्रमेयादिन्याय तेहनातर्क विचारनेविपे चणके प्रतिष्टित एवावतां प
वादिने जीपवाथकी दर्पपामेठे तथावलोकेटलाक चिंतव्याधर्थनी रचनाएरच्या
हवेकाव्येफरीने कवीपणानीप्रसिद्धिथकी तंतोपपामेठे वलीकेटलाएक ज्योतिप नाट
नीतिके व्यवहार शास्त्र लापके सामुहिक तयाथश्व गजलक्षणादिक धनुवै
केल्यायुध श्रन्यासनांगात्र थादिशब्दयी कुन गासमि इत्यादिक शान्वेंकरीने नं
पपामेवे पणपरलोकनेविपे हितकारीएवाजे संपमादिककमतेइनेविपेजो जटक०
झानतोतेसर्वेने थध्यात्मशास्वने धनुसारे अमेपेटनरा कहिये ये एटलेय या
शास्वनेमूकीवीजासर्वजे पापश्रुताटिशास्त्र तेपेटनराधनाजने ॥ ४ ॥
किं मोदसे पंडितनाममात्रात् शास्त्रेप्वधीतीजनरंजकेपु । तल्कि
चनाधीप्य कुरुप्प चाशु न ते नवेयेन नवाब्धिपातः॥४॥
पर्य ॥ वलीतहिजहदेने हेपंमिततुं जन० लोकनेरंजनना करनार पदबाज
नाटककाव्यादिगाव तेहनेविपेप्रवीणयको नाममात्रपंमिनपणाथी गुदप्रपा
लोकरंजफशाखथी कांग्यात्मायनीतिदिनथी पणतुंगावनेजालिने दगीमपणे
एहवीकरणीकर केजेणेकरीन नुसनेतार समुश्मा चुमनथाय ण्टनेजिनाग
ने तेहनेअनुसारे तंपमधाराध ॥ ५ ॥
नई कहनामा मारिपरीमदमेत पीढियरात्रदिवस पितपकार ने र पनादियानयो कृषि उरित एटलेसम पूजामरागी क्न नपा मनादियामारणेपरी विश्पषितरे एटोरहेनरी अध्यात्मकल्पधुम धिगागर्मायसि रजयन् जनान् नोयनसिप्रेत्य हिताय सयमे॥ दधासि कुदिनरिमात्रता मुने क्व ते वतत् कैप च ते नवांतर ॥६॥ थर्थ ॥ हवेक्रियाविना केवल यागमनुनणवु तेपण अर्थसाधकनथी तेकहेते हेमुनितनेधि कारठे केमकेतु बागमसिकात तेणेकरीने लोकने रीजवे पणपरनो फना हितनेमाटे सयमनविपेउद्यमवत नथीयातो तेमाटेतुकेवल पेटनराइनकोने पपताह यादगराउके नतिरने विपे तेजिनागमकिहा थनेलोकनुरीझवपणकिडा तयासपमपणकिहां एटले नयांतरेएवीगतिपामिश केजिहाएमाहेलोएकेतुजनेनहोष धन्या केप्यनीतिनोपि सटनुष्ठानेषु वचादरा उ साध्येषु परोपदे गलत अशानशुधाशया ॥ केचिवागमपाग्निोपि दधतस्तत्पु सकान् येऽलसा अत्रामुत्र हितेषु कर्मसु कथ ते नाविन प्रेत्यहा ।। थर्ष ॥ दवेयोडोनणावार्थीपण फिहॉक क्रियानो वर्षदेसामने फेटलाका जीवाश्रुतपतवतापण अक्षानजे सम्यक्ततेणेकरीने मायके निर्मजपरिणा मातहांपतेनेपन्यो फेमतेपारकाउपदेशना लेशमात्रयीपण साध्य एवाजे ननायनुष्टान तपसपमादिक्रियाविशेष तेहरिप थादरवत थनेहाइतिग्वेद तारना श्रागमना ननारत्ता तथाथागमा पुस्तकपरतातापण थालोक थन पानग्नपिहितरीम सयमादिक तेहनवि निरादरकरेले तेपुरुपनेपरनवने विरपागे एटमेपरनवतेनी शीगतीया यर्थात् ते माहामु खपामो ।। ७ ।। धन्य ममुग्धमतिरप्युदिताददाझारागेण य सृजति पुण्यमकल्प पाउन किं व्यसनतोस्य तु विकल्प या प्रस्थिनोन सदनुष्टितिपु प्रमादी॥॥ऽतिवापार ॥ यो। दनीयधातर हिनश्टेने जेथटपश्रुतवतयां पणकदाग्रहादितहापन हने मुगन नाहि नेगणनजाणवु मोजे उदितके मिझातीक राहगीते थ तिनी याद तेना गोकरीने विमाननगयाय चाहिये पिपरदिन पर पाने अनजपनियोपण कदायग्रनहोयता तेनानण्येपण गान चतुर्गत्याश्रीतोपदेश. ३ए अनेनलाधनुष्टान जेजुनक्रियातेनेविपे प्रमादवंतने तोतेहनम्युपण निष्फल था काव्यपेहेलाकाव्यतुं पागंतर ॥ ७ ॥ अधीतिमात्रेण फलंति नागमाः समीदित वसुखेनवांतरे ॥ स्वनुष्टितैः किंनु तदीरितै खरोन यत्सिताया वदनश्रमात्सुखी॥ए। अर्थ ॥ वलीतेजदृढकरेचे देवात्मा केवलनस्यामात्रथकीज बागमसिद्धांतते नवांतरनेविपे वांठितमुखेकरी फलेनही इष्टफलदायकनहोय पणतंसिकांतनेविपे कह्यांजे स्वनुष्टितके नसायनुष्टान तपतंयमादिक तेनेधाराध्येते यागमफलदायक होय तेउपरदृष्टांतकह जेमखरजेगसन तेसाकरनोनार उपाडवामात्रयी मुखोई नहोय साकरनापरिजोगर्नु सुखनपामे तेमथागमनणवामात्रयीज आगमोक्त क्रिया जनित फलपामेनहाइतिश्रीयध्यात्मकल्पद्रुमे शास्त्रगुणाधिकारोऽष्टम.संपूर्णः॥ अयचतुर्गत्याश्रितोपदेशः॥ऽगैधतो यदणुतोपि पुरस्य मृत्युरायूं पिसागरमितान्यनुपक्रमाणि ॥ स्पर्शः खरः क्रकचतोतितमामित श्व पु.खावनंतगुणितो नशैत्यतापौ॥१॥तीवा व्यथाःसुरकृता विविधाश्च यत्रानंदारवैः सततमभ्रनृतोप्यमुप्मात् ।। किं नाविनो न नरकान् कुमते विनेपि यन्मोदसे ताणसखेविपयैः कपाय॥शायुग्मं अभादवे एपूर्वोक्तशावधारांतर्गत चनुर्गल्यात्रीतउपदेशकहे। तेमांप्रयम शास्त्रोक्त नरकगतिनाउ खक्हरे निश्चेकरी नरकना एकपरमाणुमात्रना दुगंधची पुरवानित मन्ततोक्नु मृत्युयाय एहवामहाडगंधमय नरकनापुजन वलीजिहां निस्पक्रमक थपवर्तनरहित निकांचित् धने सागरोपमेप्रमित एकतागगेपमधी मामीने तेत्रीत सागगेपम पर्यन एहवाधाकपा केमके देवतायने नारकीनाथापा सदाइ निरु पक्रमहीय वजीजिहां स्पर्शतेपण करवतनीधागथी कावे वजी हांधकी धनंत गुणध खदायी महागीत तथा महातापत्रे एमत्रवेदनाक्दीने हवेपरमाधामीनी करेलीवेदनाकहने वजीजिहां देवताजे पन्नर परमायामीनदुनीकरेजीयतितीन कठोरजे वेदना तेविविधप्रकाग्ना छेदन विदारणादिकहोय एप्रकारे निरंतर प्राकंट स्दननं शकरी आकागनेपुरतो एडवांजे नविष्यमाण नग्क तथरी हेवमतिवं तयात्मालु केमनपीविहितो जेमाटे कलायतहितयो क्षणमात्रमुत्वनाकारक रह वाविपयजे गदादिक तेरोकरी दर्षनपामने एकामना श्रथएकोले ॥ १ ॥ २ ॥ ~ ४० साप्रा दरतानानसर्मापण पणानगर यमुप्पो तेमाटेपरिणामें इस अध्यात्मकल्पाम. बघोऽनिश बाढ्नताडनानि कुट्टामातपशीतवाता ॥ निजान्यजातीयत्नयापमृत्यु खानि तियक्ष्विति सहानि॥३॥ अर्थ ॥ होतिर्यंचगतियात्री उखदेखाडे अनिश नित्यवचन तया वाहन लाग्नुपाडवु तयापराणादिकना प्रहारकरी ताडन वली सुधा तृपा रामके इटगग मातर तडको तथाटादय वायुश्त्यादिक तथावलीवजातीनोनय जेमम रिने मरिपनोनय तपाहम्तिने हस्तिनोनय तथायन्यजातीयनय ते जेम मृगाडि मायामादिन्नोनय तयायपमृत्युजे कुमरण खम्गप्रहारथी तथाबाहेडीप्रमुख दी नपाना दारानज पिमादिक्योगथा छुधापादिक गाढवेदना थातिपणे भारामृत्यु न्यादिकप्रकारे तिर्यचगतिमा नयकरकीन 5 खहोयठे ॥ ३ ॥ सुधान्यदास्यानिनवान्यसूया नियातगर्नस्थितगतीना ॥ एप मरेप्वप्यसुखानि नित्य किंतत्सुखेा परिणाम स्खे ॥४॥ पाहगतियाश्री सकहेने नित्यप्रत मुधाके फोकट थन्यके० पाएकी पापा कमीमनुष्यतो धननाजोने तथाथाजीविकादिक कारणथी परनीमेश का कोहरलानेतो तंगोनिमित्ननथी तोपणसदाका शादिकनीसेवाकरवीत सानादिनी पीडा थने निया परस्परा देषादिकमा वनि पानास कमो राम्गायमिदिना देवतानेपण चाननुनपत्रे तथागना पदा नगिनिने घामानादिकाने अथवा तिर्यचनुाताले तेस पीना रमतामनीमम तो तेसुग्मुथाय माटेतेसम्मनेपण थसुग्यफरीनाण मानन्यनिनंटविश्वानिष्टयोगगददु सुतादिनि ॥ म्याविगविग्मता नजन्मन पुण्यन मरमता तदानय ॥४॥ वर्षामनुगनियाची पाने का निभाने मातनीनिजे १ T: यागन याम्मिक यानीति मग्ण 3 अपा टन निनद गला चार जनादिया पगनय तया इसनेमा - मोशनी दयांग गाना योगामाया गद रोग यात्री ग र याची ऊगयां ज्यादिगिरकरीने मनुयज मन रसारणमारे पुन मनुज मनु मुरसरात चित्तदमनाधिकार. ४१ प्रति चतुर्गतिःवततीः कृतिन्नतिजयास्त्वमनंतमनेदसं ॥ हदि विनाव्य जिनोक्तकृतांततः कुरु तथा न यथास्युरिमास्तव ॥३॥ अर्थ ।। हवेउपसंहारकहे देपंमितयात्मा एप्रकारें अनंतकालसुधी अतिशय नयनीकग्नार एहवीचारगतिसंबंधीजे उखनी श्रेणी तेप्रत जिनोक्त श्रीसर्वप्रणि त रुतांनजे सिक्षांत तेयकीवदयमा विचारीने जेम ए चारगतिना उखनीश्रेणीयो तुजने कोश्वारें प्राप्तनयाय तेवो उपाय कर ॥ ६ ॥ आत्मन् परस्त्वमसि सादसिकः श्रुतायि नाविनं चिरचतुर्गति खराशि। पश्यन्नपीह न विनेपि ततो न तस्य विच्चित्तये च यतसे विपरीतकार थर्थ ।। हवेधात्मा चारगतीना उखजाणतोयकोपण धर्मनेवि तत्परथातुं नथी तेवास्तपरमधविचारीपणुं देखाडे हेयात्मातुं थविचारमाहेमुख्यठो केमके थासंसारमा चिरकाललगें नावीएहवोजे चारगतिनाउ रखनोसमूहतेहने श्रुततिक्षांत रुपनेकरी देखतोतोपण वीकपामतोनथी वलीतेऽखना समूहनोविवेद करवा नेपण उजमालथानुनथी माटेतुं उपराठांकर्मनुकरनारतो केमके उ खोद कर्मकर वानेवटले कुखवृद्धिकारीकर्मकरे।जातिशास्त्रोपदेशांतरगतचतुर्गत्याधिकारसमाप्त अथमनः॥ कुकर्मजालैः कुविकल्पसूत्रजै निवध्य गाढं नरकाग्निनिश्चि।। विसारवत्पक्ष्यति जीव दे मन कैवर्तकस्वामिति मास्य विश्वसीः ॥२॥ अर्थ ॥ हवेचित्तटमन नामानवनमोक्षार कहे तेमांप्रथम यात्माने मनरूपशत्रु नु विश्वानकरबुनिषेधेठे देजीवतुजने मनरुपी पीवर तेकुविकल्परूप सूत्रेच्या ए हवाजे कुकर्मरुपी जालो तेणेकरीगाटोबाधीने नरकरुपयाग्निकरी मत्सोनीपर चि रकालना पचावसे जेमधीवरपण मत्सने सूत्रनीजाले गाटोगांधीनेपठे अमीमांप चावे तम्हापण एउपनयजाणवु माटेतुंताहरामनरुप धीवरनोविश्वासकरीसनही जेम ते मनरुप धीवरनाबनावेला कुकर्मरपजालमांपडेनही एवीरीतेवनजे ॥ १ ॥ चतोऽर्थये मयि चिरत्नसख प्रसीद कि विकल्पनिकरेःक्तिपसे नवे मांग बच्चोंजलिः कुरु कृपांनज सदिकल्पान् मैत्री कृतार्थय यतोनरकादिमिश् अर्थ ॥ हवेत्रात्मावाहितोयको मनरूपमित्रने विनंतीफरेवे हेचिरकालनामित्रतुं चेतहैयामाहे देवणाकालना सहचारीतुं महाराउपर प्रसादकरीने एमाग विकल्पने समूहेकरीन मुनने यासंसारमा सुनमावेडे तुजन, हायजोमाने कर्बुढं जेतुंमहारा
शोच २ सतोप ३ स्वाध्याय ४ तप ५ देवताप्रणिधानादिक लक्षण तथायमजे।
जेमवातीनागनाना स्तनधाव्याथी काश्यर्थसिदिनथाय तेमज मनवश थयाविना
४२
अध्यात्मकल्पद्रुम
अपर रूपाकरीने गुनविकटपजे धर्म ध्यानलकण तेहनीनजनाफरी यापणीमत्रीस
फलकर केमकेदु हवे नरकना उ खथी वीउ ॥ २ ॥
स्वर्गापवर्गों नरक तथातर्मुहूर्तमात्रेण वशावश यत् ॥
ददाति जतो सतत प्रयत्नाश तदत करण कुरुप्प ॥३॥
अर्थ॥ हवेयात्माने मनवशकरवायाश्री नपदेशापेठे देयात्माजे थत करण
वशतथा अवशयको जीवने अतरमुहूर्नमात्रमाज स्वर्गमोक्षादिकना सुखप्रतेयापे
थनेनरकनी प्राप्तिपणकरावे एटलेमनवशयको जीर्णोत तथाप्रश्नचदराजर्षि इत्या
दिकनीपरें स्वर्गमोक्षादिकथापे थने मनन्यवशथको तालमत्स्यादिकनीपर थतर
मुहूर्नमात्रमा नरकप्रतेयापे तेमाटेतुताहरा थत करणनेज सर्वथाप्रकारेवशकर ॥३॥
सुखाय खाय च नैव देवा न चापि काल सुहृदोरयो वा ॥
नवेत्पर मानसमेव जतो ससारचक्रभ्रमणैकदेत ॥४॥
अर्थ ॥ हवेतेहिजकहे जीवने देवता तथा व शीत ग्रीष्मादिककाल तया,
मित्र शत्रुतेकोऽपण सुखदायी तथा खदानहोय पणएकमन तेहिजजीग्ने सुग्ध
दायी तया 5 खदायी होय ने तेमनकहेतुळे तेकहेठे ससारसमुश्मा भ्रमणजे ज
न्ममरणादिक तेहनुएकहेतु एवचन सझोपडा याश्रीजाणवु अन्यथा थतज्ञीने,
मनना थनावे पण ससारमा भ्रमण देखाय॥४॥
वश मनो यस्य समादित स्यात् कि तस्य कार्य नियमैर्यमैश्च।।
दत मनो यस्य च उर्विकल्पै कि तस्य कार्य नियमैर्यमैश्च ॥५॥
थर्थ ॥ जेप्राणीनेपोतानुमन समाधिवतवतो वशवतिहोय तेहने नियमजे
प्राणातिपात विरमणादिक पाचमहाव्रत तेनुसुकार्य केमकेतेतोसर्वे मनवशका
वाना उपाय अनेजेवारते मनवशथयु तेवारतात सर्वगुण प्रथमजाव्या धनजे
प्राणोनु मन मानविकल्पकरी हतप्रदतने तोतेहने नियमयमे करीने पणसुथवानुढे
यम नियमादिक पण व्यर्थ जाणवा ॥ ५॥
दान श्रुतध्यानतपोर्चनादि स्था मनोनिग्रहमतरेण ॥ कपाय
चिंताकुलतोनितस्य परो हि योगो मनसोवशल ॥६॥
चित्तदमनाधिकार. अर्थ ॥ जीवनेएक मनवशघयाविना दानतया श्रुततिक्षांतनुन तथा तथा थर्चनजे देवपूजा आदिशब्दथी प्रासाद देवप्रतिष्टादिक किया तेसर्वस्था एवी पण तेमोक्षफलनी देनारनयाय केमके कपायजेक्रोधादिक तेसंबंधीनीचि यकी उपनीजे असाता तेणेकरीरहित एदर्बुजेमन तेहतुंवगवर्तिपणुं तेहिजपर चोग अने तेहिज अष्टांग योगर्नु सर्वस्व ॥ ६ ॥ जपो न मुक्त्ये न तपोधिनेदं न संयमो नापि दमो न मौनं ॥ न साधनाचं पवनादिकस्य कि वेकमंतःकरणं सुदांतं ॥ ७॥ श्रर्थ ।। जीवने नवकारादिजनौजप तथा वाह्य धन्यंतर वेप्रकारनुतप तथासंयम चारित्र तथा दमजे इंडियदमन तथामौनजे वचननुतंवर तथा पवनादिकनुंसाधन धादिशब्दयी चौरासी योगासनप्रमुख तेकांमुक्तिना देवावाला थायनही तेवारे तुजने किंतुके ० मुक्तिप्राप्तिनो शोउपायठे तेकहे जेणेरडीरीते पोतानुंअंतःकरणजे ग्नतेहने वाकयुं तोतेहिज एकमुक्तिनुं दातार होय ॥ ७ ॥ लब्ध्यापि धर्म सकलं जिनोदितं सुर्खनं पोतनिनं विनाय च ॥ मन पिशाचदिलीकृतः पतन् नवांबुधौ नायतिहग्जमो जनः। श्रर्थ ।। जडके हेयज्ञानीप्राणी अतिशयेंकरीपामवुलन प्रवहणसरिखो एह एसर्वप्रणात संपूर्णधर्म तेप्रतेपामिने वलीतेहनेवामिने मनरु पियो पिशाचके। भूततेणेचहेतोकन्यायको संसारसमुंहमांपमता प्रायतिहगुके उत्तरकालनो विचार करतोनथी एटलेएमनयी विचारतोजे प्रवहणरूप धर्मनेठांमी संसारसमुश्मा जंपापा तरवाई तेथी घागले हवे महारी गोगति थासे ॥ ७ ॥ सुदुर्जयं ही रिपवत्यदोमनो रिपूकरोत्येव च वाक्तनू अपि । विनितस्तजिपुनि. करोतु किं पदीनवनउर्विपदा पढे पदो। ए॥ धर्थ ॥ हेयात्मायतिगय उर्जयएहजे ताहरंमन तेपोतेंशत्रुपगुंथाचरेते थ नेवली वचननथाकायानेपण शत्रुकरेते मनश्यक वचनतथा कायानाव्यापारपण उरथाय तेकारणमाटे मन वचन तथाकाया एत्रणेशत्रु परानव्यो एड्वोतुंपगेंपगें जुट विपदा जे नरकादिक तेलुं नाजनयातोयको तुनुकरे एटलेताहगेकांचालतुं नचाए रे चित्त वैरि तव किं नु मया ऽपराई यदुर्गती तिपमि मां कुविकल्पजालोजा नासिमामयमपास्य शिवेस्तिगंता तत्किन संति तव वासपदह्यसंख्याः।।
४४ थर्थ ॥ माटेविकल्पेकरी जेहनुचित्तपीडाणु एहवाप्राणीने तपजपप्रमुखजेधर्म अध्यात्मकल्प/म. थर्थ ॥ हेचित्तरूपवैरी में ताहरोशो थपराधकीयो केतुमुजने शि परुपनाने बांधीने उर्गतिमांनाखेने जोतुएमजाणतोहोयजे एजीपमुजनपरिहरीने मुकिननाने तोपणताहरे वशकरवानास्थानक वलीमहाराशिवाय वीजायसरण्याता ससारीनी वसंनषी एटले एकदुजतोरह्यो तोपण तारेवीजानीशीसोटते ॥ १० ॥ पूतिश्रुति श्वेव रतोर्वदूरे कुष्ठीय सपत्सुदृगामनई ॥ श्वपाकवत्सजतिमदिरेपु नात्प्रवेश कुमनोहतोगी ॥ ११ ॥ अर्थ ॥ हवेमननायवशपणायकी वढप्रकारना श्रवणयायतेदेसाईचे शुग मनेकरीसतापपाम्यो एहयोजेप्राणी तेकुराकानना कुतरानीपरें रतिजेनिवृत्तियों वेगेलोहोय जेम कीखायो एहवोजे कुतरोते किहाँपणक्षणमात्र रतिपामेनहीतेन कुविकल्पचित्तनोधणी तेपणरतिरहितहोय वलीकोढीयानीपरें सपदारूपणीजे मुड शाधोरूप युत्तमकन्याथो तेहेनेवरवाथयोग्यहोय जेमकोढीयानेकोऽपण उनमा न्यावरवावठिनही तेमदुष्टचित्तवतप्राणाने सोनाग्यादि कोणसपदाधाप्रयेन्दी वलीसंगतिरूपजेमदिर तेहनेविपे श्वपाक चडालनापरें प्रवेशकरवानपामे॥११ तपोजपाद्या स्वफलाय धर्मा न उर्विकल्पैर्दतचेतस स्यु ॥ तत्खाद्यपेयै सुनृतेपि गेदे तुधातृपान्या प्रियते स्वदोपात्॥२॥ तेपोतपोताना फलनुदेवावालोनयाय थने कुविकल्पचित्तनोधणी धर्मक्रियाकरतोच कोपण मोदफलपामेनही तेउपरदृष्टांतकहे जेमको थपुण्यवतप्राणी खानपाना दिक नरेलाघरमापण पोताना रुपणताचादिकापया भुखनुप्णायेंपीडाय तेमइहाँ पण कुविकल्पचित्नवतप्राणीते बतेधर्मपण परनवेंसीदाय ॥ १२ ॥ असाध्यं मनसो वशीकृतात पर च पुण्य न त यस्य तपशं॥ सवचित पुण्यचयैस्तमवै फलैश्च हीही हतक करोतु किं॥१३॥ थर्थ ॥ एकमनना यशकरवाची बीजंसर्व पुस्यते सुखेसाध्य श्रनेते मन शनी तेप्राणी पुण्यनेसमूहें तयातेपुयजनितफलंकरीने यातिने तेफोकटने र मनवशविना पुरस्पना नया एयजन्य फलनी फोकट आशाराखेने तेमाटे हीही इतिखेदे एबापडो प्राणी सुकरे पठे तेहने एके गतिनथी ॥ १३ ॥ जेहनेव चित्तदमनाधिकार. ४५ अकारणं यस्य सुर्विकल्पतं मनः शास्त्रविटोपि नित्यं ॥ घोरेरनिश्चितनारकायुम॒त्यो प्रयाता नरके स नूनं ॥१४॥ अर्थ ॥ यद्यपितिक्षांतनोलणनाग्ने तयापिजेहनुमन अकारणके० उपसर्गादि कारणविना पण नित्य यतिगयेकुविकल्करी पीमित तेपुस्पमहागपापेकरीने दृढकी, नरकायुजेणे एहqयकोते सर्वथा मुबापती नरकमांजजशे ॥ १४ ॥ योगस्य हेतुर्मनसः समाधिः परं निदानं तपसश्च योगः॥ तपश्च मूलं शिवशर्मवल्या मनःसमाधि नज तत् कथंचित्॥१५॥ अर्थ ॥ मननीसमाधिजे एकाग्रता तेहिज योग,हेतु अनेवलीयोगजे अष्टांग लक्षण तेतपर्नुपरम उत्कष्टकारण अनेतेतपतो मोदसुखरूपणी वेलीनुमूलवे मा टेहेत्रात्मा जेतेउपाय करीने मननीसमाधिनेचादर केमके मननीलमाधिधी योग थने योगथी तप तथा तपथीमोदसुख एमपरपरायें सर्वसिदिपामे ॥ १५ ॥ स्वाध्याययोगेश्चरणक्रियासु व्यापारणैर्वादशनावनान्निः ॥ सुधीस्त्रियोगी सदसत्प्रत्तिः फलोपयोगेश्च मनो निरंध्यात् ॥१६॥ थर्थ ॥ हवेमनसमाधिना उपायकहेठे स्वाध्यायजे जिनागमतेहनायोगर्नु वहेवू यांबिलादिक तपविशेष तेरोकरीने तथाचारित्रसंबंधीनी कियानेविपे प्रवर्तवेकरी वलीयनित्यादिक वारनावनायेंकरीने वली त्रियोगीजे मन वचन कायानायोग ते होनी सदसप्रवृत्तिके जलोधने नूंडोव्यापार तेहना फलनु उपयोगजे विचारणा एटलेत्रियोगना शुजव्यापारनो शो फज एहवी विचारणा यने यगुनव्यापारनोशो फलवे एहवाजे उपयोगदेवा इत्यादिक प्रकारेकरी मननेवशकर, ॥ १६ ॥ नावनापरिणामेपु सिहेप्विव मनोवने ॥ सदा जाग्रत्सु दुनिसूकरा न विशंत्यपि ॥१७॥ अर्थ ॥ हवेवली एसर्वप्रकारमा पण नावनापरिणामने विशेपदेखाडे मनरूपी श्रावननेविषे सिंहसरिवाजे नावनाना परिणाम तेमांसर्वदासावधानरहेथके पी नजे थारीध्यान तेरूपजे सूथरोते प्रवेशपणकरीशकेनही तोतिहां तेसूअरो वासकरवानेतो सर्वथाननपामे ॥ १७ ॥ इति श्रीयध्यात्मकल्पमे चिसदमनानि पानो नाम नवमोघधिकार संपूर्ण थयो. ॥ ए॥
-
ho मृढतासहितको थने मतिमान्के ज्ञातापणतुदो रलीसुरखनु वावक श्व
पासते स्वस्तफर्मयीजयायठे यउक्त श्रीउत्तराध्ययने थप्पानथरणि अप्पामे
| मसामनी थप्पाकामयापेणु थप्पामेनदणवण थप्पाकत्ताविकत्ताय इत्यादिक
४६
अध्यात्मकम्पडम
अथ सामान्यतो वैराग्यधर्मोपदेश ॥कि जीव माद्यसि ढसस्य
यमीसेऽान् कामाश्च खेलसि तया कुतुफरशक ॥ चिति
प्सु घोरनरकावटकोटरे त्वा मन्यापतल्ल विनायय मृत्युरह॥॥
थर्थ ॥ हवेसामान्यथी वैरागोपदेशनामा दसमोयविकारकहे तेमाप्रथमची
ने मरणसवधीनयदेखाडे हेजीतु मदशानोकरेठे तथासुहोने वजी थर्थनेसुत्र
र्णरूपादिक तेहनेसुवा तथावली निगरातो कौतुरीने कामजे शब्दादिक
विपय तेप्रतेसुरमे तुजनेतो जयकर नरकरुपजे खा तेमानाखवावाढतो एका म
त्युरुपजे राइस तेउतावलु तारेसन्मुखयावतु सानजीने निगकरहिशनही॥१॥
आलंबन तव लवादिकुगरघातानिटति जीविततरु न
दि यावदात्मन् ॥ तावद्यतस्व परिणामदिताय तस्मि
न् निने दि क कच कय नविता स्वतत्र
थर्थ ।। हवेसाठविद्यमानवते जीपनेधर्मकरवु उपदेशेवे देयात्माताहरो था
लवनयाधारनूत एहवोजे जीवितव्यरूपच तेप्रत लवादिकजे लय सेश क्षण में
ही मुहूर्नप्रमुखकालमान तेरूपाया कुहामानापाव जाहाजगदेनही तेहीपदेना
ज परिणामहितजे निदानहितकारी तपसमादिक तहनश्रयद्यमकर जेघ
कोताहरो जीवतव्यरूप वृक्नेद्यापनि फरीतेहने नवपात्रयकरवाने किहांक कोइका
कारे पण मत्रउपायथासे जेणेकरीतु जीवतव्यरुपतरुने नवपल्लवकरीस एटलेर
णेणे जीवतव्यरूप दवेदातुजायचे तेवेदायापनि फरीसककरवान कोउपा
पनयी तेमाटे यात्महितनेविपे तत्परयावु एहिजश्रेष्टउपायठे ॥ २ ॥
त्वमेव मोग्धा मतिमान् समात्मन्नेष्टाप्यनेष्टा सखद खयोस्त्व ॥
दाता च नोक्ता च तयोस्वमेव तच्चेटसे किन यथादिताप्ति ॥३॥
थर्ष ॥ हवेसर्वकरणीते यात्मानेथाधीन एहयुफहिने चित्रोपेगैरेचे हेथारमात
मोग्याके
नेश खन्थापणतुती तथासुखाने खनुदाता अनेनोक्तापणतुजयो केमके ।
D
माटे जेरीते तादरीयान्माने हितनीपजे तेमजकानयीकरतो ॥ ३ ॥
वैराग्योपदेशाधिकार. Y कन्ते निरंजन चिरंजनरंजनेन धीमन् गणोम्ति परमार्यहशेति पश्य ।। त रंजयाशु चरितविशदेनवाब्धौ यस्वां पतंतमवलं परिपातुमीटे॥४॥ अर्थ ॥ हवेलोकनेरीजवतोथको प्रात्मापोतार्नु हितकांकरतोनयी तेयाश्रयीउ पदेशे निरंजन हेनिरोपयात्मा देबुद्धिवंत हेहिताहितविवेकनाजाण चिरकाल जावजीवलगें लोकनुरीजव, एटलेमलीनवस्त्र धारणकरी वाह्यक्रिया देखामीने यू न्यचित्त तामेवामें उपदेशापीने लोकनुमनरीजव तेथीतुनने गोगुणने एटचुत स्वदृष्टे विचारी परमार्थदृष्टीयेंजोता लोकरीजव्याथी थात्माने अर्थसिद्धिकांनथी तेमाटे लोकरंजनत्यजीने उतावलोथयो विगटके निर्मलजे चारित्र तपसंयमाटिक श्राचरण तेणेकरीने श्रीवीतराग तयातेमनानापेलाधर्मनेरीजव जेथकीतुजने अ वलंके० परनवें संबलेंरहित संसारसमुश्मांपडतायकां राखवानेसमर्थथाय केमके संसारमांपडता एकधर्मजाधार थापगे पणलोकको आधारयापदोनही ॥४॥ विधानदं सकललब्धिरदं नृपोदं दातादमनुतगुणोदमदं गरीयान्॥ इत्याबदकतिवशात् परितोपमेपि नो वेत्सि किं परनवे लघुतां नवित्रीय अर्थ ॥ दवेअहंकारनिवारवा उपदेशेने हेत्रात्मा ढुंपंमित दुसर्वसनीये स हितद्वं दुराजाई ढुंदातार ढुंअभुतगुणवतई तथाढुंमहोटोडे इत्यादिकजे पोता नामनकल्पित यहंकार तेहनावशयकी तुं परितोपके हर्षपामेठे पणजन्मातरें जाविनी एहवीतेपदार्थानी लघुतापते कांविचारतोनथी जेजेपदार्थनेतु धानवमां ढुंपदेकरे तेतेपदार्थनीतुं परनहीनतापामिस इतिनावः॥यक्त योगशाम्बे ॥जाति लानकुनश्वर्य वलरूपतप:श्रुतः॥ कुर्वन् मदं पुनस्तानि हीनानि लन्यते जन इति ॥५॥ वेत्सि स्वरूपफलसाधनवाधनानि धर्मस्य तं प्रनवसि स्ववशश्च कर्तु।तस्मिन् यतस्व मतिमन्नधुनेत्यमुत्र किंचित्त्वया दि नदि सेत्स्यति नोत्स्यते वा ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ हवेयात्माने शहनवेधर्मकरवानी प्रेरणाकरे हेवुतिप्राणी तुधर्मनुं स्वरूपजे झाल्यादिकदशविध लक्षण तथाधर्मनुंफलजे मोदादिक तथाधर्म-साधन जे मनुष्यजन्म थार्य देवादिक तथाधर्मना वाधकजे कुजन्म कुक्षेत्र प्रमाद मिथ्या व इत्यादिकमर्वप्रकारने वेत्सिके जाणे यनेवली स्ववशके पोतानेवशेथको ध मकरवाने समर्थपण्टो पणतिर्यच नारकीनीपरें परवश तथाधर्मकरवाने असमर्थ सुयांक कोषकोते पणपोताना थात्मानेज पुस्यहीन केमजाणतोनथी जेपुर। थर्थ ॥ वेधयुक्तवांठकपणाथीजीवनुवादुलापणुदेखाडे हेयात्मातुज्ञानदर्शन चारित्रादिकगुणरहितयकोपण गुणस्तुतिजे पोतानीप्रशसा लोकनामुखथी कीचिना | वरपनने वाठे तथापुस्प विनापण सुरखने तथा प्रतिष्टाके गौरवपणानेवांटने । ली थष्टांगजेयोग यम नियम बासन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि। | एथायोगविना पण सिदियष्टकमक्यलण सिघनाथाउगुण अथवा सिहित | थष्टमहासिदि लपिमा वशिता इशिता प्राकाम्य महिमा थणिमा यत्नकामावसानि | ता प्राप्ति तेप्रतुवा माटेहेयात्मा एताहरो बादुलापणुते कोश्यपूर्वनथुनदेव वर्य ॥ हवेगीजानाकरेला थपमानथी जीवपाकरेवे तेयाश्रीउपदेशको।। | जीवतु पुण्यरहितपणाथी थधमके नीचयरस्यापाम्योयकोपण पगेंपगें बीनानी करेली जे अनिनूतिके० थपमान याकोशादिरते देखीने परेन्य के तेजोकन ४त अध्यात्मकरूपमा नथी तेमाटे थानवमाज धर्मनेविपे उद्यमकर केमकेफरी परनवेंते का तीनही तथा तुजने तेवा धर्मनु फरीका जाणपषुपण नहीथारों माटे ॥ ६ ॥ धर्मस्यावमरोस्ति पुजलपरावरनतैस्तथा यात सप्रति जीव हे प्रस हतोदुखान्यनतान्ययम् ॥स्वल्पाद पुनरेप उर्लनतमश्वास्मिन् य तस्वाईतो धर्म कर्तुमिम विना दिनदि त उ खतय कर्दिचित् ॥३॥ थर्थ ॥ हवेयात्माने धर्मनुअवसरजणावे हेजीवयनतामुख सहित तुजने अनंते पुजलपरावर्ते ससारमानटकता सप्रतिके हमणा थानवमा धर्म करवानुधव सरथाव्योने यनतवत्सप्पिणी थने अवसप्पिणी प्रमाण एक जलपरावर्न थाय | हनुस्वरूप अथातरथीजाणवु एधर्मनुयवसरते थोडाजदिवसलगण्ठे फरीपाम ।। युउर्जन तेमाटेएथवसरे श्रीजिनोकधर्म करवाने उद्यमकर केमके एजिनोकधर्म विना ताहरे किवारेंपण जन्ममरणादिकना उखनो क्ष्यथवानुनथी माटेजोऽस नु अतकरवाने वांगतोहोयतो एअवसर पामिने धर्मकरवाने तत्परथा ॥ ७ ॥ गुणस्तुतिवासि निर्गुणोपि सुखप्रतिष्ठादि विनापि पुष्प ॥ अष्टागयोग च विनापि सिर्वोितलता कापि न वा तवाल्मन् ॥ यचे केमके कारणनी सामग्रीविनाज कार्य नापजावानी अनितापाकरे ॥ पदे पदे जीव पराजिनती पश्यन् किमीप्यस्यधम परेन्य । अपुष्यमात्मानमवेपिकिन तनोपि किंवा न हि पख्यमेव ॥ O बराग्योपदेमाधिकार. ४ शिकीय नेनो पनपने पगनराय नेमांसं महोटीशन एमाविचारतानवीय पवानिधी पृष्पजनामपरतोनी कंजेयकी कोऽपगनयनघाय ॥ ॥ किमयनिर्दयमंगिनी लघून विचंटस कर्मसु दि प्रमोदतः ॥ चंदकाप्यन्ययनार्दनः सदत्यनंतगोप्यंग्ययमनं नये ॥20॥ अर्थ ॥ दवेत्रान्माप्रतं परनेपीगर्नु फलकदेने यामातुं निर्दयपणेकरी ताहग यासका निर्वत दयाजे चंगी प्राणी तेदनपीउत्तीचको तुं प्रमोदत के किन पापकर्मविपं नंप्रयतेने फेम एमवारपण जेप्राणि अन्यजीरने पीटाउ पजावीटोय तेप्राणीयन तिवार संसारमापासासदे यतः नियरे उपउने सपगुणि उसयसहरमकोडिगुणा ॥ कोटाकोरिगुणोवाला विवागो वदुतरो वा इति ॥१०॥ यथा सर्पमुखरयापि नंको जंतनि नहायेत् ॥ तथा मृत्युमरवस्थोपि किमात्मन्नार्दमेंऽगिनः॥१५॥ अर्थ ॥ वेनेउपर दृष्टांतकहेने जेम नेकजे मेटको तेसर्पनामुग्यमा रह्यो थग्रसित थको पण जंतुजेन्दाना शुजीवते तेंवाय तेम हेयात्मा तुंपणमृत्युना मुखमा र ह्योथको पण थन्यप्राणीयोने मुंपीडायापेठे ।। ११ ॥ आत्मानमल्परिद वंचयित्वा प्रकल्पितेर्वा तनुचित्तसौख्यैः॥ नवाधमे किं जन सागराणि सोटासि दी नारक खराशीन् ॥ २॥ अर्थ ॥ दवेशहनवे हिसाजनित थल्पमात्रसुखथी परनवें थनंताऽख सहेवा पटतो तेकदेते हेजन हेनतारीप्राणी प्रकल्पितके तेताहरी कल्पनामात्रथी ःख नेज लुग्वकरीमान्या तेपणवली थल्प तु ण स्थायी एहवाजे मनवयनकाया संबंधीसुग्य तेणेकरी इहन तुम्गायावतो हाहाइतिखेद नवजे चारगतिरूपसंसार तेमा अधमजे नरफतेहनेविपे घणाक सागरोपमसुधी नारकीनाजे रखसमूह तेसहे बाने मुंतत्परथाय ए विषय सुरखते 5 खजवे पणकल्पनामात्रथी एनेजीवमुख करीमानेठे ॥१शा यटाह नर्तृहरिः ॥ तृपा गुप्यत्यास्य पिवति सलिनं स्वाइ सुरनि झुधार्न सन् शालीन् कवलयति मांसाज्यकवलान् ॥ प्रदीते रागानो सुदृटतरमा श्लिष्यति व प्रतीकारी व्याधेः सुखमिति विपर्यस्यति जन.॥ १ ॥ नरभ्रकाकिएयुदविंदुकान वणिक्त्रयीशाकटनिकायैः ।। निदर्शनारितमयजन्मा उःखी प्रमादेवंद शोचिताऽसि ॥ १३ ॥ - - " मेवारतरदानांची भर घणुनडफडतोजीनकाढतो दीनसरे पारडता मया र नानानदीत समडोनयपाम्यायो नुग्यातरम्योयकोपण मातानुसी नीतापमानाय पुनेयो रमायो देमाताम बोकडानीएनपी मायास्या तमनने परवानापण बांटायानिनयी महांपण उपनय जोमा नमनत्रा हावयनी दायें निर्नयपणे ययेष्टपुष्टयानुयो प्रादुणावारे मत्यु नयमानुपण प्रमार पुटया यथाशायरियाने पाणमन्युयाया मदुर हातान जेमगमगा परदोज मनुरीररीने एकहना म मापनसताना नामापोतेरापनामादरचीमा एक दरनं ) करायंगी बीनामांश्य्यनी सजीनरी सोपीनगर u0 अध्यात्मकल्पाम श्रर्थ ॥ वतीने हिजयर्थ नराध्ययनसूत्रना दृष्टातेकरी दृढकरेने हेयात्मात व मारजे मद्यादिकपाच तेनावशथकी मनुष्यअवतारहारीने पडेपरलवे खीपायर भावजेबांकड़ो कागिणी उदकवि थायातकीराजा वणिकत्रयीजे त्रसव्यापी गाफटजे गामावाहरु निकुजेराक इत्यादिकोनाष्टातेतुंपण घणुशोचनाकरीमा सामईपया उपनादिकना दृष्टातनिखेडे तेमाप्रथम अरजनुदृष्टातकहने पैर कोगाममा कोकनायरमध्ये एकबोकडोहतो तेको प्रादुणोयाबसे तेबारे र ग्नुमाम राममायाशे एमांचितवीने तेघरनामाणसोतेबोकडाने यन्नादिपार गनुमते बोकडो घणुपुष्टशारोययो हवेतेहनेतेहवोदेखीने एकपाडो मनम'मेर पाग्योषारी ने दोहताशेरजे पोतानीमाता, तेहने पावनही तक माताप भोग्नुकारणपुत्रेयो कहेगाजागो हेमाताजूथोने धाबोकडो यये । मारियापने तेयोलेरो पुष्टयग्योने एहने पुत्रनीपरपालेने नानाप्रभारनाथ गगारगोने यनेमुजनेतो पोतानीमातानुय तेपणकोइपीचादेतीनथी तथाभा नेपण यापनकपर प्रामजतानयी पहबुसानजी मातायेंकयु श्रापिणा पया जामिनासनिणेशावहि एप दोहावल ररकणा॥हेन्स जेमी मागवाहोप नेहन मागमांगे तेश्राप तथालनीमाला प्रमुखपहरावे तैम, पोटाममननीया गादिकारने पोपने पणकोऽप्रादुनाथायमे ता नगटाला नेमाननीयमानीग्रो पकादि तेहने प्राणायाम मा नरनामागने पदाग्यडाग पचाने प्रादुणामदितसकुटुळे घरणिय मर्गनामिना गणामि प्राणुगोचपामीम दिमि विनियमन मयागमायें वैराग्योपदेसाधिकार. યા - जातासांनरी तेवारेंरांकेविचारयंजे एककांगणीनीखोटे रखेनेवीजुरूपक वटावqपडे श्मचिंतवी सथवारोमूकी व्यनीवांसली किहांकगोपवीने तेकांगपीलेवा पाव ल्यो श्रावीनेजुएनेतो कांगणीकोश्कलगयुं अनेपाफरीनेजुएतो चांसलीपण को इकलेगयुं पठेनिराशययी अतोन्जए ततोत्ररथको घणुशोच करवालागो जेमतेरा के एककागणीनालोनथी हनारसोनयानीवांसली अनेतेकागणी वेन्हे खोस्ने घ णाशोचननाजनययो तेमात्मापणपूर्व अप्राप्तकामनोगथको वहुमूलचारित्रपा मिने चलतुंकांगणीतुल्य कामनोगनीतालसायें चारित्रत्यजीने कामनोगगवेपतोथको कामनोगपणनपामे अनेचारित्रपणनपामे एमवनयभ्रष्टथयोथको तेरांकनीपरें घ पुशोचपांमे ऽहां कांगणी ते एक मासानु चोथोनाग अथवावीलकोमी अथवा एकरुपैयान (७०) मुंनागजाणवो. हवेत्रीजु उठकर्विउदृष्टांतकहे कोकवनमा कोतपातुरने कोकदेवताये क रुणाकरीने वीरसमुन्नेकावेजऽमुक्यो तेमूतिहांपाणीपीवुनही अनेदेवतानेकह्युजे हेस्वामि महारागामनीलीममांकुठे तेहनेउपकाते माननेधग्रेलवमान एकजलविं उठे तेखरीपडसे माटेमुजनेतिहांमूकोतो विडयोपीठ तेसांनली तेहनेमूनि ग्य जाणी देवतायेतिहांसूक्यो देवतापोताने स्थानकेगयो पवेतेविंडोपण खरीपडयो तेदेखीतेमूर्ख उनयन्रष्टथयो थको शोचकरवालागो तेमहांतृषातुरतेजीवदीरतमु इतेचारित्र देवतातेसारु जलविंडारूप कामनोगनासुरव एम उपनयजाणवू. हवेचोथुधाम्रदृष्टांतकहेठे कोइकराजाने आंबानाफलघणुज बबनहता एकदिव शे घणााम्रफलनाखावाथकी अजीर्णविपुचिकाययो पठेवद्येयनेक यौंपर्धेकरीय पीकप्टेनिरोगीकीधो वसतुवैद्यका हवेजोयायफलखासोतो मरणपामसो एमकही सर्वथावास्यो राजायेपणपोतानादेशमाथी थांवानासर्ववनवेढावीनारव्या हवेकोश्क दिवसेराजा थाहेडेनिकन्यो तिहांउटय अपहरयां एहवाप्रधान अनेराजावेदुजण घणुदूरपंथें किहाकटवीमांजऽपहोता सन्यसर्वपाठलरा राजाप्रधान बन्नेजण थ श्वीनतरी यांवानीठायायवेता तेयांबानीचेफलपमचादेखी राजानेघणादिवसें थ निलापथयो प्रधानेवणुवायो तोपणतेफसरखांधु एटलेतत्काल मृत्युअवस्थातुल्यथ योथको घणुशोचवालागो जेमतेराजा आम्रनास्वाध्यायको प्रधानेवाखोयकोप ए ते फलखाइ राजा जीव्यत्वनी आशातजीने मरतांमहाशोकपाम्यो तेमहांपण विपयलुब्धकजीव विषयने परवशयको जिनाज्ञायणमानतो कामलोगासक्तययी संयम अने मनुष्यजन्म बेदुहारीने पवे पश्चात्ताप करो. --- अध्यात्मकल्पाप. हवेपाचमुंवणिकनुं दृष्टातकहेएकवणिकनेत्रणपुत्रहता तेत्रणेनेहजार हजार सौनया थापणयापीनेकयुजे एटलाइव्येतमेव्यापारकरीने अवधिउपराव हवे तेत्रणेजण नीमे नीमे मूललेश्ने जुदेजूदेनगरेचाल्या तेमापहेलोनाइसर्वव्यसनरहित थपव्ययकरतो थको व्यापारकरवासागोतेमा घणोकमाणु अनेत्रीजो हजारसौन याकायमराखीने लानयावेतेवावरे एरीतेंते मूलव्यनेराखीरा अनेत्रीजेव्यापारकी धुनही अनेवेश्यादिकनाव्यसनमा सर्वमूनश्यवावरीनाख्यु अनुक्रमेंतेत्रणेजण पा। तानाघरेयाव्या तेहोनुव्यतिकरजाणीने त्रीजापुत्रने मूलनी पणनराख्योमाटे पि तायें घरथीवारकामीमूक्यो लोकमानिंदनिकथयो दामपणुपाम्यो जेमतेत्रीजोपुत्र नीमूलनेहारीने निंदायवस्थापाम्यो तेमयात्मारिपयलुब्धयको पूर्वजन्मपुण्यरूप मूल नीहारीने जन्मातरेंगतिना 5 खपाम्योथको घणुगोचपामे हवेठो शाकटनु दृष्टातकहे जेमकोक गामानुवाहक सम विपम मार्गजाणतो थको पण विषममागे गामानेलेगयो पवेधुसरूनागेथके शोचकरवामामधु तेम होपण जीवपुण्यपापादिक मार्गनेजाणतोयको पण प्रमादना परवशपणायकी कु मार्गे चालतो कुगतीमापमसे तेवारेशोच पामसे हवेसातमुं निखकनु दृष्टांतकहे कोइकगामडीयानो रहेवासी पुरुषदाविपरा नव्यायको देशांतरेंना निदामागे पण पुण्यरहितपणायको निदानपाम्यो तेबारे फरीपोतानां घरतरफचाजवानिकल्यो मार्गमाकोझगामे पाण पाटकपाशे एकदेवजडे तेमा राजश्सतो तेदेवतमाथी एकसिमचित्रेलुकामकुनहायाले निकल्यो पजेएफ वाज्यनारही घडानेकहेवाजागो हेकुनश्हामदिरकर एटलेतिहा मदिरथा एम तिहाशय्यादिक नोगसामग्रीसर्वकीची पठेत्रीसहित रात्रेनोगनोगवी प्रनासर्व स हषु तेदेखीने निश्केचितव्यु जेथाजलगणदु फोकट पृथ्वीमानम्यो हवेजोहुएप्ति बनेसेवुतो माहीमर्वयाश्याफले एमचितवी ते पाणनीसेवाकरी एकदिवशेते पाणन सन्नयश्वोयो जैतुसुमागे तेवारेनिकुवोड्यु जेताहरापशायथोदुपण ऐहवोनोगपामु पाणेकषुतुजने गमेतो एकुनोना थनेगमेतो एकुन प्रतिष्टानी विद्यालेजा ते वारे निहुकवायो जेहेम्वामीविद्यातो कष्टकरीसामु तेगारंफले तेमाटे विद्यासिया न तेहिजमने थापो तोकष्टकियाविनाज नोगसिदिपामु पठेतेपारोधमोथाप्योह देतेनामडीयोयटोस्ने घरेयायो घटनेप्रतापें उज्वलपरनीपजावी विविधनोगसामग्री मेजवी पोतानासर्वकटुबमाहित मनोवांडित वितास नोगववालागो पोताना सङ्ग नारिकने खेतीप्रमुख बाजीविकाना उपाय सर्वमकाम्या ढोरप्रमुखचतुप्पद सर्वदो गन्यापदाधिकार. ५३ समस्या रविन चामनपाने वारदीवाने मनमायग्ना विद्यारून बनाउने नाचवानागों मानना पग्नपणानही घटपटीने नांगीगयो नयी जिवा काले चना गर्यमढीगयो एग्रामीण कृटुबमाहित नाजीविका বিশাল লাগেতানি: ভাৰমাৰিদিন। তিনীন্তন नागीयान एनीने जमतग्रामिनि पनिटनाग्ता देवयशान कामनमामिने बीमयपाननी पग्यशनायकी कुननागीनानी पियानुगोपा] तमाएजीपण पनि जिनधर्म पामिनं प्रमादपरवानाची धर्मनारीने गगनीगयोचको धर्मसा मीनिना शोचपामे पलानटांनना गंजापना तेमापदेलापांचष्टांतता श्री जगध्ययनना मातमा अध्ययनथी तथानकोष्टांत पांचमांयध्ययनची थने सा तमादृष्टांत कान्यध्ययनथी राख्ने लोकमां यायगदमलाने तेथीवीजापण द रिश्टवाटिक एदयादृष्टांत पाणावे तेयंघातरधी जाणवा. पतंग गेणग्वगादिमीनविपधिपारिप्रमुखाः प्रमादैः ॥ गोच्या यया स्युर्मुनिबंधवश्चिरायनावी त्वमपीति जंतो ॥ २४ ॥ थदिवेवली ग्रंथकार प्रमाटीजीवनं दृष्टांतकरी नाची खदेवाडेले देवात्मा जेम पर्वगीयो नया नमरो मृग तथा ग्यगक पारेवाप्रमुखपदी तथासर्पथने माठलो तथा दग्निव्यानन्यादिक सर्वजीवते प्रमादजे गदादिकविषय तेहनावायकी मरणसं धीवरगने शोचनीयथायो तेमांपतंगते नेत्रनाविषयथी दीपशिखायेंमोह्योयको मृत्युपामेवे अने नमगंधाणेश्यिनाविषयथकी कमतमध्येमुनाउमरेठे मृगशब्दविष बयों नादनुमायो पागधीथकी मरणपामेले पदीगालप्रमुखरुणनेलोने रसनेश्यिना वाथको जालमांपमे सर्पकाननाविषयथी मदुधरनानाटनोमोह्या बंधनपामे थने मल्ल बटियनामाननीतालचे रसनेश्यिना वशथीमरेवे हस्तिहम्तणीनामोहथी स्प शनपिनावडी बंधनमरणाटिपामेते व्याघ्रपिजरामारहेला बोकडानामांसनीता सचे ग्मनेंडियनावोमृत्यु वंधनादिकपामेले इत्यादिकबीजापण चित्राप्रमुखना ह टांनजाणवा तेमाडेयात्मा तुंपणतेपनंगाटिकनीपरें प्रमादनावशयकी चिरकालत गोचनीय थासः ॥ १४ ॥ पुरापि पापैः पतितामि खराशीपाद करोपिनानि ॥ मऊ न्मदापंकिलवारितः शिनानिने श्रय दसम्मान पा - ५४ अध्यात्मकल्पडम पेकरीने खसमूहमापडयो अनेफरीपण तेहिजपापनेकरे तेथीतुपणाकदिवस हितजलनापूमा बुडतोयको पोतानामस्तकनेविपे अने गजानेपिपे शिलाधरे॥१५ पुन पुनर्जीव तवोपदिश्यते विनेपि उखात् सुखमीहसे चेत् ।। कुरुप्य तरिकचन येन वारित नवेत्तवास्तेऽवसरोयमेव यत् ।।१६।। 'थर्य ।। हवेजीपने प्रमादपरिहारनुएहिजअवसर तेकहेते हेजीतुजने फरीफ रीने उपदेगकदुख केजोतु खथीबीले यनेसुग्यनेवावे तोनु एबुकाइक सुरूत करके जेथकीताहरु बाडेनुसुख तुजनेमिले धनेतेसुरुतकरवानो यवसर एहिजने ३ हाफरीनेठपदेशदीयो माटे पुनरुक्तदोपनही यमुक्त सनायजाणतवन सहेसुउवएत धुपियाणेसु ॥ सतगुणकित्तणेसु न हुति पुणरुत्तदोसाठ॥ ६ ॥ धनागमोख्यस्वजनानसूनपि त्यज त्यजैक न च धर्ममार्दतं ॥ जयति धर्माधिनवे नवेथिता न्यमून्यमीनि पुनरेप उर्लन ॥१७॥ श्रयाहवेधर्मनीपुनितादेखाडीने धर्मावसरनेज दृढकरे हेजीपतु धनतथागरीर थनेसुख तथासजनकुटुब तयामाणजे जीवितव्यपणु तेसर्वनोत्यागकर पगएकत्रीस प्रणीतजे धर्म तेहनेकोश्वारपण त्यजीशनही केमकेएधनादिक सर्ववस्तुतेधर्मथकी जतुजनेनवनवनेविपे वांवितमलशे पणधनादिकेकरी जिनोक्तधर्ममलवु उर्जन १७ दुख यया बदुविध सदसेप्यऽकाम काम तथा सहसि चेत्करुणादिनावे ॥ अपीयसापि तव तेन नवातरेस्या दात्यतिकी सकलदु खनियत्तिरेव १७ थाहवेथात्माने काम खनासहेवाने बदले सकाम खसहेवुते ननुएमकहे ने हेयात्मातुजेम थकामकेवारहित परवशयको बहुविध पुरष तृमा वध वचनादि कप खप्रतेसहेने तेमज जोकरुणादिक जेमंत्री प्रमोद कारुण्य माध्यस्य एपरिणामेकरी ने सकामके० निर्डगनीदिये तुपु ससहनकरे तो तेवायाडापण खने सहवेकरीने नवातरनेविपे थात्यतिकीके पुन प्रानावरहित एदी समस्त खनी निवृतिते नि थपथाप एटले मोल्पद पामे ॥ १८॥ प्रगल्नसे कर्मसु पापफेवरे यदा: 'न तदिनानित ॥ विनारयस्तच विनश्वर कुन बिने 7.द्विारा अर्थ ॥ हवेधर्मत्यजीने यात्मापा थरेम संजीवतु सुखनीयाम्यायेंगरी या माहा। पएकाने पण ते यन वराग्योपदेशाधिकार. UU नाहगे जीवनचनो जीकेण्डताबद्धं विनाशनीलने एवीरीतजापानांयकोपए तिनाउ खयी कमवाहितीनची ॥ १ ॥ कर्माणि रेजीव करोषि तानि येस्ते नवित्र्यो विपनो ह्यनंताः॥ तान्यो निया तहधसे ऽधुना किं संचाविनान्योपिनशाकुलत्वाणा प्रयावजीवकागंनन्तहितकहते हजीवजोतुं तवाज हिंता मृपावावाहिककर्म कर्मकरीनुजनधनंनियापदायांचा नेवारहमणाजतं यापदायोनायक अतिशेनयंकरीने याबुनताकमपामने जोपापनाफसजापतीयकोपण तुंपापक बानेप्रवती नेवापती नरकादिकनाड खताननीनेसाबान्त जयपामेन नियंतु खनोगवाजपढो एमांनंगयछंचे एनावार्यन | 0 | ये पालिता वृद्धिमिताः महेव स्निग्धा नृशस्नेढपदं च ये ते ॥ यमेन नानण्यदयं गृहीतान कालापिकिन बरसे दिताय॥२॥ अर्थ ॥ वतीजीवने हीतायनविप्रेग्ने हजीवजसजन मित्रादिक तयापुत्रादिक व्यापाप्या तयाज नुजनाडिपान्या महोटाच्या वलीतताहग अतिशयस्नेह यया नहुनेपण यमगजायें निर्दयपणेग्रन्या तेजाणीनपणतुंयात्महिनकरवानेके समाजयतुंनची कमक तंदुनंजो यमग्रन्यता तुंशीगतस्विररहिन एनावाचे ॥२॥ चैः क्लिश्यमे वे धनवंध्वपत्य यश.प्रनुलादिनिराशयस्यः॥ कियानिह प्रेत्य च तैर्गुणम्ने माध्यः किमायुश्च विचारयवं ॥श्शा वर्ष । बेजेनुकंगनहने नयीनुजने काउगुणनयी तेकहते हयात्मन्तुं या म्यक केवनकम्यिनमात्र एनवाजधन बंधु वजन अपत्यके० नंतान तथा य होनि अने प्रभुत्व सामिपाणु न्यादिकनिमित्तंकी नियनका कष्टनोगवेठे ते वजनादिकंग तुजनानवें नया पग्नवें कंटडंक गुणनाथबुंएटले ते नुसने एकरम अनयाऊपोते कंठ कवं एमविचारी धनादिक ममत्व करता करतांज उप पुगेयाजाने अने नवांत कोऽपण ताहकामेधावमनही ॥ १ ॥ किमु मुह्यमि गवरः पृथक् कृपाणवधुवपु.परिग्रहः ॥ विमृश म्य दिनोपयोगिनो ऽवसरेऽस्मिन् परलोकपांय रे ।। या पग्लोकजनार पंवीजीव तुं रुपण दीन सगणुदेवान यसमये एहवा अ एयगन्धरके जनाजुदावंगाजा एडवाजे बंधु स्वजन तथा वपुजेशीर तयाध न्याटिक पन्ग्रिह नणर्ग मुमुंजायन एकांपण तागतायें यादनही एनाया ५४ अध्यात्मकल्पडम. पेकरीनेजाखसमूहमांपडयो अनेफरीपण तेहिजपापनेकरे तेथीतुवणाकदिवस हितजलनापूरमा बुडतोथको पोतानामस्तकनेचिपे थने गलानेविपे शिजाधरेने॥१५ पुन पुनर्जीव तवोपदिश्यते विनेपि उसात सुखमीढसे चेत् कुरुष्व तत्किचन येन वाग्ति नवेत्तवास्तेऽवसरोयमेव यत्॥१६॥ अर्थ ।। हवेजीपने प्रमादपरिहारनुएहिजयवसर तेकहेने हेजीवतुजने फरीफ रीने उपदेशकद्दु केजोतु खथीबीहे थनेमुग्वनेवाने तोतु एवुकाइक सुरूत करके जेथकीताहरु वाजेनुसुख तुजनेमिले थनेतेसुरुतकरवानो अवसर एहिजने 5 हाफरीनेउपदेशदीधो माटेपुनरुक्तदोपनही यमुक्त सनायकाणतवन सहेसुचवएस धुपयाणेसु । सतगुणफित्तणेसु न दुति पुणरुत्तटोसा॥ ६ ॥ धनागसोख्यस्वजनानसनपि त्यज त्यजेक न च धर्ममार्दतं ॥ नवति धर्माधिनवे नवेथिता न्यमून्यमीनि पुनरेप उर्लन ॥१७॥ अथवेधर्मनीर्जनतादेखाडीने धर्मावसरनेज दृढकरने हेजीवतु धनतथाशरीर थनेसुख तथास्वजनकुटुब तथाप्राणजे जीवितव्यपणु तेसर्वनोत्यागकर पणएकश्रीम प्रणीतजे धर्म तेहनकोश्वारपण त्यजीशनही केमकेएधनादिक सर्ववस्तुतेधर्मयकी जतुजनेनवनवने विपे वांनितमलशे पणधनादिकेकरी जिनोतधर्ममलवु उर्जन १७ दुख यथा बहुविध सहसेप्यऽकाम काम तथा सहसि चेत्करुणादिनावै ॥ अपीयसापि तव तेन नवातरेस्या दात्यतिकी सकलदु खनियत्तिरेव रण थीहवेयात्माने थकामा खनासहेवाने वदले सकाम खसहेवुते ननुएमकदे ने देयात्मातुजेम थकामकेसारहित परवशयको बहुविध मुख तमा वध वधनादि का खप्रतेस तेमज जोकरुणादिक मंत्री प्रमोद कारुण्य माध्यस्य एपरिणामेकरी मके निर्धारानीवुधिये तु खसहनकरे तो तेवायोडापण खने सहवेकरीने नगतरनेरिपे यात्यतिकी पुन पाउनविरहित एहत समस्त खनी निवृत्तिते नि अपथाप एटले मोदपद पामे ॥१८॥ प्रगल्नसे कर्मसु पापफेवरे यदाशया शर्म न तदिनानित ॥ विनाययस्तच विनश्वर कृत बिपि कि दर्गतिद खतो न दिए। अर्थ ॥ दोधर्मत्यजीने थात्मापापकर्ममा निपुणताकरे तेथाश्रीकहेने थरेम खंजीवतु सुखनीथास्यायेंकरी पापनाउत्पादकजेकर्म तेहनरिपे प्रगत्नसेके० माहा पणकरेठे पण ते धनसजनादिकनासुख तो प्राणितके जीत्तव्यविना नोगयायनही वराग्योपदेशाधिकार. ए 'ताहरो जीवतव्यतो शीघ्रके उतावलृ विनाशशीजवे एवीरीतेजाणतोयकोपण गतीनामुखथी केमवीहितोनथी ॥ १५ ॥ कर्माणि रेजीव करोपि तानि येस्ते नवित्र्यो विपदो ह्यनंताः ॥ तान्यो लिया तहधसे ऽधुना किं संभावितान्योपि नशाकुलत्याए । अयावतीप्रकारांतरेतेहिलकहे हेजीवजोतुं तेहवाज हिंसा मृपावादादिककर्म ने जेकमकरीनुजने अनंतिधापदायोथाशे तेवारहमपाजते आपदायोसनारेथके अतिशेनयेंकरीने याकुलताकेमपामे जोपापनाफलजाणतोयकोपण तुंपापक रवानेप्रवत्तेने तेवारेवली नरकादिकनाङ खसांनलीनेसावास्ते जयपामेठे निधेतु ते खनोगवाजपढो एमांसंगयच्छे एनावार्यठे ॥ २० ॥ ये पालिता वृद्धिमिताः सदैव स्निग्धा नृशस्नेदपदं च ये ते ॥ यमेन तानप्यदयं गृहीतान् झालापि कि न बरसे दिताय॥१२॥ थर्थ ॥ वलीजीवने हीतार्थनेविपेप्रेरेठे हेजीवजेस्वजन मित्रादिक तथापुत्रादिक ल्यापोप्या तथाजे तुजसायेंक्षिपाम्या महोटाथया वलीतेताहरा अतिशयस्नेह त्रयया तेदुनेपण यमराजायें निर्दयपणेग्रन्या तेजाणीनेपणतुं यात्महितकरवानेके उजमालयतुंनी कमक तेढुनेजो यमेंयम्यतो तुंगीरीतेस्थिररहिस एनावार्य ॥२१॥ यैः ल्लिग्यसे वं धनवंध्वपत्य यशःप्रनुखादिनिराशयस्यैः ।। कियानिद प्रेत्य च तैर्गुणन्ते साध्यः किमायुश्च विचारयैवं ॥२॥ अर्थ ॥ हवेजेतुक्केगसहे। तेहथीतुजने काऽगुणनथी तेकहे। हेयात्मन्तुं श्रा यस्थक केवलकल्पितमात्र एहवाजेधन बंधु स्वजन अपत्यके संतान तथा य कीर्ति अने प्रचल स्वामिपणुं इत्यादिकनिमिनकरी क्वियमेके कष्टनोगवेठे ते नस्वजनादिकेरी तुजनेऽहनवे तथा परनवे केटबुंक गुणसाधबुंठेएटले ते तुजने गुणकरसे अनेयाकपोते केटबुंको एमविचारी बनादिकनुं ममत्व करता करतांज रायुप पुगेयजासे बने नवांतरेकोऽपण ताहरेकामेधावसनही ॥ १५ ॥ किमु मुह्यसि गवरैः पृयक कृपणेवैधुवपुःपरिग्रदः॥ विमृश स्व हितोपयोगिनो ऽवसरेऽस्मिन् परलोकपांय रे ॥ ३३ ॥ अथ। हपरलोकजनार पंथीजीव तुं रुपण दीन सरणुदेवाने असमर्थ एहवा य रे टयगत्वरके जूदाजुहावराजासे एहवाजे बंधु स्वजन तया वपुजेशरीर तथा ध धान्याटिक परिग्रह तेणेकरी सुमुंजायवे एकोऽपण ताहरासाथे यावेनही एजावा जयराव्यपदेवा ॥नवेनवापायपिनाशनाय तमधर्म कलुपीकरोपि नादने मनायादवाचर्मन देयात्मा प्रमादजे मयादिक तपानन नादियानामप्रिनगरमामयारहनम्यात टनेमिः मिश्रित अध्यात्मकल्पडम पने माटेएपमारवायोग अवसरनेविपे पोतानाहितोपयोगी परलोकना सहायनून एडवाजे ज्ञानादिकगुण तेहोने चित्तमाराख ॥ २३ ॥ सुखमास्से सुख शेपे नुदे पिवसि खलसि ॥ न जाने त्वग्रतः पुण्यैर्विना ते कि नविष्यति ॥ २४ ॥ श्रर्थ। हो दमणातुसुग्वेपिजशेने पण बागलताहरी सीगतियासे तेफहेवे हया रमातु हमणागपार्जित पुण्यफलना नपायथी सुसुखेवेशीरहे तथासुग्वेनोजना न सगेमयादिकपानकरेने मुग्यूतादिकरमेने पणथागत परनमें तुजनेपुरस्यदिना सुपगनुने तेसुनथीजाणतो एटले पुण्यविना घणुजउखायम ॥ २५ ॥ शीतातापान्मक्षिकाकत्तृणाटि स्पर्शाद्युत्यात्कटतोटपाहिनेपि॥ता म्ताश्चनि कमान स्वीकरोपि श्वभ्रादीना वेदना धिग धिय ते॥ यर्प दोषोडाराष्टथी बोहतोयको पकष्टथगीकारकरे तैकहे। हेारमा साहपी तापची तयामासीत्रमुग्स तृण मानप्रमुखना स्पर्शादिकथी उपमुंजे थप मानाट तेयोचोदने कायरथायने थनेण्यापापफमेरीने श्वन नरकादिक्ना प्र पारनीने महादिनाथो तेप्रतेथगीराकरे तोताहरीउधिने धि कारवे ॥२५॥ परिकपाय कचन प्रमादै कढायदे कापि चमत्सराये ॥ ग्मानमात्मन् कलुपीकरोपि बिपि हि नो नरकादधर्मा ।।दा अर्थ ॥ नीतहिना देयात्मा हिमपरीपहादिकमा कपायेंकरीन यानी Pि स्पिानुष्टानादिग्नेषि प्रमागरीने बजीक्दिाक उपदेशादिकमा कदागदा ने स्टिारगुणवतनी अनुमोदनापि मन्मगदिकांगने पोतानीग्रान्माने मनोन रोपणनुपर्मनिया नपथावाहितांनी माटेनुजने विकाचे ॥ २८ ॥ इनि श्रीप्रयरमामे मामान्यतो वेगग्यापदेशाग्यो ददामोपिकार समाप्त प्रमा दमानोपषिमन्मगनिनिने मिश्रित द्याप मामयापढ । अर्पा इवे मंत्रिपदानाम ग्याग्मा श्रमिकामा निहांप्रथम धर्मनी मन नामामामादिक तहना बाट नाममा न्यादिक मनले होतेडा र
धर्मशुध्युपदेशाधिकार.
ए
जे ओपय तेकांरोगनिवारकनहोय अनेतेमजतेीपधनीपरें धर्मपणजोप्रमादादि
के मिश्रितहोयतो संसारना अपायजे पुःखतेनो निवारकनहोय ॥ १ ॥
यतः॥ शैथिल्यमात्सर्यकदाग्रक्रुधोनुतापदंनाविधिगौरवाणि च ॥
प्रमादमानो कुगुरुः कुसंगतिः श्लाघार्थिता वा सुकृते मला इमे ॥५॥
अर्थ ॥ हवेधर्मनेविपे मलसरिवाजेटलादोपत्रे तेटलापूर्वाचार्यना वचनीदेखाडे
वे सुरुतजेधर्मकार्यतेमां शैथिल्यके धर्मनेविपे अनादरता मात्सर्यके गुणवंतनेविषे
पर्नुपरतथाकदायहके जूगवचन-हत अधके क्रोध वली अनुतापके सुरु
तकरी नेपठे हाऽतिखेदेमें फोकटदानदी, फोकटतपस्याकीधी इत्यादिकपश्चात्तापर्नु कर
बुं तथादंलके कपट अने अविधिके ० शास्त्रोक्तविधिये रहित क्रियानुकरबुं तथागौर
बके ढुंमहाधर्मिष्ट इत्याटिक महोटाश्च॑चिंतवद् वलीप्रमादजे धर्ममां असावधा
नपणुं अने मानजेअहंकार वलीकुगुरुजे लोहशिलातुल्य अने कुसंगतिजे ऊत्सूत्र
नापी एहवा मिथ्यात्वी प्रमुखनोसंग तथा श्लाघार्थिताके लोकनामुरवथी पोतानी
कीर्तिवांव एटलाप्रकारेकरी धर्ममलीनयाय धर्मयथोक्तफलनयाय ॥ २ ॥
यथा तवेष्टा स्वगुणप्रशंसा तथा परेपामिति मत्सरोशी॥
तेपामिमां संतनु यक्षनेयास्तां नेटदानादिविनेष्टलानः ॥३॥
अर्थ ॥ हवेथात्मापोतानागुणनी प्रगंसावांठेने तेयाश्रीउपदेशेवे हेयात्माजेम
तुजने पोतानागुणनी प्रशंसावननवे तेमपरजे अन्यजन तेहनेपणपोताना गुणनीम
शंसावजन एहजाणीने मत्सररहितथको तेअन्यजननीमांके गुणनीप्रशंसान
ते विस्तारीनेकहे जेमतुंपणतेप्रगंसाप्रतेपामें केमके कोने वांठितदानटोयाविनापोता
नेपण वांवितलाननथाय एटलेपारकागुणनी प्रशंसाकरीयेतो पोतेपण प्रशंसनीयथैयें
जनेषु गृहत्सु गुणान् प्रमोदसे ततो नवित्रीगुणरिक्तता तवायत्सु
दोपान् परितप्यसे चरे भवंतु दोपास्त्वयि सुस्थिरास्ततः ॥ ४ ॥
अर्थ ॥ हवेकेटलाक काव्यनेविपे गुणप्रशंसानीवांठाथकी थवगुणदेखामेळे हे
यात्माजोताहरायण लोकेंयहणकस्याथका तुहर्पपामेवे तोतेहपपामवाथी ताहरे
गुपनी रिक्तताथासे श्रनेजोलोके अवगुणबोलतेठते तु परितापके खेदपामे तो
तेखेटपामवाथी ताहरा विपे अवगुणते निश्चलथइरहेसे तेमाटे गुणकह्यानी हर्ष
नेटोपकह्याथी खेद एवेद्वाना तुंकरीसनही ॥ ४ ॥
-- . ताके० मध्यस्थानावनेनजे तेवारेतु अर्थवेदीके परमार्थनुजाणो एमनाजिर तमा ख्यातिकार्तिजोवणीहोय तोपण तेथी काइपरनवनु हितनयाय तेमाटेपरने के हितनुवाठक एहबुजेतुते मुधाके० फोकट थनिमानेकरी घहेज़ोथयो थकाईव दिकेकरीने थायतिजे उत्तरकाल तेहने सावास्ते बगाडेठे एटाईप करवाथी ताहरा दानादिधर्माणि मलीमसान्यमू न्युपेशक सुकृत चराएवपि ।।। दिक पाचप्रकारें तथामात्सर्य एटले पारकीसपदानी थदेखाइ तथाकुवाय | पादर्शननु दृष्टिराग तेणेकरी विलुतके० परानव्या एहवा वहिरमुखजे खबिर रिपत मार्गनास्यापर कुत्तीर्यकपोकते मलीमसके। महाबारनादिके दूपत (१ चादानप्रमुख ते धर्मकार्यमा कोएकोणनथीकरता थर्यामिप्यात्वीलोकपण सर अध्यात्मकल्पद्रुम प्रमोदसे स्वस्य यथाऽन्यनिर्मिते स्तवैस्तथा चेत्प्रतिपधिनामपि ।। विगर्दणे स्वस्य यथोपतप्यसे तथा रिपूणामपि चेत्ततोसि वित्॥ अर्थ ॥ हेयात्मातु जेमलोकनामुखें पोतानागुण स्तवसानजीने प्रमोदपामे तेन शत्रुनापण गुणस्तबसानलीने जोप्रमोदपामें थने पोताने विगर्हणे के यवर्णवाई करीने जेमपरीतापकरेते तेमजजो शनापण वर्णवाद सानतीने तुपरीताप को तेवारे एम जाणिजे तुझाताबो ॥ ५॥ अथवा ॥स्तवैर्यथा स्वस्य विगणैश्च प्रमोदतापोनजसे तथा चेत्॥ इमो परेपामपि तेश्चतुर्वप्युटासतो वासि ततोऽर्थवेटी ॥६॥ इतिवापाड थर्थ ॥ वली पाठातरेकरी एदिजयर्थको हेयात्माजेम पोतानीस्तुतिक ने तथापोतानेविगर्हणेकरीने प्रमोदतापाको दर्पनेशीकप्रजजेजे तेमज पातानी स्तवना तथा निटा थने परनीस्तवना तथा परनीनिदा एचारेनेविजो उगम एकाव्य पहेलाकाव्य, पानंतरजाणवु ॥ ६ ॥ भवेन कोपि स्तुतिमात्रतो गुणी ख्यात्या नवव्यापि हितं परत्रच! तदिधुरीयादिनिरायति ततो मुग्धाभिमानग्रहिलो निहसि कि ॥ अर्थ ॥ देथात्माकेवल एकजीस्तुतिमात्रथीज कोश्गुणवतनथाय अनेवली जा परनयनुहित विणसीजायते इतिनाव ॥ ७ ॥ सृजति के के न बहिर्मुखा जना प्रमाटमात्सर्यकुबोधविनुता । थर्थ ॥ हवेदानादिककर्मने जे मसीनकर तेहनेकहठे हेयात्मा . . ज"
धर्मशुध्युपदेशाधिकार.
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तपोताना मननीरुचियें दानप्रमुख धर्मकार्यकरेले पण तेप्रमादादिके दूपितथका य
थोक्तफलदायकनयाय तेमाटेतेमलीन धर्मकार्य उर्वपीने थोमुंपण शुधर्मकर ॥॥
आच्गदितानि सुकृतानि यथा दधते सौभाग्यमत्र न
तथा प्रकटीकृतानि ॥ ब्रीडानताननसरोजसरोजनेत्रा
वक्त स्थलानि कलितानि यथा उकूलः ॥ ए ॥
अर्थ ॥ हवेप्रशंसारहितवर्मनुं विशेषफलदेखाडेठे इहांश्रीजिनशासननेविषे श्रा
वादितके प्रशंसानेढाक्यायका एटलेजेप्राणी प्रशंसायेरहित थका एहवाजे सुरुत
के० धर्मकार्य तेथीजेहवी सुनगतानेपामे तेहवी प्रकटितके जेमुरुतकरीने लोक
आगलें प्रशंसाकरावे ते सुलगतानेनपामे तेहदृष्टांतकडे जेम ब्रीडाजेलजा ते
रोकरीने नतके० नम्रठे याननसरोजके मुखकमलजेहनु एहवीजे सरोजनेत्राके
कमलनयना एटले उत्तमस्त्री तेहना वद स्थलजे स्तनमंडलते उकूलजे वस्त्रतेणेकरी
सहितयका जेहवी सुलगताप्रतें पामे तेहवा उघाडाथका सुनगताप्रतेनपामे ॥ए
स्तुतेः श्रुतैर्वीप्यपनिरीदितै गुणस्तवात्मन् सुकृतन कश्चन ॥
फलंति नैव प्रकटीकृतैर्नवो द्रुमा दि मूलैर्निपतंत्यपि वधः ॥२०॥
अर्थ ॥ देथात्मा ताहरासुरूतजे धर्मकार्य ते अन्यलोके स्तुतके वखारोथके
तथा अन्यलोके तांनोथके तथा अन्यलोकेदेखेथके तेथीतुजने कोश्गुणनथी तेल
परदृष्टांतकहे जेमनूमीमांहेंथी मूलप्रगटकरेठते जुमजेदतेफलेनहीपण उलटाहे
गपडे तेम मुरुतपण कघाडाकखाथका फलदायक न थाय ॥ १० ॥
तपःक्रियावश्यकदानपूजनैः शिवं न गंता गुणमत्सरी जनः॥
अपथ्यनोजी न निरामयो नवेज्सायनैरप्यतुलैर्यदातुरः॥१२॥
अर्थ ।। हवेगुणवतनुं मत्सरकरचुंनिपेधेचे गुणजेपारका तपसंयमदानादिक तेह
नेविपे मत्सरनुकरनार एहवोजे मनुप्यते तपतथाक्रिया जे यावश्यक दान तथापूजन
जे जिनबिंब पुस्तकप्रमुखनीपूजा इत्यादिक सर्वप्रकारेकरीपण मोक्षपामेनही तेउपर
दृष्टांतकहे जेम थातुरजे रोगीपुस्पते अपय्यनोजन करतोयको थनोपम
महामू
ला एहवाजे रसायन पारदादिक श्रीपध तेणेकरी रोगरहितनयाय इहां रोगीतेया
स्मा थने तपप्रमुखते रसायण यनेगुणवंतउपर मत्सरते थपश्यनोजन तथा मुक्ति
ते निरोगता जाणवी एउपनयका ॥ १२ ॥
अध्यात्मकल्पधुम. मत्रप्रनारत्नरसायनादि निदर्शनादरपमपीदि शुई ॥ दाना चनावश्यकपोपधादि महाफलं पुण्यमितोन्ययाऽन्यत् ॥२७॥ थर्थ । वलीप्रकारातरे तेहिजकहे। इहांश्रीजिनशासनमा दान देगपूजा यावश्य क पोसहप्रमुखजे पुस्य तेथोमुपण गुम दोपरहितकोयोहायतो मबजे जामुनी मुख तथा रत्नजे सूर्यकात चकातादिक तया रसायनजे पारादिक तेहनीपर म हाफलकारीथाय जेममत्रथोडायझनुहोय तोपण विषप्रहारादिकनेहरी महागुणक रे तथासर्यकातादिक रत्नन्दानुहोयतोपण महाप्रकाशकरे श्रने रमायणयोपण म होटारोगहरे तेमदोपरहित पुण्यजो थोमुहोयतोपण महाफलदायकथाय थनेतेहथी विपरीतजे अगुचपुण्यकार्य तेधन्यथाके० घणहोयतोपण थापफलदायकथाय॥१॥ दीपो यथाल्पोपि तमासि इति लवापि रोगान् दरते सुधाया ॥ तष ददत्याशु कणोपि चाग्नेधर्मस्य लेशोप्यमलस्तयाद ॥१३॥ अर्थ ॥ जेमदीपक थपके० न्हानोहोयतोपण अधकारटालेने वलीनेम थम तनो एकविमात्रतेपण सर्वरोगनेहरे वलीजेम थनीनुएककणीयुमात्रतेपण तृणा नेबालीनाखे तेमनिर्मलदोषरहित एहयोधर्मनु लेशमात्रतेपण पापनेटाले ॥ १३॥ भावोपयोगशून्या कुर्वन्नावश्यकी क्रिया सर्वा ॥ देहक्लेश लनसे फलमाप्स्यसि नैव पुनरासा ॥१५॥ ॥ दवेसर्व कियानी सफलताते नावसहितकरवायोजहोय तेकहे। हेया श्रधा तेहनानपयोगेकरी शून्यकेन रहित एहवासर्वए थवश्यकरवा पडिलेहणप्रमुख क्रिया तेप्रते करतोयको पणतेथीफेवल शरीरने तेहिजफलपामे पणतेभियानु मुख्यफलजे मोजक्षण तेसर्वे जावथको शून्यक्रियाजो घणोकरीतोपण निलयाय ।। १४ धर्मशुपदेशाख्य एकादशोधिकार समाप्त ॥ ११ ॥ रुपमा विमधिकृत्य किचिदपदेश ॥ प्रधान हितार्थधर्मा हितक्तिसाध्या । धर्मप्रयासान् कुरुपे थे॥३॥ धर्म एप्रणतत्वनाधिकहेसे तिहाप्रथमतो लिये तेमाटेप्रथम गुरुतत्वनी शुद्धि गुरुवे केमके हितार्थ मोक्षनेथर्थ धर्म mad देवगुन्धमा यधिकार. माग्योकोयना ते गुनानीमाय नमान दायको पहाण्याविनाज गु ग्ने याप्रयना धमननिमियान रणरं फोटो ॥ १ ॥ नवी न धर्मविधियुन गमी शिवं वपु गन्नं शुम ॥ गनीदि कल्पा नग्मायनन पां प्रयोक्ता निपगय महाशा अर्थ ॥ यमुनापती धर्मपण धार नेकन नबोले नारीजीय तेणे अविधियी गएनवाजे बानादिकम् तर चीजीप मोगामीनधाय मजे धर्मनधि निर्वापरणं नवी धर्मश्यावे तेहपष्टान पर लेमनारन करनार बचते गुणागुणर्नु प्रमाणमूहोपनी रोगीपुरप ने मायनेरी निगंगीन भाय नमगिंगी नेत्रामा प्रोपपनेधर्म मृत्पद्य ते फुगुर जाणवी ॥ २ ॥ समाधिन्नारगावस्तिो पो यस्यारत्वन्तो मजपिता स एव ॥ श्रोचं नरीता विपमं कायं स नयेव जंतुः कुगुरोर्नवाब्धिं ॥३॥ अर्थ ।। दवेगस्थने इताग्कनुंदृष्टांतर हे जेनाणि तारकयुधियफरीने तार कनेयाश्रयाने अनेततारपज यात्रीनप्राणीने माटनारदोय तोतेप्राणी विपमा स्तर एहयो उपजे समुश्नापाणीनो प्रवाह तेशीरीतेतरस तेमज जेथकी तरवानीया शागग्यि तेहिज जेवार बोटे तिवारे नमुनु पारते केमपामि तेमज गुरुथी नवसमुश्पण जाण केमके जेगुस्मतें तारकजाणीने संताग्नमुइ तरवानी थागा में तेदने यात्रपियें धनतेगुस्तो दन्मार्गने देग्वाडवेकरी धाश्रीतप्राणीने तंसारसमु इन बोटे तेयारे ते प्राणी नंमारसमुश्नो पारकेमपामे एनावार्थः ॥३॥ गजाध्वपाताहरयान यथेष्टपदाप्तये न निजान् परान वा ॥ नति विझा. सगुणान नवं शिवाय शुशान् गुरुदेवधर्मान् ॥४॥ श्रर्थ ।। तेमाटेगुरुदेवगुरुधर्मने यादग्वुतेकहे जेमविज्ञजे निपुणपुस्प तेवां ठितम्थानक पहांचवानेयर्थं पोताना यथवापारका हाथी घोडा तथा वाहण उठव सद ग्थ नेयापचापणेगुणमहितसुनदणाजोग्ने थाहरे केमकंजो निरीक्षण चाहन दोपतो तेहथीवांवित स्थानकंपहोचायनही माटेहेसरलमाणी एरीतेतुंपण मोक्षस्था नक पामवानेयर्थे शुझगुणोपेत एवाजे देव गुरु धर्मनेप्रतेनज जेथकीमोपदपामे फलाया रचः कुगुरुपदेशत. कृनादि धर्मार्थमपीढ़ सूद्यमाः ॥ तदृष्टिगगं परिमुव्य न द गुरुं विशुधे नज चेचितार्थ्यमि ॥५॥ थर्थ ।। हवेकृगुस्नाठपटेंच्याधर्म फलदायकनहोय तेकह रहाश्रीजिना पनाने - अध्यात्मकल्पम. विषे कुरुनाउपदेशथकीधर्मनेयर्थपणजे नजाउद्यमफरेलाहोय तेफलदायकनयाय माटेहेनश्कजोतु मोइफलनोथो तोदृष्टिरागवामीने शुरूपरुपकगुरुनेनन ॥५॥ न्यस्ता मुक्तिपथस्य वादकतया श्रीवीर ये प्राक् वयालु टाकास्वदृतेऽनवन् बहुतरास्ववासन ते कलौ॥विधा णा यतिनाम तत्तनुधिया मुष्पति पुण्यश्रिय फूत्कुर्म किमराजके ह्यपि तलारदा न कि दम्यव ॥ ६ ॥ श्रर्थ ॥ हवेदृष्टातेकर "उष्टताकहेडे हेश्रीमहावीर पूर्वेतुमेजे सुधर्माखा समक्याहता तेप कनियुगमा तुजविना ताहरासा देवगुमधर्मशुध्यधिकार ८३ गीगायकांश उपयापनही बनीदेगष्टविषमत्रवत्यानपान्यो जेगजातने नजीपन्ने योथोपा लशान थापे तेमकुगुम्नेपाण नेत्र्योधका धर्म अथवा मानतनन्यापे कुलं न जातिः पितरो गोवा विद्या च बंधुश्य गुन्धनं वा ॥ दिताय जंतोन परं न किचिन किंवाहना. मग्यधर्माः ।। अर्थ ॥ दयेसर्वपदार्थधी देवगुम्धमचरिने र जना जीने कुल वांगपुनरमुग्य तपाजातिजे मातानुपम पिन पिनामस्य नघागण स रवानग्यामित्रनीटोजी नथाविद्यानं पनीरमुग्प तनावले मनन नजीर, लरिधानअध्यापक बने धनतेनु वाणांदिय नपाचीनार का माम मरममा तसर्व हितायके० पग्लास्ना हितने धोऽधायन मनमा दम गुम्वनधर्म एवणनेघाटग्याप पग्लोपनाशिननं प्रदेश माता पिता स्वः सुगुमश्च नत्वान प्राप्य या पांजनि नब्धमं ।। ननरमारि. हिपत जवाब्धी यो धगिदिनेश जी110॥ पर्थ पोजेमधर्ममांजोगे नपुरानीगंग पद नपाटी तीरोधपमारी धनेगुराधर्ममांजोड तेदनदिजपुर माता नदिना नहिरात नभनेतेहिज गुरजाणवु न्चनजंजीर हारमाणिने धर्मग्रंतगपादिर की मंशा गारमानापतो तेसरियातनाको वीजा मानधी : !' वादिष्पलनं गुन्टेवपूजा पित्रादिषि मुनिनाय ।। परोपकारी व्यक्तारमहिनणामिटानत्र वनपद न्या रापन संस्थानागार देरजाने नरो दानाडे मान्डा रेगुनीता नापिनागना शारंगै महोटा कोरपानारपाटार नदनी नपापग्नारगन राया gr Paar मंरटेशन जिनेनिनिनिनाडा दमबन भिमत पावननिसंग पिटर. Timiri जितने म पाre रा, - ६४ अध्यात्मकरूपम पाविरुक्ष्यमिते मिथ्यात्वी कुमतिप्रमुख तेहनीमित्राश्ते विवाहव्यापार प्रमुवेकरी परिचयकरवु तयापिताप्रमुखनी थवगणना अनेपरने कुमालेख कुमानामा कुहा माप कुडातोजप्रमुग्वेकरोने उगवु एटलासर्वप्रकारेकरी पुरुपनेयापदाचपजे ॥१२॥ नत्त्येव नार्चसि जिन सुगुरोश्च धर्म नाकर्णयस्यविरत विरतिर्न धत्से ॥ मार्य निरर्थमपिच प्रचिनोप्यघानिमूल्येन केन तदमुत्र समीइसे शर३' श्रर्थयजीप्रकारातरेकहेते हेयात्मातु नक्तियेफरी जिनपूजाकरतोनी थनेकदा पिपूजेनेतोपण कुजफर्मादिक परवशपणायकी पूजेने पणनक्तिीपूजतोनयी तथात दगुरुंपासेची धर्मसानजतोनथी तथानिरतर बढारपापस्थानक पन्नरकर्मादान प्रमु रखपीनपरनुसत्यादिकपिरतीपणु तेपणनाथादरतो तथासार्थक पोतानेश्व पवाटुनादिकनेश्रय श्रनेनिरर्यको स्वार्थविनापण थपथ्य थनाचरित पापोपदेश हिंमदान प्रमादाचरित एपाचप्रकारेकरी कारणपिना पापनेमेलवे तोपरलोके तुं शामृजेंकरी सुम्पनी यांचाफरेने शहा मूलरूपते पुण्यजाणवु ॥ १३ ॥ चतुप्पटे सितम्य स्वजात्येमिल निमास्तारयतीदि कश्चित्॥ संदेव तमजति कोपिउंगशृगालवच्चेत्यमिलन् वर स ॥१४॥ वर्य । दोसुगुमनेसिवनीउपमा बनेकुगुरुने सीयाजनीउपमाकहीने उपदेशेने पोतानीजातीनाजे चतु पदमृगप्रमुख तेसाथेमा सिहनीपरें एसप्तारमांजे सद्गुरु तेपोनानी जातीना नयपश्यिमझीमनुष्यन्यादिकसाथे मव्योथको थाश्रीतजीव नेतारे जममिनिजाश्रितचनु पदने कृपगनादिकथीतारे तेमसुगुरुपण निजाश्रितन थ्य नीरा ममाग्ममुश्योनार थनफुगुम्तेमीयाजनीपर स्वजातीयजे मनुष्यादिक य नेपिनातीयने गनु पद तेदनमायनेजाने उगजेनरकप्रमुग्य वजीर्णजे कपादिकत मामाडे तेनादेनागुम्नेनमयोयशनमारों जेमपचारयानमा काकानमा वीजा वामिहादिग्नुनपटानाने अर्थ सर्वचनु पर्दमजी एकवजातमिहने गजाकर पायो यनेमबचतु पद तेहनीमेपारवानागा एकदिरमेतानमा थनीजागी तेवाई नेमाचनु पद मिदन माग गया नेमननमिडेपोताने पुनडेबजगामी एकफाडारीको महानदी पनीरदार पदागदया बीटतार दियमे दावानलमिटपा बत नसलदया नेवारेमवचनु पदने पानापानानेतामे पहोचाडया होते मिहनोग गामात शेनवंशिमीयानाण केदार दीनसत्व निर्माग्य मसजाप्रमुग्वजीन जिरी नानांतो दानामा नरसीयाल निजातिमांचनु पदने
देवगुरुधर्मशुध्यधिकार.
