Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Gaurav Shikhar

Dr. Natthan Singh · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

गौरव-शिखर कनिष्क प्रकाशन गौरव-शिखर डॉ. नत्यन सिंह

No text on this page.

समर्पण
उन सभी को,
जिन्होने
राष्ट्र की स्वाधीनता
और
समृद्धि मे
योगदान किया है।

No text on this page.

अपनी ओर से जननी और 'जमभूमि स्वग स भी महान् होती है। इन पर बलिदान हान वालो की क्या पर मेले लगते हैं, इसके लिए कष्ट सहने वाला के सिरो पर फूला की वर्षा होती है, इतिहास के पना पर वे अमर रहते है और अपनी कहानी से देशवासियो को हमेशा प्रेरणा देते रहते हैं । ऐसे लोग किसी एव जाति, एक काल तथा एक धम वे न रहकर समस्त लोक एव काल के गौरव शिखर बन जाते हैं। ऐसे व्यक्तिया भले-बुरे सफल-असफल और लोकहित एव विराधी कार्यों से हमारा माग प्रशस्त होता है । अच्छे तथा हितकर कार्यों से हम प्रेरणा मिलती है और काल तथा परिस्थिति की सही समझ के अभाव म, उनके द्वारा हुए लाक विरोधी कार्यों स हम भविष्य के प्रति सावधान हात है, उन भूला को दुहरान से बच जाते है, जिनमे लाक तथा राष्ट्र का अहित हो सकता है। इस प्रकार, जाके काय हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ बन जाते है, हम विना ठोररे खाए जाग बढ़ जाते हैं, राष्ट्र तथा समाज का समृद्धि की जार ले जाने वाले सही माग का सधान पा लेते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि एसे बलिदानी वीरो के जीवन इतिहास तथा समाज एव राष्ट्र हित के कार्यों को हमेशा याद रखा जाए। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस पुस्तक की योजना को गई है। भारत की सभ्यता, सस्कृति और स्वाधीनता को खतरा अनेक विदेशी आक्रातानो स रहा है । इनम हूण शक तुक, अफगान और अग्रेजा की गणना होती है। इनम से किसी ने तलवार से और किसी न प्यार स हमारी संस्कृति एव स्वाधीनता को समूल नष्ट करने के प्रयास किए है । इस पुस्तक म, ऐसे छ व्यक्तियों के कार्यों पर प्रकाश डालन का प्रयास किया गया है जो इस देश तथा यहा की स्वाधीनता तथा समृद्धि के लिए बलिदान हुए हैं अथवा निरतर सघष में लगे रहे हैं। औरगजेब के भ्रष्ट तथा जन विरोधी शासन के विरुद्ध ब्रज क्षेत्र मे शान्ति का मण्डा उठाने वाले एक किसान राजाराम थे, अफगान लाक्रान्ताओ का मुह माडने . में शेरे पजाब रणजीतसिंह ने महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया था, 1857 क प्रथम स्वाधीनता आदोलन म वहादुर शाह जफर की रक्षा करने तथा दिरली पर अग्रेजा की वढत रोक्न का ऐतिहासिक काय नाहरसिंह ने वि या था, भारत के प्रति कारी आदोलन को एक दशन का रूप देन और भारत के लिए समृद्ध लोक्तत्र का नशा पेश करन वाले सरदार भगतसिंह थे, देशी-सामतो और अंग्रेजी साम्राज्य की जजीरा में जक्डी राजस्थान की धरती को स्वाधीनता तथा राष्ट्रीय आदोलन की राह पर ले जान वाले स्वामी केशवानद थे और भारत की स्वाधीनता के फल को धूल में मिला देन की चालो को हथियार के बल पर विफल करन के लिए कोशिशा मे सलग्न मजर जयपाल थे। ये सभी बलिदानी वीर साधारण किसानो के घरा म पैदा हुए थे और अपन अदम्य साहस, जपरिमेय देशभक्ति एव असीम लोक हित के बल पर भारत के लिए गौरव शिखर बन गए हैं। इनकी गाथाआ को पढकर, भारत के भावी नागरिको को देशभक्ति, लोक हित, राष्टीय एक्ता और चरितगत उदात्तता की प्रेरणा मिलेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। T बडौत (मरठ) -नत्थर्नासह जून, 1987

विषय-सूची
17
47
49
सिनासिनीमा क्रातिकारी पिसान राजाराम
शेर-पजाव महाराजा रणजीतसिंह
एक लोकगीत म राजा नाहर सिंह
1857 या महान् क्रांतिकारी
शहीदा व प्रति (कविता)
शहीद ए आजम--सरदार भगतसिंह
है त्यागमूर्ति केशवानद
स्वामी केशवानद
मेजर जयपालसिंह
65
67
95
97
109

No text on this page.

सिनासिनी का क्रान्तिकारी किसान राजाराम - बादशाह अक्बर ने इस देश को सामाजिक, सास्कृतिक तथा राजनीतिव एक्ता के धागो में पिरोया था। उसका बाबा वावर बाहर से इस देश म आया था, स्नि यही वा होकर रह गया था। उसका बेटा हुमायू तथा नाती जलानुद्दीन जक्चर इरा देश का अपना देश मानवर २सयो सजाने, मवारने तथा समृद्ध बनाने पर लग रहे थे। यहा की जातिया तथा धर्मो को बुचरने अथवा समाप्त करने म उनकी चि नही थी। उहाँने जातीय धार्मिक तथा सास्कृतिक एकता का अद्भुत परिचय दिया था। जहागीर तथा शाहजहा तक ने भी एक सीमा तक, इस नीति का निवाह किया था। मदिराम शख ध्वनि और मस्जिदा म अजा एक साथ होती थी। ईद और हाली दोना (हिन्दू तथा मुसलमान) एक साथ मनाते थे । रहीम और रसवान कृष्णभक्ति मे झूमते थे। दाना धर्मों के सत तथा सूफिया का, दोना धर्मों के लोग अपन सत तथा सूफी मानकर, पूजते थे। कही कोई भेद भाव नहीं था । गगा- जमुनी संस्कृति का यह अद्भुत उदाहरण था। जिस तरह एक जोर से गगा और दूसरी ओर से यमुना आकर प्रयाग में मिल जाती है पतित पावन तीयराज का निर्माण करती है उसी तरह हिदू तथा मुस्लिम सस्कृतिया मिनकर कृष्णभक्ति की धाग मे बह रही थी। ब्रज की गोप सस्कृति न जाति धम तथा सस्कृति का भेद मिटाकर एक मानवतावादी सस्कृति की धारा बहा दी थी। औरगजेब ने इस एक्ता को भग कर दिया । गज्य पान के लिए उसन पिता शाहजहाँ को दक्यिा, कुछ भाइया का जहर खिला दिया और गद्दी को हथियान के बाद दारा तथा शिकोह का कत्ल करा दिया। अपनी स्वाथपरता और राजनीतिक नृशसता पर परदा डालने के लिए खुद को इस्लाम का अनुयायी बताया और उदारतावादी शाहजहा तथा दारा का काफिर । इस प्रकार उसने सांस्कृतिक एकता, सामाजिक सद्भावना और मानवधामिता का नाश कर दिया और दोनो जातियो को आमने सामने खडा कर दिया था। शाही शान और । अधिकार के घमण्ड में वह भूल गया कि काई कौम, धम एव सस्कृति मिटाने स - मिटती नहीं है, वह जब एक ताक्त बनार उभरती है तो मिटान वाले का ही मिटा देती है। औरगजन ने भारत स उसकी प्राचीन संस्कृति को इस्लामिक कट्टरता तथा ततवार के जोर से मिटाना चाहा था, अत वह न सिफ खुद मिट गया वरन् मुगन माम्राज्य के विनाश के बीज भी बो गया । जो कार्य महाराष्ट्र म शिवाजी न किया था, वही काय ब्रज क्षन म सिनासिनी के किसान राजाराम न कर दिखाया। दाना में सिफ जतर एक है । शिवाजी को पिता की सेना प्रशिक्षित सिपाही जार मराठा ताक्त विरासत में मिली थी। राजाराम के पास फिसाना के सहयाग और आम जनता की सहानुभूति के अलावा कुछ नहीं था। उसको सनिक ता जनता स मिते थे लेकिन हथियार और सम्पत्ति मुगलो सही छीननी पड़ी थी। नज क्षेत्र की समस्त जाता औरगजेब के घट्टर शासन के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू थी उमको नेता के रूप म मिल गया गाव सिनसिनी का एक जाट किसान राजाराम । क्षेत्र की माता कौमा (ब्राह्मण, वैश्य, जाट, धाबी, गूजर, अहीर और हरिजन जातिया) के चौवरिया न, सिनसिना देव के मदिर पर, राजाराम के सिर पर पगडी वाधकर उमका अपना नेता मान लिया और वह मुगल-शासन से टक्कर लेने के लिए तयार हो गया। मवाल यह है कि ब्रज क्षेत्र की जनता, क्मिाना के नेतृत्व मे, मुगल शासन को चुनौती दने के लिए क्या खडी हा गयी थी? कोइ राज्य, जव जनता के जान माल और जादर की रखवाली न करके उमको लूटने, वइज्जत करन, उसकी बहू- बेटिया को छीनने उमके रीति रिवाज तथा धार्मिक परम्पराजा का ध्वस्त करके, तलवार के बल पर धम बदलन के लिए मजबूर कर देता है तब स्वाभिमान नौर लाकतन म जास्था रखने वाली जनता विवाह पर उतारू हा जाती है । औरगजेब का मुगल शासन लोकप्रिय शासन न रहकर जन विरोधी राज्य बन गया था। उसके द्वारा नियुक्त मथुरा के फौजदार जब्दुल नवी ने मथुरा के ब्राह्मणा को मृतक मुस्लिमो के लिए सब खोदन का विवश किया था, इलाके की सुदर स्त्रिया का उडाना प्रारभ कर दिया था क्टरा वेशवदव के मदिर से दाग द्वारा दिया गया पारदर्शी पत्थर निक्लवाकर मदिर ध्वस्त करा दिया था, क्सिाना से बार-बार और बलपूर्वक लगान वसूल कराना प्रारम्भ करा दिया था। यही कारण है कि जनता के मन म विद्राह पनप रहा था। उसको बाहर निकलने के लिए अवसर और साधन की जरूरत थी, वह मिला राजाराम वेस्प म। मुगल उनके अनुयायो इतिहासकार ग्रज-क्षेत्र की जनता का बुरा लगानदाता (बडटकम पेपर) बहत हैं और मुगल राज्य की भूमि व्यवस्था पद्धति की तारीफ मरत नही छत । इमलिए लगान-वमूली के लिए, पिसाना पर की गई प्रत्यक ज्यादती को यायाचित ठहरात हैं। राजाराम के विषय में कुछ पहन स पहल, 13 थोडा-गा प्रकाश मुगल शासन की भूमि-व्यवस्था पर डालना जरूरी है। उन दिना, भारत में जमीन अधिक थी और उस पर खेती बरा वाले चम थे। भूमि का मालिक गज्य था। उसने अपने और किसान के बीच जमीन वा मालिक एव एसा वग बना लिया था जिसमे हिद, मुम्लिम राजे, नवाव, जमीदार और जागीरदार थे। अक्चर के समय म एमे जागीरदारा की सख्या 1 658 थी, जहागीर ये समय मे, 2,069 हो गई थी । शाहजहा के काल मे वह 8,000 हुई और औरगजेब के काल मे 11,456 हा गई । इनम मे अधिकाश जागीरदार अब्दुल नबी के रास्ते पर चलने वाले थे, जो विमाना को किसी प्रकार की सुविधा प्रदान न कर, उसको हर तरह परेशान करते थे। ऐसे जागीरदारा को लगान न देरर उनके खिलाफ विद्रोह कर देना ब्रज की जनता के लिए, वृष्ण तथा बलराम की प्रान्तिकारी परपरा का पालन करना था। मबसे पहले यह काम दिया था नादराम नामक किसान ने। उसके नतत्व मे क्सिाना ने लगान देना वद कर दिया था, कि तु सन 1660 मे औरगजव ने सना र बल पर उस विद्रोह को दवा दिया था। इसके सिफ नौ वप वाद, जिला मथुरा के पिसाना न तिलयत गाव के किसान गाकुला के नेतत्व म, औरगजेब के शासन को चुनौती दी । बीम हजार किसान मारे गए। गावा की महिलाआ ने युए तथा तालाबो म भूदकर मौत को गले लगा लिया पर मुगत-सेना के हाथा वेइज्जती नही सही। औरगजेब स्वय दिल्ली से चलकर वहा गया था और गोकुला विरोधी अभियान का सचालन किया । गोकुला और उसके अनुयायी किमान मुगल फौज के सामने हार गए थे। लेकिन उनकी भस्म ने एक ऐसे व्यक्ति को जन्म दिया जो मुगल साम्राज्य के स्तम्भा को उखाड कर एक किसान राज्य की स्थापना करने में समथ हुआ था। उसने गिद्ध पर दिया था कि बड़ी से बड़ी जन विरोधी ताकत को भूमिसात क्यिा जा सकता है जनता के दुश्मन को धूल चटाई जा सकती है और उसके विनाश मे एक नयी ताकत को उभारा जा मक्ता है। औरगजेब के भ्रष्ट मुगल शासन के विरोध में राजाराम का उदय हुआ । उसने वह गनती नहीं दुहराई जो नदराम तथा गोकुला ने की थी। वह गलती थी, मुगल-फौज के सामने जमकर लडाई लडना । मवस पहला काम उसने यह किया कि जिला भरतपुर (राजस्थान) के वतमान ग्राम सिनासिनी, थून तथा मोगर आदि मे धने जगला के बीच अपनी गढिया बनवायी, उनम क्सिाना को सैनिक शिक्षा दिलाई, उनका अनुशासन सिखाया और गुरिल्ला युद्ध के लिए उनको प्रशिक्षित किया । इसम कोई शक नहीं कि ममूचा क्षेन जाट बहुल था अत उसके सानिको में अधिक्ता जाटा की थी पर अय कोमा वा अभाव न था। सनिक कायवाही के लिए जाट सर्वाधिक उपयुक्त थे और दूसरे प्रकार के वामा के लिए अय लोग । साता जातियो के मयोग से राजाराम आग वढा था।

14 उसने मवसे पहले जागरा के गवनर हाजी मुहम्मद शफीखान को आगरा से वाहर न निक्लन के लिए मजबूर कर दिया। आगरा स बाहर जान वाली सडका वी नाववादी कर दी और इस बाद मिक्दग (आगरा) ये फौजदार मीर अब्दुल फजन पर आक्रमण करके उसके हथियार तथा खजान का अपने मात्र मन कर लिया और रात के अधेरे मे ही जपने साथिया के साथ जगला मे छिप गया। इम सफलता मे उनके इरादे तथा साहस बढ़ गए। राजाराम की दूसरी जीन अधिक उल्लेखनीय थी। इमाम कुली आगरखा तूरानी नामक मशहूर मुगल सेनापति, सम्राट औरगजेब की महायता के लिए दक्षिण की ओर जा रहा था। उसके साथ बडी मेना, खजाना तथा हथियार थे। धौलपुर के पास वह ठहरा हुआ था। उसके अत्याचारा से इलाके की जनता कराह रही थी। राजाराम ने रात के अधेरे म उसके पड़ाव पर हमला कर लिया । आनन फानन मे राजाराम के सनिक उसके हथियारा तथा खजाने पर टूट पडे और इमाम कुली जागरखा तुरानी उसके दामाद तथा अस्सी अयो को मौत के घाट उतारकर भाग गए। इस तरह, वह धीरे धीरे मुगल शासन की नाक नीची करने लगाया। गजाराम की गतिविधि को रोकन के लिए सम्राट औरगजेब न मई मन् 1686 मे खाने जहा कोक्लतास जफरजग को नियुक्त किया था। जफरजग अपनी सेना के साथ यमुना के किनारे। ठहरा हुआ था कि गजागम ने रात के अधेरे म, हमला कर उसको भी धूल चटा दी। मुगल सिपाही जब तक तैयार होत राजाराम और उसर सैनिक अपना काम करके भाग लेते थ । जफरजग की विफलता स मम्राट चिंतित हुआ था। उमन जपने बेट जाजम को राजाराम के दमन वी नाना दी थी। वह बुरहानपुर तक पहुंच ही पाया था कि उसका वापस बुला लिया गया। इसके बाद, उसके सनह वर्षीय पुत्र वदार बम्त का राजाराम के दमन हतु भेजा गया। वदार वख्त जभी तक आगरा पहुच भी नहीं पाया था कि राजाराम न सन् 1688 के प्रारभ मा महावत या वी पदवी धारी मीर इनाहिम हैदराबादी का जास्मिा हमल मे छका दिया। महावत खा पजार सूत्रा की गवनरी पर जा रहा था कि अपना सारा साज समान खो बैठा। मुगल सेनापतिया को निरतर पराजया का कारण एक ओर तो उनकी विलासिता क्रूरता और नृशस सहार था और दूसरी जोर जनता का आक्रोश । जनता की सहानुभूति तथा मयाग राजाराम के साथ था। वह उसकी विजय जोर मुगला की हार दखना चाहती थी इमलिए कि वह स्वाभिमान तथा स्वाधीनता के साथ जीना चाहती थी और राजाराम उनरी स्वाधीनता तथा सम्मान का प्रतीक बन गया था। उसके किसी सनिक न मुगल सैनिक तथा .

सेनापति के अलावा कभी किसी को न तग क्यिा और न लूटा। इस प्रकार राजाराम, एक सीमा तक, ब्रज-क्षेत्र में वही वातावरण पैदा करने में समय है। सवा था, जो शिवाजी न महाराष्ट्र मे पैदा कर दिया था। उसने, इस क्षेत्र के उन तमाम मुरला, सामत, गढीदार नवाबा को मार डाला जो बह्न पटिया को छीनते थे अथवा छीनने के पड्यत्रो म शामिल हात थे । उसन अऊ के क्लेिदार लालवग को मार डालाजो इलाके मे वेईमानी तथा मक्कारी के लिए विख्यात था। राजाराम की लडाई न तो इस्लाम के साथ थी और न इस्लाम के सच्चे अनुयायिया के साथ । उममा विरोध उन लोगो के साथ था, जो एव धम के दाग की रक्षा के लिए दूसर धम को मिटाने पर तुल जाते है, अथवा इसान इसान के बीच धम और जाति की खाई खोदकर, इसान के लिए घणा पैदा करात है । वेदार बख्त के आगरा पहुचने से पहले राजाराम अपनी स्थिति मजबूत और लेना चाहता था। इसलिए उसने अपने सैनिर तथा सामग्री को मौके के लिए तैयार कर लिया था और दूसरी ओर शेखावाटी के शेखावत तथा चौहान राजपूता में जमीन के बटवारे स साधित झगडे म मध्यस्थता करके अपना पक्ष मजबूत बनान का प्रयास कर रहा था । लक्नि दाना जातिया का पारस्परिक सघप रोमान जा सका। शेखावता का भुगत तथा मवान का नवाव समझौता नहीं करने दे रहे थे। उनके हित, दोना जातिया को लडाये रखने म सुरक्षित थे, अत मेवात के नवाब ने शेखावतो को सनिक सहायता दी और उनको चौहाना से लड़ने के लिए मजबूर कर दिया। विवश होकर चौहाना ने राजाराम स सहायता मागी। राजाराम ने उनको सैनिक सहायता दी और मेवात के नवाब तथा शैखावता की सम्मिलित मेना को हरा दिया। विजय चौहाना के हाथ लगी, किंतु विजय की खुशिया अधूरी रह गई। अन्तिम यात्रा के लिए प्रस्थान शेखावटी के चौहान तथा शेखावत राजपूता सघष मे चौहाना की जीत के वाद, विजयी के रूप म, राजाराम अपने सनिवा तथा तडाईवे क्षेत्र का निरीक्षण कर रहा था। वह घोडे पर सवार था। अधेरे का लाभ उठाकर झाडी म छिपे किसी सिपाही ने उस पर गोली दाग दी। गोली लगने से उनका स्वग वास हो गया । इस तरह उनकी जीत को खुशिया अधूरी रह गइ । साथ ही अत्याचारी मुगल शासन के विरुद्ध शेखावटी तथा ब्रज-क्षेत्र में सम्मिलित तथा सगठित विरोध की कल्पना भी अधूरी रह गई। लेकिन उसने मुगल शासको तथा सेनापतिया की जनशक्ति के हाथो हार को जो परपरा प्रारम्भ की थी वह आग बढती रही। वह रुकी नही । सिनसिनी मथुरा आगग के यहादुर किसान राजाराम के ही 16 याादानी रामा मे तित्व म मुगम शारा या तब तम चुनौती दत रह जब तर वि उगन सी शनि या स्पीपार हो पर लिया और पूरामन समस्त प्ला म ध्रप्ट शामया, दताना, यसापारी नवाया, हिन्दू नारिया ग सूट करन वाले फीरा और तवीया पर रहन यार याजिया मा इलार स प्रभाव परम नही कर दिया। डीग व पाम अऊ नामक स्थान में विदार लालवा सामाखर राजाराम ने इलावे म स्वाधीनता तथा शान्ति का वातावरण पदा कर दिया था। वह माम्राज्य विराधी एव लोपनत्रमुग्री प्राति वा अग्रदूत बनपर उत्पन्न हुआ था । उमन शताब्दिया स दाराता तपा शोषण से उत्पीडित जनना या मुपित एव स्वाधीनता यो राह दिपाई थी। यथाथ म यह हमार राष्ट्र या एम गौरव है हमारी गगा जमुनी संस्कृति का उज्ज्वल प्रतीय है और हमार इतिहास या एक गौरव शिखर, जिसको ढक्न तथा अध्यार म रमन ये अनय प्रयास किए गए हैं। लेकिन क्या वह अधपार म रह पाया है। हमार सास्कृतिक मूय की पहली किरण ता उमी पर पडती है। -- शेरे पजाब, महाराजा रणजीतसिह महाराज रणजीत सिंह भारत की एप ऐसी सपूत सतान थे, जिसने कभी चाणक्य, चद्रगुप्त तथा महाराजा सूरजमल की तरह स्वाधीन तथा शक्तिशाली भारत बनाने का स्वप्न देखा था और अपनी सारी शक्ति इस स्वप्न को पूरा करन पर लगाई थी। उन पर भारत का प्रत्येक आदमी गव कर सकता है। विशेषत आज 'युग म, जबकि पजाब आतक्वाद की ताक्तो से है और देश सकोणतावादी मनावृत्तियो से आक्रान्त है। यदि आज रणजीतसिंह होते तो निश्चय ही देश को शक्तिशाली एव सगठित बनाने में महान योग देते। जम, शिक्षा तथा परिवार महाराज रणजीत सिंह का जन्म सन् 1780 मे हुआ था। इनके पिता का नाम महासिंह और माता का नाम राजोर था। महासिंह जाट सिखा की मुकर चक्यिा मिसल के एक बहादुर आदमी थे। यह मिसल पजाब को सुवरचविया नामव गाव वे लोगा ने बनायी थी। सरदार चरतसिंह इस मिसल के नेता थे। सुवरचरिया अथवा सकरच द्र नाम गाव अमृतसर के पास है। सरदार चरतसिंह ने धोडे से ही समय मे इतनी ताक्त पदा कर ली थी कि वह पजाव के जाद सिखो की दूसरी ग्यारह मिसलो के सचालको मे प्रमुख मान जान लगे थे । सरदार चरतसिंह के पास हर समय ढाई-तीन हजार सनिम लडाई तथा अपनी रक्षा करने के लिए हर समय तयार रहते थे। रणजीतसिंह की मा राजकीर (राजक्वारि) जीद ये राजा गजपतसिंह की बेटी थी। जिस समय इनके पिता महासिंह ना-बालिग थे उस समय उनकी माता देशो राज की व्यवस्था करती थी। वह बहादुर और कुशन प्रशासक थी। रणजीतसिंह को ये गुण विरासत मे अपनी दादी तथा पूर्वजा से मिले थे। वह पढ़े लिखे नही थे किन्तु राजनीतिक सूझबूझ और राज की व्यवस्था करने की मला मे यह नाजवाब थे। महाराज रणजीतसिंह के वश वक्ष के बारे मे इतिहासकारो की मायता है निमहाराज शालवाहन (शालिवाहन) इनके आदि पूवज थे। यह स्यालकोट के 18 . राजा । या जोगिमा गना EITH IT गया का जोराटामस्थामामांगानागाभागांनी मरमागाना पुष मारा था और परी। गेमा पाप या उपमा और "राजानी। जाती ये या गा गा. पा, पी, पासा, मागमा मात्र जापागल बोस या गदर पामा, पारा, पुला, पिना आलिई रारा ग परिवार म TT पिला या पिशामिह र पुन का नाम पमिद पा गती गिर जार! म गुपगमा मिगन रे गरारमा सामेरा महागिर पा । मागिह मोहीपार और रणजीतमिहमा मिला थप प्राप्त है। महागन म पूर्वानीपजा 1746 गांगी नागा पापा छोडपर वीरायाद में पारा गुण्TIRT गाय म था यस । गत् 1488 में रायगयारा हो गया था। इनो या नादयनी । सागी जा मी एर टुागे गडी बरसे राज्य ग्यापित रामी याजना यगाई। सूट मार भी इम याना TIME अग पा । मा 1515 मधार म उसी मरमु । गई। इनके बाद पुष गालिय सागी जाटा पा सरदार पा गया। उगन पर्याप्त मम्पति पत्र पी। 1549 म उगा स्याम हा गया । गर पश्चात् इना वेटा विर गुण्ड गाव शायर गुजगन याला में पाम बसे गाव गुरिया म आगर रत्न लगा। यह मत स्वभाव का व्यक्ति था, उमन शान्ति या जीवन व्यतीत किया। सन् 1578 म उसका स्वगवास हो गया। इसम दो वट थे- पहला रामदास और दूसरा प्रेमू । पहला बेटा शात स्वभाव का था। उसन व्यापार करना शुरू किया। उसये दा-बेटे तलू और नी युयायस्था में ही स्वग सिधार गा और तोमर वेटे तलमल न याप का पेशा व्यापार रामाल लिया । सन् 1620 म गातारा भी स्वग गिधार गा ! इनवे दा वटे थे-ए वाय दुमरा यारा । पहला साहसिका ये दल म शामिल हो गया और दूसरा यारा गुजरान वाता के एक भका का शिष्य हो गया। जतिम समय म उसने अपने बेटे बुद्धा को सिष धम मे शामिल होन या आनेश दिया और वह सन् 1762 म सिप धम म दीक्षित हो गया । वह साहसी वीर तथा पगक्रमी था। सिखा के एक वग ने उसको अपना नेता मान लिया। वह भी साहसिक कार्यों में उलझ गया। उमरे पास दसू नामवण्य शानदार घोटी थी जिसके द्वारा उसले पचासा वार झलम चेनाव तथा रावी नदियो को पार किया। सन 1716 मे उसकी मत्यु हुई। उनकी पत्नी सत्यवती ने ऐसे वहादुर पति के वियोग मे जीविन न रहने की इच्छा से छानी में तावार भोवकर प्राणो या आत कर दिया था। बोधमिह तथा चदासिंह नामक उनके दापुत्र थे । दोनो ही पिता के समान वीर थे। उहोंने सुक्रचकिया गाव को फिर से व्यवस्थित किया। अपने भाइयो को एकत्र करके 19 उसने एक टुाडी पडी कर ली और आसपास के गावाको अधिकार में ले लिया जौर गपिंडी से सतलज तक अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। मजीठ के सामी जाट गुलाबसिंह की बेटी से उनका विवाह हुआ था। वोधसिंह महागज सूरजमल वा समाालीन था। उसन नवाब कपूरसिंह के गाध मितपर जहमदशाह अब्दाली वे आक्रमण का प्रतिरोध दिया था। सन् 1848 म फिगाना के साथ लटते हुए गोली लग जाा के कारण उनकी मृत्यु हो गई । उस समय उनका पुत्र चरतसिंह सिफ पाच वप का बालक था। उसने भी सन् 1754 के आसपास सासी जाटो की टुक्डी बनाकर अफगान आत्रमणकारियो पा सामान छीनना प्रारम्भ कर दिया। अब्दाली के विलेदारो पर उसका इतना डर छा गया कि पाली के सरदार मुहम्मद यार खा ने अपने राज्य का प्रबंध चरतसिंह के हाथों में सौंप दिया और स्वय पद्रह सवारा के साथ उनकी टुक्डी म शामिल हो गया। इस समय चरतसिंह के पास सिफ 150 घुडसवार सिपाही थे। इनके बल पर ही उसने गुजरान वाला ये किले पर अधिकार कर लिया था। वहीं अमीरसिंह नामक सासी जाट की क्या के साथ विवाह कर लिया। अमीरसिंह भी एय वीर सैनिक था। दोनो मिलकर वहा के मुगल सरदार पा मपाया पर दिया । लाहौर वे मुगल शामर न इन दोनो की वढती ताकत को कुचलने के लिए 7 पर हमला कर दिया विन्तु वह भी इनके सामने ठहर न सका। वन भाग खडा हुआ। उसमा बहुत सा सामान इन दोना के हाथ लगा। इस प्रकार उमीरसिंह और चरतसिंह के नेतत्व मे पजाब वे जाट भी मुगल तथा अफ्गातो के शोषण तथा गुलामी से पजाब वी जनता का उसी प्रकार छुटकारा दिला रह थे, जिस प्रकार बनी चूरामन तथा राजाराम न भरतपुर क्षेत्र म दिलाया था। पानीपत की तीसरी लडाई म जिस प्रकार मगठा और मुगल ताकता को धराशायी करसे अहमदशाह अ दाली महाराज सूरजमल को मिटान पर तुला था और महाराज उसे अपनी बटनीति से उल गाय हए थे, उसी तरह पजाव में महाराज रणजीतसिंह के बारा चरतसिंह, जस्सासिंह तथा मगी मिसल के जाट सिख सरदारो को अपनी जार करके, पानीपत स लौटत हुए अब्दाली वो हार का पाठ पढाने की योजना मे लग थे । उन्होंने सबसे पहले अपने बाल बच्चो राधा माल असवाय को जम्मू भेज दिया। आसपास के अफगान क्लेिदारो को पोट पाटकर कमजोर बना दिया ताकि अब्दाती से लोहा लेते समय उनके विरद्ध अब्दाली की सहायता न पर सके । इस प्रकार पूरी तैयारी के साथ उन्हान अदाली की फौज पर हमला करखे उसको परेशान करना प्रारम्भ कर दिया था। जिम समय अगली पी पोज व्यास नदी को पार कर रही थी उस समय चरतसिंह के नेतृल मे पजावी जाटो ने इतनी ताक्त और चतुराई के साथ उम 20 पर हमला किया था कि अफगाना के पैर उखड गए। हिदुस्तानी जनता के लोगा को गाजर मूली की तरह काटकर फेन देने वाले, अफ्गान सिपाही सारी हकडी भूल जान बचाकर भागन लगे थे और हजारो जाटो को नलवारो के शिकार हुए। जान बचाकर लाहौर पहुचने वाला अन्दाली जाट सिखो को पाठ पढान के लिए मन मसोसकर रह गया था। यहा सिफ विचार करने की बात एक है कि ब्रज की भूमि पर वह सूरजमल के सिपाहियो से पिटा जो उसकी फौज पर पीछे से हमला करते थे और जब उसकी सेना उनका पीछा करती थी तो दूसरी दिशा की ओर से सूरजमल के मिपाही अफ्गान सैनिका पर हमला बोल देते थे और इसी तरह वे उसको पीटते रहे और अत मे उसको लौटने के लिए मजबूर कर दिया। यही काम पजाब के जाटो ने किया और अब्दाली की दिल्ली विजय की खुशी को खत्म कर दिया तथा उससे दिल्ली की लूट के माल को छीन लिया। यदि महाराज सूरजमल का सुझाव मानकर सदाशिव राव भाऊ बीवी बच्चो का युद्ध के मदान म न ले गया होता और उनको महाराज सूरजमल द्वारा प्रस्तावित भरतपुर राज्य के किमी मजबूत विते म सुरक्षित रख दिया होता तो उसका हार का मुह न देखना पड़ता। अफ्मोस इस बात का है कि सूरजमल तथा चरतसिंह जैसे दो किसानो ने जिस कुशल रणनीति को अपनाने की बात सोच ली वह सदाशिवराव भाऊ होल्कर तथा सिंधिया जैसे कुशल सनापतिया के दिमाग मे क्या नहीं जाई और जब महाराज सूरजमल न उनका वह रणनीति बताई तो उस समय उसकी उस पर आखें क्यो नही खुली? इसको दश या दुर्भाग्य ही माना जायेगा। काबुल पहुचकर अब्दाली ने, पजाव व जाटा को पाठ पढ़ाने के लिए नुरुद्दीन नामक एक सरदार यो बडी फौज ये साथ भेजा था। उसन यहा की जनता को लूटना प्रारम्भ कर दिया। जब चरतसिंह को इस बात की खबर लगी तो नुरुद्दीन का मुकाबला करने के लिए पह उसको भयकर लडाई म हराया। वह भागकर स्यालकोट के दिल म जा छिपा तो चरतसिंह ने किले को घेर लिया। गुरुद्दीन रात के समय छिपरर जम्मू की ओर भाग गया । उसरे सनिक मामान का अधिकार मलने के बाद चरतसिंह न चक्वान और पिण्डादन था यापन पिया । बाट साबधा रापा राजा काकोट नामा स्थानोको अधिकार मलिया। यजीगवाद तथा सहमदाबाद का वह पहले ही अपने काबू म बरचुर थे।दोन यी हार या वाला लन पे लिए लाहौर का मूबदार स्वाजा हमैयद पोजमेरर गियाव विरुद्ध यढ़ा मेरिन परतमिह न उसको भी ठान लिया। मातीजा पर हुआ रिजोपरगान परने वाले अफगान सपा मुगल गागर परतगिरम पालग। यह पजाब म आजाती और मम्मानपा प्रतीप ? बनरर उभग्न मग गया।

21 जम्बू के राजा रणजीत देव से उसके बडे बटे को राज दिनान के लिए हुई लडाई म अपनी बन्दूक की नली फट जान स चरतगिह घायल हुए और स्वग सिधार गए। उस समय महासिंह की अवस्था वेवल दस वष की थी। सन् 1774 म चरतसिंह का स्वगवास हुआ था। इसके एक वप बाद उनके पुष महासिंह का जीद के राजा गजपतसिंह को क्या राजकुवरि अथवा राजकौर के साथ विवाह हुआ। महासिंह की नाबालिगी म राज यावाम उनकी मा दशा चलानी थी। वह वीर एव साहमी महिला थी। उसने सरदार कहैया तथा बारह वर्षीय महासिंह की सहायता से रसूलनगर में मुस्लिम शासक पीर मुहम्मद को ठिकान लगाया और उसस वह तोप छीनली जिसको दन की आनाकानी वह पर रहा था । इस ताप को झण्डासिंह नामक एक जाट सरदार न जगली स छीनकर अमानन व तौर पर पीर मुहम्मद व पास रख दिया था। महासिंह न रमूलपुर का नाम रामनगर तथा अलोपुर वा अकालगढ रख दिया। साथ ही, पौर मुहम्मद के राज्य को अपन राज्य म मिला लिया। इस घटना से एक ओर महासिंह को योद्धा के रूप म ख्याति मिली, दूसरी ओर दो वष बाद पुत्र रत्न पी प्राप्ति हुई । यही पुत्र आगे चलकर रणजीतसिंह के नाम से विख्यात हुआ। जिसको स्वतन और शक्तिशाली पजाव बनाने का श्रेय है। बचपन म बालक रणजीतसिंह के भयकर चेचर निकली, जिसम उनकी एक आप मारी गई और मुह पर दाग बन गए, वितु वालान्तर म उनसरी शारीरिक कुरूपता का उनके वीरता तथा दश भक्तिपूण कामो ने धो दिया। वह जाट जाति, सिख धम, पजार और अन्तत दश के लिए गारव म प्रतीक बन गए । उन दिना मुलान और बहावलपुर पर भगी-मिसल + सरदारा का अधिकार पा, तैमूरशाह के सामन व नही ठहर पाए । उनकी हार का कारण वीरता अथवा रणकौशल का अभाव नहीं, वरन् आपसी फूट थी। व एकजुट होकर तमूरशाह का सामना नहीं कर पाए थे। इसलिए महासिंह ने उनके ईशाखेल तथा मूसासेल नाम ठिकाना का हथिया लिया आर झग पर हमला वाला तथा बन्दूक बनान के लिए उन दिनो मशहूर मोटली नामक स्थान वा काबू म कर लिया। उन दिना जम्बू का राजा बजराज अनेक प्रमाद तथा ऐयाशी म फसकर जनता को परेशान कर रहा था, महासिंह की इच्छा हुई जनता के दुखा का दूर कर दिया जाए, कि तु ब्रजराज द्वारा, महासिंह की सहायता से अपने खोय हुए इलाके को पान की इच्छा से की गई प्राथना के कारण महासिंह ने उस पर हमला नहीं किया, पर ब्रजराज क हैया मिसल के सरदार हकीकतसिंह को जोत नहीं सका। पाडे दिन बाद हकीकतसिंह ने महासिंह को ब्रजराज पर हमला करने क लिए राजी कर लिया, लेकिन महामिह में पहुंचने से पहले ही उसन नाक्रमण कर दिया । इस पर महासिंह उससे नाराज हो गए। महासिंह द्वारा जम्मू की 22 जीत समिती सम्पत्ति को अक्ल ही ले लन के कारण हकीकत राय का पुत्र जयसिंह बहुत नाराज हुआ। जमृतसर के पवित्र तालाब म सान परा गए महामिह न सिंह स नाराजगी दूर करन क लिए भी रहा पर वह नहीं माना। वह जम्मू की सम्पत्ति का आधा भाग मागता था और महामिह उसमा दन लिए तयार नहीं था। अत वान यहा तर पहुची वि दाना जयसिंह ये निवारा स्थल बटाले पर लडाई के मैदान म आ गए । जयमि' की हार हुई, उसका बेटा गुम्बख्शसिंह मारा गया। नौगहरा नामा स्थल म जयसिंह न फिर महासिंह पर हमला किया किन्तु फिर हार पानी पडी। इसप बाद दोना म सधि हुई, जमिह का साधी शर्तो म कागडे का मिला मसारसिंह को तथा रामगढिया का नस्सासिंह का दनापडा। दोना मिसलो योक्टुता मिटान के लिए गुरुयशसिंह की पत्नी सदामोर न जपनी वटी महताब मोर की सगाइ रणजीतसिंह के साथ वर दी। सन 1788 म भगी मिसल क मरतार गूजरसिंह के स्वगवास र बाद, उनक पुन मावसिंह से भी महासिंह की लड़ाई हुई । सामिह सहादरा के किल स युद्ध पर रहा था और मतासिंह तीन माह तर उमका घरा डाल रहा। इसी दौरान वह बीमार नोर गुजगन वाला ना गया, जहा उसका स्वगवास हो गया। चरतसिंह तथा महामिह की वीरता के कारण सुवरचक्यिा मिसल का महत्त्व जय सभी मिसलो को अपक्षा अधिर हो गया और यह मिसल दूसरी मिसला में बड़ी तथा प्रभावशाली मानी जाने लगी। महाराज रणजीतसिंह का बचपन उनके पिता महासिंह जी या स्वगवाम सत्ताइस वप वी जायु म हो गया था । उस समय इनकी उम्न घेवल बारह वप की थी। अत उनका सालन पालन मा मतावा द्वारा किया गया । दीवान लखपत राय इनक परामशदाता थे। सास सटाकर राज वाज मे सहायक थी। कुछ ता लडाइया तथा सघर्षों म निरतर लगे रहन के कारण और शिक्षा दीक्षा का अधिक प्रचार न हाने के कारण रणजीतमिह स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं कर सके । सत्तरह वप की आयु मनाई सरदार रामसिंह की बटी + साथ उनकी दूसरी शादी कर दी गई । अव उनक सामन दा समस्यायें थी, एक ता कृतघ्न लखपतसिंह स छुटकारा पाना और दूसर सास तथा मा की छत्र छाया स निक्लवर स्वतत्र व्यक्तित्व का निर्माण करना। इनके समाधान के लिए अपनाय गये रास्त से उनके बुद्धि-कौशल का अदाज जगता है। जयपत सिंह को नापन या भयार युद्ध म भेट दिया, उसनी मृत्यु हो गयी और सास तथा मा के यवन स मुक्ति रामकाज की स्वय व्यवस्था करके पा ली। रणजीतसिंह का स्वास्थ्य बहुत अच्छा था। बीस वर्ष M जजाला से मुक्त रह थ और अपार शारीरिक शक्ति सचपन किया था हुराहस्थ के सत्ता और अधिकार की दिशा म बढते उनके कदम चरतसिंह बाद म महामिह के नेतृत्व म, सिख पजाब के अधिकाश भाग पर अधिकार जमात गए थे। यह बात अहमद शाह अब्दाली के पात का सली, जा खानजमा या के नाम से काबुल का शासक था। उसन अपने दादा द्वारा जीता इलाका वापस लने की याजना बनाई आर 1795-1796, तथा 1797 में लगातार तीन बार पजाव पर हमले क्यि । उसके हमले के समय सिख जगला तथा पहाडा मे छिप जाते थे और उसके जान के बाद इलावे पर फिर अधिकार कर लेतथे । इस प्रकार अपने जन तथा धन की हानि किए बिना, व जपना प्रभाव बनाय रख रहे थे। रणजीतसिंह भी इस रण काशल मे भाग ले रह थे। वह एक आर ता सतलुज पार के क्षन पर अधिकार करने म लगे थे, दूसरी तरफ पानजमा के साथ सधि की बात चला रहे थे, इस प्रकार महाराज सूरजमल की नीति पर आग बढ रह थे, यानी उनक एव हाथ म मधि की सफद झण्डी थी, दूमर म तज तलवार। इही दिना, शाहजमा को सूचना मिली थी कि इरानी लाग अफगानिस्तान पर हमला करना चाहत है, अत जब वह अपने घर का बचान के लिए कावुल की ओर लौटने लगा था, तभी झलम म बाढ आ गई और उसको 12 बढिया ताप नदी म डूब गइ। उसन रणजीतसिंह को सदश भेजा कि अगर वह उसकी तोपे मदी स निवलवार पशावर भिजवा दग, ता वह उनवा लाहौर तथा उसक आसपास का इलाका सौप देगा सौर उनको राजा की उपाधि भी दगा। रणजीतसिंहजी न उसका आठ ताप उस पास भेज दी और चार अपन पास रख ली हागी। शाहजमा ने अपने वायद का निवाहा उसन खिताव, सनद और भट भादि रणजीतसिंह को भेजी। इतन पर लाहौर पर असली अधिकार ततवार के बल पर ही करना पड़ा। छत्ता का सरदार हसमत या और रगजीतसिंह शाहजमा के पाबुल लौट जाने के बाद, एक दिन, महाराज रणजीतसिंह शिकार से लौट रहे थे पिता के मरदार हमगत या न छिपार, एव उन पर हमता पर दिया। महाराज ने ठीक मौरे पर दाव वा लिया, पर पानी की - 24 । लगाम कट गई यदि वह जरा भी चूक जाते तो तलवार उन पर ही पडती । उसने दूसग वार करन को हाथ उठाया ही था कि महाराज वी तलवार से उसका सिर गदन से अलग हो गया। महाराज ने उसका सारा इलाका जब्त कर लिया। लाहौर पर अधिकार हालाकि खानजमा के खिताब और सनद के आधार पर लाहौर अब रणजीतसिंह का पा, किन्तु उस पर अधिकार अभी दूसर लोगो का था। इसी बीच, एक ऐसी घटना घटी कि महागज रणजीतसिंह को सैनिक बल से, लाहौर पर अधिकार करना पड़ा। सिखाकी भगी मिसल क सरदारा ने, अहमदशाह अब्दाली के गवनर को, जबकि वह रान क समय नाच देखने म व्यस्त था, एक हमले म मार डाला था और लाहौर जधिकार कर लिया था। से कहैया मिसल के शोभासिंह भी सहायता के लिए पहुच गए थे। इस तरह लाहौर पर तीन लोगा का कब्जा हुआ किन्तु उनके उत्तराधिकारी अयोग्य सिद्ध हुए जोर लाहौर पर ठीक से नियत्रण नही कर पाए । जिस समय शाहजमा स लाहौर क्षेत्र रणजीतसिंह को मिला था, उस समय चेतसिंह, जौहरमिह जोर साहबसिंह लाहौर के शासक थे । चेतसिंह के अलावा, शेप दोना असावधान तथा खाने-पीन म मस्त रहने वाले लाग थे। पर चेतसिंह से नगर के दुल मुसलमान चौधरी नाराज थे और हर समय उसके विरोध के लिए तयार रहत थे । इन चौधरिया से शहर के खत्री परिवार नाखुश थे । उहोंने चेतासिंह स शिकायत की कि चौधरी बदरद्दीन उसके विरुद्ध शाहजमा के पास नगर की पबरें भेजता है । शिकायत मिलने पर, चेतसिंह ने मिया बदरुद्दीन को गिरफ्तार पर लिया । शहर के अनेक प्रतिष्ठित लाग बदरुद्दीन को मुक्त कराने की कोशिशा म चैतसिंह के पास भी गए, लेकिन किसी की बात नहीं सुनी गई। इस नगर क प्रमुख मुस्लिम चौधरिया ने चेतसिंह के जुल्म से मुक्त कराने की प्राथना महाराज रणजीतसिंह से की। नगर व नागरिका की प्राथना और सहयोग के आश्वासन पर महाराज रणजीतसिंह न, अमृतसर से पाच हजार सैनिक लाहौर का रवाना कर दिए और स्वय न वजीरया को बारादरी पर डेरा डाल लिया । सन् 1799 के एक दिन, सबरे के माठ बजे उनकी सना न लाहौर की ओर कूच किया। इनकी फौज में स्वागताप मीर मुदरम, मुहम्मद आशिा और मोर सादी नामर तीन चतसिंह विरोधी सनिवान शहर से दरवान पोल दिए। सना न नगर म प्रवेश किया और उस पर अधिकार पर लिया। इसरे पान महाराज न मुनादी पारादीनि शहर में विमी मजर तपाजानिये आदमी को तग रहो पिया जायेगा । इसपा बडा मारल मगर पड़ा भोर महाराजपी प्रगसा घर पर महान लगी। बहुत दिना र बाद, लाहौर मे सुशासन की स्थापना हुई और मद कौमा ने राहत की सांस ली। कसूर, जम्बू, स्यालकोट, दिलावरगढ आदि की फ्तह लाहौर पर लोकप्रिय शासन की स्थापना कर लेन से महाराज रणजीतसिंह का प्रभाव बहुत बढ गया था और वह दूसर राजा तथा नवाया की नजरोम काटे वर तरह क्सक्त जा रहे थे । बीस वप की आयु मे, उनकी इस सफलता पर दूसर शासका के सोने पर साप लाटने लग गया था । उनके विरुद्ध पडयान परन पर लग गए थे। एक दिन रामगढिया मिसल के जस्सासिंह, ममतसर के भगी मिसल के गुलाबसिंह, गुजरात की भगी मिसल वे साहसिंह, वजीराबाद के जारावरसिंह और कसूर के निजामुद्दीन न अमतसर स लाहार की दिशा म रणजीतसिंह के विरद्ध कूच कर दिया । वे जानते थे यि युद्ध के मदान मे महाराज रणजीतसिंह स लाहा लेना आमान काम नहीं है, अत उ होने एक षड्यत्र की रचना की। उहाँने महाराज को संदेश भेजा कि वह हमसे भेंट कर जाये। भेट होन के बाद, आपसी मन मुटाव भी दूर हो जायेगा और वे अपने घरा को वापस चले जायेंगे। महाराज ने उनका निमत्रण स्वीकार कर लिया और उनके पडय त्र को विफल करने की योजना भी बना ली। वह इतन चुनीदा सिपाही साथ लेकर भेंट करन गए कि किसी का साहस नहीं हुमा वि महाराज की ओर हाथ बढाता । इस बाद, खुलकर तडाई तो नहीं हुई, पर भीतरी युद्ध कायम रहा। अधिक शराब पीने से गुलाबसिंह की मत्यु हो गई । उसका लावा महाराज के हाथ लगा। इसी बीच महाराज को मालूम हुआ कि पडयत्र की जड म कसूर का निजामुद्दीन था। अत महाराज ने सूर पर आक्रमण कर दिया। वाय निजामुद्दीन उन पैरा पर आ गिरा । महाराज ने उससे कर तेन और मागन पर सैनिक सहायता देन के के आश्वासन पर उसको अपन अधीनस्थ शासक बना लिया। इसके बाद, महाराज नारूवाली, बेरूवाल तथा जस्सरवाल हात हुए जम्वू पहुचे। जम्मू से चार मील की दूरी पर डरा डाला । भयकर परिणाम की कल्पना करके, जम्मू का राजा बीस हजार रपय तथा एक हाथी महाराज का भेंट करने आया। उसका अपना क्षत्रप बार वह स्यालकोट की आर वढ । स्यालकोट का मुस्लिम शासक एक ही चपेट मे हार मान गया। इसके बाद, वह दिलावरगढ की ओर बढे । उसको एक झटके म जीत लिया गया। यहाभा सोढी शासक मरसिंह अधीन हो गया।