६५
पुंगडेवनगामी फालनरीनटी उतरवा लागो तेवारे सर्वजीवसहित पोतेपण श्र
गाधजलमाबुमो हालिहते मुगुरु अनेसीचालते कुगुरु महानदीते मुर्गति धने
याश्रितजीवते धर्माया मनुष्य एमपनयलेवो ॥१४ ।।
पूर्णे तटाके तृषितः सदैव नृतेपि गेहे तुधितः स मूढः ॥ क
ल्पद्रुमे सत्यपि दी दरिजो गुर्वादियोगेपि दिय प्रमादी ॥१५॥
अर्थ ॥ हवेगुवाटिकनुं योगठतेप्रमाद करवूनही तेदृष्टांतदेऽनेकहेठे निधेकरीजे
प्राणी देवगुस्धर्मनु योगठतेपण प्रमादवंतयायते तो हाहाशतिखेदेतेप्राणीनस्यातला
वेपण सदाऽतरस्योठे वली ते पुस्प सुरखडी प्रमुखे नसायका घरमां पण जुन्यो
वली घग्मावते कल्पः पण दरिझाने तेमाटे गुर्वादिकनो योगरते प्रमादत्यजीने
धर्मसाधनकरवु तेहिजसार्थकठे ॥ १५ ॥
न धर्मचिंता गुरुदेवनक्ति यंपांन वैराग्यलवोपि चित्ते॥तेपां
प्रमूलेशफल पशूना मिवो भवः स्याउदरंनरीणां ॥१६॥
अर्थ॥हवेप्रकारांतरतेहिलकहे याजमेंगुं धर्मकीयोयनेहवे नित्य प्रत्यशोधर्म
करवानुने एहवीजेने विचारणानथी यमुक्त उत्यायोत्थाय चितेयं किमद्य सुरुतं कृत।
थायुप. खममाटाय रविरस्तमय गत ॥१॥ तथा जेने गुरुयने देवनीनतिनथी वली
वैरागर्नुलेशमात्रपणनया एहवाजेपेटनराप्राणी तेहोर्नुजन्मते पशु जुम कुतराप्रमु
खनीपर केवल माताने गर्नधारणादिकक्लेश करवामात्रज फलहोय ॥ १६ ॥
न देवकार्ये न च संघकार्य येपां धनं नश्वरमाशु तेपां॥ तदर्ज
नाद्यैर्वजिनेनवांधौ पतिप्यतां किं ववलंवनं स्यात् ॥ २७ ॥
अर्थ ॥ हवेप्रकारांतरे सुपात्रेधनवावरवानी सफलतादेखाडेठे जेधनवंतप्राणीनुं
धन देवकार्यजे प्रासाटकराववा यथवाजीर्णोधार विवप्रतिष्टा इत्याटिकनेविपे तथा
संघकार्यजे चतुर्विधतंघ,पोपवू तथासामिनीवत्सलताते हीन बने दीनजे साधर्मि
कहोयतेनीचिताकरवी तथा पुस्तकलखववा इत्याटिक कार्योमांउपयोगीनहोय तेप्रा
पी विनाशशील एवूजेधन तेउपार्जनादिकनापापेकरी संसारकूपमापडताने तेधन
सुंकाइ अाधारनूतथाय अर्थातकाऽनयाय एटलेसुपात्रेव्ययविना यन्यथाकोशकामेना
वे॥१७॥ति श्रीयथ्यात्मकल्पधुमेदेवगुरुधर्मगुदीनामा घाटशोधिकारः समात॥१॥
पापमुमतीन धारणकरतोनयी रजीगरीग्नामोदयी बाह्यथन्यतर प्रकारतपर
देगनुमानयोगाना नगननुयामग्नार एहजेमृत्युते सोयीननान
मेयरधादायी वीदिनोया निर्मननिरनिचार जैचारित्रतेमते घगतीनपीता |
अध्यालकरपजुमा
ते तीशी नववारिधि मुनिवरास्तेच्यो नमस्कुर्महे येषा नो विपयेषु निश
ध्यति मनो नो वा कपाये छुत॥ रागक्षेपविमुग् प्रशातकलुपं साम्याप्त
शमीय मित्य खेसति चाप्तसयमगुणाकी नजभावना ॥१॥
अर्थ ॥ दवेयतिशिझोपदेशनामा तेरमोथधिकारकहे। तेमाप्रथमयतिनुसरुपक
मेने जेमुनीनुमन पियमा अासक्तपामतुनयी तथाको गदिककपायमा मार्नु
नयी हगजेमहानुनार ससारसमुथीतखा तेहनेनमस्कारकरियेवैये जमुनिराज
गगवरित यने रजपताजे पापाचरणतेहने शातपमाडयो पजीसमतायेंकरीय
नुपममुग्मपाम्योने वुथइने पाचमहातनी पचवीसनावना तथा थनित्यादिक
बारनाम्नानेनजेचे नीजिनप्रणीतजे सयमनागुण हमादिकरूप उद्याननेत्रिय
गने जेन मनसोप तेहनेज तत्वयफी मुनिकहिये एनावार्थडे ॥ १ ॥
स्वाध्यायमादित्मसि नो प्रमादै शुक्षा न गुप्ती समितीश्च धत्से॥त
पाब्धिा नाजसि दंढमादा दल्पे हि देतो दधसे कपायान् ॥शा प
महनोमदमेन चोप सर्गान शीलागधरोपि वाऽसिातन्मोढमा
गोपि नगादिपार मने कय यास्यविशेपमात्रात ॥३॥ युग्मं ॥
वर्ष ॥ माधुनापमात्रयकीन असिनाय तेरहते हेमुनितुप्रमार्वक
गगिनापयानरमा नितीनथी तथासनिर्मज मनादिकत्राणप्ति यने ईयादि
पकग्नानयो नयायामापण पायनुरागण उपनायीपायधरेठे ॥५॥तयारया
दिर बामपरिमह यन यता प्रमुगनाकरेला उपसर्ग तेप्रतनयीमहेतो तथा य
द्वारमहमर प गोनागरथने पणन्तानयी थनमा धमायाज मोदनपनिने प
पपीतेन तु ममाग्ममुनापारमपामीम ॥ ३ ॥ काय्यनाथर्य एकाने
माना गयमिद यद्यनिपमे कम चन्त्रिममता न तु कटनी ॥
मिकिन न विनति नगनिमय तोपि नरकचन वेपमात्रान्।
यवनीताटेने हेमायामगारमा ग्रामीकानेथ जे यतिनार
देना दयनरनेमावरेज प तादागयी डरमेनही तिनार ॥ ४ ॥
यतिशितोपदेशाधिकार. ១ वेपेण माघसि यते चरणं विनात्मन् पूजां च वांसि जनाबहुधोपधिं च।। मुग्धप्रतारणनवे नरके ऽसि गंता न्यायं बिनर्पि तदनागलकर्तरीय॥४॥ अर्थ ॥ हेअत्मातुंचारित्रविना यतिनेवेपेकरीहर्पपामेछे अनेलोकथकी बदुप्रकार नीपूजा बटन सत्कारप्रमुख तथाउपधिजे वस्त्रपात्र पुन्तकादिकरतेवांने पापनेतुं एमुग्धलोकने प्रतारपके० कपटक्रियायें उगाकरी तेहयोउपायोजेनरकतिहांज रहींग तमाटेतुंशजागने कतरीना न्यायप्रतेंधने जेमको खाटकिये एकवकरीहण वानेय वधकरवानेस्यानकेाणी कातोयेंधारचडावी तरी तेवफरीनेपासेका तिमूकी एटलामाकोऽकामनधर्य पोतेवरमांगयो पठवाडेवकरीचे पोतानापगेंकरीनू मोखोदितेमाकातिदाटी नेविचायुंजे रखेखाटकोधावेतिवारदेखे एमजाणीतेहनान परसुती देवयोगी कंवतलेलातीनीधारथावी तेथीगढुंदवाश्गयुं अनेमृत्यपामि तेमहे थात्मातुंपण तेवकरीनीपरेंथज्ञानीयाने कातीरूपनरकने ढाकिराखे पणतेअवश्य नाविपणाची उदयधाव्याविना रहेसेजनही तेमाटेप्रथमधीज अज्ञानत्यजीने साव धानरहेजे एन्यायग्रंथातरें बीजेप्रकारपण सरस्युंते ॥ ५ ॥ जानेऽस्ति संयमनपोनिरमीनिरात्मन्नस्यप्रतिपदनरस्य न निष्क्रियोपि ॥ किंगतो निपततः शरणं तवास्ते सौख्यं च दास्यति परत्र किमित्यवेदि॥६ अर्थ ॥ हेयात्माएलोकरजन निमित्तेजे संयमतयातप तेणेकरीने गृहस्थोपा संथी अहार चौपथ वरपात्रादिक,जेवं ते तो संयमतपादिकना समूहनु वक्रयके मूलपणनथतंवारेंतुजने गतिमांपमतां शरणतेमुंडे यनेपरलोक सुरखते कोणत्या पने विचारीजो एतोलोकोनाप्रतिग्रह मूलमात्रपण ताहरंसुरुतनथी माटेतुलने नरकेपडतां नहार श्रनेपरलोकनेविपे सुरखतेशाथकीयासे एनावार्थः ॥ ६ ॥ कि लोकसत्कृतिनमस्करणार्चनायैरे मुग्ध तुप्यसि विनापि विशुश्योगान् कृतन् नवांधुपतने तव यत्प्रमादो बोधिद्रुमाश्रयमिमानि करोति पर्शन। अर्थ ॥ हवेलोकसत्कारादिकदेखी राचवूनहीतेकहे। हेमूटधात्मा शुइनिर्मल दोपरहित एहवाजे मनवचनकायानायोग तेधिनालोकोनो सत्कारजे श्रन्युस्थाना दिक तथानमस्कारवदना अर्चना जेनवांगपूजा विलेपनादिक तेणेकरीने मुंहर्पपामे दे केमकेएप्रमाढते ताहरेतंसारकृपमा पडतावोधरूप दृदनाथालंबनने वेटवाने ए लोकसत्कारते कुहाडारुप एटलेताहोप्रमादरूपवैरीते तुजने संसाररुपकवामां ने लोकोत्तरशास्त्रने जाणतोयको तथा पचमहाव्रतधारीथको तथास्त्रीपुत्रादिकना/ |ज कोश थतक्ष्यमहाउष्टताजाणवी थथयाते नररुपपशुबापडो पूर्वनरकारिकना दन अध्यात्मकल्पडम नाखवासारूं बोधयालधनरुपवृक्षने लोकसत्काररूप कुहाडेकरीदेचे एटानेहमणा! तो सत्कारपामिमनमा हर्पधरेठे पण्यागले वोपपामयो उर्जनयासे ॥ ७॥ गुणास्तवाश्रित्य नमत्यमी जना ददत्युपध्यालयदशिप्यकान् । विना गुणान् वेपम्पेविनपि चेत् त तष्ठकाना तव नाविनी गति ॥ull यथासाधो धर्माथिलोकतो तहारागुणयाश्रीने तुजनेनमेठे तथा उपपि यत्र पात्रादिक थालय वस्ति नेपज थन्नपानादिक यनेशिष्य तुजनेयापेने थनेतुनायुष। विनाज मात्र वेपधरेचे तेवारे ताहरीबूतनी गति थाने जेमतगारा कृत्रिम नवानवा वेष करीजोकना धनगीलिये पठेकोइकदिवसे तेहनाविपाकथी वध बधनादिक पा मे तेम ताहरा हवालपण तेहनीपरे थासे ॥ ॥ नाजीविकाप्रणयिनीतनयादिचिता नोराजनीश्च नगवत्समय च ये सि। नो राजनीघरसि वागमपुस्तकानिइत्यपि पान आशुधेतथा पिचरणे यतसे न निक्षो तत्ते प्रतिग्रहनरो नरकार्थमेव पणा थर्थ ॥ हवेसाधुपणानु सुखदेखाडेते देनिकतेंघरबारपरिग्रहतोमूस्या मारे थाजीपिका तथापुत्रादिकनी चितानथी तेमराजासबधीनयपणनथी वजीजिनप्रणी त सिवांतपणजाणे अथवाजैनसिकतना पुस्तकधरे तोपणशुरुचारित्रनेवि उद्यमकरतोनथी तेवारेताहरु वस्त्रपात्रादिकनुलेनु तेहनुनारते नरकनेयज ॥र शास्त्रझोपि दृढव्रतोपि गृहिणीपुत्रादिवधोज्कितोप्यगी यद्यतते प्रमादवंशगो न प्रेत्य सौख्यश्रियो|तन्मोदहिपतस्त्रिलोकजयिन काचित् परा उष्टता बचायुप्कतया स वा नरपशुनून गमी उर्गतौ॥१० अर्थ ॥ हवेततैयोगेपणजीव धर्मक्रतोनथी तेहनाकारणदेखाडेने लौकिकश्र प्रतिधधेरहितयको पण जेप्राणीप्रमादवशे पायोयको परलोकनासुखनीसपदारूपथ मकार्यविउद्यम करतोनयी तोतिहा प्रलोकनु जीपनारजे मोहरूपशत्र तहनी थापुपाना बांधवाथकी उगतिमाज जनारठे एमजाणीयेयें ॥१०॥ उचारयस्यनुदिन न करोमि सर्व सायद्यमित्यसकदेतदयो करोपि।। नित्य स्पोक्तिजिनपचनानारिता तत्सापद्यतो नरकमेव विनायये तेर।
पनिशिवायनाधिकार. {{মনিলাল নিশান নীলাশান শান্ত मागधामायद्यानी करीनर वागार मावकामचिन्त्रात्त मकर नेमानिन्नपाती नाच पवने मायनानामि नेदयी गुजन न जवजनंनो योजीने नायद्याखाची निनामनिवार ॥ ११॥ चपापंदनायुपधिप्रनारिता ददयनीटानजयो धुना जनाः॥ नंदा व पै च सन्य विचष्टये नवांतर झान्यमि न पालं पुन.॥१॥ वर्ष ॥ बालीनदिजानने ना मनावानयमान यजामेतामात्रमुगना গ নগ্নতানেন না। তার মানে ও न्यादिककपटारी नोजानोरने नुजने बानित र पान बन पान नसनि मिल दिल्याने तेथीगंग्यायचे नगंसने मुग्मनोफिले पणतं सुमनोगयतुं फज परनवे नमादिकनारकाम्यगिना बीजांकाइजानीमनदी प्राजीविकादिविविधानिनमानिशातीः कोण कपि मदनव मृति धर्मान तेन्योपि निर्दय जिवदामि सर्वमिष्टं ना संयम च यतमनविता कन्यं दी। अर्थ ॥ वली प्रयागत तजिप फेटलाफश्रावको घाजीविकाजे उदरनि धादिशदधी बन्न धानरण राजदम पुनाटिक विवाद इत्याटिकचिनायकरी सटा काजधायजयका घणीसप्टेंकरीने धर्मजेदानप्रमुग्म तकरचे घने देनिर्दयवेपनाधरना र तुर्नवापाशेधीपण अन्नपानादिक सर्ववाठितवन्नु वानेवाले घनेसयममा उ धमकरतोनथी माटे दातिवंदताहरी तनीगतीथासे ॥ १३ ॥ आराधितो वा गुणवान् स्वयं तरन् नवाब्धिमम्मानपि तारविष्यति ॥ अयंति ये त्वामिति नग्निनिनिः फलं तवैपां च किमन्ति निर्गुण ॥४॥ अर्थ ॥ गुणवंतवे एनयमगुणसहितने एमहानुनावने एनेयागयोधको पोतेर्स सारसमुश्तरेचे तेम थापागनेपण ताग्ने एदवीवुद्धिये घणीननियेफरी तेप्राणिये तु जनेथालयोने थनेतुंतोपातेनिर्गुणनो माटेतुजने अथवाने याश्रयकरनारनं एमागो फत गटलेतुयुमनाथको तेप्राणानेपण वोडे एनावार्थ ॥ १५ ॥ स्वयं प्रमानिपतन् नयांधी कयंस्वनक्तानपि तारथिप्यसि ॥प्र तारयनम्बार्थमजून शिवार्थिनः स्वनोन्यतश्चैव विलुप्यसेंऽदसा॥१५॥ अर्थ ।। हेमुनिनुपात प्रमाटेंकरीने चुमतोलतो पोतानानक्तजे सेवकलोक तेने गोरीतेतारीश केमके पोताने अन्नपानादिकमाने तेनेयर्थे सरल मोझाथिनोक ते
थर्थ ।। फरीतहिजरूहे थरेनिनोग्य नि पुरस्यकथात्मातु गुणरहितयको फा/
go
अध्यात्मकल्पडम.
हनेवचतोयको तुफरेठे एटलेपोताना प्रमादाचरणथी थनेबीजोजोकने उगवायो
एवन्नेप्रकारना पापेकरीने तुलोपायवे ॥१५॥
गृह्मासि शय्याहृतिपुस्तकोपधीन सदा परेज्यस्तपसस्वियं स्थिति ॥
तत्ते प्रमादामरितात्प्रतिपदे सणार्णमनस्य परत्र का गति ॥१६॥
थर्थ ॥ हे वेपना धरनारयति तु लोकोपासेथी शय्या वस्ति यहार तयापुस्तक
झानोपकरण तथाउपधि वस्त्रपात्रादिकजे नित्यनियेठे तेतो तपसीजोकनी स्थिति
वे परतु तुतो प्रत्याप्रमादमा मग्नथको काइपणतपस्यादिक करतोनयी तेमाटं प्र
तिग्रहने निगवेकरी नारीययु एहजेप्रमाद तेथकोपायजे लेणो ते लेणानेदिषे
ममयको खुतोटोएहवुठतो ताहरीपरनवें सीयवस्थाथासे एटलेप्रथमतु चारित्रने
ने प्रमादसेवेठे तेलेणोकरेठे तेवारपत्रे तपसयमादिकविना लोकोपासयोगव्यादि
क प्रतेजीयेते तेवीजोलेको एमएवेप्रकारना लेणामाखूतोथको ताहरीमी था
स्याथासे थर्यात उष्ट्यवस्थाज पामीस इतिनाव ॥ १६ ॥
न कापि सिनि च तेतिशायि मुने क्रियायोगतप श्रुतादि ॥ तथा
प्यदकारकथितस्व ख्यातीच्या ताम्यसि घिड मधा कि ॥१७॥
थर्थ ॥ हवेतथाविधगुणविना कीर्तिनेसुवावे हेमुनिताहरेविपेको विद्यामत्रा
दिक सिदिनथी बलीपादणा खमासमणाप्रमुख उलटक्रियानथी तथामनवचन
कायाना योगनी शुनप्रतिनथी तथावाह्यान्यतरतपनथीरतो तथाश्रुतज्ञान था
दिशदथी प्रनाविकपणु राजाप्रमुखनु प्रतिबोध इत्यादिकगुणतेपणनथी तापण
थहकारे कदर्यितयको ख्यातिजे प्रतिक्षितहनी वाटायेकरीने फोकटशोपरीनाएका
ने माटेतुजने धि कारथाउताहरामा जो कोइ अतिशयगुणहोय तेवारेंतो ख्यातिनी
वांढापणयुक्तले थनेतेपिनाज प्रख्यातीनेवा माटेतु धिक्कारवायोग्यो ॥ १७॥
हीनोप्यरे नाग्यगुणेर्मुधात्मन् वास्तवार्चायनवाप्नुवश्च ॥
ईर्यन् परेन्यो जनमेऽतितापमिहापि यातो कुगति परत्राणा
क्टसवनापूजाप्रमुग्यने गवतो जोपूजास्तयनानथायतो बलतकोउपरकोधकरता
यको ऽहजारपण यतिगय तापसतापपायनेपरलोकपणतियजश॥१७
गुणविदीनोपि जनानतिस्तुति प्रतिग्रदान् यन्मदित प्रतीसि ।।
खुलायगोश्वोष्ट्रखरादिजन्मनि विना ततस्ते नविताननिष्क्रय ॥१६॥
यतिशिदोपदेशाधिकार. अर्थ ॥ हवेकुगतिमांपडवाविपे उपदेशकरीने प्रतिवोधने हेयतिवेषनाधारक तुं गुणरहितयको पणहपवंतथयीने लोकथी नमस्कारादिक स्तवना वस्त्रपात्रचन्नादि - कलेवावांठे तेहथीनुजने खुलायजे पामोपाणीवहेवायोग्य अथवागोजेवसदीयो हल गाडा यंत्र कोल प्रमुख वहेवायोग्य अथवाअश्वते अस्वारीकरवायोग्य तथा उंट खररासन अनेकविधनारवहेवायोग्य इत्यादिकअवतार पाम्याविना तेप्रतिग्रहादि कनु मूलनथाय केमकेगुणविनापण लोकोपासेथी प्रतिग्रहादिक कल्पेठे तेहलेणो पामाप्रमुखना यवतारपामि नारवहीनेतूटबुंठे एनावार्थ ॥ १५ ॥ गुणेपु नोबच्चसि चेन्मुने ततः प्रगीयसे पैरपि वंद्यसेऽर्च्यसाजु गुप्सितां प्रेत्य गति गतोऽपि तैईसिप्यसे चाऽनिनविप्यसेऽपि वाणादानमाननुतिवंदनापर मोदसे निकृतिरंजितर्जनैः ॥ नववैपि सुकृतस्य चल्लवः कोपि सोपि तव लुंठ्यते हितैः॥२॥ अर्थ ॥ वलीतेहिजप्रकारांतरेकहेठे हेमुनिजोतुंगुणनेविपे उद्यमकरतोनयी ते वारेहनजे तुजने श्रावकादिक गीतनासप्रमुखेकरीगाय तयावतीवादशावर्त वां दणाकरीवादेठे सुगंधलेपनादिकेकरीपूजेठे तेतुपरनवें निंदनीक कुरुप दरिश्तादि क पाम्याथका तेहिजताहराउपर हससे तथानानाप्रकारनीपीमा उपजावसे एटले ते स्वामिपणे अवतरसे अनेनुदासपणेथाइस तिहां लातो लाठीप्रमुखना प्रहारेकरी तुजपीडसे ॥ २७ ॥ हेमुनितुं कपटक्रियायेंकरी लोकरीजवीने तेहोने दानसन्मान स्तवन वदनानेविपे तत्परदेखीने हर्पपामेठे पण एम नथीजाणतो जे ताहरो लेश मात्रनुरुतते तेहनेएलोकबुंटेवे ॥ २१ ॥ नवेजुणी मुग्धतेनदि स्तवे न ख्यातिदानार्चनवंदनादिनिः॥वि ना गुणान्नो नवखसंदय स्ततोगुणानर्जय किं स्तवादिनिः॥श्श अथाहवेलवनादिकनी वाठामूकीने गुणनुपोपकरवुतेकह। हेमुनितुं विशेपाविशे नाथजाण एहवामुग्धलोकनीकरेलीजे स्तुतितयाख्याति प्रशंसादिक तेणेकरीगुणवं नथाय वलीगुणजे ज्ञानादिक तेहनीप्रातिविना संसारनोविनाश अनेमुक्तिनाप्राप्तिन य तेमाटेकेवल गुणनेजउपार्जनकर पणन्तुतिकराववाथी कांस्यतिदिनथीर अध्येपि शास्त्रं सदसदिचित्रा लापादिनिस्ताम्यसि वा समा वै॥येपां जनानामिद रंजनाय नवांतरे ते क्व मुने क च ॥३॥ अर्थ ॥ हवेलोकरीजववामाटेतुं शास्त्रनणेने पणनवांतरेतुंकिहां । परिग्रहपणे परिणम्याचे तोतेहनेथर्य क्लेशकपायादिकने करवेकरीफर्मरविकाने थीजाणतोजे अतिशयनारी एहमोजेसुवर्ण तेणेकरीनरी एहवीतरीजे होडी तेजेम) थगीनके वेशनारमनुष्यने वोडे तेमनुजनेपण धर्मोपकरणनेमीसे मोएडवो थर्थ ॥ जेमुनिये हितके वायुवे धर्मनुसाधनजेथकी एडवाजे पुस्तकादिकते | णेकरोनेपण शहजेपाप तथाकपायजे कोधादिक तथा कलिजेकलहतेना करवा सुखसार्य निरनिनुकरनारनथाय एटलेजेहनेधर्मोपकरणतेहिज ममत्वनावशयकी/ थकी कमजे झानावरणियादिक तेनानिकाचित्बधनुनाजनथाय तेहनेबीजोको । ३ अध्यात्मकल्पडम ककिहा तेदेखाडे हेमुनितुजे लोफरीजववानिमित्ते सत्के नजोजिनागम तथा असत्के० विरुवीक्षादिकनुशास्त्रते प्रतेनणे अनेवली कपटसहित नानाप्रकार मायालापसलापादिक तेणेफरीने घणुप्रयासकरे पणनगतरे तेजोककिदागतिभा जो थनेतु केइंगतियेजश एटलेयानवे जायजीवशुद्धीजे जी तें रोजव्याही तेपरनवेकोरपण ताहरे कामेथावेसेनही ॥ २३ ॥ परिग्रह व व्यजहाशदादे स्तत्कि न धर्मोपकृतिबलात्त ॥ करोपिशय्योपधिपुरतकादे रोपि नामातरतोपिढ्ता॥२४ थर्थ ॥ हवेपरिग्रहत्यजवा याश्रीउपदेशेने हेमुनितेपूर्वे घरप्रमुखनुपरिग्रहवा ड्यु धनेवली धर्मोपफरणने मीसेकरीने शय्या वस्ति उपधि वस्त्र पात्रादिक पुस्त क थादिशब्दयी पाना चाबखी पोथी वाधणा जपमाला प्रमुखउपकरणनो परिग्रह सुकरे धर्मोपकरणजेका बहुमूलो ममतानावशयकी वधारराखियेंते परिग्रहजजा एवो केमके गरके विप तेहनेनामातरकस्यायकी एटलेनामफेरवीनाख्याथीर | हताके० मृत्युकारकहोयज जोविपने साकर थमृत इत्यादिककहियेतोपण खापु थकु प्राणहरणकरे तेमपरिग्रहने धर्मोपकरण निमित्त राख्योथफोपण पुर्गतिश्राप परिग्रहात्स्वीकृतधर्मसाधनानिधानमात्राकिम मूढ तुप्यसि॥ न वेत्सि देनाप्यतिनारिता तरी निमज्जयत्यगिनमबुधौ द्रुत ॥२५॥ थर्थ आवजीतेहिजकहेठे हेमूर्वसाधोतु स्वीस्तके प्रमाणकिने धर्मसाधनके धर्मोपकरण एहनाममात्रजेहनु एहयोपरिग्रह पाम्याथी सुहर्षपामेळे हेमूर्वतुन जे थतिपरिग्रहतेनयसमुहमा बोडो इतिनाव ॥ २५ ॥ यह पायकलिकमनिवधनाजन रयु पुस्तकादिनिरपीहितधर्मसाधने । तपा रसायनवरैरपि सर्पदामय रातत्मिना गदहते सुखकृत्तु कि नवे .
यतिशितोपदेशाधिकार. ७३ तोतेहनेतंतोपते पवे फरीबीजागाथकीयाले एनावार्य तेहवेंदृष्टांतकहे जेम रता यनजे मृगांगपारादिक तेहनोतवनकरवाचीज उलटोमांदापडयो एटरसायनय कोपण जेहनेरोगवथ्या नोपत्रेतेहनारोग, निवारकबीजोसुखकारी कोऽनयी ॥१६॥ रदार्थ खलु संयमस्य गदिता येऽर्या यतीनां जिने वासःपुस्तकपात्र कप्रनृतयो धर्मोपकृत्यात्मकाः॥ मूर्वन्मोत्वशात्त एव कुधिया संसा रपाताय धिक् स्वं स्वस्यैव वधाय शस्त्रमधियां यहःप्रयुक्तं भवेत्।। अर्थ ॥ निश्चेकरीनेजे वस्त्रपुस्तकप्रमुख पदायतेश्रीलिनेवरें साधुनेतंयमनी रक्षा नयर्थे धर्मोपकरण स्वरुपेकह्याद तोहाहा इतिखदे तेहिजपदार्थ कुबुद्धिनाधणीने अतिगय मोहनावशयकी नसटातंतारमांबूढावनारनाकारण थपडे तेहबुंदृष्टां त जेम बुद्धिहीनपुस्प पोतानु अस्त्रजखड्गादिक तेविपरीतपणे राज्युहोय तोपो तानेजवधकारीयाय तेहनीपरे जाणवु ॥ ७ ॥ संयमोपकरणवलात्परान् नारयन् यदसि पुस्तकादिनिः॥ गोखरोष्टमदिपादिरूपनृत्तचिरं समपि भारविप्यसे।एना शुर्थ । मुनितुंजे परमाणीनारवाहक पोटी वलद उटप्रमुखने संयमनाउपकरण नमोसेकरी पुग्नकादिक नारवहेवरावे तेमाटेतेप्राणीतुजनेपण वलद उंट रास न पामाप्रमुखना अवतारपाम्यायका चिरकासनगं नारवहेवगवगे ॥ ७ ॥ वस्त्रपात्रतनपुस्तकादिनः शोनवा न खलु संयमस्य सा॥ आदिमा च ददते नवं परा मुक्तिमाश्रय तदिव्यकिका थर्थ ॥ दवेवन्धपात्रादिकयी नंयमनीगोनानीतंकहे। मुनि वस्त्रपात्रतथा रीर पुस्तकात्यादिकनी मोनाकाधयक निवेकरी संयमनीगोनानयाय एटलेवस्त्रादि कनीगोनाते संयमन अगोनाकारणीने तेमांपणवलीयाटिमके० पहेली वस्त्रादि कनीगोनाते नवचमणजयापे धने परके बीजीज नंयमनीशोनाते मोदजयापे ते माटेजोतंसारनी वांठाहोयतो वनादिक्नी गोनाथादर थनंजो मुनिनोवादा तुजने होय तोयमनीगोनाबादर ॥ ५ ॥ वस्त्रपात्रतनुपुस्कादिन गोजया न खलु मंबमम्य मा॥ तां तदत्र प रिदाय मंयम किं यते न यतसे शिवायपि ॥ निचोत्तराईपाठ ॥३॥ अर्थ ॥ वन्धपात्रेति एपानांतर एश्लोक्नुपूर्वा पूर्वनोपरेजाणवू अनंउचगनी
शमत्र यहिरिव प्रमादज परत्र यच्चाधिरिव द्युमक्तिग ॥तयोमि
| विउजेटलुरे यनेसयमना पालवायकीज देवलोकमुक्तिनासुख तेसमुक्सरखाने
४
अध्यात्मकल्पद्रुम
ध्यारण्याकहे तस्मात्कारणात् तेकारणमाटेहेसाधो ते वस्खादिकनी शोनाटामीने
जोमुक्तिनोथ होतो निनप्रणीत चारित्रनविप केमन्द्यमकरतोनी ॥३०॥
शीतातपाद्यान्नमनागपीह परीपदाश्चेत्तमसे बिसोटु ॥
कथ ततोनारकगर्नवास उखानिसोढासि नवातरे व ॥३॥
अर्थ॥ हवेपरीपद सहेवाथाश्री उपदेशथापेठे हेमुनिजोतु सयमनेविपे टाहाइ
तापप्रमुख थोडापणपरीपद सहेवानेसमर्थनथी अनेकायरथाय तोनवातरेनेदिने
नरकतथा गर्नवासनाउ ख केम सहीस एटले नरकादिकना 5 खसहेवाथीतो परीप
हना खनु सहेवुनलुठे एमजाण ॥ ३१ ॥
मुने न कि नश्वरमस्वदेद मृप्तिडमेन सुतपोव्रताये ॥ निपी
ड्य नीतीनवदुखराशे दित्वात्मसावेवसुख करोपि ॥३०॥
अर्थ ॥ दवेसाधुने तपप्रमुखनु उद्यमकरवुकहे हेसाधु एविनाशशीज तथाथ
खरपोतानुनही एहवोजेदेहरूप माटिनुपिम तेहने नलाजिनाझासहित तपवतप्रमुख
करी दमीने ससारनाउ खसबधी सर्वनयटामिने मुक्तिसबधी सुखते पोतानेवश
केमनथीकरतो ॥ ३२ ॥
यन्त्र कष्टं चरणस्य पालने परत्र तिर्यड्नरकेषु यत्पुन ॥तयोमि
थ सप्रतिपदता स्थिता विशेपदृष्ट्यान्यतर जहीहि तत् ॥३३॥
अर्थ ।। हेमाधुजेहा श्रीजिनशासनविचार भनेपरनवे ति
पंचनरकादिकनेपिजे कष्टले तेवेदुकप्टने परस्पर प्रतिपक्षपणुरहे एटलेजिहाँ चा
रित्रकष्टने तिहातियच नरकनु कटनया अनजिता तिर्यचनकादिकना कष्टने तिहा
चारित्र कटनथी तेमाटेविशेपदृष्टिये विचारी तेबेमाथी एककटनेमूक ॥ ३३ ॥
थ सप्रतिपकता स्थिता विशेपदृष्ट्यान्यतरगहाण तत् ॥३४॥
अर्थ ॥ दवेसुम्यनुग्रहकते देसागहा चारित्रमाप्रमादकरवायोजे सुर
मुकिसुन तिहाप्रमादमुग्वनी माटेविरोपैविचारी बेमाथी सारजाणतेने यादर॥३३॥
यतिशिदोपदेशाधिकार. जय अथवा नियंत्रणायाचरणेऽत्र तिर्यक् स्त्रीगर्नकुंनीनरकेपु या च ॥ तयोमियः सप्रतिपत्तनाचा हिशेपदृष्ट्याऽन्यतरां गृहाण ॥३॥ अर्थ ॥ दवेगुरूपाग्नत्रयाश्रयीकहे। देलाधुहाजिनशासनमा चारित्रनेविपेजे गुरुपारनच्यादिकत्रणप्रकान्नो परवगप'ने अने तियंचनाअवतारमा तयाबीनागन मा तथा कुनीतेवणोजसांकमामुखनुनारकीने उपजवानुस्थानकतेमां उपनाजनार कोते ग्वंडोखंडथयी वाहेर निकले तेहनेविपेजे परवशतापाणुठे तेवेढुने परस्परप्रति पदीपपुवे एटले जिहांचारित्रनी नियंत्रणाहोय तिहांतिथंच स्वीयने नरकादिकनी नियंत्रणानहोय थनेजिहां तिर्यंचस्त्रीनरकादिकनी नियंत्रणाहोय तिहां चारित्रनी नियंत्रणानहोय माटेविगेपष्टिविचारीने तेवेमांथी एकनियंत्रणानेवादर ॥३॥ सदतपोयमसंयमयंत्रणां स्ववशतासढ्ने दि गुणो महान्॥शिवं गुण पति वा पाठः॥ परवशस्त्वतिनूरिस दिप्यस न च गुणं बहुमाप्स्यसि कं च न ॥ ३६ ॥ अर्थ ॥ हवेपरवोठःखसहेवाकरता पोतानावगंड खसहेवूनबुंवे तेकहेते देता धुतुं चोयप्रमुखतप तथा नियमयनियहादिक ते यम तथासतरनेंदें संयमसंबंधी एत्रण नियत्रमाउनेतेनुसहनकर केमके एत्रण नियंत्रणायोते पोताने स्वाधीनपणे सहनकरचीते महोटो गुणवे तथापाठांतरे एथकी शिवंगुणके० मुक्तिरूपीयोगुण होय थने जे अतिपरवगपणे एकेडियाटिकमां पराधीनथको घणीजनियंत्रणायो महील तिहां अकामनिरासिवाय यधिकुंगुणमात्र कांऽपणपामीसनहीं ॥ ३ ॥ अणीवसासाम्यनियंत्रणानुवा मुनेऽत्र कप्टेन चरित्रजेन च॥ यदि दयोतिगर्नवासगा सुखावलेस्तत्किमवापि नार्थितं ॥ ३ ॥ थर्थ ।। वलीप्रकांतरेतेहिलकहे हेसाधो याजन्ममा समतारुपनियंत्रणातेतं बंधीकष्ट तथाचारित्रसंबंधीजे अल्पमात्रकप्ट तेणेकरी दुर्गति थने गर्नावाससंबंधी थसपनासमूह क्यथायवे तोतेथी सुवाठितपणुंतुंनपाम्यो थर्थात्पाम्योज ॥३॥ त्यज स्पृहां स्वः शिवशर्मलाने स्वीकृत्य तिर्यड्नरकादि उ.खं ॥ सुखाणुनिश्चेदिपयादिजातेः संतोप्यते संयमकटनीरुः ॥ ३० ॥ थर्थ ॥ हवेप्रमादवंतने रीसेक कहेले हेसाधुतुं जो विपयादिकधीउपनोजे सुख नोलेग तेणेकरी संतोषपामेले घने संयमनाकटयीवीहेने एरीसंतो तें नियंत्रणा
साधिसकीयएहतीजे यनित्यादिकनापनातेनुसेवनकर ॥ ४० ॥ तथावनीप्रकारात
कहेने देसापोतुथ नित्यताप्रमुख वारनायना ने सदानज थनेड ग्खें साधवायोग्य
वर्ष ॥ हवेमाममोरिनापण महोटामहोटा मनोरथफरवा थफल तेकहते है |
अध्यात्मकल्पडम
नरकनु समबुजकरीने स्वर्गमोदनासुखपामवानी यांनामूफीडीपी एटनेत्रघुमात्र
मुख उपर राज्योथको स्वर्गमोदनु थतुल्यसुखहारेठे एनावार्थठे ॥ ३० ॥
समग्रचितार्तिहरिदापि यस्मिन् सख स्यात्परम रताना ।।
परत्र चज्ञादिमहोदयश्री प्रमाद्यसीहापि कथ चरित्रे॥३ए।
थर्थ ॥ दवैचारित्रथी इहलोकेतया परलोकेसुख तेकहेने चारित्रमारतथयना
एडयाजेनावसाधु तेहने सर्वचितामा निवारवाथकी इहलोकेपर्ण परमयनुपमहम्
होप थनेपरजोकेपण शादिकनीसपदा तथा मोदनीसपदाहोय तोहेसाधो एड्दुझे
चारित्रतेने विपे रह्योथकोतु सुप्रमादकरेठे यत देवलोकसमाणोय परियाउँमहेलि
ए॥ रपाण्यरयाणच महापरयसारिसा ॥ १ ॥ पुन नच राजनय नच चोरनपन
च तिनयं न पियोगनाइह लोकसुख परलोकहितं श्रमणत्वमिद रमणीयतर॥ २॥
मदातपोध्यानपरीपदादि न सत्वसाध्य यदि धर्तुमीग ॥तभावना
किं समितीश्च गुप्ती धत्से शिवार्थिन् न मन प्रसाध्या ॥४॥
अनित्यताया जज नावना सदा यतस्वसाध्यगणेऽपिसयमोजि
घत्मया ते त्वरते ह्यय यम श्रयन् प्रमादान नवाहिनेपि किंग ॥
थर्थ॥ हवेजेबदुकष्टकरीशकेनदीतोते सुखसाध्यधर्मकरे तेकहे। हेसाधु तु पराक
मातपुपने साधयायोग्य एहवाजे मासखमणप्रमुख महातप तथा प्राणायामादिक
ध्यान तथाधादिकपरिसह धरवानेसमर्थनथी तोहेमोहनावांचक केवलमनेकरी
स्युते नुजने ग्रासकरवानीगठायें उतालुयायचे दिनदिनप्रत दुकमुश्रावेने मा
टेप्रमादगेवतोयरोपण मनेकरीससारथकी वीहितोरहेजे ॥ ४ ॥
ढत मनम्ने कुविकल्पजाले वचोप्यवद्यैश्च वपु प्रमाटे ॥ लन्धी
चमिवीश्च तयापि वान् मनोरथैरेव ददा ढतोसि॥४॥दग्ध
मनो मे कुविकल्पनाले वचोप्यवद्यश्च वप प्रमादेलब्धीश्च सि
शीश्च नापियाग्न् मनोरये रेव दहा विद्यन्ये । तिवापान ॥४३॥
यतिशितोपदेशाधिकार.
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साधुताहरोमनतें मानाधिकल्पनासमृहें विणसाड अनेवचनपण मृपानापणादि
क पापेकरीविणसाडयु वलीशरीरपण प्रमादजेमद्याटिकतेणेकरी विपसाड्युं एरीतें
मनवचनकायारूप त्रणप्तिविणासाडी तोपण घामोसहीप्रमुखलब्धि तथामंत्रधि
याटिकसिदिने चांटे माटे हाऽतिग्वेदे मनोरथेकरीज पीडायठे जेमगालीऽध खां
मप्रमुख सामग्रीविनापण कोऽमूर्खदीरनानोजननुं मनोरयधरतो थहार्नशविकल्पं
ज पीडाय तेमतुपएपीडायवे ॥४॥ तथावलीपावांतरें माहस्मन कुविकल्पजालें
विणाम्यं तथा श्रवद्यके मृपानापणादिकपा– वचनविणास्युं यनेप्रमादेकरीशरीर
विणास्युं तोपण लब्धि भने सिद्धि प्रतें वांठतो थको हाइतिखेदे टुं मनोरथमाने
ज सुपीमाई इत्याटिक पहेलाकाव्यनुं पागंतर काव्यजाणवू ॥ ३ ॥
मनोवशस्ते सुखःखसंगमो मनो मिलेयैस्तु तदात्मकं नवेत् ॥
प्रमाढचोरैरिति वार्यतां मिलहीलांगमित्रैरनुपंजयानिशं ॥४४॥
अर्थ ॥ हवेमननेसतसंगमांजोडवू तेकहे। साधुताहरे सुखधने पुरखनोजे मि
लाप तेमननेवश केमकेमनजेहनीसाथेमिले तेरूपीयाय जेम तैलने जेहवाफूलनो
संगमिले तेहवीवासनामयथाय माटेमननेप्रमादरूपचोरसाथेमलतो वारीने नित्ये भी
लांगरथरुपजेमित्र तेनीसामेलव जेथकोतुजने सर्वथासुखसार्थेज मिलापथाप ॥४४
ध्रुव प्रमादेववारिधी मुने तव प्रपातः परमत्सरः पुनः॥ गले
न बोरुशिलोपमोस्ति चे कयं तदोन्मजनमव्यवाप्स्यसि॥४॥
अर्थ ॥ हवेयुक्तिविजोकरी प्रमादनोपरिहारकहे हेताधुप्रमादनातुयेंकरी तु
जनेसंसारमांपडवूतो निश्चय थकी केमकेप्रमाद अनेसंसारने अग्निधुमादिकनीपरें
नित्यवंधते चनेवलीजो गलेवाधिमोटी शिलासरिखं परप्राणीउपरमत्सरतुजने तेवा
रेसारसंमुश्माथी तरीनिकलनु केमपामिस माटेप्रमादयने मत्सरवेदुत्यज॥५॥
मर्पयः केपि सहव्युटीर्या प्युग्रातपादीन्यदि निर्जरायं ॥
कप्टं प्रसंगागतमप्यणीयोपीचन् शिवं किं सदसे न निदो॥ ४६॥
अर्थ ॥ हवेकष्टसहेवाथाश्री उपदेशयापेठे केटलाफमहारुपी तेजस्वादुवा
मी टीदितचार व्यवहारीपुत्रनीपरें शीतादिक परिसहनासदनारा चली उपके घ
गोकठिण थातपके तडकाप्रमुख कष्टने उदरीनेपण निर्जरानेसहे तेवारेहे
साधुतुं मुक्तिनेतोवांते तेवारें प्रसंगयी उदयघायुं एहवोस्वल्पमात्र कष्टप्रतेकांन
थीलहेतो थनेकष्टसह्याविना मुक्तिकेमपामिस एनावार्थ ॥ ४६ ॥
मवतपुरुपने साधवायोग्य एहवाजे मासखमणप्रमुख महातप तथा प्राणायामादिक साविसकीयएहवीजे थनित्यादिकनापनातेनुसेवनकर ॥ ४० ॥ तयावतीप्रकारांत रेकहेने हसायोतुयनित्यताप्रमुख वारनावना ने सदानज थने ग्वें साधयायाग्य वर्ष । दवेमाममोरिनापण महोदामहांटा मनोरथफरवा थफलने तेकहते है। ६ अध्यात्मकल्पाम नरकनुषु खकगुनकरीने स्वर्गमोदनासुखपामवानी बावामूकीदीपी एटलेअणुमात्र सुस उपर राच्योयको स्वर्गमोदन थतुव्यसुखहारेवे एनावार्थ ॥३८॥ समग्रचितार्तितेरिदापि यस्मिन् सुख स्यात्परम रताना ॥ परत्र चेज्ञादिमहोदयश्री प्रमाद्यसीदापि कथ चरित्रे॥३॥ थर्थ ॥ हवेचारित्रथी इहलोकेतथा परलोकेसुख तेकवे चारित्रमारतथाना एहवाजेनावसाधु तेहने सर्वचिताना निवारवाथकी इहलोकेपर्ण परमयनुपमसुन्द होप थनेपरलोकेपण शादिकनीसपदा तथा मोदनीसपदाहोय तोहेसाधो एहबुने। चारित्रतेनेपिपे रह्योथकोतु संप्रमादकरे यत देवलोकसमापोय परियाऽमहेलि. प॥ रपाणथरयाणच महापरयसारिसा ॥ १ ॥ पुन नच राजनय नच चोरनर्पन च तिनपं न वियोगनयं॥ह लोकसुख परलोकहितं श्रमणत्वमिद रमणीयतर।। मदातपोध्यानपरीपदादि न सवसाध्य यदि धतुमीश ॥तभावना किं समितीश्च गुप्ती धत्से शिवार्थिन् न मन प्रसाध्या ॥ ४० ॥ अनित्यताया जनावना सदा यतस्वसाध्यगणेऽपिसयमोजि घत्सया ते वरते ह्यय यम श्रयन प्रमादान नवाहिनेपि किंा॥ थये॥दोजेबदुकष्टकरीशकेनहीतोते सुखसाध्यधर्मकरे तेकहेने हेसाधु तु पराक ध्यान तथाधादिकपरिसह धरवानेसमर्थनथी तोहेमोहनायांक केवलमनेकरीन मृजोनरगुणने जैना एहवासयमनेविषेपण समाजणगामीग्यमार केमके म त्युते तुजने ग्रासकरवानीपाठायें उतावनुयायठे दिनदिनप्रतें टुकच्यावेचे मा टेप्रमादमेवतोयोपण मनेरीससारथकी वीहितोरहेजे ॥ १ ॥ ढत मनम्ते कुविकल्पजाले वैचोप्यवद्यैश्च वपु श्यामिदीश्च तयापि वान् मनोरयैरेव ढहा ढतोसि॥४॥ मनो मे कुविकल्पनाले वैचोप्यवद्यैश्च वप प्रमादलब्धीश्च सि धीच तयापि वान् मनोरथ रेव दहा विदन्ये तिवापार ॥४३॥ प्रमाटे लगी यतिशिदोपदेगाधिकार. ४ मायुनावगेमनने मानाधिकानाग्नमृ विपना श्रवचनपण मृपानापणाटि का पाकविणनाट्यं यतीम पण प्रमादमयादिस्तक विपनाढयु गर्ने मनवचनकायारुप त्रणनिविष्णसादी तोपण ग्रामोमहीप्रमवतब्धि तयामंत्रधि पादिकसिडिने गनिने माटे बानि मनोग्गज पहाय जमगाली र खां मप्रमुग्य सामयाग्निापण काश्मृग्यशोग्नानीजननुं मनोग्यधरती प्रदानगविफल्में ज पीहाय नेमनुपपीटायने ॥17॥ तथावतीपातांना माद मन कुविक पजालें विग्णान्यं तथा अवयो। मपानापणादिकपा वचनविणास्युं थनेयमादेकरीगरीर विणायु तोपण लब्धि प्रने निधि प्रने चांगतो थको दानिवदेई मनोरथमात्रे ज सुपीमावं इत्यादिक पहेलाकाव्यतुं पातिर काव्यजाणवू ॥ ४३ ॥ मनोवास्ते मुखपुग्वमंगमा मनो मिलेयैस्तु तदात्मकं भवेत् ॥ प्रमादचोर रिनि वार्यतां मिलहीलांगमित्ररनुपंजयानिशं ॥४४॥ श्रर्थ ॥ दवेमननेनतनंगमांजोडवु कहेने हेसाधुतान्ने सुखथने खनोजे मि लाप तेमननेवावे केमकेमनजेहनीतामिले तेरुपीयाय जेम तैलने जेहवालनो संगमिले तंदवीवासनामयथाप माटेमननेप्रमादरुपचोरसाथेमलतो वारीने नित्ये शी लागग्यरुपजेभित्र तेनीमाथेमेलय जेथकोतुजने सर्वथासुरवसायेंज मिलापथाय ॥४ ध्रुवः प्रमादैनंववारिधी मुने तव प्रपात. परमत्सरः पुनः॥ गले न वारशिलोपमोस्ति च त्कयं तदोन्मजनमव्यवाप्स्यसि॥४॥ अर्थ ॥ दवेयनिविशेपेकरी प्रमादनोपरिहारकहेठे हेसाधुप्रमादनाहेतुयेंकरी तु जनेनंनारमापडवुतो निश्चय थकी कमकेप्रमाद थनेसंसारने थनिधुमादिकनीपरें नित्यवंधने घनेवलीजो गलेवांधिमोटी शिलासरि परप्राणीउपरमत्सरतुजनेते तेवा रेनंसारसंमुश्मांयी तरीनिकलq केमपामिस माटेप्रमादयने मत्लरवेदुत्यज॥४॥ मदर्पय. केपि सदंत्युदीया प्युग्रातपादीन्यदि निर्जरायं ॥ कटं प्रसंगागतमप्यणीयोपीचन् शिवं कि सत्से न निदो॥ ४६॥ श्रर्थ ।। हवेकष्टसहवाथात्री उपदेशथापेठे केटलाकमहारुपी तेनश्वादुवा मी दीक्षितचार व्यवहारीपुत्रनीपरें शीतादिक परिसहनासहनारा बली उपके घ एणकठिण थातपके तडकाप्रमुख कटने उदरीनेपण निर्करानेयर्थसहेते तेवारेहे साधु, मुक्तिनेतीवांचे ने तेवारे प्रसंगथी उदयथा युं एहवोस्वल्पमात्र कष्टप्रतेकांन थीसहेतो अनेकष्टमयाविना मुक्तिकेमपामिस एनावार्थ ।। ध६ ॥ - -- -- ទូច श्रर्थ ।। हेसाधु पोतानुपरमूकीने वलीपारका श्रावकादिकनाघरनी चिताकी वेपनाप्रतापथी याजीविकाचालेठे पणपरनवेतो तुजने अतिशयतिनिवारर दिकृत्यपु नुदन् गृढस्यान् हृदा गिरा वाऽमि कथ मुमुल ।। या थर्ष ॥ दबेतुकायामात्रयीसाधुगे पणमनवचनोसाधुनथी तेकहे। हेमुनिज निविहेण मणेष वापाए काएष इत्यादिकपाठकहीने दुसर्वसावद्यकरुनही एहवी उक्साधुतु नित्यतथावश्यककरतांसघ सावजोग पच्चखामि जा जीवाए सिविही | निशाकरतोय तेसादयमात्र शरीरथीजयणकरतोयकोथयो पणशय्या जेठपात्र यामुग्व कार्पनेविषे ग्रहस्थने औरतोयकोचो तो तेमामनथीथनेवचनथी मुमुक्ष तशा नो एटमे मन वचन कापायँकरी साययमूके तेदनेमुमुटुकहिये थनेतुतारापान प्रपोज सायपरतोनची पशमनयी सावधचितवे थनेवचनथी सायद्यामंत नेमाटमनची तया वचनामुमुदनथी मात्रकायायीज मुमुकुठे एनावार्थ इदार/ अध्यात्मकल्पडम यो दानमानस्तुतिवदनानिनिन मोटतेऽन्यैर्न तुजुर्मनायते ॥ अला • नलानादिपरीपदान् जयन् यति सतबादपरो विम्यक || Hsil अर्थ ॥ हवे असाधुपणा तथा साधुपणानो नेददेखाडे जेतानथानानादिकप रिपहनेजीपतोयको ग्रहस्थनुयाप्यो श्रहारउपधिप्रमुखदान तथासत्कारस्तुनिधन खमान इत्यादिकेकरी हर्षपामेनही थनेसलान अपमान प्रहारादिके मुहवायन हिजपरमार्ययी यतिजाणवो श्रने अपरके बीजाजेदान वदनादिकयी हर्षपामे तथा थलाननदादिकथा उहवाय तेयतिनावेपे विडवकके. नटरूपजाणवा ॥४ दधस्थेपु ममत्वबुद्धि तदीय तप्ल्या परितप्यमान ॥अ नितात करण सदा स्वै स्तेपा च पापेभ्रमिता भवेसिाधना अर्थ ॥ हवेमनोएप्तिराखयाने यति यहस्थनी बिताकरवीनही तेकहने देसावतुमहस्यनेविपे ममत्वनीवुविधरतोयको अनेरास्थनीचितायें तपतोपको पोतानापा तथाग्रहस्थनापा निरतरव्याकुलचिनवतयको ससारमाजमीसाइड त्यक्त्वा गृढ स्व परगेचिंता तप्तस्य को नाम गुणस्तव ।। आजीवि काऽस्ते यतिवेपतोऽत्र सुगति प्रेत्य तु अनिवारा ॥ एहया नरकादिक पणपरनवें उर्गतिनोवारनारकोश्नथी एनावार्थ ॥ १५ ॥ फु नसावयमिति प्रतिझा वढन्नकुर्वन्नपि देवमात्रात् ॥ शय्या -
गनिमाधिनगर.
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सायं ममन्याय समन्चनांचा सार मिनस्यपि संघलांक ॥न
समय गिनीदिनालिनियमन yि
अर्थ | Singinniyin
না সীমানা নেন না।
সেনাশাপাশি বিনা। নানা না
{}নামানাে যায় নানান
ঘাত হানা নানি গান না যানানী
इमाचार माणतणनीररी. एटलेसोगानीgirल पंटमामायकोमा
पद तमगंपनिम्मिनपण विधिये लावधरमतरी ते मपमरूपमाणनेहावर
रंकाः वापि जनानितिपदा त्यक्त्वा प्रमादा जुगवपं प्राप्य यनेः
कायंचन कियधाम्नं पटं फोपि च ॥ मोगर्यादिवशीरनजजनतादा
नाचगवना गाग्मानं गणयनरेऽमिव धिग्गंता पुतं ऽर्गती॥४॥
अर्थ ॥ प्रात्माने राक्षतपणुनिवारवा उपदेशे फोकपुरुषाचे अदम्याव
मताये गकीय चनेजारीने उपराग्यफरवायोग्य निदापरवायोग्य विविधप्रकारनी
लोशनीचा फरवायोग्यनीय पठेगुरुनापशावषी तेवयम्यान्यजी यतिनावपपा
मीनपावणाट कामगारपननागपामी तथातंमावती कोकथाचार्य उपाध्याया
दिकरतीपामिनं वाचालपणा प्रमुग्पकलाये नोजानोकोनवारी तेदनाकरेजा जे
दानपूजा मयागटिक तणेकरीने प्रहकारधरतो थको पोताना यात्माने राजातु
गणे पण एमनजाणेजे दंते शीगणतिमा पनवं दानपूजादिक जे पायो तेतो
श्रीजिनेश्वग्ना मार्गन थाय तेमाटेहानियट तेप्राणी उतावलु उर्गतिजे नरकादिक
तमाजाग माटेगर्वनराग्वं ॥ ५ ॥
प्राप्यापि चारित्रमिदं पुगपं स्वदोपजेश्चपियप्रमादः॥नवां
बुधौ धिक पतितासि निढो दतोऽसि उखेस्तदनंतकाल॥५॥
गृह राज देशांतर जनपथ प्रमुखव्यापार तेहनोथनावबता पण परलोकना हितन। जासमिना॥जुगनिड्डमि पवेसो श्य ससव मपुथलनो ॥२॥ इत्यावश्यक ॥१४॥ अर्थ ॥ हवेनामथकी शत्रुदेखामीने तेथीदूररहेवानो उपदेशथापेने देसाधो नि पयजेशब्दादिकपाच तथाप्रमादजे मद्यादिक पाच थने असतकहेता मोकनाम्। क्या एवाजे मनवचनकायानायोग तथा प्राणातिपातादिक पाचयव्रत अनेपादि। यर्नु थाजीतवु तथाक्रोधादिक चारकपायनो अपरिहार थनेमनवचनकाया एत्र) योगने उप्रवर्तियेप्ररविवु एसर्वमलीसत्तर असयमनास्थानक तथावली हास्य निर्वाचितादिनरायनावे प्यूपेन किं प्रेत्य हिताय यत्न En थर्य ॥ हसर्वसामग्री मल्याउतापण यात्महितकानथीकरतो तेकहे देवन्ति घरतांमीने गुरुजेधर्माचार्य तेहनेपामीने तथातत्वप्ररुपक शास्त्रजेसिक्षात तेनर्णने । पण तथानिर्वाहजेयाजीविका तेहनीचिता थनेयादिशदथी वस्त्रपात्र वसतिप्रमुख | नीचिना थनेराजनय चीरनय इत्यादिकतेहनो नरजेसमूह तयावलीयादिशदया। FO अध्यात्मकल्पम. थर्थ ॥ हवेतनचारित्रपामिने विषयप्रमादत्यजया तेप्रकारांतरेकहेले हेजिड़ झनएहबुजे चारित्रतेपामिने जोपोतानावांकथापना एहयाजे विषयप्रमाद तेरे करीतुससारसमुश्मापमीश तेवारे ते अनताकालसुची चारगतिसवधीनाउ खेकरने पीडाइश तेमाटेधि कारतुजने जेतुचारित्रनेविपे. उजमाजथातोनी ॥ ३ ॥ कथमपि समवाप्य बोधिरन यगसमिलादिनिदर्शनाहुराप ॥ कुरु कुरु रिपुवश्यतामगवन् किमपिडित जनसे यतोऽयित शा॥४॥ थर्थ ॥ हवेदृष्टातसहित बोधनु नपणुकहते हेसाधुतुयुगसमिलादिक दशदृष्ट तेकरी उर्जनएह समकेतरूपरत्न तेघणेकप्टेंपामिने यागांवक्ष्यमाण विषयारिक शत्रु तेहबुआधीनपणुत्यजतुथको कांस्कयात्मानुहितजे सयमादिकतेकर जेथकीक वितसुखपामे चुलग पासगधन्ने जुए रयणेय सुमिण चकेथ ॥चम्मजुगे परमाणु दास दिघ्ता मणुयलने॥१॥एदशद्दष्टातनानामजाणवा ॥ पुत्र तेदुलजुग थेवर ते तस्सह पिस्सिमे ते विपयप्रमादा असत्ता मानसदेहवाच ॥ अस यमा सप्तदशापि हास्या दयश्चबिन्यच्चर नित्यमेन्य ॥५॥ सदाकाल बीहीतोथको विचरजे ॥ ५५ ॥ गुरूनवाप्याप्यपदाय गेट मधीत्य शास्त्रोयपि तत्ववाचि ॥
यतिशितोपदेशाधिकार. पंथ कांग्यमनधीकरतो एटजे नकलमामग्रोने योगेपण जोधात्महितनथी साथ तो नोपने घणोज शोरकरीता एनावार्थते ।। ५८ || विराधितेः संयमसर्वयोगः पतिप्यतम्ते नव खराशी॥शास्त्रा णि शिप्योपधिपुस्तकाद्या नक्ताश्च लोकाः शरणाय नालं॥५॥ अर्थ ॥ हवेनंयमग्रहीने संयमविराधनानकरवी तेकहेते देवतितेविराध्या एहवा जे संयमनासर्वयोग एटले मूलगुणउत्तरगुणादिकविराध्यातेहेतुयेंकरीने संसारना उखसमृदमापडतानुजने शास्त्रजेयागमादिक तथाशिप्यजे उपधीपुस्तकप्रमुख तथा वतीनतलोकजे श्रावकाधिकाटिक तेकोरण्यापवाने समर्थनहीथाय पण एक संयम मात्रज अविराध्यो धको शरणदाथाडो || 0 | यरय हगोपि सुरधामसुखानि पल्यकोटीणां नि वती ह्यधिकां ददाति ॥ कि दारयस्यधम संयमजीवि तं तत् दा हा प्रमत्त पुनरस्य कुतम्तवाप्तिः ॥ ॥ अर्थ ॥ हवेसंयोजीवितर्नु फलदेखाडी प्रमादनोपरिहार उपदेशेठे हेसाधो संय मजीवितर्नु पजेमुहूर्नमात्र तेपणपुस्पनेनिश्चयथी साधिक वाणोकोमिपल्योपमल में देवलोकनासुरवयापे यउक्तं प्रतिक्रमणसूत्रवृत्ती सामाश्यंकुरांतो समनावसा बयघडियगं ॥ श्रासुरेसु बंध उत्तिय मित्ताऽ पलिया ॥१॥ वाकोडी लरकगुणसहिमहस्तपणवीमा नवसयपणवीसाए सत्तिहा अडनाग पलियस्स ॥२॥ इति वाणुकरोड भोगणसातलाख पचीनहजार नवसंपचीग एटलापट्योपम अनेएक पल्यापमना नवनागरीय एहवाथानवमांग थनेतेउपरवाली एकनवमांशनो एक तृतीयांश एटलुदेवायु वेधमीना एकसामाऽकथीबंधाय ते थाके करी लिखियेठयें ए ए २५ ए २५, १ . तो हाहाऽतिखेदे हेअधमनीचप्राणी तु संयमेंजीवितने के महावे हेप्रमाढवतफरीनेनुजने एसयमनीप्राप्ति क्याथीथारो ॥ ५ ॥ नाम्नापि यस्येति जनेऽसि पूज्य. शुचात्ततो नेप्टसुखानि कानि॥त संयमेऽस्मिन् यतसे मुमुदो ऽनुनूयमानोरुफलेपि किं न ॥५॥ थथे॥दवेधारसमाप्तिना मंगलनेयर्थे संयमनागुनफल देखाडी शिक्षाकहे हे मोक्षार्थीसाधु जेसयमना केवलनाममात्रयीज एटलेसंयमी एहबुनाममात्र धराव्या थीज प्रत्यद प्रकारे करी लोकनेविपे तुं पूजनीकथयोठो तोगुहनिर्मल संयमथी शाशास्वर्गमोदादिक वांठितमुखनहोय एटलेसंयमयी थनीटसुख होयज तेमाटेप्र.
ममादिक पांच एचारेनेसदाकाललगे सवरवुकेमके एचारने थणसरस्थायरा अध्यात्मकल्पडम त्यस्दश्यमान जेहन महाफजयनुनवायचे एहवाए सयमनेपिप तु काउद्यम नथ करती मांथा उद्यमकरयोज युक्त पणा इति श्री यध्यात्मक पडुमै यतिक सानिधानोनाम त्रयोदशोधिकार सपूर्ण ॥ अय सामन्यतो यतीन् विशेषधर्मस्यगृहिणश्याश्रित्य मिथ्यावाग्मि वरोपदेश ॥मिथ्यालयोगा विरतिप्रमादानात्मन्सदा सरण सोय मिन् ॥ अमरता यभवतापमैते समयता मुक्तिरमा च दयु श्रयी। दये यत्तिने तथासम्यक्तमूलबारवृत्तधारक श्राऊने साधारण मिथ्यावाने फपाय योग निरोधोपदेश तया सपरोपदेश नामाचीटमोथरिकारकहेने तिहांधमा मयधनातुजे मिथ्यात्वादिकतेहसवरकहे। हेयात्मातु मुसनेवाढतो होयतामिद त्वजे अनियहिकादिकपांच तेमायनिग्रहिक तेपोतानाशास्त्रादिकना ममत्वयी कार दायो तेतीधिपाखडादिक बीजुयनानियहिक ते स देया सर्व गुरुव सब भधाराध्या एहोयनिप्राय जेसामान्यालोकोनोते त्रीजुयानिनिवेगिर । नुनु पथास्थित स्वरुपजाणेथके पण कोष्टानिनिवेशना वशथी पोतानु ।' पानेयय गोष्टीमाहिनादिनीपेठे यसत्यरूपणानुकरवु चोथोसाशपिक त । कतत्वरिप ग्रासाजूके यासान एमसदेहधरण पाचमु धनानागिकते .. नापशथकी एफेडियादिकनेपिपे जीवादिकतत्वनु थपजाणवु " तया थरानमनोयोगादिकत्रण थनेथविरतितेप्राणातिपातादिकपाच तपाप्रमा रनातापप्रत्ये थापे थने सवग्याथफा मुक्तिरूपिणी लक्ष्मीनेश्रापे ।। १ ॥ मन सरण दे विनतमना यत ॥
मिथ्यावादिनिरोधोपदेशाधिकार. रे एरीतेंजीवते वचन तथाकाया अशक्तथकोहोयतो पण मात्रएकमननाज अ वरथकी नंपुनमल्यनीपे उर्गतिगामीयाय ॥ ५ ॥ प्रसन्नचंजराज मन प्रसरसंवरौं। नरक स्य शिवस्यापि हेतुनूतो कृपादपि ॥ ३ ॥ अर्थ ॥ वलीतेउपरज दृष्टांतकहे। हेप्राणि मननुप्रसरजे उर्ध्याननीप्रवृत्तियने सं जे उनिधीनिरनि तेवेनु एकदणमात्रमांजेम प्रसन्नचंभाजझपिनेनरकनां अने किनापण कारणथया केमकेतेने मननाऽर्थ्यानथी एकणमात्रमा सातमांनरकनुंद मेजव्यु थने तेजमनना संवरथी एकदमां केवलज्ञानपण उपायं. ॥ ३ ॥ हवेतंदेपथीतेप्रश्नचं राजर्पिनोसबंधलखीठ दितिप्रतिष्टितपुरमा प्रसन्नचं राजा राज्यकरताहता अन्यदातिहां श्रीवीरस्वामी समोसखा प्रसन्नवंशराजा सह ग्वारे वांदवावाव्यो देशनासांनती वैराग्यपाम्यो पुत्रनेराज्येस्थापी श्रीवीरपाने तेदीदालीची अनुक्रमेगीतार्थथयो अन्यटाविहारकरतो राजगृहनगरेंचाव्यो ति जिनकल्पीनी तुयनानेयर्थ स्मगानमा काउसग्गधरीरह्योः एटलामांश्रीवीरस्वा राजगृहनगरेसमोसस्याले नगरलोकसर्व जगवंतने वांदवाजायठे एटलामांफोऽए वेवणिक तेक्षितिप्रतिष्टितनगरथीयाव्या तेमांथीएकवणिक प्रसन्नचाजर्पिने isवोल्यो केधन्यव्यापणाराजानेजे राज्यलक्ष्मी तृणनीमाफकत्यजीने ध्यानाविरुदय । उग्रतपफरेते तेमांनजीबीजोवणिकवोल्यो कंबहोधि.काग्नेएनातपने एनुमुखजो योग्यनथी केमकेएबापटावालकपुत्रने राज्यधापी मूढथानिकल्यो अनेपाजतो माडेबीजाराजायावीनेबालकनुराज्यहरीलेवानगरपखंचे नगरतयादेशनालोकमर्व नाथथयायका वहुतनपेठे माटेदेगनांगमे घाणंअनर्थयागे तेथीएतेंगुधर्मधाराधेठे सांननीप्रसन्नचराजर्पि ध्यानयीचूकीने चितववातागो केन्यहोमुजवेता माहा ज्यने एवोकोणने एमरीय्यानमां व्याप्तयग्ने मनमायेंज महातंग्रामकरवामांमयो समणिकगजा श्रीवीरने वांदवाजातांमार्गमां तेफाउसग्गधरसाधुढग्वी नति बैंकवाटी तेदनीउग्रतपम्याने अनुमोटतो लोमरणेपहोतो त्यांधीवीरनेवाटिने एं जेखामीएममन्नाजर्पि ध्यानाविन्ट्यवस्थामां मेवांद्यो तेश्रयस्थाने समय त करेनो गोगनिपामें जगवंतेंग्यु सातमीनरक्पा तेनांनजिणिकसंवांतर तो हवेप्रसन्नचंराजर्पियें मनथीतंग्रामकरतां सर्वशत्रुहाया थनेएककोऽमहोटा दम नीनायुश्करता यायुधनवनष्टययाने त्यारेजाएंजे मायलाहनोटोपपहंगांचे ते नेशनेमारूं एमचितवी माहाथनारज्यो एटलमन्नक्तत्काल- लो .
सम्वतानेरदायाननने एहगने ममारनापारगामी साधुत्तेरने दृमर अर्थ बदननय गनु मादपदान देनरपननीयानि एटनेमारमा G४ अध्यात्मकल्पडम. ने मनमांसंवेगपाम्यो पचात्तापकरवालाग्यो हाहायामेगुंर्थ्यानाचतव्यु मिठामिण डगातागो एवामाफरी श्रेणी के चीरनेपुवध हेस्वामीथासमये राजर्पिकानकरेतोशीत निपामे नगवतेयनुत्तरविमानका तेसानलीविस्मितथइने श्रेणिकपुत्यु कहाना मी पहेनेप्रश्तोतमे नरककह्यो तेएतपस्वी नेकेमसनवे थनेएकमुहूर्तनेयातरे अनु नरधिमानमा तेपणयसमजस अथवा नातेकरीनेमे अन्यथासान यु तवान गाते यथास्थित वृत्तातेकरी श्रेणिकनोसदेह टात्यो एटलामा देवनिना नादसानजीने श्रेणीके पुत्यु देखामि थामहोत्साक्याथायवे नगवतेकाने प्रश्न प्रयजपिने केवलज्ञानवपनु त्यादेवता महोत्साकरे एमएप्रसन्नचरागारिने परमाननेयतरे मननोव्यापार नरकहते थनेमुक्तिहेतेपणथयो मनोऽप्रवृत्तिमात्रेण ध्यान नैकेश्यिादिपु ॥धर्म्य शुरामन स्थैर्य नाजस्तु ध्यायिन स्तुम ॥४॥ वर्ष ।। पचनसापनादिकथा मननोरोगनिरर्थको तेकने केवनमननीय शनि मायापारहितपण तेणेफरी ने एडयादिकजे एकड़ियक्षिय तंडियनी गइप यगशिपययि तेहनेविषयानजे मनोगेध लक्षण तेगुनथी पटानेपानन्ग मादि मनोगावाची जोमानथापतो एफशियादिकनेषियाय केमोहनन गायीन मननेवनागरी मनाथापानाप्रतिनी तेथोपानसानादिकते मारिलक्षण ध्याननोपयोगीनयी धामरोगादि कष्टकमया साहमु मनाति प्पाहनयाय पणजेपर्म यान थनेयुक्यान तणेकरीन मननास्थरतानेनजे एमने ध्याननागनार ननन मानिये ष्टध्यानते तनुजप्रमाणने इतिनार ॥ मार्य निरयंक पा यन्मन मुध्यानयत्रित ॥ विरत परिपन्य पारगाम्ना स्तवे यतीन ॥ ५ ॥ यई " इदे याना जेहनुमनमाज अथानियको नि जा रन याने पिजिन एटमस्या पायजे अनायनामनारयत वोपनिमाण मान के केन नित।निर वय पनी या गुप्ताम्नु ताम्तुरे ॥६॥ पर यमानि कादियादिक तथा पंचश्यिमापण TE -- मिध्यात्वादिनिरोधोपदेशाधिकार. GU पथी तथामनुष्यमांपण मुंगाबोबडाप्रमुखप्राणी मीनपणानेनथीवरतासुं एटलेतेसवैमा नपणोजधरे तोतेथी तेहने वचनगुप्तिवंतनकहिये पण जेहवचन निरवद्यके पाप रहितहोय एटलेवचनबोव्यानी शक्तिवतांपण सर्वथासावयवचननबोले तेनेवचनगुप्ति बतरुदिये तेवाने,स्त बुंदु पणमात्रानपणोज धयाथी वचनगुप्तिवंतनकहियें ॥८॥ निरवचं वचो ब्रूहि सावधवचनैर्यतः॥प्रया ता नरकं घोरं वमुराजादयोद्रुतं ॥ ७ ॥ श्रर्थ ॥ दवेदृष्टांतेकरीने सावद्यवचननु अनिष्टफलदेरवाडेठे हेप्राणितुं पापरहि तवचनबोल केमके सावधवचनेकरीने वसुराजा प्रमुख ते घोररीइ एहवोजे नरक तेने पाम्यां तेवसुराजानोसंबंध श्रीहेमाचार्यरुत रामचरित्रमांथी विस्तारेंजोऽलेवो ए मजाणी असत्यवचन सावधवचननो परिहारकरवो ॥ ७ ॥ ऽदामुत्र च वराय चिो नरकाय च ॥अग्निद ग्धा. प्ररोति वागदग्धा पुनर्नहि ॥ ॥ श्रयं ॥ वलीतेहिजकहे जेजुर्वचनो तेथानवमां अनेपरनवमांपण वैरकारीया य अनेवलीनरकटाऽपणथाय जेमाटेअग्निकरीटाधाजेपदादिक तेफरीनवपन्नवथा य पण पुर्वचननादाधाजेमनुष्य तेनवपल्लवनयाय एटलेस्नेहांकुर तेनेप्रगटेनही केम के उरवचनथी उपनोजे वैरनाव तेजन्मांतरेपणनमटे ऽतिनावः ॥ ७ ॥ अतएव जिना दीदा कालादाकवलोनवं ॥ अव यादिनिया बयु झानत्रयनृतोपि न ॥ ५ ॥ अथ। एटलामाटे टोदालीवापठे केवलज्ञानउपजेतिहांलगे जिनजेतीर्थकरदेव तेमति श्रुत अवधि एवणानना धारकततापण अवद्यजेपाप तथायादिशब्दथी वचनते ध्यानविद्याताटिक एमजाणी तेहनानयथी वोलेनही यद्यपि जगवंतने ठ अस्थपणे मनपर्यवज्ञाननी सत्ताहोय तथा पिऽहात्रणझानना धारककह्या तेजाणि ययन मनपर्यवज्ञान-तो मात्र मननो पर्यायजाणवानुज साम्यर्थ तेमाटेया चार्ये ऽदांकयुनही यनेनपाध्यायश्री रत्नचंगणिस्त एजयंथनी टीकामांपण एम जलरब्युचे वतीविशेपबुद्धिवंतेविचारवु ॥ ए॥ कृपया सटणु स्वांग कूर्मा झाननिदर्शनात् ॥ सं तासंटतांगा यत् सुखदुखान्यवानुयुः॥१०॥ थर्थ ॥ हवेकायतंवरकहेठे हेप्राणि तुंकरुणायेंकरीने कांचवानादृष्टांतनानि न माना निगरयौन काणोणायि बेश्यि तश्यि चौरश्यि तयापन दिन यमनमा नरियने नयीयजतासु यतन्यजन पण मर काममा नयायनिटन यमय पीनमत्रमुपजाष्टिनापिन समट गादिनापायीकाणर्माण शुनासनगरने अध्यात्मकल्पजुम. दर्शनयकी पोतानीकायानेसवर केमके कायानासवरवत धने अमारयतते अनुमे सुनयनेषु सपामे ण्टलेकापाना सवरवततेसुखपामे थनेयसवरवतते उ सपामे में मवेशचाहता तेमाथीएकेपोताना थगसवखातो पापीशीयालयीमृत्युनपायो त्र ने बीजेपातानाथगसवण्यानही तो पापीगीयालयी थकालमृत्युपाम्यो एदृष्टांत सति म्नपणे श्रीमातासृनना चोयाथध्येनथी जाणवु ॥ १०॥ कायम्ननान के के स्यु स्तरुस्तनादयो यत ॥ शि बढेनु किया येपा कायस्तास्तु स्तुवे यतीन् ॥ ११॥ वर्ष॥ जायने स्थिरतामाथीतोतरुजे वद तथा थचेतनजे रतनादिक ते गोपांगमारानी अर्थातजेको कापण्यापारना समर्थने तेसर्वकायसवाल जन पाणजेनी कयाजे कायथ्यापार तमोक्षनेहोय तहने कायगुप्तिपत कहिये उप गपचापाग्ने नतमामय पण श्रगुनकायव्यापारनेरुधे थनेगुनकियानो स्वर को गाने कापानिपताहिये ऽतिनार ॥ ११ ॥ श्रुतिसयममात्रेण शब्दान्कान् के त्यजति न॥ इटानिष्टेषु चैतेषु रागपो त्यजन्मनि ॥१२॥ गपंचपिनु मगरहने तेमांप्रथम श्रोत्रहियथाश्री कहेने केयागनना पण यांनयन पणजगाऽटने मृदगादिवाजित तयात्रीयनप्रमुगना १५ अनिष्ट पर नया प्रमुगनाशदनैपिंगगनपन्यजे तेगारमुनिया चट मरम्मात्रा करपालोफाम्त्यजति न ॥ टॉनिटेषु चीप रागपो त्यजन्मनि ॥१३॥ थर्ष कानापानय याश्य नेडियन परेर मयनं नं न्यर नेवार न मुनियाप ॥12॥ मामयममाण गमान कान के त्यजनिन ।। मनिटेन नेपगगःपी न्यजन्मनि ॥१४॥ + मिथ्यावादिनिरोधोपदेशाधिकार. ច១ झ्यिादिक तथाबीजापण घ्राणेंहिये विकलथयेला प्राणि नथीत्यजतां यर्थातत्य जेज पणश्टजे फुलप्रमुख अनेअनिष्टजे अमेध्यादिक एवाजेगंध तेहेनेविपे राग अने देपत्यजे तेवारे तेमुनियाय ॥ १५ ॥ जिव्हासंयममात्रेण रसान्कान्के त्यति न ॥ मनसा त्यज तानिष्टान् यदीवसि तपःफलं ॥१५॥ अर्थ ।। केवल जिव्हाना संवरमात्रयीज कोणकोणशुनागुन रसने पृथ्वीकायादिक एकेश्यि तथाबीजापण नावरसनेश्यिथी विकलथयेलाप्राणी ते नथीत्यजतासु थ यातत्यजेजते पण्यात्माजो तुं तपनुफलवांठेठे तो तेजेश्ष्टवांठित मधुरादिकरस तेने मनसाकहेतां मनोयोगपूर्वक समता परिणामेकरीनेत्यज ॥ १५ ॥ वचःसंयममात्रेण स्पर्शान् कान्के त्यतिन ॥ अष्टानिष्टेपु चेतेपु रागक्षेपो त्यजन्मुनिः ॥१६॥ अर्थ ॥ केवलत्वचाजे स्पर्शनेश्यि तेहनो संयमजे स्पर्शज्ञानना नलेवानी शून्यता तेणेकरीने कोणकोणप्राणी गुनागुनस्पर्शने नथीत्यजता यर्थातत्यजेजचे यद्यपि एकेझ्यिादिक सर्वजीवने स्पर्शनु विपयहोयठे तयापिकुष्टाटिक रोगनावशयकी त्वचानीबाहिरिनाधणीने स्पर्श-ज्ञाननजहोय एनावठे पणऽष्टजेस्त्रीस्पर्शादिक तथा यनिष्टजे ताप शीत मांस ममा प्रमुखनेविपे राग हेपनेत्यजे तेवारेंजमुनियाय॥१६ बस्तिसंयममात्रेण ब्रह्म के के न विते ॥ मनःसंयमतो धेहि धीर चेत्तत्फलार्थ्यसि॥१॥ अर्थ ॥ हवेवलीस्पर्शनेश्यिमां विशेषकहे। वस्तिके ० मूत्राशय एटलेगाड़िय ते नासंवरमात्रयोज ब्रह्मचर्यधारणनयीकरतां सुं एटले नारकी संमूर्तिमपंचश्यि प्रमुख तथा पुरुपरुपनपुसक अने बीकपनपुंसक इत्यादिक कोणकोणप्राणी मैथुननीया तिथी गोलधारणनयीकरता एट लेतेनर्व ब्रह्मचर्यवतजने पणपरिणामविनायसक्कि थोपालवं तनिष्फल माटहेधीरथात्मा जो तुंब्रह्मवतनाफलनोधीहोयतो मनने संवरेकरीने उतीगने ब्रह्मव्रतधारणकर ॥ १७ ॥ विपडियसंयोगा नावात्क के न मंयताः॥ राग हेपमनोयोगनावायेतु म्तवीमि तान् ॥ १७ ॥ अर्थ ॥ हवेसामान्यथा सर्वश्यादिक तेहोतंयोगजे एकत्रमलते दनावना वथी कोणकोणसंवग्वंतनहोय एटलेविषयनोयोग मख्याविनासर्वसंवरवंतज परा ।
GG थपहिरेवतोमनायागादिस्नो सारकहे जेप्राणिनेका तपसयमादिकनपीछ मिनिटे तेमाणिजेमतेम यसवरबोजे तयाथन्यजीपने पीडाकरे एटने थाती नय म्त्यको तेनेरटेने पणविरतिवतमाणितो एतपसयमादिक घणुजकटेंप्राप्तियायन | मजाणीतहगनी के० रपेमदारातपसयमनो पिनाशयाय एमवीहीतोथका मनाया। | गादिस्ने मनमारे एटलेपिरतिवतने सर्पयामपरकरयुज एनाचार्यते ॥२॥ भवेत्ममग्रेप्चपि मंवरपुपर निदान शिवमपटाय ॥त्यजन यये । दवेरनीमननामग्नु थारिभ्यतापणुकहे जेमननो सारने तेथील जेहन मग तमा मोदमपदानु परमझारण ते माटे गिरवि अध्यात्मकल्पद्यम जेमहापुरुपवे ते तो विपयादिकनो योगवतापण रागपथने मनयोगना अनावषी एटसेजेमनथकी रागवेपरहितपणे सवरवतठे तेयोनेहुँस्तवुटु ॥ १७॥ कपायान् सवृणु प्राज्ञ नरक यदसचरात्॥ महातपस्विनोप्यापु करटोत्करटादयः॥१९॥ थर्थ ॥ एमश्यियाश्रित सयरकहाँने हवेकपायथाश्रितकहेते प्राइके० देवि वेकीप्राणी कपायजे कोधादिक तेनुतुसवरकर केमकेएकपायना थसवरथकी करम भने उक्करम प्रमुख महातपस्वी महानुनाव तेपणानरकनेपाम्या एकरड थनेउका घेवाह्मणमासीयाइ नाइहता ते वैराग्यथकी दीक्षाला उग्रतपरी थन्यदाकुणानान गरिये कोटनायरनाजामा चोमासुरा तिहानगरना जलप्रवाहने पूरे साधुरग्वेतण ऽजाय एमजाणीदेवतायें कुणालानगरीउपर परसादयताव्यो कुणालाशिवायवी सत्रिदिवरस्यु केटलेक दहाडे तेवातजाणी नगरलो ताडनातर्जनाकरी तेला नेकाट्या तेवार कोधशेखर करमबोल्यो वर्षमेकमायां तवारे उकरमबोया । नानि दश पच च वलीकरमबोयो मुशलप्रमाणपानि वलीउकरमबोयो पयारात्री तया दिवा तेश्चनथी यहोरात्रमुसलधारायें कुणालानगरीउपर मेयानो तेहपी गाजानगरी लोकमहिततणाग महायनथयो पारपत्रीजवर्षे साकेतप्रेत पापनेधणथानोठते करमथनेवकरडबेमाने सातमीनरके कालनामा नरकावार मा जीममागरोपमनेयापुष नारकीपणे यवतमा एमाणी कपायनोसवरकरवा यस्याम्ति किंचिन्न तपोयमादि ब्रूयात् स य तत्तुटता परान् वा ॥ ग्यास्तिकष्टाप्तमिद तु कि न तश्शनी मपुते स योगान् ॥७॥ कपायादिजविकल्पान कर्यान्मन सवरमिधीस्त ॥2 गुनप्रतिशिदोपदेशाधिकार GU पुरुपतो कपायाठिकथीउपनाजे कुविकल्पते त्यजतोयको मननोसंवरकरे एटले मु क्तिनुं मुख्यकारणजाणीने विवेकीपुरुषे प्रथममननुं संवरकरवू ऽतिनावः ॥ २१ ॥ नदेवमात्मा कृतसंवरः स्यात् निःसंगतानाक् सततं सुखेन॥ नि.मंगनावादथ संवरस्तद्द्यं शिवार्थी युगपमजेत ॥२॥ अधीदिवे ए अधिकारनो उपसंहारकहे तेमाटे एमपूर्वीप्रकारे कततंवरके संव रवतजे श्रात्मा तेसदाकालें सुग्वेकरीने नि.संगपणानेनजे अथवा वली नि.संगपणाथी संवरयाय एटले एवेदुनो अन्योन्यकार्यकारण नावजाणवो केमके कोऽकनेनिःसंग पणाथी संवरचावे अनेकोऽनेसंवरथी नि.संगतापणुंबावे माटेमोक्षार्थीपुरुष तेसंव र अनि संगता एवेनेसमकालेसेवे ॥ २२ ॥ इति श्रीअध्यात्मकल्पमे मिथ्यात्वादि संवर्गपशाख्य चतुर्दगोयधिकार समाप्त ॥ १४ ॥ अथ शुनदृत्तिशितोपदेशः।।आवश्यकप्वातनु यत्नमाप्तौ हितेषु शुधेषु त मोपहपु॥ न दंत्यनुक्तं दि न चाप्यशु वैद्योक्तमप्योपधमामयापद॥२॥ अर्थ ॥हवेशुनप्रवृत्तिशिदा एट्वेनामे पन्नरमोअधिकारकहे। एअधिकारमा य तियोग्यशिक्षा यतीनेजाणवी धनेश्रावकयोग्यगिदा श्रावकनेजाणवी हांप्रथम था वश्यक करवायोग्यजाणीने यावश्यकथाश्रयी उपदेवोकहे हेसाधु तथा हेश्रावक तुं पापनानिवारक अनेसर्वानापित एवांजेगुहनिर्मल आवश्यक सामायिकादिक तथाधवश्यकरणीय पोसह उपवास आलोयणादिक तेहनेविपेउद्यमकर तेनाउपर दृष्टांतक जेम वैद्यनुकलुजेापय तेनखाधुंथकुं तथाअगुजेकाचु हरितालप्रमुख तेखाबुंथकुपण रोगनिवारक नथाय तेम सर्वज्ञानापित थावश्यकजाणीनेपण तेह नीक्रियानकरी अथवाअगुइकियाफरिये तोतेहथीकमदयनथाय तेमाटेढोपरहित शुक्रियायेंकरीयावश्यकाटिकनोउघमकरवो एउपनयवे शहाप्रसंगथी सामायिकना टोपलवियें वैये । वस्तथानुजायेंकरीने पलांनीबांधे आसनयाघुपातुंफेरवे ३ चपलप सर्वदिशायेंजोवे । गृहसंबंधीसावद्यकर्मकरें ५ निंतीस्थनादियोगीवे से ६ अंगोपांगमोडे ७ घालसमोडे तथाधर्मकार्यधालसकरे हाथपगेंकरकड़ाव जाडे ए शरीरनोमेलवतारे १० खाजिखणे ११ विसामणकरावे । २ निझाकरे ए वारदोपकायथकीजाणवा तथा ? कुवचन कोऽनुमर्मनिटादिकवोले र सहसात्कारे अविचाग्यंबोले ३ अार्तिमयविसंस्थलवचनबोले ४ यापट्टेबोले ५ सूत्रनणतो थ १२ कसहेवापडे तेमाटे कडवाठे पण थायतिके० उत्तरकाले सुखनाकरनार एहमाजात निवाग्वे तेचपरदृष्टातकहे जेमरसायन पारो हरिताल सुवर्णादिक श्रीपविधा महोपमास्तनुनिर्मम सन् नजस्व गुप्ती समितीश्च सम्यक चनकायाना योगशफर एनावाथैठे बलीदेहनेविपे ममत्वरहितयको देवादिनाक ए अध्यात्मकल्पजुम थवानवकारगुणतो वचनसदेपकरे ६ कलह विवादकरे राजकथादिकविस्थाको पताम्यनावचनकहे ए सपदारहितसूत्रनणे १० जावायावपानायादेश थापे एड गदोपचनीजाणवा वली १ निर्विवेकीमनेकरे श्यशकीर्तिनीयानायकरे ३ धनना जनेश्रर्थकरे । गर्वथोकरे नयथोकरे ६ धनपुत्रादिनेनियाणकरे ७ सामाथि कनाफजनो सदेहकरे रीसबरीसामायिककरे ए विनयरहितसामायिककरे ! नक्तिरहितसामायिककरे एदशदोपमनथीनपजे एम मन वचन थने कायाना मनीने वत्रीशदोषसामायिकनात्यजवा तथावादणाना ३२ दोप थने काउसग्गना १५ दी। पते नाप्यादिक ग्रथथी जाणीने त्यजया ॥१॥ तपासि तन्याधिविधानि नित्य मुखे कटून्यायतिसुदराणि ॥ वि घ्नति तान्येव कुकर्मराशि रसायनानीव जुरामयान् यत् ॥२॥ थर्थ ॥ हवेतपप्रवृत्तिधाश्रयीउपदेशेठे मुखके० प्रथमकरतीयेलायेतो मुरवतृशति विधप्रकाग्ना नव थम दशमादिक तप नित्यकरवा कमतपज कर्मनासमूहन तेहिज ज्वरथनेक्ष्यादिक मुष्टरोगोनेनिवारे तेम इहापण उपनयलेषु ॥ २॥ विशुधशीलागसहस्रधारी जवानिश निर्मितयोगसिद्धि ॥ धर्य । हातपफरनार प्रायेगीजवतजोऽये तेमाशीजश्राश्रयीचपदशेने देसाई नुवियुआनिर्मनएजे थढारसहस्र शीजांगरयतेने धरतोथको नित्य निर्मित यार मिहिर निपजावीने श्रष्टागयांगनी सिदिजेणे अथवायोगजे मनोयागादिक तह ना प्रणिधानना निवाग्यारूप समाधिना निEिकर एटलेशीतागधरताथका मना ग्ना उपमर्ग तेनेमदनकर नेपाचममिति तथात्रगुणगुप्ती तेदनेनज ॥ ३ ॥ स्वाध्याययोगेषु तपस्व यन मध्यस्थवृत्त्यानसरागमायांन ॥ अगारगो नेहमटाधिपादी देतो विशुद्धे वशितेज्यिाच ॥४॥ अर्पा हदेगोनानने मनस्थिरकरणानिमित्त सिद्धांतादिकनु 'स्वाध्याय नाना
शुनप्रतिशिक्षापदशाधिकार.
ए?