लाहौर का दरवार और महाराज की उपाधि सन 1801 के आसपास सभी शासक रणजीतसिंह का लाहा मान चुक थ । किसी म साहस न था कि वह उनके विरुद्ध सिर उठातो । अत आपन सन 1801 म लाहौर में दरबार क्यिा। चारा ओर के सरदार उपस्थित हुए। सबन उनका भेंट दी । पुरोहितो न मन पढे राजतिलक किया और उनको महाराज घापित किया गया। महाराज न मनिक सलामी ली। इसके बाद लाहौर मे टकसाल की स्थापना की गई। यायालय स्थापित किया गया। काजी निजामुद्दीन आर अजीमुद्दीन के भाई पर रुद्दीन को न्याय सचिव नियुक्त किया गया । इमामबरस को शहर का कोतवाल बनाया गया। दीवानी मोतीराम का मिली। इस प्रकार, महाराज ने समान रूप स हि दू तथा मुसलमानो का शासन मे हिस्सा दिया और वह उस गलती से बच गए जो मराठा विजेताला न की थी। अपनी पजाव विजय के बाद उ होने कमजोर मराठे प्रतिनिधिया को पजार म विठा लिया था, जो जहमदशाह अब्दाली के भयकर जामण का सामना नहीं कर सके थे और भाग खडे हुए थे। यदि, स्थानीय तथा वीर शासक होत ता अब्दाली की बाइ का रोक दत और मराठा शक्ति पानीपत की तीसरी लडाई के दुष्परिणाम से बच जाती। दरवार के बाद, महाराज के नाम का सिक्का जारी किया गया। उस समय खजान मे जा रकम थी, उसको दान कर दिया गया। अमृतसर तथा भगी मिसल के सिय सरदारो पर अधिकार सन् 1802 म महाराज न तरनतारन की यात्रा की जोर वहा अलूवालिया मिसल ये सदार फतहसिह व सात पगडी वदलवर मित्रता कायम की। महाराज रणजीतसिंह क बत्त प्रभाव के बावजूद भगी मिसल के सरदार उनस खार खाए हुए तथा नाराज थ । उनस निपटन के लिए महाराज न एक चाल चली । आपन उनका सबर भेजी रि लाहार पर लधिकार करत समय जमजमा ताप का मर पितामह चरतसिंह ये हिस्से म रखा गया था, अत वह मुझ वापस दे दी जाय । भगो मिसल वे सरदारा ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया, अत महाराज का उन पर हमला करन का बहाना मिल गया। अमृतसर की इस चढ़ाई म फतहसिंह उन साथ था। गुलाब सिंह की विधवा रानी न शहर व द्वार बद परा दिए। महाराज न लागढ़ द्वार से और गुलावसिंह न हाल दरवाज स तारिया ! पार मग्राम ग रात गिर पर अधिकार र भी लिया गया पिन्तु महाराज व नाश सपही लूट गार न हो गरी। रानी तथा उसरे मरदारोश महाराज रणजीतसिंह का अधिकार स्वीकार कर लियो । फगवाडा, होशियारपुर, लुधियाना तथा कागडा पर अधिरि महाराजा का सूचना मिली कि चूहडमल खनी को विधा फगवाडा म अपना स्वतत्र राज्य वायम करन की याजना बना रही है । सस पहल हि वह अपनी योजना का वार्या िरत करती महाराज न फगवाडा को अपने अधिकार म ल लिया आर विधवा को हरिद्वार भिजवा दिया। इस बीच ससारचत न हाशियारपुर तथा वैजवाडा पर हमला कर दिया। महाराज न भी उधर अपनी सगा भेज दो। ससारचद मारा गया आर २स तरह दोना पर महाराज का जरिवार हो गया। उन दिना लुधियाना पर राजपूत मुसलमान इलियस खा की दा विधवाजा का अधिकार या। महाराज न दोना को भगा दिया भार अपना अधिकार स्थापित कर लिया । उन दिना गोरखा जनरल जमर की नजर कागडा पर थी, जत उमन कागडा या आ घेरा । महाराज तुरत मना क साथ कागडा पहुचे । अमरसिंह का प्रतिनिधि जारावरसिंह महाराज स मिला, उसने महाराज क खर्च का दूना नजराना पश किया, सविन महाराज न उसका अस्वीकार कर दिया। इस प्रकार वागडा पजाव का जग बना, अन्यथा वह नपाल वा अग होता। इसक अतिरिक्त, उहान जडियाता, रायमाट, जगराम, तिलाडी आदि का भी जपने अधिकार में वर पजाव को सगठित किया। कुतुबुद्दीन को पाठ पढाना महाराज द्वारा पराजित कसूर वे गिजामुद्दीन पा साला कुतुबुद्दीन पजाब म महाराज रणजीतसिंह के राज्य को वुफ रामझता था। वह माता म, हिंदू मुस्लिम वैमनस्य पदा परसे वसूर म स्वत न राज्य स्थापना को योजा व17 लगा। महाराज न उस पर धावा वात दिया, उसन अधीनता स्वीकार कर ला थी, पर पाडे दिा बाद वह फिर शक्ति सटटी करा लगा था, तब महाराज न फिर उस पर हमला किया । एक महीन तक किले म पद रहा के बाद उसका हारना पडा । महाराज का दिल पर अधिकार हो गया। नाभा और पटियाला राज्यो मे सचि कराना सन् 1806 की बात है कि नाभा तथा पटियाला के शासर आपस म गड पडे । दायी लाई न पाडपरपजाय म वरती गिय ताात मो वम पर र सक्ती थी और इस प्रकार एक ओर तो अग्रेजो वे पजाब में प्रभाव तथा दूसरे 28 अफगान आक्राताओ के हमलो को आसान बना सकती थी। दोना ने महाराज रणजीतसिंह को झगडे या फसला करने के लिए बुलाया। महाराज अपनी सना लेकर गए। दोना मे कुछ लडाई भी हुई, लेकिन महाराज न बीच में पड़कर मामला सुलझा दिया और दोना म राजीनामा हो गया। इस प्रकार एव दुघटना टल गई। नकिया मिसिल के सियो के यहा शादी और हरियाणा प्रात पर अधिकार इतिहास का वह ऐसा युग था कि वेटी और रोटी देने स परम्पर लडाई झगडा, दोस्ती तथा भाई चारा म बदल जाया करता था। महाराज रणजीतसिंह न भी विरोधी सिख मिसिला के साथ मित्रता स्थापित करने के लिए इस हथियार वा प्रयोग किया था। सन 1802 म उहान नक्यिा मिसल के सरदारो की क्या से विवाह किया। उनके देसासिंह को कागडा का कमाडर बना दिया । इसी दौरान भडी तथा सुकेतकल्लू से भटे ली और रास्ते म सरदार बघेलसिंह की विधवाआ से हरियाणा का इलाका छीनकर अपने हाथा म ले लिया। । सरहिन्द, राडू, भरतगढ और नारायणगढ पर अधिकार सन 1808 म महाराज पटियाला तथा उनकी रानी म कुछ झगडा हो गया था, उसका निपटारा करने के लिए महाराज रणजीतसिंह पटियाला गए थे । लौटते समय आपने सरहिद के इलाके से खिराज वसूल क्यिा नारायणगढ के किले का जीतकर फतहचद अहलूवालिया को सौंप दिया। राडू का शासक नारायणगढ के युद्ध म मारा गया था अन उसका इलाका भी अपन अधिकार म ले लिया। सरदार भावलसिंह को सना से भरतगढ़ छीन लिया और दीवान हुक्मवाद से वादनी का इलाका छीनकर अपने अधिकार म कर लिया । इतिहास का एक गलत निणय टल गया महाराज के बढत हुए प्रभाव तथा छोट छाटे शासका क क्षेत्रा का अपने अधिकार म लेने की नीति से पजाब के कुछ राजा चितित होने लगे । उनको अपना अस्तित्व तथा राज्य खतरे का शिकार होता नजर आने लगा। इसलिए सतलुज पार के कुछ राजा ने मिलकर पटियाला राज्य म एक मीटिंग की। उसमे विचार यह बसा था कि उनको महाराज रणजीतसिंह के साथ मिलना चाहिए अथवा ।

अंग्रेजों में साप । यो गरी नि रणनीतमिर उनमा तुरनाम पर भाषण भोर अपेज पर गायेंगे ! तय हुभा दि अजा मोमरण मना पाyि भातु जीन्द महाराव भागिह स्पनर रामा सामिह पटियाना या दीवाना पन, मामा राष्ट गुलाम हुसैन एम शिष्टमन मेर दिन्ली आए भोर अपनोरण पान रे लिए सिथित प्रापपत्र पेश पिया सेपिन अपर भी रणजीतसिंह ग जग ममय सार मनरे पराम नही ५। माना हो frष्टमान रोगोई मायामन नीला । महागन रणजीतमिर जय पटना पापता माता उन्होंने मरो मम्मानपूपर अमतमर पलाया। उसो धेय निश, आगा-पीटा गया और इस तरह तिक्षामनाम ना निगपटल गया। गुजराा तथा वजीराबाद पर अधियार और पहाडी गजाओरा दमन महारान रणशेर सिंह जाने मे भान मारे ममय में अप्रेम-गेहा अपनी सारत तपा पाग्य रण-पोगर के धन पर, भारत को निगल मरती है । गको रोमन का पर ही तरी पारि यह अपनी सना को युट-नोशल म पारगत करा और अपनी सारत मोबाने। यह सापर यह दो दिशामा म आग मद रहे । यह सेना का प्रशिक्षण भी दिसात और छोटी छोटी सारतोरा समाप्त गररे अपनी भक्ति को बढ़ाते थे। सन् 1809 में वजीराबाद मागासर मर गपापा इम अवसरमा मापने पजीरारा यो प्रपन राज्य म मिलाये लिए सर्वाधिक उपयुक्त मोषा । मत यह समन्य वजीराबाद गए । जोधसिंह र पुत्र गगासिंह ने उनसे माय रपये भेंट से उनसरी अधीनता स्वोसार पर सी। गुजरात में शासन साहबसिंह वषा उसरे पुत्र के बीच गडा था। अत आपने गुजरात पर हमला पर दिया । गासिंह भागर जलासपुर में मिल महिा गया। वहा भी उसका पीछा रिमा गया और जलालपुर को भी मे लिया। सन् 1811 म यह दोनारगर पहुँचे और उन परासी रामायो शुदने के लिए मजबूर पर दिया जो गुरु गोविंद सिंह ने सामो स ही हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य वा वातावरण पदा कर रहे थे। महाराज के विरुद्ध 'अग्रेजो पीगरण जाने वाले नूरपुर रे राना से तया उरावे ससुर से राज्य छीन लिया गया । और उसरो अधिकारमयर लिया गया।

30 मुलतान विजय महाराज रणजीत सिंह ने मुततान के सरदार को खिराज तथा नजराना देन वे लिए पहले ही मजदर पर दिया था, फिर भी वह उसे अपन अधिकार में लाये बिना अपनी योजना को अधूरी समझते थे। वहा का शासक मुजफ्फ खा भी ममय गया था कि महाराज की नजर मुलतान पर है, इमीलिए वह भी चौरसी मे था और तैयारी कर रहा था। महाराा ने उसको समय न देना होशियारी समया और दीवान मोतीराम भवानीदास हरीसिंह नलुआ और दीवानच द्र को मुलतान के लिए रवाना किया। मुजफ्फर या ने डटकर सामना किया और इनके हमले को नाकामयाब कर दिया । य लोग खाली हाथ लाहौर लौट आए। महाराज रणजीत सिंह इम पराजय को जीत म बदलन के लिए वताव हो उठे । अन अगले वप सन 1818 म 25 हजार सिख सनिव मुलतान की जोर भेज दिए । रावी तथा चेनाव के द्वारा रसद वा सामान भेजन का इतजाम कर दिया गया । दीवान मातीराम न मुलतान का घेर लिया । तोपा क गोलो से किले की दीवार म छद कर दिए । मुजफ्फर खा ने जिहाद का नारा लगाकर मुस्लिम सरदारो को सिखा के विरुद्ध पटा करो वा प्रयास मिया। पर उसकी फौज लगातार पिटती रही। कुछ सिपाही भाग गए कुछ ने हथियार डाल दिए । उसके पाम थोडे से सिपाही बच रहे थे, तभी साधूसिंह ने शुक्रवार के दिन गजब का हमला कर दिया और सब दुश्मनो का सफाया कर दिया। मुजफार खा अपन वच्चा के साथ कुर्बानी के प्रतीक हरे कपडे पहनकर, सामने जा गया। उसी समय सिख सनिका ने हमला दिया। और पाचा घेटा सहित उसको मार डाला। वित पर अधिकार कर लिया गया । उगवी खुशी में पानौर तथा अमतसर म रोशनी की गयी । गलिया म घूम घूमकर महाराज ने स्पये फेंके । हिदू सिख तथा मुस्लिम जनता ने गुशी मनाई। विजय से उनकी शक्ति बढ गई। दूसर लागो पर भातक छा गया। रणजीतसिंह पजाब म ही नहीं समूचे देश म एक शक्ति के स्प में उदय हुए। मुलतान का जीतन वे बाट महाराज न सा छ लाख के लगान पर श्याम गिह पेशावरिया का दे दिया था, लेकिन श्यामसिंह न अत्यधिक धन बटोरने के उद्देश्य से जनता पर भारी अत्याचार करना प्रारम्भ कर दिया जोर महाराज को सकी खबर लगी तो आपने श्यामसिंह का कट कर लिया तथा भाई वदन हजारी यो पहा पा सूवेदार बनाया एव सावन लाल का माल अफ्सर नियुक्त किया। यह घटना बताती है कि महाराज रणजीतसिंह का ध्याजाता हिता पर टिका पा।

डेरेजात हजारा, तथा कवीलो का दम मुलतान विजय के बाद डेरजात और हमारा के इलावे पर अधिकार करना लाजमी बन गया था।। इसलिए राजकुमार शेरसिंह और तोरामिहको सेना घे साथ भेजा गया। वहा इलावेदार मुहम्मदान अनेक मुसलमान साथियो यो भडावर सामना करने के लिए आया, पर लडाई म मारा गया। उसके बेटे न 75 हजार रुपय देवर सधि कर ली । टसी दौरान पबर मिती मि हजाग, पिलखी, धतूडा और तिखला के मुस्लिम सरदागे ने मक्वसिंह धो करन पर दिया है। अत स्थिति पर नियत्रण करने के लिए महाराज न दीवान रामदयाल और अटारी वे श्यामसिंह वो राजकुमार शेरसिंह के साथ भेजा। दोना ओर से जम कर लडाई हुई। मिव सेना ने शत्रुनो या सप कर दिया। इस पर अय स्थाना के मुस्लिम सरदार एकत्र होकर सामने आ गए । इस लड़ाई मे दीवान रामदयाल काम आए। महाराज श्रोध से भर उठे और विरोधिया को मजबूर हाकर महाराज वा पर देना पडा, अयथा वे रणजीत सिंह के कोप बाजारात थे। रावलपिंडी कम्नवाड फतहकोट भक्खर डेराइस्माल खा, खान गिगन लया, फेजगढ, मनकेए आदि पर अधिकार सन् 1820 मे महाराज रणजीत सिंह ने झेलम नटी को पार किया और रावलपिंडी के सरदार नदसिंह वो हरा वर रावलपिंडी को अपने अधिकार म पर तिया। सन 1821 मे वस्तवाद और फतहमोट को जीतपर भी अपो राज्य मे मिलानिया । इसके बाद हरीसिंह नलुआ, दीवानचद तथा दीवन माराव आदि सरदारा को भेजकर भक्खर जीत लिया। इसकी जीत के बाद सरदार दिलसिंह तथा जमादार खुशहाल सिंह द्वारा डेगइस्माइल खा को पराजित पराया । वहा के अधिकारी नानक राव ने बडी मजबूती के साथ सामना किया, किंतु अत म पपडा गया। इसके बाद खान गिराज, लया तथा पंजगढ पर अधिकार कर लिया गया। इसके बाद महाराज की पोज मुनरा बी ओर गई। पहा के नवाब हाफ्जि रहमत खाने क्लेि के भीतर से मुकाबला किया । रिले में पानी का अभाव था।पानी बाहर से ऊटी पर आता था।महाराज की सेना ने पानी मी आमद को रोक दिया। चौबीस दिन तक सडाई होती रही । अत में नवाब ने हार मान ली भोर साधवी प्राधना की। इस विजय से 28 तो तथा 10 लाख की आमदनी का इलावा महाराज को मिला। 4 32 नौशेरा की लड़ाई और जीत तथा पीलो के विद्रोहियो वा दमन - कावुल के शासक मुहम्मद अजीम वो हमेशा माशिश यह रहती थी कि वह महाराज के भारतीय इलायो यो हथिया ले । उसके दमन के लिए 1823 में आपने राहिताश नामक स्थान पर अपनी सना इकट्ठी की और वहा से रावल पिंडी की ओर कूच करा दिया। इसी समय, पेशावर के मुहम्मद यार खा से नजराना वसूल करने के लिए अजीजुद्दीन को भेजा । मुहम्मद मार या ने बिना क्सिी हुज्जत के नजराना दे दिया और साथ म बहुत में अच्छे घोडे भी दिए । अजीम खा को अजीजुद्दीन का यह काम पसद नहीं आया। उसने एक सेना के साथ काबुल तथा पेशावर की ओर कूच क्यिा। रणजीतसिंह भी उसकी धेकडी को मिटाना चाहते थे। अत नापने दीवान कृपाराम और सरदार हरीसिंह नलुआ को सेना के साथ पेशावर की ओर भेजा। उहाने पहले जहागीराबाद को अधिकार में लिया । अजीम खा ने जहाद का नारा लगाया और समस्त पठानो को एकत्र करके नौशेरा पर मोर्चा लगाया। महाराज न खडगसिंह तथा दीवानच द के साथ एक सेना पहली सेना की मदद को भेज दी। दोस्त मुहम्मद तथा जबर खा भी सामने आ डटे । इस स्थिति को काबू मे लाने के लिए महाराज ने 15 हजार सैनिको के साथ, घोडा पर अटक नदी को पार दिया। हाथियो द्वारा तोपें पार कराई गई। कई हजार सनिक नदी म बह गए पर महाराज न नदी पार करके असम्भव काम को सम्भव बना दिया। इस समय चीस हजार पठान-सेना महाराज के सामने खही थी। पठानो को भयकर मार से जनरल सतगुरु सहाय और महासिंह खेत रहे । जान बचाने के लिए मिस मनि पहाडी स घाटियो म उतरने लगे । अकाली फूलसिंह ने अपन साथियो को प्रोत्साहित किया। वह तजी में पठाना पर झपटा पर गोली का निशाना बनकर खेत रहा । इससे महाराज ने स्वय धावा बोला। दीवानचद ने जपना तोपखाना लगा दिया। शाम तक घमासान लडाई हुई पठाना ने मोर्चा सभाले रखा । महाराज न जपनी गोरखा सेना को आग के मोर्चे पर तनात किया और पीछे सिख सनिक लगा दिए । अब कई ओर से पठानो पर प्रहार होने लगा था। अत मे उनको मैदान छोड़ना पडा। जजीम खा भाग चुका था। महाराज न हस्तनगर को अपने अधिकार में किया। 17 मान को पेशावर पर अधिकार कर लिया गया। सिख सनिका न खबर तक का क्षेत्र रौंद डाला। तब महाराज ने दोस्त मुहम्मद तथा यार मुहस्मद को बुलाया । जीता हुआ क्षेत्र उनको बाट दिया। उनसे नजराना लेकर वह 26 अप्रैल को लाहौर लौट आए। इस तरह महाराज ने वहादुरी तथा बुद्धिमानी का परिचय दिया। दोस्त मुहम्मद के साथ दोस्ती का रिश्ता कायम किया। पिपली और धमतूर आदि कबीला के लोग धार्मिक जनून के कारण प्राय 33 रणजीतसिंह के खिलाफ विद्राह विया परत थे । सन् 1823 मे महाराज की २च्छा हुई पि इनस अतिम तौर पर निपट लिया जाए। अत आपने सरदारहरीसिंह मलुभा वो सेना के साथ वहा भेजा । हरीसिंह ने उनके साथ वसा ही व्यवहार दिया । जसा कि अब्दाती, तैमूर तथा नादिरशाह को पोज भारत मे करती थी। हरीसिंह ने उगवे गाव जला दिये । विद्रोहियो वा खाज योज वर माग। इसी बीच हमारा वे तागो ने विद्राह कर दिया और महाराज के प्रतिनिधि जब्बासखा को यदी बना लिया। नलुआ ने उनका भी दमन क्यिा । अब्बास को द से छुटाया । और उनकी इतनी अधिक धुनाई की थी मि नारिया रोते बच्चो को मतुआ का नाम लेपर डराती और चुप करती थी। कश्मीर और महाराज रणजीत सिंह कश्मीर भारत का स्वग माना जाता है । उस पर विदशियो की नजरे हमेशा टिकी रही हैं । महाराज रणजीत सिंह की आखें भी कश्मीर की ओर लगी थी। उन दिनो, कश्मीर काबुल के अधीन था और अतामुहम्मद उसका सूबेदार था। सन् 1810 मे सूबेदार ने शुजा वो सहायता देकर उसके विरोधी भाई महमूद को पराजित करा दिया था। महाराज को पता लगा कि शाह महमूद कश्मीर के सूबेदार अतामुहम्मद को दडित करने लिए आ रहा है । अत महाराज न उसके साथ मित्रता के सम्बध स्थापित कर लिये, ताकि उनकी कश्मीर याजना पूरी हो सके। 1810 ई० मे ही महाराज के सेनापति दीवान हुक्मचदने भम्बर तथा राजोरी पर आक्रमण कर दिया । वहा के सुल्तान पान ने थोडा सा प्रतिरोध दिया, पर वह दीवान हुक्मचद का सामना न कर सवा और चालीस हजार रुपय खिराज देकर छुटकारा पा गया था। दूसरी ओर महाराज न स्टाल मे गगा का विला छीन लिया था। शाह मुहम्मद से दोस्ती हाने के बाद वह लाहौर वापिस मा गए थे । यहा आने पर उनको सूचना मिली कि मुत्तान खा न दीवान हुकमचद द्वारा नियुक्त भम्वर के इलावेदार इस्माइल खा को निकाल दिया है । अत भाई राममिह तथा धुवर खडगसिंह को सुल्तान या पो दण्ड देने के लिए भेजा गया, लेक्नि मिख सनियो को मुह की खानी पड़ी, लेकिन जब सुल्तान खा ने यह सुन लिपा कि दीवान हुक्मचद सेना लेकर ना रहा है तो यह डर गया और सधि परने लिए तैयार हो गया। दीवान हुक्मचद उमको जपन साथ लाहौर ले आए, जहा महाराज न उसको वद करा लिया था। और उसका इलावा अपने राज्य मिला निया। इधर इस्माइल या स्वतत्र बनने की योजना कर रहा था। उसने राजौरी के 34 अजीज या के साथ मिलकर, आमुहम्मद की सहायता स बगायत कर दी। महाराज ने स्वय राजौरी जावर विद्रोह का दमन कर दिया। उन दिना पाल को अमीर शाह जमाल और शुजा के परिवारा न लाहौर की यात्रा की थी, महाराज ने उनका बडा स्वागत पराया । वह चाहते थे कि शुजा लाहौर म ही रहे ताकि उनको अपनी कश्मीर योजना को पूरी करन में सुविधा मिल सके । वजीर फतह पा को कश्मीर के सूबेदार अतामुहम्मद और उसके भाई जनादाद, जो अटक का वितेदार था, सजा देने के लिए कश्मीर जा रहा था। उसने सोचा कि महाराज रणजीत सिंह की सेना कश्मीर के पहाडी रास्तो से परिचित होगी, इसलिए उसने उनके साथ मिलकर यह अभियान चलाने की योजना बनाई। महाराज ने भी अपनी योजना पूर्ति का स्वर्णिम अवसर माना और वह तैयार हो गए । उनकी शत यह थी कि कश्मीर की लूट से प्राप्त एक तिहाई भाग उनको मिलना चाहिए । शत स्वीकार हान के बाद, हुक्मचद को, बीम हजार सेना के साथ कश्मीर के लिए रवाना कर दिया गया। दोनों सनाए कश्मीर पहुची । अतामुहम्मद उनका सामा। न पर सवा । वजीर फतह या ने शाह मन्मूद के नाम पर रश्मीर पर अधिकार कर लिया और वहा की व्यवस्था अपन भाई अजीज खा को सौप दी । जाट सिखा वो जगूठा दिखा लिया। दीवान हुकमचन खाली हाथ कश्मीर से लौट जाय । इस पर रणजीतसिंह गुस्से से भर उठे। उहोन तुरत अटव के क्लेिदार वा लिखा कि वह क्लिा सिखो को सौंप द । जहादाद के पास कोई चारा न था, मजबूरी म उसको क्लिा महाराज रणजीत सिंह को सौपना पडा। कश्मीर को अधिकार में लेन की दिशा मे यह उनका पहला कदम था। उसी समय वजीर फतह खा का कश्मीर से लौटना हुआ । वह अटक आया। सिख मेना के साथ उसकी मुठभेड हुई । दीवान हुकुमचद मिख सेना की पीठ पर थे, जत वजीर फतह खा तथा उसके भाई दोस्त मुहम्मद को मैदान छोडना पड़ा। 13 जुलाई सन 1813 का विजयश्री सिखो को प्राप्त हुई। इस विजय के बाद महाराज ने अटक की यात्रा की। इस याना का उद्देश्य पहाडी राजाआ से पर वसूल करना और कश्मीर विजय की योजना तैयार करना था। तथा उत्तर भारत मे एक ऐसे शक्तिशाली राज्य की स्थापना करना था, जिसकी सीमा की जोर कदम बढाने की हिम्मत किमी की न हो। इस योजना की पूर्ति के लिए आपने गुजरात के रास्ते से अपनी सनाए कश्मीर भेजी और भम्बर तथा राजोरी होते हुए वे ठट्टा म जा पहुची लेकिन कश्मीर के सूवेदार की सेनाओ ने बहराम गिला पुल काटकर उनका आगे बढना रोक दिया, लेकिन राजोरी के सरदार न महाराज को दूसरा रास्ता बता दिया और उहाँने बहराम के विले पर अधिकार कर लिया। इसी बीच बरसात शुरू हो जान के कारण महाराज की सेना का आगे - बढना रुक गया और वह लाहौर लौट आए । अगले वप फिर कश्मीर अभियान की तैयारी के सिलसिले म स्यालकोट मे. सेना इक्टठी की गई। दीवान हुवमचद की राय थी पि रिमौर अभियान से पहले रानौरी म युद्ध का सामान एकत्र कर लिया जाये लेकिन महारों में उनके परामश पर ध्यान नहीं दिया और अभियान प्रारम्भ कर दिया। बीमारी के कारण दीवान हुप मचद इस अभिमान में शामिल न हो सके । उनका स्थान उनके चौबीस वर्षीय पौत्र रामदयाल ने लिया । दीवान हुक्मचद की अनुपस्थिति का लाभ उठाया राजौरी के हाकिम अगरखा ने । उसने महाराज को पूछ के गलत रास्ते पर डाल दिया और वह श्रीनगर के स्थान पर पूछ पहुच गए । इसमे दीवान रामदयाल की मुसीबतें बढ गई। वह श्रीनगर के पास एक गाव मे डेरा डाले पडा हुआ, महाराज के आने की प्रतीक्षा करता रहा । बरसात शुरू होने को थी, इसलिए उसने अवेले हो हरीसिंह नलुआ तथा अगरी वाले हरनामसिंह के साथ पीरपजाल पार करने महरपुर तक सना पहुवा दी । अजीमखा ने मार्चा सम्भाल लिया, पर उसको पीछे हटना पड़ा। लेकिन उसन शोपम नामक स्थान पर मजबूत माचा लगा दिया। इसस सिन सेना की प्रगति रस गई। ठीच रास्ता न मिलने और बरसात शुरू होन वे धारण महाराज तो लाहौर वापिस लौट आए थे, लेकिन रामदयात की सेना घिर गई थी। जत महाराज ने भाई रामसिंह के साथ दीवान रामदयाल की सहायता के लिए सेना भेजी, पर वह भी बहराम गले मे चक्कर खाता रहा और उसका भी रास्ता न मिला । दीवान रामदयाल न अकेले ही इस होशियारी के साथ युद्ध का सचालन किया वि अजीमा को घुटन टेक्ने पडे । उसने सधि का प्रस्ताव रखा। महाराज यो भेट भेजी, जिसे लेकर रामदयाल लाहौर लौट आया, पर कश्मीर विजय का मौका इस बार भी हाथ से निक्त गया । इसी बीच राजौरी तथा कोटली के सरदारो ने बगावत का पण्डा बुलद कर दिया, जिसको दीवान रामदयाल ने दवा दिया और महाराज ने कुछ दिन बाद राजौरी काटली तथा रामगढिया का सारा इलाका अपन अधिकार म कर लिया। जर काबुल के वजीर फतह वा को महाराज के कश्मीर अभिमान यी सूचना मिली, तो वह अजीम खा की सहायता के लिए चल पड़ा। उसके द्वारा सिंध नदी पार कर लेन पर महाराज को उसके आगमन की सूचना मिली। इस पर महाराज न दीवान रामदयाल को उसको आगे बढ़ने से रोकने के लिए भेज दिया। सन् 1818 मे कश्मीर के नये सूवेदार जबरखा का वजीर वीग्घर उसमे नाराज हावर महाराज के पास आया। उसने कश्मीर विजय के समस्त तरीके महाराज को बता दिए । महाराज ने सेना को तीन भागा मे बाद दिया---एक 36 भाग का सनापति मिश्र दीवानचद का बनाया गया, दूसरा भाग कुवर पडगसिंह वा सौंपा गया और तीमरे का सचालन स्वय महाराज न पिया। मार्च सन 1819 म दीनानच द्र ने राजौरी पहुचकर अजीजखा को कद करने का हुक्म दिया, वह भाग गया और उसके बेटे ने राज्य दीवानचद्र का सौंप दिया। दीवानच द्र यहा से चलकर पूछ पहुचा और वहा के शासक जबरखा को अपने अधीन किया। पीर पजाल को पार करके उसने अपनी सेना को तीन भामा मे वाट दिया। जाट सिख सेना 16 जून 1819 को मरायअली पर एकत्र हुई और 5 जुलाई को शोपिन वे स्थान पर जाट मिख तथा पठान सैनिक आमने-सामने आ गए । दानो आर से घमासान लडाई हुई, जिसमे पठानो की हार हुई । जबरखा बुरी तरह घायन हुआ। कश्मीर पर महाराज वा अधिकार हो गया। प्राय दखा यह जाता है कि हारे हुए राजा तथा नगर की बुरी तरह लूट होती है लेकिन रणजीतसिंह के आदेश से कश्मीर को लूटा नहीं गया । दीवान मोतीराम को कश्मीर का गवनर बनाकर भेज दिया गया, लेकिन नाराज होकर बाद मे उमका वापस बुला लिया और उस पर 17 हजार जुमाना कर दिया। उसके स्थान पर भीमसिंह को गवनर बनाकर भेजा गया लेकिन वह अयोग्य मिद्ध हुआ अत उसका स्थान दीवान चुनीलाल को दिया गया। वह वहा का शासन करने मे सफल नहीं हुआ। बाद में दीवान मोतीराम पर खुश होने के वाद कृपाराम को गवनर बनाया गया। उसने बटी योग्यता के साथ कश्मीर का शासन दिया। उसके काल मे व्यापार की समद्धि हुई और व्यवस्था बनी रही। उसके बाद वैसाखसिंह को वह स्थान दिया गया। वह विलास म डूब गया । जनता पर जुल्म करने लगा। शाल का व्यापार ठप्प पड़ गया। उसको महाराज पक्डवाकर लाहौर बुलाया, उस पर पाच लाख रपया जुर्माना किया। शेरसिंह की सहायता के लिए जमादार खुशहालसिंह, भाई गुरुमुखसिंह और गुलाम मुहीउद्दीन को भेजा, लेकिन ये लोग भी वाई खास प्रवध नहीं कर पाए । कश्मीर की अकात पीडित जनता भागकर लाहौर आई। वे लोग राटियो के लिए परेशान थे । महाराज ने स्थान स्थान पर उनके लिए सहायता शिविर लगाए । मदिरा तथा मस्जिटो म उनके गान पीन की व्यवस्था की। इस तरह एक आर दुखी जनता की सहायता की और दूसरी ओर खुशहालसिंह के स्थान पर महासिंह को वश्मीर भेजकर वहा की व्यवस्था ठीव की। सन् 1834 म जम्बू के राजा गुलावसिंह पो उसके सेनापति जोरावरसिंह गद्दी से अलग कर दिया और उसके मत्री को राजा बना दिया। और तीस हजार वापित खिराज देकर महाराज रणजीतसिंह की अधीनता स्वीकार कर ली। इस तरह न येवल जम्बू तथा कश्मीर पर ही महाराज रणजीत मिह का अधिकार ना वरन एक लाकप्रिय शासक के रूप म भी उनका या चारों ओर फैल गया। पेशावर पर अधिकर पशावर पर महाराज रणजीतसिंह की भी नजर टिकी थी और काबुल के मृबदार दास्त मुहम्मद की भी । महाराज के लिए तो पशावर का महत्त्व इसलिए पा कि उस पर अधिकार करने के बाद वह भारत की मार जाने वाले आममण कारिया को हमेशा के लिए रोक देन की स्थिति म आ जात और दोस्त मुहम्मद का पेशावर की जरूरत सेना मनालन अथवा जभियान की दप्टि से थी। उसका इशारा पावर दिलासा खा न बनू के इलाके में सिक्ख अधिका विरद्ध विद्राह पर दिया । सरदार शामसिंह तथा वरशा तारासिंह न उसको जाकर उसकी गढी म ही धर दबाया, लकिन रात के समय सात हुए सिख-सनिया पर उसन हमला कर दिया। इस अचानक आक्रमण से सक्डा जाट सिख सैनिक मार गए, मदि राजा मुचितमिह की मदद न मिली होतो ता सिखा का हार का मुह देखना पडता। इस घटना के बाद महागज को पेशावर पर अधिकार कर लेने का निश्चय करना ही पड़ा। उसी समय महाराज ने सरदार हरीसिंह नलुआ को माना दी कि कुवर नौनिहालसिंह का साथ लेकर पेशावर के विरद्ध मैनिक कायवाही कर। आज्ञा का तुरन्त पालन किया गया। अप्रैल सन् 1834 म उनकी सेनाए पशावर पहुच गइ । सुल्तान महमूद ने बहुत स घोडे नजरान मे पेश किये, किन्तु सिखो ने उनका लौटा दिया। इसको नाराजगी तथा सिखो के मूड का सक्त मानकर सुलतान महमूद ने अपन परिवार को काबुल की ओर भेज दिया । हरीसिंह नलुआ ने महमूद को खवर भेजी कि कुवर नानिहालसिंह शहर का निरीक्षण करना चाहते हैं। सुलतान महमूद इसका मतलब समझता था । अत उसन रात के समय भाग जाना ही उचित समझा । वह पहाडो की आर भाग गया और पशावर पर सिखा का अधिकार हो गया। यहा उल्लेखनीय बात यह है कि जिस हरीसिंह नलुआ न पशावर पर महाराज रणजीतसिंह का अधिकार कगया था, उसीन 1746 1753 और 1762 के अफगान आक्रमणकारिया द्वारा नष्ट- भ्रष्ट क्यि अबाल तल का पुनर्निमाण 1775 मे कराण था और इस काय के लिए बहुत-सा साना दान भी दिया था। यह वही हरी सिंह नलुआ है जिसको तलवार से भयभीत होकर कावुल की ओर से भारत पर हमला करने वाल लोग हमेशा के लिए गात हो गये थे । इसीलिए वह न सिफ धार्मिक व्यक्ति था, वरन् वीर एव राष्ट्रभरा भी था । उसम धम, वीरता तथा राष्ट्रभक्ति का अद्भुक्त सामजस्मथा।

38 पगावर पर अधिरार पर रन के बाद भी महाराज रणजातसिंह निरल सावधान रह । यह जाात थ विधा लगार हमला कर रावत हैं, इसलिए यह गना तथा रसद निरन्तर भेजत रहे । बाबुलम दास्त मुहम्मद का, पेमावर पर मिधा का अधिकार सहन नहीं हुआ। उसन अप्रेजा से प्राथना की दिद रणजीतसिंह म पशावर मा इलामा वापस राय, लपिन उत्तरभारत म, अंग्रेज अभी महाराज रणजीतसिंह , सामT पहा नही चाटत ५१ नहीं चाहत थ गि अभी रणजीतमिह स टवार सी जाए। जग्रेजा स निराश हावर भी वह चुप नहीं वठा। उसा जबरया को मदद लिए ईरान भेजा और स्वय सना लकर जलालाबाद तक आ गया। यहा स उसन पशावर की आर कूच किया, राने में अलीबागान म ईद मनाइ, यम का नारा लगाया, पठाना को इकटठा दिया, और का मुस्लिम सरदार सिखाका साथ छोडार जिहाद व नाम पर, उधर चला गया। पवर मार पर वह सिक्खस्यान नामक स्थान पर आया। महाराज रणजीतसिंह भी सना माथ पावर पहुच गए थ, लदिन आपन वड राजनातिर चतुराइस काम लिया। दाम्न मुहम्मद के साथ मुतह की लिखा पढी परत रह और दूसरी और अपना रक्षा पक्नि तथा आत्रामा शक्ति का मजबूत करत र । उ होने अपनी सेना का यह रद्ध किया। अपना तापखाना सामन लगाया, उसर पोछ सना लगाई, उसक बाद फिर घुड़सवार तनात किए। अजामुद्दीन तथा हारमन का दास्त मुहम्मद दानो आर तैनात कर दिया और इस प्रकार उनको घर लिया । जर उमका अपन घिर जान वा पता लगा ता उसन भी कूटनीति स काम लिया, उसन अपने भाई सुनतान महमूद से कहा कि अजीमुद्दीन तथा हारमन का सधि के बहान बुतार २द भर लो। उसने ऐसा ही किया । वह दोनो को भाई को कदम छाडकर चल दिया और जब उसको मालूम हुआ कि सिख सनाने दाना का घुडा लिया है, तो अपनी हार पर बहुत लज्जित हुआ। पशावर पर सिखा का अधिकार हो गया। इस साथ ही रणजीतसिंह की तान बहुत बद्ध गई। उन्हान दास्त मुहम्मद क आक्रमण म पजाब तथा पश्चिमात्तर प्रदेश का वा लिया । पर वह अप्रजा की आख म खटकन ला। सन 1836 म हरीसिंह नतुजा न पशावर समाग जमसद को अपन अधिकार म त लिया। दास्त मुहम्मद ने जब यह खबर सुनी तो उसन अपन वजीर व माथ पाचा बटो को सना देकर मुकाबले के लिए भजा। हीसिंह ननुआ की सेना पर पठाना न हमला किया और पहन हमल मे उहान दिले के बाहरी भाग पर अधिकार कर लिया। व इस छोटी-सी जीत को गुशी माा ही रह थकि ननुमा नभयर हमला कर दिया। पठाना में पैर उखड़ गए। वे भागने ला । मनुमान जाती 14 ताप छीन ली। उनकोबर तर सुशा और जमकर मारा। इसी शराब, उसकी सहायता के लिए समशुद्दीन पोज सकरा गया । भयर युद्ध हुआ।

39 इसम हरीसिंह का भयकर घार लग जिनसे उनका देहा न हो गया। राजा ध्यान रह न जमरद पहुचवर किरा की मरम्मत कराई । महाराज स्वय पशावर गए । वहा पतीस हजार सिख मनिर तैनात किए और पठानो को हमेशा के लिए चुप कर दिया। पशावर मिखा के अधिकार में आ गया और इस प्रकार भारत पर अगान जाश्रमण की सभावना हमशा के लिए खत्म हो गई। दोस्त मुहम्मद के मुवारले शाहशुजा की सहायता उसकी गेना के सनापतिया द्वारा छोड दिए जाने पर दुर्रानी शाह शुजा को अपने राज्य में सन् 1809 हाथ धोन पड़े थे । उसको वदी रूप म कश्मीर ले जाया गया था। वश्मीर का अफगान सूबदार अता मुहम्मद या उसयो कोहनूर देन में बाद मुक्त करन के लिए तैयार था लक्नि शाहशुजा न वह रत्न दना अस्वीकार कर दिया। रणजीतमिह क सेनापति माहवम चद न उसकी प्रार्थना पर जो उसकी पत्नी वफा वेगम न की थी, उसे अतामुहम्मद की कैद से मुक्त कराया और उसको लाहौर लाया गया। यहा उसको महासिंह वी-हवेली म रखा गया और उसके हरम के लिए दूसरी हवेली दी गई। कुछ दिन बाद, रामसिंह न उससे कोहनूर देने के लिए कहा लेकिन उसने जवाब दिया कि जब सच्ची दोस्ती स्थापित हो जाएगी, तब कोहनूर दे दिया जायगा । कुछ दिन बाद, रणजीतसिंह के आदमियो न उमस पूछा कि क्या कुछ धन के बदल वह वाहनूर दे सकेगा? उसका उत्तर स्वीकारात्मक था। दानो मे सधि हुई। इसके अनुसार कोट कमालिया, झाग मिआल और खुलेनूर के जिले शुजा को दिये जान थ । इसके अलावा जपन छोए राज्य को पाने के लिए फौजी सहायता दन का वायदा भी दिया गया था। इस सधि के बाद दाना की पगडिया बदली गइ और शाह ने कोहनूर रणजीतसिंह को ६ दिया लेकिन कुछ इतिहासकारो की मा यता है कि महाराज रणजीतसिंह न शुजा को दिया गया अपना नाश्वासन पूरा नहीं किया । इसलिए शाहशुजा न भारतीय नारी की वशभूषा पहनाकर अपन परिवार का लुधियाना भेज दिया। जब महाराज रणजीतसिंह का उसके परिवार के निकल जाने की बात मालूम हुई तो उनको आश्चय हुआ और शाहशुजा की गतिविधि पर नजर रखने का आदेश पर दिया गया। इस पर शुजा न भाग निक्लने की योजना बनाई और अपन पलग पर एक विश्वस्त सिपाही को सुलावर फकीर के वश म निकल गया। रणजीतसिंह ने लाहौर म रखो उसकी सम्पत्ति को जन्न कर लिया। लुधियाना पहुचकर शुजा ने अग्रेजो की शरण ले ली। एक समय यह था, जब शाहशुजा की पत्ती वफा बेगम ने रणजीतसिंह में प्राथना की थी कि नगर वह अतामुहम्मद खा, जो उसके पति की आये निजलवावर on 40 मार डालने की योजना कर रहा था, से उसके पति को रक्षा कर लैंग तो उनको बदन म काहार होरा दे दिया जायगा। रणजीतसिंह । शाहशुजा का मतामुहम्मद व पुजास बना लिया था। इसलिए वायद के अनुसार पाहनूर रणजीतसिंह का द दिया जाना चाहिए था, पर शुजा को आर स हान वाली दरी न रणजीतसिंह के शव का बढाया था, जिसका परिणाम दाना के लिए विश्वारा तथा बचाव का नीति अपनाना हुआ। जसल म शुजा चाहता था कि महाराज उसका उसमा वाया हुआ राज्य दिला दें लेकिन महाराज यह वाम शायद पाहनूर पान से पहल नही करना चाहते थ । शुजा द्वारा टाल मटोर करन के कारण महाराज के मन म उसके प्रति विश्वास न ज म ले लिया था। महाराज रणजीतसिंह और भारत की ब्रिटिश सरकार जब तक अंग्रेजी राज्य योरोप मे नेपोलियन की ताकत को कुचलने, भारत म बढ़त हुए फ्रासीसियो के प्रभाव को कम करन, मराठी की ताकत को कुचलन और राजपूताना के राजाआ के घुटने नवान म लगा रहा, तब तक महाराज रणजीतसिंह के साथ उसके सवध दास्ती के रह । दोस्ती के दारान अग्रेजा न स्वय का भारत की एक बड़ी शक्ति के रूप म स्थापित कर लिया था और रणजीतसिंह ने मुलतान, अटक, कश्मीर पूछ, नौशेरा तथा पेशावर पर अधिकार करके एक शक्तिशाली राज्य बना लिया था। अग्रजी सरवार उसको आर वह जग्रेजो को सदह तथा अविश्वास की नजर से देखते थ । पर अग्रेज बेईमान, धोखेबाज आर घात लगाकर मार करने वाल थे और महाराज रणजीतसिंह वीर सिपाही थे। इसलिए अन्त म वीरता आर ईमानदारी को मक्कारी तथा धोखवाजी के सामने झुकना पड़ा था। उसके बाद देश को जाजाद होने म लगभग दो सौ वप लग गए। नपालियन तथा मराठा ताक्त पर विजय पान के बाद महाराज रणजीतसिंह के प्रति अग्रजा के व्यवहार म अतर आता गया। व उनकी प्रगति वा रोक्न लग, उनको योजनाआमे रुकावट डालने लग और विवशता म रणजातसिंह ने उसक प्रस्ताव का मान लिया। अग्रेज तथा जाट सिखो की सधि 1809 म अमृतसर म हुई थी और यह 1828 तक ठीक प्रकार चलती रही। महाराज रणजीतसिंह ने वाहे से सन 1826 में कहा था कि चाल्स मटवाफ न विदा हात समय मुझस कहा था कि अग्रेजा के साथ अपनी दोस्ती का लाभ आपका वीस वप बाद मिलेगा। वह वात आज ठोर निकल रही है और महाराज नही जानत थ वि अग्रेज उनकी बढता हुई तारत तथा प्रभाव को रोकने यी याजा बना रहा है। सबरा पहन सतलुज वे किनार ग्रिटिश कम्प स पाच मीत पिनीर नाम स्थान पर एक क्लिा जाट सिखो ने बनाया था, हा अग्रेज मिति मोहरमच द को उसका अधिकारी बनाया गया। अग्रेका का। नीति की दृष्टि से महत्त्वपूण थी। उनको वहा किले वा बन पर 1809 को सधि के बाद सनेह दूर हो गया। आक्टरलानी के 6 जुलाई 1809 के पन व अनुसार दीवान माहक्मच द, सरदार गरवसिंह, कागडा का सरदार उतमसिंह सिख राज्य की सीमा म थ और सरदार फतहसिंह सरदार धनासिंह और माछीवारा तथा मसावल के जिल पगडा-तलव थे और शेष क्षेत्र ग्रेजी राज्य की सीमा म था। इस सधि के अनुसार उनके जागीरदारो तथा उनके अपन अधिार के क्षेत्र उसकी सीमा म रह । विन्तु फिरोजपुर पर रणजीतसिंह का अधिकार नहीं माना गया। उन्हाने यह तर्क दिया कि फीराजपुर की सिय जनता पर उसका बहुत पुराना शासन है फिर भी 1838 म फीरोजपुर पर अनजा न अधिकार कर लिया और 1838 म उसका सैनिक छावनी बना दिया। अब महागज को अपनी मूल वा अहसास हुआ कि उन्होंने लाड लेय के हमले के समय भरतपुर की सहायता न वरव क्तिनी बड़ी गलती की थी । उनको अब मालूम होने लगा जिग्रेज उनके बिल्कुल पास जात जा रह है और उनका राजनीतिक प्रभाव कम होता जा रहा है । इसलिए आपने भी वसूर म अपनी सैनिक छावनी स्थापित बर दी। सन 1823 तक जब वाडे लाहौर म पालीटिवल एजेंट रहा, तब तक अग्रेज- सिख सवध सामा य रह, लेकिन उसके लुधियाना चले जान और मूरे के अम्बाला आने के बाद जग्रेजा की जाट सिखाने प्रति नीति म बड़ा बदलाव आ गया था । फिर भी महाराज ने नेपाल के साथ जग्रेजा की लडाई म गोरखाआ की प्राथना को मजूर नहीं किया। उहोने गगा तथा यनुना नदी को पार कराने की सहायता मागी थी और साहूयारा से उनको पाच लाख रुपया उधार दन के लिए कहन पी विनय की थी । महाराज ने इसका नामजूर कर दिया। यह उनकी दूसरी भूल थी। 1822 में प्रजो खिलाफमराठो की मदद करन की पशवा बाजीराव को मांग को भी आपने नहीं माना था। यह उनकी तीसरी भूल थी और पहली तथा अत्यन्त बड़ी भूल वी सन् 1823 से 1826 तक अंग्रेजा के साथ भरतपुर को लडाई मै भरतपुर द्वारा अनेक बार की गई प्रार्थनाओ यो न मानना । भरतपुर का प्रस्ताब था कि प्रत्येक दिन की कूच के लिए उनको एक लाख और उनके साथ रहा के बदले पचाग हजार म्पय प्रतिदिन के हिसाब से उनको दिए जाग, यदि यह बीस हजार सेना लेकर उनकी मदद लिए आ जायें। सेरिन महाराज न इसको स्वीकार नही पिया। इसरो सावित होता है कि वह अप्रेजा से भयभीत हाने लग गए थे। उनने साप दोरती बनाए रखा पाहते थ। इस तरह उन्होंने सापा को दूध पिलाने का काम शुरू कर दिया था।

42 ज 1827 तथा 1831 के बीच मैयर अहमद द्वारा पेशावर म घुम पैठ को कापवाही न जाट सिख राजा को उलझाय रखा था, लेकिन 1831 में वह मारा गया। जग्रेजो न खुलेआम संयद की सहायता नहीं की, पर व दोना की लडाई का प्रात्साहित करते रहे। 1827 म दिल्ली के अग्रेज रेजीडेण्ट मटकाफ द्वारा सेरेटरी को लिखे विवरण से यह बात सिद्ध होती है । सैयद अहमद को ठिकाने लगाकर महाराज रणजीतसिंह न सिध की आर जाखें फेरी थी, कि तु यहा भी वह जग्रेजो की चाल मे फस गए । जिस समय रोपर नामक स्थान पर गवनर जनरल और महाराज की मुलाकात हो रही थी क्नल पाटिजर सिध नदी मे व्यापार करने की सुविधा को सधि के प्रस्ताव के साथ सिध की ओर जा रहा था। इस प्रकार इस व्यापारिक सुविधा के बहान अग्रजा न रणजीतसिंह वा सिध की ओर जाना रोक दिया। यदि सिख राज्य ने मिध पर अपना अधिकार कर लिया होता तो उनको जग्रेज दिरोधी देशो से सम्पक करन का मौका मिल जाता लेकिन उन्हाने इस मौके को खो दिया। 1831 म लेफ्टीनण्ट अलेक्जेंडर वर्नीज न सिधु नदी की नाव द्वारा यात्रा की थी। दूसरे वप वह फिर पेशावर से जनालाबाद हाते हुए कावुल की ओर याना पर गया था। इन यात्राला का सनिक महत्त्व था । अग्रेज अफ्गानिस्तान म रुचि लन लग गए थे। इससे रणजीतसिंह के कान तो खडे हुए पर कुछ कर नहीं पाए । जग्रेज चाहत थे कि पेशावर पर सुलतान माहम्मद का अधिकार हो जाए ताकि उनका प्रभाव अफगानिस्तान मे बढ जाए और इस ओर रूसी ताकत का बढने म रोक दिया जाए । इसलिए वायसराय ने महाराज रणजीतसिंह से लिखा पनी करके उनको इस बात पर राजी कर लिया कि अमीर सुलतान मोहम्मद स कीमत वसूल रक और उस पर अपना सैनिक अधिकार बनाए रखार पशावर राज्य उसे द दिया जाए। महाराज यहा भी जग्रजा की चाल के शिकार हो गए। रणजीतसिंह का ध्यान सिध की आर न जाए और वह उसका अपन अधिकार म लेन की बात न सोच, इस उद्देश्य से अग्रेजो न शाहशुजा के साथ सन 1838 म रणजीतसिंह की सधि कराई । रणजीतसिंह अग्रेजा की इस दखलनदाजी के पक्ष म नहीं थ, शाहशुजा की सहायता तो उहान पहले भी की थी, पर अग्रज शाहशुजा पर यह एहसान करके अपना प्रभाव बढान की योजना कर रहे थे। फजर यात्रा विवरण स पता लगता है कि मध्य एशिया के क्षेत्राम अग्रजा के विराध म बडी तीन भावना थी। यदि महाराज रणजीतसिंह न उस विरोध का अपन पर मे इस्तेमाल करके योजना बनाई होती तो अग्रेजा का प्रभाव रुक जाता, उनकी प्रगति टसर जाती। इराम काई शा नही है मि1809 1 1824 तर अंग्रेजा की दोस्ती से उन महाराज रणजीतसिंह को ताभ हुआ, लेकिन उसके बाद वह पिरस गए। पगति पर राम लग गई। जग्रजा का प्रभाव बढता गया और उनके पड़ोस एक ऐसी ताक्त उभरती गई, जिसन एक दिन सारे दश को निगल लिपा17- -- - महाराज रणजीत सिंह का व्यक्तित्व और भारत के इतिहास मे उनका स्थान महारान रणजीतमिह गरीर अ र अपन राज-काज सबधी बुद्धि-ौशल स सम्पन्न व्यक्ति थ । वह पढ़े-लिखे नही थ, वितु उनम व्यावहारिक बुद्धि की बहुलता थी। उनको भापाआ का नान नहीं था, पर जपन दरवार के अधिकारियो द्वारा लिखे पना तथा दस्तावेजों को शुद्ध करने म उनको काई समय नहीं लगता था। दरबारी लेखक पनीर अजीजुद्दीन द्वारा अरवी म तिखे दस्तावजा वा वह खुल दरवार मे ठीक करा दिया करत थे। वह स्वय सिख धम क अनुयायी थे, । पर ब्राह्मणा का आदर करते थे। वह अमृतसर के गुरुद्वारा मे जात थे, मुसलमाना की मस्जिदो तथा गुम्मदा म भी सम्मानपूर्वक जाते थे। वह सारा काम खुद करत थ । सारे निणय स्वय लेत थे, पर समस्त लागा का परामश भी लेत थे। पढे लिखे न होने पर भी नान तथा पुस्तकालया की रक्षा करत थ। पशावर के हमले के समय मुसलमान सत चमकानीस ने पुस्तकालय को नुकसान न पहुचान का आदेश दिया था, जबकि भारत पर मुसलमान तया अग्रेज आक्रमणकारिया ने हमशा बहुमूल्य पुस्तकालया का बरवाद किया था। उनकी स्मरण शक्ति बहुत तीव्र थी। अपन राज्य के सभी जिला के नाम तथा विभिन्न भागा के शासका के नाम उनका याद ये। प्रशासन के मामल म वह स्वय समय ये किसी पर निभर नहीं करते थे। 18 नवम्बर 1833 स 18 दिसम्बर 1834 में सैनिक परवाना स सिद्ध हाता है कि उनका अभियान के समय आना दन की इतनी क्षमता थी कि गुजाइश के लिए जगह नही रहती थी। वह वहादुर सैनिक तथा कोमल हृदय थ । उनका जब उनके सिपाहियो न युद्ध में लग घाव दिखाए तो वह रो पडे थ । कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि काल माक्स के लिए जा महत्त्व लनिन का था, मुहम्मद के लिए जो महत्त्व अमर का था वही महत्त्व गुरु गोविन्द के लिए रणजीतसिंह का था। गुरु गोविंदसिंह के घम का सनिक शक्ति के बल पर प्रमारित तथा प्रतिष्ठित किया था। गुरु गाविन्दसिंह तया महाराज रणजीतसिंह रे प्रभाव स उत्तर-भारत की रक्षा करन मे जाट जाति यो एतिहासिक मिना या। उन नतत्व म हिन्दू, सिख तथा मुसलमान बाट सा 44 सगठिन हुए और देश पर अफगानिस्तान सहीन वान हमसा का हमशा के लिए यम कर दने म समय हुए। रा प्रकार उ41 अनस राष्ट्रीय महत्व के एतिहासिय काम परन का श्रेय प्राप्त हुआ। हिमाचल प्रदेश कायागडा तथा बहुत यडा भू भाग आज भारत का अग है, इसका येय रणजीतसिंह पा है, अयथा वह नपाल का हिस्सा हाता । यही नहीं, महाराज रणजीतसिंह न हात ता पश्चिमोत्तर प्रदश पगार तथा कश्मीर भी भारत स अलग हा गए होत, जिस प्रभार अफगानिस्तान हा गया था। महाराज रणजीतसिंह न एप बहुत बडे राज्य की स्थापना की थी, पर उहान हर बात अपन अधिकार म रयार किसी समझदार तथा शक्तिशाली उत्तराधिकारी का निर्माण नहीं किया, इसलिए उनर बाद साम्राज्य की रक्षा न हा सकी। उनको बहादुर सनानायक मिल थ। पर वह दुर्भाग्यशाली इसलिए थ कि उनके सामन ही मोहरमचद, दीवानच द, रामचद्र तथा हरीसिंह नलुआ आदि वीर मनापतिया का स्वगवास हो गया था। महाराज रणजीतसिंह की सबसे बड़ी सफलता तो सिख कौम का बहादुर बनाकर देश के दुश्मन को सफाया करने में है, अफ्गान आक्रमणकारिया को चूहो की तरह बिला मे घुसा देने म है, घाडे की पीठ पर बठार मोला चौडी नदियो का पार करके शनुआ का सफाया करन म है, पर उनकी सबसे बड़ी असफलता अग्रेजा की कूटनीति को न समयकर उनका दोस्त बनाए रखकर ताकतवर बना देने मे है। जगर उहोने पेशवा की प्राथना पर मराठो को सहायता दी हाती, भरतपुर राजा की माग पर अपनी सेना भेजी होती और नपाल + राजा की माग पर उसका मदद दी हाती ता तीना स्थाना पर अग्रज पिटत और दश गुलाम न होता। फिर भी यह मानना पडेगा कि उसक प्रभाव स अग्रजा की ताकत तजी क साथ न फट सकी । अयथा व बहुत पहल पूर भारत पर छा गए हात । महाराजा रणजीतसिंह के जीवन की एक प्रमुख घटना और उनकी युद्ध नीति कुवर नौनिहालसिंह को शादी नजदीक आती जा रही थी और उधर पेशावर तथा जमरीट क क्लेि महाराज का ध्यान अपनी ओर खीचे हुए थ । परशानी का कारण सिफ यह था कि उनका बहाटर सेनापति हरीसिंह नलुआ पेशावर मे बीमार पड़ा हुआ था। नलुआ का डर अफ्गान तथा मुस्लिम इलाका म शेर से भी अधिर था । भारत पर बार बार आगमण करने वाले अफगानो को सुआ ने मार मारपर पहाडो की गुफाओ म घुसा दिया था। उसकी बीमारी 45 का लाभ उठाकर अफगान पशावर नथा अमरीद पर तारत अजमाने लग गए थ । उनका नेतृत्व कर रहा था, दास्त मात्म्मद । एक दिन यकायक खबर के दर से निकलकर दास्त मोहम्मद ने अमराद में क्लेि पर नाक्रमण कर दिया। उस समय क्लेि में मिफ एक हजार सिख सैनिक ये। थोडे से सिख-सैनिको ने अफगान सिपाहियो वे मैलाब को बडी बहादुरी के साप रोका। इसी बीच उहोने प्रचार करा दिया कि पाच लाख सिख सेना आ रही हैं। सिख-सेना ये आन को सिद्धारने के लिए उन्होंने एक याजना बनाई कि विले के चाग तरफ कुछ सिपाही रात भर माच करते रहे । दूसरी योजना यह पनाई गई कि किसी को भेजकर अमरोद पर पठान हमले की सूचना पेशावर में हरीसिंह नलुआ का पहुचाई जाये। यह काम बहुत मुश्किल इसलिए या कि दुश्मन विले के चारो तरफ घेरा डाले हुए था। इम काम का आसान बनाया बीबी शरणवीर न । वह जानवर की तरह चलकर दुश्मन के बीच से निकल गई और हरीसिंह को खबर कर दी गई। दुश्मन का घेरा पारवर जान की सबर सिख-सेनापनि को तोप का गोला चलाकर दे दी गई। क्ति के चारो तरफ माच करत संनिर 'सत सिरी अकाल, जो बोले मो निहाल' के नारे लगा रहे थे और छ लाख सिख फौज के आने की घोषणा करते रहे। इससे दुश्मन की फौज म घबराहट पैदा हुई। दूसरे दिन थोडे से मिषा ने पठानो की वाढ को रा दिया। इसी बीच हरीसिंह नलआ अपनी सेना लेबर पहुच गया । दानो आर से घमासान युद्ध हुआ। हरीसिंह ने चुन चुनकर लोगो को मारा। पठान-सेना वापस भागने लगी। वह खैबर दर की ओर भागी। हरीसिंह ने उसका पीछा किया। पहाडी से चली दो गोलिया हरीसिंह को लगी और वह किले म लौट आए । यही रात को उनका स्वगवास हो गया। उनके स्वर्गवास को खवर गुप्त रखी गई पर महाराज यो सूचना भेज दी गई। उनको वहा दुःख हुआ और क्रोध भी । पठाना को पाठ पढ़ाने के लिए एक बडी सेना अमरोद की ओर भेजी गई । उसने पठानो की जमकर धुनाई की। दोस्त मोहम्मद जान बचाकर कावुल भाग गया। वहा सिखो ने अपना अधिकार जमा लिया।

No text on this page.

एक लोकगीत मे राजा नाहरसिंह बल्लभगढ से आजादी की आवाज सुनाई द । नाहरसिंह के मिर पे दिल्ली का ताज दिखाई दे ॥1॥ आजादी के लिए तेवतियो ने सदा लडी लडाई थी, पनवे पितामह जीवनसिंह ने तेवतिया फौज बनाई थी, परदादा केहरी सिंह ने अजमेर को धूल चटाई थी, तेवतगढ का राजा आ गया ऐसे मची बुहाई थी, रणभूमि मे भी तेवतिया की तलवार दिखाई दे नाहरसिंह के सिर पे दिल्ली का ताज दिखाई द॥2॥ नाहरसिंह दिल्ली का ताज दिखाई दे, तेवनगर से देहरसिंह हरियाणे में आया था, आपने दादा बलराम ने बल्लभगढ़ बसाया था, भरतपुर का सूरजमल किशोरी ने विवाहवण आया था, राजमहल मे खुशी मनाई, दर्जा पटराणी वा पाया था तेवतियो के राज की सदा इतिहास गवाही दे ॥3॥ नाहरसिंह के सिर पे दिल्ली का ताज दिखाई दे, इनरे भानजे जवाहरसिंह ने दिल्ली पर करी चढाई थी, इनकी युवा किशोरी ने मुगलो पर तलवार चलाई थी, भाले चुमेंगे शरीर मे हाथी की ना पार बलाही थी, फिर लाल किले के फाटर बलराम ने छाती लाई थी, लाल किले मे तेवतिया का बलिदान दिखाई दे ।।4।। .

48
म
नासिर सिर पर दिरामा ताज निमाई,
मई 1857 मची घमागान समाधी,
नाहमि' 7 अप्रजा मी भा। यरी पिटाई पी,
सडत-ल रत भारत मां पंजाश भी पपाई थी,
श्री जयम सिंह जाट पिया तेवतिया बी गाई थी,
सपने में भी अग्रे या तवतिया पी ललवार गुनाई। 1511
पाहरसिंह के सिर दिनी या ताज मिनाईद,
महाशय जयमलसिंह द्वारा रचित

1857 का महान क्रान्तिकारी राजा नाहरसिह । बल्लभगढ के राजा नाहरसिंह की गिनती देश के महान वीरो मे होनी चाहिए । वह आजादी की पहली लड़ाई के महान शहीद है । इस लड़ाई में उनकी पुर्बानी विशुद्ध देश भक्ति के आधार पर हुई थी। अग्रेजा ने न तो उनका राज्य छीना था और न उनके साथ कोई ज्यादती की थी, जैसा कि दूसरे राजाओ के साथ किया गया था, फिर भी उहाने सन् 1857 मे विद्राह्यिो का साथ दिया, बादशाह बहादुरशाह की रक्षा करते हुए, जब तक जिए अग्रेजो का दिल्ली पर अधिकार करने से रोक्ते रहे विद्रोही सिपाहियों को मदद दते रहे और जब तक चादनी चौक की कोतवाली के सामन उनको फासी पर नहीं लटका दिमा, तब अग्रेजा को नाको चन चबवात रहे। बल्लभगढ़ का मक्षिप्त इतिहास और राजा नाहरसिंह दिल्ली से थोड़ी दूर पर फरीदाबाद के पास बल्लभगढ़ नामक स्थान है। इसके किले का निमाण बालू नामक व्यक्ति ने कराया था। वालू अर्थात बलराम के पिता परीदाबार की मालगुजागे वसूल किया करते थे। यह अधिकार उनके ताऊजी गोपालसिंह को फरीदाबाद के मुगल अधिकारी मुतजा खा न दिया था। आगे चलकर बलराम के पिता चरणदास को यह अधिकार मिला था। चरणदास साधु स्वभाव के थे अत समय पर मालगुजारी वसूल करके खजान मे जमा नही वरा पाय । इस पर उनको कैद म डा7 दिया गया। बलरामसिंह उफ बालू न उनको छुडाने की एक परवीब निकाली। उसने बतनो मे नोचे तार के सिक्के विद्यावर ऊपर से साने की शपिया बिछा दी और मुतजा खा को भेंट परसे पिता को छुडा लिया । उन दिना की परिस्थितियो को देखते हुए यह बईमानी नहीं थी, राजनीतिक चतुराई थी। पिता का कद से छुडाकर वह महाराजा भरतपुर की शरण मे चला गया । बाद में सूरजमल ने दबाव डालकर सोहि भूरे लोहागढ मुजहदी और मिर्जापुर नामक पाच गाव जागीर मे दिला दिए । बलरामसिंह चतुर भी था और यहादुर लडाकू भी। उमने एक लगाकर जाविद बा को मार डाला। आसपास के इलाके पर 50 लिया । उसकी मदद के लिए महाराज सूरजमल गौजूद थे। उसकी सहायता से बलरामसिंर ने बत्तभगढ म विला पावाया। आसपास 4 लाये का उनक मुस्लिम मालिको से छीनकर अपने राज्य म मिला लिया। उसरे युछ आदमिया ने शम्सपुर के थान से सरकारी आदमिया को मार भगाया। वजीर ने वहा दूसरे आदमी भेजे, जिनका बडी वहादुरी के साथ उसन सामना किया और उसन उनको जमन नही दिया। इस पर वजीर सफदरजग को उसके विरुद्ध पायवाही करनी पड़ी। वजीर अपनी सेना लेकर खिआवाद तव ही पहुचा था कि बलरामसिंह ने बरबादी से बचने के लिए मराठा सरदार की मारफ्त वजीर से सधि कर ली। इस प्रकार उसको मा यता मिल गई । वह अपनी शक्ति का बढाता रहा। सफदरजग वजीर और नादिर जाविद के आपसी झगडे से लाभ उठाने की बलरामसिंह ने कोशिश की। जाविद खा ने उमको निमत्रण दिया। उसके साथ दरवार किया और खिलजत दी। जाविद के परामश से ही उसने सिकदरा पर हमला कर दिया । शाही अधिकारियो वा मारकर भगा दिया। “यापारिया से धन वसूला । यह स्थान बादशाह की निजी सम्पत्ति मे था । सफदरजग के लिए अब जावेद तथा बलरामसिंह दोना से निपट नेना आवश्यक हो गया। उसो सूरजमल से धया बातें की जाये इस प्रश्न पर सलाह करने के लिए जाविद को अपने घर बुलाया और उसके आन पर महल के एक एकातयुज मे ले गया। वहा उसके जादमियो ने जाविद पर आरमण कर दिया। उसके शव को पिचवा दिया गया। उसकी सम्पत्ति को लुटवा दिया गया। बलरामसिंह भी अपना हिस्सा लेकर डकौर के किले मे चला गया। सफारजग ने अब उसके विरुद्ध भी अपनी सेना भेजनी तो वह नावो द्वारा बल्लभगर के किले म सुरक्षित पहुच गया। वादशाह अह्मदशाह और सफटरजग म लडाई के बाद दिल्ली वा असली अधिकारी इमाद बन गया था। उस समय मरकारी खजाना खाली हो चुका था, लगान वसूल होता न था पोज और नौकर वेतन के लिए झगडा करते थे इसलिए इमाद ने पलवल फरीदाबाद तथा बरलभगढ के सम्पन विमानो से पसा इक्टठा करने की योजना बनाई। इस इलाके मे जधिकाश जाट क्सिान थे और सम्पन भी थे। उनसे पैसा वसूलने के लिए इमाद ने अपने प्रधान सेनापति अवीरत महमूद या को भेजा । वह पाच सौ बदम्शी और दो हजार मराठा घुडसवारो साथ बलरामसिंह से मालगुजारी तथा खिराज लेन वे लिए आया। इमाद ने सात हजार मिपाही वीस तोपें तथा अय युद्ध सामग्री पीवत की मदद के लिए भेजी । बलरामसिंह स एक झपट हुई, पर उसने शक्ति और पसा युद्ध पर व्यय करने की अपेक्षा खिराज देने का वायदा करके सुनह कर ली। अकीबत वहा मे चला गया लेकिन कुछ लोगो के कहो पर वह बात को खत्म करने का इरादा लेकर वल्लभगढ़ के एक गाव मे आकर टहर गया। यहा बालू को बुलाया गया । वह अपने पुत्र तथा चद लोगो को रोमीयत के डर पर गया । बागा आता म गमागर्मी हो गई और जीवन ३ आदमी इन लागापर यपट पड। उसे मार डाला गया । वल्लभगढ़ पर अकीबत को अधिकान्हा गया । इस कायवाही मे मल्हारराव होलर का बेटा पाण्डोजी हो कर भी अवीवत के साथ था। इस इलाके के वहादुर जाट विसाना को नेस्तनाबूद करन के लिए अकीवत ने वल्लभगढ तथा वाण्डाजी ने होडल पर डेरा लगाया। उनकी टुकडिया चारा तरफ जाती, लूटमार परती ओर जाटो को उखाडकर भगाने की कोशिशें करती थी। नादगाव तथा बरसाने तक धाव मारे गए। वहा से जाटो का आधिपत्य समाप्त करके सन् 1753 म मराठो ने अपने थाने स्थापित कर लिये । उधर अवीवत ने गगूला तथा धासेरा से जाटो को भगावर सन् 1754 मे अपने अधिकार कर लिया। इन मबकी योजना भरतपुर वे राज्य को मिटाने की थी। सन् 1753 म पेशवा बाजीराव के छाट भाई रघुनाथ राव के नतत्व में एक बड़ी सेना उत्तर भारत के राज्यो से चाथ वसूल करने के लिए चल पड़ी थी। भत्हारराव हो कर उनके साथ था। वह दो माह तक जयपुर म ठहर कर छोटी- छोटी रियामता मे चोय वसूल करता रहा । स्वय जयपुर से 12 लाख वसूल परके वह भरतपुर की ओर बटा । उधर से अकीबत तथा खाण्डोजी भी आ गये थे। रघुनाथराव बडी सेना के साथ था ही। कुम्हेर वो घेर लिया गया । महाराज सूरजमल से दा करोड रुपये मागे गए । सूरजमल ने एक पाई नहीं दी। कुम्हर पर जमकर लडाई हुई । पालपी पर बैठकर खाइया का निरीक्षक करत रामय खाण्डोराव को तोप का गोला लगा और वह ढेर हो गया। अत में मराठो यो घेरा उठाना पड़ा । इमाद भी मथुरा की ओर चला आया । महाराज सूरजमल की तारत बहुत बह गई। 14 जनवरी 1761 को पानीपत के मैदान मे सदाशिवराव भाऊ की पराजय लगभग एक लाख मराठा शरणार्थियो को भरतपुर राज्य म शरण देन तथा अहमदशाह अब्दाली को थका-थकाकर मारन एव उराको लौटने के लिए विवश पर देने के बाद महाराज सूरजमल के मामन जमन वी तावत हर एक म नहीं रह गयी थी। उहाने आगरा को अपन अधिकार मे पिया और हरियाणा म शक्तिशाली राज्य स्थापित करने की योजना बनाई। इसी योजना ये मतगत वल्लभगड पर फिर से जाटो का अधिकार हुआ। आगे चलकर सी परिवार म नाहरसिंह का ज म हुआ।

52 एक नये युग की शुरूआत धीर धीरे मराठा साम्राज्य के सेनापति म्वतत्र हाते गए। सिधिया तथा होल्कर स्वतत्र हो गए। इम तरह एक शक्तिशाली सामाज्य बिखर गया । महाराज सूरजमल के बाद, भरतपुर की शक्ति भो विघटित हुई। पजाब म महाराज रणजीतसिंह ने जो ताक्त पैदा की वह उनके बाद विखर गई थी। अंग्रेज भारत मे घुस चुके थे। योरोप मे फासीसियो की हार के बाद भारत म भी इच तथा फ्रेंच ताक्तो के मुकाबले म अग्रेज विजयी होते गए। भारतीय राज्या का सितारा अधकार मे डूबने लग गया था। अग्रेजो का भारत प्रवेश और भारत को निगनना - जिस समय मुगल सम्राट जहागीर ने सन 1613 मे सूरत म अग्रेजा को व्यापार करने की इजाजत दी थी तब उमने यह नहीं सोचा था कि जो अग्रेज कोम आज हाथ जाडे उसके सामन खडी है एक दिन वह भारत को तबाह कर देगी उसकी मतान का गोलियो से भून देगी मुगलिया सलतनत र वादशाह को कर कर लेगी उसके हरम की बेइज्जती करेगी। सर टामस रो ने मुगल बादशाह मे आगरा अहमदाबाद और भडौच मे अपनी फैक्ट्रिा गाने की इजाजत लेकर अपने पर फैला लिय थे। 1668 म बम्बई भी अग्रेजो के हाथ म आ गया था। 1633 म अग्रेज बगाल मे घुसे थे। 1651 ई० मे व्यापार करने की इजाजत लेकर फैल गए थे। भारत मे एक ओर मासीसी बढना चाह रहे थे टूसरी ओर अग्रेज । मन 1740 मे अग्रेज और मामीमिया के बीच योरोप मे लडाई शुरू हो गई थी फ्लत भारत म भी दोना के बीच युद्ध प्रारम्भ हो गया था। इस तडाई मे जीत अग्रजो की हुई और वे बगाल तथा महाराष्ट्र म कई महत्त्वपूण स्थाना पर कब्जा कर सके। मीरजाफर की गद्दारी के कारण वगाल के नवाव को प्लासी के युद्ध में हराकर अग्रेज बडी ताक्त के रूप में उभर आय थे । भूमिकर सग्रह का अधिकार कर व वगाल के रोजाना की कानून तथा व्यवस्था का अधिकार भी पा गए थे। पेशवा परिवार मे गद्दी में सवाल पर फूट पड जाने के कारण अग्रजा को वहा भी अपनी टागें फ्सान का मौका हाथ लगा था । नाना फडनवीस का विरोध करन पी दृष्टि से पशवा रघुनाथराव न जग्रेता की शरण ली थी। उहाने पेशवा को मदद देकर लडाई शुरु करा दी और बदले म पूना दरवार में अपना प्रभाव जमा लिया। लाह मानवालिस (1786 1793) न मैसूर में अपना प्रभाव जमान का 1 53 प्रयास किया । लाडवेलेजली न टीपू सुलतान को हराकर पश्चिमी नट तक का अधिकार पा लिया था। वेलेजली न उत्तराधिकार के प्रश पर अवध म दखल देकर अवध पर काबू कर लिया। रान 1802 म वसीन की सधि के आधार पर अग्रेजा को पशवा के राज्य में अग्रेजी सेना रखने का अधिकार मिल गया था। मराठा को हराकर जनज वगाल और मद्रास के अपने अधिवार क्षेत्र को मिलान म सफल हो गए थे और एक बड़ी ताक्त बनकर उभरन लगे थे। अब उहान राजपूताना के राजाओ के साथ भी र्सा धया पर ली थी। गवनर जनरल लाड हेस्टिग्स ने 1817 मे कोटा तथा उदयपुर, 1818 मे बूदो, किशनगढ, बीकानेर तथा जयपुर स और जक्टूबर से लेकर दिसम्बर 1918 म वासवाडा, प्रतापगढ, डूगरपुर, जसलमेर तथा सिरोही आदि राज्या से सधिया करके अपना प्रभाव क्षेत्र बढा लिया था। इस समय समूचे भारत में अब उनक सामने पड़ने बाला काई राज्य नहीं रह गया था। थोडी बहुत ताकत बची थी ता वह भरतपुर तथा लाहौर में थी। रणजीतसिंह से जभी अग्रेज भयभीत थे और भरतपुर अभी उनके अधिकार के सामने युवा नही था । पिंडारिया को समाप्त कर अग्रेजा के हौसले आर भी बढ गय थे। राजपूतान में लूटमार करने वाले अफगानो को हराकर उनकी ताक्त पा लोहा माना जाने लगा था। इस तरह सन 1818 तर भारत पर अपना का अधिकार हो गया था। लाड क्लाइव न जिस अग्रेज राज्य की नीव डाली थी, वान हस्टिग्स तथा वलेजली ने उसका विस्तार किया और लाड हस्टिग्स ने उसको पूर्ण बनाया। अब उनका राज्य पश्चिम म पजाव स, पूरब म आसाम तथा वर्मा से जा मिला था। इसलिए एक ओर उनको वर्मा से लडाई लडनी थी और दूसरे महाराज रणजीत सिंह स निपटना था । वर्मा से पहली लडाई के वाद सन 1826 म अग्रेजो को वडा लाभ हुआ। आसाम, चाचार और मणिपुर अग्रेजा के हाथ लग गय । वर्मा के समुद्र तट पर उनका अधिकार हो गया । सन 1852 में वर्मा के साथ उनकी दूसरी लडाई हुइ और अग्रेज उस पर काबिज हो गय । अब केवल पजाब म जाट सिख राजा रणजीतसिंह उनके रास्त वा वाटा रह गया था। उनको मत्यु के बाद अग्रेजा का रास्ता साफ था । वह पजाब का भी हडप चुके थ । अफगानिस्तान तया कश्मीर पर भी अपना पजा रस चुके थे । अब उनके सामने एक ही उद्दश्य था कि भारत में कोई ताकत एसी न बच रहे जो कभी सिर उठा सके । इस उद्देश्य का पूरा करने के लिए उहान देशी राजाओ के राज्या मे झगडे पराये, उनकी व्यवस्था तथा प्रशासन म दखल दिया और जब राज्यो म झगडे बढ़े तो अच्छी म्यवस्था करन नाम पर राजा को पशन देवर राज्य को अपन अधिकार मे ले लिया । इस गीति के बल पर, उहाने मारे भारत के राज्यों को हइप लिया था। अमाध्यापारिया ने रेयल भारत पर राजनीतिक दृष्टि से ही अपना पना न 54 रखा या, उनका असती मकसद या भारत में सोने यो इगलण्ड ग जाना । इम लिए उहाो यहा उद्योगामा वरवाद करायी नीति अपाई। बगा7 म मलगल बनती थी, जिसमा व्यापार एशिया तथा यारापयशा तर हाता था। अग्रेजान कारीगराया स्वतत्र प रा धधा परन स राम दिया, उनका कम्पनी में नोपर रगा, पुद मलगल बनवाई, उसाध्यापार किया, जिसन यपनी की नोरा परन से वार कर दिया, उसके हाथ व टया दिय । इस तरह मलमलमा उद्योग और व्यवसाय पत्म कर दिया । चटगार म जहाज यात थ । वह काम खत्म कर दिया। नासिक म बतन बनत थ वह काम भी पत्म कर दिया। नील की सेना अपन हाया म ने ली। पिसाना से डडे के बल पर नील की खेती कराई, जिस किसान ने मना किया, उसके साथ पार अयाय दिया। भारत पा सारा कच्चा माल इगलड भजा जान लगा । वहा या तयार माल भारत म लारर बचा जान लगा। सुई तब इगॅलण्ड से आन लगी। भारत आर्थिक दृष्टि स यरमाद हा गया, इगल मालदार बन गया । मो याद अकाल पटा लगे। हजारों की सख्या में लोग मरो लगे । जग्रजा के प्रति लागो म गुस्मा पैदा होन लगा। जवाल के बाद प्लेग को बीमारी फैली। भारत म, पहले यह बीमारी नहीं थी, अत लागो को विश्वास हा गया कि अंग्रेज अपने साथ यह बीमारी लकर आय हैं। अफगानिस्तान म अग्रेजा न लडाई लडी। उमका खच भारत के सिर पर लाद दिया । बम्बई स इगलैंड तक ममुद्र म केबिल डाला गया। उसका खच भारत से वसूल किया। कहने का मतलब यह है कि भारत स हर तरीके द्वारा पसा ऐंठा गया। भारतीय मजबूर होकर सब कुछ देख रह थे पर चुप थ । अग्रजा के विपरीत भीतर ही भीतर आग सुलग रही थी। अग्रेजा न अवध की बेगमा के साथ अनीति तथा अभद्र व्यवहार किया, बनारस के राजा चेतसिंह के साथ नीचता भरा यवहार किया, उसके लिए जिम्मेदार वारेन हेस्टिग्स पर मुकदमा चलान का ढोग रचा गया, पर उसको नशनल हीरो मान लिया गया, सिधु का अनीति जार अयाय से अपन राज्य म मिलाया, झासी राज्य के साथ बेईमानी की, भूमि बदोबस्त के नाम पर एक और कम्पनी जमीन की मालिक बन गई और दूसरी ओर अग्रेजा के खुशामदी जमीदार जमीन के मानिक बन गय । आम जनता जा पहले जमीन की मालिक थी, रयत बनकर रह गई । अवध के किसानो पर मालगुजारी 20 30 लाख रुपये वापिप बढा दी गई। इसका नतीजा यह हुना कि आम जनता स लेकर जमीदार तथा पदच्युत राजा तक अग्रजो स नाराज होकर पिसी मौरे का इतजार करन लग थे। नाड डलहाजी की नीति ने इस नाराजगी को बुरी तरह बढाया था। वह मुगल बादशाह को क्लि से निकालकर कुतुब मीनार के पास रखना चाहता था, इससे हिंदू तथा मुसलमानो म क्षोभ बढ़ता गया। अवध के नवाब की सेना के 55 खत्म कर दिए जान स हजारो नौकर चाकर बेकार हो गये थे। डलहौजी द्वारा पेशवा के साथ अन्याय करने, नाना साहब तात्या टोप, बिहार के कुवरसिंह के साथ ज्यादती करने तथा दक्षिण मे वीस हजार इनामी जायदादे छीन लेन के कारण पोर असताष छा गया था। ईसाई पादरियो द्वारा भारतीयो को बलपूर्वक ईसाई बनाने के कारण वह रोप और भी बढ़ता जा रहा था। ये ही सन 1857 को काति व मुख्य कारण थे, लेकिन अग्रजो ने अपनी असलियत छिपाने के लिए इन कारणा पर पर्दा डाल दिया और आ जाती की इस पहती लडाई को सिपाही- विद्रोह का नाम दे दिया। अफसोस यह है वि एक लम्व समय तक भारतीय इतिहासकार भी इसको सिपाही विद्रोह कहत रहे । अग्रेजो न इस बात का जोरदार प्रचार किया कि हिद् सिपाहिया न नय कारतूसा यो लेन से इनकार इसलिए कर दिया था कि उनका गाय की चर्वी से बनाया गया है। दूमरा प्रचार उहान यह किया कि यह लडाई मिफ उन सामतो या राजाओ द्वारा शुरू की गई जिसको अग्रेजा ने गद्दी से उतार दिया था। असल में, ये दानो कारण झूठे थे । असली कारण था, भारतीय जनता मे व्यापक रूप स वतमान अग्रजा क खिलाफ गहरा असतोप। जिसका जम भारतीयो के साथ अग्रेजो द्वारा दिया गया नीचता तथा कमीना व्यवहार था, एसा व्यवहार जो जानवर के साथ भी नहीं दिया जाता। समूचे देश में फैल गई थी सन् 1857 की आग 26 फरवरी सन 1857 के दिन बेहरामपुर (बगाल) को छावनी के भारतीय सिपाह्यिा ने चर्गी लगे कारतूसो का हाथ मे लन से इन्कार कर दिया था, इस पर अग्रेज सेना-नायक मीचल ने उनको बहुत धमकाया और कम्पनी को बर्खास्त पर दिया गया। इसक वर्षास्त सिपाहियो न इस बात की चचा दूसरे सिपाहियो से को। 29 माच, 1857 को मगल पाडे नामक सिपाही ने अपने सारजेंट मजर पर गोली चला दी, निशाना चूर गया । घटनास्थल पर लफ्टीनण्ट बाग पहुच गया। उस पर भी पाण्डेय ने गोली चलाई। यह निशाना भी चूक गया। इस पर दूसरा भारतीय सिपाही तलवार लेकर दोना अग्रेजो पर पिल पड़ा और उनको जमीन पर पटक लिया। शेष पलटू नामय सिपाही ने आकर मगल पाडय को पकड लिया, लेगिन पाडेय उसस छूट गया और अपने साथिया को सहायता के लिए पुकारने लगा। जनरल हीयरिस घटना-स्थल पर पहुचा, मगल पाडेय ने उस पर भी गोली चलाई लेकिन निशाना यहा भी चूक गया, तब स्वय पर गोली पलाई, पर वह पायल हुआ, मरा नही । इस पर हीयरिस न 34वो पलटन को पटवारा सिपाही बरसा में पल गम । पर कम्पनीको बर्यास्त पर दिया गया और मगल पाडेय को गोली मार दी गयी।

54 रखा था, उनका असती मकमद था भारत के सोने को इगण्ड से जाना । इसके लिए उ होो यहा उद्यागो वो बरबाद करने की नीति अपनाई । बगाल में मलमल बनती थी, जिसका व्यापार एशिया तथा याराप के दशो तक हाता था। अग्रेजा ने कारीगराको स्वतन रूप से धधा वरन स रा दिया, उनका कम्पनी में नौकर रखा, खुद मलमल बनवाई, उसका व्यापार किया, जिसन कपनी की नौकरी वरन से इकार कर दिया उसके हाथ कटवा दिये । इस तरह मलमल का उद्योग और व्यवसाय खत्म कर दिया । चटगाव म जहाज बनत थे। वह काम खत्म कर दिया। नासिक म बतन बनते थे, वह काम भी खत्म कर दिया। नील की खेती अपने हाथो मे ले ली। किसानो से डडे के बल पर नील की खेती कराई, जिस क्सिान ने मना किया, उसके साथ घोर जयाय क्यिा । भारत का सारा कच्चा माल इगलड भेजा जाने लगा । वहा का तैयार माल भारत में लाकर बेचा जान लगा। सुई तक इगॅलण्ड से आने लगी। भारत आर्थिक दष्टि स वरवाद हो गया, इगलड मालदार बन गया। इमक बाद अकाल पडन लग । हजारो की साया में लोग मरन लगे । अग्रेजो के प्रति लोगो म गुस्मा पदा हान लगा। अकाल के बाद प्लेग को वीमारी फली। भारत म, पहले यह बीमारी नही थी, अत लागा को विश्वास हो गया कि अग्रज अपन साथ यह वीमारी लकर जाय हैं । अफगानिस्तान मे जग्रेजा ने लडाइ लडी । उमका खच भारत के सिर पर लाद दिया । बम्बई से इगलड तक समुद्र म केबिल डाला गया। उसका खच भारत स वसूल किया। कहने का मतलब यह है कि भारत से हर तरीके द्वारा पसा ऐंठा गया। भारतीय मजबूर होकर सब कुछ देख रहे थे, पर चुप थे । अग्रजा-क विपरीत भीतर ही भीतर आग सुलग रही थी। अग्रेजा ने अवध की वेगमा के साथ अनीति तथा अभद्र व्यवहार किया, बनारस के राजा चेतसिंह के साथ नीचता भरा पवहार क्यिा, उसके लिए जिम्मदार वारेन हस्टिग्स पर मुपदमा चलाने का ढोग रचा गया, पर उसको नशनल हीरो मान लिया गया सिधु काजनीति और अयाय स अपन राज्य म मिलाया, झासी राज्य के साथ बईमानी वी, भूमि यदावस्त के नाम पर एष आर कम्पनी जमीन पी मालिक बन गई और दूगरी भार अग्रेजा व खुशामदी जमीदार जमीन के मानिक बन गय । आम जनता जा पहले जमीन की मालिप थी, रैयत बनकर रह गई। अवध र किसाना पर मालगुजारी 20 30 लाप स्पय वापिक बढ़ा दी गई। इसका नतीजा यह हमा वि आम जनता स लेकर जमीदार तथा पदच्युत राजा तक अप्रजास नाराज हाकर विसी मोरया इतजार वरन लग थे । नाड डलहौजी को गीति । दस नाराजगी या बुरी तरह बढाया था। वह मुगायाशा' या पिस स निवालार युतुब मीनार क पास रखना चारता था, गग हिंदू तथा मुसलमाना म दाम पढ़ता गया। जवध के नवाब की सना 35 खत्म कर दिए जान से हजारो नौकर चाकर बकार हो गय थे । डलहौजी द्वारा पशवा के साथ अयाय करने, नाना साहब, तात्या टोपे, बिहार के कुवरसिंह के साथ ज्यादती करने तथा दक्षिण म बीस हजार इनामी जायदादें छीन लने के कारण पार जसनोप छा गया था। ईसाई पादरियो द्वारा भारतीयो को बलपूर्वक ईसाई बनाने के कारण वह रोष और भी बढता जा रहा था। यही सन 1857 की काति के मुख्य कारण थे लक्नि जग्रजो अपनी जसलियत छिपान के लिए इन कारणा पर पर्दा डाल दिया और आजादी की इस पहली लढाई का सिपाही विद्रोह का नाम दे दिया। अफसोस यह है कि एक लम्बे समय तक भारतीय इतिहासकार भी इसको सिपाही विद्राह कहत रह । अग्रेजान इस बात का जोरदार प्रचार किया कि हिंदू सिपाहिया ने नय कारतूसा को लने स नकार इसलिए कर दिया था कि उनको गाय की चर्बी स बनाया गया है। दूसरा प्रचार उहान यह किया कि यह लडाई मिफ उन सामता या राजाआ द्वारा शुरू की गई जिसको अग्रेजो न गद्दी से उतार दिया था। असल म, ये दोना वारण झूठे थे । असली कारण था, भारतीय जनता में व्यापक रूप से वतमान अग्रजा के खिलाफ गहरा असताप। जिसका जाम भारतीयो के साथ अग्रेजा द्वारा किया गया नीचता तथा ममीना व्यवहार था, ऐसा व्यवहार जो जानवर के साथ भी नही किया जाता। समूचे देश में फैल गई थी सन् 1857 की आग 26 फरवरी सन 1857 के दिन बेहरामपुर (बगाल) को छावनी के भारतीय सिपाहियों ने चर्बी लग भारतूसो को हाथ मे लन से इकार कर दिया था, इस पर अग्रेज सेना-नायक मीचल ने उनका बहुत धमकाया और कम्पनी को बर्खास्त कर दिया गया। इसक वर्खास्त सिपाहिया ने इस बात की चर्चा दूसरे सिपाहियो से की। 29 माच, 1857 का मगल पाडे नामक सिपाही ने अपने सारजेंट मजर पर गोली चला दी, निशाना चूक गया। घटनास्थल पर लपटीनण्ट बाग पहुच गया । उस पर भी पाण्डेय ने गोली चलाई। यह निशाना भी चूक गया। इस पर दूसरा भारतीय सिपाही तलवार लेकर दानो अग्रजा पर पिल पड़ा और उनको जमीन पर पटक लिया। शेख पलटू नामक सिपाही ने आवर मगल पाडय को पकड लिया, लेकिन पाडेय उससे छूट गया और अपने साथिया को सहायता के लिए पुकारन लगा। जनरल होयरिस घटना स्थल पर पहुचा, मगल पाडेय न उस पर भी गाली चलाई लेकिन निशाना यहा भी चूक गया, तब स्वय पर गोली भलाई पर वह घायल हुआ, मरा नहीं। इस पर होयरिस न 34वी पलटन को सिपाही बैरवा में चले गये । पर बम्पनीको वस्ति पर दिया गया और मगल पाडेय को गोली मार दी गयी। पटवारा, 56 अम्बाला, लखनऊ और मेरठ वरकपुर के विद्रोह की कहानिया अम्बाला, तखनऊ और मरठ पहुंची। 90 फीसदी सिपाहियो न गाय की चर्बी से बने कारतूसा पालने से इकार कर दिया। अवध की पलटन बर्खास्त पर दी गई। समूच देश मे चपातिया बटी, गुलाब का फूल घुमाया। जिस गाव के लोगो न रोटिया ले ली और दूसरी रोटिया बनवाकर और गावा म बटवा दी, उस गाव वा यान्तिकारिया का हमदद मान लिया गया। जिस पलटन ने गुलाव रा फूल ले लिया, उसको विद्रोहिया का समथक मान लिया गया। मेरठ का विद्रोह मेरठ छावनी के 85 घुडसवारो ने कारतूस लेन से इंकार कर दिया था। इनका कोटमाशल कर दिया गया। सिपाहिया न गारे अफसरो को गालिया दीं। 9 मई की शाम को एक भारतीय अफमर ने गफ कोजाकर बताया कि 10 मई को मरठ के सिपाही विद्रोह कर देगे। गफ ने अपने कनल का सारी बातें बतायी । कनल ने गफ को डाट दिया। वह ब्रिगेडियर के पास गया, वहा भी उसने फटकार खाई ।लेक्नि शहर में विद्रोह के इश्तहार चिपकाय गये, अग्रेजो के भारतीय नौकर उनको छोडकर चले गय । 10 मई को मरठ मे विद्रोह हो गया। सबस पहले विद्रोहिया ने जेल से अपन साथिया का छुडाया कोई दूसरा वदी उहोन नहीं छुडाया । जेल की फौजी गारद तथा पुलिस ने उनका साथ दिया पर विद्रोहियो ने खजाना नहीं लूटा। सिपाहिया न लेफ्टीनेंट मकेजी तथा क्प्टेन जी के परिवार की रक्षा का। अग्रेजा न यह प्रचार किया था कि विद्रोही सिपाहियो न अग्रेजा को मार डाला, लूट पाट की, महिलाओ को वेइज्जत क्यिा, सगसर झूठ था । मेरठ से दिल्ली की ओर मरठ के क्रातिकारी दिल्ली की ओर चले । रोबट स के अनुसार दिल्ली की पलटन मेरठ के विद्राहियो का स्वागत करने के लिए तैयार थी। मरठ के सिपाहियों ने राजघाट को ओर वाले दरवाजे स दिल्ली में प्रवेश किया। वे बादशाह की जय और अग्रेज मुर्दाबाद बोल रहे थे। जग्रेजा न 38ो पलटन को उहे रोक्न का हुक्म दिया । वह पलटन विद्राह्यिो के साथ हो गई। दिल्ली की जनता न प्रांतिकारियो का स्वागत किया। ग्रेजा से भाग जाने के लिए कहा गया । मेरठ के सिपाहिया ने यारशाह बहादुर शाह से तहत पर बैठन पी प्रायना की। उसने इकार पर । दिया, इस पर उनको तख्त पर बैठकर उनका नेतृत्व करन के लिए हा गया । दिल्ली पर प्रातिकारियो का अधिकार हो गया। उधर भारतीय सिपाहिया ने लाहौर के किले पर अधिकार पीजना बनाई। अग्रेजा न मियापीर, फिरोजपुर क सिपाह्यिा स हथियार पिया लिये। बाजार से जब सिपाही निकले तो जनता न उनपा स्वागत किया। पजाब की कई छावनिया मे मई के महीन म विद्रोह हो गया। विद्रोहियो का दिरली पर वजा हो जान के बाद, हैनरी तारस न दिस्ती म दरबार किया। उसन अग्रजी राज्य की तारीफ की। भारतीय सिपाहियो को इनाम दिय जि होन कातिकारिया का पत्र ले जाने वाले आदमी का पकड लिया था । मेरठ और दिल्ली क विद्रोह की कहानी सुनकर शाहजहापुर की जनता भी अग्रेजो से लडन के लिए तैयार हा गई। 31 मई को वना सेना न विद्रोह कर दिया था। क० न लिखा है कि वहा को जनता विद्रोह पर उतारू थी। 20 मई या अलीगढ की सना न विद्राह पर दिया था और 23 मई को मैनपुरी तथा इटावा म विद्रोह हा गया। 16 मई की रात म गुडगावा म विद्रोही पहुच गय थे । गाव वाला न उनका साथ दिया। वहा असिस्टेंट मजिस्ट्रेट सहायता के लिए मथरा के मजिस्ट्रेट योनहिल के पास आया । उसने आगरा से सिपाहिया की एक टुक्डी खजाना ले जाने के लिए बुलवाई। 31 मई का बरेली की सेना तथा जनता न विद्रोह कर दिया था। 23 मई वो सहारनपुर जिले + ज्वाइट मजिस्ट्रेट एवटसन न लिखा था कि मारा- पास की जनता उस पर हमला करने के लिए तैयार बरी है । फतहपुर तथा बादा के अफसरो ने भी जनता के विद्रोही होने की सूचना दी थी। इलाहाबाद के किसान विद्राह पर उतर पडे थे । उहान नीलाम हुई अपनी जमीना को छीन लिया था। आजमगढ व विद्रोही सिपाहिया ने अग्नेजा को खजाना ले जाने रा रोका था, बनारस मे प्राति हुई, पर सिपाहिया ने अग्रज अफ्सर वनट के प्राण बचाए थे। 8 जून को फजाबाद जाति की लपटो म आ गया, लेकिन श्रीमती मिल नाम की अग्रेज महिला अकेली चली, गाव की स्निया न उनकी आव भगत की, किसी विद्राही न उनस हाथ तक नहीं लगाया । गोरखपुर स लेनीक्स परिवार अकेला चला तो विद्रोही नता मुहम्मद हसन न उसके प्राणो की रक्षा की। अवध के विद्रोही लागा के व्यवहार की तारीफ करत हुए फोरेस्ट न लिखा था उहोन अग्रजा के साप दयालुता का व्यवहार किया था।' बदायू तथा फरुखाबाद के जिलो म जून के अन्त तक समूची जनता विद्रोही हो गई। के० न लिखा है कि झासी तथा आगरा के पूरे जिले विद्रोही हो गय है। पटना विद्रोह का मुख्य केंद्र था। पजाब, बुदलखण्ड, अवध आर बिहार की जनता विद्राही हो गई थी। स्यातकोट से विद्रोही सेना चली नीमच पलटनें उमड पडी, नसीराबाद की पलटन विद्रोही हो गई। - .