नणावद् तेहनुं योगजे मनवचनकायायेंकरी नित्यधन्यास करवानेविपे उद्यमकरे
चलीश्रागमनाजे अर्थ तेमध्यस्थवृत्तिय कदायहर दिनपणे अनुसरे एटले कदायह
करीने जिनवचननाअर्थनी परुपणाजूनीनकरे वली अगारवके० रुहिगारव रसगा
व मातागारव तेरोरहितयकुं अनेविशुद्धिनिर्मलहेतुजे मोदसाधन तेहने विपे वि
पादरहितयकु एटलेगुझक्रियाकरतां अविपिन्नचित्तयकुं अनेवलीवगकीधोने इश्यि
नोसमूहजेणे एहथकुं नदेजेउंचनीचकुल गुइमानबाहारतेहनी गवेषणाकरे ।।
ददस्व धर्माधितयेव धान् सटोपदेशान् स्वपरादिसाम्यात ॥
जगतिपी नवनिश्च कल्पे ग्रामे कुले वा विद्राप्रमत्तः ॥४॥
अर्थ ॥ हवेसायनुंफलते गुनउपदेश तेमाटेगुनोपदेशयाश्रीकहे। हेसाधो
तुं पोताना धनेपारकाने विपे समानपणे उपदेशकर एटले यामाहारोनक्त दाताने
धनाढयते एहवानेधर्मकर्बु अथवा प्रा मिथ्यात्वी रुपएदरिडीने एहवानेउपदेशको
एकहे इत्यादिककल्पना त्यजी केवलधर्मार्थीपणेकरीनेज पण थाहारवम्याटिकने
अर्थेनही एप्रकारे नित्यधर्मतंबंधीयाजे उपदेशते कहेतोग्हे अनेवली सर्वसंसारीजी
बने हितवांवतोयको नवकल्पेकरीने ग्रामनगरादिकनेविपे गुन उपदेशफरतोरहे त
याविहारकरवानी अशक्त कुलके ग्रामनगगटिकनो एकप्रदेशतेनेविपे प्रमादरहित
यकुं विहारकर हांकल्पते मागसिरप्रमुख श्रातमास जेरुतुबकाल तेदनाधावकल्प
अनेश्रावणाटिक चारमास चोमासना तेनोएफल्प एरीते सर्वमलीने नवकल्प जाणवा
कृताकृतं स्वस्य तपोजपादि शक्तीरशक्ती. सुनेतरे च॥ सदा
समीतम्ब हवाऽय माध्ये यतस्व देयं ल्यज चाव्ययार्थी all
अर्थ ॥ हवेगुनोपदेशनाकहेनारनं कन्यारूत्यनोविचारजायें तेमाटेनेयाश्रयी
वे हेनाधु तथादेवावक तुपांतानु तप जप प्रमुग्वजेकर्म ते कन्यारुन्यकता एटमी
धं एटलुमेनयीकी एहविवेचन तथागनि अनेयक्ति तथापीतानुनुस्त घनेछु,
रुत एटलांवाना पोतानामनसायेंगदायविचारीने नेवारपने मोहायकुं नायजे
साधवायोग्य तपोनुष्टानाटिक तेहनेविपउद्यमकर धनेवती देयकहेनां त्यजबायोग्य
जेविषयकपायादिक तेहनेत्यज सत्पुत्पने चिनपिणीनृमिनवि गुस्पदेश तेबीज
वृद्धिरूपहोय पतमा विचाररूप जलनानिंचवायी मुरुना पर विस्तारनामेने
माटे मोदाथि हेपउपादेयनेयना विचारपूर्वक धमाधमकरवा ॥ ८ ॥
- | मातु मैत्रीतयाप्रमोद तथाकारुस्य थनेमध्यस्थता ए चारनावना तेयात्मानेनि थपे । दवेष्यधिकारनो उपसहारकहेठे एप्रकारे यतिवरजे नजासाधु उपना /- ए अध्यात्मकल्पद्रुम परस्य पीमापरिवर्जनात्ते त्रिधात्रियोग्यप्यमला सदाऽस्तु ॥ साम्यैकलीनं गतर्विकल्पं मनोवचश्चाप्यनघप्रत्ति॥ ॥ श्रथ। दवेजेविचारवतहोयते त्रियोगीनिर्मलजोऽये तेमाटेतेयाश्रयीकहेने हेत्रा त्मात्रियोगीजे मनवचनकायाना त्रणेयोगतेणेकरी सदाइनिर्मलथा एटन्नेमनीवउप रे हितबुझिराखीने मनवचनकायानायोग निर्मजकर एनावार्थडे केमके परनेपीडाव जवायकी काययोगतो निर्मलथयोजयनेतेफाययोगनी निर्मलताथी मनपणसमना येलीन अनेकदपरहितथाय तथावचनपण पापव्यवहाररहितथाय इहावाश ये काययोग सुगम माटे जुदोकरीने नको ॥ ७ ॥ मैत्री प्रमोद करुणा च सम्यक् मध्यस्थताचानय साम्यमात्मन्॥ सभावनास्वात्मलय प्रयत्नात् कृताविराम रमयस्व चेत ॥७॥ थर्थ ॥ होएत्रियोगीनेनिर्मजताते मैयादिनावनाथीयाय तेमाटेतेकहेने हेया। तवीर्यफोरवयाथी चित्तने थात्मलयके ध्यानलीनअनेध्यानाथपिपिन्न एहबु था था शुननायनाजे थनित्यादिक तेहनेविषेरमाड ॥ ७ ॥ कुर्यान्न कुत्रापि ममत्वन्नाव न च प्रनो रत्यरती कपायान् ॥ इटापि सौख्य लनसेप्यनीहो ह्यनुत्तरामर्त्यसुखानमात्मन्, ॥ ७ ॥ थर्थ ॥ हवेएनावनाश्रोते ममत्वनात्यागयीहोय तेमाटेतेयाश्रयीकहेने हेसमध थात्मा जोतुकोजन्तुनेपिपे ममत्वनका नेता प्रति नेकपाय नको ६ हुवातु वाननारहितयको म्हेतो थानोज श्रनुत्तरविमानवासी देवतानाजवू सुपगा। में कम अनुत्तरवासी देवतामा स्वामिसेरको व्यवहारमा तेमाटे ससारिक सुन जोता थनुनरपिमाननो सुग्यते सर्वोत्कृष्टजाणवु ॥ ए॥ ति यतिवरशिक्षा योऽवधार्य व्रतस्थश्चरणकरणयो गानेकचित्त श्रयेत ॥ सपदि नवमहाब्धिक्केशराशि सतीची पिलमति शिवसौख्यानत्यसायुज्यमाप्य॥१॥ पनि + साम्यसर्वस्वाधिकार. [ ५३ । पथी नलाश्रावकपणलेवा तेतंबंधीनीजे शिक्षा तेनेचित्तमांधरीने एकाग्रचित्तथकुं चर एकरणयोगजे चरणसित्तरीचनेकरणसित्तरीनागुण तेनेजेसेवे तेसाधु तथा ते आवक शीघ्रके० उतावलृ वेशमुखना समूहरूपजे संसारमहासमुश् तेथकीतरीने मोदसु खनुअनंतपणुं तेहर्नु सायुज्यके जेसहवारीपणुं तेपामीने वलीमोक्नायविनाशीनु खनीपरे पोतेपणल्या अविनाशीनावपामी विलसतिके सर्वदासुखनेअनुनवे ॥१७॥ इति श्रीअव्यात्मकल्पामेऽशुनप्रवृत्तिशिदोपदेशाख्य• पंचदशोअधिकारसमाप्त. अथ ग्रंथोपसंदाराय साम्यसर्वस्वं ॥ एवं सदान्या सवशेन सात्म्यं नयस्व साम्यं परमार्थवेदिन् ॥ यतः करस्थाः शिवसंपदस्ते नवंति सद्यो नवनीतिनेत्तुः॥ २॥ थर्थ ।। हवेग्रंथनाउपसंहारनेयर्थ साम्यसर्वस्वनामें सोलमोयधिकारकहे। हेप रमार्थनाजाए विवेकीपुरुप तुंएमपूर्वोक्तप्रकारे अन्यासवशंकरीने साम्यजेसमता ते हने सात्म्यकहेतां यात्मासाथे एक्यपमाड जेसमताथी नवनीतजे संसारतंबंधी जय तेहनेनेदवावांठतो एवोजेतुं तेतुजने मोदनी संपदाथो ते तत्कालमात्र करस्था कहेता हस्तप्राप्तथाय ॥ १ ॥ त्वमेव खं नरकस्तमेव त्वमेव शर्मापि शिवं समेव ।। ल मेव कर्माणि मनस्त्वमेव जहीयवझा मवधेदि चात्मन् ॥॥ थर्थ ॥ हवेत्रात्माने अविद्यानोपरिहार यनेसमतानुंधरवु कहे। देयात्मातुः खनेकारणें प्रवत्यो माटे 5 खतेतुंजवे एमयागलपण सगलीवस्तुनुं यात्माजकार परपजाणषु वलीनरकनुंझारणतेपणतुंजठे वलीसुखपणतुळे अनेमुक्तिपणतुरे व लोकर्मपणतु धने मनोव्यापारना प्रकाशकपणाथी मनपणतु तेकारणमाटे अव झाजेधर्मकार्यनेविपे अनादरकरवो एटलेहमणा धर्मनथीथातो तोपत्रेकरीग इत्यादि क कल्पना त्यजाने अवधेहिकहेता धर्मकार्यनेविपे सावधानरहे ॥ २ ॥ निःसंगतामेदि सदा तदात्मन्नर्थेप्रशेप्चपि साम्यनावात्॥ अवेदि विघन्ममतेव मूलं शुचां सुखानां समव चेति ॥ ३॥ थर्थ ॥ हवेसर्वत्रपणे नि:संगपणानुं प्राध्यान्यपणुंकहे। हेयात्मा तेकारणमाटे सकलपदार्थनेविपे समतानावथी सदाय नि संगपणाने पाम थनेवली हेनिपुणप्राणि
.
ग
जणीने तत्वरहस्यपण तेजचित्तमांचितव केजेगुरुथीथनेशास्त्रथी तथाजेतवी साम
तारुपीयु जेथमृत तेनोउपनोग यास्वादपामे एटलेजेजेपदार्थनेतु समतानुकारणा
थर्य ॥ हवेयाचार्यग्रथने उपसहरतो यथनीउपादेयतादेखाडेने हेपंक्तिमा
| तमेसमग्र ननांजे धर्मशास्त्र तेरुपीयो जेमहासमु तेहथीउधखुजे एसमतारूपित
| सुधारसके० थमृतरसतेप्रत्ये तुमें पीयताकहेता थादरसहितसानजो तथानणाज
थी तमेथानोपण मुक्तिनासुखनी वर्णिकाकहेता वानगीनेपामो केमोसमतारत
"बर्ष ॥ हवेमचनेवेडे याचार्यपोतानुनाम थनेमथनुनाम जणाववाकहेने
परहितकहेता पथक्त्ताने तथापरजेश्रोताप्रमुख एवेहुनेहितकारी एयोजेथाथमा/
ए४
अध्यात्मकल्प/म.
सकलशोकनुमूल ते ममताज थनेसकलसुखनुमूलते समताजचे एहबु जाणीने म
मताने त्यज अने समताने श्रादर तिनाव ॥३॥
स्त्रीपु धूलिपु निजे च परे वा सपदि प्रसरदापदि चात्मन ॥त
त्वमेहि समता ममतामुक् येन शाश्वतमुखाध्यमेपि ॥४॥
उपरो
अर्थ ॥ जेनि सगताते ममत्वमुकवाचीजथायवे तेमाटेममतात्यजवाबू
ने हेयात्मा ते पूर्वोक्तकारणथी तुममतारहितयको स्त्रीने विषे अनेधूजिनेविषे वन
खजननेविपे यनैपरशत्रूनेविपे तथा वजि सपत्तिनेविपे भने विस्तारपामतीबापदान
विपे समतानेपामवेकरीने सरस्योपरिणामराखजे एटलेमोक्सुखनोनोक्ताया।
तमेव सेवस्व गुरु प्रयत्ना दधीच शास्त्राण्यपि तानि विधन ॥नदे
वतत्व परिनावयात्मन् येभ्यो नवेत्साम्यसुधोपनोग ॥५॥
थर्थ ॥ हवेसमतातेज सकलपदार्थनो सारकरीनेउपदेशेने हेविछन् हेश्रात्मन)
तुचद्यमकरीने तेहिजगुरुनेसेव थनेगुरुसेवनाकरीनेशास्त्रपण तेहिजनण तथाशान
णे तेतेपदार्थनुस्वरूपकर केमकेवीजासर्वपदार्थ तेनिरर्थकते ॥ ५ ॥
समग्रमतास्त्रमहाणेवन्य समुघृत साम्यसुधारसोऽय॥निपी
यता दे विबुधा लनेव मिहापि मुक्ते सुखवर्णिका यत् ॥६॥
मय जीवते याजोकेपण मुक्तिसुखने थनुनवे ॥ ६ ॥
गातरसनावनात्मा मुनिसुदरसूरिनि कृतो ग्रथ ॥
ब्रह्मस्पृढया ध्येय स्वपरहितोध्यात्मकल्पतरुरेप ॥७॥
ए. साम्यसर्वस्वाधिकार. पडुमनामेग्रंथ तेनपगबाधिराज श्रीमुनिहुंदरसूरियकीयो ते एग्रंथ पंमितें व्र ज्ञान तेहनीवांवाये जावु अथवा ब्रह्मजे मुक्ति तेहनीवांवायें चिंतवq ॥ ७ ॥ उममिति मतिमानधीत्य चित्ते रमयति यो विरमल्ययं नवाजा॥स च नियतमतो रमेत चाम्मिन् सदनववेरिजयश्रिया शिवश्रीत अर्थ॥ हवेफलोपदर्शन धारें मंगलगनित उपसंहार वाक्यकहे जेमतिवंत पुरुष पध्यात्मकल्पडुमनामे ग्रंयनेनणि पोताना चित्तनेविपेरमाडे गत्रदिवसवितवे तेपुरुष संसारयकी योडाकालमां विरक्तघाय अनेवलीएहनाज चितनथी तेपुस्पनेवि सं साररुपीया शत्रुनीजे जयलक्ष्मी तेणेसहित शिवश्रीजेमोदजन्मी तेमा रमिकेण्या पीनेरहे एटलेतेतंतारम्प शत्रुनेजीतीने मोदकपलचीपामे. तिअध्यात्मक-पजुमे साम्यसर्वस्वनामा पोडशोधिकारः नमाप्त.॥ १८ ॥ ए श्रीधध्यात्मकल्पमनामे ग्रंथनो वालावबोधार्थ उपाध्यायश्री रत्नचंगणिकत तथाउपाययश्री विद्यासागरगणिकत एवेटीकाजोने में महारीवुधिने यनुनारें मुज सरखा स्वल्पबुद्धिवंत प्राणिना उपकारने अर्थ लेगमात्र लख्याने तेमा अनानोगयी तथाघवानी तथानांतिची कांग्मत्रना तथाटीकाना अनुसारथी योययकुं अपुन सखागुंदोय तेहनु मिठामीझमं श्रथवाकिहांएक सुगमपणानेय किहाएक साहचर्यची किदांएकरूढिथी जंकांड विनकि वचन जिंग कारक अन्वय प्रमुखनो विपर्यास कीर्श हाय तेथपगध बदुश्रुत गीनाथग्वमवो नया उपकारबुझे थाम टाजिने गुरुकर. श्रय प्रगन्नि ॥ श्रीमनपगाणगगनां गणनाननतमपनरणिनिन श्रीगजविजयन ग्विनृव मुवि नृनिवितानयया ॥ १ ॥ योन्याचीहिनव घनं नुविदिनानुष्टानयज्ञादगे लोक कोकमिव प्रबोधमनयनानिध गोस्वामियत निन्वाटीफिटदर्पमुन्यजपटानक वि पोज्यतान् यो वाचालितमाजबंश्वरनितमत्रमनायोग्यतः ॥ रत्नत्रयप्रथिननंय मनृनदीप पट्टेप्यग्नविजयान्यनुग्गिनीत ॥चन प्रयांतरजमा प्रगमावन स्त कंगपिनमनत्सगुणावग्नः ॥ ३ ॥ नन्गन्वये निविजनूनजनीनरीनि श्रोटीन इतिऋग्विर्ग नि । वर्ग गनायग्लिननसनीहिनानि योद्यापि पृश्यनिनव्य वा रसु. ॥४॥ नन्पहनूपाणमर्जियन्द्रनिर्वाग्राणीनियरिगुतात्रयोनृत। - नावन्नने नाबविटा वरेन्द मत्स्टन पनि नप्रतिनन्गि || श्रीहीग्रसर A' ग्रम कृपनतुन्यगति तृपद सदा व्यजितदर्पोकदर्पकनेदक ॥ अमितशनवनीतिविवारी जिनमह प्रणमामि सुशीतल ॥ १ ॥ दृढरथाख्यकुनागनिनदन सुमतिधाम विवा पुगव ॥ उपिविनिर्जितपद्मप्रन वर जिनमह० ॥२॥ यमसुपार्वविनूपितविग्रह, तलवाग्नर सकलश्रेयसिकामकुटोपम॥ सुवसुपूज्यपद शिवदायक जिन ॥ URI To ॥५॥जगति गांतिपिताननिपादक वृतशम फिल कुस्थमनिदितं ॥ विगतको । नमत दानवमानवराजित ।। जिन ॥७॥ विततधर्मरथांगकनेमिक निखिनविटर। पमर नविनौनिन ।। जिन०॥६॥पुगकषायजयप्रतिमनन कनकवर्णधर मुनिसुनका , पार्थमदृपण ।। सबलमोहविनाशनवीरक | जिन ॥ ॥ इति स्तुत श्रीनिनशा, प्रिये स्तात् ॥ ए॥ इति श्रीमहीतलनाथाख्यदशमतीर्थाधिपतेरएक समातम् ॥ लारप स्थित पुरे रायधनानिधाने ।। श्रीवीरचऽस्य मनूकच नाना विनयेन / (६ अध्यात्मकल्पडमा मुंख्या शिष्या सुनिर्मलानिख्या ॥श्रीजधिरत्नविबुधा शास्त्रार्णयपारदृवान ! श्रीसिरित्ननाम्ना पाठकवर्यास्तदन्वये तदनु ।। श्रीहरिनपाचक, परा वरीयोगुणे या ॥ ७ ॥ लम्भीरत्नगणीशाथासन दिनुजजमीगा ॥ श्रीज्ञानरत्नगणयम दावा साप्रतं जपतु चिर ॥॥ तचरणकमजसेवा गस्तत्सगसमयतरंग ॥ सुनिहि तकल्याणविमन गणिवर विहितार्थिनीनुन्न ।। || बालायबोवार्ता मध्यात्ममुह माख्पशास्त्रस्य ॥ मुनिहसरत्न एता मतनोत्तनुयुधिसत्वहितां ॥१७॥ शोध्य सुलत्वरि निर्यथो ऽय धीरने प्रवाच्यमानश्च॥ सनावमपदाढय रावज्ञ चिर जयतात्॥११॥ इति श्रीमुनिसुदरसूरिस्तथध्यात्म कल्पद्रुमो वालावबोधसहित मपूर्ण ॥ अथ श्री सीतलनाथष्टक ॥ विशदचानाननबधुर ॥ सुविधिरजितनव्यजनज जिन ॥ ३ ॥ मलनीरजपत्ररिलोचन गृहमनतगुणस्य रुपापर ॥ লিন विसुधमाद . सदयधर्मप्रवृत्ति प्ररूपक
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सरिस्निायजिन नवद परं । सुविधिनायजिन यतिकी तंद सुपिरिनामा' ន यज्ञानमोहनपसंज्वरजेपजाय सोनाग्यनाग्यगुणरत्नकरडकाय ॥ थाटापदानननुर। तपिरामिनाप नि नहसरतिग्वेजनमानसाय । थाव्हानमत्रविनिवारितपानका परसाएमागरतरंगकलाधराय ॥ उष्टारिचालवणांबुधरोपमाय वाचासुधामया। पिननागगपा ६ ॥ समर्ममार्गविधिदेशनदेशिकाय दु खोषवारणमृगपराकमायण, लोकानिशापिमहिमायतनूपणाप गर्वनम्नसुगोनितपत्कजाया सस्यापति | प्यमणिमनपरोहाणाय सज्ञानदिवरदाय गुणाकराय कौशयलिपरिवनमा पऽपामगापुन जमाप नरार्चिताया जा सकपाटपनविर्जितमानसाय गांनी ल ॥ निति तानि शुना समृदय कल्याएमपादनकामना नरिकोदिनद ॥ जलीरनिगृहं सदापजिनर्त श्रीमनगारख्य जिन समात मनाव नवगैनोपे नवाच्या तट। देवाधीशनरेशशेषपट संसेवित कामह मुहिम हनविनविनर ॥ विपिनापजिन नपनामृत सुविधिनायजिन महिमा नापजिन नरांजन सुविपिनापजिन परकेयज ॥ १॥ सुविधिनायनिक स्तोत्र नेश कुशलार्यवनोततिवारिधार ॥ विशदावदातावनिचित्तनामा जववादियोत ।। लपाकनाथ ॥१७॥ कुजकाइश्ववाद ॥एव मया सन्तुक्त श्रादिदेवो नूयात् सा सघगणस्य नूयं ॥ मकरो विश्वजगत्सुदीप कल्याणमागव्यकलापकोश ॥ १५॥ ॥ अथ सूर्यपुरीयश्रीसनवजिनस्तवनप्रारन । वसततिलकान्द ॥ काम नमोऽस्तु सततं जिनसनवाय चाननाय कमनामन लोचनाय ॥ देहप्रनास्थगितलोकचमत्कराय उध्यानपादपविजेदनसिंधुराय ॥१॥ देचे स्तुताय नवसागरपारगाय कीर्तिप्रसूनसुरजीतविष्टपाय ॥ सन्मूर्तिकानिनतिर जितमानवार्य सेनांगकुक्षिवरणुक्तिकाक्तिकाय ॥ ॥जोपमाय जिनशासन काय सूर्यारम्पबंदरमनोरममडनाय ॥ नव्यान्जकाननविनासननास्कराय नाना दानहरिचदनसन्निनायशायादेयनामकलिताय शुनाशयाय सिध्यगनामिननसार सोजुपाप ॥ राक्षांतहाईकथनोत्तरकोविदाय तेज नावयशसामवनीश्वराय ।। ग्णाप जितेंहियाप शुशान्वयोन्नतिराय पालयायामिप्यावतापशशिवरना। सुदरंगनोनमनिरा से। मुदा सिर ११॥ ॥ अथ श्रीसुविधिजिनम्तवनप्रारंन.॥
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. विशर्म विधायिना॥७॥इति तृतीयातविनक्तिकाव्यप।इश्वनाउद ॥श्रीशांतिदेवार || नमोऽस्तु नेत्रे विघ्नोपहः शिवमार्गदात्रे । चकांकहस्ताय समस्तन: शखेंहारो ग्म ॥ उपेंचवावेद ॥ अघानि नश्यति पुरारुतानि प्रशस्तनानातिशयपतन । ति सुखमनतं शांतिनाथप्रसादाक्षरिणशरणदातुर्विश्वसेनांगजातात् ॥ नतनविज तविनक्तिकाव्यर्थ ॥ शिखरिणीउद ॥ सदा ध्यान शांतेरखिलगुराधान्न युनवतो धरति श्रीनार सुमतिमतिकार नयहर ॥ नरा नव्या शत्या विगतमदत श्रुता। पाद६६ नखानला सश्रीका स्यु ॥नोनो श्रादायायुप्मतस्तुष्टयानद कृत्वा हवा १३ ॥ इति पष्टीविनक्तिकाव्यक्षिक ॥ वसततिलकालंद ॥चेतोस्ति चैवपयोनिति/ पारमाप्त तीर्थकरे जिनपती किस शांतिदेवे । नक्ति कुरुप्प सततं विपुनामुदारा हत्या प्रमादमपि कर्मविशेषजन्यं ॥ १४ ॥ दोधकद ॥र्गतिसागरपीतसमुईन/ |श्चलसयमपाजनमेरो ॥ शारदराक्षसुधाकरवन शखसमाननिरजनचिसे ॥१५॥ना) २०० स्तोत्र नाजा त्रिनुवननगरे स्फारकोटीरहीर ॥ चार्वाकारे प्रणेता प्रणतहितकर काम रो मारिवार सर्वज्ञारख्यातनामा प्रकटितमहिमा प्राप्तकर्मारिपार १॥ तोरकार । सुरमानवपूजितपाणिकज कमजोदयकारकर्मधन ॥ गितामयदूषण नन्मननि शुनसागरसोमनिनो विमल ॥ ॥ इति प्रथमांतचिनक्तिकाव्ययुग्म ॥ हुनगप्रशत, छद ॥ अजयं विनु विश्वपूज्य प्रसन्न जिन सन्प्रन गफर देवदेव ॥ सदाझानर नीतती मेघमेक स्तुवे शांतिनाथ की कामकुना॥ हरिणीबंद ॥ कमनयदन मानद नतानचचन गजपतिगति विश्वाधार सुरेश्वरवदितासदयहृदय त्यक्तानकति निनितशोचन परमपदद झातार्यो त्रिकाल पिदचितं ॥ ४ ॥ श्वशाउद ॥ अत्र ति देवा नवपारग जिन कल्याणकार मुनिदसेवितं ॥ त्रादिसलक्षणनदिन हि तावानवसवोहकर सुधामय ॥ ५॥ इति वितीयातविनतिकाव्यत्रिक ॥ शानिनीत ६॥ प्राज्य राज्य चक्रवर्तित्वसग त्यक्त्वा दत्वा स्वर्णरुप्यादिदानाश्रुत्वा वाक्प नाप लोकांतिकानां येनावाप्त सयम मुक्तियोग्य ॥ ॥ दुतविलवितघद ॥ श्रमितपूर वता जनतावता कुगतिवारणतत्परसजिरा ॥ नतनरामर किन्नरशातिना जगवता जातकः ॥ ॥ रोचताब्द ॥ दर्शनामृतानतीनजतवे विश्वशास्त्रनयनीतिहे। वेलोनसागरसुवेजसेतवे वापरावलितमिलनानव इति चतुर्थी विनस्किामा थनेकससारनिबधितानि प्रगाढवधस्थितिसंचितानि ॥ मालिनीवद ॥ ॥
सोन. २०१ रार: ॥ कामयागजिने वार्पण्यटोपवर्जिते ॥ देवाधिपेऽचिगसुने लोकोपकारक मट ॥ १६ ॥ इनिमसमीविननिकायत्रिकं । वनस्पद-खकीयवंगांवरनास्कर मनो विशालगंगाजलगुबकीनं ॥ अपारसनानयात्र नवरं कापरस्त्वं परिग्द मेवकान् ॥13॥ इनि नंबोधनविननिकायमेकं ॥ मंदाक्रांताट ॥ कल्याणोक्तं इशलजननं नवनंबन्य निन्यं नानात्तः प्रतितमिदं स्तोत्रमेतनिकाजीमुक्त्वाऽऽज स्यं नाणनि मनुजो नाबिनानाविनामा गेहे लम्चीवति दृढता तन्य दीर्घायुप च ॥ १७ ॥ माईलविक्रीटितमंद ॥ कल्याणोदधिवर्धनं कतिहा बोगव्यमानास्पदं सोनाग्यायकर विननिकलिन कार्यविनिनः पर ।। श्रीगांतः स्तवनं पति नविनः मत्पायपल्यालयान्तेषां धाम्नि गुने निवासमतुताः कृति संपत्नयः ॥ १५ ॥ ॥ अथ श्रीअंतरिक्तपावस्तवनप्रारंनः॥ इंश्यजामंद.॥विश्वेश्वरं विश्वजनेशपूज्यं सवानिप्पादनकामकृनं। प्रख्यातिमंन महिमायलदम्या पाच नजे संस्थितमंतरिदे ॥१॥ कल्याणमालागृहमगिदेव विद्या धराधीगनुतांदिपन्न ।। सर्वत्र राष्ट्रेपु विगालकीति पावै॥शा रोगाधिचितान्तिमू दतापनपज्यमाचारविचारसरि ॥ सन्नीलरत्नाविनृपितांगं पावै॥३॥ संसारसिंधी वरपानपात्रं मुक्तपंगनासक्तहदं शरण्यं ।। वामांगजानं जगतीप्रदीपं पा०॥४॥ श्री पायदाधिपमस्तिोप श्रीशानिनं सेरपुरावनसं ॥ वाचासुधाकर्पिततन्यलोकं पा 0 | U॥ त्रैलोक्यकोटीरमनाथनाथं दारिद्रयवाताहिमनंतशक्तिं ॥ शालार्थन स्यनिधि दयालु पाव ॥६॥ पद्मावतीने वितपादयुग्म मंहोनरध्वांतदिनेशमागु ॥ लावण्यसानाग्ययगोनिराढ्यं पावै ॥ ॥ ज्ञानादिधर्माचरणं वरेण्यं सहायदाना टिकमार्गपांथं थानंदवनीततिवारिधारं पा० ॥ ७ ॥ फलगः ॥ स्वग्धराउँदः इत्थं ये देववयं विविधमुरखकरं चांतरिझारख्यपाच नित्यं ध्यायति नत्या हृदयरति पुजो नाग्यवंतो नरोपि ॥जयीतेषां निकाध्ये वसति दृढतया सर्वदा कामकी क व्याणणिकर्नु वि विदिततरा सर्वसंपत्तिकांता ॥णा ॥ अथ श्रीगोमिकपाश्चीप्टकप्रारंनः॥ शार्दूलविक्रीडितछंद ॥वामेयं मरुदेगनूपणतरश्रीपार्श्वयदाचिन कल्याणावलिवन्नि सिंचनयनं श्रीक्ष्वाकुवंशोमवाधाराष्ट्रसमागतर्नरवरैः संसेवितं नित्यशः श्रीमतीकर गाडिकानिधधरं पाच मुपा नजे॥१॥नानासाधुजनीयपंकजवने म वि. प्रव्यदनिवारकं कलियुगे प्राप्तप्रतापालयं । विश्वम्यां प्रथितावदान निकर सपन शुनाशयेन ॥ ॥ जुतविलवितष्ठद ॥ मम नमोस्त्ववते परमात्मने , || नाना ध्वस्तसमस्तवैरिनिचयं रातिनिर्देशक श्रीमत्री० ॥ ६ ॥ जूपिटामननति | स्त्रिग्धरामद ।। ध्येय श्रीपार्श्वदेव नजत कित जना गोमियामराज शश्वत्सवार्य सिधै विहितगुनहितं विष्टपे चैत्रपूर्वासानदोलासलटा कुशजगविषुधा सर्वना मातिनीठद ॥जयति जगति चद्र पार्श्वनामा जिनेंशे विकचकमलचा नदिताम स्रग्धरावद ।। श्रीपार्श्व गोडिकाख्य नजतनावगणे कल्पदं सुगोत्र नानादेशेषुन क़मर्त्य ॥ श्रकलितमहिमीपस्तीर्णससारसिधुर्नुजगकलितपाद पुस्यपीयूपपुष्ट । | धातिशयमहितताव्यूहवार सुमूनि ॥ श्रीमतं नीलरत्नाधिकतरवपुष स्फारलावापा । विवेकरनरोहण दयाकरं ॥३॥ यसततिलकाबद ॥ करीरुतं व्रतमनुत्तरमगिनेवार ति पावमगिनो नरालसा धृतातपत्रचामर सुरै स्तुतं ॥धनतशक्तिमाजिन गताम त्वा ऽशु येन वरवार्षिकदानराशि ॥ वामोहेन मुनिनायकनायकेन कमाणकेविन शिवशर्मविधापिने ॥अमितशीर्यतिरस्रूतमेरवे शुनदशेरकमडलमीलये १०३ स्तोत्र ज्वल श्रीमती ॥शासपनेणिसुदानकामकलग त्रैलोक्यचितामणि समाचामृतराज तामरनर समर्मबोधप्रद ॥ सानाग्याइतकातकीनियशसा संपूरितातिर श्रीम बी० ॥३॥ मार्गे चांतरनीतिवारिनिचिते हेमकरं सर्वदा दारियाशिनिपातनामकृति श चितातिरोगापह ।। उ खत्राससमीरणायनुजग नागांकमहोमथ श्रीमती॥ ३॥ कारुण्यांचितचारुचित्तकमल सत्वेषु ससारिपु सत्यादिगुणरलस्ततनु लाबर नोना स्पद ॥ ससारार्णवपीतवारिधिसम मुक्त्यगनावानन श्रीमती० ॥ ५ ॥ त्रैलोक्य नि लकायितं निरुपम नव्यैनि पूजित हटानां निजसत्वदर्शनपर क्षिप्रसता काम। शक्तिकलितैर्देवश्चतुर्श नत सर्वाशाकरणकटपफलद सर्वांगिचूडामणि ॥ शिष्टान तचतुष्टयीवरतर श्रीमेस्तुग जिन श्रीमनी ॥ ७ ॥ स्फाराकारनिराजितांगमनुन त दायहेमाकर विश्वव्यासतर प्रवाससदन गनीरतासागर ॥ नासोद्योतितविश्वविश्वम वनी कल्याणसिधौ विधु श्रीमती ॥ अष्टनि कुलक ॥ अनुष्टुपुलंद ॥ नित माले सदाश्रेष्ठ गुणवन्दनूपिते पुष्पमालेतरा निल्प नकवीहारसपुते ॥ ९श्री मत पानाथम्य स्तवन जगतोऽवनकल्याणसागराधीशे मूरिनी रचित मुदा विशिष्टानिर्दीपाचारपुष्टा जिनपपतिषु रता थाप्सकल्याणतुष्टा ॥ ११ ॥ ॥ अथ श्रीगोमीपार्श्वनाथस्तवनप्रारन॥
स्तोत्र. २०३ णीवेदः।। अमृतरसताधिक्यानीटानरोत्तमसंगतानुवनसुनगात्पार्शनिख्याधिनश्यति पातकं ।। प्रसरति च वै कोतिर्दिक प्रसूनवउज्वला प्रनवति पुनः शी लीजाजयो प्रतिवनिं । ॥ शार्दूलविक्रीडितदः ।। बाकल्या नरदेवदेवमनुयां संतुष्टिकर्तुस्सटा चेतोवलनकामसार्यददतः कर्मारिहर्तुशं ॥ यानंदीघसरःप्रधिकरणे पानीयदा तुर्मुटा पावत्यास्ति नतिः समृधिजननी कल्याणविस्तारिणी ॥ातोटकवंदः।नरल दणनूपितवस्युपुरे मुखनीरजरंजित विश्वजने॥श्रुतदेशनदर्शितधर्मपथे जिननेतरिति प्रति नाग्यरमानानुजंगप्रयातवंदः॥ सुराधीशचकैः स्तुत ज्ञानसिंधो जगन्नाथ नेतः रुपालोकबंधो ॥ विनो पाहि मां सर्वदा नक्तिनाजं स्मरं तं चिरं त्वत्पदानोजशृंगं ॥ ए | शार्दूलविक्रीडतवंदः ॥ स्तोत्रं पार्वजिनेश्वरस्य सतत ये प्राणिनो ना वतः सहश्यापि पति हृद्यमनसस्तेषां गृहे संपदः ॥ स्युनित्यं स्थिरनावशोन नतरा धर्मार्थनिप्पादिकाः कल्याणार्णवसूरिनिर्विरचितं मांगल्यमालाकरं ॥१०॥ गिरवरिणोदः। तदा धाय विने स्तवनमनवयं जयहरं नरैनं तिचै कुशलवन राजी धननिनं ॥ यवंध्यं जतानां जिनगुणरतानां स्मृतिमतां तमेषां नव्यानां प्रमु दकरणं कामितकरं ॥१५॥ ॥ अथ श्रीदानापार्श्वनाथस्तवनप्रारंनः॥ ॥ वजाउँदः ।। कल्याणगेहं गुणरत्नराज सद्देहकात्याजितनीलरत्नं ॥स्तोप्ये मुदाशंकरमंगिवंधे दादानि, श्रीवरपार्श्वनाथं ॥ १ ॥ सर्मलीनाशयमाशु विज्ञ कम्माप्टदावानलवारिधारं ॥ संसारपायोनिधिकर्णधारं दादा० ॥ ५ ॥ याचारव नोतत्तिचिनोरं सत्कीनिंपुष्पकृत्तवासितागं ॥ नानाथराक्षांतविचारददं दाद ।। ॥ ३ ॥ वैराग्यरगापितवातचित्तं तहोषिटातारमनीहसव्यं ॥ नागेंड्ससेवि तपादपद्मं दाढा ॥ ४ त्रिलोक्यचूडामणिमृहिशोनं सोनाग्यनाग्यावनिपूर्ण देहं । नयाघराजीवटिनेगमेकं ।। दादा० ॥ ॥ सर्वांगिनेतारमनीष्टवाचं विधे श्वरं जितत्तन्यतोकं ॥ लोकार्निचिंतानय खवार दादा० ॥८॥ हृद्यारुति कृतजरा: विदोष नरामर स्तुतमर्त्यत्तं ॥ सन्नागचिन्हं कृशलार्यकारं दादा० ॥ ॥ सर्वत्र दि ख्याततरप्रतापं कारस्पतत्रं वि शिष्टगोत्रं । यज्ञानमिप्यालतमिहादीपं दादा ॥ ॥ वनि. कुनकं । शार्दूलविक्रीडितवंद. ।। श्रीमतीवटपञ्जनगरे श्रृंगार हारोपमं कल्याणांबुजनानुबंइमसमं वामांगजात परं ॥ दादाख्यं जिनपार्श्वदेवमन घं ध्यायति ये नित्यशस्तयां धानि रमा निवासमनिशं कुर्वति कल्याणतः ।। ए ॥
\ ॥ ३॥ सन्नीलनासा हसितेश्नील सत्कातकात्या रमणीयरूप । प्राचीन न्यं ॥ श्रुतलरिय पुस्यविराजमान कति ॥७॥ थनि कुनक ॥ विनाम।। गंगजातं कुलनदिकार ध्वस्तोपसर्गोत्कटपुष्टरोग ॥ प्रख्यातिमत सुवने वन १०४ स्तोत्र ॥ अथ श्रीकतिकुडपार्थाष्टकतारन । ॥ विबुधादिराजनतपादपद्मं बढ़नाग्यसानाग्यलतापमेव ॥ धर्यनित्ति कनिकुमपार्श्व सुचिर नजेऽहं ॥ १ ॥ कमजामदाने । सपयोघिदेशानुतलयकीति ॥ रुचिरारुती रजितविश्वविश्व कनिकुम० ।। महिमावदातोत्तमनाममत्र समतानिराम कमलानिनेत्र ॥ थनिनापद विजासपत्र कति ॥ ३ ॥ हरिताधकारारुणसन्निकाश करुणाशर उसमें पु दाय ।। नरदेवपूज्यं सुखद सुमूर्ति कजि ॥ ॥ कनकादिदातारमननती वरनीजरत्नाधिकदेहवर्ण ॥ शिवशर्मराज जनतानिवद्य कनि० ॥ ५ ॥धनष तय समुणकेजिपाल युनजक्षणास्तवर्यगात्र ॥ अनूपण शतृणोधदात्र इसी ॥ ६ ॥ जगतीवर कर्मविमुक्तसग विपमायुधालगमन स्वरूप ॥ पादपुग्म कलि ॥ ७ ॥ गुनसिंधुवनी शशिन वरेण्य वचसा सुपालन सहन | एव स्तुत श्रीकलिकुडपार्श्व कल्याणनाना मयका नितात ॥ ये प्राधिन स्तात्रन्न पति तमानि लक्ष्मीविलसत्यवश्य ॥ ए ॥ ॥ अथ श्रीरावणपाच टकप्रारन ॥ ॥ यजामंद ॥ देवाधिदेव पावणाविराजेन नता-िहाय । मावतीसस्तुतनामधेय सेवे सदा रावपार्श्वनाथ ॥ ॥ धानका हिमेयं मेयध्वनिध्वान विशेपराज ॥ जितारिखद विगताविमोह सवेश ।। पररोशाचीच नि
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पुगनकाशित अरुणोटिपिनाधिकनास्वर कुमुदबांधवशुव्रतरानन ॥ परगनारगुणोनमा ननतः ॥३॥ नाधिपधिनामननास्फर जगति नावप्रकाशनदीपक ॥ नपनपत्र मंगमोगणनागिन नजत ॥ ५ ॥ कमलनिर्मितपायुकदवर्क स्थिरतरामनार गिजिन ।। जगनि उनसर्प विपापह नजत०॥६॥ प्रगमनूपानपणनृपन सुना नागपगुणानिमदिर ॥ चपनफीतियशावरपामिनालजत ॥ ॥सफनसरसन निन्या उमति तम्य गृह समताऽपि स्थिरतरामुमतां वरदायिनी॥१॥ ॥ त्वममि सगुणनदनमदरम्त्वममिमेस्नतानिमार। नमामि ग्वग्नाविनाम्नतम्वमग्नि परशीतपिष्टप ॥१॥ त्वममि यागि निदिनानिमांदिन ॥ २ !! न्यममि न मगानयस्त्वममि नरना गंमतिदममिकानिरिकापितदिग्गण ॥ त्वममि नापितरजितनागर न निरनमाम दगनपिनमानसम्न्यममि ममतिमागरपोतर ॥३॥ २०६ तोत्र निकातिनिकेतनमगिनुन ॥६॥ निजवशतसकमातिहर रवनिर्जितमेग्नद गिर वपिन चुधि विश्वजनोनतम नतनूतगण जितनोननट ॥ ॥ शरणाश्रितपाकर किपद दधन परशातरस नवम ॥ महमेश्मणिप्रनदेहवर धरणे निपेवितपाईपुर IIजा थमम नुतपाइर्वजिन सतत तपसा हतसिवमनतवल ॥ सजनाजनसनिग्न मज मनार्जितमुत्तरसौख्यधर ॥ नवनि कुलक । सुरराजखेचरनागपुरदर पर जसुसेवितं श्रीपार्वजिनेश्वर नमितसुरेश्वरपद्मावतीसस्तुत॥ येऽनतनत्या दिनु नया सस्तुवति जिन मुद्दा शुनसागरपउनानविकरमासमेत ते लनति सुस सदा ॥ अथ श्रीमदुरपाप्टिकपारन ॥ द्रुतग्जिपितष्ठद ॥ विबुधमानवमानसनदन पिनवदानपिया हरिचदन । म मितसन्यजने स्तपदन नजत पार्वजिन मदुरानिध ॥१॥ म्पतगगप नुराननानुनिवासघनाश्रय ॥ विपयिवारणकेसरिसन्निन जनता र पीजद ॥ मदुरजिनप नित्य पदे मिगो INHEAaiत दि महादप ॥ नाननणने चिताहा मतादरसाधनद विपि वनित ननानने नानावतपदामदुरपाजिन वसन्त पठति य सुप्रिया ॥अथ मन्यपुरीय श्रीमहावीरस्तवनतारन ॥ इतनिधिनपद मंटन टमुगवनमि धर्मग्नो धनरामद ॥ त्वममि मायराना म्तोत्र. 10 स्त्वमनि दर्शितजीवदयापथः ॥ ॥ खमसि धाग्निगीतविनूपणस्त्वमसि कामि तटामरहम. ॥ त्वमसि देवनगविपवादिनम्त्वमति जाव्यतमिबननोमणि ॥५॥ त्वमग्नि कर्मवनावनिपावकम्त्वमसि सेवकपूजितपंकजः ॥ त्वमग्नि जन्मजरामृतिवा गन्दमनि शाश्वतमोदपदस्यित. ॥ ६ ॥ त्वमसि मंजुनमत्युग्नदीपकस्त्वम नि सर्वपदार्थ विगाग्द. ॥ त्वमनि लोकनतो नतवत्सप्त स्त्वमनि देवगितीमुख पुफ्फर. ॥ ७ ॥ त्वमग्नि नाथमनोहरलक्षणम्त्वमनि संमतजीवगागु सदा॥ त्वममि नंबरमार्गविधायकस्त्वमनि टानगुणापितकापकः ॥ ७॥ त्वमसि चित्रकराति गयांचितम्त्वममि सरितती यग्मेवितः। त्वममि मुस्विजनावनतत्परम्त्वमसि दानि न. विनिमंडले ॥ ॥ ॥ त्वमन्नि गिटनगमरसंगतम्त्वमनि लोकचमरुतनिर्म म. ॥ त्वमगि केवलिसाधुनतो मुदा त्वममि कुग्रहदोपनिवारकः ॥ १५ ॥ त्वममि सद्रतनारसपोपमम्त्वमसि बीतमदो विशदागय. ॥ त्वमसि तीर्थपते रु चिगव्हयस्त्वमनि गुप्तिपवित्रितमानमः ॥ ११ ॥ त्वममि बुदिपराजितगी-प ति स्त्वममि हाटकसन्निनविग्रदः ॥ त्वमनि नाग्यविनाश निकेतनस्त्वमसिलोन महीयग्वजकः ॥ १२ ॥ त्वममि सप्तनयार्णवतारकस्त्वममि दुर्घटसत्यनयाध्य ग.॥ त्वमति सम्मदतंततिकारकस्त्वमति सिदिकरो वरदायकः॥१३॥त्वमति विश्व जगहानवमनस्त्वमसि रक्षितनूतकदंवक. ॥ त्वमसिउर्नगडस्थहरोनिशं त्वमसि वि स्तृतलोचनरंजकः ॥१॥ त्वमस्ति विश्वपति. श्रितवांधवस्त्वमसि वऋतिरस्कृतचं माः ॥ त्वमसि वरिसमुश्घटोगवस्त्वमसि तीर्थकर. प्रतिबोयट. ॥ १५ ॥ त्वममि नव्यगिखंडिवलाहकस्त्वमसि बंधुरमूर्तिधरोऽजर ॥ त्वमति सर्वविविंग तातुरस्त्वमसि संयममंडनमंडित. ॥ १६ ॥ त्वमति शांतरसाश्रितचेतनस्त्वमसि पोस्पनिर्मितकामागुः ॥ त्वमनि उर्जनबोधिनिबंधनस्त्वमति कामचाधिकदानदः ॥ १॥ त्वममि सचितपुण्यनिति परस्त्वमसि विघ्नसरीसृपगास्टः ॥ त्वममि शु नयगोनरमंदिरस्त्वमसि सघजयोन्नतिहर्षदः ॥ १७ ॥ त्वमसि सत्वहितो मतिव इनस्त्वमसि धम्मसरोजसर सम. ॥ त्वमसि चक्रिनतो नविशेखररत्वमसि पारग त परमेश्वरः ॥ १५ ॥ त्वमनि सत्यपुरामलनूपणस्त्वमसि संश्रितपादमृगाधि पः ॥ लमति केवलयुग्मविराजितस्त्वमसि वीरजिनो जिननायक. ॥ २० ॥ त्वमसि शासनपोतनियामकस्त्वमसि साधुटयालुलनामकः॥त्वमसि सारख्यकरस्त्रिश लांगजस्वममि विश्वगुरु. शुनसागरः ॥ १॥ हरिणीवंट.॥ जयति सततं वीर.शं सुर्नवोदधियारगो जगति तिलक. पापध्वांते गनस्तिरनुनरः ।। कुशल निलयस्तीर्थस्वा तुन्य नमो हरिवनायकनाथ नमाननितनादशिराजिताय || ३ ॥ तुन्य नम कुशलमार्गविधायकाय तुन्य नमा नगाय ॥ ४ ॥ तुन्य नमो दलितमोत्तमोनराय तुन्य नम कनकसजिनानुगना | तुन् नमानिगपगनिपिनूपिताय तुन्य नम कुमतितापसुनजनाय ॥ तुन प॥ तुन्य नमोप्यपिनमहादराय तुन्य नमो मुखकलादिऽतचश्किाय ॥ ५॥ मा मुवपयामिदिराप तुन्य नमो विगतकंतवमत्सराय ॥ ६|| तुन्य नमार, मनपजनागपाप नुन्य नमो निग्विलसायगारकाय || तुज्य नम प्रथितय ताप सुन्य नम मागदमपपारगाय ।। तुल्य नमो नविकचातफनीरदाप तुम नमपानरापराप || G ॥नकम् ॥ ओगटा पति य मत त्रिमयला श्रका कानां शिपिवारसागर ॥ पिया तर्जितागीश परमात्मानमा इम गनारिय्यारिदृषण र नुमरायपु श्रीप्रद दनिनामय! यमनमा रिणिभिगमणि रिपुमाग्गमाग मगिनाथनिरिना स्तोत्र मी सुरासुरसस्तुतो विवितमहिना विश्वे विश्वेश्वरार्चितपत्कज ॥श्शा वशरणार कुतारनंस यतिधर्मदेशक कलादिकापारगमगिपालक ॥ नवीमि वीर मतिइ दिन वद मनोसपादनकामकुनक ॥ २३ ॥ जगप्रयातछद ।। प्रनु देववय जिनकी श्वनाथ जगशारुचूडामणि वीरनाथ ।। स्तुवेऽह जितारिं नतसर्गिनाथ सदा शति कार नराधिनाथ ॥ २४ ॥ स्त्रग्धरामद ॥श्रीराज वारदेव प्रणतसुरमणि देवभक विराम कल्याणांनोधितही विमनशशधर नाग्यसानाग्यकार | ये नव्या सन्त्र नि प्रतिदिनमनय चारुनन्या त्रिसध्य प्रख्याति ते जनते त्रिवनविदिता कोश ग्नारकीं ॥ २५ ॥ तुन्य नम समयधर्मनिवेदकाय तुन्य नमस्विनुवनेश्वरशेन न्य नमोऽनिनपते हरिचनाय तुन्य नौ वरनावरनास्करायातुन्य नभ प्रण राप ॥ तुन्य नम सुरनरामरसेविताय तुन्य नमो जिनजनार्चितपत्कजाय ॥१॥ चनगाधिपाय तुन्यं नम भरररूपमनोहराय ॥ ५ पाप तुन्य नमो यतिततिप्रतिपालकाय ॥ तुन्य नमो विकचनीरजलोचनाय जुन गोबिनाप नुन्य नमा जितपीमुना यगय तुन्य नमाप्रमितपुञ्चनिश्च पदा महा अनमीदजा प्रमाद नहानि म पुस्ते कमला निवाम पाया, गगममनामनीट 1m !! ॥ अय श्रीलोटणपाधनायम्नवनप्रारन ॥ नरमा को ग्मानिपद पर मनामदमानोपमर्गनादाप राजन स्तोत्र. ॥ - तेजसा मंदिरं रम्यं वारिताशेपउर्जनं । निःसीम सर्वगोत्राणां श्रीमंत गुणसागर ॥ ५ ॥ कथिताचारमार्गौयं कल्याणकमले विधु ॥ प्रणताशेपदेवेशं शासनं कांतनूप नं ॥ ६ ॥ गदितागमसंदोहं रसनामृतसुंदरं । सूराधिकप्रतापानि रिक्थदं दमितेहि यं ॥ ७ ॥ नागेंइविवुधः सेव्यं लोकानां शांतिकारक। जडताया विठेत्तारं नयनाल्दा टकारणं ||॥ पालकं सर्वसत्वानां पार्वयोण पूजितं ॥ नाकिमानववंद्याहिं नाथ नाथं जगत्प्रनुं ॥ ए ॥ क्रियासंततिनेतार त्रासितानेकदोपकं ॥ कृतांतार्थ विचारइं नारतारुण्यराजित ।। १०॥ संसारसागरे पोत घस्मराविविवर्जित ॥ सर्वज्ञ मेवगंनी हित विश्वस्य सर्वदा ॥ ११ ॥ तेजोनिधि मुदा पाच नवीमि लोमणानिधं ॥ क पाणसागराख्येन संस्तुतं ह्यादिमादरैः ॥ १२ ॥ बादशनि कुलकं ।। श्रीमनोडण विनाथमवनौ विख्यातगोत्रानिय ये नव्या वरनावनक्तिसहिताः पूजति सौख्या निः। ते सत्वा. सुरखमानकीनिकलिताः कल्याणतुंगाः परा जायते नुवने प्रतापरु रा आदेचवाचः सदा ॥ १३ ॥ ॥ अथ श्रीसेरीशपाछप्टकप्रारंनः ।। कामोधकर्तारमशेपटेवाधीशेस्सदाचर्चितपाटप ।। कल्याणकारं वरनीलवर्ण सेरी शपाइ नुथ लोडणारख्यं ॥ १ ॥ सत्पुस्यवल्लीवनवारिधारं निःशेषनव्यावतिपूरिता गं॥ त्रैलोक्यवत्रं वनाधिनाथं सेरी ॥२॥ सारगवाणीजितचित्तदाढय सारंगगंनी बनिनाटकांनं ॥ सारंगसारांवकयुग्मराजं सेरी ॥३॥ विश्वेषु सत्वेषु रूपानिधानंस म्यक्त्वरत्नानरणाकितांगं ।। 5.स्वांगपर्श दलितारिवगै सेरी० ॥४॥ श्रपारसंसारसमुह पोर्न सर्वज्ञमाचारपवित्रवंशराक्षांतशास्त्रार्थरहन्यदहं सरीखा वाणीरसानंटितवि विश्व तीर्थकर नागपुरेशपूज्यं । सर्वत्र विरज्यातयगोनिरामं सेरी० ॥६॥ तेजोनिधि अमितकामकुंनं सौजन्यसौदाई विलासपात्रं ॥ कल्याणसूर्यादिवितानहेतु सेरी ॥ ७॥ थादित्यचंशाधिकटेदनानं सत्प्रातिहााटकगजिराज ॥ स्फारारुता मोहि देवदेव सेरी 10॥ कला ॥ एव कल्याणवद्यं त्रिनुवनतिलक लोडणाई सपा विकाम्यं स्वचित्ते नवसफलरुते ज्ञानसंपत्तितिच्या नित्य ध्यायति जव्याजिनसमय Tः शुनजेश्यानिरामास्तेयां हन्प्रिकामं नवति च सदने मंजुपद्मानिवासः ॥ ५ ।। ॥ अथ श्रीमंनवनाथाष्टकप्रारंनः॥ लावण्यगेहं कलहेमवर्ण ठोभिनं सुंदरवारचिन्हें ॥ लक्ष्मीकलापार्णवधि नायं देवननं संनवनाथमोहे ॥१॥ येनांगजं दारणकर्मगत्री वीर वरं पू रित्रयोनं ॥ देमास्पदं सजणारत्नखानि देव ॥२॥ वाकृवशं वतिग्मरहिम - सहानगुणान्यायप्रतिज्ञादमा चित्ताय च कुन विवेकविनयो विद्योपकारोयमा । दानक्रोधदयादितोपविषया सादात्प्रमादस्तया साधुश्रावकधर्मवर्गविषये या । प्रसगाह्यमी ॥ २ ॥ अथदेवतत्वविपे मालिनीउद ॥ सफल करमवारी मोक्षमारा |धिकारी ॥ त्रिचुपनपगारी केवलझानधारी ॥नपिजन नित सेवा देव ए नलिन ये ॥ इहिज जिन नजता सर्व सपत्ति श्रावे ॥ ३ ॥ जिनपरपदसेवा सर्वसपना ई॥निशिदिन सुखदाई कटपपत्री सहाई नमि विनमिलहीजे साविया बड़ाई।। मंशाणी वरवाणे ॥ परम गुरुकह्याथो तत्व नीशक माणे॥ नविककज विकराये नुग्यू तेज नासे ॥ इहज गुरु नजो जे गुआमार्ग प्रकाशे ॥५॥ सुगुस्वचनता। निस्तरेजीचरगे ॥ निरमत नर थाए जेम गगाप्रसगे । सुणिय सुगुरु केशी वाणि सिजनवेला चश्थी जेम वाधे ॥ सकल दिनवलीना धर्मथी तेम साधे ॥ मनुका रायप्रदेशी । लहि सुरनव वासी जे हसे मोक्वागी ॥ ६ ॥ अथधर्मविपे । नति- जनमफेरो सार ते धर्म जाण ॥ नजिनजि नवि नावे धर्म ते सौरव्य खाणी सूक्तमुक्तावली राकेचक्र गतवक्रमांद्य ॥ श्रझानवश्वानरशातिनीर देवः ॥ ३ ॥5 खोदयी समुशमि६ ॥ सत्यातिहार्याप्टकरा जिराज ॥ क्षमानिधि विस्तृत पुरयमूनि ।। वै० ॥ ४ ॥ नव्यर्मुदा सेवितपादपद्म समानवजाहतमोहनूपर ।। ससारदावार मर्त्यमेघ देवैपासत्कोर्निपात्र हरितारिसेव्य जगहनानंदकर शरण्य ॥ कारुपन युकपवित्रचित्त देवै० ॥६॥ कुदाईदतं कजजीवन में वपु श्रियातर्जितसूर्यकानिंग पापायकारे ऽमलदीपक त देव ॥ ॥ प्रसादनातत्परसेवकस्येष्मितार्यदाने । देवद ।। सुखरनेर्यंतचारुदेह देवे NGI लग ॥ इत्यष्टक श्रीनिनमनदम पनति ये मजुननावयुक्या।।तेपा गृहे पुल्यनिधाननव्या कयाणकाराम नवति । ध्य एति श्रीमकिननायकस्य श्रीसूर्य पुरनूपणम्य श्रीसनवनाथम्याटर सपूर्ण ॥ अथ श्रीसूक्तमक्तावली प्रारन ।। मालिनी उद ॥ सकलसुस्तवाली पुटजामतमाला निजमनसि निगाय श्रीर नन्य मूनि ॥ ललितवचनलीलालोकनापानिवरित कतिपयपये मुनमान्न तनोमि ॥ १ ॥ अथकमसग्रहकाव्य ॥ शार्दूलविक्रीडितब्द ॥ तत्त्वज्ञानमा कपन जिनह सेवा साधता तेह पाई ॥ श्रथगुरुविणे ॥ स्वपरसमयनाणेच ME यानाविपतितानाधजिकई । इरसलमय सायावे ॥ पण इक बुदिर जस नर गज माजी मुनिकामा तानको ॥ इसमय यया सजाय साचा निक मुक्तावली. झान संसारमा ते ॥ नवजाननिधि तारे सर्व जे उरख वारे ॥ निजपरहित - ज्ञान ते का न धारे ॥ ॥ यवज्ञपि म गाथा बोधयीन निवारयो । क पट • चिलातीपुत्र संमार वारयो । अतनाणत जुझानी मास तुनादि यावे॥ श्रुतथि थ य दाथे रोहियो चोर नावे ॥ १७॥ श्रथमनुष्यजन्मविपः॥ नवजलनधि नमं को वेला विशेषे ॥ मनुजजनम लाधो उलहो रत्न लेखे ॥ सफल कर सुधर्मा , म ते धर्मयोगे । परनवसुख जेथी मोदजयी प्रनोगे ॥ ११ ॥ मनुजजनम प मी बालने जे गमे ॥ शशिनृपतिपरे ते शोचनाथी नमेवे ॥ सुलह दश कथा यूं । मानुरखोजन्म ए ने । जिनधरम विशेपे जोड़तां सार्थ ते ते ॥ १२ ॥ अथसऊन विपेः ॥ सदयमन सटा इखियां जे सहाई । परहित मतिनाई जास वाणी मि वाई ॥ गुणकरि गहराई मेस्ज्यू धीरता ॥ सुजनजन सदा तेह थानंददाई ॥१३॥ जा उरजन लोके दृहव्या टोप दे ॥ मनमलिन न थाए सजना तेह ते ॥ इप दजनकपुत्री थंजना कष्टयोगे॥ कनकजिम कगोटी ते तिसी शोल नोगे ॥ १४ ॥ यथगुणविपे. ।। गुणगहि गुण जेमा ते बहू मान पावे ॥ नर सुरनिगुणे ज्यूं फूल शीगे चढावे ॥ गुणकरि बदु माने लोक ज्यूं चश्माने ॥अति कम जिम माने पू ने त्यूँ न माने ॥ १५॥ मलयगिरि कडे जे जवुलिबादि सोई॥ मलयजतरु संगे चटना तेइ होई ॥ इम लहिय बडायूं कीजिये संग रगे ॥ गजगिरचडि वेठी ज्यूं यजा सिहसंगे ॥ १६॥ श्रथन्यायविपे ॥ जग सुजस सुवासे न्यायलही उपासे ॥ व्यसन उरित नाले न्यायथी लोक वासे ॥ इम झटय विमासी न्याय अंगी करी जे॥धनय परिहरीजे विश्वने वश्य कीजे ॥ १७ ॥ पशु पण तस सेवे न्यायथी जे न चूके । यनयपथ चले जे तास मृके ॥ कपिकुन मिलि सेव्यो रामने नीस नामी ॥ श्रनयकरि तज्यो ज्यूं नाइए लंकस्वामी ॥१॥ हय गय न सहाई ६ की सटाई ।। रिपुविजय वचाई न्याय ते धर्मदास धरमनय धरे जे ते सुखे रिजीपे ॥ धरमनय विहूणा तेहने वरि कोपे ॥ १५ ॥ धरमनय पसाये पांमवा व तेई । करि युधे जय पाम्या राज्यलीला सहेई ॥ धरमनय विहूणा कारवा माता रणसमय विगृता पांमवा तेह जीत्या ॥ २० ॥ अथप्रतिज्ञाविपे. । यशुन जिकाई यादयुं जे निवाहे ॥ रवि पण तस जोवा व्योम जाणी 'हे ॥ करिगहन तिवाहे तास निस्संत थापे ॥ मलिन तनु पखाले 'मा सूर आपे ॥ २१ ॥ पुरुषरयण मोटा जे गणीजे धराये ॥ जिण जिम प न्यूं ते न बाड़े पराये ॥ गिरिग विष धयो जे ते न अद्यापि नारख्यो ॥ उर नाते दिन न काजोरमा जताई।॥३१॥ग्निय गुण पहीजे जेहयीश्रीव iममा ६ प्रकारविष॥तन धन ताणायायुमरगा ॥ उपसम दीयर वायो॥ घर सफल फलतो शीत धर्म सुहाव्यो । २६ ॥ श्रथ कुन सहज गुण वर्ग ज्यू गखमा तताई ॥ थमृत मधुरताई चलमा निर्व पुरनप सुग्नाई ऽदुमा ज्यू मिगई ॥ कुलज मनुजकेरी स्यू सुनारे ननाई। ॥२॥ जिण घर घर विद्या जो छो तो न ६ ॥ जिण घर जय नान' न माजन्य वृद्धि ॥ सुकन जनम योगे ते त्रणे जो सहीजे ॥ श्रनय पुमर ।। ना जन्म गायकीज || २८ ॥ यय विवेकषिपे ॥ हदय घर विक प्राधि न्वय नाग ॥ करम नर पतंगा स्वाग तेने विधसे ॥ विना जादोर वामे ॥ माजना तणो तो माह थवार नागे ।। परम धरम वमु, पतीजे नि पिहीना || सरन गुण नया जे ते पिके चिनीना । जिमस्र निपुगगनमि गहे मिते ।। ठगति जुगति कीपीजे पिके उगते ॥२०॥ थप पिनय नि || निनिषिण नशिसार न्यून गोल्ने कलाई निया नमार म्यून पिया यमाई ॥ पिनयरहि सदाई जेह विद्या समाविर' निपूरे विश्य कोन गजे ।। दिन वन भजे विद्यय विव रज नि पर वियामश्व एणतमाम | गुरुमुप नणि पिया दराम: ११७ सूक्तमुक्तावली गति नर से विक्रमादित्य राज्यो ॥ २२॥ यथ उपशमविपे कारी सटा लोफमाही ॥ उपशम धर प्राणी ए समो सौख्य नाही ॥ तर ३ प सुर मेवा सर्व जे यादरे ॥ उपशमविण जे ते वारि मथा करे ले ॥३॥ उपमम रस लीना जास चित्ते विराजी । किम नर नारी हिमा तेत्र र जी ॥ गज मुनिवर जेहा धन्य ते ज्ञान गेहा ॥ तपरि श दहा शाति पार प मेहा ॥२४॥ श्रथ त्रिकरणादिविषे ॥ जग जन सुखदाई चित्त एबु सदा । मुने श्रति मधुराई सार वाया सुहाई ॥ व परहित हेते अण्य ए छक जान । तप जप व्रत सेवा तार्थ ते सर्व तेने ॥ २॥ मण वचतनु वये गाई एमजेने ॥ निज घर निसता निराधर्म तने ॥ जिम त्रिकरण शुद्ध कर ॥ ज निययितापी वि तह रिया ॥ ३२ ॥ यप पिचारिष घाम नाम तय नगि जग मुवामा सम 1 गिरि नृप रयां नोज याणे मयुरे ॥ नि gi
सूक्तमुक्तावली.
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परहित कहिले जे तादरी ए समे ते ॥ जब जनम जरा जा लागशे
वंत साई । कहि न तिण समे तो कोण थाशे सहाई ॥ ३५ ।। नहि त
सफल वाव ना नदी नीर पीवे । जस धन परश्रय तो चले जीव जीवे ।।
नान करण नारदा विक्रमा राम जेवा ।। परहित करवा जे उद्यमी दच तेया॥३६॥
॥अथ उद्यमविपे । रचण निहितरी ने उद्यमें लमि आणे ।। गुरु नगति हरीने उ
द्यमे शास्त्र जाणे ॥ उग्य समय सहाई उद्यमे से नलाई ॥ अति अप्लस तजी
ने उद्यम लाग नाई ॥३७॥ नृपशिर निपतंती वीज जात्कारकारी ॥ उदम क
सिबुद्धी मंत्रिए ते निवारी ॥ तिम निज सुतकेरी श्रावती उद्देशाने ॥ उदम
करि निवारी ज्ञानगर्न प्रधाने ॥ ३ ॥ अथ दानविपे ॥ थिर नहि धन राख्यो
तेम नाग्यो न जाए ॥ ऽणि पर धन जोतां एव गत्या जगाए ॥ इह सुगुण सु
पात्र जद नक्ति नावे ॥ निधि जिम धन धागे साथ तेहीज श्रावे ॥ ३ ॥
नस बनि हरिचढा नोज जे जे गवाए ॥ प्रह समय सदा ते दानकेरे पसाए ॥
इम हृदय विमानी सर्वथा दान दीजे ॥धन सफल करीजे जन्मनो लाहुली
जे ॥ ४० ॥ अथ मीनविपे॥श्रशुल करम घाले गीत गोना दिखाले ॥ गुणगण
अजुश्राले श्रापदा नर्व टाने ॥ तस नर बहु जीवी रुप लावस्य देई ॥ परनव शि
व होई शीत पाजे जिके ।। ४१ ॥ इण जग जिनदास श्रेष्ट गीने सुहायो । ति
म निरमल झीले शील गंगेव गायो। कति करण नरिदा ए समां जिकोई।
परनव शिव पामे गीत पाले तिकोई ॥३॥अथ तपविपे । तरणि किरणथी
ज्यू सर्व अंधार जाए। तपकरि तपथी यूं सुख ते दूर थाए ॥ वनि मनिन थ
यूं जे कर्मचमाल ती ॥ किम तनु न पखाले ते तपस्वर्ण नीरे. ॥४३॥ तपविण
नवि थाए नाश 5 कर्म केगे॥ तपविण न टले जे जन्म संसार फेरो॥ तपब
जिलद लब्धी गोतमे नंदिखणे 1 तप बलि वपु की विष्णु वैक्रीय जेणे ॥४॥
अथ नावविपे । मनविण मिलवो ज्यूं चाववो दंतहीणे ॥ गुरुविण जावो ज्यूं
जीमवो घ्यू थलणे ॥ जसविण बदु जीवी जीव ते ज्यू न सोहे ॥ तिम धरम
न सोहे नावना जो न होहे. ॥ ४५ ॥ नरत नृप इजाची जीरणश्रेष्टि जावे ।।
वलि वजकल चोरी केवल ज्ञान पावे ॥ वजनद हरिणजे पंचमे स्वर्ग जाए ।
उहज गुण पनाये तास निस्तार थाए ।॥ ४६॥ अथ क्रोधविपे ॥ तृण दहन द
हंतो वस्तु ज्यू सर्व वाले || गुण करण नरी यू क्रोध काया प्रजाले ॥ प्रसमज
लद धाग पन्हि ते क्रोध वारो || तप जप व्रत सेवा प्रीतिवानी वधारो. ॥ ४ ॥
निनिदिन नर पामे जेहयी दुग्य कोडी॥ तज तज धन चोरी कटनी जेहधारी ॥ ५२ ।। थथ लोनविपे ॥ सुण वयण सयाणे चित्तमा लोन मारो सात सनकेरो मार्ग एलोन जाणे ॥ इक खिण पण एने सग रंगे म लागे । ना जय उस दे ए सोनने दूर त्यागे ॥ ५३ ॥ कनकगिरि कराया लोनयी नदार निज थरथ न याया ते हया देवताये । सयल निधि सही जे स्वाय तंतिम कीजे ॥ मन तनह वरीजे लोन तृष्मा न ठीजे ॥ ५४ ॥अथ दयाविष। सुस्ता लप घेतोसछि विद्या सहली॥ विरतिरमण केली शाति राजा महेनी ॥ सात निज सरण परेपो नयी जेण राख्यो ॥ पट दशम जिने ते ए दया घRT यो । तिह त्हदय धरीने जो दया धर्म कीजे ॥ जवजलधि तरी मुसहर त्रिण थनिक तजीजे साववाणी वदीजे ॥ ५७ ॥ जग थपजश वाधे पूडबार समयहिराणी साच विश्वास साणी ॥सुपसन सुर कीजे साचथी त तरी। वदतां ।। वसु नृपति कुगत्ये साख कूडी नरतां ॥ असत वचन परी सापन । त पारी॥ वद वचन विचारी जे सदा सारख्यकारी॥५८॥ यथ चोरीविष।। २१४ सूक्तमुक्तावली धरणि परशुरामे कोधि निक्षत्रि कोधी ॥ धरणि मुजुमराये कोधि निब्रह्मि त धी । नरकगति सहायी कोर ए 5ख दाई । वरज परज नाई प्रीति है ज तक 514 ॥ यथ मानरिपे ॥ विनय बनतणी जे मूल शाखा घिमोडे ॥ नककेरी शुखलाबंध तोडे । उनमद करि दोडे मान ते मत्त हाथी । निषत्र करि ले जे थन्यथा दूर एथी ॥ ४ ॥ विपद विष समो ए मान ते सर्प जाण मनुज विकज होवे एण मके जडाणो ||हन परिहयो जो मान याधने तो ३ निज कुन विणसाड्यो मानने जे वहतो ॥५॥ अथ मायाविपे ॥ नितुपए, निवारी हीयडे हेज धारी। परिहर जमाया जे असनोपकारी ।। मधुर मधु बोले तोहि विश्वास नाणे॥यहि गिल प्रमाणे मायिने लोक जाणे ।। ५१॥ म कर म कर माया दन दोपहनाया ॥ नरय तिरिय केरा जन्म दे जेह माया। बनि नृप उलवाने विनु माया वहता ॥ लदुयपण सह्यू जे वामनारूप गुण नजेरी जे दया जीव केरी ॥ निजदय रीत साधिए मुक्ति सेरी ॥ जे ॥ ५६ ॥ श्रथ सत्यविपे ॥ गरल अमृत वाणी साचा अग्नि पाणी ॥ को निण देते मर्षय दर बाग जग जन हितकारी होय सतोप धारी ॥ पर विना हतो रोहिणीचा गहनय कुमारे ते ग्रह्यो बुद्धि सग।"
सूक्तमुक्तावला. ११५ अथ कुशीनविपे । अयश पमह वागे लोकमां लीह नागे ॥ उरजन वदु जागे जे कुजे लाज लागे। सजन पण विरागे मां रमे एण रागे॥ परतिय रस रागे दो पनी कोडि जागे ॥ ६१ || परतिय रसरागे नाश लकेश पायो । परतिय रस त्या गे गीत गंगेव गायो॥ द्रुपद जनक पुत्री विश्व विश्वे विदीती॥ सुर नर मिलि सेवी गोनने जे धरती ॥ ६ ॥ अथ परिग्रहविपे ॥ शशिउदय वधे ज्यूं सिंधु वेला नलेरी धनकरि मन साए तेम वाधे घणेरी रित नरग सेरी तूं करे ए परेरी॥ ममकर अधि केरी प्रीति ए अर्थकेरी॥ ६३ ॥ मनुज जनम हारे ॥ खनी कोडि धारे ॥ परिय द ममता ए स्वर्गना लोख्य वारे ॥ अधिक धरणि लेवा धातकी खंग केरी ॥ सुचम कुगति पामी चकिराये घणेरी ॥ ६४ ॥ अथ संतोषविपे ॥ सकल सुख नराए विश्व तावश्य थाए ॥ नवजलधि तराए 5 ख दूरे पलाए । निज जनम सुधारे आपदा दूर वारे ॥ निज धरम वधारे जेह संतोष धारे ॥ ६५ ।। सकल सुरवतणोते मार संतोष जाणे ॥ कनक रमणिकेरी जेह हा न थारो ॥ रजनि कपिल वांध्यो स्व पनी लोलताए ॥ नमर कमल बांध्यो ते असंतोपताए ।। ६६ ॥अथ विषयविपे ।। शिवपद यदि वांने जेह प्रानंद दाई॥ विपसम विपया तो वमि दे 5 खदाई ।। मधुर थमृत धारा दूधनी जो सहीजे ॥ श्रति विरस सदा तो कांजिका संग्रही जे ॥ ६ ॥ विषय विकल ताणी कीचके नीम नार्या ॥ दशमुख श्रपहारी जा नकी रामनायां ।। रति धरि रहनेमी कीडवा नेमि नायो । जिण विषय न वा तेह जाणो अनायां ॥ ६ ॥ अथ इंश्यिविपे ॥ गज मगर पनंगा जेह नंगा कुर गा | sक क विषयार्थे ते लहे पुख चंगा ॥ जस परवा पाव तेहतुं शू कही जे । म त्दृदय विमासी हि पांचे दमीजे ।। ६५ ॥ विषय वन चरतां इंडिजे उंदडा ए ॥ निज वश नवि राग्वे तेद दे उखडा एप्रवदा करण मृत्यूयं श्रगुप्त इ पामे ॥ स्ववश सुख लह्या ज्यूं कुर्म गुदि नामे ॥ ७० ॥ अथ प्रमादवि सहु मन सुग्व वांने इखने को न वाले। नदि धरम विना ते तौरव्य ॥ संपजे ते ॥ इह सुधरम पामी का प्रमाद गमीजे ॥ यति अलग तजीने उद्यमे धर्म की जे ॥ ३१ ॥ इह दिवटा गया जे तेह पाठा न यावे ॥ धरम समय थाले काप मादे गमावे ॥ धरम नवि को जे वायु वाले पहा ॥ शशि नृपनिपरे त्यु मोर ना धन पावे ॥ ७॥ अथ साधुधर्मविपे । माइज विकीहितमंदाजे पंच व्रत मे नार निवदे, नि नंग रगे रहे ।। पंचाचार धरे प्रमाद न करे. जे 5 परिम्नासते ।। पांचे हि तुरंगमा वा का.मोझार्यने तंग्रहे ॥ यो पुष्कर माथु धर्म धन ने, जे पे ॥
ज्यो ।। लग्पमिलहिय शाके विक्रमे विश्व रज्यो ॥ ७॥ अथ रुपण विरुण ए विद्या रुपने कोण जोवे ॥ अनिनव सुखकेरो सार ए अर्थ जाणी । सकन, रस्पो ॥ अरथ विण वसिऐ राम जातो वेख्यो । सुरुत सुजत कारीयर्थ तर, उपाजो । कुवराज उपजतो अर्थ ते दूर वजा ॥३॥ अथ हित चिनि ॥ परहित करवा जे चित्त उन्माद धारे ॥ परस्त हितहीये जेनकाई विसार मिति हित परथी ते जे न वांजे कदाई । पुरुप रयण सोई वदिए सो सदाई ४० निल उखन गणीने पारकू उख वारे ॥ तिहतणि बलिहारे जाए कोहि रे॥जिम विपनर जेणे मक पीडा सहीने ॥ विपधर जिनवीरे बूजव्या त वहन ॥५॥पथ लमीषिपहिरि सुत रति रगे जे रमे रात सारी ॥ शिवतनय कुमा दे सो सोहि दिल्यात होवे ॥ ६ ॥ लखमि वति यशोदा नदने विश्वमोहे। खमि विण धिरुपी सनु निटून सोहे ॥ लवमि सदिय रोके जे शिलादित्य सूक्तमुक्तावली ज्यूं यहे त्यूं बहे ॥ १२ ॥ माजिनीचंद ॥ मयण सरर मोमी कामिनी सग माग तजिय कनक कोडी मुक्तिसू प्रीति जोडी । नव नय जय वामी शुक्ष चारित्र पामी। इद जग शिवगामी ते नमो जवु स्वामी ॥ ४ ॥ अथ श्रापकर्म विषेश दूलविक्रीडितछद ॥ जे सम्यक्त सही सदा व्रत धरे. सर्वज्ञ सेवा करे ॥सयाका कभादरे गुरु नजे, दानादि धर्माचरे ॥ नित्ये सद्गुरु सपना मनपरे एनो जि माधीशरे । नारख्यो पापकर्म दोय दगधा, जे श्रादरे ते तरे ॥ ४५ ॥ मालिनी बद ॥ निशिदिन जिनकेरी जे करे गु६ सेवा ॥ श्राणु व्रत परिजेत काम थान, देवा ।। चरम जिन वारदे जे सुधर्मे सुवास्या । समकित सतरता पाया तामा स्या ॥ ७६ ॥ इम श्ररथ रसाला जेरची सक्तमालावरम नृपति वाना मात्र नी वद शाला ॥ धरम मति धरता एउहा पुस्य माध्यो॥ प्रथम धरम करा सार र वर्ग साध्यो ।। ७७ ॥ इति श्रीमत्सूक्त मुक्तावल्या धर्मार्ग प्रथम समाप्त ॥१॥ ॥ अथ अर्थवर्ग प्रारन । खलादिमा व्यसनादि य, महावा कसा ॥ १ ॥थय वर्ष उपेंड्वजाबद ॥ अथार्थवर्ग हितचितन श्रीमिनपचार्यस्व महीशसेवा ! विपे मालिनी बदः ॥ श्ररथ घरजि जेणे स्वापते विश्व होवे धरम एथी साधिए चित्त आणी रथ व कवनो जेह वेदयाइ.स जिण विण सक्तमुक्तावली. ११७ कल जिम मंचे कीटिका धान्यकेगे ॥ मधुकर मधु संचे नोगवे को अनेगे । ति म धन रुपाणगे नोपकारे दिवाये ॥ इमहि विलय जाए अन्यथा अन्य खाए ॥ G॥ रुपण पाणु धता जे नवे नंद गया ॥ कनक गिरि कगया ते तिहां अर्थ नाया ॥ म मनत करतां इग्य बाग वमीजे ॥ रूपाग पाणु तजीजे मेघज्यूं दा न दीजे ॥ ॥ अथ याचनविपेः ॥ निग्मल गुण गजी त्यां लगे लोक गजी। तब लग कहि जीजी न्यां लगे प्रीति काजी ॥ सुजन जन सनेही त्यां लगे मि प्रतही ॥ मुग्य यकिन कहीजे ज्यां लगे देहि देही ॥ १० ॥ ज वडपण वांचे मांगजे तो न काई । लदु पग जिण होवे केम कीजे निका॥ जिम लघु या सोने वीग्यी दान ली, ॥ दरि बल नृप श्रागे वामना रुप की। ॥ ११ ॥ अथ नि धनविपे ॥ धनविण निज बंयू तेदने दूर हंडे ।। धनविण गृह नायर्या तेह सेवा न मंडे ॥ निरजल सरजेवो देव निर्जीव जेवो ॥ निग्धन तृण जेवो लोकमें ते गणे वो ॥ १२ ॥ सरवर जिम मोहे नीर पूरे नरायो ॥ धन करि नर सोहे तेम नीते उपायो । धनकरिय सुंहतो माघ जे जाग दूतो॥ धनविण पग सूजी तेह दीगो मरं तो ॥ १३ ॥ अथ राज मेयाविपेः ॥ सुजनसु हित कीजे उर्जना सीख दीजे ॥ जग जन वश कीजे चित्त वांठा वगैजे ॥ निज गुण प्रगटीजे विश्वना कार्य कीजे ॥ प्रनु सम विचरीजे जो प्रनूसेव कीजे ॥ ४ ॥ जगतिकरि वडानी सेव कीजे जिकार्ड ॥ अधिक फल न थापे कर्मथी ते तिकाई ॥ जलधि तरिय लंका सीत संदेस लावे ॥ हनुमत करमे ते राम कचोट पावे ॥ १५ ॥ अथ खलताविपे॥ रस विर स नजे ज्यू धंव निव प्रसंगे ॥ खत मिलण दुवे त्यूं अंतरंग प्रसंगे ॥ सुण सु ण मसनेही जाणि ले रीति जेदी ॥ खल जन निसनेही तेहशू प्रीति केही ॥१६ मगर जल वसतो ते कपीराय दीठो ॥ मधुर फल चरवावी ते करयो मित्र मीठो ॥ कपि कलिज नग्वेवा मत्स खेली खलाई॥ जलमहिं कपि बुद्धी गमि दे ते नला ॥ १७ ॥ अथ अविश्वाशविपे ॥ उपजाति ठंट ॥ विश्वासिसाये न ले रमीजे॥न वरि विश्वास कदापि कीजे ॥ जो चित्त ए धोर गुणे धरीजे ॥ तो लह लीला ज गमा वरीजे॥१७॥श्वजाउंट॥ चाणायके ज्यूं निज काज सायो॥जे राज जागी नृप तेह माग्यो । जो घूअडे काक विश्वास कीयो ॥ तो वायसे घूकने दाह दीधो ॥१॥ श्रथ मैत्रीविषे ॥मालिनीठंद ॥ करि कनक सरीसी साधु मंत्री सदा ॥ घसि कसि तप वधे जास वाणी सवाई ॥ अहव करहि मंत्री चंमां सिंधु जेही ॥ घट घट वध वाधे सारया बेसनेही ॥ २० ॥ इह सहज सनेहे जे वधे मित्रता ॥ रवि प नजे ।। मृगयाथी उरव जे लह्या नवा ॥ हरि रामादि नरेश जे हवा ॥३॥ चीपाईछंद । स्वर्ग सौख्यनणि जो मन आशा ॥ वाहे तो परमार विलासा ॥ जेण एण निज जन्म उखए ॥ सर्वथा न परलोक सूखए ॥ ७॥ थथ ए विषयोना उदाहरणो ॥ शार्दूलविक्रीडितघद ॥ जूवा खेजण पोमचा वन नम्या, मद्ये बलीदारिका ॥ मांसे श्रेणिक नारकी सुख लह्या, बांध्या नरे चार रमे, जे ए तजे ते तरे ॥२॥ अथ कीतिविपे ॥मालिनी उद ॥ दिशिदिशि पसर- का ॥ श्राग्वेटे दशरत्यपुत्र विरही, केवन्न वेश्या घरे ॥लकास्वामि परत्रिया स- ती चश्मा ज्योति जैसी ॥ श्रवण सुगत लागे जाण मीठी सुधासी ॥ निशिदिन जनगाये रामराजिद जेवी ।। इणि कलि बहु पुष्ये पामिये कीर्ति एवी ॥३० वर्ष प्रधानविपे । सकल व्यसन वारे स्वामिसू नक्तिधारे। स्वपरहित बधारे राज्यना का पधारे ॥३१॥ अथ कलाधिपे ॥ चतुर कर कलानो सग्रहो सौख्यकारी । गुण जिण साधी डोण सपत्ति सारी ॥ त्रिपुर विजय कर्ता जे कलाने प्रसगे॥हि गाना न वेदे ॥ तस कुपचन खेदे तेहने सोव जे दे॥ नृपशिर रज नाखी जेणम् सें वहीने ॥ हित कहत हणीज्यु वानरे सुग्रहीने ॥३२॥ अथ लळाविपे । निज ११७ सूक्तमुक्तावली रि न चले ते काजज्यूं बंधुताई ॥ हरि दलधर मैत्री रुमने जे तमासे ॥ हनपर , जखधे से फिस्यो जीवि थासे ॥२॥ श्रथ व्यसन पि ॥ नजिन मनिन मोना ) मथी जेम थाए ॥ इह कुवसनथी यूं सपदा कीति जाए । कुपिसन तिण देते है वथा दूर कीजे ॥ जनम सफल कीजे कीति कांता वरीजे ॥ २२॥ श्रथ यूतविषे॥ तपिलबित बंद ।। सुगुरु देव जिहां नवि सेखो पनविणा सदुए जिण खनवे ॥ नवे नमवू जिण कवटे । कहिनि कोण रमे तिण जूवटें ॥ २३ ॥ श्रथमांस प्रदान विपे॥ उपजातिवद॥ जे मास सुधा नर ते न होगात राक्षसा मानुषरूप सावात्रा चोरीपिपे ॥जे लोकमां नर्ग निवास करी ॥ निवारीए ते परश्व्यचोरी ॥ २४ ॥ श्रथम यविपे ॥ नुगप्रयातनद ॥ सुरापानथी चिन सत्रात थाये । गले लाज गनीरता को ल जाये जिहां ज्ञान विज्ञान सूजे न बूझे ॥ इश मय जाणी न पीजे न दी। ॥२५॥ अथ वेश्याविषे ॥ कहो कोण वेश्या तो अंग सेवे। जिणे थर्थनीलाउने दाणि होवे ॥ जिणे कोग सिदा गुफाये निवासी बल्यो साधु ने पानग्यो श्वनानी ॥२६॥ अथ ग्वेटकविपे॥ उद॥ मगयाने तजजीव घात जे ॥ सघले जीव दया सा परस्त्री । सूक्तमुक्तावली. ए वचन निवाहे लाज ग्युराज्य वाले ॥ व्रत नय कुलरीतें मातज्यूं लाज पाले ॥ सक त गुण सुहावे लाजथी नावंदेवे ॥ व्रत नियम लह्यो जे नाइला प्रनावे ॥३॥ शालिनी ठंट ॥ एवा जे जे रुयडा नाव राजे ॥ एणेविश्व अर्थथी तेह बाजे ॥ एवं जाणी सार ए सौरव्य केरो॥ ते धोरा जे अर्थ अजै नलेरो ॥ ३५ ॥ इतिश्री सूक्त मुक्तावल्या अर्थवर्गो वितीयः समाप्तः॥ २ ॥ ॥ अथ कामवर्ग प्रारंजः॥ उपजाति छंदः।। ग्राह्याः कियतः किल कामवर्गे कामो नृनार्यों गुणटोपनाज.॥ सुतण योगवियोगयुक्त समातृपितृप्रमुखाः प्रसंगाः ॥ १ ॥ अथ कामविपेः ।। कंदर्प पंचानन तेज धागे ॥ कुरंग जेवा जगजीव नागे ॥ स्त्रीशस्त्र ले जग जे व दीता ॥ तिएण देवा जनवृंद जीता ॥ २ ॥ मालिनी ठंद. ॥ मनमथ जगमाहे 5 जयीजे घद्यापी॥ त्रिवन सुरराजी जासशस्त्रे सतापी ॥जलज विधि उपासे वा विजा विष्णु सवे ॥ हर हिम गिरिजाने जेण अर्जग देवे ॥ ३ ॥ शार्दूलविक्रीडित वेदः ॥ जिन्लीनाव चव्या महेश उमया, जे काम रागे करी ॥ पुत्री देखि चल्यो चतुर्मु ख हरी.धाहेरिका बाटरी। इंगोतमनी त्रिया विलसिने. संजोग ते योलव्या॥ कामे एम महंत देव जग जे, ते नोलच्या रोलच्या ॥४॥ मालिनी लंद. ॥ नस नृ पद वदंती देखि चारित्र चाने ॥ घरह नरहनेमी ते तपस्या विटाले ॥ चरम जिन मुनी ते चिन्नणारुप मोहे ॥ मयण सर व्यथाना एह उन्माद सोहे ॥ ५॥ अथ गुणदोपोनावनविपे ॥ रयोक्ताउँदः ॥ उत्तमा पण नरा न संनवे॥ मयमा तिम न योपिता दुवे ॥ एह उत्तमिक मध्यमी पणो ॥ वेदुमांहि गुणटोपनो गिणी ॥६॥ तत्र पुरुषगुणा यथा ॥ शार्दूलविक्रीडितवंद.॥ जे नित्ये गुण वृंट ने परतणा. दोषां न जे दाखवे ॥ जे विश्वे उपगारिने उपकरे, वाणीसुधा जे लवे ।। पूग पूनिम चट जेम सुगुणा, जे धार मेरुसमा|उंमा जेद गंनीर सायर जिम्या, ते मानवा उत्तमा ॥७॥ धनुष्टुप् सुंदरुप सौनाग्य संपन्नाः सत्वादिगुणगोनना. ॥ ते लोके विग्ना धीरा श्रीराम सहशा नराः ॥ ७॥ अथ पुरुष दोपा यथा ॥ शार्दूलविक्रीडितलंद ॥ संकासामि दरति राम तजि जे, गीतातणी एवकी ॥ स्त्रीवची हरिचंद पांडव नृपे, र दणा नराखी सको । राने गामि निज स्त्रिया नल नृपे. ए दोर मोटा नणी। जीवों उत्तम मांहि दोष गणना, का वात बीजातणी ॥ ॥ अथ स्त्रीगुणा यथा ॥ उपजा तिछंदः ।। सुसीख थाले प्रिय चिन चाले । जे शीत पाले गृह चिंन टाले ॥ दाना ॥ जे न दाग्वे ॥ प्रिय मितण समे जे थतरो तेह राखे ॥ १५॥ श्रय वियागविष रज जेम थोपे ॥ ज्यां धर्म चर्या बहुधा परीखी ॥ त्या मातपूजा सहुमा सरस्वी ॥१७॥ जे मात मोह जिन एम कोपो ॥ गर्ने वसता त नेमलीगोजेमातना वे सुतने रमाहे ॥ विद्या नणारे सरसू जमाडेते तातनो प्रत्युपकार एहीजे तह मात तातपद पकज सेगा।जे करे तस सुपुत्र कहेवाजेह कीर्ति कुजनान वा ॥ सूर्य जेम जगि तेज सधारे॥ २१ ॥ शातिनीलद ॥ गगापुत्रे विश्वमा कौन/ रोपी । याज्ञा जेणे तातरीनलोपी॥ ते धन्या जे अजनापुत्र जेवा ॥ जेसी/ घी जानकी नाथ सेवा ॥ १२॥तोटकपद ॥ इम काम पिल्लास उजास तए।। सरीति हदे थनुनावतए ॥ जिमचढन थग पिलेप तए ॥ हिय होय सदा र १२० मूक्तमुक्तावली दि जेणे गृहधर्म होई ॥ ते गेहि नित्ये घरननि सोई॥ १७ ॥ यथ वीनारायण ॥ उपजातिवद ॥ ना हण्यो जे पति मारफाये ॥ नाख्यो नदीमा शुक मानिका ये ॥ सुदर्शनश्रेष्टि सुगीन राख्यो । ते थान देई थनयाय दाख्या ॥ ११ ॥ वन ततिलका वद ॥ मारयो प्रदेशि सुरिकाति विपयाचजीए ॥ राजा यशोधर दरया न यनापलीए ॥ 5खी कयो स्वसुर नूपुर पडिताए ॥ टोपी प्रिया इम न इण दोपताए ॥ १२॥ थथ सुजवणी स्त्रीपिप -शार्दूलविक्रीडितद ॥ ही रूपवती सुगीज सुगुणी, लावण्य श्रगे लसे ॥ लाखु प्रियवादिनी प्रियतणे, चित्र मदा जे वसे ॥ लीला योवन उनसे उरवसी, जाणे नलोके वशी ॥ एवी पुग्नाचे पसाय लहिये, रामे रमा सारशी ॥१३॥ उपजाति० ॥ सीता मुनश ननरागस णी ॥ जे झोपदी शीजवती बरखाणी जे एही गीतगुणे समाणी ॥ मुनला ते जगमाही जाणी ॥१४॥ अथसयोगविपे || मालिनी द प्रियससि प्रिययागे अ से नेत्र रगे ॥ हसित मुख गशीज्यु सर्व रोमाच अंगे॥ कुच क मुझवरी नत्रा ॥ शशिरसिकरसो जे सरसो सो लागे ॥ प्रिय विरद प्रियाने सुख शूशून जा ॥१६॥ श्रथ माताविप। वजाउद जे मातनो बोल कदान लोपे॥ जे विश्वमा स श वयणे प्रबुद्धो ॥ शीना तपते अरहन सी थपितापिपे ॥ जे वान नी नक्ति हिये वहेही ॥१॥ मानिनोन र राया जे हरीन । ॥ तिम दशरथ राया जे प्रसन्ना मुनिज्ञ ॥ मन जन जेते पुत्रने माह स्खा ॥ स्वसुत हित करीते तेहना काज साखा ॥ अथ पुत्रविणे वागतान सपतए ॥ २३ ॥ इति श्रीमुक्त मुक्कापया काम वर्गस्तृतीय समाप्त " ॥ में 197 ---- मृक्तमुनावली. अथ मोक्रवर्ग प्रारंजा उपजानिएंटः ॥ प्रात्यायिनः किल मोदबंग कर्मदयानंयमनायनायाः॥वि वैकनियंदनिजप्रबोधा इयमेने प्रवरप्रसंगाः ॥ ॥ मौदार्यवि मालिनी ६. ॥ जय मुग्य देने के प्रवन नग॥ पग्नव सुम्बहन जे प्रयतं घनेग॥अव प्ररथ मी मुनि, पंथा अगधे ॥ परम पुम्प माई जेद मांदाय नारे ॥४॥ सजिय नगत के जेाग ने ग्न नूमी ॥ शिवपथ जिण सायो सोलमे मांति सामी ॥ गजमुनि सुप्रनिमा म प्रत्येक बुझा ॥ चवर यर्थ तंठी धन्य ते मोद लु॥३॥ श्रय कर्मविपे । करम नृपति कोपे उग्य यापे घणेगा नग्य तिरय केरा जन्मज न्मे अनेग ॥ शुन परिणति होवे जीवने कर्म ते ॥ सुग्नरपतिफेरी संपदा सोड देवे ॥ ४ ॥ करम शशि कलंकी कर्म निरू पिनाकी ॥ करम वनि नरें प्रार्थना विष्णुरांकी ॥ करम वश विधाता इंश मर्यादि दो ॥ सब करम सोई.कर्म जेवो न कॉर्ड ॥ ॥ अथ कमाविपे ॥रित नर निवारे जे क्षमा कर्म वारे ।। सकल तप सधार पुन्य लक्ष्मी बधारे ॥ श्रुत सफल थराध जे दमा मोद साधे ॥ जिण निज गुण वा ते कमा कां न साधे ॥ ८ ॥ सुगति लहि खिमाए खंध स्रोत मीसा ॥ सुगति दृढ प्रहारे कूरगा मुनीसा ॥ गज मुनिस खिमाए मु क्ति पंथा थराधे ॥ तिम सुगति रिखमाए साधु मतार्य साधे ॥ ७ ॥ अथ संयमविपे स्वागता तंद ॥ पूर्व कर्म मवि संयम वारे ॥ जन्म वारिनिधि पार उतारे ॥ तेह संयम न केम धरीजे ॥ जेण मुक्ति रमणी वग कीजे ॥ ७॥ तुग शेल बलदेव सुहायो॥ जे ण सिंह मृग बांध बतायो । तेम संयम लहीय घरायो। जेण पंचम सुरालय पायो ॥ ॥ ॥ श्रथ वादश नावनाविपे.॥तत्र प्रथम अनित्य नावना मालिनी वंदपण कण तनु जीबी वीज जात्कार जेवी ॥ सुजन तरुण मंत्री स्वप्न जेवी गणेवी ॥ थहमत ममताए मूढता कांड माचे ॥ अथिर अरथ जाणी एणशू कोण राचे ॥ १० ॥ धरणि तरु गिरिंदा देखिए नाव जेई ॥ सुर धनुप परे ते जंगुरा नाव तेई इम ददय विमासी कारमी देह वाया|तजिय लरतराया चित्त योगे लगाया॥११॥ वित्तीय घसरण नावना ॥ परम पुरुष जेवा संहस्खा जे रुतांते ॥ थवर सरण के नुं लीजिये तेह अंते ॥ प्रिय सुत्दृद कुटंवा पाश बेठा जिकोई ॥ मरण समय राखे जीवने ते न कोई ॥ १२ ॥ सुर गण नर कोडी जे करे जास सेवा ॥ मरण नय न लूटा तेह शिदि देवा ॥ जगत जन हरंतो एम जाणी अनाथ॥ व्रत यहिय वि - नृटो जह संसारमांधी ॥ १३ ॥ तृतीय संसार नावना ॥ शार्दूलविक्रीडितछंदः॥
चतुर्य एकलनावना - | रिकर्पूर सुश्व्य सोई॥ ते काय सयोग मलीन होई॥२०॥थशुचि देही नर नारि की ॥ मराच जे एमलमूत्र सेरी॥ए कारमी देह असार देखी।चतुर्थ चक्रिय पण ते उदेसी ॥२१॥सप्तमीथाश्रवनावनामालिनीबद ॥ह अविरति मिथ्या योग पापादि सार। मर समय थात्मा सवरी सो प्रचुके ॥श्शा वजाबद ॥जेकुडरीके व्रताडि नाश्तणू तेवति राज्य लीचुाते ख पाम्या नरके घणेरातेहेतु एथाश्रवदोपका एवज स्वामी॥जेणेत्रिया कचन को डिवामी ॥श्वानवमीनिजरानावनामानिनी। थटमीसवरनावनाजे सर्वथाश्रावनेनिरुधे। तेसवरीसवरनाव साधे॥ते नावनों छद ॥ऽपदस तपनेदे कर्म ए निर्जराएाउतपति थिति नाशे लोक नावानरापारनन । जगबोधीउलनाधर्मबुद्धीनिव हरणि विनावोजावना एहशुद्धी॥२पाउपजातिक्षा ये निर्जरा काम सकाम तेही॥थकामजे ते मरुदेविजेही॥ ते ज्ञानयोकर्मह निर्व रोजे ॥ दृढ प्रहारी परि तो तरोजे ॥२६॥ दशमी लोकनावना मानिनीसंग जिम पुरुप विलाये ए अधो सोक तेवो ॥ तिरिय पण विराजे थाल स्योहन में। वो॥ उरथ मुरज जेवो लोकनाले प्रकास्यो । तिमज नवन नान केवनी ज्ञान। जास्यो ॥ २७ ॥ एकादश बोधिदुर्खननावना ॥ स्वागता उदः ॥ बोधि वीनस जेह अराधे ॥ ते शनासुत परे शिव साधे ॥ धर्म नावन सही नवि नावो ।स। २२२ सूक्तमुक्तावली तिर्यचादि निगोद नारकितणी, जे योनि योनी रह्यां ॥ जीवे दुख अनेक सुनिल णा, कर्मप्रनावे लयां ॥ या संयोग वियोग रोग बदुवा, या जन्म जन्मे पुची । ससार असार जाणि हवो, जे ए तजे सो सुखी ॥ १४ ॥ श्वनाउँन ॥जे जी ते उत्तम जाति जाए ॥ जे उच्च ते मध्यम जाति थाए ॥ ज्यूं मोमेताव मुनी जाए ॥ त्यूं मग सूरी पुरयद थाए ॥ १५ पुण्ये थकलो जिव स्वर्ग जाए। पापे अकेलो जिव नर्क जाए ॥ एजीव जात्रा व करेअकेलोए जाणिने ते ममता महेलो ॥१६॥ उपजाति पद ॥ए एकनोजी व कुटव योगे ॥ मुखी रखी ते तस विप्रयोगे॥स्वी हाथ देखी वलयो अकेलापन मी प्रबोध्यो तिणथी वहेलो राम धन्यवनावना ॥ जो आपणे देदजर न होई ॥ तो अन्यको श्रापण मिन को सर्वश्रन्या नणीजे ॥ केहो नि । हां हर्ष विपाद कीजे ॥१७॥ देहादि जे जावको अनेरा ॥ इयो 5 ख कीने तर नासकेरा ॥ ते जाणिने वाणिने प्रबोधी॥ सुकोसले स्वांगन सारकीची ॥१९ अचिनावना ।। काया महा एह अशुचिताई । जिहा नवधर वहे सदाई ॥ पण नव जीवा श्राव कमवा जनकने श्राश्रया जे न रुधे । .