58 राजस्थान की जनता को अग्रेजो पर विश्वास नही रहा था । नसीराबाद के विनोह को दबान के लिए जोधपुर से एक टुक्डी भेजी गई, वह भी विद्राही हा गई। अजमर कोटा इदौर की छावनिया पर आक्रमण हुए । कराची की सेना भी विद्रोही हा गई थी। कोल्हापुर मे दिमम्वर म विद्राह हुमा जग्रेजो न 36 आदमिया का पासिया दे दी । सतारा मे रगोबा पोजी न विद्रोह कर दिया । चटगाव की देशी सेना ने नवम्बर म विद्रोह कर दिया । नवम्बर मे ही ढाका की सेना न विद्रोह दिया, वह जलपाई गुडी की ओर बढी, अग्रेजा ने लाख कोशिशें की उनको दवान की, पर व जगला म फैल गय । कहन का मतलब यह है कि पूरे दश की जनता अग्रजा को भारत से भगा दने पर उतारू हो गई थी। विद्रोही सिपाहियो ने 11 मई से 25 मई 1857 का समय दिल्ली शहर की व्यवस्था म लगाया । वजीराबाद की मगजीन से उनका बदूकें तो मिली, पर बारूद नहीं मिल पाई थी। नीमच और बरेली की सेनाए अभी दिल्ली नही पहुचपाई थी । मेरठ और दिल्ली की सेनाए ही नगर की रक्षा कर रही थी। दिल्ली को लने के लिए एक जोर से बनाड और दूसरी ओर से बिलसन वढ रहा था। देशी सिपाहियो की कोशिशे थी कि दोनो की सेनाए जापस म न मिल पाये, लेकिन व मिल गइ, हालाकि भारतीय सिपाहिया ने अग्रेजो को दिखा दिया कि भारतीय कितन दश भक्त तथा वीर होत है। उस समय दिल्ली म अहसनुल्ला खा तथा मिजा इलाहीवरुश जस अग्रेजोक जासूम थे, तो ऐसी वीर हिदू तथा मुस्लिम स्त्रिया भी थी, जो जनेजा का सफाया करने म पुरुषा से आग थी। विलसन तथा ग्रेटहेड का आग बढने मे पल पल पर कठिनाई हो रही थी। दिल्ली पर अधिकार करने के बाद, नीचता का परिचय दिया, उसकी मिशाल शायद ही कही मिले । बादशाह तीन शाहजादा का होडसन ने गोली मार दी, बहादुरशाह को टूटी बैलगाडी म बिठाकर लाया गया, टूटी खाट पर बिठावर, उसके सामन हरम की वेगमा को बेइज्जन दिया गया था, चारा तरफ मार-वाट और लूट पाट की । मतको को जेबा तक का खापाला। घरा वो लूटा, मन्दिर और मस्जिदा को लूटा जो मिला उसको गाली मारी, सामूहिक पासिया दी। इसके विपरीत विद्राहिया ने अंग्रेज, स्त्रिया ही नहीं, पुरुषा को भी बचाया। जिस समय दिल्ली का फिर स हथियान के प्रयास म अग्रेज जान की बाजी सगा रहे थे, उस समय राजा नाहरसिह न एक महान् दश भक्त की भूमिका अदा अग्रेजा ने जिस के 1 59 राजा नाहर सिंह और उनका देशभक्ति पूर्ण काय नाहर सिंह एक ओर बहादुर शाह जफर की हिफाजत में लगा रहा, दूगरी भार अग्रेजो को परेशान करन वाल युद्ध की रचना करता रहा । जब अग्रजा को बत्लभ गढ नरश के साहसी frतु विरोधी कारनामो या पता चला तो भौचमा रह गए। जाट वीर नाहर सिंह की प्रवल देशभक्ति और प्रचण्ड युद्ध कला से वे सचमुच चकरा गए । अग्रजा को इस छोटे से जाट राज्य की अजय शक्ति का पता ही नहीं था बल्लभगढ और मुगलो के सम्ब धा की जानकारी भी अग्रेजो का नहीं थी। नाहर सिंह न मुगला स मित्रता को निभाया और बुरे वक्त म निभाया । दिल्ली म मुगल शासन अतिम सामेल रहा था। उसकी जड हिल रही थी। उनम दम-खम नहीं रह गया था। इन परेशान हाल मुगला का सहारा दिया जाट वीर नाहर सिंह ने । मित्रता के नाते राजा नाहर सिंह न उनका उत्तरदायित्व भी अपने कधा पर ले लिया। रसद मुरक्षा और आतरिव व्यवस्था की बागडार युवा नरश नाहर सिंह ने सभाल ली। दिल्ली दरवार में राजा नाहर सिंह का समाट के समीप सोन की कुर्मी मिलती थी। कहने की जरूरत नहीं है कि युवा नरश नाहर सिंह का दिल्ली दरबार म बहुत सम्मान होता था। सकट की घडी म दिल्ली दरबार का एक मात्र सहायर राजा नाहर सिंह ही था। यदि नाहर सिंह मित्रता न निभाता ता मुगल सम्राट और उनका परिवार लालकिले मे भूखा- प्यासा ही मर जाता । राजा नाहर सिंह के प्रयास के बावजूद दिल्ली म मुगलो कर शासन कमजोर पडता गया और अग्रेजा की पकड जकड मजबूत होती गइ । राजा नाहर सिंह ने स्थिति का भाप लिया और वे सराव हो उठे। उहोन रणनीति बदली । अब केवल सुरक्षा और प्रशासन का प्रश्न नही था। अब अग्रजा पर आक्रमण करने और सनिक सगठन को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी उन पर आ गई । उहोन दिन देखा न रात-घाघार दौड धूप थी। और मजबूत किस्म का सय सगठन खडा किया। इस रणनीति को सफल बनान के लिए उहान यूरोपीय पप्तानो को अपनी सेना म उनत पदा पर नियुक्त किया। श्री पीयरसन को दिल्ली में बल्लभगड राज्य वा रेजीडेट नियुक्त किया गया। बल्लभगढ की सेना को आधुनिक हथियारा से लैस किया गया और प्रशिक्षण की अच्छी व्यवस्था की गई। युवा नरेश नाहर सिंह के नेतृत्व में उसकी सुनियाजित राजनीति सफल हुई। 16 मई 1857 को दिल्ली अग्रेजा ने चगुल से मुक्त हो गई । राजा नाहर सिंह मी सना दिल्ली की पूर्वी सीमा पर ताात हुई। मुगल मम्राट वा महायता के लिए 15,000 रुहेला की सुसज्जित सेना लेकर मुहम्मद वरून या दिल्ली आ चुका था ।

60 - उमा भी गजा नाहर सिंह की रणनीति यो स्वीकार लिया और उन्हें पूर्वी मामा पर ही सनात रहन की रजामी दी। दिल्ली को पुलिस राजा नाहर पर ही मुगल सपाट आधिन हा गा । शग्राट बहादुर शाह जफर भी मानो दाहिनी भुजा जाट योर नाहर गिह काही मात । अग्रजा व आधिपत्य से आजाद लिी 134 दिन मा इतिहास पुरा नरेश नाहर मिह र परिश्रम प्रभासा और पौशल का इतिहास है। राजा नाहर गिह न आनगि व्यवस्था का शानिपूण बनाए रग्रा और मोदी का मजबूत बनान प्रयन पिए । उहान दितीस लेकर बल्लभगडत सैनिर चौरिया स्थापित की। उनकी सुरक्षा वा चुस्त और मजबूत बनाया। उन्होंने गुप्तचरा । दता का भी इस क्षत्र म जाल बिछा दिया। सूचना र आधार पर सप-सगठन यो और मजबूत बनात गए। परिणाम यह हुआ कि अमज मना पूर्व की ओर से दिल्ली में प्रवश न पा मी ! युवा नरेश हर यो मुस्तंदी और मजबूत मोर्चा बदी स अग्रेज मस्त हा गए । और सर जास सारेस न पूर्व दिशा स दिल्ली पर हमला करने की माजना को त्याग दिया। सर जोस लारस न लाइनिग का अपने एक पत्र म लिपा --- 'पूर्व और दक्षिण दिशा म बल्लभगढ के नाहर सिंह की मजदूत मोर्शवदी है। उस सुदृढ संनिय दीवार को तोडना तब तक असभव प्रतीत होता है जब तक चीन बार गलड से हमारी कुमुद नही आ जानी।" सर जाम लारेंस की बात सही निकली, 13 सितबर 1857 का जब अंग्रेजी सेना का दिल्ली पर आक्रमण हुआ तब वह कश्मीरी गट को जार से ही किया गया । जैस ही अप्रेजान शहर म प्रवेश किया, अधिकाश भारतीय सैनिक तितर बितर होन लग । राजा नाहर सिंह ने कई अवमरा पर मुगल शाम और उनके राना-धिकारिया को सचेत दिया था कि शहर मे विसा भी आर मे अग्रजा में प्रवेश का राशन के लिए सावधान रहना चाहिए । लकिन मुगर शासन और सनिक दोना हो मातमा गए ! इस होनी और आकस्मिक अग्रेजी चाल के भाग भारतीय सैनिको म भगदड मच गई । सुरक्षा और व्यवस्था का ख्याल कौन करता। यहा तक कि सम्राट बहादुर शाह जफर भी हुमायू दे मकबरे में आ छिप। मुगल दरबार न जान बचाकर भागन की दिशा भी पूर्व द्वार ही धुनी क्याकि उनका विश्वास था कि बल्लभगढ़ नरश नाहर सिंह की मौदिदी म ही व सुरक्षित रह सकग। अप्रेजा का आत वदता गया। राजा नाहर सिह न सम्राट जफर को बल्लभगढ़ के किले म आन वा नियंत्रण दिया । सम्राट बहादुर शाह जफर चलन का तयार भी थ लविन इलाही वखानामा अग्रेज एजट के बहकावे म द हुमायू 4 मायर म ही रह गए । राजा नाहर सिंह के प्रस्ताव को अस्वीकार करना यह नतीजा निकला कि ! मितम्बर 1857 को कप्तान हापमन ने चुपचाप 61 बहादुर शाह जफर वा गिरफ्तार कर लिया। युवा नरेश नाहर सिंह न तुरत हुमायू वे मकबर की मजबूत घेराबंदी कर दी। जग्रेज फौज वो राजा नाहर सिंह के घेरे म पाकर कप्तान हायसन न भ्रूरता की चाल चली । सक्ट की नजाकत को समयते हुए उसन शहजादो को गोली से भन दिया । और बाआवाज बुल द ऐलान किया कि यदि अग्रेज फौजी की घेरावदी नही हटाई गई तो बादशाह जफर को भी मौत घाट उतार दिया जायेगा। राजा नाहर सिंह ने भी अवसर की अहमियत को समझ लिया और सम्राट की प्राण रक्षा की दृष्टि से घेराबदी को हटा लिया । यही मुगलकालीन दिल्ली दरवार का अतिम अध्याय कहा जाता अग्रेजी फौज जश्न मना रही थी। दिल्ली विजय की खुशी में झूम रही थी। तभी अग्रेजो को पता चला कि आगरा की ओर से आने वाली पलटनो का सफाया हो गया है। इस समाचार से रग मे भग पड़ गया । दिल्ली दरबार के पतन का प्रभाव ता होना चाहिए था कि राजा नाहरसिंह भी बत्लभगढ म शान्त बैठ जाता । मगर उसकी धमनियो में जाट वीर का रक्त प्रवहमान था। वह दिल्ली से लौटकर बल्लभगढ विले मे आया और अपने सैनिक सगठन को और मजबूत बनाने मे दिन रात मेहनत करने लगा। आसपास किसी भी गोरी पलटन की सूचना मिलते ही उस पर टूट पडते और उसका सफाया कर दते । अग्रेजा न जाट योद्धा नाहर सिंह के रण-कौशल और संय-बल का जदाजा लगा लिया । अन उहाँने दिल्ली विजय की नई योजना बनाई। कहते है कि प्रेम और युद्ध म सब जायज होता है। धोखा, छल, कपट के सम्मुख सत्यशील वीर को पराजय वा मुह देखना पड़ता है। ऐसा ही हुआ, दिल्ली की तरफ से अग्रेज घुडसवार आए । रण क्षत्र मे उहाँन सधि- सूचर सफेद झडा दिखाया और राजा से प्राथना को वि सम्राट बहादुर शाह जपर से मधि निश्चित हो गई है । उसमे आपकी उपस्थिति आवश्यय है। यह सम्राट बहादुर शाह जफर को भी इच्छा है और ग्रेज भी आपके साथ दोस्ताना ताल्लुवात रखना चाहत हैं। युवा नरेश नाहरसिंह का निमल मन था। भोला भडारी जाट वीर जो ठहरा । अग्रेजा की चाल मे फम गया। कहते हैं अग्रेज किसी मुगल सनिक अधिकारी को अपने साथ लाये थे। उम अधिकारी की गवाही क्षौर समधन ने नाहर सिंह का अग्नेजो की चाल मे फमने का अवसर दे दिया । राजा नाहर सिंह ने अपने पाच सो सनिको के साथ दिल्ली के लिए प्रस्थान दिया। अग्रेजो की कूटनीति ने दोतरफा आक्रमण किया। जैसे ही राजा नाहर सिंह ने दिल्ली म प्रवेश दिया उनकी छिपी हुई अग्रेज फौज ने उन पर हमला किया और धासे से उनको पदी बना लिया । उससे पाच सो वीर सैनिकाको भी गोलिया से उड़ा दिया और उधर दूसरे ही दिन मल्लभगढ़ के बिल पर भी आतमण बोल दिया और अंग्रजों न स 62. कुछ बार वी भेट यर पिया। सधि सदश ही उल्लभगढ़ या अपिताप हो गया। नामगहने हिलेम गाना या और गदगी यमी नही थी, रागामग्रीस वर्षों तक युद्ध चलाया जा मरता था, लेकिन उस दुग व वीर रानापति युवा नरेश के विना क्व तप लदा जा सकता था। बल्लभगढ़ यी आवान शान तो ढह गई लेकिन उसके सपूत चरित्र पल या गगा सा पावर और हिमालय मा उनत बना दिया। - युवा नरेश नाहर सिंह स्वाभिमानी, साहसी और परम दश भरा था। वाई भी प्रलोभन उावे चग्यि का दागदार नहीं बना सकता था। दिल्ली म अग्रेजा की विजय दुदुभी बज उठी । वही माई उनका विरोधा नजर नही आता था । जिा विरोधिया को उहान वदी बना लिया था, उन्हें पासी रागा दी गई थी या गाली स मार दिया गया था। दिल्लीम शमशान की-सी शाति व्याप्त थी । राजा नाहरसिंह या वे सब दश्य दिखाए गए। डर बैठान के अनेक प्रयत्न किए गए, लेकिन उग वीर सनानी न जग्रेजा करिसी सुपाव भो स्वीकार नहीं पिया। अंग्रेज अधिकारी राजा नाहर मिह स मित्रता चाहत में लेकिन इस शत पर कि वह युगवर जग्रेजा पी अधीनता स्वीकार कर ले । उम जाट वीर नाहर सिंह ने अपना जीवन उच्च आदश और मानव मूत्यो वे उत्तम लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया था। उसे मायाची तोभ लालच कब नीचे गिरा सवते थे? यही होता है जाट वीरो ये परिय का यमाल । व्यक्ति की पूजा नहीं करत । स्वाथ हित पर मक्खिया की तरह मडगते नहीं है। यदि काई जाट ऐसा करता है तो समझ लिया जाए कि उसकी धमशिया मे जाट का खन नहीं किसी अ य या दौडता है । जाट हमेशा ही जीवन के परम उद्देश्य के लिए मर मिटना आसान समताते हैं। उद्देश्य प्राप्ति में सफलता और विफलता की भी उहे चिता नही रहती। चिता एक तरह से रहती ही नही और अगर रहती भी है तो इसानियत के वामा म क्ला दिखान की। एसे ही उज्ज्वल भावा और प्रखर विचारा मे परिपूण था राजा नाहरसिंह का प्रभावकारी व्यक्तित्व । जग्रेज अधिकारी हडसन न राजा नाहर सिंह से वहा 'तुम थोडा झुक जाओ। जनज तुम्हे तुम्हारा राज्य लोटा देंगे।' जानत हो उस समय उस जाट वीर नरेश ने क्या कहा? सुनो-- अग्रजा तुम हमारे शत्रु हो । शत्रु से क्षमा मागना इस देश का दस्तूर नहीं है। मैं और तुम जैसे धोखेबाज क्पटी लोगो के सामने चुकूगा। यह कभी सभव नही है । आज एक नाहर सिंह मरेगा, क्ल हजारा नहार सिंह इस देश मे पैदा होगे। तुम इस देश का गुलाम बनाकर नही रख सकागे ।' बहादुरी के ये वोन देर तक उस वातावरण मे गजते रहगे । शब्द शब्द म स्वाभिमान, शक्ति और सकरप की साधना मिद्ध हो रही थी। उसी समय अग्रेजो म मश्रणा हो रही V0- । थी कि राजा को ठिकान क्स लगाया जाए । अग्रेजा की हिस्गत नहीनताबी कि राजा नाहर सिंह को फासी पर लटका दे। व जाताग भी-तोiN भय था कि किसी आकस्मिक निर्णायक युद्ध मे न उलझना पड जाए।" अग्रेजा ने फैसला किया कि राजा नाहर सिंह की शक्ति, स्वाभिमान और लोकप्रियता को देपत हुए उह जीवित रखना जग्रेजी राज्य के हित मे नही है । राजा को फासी रेना तय हो गया। पासी देन मे भी ग्रेजो ने छल बल से काम लिया। कारणो का उल्लेख करता यहा इतना लाभप्रद नही जितना यह जानना कि अग्रेज जानते थे कि हिन्दू राजा का वध नहीं किया जा सकता। वे यह भी मानते थे कि यदि लोगो को इस तथ्य का पता चल गया तो कोई नया हगामा खडा हो सकता है। अत उहोने ऐलान किया कि नाहर खा को पासी दी जाएगी। चादनी चौक म वतमान फव्वारे के समीप ही राजा नाहर सिंह का दिल्ली स्थिन आवास गृह था। इसी स्थान पर उनको खुलआम फासी दन की यवस्था की गई । दिल्ली की जनता को कानोकान असली सूचना भी मिल गई थी। जिस जनता ने राजा नाहर सिंह को अपनी सुरक्षा का देवता स्वीकार किया था, आज उसी राजा को प्रतीक्षा मे बडी संख्या मे शोकाकुल गदन झुकाए खड़े थे। राजा के अतिम दशन की अभिलापा लिये सकल्पो के सपने गढ रहे थे। वह वीर सेनानी अपने तीन साथियो के साथ फासी के तख्ते के करीब आया। उसके अन्य विश्वस्त साथी थे-खुशहालसिंह, गुलाबसिंह और भूरासिंह । वे भी वल्लभगढ ये ही जाट वीर थे। इन चारो देशभक्तो को अपने ही देश में पासी के तख्ते पर झूलना पहा। फामी से पूर्व राजा नाहरसिंह का युवा मुख मडल दामिनी की तरह दमक रहा था। उनासी का कोई निशान न था। मुख तेज तीव्रतर हो रहा था। मानो स्वाधीनता के सूरज की किरणें नये इतिहास के आलोक बीज बो रही हो। जब पासी वी घडी आई ता हडसन ने सिर झुकाकर राजा से उनकी अतिम इच्छा जाननी चाही । उस युवा वीर की वीर वाणी से शब्द झरे--- 'तुमसे मुझे कुछ नहीं मागना । परन्तु इन देशवासी दशका को मेरा यह सदेश दे दा वि जो प्राति की चिंगारी मै आप लोगा के लिए छोडे जा रहा हूँ उसे बुझने न देना। देश का सम्मान अब आपके हाथ में है।" मौन दशका ने उनके सदेश को मौन स्वीकृति दी। हडसन भी चिन्तातुर साचता ही रह गया । बल्लभगढ ढह गया लेकिन राजा नाहर सिंह के बलिदान का सूरज अमर हो गया। कहते है यह दिन उनकी बत्तीसवी वप गाठ मा दिन था। बलिदान वेदी पर उस युवा नतृत्व न जा सकल्प किया था, वह साकार हुआ लेकिन दुर्भाग्य इस देश 64 की गई पोडी या कि हरियाणा तर मी पाठयपुग। म म पोर यादा का जावन चरित्र उपल ध नहीं है। पिरा पडपत्र या प्रतिपन है, यतामा आवश्यकता नहीं। प्रत्यक पाठा यधु समझता है। हम भी समझ और जाट वीर को श्रद्धाजलि न कभी-कभार बल्लभगढ ये दशन परे । बल्लभगढ़ हमार जातीय गौरव का स्मारन है, प्रेरणा या शिलालेख है।

No text on this page.

66
झझा तूफाना न जिस तढता का लाहा माना।
दश प्रेम ये जो मतवालो । उनका भल न जाना ।।
जिह देखकर स्वय नाश भय से कातर हो जाता।
जिनके आगे पशुता का सिर झुक्ता-छल दह जाता।।
करता था उपहास प्रति चरण जिनका दण्ड दमन का।
डरते थे तूफानन जिनसे पशुवल होड लगाता।।
चलो करें हम उनकी ज्वाला का फिर से आवाहन ।
उनकी सुधि की ज्याति जगाए करें उही का वदन ॥
उन प्रणवीरो की बलि को जीवन त्योहार बनाना ।
देश प्रेम के ओ मतवालो । उनको भूल न जाना ।
जग करता आह्वान वारुणी वा वे विप अपनाते।
दुनिया सुख की भीख मागती य सवस्व लुटाते ।।
रहती उनमे शक्ति धरा का वैभव ठुकराने की।
मिट्टी का लघु गात लिये वे लपटो मे लहरात ।।
आतताइयो का विचलित वरती उनकी हुकारें।
प्राण फूक्ती चलती मुर्दो म उनकी रालकारें ।।
समय सिधु ने इन बहते शूला का शासन माना।
देश प्रेम के ओ मतवालो | उनको भूल न जाना ।।
इन मीनारो की नीवा मे उनी लाशें सोई।
नेतत्वो की जरें गयी उनके जोहू से धोई ।।
आजादी का भवन उठ रहा उनके उत्सर्गों पर।
जिनको इट इट में उनकी कुचली साधे खोइ ।।
आज चलो हम उनके घर पर साध्य प्रदीप जलायें।
उसमे सू से सिंचे पथा पर गलियो पर मडरायें।
पूरा हुभा न अभी हमारा प्रतिहिंसा का बाना ।
दश प्रेम के जो मतवालो । उनको भल न जाना ॥
(प्रदीप से माभार)

No text on this page.

68 यह भी महात्मागांधी भी गरे मामा के पीछे छिपी दशभनित और गर भारत का भागो पर TIोग्या गामवल उस पिस्तौल रा पता गाता वापर बम्बा का जोर मग मार गा चद प्रगा। उग्रगा या जिहान 1857 की आजादीपी परती लडाईम लाया येममूरामा गोली स भून दिया था, लागालो पागी पर चढाया था, लूटपाट और बनातार या नया पोतिमान स्थापित किया था और हजाग देशभक्ता से अपन देश म रहन का अधिकार होनार अहमान पी जेलो म सहाया था अथवा विनया मे भटरन के लिए मजबूर कर दिया था। अग्रेज शाराया मी तरह, गाधी जी तथा याप्रेम का भी भगतसिंह तथा अप पानिपारी आतववादी दिगाई पड़े थे, यातिल जर आये थे, लेशिन इस देश का परोडा जासच्या पी नजरा म वह देशभया थे और उनकी देशभक्ति न गाधीजी से कम थी और 7 भारतीय गष्ट्रीय माम वे किसी भी बडे म बडे ना स बम । जाश्चय ही है कि राष्ट्र पिता जिनको आतावादी माता था, उसी को दश यी जनता, उसी की यायो जनना, महान देशभयन तथा जमर शही मानती थी और आज भी मानती है। यही नहीं, एक गमय ऐसा भी आ सकता है, जब इग देश या तटस्थ इतिहामपार यहाहन लगे रि महात्मा गाधी तथा मानससी अपेक्षा भारत के भावी ल क्त के स्वरूप की तसबीर, सरदार भगतमिह या अधिक स्पष्ट थी और यह सम्भव हा मरता है कि भावी इतितराम लेखा इस नतीजे पर पहुचे कि अगर भारत मे बाजादी सरदार भगतसिंह के मातिवारी रास्ते पर चलकर आई होती तो देश का भविष्य अधिय उज्ज्वल हुआ होता । उस स्थिति मे, स्म, चीन तथा वियतनाम के ममान भारत भी अधिक मशक्त, समद्ध और मजयत हुआ होता । वह भारत आज ये भारत स भिन और शक्तिशाली होता। वह अधिक अच्छा लोक्ता तथा अधिव नैतिव एव शभक्त नागरिका का देश होता । जाज इस देश के अधिकाश जोग यह मान चुप है और मरा विश्वारा है वि आग आने वाले समय म और भी अधिक मानने लगा कि भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस पर देशी पूजीवादी तत्त्व शुरू से ही अपना प्रभाव जमान के प्रयास म थे और गाधी जी की अहिंसा उनके लिए एक पवच का काम कर रही थी। देशी पूजीवादी तत्व नही चाहते थे कि जग्रेज, कातिवारी आदालन के परिणामस्वरूप, इस देश से जाय । वे नही चाहत थे कि भारत में रूस की मी प्राति हो। ऐमी क्रान्ति म उनका जपने अस्तित्व की ममाप्ति का डर था और इस डर से बचाव गाधी जी ही पर मक्त थ । फ्लत गाधी जी और उनकी काग्रेस को यातिकारी जातकवादी दिखाई पडे और बसर जग्रेज कौम दया की पान प्रतीत हुई। यह दुभाग्य तो है ही, साथ म निहायत मकीण दलगत एकागी विचार भी है । शनीदा वी पत्र पर हर वरस लगगे मेने वतन पर मरने वाला का यही नामा निशा हागा।

69 पात के सन आश्चर मदार म मिह का जन तापला बिर बा नामर गाव म 25 नितम्ब 1907 का हुआ पानी दिन दना पिता निम्ननिह ठया चाचा सदा म्वामिह दस्ति कलादालन में मजा काटन घरवार का नौ दिन 'नरे चाचा करता अजीन्हि निजामुन की अवधि समाप्त होन वीनूचना मिली थी। दानिर वार का निहारत भाप- मानी माना गया था। वह दाना घर में त्रुम्मिा ले जाया या जा' मान्दार ही नहीं, बार भारत को समीम पोरव दवर चना गया। दिन उमर दह दुनिया म दिवश हुवा यौनए कि दन्ति र कारण सानों ने टनन कीदिन रहन अनधिका डीन निदा या, उ ममा उनी उन्न विरतर्दन दर्प को यो । दुनिया में भात धर्म दान दया नन्कृति का डका बनान दाने दिवानन्द दातानीस वर्ष मया की चरम नीना पहुंच ५ दसा मसीह वैवीर दर्ष की आयु में म्याति के दिन पर जानीन हुए स बार सरावा ठोन वष को वायु में धम का उम्टा पहा न य सर्विन अमर उहीद भ नि मिस न दप गजापु म दाम की वह नराल जना ए किनारा देन हो त्राया, मकिन न दा किन के घ का दीपक हमा निर म मा या। सदार किम्नमिन प्रग ही क्यों, दाना सारना बनाया था। मादि प्रारमित शिया दामाद के प्राइमरी स्कम न हुई। पन न अच्छे है। बढ़त बना-बना कर मुन्द नि ये। यध्यापकों का मानक ने यजा नायिका के नाम हमदर्गे ने यवह बने शिष्ट दया म्हादन थे कि बडे दचे उनका स्वादिक युग में । उन बचा काम समय पता नया कि सर व 10 दिन, भारदियों के दिलो पर र कानारदा- मनीमीनिटी म्यान पर होगी। तीसरी कमान पवार वह पह मायने नई ये कि उनके एक चाचा रेन ने, दिनानान के नीकी अग्नारों के कामहीद हो गए हैं कि चाचा गानाशक देर निकाले गेरा मिली इन टनामाद में ही उनको नानी -दिन रोजी हवी हैं और के तिम हाही एक पर बैन मठया ना घर में रखा ह । चीयो कक्षा में पहवाद उप्रेतों को मारन न निकलनगे दान र चने नया प्रतीक्षा करें नाये। मन जिददीला किमन्त्रिी दर भनिन दोनेक सानोवारा के समान किमी मार्ग का नदीना यो न राष्ट्रीय मान्दीन कोनो कपरिदै शामन की कुर्ग तक पचने उना का। वह उनका उदार यो, चना नना में प्रवाहित ? ने दाना मन पनी म सपने को सुन्न बनाने वाली वर्ग के प्रति मानी निराकामाम की। मरदार मम्हिग दशमनि उन नौगोंकी दम्मति 70 जग्रजाकी जेलो म इमलिए रहे पनि उनके बाद शासन उनके हाथो म आयेगा।वह देशभक्ति त्याग और बलिदान व लिए थी, दश वे उज्ज्वल भविष्य की चिता के लिए थी, गद्दिया पर बैठने की योजना का प्रतीक नहीं थी। पाचवी कक्षा म पहुचकर, वह गदर पार्टी के शहीदा य मुक्दमा की खबर से ना दालित होन लग गए थे । पाचवें दर्जे के विद्यार्थी के लिए दशभक्ति का इतनी गहराइ म उतर जाना सचमुच ही एक आश्चय है । दुनिया इतिहास म इसपी मिशाल शायद ही कही मिल सके । जिस बच्चे न, ढाई वप की आयु म बदूवा की फसल सलिए उगान की बात सोची थी कि उनसे वह अग्नजा का मार भगायेगे, उसी स ती अधिक दशभक्ति की अपेक्षा की जा सकती है। 13 अप्रल सन् 1919 का जलियावाला काण्ड हो गया था। भगतसिंह गुस्म म उबल पडे । वह जलियावाला बाग गए। वहा की मिट्टी लाय और दशवासियो के खून से सनी मिट्टी पर वर्षों तक फूल चढात रहे । सन 1921 मा गया था । सारा देश अंग्रेज विरोधी आदोलन म डुबा था। उस समय भगतसिंह नवी कक्षा में डी० ए० वी० स्कूल म पढते 4। यह तय कर चुके थे कि स्कूल छोडकर जाजादी के आ दालन म शामिल होंगे। अपन निश्चय की सूचना, स्वय पिताजी कान दकर जय व गुप्त द्वारा उनको दिलवाई। पिताजी स्वय आदाननकारी थे । उनको काई जापत्ति नहीं थी। फिर भी भगतसिंह सोच कर गए थे। वह विदशी वस्तु के बहिष्कार आ दालन का समय था। भगतसिंह लड़का की टोली बनाार विदेशी वस्त्र इक्टठे करते फिर किसी चौराहे पर रखकर उनकी हाली जलात । उनकी यवहार पटुता और विनम्रता के कारण उसको विदेशी कपडे भी ढरो मिलते । जादोलन बडी तेजी पर था। तभी 5 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले के चौराचोरी गाय म काण्ड हो गया। काग्रेस के जलूस के समय उत्तजित भीड न थान म आग लगा दी जिसम एक थानदार तथा 21 सिपाही जल गए थे। इसी प्रकार के काण्ड बम्बई म 17 नवम्बर 1921 तथा मद्रास मे 13 जनवरी 1922 या हा गए थे। अत गाधीजी न आदोलन का वापस ल लिया । आदोलन वापस लेन या प्रस्ताव 12 फरवरी 1922 को बारडाली मे होने वाली मीटिंग म लिया गया था। समस्त देश म गाधीजी के इस काय का विरोध हुआ। पडित मातीनाल नेहरू तथा लाला लाजपतराय ने भी इस प्रस्ताव पर तीखी नाराजगी व्यक्त की पर बाद म व गाधीजी के सामने झुक गए। लकिन भगतसिंह का कातिकारी गाधीजी से सहमत न हो सका। उनके सामन जारण था गदरपार्टी के ताआ वा विशेषत करतारमिह सरावा का जिगा जज व मुह स पासी पी मगा मुनवर भक्यू' यहा था और दूसरे माथी न पाला पानी पी सजा मिलने पर पासी की सजा दन के लिए जज से प्राथना की थी। अब भगतसिंह नेशनल कालिज म थ । असहयोग आ दोलन में वह नवी कक्षा से पढाई छोड कुबे थे, फिर भी उनकी योग्यता, देशभक्ति और सामा य- ज्ञान की अधिकता को देखकर भाई परमानद की कृपा से उनको कालिज प्रथम चप म दाखिला मिल गया था और दो माह का समय उनको पिछली पढाई का पूरा करन के लिए दिया गया था। इसको वह जल्दी ही पूरा कर सके थे। कालिज के पाठ्ययम म रोलेट-कमेटी रिपाट तथा राष्ट्रीय आदोलन का इतिहास भी था। असल म अब जयचन्द्र विद्यालबार सम्पक म उनकी असली पढाई प्रारम्भ हुई । जयचन्द्र विद्यालबार क्रातिकारी विचारधारा के थे और वगाल के क्रान्तिकारिया के साथ उनक सम्बध थ। लाला लाजपतराय द्वारा स्थापित दुर्गादास पुस्तकालय प्राप्तिकारी साहित्य का केद्र था। उनके अध्यक्ष राजाराम शास्त्री थे, जो बाद में मजदूर नता बनकर उभरे और यू० पी० की सरकार में भी रहे । यहा वहस के दौरान भगतसिंह शाति, आतक और आत्म-बलिदान के द्वारा प्रचार के पक्ष म बालन लगे थ। 'बहरा को सुनान के लिए ऊची जावाज की जरूरत होती है, अराजक्ता वादिया के य शब्द उनको प्रभावित करन लग गए थे। एक दिन प्रो० जयच द्र विद्यालकार व घर वगाल के विख्यात पातिवारी शचीद्र नाथ सायाल से उनकी भेंट हो गई और यह भगतसिंह के जीवन का नया दिन सिद्ध हुआ । कातिकारियो के साथ उनके सपक कायम हुए। अब वह बाकायदा प्रातिकारी दल के सदस्य थे। नेशनल कालिज मे राष्ट्रीय नाटक क्लब की स्थापना की गई थी। इनमे भगतसिंह राणाप्रताप, शशिगुप्त तथा चन्द्रगुप्त का अभिनय क्यिा करते थे। एक बार उनके अभिनय को देखकर भाई . परमान द न कहा था-- मेरा भगतसिंह सचमुच शशिगुप्त सिद्ध होगा।' पाठक जानते हैं कि शशिगुप्त ही वह व्यक्ति था जिसने भारत विजय के बाद ग्रीस लोटत हुए सिकदर को भारत की जीत का पाठ पढाया था । जिसन सिकदर की सना का नष्ट भ्रष्ट कर दिया था और सिकदर को इतने घाव दे दिए थे, उनसे मराह कराहकर वह मर गया था। इस तरह शशिगुप्त देश के गौरव की रक्षा करने वाला था। भाई परमानद का भगतसिंह को शशिगुप्त पहना सत्य सिद्ध हुआ। दश और देश की जनता के साथ खून की होली खेलन वाले अंग्रेजो स, भगतसिंह सचमुच शशिगुप्त के समान ही बदला लन वाल सिद्ध हुए। सन् 1923 मे भगतसिंह एफ० ए० करके बी० ए० प्रथम वष मे पढ़ते थे। माताजी चाहती थी कि उसकी शादी कर दी जाय, भगतसिंह शादी के विरोधी थ। वह मन ही मा, मौत से अपना विवाह कर चुके थे। शादी के लिए तयार परो होते? तेपिन माताजी शिद पपड़ी थी । रागाई वा दिरा निश्चित हो गया था, 1 12 लदिन वह दिन आने स पहल ही भगतसिंह फरार हो गए । जान से पहल पिताजी को इस आशय का पत्र लिखकर छोड दिया था- 'पूज्य पिताजी नमस्त। मरी जिनगी मक्मदे आला यानी आजादी ए हिंद व उगूल लिए वह हा चुकी है। इसीलिए मरी जिंदगी म आराम और दुनियावी खाशात बायम वशिश नहीं है। आपका याद हागा कि जब मैं छाटा या ता वापूजी न मर पनापवीत क वक्त एलान किया था कि मुय खिदमत वतन के लिए वक्फ कर दिया गया है । लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा हूँ। उम्मीद है आप मुय माफ फरमायगे। आपका ताबार भगतसिंह इस पर स भगतसिंह के इरादों को बुल दी और देश की आजादी के लिए वेचनी का पता लगता है । इस फरारी के साथ ही उनकी स्कूली शिक्षा का अत हा गया था औ• दश प्रेम काति तथा समाजवाद की असली शिक्षा प्रारम्भ हो गई थी। शची द्रनाय सायाल व आदश पर भगासह घर से फरार होर कानपुर आए। यहा नातिकारी सगठन या काम योगशचन्द्र चटर्जी देख रह थे। शुरू में भगतसिंह वा मनीलालजी अवस्थी व घर पर रखा गया। यहा उनका श्री मुरशचन्द्र भट्टाचाय बटवेश्वर दत्त, अजय घाप और विजय कुमार सिहा क साथ काम करने का मौका मिला। पुलिस की नजरा म बचन के लिए वह बलवन्तसिंह के नाम से प्रताप म लिखत और सम्पादकीय विभाग म काम करत थ। यहा पुलिस की खोजबीन बढ़ने के कारण विद्यार्थी जी ने उनको जिला अलीगढ़ की तहसील पैर र गाव शादीपुर के स्कूल में हडमास्टर बनाकर भज दिया। उहान स्कूल का चमवा दिया। इसी बीच भगतसिंह की दाली बीमार हुइ । वह भगतसिंह का दखन क लिए तडपन लगी। सरदार विशासिंह न भगतसिंह को बुलाने लिए एष विज्ञापन निराला और विवाह गीगा रद्द कर दी तब विद्यार्थी जी तथा मौलाना हसरत मोहानी की मध्यस्थता रा वह पर लौटे। या आपर उनका अपना नतत्व दियान का मौका मिला। उन निा अगासी आसन के सिलसित म अकाली जत्य ननकाना साय जा रहे थे । हमरा उद्दश्य या गाला-माण्ड तथा माटी माजमा विराध परना । इगर गमधन म मा १ महाराज गिण मन राह द्वारा पानीपट्टी गाधरर निगध प्राट मग्न य नारस म ार 17 दिया गया पात अरामी जापाननराना मा) पान 13 १ जाने लगे । एक जत्था वगा होकर जान को था । भगतसिंह के वादानी ऑरेगे मजिस्ट्रेट दिलवासिंह नही चाहत यदि बगा मे जत्थ का स्वागत किया जाय, पर सरदार किशनसिंह ने उसके स्वागत का दायित्व भगतमिह को सौप दिया था। निश्चित तारीख पर 13वा शहीवी जत्था आया। दिनरागसिंह तथा सरकार की मर्जी के खिलाफ भगतसिंह की पुकार परम्नौजवान-माथियों न जत्थे का जोरदार सत्यार किया। एक दिन के स्थान पर तीन दिन तव जत्था मका । रातो रात मना टूध रोटी सब्जी तथा दूसरी चीज इधर उधर गावास भगतसिंह के घर आन लगी। उसो युवा साथी उनका जत्य मे ले जात थ । भगतसिंह न मोर्चा जीत लिया था। उनका डका गुजन लगा। भगतसिंह के इस काम रा उनके पाादानी चाचा दिलवासिंह राख्त नाराज हुए । उनले दवाव से उनका वारण्ट निकाला गया । भगतसिंह भाग निवल । वह दिल्ली मा गए । यहा बलवतसिंह के नाम से दैनिक अजुन' के सम्पादकीय विभाग म काम करने लगे । कानपुर म जवाल के दौरान, पार्टी की सहायता म लिए वहा गा और वहा म फिर लाहौर जा गए। यहा नौगवान भारत सभा बनाने के काम म जुटे । साथ म भगवती चरण थे । उन दिना, लाता लाजपतराय इडिप डैण्ट काग्रेस दत बनाकर काग्रेस से जलग पजाय असम्बली वा चुनाव लड़ने की तैयारी म य । वह हिदू साम्प्रदायिकता के समीप पहुच गए थ। सरदार किशन सिह लालाजी के विराध म थ । मगमिह न यहा अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। चौमी सभा के अध्यक्ष थे-रामकिशन, जनरल संप्रेटरी थे भगतसिंह और प्रचार मत्री थे भगवतीचरण । इस सभा ने गदर पार्टी के शहीद करतारमिद सरावा का बलिदान दिवस मनाया । दुर्गाभाभी तथा सुशीला दीदी ने अपनी उगलिया काटकर रवत के छोटा स सगवा के चिनकाजभिषय किया। नौजवान राभा न जपना अत्यत प्रगतिशील समाजवादी विधान बनाया। उसन सन 1926 म ही भारत के लिए पूण स्वाधीनता की माग रप दी, जबकि नाम न सन् 1929 म पूर्ण स्वाधीनता वा प्रस्ताव पास किया था। यह रा बान का प्रमाण है कि अय राष्ट्रीय ताआ की रामता म, भगतसिंह की समझ अधिव जावादी तथा लोक्तापिन थी और वर गाधीगी तथा उनकी मण्ग्ली से अधिन सजग थ। कागोरी पड्यत्र केस में नताना स भगतसिंह वा सपर था। यह गिरफ्तारी तथा सी० आई० डी०वी चिता विए बिना अदालत में उनका मुषदमा सुान जात । उनको छुडान की याजना यन रही थी। जागरा उन दिनो दल की गतिविधि या पेद्र था। जाजाद, भगतसिंह और विजय कुमार सिनहा आगरा म थे। मुछदित या नूरी दरवाजा व मदिर म रह कुछ दिन रामा मण्डीये सुर होटर पमर में ।

12
नविन वह दिन आने से पहले ही भगतसिंह फरार हो गए
पिताजी को इस आशय का पत्र लिखकर छोड़ दिया था
'पूज्य पिताजी नमस्ते ।
मेरी जिंदगी मक्मदे आला यानी आजादी ए हिक
हा चुकी है। इसीलिए मेरी जिंदगी में आराम आर
वशिश नहीं है।
आपका याद होगा कि जब मै छाटा था तो र
वक्त एतान किया था कि मुझ पिदमत वतन के
लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतिज्ञा पूरी कर रहा
उम्मीद है आप मुझे माफ फरमायगे ।

75 यह समझ गया था कि जब तक भीड को न हटाया जायगा, तब तक बिना विरोध के कमीशा के सदस्य बाहर ही निक्ल सक्ते । जत भीड हटान या दायित्व सहायक पुलिस अधीक्षक साण्डम वा सौपा गया। उसने लाठी चाज कराया। उसम लालाजी को चाटें लगी जिनसे उनकी मत्यु हो गयी। इसके एक माह बाद, स्काट वो गाली स उडान की योजना बनाई गई। याजनानुसार जयगापाल वो पुलिस थाने पर साट व आन की सूचना लन भेजा गया । गजगुर जव म पिस्तौल डाले पैदल उधर गए। भगतसिंह और नाजाद सार किलो पर थे। याजनानुगार भगतसिंह और राजगुरु को साट पर गाली चलानी पी चौकी मे कोइ पुलिस वा जादमी जाए तो आजाद का उस राया था। जयगोपाल से सक्त पावर राजगुरु तथा भगतसिंह आग बढ । साण्डस न मोटर साइकिल स्टाट करन वे लिए हैडिल घुमाया ही था कि राजगुरु न फायर कर दिया। साण्डस आर माटर माइविल गिर पड़ी। भगतसिंह नाग बढे, पाच गालिया से साण्डस का छलनी किया और डी० ए० वी०कालिज के जहाते स निक्लकर गायव हा गए । ब्रिटिश सवार को यह बहुत बडी चुनौती थी। जिस समय भगतसिह और राजगुरु भाग रह थे, पुलिस जमादार चदनहि उनका पीछा करन लगा। आजाद 1 उसका खन वे लिए कहा, पर वह जोश म पीछा करता रहा। जाजाद व माउजर स गोली चती और उसका ढर हा गया। हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातय रामा वा नाटिस निकला, नारशाहो का सावधान किया गया, साण्डस वी मत्यु स लालाजी वे अपमान का बदला ल लिया गया । इक्लाब जिदाबाट क नारे के साथ बलराज के हस्ताक्षर स पास्टर बाट दिए गए । उस समय दल व लगभग सभी सदस्य लाहौर म थ । साण्डस क वध के बाद अधिवाश सदस्य निकल गए थे। पर समस्या भगतसिह वा बाहर निवासन की थी। इसका हल क्यिा दुगा भाभी न । दुर्गा भाभी के पति भगवतीचरण स्वय क्रातिपारी थ। मरठ स म फरार थे। जान स पहले वह पत्नी का 1000 रुपय द गए थे। व रुपए उन पास थे। उनस लाहौर से कलकत्ता के लिए फस्ट क्लास या वूप रिजव कराया गया। भगतसिंह ऊच कालर का आवरकोट पहने तिछा पलट हैट लगाए, बाई आर भाभी व बट वो गाद मे लिय दुर्गा भाभी का पल्ली व रूप म साथ लवर पाच बजली गाडी म सवार हुए । विस्तर-बद लेकर नौकर की तरह राजगुरु पल और कलपत्ता पहुंच गए। इसी ट्रेन से रामनामी दुपट्टा आहे माथ पर तिलक लगाए, हरिआम बालत मथुरा के पण्डा बन जाजाद यात्रा र रह थ। आजाद सपा राजगुरु नखाऊ पर उतर गए । भगतसिंह तथा दुगा भाभी भी प्तट पाम पर उतरी यहा म यहा गुशीता या तार दिया-भा' गावर साय ा रही है। क्लरसा पहुंचन पर मुशाता दोगे राधा भगवती चरण न स्टेशन र 74 पहली बार पुलिस की हिरासत में 29 जुलाई 1927 को भगतसिंह जमरामर के स्टेशन पर गाडी से उतर थे। देखभालकर स्टशन स बाहर आए । थाडा आग बढे ही थ कि एक पुलिस वाल पोपीछा परत देखा ! वह तज चल, पुलिस वाला भी तज चला। वह दाडालग, वह भी दौडा । वह गलियो महिपत हुए सरदार शादूलीसिंह एडवावेट पी बैठक म घुस गए । एडवाक्ट साहब का मव कुछ बता दिया। पिस्तौल मज पर रख दी। एडवोकेट साहब न पिस्तौल दराज म रखी और भगतसिंह या नाश्न पर भेगार वाहर घूमना शुरू कर दिया। इसी बीच पुलिस वाला भी आ गया। उसन शादूलीसिंह से पूछा-क्या उ हान एक सिख युवक का इधर आते देखा है ? उनका उत्तर था पाट पाजामा पह्न एक युवक दौडता हुआ आया तो था। वह इधर गया था । सक्त विर्ती दफ्तर की आर था। पुलिस न दफ्तर घेर लिया। भगतसिंह दिन भर घर म रह और शाम को लाहौर के लिए चल दिए। ज्या ही स्टेशन स निकलार ताग म बैठे वह आगे बढे ही य कि गिरफ्तार कर लिय गए । उनको लाहौर के क्लेि तथा वोस्टल जेल म रखा गया था। बाद म वह 60 हजार रुपये की जमानत पर छोड दिए गए। 30 हजार की जमानत वैरिस्टर दुलीच द न दी और तीस की दौलत राम न । श्री बोधराज जार टा. गोपीचद भागव द्वारा पजाव असेम्बली म सरकार पर दबाव डाल । उनका तक था कि यदि भगतसिंह के खिलाफ कुछ तथ्य है ता मुकदमा चलाजो, वरना जमात समाप्त होन की धापणा क्रो। अन्त म जमानत समाप्त हा गई। भगतसिंह स्वतनतापूवव घूमन लग । तथा 9 सितम्बर 1928 का दिल्ली मे फीरोजशाह के सण्डरा म ा ितवारिया की एक मीटिंग हुई। इमम भगतसिंह को कातिकारी मा दोलन का नतत्व सौपा गया। अपन दर का नाम हि दुस्तान रिपब्लिशन एसाशियक्न में स्थान पर हि दुरतान साशलिस्ट रिपटिनकन एगाशियशन, रख दिया गया। पार्टी का काम पूरा करन के लिए उनका देश मे घूमना था, अन पार्टी के निणय अनुसार उहान दाढी तथा बाल क्टा दिए । अब वह वम्ब बनाने की कोशिश म थे। साइमन कमीशन का विरोध और माण्डस वध समूचे दश में साइमन कमीशा का विरोध हो रहा था। भारत का वोना कोना साइमन गा बैंक' क नारा से गूज रहा था। लाहौर म उसका विरोध करने का मुख्य सयित्व भगतमित पर था। पर नानाजी का भीड वा तित्व रन क लिए तयार बरसे आए थे। भीड वरती जा रही थी। पुलिस सुपरिटइट स्मार 75 यह समझ गया था कि जब तत भीड को न हटाया जायगा, तब तक विना विरोध के कमीशा के सदस्य बाहर ही निपल सकते । अत भीट हटाा या दायित्व सहायक पुलिस अधीक्षर साण्डम वा सौपा गया। उसो लाठी चाज कराया। उसम लालाजी को चाटें लगी जिनसे उनकी मृत्यु हो गयी। इसके एक माह बाद, साट या गाली से उडान की याजना बनाई गई। याजनानुसार जयगापाल या पुलिस थाने पर साट वे आन की मूचना ला भेजा गया। राजगुरु जब म पिस्तौल डाल पदल उधर गए। भगतसिंह और आजाद साइविता पर थ। याजनानुगार भगतसिंह और राजगुर का साट पर गाली चलानी थी, चौकी स कोई पुलिस वा आदमी जाए तो जाजाद का उस राता था। जयगापाल से सक्त पार राजगुर तथा भगतसिंह आग बढे । साण्डस न माटर साइकिल स्टाट वरन व लिए हैडिल घुमाया ही था कि राजगुर न फायर पर दिया। साण्डस आर मोटर माइरिल गिर पडी। भगतमिह नाग बर्ड पाच गालिया स साण्डस का छलनी किया भोर डी० ए० बी०कालिज वे अहाते स निवलपर गायव हा गए । ब्रिटिश सरवार को यह बहुत बड़ी चुनौती थी। जिस समय भगतसिह और राजगुरु भाग रहे थ, पुलिस जमादार चदनमिह उनमा पीछा करन लगा। आजाद न उसका रवन के लिए पहा, पर वह जाश म पीछा करता रहा। जाजाद न भाउजर स गाली चनी और उससा दर हा गया। हिमुस्तान ममाजवादी प्रजातन स71 का नोटिस निकला, नौकरशाही का सावधान किया गया, साण्डस की मत्यु स लालाजी के अपमान का बदला है लिया गया । इलाव जिदाबाद के नार के साथ वलराज के हस्ताक्षर से पास्टर बाट दिए गए । उस समय दल व लगभग सभी सदस्य लाहौर में थे। साण्डस क वध के बाद अधिकाश सदस्य निरल गए थे। पर समस्या भगतसिह वा बाहर निकालन की थी । इसवा हल विया दुगा भाभी न । दुर्गा भाभी के पति भगवतीचरण स्वय क्रातिकारी थ। मेरठ रस म फरार था जान स पहने वह पत्नी वा 1000 सय द गए थे। व स्पए उनक पास थे। उनस लाहौर से कलकत्ता क तिए फस्ट क्लास या कूपे रिजव कराया गया । भगतसिंह ऊचे कालर का आवरकाट पहने, तिछा पलट हैट लगाए बाइ आर भाभी वे बेटे को गाद म लिय दुर्गा भाभी का पत्नी के रूप म साथ लेकर पाच बजे की गाडी म सवार हुए। विस्तर बद लेकर नौकर की तरह राजगुरु घले और कलकत्ता पहुच गए। इसी दून से रामनामी दुपट्टा ओढे, माथे पर तिलक लगाए, हरिओम बालत मथुरा वे पण्डा बने जाजाद यात्रा कर रह थ । जाजाद तथा राजगुरु लखनऊ पर उतर गए। भगतसिंह तथा दुर्गा भाभी भी प्लट फाम पर उतरी, वहा मे वहा गुशीता का तार दिया-भाई सारव के साथ आ रही हू। कलकत्ता पहुंचने पर सुशीता दी तथा भगवती चरण ने स्टेशन पर -- 76 - स्वागत पिया । पती को दस भूमिका पर भगवतीचरण मुग्ध हो गए। भगर्तासह को सेठ छज्जूगम की तिमणिला कोठी म रखा गया। सठजी की पत्नी श्रीमती लक्ष्मी दवी को सुशीला भाभी । सारी बात बता दी थी। उन दिना कलकत्ता मे काग्रेस अधिवशन हो रहा था। भगतसिंह बगालिया की तरह कुर्ता, धोती तथा दुपट्टा पहने काग्रेस पण्डाल म धमते, नताआव भाषण सुनते और उनकी गजनीतिक समझ पर दुखी हात थे। काग्रेम औपनिवेशिक स्वराज की यात कर रही थी। भगतसिंह पर प्रासीसी आतकवादी बेला का प्रभाव था। वह कुछ करने के लिए व्यग्र हो उठे । उ होन लोक विराधी दा बिला पर वहस के दारान असम्बली म बम्ब फेमन का निश्चय कर लिया। अपनी योजना पर प्रफुल्लच द गागुली स विचार विमर्श किया। उनकी मजूरी व बाद याजना का पूरी करन पर जुट गए । क्लस्त्ता मे उसका नाम हरि था। जब वहा स चले तो सुशीला दीदी ने अपने रक्त स तिनक लगाया । वह जागरा आए । हींग की मण्डी तथा नाई को मण्डी म दो मकान लिय हुए ये । बम्ब बनाने का काम यही हाता था। यही स वह दिल्ली जात जाते रहे और योजना की बारीदियो पर विचार करत रह । दिल्ली की असेम्बली में धमाका असम्बली म पब्लिक सुरक्षा पिल' तथा 'टूट डिस्प्यूटस बिल को बहरा के दौरान बम्ब फेरन का निश्चय हा गया था। याजनाचतुर आजाद समस्त योजना का अतिम रूप दे चुके थे, लेकिन चाहते थे कि बर फेंकर भाग जाया जाय, जो विरकुल सम्भव था । वाहर आजाद मादर लार तैयार रहने और उनको भगाकर ले जायग, कि तु स्वय भगतसिंह इसके विराधी थे। वह फासीसी प्रातिकारी बेला की भाति वा साथ माय एक विचार जनता को दकर कुछ नया करना चाहते थे और आत्म वलिदान द्वारा दश के कातिकारी जान्दोलन का सशक्त तथा स्वाधीनता-आगमन को समीप नाना चाहत थे। याजा उसकी थी, अत उनका जाना जधिक निश्चित था दूसर हि० स० प्र० स० के दशन का वही अ या वी अपक्षा अच्छी तरह अगलत में पश करने की क्षमता रखत थ लक्नि दल की भावी प्रगति के लिए जावश्यक था कि उनका मौत के मुह म जान स बचाया जाये। अत दत्त के सदस्या ने तय किया वि बटुश्वरदत्त तथा विजयकुमार मिहा वम्य फेरन जायेंग। इस निणय स सुपदेर बाखला उठे । वह भगतसिंह के पास गए। उनी भत्मना की और कहा-इस निणय स इतिताम तुमका पायर वहगा। भगतसिंह न प पिडक दिया पर दूसर फे द्वीप-ममिति की मीटिंग म निणय कराया कि यम्व फक्ने बटोपवरदत्त में 77 - साथ वह खुद जायेंगे । इसी साथ निश्चित हुआ कि शेप साथी दिल्ली से बाहर चत जाये । एसा ही हुआ। 8 अप्रैल 1929 का दाना विला पर सुनाई की जान का पी, उसी दिन बम्ब फेकना तय हुआ और फेरा गया । बम्ब ऐसी जगह फेके गए कि किसी को चोट न लगे । उनका धुआ सब जगह छा गया था, वह चाहते ता पिवल सकते थे, लेकिन वही खड़े रहे । काफी दर वार साजण्ट टरी और इस्पेक्टर जानसन जाये पाम आए । दाना घबराए हुए थे। भगतसिंह न भरा हुमा पिस्तौल निकालकर डेस्क पर रख दिया । व गिरफ्तार हो गए । जब पुलिस दाना का कातवाली ले जा रही थी तो उन्होन 'इक्लाव जिंदाबाद' के नार लगाए । 22 अप्रैल 1929 को पुलिस वालान से जेल भेज दिया गया। वम्ब फेंक्ते समय उहान फिलासफी आव वम्ब' नाम मे पर्चे भी फेंके 4 जा हि दुस्तान समाजवादी प्रजातन सना की नीति को बतात थ । 3 मई 1929 को सरदार किशनसिंह वरिस्टर जामफ अली साथ दिल्ली जल म मिल । पिताजी पूर बचाव के साथ मुक्दमा लडना चाहते थ, वितु भगतसिंह अपने पलिदान द्वारा अपने मिद्धान्ला के प्रचार का जवमर देय रह थे। भगतसिंह को जीवन प्रिय नहीं था, प्रिय ये अपन गिद्धात, उनका प्रचार और प्रचार के लिए अवसर की योग। मौत की सजा मे एक दिन पहले मुकरात का शिप्य उन पाम जाया था और वोना -भाग निक्लन की याजना तैयार है चलिए भाग चले । उमने कह दिया-मैरे भाग जान से तो मरे सिद्धा त झूठे पड जायेंग, लोग मुझे ढोगी कहगे । भगतसिंह भी इसी रास्त पर चल रह थे। लकिन सुक्रात जीवन दम्ब चुके थे, भगतसिंह का भी शंशव समाप्त ही हुआ था । अपन सिद्धातो के लिए उता पतिदान दुनिया के अनेक पतिदाना स अधिक महान तथा आश्चयजनय था। जेल की अदालत मे भगतसिंह की पेशी 7 मई, सन् 1929 का जेल म एडीशनल मजिस्ट्रेट मि०पून की अदालत लगी। सरवार न अपना पक्ष प्रस्तुत किया, लेपिन भगतसिंह न कहा- हम जपना भयान मेशन जज की अदालत मे देंगे इमलिए उनका मुकदमा सशन जज मिडलटन की अदालत में भेज दिया गया 14 जून 1929 का सेशन अदालत म सुनाई प्रारम्भ हुई । यहा भगतसिंह ने 6 जून 1929 को ऐतिहासिक वयान दिया (यह बया आग पढिए) 1 10 जून, 1929 को मुकदमे की सुनवाई खत्म हो गई और 12 जून 1929 को, अपने 41 पृष्ठ के फसले म जज ने दोना पो आजम धारावास की सजा सुना दी। इसके बाद भगतसिंह को लाहौर मेरल जेल तथा 78 बटुकेश्वर दत्त को मियावली जेल म भेज दिया गया। हाईकोर्ट में मुनवाई भगतसिंह ने बडा ऐतिहासिक बयान दिया। इससे उनके ज्ञान की धूम मच गई। उनके सिद्धाता के लिए देश म व्यापक सहानुभूति पैदा हो गई । लेविन ब्रिटिश माम्राज्य के नौकर जजा को न ता भगतसिंह की देश भक्ति प्यारी थी और न रसार पर इसान के शोपण का विरोध अच्छा लगता था । उह भगतसिंह और उनके साथियो के काय तथा सिद्धातो मे अपने साम्राज्य के लिए खतरा नजर आ रहा था। इसलिए जस्टिम फोड और जस्टिस एडीसन ने सेशन अदालन का निणय बरकरार रखा । यह निर्णल 13 जनवरी 1930 को सुनाया गया था । कारावामो के अनुभगो की व्यथाभरी अनन्तगाथा से उभरता लौह पुरुप का महान् व्यक्तित्व अमेम्बली बम्ब काण्ड के अभियुक्तो के रूप मे भगतसिंह तथा बटुकेश्वर दत्त को योरोपीयन क्लास में जेल मे रया गया था जहा उनको मब प्रकार का आराम था, फिर भी उहान जेल मे भूप हात वरन का निणय लिया था इसलिए कि वह अपनी मत्यु को महगा बनाना चाहते थे । अपना सबरी से भारतीय जनता को उद्वेलित करना चाहते थे, अपने आदशों की गज का घर घर तक पहुचाना चाहते थे। साथ ही जेलो म भारतीय स्वाधीनता आदोलन में सघपरत सेनानियो के साथ होन वाले अन्याय के विरोध मे जावाज उठाना चाहते थे। इसलिए 14 जून 1919 से उनकी भख हडताल प्रारम्भ हुई। जक्तूबर 1929 के प्रथम सप्ताह तक चली। यानी दिल्ली मे लाहौर के लिए चलते हुए ही ट्रन म भूख हडताल प्रारम्भ की जा चुकी थी। उसो टेन के टूसर डिब्बे मे बठे पिता सरदार किशनसिंह यात्रा कर रहे थे । वह हर स्टेशन पर उनको कुछ खिलाने का प्रयास करते पर वह कुछ नही खात । भूख हडताल प्रारम्भ करते समय उनका वजन 133 पौण्ड था, 30 जुलाई तक वह 5 पौण्ड प्रति सप्ताह कम नुआ, पर बाद मे दहर गया। ये लोग खाने से ही नही, पानी स भी वचित रहे क्याकि जेल अधिकारी पानी के घडो मे दूध डाल दिया करते थे, जिमको ये पीते न थे। आखिर मे ये घडा को फाडन लग गए मजबूर हायर पानी रखा जान लगा । यतीद्रनाथ को बलपूर्वक दूध दिया गया उहाने प्रतिरोध किया उनकी हालत पराव होने लगी। तब भगतसिंह न भय कानिकारिया को भूख हड़ताल खत्म करने की 79 । सलाह दी, लेकिन सबा भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त का साथ दा का निश्चय कर लिया था। इस निणय के पीछे भावना देवल यती द्रनाथ की जान बचाना मात्र थी। वे दोना ही भूख हडताल कायम रखेंगे। लकिन जब यती द्रनाथ ने भूख हडताल नही तोडी तो गवनर की आज्ञा से भगतसिंह को वास्टल जेल में नाया गया। उनके वहन पर यती द्रनाथ ने हडताल पत्म कर दी । तब उनसे जेन अधिकारिया न पूछा 'आपन भगतसिंह का हुक्म पौरन मार लिया और दूसरा की बात नहीं मानी।' वह बाल- भगतसिंह हमारे नेता और वीर पुरप हैं।' ऐसे थे भगतसिंह । इनके दिल मे, हर भारतीय के लिए अमिट प्यार था और शोपन तत्त्वो से घणा थी। जेल में क्रातिकारिया की भूख हडताल वो लेकर देश का वातावरण बहुत गम था। इसलिए सरकार ने 2 सितम्बर 1929 को जेल र स्वायरी कमेटी की स्थापना की। कमेटी के सदस्य जेल में आये । भगतसिंह से उनकी बातचीते हुईं। उहीन वायदा किया कि अगर भूप हडताल खत्म कर दी जाए ता सरकार यती द्रनाथ को छोड़ सकती है। भगतसिंह न हडताल वापस लेन का निणय कर दिया, पर मरकार अपने वायद से मुकर गई और दो दिन बाद 4 सितम्बर 1929 मे फिर प्रारम्भ हो गइ। 2 सितम्बर को भगतसिंह तथा यदुवेश्वर दत्त की भृष हरताल मा 31वा दिन था और दूसरे साथिया की 53वा । फिर भी, अदालत मे भगतसिंह को स्टेचर पर लाया जाता। एव पुलिस वाले के हाथ के साथ उनके हाथ में हथकडी हातो। इसका उ हान विराध किया मजिस्ट्रेट श्रीकृष्ण को उहाने खरी-खोटी भी यही, पर उसन गुलामी का डटकर परिचय दिया । हडतालियो की हालत खराब होती जा रही थी। 13 सितम्बर 1929 को यतीन्द्रनाथ शहीद हो गये । इमसे समूच दश का वातावरण गम हो उठा। सरकार परेशान हुई । उसको जल इक्वायरी कमेटी की रिपोट मिल गई थी। सरकार ने भगतसिंह का यह प्रस्ताव मान लिया था कि यदि उन सबको एक जगह इकठ्ठा होर हडताल समाप्त करन का मौका दिया जाए ता वह हडताल खत्म कर देंगे सरकार न बात मान ली और फनाक रस की जगह भगतसिंह ने दाल तथा पुलवा से अनशन समाप्त किया । 5 अक्तूबर 1929 को 124वें दिन जनशन खत्म हुआ। मरकार ने उनका राजनीतिक कदी मानकर सुविधाए प्रदान पसी प्रारम्भ कर दी । गाधी जी के साथ इग दश का पूजीवानी प्रेम था इसलिए उनके 21 दिन के अनशन को राष्ट्र की महान घटना बना दिया गया। भगतसिंह और उनके साथिया के साथ, न तो देश का पूजीवादी प्रेस था और न साम्राज्यवादी विदेशी प्रेस । जूट प्रेस ने भगतसिंह के अनशन के विषय म जो कुछ लिखा था, उसके पीछे अपवार की वित्री का भाव अधिर था, भगतसिंह के आदश के प्रति सहानुभूति कम। इसलिए उनकी 124 दिन की भूख हडताल विशेष घटना न 80 मरपारी गवाहा बन सकी। भगतमिह जिस समय अदालत में आत, उस समय 'इक नाव जिदाबाद का नारा लगाते । वदमातरम गीत गाते और फिर उसके बाद कातिवारी महीदो का प्रमिद्ध गीत गाते-- सर फ्रोशी की तमना अब हमारे दिल मे है। देखना है जार वितना याजु ए कातिल म है। वक्न आने दे बता दंग तुझे ऐ आसमा, हम अभी से क्या बताए क्या हमारे दिल म है । से इम प्रकार जिरह करना कि पातिवारी दल के उद्देश्य तथा नीति स्पष्ट हो जाए भगतसिह के दिमाग की योजना थी। फ्णीद्राथ धोप से शिव वर्मा , म प्रकार वहस की कि वह वम्व बनाने की सारी तरकीव ही वता गया और इस या बहुत से लोगा पो वम्ब बनाना आ गया। यही नही, अपने कातिकारी आोलन को विश्व के प्रतिपारियो के साथ जाडन के लिए अदालत मे लेनिन दिवस मनाया गया । जमनी म श्याम जी कृष्ण वर्मा की मत्यु होने पर शोक सदेश भेजा गया, हगरी मे राजनीतिक वैदी द्वारा भूख हडताल म मरने पर शो दिवस मनाया गया। भगतसिंह इस तरकीब से यह सब कुछ करते कि सरवारी पायवाही म यह शामिल हो जाए और उनकी पार्टी की असली नीनि जनता का मालूम हो जाए। भगतसिंह जानत थे कि मौत की सजा या जाजम कारावास की तलवार उनके सिर पर लगी है फिर भी वह अदालत के बीच म बच टाइम पर हस हगकर खाते सका सिलाऔर पिकनिक वा मा माहान पैदा कर दत । एसी हिम्मत या जिंदादिली वही जादमी निषा सकता है जिसको यह विश्वास हो जाता है कि उनकी मत्यु ही उन जादों की गवाह बागी विदशी शामन का अत करने के लिए देशवासिया म जाश भर देगी । अदालत म, भगतसिंह खूब जोर से बोलत ताकि बाहर राड लाग उनकी बातें सुनें उनकी पार्टी के दशन बाजान ले और भली प्रकार समाल कि वह पनो नही, दश की आजादी तथा तकनी के दीवाने है । वह अदालत म ही गात- कभी वा दिन भी आएगा जि जब आजाद हम होंगे ये अपनी ही जमी होगी यह अपना ही वतन होगा। शहीये की चिताओ पर जडेंगे हर बरस मेले वतन पर मरने वाला का यही बाकी निशा होगा। वाहर खडी भी' या लाइनो को दुहराती। भगतसिह बडी चतुराई मे अपने उद्देश्य की ओर बढ़ रहे थे। अदालत म हथकडिया लगे रहने के विरोध म, भगतसिंह और उनले, 81 साशिया 7 अदालत म भ नामजूर पर दिया। पुलिरा न मब लागा को जमा मारा, पर वाई अदालत म जाया जा सपा । एक दिन अदालत कर यमर म पानाखात समय भगर्तागद ने हयादिया खाल नाय लिए कहा, व ख दी गड, पर बाद म उन नोगा न हथकडिया नहीं लगवाह । दम पर मजिस्ट्रेट समेत पर उनका मारा पीटन के लिए पहल स तैनात पठान छाड दिए गरे भगतसिंह दसर मुख्य निशान थ। इस दृश्य वा अनब लागा न देया। शाम महा म जलमा हुआ, इसमे इम पायवाही की निदा की गई । दश विदश अपवारो मे खबरें छपी, अग्रेजी शामाका वाता चहरा लागो के मामन अ और भगतसिंह के सिद्धान्ता की धूम मच गई । लकित गाधी जी उनये मा अहिंसा का सवाल था { हिंसा मो हिंसा से दवाया जा रहा था । उनरे लिए क पायही कारण था। जेल-मुधार समिति की सिफारिशा गो लागू करन वा समय नवम्बर 19: रखा गया था, फिर इसको दिसम्बर तक वढा दिया, जावरी भी बीत गया सरकार ने कोई कदम इस दिशा मे नही उठाया। इस पर भगतसिंह ने 4 फरक सन 1930 म फिर भूख हड़ताल प्रारम्भ पर दी और स्पेशल मजिस्ट्रेट पो निवार अपनी शिकायता का ब्योरा दिया। यह हमेशा अपने अधिकारो के लडते रहे और अपनी हर लडाई को इस प्रकार लडते थे रि दशवासिया के नि एक यवर वन जाए और आजादी की लड़ाई मे उबाल आ जाए। एक नयी ट्रिब्यूनल अदालत का गठन और उसके मामने भगतसिंह भगतमिह तथा अ य कातिवारिया की यह नीति थी कि उनके साथ जब पाई ज्याती होती, व जनालत नही गात थे। यह मुादमा तम्या पिचता र था । सरकार इसराज दी निपटान के पक्ष में थी, वह ही चाहती थी एस मुकदमे की लखवारा म ध्पन वाली वायवाही से जनता की राष्ट्रीय भावन म उबाल आय । इसलिए सरकार ने जसम्बली में एक बिल पश किया कि ? कोई अभियुक्त अदालत म पश नहीं होता तो यायाधीश को अधिकार होगा उमयी अनुपस्थिति में भी कायवाही जारी रखे । इस बिल का विरोध हुआ सरखार ने बिल जाम राय के लिए पश बग्ने की बात मान ली। लेकिन । 1930 या वायसराय लाड इरविन न एक आर्डीनस जारी किया। इसके अनुर तीन जना का एक रिन्यूनल नियुक्त किया गया जो अभियुक्ना सरकारी गा थी जिरह बचाव पक्ष में वकीता की वहस और सरयारी गवाही पर जिरह अभापम भी भरदमे यो एक तरफा मन सकते है। पजाब हाई मोट नेता 82 एक मुगलमान जन था। दिनल की नियुक्ति को भगतसिंह अपनी ननिक जीत मानत थ। उस मन था कि इगस अग्रेजा को "याय प्रियता वा जनाजा निकल गया है। अत उनका विचार था कि साथिया का अदालन की वापवाही से अलग होना चाहिए, लेकिन दुमरे साधी पाहत थे कि भगतमिह इस अदालत मे भी पहले जमा संशातिर वयान दें। भगतसिह न माथियो की बात मान ली। अभियुक्त अदालत में आते। इक्लाब जिन्दाबाद का नारा लगाते, वादे मातरम् गीत गाते, मस्ती मे झूमते होरो की तरह अदालत म आते और 'सरफरोशी की तमना' वाला गीत गाते । अग्रेज जजा का इससे परशानी होती। एक दिन अदालत में बडे मीठे म्यर म भगतसिंह न गाया-- यतन की आपरा पास देखें कौन करता है सुना है आज आतव म हमारा इम्तहा होगा? इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज देवगे जब अपनी जमी हागो और अपना आस्मा होगा? मुख्य जज ने इन पक्तिया का अथ पूछा तो भाग याला हो गए। सरे दिन वह कुर्सी पर जाकर पहले ही घट गए, ज्यो हो अभियुक्तो न नार लगाते हुए प्रवेश किया तो उहोो उनको बन्द परन का आदेश दिया। मौत मे सेलने दाला जातिवारी ऐसे आदेशाको क्व मानता है। भगतसिंह ने फिर गाना शुरू विपा-- अपनी किस्मत मे अजल से ही सितम रखा था, रज रखा था, मुहिम रबी पी, गम रखा था, विसको परका भी और किसम य दम रखा था हमन जर यादि ए गुरवत म कदम रहा था, दूर तर या वनन जायी थी समपाने को। इस पर पुलिस का हुक्म दिया गया वि गान को बद कराया जाए, पुलिस बीच म आ गई। उसने अभियुक्ता को बुरी तरह मारना शुरू कर दिया। प्रधान न्यायाधीश कोल्टस्ट्रीम इस दश्य का दखता रहा। ट्रिब्यूनन के तीसरे जज जस्टिम आगा हैर इस अन्याय के विरोध म उठन वो हुए, पर कोल्डस्ट्रीम की व्यक्तिगत प्राथना पर वठे ता रहे, पर अपवार से मुह ढक लिया। अपनो की “याप-व्यवस्था का यह राक्षसी रूप था, जिससे गाधीजी तथा कानमीनताओ ने तो मह लिया था, पर जनता ने नहीं सहा । इतनी बबरता के साथ, अदालत में चोरा डावुआ तथा कातिलो को भी नही पीटा जाता, जितनी बबरता के साथ अपजी-पुलिम देश के इन दीवाना को पीट रही थी। चौरी चौरा के बाण्ड पर आदोलन वापस लिया जा सकता था, पर दशभवना के साथ हुई बबरता पर । आदोलन नही छेडा गया, इसलिए कि भगतसिंह गाधी जी तथा काग्रेस के नीतिक प्रतिहदी या वह अंग्रेजा के खिलाफ उमडउटा । वानसी ना दालन: बल पर ही कामयाब हुना । इस घटना व वाद अदालत उठ गई स्थगन अ पर फेवल अग्रेज जजा ने ही हस्ताक्षर विए जस्टिस आगा हैदर ने नहीं । उ समस्त कायवाही से स्वयं को अलग रखते हुए अलग से निणय दिया।। याद सभी साथी भगतसिंह की बात पर सहमत हो गए और याय या यहि क्यिा जाने लगा। वायसराय ने पहला ट्रिब्यूनल समाप्त करव दूसरा बनाया, जस्टिस जी० हिस्टन अध्यक्ष बने और जस्टिस अब्दुल कादिर तथा जे० ० टैप सदर ट्रिब्यूनल ने अभियुक्तो से अपना पक्ष पेश करने को कहा पर वे तयार हुए। वे समय गए कि अव फैसला होन वाना है। 5 अक्टूबर 1930 को जे पार्टी हुई। क्रान्तिवारियो तथा जेल अधिकारियो न बडी सदभावना के साथ तिया। प्रान्तिकारी मिल रहे थ, विदा ले रहे थे, हस रह थ, युश हो । मजाव कर रह थ । अधिकारी इस जश्न पर चवित थ । दूसर दिन, जेल के और पुलिस का सख्त पहरा लगा दिया गया। अग्रेजो को डर था कि जनता तोडकर भगतमिह तथा उसके साथियो को न छुडा से । 7 अक्टूबर 1930 को सुबह जेल में जाकर टिब्यूनल का फैसला सुन गया-भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को पासी, कमलनाथ तिवारी, हि भुमार मिहा जयदेव कपूर, शिववमा, गयाप्रसाद, विशारीलाल और महा सिंह को आजम कालापानी, कुदलाल को सात वप की सजा, प्रेमदत्त को साल की कैद और मास्टर आशाराम आयघोप, सुरन्द्र नाथ पाण्डेय, देशराज जिते दनाथ सा याल यो बरी कर दिया गया। सरदार किशनसिंह का कानूनी दाव पेच और भगतसिंह की प्रतिक्रिया इस फसले को सुनकर सरदार किशनसिंह व्यथित हो उठे। क्रान्तिकारी रह थे लेकिन उनकी नीति खुद सुरक्षित रहकर वार करन वाली थी। इसलिए भगतसिंह को बचाना चाहते थे, अपने लिए नहीं, देश के लिए, क्रान्तिक आदोलन को जिदा रखन के लिए। इसलिए उहोने स्पेशल ट्रिब्यूनल को पापन दिया कि सॉण्डस वध के दिन भगतसिंह लाहौर मे थे ही नही। वर उहाँने खद्दर भण्डार परी महल लाहौर के मनेजर रामलाल को एक पत्र हि था जो टार द्वारा उनको मिला था। वह गवाह के रूप म पश हो सकत दाव अचूप था। कितु भगतसिंह को मजूर नहीं था। अपने पिताजी को 84 लिपकर अपना विरोध प्रपट किया। पिताजी को लिया, भगतसिंह का यह पर देशभकिा और इसानियत की गी।। है । भगतसिंह अपन जीवन के साथ ही, अपने सिद्धातो के साथ प्रतिबद्ध हो गए थ, देशभक्ति में मौत को "तना प्रिय बना लेना उनके वश की ही बात थी। स्वाधीनता आदोलन के अनर नता मिद्धातो का ताक पर रखकर स्वाधीनता का वैभव भोगने के लिए जिदा रहे, अपनी कुर्मी के लिए देश को बार भी लिपा लाखा लागा को पुश्तैनी घर तथा जमीन से भागने के लिए मजबूर भी करा दिया हजागे बालिकाओ का शील भग हुआ, बलात्कार तथा मारकाट के टश्या मे मानवता राह उठी और नतिष तथा मामाजिक मूल्य विहीन पीढी को जन्म देकर व नंता गद्दियो पर बैठे रहे लेविन भगतसिंह ऐसे व्यक्ति नहीं थे। उनको आदर्श प्यारे थे, सिद्धातो के लिए मरना अच्छा लगता था। इसलिए घर स विमुख हुए, पिता स विराध प्रकट दिया और अग्रेज सरकार के सामन अड गए । जानत थे कि इसका परिणाम मौत होगा, लेकिन देश और ममाज को स्वाधीनता के लिए संघप करन वाले व्यक्ति का डर विमी से नहीं लगता। जल उनके लिए तीथ स्थल बन जाती है उसकी तकलीफ अमत बन जाती है और मौत मोक्ष का पैगाम तकर आती है। भगतमिह के सामन गाधीजी आदश नही थे आदश थे महान् गा ितवारी रूसी अक्टवर जाति वे सपा नेता महान रानिा। भगतसिंह को जेल मे छुडाने का असफल प्रयत्न भानाद भगवतीचरण सुखदेव राज और यशपाल को योजना थी कि भगतसिंह तथा उनके दोना माथियो पो गेल मे छुटा लिया जाए । इस लिए उ हो योजना काई । एक योजना यशपाल वी थी और दूगरी स्वय भगतसिंह की यशपाल की योजनानुगार मेट्रल रेल पे पाटव पर उग समय आश्रमण वरना था, जब भगतमिह तथा उनो साथियो का अदावत म जथवा बोस्टल जल ल जाने के लिए निकाला जा रहा हो। इसका कारण यह बताया गया था कि सेन्ट्रल जेल का फाटक सडक के बहुत पास है, त वहा तक पहुचन म रिसी को गह न होगा। दूसरे वहा पुलिस वा प्रवध भी ज्यादा नही रहता था। भगतसिंह की योजना थी विजेन पर हमला उम समय दिया जाए जब हम लोगा पो कचहरी मे वापस जेल लाया जा रहा बोर्टल जेल पापाटप गप्प मे भगभग सौ गज दूर था, दूसरे उसके सामने शेर दिल पुलिम पी एय टुवतीहर समय रहती थी। यशपाल इस योजना ये विरोध म थे। पहनी योजना या पी कि मूळ गैस पचहरी के बारे म छोडकर को हाजिया जाय । लेकिन हमराज न उनको गैस बनाकर नहीं दी। वह वार बार धोखा दता रहा। इसलिए अदालत के कमरे सज्जतको छुड़ाने की योजना त्यागकर जेल के फाटक से ही छुडान की योजना बनाई जाने लगी थी। भगवतीवरण तथा आजाद चाहत थ वि यशपाल व दूक चलाने की ट्रनिंग ले । इस लिए वह जिला मरट के एक गाव म गए भी। याजना का वहा और विस प्रकार क्रियावित विया जाय, इस विषय म यशपाल को आपत्तियो पर जल रा भगतसिह न सदश भेजा था-"उस कलाकार स क्हा नित्य नई कल्पना (अथात शेर दिल काण्ड) न गढ़ा कर जा पहन साचा है, वह पहल हाना चाहिए। उस समयाजा वि परिस्थिति और नीति निश्चित करन मे माटा (भगवतीचरण) ज्यादा योग्य है । एक्शन (सशस्त्र सघप) म माट का बचाकर पडित (आजाद) का आग रखा । कलाकार (यशपात) से कहा मैनीफस्टा लिख। इस मदश स मालूम पड़ता है कि भगतसिंह मुक्त हाना चाहत थे और उनका अपन दल के सदस्था की योग्यता तथा काम करन की ताकत का अच्छा तरह ज्ञान था। पार्टी के कामो पर उनकी जबदस्त पक्ड थी। साथ ही उनका यशपाल की योजना स्वीकार नहीं थी। यशपाल द्वारा लिखित पुस्तक सिंहावलाक्न' पढने स ज्ञात होता है कि यशसाल का, भगतसिंह द्वारा कलाकार कहा जाना अच्छा लगा था, योजना बनाने म अकुशल कहना अच्छा नहीं लगा । इसका यह अथ न निकाला जाय उन्हान भगतसिंह की मुक्ति के लिए गम्भीरता के साथ प्रयास नहीं दिए। जल पर हमला करके भगतसिंह और साथिया ना छुडान के लिए 1 जून का दिन निश्चित किया गया था। 28 मई का भगवती भाई न यशपाल स पहा कि बबा का भरकर तयार पर दो ताकि उनम स एक ना आजमा कर तय लिया जाए । बबा के खाल कानपुर म तैयार हुए थे और मसाला राहतक म। यशपाल के अनुसार बा का भगवतो और सुखदेव राज न भरा था । उसका आजमान के लिए सुखदव राम, भगवती भाई आदि रावी किनार जगल म ल गए आर फक्न स महल ही वह बम्ब भगवती भाई के हाथा म ही पट गया था, जिसस व दाना तथा बच्चन बुरी तरह घायल हो गए थे। इसी दुघटना म, भगवती भाई की मृत्यु हो गए थी। यशपाल सिहावलाकन-2 मे, स्वावार करत है कि इस घटना के लिए दापी वह है कि जब बम्ब का टिगर ढीला था ता उसको ठीक पहल ही मन क्या नहीं किया? प्रातिकारिया को जल स छुडान की अकुशल योजना बनान के लिए यशपाल का क्षमा किया जा सकता है, किंतु बब का ट्राइगर न क्सन के लिए माफ नहीं किया जा सकता अगर एसा कर दिया गया होता ता भगवतीचरण भी बच जात और भगासह भी छूट गए हाते। भगतसिंह वा घुमो की योजना र गदभ म वहावापुर रोड पर एरवगला किराए पर लिया गया था। उसको खाली मरत समय, एक पत्र को 86 फाडकर फक दिया गया था। पुलिस को, उनो टुकड़ा म कुछ सूत्र मिन, जिनके आधार पर गिरपाारिया हुई थी। एक्शन म शामिल होन के लिए, छलम्हिारी तथा मदनगोपाल दोना था, एक्शन की भयक्रता और मौत का खतरा बतासर पूछा गया था, छलनिहारी उस स्थिति के लिए तैयार नहीं था। मदनगोपाल ने साहस अवश्य किया था। आजाद द्वारा गब लागा की डयूटिया बाद दी गइ थी। जगतीश और बच्चन को दायित्व मोपा गया था कि व भगतसिंह का पास्टल जेल पहुचन भी सूचना देंगे। उहान गूचना दी थी कि सवा-दा बज पुलिस की गाडी उनका यास्टल जल पहुंचावर लौट गई है । जत अनुमान दिया गया था कि यह पाच बजे के लगभग लौटकर आयेंग। इसलिए चार बजे मर लोग कार मे बैठार जेल की ओर जान का तैयार हुए, तभी सुशीला भाभी न, अपनी उगली ये पून से, सपक माथ पर तिलक लगाया। सब लोग जेल के सामने से गुजरकर नहर की ओर चले गए। बच्चन को यह बताना था कि कर भगतसिंह जैन स बाहर आते हैं। ज्या ही पुलिस की गाडी उनको लेने के लिए आई और वह जेल के फाटक से पीछे की पिडवी का सटाकर खड़ी हो गई । तव नाजाद न यशपाल से पूछा, अब' 1 जवाब मिला, आगे बढना है। इन लोगा न बासुरी बजाकर भगतसिंह को जपनी उपस्थिति का सिगनल दिया। यशपान का काम था, फाटक के सामने बैंच पर बठे छह सिपाहियो पर बम्ब पेपना, बच्चन का काम था, लारी में बैठे सिपाह्यिा का बम्ब फेंककर रोके रखना। मदन गोपाल का काम था अपनी ओर दौडवर आते भगतसिंह तथा दत्त को एक एर रिवाल्वर देना। भगतसिंह फाटक स बाहर निकले, लेकिन उहाने माथा खुजलाकर इशाग नहीं दिया, जिसकी प्रतीक्षा वे कर रह थे। इसलिए योजना शुरू नहीं की जा सको। बस उनको लेकर चली गई। कुछ हसराज की वायदा खिलाफी के कारण और कुछ यशपाल की नापत्तियो तथा असहमतियो के कारण भगत सिंह तथा उनके साथियो को जेल से मुक्त कराने की याजना अधूरी रह गयी और महान देशभक्ता के लिए फासी का पदा सुनिश्चित हो गया। क्रातिकारी आदोलन की यह सबसे बडी असफलता थी। भगवती बाबू तो इस योजना के शुरू हात ही बम्ब पटने के कारण स्वग सिधार गए य और आजाद बाद म अलफ्रेट पाक इलाहाबाद मे, पुलिम की गालियो से शिकार हो गए थे। हो, यशपाल अवश्य बच रह थ। कुछ उपयास तथा "सिंहावलाकन' नाम से, क्रान्तिकारिया के कम, अपन सस्मरण अधिक लिखने के लिए। अगर सारी घटना पर नजर डाली जाय तो यशपाल जी दूध के धुले प्रतीत नही होत । वह सावधानी के साथ चल रहे थे।

87 काल कोठरी में साधना रत एक महामानव - - ट्रिब्यूनल के फसल के खिलाफ, लाहौर करा की बचाव समिति न प्रिवी कौसिल में अपील करन की जारदार तयारी की। फैसला इकतरफा था-अदालत मन अभियुक्त पेश हुए थ, न बचाव पक्ष की आर से वकील तथा साक्षिया पश की गई थी और न ही सरकारी पक्ष के गवाह तथा उनस बहस हो पाई थी। इसलिए केस कानून की नजर म बहुत कमजोर था और दुनिया की नजरा म त्रिटिश याय की कलई खाल रहा था । अत अपील मजूर होन को उम्मीद थी, भगतसिंह को अपील स्वीकार कराना मजूर नहीं था। उनको, अपनी फासी स जिस सफलता की आशा थी, वह अपील की मजूरी से नहीं थी। अस्तु, सलाह के लिए आए विजय कुमार सिनहा स आपन कहा था- एसा न हो कि फासी रक जाय । हम मरकर ही क्राति की सवा कर सकते हैं।' पडित मातीलाल नहरू की इच्छा थी कि पासी को थाडे दिन रोके रसन के लिए अपील कर दी जाय, इस बीच म दूसर कदिया को छुडाने का मौका भी मिल जायगा। वकील प्राणनाथ मेहता भी अपील के पक्ष मे थे। भगतसिंह न इस स्थिति स निपटने के लिए दो शर्ते पेश की- 'पहली कही यह न कहा जाय कि हम लाग यान्तिकारी नहीं है और दूसरी अपील का आधार वायसराय के आर्डीनस को चुनाती दी जाय ।' य दोना शर्ते भगतसिंह को भावी-युग का सजक बना रही थी। वह जानत थे कि इन दोना बातो स, पासी ता माफ होगी नहीं, सिफ फासी लगन का समय आग खिसक जायगा । वह चाहत थ-फासी तब हो, जब दश की जनता का जाश पूरे उफान पर हो और उसका ध्यान पूरी तरह उसको फासी पर केद्रित हा । इस इच्छा के पीछे कोई स्वाथ नही, वरन् अपनी पासी की घटना से, भारतीय स्वाधीनता आदोलन को गति देना था और जिन आदर्शों के लिए फासी पर चढा जा रहा है, उनके प्रति जनता को भावक तथा प्रतिबद्ध बनाना था। इसस बडा भगतसिह की दश भक्ति का और क्या हो सकता था? फासी की काल काठरी मे बैठे भगतसिह, मौत की चिंता किए बिना, कातिकारी साहित्य पढने म मग्न थ, 24 जुलाई सन 1930 को सट्रल जेल लाहौर स जयदेव को पत्र लिखकर जो पुस्तके आपने मगाई थी, उनकी सूचा, उनक दिमाग की दिशा का आभास देती है । किताबो की सूची थी- 1 काल मावस सिविल वार इन मास, 2 स्लैणन ग्विाल्यूशा इन रसा 3 प्रिंस पो आटविन म्युचुअआ एड 88 " 4 वी० रसल वाई मन फाट 5 सोवियन एट वा 6 वाले नाफ मेड इटरराशनल 7 फोल्डरा फैक्टरीज एण्ड वय शाप 8 अप्टा सिक्लयर म्पाई 9 बुपारिन हिस्टारिवल मटियरिलिज्म 10 डालिग्म पोजेटसन प्रापरिटीज एण्ड देट रना अलावा भी वह पिता मागत तथा पत्त थ । भगतसिंह बुल एफ. एक तर पढे थे लेकिन म्वाध्याय स उ हान पूरा ज्ञान कर लिया था। पढन क माय, फासी की काल कोठरी म ही जापन चार पुस्तक लिखी--1 जात्म स्था, 2 दि डार टू डेथ 3 माइडिअल आफ् साशलिजा 4 स्वाधीनता की लडाई म पजाब का पहला उभार । इन किताबो स भगतसिंह के चिंतन की उस दिशा का अनुमान लगता है जा वह भारत वे भावी समाज के विषय मे साच रहे थे। इसी काल याठरी मे भगर्तामह न देश के नौजवान साथिया को सदश भेजा, इसी स अपने भाई कुलतार का पत्र लिखा और इसी में उन्होंने अपने वकील प्राणनाथ महता के मर्सीपिटीशन के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करन से गना किया था। प्राणनाथ महता ने, अन तरह उनका समझाया, दश के लिए उनके जीवन की जररत का महत्व बताया, उनके जीवन का उनकी नहीं, समाज की सम्पत्ति भी कहा और यह भी जोहामि भारत उनका जीवित रखना चाहता है, पर व टस से मस नहीं हुए । राजगुरु तथा सुखदेव पोतो नाराजगी भी हुई, पर भगतसिंह ने उनको शात कर दिया। दूसरे दिन, एक कमेटी द्वारा तयार किया गया ड्राफ्ट लार प्राणनाथ महता फिर जल म उनस मिल । भगतसिंह 7 उस ड्राफ्ट पर हरा दिया। वह वाले, 'हमन ता प्रायना भेज भी दी', और उहाँन जपना ड्राफ्ट दिखाया, उसका देवर प्राणनाथ भगतसिंह का इरादा समझ गए । उनकी मर्जी 4 सामा खडे रहने का माहम उनम न था। वह समझ गए थ, भगतसिंह बहुत - - माच 1931 को गाधी इरविन समझौता हो गया । जेलो स सत्याग्रही छोड जान लगे। उनके स्वागत हो रहे थे, गल में मालाए गिर रही थों पर सच्चे दश भक्ता के गला के ममाप फासी का पदा कर रहा था। वायसराय दरवि से बातें वरन रे लिए जान र समय, दश की जनता ने गाधी जी स भानसिंह और उनके साथियो के प्राण बचान के लिए प्रार्थना की थी। इस पिग का गगगरागरे गामा उठापाराध पिया था पर गाधी जी मौत !यायमराय गाधी की भावना को समाा गया था। उरान देख लिया पा 89 दि गाधी जी मफल होत है, तो भारत म अग्रेज कुछ दिन और ठहर सवत हैं, यदि भगतसिंह सफल हात हैं ता अग्रजा का विदाई तुरत निश्चित है । सरदार किशनसिह की अपील खारिज हा गई थी। सरकारी वकील काडन नाउ हाई काट स फासी दन वा आदश हासिल कर चुका था । यह सव गुप्त रखा गया, पर नाग समझ गए थ कि भगतसिह और उनक साथिया का फासा हान वाली है । इसलिए जनता जल की आर मुड रही थी। प्राणनाथ महता, पातिकारी लनिन की जीवनी लपर भगतमिह के पास पहुच थ। क्यारि भगतसिंह ने इसका मगाया था । मेहता न, उनस अतिम सदश मागा, वह विना साच बोल- 'सामाज्यवाद मुदामाद, इक्लाव जिंदावाद' ! प्राणनाथ न उनस उनको अतिम इच्छा पूछी । उसका उत्तर था- फिर जम तू और मातभूमि की अधिक सवा कर सकू।' उसी दिन उनका एक पुजा मिला, उसम लिखा था- सरदार, जाप एवं सच्च इन्कलाबी की हैसियत स वताए कि क्या आप चाहत है कि जापका बचा लिया जाये। इस आखिरी वक्त म भी शायद कुछ हो सकता है । अगर बाई दूसरा हाता तो प्राणा की भीख मागता। पर उनका उत्तर था- -मैं कद हावर या पाब द हाकर जिदा रहना नही चाहता। मरा नाम हिदुस्तानी इलाब पार्टी का निशान बन चुका है और इ क्लाब पार्टी के जादशा और बलिदाना न मुप बहुत ऊचा कर दिया है । इतना ऊचा कि जिदा रहने की सूरत म इससे ऊचा मैं हरगिज नहीं हो सकता। जब तो बडी बेताबी स आखिरी इम्तहा या इतजार है । आरजू है कि यह और वरी आ जाय।' वह कौन सा आपिरा रम्तहा था, जिसकी प्रतीक्षा भगतसिंह कर रह थ? वह जल्दी स जल्दी दशवासिया का दियाना चाहत थे वितिकारी आदर्शों की रक्षा के लिए हात हसत पामी का फदा गल म इस तरह लगाया जाता है। जीवन नाटक का अन्तिम दृश्य सर फराशी के लिए भगतसिंह पूरी तरह तयार हो चुके और बाजुए-कातिल का जार दखने क लिए लालायित थ उनके राम राम से आवाज निकल रही भी- सर फरोशी की तमन्ना आज हमारे दिल म है, दखना है जार कितना बाजुए-कातिल म है। दोपहर का समय था, भगतसिंह मस्ती के साथ, साथिया द्वारा भेज गए रसगुल्ला मा रह थे। यही उगो जोवा या जाखिरी गाना था। सहसा बाहर धूमते दिया का हुक्म दिया गया नि अपनी अपनी बरसा म त बायें। यह 90 अजीव बात थी, सध्या के समय बैरवा म बदहान वाल कैदियो का दिन म बद किया जा रहा था। स्थिति गम्भीर थी, इसका अनुमान लग रहा था । उसी समय जल व चीफ वाडन सरदार चतरसिंह न भगतसिंह से आकर कहा- वटा, यह आखिरी समय है, मेरी एक बात मा लो।' भगतसिंह न मुस्कराकर उनका स्वागत किया। वह बाल-आखिरी वक्त मता वाहे गुरू का नाम ले ला और गुरवाणी का पाठ कर ला।' और उहान गुटका उनवी आर बढ़ा दिया। लकिन भगासिंह वह तो न मौत स पडात य, न उनमो धम का डर था और परमात्मा का पान की कामना । उनका उत्तर था, 'अब जब आखिरी वक्त आ गया है, तब में परमात्मा का याद करू ता वह वहग, यह बुजदिल है। तमाम उम्र ता इसन मुये याद किया नहीं, अब जब मौत सामन नजर आयी है तो मुझे याद वरन लगा है।' उनको इस बात की फिक नहीं थी कि लाग उनको नास्तिक' कहेंगे, लक्नि लागा स वुजदिल और बईमान कलाना नहीं चाहत थ। वह अडिग रह, अतिम क्षण तर, अपनी आन पर कायम रह, अपन विश्वासा को बनाए रखा। जिस समय, उनकी काठरी वा दरवाजा खुला और जेल अधिकारी न भीतर कदम रखा था, उस समय वह वकील प्राणनाथ महता की लाई हुई लनिन मी जीवनी पर रह थे । उनकी आत्मा महान् प्राप्तिकारी, दुनिया से शायण और साम्राज्य का अत पर देने वाल महान् व्यक्ति के साथ मिलकर एक हो गई थी। जेल अधिकारी ने आर कहा था- सरदार जी, फासी लगान का हुक्म बा गया है, आप तयार हो जायें।' भगतसिंह ने पुस्तक पर स नजर उठाय बिना, अपना वाया हाथ उठाकर कहा- ठहरा, एक क्रान्तिकारी, दूसरे पातिवारी स मिल रहा है।' स्वर म, कडक थी। जेल अधिकारी सहम गया। भगतसिंह न कुछ पराग्राफ पढ और उसके बाद पुस्तक छत की आर उछाल दी। उछलकर पडे हुए, बोल-चला। अन्तिम दृश्य , भगतसिंह काल-कोठरी स बाहर आ गए थे। राजगुरु तथा सुखदव भा आ गए थे। तीना ने एक-दूसर का देखा, जाखो भाषा में बातें हुइ, गले मिले। अब भगतसिंह बीच मे थ और उनके बायें सुखदेव तथा दाये राजगुरु थे। उनकी दाना भुजायें दोना साथिया की भुजाआ पर रमी थी। तीना एक क्षण रुके, फिर भगतसिंह न गाना शुरु विगा- दिन से निरोगी न मरवर भी वतन की उल्फत । मरी मिट्टी से भी पुशवू ए-वतन आएगी।

91 फिर तीना ने मिलकर गाया, झूमकर गाया, मस्ती के साथ गाया और गात गाते चल पडे, आत की आर, जहा भारत को स्वाधीनता दवी उनके अभिनदन के लिए खडी थी। फासी घर पर लाहौर का डिप्टी कमिश्नर मौजूद था। उस देवकर, भगतसिंह न कहा- वैल मिस्टर मजिस्ट्रेट, यू आर फाचूनट टुवि एवल टुडे टु सी हाऊ इडिया रिवाल्यूशनरीज कन एम्बस डेथ विद प्लजर फार दि सक आव देयर सुप्रीम आदडित।' यह कहकर तीना फासी मच की सीढिया पर चढ। पासी क फद लटने थ, उनके पीछे तीना खडे हो गए। फिर तीना न नारा लाया-'इकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुदाबाद । इसके बाद फना को चूमा। अपन हाथा स गला में डाला और पास सडे जत्लाद से नग्नतापूर्वक कहा, "इनका ठीक कर ले।' सध्या के 7 बजकर 33 मिनट पर तीना जमर शहीद भारत माता की मिट्टी म मिल गय- जालिम फ्लकने लाख मिटान की फित्र की, हर दिल में अक्स रह गया, तस्वीर रह गई। क्रूर ब्रिटिश सरकार न इन क्रातिकारिया के प्राण लेकर मिटान की कोशिशें की, गाधीवादिया ने उनको भुलाने की साजिश की, लेकिन क्या वह मिटे ? . पाति के दाशनिक भगतसिंह क्रान्ति के दाशनिक को न पाई जाति होती है न धम वह सवीण सीमाओ स बहुत ऊचा उठ जाता है। उसके सामने, शापित उपेक्षित, उत्पीडित और अभावो में ग्रसित इसान का एक समाज होता है, जिसकी समृद्धि और तरक्की क लिए वह साचता है और उन तमाम ताक्ता पर हर तरीक से चोट करता है, जो इसान का खून पीती रहती है उसकी महनत का शोषण करती हैं, खुद ऐश और जाराम की जिंदगी बसर करती हैं, लविन इसान की महनती जमात को भूखा तथा नगा रहने के लिए मजबूर कर देती है और जब कभी भूखे तथा नगो की यह जमात अपना हक मागती है, अपने इसानी अधिकारो की आवाज बुलद करती है, तथा अपने राजनीतिक अधिकारा दी लडाईछड देती है तो उसको गालिया से भून दिया जाता है, जेला म सडा दिया जाता है और फासी के तख्ता पर चढा दिया जाता है। विश्व-स्तर पर शापर वग के खिलाफ लडाई वा दशन पेश किया था काले माक्स ने । उसको व्यावहारिक स्तर पर उतारा था लेनिन ने । सरदार भगत- सिंह पचपन से ही आगरण स्तर पर उस दशन । अनुयायी या गए थे। उसको इसारा तथा इसारा के बीच अतर करने वाला व्यक्ति तथा दशन पसंद

No text on this page.