मृतमुनावली. मंनि परे एप पात्रो ॥ - ॥ अथ गगधि ॥ श्वना ।। गमगले नव बंगलात जागतंगग वही अनाणी गोगन गगमन गगीयांग देवानि जति जागी ॥ २॥ अथ पवित्र ।। रे जीव विहेप मने मयाण॥ विप संसार निदान जाणे ।। गानुन मितिकृट की ।। जुठ जनश गिरवाल दी ॥३०॥ अननोति। पतनिलराट.॥संतांपतृत जननं सुप होयजे ॥ ते ऽव्य सुब्ध जननं सग्य नादि नेषु ।। नंतोपवंन जननं गद लोक मेये ॥ गजेंक सरि मा सरिजंद जोवे ॥१॥ विवेकविष उपजाति वंद. ॥जो जेह चित्त सुवि देवनाग ।। नामांह चंपाररिकार नारे ॥ विवेक विहानतणे प्रमाण ॥जीवादि जे चम्न म्बनाय जाणे ॥ ३२ ॥ वजा नंदः ॥ वाला पणे संपम योग धावांइन काचति जण नारी ॥ श्रीवीरकरो श्रयमन ॥ सुझान पाम्यो सु विवेक । ॥ ३३ ॥ श्रय निर्वदविपाशार्दूलविक्रीडितलंदाजे बंधूजन कर्म बंधन जि ना, नोगा जंगा गिणे ॥ जातो विषतारिखी विषयता, संमारता ते हणे ॥ जे तं माग्द गगहेतु जनने, संसार लावा दुदे ॥ नावी ते विरागवंत जनने, वैराग्यता दावदे ॥ ३४ ॥ वसंततिलकादंद ॥ निवेट तं प्रवन पुनर दिखाणो ॥जे वोडवा मनध बुध तेह जायो। निर्वेदयो तजिय राज विवेक लीयो ।योगी नर्तृहरि तं यम योग लोगो ॥३॥ श्रथ यात्मबोधविषाए मोहनींद तजि केवल वोध हेते॥ ने ध्यान शु६ दि नावनि एक चित्ते ॥ ज्यूं नि प्रपंच निज ज्योति स्वरूप पावे ॥ निर्वाध जे थखय मोच सुखार्थ थावे ॥३६॥ मालिनी बंद ॥ नवि विश्यतणा जे चंचला नारख्य जाणी ॥ प्रियतम प्रिय योगा नंगरा दिन थाणी ॥ करमटल खपे 5 केवल झान ने ॥ धन धन नर ते मोह साधे जिकई ॥ ३५ ॥ इति मोक्ष्व '.. चतुर्थ समातः ॥ ठपनाति वृत्तं ॥ इत्येवमुका किस सूक्तमाला विनूपिता वर्गचतुष्टयेन ।। तनोतु ना मधिकं जनानां कंठस्थिता माक्तिकमाजिकेव ॥१॥ शार्दूलविक्रीडिनं वृत्तं ।। धामीमणसिंधुपार्वणगशी श्रीमत्तपागठपः सूरि• श्रीविजयप्रनानिधगुर्बुध्या जित म्यगुरु ॥ तत्पादयनूधरो विजयते नावानिवोद्यत्मन. सरिश्री विजयादिर बसुगुसर्वि पहानानंदन. ॥ ॥ श्रापदिनं ।। विख्यातास्तभाज्ये, प्राडा श्रीगतिवि मलनामान.॥ तल्लोदग बनवु. प्राज्ञा. श्रीकनकविमजाव्हा ॥३॥ तंपामुनी विनया विहान् कल्याण विमन इत्याव्ह.।तत्सोदरोहितीय. केसरविमनानियों ऽवरजः ॥ तेन चनुनि वै ग, रचिता नापानिवसरुचिरेयं ॥ सूक्तानामिह माला, मनोविनोदाय ॥ यथ लाचरणकरेवे हेनव्यो जेमा कोइनिनथी एटलेनिकलवानो वारणोनची बनीमा समस्तप्रकारे पाचयाश्रवरुप मेघ वरसीरघुने तथानानाप्रकीरना ज्ञानावरणीयादि) | साररुपवन तेमाफिरनाराजे प्राणीयो तेने स्थिरकरवानेयर्थं करुणाकरीपवित्र थर्प ।। हवेजेगांतसुधारसते नायनाथोविना स्फुरतोनथी तेकहे विज्ञाननाको यदिद रोदति मोतिरोदिताभुतगतिविदिता समतालताधा. २७४ .शातसुधारस. बालाना ॥ ५॥ वेदेशियपि च,प्रमिते श्रीविक्रमाहते व ॥ अयि सूक्तमाना केनर विमलेन विवुधेन॥६॥ इति श्रीसूक्तमुक्तावली सपूर्ण ॥ श्री शखेश्वरपार्श्वनाथाय नम ॥ श्री विनयविजयजी उपाध्याय:त शांतसुधारस अथ अर्थसहित पारन शार्दूलविक्रीडितवद ॥नीर नवकानने परिगलत्पचाश्र वानोधरे नानाकर्मलतावितानगढने मोदाधकारोल्धुरे ॥ भ्रातानामिद देदिना स्थिरकृते कारुण्यपुण्यात्मनिस्तीय शे प्रथितास्सुधारसकिरो रम्या गिर पातु व ॥१॥ श्रर्थ ॥ प्रथमययकर्ता ग्रथनेयादें श्रीतीर्थकरदेवनी वाणीनी स्तुतिकरी मा सेजी थमृतरसने वरसती एहवीरमणीयजेवाणी ते तमारु रक्षणकरा ॥१॥ द्रुतविलवित वृत्तत्रय।स्फुरति चेतसि नावनया विना न वि उपामपि शातसुधारस ॥ न च सुख कशमप्यमुना विना जगति मोदविपादविपाकुले ॥२॥ यदि नवभ्रमखेदप राड्मुख यदि च चित्तमनतमुखोन्मुख ॥ शृणुत तत्सुधि य शुननावनानृतरस मम शातसुधारस ॥ ३ ॥ सुम नमो मनसि श्रुतपावना निदधता घधिका दश नावना ॥
१२५
शांतसुधारस.
ना यंतःकरणमांपण शांतिरूपयमतनोरत तेलाव विना स्फुरतोनथी यने मोह
तथा खेद तद्रूपविकरीव्याप्त एहवोजेजगत तेमां शांतसुधारसविना किंचित्मात्र
योमोपणसुरखनथी ॥ ॥ माटेथाशांतसुधारसनामा ग्रंथसानलवानो उपदेशकरे।
हेबुद्धिमंतो जोतमारुमन तंसारभ्रमणकरवाना खेटेकरी पराङ्मुख उपरांतूं थयोहोय
थनेजेमां अनंतसुखो एहवोजेमोद तेनासुखपामवानेविपे सन्मुखथयो होय तोजेमां
मनोहरनावनानो रसनरेलोवे एवोमारो आशांतसुधारसनामा ग्रंथसजिलो ॥३।।
हवे नावनाथी समताप्रगटथायतेकहेठे हेपंमितजनो थासंसारमा जेनुश्रवणमा
त्रकरवायीज पवित्रतानेकरनारी एहवीवारनावना तो तेने धारणकरनारो जेजीव
तेनाझयमां मोहजेयज्ञान तेने बातादितकरनारी यनेजेहनी अभुतगतिठे एहवी
प्रख्यात समतारूप वेलीप्रगटथशे ॥ ४ ॥
रथोचतात्तआर्तरोऽपरिणामपावक प्लुटनावुकविवेकसौष्ठवे॥
मानसे विपयलोलुपात्मना व प्ररोतितमा समांकुरः ॥५॥
श्रथ ॥ हवेसमतापामवाने जे अयोग्यहोयतेकहे जेनुमन पांचेंश्यिना त्रेवीत
विपयोनेविपे लोलुप एहवाप्राणायोने थार्त रोऽध्यानेकरीने उत्पन्नथयेली एह
वीजे मातापरिणामरूप अग्नि तेणेकरीने नावनाना रसनेविपेजे चतुरपुरुपोठे तेना
विचाररूप रुडापणुं जेमांथीवलीगयुंचे एहवाप्राणीयोना मनमा समतानोयंकुर
किहांथी उत्पन्नथाय अर्थातनजथाय ॥ ५॥
वसंततिलकावृत्तं ।यस्याशयं श्रुतकृतातिशयं विवेकपी
यूपवर्परमणीयरमं श्रयते ॥ सभावना सुरलता नदि
तस्य दूरे लोकोत्तरप्रशमसौख्यफलप्रसूतिः ॥ ६ ॥
अर्थ ॥ हवेसमतापामवाने योग्यहोयतेकहेठे सिद्धांतश्रवणाटिकेकरीने थत्यं
तपणे संपूर्णनरेला वृद्धिपामेला तथा विवेकरूप यमृतवृष्टीनी रमणीयजेक्रीडा ते
रोकरीने रम्यके मनोहर शोनायमान एडवांजेनां अंत करणळे तेवांयंत करणो
मां सनावनायो अयंतेके० प्रवेशकरे तेथीतेपुस्पने लोकोत्तरजे प्रामके० शांतर
सनासुख अर्थात्मोदनुग्व तेनाफलने प्रसवनारी एहवीज सुरलताके० कल्पलता
ते दूरनथी अर्थात् तेहने मोक्ट्टरनथी ॥ ६ ॥
मिनी मानियोन तेरा पिपत्तियकरीपुतने अने समस्त परमार थर्प ॥ दवेप्रथमथनित्यनावना नावां शरीरनु थनित्यपणुदेखाडेने और | नजन याजगतमा थनतीनानोपरे कानगुर थनेजेहनो जयकरवो अत्यंतकनी जे मनुष्योनुरते शिवानजे पंमितलोक तेनापण महोटा उदयकरवानु भारत ही मानपादाने पाणीनातरंग हनीपर यापुपपणयग्नन अपं ददेवशयक समारनो थनिन्यपणुदेरखामेने हेप्राणी थाससार २२६ शांतसुधारस. अनुष्टुब्सत्तक्ष्या। अनित्यताशरणते नवमेकलमन्यता ॥ अशोष माश्रव चात्मन् सवरं परिनावय ॥७॥ कर्मणो निर्जरा धर्म सुक्ता लोकपद्धति ॥बोधिउलनतामेता नावयन्मुच्यसे नवात् ॥ अर्थ ॥ हवेचे श्लोकेकरी थाग्रथमानाववानी वारनावनाधोना नामकहने । अनित्यनावना र थरपनावना ३ ससारनावना ४ एकत्वनावना ५ ॥ न्यत्सनावना ६ अनुचिनावना थाश्रवनावना सवरनावनाहेयात्मातुं एच बनायोनो विचारकर ॥ ७ ॥ ए कर्मनिर्जरानावना १० धर्मनावना ११ IN रनो लोकसरूप नायना १२ बोधि न नावनाहेयात्मातुं एवारनावनाओं को कि चारकरतोपको ससारथकीमुक्तथइस ॥ ७ ॥ पुष्पितामात ॥ वपुरवपुरिद विदभ्रलीलापरिचितमप्यतिनगुरं नरा णा ॥ तदतिनियौवनाविनीत नवति कयं विज्पा महोदयाय ॥ पाचे एहयो तरणयास्यायेकरी उन्मत्त मदनजे कामदेव नाजेद सुंदर एका मोरोपाय अपितुनहीनथाप । ए॥ शार्दूलविक्रीडित टनक्ष्य। आयुर्वायुतरतरंगतरल लग्नाप द सपद सर्वपीडियगोचराश्च चटला सध्याघ्ररागादिवता। मित्रत्रीचननादिसगममुरास्वप्रेजालोपम तल्कि यस्तुन ये नदिद मटामालन यत्सताप्राततिरिदार दानस्चयो यचंतनातना दृष्टा विश्वमन प्रमोटविपुराना या म्बत मुंदगताम्तव दिने रिपाकविरसात् दा नश्य त पश्यनयन प्रेतदन जहानि न नरप्रेमानुयव ममा॥
शांतसुधारस. २२७ विषय ते संध्याकालना बाकाशजेवासुंदर एटले संध्याना अन्ररागनीपरें सुंदर तो पण अचरागनीपरें थोडीवारपनि विनाशशील तथा मित्र स्त्री स्वजन इत्या दिकोनोजे समागम तेणेकरीने थयेचुंजेसुख तेस्वप्नसरोखू किंवाजालसरखं ते वारे यातंसारमा सत्पुरुषोने याश्रयकरवायोग्य कश्वस्तुवालं, अर्थात्कोइजनथी सर्वविनाशशील अनित्य इतिनाव ॥ १०॥ वली चातके हेनाई जगतमा जे प्रजातसमयें स्वहकांतिवान तथा अत्यंतपणे जगतने आनंद थापनारा थने स्वतासुंदरजे चेतनपदार्थ अने अचेतनपटार्थना नावदीगहोय तेपदार्योनो काल परिपाक थयाथी तेहिनदिवसे शोनायेंकरी हीन थजायचे अने नाशपामेठे ए दवापदार्थोंने जोनारो एहवो महारं हतके० नष्टथयटु जे अंतःकरण ते संसार संबंधने मूकतुंनथी ए कहेवी महोटी खेदनीवातठे ॥ ११ ॥ ॥ प्रथमनावनाटकं रामगिरिरागण गीयते ॥ मूढ मुह्यसि मुधा ॥ मूढ मुह्यसि मुधा ॥धुवपदं ॥ विनव मनुचित्य हदि सपरिवारं । कुशशिरसि नीरमिव गलद निलकंपितं ॥ विनय जानीहि जीवितमसारं ॥ मू॥१॥ अर्थ॥ हवेवलीवितोपें यनित्यनावना नावतोयको संसारनुं यनित्यपणुं देखाडे वे हेमूर्खशिष्य तु परिवारसहित पोतानीसंपनि, चिंतनकरीने मुव्यर्थमोहपामेछे वायुचें हलाव्योथको कंपायमानथयीने गलीजनारो एहवो दननाथग्रनागें रहेना रोजे पाणीनु विड्यो तेनीपरें हेविनय था तहारंजीवितव्य असारठे एमजाण एरीतें विनयविजयजीउपाध्याय पोतेपोताने प्रतिवोधकरतो वीजानेपण उपदेशकरे॥१॥ पश्य नंगुरमिदं विपयसुखसोह्रदं पश्यतामेव नश्यति सदासं ॥ एतदनुदति संसाररूपं रयाज्वलकलदवालिकारुचिविलासामूणा अर्य ॥ वलीहे मित्रतु जो के याविपयसुखते क्षणनंगुर जेमकोई हायतालीदे ने हसतांहसतांज नाशीजायठे तेनीपरें विपयमुखपण जोतांजोतान नहता एह वाजायचे वली था संसारनु स्वरुपते वेगेकरीने जनारी एहवीजे वीजली तेना जधुकानी कांतीनु यनुकरण करेले एटले एतंतारनु स्वरुपते वीजलीनीपर चंचलाश हंत दतयौवनं पुवमिव शौवनं ॥ कुटिलमति तदपि लघु दृष्टनष्टं ॥ तेन बत परवशापरवशा इतधियः। कटुकमिद किं न कलयंति कष्टम्॥मूणा३ 19G शातसुधारस श्रर्थ ॥ था एकमहोटी खेदनीपत के उष्टतारुण्यपणुंते कुतरानी पुडीमारिलो वांको थने जेहने जोतावारज तुरतनहीएवोजायचे थर्थात् नाशपामीजायजे वा तारुण्यपणाने परवा पराधीनथयला हतषियके नएक्षियतजे पुरुषोडे ते ससारमा परवशाके० स्त्रीयो ते कष्टकारी कडवाफलनीथापनारीने एह जाए तानयी माटे बतइतिखेदे एपणएकमहोदु खेदनोज कारण ॥ ३ ॥ यदपि पिण्याकतामगमिदमुपगत ॥जुवन यजरापीतसारं॥ तदपि गतलजमुमतिमनो नांगिना वितथमतिकथितमन्मयविकाराामूणा॥ श्रयं ॥ जोपण प्रणेलोकना प्राणीयो जेने जीतवाने थत्यतथसमर्थ एहवीजे जरायवस्था तेणेकरीने जेपुरुषनु सारके सत्वपणु जतुरपुढे एटले जरायकरी भारीरदीपगने का एगरीर उल थयु होय तोपण निलऊप्राणीश्रोना मन निफज युधिषी उत्पन्नययता कामविकारने मृकतानथी ॥ ४ ॥ मुखमनुतरसुरापधि यदतिमेर॥कालतस्तदपि कलयति विरामक तरदितरत्तदा चम्त मासारिकास्थिरतर नवति चितय निकाम ।मु०५ सर्प । तयोरे पापयनुत्तरिमानना घणाज पुष्टकारीसुरखने तेनीपण मर्यादा ते पणकार मादापुरीयपाथी गिमपामेने तो पांच अनुत्तरयिमान करता प्पी पीतीने जेससारमा यभारेस्थिरीनूतथी पातनोतु महोटोविचारकर पै सम क्रीमिता ये च नृशम मिना य महाकृप्मदि प्रीतिवाटतान जनानीदप रत जम्मयगतान्निपिंगका स्म प्रति जमादा जीमायें यापणे सदमेम ग्मता पनता मारता तया जेनीया पणे यापन मनिका यने जेनीमायें श्रापणेप्रीती वाताहता तेविजया लीन गम्मत पंगपना देगीने पण जोयम निगम रहिय तो वतानिने एवोने यमागे प्रमाद नेप्रमादने विकारहाना ॥ ६ ॥ अमादुन्मिय निमिपनि मिमिवचननाचंतना सानामा ॥3 सोपमा म्वननसनमगमानेपुरत्यनि मुढम्बनाता ॥ मु० ॥ ७ वर्ष जेन ममुश्ना कलान वागार मपनीने नागपामेले तेमज जगत मापदायने जगमनाना नार एमजाणवु यने जगनमा इम्यादि ने घर नेमानन मग्गियां तो नया पदार्यावर राणी गगनकामन'
शांतसुधारस.
२२
कवलयन्नविरतं जंगमाजंगम जगददो नैव तृप्यति कृतांतः ॥ मुखग
तान् खादतस्तस्य करतलगतैन कयमुपलप्स्यतेऽस्मानिरंतः ॥ माता
अर्थ ।। वली स्थावर अने जंगमात्मक जगतने निरंतर नक्षणकरनारो एहवोजेक
तांतके यमते तृप्तथातोनयी एमहोटोधाश्चर्य तोमुखमां आव्याप्राणीनो नभएक
रनारोजे कालतेनाजहाथमा रहेनारा अमेये ते घमारोमृत्यु केवीरीतेनथाय।।७॥
नित्यमेकं चिदानंदमयमात्मनोरूपमनिरूप्यसुखमनुनवेयं॥
प्रशमरसनवसुधापानविनयोत्सवो भवतु सततं सतामिद न
वेऽयं ॥ ए॥ इतिमहोपाध्याय श्रीकीर्ति विजयगणिशिष्योपा
ध्यायश्रीविनयविजयगणिविरचिते शांतसुधारसगेयकाव्ये
अनित्यनावनाविनावनो नाम प्रथमः प्रकाशः ॥
अर्थ ॥ तेमाटे नित्य एकचिदानंदमय जे महारोबात्मा तेहतुं स्वरुपजोऽने सु
खनो
अनुनय ढुंकरीग इहां विनयविजयजी उपाध्यायकहेवेके या मनुष्यनवमां
दातिरसरुपजे नूतनअमृत तेहनेपानकरवानो उत्साह सत्पुरुपोने निरंतरहोजो ए
इतिश्रीमन्महोपाध्याय श्रीकीर्तिविजयगणिशिप्योपाध्याय श्रीविनयविजयगणि
विरचिते शांतसुधारसेगेयकाव्ये अनित्यनावनाविनावनोनाम प्रथमःप्रकाशः ॥
शार्दूलविक्रीम्तिं दत्ताये पटखंडमहीमहीनतरसा निर्जित्य वभ्राजिरे ये च
स्वर्ग जो नुजोर्जितमदा मेर्मुदामेराः ॥ तेपि क्रूरकृतांतवकरदनर्निर्द
ल्यमाना दगदत्राणाः शरणाय हा दश दिशःप्रेहंत दीनाननाः ॥ १ ॥
थर्थ ।। हवेवीजी यशरण जावना नावे थासंसारमा मृत्युद्यावेथकेको ने को
नु शरणनथी एमदेखाडेने दाऽतिखेदे जेपुरुप महोटापराक्रमेकरी उखमष्टथवी
जीति शोनानेपाम्या
एहवा चक्रवर्ती तथा जेहर्पकरीपुष्टथयता घने जेहनी छ
जायोमा उलटवलवे एटले स्वर्गनासुखनोगवीने धानंदपाम्याचे एहवा देवतायो
नेपण जेवारे कूरहदयवंत जे यम तेपोताना मुखमाले दांतोनावलात्कारेकरी न
इणकरे तेवार तयशरण थयाथका टीनमुरखकरी कोऽनुशरणलेवानेथे दशे
दिशाये जुएले तोपणतेने कासनादातमांची मूकाववाने कोई समर्थनथाय ॥ १ ॥
स्वागतारनं ॥ नावढेव मदविभ्रममाली तावदेव गुणगौरवशा
ली॥ यावदत्तमकृतांतकटाददितो विशरणो नर कोटः ॥ ३ ॥
॥ १३७ शांतसुधारस अर्थ ॥ माटेजेनो रक्षणकरनार कोश्नथी एहवो एमनुष्यरुपीयो कीटजेकीहोते हनेजिहांसुधि सहनकरवाने उर्जन एहवोजेकाल तेणे पोताना कटाकरीजोयुन थी तिहांसुधी मदजे बहकार तेनाविलासेकरी शोने श्रने तिहांसुगीज गुणोनो गौरवपणु धारणकरे ॥२॥ शिखरिणीरत्त ॥प्रतापापन्न गलितमय तेजोनिरुदितर्गत धैर्योद्योगै श्लथितमथ पुष्टेन वपुपा॥प्रटत्त तद्रव्यग्रहणविपये बाधवजनैर्जने कीनाशेन प्रसनमुपनीते निजवश ॥ ३ ॥ थर्थ ॥ पण जेप्राणीने जेवार यमराजाय पोतानाधीनको तेवारें तेप्राणी नो प्रतापपण नाशपाम्यो भने अदितथयबुजेतेज हतु तेपणगलीग तया धैर्य व ने उद्योग पण जतुरा वली शरीरपुष्टहतो तेपण शिथिलथईगपुथनेतेपुरुषर्नु एक करेलु इष्य लेवाने यर्थे बाधवजन जे नाईयो प्रमुख हता ते प्रवर्तयया ॥३॥ दीतीयत्नावनाष्टक मारुणीरागेणगीयते स्वजनजनो बदुधा हितकाम प्रीतिरसैरनिराम।मरणदशावशमुपगत वत रक्षति कोपिन सत ॥२॥ विनय विधीयता रे श्रीजिनधर्म शरणा। अनुसधीयता रे शुचितरचरणस्मरण ॥ विण ॥॥ ध्रुवपद ।। थर्थ ॥ फिरि सम्पदृष्टीजीवे विशेषेकरी अशरणनावनाने कहे जेपोताना स्वजनलोकडे तेघणुज हितनावालक तथा प्रीतिनीराखनार दिकरीते घणाप्रकारे रुडा पणतेसर्व स्वार्थनिमित्नजाणवा ए तात्पर्यवे परतु. पुरुषो जेवारे जीव मरणयवस्था पामवाने तैयारथयो तेवारतेनु सरहण र कोईनथी॥१॥ तेमाटेग्रंथनाका श्रीविनयविजयजी उपाध्यायकहेठे के नय तु श्रीजिनधर्मनु शरणकर यने पवित्र एहजे चारित्रतेनु स्मरणकर ॥ २ तुरगरथेननरातिकलित दधत बलमस्खलित ॥ हर ति यमो नरपतिमपि दीन मैनिकश्य लघुमीन ॥ वि० ॥३॥ धर्य ॥ घोडा रप दाधी पायदल एचतुरगणी सेनायेकरीपुक्त तथा पोतेपण यस्वलित बजने धारणकरनारो एटलेको कालें खलनापामेनही एहवो महापरा कमवत राजा तेनेपण जेरी मनिक मालानोमारनार जटवे ने लघुमी नके न्हाना दीनमानसाथीने पकडीजिये तेरीतें यम पफमीतिये॥३॥ त शांतसुधारस. १३१ प्रविशति वत्रमये यदि सदने तृणमथ घटयति वदने । तदपि न मुंचति दतसमवर्ती निर्दयपौरुपनर्ती ॥ वि० ॥ ४ ॥ । बाजो वजमय एटले वजनाज परमाणु बनावेला घरमांप्रवेशकरे अथवा मुखमां तृणपलाधारणकरे परतु निर्दय थने पराकमेंकरी नाचनारो तथाजेहनी सर्वेनेविर्षे समानघातकरवानीजत्तिवे एहवोजेयम ते तेनेपण मूकतोनथी ॥४॥ विद्यामंत्रमदौपधिसेवां सृजतु वशीकृतदेवां ॥ रसतु रसायनमुपचयकरणं तदपि न मुंचति मरणं । वि०॥५॥ । अर्थ | हेप्राणी जो देवतानुसाधनकरी पोतानेस्वाधीनकरो अथवा महोटीम होटी विद्याथो साधनकरो मंत्रसाधनकरो तथा महोटी औषधियोसाधी शरीरपु ही करवानेयर्थ थारोगो तोपण मरण मूकतुंनथी॥ ५ ॥ वपुपि चिरं निरुणद्धि समीरं पतति जलधिपरतीरं ॥ शिर सि गिरेरधिरोदति तरसा तदपि स जीयति जरसा॥विणा॥ अर्थ ॥हेनव्यो जो समाधीचडावी शरीरने घणाकालसुधी वायुनोरोधकरोथथ वा समुश्ने पदेलाकांते जईवेशो अथवा वलात्कारें पर्वतनाशिखरउपर चडीवेशो जरायवस्थाथी दीपयq ते काईबंधयतुनथी ॥ ६ ॥ सृजतीमसितशिरोरुहललितं मनुजशिरोवलिपलितं ॥ को विदधानां नघनमरसं प्रनवति रोएंजरसं ॥ वि० ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ कालाकेशकरीने घणोजसुंदर एहवो मनुष्यनो कालोमस्तक तेने सपेतप पानी करनारी तथा गरीरना मांसनोनागकरनारी खोखरासरीखोकरी नशोनसने सूरी करीदेखाडनारी पृथवीउपर मेघसमान शरीरतेने शुष्ककरीनारखनारी एहवीजग यवस्था जेवारे प्राणीने श्रावशे तेवारे तेनोरोधकरवाने कोण सहायनूतथसे थ यात् कोऽपण व्यावस्थानो रोधकरवाने समर्थनथाय ॥ ७ ॥ न्धत नग्ररुजा जनकायः कः स्यानत्र सहायः ॥ एकोऽ नुनवति विधुरुपरागं विनजति कोपि न नागं । वि० ॥॥ धर्ष ॥ हेवात्मा जैवखतें ताहाँशरीर उमरोगेकरी व्याप्त पाशे तेवरखतें तुजने कोणसहायथागे ! यो जेमचंमा एकलोपोतेज राइना महणनी पीरानांगवेवे प तोपण . ते उदयनेपामनारोजे लोनरूप अनोनि के उदकते शातकरी शक्तोनथीपणतटो थतनथी यनेदावानल सरियो थर्थात् वनयमीसरखो एडवोजेलोन तेनेकोऽपथरी ससारमा विपत्तिरूप खानापाणीनी घमरीमा । २३२ शांतसुधारस. रतु नत्र थथवा ताराकोईपण तेनाड खमांविनागलेतानथीतम. रोगादिक खप्राप्तथशे तेवारे ताहरोकोऽपण सबंधी तेऽ खमाविनागसेनारनथी शरणमेकमनुसर चतुरगं परिदर ममतासग ॥ विनय रचय शिव सौख्यनिधान शांतसुधारसपान ॥ विण ॥ए॥ इति श्रीशातिसुधार स गेयकाव्ये अशरणनावनाविनावनो नाम दितीय प्रकाश ॥ अर्थ ॥ माटे दान शील तप धने नाव एचार थग जेहनाठे एहवाएक तु शरणकर अने ममत्वनो सग परिहर हेविनय तु शिवसुरखनो निधान ५. जे शातसुधारस तेनुपानकर ॥ ए ॥ इति श्री शातसुधारसगेयकाव्ये बना विनावनोनाम हित्तीय प्रकाश ॥ शिखरिणीदत्तत्रय ॥ इतो लोन दोन जनयति पुरतो दवध्वी सल्लानानोनि कथमपि न शक्य शमयितु ॥ इतस्तृप्याऽदा णा तुदति मृगतृष्णेव विफला कथ स्वस्थै स्येय विविधनयनी मे नववने ॥ १॥ गलत्येका चिता नवति पुनरन्या तदधिका मनोवाक्काये दा विकृतिरतिरोपात्तरजस ॥ विपातीवर्त कटिति पतयालो प्रतिपद न जतो ससारे नवति कथमप्यतिविरति ॥ ॥२॥ सहित्वा सतापानशुचिजननीकुतिकुढरे ततो जन्म प्राप्य प्रचुरतरकष्टकमदत ॥ सुखानासैर्यावस्पृशति कथमप्यतिवि रति जरा तावत्काय कवलयति मृत्यो सहचरी ॥३॥ ॥ दवे त्रीजी ससारनावना नावे थामसारमा पुरतके घणोमहोटो जेहनो दोनने उत्पन्नकोठे बलीहा ससारमा मगला जेवारतेविफल तेवारीतेऽडियानी हला प्रेरणाकरेठे तेपणाफल तोएहवा अनेकप्रकारना नानाधिनयेकरी बिहा 'णा ससाररुप यरस्यमा। स्वस्थपणे रहिशकिये ॥ १॥ याससारमा एक घरमटिजाय तोफरी 'ए अधिक वीजीचिताथावी उत्पन्नथायवे वनीम विकारथाय तथाथत्योधना योगेंकरी रजो प्रजने क्रमवत स्थने कायार नके न्हानापागु शांतसुधारस. १३३ पगलेपगले परनारा प्राणीधोने कोईचारे रखनो अंतधावतोनथी॥शावली पहे लातो अपवित्रमाताना टरनेविपे नानाप्रकारना उदरसंबंधी संतापोने सहनकर तो कटनीपरंपरायेंकरी तामनतर्जनायेयुक्तथको रहे थने जन्मपाम्यापळे जेटलामा सुग्वानान करवाने अर्थ कोऽपणपोताने थतीपीमाशो दूरकरेले परंतु एटलामांतो मृ युनी सदचारिणी एहवीजे जराअवस्था ते धावीने प्राणीनादेहनो यासकरेने ते वारे मंसारमा सुखतेसु अर्थात् काउंजनथी ।। ३ ।। नपजातिवृत्तं ॥ विश्रांतचित्तो बत बंभ्रमीति पहीव रुबस्तनु पंजरऽगी ॥ नुन्नो नियत्याऽतनुकर्मतंतुसंदानितः सन्निहितां नकोतुः ॥ ४॥ अनुष्ट्रव्वृत्तं ॥ अनंतान पुजलावर्ताननंतानं तरूपन्त् ॥ अनंतशो भ्रमत्येव जीवोऽनादिनवार्णवे ॥५॥ अर्थ ॥ प्रारब्धं प्रेरणाकरेलो महोटाकर्मरुप तंतुयेंकरी बांधेलो कालरूप बिना डानीपासें वेठेलो एहवोमाणी वतइतिखेदे शरीररुप पिंजरामा पदीनीपरें संध्योथ को बांतिवंत चिनेकरीफिरेठे ॥४॥ एरीतेअनंतानंत शरीरोनोधारणकरनारो एजी वनंतीवार थनादिकालनो संसारसमुश्मा धनंता पुजलपरावर्तरूप पाणीनी न मरीमा प्रतिघ्रमण करतोथको फिरे ॥ ५ ॥ । तृतीय नावनाटक केदारारागेण गीयते शांतसुधारसकुंमेमां एदेशी ।। कलय संसारमतिदारुणं जन्ममरणादिनयनीत रे । मो दरिपुणेद सगलग्रहं प्रतिपदं विपदमुपनीत रे॥क॥ १ ॥ जीविशेषप्रकारे संसारनावनानावतो संसारनीबीकदेखाहेठे मोहरूप पकडते तेणेकरी पगले पगले विपत्तीनेपामेला अरेजीव था कना नकरी अत्यंतनयंकर एवं तुं जाण ॥१॥ 'रिचयगुणैरिद मुधा वध्यसे मूढरे ॥ प्रति ५६ नवनय नप: परिनवे रसकृउपगढ रे ॥ कण्॥३॥ थर्थ ॥ हेमूर्खथात्मातुं स्वजन धने पुत्र इत्यादिकोना परिचयगुणेकरीने शृंधा संसारमा व्यर्थ धाय वली पगलेपगले नवानवा थनुनवेकरी अने नवानवा परा नवेकरी वारंवारतुं थालिगितको एटले युक्तो ॥ ५ ॥ - १३४ शातसुधारस. घटयसि कचन मदमुन्नते कचिदढो ढीनतादीन रे ॥ प्र तिनव रूपमपरापर वदसि वत कर्मणाधीन रे॥०॥३॥ यर्थ ॥ हेयात्मातु किहाकतो राजलक्ष्मीप्रमुख सपनीनामदने या वलोकिहाकतो हीनतापामी रांकजेवो जीखारीयई दीनतापणाने धारणकरेने वाथाश्चर्य हेजीवतु कर्माधीनथको जन्मजन्मप्रतें थपरयपरके नवानवाज रूपा रेठे कोनिवेनीखारी कोनवेराजा कोनवेतिर्यच कोनवेनारकी वलीएकनवमापण राजारकपणुप्रमुख थनेकरूपधारणकरे ए केहेवो महोटो खेदनोहेतु ॥३॥ जातु शैशवदशापरवशो ॥ जात तारुण्यमदमत्त रे॥ जातु जयजराजर्जरो ॥ जातु पितृपतिकरायत्तरे ॥क॥४॥ थर्थ ॥ थरेजीवतु एकजनवमापण कोकवारेंतो वालकथवस्थाने वाधीनर हेने अने कोऽकवारेतो तारुण्यश्रवस्थाना मदेकरी उन्मनथायठे वलीकोकवारे उर्जय जरा अवस्थाये करी 5 खवतथायठे थनेकोकवारे यमराजाना हाथमा सा डाईजायते एहवी अवस्थाोने पामेठे ॥ ४ ॥ ब्रजति तनयोपि ननु जनकता ॥ तनयता व्रजति पुनरेप रे ॥ नाव यन् विकृतिमिति नवगते ॥ स्त्यजतमा नृनवशुनशेप रोकणा५ ।। यर्थ ॥ हेयात्मा थाससारमा को नवमातो दीकरोते यापथायवे फरीकोक नवमा वापतेदीकरो थायठे एहवी ससारी पुरुषोनी गतियोनी फजेतीजोऽने मनु प्यजन्ममा जेना पुण्यशेपरह्यावे एदवो तु थाससारने मूकीयाप ॥ ५॥ यत्र सुखातिगददवलवेरनुदिन दह्यसे जीव रो॥ दत तत्रैव रज्यसि चिरं मोहमदिरामदतीव रे ॥ ॥ ६ ॥ यर्थ ॥ थरेजीव थाससारमा सुख तथा थारतिजेचिता थने रोगरुप दावान संकरीने तुं नित्यनित्यप्रते दाजे तोपणमोहरूप मदिराना मदेकरी उन्मन ने तेमा जपणाकाजसूची अनुरक्तथायने माटेवतातिखेदे मोहनाफजजीव खीथापन दर्शयन् किमपि सुखवेनव ॥ सहरस्तदथ सदसैव रे॥वित्र लनयति शिशुमिव जन ॥ कालबटुको ऽयमत्रैव रे ॥काशा अर्थ ॥ थरेजी जेमकोबालकने वाला कोचीजतेनाहाथर्मा था पीपाडगे बीनवानश्यं तम हतातिवंद श्राजगतमा कालापीयो बटुकके० धार ते शातसुधारस. तुजने कांकमुख ऐश्वर्यादिक देखाडीने अकस्मात् तेसुखने जाणेनजहता करीनाखेडे एम टोकराने उगवानी रोतें कालरूपबढ़क लोकोने उगेठे ॥७॥ सकल संसारनयन्नेदकं ॥ जिनवचो मनसि निवधान रे। विनय परिण मय निःश्रेयसं ॥ विदितशमरससुधापान रे॥ इति श्री शांतसुधारस गेयकाव्ये संसारनावना विनावनो नाम तृतीयः प्रकाशः॥ अर्थ ॥ तेमाटे अरेविनयतुं शांतिसुधारसनुपानकरी समस्तसंसारिकनय नागकरनार एहवा जिन श्री वीतरागनावचनने मनमांधारणकर यने मोदपान एरोते विनयविजयजीउपाध्याय पोतेजपोताना यात्मानेतीवामण आपेठे। इतिश्रीगांतसुधारसगेयकाव्ये संसारनावना विनावनोनाम तृतीयःप्रकाशः ॥ ३ ॥ स्वागतासत्ताएक एव नगवानयमात्मा झानदर्शनतरंगसरंगः ।। सर्वमन्यांपकल्पितमेतत् व्याकुलीकरणमेव ममत्वम् ॥ १ ॥ अथ। हवेचोथी एकत्वनावना नावेठे एकजनगवानते थायात्माते धने ज्ञानदर्श न नया चारित्ररुप तरगेकरीने सरंगके विलासोते पणते यात्मासिवाय वीजाजे काई कश्पितपुजनादिकले तेसर्व ममतास्पदमांज व्याकुलकरनाराने ॥ १ ॥ प्रबोधतावृत्तत्रय।अबुधैः परनावलालसालसदमानदशा वशात्मनिः॥ परवस्तुपु दा स्वकीयता विपयावेशवशादि कल्प्यते ॥२॥ कृतिनां दयितेति चितनं परदारेपु यथा विपत्तयो।विविधार्तिनयावढं तथा परनावेपु ममवनावन।। ३ ॥अधुना परनावसंपतिं द्र चतः परितोवगुंगिन। तण मात्मविचारचंदनद्रुमवातोर्मिरसाः स्पृशंतु मां ॥४॥ अर्थ ॥ परवस्तुउपर रहेलावत्यंतश्ठाना योगेकरी उपनीजे धज्ञानयवस्थानी बाधीनता ते जेना अंतःकरणमा व्यापीठे एहवामृखोंने जे परकीयवस्तुउपर स्वकी पणुंकप्पेठे तेमात्र गद रुप रसादिकविषयांना यावेडोंकरीजस्थप्योलायचे एए महोटुं सदनुकारण ॥ २ ॥ पुण्यवानपुरुचे परस्त्रीने पोतानीस्वीकरी चितवनक तेजेमविपत्नीन कारणपायठे तेमन परकीयवस्तुउपर जे ममन्वकर तेपण प्रकारनीपीमार्नु धने थनेकप्रकारना नयतुं कारणथायचे ॥
पुरुष ससाररूप जमिनमांपडे लोटेवे थने जनायमान थयोयकोरहे। ॥४ पोतेज पोतानीयात्माने उपदेगेठे के हेविनय तु वस्तुतत्वजे यात्मज्ञान तेनु नथी ॥ १ ॥ हेथात्मा ताहरोजीव एकलोज उपजेने एकलोज मरणपामेने लोज कर्मनेवाये अने तेबधायला कर्मोनाफलनेपए एकलौज नोगवेलें ॥२॥ यस्य यावान्परपरिग्रह ॥ विविधममतावविध ॥ जलधि थर्य । जिहासुधी जेप्राणीनेमाथे परपरिग्रहनपर नानाप्रकारनी जे ममन्य दूपनारपडयो तिहांसुधी तो पहराप्रमुख वजनदारवस्तुयेंनरेलो जिहाज जेम नातलियामां जश्वेसेवे तेम तेप्राणी पण ससाररूप समुश्ना तलियामा । एदु॥३॥ जेम मटेकरी उन्मत्तययला पुरुष स्वकीयस्वनाव एटले मून | वने लोपी जमीनउपरपमी चेप्टाकरेठे तेमज परवस्तुनी घटनायकरी orm शातसुधारस रमा हवे चारेबाजुयेविटेली परवस्तुनी संवृति जे थापादन तेनेदकर अने चाररूप चदनद उपरना वायुनौतहेरीजे रस तेनुएकदणमात्र स्पीकर अनुष्टुवृत्त ॥ एकता समतोपेतामेनामात्मन् वि जावय ॥ लनस्व परमानदसपट नमिराजवत् ॥५॥ यर्थ ॥ अरेजीव थासमतायेंकरीयुक्त एहजे एकत्खपणु तेने तु पोताना स्मामा विचारीजोईतो नेमिराजरूपीनाजेची परमानद सपदानेपामिश ॥ ५ ॥ ॥ चतुर्थनावनाटक परजीयारागेणगीयते ॥ विनय चिंतय वस्तुतत्व जगति निजमिह कस्यकि॥ नवति मतिरिति यस्य हृदये जरितमुदयति तस्य कि॥ वि० ॥ १॥ एक उत्पद्यते तनुमानक एव विपद्यते ॥ एक एव हि कर्म चिनुते ॥ सेकक फलमश्नुते ॥ वि० ॥ २॥ यर्थ ॥ हवेवलौविशेपें एकत्वनावनानावे हाश्री विनयविजयजी वनके विचारकर आजगतमा कोइनोस्वकीयपणुवेकेगु एदवीबुद्धि उत्पन्नथायवे तेप्राणीने उरितपापादिक उदयपामेवेसु अपित्तेने पर विनिहितपोतयुक्त्या पतति तावद सावध ॥ वि० ॥ ३ ॥ स्वस्वनाव मद्यमुदिते नुवि विलुप्य विचेटते ॥दृश्यताप परनावघटनात्पतति विलुवति जुनते ॥ वि० ॥ ४ ॥ M शांतसुधारस- १३७ पश्य कांचनमित्तरपुशलमिलितमंचति का दशां। केवलस्य तु तस्य रूपं विदितमेव नवाहशांविण ॥ एवमात्मनि कर्मवशतो भवति रूपमनेकधा।कर्म मलरदित तु नगवति नासते कांचन विधाविणा॥ अर्थ ॥ जेमनुवर्णमां वीजाधानुनी मिश्रताथवाथी विपरीतदशानेपामेने अने तेसुवर्णना शुबस्वरुपनीतो हेजीब तहाराजेवाने खबरजवे ॥ ५ ॥ तेमजथात्मा नेविषे कर्मरुप अन्यधातुना बकरी नानानकारना रूपथायवे पणकर्ममलरहित शुदानस्वरुपीयात्मातो सुवासरखो देदीप्यमाननासेठे ॥ ६ ॥ झानदर्शनचरणपर्यवपरितः परमेश्वर ॥ एक एवानुनवसदने सर मतामविनश्वरः॥विणाति सचिरसमतामृतरस तणमुदितमास्वाद व मुदा॥विनय विषयातीतसुखरसरतिरुदंचतु ते सदा॥विणानाइतिश्री गांतसुधारसगेयकाव्ये एकत्वनावनाविनावनोनाम चतुर्थः प्रकाशः यथतियात्मा ज्ञान दर्शनधने चारित्रना पर्यायकरीयुक्त एहवो अविनागीजे एकपर मेश्वर तेमहारा धनुनवगृहमा रम्यमाणथजोशमाटेहेयात्मा प्राप्तथयलो एहवोध तिमुंदर समतारुप धमतरस तेनोएकक्षणमात्र पण संतोपेंकरीयास्वादनकर अने हे विनय सर्वकाल विपय मुखथा यतीत एटलेजूदा एहवाजे गांतिसुख रस तेनाउपरताह 15॥इशांतसुधारसगेयकाव्येएकत्वनावनाविनावनोनामचतुर्थ प्रकाशः प्रजातिवृत्तं ॥ परः प्रविष्टः कुरुते विनाशं लोकोक्तिरेपान मृति मन्यो। निविश्यकर्माणुनिरस्य कि कि झानात्मनो नो समपादि कष्टं ॥ १ ॥ यथी। हवे पांचमीअन्यत्वनावनानावतोयको श्रीविनयविजयजी उपाध्यायकहे वे एकनायरमां वीजायें प्रवेशकखो एटले पहेलानानाशकरेवे एहवू लोको बोलवू मने खोलागतुनथी केमके महारोगात्मा ज्ञानस्वरूपी तेमां कर्मरूप परमाणुये प्र वंशकरीने प्रात्माने कोणकोण मटोनीयापी अर्थात् सर्वकष्टोद्यापीज ॥ १ ॥ स्वागतावृत्तम्॥खिद्यसे ननु किमन्यकथातः सर्वदेव ममतापरतंत्रः॥ चितयरर्यनुपमान्कयमात्मन्नात्मनो गुणमणीन्न कदापि ॥ २ ॥ अर्थ ॥ अरेजीवतु सर्वकाल ममताने स्वाधीनथई श्रन्यजे पुजनादिक तेनीज गोष्टीय पीडितको काखेटपामे बने जेहनीको उपमाजनथी एवा तारी थात्मा ना गुणरु पजे मणीरत्न तेर्नुकोश्वारेपण चिंतन केमकरतोनथी एकेटलु अयुक्तवे ॥ रेप्रीतिहोजो।
१३७ शांतसुधारस शार्दूलविक्रीडितं वृत्तक्ष्यम् ॥यस्मे व यतसे विनेपि च यतो यत्रा निश मोदसे यद्यवोचसि यदिवसि हृदा यत्प्राप्य पेप्रीयसे ॥ स्निग्धो येपु निजस्वनावममल निौठ्य लालप्यसे तत्सर्वं पर कीयमेव नगवन्नात्मन्न किचित्तव ॥ ३ ॥ जुटा काटकदर्थना क तिन ता. सोढास्त्वया ससृतौ तिर्यनारकयोनिपु प्रतिहतचिन्नो विनिन्नो मुटु ॥ सर्व तत्परकीयचविलसित विस्मृत्य तेप्वेव हा रज्यन्मुह्यसि मूढ तानुपचरन्नात्मन् न कि लजसे ॥ ४ ॥ श्रयं ॥ हेयात्मातु जेनेवास्ते घणीयत्नकरेते थने जेनायकी घए- तथा जेथकी सर्वकाल थानंदपामेने वली जेनायर्थघणुशोचकरेते अथवा ताहरादयमा हरहमेस इछेने चली जेनादेखवाया थत्यतप्रीतिपामेने जेनेविषे घणुस्नेहराखी पोताना निर्मल ज्ञानादिक वनावनो नाशरी लालनपालनकरेले त्यादिकक्रियाते सर्वपरकीयज पण हेआत्मस्वरूपी नगवन् एमासकीय नयो॥३॥ थरेजीवतुपूर्वोक्तप्रकारेकरतोयको बाससारमा तिर्यंच थने योनीमा थत्पतउष्ट एहवी थनेककदर्थनायो तेनोगवीनथी फेसु थपितु अ केमके मुद्के वारवार नरकादिकयोनीयोमा हणाणु वेदाणु दाए। वी तहारी थरस्थायोथश्तोपणहेमूर्ख तेसर्व परकीय एटले सरुपविना थी विलासथया तेने विस्मृतकरी फरितनाउपरज प्रेमधरीने मोहपामेने ज सेवनकरतोयको केमलातोनथी माटे हाइतिखेदे एपणमहोटी खनीज अनुष्टुववृत्त ।। शानदर्शनचारित्रकेतनाचेतना चिना ॥ सर्वमन्यतिनिश्चित्य यतस्व स्वहिताप्तये ॥ ५ ॥ थर्य ॥ हेयात्मातु ज्ञान दर्शन अने चारित्रनी श्राश्रयनूतजे चेतना । बीजाजे विनाविक पदार्थो तेसने निश्रयथकी तहाराथी बन्यके पोताना हितने थर्थयत्नफर ॥ ५ ॥ ॥ पचमनावनाष्टक श्रीरागेण गीयते ॥ तुजगुणपारनहिनथणोएदेशी ।। विनय निनालय निजनवन तनुधनसुतसटनस्वजनादिपु कि नि जमिद कुगतेरवन विणायेन सदाश्रयसे ऽतिविमोहादिदमहमि त्यविनंद तदपि शरीर नियतमधीसत्यजति नवत धृतखेदावि०॥ .
शातसुधारस.: २३ए थी।हवे विशेषे अन्यत्वनावनानावता श्रीविनयविजयजी उपाध्याय पोतानेउप देशकरेठे के हेविनय तुंतहारापोताना आत्मारूपधरने जो अने संसारमा शरीर व्य-पुत्र-घर स्वजनादिकमां कोणतुजने उर्गतिथी रहाण करवालोठे अर्थात्कोज नथी.एटलेतुं स्वजनादिकनेयर्थे मागकर्मकरेठे तेकर्मनायोगथी जेवारें नरकादिक जुर्गतिमानस तेवारें तहारोहाथपकमीने तुजने कोउर्गतिथी वारीराखोनहीं ॥१॥ वीजातोदूररह्या पणजेनीसाथै तुं अत्यंतमोहनावशथकी ऐकपणुंकरेठे एहबुंजे शरीरतेपण निश्चयीप्रधीरोठे सेवट खेदकरावी तुजने मूकीचाल्योजसे अथवा खेद नोकरनारतुंठों एहवा तुजनेमूकी चाल्योजसे ॥ २ ॥ जन्मनि जन्मनि विविधपरिग्रहमुपचिनुपे च कुटुंव।। तेपु नवं "तं परनवगमने नानुसरति कृशमपि सुवं ।। वि० ॥शा त्यज ममतापरितापनिदानं । परपरिचयपरिणामं ॥ नज निस्संगत या विशदीकृतमनुनवसुखरसमनिरामं ॥ वि० ॥ ४ ॥ ॥ हेप्राणीतुं जन्म जन्मने विपे विविधप्रकारना परिग्रहने संपादनकरेठे कुटुंवने संपादनकरेठे परंतु जन्मांतरेंजाता ते पूर्वोक्तपरिग्रह १ . एकदोकडो पण ताहरीसाथेंबावतोनथी ॥३॥ माटे ममतानायोगेंकरीथ मुख्यकारण एवो परकीयवस्तुनो परिणाम तेनोत्यागकरथने निःसंग स्वचथयर्बु श्रआल्हादनोकरनार एहदुंजेअनुनवसुख तेनुसेवनकर ॥ ४॥ पधि पथि विविधपयैः पथिकैः सह कुसते कः प्रतिबंधं ।। निजनिजकर्मवशैः स्वजने सह किं कुरुपे ममताबंधाविया प्रणयविहीने दधदभिपंगं । सहते वहुसंतापं ॥ त्वयि निः प्रणये पुजलनिचये वदसि मुधा ममतातापं ॥ वि० ॥६॥ वर्ष जेमपंथीमाणसने जूदेजूदेस्थानकें मार्गमार्गमा वाटाजुलोकनुं मिलाप पणते वाटमार्गुनीतार्थे कोप्रतिबंधकरतोनयी तेमजपोतपोताना कर्म नेवशे याचोमव्या एहवाबाटमातुल्य जे तारासजनलोक तेनासाथेतुं ममत्वनो प्रतिबंधकांकर जेमकोइ स्नेहशून्यपदार्थदीय थथवामनुप्यहोय तेनापर लेडपरनारापाणी वसंतापने सदनकरे। तेमन तुंपण ताहाराउपर निस्नेही ए रखोने पुलनोसमुदाय एटलेपोता,शरीर तेपणपुजलवे धनेजेसननादिक शरीरी २ २४ यांनी यानि नागना नापने जेम मनिंग गागनुपन पानीमा न्यानु यादीनायने तगमात्र पण मदिगनामगरगने थपरिताप मान विकागर पस्त्रियायनी तमन मनुष्यनाथ पनपीना शातसुधारसा जीव तेपणपुग्लज तथा नवविधपरिग्रह तेपणपुगतले एहमापुगनना समु र व्ययं ममता रूप ताप धारण करीने सताप सहन करेठे ॥ ६ ॥ त्यज सयोग नियतवियोग ॥ कुरु निर्मलमबधान ॥ नदिविद धान कयमपि तृप्यसिामृगतृष्णाघनरसपान ॥विाणा नन जिनपतिममहायसहाय ॥ शिवगतिसुगमोपाय ॥ पिन गद शमन परिहतवमन॥गातसुधारसमनपाय ॥ वि०॥ ७ ॥ 50शातसुधारमगेय काव्ये अन्यतनावनाविनावनो नाम पचम । वर्ष ॥ माटेनिभयेकरी जेहनो पियोगथयानो एहवापुजनादिकसाथे जे ते यांगागुने तेनोन्यागार थनेनिर्मल एहगोजेपोतानो गुहात्मनावतेनेपिपे मे० मस्यया एकामपणेजदाख केमकेकोरपणप्राणी मृगतृलारूप जानु रीने कदापिराने तृपयानोनयी तेमतुपण परवस्तुउपर ममत्वाखो कार यामरतिमा तृतिपामनारनयी ॥ ७ ॥ माटेरेयात्मा तु थसहायने सहा नार टनेयशरणने शरणनूत एडवातीर्थकरदेव तेनुसेवनकर घनेनिरदोष गनिमानगनु ने सुगमोपाय श्रया जेमांची परिश्तके नाशपाम्पुते वमनके मोदनागपना यमरापाणु पती गदशमनके ससाररूप रोगनो समापना जे गाननामा सुपामो अमृतरस तेनो पियरे पानकर ॥ ७ ॥ इतिश्री धारापराये यन्यन्वनारनापिनापनो नाम पचम प्रकाश शादलपिकी डिन वृत्त । मचिजो मदिरापट परिगलनलेश मगाशुचि गुन्या मृयमृदा यदि म बदगी धोतीपि गगी दर ॥ नापन शुचिता यया तनुनृता कायर्या निकायो मदारी नन्मान्यिपुरीपमूत्रग्जमा नाय तया शुध्यति ॥ १ ॥ एमरगना नानना नितपरिवागाने भय वाशियी माटीगा ग ने नर्गना पापी मनपाने माफरनामानिय ना शांतसुधारस. २४२ जुगाकरवायोग्य हाम रक्त मल मूत्रनोस्थानकरुप शरीर तेने माटीवेंगसवाथी अथवा गंगादिकनापाणीये नवगव्याथी पाणपूर्वोक्त दृष्टांतेकोऽवारे शुभयातुनथी? मंदाक्रांतावृत्ताम्नायं रनायं पुनरपि पुनः स्नांति शुशानिरनि वा रं वारं वत मलतनुं चंदनेरचयंते॥ मूढात्मानो वय मपमलाःत्री तिमिल्याश्रयंते नो शुद्ध्यंते कयमवकरः शक्यते शो मेवं ॥५॥ थर्थ ॥ माटेजगतमा जे अंतःकरण मूढथयुंठे एहवालोक स्नानकरीने वा रंवार शरीरादि करवानेथे फरिपण स्नानकरे तथा वारंवार मलनास्थानकरू प शरीरने चदनेकरी चर्चेने यने अमें निर्मलयया एवंकहीने प्रीतिकरेते पण एम न थी जाणताजे एशरीर तो फिवारेपण गुरुयातुनथी केमके खात्र, उकरडो तेको हरीने शुद्ध थायकेतुं यर्थात्नजयाय ॥ २ ॥ शार्दूलविक्रीडितं दृत्तं ॥ कर्पूरादिनिरचितोपि लगुनो नो गाढ्ते सौरनं नाजन्मोपकृतोपि दंत पिशुनः सौजन्यमा लंबते॥देदोप्येप तथा जहाति न नृणां स्वाभाविकी विस्त्र तां नान्यक्तोपि विनूपितोपि वढुधा पुष्टोपि विश्वस्यते॥३॥ अर्थ ॥ जेमलसणमां कर्पूरादिकपदार्थोनो नेलकखो तोपण लसणकाइ सुगंधी वत थायनही तथा जन्मपर्यंत उपकारकयोहोय तोपण उर्जनपुरुप का सौजन्यता धारणकरतोनथी तो हंततिखेदे श्रामनुप्यनुशरीर तेपण स्वनावसिंह उर्गधने मृकतुंनथी पाशरीरने विविधमकारनासुगंधी तेलेंकरीमसट्यो भनेवस्त्रालंकारेकरी भूपितकरयो तथा खरावी पीचरावीने अत्यंतपुष्टकयो तोपण विश्वासनोपात्र था पनही एटले एगरीर हवेसारंगयु एहवोविश्वास कदापियावेनहीं ॥ ३ ॥ उज्वचारत्तं ॥ यदीयसंसर्गमवाप्य सयो नवेच्चुचीनामशुचित्वमु वैः॥अमेध्ययोनेर्ववपुपोस्य शोचसंकल्पमोदोयमदो महीयाना॥ अर्थ ॥ शरीरनोमबंधपामिने पवित्रपदार्थोने पण अपवित्रतापणुं श्रावेठे केम के वाशरीरने उत्तमातिनानादिक मर्दनकरो तो तेचंटनादिक थोडीजवारमा पोता सुमंधतापामूकीने सुगंधतानधारणकरेठे तेमज उत्तमप्रकारनानोजन खव राव्याथी तेपण तुरत नरगमय थयीलायवे एवो था थपवित्रवन्तुने उत्पत्तिनुकार राजेशरीर तेनेपवित्रपाणु करवाना संकल्पनो मोहराव, एमहोटोग्राश्चर्यकारीवेध ने -- सरहनो सुबामनिय एतागंपरिचताना याचारजाश्ने पडितनाराहमन २० वर्ष ।। मुदग्नापूनमा कांग्प्रमुचनापीने मुसमापीरापु यनुम्नरवानर (धिरेनगर पहना तहागम पनी मुगीत पेटनाफ परसतरह ॥३॥ शरीरमा नो विना विसरमदित यमुरनिगरनी पडेनाराजे तादामुग्मनों का शातसुधारस स्वागतासत्ताऽत्यवेत्य शुचिवादमतथ्यं पथ्यमेव जगदेकपवित्र ॥ शोधन मकलदोपमलाना धर्ममेव हृदये निदधीया ॥५॥ अर्थ ॥ एरीते शरीरने पवित्रकरवानोवाद स्वोटोजाणीने जगतमा एक पष्य तो समस्तदोपरुपमतनो शोधक एहवोजे धर्म तेहनेकदयमाघरो ॥ ५ ॥ ॥ पटनायनाटक थासावरीरागण गीयते कागारेतनुचुनिचुनिजावे एदेशी ॥ नावय रे वपुरिदमतिमलिन विनय विवोधय मानसनलिना। पायनमनुचितय विनुमेकापरममहोमयमुदितविवेकानाणार॥ दम्पतिरेतोरुधिरविवर्ते कि शुनमिद मलकामलगत्तौ। नृशम पिपिदित स्रवति विरूप को बदमनतेऽवस्करकूप॥ना॥ थर्प ।। होस्नियविजयजी उपाध्याय पोपोताने उपदेशकरतो भागने देपिनप थागरीरनेतु घणुजमलीनजाणीने पोतानुमनरूपकमज पर यजीने परमतेजसी यनेननायको उत्तम विचार उत्पन्नथाय एल्यो एकपरित्र परमारमानु चितपनार ॥ १ ॥ स्वानोरक्त थने पुरुपनो रेत तेनापरिणाम मापपी गुपनयपु एदयु मनमयजे कश्मनके चीखलतेनी गतके ० खाद का या सरीर तमासाने जोधाशरीरने थत्यतदाफीराख्यु तोपणतेमाथी पिपर मानोऽगान सोने तोपांचगना गाने कोणडोकरी माननारचे श्रषांत को उपहारूप कचराफरी नरेला गने ननुमानसेनही ॥ २ ॥ ननति मच गुचि तानूल ॥ कतु मुसमास्तमनुकूलत नि मुगनि कियत कालामुगमसुगपिं जुगुमितलाल॥ जाए ॥३॥असुरनिगंपरदोतरचारयावरितु गम्यो न पिकार।। वपुरूप जित्रमिवारवागावमति युधम्त गौचाचार नाOM पायो पानु निदागायोग्य नाणारयाय ताजनी नीशा ॥तिष्ठ दुनने पावने नुसमर्थांनी तनावगगन सुगतापदायाना मेपररीक शांतसुधारस. २४३ घादश नव रंध्राणि निकामं ॥ गलदगुचीनि न यांति विराम।। यत्र वपुपि तत्कलयसि पूत।मन्ये तव नूतनमाकूतानाणाय॥ अशितमुपस्करसंस्कृतमन्नं जगति जुगुप्सां जनयति दन्न।' सवनं धनवमपि लीढं नवति विर्गादतमति जनमीटना अर्थ ॥ यतिशयेंकरी जेमांयी रात्रदिवस अपवित्रवस्तुश्रवेठे पणकोश्वारें विरा मपामतिनथी एवास्त्रीना वारवि अने पुरुपनानवठि तेनिईकरीसहित एहवा गरीग्ने तुपवित्रपणेजाणेने माटेए ताहरोकोऽ नवोज आचारजणायठे ॥ ५ ॥ ना नाप्रकारे वगारप्रमुखना संस्कारेकरी संस्कृतकरेलुं पचावेलु एहजे अन्न तेपण था शरीरमा थारोग्याथकी हन्नके विटारूपयजायते तेणेकरी जगतमां जुगुप्ता के उगनाउत्पन्नकरेठे बली प्रागरीरने वीर्यनीक्षिकरनारुं गाय-बुध प्राशनक रीने फरीतेपुरुपे मूत्रितकयोथको तेपणथत्यंत निंदाकरवायोग्य थपडेठे ॥ ६ ॥ केवलमलमयपुजलनिचये अशुचीकृतशुचिनोजनसिचये ॥वपु विचिंतय परमिदसारं शिवसाधनसामर्थ्यमुदारं॥ ना॥ ॥ येन विराजितमिदमतिपुण्यं तचिंतय चेतननेपुण्यं विशदागमम धिगम्य निपानं विरचय शांतसुधारसपानं ॥नाणात॥इतिश्री शांतसुधारसगेयकाव्ये अशोचनावनाविनावनोनाम पष्ठः प्रकाशः थर्थ ॥ माटे केवलमलरूप पुजलनोसमूह अने पवित्रनोजनने अपवित्रपषु आ पनार एहवाशरीरमां मात्रएक मोक्षसाधन करवानुंजे सामर्थ्य एहिजमहोटो सार नूतजाण ॥ ७ ॥ मोदसाधनेकरी नूपितकरयोथको ए शरीरपवित्रयायते तेचेतना नीज चातुर्यताजाणवी पणजेमा निर्मलसिमांतरूप जलमिलेठे एहवो जलस्थान कजोऽने शांतसुधारसनोपानकर ॥ ॥ इतिश्री शांतसुधारसगेयकाव्ये अशुचिना वनाविनावनोनाम पष्टः प्रकाशः नुजंगप्रयातं वृत्त।यथा सर्वतो नि:रै रापतनिःप्रपू]त सबः पयोजिस्त टाकातयेवावेः कर्मनिःसंनृतोगी नवव्याकुलश्चंचलः पंकिलश्च ॥१॥ अर्थ ॥ हवेसातमी पाश्रवनावना नावे जेम सर्वबाजुथी पमता पाणीना निजरणायेकरी तत्कालतलाव राजायचे पठे पाणीनातरगेंकरी चचलथायवे ते
वर्ष 1:या नया प्राणातिपानादिर पाचश्यात घने कोपादिक नारा
पनी मनादिर शपयांग नया कायिसादिर पचीस यसक्रिया एरीत सर्व
नानामा निगगिलगिरेसात्मना जाग्यतितव्यमान्मना
रवाना चाश्रयाणामधिगम्य तत्व निश्चित सत्त शुनिसनिया
सरहद यात्रानु नन्दनाणीने निधययसी शाखमनिशानपण एक
नविन र नाम्नु टना तेनायकी रिगंगयुं एहसायापार
१४४
शांतसुधारस
मज सादर इत्यादिके व्याकुनथायवे तेम श्रावेरीयुक्तप्राणी
यो नगपुग्य; व्याकुज यने चचजथको पापरूपकादव सहितथायवे ॥ १॥
गार्दूलविक्रीडित वृत्त ॥ यावकिचिदिवानुनूय तरसा कर्मेह
निर्जीयते तावच्चाअवशत्रवोऽनुसमय सिचति नूयोपि तत् ॥
दा कष्ट कयमाश्रवप्रतिनटा शक्या निरोछु मया ससा
रादतिनीपणान्मम ढढा मुक्ति कथ नाविनी ॥२॥
अर्थ ॥ ते जेटलामा यनुनालेश्ने बलात्कारेकरी महारा थत्मामाथी काका
मंने र गाम्नु तेटनामापती श्राश्रारुपशत्रु समयसमयप्रते कमाने फरी
पनाने माटे माइतिगदे मने एतु कवणलागेठे के हुँ थाश्रवरूपशत्रुने
जीनगायने नतो अत्यतनपफर ससारथकी महारोलूटको सारा
प्रदपाणीवता मिथ्यालाविरतिकपाययोगसझाश्चवार
मुरतिनिगश्रवा प्रदिष्टा ॥ कर्माणि प्रतिसमय
मुकुटरमीनिम्नतो भ्रमरगतो भ्रमति जीवा ॥ ३ ॥
अर्ष पुपानपाए । मिथ्यात्व २ थाति ३ कपाय ५ योग
7 मामाभागबाने ते समयसमयत वाग्याना योगेकरी कमीने
नागना ते बी चारगतिप्प समाग्मानमेवे ॥३॥
ग्योलाउन॥डियानतरुपाययोगजा पच पच चतुरचितान
य ॥ पचपिगनिम्मक्रिया पनि नेत्रदपरिमग्न्यया ऽप्यमी
मनने याया वनाजीम प्रसग्नुते ॥ ४ ॥
गवनी नागवि दयमातु नग्न पदार ॥ ५ ॥
शांतसुधारस. २४॥ सप्तमनायनाटकं धनाश्रीरागण गीयते ॥ नोनीमारेहंतारेविययनराचियें एदेशी ॥ परिदरणीया रे सुकृतिनिराश्रवा हृदि शमतामवधायप्रिनवं त्यैत रे नृशमुच्चूंखला विनुगुणविनववधाय ॥ परि ॥१॥ कुगुमनियुक्ता रे कुमतिपरिष्टुनाः ॥ शिवपुरपथमपदाय प्रयन्तेऽमीरे क्रियया उष्ट्या प्रत्युत शिवविरदाय । परिणाशा अर्थ ।। सुस्तवंतपुरुचे हृदयमा समताधारणकगे श्रावनोपरिहारकरवो घरे जीव था लोखदना गांकलनीपरें वांधीराखनारो जे श्राश्रव ते विलुजे परमात्मा तनागुणरूप ऐश्वर्यतानो नागकरवाने समर्थयायते ॥ १ ॥ कुगुरुयेकरेलीप्रेरणा बने कुमतियकरी युक्तथयना हेडटजीव तुं कायिकादिक उटक्रियाउँमा प्रवनवे करी मोहपुगे जवानो मार्गमूकीने उत्सटोमोक्षमार्गनो नाशकरवानुज यत्नकन्ने॥२॥ अविरतचित्ता रे विपयवशीकृता विपढ़ते विततानि ।। 5ढ् परलोके रे कर्मविपाकमान्यविरल खशतानि ॥ परिणाः ।। करिकपमधुपा रे शलनमृगादयो विषयविनादरसेन ॥ दंत लनंते रे विविधा वेदना वत परिणनिविरसेन । परिण ॥४॥ थर्य ।। जेनाचिनमा वैगग्यनथी एहवा विषयने पगधीनययसाप्राणी उदोक तथा परनांकेपण निरंतरपणे कर्मनापरिणामोथी उत्पन्नथयला शैकमाइ खोनुं महनको ॥ ३ ॥ इम्ति मन्न्य त्रमर पतंग अने मृग एवा पांचजानना प्राणीयो अनुक्रमेम्पर्श रन गंध रूपवाद ए एकंकाविषपना विनोदग्संकरी नानाप्रकाग्नी वेदनाश्रोने एविषयोना परिणाम विग्न एटले मागस तणेक्ोपामते ए मही ट्रंपेदन कारणने ॥ ४ ॥ उदितकपाया रे विषयवशीकता यांनि महानरकेपु परिव नने रे नियतमनंतशो जन्मजरामरकेषु ॥ परिण ॥ ४ ॥ मनसा वाचा रे वपुपा चंचला जयजरितनरेण ॥उपलि प्यंते रे तत आश्रवजये यततां कृतमपरेण ॥ परिण॥६॥ अर्थ जेने कोपादिक काय उध्यमांधाव्याने नेपालीयो पांच मियांना विषयोने साधीना तक महोटा नकमा जायने ने अनंनिदा जन्म जरामाणकरे ॥ यावेंकरी चंचल थपजा प्राणी मन वचन यने सपाना
वनपावजयजी.
स्थिरपरिणाम पणे करीने थार्त तथा राइ एव च्याननु निरतर रुपनकर ॥ २॥
२४६
शांतसुधारस
योगे उर्जय एहवुजेपाप तेणेकरी युक्तयाय माटे चतुरपुरुषे यात्रवन
प्रयत्नकरवु श्रने नवा कर्म बांधवानही ॥ ६ ॥
शुझायोगा रे यदपि यतात्मना स्त्रवते शुभकर्माणि ॥ काचन
निगडास्तान्यपि जानीयात् दतनिटतिशर्माणि ॥ परिण ॥ ॥
मोदस्वेव रे साश्रवपाप्मना रोधे धियमाधाय ॥शातसुधारसपा
नमनारत विनय विधाय विधाय ॥ इतिश्री शातमुधा
रस गेयकाव्ये आश्रवनावनाविनावनोनाम सप्तम प्रकाश
थर्थ ॥ जेणेपोतानु मनस्वाधीनकयु तेनायुष्योगजेने ते शुक्ष्योग जो
शुनकानेज स्रयेने एटने शुनकर्मोनीज प्राप्तिकरावे परतु कर्मोपण
ना नाशकरवाने शोनानीबेडीसरखा जाणवा ॥७॥ माटे
पोते पोतानेकहेने के अरेविनय श्रावाप्रकारेकरी श्रावसहित जेपाप तना
रोधकरया सपर चुधिराखी वारवार शांतिसुधारसनो पानकरीकरीने
इतिश्रीशातसुभारस गेयकाव्ये श्राश्रयनावनाविनावनो नाम सप्तम प्रकाश
स्वागतासत्तध्य ॥ येन येन य हावरोध सनवेन्नियतमी
पयिकेन॥ आजियस्व विनयोद्यतचेतास्तत्तदातरदृशा परिक्षा
व्य ॥१॥ सयमेन विपयाविरतत्वे दर्शनेन वितयाभिनिवे
शाध्यानमार्तमथ रौजमजन चेतस स्थिरतया च निरुध्या ॥३॥
अर्थ ॥ हवेथानमी सबरनावनानावे थरेविनय थाजगतमा जे जे
निश्चयथी याप्रवनारोध थतोहोय ते ते उपाय तारा तरष्टियेजोइ तेन
चिन लगामीने तेनेस्वीकारकर ॥१॥ एटले सयमेकरीने विषयउपर 4.
सम्यक्त दर्शनेरीने प्रनिनिवेशके मिथ्यात्वना याग्रहमूकीश्राप थने नि
शालिनीरत्न ॥ क्रोष वात्या मार्दवेनानिमान दन्या मायामाज
ज्यलेना।लोन वाराराशिरोऽनिरुध्या सतीपेण
अर्थ ॥ क्षमायेंगरी कोधनो जयकर माईवेकरी थनिमाननो जयकर सर.
करी मायाजेपट तेने दणीनारख वलीसमाजेवो फरजे लोन तेहनो उयो ।
सरिपोजे तोप तेणेकरी रोधकर ॥ ३॥
शांतसुधारस. २४७ स्वागतारत्त।। गुप्तिन्निस्तिसृभिरेवमजव्यान् त्रीन् विजित्य तरसाऽधमयो गान् ॥ साधुसंवरपथे प्रयतेया लप्स्यसे दितमनीदितमिदं ॥ ४ ॥ यर्थ ॥ एमज मनगुप्ति वचनगुप्ति यने कायगुप्ति एत्रण गुप्तियेकरीने जे जीत वाने घणाजतन निंदनीक एहवा त्रण उष्टयोग्य तेने जीती रूडासंवर मार्गनेवि पे यत्नकर एटने प्रकाशवंत देदीप्यमान धने कोइकालें विनाशने न पामनारा एह वा जे हितार्थ तेने पामीत थर्थात् मोदसुरखने पामीस ॥ ४ ॥ मंदाक्रांतासत्तं ॥ एवं रुक्षेप्वमलहृदयैराश्रवेष्वाप्तवाक्यश्रधाचंच त्सितपटपटुः सुप्रतिष्ठानशाली ॥ शुधैर्योगैर्जवनपवनै. प्रेरितो जीवपोतः स्रोतस्ता नवजलनिधेर्याति निर्वाणपुर्या ॥५॥ थर्थ ॥ एवाप्रकारेकरी स्ववादयवंत पुरुपें थाश्रवनो रोधकरवो पठे श्राप्तके पोतानाहितवांठक तीर्थकरादिक पुरुपोना वाक्योउपर जेवाराखवी तेजाणी वाहणनेविषे एकसुंदर अनेरज्वल वावटोचडाव्यो एहवो नूतनपीतबंध थयो थको शुक्ष्मनोयोग शुक्ष्वचनयोग शुभकाययोग एवणयोग तेहिज जाणिये कोइक वेग वानवायरो तेरोकरी पूखोयको जीवरुपीओ जहाज तेसंसारसमुनो प्रवाहतरी ने तुरत मोदप नगरि जपहोचेवे ॥ ५ ॥ ॥ अष्टमनावनाष्टकं नटरागण गीयते महावीरमेरो लालन एदेशी ॥ शृणु शिवसुखसाधनसउपायं सउपाय रे सज्पायं ॥ शृणु शिवसु खसाधनसउपायं ॥ ज्ञानादिकपावनरत्नत्रयपरमाराधनमनपायं ॥ गृ० ॥ ॥॥ विपयविकारमपाकुरु दूरं क्रोधं मानं समाय॥ लोन रिपुंच विजित्य सदेलं ॥ नज संयमगुणमकपायं॥ शृ॥9॥ अर्थ ॥ हे विनय तुं मोक्षसाधननो रुडोउपाय सांजल एकतो निर्दोषपवित्र ज्ञानादिक रत्नत्रयनुं बाराधनकर बीजो पांचेश्यिोना विपयसंबंधीजे विकारोवे ते हनेदूरकर त्रीजोमायासहित क्रोध मान अनेलोनरूप शत्रयोनी हेलनाकरी सहेज मा श्रमविना एचारेकपायने हलकटजेवा लागी जीतीजेशने कपायथी शून्यथयलो हवोजे संयमरूप गुण तेनुंसेवनकर ॥ ५ ॥ संतु . भ १४G शांतसुधारस. नुपशमरसमनुशीलय मनसा रोपददनजलदप्राय ॥ कलय विराग धृतपरनाग हदि विनयं नाय नाय । शृ० ॥ ३ ॥ आत रो ध्यान मार्जय ॥ दह विकल्परचनानाय ॥ यदियमरुचा मानसवीथी॥ तत्वविद पथा नाय ॥शु०॥४॥ अर्थ ॥ क्रोधरूपथनीने शमायवा मेघनीपरें शांतिनोकरनार एहवोजे उपशम रस तेहने तु मनमा धारणकर हे विनय रुदयमा धारणकरेलोजे ५५ सबधी जाग तेहने तहाराकदयमाथी नीत्वानीत्वाके० काढीकाढीने थत्यत उ. नजे वैराग्य तेने धारणकर वली थार्तध्यान थनेरीध्यानने धारणकरीसनहीं। तथा सकल्प विकल्पनीजेजालो तेने वाली नस्मफरीनाख कारणके योगना मार्गने रुधी न राखयो एवोकांश तत्व वेत्तानो मार्गनथी तत्ववेता नेतो मनोयोग मोकसो राखवुज नही ॥ ४ ॥ सयमयोगैरवदितमानसशुया चरितार्थयकाय ॥ नानामत रुचिगदने नुवने निश्चिनु शुशपथ नाय ॥शृणा॥५॥ ब्रह्म व्रतमगीकुरु विमल विधाण गुणसमवाय ॥ नदित गुरुवदनाउपदेश सगृढाण शचिमिव राय ॥१०॥६॥ अर्थ ॥ सपमनायोगथी थयतीजेमननीशुद्धि तेणेकरीने कांपण .. नानाप्रकारनी रुचिसहीत विचित्रप्रकारना मतेकरी गहन एटलेव्याप्त एहवो गतमा नयरूप शुझमार्ग एटले स्यामाद शैलीरूपजे जनमार्ग तेनोशोधकर ।। चली गुणना समुदायने धरनार अत्यत्तनिर्मल एहवाग्रह्मचर्यव्रत ने स्वीकारकर थने गुरुयेंकरलायपदेशने जेरीते शुक्ष्व्यनो सग्रहकरियें तेरीतेंसग्रहकर ॥६॥ सयमवाड्मयकुसुमर सुरनय निजमध्यवसाय ॥ चेतन मुपलक्ष्य कृतलदाणझानचरणगुणपर्याय ॥ शृ०॥ ७॥ वदन मलकुरु पावनरसन जिनचरित गाय गाय ॥ सविनय शातिसु धारसमेन चिर नद पाय पाय॥ शृण॥ ७॥ति श्रीशातसुधा रसगेयकाव्ये सवरनावनाविनावनों नाम अष्टम प्रकाश यर्थ ।। सयमना प्रतिपादन करना एहवा परमेश्वरना वाणीमय जेपुप्प ते पुप्पोना रसनीसुगधी पोताना यध्यवसायनेऋत्यतपणेकर थने ज्ञानादिक गुणपर्या ३ रसैरति शांतसुधारस. २४ए यरूप लक्षणनो करना एदवोजे तदारुं चैतन तेने तुं थोलख ॥ ७॥ पवित्र बने ललारसेंकरी सहित एह परमेश्वरनाचरित्रोनुं गायन करीकरीने पोताना मु खने थलंऊतके शोनितकर (नूपितकर) वली विनयसहित था शांतिधारसनो पान करी करीने घणाकाल सुधीथानंद मग्नमां रहे ॥ इतिश्री शांतिधारस गेयका बे संवरनावनाविनावनो नाम अष्टमः प्रकाशः॥ स्ववात्तायनिर्जरा झादशधा निरुक्ता तत् घादशानां तपसां विने दात्॥ हेतुप्रनेदादिद् कार्यनेदः स्वातंत्र्यतस्त्वेकविधैव सा स्यात् ॥१॥ अर्थ | हवे निर्जरा नावनानावे निळीराजे वारप्रकारनी कही तेवारप्रकारना तपने करीयाय इहां कारणनेनेर्दे कार्यनो नेदथाय तेणेकरी वारप्रकार कहेवाय नहीका सर्वत्रपणेतो निर्जरा एकप्रकारनीज ॥ १ ॥ अनुष्टव्वृत्तंध्याकाष्टोपलादिरूपाणां निदानानां विनेदतावन्दि.. यथेकरूपोपि पृथग्रूरूपो विवदयते॥॥ निर्जरापि घादशधा तपो नेदेस्तथोदिता। कर्मनिर्जरा णात्मा तु सैकरूपेव वस्तुतः॥ ३ ॥ वर्ष जेम कारणरूप काट धने पाखाणना जूदाजूदा नेद तेनानेकरी या रियमिएकरूपठे तथापि निन्ननिन्नरूप देखायठे एटले था यमुक काटनीयाग्नि अपवा या यमुक पाखाएनी थामि इत्यादिक अग्निना नेदकहेवायठे ॥२॥ ते म जपनानेदेकरी निहरा वारप्रकारनीकही पण वस्तुतते विचारतां कर्मनि रासरूप जे ले तेतो एक रूपजते ॥ ३ ॥ नववाढत्ता निकाचितानामपि कर्मणां यजरीयसां भूधरज्यराणां विनेदने वचमिवातितीव्र नमोस्तु तस्मै तपसेऽमुताय ॥ ४ ॥ वर्थः। पर्वतजेवार एहवा महोटा निकामितकोनो दकरवाविषे वजनी अन्यंततीव एहबुंध तजे तप तेने महारो नमस्कार होजो ॥ ४ ॥ उपजातिवृत्त । किमुच्यते सत्तपसः प्रनावः कारकर्मार्जितकिस्वि पोपि॥ दृढप्रदारीव निदत्य पापं यतो ऽपवर्ग सनतेऽचिरेणा॥ यया सुवर्णस्यशुचि स्वरूपं दीप्तः कृशानुः प्रकटीकरोति ॥ तात्मनः कर्मरजो निहत्य ज्योतिस्तपस्तशिदीकरोति ॥६॥ वर्थी सपना रुमाननाव केटलुं बवाण करिये जेट बसाणकरिथे - 4 मरमपग्दिार नजमालीन्य कायलंग तपति बाह्यमुटागाटा २५० शांतसुधारस योजने केमके दृढप्रहारी जेवा पुरुषोए महोटा कठोर कम करीने अत्पत सपादान कम्युहतो तेपण तपस्याना प्रनावे समस्त पापोनो नाशकरीने '; समा मोद प्रतें पाम्या ॥ ५ ॥ जेम प्रदीप्तयनि सुवर्णनु पवित्रस्वरूप + . तेमज तपजेने तेपण यात्मामाथी कर्मरूप रजनो नाशकरीने सादात् । ज्योतिस्वरूप प्रगटकरेठे ॥ ६ ॥ स्रग्धरावृत्त। बाह्येनान्यतरेण प्रथितवदुनिदाजीयते येन शत्रुश्रेणी वाह्यातरगा भरतनपतिवत नावलब्धढिम्ना।। यम्मात्प्राजुनवेयु प्रकटितविनया लब्धय सिध्यश्च वं दे स्वर्गापवर्गार्पणपटु सततं तत्तपो विश्ववद्य ॥ ७ ॥ अपं ॥ जेना बाह्य श्रने अन्यतर देकरी घणानंद प्ररल्यात एहवा उपर विशेषनारना योगेकरी जेहने दृढपणु लब्ध प्राप्तयायतो ते तपकरी मनादिक याह्यानु थने रागादिक थतरग शव तेनीजे श्रेणीके० पक्ति तेने राजानीर जीनीजवायने यती जेतपयकी ऐश्वर्यताने प्रगटकरनारी पीया यने यासिक्षियो प्रगटथापने तथा जे स्वर्ग थने मोदना सुप पुतायतीनगतने पूजयायोग्य एहवोजेतप तेहनेदु निरतर नमस्कारकरवं॥ थपनयमनापनाष्टर सारगरागण गीयते ॥ जिलदरायसरण तिहारे विनावय विनय तपोमदिमान॥ध्रुवपद ॥ बदुनवसचित फ्नममुना ।। जनतेलघुलघिमान ॥ विण॥1॥ याति घनापि नाघनपटली ॥ सरपवनेन विराम ॥नजति त. या तपमा चरिताली ॥ द्वणनगरपरिणाम वि०॥२॥ वर्य । नियग्निपजी पोताने उपदारेनेके थरेरिनय तुं तान नागनार नायागयकी घणानानु सचितारेनु पाप तुरतज 1 म नीकृष्णरायुयं को महाटी महाटी मेनोपनिया नागपामेने तम नने महाटीमोटी पापनीनिया एक क्षणमात्रमा नटपाजायन ॥ १.५ वातिमापति दूगटपि रिपुमपि व्रजति वयस्य। तपटमाश्र पनिमसनापाटामपग्मन्दम्याअनशनमूनोटरता वृत्तिन्द M -- । शांतसुधारस. २५२ - अर्थ ॥ वली जे वांरितार्थ घणुंदूरहोय तेनेपण नजीकथाणीयापेवे तथाशत्रु नेपण मित्रकरे एहवाएतपने शास्त्रनुं परमरहस्य नाणीने निर्मलनावें आदर ॥ ॥ ३ ॥ तेतपनावारनेदने । अनशन उनोदरी ३ वृत्तिहास एटले वृत्तिसं केप ४ रसपरिहार ५ सालीन्यता एटले इंडियोनोरोध एकांतेवेसवु ६ कायक्लेश एकप्रकार- महोटं बाह्यतपत्रे तेनुं तुं सेवनकर ॥ ४ ॥ प्रायश्चित्तं वैयावृत्यं स्वाध्यायं विनयं च ॥ कायोत्सर्ग शुनध्यानं आन्यंतरमिदमचविणाशमयति तापं गमयति पापं रमयति मानसदंसंदरति विमोदं दूरारोदं तप इति विगताशंसंः॥वि०॥६॥ अर्थ ॥ १ प्रायश्चित्त २ वेयावच्च ३ स्वाध्याय ४ विनय ५ कायोत्सर्ग ६ गुन ध्यान एउपकारना धान्यंतर तप तेनेसेव ॥ ५॥ एतप अनेकप्रकारना संसारी कतापनी शांतिकरेते श्रनेपापनोनाशकरेठे तथा मनरूपहंसने रमाडे वली निःसं गयपणे थाजगतमा दुःखोनेदूरकरवा असमर्थ एदवोजे मोहतेनो नाशकरेठे ॥६॥ संयमकमलाकामणमुज्वलशिवसुखसत्यंकारं चिंतितचिंतामणिमाराध य तप श्द वारं वारं ॥विणा॥कर्मगदौपधमिदमिदमस्य च जिनपत्ति मतमनुपान॥विनय समाचर सौख्यनिधानं शांतिसुधारसपान।विण इतिश्रीशांतसुधारसगेयकाव्ये निर्जरानावनाविनावनोनामनवम प्रकाशः अर्थ ॥ वजीएतपते चारित्ररुप लक्षीने वशकरवानी विद्या तथा सुंदर मो दना सुखापवाने विशारद वली चितितार्थ देवाने चिंतामणीरत्नसरखोठे एह वा तपने थाजगतमा हेविनय तुं वारंवार अंगीकारकर ॥ ७ ॥ देविनय कर्मरूप रोगनु यापध अने तीर्थकरोनो जे मत ते अनुपानजेहलु तथा समस्त सुखनुं निधान एहवोजे शांतसुधारस तेनुतुपानकर ॥ ॥ इतिश्रीशांतसुधारस गेयकाव्ये निर्जरानावनाविनावनो नाम नवमः प्रकाश उपजातिरत्तं ॥ दानं च शीलं च तपश्च जावो धर्मश्चतुर्धा जिनवां धवेनानिरूपितो यो जगतां हिताय स मानसे मे रमतामजन॥२॥ अर्थ ॥ हुवेदशमी धर्मनावना नावेले तीर्थकरदेवें लोकहितार्थे दानशील तपथ ने नाव एरीते चारप्रकारनो धर्मको धर्ममारामनमा सर्वकालरहो ॥ १ ॥ -~-~- . ना पर्मनांनतापमाण यनेवनी पनुपनायोगारी चपजयपजो जे सम्यक निमयपत्रे एवी क्ष्क्ष्यम्याना परिणामगर्ने पण सकनाएहजे याप मित्रने पवनायगा बग्जाजेदुपः जाणे एक धर्मरुप बग्न्ताज पढेहापनीए २५३ शातसुधारस. ज्ववायत्त त्रयसत्यक्षमामार्दवशौचसंगत्यागार्जवब्रह्मविमुक्कियु क॥य सयम किच ततोपगूढश्चारित्रधर्मो दशधायमुक्त ॥२॥य स्य प्रनावादिद् पुप्पदतौ विश्वोपकाराय सदोदये ते॥ग्रीप्मोप्मनी प्मामुदितस्तमिवान् काले समावासयत्ति हिंति च ॥३॥ नल्लो लकल्लोलकलाविलासै प्लावयत्यबुनिधि विति यत् ॥ न नति यत् व्याघ्रमरुद्दवाद्या धर्मस्य सर्वोप्यनुनाव एप ॥४॥ श्रये ॥ १ सत्य २ क्षमा ३ माईव ४ शीय ५ तपधर्म ६ सगल्यागनामवर्य विशेष प्रकारे मुफिएट निलोनतापणु ए सयम १० किचनता तेणेकर रोते वसप्रकारनु चारित्रधर्म कर्युने ॥ २॥जे धर्मनापसायेंकरी जगता पण समाणीमात्रने सपकारकरवाने श्रथ नित्यपदयपणु पामेठे बलीमा नी धरपंत ततपपली जमीनने वर्षाऋतुमा मेघ वदकरीने समिकरेचे ॥३॥ पा समुषोताना महोटाकामोरी पृथ्वीनेबुडायतोनथी श्रने व्याघ्र तथा नज धने पग्न श्यारिकोकोने मारतानथी एप्रतापसर्व धर्मनोजने ॥ ४ ॥ शार्दूलविक्रीडित उत्तय ॥ यस्मिन्नेव पिता हिताय यतते भ्राता च माता सुत सैन्य दैन्यमुपैति चापचपल यत्रा फल दौर्बल ॥ तस्मिन्कष्टदशाविपाकसमये धर्मस्तु सवार्म तमन्न मनन एप सजगतस्त्राणाय चोयम 100 त्रैलोक्य मचगवर विजयते यस्य प्रसादादिद योत्राम व हिनापदम्ननुनृता सायंसिविद ॥येनानर्थकदर्थ ना निजमट म्सामर्थ्यतो व्यर्थिता तस्मै कारुणिकाय घ मंपिनो भक्तिप्रणामोऽस्तु मे ॥ ६ ॥ अपं जेवापत पोतानाहितनेयय याप नाइ माता पुत्र या नेरण देयक दोनपणाने पामेले तथा जेवग्यतपोतानी
दान गीत शुननाव यने तप एचारप्रकारेकरी लोकोने चारित्रार्थनो करनागे घने
शांतसुधारस.