93 हम, जब यह वरत है वि भगतसिंह पातिदर्शी थे, तो हमारा मनलब यह हाता है वि स्वाधीनता के बाद इस दश के लिए वह एक नयी सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था की वकालत पर रह थ। उस व्यवस्था का स्वम्प क्या था दम विषय में उहाने असेम्बली बम्ब काड ये मुकदमे सिलसिले म, 6 सितम्बर 1929 कोमेशन जज की अदालत में बयान देते हुए विचार व्यक्त किए थे। उहाँने करा था- 'माप्ति में हिंसात्मक सघर्षों का अनिवाय स्थान नहीं है न उमम व्यक्तिगत रूप से प्रतिशोध लने की गुजाइश है । प्राति बम्ब और पिस्तौल पी सम्वृति नहीं है । फ्राति से हमारा प्रयोजन यह है कि अयाय पर जाधारित वतमान समाज-व्यवस्था मे परिवतन हाना चाहिए । उत्पादक अथवा श्रमिक समाज में आवश्यक तत्त्व ह तथापि शापक लोग उ ह उनके थम के पलो और मौलिक अधिकारो से वचित कर देते है। एक बार सबके लिए अन उगान वाल कृपय सपरिवार भूखा मर रह है सारी दुनिया म कपडा का पूर्ति करन वाले बुनकर अपने और अपने बच्चा प शरीर का ढापन के लिए पूर वस्त्र प्राप्त नहीं वर पात, भवन निर्माण, लोहारी और बढईगीरी के वामा म लगे लोग शानदार महला का निर्माण करवे गदी गालिया म रहत आर मर जात हैं। दूसरी आर पूजीपति, ताक और समाज पर घुन की तरह जीने वाले तोग अपनी रानव पूरी परने के लिए क्राडा रुपये पानी की तरह वहा रहे है । य भयकर विषमताए और विकास के अवसरो की कृत्रिम असमानताए समाज को अराजक्ता की ओर ले जा रही हैं । यह परिस्थिति हमेशा नही रह सकती यदि सभ्यता के ढाचे को समय रहते नही बचाया गया तो वह नष्ट भ्रष्ट हो जायेगा। इसलिए काति- पारी परिवतन की आवश्यक्ता ह और जो लोग इस आवश्यकता को अनुभव करते हैं उनका यह वर्तव्य है कि वे समाज का समाजवादी आधार पर पुनगठिन करें। जब ता यह नही होगा जोर एक मनुष्य द्वारा टूसरे मनुष्य था तथा एक राष्ट्र के द्वारा मरे गष्ट्र का शोपण होता रहेगा जिसे साम्राज्यवाद कहा जा सकता है तब तक उससे उत्पन होने वाली पीटानो और अपमानो से मानव जाति का नहीं बचाया जा सकता एव युद्ध को मिटाने तथा शान्ति के युग का सूत्रपात करने के बारे म की जाने वाली ममस्त चर्चाए कोरा पाखण्ड है । प्राति से हमारा प्रयोजन अतत एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करना है, जिसको इस प्रकार के घातक खतरा का सामना न करना पड़े और जिममे सवहारा वग की प्रभुता को मायता दी जाए। यह था भगतमिह का शान्ति न्शन जो हर मानव की आर्थिक तथा सामाजिक समता का पक्षपाती है। मरदार भगतमि के दिमाग में भारत के से निजाम की तसवीर थी, जिसम कोई भूखा तथा नगान रह मह्नत करन वाले को अपनी महनत का फल 94 - मिल और दसान को धम, जाति तथा अय के बल पर छोटे तथा बडे, ऊचे तथा गरीब कप में बाटा जाय । यदि गहराई के साथ, बिना किसी भेद भाव तथा पूर्वाग्रह के पहा जाय तो हम कह सकत है कि वह इस दश व अनेक शुभ चिनको से अधिक शुभचिंतक थे और अनेक विचारको से अधिक लोक्तात्रिक एव जनवादी विचारक थे, कि तु कांग्रेस वे नवाओ के समान, अपने सिद्धातो के साथ सौदा वरना नहीं जानते थे । अपने सिद्धातो की रक्षा के लिए मिट सकते थे, पर डिग नहीं मरते थे। इसलिए मिट गए, पर हिल नही।

हे त्याग-मूर्ति, केशवानन्द
हस हम मदेव तप-त्याग किया,
सत सेवा का समाग लिया,
दीना दुखिया के कप्ट हरे
जन जीवन में सदभाव भरे,
तुम साधु सुधि आनद क्द
हे त्यागमूर्ति केशवानद ।
-
तुमको न गहस्य भाव भाया
जन जन कुटुम्बवत अपनाया
तुम राष्ट्रधम उनायव हो,
सबके समित्र-सहायक हो
काटे
पटुता
के
हे त्यागमूर्ति वेशवानर ।
अज्ञान अविद्या-नाशक हो
शुचि ज्ञान प्रभाव प्रकाशर हो,
मानवता समता वे सुभक्त
शुभ
स्वावलम्बन्दृढतानुरक्त,
पमवीरताव्योमचद
है त्याग मूर्ति केशवानद।

96
नतिकता का निर्माण लिय,
जग जीवा पत्याण लिय
शुभ सत्य साह की ज्योति जगे,
आपाधापी मे आग लगे,
तुम धमवीर विचरो जमद,
हे त्यागमूर्ति केशवानद ।
(स्वामी केशवान द अभिन दन ग्रन्थ से साभार)

स्वामी केशवानन्द (सवत 1940-सन् 1972) हि दुस्तान में रहने वाली जाट जाति सच्चाई, ईमानदारी, देश भक्ति और तलवार की ताह्मेशा धनी रही है, पर रुपये पैसे का हमेशा उसके पास अभाव रहा है। इसका असली कारण यह है कि वह आमतौर पर खेती करती है और इस देश में खेती कभी मुनाफे का वनज नहीं रहा। कभी-तो विपरीत मौसम उसको चौपट कर जाता है और कभी सरवार तथा व्यापारी उसकी कमर तोड डालते हैं। इन पर स जो थोडा-बहुत बचता है उसको पडा तथा पुरोहित, धर्म, ईश्वर तथा स्वग के नाम पर छीनता रहा है । महनत वह करती है, अन्न वह पंग करती है, लेकिन गोदाम भरे जाते रहे है यापारी तथा सामतो के। दुर्भाग्य यह है कि यह किसान कौम, अशिक्षा के कारण, इस आर्थिव शोषण के तरीके या चालाकी को समझती नही थी, इसलिए अनेक वर्षों तक गरीबी तथा शोपण की शिकार होती रही थी। लेकिन उनीसवी सदी के आखिरी चरण म स कौम म, कुछ ऐस महानुभाव पैदा हो गए, जिहाने कौम की गरीयो पो, पहले जम के पाप का न मानकर अथवा भाग्य की देन स्वीकार नवरो, सामाजिक तथा आर्थिक शोषण का फल बताया और उसको तरीको को बताया । पजाब मे चौधरी सर छोटूराम, उत्तर प्रदेश म चौधरी परणसिंह और राजस्थान में स्वामी केशवान द ऐसी ही विभूतिया पैदा हुइ, जिहोने हमेशा विसानो तथा गरीयो की नदी के लिए सोचा और काम किया। दूर करने जाम, परिवार और पचपन स्वामी वेशवान द जी वाजम राजस्थान के मशहूर क्षेत्र शेखावाटी के प्राम मगलूणा मे हुआ था। सौभाग्य से, मगलूणा वा पानी न तो बहुत नीचा था और नखारा । इसलिए वहा कुआ के आप पाप्त गाजर मूली, तम्बाकू तथा अय चीजा की पदावार किसान कर लिया करते थे। शायद इसी वजह से वहा पी आवादी पनी पी, मेती करने वालो की तादाद अधिक थी और जमीन की कमी 98 थी। इसलिए इनवे पिता ने मगलूणा छोडने और सती मा बनज त्यागामा फैमला किया था। एक दिन, उहान आपाढी वो फराल काटनर बटटी की और उस पर गाव की सभी गाया का चरो के लिए छोडन का पुण्य कमाया था। खुद न खाकर गायो को पिला देने की यहादुरी, दिलेरी तथा उदारता पिसान में ही होती है । वह इनके पिता जी ने दिखाई और सब कुछ छाडार रतनगढ मे आ चमे। यहा उहनि एक मानी को पाडी-बदल दोस्त बना लिया पा। उसके पास ही, झापडी डालकर युद रहने लगे थे और बीबी यच्चायो भी ले आये थे । गुजारे के लिए, वह ऊट गाडी चलाने लगे थे । ऊट-गाडी से सवारी तथा माल लाना ने-जाना उनमा काम था। इस तरह, वह किसान मे मजद्दर बन गए थे। अपनी बहन तथा बहनोई को मत्यु के कारण असहाय भानजे को भी वह अपने पास रखत थे । एक दिन, वह अपने ऊट को चरने के लिए पगिहा देते समय, बैठे के बठे ही रह गए। शायद उनके दिल की धडकन रुक हो गई थी और इसके साथ ही वालक वीरमा तथा उसकी विधया मा की दुनिया सूनी हो गई थी। पिता की मृत्यु के समय स्वामी केशवानगी आयु ढाई वप की थी और उनके पुरे भाई को 14 या 15 वप वी। रतनगर में जीविका का कोई ठिकाना 7 दखबर, इनकी माता इामो तथा फुफेर भाई को लेकर फिर मगलूणा आ गद नेवि युटुम्बिया रे वहा उनको जमन नहा रिया । अत वह अपनी मालदार मौसी के गाव मे आ गइ और एक गाय तथा झोपडी तेकर वहा रहन लगी। चालक स्वामी केशवाद ने, गायें चराने का धधा करना शुरू कर दिया । गाय चराते समय उनको भेडियो का सामना करना पड़ता था। शिकारी भेडिया स,गाया तथा बण्डा को बचाने की जो क्ला नापने बचपन मे सीखी थी, वही बडा होने पर अशिक्षा गरीबी तथा शोपण के भेटिये से इसारा को बचाने के लिए, काम में आई। इसान को बचाने यानी उसका गरीवी वेगारी, अशिक्षा और शोपण मुक्ति दिलाने के लिए आपने पुस्तकालय, साहित्य सदा, ग्रामोत्थान विद्यापीठ, युवक समिति, शिक्षा सदन छात्रावाम, महिला विद्यापीठ आदि की स्थापनाए परायी। कहा जाता है पिजा नहीं फटी विवाई वह क्या जान पीर पराई, लेविन सामी केशवानद के पैरा म तो बचपा म ही एप नही अनेक विवाइया फट चुकी थी।छ-सात साल की उम्र से ही वह गर्मों सर्दी तथा बरसात में नगे पाव तथा नो शरीर पशु चगन जाते थे। उन दिना शादी होने पर ही, लडके यो पहनने के लिए धोती मिला करती थी। स्वामी जी का वचपन का नाम वीरमा था और उनका जम सवत् 1940 वि० के पौष माह म हुआ था। पदह वर्ष की उम्र तक, पीरमा ने अनेक कठिनाइया का सामना दिया था। उस समय में किसानों को गरीबानात वा वणन स्वामी जी ने इस प्रकार किया हैविसी बर या पूह राम्पा चौधरी से पर यदर की एव नगरसी तिगार म बार यूटी पर सदव लटकी रहती यदि किसी को विवाह मुक्लावा जैस याम वाम पर जाना होता तो उसे पहनकर चला जाता और आत ही उसी यूटी पर उसे सजा दिया जाता।" गरीबी और तगदस्ती ये कारण रिसानो को जब यह हालत थी, तो बच्चा बीहालत की कल्पना, वे लोग हरगिज नही पर मरते जा शहरा म धनवान घरो मे पैदा हुए है । वीरमा स्वामी फेशवान द ने गरीबी देखी थी इसलिए वह धीरे धीर एक इरा की ओर बढ़ रहे थे, वह रादा था -इसान को गरीबी और अशिक्षा से छुटकारा दिलाना तथा गरीय विमानो या गुशहाली के रास्ते पर लगाना। अपने बचपन की जिंदगी का जिन करत हुए स्वामी जी ने कहा है-'सिर हाना, गदेला, रजाई जादि रुई का कोई सामान उस जमाने में गाव मे नहीं होता था, उनका कम्बल तिहरी और एक्हरे वमलिय जरूर हात थे जो बटन पर साय प्रात ओढ लिये जात थ नौर काम करने पर एक धोती ही होती थी तब पिर जगत म पिरने वाले सवाल गापालोको कौन कपडे, धोती और अगरखी पहनाता।" इस क्थन से साफ जाहिर होता है कि वीरमा व रूप में बचपन म स्वामी जी न गे बदन मर्दो, गर्मी वाटी थी व गर्मी के दिनो म, पानी के भूख जाने पर रेतीली जमोन म घास जत जाती थी, इसलिए बीरमा को पाच पाच, छ छ मील ता गायें चरान के लिए ले जाना पड़ता था। वह दिन भर ग्वाले बनार गायो को रखवाली परते, शाम को घर लौटन पर रात के समय ब-यूढा रो महानिया सुनते और रात भर सोते । यही का प्रम था। बचपा वे पद्रह वष उहोगी प्रकार गुजार निगराधे । उन दिनो कौन सा अभाव तथा दद ऐसा था जाउगोपला हो। मन्यासी बनने की दिशा मे पदम पिता स्वग सिधार गा थे। एक दिन माता भी चली गई और धीरमा रह गया अमेला । चारो तरफ नजर दौडाई रही कोई सहारा जर नहीं आया । गाव की सम्पत्ति पिताजी रतनगढ जाने से पहले ही छोड़ गए थे, परिवार के लागा , बच्चे के साथ वेसहारा रतनगढ़ से तोटी विधवा को गाव म ठहरने ही नहीं दिया था। मा को मौसी के गाव म झोपडी के अलवा कुछ था ही नही । पद्रह वप का बीरमा बेसहारा अवश्य था, पर गाय चराते चराते तथा भेडियो से सघष करते परते वह साहसी और दढ निश्चय वाला बन गया था। इसतिश उराये मन में पड़ने और तकदीर को आजमा की छा पैदा हुई औरमवत् 1961 में 100 वह सस्थत पढने की इच्छा लेकर घर म मिल पटे। भटिंडा आए, वहा से पदल चलार अबोहर होत हुए फजिका पहुंचे। इस यात्रा म, गत का पुईखेडाम चौधरी राधाकृष्ण वे परदादा के यहा ठहरे थे । चौधरी साहब राधास्वामी मत ये अनुयायी थे। जाति के सुधार में रुचि रखते थे। उनके यहा रात बिताकर दूसरे दिन दस बजे फजिल्ला पहुचे। वहा न पोई परिचित था और न कोई रिश्तेदार घूमते घूमते शहर पार किया और उस जगह पहुचे जहा आजकल रलवे स्टेशन है। एक पीपल के पेड़ के नीचे पडे होकर, वह अपना रास्ता खोजने की तलाश में थे दिगुरुप्रय साहब या प्रकाशन करने वाले एक सिख ने उनसे पूछ लिया विघर जाना है । आपने जवाब दिया कि मैं यहा को सस्कृत पाठशाला में जाना चाहता यह सुनकर उस भले सिख ने इनको बताया कि यहा सस्कृत को कोई पाठ गाला तो नहीं है, पर एक साधु सस्कृत अवश्य पढाते हैं। इनके द्वारा वहा जान की इच्छा प्रक्ट करने पर उस भले आदमी ने चोरमा को मगलराम डाबडा नामय एक बालक के साथ साधु के पाम पहचवा दिया । साधु महाराज उस समय शहर से आई भिक्षा का भोजन कर रहे थे। भोजन के बाद, अहोर वीरमा से वातें की। उसकी इच्छा जानी और वहा ठही आठ दम मतो के साथ उनको भी भोजना वराया। भोजन के बाद, वीरमा ने दसरे साधुओ से बातें की। उन्होने सलाह दीअमतसर जाकर मस्कृत पढा । लेविन इसके लिए जरूरी है कि तुम माधु हो जाओ। उनका तक था कि जाट को न तो कोई सस्कृत पढायेगा और न पाने-पीने को देगा साधु बन जान पर, ये सारी परेशानिया दूर हो जायेंगी। अब वीरमा के सामने बडी जटिल समस्या उठ गडी हो गई यो। साधु वह होना नहीं चाहते थे। समाज से अलगावित माधुओं के जीवन से उनको पणा थी। जाट पाबेटा होने के कारण विमा महनत दिए याना भी उनको रविपर नहीं पा लेविन साधु बने पिता सम्वृत पा अध्ययन भी असम्भव था। यही नहीं, आगे चलपर वह जिस सामाजिक उत्तप की यल्पना मन मे विए हुए थे, वह भी सम्भव नहीं था। अत सोच विचार करन के बाद उहाँने सयासी बनकर ही अपना रास्ता तलाश करने का इरादा कर लिया और वह साधु हो गए। म्पिति म भी उनकी दिली पाहिश पूरी नहीं हुई। समय गुजर रहा था, पर अध्ययन का सिलसिला नहीं बैठ रहा था। पेट भी भूप भान्त होने का रारना तो मिल गया था लेक्नि मानसित भूय शान होन का कोई इनाम 7 था। यही आप चीरमा सेनेशवानन्द बन गए थे। एक वर्ष वह साधुओं के माय मरते रह पै तभी प्रयाग मम्म ने मेरी घष होन पगी यो । आरन भी गाचा विशुभ म जाया जाप, पदी प्रपागराज म स्नान भी होंगे और विद्वान साधु-सत तलास अध्ययन भी पाया भी हो 101 सकेगी। इस इरादे के साथ, वह फजिल्ला स पैदल चलकर दिल्ली आए। यह बात, सवत 1962 के जेष्ठ माह की है। पद्रह दिन म यह यात्रा पूरी हुई। हालाकि उन दिनो दिल्ली म साधुओ को खाने पीन के लिए काफी मिलता था, पर आपका मन दिल्ली मे नही रमा । दिल्ली से आप खुर्जा आए। यहा से अलीगढ पहुंचे और अलीगढ स हाथरस । अब स्वामी जी कृष्ण की भूमि म थे, जो सतो तथा विचारको के लिए हमशा प्रेरणा का सात रही है। हाथरस से आप मथुरा आए। मथुरा के दशनीय स्थानो पर गए, सभवत यही कृष्ण के क्रान्तिकारी यागी के रूप को समझा और एक इरादा लेकर आगरा आए । यहा दयालबाग देखने गए, जहा स राधास्वामी मत का उदय हुआ था । यही आपकी भेट आगरा वे एक सिधी सेठ स हुई जिसने पुण्य कमान क प्रलोभन म इन तिए इलाहाबाद का टिकट खरीद दिया और आप रल स यात्रा करके प्रयागराज पहुच गए। यहा स्वामी केशवान द न सस्कृत भाषा तथा विद्या के केंद्र काशी जाने का निश्चय किया और वह बनारस चले गए। बनारस से फिर लोटकर प्रयागराज आए। इन दिनो स्वामी हीरानद अवधूत की झोपडिया गगा-तट पर लग गई थी, आप भी उनम रहने लगे। यही एप नाथ साधु के पास एक घटे बैठकर गीता पढने लगे। महात्मा हीरान द के यहा आत्म पुराणको क्था होती थी । स्वामी केशवान द का उच्चारण ठीक था। अत इनको कथा-वाचक का काम मिल गया और अच्छे कथा वाचक के रूप म उनको प्रशसाए होन लगी। थाडे दिन बाद, उनके गुरुजी भी वहा आ गए। श्रोताओ तथा महता ने, स्वामी केशवानद जी के गुरु से उनके कथा वाचक के अच्छे ढग की तारीफ की । लागा न पहना शुरू कर दिया था कि उनके बीच मे दूसरा केशवान द ना गया है। हरिद्वार की ओर प्रस्थान कुम्भ क बाद, प्रयागराज से इनक गुरु इनको फजिल्का ले आए। संस्कृत भाषा तथा ज्ञानाजन की उल्क्ट अभिलापा दखकर गुरुजी ने इनका हरिद्वार भेज दिया। हरिद्वार म गगा की रेती और हरि की पौडी पर गगा की पावन धार तो थी, पर ढोग तथा धार्मिक आडम्बर के कारण सच्चे धम तथा ज्ञान पिपासा की शान्ति के सच्चे साधनों का अभाव था । अत साधु वेश में छिप ईमानदार जाट का मन, हरिद्वार से विरमत हो गया। वह चल पड़े और अमृतसर पहुचे । यहाँ लघु कौमुदी पढने का अवसर मिला और इसके बाद देशाटन की अभिलाषा पूरी करने के लिए सिध चले गए। यहा आप साधु वेला नामक तीथ मे ठहरे और तत्पश्चात जकोवाबाद, क्वटा तथा चमन की यात्रा पर निकल गए। क्वेटा म, उनकी भट एक पुराने सिप से हुई जो आय-रामाजी विचारधारा का था और बदर पहनता था। उसने स्वामी केशवान द वो देशानुराग, स्वदेशी तथालोकोसार 102 तित्व विपयन के प्रति आकषित किया। बेटा से फिर जीवावाद, शिकारपुर तथा सबपर होत हुए मुलतान पहुचे और फिर फजिल्ला । यहा यह थाइ दिन बीमार भी रह । ठीक न व बार, बागड चल गप । वर्षा अधिक होन के कारण सतलुज म बा आ गई थी। फजिल्का ये सकडो मवान बाद मगिर गय थे 1रा आश्रम भी क्षतिग्रस्त हो गया था। वागड से नोहर, भादरा, रतनगढ वीरानेर आदि शहरा वोदया। इसी बीच उनके गुरुजी का स्वगवास हो गया था अन फजिल्का के आश्रम म जाए। गुरुजी के अनेक शिष्य थे पर उनका सर्वाधिक विश्वाम स्वामी जी पर ही था। इसीलिए स्वग-वास से पूर्व आश्रम की गद्दी का उत्तराधिकारी इनको ही बना दिया था। गुरु जी का भण्डारा करन के बाद, आप फिर भ्रमण पर निवल गए। भ्रमण पर जासे पहले, आश्रम मे वेदात पुष्प वाटिका नाम स एक पुस्तकालय की स्थापना कराई। इस पुस्तकालय को धम, इतिहास, संस्कृति, पुस्तको से सम्मान दिया। सन 1908 से 1910 तक लापने फाजिल्का आश्रम को ज्ञान, धम नियम, सयम तथा स्वच्छता का वेद्र बनाने का प्रयास किया। मन् 1912 म, आपन फजिल्का म सम्मृत पाठशाला की स्थापना की। यहा से उनका ध्यान बदला और वह साधु आश्रम तथा पाठशाला के क्षेत्र स बाहर निकलकर, राष्ट्रीय क्षितिज पर उठते हुए राष्ट्रीय आदोलन की आर आकर्षित होने लगे। 1918 म गट एक्ट के विरोध म मारे देश TT वातावरण गम था। सरदार भगतसिंह जमेचती म बम्ब फेोपर देश म जोश तथा जग्रजा के प्रति क्षाभ पदा कर चुके थे। स्वामी जी भी देशभक्त के रग म डूबा लगे। लेकिन देश मेवा का, आपका तरीका, कुछ भिन प्रकार का था । आपने अबोहर मे 'चलता-पुस्तकालय' स्थापित किया, ताकि उसका लाभ देहात मा रहने वाले किसाना को मिले । इस पुस्तकालय की स्थापना के समय, आपने कहा था- 'मरे हृदय मे सदा से यह बात रही है कि किसान लोगो म जागति फैल ताकि व अपन दुषो के निवारण के लिए प्वय प्रयतशील हो सकें।" अछूतोद्धार की ओर दृष्टि स्वामी जी बचपन म देष चुप थे कि छोटी जाति के ग्वाला का पानी, प्यास हाने पर भी, ऊची जाति के बाल नही पीत थे । यही बात, उनका सगरिया के छात्रों तथा अध्यापया में भी दिखाई पड़ी। इसके निवारण के लिए आपन न केवल प्रचार ही पिया, परन् स्वय अपने पास एक हरिजन को रख लिया, जो विद्यापीठ में महमाना या सत्कार करता था। इस तरह स्वामी जी व्यावहारिस स्तर पर सवर्ण और हरिजन का भेद मिटा रह थे।

103 'साहित्य सदन अबोहर' की स्थापना स्वामी जी का दिमाग हर आर से जनता की सवा वरन पर लगा था। साहित्य को वह जनता म जागनि लाने का साधन समपत थे। अत अनर स्थानीय दानदाताआ के सहयाग से अवाहर म एव साहित्य सदन की स्थापना कराई। यह बात सवत् 1966 की है । जब जल चले गए ता साहित्य-सदन का काम टप्प पड़ गया। अत जेल स वापस आन पर फिर आपने इसको पुनर्जीवत किया। सवत 1986 तक यहा 3763 पुस्तक हो गई थी। यही से चलत-फिरते पुस्तकालय का जम दिया गया था । पुस्तकालय के अतिरिक्त एक विशाल वाचनालय को भी स्थापना आपन कराई, जिसम लगभग 125 पत्र-पत्रिकाए आती थी। एक सग्रहालय भी स्थापित कराया गया, जहा दुलभ पुस्तके, चित्र तथा सिक्को का सग्रह कराया गया था। यही दीपक नामक एक प्रेस की स्थापना कराई गई, जिससे दीपक' नामक मासिक पत्र प्रकाशित कराया गया। इसी प्रेस से, 'ग्राम सुधार नाटक', विश्वधाय, ईसपनीति निकुज' तथा 'बालगोपाल नामक पुस्तको का प्रकाशन भी कराया। यही से राष्ट्रभापा प्रचार का काय भी प्रारम्भ किया गया। साहित्य सम्मलन प्रयाग तथा पजाब विश्वविद्यालय की हिदी परीक्षाआ वा केद्र भी साहित्य सदन को वनवाया गया। सन् 1941 म आपके प्रयत्नो से अबाहर म हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन हुआ, जिसक स्वागताध्यक्ष आप थे और सम्मलन के अध्यक्ष प० अमरनाथ या थे । यह ऐतिहासिर सम्मेलन स्वामी केशवान द की . देन था। असहयोग-आन्दोलन के मैदान में स्वामी केशवानद कारे देशभक्त तथा पद-सालुप राजनीतिक नेता रहीं ५। उनके मन म देशभक्ति की धारा बहती थी, वह देश को शीघ्र स्वाधीन हुआ देखना चाहत थे । अत खुद को असहयोग आदासन से अलग न रख सका वह लोव से विरक्ति मा ढाग पर रूढ़िवादी धम तभा रान्यास क माग पर चलने वाले साधु नहीं थ । उनवा सयास लोक ये प्रति मही, सोर म फली बुराइयो तथा गुलामी के साथ था। इसलिए पांगरा म मिा मोई पर लिय वह दहात मे अग्रेजी साम्राज्य विरोधी प्रचार पर जुट गये थे। फसत आपको सन् 1921 म दो माल के लिए जेल मी गाना पसी पी। दूसरी बार यह रान् 1930 मे जेल गए । उनरा पाम भा, देहात म TATA मा राम नाना और वहा से सत्याग्रहिया के रूप म स्ययंगार पर तोटा भाषी * 104 प्रभाव और निर्भीकता से सरकार घबरा उठी थी, पर वह स्वामी जी का गला बदन कर सकी । अग्रेजी राज्य के भारत मे विदा हान पर आपन यहा स अग्रेज और जग्रेजी को विदा करके राष्ट्र और राष्ट्रीमता विकारा की साधना का व्रत लिया। एक व्यावहारिक मत इस देश में गाधु तथा सतो का मुफ्त म माल खान को मिलता है। वे बिना मह्नत किए गुलछरें उडान है । लेग्नि स्वामी जी इसके विरोधी थे। उनकी खान-पान की आदत देहाती किसानो की-सी थी। दिल्ली में भी वह तदूर की सूखी रोटिया को दाल के साथ खापर तृप्त हो जाया करते थे । सादा भेष तथा साधारण भोजन ही डाकी सफलता के स्रोत थे । वथन और कम पी एक्ता उनकी शक्ति थी और जनता की सेवा उनकी साधना थी। उना कोई एक परिवार नहीं था। सारा ममाज, सारा देश उनका परिवार था । उसी को उन्नति उनकी साधना का मूल मर था शिक्षा को वह उन्नति का माग मानत थे। जन उनका सारा वल शिक्षा सस्थाओ की स्थापना अथवा पहले से वतमान सम्यानो की प्रगति पर कन्द्रित था। ग्रामात्यान विद्यापीठ सगरिया साथ उनका यही सम्बध था। राजनीतिक आन्दोलन से सास्कृतिक मान्ति तथा सामाजिक मरचना की ओर राजस्थान और उसकी सीमा से लग पजाब के इलाके म धूमकर स्वाधीनता सैनिक तैयार करन के दौरान स्वामी केशवानद ने राष्ट्रीय भावना का तूफान ता दिया था। उनकी सरगर्मी वा दखार सरकार तथा उसकी पुलिस बेहद परेशान हो गई थी। इसीलिए यह दो वार जेल की यात्रा कर चुके थे । राष्ट्रीय आदालन के अभिन्न अग तया मयोग आदोलन के जुयार सिपाही होते हुए भी, स्वामी देशवान को, यह विश्वास हो गया था कि हम सबसे किसान के भाग्य का परिवतन हो सकेगा। आजादी के बाद, भारत का पूजीपति अधिक मालदार हा जायेगा, प्रशासन की कुर्सी पर बैठा अफ्मर एक नय वग का निर्माण पर लेगा, जिसस आम आदमी का कोई भला नहीं होगा, किसान अपनी हालत का बदलन म असमर्थ रहेगा। यह बात उहाँने भले ही कही तथा निखी न हो, पर उनके मामो मेरोमा अवगत होता है। उनके लिए देश की आजादी का मतलब, किसान समाज की बबूदी, 10 अशिक्षा से उसकी मुक्ति और अधविश्वासो से उसके छुटकारा से था । अत उ होने देहात म, प्रावधिक तथा औद्योगिक शिक्षा के केन्द्र खोलने की नीति बनाई। इसी नीति का परिणाम प्रामोत्थान विद्यापीठ था। इस विद्यापीठ का जम 9 अगस्त सन 1917 म हनुमानगढ म हुआ था । क्षेन मलेरिया प्रधान था, अत स्कूल का सेठ बजरदास की धमशाला मगरिया में जनवरी सन 1918 के दिन लाया गया। सात वष तक, सस्था स्थानीय दानदाताओ तथा शिक्षा प्रेमिया के सहयोग से चली। इसका काम, दूसरे ग्रामा भी कान तथा छानामा के लिए प्राइमरी पाठशालाए चलाना था। सन् 1925 तक सस्था जडे जमा चुकी थी, जनता में अपनी अच्छाई तथा महत्त्व का डा बजा चुकी थी। फिर भी एक हद तक लडखडा रही थी। सन 1932 मे स्वामी जी इसके साथ जुडे । अपने जुड़ने के साथ, स्वामी जी ने 'यायापलट' नामक एक विज्ञापन निकाल कर सस्था के भवनों का जीर्णोद्धार कराया, फरनीचर बनवाया । सन 1938 में संग्रहालय स्थापित कराया, 1944 मे 'वैवापिक शिक्षा प्रसार योजना' प्रारम्भ कराइ । 1950 मे प्रेस और महिला आश्रम को स्थापना कराई, वृक्ष लगाए । सन 1942 मे रजत जय ती मनाई, हाई स्कूल स्थापित पराया, सिलाई-रगाई, बढई गीरी कताई बुनाई के प्रशिक्षण की व्यवस्था कराई, व्यायाम शाला स्थापित की, आयुर्वेद विभाग खुलवाया, सगीत विद्यालय शुरू कराया, अध्यापक प्रशिक्षण विद्यालय खुलवाया, स्त्री शिक्षा की व्यवस्था की, मरुभूमि सेवा-बाय की योजना चलाई, कृपि महाविद्यालय प्रारम्भ कराया, और इस प्रकार सगरिया के विद्यालय को, इस प्रकार सम्पन करन की कोशिश की ताकि वह हर तरह से ग्रामीण क्षेत्र से आए बालका को आधुनिक आवश्यक्ताआ का पूरा करने म समथ हो सक । यह कहने म कोई अतिशयाक्ति न होगी कि जिस प्रकार मालवीय जी ने हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस और रवी द्रनाथ टैगोर ने शाति निवेतन की कल्पना द्वारा भारत के भावी छात्र को आवश्यकतामा की पूर्ति के लिए कल्पना की थी, उसी प्रकार स्वामी शवानद ने ग्रामात्थान विद्यालय सगरिया द्वारा, राजस्थान की किसान जनता बै, आधुनिक युग की आवश्यकता के अनुसार विकास का स्वप्न देखा था। उसी स्वप्न का साकार रूप है, सगरिया का शिक्षा-मस्थान। स्वामी बेशवान दजी के इस मनोराज्य को सापक सशक्त और क्सिान जनता भी बहबूदी का कारगर हथियार बनान के लिए निहायत ईमानदार तथा मठ पुलिस अधिकारी डा. ज्ञानप्रकाश पिलानिया ने सगरिया म स्वामी पेशवानद ट्रस्ट बनाकर स्वामीजी के आदर्शों को आगे बढाने की प्रतिज्ञा ली है। मरा विश्वास है, उनको सफलता मिलेगी। राजस्थान ही नहीं, दूसर प्रान्तो के समाज प्रेमिया पा भी रत्तव्य है कि वे डॉ० पिलानिया को सहयोग दे।

106 ससद मे स्वामीजी के कदम सन 50 म राजस्थान वाग्रेस नगेटी न तय किया था कि राजस्थान स स्वामी देशवान दी वो राज्य सभा के लिए मानीत किया जाय । उरान इन नाम की सस्तुति के द्रीय काग्रेस कमेटी के लिए की और उसन सहप इसका अनुमादन पर दिया। राजपि पुरुषोत्तमदास टण्डन न इस चयन पर साल्लास कहा था विजब ससद म एक दाटी और चमकेगी । स्वामीजी भव्यमूर्ति के महानुभाव थ। मुझे सन् 1953 म उनके दशन करने का अवसर मिला था। इसका श्रेय ५० बनारसीदास चतुर्वेदी को है। उन दिना चतुर्वेदी जी भी राज्य सभा के सदस्य थे और नाथ एवेयू मे रहत थ । चतुर्वेदीजी का साहित्यिका, समाजिक कायकर्ताआ, दशभक्तो, नान्तिकारिया और प्रवासी भारतीयों के साथ विशेष लगाय था । म उनके पास बैठा हुआ था, उसी समय स्वामीजी पधारे । चतुर्वेदीजी ने उपा मुझ परिचय दिया । स्वामीजी ने अपने क्वाटर म चलने का निमत्रण दिया। मुझम साहस न था कि मित्रण को अस्वीकार करता । हम गए और माता के दारान मालूम हुआ कि उनकी एक चिंता भारत के किसान की तरक्की थी । वह हर समय किसान के जीवन में बदलाव लाने की बात सोचते थे। उनका न खाने वा शौक था, न पहनन का । उनका शौक था, गरीबों के पगेको खान तथा पहनन यी चीजा से भरने का, उनका शौक था देहात में फैली अशिक्षा, गरीबी तथा अध विश्वास को दूर भगा देने का। काश सरकारी पदा पर बठे काग्रेसी तथा गर-काग्रेसी लोगो म भी आज यह भावना होती तो हमारा देश अब तक जहालत, गरीबी, कच नीच की भावना, साम्प्रदायिक भेद भाव, क्षेत्रीय सकोणता और सकीण प्रान्तीय भावना से अवश्य मुक्त हो गया होता। स्वामीजी का अभिन दन सन् 1957 में जिस समय देश में 1857 के प्रथम स्वाधीनता आदोलन की शताब्दी मनाई जा रही थी, उम समय ठाकुर देशराज अधीना (भरतपुर) न ५० बनारसीदास चतुर्वेदी की प्रेरणा और स्वामीजी के श्रद्धालुआ के सहयोग स एक अभिन इन प्रथ भट किया था। यह उस महान् विभूति का सम्मान अवश्य था, पर इसमे हमार सरदार भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, विस्मिल, गाधी, नहरू और स्वामी कशवान द की शहादत मौजूद है, हमका तब तक चन स नहीं घंठना है जब तक इसान पर इसान के शोषण का अन्त न कर दें, जब सर दुनिया से लड़ाई और भेद भार सौ न मिटा दें, जब तर ऊप और नीच तर को दूर कर दें, जब तर माम्प्रदायिक वमनस्य को दूर न भगा दें 101 और जब तक भिन्न जाति तथा धम के आदमी को राष्ट्रीय एकता के धागे मे न पिरो दें। ऐसा करन के बाद ही इन महान आत्माआ के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा प्रकट हो सकती है। स्वामीजी की अन्तिम यात्रा सन 1972 म स्वामी केशवान द अपनी सस्था के लिए धन एकत्र करन की दृष्टि स मद्रास गए थे। सितम्बर 1972 म वहा मिली रक्म का डाफ्ट भेजवर सगरिया के लिए चल दिए थ और 13 सितबर 1972 को दिल्ली जा गए थे। माग मे ही उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था। इनके साथ गए विद्यान दजी कुम्भाराम आय का मकान खाजन निकल और स्वामीजी आराम के लिए गोल डाकखान के पास एक पेड के नीच लेट गए । विद्यानद की प्रतीक्षा करा क बाद स्वामी स्वय उठे और विट्ठल भाई पटल हाउस पहुंचे, वहा स ताल कटोरा माग के चौराहे पर माये । शायद यह पूरा भ्रमण पदल हुआ होगा, अत वह बहुत थक गए और आराम के लिए ताल कटारा माग के फुटपाथ पर, पुरान चुनाव-कार्यालय के पास एक पड के नीचे सो गए और फिर कभी नहीं जग । विद्यानद जब उनका खोजते सोजते उधर स गुजरे तो स्वामी जी को चिरनिद्रा म वहा सोए पाया। श्री रामनिवास मिधा व रुचि लेन पर पुलिस न सगरिया विद्यापीठ को वायरलेस से स्वामीजी के स्वगवास की सूचना दी और वहा स पुछ सज्जन आकर उनके पार्थिव शरीर को समरिया ले गए जार उनकी भस्म भी इस सगरिया के काम आ गई।

No text on this page.

मेजर जयपाल सिह मेजर जयपालसिंह के साथ, मेरे तथा मेरे परिवार के बहुत नजदीकी सम्बध थे । भूमिगत जीवन खत्म करने के बाद अपने इलाये म अपने ही विपरीत तथाकथित राष्ट्रवादी कुछ काग्रेसी कायकर्ताआ द्वारा किए गए घृणित प्रचार को देखकर, वह प्रक्टिक्ल राजनीति और चुनाव की आर से अलगावित होकर माक्सवादी विचारधारा के सैद्धान्तिक कायक्रमो के साथ प्रतिबद्ध बने दिल्ली रहने लग गए थे । वह मुझे बुलाते थे देश विदेश की राजनीति पर विचार करते थे। नये भारत के आर्थिक तथा सास्कृतिक विकास की काग्रेसी विफलता पर क्षुब्ध होते थे, सी० पी० आई० की भूमिका पर चिंताए व्यक्त करते थे, देश पर पूजीवाद के बढ़ते खतरे से हम सावधान करते थे, भारत की एकता, शाति और सुरक्षा को तोड़ने के लिए अग्रेजो द्वारा दिए गए हथियार तथा धम प्रचारको द्वारा किए गए भारत विरोधी प्रचार पर सावधान, हान की चेतावनी देत थे और देश मे । माक्सवादी चितन के विकास की आवश्यक्ता पर बल देते थे। मेरे बौद्धिक विकास यो नजर म रखकर, उहोने मुझे भारत के प्रख्यात सी० पी० एम० नेता भी ज्योति वमु तथा प्रमोददास गुप्ता से मिलने के लिए भेजा था। देश के अय अनेक विचारवो से मिलाया था । आपने निपुग, आसाम तथा तेगाना के राजनीतिक आदोलनो म वहा की जुझारू जनता के साथ एक होकर लडाई लड़ी थी। मैं उनसे जब अपनी आत्मक्या लिखने का आग्रह करता या, तो वह प्राय यह कह कर मुझे चुप पर दिया करते थे कि मेरा अपना कुछ भी नहीं है, जो कुछ है, वह पार्टी का है । मैं अनुभव करता हूं कि उनके सघपमय जीवन की अनेक घटनाए बाल के अधकार में दब गई है, उनके प्रकाश म आने की जरूरत है ताकि इस देश के महान् क्रान्तिकारी किसान का इतिहास सामने आ सके। भगत सिंह और मेजर जयपाल मिह दोनों किसान के बेटे थे। एव पजाब की भूमि पर जमा था, दूसरा गगा ममुना के दो आप मे, एक ने बचपन म बर्षे बोई थी, दूसरे न गाव में भैसें पराई थी, एक अग्रेजा की जेलो म रहा पा, दूसरे ने 110 सेना में कमीशन पाया था, एक न अग्रेजो पर गाली दागी थी, दूसर युद्ध य मार्चे पर लड रही जग्रेजी सा ये तिए न्वाई जहाज रा रसद पचान को टैपनीक पा विकाम किया था, लेकिन दाना पाजपा देश तथा समाज स बहुत गहरा लगाव था दोनो ही पिसान तथा मजदूर की यादो के पक्षधर थे और दोनो ही किसान मजदूरो की प्रगतिशीलता के आधार पर भारत के नव निर्माण की कराना मडये ये दोना को अंग्रेजो से घणा थी, दाना ही साम्राज्यवाद या अत पररे में लिए लालायित थे, दानो हो इक्ताव के पुजारी थे और दाना ही दो मिन परिस्थतियों में रहते हुए भी लेनिन के भक्त थे । एक की शिक्षा वेवल एफ० ए० तर हुई थी और दूसरे को एम० ए० तक लेकिन दोना का अमली पान शिक्षा के बाद विकसित हुआ था । एर वा अध्ययन जेलो मे हुआ था, दूसरे का सेना के बंग्या मे, दोना ने जग्रेज विरोधी सगठन को खडा किया था, एक ने अग्रेज अफसरो की नाक के नीचे सेना के अफसर को अग्रेजा को मार भगान के लिए एक प्रातिकारी सगठन मे बाधा था दूसरे न कातिवारिया के सगठन का नयी दिशा तथा शक्ति प्रदान की थी। दोनो म सिफ अन्तर यह है कि पहला व्यक्ति यानी सरदार भगत सिंह सिफ तईस वप की उम म अग्रेज साम्राज्यवादिया की पाती पर लटक्कर दुनिया के शहीदो वे शिरोमणि बन गये और दूसरा अग्रजी की सुफिया पुलिस तथा सेना की पुलिस को आखा म धूल झाक्कर भारत की आर्थिक तथा राजनीतिक स्थिति म द क्लाव लान के लिए संघर्ष करता रहा दानो ही भारत के ऐसे लाल थे, जिन पर गव किया जा सकता है। मेजर जयपाल सिंह का जम, जिला मुजफ्फर नगर के गाव कुरमानी मे सन् 1906 की 15 जुलाई को हुआ था। इनके पिताजी का नाम वोहरग लाल था। पिता जी पोज मे नौपरी परते थे । इसलिए घर पर मा की दस रेप मे वह युध दिन पले। शायद इही दिना आपको भैसें चरानी पड़ी थी। भसें चराते समय पालक जयपाल सिंह ने विमानो की गरीबी दखी थी उनका अभाव भरा जीवन देखा था, उनकी आपमी लडाई तथा फ्ट देखी थी और देखा था गाव के बढ्दया नाइया, कुम्हारा और जुलाहा की वेवारो म डूबी पोजें । इसके अलावा आपन देखा था कि गरीव जाट किसान तो अपन बच्चा को फौज म भेजकर, यानी भाडे के सिपाही बनाकर, अपनी गरीबी दूर करने का सपना देख लिया करते थे तेकिन दूसरी कोमा में बालकों को तो अपनी रोजी रोटी पे लिए दूसरा पी पिरोरिया परनी पडती थी। यह देखकर वालर जयपाल सिह का मन क्षोभ से भर जाया करता था। जब कर्जे मे पिसते विसाना को वह देखते और इस सवव कारणा पर विचार करते ता उनको वही तकलीफ होती। इतनी महनत परन पर भी पिसान भूखा क्यो है, 7व यह सवाल दिमाग मे जाता और उसका सही उत्तर नहीं मिलता तो फिर क्रोध पाता और वह क्रोध निकलता भैस के उपर। वह 111 गोवर से सनी अपनी लाठी मैम की पीठ पर जमाते । बाद म निर्दोष को पीटन की व्यथा से पूट फूटकर रोते। स तरह भस और अभाव भरे वातावरण में उनका बचपन बीत रहा था। वीम दशक बा समय, इस दौरान उनके परिवार की गरीबी, गाव वाला की दुख दद भरी कहानिया, उनके कोमल एव सवेदनशील हृदय पर कुछ ऐसे जरम छोड़ गई जो हमेशा टोसते रहे और उसके द- म जाराम तथा सनिक अफ्सरी के सम्पन वातावरण में भी उनको शात नही बैठने दिया। उनको रह-रहार याद आता था कि गरीवी मे दिन काटते धावा की गुर्राहट को सहन करने मे अममथ पिता, घर और परिवार को छोडवर फौज मे चले गए थे और वर्षों तक मा की सिसक्यिा बट नहीं हुई थी। घर की देखभाल तथा बच्चे को पालवर उनको सुख मिलता था, लेकिन एक दिन फौजी पिता ने मा का वह सुख भी छीन लिया था। वह बाला जयपाल सिंह को अपनी बैरक मे ले जाए थे। फौजी अफसरों को देखकर, उनका शिक्षा के महत्त्व का पता लग गया था । शायद मन में सोचत रह होगे कि अगर वह भी अधिक पढ़े लिखे होते तो अपगर बनते । इसलिए वालक जयपाल का बड़ा अफसर बनाने की इच्छा से पढाने के लिए अपने पास ल आए थे । मजबूरी म इनको पिताजी के पास सिपाहिया को बरका म रहना पड़ा जिनके विषय मे स्वय मेजर जयपाल सिंह थी राय है.---"मेरे सामने वह प्रक्रिया स्पष्ट थी जिसके चलत जाट किमान, जिहे ईमानदारी से काम करने की आदत होती थी, कसे पशुता भरे चाबी के खिलौने बन जाते थे । धीरे-धीरे उनके भीतर वे वे तमाम बुनियादी मानव मूल्य मर जाते थे जो उन्हें अपने गावा मे पूरी ईमानदारी से मेहनत करने की प्रक्रिया मे प्राप्त हुए थे। अपने मुजरिम मालिकान की शह पर वे जगली दरिंदो की तरह भारतीय देश भक्ता पर टट पडते थे । वर्तानवी साम्राज्यवाद ने मेरे देश के लोगा को इस तरह 'मभ्य' बना दिया था।" विशेषता यह है कि जयपाल सिंह यचपन तथा जवानी के बापी दिन इन बरको मे रहे थे, समय के साथ-साथ अग्रेज और उनके साम्राज्य के प्रति उनके मन मे घणा मढती गई। भोले भाले भारतीयो को गुलाम तथा दरिंदा बनाने की, अग्रेजी साम्राज्य की जो प्रक्रिया जयपाल सिंह ने दखी थी, उसकी झलक हमारे राष्ट्रीय नेताआ यो नही लगी थी। लेकिन, जयपाल सिंह न गुलाम वन और न दरिदा । उहाँने तय किया था कि अग्रेजा का अफसर बनकर ही, अग्रजो की ज. वाटी जायें । इसलिए वह अग्रेजा वे नहीं, बल्कि उस अग्रेज नीम के घोर दुश्मन बन गए जो दूसर देशो के लोगा का सभ्यता सिखाने के नाम पर हैवान बना रही थी एव गुलामी मे जकडकर उनका आर्थिक शोषण पर रही थी। छह वप तक इन बैरकाम रहकर, बालक जयपाल सिंह ने देखा कि सिपाही गदी मजार बरत 112 हैं, समलैंगिक यौन मपक रखते हैं, पशुआ से यौन सप रपत हैं, जमादार या मस लाला यी बच्चियो को अपनी वासना का शिकार बनाता है। इससे एक जार उनके मन म अग्रेजी सभ्यता स पूणा हुई ता दूसरी ओर भारतीय सैनिको की इस गुलाम मनोवृत्ति से। वह रजाई में लिपटे जातिवारिया या साहित्य भी पढ़ते रहे। काकोरी पड्यत्र वेरा के प्रातिवारिया बी यातनाए पदार उनकी आखा से आसुआ की धाराए वहतो और दिन के अदली वे आने से पहले ही बत्ती बुझाकर सो जाते । उस समय दो विराधी विचार उनके मानस में विग रहे थे । शामली में नमक कानून भग के मिलसिले में आपने देखा था कि बीस हजार आदमियो की भीड का पाच पुलिस के सिपाहियो ने तितर बितर कर दिया था। ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध का यह रास्ता सुख और शाति का था और नातिकारियो का रास्ता विपत्ति तथा सघप का था, फिर भी उहोने रास्ता खतरना चुना । अग्रेजा की फौज म रहार भी, अंग्रेजा के पिलाफ पोजी बगावत का या सवाल उठ सकता है वि फौजी नाति का रास्ता उहोंने वयो चुना' धमका उत्तर यही है कि वह पाग्रेस पर देश के पूजीपतिया तथा उच्च वग वा अधिकार दे रहे थे और उनस उनको आशा नही थी वि वे देश की बहुसग्यक जनता~-किसान, मजदूर तथा मध्य वग वा कोई हित कर मवेगो। दूसर वह देख रहे थे वि काग्रेस का राष्ट्रीय आदोलन फिरवापरस्ती तथा साम्प्रदायिकता का शिकार भी होता जा रहा है और उनके दिमाग मे कल्पना यह पैदा होती रही थी कि सैनिक विद्रोह न तो साम्प्रदायिक होगा और न फिरकापरस्त । वह किसी राजनीतिक दल का सहारा लेकर पूरा होगा, इसलिए उहाने भारत के कई राजनीतिक दला से सम्पर भी किया था । जयप्रकाश नारायण तथा डॉ० नोहिया से भी सम्पक स्थापित करने का प्रयास किया गया था। इससे साफ जाहिर होता है कि उनके सैनिक विद्रोह की कल्पना पारिस्तान, बंगलादेश कागा तथा अप दशो के सैनिक विद्रोह से भिन थी, जहा विद्रोह वरन वाल स्वय सत्ता अधिकारी बन वठे हैं। इसके विपरीत वह सत्ता प्रगतिवामी राजनीतिक दल को देने के पप मे थे। सेण्ट जा स कॉलिज आगग मे पढ़त हुई वगाली युवकोपी वीरता उनको आर्पित कर रही थी। पल्पना दत, गणेश घोष और राम प्रमाद विस्मिल की कहानिया मन को मोह रही थी। शचीद्र नाथ सेन की पुस्तक 'वदी जीवन उन पर गहरा प्रभाव डाल रही थी और उनका मन पातिवारी साहित्य पढन, आगरा ये प्रातिमारी अडडा पर बातचीतो मे शामिल होने में लगा करता था। इसी बीच आपने एम० ए० पास कर लिया। इसर साथ ही, आपने फैमला कर लिया था वि पोज म रहकर ही अग्रेगो की जा बाटेंगे।

113 रोण्ट जा स पालिज आगरा म पढते हुए आपके सम्पक मेरे पिता श्री भगवान सिह फौजदार पे साथ स्थापित हुए जा उन दिना जागरा कातिज स्टडट्स यूनियन के अध्यक्ष 4, जा प्रगतिशीन विचारधारा के लागा के साथ उठते बैठत थे, जा तागा यूनियन के गठन के लिए भाग दौड कर रह थे। रेलवे मजदूर संगठन के निर्माण म याग द रहे थ, और जा आगरा के छात्रा म मजदूर संगठन तथा राष्ट्रीय आदोलन के वायत्रमो का लोक प्रिय बनाने के लिए जी- तोड कोशिशा म लग थे। उन दिनो, आगरा का सेण्ट जा स वालिज राजनीतिक राय कातिनारी चेतना पाकेद्र था । मजर जयपाल सिंह सेण्ट जास के छान थे और भगवाजसिंह फौजदार आगग कालिज के । इ ही दिनो यहा गुलाम रब्बानी तावा (पत्मश्री प्राप्त उर्द शायर) और हिंदी के प्रगतिशीन लेयक मिचन्द्र जन भी मौजूद थे। इनका एक प्रगतिशील सगठन था जहा में अध्ययन के अतिरिक्त राष्ट्र और समाज को समस्याला पर साचत थे और यह सगठन इस नतीजे पर पहुंच रहा था कि भारत आजाद ता हागा, पर सभी आर्थिक समता दूर की चीज है । आर्थिक बहबूदी के अभाव म राजनीतिक स्वाधीनता अपूर्ण है 'ऐसा इस वग का चितन भी था । मेजर जयपालसिंह और भगवानसिंह पौजदार दोनो का सवध किसान जीवन के साथ था, जत इनकी नजरों मे आर्थिक बहबूदी रहित आजादी का विशेष महत्त्व नहीं था। वे चाहते थे, अग्रेजो से देश की राजनीतिक स्वाधीनता के साथ देश की आर्थिक सम्पनता छीन लेना। इस अभाव मे दोनो की नजरा म स्वाधीनता का विशेष महत्व नहीं था। उन दिनो द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मडराने लगे थे । हिटलर मिसोलिनी तथा तीजो के रूप म उभरता साम्राज्यवाद इग्लैंड और अमेरिवा के पूजीवाद के पिलाफ जबदस्त चुनौती बनता जा रहा था। ये दोना शपितया टपराने को थी। दोनो का उद्दश्य दुनिया के अविकसित देशो को गुलाम बनाए रपकर उनका आथिर तथा राजनीतिक शोषण करना था । सिर पर सवार इस युद्ध का मुकाबला करने के लिए शिक्षित युवकाको कमीशन मिल रहा था। जयपालसिंह एम० ए० पास थे । हॉकी खिलाडी थे। जाट के लम्बे तगडे बेटे थ । पिताजी 35 वर्ष तक फौज मे नौकरी कर चुके थ । इसलिए इनको कमीशन मिल गया, यानी सविण्ड लेफ्टीनेंट के बुराव मे आ गए । इसी काल में हमारे पिताश्री भगवानसिंह फौजदार को भी कमीशन मिल गया था। जयपालमिह मिलिटरी बॉलिज से कमीशन पाने के बाद अपने पिताजी से मिलने गए थे उस समय वह हैदराबाद ग्रुप ऑफ बटालियस के रेजिमेटल सेटर (इसको अब कुमाऊ रेजिमट कहा जाता है) के सूबेदार मेजर थे। बेटे को सैनिक अफ्सर र रूप मे दबकर पिताजी का सीना गव से फूल गया था। उनकी - खुशियो का कोई ठिकाना नहीं रहा था। इसी खुशी की अधिरता मे पिता न पुत्र को फौजी सलूट दिया इसलिए कि बेटे का ओहदा पिता के बोहदे से अचा था। पिताजी खुश होकर बेटे को कैप्टन थिमैया के पास ले गए। यह वही थिमैया साहब थे जो बाद में भारतीय थल सेना के जनरल बनकर रिटायर हुए थे। कै. पिर्ममा को लेफ्टीनेंट जयपालसिंह ने फौजी सलूट किया। वह अपने स्थान से खडे हुए। जयपालसिंह से हाथ मिलाया। उनको बैठने के लिए कुर्सी दी। सिगरेट आफर की और पिताजी की ओर मुखातिब होकर कहा-अब तो खुश होंगे। और यह बहुत अच्छा अफमर बनेगा। इसके बाद पिताजी को मुबारक पाद दिया और जयपालसिंह से कहा-"देखो छोकरे, तुम एक अफसर हो, शैतानी मत करना।" लेकिन जयपालसिंह शरारत करने से बाज नहीं आए। पर उनकी शरारत किसी निर्दोष को मारने-पीटने या किसी का सामान या इज्जत लूटने वाली नहीं थी, वह पी देश को गुलाम और देशवासियो को शंतान बनाने वालो की जड़ें खोदने वाली। इसके बाद पिताजी ने उनको के मजीद से मिलाया। उहोंने शाम को इयो दावत दो और पान मे पहा- "अप्रेजों पर कभी यकीन न बरना। ये हमसे नफरत करते हैं।" यह मजीद साहब बाद में पारिस्तान की फौज में लेफ्टीनेंट जनरल बन गए थे। अनेजा से वह हमेगा लहते भिदते रहे थे। इसलिए मजीद साहब या तीन चार कोटमाशल भी हुआ था। विशेष बात यह है कि मजीद साहब और जयपाल सिंह दोना 1936 में बनारस जिले की हॉकी टीम में साप-साथ खेले थे। इस तरह अग्रेज विराध उनपी नसों मे प्रवेश होता जा रहा पा और मैंने उनके अतिम क्षणा मे देवा मा कि उसमें कोई कमी नहीं आई थी। आगराकैट की अजीव घटना एक दिन शानदार वेशभूषा पहने जलपालसिंह आगरा छावनी में रेलवे स्टेशन में सेटफाम पर बडे क्सिी रे आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनको वहां बडा देखार अधेर वायुपी सहिपल-सी महिला को बहुत से कपड़ों में सजी हुई पी, उनके पास आई और बोली-"हाय सेपटोनेंट, अवेला महसूस कर रहा है, मेरी पान" और यह पहार उनको बाहों में सपेट लिया। इस दृश्य को एप बिटिंग अपमर देख रहा था। वह बोला--"सूसी, पागल हो गई है क्या। दौता नहीं, यह हिन्दुस्तानी हरामजादा है।" यह गुना र बापरा गुस्सा उसी तह उमा परा से पहले अपनी भंस पर उमड़ा करता था। उसने बाद मात मोर माँ से मापने उस प्रिटिश भमगोपी मार पिटाई की और उसकोगन में मयपथ छोडकर भार पहा से चल दिये।