१५३
से आंगमां बरतरपहेग्या नीपरेथवीने सर्वजगतना रक्षणार्थ उद्योगकरे ॥ ५ ॥
वली जेदनापसायथकी स्थावर अने जंगमसहित जगत शोने तथा जे आलोकें
पाणीयोने हितकरवाने योग्यथयाने सर्वधर्थनी सिस्ताने पमाडेवे जेणेपोताना
नेजस्वीतामयरी पापरुपविटंबनानो नागकरीनारयुचे एहवो जे दयावंत धर्मरूप
पन्तु तेने महारो नमस्कार होजो ॥ ६ ॥
मंदाक्रांतारत्तं ॥ प्राज्यं राज्यं सुनगदयिता नंदनानंदनानां रम्यं
रूपं सरसकविता चातुरी सुस्वरत्वं ॥ नीरोगत्वं गुणपरिचयः
सहनत्वं सुबुद्धिं किंतु ब्रूमः फलपरिणति धर्मकल्पद्रुमस्य ॥३॥
श्रये ॥ महोदुराज्य मुंदरस्त्री पुत्र पुत्रीयो रमणीकरूप घणीज सरस कविता
करवानी चतुराई सुखरपणुं यारोग्यतापणुं गुणोनोपरिचय तथासङनपणुं अने
मडीयुधि एसर्ववाना ते धर्मरूप कल्पवृदना फलवे ॥ ७ ॥
॥ अथ दशमनावनाष्टकं वसंतरागण गीयते नवितुमेवंटोरेहीरविजयसूरिराया एदेशी।
पालय पालय रे पालय मां जिनधर्म ॥ मंगलकमलाकेलिनिके
तन करुणाकेतन धीर ॥ शिवसुखसाधन नवनयबाधन जगदा
धार गंभीर॥पा॥॥ सिचति पयसा जलधरपटलीनूतलममृत
मयेन ॥ सूर्याचंउमसावुदयेते तव मदिमातिशयेन ॥ पा ॥२॥
अर्थ ॥ हे जैनधर्म तुं महारुरवणकर महारु रक्षणकर तुं मांगलिकरूप लक्ष्मी
- क्रीमागृहवो वजीकरुणाना स्थानकठो तथा मोदनुखनु साधनो धने तंसा
ना समननयनो नागकरनारठो तेमज जगतना जीवाने याश्रयनूतो अनेअतिर्ग
नोरठो ॥१॥ जे मेवनो ममूहते पृथ्वीनलने धमृत सरखा पाणीयें करीने निंचन
करने यने चं सूर्य जे नित्य वगे। तेसर्व ताहरोज महिमात्रे ॥ ५ ॥
निरालंबमियमसदाधारा तिष्ठति वसुधा येनातं विश्वस्थितिमूलम्तं
नंतं मेवे विनयेन।पाण॥३॥दानशीलगुननावतपोमुखचरितार्थीऽक
तलोकः ॥ शरणस्मरणकतामिद नविना दूरीकृतजयगोकापा ४॥
अर्थ ॥ निरालंब पृथ्वीनको आधार नठतां जेनाथाधारथकी रहे। एहवो जग
तनीस्थितीनो मूलस्तन जे धर्म तेने दुं निव्यप्रतें विनय एटले नक्तिये करी से ॥३॥
थग्निते पाणीसरवीयाय बने समुश्ते स्थल सरखो तुरतयजायते वधा थथे । सर्वशास्त्रोमा नवनीत एटले मारखणजेवो सारनूत थने सनातन खत तथा सिदिरूपगहनो सोपान एटले निसरणीरूप अने जे विनयव ने शातिसुधारसनु पान करावेठे एहवोजे धर्म ते जयपामो जयपामो ॥ २५४ शातसुधारस. जे प्राणी या जगतमा ए धर्मनो स्मरण करे तथा धाश्रय करेचे ते नय तथा शोकने दूर करनारो एहयो ए धर्मः ॥ ४ ॥ हमासत्यसंतोपदयादिकसुनगसकलपरिवार ॥ देवासुरनर शासन कृतबदुनवपरिवार पाणावरबघुजनस्य दिवानि दायस्य सहाय ॥धाम्यति नीमे नवगढ़नेगी त्वा वाधवमपढाया थर्थ ॥ जेनो कमा सत्य सतोष दया थादेदेऽने समस्तपरिवार - देवता दैत्य थने मनुष्योए जेनी थावामान्यफरीने तथा अनेक जन्म | नो परिहार करनारो ते ए धर्मजने या वलीहे धर्मतु जेनेको नाइन 5 तथा जेनेको सहायनथी तेने रात्रदिवस सहायनो करनार बांधव उता वाधवरूप तुजने मूकीने प्राणीयो ससाररूप धरण्यमा फिरे।। ६ गति गहन जलति कृशानु स्थलतिजलधिरचिरेणातव कृपय कामितसिर्बिहुना कितु परेण पाणा॥ इद यवसि सुखना- प्रेत्यज्ञादिपदानिकिमतोझानादीनि च वितरसिनि अहे धर्मरूपमित्र तहापाथका पारण्य ते महोटा नगर जेवो तहारी रुपाथकी प्राणीमात्रना सर्व मनोरथ पूर्णथायठे अगनेविपे दयारूप धर्म उदययाव्याने तो तेने शहापण पूर्वोक्तप्रकार थने परनो शिदिक देवतायोनी पदवीयापेठे बली कमेफरी मादसव नारा एहसा झानादिक गुण्यापेठे ॥ ७ ॥ सर्वतत्रनवनीतसनातन सिधिसदनसोपान ॥ जय जय नययता प्रतिलवितशातसारसपान पाए॥ इति: सुधारस गेयकाव्ये धर्मनावनाविनावनो नाम दशम प्रक ॥ ७ ॥थानोम इतिश्री शांतसुधारस गेयकाव्ये धर्मनावनाविनावनो नाम वशम प्रका अर्थ पटव्यरूप जेना प्रात्मा स्वरूपले जेनेकोश्य कखोनथी जेनो जल रंगस्थानं पुजलानां नटानां नानारूपैर्नृत्यतामात्मनां च ॥क शांतसुधारसा १ नारत्तं॥सप्ताधोधो विस्तृता याः एथिव्यश्त्राकाराःसंतिरत्नप्रना Tतानिःपूणों योस्त्यधोलोक एतो पादौ यम्य व्यायती सप्तरजः।।? थर्थ ॥ दवे ग्यारमी लोकस्वरूप नावनानावे सातयधोधो एटले एकवी जाने नीनीचें विस्तीर्ण उत्राकारें रत्नप्रनादिक सातप्टप्वीयोवे तेणेकरी परिपू एवा अधोलोकरुप सातरजुप्रमाणे जेना महोटावेपग ॥ १ ॥ तिर्यग्लोको विस्तृतो रज्जुमेकां पूर्णो हीपैरणवांतरसंख्येः ॥यस्य ज्योतिश्चक्रकांचीकलापं मध्ये काश्य श्रीविचित्रं कट्त्रिं ॥३॥ ॥थिने एक रज्जु प्रमाण विस्तारवंत थसंख्याता दीपसमुकरी व्याप्त एह तिर्यग्लोकमा रुशपणानी शोनायेंकरी युक्तठे वली ज्योतिष चक्ररूप कांचीक लापार्य युक्त जेनु सुंदर कणदोरोठे ॥ ३ ॥ लोकोऽयो ब्रह्मलोके द्युलोके यस्य व्याप्ती कूपरौ पंच रजू लोक विस्तृतो रङ्गुमेको सिज्योतिश्चित्रको यस्य मोलिः ॥ ३ ॥ ॥ जेनो कर्वलोक ब्रह्मनामा देवलोक पांचरन्जुप्रमाणे व्याप्त ते कोपरास कूरपर थने जेनुं लोकनेथंते एकरज्जुविस्तारपणेजे सिक्षशिलातेमस्तक॥३ यो वैशाखस्थानकस्थायिपादः श्रोणीदेशे न्यस्तदस्तक्ष्यश्च ॥ का सऽनादौ शश्वदूर्ध्वदमत्वादिभ्राणोपि श्रांतमुजमखिन्नः ॥ ४ ॥ यथा जेना मथन करवाना दंडने स्थानकेंपगठे एटले वासमथन करवाना दमनी परजेना पगपसरेला जेणे पोतानी कटीनपर वेहाथ राखेलाठे एहवोथको थना दिकालनु निरंतर कदमपणे जितेंहियथको शांतमुशधरीरह्योठे पण खिन्ननथ॥४ सोयं शेयः पूरुपो लोकनामा पड्जव्यात्माऽ कृत्रिमोनाद्यनंतः॥ धर्माधर्माकाशकालामसझै ईव्यैः पूर्ण सर्वतः पुजलेश्च॥ ५॥ थवा मृत्युथयोनथी वली धर्म अधर्म थाकाश काल जीव अने पुजल एपांच ज्यकरी सर्वस्थले परिपूर्ण एवो आ चउदराज लोकनामा पुरुपजाणवो ॥ ५ लोद्योगस्वस्वनावादिनावैः कर्मातोयै तितानां नियत्या॥६ अर्थ ॥ वली 'जे काल उद्योग स्वसनावादिकनावें कर्मरूपवाजि, नियति ७ असल्यातो लोकाफाशने माटे, वली जेनीसीमाधर्मादिक पाचव्यकरी सुघटितके- णानु स्थानफजाणवु ॥२॥ बनी ए सोकाकाश पुस्पमा यद्यपि रूपने धारण नार एक पुगनपते तेणे नानाप्रकारना करेला पहना फिहाक मेस्ना शिरपर | माणेवचा सुवर्णमवार वतीने वजीकिहाफतो गर्ता एटले सामाथोखे ॥ ४ ॥ २५६ शांतसुधारस. री नानाप्रकारना रूपेरी नचावेला जीयोनु थने नाचनागेजे पुनरूप श्रो तेनु रगस्थान एटले रगममप एवो एचउदराज लोफनामा पुस्पते ॥ ६॥ एव लोको जाव्यमानो विवित्या विज्ञाना स्यान्मानसस्थैर्यहेतु ॥ स्थैर्य प्राप्ते मानसे चात्मनीना सुप्राप्येवा ऽध्यात्मसोरयप्रमूति ॥३॥ थर्थ ॥ एरीतेलोकने विवक्त एटले जुदोजुदा स्पष्टपणे नाव्यो थको विज्ञानी, नामनने स्थिरकरवानो कारण तेहीजथाय जेवारे मनस्थिरथयो तेगार हितकरनारी अन्यात्मिक सुखनी प्राप्तिमुतनयाय ॥७॥ सप्तनिर्माजनोरन ॥ थथ एकादशनावनाष्टक काफीरागेणगीयते थाजसखीमनमोहनो॥ एदेशी विनय विनावय शाश्वत ।। हदि लोकाकाश ॥ सकलचराचरधा रणे परिणमदवकाश ॥ विलसदलोकपरिवटितं गणनाति गमान॥ पचभिरपि धर्मादिन्ति सुघटितसीमान ॥ वि० ॥२॥ अर्थ ॥ विनयविनयजी उपाध्याय पोताने समजावेजे थरेविनय । चिरकाल रहेनारों एहयो लोकाकाशतु तादरा हृदयमा धारणकर जेमा स्थावर अनेजगमपदार्थाने धरवाविपे पूर्णश्रवकाश ॥ १ ॥ तनमान लोकेकरी चेष्टितके विट्युवे तथा जे गणनाके परिमाण मूकीने रह्यो हमीरचनायें करी रचित एडवो ए चग्दराज लोकनामा पुरुषले ॥ २ ॥ समवघातसमये जिने परिपूरितदेह ॥ असुमदणुकविविधक्रिया गुणगौरवगेद ॥विण॥३॥ एकरूपमपि पालै कृतविविधविवर्त ॥ काचनशैतशिखरोन्नत कचिदवनतगत ॥ वि० ॥ ४ ॥ श्रर्थ ॥ वली लोकनामा पुरुपनेविपे श्रीतीर्थकरदेव समुज्ञातना समय पोता थात्माना देशेफरीने चउदेराजलोकना समस्तनाग परिपूर्णकरे तथा प्राणी यने येके परमाणु तेमनी नानाप्रकारनी जेकिया थनेगुण अनुमो शांतसुधारस. २५७ वचन तविपमणिमंदिरैरुदितोदितरूपं ॥ घोरतिमिरनरकादिनिः कचनातिविरूपं ॥ विण ॥५॥ कचित्सवमयमुज्वलं जयमंगल नादं ॥ कचिदमंददादारवं ॥ एथुशोकविपादं ॥ वि० ॥ ६ ॥ अर्थ॥ वली किहांक तो देवतायोना जुवन तेनी सूर्यकांत मणीरत्ननी शोनायें करी सुंदररूप पणाना उदयने पायो। एटले उदितोदित रूपनेपाम्योठे वली किहांक नयंकर अंधकार घने नरकादिके अत्यंत विरूप एटले मागरुप पणाने पा म्योने ॥ ५॥ वली किहांकतो उत्सवमयते एटले उज्वल जयमंगलना याजित ना नाउँकरी युक्तछे तथा किहांकतो अत्यंतशोक अने खेदे करीयुक्त जेमांथी महो टो हाहाकार शब्द निकलीरह्योवे एहई पुशल इव्यते ॥ ६ ॥ बढुपरिचितमनंतशो निखिलैरपिसत्वैः जन्ममरणपरिवर्तिनिः कृ तमुक्तममलैः ॥ वि० ॥ इहपर्यटनपराड्मुखाः ॥ प्रणमत नगवं तं ॥ शांतसुधारसपानतो धृतविनयमवंतं ॥ ॥ इतिश्रीशांतसु धारसगेयकाव्ये लोकस्वरूपनावनाविनावनो नामकादशः प्रकाशः अर्थ ॥ वली लोकमां पुज्जनो स्वरूप विशे कहे जेने जन्म मरणाना योगेंक री फिरनारा प्राणी पूर्वपूर्व ममत्वनी परपरायेंकरी अनंति अनंतिवार लेनेग्नेमू क्पोने यनेजेनुं सर्वप्राणीयोए अनंतिवार घऍपरिचित करांते एहए पुगतच्य ॥ ७ ॥ माटे हेजीव तुंजो थालोकरुप पुरुपमा फिरवाने विपे परामुख थयो होय तो गातिसुधारसना पानेकरी विनय धारण करनागोतुं रक्षण करया वाला जै नगवत परमात्मा तेने नमस्कारकर 1G ॥ इतिश्री शांतसुधारस गेयकाव्य लोक स्वरुपजावनाविनावनो नाम एकादश प्रकाग मंदाक्रांतारत्तायस्माधिस्मापयितसुमन स्वर्गसंपदिलासप्राप्तोल्ला साः पुनरपि जनिः सत्कुले नूरिनोगे। ब्रह्मानप्रगुणपदवीप्राप कं नि सपनं तहुप्प्रापं नृशमुरुधियः सेव्यतां बोधिरनं ॥१॥ थर्थ ॥ हवेवारमी बोधिलिन नावनानाये जेनाथकी देवतायोपण वि स्मयपामे एहवो वर्गसंपनिनो विलास पामीने जीव यानंद पामनार पायने व लोजेनाथको अनेकमकारना अत्यंत जोगेंकरी युक्त एदवा समाजमा पुनःपुनः 3.
टके यन्याम करीन पानपोताना मतना उदय पिपरमिराहगा घणामतानाथा कनमा यनेनी देवनानेपूवानश्यता देरकांड कापामे थावतोनयी एमजार दोपनिनपर नोरण कांग्लयो जेने पूति निर्णय करीय तोरपा या उपायान। २UG शांतसुधारस. न्मयायचे तथा परपरायें अवैत ब्रह्मपदवी पमाडवामा जेनेकोइशगुनथी जन पामयी थत्पतकठीणने एहवुजे बोधरूपरत्न तेनोहेक्षिमतो तमेसेवनकरो ॥ १ नुजगप्रयातस्त्तत्रया॥अनादौ निगोदाधकूप स्थितानामजस्त्र जन्म त्यु खादिताना॥परीणामशुद्धि कुतस्तादृशी स्याद्यया दत तस्माधि नियोति जीवा ॥ ततो निर्गतानामपि स्थावरत त्रसव पुनलन देवनाजा॥ त्रसलेपि पचादपर्याप्तसझिस्थिरायुप्कवत उर्जन मानु पत्त ॥३॥ तदेतन्मनुप्यत्वमाप्यापि मूढो मदामोदमिथ्यासमायोपगूढ ।। भ्रमन्दूरमग्नो नवागाधगर्ने पुन के प्रपद्येत तहोधिरत्न ॥ ४ ॥ यर्थ ॥ पण थनादि कालना निगोदरुप थधकार तद्रूप कुवामा रहेनारा तर जन्म मरणना 5 खेंफरी पीडायला प्राणीयोने तेवी परिणामशुदि मी जेयकी महोटा थान सहित जोर निगोद रूप थधकार कुमामोषी देरपटेने ॥ २ ॥ ते निगोदमांथी नीतीने पण स्थावरमा उपजवुथाय पाणीने प्रमपणु पामतो उन यती वसपणामां पण पश्यिपणु पामधु . बनने तेमा यीपर्याप्तिपाणु पामवु दूलन तेमापण सही पचेश्यिपण ने मनुष्यपणु पामयुतो परमानने ॥शमहामोह मियाल तथा मापा पुनपरी मृर्गमाणी था मनुष्यपणु पामीने ससाररुप अगाध पाडार्मा रितो पडयोयग रहने तेप्राणीने बाधिरत्न फरीने शारीते प्राप्तथसे ॥ ४ ॥ शिमगिणीवृत्ताविभिन्ना पद्यान प्रतिपदमनल्पाश्च मतिन कुयुनि व्यामगर्निननिजमतोल्लासरमिका न देवा सान्निध्य विदधति न या गोप्यरमिकम्नदेव कालेऽस्मिन् यह दृढ वर्मा स मुली ॥ बर्ष धमाना निन्नभिन्न मार्ग यने निननिन स्याना कुपुदिना व्यामा र मां मानी पमंदर हटना गा तेज प्राणी पृष्यवान जाणम॥५॥ .
शांतसुधारस. पए शार्दूलविक्रीडितरत्ता यावमिदं गंदन मृदितं नोवा जराजर्जरं याव त्वतकदवकं स्वविषयज्ञानावगाहमा यावच्चायुरनंगुरं निजदिते ता बहुधैर्यत्यतां कासारे स्फुटिते जले प्रचलिते पालिः कयं बध्यते ॥६॥ अर्थ ।। जिहांधी आगरीर रोगाक्रांत थयोनथी तेमज जिहांधी आशरीर जगयकरी जर्जरीनूतथयोनथी तथा जिहांधी या पांचंडियनो समूह पोतपोता ना विषयो लेवाने समर्थवे बने जिहांधी आयुष्य दीपथयुनयी तिहांसुधी हेजीव तुं पोताना कल्याणविपे यत्नकर केमके तलोफुटीने पाणी वाहेर नीकली जसे तोपत्रे पालते केवी वांधीस ॥ ६ ॥ अनुष्टुववृत्तं ॥ विविधोपज्वं देवमायुश्च हणनंगुरं ॥ कामालंव्य धृति मूढः स्वश्रेयसि विलंव्यते ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ वाशरीर नानाप्रकारना उपवेकरी युक्त घायुष हणनंगुरते एमन्तां कोणमूर्ख तेनाउपर तंतोष राखी पोताना कव्याणयवाना कार्यमा विलंब करे। ॥ दशनावनाष्टकं धनश्रीरागेणगीयते॥हीचेरेहीचेरेपीयाहिंडोलडेएदेशी॥ बुध्यतां वुध्यतां बोधिरतिलना । जलधिजलपतितसुररत्नयु नया सम्यगाराध्यतां स्वदितमिद् साध्यतां ॥ वाध्यताम धरगतिरात्मशक्त्या ॥ बु॥ १ ॥ चक्रिनोज्यादिरिव न रनवो उतनो भ्राम्यतां घोरसंसारकतो ॥ बदुनिगोदादिका यस्थितिव्यायते ॥ मोमिथ्यात्वमुखचोरलते ॥ ७० ॥ ३॥ अर्थ ॥ जेम समुइनापाणीमां पमोगयतुं चिंतामणीरत्न पाठोहाथमा श्राव, श्रतिजन तेम वोधिपामवीपण अतिर्सनचे माटेमोरीते वोधिनु थाराधनकरी पोता हितसाधनु अनेपोतानी शक्तीकरी मुर्गतिनो वाधकरवो ॥१॥ घणी नि गोदादिक कायस्थितियें करी विशाल बने मोह मिथ्यात्वप्रमुख लाखोगमे चोरटा युक्त एहवो था घोर संसाररूप धरस्यमा फिरनारा जीवोंने चक्रवर्तिना नौजन मरखो मनुष्य जन्म पामवो पुतिनने ॥२॥ लब्ध इह नरनवो ऽनार्यदेशेषु यः स भवति प्रत्युतानर्थकारी ॥ जी पहिसादिपापाश्रवव्यसनिनां माघवत्यादिमागीनुसारी॥ ७० ॥ ३ ॥ ॥ ये "कुनमा गजनी धर्मनेपाम्यो यने धर्मनेरि उद्योगपण करपागे तेरा नापान दो जगनि जनता मियो पिटते कविग्मगातगमगौरवातीOIR प्पमनिपलनान्प्राप्य पुलनतम बोधिरन सकलगुणनिधानापुरु गुरु शांतसुधारस आदेशस्टशामपि सुकुलजन्मनां ॥ उर्खना विविदिपा धर्मतले ॥र तपरिग्रहह्नयादारसकावर्तिनि दत मग्नं जगढस्थितले ॥ ॥ ३ अर्थ ॥ जो था जगतमा प्राणी धनार्यदेशमा मनुष्यनव पाम्योतो . थेनु कारणथाय केमके जीवहिसादिक पापावना व्यसनवाला जी नि जे सातमी नरकादिकडे तेना मार्गनुं कारण थायवे ॥३॥ पामेलो होय थनेती थार्यदेशमा रहेनार होय तेनेपणधर्मतत्व जाणवानी पीनने कारण रतके मैथुन परिग्रह लय भने यहार ए चार नामना स्थितपणामां सर्वजगत बूमोपडयो ॥ ४ ॥ विविदिपायामपि श्रवणमतिपर्सनं धर्मशास्त्रस्य गरुसन्निधाने ॥ वित अविफयादितत्तसावेशतो विविधविदेपमलिनेऽवधाने ॥ बु० ॥ ॥ ॥ धर्ममाकप सबुध्य तत्रोद्यम कुर्वतो वेरिवर्गोऽतरंग राग पश्रमालस्यनिजदिको बाधते निढतमुक्तप्रसग ॥ यु ॥६! वर्ष ॥ कदापोऽने धर्मतत्य जाणयानी होय थने गुरुसनिध नोरण यथा पियारसना थावेगयी नानाप्रकारना विपेफरीज मनीत पहायतो धर्मशास्त्रानु श्रवण पुर्ननहोय ॥ ५॥ यती जेप्राणी गगना नागनाग जे गगप अमानस निश इत्यादिक थतरण नो गमले पीडाव तेयीनने धर्मपामगु ननयायः ॥ ६ ॥ चतुरशीनारदी योनिलदेविय क त्वया कणिता धर्मपाती ॥ प्राप मा पिनयप्रमादोदित ॥ शातग्ममरमपीयूपपान ॥ ० ०ानमधाग्मगेयकाव्य घोधिनानापिनापनोना वर्ष ॥ माटे श्रदौति थाययं देजीर चागलीना जीरा 7 में मिनीबात माननी दमा यान् नहीज माननी हमे कमो घपु यजगतमा कहिगाव रसमाग्न सातागाय पण महोटा गारकरी पीडा रो पर एमबीना साये वादार पणामनी वातासानजी धर्ममागे शांतसुधारस. नतानयी ॥७॥ एम अनिउन वस्तु करतां पण विशेष उर्जन अने समस्त निधानए जे बोधिग्न ते पामीने गुरुनो अत्यंत विनयकस्यो तेणेकरीने प्राप्त हवू जे शांमिसुधारत रुप जलोअमृत तेनु तु पानकर एमाकर्ताये पोतानाम प चञ्यं ॥ ॥ इतिश्री शातलुबारस गेयकाव्ये वोधिनावनाविनावनोनाम दादा जागः एरीत अनित्यादिक वारनावनायोनो अधिकार संपूर्णथयो। अनुष्टुत्तं । सधर्मध्यानसंध्यानदेतव श्रीजिनेश्वरैः ॥ मैत्रीप्रनृतयः प्रोक्ताश्चतस्रो नावनाः पराः ॥१॥ तयानुः॥मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्य स्यानि नियोजयेत् ॥ धर्मध्यानमुपस्कत तद्धि तस्य रसायनं ॥२॥ थर्य । हवं मंत्र्यादिक घारनावनाघो नावे श्रीतीर्थकरदेव सत्यधर्मध्याननी धागनी हेतुनृत मैत्रीयादेदेइने वीजी चारनावनायो कही। ॥१॥ तेश्रीतीर्थकरदेवे कहीने तेमज नावियेत्ये १ मैत्री २ प्रमोट ३ कारुण्य अने ४ माध्यस्थ्य एचारनाव जाते धर्मव्यानना नूपणार्थ एटले धर्मध्याननी शोनानेयर्थे योजना करीयकी ध्या वनारने चारनावनायुक्त जे धर्म ते रसायन (योपथी) तुल्य थायठे ॥ २ ॥ नपजातिवृत्तमित्री परपां हितचिंतनं यत् नवेत्प्रमोदो गुणपदपातः।। कारुण्यमा गिरजां जिदीपैत्युपेवणं उटधियामुपेता ॥ ३ ॥सर्वत्र मंत्रीमुपकल्पयात्मन् चित्यो जगत्यत्र न कोपि शत्रुः ॥ कियदिन स्यायिनि जीविते ऽस्मिन् किं खिद्यते वैरिधिया परस्मिन् ॥ ४ ॥ सर्वेप्यमी बंधुतया ऽनुनूताः सहस्रशोऽस्मिन्नवता नवाब्धी ॥ जी वास्ततो बंधव एव सर्वे न कोपि ते शत्रुरिति प्रतीदि ॥ ॥ सर्वे पितृभ्रातृपितृव्यमातृपुत्रांगजाम्बीनगिनीस्नुपात ॥ जी वा प्रपन्नावदुशस्तदेतत्कुटुंबमेवेति परो न कश्चित् ॥ ६ ॥ अर्थ ॥ जे वीजानाहितनुं चितनकर, ते मैत्रीनावना जाणवी गुणीनो पदपा र, ते प्रमोदनावना जाणवी उरवीप्राणीना उख उरकरवानी वाराखवी ते का बनावना छुटवुद्धीवत प्राणीउपर उपदाकरवी ते उपेक्ष्णनावना ॥ ३ ॥ हेया तु सर्वत्र मैत्रीतापणुंफर एटले थाजगतमां कोऽपण महारो शत्रु एहवो तुं मनमां वीनकुज लावीसनही कमके थोडादिवस रहेनारो अल्पमात्र ताद वतव्यपपुवे तेमा वीजाउपर शयुधि राखीने सु व्या ग्विन्नथाय ॥ ४ ॥ ॥
. " २६२ शातसुधारस हेजीर याससारसमुश्मा ए समस्तप्राणीसाथे हजारोपसत त नाइपणो व्यो तेमाटे एसर्व ताहरा नाइयोजठे पण कोइ तहारो शत्रुनथी एवीरीत ॥ ५ ॥ सर्वजीवो मात्र, ससारमा माता पिता बधु काको पुत्र पुत्री स्त्री गोकरानीस्त्री इत्यादिकरीते ताहरीसाथे शेकडो वखत सगपण करीचुकाने एसर्व ताहारो कुटुंवज पण एमांकोइ परकीयनथी एमविचारी सर्वजतु उपर त्रिता पणु थादर ॥ ६ ॥ इश्वबाटत्तक्ष्य॥ एकेडियाद्या थपि दंत जीवा पचेश्यितायधि गत्य सम्यक् ॥बोधि समाराध्य कटा लनते नूयो नवभ्रातिनिया विराम॥ ॥या रागरोपादिरुजो जनाना शाम्यतु वाक्काय मनोहस्ता ॥सर्वेप्युदासीनरसरसतु सर्वत्र सर्वेसुखिनोनवनु।।। अर्थ ॥ फिरी हेजीव तु एवो विचारकर के या ससारमा जे एके जीवोठे तेपण रुडाप्रकारे पचेश्यिादिकपणु पामीने झानाराधनाकर . ण ससारमा नमवारूप नयनु अतकरसे एजाणीने तेजीवोनी साथे पणन कर ॥ ॥ वलीजे प्राणीश्रोने रागक्षेपादिरूप पीडा मन वचन कायाना गोनो शोहकरे तेसर्वप्राणी उदाशीनतापणु पामीने सर्वलोक सुखीयाथो त्रीपणु तु सर्वजीरो उपर राख ॥ ७ ॥ ॥ अथ प्रयोदशनावनाष्टक देशाखरागेणगीयते रेजीवजिनधर्मकीजियें एदेशी ॥ विनय विचितय मित्रता ॥ त्रिजगति जनतासु ॥ कमविचित्रतया गति विविधा गमिता वि स प्रियवावा नहि रिपुरिह कोपि ॥ माकुरु कलिकलुप मनो निजसकतविलोपि ॥ विनय ॥७॥ अर्थ ॥ देविनय या त्रयलोकमा कर्मनी विचित्रतायेफरी नानाप्रकारनी चादिक गतिथीने पामेलापाणी जे ले तेसर्वप्राणीमात्रना समूहउपर तु . तानाय राव केमके एसर्व ताहरा परमप्रिय वाधवज पण एमांकोइ १६ नयी माटे फोकट मनने लशकरी कनुपता मकर कारणके क्रोधजेने ते पोतानाज पुस्पनो नाशकरनारोए बेकायनो थर्थ एकठोठे यदि कोप कुरुते परो निनकर्मवशेन अपि नवता कि नूयते दृदि रोपवशेन ॥ वि अनचितमिद कलह सता ॥ त्यज . समरसमीन ॥ जज विवेककलहसता परिचयपीनाविणा! . . ३ २६३ ने शांतसुधारस. अर्थ ॥ माटे जो बीजोकोऽ पोताना कर्माधीनपणायकी ताहराउपर कोषकरे ने तो तुंपण तहाराहृदयमां तेनाउपर क्रोध शावास्ते कोठे ।। ३ ॥ यजीवतुं न मतारुप पाणीना तलावनुं मत्तयश्ने तत्पुस्पोने अयोग्य एहबुंजे फजह तेने कीयाप अनेगुणोनो परिचय करवाने पुष्टकारी एहवोजे विवेक्रुप सरोवर तेमा रमण करवाने दंन जेवो था ॥ ४ ॥ शत्रुजनाः सुखिनः समे मत्सरमपदाय ॥ संतु गंतुमनसोप्यमी शिवसौख्यगृढायाविणाशासकृदपि यदि समतालवं हृदयेन लि दति ॥ विदितरसाम्तत इद्ध रतिं स्वत एव वदति ॥ वि०॥६॥ अर्थ ॥ हेजीवतुं नमन्त शत्रुतोकांनी ममजीउपर मत्नरतानावनो त्यागरी परमसुग्वीया धने मोक्षरूप सुखना घग्ने जाणवाने ताहरं मनरूर ॥ ५॥ जोए कवारपण समताना लवर्नु ताहरा हृदयमा थास्वादन करीन तो रसदायाने सम्प कमपर पीतानी मेलेज प्रीतिकरीत ॥ ७ ॥ किमुन कुमतमदमूर्वितां जरितेपु पतंति जिनवचनानि कथंद टा न रसाऽपयंतिाविणाशा परमात्मनि विमलात्मनां परिणम्य वमं तु ॥विनय समामृतपानतो जनता विलसंतु॥विणातातिश्रीशांत सुधारमगेयकाव्ये मैत्रीनावनाविनावनोनाम त्रयोदशः प्रकादाः अर्थ ॥ हे जीवतुं शावान्त कुमतायेंकरी मृविनयने नरकापटेने बने शनि ग्सचीज नरेला श्रीतार्थरदेवना वचनानु केम संरक्षण परतोनयी ॥ १ ॥ निर्म जयन.गणवाला जीवोनामन परमात्माना न्यरुपनविपेज पनि घाग्दी अन लोकानानमृद ते नमनारुपी धमृतना पानेकरी विनयना दिजामपामा मानतधारन गयकाव्ये मंत्रीनावनाविनावनो नाम त्रयोदय प्रकार मगधगत्तयिन्याने वीतरागा.कपकपयगनिहीणकमों पगगालोक्ये गंधनागा मदनममुदिनकानजाग्रदबिग गागाअध्यानह्यान्मगुच्या मकलाशिकलानिमलध्यानया रामारान्मुक्त. प्रपन्नाः कलमुकुनदानापाजिनादन्यदनी नेपां कर्मयोल्यन्तनुगणगरी निर्मलामन्यसागाय निश्री mum an A m reranaameeruar--- दानगुणी जितश्यि एकपा महापुरुष जे जगतमा प्ररताथफा श्रीतीर्थकरदेव २६४ शातसुधारस. गाय पुनीमस्तवनपरिणतेरष्टवर्णास्पटानि धन्या मन्य र सझा जगति नवतस्तोत्रवाणीरसकामझा मन्ये तदन्या वितयजनकथाकार्यमौखर्यमग्ना ॥२॥निर्यथास्तेपि ध न्या गिरिगदनगुदागव्हरातर्निविष्टा धर्मध्यानावधाना समरसमुदिता पदमासोपवासा ॥ येन्येपि झानवत श्रुतविततधियो दत्तधर्मोपदेशा शाता दाता निताता जगति जिनपते शासन मासयति ॥ ३॥ दान गील तपो ये विदधति गृहिणोनावना जावयति धर्म धन्या चतुर्धा श्रुतसमुपचितश्रक्ष्या राधयंति ॥ साध्व्य श्राध्य श्व धन्या श्रुतविदशधिया शीलमुभावयत्यस्ता सर्वान् मुक्तगर्वा प्रतिदिनमसजाग्यनाज स्तुवति ॥ ४ ॥ श्रर्थ ॥ हवे प्रमोद नावना नावेठे पकश्रेणीना मार्गमा प्रवेशकरवाने रुपमलने जेणे क्षीणकयने थने त्रलोकमा गधहस्तिसरखा स्वस्वनावमा रमण करनारा सहजउदयने पामेला केवलज्ञानेकरी जागृतथयुते वैराग्यजेहनु एहवा श्रीवीतराग एटले तीर्थकरनेधन्यवे केमके जे यात्मशुद्धिकरीने पूर्ण चकलात रिखी निर्मल जे ध्यानधारा तप अनतपुण्यना समूहकरी सपादनकरेली ती करनीलनी तेनु श्राराधनकरी मुक्तिनेप्राप्तयाय ॥२॥ श्रीविनयविजयजी उपा ध्यायकहे के दु ते तीर्यकरोना कर्मपथको उत्पन्नथयाजे घणा गुणना सभा तेनी स्तुतिकरयाविप जेहना परिणामहोय। एवा घामान निर्मलखनाव सहित तीर्थकरनी स्तुति करीरीने वरणना थास्थानकोप्रते पवित्रकरुनु भने था तमा तार्यकरीना तिना रसने जाणमा जहान धन्यमानुनु तैपिना वीनी निष्फ लोकात धने कार्याना वाचालणामा नारा जिव्हान मूर्खनु, मानुतु ॥ २ ॥ रजा पर्वतमा थरण्यमा गुफागुहिरमा निवासकरीने धर्मध्यान : पर एकाग्रचित्त राखनारा तथा सम्यक्तरूप रसेकरी सतुष्टययला वली पर मार निगेरेना अपाम करनाग पडवा जे नियथसाधु तेनैपण धन्य तथा बनी जाजे ज्ञानीपुरुषो गाम्बरपर पसरेली युधियेक धमोपदेशधापेने अने शातगुन शांतसुधारस. २६५ शासनने प्रकाशितकरे तेनेपण धन्यते ॥ ३ ॥ वलीजे गृहस्थावासमा रह्याथका पण सुपात्रने दानापेठे गीलपाले तपकरेचे नावनायो नावे तथा चारप्रका रे करी धर्मध्यानने 'पाराधे थने पुष्टश्रमायें शास्त्र धाराधन करेले तेनेपण धन्यठे वलीजे साध्वी तथा श्राविकायो शास्त्रथकी वजथयती बुधिये शीलपाले ने तेनेपण धन्यठे एरीतें हे नाग्यवंत जव्यपुरुपो तमे सर्वथा गर्वमूकीने ए पूर्वोक्त समस्त उत्तमपुरुषोनी नित्यप्रतें निरंतर स्तुतिकरो के जेथकी तमारुं कव्याणथाय॥४॥ उपजातिउत्तमिट्याशामप्युपकारसारं संतोपसत्यादिगुणप्रसा रं॥ वदान्यतावैन यकप्रकार माीनुसारीत्यनुमोदयामः ॥ ५ ॥ अर्थ ॥ ए पूर्वोक्त सम्यक् दृष्टी जीवनी स्तुति करवी ते तो श्रेष्ठजले परंतु अमें मिथ्यादृष्टीनो पण उत्तम उपकार जाणीय.ये कारणके जो तेमनो संतोप सत्या दिक गुणनो प्रसार तथा दातारपणुं अने विनयना प्रकार एटलावाना मार्गानुं सारीचे तो एहवोजाणीने तेनीपण अनुमोदना करियें ॥ ५ ॥ स्रग्धरावृत्तं ॥ जिव्दे प्रव्दीनव वं सुकृतिसुचरितोच्चारणे सु प्रसन्ना नूयास्तामन्यकीर्तिश्रुतिरसिकतया मेऽद्य की सुक # ॥ वीदयान्यप्रौढलदमी द्रुतमुपचिनुतं लोचने रोचनवं संसारेऽस्मिन्नसारे फलमिति नवतां जन्मनो मुख्यमेव ॥६॥ थर्थ ॥ जीवो जो तमे सरलठो अने पुण्यवान पुरुषोना पुण्यनो उच्चार कर वाने प्रसन्नतो एटले बाज अमारा कान बाँजा पुण्यवान पुरुपोनी कीर्ति श्रवण ना रसिकपणे करी सुकर्णरहो अने बीजानी प्रौढ ऐश्वर्यताजो ने अमारी च प्रकाशपणाने धारणकरो एहवा जो तमारा विचार तो था संसारमा एज तमारा जन्म सफल पणानो मुख्य फलठे ॥ ६ ॥ उपजातियत्तं । प्रमोदमासाद्य गुणेः परेपां वेपां मति. सति सा म्यसिधो॥ देदीप्यते तेषु मनःप्रसादे गुणास्तथैते विशदीनवंनिाः। बर्थ ।। बीजाना गुणो सांजली संतोपपामिने जेनीवुद्धि समतारलाप समुश् पी संहननथायवे तेप्राणीना मननो प्रसाद देटीप्यमान थायजे तेमज तेना ना ना गुण पण सर्व स्वच्छ थायठे ॥ ७ ॥ ॥
२६६ . " प्रर्ष जेनीनगरी कराने का समर्थनथी एहयो मुनिनु पारणमा ने श्रीनीदर नाथा के जेणेकरी कापमहित यनिमानेरी शानना य॥ पटाया परघीनु यागासी महादसीसताना तरमणालय पा निता अनि यदामा माकलयुगलं पिट पनि मुपनार॥ घर मीयागीन पानीन पाताना मागिनतया मग यमन शातसुधारस ॥अथ चतुर्दश नावनाष्टक टोडीरागेणगीयते पनकीमेरेमननति विनय विनावय गुणपरितोप ॥ ध्रुवपद ॥ निजसुकृता तवरेप परेषु ॥ परिढर दूर मत्सरदोप ॥ वि० ॥१॥ थर्थ ॥ हैनिय तु गुणीपुरुषनागुण उपर सतोप करवु मनमानाय थने साना पुरानातिनापसतें बीजाउपर मत्सरकरवापणाना दोपने दूरकर ॥ १ ॥ दिष्याय वितरति बदान वरमयमिह लनते वदमान ॥ किमिति न विमृगमि परपरमाग॥ यहिनजसि तत्सुकृतविनाग विणा ॥ पर्य ॥ यमुरु मनुष्य अत्यत दानथापेठे एबटु कल्याणकारक पाम, या यमुर पुष्प यमुरम्यानो बहुमानपामे एपणघणुजरुमुचे एहयो रुडोनि तु मारतोनयी गाणेकाणे तोकोना गुणोक करा पहिज सस्ता पेपा मन ऽद विगतविकार ॥ये विदधति नुवि जगज्पकार । नेपा यपमुचिताचरिताना ॥ नाम जपामो चारवार ॥ ३ ॥ अर्थ ॥ या जगतमा जेना मननेविष को प्रकारको विकारनथी एटने नि गिरना एपीनारप लोगनो पारकरे एदवा परित्र सदाचारी पुरुषोना बयार जपि ॥ ॥ घट तिनिधागुणमसमान ॥ पश्यत नगवति मक्तिनिदान। पन म्चा मह समाजमान ॥ जटिति विपटते कमवितान वि० ॥ गर मंनो ममृद ने नुग्न नागपामे ॥ ४ ॥ घर चन गोलमुदार ॥ गतिणीपि परिहतपरदार ॥ याद मानषि विनया रिलमनि फलिताफलमहकार विrun जामवित्र या नीलून ययायामान यांगाना यागिपागानाNL3 नामा मग्निमचिनगा ॥ दर्शनमपि कलमुस्तविपाका पिणा शांतसुधारस- २६० लोने यशनी सुपताकके ध्वजाकरे एवीस्त्रीयोनो पुण्य परिपाके करी प्राप्तथ येचुं जंदर्शन ते पण पुण्यरुप धनज संपादकठे ॥ ६ ॥ तात्विकसाविकमुजनवतंसाः॥ केचन युक्तिविवेचनहंसाः ॥ अलम कृपत किल नुवनानागं । स्मरणमनीपां कृतशुन्नयोगविणा॥ अर्थ ॥ खरेखरा सत्वगुणने धारणकरनारा सऊनलोकोना मस्तकना नूपणस मान बने जेम हंस दूध तथापाणीनो विवेचनकरे तेनीपरें युक्तियेंकरी विवेचन नाकरनारा एहवा जे सर्वोत्कृष्टप्राणीने ते या त्रणेचुवनने शोलायमान करवाने तत्परते तो तेवापुरुयोर्नु स्मरणकरवु ते पण शुनयोगनो करनारथाय ॥ ७ ॥ पति परगुणपरिनावनसारं ॥ सफलय सततं निजमवतारं ॥ कुरु सुविहितगुणनिधिगुणगान।विरचय शांतसुधारसपान।विणात॥ इति श्री शांतमुधारसगेयकाव्ये प्रमोदनावनाविनावनोनामचतुर्दशः प्रकाशः अर्थ ॥ हे आत्मा एपूर्वोक्तरीत परनागुणनो विचार कर, एहिज जेमा सार ने एवं या तहागे पोतानो अवतार तेने तुं निरंतर परनागुणो स्मरणकरीने सफ सकर तथा शुधगुणोना निधि एहवाजे मनुष्यो तेना गुणोतुं गायनकर बने शां तसुधारमनुं पानकर ॥ ७ ॥ इतिश्री शांतसुधारसगेयकाव्ये प्रमोदनावना वि नावनो नाम चतुर्दशः प्रकाश ॥ मालिनीरत्ता प्रथममशनपानप्राप्तिवांगविहस्ता स्तदनु वस नवेश्मालंकृतिव्यग्रचित्ताः ॥ परिणयनमपत्यावाप्तिमिप्टेंडि यार्थान्सततमनिलपतः स्वस्थतां क्वास्सुतीरन् ॥ २ ॥ थर्थ ॥ हवे कारुण्यनावना नावे प्रथमतो अशनपान प्राप्तिकरवानी हा व्याकुलथवला तदनंतर वन्त्र घर अलंकार इत्यादिकोनी प्राप्ति करवाने विषे जे मनुचित व्यग्रथयंते तेवारपविलमकरवानी वा तेपठि पुत्रपुत्री प्राप्त करवानी Sक्षा यने इश्चिार्यजे पांचशियोना त्रेवीस विपयोतेप्रतें सनार एहवाजे संसार वामी जीवो तेकेवीरीतें स्वस्थ थाय ॥ १ ॥ शिखरिणीतं ॥ नपायानां लतेः कथमपि समासाद्य विनवं नवा न्यासात्तत्र ध्रुवमिति निवनाति हृदय।। अथाकस्मादम्मिन्विकिर ति रजः क्रुरहदयो रिपुर्वा रोगो वा नयमुत जरा मृत्युरथवा
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या पतनि । तया ततो निष्क्रमण तु दूरे ऽधोद प्रपाताधिरमति
ययं ॥ प्राणीत पोतानहाय पाडोमोदीने तेमा एपीरीत पहना करी
कटनीवानोनीत ॥ ५ ॥ प्राणीहिनापदेन साननतानची धनं
अपने ना मग मादापरतानपी तेत्राणीना योगीरीने दुरसीय
शातसुधारस
यर्थ ॥ हे प्राणी तुथा जगतमा लक्षावधि अपायोकरीने कोऽपथरीलें।
ता मेजची जन्मोजन्मना थन्यासेकरी तेहनाउपरज मनने स्थिर राखेने ।
उपरतो एयोथनतर जे थकस्मातिक क्रूर हृदयवत शत्रु किंवा रोगप्राप्ति भय
अयग मृत्यु एटलावाना धुलनाखे ॥ २ ॥
सम्परारत्त ॥ स्पर्धते केपि केचिद यति हदि मियो मत्सर
को पढग्धा युध्यते केरुप्यचा धनयुवतिपशुहत्रपजादिदेतो॥
केचिल्लोनाक्षनते विपदमनुपद दूरदेशानटत ॥ कि कुर्म
कि वदामो नशमरतिशतप्कुल विश्वमेतत् ॥ ३ ॥
मर्य ॥ कोड कोधेकरी दग्धथयायका पकरे कोई परस्पर हृदयमा
पाने गटनाक कोनारुष्यानता स्वदपणे व्य स्त्री पच खेत्र गाम इत्यादि
शाम तारने वजी कोक लोनेकरी विपत्तिये नोगित यायका दर देशांतरोभा र
मागने ध्यामृत्यायने तो हो सुकरिये थने म बोलिये था जगत तो
शारागारी व्यानरे ॥ ३ ॥
पजानिटत्तत्रय ॥ स्वय सनत स्वकरण गर्तान्मध्ये स्वय तर य
ना॥४॥ प्रकल्पयन्नास्तिकतादिवाद मिट प्रमाद परिशीलयत
॥ मना निगोदादिषु टोपदग्धा पुरता सानि ददा सहते ॥५॥
गपति ये नय हितोपदेश न धर्मलेश मनसा स्टगति ॥रुन
क्यारमयापर्नयामंपामुपायम्वयमक एव ॥ ६ ॥
मातम यो नीनवना दुर्गा परतु नटा नीचनीच जऽपडा तेर्नु ।"
अनन यापनार नयी पटना नडापाडा गाव ॥ जे नाम्निादिक
पान प्रमादनां यन्यामाग्नाग दोकरीधययीने निगादाविरमा :
पा र अन पागुनमाटो एडवा महा मेंगारी सोने सामने ता हाहा
पार पाप नेयमलनानोमादेन ॥६॥
शांतसुधारस. २६ए अनुष्टव्वृत्तं ॥ परग्बप्रतीकारमेवं ध्यायति ये हृदि॥ जर्नल निर्विकारं ते सुरखमायतिसुंदरं ॥ ७ ॥ अर्थ ॥ संग्राणी पूर्वोक्तप्रकारे बीजाना खोनो प्रतीकार हृदयमा धरेचे तेणे करी जेना परिणाम मुंढग्यायवे तेने निर्विकारी नुख प्राप्तधाय ॥ ७ ॥ ॥ पंचदानावनाष्टकं गमकुजीरागण गीयते ॥ हमारो भंवरदेदुमुरारी एदेशी॥ सुजना नजत मुदा नगवंतं सुजनान्नजत मुदा नगवंतं ॥ध्रुवपदं॥ शरणागतजनमिद निष्कारणकरुणावंतमवंतरे ॥ सुज ॥१॥ अर्थ ॥ देसानो या जगतमां कारणविना दयाना पालनारा अने जे पोताने शरणे यायो तेनारदाना करनारा जे नगवंतवे तेने तुमे हकरी नजो॥ १ ॥ तणमुपधाय मनः स्थिरतायां पिवत जिनागमसारं का पयघटनाविकृतविचारं त्यजत कृतांतमसारं रे॥सुज ॥॥ अर्थ ॥ एकदणमात्र पोतानो मनस्थिरकरी जनागमना सारनु पानकरो अने जे स्त्योमा कृतिलन मार्गनी घटनायें करी थापणो विवेक विकारवंत थायठे एवा यसार निंदनिक कल्यनो त्यागकरो ॥ २ ॥ परिदरणीयो गुरुरविवेकी भ्रमयति यो मतिमंद॥ सुगुरुवचः सकदापि परिपीतं प्रथयति परमानंदं रे ॥ सुज ॥ ३ ॥ ययायविचारितगुरुनो संगमको केमके जे गुरुयो मंदबुद्धिवंत पुरुपोने चांति सहि न करेने यने सुगुरुना वचनो जो एक वखत सांनिध्या तोपणपरमानंद उत्पन्नकरेठे ३ कुमततमोनरमीलितनयनं किमु पृच्छत पंथानं॥ दधिबुध्या नर जलमंयन्यां किमु निदधत मंधानं रे ॥ सुज० ॥ ४ ॥ थर्थ ॥ कुमतरूपी अंधारेकरी जेनी थांखोढकांऽ गयली तेवाप्राणीने मोद मार्गनो रस्तोतुं पूवं हेलोको तमे दहीनी बुधिये पाणीनेविपे मथनिकाने केम नाखोगे केमके हे पाणीमाथी कांड माखण निकलवानुं नयी ॥ ४ ॥ अनिरुच मन एव जनानां ॥ जनयति विविधातकं ॥ सप दि सुखानि तदेव विधत्ते॥ आत्माराममशंकरे ।। सजाया अर्थ ॥ पौतानुमन पोताने वाधीन न राख्यो उता तेहिज पोताने नानाप्रकार । या अपमहिना वाश्या तन एक नियम की पटाने तदातार वृत्तिय करीधगम जिअन्त्र कांगा गम्यते न पापानम्माढाटामीन्यमेवमनी १४० शातसुधारस नायो उत्पन्न करने थने तेहिज मनपोताने साधीन राज्योत्ता निगकपणे विविध प्रकारना मुसयापेठे ॥ ५॥ परिदरताश्रवविकयागौरव मदनमनादिवयस्य ॥ क्रियता सावरसाप्तपदीन ॥ध्रुवमिदमेव रदस्यम् रे। सुज० ॥ ६॥ अर्थ ॥ हे सऊनो तमे थाश्रव श्रने विकथानुजे गौरवपणु तथा धना मिरजे कामदेर तेनी साय मित्रतानो त्याग नार करीने सरररूप सामान हिज एक गुन तत्वले ॥ ६ ॥ मात ऽद कि नवकातारे॥ गदनिकुरबमपार ॥ अनुस ग्तादितजगउपकार जिनपतिमगदकार रे। सुज०॥७॥ अर्थ ॥ जीर या ससाररुप अरण्यमा रागपादिक थपाररोगना । गाने तेनो त्यागकरी ने जगतना उपकार करनार ने ससारीजोशेने घर मा मगर ज्यादिक रोगोनो निवारणकरी निरोगताना थापनार एहवा नीर्यारम्प यापनी मेवनाफर ॥ ७ ॥ शणतंक नियोदितपचन नियतायतिदितरचनं ॥ रचयत सुरून मुगगतममान शातसु पारसपान रे ॥सुजाता इति श्रीगातमु धारमंगयफाय कारुण्यानावनाविनायना नाम पचदश प्रकाश ।। य॥ माटेर गयो नियजियजीना कहेला श्रयया पिनयारीने । ध्यानगगीन मांगना पचना सानायायो नाफानी प्राप्तियाना मानना दिन जनना कामागचे हाताणीने पाया नियमासाननाict श्री नमुगम गंयमय कामण्यनापनाविनायना नाम पचदश प्राय " पचापि मालिनीटनानिािता यम्मिन विश्रम मययते रुग्णात्री नियममामाद्य मयालय रामपरिवपि पाटोदामीन्य मर दानविय नालीक लोका निन्ननिनबम्पा निनिने म निनाम्याम्यान निम्न्यनेमायने दास ॥मिथ्याहामन्बीनीयर्थगण गोफे नम्मशिया जमा
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जायकरी सहित मोदसुख नोगवे ॥ ५ ॥
शांतसुधारस.
नं ॥३॥ अदतोपि प्राज्यशक्तिस्पृशः किं धर्मोद्योगं कारयेयुः प्र
सह्य ॥ दद्युः शुचकितु धर्मोपदेशं यत्कुर्वाणा उस्तरं निस्तरंति॥
तस्माढोदासीन्यपीवपसारं वारंवारं दंत संतो लिहंतु ॥ आनंदा
नामुत्तरंगतरंगजीवनियनुज्यते मुक्तिसौख्यं ॥ ५॥
अर्थ ॥ दवे सोलमी माध्यस्य नावना नावे जेमकोप्राणीने थाकचडेलो
होयने प्राणी विनातिनास्थानक विश्रांतिलेते तेमज उदासीनता जेनेते संसार
रुप धरण्यमा व्रमणकरनारा प्राणीने विश्रांतिजेवावें स्थानकडे अने जेनेजो
गंगीपुरुप तत्काल प्रीतिवंतथाय एटले गमेतेवा रोगेकरी पीडितहोय तथापि
जेन उदासीनता पणं प्राप्तथयु तो तेने ते रोगनी व्याधि कांऽपण जाणवामां न
थावता उलटो हर्पवधेठे बली जेनीमाप्ति राग थने परुप शत्रुनो रोधकरवाथी
यापने एहवी उदासीनता ते श्रमोने सर्वकाल प्रियवे ॥१॥ भाजगतमांना
लोको अंतरना प्रागयेफरी मर्मनाजेटे निन्ननिन्न कर्मकरी अने रम्यारम्य व्या
पारेकरी निन्नभिन्न स्वरूपवतो पण वधाप्राणीनी एकप्रकृति तो नधीज तिवारे
दवे विधानपुरपे केनीकेनी रम्यारम्य चेष्टा उपर संतुष्टथा, किंवा रुष्टथावु अर्था
त् विधान पुरुपेतो सर्वप्राणी उपर संतुष्ट अथवा रुटनयता समदृष्टीज राखवी
नलीने ॥ २ ॥ जुयोकेश्री वीरनगवान पोते तीर्थकर उता मिथ्यासहित बोलना
रो पोतानो शिष्य जमाली तेने रुधीशक्यानही तो बीजो कोण कोइने पण पाप
थकी रंधीराखनारते माटे उदासीनपणुं राखतेहीज थात्मानु हितकारी एम
जागवू ॥ ३ ॥ जुधोके श्रीतीर्थकरदेव अत्यंत शक्तिना धरनारदता तथापिते
कोऽने वलात्कारेकरी धर्मोद्योग करवाने प्रवर्तावताहता केसुं ते तो जेणेकरी न
व्यपुरुषो उन्तर संसार समुश्माथी तरी पारपामे एहवो केवल शुक्षधर्मनोज उपदेश
मात्र थापतादता ॥ ४ ॥ कारणे हेसत्पुरुषो तमेवारवार हर्पसहित औदासीन्य
तारप सारनृत अमृतनो धास्वादनकरो के जेथकी जीव आनंदना वहेनारा मो
। पोडानावनाष्टकं प्रनातिरागण गीयते ॥ पादरजीवक्ष्मागुणयादर । एदेशी
अनुनय विनय सदासुखमनुनव ॥ औदासीन्यमुदार रे ॥ कु
गलसमागममागमसारं ॥ कामितफलमंदारं रे ॥ अनु० ॥१॥
नहाने नोन नदागयी पुग्ने एटाने तहागयो पारोशाय तमनः मोहरपने यानर यापनागीने समनानेन मना पागणी यानाने अनुपम मिट म्मर चतनमतम्यिनमनिगमरे॥ चिग्जीन पिण टन जनमे मुममधिगम ॥ अनु० ॥ परजापति १७२ शातसुधारस परिदर परचितापरिवारं ॥ चितय निजमविकारं रे॥ वदति को पिचिनोति करीर ॥ चिनुतेऽन्य सहकार रे ॥ अनु० ॥३॥ अर्य ॥ वजी विशेष प्रकार माध्यस्थपणु नावेडे हे विनयतु सर्वसन थनुनकर जेम वाचित पदार्यो थापयामा कल्पवृक्षमुख्य तेम बानित सनी पमाडनारी थने सर्वशास्त्रोमा महोटी सारनूत एहचीजे उदाप्तीनता । तुमेयनर ॥ १ ॥ थरेजीर तु वीजा विकारीपदार्थोनी चितवनानो । तादग परियार तेनोत्यागकर थने पोताना अधिकारि सरूपनु चितनार ।। २ योपि न सहते हितमुपदेश ॥ तपरि माकुरु कोप रे ॥ निष्फ लया कि परजनतत्या॥ कुरुपे निजसुखलोप रे॥ अनु० ३॥ सूत्र मपास्य जडा नापते ॥ केचन मतमत्सूत्र रे ॥ किंफर्मम्ने प हितपपमो यदि पीयते मूत्र रे ॥ अनु० ॥ ४ ॥ अयं । जापणा हितकारी उपदेश सानजतो नथी तोपण ना. गारी निकालोकोमपर रातापरी पोताना सुखनो तोपकोकरे ॥३॥ कार मग सत्र न्यनीने धोने केटलाक नसूत्र नापणकरे पी नारा जानिमाणीने मी लघुनीत पान करवालागा तातेने श्रमेहरिय॥ ॥ पश्पनि किन मन परिणाम निजनिजगत्यनुसार । येन जनेन यया नवितव्य तन्यता चार रे ॥ अनु० ॥५॥ ग्मय दादयगमममता ॥ मरण मायाजाल रे ॥रया पदमि पुजलपरगतामायु परिमितकाल ॥अनुणा ६ ॥ अर्थ ॥ देती पातपातानी गन्यनुमा मांजीगनामनना परिणाम आग से नेत्र कमाताना माना नना मनना परिणा यो मापन या व्यय जननाय मा तहागया मित्राने प्रमाणमदिनन नेनेनटना पारनागनती।
पोताना यानिमायर्नु कथनकरेवे. यावीरीतें पूर्वोक्तप्रकारें मनायनायोनी सुगंधियें मिनी नटीपसरं वती रागपरुपशत्रु दीयाजापो निम्पि मामाजली शांतसुधारस. २७३ पामनिदानं ॥ स्फुटकेवल विज्ञानं रे ॥ विरचय विनय विवेचित झानं ॥ शांतसुधारसपानं रे॥ अनुण ॥ ॥ इतिश्री शांतसुधार स गेयकाव्ये माध्यस्थ्यनावनाविनावनो नाम पोमशः प्रकाशः॥ श्रर्थ ॥ हेनव्यो तमे मनमा रहेनारं आनंदद् कारण एहवं अनोपम उदा सोनपणारूप तीर्थर्नु स्मरणकरो अने जे कोशकालेंपण विराम पामतानथी एहवा मोक्षसुखपामि चिरकाल स्वबपरिणामेरहो ॥ ७ ॥ अने परब्रह्मतारूप परिणामोनुं ज निदान तप विज्ञानने जे प्रगटकरेठे एहवं विवेचन करनारुंजेमा ज्ञान ने एहवा शांतसुधारतर्नु पान ते हे विनयतुं निरंतरकर ॥ ॥ इति श्रीशांतसुधार स गेयकाव्यमाध्यस्थ्यनावना विनावनोनाम पोडशः प्रकाशः ॥ स्त्रग्धरारत्तध्यं ॥ एवं सनावनानिः सुरनितहृदयाः संशयाती तगीतोन्नीतस्फीतात्मतत्वास्त्वरितमपसरन्मोदनिजाममत्त्वाः ।। गत्वा सत्त्वा ममत्त्वातिशयमनुपमा चक्रिशक्राधिकानां सौख्या नां मंतु लहमीं परिचितविनयाः स्फारकीर्ति अयंते ॥ १ ॥ निप्रेतपीमा प्रनवति न मनाक काचिदइंसौख्यस्फा तिः प्रीणाति चित्तं प्रसरति परितः सौख्यसौहित्यसिंधुः ।। दीयते रागरोपप्रऋतिरिपुनटाः सिद्धिसाम्राज्यलहमीः स्या श्या यन्महिम्ना विनयशुचिधियो नावनास्ताः श्रयध्वं ।। ॥ यर्थ ॥ हवे श्रीविनयविजयजी उपाध्याय श्राग्रंथ समाप्तकरीने उपदेशप जनाहृदयमा संगवरदित गायनकवाथा तार्किकका स्पष्ट यात्मतत्वजण श्रने जे ना मोह निशा धने ममत्व तुरत नाशपाम्या ने एवाप्राणी ममनानं अतिशय परा मूकीने चक्रवर्ति तथा शादिकांनासुखोथकी पण अधिक वा विनययग्नाग न्य नुपम सुखोनी पुष्कल कीर्तिवंत लयीने पावे ॥१॥ जेदना महिमायक यनिरुप प्रेतनापाडा गारमात्रपण थातीनथी पण कोइएक अपूर्व नी म्यनी विधायः श्रने चित्तप्रीतिवंतथाय धने यात्माने चार बाजुचा नांग्ज्य न . अर्थ ॥ जेम चश्मा सोलेकलाये पूर्णतापामी जगतने पवित्रकरे तेम. इववाटत ॥ यावजगत्येप सहस्त्रनानु पीयूपनानुश्च सदोटये अर्थ ॥ जेकालपर्यत जगतमा चश्वर्य उगे तिहांसुधी जेमांप्रकाशमान का २७४ शांतसुधारस वशथायवे एहवीजे लावनायो तेने हे नव्य लोको तमारी विनयेंकरी विथवता ते नावनायोनु थाश्रयकरो ॥ २ ॥ पथ्यारत्तं ॥ श्रीहीरविजयसूरीश्वरशिष्यो सोदरावनूता ॥ श्रीसोमविजयवाचकवाचकवरकीर्तिविजयास्यो॥३॥ अर्थ ॥ श्रीहीरविजय सूरीश्वरना शिष्यवेनाश्हता तेमा एकस क ने वीजा कीर्तिविजयवाचक ॥ ३ ॥ गीतिक्ष्यं ॥ तत्र चकीतिविजयवाचकशिप्योपाध्यायविनय विजयेनाशातसुधारसनामा सदृष्टो भावनाप्रबोधो ऽया18 शिखिनयनसिधुशशिमितवर्षे हर्पण गधपुरनगरे ॥ श्री विजयप्रनसूरिप्रसादतो यत्न एप सफलो ऽभूत् ॥५॥ अर्थ । तेमा कीर्तिविजय वाचकना शिष्य श्रीविनयविजयजी । शांतसुधारस नामा नावनानो प्रबोधकरयो ॥ ॥ था प्रयत्न सवत " त्रेचीसना वर्ष श्रीगाधार नगरमा श्रीविजयप्रनसरिता प्रसादयकी दर्पस उपजातिरत ॥ यया विधु पोडशनि कलानि सपूर्णतामेत्य जग पुनीतेपथस्तथा पोडशनि प्रकाशेरय समग्रे शिवमातनोतु।।६ ग्रथपण सोनकतारुप सोलप्रकारकरी जगतनु ते॥ तावत्मतामेतदपि प्रमोद ज्योति स्फर डिमयमातनानु॥७॥ णी मपरप ज्योतिने एहयो या शास्त्र ते सत्पुरुषोने श्रानद श्रापो ॥३॥ सफलथयु ॥५॥ વિવારના રીપ इति श्रीमन्महोपाध्याय श्री कीर्तिविजयगणिशिष्योपाध्याय श्री नियरिजयगणिविरचित शासधारसय पोमश प्रकाशोऽर्थस हित समाप्तिमगमत् स्तोत्र २७ ॥ अथ श्रीजिनप्रनसरिकतचतुर्विशतिजिनम्तवनं ॥ पात्वादिदेवो दशकापसा यम्मादधीयेदितदानविद्याम् ॥ अप्पुजन् यचरणो नपातिव्याजेन नृनं नवपनवः स्व. ॥ १ ॥ गत्या विजित्य विरदं स्वसेवां चिन्ह अनावश्यदचीकन्य. ॥ यम्यादये हव्यनुजा नृणां वो वनूब नूमा भुवि सोऽजि नोऽध्यात् ॥ २ ॥ मद्यः स नियामवसनवं वः श्रीगंनवो यस्य पितुर्जितारेः ॥ रा जाधिराजत्वापि मेनापतित्वमेवानिमन बतानृत् ॥ ३ ॥ जातोपि य संवरत. मयं यदजीजनत् मंचग्मनुतं तत् ॥ स कोशकेतुर्जितमीनकेतुर्जितोऽनिनंद्याटनिनं दनो वः ॥ ४ ॥ सुनन मेवनवस्य यम्य मुक्ताफलस्येव न दर्शनं कैः ॥ चाव द्वान उमनि तमायाः सर्वश्रियामाश्रयमाश्रयध्वं ॥ ५ ॥न नेजिवान् वक्रगति क दाचित् नवातिचार मतन च साम्य ॥ पद्मप्रनः शोणतनुप्रनोपि नव्यश्रिये को पि धगंगजन्मा ॥ ॥ पृथ्व्यां प्रस्तः सुमनोनिरर्यः सुपर्णकातिर्वदुकव्युपास्यः ॥ अय.फलश्रीयतादयस्कंध. सुपारपास्तताप ॥ ७ ॥ चंमनोऽव्यात् वपुरं एजाजरातिगितांगीजनता यदीयः ॥ प्रसेननिर्वाणरमाविमुक्तकटादसदस्नपितेव नानि ॥ ७ ॥ नावावे पुष्पशर विजित्य नश्यध्वज यो मकर गृहीत्वा ।। आरोप ध्रुव स स्वनृत्यतां में मुविधिविधेयात् ।। ए ॥ पित्रंगदाहप्रगमेन नाव यलमायेपि खनु स्वक्ति ॥ अजिकपनगतोपि विज्ञान यस्तं स्तम शीतलमठ मोज ॥ १० ॥ श्रयान् श्रिये टोहटि मातृरुवात् गर्नस्थिते यत्र महातपात् ॥ ध्यतर्गशम् प्रणनागमोहराजाय पूत्कर्तुमिवाहितोत्थ ॥ ११ ॥नव्यांगिनां यस्य सचिमपंचग्गानि चेतानि च रजितानि ॥ स वासुपूज्यो जगदेकपूज्य संपूज्यतां नि ॥ १२ ॥ कमानर धर्तमशिहिताकरलेन सेवां प्रतिपद्य यस्मात् ।। धन तत्तस्तं स फिलादिकोलः कापिल्यजन्मा विमलः स जीयात् ॥ १३ ॥ अनंत जिन्नतुरनंतताव्यप्रदोऽस्तु टोस्तनितरिवारः ॥ यन्नादनं श्येनमपि प्रदृश्य विश्व स्य नश्यत्यथ वर्तिकौघाः ॥१४॥ पापानिमचमुदीदय टीनं यलदणं जक्तिचिकीरू पेतः ॥ तद्धंगगंकी मुरालुलोके शक सपाणि स धिनोतु धर्मः ॥१॥ अरातिरम्ये प्यनरातिरम्य सन्नानियोगपि ढानियोगे॥ चके स्थिता यस्य सुखं जयश्री स पातु व. पंचमचक्रवर्ती ॥ १६॥ वागं ध्वनं यस्य तनी विलोक्य तत्प्रेमतो दव्यनुजा भुवं यः ॥ सर्वागमालिगिसुवर्णवर्णनाः सुपरदनात्स मुटेऽस्तु कुंघु. ॥१७॥ सुदर्शना यलमपटे जितपुयारि.
२७६ स्तोत्र साक् नीलोत्पलेनास्तु जात इति प्रसह्य वेद व्यधाद्यस्तमस खवृत्ते ॥ पितु कम पाजयितु स्तान कलासीप्टवरूढिनोर ॥ १७॥ यस्य प्रिया नो विहितारिलोपामुश यो न पपी नदीन ॥ निस्तारकात्मा नयमालयस्यो नव्य श्रिये कुननव सम ॥ १५ ॥ यस्यागरोचि पटल समतात्मतृत्वर नृगकुजानिराम ॥ अचान वास साक्षाभावविधा नदतु सुनतोऽसी ॥ २०॥ यलोचनस्पर्मिविविदित्वा सापरा जगदेकनाथ ॥ यो लम्मलक्ष्याधरण श्रितो स नूत्यै ॥ २१ ॥ यक्ष्क्रयोगात्सुनग विदन् स्व महाशयोत्पन्नतया कृतज्ञ ॥ ये घुराकमिपारिसपेवे त नेमिमध्येमि यप्रकाड ॥ २२ ॥ यदेहदीप्ति तु प्रना चिर चारुनिनालयत ॥ नर्मव्यकोटि घटयति दृष्टे शिष्टा थनिष्ट स पार्थ ॥ २३ ॥ प्राच्य विमोच्यास्पदमुद्भवात्प्रारु स्थानातरे रोपितवान् हा प्राचोकसत्सगुणशानिनूयं यस्याघमम्यानमतां से वीर ॥ २४ ॥ जपति जन्मदीक्षा ज्ञानापवर्गोत्सववासराणि ॥ जनानि नाकायितनूतलानि । लोकप्रमदप्रदानि ॥२५॥ यदाप्तवान शिरसाऽनिवद्य सुमेरुरक्षाजनि गोत्रमुख्य तीर्थाधिनाया प्रथयतु सेवाहेवाकिना ते कुपथप्रमाय ॥ २६ ॥ कुवाच । हातरान्न प्रयोगघकालिरल निरेतु ॥ यस्मिस्तपत्यस्ततम समूहे श्रीवीरनि स जीयात् ॥ २७ ॥ व्यामोहनूपालवर विजित्य तस्माऽपान तु सितातपत्र । स्या करे राजति पुमरीक सा भारती यन्तु वाठितं व ॥ २७ ॥ इति । रिनिरीडिता जिनवराश्चतुरुत्तरविशति ॥जरतवर्षनवा जुवनेश्वरा वरत रख वितरतु न ॥ ए॥ इति श्रीचतुर्विशतिजिनस्तवन समाप्तम् ॥ ॥ इति श्रीचतुर्विंशत्तिजिनस्तवन समाप्तम् ॥
आस्तिक नास्तिक संवाद. ॥श्री वीतरागायनमः॥ ने ॥अथ श्रीयास्तिक तथा नास्तिकनो संवाद प्रारंन । १ नास्तिकः-श्रा जगत अने तेमांना पदार्थो सर्व शून्य। एने ससलानां शीगडां, आकाशनां फूल तथा वांजणीना पुत्र वगैरे जे पदार्थोनी त्रणे कालमा सिम ता थती नयी, तेवा पदार्थोनी उपमा देवाय. कदाच तमे कहेगो के, जेम गगशृं गादिक देखाता नथी, तेम ए पदार्थो पण देखाया न जोश्ये, तेम तो नथी. जग ततो प्रत्यद देखायठे, तेने ए उपमा केम देवाय; प्रत्यक्ष प्रमाणवडे सिह पदार्थ शून्य केम कहेवाय? एनो उत्तर ए के, जे ए पदार्थोने देखे , ते त्रमिष्ट . जे पुरुपर्ने भ्रम थयो होय, तेने एक वीजु नाशे, तेम तमने पण थलं कहेवा हो. तमे ए दृष्टांतोनो मर्म समजी शकता नथी, त्यारे तमारा ध्यानमा सहेज था वे एवो बीजो दृष्टांत कर्बु बु ते सांगलो; आ जगत स्वप्नसमान वे. जेम स्वप्न अस तम जगत पण असत्य वे. अने स्वप्नना पदार्थोनी परे था जगतना पदार्थों पण असत्य वे. जे देखाय ते स्वप्ननी पठेत्रम मात्र एमां संगय नयी थास्तिकः-थरे नास्तिक. ढुं तने एटझुंज पुवं के तारा सिंहांतनो कहेनार जीव के यजीव , एनो उत्तर ताराथी गुं देवाने ? जीव अथवा धजीव कह्यायिना चाल राज नही जो तु कहीश के ते 'तमरूप में, तो ते एक रीते व्यवहार दृष्टीए योग्य कहवाशे खलं, कैम के जे पोते नमरूप होय तेने वधु नमरूप नाशे. जो एम हो य तो अमारो कार्ड वांधो नथी; पण जो तारो सिहांती चमरूप तो नही. तो जेवो वरशे तेवा बीजा पदार्थो पण कबूल करवा पडगे; अने कवृत्त कस्याविना चालनार नथी, केम के,वीजें वधु नमरुप होय थने तारो सिक्षांतीज मात्र थनम होय एम संनवे नही. त्यारे एक सिद्धांती ने एक सिद्धांत ए बे पदार्थ मानवा जोऽये ले. ए वे पदार्थ जो तु माने, तो जीव अने यजीवपर्ण सिह थाय ने के नहीं! एवो रोते जगतमां पण घटपटाटिक जे वन्तु वे ते वस्तुज ने अयस्तु नथी. तेमज घटते घट ने, ने पट ते पटले. घट पट नयाँ. ने पट घट नथी एक पदार्थमां बोजा पदार्थनो थनाव दोय . पण घट घटपणे नावरूपं . ने पट पटपणे ना वरूपे से. इत्यादिक सर्व पदार्याविषे जाणी जे. जे नावरूप होय ने मन्वन गोय ए रोते था जगत नावरूप दोवाची सत्य वे. केम के सर्व वस्नु पोतपोनानार . ने.
स्वमारस्यानो तमे पोते अनुनय करेलो ने,त्यारेज तेनाधिपे कयन करीशका मा. २४ज ८ 4 १ M थो नमिष्ट, तमे जीरने मानो वो के नही जो ना कहेशो तो था बोले । दो ए वात तमाराथी ना कहेगा नही अने जगतने थसत्य मानो गतवारे | पोते तो सत्य उरगोज, केमफेजे पोतायी अतिरिक्त वस्तुने असत्य माने ते पोते | ना जे असत्य होतो नथी,फितु तेनाफरता विपरीत स्तनापवानो सत्य हायने नोया प्रत्यक्ष दापनो ने के जगतने तमे स्वप्नजेनु गणोतो, त्यारे तमे पोत जा को नही? केमके तमे पोते जागृत अवस्थामा न हो तो सामने स्वम कहान आस्तिक नास्तिक संवाद पें अनादि सिवे, घने जेना अत नथी तेने शगताना गिगडा प्रमुखनी देवी ए केवी मूर्खता वे वास । माटे ए बोलवु बालकना जेतु कहेवाय जो स्वप्नजे जगत मानशो. तो तमारा पोताने महोडे पोते बधागो ते स्वप्नपणे लावरूप अनेजाग्रतपणेयनावरूप,तेमजागृत जे जे तक नावरूप वे अने स्वप्नपणे यनावरूपठे, पण केवल अनावरूपे कोई पदार्य नही ज्यारे स्वप्ननावरूप त्याने तेना'जेवो जे जगत तमे कहोठो ते केम कहेवाय,थने स्वप्नने जो अनावरूप कहेशो तो देखाय ? केम' जे खाय नही, अने स्वप्न तो रात्रे दीतु ते रात्रे दीतुकहेवाय बनदियत दी १६२, तु कहेवायडे, माटे जे वरखते स्वप्न देखाय ले ते वखते ते देखावारूपे थने सनात त्य वे यने जागृत असत्य तेमज ज्यारे जागृत देखाय ते त्यारे एम नावानावरूप पदार्थ होय ते साद्यत होय वे पली विशेप एवु समजवु ये ले के, यद्यपि स्वप्न तो सायंत वे पण स्वप्ननो जे विकल्प ने ते श्राद्यतरहित श्वत ने तेमाथी कोई समये स्वाय माटे स्वप्ननु देखवु कोई कान्ने तेमज यद्यपि जगतमाना पदार्थोने पलटवापणे उत्पाद व्ययनी थपेक्षा णे साधत ने तथापि व्यरूपे सदा शाश्वत व केमके पर्यायपणे धर्म, श्राफाश, काल, जीव अने पुजन ए ए व्य शाश्वत , जो पण देना इव्यना पर्याय अशाश्वत कहेवाय , तो पण स्वरूपे व्यपर्याय सदा छे, तेने यसत्य केम कहेवाय ' कोयनेजगत कोण पोज असत्य होय ते सत्यामत्य कहेगानो ? जे पोतेसत्य होय ते वीजाने सत्य अथवा यसत्य कई समर्थ थाय माटे जीव पदार्य नथीज एम जो कहेशो तो तमे पतिजा " आस्तिक नास्तिक संवाद १७ए मज जगनविषे पाण तमे अनुनय करीने कथन कगे ठो, तेथकी जगतची जुदा अ नुनय कना न माटे जीव तो. धने जो जीवन होय तो गतागतनाग, नाव, जापा, कार्य तथा कारण इत्यादिक विषयानो अनुनय करबो. पांच इयिोनो निग्रह करवो, त्रणयांगे गरीरनी चाल ना करबी न्यादिक चष्टा करनारो कोण ? ए चेष्टा चैतन्य गतिथी थाय वे एथी चनना लक्षागवान जीव जाग्गयो. ज्यारे शरीरमांथी चेतना नीकली जाय त्यारे बष्टा यनी टीठामा श्रावती नदी, माटे ते अजीव कहिये. एवी रीते जीव अने अजीव ए वन पदार्थ ने एम लिक चाय . मक वस्तुना वे प्रकार थाय ने. एक पक्ष्यने बीजोप्रतिपट्य.जीव पत्तीवेत्रने अजीव प्रतिपक्षी अथवा अजीव पदी ने जीव प्रतिपक्षी ने. अर्थात् जीव तथा अजीर ए वे पदायों सदा शान्धत अविनागी , एवं केवलीनुं वचन , ते अवश्य मान्य कर जोये. दोहा, खरी गीख ए मानजो, मनमा राखी नाव; सहाण जिन वचन, कगे धरी चित चाव. १ नास्निकः-जीव थने यजीव नही मननारा मूर्ख के. केमके, जीव तो पांच महान्तोना संमेजनथी उत्पन्न पाय ले. ज्यारे पांच माहानूतोतुं प्रथककरण एटले सुंध्यवापणं थाय ने. त्यारे जीवनो नाग याय वे ए वात साची वे. यानिक:- पांच महानतोथी तो तमारा मतप्रमाणे पांच जुटाजुदा पदार्थोनी नन्यत्ति थाय वे. ते याप्रमाणे.- पृथ्वीथी अस्थि, जलयको रुधिर, अग्नियकी जन गग्नि, वायुथकी वालोबान अने थामाशयको शून्यता थाय . ए वधाथी जीव नो जुदा ने, ते गायकी नत्पन्न थायवे वार ? चैतन्यने उत्पन्न करवानी शक्ति कया नूनमा वे ? चैतन्य कयानूतना अंमयकी उत्पन्न ययुं ? ते कहो. पाचे मना भून पोते जड ; ने चैनन्यने कम करी शको ? माटे ए पांच महाजतनुं समंज न जीवनी उत्पत्ति को ठे एम तम कयुं ते पण नंनवे नही; कमके, नमनन कोई एवो पदार्थ नयी के जेथी को पदार्थ उत्पन्न यशक. माटे जीवना उत्पन्न मनारो कोई नथी, पण ए तो अनाटि पंच महानृतयकी जुदोज दोहा,जिनवच नामृत पान करि, पामो अमर स्वरूप; जीव अनादी अनुनवो, ए गीग्य अनूप.२ ३ नानिको मर्व जाणेने के जीव ते गायत पदार्थ , तेनी उत्पत्ति केम मनवे ! ज्यारे उत्पनि कनो त्यारे नाश पण यश. अने चेतन तो उत्पनि त ? -- कोई पापी, कोई पुण्यवान, कोई नरकगामी, तथा कोई स्वर्गगामी वगैरे सर्व जीवा . 4 थस्तिक - जगतनो की ईश्वर होय, तो सर्व प्राणीमात्रनु ईश्वर कारण पदाया पुत्ररूप माना जोये पुत्रनी उपर पितानो प्यार होय ए स्वानाविक । सिझने तेम ऽभ्वर नो पण सर्वनी उपर प्यार होवो जोये जो एम होय तो सर्व प्राणीमात्र सुखी होवा जोये तेम तो दीगमा थावतु नथी कोई सखी, काई दुखी G8 आस्तिक नास्तिक सवाद. जोये. माटे ईश्वरेबाथी जीवने कर्म बंध थाय वे. थने तेज प्रेरक वे एम थास्तिक - लगारेक हास्य करीने बोले वे 'वरे पोताना अशरूप उत्पन्न कराने तेयी जीव वरनो थंश कहेवाय, ए उपरथी जीव तथा अंशाशीनाव सबंध तमारा कहेना प्रमाणे ठरे से जो वर यश ठे ईश्वरना जेवो जीप होवो जोये केमके, थशायशीमा भेद होतो नयी नी पवे जीव पण निर्मन , एम मानवु जोये त्यारे एवा निर्मलस्वरूपी कर्म लगाडीने मलसहित करवानु कारण शु हतु थापणे कोई गुरू वस्तु रवाने थर्थ ज्यारे लावीए वैये, त्यारे जहासुधी बने तहांसुची तेने मलीन देता नथी, बने स्वच्छ राखवानो घणो प्रयत्न करखा करीये ठे त्यारे पोताना रूप जीवने जाणी जोईने मेल लगाडवु ए ईश्वरनेविपे सनवे नही एम साधारण मूर्स मनुष्य पण करे नही, त्यारे ईश्वर ते तेम करे। अने जे ना थगनो तिरस्कार अथवा नाश करे ते अात्मघाती कहेवाय तेम श्रात्मघाती कहेवाशे कदाच तमे एम कहेशो के, ईश्वर पोते पण कर्मक वे त्यारे जे पोते कलकसहित होय, ते वीजानो कलक शु मटाडी : थने ते ईश्वर पण शानो। माटेगमे तेवी मनकापना करीने निर्दोषी दोप लागु करवो ए केटली मूर्खता । माटे ईश्वरनी वायी काई पण जे याय ने ते कर्मया थाय व एम जाणवु दादा, कर्मबध या जीवने, ' छारूप, कहे एम ते मूर्य , ईश अकीय अनूप 5 ११ नास्तिक था जगतनी जे अनुत रचना देखाय , तेनो को जोये केमके, एवी रुति स्थानाविक थई शके नही तेम कर्मादिक जड पर पण जगतनी उत्पत्ति सनोनही माटे जे जगत मत्पन्न करे , तेनेज • कहिये, थने एवी लोकवदता पण , के जगत सर्व ईश्वर कृत्य श्वर सर्व प्राणी मात्रना उत्पत्ति का यावर पितारुप थने . क A आस्तिक नास्तिक संवाद. ។ gប नी वर्तणुक जुदी जुदी दीवामां आवे के. एम केम की, ते ? वली जगतना जी वाने प्रवत्तीवनारो ईश्वर , एम पण तमारा कह्या उपरथीज सिमथाय ते. त्यारे हिंए गायनी पूजा करवी. अने म्लेले तेनो वध करवो. ए बुद्धि पण ईयरे या पी कहेवाशे. जो एवी बुद्धि देनारो वर मानगो नही. तो बीजो कोई मानयो जोजो केमके तमारा मत प्रमाणे प्रेरणा करनारो कोई जुदोज होय ने अने जे अंगणा करे वे ते ईश्वर ने. त्यारे ते वीजो प्रेरणा करनारा वर मानवों पटतो. वीरीत वरनो ईश्वर तेनो ईश्वर इत्यादिक मानो तो अनवस्था टोप प्राप्त थ ओ. बली पोते पोताने पुःखी कोई पण करतो नयी सर्व पोताने सुसनीचाहना करे वे. तेमज पोताना संबंधीयोविपे पण सुखनी चाहना करे . तमाग केंदवा प्रमाणे तो जे जीव नग्के जाय ते तेपण वरनो अंशयने जे स्वर्ग जाय ते पण घर नोज अश से. एटले सुखी तथाऽखी थाय ते सर्व वर पोतंज के एम ठग्यं. एप्रमाणे वर पोतेज संसारमा परिचमण करेठे. ते पोताना संबकना जन्म मरणाटिक पुग्य कम टाली शो! अने जीवोने नरकथी अथवा बीजी कुगतिथी केम बचावी ? व्याटिक विचार करता जगतनो कर्तावर नथी; कितु स्वानाविक मिनटोदा.ज ग कर्ना वर कह ते विधान न होय: ईश्वरने कर्तव्यनहि, स्वनाय निराज जोय । १२ नाम्निक - जगतनी उत्पत्तिका नजे वर न होय. मा ९ करो यायो सेना नयी. पण वर सर्वव्यापक डे के नहीं? यानिकः- जो ईश्वर सर्वव्यापक होय. तो जीव शिवाय बीजो कोई पदार्थ न होवो न जोये. कमके. वरतो चेतनवत ने नर्वमा व्यापर दांप.तो नंतना निा कोई जगा खाली न जोयेजे काणे बीजो पदार्थ न्दी टारने जगनमा तो जीव यजीव पदायों जुदा जुदा टोमा यावे . एवी स्पष्ट निक बार वे के वर सर्व व्यापक नथी. बली ब्राह्मण, क्षत्रिय. वय नया rs.r चार वर्ण अनुक्रमे श्रेष्ठता तथा कनिष्टता कम पाया ! जेम के.वाट्नण की। नष्ट ननाघी इत्रिय कनिष्ट. हात्रियथा वैटय. धन वैदयरी इ बनिष्ट दे, नं मईची कनिष्ट चमालाटिक जानि के नेयामा भ्रष्ट शनिष्टता न पी जा रे मा. पर तो सर्वमा एक घने समान ने तमां बनम मयमना र गन नही बने उनम मनाने जो बीमार र जमक. कोई पुस्प हुन रन्य रे .ने रोमन र उ एम न यई जोऽय वर नो बधामां मारनी रनायन या .
ज 0 - . १४ नास्तिक-याटला सवाद थया, तेश्रोमा ईश्वरनु यथार्थ कारणपणु थास्तिक - पोतानु सामर्थ्य प्रगट करवानी या तो तेने थाय के, जेनविर्ष गमा केटलु सामर्थ्य , एवो जेने सशय होय, ते ईश्वर शानो साधारण मनु। प्य प्राणी पण पोतानु सामर्थ्य जाणी शके , तो ईश्वर केम न जाणी शके। ច आस्तिक नास्तिक सबाद रु करे ? ए उपरथी एपो निश्रय थाय ने के,वर सर्व व्यापक नयी दाहा, क ईश्वर जे कहे, तेह न जाणे मर्म, नम नूया सर्व मत, पिना एक जिनधर्म ? १३ नास्तिक - इन्वर सर्व व्यापक दो के न हो तेनी साये अमारे जा पण था जगतनो अधिपति ग्वर , अने जगतरुप तेनु ऐश्वर्य ने, तथीन रताने पाम्यो वे जे यश्वर्यगालो होय तेने ईश्वर कहिये थास्तिक - जगत श्राधिपत्य लेगानु ईश्वरने शु कारण हतु! रूप थर्य पण तेने शासारु जोऽतु दतु । शु जगतनी उत्पत्तिनी पूर्व ते ने पाम्यो न हतो ऐश्वर्यविना इश्वरता सनोनही ए उपरथी जे जगतनी तिनी पूर्व थनीयर हतो. ते 'उत्पत्ति करीने ईश्वरताने पाम्या हे, एका तन थाशय जणाय वे नही वारु ! पण एव खोटु वे वरनेपिपे एवो करवीज नही जोये जुयो के, तमारा कहेवा प्रमाणेज जेम प्रजानी राजा कहेवाय , यथा धननी थपेक्षाये धनाढ्य कहेवाय ठे, तेमन थपेक्षाये ईश्वर कहेवाय वे एटले जेवारे जगतने उपजावे तेवार जगतनु पणु कहिये, एथी जगतनी पूर्वे ईश्वर न दतो एम ययु, थने जेवारे थाय त्यारे ईश्वरना पण नाव जयो जोये जो एवात कबूज करशो तो जेक कालमा होय ने कोई कालमा न होय ते क्षणिक कहेवाशे जो दणिक मान" वीजा घणा दोप प्राप्त पो, माटे वरने जगतनो एवी रीते अधिपति प | ते योग्य नथी दोहा, अधिपति जगनो जे कहे, परने मतवादि , ते । कनिष्ट ठे, उत्तम अनेक वादि ११ काइए का नथी जगतनी उत्पत्तिनी पूर्व वरने एवो सा प थया के. मारू सामर्थ्य प्रगट करू, ए वात वेदमा कही ते श्रावो रोते . एकोह बहुप्यामि एटने एक हु बहु रूपे था एवा कारणया ना त्पत्ति करी है, तेथीईन रने कारण को ले थशान होय धरतो सर्पज्ञ , ते तु पोतानु सामर्थ्य जाणतो नहोतामा ५ .