115 अग्रेजो से निरनर वढनी घृणा - एक प्रशिग केद्र पर जग्रेज अधिमारियो के बीच केवल पचास भारतीय अफसर थे। प्रशि ण आफीसर अंग्रेज था । वह भारतीरो को कमजोर, मूप मशीन बादि के ज्ञान को समझने में अममथ सिद्ध करने के लिए इरादत न इनमे बड़े टेडे और कठिन सवाल किया करता था। इस चुनौती का सामना करना उनके लिए आसान भी नहीं था। बात चाहे खाने की हो, चाहे नहान अथवा बात करने की हर मामले म वे इन भारतीया को लज्जित किया करते थे। वे यहते- 'हम तो इस असभ्य देश से परेशान हा गए।" तब नरमी के साथ जयपाल सिंह कहते- "तुमको यहा आन की दावत विसन दी थी?' एर दिन, जयपालसिंह और उनके दोस्त चडी हिदी मे बात कर रहे थे। एक अग्रेज अफ्मर ने अंग्रेजी मे बात न करने पर उनकी मत्सना की। इस पर जयपालसिंह न फेंवकर उस पर गिलास मारा। कानपुर के वैरिस्टर का बेटा लेफ्टीनेंट खर ने अपना व्हिस्की से भरा गिलास, एक ऐसे अग्रेज अफ्सर ये कार उडेल दिया जो वह रहा था कि हमने एक असभ्य देश को सभ्य बनाया है । खरे ने कहा था, तुमने हमको गरीबी, भूप और सूजाव दी है । एक दिन परे को ऐसे माग पर घोड़े पर चढ़कर जाने पर सजा दी गई, जिस पर अग्रेज रोज जाया करते थे। इस भेदभाव से उनके भीतर अग्रेज विरोधी भावना और तीन होती गई। मेजर जयपालसिंह तथा अयों का कोस सन 1942 गे खत्म हो गया था। तमाम भारतीय अफ्सरो को खराब रिपोट दी गई थी। इनको रिपोट म कहा गया था कि इनमे लगन तथा पहलकदमी की कमी है । अग्रेजी के भेदभाव भरे, पक्षपातपूण तथा भारतीया के प्रति घणा भरे व्यवहार को देवपर, आपने अपने पठान बरा अब्दुल यो भेजवर चार भारतीय अफसरा को 10 फरवरी 1942 के दिन शाम को दावत पर बुलाया। यह दावत बर कमरे म हुई और यही जग्रेज- विरोधी सगठन के सदभ मे पहली मीटिंग थी। इसम फसला हुआ था कि चारो की एक आगनाइजिंग कमटी बने । उसका सयोजक लेफ० जयपालसिंह को बताया जाए। अपनी अपनी यूनिटो मे नियुक्त होने के बाद मिलकर स्थिति पर फिर से विचार किया जाए। ऐसे साधन तताश किए जायें कि अगर हम लोग दूर दूर हो जायें तो परामर्श हो सके और एक कोड भाषा बनाई जाए। इसके बाद सबने इन उद्देश्यों के प्रति समपण की प्रतिना की। इसके बाद तीन साथियो की नियुक्ति दिल्ली देवलाली कराची मे हो गई और जयपालसिंह की अबाला। अबाला आवर आपने अपना निवास अम्याला कण्ट स्टेशन के पास मेट्रोपोल होटल को बनाया परीज लॉज होटल को नही, जहा प्राय आफीसस ठहरत थे। यहा ठहरकर गुप्त संदेश भेगा के लिए आपने दो लेडी टिक्ट पक्स को तैयार ।

116 विया और बाद म बीमा करान का प्रलोभा देवर प्रडेंशल इश्यारेस बम्पनी के मनजर नानी जी को और उसके माध्यम से किलरा वार में मनजर वा । उसक वाद रेलने स्टशन पर स्थित किल्लम बार आपकी गुप्त गतिविधि का अडडा बन गया था। यहा से ही आपने दो महीने के भीतर तीन सौ कमाडिगा आफीसर को अपने मगठन का अग बना लिया जो दस हजार सैनिकों पर प्रभाव रखते थे। इस प्रकार अग्रेजा की भारतीय सेना मे शातिवारी सगठन प्रवेश करता जा रहा पा जिसका इरादा राजा महेद्र प्रताप सुभाष चद्र बोस और भगतसिंह के समान, भारत के खिलाफ अग्रेजो की हर चात यो हथियार एव ताक्त के बल पर विफल करना था। ट्रेन मे एक अमेरिकन अफमर से भेंट और दोनो की प्रतिक्रिया मेजर जयपालसिंह जून 1942 मे आर्गेनाइजिंग कमेटी की बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली आ रहे थे। प्रथम श्रेणी के डिब्बे म वैठे अमेरिकन सनिक वीयर पी रहे थे उहाँने इनका बडा स्वागत किया और एक ने कहा-"नेफ्टीनेण्ट क्या तुम इन मुट्ठी भर जग्रेजो को बाहर नहीं फेर मक्ते" ये खामोश रहने पर एक अफसर ने अपना रिवाल्वर इनको भेंट करते हुए कहा- पिसी दिन रमको अग्रेजो के खिलाफ इस्तेमाल करना।" आपने उस भेंट को स्वीकार कर लिया। बाद में जब आपने वियतनाम पर अमेरिकन बम वर्षा को देखा, तो उनके लोकतत्र के प्रति भी इनके मन में नफरत ने स्थान ले लिया। अवाला से कातिवारी सदेश दिल्ली मे इनकी गुप्त मीटिंग विक्टोरिया रोड पर स्थित घुडदौड ये पोडो के मालिक एक मुस्लिम सज्जन के पर पर हुई थी, जिसमे ग्यारह महत्त्वपूर्ण निणय लिये गए थे। इनमे एक था, जग्रेजो के खिलाफ आदोलनात्मक साहित्य को बड़े पैमाने पर प्रकाशित करके, गुप्त रूप से सैनिका के पास पहुचा जाए और यदि पिसी सैनिव पर वह साहित्य परडा जाए, तो वह उसको अपने अफसर को इस तरीके से दे दे कि उनको ऐसा लगे कि यह काय विसी बाहरी पातिवारी गगठन या है। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए आपने अवाला में प्रेम की खोज शुरु कर दी । सौभाग्य से उनको एक सडियल सा प्रेस भी मिल गया, जो इसी साहित्य को छापकर माला माल भी हो गया था। खाने की चीजा रे पक्टिो में इन इश्तहारो यो लपेटकर लेडी टिक्ट-क्लेक्टरो के द्वारा अपने सम्पर के व्यक्तिया के पास भेजन काकाम आपने बड़ी चतुराई के साप दिया। जिन 117 यूनिटो म इन सम्पक नहीं थे, उनके अफसरो को डाक से भेजे जाते थे। ये चिटिठया अबाला से न डालकर दिल्ली स डाली जाती थी, ताकि खुफिया विभाग को नजर स जबाला वचा रहे। इसके अलावा, अबाला म इडियन एयर फोस के प्रशिक्षण लेन वाल भारतीय पायलट, रात के समय, जम्यास के लिए की जाने थाली उडाना म इश्तहारा के बडलो को छावनी के नजदीक गिरा दिया करते थे। इस प्रकार जयपालसिंह एक भयानक खल वहादुरी तथा होशियारी के साथ खेलत रह । फिर एक अग्रेज अफसर से टक्कर और साफ बच निकलना, जबाला रहत हुए एक घटना और घटी। अमृतसर की एक शराब फैक्ट्री के मातिक के बेटे लपटीनेण्ट स्वण सिंह को कुछ एग्ला इडियना न रेलवे स्टेशन के पास बन रेलवे इस्टीट्यूट म डास के लिए जाने से रोक दिया था। उनका कहना था कि वही सिफ यारोपिय स ही जा सकते हैं। जिस समय, रोत हुए लेफ्टीनेण्ट स्वसिंह अपनी दास्तान जयपालसिंह को सुना रहा था, उसी समय लफ्टीनण्ट परे मा गया। दोना न सलाह की कि चलकर एग्लो इडियना पर हमला किया जाए, इस समय अनावश्यक झगडे से बचने के लिए जयपाल सिंह न अपन कमरे पर खरका पार्टी दन का प्रस्ताव रखा, जा दाना द्वारा स्वीकार कर लिया गया । वे तीना जा ही रहे थे कि रास्ते म उनका एक अग्रेज मित्र अफसर भी साय हो लिया था। कुछ देर तक ता शाति के साथ सभी बठे रहे, लेकिन स्वण सिंह द्वारा भारतीय नाजादी की बात कहने पर अग्रेज उबल पडा । वह बोला- आजादी मर क्टू पर तुमको आजादी कभी नहीं मिलेगी, क्सिी सूरत मै नहीं, लडाई खत्म हो जाय तब भी नहीं। उसका इतना ही कहना था कि स्वणसिंह न गुत्यम गुत्या शुरू कर दी। दोना म जमकर लडाई हुई। खरे स्वणसिंह को शाबाशी दता रहा । मामला तूल न पक्डे, पगडे यी रिपोट न हो, इसलिए जयपाल सिंह ने मामला शात कर दिया । पर रात भर, अग्रज अफसर क शब्द उनके वाना पर गूजते रहे और रह रहकर उनको अग्रजा की कपट चाला पर प्राध लाता रहा । उनका विश्वास होता गया कि अगर काई सैनिक विद्वाह नहीं हुआ तो जग्रेज वेवल राजनीतिर विद्रोह स डरकर भारत का आजाद नहीं एक खूबसूरत बला के चगुल मे फेमकर निकल गए पलकता के एक सभ्य परिवार की निहायत एवमूरत, युद्धिमान, अप्रेजा के विरुद्ध आग उबलवान वाली एक लड़की, अपने परिवार के साथ वहा के ग्रेट ईस्टन होटल के हॉयनिंग हाल म आई पी। वहा वह राना अग्रेज विरोधी पातिकारी संगठन के एक सदस्य के सम्पक म आई। उस रातस्य न उसका हिर तथा डास पर निममित किया और उसका अग्रज विराधी मानकर, अपन रागठन मल लिया। एक दिन, उसी लेटीनण्ट सदस्य का गुप्त पर लपर वह लेपटीनगर जयपालसिंह का योजती अम्बाला आई । जयपालसिंह जून की एक शाम का स्टेशन वाले अपन अडडे पर बैठे थे विचार के मंनेजर न आर उनको कान म कहा कि मिया, एक लेडी आपसे मिलने जाई हैं । यह सुनकर वह उठे, थुक्कर उसासागत किया और वैठन का निमत्रण दिया । उसन पूछा--'आप मिस्टर आर हैं ' 'आर' जयपाल सिह या गुप्त नाम था । वह अपन साथ एक पत्र लाई पी। जिमम बार बार लिखा था कि हमे अंग्रेजो का निकालकर बाहर फेंक दना चाहिए । मैंन इनका अपन सगठन म भर्ती पर लिया है। पत्र पढकर आपने पूछा था कि अभी एक दो दिन आप यहा ठहरेंगी ? उसन जवाब दिया था-~-यह सब आपकी मर्जी पर है। क्या आप सदेश भेजन वाले को काई सदेश देंग? इस पर लेफ्टीनण्ट जयपाल सिंह ने उसके ठहरन को व्यवस्था करने की बात पूछा । उसका उत्तर था, उसब एक मित्र यहा रहते हैं, वह सारे पास रहगी । यह सुनकर उन मन म शक पदा हुआ और उसके दोस्त का पता लगान की बात मन में उत्पन्न उस शाम को, वह एक पादरी के यहा ठहरी । वह नौजवान पादरी अग्रेजा का जासूस था, यह वह सुन चुके थे। उस पादरी की असलियत बताने वाले छावनी के पी० सी० एम० जाट मजिस्ट्रट भीमसिंह थ। इनके पिता प्टन दलपत सिंह धारासभा क मनोनीत सदस्य ये और इनके पिताजी के दोस्त भी । भीमसिंह को ईमानदारी पर इनको विश्वास था जित आपन रात पोचडी के कमरे म, एक गुप्त बठक बुलाई, इस बात पर विचार किया। एक सिखनफ्सर ने उनको, पादरी के मकान पर जान और खुद उम लडकी स यह कहन कि तुमने उनको जा पत्र दिया है उसको वह पुलिस कोद रह हैं, सलाह दी। आपने प्रात तीन बजे, पादरी के मकान पर जाकर उस लडकी से कहा पि आपन खत गलती स मुझे दे दिया है, एक ऐसे अफमर को डगमगाने की कोशिश की है जिसके बाप दाटे हमेशा से महामहिम समाद के प्रति वफादार रहे हैं। मुझ आपको पुलिस के हवाले करना पड़ेगा। उसके बाद, वह पैरीज हाटल गय ! सार मामले को रिपोट की। वह खत माडिंग अफमर को दे दिया। उस स्त्री क खिलाफ काई कायवाही नही हुई। जयपालसिंह उसके जाल स निक्ल तो गय, पर उसी दिन से उन पर निगाह रखी जान नगी। 1 119 लीबिया के रेगिस्तान में भारतीय ड्राइवरो ने दी थी अग्रेजो को तुनौती बला की खूबसूरत वह जासूस लडकी जयपाल सिंह के पास जा पत्र लेकर आयी थी, उसम एक बडी महत्व की सूचना मौजूद थी। सूचना यह थी कि 1942 में प्रारम्भमा लीविया के रेगिस्तान म सैनिक मोटर चलाने वाल ड्राइवरा ने अग्रेजो के खिलाफ बगावत का झण्डा खडा कर दिया था । हडताल का कारण यह था कि भारतीय ड्राइवरा को बडी महनत के साथ रगिस्तान पार परक जाना पडता था। सकडा मीलो की यात्रा, व ठसाठस भरी गाडिया लेकर पार करत थ । गर्मी तथा धूप म ड्राइविंग करन क बाद गाडिया म भरा सामान उतारकर रखना पड़ता था, जबपि अग्रेज ड्राइवर, सिफ गाडी चलाकर आराम करत थ । इस भेदभाव से भारतीय ड्राइवर वगावत पर उतारू हो गय थे । उन्होन काम पर जान से मना पर दिया। इस हड़ताल के दौरान, हजारा को गिरफ्तार किया गया, सैक्डा पर मुक्दमे चलाये गय और सजा के तौर पर उनको गोली मार दी गई । अग्रज मिलिटरी पुलिस न, इन वहादुर भारतीया का गोलिया से उड़ा दिया। इस समय, भारतीय तथा अग्रेज सैनिको के बीच गोलिया भी चली। सन् 1857 के बाद, यह बहुत बड़ी घटना थी। इस घटना स, अग्रजा क कान खडे हुए और उनको भारतीय सनिक विद्राह की सुगध आने लग गयी थी। जयपाल सिंह के विद्रोही सगठन ने इस घटना का जमकर प्रचार किया था। इस समय जयपाल सिंह 323 सप्लाई यूनिट के आफीसर कमाडिंग थे। उनको, उक्त घटना क एक सप्ताह बाद आदर मिला कि अपनी पमान का चाज अग्रज आफीसर वा देकर अम्बाला स रात को 11 बजे चलन वाली गाडी से जबलपुर चले जाए। वहा जाकर आप 600 भारतीय सिपाहियो की कमान सभालगे और फिर कराची को रवाना हाग । वहा जाकर आपको मालूम हागा कि जापको कहा जाना है ? इस आडर का मतलब वह समझते थे कि उनका मध्य एशिया व युद्ध में झाना जा रहा है। यह आदेश, जनरल हैड क्वाटस का नहीं था और उनको वही के आदेश पर सप्लाई कमाण्ड से हटाया जा सवता था। जत आपने इसका विराध किया। आपने अपने क्नल से कहा था- आप मुझे नहीं हटा सकते। मुझ सिफ जनरल हैड क्वाटस के आदश पर हटाया जा सकता है। जयपाल सिंह का यह कदम उनकी बहादुरी तथा थपन अधिकारों के लिए सघप करन की क्षमता का प्रतीक है। इस घटना के बाद, आपन सगठन का काम एक दूसरे अफसर को मौप दिया और अपने प्रातिवारी साथियो से परामश पर स्वय अग्रेज भरतो की तरह आचरण परना प्रारम्भ किया, ताकि खुफिया की नजरों से बचे रहे । वनल स हुई वहा सुनी 120 के दो दिन बाद, इनको लाहौर के सप्लाई डिपो म भेज दिया गया। वहा पहुंचने पर मेजर वेनिग ने इनको बताया था कि तुम्हारी रिपोट पराव है। मैं 60 दिन तर तुम्हारी निगरानी रगा और तुम्हारी रिपोट जनरल हैड क्वाटर का भेजूगा। फूल फूलवर कदम रखना । और सचमुच आपन बडी सावधानी के साथ रहना शुरू किया। लाहौर में, अपनी बडी सत्रिय इकाई तक वो, आपन आन की सूचना नहीं दी। मजर केनिंग ने, इन पर नजर रपने के लिए स्वाटलैण्ड निवासी कैप्टन ब्राउन को नियुक्त किया था। यहा इनकी सहायता डब्ल्यू. ए० सी० (वाई) को शेख-बहनो ने की। य दिल्ली में इनका घुडदौड के मालिक के घर पर हुई बैठक मे मिली थी। दोनो वायर लेस आपरेटर थी और बहुत सुन्दर भी । दोनो ही कातिकारी सगठन की सदस्या थी। दोनों ने कैप्टेन गाउन पर ऐसा जादू विया दिन तो सगटन का रहस्य खुला और न ब्राउन न जयपाल सिंह के खिलाफ रिपोट दी। दो बहना म से एक यो-यूमो और दूसरी थी नसी । इही दोना से सूचना पाकर जयपाल सिंह ने यहा के चिनप्पा लच होम का पता मालूम किया, जहा राजनीतिक विचारधारा के लोग बैठत थे । यही बठकर आपने साम्यवादी साहित्य पढा। यही आपने अजय पोप की पत्नी लिट्टो घोप को पार्टी साहित्य वेचते देखा था । यहा की बैठक तथा साहित्य के अध्ययन के परिणामस्वरूप, आप इस नतीजे पर पहुचे कि सन् 1942 के आदोलन म सैनिक विद्रोह का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। शव बहना की सहायता से के० प्राउन ने इनके बार म अच्छी रिपोट दी और आपने अम्बाला आकर अपनी कमाण्ड वापस प्राप्त कर ली। यदि शेख बहाने अपने सौदय तथा आकपक रूप रंग से क्ट 7 ब्राउन का मूख न बना लिया होता, ता वह निश्चय ही जयपाल सिंह के विरोध मे रिपोट दता । उग रिपोट पर नाग कायवाही होती, जिसका परिणाम हाता कोटमाशल और गाली । शेख बह्नो का काम, बड-मे बडे महत्त्वपूर्ण दश भक्त नता स म राष्ट्रीय नहीं था। 25 अगस्त 1942 को सैनिक कातिकारी संगठन की दिल्ली में बैठक 25 अगस्त 1942 को आर्गनाइजिंग कौंसिल की बैठर दिल्ली जवशन के पास फटियर हिदू होटनम हुई। वौंसिल के सात सदस्य उपस्थित थे। इसमे आठ निणय लिये गये। इनम महत्त्वपूण यह था कि निरी ताड फाड से अग्रेजा को नहीं हराया जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि शक्ति केन्द्र तथा लक्ष्या पर अधिकार किया जाए और फिर उनको जग्रेजो के हापा मन जान दिया जाए। यह काम जनता को प्रशिक्षित वारियो के अभाव म पूरा ही हो सकता। आपन अपने अध्यक्षीय भाषण म यह भा रहा कि जब तक सेना और जनता एक जुट होकर, किसी क्रांतिकारी सगठन के नीचे बगावत नहीं करती, तब तक परिणाम की दष्टि से घटिया हाते हुए भी अग्रेज गुण म श्रेष्ठ वने रहेगा उनका हमशा-स बात का दुख बना रहा कि सेना का 24 घट का नौकर सिपाही जनता का ऐसा प्रातिकारी सगठन खडा नही कर सकता। इमी विचार स प्रेरित होन के कारण, आपके सगठन ने सन 1942 के जादालन म जनता की हथियार तथा पैसा स सहायता की। लगभग तीन हजार हथियार सेना म 42 के नातिकारिया का मिल । इसस सिद्ध होता है कि भारतीय सना जाजादी की लडाई म, गाधीजी के अहिंसात्मक आदोलन से कम महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा नहीं कर रही थी। इसका एक प्रमाण है कि मेरठ म पैदल सेना की एक यूनिट न मोर्चे पर जान स इनकार कर दिया, बम्बई मे एक यूनिट ने अग्रेजा पर गाली चलाई थी और च दसिंह गतवाली की यूनिट न सत्याग्रहिया पर गोली चलाने से साफ इनकार कर दिया और बम्बई का नाविव विद्रोह ता मशहूर है ही। क्लकत्ता की एक शाम और अग्रेजो के प्रति कोच मे उबाल सन 42 की अहिंसात्मक क्राति की गहरे धूमिल होती जा रही थी और द्वितीय युद्ध म निखार आता जा रहा था। जयपाल सिंह जी की यूनिट का आसाम और वर्मा की दिशा मे भेजा गया था। उनकी स्पेशल क्लबत्ता होकर गुजरी थी। वहा य दा दिन ठहरे थे । ग्रेट ईस्टन हाटल म नाप जपने सहयोगियो से मिले। उनस आपन, अग्रेजा द्वारा भारतीया के साथ किय गये यवर व्यवहार की कहानिया सुनी थी । उनको सुनकर भावावेश म आप भी बिलय बिलखकर राय थे और सुनाने वाला सिख अफसर भी रोया था। उनके अत्याचारा की हानिया की इनक सगठन न इश्तहारो के द्वारा सारे देश म पहुचा दिया । एसी ही एक घटना नोआखाली तथा क्लत्ता के साम्प्रदायिक झगडा के समय घटी थी। 15 अगस्त 1946 म जतरिम सरकार की स्थापना दिल्ली में हो चुकी थी और 16 अगस्त को कलकत्ते म दगे शुरू हो गये थे। आदमी पागल बना आदमी को मार रहा था । वलात्कार लूट पाट और आगजनी से कलकत्ता उजड़ रहा था और दगा वा रोक्न के लिए तैनात गार सैनिक तमाशा देख रह य। वे खुश होकर एक दूसरे से पहते थे-"मरन दो हरामजादा को । रादा इह स्वराज्य । अग्रेजा वे इस व्यवहार के विरुद्ध उस रात हवाई यूनिट के मेस में खाना न बनान का जयपाल सिंह ने आदश दिया। वनल इगिला डिार के अभाव म विगडा था, ति मापने वह दिया कि हम राष्ट्रीय शोक के दिन या नही पाते।' दूसरे दिन, इाको मातम हुनामि हारे मित्र वे० एन० पाग को नोगापाली म मुस्लिमा । वद पर लिया है और उसके परिवार को 122 ल गए हैं। आपन बनल इगिल्स से उसको बचाने के लिए कहा था। इस पर उसका उत्तर था--- अर घोष उसब साथ एसा हुला । पर यह इसी काबिल था।" इम पर आपन राप के साथ बनल रा कहा कि यदि आपन उगक बचाव में लिए कुछ नहीं किया तो मैं अपन पार सो गैनिक लवर वहा जा रहा हू " अग्रेजा के इस घणास्पद व्यवहार रा उनका गुस्सा और और बढता गया । अग्रज भारत का बर्बाद करने पर तुले थे और मेजर जयपाल सिह उनकी हर याजना का विफल कर्नल कॉथोन और जयपाल सिंह जयपाल सिंह को अग्रजा स वहद घृणा थी किन्तु उस समय का बैप्टन और बार का कनल हाँथोन उनका गहरा मिल था। इसलिए कि वह उदार अग्रेज था । अवाला स जयपाल सिंह को, अपन सक्शन के साथ तेजपुर म नियुक्त किया गया था। उनका काम था काचिन और चीन की पहाडियो म दुश्मन की फौजों के पीछे काम कर रही ब्रिटिश खुफिया यूनिटा को रसर पहुंचाना । यही आपकी भेट कायोन स हुई थी। यहा हायान के सहयाग और पगमश स, आपने विमानों द्वारा मा पर लड रही सना को वेवल रसद बतिक जीप, मोटर तथा भारी तापा तक पहुचान की तकनीक विकसित की थी। इस काम में जयपाल सिंह इतन उलझे कि संगठन का काम शिथिल पड़ गया। 1943 म संगठन की ओर से यह तय किया गया कि सगठन का काम यूनिट के स्तर पर यूनिट करे । 1943 में इनको चक्रलाला नियुक्त कर दिया गया था और मेजर रिध की पमान म नयी एपर सप्लाई यूनिट सगठिा करने का काम सौंपा गया था । मेजर रिधे भी उदार थे और भारतीयो की स्वाधीनता के ममथक थे, इसलिए इनका उनके साथ पाम वरन म कोई परेशानी नहीं हुई । यही रहकर, आपको सना म, अग्रेज विरोधी एक दूसरे सगठन का पता लगा था। यह सगठन गर-कमीशड आफीसस का था । इस सगठन का नाम था--"इडियन सालजस लोग।" आपन इस लीग को, अपन सगठन के साथ जोडने वा बडा प्रयास किया, वितु लीग के कायकर्ताओं को यह बात रास नही आई, केवल समझौा इस बात पर हुआ कि चूकि उद्दश्य दानो का एक है, जत काइ कायवाही करने से पहले एक दुसर का परिचित करा दना आवश्यक है। फिर वर्मा की दिशा मे प्रस्थान भगम्त सन् 1943 में आपको अपनी एयर सप्लाई यूनिट के साथ यमा भेज दिया 123 गयी । इस समय इनका रेंक कंप्टेन था । सिफ छह महीने के भीतर आपकी यूनिट को त्रिपुरा से चटगाव, चटगाव से जोरहाट और जोरहाट से मणिपुर के इलाका म जाना पड़ा था। यहा लडाई मे फसी डिवीजना तथा दुश्मन से घिरे इम्फाल म अपन सिपाहियो वा रसद गिरानी पडती थी। निरतर थका दन वाल इस काम से उनकी सेहत पराब हो गई । सग्रहणी वा रोग लग गया, मलरिया हा गया और शरीर की तावत छीजने लगी। फिर भी जापन अपन जफ्सरा स अपनी बीमारी का जिक्र नहीं किया। उन दिनो कोहिमा को जापानी ले चुवे थे । मणिपुर के इला पर हमला प्रारम्भ कर दिया था और नागा हिल्स म जबरदस्त लडाई हो रही थी। आई० एन०ए० भी जापानियो के साथ लड रही थी। अंग्रज आई० एन० ए० को जिपस के नाम से पुकारते थे और भारतीय अफसरा का इस बारे म कुछ भी नही बताया जाता था। लेकिन जिपस के बारे म जानन वी जिज्ञासा क्प्टन जयपाल सिंह को परेशान करने लगी। आप एक दिन, बरसात म ही ओएरगाव एयरफोल्ड स दीमापुर के लिए गाडी लकर चल दिए थ। यहा आई०ए० एस० पा० व कैप्टन खना ने आपको बताया कि नाई० एन० ए० का जा सैनिक अग्रजा व हाथ लगता है, उसका गोली मार दी जाती है, और ऐसा सकडो के साथ हुना है । इस घटना ने, कै० जयपाल सिंह का अधिक क्षुब्ध किया। वह चाहत थे कि उनक साथ, अग्रेज युद्धदियो की तरह आचरण करते । व सब वर्दी म लड रह थ आर ऐसा करना, आपक अनुसार उनका हल था। नेक्नि अग्रेज काम न कभा किसी क हक तथा अधिकार की रक्षा कब की थी ? लाक्तन के सिद्धात, इसानियत का आदश, मानवीव सस्कृति की रक्षा की उनकी पुकार वेवल एन ढाग था, एक हाटक था, जीवन को वास्तविक्ता नहीं । आयरलण्ड की आजादी का माग बरन वाली गोरी जनता से लेकर भारत के कालआदमी तक का उहान गोलिया से भूना तथा ताप ने मुह स बाधकर उडाया था । जग्रज कोम की इस बईमानी के प्रांत, मजर जयपाल सिंह के मन म गहरा राप पदा हाता जा रहा था। एक दिन, अराकान पहाडियो पर रसद गिराने की मुहिम पर जात समय पटगा (चटगाव) जाना पडा । वहा जापन देखा कि एक सी 47 जहाज भारतीय नागरिका को लवर उतरा था। य सर आजाद हिंद फौज क सिपाही थ, जिनकी दिया उतरवा वर नागरिका ये पड़ पहनवा दिए गए थे। वहा उनका बदी शिविर म रखा गया । अमरिकी सिपाही उन पर पहरा दे रहा था। उसस बातें कर आप बदिया पास पहुच । उनस वाते परन पर मालूम हुमा वि ध आजाद हिद फौज के सैनिक थ, जिनवा इम्पाल से वदी बनावर लाया गया था। इनम हरियाणा 4 लोग ध । उनकी हालत देखकर आपनो वडा दुप हुआ। एसा हर घटना ग्रेजो की असलियत उनके सामने घुलती जा रही थी और उनका 124 उपाड फेंका का इरादा पक्का होता जाता था। मौत के मुह रो नोट आए थे २० जयपाल सिह एक दिन आप दरगाव एयरफील्ड पर पड इम्पाल जा वाली रसद पक कर रह थे कि थकान के कारण सहसा गिर पडे । वहा स उठाकर आपका गोलाघाट एयरफील्ड के अरपताल में भर्ती कर दिया गया। अगले दिन विमान से कलकत्ता लाया गया। वहा से एबुलेस ट्रेन स बरेली जस्पताल के लिए भेजा गया। बरेली मे उनकी हालत और अधिक निगडने लगी। एक और भयकर राग और दूसरी ओर अग्रेज डाक्टरा तथा नर्मो का भेदभाव भरा बरताव दोनो ही उनको परेशान कर रहे थे, लेकिन युद्ध के बाद भारत का स्वरूप क्या बनता है, यह देखने के लिए जिंदा रहन की कामना ही उनका बनाए रख सकी। युद्ध म जापानियो की हार और आजाद हिंद फौज द्वारा समपण उनको व्यथित कर रहे थे, पर आजादी लान की भावना उनको जिंदा रखने के लिए सघप कर रही थी। बरेली के मेडिकल बाड ने इनको पूना के अस्पताल म भेजन का फैसला लिया था। लाइलाज मरीजा को पूना भेजना नियम बन गया था और उनको फौज स पारिज करने का भी यह एक तरीका था। स्टेचर पर रखकर आपका गाडी की एबुले सम रख दिया गया, जहा एक बुडढी अग्रेज नस उनकी दखभाल को तैयार की गई थी । इनको देखते ही उसकी चीख निकल पड़ी थी- 'स्पू क्स' और इसके बाद उसने अपन सीन पर, उगलियो स पास बनाया। इसके बाद वह बोली-इशू मसीह तुम पर रहम करे और तुमको अपनी गोद म ले ले । वह उनकी मौत की प्रापना कर रही थी और वह स्वय किसी कीमत पर मरना नहीं चाहते थे। जनरल तिमया के छाटे भाई ने, जो इनके बगल के पलग पर थे, इनको हिम्मत बधाइ । आगरा तथा घर की खबरें सुनाई । पिताजी के अवकाश लेने की सूचना दी । इन बातोस इनको कुछ शाति मिली थी, तो मरीजा तथा धायला की हालत का देखकर बेचैनी पदा हुई थी। बीमारी की हालत म वरेली से पूना तक की यात्रा बडी दुखदाई सावित हुई। सर्दी और डिवे म टिंचर की बदबू ने बहुत परेशान किया था। इस भयकर बीमारी से इनको एक जमन यहूदी डाक्टर ने बचा लिया। उसन इनको केवल सूखी मछली की खुराक पर रखा। एक महीन मे। ठीक हो गए और यहा से सीधे चकलाला डिपो पर वापस पहुच गए। - आप 125 नम्बर 8 एयर डिस्पंच लाइन की कमान और परीक्षा की घडी एक ओर ता देश म राजनीतिक गतिविधिया बहुत तज हा गइ थी, इमरी आर सेना के विविध अगो मे ब्रिटिश विरोधी भाव बड़ी तेजी के साथ उभर रहे थे । साथ ही, भारत के अंग्रेज अफसर इस तथ्य से अवगत थे। वे जानते थे कि उनके प्रति भारतीया की पूणा का तूफान फूट सकता है और यह तूफान 1857 में तूफान से अधिक पतरनार तो होगा ही, सफल भी हो सकता है । उनका दिमाग इस तूफान को रोककर अथवा उसकी दिशा माडकर, कुछ दिन तक और भारत को गुलाम बनाए रखा था। इसी उद्देश्य स उहाँने नम्बर 8 एयर डिस्पच यूनिट का गठन किया था और उसकी कमान २० जयपाल सिंह को सौंपन का निणय लिया था। चपलाला पहुचने के बाद, कनल हाथान ने उनको बताया कि तुमको नम्बर 8 एयर डिस्पेच यूनिट की मकान सौपन का निश्चय किया है । उहांने यह भी कहा कि एक लम्बी बीमारी के बाद, तुमको जाराम की जरूरत है, लेकिन मेरा विश्वास है कि तुम इस मौटी पर खरे उतरोगे । आपने इस नवीन पद भार को स्वीकार कर लिया । इस समय आपदा रेंक मेजर का था । आप फील्ड-अफ्मर थे। पाच अग्रेज २० और दो लेफ्टीनेण्ट इनकी कमान मे थे। इस समय, मजर जयपाल सिंह इस प्रकार का भार सभालने वाले पहले भारतीय थे। इस क्मान में 600 सिपाही थे। जिनम जाट, सिख तथा पठान थे। 12 नमीशन प्राप्त अफसर भी थे। यह जनवरी 1944 का समय था । इस यूनिट को हरक्त म लान का समय दो माह दिया गया था। पर थोडे दिन बाद ही आदेश दिया गया कि 15 दिन मे ही सारी तैयारी पूरी कर लनी है। आपो अपनी यूनिट वा संचालन अफमरी तरह से नहीं, भाई चारे की तरह किया। सबको व्यक्तिगत तौर पर बुलाया। उनके सामने अपनी बात रखी। अग्रेजो से आपन कहा, आप मुझे सर कहकर नही पुकारेगे मुझे केवल 'जय' रहेंगे । आपने यह भी कहा वि मै अग्रेजो का व्यक्तिगत तौर पर विरोधी नहीं हू उनस भरा सैद्धातिक मतभेद है । इस यूनिट का काम भाई चारे के साथ, पूरे अनुशासन से चलना है ।, इसम शिथिलता बर्दास्त नहीं की जायेगी। एरिया पमांडर विदेश जाने से पहले जब इनकी यूनिट को देखने जाया था तब बनल हाथोन ने उसमे मेजर जयपाल सिंह के विषय मे कहा, 'यह आदमी काम करने में शैतान की तरह तेज और मजबूत है।' माच 1944 में आप विमान द्वारा अक्यव गए, जहा आपको युद्ध से बर्बाद वर्मा को देखने का मौका मिला था। उसकी बरवादी को देखकर इनकी युद्ध- विरोधी भावना और अधिक बढ़ गई। यहा आपने बर्मा को मेडिकल सर्विस ने 126 सिपिल सजन पनल IT गिर ये माध्यम से धर्मीजगट्रियोटिर आमी ये मनिका ग मुनावत गी। इन बहादुगर अपन मुररा जापारिया वा प्रदान लिए प्रिटिश सैनिसराका साथ उसी प्रकार दिया था जैम माआ की चीनी मना न, फासीमियो को चीन म पटेडन के लिए चापाई शेर यी सेनामा का साथ दिया था। ये लोग अग्रेजाब पिलाप हथियार उठाने का मौका पोज रहे थ। एयर डिम्पेच नम्बर 5 के पेप्टा शेषाद्रि वर्मीगट्रियोटिव आर्मी के तीन अपमरो यो उनके पाम लाए। जर कंप्टन हार्वेसन यो मालूम हुआ तो उरान मेस म उनके पाना पाने पर एतराज दिया। लेकिन मेजर जयपाल सिंह ने हावेंगन को डाट दिया और कहा यहा मीनियर अफगर मैं हू हुक्म मेग चलेगा। इस पर सारे अग्रेज अफ्मर विरोध में उठपर चले गए। वर्मी पैट्रियोटिक आर्मी के बारे मे, अग्रेजो की राय थी कि वे गद्दार हैं, दुश्मन से उनकी साठ गाठ है। जिस तरह अग्रेज भारतीय को स्वाधीनता के नाम पर विदवने थ, उसी तरह वर्मा ये पातिवारिया को भी गालिया देत ये। भारत के राष्ट्रीय आदोलन वे बारे मे, वर्मी पैट्रियोटिक आर्मी के इन अपमरो की राय थी-'आजाद हिंद फौज एक नयी तावत है जिसे इस युद्ध ने भारत के लिए पैदा किया है । युद्ध ब्रिटिश इण्डियन आर्मी में एक नयी चेतना फा रहा है। तुम्हारे देशवासी विद्रोह के लिए तैयार बैठे हैं। काश गांधी जी पोडी देर के लिए ही सही विद्रोह के रास्ते मे न आयें।' योरोप मे, युद्ध की समाप्तिो बाद, भारतीया की सेना भारत वापस आ गई थी और अपने साथ अग्रेजा के खिलाफ भारी गुस्सा तथा नफरत लायी थी। कंटीनो यलबो और मेसो मे सवत्र भारतीयो का यह गुस्सा देखा जाता था। ब्रिटिश विरोधी इस गुस्से यो जधिर तेज करने के लिए मेजर जयपाल सिंह का पातिवारी मगठन, आजाद हिद पौज ये संनियो के साथ अग्रेजा द्वारा दिए गए बवर अत्याचारो की कहानी, इश्तहारो के माध्यम से, भारतीय सेनाओ मे पहुचा रहा था। इसी बीच 6 अगस्त 1945 वो हीरोशिमा पर अणु बम गिरा और दो दिन बाद नागामापी पर भीपण वर्बादी से बचन के लिए जापान ने 10 अगस्त को भारम समपण की घोषणा कर दी और 14 अगस्त को युद्ध विराम की घोषणा हो गयी। यह घोषणा मेजर जयपाल सिंह ने दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सुनी। उस समय वह कश्मीर से अपनी युद्ध-अवकाश की छुट्टिया मनाकर लौट रहे थे। कश्मीर-यात्रा का उद्देश्य आर्गेनाइजिंग कमेटी की बैठक में भाग लेना था। इस बैठक मे, देश को भावी राजनीतिक गतिविधि पर विचार किया गया था। बैठन की आम गय यह थी कि ब्रिटिश सरकार हिंदू मुस्लिम दगा को प्रोत्साहित भारत से अपने जान की शत के रूप मे हिन्दू मुस्लिम एकता का दाव 127 लगायगी । आजादी व सवाल या पीछे धकेलगी, शिमला कास एक धोखा है और भारतीय नेता उस धास का शिकार बन गए है । अत जावश्यक है कि भारत वो ब्रिटिश विरोधी ताकतो मे तारतम्य स्थापित किया जाए और देश की समाजवादी, साम्यवादी पार्टियों के साथ मिलकर युद्ध के तुरत बाद विद्रोह कर दिया जाए। मेजर जयपाल सिंह का वर्मा थाईलैंड और इडोचाइना जाकर आजाद हिंद फौज के लोगो से सपर्क करने की योजना- मेजर जयपाल सिंह का दिमाग इस समय इस बात पर लगा हुआ था कि अग्रेज एक बार भारतीयो का अपनी चाल म जरूर फासेग । इसलिए उस परिस्थिति मे, अग्रेजा से आजादी छीनने के लिए जनता, राजनीतिक दलो और सेना के विद्राही संगठना का एक होना बहुत जरूरी है। अपने इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए, आजाद हिंद फौज के बचे खुचे सैनिको को खाज मे आपने बर्मा, थाई नैण्ड तथा इडोचीन जाना आवश्यक समझा। जाप विमान द्वारा क्लबत्ता से अक्यव पहुचे रगून गये, लडाई खत्म होने के पाच दिन याद आप वार मे ये, सात दिन वाद सैगोन मे । बैंकार म भारतीय वस्ती मे घूमे। वहा मालूम हुआ मि आजाद हिद फौज के लोग भारत चले गए हैं, वहा बगावत की तैयारी करने के लिए। भारत के राजनीतिक दलो से निराशा ही हाथ लगी नवम्बर 1945 मे आपकी यूनिट चकलाला आ गई थी और भाकर आप भारत की राजनीतिक पार्टियोपी वार्ताओं के नतीजे पर ध्यान लगाये हुए थे। 1949 के प्रारम्भ मे, वाग्रेस ने प्रातो मे सरकारें बनाई। अग्रेज भारतीय सेना को खत्म करने पर तुले थे और इनका कातिकारी संगठन नेताआ से बात कर रहा था। आपने सोशलिस्टा से सपक क्यिा आप स्वय हिलटज' के सपादक आर० परजिया से मिले थे। उनको अपनी भेट का मक्मद बताया था। उनको एक दस्तावेज दिखाई थी और उसके प्रकाशन की व्यवस्था का रास्ता बताने का अनुरोध दिया था। रजिया साहब ने उसको प्रकाशित न कराने की सलाह दी और अच्युत पटवधन तथा जयप्रकाश जी से मिलने का परामश दिया था। मेरठ काग्रेस में जाकर और नेताओ से मिलने को भी कहा था। सोशलिस्ट पार्टी में सेकेंटरी सुरेश देसाई के नाम एक पुर्जा लिखकर भी इनको दिया था। श्री सुरेश देसाई पोरबदर ये होटल के कमरे में इनसे मिलने आए थे। साइबलास्टारत करान के लिए श्री देसाई को आपने कुछ दस्तावेज भी दिये थे। ये दस्तावज यदि 128 - प्रकाशित हो जाते तो भारत की जनता का, उस परिस्थिति तथा उन घटनामा पाना हो जाता, जो भारतीय स्वाधीनता की पूर्व वला में भारत म पटित हान का यी जो निश्चय ही अग्रेजा की पडयत्रकारी योजना पा परिणाम थी। सोशलिस्ट पार्टी के सेनेटरी सुरेश दसाई के साथ आप मेरठ भी आए । वहा पास नेताआस मिले थे । उनम, आपका पाई उत्साह नजर नही आया। मेरठ मे भी साम्प्रदायिक झगडे के कारण पy ला था। जापकी राय है कि काग्रेसी नेताओ के पास इस मजहबी जनून को रोक देने की कोई योजना नहीं थी। गम भापण अवश्य थे। मेरठ से, जाप जयप्रकाश नारायण से मिलने बम्बई आए थे। यहा आकर आपने अपनी सारी योजना को लिख डाला और उसको सुरेश देमाई हवाले कर दिया ताकि तीनो प्रमुख समाजवादी नेता को वह दिवा लें । कुछ दिन बाद वे जयप्रकाश जी के वम्बई आने पर, ठाकुर द्वार रोड पर समाजवादी पार्टी के दफ्तर म उनसे मिलने गए। कुछ तकनीकी कारणो से वह ता बाहर रहे श्री सुरेश ने दस्तावेज उनके सामने रसे । जयप्रकाश जी न, कुछ दिल वाद, अपना मत दने के लिए कहा। सुरश देसाई की सलाह पर ही आप डॉ. लोहिया से मिलने गए । उनसे आप प्रभावित हुए। लम्वी चौडी याते हुइ, पर ठोस नतीजा कुछ ही निपला । जय प्रकाश जी वा मत भी उनका मिल गया था। उनका कहा था कि वह जनता की सामूहिक पायवाही में ही विश्वारा रखते हैं । और मेजर जयपाल सिंह का मत था कि वह भी जनता और सा की मिनी-जुली कार्यवाही म विश्वास रखते थ। और यथाथ म दोनो विश्वासा मे काई अतर नहीं था। अतर वेवल इनना था कि मजर जयपाल सिंह ब्रिटिश साम्राज्य के भारत विरोधी पडयत्र का जनता तथा सनिक विद्राह द्वारा विपन परना चाहत थे और जयप्रकाश जी मो टाल रहे थे। मेजर जयपाल सिंह का, साशलिस्ट पार्टी के विषय मे मत है कि जयप्रकाश जी द्वारा गवनराको गिरफ्तार करने और गुरिल्ला नहाई छेडने का आहान रिफ राजनीतिक लफ्फाजी थी। आपा मत है कि 1945 अतिम दिनो म वाग्रेसी रहनुमा इस बात पर महमत हो गए थनि अब पाकिरतान बनने से रोया नही जा सपता । राजाजी नगी बात कह दी थी। इस सबसे, आपन नतीजा यह निकाला कि पाप्रेसी नता स्वय यह समझ गए ये कि जब जनता साम्प्रदायिर आग म झुलगेगी तब वह सहायता के लिए धुवारेगी और चिल्ला चिलार पहगी कि जिन्ना यो पारिस्तान दे दो। एक सीमा तय हुआ भी यही। मभूधा देश साम्प्रदायिकता की आग म झुलस गया। पजाय, नोआखाली और भारत तथा पारिस्तान में यनर शहरा म जो रक्तपान, लूटमार हिंसा तपा बतासार यी पाए मटी उतनी मम्भवन नादिर माह तथा अहमदशाह अलगली के आगमणा * गणप भी 7 परी होगी। मेर साम दाना के दौरान, वह प्राय इस बात पर 129 बल दत थ कि अग्रजा के समान वाग्रेस भी हिंदू मुसलमानो यो बाटपर राज परने थी याजना अपना सकती है । दश में बटनी हुई साम्प्रदायिक तापतो का दपकर उनकी भविष्यवाणी मत्य सिद्ध होती दिखाई पटती है अत प्रत्यय दशभक्त या याम है कि वह इस खतरे शो रोपने के लिए आगे आये। 7 जनवरी 1946 को मरी म आपन पिरनिर आयाजित बरन के बहाने आगनाइजिंग कमेटी की मीटिंग युनाई। उसमे पद्रह अफसरो, डब्ल्यू०ए० सी० (आई) में तीन सदस्यो, वायु सेना के दस गैर कमीशड अफ्सरा, सिगनल पोर तथा पदल सेना की यूनिटो ने भाग लिया था। इससे दो बातें साबित होती हैं, पहली यह कि अंग्रेजा को भारतीय मेना मे बगावत की बात हवाई वल्पना नही थी। उसका ठोस आधार था। उसका प्रभाव सेना के अधिवाश अगो मे था और बगावत के दौरान सेना के अधिवाश साधनो तथा शक्ति सातो अधिकार पर लेने की उनकी योजना विचारित थी। दूमगे यह कि वह सेना की बगावत द्वारा अंग्रेजा स सत्ता छीनकर सैनिक शासन स्थापित करन की बात नही साचत थे। यही कारण है कि मजर जयपाल सिंह ने भारत के समस्त राजनीतिक दला से नतत्व की याचना की थी। लेकिन भारत का राजनीतिक नेतत्व इस देश के लिए न तो इस प्रकार के विद्रोह से सहमत था और न देश के लिए समद एक माम्प्रदायि भेदभाव रहित जहियत लाने के लिए तैयार था। वह तो धम और जाति बनाम भारत को विभाजित करने भी मानसिकता से भरे बैठा था। 7 जनवरी 1946 की इस मीटिंग में ही, एक सिष अफसर ने, मेजर जयपाल सिंह द्वारा पी० सी० जोशी से सपा परने के प्रस्ताव मा विरोध करते हुए कहा-'यार, वे हमसे गद्दारी करेंगे। मेजर जयपाल न उनके एतराज को स्वीकार कर अपने लोक्तत्रीय मायता का परिचय दिया था। माच 1946 के महीने में विद्रोह करने की बात पर सहमति हो गई थी। एक पायवाही-परिषद् की रचना कर दी गई और मेजर जयपाल को उसका सचिव बना दिया गया था। फरवरी 1946 म चलाला वापस लौटन पर आपको मालूम हुआ कि जनरल आविनलेक 'मैना आपरेशन का मुआयना करने के लिए उत्तर पश्चिम सोमा वाहवाई दौरा करेंगे। इसको सुनकर आपरे कान खड़े हो गय । आप जानते थे कि भारत के राष्ट्रीय आदोलन के परिणाम को विफल करन के लिए अग्रेज पडयत्र कर रहे हैं । जनरल हैड क्वाटर के एक अग्रेज अफसर ने, जिसको उपनिवशो की जनता के साथ सहानुभूति थी मेजर जयपालसिंह को मैना ऑपरेशन की योजना दे दी थी और उस दस्तावेज वो भारत के राजनीतिक दलो तक पहुंचाने की सलाह दी और इस सलाह यो मानकर सभी राजनीतिक दला तक पह दस्तावेज पहुवाई गई। इस पर साम्यवादी पार्टी ने अवश्य कुछ कदम उठाय, पर शेष पादिया मौन रही। इस दस्तावेज मेषास बात यह थी कि भारत तथा 130 बर्मा के राष्टीय आदोलन का कुचलने के लिए जग्रेग कमीतो के लोगो को हथियार देकर पडा करन की योजना कर रहे थे। निमाना द्वारा उनका सैनिक सामग्री पहुचाने की योजना थी। मेजर जयपाल सिंह का क्या है कि आकिन- लेक ने उत्तर पश्चिम सीमा पर दौरा किया । उसके पीछे सी 46 विमानो की एक टुक्डी ने उडान भरी । सम्भवत उनसे हथियार भी गिराये । इही हथियारो से पठाना ने कश्मीर पर आक्रमण किया था, इही से मारनो ने बगावत की थी और इही से नागालैण्ड मे पई वर्षों तक विद्रोह चलता रहा था। अ ग्रेजा द्वारा भारतीय मेनाओ मे हथियार रखवा लेना स्थान स्थान पर भारतीय सेना की यूनिटो द्वारा किए जाने वाले विद्रोहो और भारतीय सैनिको द्वारा अग्रेजो पर गोली चलाई जाने की घटनाओं को बर अग्रेजो ने यह उचित समझा कि भारतीय सेनाओ से हथियार रखवा लिय जाए। बहुत मभव है, नाविक विद्राह ने उनकी आपे खोल दी थी। नौ सना के लाग, बम्बई की सडको पर निकल पडे थे, ब्रिटिश सनिक उनको घेर रहे थे । यह अग्रेजा के लिए बडा समेत था। ज्या ही मेजर जयपाल सिंह अपनी यूनिट में पहुंचे तो देखा उनो याद का वरिष्ठ जग्रेज अफसर यूनिट के हथियार क्याटर गाड स म रखवाकर ताला बंद कर चुका था। वायरलस के द्रो मे भारतीय आपरेटर हटाकर अग्रेज ऑपरेटर लगा दिए गए ये । इस तरह अग्रेज तैयारी कर रहे थे। उधर सेना में निश्चित हा गया था कि ज्यो ही जग्रेज हमार नौ सेना के जहाजा पर फायर करें, सेना के हमारे सभी मगटनो पो बगावत कर दनी चाहिए और माच की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अरणा आसफ्अली और जयप्रकाश नारायण विद्रोही मनिकोवा ममथन पर रहे थे, पर गाधीजी के हस्तक्षेप से मौन हो गए। सरदार पटेन और आविन लेय मी मध्यस्थता से नौ मैनिया से हडताल वापस लेने के लिए कहा गया था। सेना पा विद्रोह राष्ट्रीय नेता के हस्तक्षेप से शात हो गया और अप्रेज साम्राज्य वादियो को अगस्त 1946 म व्यापक पैमाने पर हिदू मुस्लिम पगडे घराने का मौरा मिल गया। ऑपरेशन-एलाइस और भावडी से चौसा 'आपरेशन-एलाइस' ब्रिटिश शामन थी एक एसी चाल थी जिसरे द्वारा ये भारत ये मुकित आदोलन यो असफ्स बनाने पर तुले थे। इस योजाये अनुगार अंग्रेज फौजी टुकडिया को भारतीय जनता को बुचतन के लिए चारो तरफ 131 फैल जाना था। इनमा मदद तथा रम दा वा बाम विमानो द्वारा होता था। राजा मारण है पि सो डर था कि भारतीय राजा. प जय साधना का नष्ट कर सकत है। एयर सप्लाई की जिम्मेदारी मजर जयपाल सिंह की यूनिट को सौंपी गयी थी। इसका भी एक विशेष कारण है और वह यह है कि चौसा के जगलो म बनी छावनी के अग्रेज सैनिन अमानुपिय परिस्थितियो म जी रहे थे और एक एव वरखे सेना छोड़कर जा रह थे। तकनीकी जगह भरने के लिए अंग्रेज किमी कीमत पर उपलब्ध नहीं था। इसीलिए आवडी से इनका ट्रासफर रद्द करके चौसा कर दिया गया था । मेजर जयपाल सिंह ने पहला वाम तो यह किया कि बडा भारी खतरा मोल लेकर 'आपरेशन एलाइस' की योजना को राजनीतिक दलो तक पहुचा दिया, स्वय उसको छपवारर बटवा दिया और तीमरे आपने योजना बनाई वि वैरखपुर पानागढ तथा पूर्वी कमान के जय एयर सप्लाई अडडा तथा दक्षिणी-पश्चिमी कमान वे अडडा का बकार पर दिया जाएगा, पैराशूटा मे छे वर दिय जाएग और अय सामान वाले डिपोज का आग के हवाले कर दिया जायगा। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी आपरेशन एलाइस पर किताब छापवर ब्रिटिश-साजिश को बेनकाब कर दिया था। चौसा पर पनल एग्लिस तथा अय अग्रेज अफसरो से आपकी निरतर टपपरें होती रही थी। पर आप अपने काम पर मुस्तैद थे, अग्रेज यदि आपरेशन एलाइस पर काय करते तो आपकी यूनिट उनको खाक मे मिला देती, मेजर जयपात सिंह की यह महान् राष्ट्रीय सेवा थी, जिसको नेताजी की सेवा से कम महत्व नही दिया जा सकता। एक और जाम्म के हाथ पडते पडते निकल गए मेजर जयपाल सिंह सगठा ने, जापयो कलकत्ता जार मेजर जनररा ए० सी० चटर्जी से बातें करने था काम सौंपा । आप गए और चटर्जी से उनके आफ्मि मे मिले । मेजर जनरल ने उनको घर पर बुलाया और सभलकर आन के लिए इसलिए कहा कि उनका घर पुलिस की नजरोम था। वह सादा वेश म गए । उनसे बातें हुइ, योजना धनी। 15 अगस्त 1946 का जतरिम सरकार की स्थापना हुई। उसम केवल पाप्रेस शामिल हुई। मुम्लिम लीग ने सीधी बायवाही का नारा लगाया सारा देश साम्प्रदायिक वातावरण मे डूब गया । मेजर साहब की आत्मा रो उठी। सितम्बर 1946 म सगठन की कलकत्ता मे एक बैठक हुई। यह बैठक बैरिस्टर की पत्नी नीलिमा डे न अपन घर पर बुलाई थी। नीलिमा डे एक जासूस थी। मीटिंग मे फैसला लिया गया था कि मेजर जयपाल सिंह की अडर ग्राउण्ड हो जाता चाहिए और वह अक्टूबर 1946 ग डर ग्राउण्ड हो गए । अण्डर ग्राउड होने से 132 पहले एक घटना घटी। नहर का प्रोग्राम फापर उडान भरने के लिए इधर स जाने पापा। कनल एगिरस ने मजर जयपालसिंह से कहा-"मुझ उम्मीद है कि उत्तर पश्चिम सीमात प्रवेश की तरह वह इसका भी मजा लेगा।" बहुन मुमकिन है कि अग्रेजो की कोई गुप्त योजना हो कि सीमात प्रदेश के समान इधर भी गहरूजी पर हमला किया जाय और भारतीय स्वाधीनता आदोलन के क्णधार को खत्म कर दिया जाए । मेजर जयपालसिंह काग्रेस पी आदोलन नीति से असतुष्ट थे, यह एनल एगिल्म जानता था, इसलिए उसने उक्त यात उनसे कही थी, वितु मेजर साहय की देशभक्ति को नहीं समझता था। वह नही जानता था कि मेजर जयपाल सिंह सैद्धातिक मतभेद रखते हुए भी नेहरू जी को श्रद्धा की दृष्टि से देपते थे और उनकी सुरक्षा के लिए उतने ही सजग थे, जितना कि अपनी सुरक्षा तथा स्वतनता के लिए। आपको राय ने भी बताया था और एक अमेरिकन अफसर ने भी कि नेफा में नेहरू के लिए कुछ खतरा हो सकता है। आपन सुरत एक आदमी क्लबत्ता भेजा और उसके द्वारा एक नामी पत्र नेहरू जी के लिए भिजवाया जिमम नेफा-यात्रा को रद्द करने की प्रायना की गई थी। उसी शाम, यूनिट के वायरलैम पर, इनके सगठन ने इनको बताया कि 'गद्दागे' तुमको गिरफ्तार कर लिया जायगा। भूमिगत जीवन-यात्रा की ओर पला कदम जब मेजर जयपाल सिंह को, यह मालूम हुआ कि डाके साथ धोखा हो गया है और अग्रेज उनको गिरफ्तार करने वाले हैं, तो पहला काम उहोन यह किया कि अपने क्नल एगिल्स को खूब सुनाई, उसको कह दिया कि अव अग्रेज भारत से भागन ही वाले हैं । इसके बाद, वह जहाज से पलवत्ता आए । क्लवत्ता कपy । डूबा था। वह प्राड होटल म ठहरे । वहा रे सभी साथी इनसे मिलने आए। वह सेना से भाग घुसे थे। अगले दिन वह जनरल चटर्जी से मिले । गुप्त दस्तावेज उनको सौंपे और स्वय लेफ्टीनण्ट हामिद युपारी की सहायता से, पाप सकरा के एक अमीर मुस्लिम के पर ठहरे। दूसरे दिन हामिद ने उनको क्लक्त्ता ववई मेल से ववई का भेज दिया। बबई पहुचकर हामिद बुखारी कलकत्ता आ गए। यहा ग्रीन होटल में ठहरे। अभी वर्दी पहन रहत थे और मजर कोल के नाम से पुकार जाते थे। कुछ दिन बाद, नागरिक वेश मे, बोरी बदर के होटल मे रहन लगे। इनको गायब देखकर इनकी यूनिटो हडताल कर दी । उमका डर था वि अग्रेजा न उनकी हत्या कर दी है। पहले अग्रेजों न यूनिट का बताया कि वह पलक्ता किसी काम से गए हैं, लेकिन बाद म आरोप लगाया कि वह रुपया लेकर भाग गया है, वह जाल साज पा । इसका आपन क्नल एगिरस वा पत्र लिखकर विरोध किया और उससे कहा- मैं स्वस्थ हू और रहूगा जब तक कि तुम लोग इस देश रो 133 भाग नही जात । मिसज नीरेन डे क्लबत्ता म जनरल चटर्जी पी बेटी समिली और उनस कहा कि वह जयपाल से मिलना चाहती है। बटी ने पिता से बाते की। पितान जयपाल सिंह से सपक क्यिा । कलकत्ता उनके लिए खतरे की जगह थी, पर चटर्जी की बात टाली नही जा सकती थी। वह वहा पहुचे, चटर्जी से मिले, उनके कहन पर मिसेज डे के घर गए। वह घर पर नही थी। डे से बातें हुइ, डे ने बताया था कि वह जासूस है । लेफ्टीनेण्ट ब्राउन और वह तुमको गिरफ्तार कराने की कोशिश म है । तुम उनसे बचो। मिस्टर डे देशभक्त थे। अत उ हान मजर जयपाल सिंह को बचा दिया। बम्बई आन पर आर० के० करजिया स मिले, समाजवादी पार्टी के नेताजा स मिले, मेरठ काग्रेस-अधिवेशन के समय काग्रेस नताओ से मिले, लेकिन सब व्यथ । राजनीतिक दल सेना के इन विद्रोहमुखी लोगा के सहयाग के प्रति उपेक्षित थे। अत आपने सगठन को भग करन का निणय लिया । सगठन ने, इनको सलाह दी कि वह भूमिगत ही रहें और आजादी के बाद ही प्रकटित हो । आजादी का प्रकाश लेकिन मेजर जयपाल सिंह के लिए अमावस की रात आजादी के बाद, आपने भारत के प्रधानमत्री को खुला पत्र लिखा और अग्रेजा द्वारा लगाय गए आरोपा उत्तर दिये और समपण थी इच्छा प्रकट की। 3 सितम्बर 1947 को आप दिल्ली छावनी मे, एरिया कमाडर जनरल राजेद्र सिंह से मिले । जनरल ने इनसे कहा था-"प्रधानमत्री के दफ्नर ने फोन किया था कि तुम एक भगोडे हा ।' उसी समय, एक अग्रेज कनल ने कहा - 'सर | यह पम्युनिस्ट है, देखिए यह वर्दी में भी नहीं है। मजर जयपाल सिंह ने उसको डाट दिया, लकिन जनरल ने गिरफ्तार करने का आदश दे दिया। उनको स्टाफ कार म राजपूताना राइफल्स ऑफीसम क्वाटस म लाया गया और यहा से फाट विलियम म कलबत्ता भेज दिया गया। जहा वह एक वर्ष तक रह । उनकी सारी शक्ति, अरमान, देशभक्ति ऊची ऊत्री दीवारा को बंद म छिजती रही । उनकी देशभक्ति का वह बदला मिला । राष्ट्रीय सरकार भी अग्रेजावे लगाये आरोपा के बहकावे में आ गई और एक निहायत पाप-दामन इसान, एव परे दशभक्त तथा लोवतत्र प्रति निष्ठावान मानव को सही हुई जिन्दगी जीन के लिए मजबूर कर दिया। फोट विलियम की दीवारो म एक साल गुजारन में बाद, दिसम्बर माह की एर शाममा, एक सदेश वाक सीधा उतर आया और वह विले से बाहर हो गए थे, एक लम्बे अडर ग्राउण्ड जीवन की यात्रा के पथ पर चलन के लिए।

134 अब वह मी० पी० एम० वे सदस्य थे। तीन महीने, आपने पार्टी पदीय अडडे पर गुजारे और फिर उसो याद वह पहुच गए तैलगाम कि-आदोलन की देखभाल करने के लिए। राम्त म ट्रेन के इण्टर क्लास मे सफर परत हुए पुलिस वे लागास तलगाना की जनता के साप हान वान अत्याचारावी आपस जा पहानिया सुनी, उनकी रह बाप उठी। पुलिस वाल आपस में ही बलालार, लूट पाट आर मारपीट की डीग हार रह थ और मजर जयपाल सिंह उसको तटस्थ बने सुन रहे थे। आन्ध्र-प्रदेश के तेलगाना क्षेत्र मे भूमिगत जीवन के दिन तलगाना म एक लम्बे असे तक विमा आन्दालन चला था। उस आन्दाला फा नेतृत्व निश्चय ही साम्यवादी दल ने हाया म था। सरकार की नजर में अग्रेजा स अधिक खतरनाक साम्यवादी दल था । मन् 1946 में ही उसने समस्त कायालया पर छाप मारे गए थे । तलगाना के विषय म, मेजर जयपाल सिंह की राय है- "आध्र की जनता न, तलगाना में विसाना और पार्टी ने, पिछले चार सालो म जा कुछ देखा और भुगता था, इन प्रातो मे बाहर रहने वाले लोगा का न ता उसको समुचित जानकारी पी और न हमन उसे ठोप स समझा।' (आजादी परचम के तले, पृष्ठ 99) आ ध्र प्रदेश कमेटी के हैड क्वाटस म आप कुछ दिन रहे । यहा कामरेड नाग स बातें हुइ, आदोलन की रूप रेषा जानी, हैदराबाद आदि शहरो की बदली स्थिति को देखा, सरकार द्वारा आन्दोलन के दमन का दृश्य देखा। एक दिन, अदरूनी क्षेत्र से एक सदशवाहर आया, जिसका काम था, शहर के बाहर बीस मील तक उनको रास्ता बताना और फिर रक्षक टोली के हवाले इनको कर देना। नौ कारतूस वाना एक रिवाल्वर इनकी धोता की फेट म बधा था और इनको सशस्त्र सैनिका के उस स्थान की ओर ले जाया जा रहा था, जो ठीक इनका नाक की सीध मथाागेकादा सौ मील का फासला जापको पैदल और कई पडावा बाद तय करना था। एक चादनी रात म टोला के बीच, खेता महापर वह जा रह थे कि दा गालिया चलन की आवाज सुनकर पथ प्रदशक के यह कहन पर कि छिप जाना दोना एक झाडी के पीछे छिपे और फिर रास्ता बदलकर आगे बढ़ गए । कटीली माहिया पार करके, किसान का बेटा, उनका वह पथ प्रदशन, उनका लिय जा रहा था । उसको अपन ठिकाने का रास्ता भली प्रकार मालूम था, वहा वान पहुच पान की स्थिति म, उनको पहा रया जाएगा, इसा भी पान था, वह नादान गावद् विसान बालकास भिापा, चरापो अपनी गिी का रास्ता चुनन 135 का ज्ञान था। बाठ घटेगिरतर चतने के बाद जब वे थक गए, तो पथ प्रदशक विसान बालवन जलाशय स लाकर उनका पानी दिया। दस घण्ट चलने के बाद पथ प्रदशन इन दोनो को पहाडी पर एक बडी चट्टान के पीछे छिपाकर स्वय सशस्त्र टाली का बुलाने के लिए चला गया। वकरी यी तरह आवाज निकालकर पथ प्रदशा ने सशस्त्र दाडिया को बुलाया। उसके बाद, इनको पिसी अपरिचित जानवर व खाखियाने की आवाज सुनाई पडी, यह जावाज विसी गुरिल्ला की थी, जो अपनी टुकडी को बुला रहा था । उसके बाद, झाडियो के पीछे से कई छायाए प्रकट हुइ और उनके गुरिल्ला सरदार न दौडवर गमजाशी के साथ दोनो का स्वागत किया, लाल सलाम दिया । बाकी के तीनो गुरिल्लाआ ने बारी बारी से इन दोना को लाल सलाम दिया और एक पहाडी पर ले गए। जहा समतल चट्टान को बिछौना, बनाकर अपन थव शरीरो को आराम दन के लिए वे लेट गए । पर नीद नहीं आ रही थी, जब कि उनके चारा आर कामरेड खर्राट भर रहे थे। तेलगाना के वहादुर किसाना का डाकू, नरभक्षी, आतकवादी तथा उमादी आदि अनेक नाम दिए गए थे, लेकिन मेजर जयपाल सिंह न अपनी आखा से जा कुछ देखा और समया था, वह इस प्रकार है-'1947 म, जब कातिकारी उभार की लपटा न तलगाना म सामती दुर्गो वा घेर लिया, जब रियासत का गाधी टोपी वाला नतृत्व नहा निजाम की पनाह म मुह छिपान के इरादे से मद्रास प्रात म भाग गया, जब सवहारा की पार्टी न वक्त की नजाक्त का समझकर तेलगाना के किसाना, रजाकारो के हाथों से अपनी इज्जत, अपन घर और माल का रख- वाली वरने व लिए, हाया मे हथियार उठावर सगठित करने का फैसला किया तब न हा वुद ना घर से निकलकर सबस पास व पार्टी हैड क्वाटस म जा पहुचा (आजादी के परचम व तले, पृष्ठ 112) । कुदना चौदह वप का था। उसकी मा, उसका पार्टी म जान से राक रही थी, प्रलोभन दे रही थी, पर वह जान की जिद पर अड़ा रहा। अत मे, उसने कहा- नहीं, आप रजाकारो से लडन स किसी को रोक नही सक्त । जापको मुझ भ परना ही पडेगा।' (आजादी क परचम के तल, पृष्ठ 112) कुदना और उनके साथियो की कायवाही को देखकर, आपका विश्वारा हा गया था- अपने सदिग्ध हथियारा की मदद स अगर य मुट्ठी भर नौजवान निरे डाकुना व रूप म काम करत ता इनवे लिए दुश्मन का मुकाबला परना कभा मुमकिन न हाता' (आजादी के परचम र तले,पृष्ठ 113) : 'इन लडका को एक नजर भर देखन पर य भयकर झूठ मेरे सामन बेनकाब हा गए' (आजादी कपरचम रे तले, पृष्ठ 114)। आपका कहना है कि सरकारी आदश के अनुसार इन प्रातिकारियो को एक दाना दन की सजा मौत थी, फिर भी लाग बढ़िया चावल खान को दन थे । सरवागे प्रचार था कि ये लोग बलपूर्वक चदा तथा सामार यमूल परले पे, नापका मत है वि नाता नको जपना मानती थी, मत 136 । पिना मांगे देती पी। गत पुना म, पफ 115 पर एक घटना उवन । प्रांतिकारी EिT ने उनको बनाया पानि पुलिग उसे बीयो और तीन गाल पे बच्चे का गिरपाार पर पुती है । बीयो पापाला मुह परप शहर ग घुगाती है लोगा या बताती है कि यह वेश्या है। उसे धमकी दी जाती है कि या तावह मरा पाठिशाना बताए नही ता बेटे मो हत्या पर दी जायगी। उगन हा यह भी बताया कि हमन भी पुलिस और पाजवे लागायो गिरफ्तार रिया है, पर उनको रिहा कर दिया। उार साथ इसानियत का सलूप दिया और पायला पी चिकित्सा पराइ । यहा, मजर जयपाल सिंह के लिए जपान यूनिट का दाना एक नया तजुर्वा था। यशाम को यात्राबरत120 मीरवा पागला तय बरनवे वादगारवा ग्यता, तर आराम करन के लिए खत । उनको मानत ईमानदारी, अपने अधिकारा की रक्षा के लिए हथियारयद लहाई का देसार उनको आत्मा को ठेस लगती। उनवे मापी गई गदवारी परोध आता और गहरे विचाराम डव जात । इस पडाव तर पहुंचते पहुरते वह तेलगाना ये आदोलन यी आत्मा को जान गए थे। इस पडाव व साथिया न उनको चावल, दूध, दाल और चिरापाण्ड मा विदाई भाज दिया। डा सुरभित पहुचन को मंगल कामना की और आत्मीयता भरी विदाई स भाव विभोर पर दिया। पहाडी भरला यो पार करके हजार फीट ऊची पहाडी को चढकर और दा हजार नीचे उतरकर और ऐसा यई चार वरर वह उस स्थान पर पहुंचे, जहा अगली मजिल तक ले जान वाला माग-दशक मिलन बाला था। आगे जान के लिए रास्ता कौन-सा अपनाया जाए, इस प्रश्न पर कमाण्डर और कुदना म बहस हो गइ । वुद ना का तक पा दि उसे एरिया हैड चाटर रा जा आदेश मिला है, उसका पालन करगा। वमाडर सुरक्षित रास्ता ढूढना चाहता था। तब रगना की पुकार हुई, उसन दोना व रास्ता को अस्वीकार कर दिया और एक तीसरा रास्ता बताया। जब इस पर भी आपत्ति हुई तो वहा मौजूद सभी कामरेडा की बैठक हुई। उसम रास्ता का चयन विचार का विषय था । तीनो ने अपने-अपन रास्ते में गुणा वा लेगा प्रस्तुत किया। अन्त म, पुले विचार के बाद तीसरा रास्ता ठीक पाया गया। इस प्रकार निणय करन की यह पद्धति समवेशम कहलाती है। सफर और रास्त की भयवरता का वर्णन मेजर जयपाल सिंह इस प्रकार करते हैं- रात के लगभग दो बजे तक हम चलत ही रहे । ठडी हवा चल रही थी। कुचली हुई घास को महक हवा मे भरी हुई थी। वही बहुत दूर शेर की दहाड सुनाई दे रही थी। एक सिसकारता हुआ साप हमारी बगल स होता हुआ वायी जोर की झाडी म घुस गया। मच्छर लगातार हम काट रहे थे। भचानक, बादल गरजने लगे और बिजनी क्डको तगी। पानो को बहरा पर । देने वाले एक भयकर तूफान न जगल को ढाप लिया ! हमारे ऊपर घने बादल मडरा रहे थे और नीचे ही हात जा रहे थे । अचानक जोरदार बारिश होन लगी' (आजादी के परचम तले, पृष्ठ 125) । इन पंक्तियो से मजर पाल सिंह का लेखक उभरकर आता है। उनकी गणना एक बहुत अच्छे रिपार्ताज लेखक के रूप में की जा सकती है। लगातार चलने के बाद, रगना खुशी से नाच उठा था। उसने अपने दा साथियो को चट्टान के नीचे से निकलकर आत देख लिया था। उनके हाथ, लाल सलाम की मुद्रा में उठे हुए थे। उसकी खुशी का विशप कारण यह था कि उसका बताया रास्ता ठीक निकला था। इसके बाद दिन म आराम करन के लिए दा हजार फीट ऊची पहाडी पर चढे, दोनो ने मागदशन किया था । पहाडी पर चढकर सागर साहव तथा नापन आस पास के किसानों चरवाहो, गावा और पशुआ को देखा। आपने देखा कि किसान तथा चरवाहे इनको पुलिस की गश्त की सूचना दत थे, उनको छिपाने के लिए प्रयास करते थे । एक चरवाहे ने, उनसे बर्मा 2 कामरेड तथा रूसी किसाना की हालत के बारे में सवाल किए । उनकी स्थिति जाननी चाही। उसकी जिनासा का समाधान किया रगाना न। उसने चीनी किसानो तथा मजदूरा की बातें की, हिद चीन और बर्मा के किसाना के किस्से बयान दिय । उनकी राजनीतिक चेतना देखकर मेजर साहब को जाश्चय हुआ। जब वह एरिया हड क्वाटस की ओर वढे ता यई युवा तथा युवतिया ने उनक साथ चलने का प्रस्ताव किया। वे लोग पार्टी के भीतर के सघष के विषय म जानन के इच्छुक थे। वे जानना चाहत थे वि पी० सी० जोशी किसकी वकालत कर रह है, डागे साहब का क्या मत है ? आ व्र के साथी किस प्रकार क्राति और सशस्त्र सग्राम की रक्षा कर रह है । इन प्रश्ना के उत्तर म रीजनल कमेटी के सेक्रटरी ने जा चित्र प्रस्तुत किया था, वह मेजर साहब की नजर से आशाजनक नहीं था। तेलगाना के किसाना की ईमानदारी, सघप शीलता, निजाम के पासीवाद तथा रजाकारा की क्रूरता का सामना करने की क्षमता देखकर मेजर जयपाल सिंह जितन उल्लसित हुए थे, पार्टी नेताओ की नीति और जनता से अलगाव का देखकर उतने ही निराश । उनके भीतर छिपा महान् सघपशील व्यक्तित्व कुठित तो नहीं, पर विचलित अवश्य हाने लगा था । 7 नवम्बर 1947 को कलकत्ता फोट विलियम की जेल स मजर जयपाल सिंह न भारत के प्रथम प्रधानमत्री प० जवाहरलाल नहरू के नाम एक पत्र लिखा पा। इस देश की राजनीतिक गतिविधि, स्वतत्र भारत के विरुद्ध ब्रिटिश साम्राज्य के पडपत्र और अपन अधिकारा के लिए संघपरत कातिकारी मेजर जयपाल सिंह की मानसिकता को समयन के लिए यह पर बहुत उपयोगी है । यहा उसी पाये कुछ अश दिये जा रह हैं- 138 "3 7वम्बर 1946 41 जब मैं मोहन बाडी हवाई क्षेत्र से भूमिगत हो गया था, उस समय मानापको विस्तार के साथ जपन भूमिगत हान का कारण स्पष्ट करते हुए पर लिया था। यह पत्र, एक राजनीशिक नता हान के नात, आपको यह सूचित परन के लिए लिखा गया था किनिटिश हुकूमत के विपद भूमिगत रत्वर उस समय मैं क्या कदम उठा रहा था। उस वक्त ब्रिटन द्वारा इस देश का इतनी जल्दी छाड जान की काई आशा व चिह्न नही थे और मन यह उचित समझा कि देश के राजनीतिक नताना को यह सूचित किया जाए कि ब्रिटेन द्वारा, मेरे इस प्रकार सेना से पलायन करने और उस पैसे के बारे में जिस में अपने साथ लाया था, क्या रूप देने का प्रयत्न किया जायगा । ब्रिटिश शासन ने बहुत सतक्ता साथ, भारतीय सेना की उस नियमित यूनिट को भग करने जिसका मैं भूमिगत हान स पले नतृत्व करता था, मुये काफी नुकसान पहुंचाया। 15 अगस्त से पूर्व यदि मैं किसी भी तरह स ब्रिटिश शासन के हाथ आ जाता तो मेरे साथ कुछ भी हो सकता था। 15 अगस्त में बाद यहा की गतिविधिया का सचालन परत हुए प्रिटिश जनरल मेरे विरुद्ध वेवल सेना से पलायन करन तथा आपराधिक विश्वास- भग के आराप दज कराने पर सहमत हो गये। 'मॅन हर तरह का खतरा उठात हुए कातिकारी नेताओं को चेतावनी" नामक अपना पर्चा छपवाकर वितरित किया क्याकि मरी धारणा थी कि देश और नताओ को यह जानना चाहिए कि ब्रिटेन क्या करन जा रहा है और यदि हम पाकिस्तान के बनन या रोक्न के लिए देर हो जान के कारण, बुछ वर सरन की स्थिति मे न भी हा तो भी हम इसके जम के बाद उत्पन्न हुए पतरोका जवाब दन के लिए आवश्यक रोक थाम व तैयारी कर सकें। यह पर्चा देश के राजनीतिक जीवन में सक्रिय सभी लोगा को पहुंचा दिया गया था। आज कश्मीर म वे ही घटनाए हो रही है जिनका एक वप पूव मैंने अनुमान किया था। उस समय कुछ लोगो का ख्याल था कि मैं सपना देख रहा हू । उत्तर पूर्वी सीमा त म हमार या बमा कविरुद्ध सनेट उभरकर आयेगा । जमा कि मन उस समय जिक्र किया था, नागा लोग भी हमारी चिंता का विषय बने हुए है । दाजिलिंग के चाय बागानो * मालिको द्वारा सगठित किए गए गोरखा लाग वगाली विराधी प्रचार म लग हैं तथा ताड फाड करन वाला का तमाम विस्पाटव वाम भी फटवर भयावह रूप ले सकता है। लाहिया घाटी के कबील द्वारा इशारा मिलते ही किसी भी दिन असम पर चढ़ाई कर दन के लिए तयार बैठे हैं। हैदराबाद को घटनाए अव सव विदित हैं और आप दखिएगा कि शीघ्र ही वहा हमे एक आघात का मामना करना पड़ेगा। माज इस बदीगृह मे में पिछल इतिहास पर दुख क साथ नजर डालता हूँ और मासूस परता हूं कि वान प्रिटिश पडया की मूपाए और रहस्य जो मैंन दस और मूचित किए थे, उन पर आप लोगा न भरोसा दिया हाता ।

139 "15 अगस्त 1947 के बाद मैंने आपकी सरकार के समक्ष आत्म समपण करना बेहतर समझा। "मैं एक समाजवादी हू और अब इस छिपाता नही हू, जसा कि मैन पहत्त किया था। मेरे द्वारा सेना से पंसा और हथियार लकर पलायन कर जाना सोशलिस्ट पार्टी द्वारा निर्धारित हुआ था, म एक बार फिर इराका खण्डा परता हूं। मैने उनसे मेरठ तथा अन्य स्थानो पर उसी तरह सपा स्थापित किया जिरा प्रवार से मैंन अय राजनैतिक नेतालो से मपक किया। मैंने कभी उनसे जपनी योजनाआ की स्वीकृति या अय किसी भी प्रकार की मदद नहीं ली। 'गुलामी के विरुद्ध सघप करन व व्यक्ति के कुछ बुनियादी अधिकार है, जिनका प्रयोग करन पर एक सामाज्यवादी शासन द्वारा उस जेल म डाला जा सक्ता है, लेकिन वह निश्चित रूप से इस बात की उम्मीद करता ह कि साम्राज्य वादी शासन के उग्रड जान के बाद, एक स्वतन तथा जनतात्रिक दश की स्थापना होन पर, माम्राज्यवादी शासन के विरुद्ध जपने इस बुनियादी अधिकार का प्रयाग करन के आरोप मे उस कोई सजा नहीं दी जायगी। "एक्शन कौसिल ने ऐसा कोई काम नहीं दिया जिसस ब्रिटेन के साथ शाति पूण समझौते में किसी भी तरह का विघ्न या अडचन पदा हा । मन 'भारतीय सना के सभी अफसरा । निणायक युद्ध के लिए तैयार हो जानो नामब अपने बुलटिन म जापगे शानदार औपचारिक वधाइया दी थी। यह बुलटिन जनवरी 1947 में भारतीय सेना म वितरित किया गया था। एसा कर हमन अपना वचन तथा क्तव्य निभाया, लेशिन गर हमने आपका 'दश के विभाजन 4 समझाते पर हस्ताक्षर देखा तो अपने सगठन मे हमे दुखद सक्ट का सामना करना पड़ा । राष्ट्रीय एकता के लिए हमन हथियार डाल दिये। 'भूमिगत रहते हुए भी हम निष्क्रिय नही बठे थे । सयुक्त सुरक्षा परिषद्, बाउण्डरी फोस तथा अग्रजो द्वारा सना का सभालकर रखन से सवधित सूचनाए जा कि अत्यत आवश्यक साबित हो सकती थी, उसी समय सरदार बलदेव सिंह के पास भेज दी गयी थी, जबकि लाड माउण्टब्रिटेन इगलड म ही थे । वास्तव में, ब्रिटेन द्वारा दिसम्बर 1946 म राष्ट्रीय आदोलन का विध्वस करने की योजना बनाई गयी थी। यदि काग्रेस द्वारा 6 सितम्बर से निणय तथा घटना की नयी व्यवस्था को अस्वीकार कर लिया गया होता तो ब्रिटन द्वारा आग भडकाय जान की योजना थी । लेकिन, अग्रेज जानते थे कि कस दिा उनका इलजार पर रह हैं । 'भारत म ब्रिटेन के ई शक्तिशाली दुर्गों को ढहा पर ग्रिटन वा प्रत्यक्ष संहार कर दने की हमारी योजना थी। हमने उसने ऐरो स्थान पर चोट की हाती जहा उसे इसपी वग सभावना धी। लक्नि, विभाजन कारा के लिए करम उठाना न तो हमारे अधिकार क्षेष म आता था और ही हमारी शक्ति पी। इसे ।

140 देवल सना तथा जनता के बीन सपक समितिया वापर कायम हुए तथा बेहतर बनाए गए तालमल द्वारा ही रोगरा जा सकता था। मैं जानता हूँ कि मैं असफल हुमा, लेकिन मुझे इस बात का मतोप है कि मन कम से कम असफल न हान का प्रयास तो किया। "मुझे अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए दूसरो की गदन ताडन का पूरा अधिकार है। 'मेरी स्थिति बिरकुल स्पष्ट है । मैंने गुलामी और इसके परिणामा के विरुद्ध ब्रिटन वेपन जम सिद्ध अधिकार का प्रयोग किया है। यदि वतमान सरखार मुझ पर उपयुक्त अपराधा बाजारोप लगाती है तो मैं और कई मामला म अपना हाथ हाना स्वीकार करता हू, जैसे ब्रिटिश सम्राट के विरुद्ध युद्ध का पडयन वरन, सना क रहस्य प्रक्ट करने तथा ब्रिटिश शासनाने विरद्ध निजी सना एकत्र करन आदि। - आपको राज्य प्रधान हाने के नाते पूरा हा है कि आप यह निश्चित करें कि मरी योजना किसी प्रकार से भारत के हिता की विराधी न तो अव है और न हो पहले थी। जापको जानकारी प्राप्त करने का सबसे बेहतर तरीका वही हा सकता है जो मैंने इस पत्र के अत म बताया है । "यदि भारत सरकार के प्रशासनिक अधिकारी अभी भी इस बात से सतुष्ट नही हा सके हैं कि मेरा सेना से पलायन आर गुप्त काम किसी भी तरह स दश विद्रोही तथा दश को नुक्सान पहुचाने वाला नहीं था, तो उह एक राष्ट्रीय ट्रिब्यूनल बनाना चाहिए जिसम दा दक्षिणपथी तथा एक वामपथी मदरय हा और बद कमरे मे बैठकर जिसके सामन मैं सुरक्षापूर्वक अपनी योजना और गति विधिया की तथा अपन सह्यागिया के नाम बताय बिना, ताकि उह अपमान और उत्पीडन का शिकार न हाना पडे, पुला बयान दे सकू और यदि उन लोगा अ य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मामला म उलये रहने के कारण यह सभव न हा तो मेरे मुक्दम का उस समय तक के लिए मुल्तवी रखा जाए जब तर हम पूर्णत स्वतत्र नहीं हो जाते आर यायपालिका एक नये सविधान और कानून की धारा के अनुसार काम करना शुरू नही कर देती।" यह पन मजर जयपालमिह की योग्यता, दशभक्ति, ब्रिटिश साम्राज्य की भारत विरोधी नीति उसस अतिम क्षणों तक सघष बरके नाकामयाब बनान के उनके अदम्य साहस का प्रतीक है। राजा मह द्र प्रताप के समान वह भी सनिक- विद्रोह आर राजनीतिक आदोलन के आपसी तालमल क हिमायती थ। उनकी नजर सत्ता की कुर्मी पर नही जग्रेजो क पडया को नाकामयाब बरखे दश का भाजाद करा पर थी। 24 जनवरी 1956 का अपना भूमिगत जीवन कुछ राजनीतिक दलो को 141 सलाह पर तथा कुछ अपनी इच्छा से समाप्त करके आप प्रकट हो गए थे। मुजफ्फरनगर मे जिस गगजाशी के साथ, वहा के पिसाना, मजदूरा तथा अ य लोगा ने उनका जबदस्त स्वागत किया था, उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। अनेक लोग उनसे फोट विलियमकी ऊची ऊची दीवारो से निकल भागने की याजना के बारे ग पूछ रहे थे । खुफिया विभाग का आदमी पूछ रहा था कि दस वष के दौरान आपन क्या किया था? लागा म अफवाह थी कि आप सुभाष चन्द्र बोस में यारे मे जानते हैं और उहोंने ही देश की हालत समझने के लिए पहले इनको भेजा है। मुजफ्फरनगर की इस बहादुर सतान वा स्वागत करने के लिए जनता उमड रही थी, लेकिन जिला-काग्रेस का आदेश था कि कोई काग्रेसी स्वागत समारोह में शामिल न हो। लेकिन पार्टी अनुशासन को खूटी पर टाककर एक दाढी वाले मुस्लिम सज्जन वहा आये और बोले कि मुझसे कहा गया था कि मेजर जयपालसिंह कम्युनिस्ट हैं, इसलिए वहा नहीं जाना है, लेकिन मैं एक कम्युनिस्ट से मिलने नहीं, बलि एक वतनपरस्त शरस का खैर मक्दम करने आया हूँ ! मैं, मेजर का उसके अपने घर मे, उसक अपने लोगा के बीच, स्वागत परता है। लोगो ने तालिया बजाकर उनसी बात का समर्थन किया। लेकिन जब कुछ दिन बाद आम चुनाव हुए और उसमें मेजर साहब ससद सदस्य के लिए चुनाव के मैदान मे सामने आये, ता वाग्रेसियो ने कहा कि 'एक डाक जिले मे छुट्टा डोल रहा है' (आजादी के परचम के तले, पप्ठ 2)। यह थी मुजफ्फर नगर के काग्रेसियो की एक महान देशभक्त और सच्चे इसान के बारे मे राय जबकि सत्य यह है कि मुजफ्फरनगर के काग्रेसी तथा मिल मालिक का एक खत, एक मतक डाकू की जेब से निकला था। मैंने देखा है और मैं उनने परिवार की स्थिति से भली प्रकार परिचित है। मेरा विश्वास है कि मेजर जयपाल सिंह की गणना देश के उन सपूता म होनी चाहिए, जो अपने तथा अपने परिवार के लिए कुछ इवटठा नही करते और जिनका तन मन देश तथा समाज के लिए समर्पित होता है । मेजर साहब ने कोई सम्पत्ति परिवार के लिए नहीं छोडी, जो कुछ छोडा है, वह है--समद भारत के निर्माण की प्रान्तिकारी परपरा,देश के किसान तथा महनतकश लोगा को प्रगति की प्रेरणा और इसान के सुखद तथा शाल भविष्य के लिए उत्कट कामना । तेलगाना के क्सिाना को जुझारू शक्ति का स्मरण करके उनकी आखें चमक उठती थी और भारत मे उभरती साम्प्रदायिकता को देखकर वह चमर गायब होने लगती थी। भारत के आम आदमी को बहानदी, देश को साम्प्रदायिक एक्ता, देश मे समय तथा सम्पन लोक्तत्र का उमेष का नाम था, मेजर जयपालसिंह देश की राष्ट्रीय एकता का मधुर गायन या, मेजर जयपालसिंह । वह एक इसान 142 था, जो सुगद तथा सम्पासावतम की कल्पना म जी रहा था। वे स्वर्गवास के गाथ एक निष्ठावा माग चला गया, महाश समाज का महान् समय विदा हो गया और चना गया भारत पी किसान संस्कृति का मूर्तिमान जीता जागता इमान। मेजर जयपाल सिंह के जीवन की प्रमुख घटनाए - -- 15 जुलाई 1916 जिला मुजफ्फरनगर के गाव वुरमानी मे जम। 1935-1937 बनारस हिंदू विश्व विद्यालय में शिक्षा 1938 1940 सेंट जास कालिग आगरा में स्नातकोत्तर शिक्षा 1941 सेना मवमीशन मिला 1945 सेना म मेजर बने 1946 असम सैनिक अडडे से भूमिगत हुए 1947 सितम्बर तक भूमिगत रहे। इसी वप जनरल राजेन्द्र सिंह ये सामन हाजिर हुए 1948 फोर्ट रिलियम पलकत्ता मे जरवद, यही से फरार 1949 रिसान जादालन में मदद करने के लिए कायद्वीप (वगाल) गय 1950 उपा से विवाह । किसान सघप म मदद करने तेलगाना 1951 तेलगाना मे वापस आय 1952 1956 भूमिगत रहे 1953 पाडिचेरी गये 24 नवम्बर 1956 पार्टी के फैसले के अनुसार युले मैदान मे काम, मुजफ्फरनगर म अभूतपूर्व स्वागत 1957 लोक-सभा का चुनाव लडा 1961 1962 दिल्ली में रहे 1964 मी० पी० एम० वे मुख्यालय कलकत्ता में चले गए 1970 आजादी से पहले के मामले म दण्ड, एक वष अलीपुर से ट्रल जेल, क्लबत्ता में रहे 1972 दिल्ली रीजनक कमेटी के सेक्रेटरी चुने गए 257 1975 आपातकाल म मीसा म गिरफ्तार 1976 जेल से रिहा हुए 1977 दिल्ली राज्य क्मटी के सेटरी चुने गए - --- --

143
1978 दसवी पार्टी वानराम बद्रीय वमटी के सदस्य
1980 वियतनाम, लालोस और कम्भूचिया का दोग किया
25 जनवरी 1982 सी० पी० एम० की 11वी काग्रेस के ठीक पहले केंद्रीय
कमेटी पी टप भाग लेते हुए विजयवाडा म स्वगवास ।

No text on this page.

'कर्मयोगी शिक्षा सन्त स्वामी केशवानन्द' । स्वामी केशवानद की कहानी 'गुन्डी के लाल' की कहानी है। जिदगी की यूनतम आवश्यक्ताजो के अभाव मे राजस्थान के सीकर जिले के मगलूणा गाव म साधारण जाट परिवार में पोप सवत 1940 ईस्वी सन 1883 मे जापवा जम हुआ। इनषे पिता का नाम ठाकरसी और माता का नाम सारा था। वीरमा नाम दिया था मा बाप ने । ब्रह्मा का अप्रमथ है वीरमा। मा-बाप का इकलौता बेटा था केशवानद । बचपन में ही वीरमा के सर से पिता का साया उठ गया। मा ने बडी पटिनाइयो और दुखो मे वीरमा को बडा किया । गायें चराकर अपना पेट पालो याले वीरमा का दुखा ने दुर्दिनो ने साथ नहीं छोडा, विक्रमी सवत 1956 के भयवर अकाल मे धीरमा को भा भी चल बसी। जाए तो कहा ? आश्रय पाये तो फहा ? ऊपर आसमान नीचे धरती। कौन सहारा देता विक्ट परिस्थितिया से पायल वीरमा को। पापी पट को भरने की समस्या थी वीरमा के सामने । वह भटकत्ता, दर दर ठोकर खाता मोहर, सिरसा, भटिण्डा गिदडवाह, मालोर होता हुआ झुमिया चाली के कुछ समाज सेवी लागाकी सहायता मे फिरोजपुर अनाथालय मे आश्रय पा सका । वही पर डेढ वप बीता। भीषण, विक्ट परिस्थितिया में जुझारू जिन्दगी को लेकर जो चट्टान की तरह खडा रहन की क्षमता हासिल कर लेता है, महानता उसकी दासी बनकर सदा सदा साथ रहती है । वीरमा पढ़ना चाहता था। उसके दढ सक्ल्म के वारण सरस्वती उसक हृदय पर आसीन हा गयी । अनाथालय छोडकर इधर उधर गावाम भटवन के बाद संवत 1965 ईस्वी सन 1904 मे संस्कृत पढने की लालसा से वीरमा फाजिल्का ये उदासी साधु श्री कुशल दासजी के पास गया । वही वह गुरु का घरद हस्त प्राप्त पर मम्वृत म पारंगत हो गया। सन् 1905 6 म प्रयाग के कुभ मले म अवधूत होरानद से केशवानद नाम पाया। गुरु आमा से केशवानद हरिद्वार अमतसर आदि स्थाना मै मस्कृत पढ़ने गये । संस्कृत का प्रारम्भिक मान प्राप्त कर उहोने देश भ्रमण किया-वहीं से 146 - उह तीथ स्याना, संग्रहालया और शिक्षण संस्थाजा का अनुभव मिला। सन 1908 म गुरु-गद्दी के उत्तराधिकारी बने जिस काला तर मे पुस्तकालय वास्प देवर त्याग दिया। स्वामी केशवानद जी का जीवन कोटि-कोटि श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा-पुन है। वेदात दशन का गहन अध्ययन किया था म्वामी केशवान द जी ने । लोरमान्य तिलप के गीता रहस्य । निपाम पमयाग वी साधना दी थी। महाँप स्वामी दयान द वेशवानद जी के प्रेरणा स्रोत थे। सत हृदय स्वामी वैशवानद जी ने राष्ट्रपिता महात्मा गाधी वे अहिंमात्मम अस्त्र को धारण कर राष्ट्र-सेवाये महान यम् पो समर्पित हो गय। कमनिष्ठ महान गृजनशील शिक्षाविद स्वामी जी पस्तुत एक युग पुरुप थे। यम ही जीवन है। इस बीज मत्र यो धारण कर वे कम क्षेत्र में कूद पड़े। राष्ट्रपिता महात्मा गाधी के नेतत्व म सचालित आजादी के आदोलन में 1921 से 1931 तप सक्रिय रह। स्वामी जी ने दो बार जेल-यात्राए की। स्वामी केशवान द जी के सृजन की लम्बी पहरिश्न है । सन 1925 म साहित्य सदन अयोहर की स्थापना की। राष्ट्र-भाषा हिंदी के प्रसार प्रचार, शिक्षण प्रशिक्षण की दिशा मे स्वामी पेशवान द जी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। जम्मू पम्मीर मे हिंदी भाषा की विभि न परीक्षाए आयोजित की पुस्तकालय स्थापित किये। स्वामीजी राष्ट्र भाषा हिन्दी मे कौमी एकता के दशन करते थे। उनकी मान्यता थी कि हि दी ही राष्ट्र को एक्ता के मजबूत सूत्र म बाधे रख सकती है। स्वामीजी नागरी प्रचारिणी सभा काशी और हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के आजीवन सदस्य रहे। उन्हे राष्ट्र भाषा हिंदी के लिए दिये महान कार्यो के लिए राष्ट्र भाषा गौरव की उपाधि से विभूपित किया गया। हिंदी साहित्य सम्मेलन ने साहित्य वाचस्पति की उपाधि का मान दिया। 1952 से 1964 तर स्वामीजी राज्य-सभा के सदस्य रहे। म्वामी जी द्वारा प्रतिस्थापित ग्रामोत्थान विद्यापीठ सगरिया उनकी अनुपम देन है। राष्ट्र को उसमे कृषि क्ला, विनान, वाणिज्य, महाविद्यालय शिक्षा महा- विद्यालय, सग्रहालय, पुस्तकालय औपधालय एव 300 एक्ड भूमि म विशाल कृषि फाम विकसित कर ग्रामोत्थान विद्यापीठ को नया चिर अमर रूप दिया है स्वामी देशवानद जी ने। यह शिक्षा का विशाल वट-वक्ष प्रामा से आये छानो पर व्यक्तित्व विकास की शैक्षणिक छत्रछाया किये हुए है । समाज सुधार महिला त्याण का प्रतीक बन गया है सेवा भावी सन्त का यह सस्थान । स्वामी जी एक सिद्धहस्त लेखक, एक इतिहासविद, कला, संस्कृति, साहित्य, समाज सेवा के क्षेत्र म सदा-सदा के लिए जनता द्वारा सादर याद पिय जाएगे । छुआछूत रूढ़िवादिता अविश्वास, असमानता के घोर निराधी सत हृदय स्वामी

147
वैशवानद जी भारत की युवा शक्ति के प्रेरणा पुज ये स्प मे आज भी चिर
स्मरणीय हैं। 1972 में उनका दिरली मे गालाव वास हो गया पर महान
पुरुषा के कृत्य कदापि नहीं मरते । व युग युगा तक अमर रहत है, हम प्रेरणा
देते हैं।
क्मयोगी शिक्षा सन्त स्वामी केशवानद इतिहास के अमर हस्ताक्षर हैं-
जिहोंी राव हित का सकल्प लेकर जीवन बिताया। वे पूरे साठ वष तक बहुजन
हिताय, बहुजन सुखाय परते रह । उहान मरुधरा के चिर सुपुप्त क्षेत्र म जन
जागरण करने, वैचारिख क्राति लाने तथा सामाजिक उत्थान का महान काय किया
है। निस्स देह युगो तक उनका यह सृजन यायम रहेगा, पीढिया पढती रहेगी, आगे
बरती रहेंगी कहती रहेगी-
नमो देशवामद।
रामदेव
48, प्रयाग पोलो, पावरा
जोधपुर (राज.)
यह लेख श्री रामदेव चौधरी की रेडियो वार्ता है,
जोधपुर से 31-3 87 को प्रसारित हुई थी।

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

Gaurav Shikhar

Author
Dr. Natthan Singh
Title
Gaurav Shikhar
File name
Gaurav Shikhar
Text
OCR done
Citation
1957
Published
2011/03
Publisher
Kanishka Prakashan Durga Puri Loni Road Dehli
Language
Sanskrit
Pages
156
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551091
Barcode
4990010031866.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
EBTvNbmpkMf
Download PDF

Gaurav Shikhar