आस्तिक नास्तिक संवाद. ៗ ថ្មីៗ माटे एम कहे, ते मूर्यता ने. दोहा, निज समर्थने जाणवा, क ईश जग एह. कारण वादी जे कहे, शतमूरख ने तेह. १२ १५ नास्तिक -- ईश्वर पोतानु सामर्थ्य बतावया सारु जगतनी उत्पत्ति करी; एम जाग जोये. शास्तिकः--कोने बतायवा सारु जगतनी उत्पत्ति करी जीव अने जड प पापों तो ईश्वरेज उत्पन्न करवा , एम तमे कहो तो. त्यारे वीजो कोण जगतनी पूर्व दनो के, जैने देखाडवा सास ईश्वरे श्रा जगतनी उत्पत्ति करी! माटे ए वान पण असत्य ले दोदा. वीजाने देखाडवा, पोतानुं सामर्थ्य; जग उपजा व्यं ईश्वरे. एम कहे ते व्यर्थ. १३ १६ नास्तिक-जेम माणस सबारमा उठी वस्त्रादिक पहेरीने भारीसामा पोतानुं वरप टेग्वे ते ते सारं देखाय तो श्रानंदित थाय , तेम ईश्वर पण पोते पोतार्नु वरप जोवामारु या जगतरुप शृंगार करी पोतार्नु रूप विस्तारीने देखे डे; एम जाण जोश्ये आस्तिक -माणम पोतान रूप धारीतामा जुवे , तेनुं कारण ए के, मारु रूप सार देवाने नही, तो लोको हाशी करो; अथवा कोई खोड काहाडशे; तेम ईश्वरे बीजा कोना नययी पोताना रूपनो विस्तार कस्यो ? ईश्वरना जेवो बीजो ईश्वर कोई ने नही; त्यारे जोनारो कोण ! माटे ए वात पण जूनी दोहा, पोते जोवा थापने, रच्यो जगत था ईश: कोना जयथा ते कहो, मतवाटी तजि रीश. १४ १७ नास्तिक - "एक एवहि नूतात्मा. नूते नूते व्यवस्थितः; एकथा बहुधा चेव, इम्यते जल चंवत्" एवी रीते श्रात्मा एक बता सर्व प्राणीमात्रमा जुदो जुदो दी लामा यावे वेजेम चंमा एक तां अनेक जलस्थानकोमा प्रतिबिब रुपे जुदो जुदो दीवामां आवे : तेम वर एकज ने पण घट घटमां जुटो जुदो देखाय ने एटाले ईश्वर विज ने सर्व जीव प्रतिबिंब ; एम जाणवू. यास्तिकः-- जेम एक चश्माना अनेक प्रतिविवो दोय , ते जेवो चश्मा होय तेवा देखाय ते. तथा काचना वनमा एक मनुष्य ता अनेक प्रतिविव रूपे दीवामां आवे . तेमा मूल आरुतिथी जुदी आरुति देखाती नथी. जमके, बीजथी ते पूर्णिमाणुधी गमे तेवी चश्मानी थारूति होय, तेवो प्रतिबिंब देखाय ते; तथा कार्य नुवनमा मनुष्यनी जेवी थारूति होय तेवीज तादृश्य दे खाय वे. काणो दोय तो काणो देखाय, धाधलो होय तो बांधलो देखाय; वगैरे
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माथीज सर्व थाय : एम जाणवु जाये. आस्तिक नास्तिक संवाद. नए हे. पण पहेली होयज नहीं, तो तेनीसाथे बीजो संबंध सायी करे! तेम जीव प ण अनादिनो कर्मसहित . अनादि जीवनुं एहज स्वरूप चाव्युं यावे ठे, माटे जहागुधी कर्म सहित ते तहांगुधी नवां कर्म पण ग्रहण करे ठे, पण प्रथमयी अमुक वखतेज जीव नवां कर्म ग्रहण करी कर्ममल सहित ययो; एवी थादि नथी. २० नास्तिक - जीवने कर्म क्यारे लागां ? कर्म लागवानी कोई पण घाद्य जोयें जे पदार्थनो अंत घतो होय. तेनी याटि पण दोवी जोये. ज्ञान करी क मोनो अंत याय ते एम तमेज कहो तो. त्यारे याद्य पण कबुल करवी पडगे; ते यादिनो समय कह्यो तेरवशो? केम के, जीव प्रथम निर्मल होय तोज तेने कर्मम्प मन लाग्यो कहेवाय. यान्निक.--ए वचन दूपण सहित केमके, जीव प्रथम ज्यारे निर्मल हतो न्यारे तेने कर्म लागवाना परिणाम केम थया ? जे निर्मल होय ते पोताने मल महित थवानी ना करे नही. तेम उतां जीवे कर्मेनी वांठा केम करी? माटे जीव यनादिनो कर्म सहित ते. जीवनेविपे कर्म वनावे अनादिसि वे. टोहा, श्रादि जीव निर्मल हतो, पति वलग्यां वे कर्म, एम कहे ते ना लहे. जिन वच १ नास्तिक---सर्वमा व्यापक आत्मा एक ठे, अने गरीगे जुदां जुटां वे, एम यान्तिक --जो वधामा यात्मा एक होय तो माता. पिता. स्त्री. पुस्प, नाई, पुत्र, गजा, प्रजा. चोर, सानुकार, चमाल, दत्रिय, उंच, नीच, नरक, देव ता, पुण्यवान, तथा पापी इत्यादिक निन्न निन्न केम देखाय ने ? सर्वमा धान्मा जोऽये; यने एके कोपेनु पाप सर्वन लागवु जोश्ये: ते मज एक कोयेला पुस्यना सर्व नागीटार थवा जोऽय: एकना मुक थयायी मर्व मु जोड्ये, प्रत्येक माणसनुं जुडं जुडं अनुष्टान निष्फज़ थर्बु जोऽये; तम नो चनु नयी जे को ले ते नोगवे , ए कहवत प्रमाणे या धात्मा निन्न निन्न टे स्वाय ने. माटे सर्वमा एक यान्मा व्यापकपणं कहे ते समीचीन नथी, एम जाणवु दोहा. याम सर्वमा एक वे. निन्न निन्न या देद; एम रहे कान म २० नास्तिक --सर्व कार्य बने कार्य वग्नी वारप ने धने विग्नी नोनो मर्म १६ मानवु जोश्ये. वेन. क दोवाथी तंज देग्वायु कथवा न, यमत कहीजे तेह. १३ . नयी ते जीर पूर्णपार्जित क्में करी शरीर बाधेले ते जरा पुद्गननु ग्रहण नायो नोपनी नन्पनि केम मनाय। दोहा, जीरकपजे नृतथी, ए मत। ३४ नाम्निर तमाग क्या प्रमाण नीरने जगातर थायमें नानी प्राप्ति २० आस्तिक नास्तिक सवाद. यान्तिक -जो एम होय, तो जन्म धारण करवामां मातापितानु गु 3 श्रने विष खाधाथी मरण थाय ने, तेमां विपनु सु वाक ने तेमन जनयी धानी निवृत्ति, पाणीथी तृपानी निवृत्ति, यमिथी शीतनिक्ति, ली तापी खेदोत्पत्ति, वर्षाथी धान्योत्पत्ति, पथी बरोल्पनि, नम्रताथी । त्पनि, चोरी कस्याथी ताडन, यारी यकी निर्जङ, पापथकी नरक, स्वर्ग, इत्यादि सर्व कारणो थने कार्यों व्यर्थ थशे अने सर्व वस्तुयो सगुण कहेगी जोजो राग करनारो स्नेही नही, तेम क्षेप करनारो वेरी नहीं कहेवाश पार प्रति उपकार करवानी काई जरूर रहेशे नही अने पाप पुण्य पो केम के, सर्व कार्य करवानु मूल कारण एक वर छा , माटे सर्व र घारूप ठे, एम कहे ते समीचीन नथी तमारा कहेया प्रमाणे पुण्य कर्ना पण ईयर थने नोक्ता पण ईश्वर थयो दोहा, ईश्वर श्वारूप था, जगमाहि एम कहे गुणता टले, सारासार न काहि १७ १३ नास्तिक - यात्मा पच नूतो धकी थयो , ए वात असत्य नयी । साची ने, श्रमने जणाय ने याम्निा नूत गदना अर्थ त्रणे कालमा अस्तित्व थाय ने एटले जे वे ने चे, तेने नृत कहिये नूतनो तो कोई काले वेद यतो नथी, माटे एक नृतनो श्रश तो सनो नही, तेम श्राकागादिक पच महानूतनो यश पण गंगप नही गजी पाच नुतना श्रगे करी शरीरनी उत्पत्ति थाय डे, त्यारे थने चनना ह्या श्री पन या माटे नत शब्द ए ब्रमजान ले रिदानद ज्ञानम्प थात्मा तो शाश्वत ले ते कार्ड समये जूना तथा नग तमा नृननु काई प्रयोजन नथी, केवी पति नायता रूप ले के पाय ने पिप का विचारात नथा, माटे नूतपशदन व्यर्थ ने पप जोर चिदानंद मत्य ने, यनादिनार थनूप १॥ मागे ना , अने अगुन मनु फोन ते वात मन्य के, पातु " एच जीर के जडी - आस्तिक नास्तिक संवाद. २" देश जीवने एक खंडमां शरीर मूकीने बीजा खममां बीजं शरीर धारण करवु पर्छ तो एटलो दूर जतां तेने केटलो वखत लागतो हो ! अने कोई जीवने एक श रीर मूकी तरत तेज गाममां उपजवु होय, तेने काई दूर जवू पडतुं नथी, तेथी काई वधारे वखत लागतो नही दशे, पण जेने दूर जवू पडतु हशे तेने रस्तामां चालता वधारे करवत लागतो दशे नी! आस्तिक - नजीक अथवा दूर नवांतर करवामां वधारे वखत लागतो नथी, सरखोज वखत लागे . जेम घाणी, रहेंटीयो अथवा बार| इत्यादिक ज्यारे फरे वे, त्यारे तेश्रोना माहेला तथा बाहेरना नागने फरतां सरखोज वखत लागे ने यद्यपि अंटरनो क्षेत्र थोडो होय ने, ने बाहेरनो घणो होय , तथापि फरतां वखतमां वधघट थती तथी. वली जेम दीपकने शलगावीए ते क्षणमांज प्रकाश करेते वचमां कोई अंतर पडतो नथी, तेम जे वरखते एक नव मूके के लागलोज बीजो नव पामे ठे, तेमां लगार पण अवकाश रहेतो नथी. ते नव पड़ी दूर धारण करवो होय, के नजीक देशमा धारण करवो होय, गमे त्यां नव धारण कर मांवामा वखतनो वार फेर थतो नथी. २५ नास्तिक -जीवने कर्म केवी रीते लागे . आस्तिक. यात्माना शुनागुन परिणामथी जीवने कर्म लागे जे. जो शुन परिणाम होय, तो सारा कर्म लागे , अने अगुन परिणाम होय, तो नरशा कम लागे बे. अने तेनां फल पण तेवां थाय . कर्मने काई शान नयी, जे या जीवे पाप का माटे ढुं एने पापरूप कर्म थई लागुं. २६ नास्तिक -कर्म तो जड वे. तेथी तेश्रोमा झान शक्ति नथी त्यारे जीवे नर शा अथवा सारां की कस्यायी पाप अथवा पुण्यरूप परिणाम केम थाय ते । ए परिणाम तो छानविना थाय नही. तेथी एवं जणाय वे के कर्म लागवामा . ग्वापणुं जीवने ठे, ने तेनुं फल देवू इश्वरने वे. मां ईश्वरनु काई काम नथी. कर्मोनो एवो स्वनावज वे कोई पुरुप विपमिश्रित नोजन करे, ते मरण पामे ठे विष जम पदार्थ होवाथी तेने एवु डान नथी त सतां तेथी तेवो परिणाम यायठे के नही। । यी पुष्ट थाय रे पण ते नोजन एम थाय ते. तेम उता तेनो परिणाम . . १ Sh रए आस्तिक नास्तिक संवाद तेयो थाय ने एतो एनो स्वनार वे तेम गुनागुन कमाने यद्यपि तोपण तेयोनो एपो सनावज वे, के फतापे पोते परिणामने पाम - नो एवो स्वनाचज के गुन कन्याथी पुण्यकर्म बंगाईने उत्तम गनिनी जे, तेमज अशुनविपे पण जाणी से एगो कमीनो थनत काज़नो वली जेम चमक पाहाण लोहने पोतानी तरफ खेंची जिये , तेनु पण ज्ञान नथी, के दु लोहर्नु याकर्पण करुंतु, परतु ते क्रिया ने तेम जीव शुनागुन परिणामना नपयोगे गुनागुन कर्म थाकर्षण स्माषणे लोलीनूत करे , एयो धनादि कालनो स्वनारज वे एमा काम नथी २७ नास्तिक - जीव एवो कोई पदार्थज नथी, व शून्यज ठे त्याने फर्मों ते कोने लागवाना दता। ए वो नर्म ने जी को वेज नही थास्तिक-नाई, तूं पाको बुझिनो देखाय के जीवनेज बराडी बधी खटपट चूकी गई के नही वारु 'अरे मूढमति विचार तो कर के जो जीवन होय, तो शरीरनी चेष्टा केम थई के शरीर तो जम, तेमा न होय तो किया केम थाय? जो श्रात्मा न होय तो या शरीर, हाक कान, नाक, जीन, धारव, मन, बुद्धि, धन, धान्य, राज्य, तथा सपति सर्व पोताथी जुदा पदार्थामा शरीर मारु ने, धन मारु ले, वगैरे एवो कोण ले । मारु बे, एवु कहेनार पदार्थथी जुदो होय जे एम तो कोई पल तो नथी के दु शरीर बु, दु मन बु वगैरे, माटे शरीरादिक सर्व वस्तुनो वहार होवाथों जीव एव परे शरीरमाथी जीव नीली गया पनी करवु, बोलवु, तथा चालवु वगैरे काई पण किया थई शकती नथी तेथी थकी जीप जुदो कोईक जे एम नको जाणजे वली शरीरमा ज्यारे जीव के बोले ने, ने घट पटादिक पदार्थोमा जीव नयी त्यारे बोलता नथी तेथी व्य ते शरीर थकी निन्न एवु शिक्ष थयु तेने बेज नही एम तु ? जो जीव न होय तो व्यवहार केम चाले ? माटे जीव अवश्य ने २७ नास्तिक -- जीव समय समयनेविप नवो थाय ने हमेश एक जीव तो नथी थास्तिक - ए वात तदन जूनी ने जीवत्व नवु कोई समये यतुज जीपना पर्याय इव्य, देव, काल, नाव, तथा उदय नावाश्रित तो जुदा , . । १ आस्तिक नानिक संवाद. एक होय ने. पण जीवाणु नवु होतुं नथी. जीव समय समय प्रत्ये जो नवो घ मो दोय, नो वानपणनी वात चौवनावस्थामा माननवीन जोये. तथा गत सम बनु शानहे. दीतचं. जोगवे. लीधेनु तथा दीधेनुं प्रमुख काई पण स्मरणमा बायं न जाये. तेनी स्मृति तो चाय वे. तेथी जीव तेहिज . जो जीव नवो थनो टोय तो एक जीवन करेलु कार्य बीजो जीव केम जाणी शके ? ए तो प्रमिह वात ले तेथी जीव इय सदा सरखं : एमां कोई काले पण फेर पडतो नथी. एम जाणवू. २ए नास्तिक - जीव जे नाना प्रकारनां कर्मो करे .तेयोनो करावनार ईश्वर जे. वरनी प्रेरणा विना जीव थकी कर्म थाय नही. एम जाणवं. यास्तिक'- जो जीवने कर्म ईश्वर करावतो होय, तो कर्मनो कर्नाज ईश्वर नरो केमके जे कीयानो प्रेरक होय . तेज कर्ता होय . जो ईश्वर का तेरा वा तो जे कर्ता होय ते, तेज जोक्ता होय . ए रीतथी ईश्वरने नोक्तापणुं पण यावशे. नोक्ता ईश्वर थयाथी पापपुण्य ईश्वरनेज लागे वे. एम मानवं पडशे. जेम គន पुरुष पोताना हाथमां खड्ग लईने बीजाने मारे. तेनु पाप खडगने लागतुं नथी, पण ते खडगना मारनारने लागे . तेम पुरुपे कीधेलु पाप पण ईश्वरने लागनार ते. कर्मनो करनार तो खडगना जेवो : तेने कर्म लागवा न जोईए. नेथी कर्म इश्वरने लागे ने एम सिह थयु. एम माननारने एटलुंज जोगे के., कर्मनो कर्त्ता तु नथी, तेम कर्मनो नोक्ता पण तूं नथी; कर्ता जोक्ता ईश्वर ले. त्यारे सर्व मनुष्यो पोतपोताना मत प्रमाणे क्रिया करवानी बुद्धि केम करेने ? ; मद्य माशनो त्याग, अने स्नान, संध्या, स्त्रोत्र, तप, जप, वगरे शासार करे ? पोताने काई पाप प्रमुख लाग्युहोय तो तेनु निवारण शासारु करे ले ? पगार्य शासा करता नथी? पाप थकी शासारं बीहेने ! कर्ता शो नोक्ता एम शासारं करे ? पोते करे ले, ते नोगवे , तेम नता वली कहे ते के से प्रभु, मारो पाप टालो. प ए एम नयी कहेतो के प्रनु तमारां पाप टालो. जे चोरी करे तेने दंड भाग ने जे बेद करे तेनां प्राण जाय. अने हिंसा करे ते अवश्य नरक गामी जाग. नगरे ए सर्व व्यर्थ मानवा जोो. माटे कर्ना जीव ने ईश्वर नधी एम मानj जोगे. ३० नास्तिक.- अमे मान्य करेतु वर सर्वत के गम जाण. पने शायोमा पण “सर्वको ईश्वर." एवां घणो वापयो गटेर जाणे.
8 । ८ आस्तिक नास्तिक संवाद. थास्तिक-यद्यपि तमे कहोठो के वर सर्वज्ञ , ए बात सत्य ते ते सर्वज्ञतानी रीत काईक जूदीज ले जे तमे मानो तो ते वर सर्वज्ञ नयी मे एटलुज पूनीए वैए के, ज्यारे ईश्वर सर्व ले, त्यारे पोताने इस देनारा गादिकने तेणे शा सारु उत्पन्न कया । ज्यारे ए राक्षसोनी उत्पत्ति पोते व्यारे पोतानेज पुच करवु पडधु ए उपरथीज विचार करो के जो ईश्वर जाणतो होय तो एवी नूल फेम करे, जो एम कहिये, के रासादिक ओ ईश्वर थकी अजाणमा उत्पन्न यया जणाय ठे, तो ईश्वरनेविपे दूषण प्राप्त थशे अने जो एम कहीशु के जाणी जोऽने उत्पन्न कसा दे, तो वरना नकने पण सयाम उचित नथी, तो ऽश्वरने ते केम सग्राम कार्य न थयो ? माटे एम कहेवु तदन असनवित ठे ३१ नास्तिक-इश्वर ज्यारे जगतनो सहार करेठे त्यारे पोते प्रागवानां डापर पहोढे , अने ज्यारे जगतनी उत्पत्ति करवानो सनव होय, त्यारे न्याय ले, ए वात तो साची के नी? श्रास्तिक--ए वात ते वली जूठी होय । तमने बड थ्रधर श्राकाशमा रहे ले के, पृथ्वी नपर होय । तेमा अधर रहे डे, तो तमे कबूल करशो नही, केम के तमे वली एम पण मानो तो के, बर ज. यई जाय , ने तेनी उपर मात्र प्रागरम देवाय वे, त्यारे पृथ्वी पण कमूल रवी पो जो पाणी, पृथ्वी, तथा प्रागवम ए बधा पदार्थ महा प्रनय पची पण रहे , त्यारे सहार ते शानो कयो कहेवाय' जो एम दोय तो पदाथा शाश्वत थया एम जणाय ने फरी ज्यारे ईश्वरे सृष्टि उत्पन्न करी, ते न्हेजा कह्या प्रमाणे पाच महा नत तथा, प्रागवड हतो त्यारे नवु ते शु र वगैरे विचार करायी एम जणाय ने के, ए बधा गपाटा ने जेना जेम याव्यु, तेणे तेम शास्त्रोमा लखी नाख्य जपाय ठे ३२ नास्तिक ब्रह्मा, विमु, थने महेश एत्रणे सर्वज्ञ श्वर , एम अमे निये ये थान्तिक -तमे गमे तेम मानो तेमा अमारु शु गयु। अमे तो जेम हो म माना तमे कह्या ते त्रणे जो मर्वज्ञ होय तो श्रज्ञानने केम श्रगीकार रे। जुरो के, महादेय पोताना पुत्र गणेशन माथु कापी नायु तेनी खबर पो साने केम न पडी गवण सीतानु हरण करी गयो ते वखते राम सर्वज्ञ उता पण दु .
वमा पण दमग एक गेत ग्हती नयी जम के वानपणानी प्रीति होय ते कोई दाग्दिा आव न कोई कर्मना योगे प्राणी वंटीग्वानामां पड़, ते वा तनां अन्य नम्नही होय ते पण पामे यावतो नथी को पुस्प एक वीनपर बीजीक आनिक नास्तिक संवाद. ए प. पही, तथा वन प्रमुखनं कम पूर्वतो दतो? यने ब्रह्मा पासथी रादलो वेट कम चोरी नई गया? ए गते ब्रह्मा, विनु अने शिव अज्ञानी गरे ठे. एवा बज्ञानी तेन ईयर कम कहिये? ३३ नाम्निक.-सर्व योनियामां मनुष्य योनि उत्तम वे. एवं शास्त्रोमां कयुं वे तं मन्य ने. अने बजीयनुनव निह पण ने. आम्निक.-ना कोणे कन्यु ? मनुष्य योनि तो उत्तमज वे. परतु तमे तेम बनाकरण पूर्वक मानता नथी देखाता महोडाथीज मात्र कहो तो. केम के नमारे तो एयकी पराबीजी उत्तम योनियो मानवी जोऽये वे. जे योनिने भरे अंगीकार करीत, ते योनि तमारे पण सर्वोल्लट मानवी जोऽये. मह, १ तथा वगह, प्रमुख योनियोमा इश्वरे यवतार लीयो वे; ते योनियो मनु प योनिकरतां उत्तम मानवी जोऽये. जो मनुष्य योनिज उत्तम होय तो ऽश्व र पति वीजी योनि कम धारण करे ? माटे तमारा बोलवा प्रमाणे तो मनुप्य योनि कानां वगहाटिक योनि उत्तम जणाय . वर ज्यारे पगुमां अवतार लिये . त्यारे पगुमुखी. पशुवाही. तथा पशुरूपी होय . तेने देव मानवो न अयोग्य वं. श्रादार, यन्ति, थायुध, यसवारी तथा आवाश ए पांच पदार्थ भग्ना नकन पण त्याग कन्या का ले, तो वर पोते तेनु केम ग्रहण करे ? माट बगदादि योनि धारण करनागेश्वर मानो, तो मनुष्य योनि करता ते योनि उनम कहेवी जोतो; जो तेम नही कहेगो तो वरने अपमान लागतो. ३४ नाम्निक -गग्नी त्याग करीने जीव परलोके गया पीपा या लोक माम यावतो नयी जनतेने तो याव्यं जोऽये. थानिक -या संमारनो नंबंध मटी गया पठी जीवनुं फरी यावq यतुं न था, ने कारण कर्म . जीवन श्राव, जवं कर्माधीन वे. ज्यां कर्म लई जाप या जीव जाय . यने नव पामे वे ते ते नवना कार्य को नं. या न बु थाय ने. तो पूर्व जन्मना संबंध ते कम बाट श्रावे ? कानावराणी कर्मना यो -- २९६ . G राजा - A आस्तिक नास्तिक सवाद गे बीजा नपनु स्मरण पण थतु नथी ए विषयने मलती प्रदेशी राजा शी गुरुगी प्रमोत्तररूप चर्चा वे ते कदु बु प्रदेशी राजा-मारो थपर्मी दादो नरकमा गयो , ते तमारा मत त्याथी प्राचीने मने थपर्म करतो वारे त्यारे दु मानु, के वात साची ठे केशी गुरु - तारी स्त्रीनी साथे को पुरुपने कामनोग करतो तने दीनामा वे, ने ते तारा हाथमा याव्या पठी ते तारी वीनती करे के,मने थोडीक वार आपो, तो दु मारा कुटबने कही थावु के, कामनोग करवायी यात्रु उस तो ते वात कबूल करीने तेने तू रजा थापीग? ना तेने एक कण पण बुटो मूक नही गुरु-तेमज तारो दोदो पण पापसची, गुनेहगार थई, नरकमा गया परमागामी तेने केम मूके ? तेयो ते आवी शके नही राजा - मारी दादी स्वेद्याचारी थी, जैनधर्मने अंगीकार करीने स्वर्ग गई, पानी केम कहेवा थावी नही, ने थारे तो तेने गु हरकत पुस्प मानकरी, 1, कुशुम तथा धूप प्रमुख लाई देवनी पूजा जेतो होय, तेने कोई चामाल समागमा जवान कहे तो ते त्या जाय के? एवी दी हा पण करे? ना ते एवा खराब स्थले केम जाय । कदी पण जाय नही गुरु-तेम तारी दादी स्वर्गलोकमा गई , ते सेतरवाना तुय था मनुष्य कमा केम थावे । या लोकमा श्राववानी इछा पण थाय नही एक चोरे चोरी करी, तेनो इन्साफ करीने तेने लोहानी कोठीमां ली दीयो तेनु मुख वध करीने उपर सारी रीते कनई कगवी तेमा पवन प्रवेश करी शके नही एवु कयु पठी ते चोर कोतीमा मरी गयो तेनो जीव कोठीना क्या रस्तेथी नोकली गयो ? तेमां तो कोई विद दीनामा श्राव्यो हरे जीव ते केम मनाय? रोजी होय, तमा तरी वगाड्याथी तेनो वाज बाहार गनलाय ने ते गुरु - मोटी शाजामा एक पुस्पने नेरी सहित घालीने तेने चोतरफ वध इयिना बाहार फेम यावे व तेम जीव पण विवना बाहार निजी जाय । एक चोरना कटका करी एक कुनमा में नरी राख्याहता तेनु महोड़ परथी सारी रीते वापी लीधु हतु, के जेमा पवन पण प्रवेश करी शके नही गुरु-कोई राजा . राजा राजा आस्तिक नास्तिक संवाद. रए t . पती-वघाडीजो, तो तेमा थनेक क्रम पडेला देखायां. ते बिह क्यांचीश्राव्यां? थनिमा लोहनो गोलो नारख्यो होय तेमां निविना अग्नि केम प्रवेश बजे वस्तु अनिमा नाखीए-तेमां नि नहोय, तो पण अनि प्रवेश करे जे. जीवनो प्रवेश थवामा निनुं काई काम नथी. --एक चोरने में ते जीवतो हतो त्यारे तोल्यो, अने मरी गया पड़ी सोल्यो त्यारे जीव नीकली गयो उता नारमा काई फेर पडयो नही. तेनुं शु हो, जोये? जेम खाली मशक तथा पवनधी नरेली मशक तोली जोतां वजनमां यतो नथी. तेम जीव वायुरूप होवाथी ते शरीरमांथी नीकली गया प तोलमा फेर पडतो नथी. .बालक थने योवनना शरीरमा फेर ले पण जीवमा कांई फेर नथी. सरखी वोले ने तेनुं शब्द पणे कानमां सरखी रीते स्वर जाय डे; उपयोग सरखो केम थतो नथी? युवान जे क्रिया करी शके जे ते बाल पती नथी तेनु कारण | ते कहो. जेम जूतुं धनुष्य होय तेथी वाणनो उपयोग जुदी रीते थाय बे ने न होय तो तेथी वाणनो उपयोग जुदी रीते थाय ने धनुष्यमा फेर होवा कियामां फेर पडे ने. तेम बालक धने युवानना शरीरमा फेर होवा । क्रिया सरखी थाय नही. एटले बल वीर्य प्रमुखमां पण फेर फारथाय ने. थने वृक्ष माणशना शरीरमा जीव सरखो बतां युवाननी पत्रे मनार तपाडी शकतो नथी? जेम कावडवडे लार पाडनारी पुरुप सारी नवी कावड होय तो वधा उपामी शके ने, ने जूनी कावड होय तो काईक थोडो नार उपाडी शके जीव तो तेज ले पण युवान शरीर होय तो वधारे नार उपामी शके, ने “याय तो थोमो नार उपाडी शके ले. एक चोरने मारीने तेना थनेक खेम कीधां, पण जीव तथा जीवना तेकाएं दीवामां थाव्यु नहीमाटे जीव कोई बेज नही. जेम काटमा अग्नि रही छे, तेम शरीरमा जीव रह्यो में; ते देखायकैम ? मां अग्नि देखाय तो शरीरमां जीव देखाय. कालीधारो हमेशलाकमा ' युवान *- - A रएन आस्तिक नास्तिक सवाद कापे से पण तेने अग्नि कोई वखते पण दीनामा थापती नयी ने ते हेवानु वेकाणु पण दीनामां थावतु नथी तेम जाणी लेवु राजा -मने प्रत्यक्ष जीव देखामी यापो के जेथी दु जीरने जाणु गुरु तमे वादर वायु कायना जीपने जोर्ड कगो के तेने पण जोई शो नहीं तो जे अरूपी जीव ने तेने केम जो गफशो' राजा -हाथीमा अने कोमीमा जीव केम सरखो होय । गुरु -हाथीनु तथा कीमोनु शरीर महोटु नानु ठे, पण जीपमा अधिक ता नथी जीव बन्नेमा सरखो ने राजा- लोकमा जीप धने जड एक देव अवगाही निरतरपणे केम रह्या ? गुरु - जेम दूधनी नरेली कडाईमा साकर, एलची, अने केशर नाखी ते केम समाई जाय डे' दूधशा चारे वस्तु एक क्षेत्र अवगादी नि: केम रहे ले ? एकज काणे चारे वस्तु थनिन्न नारे रहेली ने एना वर्ण, रस, फरश निरतर निरावाधपणे तेम जीव अने जड जगतमा निरतर क्षेत्र अवगाही निराबाधपणे रह्या वे ३५ नास्तिक - सर्व लोकमा जीव नरपूर ठे त्यारे देखाता केम नथी । यास्तिक - जेम सूक्ष्म जीव सर्वत्र पूर्ण वे ते ज्यारे दिवशे तडको पडे घरमाना कोई विक्षारायें थोडोएक तडको घरमा श्रावे ते तडका तर केटला एक परमाणु जेवा दीनामा थावे , ते वधा सूक्ष्म जीवो ने ते मा तडको थावे त्यारे उडता देखाय बे, बीजी रीते देखाता नयो तेम ने जड सर्व लोकमा नरपूर उता उद्मस्थने देखाय नही, फितु केवल ज्ञानरूप तपना योगे देखायो अर्थात् केवल ज्ञानीज जाणी शकेचे ३६ नास्तिक च, सूर्य, ठाया, थातप, माता, पिता, स्वर्ग, नरक, जड, घट, पट, स्तन, तथा कुन प्रमुख सर्व ब्रममात्र दे, वस्तुरूप जनयी थास्तिक - जेम अधकारमा बाकाशनेविषे कोई पुरुष चायो जाप, ते बाधपणे जई शके , पण वचमां जो नित धावीजाय तो थागन चनातु ने ते कार्यमा थपगबाधक यायचे ए प्रत्यक्षम के सत्य ? तथा कोई मारे, कूटे, दानदिये, ए वस्तु गत्ये सत्यने, यसत्य अने नमजाल तो स्वप्न सक्दपने कहिये प A , PM 3 ... को नु फसासर्वनेथ जोये, तेमज को एक पाय करे तेनुं फल पण सर्वने थर्बु जो. ये एके नोजन कस्वाथी सर्वनीतृप्ति थवी जोये; एक नरकगामीथयाथी सगला न रके जवांजोये; एक स्वर्गगामी थयाथी सर्व स्वर्गमा जवा जोये; एकनो नोग सर्वने 'जोगवे एवं स्पष्ट देखाय . त्यारे सर्वमा एक ईश्वर केम कहेवाय? माटे एमक जोगव्यो-जोये; कर्म जुदा जुदा जोगवां न जोये; तेम तो देखातु नथी, जे करे ते व सर्व असत्य..ले; एयोमा सत्य पदार्थ कोई नथी. आस्तिक नास्तिक संवाद. ए नास्तिकः-सर्व जगतमा एकज ईश्वर . श्वर विना बीजं काई नथी, ए जोये. स्तिका- जो सर्व जगतमां एक ईश्वर होय, तो दाननो देनार पण ईश्व सेनार पणं ईश्वर कहिये लेनार थने देनारमा कांई नेद थयो नही. ६ पोतानी पाशेथी दान लिधुं त्यारे दान दीधातुं पुस्य कोने थयुं ? एथी तथा पुस्य व्यर्थ गया. वली मारनार पण ईश्वर ने मरनार पण ईश्वर कहेवो तो ईश्वरे वरने मायो तेनु पाप कोने लाग्यु ? धणी पण ईश्वर ने चोर तो ईश्वरनो माल ईश्वरे चोयो कहेवाय, त्यारे चोरीनी तपाश शासा जोयेठे? पुस्य करी स्वर्गमा गयो ते पण ईश्वर, तथा पापे करी नरकमा पण ईश्वर; त्यारे स्वर्गमा पुण्यवान जाय अने नरकमां पापी जाय; एमक व्यर्थ ले. ए 'उपरथी तमा बोलवू असंनवित ले. जगतमा एकज ईश्वर जे कहेड ते असत्य . घटघटप्रत्ये जीव जुदा जुदा , अने तेयोनी कर पण जुदी जुदी जाणवी. ७.नास्तिक-घट पटादिक सर्व पदार्थोमां ईश्वर एकज जे. एम जाणवू जोये. ग्यास्तिकः-जो सर्वमा एक ईश्वर होय तो जात, कुल, राजा, तथा चंडा निन्नता कही न जाये; कोई श्रेष्ठ तथा नष्ट कहेवाय नही. एक पुण्य करे ते 'ले समीचीन नथा बधा जीव जुदा जुदा से, एम कहे योग्य .. ए नास्तिक स्वर्ग, नरक, पुण्य, पाप, चंइ, सूर्य, नदी, समुइ, बीप, नर, नगर, याम, तथा माता, पिता इत्यादिक चोराशी लद, जीवयोनि प्रमु. यात्तिकः सर्व पदार्थ सत्य ने जजनी बुंद पण सत्य कहवाय नहीं, स्वर्गादिक पदार्थो केम असत्य कहेवाय? जे वस्तु थाय J Kw ।
. . ३०० आस्तिक नास्तिक सवाढ. थने वणो त्यारे नाश य कहेगायवे ए प्रत्यक प्रमाणे सिम वे, ते पण जाणे वे तो हे नास्तिक तू केम जाणतो नया। ४० नास्तिक -जगत ईश्वर रचित ठे श्रास्तिक-जो जगत वरस्त होय, तो जेटला वरना नत ठे, त सुखी होगा जोये, तेम तो दागमा थापतु नयी हिउ तथा मुमनमान सुखी तथा पुखी देरवायवे, तेने पण पूठिये तेवारे एम कहे जे सहु.५ करणी प्रमाणे पामेवे, एम कहीलूटे, त्यारे तमारा कहेवा प्रमाणे तो सुख उखनो देनार कर्मविना को वीजा होवो जोये तेनो तो विचार थई शके माटे हे मूर्खनुक्षि था जगतनो कोई करता नथी, ए तो सनार सिक व जेवी करणी करे, ते प्रमाणे सुख तथा उ ख जोगवेठे ४१ नास्तिक -सुरव 5 खनो देनारो वर ठे, एम मानवु जोये. श्रान्तिक -सुखऽ खनो कर्ता थापणो यात्मा , तेज सुसऽ खनो जाणको माटे सुखड सनो देनारो वीजो कोई समजवो नही ४२ नास्तिक -(प्रत्यक्ष प्रमाण वादी) पुण्ययकी सारु थायडे, ने पाप नरगु थायडे, ते थमने प्रत्यक्ष दृष्टिए देखाडो तो मानीए वास्तिक -पुण्यपाप तो सदम पुगत समूहरूपने जेम ना उग:। वेत्यारे शब्द-ज्ञान यायो, माटे ते सत्य वे पण थापता देखाता नयी तन ध, मुर्गप, प्रमुखना पुगत इडियो प्रत्ये यारता देखाता नथी, पण तेनु, यायचे, तेया थनुमान प्रमाण वडे जपाय वे के ए सत्य ने तथा वायु थने गरमी प्रमुग जे थायजे, ते रोगना उदयथी जाण्यामा थावे, प्रत्यक्ष दीनामा थारतानथी तेम पुण्य तथा पाप पण फल जोगव्यायकी स्यामा थाने तेयोना पुगत उग्रस्य दृष्टिए थारे नही ५३ नास्तिक -बाल्यावस्था तथा तरुणावस्थामा जी सरसो के ता ते थवस्थामा विज्ञान, विद्या, नापा, तथा पराक्रम सरखा केम नथी देखाता ? धान्तिक -जैम ना वीमायनेक छ, फन, न प्रमुख रहेता दे, जेग साइनो मोने, तेवी नमरताने पामेने जेम के, क्षेत्रनी चूमि सारी पाणीनी पण बगबर साह्यता होय, तो रुपि फजरूप धान्यनी उत्पनि तार तेम साग सानोरडे जेम जेम शरीग्नी वृद्धि यती जाय, तेम तेम नापा पण ताने पामती जायडे, पण यास्यांतर थयाथी युक्षि बाहेरथी यावती नथी किंतु . . .
तो, ते पण अज्ञानी होवाने लीध मानोठो माटे संनवे नही. एनास्तिकः-ईश्वर नक्तवत्सल , थने स्वेहाथी जन्मधारण करे. सोधेलो आणी तेनी लहेरने स्वाधीन थई जायचे, तेम जीवविषे पण जाणी. जन्ममरण,पण कर्माधीन : तेने जे धारण करे तेश्वर मानो! ते तो संजनादिकना कोलाहल शब्दो सांगलीने नक्कने वत्सलनावकारी थायुप्यहि बीज कहेंवाय वर तो-कर्मथी मुक्त होय, माटे तमाळंबोलवुयधुव्यर्थने. तक नास्तिक संवाद. रनी पते बुधिन अवस्थांतर थायठे. सर्व आत्मगुण आत्माने विपे सदा दे. पण योग्य समयमा उनव मात्र थायवे. कांई बाहेरथी नवा भाव जेम मयूरना शरीरमां अनेक रंग रहेला, पण समय पामे प्रगट थाय तम बाल्यावस्थामां पण सर्व गुण सत्वनावे ठे, परतु जेवी रीते पुरुप बलवान अनुप्यविना वाण चलाववामां समर्थ थाय नही, गलोला, गोफण, तथा खड्न वधा शस्त्र तेथोना उपकरणथी उपयोगी थायठे, ते विना थाय नही; तेम प्रण शरीरोपकरण: यवस्थारूप सामग्री यकी सर्व कार्य साधी शके. चेत कोई फेर नथी, चेतन सदासर्वदा सरझुंज . व नास्तिकः-जगत सर्व ईश्वरकत होवाथी सर्व पदार्थमां तथा सर्व जीवमा ई ध्यास्तिकः जो एम होय तो घट, पट, स्तन, कुंन, शास्त्र तथा नापा इत्यादिक अनेक वस्तु, ज्ञान कोई एक जीवने ठे, ने कोर्डएक जीवने नथी. जे जीवने शेय दार्थ ज्ञान ठे, तेने तो हे मूढमति, , ईश्वरनो अंश मानेवे, त्यारे श्वान, शकर, मांतर, व्याघ्र, प्रमुख श्वापद चौपद जीवोने घटादिक पदार्थोनुं ज्ञान नथी तेथोमा | ईश्वरनो अंश नथी? तमे तो जीवमात्रने ईश्वरना थंश मानो तेने बाध यावशे. जे वरनो अंग होय ते अज्ञानी केम होय? एथी जगत कर्जा श्वर अविवेकी रे. अने सर्वमा ईश्वरनी कला , ए वोल, पण थ केमके जो एम.होय तो सर्व सरखा झानी होवा जोये. तेम तो देखातुं माटे ए वात पण मिथ्या वे. तेम सर्व जीव ईश्वरना थंशरूप ले. एम जे तमे कला ठे. स्तकः-जो एम दोय, तो नक्तोने शरीर मूकतां वेदना केम थाय थे ? न्थी करतो ? मरणादिक किया तो सर्व इश्वरना स्वाधीन के. ए श्रादि वि 'तमारं बोलतुं वधु पोकल के. जीव तो कर्मने थाधीन वे. जेम के नास्तिक-था पंच महाभूतोथी उत्पन्न थए, जे विश्व, ते महागा . ते श्रान्तिक-पुगतना परिणामनो नियम नयी एना पुन पुन रुपातर यया क २०३ आस्तिक नास्तिक संवाद समये पोताना कारण पच महाभूतोमा तीन थो, ने पच महाभूतो । लीन थो थास्तिक -जो एम होय तो ईश्वर जड मिश्रित थाय थने ते समन निर्मल ए वे अवस्थावालो कहेवाशे त्यारे केवल ज्योतिस्वरूपपणु क्यां गई जे पच महाभूतोथकी जगतनी उत्पत्ति थ कहोगे ते तो सदा शाश्वत के थोमा पृथ्वी, आप, तेज तथा वायु, ए चारे नूतो पोतपोतानी क्रिया करंडे, म के, वनस्पति अने जगम त्रसनी उत्पत्ति करेठे ते क्रियाविना थाय नहीं रीते तो जीवनी ट खान शाश्वत सदा काल , त्यारे प्रलय ते शानो जो एम कहेशो, के पच महाभूतो जगत विनिर्मित क्रिया करता नथी, त्यारे नूतभव्यरुप कथन मात्रज उरशे थने हरेक वस्तु पोतपोताना गुणविना नहीं एवो नियम ने वली जो कहेशो के नूत तो बनत कालना त्यारे ससार पण अनत कालनो तरो तेनी उत्पत्ति तथा प्रलय केम कहेवाय । तो जेम ले तेम ले वली ईश्वर मनसा वाचा कर्मणा करि रहित , अने थी थनेक था एवी मननी छा यई त्यारे जगतनी उत्पत्ति करी ए वे नो परस्पर विरोध दे, केम के, प्रथम वाक्यप्रमाणे ईश्वर वारहित रे , वीजा वाक्यमा श्वासहित कहो हो, एयो पूर्वापर वचनविरोध होवाथी. बोलवु सर्व थसमीचीन के ४७ नास्तिक - सर्व वस्तुनो ईश्वर अधिष्ठान वे ईश्वरनी चाथी कत यस्त स, थाय थान्तिक - जो एमवे तो घट ते पट केम थतो नथी ? पण तेम थाय कैमके, घटनु कारण मृत्तिकानु पिम , तेमाथी घटज थायडे पण पटादि नयी थता तेमज पटनु कारण ततु, तेथकी पटज थायठे, पण के वीजा कार्यनी उत्पत्ति थायनही जो एम थतु न होय तो कारणथी थायठे, ए प्रवृत्ति मिय्या थाय माटे ईश्वरना थपिष्टितपणातले श्वरनी । स्त तथा यात सर्व थायवे ए तमारु कहेतु सर्व व्यर्थ ने नास्तिक - जीरने नवातर थाय ने खरु, पण वेदनो वेद पत्तो नय वेद ते स्त्री वेद न याय, स्त्रीवेद ते पुरुपवेद न याय, तेम स्त्री तथा पुरुष ते क वेद न थाय, अने नपुसावेद ते पुरुष तथा स्त्री वेद न थाय एम जाण्युज .
, पप दोवायी सर्व जीव सररखा जावा. उत्तम मध्यम वगैरे सर्व साकिक कार्य की कहवायने. पण चतनपणे तो सर्व सरखा है. एना उपर एक दृष्टांत कहूँ आता नधी पण ते तलावमांधी पाणी नरीने पोतपोताना वासयोमा लीया पठी इसका वर्णना वासणर्नु पापी उंचा वरणवालो माणस पीए तो वटले वे. फरी नां वर्णना नरेला पाणीना वासो मार्नु पाणी ते तनावमा नारवीने पी ताको बटलतुं नथी तेनु कारण गुं? माटे पाणीमां वटलवापणुं नथी. ने वा मिस नो मर्वनां सरखा ले. मार्ट बटलवु ए मननी मानीता ठे:यने एवीलोकम पांग ले. ज्या सुधी मननो मिथ्यानाव ठे, त्यां सधी निन्न पएं ने एम जाणवू. U: नास्तिक.- समदृष्टीने विपेमिय्यानाव होतो नथी, तेम उतांत निन्न आस्तिक नास्तिक संवाद. ३०३ मात्र अवस्तपणू पामता नथी, वस्तुपणे गमे ते रूपे थई जायचे. जेम नेंस गिगमाथी केल यायचेकाशथकी सेरडी थायडे, मारवीना हिंगारथकी कद नानी नाजी थायने. एवी रीत कर्मना परिणामे गत्यंतर थायवे. थागामिक नव विषे मायवंट पलटान त नवा नवरुप परिणमेवे. जेम सोनीना योगे सुव नाना प्रकाग्ना धाकाररूपे परिणामने पामे. तेम जीव कर्मना योगे नाना बेर गतियो पामेवे. ते तो ग्यु, था नवमां पण एकसरखी स्थिति रहेती न थी. जेम के, गजा ते क प जायने, ने, रक ते राजा वनी जायठे, सुखी ते इ. नी तथा हवी ते सुखवान थ जायते. इत्यादिक था नवमां पण पर्याय पलटाई बायः तो नवांतरमा कम एकरुपे रहे ? कर्मना बंध सादि दे, माटे जेवो कर्म नो उठय तेवा फलनी प्राप्ति थायने, एविप कोई नियम ई शक नही. गमे ते वर वदनी ने गर्म ते वेद कर्मना योगे थायठे एम जाणवू. पए नानिकः-एम का ते के ब्रह्माना मुखमांथी ब्राह्मण उत्पन्न थया, जुज यकी कृत्रिय थया, तथा जंघा थकी वैश्य थया, माटे एत्रणे वर्ण उत्तम ,श्र न पादयकी गृह उत्पन्न थया माटे अधम वे, एम जाणवू. थास्तिक-- ए वात निवित नथी. जुवो के, उबराना वृदमां पेड, दाल, नया पत्रनंविषे सरखो फल लागते. ते सर्व फलोतुं रूप सरखं होय; तथा ते यामा रम पण सरोज होय तेश्रोमां कोई प्रकारे उत्तम तथा अधमता क हवाय नही तेमज ब्रह्माना शरीर थकी उत्पन्न थया जे चार वर्ण, ते सर्व चेतन नाद कम राखते?
३०४ आस्तिक नास्तिक संवाद " . थास्तिक-लोक मर्यादा लोपदी नहीं एनीति ने तेनो लोप करचो जे कार्यनी जगत. निटा करे ते कार्य करवो नहीं एवु श्रेष्टोन पचन तेन लोप करवो नही तेथीज समदृष्टि पण तेवु आचरण करे पण मनय म दृष्टिने का नथी ५१ नास्तिक - सर्व कार्यनो कर्ता ईश्वर , एम मानवु जोये के नई- आस्तिक - एम मानवु नही जोये ए वचन प्रताप ईश्वरपिपे होयज नही घट, पट, रुपि, सयाम, खान, पान, दान, मान, स्नान क्रिया, विनय तथा व्यावच इत्यादिक सर्व पदार्थोना कारण कान, स्वना यत, पूर्वरुत कर्म, तथा पराक्रम ए पाच वे जेम के, नंतुना पुजमाथी पट त्पत्ति यवानो जे समय ते काल समजवो, नतुना पुजने पटनी उत्पत्ति कर योग्यता ते स्वनार जाणो, ततुना पुजमाथी पटनी उत्पत्तिनु जे निमित्त पूर्व कर्म समजवु, थने ततुना पुजमाथी पटनी उत्पत्ति करवानो जे उद्यम ते पराक्रम जाणवो, ए पाचमायो एक अोलु होय तो वस्तुनी उत्पत्ति यई शके ए पाचना समुदायथी घटपटादिक सर्व कार्योनी उत्पत्ति याय, एयुष मत ५२ नास्तिक - जो कुछ होता है, सो थमाइतालाके दुफमसे होता है किसीका किया कुछ होता नही, यही बात रास्त है थास्तिक - जो ऐसे होवे, तो थन्लाइतालाने पैदा किये हुये, इमामे श्री दुसन, काफिरोंके हातसे कैसे मारे गये तो खुदाफे प्यारे बड़े थे, काफिरोने मारे, ये बड़ी अजायबकी बात है तिनकू बचाने के बाते कावत था? इमाम किसीके गुनेहगारनी नही थे, ये क्यू मारे गये ? जो होता है, सो तकदीरसे होता है जो जैसा करता है, सो तसा तामें यालादुताजाका कुछ वास्ता नही है यही बात रास्त है ५३ नास्तिक - अलादुतालाने श्मामाका दिल टेरखनेके वास्ते बाजार यान्तिक -थाजाव दिये शिवाय तिनाफे दिलकी यात सुदा नही. या। जो कहोगे की नही जाणताया, तो खुदामें सुदापना क्या रहा सब जानता है, मे तुमारे कुरानेशरीफमे कहा है एम होके नी मारनेकी दयानत जो काफरोने करीथी सो खुदा जानके नी से चुप र सवान्ते ये वात नी गलत है १ 1 -- - R नाव थथवा सिह प्रमुख मनुष्यनो थाहार करनार लीव, तमन मारवा या दावमायावी जाए तो कम मारीनाखो ठो? जम सुदाए तमने जीतमा कहीतुं दोय तो जे जीवोंने तमे मारांनो मारने लायक है. है आस्तिक नास्तिक संवाद. नास्तिकः यादमी मरगये वाद जी फिरस्त लेजाते हैं ये बात ते अबाह की नहीं? थास्तिकः- इस वातएं कौन फूठ कहता है ? लेकीन समजमें कुछ फरक है. कहेते. हो की कोयामततक जीवँ एक ठिकानेमें रखते हैं, पीने खुट्टाके पाग से नाके इन्साफ करवाते हैं, ऐसे नहीं होवे है. लेकीन उसीवस्त जो अपनी त जिये या या बुरा फल पावता है. तुमनी सुख.फुःख, नेहेत यी दोन तो.मानते हो! तो जती जीने करनी करी होवे तेती गति उसकु मलती है. पए नास्तिकः-अल्लागुतालाने अने फरमाया है की जो किती• ऽजा देता है आस्तिकः- कबू मावाप ठोकरेकू जा देते हैं, या क्वु टोकरा मावाप• इजा है; कबू पीर मुर्विदकू इजा देता है, श्री कबू मुर्पिद पोरकू इजा देता है; कबू खाविंदर्दू शुजा देता है, कबू खाविंद नोकर जा देताह; ऐसे खुटाकी जहांतक जी हैं, वे सब इजा देनेवाले होनेते तो तव माग्ने लायक हां महिर कैसे रहेगी! यो रहम करने लायक कोई नी नहीं रहेगा थार बब काफरोने जा दी, तब तिनोडूं कायके वास्ते ऽमामोने मारे नही इस जो हो है सो तगदिरसे होवे एस जानना चाहिये. नास्तिकः-मांसायादारी पापिष्ट कहे .था नीयामां जलचर, स्थलचर, खेचर प्रमुख जे नाना प्रकारमा जाने, तेयाने वंशक मार्ग नायवा, थने मांस नदण कर. एम थमने ताहवे फरमायुं ते, ते प्रमाणे करवामां तथा पाप ? स्तमारा कह्या प्रमाणे जीवने मार, ए खुटानो हुकम ने, ते कोई ...जोये नही. जो फेरवीए तो गुनेहगार नगए. एम निधापने ; त्यारे ची मरीन तमे केम नाशी जायोटा थने ते प्राणीने नाना प्रकाग्ना ह सहायता वमें कम मारवा तैयार थायोतो? थने ला ते जीव रमायु - तैम तेयाने पण मनुष्य माग्वाने फरमायु व ते प्रमाणे गर्नु रुच करते, तेयोने मार लायक नथी. जो तेश्रोने मारवाई न । विगैरेनी . ५ २०६ आस्तिक नास्तिक सवाद. स्ते कोई बीजा प्राणीए तमने मारवु पण नालायक नथी, लायकज ले माटे वाघ वगैरे प्राणीयो जीप घातक होवाथी मारया योग्य ले तेम तमे पल व घातक होयाथी मारवा योग्य तो एम तमारे कबून करवु जोगे जो कबूल नही करशो, तो खुदाना गुनेहगार उरगो माटे हे महामदीयन मुसजमीनो वनर जीव मारवामां खुदानोदुकम होयज नही जो एम दोय तो खुदा रदम रे खुदा तो रहमदिल में, एवु तमारा रसूजिनाए कुरानेशरीफमा फरमायु ने बाध थावशे ए उपरथी एवु जणाय वे के, कोई एक पुरुपने काई धे अचानक मांसनो थाहार मली गयाथी, तेने तेनो साद लागो तेथी, व्यसन गयुं, ने पठी लोकापवादसारु खुदाए फरमाव्यु , एम कहीने बचारा सुदाने ठेरव्यो जणाय ने तेमा केटलो गुनाह ले । एनो विचारतो करो। ते प्राणीश्रोने वाने खुदा फरमावे त्यारे वीजी अन्नादिफ यन्तुथो पेदा शावास्ते करे ? ए . साफ जणायवे के, अन्नादिक वस्तु खावायोग्य , पण मांस खावायोग्य नथी म उतां जे जीनना स्वादने यर्थ खायचे ते रादसतुल्य जाणवा चली मुसलमीन प्रमुखने बीजु युक्तिथी समजावे के तमारा किताबोमा बने पाक वस्तु कही, थने पिशावने नापाक वस्तु कही, पाक वस्तुथी जे दाश थायडे, ते पाक कहेवापत्रे, श्रने नापाक वस्तुथी जे पेदाश थापळे ते कहेवायचे जेम के, थन्न वगैरे पदार्थों जे पाणी थी पेदा यायचे, ते पाक ने, पिशावथी जे कीटकादिक पेदा थायवे, ते नापाक वे ए तमे पण मानो बो तेम चालता नथी केमके मासाहार करोडो धोके प्राणिमात्र पिशावनी ले ते पिशाब ज्यारे नापाक त्यारे तेथी पेदा श्रयेला प्राणीयो केम पाक होय' श्रोना मासने समे पाक मानो हो, ए केटली वेवकूफी वारु 'जो मासने नशो तो पिशाबने नापाक कहेवाशे नही, ने जो पिशाबने नापाक मानशो तो ने पाक मानशे नही जेवु कारण तेवो कार्य एवो नीयामा नियम ज्यारे शाब जेवो मास ठे, त्यारे तेनो थाहार कस्याथी दोजकमा गयाविना केम एनो पाको विचार करीने मास नक्षण मूकी द्यो, थने पाक पाणीनी पेदाश फल, तथा फूल वगैरे अनेक स्वादिष्ट पदार्थोनो थाहार करोने परतु तमे नही केमके एतो जन्मनी बादत पडीगई का ले के, तहाड जाए रूए ने त जाय मुए, तेम तमारी यादत्त हमणा जनार नथी, पण याद राखजो के मतने दहाडे जबाब देवो पडगे त्यारे थांखो, फाटीने पडोला थो हो । , .
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२०६ आस्तिक नास्तिक सवाद. स्ते कोई बीजा प्राणीए तमने मारवू पण नालायक नथी, लायकज ले माटे वाघ वगैरे प्राणीयो जीव घातक होवाथी मारया योग्य वे तेम तमे पण व घातक होवाथी मारवा योग्य तो एम तमारे कबून करवु जोशो जो क नही करशो, तो खुदाना गुनेहगार ठरशो माटे हे महामदीयन मुसलमीनो व जीव मारवामा खुदानोदुकम होयज नही जो एम होय तो खुदा रहम विनानं रे खुदा तो रहमदिल के, एबु तमारा रसूलिलाए करानेशरीफा फरमाव्यु ने बाध श्रावशे ए उपरथी एवु जणाय ने के, कोई एक पुरुपने कोई कारणने धे अचानक मासनो आहार मली गयाथी, तेने तेनो खाद लागो तेथी, व्यसन गयुं, ने पठी लोकापवादसारु खुदाए फरमाव्यु वे, एम कदीने वचारा खुदाने हि तेरव्यो जणाय ने तेमा केटलो गुनाह वे । एनो विचारतो करो। ते प्राणीश्रोने चाने खुदा फरमावे त्यारे बीजी अन्नादिक वस्तुथो पेदा शावास्ते करे ? ए. साफ जणायवे के, थन्नादिक वस्तु खावायोग्य , पण मास खावायोग्य नथी म उतां जे जीनना स्वादने यर्थ खायचे ते रादसतुल्य जाणवा वली मुसलमीन प्रमुखने बीज युक्तिथी समजावे ठेके, तमारा किताबोमा बने पाक वस्तु कहीजे, थने पिशाबने नापाक वस्तु कही, पाक वस्तुथी जे दाश थायजे, ते पाक कहेवायडे, थने नापाक वस्तुथी जे पेदाश थापळे ते कहेवायवे जेम के, थन्न वगैरे पदार्थों जे पाणी थी पेदा यायचे, ते पाक ठे, पिशावथी जे कीटकादिक पेदा थायने, ते नापाक ले ए तमे पण मानो तो तेम चालता नथी केमके मांसाहार करोगे जुमोके प्राणिमात्र पिशावनी ते पिशाब ज्यारे नापाक त्यारे तेथी पेदा थयेला प्राणीयो केम पाक होय थोना मासने समे पाक मानो हो, ए केटली बेवकूफी ने वारु जो मांसने पाक नशो तो पिशाबने नापाक कहेवाशे नही, ने जो पिशावने नापाक माना तो ने पाक मानशे नही जेवु कारण तेवो कार्य एवो हनीयामा नियम ने ज्यारे शाब जेवो मास , त्यारे तेनो थाहार कस्याथी दोजकमा गयाविना केम . एनो पाको विचार करीने मास नक्षण मूकी यो, थने पाक पाणीनी पेदाश फज, तथा फल वगैरे अनेक सादिष्ट पदार्थोनो थाहार करोने परतु तमे मा नही केमके एतो जन्मनी धादत पडीगई का के, तहाड जाए रए ने त नाय मुए, तेम तमारी यादत दमणा जनार नथा, पण याद राखजो के कि- मतने दहाडे जबाव देवो पडलो त्यारे थांखो, फाटीने पडोला यो हो। . .
३०७ रही ने एन्य देवतायोन केम नव ? जोत देवतायोन मान नक्षण वग्यानी होय.ना पोताने माटे जुटीज जानना कोई जीव विनाना एवाज वाटया वान मनकम्पित, उनम देवताधोनविप एवी कल्पना करावी योग्य नबी. नान नमाग क्ह्या प्रमाण साची होय, ता त उनमदेव नही, पणथम 'रसय माविक लोको होमादिकने घचे जीवधात की, नंनो वलिदान टीका सीमोलान जक्त समजे . करणहोचले. नेमामलिन वान्ना उत्पन्न वादन नही जो महिन जावाजान ना कहिय, तो यजतकान कही। मात्र संशययाएवानही आस्तिक नास्तिक संवाद. ५ नास्तिक-याशिक नास्तिको प्रश्न करे ने के, यज्ञनेविपे होम करवानारु जी नमार योग्य वे. केमके ए कत्य शास्त्रविहित ठे: माटे एमां पाप नधी; पण पुण्य २. यानेय जे जीव मरे नेते स्वर्गमां जायठे माटे ते केम न करवू ? पातिक:- यज्ञादिकने धधं जे जीवनी हिंमा करवी ते योग्य नथी. केमक, हिमानो परिणाम ते पुण्य होयज नहीं; कितु पाप होयवे. एवो नियम ते.जे शा भामा पठ्ठ होमवानुं का वे, ते शास्त्र नही पण कुशान्य वे. थने तेनी रचना पर नाग मनुष्य नही पण मनुष्यरूपे राहत : एम निश्चय जाणवू. जे पापने पुण्य माने तेना करतां बीजो पापी कोण ! यज्ञमा होमापखं जीव जो स्वर्गमा जतु होय नो यह करनारा तथा करावनारा पोते होमाईने कम स्वर्गमा जता नथी! पति एम ना नयी तेथीन जणाय के, एकल्पित वचन : यसमा पवाटिकनी दोम भिव, ब्रह्मा, धने विष्णु धादिक देवतायोने थर्य करने. थने तेनों बजी नांग में देवतायो लियेने. एवात जो साची दोष, तो ते देवतायो मांसाहारी नरहो. देवनाशीने जो मांत नक्षण करवानी यादत होय, तो तेयो मनुयना हाये या मार लीय ! तेश्रो पाते श्राहारने अर्थ माल मेलवी शकता नयो ? नेयो तो मोटा मामध्यवान कहेबापते. ते सामर्थ्य कम फोग्यता नची जेजीयना माननो जिदान तेयाने माने ते जीवाना उत्पति पण तथा पोतंज कन्वे; एम तमं माना दो पोन जीवाने उत्पन्न करी तेने मनुष्यना हाये भगवीन नेनो बलिदान मान जया ए शुं देवतायोने योग्य एम तो कोई माधारण माणन पायो समानी उत्पनिक पदार्यनो आहार करवानं / हरकत मार पण एहवू नगर्नु लदा दांच नदीः देबरतन एवं हिंगर रन . ना मानवो नही, परायननमानवो. मनाने ।
२०G आस्तिक नास्तिक सवाद . ५७ नास्तिक - को वेदधर्मी प्रम करे वे के, तमारा जैनमतमा जीवना वरूपा दिकनेवि केवीरीते वर्णन करेखीतेने उत्तर दिये वे के, सर्वज्ञ केवलीए यावीरीते कावे -सर्व लोकनेविपे धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय थाकाशास्तिकाय,काल,जीवा स्तिकाय तथा पुगजास्तिकाय एउव्य नरपूर ने एमए व्य पोतपोताना गुण तथा पर्याये करी पूर्ण के. सदानावरूप वे जगतनी स्थिति जेम वर्तमान कालमा , ते मज नूत कालमा हती, अने नाविण्य कालमा पण एवी रीतेज जाणवी ते मध्ये जीव यने पुद्गल धनत काल लोलुपचूत के एटले जेम वीर तथा पाणी बने मृत्तिका तथा धातुनु मिश्रण थयाथी एक रूप बनी जाय तेम जीव तथा धु जजोपण एकरूपे रहे ले समय समयने विपे नवा कर्मजीवापेठे थने समय त मयने विपे पूर्व कर्म निर्जरीने टूटी पण जाय रे कर्मोनी उत्पत्ति तथा नाशर्मा ईश्वरनु का कारण पणु नथी ईश्वर तो अकती ठे, तेने विपे की पणु कल्पाव नही माटे ईश्वर कोईनु कारण नयी काल, सनाव, नियत, पूर्व कर्म, तथा पु रुपाकार ए पाच कारणो उत्पत्तिना कह्या वे एणे करीनेज पुण्य पाप जन्य स्व गै नरकने विपे गमनागमन थाय ने अने दमकमा जे नरक, तिर्यच, मनुष्य त था देवतानी चोवीश गतियो कही ते प्रमाणे नपरपराने पामेठे अने पो ताना उपार्जेला गुनागुन कर्म नौगवे वे ते ते नवने रिपे झानावरणादिक श्रा व कर्मने अनुसारे वत्ते ने जेम माटीनी नरेली बी जलमा नारसीए तो ते मा टीना नारने लीये मूवी जाय ले पनी जेम जेम तेमाटी, तेमाथी थोठी थती जा य तेम तेम ते तूबी उपर भारती जाय ले ज्यारे वधी माटी नीकली जाय त्यारे पा गीनी उपर तरती रहे ने पण पाणीथी उपर जाय नही तेवी रीते जीव पाप कर्मथी लेपायो थको अधोगतिने पामे वे पी जेम जेम ते कर्मनी न्यूनता पती जाय तैम तेम ते कर्व गतिने पामतो जाय , ज्यारे वधा कानो नाशप ई जाय त्यारे ते जीव लोकाग्रने विपे प्राप्त थाय ठे, पण तेनी उपर अशोक मा गमन करता तयी, जेवी रीते तुबी जलना योगे उची थावे , तेम जीव मास्तिकायना योगे तोकात रूप ऊर्य गति पामेठे वादी बागका कर वे के, मनुष्य शाना बनायी सात राज लोक सुधी कर्व, मन करे वेजीप तो चादमे गुणगणे अयोगी यायले एनो उत्तर दिये थे जेम पनुष्यथा जे वाण नृटे वे ते पूर्व जोरना वलया चालेने तेने वचमा बीजो को चिजावनारो जो तो नयी ज्यारे धनुष्यमाया वाण लूटे ठे, ते हणने रिपेज नि नो तरत जणागे के ते मोतीयो उन्चसना गुणरूप मब एक. पण कमां जवान जीव तथा पुगतनी गति थती नयी. नास्तिक. कौनो दय करीन सिमावस्याने पामेला जे सिजीवो ते, डी. नेची मिना जीयो समश्रेणीए सिझसिला उपर जायचे. - याग्निक. जेम टारानुं वामण वनाववाने अथ प्रथम तेना जेवो मेनो या नास्तिक:-सिन गरीरनो अनाव थायले. त्यारेयवगाहना कम कही? प्रसवो पडेले. तेमां ते रस श्रोत्याथी ते धातुनो तेवो आकार घायले. ते बामण मणधीतूटुं कस्वा पठी पण मेणनो श्राकार थायलं. कदाच मेण गाली नो पण त थाकारपणुं जतुं नथी, केमक वासणनो याकार जे कायम कानपण ने मेएना याकार जोजवे, तेथीयाकारपाणु कायम रहेने. जीव जे दारीराकारे थयो. ते शरीरनो अनाव थया पठी पण मिक्ष पुरु आत्मा त गरीरनी अवगाहनारुये रहने. एटले पाउखान अंने जेवा नि साभगीरतो याकार रहेने. तेवोज जीवना प्रदेगोनो घरपी धास्तार रहने. नास्तिक:--जेम जलमां जल मले ते एकरूपे चई जायचे. निन्नता देखा नची. तेम अनंत सिह एकरूपे यई रहे। के चेतन इव्यपणुं जुडं जुडं वे. चाम्निक:- ज्यारे जलना बिंड्यो मलीने एक जजनो पिम याय; त्यारे एक बत कहवायचे. पण ज्यारे जलना विउ जुदा जुदा होय त्यारे बिड कहवा । एक जल कहवाय नही. तेम सिम पणे सर्व एकजः परंतु चतन श्रीसर्व जिन्न निन्नने ते उपर दृष्टांत; जैम अनक नीरीयांपकी उत्पन्न मला अनेक मोतीयो जुदा जुदा होय. तेयोमाना कंटनाएकजन एक गंडों स्ता कम्यि न पठी तेयो विपे विचार करिये के ए ढगतामां एक्ता प्रश्ना आस्तिक नास्तिक संवाद. ए तेकाणे पहोतो एम समजवु. ए विषय उपर वीजा पण त्रण दृष्टांतो वे. चक. अग्निनो धूमाडो, तथा एरंडीयो ए चार दृष्टांत बडे जाणी लेवू. या नाम्निक. कर्मक्ष्य यया पठी जीव अलोकनेविपे केम जतो नयी! जो अपना वचमा नेने कोग रोकनारो वे ? धानिक. वजन शक्तिन सहाय यापनासं जे धर्मास्तिकाय इव्य, तेनुं त्यां संबन नयी. धर्मास्तिकाय इव्य लोक प्रमाणेज . ते थकी अधिक नथी. तेथी ममश्रेणीए लायने. पण स्थानांतरनेविपे जता नथी तेनु कारण शु? आस्तिक --ते समयनविषे कोई प्रेरक नथी प्रेरणाविना चक्रव्रमण याय .
२१० आस्तिक नास्तिक सवाद " 1 थाकाररूपे सर्व जुदा तेभ सिको सर्व सितारूपे तो एक पण चेतन इव्य रूपे जुदाने, एविपे धान्यना पुज वगैरे घणा दृष्टातो वे तेथी विचारी लेवु वली सर्व सिोनु सिवरूपपणु एक सरखु होवायी जाति वाचकपणे तेयो एकज कहेगाय, पण इव्यपणे अनता कहेवायठे, माटेज जगतमा एवी वदता बे के, प्रनु एकमा अनेक ठे, अने अनेकमा एक वे" को सिममा मोटा नाहनाप णु नथी, सर्व समान वे. मोटामा मोटापणु तेनी पोतानी थपेदा ए नयी थतुं पण बीजा नाहनानी थपेक्षा ए थायठे, मोटो पोताना स्वरूपे करी ग्रु मोटापा पामेवे, जो मोटो कहेगु तो कोई काले नाहानो थानो सनर यो । श्रने नहा नो थयाथी स्वरूपमा अपूर्णता यगे, माटे सिक्ष वधा सरखा ठे एम जाणवु यने सिह जनना कर्मना यश सर्व क्ष्य थई गयाथी पुनरपि जगतमा आगमन थतु नथी जेम भुजेला अनाजना दाणाने प्रथीमा वावीए तो ते उगे नही, तेम लिच पण पाठा ससारीजीव थाय नही केमके ससारमा थाववु कर्म विना थतु नयी ६३ नास्तिक - ईश्वर पृथ्वीनो नार उतारवाने यर्थे अवतार धारण करेने ए वात सत्य के के मिथ्या। थास्तिक - ईश्वरने तो कोई शत्रु मित्र नाव नथी तेम उता दानवने मार वासारु तथा देवतायोने निर्नय मुखी करवासारु अवतार धारण करे तो दानव शट यने देवता मित्र उखा के नी। जेने शत्रु मित्र नाव होय तो ते ईश्वर शानो । थने दानवोने प्रथम उत्पन्न शासारु क्या के जेओने मारवासारु पो ताने माताना उदरमा श्रावी नाना प्रकारनी वेदनायो सहन करी सयामादिक थापनि वेगी पडी। वजी दाना अने देवतान्योनो ईश्वर तो एकज ने, सर्वमा तेज वरनी कलाले तेम उता दानवनी उत्पत्ति करी तेथी ईश्वरमा अज्ञानपशु यावशे ससारमा व्रण प्रकारना जीव होय ने एक धर्मी, वीजा पापी, श्रीजा महापापी जे कोने मारे नही ते धर्मी कहेवायचे जे बीजा जीवने मारे ते पापी कहेवायने ने जे पोताना जीवनो घात करे ते महापापी कहेवायने ईश्वरे देव तथा दानव वगैरेनी उत्पत्ति करीतमा पोते अंशरूपं प्रवेश कस्यो उता तेयोने माखायी यात्मयाती रो ने तेम खायी महापापी कहेवाशे ६४ नास्तिक-स्नाने करीने गुरु यवु ए मुक्तिनु थग वे शान्तिा -पेटमा रोग होय ने शरीरनी बाहेर लेप लगाडीए तो ते रोग की मटे नही तेम थाल्माना कर्म विकार ते शरीर शुचिया कोई काले जाय नहीं ।
. - H vigat +m . । आस्तिक नास्तिक संवाद, कहूँ . जेम कोई मोटी हवेलीमा बालक मूतस्यो होय ते शुष करया वगमी होय तेटलीज धोवी जाश्ये. तेम शरीररूप हयेजी फर्मे पारी होय तेटलीज तपसा करी शुरू करवी. पण थारखा शरीरने रमान, वह वस्त्रादिक, तथा सुगंध्यादिक करवा कोई काम नथी; मान तो सोपा प्रथम शृंगार दे.ते सर्व शृंगारनो त्याग करे त्यारे बामचारी फसेवाग. यर्थे मुनिने ब्रह्मचर्य व्रत पालवो कह्यो तेथी पण खान पर थाय . -यह उनिया सब खुदाने पैदा करी है. यह उनिया सव खुदाकी करी होवे तो जो खुयाफा पा परपरषा बदगी करै, कुरान बांचे, नमाज करे, श्री रोजा रखें, तिसी जीयाnil जसकी बाल बौलाद धौ पैसा वगैरा मिलना चाहिये; श्री भब फकीरके 'माफर्क होना चाहिये. तसे ती नही होता है. दूसरे नाथ वाले थोखोके सामने मौजूद है. इस वास्ते ये घात गम्त हा है सो सब तकदीरसें होव है. नास्तिक-श्रा संसार रामे उत्पन्न करयो के. :- जो था जगत रामनु उपनाये छोय. तो गेयो मे Infla पुराण वाचते. वंदना करते. तथापाणी घागि गणे सर्वव्यादिक संपत्ति मलवी जीये. बाजायोने विपनि गो. यावतुं नयी वीजा मुसलमानादिक पण महा Nare 'व.तेथी वधु कर्माधीन. नास्तिकः-थंगदान (कन्यादान ) ाणी Tru था . . kig मथुन क्रियाना सपने पामे . farm Int, नाई, ताग जैया पूर्वपीन my nो भी मा ult नाई, मैयन किया नाम : initiamstin किया करत्र, यार मधुन मध्याना या mai anti तथा नापाक कोने नमी , unfair मधुननी त्यांग को जमा (ft San mjan वान श्री. HIRurffaiffer, इति श्रीमतिantarai Post 1 आस्तिक नास्तिक सवाद यायाम्पे म जुदा ले तेम सिको सर्व सितारूपे तो एक पण चेतन इय मसे जुदा ने, एविपे धान्यना पुज वगैरे घणा दृष्टातो के तेथी विचारी लेवु वली मा मिझोनु मिरूपपाणु एक सरसु होवाथी जाति वाचकपणे तेयो एकज काय, पण व्यपणे श्रनता कहेगायने. माटेज जगतमा एवी वदत्ता ने के, "प्रनु एस्मा थनेक वे अने अनेरुमा एक " कोई सिमां मोटा नादनाप 'नथी, मर्व समान ले. मोटामां मोटापणु तेनी पोतानी पेक्षा ए नची पद्ध पाल बीता नाहनानी अपेक्षा ए थायने, मोटो पोताना सरूपे करी शु मोटाप पामेनेजो माटो कहा तो कोई काने नाहानो थरानो सनर थशे' बने नदा नाथपायी मरूपा अपूर्णता यगे, माटे मि६ बधा सरवा वे एम जानु ने गित जनना कर्मना यश साक्ष्य थई गयाथी पुनरपि जगतमा श्रागमन पतु नयी जेम नुज ना अनाजना दाणाने पथरीमा वावीए तोते उगे नही, तेज Ram सारीजी याय नही केमो ससारमाथावयु कर्म पिना पतुनी नाजिर-घर पीना नार उतापाने थथे अवतार धारण करे। पान गयन मिथ्या जागिर - भग्न ता माई गट मित्र नाम नथी तेम वा दानवने मार गगार नया दपनायान निर्णय मुप्पी करामार श्रयतार धारण करे तो पानव अनदाता मित्र ठग्या के नी' जेने शत्रु मित्र नार होय तो ते पर मा' यने दानपाने प्रयम नत्पन्न शामाया के जेयाने मारवाभारु को नारे माताना ददग्मा श्रारी नाना प्राग्नी दनाया सदन करी समामारिक मानिनी पहीदाना ने दाताथाना श्यर ता एफज , सर्व नरभानी मानतेम ननां दानानी नतानि करीतथीभरा यज्ञानपण श्राममारमा प्राग्ना जी दायक धमी, बीना पापी श्री महाली 7 काने मार नही ते धावायने जबीजा जीरने मारे FR कद गायन न जे पाताना जीना पात रेत महापापी करेगा.' भाग तयार गग्नी नत्पनि कोतमा पाते अगर ये या नेपने मायावी यात्मपानी वग्ना ने नेम तम्यायी महापापी करा ६४ नमा-नान गन 6 या मुनिनु अग ने यमरमा गंगदाय ने रीग्नी वादा मप गाडी ता त गग में ही दम यामना कर्मकार नी शुनिया काकाने जाय नती इति श्री आस्तिक नास्तिकनो संवाद संक्षिप्त रूपे नमान. - । . मन्तीनत वाले यांखोके सामने मौजूद है. इस वास्ते ये वात रास्त नहीं है। ६६ नास्तिक-श्रा संसार रामे उत्पन्न कयो . करने. पुराण वाचले. वंदना करे. तथा एकादगी आदिक व्रत गग्वेने। ने सर्व व्याटिक संपत्ति मलवी जोये. वीजायोने विपत्ति होवी जाये. ते नो टोठामां यावतुं नथी. वीजा मुसलमानादिक पण महा संपत्तिवान दीठा । कोपावे ने तेथी वधु कर्माधीन वे. ६३ नास्तिक-यगटान (कन्यादान) दीयाथी पुण्य थाय ने. केमके स्त्रीपु हनीमनी मैथुन क्रियाना सुखने पामे वे. तेनुं फल दानदेनागने थायने आस्तिक-नाई, तारा जेवो पूर्वपदी तो एके मल्यो नधी तें तो श्राडो ग्राफ सम्पन तेयो नापाक कहेते. तेमज हिंड्यो देवपूजामा, व्रतने दिवश तथा नगनी किया करते. त्यारे मैथुन सेव्याना वस्त्र पहेरीने करता नथी कमर माशात्रामा मथुननो त्याग कोठे जे मुमुद (मुक्तिनी ना करतो दोय) नेणं प्रथम मथुननो त्याग करवो. ए कृत्य नरकनो हेतु होवायी सर्वधानिंदनीक आस्तिक नास्तिक संवाद. १ दृष्टांत कहुं . जेम कोई मोटी हवेलीमा वालक मूतखो होय ते गुच करवा जेटली नूमि बगमी होय तेटलीज धोवी जाइये. तेम शरीररुप हवेली कर्मे करी थई होय तेटलीज तपसाये करी शुरू करवी. पण पाखा गरीरने स्नान, "स्व वस्त्रादिक, तथा सुगंध्याटिक करवान कोई काम नथी; स्नान तो सोल प्रथम शृंगार .ते सर्व शृगारनो त्याग करे त्यारे ब्रह्मचारी कहेवाय. निर्जराने यर्थे मुनिने ब्रह्मचर्य व्रत पालवो कह्यो तेथी पण स्नान कर, ग्धं सिह याय ठे. ५ नास्तिक -यह उनिया सब खुदाने पैदा करी है. धास्तिक-यह दुनिया सब खुदाकी करी हो तो जो खुदाका बंटा हरवरखत । बंदगी कर, कुरान बाँच, नमाज करे, औ रोजा रखे, तिसी• ऊनीयांकी जसेकी थाल बोलाट औ पैसा वगैरा मिलना चाहिये, यो हि व 4 सब फकीरके माफक होना चाहिये. तैसे तो नही होता है. दूसरे नी य की हॉव है सो सब तकदीरसे होवे है. "पण नाई, मेथुन किया तो सर्व थकी अगुवे, यवन लोकां पण इमाम - सम्यक्त सडसम्बोल सजाय ॥श्री जिनाय नम ॥ अथ श्रीयशोविजयजी उपाध्यायकृत सम्यक्तना सडस बोलनी सज्जाय प्रारन ॥ 1 ॥ दोहा॥ ॥ सुस्त वालिकादविनी। समरी सरसति मात ॥ समफित सर सत बोलनी । कहिशू मधुरी वात ॥ १ ॥ समकित दायक गुरुतणो । पनुवयार न थाय । नव कोडाकोडे करी । करता सर्व उपाय ॥ २ ॥ दानादिक फिरियान दिये । समफित विण शिवराम ॥ तेमाटे समकित उडू । जाणो प्रवचन मर्म ॥३॥ दर्शन मोह विनाशथी । जे निर्मल गुणगाण ॥ ते निश्चय समकित कह्यो । तेदना ए श्रहिगण ॥४॥ ॥ ढाल ॥ दे दे। दरसण थापणू, एढेशी॥ ॥ चउ सदहणा तिलिग ने । दशविध विनय विचारोरे ॥ त्रिण युधि पण दूपण । यात प्रनाधिक धारो। nाटकाप्रनाविक थड पच नूषण । पच लक्षण जाणियें॥ पट् जयण पट् श्रागार नावन । विदा मन थाणिये ॥ ५॥ पट वगण समफित तणा सहस । नेद एह उदार ए॥ एहनो तत्व विचार करता 1 लहीजे नवपार ए ॥६॥ ढाल ॥ चद् विद सहहणा तिहा। जीयादिक परमोरे ॥प्रवचनमा जे नापिया। लीजे ते नो अगरे॥॥टक । तेहनो थर्थ विचार करिये। प्रथम सहहणा खरी ।। बीजी सहहणा तेहना जे। जाण मुनिगुण जवहरी ॥ सवेग रग तरंग जी । मार्ग युद कहे बुधा ॥ तेहनी सेवा कीजिये जिम । पीजिये समता सुधा ॥७॥ ढाल ॥ सम केत जेणे ग्रही वमिक । निन्हा ने अहमदारे ॥ पासवाने कुशीसिया ते । वेष विमवक मदारे ।। ।। त्रूटक । मदा थनाणी दूर बमो। नीजी सहहणा ग्रही। परद शनीनो सग तजिये । चौथी सदहणा कही ॥ होणातलो जे सग न तजे । तेहनो गुण नपि रहे ॥ ज्यू जलधि जलमा नव्यू गगा। नीर खूणपणू लहे।।१७।। । ढाल ॥ कपूर होवे यति मजलू रे, एदेशी ॥ ॥त्रण लिग समकित तणारे। पहिलो श्रुतअनिलार जेहथि श्रोता रस लहेरे । जेवो साफर ज्ञाखरे। प्राणी धरिये समकित रंग । जिम लहिये मुख थनग रे । प्राणी, टेक ॥ ११ ॥ तरण सुनी बी परिवखोरे चतुर सुणे सुरगीत ॥ तेहयि रागे थति घणो रे । धर्म मुख्यानी री रे । प्राणी ॥ १२ ॥ नृख्यो यटयी कतग्यो रे । जिम जि पेपर चग ॥ तिम जे धर्मने रे। तेहिज बीजू जिंग रे । प्राणी ॥ १३ ॥ चयापच गुरु देवनू - - त सम्यक्त सडसम्बोल सजाय. रे । त्रीजें लिंग उदार ॥ विद्या साधक तणि परे रे । बालस नचिय लगार रे । प्राणी ॥१॥ ॥ढाल ॥ प्रथम गोवालातणे नवेजी, ए देशी॥ ॥थरिहंत ते जि न विचरता जी ॥ कर्म खपी दुआ सिह ॥ चेश्य जिण पडिमा कही जी। सूत्र सिक्षांत प्रसि-६ । चतुर नर, समको विनय प्रकार । जिम लहिये समकित सार। चतुर ॥ १५ ॥ धर्म खिमादिक नाखेयो जी। साधु तेहना गेह ॥ याचारय था चारना जी। दायक नायक जेद । चतुर ॥ १६ ॥ उपाध्याय ते शिष्यने जी। सूत्र नणावण दार ॥ प्रवचन संघ वखाणिये जी । दरसण समकित सार । च तुर ॥ १७ ॥ नगति वाह्य प्रतिपत्तिथी जी । हृदय प्रेम बहुमान ॥ गुण थुति यवगुण ढांकवा जी। यागातननी हाण । चतुर ॥ १७ ॥ पांच नेद ए दश त पो जी। विनय करे अनुकूल ॥सीचे तेह सुधा रसे जी । धर्म वृदन मूल । चतुर ॥ ॥१॥ ढाल ॥ ॥धोबीडा त धोए मननूं धोतीयू रे॥ ॥ एदेगी॥ ॥त्रण दिसम किततणी रे । तिहाँ पहिली मन क्षिरे ॥ श्री जिनने जिनमत विना रे । फूल स कल ए बुधि ।। चतुर विचारो चित्तमां रे । टेक ॥ २ ॥ जिन नगते जे नवि थर्पु रे। तेबीजाथि नवि थाय रे।। एवं जे मुख नाखिये रे। ते वचन शुद्धिकहिवाय रे । च तुर० ॥ २१॥ठेद्यो नेद्यो वेदना रे । जे सहतो अनेक प्रकारचे जिण विण पर सुर नवि नमेरे। तेहनी काया शुरु उदाररे । चतुर० ॥२शा टाल । मुनि जन मारगनी, ए देशी ॥ ॥ समकित दूपण परिहगे । तेमा पहिली ते गंका रे ।। ने जिन वचन मां मत करो ।। जेहने समनृप रकारे । ममकित दृपाण परि हगे ।। टेक ॥ २३ ॥ पंखा कुमतनी बांठना । बीगं दृपण तजिये । पामी सुरतरु परगढी । फिमवाकन नजिये । लमकित ॥ ५४॥ मंगय धर्मना फलतणां । विनिगिया नामे ॥ त्री@ दुपाण परिहगे। निज शुन परिणामे ॥ समकित ॥ २५ ॥ मिय्यामति गुण वर्णनो। टालो चोयो दोप। उन्मानगि थुणता दुवं । नमाग्ग पोप ॥ ममकिन० ॥ १८ ॥ पांचमा दीप मिय्यामती। परिचय नविकीन । म गुन मति अविंदनी न लीवामनाली नमकित ।। 3 ।। ॥ ढालनोनिदा दंमा विपयन ए यात प्रनाधिक प्रवचनना पह्या । पावयाणी रिजाण ॥ श्रुतना जयर्थनां । पार लंद गुण साग ॥ धन धन झालन मंगन म निवराटक ॥ 9 ॥ धर्म की वीजा जाणिय । नदियण परिजेदन ज उपटे र लोकतं । नंजे हृदय नंद । धन धन यादी त्रीजान के निपुण नल्यो । मन्त्रवादी परिजंद ॥ गजहारे जवक्रमता व गाजनो जिम --- चीये, दंगी॥ मान ३२४ सम्यक्त सडसम्बोल सजाय मेह । धन धनः ॥ ३० ॥ नश्वादु परि जेह निमित्त कहे । परमत जीपण का ज ॥ तेह निमित्तीरे चोथो जाणिये । श्री जिनशासन राज । धन धन॥३१॥ तप गुण ऊपर रोपे धर्मने । गोपे नवि जिन थाण ॥धाच लोपेरे नविकोपे क दा। पचम तपसीजाण । धन धन० ॥३॥रगे विद्यारे मत्र तणो बजि । जिम श्रीवयर मुणिद ॥ सिम सातमोरे यजन योगथी । जिम कालिक मुनि चट । धन धनः ॥ ३३ ॥ काव्य सुधारस मधुर अर्थ नया । धर्म हेतु करि जेह ॥ सिक्सेन परि नरपति रीजवे । थम वर कवि तेह । धन धन ॥३४॥ जव नवि होवे प्र नाविक एहवा । तव विधि पूरव थनेक ॥जात्रा पूजादिक करणी करे । तेह प्रनावि क नेकयन धन ॥३५॥ढाल॥ सतीय सुनानी। एदेशी॥ ॥सोहे समकित जेदथी । सखि जिम यानरणे देह ॥ नूपण पांच ते मन वस्या । सखी मन व स्यां । तेमा नहीं सदेह । मुज समकित रंग अचल होयो । टेक० ॥ ३६॥ पहि लु कुशलपणु तिहा । सखी वदन ने पञ्चखाण ॥ किरियानो विधि अति घणो । सखी पाचरे तेह सुजाण । मुझ० ॥ ३७॥ बीजू तीरथ सेवना । सखी तीरथ तारे जेह ॥ ते गीतारथ मुनिवरा । सखी तेहस कीजे नेह । मुकः ॥ ३८ ॥न गति करे गुरु देवनी । सखी त्रीजू नूपण होय ॥ किणहि चलाव्यो नवि चाने । सखि चोथु नूपण जोय । मुफ० ॥ ३ ॥ जिनशासन थनुमोदना । सखी जेद थी बहु जन दुत ॥ कीजे तेह प्रनावना । सखी पांच नूपणनी खत । मुफ. ॥ दाल ॥ इम नवि कीजे हो, ए देशी॥ ॥सण पाच कहां स मकित तणा । धुर उपशम थनुकूल । सुगुण नर ॥ अपराधी सू पण नवि चि तथकी। चितवियें प्रतिकूल । सुगुण नर । श्री जिननापित वचन विचारिये । टेक ॥४१॥ सुरनर मुख जे 5 ख करि सेखवे । वठे शिवसुख एक ॥ सु० ॥ बीजूं सदण ते थगीकरे । सार सवेग सुटेक । सुश्रीजिन०॥४२॥ नारक चारक स मनव कनग्यो। तारक जाणिने धर्म । सु०॥ चाहे निकलवु निर्वेद ते । त्रीजू ज क्षण मर्म । सु० । श्री जिन ॥ ४३ ॥ इव्ययकी 5 खियानी जे दया । धर्मही पानी नाव । सु० ॥ चोयु लक्षण अनुक्पा कही । निज शकते मन याव । सु० श्रीजिन ४ ॥ जे जिन नायु ते नहि अन्यथा । एहवो जे दृढ रग । मु. थास्तिकता सण पाचमु । करे कुमतिनो ए नग । सु० । श्रीजिन ॥ ४५ ॥ ॥ ढाल ॥ जिन जिन प्रति वदन दिसे, ए देशी ॥ पर तीर्थी परना सुर तेणे । चै त्य ग्रह्या वलि जेह ॥ बदन प्रमुख तिहां नवि करवु । ते जयणा पट नेय रे ॥४०॥ - 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सम्यक्त सडसम्बोल सजाय. २५ । । जविका, समकित यतना कीजे । टेक ॥ १६ ॥ वंदन ते कर जोडन कहिये।न मन ते गीस नमाडे । दान इष्ट अन्नादिक देवू | गौरव जगति देखाडेरे । नवि का० ॥ ४ ॥ अनुप्रदान ते तेहने कहिये । वार वार जे दान ।। टोप कुपात्रे पात्र मतिये । नहि अनुकंपा मान रे । नविका० ॥ ४० ॥ अण बोलावे जेह ना खवू 1 ते कहिये थालाप ।। वार वार यालाप जे करवो । ते कहिये संलाप रे । नविकास ॥४ा ए जयणाथी समकित दीपे । वलि दीपे व्यवहार ।। एमां पण कारणथी जयपा। तेना अनेक प्रकार रे । नविका० ॥ ५० ॥ ढाल ॥ सलना नीटेशी ॥ गुम धरमयी नवि चले । अति दृढ गुण आधार ललना ॥ तो पण जे नवि तेहवा । तेहने एह आगार । सतना ॥ ५१ ॥ वोट्यु तेहबु पालिये। दंति दंत सम बोज । सलना ॥ सङानना उर्जन तणा | कलप कोटिने तोलाल लनाबोशाराजा नगरादिक धणी । नस शासन अनियोग । ललना। तेहथी कार्तिकनी परे । नहि मिय्यात संयोगा ललना ।।बोपामेलो जननो घण कह्यो। बल चोरादिक जाण ललना ।। पेत्रपालादिक देवता । तातादिक गुरु गण । त लनावो॥४ावृत्ति उर्जन आजिविका । ते नीखण कंतार । ललना ।। ते देते दू पण नहीं करतां अन्य याचार । ललना ॥वोगाएगाढालाराग मल्हार ॥ जाविजे रे समकित जेहथी स्यडूं|ते नावनारे जावो मनकरि परवडूं ॥जो समकित रे ताजू रे । तो व्रत तरु रे दीये शिवपट यनुकून रे॥५६॥टका अनुकूल मू ल रसाल समफित । तेहविण मति अंध रे ॥ जे करे किरिया गर्व नरिया । तेह पृठो धंध रे।। ए प्रथम नावना गुणो रुअडी। सुणो वीजी नावना ॥ बारगूं समकि त धर्मपुरतुं। एहवीते पावनाITU SIटानात्रीजी नावना रे समकित पीठ जो दृढ स ही । तो मोटो रे धर्म प्रासाट मगे नही ॥ पाइये खोटे रे मोटो मंमाण न गोनी ये ॥ तेह कारण रे समकितसं चित योनीयें ॥५॥त्रूटकाथोनीयें चित नित एम नावी । चौथी नावना नाविये ॥ समकित निधान समन्त गुणनुं । एहQ मन ला वियें । तेह विण लूटा रत्न सरिया । मूल उत्तर गुण सवे ॥ किम रहे ताके जेह हरवा । चोर जोर नवे नवे एयाटालानावो पंचमी रे जावना सम दम सार रे एथवी परे रे समकित तस प्राधार रे । ती नावना रे नाजन समकित जो मि ॥ श्रुत शीजनो रे तो रस तेहमा नवि ढले॥६॥चूटकानवि ढले समकित नाव ना रस । अमियसम संवरतणो । पट नावना ए कही एहमां। करो आदर अ ति घणो ॥ म जावता परमार्य जलनिधि । दोइ निनु फकफोल ए ॥ धन पवन साजूं मूल सम्यक्त सडसम्बोल सजाय - - पुण्य प्रमाण प्रगटे।चिदानद कनोज ए॥६॥ढानाजे मुनिप सके नवीनमीए देश रे जिहां समस्ति ते थानक । तेहना पट विथ कहिये रे॥ तिहा पहिज थानक कने चेतन । जाण श्रातम लहिये रे ॥ सौर नीर परे पुजन मिश्रित । पण एमपी ने थनगो अनुना हस चच जो लागे। तो नपि दी बनगो रे ॥६॥ बीजू थानक नित्य थातमा । जे अनुभूत सनारे रे ॥ बालकने स्तन पान वासना | पूराना अनुमारे रे ॥ देव मनुज नरकादिक तेहना । थनित्य पर्याय रे ॥ इध्यपही अश्विनित श्रममित | निज गुण यातमराय रे ॥ ६२ ॥ त्रीजू धान नेतन कर्ना । कर्मतणेने योगे रे ॥ कुनकार जिम कुनतो जे । दमादि क गपागे रे ॥ निभययी निज गुणनो का । श्रनुपचारित व्यवहारे रे ॥ इस बर्मनी नगगदिस्नो । त उपचार प्रकारे रे ॥ ६॥ ॥ चोए थानक ले ते नोक्ता। पुप पाप फारेगे रे ॥ व्यासारे निश्चय नय दृष्टे । भुजे निज गुण नेरो रे॥4 पम पानर ले परम पद । थवा अनत सुम नासो रे ॥थापि व्यापि तन म नवी माहिये । नमु थनारे सुप मामो रे ॥६५॥ तु थानक मोक्ष्तण ले। से पमान उपापा ॥ जोगरिजेलहिये ता गया। कारण नि.माथाया रे ॥ कहे जान नप ज्ञान सा । ते रिण दिग्यिा रे ॥ न राहे रम रुपू जाणी ITT Trयार ॥६६॥ कह किरियानय किग्यिाणि जे । ज्ञान सेब माया प्रेमी का पदनारे । तारते फिम तरने रे॥ दपण नूषण नेदा यदा । नप पारने पाद र || मिति ते नय साये। ज्ञानात अमाई ॥ ६॥ इति पर मदान रिचारी । ममस्ति याराहे रे। पटानी मन गनी। त मममुग यागाह || जेहनो मन समक्तिमा निधन | कार नही नग ना रे ॥ श्री नय विजय रियुध पय सेगका वाचक तमा॥८॥ testerstepstesans, ॥ इति श्रीसम्पन महामनगांन मगाय गमान शृंगारंवैराग्यतरंगिणी. २७ श्री जिनाय नमः अथ श्री शृंगारवेराग्यतरंगिणीप्रारंना संस्कृतटीकाना कत्तो पारनमां मंगलाचरण करने. नपजातिटतं ॥ श्रीपार्श्वनायं प्रणिपत्य भत्त्या पुरि स्थितं श्रीफलवचिकायां ॥ शृंगारवैराग्यतरंगिणी या व्याख्याननाच्या क्रियते मया सा ॥१॥ अर्थः- श्रीफसवम्किानामनी पुरीनेविपे स्थित श्रीपार्श्वनाथ जगवानने न किवडे प्रणाम करीने शृंगारवैराग्यतरगिणी नदीनी नाविकाम्प व्याख्या हूँ करंतुं. अवतरण-श्रीनोमनाचार्य, बंगग्यनी वामनावई शृंगाग्नं दृपित करनार ठ तां श्रा शृंगारगग्यतरगणी नामनो ग्रंथ करवानी कामनाएफरी स्वीनुं रुप निं दा करवा योग्य एव प्रतिपादन करे.॥ १ ॥ शालविक्रीडितंवृत्तम् ॥ धर्मारामदवाग्निधूमलहरीलावण्य लीलाजुप स्तन्वंग्या यमितान्विलोक्य तदता वालान्किम कंउसे ।। व्यालान् दर्शनतोपि मुक्तिनगरप्रस्थानविनत मान् मत्वा दरममन् विमुंच कुगलं यद्यात्मनो वांसि ॥ २॥ अर्थः यही था धर्मरूप वनविपे दावाग्रिना धुमाडानी पकिना जेवा व्या मराजा. मृम्भधंगयुक्त शरीग्याती बीयोना बाधता जे वालो . तेने जाई न कम धानंदने पामेवे ? जो त पोता नारं यवानी चा करतो दो नो जे ना दर्शनेकरी मुक्तिप नगरीना मार्गमां विघ्न यायचे. एवा वाताने व्याज (न ५)प मानाने दृग्या त्याग क्र. पणफरी बैंगग्यग्स टावीने शृंगाग्ने दृचिन मरांने मनसावा अने काला दोपवे. नेमज बीना वान पण लांबा अने काजा होवाधी. तया नाट्यपणू राव: जम नर्पने जोनांज यापणे नानी जये ये तम ते वानांन जोतांज तंयोनी निगार कम्बो नाश्ये. सनगान्धमा क्युले के कोई बदर गान काम जता दोष ने बसने जो मा गम्ग साप न तो ने शाममां रित पडना ते कार्यनी निति बार नही G शृगारवैराग्यतरगिणी मुनिरुप नगरीना मार्गमा स्त्रीना वालरूप सर्प जो थाडे श्राचे एटले तेत्रामा मोह उत्पन्न याय तो मोटो पिन यायचे, माटे ए सर्वथा त्याग करया योग्य ने उपर कत्यु के. स्त्रीयांना बाधेला वालने व्यालरूप जाण, ए ठेकाणे कविए व मलार राग्यो वे के, वाजशदमा यकार मन्याथी व्यालशद थायडे, माटे वा सने व्याज़ कहे योग्य ले एने लेपानकार कहे। श्रा उनमा सर्प वाजती वसते जेम चाकोचको थ जायते, तेम स्त्रीना के शरिटढीयाजा दोय तेने करितोको श्रेष्ठ कहेते थने जेम सपनो रग अति माती नोयने. तेम बीना श्रति काला रगगना चान होय, तो ते श्रेष्ट कहेवाय ने गतीरीने गजनी जे श्रेष्ठता , ते विषयक शृगार रस दर्शायोने, श्रने जे म मार्गर्मा सर्प थामो थारे तो कार्यमिति याय नहीं, तेम गुणस्यानक निसर नी पटना पुम्पने यसमा बीमा केशनो मोह उत्पन्न थयो तो तेथी श्रेणी आरो हनी पिसि पनी नयी. जीरीते वालनी जे निनसना कीधी ते विषयक बरा पसमायोने ॥१॥ ये केशा समिता सरोमददगा चारित्रच प्रनाभ्रशा नोटमहोदरास्ता मये चेतश्चमकारिण ॥ गान्मू निमतोऽवगम्य नियत दूरण तानु सजेनीचेत कष्टपरप रापरिचित गोन्या दशामा यमि ॥७॥ वर्ष-देममा समापनना जेगा नेता वीना देदीप्यमान देश, मिप यानी ज्यानिता नारा याविर्ष मेजयान, थन जे ताग यत मरणया गमगा पन करने, नया मृनिमान चपिगम्य क्लेश ने, मनिषा जाने दर नामोद जाण्याना तु याग की नहीं, तो तु टिपरंपराए पर पपापा गायोग्य श्राम्याने पामीदा था मारमा घाना कान का माटदय पुन, न यारीगते "नमित" दाद मनमाने, एना अर्थ, लहारे, सीमित दना गुन, कागरना वेग नगद पायने या TIR' माना जनी माय माना जनी अगरीगने जे नंतर धनि मानापमान दीमामा यान, तम बीना मगर काय मिनट देदीप्यमान दशामा याम बीना कपनस्तान पने भै गायन मुग्म केगनी श्रेष्टताना पिय रस्ता यनग्गत ते " , . ड शृंगारवैराग्यतरंगिणी. श धारण करनारी स्त्रीनां नेत्रोने कमलपत्र जेवां कह्यांठे; ए वधो शृंगार रस जाण वो. अने स्त्रीना एवा केश जोईने पुरुषना अंतःकरणमा मदनादि विकाररूप चम कार उत्पन्न थायते, माटे ते क्लेगरूप कह्याठे; केमके, कामादि विकारो क्लेशरूप कह्या, क्लेगो अंतरना विपय होवाथी चतुना विषय नथी, तेथोएज जाणे केश रूप मूर्ति धारण करी होय नी ! एवी उत्प्रेदा थायवे. एकारणथी स्त्रीना देदीप्य मान केगने क्लेशरूप जाणीने तेनो तुं त्याग कर, एवडे वैराग्य रस दर्शाव्यो.॥शा वसंततिलकात्तम्।। ये शुश्बोधशशिखंडनरादुचमाश्चित्तं रंति तव वक्रकचा दृशांग्या ॥ ते निश्चितं सुकृतमर्त्य विवेकटेनिरिणे ननु नवक्रकचाः स्फुरंति ॥ ३ ॥ अर्थ:-हे पुरुष, निर्मल ज्ञानरुप चश्नुं ग्रासन करवा विपे, स्त्रीना वांका के श, रानु जेवा क्रूर वे. ते तारा अंतःकरणमां चमत्कार उत्पन्न करे. अर्थात् रा जेम चंइनो ग्रास करे, तेम ए वांका केश तारा शाननो नाश करनारा वे. धने ते जाणे मुरुतरूप मनुष्यना विवेकरुप देहवें विदारण करवाने नवी कर्वत ज होयनी ! ए उदा . एमां “ वक्र कच" एटाने वांका केश ते “ नवकक च" एटले नवी करवतना जेवावे. एमकह्याथी खेपरुप चमत्कार जाणवो. या वृत्तमां, बीना वांका केश होय ते श्रेष्ट कह्यावे. स्त्रीना वक्रकेश पुरुपना मनने मोहित करेते, एथीज अंतःकरणमा चमत्कार उत्पन्न करेठे एम कपु , माटे ए शृंगार रस वे ; अने स्त्रीना वांका केगनुं दर्शन थत्तांज पुरुपर्नु मन विन्दल थायठे, देहनी पण शुद्धि रहेती नथी, अने झाननो नाश थई जायचे तेथी तेयोने रादुरुप कह्यावे. तेमज विवेकरूप शरीरने कापवाने नवी कर्वत जेवा कराठे, एवा जाणीने तेयोनो तु त्याग कर. ए वैराग्य रस जाणवो. ॥३॥ उपजातिटत्तम्॥अलंकृतं कुंतलनारमस्या विलोक्य लोकः कुरुते प्रमोदम्।।वैराग्यवीरच्चिरं रंत ममुं न किं पश्यसि कुंतनारम्।।४।। अर्थ:-हे पुरुष, पुप्पादिकेकरी गूंथेला बीना बांधला केगोनो समूह एटने आंबोडो जोड़ने लोक श्रानंदने पामते, परतु ए वैराग्यरुप वीरनु वेदन करणा प्रास नामक सह गस्त्र . एम तूं का जोतो तथा? अर्थात् स्त्रीना अलंकृत कृत्तलनार" एटले जे गणगारीने बांधेला केश वे, ते कुंतनार एटले प्रास - से - ३० शृगारवैराग्यतरगिणी क शस्त्रज ने एम जाणवु या ठेकाणे अल एटले सकाररहित, रुत एटले को लो, जे कुतलनार शब्द, तेनो कुतनार एवो शब्द थाय, ते योग्य ठे श्रा वृत्तमा, पुष्पादिकेकरी शृगारेलो स्त्रीना केगोनो अबोमो पुरुपने एपो रम एगीय लागेने के, ते जोड़ने वैराग्यवान पुस्पनो वैराग्य पण मगी जायठे , एवी श्रेष्टता कही, ते शृगाररस ने अने ते 5 ग्वे करीने पण सहन न थाय एवा प्रास नामक शस्त्ररूप उता वेराग्यनो नागकरनारो ठे, माटे तेनो त्याग कर, ए वैराग्य रस ने ॥४॥ वसततिलकारत्तम् ॥ कस्तूरिकातिलकित तुलिताष्टमी चित्ते विचितयसिसौख्यनिमित्तमेकम् ॥ वामध्रुवा यदलिक तददी अलीकमित्यारत्ययेव परया प्रवदति रूपम् ॥५॥ अर्थ -हे पुरुप, जेमा कस्तूरीनो तिलक कस्योते, तेथी यष्टमीना चइ जेवी जेनी सुदर नृकुटी देखाय ठे, ते वित्तीय सौख्यनु कारण से, एवु तु अत करण मा यितन करे, ते व्यर्थ वे अहो ऽत्याश्चये। ते स्वीयोनु थलिक एटले जेल लाट बे, तेने पडित लोको थलीक एटले मिथ्या कहे अर्थात् थलिक एवावे रूप ललाट वाचक वे, तेयोमाना पहेला रूपने वीजा रूपे करी जाण, एटले ल लाटने मिथ्या जाण, एपण श्लेपज ने या वृत्तमा, थष्टमीनो चश् अर्धगोलाकार तेना वचमा श्याम वर्णना चादलाना जेवु देखायवे, तेथी ते अति शोनित लागे, तेम स्त्रीनु पण वाकु सलाट उता तेमा कस्तूरीनो तिलक कस्यो होय तो अति म नोहर देखाय, ते जोऽने पुरुषना मननेवि घणो थानद थायठे, ते शृगाररत दे अने ए जे कस्तूरीना तिलक सहित स्त्रीनु लजाट यति शोनायमान देखायडे, तेमा काई अर्थ नथी, किंतु व्यर्थ , माटे तेनो त्याग करयो ए वैराग्यरस चे ॥५॥ नपजातिटत्तम् ॥ न भूग्यि पकजलोचनायाश्चकास्ति शृगाररसै कपात्रम्॥नू कित्वसौ साधुतरा प्रसूते निवधन मोदविपउँमस्यादि। थर्थ -हे पुरुष, कमलपत्रना जेवा लोचनवाजी स्त्रीनी शोनायमान चुकुटी , ते जाण शृगाररसनु एक पात्रज ठे, ते यतिशय श्रेष्ट नृमि ने, केमके, एयकी मोह रूपविपना वस्नो प्राश्नाव उत्पन्न थायने, थर्थात् – एटले चुकुटी, ते साबुतरा उता वन्ने खूणाए सरसो देखायने, , प्र ने शृंगारवैराग्यतरंगिणी. ૨૧ नू एटले नूमि थायठे, एम कयुं; तेमां भावी रीते लेप बेः- सा एटले प्रसिक्ष, धुतरा एटले रेफरहित एवो, बे शब्द नूमिवाचक शब्द थयो ते योग्य बे. श्रा वृत्तमा, स्त्रीनी जे शोनायमान त्रुटि, तेने शृंगार रसना पात्ररूपे कही केमके, एने जोतांज पुरुपने मोह उत्पन्न थायठे, माटे ए शृंगार रस डे, ए चुकुटि नथी पण मोहरूप विपना रदने उत्पन्न करनारी सारी नूमि , एम कहेवाथी वैराग्य रस जाणवो. ॥ ६ ॥ मालिनीटत्तम् ।। नवकुवलयदामश्यामलान् दृष्टिपातान् कृत परमदनाशान् विक्षिपत्यायतादी॥ इति वदसि मुदं किं मोद राजप्रयुक्तान् प्रशमनटवधार्थ विद्यमूदृष्टिपातान् ॥ ७ ॥ अर्थ.- हे पुरुष, विस्तीर्ण नेत्रोवाली स्त्रीना कुवलयनी माला जेवा श्यामव र्णवाला, धन्यमदना नाश करनारा जे कटाद, ते मारा उपर नाखेठे, एम जाणीने तूं शासारु हर्पित थायठे ? अरे, ए जे दृष्टिपात (कटाद ) ते प्रशम रूप शूरवी रनो वध करवा सारु मोह राजाए प्रेरणा करेला टिपात एटले तलवारना पात (घा) ठे; एम जाण: अंही दृष्टिपातनो शष्टिपात थावी रीते थयो :- दृष्टिपात शब्दनुं विशेषण मूलमां “कृतपरमदनाशान् ", एनो श्लेप करीधावो अर्थ थाय वे:- कृत एटले कयो, परम एटले अत्यंत, दनाश एटले दकारनो नाश थयाथी झष्टिपात शब्द थाय ने ते योग्य वे. था वृत्तमां, विस्तीर्ण नेत्रोवाली स्त्री कदी ने, एथी स्त्रीना विशाल नेत्रोने कवीयो ए उत्तम कह्या वे, एम जाणवू, एवा विशाल नेत्रोना जे कटाक्ष, ते कुवलयनी माला जेवा, थने अन्य मदना नाश करनारा कह्या ; एटले जे पुरुप उपर कु वलयनी मालाना जेवा कटाद पमे ते पुरुप बीजा गमे तेवा मदवालो होय तो पण तरत ते स्वीनी उपर मोहित थईने तेना किंकर जेवो थई रहे, अने ते पोतानी उपर स्त्रीना कटाद पडया जोइने अति थानंदित थायठे, माटे ए शृंगार रस ने अने एवो जुब्ध थएलो पुरुप मोहरूप राजाने वश थयो थको उ.खी थायडे; केमके, नेत्रकटाक्षरूप तलवारना घाएकरी सेना प्रशमरुप शूरवीरपणानो वध थायवे. तेनो तुं त्याग कर, ए वैराग्य रस . ॥ ७ ॥ शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ तस्याः कोपपदं यदाननमदोरा नं स्मरन्नात्मनः संतापं वितनोपि काननमदो झाला स २१२ शृगारवैराग्यतरंगिणी खे तत्त्यजे ॥ एतस्मिन् वसता मनोनवमहासर्पण दष्ट पुमान् कार्याकार्यविवेकशून्यहृदय कस्को न सजायतो श्रर्थ -हे सखा, कोपनु स्थान जे स्त्रीनु थानन एटले मुग्य, तेनु रात्रदिवस स्म रण करीने तू पोताने सताप करीले ,अहो ऽति ग्वेदे । ते आनन नथीपण कानन एटले वन ने, एम जाणीने मूकी दे, केमके, ए वनमा रहेनारो जे कामरूप सर्प, ते जे पुरुषने दश करे, ते पुरुषनो हृदय कार्याकार्य रिवकथी शून्य थ जायने, एवो कोण , के जे उक्त विवेकग्रन्य न थाय। फितु सर्व थायज ले सामान्य सर्पनाविपे करीने मूर्षित थएलो पुरुप पण शून्य हृदयवालो थर्ड जाय, तो जेने सपै दश करयो दोय तेनु शु कहेवु । अहीं कोपपद थानन कानन , एम काळे, तेथी कोपपद एटले ककार ने उपपद एटले समीपपद जेनो एवो थानन शद कानन शब्द थाय ते योग्य ठे, एश्लेप वे या वृत्तमा, स्त्रीनु मुख कोपायमान का ले तेनु कारण ए के, स्त्रीनी मुखमुज्ञ यत्किचित् कोपायमान पुरुपने दीवामा थावे तो तेने कामविकार उत्पन्न थापळे श्रथवा कोई कारणने लीधे स्त्रीने रीश थावीने पुरुपने पोतानी मुखमुश कोपाय मान करी देखाड्याथी तेने प्रीति उत्पन्न थायले, अने विविध प्रकारे तेने सम ज्याव्यानी आतुरताने लोधे कामविकार उत्पन्न यायचे ते यहीं शृगाररस जाणवो, अने स्त्रीना मुखने वन जेवु का , ने तेमा कामरूप सर्प रहे जे ते दश करीने पुरु पना हृदयने शून्य करे ये एटले सारासार विवेकरहित करे , अर्थात् मृतकतु व्य करे , तेथी तेनो तु त्याग कर ए वैराग्यरस जाणवो ॥ ७ ॥ नपजातिटत्तम् ॥ साकारमालोक्य मुख तरुण्य कि मुग्धबुद्धे मुद मादधासिाद हि चित्तभ्रमनाटकस्य विचरणैरामुखमाचचः ॥णा अर्थ - हेरुडीक्षियान पुरुप, तरुण स्त्रीनु साकार एटले सुदर मुख जोईने तु शासारु थान दित थायठे। ए मुखने विज्ञान पुरुप निश्चये करी चित्त भ्रमरूप नाटकनु थामुख एटले थाधारन कहेठे यही साकार एटले श्राकार सहित जे मुख होय ते थामुख , ते योग्य ने था वृत्तमा, तरुण स्त्रीनु सुदर मुख का के, तेनु कारण एके मुरखनी सुदरता तारुण्यपणामां होय ते गमे तेची सारीदियाला पुरुपनी बुधिने विघ्रम करे ने एटले मोदित करेते ए शृगार रस ने श्रने तरुण स्त्रीनु मुख चित्तविनमरुप .
एटले स्त्रीनुं मुख जोईने मोहनो आरंन थाय . आद्यारन सूत्रधार अने नटीप्रमुखना गायन क्षारा थायठे, ते पुरुपना चित्तने मोह उत्पन्न करेठे. तेम ए पण जाणवं. तेनो तुं त्याग ए वैराग्य रस वे.॥ ए॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥कामज्वरातुरमते तव सर्वदाऽऽस्यं वा मध्रुवां यदि कयंचिदवाप्तुमिचा ॥ यत्तं विनाप्यखिलज न्मपरंपरास तज्जातमेव नवतो ननु सर्वदास्यम् ॥ १० ॥ अर्थः-हे कामरूपज्वरथी पीडायमान थएली मतिवाला पुरुष, जो सर्व एटले सर्व काल सुंदर त्रुकुटिवाली स्त्रीनु बास्य एटले मुख, कोई पण प्रकारेका तने प्राप्त थवानी वा होय, तो निश्चयेकरि यत्नशिवाय संपूर्ण जन्मपरंपराने विपे सर्वदास्य एटले सर्वनु दासपणुं तने थयझुंज , एम जाणवू. श्राश्लोकमा वे ठेकाणे "सर्वदास्य " ए शब्द यावेलो . ते बन्नेनो अर्थ निन्न निन्न थाय वे. तेथी अहिं यमक जाणवो. था वृत्तमां, सुंदर नृकुटीवालुं स्त्रीनु मुख कयुं , एथी जे स्त्रीनी कुटि सा री होय, ते सुरूप दीवामां आवेठे. तेनु मुख कामी पुरुपने अति प्रिय लागे. अने तेने जोतांज कामीपुरुपनी मति कामज्वरथी पीडायमान थायठे, एज इहां शृंगार रस वे. अने एवा स्त्रीना मुखनी प्राप्तिनी हा जे पुरुष करेने ते जन्मो जन्मने विपे पराधीन रहे. माटे तेनो तू त्याग कर ए वैराग्य रस जाणवो.॥१०॥ शार्दूलविक्रीमितं वृत्तम् ॥ तस्याः साधुरदं विलोक्य वद नं य. संश्रयत्यंजसा मुक्त्वा मुक्तिपयं ददा प्रविशति भ्रां त्या स उंगै वनम् ॥ तच्चात्यंतमचारुवश्वसतिर्येनात्र रा गादिनिश्योरैर्धर्मधनापहारकरणात्कष्टं न किं प्राप्यते॥१२॥ अर्थ:- ते स्त्रीनु “ साधु रदं " एटले सारा दांतवालुं वदनं एटले मुख जो जे पुरुप वेगे करी तेनो श्राश्रय करेते, एटले तेमां लुब्ध थायवे ते पुरुष, हा इति खेदे ! मुक्तिमार्गने मूकीने, वसतिने घरम्य करीने उ.खेकरि प मन ने थाय एवा वननेविपे नातिए करि प्रवेश करेठे. ते वन मर्यादारहि तेमां गमन करनारा पुंरुपर्नु धर्मरूप धन रागादिक चोरो हरण करी जाय । युं कटनी प्राप्ति थती नथी ? यहिं साधुरदं वदन जे ते वन वे ए २२४ शृगारंवेराग्यतरंगिणी म का ले ते थाम- साधुरद ए गन्दनो पदद करिये तो साधु थद ए बे पद जुदा थायवे एमाना यद पदथकी दकार रहितपणु यायवे, एम वदननु वन थाय, ते योग्य श्रा वृत्तमा, सारा दातवाली स्त्रीनु मुख जोताज पुरुपनु मन सुब्ध यई जा यठे मुक्तिनो मार्ग जे धर्मध्यानादिक तेने ते मूकी दे रे जेने वसति सारी ला गती नथी, मदनने वश थयो यको वनादिक एकात स्थलमा ते स्त्रीसहित अथवा स्त्रीना धागमननी शायान थयो थको वास करे, थने तेथी महाकष्ट सहन करे, एयो स्वीना मुख दर्शननो जे प्रनाय ते यहि शृगार रस वे थने स्त्रीना मू खरूप जे वन तेमा जे पुरुप प्रवेश करेले तेनु धर्मरूप धन रागादिक चार वटी लिये ये माटे तेमा लुब्ध यवु नही ए अहि वैराग्य रस ठे ॥ ११ ॥ पृथ्वीरत्तम् । यियाससि नवोदधेर्यदितट तदेणीशामदीनमधर धर, परिरे पर दूरत ॥ दास्फुलनतोऽन्यथाविशवासनानौ स्तव वजिप्यति विशीर्णता न नविता ततो वाठितम् ॥ १२ ॥ अर्थ -हे पुरुप, जो तु या ससार समुश्नो पार लेगानी वा करतो हो, तोह रिणी जेवा नेत्रोवाली स्त्रीयोना यहीन एटले थमृतादिवडे परिपूर्ण, यधर एटले थोष्टरूप धर एटले पर्वत जे वे तेने तु दूर नाखी दे ते जो तु नहीं मूकीश तो ते प वतना सघनना योगे तारी निर्मल वासनारूप नौका नागी जगे तेथी तारु छे लु पार पडतो नही नेम समुश्मा पर्वतना लागवाथी वहाण नागी जाय तो जवा थाववादिक इष्टसिदि यती नथी ते प्रमाणे तु पण था नव समुज्ने पहेले पार पहोची शकोश नहीं यही अहीन अधर जे जे ते धर एटले पर्वतज , एम का के, ते थाम -जे अहीन एटले अकारे करि दीन एटले रहित यधर शब्द ते घर शद थाय , ते योग्य वे था उनमा, स्त्रीना नेत्रोने हरिणीना नेत्रोनी बराबरी की, एटले हरिणी नां नेत्रो यति विशाल थने सुगोनित दोय तेम स्त्रीना नेत्रो पण थति पिशा ज तथा सुशोनित होयाथी पुरुषनु मन खेंची नियेते, तथा जे कामी पुरुष तेने स्त्रीना थधरामृतनेविषे घणी प्रीति होयने, माटे थमतेरी पूर्ण श्रधर कहां के, ते शृगार रस चे थने ते थधर वे ते पर्वतज वे कैमके, जे रनेविपे खुध थायवे ते ससारयी लूटी शकतो नथी ए वैराग्य रस के ॥ १२ ॥ ले ते थध शृंगारवैराग्यतरंगिणी. २२ शिखरिणीदत्तम् ॥ न जातीदं भ्रातः स्फुरदरुणरत्नौघकिरणप्रता नं तन्वंग्याम्तरलतरलं कुंडलयुगम् ।। दमं उग्धं पुंसामिह विरदसं योगदशयोर्चलचोकानं गज्वलनयुगिदं कुंडयुगलम् ॥ १३ ॥ अर्थ.- हे नाई. देदीप्यमान रक्तवर्ण रत्नोनो किरणसमूह वे जेनाविपे, तथा तरल तरलं " एटले जे अत्यंत चंचल वे. एवा कशांगी एटले पातला बांगवाली स्त्री नाजे “कुमलयुगं" एटले जे वे कानना कुंमल ते शोनता नथी; कितु विरहदशा अने संयोगदशामां शोक तथा कामानिएकरी मुक्तले एटले विरहावस्यामां शोकावि नव, तथा स्त्रीपुरुपनी संयोगावस्थामां कामानिनो याविनीव थायठे. अने या संसारनेविपे पुरुपना गांतिरूप दूधने वालवावाला ए कुंमयुगल एटले वे कुंम एम जाण, वहीं कुंमलयुग ते कुंमयुगल पाच ठे. ते धावी रीते-कुंमलयुग शब्दनु वि शेषण तरलतरलं एबु के. एनो पार्थ थाम वे.- तरलतर एटले चंचल तेल एटले लकार जेमा एवो जे कुंमलयुग शब्द तेमांनो लकार कहाडी नाखिये तो कुंमयुग शब्द थायवे, अने युग गद यया पठी तेना अंतमां लकार जोडीये तो कुंमयुगल शन्द थायले. ते योग्य ते. श्रा वृत्तमा, बीना काननेविपे देदीप्यमान रत्नजडित जे वे कुमज होयने, ते स्वीना रूपमा अति वृद्धि करने. अने चंचल होवाथी अति सुशोनित दरवायचे तमा पण कशांगी एटले पातला श्रांगवाली स्त्रीने अति गोनेने. ए शृंगार ते. ने ए जे व कुंमल ते ते शोनाकारक नयी पण विरहदशा तथा संयोगदशामां शो क तथा कामानिना उत्पन्न करनारा ते, ए पुस्पनी शांतिरुप दृधनो नाश करना रा ने तेथी कुंडरूप , तेनो तूं त्याग कर ए वैराग्य रस ते. ॥ १३ ॥ अनुष्टुत्तम् ॥ ताडकं सस्पृहं तस्याः पश्यन् मूढः परे नवे ।। नरो नरकपालेन्यस्ताडं कं न सदिप्यते ॥ १४ ॥ अर्थ-- हे मूर्ख पुरुष, ते स्वीतुं सानिलाप “तामंकं " एटले कर्णनूषण अव लोकन करतां पागल थावनारा नवमध्ये नरक पालन करनारा अथम परमाधा मी पुरुषोनी पाशेथी "कंताडं" एटले कोण याघात सहन करनार नथी ? अ पितु सर्व धायात सहन करश. ग्रही “ताडंक ' ए शब्द वे वार याव्यो, तेयों नो थर्य निन्न निन्न . ए चमकालंकार .
मुद्र २२६ शृंगारवैराग्यतरंगिणी था वृत्तमा, स्त्रीना कानना कुम जोताज पुरुपने एपी अनिता थाय के ए कुमलेकर। शोनायमान स्त्री मने प्राप्त थाय तो सारु ए शृगार रस दे, थने श्र निसापाए करी स्त्रीना कुडलोने जे पुरुष जुरे ते ते थापता नरमा नरकना पा लन करनारा परमाधामी देवतायोनी मार खायो, माटे एनो त्याग करवो एवं राग्य रस ॥१४॥ वसततिलकावृत्तम् ॥ सार गल यमरविदविलोचनाना मालोक्य चेतसि कलयति मूढा ।। दा निश्चित रचि तमुक्तिपुरप्रवेशव्यापेधमर्गलममु न विचारयति ।। १५ ।। अर्थ - हे मूढ, कमलना जेवा नेत्रोवाली स्त्रीयोनो जे सार एटले श्रेष्ट, गल एटले कठ अवलोकन करीने पुरुपो अत करणमा हर्ष पामेळे परतु हा इति खे दे । ए जे गज ले ते मुक्तिनगरीमा प्रवेश करवानेवि प्रतिवध करनार होवाची श्र गल , एवो विचार करता नथी यहीं सार एटले घरसहित गल शब्द ते अर्गल शब्द थायवे ते योग्य ने या वृत्तमा, स्त्रीना कनी श्रेष्टता कही जो स्त्रीनो कठ सारो दोय तो से ने जोताज पुरुप थानदित थायडे, अर्थात् कामनी या उत्पन्न थायने, ते ५ ही शृगार रस ठे, अने एवा थनिलापी पुरुपोनो मुक्तिरुप नगरीमा प्रवेश पतो नथी माटे तेनो त्याग करवो ए वैराग्य रस वे ॥१५॥ शिखरिणीरत्तम् ॥ अल प्राप्य स्पर्श कुचकलशयो पकजशां परा प्रीति भ्रात कलयसि सुधामन्नध्य किम्॥अवस्कद धर्महितिप पकटके दातुमनसा प्रयुक्त जानीया कलुपवरटेन स्पशमिम्॥१६॥ थर्थ - हे 'नात, जेना कमजना पत्र जेवां नेत्र , एवी स्त्रीयोना स्तनरूपजे कुन दे, तेने अल एटले थत्यत्त स्पर्श पामीने थमतमा मन थई जनाराना जेवो जे तु ते गु उत्कृष्ट प्रीतिने पामे, ए स्पर्श, धर्मरुप राजानी सन्यने प्रहार क रपान ने जेना मनमा, एवा कजुप एटले पापपनीने मोकलेजो स्पश पटले जासूद डे, एम तु जाण यही अल स्पर्श जे जे ते स्पशवे, एम का रेफ बने सकार एफज होयठे, एवो नियम ले माटे थल एटले जेमा रेफ नथी एवोस र्श शद जे ते स्पश गब्द थाय ते योग्य .
शृंगारवैराग्यतरंगिणी. 9 या वनमां, स्वीना स्तननी उलष्टता कदीने, एटले पुस्पने स्वीना स्तननो स्प नयनांज अमृतनेवित्र मन्न थर्ड गएता पुरुपनी पते यानंद उत्पन्न थायवे; ए शृंगार ग्न धने एलन जे ते धर्मनो नाना परवाने अर्थ पापना एक ठा नो जाट ने. मग तनोतुं त्याग कर. ए वैगग्य रत वे. ॥१॥ वसंततिलकावृत्तम्॥ पीनोन्नतं तनतट मृगलोचनाया आ लोकने नरहितं यदपूर्वमेतत् ॥ मोबांधकारनिकरदय कारणम्य विद्याम्नदातटमेव विवेकनानो. ॥ १७ ॥ पर्व.- मृगना जेवां लोचनवानी बीनां जे पुष्ट ने उन्नत स्तननट एटले ननो ने. ने नरहित एटने पुन्पने हितकारक जानवे, अने अपूर्व एटले प्र निदा पुम्पने चमत्कार उत्पन्न करते: तेनु तुं यवलोकन करे : पण ते माद म्य धंधाना दर कन्वा, कागरा विवनपर्यना अन्ततट वं. अर्थात् ए बनी डानम्प मर्यनो अन्न यायठे. या पद्यमांन्तनत जे तने तुं अन्ततट जान एम का. म. नगहिर्न धने यपूर्व ए वे स्तनतटनां विशेषणों में, श्री नवी भावां भयं निकले वे.- नरहित एंटने नकारेकरी रहित बने थपूर्व एटले १जनीघादनांकार. एनकायीननतटनो धम्नतटगद यायचे ते योग्य ते. श्रा वृनमां. मृगना जवां सोचनवाजी स्वीना मानवी नग्लायने उंचा रहता वनन. ने पुम्पने अनि मुख करनाग लागे धने पुत्पना मनमा कामवि कार उत्पन्न करने माटे ए श्रृंगार ग्न ले. धन एज न्ननोन बिजोकन करनाग पुर मनोविक्ना जाय.. एटले कामविहज यो चको नेने का सजन श्रीनबीनो त्याग कर एवंगग्य ग्ल ठे.॥ १७ ॥ भाईलविक्रीमितं वृत्तम्।।कंदप्पविपकुंजचासणि कुचछे म गादा मया न्यनो दम्न प्रति प्रमोदन दिनमान्मना मा ग्मनु.॥ किन्वाजन्म यदर्जितं वनुविधामन्यस्य कटकियां इन्नोऽयं मुक्तम्य नम्ब महमाऽनाति मंचितये॥१७॥ अयं हे नया नामापन्निना गंमस्थल वा मनोज जे मृगाही नीना वे न. नंदिर में दम्नस्थापन क्या . एम जाणीने हरप मटिगएकी मदी मन न.गणवानी तु नहीं था. कम, नाना प्राग्नी तानुटानादिम्पक मर किया सेनन अन्यान ने जन्मस्री नंपादन कला जेरुत पटले . . F- +rt शृगारवराग्यतरागणा. प.तेने ते थाडु हाथ दीवुठे जेमके, कोई बाहेरथी थायनारा पुरुपने हस्तम समझाएकरी निषेध करे, तेम कुचक्षनेविषे हस्तप्रदानेकरीने सुरूतनो ते नि 'स्योरे एपो जे तु ते मनमा विचार कर आ पद्यमा स्तन उपर हाथ रा थने सुम्तने हाथ दी एज चमत्कार दे श्रा वृत्तमा, कामरूप हस्ती कहोने ने तेना गमस्थलरूप स्त्रीना वे स्तन क ने ते ज्यारे पुरुप हाथनेपिप ग्रहण करेठे त्यारे मदनातुर थयोथको म ने पामरे, ए ड्रागार रस , थने नाना प्रकारे कष्ट करीने सपादन करना इतना निषेध करेने माटे तेनो त्यागकर ए पैराग्य रस वे ॥ १७ ॥ ज्यगायत्तम्। कगेपकने लुलित विनावयेर्नुज युक्त्या नुजगं गराजिनम् ॥ एतस्य सस्पर्शवशादपि कणाद शेपचैतन्यमुपैति महायम् ॥ए । अर्थ-गवनी पारी जेजा गर एटले विप करीने अजित पा जे तरुण स्त्री यादा ते नुजग एटले सर्पज ले. एम तु जाण ए सर्पना स्पर्शमा 1) गंपूर्ण रतन्य क्षणमात्रमा नागने पामेने जेम सर्पना स्पर्गकरी चंताप ना पाप, तेमज तरण खोना नुजम्पर्शयी चैतन्यनाग थाप पुन तुनग यावी रीने पायो -नुज शब्दनु विशेषण गराजित . तेनो वर्ष र योगनित ण्टने पुक्थपायी नुजग शद थायो . ते पुक के. था एनर्मा, मनी पागे गम बता स्वीना ये दाथ पुरुपने धडकलांग नि मोहित पयोधरा पाताना शरीग्नी गुद्धि पण रदेती नयी र मार बने । वे पीना दाय ने ने माधात सर्परप, केमके, एनो र ये पा जायजे, माद तेनो तु त्याग र बंगग्य रस डे नुपजानिधनम्।। कगवमक्ते कुपिते नवादी वर नदि द ॥रियम्लधर्मातरजीवित न येणे न वाढी १३ अर्प-वाद्य प्राणनो नाग नागे कोपायमान जे नमारी ने उपना गनामा मजन थाप ते मार, परतु उमरप नाग र मीमची ही एटने नुन, त पुष्पना गनामा पपत्र त पमिन पृपने या नयी, मि. मपं, १.६ न ना कर, समीयांना रे पाइने, ने करामनग्न उन एदने 1 . 2 4 + शृंगारवैराग्यतरंगिणी. शए नो नाश कन्चे : माटे स्त्रीए पोताना हायधी करेलु थालिंगन सर्प करतां पणथ पिक पु.ख देनारले. या श्लोकमां नवाहांगद वे वखत द्याव्याने तेनो थर्थ जुदा ने. था वनमां, स्त्री ज्वारे पोतानी भुजावई पुस्पन यालिंगन करने, त्या पुस्य पोताना प्राणनी पण परवा गखता नवी, एवो कामातुर वायने : ए शृंगाररतो. अन सर्प गलामां बाजी प्राण निये ते नारं, पण न्वीतुं यानिंगन नखं नहीं: मकनेत्री माता कर्म बंधान अंतगत्मानो नाग यायचे. माटे तेनो त्याग कर वो उचित ने ए वैगग्यग्त वं. || 0 | जवंशात्नम् ।। कोयं विवेकानव यन्नतन्त्रुवां दोपावगूढः प्रमदं वि गादसे ॥ यत म्मरानंकपरीनचेनमा कि सुंदरासुंदरयोविवेचनं ॥३॥ अंग्रे.- हे साधो. या नागे कयो विवेक ने के. नत्र । कुष्टि जयोनी एवी बीना ढोपावगृढ एटले भुजाए यानिंगित भयो यको तूं उलट मदने पामने ! कमक. कामन्य रोमेगैने जेना अंत करण व्याप्त थयावे, एवा पुत्पने नाग तथा नग्नातुं विवेचन यतुं नथी. जेम अपस्माराटि (मरी) रोगवाला पुस्पने गु नाशुन ज्ञान होतुं नयी, नेम तने पण ययुंचे. अथवा तागे विवेक दोशवगृढ एटले दोपरगने युक्त वे एवी अर्थ पण यायचे, माटे ए तार्ग कवो विवेक व एम कहं योग्यजते. या वृत्तमा, पुत्पने स्त्रीए यालिंगन कन्यंठतां, ते गमे तेवो विवेकी होय तो पण ते एक कोने रहीने कामातुर थयोथको हर्पित यायचे; ए श्रृंगार रन ; श्रने स्वीना वाजिगनधी पुरुपना विवेकनो नाम थायवे, थने अंतःकरणमां य विवेक श्रावे. माटे तनो तुं त्याग कर ए वैराग्य रन वे. ॥ १ ॥ वसंततिलकाहत्तम् ॥ ददो विलोक्य परमंगळमंगनाना मानंदमुवमि कि मदनांधवुझे ॥ सत्यं विवेकनिधन कनिमित्तमेतत मेधाविनोदि परमं गदमुनि ॥ २॥ अर्थ:- कामकरी ग्रंधजिवाला पुस्प. बीयोना परमंगदं एटले उत्स्ट वाजवंध जोड्ने झुं यानंट करें ? पंमित सोको जेने ते ए बाबंधने ज्ञाननोनाग कग्नागे परम एटले उल्लष्ट गढ़ एटले रांग कहंः ने नत्य ने.कमके.जमगंग जीव ना नागना हेतु . तम बीनां वादुनुपण पण डानना नागना हेतुने. ए पद्यमा पग्मंग एवे वखत याव्योन.नाधये जुदो जुही,एवां यमकल्प चमत्कार .
३३० शृगारवैराग्यतरगिणी श्रा वृनमा, स्वीना बाहुनुं नूपण जे बाजूवध वे, ते पुरुषना मनने एवो मो हित करीजिये के पुरुष कामाध थयोथको महाहर्पने पामेने ए शृंगार रस दे, यने ए जे वावध वे ते थानद करनारो नयो, पण जीवनो नाश करनारों मोटो गेग , एम जाणीने तेनो व त्याग कर ए वैराग्य रस ने ॥ १२ ॥ अब जनो बलयनर विलोकते मृगीदशामधिनुजवल्लि वालिश ॥ न बुध्यते सुनचमू निगीपत समुद्यत बलनरमेनमेनस ॥३॥ युर्थ-अप एटले या प्रत्यक्ष मूर्ख जन जे ते, ते हरिणादी स्त्रीश्रीना जुज लताने रिपे वजयनर एटने जे कणसमूह ते जुरे परतु ए वनय जे ने ते सुस्त जे शीतादिक तेयोने जीतमानी शालो एवो पापनो सावधानी नूत यानर एटले गेनाममद , एम जाण था पद्यमा यतयनर जे , ते वसनर ने एम रघुने, यसर यने वराग्नु ऐक्यचे वलयनर शब्दनु विशेषण थप ए शब्दले एनो वर्ष व रहित प थापने, तेथी वजयनर शब्द बजनर थयो ते योग्प दे. या नमा, योना दायमा जे फण होय, तेने जोईने जे मूख जन ते यानदने पामेने, ए मृगार रस ने , अने ए जे फणनो समूह ने, ते शीनादिक ना ना करना , माटे तेना तु त्याग कर ए राग्य रस वे ॥ २३ ॥ चमततिलकाटनम् ॥ ये दृक्पये तव पतति नितविनीना काता फग जमिमपल्लवनप्रवीणा ॥नो वेत्सि तान् किमपय गंपरप्रयाणप्रन्यूढकारणतया करकानवश्यम् ॥ ४ ॥ अर्प - जमनाना पाटीकरण करवारिप निपुण पुस्प, निचिनी स्त्रीयोना कान एटने मना कर एटने हाय तारी दृष्टिम्प मार्गमा याने तेश्रोने मारप नगरी प्रने जता कर एटले कगनी पेरित करनारा म जाणतो नथी। बाद जना जो मार्गमा क्गनी वृष्टि याय तो ना शायनी मिमि थाय नदी, एन कुनगारमा क्युठे था पद्यमा बीना कर जेने ते रकन म क्यु ले ते या वोगने-परशदनु विशेषण कात गुद, एनों यक ने जेना यतनवि एवा पाने, अपान कर गदना यने कसार गपिये तो कार पाप ते योग्य ने या नना जातानु प्रकटोरगण करविष स्वीना दाथ निपुण , परने की ना हापदनी पुग्ने मादियांज त गमे तग धमादिनिषि मायध होप तो शृंगारंवंराग्यतरंगिणी 331 पण दिग्मृट एटन्ने कामने वश थई जाय .न तेमां ते पोतान परमानंद माने वे. शृंगार रस ने. घने स्त्रीना स्स्यादिककरी स्तब्ध बनी गाला पुरुपने मोदनो मार्ग धर्म. ते जतो नथी, माटे तेनो तुं न्याग कर.ए बैंगग्य रस के. उपजातियत्तन् । नीव्याप्तमस्या दरिणेक्षणाया यंवीट्य दारं हदिद पमेपि ।। विवेकपकेकाननस्य तमेव नीहारमुदाति ॥ ५ ॥ अर्थ -जीवी एटले बम्ब, तेनी गांव पर्यंत दरियादी स्त्रीनो जे संशयमान हा र, तेन जोन तूं पोताना मनमां थानंदने पामेने, ते हारने पंमितजोक, ज्ञानरु प कमलना वनने नीहार एटले हिम कहेते. जेम हिम, कमलना वनने नाग कर नागे. तेम स्त्रीना हृदय ऊपरनो जे हार ते झानने नाश करनारो ते. या पद्यमा दारने नीहार कोठे, ते धाम-हारशब्दनु विज्ञोपण नीच्याप्त . एनो अर्थ था -नीगडेकरी व्याप्त एटले जे युक्त हारशब्द ते नीहारशब्द थायवे ते योग्य वे. था वनमां. स्त्रीना हृदयनो जे सांवो हार ते जोतांज पुरुपने यति आनंद उ त्पन्न थायडे, ए अंगारग्स ; थने ते हार जे वे ते ज्ञानरुप कमलना वनने वा सवामां हिम जेवों वे. एटले ते दारमा सुब्ध थएला पुरुप, ज्ञान नाश थ जाय वे, माटे तेनी तुं त्याग कर. ए वैराग्य रस ते. ॥ २५॥ वंशग्यरनम्॥ विलोक्य किं सुंदरमंगनोदरं करोपि मोदं मदनज्वरा तुरानो ऽकसे उर्गतिपातसंनवं नवांतरे नाविनमंगनोदरम् ॥२६॥ धर्थःकामज्वरवडे पीडाने पामेला हे पुस्प, सुंदर अंगना एटले स्त्री उदर जोईने तूं का मोहने पामेठे । अंग एटले हे पुरुप, ए उदर नयी पण जन्मांतरने विपे अने नग्कने विषे पड्याथी उत्पन्न यनारा जे दर एटले जय; तेज , एवो कां विचार करतो नथी? या पद्यमां अंगनोदर ए पट वे वखत वे; तेयोनो पद विनागेकर निन्न यर्थ ठे, ते यहिं यमकरुप चमत्कार जाणवो. श्रा वृत्तमां, स्त्रीनु उदर जोई पुरुप मोहने पामीने कामज्वरनी पीडाने पामेले ए शृंगाररसयने ए उदर नथी पण जन्मांतर तथा नरकमा थनारो जय , एम जाणीने तेनो तूं त्याग कर ए वैराग्य रस . ॥ २६ ॥ वसंततिलकावृत्तम् ॥ स्फूर्जन्मनोनवनुजंगमपाशनानी नानी कुरंगकदृशां दृशि यस्य लग्ना ॥ नानीमयं जगदशेपमुदी दतेऽसौ यो यत्र रज्यति स तन्मयमेव पश्येत् ॥ २० ॥ .
939 शृगारवैराग्यतरगिणी थर्य- देदीप्यमान कामरूप सर्पनु पागनानी एटले रहेवानु स्थान जे हरि पादो स्वीयोनी नानी एटले श्रवयव विशेप, तेनेपिपे जे पुरूपनी दृष्टि लग्न एटले लागेलीने ते पुरुप अनीमय एटले निर्नय अवलोकन करतो नथी, जे पुरुष जे ठेकाणे श्रनुरक्त थापत्रे ते पुरुष सपूर्ण तप थायले था पद्या दृष्टि सजन नानी, नानीमय सपूर्ण जुएठे एशद सेप चमत्कार श्रा वृत्तमा. मीनी जे नानि 2 ते कामने रहेवानु स्थान ले,एटले ते नानिने जो ताज पुम्पने कामविकार उत्पन्न थायडे, ए शूगार डे, श्रने जे पुरुप ए नानिनेधि यामक यायचे, ते अनेक नयने पामेठे, माटे एनो तु त्याग कर, ए वैराग्य ॥२७॥ उपचवाटतम् ।। जमोपयुक्त जघन मृगादया समीदय कि तोपत्न र तनोपि॥ अमु विशंशाध्ययसायदंसप्रवासहेतु घनमेव विद्या ॥श्ता अर्थ - रे मम्मा, जम एटने मूर्य, तेयोने उपयुक्त एटले योग्य, एवा हरि गादी चीना जे जपन एटने जांघ जाईने तु का शानद पामेछे । ए जान जे ने ते निर्मत चिनानिप्रायरूप दमना प्रयास ने कारण नूत धन एटले मेघ ने, ए म तु जाण अर्थात् ज्यारे पर्या पडे त्यारे इस पोतानु स्थान मूकीने मानसस गंर मपर जायने मिहवे तेम मनुष्यनी दृष्टिने रिपे स्त्रीनी जया था, न्यारे गिनना निम निप्राय मटी जायते या पद्यमा जडोपयुक्त जन जे वे ने पन के, एम माने, मार थने लाग्नु सापर्य होगायी जडापयुक्त शद नो जनोपयुन गद का पटाने मराग्ना नोप सहित जे जवन ते धन थाप .ते योग्पन ॥ २० ॥ या रनमा, स्वीनी जार मृर्म कामी पुस्पोने ति प्रिय लागे ने ने ते तेमा सुन्न होयने ए शृंगार रस , थने निर्मज चित्तना अनिमायना नाग कोठे, बान् बीनी नग निरग्यायो पुम्पनु चिन मनिन यायचे, माटे त्याग करता पोप ने एगम्य रसवे ॥२॥ नपजातिवनम् ॥ नितवमल्वामिततापनोट दिक्षमे यकमलेक्षणाना मामां मनाऽन्यतकटु विटिवा त निमय न्यज दुरतोपि ॥ वर्ष- मनापनी प्रेरणा करनाग स्मननयना पीना जे नितंत्र, ट नापानी नाग नांगानी तु मा काने ते नितंत्र पत्र, पुष्प नया फन या दिना मनहरी चयन गराइना जेगवे, एम नागीन दुर नाग्चीद अया शृंगारवेराग्यतरंगिणी. २३३ त् निंबर्गे फाड सर्व प्रकारे कडधुं होयते, तेम वीना नितंब सर्व प्रकारे ग्लानि कग्या योग्य वे. तेनो तुं त्याग कर.या पद्यमां उन्नसित तापनो देनार जे नितंब ते निवज वे, एम कडं. ते श्रामः-उललित एटले विकसित वे तकारनो अप नोद एटले नाश जेने विपे. एवो मिनंव शब्द निंबशब्द यायठे ते योग्य वे. था वृत्तमां, क्मलना जेवां नेत्रोवाली बीना जे वे नितंब .ते संतापनी प्रेर णा करनारावे, एटले स्त्रीनी कदिनो पालो नाग जोयाथी अत्यंत मदन विकार उत्पन्न यायचे. ते हा पूर्ण न ययाथी तेना मनमां संताप थायवे, एवो ते नि तंवोनो जे प्रनाव , ते शृंगार रस : अने स्त्रीरोना नितंब निवडाना हाडजेवा कडवा ठे, माटे एनो तुं त्याग कर; ए वैराग्य रस वे.॥ २९ ॥ शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम्॥नूनं नूपुरमेतदायतदृशो रागादि विपिणां क्रीडार्थ पुरमित्यवेत्य न हशाप्यालोकनीयं क्व चित् ॥ येनास्मिन् मुखमात्रचंगिमगुणेराकृप्य तैरुल्वणे बञ्चत्य प्रसनं चिरादपि सखे मुक्तिनवित्री न ते ॥ ३० ॥ अर्थ - हे नवा. नूनं एटले निश्चयेकरी विशालनेत्रोवाली स्त्रीयोनां जे श्रा नूपुर एटले चरणनूपण, रागादिगत्रने क्रीडा करवानुं पुर एटाले नगर वे; एम जाणीने क्यारे पण नजरेकरी जोश नही. जेने पोतानुं सारं यवानी वा हो य. तेणे क्यारे पण शत्रुनु नगर जोवू नही. केमके, ए नगर प्रतिझ. उदार, त या मुख्यत्वे श्रेष्ट गुणे याकर्पण करी वलात्कारेकरी तने वांधीलेशे, तेयो फरी तू टूटी शकनार नयी अर्थात् ते नृपुरमा जो तु यासक्त यो तो, फसाई पड गे; या पद्यमा स्त्रीयोना नूपुग्ने शत्रुनु नगर कोते. ते याम-नृपुरशदनुं विशे पण जे नून वे तेनो अर्थ न गदेकरि ऊन एटले जे रहित , एवु नूपुर ,एम जाणवू. श्रा वृत्तमा' स्त्रीयोना पगनां नूपुर पुरुषना मन, हरण करी लिएन. ए शृंगाररस ने अने ते नृपुर शत्रुनुं नगर एम जाणीने तेनो त्याग करवो, एवंगग्य रस ने. ३० उपजाति वृत्तम्॥यास्त्रीतिनाम्ना विन्नृते शमादौ शस्त्री प्रबुबैरवबुध्यतां सा॥ एनां पुरस्कृत्य जगत्यनंगनटो यतः पुण्पनटं निन्नत्ति ॥ ३१ ॥ अर्थ:-जे स्त्री एवं नाम तुयंत करणमा धारण करते, ते दमादा एटले उपय मादि धर्म मंने विपे शस्त्री एटले एक श्रायुधविशेप ने, एम सुजाण पुम्याए जा - , -- शृगारवैराग्यतरंगिणी था ससारनेविपे कामरूप योदो, ए स्त्रीरूप शस्त्रीने श्रागल करीने धर्मरुपयों न जेदन कोचे जेम सग्रामनेविपे एक मोटो योदो, पोताना शस्त्रेकरीने प्रति बानु नेदन करेने, तेम कामरूप यो स्त्रीरूप शस्त्रीए करी धर्मरुप योहान ने करेले था पद्यमा स्त्रीने शस्त्री कही, ते थाम -या स्त्री अमादी विनृते, ए जे स्त्री प्रथम शफार धारेते, अर्थात् स्त्रीशब्दनी थाये शकार श्राव्याथीं शस्त्री थायने ते योग्य वे था ममा, प्रसिभ गगारग्स नथी, परतु स्त्रीनी निसना बारा वैराग्यांतर शृगारनी पण सूचना करीने ॥ २१ ॥ वसततिलकारत्नम् ॥ येय वधूरवसिता हृदये प्रमोदसपा दनव्यतिकरेकनिधन ते ॥ सा उगजुर्गतिपथेन जगन्नि नोपोधूरेव मन्मयरथस्य विनावनीया ॥ ३२॥ अर्थ - हे पुरुप, ताराहदयनेपिपे हर्पसमूह उत्पादन करवानु कारण जे वधू टम्ने स्त्री, यवसिता एटले थावीने रही, ते स्त्रीने तु जे हटयने हर्ष उत्पन्न नारी मानेने, ते या अत्यत उर्गम नरकना मार्गेकरी सेई जवाविपे छा क रा कामरथनीधू एटजे धुरी , एम तु जाण थर्थात् ए स्त्री नथी. फितु नरक मागारी ससारनेषिपे सजनारो जे कामरथ, तेनी धुरी ने था पद्यमा व कामरथनी धुरी ने, एम का, मृनमा व शब्दनु विशेषण अवसिता शब्दले, थर्य वारकरि मित एट ने रहित ययायी व शदनो धूशब्द थायने पोग्य या वृनमा, स्त्रीने हर्पमह उत्पादन करनारी, थने पुरुपना मननेपिपे रम करनारी रही, ए झूगार ग्म दे,थने ए व नयी पण कामदेवना रथनी धुरी एम जाणोन तु त्याग कर, ए वैराग्य रस . ३२ ॥ मढाकानात्तम् ।। प्रीति तन्वत्यनलसहगो यास्तरुएप स्तता देवाल्या कनकनिनया योतिताशा विवकिन् । अमन्य तामामनलसदशा सयमारामराज्या मानू पा पानोप्यमि यदि शिवावाप्तये वनुचि ॥ ३३ ॥ ना ममृहकारिक गन् पुम्प, जेनी अननमण्टने याजम्य रहित दृष्टि वे, अने
शृंगारवैराग्यतरंगिणी.
जेनी सुवर्णना जेवी शरीग्नी कांतीए दिशायो प्रकाशित करीते, एवी तरुण स्त्रीयो
तने दर्ष उत्पन्न करने. ते अनलता एटाने अग्निना जेवी बीयोनी सत्ता संयम
एटले चारित्ररूप वनपरंपगविपे ने, एम जाण. अर्थात् जेम अग्निसंपकरी वन द
ग्ध थायठे. तेमन्त्रीनंपकरी चारित्र दग्ध यायचे. जो मोक्ष्मातिनी बुद्धि तने
यो दोय तो बीधोनी नमीप पण जतो नही, या पद्यमा अनलसहा पद वे वार
याव्यांचे, तेनो धर्य नोखा नाखो ने.ए चमत्कार जाणवो.
था वृत्तमां, चंचलदृष्टिवाली स्त्रीना शरीरनो वर्ण मोना वो होय, तो पुरु
पना मनमा धनि यानंट उत्पन्न करेने. ए शृंगार रस वे; अने स्त्री अग्नि जेवी
वे. ने संयमादिक वनपरपराने बाजी जस्म करनारी ठे, माटे एनो तुं त्याग
कर, ए बैराग्य रस ते ॥ ३३ ॥
मालिनीवृत्तम ॥ क द विपयनोगं पुण्यकर्मायगून्यं स्पृढ्य
ति विपन्नोगं नावयेस्तत्वतस्त्वम्॥स्मरति न करणीयं मूर्वि
तो येन जंतुः पतति कुगतिगते नेहते मोदमार्गम् ॥ ३४ ॥
अर्थः-था संसाग्नेविपे कयौ पुरुप पुण्यकर्मनो आय एटले लान. एणेकरी
शून्य एटले रहित जे विषय नोग एटने पांच इंश्यना सुखनी हा करेगे, केमके
एजे विषयनोग ने, ते विपनोग एटले विपनरुण ने, जे विपयनोगना योगे
मोहन पामेलो प्राणी, स्मरण करवायोग्य ते करतो नयी, तेथी नरकरूप रखा
डामा पहेवे. ते फरी मोक्षमार्गने पामतो नथी, जेम विप खानारा पुरुपने स्म
गणादि रहेता नथी, तेम विषयोपलोग करनाराने पण स्मरणादिक रहेतां नथी.
श्रा पद्यमां विषय नोग जे ते विपनोग के, एम का,
थाम.-विषयोपनोगी
पदनु यगृन्यं ए विशेषण उ, एनो अर्थ यकारेकरी शून्य एटग्ने रहित थायठे;
एम यझाररहित जे विपयनोगते विपनांग के, ते योग्य ले.
या नमां, पाच विषयोनो तिरस्कार करो , तेयोनु मूल कारण वी विषय
सुम्ब गात्रोमा कयुठे, ते याश्लोकमा यद्यपि प्रगट का नथी तथापि अर्था
त् मिह वायवे, तेथी ए शृंगार गम ने धने विषयनोगन विपनांग कह्याने ए
उपजानिवृत्तम् ॥ सरखे सुखं वैपयिकं यदेतदानासते तन्नरको
नमंतः॥ सत्यं तसर्पदघप्रबंधनिबंधनवान्नरकांतमेव ॥ ३५ ॥
ते
वैराग्य रमले. ॥ ३४ ॥
एम २३६ शृगारवैराग्यतरगिणी थर्थ - हे सखा, था जे विषयसुख चे ते तारा अत करणमा कांत एटले म नोद लागेवे, ते सत्य ठे, मिय्या नथी, परतु विस्तारने पामनारी जे पाप परपरा, तेनुंए कारण ले. माटे जेनो श्रत नरक उ, एटले नरकने देनारा , जाण था पद्यमा प्रयमना नर कात ए वे शद निन्न , थने पाठाना नरकात ॥ पद एमरखा , एकायचमत्कार जाणयो श्रा वनमा, विषयसुस जे . ते पुरुपना मनने घणा सारा लागेने, एम का नेते शगार रस , अने ए विषयसुसथी पापपरपरा निस्तारने पामेछे, माटे त्या ग का योग्य वेगग्य रस वे ॥२५॥ गियरिणीरत्तम् ॥ स्मरक्रीडावाप्या वटनकमले पदमलशा दृढाड मनियंपाम परमपान विदयताम् ॥ अदूरस्था बंधव्यसनघटना शमदती विदग्माना तेपामिद मधुकराणामिव नृणाम् ॥ ३६॥ थर्य - रामनी कीडारुप जे वापी एटाने कुयो , तेनेपिप स्त्रीनाथधरोधरूप मधुपुषण पान करणारा जे पुरुष ने, जेयोनी स्त्रीना मुखकमानेचिपे दृढ श्रा माफिके. एग मोद पामनारा जे पुस्प ले, तेयोने या स्त्रीना मुस्ख कमानेविषे नमगनी पट गरी मह ए बपनाए व्यसन घटना पटने कप्टरचना समीप पनिनीचे जम मथुपान करनारा नमरायांनी कमनोनेपिपे ढाक्ति बंधने करी क एरेनारीवे. तेम याररमपान करनाग पुस्पाने स्वीना मुख कमजनेपिपे 28 जे थासनि ते प्रेमधने कष्ट देनारीले था ग्रनमा योनो अपगमृत नमरायानी पत्रे पुम्पाने श्रति प्रेम पन कर नागे ने, ए भूगार गम , श्रने तेथी ते नमरानी पते वपनने पामेवे, माटे त्याम कावा योग्य , ए वैराग्य ग्म ते ॥ ३६ ॥ गखे मनोपान पिर चपलतामुत्सृज निजा गमागमे काम पिर चय मचिं चिनरिण ॥ दरत्येता तृष्णा न युनिनितम्यलनु यो पिता नीगरिपमदारमपातविपमा ॥ ३१ ॥ वर्ष- ह मया, या चिन दागिणना जेगा नेमो,जमणि अतिययन रापले. तम दिन पण महायरन होपर्व, माटे मग अने चित्तनु मान्दपन्य । दुबे, दीपाननान त्याग स्रोनं मनाप ननु पान कर, अन यायत गम र स्ननी प्रीति का याने पुग्नी एट तरण प्रौद्यों न, तेयोना निविण्टने शृंगारवैराग्यतरंगिणी. जे हनी पाटननो नागवे, ते स्वजनूमिना जवा . त्या तारी वृपा मन्नार न ची. ए स्वजनृमि कवी . नीर एटले पाती वनं यग एटले वृद. एणेकरी रहि न. जज अथवा वृदनी वाचावडे नृपा निवारण चायने, ए वनमांना को ए स्वजमिन बि नयी. अन ए मिनेवि व्यायाविक उट पुत्र गण नावचे. वान्यारी चणा नंताय पामोन तास मरण यो: परा वृता मटवानी नवी. व लीन निनव भूमि कवी ? के रागहित पुत्साए जनो त्याग करावं. धने वि पनगर जे नामदेव. तंना वापना पानना योग बिहामणी. माटे युक्तीना निवनीचा नही कर. एवो दिन प्रत्य उपदेश. थानमां, बीना नितंब, वर्णन कने: ए शृंगारग्नवे: अनं ते त्यानृमि नी पते निन्य ब्रमन्न पीडा करने, ए बैंगन्यन्न के. ॥ ३ ॥ शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ चतन्यापलमाकलव्य कुटिलाका रां कुरंगीहशो दृष्ट्वा कुंतलराजिमंजनघनश्यामा किनुत्ता म्यसि ॥ धर्मध्यानमानिधानमधुना स्वीकतुकामस्य मे प्रत्यूहार्यमुपन्यितेयनुरगश्रेणीति संचिनयः ॥ ७ ॥ यर्थ:- द चिन. वृटिज एडन्ने वा धाकान्वाजा मंबना जंबा कालावधवा मजलना जेवा अत्यंत इगमवर्ग, जहरिणादीबीना कानी पन्ति. तेने जो मानान व्याकुल थाय? एबीना कंगनी पनि त धर्मनिरपम निगन बीमार नागे तुं ननं सांप्रन काजनेवि विन रवाना नपार यई 7. एबी उगति एटले नलिन एम जात. कोई कार्य करवानार नर्पदर्शन निनिनियान ग्रहना नमये ना अवंत अनिष्ट ने. मंट श्रीमपि नपिजिन दीन नही कर केक. एम काची थम निनाप निचानना हनमय नन विनाको नही. धावनमां. बीनाकानी पनि तपकिरी . अनेनी मान्नान में, बनी नया गाजतनी उपमा दीपति ए गंगाग्न अनंतनानी चिनी दादायी नवं लागावागमन ...! यातुं यधनुन्च्यने शिवपुरी गनानितंबन्यली नचनिमामनं गकलनक्रीडाविहारोचिनान् ॥ नोबोवनचंडवानविनतव्यामी हथलीकणमाम्यदृष्टिटिशाश्वतपत्रः प्रातीनि जन्माटमा - on .
२३७ शृगारवैराग्यतरंगिणी . अर्थ- हे पुस्प, जो तने मुक्तिरुप नगरी प्रत्ये जवानी अनिरुचि होय, तो तू कामरुप गजशिगुने क्रीडाने थर्थे, विहारविपे योग्य एवा था स्त्री नितंबरूप स्थली एटले नूमि, तेने तू दूर मूकीदे जो त् ए नूमिने मुफीश नही, तो यौवनरू प प्रबल पायुए कररी विस्तारने पामेला व्यामोहरूप रज कणो तारा नेत्रोमा पमशे तेथी मार्ग समनार नथी अर्थात् मोदमार्गमलनार नयी थाखोमा यूत गयायी मार्गने जोई शकातु नथी ए प्रसिद्ध , एम ससाररुप अरण्यमा व्रमण करीश या वृत्तमा, कामने हस्तिनाबालक जेयो कह्यो तेने क्रीडा करवाने स्त्री नितंब रूप टथवी ने, अर्थात् कामक्रीडानु स्थान जे स्त्रीना निनब कह्याने एशृगाररस दे, थने ए टथवीनेपिपे यौवनना योगे नेत्रोनेपिपे रज कणो पमयाथी मार्ग सूजतो नथी, अर्थात् स्त्री निनंबरूप मिनेविपे जे पुरुप यावी जायठे ते विषयरूप रज क करी हृदयाय थ जायवे माटे ए त्याग करवा योग्य वे ए वैराग्यरस ॥३॥ मालिनीरत्तम्॥शमधनमपहर्तु कामचौरप्रचार विरचयति निकाम कामिनी यामिनीयम ॥ सपदि विदधती या मोद निडासमुजजनयति जनमत सर्वचैतन्यशून्यम् ॥ ४० ॥ अर्थ -श्रा कामिनीरूप यामिनी एटले रात्रि, उपशमरूपधन हरण करवाने सारू कामरुप चोरनो अत्यत प्रचार प्रगट करेठे, तथा मोहरूप निशानी समृद्धि कर नारी जे ए रात्र, ते जन एटले मनुष्योने अत करणनेविपे सर्व चैतन्य थकी रहित करेठे जेम रात्रिनेविष सर्व मनुष्य निश्ति उता इव्य हरण करवातारू चार फिरे ने तेनी पते जाणी सेवु था उत्तमा, स्त्रीने मोह उत्पन्न करनारी रात्रि कही, ने कामने चोर कह्योने, श्रर्थात् स्त्री कामोत्पत्ति करनारी , एशृगाररस , श्रने एरात्रिनेविपे मनुष्य चम ण करे तो कामरूप चौरना सपाटामा थाची पोतानी सपत्ति तथा प्राण प्रमुख 'सर खो दियेठे, माटे एनो त्याग करयो योग्य ते ए वैराग्य रस ॥४०॥ नुपजातिवृत्तम् ॥ मृगेक्षणा नूनमसावमीमा नीमाटवी बुद्धिमतामती त्या॥ यद्दाहुवल्लीनिरनगनिल्ली वध्वा नरान् जनयते न मुक्तिम् ॥४॥ थर्थ- बुद्धिमान पुस्पोने अतिक्रमण करया योग्य नथी, जेने मर्यादा नथी, जेना मगना जैग नेत्र , एवी था स्त्री ते नपार वन ने, जेनी वाटुलताए करी, .
शृंगारवेराग्यतरंगिणी. २३ए कामरूप नीत. मनुष्योने बांधिने फरी बोडी मूकतो नथी, अर्थात् वांधेलोने वधिलो ज रहेवा दियेने. जेम अगम्यमा मार्ग चालनारा लोकोने चोर. वेनिवडे वांविन तेश्रोनुं सर्वस्व हरण करी लीयेते. तेमज मृगेणा स्त्री पोतानी वादुलताए कंचने विषे बंधन कग्या पठी पुरुपने मूकती नयी या वृत्तमां. स्त्रीने मर्यादारहित कही. तेथी हावनाव सूचव्या ठे, स्त्रीने वनरूप कही ने तेनी नुजाने लतारूप कही, एमां कोई पुरुप सपडाय तो फसी पडेठे, य र्यात् स्त्रीए जुजावडे श्रालिंगन कयुंठतां तेथी पुरुप लूटी गकतो नथी, ए शृंगार रस .अने ए वनमां कामरुप चोरटा बोते ते मोदमार्गे जनारा पुरुपर्नु धर्म धन प्रमुख हरण करी लेनार ठे,माटे त्याग करवा योग्य ठे, ए वैराग्य रस ते. ॥४१॥ शिखरिणीरत्नम् ॥ऽयं वारं वारं द्युतितुलितरोलंबवलयं न वक्र भ्रूचक्र चलयति मृगाही मम पुरः ॥ कुधीकारागारापसरणमति मां स्वलयितुं प्रपंचपंचेपोर्वदति निवडं लोनिगडम् ॥ ४ ॥ अर्थ.- या मृगलोचना जे स्त्री ते. तेनु जे वांकुं कुटिचक्र ठे, ते नमरायोना जवं कातिवाद्यं त मारी सावे वारवार चचल करेठे, एम नथी, पण नरगी बु विरूप कागग्रहथी दृर नागी जवानी हावालो जे दुं बुं, तेमने नागी जवा न देता कामना प्रपंच युक्त सह जे लोखमनी बेडी धारण करेली ते. अर्थात् जेम चोरने वो नावीने बंटीखानामां नाखेने, तमज मने पण वश करवा सारु या स्त्री नृकुटी चक्रप कामदेवनी लोखमनी वेडी धारण करेठे. या वृत्तमा, स्त्रीने नुकुटिचक्र एवं ने के जे पुरुप तेना फासामां थावे ते फरी नृटीशकतो नयाँ, अर्थात् अति मोह उत्पन्न करनारुं बे; ए शृंगार रस वे; अन स्वी, त्रुटिचक्र काम देवनी लोहनी वेमी ने, माटे तेनो त्याग करवो जोये ए वैराग्य रस . ॥ ४ ॥ मंदाक्रांता वृत्तम् ॥ यामोन्यत्रततरमितो मित्र यत्कंठपीठे नायं द्वारश्चकितहरिणीलोचनाया चकास्ति ॥ नानीरंध्रे विदितवसति योस्ति कंदर्पसर्पस्तन्मुक्तोयं स्फुरति रुचिरः कितु निर्मोकपः॥४॥ यर्थ -हे मित्र, या पापणे स्थानकने मूकीने जलटीबीजे ठेकाणे जर्बु जोये के मके तृषावान थएनी हरिणीना नेत्रना जेवी जेना नेत्र ठे, एवी स्वीयोना कंतमा जे , २४० शृगारवैराग्यतरंगिणी था हार गोने से, ते दार नथी, किंतु नानिरूप रमनेविपे रहेनारो जे कामरूप स प, तेणे मूकेजु था मनोहर निर्माकपट्ट एटले क्चुक दीठामा थावे, तेज था काणु मूकीने बीजे काणे नानी जवानी सूचना करते सर्पनु कचुक नयनो हेतु ने माटे नानीरूप जे कामरूप सर्पने रहेवानु राफ, थने था दाररुप सर्पनु कबुक , एम जाणीने नाशी जवु योग्य था वृत्तमा, स्त्रीयोना कठना हारनी शोना कहीने, तथा नानिनु वर्णन करेलु वे, ए शृगाररस , अने ए बन्ने उखना साधन होवाथी त्याग करना योग्य ठे ए वैराग्यरस वे ॥१३॥ वमततिलका उत्तम् ॥य कामकामलविलुप्तविवेकचतु स्वर्गापवर्गपुरमार्गमवीदयमाण ॥ कानाजन प्रति निरा दरतामुपेति भ्रात: पतिप्यति स नीमनवाधुकूपे ॥४॥ थर्थ- जे पुरुपना विवेकरुप चक्षु कामरुप कामल एटले नेत्र रोगेकरी ग्रस्त ठे, ते मर्ग थने थपवर्ग एटले मोदरूप नगरनो मार्ग जोई शकतो नथी, एमता जे पुस्ष ज्ञानर प थजननो श्रादर करतो नयी ते पुरुप नयफर ससाररुप धक्कू पमा पढेवे, जेम कमनाना रोगेकरीने जेना नेत्रो ग्रस्त थयला होय, ते जो था, सोनेपिप यजन नासपानो यनादर करे तो श्रध पमा पडी जाय, तेम ज्ञानां जननी जे निगदर करेले, ते था ससाररुप धापना कृपामा पडेने था उनमा, कामने नेत्र रोगना कह्योने, एटले जने कामतो प्रमुग्प में गंग यायचे ते काई जाई गस्तो नयी तेम कामरुप नेत्र रोगना योगे पुरुष निन थायने, जी कामनी महिमा ने, ते शृगाररस ले थने कामार पुरुष था ससारापथारता कृपामा पहने,माटे त्याग करवायोग्य , वराग्यरन वे ॥४॥ शिखरिणी उत्तम् ॥ नवारण्य मुक्ता यदि जिगमिपुर्मुक्तिनगरी त दानी माकापापियविपटकैप वसतिम् ।। यतश्गयाप्येपा प्रथय ति मदामोद्मचिराटय जतर्यम्मात्पदमपिन गतु प्रनवति ॥३॥ वर्ष- पुम्प, जो तु नगटनीने मूकीने मुनि नगरीवते जापानी याक रनो दो, नो पियरूप दिनरिपे यसति नहीका केमो, था पृष्टनी वा पा पण महामोहना रिम्नाग्ने पमाडेने एपियटनी नापाना स्पर्श पण मा
विरचिना सुरवबोधिकारख्या श्लेषाघउत्तरतरंगिणिकासुशावे ।। १ ।।थागारानानि
शृंगारवेराग्यतरंगिणी.
४२
ह कारक ते. ए कारण माटे या प्राणी एक पगढुंपण चालवाने समर्थ थतो नथी.
जेम वनने चिपे विपक्षनी नीचे बैठेलो पुरुष, मत्त थयेलो होय, ते वखते ते
वन मृकीने नगरमा जवानी ना करे तो एक पगलुं. पण नाखी शकातुं नथी. मा
टं मोहनी ना करनारा पुरुपे विषयसेवन करवानी वृद्धि करवी नही.
था वृत्तमां. विषयना सेवन थकी पुरुप कामांध थर्ड जाय , एम कझुंचे ते शृं
गाररस थने ते सर्वथा त्याग करवा योग्य वे एम कयुं ते वैराग्यरस .
उपजातियत्तम्।।सोमप्रनाचार्यमना च यन्न पुंसां तमःपंकमपाकरोति॥
तदप्यमुष्मिन्नुपदेशलेशे निशम्यमानेऽनिशमेति नाशम् ॥ ४६॥
इति श्रीशतार्यत्तिकारश्रीसोमप्रन्नाचार्यविरचिता
शंगारवैराग्यतरंगिणी समाप्ता.
अर्थ:-सोमप्रना एटलेचकांति. अने यर्यमना एटले सूर्यकांति जे मनुष्यो
नो तम पंक एटले थानाधकारसमूह दूर करता नथी, ते पण आ अल्प उप
रश श्रवण करयो ठतां नागने पामे, थर्थात् चंकांति तथा सूर्यकांति यज्ञानरु
प अंधकारनो नाश करवाने समर्थ थती नथी, यने या उपदेश यंतरनो अंधका
र मटाढवाने समर्थ . एथी श्रा उपदेश यति उलट . श्रा पद्यमां ग्रंथकनी
ए पोना सोमप्रनाचार्य एवं नाम चातुर्ये करी गोपन करेलुंते, ते छातायोए
था ग्रंय नाम ग्रंथकर्ताए शृंगारवराग्यतरंगिणी रारब्युंजे, एनोर्थ शृंगार अने
बंगग्याप तरंगोवाली थाने नदीमा बन्ने प्रकार नंदलाल नामना टी
काकाए स्पष्टीते दर्शाव्या , तेनोज नाव लाने या अमे अर्थ कयो . ग्रंथ
ना अंतमा टीकाकर्ताए त्रण श्लोक राख्या ते याप्रमाणे-
संवत्सरदिपमुनामितस्य मासे मार्ग त्रयोदशमिते दिवसे नृगोच। स्वल्पा तरी
नगरे नंदलालेन RTI टान विशालशिष्यानुरोधेन रुपया गुरोः ॥२॥ युग्मम् ॥
सोमप्रनाचार्यकति मुर्गमा विवता वल्पधिया मयाऽत्र यत् ।। न्यूनाधिकोटकन
मल्पबुद्धितः कनं विशोध्यं कृतिनिः रुपालुनिः ।। ३ ।।
इति श्रीशंगारवैगम्यतरगिणीनापांतरं समाप्तं
SAREERSad
जाणी सेबु.॥४६॥
२४३ स्तोत्र " ॥अथ श्रीचीरस्तवनप्रारना॥ । T . 'स्व श्रेयससरसीरुह, सूर श्रीवार पिचर सेव ॥ सविशेषहर्परसवश, सुरासुर व्यूहसेव्याऽन्हि ॥१॥ अश्वोचसीयससर ,शोपसहस्रागुराश्रय सहसा । ससार सालसा वो, नूयालयशो वशी वीर ॥२॥ पियाशीविपवीश्वर, हिसारस सरसवा रिसहशिशिर ॥ विश्वम्य रोपशावर, सहाररवे शिवाय स्या ॥३॥ थाशसव शि वश्री,विलासलीला विहाय सुरयोषा ॥ य शिश्रियु स्वरीशा श्रीवीर श्रेयसेऽसी व ॥ ४ ॥ हरहासहसशशिहा,रहारियशसो शिवपिसश्रययो ॥ईहे वरिवस्याय, वीरेशस्यान्हिसारसयो ॥ ५॥ शीलसरोवरलहरी, विहारशिशिरा यसवरीयो व ॥ चौरम्य व्याहारा, व्हियासुरशरीरशौर्यहरा ॥ ६ ॥ उरुसशयशैलस्वरु, ररिहा वीराव्द यो वरपास ॥श्रवसेयात्रीत्य वा, वर्पारुहवारिवाहरव ॥ ॥ सरलाशया सुशी ला, रिरसव श्रायसधिया सह ये ॥येपा श्रीवीरेश्वर,सेवारस एव हाय ।। ॥वीर शिवालयसरसी, वरलावर सर्वविपयविनाम्यासवरसारसवासर, सर्वेषां लोलवीयर ५॥ ॥ शीलश्रियो विवाहावसरे विश्वाश्रयो रसावलये ॥ यावर्ष यमुपर्षी, दि शा विशालरयरासी ॥ १० ॥ श्राशसे सहसाह, वासवसेवाह शिवरसाल हरे॥ रु हविश्रसावसाय, व्यवसायायासविरहवर ॥ ११ ॥ श्रहरुपयोविंशरारु,श्रीसर्वस्व हि शशिसरोरुहयो ॥ अशरारुस्वास्यश्री, लाम्यविलासविलोलयसि ॥ १२ ॥ ससा रसजिलराशे, गोपे शपिराशेयर वीर ॥ सर्वाशालासिपशो राशिरहिसारह शा ला ॥ १३ ॥ उरसिशयालु श्रेय ,श्रिया असवरसरोरुहशशीव ॥ रायालयं शि वावह, रसाविहार स्वसेवाया ॥ १४ ॥ सदानिक ॥ अविषह्मशिर शूल, विश्व निहो विषयवैरिवारस्य ॥ व्याहरसि परहस्य, शस्याय शरीरिरिसराय ।। १५॥ शैश शरोविलोलसेव्यान्हे ॥ सहरसि हेलाह , सिहश्व वशेश्वर पशुशिशिरलेश्य,रायव्यवहारलालसररुपै ॥ सत्रीयसेक ॥ १७ ॥ उमासय स्वसेवारसशीले विशि शिवावली वी ल, सहरीसहारसुशिरीर ॥ १७॥ श्रवसी यशयसि सोब, शा॥ ये सह रसालयाऽहा,सि हारहूरारसानरस ! पार्यवीर्यशाजी य सवरवैरियश शशि, रादुरशेषश्रियाँ सूरिवर,विहाय थाशारसाबिहारियशा ॥थहोऽसुरवश , स्तोत्र. २४३ हरि, सुरशैलशिल्लविद्यालोराः ॥ २१ ॥ शुश्रूषुशिप्यविसर,श्रव.सुहर्परसर्पिरा ३॥ अविलयवायैश्वर्य, श्रीयोपाश्लेषरसविवशः ॥२॥ सैपोऽसहायवीरः, शिवा रिवाराहवेवमुसहेषु ॥ विश्वस्य सुरोर्वीरुह. आयुष्यः श्रेयसां वीर. ॥ २३॥ संसारो रुविधालय, वारिविशोपविहव्यवाहो वः॥ अव्यानीताऽलससुर, विलयाहावाऽविपय शीतः ॥ २४ ॥ पंचनिः कुनकं ॥ यहियोऽलसस्य शिप्या.वयवलवस्याऽयविरह वि रमस्य ।। श्रीवीर वीरयरया लेण्या अश्रेयसीरस्य ॥ २५ ॥ यः पंचवर्गपरिहारमनो शमेतबेतश्चमत्कतिकरं गुणकीर्तनं ते ॥ जिव्हायवर्ति वितनोति विपक्षिताना श्री वोनाग्ययुजि न प्रनवति तस्मिन् ॥ २६ ॥ इति पंचवर्गपरिहारेण श्रीजिनप्रनसू रिक्तश्रीवीरस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीगौतमस्तवनं ॥ श्रीमंतं मगधेपु गावर इति ग्रामोनिरामोऽस्ति यस्तत्रोत्पन्नमसन्नचिनमनिशं श्री वीरसेवाविधी ॥ ज्योतिःसंश्रयगीतमान्वयवियत्प्रयोतनयोमणि तापोनीण सुन वर्णवपुरं नक्क्येऽनूति स्तुवे ॥ १ ॥ के नाम नानंगुरनाग्यसृष्टच दृष्टय सुगणा स्टहयंति संतः ॥ निमेप विनोभितमाननें उज्योत्स्ना मनोहत्य तवा पिवया ॥५॥ निर्जित्य नूनं निजरूपलदम्याट पीतः पंचशरस्त्वया स ॥ इत्थं न चेनदि पुतम्रिने धनत्रानलम् सहसा दाह ॥३॥ पीत्वा गिर ते गजितामृतेशा सुराचिरं चाग्नी अमिळ ॥ सुधान्हढे तत्र मुनीश मन्ये लक्ष्मछलात् शैवलमीयतेऽत || || सं नागपनंग्यापि समाधिदाने प्रत्येति लोक कथमेतटझः॥ यत्वा समगारविलम्भिर ताः समातिलिंगुः समकालमेव ॥ ५ ॥ त्वत्पादपीठे विलुवत्यमग्निरनन्या कटपरदा. ॥ तैरप्यमाहंत तवोपमानोपमेयनायः कथमन्त बम्ल ॥ ८ ॥ पदों नखाली तब रोहिणीयं मुटे न कम्यानतरुचरित्रा ॥ वदार पुमा चपनेत प्रविष्टधि गोपि शिवाय यस्या.॥ ॥ यत्केवलज्ञानमविद्यमानमान्मनि निदादा म्त्वं ॥ लोकोत्तरत्वे ननु तावकानां टिट्मात्रमेताग्तिा ताना ॥ ८ ॥ नमणानां नुतयो गुणज्ञविधीयमाना विधाधिपाय. ॥ स्तन्यनिग्नोर गाणार मार पत्करणीनवंति ॥ ए॥ न गंगवानी नजमेनियार नायगे बागान मदारित ॥ पुरस्कृते नोपि घनापनागी तथापि जीतनयोनिमा ॥१०॥नीमा मुपाम्य मम्यक् त्वयार्जिन यतालागरम्यं ॥ गरे पनि कोतिरतानि तेन ॥ ११ ॥ वाणिमार्गजिता पाय रिना बानटी गिर २४४ स्तोत्र. श ॥ तत्रापि नीतिं दधती शलाकाव्याजेन जग्राह तृण नु वक्रे॥१२॥ श्रीवीरसेका रसलालसत्वात् तदाधिनी केवलबोधजमीं ॥ श्रयायतामादरिणीं वरीतु तृणा य मत्वा त्वमिव खमस्या ॥ १३ ॥ श्रपोढपके करिनिनिपेव्ये निरस्ततापे बहु जगजाले ॥ विनो नवदाइमुखगांगपूरे पूर्वादिपूगास्तृणवत्तरति ॥ १४ ॥ राका मये दिग्यलये समतात् यश शशाकेन रुते व ते ॥ कुहूघनि केवलमेर क्वदेश पिकाना शरणीचकार || १७॥ जगत्रयोनासि यशस्तवेतत् क स्पर्मता साईमनेन च इ. ॥ यस्यापराईपि तृणस्य नव प्रनाप्रनावो लनतेऽवकाश ॥ १६॥ उपद्मादिषु रूढिमात्र खन्नानि तु श्रीर्वसतीति मुष्टि ॥ कुतोन्यथा तापदीक्षितानां पुर पुरो नृत्य ति नित्यमृद्धि ॥ १७ ॥ वसुनूतिसुतोपि कोतुक वसुनूतेजनक प्रणेमुपा ॥ जगव ननगोपि वर्तसे कथमगीरुतसर्वमगल ॥ १७ ॥ नाथ करोपितृपमीश गणाधिपोषि | धत्से सदास यमपाशमपि प्रचेता ॥श्रीदोपि सूत्रितयमालयवासके निस्त्व पावकोपि दरसे हरहेतिपाते ॥ १५ ॥ यत्तपत्यपिकली जिनमनाचार्यमत्रमनुशीजता स्फुरेत् ॥ हेतुताऽत्र खलु तत्वदेकताध्यानपारमितयैव गृह्यते॥२०॥ मयैव इदैव शमयितुमल नूममहिमा सुतस्त्व शेन श्रुतरथधुरा गौतमगुरो॥ कुरुद्योत तीवदिनपतिसुधा गीत मसिमे प्रनो विद्यामत्र मनव नवतो गौतम नम ॥१॥इति श्रीगौतमस्तवन समाप्तम् ।। ॥ अथ नेमिस्तवन क्रियागुप्त ॥ । श्रीहरिकुलहीराकर, वजमणिर्वचपाणिना प्रणत ॥ त्वमवद्यमुक्त नेमे, प्रणमुपी शेमुपीमशुना ॥ १ ॥ थवद्य ॥ मयि प्रसादप्रवण रुपानिधे विधेहि शैवेय निज मनस्त था॥ यथा जगन्नाथ मधुवत व्रतं नवे नवे तारकपादपद्मयो ॥शान।नयेन नेमे या वशमौक्तिक श्रियानिवासस्तव पादपकज ॥ 5 खोर्मिसघट्टविघट्टितात्मना तेनाति गनीरतमे नवावुधौ ॥ ३ ॥ श्राति ॥ ऽनयार्णवमहातरीनिना स्यात्पदोपहितवस्तु विस्तरा ॥ पातकानि नवदीरितागिराऽजतु जातशिवदानलालसा ॥४॥ थजतु ।। खन्नखश्रेणिमपूखलेखा निर्वासिताशावलयाकार || थवार्यसौदर्यविलास गेऽई सवांघ्रियुग्म शरण प्रपद्ये ॥ ५॥ गे॥यस्त्वया रुजुपथ सता मतो देवखडितकुतीर्थ करर्ग ॥ त प्रपद्य निरवद्यमुद्यता नेदयति ननु मुनिपुरी झाक् ॥ ६ ॥ कदे ॥वरिवस्या विगै यस्तै सहिषेकरिनारुत ॥ तम्यानिमुखमीदते न जातु सुखसपद जाथसत् ॥ कर्मफदायजीपावक तावक नयाहरूतित्रासन शासन ॥ ये प्रपन्ना गुणस्नेहिनो देहिनम्ते सुराराध्यउ खानि मुश्रियां ॥ ८ ॥ थसु ॥ विनवराज्यकलासुररा जतावरमणीरमणीनिरल मम ॥ हृदि पदापुरुहस्मरण चते गिरि च तथ्यगुणस्तर परमंजिनेश्वर ॥ १ ॥ त्रैलोक्यनेतस्तव उर्नयालीनिर्नाशनं शासनमाश्रितो यः॥ त स्तोत्र. श्य नं तवः ॥ ए ॥ चते ॥ -जगऊनश्रवणपुटामृतहटां तमोपहां सुललितरा पपेशलां ॥ उदीरयन् गिरमिलदेशनावनावरा गतामयसुखसंपदा - सतां ॥ ॥ १० ॥ अराः ॥ नव्यान् नवन्रमणनीरुकचित्तवृत्तीन् सद्देशनानिरनितस्त्वमुरुप नाव ॥ दोषासमागमनिमीलितमजखंडमाश्वासयेन्न किमुरश्मिनिरंशुमाली ॥११॥ धाव. ॥ नूत्यानिनूतपुस्हूतपुरानिरामतां कुर्वति संततमहोत्सवनाजमुर्वरां ॥ स्वबंदनंदथुमयानि महामृतानि ते कल्याणकानि नुवनेश विनाव्य चेतसा ॥ १२॥ अयानि ॥ नास्त्वया ब्रमरविन्रमवर्णो हे मुनीं वपुपि प्रचरिमुः ॥ पापशात्रवनिव हणाल ध्यानसंततिरिवाश्रितमूर्तिः ॥ १३ ॥ कहे ॥ पुर्बोधं मे सपटि पटकीनूत वास्तोः पते सद्गश्रेणीकुवलयवनश्यामलनायकाय ॥ आकौमारानुवनजयिनि यस्य ते ब्रह्मवर्म स्वैः कादंन खलु मदनः स्पष्टमयदमीष्ट ॥१४॥ उय ॥ नानो उनिनादयादवकुलश्रीकंठपीतीबुन्न् मुक्ताहारमहारथं रतिपतिं निर्जित्य जैनाजिरे ॥ कीर्ति कैरवकोमलामधिगतं त्वामेव देव प्रचुं श्रीमन्नेमिजिनेचं शरणं नीरुन वारातितः ॥ १५ ॥ एमि ॥ सेवाहेवाकिनः स्युस्तव पटयुगले येऽत्र जतिप्रयुक्तास्ते पां देवाः सदा पिप्रति हतविपदः संपदः सुप्रसन्नाः ॥ चितारत्नं प्रयत्नात् करतलकलि में कुर्वतां सर्वकालं कालं नेतर्नराणामटति सुघटतां नो मनोराज्यसिदिः॥ १६ ॥पि प्रति ॥ नवताऽऽरि जयोपुरैर्यशःप्रसरैः शुक्लतया जगत्रयं । जिनसिविरिति प्रसिधिना ९ सुखसाम्राज्यमयी महापुरी ॥ १७ ॥ थारि ॥ यवगवतरां स्वसेवकं मा नगवन् पांच शिवस्य वर्तिनी वं। करुणाईमनाः कुरु प्रसादं मयि तस्याः सपदि प्रकाश नेन ॥ १८ ॥ अव ॥ मरकतकमनीयकांतिकाय मनिनते किरीट्यहितान्हे ॥ चिरमिन मम चंचरीकचर्या हृदय कुशेशयकोशमन्वजस्त्रं ॥ १५ ॥ श्रय ॥ निखिलज मतां गोता गुप्तक्रियास्तवसूत्रणादिति कतनुतिः सानंदं श्रीजिनप्रनसरीनिः ॥ नव नवतां नेतुं नूयो नवज्रमसंनवं नयमनयदो नामः श्रीमठिवातनय प्रनु ॥२०॥ प्रति श्रीनेमिजिनस्तवनं क्रियागुप्तं समाप्तम् ।। ॥ अथ श्रीवईमानस्तवनप्रारंनः॥ सारिक्रमनिर्यटापगाधाराणुहविराटनवि ॥ छंदोनिर्विविधैरधोग्धीः स्तोप्येऽदं स्वेश्वजायुधमाविरस्ति कमशानदाविधान ॥ ॥ किमेकमाचर्यकरं न ते यत पुरुपयोप्येष विशेषविज्ञः ॥ त्यक्तोपजातित्रमणानिज़ापस्त्वदंगसोगंध्यमनुप्रयानि # ३ ॥ य. सृजत्यजर सौरनसारंबुजैस्तव पदांबुजपूजां ॥ प्रेय तम्य विवि टेवम् २४६ स्तोत्र गाक्ष्य स्वागतानि निगदति सराग || वाजिवारणरथोपतानटेरुजटा सुनम जोगनगिनृत् ॥ राज्यशक्षिरुपनन्नमीति ते नंनमोति'तव य पदी मुदा ॥ ५॥ ना किनिकायकरप्रहताना सप्रसरन् गगने मरुजानां ।। जन्ममहे तव कस्य न जज्ञे दत्तमदो धकधोकतिनाद ॥ ६ ॥ ये नत्याननमरविलासिता जा पादांबुरुहि तव विनो॥ ते श्रेय श्रीर्मधुरमधुरसास्वादो सादात् समजनि तिनि ॥ ॥ तला तत्वारोपलोपप्रवीणों प्रव्हप्राणित्राणसस्थाधुरीणा ॥ थाझा धत्ते मौजिना जव्यज तुश्रेणिं अक्षाशालिनी तावकीनां ॥ ७ ॥ वसुधाम सुधामयवक्र विधो तव नापित माश्यिते नविय ॥ स सुखानि सुखानिरिवोद्यमपीन् विनते परितोऽटककीर्ति भर ॥ ॥ लंग्विणी कुडलबाजिगनेस्थला तारदारयुतियोतिवदस्तटा ।। राजि गखमलानामखडादरा पादपीठे खुदत्तावके पावके ॥ १० ॥ णादेव तेषां शिर श्रीनुजगप्रयातं विधि गुन कर्म पुसा ॥ नवन्नाममत्रस्य वर्णानुप्तर्वी रसज्ञायव तिमुरापादिता यै ॥११॥ दृतविलवितमध्यरवध्वनद् विविधतूर्यमनेकमणीम ।। कुसुमवर्ष चिर्त तव देशनावनितल कश्वत्य न मोदते ॥ १२॥ मुकुरोज्वले म एनृता हृदये प्रमितादापि बत वाक् नवत ॥ थनियत्तया प्रतिपफाल जिनध्य नित्तोऽर्थतश्च जगद→धिया ॥ १३ ॥ जगत्प्रनो जक्तिरानुदिजा दिजातिवशाद पहत्य रूल्यवित् ॥ नरेंड्वशस्थमचीकरचीपतिर्नवत हरिनगमेपिणा ॥१॥ वाचा ते निखिलनयाविरोधिनीना धिद्रुमदलने कुनारिकाणां ॥ माहात्म्य जुवनमन प्रदर्पिणीना निर्वक्तं कश्च यथावदस्तु शक ॥ १५ ॥ सिदार्थराजकुलनवनपारिजा त न चाम्यति क्क तव कीर्तिरपारिजात ॥ वर्णेन उग्धमधुरेण मतोजनागसिहो इता स्थिरतया सुमनोजनाऽग ॥ १६ ॥थति महति नवोर्मीमालिनीह चमतो जननमरणवीच्या घातदोदूयमाना ॥ कथमपि एथुपुल्या प्राणिन प्राप्नुवति प्रव हणमिव केचिहासन तावकीन ॥ १७ लिवणिमत्तर्जितस्मरपुरधिरूपदर्पा घटितक टादलदाशरविद्धकामिमर्मा॥ कनकमणीमयानर रश्मिरजितांगी व्यजयत वाणि नीन नयत समाधिमु ॥ १॥ प्रबोध नव्यानोरुहवनमधीशाधिगमयन् । रन् मोहध्वात परसमयतारा कवलयन् ॥ निविष्ट सिहासन्यतममलनामडला तो नवानानातिस्मोदय शिखरिणीय युतिपति ॥ १५ ॥ थमितदमितस्रोतो मा यत्तुरगमसगमत्रिदशहरणीनेत्रो नेत्रविनागविलोकित ॥ तव जिन मन शेके कर्तु मनागपि न साचलयितुमलं किं हेमादि युगातमहावता ॥ २०॥ दारिद्र्यापत्प रिजवजनुर्विवतामृत्यु खराता के के न त बलव देवसेवा प्रपन्ना ॥ किं स्याज्ञोग
स्तोत्र.
२४
मनमनपटोंगेत्रयम्योपयुनी मंदामांना जगनि जनता उसदेनामयेन ॥ २१ ॥ श
रहरिननिशाकरांगुनना जंत्रकीर्तिवटाधवलितनिखिजत्रिलोकीतनं अध्योपासते
॥ मग्नमविनमन्मगावीगडामणिज्योतिपामरुणितपदपीठभूमिनिरेप्यत्र विस्वां
मनी ॥ २२ ॥ विवाणी नग्यविक्रियां जयकरी धूतोलसवालोगई शब्दम
नीचकः प्रकटयन योयनीकादतः ॥ त्वमत्या नृतकोप्यवाप्य नृपतां मांसादरं
बर्थपन धनऽनेकपगजिदर्पदलने शार्दूलविक्रीडितं ॥ २३ ॥ विद्यामंत्रन कार्य सुर
तरुनिरनं विनन च मून पर्याप्तं राज्यलक्ष्म्या रुतममरतया ह्यास्तां सुवदना ॥ स्फ
जन्दका तु नक्तिरत्वयि मम मनसि ध्वम्ताखिलमला कंवल्यश्रीर्यया स्यात् करतलनिल
चा साऽन्हाय नगवन् ॥ २४ ॥ श्रीवारः सर्वदिकः कनकरुचितनूरोचिरुदीप्रदीपैमंग
व्य. मोस्तु दीपोत्सव व जगदानंदसंदर्नकंदः।। सक्ति नमनीयं मृविशदपदा स्रग्ध
गधीयमाना नव्यानां नय्यनृत्य नवतु नवतुदे नावनानावितानां ॥ २५ ॥ इति
श्रीमान स्तवनं समाप्तम् ।।
॥ अथ चतुर्विंशतिजिनस्तवनं ॥
कनक्कानिधनु शतपंचकोतितपांकितदेहमुपास्महे ॥ रतिपतेर्जयिनं प्रथ
में जिनं नृप वपन पजिन ॥ १ ॥ विरदलांन्ति वांवितदायक कमलुनन्त्रि
आसुग्नायक।। स्तुतिपर पुरुपो नवति दिता वजित राजितरा जितराग ते॥शातुरग
लाइनमनब मंजवत्यहन्दि जिन यत्र रसाददं ॥ हृदि दधे नणितीर्गुणनूरुहां
समाहिता महितामहि तावकी. ॥ ३ ॥ नवमहार्णवनिस्तरणेच्या त्वमनिनंदन
व निषेव्यमे ।। तनृतां कुगतेः स्मरनिग्रहप्रसनया सनया सनयात्मना ॥ ४ ॥
अहवनामितकामितपूरणे सुरतरोरुपमामतिगामुको ॥ तव विनो नजते नवतः
मावसुमते मुमते सुमतेर्दट ॥ ५ ॥ धरनृपात्मज पष्ट जिनेश्वर त्वयि कृतप्रण
- क्रियते पतिः ॥ रजसतः प्रथितार्थिदरिद तोपरमया रमया रमयान्वितः ॥६॥
सुपार्श्वजगत्रितयाऊनुः पवितकाशिपुरीकवीलण ॥ सुकृतिनः कृतिनचरितं वि
पनवतो नवतो नवतोटनं ॥ ४ ॥ कुनयकानननंजनकुंजराः शशिरुचे महसेन
प्रनो ॥ निखिलजीवनिकायहितोक्तिनिः शुनवदा नवदा नवदागमा. ॥ ७ ॥
पि विजित्य मनोनवमहान्मकरसंकमिपाध्वजमस्य यः ॥ स्तुतजनाः सविधि
नशां सुरम्तुतमसंतमस तमसंस्तुत ॥ ॥ ॥ दृढरथांगजशीतल शीतलद्युतिकलावि
सा सव नारती ॥ मनसि कस्य न हर्षसनायतां जिन ततान ततानततायिनी ॥१७॥
यति गंडकजनतनुजिन शशिमुखोपुलहक् दशमोत्तर | कनकदीतिरमर्पितहीर म्तबग्दो घरदो वरदोर्युग ॥ ११ ॥ शुनमयी वसुपूज्यसुत प्रनो भुवननेत्रमहो महि iकिता ॥ तव तनुर्वितनोतु सुग्न सतामरुचिर रुचिरं रुचिरजिता ॥ १२ ॥ सकळत बसगेसपिकासने रविरुचिर्विमल त्रिजगत्पते ॥ अपि शम नयते तव गीर्जिनामृत सा तरसा तरसा तृष ॥ १३ ॥ निजयशोनरनिन्दुतजान्हवीजजवलक्ष्मिकिर्तिरनं जित् ।। दिशतु व कुमतासुरनिग्रहे नृशमन शमनं शमनम्वर ॥ १४ ॥ नवन र धर्म पुनोतु यारुश्रुतिपथाऽतिथिता गमिता सती ॥ किमु करोति न पित्तरज' शर्म रमिता रसिता रमिताजुपा ॥ १५॥ जयति शांतिजिन स्म जगति या नटचमूर्यु ये मोहमहीपते ॥ रणकथामपि नक्तिनरेण ते ससहसा सहसा सहसाऽमुचत् १६॥रति कुथुजिनाधिपराज्यमाहिमवत स्त्वयि चकहताहित । त्रिदिवतोऽय का जनिदिनिनग्मा नरसानरसारकिरणानगदधीश सुदर्शन नूमिपान्वयपय ग्दिी निगामणे॥प्रणिदपऽतिपदो पिशवनता बनरतानरता नरतावकान् ॥१७॥ दि नरनिराममिजिनस्मरन्नपि हि मूर्तिमुपैति महत्फल | निशमयन् समताकर गाविता रिमुदिता मुदिता मुदितादर ॥रणा त्वमिन सुत्रत करपलांतनो जनरुचि पिरिनुपण ॥ शिवसुरवाय तप परशुछिताऽशुनानो नग्नो नवनोधियो॥२०॥ पनिगम तटावनिपतितस्माशर शरणाक्रियता त्वया ॥ गुणगणस्य नमिर्बुधव प्रजनना जननाजन नापनर ॥ २१ ॥ श्रनुमित राज नेमिपिनानानमणतो अपरा यदि यभिर ॥ महितपादनगन् नात रूपानमनमानरमा बनमानिना ॥ २२ ॥ मनशामन पायगिरकरे रमतएर मन प्रियधर्मणां ॥ अपि कुतीर्पन न घुगन्मना तर मतेचमतेचमतेजस ॥ २३॥ त्रिजगदीक्षण केसरियाक्षण र मपि अउरीर मनागिरी । गुणगणान् मम माम्म रिज्यतामुदायिता दयितादपि तावरान् ॥ २५ ॥ च्युतिजनुनंत विननितिक्षणदिनाददता मुदमाता ॥ व्यरधि परमपविदरोगा नरसा वसुगा बसुगमनि ॥ २५ ॥ इति जिनप्रनगोमयकाउनि मकमगर्नमारयवना ॥ बजममी पितानु युनिस्यता शुनाता जरा नंगता निमित् ॥ २६॥ मप्रदेशमा प्रसदिताऽपिजतमस्कतया तपनोपमा ॥ ददतु तीर्थ स्तो मम निर्ममा शमग्मा मग्माऽमम्मानिता ॥२७॥ जपति नयनिनीवने हिमननिर्मनिरपरामुमयितु निमिगणिजने महारजिननाजिन 'नाजिननार ती॥२॥कारनाम्रफता टणती निनमनातीमिनारिमधिनिता ॥ जानु हेमर चि सुटमा सुपथुपरम परम परमविश ॥ऽनि चनुगिनिजिनम्नान समानी।
नमुरुयतस्तथा तथा यो उरचेष्टत त्वयि ॥ वहिः रुतः स्वर्गिसमाजसंगमा पित्रोरनोचिति ते विनयेन धीमान् ॥ ११ ॥ व्याकुर्वतस्ते हरये यदागमं संगृह्य बु। च्या कतिचित् गिरां लवान् ॥ अध्यापको यष्टिधे तउच्चकैरै सुवि व्याकरणं प्र, |जितविग्रहं यत् त्वत्पादमूले चमरं निलीनं ॥ जनारिदंनोलियमः प्रचंडो नस्त्र | टुमायष्ट किमत्र चित्रं ॥ १४ ॥ न वाधितुं जातु दधुः समर्थतां मुनीश् धातोरि नान्ववर्तिषुः ।। समाधिरूढां प्ररुतार्थसंपदं तवोपसर्गा व्यशियंस्तु केवलं ॥१॥ न कौशिके रागमुपासनापरे करोपि रोपं स्मन चंगको शिके ॥ अहो उदासीनत, वैव निर्जिता चमूस्त्वया उविपहापि कर्मणां ॥ १६ ॥ निहितुगां सर। स्तोत्र. धए अथ श्रीमहावीरस्तवनप्रारंनः पराक्रमेणेव पराजितोऽयं सिंहः सिपेवे धृतलादंना ॥ सुखानि वः खानिरयंर माणां वैमातुरस्तीर्थकरः करोतु ॥ १ ॥ सप्ताश्वतेजा करसप्तकोचः कमैधसप्ता निरसप्तनीति ॥ प्रणीतवान् सप्तशती नयानां वीर. श्रिये व्यंजितसप्ततत्वः॥ ५ ॥ अमानत प्राणतकल्पपुप्योत्तरावमापाढवलपष्टयां ॥ देवाधिदेव विजदारदेवा नंदोदरेऽनर्विहितावतारः ॥ ३ ॥ इपस्य नंद्यादसिता त्रयोदशी यशोत्यहानंत तरमीगितस्ततः ॥ सुरेशसेनापतिदेशिताध्वना दात्रं कुलं यत्र पवित्रितं त्वया ॥ ४ ॥ प्रनूतनूतिद्युनवानुवा नवङनुर्महे नोऽजनि हेजिन ध्रुवम् ॥ लगत्रयीजंतु पु हर्षवर्पिणी निरुढ ढिर्मदनत्रयोदशी ॥ ५ ॥ त्वया स्वदेवद्युतिसंविनागसंनावि त हेम सुवर्णमासीत् ।। तारतु दीनं त्वदनुग्रहेण वर्णमित्यापटवर्णवादं ॥ ६ ॥ बाव्ये विबोधाय हरेः सुरादिः पादायनुन्नस्तव यच्चकंपे ॥ चित्रीयता त्वत्तरसा रसात मूर्धानमाधूनयतिस्म नूनं ॥ ७ ॥ वनूव नाग्यातिशयप्रनावात् गुरुस्तवापि त्रिजगं ॥ युक्त्यैव तं मेरुगिरेगरिष्टं सिद्धार्यमप्यार्यगणा गृणंति ॥ ॥ कयं गु शः प्राप्तयशःपताका नारीपु नास्तु त्रिशलाशलाका ॥ यत्कुतियुक्ती विमलः संर नो मौतिक्यनूस्त्वं गुणयुक्तिहृद्य. ॥ ॥ ॥ दिवि प्रवाई सुरमीश मुष्टियातेन यधाम नतामनेषीः ॥ गर्वाइिखर्वीकरणश्रमं तु चकर्ष तीर्येश्वर शैशवेन तत् ॥ १० ॥ मो हूँ गमी यः खलु तनवेपि गंतुं कथं सोहति लेखगाला ॥ ऽतीव शक्रोऽपजलाप पामगात् ॥ १२ ॥ यस्या न कस्योदितमुक्तिमार्गमार्गम्य कला दशमी शमीग ॥ प्रा ज्य प्रनो यत्र विसृज्य राज्यं श्रमण्यसाम्राज्यमुपायथास्त्वं ॥ १३ ॥ शिवालये प्रो अरोय.
३५० स्तोत्र त् ससगम म्यानकथ जनगम ॥ १७॥ एकाग्रपत्रिशतापसाने श्रीचौरती रेजुवातिकाया ॥ तचोदगात् केवताधिरस्ताऽपरापराधम्य गुची दशम्या ॥ १७॥ एकादमाईर्मनय कय मामितीय कोपात् त्वउपर्यशोक ॥ यदीहशत् पट् पदगर्नपुष्पव्याजस्फुरनारकहरुमहस्र ॥ १॥ सुविकीर्णास्तव देशनापना बनु प्रमूनप्रकग समतत ॥ नयश्लथीनूतफरात्परिच्युता शराधानगनटस्य काममा ॥ २० ॥ स्फुटीनान्माजकाशिकीमुग्वप्रशस्तरागस्तरसस्तवोचित ॥प्रविश्य वि प्य अरणाचनि धनिर्मदे न केपा रजयन् मृगानपि ॥ २१ ॥ स्थातु चतबामर पुग्मकतयात् त्वदीयदतद्युतिजान्हीजले ॥ ध्रुव त्वदास्यायुजवासिनारती पुग्ये उपेतां बजरसदपती ॥ २२ ॥ स्वयं हृतं याता शिगुले तयाचनाय स्फुटमे प मेस् ॥ सपसमागादिति तुगहेमसिहासने ते करवति तर्क ॥ २३ ॥ हतु कमो हतमपमेव तहेहि मेसरतमोपहत्व ॥ श्ती विज्ञापयितु सिपेरे नामडलक्षण धरी रपियां ॥ २४ ॥ दृगलगजन्मनिदे नवजी सुधासपीत्य त्रिजगनधि ।। नूनं नदन् मसदि देवदेवदियाइतो निराजुहार ॥ २५ ॥ मेद प्रमाणांतरद शिन सनमम्यते स नीर पुस । सितातपत्रत्रितयछलेन रत्नत्रय दर्शयतिस्म सा क्षात् ॥ २६ ॥ सुपर्वसचारितहेमपफजापदेशतक्रमणकणे कित ॥ गतस्टहस्या सिं गुणवंगवदा पदोस्तने ते निपयो नयानुन् ॥ २७ ॥ तोक्यसयुकनिरंकुरात्रि प्राकारमानयोटिनाग ॥ नरुत धन्या कतिनाम रक्षायत्रोपम त्यां सुमनोर्चनीय ॥ २८ ॥ बन्नानिहापंश्रियमित्योदय घेनो न यम्येन चमचकार ॥ स केजी नत्र नदा इन तम्य नटसम्यानननिर्जगया ॥ २० ॥ थनिद्यविद्यापदनदर्पणा गणा विपाग्ने पदमृनयन् शुन । निरन्तर विपदीमुमारि सतां मन स्वप्रथितेन गौ ग॥ ३० ॥ श्रगेषनागपरिणाममजुन विचित्रसदेहविपतिपक्षा॥ स्तुरे वन ने नयनिरिंगपना रियायि मवावरिया निधन ॥३॥तप्त्वा तप पष्टमपान्तन यनांशातिर गतिरदर्शगनी ॥ पापमापु पदमीग पापा पुपी दियुगात निरनारायः ॥ ३२ ॥ में यत्र युके मनि फगुनीपु जाने स्मगेनन्मृतापमानी नहिमपद्योनफर गुनी बर मयाणम्पया ने ॥ ३३ ॥ नानाधिपतेग्नतया नरत सानिगतंत्र नापि ॥ उदयायचिन पनापनादक्पागानपारिधि पा॥ ३४ ॥झानेदानप्रदीर नगग्न पदारदारश्रेणीग्नफिगटनिसरी मंत्रायमाहिये । मांहोंगॉपनिगर्वननिदि व्यायामपामश्रियामान जिनप्ति हमम्मिहिन श्रीगौर नुन्य नम ॥३५ तिम्नुनिषगयणे प्रिनगरचूडामणे प्रसीद whapatnam - बटाती।। त्वद्देशनावाग जयति त्रिलोकीलोकस्य कर्णामृतष्टितुल्या ॥ ६ ॥ रिपून् । वजित्यातरगानगाधवीण सत्झानरमा निवेदय ॥ करर्यकापीरिन मुक्तिपुर्या सा स्तोत्र. पर परमेयर म्यरमननिननं मयि ॥ नवन्मम नवेनवे नवउपासनावासना जिनप्रनवसं विद्रा बन्द गमेतावता 15 ८॥ इनि पंचकल्याणिकमयं श्रीमहावीरन्तवनं समाप्तम्।। ॥ अथ श्रीमंत्रस्तवनप्रारंनः॥ मश्रियं श्रीमदत. निहा- निक्षिपुरीपदं ॥ श्राचार्याः पंचधाऽऽचारं वाचका वाचनां वगं ॥ १ ॥ नायव मिहिनाहाय्य वितन्नु विवेकिनां ।। मंगलानां च सर्वेपा माय नवनि मंग ॥ ॥ यमित्यदरं माया वीजं च प्रणवादरं । एनं नानास्व पंच यं याति योगिन ॥ ३ ॥ हत्पद्मपोडशदलस्थापिन पोडशावर ॥ पर मेष्टिम्सुतेवींज ध्यायेदाद मुटा ॥ ४ ॥ मंत्राणामादिमं मंत्रं नत्रं विश्नोपनियते ॥ ये स्मति मर्द वेनं तनयंति जिनमनाः ॥ ५॥ इति श्रीजिनप्रनविरचितं मंत्रस्तवनं ॥ अथ श्रीवर्धमानस्तवनप्रारंनः ।। श्रीवईमानः सुखमयेऽस्त यश प्रतापरनिवईमानः ॥ सिहायिका रति यम्य तीर्थ विरोधनः संततमेव देवी ॥ १ ॥ जिनेंड नेश अपि तावकीनां स्तोतुं गुणान् शक्तिपम्तथापि ॥ नक्त्येरितस्तान् कतिचिन्नवीमि नाशः स्वमात्रां विविनक्ति वीर ॥ २॥ नया वनां नाथ कृतकमत्यरत्रांतमेकांतहितोपदेशः ॥ करैरिवोलद्युति ना तमिवान्त्वया नतानां नवनीनिंगति ॥ ३ ॥ प्रणीयतेऽस्मानुतरत्नचित्रः स में विमान विदशागमेन ॥ कल्याणकवलयं त्वटीयस्त्रिविष्टपान्यूनमनूनधि ॥४॥ नातमी नजतोऽनुजातु .खान्यन कानि च नापि ताप ॥पाणिस्थचिंतामणिमंग नाज का निईति पीडयितु शशाक ॥ ॥ सूर्यप्रना मोहतम समूहव्यापाटने मंशयव समातम्॥ बान्यमज्यानि सुम्योत्करण देवोमिपूर ॥७॥ निस्सेव पीयूपनुजा जनस्य मध्नाति मिथ्याल ॥ तव प्रना नेत्रपुटैनिपीता कृतस्थितिवमणि नि.कलंके ॥ ७॥ वृत्ताप्ट नद्यहरनाम'यस्तदंत्यवर्णाहितनामकेऽन्हि । इयं स्तुतिरिजिनस्य दृष्टा करोतु क माणमनुत्तरं व. ॥ ६ ॥ इति जिनप्रनसूरिकृत श्रीवईमानस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीपार्श्वस्तवनप्रारंजः॥ पा प्रतुं शश्वदकोपमान कोपमान नववन्हियांनी ॥ धाराधतां दत्तनिरतरा ॥ १ ॥ वीदे जगन्नेत्र महान पत्र महा स्य तवांद्रि निग्तरायं पदमाप्तमीडे ວີບ] स्तोत्र. युग्म ॥ पुण्य स एवाऽवसरोऽमराली सरो मरालीन निपेवते यत् ॥ २॥प्रणेमुर्ग पूर्णसमस्तकाम समस्तकाम सरुदप्यधीश ॥ जवतमानम्य विमानमाया विमानमा या प्रनयो नयति ॥ ३ ॥ नयाढयमुयजमनगमाल मनगमालदितसर्वनाव ।। कर्ना म धीमभिरमानि गात रमानिशात न वचस्त्वदीय ॥ ४ ॥ नित्य प्रमादेन विना शि ताम विनागितामगजमगनाजा ॥ त्वन्नाम धन्य स्मरतीश सार रतीशसारगमगे नाद ।। ५॥ नृत्योपि योत्राऽजिनप्रनावे जिनमनायैकरमस्त्वयि स्यात् ।। सरूपया नौग्गजाश्वसेने गजावसेनेश्वरतामुपति ॥ ६ ॥ नूयान्नमो नीजतमाऽलकाय तमाल कायमन तुन्यमेर ।। नयाचदन्य कतमोऽवितान तमोवितानछिरोऽर्फ एव ॥ ७॥ बस्तरुत्येपविरामवामे विराम वामेय मयि प्रसीदानव्यान स्तव पातु जिन मनोऽय निनननो य विदधे यती ॥ ७॥ इति जिनप्रनसूरिविरचितं श्रीपार्थस्तवन समाप्तम्।। ॥ अय श्रीपार्श्वनाथस्तवनप्रारन ॥ श्रीपार्भपादानतनागराज प्रोत्सर्पदेन कफनागराज ॥ सत्ता हताऽसत्परिणामराग वा सस्तुम स्वैगुणाऽमराग ॥१॥ ये मर्त्यदेवासुरमाननीप पश्पति ते श्रीन रमाननीय ॥ सवितोफीतिलकाऽमितानि सिध्यति तेपामिह कामितानि ॥ २॥ दृशो पदलानुसार नाशिश्रपने कमतानुसार ॥ कुतोऽन्यथा त्वन्नतिदीहितेषु स यभिपा प्रेम तदाश्तेषु॥ ३ ॥ ययति नयकदवकाना पेप्रकर्षानसबकानी । सेवति ये त्यां विधिवाननते निर्वाणसीरप्प बुधवक्षन ते ॥ ४ ॥रतेरदरुत्यपनायिका नि वैषु श्रिया ते सुग्नायिकानि ॥ नादोनि चेत परनावतीनमचिंत्यविस्तारि छ नापनीन ॥ ५ ॥ प्रनो तरातस्मरगजमाने नखांशुजानेन विराजमाने ॥ कर्मा जे लधि रमेनाचनीय स्तुमहे रसेन ॥ ६॥याकांदिता बटुधिय जनतानि गमाटरामहोदयपुरी ध्रुवतानिगमा ॥ यप्यन्वरश्रुतितप सपनाहते न पुसाss प्यते निन नव नवनाहतेन ॥ ७ ॥ऽन्य फणी सततश्रितपार्थनाऽथ स्त्रीयालय पनि यनर पावनाय ॥ तस्मै स्टदामनिनप्रनराय नय्या सन्नी विनति सुमन स मवापनमा ॥ ॥ इनि निनप्रनमूरिचिरचिन श्रीपार्थनाथस्तवन समातम ॥ ॥ अथ श्रीनटीश्वरकल्पप्रारन ॥ धाराध्य श्रीनिनाधीनान् मुगधीमार्चितझमान् ॥ कल्प नदीवर जीपम्याचइति भारन ॥ १॥ यनि नदीवरीनामाऽमोडीपो घुमनिन ॥ तपरिक्षपिता न दोधोनोपिना पुन ॥ २ ॥ एतजयविपने सदाशीतिमनुर्युता ॥ योजना ॥
जपतीच जयंती चापराजिता ॥ ४ ॥ प्रत्येक योजनं पंच पंचात्या परत्रच ॥ यो जनानां पंचशतिं यावदितारनांजि तु ॥ २५ ॥ लक्ष्योजनदीयांणि मदो पानानि तानि तु ॥ अशोकसप्तपटक चूत चपकतंज्ञया ॥ २६ ॥ मध्ये पुं फरिणीनां च स्फटिका. पत्यमूर्तयः ॥ लजामवोध्यानादिचिन्हा दृषिमुन्या स्तोत्र. ३५३ नां त्रिपष्टिश्च कोट्यः कोटीशतं तथा ॥ ३ ॥ असौ विविधविन्यासोद्यानवान् देव नोगनू. ॥ जिनें पूजासंसक्तसुरसंपातसुंदरः ॥ ४ ॥ अस्य मध्यप्रदेशे तु कमात् पूर्वानिदिनु च ॥ अंजनवर्णाश्चत्वारस्तिष्ठत्यंजनपर्वताः ॥ ५ ॥ दशयोजनसहस्रा तिरिक्तविस्तृतास्तले ॥ सहस्रयोजनाश्चाई कुश्मेरूट्याश्च ते ॥ ६ ॥ तत्र प्राक् देवरमणो नित्योद्योतच दक्षिणः ॥ स्वयंप्रन प्रतीच्यस्तु रमणीय उदस्थितः ॥७॥ गतयोजनायतानि तदर्थ विस्तृतानि च ॥ विसप्ततियोजनोच्चान्यर्हचैत्यानि तेषु च ॥ ॥ ७ ॥ पृथक् वाराणि चत्वार्युच्चानि पोडश योजनी ॥ प्रवेशे योजनान्यष्ट विस्ता रेप्यष्ट तेषु तु ॥ ए । तानि देवासुरनागसुपर्णानां दिवौकसां ॥ समाश्रयादेव तेपां नामनिर्विश्रुतानि च ॥ १० ॥ पोडशयोजनायामा स्तावन्मात्राश्च विस्तृती ॥ अष्ट योजनकोत्सधास्तन्मध्ये मणिपालिकाः ॥ ११ ॥ सर्वरत्नमया देवळंदकाः पीविकोप रि ॥ पीतिकान्योऽधिकायामोठ्यनाजस्तु तेषु च ॥ १५॥ रुपना वर्षमाना च त पा चंशननापि च ॥ वारिपेणाचेति नाना पर्यकासनसंस्थिता ॥ १३ ॥ रत्नमद्योयु ता स्वस्वपरिवारेण हारिणा ॥ शाश्वतार्हत्प्रतिमाः प्रत्येकमष्टोत्तरं शतं ॥ १४ ॥ ३वे नागनूतकुंडनृत् प्रतिमे पृथक् पृथक् ॥ प्रतिमानां दृष्टतस्तु उत्रनृत् प्रतिमकिका ॥ १५ ॥ तेषु यूपघटीटामवंटाष्टमंगलध्वजाः ॥ नतोरणचंगेर्यः पटलान्यास नानि च ॥ १६ ।। पोडश पूर्णकलशादीन्यलंकरणानि च ॥ सुवर्णरुचिररजो वायु कान्तत्र नूमयः ॥ १७ ॥ आयतनप्रमाणेन रुचिरा मुखमंडपा ॥ प्रेझार्थमंडपा थवाटिकामणिपीठिका. ॥ १७ ॥ रम्याश्च स्तूपप्रतिमाश्चत्यहदाश्च सुंदरा. ॥ इश्वजाः पुष्करिस्यो दिव्याः संति यथाक्रमं ॥ १५ ॥ प्रतिमाः पोमश चतुरिस्तू पेषु सर्वतः ॥ शनं चतुर्विशमेवं ता. साष्टशततद्युता ॥ २० ॥ प्रत्येकमंजनाझीणां कुकुटम् चतगृप्वपि ॥ गते लदे योजनानां निर्मल्यस्वमवारय ॥ २१ ॥ सहम योजनो देवा विष्कने लक्ष्योजना. ॥ पुष्करिण्यः सति तासां कमान्नामानि पी मग ॥ २१ ॥ नंदिपेणा चाप्यमोघा गोस्तूपाऽथ सुदर्शना ॥ तथा नंदोनगनंदास नहा नंदिवर्थना ॥ २३ ॥ ना विशाला कुमुदा पुडकिणिका तया॥ विजया व च ॥ १७ ॥ चतु पटिसहस्रोचाः सहस्त्रं चावगाहिन ॥ सहस्राणिशा धम्ताउपरिष्टाच पिस्तृता ॥ २७ ॥ अतरे पुष्करिणीनां दीदी रतिकराचली ॥ त तो नवतिक्षात्रिशदेते रतिकराचला ॥ २५ ॥ शैलेषु दधिमुखेषु तथा रतिकराशि पु॥ तवावतार्होत्यानि सत्यजनगिरिष्विव ॥ ३० ॥ चत्वारोहीपविदित तथा रतिकराचला ॥ दशयोजनसहलायामविष्कलगानिन ॥३१॥ योजनाना स हस्य तु यावत्यशोनिता ॥ सर्वरत्नमयादिव्या कन्नर्याकारधारिण ॥ ३२ ॥ त त्रयो रतिकराचलयोर्दक्षिणस्थयो ॥ शमस्येशानस्य पुनरुत्तरस्थितयो पृथक् ॥३३॥ श्रष्टाना महादेवीना राजधान्योऽष्टदित ता ॥ सदाबाधा लक्ष्माना जिना यतननृपिता ॥ ३४ ॥ सुजाता सामनसा चार्चिमालीच प्रनाकरा ।। पद्मा शिया तथा शुच्यजने नूतावतंसिका ॥ ३५ ॥ गोस्तूपासुदर्शने अप्यमलाप्सरसी तथा॥ रोहिणी नयमी चाथ रत्ना रत्नोचयापि च ॥ ३६॥ सर्वरत्नसचया च सुवसुर्वसुमित्रिका ॥ व सुनागादि च वसुधरानदोत्तरे थपि ॥ ३५ ॥ नदोत्तरकुरुर्देवकुरु कला ततो विच । सनराजी रामरामा रक्षिता प्राक् क्रमादमू ३७ ॥ सर्वपयस्तासु देवा कुर्व ते सपरिवदा ॥ चत्येप्वष्टाहिकापुण्यतिथिषु श्रीमदर्दतां ॥ ३९ ॥ प्राच्येऽजन गिरी नाक कुरुतेऽष्टाहिकोत्सव ॥ प्रतिमानां शाश्वतीनां चतुरेि जिनालाये ॥४०॥ तम्य चाचतुर्दिकस्थमहापापीवितर्दिषु ॥ स्फाटिकेपु दधिमुरवपरितेषु चतुर्वपि ॥ ३१ ॥ चत्येपत्यतिमानां शाश्वतीना ययाविधि ।। चत्वार शक्रदिग्पाला कुर्वते पाहिकोत्सा ॥४॥ईशानेश्स्वोत्तराहेऽजनाही विदधाति ॥ तलोकपाजास्तवापी दध्याम्यादिषु कुर्वते ॥ ३ ॥ चमरो दाक्षिणात्येऽजनाज्ञावुन्सव सृजेत् । तदाप्यत दधिमुग्वेषस्य दिग्पतय पुन ॥ ४ ॥ पश्चिमेऽजनशैलेतु वलीइ कुरुते मह । तर ग्पाजाग्नु तवाप्यतनाग्दपिमुखाशि ॥ ४५ ॥ वदीपदिनारब्धानुपवासान् कुदू तिया ॥ कुर्वन्नदोबगेपास्न्य आयमी त्रियमाश्रयेत् ॥ ४६॥ जत्या त्यानि यदा स्तत्स्तानम्तुतिपावनार ॥ नदीयमुपासीनोऽनुपर्वाहस्तरेतरां ॥ ४ ॥ प्राय ५ पांचा मथितैरेवापमाचित लोके ॥ श्रीनदीवरफटपो लिखित इति श्रीजिन प्रनाचार्य ॥ ४० ॥ इति श्रीजिनमनाचार्यविरचितनदीवरकटप समाप्त ॥ ॥ अथ श्रीशारदास्तवनप्रारज ॥ वाग्देरते ननिमता सारिजापवित्रासितविग्रहा मे ॥ बोध विशुद्ध नयती पिना कनापरिनामित रिग्रहा मे ॥१॥ मीणारजहसपत्रारूतस्मरेणानमा निहतु ॥ यत्रवीणा बजहमपत्रा सरमती नदपाहता ॥२॥ वाली विजे स्तोत्र. ຮູບປີ पोष्ट विनिश्कंदप्रनावदाता धनजितन्य ॥ स्वरेण जंत्री क्नुना स्वकीयपना रदाता पनजनन्य ॥ ३ ॥ मुकादमाजालसदीपयोगाऽनिगृज्वला नाति करे त्व दीये ॥ मुकाठमाला सनदापयोगा यां प्रेक्ष्य नेजे मुनयोपि हर्ष ॥ ४ ॥ ज्ञानं प्रदानु प्रचाणा ममातिाया खुनाना नवपातकानि ॥ त्वं नेमुपां नारति पुंडरीक गयाजुनानानवपानकानि ॥ ५॥ प्राढप्रनावा समापुस्तके न ध्याता सि येनांवि विरा जिदम्मा ॥ पटनाया समपुतिकन विद्या सुधापूरमट्टरमुःखा ॥ ६ ॥ तुभ्यं प्र म. क्रियने नयेन मरालयन प्रमटेन मातः॥ कीतिप्रतापी नुवि तम्य नम्रमरालयेन प्रमटेन मान. ॥ 3 ॥ च्याविदनमदं करोति वेलं यदीयोर्चति तेऽन्हियुग्मं ॥ रु च्या रविं दन्नमदं करोति त स्वन्य गोष्ठी विपां प्रविश्य ॥ ७ ॥ पादप्रसादानव रू पसंपत् लेखानिरामोदितमानवेश ॥ नवेन्नरः सूक्तिनिरंव चित्रोलेरखानिरासीदि नमानवेशः ॥ ॥ ॥ मितांगुफा ते नयनानिरामां मूर्ति समाराध्य नवेन्मनुष्यः ॥ मिनांद्युकांत नयनानिरामांधकारसूर्यः क्षितिपावतसः ॥ १० ॥ येन स्थित त्वामनु गर्वतीय -सनाजिता मानतमस्तकेन ॥ दिनां निर्दलित नरेंइसलाजितामानत मस्तकेन ॥ ११ ॥ सर्वज्ञ वनवरतामरसांकलीनामाली प्रती प्रणयमंथरया दृशै व ॥ सर्वश्व कवरतामरसांकलीना प्रीणातु विश्रुतयशाः श्रुतदेवता नः ॥ १२ ॥ जनम्ततिनिबिडनक्तिमत्वष्टक्तैर्गुफगिरामिति गिरामधिदेवता सा ॥ बालोऽनुकप्य : नि रोपयतु प्रसादस्मेरा दृशं मयि जिनप्रनस रिवा ॥ १३ ॥ इति श्रीजिनप्रनसूरि हत्तीगारदास्तवनं समातम् ॥ ॥अथ श्रीजिनसिंहसूरिस्तवनप्रारंनः ॥ अनुः प्रदद्यान्मुनिपदिपंक्ते गारिरागोपचिति सदानः ॥ समुहहन् श्रीजिनसिंह सग्निागारिरागोपचिति सदा न ॥ १ ॥ कल्याण गोत्रायितमोहरेणी चंमानिलेन स्थिरतागुणेन ॥ कल्याणगोत्रायि तमोहरेणीनत्य त्वयैवाईतशासनस्य ॥ ५॥ स्वा मिन् मनोन्वेति न ते मृगादी मनोजवानां चतुरगमानां ॥ बोधेन कार्न कुलं गजा नो मनोजवानां च तुरंगमानां ॥ ३ ॥ कंदर्पकांतारविनावसूनां प्राप्ते वयोशान्यम पिं तप श्रीः ॥ कंदर्पकांतारविनावसूनां निधिर्गुणानां वि यत्त्वमेव ॥ ॥ गहनांनोजवने गुणोघवकारविदं नविना कृतोद ॥ वदे त्वदीयं सकलोमुपस्य व कारविदं नविनारुतोदं ॥५॥ सर्व कपायानलमेघवारिमोहाय सूक्त शृणु त विजेतु ॥स व पायानसमेघवारिवृत्तं रमर श्रीजिनसिंहसूरेः॥ ५ ॥ मुदेन कम्यास्तु धुरि स्थि U६ ताते सरस्वती वशीकराणा ॥ माधुर्यशैत्यायिनी तरिनी सरसती तश्वशीक राणां ॥ ७॥ सदोदिताबोधमपूपा अप्यानदितावागमृतं अयोन्यां ।। सदोदिताबो धमपुरुषा थप्पुपाशमस्तेन मुनीपु तेषां ॥ ७॥ व्यामोहबाणासुरदर्पमाथ पद्मावरो दीगतमोषितान ॥ त्वमेधि सन्मत्रजपानिराम पनापरो दीर्णतमोगितान ॥४॥ योगेन धीरोचित माननीय श्रियस्तयोचे शशिनोपमान ॥ योगेनधीरोचित माननीय प्रख्यातमूर्ख तमुदाहाम ॥१०॥ स्मरायगाना हदि मेगिमर्माविधामरेशास्त्र निधेहि तानि ॥ तत्वानि सूरी मदान्दिनेदविधाऽमरेशाऽस्त्रनिधे हितानि ॥ ११ ॥ जिनन नाचार्यमनासमानावबोधमव्या कविमात्मशिष्य ॥ जिनप्रना चार्यमनासमाना प्र जो स्फुरत्वम्य ता प्रसादात् ॥ १२॥ श्रीमङिनेश्वरयतीश्वरपादपद्मगंगारनृगकरणि जिनसिहसरि ॥ अन्य नुतोस्तु यम शमरवरानदकदलनमुलतितो नताना ॥१॥इति श्रीजिनप्रनमृरिस्तयमकम्तयक्तिश्री जिनसिहसूरिस्तयन समात ॥ ॥ अन्य श्रीपचनमस्कृतिस्तवनप्रारनः ॥ प्रतिचिन तम पारे पारेवाग्यविनर ॥ प्रपंच वेदस पंच नमस्कारमनिष्टुम १॥ यही पंचनमस्कार कोप्युदारो जगत्सु य ॥ सपदोऽष्टी सप धत्ते बनेऽनता न ता सतां ॥ २॥ दनेऽनुकूलएान्यो सुकिमात्रमपि प्रनु । एप पच नमस्कार प्रा निजोम्यपि मुकिदः ॥ ३ ॥ नमस्कारनरेश्म्य किमपि प्रानव स्तुम ॥ यदीयफन्ततेना पिरिश्चनि विषाणात् ॥ ४ ॥ सिक्ष्योप्याणिमाद्याम्ता नमस्कारमधिष्ठिता ॥ यष्टारटपक्षान्मापि पदमा मणोऽपिशत् ॥ ५ ॥ शिर कादिपियापीर सांगदेशनि वैगिता ॥ नमस्तेनरपदी कटरे वसपजर ॥६॥ पाप्यतां श्रीनमस्कारान कार्मल मिनोरिव ॥ परमप्रयोगत पायपि सपनयेङगत् ॥ ॥ नमस्कार नुम सिक पत्पदस्पर्शपूतया ॥ पद्यामादितमांग मातिमामादयेऽऽवरी ॥ 7 ॥ नववर्णी नम सरन्या स्नी निपट जपन् ॥ धिने विविधानितरिनारयदनियद॥ ॥ ॥ कर्णित एनाइहपुग निवेदय य ॥ व्याये पचनमारममारंस तरेनरा ॥१०॥ कोटे पदेयम्य यांनानिग्य तारन ॥ कुडपादावर्चपन् सम्यगेति शांतर्निशांतता याचादगापपीटायमिध्ये म्य परमेशिनशिपुरप्यामृत किन नागविपति रियाn १ गडी पिन्यम्यादादीन् यानमानयन ॥ मन्दपनगव्यूहय्यपाहे बननेपनि ॥१३॥ गुरुन् पत्र कमात् ध्यापन मुश्या परमेटिनां । गृहमालमपिरात् कर्मपि विमोचपेत् ॥ १४॥ पांडसादरगान् अक्षापरम परमेष्ठिन ॥ प्राणीप्रति पवस्तुफलमेधते ॥ १५॥ विद्युङनामिनूपालव्यालचौरारिमारिज जयं वचयते पंच नमस्कारस्य संस्मरन् ॥ १६ ॥ आराध्य विधिवत्पंच नमस्कार दारधीः ॥ लहाजापेन पापेन मुक्तमाहत्यमश्नुते ऐहिकं फलमीप्सनामष्ट क्मप्रसाधिनी ॥ मुक्त्यर्थिनां च स्यादेपैवाटकर्मनिपेधिनी ॥ १७॥ विपदामनि चारन्योपादानस्याखिलत्रियां ॥ स्मर्ता नमस्कृतेः स्वर्गिवर्गेण वरिवस्यते ॥ १ ॥ बतुर्दशानां पूर्वाणामेथैवोपनिषत्परा ॥ आद्या सकलविद्यानां वीजानां प्रकृतिः पग ॥ ५० ॥ इयं पय्योदनं पथ्यं परलोकाध्वयायिनां ॥ परमास्त्रं नृणां मोहराज बुझाय सकतां ॥ २१ ॥ प्राणी प्राणप्रयाणस्य दणे ध्यायन्नमस्कियों ॥ जनते सु गति नेकान् पाप्मनः कृतपूर्व्यपि ॥ २२ ॥ नमस्कृति रूपावितैः श्रोत्रयोः प्रान्ती हतां ॥ स्वीकृत्य पुस्यसध्यंचस्तिर्यचोपि ययुर्दिवं ॥ २३ ॥ त्रिदंडिनं निगृह्याऽसिय टिना श्रेष्टिनंदन ॥ नमस्कारस्य महसाऽसाधय स्वर्णपूरुपं ॥ २४ ॥ स्मृत्वा पंच नमस्कार प्रविष्टायास्तमोगृहं ॥ घटन्यस्तो महासत्याः पन्नग. पुष्पमाल्यनूत् ॥२५॥ नमस्कारेण संवोध्य मातुलिगवनामरं ॥ प्राणत्राणं स्वपरयोwधत्त प्रारूपुगयः ॥ २७ ॥ यदता ढुंडिकः प्रापत् सुकुलं चंडपिंगलः । इतस्तादृक् गुणस्फीति सुदर्श सुदर्शने ॥ २७ ॥ एप माता पिता स्वामी गुरुनॆत्रं निपक सखा ॥ प्राणनाणं गतिपि शांति पुष्टिर्महन्महः ॥ २८ ॥ निधयः संनिधौ कामधेनुरप्यनुगामिका ॥ नन्तो नृतकास्तस्य यम्य नेप हृदो हिरुक् ॥णा नास्येयत्तां प्रनायाणा कमवर्ति तया गिरा ॥ मितायुष्ट्वाञ्च सर्वोपि न्यदेण नणितु छमः ॥ ३० ॥ सर्वावस्थोचिन सर्वश्रुतसार सनातन ॥ परमेष्टिमहामंत्रं नक्तितत्रमुपास्महे ॥ ३१ ॥ संयोजन सदमानविदितो विनत्सुवर्णात्मता नव्यानटननशालमहिमा गचिामवृत्ताधि ॥ अस्तु श्रीजिनगेहनास्वररुचिस्यानं लसन्निर्जर सोय वः परमेष्ठिपंचफनम कार. सुमेरु.श्रिये ॥३२॥ सानायावयवां जिनप्रनगुरुर्या सत्रयामासिवान टि पंचनमस्कृतिस्तुतिमिमामानंदनंदन्मना. ॥ यग्यपांचति पठसीमनि सदा मुना विन्रमं त मुंचल्यचिरेण विघ्ननिचयाः लिप्यंति च श्रीनरा ॥ २२ ॥ इति चनमस्रुतिस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीवीरस्तवनप्रारंभः ।। वर्षमान परिपूरितनमकाम चामीकरमन जिनप्रनसरित ॥ मोमध्यते न ऊनहर्पवर्षदीपोत्सवस्तवलव यमकायदान ॥ १ ॥ निता व माद JUG स्तोत्र H कल्पपाद पयोज ये ॥ करी तान् प्रति विश्वकल्पपादपयोजये ॥ ५ ॥क म्ते नति न सबोरमिधुरारातिजाणे ॥ रके च तुत्य चित्ताय सिधुरारातिलक्ष्मणे ॥ ३ ॥ हितेश देह दर्श वा शिवगकार्तिके विद ॥ नान्यतीया यत्र लुप्ता शिवशंका तिविद ॥ ४ ॥ स्टान्यपपर्णानामादान दीपालिका सता ॥ कोटि परां यत्र तेऽनू दानदो पालिका सता ॥ ५॥ कुदृशा शुश्रुषे तेऽत्यदेशनागितदर्पका ।। धन्यैरेवेश वैरा ग्यदेवगनागितदर्पका ॥ ६ ॥ त्वन्मुक्तयाऽसीत्तमो हतु तरसा दद पावनी॥पू पापा पापपद्माऽस्पेतग्मादपायनी॥ ॥ त्वत्सेवाया हपीफेनहान्निपाऽलम्यहीनता ।। रुन नाम तदा राझो दन्तिपालस्य हीनता ।। । दधानाऽधोरगेपूक्तस्वातिरेकाविराज ता॥रदेषु जात त्वन्मोको स्वातिरेका रािजता ।। ए ॥ त्वनिर्याणेन करण ना गमशमरजयत् ॥ एनामि नगरन् क ना नागसझमरजयत् ॥ १० ॥ मूर्वागत म्यपियार्यममता विषपानत ॥ नायोपचा कुर्यास्त्व मम ताविपपानत | RA ताम या पिधन्युर्च रमायाननसारस ॥ दृष्टिविंदति सोरस्य रमाया न न सारस ॥ १२ ॥ स्तूयासमन्यहमह नरत दृथिव्या सिदार्थनदनयशोनिमत समस्या ॥ निशानदनयनोनि मन समन्या सर्व भिया जिन निज हदि रोप्यता मे ॥१॥ इतिश्री निनमनमूरिविरचितश्रीपरम्तयन समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीआदिजिनादिस्तवनमारन । प्रणम्यादिजिन प्राणी मस्देयागजायते ॥ हरणे पापरेणूना मस्या ग जायते ॥ १ ॥ गामदारमानापमाननम्यप्रनारण ॥ मादयेणाजितम्बर माननम्य प्रनोरु ण ॥ २ ॥ मोहम्यानापनम्याण मनोग मिता रये ॥ यस्म धि नमश्चकेश जो गमिनारये ॥ ३ ॥ मुट ऽनिनदन मृतो गजसग्देदत ॥ यत्पादाजे ना नाब गजम याद बन ॥ ४ ॥ स्याना सुमते नीस्थ्य सा पसागदान ॥ ध्यापस्न्वा च मनीगग सा मागद रानन ॥ ५ ॥क पद्ममन शक्तीम्त प्रनार मिता हिना ॥ मम्मानुमीटे चप्रनारमिता हिता ॥ ६ ॥ मोहरान सुपात्र च नुनमायामनोनुप || ना तेऽत सोग्नु रिहानुनमायामानुप || || नर चश्मनोपनमहमे नकमेनन । न मेगापिरह सादु महगेनहमे नत ॥७॥ मपि विचननु चश्नापनानादया ॥ तन्याप सुपिय मानापनद प्रनो दया ife | शीननान प्रियोगाना गरि पमनामया ॥ न्वा प्रत्यान्मा स्तो नगरवि कपमना मया ॥10॥ वन्मने ग्मत श्रेयन समनायतनेत्र यासा धीत्रिया मेन नं कमनायननत्रया ॥ ॥ मामुपज्य मरिनाम्न बमामाययागन ॥
थए
इति श्रीयमकयुक्त यादिजिनाटिस्तवनं संपूर्णम् ॥
हितापन्नगां कमर्पकोविण ॥ १ ॥ कोनुरज्यति टेगनौकलि शगगोकतरणा वि
तिरस्कृती दयन्सारना. सुमनस. सदानवा ॥ देशना भुवि फिरंति ते स्फुरसारना.
स्तोत्र.
भरण न्वक्रमी विश्वबंधकामण्ययोगतः ॥ १२ ॥ श्रेयसः शरणं नव्य त्वं गन
मितते । टि देहि च ननयादिन्य गविमरुते ॥ १३ ॥ याख्यात स्त्रि
उगन्यार्य महानुननयोऽनिगं ॥ दंत्ववन्मोहमयी सदानुतनयोनिगं ॥ १ ॥
वपादानलिनी दाट मनं पटतां पदं ॥ मांते मोहं जिनं मन्ये दमलंपटतां
पदं ॥ १७ ॥ मुश्रीकथं प्रनिप्रदा यमलार्जन नंजना. ॥ यान्तावा गरोपयम
मार्जननंजनाः ॥ १८ ॥ सोर्ट समर्था नूयन्य नतमामवनिर्वलं ॥ गौरवमहब
कीनत मामय निर्वतं ॥ १ ॥ शक्ति नवाब्धत मतिमलीनदेहिनः ॥ पुण्य
धानने ननिर्मितिमाहीन देहिनः ॥ १८॥ यम्या विलासारखेलोक्य पद्मानंदनना
नव. ॥ मा तु नव्रत मा शक्या पद्मानंदनना न व॥१७॥ यत्र नाहित्यी ते वा न
म रुचिकोमला ॥ तत्र राजेप्यनीतानां नमेचिरकोमला ॥ ५० ॥ नेमे नमस्त
दोपडा रजनः प्रनविनवे ।। कर्मानुग्यथायोचरजनप्रनविनवे ॥ ११ ॥ तापानी
जुदुवे पार्थ नवता पंचनायक ॥ धितोऽतस्त्वं जनो मोहनवतापं च सायकः ॥
२२॥ नाऽन्यः कामसारख्याच लोकनेतरणीयसा ॥ तेन वीर जगत्कर्मालोकने त
रणीयसे ॥ ३३ ॥ तवाहन पंचकल्याणी दया लोकामदायिन ॥ पायास्त्रिजगते दत्तो
दयालो कामदायिन. ॥ २४ ॥ त्रातुं जीववीया. संविदा मानव तामिता ॥ जिन
शः पातु करणा ददा मानवतामिताः ॥ २५॥ यदाराध्यति गीर्वाणवजाऽनयदशा
मन ॥ तत प्रज्ञा शरणं नक्ता बजानवढगासनं ॥ २६ ॥ यस्या नेगजिरा जन्या सुत
गमवासना ॥ हंन्वापद. मुसंवन्यासुतरा मघवासना ॥२॥ लदम्यारुष्टिकरं जिने
मन नावलीमंदिर व तम्य गिर नतन्रमतमः सूर्य धियां कारणं ॥ सावीयप्रथित
मनावमखिलारिष्टोयहानिप्रद दंनव्यालमृणिं वरेण्यतमयं रंगजुएं बोधिदं ॥ ७ ॥
॥ अथ श्रीपार्श्वप्रातिदायस्तवनप्रारंन.॥
वां विनुन्य महिमश्रियामहं पन्नगांकमटपकोपिणं ॥ स्वां पुनामि किमपीनर
नागिने । नमचिनोजसागोकतरणाविनासिते ॥ २ ॥ देहदीविति
सुमनसः सदानवा. ॥ ॥ तादृशः श्रवणतन्तवोत्तमा कारकाय वरदेशनाध्यन ॥
मास्थितः कश्च पाप्मनां निराकारकायवरटेशनावने ॥ ४ ॥ नाकिनायकयुगेन सादर
चामविपदनाग याज्यसेवं न कनवसुखायमुक्तये चामविपटनागवीज्यस ॥ ७ ॥
श्रिया नपन्मुद २६० स्तोत्र नीदिनुनयनयोनिरारुता गसनासुरमणीपनावत ॥ थातनोति रुतसिहविष्टर गस जासुर मणीपनारत ॥ ६ ॥ इष्टरपंयति कीर्तिनिता शातनायजयमर्यमोहद ॥ दीप्यमानमनुमोजि तावक शातनावजयमर्यमोहद ॥ ७ ॥ व्योमि गजि निनद पु रम्तमान रिमुदिरो महर्षिनि ॥ कन निरव श्रुतस्तनी मानरिमुदि रोमहर्षि नि ॥ ७ ॥ अमुषीपु कुपयानि मौक्तिकन्यास हयरुचितानि चायितु ॥ त्रीणि ते जिन शितोनवारण न्यासहद्यरुचितानिचायितु ॥ ॥ प्रातिहार्यमहिमालयस्तर श्री जनप्रन पिति स्तुतो मया ॥ पार्श्वकामितफलाय कटपता क.पपादप भेष नेमुपा ॥ १० ॥ इति जिनप्रनसृरिस्तश्रीपार्थप्रातिदायस्तयन सपूर्णम् ॥ ॥ अन्य श्रीकल्याणपचकस्तवनप्रारन ॥ निनिपनीयापित नूतन नैरयिकानपि क्षण ॥ त्रिशोकलोसम्य गते प्रपचर जिने कयाणरुपचक स्तुम ॥१॥ निवेदित प्रीतिपर पुग्दरेश्चतुर्द समधिनापितोदय ॥ महानिधानागम चाररईतां तनोतु गीयतरोत्सव शिव ॥ २ ॥ उगमारीमतसृतिसम्झिय सुपर्वसपादितमानण ॥ सृजतमुद्योतम पं जगप्रय जनमह सम्तुमरे नगदह ॥३॥ सुरोपनीत परिवत्सर धनयथानिता प परितोरितायिने । निनाधिपानी निस्सिनागिरक्षिणे नमस्तपस्याप्रतिपनिपर्वणे ॥ ४ ॥ श्रम निर्मनितदेशनानीस्ताबुत फवजयनयोजन ॥थमदनादीरा स्तियर कगंतु जैन गुननाजन जन ॥ ५ ॥ पुरदरकदितसनमनमत्राधमालित गितमुनिराजन ॥ निम्य निर्माणदिन दिगतरम्फुरत्तम मनमशमणेऽस्तु न ॥६ महर्पयो गननामपियनाममुत्र स्याणापफेहतां । पिना विदेलान् दश कमेनू निपु म्मानि मामर्हनियीन मनातनान् ॥ ॥ न्याहतम्पिनुग्नप्रनुमक पंचक यात्रापदि यांविननि । शवाणित जिततगण्यपि मोगगज मानाग्य भाग्ययुनि न प्रनानि तम्मिन् ।। ७॥ नि श्रीरयाणपरम्तग्न समातम ॥ ॥ अय लढाणप्रयोगमयश्रीवीरमरनतारन । निम्नीनदिनीनगर कमाणितपर्णाद ।। सुपर्णमाहि दमे स पलं श्रीपर्णपिनुगम पीर ॥॥ याप्यता प्राप्यत तासरीन कमाउन नाय नागने । ममावानमणानिरम्य गणम्य त वाण ग्रणनि ॥२॥ तुयेनिने बामनवाना वनापरच्युतिमपुनियां ॥ प्राननिष्ट पदन बदीप मन्यामर बानपरिमिषु ॥ ३ ॥ हिंगाग्निन्दप्रणम्य माया गनिने कृतीयित प्प बंदतेर्वासवानयाधारः श्रीसंपदा संप्रदानं त्रैलोक्यस्य स्तोत्ररत्नोपदापाः ॥१॥ जते गुणधिनाजनतया मस्तदत्यनुवं ॥ १५॥ तात त्रातरिदं नपुंसकमपि सनि नाववशतः क्लैव्यं विधूय णात् तत्रोत्पादयिता ऽथ शाश्वतचिदानंदाव्हयं नंदनं र॥ इत्थंकारमिनारि सदनरः साबणप्रकियाचित्रं स्तोत्रमिदं विदंनादयो। बदायजायत्तमं ॥ कुर्वाणः स्मरवाकुंठनकलानिलाततानतको नाटपाचार्य विनयनें पदवीसाम्राज्यमासादयेत् ॥ १७ ॥ इति श्रीजिनमन विरचितलक्षण -॥ देवाधिदेवत्वमनिष्टुवंतमतुःकपापतये स्तोत्र. नां ॥ विनो बहुव्रीहिसमासवत्वमन्यार्थ एवोपदधासि वृत्निं ॥ ४ ॥ विनक्तिमुक्तं ५ । पैरसंख्यैः समाश्रितं. धातुविकारहीनं ॥ अपूर्वमेतत्कटकृत्यनिष्ठाप्रधानमारल्यात मिन वदीयं ॥ ५ ॥ यस्मिन्न संनि च वर्णलोपो न संस्तुतिर्विग्रहकारकाणां । नवा विकल्पः क्वचन प्रयोगेप्वहो नवं व्याकरणं तवेदं ॥ ६ ॥ ध्यात्वा हदा खां फ समेति नव्यो दृष्टापि सादान्न कतीत्वनव्यः ॥ तत्सत्यमेतद्दहिरंगतो यत् स्यादतर गोत्रविधिर्वलीयान् ॥ ७ ॥ एतावतैव प्रतिनाति विश्वविलक्षणं वीर नवचरित्रं ॥ जालेन युप्मत्पदसंप्रयोगेप्यलंनि लोकम्य यउत्तमत्वं ॥ ॥ एकत्र धातापस गपंचकप्रयोग इट. कविनिनिरंतरं ॥ त्वक्ष्यानधातावुपसर्गविंगति सुरः प्रयोक्ता न फयं कुलदणः ॥ ॥ प्रनो महचित्रमिदं कवके कुतीथिकाणामपि कर्म धारये।। यन्मोहराजप्रधनेषु पुंवभावो न कश्चित् परिपोस्फुरीति ॥१०॥ गुरुयोर्वरद नायकर्म पोर्दर्शयन् विकरणस्थिति पदे।निर्विनक्ति समुदाहरन् पदं साधुलणविचक्षणोन वान्यनुपघातिनमेव किलागमं प्रणिगदंति जिनेश्वर शादिकाः।यसुमतामुपपा तकरःस्टशत् कथमिवागमतांस कृतःपरः॥१शायोपादानं नव्यतः पापपूगम्यासि घ्या अडावद्यःकरणमुशतां मोहवादि तरीतुं कर्ता नातेदिरदरदनप्छेदशानियोनिः । नव्यानां यस्त्वमसि सुपथप्रस्थितो हेतुकर्ता तस्मै तुन्यं जिन मम शिरोनग्रताकयम ॥ १५ ॥ यंतस्थास्तव शासनस्य यशसां कुंदावदातविपा गटनंत वि संत्र रणविधौ मा न तत्कातुकं ॥ यत्ने नित्यमनामिनोपि कुगुरी वृनदेवेषु न त्रा Y - यमपीवीरस्तवनं समातम् ॥ ॥ अथ श्रीवीतरागस्तवनप्रारंनः ।। पति पादा जिननायकस्य दोपापहा ध्वस्ततमोविकारा पर १ 'कोशिककेशकराः खराम ॥ १॥ r tantan २६ स्तोत्र स्तरेन हतार्थतामेति रुती सतीशन वाच्यता याति कदापि लोके यथा यथार्थस्तव काव्यकर्ता ॥३॥ त्वमेव नेतसि जागरूको जतोरसि श्रीजिनराजमान ॥ जवेन कि सचिजगन्महल प्रपात्यते कि नहि मोहमन ॥४॥ त्वमेव देवस्खिविधेन यंपा जगत्र यीपद्यपदो हि पाद ॥ धात्री परित्रीक्रियते किमत्रचित्र तदीय स्त्रिजगत्पवित्र ॥ ५॥ उपाधियोगान्महतो लघुत्व सपोरपि प्राज्यगुरुत्वमेव ॥यादर्शके देव यथा दिपस्य प्रदी पदोनो तु तन्नत म्यात् ॥६॥ कश्चिनुपाना हि लोपि लोके यो दृश्यते सोपि विनो प्रनार ॥ यातक यागनिर्जिने पयोपिना पल्लविता नरद ॥ ७ ॥नात पर देव जडत्वमत प्रत्यक्ष्जदोपि नवान्नबुझ ॥ सर्वज्ञताप्यन्ति पिनो न चान्या त्वमेव दे यां रिदितो यदीह ॥ G॥ चिदति संप्यपरानधोशान् नतानतास्ते प्रयदति सर्यान् ।। जगङगन्नाथ यथास्थित हि व वेत्सिहि त्वातु न वेनि चित्रं ॥ ॥ ॥ बहि स्थित पनि परसम्पन सस्थिन देव तव स्वरूप॥ चतुर्यथा पश्यति बाह्यरूप नचात्मरू प तु कदापि लोके ॥ १० ॥ सदात्मविज्ञान विहीनधीनिन ज्ञायते नाथ दिनों सरप ॥ पशोपचाप्रपिनागसम्य निरीक्षणे कोपि न बाह्यहेतु ॥ ११ ॥ मध्य म्यनागपि निन त्वयीन गुणस्ते स्याजुणिनो नितात ॥ यथाऽगुणप्रत्यय एपधाता यमप्पयो कोत्र पिचारहतु ॥ १२ ॥ त्वज्ञक्तिनायोप्ययथार्य एव नवत्प्रणीतार्थ रिपर्यण ॥ विीपते सहितोपसर्गर्गण यात्वर्थशान्यया हि ॥ १३ ॥ दो दपते य पयमेर रागदेवादिनुटाकनर्यथेष्ट ॥ सस्तूयते सोपि हि देवयुध्या दहा महामोहरितृनि तत् ॥ १४ ॥यचित्यमाहात्म्यनिधि प्रसन्न जगतराय जगतोपि प्रय ॥ त्वमेर देर प्रतिसि हिन्वा प्रमागतेऽन्येन किमु प्रदीप ॥ १५ ॥ मि मिनाम्निति विपदा गगादिपददति तयदक्षा ॥ये श्रीजगन्नाथ जिनमाने न्वामेर दा निनमाश्रयति ॥ १६ ॥ इति श्रीचीतगगम्तन समातम ॥ अयश्रीचप्रनवामिम्तवनप्राग्न ॥ देरर्य न तुटै मामनावितरिग्रह ॥ ददाश्मन प्रीति साम नितरियर ! १ ॥ पंग प्रमानिरिक्मांगनहरमनानय ॥ ने जिना पातु गानयजनहत ॥ २ ॥ नोथिमायन उगमद नादानिरजन ॥ श्रन मेग्न माराग्नि मदनी दानिानन ॥३॥ पातु गी नापियापरमा मिनासना ॥ यन प्रना याज नंतने पामा क्मनामना ॥ ४ ॥ इनि श्रीवप्रनमामिलान समातम ।
मबाटिस्टी पढदि नवे ॥ए ॥ तमवय्यवय्यिदमिधं,याचिरिकट गुम्छमारकपुनम स्तोत्र. परनिसेहता ॥ ७ ॥ ॥ अथ श्रीझपनदेवस्तवनप्रारंभः ॥ संस्कृतनापा. निरवधिरुचिरज्ञानं दोपत्रय विजयिनं सतां ध्येयम् ॥ जगढवबोधनिबंधनमादि जिने नवीमि मुदा ॥ १ ॥ कस्तवमिति हिपोलं वदितु परितो गुणान् गुरुनिनो पि ॥ चुलुकै. प्रमिमासति वा कश्व जलं वरमनीरनिधे ॥ २ ॥ तदपि त्वभक्तिनर प्रतरलितो वश्मि तावकगुणाएं ॥ चापलनुन्नो स्फुटमपि लपन शिगुर्वा निरपवा द. ॥ ३ ॥ ज्ञानप्रदीपजमिव स्निग्धांजनमुपहित चरणलदम्या ॥ सध्यानहगंजि ताय चिकुरचयस्ते स यो रुरुचे ॥ ४ ॥ प्राकृतनापा. तमकसिण सप्पखयमो.र मोरउलादुते किलिम्मति ॥ तुह सासणापि, जे कुएं ति विविहे तव किलेसो ॥ ७ ॥ तकिय कन्नाणसिरि, पिटे वकलाणसिरिविलासगि ह॥ तुह वदे देहमहं विलसिरमोहंपि हयमोहं॥ ६ ॥ युग्मं ॥तुह मुहग्नासयला, रविदलची मरटफसणेणं ॥ ज विजितु हिमरस्सी नियकती निवहसुहडेहिं ॥ ७ ॥ असइ तमनि नवनर सुसिरिर पहू ससंकोसो ॥ उग्गं खुर ऽय घणपरि,हिदंना मागधीनापा. तुह शुस्तिदेवनाव, स्तं गढपने शमयपथमचन्ने ॥ते यिण कुमदल फगव.गि in काला चिटामि हगे, हलिगनन्ने पिस्किई धन्ने ॥ १० ॥ केलीहलादगुणहं, जिनकगबस्टलायि किलणाद ।। तुद अपुजनवनिलसं, बदामु हगे अनीताह २१ ॥ संयणिधनकमले, व पप्फालिटमहंदपंकमले ॥ विदपलमहिमगलवे, नव श ाटा कोहे ॥10॥ पंशाची नापा. न गचित्रानन,अनन्न मामन बुज तिसपरंतन शितप मे, पतन्नि विनी पनय ॥ १३ ॥ ननिनगतो दृरे विष्टति यो नुन मिय्यतेनेन । कमटनो था विहितमिनानी न मोनोति ॥ गुम्मानिमगि तो अपुग्यमापन येवाकोतिनो यनपतीमकाय वपतं समतबीयन के तुम मिमतम्या लिमिर पमतछीजन, पकाका.
४ स्तोत्र चूलिका पैशाची काठ मिनहफलिता तुह रतन सेवते समा अनरवाहानून फकुरकुन पोम सक लक्मपि च पियु ॥ १७॥ चलयनमटलपटिमा चिकुराली शोफते तवसयुके ॥ चज नमिरिनितसयेन चरनायज्ञ तब ना तुवा ॥ १७ ॥ तुउंसफिनितटे फुजाति मरख नाजिव मनुरुवताची गतरुवरुपोजतजरचि,फासुर सोतामिनीतामा ॥ १॥नि मकसमझानापिन चनपरिहिन सखनीरवाहखटा । पथस फुषि सहकला नयनी तीनसिया तुमए ॥ २०॥ शौरसेनी कुमद मा यनिदाए ताश्य नामाणपिङ्गादे नगव ॥ चिदाधिदाय नय्ये, व नो दिमागणनार मा ॥ २१ ॥ काय थल हरिपदपि काय थां वा महन पिस पसु । मज लहिप यपुग्यपद पणजण पारिदृण सनु ॥ २२ ॥ दधाति गामिदो पप्यनं योग ननगडोण ॥ नपरि तुह नतिपथि माजिणराप फुरऽ हि पमि ॥ २३ ॥ पुग्मम ॥ हीमागहे नगदो चकिदोह थम्मले यविषयो॥णता पप तापथ म समेग सामिया तनी ॥ २४ ॥ ॥ समसस्कृतम् ॥ मममगेम्हनाग निमनामनानिमयहिमनाम ॥ लग्नपतिमहावा ना प नग्नमनिवद ॥ २॥ ॥ तर चरणोनयजाद पाजीमेगापरायणादेव ॥ पिद निनगनिगणा वरनितिग्मामग्रनय ॥२६॥ महिमपर तमसमहिम, विमा वरधी गर्गदरिमन || समयदयाग्मसुगम चरण सेरे तपासुगम ॥ २७ ॥ तर नामधेय शिवायरमा नुपि नगपनीने ॥ महाग्निगमग्न, दरमाजिगोनिरस ||Rit ॥अपशनापा। नहर यनिमामनि पिदुनगानि नुयपिहित निद्रिायग्विजमृणे पुग सुहान बमिनाहा मिति विमति, यारहतिय जणाहार ॥ पद कापति मुगिप पुकामतिर गणपयार ॥३०॥ तास महानाजनहिज, निनर निवडा दुदु नि । जापन पापिय नुध प हमारनायकदानि ॥ ३१ ॥ सुटुका निहता तुप महत मुमननदनम् ॥ दिनिदिशिजीगनुन कर दिप युत उनिणयामु १३वे हि कुनिन्दिपन वपण याम्यग्य मिलान नामिवपक्षिय त, जिर महिमगि ३३ ॥शमि तेहा नार रितु उपरणमिय तु पाय ॥ नुनिक निन्न ॥३७॥ निहलानीटलनी ॥४०॥ इति श्रीजिनप्रनसूरिविरचित घटनापात्मकं श्रीरुपन २६५ हिता रद करिविष्णु पुरक विधाय॥३॥ मन कहंतिदु नावरिन दडवड तण उद्द वा ॥ मामिय नटलतंच.बुदुनदु चंपा परचमू ॥३णा जुत्तिवि किरिय नाणहरि, घ घमण मनमुधिगि ॥ कुकुनपदुम्बा निवनय रितुह सासणरहिलग्गि ॥३६॥ परि कवि नुन तणु जूटहि कंचणकांति रवन्न ॥ वियसहि महणयषुल्लम, तामा नवउह नुत्तरपद्यम्याचंन्ही संस्कृतं समसंस्कृतं प्राकृतं ३ दितीये पैशाची चूलिका पैशाचिक ॥ तायिके मागधीशौरसेन्यो।तुर्ये अपभ्रंशः॥ नायालीयमंदयामयमलं नातं धरंत परं राकालि पवलोतयं अखचयासत्तं क मालाचिन ॥ धीतं लोअमहं ददावहकलं ठिनाहमायालदं नाधा नीदिरेसि वदउँ पई साणंड सीनुन ॥३०॥ ॥ कविनामगर्नचक्रं ॥ न प्रामा चिगुड्योगरनसोन्मीनत्प्रतोपान्वित शस्तः सौष्टवननमोहरवनः कंक जहमत छवि. ॥ स्च्या नास्करतिग्मतिहिरमणीसंकृप्तनावः पर रंता ज्ञानरमांशमास्त स्थमे तन्या. मुविद्यां चिर ॥ ३॥ ॥ जगति विटितवान् यस्त्वत्कमाझास्वरूपं तव गु विपटनावं संन्तवादध्यवम्य ॥ रचयति निजकंठालंकियां स्तोत्रमेतमवति नवकरीणा देवस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीमहावीरस्तवनं ॥ चित्रः स्तोप्ये जिनं वीरं चित्ररुचरितं मुदा ॥ प्रतिलोमानुलोमाद्यः खड्डाद्यैश्वातिचारुनिः ॥ १ ॥ ॥प्रतिलोमानुलोमपाद॥ वदे ऽमंददमं देवं यशमाय यमाशयः॥ नायनायबनायेना पाळता ममता रूपार ॥ अनुलोमप्रतिलोम ॥ दासतां तव नागारा नचेयाय मतामस॥समतामययाचेनरागानावततां सदा॥३॥ ॥अईप्रतिलोमानुलोम॥ वरदानवरादित्व त्वदिरावनटारव ॥ याज्यदेव जयान्यास सन्याय नवदेज्यया॥४॥ ॥ अईभ्रम॥ श्रीद वीर विरेनत्वं दमिताद गतायुन॥ वीतामारनितारे रद मां सदरगविण
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स्तोत्र
॥ मुरजवध ॥
गीरतारजतारदणे धीरता स्थिरतारसा ॥सारतारश्रुतावध्या सुरता जन तावकीय
॥ गोमत्रिका॥
ये पश्पति तवेहाम्यारविदं नक्रिबंधुरान पति नवे शस्यास्ते विदो नगवारा III
॥ सर्वतोन॥
नमामररसामान मारिताक्ष्क्ष्तारिमा|साता मया यामतासा रक्ष्याममपादर
॥रयपद॥
तिर्यनरसुराकीर्णा नामते ननते सना ॥
पमाहात्म्यात् म्ताधर्य याश्रिता ततता प्रिया ॥ ४ ॥
॥ यदरपाद ॥
रंगारोगोरुगीगंगा गौरीगुरुररोगरर ॥ गोरंगा गाररोगारिरेरिरो रैगुरुं गिरि ॥ १७॥
॥ एकादरपाद ॥
लाननानीनान तततातनितातते ॥ ममाममाममममा ननानेनोननानना॥११॥
॥एकाकर श्लोक
कारकि कारगर केकाफोरकरिक ॥
साराकुम्मायक्कु मारि ॥ १२ ॥
॥ अमयोग॥
मस्नुमा नपश्तासि चाम्सरी ॥
कुन सुस्तहीनाना सुनन तर शामन ॥ १३ ॥ पुग्म ।।
॥वान्या सड़मदानितक ॥
मन्ति पुचवन्यापा न्यापमानिरनिया ॥ कामधेनुनयग्लिो बोधानन
जमासार म्याहादमुज्ञयामिपदी नातो जसा सा मेऽग्नु हरिका
गनिन हितेन मा ॥५॥
॥मुसलं ॥
श्रीनिवार्यकृतव्यानदिवाकर निग्जन ॥
रश्नांना मन तीर्थकर तापिता ॥१८॥
स्तोत्र.
२६
॥ त्रिशूलं ॥
नुक्ता या त्वयि नव्याली धन्या धनेस्म चेतसा ॥
सामता तामसाकाममकासारंगसागरं ॥ १७ ॥
॥ दलं ॥
त्रिशलाकुक्षिपाथोजराजहंस जगदिनो ॥
नोगास्तुणमिव त्यक्तास्त्वयामुक्ति दिवदया ॥ १७॥
॥ धनु॥
सुरासुर नमस्तुभ्यं नमम्यति लिनोनम ॥
मनःप्रसादसंदर्जदलिता गुनवासना ॥ १॥
॥ शर॥
कथं कर्तुं जनो मोहव्यपोहमहहदमः ॥
मनसा सादरं यस्त्वां न स्तौति तिमिरापहं ॥ २० ॥
॥ शक्ति॥
वाल्यो मरुशिर कंपतंपत्प्रमितविक्रम ॥
मनोजानोकहव्याल मम स्वामी नवानवं ॥ २१ ॥
॥ अष्ट दलकमलं ॥
मानितार्यक्रमामार रमामाकंद माधवः ।।
वधमार्ग ममाकात तकामाधीः प्रतानि मा ॥२२॥
॥ पोडशदल कमलं ॥
वनप्या न धनवान ध्यानमान कनन ।
झामस्थान जिनश्रीनघनमेनस्खनःस्व न ॥ २३ ॥
॥ स्तुत्यनामगर्न बीजपूरं ॥
जय हेमवपु.श्रीक जगन्मोहापहारक ।
जराहिवीन सिंहांक जन्मनीरधि नाविक ॥ ३ ॥
॥ द्वरा ॥
तुन्यं नमोस्तुलनयस्थितिकाय नीतिवन्या पावक सुरस्तुत वीर नेतः ।
विद्याल ताविपुलमंडपहेमरूप कल्याणधीरपदद नदमीन ॥ ५ ॥
ច स्तोत्र ॥ कविकाव्यनामाक चक्र ।। जमान्यपथो जिनेश्वरवरो नव्याज मित्र क्रियादिष्ट तत्व विगानदोपरहित सूक्त श्रयस्तर्पण जन्माचित्यसुखप्रद सुरचितारिष्टक्ष्यो व सदा दाता शोननवादिधी क जनद यामेछण सविदा ॥ २६ ॥ ॥चामरवध ॥ श्रीमाम समयपिमह मया चित्रम्तनामुना नतस्त्व पुरुहूतपूजित बिनोसय प्ररिम ॥ रज्यातशातकुनारतम सफलतलोम्यतातर स्फारतरतरज्वरस्मरन र मध्यरष्टारत ॥ २७ ॥ इति श्रीमहावीरस्तवन समाप्तम् ॥ ।। अय श्रीमीरापल्लिपार्श्वस्तवन ।। जोगितापनि संपादयतं परमद स्तो जिन ॥ यस्य नाम जगतो वशकर शर पनि मत्रपान ॥ १ ॥ नाय तर मुग्दर्शन दर्शन च नयनामृत मोयेन मेपुस्तितापमारिणा दारिणा सति पुण्यवारिधि ॥ २ ॥ विश्वविस्तृत मनार ते जारतेन मातिनो पुगे । उगते दिनकरे हि नासुरे नासुरेश्वरपुर म्य रिनन् ॥ ३ ॥ अदम्य नरता य्यनापि या नापियात्रिकजनेपनातिद । पापतोरनृनापि सारसा सारमाधुनिचिता नाच ॥ ॥ ग्राममानमपिजीरप जिरा पत्रिकाननगदोदरीर या ॥ त्वत्पदस्थितिमनेन साधुना साधुनायकपुरीना राने ॥ ५ ॥ त्वां नमन्यतिरहितार तारकरणसुमै प्रपन्य य ॥ प्राप्य चिन्म पगनेनम पद गपद म ममुपनि गायती ॥ ६ ॥ वन्पुर प्रकुस्ते प्रनारना नागना पिन निधाप या हरि निधिले मसनने न मुर्गती उतीर्णनामागर प्रनो ॥७॥ यो दयानि दिन्विारन परन मामा क्गति स ॥ ततयेपि न नाति पा भत पार्थनम्पनु नगनशनमा जान्यस्मृतेरपि जना निगमया रामपा परमया निगमया ॥ यामिन नरनि नृपिना नृपिता किन सुपागना II लादण निन सादर मादा पनि जातुना पनि ॥ यत्र यानि ननु नानुनाना नानगार पनमम्न त1ि॥ धनग्गम्पिगपापग पापगनिदा पीमा मा । मन्वदिग्निी पानपानयागणाग तन ॥ ॥ वन्मय नगान पब मनम मान यमनतन्य ग ॥ नमगननपय करणारेणा जिन न वन तवान् ॥ १२॥ यमारिमतिमनुगना देव नारदित सामिप्रदा ॥ या दर नव पामनाम नाम तुमनमि प्रदीयन ॥१३॥ शानिन जगदिन निरनन नदागर्म धन्ना ॥ चरणग्या चरणरया, चरणरया नाश्चत्ततिरी॥१०॥ निप्पहस्स विपत ॥ सुगसुग्टनमस्कत नंद महोदय कल्पमहीरुहवंद ।। ७॥ न्नोन. ए निनं निजगन पुगननं ॥ त्यां म्ममि सकतंच निफ निष्कलंकमचलं महाव ययन. नवनि मनन श्रीजीपानीपुरीवातं पार्वजिनाचं प्रकटित अंटरतापांव्य ॥ नांवन्यं सनगं नविनुरधिकं धर्मार्थकामामृतश्रीनिः स्वीनिरिव वर गुणगणाश्लिष्टानिलियोति श्रीजीगपत्नीपा वस्तवनं समाप्तम्।। ॥ अन्य श्रीफलवििजनपार्श्वस्तवनं ।। नग्लारिवाहिजजदर नमृदगंदगणवटपरमाणं ॥ फलवक्षिपासनाहं तंधुणि मी फणय ऽहफज ॥ १ ॥ विदुयानं बिछयानं. विदुयातं पत्नमनिघुर्णति तुमं ॥श्रम अग्या श्रमपग्या. मयग्या गुगग्यमवयम् ॥ २ ॥ समपाणं तमणाएं, समया पवित्र फरक मनी ॥ विणयाणं विणयाणं, विणयाणंटानयाहि मुटे ॥३॥य द्विग्ना अग्निा अद्विग्ना विणियमंनि क्यया ॥ सवाही सम्बाही. सबाहीणा नुद य नना ।। ४ ॥ गयवादा गयबादा. गयवाहा अहियापऽपसन्ने । परमहिया पन्मदिया. पग्मदिया मद न दुनि नग ॥ ५॥ सदवणा सहवणा, सद्दवणामयरि 3 दवति जणा ॥ मुदयगया मुहयगया. सहयगया तुह पसाएण ॥ ६॥ कणयाउ झणयाउ, काणया कनी तुम नवणं ॥ नवयो नदवयो, नहवयो रिक्षितिरिया T॥ नाएक नाएणं, नाएणं चियति लोहमहमि ॥ नवराई नयराई, नयरा ईमुगुगपांगणं || Geी फलवक्षी, फजवही टाणा तुमे विहिया ॥ सन्न परी सन्नयरी, सन्नवगणयालया समणाली समणाली, समणाली एं ना ॥ ११ ॥ इत्यं थुनि सिरिपासजगनिवास सिंगारदारफलवधिपुरीसिरीए । चुदीपगकयजिणप्पामारवाणी पञ्चमे वियर अंतररोगमुरकं ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीफलवदिपार्श्वनाथस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीचंप्रनस्वामिस्तवनं ॥ ॥ संस्कृत ।। नमो महमेनन इतनूज जगऊनलोचनन्नुंगसरोज ॥ शरमवसोमतमद्युतिकाय यामय तुन्यमनंतसुखाय ॥१॥ सुखातमादरसेवकलद विनिर्जितर्जपनाव ॥प्राकृतं ॥ जय निरमिय तिदुयणजंतु नंति जय मोहमहीरुहदलनदंति ॥ जयकुंदक ५ % 3ame 90 स्तोत्र. जियसमदतयंति जयजय चदप्पहवदकति ॥३॥ जय पणयपाणिगणकप्पर रू जय जगडिय अपयमासयपरक ।। जय निम्मलकेवलनाणगेह, जपजयजिलि द थप्पहिमदेह ।।४॥ ॥ शौरसेनी॥ गिदहहे। मोहारिकदूदय दजिदगुरु रिदमध विहिदकुमदरकप ॥ नापत नमदिजोसदनदवत्सजजहादिनिमादि गति सोदद निम्मज ॥ ५ ॥ ॥मागधी॥ थसुनसुनरिसजनजनाय सेश्विपदे नमिल जय जतुतुदि दिनसिवपुलपदे ।। नानपुननिजद ससाजिसजसीबुदे, देहि महतामितसालि सासदपदे॥ ६॥ ॥ पैशाचिक। तजितारिखजतोसतया सतन मदनानलनीजमनानगुण । नजिनारुणपाततलानमते जिननो श्धत सशिव सनते ॥ ७ ॥ ॥ चूलिका पैशाचिक ॥ रजनानिरुनातुनतप्पहन चलनीफज चानुपशप्पसल ।। लजनाचनकीतकुन चिज चिनलारमहसमलामिचितं ॥ ७॥ ॥ अपवश ॥ सामपसुरम्प निहाणुनाहनदि जेहि तव पुनविदूणउजापु निफलजम्मु ति नरपत ॥ ॥ निम्मत तुह मुहाउने पपिरयु पसरिसियनिरुवमथापति ह मुनिसामी रिपुरs ॥ १० ॥ ॥६य समसस्कृत ।। दाम्हिाराहामादसुदग्देदानय केरजस्मताकेनिनिलप मजुनगुणगणमय॥ समनार एकचरणरणनरपणात बजमिहिरमणिसगमपिलासलालसमनम वदन ॥ ११ ॥ नरनादवजनादपिमतमगजनमदिर वामरामारिकनिहरण हरियरगुपपुर ॥ मदगिरीगुम्माग्मनिरनिनूम्हाजर देहिमहादयमेर देर म मनिनर ॥ 1 ॥ नि जगदनिनदन जनहदि चदन चमन जिनवर। पहनागनिटुन मम मममपुतमिक्षिसपानि पिनो पितर ॥ १३ ॥ इति श्रीजिनमनमरिम्नानम्यामिमन पम्नापास्तयन मपूर्णम् ।।
याय तावकानुयहेण हनुमत्वमिहवः॥१॥ कुग्रहा न तव लातु शासन वीर बाधितुम खनविलवः॥ एककः स खलु नस्मकग्रहो वाधते जवउपेक्षितस्तदारशा जग्मुषित। यि शिवं नराधिपास्तत्दणं गृहमणीनवोधयन् ।।ये वन्नु कुनयकाननपरत्वत्प्रताप मिखिन. कपा इव ॥२४॥ यन्न कश्चन मुनिस्त्वया समं युक्तिमयरितनिधि । सुषमा समयनावलिगिनां व्यजितेन गुरुनियपेक्षिता ॥ १५ ॥ प्रस्थिते त्वदि शिवाय तदर्ष संमुमूर्तुरधिष्टवि कुंथव. ॥ जीवबगुलामतः परं तृवपंतश्य नाविनी महीं ।।१६।। यत्र यत्र चरणों त्वयाऽपिता तत्तदास्पटमगादनापतां ॥ए कया पुनरपापया पुरापापयाऽजनि सुरोक्तिनामतः॥ १३ ॥ पत्र मुक्तिमगम. नाम | मावाप पापतुदिनार्कतापतत् ॥ प्रीतिमीति तरुकुंजनजने नाग नागकणां गं तु न. १७॥ यः पठत्यशम्धीस्तव वीरलोत्रमेतदवधानसमेत. ॥ तत्रजागि स्तोत्र. २१ ॥ अथ श्रीवर्धमाननिर्वाणकल्याणकस्तवनप्रारंजः ॥ श्रीप्तिधार्थनरेशवंशकमलाशृंगारचूमामणेर्नव्यानां सुरपोहमोहतिमिरप्रोडासने हर्मणेः ॥ कुर्वे किंचन कांचनोज्वलरुचेनिर्वाणकल्याणकस्तोत्रं गोत्रनिदर्चनीयचर पांजोजस्य वीरप्रनोः ॥ १ ॥ प्राप्य देव शरदादिसप्तति शीतगी पवनदेवतगे ॥ तामुपायत रसेन कार्तिकाऽमावसीनिशि शिवश्रियं जवान् ॥ ५ ॥ हस्तिपालकन पालपाजिता पूर्न पूरयतु मन्मन शुचा ।। यत्र दर्शश्व चंमा नवानस्तमाप नवताप हा पुनः॥शा कर्जदर्शनिशि दर्शितध्यस्तत्रपुर्य खिलवर्णजाःप्रजाः॥ त्वन्महोदयमही तयाऽधुनाऽप्युत्सवं विदधतेऽनुवत्सरं ॥ ४ ॥ यैर्ध्वनिस्तव पपे अवःपुटः पोडगप्रहरटे शनाविधो॥ तानिवेश्य धुरि धन्यताजुपा रेखया न खलु सुप्यतेऽन्यतः ।।५।। पुण्यपाप फलपाकवर्णनामध्यमध्ययनपंक्तियुक्शतं । व्यारुथाः स्फुटमष्टष्टपतिव्यास्तीध परिषद्पुरस्तदा ॥॥ जीवति त्वपि जिनेतिना त्वत्प्रणामविधिनंगनीरुणा ॥ नून मेष्यत न देव केवलज्ञानसंपदनुरागनागपि ॥ ७ ॥ यविधेयमुपटिट्य गौतम प्रपि नकिनृदपि त्वयाऽन्यतः ॥ रोगिणः कटुकजायुपानवज्यायसेऽस्य चरूपे गुणाय तत् ॥ त्वदिक्ष्ववतरत्रावली या न देहमणिनूपणांशुभिः ॥ सा कुदूरजनि र जातामसा पूर्णिमानिगमुपाहसद्ध्वं ॥५॥ निवृते त्वयि विलोक्य विष्टपं ध्वातपूरपरि परितोदरं ॥ रोदयंत बरोदसी प्रतिश्ररेण स्ः पुरदरा.॥१०॥ वन्हिवायुजलदेश्य मुरैतलपणिकस्तांगसंस्कतानतिमात्रमपि नूतिधाम ते ऽपस्टशन वत न तान् । जोऽस्टशत् ॥११॥ नतितो महिमशिवासवान्तावकीनन्दनुसंग्रहं व्यधुनूनमदयिज नदमनामनगजकरट देखनसबनतमहत्तमदचरट ॥७॥ मदनयनगमारन रमदहमहनग्न ॥ ॥ सततमचरचरजगढ गमक मननजनकथनतरतमशम समदननसनमदमन नपनपचनचरनरयतसमर ॥ दलयवहलमजमरवरवशत मतरतनरमतगतपरवशत ॥११॥ कपटशफटजलशयसमनवक जनमवगमय समनमतमहपरमतरुजम गणधरगणपरामरसकलस ॥ नपदनपदपदनवन्स मरोगविदा काम के रजार्णसन्त रसुवावाद विधत्ते सुधी ॥श्रेया या न जरामा दवन यनमग्नमयसहनमहनवम ॥१३॥ एष श्रीथरतीयराज तर यो 56 तपदवीमागमानि बाहानरा मित्रानी जय सुदर सनियनं शिश्रीयते मानव ॥१॥ ३ स्तोत्र जि रयश्रीनाजि न प्रनवति प्रवलापि ॥ १॥ इति श्रीवर्धमाननिर्वाणकल्याण कस्तान समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीअरिनाथस्तवनप्रारन । जय गरदशकलदगहयवदन जय हतजगदसहनमदमदन ।। जय नतशमगतश मनजकदन जयनगवदरपरमपदसदन ॥ १ ॥ गतमलकमलसकनकरचरण जननमरणनपनयनरहरण ॥ रचय चरणरसनशबलसन मनवमसनवमरसरम पचन ॥२॥ नपरचनरतदशशतनयन नयवनजदजलजदलनयन ॥ फनद फतकलपजयकरयजन नमदशमपहरशममननजन ॥ ३॥ यमरफलदपदहर पदमन गजकरसरलसवलकरयमल ॥ जनयसनयमतनतजनसकल मतक समपमनरूजमलमफा ॥ ३ ॥ नयमयवचनपवनसमवमत परमतजनदपट समनसमत ॥ शमदमयमसमरसरमसमय जवपतनजनयमज मम शमय ॥ ५ ॥ धनसकनकशातपन परन मदकसारणकलनजयशरन ॥ शरणदचरणनरकदर सामन सदयमदयमफजयगजगमन ॥ ६ ॥ नतशतमखतमरखलजनमदर ग मपपग्मपदमनयदमदर ॥ नवनवनयवननवदशमगम शकलनगजकजगनदन वगम ॥ ७ ॥ तमचयमपनयतपमहतपन परसमयजरजहरपदजपन ।। समन रसरण गतरणमदरतरणपरकरण ॥ परसहचरसमरसजगदवन समवसरण २ ॥ परपदनगरगमनरणरणक मफलदशमसफलयपथना ॥ १० ॥ रसनर समपरसमक ॥ गदगजरणफणपरदकदहन धनहरमरकजदरदरमहन ॥१२॥ अनिकानाकामा सोमm
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स्तोत्र यश्रीनाजि न प्रनवति प्रबलापि ॥ १ ॥ इति श्रीवर्धमाननिर्वाणकया। नि समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीअरिनाथस्तवनप्रारन । य शरदशकलदशहयवदन जय हतजगदसहनमदमदन ॥ जय नतशमगतश किदन जयनगवदरपरमपदसदन ॥ १ ॥ गतमजफमलसकलकरचरण मिरपानवजयनरहरण ॥ रचय चरणरसनशबलस्वन मनवमसनवमरसरम ' ॥ २ ॥ नवरचनरतदशशतनयन नयवनजरादजलजदलनयन ॥ फलद लयजयकरयजन नमदशमपहरशममननजन ॥ ३॥ यमरफलदपदहर मल गजकरसरलसवलकरयमल ॥ जनयसनयमतनतजनसकल मतफ।। मलकलमलमकल ॥ ४ ॥ नयमयवचनपवनसमवमत परमतजलदपट समत ।। शमदमयमसमरसरमसमय नवपतनजनयमज मम शमय ॥ ५॥ कनकशकलघनवरन मदकलकरणकलनजयशरन ॥ शरणदचरणनरकदर । सदयमदघमफजयगजगमन ॥ ६ ॥ नतशतमखतमरवलजनमदर ग रमपदमनयदसदर ॥ नवनवनववननपदशमगम शकलनगजकलगतदन | !! ॥ तमचयमपनयतपमहत्तपन परसमयजरजहरपदजपन ॥ समज निकमनगजकरट ढलनसबलतमहतमदचरट ॥ ॥ मदनयनगमशरणन ए गतरणसदवतरणरकरण ॥ परसहचरसमरसजगदवन समवसरण हमहनवन ॥ ॥ सततमचरचरजगढवगमक मननजनकथनतरतमशम परपदनगरगमनरपरणक मफलदशमसफलयपथनाक ॥१०॥ रसनर इनलसनमदमन नवनपवनचरनरयतसमर ॥ दलयबहलमलमरवरवशत -तनरशतगतपरवशत ॥ ११ ॥ कपटशकटजलशयसमनवक जनमवगमय परसमवक ॥ गदगजरणफणधरदकदहन धनहरमरकजदरहरमहन ॥१२॥ तसतमहपरमतकलस गणधरगाधररामरसफप्लस ॥ नवदनवदपदलबलस न वनमवनमयसहनमहनवम ॥ १३ ॥ एव श्रीधरतीर्थराज तब यो हक गहिदा काम केवलवर्णसस्तपसुमावाद विधत्ते सुधी ॥ श्रेयो वा न जरामर दवीमाग्व्यानि बाह्यतरा मिनाजी जय सुदर स नियत शिश्रीयते मानव ॥१४॥ केवलादरमप श्रीधरनाथस्तवन सपूर्ण ॥
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२७२ स्तोत्र. जि रयश्रीनाजिन प्रनवति प्रबलापि ॥ १॥ ॥ इति श्रीवर्धमाननिर्वाणकल्याण कस्तवन समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीअरिनाथस्तवनप्रारन ॥ जय शरदशकलदशहयवदन जय हतजगदसहनमदमदन ॥ जय नतशमगतश मनजकदन जयनगवदरपरमपदसदन ॥ १ ॥ गतमनकमलसकलकरचरण जननमरणनवनयनरहरण ॥ रचय चरणरसनशबलस्पन मनवमसनवमरसरम वचन ॥ २ ॥ नवरचनरतदशशतनयन नयवनजदजलजदलनयन ॥ फलद कलकलयजयकरयजन नमदामपहरशममननजन ॥ ३॥ अमरफलदपदहर पदकमल गजकरसरलसवलकरयमल ॥ जनयसनयमतनतजनसकल मतक समपमलकलमलमकल ॥ ४ ॥ नयमयवचनपवनसमवमत परमतजलदपट। समनसमत ॥ शमदमयमसमरसरमसमय नवपतनजनयमज मम शमय ॥ ५॥ धनरखकनकशकलघनवरन मदकलकरपकलनजयशरन ॥ शरणदचरणनरकदर शमन सदयमदघमफजयगजगमन ॥ ६ ॥ नतशतमरवतमरवलजनमदर ग मयपरमपदमनयदसदर ॥ नवनवनववननवदशमगम शकलनगजकलगतदन वगम ॥ ॥ तमचयमपनयतपमहतपन परसमयजरजहरपदजपन ॥ समज नदमनकमनगजकरट दलनसवलतमहतमदचरट ॥ ७ ॥ मदनयनगमशरणन रशरण गतरणसवतरणयरकरण ॥ परसहचरसमरसजगदवन समवसरण रमदहमहनवन ॥ ॥ सततमचरचरजगदवगमक मननजनकथनतरतमशम क। परपदनगरगमनरपरक मफलदशमसफलयपथनक ॥ १० ॥ रतनर लसदनलसनमदमन नवनपवनचरनरयतसमर ॥ दलयबहलमलमरवरवशत मतरतनरशतगतपरवशत ॥ ११ ॥ कपटशकटजलशयसमनवक जनमवगमय समयरसमवक ॥ गदगजरएफएधरदकदहन धनहरमरकजदरहरमहन ॥१२॥ समतसतमहपरमतकलस गणधरगएपरशमरसकलस ॥ नवदनवदपदसवलत दवम वनमवनमयसहनमहनवम ॥ १३ ॥ एव श्रीधरतीर्थराज तर यो एक मेरोगछिदा काम केवजवर्णसस्तवसुधास्वाद विधने सुधी ॥श्रेयो वा न जरामर खपदवीनारयानि बाह्यतरा मित्राली जय सुदर सनियत शिश्रीयते मानय ॥१॥ इति केवलादरमप श्रीधरनाथस्तवन सपूर्ण ॥
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२ स्तोत्र जि रयश्रीनाजि न प्रनवति प्रवलापि ॥१॥ इति श्रीवर्धमाननिर्वाणकल्याण कस्तवनं समाप्तम् ॥ ॥ अथ श्रीअरिनाथस्तवनप्रारन ॥ जय शरदशकलदशहयवदन जय हतजगदसहनमदमदन ॥ जय नतशमगतश मनजकदन जयनगवदरपरमपदसदन ॥ ॥ गतमजकमलसकलकरचरण जननमरणनवनयनरहरण ॥ रचय चरणरसनशबलस्वन मनयमसनवमरसरम वचन ॥ २ ॥ नवरचनरतदशशतनयन नयवनजसदजलजदलनयन ॥ फलद कलकलयजयकरयजन नमदशमपहरशममननजन ॥ ३॥ यमरफलदपदहर पदकमल गजकरसरलसवलकरयमल ॥ जनयसनयमतनतजनसकल मतफ लमपमलकलमलमकत ॥ ४ ॥ नयमयवचनपवनसमवमत परमतजसदपट समनसमत ॥ शमदमयमसमरसरमसमय नवपतनजनयमज मम शमय ।। ५॥ घनरखकनकशकलघनवरन मदकलकरणकलनजयशरन ॥ शरणदचरणनरकदर शमन सदयमदघमफलयगजगमन ॥ ६ ॥ नतशतमखतमखलजनमदर ग मयपरमपदमनयदसदर ॥ नवनवनववननवदशमगम शकलनगजकलगनदन वगम ॥७॥ तमचयमपनयतपमहतपन परसमयजरजहरपदजपन ॥ समज नदमनकमनगजकरट टलनसबलतमहतमदचरट ॥ ॥ मदनयनगमशरणन रशरण गतरणसदवतरणावरकरण ॥ परसहचरसमरसजगदवन समवसरण रमदहमहनवन ॥ ॥ सततमचरचरजगदवगमक मननजनकथनतरतमशम क। परपदनगरगमनरपरक मफलदशमसफलयपथनाक ॥१०॥ रसनर जसदनलसनमदमन नवनपवनचरनरयतसमर ॥ दलयबहलमलमरवरवशत मतरतनरशतगतपरवशत ॥ ११ ॥ कपटशकटजलशयसमनवक जनमवगमय समयरसमवक ॥ गदगजरणफणधरदकदहन धनहरमरकजदरहरमहन ॥१२॥ समतसतमहपरमतकलस गाधरगाधरशमरसकलस ॥ नवदनवदपदलबलस दवम वनमवनमयसहनमहनवम ॥ १३ ॥ एव श्रीयरतीर्थराज तर यो हक मेरोगछिदा काम केवलवर्णसस्तवसुधास्वाद विधने सुवी ॥ श्रेयो वा न जरामर त्वपदयोमारण्यानि बाह्यतरा मित्रानी जय सुदर स नियत शिश्रीयते मानव ॥१४॥ इति केवजाक्रमप श्रीधरनाथस्तवन सपूर्ण ॥
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